Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Istrot Ratnawali

2011/08

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Front matter

प्रकाशक- गोविन्द-भवन-कार्यालय, गीताप्रेस, गोरखपुर
सं० १९९२ से २०४४ तक
५.२५.२५०
सं० २०४५ सत्ताईसौं संस्करण
२०,०००
सं० २०४५ अट्ठाईसवाँ संस्करण
२०,०००
कुल ५६५.२५०
(पाँच लाख पैसठ हजार दो सौ पचास)
मूल्य-सात रुपये
पुश्क- गीताप्रेस, गोरखपुर

निवेदन
'स्तोत्ररत्नावली' के दूसरे संस्करणमें आवश्यक संशोधन और
परिवर्धन कर दिया गया। पहलेके ४ स्तोत्र घटाकर नये २५
बढ़ा दिये गये।
-
पांचवें संस्करणमें पहलेके २ स्तोत्र घटाकर दूसरे २ स्तोत्र
दे दिये गये थे। अब यह अट्ठाईसवाँ संस्करण निकल रहा
आशा है कि पाठक इस पुस्तकसे अधिकाधिक लाभ उठावेंगे।
-प्रकाशक

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श्रीहरिक विषयानुक्रमणिका प-संख्या (१) विनयस्तोत्राणि- ... ... १२ ... ... ૨૨ .. ... २-श्रीविष्णोरष्टाविंशतिनामस्तोत्रम् ३-पटपदी (स्वामिश्रीशङ्कराचार्यस्य) ४-श्रीहरिशरणाष्टकम् (स्वामिश्रीब्रह्मानन्दस्य) ५-न्यासदशकम् (श्रीवेङ्कटनापत्य) ६-परमेश्वरस्तोत्रम् (२) शिवस्तोत्राणि- -शिवमानसपूजा (स्वामिश्रीयङ्कराचार्यस्य) ८-शिवापराधक्षमापनस्तोत्रम् (,) ९-वेदसारशिवस्तवः (") १०-शिवाष्टकम् (") १-श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् १२-द्वादशज्योतिर्लिङ्गानि १३-दादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम् १४-शिवताण्डवस्तोत्रम् ( श्रीरावणकृतम्) १५--श्रीरुद्राकम् ( गोस्वामिश्रीतुलसीदासस्य) १५-श्रीपशुपत्यष्टकम् ( श्रीपृथ्वीपति सूरेः) १७-श्रीविश्वनाथाष्टकम् (श्रीमहर्षिव्यासविरचितम्) (३) शक्तिस्तोत्राणि- १८-ललितापञ्चकम् (स्वामिश्रीशङ्कराचार्यस्य) १९-मीनाक्षीपञ्चरत्रम् ( " ) २०-देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् (") २१-मवान्यष्टकम् २२-आवन्दलही .... ... ४२ ... ... ... .. ५८ .. ६७ ... . . ... ७३ 40 44 ... 13 (UAE २८-ANETrme(Em) २.nteree ( 1-METER R ... U-AIRATRO AruRITIE(माग-II-10 २५-tama(Hinापान) -हरिमोरम (माग..1.1-44) (५) गमरतोरान- २७-मरणम् (suो :) २८-RITTABHARATAR-१८१५८ ३९-रामीराममोरम् " 14Im-५५) ११२ ४.-नीरामसोत्रम् ( ११।१४-१२) ४१-रामाष्टकम् (भीममानन्दस्वामिनः) ४२-भीसीलगमायम् (भीमपुपतिश्यम्) १०१ ४३-सीरामचन्द्र तिः (गोस्वामिभीतुलसीदासस) m-श्रीराममप्रसाशासनम् (भीपरयरमुनिस्वामिनः) (भीयामुनाचारस) --एकम् (अमरदासक्यः) ... ... ... १८१ " .

... ... १८९ ... ... २०३ ...२१० ...२२८ ... ... २३१ २३३ (६) श्रीकृष्णस्तोत्राणि- ४७-गोविन्दाटकम् ( श्रीब्रह्मानन्दस्वामिनः) ४८-श्रीगोविन्दाष्टकम् ( स्वामिभीशङ्कराचार्यस्य) ४९-अच्युतायकम् ५०-कृष्णाष्टकम् ५१-श्रीकृष्णाटकम् (") ५२-मगवस्तुतिः (श्रीमद्भागवते १।९।३२-४२) ५३-गोविन्ददामोदरस्तोत्रम् (श्रीविल्वमङ्गलाचार्यस्य) ५४-श्रीमपभगीतम् (श्रीकृष्णलालदिजस्य) ५५- श्रीकृष्णः शरणं मम ( ५६-गोपिकाविरहगीतम् ५७-मधुराष्टकम् (भीमहाप्रभुषालमाचार्यस्य) ५८-श्रीनन्दकुमाराष्टकम् ( ५९-चतुःश्लोकी (भीविडलेश्वरस्य) (७) विविघदेयस्तोत्राणि-~ ६.-भीगणपतिस्तोत्रम् ६१-सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रम् (भीनारदपुराणात् ) ६२-सूर्याष्टकम् (भीशिवपोकम् ) ६३-भीसूर्यमण्डलाष्टकम् (भीमदादित्यहृदयात् )... ६४-वीरविंशतिकारल्य भीहनुमस्तोत्रम् ( कविपते: भीमदुमापतिशमदिवेदिनः) ६५-नाष्टकम् (भीमहर्षियाल्मीकिविरचित्तम् ).. १६-भीगाटकम् (स्वामिभीशङ्कराचार्यस्य) १७-श्रीगजालोरम् । ६८-भीममुनाटकम् ११-यमुनारकम ... ૨૨૮ ... ... २४० ... २४५ .. ... २४८ ... ... ... २६७ " 1 ... २७३

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७८-दाराम
७९-गौशाम् (fer)
८.-रात लोकी गीता (भीमनगपत)
८१-चतुःश्लोकीमागयतम् (भीमनागपवे २।९।२१-३०)"३१५
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খার যা हरेपो रेमो नमः स्तोत्ररत्नावली धिनयस्तोत्राणि सजयति सिन्धुरवदनो देवी वासरमणिरिव तमसा सुमुखश्चैकदन्तश्च , अनि लम्बोदरश किटी धूम्रकेतुर्गणायची बादशैतानि नम् ॥ २॥ युधम् । त्तिमम् ॥३॥ हरिम् । डध्वजम् ॥४॥ पातकम् । हजार नामोंका जप . वर्णन कीजिये ॥१॥ इ, वामन, जनार्दन, सहस्राक्ष, वनमाली, विश्वरूप, वासुदेष, गरुडध्वज, अनन्त के भीतर पाप

स्तोत्ररतापली
संग्रामे सकटे पैर मिस्तस्य न जायते ॥ ४॥
शुलाम्बरधरं देवं शशिवर्ण चतुर्सजम् ।
प्रसन्नवदन घ्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ॥५॥
व्यासं यसिष्टनातारं शक्तः पीत्रमकल्मपम् ।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥ ६ ॥
व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।
नमो चै प्रानिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥७॥
अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विवाहुरपरी हरिः ।
अमाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥८॥
इति मङ्गलं सम्पूर्णम् ।
उसे किसी प्रकारका विप्न नहीं होता ॥ २-४॥ जो दवेत वस्त्र धारण क्रिये
हैं, चन्द्रमाके समान जिनका वर्ण है तथा जो प्रसन्नवदन हैं, उन देवदेव
चतुर्भुज भगवान् विष्णुका सब विनोंकी निवृत्ति के लिये ध्यान करना
चाहिये ॥ ५ ॥ जो वसिष्ठजीके नाती (प्रपौत्र), शक्तिके पौत्र, पराशर-
जीके पुत्र तथा शुकदेवजीके पिता हैं, उन निष्पाप, तपोनिधि व्यासजीकी
मैं वदना करता हूँ ॥ ६ ॥ विष्णुरूप व्यास अथवा व्यासरूप
श्रीविष्णुकों में नमस्कार करता हूँ। वसिउवंशज ब्रह्मनिधि श्रीव्यासजीको
बारंबार नमस्कार है ॥ ७ ॥ मावान् वेदव्यासजी यिना चार मुखके
ब्रहा है। दो भुजायाले दूसरे विणु हैं और ललाटलोनन (तीसरे नेत्र)
भे रहित माक्षात् महादेवजी है ॥ ८॥

दिनानि २--श्रीविष्णोरघाविंशतिनामस्तोत्रम् अनार नु नाम सहसागि अपते प पुनः पुनः । पानि नामानि रियानि तानि मागस्य केनर ॥१॥ कामगानुपा मरस्य फर्म पराई प सामनं प जनार्दनम् । गोपिन्दं पुरीकाएं मार माग्दनम् ॥ २॥ पपनाम सहसाएं पनमालि इलापूपम् । गोवर्धन पीक ६ष्ट पुरपोचमम् ॥३॥ विधापं पागुरं रामं नारापगं हरिम् । दामोदरं श्रीधरं प पैदा गरुडरजम् ॥ ४ ॥ अन कृष्णगोपाल जपतो नास्ति पातकम् । मनने पूजाप ! मनुष्य पारपार एक इमार नामों का गप बयों करता है! आनो दिप नाम रों, उनका पर्णन कीजिये ॥१॥ धीमगवान पोले-अर्जुन ! माप, धर्म, पराद पामन, जनार्दन, गोविन्द पुकारा, माधय, मधुम्दाना पानाभा सदसाक्ष, पनमाली, हलायुध, गोरधना सा पेष्ठ, पुरोधमा विश्वरूप, यासुदेष, राम, नारायण, हरि दामोदर भीपर, दान गरभ्वज, अनन्त मौर इगोपा करनेवाले मनुप्पके भीतर पाप सोreal गो कोटिप्रदानरस अपमेगनतस्य ॥५॥ फत्पादानहसाणा फलं प्रामानि माना। अमापा या पीनमासामेादा तया ॥६॥ सन्ध्याकाले मरनिय प्रातःकाले सर । मध्या जपनिायं सपा प्रमुच्यते ॥७॥ इति श्रीकृष्णानरांबादे भागोरातिनामरो गम । ३-पटपदी अधिनयमपनय विष्णोदमय मनःशमय विषयमृगवाणाम्। भूतदयां विस्तारय ताग्य संसारसागरतः॥१॥ दिव्यधुनीमकरन्दे परिमल परिमंगसचिदानन्दे। नहीं रहता । यह एक करोड़ गादान, एक सौ अश्रमेष-यश और एक हजार कन्यादानका फंट प्राप्त करता है । अमायरा, पूर्णिमा व्रया एकादशी तिथिको और प्रतिदिन सायं-प्रातः एवं मध्याह्नके समर ल नामों का जप करनेवाला पुरुष मम्पूर्ण पापोसे मुक्त हो जाता है ॥२-७॥ - हे विष्णुभगवान् ! मेरी उद्दण्डता दूर कीजिये, मेरे मनका दमन कीजिये और विषयोंकी मृगतृष्णाको शान्त कर दीजिये, माणियोंके प्रति मेरा दयाभाव बढ़ाइये और इस संसार-समुद्रसे मुझे पार लगाइये ॥१॥ भगवान लक्ष्मीपतिय उन रणकमटकी वन्दना करता है। जिनका विनयस्तोवाणि श्रीपतिपदारविन्दे मवमयखेदच्छिदे वन्दे ॥२॥ सत्यपि मेदापगमे नाथ तवाहं न मामकीनस्त्वम् । सामुद्रो हि तरङ्गः कचन समुद्रो न वारङ्गः ॥३॥ उद्धृतनगनगमिदनुज दनुजकुलामित्र मित्रशशिदृष्टे । दृष्टे मवति प्रमवति न भवति किं भवतिरस्कारः॥४॥ मत्स्यादिमिरवतारस्वतारवतावता सदा वसुधाम् । परमेश्वर परिपाल्यो भवता भवतापमीतोऽहम् ॥ ५ ॥ दामोदर गुणमन्दिर सुन्दरबदनारविन्द.गोविन्द । भवजलधिमथनमन्दर.. परमं दरमपनय त्वं मे ॥ ६ ॥ मकरन्द गङ्गा ओर सोरम सायदानन्द है तथा जो संसारके भय और खेदका छेदन करनेवाले हैं ।। २ ।। हे नाय ! [मुझमें और आपमें ] भेद न होनेपर भी, मैं ही आपका हूँ, आप मेरे नहीं; क्योंकि तरङ्ग ही समुद्रकी होती है, तरका समुद्र कहीं नहीं होता ॥३॥ हे गोवर्धनघारिन् । हैद्रके अनुज (वामन ) ! हे राक्षसकुलके शत्रु ! हे सूर्य-चन्द्ररूपी नेत्रवाले ! आपजैसे प्रमुके दर्शन होनेपर क्या संसारके प्रति उपेक्षा नहीं हो जाती अपिठ अवश्य ही हो जाती है] ॥४॥हे परमेश्वर ! मत्स्यादि, अवतारोंसे अवतरित होकर पृथ्वीको सर्वदा रक्षा करनेवाले आपके द्वारा संसारके त्रिविध सापोंसे मयभीत हुआ में रक्षा करनेके योग्य हूँ॥५॥ हे गुणमन्दिर दामोदर । हे मनोहर मुखारविन्द गोविन्द ! सारसमद्रका मन्यन करनेके लिये मन्दराचलरूपं 1 मेरे महान् मयको .'

नारापगकरुगामय सागितातोपरगी। इति पदपदी मदीये पदनगरोने सदा पार 10॥ पनि ममानानना गदागो गया ४-श्रीदरिशरणाष्टकम् पेयं पदन्ति शिवमेव हि फेपिदन्ये शक्ति गणेशमपरेतु दिवाकर । रुपैस्तु तैरपि विमासि यतस्त्वमेव तसाचमेव शरणं मम दीनबन्धी ॥१॥ ना सोदरी न जनको जननी न जाया आप दूर फीजिये ॥ ६ ॥ हे करुणामय नारायण ! में सब प्रकारसे आपके चरणोंकी शरण लें। यह पूषोंक पटपदी ( पदोंकी स्वनिरूपिणी भ्रमरी) सर्वदा मेरे मुखकमलमें नियास करे ॥ ७ ॥ , P- कोई शिवको ही ध्येय यवाते हैं क्या कोई शक्तिको कोई गपेय- को और कोई भगवान् मास्करको ही ध्येय कहते हैं। उन सब पोमें आप ही मास रहे है। इसलिये हे दीनबन्धो ! मेरी धरण वो एकमात्र आर हो ॥१॥ माता पिता माता बी पुत्र कुल एवं प्रचुर बल- उपाय इति पान्तर विनयस्तीत्राणि नैवात्मजो न च कुलं विपुलं यलं वा । सन्दश्यते न किल कोऽपि सहायकोमे। तसा०॥२॥ नोपासिता मदमपास्य मया महान्त- स्तीर्थानि चास्तिकधिया न हि सेवितानि । देवार्चनं च विधिवन कृतं कदापि । वसा० ॥ ३ ॥ दुर्वासना मम सदा परिकर्पयन्ति . चिचं शरीरमपि रोगगणा दहन्ति । सञ्जीवनं च परहस्तगत सदैव । तसा० ॥ ४ ॥ पूर्व कवानि दुरितानि मया तु यानि स्मृत्वाखिलानि हृदयं परकम्पवे मे । ख्यावा च ते पतितपावनता तु यसात् । तसा० ॥ ५ ॥ इनमेंसे कोई भी मुझे अपना सहायक नहीं दीखता; अतः हे दीनबन्यो । आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ २ ॥ मैंने न तो अभिमानको छोड़कर महात्माओंकी आराधना की, न आस्तिकबुद्धिसे तीर्थोका सेवन किया है और न कमी विधिपूर्वक देवताओंका पूजन ही किया है। अतः हे दीनबन्धो । अब आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं ॥ ३ ॥ दुर्वासनाएँ मेरे चित्तको सदा खींचती रहती हैं, रोगसमूह सर्वदा शरीरको तपावे रहते हैं और जीवन तो सदैव परवर ही है। अतः हे दीनबन्धो ! आप ही मेरी एकमात्र शरण हैं।॥४॥ पहले मुझसे जो-जो पाप बने हैं, उन सबको याद कर-करके मेरा हृदय काँपता है। किन्तु सुम्हारी पतितपावनता वो प्रसिद्ध ही है, बस हे दीररन्धो ! यथार ही मेरी एकमाघ Wण ॥५॥ r

शोधरसापली
दुःखं जराजननजं विविधाच रोगा:
कायमूकरजनिर्निरये पावः।
से विस्मृतेः फलमिदं विततं हि लोके । वसा०॥६॥
नीचोऽपि पापबलिवोऽपि विनिन्दितोऽपि
ध्यात्तवाहमिति यस्तु मिलैकवारम् ।
तं यच्छसीश निजलोकमिति व्रतं ते । तमा० ॥७॥
वेदेषु धर्मवचनेषु
- तथागमेपु
रामायणेऽपि च पुराणकदम्बके वा।
सर्वत्र सर्वविधिना गदितस्त्वमेव । तस्मा० ॥ ८॥
इति श्रीमत्परमहंसस्वामित्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं सम्पूर्णम् ।
प्रभो! आपको भूलनेते जरा-जन्मादिसम्भूत दुःख, नाना व्याधियाँ, काका
कुधा एकरादि योनियाँ तया नरकादिमें पतन-ये ही, फल संसारमें विस्तृत
है, अतः दीनबन्धो ! अब आप ही मेरी एकमात्र गति ॥६॥
नीच, महागपी अपवा निन्दित ही क्यों न हो; किन्तु जो एक बार मी
यह कर देता है कि मैं आपका हूँ, उसीको आप अपना पाम दे
देते हैं, नाय ! मापका यही प्रत है। अतः हे दीनबन्यो । अब आप ही
मेरी एपमा गति ॥७॥ वेद, धर्मशाल आगमः रामायण पा
पुरानसमूहम मी सर्वत्र सब प्रकार आपही श्रीन है। अरे दीनबन्यो।
मरवारी मेरी एकमात्र गति ॥८॥

विनयस्तोमाणि
५-न्यासदशकम
मद्रक्षणभरो मद्रक्षणफलं तथा।
न मम श्रीपतेरेवेत्यात्मानं निक्षिपेद् बुधः॥१॥
म्यस्याम्यकिञ्चनः श्रीमन्ननुकूलोऽन्यवर्जितः।
विश्वासप्रार्थनापूमात्मरक्षामरं
त्वयि ॥२॥
स्वामी स्वशेषं स्ववशं स्वमरत्वेन निर्भरम् ।
खदत्तखधिया स्वार्थ स्वस्मिन्न्यस्यति मां स्वयम् ॥३॥
श्रीमन्नमीष्टवरद स्वामस्मि शरणं गतः।
एतदेहावसाने मां त्वत्पादं प्रापय स्वयम् ।। ४ ॥
मैं, मेरी रक्षाका मार और उसका फल मेरा नहीं श्रीविष्णु-
मगवान्का ही है-ऐसा विचारकर विद्वान् पुरुष अपनेको भगवान्पर
छोड़ दे॥१॥हे भगवन् ! मैं अकिञ्चन अपनी रक्षाका मार अनन्य
और अनुकूल (प्रणत ) होकर विश्याम और प्रार्थनापूर्वक आपको
सौंपता हूँ ॥ २ ॥ मेरे स्वामी अपने शेष, पशीभूत और अपनी ही
रक्षकतापर अवलम्पित हुए मुझको अपनी निजकी दी हुई बुद्धिसे स्वयं
अपने लिये अपनेमें ही समर्पित करते है [ अर्थात् परम पुरणार्थको
सिद्ध करनेके लिये स्वयं ही अपने शरणमें ले लेते हैं J॥३॥
है अमीर-घरदायक म्यामिन् ! मैं आपकी शरण हूँ। इस देहका
मन्त होनेपर पाप मुझे स्वयं अपने चरणम्म तक पहुँचा ॥४॥

परमारली । रुपये मिरधि समाप्येकप्रयोजनम् । निपिदकाम्यरहिवं कुरु मां नित्यकिटरम् ॥५॥ देवीमपणहेन्यादिजुष्टस्य मगस्तव। नित्यं निरपराधेषु फैहयें निपुख्य माम् ॥६॥ मां मदीयं च निखिलं चेतनाषेवनारमकम् । स्वयै क्योंपकरणं पद स्वीहरु स्वयम् ॥७॥ त्वमेव रक्षकोऽसि मे स्वमेव फरुणाकरः। प्रवर्तप पापानि प्रपत्तानि निवारस in अकृत्यानां च फरणं, त्यानां वर्जनं च में। न १ आपका शेष होने में स्थिर-युद्रियाले, आपकी प्रसिधही एकमात्र प्रयोजन रखनेवाले, निपिद और काम्य कमसि रहित मुझको पाप अपना नित्य सेवक बनाइये ॥५॥ देवी (भीलक्ष्मीजी ), भूपण (कोखमादि) और शस्त्रादि ( गदा, शदि ) से युक्त अपनी निर्दोष सेवाओंमें, है भगवन् ! आप मुझे नित्य नियुक्त रखिये ॥ ६ ॥ हे वरदायक प्रमो ! मुझको और चेतन-अवेतनरूप मेरी समेत यस्तुओंको, अपनी सेवाकी रामग्री के रूपमें स्वीकार कीजिये ॥७॥ प्रभो ! मेरे एकमात्र पार रक्षक हैं, आप ही मुझपर दया करनेवाले हैं। अतः पापोंको मेरी र प्रात्त न कीजिये और प्राव हुए पाोका निवारण कीजिये ॥८॥ । देष ! हे दीनदुःखहारी भगवन् ! मेरा न करनेोग्य कार्याका करना पिनयस्तोत्राणि क्षमख निखिलं देव प्रणतातिहर प्रमो ॥९॥ थीमनियतपञ्चा मद्राणमरार्पणम् । अचीकर स्वयं स्वस्मिन्नतोऽइंमिह ददि भीदेहटनायातं म्यासदरा सम्पूर्णम् । निर्मरः ॥१०॥ ६---परमेश्वरस्तोत्रम् अगदीश सुधीश मवेश विमो परमेश परात्पर पून पिठा। प्रणत, - पतित इत्युद्धिरले जनतारण धारप तापितकम् ॥ १॥ - गुणहीनमुदीनमलीनमति और करने योग्पोका न करना भार रामा करें ॥१॥ भीमन् । भाग्ने सही मेरी पाँचौ इन्द्रियों को नियन्त्रित करके मेरी रयान मार पाने कार ले लिपा मा भर में निर्भर गया..॥ है अगदी12 मुमतिमेरे सानी ! रविरेसमारिन् । है परमेपर!रे प्रकृति आदिसे अव परमरावन 17 विरे देशका नितार करनेपा sana मोर रिसेन URETS ON TAR 10 हरा पानामा साप . स्वपिपायरि दावरि पापरविम् । घमसा रजसाएतचिमिमम् । अन० ।।२।। मम मीरनमीनमिर्म पवित मरुपांगसुपीह मुवीहमहो। फगापिचलामिजलानयनम् । बन०॥३॥ मदारण कारण ... फर्मती मसिन्धुजले शिव मममतः। करुणाश्च समर्प परि स्वरितम् । जन० ॥ ४ ॥ अविनाश्य जनुर्मम पुण्यरुचे दुरितीपमः परिपूर्णवः दीन भोर. मलिनमति है क्या अपने रक्षक और दावा आपसे परामुख है, जीयाका निस्तार करनेवाले | इस संसारख्या उस; धाम "राजसवृत्तिवाले दासका आप उदार कीजिये ॥ २॥ जीयोन निस्तार करनेवाले ! इस मयानक माभूमिमें पड़कर निवास्त निश्चेष्ट हुए मेरे इस अति सन्तप्त जीवनरूप मीनका अपने करुणा पारिधिकी चञ्चल सरोका जल लाकर उसार कीजिये|tin अतः हे संसारकी निवृत्ति करनेवाले 12 धर्मविस्तारके कारणस्वरूप। है फल्याणमय ! हे जीवों का निस्तार करनेवाले | संसारसमुद्रके जलमें हमकर सन्तप्त होते हुए इस दासको अपनी करुणारूप नौका समर्पण करके महाँ- उधार कीजिये ॥४॥ हे पुण्यरुचेरे भीषोदारका निमी भारमै पृथ्यी परिपूर्ण है, ऐसे मुस नीचके जन्मको मिटाकर मुझ अत्यन्त निम्दनीय नगण्य, पाप, मचि दिनपतोत्राणि हे सुजघन्यमगण्पमपुष्परुचिम् बन०॥५॥ मक्कारक नारकहारक मस्तारक पातरुदार किचकर्मचयम् । जन० ॥६॥ राषितश्विरमस्मि सुर्घा हित मे- ऽच्युत चि मय देहि वदान्धार। अतिमोहचान विनष्टकम् । बन० ॥ ७॥ प्रणमामि नमामि नमामि मा मवजन्मकतिप्रागाहनकम् गुणहीनमनन्तमित शरणम् । बन० ॥८॥ इति परमेश्वरलोधपूर्णम् । MODom रखनेवाले और संसारके दुःखों दुःखिताउतार कीजिय॥५॥ हे जगकर्ता! देनारकीय यन्त्रणाओका अपहरण करनेवाले! हे संधारकाउदार करनेवाले । हे पापराशिको विदीर्ण करनेवाले ! हे सर इस दासका कर्मशिका हरण कीजिये, और हे जीवोंका निस्वार करनेवाले इस संघरवन्वत जनका उद्धार फीजिये ॥ ६॥ हे अभ्युत चिन्मय ! हे उदारचूडामणि! के कल्याणस्वरूप ! मैं अत्यन्त दुषित हूँ। मुझे शानरूप अमृतनपान काइये । मैं अत्यन्त मोहके पर्याभूत होना हो रहा हूँ। जीपोत्र उदार करनेया । मुझ संधारमन्ततो पार गारखे 10|| संघारमें जन्ममाक्षिके कारणभूत कमाका नाश करनेवाले आपका मैं परमार मणाम और नमस्कार करता हूँ। जीवोका उसार करनयाले बार निम और अनन्तकी शाणो हुए इस संकर सन्त जनम उमार काtKI

शिकस्तोत्राणि
७--शिवमानसपूजा
रत्न फल्पितमासनं हिमजले स्नानं च दिव्याम्परं
नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाइतं चन्दनम् ।
जातीचम्पकविल्वपत्ररचितं पुष्पं च. धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हत्कल्पितं गृह्यताम् ।। १ ।।
सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं .पायस......
मक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्माफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं करखण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसामयाविरचितं मक्त्या प्रमोस्वीकुरु ॥ २॥
हे दयानिधे ! हे पशुपते । हे देव ! यह रत्ननिर्मित सिंहासन, शीतल
जलसे स्नान, नाना रत्नावलिविभूपित दिव्य वस्त्र, करत्रिकागन्धसमन्वित
चन्दन, जुही, चम्पा और बिल्वपत्र रचित पुष्पाञ्जलि तथा धूप और दीप
यह सब मानसिक [ पूजोपहार ] ग्रहण कीजिये ॥ १ ॥ मैंने नवीन
रत्नखण्डोंसे खचित सुवर्णपात्रमें घृतयुक्त खीर, दूध और दधिसहित
पाँच प्रकारका व्यञ्जन, कदलीफल, शर्यत, अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित
और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और ताम्बूल ये सब मनके पास ही
स्लामर प्रत किये। प्रमो पिया ने स्वीकार गोडिये ॥२॥

शिवस्तोत्राणि छत्रं चानरयोयुगं व्यजनकं चादर्शक निर्मल वीणामेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा । साशङ्ग प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा शेतत्समस्तं मया सङ्कल्पेन मतिं तव विमो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३ ॥ आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराःप्राणाःशरीरं गृहं पूजा ते विपयोपमांगरचना निद्रा समाधिस्थितिः। सञ्चारः पत्योः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि स गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तबाराधनम् ॥४॥ करचरणकृतं वाकायजं कर्मजं वा श्रवणनयन वा मानसं वापराधम् । विहितमरिहित वा सर्वमेतत्क्षमस्व छत्र दो चैवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदङ्गा दुन्दुभीके वाय, गान और नृत्या साष्टाङ्ग प्रणाम, नानाविध खति-ये सब मैं सङ्कल्पसे ही मापको समर्पण करता हूँ। प्रमो ! मेरी यह पूजा प्रक्षण कीजिये ॥३॥ हे शम्मो ! मेरा आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी है, प्राण आपके गण है। घरीर आपका मन्दिर है, सम्पूर्ण विषय भोगकी रचना भापकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा घटना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं। इस प्रकार में जो जो भी कर्म करता हूँ षह सभापकी बाराधना ही है ॥ ४॥ प्रभो! मैंने हाय, पैर, पाणी, मी अपराध किये हो विदित हो २५ जय जय रुगाचे श्रीमहादेवशम्मी ।।५।। इति श्रीमारानाचता शिपमानामा समाना। ८-शिवापराधक्षमापनस्तोत्रम् आदी कर्मप्रसङ्गात् कलपति कउप मारकुक्षी स्थित मा विष्मूत्रामध्यमध्ये कययवि नितरां जाठरी जातवेदाः । यद्य तत्र दुःखं व्यथयति नितरां शक्यते फेन यन्तं क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भो श्रीमहादेव धम्मो ॥१॥ पाल्ये दुःखातिरेको महलुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा नो शक्तधेन्द्रियेम्यो भवगुणनिता जन्तवो मां तुदन्ति । अथवा अचिहित, उन सबका आप क्षमा कीजिये । फरणासागर श्रीमहादेव शङ्कर ! आपकी जय हो ॥ ५ ॥ पहले कमप्रसङ्गसे किया हुआ पाप मुझे माताको कुक्षिमे ला विठाता है, फिर उस अपवित्र विष्ठा-मूषके बीच गठरामि खूब सन्ता करता है । यहाँ जो जो दुःख निरन्तर यपित करते रहते है उन्हें कौन कह सकता है ? हे शिय ! हे शिर ! शङ्कर ! हे महादेव ! हे शम्मो ! अब मेरा अपराध क्षमा करो ! क्षमा करो!॥१॥ पाल्यापसा दुःखकी अधिकता रहती थी, शरीर मउ-मूबसे लिया रहता था और निरन्तर सनपानकी लालसा रहती थी। इन्द्रियों में कोई कार्य करनेकी सामर्ष म यी रोवी मायासे उत्पर हुए तना जन्तु मुझे काटते थे। .

शिश्स्तोत्राणि नानारोगादिदुःखाट्ठदनपरवाशकरं न सरामि । शन्तब्यो० ॥२॥ प्रौढोऽहं यौवनस्यो शिपयविपरैः पश्चमिमर्मसन्यौ दष्टो नष्टो विवेकः सुधनवविवादसौख्ये निपण्णः । ॐवीचिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगधिरूढं क्षिन्तव्यो० ॥३॥ वाक्ये चेन्द्रियाणां विंगतगतिमविश्वाधिदेवादिताः पापै रोगैषियोगस्त्वनासितवपुः प्रोटिहीनं च दीनम् । मिथ्यामोहामिलापमति मममनी धूर्जटेनिशून्यं वन्तम्यो०४ नाना रागादि दुःलाके कारण मैं रोता ही रहता था (उस समय मी) मुमसे परका स्मरण नहीं पना, इसलिये हे शिव ! हे शिप ! शहर महादेष शम्भो ! अब मेरा आराध रामा कराधमा फरो॥२॥ जब मैं युषा अवस्थामे पार प्रौद हुआ तो पाँच विषयरूपी सगने मेरे मर्मस्थानों सा जिसं मरा विक नष्ट हो गया और मैं पन, बी और सन्तानक सुख भोगने में लग गया। उस समय भी आपक चिन्तनको भूलकर भरा हृदय बो धमर और आभमानसे मर गया । अतो fort! र!हे महादेव ! शम्मी! अब मेरा अपराध धमा करो! क्षमा करा ! ॥३॥ मापस्या मी, अर'daयोकी गांव विपिस हो गयी दि मन्द पड़ गया है और भाभिदेविकादि तारों, पा, रोगों और वियोगोसे पर जोरत हो गया। मेरा मन रिप्पा मेर और भाभसाराओंसे दुख और दान होकर (भार ) भीमहादेव तिरसेम ही भ्रम है। अब विपरियार परदेष!रेलम्मो | अबरारराय एस रो! सा!"

स्तोमरनामा नो शर्य सातकर्म प्रतिपदगहनप्रत्यवायाकुताल श्रीते या वर्थ मे द्विजकुलविहिते मनमागें सुसारे नास्था धर्मे विचार श्रवणमननया:किं निदिध्यासिवन्याशतम्यो०५ नात्वा प्रत्युपकाले सपनविधिविधी नाहतं गानचोर्य पूजार्थ वा कदाचिरहुवरगहनासन्डविल्लीदलानि । नानीतापग्रमालासरसि विकसिवागन्धपुष्प त्वदर्थ शस्तयो०६ दुग्धर्मध्वान्ययुक्तर्दधिसितसहितः सापित नैव लिङ्ग नो लिप्तं चन्दनायैः कनकविरचितः पूजितं न प्रश्नः। पद-पदपर अति गहन प्रावितो व्याप्त होने के कारण मुझसे तो सातकर्म मी नहीं हो सकते, फिर ओ दिजकुलके लिये यिरित हैं, उन अझप्राप्तिके मार्गस्वरूप प्रोतकमोकी तो बात ही क्या है ? धर्ममें आस्था नहीं है और श्रवण-मननके विषयमें विचार ही नहीं होता. निदिध्यासन (ध्यान) मी कैसे किया जाय ? अतः हे शिव । हे शिव | हे शङ्कर । हे महादेव हे शम्भो ! अब मेरा अपराध क्षमा करो। क्षमा करो ॥५॥ प्रातःकाल स्नान करके आपका अभिषेक करनेके लिये मैं गाजल लेकर प्रखत नहीं हुआ, न कभी आपकी पूजाके लिये पनसे विस्वपत्र ही लाया, और न आपके लिये तालाबमें खिले हुए कमोंकी माला तथा गन्ध-पुष्प ही लाकर अर्पण किरे। अतः हे शिव ! हे शिव ! हे शहर! हे महादेव ! हे शम्भो ! अव मेरा अपराध क्षमा करो! क्षमा करो!॥६॥ मधु, ध, दधि और शर्करायुक्त दूध (पञ्चामृत) से मैंने आपके लिङ्गको बान नहीं कराया, चन्दन दस अनुले महीं किया परेके इस शिवलोपान २७ धूपैः कर्पूरदीविविधरसयुत व भक्ष्यापहारैः । क्षन्तव्यो०१७॥ ध्यात्वा चित्ते शिल्पं प्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो हव्यं ते लक्षसंख्य तबहक्दने नापित वीजमन्त्रः। नो तप्तं गाङ्गनीरे व्रतनपनियमै रुद्रजाप्यन वेक्षन्तत्र्योटा स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरु-कुण्डले सूक्ष्ममार्गे शान्ते स्वान्ते प्रलीने प्रकरितविभवे ज्योतिरूपे पराख्ये। लिङ्ग प्रमशक्ये सफलतनुगतं शङ्करं न स्मरामि क्षन्तव्यो ०।९। धूप, दीप, कर तथा नाना रसोंसे युक्त नैवेद्याद्वारा पूजन भी नहीं किया ! शिव है शिव ! है शङ्कर ! हे महादेव ! हे शम्भो। अब मेर अपराधीका ना करो ! क्षमा करो!॥७॥ मैंने चित्तमें शिव नामक आपका सरण करके बाझगोंको प्रचुर धन नहीं दिया। न आपके एक लक्ष बीजमन्त्रीद्वारा अग्निमें आहुतियाँ दी और न मत एवं जपके नियम तथा रुद्रजाप और वेदविधि गजातस्पर काई साधना ही की। आः हे चित्र ! हे चित्र ! हे शङ्कर ! हे महादेव । है शम्भो ! अब मेरे अपराधों को क्षमा करो ! ना करो ! 11८॥ जिस सूरममार्गप्राप्य सहसपल कमउमें पहुँचार प्रमूद अगवनादमें लीन हो जाते हैं ओर जहाँ जाकर बंदके यार शर्थ तया तात्पर्य- भूत पूर्णतया आविर्भूत ज्योतिष शान्त परम तत्वमें मन लीन हो जाता है, उa कम उमें स्थित होकर मैं सन्तिमी कल्याणकारी आपका मरण नहीं करता हूँ ! अतः इंशिक ! हे शिय ! शहर महादेव ! शम्मा ! अब मेरे अपराभोंको क्षमा भो ! या II ভয়ঘণ . नमो निराशुद्धसिगुणविरहित सम्माधिकारी . नासाग्रे न्यस्तरष्टिप्रिंदिवमागुणा नैव रए पदाचिद ।। उन्मन्यायस्पपात्या विगतकसिमकान सरामिशिन्तयो०१० चन्द्रोद्भासिवशेखर मरहरे. गलायरे शंकरे सपैपितफण्ठकर्णविरे नेत्रांत्ययानरे। दन्तित्वकठसुन्दराम्परधरे प्रैलोक्यसारे . हरे मोक्षार्थ कुरु चिसचिमखिलामन्यस्तु किं कर्मभिः ॥११॥ किं पानेन धनेन पाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं किं वा पुत्रकलपमित्रपशुमिहेन , गेहेन किम् । नमा निःसन, पुद और त्रिगुणातीत शेकर, मोहान्धकारका ध्यंस कर तथा नासिकाममें दृष्टि स्थिरकर मैंने (आप) यक्षरके गुणों को जानकर कमी आपका दर्शन नहीं किया और न उन्मनी अवस्थासे कटिमलरहित आप कल्याणस्वरूपका स्मरण हा करता हूँ। अतः हे शिव ! हे शिव । हे शङ्कर । हे महादेव ! हे शम्भो। अब मेरे अपराधोंसो क्षमा करो । क्षमा करो!॥ १०॥ चन्द्रकलासे जिनका लडाट-प्रदेश मासित हो रहा है, जो कन्दर्पदर्पहारी हैं, गङ्गाधर है, करमण वा है, ससे जिनके फण्ठ और कर्ण भूपित हैं, नत्रोंसे आमे प्रकट हो रहा है, हजिचर्मकी जिनकी फन्पा ह, तथा जो त्रिलोकीके सार हैं, उन शिबमें मोशके लिये अपनी सम्पूर्ण विचचियाको लगा दे; और कमासे क्या प्रयोजन है '१ ॥ ११ ॥ इस धन, घोड़े, हापो और राज्यादिको मासिसे भ्या ! पुष, भी, मिस, पाम दे और परहे म्या ! .

शियस्तोत्राणि ज्ञात्वैतरक्षणभङ्गुर सादि रे त्याज्यं मनो दूरतः स्वात्मार्थ गुरुवाक्यतो मज मज श्रीपार्वतीचल्लमम् ॥१२॥ आयुश्यति पश्यतां प्रतिदिनं याति क्षयं यौवन प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षक। लक्ष्मीस्तं यतरङ्गमञ्चपला विघुचलं जीवित ससान्मा शरणागतं. शरणद वं रक्ष रक्षाधुना ॥१॥ करचरणकृतं पाकायजं कर्मजं या श्राणनयनजं वा मानसं वापराधम् । विहितमविहितं सर्वमेवपक्षमख अप जय करणाधे श्रीमहादेव शम्मो ॥१४॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवापराधक्षमापनस्तोत्रं सम्पूर्णम् । या इनको क्षणमहर जानकर रे मन ! दूरहीसे त्याग दे, और आत्मानुभवके लिये गुरुवचनानुसार पार्वतीवल्लम श्रीशङ्करका मजन पर ।। १२॥ देखते. देखते आयु नित्य नष्ट हो रही है, यौयन प्रतिदिन क्षीण हो रहा है। बीते हुए दिन फिर लौटकर नहीं आते; काल सम्पूर्ण जगत्को खा रहा है । लक्ष्मी जलको तरङ्गमालाके समान चपल है। जीवन बिजली के समान चचल है। अतः मुस रणागतकी हे शरणागतवत्सर शकर ! अर रक्षा करो। रक्षा फो।। १३ ॥ हापसे गमे, पापी, शरीरसे, कमसेकणसे नेत्रभिषया मनसे भी जो अराध किये हों। चे विहित हो अथका अविदित उन सबको हे फरुणासागर महादेवसम्मो ! धमा कीजिये । आपकी जय हो, अयोml लोत्ररक्षागली ६-वेदसारशिवस्तवः पशूना पतिं पापना परेश गजेन्द्रस्प कति पसानं परेव्यम् । बटाजूटमध्ये परदादारि महादेवमेकं मरामि सारारिम् ॥ १॥ महेशं मुरेशं सुराराविना विसं विश्वनाथं विभून्यमाम् । विरूपाक्षमिन्द्वव द्वित्रिनेत्रं सदानन्दमीटे 'प्री पञ्चवक्त्रम् ॥ २॥ गिरीशं गणेशं गले नीलवर्ण 'गवेन्द्राधिरुद्ध गणातीवरूपम् । मवं- . माखरं . मसना भूपिताङ्गं :जो सम्पूर्ण प्राणियों के रक्षक है, पापका ध्वरा करनेवाले हैं, परमेश्वर हैं, गजराजका चर्म पहने हुए हैं तथा श्रेष्ठ हैं और जिनके जटाजूटमें श्रीगङ्गाजी - खेल रही हैं, उन, एकमात्र कामारि श्रीमहादेवजीका में स्मरण करता हूँ ॥१॥ चन्द्र सूर्य और अग्नि तीनों जिनके नेत्र हैं, उन विरूपनयन महेश्वर, देवेश्वर, देवदुःखदलन, विभु, विश्वनाथ, विभूति- भूषणं, नित्यानन्दम्वरूप, पञ्चमुख भगवान् महादेवकी मैं स्तुति करता हूँ ॥२॥ जो कैलासनाय है, गणनाथ हैं, नीलकण्ठ हैं, बैलपर चढ़े हुए हैं, माणित रूपवाले हैं, संसारके "आदिकारण है, . प्रकायस्वरूप हैं, शरीरमें मस लगाये हुए हैं और,श्रीपार्वतीजी जिनकी अाङ्गिनी है, LAM शिवस्तोत्राणि भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम् ॥ ३ ॥ शिवाकान्त शम्मो शशावार्धमौले महेशान शलिन् जटाजूट्यारिन् । स्वमेको जगदयापको विद्याप प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप ॥ ४ ॥ परात्मानमेक जगदीजमा निरीह निगकारमशाग्वेयम् । यो जायते पाल्यते येन विश्वं तमीशं मजे लीयते यत्र विधम् ॥ ५॥ न भूमिर्न धागे न पहिर्न वायु- नपामारामास्ते न तन्द्रा न निद्रा। नप्रीमो न शीतं न देशो न वेपो उन समुष महादेवजीको मैं ममता हूँ॥३॥ हे पार्वतीयस्लम महादेय ! पन्द्रशेखर ! महेश्वर पिटिन् ! हे अमूटपारिन् ! है विश्वरूप एकमात्र आर ही जगत में पारा है। पूर्णरूप प्रभो! प्रय ईपे, प्रसन हो ४॥ जो परमात्मा हैं, एक रे, जगत्के आदिकारण छातीत, निराधार और पारा अनने. पोप तथा जिनसे सम्पूर्ण विकी उपसि और पारन वारे और रि जिनमें उमर से जाता है उन प्रभुको मस्टा हूँ॥५॥ जोन पृथ्वीन , न ममि है, न मोर न मा नवनदान निदान और न खानपान त्रिनेत्र ! पाम्तीमाणपस्टग ! हे शान्स 1हे कामारे 1 त्रिपुपरे! . योगसे प्राप्तव्य प्रभो! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । वेदवेध भगवन् ! आपको नमस्कार है, नमस्कार दे॥८॥हे प्रभो!हेत्रिशूल- घाणे!हे विभो । विश्वनाथ हे महादेव ! हे शम्मो परेमरेश्वर-1 रोभरना न यसामा मििनमूनि रामीडे॥ ६॥ अर्ज छानतं कारणं करगाना शिव केवलं माम मामझानाम् । परीय उमापारमायन्तहीन प्राये परं पावन देतहीनम् ॥ ७॥ ममस्ते नमस्ते विमो दिनमूने नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमू । नमस्ते नमस्ते, तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते शुविज्ञानगम्य ॥८॥ प्रमो शूलपाणे विमो विश्वनाथ महादेव शम्मो' महेश त्रिनेत्र । शिवामान्त शान्त संगरे पुरारे कोई देश है, न नेष है, उन मूर्तिहीन त्रिमूर्तिकी में स्तुति करता हूँ ॥६॥ जो अजन्मा हैं, नित्य हैं, कारण मी कारण हैं, फल्याणस्वरूप है, एक हैं, प्रकाशोंके मी प्रकाराक हैं। अवस्थात्रयसे विलक्षण हैं, अजनसे परे हैं, अनादि और अनन्त है, उन परमपावन अदेतस्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ हे विश्वमूर्ते ! हे विभो ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे चिदानन्दमूर्ते ! आपको नमस्कार है। नमस्कार है । हे तप तया १..

शिवस्तोत्राणि
३३
Amastarak
त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः ॥ ९ ॥
शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे
गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन् ।
काशीपते करुणया जगदेतदेक-
स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥१०॥
त्वत्तो जगद्भवति देव भय सरारे
त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ।।११।।
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतो वेदमारशिवस्तयः सम्पूर्णः ।
तुम्हारे अतिरिक्त न कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न गणनीय है |॥९॥
हे शम्भो ! हे महेश्वर ! हे करुणामय । हे त्रिशूलिन् ! हे गौरीपते ! हेपशुपते!
हे पशुबन्धमोचन! हे काशीश्वर ! एक तुम्ही करुणावश इस जगत्की
उत्पत्तिा पालन और संहार करते हो, प्रभो ! तुम ही इसके एकमात्र
स्वामी हो ॥ १०॥ हे देव! हे शहर !हे कन्दर्पदलन! हे शिव !
हे विश्वनाथ ! हे ईश्वर ! हे हर ! हे चराचरजगद्रूप प्रभो ! यह लिङ्गस्वरूप
समस्त जगत् तुम्हींसे उत्पन्न होता है, तुम्हीं में स्थित रहता है और
Hinो जाता है॥ ११॥

भगवन् ! आपको नमस्कार ..नमस्कार है॥८॥हे प्रभो! प्रियल पाणे!हे विमोहे विश्वनाय! हे महादेव! हे धम्मो रिमोश्वर! त्रिनेत्र !६. पास्तीप्रायल्टम! हे शान्त ! हे कामारे ! त्रिपुरपो! रक्षामा सरी न सामे मिनिम्ने समीरे ॥ ६ ॥ अनं गानां पारणं फरगान शिव फेलं मास मासकानाम् । समापारमायन्तहीन प्रपये पर पारन देतहीनम् ।। ७॥ ममस्ते नमस्ते विमो विमर्ने नमस्ते नमस्ते चिदानन्दम् । नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते विज्ञानगम्य ॥ ८॥ प्रमो शुलपाणे विमो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र । शिवामान्त शान्त संगरे पुरारे कोई देश है, न प है, उन मूर्तिहीन त्रिमूर्तिकी में स्तुति करता हूँ॥६ जो अजन्मा हैं, नित्य है, कारणके मी कारण हैं, कस्याणस्वरूप एक हैं, प्रकाशकों के भी प्रकाशक हैं, अवस्थात्रयसे विलक्षण , अशा परे हैं, अनादि और अनन्त है, उन परमपावन अतस्वरूपको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ हे विश्वमूर्ते ! हे विभो ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे चिदानन्दमूर्ते ! आपको नमस्कार है, नमस्कार है । हे तप क्षया योगसे प्राप्तव्य प्रभो! आपको नमस्कार है। नमस्कार है । वेदवेध .

शिवस्तोत्राणि ३३ त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो नगण्यः ॥९॥ शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन काशीपते करुणया जगदेतदेक- स्त्वं हसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि ॥१०॥ त्वत्तो जगद्भवति देव मय सरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ । स्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश लिङ्गात्मकं हर चराचरविश्वरूपिन् ॥११॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतो वेदभारशिवस्तयः सम्पूर्णः । तुम्हारे अतिरिक्त न कोई श्रेष्ठ है, न माननीय है और न गणनीय है ॥९॥ हे शम्भो ! हे महेश्वर ! हे करुणामय ! हे त्रिशूलिन् ! हे गौरीपते ! हे पशुपते! हे पशुबन्धमोचन ! हे काशीश्वर ! एक तुम्ही करुणावश इस जगत्की उत्पत्ति, पालन और संहार करते हो प्रभो ! तुम ही इसके एकमात्र खामी हो ॥ १० ॥ हे देव ! हे शङ्कर ! हे कन्दर्पदलन ! हे शिव ! हे विश्वनाथ ! हे ईश्वर ! हे हर ! हे चराचरजगद्प प्रभो ! यह लिङ्गस्वरूप समस्त जगत् सुम्हीसे उत्पन्न होता है। तुम्हींमें स्थित रहता है और तुम्हीमें लय हो जाता है।॥ ११ ॥ -- स्तोत्ररसायली १०-शिवाष्टकम् तस्मै नमः परमकारणकारणाय दीसोज्ज्वलज्वलितपिङ्गललोचनाय । नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूपणाय ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नमः शिवाय ॥१॥ श्रीमत्प्रसन्नशशिपन्नगभूषणाय शैलेन्द्रजावदनचुम्बितलोचनाय कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय लोकत्रयातिहरणाय नमः शिवाय ॥२॥ पद्मावदातमणिकुण्डलगोपाय कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय जो कारणके मी परम कारण है, ( अमिशिखाके समान ) अति देदीप्यमान उज्ज्वल और पिझल नेत्रोयाले है, सर्पराजोंके हार-कुण्डलादि- से भूपित है तथा मझा, विष्णु और इन्द्रादिको मी यर देनेयाले हैं उन श्रीशङ्करको नमस्कार करता हूँ॥१॥ शोभायमान एवं निर्मल चन्द्र कला सपा मारी जिनके भूपण है, गिरिराजकुमारी अपने मुखसे जिनके लोगों का धुम्पन करती है, कैलाम और महेन्द्रगिरि जिनके निवासस्थान पारिलोधी मो दूर करनेवाले हैं उन श्रीशहरको नमस्कार परवा है ॥ २॥ मोसमय परागमणि कुण्डलोंमे किरणों की यप करने . .

शिवस्तोत्राणि . मसानुपक्तविकचोत्पलमल्लिकाय नोलाजकण्ठसदृशाय नमः शिवाय ॥३॥ लम्बत्सपिङ्गलजटामुकुटोत्कटाय दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय त्रैलोक्यनाथनमिताय नमः शिवाय ॥ ४ ॥ दक्षप्रजापतिमहामखनाशनाय क्षिग्रं महात्रिपुरदानवधातनाय । अझोजितोर्ध्वगकरोटिनिकन्तनाय योगाय योगनमिताय नमः शिवाय ॥ ५॥ संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय वाले, अगरु और बहुतगे नन्दनगे नर्नित तथा भस्म, प्रफुल्लित कमल और जूहीसे मुशोभित है, ऐसे नीलकमरमहराकण्ठयाले शिवको नमस्कार है॥३॥ पटकती हुई रिलायवर्ण जटाभोंके सहित मुकुट धारण करनेमे जो उत्तर जान पड़ते हैं, तीक्ष्ण दादोंके कारण जो अति विकट और मयानक प्रतीत होते हैं, म्याग्रचर्म धारण किये हुए हैं, अति मनोहर हैं तथा तीनों लोकोंके अधीश्वर मी जिनके नरणोंमें शुकते हैं, उन श्रीगहरको प्रणाम है।॥ ४॥ दक्षप्रजापति महायशो बंम करनेवाले, महान् त्रिपुरामुर• यो शाम मार डालनेगले, दपंयुक्त प्रमांक. कर्षमुगं पसम शिरका हेदन करने वाले, योगस्वरूप, योगसे नमस्त गिता में नमस्तार करता ॥५॥ जो कल्प-करपने मंसाररननारा परिवर्तन करनेवाले मोरासानी । - स्थापिशाचगणसिद्धसमागलाप सिद्धोग्गप्रहगणेन्द्रनिपेविताय शाईतचर्मवसनाय नमः मियाय ॥ ६ ॥ मम्मामरागकवरूपमनोहराय सौम्यायदातवनमाश्रितमाभिवाप । गौरीकटाक्षनयनानिरीक्षणाय गोक्षीरपारधवलाय नमः शिवाय ।। ७ आदित्यसोमवरुणानिलसेविताय यज्ञाग्निहोत्रवरघूमनिकेतनाय ऋक्सामवेदमुनिमिः स्तुतिसंयुताय है। राक्षस, पिशाच और सिद्धगोंसे घिरे रहते हैं। सिद, सर्प, प्रहगण व इन्द्रादिसे सेवित हैं तथा जो व्यामचर्म धारण किये हुए हैं उन श्रीशहरव नमस्कार करता हूँ॥६॥ मस्मरूपी अन्तरागसे जिन्होंने अपने रूपको अत्यन्त मनोह बनाया है, जो अति शान्त और सुन्दर वनका आश्रय करनेवालों आश्रित हैं, श्रीपार्वतीजीके कटाक्षकी ओर जो बाँकी चितवनसे निहार रहे हैं, और गौदुग्धकी धाराके समान जिनका श्वेत वर्ण है .उन श्रीशङ्करको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७॥ सूर्य, चन्द्र, वरुण और पवनसे जो सेपित है, यश और अग्निहोत्रके धूममें जिनका निवास है। 'ऋक्सामादि येद और मुनिजन जिनकी स्तुति करते हैं, उन नन्दीश्वर- शियस्तोत्राणि ३७ गोपाय गोपनमिताय नमः शिवाय |८|| शिवाटकमिदं पुण्यं यः पठेन्छिरसनिधी । शिरलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥९॥ इति भीमदराचार्यविरचितं निपाएर सम्पूर्णम् । ११-श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय मस्मागरागाय महेसराय। नित्याय शुद्धाय दिगम्पराप तस्मै नकाराय नमः शिवाय ॥१॥ मन्दाकिनीसलिलचन्दनपचिंताप जित गोका पालन करनेयाले मतदेय नमस्कार ॥८॥जो ल परित्र dिrent भीमाादेस मार पदला पर शिवलीको मात शंका है और भारतीय माध मानन्द माता॥९॥ Ant,f, watfree राम (ana Refer than a मरए mratममाm स्तोत्ररत्नावली नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै 'म' काराय नमः शिवाय ॥२॥ शिवाय गौरीवदनाब्जयन्द- सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय । श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै 'शि' काराय नमः शिवाय ॥३॥ वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य- मुनीन्द्रदेवाचिंतशेखराय चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै . 'व' काराय नमः शिवाय ॥ ४ ॥ यक्षस्वरूपाय जटाघराय कुसुमोसे जिनकी सुन्दर पूजा हुई है, उन नन्दीके अधिपति प्रमय गोंके स्वामी मदेश्वर म' कारम्वरूप शिवको नमस्कार है। जो कल्याण म्वरूर है, पार्वतीजीके मुखकमलको विमित (प्रसन्न ) करनेके लिये जो एम्वरूप जो दक्षरे यशका नाश करनेवाले हैं जिनकी भाना अलका चिहहै उन गोमाशाली नीलकण्ठ शि' कारस्वरूप शियको नमस्कार है | यधि, अगस्त्य और गौतम आदि भेठ मुनियोंने तथा रुद्र मानि देवनाभोंने जिनो मतककी पूजा की है। चन्द्रमा, सूर्य, और मोननि नेत्र हैं उन बारम्वरूपाको नमस्कार जिन्होंने मालपा, मोजमापारी, जिनमें सपना जो शिवस्तोत्राणि पिनाकहस्ताय सनातनाय। दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै 'य' काराय नमः शिवाय ||५|| पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसनिधौ । शिवलोकमपामोति शिवेन सह मोदते ॥६॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रं सम्पूर्णम् । १२-द्वादशज्योतिर्लिङ्गानि सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उअयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम् ॥१॥ दिव्य सनातन पुरुष हैं: उन दिगम्बर देव "य'कारस्वरूप शिवको नमस्कार है ॥ ५॥ जो शिक्के समीप इस पवित्र पञ्चाक्षरका पाठ करता है वह गिवलोकको प्राप्त करता और यहाँ शिवजी के साथ आनन्दित होता है ॥६॥ (१) सौराष्ट्रप्रदेश ( काठियावाड़) में श्रीसोमनाथ, (२)श्री. शैलेपर श्रीमल्लिकार्जुन, (३) उजयिनी ( उज्जैन) में श्रीमहाकाल, १. श्रीसोमनाय काठियावाद प्रदेशके अन्तर्गत प्रभासक्षेत्रमें विराजमान है। २. यह पर्वत मद्रास प्रान्तके कृष्णा मिलेमें कृष्णा नदीके तटपर है, इसे दक्षिणका केलास कहते है। ३. भीमहास्पलेश्वर मालवा प्रदेश क्षिप्रा नदोके तटपर उज्जैननगरमै विराजमान है, उज्जैनको मन्तिकापुरी भी करो।

४० स्तोत्ररतापली । परल्या वैद्यनाथं च डाकिन्यां मीमशङ्करम् । सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥२॥ (४) ॐकारेश्वर अथवा अमलेश्वर ॥ १ ॥ (५) परलीमें वैद्य. नाथ, (६) डाकिनी नामक स्थानमें श्रीभीमशंकर, (७) सेतुबन्धपर श्रीरामेश्वर, (८) दारुकावनमें श्रीनागेश्वर ॥२॥ (९) वाराणसी (काशी)में १. कारेश्वरका स्थान मालवा प्रान्तमें नर्मदा नदी के तटपर है । उज्जैनसे खण्डवा जानेवाली वी० बी० एण्ड सी. आई. रेलवेकी छोटी लाइनपर मोरटका नामक स्टेशन है. यहाँसे यह स्थान ७ मील दूर है। यहाँ स्पयरेश्वर और अमलेश्वरके दो पृथक्-पृथक् लिङ्ग है, परन्तु ये एक हो लिङ्गके दो स्वरूप है। २. निमामराज्यके हैदराबाद नगरसे श्वर परभनी नामक एक कशन that से परसोतक एक, प्राच सारन गयी है, इस परली स्टेशनसे थोड़ी दूरपर परली प्रामके निकट भीदेवनाथ नामा ज्योतिलिंग है। शिवपुराणमें बैधनाथ चिताभूमी' ऐसा पाठ है, इसके अनुसार संथाल परगनेमें to at० रेलोके सीटी स्टेशन के पासगला वैधनाथ-शिवलिङ्ग ही वास्तविक वैपनाथम्योतिलिंग सिमा क्योंकि यही निताभूमि है। 1. भीभीमदारमा साग बम्बास पूर्व और पूनासे उत्तर भीमा नदी के किनारे समापतर या स्थान लारीके पसे गाशिको लगभग ११० मील दूर है। पर्वतके एक शिखरका नाम सकिनी है। इससे मनुमान होता कभी यहाँ दाकिनी और भूतोका निवास । शिपुरकी एक कथाके मारपर भीमराइर म्योतिलि आसामके अमरा में पी. रेलपर गोहाटी पारा प्रयापुर पहार feer ME मना है। होगको गैनीताल निलेके पमनाक गामक समसनि मिलिरही भीमरारका सान है।४. श्रीरामे पर - माम शलरामना ति रामनारामाको रोग बार पन रावान्तर्गत गोमतोमारकासे शानकोणमैं बार शिवस्तोत्राणि वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे। हिमालये तु केदारं घुश्मेशं च शिवालये ॥ ३ ॥ एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः । सप्तजन्मकृतं पापं सरणेन विनश्यति ॥ ४ ॥ श्रीविश्वनाथ, (१०)गौतमी (गोदावरी) के तटपर श्रीन्यम्बकेश्वर, (११) हिमालयपर केदारखण्ड में श्रीकेदारनाथ और ( १२ ) शिवालयमै श्री. धुश्मेश्वरको स्मरण करे ॥ ३ ॥ जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सन्ध्याके समय इन बारह ज्योतिर्लिङ्गोंका नाम लेता है, उसके सात जन्मोस किया दुआ पाप इन लिङ्गोंके स्मरणमात्रसे मिट जाता है ।।४।। तेरह मोलकी दूरीपर है । कोई-कोई निजाम दराबाद राज्य अलग मोदायाममें स्थित शिवलिङ्गको दो नागेश्वर' मोतिलिंग मानते हैं। कुछ लोगों के मतसे अमोइसे १७ मील उत्तर-पूर्वमें यागेश । आगेशर ) शिवलियरी नागेश ज्योतिसिंह है। १. काशीके मोविश्वनायजा प्रसिर । २. या ज्योतिर्लिंग बर्मा मान्तके नासिक जिलेमें नासिक-पत्रवटोसे (अहाँ खाकी नाक बटी पी) १८ मोलको दूरीपर मागिरके निकट गोदावरीके किनारे है। १. भोकेदारनाथ रिमालयके देदार नामक महार सित है। शिखरके पूरंकी ओर मलयानन्दा के तटपर मोवारीनाथ भवस्थित है और पश्चिम मन्दारिनोके किनारे भोकदारमाए विराजमान है। यह स्थान हायरसे १५. मोल और रिसे १२२ मोल है। ४. भीपुरमेश्वरको पुसगेस्सर पूरकर भी कामे नए स्थान निजाम रायके अन्तर्गत दौलासर ऐशनसे बार मोटर बम गौबके पास - - ४२ स्तोत्ररायली १३--द्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रम् , सौराष्ट्रदेशे विशदेऽतिरम्ये ज्योतिर्मयं चन्द्रकलावतंसम् । भक्तिप्रदानाय कृपावतीर्ण तं सोमनाथं शरणं प्रपद्ये ॥१॥ श्रीशैलने विबुधातिसंगे तुलाद्रितुङ्गेऽपि मुदा बसन्तम् । तमर्जुन मल्लिकपूर्वमेक नमामि संसारसमुद्रसेतुम् ॥२॥ अवन्तिकायां विहितावतारं मुक्तिप्रदानाय च सजनानाम् । जो अपनी मति प्रदान करनेके लिये अत्यन्त रमणीय तथा निर्मल सौराष्ट्र प्रदेश ( काठियावाइ ) में दयापूर्वक अवतीर्ण हुए, चन्द्रमा जिनके मस्तकका आभूषण है, उन ज्योतिर्लिङ्गस्वरूप भगवान् श्रीसोमनापकी शरणमें जाता हूँ ॥ १ ॥ जो ऊँचाईके आदर्शभूत पर्वतोंसे भी पढ़कर ऊँचे श्रीशैलके शिखरपर, जहाँ देवताओंका अत्यन्त समागम होता रहता है, प्रसन्नतापूर्वक निवास करते हैं तथा जो संसार सागरसे पार करानेके लिये पुलके समान है, उन एकमात्र-प्रभु मलिका जुनको मैं नमस्कार करता हूँ ॥२॥ संतजनोंको मोक्ष देनेके लिये जिन्होंने भवन्तिपुरी (उभेन) में अवतार धारण किया है, उन महाकाल .

शिवस्तोत्राणि ४३ पूर्वोत्तरे अकालमृत्योः परिरक्षणार्थ वन्दे महाकालमहासुरेशम् ॥ ३॥ कावेरिकानर्मदयोः पवित्र समागमे सजनतारणाय। सदैव मान्धात्पुरे वसन्त- मोङ्कारमीशं शिवमेकमीडे ॥४॥ प्रज्वलिकानिधाने सदा वसन्तं गिरिजासमेतम् । सुरासुराराधितपादपद्म श्रीवैद्यनाथं तमहं नमामि ॥ ५ ॥ याम्ये सदङ्गे नगरेऽतिरम्ये विभूषिताङ्ग विविधश्च भागैः। नामसे विख्यात महादेवजीको मैं अकालमृत्युमे बननेके लिये नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ जो सत्पुरुषोको संसारसागरसे पार उतारनेके लिये कावेरी और नर्मदाक पवित्र संगमके निकट मान्धाताके पुरमें मदा नियास करते हैं, उन अदितीय कल्याणमय भगवान् ॐकारेश्वरका में स्तवन करता हूँ ॥ ४ ॥ जो पूर्वोत्तर दिशाम चिताभूमि (वैद्यनाथ धाम ) . भीतर सदा ही गिरिजाक साथ चाम करते हैं, देवता और अमुर जिला चरण-कमलीकी आराधना करते हैं, उन श्रीवधनाथको में प्रगाम करता ॥ ५ ॥ जो दक्षिणके अत्यन्त रमगीय मदम नगरमें विविध भोगोंगे म्पन्न शेमर गुन्दर आभूषणोंने भारत हो रहे एकमात्र सोही गोरा सद्भक्तिमुक्तिप्रदीगमे श्रीनागनाथ मरणं प्रपये ॥६॥ महाद्रिपार्य ग सटे रमन्न सम्पूज्यमानं सततं मुनीन्द्रः। सुरासुरैर्यक्षमहोरगावैः फेदारमीन शिवमेकमीडे॥७॥ सह्याद्रिशी विमले यसतं गोदावरीतीरपवित्रदेशे यदर्शनात्पातकमाशु नाशं प्रयाति तं त्र्यम्पकमीशमीडे॥८॥ मुताम्रपर्णीजलराशियोगे निबध्य सेतुं विशिवरसंख्यः । सद्भक्ति और मुक्तिको देनेवाले हैं, उन प्रभु श्रीनागनायकी में शरणमें जाता हूँ ॥ ६ ॥ जो महागिरि हिमालयके पास केदारङ्गके तटपर सदा निवाम करते हुए. मुनीश्वरोदारा पूजित होते हैं तथा देवता, असुर, यक्ष और महान् मर्प आदि भी जिनकी पूजा करते हैं, उन एक कल्याणकारक भगवान् केदारनाथका मैं स्तवन करता हूँ !॥ ७॥ जो गोदारीतटके पवित्र देश में मह्यपर्वतके विमल शिखरपर काम करते हैं। जिनके दर्शनभे तुरंत ही पातक नष्ट हो जाता है, उन श्रीव्यम्बकेश्वरका मैं . : करता हूँ॥ ८ ॥ जो भगवान् श्रीरामचन्द्रजीके द्वारा ताम्रपर्णी और ।

शिवस्तोत्राणि श्रीरामचन्द्रेण समर्पितं तं रामेश्वराख्यं नियतं नमामि ॥९॥ यं डाकिनीशाकिनिकासमाजे निषेव्यमाणं पिशिताशनैश्च । सदैव भीमादिपदप्रसिद्ध तं शङ्कर भक्तहितं नमामि ॥१०॥ सानन्दमानन्दवने वसन्त- मानन्दकन्दं हतपापवृन्दम् । वाराणसीनाथमनाथनाथं श्रीविश्वनाथं शरणं प्रपद्ये ॥११॥ इलापुरे रम्पविशालकेऽसिन् समुल्लसन्तं च. जगद्वरेण्यम् । सागरके संगममें अनेक वाणोद्वारा पुल बाँधकर स्थापित किये गये, उन श्रीरामेश्वरको मैं नियमसे प्रणाम करता हूँ ॥ ९ ॥ जो डाकिनी और शाकिनीवृन्दमें प्रेतोंद्वारा सदैव सेवित होते हैं, उन भक्तहितकारी भगवान् मीमशकरको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १० ॥ जो स्वयं आनन्दकन्द हैं और आनन्दपूर्वक आनन्दवन ( काशीक्षेत्र ) में वास करते हैं, जो पापसमूहके नारा करनेवाले हैं, उन अनायोंके नाय काशीपति विश्वनाश. की शरण में जाता हूँ ॥ ११ ॥ जो इलापुरके मुरम्य मन्दिरमें विराजमान होकर समस्त जगत्के आराधनीय हो रहे हैं, जिनका स्वभाव . ४६ स्तोत्ररतायली वन्दे महोदारतरस्वमा घृष्णेश्वराख्यं शरणं प्रपद्ये ॥ १२ ॥ ज्योतिर्मयद्वादशलिङ्गकानां शिवात्मनां प्रोक्तमिदं क्रमेण । स्तोत्रं पठित्वा मनुजोऽतिभक्त्या फलं तदालोक्य निजं भजेच्च ॥ १३ ॥ इति श्रीद्वादशज्योतिर्लिङ्गस्तोत्रं सम्पूर्णम् । १४--शिवताण्डवस्तोत्रम् जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् । डमड्डमड्डमड्डमनिनादवड्डमर्वयं बड़ाही उदार है, उन घृष्णेश्वर नामक ज्योतिर्मय भगवान् शिवकी मैं गरणमें जाता है ॥ १२॥ यदि मनुष्य क्रमशः कहे गये इन दादा ज्योतिर्मय शियलिझोंके स्तोत्रका मनिपूर्वक पाठ करे तो इनके दर्शन होनेवाला पाट प्रास कर मरता है ॥ १३ ॥ जिन्होंने जापी भटयी ( पन ) में निकलती हुई गाजी के गिरत ४. माने परिपको गरे गले मोकी लटकती हुई विशाल मालाको मरम वादोंमे माग्न प्रचण्ड .

शिवस्तोत्राणि ४७ चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ।। १ ॥ जटाकटाहसम्भ्रमभ्रममिलिम्पनिर्झरी- विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्द्धनि । धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥२॥ धराधरेन्द्रनन्दिनीविलासबन्धुन्धुर- स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे । कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि. कचिद्दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥ ३ ॥ जटाभुजङ्गापिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रमा- कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे । (नृत्य) किया, वे शिवजी हमारे कल्याणका विस्तार करें ॥१॥ जिनका मस्तक जटारूपी कड़ाहमें वेगसे घूमती हुई गङ्गासी नाल तरह-ताभोंसे मुशोभित हो रहा है, ललाटाग्नि धक-धक जल रही है, सिरपर बाल चन्द्रमा विराजमान है, उन [ भगवान् शिव ] में मेरा निरन्तर अनुराग हो । २ । गिरिराजकिशोरी पातीके बिलामकाली- योगी शिरोभूषणसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित होते देश जिनका मन आनन्दित हो रहा है, जिनकी निरन्तर पाररिम टिन आपतिका भी निवारण हो जाता है, ऐमे किमी दिगम्बर तत्पमें मेरा मन रिनोर करे ॥ ३ ॥ जिन रायती भुजामा पलों में मणिमा फेला हुआ रिहर प्रभापुर दिवारणी भहनामओके मुखर हमला ४८ स्तोत्ररतायली मदान्धसिन्धुरस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदमद्भुतं विमर्तु भूतमर्तरि ॥ ४ ॥ सहस्रलोचनप्रभृत्यशेपलेखशेखर- प्रसूनधूलिधोरणीविधूसराधिपीठभूः । भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५! ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गमा- निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् । सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं महाकपालि सम्पदे शिरो जटालमस्तु नः ॥६॥ करालमालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- अनुलेप कर रहा है, मतवाले हाथीके हिलते हुए चमड़ेका उत्तरीय वस्त्र (चादर ) धारण करनेसे स्निग्धवर्ण हुए उन भूतनाथमें मेरा चित्त अद्भुत विनोद करे ॥ ४॥ जिनकी चरणपादुकाएँ इन्द्र आदि समस्त देयताओंके [प्रणाम करते समय ] मस्तकवी कुसुमोंकी धूलिसे धूसरित हो रही है। नागराज (दोष) के हारसे पंधी हुई जटावाले घे भगवान् पन्द्रशेखर मेरे लिये चिरस्थायिनी सम्पत्तिके साधक हो ॥५॥ जिसने रहलाट येदीपर प्रचलित हुई अग्निके स्फुलिनोंके तेजसे कामदेयको नष्ट कर गला था. जिगे इन्द्र नमस्कार किया करते हैं, मुधाकरकी कलासे मुशोभित यह [श्रीमहादेयमीका ] उमत विशाल ललाटयाला जटिल मरतक मम्मति सापक दो॥६॥ जिन्होंने अपने विकराल मालपपर ८

शिवस्तोत्राणि
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
घराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचनेरतिर्मम ॥७॥
नवीनमेघमण्डलीनिरुद्धदुर्धरस्फुर-
स्कुहूनिशीथिनीतमःप्रबन्धवद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिहरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानवन्धुरः श्रियं जगधुरन्धरः ॥८॥
प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा-
वलम्पिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्ध कन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदान्धकन्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥
धक-धक जलती हुई अमिमें प्रचण्ड कामदेवको बन कर दिया था,
गिरिराजकिशोरीके स्तनोपर पत्रभङ्ग-रचना करनेके एकमात्र कारीगर उन
भगवान् त्रिलोचनमें मेरी धारणा लगीरहे ॥७॥जिनके कण्ठ में नवीन मेघ-
मालासे घिरी हुई अमावस्याकीआधीरातके समय फैलते हुए दुरूह अन्धकार-
के समान श्यामताअङ्कित है; जो गजचर्म लपेटे हुए हैं वे संसारमारकोधारण
करनेवाले चन्द्रमा के सम्पर्क ] से मनोहर कान्तिवाले भगवान् गगाधर
मेरी सम्पत्तिका विस्तार करें जिनका कण्ठदेश खिले हुए नील कमल.
समूहकी श्याम प्रमाका अनुकरण करनेवाली हरिणीकी-सी छबिवाले चिहसे
मुशोभित है तया जो कामदेव, त्रिपुर, भव (संसार), दक्ष यश, हाथी,
अन्धकासुर भोर यमराजकाभी उच्छेदन करनेवाले है उन्हें मैं भजता हूँ॥९॥

५० स्तोत्रम्मायली heroink- - अखर्वसर्वमङ्गलाफलाकदम्बमञ्जरी- .. रसप्रवाहमाधुरीविजृम्मणामधुव्रतम् . सरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं मजे॥१०॥ जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस- द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालमालहव्यवाद । धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमगल- ध्वनिक्रमप्रवर्तितप्रचण्डताण्डवः शिवः ॥११॥ हपद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः , 'सुहृद्विपक्षपक्षयोः । तृणारविन्दचक्षुपोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः जो अभिमानरहित पार्वतीकी कलारूप कदम्बमझरीके मकरन्दस्रोतकी बदती हुई माधुरीके पान करनेवाले मधुप हैं क्या कामदेव त्रिपुर भवा दव-या हापी, अन्धकासुर और यमराजका भी अन्त करनेवाले हैं, उन्हें मैं भजता हूँ ॥ १० ॥ जिनके मस्तकपर बड़े वेगके साथ घूमते हुए भुजबके फुफकारनेसे ललाटकी भयंकर अग्नि क्रमशः रही है। शिमि घिमि बजते हुए मृदङ्गके गम्भीर माल पोरके क्रमानुसार जिनका 'प्रचण्ड ताण्डव हो रहा है, उन भगवान् गहरकी भयो ।॥ ११॥ पत्थर और सुन्दर रिछोनोंमें, सॉप और गुलामी मारा, बहुमूल्य रत्न पण मिहीके टेलेमें, मित्र या अशुपक्षम, तुम अपया कमललोचना पणी, ममा और पृथ्वीके माराममें समान माप रखता धधकती हुई फैल शिवत्तोत्राणि समप्रतिकः कदा सदाशिवं मजाम्यहम् ॥१२॥ कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमञ्जाल वहन् । दिलोललोललोचनो ललाममाललग्नकः शिवेति मन्त्रमुच्चरन् कदामुखी भवाम्यहम् ॥१३॥ इमं हि नित्यमेमु कगुप्तमोत्तमं स्तवं पठन्सरन्दनरो विशुद्धिमेति सन्ततम् । हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गति । ... विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य विन्तनम् ॥१४॥ पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं ... यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे । हुआ मैं कब सदाशिवको भनूँगा ॥ १२ ॥ सुन्दर ललाटवाले भगवान् चन्द्रशेखर दत्तचित्त हो अग्ने कुविचारोंको त्यागकर गङ्गाजीके तटवर्ती निकलके भीतर रहता हुआ सिरपर हाथ जोड़ डबडबायी हुई विहल आँखों 'शिव' मन्त्रका उधारण करता हुआ मैं कर सुखी होऊँगा? ॥ १३ ॥ जो मनुष्य इस प्रकारसे उक्त इस उत्तमोत्तम स्तोत्रका नित्य पाठ, स्मरण और वर्णन करता रहता है, वह सदा शुद्ध रहता है और शाम ही मुरगुरु भीराहरजीकी अशी भक्ति प्राप्त कर लेता है, यह विरुखगतिको नहीं प्राप्त शेता, क्योंकि श्रीशिवजीका अन्ही प्रकारका चिन्तन प्राणिवर्गके मोहका नाय करनेवाला है ॥ १४॥ सायट्ठालमें पूजा समाप्त होनेपर रावणके गाये हुए इस शम्मपूजनसम्बन्धी स्तोत्रका जो पाठ करता है। शहरमी उस ५२ स्तोत्ररथावली स्थिर स्थगजेन्द्रतरगयुक्तां लक्ष्मी सदैव गुगुखी प्रददाति शम्मुः ॥१५॥ इति श्रीरायणकृतं शियताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम् । १५-श्रीरुद्राष्टकम् नमामीशमीशाननिर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् । अजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकारमाकाशवासं भजेऽहम् ॥१॥ निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् । करालं महाकालकालं कृपालं मनुष्यको रथ, हाथी, घोड़ोसे युक्त सदा स्थिर रहनेवाली अनुकूल सम्पति देते हैं।॥ १५ ॥ AA . हे ईशान ! मैं मुक्तिस्वरूप, समर्थ, सर्वव्यापक, नावेदस्वरूप जन्मरहित, निर्गुण, निर्विकल्प, निरीह, अनन्तानमय और आकाशके समान सर्वत्र व्याप्त प्रभुको प्रणाम करता हूँ ॥१॥ जो निराकार ।। मोटाररूप आदिकारण है, तुरीय, याणी और बुद्धिके पपरी परे है, केलासनांप है, पापियोंके लिये कराल और भक्तोंके हेतु दपाठ हैं, महाकालके भी काल है, गुणों के आगार और संसारखे शिवस्तोत्राणि गुणागारसंसारपारं नवोऽहम् ॥ २॥ तुषाराद्रिसंकारागार गमीरं मनोभूतकोटिप्रमासी शरीरम् । स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चालगना लसद्भालपालेन्दु कण्ठे भुजहा ॥३॥ चलत्कुण्डलं शुम्रनेत्रं विशालं प्रसपाननं नीलकण्ठं दयालम् । मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शहरं सर्वनाथ मजामि ॥ ४ ॥ प्रचण्ड प्रष्ट प्रगमं परेश- मखण्डं मजे मानुकोटिप्रकासम् । प्रयीशतनिर्मूलन शूलपाणिं पारनेराले है, उन भगवानको मैं नमसार परदा ॥२॥ को दिमाय मम तवर्ण, गम्भीर भौर परोपामदेव ममान सच. मान् परवाले हैं, जिनमें मसर मनोहर गाजीरासमा पानचन्द्रमा मुधोमितरोत भोर गरेमें मनेगी माला योभा देती ॥३ पुरस सि रहे, त्रिपुर भोर, निरम भौर पर नौर, मे, मे और HINEMAt 31 mriter पिमें भरन FIFA RAM R REAfry शिनोबानोमे .y स्मोगरतायती न मजेऽई मानीपहिं भावगम्पम ॥५॥ फलातीवकल्याणकल्पान्तकारी सदा सअनानन्ददाता पुरारिक। चिदानन्दसन्दोहमोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रमो मन्मयारिः ॥६॥ यायामानावपादारविन्द मजन्तीह लोके परे वा नराणाम् । न तात्सुखं शान्तिसन्तापनाशं प्रसीद प्रमो सर्वभूताधिवास ॥७॥ न जानामि योगं पं नैव पूजा नतोऽहं सदा सर्वदा देव तुम्यम् । नाशक और हायमें त्रिशूल धारण करनेवाले हैं उन भावगम्य भवानी- पतिका में भजन करता हूँ॥ ५॥ हे प्रभो 1 आप कारहिता कल्याणकारी और कल्पका अन्त करनेवाले हैं। आप सर्वदा सत्पुरुषों को आनन्द देते हैं, आपने त्रिपुरासुरका नाश किया था. आप मोहनाशक और ज्ञानानन्दघन, परमेश्वर हैं, कामदेवके आप शत्रु है, आप मुझपर प्रसन्न हों, प्रमन्न हो ॥ ६ ॥ मनुष्य जबतक उमाकान्त महादेवजीके चरणारविन्दोका भजन नहीं करते, उन्हें इहलोक या परलोकमें कभी सुख और शान्तिको प्राप्ति नहीं होती और न उनका सन्ताप ही दूर होता है। हे समस्त भूतोंके निवासस्थान भगवान् शिव ! माप मुशार प्रसन्न ॥ ७॥ हे प्रभो ! है शम्भो ! हे ईश! मैं है शिवस्तोत्राणि जराजन्मस्खौघतातप्यमानं प्रमी पाहि शापानमामीशशम्मो ॥ ८ ॥ रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण विप्रेण हरतुष्टये। ये पठन्ति नरा मस्त्या तेषां शम्भुः प्रसोदति ॥९॥ इति भीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं सम्पूर्णम् । १६-श्रीपशुपत्यष्टकम् ध्यानम् ध्यायेनित्यं महेशं रजतगिरिनिमं चारुचन्द्रावतंसं रसाकल्पांज्याला परशुमृगवरामीतिहस्तं प्रसन्नम्। योग, जा और पूजा कुछ भी नहीं जानता, हे देय ! मैं सदा आपको नमस्कार करता हूँ। जरा, जन्म और दुःखसमूहसे सन्तप्त होते हुए मुस दीनकी आप शारसे रक्षा कीजिये ॥८॥ जो मनुष्य भगवान् शंकर की तुष्टिके लिये ब्राह्मणद्वारा कहे हुए इस रुद्राटककामविपूर्वक पाठ करते हैं, उनपर शङ्करजी प्रसन्न होते हैं।॥९॥ चाँदीके पर्वतममान जिनकी श्वेत कान्ति है, जो सुन्दर चन्द्रमाको आभूषणम्पसे धारण करते हैं, रत्नमय अलङ्कारोंसे जिनका शरीर उज्वल है, जिनके हाथोंमें परशु, मृग, वर और अमय है, जो प्रसन्न हैं, पद्मके आसनपर विराजमान है, देवतागण जिनके चारों ओर खड़े होकर स्तुति

मनापावापनी
पमासीनं समन्तात्स्तुनममरगणे पनि यशानं
विधायं विश्वचीज निपिलमगहरं पश्यत्रिनेत्रम् ।।
.
स्तोत्रम्
पशुर्ति ग्रुपति धरणीपति भुजगलोकपतिं च सतीपतिम् ।
प्रणतमक्तजनातिहरं परं मजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ १॥
नजनको जननीनचसोदरोनतनपोनचभूरिवलं कुलम् ।
अवति कोऽपिन कालवशंगतं भजत रेमनुजा गिरिजापतिम्।।२।।
मुरजडिण्डिमवाद्यविलक्षणं मधुरपश्चमनादविशारदम् ।
प्रमथभूतगणैरपि सेवितं मजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ३ ॥
करते हैं, जो बाघकी खाल पहनते हैं, जो विश्वके आदि जगत्की उत्पत्तिके
बीज और समस्त भयोंको हरनेवाले हैं, जिनके पाँच मुख और तीन नेत्र
हैं, उन मदेश्वरका प्रतिदिन ध्यान करे।
अरे मनुप्यो ! जो समस्त प्राणियों, स्वर्ग, पृथ्वी और नागलोकके
पति हैं, दक्ष-कन्या सतीके स्वामी हैं, शरणागत प्राणियों और भकजनोंकी
पीडा दूर करनेवाले हैं, उन परमपुरुष पार्वती-वल्लम शंकरजीको
भजो॥ १ ॥ऐ मनुष्यो ! काळके वशमें पड़े हुए जीवको पिता, माता, माई
बेटा, अत्यन्त बल और कुल-इनमेंसे कोई भी नहीं बचा सकता।
इसलिये तुम गिरिजापतिको भजो ॥ २ ॥रे मनुष्यो ! जो मृदङ्ग और
डमरू बजानेमें निपुण हैं, मधुर पञ्चम स्वरके गायनमें कुशल हैं, प्रमय
और भूतगण जिनको सेवामें रहते हैं, उन गिरिजापतिको मजो ॥ ३॥

शिवस्तोत्राणि शरणदं सुखदं शरणान्वितं शिव शिवेति शिवेति नतं नृणाम् । अमयदं करुणावरुणालयं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ।। ४ ।। नरशिरोरचितं मणिकुण्डलं भुजगहारमुदं धूपभध्वजम् । चितिरजोधवलीकृतविग्रहं मजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ५॥ मखविनाशकरं शशिशेखरं सत्ततमध्वरमानि फलप्रदम् । प्रलयदग्धसुरासुरमान भजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ६॥ मदमपास्य चिरं हृदि संस्थितं मरणजन्मजराभयपीडितम् । जगदुदीक्ष्य समीपमयाकुलं भजत रे मनुजा गिरिजापतिम्।। ७ ॥ हरिविरश्चिसुराधिपपूजितं यमजनेशघनेशनमस्कृतम् । हे मनुष्यो ! शिव ! शिव ! शिव ' कहकर मनुष्य जिनको प्रणाम करते हैं, जो शरणागतीको शरण, सुख और अभय देनेवाले हैं, उन दयासागर गिरिजापतिका भजन करो ॥४॥ अरे मनुष्यो ! जो नरमुण्डरूपी मणियोंका कुण्डल और साँपोंका हार पहनते हैं, जिनका शरीर चिताकी धूलिसे धूसर है, उन वृषभध्वज गिरिजापतिको भजो ॥ ५ ॥रे मनुष्या ! जिन्होंने दश-यसका विध्वंस किया था, जिनके मस्तकार चन्द्रमा सुशोभित है, जो यश करनेयालोको सदा ही फल देनेवाले है और जो प्रलयकी अमिमे देवता, दानव और मानवोंको दग्ध करनेवाले हैं, उन गिरिजापतिको मजो ॥ ६ ॥ अरे मनुष्यो ! जगत्को जन्म, जरा और मरणके भयसे पीड़ित, सामने उपसित भयो भ्याकुल देखकर बहुत दिनोंसे हृदय में सचित मदका त्याग कर उन गिरिजापति को भजो ॥ ७॥ २ मनुष्यो ! विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र जिन पूजा करते हैं. 'यम स्तोत्ररत्रायली hord त्रिनयनं भुवनत्रितयाधिपं मजत रे मनुजा गिरिजापतिम् ॥ ८॥ पशुपतेरिदमष्टकमद्भुतं विरचितं पृथिवीपतिरिणा । पठति संशृणुते मनुजः सदा शिवपुरीं वसते लमते मुदम् ॥ ९॥ इति श्रीपृथिवीपतिरिविरचितं श्रीपशुपत्यष्टकं सम्पूर्णम् । १७-श्रीविश्वनाथाष्टकम् गलातरङ्गरमणीयजटाकलाप गोरीनिरन्तरविभूषितवामभागम् । नारायणप्रियमनङ्गमदापहारं वाराणसीपुरपति मज विश्वनाथम् ॥ १॥ वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं और कुबेर जिनको प्रणाम करते हैं, जिनके तीन नेत्र तपा जो 'पिभुयनके स्वामी हैं, उन गिरिजापतिको भजो ॥८॥ मनुष्य पृथ्वीरति सूरके पनाये हुए इस अद्भुत पशुति-अष्टकका भदा ही पाठ और भयण करता है, यह शिवपुरीमें नियास करता और मानन्दित रोता ॥९॥ किनकी जटार गन्नानीकी लहरोंसे मुन्दर प्रतीत होती है, जिनका रामभाग मा पार्वती जी मुशोभित रहता है, जो नारायण मिप और अपर मदरानापनेवाले हैं, उनकाशीपति विनापको मन ॥१॥ too विरान नहीं तोसमा बिन भनेक गुण और अनेक शिवस्तोत्राणि ----------- ------ वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम् । चामेन विप्रहवरेण कलत्रवन्तम् । वाराणसी० ॥२॥ भूताधिष भुजगभूषणभूषिताङ्गं घ्याघ्राजिनाम्बरधरं जटिलं त्रिनेत्रम् । पाशाङ्कुशामयवरप्रदशूलपाणिम् । वाराणसी० ॥३॥ शीतांशुशामितकिरीटबिगजमान मालेक्षणानलविशापितपञ्चचाणम् । नागाधिपारचितमासुरकर्गपूरम् । वाराणसी० ॥४॥ पश्चाननं दुरितमचमताजाना नागान्तकं दनुजपुशवपभगानाम् । स्वरूप हैं, 'ममा, विष्णु और अन्य देवता जिनकी चरणपादुकास सेवन करते हैं, जो अपने सुन्दर घामानके द्वारा दी सपनीक हैं, उन पाशीपति विश्नापको भज ॥ २ ॥ जो भूसोंके अधिपति है, जिनका शरीर सर्परूपी गहनोंसे विभूषित है, जो पापको खालका उम्र पहनते हैं, जिनके हापोंमें पाश, अंकुश, अभय, घर और शूल है, उन जटाधारी त्रिनेत्र काशीवि विश्वनाथको मज ॥३॥ जो चन्द्रमामारा प्रकाशित किरीटसे घोभित है, जिन्होंने अपने भास नेकी अमिसे कामदेसको पर दिया. जिनके कानों में पढ़े-बड़े सांपोंके कुण्डल चमकर है, उन काति विश्वनापको मज ॥४॥ो पापरूपी मतवाले सपियों के मारनेवाले सिंह त्यसमूहरूपी सांपों का नाश करनेवाले गार वा डओ मरण, सपनापनी दावानलं मरणशोकजराटवीनाम् । धाराणसी० ॥५॥ तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीय- मानन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम् । नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपम् । याराणसी० ॥६॥ रागादिदोपरहित खजनानुराग वैराग्यशान्निनिलयं गिरिजासहायम् माधुर्यधैर्यसुमगं गरलामिरामम् । वाराणसी० ॥७॥ आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दा पापेरतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ । आदाय हृत्कमलमध्यगत परेशम् । वाराणसी० ॥८॥ शोक और बुढ़ापारूपी भीषण धनके जलानेवाले,दावानल हैं, ऐसे काशी- पति विश्वनाथको भज ॥ ५ ॥ जो तेजपूर्ण, सगुण, निर्गुण, अद्वितीया आनन्दकन्द, अपराजित और अतुलनीय हैं, जो अपने शरीरपर सॉपोंको धारण करते हैं, जिनका रूप हास-वृद्धिरहित है, ऐसे आत्मस्वरूप काशीपति विश्वनापको भज ॥ ६ ॥ जो रागादि दोषोंसे रहित हैं। अपने मतोपर कृपा रखते हैं, वैराग्य और शान्तिके स्थान हैं, पार्वतीजी सदा जिनके साथ रहती हैं, जो धीरता और मधुर स्वभावसे सुन्दर जान पड़ते हैं तथा जो कण्टमें गरलके चिहसे सुशोभित हैं, उन काशीपति विश्वनाथको मज ॥il सब आशाओंको छोड़कर, दूसरोंकी निन्दा त्यागकर और पापकर्मले अनुराग हटाकर, चित्तको समाधि लगाकर, हृदयकमलमें प्रकाशमान

शिवस्तोत्राणि
वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
न्याख्यावमष्टकमिदं पठते मनुष्यः ।
विद्या नियं विपुलसौख्यमनन्तकीति
सम्प्राप्य देहविलये लमते च मोक्षम् ।। ९॥
विश्वनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छिवसनिधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥१०॥
इति श्रीमहर्षिव्यासप्रणीतं श्रीविश्वनाथाष्टकं सम्पूर्णम् ।
परमेश्वर काशीपति विश्वनायको भज ॥ ८॥ जो मनुष्य कादीपति दिविके
इस आठ श्लोकोंके स्तवनका पाठ करता है, वह विद्या धन, मधुर सौख्य
और अनन्त कीर्ति प्राप्तकर देहावसान होनेपर मोक्ष भी पास कर
लेता है ॥ ९ ॥ जो शिषके समीप इस विश्वनाथाष्टकका पाठ करता है यह
शिवलोक प्राप्त करता और शिवके साथ आनन्दित होता है ॥ १० ॥

ॐ
शक्तिस्तोत्राणि
.
3
..
१८-ललितापचकम्
प्रातः मरामि ललितावदनारविन्द
विम्याघरं पृपुलमौक्तिकशामिनासम् ।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलायं
मन्दसिनं मृगमदांज्ज्वलमालदेशम् ।।१।।
प्रातर्मजामि ललिताभुजकलरवहीं
रक्तामुलीयलसदालिपल्लवान्याम्
माणिस्यहेमवलयाङ्गदशोममानां
मैं प्रातःकाल श्रीललितादेवीके उस मनोहर मुखकमलका सरण
करता हूँ, जिसके बिम्बसमान रक्तवर्ण अधर, विद्याल मौकिक (मोतीके
बुलाक ) से सुशोभित नासिका और कर्णपर्यन्त फैले हुए विस्तीर्ण
नयन है, जो मणिमय कुण्डल और मन्द मुसकानसे युक्त है तथा जिसन
ललाट कस्तूरिकातिलकसे सुशोमित है ॥ १॥ मैं भीललितादेवीकी भुजा-
रूपिणी कस्पलताका प्रातःकाल मरण करता हूँ, जो पल अँगूठीसे
सुशोभित सुकोमल अंगुलिरूप पल्लवोंवाली तथा रनखचित सुवर्णकाम और

शकिस्तोत्राणि ३ घुम्देक्षुचापकुसुमेषुसृणीदधानाम् ॥२॥ प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्द मक्तेष्टदाननिरतं मवसिन्धुपोतम् । पासनादिसुरनायकपूजनीयं पमाङ्कुशध्वजसुदर्शनलाञ्छनाढ्यम् ॥३॥ प्रातः स्तुवे परशियां ललियां भवानी अय्यन्तवेद्यविमा करूपानवद्याम् । विश्वस्य सृष्टिविलयस्थितिहेतुभूता विषेश्वरी निगमवाङ्मनसाविद्रराम् ॥ ४ ॥ प्रातर्वदामि ललिते तब पुण्यनाम कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति । अन्नदादिसे भूषित है एवं जिम्ने पुण्ड्र-ईसके धनुप, पुष्पमय बाण और अश धारण किये हैं ॥ २ ॥ मैं श्रीललितादेवीके चरणकमलोको, जो भकोंको ममीट पल देनेवाले भौर संगरसागरके लिये सुद जहाजरूप में सपा कमलासन भीनमाजी आदि देवेश्वरोंसे पूजित और पना मश, ध्वज एवं सुदर्शनादि मङ्गलमय विष्ठोसे युक हैं। हूँ॥३॥ जिन मद वेदान्तवेद्य है, जो है। विक्षी साति, स्थिति देवी तथा १ - . ..मैं तेरे पुण्य- वाग्देवी वा ७...

Marat श्रीशाम्मानि नगर्दा जननी परेनि वाग्देवतेति बनसा गिरेपनि ॥५॥ यः सम्पयामिद सलिम्पिा: गीमाग्पद गुललितं पठति प्रमाने । तस्मै ददाति सलिवा सटिति प्रामा चिया प्रिय विमलमास्थ्यमनन्तकी तिम् ॥६॥ प्रति मारामाह मनिराज गपूर्णम . १६--मीनाक्षीपञ्चरतम् उद्यानुसहस्रकोटिसदृशां केपहारोज्वला चिम्पोष्ठी मिनदन्तपङ्क्तिरुचिरां पीताम्बरालकृताम् । त्रिपुरेश्वरी आदिया प्रातःकाल अपनी वाणीद्वारा उधारण करता हूँ ॥ ५॥ माना ललिताके अति सौमाग्यप्रद और मुललित इन पाँच दलोकोंको जो पुरुष प्रातःकाल पढ़ता है, उसे शीघ्र ही प्रसन्न होकर ललितादेवी विद्यार धन, निर्मल'मुख और अनन्त कीर्ति देती हैं ॥ ६ ॥ जो उदय होते हुए सहस्रकोटि सू”क सदृश आभावाली हैं, केमूर और हार आदि आभूषणोंसे भव्य प्रतीत होती हैं, बिम्बाफलके समान । ओठोगली हैं, मधुर • मुसकानयुक्त दन्तावलिसे जो सुन्दरी मालूम पूर्णचन्द्र के समान है, जो नकारते हुए नूपुर (पायजेब), किङ्किणी (करधनी) शक्तिस्तोत्राणि विष्णुप्रझसुरेन्द्रसेवितपदां तवस्वरूपा शिका मीनाक्षी प्रणतोऽसि सन्ततमहं कारुण्यारानिधिम् ॥ १॥ भुताहारलसकिरीटरुचिरा पूर्णेन्दुवक्त्रणमा शिअन्न पुरकिरिणीमणिधरा पद्मप्रमामासुराम । सर्वाभीष्टफलप्रदागिरिसुतावाणीरमासेविताम् । मीनाधीशा श्रीविद्या शिवयाममागनिलयां हीकारमन्त्रीज्मला श्रीधकाशितविन्दुमध्यवसति श्रीमत्समानायिकाम् । श्रीमत्पण्मुखविनराजजननीं श्रीमजगन्मोहिनीम् । मीनाक्षी०॥ होती है तथा पीताम्बरसे अलता है। ब्रह्मा, विष्णु आदि देवनायकोंसे सुसेवित चरणोंवाली उन तत्त्यसरूपिणी कल्याणकारिणी करुणावरुणालया श्रीमीनाक्षीदेवीका मैं निरन्तर चन्दन करता हूँ ।॥ १ ॥ जो मोतीकी लड़ियों. से मुशोभित मुकुट धारण किये सुन्दरी मालूम होती है, जिनके मुखको प्रमा तथा अनेकों मणियाँ धारण किये हुए हैं। कमलकी सी आभासे मासिल हो वाली, सबको अभीष्ट फल देनेवाली) उन गिरिराजनन्दिनी क... - करता आदिसे सेपिता --मनिरन्तर यन्दन विराजमान मध्यमें निवास कार्तिकेय और, है,

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स्तोत्ररायली
श्रीमत्सुन्दरनायिका भयहरं ज्ञानप्रदा निर्मला
श्यामामां कमलासनाचिंतपदा
नारायणस्यानुजाम् ।
वीणावेणुमृदङ्गवायरसिकां नानाविधामम्बिकाम् ।मीनाक्षी०॥४॥
नानायोगिमुनीन्द्रहृत्सुवसतिं
नानार्थसिद्धिप्रदा
नानापुष्पविराजिताङ्घ्रियुगला नारायणेनार्चिताम् ।
नादब्रममयी परात्परतरांनानार्थतत्वात्मिकाम् ।मीनाक्षी० ॥५॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं मीनाक्षीपञ्चरत्नं सम्पूर्णम् ।
हैं, शानप्रदायिनी है, निर्मला और श्यामला है, कमलासन श्रीब्रह्माजीद्वारा
जिनके चरणकमल पूजे गये हैं तथा श्रीनारायण (कृष्णचन्द्र) की
को अनुजा ( छोटी बहन ) है; यीणा, वेणु, मृदङ्गादि यादोंकी रसिका
.उन विचित्र लीलाविहारिणी करुणावरुणालया श्रीमीनाक्षीदेवीकर मैं
निरन्तर यन्दन करता हूँ॥४॥ जो अनेकों योगिजन और मुनीश्वरोके
हृदयमें नियास करनेवाली तया नाना प्रकारके पदार्थोकी प्राप्ति कराने
पाली है, जिनके चरणयुगल विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित हो रहे हैं, जो
भीनारायगये पूजिता है तथा जो नादनक्षमयी, परेसे मी परे और नाना
• तत्वम्वरूपा । उन फरणावरुणालया भीमीनाशीदेयीका में
पन्दन करवा ॥५॥

सशक्तिस्तोत्राणि २०-देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम् न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो न चाहानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः । न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम् ॥ १॥ विधेग्ज्ञानेन द्रविणविरहेणालसतया विधेयाशक्यत्वातव चरणयोर्या च्युतिरभूत् । तदेतत्क्षन्तव्यं जननि सकलोद्धारिणि शिवे कुपुत्रो जायेत कचिदपि कुमाता न भाति ॥ २॥ पृथिव्यां पुत्रास्ते जननि बहवः सन्ति सरलाः परं तेषां मध्ये विरलतरलोऽहं तर सुतः । है मातः! मैं तुम्हारा मन्त्र, यन्त्र, स्तुति, आवाहन, ध्यान, स्तुतिकथा, मुद्रा तथा विलाप कुछ भी नहीं जानता; परन्तु सब प्रकारके क्लेशोंको दूर करनेवाला आपका अनुसरण करना (पीछे चलना) ही जानता हूँ ||१|| सबका उद्धार करनेवाली हे कल्यागमयी माता! तुम्हारी पूजाकी विधि न जाननेके कारण, धनके अभाव, आलस्यसे और उन विधियोंको अच्छी तरह न कर सकनेके कारण, शुम्हारे चरणों की सेवा करने में जो भूल हुई हो उसे उमा करो, क्योंकि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ॥ २॥ मा ! भूमण्डलमें तुम्हारे सरल पुष भनेको हैं पर उनमें एक मैं विरला ही पड़ा चमल हैं। तो मोरे शिवे । मुझे सोत्रामापी मदीयोऽर्ग रयागः समुनियमिदं नो गर मित्र फुपूयो जायेत कचिदपि कुमावा न मावि ॥३॥ जगन्मातर्मातम्तय घरणसेवा न रचिता न वा दत्त देवि द्रविणमपि भूयस्तय मया । तथापि त्वं स्नेहं मयि निरुपम यत्प्रकुरपे फुपुत्रो जायेत कचिदपि कुमार न भवति ॥४॥ परित्यक्ता देवा रिधिविधिसे गलतया मया पश्चाशीतेरधिकमपनीते तु ययामि। इदानी चेन्मातस्तव यदि कृपा नापि भविता निरालम्पो लम्बोदरजननि के यामि शरणम् ॥५॥ श्वपाको जल्पाको भवति मधुपाकोपमगिरा निरातको रङ्को विहरति चिरं कोटिकनकैः । त्याग देना तुम्हें उचित नहीं, क्योंकि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ॥ ३ ॥ हे जगदम्य ! हे मातः ! मैंने तुम्हारे चरणों की सेवा नहीं की अथवा तुम्हारे लिये प्रचुर धन मी समर्पण नहीं किया तो भी मेरे ऊपर यदि तुम ऐसा अनुपम स्नेह रखती हो तो यह सच ही है कि पूत तो कुपूत हो जाता है पर माता कुमाता नहीं होती ॥ ४ ॥ हे गणेशजननि ! मैंने अपनी पचासी वर्षसे अधिक आयु थीत जानेपर विविध विधियोद्वारा पूजा करनेसे घबड़ाकर सब देवोंको छोड़ दिया है, यदि इस समय तुम्हारी कृपा न हो तो मैं निराधार होकर धरणमें गाऊँ। ॥५॥ हेमावा अपर्णे । यदि हारे मन्त्रावकि शक्तिस्तोत्राणि तवापर्णे कर्णे विशति मनुवणे फलमिदं जनः को जानीते जननि जपनीयं जरविधो ॥६॥ चिता मसालेपो गरलमशनं दिक्पटधरा जटाधारी कण्ठे भुजगपतिहारी पशुपतिः । कपाली भूतेशो भजति जगदीश कपदीं मवानि स्वरपाणिग्रहण रिपाटीफलमिदम् ॥७॥ न मोक्षस्थाकाङ्क्षा भाविभवान्छापि च न मे न विज्ञानापेक्षा शशिमुखि सुखेच्छापि न पुनः । अतस्त्वां संयाचे जननि जननं मातु मम वै मृडानी रुद्राणी शिव शिव भवानीवि जपतः ॥८॥ कानमें पड़ते ही चाण्डाल मी मिठाईके समान सुमधुरवाणीसे युक्त पड़ा भारी वक्ता बन जाता है और महादरिद्र भी करोड़पति बनकर चिरकालतक निर्भय विचरता है तो उसके जपका अनुशन करनेपर जपनसे जो फल होता है उसे कौन जान सकता है ।।६॥ जो चिताका मस्त रमाये हैं, विप खाते हैं, नंगे रहते हैं, जहान यांधे है, गलेमें सर्पमाल पहने हैं, हायमें खप्पर लिये हैं। पशुपति और भूतोंके स्वामी है ऐसे शिवजोने भी जो एकमात्र जगदीश्वरकी पदवी प्राप्त की है वह हे भवानि ! तुम्हारे साथ विवाद होनेका ही फार है । ७ ॥ हे चन्द्रमुखी माता! मुझे मांस का इस नहीं है। सांसारिक वैभवको भी लालसा नहीं है, विज्ञान तथा सुसकी भी अभिलाषा नहीं है। इसलिये मैं तुमसे यही मांगता हूँ कि मेरी सारी आयु मुनी रुद्राणी, शिव- शिमाती भारदे मामाके जरते-डरते ही पीते ।

स्तोत्ररक्षापली नाराधितासि विधिना विविधोपचार: किरुयाचिन्तनपरैर्न का वचोमिः । श्यामे त्वमेव यदि किश्चन मय्पनाये धत्ते कृपामुचितमम्ब परं तय ॥९॥ आपत्सु मग्न: सरणं त्वदीयं करोमि दुर्गे दुर्गे करणार्णवैशि। नैतन्छठत्वं मम भावयेया: क्षुधावपार्वा जननी स्मरन्ति ॥१०॥ जगदम्ब विचित्रमत्र किं परिपूर्णा करुणास्ति चेन्मयि । अपराधपरम्परावृतं नहि माता समुपेक्षते सुतम् ।।११॥ मत्समः पातकी नास्ति पापनी त्वत्समा न हि । हे श्यामे ! मैंने अनेको उपचारोंसे तुम्हारी सेवा नहीं की ( यही नीं, इसके विपरीत ) भनिष्टचिन्तनमें वत्पर अपने वचनोंसे मैंने क्या नहीं किया ? ( अर्थात् अनेका मुराइयाँ की हैं) फिर भी मुझ अनाथपर यदि तुम कुछ कृपा रखती हो तो यह तुम्हें बहुत ही उचित है, क्योंकि मुम मेरी माता हो ॥ ९॥ हे दुर्गे दयासागर महेश्वरी! जब मैं किसी विपतिमें पड़ता हूँ तो तुम्हारा ही सरण करता हूँ, इसे मुम मेरी दुष्टता मत समझना, क्योंकि भूखे प्यासे बालक ही याद किया करते है॥१०॥ हे जगजननी ! मुझपर कृपा है। इसमें आभर्य ही क्या है। क्योंकि अनेक अपराधोंसे : मी माता त्याग नहीं देती ॥ ११ ॥हे महादेवि ! मेरे समान शास्तोत्रागि एवं ज्ञात्वा महादेवि यथा योग्यं तथा कुरु ॥१२ २१--भवान्यष्टकम् न तातो न माता न पन्धुर्न दाता न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता । न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१॥ भवाब्धावपारे महादुःखमीरुः पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः। कुसंसारपाशप्रबद्धः सदाहम् । गतिस्त्वं ॥२॥ न जानामि दानं न च ध्यानयोगं कोई पापी नहीं है और तुम्हारे समान कोई पाप नाश करनेवाली नहीं है यह जानकर जैसा उचित समझो करो ॥ १२ ॥ हे भवानि ! पिता, माता, भाई, दाता, पुत्र, पुत्री, भृत्य, स्वामी, स्त्री विद्या और वृचि-इनमेंसे कोई भी मेरा नहीं है, हे देवि ! एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ।। १ ।। मैं अपार भवसागरमें पड़ा हुआ हूँ, महान् दुखोंसे भयभीत हूँ। कामी लोभी, मतवाला तथा गायोग्य संसारके बन्धनोंमें बधा हुआ हूँ, हे भवानि ! अब एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो ॥२॥ देवि ! मैं न तो दान देना जानता हूँ और न भ्यानमार्गका ही मुझे पता है, कोटोपनमन्चेहेननही है. पूजापान कर न्यानरहरदा कुष्टिः उवासमन्प: सदाइम् । गतिस्त्वं ॥५/- नदानानि चान्य समाई शरन् । गाविस ॥६॥ जान्न! बीरूपाइन् राइरसकुमारसनगन्य राखि मानाननं न वन्यन् । न जानामि पूजन नयानयोग । गनिम्नगा। नानानि पुर्वन नाभि मार्च न जानानि मुनि कदाचित् । न जानामि मा मनं ति मावि ॥४॥ हामी सुमही सुद्धः दासः स्मानारहीनः मह गरे दिने निसीपमा वा कदाचित । कदापारीनः। . प्रजेरं रमे पर मटक माम!

शक्तिस्तोत्राणि विवाद विपादे प्रमादे प्रयासे जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये। अरण्ये शरण्ये सदा म प्रशाहि । गतिस्त्वं ॥७॥ अनाथी दरिद्रो जरारोगयुक्तो महाक्षीणदीन:सदानावरक्या। विपत्ती प्रविष्टः प्रणयः सदाहम् । गतिस्त्व० ॥८॥ इति भीमरानात भापक मापूनम । २२-आनन्दलहरी मानि स्तोतुं वो प्रमाति पतुभिन पदनैः प्रजानामीशानसिपुरमयनः परामिपि । घर म भिमाद : मम नया भर ही मेरी मलानमार प्रीति मान: रामनापा र जए-गम गंगा भारत राना गा र मोर ना. भAR मरी गो॥८॥ रेपsari ने Stsit नु परने irrita rist tiem at: TIMERR५ * Pri मारली न पड्मिः सेनानीदेशशतमुसैरप्यहिपति- सदान्या केप कथय कथमसिमयमरः ॥ १॥ घृतक्षीरद्राक्षामधुमधुरिमा फेरपि पर्द- विशिष्यानाख्येयो मयति रसनामात्रविषयः । तथा ते सौन्दर्य परमशिवमात्र विषयः फथशारं घूमः सम्लनिगमागोचरगुणे ॥ २ ॥ मुखे ते ताम्बूलं नयनयुगले फजलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता। स्फुरत्काची शाटी पृथुकटिवटे हाटकमयी असमर्थ है, इन इने-गिने मुखवालोंकी तो बात ही क्या है, नागराज शेष हजार मुखोंसे भी मुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्हीं बताओ जब इनकी यह दशा है तो दूसरे किसको और किस प्रकार तुम्हारी स्वविका अवसर प्राप्त हो सकता है । ॥१॥ घी, दूध, दास और मधुकी मधुरताको किसी भी शब्दसे विशेषरूपसे नहीं बताया जा सकता, उसे तो केवळ रसना (जिहा) ही जानती है । इसी प्रकार तुम्हारा सौन्दर्य केवळ महादेवजीके नेत्रोंका ही विषय है, उसे हम क्योंकर बता! हे देवि ! गरे गुणोंका वर्णन तो सारे वेद भी नहीं कर सकते ॥ २ ॥ तुम्हारे 'मुखमें पान है, नेत्रोंमें काजलकी पतली रेखा है, ललाटमें केसरकी वेदी है। गलेमें मोतीका हार सुशोमित हो रहा है, कटिके निम्नमागमें सुनहली साड़ी .: रत्नमयी मेखला ( करधनी ) चमक रही है, ऐसी वेष- हुई गिरिराज हिमालयकी गौरवर्णा कन्या सुमको मैं सदाहरी

शतिस्तोत्राणि
मजामित्यां गौरी नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥३॥
विराजन्मन्दारदुमकुसुमहारस्तनतटी
नदद्वीणानादश्रवणविलसत्कृण्डलगुणा ।
नवाङ्गी मातङ्गीरुचिरगतिमङ्गी भगवती
सती शम्भोरम्मोरुहचटुलचक्षुर्विजयते ॥४॥
नवीनार्कम्राजन्मणिकनकभूपापरिकर-
पताङ्गी सारङ्गीरुचिरनयनाङ्गीकृतशिवा ।
तडित्पीता पीताम्बरललितमजीरसुभगा
ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ॥५॥
भजता हूँ॥ ३॥ जहाँ पारिजात-पुष्पकी माला सुशोभित हो रही है उन
उरोजों के समीप पजती हुई वीणाका मधुर नाद श्रवण करते हुए जिनके
कानौम कुण्डल शोभा पा रहे हैं, जिनका अन एका हुआ है, हथिनीकी
भाँति जिनकी मन्द-मनोहर चाल है, जिनके नेत्र कमटके समान सुन्दर
और चञ्चल है ये शम्भुकी सती भार्या भगवती उमा सर्वत्र विजयिनी हो
रही हैं।।४॥ जिनका अङ्ग नवोदित बाल रविके समान देदीप्यमान मगि
और सोने के आभूषणोंसे अलङ्कत है, मृगीके समान बिनके विशाल एवं
सुन्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिवको पविरूरसे स्वीकार किया है, रिमीके समान
मिनकी पीत प्रभा है, जो पीत पत्रकी प्रमा पपनेसे और अधिक
सुन्दर प्रवीव होनेवाले मजीरको चरणों में धारण करके मुशोभित हो रही है
निरविश्य मानन्दसे पूर्ण भगवती भरर्मा मुकार सुनकर रों॥५॥

७५ hinnat न पद्मिः रोनानीर्दशनसरप्याहिपनि सादान्येषां के कथय कथमसिनासरः ॥१॥ घृतधीरदायामधुमधुरिमा फेरपि पदे- शिशिष्यानाख्येयो मति रसनामात्रविषयः । तथा ते सौन्दर्य परमशिवाइमात्र विषयः कयकारं घूमः सम्लनिगमागांचरगुणे ॥२॥ मुसे ते वाम्यूलं नयनपुगले फजलकला ललाटे काश्मीरं विलसति गले मौक्तिकलता। स्फुरत्काञ्ची शाटी पृथुकटितटे हाटकमयी असमर्थ न इने-गिने मुखयालीकी तो मात ही क्या है, नागराज योग हजार मुखोंसे भी तुम्हारा गुणगान नहीं कर पाते, फिर तुम्ही बताओ जब इनकी यह दया है तो दूसरे किसको और किस प्रकार तुम्हारी खतिका अवसर प्राप्त हो सकता है । ॥ १॥ घी, दूध, दाख और मधुकी मधुरताको किसी भी शब्दसे विशेषरूपसे नहीं बताया जा सकता, उसे तो केवळ रसना (जिहा) ही जानती है । इसी प्रकार तुम्हारा सौन्दर्य केवळ महादेवजीके नेत्रोंका ही विषय है, उसे हम क्योंकर बता । हे देवि ! तुम्हारे गुणोंका वर्णन तो सारे वेद भी नहीं कर सकते ॥ २॥ तुम्हारे मुखमें पान है, नेत्रोंमें काजलकी पतली रेखा है, ललाटमें केसरकी पेंदी है, गलेमें मोतीका हार सुशोभित हो रहा है, कटिके निम्नभागमें सुनहली सादी है, जिसपर रत्नमयी मेखला ( करधनी ) चमक रही है, ऐसी वेष. भपासे सजी हुई गिरिराज हिमाल्यकी गौरवर्णा कन्या हमको मैं सदाही

शक्तिस्तोत्राणि
मजामित्वां गौरी नगपतिकिशोरीमविरतम् ॥३॥
विराजन्मन्दारदुमकुसुमहारस्तनतटी
नदद्वीणानादश्रवणविलसत्तण्डलगुणा ।
नवाङ्गी भावङ्गीरुचिरगतिमङ्गी भगवती
सती शम्भोरम्भोरुहचटुलचक्षुर्विजयते ॥४॥
नवीनार्कम्राजन्मणिकनकभूपापरिकर-
घृताङ्गी सारङ्गीरुचिरनयनाङ्गीकृतशिवा ।
तडित्पीता पीताम्बरललितमजीरसुमगा
। ममापर्णा पूर्णा निरवधिसुखैरस्तु सुमुखी ॥ ५॥
भजता हूँ॥ ३ ॥ जहाँ पारिजात-पुष्पकी माला सुशोभित हो रही है उन
उरोजोंके समीप रजती हुई वीणाका मधुर नाद श्रवण करते हुए जिनके
का!कुण्डल शोमा पा रहे हैं, जिनका अन झुका हुआ है, हथिनीकी
माँति जिनकी मन्द-मनोहर चाल है, जिनके नेत्र कमटके समान सुन्दर
और चञ्चल हैं। वे शम्भुकी सती मायर्या भगवती उमा सर्वत्र विजयिनी हो
रही हैं। जिनका अस नवोदित बाल रविके समान देदीप्यमान मांग
और सोने के आभूषणोंसे अलङ्कृत है। मृगीके समान जिनके विशाल एवं
सुन्दर नेत्र हैं, जिन्होंने शिवको पविरूपसे स्वीकार किया है, बिजली के समान
जनकी पीत प्रमा है, जो पीत वरकी प्रमा पड़नेसे और अधिक
न्दिर प्रतीत होनेवाले मौरको चरणों में धारण करके सुशोभित हो रही है
निरतिशय आनन्दसे पूर्ण भगवती अपर्णा मुझपर मुसकन ॥५॥

हिमा संगना गुलपित्ता रापुमा कामिर्ममरकलिता पाठकमी। कासाशुशाना मातनवा पक्तिसरया राजा इन्वी गन्त्री विठसविचिदानन्दततिका॥६॥ सपर्णामाकीणां कविषयगुणः सादरमिद पपन्त्यन्ये परली मम तु मतिर तिमति । अपर्णका सेय्या जगति सकलपत्परितः पुराणोऽपि स्थाणुः फलतिस्ठि कवस्यपदवीम्।। विधात्री धर्माणां त्वमास सकलानापजननी समस्त रोगोको नष्ट करनेपाली एकमना-फिरती निदानन्दमयी एटा (उमा) गुशोभित हो रही है, वह हिमालयसे उत्पन्न हुई सुन्दर हाप ही उसके पासप हैं, मुफाफा दर ही मुन्दर फूल है, काली-काली मलके भ्रमकी भाँति उसे आच्छन्न किये हुई हैं, स्थाणु ( रारजी अथवा दूंठ पक्ष) ही उसके रहनेका आश्रय है, उराजरूपी फलों के मारसे यह हुकी हुई। और सुन्दर वाणीरूपी रससे मरी है ॥ ६॥ दूसरे लोग कुछ ही गुणों से युक्त सपर्णा (पत्तेवाली) लताका आदरपूर्वक सेवन करते हैं, परन्तु हमारी प्रकार स्फरित होती है कि इस जगत् में सभी लोगोंको एकमात्र (पार्वती या बिना पत्तेकी एता) का ही सेवन करना चाहिये। जिससे होफर पुराना स्थाणु (हूँठ क्ष अथवा शिव) मी कैवल्यपदयी )रूप फलं देता है ॥ ७ ॥ सम्पूर्ण धर्मोकी सष्टि करनेवाली और आगमोको जन्म देनेवाली मुम्ही हा । हे देवि ! मुफेर मी मारे M शकिस्तोत्राणि स्वमर्थानां मूल घनदनमनीयाधिकमले । स्वमादिः कामानां जननि कृषकन्दर्पविजये सता मुक्तेयो त्वमसि परमप्रभमहिषी ॥८॥ प्रभूता मक्तिस्ते यदपि न ममालोलमनस- स्त्वया तु श्रीमत्या सइयमवलोक्योऽहमधुना। फ्योदः पानीयं दिशति मधुरं चातकमुखे मृशं शके कैर्वा विधिमिरनुनीता मम मतिः॥९॥ कपापाङ्गालोकं वितर तरसा साधुचरिते न ते युक्तीपेक्षा मयि शरणदीक्षामुपगते । न घेदिष्टं दद्यादनुपदमहो कल्पलतिका चरणोंकी पन्दना करते हैं, तुम्ही समस्त वेमयका मूल हो। हे कामदेवपर विजय पानेवाली मा ! कामनाओंकी आदि कारण मी तुम्ही हो। तुम परवक्षस्वरूप महेश्वरकी पटरानी हो। अतः तुम्हीं संतोंके मोक्षका बीज हो 100 मेरा मन चञ्चल है, इसलिये यद्यपि मैंने आपकी प्रचुर मति नहीं की है तथापि आप श्रीमतीको इस समय मुझपर अवश्य ही दया-दृष्टि करनी चाहिये । चातक चाहे प्रेम करे या न करे, पर मेघ तो उसके मुखमें मधुर जल गिराता ही है अथवा मुझे रड़ी शहा हो रही है कि मेरी बुदि किन विधियोवे आपमें अनुनीत हो, आपकी ओर टो।। ९॥ हे साधु चरित्रावाटी राइम पहुत शीघ्र अपनी झपाटाशयुक्त टिने मुझे निहाये। मैं तुम्हारी उरणकी दीक्षा से चुका है। अप मेरी उपेक्षा करना उचित नहीं है। पदि विशेपःसामान्यैः कशमितरवल्लीपरिकरः ॥१०॥ महान विश्वास तब घरणपकेरुङयुगे निधायान्यन्नवाधितमिह मया देवतमुमे । तथापि त्वन्तो यदि मयि न जायेत सदर्य निरालम्पो लम्बोदरजननि फैयामि शरणम् ॥११॥ अयः सर्गे लग्नं सपदि लमते हेमपदीं यथारथ्यापाथः शुचिमवति गङ्गाधमिलितम् । तथा तत्तत्पापरतिमलिनमन्तर्मम यदि त्वयि प्रेम्णासक्तं कथमिव न जायेत विमलम्॥१२॥ त्वदन्यसादिच्छाविषयफललामे न नियम- स्त्वमर्थानामिच्छाधिकमपि समय वितरणे । कल्पलता पग-पगपर अभीष्ट कामनाओं की पूर्ति न कर सके तो अन्य साधारण लताओंसे उसमें विशेषता ही कैसे रह सकती है।॥ १०॥ हे लम्बोदर गणेशको जन्म देनेवाली उमे | मैंने तुम्हारे युगल चरणारविन्दोंमें बहुत बड़ा विश्वास रखकर किसी अन्य देवताका आश्रय नहीं लियातथापि यदि तुम्हारा चित्त मुझपर सदय न हो तो अब मैं किसकी शरण जाऊँगा ! ॥११॥ जिस प्रकार लोहा पारससे छू जानेपर तत्काल सोना बन जाता है और गलियों [ के नाले ] का जल गङ्गाजीमें पड़कर पवित्र हो जाता है उसी प्रकार भिन्न-भिन्न पार्कोसे मलिन हुआ मेरा अन्तःकरण यदि प्रेमपूर्वक तुममें आसक्त हो गया तो यह कैसे निर्मल नहीं होगा ॥ १२ ॥ ईशानि ! तुमसे अन्य किसी देवतासे मनोवाञ्छित फल प्राप्त हो ही जाया शकिस्तोत्राणि इविप्राःप्रानः कमलमवनाधास्त्वयि मन- स्त्वदासक्तं नक्तं दिवमुचितमीशानि कुरु तता॥१३॥ स्फुरनानारतस्फटिकमयमित्तिप्रतिफल- वदाकारं चञ्चच्छशधरकलासौधशिखरम् । मुकुन्दब्रह्मेन्द्रप्रभृतिपरिवार विजयते वागारं रम्यं त्रिभुवनमहाराजगृहिणि ॥ १४ ॥ निरासः कैलासे विधिशतमखाद्याः स्तुतिकराः कुटुम्ब त्रैलोक्यं कृतफरपुटः सिद्धिनिकरः । महेशः प्राणेशम्तदवनिधराधीशतनये ऐसा नियम नहीं है, परन्तु तुम तो पुरुषोंको उनकी इच्छासे अधिक वस्तु मी देने में समर्थ हो--इस प्रकार ब्रह्मादि प्राचीन पुरुष कहा करते हैं। इसलिये अब मेरा मन रात-दिन तुममें ही लगा रहता है, अब तुम जो उचित समझो करो ॥ १३॥ हे त्रिभुवनमहाराज शिवकी गृहिणी शिवे ! जहाँ नाना प्रकारके रन और स्फटिकमणिकी मीतपर तुम्हारा आकार प्रतिविम्बित हो रहा है, जिसकी अशालिकाके शिखरपर प्रतिबिम्बित होकर चन्द्रमाकी कला सुशोभित हो रही है, विष्णु, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवता जिसे घेरकर खड़े रहते हैं, यह तुम्हारा रमणीय भवन विजयी हो रहा है ॥ १४ ॥ हे गिरिराजनन्दिनि! तुम्हारा केलासमें निवास है, बझा और इन्द्र आदि तुम्हारी स्तुति किया करते हैं, समस्त त्रिभुवन ही तुम्हारा कुटुम्ब है। आठों सिद्धियोंका समुदाय तुम्हारे सामने हाथ जोड़कर खड़ा रहता है और महेश्वर तुम्हारे माणनाथ है। मुम्हारे सौभाग्यकी की अस मी तुलना नहीं रक्षामनी नतेसामाग्यस्य कचिदपि मनागस्ति तुलना॥१५॥ प्पो पद्धो पानं पिमशनमाशा निवसन श्मशानं झाडापूर्वजगनिवदो मागविविः । समया सामग्री जगवि विदितै सररिपो- र्यदेतस्यैश्वर्य सब जननि सीमाम्यमहिमा ॥१६॥ प्रपत्रमा उप्रलपविपिनसगिंम्मतिः श्मशानेम्वासीनः कृतमसितलेपः पशुपतिः। दघी कण्ठे हालाहलमखिलभूगोलकपया मत्याः संगत्याः फलमिति च कल्याणि कलयो॥१७॥ त्वदीयं सौन्दर्य निरतिशयमालोक्य परया मियैवासीद्गङ्गा जलमयतनुः शैलतनये । हो सकती ॥ १५॥ हे जननि ! कामारि शिवका बूदा यैल ही पाहन है, विष ही भोजन है, दिशाएँ ही वस्त्र हैं, श्मशान हो रङ्गभूमि है और साँप ही आन- पणका काम देते हैं, उनकी यह सारी सामग्री संसारमें प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनके पास ऐश्वर्य है, यह तुम्हारे ही सौभाग्यकी महिमा है ॥ १६ ॥ हे कल्याणि ! जिनकी बुद्धि स्वभावतः समस्त ब्रह्माण्डका संहार करने में ही प्रवृत्त होती है, जो आङ्गोंमें राख पोतकर श्मशानमें बैठे रहते हैं, [ ऐसे निठुर स्वभाववाले ] पशुपतिने जो समस्त भूमण्डलपर दया करके कन्ठ, हालाहल विष धारण कर लिया उसे मैं आपके सत्संगका ही फल समझता हूँ ॥ १७ ॥ हे शैलनन्दिनि ! आपके सर्वोत्कृष्ट सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त

যকিদাখাটি।
६५
---
:
तदेवस्यास्तसावदनकमलं वीक्ष्य कृपया
प्रतिष्ठामातन्यनिजशिरसि वासेन गिरिशः॥१८॥
विशालश्रीखण्डपमृगमदासीयुमृण-
प्रसनव्यामिश्र भगवति तवाम्यङ्गमसिलम् ।
समादाय स्रष्टा चलितपदपांमूनिजकरैः
समाधचे सृष्टिं वियुधपुरपरुशाम् ॥१९॥
वसन्ते सानन्द कुमुमितलताभिः परिवृते
स्फुरनानापद्म सरसि कलहंसारिसुमगे।
'सखोमिः खेलन्ता मलयपयनान्दोलितजले
सरेधस्त्वां तस्स अरजनिवपीडापसरवि ॥२०॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिता आनन्दलहरी सम्पूर्णा ।
.
मयके कारम दी गनाजीने जलमय शरीर धारण कर लिया. इसवे गाडीके
दीन मुखकमलको देखकर सारा शहरजी उन्हें अग्ने विसर निरास
देख उनकी प्रतिमा पदाते हैं ।। १८ ॥ हे भगवति ! जिसमें विशाल चन्दन-
के रस कस्तूरी और केसरके फूल मिले हुए हैं ऐसे मुम्हारे अनुग्नके
बउको और चने हुए तुम्हारे चरणोकी धूलिको ही लेकर माजी सुरपुरकी
मनपनी पन्तिाभी ( अप्सरामों) का हाट करते हैं ॥१९॥ हे देवि !
पचन्द ने खिली हुई सताओंसे महित) नाना कम से मुशमित एवं
सोकी मण्डलीमे अरहत सरंकरके भीतर, जहाँगा जल भटमानिलले
आन्दोलित हो रहा है, उसमें ] पतियो सार कोसा करती हुरंभारको
शप पान करता है उसमेवर रोगनित पीडादूर हो जाती ॥२०॥

. हूँ॥ १७॥ शैलनन्दिनि ! आपके सर्वोत्कृष्ट सौन्दर्यको देखकर अत्यन्त गोरखापती नसीमाम्पस्य कचिदपि मनागस्ति तुलना।।१५।। पुपो पदो यानं पिमशनमाशा निक्सन श्मशान मोटामीजगनिवहो भूषणविधिः । समग्रा सामग्री जगवि विदित गाररिपो- र्यदेतस्यैश्वर्य राजननि सीमाम्यमहिमा ॥१६॥ प्रोपप्रझाउप्रलपरिधिनसगिंम्मति: श्मशानेष्वासीनः कृतमसितलेपः पशुपतिः। दधी फण्ठे हालाहलमखिलभूगोलकृपया भवत्याः संगत्याः फलमिति च कल्याणि कलये॥१७॥ त्वदीयं सौन्दर्य निरतिशयमालोक्य परया मियैवासीद्गङ्गा हो सकती ॥ १५॥ ६ जननि ! कामारि शियका पूदा पैल ही पाइन है, विष ही भोजन है, दिशाएँ ही धन है, मशान ही भूमि है और सौंप ही आ षणका काम देते हैं, उनकी यह सारी सामग्री संसार में प्रसिद्ध ही है, फिर भी जो उनके पास ऐश्वर्य है, यह तुम्हारे ही सौभाग्यकी महिमा है ॥ १६॥ हे कल्पाणि ! जिनकी बुद्धि स्वभावत: समताडका संहार करने में ही प्रवृत्त होती है, जो अग्नीमें राख पोतकर मशानमें बैठे रहते हैं निठुर स्वभावयाले ] पशुपतिने जो-समस्त भूमण्डलपर दया करके कण्डम हरालाइल विप धारण कर लिया उसे मैं आपके सत्संगका ही फल तमलता जलमयतनुः शैलतनये।

शाक्तिस्तोत्राणि
८
तदेवस्यास्वलाद्वदनकमलं वीक्ष्य कृपया
प्रतिष्ठामातन्यन्निजशिरसि बासेन गिरिशः॥१८॥
विशालश्रीखण्डद्रवमृगमदासी मृण-
प्रसूनव्यामिश्र भगवति तवाम्यनमलिलम् ।
समादाय स्रष्टा चलितपदपांमुनिजकरैः
समाधत्ते सृष्टिं विबुधपुरपङ्केरुहशाम् ।।१९।।
वसन्ते सानन्द कुमुमितलताभिः परिवृते
स्फुरनानापद्म सरसि फलहंसारिसुभगे।
सखोभिः खेल मलयपनान्दोलितजले
सरेयस्त्वां तस्य ज्वरजनिवपीडापसरति ॥२०॥
इति श्रीमन्छङ्कराचार्यविरचिता आनन्दउहरी मापूर्णा ।
भयके कारण ही गन्नाजीने जलमय शरीर धारण कर लिया. इस गमाजीके
दीन मुलकमको देखकर दयास गहरजी उन अग्ने तिर निख
देकर उनकी पवित्रा पदाते हैं 11 १८ ॥ हे भगवति ! जिनमें विशाउ धन्दन-
के रस, कस्तूरी और केसरके फूल मिले हुए हैं ऐसे तुम्हारे अनुलग्नके
जओ और चलते हुए तुहारे चरणोकी पूलिको ही लेकर जी मुरपुरकी
कमजपनी पनिवाओं ( अप्सराओं) की सटि करते हैं ॥१॥हे देवि ।
यन्त अनुन खिली हुई रुवाओंठे मपिता नाना कमोसे मुसभित एवं
सोपी मण्डलीमे अरहत सर,परके भीतर, बांका अल मापानिको
मान्दोलित हो रहा है। उसमें ] सखियों के साथ कारा करती हुभारमये
पुरर मान कर उसकी पररांगजनि पीडादूराठी ॥२०॥

सोरतापली २३-श्रीभगवतीस्तोत्रम् अप मगरति देखिनमोपरदे, जयपापविनाशिनिबाफदे। अप शुम्मानि गुम्मरुपालथरे, प्रणमामि तु देविनरातिहरे ॥१॥ जय चन्द्रदिवाकरनेवरे, जय पायकभूपितवक्त्रवरे । षय भैरवदेहनितीनपरे, आय अन्धकदैत्यविश्वोपकरे ।।२।। जय मदिपरिमर्दिनि शूलकरे, जय लोकसमस्तकपापहरे। अप देवि पितामहविष्णुनते, जय भास्करशक्रशिराऽवनवे ॥३॥ जय पण्मुखसापुधईशनुते, जय सागरगामिनि शम्मनुते । हेपरदायिनी देवि ! भगवति ! तुम्हारी जयहो । हे पापोंको नष्ट करने पाली और मनन्त फट देनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। हे शुम्भ-निशुम्म के मुण्डोको धारण करनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। हे मनुष्योंकी पीड़ा हरनेयाली देवि ! मैं तुम्हे प्रणाम करता हूँ ॥१॥ हे सूर्य-चन्द्रमारूपी नेत्रों- को धारण करनेवाली ! तुम्हारी जय हो । हे ऑमके समान देदीप्यमान मुखसे शोभित होनेवाय ! सुम्हारी जय हो । है मैरव शरीर में छीन रहने पाली और अन्धकासुरका शापण करनेवाली देवि ! तुम्हारी जय हो जय हो ॥ २॥ हे महिषासुरका मर्दन करनेवाली, शूलधारिणी और छोकर्क समस्त पापोंको दूर करनेवाली, भगवाते ! तुम्हारी जय हो । ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और इन्द्रसे नमस्कृत होनेवाली हे देवि ! तुम्हारी जय हो जय हो ॥ ३ ॥ सशस्त्र शङ्कर और कार्तिकेयजीकेदारावन्दित होनेवाली देवि! तुम्हारी जय हो। शिवके द्वारा प्रशस्ति एवं सागरमें मिलनेयाली गारूपिणी देषि! मुम्हारी जय हो । दुःख और दरिद्रताका नाश तथा पुत्र कालकी पदि करनेपाल शदिस्तोत्राणि जय दुःखदरिद्रविनाश करे, जय पुत्रकलावियूद्धिकरे ॥४॥ जय देवि समस्त शरीरघरे, जय नाकविदर्शिनि दुःखहरे। जय व्याधिविनाशिनिमोक्षकरे, जयवान्छितदापिनि सिद्धिवरे ५ एतदयासकृतं स्तोत्रं यः पठेनियतः शुचिः। गृहे या शुदभावेन प्रीता भगवती सदा ॥ ६ ॥ इति व्यास श्रीभगवतीला सपूर्णम् । २४-महालक्ष्म्यष्टकम् इन्द्र उवाच नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते । हे देवि ! तुम्हारी जय हो जय हो ॥४॥ हे देवि ! तुम्हारी जप हो । दुर समत शरीरोंको धारण करनेवाली, स्वर्गमा दर्शन करानेवाली और दुखदारिमी हो। व्याधिनाधिनी देवि! तुमारी जाहमोर मुम्हारे करतात, हे मनोधान्ति र देपाली र सिरियाले समम परा देवि ! तुम्हारो जा हो ॥५१ जोकझं भी रहर पवित्र मारसे नियमपूर्वक इस मानव स्वा पाठ करता है अपना गुर मारते . परही पाठ करता है उसके ऊपर भगवती सदा ही रही है ॥६॥ द बोले-धीपीठपर सित और देवदासे पूपि रोनेसी मसीहें ममस्मरपास और मा भरपरने.

सोपासायी
शानक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥१॥
नमस्ते गरडारुडे फालामुरमयरि।
सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ २॥
सर्वो सर्ववरदे सर्वतुष्टमपरि ।
सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥३॥
सिद्धियुद्धिप्रदे देवि मुक्तिमुक्तिप्रदायिनि ।
मन्यपूते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ४ ॥
आयन्तरदिवे देवि आवशक्तिमहेश्वरि ।
योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ५ ॥
स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे।
महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥
वाली हे महालक्ष्मि ! तुम्हें प्रणाम है ||१|| गरुडपर आरूदहो कोलासुरको
भय देनेवाली और समस्त पापोंको हरनेवाली हे मगवति महालक्ष्मि !
तुम्हें प्रणाम है ॥२॥ सब कुछ जाननेवाली, सपको वर देनेवाली, सरत
दुष्टोंको मय देनेवाली और सपके दुःखोंको दूर करनेवाली, हे देवि
महालक्ष्मि ! तुम्हें नमस्कार है ॥ ३ ॥ सिद्धि, बुद्धि, भोग और मोक्ष देने.
वाली हे मन्त्रपूत भगवति महालक्ष्मि ! तुम्हें सदा प्रणाम है ||४il हे
देवि ! हे आदि-अन्तरहित आदिशके । हे महेश्वरि । हे योगसे प्रकट
हुई भगवति महालक्ष्मि ! सुम्हें नमस्कार है ॥५॥ हे देवि ! तुम स्थूल, सूक्ष्म
एवं महारौद्ररूपिणी हो, महाशक्ति हो, महोदरा हो और बड़े बड़े पापोंका
नारा करनेपाली हो । देवि ! मझलक्ष्मि तुम्हें नमस्कार है॥६॥

शकिस्तोत्राणि पनामनस्थिते देवि पानप्रस्वरूपिणि । परमेशि जगन्मावर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥७॥ श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते । जगस्थिते जगन्मार्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥८॥ महालक्ष्म्यटक स्तोत्रं यः पठेदभक्तिमान्नरः। सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्य प्रामाति सर्वदा ॥ ९ ॥ एककाले पठेनित्यं महापापविनाशनम् । द्विकालं यः पठेनित्यं धनधान्यसमन्धितः ॥१०॥ त्रिकालं यः पठेनित्यं महाशत्रुविनाशनम् । महालक्ष्मीमवेनित्यं प्रतन्ना परदा गुना ॥११॥ हतीन्दा मालम्पएर सम्पूर्णम् । रे कमलके आमनपर विराजमान परमसरूपिणि देवि गरे परमेश्वरि ।। अगदमारे महालक्ष्मि ! तुमेरा प्रणाम है ॥७॥ हे देवि ! म देव वन मारण करनेवाली और नाना प्रकार के माभूषणोंसे विभूषिता हो।सम्पूर्ण गर्ने म्यात एवं अखिल लोकको जन्म देनेवाली हो । महालक्ष्मि में मेरा मगाम है ॥८॥ जो मनुष्य भकियुक्त होकर इस मारम्पष्टक वंशका दा पाठ करता है यह सारी सिदियों और राज्यमयको प्राप्त कर सकता है। ॥९॥ जो प्रतिदिन एक समय पाठ करता है। उसके बोबो पागेंशनाश हो वाता है। जो दोसमय पाठ करता है वह धन धान्यसे सम्पब रोता है। जो विदित तीन कल पाठ करता है उसकेमा शत्रुभोंका नाय रोवावा है और को रकमाणगारेयोपरायिनी महालमी सदा ही मानती हैं।

तोप्रासापनी २५-श्रीसरस्वतीस्तोत्रम् या फुन्देन्नापारहारधवला या शुनसाहता या वीणारदण्डमण्डितकरा यावेतपद्मासना। या ग्रहायुनशङ्करप्रभृतिमिदेवः सदावन्दिता सामापातु सरस्वती मगवती निःशेषजाड्यापहा।। १ ।। आशामु राशीमगायल्ली- मासय दासीकृतदुग्धसिन्धुम् । मन्दस्मितनिन्दितशारदेन्द पन्देऽरविन्दासनमुन्दरि त्वाम् ॥ २॥ शारदा शारदाम्मीजवदना बदनाम्जे । सर्वदा सर्वदास्माकं सनिधि सनिधि क्रियात् ॥ ३॥ जो कुन्दके पूल, चन्द्रमा, बर्फ और हारके समान देत है, जो शुभ कपड़े पहनती हैं, जिनके हाथ उत्तम वीणासे सुशोभित हैं, जो श्वेत कमलासनपर बैटती हैं, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि देव जिनकी सदा रति करते हैं और जो सब प्रकारको जड़ता हर लेती हैं, वे मगवती सरस्वती मेरा पाटन करें ॥१॥हे कमलपर बैठनेवाली सुन्दरी सरस्वति! सुम सब दिशाओंमें पुञ्जीभूत हुई, अपनी देहलताकी आमाछे ही हीर- समुद्रको दास बनानेवाली और मन्द मुसकानसे शरदऋतुके चन्द्रमाको तिरस्कृत करनेवाली हो, तुमको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥ शरत्कालमें उत्पन्न कमलके समान {मुख्याली और सब मनोरयों को देनेवाली शारदा इन उम्पक्षियोंके साप मेरे मुखमे सदा निवास करें ॥१॥ उन पचनकी मलोगोंरा पालन करें।॥ ५॥ बिना रूप रेट, जोम विचारकी परम तय है, जो सब संसारमें प.ट रही हो पापोंमें पीला रमेमगरती मरम्पती धन्दना पहा॥६॥पारा कारण शक्तिस्तोत्राणि सरस्वती च तां नौमि वागविष्टात देवताम् । देवयं प्रतिपयन्ते यदनुपहतो जनाः॥४॥ पातु नो निरूपनाया मतिहम्नः सरस्वती । प्राज्ञेतरपरिच्छेदं वचसय करोति या॥५॥ शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामायां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्फाटिकमालिकांचदधतों पद्मासने संस्थिता वन्दे तां परमेश्वरी भगवती बुद्धिपदा शारदाम् ॥ ६ ॥ वीणाधरे विपुलमालदानशीले मक्कार्तिनाशिनि विरचिहरीशन्दे । अधिष्ठात्री देवी सरस्वतीको प्रणाम करता हूँ, जिनकी करामे मनुष्य देवता बन जाता है। पुदिरूपी सेनेके लिये फौरीके समान सरस्पतीजीजो केवल पचनसे ही पिशान् और मूगों की परीक्षा कर दे भौर पुनक धारण फिर रहती है, अभर देती है, पूर्णतारूपी भवारने र करती है, एपमें रफटिकमगिरी मारती है। कमरे नार विराजमान रही है और मुलि देनेवारी , उन भारत Rancी मगर माल देनेपाली. मस पुraniname और रिस पन्दिता वोरप गया सोmamel कीर्तिप्रदेऽखिलमनं रथदे সদ্ধা विधाप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ७ ॥ येताजपूर्णविमलासनसंहिते है श्वेताम्परापतमनोहरम गाने उपन्मनोशासितपङ्कजमञ्जुलास्ये विद्याप्रदायिनि सरस्वति नौमि नित्यम् ॥ ८॥ मातस्त्वदीयपदपजमक्तियुक्ता येत्या मजन्ति निखिलानपरान्विहाय । ते निर्जरत्वमिह यान्ति पलेवरेण भूवद्विवायुगगनाम्बुविनिर्मितेन मोहान्धकारमरिते हृदये मदीये मातः सदैव कुरु वासमुदारमावे । पूज्यवरा और विद्या देनेवाली सरस्वति! तुमको नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ ७ ॥ हे श्वेत कमठोंसे मरे हुए निर्मल आमनपर विराजनेवाली श्येत वस्त्रोंमे टके सुन्दर शरीरवारी, खुले हुए सुन्दर श्वेत कमलके समान मञ्जुल मुखवाली और विद्या देनेवाली सरस्वति । हुमको नित्य प्रणाम करता हूँ॥ ८॥ हे मातः ! जो ( मनुष्य ) तुम्हारे चरण कमळ में भक्ति रखकर और सब देवताओं को छोड़कर तुम्हारा मजन करते हैं। घे पृथ्वी, अग्नि, वायु, आकाश और जलन पाँच तत्वों के बने शरीरसे ही देवता बन जाते हैं ॥ ९॥ हे उदार बुद्धिवाली मा ! मोह रूपी अन्धकारसे मरे मेरे हृदयमें सदा निवाद करो और अपने सब बहों. ॥९॥ '- ..

शतिस्तोत्राणि स्वीयाखिलाययवनिमेलसुप्रभाभिः शीघ्रं विनाशय मनोगतमन्धकारम् ॥१०॥ ब्रह्मा जगत् सृजति पालयतीन्दिरेशः शम्भुर्विनाशयति देवि तव प्रभावैः। न स्यात्कृपा यदि तब प्रकटप्रभावे न स्युः कथञ्चिदपि ते निजकार्यदक्षाः ॥११॥ लक्ष्मीर्मेधा धरा पुष्टिौरी तुष्टिः प्रभा धृतिः । एताभिः पाहि तनुमिरष्टाभिर्मा सरस्वति ॥१२।। सरस्वत्यै नमो नित्यं मद्रकाल्यै नमो नमः । वेदवेदान्तवेदाङ्गविद्यास्थानेभ्य एव च॥१३॥ सरस्वति महामागे विद्ये कमललोचने । की निर्मल कान्तिसे मेरे मनके अन्धकारका दाम नाश करो ॥ १० ॥ = देवि ! तुम्हारे ही प्रभायसे ब्रह्मा जगत्को बनाते हैं, विष्णु पालते हैं नौर शिव विनाश करते हैं। हे प्रकट प्रभाववाली ! यदि इन तीनोंपर वे किसी प्रकार अपना काम नहीं कर सकते ११॥ हे सरस्वति ! लक्ष्मी, मेधा, धरा, पुष्टि, गौरीतुष्टि, प्रमा, धृति- - आठ मूर्तियोंसे मेरी रक्षा करो ॥ १२ ॥ सरस्वतीको नित्य नमस्कार भद्रकालीको नमस्कार है और वेद, वेदान्त, वेदान तथा विद्याओं. सानोंको प्रणाम है ॥ १३ ॥ है महामाग्यवती शनस्वरूपा यमलके नरिवाल नेवाली, शानदात्री सरस्वति ! मुशको विधा दो, मैं हमको म्हारी कृपा न हो, स्तोत्ररतायली विद्यारूपे विशालाक्षि पियां देहि नमोऽस्तु ते ॥१४॥ यदक्षरं पदं नटं मात्राहीनं च पनवेन् । वसई थम्पा देवि प्रमीद परमेश्वरि ॥१५|| इति श्रीधरस्वतीसोय उम्पूर्णम् । २६-देव्या आरात्रिकम् प्रररातीरनिवासिनि निगमप्रतिपाये पारावारविहारिणि नारायणि हये। प्रपञ्चसारे जगदाधारे श्रीविधे प्रानशलननिरते मुनिवृन्दाराध्ये ॥१॥ जय देवि जय देविजय मोहनरूपे । प्रणाम करता हूँ ॥ १४ ॥ हे देवि ! जो अक्षर, पद अथवा मात्रा घट गयी हो, उसके लिये क्षमा करो और हे परमेश्वरि प्रसन्न रहो ॥ १५ ॥ हे प्रयरानदीतीरवासिनी, वेदोंसे प्रतिपादित क्षीरसागरविहारिणी, नारायणप्रिया, मनोहारिणी, संसारकी सार और आधाररूपिणी, लक्ष्मी और विद्यास्वरूपिणी, शरणागतको रक्षामें तत्पर, मुनिगणोंसे आराधित हे देवि! तुम्हारी जय हो ! जय हो! हे मनोहर रूपयाली ! तुम्हारी जय हो।। माधः ! इस संसारकूपमें पड़े हुए मेरा उझार फो॥ १ ॥ पूर्णनन्द्रके जय दो)॥२॥ चरणों में नूपुर धारण करनेवाली, मणि और मोतियों के विघ्न बाधाओंको दूर करनेवाली, ब्राह्मणोंके लिये भानन्ददायिनी, गज और पाएका उदार घरयाली दे देवि! मुत गरणागतपर कृपा करो 1(६ शकिस्लोवाणि मामिह जननिसमुद्धर पतितं माकूपे॥ध्रुवपदम्॥ दिव्यसुधाकरवदने कुन्दोज्वलरदने पदनखनिर्जितमदने मधुकैटमकदने। विकसितपङ्कजनयने पन्नगपतिशयने खगरतिरहने गहने सङ्कटवनदहने ॥जय देवि०॥२॥ मञ्जीराशिवचरणे मणिमुक्तामरणे फञ्चुकिबसावरणे वक्त्राम्पुजधरणे। शक्रामपमपइरणे भूमुरसुखकरणे करणां कुरु मे शरणे गजनक्रोद्धरणे ॥जय देवि०॥३॥ समान दिव्य मुपवाटी, कुन्दपुष्पकैसे स्वच्छ दाँतोंवाली, अपने पैरोंकी नख-ज्योतिसे मदनको पराजित करनेवाडी, मधुकैटभका संहार करने बाली, मल्टित कमर-समान नेत्रोंवाली, शेषशायिनी, गरुड़वाहिनी, दुराराध्या, सकटवनको मस करनेवाडी (हे देवि ! तुम्हारी जय हो! आभूषण धारण करनेवाली, चोटी और पत्रोंसे सुसजित, कमलमुखी, इन्द्रके

छिमा राम्रो पानि धान्
ददागि गएमनिरंपानिधान्।
शिरसि दानादान समर संसिद्धान्
मधमनीपरदे पाउप संसिदान् ॥ जय देवि० ॥१॥
पति देभाभमासम् ।
रेपिगारी जगहो।गर
होम एप्रीया बाहर
खोकी रक्षा सी हो, भगुगेको उनी त मृत्यु और
देपतामोको भगा देती हो मुनक भौर वीर देयो रगोग
अनेसारी । मनमुनीपरको पर देनेपा। मयुग पान्न
ये। (रेशिपारी बराम!)॥४॥

पारनाशक होने के कारण और अन्य अपणित कल्याणमय पदों (यों) की प्राप्ति करा देने के कारण सारे जगत के लिये भगवान् लक्ष्मीपति ही स्पनीय ही वहा भगवान् आविर्भत हो गये और अपने सम्बोंमे उमके वक्षःस्थलको विष्णुस्तोत्राणि २७--श्रीनारायणाष्टकम् वात्सल्पादमयप्रदानसमयादार्निनिर्वापणा- दौदार्यादपषणादगणितश्रेयःपदप्रापणा सेन्पाश्रीपतिरेक एव जगतामेतेऽभवन्साक्षिणः प्रहाय विभीपणच करिराट् पाश्चात्यहल्या भूयः ॥ १ ॥ प्रहादास्ति यदीश्वरो वद हरिः सर्वत्र मे दर्शय स्तम्मे चैवमिति जुवन्तमसुरं तत्राविरासीद्धरिः । अति वात्सल्यमय होने के कारण, भयभीतोंको अभयदान देनेका स्वभाव होने के कारण दुखी पुरुषोंका दुःख हरनेके कारण, अति उदार और हैं। क्योंकि महादा जि पदा, अहल्या और ध्रुव (कमसे) इन कार्यों सी है I प्रहाद ! यदि तू कहता है कि ईश्वर सर्वत्र है तो मुझे खम्भमें दिखा-दैत्य हिरण्यकशिपुके ऐसा कहते स्तोपरतायली वक्षस्तस्य विदारयमिजनवैत्सिल्यमापादय- मात्राणपरायणः स भगवानारायणो मे गतिः ॥ श्रीरामात्र विमीपणोऽयमनघो रक्षामयादागत: सुग्रीवानय पालयनमधुना पौलस्त्यमेवागतम् । इत्युक्त्वाभयमस्य सर्वविदितं यो राघवादचयानात ॥३॥ नक्रग्रप्तपदं समुद्धतकरं ब्रह्मादयो भो सुराः पाल्यन्तामिति दीनवास्यकरिणं देवेष्वशक्तपुयः। मा मैपीरिति यस्य नकहनने चक्रायुधःश्रीधर आर्तः॥४॥ मोकृष्णाच्युत भो कपालय हरे भोपाण्डवानांसखे विदीर्ण करके अपना वात्सल्य प्रकट किया । ऐसे दीनरक्षक भगवान नारायण ही मेरी एकमात्र गति हैं ।। २ ॥ हे श्रीरामजी । यह निष्पाप विभीषण राक्षस रावणके भयसे आया है। यह सुनते ही सुग्रीय | उस पुस्त्य रिके पौत्रको तुरंत ले आओ और उसकी रक्षा क-ऐसा कहकर जैसा अभयदान श्रीरघुनाथजीने उसे दिया यह म्पको विदित ही है। ही दीनरधक भगवान् नारायण मेरी एकमात्र गति है॥३॥ प्राहद्वारा पोय पकड़ लिये जानेपर गुंड उठाकर है ब्रह्मा आदि देवगण ! मेरी रडा करें। इस प्रकार दीनयाणांसे पुकारते हुए गगेन्द्रकी रक्षा देवताओंको असमर्थ देखकर मत र ऐसा फरार भिन भीधरने प्रारका पए करने के लिये मुदनना उठा लिया ये ही दीनरशर भगयान नागपण मेरा कात्र गदिमण अयुव । हे !

देख उसानपादक पुष भुषने जब स्वयं ही उधर चदना चाहा तो पिदाने
उसे अहमें नहीं लिया ओर विमावाने मी उसका अनादर किया, उस
विष्णुस्तोत्राणि
मासिकासि सुयोधनादपहा मोरस मामातुराम् ।
इस्युक्तोऽशपवखसंभृतत योऽपालपद्रौपदीमा ०॥ ५ ॥
पत्पादाजनखोदकं त्रिजगतां पापापविध्वंसन
पनामामृतपूरकं च पिरतां संसारसन्तारकम् ।
पाषाणोऽपि यददिपार जसाशापान्मुनेोचित आर्व०॥६॥
पित्रा भ्रावरमुनमासनगतं चौतानपादिळवी
दृष्ट्वा तत्सनमारुरुधुरतो मात्रावमानं गतः ।
यं गत्वा शरणं यदाप तपसा हेमाद्रिसिंहासनमा० ॥७॥
रे! हे पाण्डवखे ! तुम कहाँ हो ! कहाँ हो । दुर्योधनद्वारा सूटी
गयी मुन्न आतुराकी रक्षा करो ! रखा करो-इस प्रकार प्रार्थना करनेपर
जिउने अक्षयवस्त्र द्रौपदीका शरीर दकर उठ रहा की, या
दुलियोका उतार करनेमें तत्पर भगवान् नारायण मेरी गति हैं ॥ ५ ॥
जिनके चरणकमलोंके नलोंकी धोवन भीगनाजी त्रिलोकीके पापसमूहको
मंस करनेवाली हैं, जिनका नामामृतसमूह पान करनेवालोंको संसार-
लागरसे गार करनेवाला है तथा जिनके पादपोंकी रज पागण भी
मुक्त हो गया ये दीनरक्षक भगवान् नारायण ही मेरी एकमात्र
गति हैं ॥ ६॥ अपने माईको पिताके साथ उत्तम राजसिंहासपर रेठा
मुनिवास
ज्यप जिनकी शरण जाम उसने तपो द्वारा मुमेपगिरि के रामसिंहनको
माधि का ये ही दीनला भगवान् नारापन मे एकमात्र गति ॥७॥

मmi firm: मिशिनाप भीगा पारेषु पाति वर्गमनाः। राधीन भारापन्दमा पिता सुसिनी मान्ति ॥८॥ tentीनामपूर्ण २८--श्रीकमलापत्यष्टकम् सजगतल्पग पनगुन्दरं गरुडाइनमम्मुजलोचनम् । नलिनपझगदाकरमम्पयं मनत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥१॥ अलिफूलासितकोमलकुन्तलं मिलपीठालमनोहरम्। जलधिजाधिनामकलेवर मनव रे मनुजाः कमलापतिम् ॥२॥ मो पीमित है, विपादयुस है, शिपिउ (निरास) मपमीत । अपर किसी भी पोर आपत्तिमें पड़े हुए हैं. ये नारापन' यस्तो संकीर्तनमात्रले j दुस्से मुक्त होकर मुखी हो जाते हैं।॥ ८॥ . रे मनुप्यो ! जो शेषशय्यापर पौ? हुए हैं, नीलमेघ सहरा सार- मुन्दर हैं, गरुड़ जिनका पाइन है और जिनके कमल जैसे नेत्र हैं उन शनचा गदा-पद्मधारी अव्यय श्रीकमगपतिको भजो ॥१॥ मौके समान जिनकी काली काली कोमल अउ हैं, अति निर्मल सुन्दर पीताम्बर है और जिनके यामाईमें श्रीलक्ष्मीजी सुशोभित हैं, रे मनुष्यो ! उन भीकमलापतिको मजो ॥२॥ जप, तर, यश अथवा उत्तम-उसम तीखें

विष्णुस्तोत्राणि
१७
किम जपैश्च तपोमिरुनाचरैरपि किमुत्तमतीनिषेवणैः।
किमुत शासकदम्पविलोकनर्मजत रेमनुजाः कमलापतिम्॥३॥
मनुजदेहमिमं भुवि दुर्लमं समधिगम्य सुरैरपि वाञ्छितम् ।
विषयलम्पटतामपहाय वै मजत रे मनुजाः कमलापतिम् ।।४।।
नवनिता नसुतोन सहोदरोन हि पिताजननी नचान्धः।
बजति साकमनेन जनेन वैमजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥५॥
सलमेव चलं सचराचरं जगदिदं सुतरां धनपौवनम् ।
समवलोक्य विवेकशा द्रुत मजत रे मनुजाः कमलापतिम्॥६॥
विविधरोगयुतं क्षणभरं पखशं नवमार्गमलाकरम् ।
परिनिरीक्ष्य शरीरमिदंसकंमजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥७॥
सेवनमें क्या रखा है ? अथवा अधिक शाखावओमनके पचड़ेमें पड़ने
से क्या होना है १२ मनुभ्यो ! बस श्रीकमलापक्तिको ही मजो ।। ३ ।। ६७
संसारमें यह मनुष्य शरीर अति दुर्लभ और देवगणोंसे भी वाञ्छित है-
ऐसा बानकर विषय-लम्पटताको त्याग कर रे मनुष्यो ! श्रीकमपतिको
मजो॥४॥ इस जीवके साथ स्त्री, पुत्र, माई, पिता, माता और
बन्धुजन कोई भी नहीं जाता, अतः रे मनुष्यो ! श्रीकमलापतिको भो ॥५॥
१६ सचराचर जगत्, धन और यौवन सभी अत्यन्त अस्थिर है-ऐसा विवेक-
इरिसे देखकर रे मनुष्यो ! शीघ्र ही श्रीकमलापतिको मजो ॥ ६ ॥ यह
शरीर नाना प्रकार के रोगोंका आश्रय, क्षणिक, परवश या मटसे भरे हुए
नौ मार्गोवाला है-ऐसा देखकररे मनुष्मो ! श्रीरमापतिको भजो ॥७॥

स्तोत्ररतापली मुनिवरैरनिशं हृदि मावितं शिवविरिश्चिमहेन्द्रनुतं सदा । मरणजन्मजरामयमोचनं भजत रे मनुजाः कमलापतिम् ॥८॥ हरिपदाष्टकमेवदनुत्तमं परमहंसजनेन समीरितम् । पठति यस्तु समाहितचेतसाव्रजति विष्णुपदंस नरोतृवम् ।।९।। इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीकमलापत्यष्टकं सम्पूर्णम् । २९-श्रीदीनवन्ध्वष्टकम् यस्मादिदं जगदुदेति चतुर्मुखाद्य यसिन्नवस्थितमशेषमशेपमूले । यत्रोपयाति विलयं च समस्तमन्ते मुनिजन जिनका अहर्निश हृदयमें ध्यान करते हैं, शिव, बझा तया इन्द्रादि समस्त देवगण जिनकी सर्वदा वन्दना करते हैं तथा और मरणादिके भयको दूर करनेवाले हैं, रे मनुष्यो ! उन श्रीकाला- पतिको भलो ॥ ८॥ दास परमहंसद्वारा कहे गये इस अत्युत्तम भगवान् हरिके अएकको जो मनुष्य समाहितचित्तसे पढ़ता है घर अवश्य ही भगवान् विष्णुके परमधामको प्राप्त होता है॥९॥ जिन परमारमामे यह ब्रह्मा आदिरूप जगत् प्रकट होता है और सम्पूर्ण जगत्के कारणभूत जिस परमेभरमें यह समस्त संसार स्थित है हरा लम यह समस्त जगन् जिनमें लीन हो जाता है ये दीनाथ विष्णुस्तोत्राणि दृग्गोचरो मरतु मेऽद्य स दीनबन्धुः ॥१ चक्रं सहसकरचारु करारविन्दे गुर्वी गदा दरवरच विमाति यस्य । पक्षीन्द्रयापरिरोपितपादपो हमगोचरो० ॥२॥ येनोद्धता वसुमती सलिले निममा नमा च पाण्डववधूः स्थगिता दुकूलैः। संमोचितो जलचरस्य मुखाजेन्द्रो घग्गोचरो० ॥३॥ यस्याडष्टिवशतस्तु सुराः समृद्धि कोपेक्षणेन दनुजा विलयं बजन्ति । भीताधरन्तियतोऽयमानिलाघाग्गोचरो०॥४॥ मायान् आज मेरे नेत्रों के समय दर्शन ॥१॥ जिनके करकमलमें एसके समान प्रामात चक, मारी गदा और शेठ शोभित हो रहा है, जो पहिराम (गरूर) की पीटपर अपने घरणकमल से हुए हैं, ये दीनमा भगवान् आज मुझे प्रत्पादन ॥२॥ जिन्होंने में इसी हुई पीका उभार किपा, नम की जाती हुई पायधू (दोपदी) को पोंछे क लिया और माइके मुखसे गमराजारे बना लिया दीन मगवान् आज मेरे नेत्री एम हो जाय ॥३॥ जिसकी स्नेह- शेि देरो जाने के कारण देवतास्सोग ऐश्वर्य पते और पाटिदारा देरी जानेसे दानप योग नए से शाते हैं सथा सूर्य या ओर पल मादि पिसे मौतहोकरमाने अनेकानिमच होते हैं। दीनरन्तामा मात्र मेरे मेरे सामने हो जा॥ मानदेय कान धरलोग

गापन्नि सामाना गमनं मधु
भापन्ति पारमनयां यापी विधि।
पन्यन्ति मागिपुरु: पुरष गरीर गोवरी० ॥५॥
আঙ্কারাগffার্কি
मतानुकम्पननिमिनगृहीतमूर्तिः
पः सर्वगोऽपि तशेपारीरशय्या रगोनरी० ॥६॥
यसामिाजमनिद्रमनीन्द्रशन्दै-
सराप्यते
मवशानउदाहशान्त्यै ।
सर्वापराघमविनिन्त्यममाखिलात्मादृग्गोचरी० ॥७॥
पोंमें जिन अजन्मा भगवान् के गुणों को गाते है. धीर मुभिवाले
संन्यासीलोग एकान्तमें जिनमा ध्यान करते हैं और योगीजन अपने शरीर
भीतर पुरुषरूपसे जिनका साक्षात्कार करते हैं, ये दीनबन्धु मगवान् आज
मेरे नेत्रोफे गामने हो ॥ ५ ॥ जो भगवान् आकार, रूप और गुणके
सम्पन्धसे रहित होकर भी भक्तों के कार दया करने के निमित अवतार
धारण करते हैं और जो सर्वत्र विद्यमान रहते हुए मी शेषनागके शरीरको
अपनी शय्या यनाये हुए हैं, ये दीनबन्धु मगवान् आज मेरे नेत्रोके
प्रत्यय हो ॥ ६ ॥ आलस्यहीन मुनिवरों का समूह संसारके दुःखरूपी
दावानलकी जलन शान्त करनेके लिये जिन मगवान्के चरणकमलकी
आराधना करता है वे सम त जगत्फे आत्मभूत दीनबन्धु मेरे सब
अपराधोंको भूलकर आज मेरे नेघोंके समक्ष - दर्शन दें ॥७॥

विष्णुस्तोत्राणि यनामकीर्तनपरः अपनाऽपि नूनं हित्वाखिलं कलिमलं भुवनं पुनाति । दग्ध्वा ममाघमखिलं करुणेक्षणेन गोचरी०॥८॥ दीनान्यटकं पुण्यं प्रमानन्देन मापितम् । यः पठेद प्रयतो नित्यं तस्य विष्णुः प्रसीदति ॥९॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिरमानन्दविरचितं श्रीदीनपस्यएकं सम्पूर्णम् । ३०-परमेश्वरस्तुतिसारस्तोत्रम् त्वमेकः शुद्धोऽमि त्वयि निगमपामा मलमय प्रपञ्चपश्यलिभ्रमपरशा: पापनिरताः। जिन भगवान के नामगीर्तनमें तत्पर नाम भी निभय ही सम्पूर्ण कलिमर (पाप) को त्याग कर जगत्ता परित्र फर देता है, वे दौरभु भगवान मेरे ममस्त पाको आनी करुणारिसे जबर आज मेरे छोरो पर न॥॥जो लोग नमान्दके कटे हुए इस दीननया नाम परिव स्तोत्रका नित्य मैयाचिचसे पाठ करेंगे उनके अपर विशुभगान मासरोगे॥१॥ है परण देनेराले परमात्मन् ! गुम एक और मनु दे लिम दिखनेवाले भान्त मोर पाराग्यान तुम्हारे ऐसे मारने की RATE(SR) देखते हैं।ममा मगन् । मुझे उनको पहिरोम्यः कस्या सपाभरणे मानप रिमो गजेन्द्र रटते भरगद मदान्य साददम् ॥१॥ न मृप्टेस्ने हानिर्पविकिपयानाध्यासिवमा त्वयानेके गुमा व्यसनमिति तेऽमि श्रुनिपये। अतो मामुदतु घटय मगि रहिं सुविमला नरिक्त मे याआसजनरत फतुं मवहरे ॥२॥ कदाई मोस्वामिमियतमनसात्वा हदि मज- प्रमद्रे संसारे अनवरतारोऽतिविरसः। लमेयं वा शान्ति परममनिमिर्या अधिगता से अलग फरके अपने घरोकी चरणमें से दो। [अपनी धरपमें छेने] तुम्हारी उदारता गजेन्द्रके विषयमें देखी गयी कि तुमने उसकी रक्षा करके उसे अपना धाम दे दिया ॥१॥ मगवन् ! यदि तुम कर मेरी रक्षा करते हो तो इससे तुम्हारी परिमांदारी कोई हानि नहीं है । मुमने अनेकोंकी रक्षा दी है, हमारे कानों में यह यात पड़ चुकी है कि तुम्हें दशरणागतोंकी रक्षा करनेका व्यसन है, अतः मेरा उद्धार करनेके लिये तुम मुझपर भी अपनी निर्मल दृष्टि डालो। अपने मक्तजनोंकी रखा तत्पर रहने- वाले हे भगवन् ! मेरीमायनाको असफलन फरो॥२॥ हे प्रभो ! मैं क्या तुमको अपने हृदयमें संयतमनसे मृजता हुआ अमङ्गलमय एवं सर्वदा दुःखयुक्त इस संसारसे विरक्त होकर उस शान्तिको प्राप्त करूँगा जिसको कि महामुनिशेने पाया है। हे मव-बन्धनसे मुक्त करनेवाले भगवन् ! तुम दया करके मुझे विष्णुस्तोत्राणि १०३ दयां कृत्वा मे त्वं वितर परशान्ति भवहर ।।३।। विधाता चेद्विश्वं सृजति सृजतां मे शुभकृति विघुश्चेत्पातामावतु जनिमृतेःखजलधेः। हरः संहर्ता संहरतु मम शोकं सजनक यथाई मुक्तः स्यां किमपि तु तथा ते विदधताम् ॥ ४ ॥ अहं ब्रह्मानन्दस्त्वमपि चतदाख्यः सुविदित- स्ततोऽहं मिनो नो कथमपि मात्तःश्रुतिदृशा। तथा चेदानीं त्वं त्वयि मम विभेदस्य जननी स्वमायां संवार्य प्रमा मम मेदं निरसितम् ।।५।। कदाहं हे स्वामिअनिमृतिमयं दुःखनिविडं भवं हित्वा सत्येऽनवरतसुखे स्वात्मवपि । पही पराणन्ति दो॥३॥हे भगवन् ! रमा यदि संसारकी सष्टि करते है तो मेरे मम्मोंी सष्टि करें, विष्णुभगवान यदि संसारकी रडा करने । मो जन्म मरणके दुःखरूपी सागरसे मेरी रक्षा करें और शिवजी यदि संसारका मंदार करते है तो मेरे का उनके पारणभून अशुभ कोसहित मंहार परें । जिस प्रकार मेरी मुक्ति हो मके पेसा कोई उपाय ये सोग करें। १ मगरन ! मेरा नाम रमानन्द और तुम्हारा भी यही नाम सिद्ध है। इसलिये भुरिएपा (मुनने ) मैं तुमसे रिमी प्रकार मित्र नहीं है। ऐसी सितिने तुम इस ममय अग्ने और मेरेमें भेदको प्रकट करनेवाली भनी मारा दूर पर मेरी भिमतामे निकाल दो॥५॥म्भो!मकर जन-मरणार १.सरके मनुमार।

स्तोत्ररतावली रमे तस्मिनित्यं निखिलमुनयो ममरसिका रमन्ते यस्मिंस्ते कृतसकल कृत्या यतिराः ॥६॥ पठन्त्यके शास्त्र निगममपरे सत्परतया यजन्त्यन्ये त्वां ददति च पदार्थान्तव हितान् । अहं तु स्वामस्ते शरणमगर्म संसृतिमया- द्यथा ते प्रीतिःस्साधिवकर तथा त्वं कुरु विभो ॥७॥ अहं ज्यातिनित्यो गगनमिव हप्तः सुखमयः भृतो सिद्धोऽद्वैतः कथमपिन मिनोऽसि विधुतः । इति शाते तत्वे भवति च पर: संमृतिलया- दतस्तत्वज्ञानं मयि सुघटयेस्त्वं हि कृपया ॥८॥ पोर दुःखयाले संसारको प्रेहकर निरन्तर आनन्दमय सत्य आत्मस्वरूपमें नित्य रमण करूंगा जिसमें कि प्रशास्वादके रसिक तथा कृतकृत्य योगीवर महामुनि रमण करते ॥६॥ हे भगवन् ! तुमको प्रसन्न करनेके लिये शास्त्र पढ़ते हैं और कोई तत्पर होकर वेद पदते हैं। तथा दूसरे थेग पके द्वारा भारी आराधना करते हैं और तुम्हें इचिकर पख पाप करते हैं, जिन्हे प्रभो ! मैं तो संसारफे दुःोके दररो तुम्हारी परणम बारा।विपरनेयाले म्यापक परमात्मन् । जिस प्रकार मुापर नारी प्रमता हो सके पेमा करो ॥७॥हे मगन् । मैं प्रकारापनित्या मार: पूर्ण धाम, मानन्दमप भोर भूतिरिक्ष मदेवरूप हैं। मित्र नहील प्रकार तारान हो जानेर डि. योगाने वारण हानी xो मादलरिये .

विष्णुस्तोत्राणि अनादौ संसारे जनिमृतिमये दुःखितमना मुमुक्षुःसन्कविद्गजति हि गुरुंझानपरमम् । ततो ज्ञात्वायं वै तुदति न पुनः क्लेशनिवहै- मजेऽहं तं देवं मवति च परो यस्य मजनात् ।। ९॥ विवेको वैराग्यं न प शमदमाद्याः पडपरे मुमुक्षा मे नास्ति प्रमवति कथं शानममलम् । अतः संसाराधेस्तरणसरणिं मामुपदिशन् स्वबुद्धि श्रीती मे वितर मगवस्त्वं हि कृपया ॥१०॥ कदाई मो स्वामिनिगममतिवेद्यं शिवमय चिदानन्दं नित्यं श्रुतिद्दनपरिच्छेदनियहम् । दमकपा करके मुझमें तत्त्वशन भर दो।।८॥ जन्म मरणरूप मयसे युक इस अनादि संसारमै मन-ही-मन सदा दुरती रहनेवाला कोई पुष इससे मुक्त होनेकी छासे परम हानी गुरुषी सेवा करता है और उससे जिस भगवान्गे जानकर फिर सांसारिक क्लेशसमूहोंसे पीड़ित नहीं होता उस देवको मैं मजता है, जिसके मजनसे भक परब्रमस्वरूप से मावा है ॥९॥ हे भगवन् ! मुझमें न विवेक है, न घेराग्य और न म, दम भादि शानके अन्य साधन ही हैं मुझमें मुक्त होनेकी मुराद मजा मी नीर से निर्मल शन प्राप्त रो सकता है।सलिये संसारसागर पार करनेके मार्गका उपदेश देते हुए मार उसको भग्नी रेदिक दुरि (बादिपा) प्रान ये ॥१०॥ पामिन् । दिने निविविध परिप्र (सपा) घोर दुःखयाले संसारको मेहकर निरन्तर आनन्दमय सत्य आत्मस्वरूप नित्य रमण करूँगा, जिसमें फिब्रह्मास्वादफे रसिक तया कृतकृत्य योगीवर महामुनि रमण करते हैं॥६॥ हे भगवन् । तुमको प्रसन्न करने के लिये र्पण करते हैं। किन्तु हे प्रभो । मैं तो संसारके दुःखोंके रखे तुम्हारी घरपर्ने वाया है। हेदित करनेवाले व्यापक परमात्मन् ! जिस प्रकार मुहर रमे यसिमित्य निखिलमुनयों मासिन रमन्ते पस्मिस्ते कवरामलकरपा पतिराः ॥६॥ पठन्के मार निगममपरे उत्परता यजन्त्यन्ये व पददतिपपदार्थासव दिवान् । अहं तु स्वामस्ते शरणमगर्म संमृतिमया- पयात प्रीविःस्साधिवकर तमाल करु विमी ॥७॥ यहं ज्यातिनित्यो गगनमिव दप्तः सुखमयः श्ती सिद्धानवः कथमपि न मिनोऽसि विधुतः । इति शाते तत्त्वे माति च पाःसंपतिलया- दतस्तत्वज्ञानं मयि सुपटयेस्त्वं हि कृपयां ॥८॥ कोई शास्त्र पढ़ते हैं और कोई . तत्पर होकर वेद पढ़ते हैं। तया दूसरे योग यशके द्वारा तुम्हारी आराधना करते हैं और तुम्हें विकर पल दम्हारी प्रसन्नता हो सके वेश रोज विष्णुस्तोत्राणि अनादौ संसारे बनिमृतिमये दुःखितमना मुमुक्षुःसन्कश्चिद्गजति हि गुरुंझानपरमम् । ततो ज्ञात्वायं तुदति न पुनः क्लेशनिवहै- मैजेऽहं तं देवं भवति च परो यस्य मजनात् ॥ ९॥ विवेको वैराग्यं न च समदमाद्याः पडपरे मुमुक्षा मे नाम्ति प्रभवति कथं ज्ञानममलम् । अतः संसाराब्धेस्तरणसरणिं मामुपदिशन् खपुद्धिं श्रोतों मे वितर मगवस्त्वं हि कृपया॥१०॥ कदाई मो स्वामिनिगममतिवेद्यं शिवमयं चिदानन्दं नित्यं श्रुतिहृतपरिच्छेदनिवहम् । तुम कृपा करके मुझमे तत्त्वशान भर दो॥८॥ जन्म-मरणरूप मयसे युक्त इस अनादि संसारमें मन-ही-मन सदा दुखी रहनेवाला कोई पुरुष इससे मुक्त होनेकी इन्चासे परम शनी गुरुकी सेवा करता है और उससे जिस भगवान्को जानकर फिर सांसारिक क्लेशसमूहोंसे पीड़ित नहीं होता उस.देवको मैं मजता हूँ, जिसके भजनसे मक परनमस्वरूप हो जाता है ॥९॥हे भगवन् । मुसमें न विवेक है, न वैराग्य और न राम, दम आदि शानके अन्य : साधन ही हैं। मुझमें मुक्त होने की सुध्द हा मी नहीं है, फिर कैसे निर्मळ शान प्राप्त हो सकता है। इसलिये संसारसागरको पार करनेके मार्गका उपदेश देते हुए म राम्र उसको अपनी वैदिक बुदि (ब्रह्मविद्या) प्रदान करो ॥१०॥ पामिन् । भुदिने जिनके त्रिविष परिच्छेद (पचा)का पार किया है।

स्तोत्ररतावली त्वमर्थामिन्नं त्याममिरम इहात्मन्यविरत मनीपामेवं मे सफलय वदान्य स्वकृपया ॥११॥ यदर्थ सर्व यै प्रियमसुधनादि प्रभवति खयं नान्यार्थो हि प्रिय इति च वेदेप्रविदितम् । स आत्मा सर्वेषां जनितिमतां वेदगदित- स्ततोऽहं तं वेद्यं सततममलं यामि शरणम् ।।१२।। मयात्यक्तंसर्व कथमपि भवेत्स्वात्मनि मति- स्त्वदीया माया मां प्रतितु विपरीतं कृतवती। ततोऽहं किं कुर्यान हिमममति क्यापिचरति जो पैदिक बुद्धिसे ही जाननेयोग्य हैं, जो नित्य, चिदानन्दपर एवं कल्याणस्वरूप हैं तया जो स्यम्' पदके अर्थभूत जीयारमासे अभिन्न । मेरो आपका निरन्तर अपने हदय देशों में कर ध्यान फलेंगा हे उदार परमेश्वर ! मार अपनी कृपासे मेरे इस विचारको सपाल को १९॥ ६ भगवर निसके लिये प्रिय होने के कारण दी ये प्राप, धन आदि ममन परतु प्रिय प्रतीत होते हैं। और जो किसी दूसरे के लिये प्रिय होने कारण सिप नहीं है अपितु स्पतः प्रिय यह यात वेदमें प्रसिद्धी, पड़ी जन्मने मरनेवाले गमन प्राणियों आरमा ३ और उसीमा येदों में पर्भन किला गया है. अ. में उगी जानने के योग्य निर्मा मात्मदेपरी मदाही गरयता हूँ ॥१२॥ हे नाप ! मेरी मति किमी प्रसर आग्मवन म सगी तो इसी उद्देश्यों मैंने अपना मा १७ पगियण पर दिया किन्तु तुम्हारी मायाने तो मेरे विष्णुस्तोत्राणि दयां कृत्वा नाथ स्वपदशरणं देहि शिवदम् ॥१६ नगादैत्याकीशामवजलधिपारं हि गमिना- स्त्वया चान्ये स्वामिन्किमिति समयेऽसिञ्चयितवान् । न हेलांत्वं कुर्यास्त्वयि निहितसर्वे मयि विमी नहित्वाहं हित्वा कमपि शरणं चान्यमगमम् ॥११ अनन्ताद्या विज्ञान गुणजलस्तेऽन्तमगम- मतः पारं यायातव गुणगणानां कथमयम् । गुणन्यावद्धि त्या जनिमृतिहरं याति परमां गतियोगिप्राप्यामिति मनसि पुवाहमनवम् ॥१ इति श्रीमन्मौक्तिकरामोदासीनधिप्परमानन्दविरचितं परमेश्वरतिसारस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ही कार्य किया, अतः भर में क्या कम, मेरी बुद्धि कुछ म: परती, अब नहीं पा करके मुझे पत्याग देनेपाले अपने पर धरण दो॥ १३ ॥ हे प्रभो ! हमने पर्वत शादि स्थापरों, देवों पर और दूसरोंगे मी संधारमागरके पार कर दिया। इस समय को सो हेमन्तामिन् । तुम्हारे विराट् सम्पमें समा मसार है, मटिये मेरा अनादर न करो तुमको छोड़कर मैंने दूसपी धरण नहीं की।१४ | भगवन । विरहान रखनेगा शेक शारदा आदि भी पदिकम्हारे गुपर सागर पार नसतो मुखमा गाधारप बन गुम्सरे गुपरम ১৪ বা কলাইন সলমলে হক বা এ ধর্মে Faनाही सेमके उतना ही गुणगान सरके मनुषपोगमा ने परमगतिमास पर हेसार.ऐगा मनमानारमने भारावर मोपासायली V ३१-श्रीमगवच्छरणस्तोत्रम् सचितानन्दरूपाय मत्तानुग्रहकारिणे । मायानिर्मितविधाय महेशाय नमो नमः ॥१॥ रोगा हरन्ति सततं प्रपलाः शरीर फामादयोऽत्यनुदिनं प्रदहन्ति चिचम् । मृत्युथ नृत्यति सदा फलयन् दिनानि वस्मात्तमद्य ,शरणं मम दीनबन्यो ।। २॥ देहो विनश्यति सदा परिणामशील- चित्तं च खिद्यति सदा विषयानुरागि। बुद्धिः सदा हि रमते विपयेषु नान्तस्तसावः ॥३॥ आयुर्विनश्यति यथामघटस्थतायं भक्तोंपर दया करनेवाले और मायासे संसारकी रचना करनेवाले सच्चिदानन्दरूप महेश्वरको पारंयार नमस्कार है ॥१॥ हे भगवन् ! इस संसारमें प्रबळ रोग सर्वदा, शरीरको क्षीण करते रहते हैं, काम आदि भी प्रतिदिन हृदयको जलाते रहते हैं और मृत्यु भी दिनोंको गिनती हुई पास ही नृत्य करती रहती है। इसलिये हे दीनबन्धो । अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥२॥ सदा ही परिवर्तनशील यह शरीर नष्ट होता जा रहा है और विषयों में मासक्त रहनेवाला चित्त सदा ही खिन्न रहा करता है। मेरी बुद्धि मी सदा विषयों में ही रमती है, अन्तरात्मामें नहीं । इसलिये हे दीनबन्यो। अब मेरी माप ही.शरण है ॥३॥ कष्टकी दाव है कि

विष्णुस्तोत्रागि
विद्युत्प्रमेव पपला पत यौवनश्रीः ।
वृद्धा प्रयापति यथा मृगराजपत्ती । तस्लाइ० ॥ ४
आपाययो मम भवत्यधिकोऽविनीते
फामादयो हि वलिनो निक्लाः शमाया)
मृत्युर्यदा तुदति मां पत किं यदेयं तसा० ॥ ५
वसं तपो न हि कदापि मयेह तन्या
वाण्या तथा न हि कदापि तपथ तप्तम् ।
मिथ्यामिमापगपरेण न मानसं हि । तसात् ॥ ६
स्तब्धं मनो मम सदान हि याति सौम्य
पदे पदे रपे हुए जसमी तर आयुगा ना हो रहा है, योक्न
योमा चिनीकी चमासी घमर है और लापस्या सिंहनी
माँति ( सानेके लिये) घोड़ी पली आ रही है, इस कारण
दीनबन्धो । भर मेरे टि आर घरण ॥४॥ मगर
मेरे पास मारसे पर अधिक है, क्योंकि मुझ अग्निीतर म
हीबही होवे उनीमा महार प्रभार) और गम भरिनि
रहते हैं [ RM TARपर नहीं पाया ]
मुझे गत्यु पीड़ित करेगा उस समय सारिने
नग्यो । सर मेरे हो र परम ॥५॥ भगवान
ने जीवन में भी शरीर पर नहीं fmमत मारमा
हो सर मीमा भी दर ता और Sn
मी मिरी, तादीन! अरे भारde.
meriam

सागरलायली घसुध मे न सय पश्यति विवरूपम् । याचा व्येव न देन्मम सौम्यवाणी तलाव० ॥७॥ सचंन मे मनसि याति रजस्तमोम्पा विद तथा कथमही शुभकर्मवार्ता । साक्षात्परम्परतवा सुखसाधनं तमसात् ॥८॥ पूजा हवा न हि कदापि मया त्वदीया मन्त्रं त्वदीयमपि मे न बपेद्रसत्रा। चित्तं न मे सरवि ते चरणी अवाप्य | ससाद०॥९॥ रहा है, इस कारण सौम्य (विशुद्ध एवं विनम्न) नहीं हो रहा है और मेरी आँखें आपके विश्वरूपका दर्शन नहीं कर पाती। इसी प्रकार मेरी जिहा मी कोमल पाणी नहीं बोलती। अतः हे दीनबन्यो । अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥७॥ रजोगुण और तमोगुण विद्ध हुए मेरे हृदयमें सत्त्वगुण नहीं आने पाता। अहो ! ऐसी स्थितिमें शुम कोका करना तो दूर रहा उनकी बात मी कैसे की जा सकती है और सम्मान अपया परम्परासे वह (शुभ कर्म ) ही मुखका साधन है, [सो मुहमें नहीं है। इसलिये हे दीनबन्धो । अब मेरे लिये आप ही हरण हैं ॥८॥ हे भगवन् ! मैंने कमी भी आपकी पूजा-नहीं की, मेरी जिका भापके मन्त्रको मी नहीं जपती और न मेरा चित्त आपके चरणों को पाकर उनका चिन्तन ही करता है। इसलिये हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये • अर्थात् जगद' रूपमें भगवान ही विराजमान है, सो प्रठीतिन आँखोकी नहीं रो रही है।

विष्णुस्तोत्राणि
यज्ञो न मेऽस्ति हुतिदानदयादियुक्तो
ज्ञानस्य साधनगणो न विवेकमुख्यः ।
शानं क साधनगणेन रिना क मोक्षस्तसात् ॥१०॥
सत्सङ्गतिर्हि विदिता सव मक्तिहेतुः
साप्यच नास्ति पत पण्डितमानिनो मे ।
तामन्तरेण न हि साकच बोधवार्ता तसात् ॥११॥
दृष्टिर्न भूतविपया समतामिधाना
वैषम्यमेव तदियं विषयीकरोति ।
शान्तिः कुतो मम भवेत्समतान चेत्स्याचस्मात् ॥१२॥
आप ही शरण है॥९॥हे भगवन् ! मैंने हवन, दान, दया आदिमे
युक्त यश नहीं किया और न शानके साधनसमूह विवेक आदिको ही मात
किया । साधनसमूहके बिना शान कैसे हो सकता है ? और बिना जानके मोक्ष
कैसे हो सकता है इसलिये हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण
है।॥ १० ॥ ६ मगवन्!यह प्रसिद्ध है कि आपकी भक्तिका कारण सत्सव है,
पर खेद है कि अपनेको पण्डित माननेवाले मुझमें यह (सत्सङ्ग) मी
नहीं है । सत्ससके बिना भगवद्भक्ति नहीं होती; फिर शानकी सो पात
ही कहाँ हो सकती है ? इसलिये हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही
घरण हैं ॥ ११ ॥ हे भगवन् ! मेरी दृष्टि प्राणियों में समान नहीं रहती
है, अपि तु यह प्राणियों में विषम भावनाको ही अपनाती है। यदि
मेरी दृष्टिमें समता नहीं हुई तो मुझमें शान्ति केसे प्राप्त हो सकती है
इसलिये हे दीनबन्यो ! अब मेरे टिये आप ही शरण हैं।॥ १२ ॥

सोनाली मंत्री समेपुन १ मेति कदापि नाप दीने सयान करणा मदिया व पुष्ये । पापेऽनुपेषणवतो मम मुत्कय स्वाचस्मा० ॥१३॥ नेपादिक मम पहिपिपेषु सक्त नान्तर्मुखं मावि वानविहाय तस्य । क्यान्तर्मुखत्तमपहाप मुखस्स चार्वा । तस्मात् ॥१४॥ स्यक्तं गृहायपि मया भावापशान्त्यै नासीदसी हनदो मम मायया ते । सा चाधुना किमु विघास्यति नेति जाने। तम्मा० ॥१५॥ हे नाथ ! अपने परावरवालोंमें मेरी मित्रता नहीं है, और मैंने न तो कमी दीनॉपर दया दिखायी और न कभी पुण्यके विषयमें प्रसन्नता ही प्रकट की। जब मैंने पापमें उपेक्षा नहीं दिखायी तो मुझे प्रसन्नता के मिले १ इसलिये हे दीनबन्धो । अब मेरे लिये आप ही धरण हैं॥१३॥ हे भगवन् ! मेरी नेत्रादि इन्द्रियाँ बाह्य-विषयोंमें ही आसक्त हैं, इनकी वृद्धि अन्तर्मुखी नहीं होती, मला विषयोंको त्यागे बिना ही इन्द्रियोंमें अन्तर्मुखता फहाँसे होगी ! और इन्द्रियोंके अन्तर्मुख हुए बिना सुखकी वार्ता कहाँ! इसलिये हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥ १४ ॥ हे मगवन् ! मैंने सांसारिक दुःखोंकी शान्तिके लिये स्त्री यह आदि सबका परित्याग कर दिया, किन्तु आपकी मायाने मेरे म्नको हर लिया, इससे दुःखोंकी शान्ति नहीं हुई। अब समझमें नहीं आता इस समय आपकी माया और क्या-क्या करेगी। इसलिये है दीनबन्धो! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं।॥१५॥ हे प्रभो! प्राप्त हुए धना विष्णुस्तोत्राणि प्राप्ता गृहकुटुम्बगजाधदारा राज्यं यदैहिकमठेन्द्रपुरच नाथ। सर्व विनधरमिदं न फलाय कस्मै । तसा ॥१६॥ प्राणान्निरुध्य विधिना न कृतो हि योगो योग विनास्ति मनसः स्थिरता कुतो मे। तांचे विनाममनचेतसि शान्तिवार्तावलात्॥१७॥ ज्ञानं यथा मम मवेत्कृपया गुरूणां से वथा न विधिनाकरसं हि तेषाम् । सेवापि साधनतयाविदितास्ति चित्ते । तस्मात्॥१८॥ तीर्थादिसेवनमहो विधिना हि नाथ ग्रह, परिवार, दापी एवं घोड़े, स्त्री आदि तथा इस पृथ्वी अथक इन्द्रपुरीका राज्य-ये सब वस्तुएँ नश्वर है, किसी भी अच्छे फलक देनेवाली नहीं है। इस कारण हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप है शरण ६ ॥ १६ ॥ हे भगवन् ! मैंने प्राणायामके द्वारा योग (ध्यान) नई किया, बिना योगके मेरा मन स्थिर कैसे हो सकता है और स्थिरताके बिन चित्तमें शान्ति कथनमात्रके लिये भी नहीं हो सकती, इस कारण दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण है ॥ १७ ॥ हे भगवन् ! मैं गुरुजनोंकी ऐसी सेवा भी कमी नहीं की जिससे उनकी कृपा प्राप्त होक- उसके द्वारा मुझमें यथावत् ज्ञान होता, गुरुजनोंकी सेवा मी ज्ञानक साधन है ऐसा मैंने कभी मनमें जाना ही नहीं, इस कारण हे दीनबन्धो अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥१८॥ नाथ ! यह दुःखक सोमाली नाकारि येन मनसा मम शांगनं सान् । गुदि विना न मनसांजगमापरगीं । तमान् ॥ १९ ॥ घेदान्तशीलनमपि प्रमिनि करोति महात्मनः प्रमितिसाधनसंयुतस्य । नेपास्ति साधनलयो मयि नाथ तस्सास्तम्मा० ॥ २० ॥ गोविन्द पर हरे गिरिजेश मेश शम्मी जनार्दन गिरीश मुकुन्द साम्ब । नान्या गतिर्मम कथशन वां विहाय तस्मात्प्रमो मम गतिः कृपया विधेया ।। २१ ।। एवं स्वयं भगवदाश्रयणामिधानं बात है कि मैंने विधिसे तीर्थ आदिका मेयन नहीं किया, जिससे मेरे मनकी शुद्धि हो, मनकी शुद्धिक विना शान और मोश नहीं होते; इस कारण है दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण हैं ॥१९॥ हे प्रभो ! आत्मा ही ब्रह्म है, इसके यथार्थ शानके साधनमें लगे हुए पुरुषको वेदान्त ब्रह्मतत्त्वका यथावत् शान करा देता है, परन्तु मुझमें तो उस सत्य शनके साधनका अंशमात्र भी नहीं है, इस कारण हे दीनबन्धो ! अब मेरे लिये आप ही शरण है ॥२०॥ गोविन्द ! हे शङ्कर) हे हरे ! हे गिरिजापते ! हे लक्ष्मीपते ! हे शम्भो ! हे जनार्दन ! हे पार्वती माताके सहित गिरीश ! हे मुकुन्द ! मेरे लिये आप दोनों (इष्टदेवों) किसी प्रकार कोई भी दूसरा सहारा नहीं है, इसलिये है मुझे सद्गति प्रदान कीजिये ॥२॥ जो मनुष्य विनीतभाव. ..

विष्णुस्तोत्राणि
ये मानवाः प्रतिदिनं प्रणताः पठन्ति ।
ते
मानवा मवरतिं परिभूय शान्ति
गच्छन्ति किं च परमात्मनि भक्तिमद्धा ॥ २२
इति श्रीब्रह्मानन्दविरचितं भगवच्छरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।
३२-~मङ्गलगीतम्
श्रितकमलाकृचमण्डल
घृतकुण्डल
कलितललितवनमाल जय जय देव हरे ।। १
दिनमणिमण्डलमण्डन मवखण्डन
मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे॥२
कालियविषघरगञ्जन
जनरञ्जन
यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे॥३
से इस भगवच्छरण नामक सायका प्रतिदिन पाठ करेंगे वे संसारकी मार्सा-
स्याग कर परमशान्ति और परमात्माकी साक्षात् मक्कि माप्त करेंगे ॥२२
कमीजीके कुचकुम्मोंका आभय करनेवाले कुण्डलधारी और आ
मनोदर पनमालाधारी है देव हे हरे ! आपकी जय हो जय हो।'
सूर्यमण्डलको मुभित करनेवाले, मवमयके नाराक और मुनियों
मनरूप सरोपरके ईस हे देव! हे हरे ! आपकी जर हो गय हो ॥२
कालिपनागा दमन करनेवाले, मत्प्रे आनन्दित करनेवाले एवं पदक
कमलदिवाकर रे देव ! हरे ! भापती जय हो जय ॥

स्तोत्ररतावली . मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव - हरे ॥ ४ ॥ अमलकमलदललोचन भवमोचन त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे ॥५॥ जनकसुताकृतभूषण जितपण समरशमितदशकठ जय जय देव हरे ॥६॥ अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे ।।७।। तव चरणे 'प्रणता वयमिति भावयं ए कुरु कुशलं "प्रणतेपु जय जय देव हरे ॥८॥ मधु, मुर और नरकासुरके संहारकर्ता, गरुडवाइन, देवताओंकी क्रीडाके आभय हे देव ! हे हरे ! आपकी जय हो जय हो ॥४॥ निर्मल कमलदलके समान नेत्रोंवाले, भवबन्धनको काटनेवाले एवं त्रिभुवनके मायभूत हे देव ! हे हरे ! आपकी जय हो, जय हो ॥५॥ सीताके साय शोभा पानेवाले, पण दैत्यको जीतनेवाले और युद्धमें रावणको मारनेवाले है देय ! है हरे ! आपकी जय हो, जय हो ॥ ६ ॥ नवीन मेपके समान श्यामसुन्दर, मन्दराचलको धारण करनेवाले और लक्ष्मीजी के मुलचन्द्र के लिये चकोररूप है देय 1 हरे ! आपकी जय हो जय हो॥७॥ मापके चरणों की हम शरण लेते हैं, आप भी धर पारि कीजिये और हम शरणागतोका कल्याण कीमिये देय हो! भाकी जय हो जप ॥८॥इस प्रकार भीगयदेय कविका बनाया +4 विष्णुस्तोत्राणि श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मुदम् । मङ्गलमजुलगीतं जय जय देव हरे ॥ ९ ॥ इति श्रीजयदेवविरचितं मङ्गलगीतं सम्पूर्णम् । ३३ -श्रीदशावतारस्तोत्रम् प्रलयपयोधिजले धृतवानसि वेदम् । विहितवहिनचरित्रमखेदम् ॥ केशव 'धृतमीनशरीर जय जगदीश हरे ॥ १ ॥ क्षितिरतिविपुलतरे तव विष्ठति पृष्ठे। घरणिधरणकिणचक्रगरिष्ठे॥ केशव धृतकच्छपरूप जय जगदीश हरे ॥ २ ॥ वसति दशनशिखरे धरणी तव लग्ना । हुआ यह मङ्गलमय मधुर गीत भक्तोंको आनन्द देनेवाला है । हे देव । हे हेरे! आपकी जय हो, जय हो ॥९॥ . हे मीनावतारधारी केशव हे जगदीश्वर! हे हरे! प्रलयकालमें बढ़े हुए समुद्र में बिना क्लेश नौका चठानेकी लीला करते हुए आपने वेदोंकी रक्षा की यी आपकी जय हो ॥१॥ हे केशव ! पृथ्वी के धारण करनेके चिहरो कठोर और अत्यन्त विशाल तुम्हारी पीठपर पृथ्वी स्थित है, ऐसे कच्छर- रूपधारी जगत्पति आप हरिकी जय हो ॥२॥ चन्द्रमामें निमम हुई शशिनि कलाकलेर निमग्ना ।। केशर वरूप जग जगदीश हरे॥३ राय करकमलबरं नखमद्रुतगाम्। दलिवहिरण्यकशिपुग्नुगृहम् ।। फेशर नरहरिरूप जय जगदीश हरे ॥ ४ ॥ एलयसि विक्रमणे पलिमहुववामन । पदनसनीरजनितजनपावन ॥ केशव धृतवामनरूप जय जगदीश हरे ॥५॥ क्षत्रियरुधिरमये जगदपगतपापम् । सपयसि पयसि शमितमयतापम् ।। केशव धृतमृगुपविरूप जय जगदीश हरे ॥६॥ वितरसि दिक्षु रणे दिक्पविकमनीयम् । कलहरेखाके समान यह पृथ्वी आपके दाँतकी नोकपर अटकी हुई सुशोभित हो रही है, ऐसे स्कररूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो॥शाहिरण्यकशिपु. रूपी तुच्छ भृक्षको चीर डालनेवाले विचित्र नुकीले नख आपके करकमसमें हैं, ऐसे नृसिंहरूपधारी जगत्पति हरि केशवकी जय हो ॥ ४ ॥ है आधर्यमय वामनरूपधारी केशव आपने पैर बढ़ाकर राजा बलिको छला तया अपने चरण-नखोंके जलसे लोगों को पवित्र किया. ऐसे आप जगत्पति, हरिकी जय हो ॥५॥ केशव ! आप जगत्के ताप और पापोंका नाश करते हुए, उसे क्षत्रियों के रुधिररूप जलसे मान कराते हैं, ऐसे आप परशरामरूपधारी जगत्पति हरिकी जय हो ॥६॥ जो युद्धम सब विष्णुस्तोत्राणि दशमुखमौलिबलिं रमणीयम् ॥ केशव धृतरघुपतिवेप जय जगदीश हरे ॥७॥ वहसि वपुपि विशदे वसनं जलदाभम् । हलइतिमीतिमिलिवयमुनामम् ॥ केशव धृतहलधररूप जय जगदीश हरे ॥ ८॥ निन्दसि यज्ञविघेरहह श्रुविजातम् । सदयहृदयदर्शितपशुधातम् ॥ केशव धृतबुद्धशरीर जय जगदीश हरे ॥९॥ म्लेच्छनिवहनिधने कलयसि करवालम् । धूमकेतुमिव किमपि करालम् ।। केशव धृतकल्किशरीर जय जगदीश हरे ॥१०॥ श्रीजयदेवकवेरिदमुदितमुदारम् । दिशाओंमें लोकपालोंको प्रसन्न करनेवाली, रावणके शिरकी सुन्दर बलि देते हैं, ऐसे श्रीरामावतारधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥७॥ जो अपने गौर शरीरमें हलके भयसे आकर मिली हुई यमुना और मेघके सदृश नीलाम्बर धारण किये रहते हैं, ऐसे आप बलरामरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय 11८) सदय हृदयसे पशुहत्याकी कठोरता दिखाते हुए याविधानसम्बन्धी श्रुतियोंकी निन्दा करनेवाले आप बुद्धरूपधारी जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥९॥ जो म्लेच्छसमूहका नाश करनेके लिये धूमकेतु के समान अत्यन्त भयंकर सलवार चलाते हैं, ऐसे कल्किरूपधारी आप जगत्पति भगवान् केशवकी जय हो ॥ १०॥ (हे मको!) इस

सोनाक्षापली
शृणु गुरखदं शुमदं मरसारम् ।।
केशर तदशरिधरूप जय जगदीश हरे ।।
इति श्रीजपदेशपिरनि दशारतारमा सम्पूर्णम् ।
३४-ध्रुवकृतभगवत्स्तुतिः
भुव उपाध
वधाना।
योऽन्तः प्रविश्य मम वाचमिमा प्रसुप्तां
सजीवयत्यखिलशक्तिधरः
अन्यांव
इस्तचरणश्रवणत्वगादीनं
प्राणान्नमो भगवते पुरुषाय तुभ्यम् ॥ १
एकस्त्वमेव भगवन्निदमात्मशक्तथा
मायाख्ययोरुगुणया महदावशेषम् ।
जयदेव कविकी कही हुई मनोहर आनन्ददायका कल्याणमय तत्त्वरूपा
को सुनो, हे दशावतारधारी ! जगत्पति, हरि केशव ! आपकी जय हो ।।११
ध्रुवजी बोले--जो सर्वशक्तिसम्पन्न श्रीहरि मेरे अन्तःकरणमें प्रवे-
कर अपने तेजसे मेरी इस सोपी हुई वाणीको सजीव करते हैं तथा हाथ, पैर
कान और त्वचा आदि अन्य इन्द्रियोंको मी चैतन्य प्रदान करते हैं,
अन्तर्यामी भगवान् आप ही हैं, आपको प्रणामहे ॥१॥ भगवन् ! आप अकेले-
ही अपनी अनन्त गुणमयी मायाशकिसे इस मइदादि सम्पूर्ण जगत्को रचकर

विष्णुस्तोत्राणि १२१ सृष्नानुविश्य पुरुपस्तदसद्गुणेषु नानेय दारुपु विभावसुखद् विमासि ॥ २॥ विदच्या यपुनयेदमचष्ट विवं सुतप्रयुद्ध मयरमपमः। तस्यापर्यशरणं तर पादमृतं विस्मयते कृतविदा कयमातबन्धी ॥ ३ ॥ नूनं विमुटमतयस्तय मायया ते ये त्यां मशप्पपरिमोधणमन्महतोः । অলি ফুক গাবমীয়- मिच्छन्ति यत्स्पर्म निरपेऽपि नृणाम ॥ ४ ॥ सन्दार भगत गुणों में जीयाको अनुर MEर भगवत् माग हैं, जो ना सार बामे पर मार ममी पो अनुमार पिप भयो भानसमार! RETी भाग पर मामा लमेर र सो मार देगा ! Tी भोर भार पर सरकारक art. उन म दो main frre Tre और Amerim पुरतो RI RA re kat:

स्तोत्ररत्नावली पा निर्धतिस्तनुभृतां नत्र पादप- ध्यानाद् मयजनकथाश्रवणेन वा स्यात् । सा ब्रह्मणि खमहिमन्यपि नाथ मा भूद किंत्वन्तकासिललितात पततां विमानात् ॥ ५॥ मक्ति मुहुः प्रवहतां त्वयि मे प्रसङ्गो भूयादनन्त महताममलाशयानाम् । येनाजसोल्वणमुरुव्यसनं भवाब्धि नेष्ये मवद्गुणकथामृतपानमः ॥६॥ ते न सरन्त्यतिवरां प्रियमीश मयं ये चान्वदः सुतसुहृद्गृहविचदाराः । से वजनाम मवदीयपदारविन्द- मापके चरणकमलोंका ध्यान करनसे अथवा आपके भक्तोंकी कथाएं सुननेमे प्राणियोंको जो आनन्द प्राप्त होता है, यह अपने स्वरूपभूत ब्रह्ममें भी नहीं .मिल सकता; फिर जिनको कालकी तलवार सण्डित करमालतो है उन स्वर्गक विमानोंसे गिरनेवाले पुष्पोंको वो यह मिल ही कैसे समता है ॥५॥ मन हे अनन्त ! आपमें निरन्तर मकिमाव रखनेवाले शुद्धचित्त महापुरुषों की मेरा पारंवार समागम हो, जिसमें मैं आपके गुणों के कयामृतका पान करनेसे सन्मच होकर अति उम्र और नाना प्रकारले दुःलो पूर्ण इस संसार सागर को मुगमता ही पार कर।कमनाम भार परणामी मुगाय मिना रित इमाया हुआ है, उनमापुलों का जो लोग समागम रते हैं, ये रेशमाने इस अत्यन्त प्रिय पारीर और इसके समम्मी .

LITER larkirrent १२३ ते पुमान् विष्णुस्तोत्राणि सौगन्ध्यलुब्धहृदयेषु कृतप्रसन्हाः ॥ ७॥ विर्यड्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य- मत्यादिमिः परिचितं सदसद्विशेपम् । रूपं स्यविष्ठमन ते महदाराने नातः परं परम घेधि न यत्र पादः ॥ ८॥ कल्पान्त एतदखिलं जठरेण गृहन् स्वरगनन्तसखातदो। पन्नामिसिन्धुरुहकाञ्चनलोकपप- गर्ने पुमान् मगवते प्रगतोऽस्मि तस्मै ॥९॥ त्वं नित्यमुकपरिशद्धपियुद्ध आत्मा आरिपुरुषो मगास्यपीयः । I fer पर भौरखी भादिकारण मीनार 1012 पासना पत पीस, साय मोर मनुष्यमाने ধংশ এ সংঘশং মাঠে এক সা পেলে पास रस र मानता । भार परम RY , fractal RTE ARE ८ ॥ है मो REE पुल मानल पू गाये सब पर से imags Ltd उपनदान grm Et RRTratak:

कोपरखायनी ॥४॥ सामीतसत्कनारोगहराजहंस । लक्ष्मी० ॥ २॥ संगारपोरगाने परवी मरारे मारीप्रभीकरमृगप्रवरादिवस आर्तस्य मत्सरनिदापनिपीडितस । लक्ष्मी० ॥३॥ संसाररूपमतिधारमगाघमूल सम्पाय दुःखशतसर्पसमाकुलस। दीनस देव कपणापदमागतस्य । लक्ष्मी० संसारसागरविशालकरालकाल- नक्रग्रहग्रसननिग्रहविप्रहस्य , व्यग्रस्य रागरसनोमिनिपीडिवस्य । लक्ष्मी० ॥ ५ ॥ कमलका सहारा दीजिये ॥ २ ॥ हे मुरारे । संसाररूप गहन वनमें विचरते हुए. कामदेयरूप अति उप्र और भयानक मृगराजसे पीडित तया मत्सररूप पामसे सन्तप्त अति आर्तको है लक्ष्मीनृसिंह ! अपने करकमलका महारा दीजिये ॥ ३ ॥ संसाररूप अति मयानक और अगाध कूपके मूलमें पहुंचकर जो सैकड़ों प्रकारके, दुःखरूप सपोसे ध्याकुल और अत्यन्त दीन हो रहा है, उस अति कृपण और आपति- ग्रस्त मुहको हे लक्ष्मीनृसिंहदेव ! अपने करकमलको सहारा दीजिये ॥४॥ संसारसागरमें अति कराल और महान् कालरूप नकों और प्राइके प्रसनेसे जिसका शरीर निगृहीत हो रहा है तथा आसक्ति और रसनारूप तरङ्गमालासे जो अति पीडित है ऐसे मुझको है लक्ष्मीनृसिंह ! अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥ ५॥ हे दयालो ! पाप जिसका बीज है।

विष्णुस्तोत्राणि संसारक्षमघवीजमनन्तकर्म- शाखाशतं करणपत्रमनगपुष्पम् । आरुह्य दुःखफलितं पततो दयालो । लक्ष्मी० ॥ ६॥ संसारसर्पधनवक्त्रमयोग्रतीत्र- दंष्ट्राकरालविपदग्धविनष्टमूर्तेः नागारिवाहन सुधाब्धिनिवास शौरे । लक्ष्मी० ॥ ७ ॥ संसारदावदहनातुरमीकरोरु- ज्वालावलीमिरतिदग्धतनूरुहस्य । त्वत्पादपमसरसीशरणागतस्य । लक्ष्मी० ॥८॥ संसारजालपतितस्य जगन्निवास सन्द्रियार्थवडिशार्थझपोपमस्य । अनन्त कर्म सेकड़ों शाखाएँ है, इन्द्रियाँ पत्ते हैं, कामदेव पुष्प हे तपा दुःख ही जिसका फल है, ऐसे संसाररूप वृक्षपर चदकर मैं नीचे गिर रहा हूँ। ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह ! अपने चरणकमलका सहारा दीजिये ॥ ६ ॥ इस संसारसर्पके विकटं मुखकी भयरूप उप दादोंके कराल विपसे दग्ध होकर नष्ट हुए मुझको हे गरुडवाहन, क्षीरसागरशायी शौरि श्रीलक्ष्मीनृसिंह ! आप अपने करकमलका सहारा दीजिये ॥७॥ संसाररूप दावानल के दाइसे अति आतुर और उसकी मर्यकर तथा विशाल जाला-मालाओंसे जिसके रोम-रोम दग्ध हो रहे हैं तथा जिसने आपके चरण- कमलरूप सरोवरकी शरण ली है ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह अपने करकमलका प्रहारा दीजिये ॥८॥ जगनिवास! सकल इन्द्रियोंके विषयरूप रंसी (उसमें १२८ स्तोत्ररत्रावली प्रोत्खण्डितप्रचुरतालुकमस्तकस्य । लक्ष्मी० ॥ ९। संसारमीकरकरीन्द्रकरामिधात- निपिष्टमर्मयपुपः सकलातिनाश । प्राणप्रयागमवभीतिसमाकुलस्य । लक्ष्मी० ॥१०॥ अन्धस्य मे हतविवेकमहाधनस्य चौरैः प्रमो पलिमिरिन्द्रियनामधेयः। मोहान्धकूपकुहरे विनिपातितस्य । लक्ष्मी० ॥११॥ लक्ष्मीपते कमलनाम सुरेश विष्णो चैकुण्ठ कृष्ण मधुसूदन पुष्कराक्ष । प्रह्मण्य केशव जनार्दन वासुदेव फँसने] के लिये मत्स्य के समान संसारपाशमें पड़कर जिसके तालु और मन्ना खण्डित हो गये हैं ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनृसिंह ! अपने करकमलका यारा दीजिये ॥ ९ ॥ हे सकलातिनाशन ! संसाररूप भयानक गजराजकी उसके आपतिरो जिमके मर्मस्थान कुचल गये हैं तया जो प्राणप्रयाणके सारा संसार (जन्म-मरण) के भयसे अति व्याकुल है ऐसे मुझको हे लक्ष्मीनिद! अपने करकमलका यारा दीजिये ॥१०॥हे प्रभो ! इन्द्रिम नामक प्रश्न चोरोंने जिसके विवेकरूप परम धनको हर लिया है तथा मोहरूप अन्धकूपों गड्ढे में जो गिरा दिया गया है ऐसे मुझ अन्धको लक्ष्मीसिद्धार अपने करकमटका सहारा दीजिये ॥११॥ समीपते ! हकमनाम!! देवेश्वर । विष्णो ! यकुण्ठ ! हे कृष्ण ! हे मधुसूदन ! हे कमरनपन ! दे प्रसय ! ! जनार्दन ! : यामुदेव ! हे देश ! मा दीनको विष्णुस्तोत्राणि १२९ AAN . देवेश देहि कृपणस्य करायलम्बम् ॥१२॥ : यन्मायय नितवपुःप्रचुरमवाह- मग्नार्थमत्र निवहोरुकरावलम्पम् । लक्ष्मीनृसिंहचरणाजमधुव्रतेन स्तोत्रं कृतं सुखकरं भुवि शक्करेण ॥१३॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं श्रीलक्ष्मीनृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् । DO- ३६-प्रह्लादकृतनृसिंहस्तोत्रम् प्रामाद उवाच ब्रह्मादयः सुरगणा मुनयोऽथ सिद्धाः सपकतानमतयो वचसां प्रवाहः। आप अपने करकमलका सहारा दीजिये ।। १२ ।। जिसमा स्वरूप मायाले री मद हुआ है उस प्रचुर संसारप्रवाहमें डरे हुए पुरुषों के लिये के इस लोक्ने अति बलवान् करायलम्परूप है ऐसा यह मुसार বৌ যে বৃনীরেন্স গেঞ্জি কাকল ভিী মন্ম । (शङ्कराचार्यजी) ने रचा है ॥ १३ ॥ महादजी बोले-जिनकी बुद्धि एकमात्र मत्वगुणमैं ही स्थित है, य नमादि देवगण तया मुनि और सिद्धगण मी अग्ने पचनीक प्रकार के मनन्त गुणों के कारण अभीत जिनकी आराधना नहीं कर सके ने FTATER नारामित पुरगुगैरपुनारि गिमः कि सोनुमति स मे हरिरामाते? पनामिजनरूपनपाभुतीव- स्तेजःप्रमायपलपीरादियांगाः नारायनाय हि मन्ति परस पुंसा मस्त्या तुतोष भगवान् गवण्यपाय ॥२। विप्रातिपड्गुणयुतादरविन्दनाम- पादारविन्दरिमुखानपचं वरिष्टम् । मन्ये सदपितमनोवचनेहितार्थ- प्राणं पुनावि स फुलं न तु भूरिमानः ॥३॥ नैवात्मनः प्रमुरयं निजलामपूर्णों भगवान् हरि मुझ उप्रजातिमें उत्पन्न हुए दैत्यार कै सन्तुष्ट हो सकते १॥१॥ मेरा तो ऐसा विचार है कि धन, फुटीनता, रूप, तर विद्या: ओज, तेज, प्रमाव, यल, पोप, बुद्धि और योग-ये सभी गुण परम पुरुष श्रीहरिकी आराधनाके साधक नहीं हो सकते; और भक्तिले तो वे गजेन्द्रपर भी प्रसन्न हो गये थे ॥२॥ जो ब्राझण उपर्युक्त यारह गुपोले युक है, किन्तु भगवान् कमलनामके चरणकमलोंसे विमुख है उससे छ मैं उस चाण्डालको श्रेष्ठ समझता हूँ जिसने अपने मन, वचन, कर्म, धन और प्राण श्रीहरिमें लगा रखे हैं; वह अपने कुलको पवित्र कर देता है किन्तु अधिक सम्मानशाली ब्राह्मण पैसा नहीं कर सकता ॥ ३॥ (इससे यह न समझना चाहिये कि भगवान्को पूजाकी आवश्यकता है) भगवान् तो आत्म विष्णुस्तोत्राणि मानं जनादविदुपः करुणो घृणीते यद्यजनो मगरते विदधीत मान तचात्मने प्रविमुखस्य यथा मुखश्रीः वसाद विगतविलव ईश्वरस सर्वात्मना महि गृणामि यथामनीपम् नीचोऽजया गुणविसर्गमनुप्रविष्टः पूयेत येन हि पुमाननुवर्णितेन सर्वे हमी विधिकरास्तव सवधानो प्रमादयो वयमिवेश न चोद्विजन्तः लामसे ही पूर्ण हैं, वे क्षुद्र पुरुषों से अपना मान कराना नहीं केवल करुणावश ही वे अपने मोदारा की हुई परिनोको स्वीकार है, (हस्से मी उन उपासकोंका ही लाम है) क्योंकि जिस प्रक- मुखकी शोमा (दर्पणादिमें प्रतीत होनेवाले) प्रतिबिम्पको मी करती है उसी प्रकार भक भगवान् के प्रति जो-जो मान प्रदर्शि है यह (मावास्यतिषिम्वरूप) उसे ही मात होता है ॥ ४ ॥ अE में नीच हूँ, तो मी निराश होकर अपनी बुद्धिके अनुसार E उन ईश्वरकी महिमाका वर्णन करता हूँ, जिसका वर्णन करनेसे वश धारचक्रमें पड़ा हुआ जीव तत्काल पवित्र हो जाता। हे ईशये अधादिक समस्त देवगण सत्वस्वरूप आपकी आशा करनेवाले हैं। हम दैत्योंकी माँति आपसे देख करनेवाले नहीं हे मगपन् ! अपने मनोहर अवतारों द्वारा आर जो-जो स्टीला

स्तोत्ररतायली
क्षेमाय भूतय उतात्मसुखाय चास्य
विक्रीडितं. भगवतो रुचिरावतारः ॥६॥
तद्यच्छ मन्युमसुरथ हतस्त्वयाद्य
मोदेत साघुरपि वृश्चिकसर्पहत्या ।
लोकाच नितिमिताः प्रतियन्ति सर्वे
रूपं नृसिंह विमयाय जनाः सरन्ति ।।७।।
नाहं विभेम्यजित तेऽतिभयानकास्य-
जिह्वार्कनेत्रकुटीग्मसोगदंष्ट्रात
अन्त्रसजा क्षवजकेसरशङ्खकर्णा-
निर्हादभीतदिगिमादरिभिन्नखाग्राव
॥८॥
वे भी जगत्के कल्याण, उद्रय तथा आत्मानन्दके लिये ही होती है ॥ ६॥
अतः अब आप कंघ शान्त कीजिये क्योंकि असुरका संहार हो चुका ।
हे देव ! सर्प और चिच्छू आदि दुःखदायी जीवोंके मारे जानेपर साधुजन
मी, आनन्द मानते हैं, अत: इस असुरके संहारसे आनन्दित हुए सर
लोक आपका कोप शान्त होनेकी बाट देख रहे हैं। हे नृसिंह भयो
मुक्त होनेके लिये मनुष्य आपके रूपका स्मरण करते हैं ॥ ७॥ हे अजित!
जिसमें अति भयानक मुख और जिला सूर्यके समान देदीप्यमान मेधा
मृकुटिका पेग एवं उमदा हैं, जो आँतोंकी माला, रकात सहामार
एवं सीधे खड़े हुए कामे युक्त है, जिसके सिंहनादने दिग्गजों को भी
भयमीत कर दिया है तथा जिसके नखान शशुको विदीर्ण करनेवाले
हैं, आरके उम मयंकर स्वरूपसे महो कुछ मी भय नहीं है ॥ ८ ॥

विष्णुस्तोत्राणि प्रणी प्रस्ताऽस्म्यहं कपणवत्सल दुःसहोग- संसारचक्रकदनाद्वसतां बद्धः स्वकर्मभिरुशत्तम तेऽधिमूलं प्रातोऽपवर्गशरणं पसे कदा नु। यसात्प्रियाप्रियवियोगसयोगजन्म- शोकामिना सफलयोनिषु दहमानः । दुःखौपचं तदपि दुःखमतद्धियाई मूमन प्रमामि वद मे तव दास्ययोगम् । सोऽहं प्रियस्य सुहृदः परदेवताया लीलाकधास्तव नृसिंह विरिश्चगीताः है दीनवत्सर ! मैं तो अति उग्र और दुःसह संसारचक्रके दुःखसे हो रहा हूँ, जहाँ मुझे कमाने बाँधकर दिस जीवोंके बीच में डाल है। हे श्रेष्टतम ! अब आप प्रसन्न होकर मुझे अपने मोक्षपद और दापक चरणों में कर चुलायेंगे ।। ९ । हे भूमन् ! मैं सभी योनियों में के वियोग दौर अप्रियके संरोगसे उत्पन्न होनेवाले शोकानलसे होता रहा हूँ। उस दुःखकी जो ( इष्टप्राप्तिरूप) ओषधि है। दुःख ही है, अतः मैं देहादि अनात्मामें आत्मबुद्धि कर चिरकालं रंदा हूँ, सो आप मुझे अपने दास्यभावका उपदेश दीजिये ।।१ नृसिंह ! आप सबके प्रिय, सुहृद् और श्रेष्ठ देवतारूप हैं। मापके द को प्राप्त शेकर मैं, आपके चरणयुगसमें निवास करनेवाले छा-

स्लोभरतागली
अञ्जस्तितय॑नुगृणन्
गुणविप्रमुत्तो
दुर्गाणि ते पदयुगालयईससङ्गः ॥११॥
पालस नेह शरणं पितरी नृसिंह
नास चागदमुदन्वति मतो नौः।
तप्तस्स
तत्पतिविधिर्य
इहाचसेप्ट-
स्तावद्विमो तनुभृतां त्वदुपेक्षितानाम् ॥१२॥
यस्मिन्पतो यहि येन च यस यसा.
घस्मै यथा यदुत यस्त्वपरः परो वा।
मावः करोति विकरोति पृथक्समावः
सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः
सहवास करता हुआ गुणों से मुक्त हो ब्रह्माजीद्वारा कही हुई आपकी
लीलाकथाओंको गाकर सुगमतासे ही संसारसे पार हो जाऊँगा ॥१९॥
हे नृसिंह ! इस लोकमें सन्तप्त पुरुषोंकी दुःखनिवृत्तिका जो उपाय माना
जाता है, आपके उपेक्षा करनेपर यह एक क्षण के लिये ही होता है (इन
स्थायी नहीं होता)। बालकके लिये माता-पिता, रोगीके लिये घोधि
और समुद्र में डूबते हुएके लिये नौका सदा ही सहायक नहीं होते (उनके
रहते हुए भी विपरीत फल होता देखा गया है) ॥१२॥ मगवन् !
(ब्रहादि) पुरातन अथवा (उनसे प्रेरित माता-पितादि) |चीन
कर्ता जिसमें जिससे जब जिसके द्वारा जिसका जिससे जिसके लिये जिस
प्रकार जो कुछ बनाते अथवा बिगाड़ते हैं यह सब मिन-मिन खमाव-
घाला आपहीका रूप है ॥ १३ ॥ हे प्रमो! पुरुषकी अनुमतिसे कालके वारा
स्वरूपम् ॥१३॥

विष्णुस्तोत्राणि १३५ माया पुनः सृजति कर्ममयं पलीयः कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः। छन्दोमयं यदजयार्पितपोडशारं संसारचक्रमज कोऽतितरेचदन्यः ॥१४॥ स त्वं हि निन्यविजितात्मगुणः सथाम्ना कालो वशीकृतविसृज्यविसर्गशक्तिः। चक्रे विसृष्टमजयेश्वर पोडशारे निष्पाड्यमानमुपकर्प विभो प्रपन्नम् ॥१५॥ दृष्टा मया दिवि विमोऽखिलधिष्ण्यपाना- मायुः श्रियो विमव इच्छति याचनोऽयम् । गुणों में क्षोम होनेपर माया मनःप्रधान लिङ्गदेहकी रचना करती है जो अति बलवान्, कर्ममय, वैदिक कर्मकलापमें आसक तथा अविद्यादारा अर्पित (मन, दस इन्द्रिय और पञ्चतन्मात्रा इन) सोलह विकारोंसे युक्त है। सो हे अजन्मा प्रभो! आपसे अलग रहनेवाला ऐसा कौन पुरुष है जो उस (मनरूप) संसारचक्रको पार कर सके ॥ १४॥ हे प्रभो! आप अपनी चैतन्यशक्तिसे बुद्धिके समस्त गुणोंपर नित्य विजय प्राप्तकर कालरूपसे सम्पूर्ण साध्य और साधनको अपने वशमें रखनेवाले हैं, हे ईश्वर ! मैं मायाद्वारा इस सोलह अरोंवाले संसारचक्रमें डाला जाकर ( इक्षुदण्डके समान) पेरा जा रहा हूँ, कृपया आप मुझ शरणागतको अपने समीप खींच लें ॥ १५ ॥ हे विमो ! संसारी लोग जिनकी इच्छा रखते हैं .वे स्वर्गलोकमें मिलनेवाली सम्पूर्ण मात्रामायनी येस्मपितः कुपितहासविजृम्मित विस्फनितेन तुलिताः रात ते निरस्तः ॥१६॥ नम्मादमूतनुभृतामहमाशिमों आपुः श्रिय विमवमन्द्रियमाविषिश्चात् । नेन्छामि ते बिललितानुरुविक्रमेण कालात्मनोपनय मां निजभृत्यपालम् ॥१७॥ पुत्राधिपः श्रुविमुखा मृगाष्णिरूपाः क्वेदं कलेपरमशेपरुजां विरोहः। निर्विद्यते न तु जना यदपीति विद्वान् कामानलं मधुलवैः शमयन्दुरापैः ।।१८॥ लोकपालंकी आयु, लक्ष्मी और विभूतियाँ तो मैंने सूप देख ली। वे तो हमारे पिताके कंधयुक्त हास्यद्वारा किये हुए भृकुटिक्लिाससे ही नष्ट हो गयी थी और अब आपने उन्हें भी मार डाला ॥ १६ ॥ अतः बीवोंक इन भोगादिके परिणामको जाननेवाली प्रहाके भी आयु, वैभव और इन्द्रियसम्बन्धी भार्गोकी इच्छा नहीं करता, क्योंकि वे सभी परम पराक्रमी कालरूप परमेश्वरसे ग्रस्त हैं। अतः मुझे आप अपने दामोंके समीप ले चलिये ॥ १७ ॥ अहो ! कहाँ केवल सुननेमें सुखदायक मृगतृष्णारूप विषयभोग और कहाँ सम्पूर्ण रोगोंका उत्पचिस्यान यह शरीर ! किन्तु मनुष्य इनकी असारता और नाशवताको जानकर भी, बड़ी कठिनतासे प्राप्त होनेवाले ( मोगरूप) मधुकणोंसे अपनी भोगेच्छारूप अमिको शान्त करनेकी चेष्टा करता है। इनसे विरक्त नहीं होता!॥१८॥श! कहाँसो

विष्णुस्तोत्राणि
R
काहं रजाप्रभव ईश तम.ऽधिकेलि-
आतः सुरेतरकुले क उवानुकम्पा ।
न प्रक्षणां न तु मास्स न रमाया
यन्मेऽपितः शिरसि पाकरप्रसादः ॥
नेपा परा रमतिर्मवतो ननु स्था-
अन्तार्यात्ममुहदो जगतस्तथापि।
संसेश्या सुरवरोरिव ते प्रसादः ।
सेवानुरूपमुदयो न परावरत्वम् ॥
एवं जन
निपतितं प्रमवाहिकूपे
कामामिकाममनु यः प्रपतन्प्रसङ्गात् ।
इस तमःप्रधान अतुरकुल रजोगुणसे उत्पन्न हुआ मैं । और कहीं
करा अशे जो अपना प्रसादस्वरूप (और सालसन्तापहारी)क
आपने कभी ना मादेव और लक्ष्मा शिरपर भी नहीं रख
मेरे मसाकपर रस्सा ॥१९॥ अन्य संसारी पुरुषों के समान (२
और मेरे जैसे प्राणिशेमे ) आपकी उत्तम-अपम बुद्धि नहीं हो
क्योंकि आप अपूर्ण जात के आत्मा और मुहद् है। (फिर मी
कृपा जो अन्तर देखा जाता है इसका कारण यही है कि
समान आरको का भी रोजागे ही प्राप्त होती है-गके अनु-
भारपा करते हैं कुछ ऊँच नीच घिरे नहीं ॥२०॥ हैम
संसाररूप सर्पयुक्त पुएँ में परे हुए अन्य कामासक पुरके :
मी उसी में गिरानासाया। उस समर देवर्षि नारदने से मना

स्तोत्ररत्नावली. कृत्वात्मसात्सुरर्पिणा भगवन्गृहीतः सोऽहं कथं नु विसृजे तय भृत्यसेवाम् ।।२१।। मत्प्राणरक्षणमनन्त पितुर्वघश्च मन्ये स्वभृत्यऋषिवाक्यमृतं विधातुम् । खड्गं प्रगृह्य यदवोचदसद्विधित्सु- स्त्वामीश्वरो मदपरोऽवतु कं हरामि ॥२२॥ एकस्त्वमेव जगदेतदमुप्य यच- माद्यन्तयोः पृथगवस्यसि मध्यतय । सृष्ट्वा गुणव्यतिकरं निजमाययेदं कर अनुगृहीत किया था। (उन्हींकी कृपासे आज मुझे आपके दर्शनों. का सौभाग्य प्रात हुआ है ) अतः मैं आपके दार्योकी सेवा कित प्रकार त्याग सम्ता हूँ ! ॥ २१ ॥ अनन्त । मेरे पिताने अन्याय करनेकी इच्छासे हापमें खड्ग लेकर जो या "मुझसे अतिरिक यदि कोई ईश्वर है तो वेरी रक्षा को- शिर प्रागों की रक्षा दी और मेरे पिता यम मिया, यह भी अपने रात देवा नारदके पचनों सत्य करने के लिये ही या-ऐया में मानता हूँ॥ २२॥ गाय ! यह गम्पूर्ण जगत् एकमात्र मा, योकि (सम्प होने के कारण) मो भादि और अन्तमें (पारण भापितो)माही माविष्ट रहते हैं तया मयमै (अभिवानपरो) भारी पित है। भाप ही अग्नी मायागे गुमोके परिणामरूप इस जागो रसरल अनुभविष्ट हो उन गुणोंके (पशि प्रश्न आदि) काटता समय . आपने जो मेरे . और विष्णुस्तोत्राणि नानेव सैरवसिवस्तदनुपविष्टः ॥२ त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोज्यो माया यदात्मपरवुद्धिरियं पार्था । यद्यस्य जन्म निधनं स्थितिरीक्षणं च सवै तदेव वसुकालवदस्तिवाः ।। न्यस्येदमात्मनि जगद्विलयाम्युमध्ये शेषेऽऽत्मना निजसुखानुभयो निरीहः । योगेन मीलितगात्मनि पीवनिद्र- स्तुर्ये स्थितोन तु वमोन गुणांश्च युक्षे ।। म्यापासे जगत्के सथारक्षक और संदारक आदि मिन-मिल प्रतीत होते हैं ॥ २३॥ हे ईस ! यह सत् (कार्य), असत् (फ रूप सम्पूर्ण जगत् अप दी है, किन्तु आर (इसके आदि और मी पर्तमान रनेके कारण) इससे मिन । मतः यह मेरा पराया है ऐसी निरर्थक बुद्धि मारा ही है। क्योंकि जिसका जिससे स्थिति, लय और प्रकार होता है, पर दूप ही होता है, अव प्रकार (कार्यरूप) और (कारणरूप) पीज दोनों दो गन्धत रूप हैं उसी प्रकार यह सम्पूर्ण जगत् मार दी ।। २४ ॥ प्रमों एनिरिट अपस अपने समेटकर मारममुराका अनुभव कर निरीह दोपर प्रश्पपटीन जस्में पपन करते हैं। उस समय बाब दि हर और आत्मवरूपके मापसे निमा वीतर पुरीयरमें स्थित रते नो नोपुदीरे और न स्मोपरलापली तम्य ते यपुरिद निकालन्या मर्यादितप्रकृतिधर्मण आत्मगूढम् । अम्मस्पनन्नशपनाद्विरमत्समावे- मेग्भूत्सकणिकावटयन्महाजम् ॥२६॥ तत्सम्मव: फविरतोऽन्यद्रपन्यमान- स्त्वां पीजमात्मनिततंवरहिचिन्त्य। नाविन्ददन्दशनमत्सु निमज्जमानी जातेकरे कथमुद्दोपलमेत बीजम् ॥२७॥ सत्यात्मयोनिरतिविसित आय्यितोऽनं कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धमावः । मोक्ता ही ॥ २५ ॥ यह ग्रहाण्ड, अपनी कालयक्तिले प्रकृतिके गुणोंको प्रेरित करनेवाले उन्हीं आपका रूप है। पहले यह आपहीमें निहित या, जब प्रलयकालीन जलके भीतर शेषशय्यापर शयन करनेवाले आपने योगनिद्रारूप समाधिको त्यागा तो वटके बीजसे उत्पन्न हुए महावृक्षके समान आपकी नामिसे अति विशाल ब्रह्माण्डकमठ उत्पन्न हुआ।॥ २६ ॥ उससे उत्पन्न हुए सूक्ष्मदर्शी ब्रह्माजीको जब उस कमटके अतिरिक और कुछ भी दिखायी न दिया तो अपने व्यात बीजप्प आपको अपनेसे बाहर समझकर वे सौ वर्षतक जलके भीतर घुसकर ढूँढ़ते रहे, किन्तु उन्हें कुछ भी न मिग-सो ठीक ही है, क्योंकि अङ्कुर उत्पन्न हो जाने- पर (उसमें व्याप्त हुए) बीजको कोई पुरुष पृथक् कैसे देख सकता है ॥ २७ ॥ इससे आत्मयोनि श्रीब्रह्माजी अति विस्मित हो उस कालपर विष्णुस्तोत्राणि तामात्मनोश भुषि गन्धमिवातिसूक्ष्म मृतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥२८॥ सहस्रबदनाशिशिरकगरु- नासास्यकर्णनयनामरणायुधाट्यम् । मायामयं सदुपलक्षिवसनिवेश घ्या महापुरुषमाप मुदं विरिश्चः ॥२९॥ वस्मै भयान् हयशिरस्तनु च विनद् वेदद्रुहायतिवली मधुकैटमाख्यौ । हन्धानयच्युतिगणास्तु रजस्तमश्च सचं तव प्रियतमां तनुमामनन्ति ॥३०॥ बैट गये। है ! फिर बहुत समयतक तीत्र तपस्याद्वारा अन्तःकरण घर हो जानेपर उन्हे, पृप्वीमें व्याप्त अति सूक्ष्म गन्धतन्मात्राके समान भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप अपने शरीरमें व्याप्त हुए आपका माक्षात्कार हुआ॥२८॥ इस प्रकार सहसों वदन, चरण, शिर, हाय, अरु नासिका, मुख, कर्ण, नयन, आभूषण और आयुधोंसे सम्पन्न चौदह लोकरूप अवययोंसे विभूषित आप मायामय विराट् पुरुषका दर्शन कर ब्रह्माजीको परमानन्द प्राप्त हुआ ॥ २९ ॥ तब आपने हयग्रीव- रूप धारणकर अति प्रवर और वेदद्रोही रजोगुण-तमोगुणरूप मधु और कैरम नामक दो दैत्योंकी मारकर उन ब्रह्माजीको सत्त्वगुणरूप समस्त वेद समर्पण किये । अतः सत्त्वगुणको ही आपका प्रियतम रूप कहा जाता है ।। ३०४६ परमपुरुष ! इस प्रकार आप मनुष्य, तिर्थक, ऋषि, देवता !

१४२ नोपरामायनी 1 नतिर्यगृषिदेवसपातारै- लोकान् विमाषपसि ईसि जगत्प्रतीपान । धर्म महापुरुष पासि युगानुक्त एनाकली यदमवनिपुगोश्य सत्यम् ॥३१॥ नेतन्मनस्तर कथासु विकुण्ठनाय संप्रीयते दुरिन्गुष्टमसाघु तीव्रम् । कामातुरं हुचोकमयपणात तस्मिन्कर्थवय गति विमृशामि दीनः ॥३२॥ जिकैकतोऽच्युत विकर्षति माविहप्ता शिश्नोऽन्यतस्त्वगुदरं श्रवण कुतश्चित् । प्राणोऽन्यतचपलहक् क च कर्मशक्ति- और मत्स्यादि अवतार लेकर सम्पूर्ण लोकोंका पालन और जगविद्रोहियोंका संहार करते हैं । उन अवतारोंदारा आप प्रत्येक युगके धमाकी रक्षा करते हैं, किन्तु कलियुगमें ( अवतार न लेकर ) गुप्तरूपसे ही रहते हैं। इसीलिये आप त्रियुग' नामसे भी प्रसिद्ध हैं ॥ ३१ ॥ हे विकुण्ठनाय ! यह मेरा मन अति असाधु, दोपदूषित, कामातुर तथा हर्ष, शोक, मय और त्रिविध एषणाओंसे व्याकुल है, आपकी कथाओं में इसकी प्रीति ही नहीं है । मैं दीन ऐसे कलुषित चिचमें किस प्रकार आपके स्वरूपका निन्तन करूँ ॥ ३२ ॥ हे अच्युत ! जिस प्रकार बहुत-सी सपत्नियाँ (सौतें) अपने स्वामीको अपनी-अपनी ओर खींचती हैं उसी प्रकार मुझे अतृप्त रसना एक ओर, उपस दूसरी ओर, त्वचा उदर एवं कर्ण किसी तीसरी .

-- हयः सपत्न्य इव गेहपति लुनन्ति ॥३३॥ स्वकर्मपतितं मववैतरण्या- मन्योन्यजन्ममरणाशनभीतभीतम् । पश्यञ्जनं खपरविग्रहबरमैन हन्तेति पारचर पीहि मूढमद्य ॥३४॥ को न्वत्र तेऽखिलगुरो भगवन् प्रयास उचारणेऽस्य भवसम्मवलोपहेतोः। मूढेषु वै महदनुग्रह आर्वबन्धी किं तेन ते प्रियजनाननुसेवतां नः ॥३५॥ परदुरत्ययवैतरण्या- र माप और नजल नयन किसी और तरफ क्या कर्मेन्द्रियाँ र ही स्थानकी ओर खींचती हैं ॥ ३३ ॥ रणीमें अपने कर्मोके कारण पड़कर एक-दूसरेके जन्म, मरण एवं नपानादिसे अत्यन्त भयमीत तया अपने और पराये पुरुषोंसे मित्रता देष करनेवाले मूढ जनसमुदायका हे पार लगानेवाले ! माप अब न कीजिये ॥ ३४ ॥ हे अखिलगुरो ! आप सम्पूर्ण जगत्की उत्पत्ति, ते और पालन करनेवाले हैं। हे भगवन् ! इन सबको पार लगाना के लिये ऐसी क्या प्रयासकी बात है ! हे दीनबन्धो ! महापुरुषोंकी तो मूदोंपर ही होनी चाहिये, आपके प्रिय दासोंकी सेवा करनेवाले गोके लिये उसका ऐसा क्या प्रयोजन है ? (हम वो उनकी सेवासे र जायेंगे) ॥ ३५॥ हे प्रभो ! जिसका पार करना दूसरों के लिये नवोद्विजे : इस संसाररूप १४४ स्तोत्ररत्नावली स्वीर्यगायनमहामृतमग्नचित्तः । शोचे ततो विमुख गेतस इन्द्रियार्थ- मायासुखाय - भरमुबहता विमूढान् ॥३६।। प्रायेण देव मुनयः स्वनिमुक्तिकामा " मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । नैतान विहाय कृपणान् विमुमुक्ष: एका नान्यं त्वदस्य शरणं प्रमताऽनुपश्ये ॥३७॥ यन्मैथुनादि गृहमेधिसुखं हि तुच्छं कण्डूयनेन करयोरिव दुःखदुःखम् । वृप्यन्ति नेह कृपणा बहुदुःखभाज: अत्यन्त कठिन है उस संसाररूप वेतरणीसे मुझे कुछ भी भय नहीं है। क्योंकि मेरा चित्त आपके पौठपगानरूप परमामृतका पान करके मग्न रहता है, मुझे तो उनकी चिन्ता है जो मूद उससे विमुख रहकर इन्द्रियों के विषयोंसे प्राप्त हनेवाले मायिक सुखके लिये कुटुम्पपोषणादिका मार पहन करते रहते हैं ॥३६॥हे देव । मुनिजन प्रायः अपनी ही मुतिकी इच्छामे एकान्तमें रहकर मौनयत धारण कर लेते हैं। ये दूसरे हितमें तत्पर नहीं होते। किन्तु मुझे इन गरीरोंको छोड़कर अकेले ही मुछ होनेकी रा नहीं है और संसारमें मटकनेयाले इन लोगों लिये भार सिंग और मुझे उसार फरनेवाला भी दिखायी नही देता ॥३७॥ हे प्रमो ! मैयुनादि जो गदस्पीके मुम्ब वे खुमी समान डिम प्रभार हायोंमे खुजानेर मुजीमें (पहले कुछ चैन पड़नार कण्डतिवन्मनसिजं विपहेत धीरः ॥३८॥ मौनव्रतवैवतपोऽध्ययनवधर्म- 'व्याख्यारहोजपसमाधय आपयाः । प्रायः परं पुरुष ते त्वजितेन्द्रियाणां वार्ता भवन्त्युत न वात्र तु दाम्मिकानाम् ॥३९॥ रूपे इमे सदसती तव वेदसृष्टे : बीजाकुराविष न चान्यदरूपकस्य । युक्ताः समक्षमुमयत्र विचिन्वते त्वां कर) अधिकाधिक दुःख ही बढ़ता है, उसी प्रकार ये भोग मी न्त सुच्छ हैं । किन्तु अनेको दुःख उठानेपर भी ये दीनजन इनसे नहीं होते। कोई धीर पुरुष ही खुजटीके समान कामादि वेगोंको करता है.॥३८॥ है परमपुरुष ! मौन, प्रत, शास्त्रश्रवण, तप, यन, स्वधर्मपालन, शास्त्रोको 'ब्याख्या करना, एकान्तसेवन, जप उमाधि-ये जो मोके दस साधन हैं ये मी प्रायः जितेन्द्रिय की जीविकाके साधन बन जाते हैं, क्या दाम्भिकों के लिये दोघे बीविनके साधन रहते भी हैं और कभी (दम्भ खुल जानेपर) जी रहते ॥ ३९ ॥ वेदने यीज और अङ्करके समान कार्य और -ये आपके दो रूप पवलाये हैं। वास्तवमें आप रूपरहित है। इन्हें छोड़कर आपके गानका और कोई साधन भी नहीं है। काठमें निहित अग्निके समान मतिपोगद्वारा इन (फार्य और दोनोंहीमें आपका साक्षात्कार करते हैं। क्योंकि आपके लिया

सोपवायली
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मांगन पक्षिमिर दारुण नान्यता सान् ॥४०
वायरग्निरनिविपदम्पमात्रा
प्रागैन्द्रियाणि हृदर्य चिदनुग्रहमा
सर्व स्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन्
मान्यत् त्वदस्त्पपि मनावचमा निरुक्तम् ।।४।।
मै गुणा न गुगिनी महदादयो ये
स
मनाप्रमृतयः सहदेयमाः ।
आफ्न्तयन्त उरुगाप सिदन्ति हि त्वा-
मेयं विमृश्य सुधियो पिरमन्दि छन्दाद १४२॥
...सद सेऽहतम नमःस्तुतिकर्मपूजाः
फर्म स्मृविवरणयोः अणं कथायाम् ।
इनकी पर कोई पता नहीं है ॥ ४० ॥ हे भूमन् ! याय, अग्नि, पृथ्वी
भाकाश, जल, पयवन्मात्रा माण, इन्द्रिय, मन, चिच, माधार या
स्यूल सूक्ष्म सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं। अधिक क्या बिग्ने मी
पदार्थ मन या वाणीके विषय है उनमेंसे कोई भी आपसे पृयक नहीं
है ॥४१॥ किन्तु हे महाकी । ये सवादि गुण, गुणों के परिणाम
महत्तस्वादि तथा देवता और मनुष्योंके सहित मन बुद्धि आदि कोई मी
आपको नहीं जानते, क्योंकि सभी आदि-अन्तयुक्त हैं 1,आप ऐसे हैं।
यह जानकर पण्डितजन शब्दवः आपका प्रतिपादन करनेसे उपरत हो
जाते हैं ॥ ४२ ॥ हे पूज्यतम ! प्रणाम, स्तुति, सर्वकार्पण, उपार्टना
चरणोंका ध्यान सया कयाभरण-इन , अलके सहित आरती भली
-

--- मनःप्रभृतयः सहदेवमाः । पदार्थ मन या वाणीके विषय है उनमेंसे कोई भी आप पृषानों है ॥४१॥ किन्तु हे महाकी । ये सावादि गुण, गुणोंडे परिणाम स्तोत्ररतायटी योगेन पक्षिमिव दारुपु नान्यतः स्यात् ॥४०॥ त्वं वायुरग्निरनिर्वियदम्युमात्राः प्राणेन्द्रियाणि हृदयं ., चिदनुग्रहय । सर्व त्वमेव सगुणो विगुणश्च भूमन् नान्यत् त्वदस्त्यपि मनोवचसा निरुक्तम् ॥४१॥ नैते गुणा न गुणिनो महदादयो, ये ; सर्वे आधन्तवन्त उरुगाय विदन्ति हि त्वा- मेवं विमृश्य सुधियो पिरमन्ति शब्दात् ॥४॥ तत् वेऽर्हतम नमःस्तुतिकर्मपूजाः कर्म स्मृविचरणयोः श्रवण कथायाम् । इनकी पृयक कोई सत्ता नहीं है ।। ४० ॥ हे भूमन् ! वायु, अग्नि, पृष्षी भाकाश, जल, पञ्चतन्मात्रा प्राण, इन्द्रिय, मन चिच, आधार तया स्थूल-सूक्ष्म सम्पूर्ण जगत् एकमात्र आप ही हैं। अधिक क्या जिसने मी महत्ववादि वया देववा और मनुष्यों के सहित मन बुद्धि आदि को भी आपको नहीं जानते, क्योंकि सभी आदि-अन्तयुक्त हैं। आप ऐसे - यह जानकर पण्डितजन शम्दतः आपका प्रतिपादन करने , जाते हैं ॥४२॥ हे पूज्यतम ! प्रणामः खति चरणोंका ध्यान पया फयाभषणन छ भो " .. .

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स्तोत्ररक्षापली दृष्ट्वा मां न पुनर्जन्तुरात्मानं वप्तुमर्हति ॥४६॥ प्रीणन्ति यथ मां धीराः सर्वभावेन साधवः । श्रेयस्कामा महाभागाः सर्वसामाशिषां पतिम् ॥१७॥ एवं प्रलोम्पमानोऽपि बरेलोंपलोमनः। एकान्तित्वाद, भगवति नैच्छन् वानसुरोचमः ॥४८|| इति श्रीमद्भागवत महापुराणे सप्तमस्कन्धे नवमेऽभ्याये महादव- नृसिंहस्तोत्रं सम्पूर्णम् । हो गया तब उसे किसी तरहका संताप नहीं करना पड़ता ॥ ४६॥ मैं सकळ शुभ इच्छाओंको पूर्ण करनेवाला हूँ, इसलिये जितेन्द्रिय और अपना कल्याण चाहनेवाल महामाग साधुजन सब प्रकार मुझे प्रसन्न करनेका प्रपत्र करते है ||४७|| इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंको प्रलोमिव करनेवाले वकालोम दिखानेपर भी असुरश्रेष्ठ प्रहादने उनकी इच्छा नहीं की, योनि घे मायारले अनन्य भक ये!! ४८!'

रामस्तोत्राणि
३७ -रामरक्षास्तोत्रम्
मस श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्नस बुधौशिक अपिः श्रीसीता.
देवता अनुष्टुप् छन्दः सीता शक्तिः श्रीमान् हनुमान
श्रीरामचन्द्रप्रीत्यर्य रामरक्षास्तोत्र नपे विनियोगः । अथ ध्यानम्-
ध्यायेदाजानुपाई
एतशरधनु बदपासनस्य
पीवं पासो बसानं नवकमदलस्पर्धिने प्रसन्नम् ।
यामाहादसीतामुखकमलमिलोचन नीरदाम
नानामहारदीई दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥
रामरक्षास्तोत्र-मन्त्रके बुधकौशिक ऋषि हैं। सीता और
देवता हैं। अनुष्टुप् छन्द है, सीता शक्ति हैं, श्रीमान् हनुमानजी
तथा श्रीरामचन्द्रजीकी प्रसन्नताके लिये रामरक्षास्तोत्रके जपमें
किया जाता है।
- पहने हुए
-चो धनुष-बाण धारण किये हुए हैं, बद्धपद्मासनसे विराजमान
जिनके प्रसन्न नयन नूतन फमटदलसे स्पर्धा
। वाम भागमें विराजमान श्रीसीताजीके मुखकमलसे पिडे
आजानुपामु, मेघश्याम, नाना प्रकारके अगवसे विभूषिष
जटाधारी भीरामचन्द्रजीका ध्यान परे ।

निरा ने रापकः तु नाठ दशरथात्मजः ॥१॥ एक-श्रीमनुस्याकचर ये नया रएनायस पुंग सावी परित पटिया एमपर महारास्नादनन् प्यासा नीलोत्पलश्यामं रान राकिन्न । धानसमापन सासितूणधनुर्वाणपाणि नचरान्दार। सनीठया दगवानुमातिन दिन । रामरक्षा पटेखामः पापघ्नी सर्वकामदाम् । दरापाटनन्डिनम् ॥ २॥ कोसल्पेयी सो पख हशामित्रप्रिया भुढी । भोजापी चर वेल विख्यावाबो कर उठा स्थ व साके से अपनी रहे है रशा का विवानिय एक और मे

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तोप्ररक्षापळी - स चिरायुः सुखी श्री विजयी विनयी मवेद ॥१०॥ पातालभूनलन्योमचारिणश्यचारिणः न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रति रामनाममिः ॥११॥ रामेति राममति रामचन्द्रति वा सरन् । नरो न लिप्यते पापै ति मुक्ति च विन्दति ॥१२॥ जगज्जेयकमन्त्रण रामनाम्नामिरधिवम् । यः कण्ठे धारयेचस्य करस्याः सर्वसिद्धयः ॥१३॥ पनपअरनामेदं यो रामकवचं सरेत् । अव्याहताज्ञः सर्वत्र लमते जयमङ्गलम् ॥१४॥ आदिष्टवान्यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः। दीर्घायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयसम्पन्न हो जाता है |॥ १०॥ जो जीव पावाउ, पृथ्वी अथवा आकाशमें विचरते हैं और जो छादेषसे घूमते रहते हैं वे रामनामोंसे सुरक्षित पुरुषको देख भी नहीं सकते ॥११॥ राम रामभद्र' रामचन्द्र' इन नामोंका सरण करने से मनुष्य पापोंसे टिस नहीं होता तया मोग और मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ १२ ॥ जो पुरुष जगत्को विजय करनेवाले एकमात्र मन्त्र रामनामसे सुरक्षित इस स्तोत्रको फण्ठमें धारण करता है (अर्यात् इसे कण्ठस्य कर लेता है ) सम्पूर्ण सिद्धियाँ उसके हस्तगत हो जाती हैं ॥ १३ ॥ जो मनुस्य वनपद्धर नामक इस रामकवचका सरण करता है उसकी आशाका भी उल्लहन नहीं होता और उसे सर्वत्र जय और मनकी प्राप्ति होती है ॥ १४ ॥ श्रीशङ्करने रात्रिके समय स्वप्नमें इस रामरक्षाफा रामस्तोत्राणि तथा लिखितवान्धाधः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥१५॥ आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् । अमिरामखिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥१६॥ वरुणो रूपसम्पनौ सुकुमारौ महाबलौ। पुन्हरीकविशालाक्षी चीरकृष्णाजिनाम्बरौ ॥१७॥ फलमूलाशिनौ दान्तौ वापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१८॥ शरण्यौ सर्वसचानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । रक्षःकुलनिहन्तारौ त्रायेतां नो रघूतमौ ॥१९॥ आचसजघनुपाविपुस्पृशावक्षयाशुगनिपङ्गसङ्गिनौ । जिस प्रकार आदेश दिया था उसी प्रकार प्रातःकाल जागनेपर. बुध- कौशिकने इसे लिख दिया ॥ १५ ॥ जो मानो कल्पवृशेके बगीचे हैं तथा समस्त आपत्तियोंका अन्त करनेवाले हैं, जो तीनों लोकोंमें परम सुन्दर हैं वे श्रीमान् राम हमारे प्रभु हैं ॥ १६ ॥ जो तरुण अवस्थावाले रूपवान्। सुकुमार, महाबली, कमलके समान विशाल नेत्रवाले, चीरवस्त्र और कृष्णमृगचर्मधारी, फल-मूल आहार करनेवाले, संयमी, तपस्वी, ब्रह्मचारी, सम्पूर्ण जीवोंको शरण देनेवाले, समस्त धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ और राक्षसकुलका नाश करनेवाले हैं वे श्रेष्ठ दशरथकुमार राम और लक्ष्मण दोनों भाई हमारी रक्षा करें ॥ १७-१९॥ जिन्होंने सन्धान किया हुआ धनुष ले रखा है, जो बाणका सर्य कर रहे हैं क्या अक्षय बाणासे युक्त तूार लिये हुए हैं वे राम और लक्ष्मग मेरी रक्षा करने के लिये

स्तोत्ररतावमा
रखणाय ममरामलक्ष्मणावग्रवाधिदेवगच्छताम्॥२०॥
सन्नद्धा कवची खड़ी चापवाणघरी युवा।
गन्छन्मनोरथामन रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली।
काकुत्स्यः पुरुषः पूर्णः कौसल्येयो रघूचमः ॥२२॥
वेदान्तवेयो यझेशः पुराणपुरुषोचमः।
जानकीवल्लमः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३॥
इत्येतानि जपमित्यं मदकः श्रद्धयान्वितः।
अधमेघाधिकं पुण्यं सम्प्रामोति न संशयः ॥२४॥
रामं दिलश्यामं पद्यावं पीतवाससम् ।
स्तुवन्ति नाममिर्दिव्यैर्न ते संसारिणो नराः ॥२५॥
मार्गमें सदा ही मेरे आगे चलें ॥ २० ॥ सर्वदा उद्यत, कवचधारी, हायमें
खड्न लिये, धनुष-बाण धारण किये तथा युवा अवस्थावाले भगवान राम
लक्ष्मणजीके सहित ( आगे-आगे) चलकर हमारे मनोरयोंकी रक्षा करें
॥ २१ ॥ (मगवान्का कथन है कि) राम दाशरथि, शूर, लक्ष्मणानुचरा
बली, काकुत्स्थ, पुरुष, पूर्ण, कौसल्येय, रघूत्तम, वेदान्तवेद्य, योग
पुराणपुरुषोचम, जानकीवल्लम, श्रीमान् और अप्रमेयपराक्रम-इन नामोका
नित्यप्रति श्रद्धापूर्वक जप करनेसे मेरा मक्त अश्वमेध यस्से भी अधिक
फल प्राप्त करता है-इसमें कोई सन्देह नहीं ।। २२-२४ ॥ जो लोग
दूर्वादलके समान श्यामवर्ण, कमलनयन, पीताम्बरधारी, मगवान् रामका
दिव्य नामोंसे स्तवन करते हैं वे संसारचक्रमें नहीं पड़ते ॥ २५ ॥

तमस्तोत्राणि राम लक्ष्मणपूर्वज रघुवरं सीतापति सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्ण गुणनिधि विप्रप्रियं धार्मिकम् । राजेन्द्र सत्यसन्धं दशरथवनयं श्यामलं शान्तमूर्ति वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलक राघवं रावणारिम् ॥२६॥ रामाय राममद्राय रामचन्द्राय वेधसे। रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥२७॥ श्रीराम राम रघुनन्दन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम । श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥२८॥ श्रीरामचन्द्रचरणौ -लक्ष्मणजीके पूर्वज, खुकुलमें श्रेष्ठ, सीताजीके स्वामी, अति उन्दरककुत्स्थकुलनन्दन, करुणासागर, गुणनिधान, नाशपमका परम धार्मिक, राजराजेश्वर, सत्यनिष्ठ, दशरथपुत्र, श्याम और गन्धमूर्ति, सम्पूर्ण यो सुन्दर पकुलतिलक, रापत और रावणारि भगवान् रामकी में वन्दना करता हूँ ॥ २६ ॥ रामा रामभद्रा मचन्द्र विधावस्वरूप नाप प्रभु सीवापतिको नमस्कार है ॥ २७ ॥ एनन्दन श्रीराम हे मरतामज भगवान राम !हे रमवीर प्रभु राम ! ER मेरे आभय से ॥ २८ ॥ में श्रीरामचन्द्रो चरणों मनसे स्मरण मनसा सरामि सोधरखापरी श्रीरामचन्द्रचरणी वचसा गृणामि । श्रीरामचन्द्रचरणी शिरसा नमामि श्रीरामचन्द्रचरणी शरणं प्रपये ॥२९॥ माता रामा मत्पिता रामचन्द्र: स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः। सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयाउ- नान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥३०॥ दक्षिणे लक्ष्मगो यस यामे च जनकात्मजा। पुरतो मारुतिर्यस्य वं वन्दे रघुनन्दनम् ॥३१॥ लोकामिरान रगरणधीर राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकर त करता हूँ, श्रीरामचन्द्रके चरणोंका वाणीसे कीर्तन करता हूँ, श्रीरामचन्द्र के चरणोंको शिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ वथा श्रीरामचन्द्रके चरणों की शरण लेता हूँ ॥ २९ ॥ राम मेरी माता है, राम मेरे पिता है, राम खामी हैं और राम ही मेरे सखा हैं। दयामय रामचन्द्र ही मेरे सर्वख है। उनके सिया और किसीको मैं नहीं जानता-बिल्कुल नहीं जानता ।। ३० ॥ जिनकी दायीं ओर लक्ष्मणजी, बायीं ओर जानकीजी और सामने हनुमानजी विराजमान हैं उन रघुनायजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ३१ ॥ जो सम्पूर्ण लोकोंमें सुन्दर, रणक्रीडामें धीर, कमळनयन, रघुवंशनायका करुणामूर्टि और करुणा भण्डार हैं उन श्रीरामचन्द्रजीकी मैं शरण छेदा है॥ ३२ ॥ जिनकी मनके समान गति और वायुके समान का है, श्रीरामहतने मैं शरण लेता हूँ॥ ३३ ॥ कवितामयी डाओर बैठकर मधुर अावाले राम-राम' इस मधुर नाम कूजते हुए वाल्मीकिरूप नरस्कार करता हूँ॥ ३५॥ राम-राम ऐसा घोष करना सम्पूर्ण संसार- बीजाको भून डालनेवाला, समस्त सुख-सम्पचिमी प्राधि करानेवाला तथा कोपिलकी में वन्दना करता हूँ॥ ३४॥ आरचियोंको हरनेवाले तथा यपदाको भयभीत करनेवाला है ।। ३६ ॥ राजाओंमें धेट भीरामजी दा पमस्तोत्राणि 5 श्रीरामचन्द्रं शरणं प्रपद्ये ॥३२॥ मनोजवं मारुततुल्यवेग जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् । वातात्मज वानरयूथमुख्यं श्रीराम शरणं प्रपद्ये ॥३३॥ कूजन्तं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् । आरुख कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥३॥ आपदामाहार दातारं सर्वसम्पदाम् । लोकाभिरामं श्रीरामं भूयो भूयो नमाम्यहम् ॥३५।। भववीजानामर्जन सुखसम्पदाम् । यमदतानां... रामरामेति गर्जनम् ॥३६॥ मर्जन तर्जन जो परम जितेन्द्रिय योर युद्धिमानों में श्रेष्ठ हैं उन पवननन्दन वानराप्रगम्य समकारको सम्पत्ति प्रदान करनेवाले लोकाभिराम भगवान् रामको बरंचर स्तोत्ररतायली । रामो राजमणिः सदा विजयते राम रमेशं भजे रामेणामिहता निशाचरचम् रामाय तस्मै नमः। रामान्नास्ति परायणं परवरं रामस्स दासोऽस्म्यह रामे चित्तलयः सदा मवतु मे मो राम मामुद्धर ॥३७ राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने ॥३॥ इति श्रीबुधकौशिकमुनिविरचितं श्रीरामरक्षास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ३८--ब्रह्मदेवकृता श्रीरामस्तुतिः वन्दे देवं विष्णुमशेपस्थिविहेतुं त्वामध्यात्मज्ञानिमिरन्तहदि मान्यम् । विजयको प्राप्त होते हैं। मैं लक्ष्मीपवि भगवान् रामका भजन करता हूँ। जिन रामचन्द्रजीने सम्पूर्ण राक्षसेनाका ध्वंस फर दिया था, मैं उनको मणाम करता हूँ। रामसे पड़ा और कोई भी आभय नहीं है। रामचन्द्रबीचा दास हूँ। मेरा चिच सदा राममें ही छीन गोहेरामा आप मेरा उमार कीजिये ॥ १७ ॥ (भीमहादेवजी पार्वतीजीसे करते-) हे मुमति ! रामनाम विष्णुमासनाम के नुस्य है। मैं सदा राम, राम राम इस प्रकार मनोरम रामनाममें दी रमन करता है।॥ ३८॥ पापी यो सम्पूर्ण शपियोको सितिक बारला माय.

रामस्तोत्राणि हेयायद्वन्दविहीन परमेकं सत्तामात्र सर्वहृदिस्य दृशिरूपम् ॥ १॥ प्राणापानौ निधययुद्धया हृदि ध्या छिचा सर्व संशयवन्धं विपयोपान् । पश्यन्तीयं यं गतमोहा यतयस्तं वन्दे रामं रनकिरीटं रविमासम् ॥ २ ॥ मायावीत माधवमा जगदादि मानातीतं मोहविनाशं मुनिवन्यम् । योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्ण वन्दे रामं रञ्जिवलोकं रमणीयम् ॥ ३ ॥ सानियोंहायरसमे ध्यान किये जानेवाले, लाल और प्रसाद ita) सबसे परे, भारतीय, सत्तामात्र, सपने विराजमान और बासीलरूप उन आप भगवान् विष्णुदेखने में प्रगान करता हूँ ॥१॥ मोरीन मालीगम निभित मुस्कि मारामार और अमन ने रोजर तपासाने सम्पूर्ण संसाधन और विपर-धामा मन र बिस वर दर्शन उन ial, न वेबसी भगवान् राममे में समान मा Ruोस मी पति पर आदिमरर मररे नि avit मारे मोरपनायरने निम्नो पन्दना मोकन रे गाने पेशा रोगमा प्रतिपूर्ण और पूर्व र बारित मोअर मारा स्तानरमायला । मावामावप्रत्ययहीनं मयमुख्य- योगासक्तैरर्चितपादाम्बुजयुग्मम् नित्यं शुद्धं पुद्धमनन्तं प्रणवाख्यं वन्दे राम · वीरमशेपासुरदावम् ॥ ४ ॥ त्वं मे नायो नावितकार्याखिलकारी मानातीवो माधवरूपोऽखिलधारी । भक्त्या गंम्यो मावितरूपो मवहारी योगाम्यासावितवेतासहचारी त्वामावन्तं लोकततीनां परमीशं लोकानां नो लौकिकमानैरधिगम्यम् । हूँ ॥ ३ ॥ जो माव और अमावरूप दोनों प्रकारको प्रतीतियोंसे रहित हैं, क्या जिनके युगल चरमम्मोंका योगपरायण शहर आदि पूजन करते हैं और जो नित्य, शुद्ध बुद्ध और अनन्त हैं, सम्पूर्ण दानवाके किरे दावानल के समान उन ओकारनामवीरवर रामों में प्रणाम करता हूँ ॥ril हे राम! आप मेरे प्रभु हैं और मेरे सम्पूर्ण पार्थिव कार्योको पूर्ण करनेवाले हैं, आप देश-कालादि मान ( परिमाण ) से यह नारायणस्वरूप, अखिल विश्वको धारण करनेवाले, 'मलिसे प्राप्पा अपने स्वरूपमा ध्यान किये जानेपर संसार-मपने दूर करनेवाले और योगाम्पारसे शुद्ध हुए चिवमें विहार करनेवाले हैं ॥५॥ आरएस लोम् परम्पराके आदि और अन्य (अन् उत्पति और प्रळपके स्थान) सम्पूर्ण लोकांक मोर, आप किसी भी लोग मारे जाने रामस्तोत्राणि मक्तिश्रद्धामावसमेतैर्मजनीयं वन्दे रामं सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ।।६।। को वा ज्ञातुं स्वामतिमानं गतमान मायासक्तो माधव शक्तो मुनिमान्पम् । वृन्दारण्ये वन्दितवृन्दारकपन्दं वन्दे रामं भवमुखवन्धं सुखकन्दम् ॥ ७॥ नानाशास्त्रै दफदम्यः प्रतिपाय नित्यानन्दं निम्पियज्ञानमनादिम् । मत्सेवार्थ मानुषमावं प्रतिपर्व नहीं जा सकते, आप भक्ति और श्रद्धासम्पन्न पुरुषोंवारा भजन किये जाने योग्य है, ऐसे नीलकमलके समान श्यामसुन्दर आप श्रीरामचन्द्र- जीको मैं प्रणाम करता हूँ ।। ६ ।। हे लक्ष्मीपते ! आप प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे परेतया सर्वमा निर्मान हैं। माया आसक कौन प्राणी आपकोजाननेमें समर्य हो सकता है। आप अनुपम और मीयोंके माननीय हैं, तया (फष्णा. चतारके समय) पन्दावनमें अखिल देवसमूहकी वन्दना करनेवाले और रामरूपसे शिव आदि देवताओं के स्वयं वन्दनीय हैं। ऐसे आप आनन्दधन मगवान् रामको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ७॥ जो नाना शास्त्र और वेदसमले प्रतिपादित, नित्य आनन्दस्वरूप, निर्विकल्स, शानखस्स और अनादि । तथा जिन्होंने मेरा कार्य करनेके लिये मनुष्यरूप धारण किया है उन भरतमणिके समान नीलवर्ण मधुरानाय भगवान् रामको प्रणाम • मगवान् रामकोमपुरानायकार श्रीराम और कृष्णकी अमितामनकी है। ६ ..

स्लोगरत्नावली पन्दे राम मरकवर, मधुरेपम् ॥ ८॥ पदायको या पटवीमं स्ववमार्य माझे प्रयामानाविधानं मवि मर्त्यः । पमं स्याम फामितकामप्रदमी प्यावापाठापाठकजारिंगतःसाद ॥९॥ व भीमदम्यात्मरामायणे युस्काये प्रयोदयराम भोरमदेयत्वा भीरामतिः सम्पूर्ण । ३६- जटायुकृत श्रीरामस्तोत्रम् ... जटायुरुवाच अगणितगुणमप्रमेयमाचं सकलजगस्थिति संयमा.दहेतुम् । उपरमपरमं परात्ममृतं सततमहं प्रणतोऽसि रामचन्द्रम् ॥१॥ करता हूँ ॥ ८॥ इस पृथ्वीपर जो मनुष्य इच्छित कामनाओंको पूर्व करनेवाले श्याममूर्ति भगवान रामका ध्यान करते हुए प्रमाजीके को हुए इस ममशनविधायक आद्य स्तोत्रका श्रद्धापूर्वक पाठ करेगा वह ध्यानशील पुरुष उम्पूर्ण पापजालसे मुक हो जायगा |९॥ जटायु योला-जो अगणित गुणगाली' हैं, अप्रमेय है, जगतके , आदि कारण है क्या उसकी स्थिति और व्य आदिके हेतु उन परम शान्तस्वरूप परमात्मा श्रीरामचन्द्रजीकी मैं निरन्तर पन्दना करवा

रामस्तोत्राणि
अधिसुखमिन्दिराकटाक्षं धपिनसुरेन्द्रचतुर्मुखादिदुःखम् ।
वरमनिशं नतोऽसि रामं पदमहं वरचापपाणहस्तम् ॥२॥
पुरनकमनीयरूपमीड्यं रविशतमासुरमीहितप्रदानम् ।
पदमनिशं सुरागमूले कतनिलयं रघुनन्दनं प्राये ॥३॥
विपिनदवामिनामधेयं भवमुखदैवतदेव दयालम् ।
तुजपतिसहस्रकोटिनाशं रविवनयास हरि प्रपद्ये ॥
विरतभरभावनाति भवविमुख निमिः सदैव दृश्यम् ।
विजलधिसुतारणाधिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥५॥
जो असीम आनन्दमप और श्रीकमजदेवीके कटाके आश्रय
तपा जो ब्रह्मा ओर इन्द्र आदि देवगणोंका दुःख दूर करनेवाले हैं उन
नुर-राणधारी परदायक नरश्रेठ श्रीरामचन्द्रजीको मैं मानिस माम
रता हूँ॥२॥ जो त्रिलोभ र अधिक रूपवान् है, सबके तुल्य
सेकड़ों स्यों के समान तेजस्वी है पर याति फल देनेवाले हैं, उन
रणमद और रागाधित हरयमें रहनेवाड़े श्रीरएनापीको में बानिय
प्रणाम करता हूँ॥३॥ जिनमा नाम संसाररूप यनके लिये दावानलके
उमान है, जो मादेच आदि देवताओं के भी पूम देव हैं क्या ओ सइटों
करोड़ दानवेनोकादउन करलेराले और भीरनाजी के समान लाना।
उन पामा श्रीहरिमे मैं मगाम करता हूँ॥४॥ो पारने निरन्स
वाना रसवाथैछे भारत पर और संजर उन मुनियों के सदर
गोचरर हैं या जिनो घरमहर पेठ (R) मरधारते
पर रखा। अएनापरी में एल खेव ॥५॥

स्तोत्ररलावली N - गिरिशगिरिसुतामनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् । सुसरदनुजेन्द्रसेविताधि सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥६॥ परधनपरदारवर्जिताना परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् । परहिसनिरवात्मनो सुसेव्यं रघुवरमम्धुजलोचनं प्रपद्ये ॥७॥ मितरुचिरविकासिताननाजमविसुलमं सुरराजनीलनीलम् । सिवनलरुहचास्नेत्रशोमं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपंचें ॥८॥ हरिकमलजशम्भुरूपमेदावमिह विमासिं गुणत्रयानुचः। मीमहादेव और पार्वतीजीके मन-मन्दिरमें निवास करते जिनकी लीलाएँ अति मनोहारिणी है क्या देव और असुरपविगण जिनके परम- कमलोंकी सेवा करते हैं उन गिरिवरपारी सुखदायक रघुनायकी में भरण लेता हूँ ॥ ६ ॥ जो परपन और परस्त्रीसे सदा दूर राते हैं तथा पराये गुण और परापी विभूतिको देखकर प्रसन्न होते हैं उन निरन्तर परोपकारपरापण महात्माओंसे सुसेवित कमलयन भीरपुनापजीकी में भरण छेता हूँ॥७॥ जिन मुखकमल मनोहर मुघकानसे विकसित हो पात, जो मौके लिये अति मुझम हैं, जिनके परीरश्री कान्ति इन्द्रनीलमनिके समान सुन्दर नीलवर्ण रे वा जिनके मनोर नेत्र मम्मम्मी-गो शोमावाले उन भीगुरु मादेवी के परम गुरु भीषनाप- जीन में रप लेता हूँ॥८॥रेप्रमो 1 से मरे हुए पाओं में से एक पूर्व प्रविमिम्बित होता है से ही सप रश और दम-नवीनों गुयोरप मार विष्णु प्रमा और मादेसम्मसे मासिक at र देभान हवी मी सदिय पात्र में भापको

रामस्तोत्राणि
बेरिव जलपूरितोदपात्रेधमरपतिस्तुविपाश्रमीशमीडे ॥९॥
पतिशवकोटिसुन्दराङ्गं शतपथगोचरभावनाविदूरम् ।
विपतिहृदये सदा विभावं रघुपतिमाहिरं प्रभुं प्रपये ॥१०॥
इत्येवं स्तुक्तस्तस्य प्रसनोऽभूद्रघूचमः ।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्पोः परं पदम् ॥११॥
शृणोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् ।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृति लभेत् ॥१२॥
ति राघवभापितं वदा श्रुतवान हर्पसमाकुलो द्विजः ।
घुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥१३॥
तिश्रीमदध्यात्मरामायणे अरण्यकाण्वेऽटमेसमें जटायुक्त श्रीरामस्तोत्रेसम्पूर्णम्
जति करता हूँ॥९॥ आपका दिव्य शरीर सैकड़ों करोष कामदेवोंसे भी
सुन्दर है. सैकड़ों मार्गामें फंसे हुए लोगोंसे आप अत्यन्त दूर है और
यतीश्वरोंके हृदयमें आप सदा ही मासमान हैं। ऐसे आप आर्चिहर
प्रभु रघुपतिकी मैं शरण लेता हूँ॥ १०॥ जटायुके इस प्रकार स्तुति
करनेपर श्रीरघुनायजी उसपर प्रसन्न होकर बोले, जयापो ! हुम्हारा कल्याण
हो, तुम मेरे परमधाम विष्णुलोकको जाओ ॥ ११॥ जो पुरुष मेरे इस
खोत्रको एकाग्रचिचसे सुने लिखे अथवा पढ़े यह मेरा सारूप्यपद प्राक्ष
करता है और मरते समय उसे मेरा सरण होगा ।। १२ । पधिराज जटायुने
खनाथजीका यह कपन बड़े इषसे सुन्म और उन्हीं के समान रूप धारण कर
ब्रह्मा आदि लोकपालसे पूजिव परमधामको चला गया ॥ १३ ॥

स्तोमा ४०--इन्द्रकृतश्रीरामरतोत्रम् मंज राममिन्दीराम मपारम्पदानिलामाभिधानम् । मवानीरदा मावितानन्दरूपं मामा मादिप्रपनम् ॥१॥ मुरानीकासौपना रहे नराकारदेई निराकारमीच्यम् । परे परानन्दरूपं वरेण्यं हरि राममीरां मजे मारनाथम् ॥२॥ अपमाखिलानन्ददोहे प्रपन्नासिनिःशेषनाशामिधानम् । इन्द्र पोले जो नौरमा-गी आमावाले है, संसाररूप धनके : लिये जिनका नाम दावानलके समान है। श्रीपार्वतीजी जिनके भानन्द- स्वरूपका हृदयमें ध्यान फरवी है, जो (जन्म-मरणरूप) संबरसे छुड़ानेवाले हैं और शङ्करादि देवोंके आश्रय है उन मगवान् रामको मैं मजता हूँ ॥१॥ जो देवमण्डलके दुःलसमूहका नाश करनेके एकमात्र कारण है क्या जो मनुम्यरूपधारी, आकारहीन और स्वति किये जाने योग्य हैं, पम्वीस मार उतारनेवाले उन परमेरपर परमानन्दरूप पूजनीय भगयान् रामले में भजता हूँ॥२॥ जो जागोमे गा रामस्तोत्राणि तपोयं.गयोगीशमामिमान्यं कपोशादिमित्रं मजे राममित्रम् ॥ ३ ॥ सदा मोगमाना सुदूरे विमान्तं सदा योगमाजामरे विमान्तम् । चिदानन्दकन्दं सदा राघवेश विदेहात्मजानन्दरूप प्रपद्ये ॥४॥ महायोगमायाविशेषानुपुको दिमासीश लीलानराकारपतिः। त्वदानन्दलीलामथापूर्णकः सदानन्दरूपा भरन्तीह लोके ॥५॥ अहं मानपानामिमनप्रनत्तो कार आनन्द देवपाले और उनके भाभर, जिनका नाम रणागव भोंके सम्पूर्ण दु:ताको र फरनेवाला है, जिनया वर और ोग एवं पोप योगीश्वरोमी भावना निन्दन किया जाता। पाजो मुमीपादिके मित्र हैं, उन मियन भगगन परमे में माता ॥१॥ य मोगरयरम होगा बस दूर रहते हैं और योगनिर Tों के परा सनी विराज भवानीजरिये भानन्दसम्म उन चिदानन्दपन भीरएनापजीमे मैं मनवा है ॥४॥हे भगवन ! मार भनोमागमासरे गुण से बुढ़कर सोडावे तरी मनुप्पटीस जिनके कर्ण भारमेन आनदी को पयायसे 'पूर्ण होने: ARE HERE + प्रो!

१६८ स्तोत्ररत्नावळी E. न वेदाखिलेशाभिमानामिमानः । इदानी मवत्पादपद्मप्रसादा त्रिलोकाधिपत्यामिमानो विनष्टः॥६॥ स्फुरखलफेयरहारामिराम घरामारभूतासुरानीकदावम् शरचन्द्रवक्त्रं लसत्पयनेत्र दुरावारपारं मजे राघवेशम् ॥ ७॥ सुराधीशनीलाम्रनीलाङ्गकान्ति विराधादिरक्षोवघाल्लोकशान्तिम् । किरीटादिशोमं पुराराविलामं तो सम्मान और समपानके उन्मादसे मतवाला हो रहा था सर्वेश्वरताके अभिमानवश मैं अपने आगे किसीको कुछ भी नहीं समझता या । अब आपके चरणकमलोंकी कृपासे मेरा प्रिटोका- विपवित्यका अभिमान चूर हो गया ॥ ६ ॥ जो चमचमाते हुए रल जटित मुजरंद और हारोंसे सुशोभित हैं, पृथ्वीके माररूप राखोकी सेनाके लिये दावानलके समान है, जिनका घरचन्द्र के समान मुख और पति मनोहर नेत्रफमल है क्या जिनका आदि-अन्त जानना अत्यन्त कठिन । उन एनापजीको मैं ममता हूँ ॥७॥ जिनके शरीरको इन्द्रनीलमणि मौर मेपके समान श्याम फान्ति है, जिन्होंने विराध आदि राक्षसों को मारकर सम्पूर्ण लोकोंमें शान्ति स्थापित की है उन किरीटादिसे सुशोभित और भीमहादेवजीके परमधन एकुलेश्वर रामचन्द्रीका मैं ममता .

रामस्तोत्राणि मजे रामचन्द्र रघूणामधीशम् ॥८॥ लसचन्द्रकोटिप्रकाशादिपीठे समासीनमधे समाधाय सीताम् । स्फुरद्धेवगा वडिसुजभासा मजे रामचन्द्र निवृचार्तितन्द्रम् ।।९।। इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे प्रयोदयसर्ग इन्द्रकृतश्रीरामस्तोत्र सम्पूर्णम् । ४१-रामाष्टकम् छतादेववन्दनं दिनेशवंशनन्दनम् । सुशोमिमालचन्दनं नमामि राममीश्वरम् ॥१॥ मुनीन्द्रयज्ञकारक शिलाविपविहारकम् । १॥८॥ जो वेजोमय भुपर्णकैसे वणवाये और बिजली के समान शान्तिमयी जानीजीने गोद लिये गयेही चन्द्रमाओं के समान देदीप्यमान सिंहासनपर विराजमान है उन दुख और आलस्यसे रीन भगवान् रामले में भजता हूँ॥९॥ आर्व दपयाने जिन पन्दना की है। सूत्रं मान्दिव प्रने वा जिनके पार पन्दन गुनित । उन । परमेश्वर राम में नमक 10 जो मनिराज सिनियम स्त.परजापती महानुदिारक नमामि राममीवरम् ॥ २॥ स्वतावासकारण तपोवने विहारिणम् । करे मुनापारिणे नमामि राममीमाम् ॥ २॥ कुरजमुक्तसापर्क जटायुमाधवायकम् । प्रविधीयनाय नमामि राममीपरम् ।। ४ ।। पासनसम्मति निरनिम्नगापतिम् । दशासशजवि नमामि राममीश्वरम् ॥५॥ विदीनदेशहपेर्ग कपीप्सितार्थवर्पणम् । स्वबन्धुकार्पण नमामि राममीवरम् ॥ ६॥ गवारराज्यरमण प्रजाजनाविभक्षणम् । यस सम्पम फरानयाने पाणरूमा आस्यामा कर निवारण करनेवाले तया श्रीरादरका महान् धनुर तोड़नेपाछे हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ॥ २॥ जो अपने पिताके यचोंका पालन करनेवाले, तपोवनमें विचरनेवाले और हापोंमें धनुष धारण करनेवाले हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ३॥ जिन्होंने मायामगार बाप छोड़ा था, जटायुको मोक्ष प्रदान किया था तथा कपिराज बालीको विद किया या उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥४॥ जिन्होंने वानरोंके साप मित्रता की समुद्रमा पु3 बाँधा और रावणके वंशका विनाश किया उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ५॥ जो अति दीन देवताओं को प्रसन्न करनेवाले, वानकी इन्छित कामनाओंको पूर्ण करनेवाले और अपने बन्धुओंका चोक शान्त करनेवाले हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ। ६ ।। ओ शुशीन (निकटा) पमस्तोत्राणि कतास्तमोहलक्षणं नमामि राममीश्वरम् ॥७॥ हताखिलाचलामरं स्वधामनीतनागरम् । जगतमोदिवाकरं नमामि राममीश्वरम् ॥ ८॥ इदं समाहितात्मना नरो रघूचमाष्टकम् । पठनिरन्तरं भयं भोद्भवं न विन्दते ॥९॥ इति श्रीपरमहंसखामिब्रह्मानन्दविरचिवं श्रीरामाष्टकं सम्पूर्णम् । ४२-श्रीसीतारामाष्टकम् बममहेन्द्रसुरेन्द्रमरुद्गणरुद्रमुनीन्द्रगणरविरम्य धीरसरित्पतितीरमुपेत्य नुतं हि सतामविवारदारम् । राज्यके पालक) प्रजाजनकी भीतिक भक्षक और मोहफी निवृत्ति करनेवाले हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ जिन्होंने सम्पूर्ण पृथ्वीका भार हरण किया, जो सफल नगरनिवासियों को अपने धामको ले गये तथा जो संसाररूप अन्धकारके लिये सूर्यरूप हैं उन परमेश्वर रामको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ८॥ जो पुरुष इस रामायकको एकाग्रचिचठे निरन्तर पढ़ता है उसे संसारजनित भयकी माप्ति नहीं होती ॥९॥ ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, मदाणा रुद्र और मुनिजनोंने जर अति रमणीय क्षीरसागर तटपर जाकर व-प्रतिपाठक अति उदार आपकी बन्दना की, वय भूमिका मार जिन आपने अपना निधन भतिको पल १७२ स्तोत्ररक्षायली भूमिमरप्रशमार्थमथ प्रथितप्रकटीकतचिघनमूर्ति त्वां मजवो रघुनन्दन देहि दयाघन मे स्वपदाम्बुजदास्यम् । पपदलायवलोचन हे रघुवंशविभूषण देव दयालो निर्मलनीरदनीलतनोऽखिललोकहदम्बुजमासक मानो। कोमलगात्र पवित्रपदाब्जरजःकणपावितगीतमकान्तावांकाशा पूर्ण परात्पर पालय मामविदीनमनाधमनन्तसुखान्धे प्रावडदभ्रतडित्सुमनोहरपीचवराम्बर राम नमस्ते। कामविमान कान्तवरानन काञ्चनमूपणरत्नकिरीट ।त्यां॥३॥ दिव्यशरच्छशिकान्तिहरोज्ज्वलमौक्तिकमालविशालसुमौले मजनेवाले मुझको अपने चरणकमकी दासता दीजिये ॥१॥ हे कमलदललोचन ! हे रघुवंशावतंस ! हे देव ! हे दयालो! हे निर्मळ श्याम घनके सदृश शरीरवाले ! हे निखिललोकहत्पद्म-प्रभाकर ! हे अति सुकुमार शरीरवाले ! अपने अति पुनीत चरणारविन्दोंकी धूलिसे गौतमपली अहल्याको पवित्र करनेवाले, दयामय खुनन्दन ! अपने भजनेवाळे मुसको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥ २ ॥ हे पूर्ण परात्पर ! हे अनन्त सुखसागर ! मुझ अति दीन और अनायकी रखा करो। वर्षाकालीन अति चपल चञ्चलाके समान मनोहर पीताम्बरधारी श्रीराम ! आपको नमस्कार है । हे कन्दर्प-दर्प-दलन, हे मुन्दर पदना सुवर्णभूषण एवं रनकिरीटधारी, दयामय, रघुनन्दन ! अपने भजनेवाले मुसको आप अपने चरणकमलोकी दासता दीजिये ॥ ३ ॥ दिव्यधरपन्द्रकी कान्तिले मलिन करनेवाली सन्छ मुकामालाको आने मुविशाल धारण करनेवाले, कवि सूर्यची-सी आमाराबे, सदाचार पवित्र

रामस्तोत्राणि
कोटिरविप्रम चारुचरित्रपवित्र विचित्रधनुःशरपाणे ।
वण्डमहाभुजदण्डविखण्डितराक्षसराजमहागजदण्डम् । वा०।४।
रोषविहिलमजङ्गसहस्रसुरोपमहानलकीलकलापे
जन्मजरामरणोमिमये मदमन्मथनक्रविचक्रमवान्धी।
दाखनिधौच चिरंपवित कपयाय समुद्धरराम तवो मामात्वां०।५।
संसृतिधोरमदोत्कटकुअरइक्षुदनीरदपिण्डिततुण्डं
दण्डकरोन्मथितं च रजस्तमउन्मदमोहपदोज्झितमार्वम् ।
दीनमनन्यगति कृपणं शरणागतमाशु विमोचय मूढम् ।त्वा०॥६
करकमलों में विचित्र धनुष-बाण धारण करनेवाले एवं अपने प्रचण्ड
भुजदण्डसे रावणरूपी महागजका वध करनेवाले हे दयामय श्रीरघुनन्दन !
अपने मजनेवाले मुसको आप अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥४॥
जिसमें दोषरूपी हजारों हिंसक सर्प हैं, क्रोधरूपी बदवानलकी ज्वालाएँ
उठ रही हैं, जन्म-जरा-मरणरूपिणी वरसावली है क्या मद और कामरूपी
मगरमच्छ और वर हैं, ऐसे इस दुःखमय भवसागरम चिरकालसे परे
हुए मुप्तको हे राम ! कृपया अब निकालिये और हे दयामय रघुनन्दन !
अपने मजनेवाले मुसको आप अपने चरणकमोंकी दासता दीजिये ॥५॥
वृषा और दुधा जिसके तीक्ष्म दाँत है, ऐसा संसाररूपी एक उन्माउ
हायी है। उसकी यमरूपी हसे झटकों में पढ़े हुए तया. रज, सम:
उन्माद और मोहरूप चारों पोंसे कुचले हुए अति आठ, दीन.
अनन्यसरण मुझ मुदको शीघ्र ही छुड़ाइये और हे दयामय नन्दन !
अपने मननेवाले मुसको अपने चरणकमलोंकी दासता दीजिये ॥६॥

स्तोमरतापली 1 जन्मशताजितपापसमन्तिहकमले पतिते पशुकल्ये हे रघुवीर महारणधीर दया कुछ मय्यतिमन्दमनीपे। जननी मगिनीच पिता मम तालासिस्थत्यतापि यात्रामा स्वा तु दयालुमकिवनात्सउमुत्पलहारमपारसुदार राम विहाय फमन्पमनामयमोशजन शरणं ननु याचाम् । स्वत्पदपपमनः श्रितमेव मुदा खल देव सदारससीतात्या फरणामृतसिन्धुरनाथजनोत्तममन्युरजोनमकारी ... मक्तमयोनिमाम्धितरिः सरयूतटिनीठटचारुविहारी । जिसका इदयफमउ सेकड़ो जन्मों के सचिव पाओंसे युक्त है, जो पल पवित हो गया है, उस अवि मतिमन्द मुसपर हे मारनपरि खवीर का कीजिये । आप ही मेरे माता पिता और मगिनी हैं या हे पाठो! आर ही मेरे रखा हैं । हे दयामय रघुनन्दन ! अपना मजन करनेवाले मुसमे अपने चरणकमठोंकी दासता दीजिये ॥ ७॥ हे मेरे स्वामी राम ! गळे कमळपुष्पोंकी माग धारण करनेवाले आप-सा अविशय उदार दीनपत्सक और दयामय प्रभुको छोड़कर मैं और किस अनामय पुरुषकी शरम । अतः मैंने सो आपके ही चरणकमोंका आवरा लिया है । हे सीताजीके सहित राम ! आप प्रसन्न होकर मेरी सर्वदा रक्षा कीजिये और हे दयामय भगवान रघुनन्दन ! आपका भजन करनेवाले मुझको याने चरण-कमयों की दासता दीजिये ॥ ८॥ जो करुणारूप अमृत के समुद्र हैं, अनायोंके उचम है, अजन्मा और उचमकर्मा हैं, मन्त्रको मयरूप वरणावलिमे पूर्ण से पार करने के लिये नौग्ररूप है और सरयू नदीके सौरपर सुन्दर परनेया है। न भेटके इस IPा जो सदा रुग रामस्तोत्राणि तस्स रघुप्रवरस्य निरन्तरमष्टकमेतदनिष्टहरं वै यस्तु पठेदमरः स नरो लभतेऽच्युतरामपदाम्बुजदास्यम् ॥९॥ इति श्रीमन्मधुसूदनाश्रमशिष्याच्युतपतिविरचितं श्रीसीतारामाष्टकं सम्पूर्णम् । ४३-श्रीरामचन्द्रस्तुतिः नमामि मतपत्सलं कपालशीलकोमल मजामि ते पदाम्बुजं अकामिना खधामदम् । निकामश्यामसुन्दरं भवाम्भुनाथमन्दरं प्रमुष्टकालोचनं मदादिदोपमोचनम् ॥१॥ प्रलम्बवाहुविक्रम प्रभोऽप्रमेय निपाचापसाय घर त्रिलोकनायकम् । अनिष्ट को दूर करनेवाला है, जो पुरुष पाठ करता है, वह अमर हो जाता है और अविनाशी भगवान् रामके चरणकमळेंकी दासता मास फरता है ॥९॥ भोंके हिवारी, रातु और अतिकोमल स्वभाववाले भारको में नमस्कार करता है। जो निष्काम पुरुशेमे आना धान देनेवाले हैं ऐसे धारके घरण-कमयकी में पन्दना करता हूँ। जो अति सुन्दर साम शरीरपाले संसार-समुद्रके मन्यनके लिये मन्दराचलरूप, खिले हुए कमल- केसे नेत्रोयाले कपा मइ आदि पेशवे पुष्पा ॥॥ पिरकी भुजाएँ लंबी-बी और अति रठि हैं, जिनो भयका स्तोत्ररसायनी दिनेशगमन महेशचापसमन मुनीन्द्रसन्वरञ्जन मुरारिन्दमानम् ॥ २॥ मनोजवैरिवन्दिर्य अजादिदेवसेवि विशुद्धयोपविग्रई समस्तदपपापहम् । नमामि इन्दिरापति मुखाकर सर्वा गति मजे सशकिसानुज चीपतिप्रियानुजम् ॥३॥ त्वदमिमूल ये नरा मजन्ति हीनमत्सराः पतन्ति नो मवावे वितर्कवीचिसाहुले । विविक्तवासिनः सदा मजन्ति मुक्तये मुदा कोई परिमाण नहीं है, जो धनुष, बाण और तरफश धारण किये है। त्रिलोकीके नाय हैं, सूर्यकुलके भूषण है, शङ्करके धनुषको तोदनेवाले हैं। मुनिजन तया महात्माओंको आनन्दित करनेवाले हैं, दैत्योंका दलन करने वाले हैं, कामारि श्रीधरजीसे वन्दित है, ब्रह्मा आदि देषगोंसे सेधित है। विशुद्ध योधस्वरूप हैं, समस्त दोषोंको दूर करनेवाले हैं, श्रीलक्ष्मीजीके पति हैं। सुखकी खानि हैं, संतोंकी एकमात्र गति हैं तया शचीपति इन्द्र के प्यारे अनुज (उपेन्द्र) हैं। हे प्रभो! ऐसे आपको मैं नमस्कार करता हूँ और भीसीता- जी क्या भाई लक्ष्मणके साथ आपको भजता हूँ ॥ २-३ ॥ जो लोग मद मत्सरादिसे रहित होकर आपके चरणों को भजते हैं, वे फिर इस नाना वितर्क-तरजावलिपूर्ण संसार-सागरमें नहीं पड़ते क्या जो एकान्त- सेषी महात्मागण अपनी इन्द्रियोंका संयम करके प्रसन्न-रिचसे भव- बधविमोचनके लिये आपका भजन करते हैं वे अपने अभीष्ट पदको

रामस्तोत्राणि
१७७
निरस्प इन्द्रियादिकं प्रयान्ति ते गति स्वकाम् ॥ ४॥
त्वमेकमद्भुतं प्रभुं निरीहमीश्वरं विभुं
जगद्गुरुं च शाश्वतं तुरीयमेव केवलम् ।
भजामि भाववल्लभं कुयोगिनां सुदुर्लभ
खमक्तकल्पपादपं समत्तसेव्यमन्त्रहम् ॥ ५॥
अनूपरूपभूपति नतोऽहमुर्विजापति
प्रसीद मे नमामि ते पदाञ्जभक्ति देहि मे।
पठन्ति ये स्तवं इदं नरादरेण ते पदं
वजन्ति नात्र संशयस्त्वदीयभावसंयुतम् ॥ ६॥
इति श्रीमद्गोस्वामितुलसीदासकृता श्रीरामचन्द्रस्तुतिः सम्पूर्णा ।
पाते हैं ॥४॥जो अवि निरीह, ईश्वर और सर्वव्यापक हैं, जगत्के
गुरु, नित्य, जाप्रदादि अवस्थात्रयसे विलक्षण और अद्वैत है,
केवल भावके भूखे हैं, कुयोगियोंको दुर्लभ हैं, अपने मत्रों के लिये
कल्पवरूप हैं तथा समस्त लोकोसे नित्य सेवित है ऐसे आप अद्भुत प्रभुको
मैं भजता हूँ ॥ ५ ॥ अनुपम रूपवान राजराजेश्वर जानकीनाथको मैं प्रणाम
करता हूँ ! मैं आपकी बार-बार वन्दना करता हूँ, आप मुझपर प्रसच
होइये और मुझे अग्ने चरण-कमलों की भक्ति दीजिये । जो मनुष्य इस
स्वोत्रका आदरपूर्वक पाठ करेंगे, वे आपके भकि-मावसे भरकर आपके
निज पदको प्रास होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं ॥ ६ ॥

स्तोत्ररत्नागली ४४-श्रीराममङ्गलाशासनम् कौशलेन्द्राय महनीयगुणान्धये । चयक्तिनुजाय सार्वमीमाय मगलम् ।। १। वेदवेदान्तवेयाय मेघश्यामलमूर्तये । पुंसां मोहनरूपाय पुण्यश्लोकाय मङ्गलम् ।। २॥ विवामित्रान्तरदाय मिथिलानगरीपते। भाग्यानां परिपाकाय भव्यरूपाय मालम् ॥ ३॥ पितृभक्ताय सवतं प्राकृमिः सह सीवया । नन्दिताखिललोकाय रामभद्राय मङ्गलम् ॥ ४॥ त्यक्तसाकेतवासाय चित्रकूटविहारिणे । प्रशंसनीय गुणों के सागर कौशलेन्द्र भीरामचन्द्रजीकामाल हो, चक्रवती. राजा दशरयके पुत्र मण्डलेश्वर श्रीरामचन्द्रजीका मङ्गल हो ॥१॥ जो वेद-वेदान्तोंसे शेय हैं, मेघके समान श्याममूर्तिवाले हैं और पुरुषों में जिनका स्वरूप अत्यन्त मनोहर है उन पुण्यश्लोक (पवित्र पावाले) भीरामचन्द्रजीका मङ्गल हो ॥२॥जो विश्वामित्र ऋषिके प्रिय और राजा जनकके माग्योंके फलस्वरूप हैं उन भव्यरूपवाले श्रीरामचन्द्रजी- का मङ्गल हो ॥ ३॥ जो सदा पिताकी भक्ति करनेवाले हैं, जो अपने भ्राताओं और सीताजीके साय सुशोभित होते हैं और जिन्होंने समस्त लोकको आनन्दित किया है उन श्रीरामभद्रका मन हो ॥ ४ | जिन्होंने अयोध्या निवासको छोड़कर चित्रकूटपर विहार किया रामस्तोत्राणि १७ सादरं । सेन्याय , सर्वयमिनां धीरोदयाय मङ्गलम् ॥ ५॥ सौमित्रिणा च जानक्या चापवाणासिधारिणे । संसेव्याय सदा भक्त्या स्वामिने मम मङ्गलम् ॥६॥ दण्डकारण्यवासाय खरपणशत्रवे। गृधराजाय मक्ताय मुक्तिदायास्तु मङ्गलम् ॥ ७॥ शबरीदत्तफलमूलाभिलापिणे । 'सौलभ्यपरिपूर्णाय' सत्त्वोद्रिक्ताय मङ्गलम् ।। ८॥ हनुमत्समवेवाय हरीशाभीष्टदायिने। बालिप्रमथनायास्तु , महाधीराय मङ्गलम् ॥९॥ श्रीमते रघुवीराय । सेतूल्लक्तिसिन्धवे । और जो सब पतियों के सेव्य हैं उन धीरोदय श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥४॥ लक्ष्मण तथा जानकीजी सदा भक्तिपूर्वक जिनकी सेवा करते हैं जो धनुष-बाण और वलवारको धारण किये हुए है उन मेरे स्वामी श्रीरामभद्रका ॥६॥ जिन्दोंने दग्दरवनमें निवास किया है। जो खर-दूषणके शत्रु हैं और अपने मक गभराजको मुक्ति देनेवाले हैं उन श्रीरामभद्रका महल हो ॥ ७॥ जो आदरसहित गरीके भी दिये हुए फल मूल के जो सुलभतासे पूर्ण (अर्थात् योदे दी परिश्रमसे प्राप्य) भौर जिनमें सत्यगुणका आधिक्य है उन श्रीरामभद्रका माल हो । ८॥ जो हनुमान्जीवे युक्त है, हरीश (मुमौव) के अभीष्टको देनेवाले हैं और बालियो मारनेवाले हैं उन महाधीर श्रीरामभद्रया मल हो॥९॥ बो सेनु बाँधकर समुद्रको लॉप गये और जिन्होंने MAHITI अभिलाषी स्तोत्ररत्नावली मङ्गलम् ॥१० मङ्गलम् ॥११॥ मङ्गलम् ॥१२॥ मङ्गलम् ॥१३॥ जितराक्षसराजाय रणधीराय विमोपणकृते प्रीत्या लङ्काभीष्टप्रदायिने । सर्वलोकवरण्याय श्रीराघवाय आसाद्य नगरी दिव्यामभिषिक्ताय सीतया । राजाधिराजराजाय रामभद्राय, ब्रह्मादिदेवसेव्याय ब्रह्मण्याय महात्मने । जानकीप्राणनाथाय रघुनाथाय । श्रीसौम्यजामातमुनेः कृपयासानुपेयुपे। ‘महते मम नाथाय : रघुनाथाय मङ्गलम् ॥१४॥ मङ्गलाशासनपरैर्मदाचार्यपुरोगमैः । .. विजय पायी उन रणधीर श्रीमान् रघुवीरका मङ्गल हो ॥ १० ॥ जिनोंने प्रसन्नतासे विभीषणको उनका अमीष्ट लक्षाका राज्य दे दिया और जो सर लोकों को शरणमें रखनेवाले हैं उन श्रीरापय रामभद्रका मङ्गल हो ॥ ११ ॥ वनसे दिव्य नगरी अयोध्या आनेपर जिनका सीताजी के सहित राज्यामिरेक हुआ. उन महाराजाओंके राजा श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥ १२ ॥ जोनमा मादि देवताओंके सेन्य है। ब्रह्मण्य (बामणों और वेदोंकी रक्षा करनेवाले) हैं, श्रीजानकी जीके प्राणनाथ हैं, उन रघुकुल के नाय श्रीरामभद्रका माल से॥ १३ ॥ जो धीसमन मुन्दर आकारवाले जामाता मुनिकी का हमलोगों को प्राप्त हुए हैं, उन मेरे महान् प्रभु एनायजी का मल ॥ १८ ॥ मेरे आचार्य जिनमें मुपप , उन अर्वाचीन भाचारों तथा समू माचीन आचार्याने मलागायन में परायण होकर बिनम र रामस्तोत्राणि Ans सच पूराचार्यैः सत्कवायास्तु मङ्गलम् ॥१५॥ रम्पजामामुनिना मङ्गलाशासनं कृतम् । त्रैलोक्याधिपतिः श्रीमान् करोतु मङ्गलं सदा ॥१६॥ इति श्रीवरवरमुनिस्थानिकृतश्रीराममङ्गलाशासनं सम्पूर्णम् । ४५-श्रीरामप्रेमाष्टकम् श्यामाम्बुदाममरविन्दविशालनेत्र वन्धकपुष्पसदृशाधरपाणिपादम् सीवासहायमुदित धृतचापाणं रामं नमामि शिरसा रमणीयवेपम् ॥१॥ पटुजलधरधीरधानमादाय चाप किया है उन श्रीरामभद्रका मङ्गल हो ॥१५॥ जामातामुनिने इस सुन्दर मनलाशासनका निर्माण किया है । इससे प्रसन्न होकर तीनों लोकोंके पति श्रीमान् रामभद्र सदा ही मन करें ॥ १६ ॥ जो नील मेयके समान श्याम वर्ण है, जिनके कमलके समान विशाल नेत्र है, जो रधूक पुष्पके समान अरुण ओर दस और चरणोंसे योमित हैं। जो सीताजी के साप विराजमान एवं अभ्युदयशील हैं, जिन्होंने पनुप- पाणको धारण किया है, जिनका वेष बदा ही सुन्दर है, सीटायक सहित उन श्रीरामो मैं शिरसे नमस्कार करता हूँ॥१॥ जो प्रौद मेघ के समान धौर-गम्भीर, टंकार पनि फरनेपाले धनुएको धारण कर और अपने वेग सोवरनायली पानदमनमे पाणमालम्प तलाव। अभयवचनदापी सानुनः सर्वतों में रगहतदनुजेन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥२॥ दशरथकुलदीपोऽमेयवाहुप्रतापी दशपदनराकोप: धालिताशेपपापः। सतगुररिपुवापी नन्दितानकभूपी रिगवविमिरपशे रामचन्द्रः सहायः ॥३॥ कुवलयदलनीतः कामिवार्थप्रदी में कवमुनिजनरथी रखसामेकहता। अपहतदुरितोऽसौ नाममात्रेण पुंसा- पायुका मी मान-मर्दन फरनेवाले एक राणको तूणीर (वरकस) से खींच कर मव उसे ऐसा कहते हुए अपने आश्रितोंको अभय-वचन देनेवाळे है क्या जिन्होंने रणमें दानयराज (रावण ) को मारा है, लक्ष्मणके सहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सर प्रकार सहायक है ।। २ ।। जो राजा दशरपके कुलके दीपक (प्रकाशफ ) हैं, जिनके बाहुबलका मवाप मापा नहीं जा सकता जो रावणके ऊपर कोप करनेवाले, समस्त पापको दूर करनेवाले, असुरोको ताप देनेवाले और अनेक राजाओंको आनन्द प्रदान करनेवाले हैं। अशान और पापसे रहित वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ३ ॥ जो कमल-पत्रके समान श्यामवर्ण, मेरी इट वस्तुओंके दाता मुनिजनोंकी रक्षा करनेवाले और राक्षसोंको एकमात्र मारनेवाले हैं, जो [अपने ] राम नामके उच्चारणमात्रसे ही पुरुषोंके पापका नाश करनेवाले हैं, समस्त देवताओं और रामस्तोत्राणि मखिलसुरनृपेन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ४॥ असुरकुलकशानुर्मानसाम्भोजभानुः सुरनरनिकराणामग्रणी, रघूणाम् । अगणितगुणसीमा नीलमेघौषधामा शमदमितमुनीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ५॥ ऋशिकवनययागं रक्षिता लक्ष्मणादयः पवनशरनिकायक्षिप्तमारीचमायः चिदलितहरचापो मेदिनीनन्दनाया नयनकुमुदचन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥६॥ पवनतनयहस्तन्यस्तपादाम्बुजात्मा कलशमववचोमिः प्राप्तमाहेन्द्रधन्वा । राजाओंके स्वामी वे श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ४ ॥ जो असुर- इल [को मल करने के लिये अग्नि हैं, देवता और मनुष्य के समूहोंके उदय-कमलको विकसित करने के लिये सूर्य है. असंख्य गुणोंकी सीमा है नील मेघ मण्डली के समान जिनका श्याम शरीर है और जो थमने मुनीश्वरी- को भी जीतनेवाले हैं वेकुलके अग्रणी श्रीरामचन्द्रज्जे ही मेरेसहायक हैं ॥५॥ जिन्होंने लक्ष्मणको भाय र विश्वामित्रके यशकी रक्षा की है और वायु- वेगवाले राणों के समूहसे मारीच निशाचरकी मायाका नाश किया है, जो शिवजीके धनुषका भजन करनेवाले क्या पृथ्वी पुत्री (सीता) के नयन- इसको वितित करने के लियेचन्द्रमाके समान हैं, वे भीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं ॥ ६ ॥ जो हनुमानजीके हार्थोपर अपने चरण-कमलोको - स्तोत्ररत्नावली अपरिमितशरौपः पूर्णतूणीरधीरो लघुनिहतकपीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ७॥ कनकविमलकान्त्या सीतयालिहितानो मुनिमनुजवरेण्यः सर्ववागीशवन्यः। खजननिकरवन्धुलीलया . बद्धसेतुः सुरमनुजकपीन्द्रो रामचन्द्रः सहायः ॥ ८॥ यामुनाचार्यकृतं दिव्यं रामाष्टकमिदं शुभम् । यः पठेत् प्रयतो भूत्वा स श्रीरामान्तिकं व्रजेत् ॥९॥ इति श्रीयामुनाचार्यकृतं श्रीरामप्रेमाष्टकं सम्पूर्णम् । हुए हैं, जिन्होंने अगस्त्य पिके कहने से इन्द्रधनुषको ग्रहण किया, जिनका तूणीर (तरकर ) असंख्य बाणों से परिपूर्ण है, जो रणधीर हैं और जिनोंने अति शीघ्रतासे वानरराज बालिको मार गिराया वे भीरामचन्द्रजी ही मेरे सहायक हैं॥७॥ जो मुवर्ण के समान निर्मल गौर कान्तिवाली सीतारे सम्पर्क में रहते हैं, ऋषियों और मनुष्यों ने भी जिने श्रेष्ठएवं आदरणीय माना है, जोसम्पूर्ण वागीश्वरों के पन्दनीय तथा अपने भक-समुदायको बन्धुके समान रक्षा करनेवाले हैं, जिन्होंने लीलासे ही समुद्रपर पुल बाँध दिया था वे देवता मनुष्य तयावानरोंके स्वामी श्रीरामचन्द्रजीही मेरे सहायक हैं॥८॥ोपुष यामुनाचार्य के रचित इस दिम्य तया कल्याणदायक भीरामप्रेमा सोरम परभाषसे पाठ करता है वह भीरामचन्द्रजीकेसनिकट निपास मारवा।।

रामस्तोत्राणि vvv ------ ४६-श्रीरामचन्द्राष्टकम् चिदाकारो धावा परमसुखदः पावनतनु- सेनीन्द्रयोगीन्द्रविपतिसुरेन्द्रईनुमता सदा सेव्यः पूर्णो जनकतनयाह्नः सुरगुरू रमानाथो रामो रमतु मम चित्ते तु सततम् ॥ १॥ मुकुन्दो गोविन्दो जनकतनयालालितपदः पदं प्राप्ता यसाधमकुलमवा चापि शबरी । गिरातीतोऽगम्यो विमलधिषणवेदयवसा। रमा० ॥२॥ घराधीशोऽधीशः सुरनरवराणां रघुपतिः किरीटी केयूरी कनकमपिशः शोमितवपुः । बो सानस्वरूप हैं, जगत्का धारण-पोषण करनेपाले परममुखके दाता हैं, जिनका पर सबको पवित्र परनेपाल, मुनीन्दा योगीन्द्र, यतीवर देवेवर और हनुमान् किनकी सरा सेवा करते हैं, जो पूर्ण , सीवान जिनकी मदाहिनी जो देवाओं के भी गुरु मापति भगवान श्रीरामरकी मेरे रिमे सदा रमण करें ॥१॥ मुकुन्द गोबिन्द नाम रेग्यवे सीताजीने सिर परोस डालन रिसा, [ मिस मम रमे नाच कुटमें उपर से भी जिनके परमार मात गी, जो मिल युधियायी भी पानी परे? और दो रन की भगन मी भान भीगमरन्द्रीन रिसा रूप ॥२॥जो पृथ्वी पर भेदाभो मोर मनु स्वापरतायली समासीनःपीठे रविशवनिमे शान्तमनसा रमा० ॥३॥ परेम्या शारण्य: कपिपतिससथान्तविधुरो ललाटे काश्मीरी रुचिरगविमलः शशिमुखः। नराकारो रामो यतिपतिनुतः संसृतिहरो रमा० ॥ ४॥ विरूपाक्षः काश्यामुपदिशति यन्नाम शिवदं सहर्स यन्नाम्नां पठति गिरिजा प्रत्युपसि वै। भी स्वामी १ कुलके नाय है, जिन्होंने सिरपर मुकुट और बाहुओंने रेयूर पारण किये हैं, जो सोने के समान पीतवर्ण [पन्न पहने हुए हैं, जिनका शरीर चोभित हो रहा है और जो संगों सूर्य के समान देदीप्यमान सिंहासनपर बैठे हुए हैं। ये लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्रजी शान्त हृदयवाले मेरे चिचमें सदा रमण करें ॥ ३ ॥ जो भेद शरण देनेवाले हैं। सुप्रीवके मित्र है, अन्तसे रहित हैं, जिनके ललाटमें केयरका विलक है, जिनकी चाल अति सुन्दर है, मुखारविन्द चन्द्रमाके समान आनन्ददायी है जोमनुष्यरूपमें प्रतीव होनेपर भी राम (योगियोंकेभ्येय परनम) हैं, पतीवर गण जिनकी स्तुति करते हैं, जो जन्म-मृत्युरूप संसारके हरनेवाले हैं। थे लक्ष्मीपवि भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चिचमें सदा रमण करें ॥४॥ काशीमें भगवान् शंकर जिनके कल्याणप्रद नामका [ मुमूर्ष प्राणियोंको] उपदेश करते हैं, श्रीपार्वतीजी प्रतिदिन प्रभात-कालमें जिनके सासनामका पाठ करती हैं, शिव ब्रमा आदि (देवगण) अपने-अपने लोकोंमें जिनके दिव्य चरित्रका गान करते हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान श्रीरामचन्द्र • रमन्ते योगिनोऽसिन्निति रामः (श्नमें योगीजन रमण करते है इसस्मेि इनकी संशाराम' है) इस व्युत्पत्तिक मनुसार या राम का अर्थ पर है।

रामस्तोत्राणि खलोके गायन्तीश्वरविधिमुखा यस्य चरितं रमा०॥५। परो धीरोऽधीरोऽसुरकुलभवश्वासुरहरः परात्मा सर्वज्ञो नरसुरगणैर्गीतसुयशाः। अहल्याशापनःशरकर ऋजुः कौशिकसखोरमा०॥६॥ हृषीकेशः शौरिधरणिधरशायी मधुरिपु- रुपेन्द्रो वैकुण्ठो गजरिपुहरस्तुष्टमनसा । चलिध्वंसी वीरो दशरथसुतो नीतिनिपुणो रमा० ॥७॥ कविः सौमित्रीब्यः कपटमृगपाती वनचरो मेरे चित्तमें सदा रमण करें ॥ ५ ॥ जो अत्यन्त धीर होकर भी अधीर (अविद्याको दूर करनेवाले ) है, अमुर (सूर्य) के कुलमें उत्पन्न होकर भी अमुर (राक्षसकुल) का संहार करनेवाले हैं, परमात्मा है, सर्वश है। मनुष्य क्या देवतागण जिनके मुयशका गान करते हैं, जिनोंने माल्या आपका नाश किया, जिनके हाथ पाण घोभित है, जो उरछ समावराले और विश्वामित्रके मित्र हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चिचौ सदा रमण करें ॥ ६ ॥ जो हृषीकेश चौरि, पायो मधुसूदन, उपेन्द्र कुष्ठ आदि नामरो को जाते हैं, जिनोंने मछन्न होकर गजराजके शत्रु (माह) का नाश किया, जो बलिको पदच्युत करनेाले हैं, धीर हैं, वे नीविनिपुण, लक्ष्मीपति, दशरयनन्दन, भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे चिचौ सदा रमण करें ।। ७॥ जो परि (विपद) , क्ष्मणजीके पूग्य , जिन्होंने इनमें भ्रमर रने हुए मासामग ( मारीच ) का वध किया है, जो पुरमित है दान्त ( मन और इन्द्रियों का दमन करनेफाले) पीके भारत १८८ स्तोपरतावली रणश्लाघी दान्तो घरणिभरही सुरनुतः अमानी मानज्ञो निखिलजनपूज्योहदिशयो रमा० ॥ ८॥ इदं रामस्तोत्रं वरममरदासेन रचित- मुपाकाले भक्त्या यदि पठति यो मावसहितम् । मनुष्यः स क्षिप्रं जनिमृतिमयं तापजनक परित्यज्य श्रेष्ठं रघुपतिपदं याति शिवदम् ॥९॥ इतिश्रीमद्रामदासपूज्यपादशिष्यश्रीमद्धंसदासशिष्येणामरदासाख्यकविना विरचितं श्रीरामचन्द्राष्टकं समासम् । हरनेवाले तथा देववाओंसे स्तुत हैं, जो स्वयं मानरहित होकर दूसरा सम्मानके शाता ( कृतज्ञ ) हैं, सब लोगोंके पूज्य है, सबके उपन निवास करनेवाले हैं, वे लक्ष्मीपति भगवान् श्रीरामचन्द्र मेरे पिउने सदा रमण करें ।। ८॥ जो मनुष्य प्रातःकालमें भक्ति और श्रद्धा का अमरदास कविक बनाये हुए इस सुन्दर रामस्तोत्रका पाठ करेगा पर बहुत सीम ही तापजनक जन्म-मृत्युके भयका परित्याग कर तथा कल्याणमद रघुनायके पदको प्राप्त करेगा ॥१॥ / REFERE

निराश्रयोका आश्रय है, संसारसागरका पार करनेवाला है, परगुणाश्रय है,
जसकामदासमुद्र आश्रय है, जो चराचरकाआदिकारण है। देवोंका संरक्षक है,
अमृवान करानेवाला है। गरुड़ ही जिसका याइन है, जो यमों (अहिंसा,
उत्यादि)मैं बा हुआ है, मनोश है, शानस्वरूप है, मुनिजनोका आश्रय है,
श्रीकृष्णस्तोत्राणि
४७-गोविन्दाष्टकम्
चिदानन्दाकारं श्रुतिसरससारं
समरस
निराधाराधारं भवजलधिपारं परगुणम् ।
रमाग्रीवाहारं वजवनविहारं हरनुतं
सदा तं गोविन्दं परमसुखकन्दं भजत रे ॥१॥
महाम्मोधिस्थान स्थिरचरनिदानं दिविजपं
सुधाधारापानं विहगपतियानं
मनोझं सुनानं मुनिजननिधानं ध्रुवपदं सदा०॥२॥
जो चिदानन्दस्वरूप है, श्रुतिका सुमधुर सार है, समरस है।
श्रीलक्ष्मीजीके गलेका हार है, वृन्दावनविहारी है तथा भगवान् शङ्करसे
उम्भूजित है, अरे ! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदेव भजन कर ॥१॥
-
यमरतम् ।
विसान है, अरे ! उस परमानन्दकन्द गोविन्दको सदैव मज ॥ २ ॥

स्तोत्ररमायली घिया धीरथैर्य श्रवणपुटपेयं यतिवर- महापराक्यं त्रिभुवन विधेयं विधिपरम् । मनोमानामेवं सपदि हृदि नेयं नववर्नु सदा ॥३॥ महामायाजालं विमलवनमालं मलहरं सुभालं गोपालं निहतशिशुपालं शशिमुखम् । कलातीतं कालं गतिहतमरालं मुररिपुं. सदा० ॥४॥ नभोपिम्बस्फीतं निगमगणगीतं समगति सुरौघैः सम्प्रीतं दिविजविपरीतं पुरिश्यम् ।। पीर पुरुषोंद्वारा बुद्धिसे जिसका ध्यान किया जाता है और. कर्णपुटोसे पान किया जावा है, योगिजन . जिसे महावाक्योदारा जान पावे. हैं, जो त्रिलोकीका विधाता और विधिवायोंसे परे है, जिसे मन् प्रमाणों द्वारा नहीं जान सकता तया जो हृदयमें शीघ्र ही धारण करनेयोग्य है एवं नूतन तनुपारी है, अरे ! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव मजन कर ॥ ३ ॥ जिसका मायारूपी महाजाल है, जिसने निर्मल वनमाला धारण किया - है, जो मलकाअपहरण करनेवाला है, जिसका सुन्दर भाल है, जो गोपाल है, शिशुपालवधकारी है, जिसका चाँद-सा मुखड़ा है, जो सम्पूर्ण कलातीत है। काल है, अपनी सुन्दरगतिसे इसका मीविजय करनेवाला है, मुर दैत्यका शत्रु अरे! उसपरमानन्दकन्दगोविन्दका सदेव मजन कर ॥४॥ जो आकारिब के समान व्यापक है, जिसका शास्त्र संकीर्तन करते हैं, जो सबकी समान गति है, देवताओंसे परम, प्रसन्न तथा दैत्योम विरोधी है, बुदिरूपी गुहामें स्थित है, वाणीकी गतिसे बाहर है, नवनीतमा आस्वादन करनेवाला है तथा नीतिका संस्थापक है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका भजन - श्रीकृष्णस्तोत्राणि गिरां मार्गातीतं स्वदितनवनीतं नयकरं सदा० ॥५॥ परेशं पद्मशं शिवकमलजेशं शिवकरं द्विजेश देवेशं तनुकुटिलकेशं कलिहरम् । खगेशं नागेशं निखिलभुवनेशं नगधरं सदा०॥६॥ रमाकान्तं कान्तं मवमयमयान्तं भवसुखं दुराशान्तं शान्तं निखिलहृदि भान्तं भुवनपम् । विवादान्तं दान्तं दनुजनिचयान्तं सुचरितं सदा० ॥७॥ जगज्ज्येष्ठं श्रेष्ठं सुरपतिकनिष्ठं ऋतुपति चलिप्ठं भूयिष्ठं त्रिभुवनवरिष्ठं वरवहम् । कर ॥ ५ ॥ जो परमेश्वर है, लक्ष्मीपति है, शिव और ब्रह्माका भी स्वामी है, कल्याणकारी है। दिज और देवोंका ईश्वर है, महीनऔरईंघराले केशोंवाला है, कलिमलहारी है, आकाशसञ्चारी सूर्यका भी शासक है, घरातलधारी शेष के सम्पूर्ण भुवनमण्डलका स्वामी है, गोवर्धनधारी है ! अरे, उस परमानन्द- कन्द गोविन्दका सदेव भजन कर ॥६॥ जो लक्ष्मीपति है, विमल पुति है, भवभयहारी है, संसारका सुख है, दुराशाका काल है, शान्त है, सम्पूर्ण हृदोंमें भासमान है, त्रिभुवनका प्रतिपालक है, विवादका जहाँ अन्त हो जाता है, दमशील है, दैत्य-दल-दलन है, सुन्दर चरित्रवाला है, अरे! उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदैव भजन दर ॥ ७॥ जो संसारमें सबसे बड़ा है, श्रेष्ठ है, सुरराज इन्द्रका अनुज (वामन), यशपति है, बलिट है, भूयिष्ठ है, त्रिभुवनमें सर्वश्रेष्ठ है, परदायक है। आत्मनिष्ठ है, धर्मिठ है, महान् गुणोंसे गौरवयुक्त है, गुरुवर है, अरे ।

स्तोत्ररवायली खनिष्ठं धर्मिष्ठं गुरुगुणगरिष्ठं गुरुवरं सदा० ॥८॥ गदापाणेरेतरितदलन दुःखशमन विशुद्धारमा स्तोत्रं पठति मनुनी यस्तु सततम् । सभुक्त्या मोगी चिरमिह ततोऽपास्तवृजिनः परं विष्णोः स्थानं व्रजतिखलु वैकुण्ठभुवनम् ॥९॥ इति श्रीपरमहंगस्वामित्रमानन्दविरचिव गोविन्दाटकं सम्पूर्णम् । ४८-श्रीगोविन्दाष्टकम् सत्यं शानमनन्तं नित्यमनाकाशं परमाका गोष्ठप्राङ्गणरिङ्गणलोलमनायासं परमायासम् । मायाकल्पितनानाकारमनाकारं 'भुवनाकारं . उस परमानन्दकन्द गोविन्दका सदेव भजन कर ॥ ८॥ जो विशुदामा. पुरुष गदापाणि गोविन्दके इस पापनाशन, दुःखदलन स्तोत्रको निरन्तर पढ़ता है वह चिरकालपर्यन्त नाना भोगोंको भोगकर, पाोसे रहित होकर भगवान् विष्णुके परमपावन धाम वैकुण्ठलोकको अवश्यमेव जाता है ॥९॥ जो सत्य, शानस्वरूप, अनन्त एवं नित्य है, आकाशसे भिन्न होनेपर भी परम आकारास्वरूप है, जो बजके प्राङ्गणमें चलते हुए चपल होते हैं। परिभमसे रहित होकर भी बहुत यके से हो जाते हैं, आकारहीन होनेपर भी मायानिर्मित नाना स्वरूप धारण किये विश्वरूपसे प्रकट हैं और श्रीकृष्णस्तोत्राणि -- माया नाथमनाथं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥१॥ मृत्लामत्सीहेवि यशोदाताडनशैशवसंत्रास म्यादिववकालोकितलोकालोकचतुर्दशलोकालिम्। लोकत्रयपुरमूलस्तम्भ लोकालोकमनालोर्क लोकेशं परमेशं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ २॥ विष्टपरिपुवीरघ्नं क्षितिमारघ्नं भवरोगघ्नं केरल्यं नवनीताहारमनाहारं भुवनाहारम् । वैमल्पफुटतोचिपिशेपाभासमनाभास पृथ्वीनाम रोकर भी अनाय [बिना स्वामीके हैं, उन परमानन्दमय गोविन्दको यन्दना करो ॥१॥ क्या तू यहाँ मिट्टी खा रहा है। यह पूराती हुरं यसोदादारा मारे जानेका जिन पेशवकालोचित भय होता, मिही न सानेका प्रमाण देने के लिये जो मुंह फैलाकर उसमें सोभोक पादित चोदर भुवन दिखला देते हैं। त्रिभुक्तानी नगरके जो आपर- खम्भ हैं। आलोकले पो (अर्थात् दर्शनात) होनेपर भी जो विको आलोक (प्राय) हैं, उन परमानन्दलरूप, होम्नाय पर गोविन्दको नमस्कार करे॥२॥ जो देखनीयके नाशक, पपीम भार रनेपाले और संसाररोग निरा देनेवाले कैचल (म.) पर हैं IRR होकर भी नयनीतमोजी एवं विषम , आमा पर होनेर भी मर रोनेके कारण सा मिची मिन विनम्र सिंगर मामा निलदा है जो अस्तिी शाल एवं सारस्वरूप, सम्बरमा : ७

स्तोपरत्नावली
शै केवलशान्वं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ३॥
गोपालं भूलीलाविग्रहगोपालं कुलगोपालं
गोपीखेलनगोवर्धनविलीलालालितगोपालम् ।
गोभिनिगदितगोविन्दस्फुटनामानं बहुनामानं
गोपीगांचरदूरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ४॥
गोपीमण्डलगोष्ठीभेदं मेदारस्यममेदाम
शश्वद्गासुरनिधूतोद्धतधूलीधूसरसौभाग्यम्
श्रद्धामक्तिगृहीतानन्दमचिन्त्यं चिन्तितसद्भावं
चिन्तामणिमहिमानं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ५॥
उन परमानन्दमय गोविन्दको प्रणाम करो ॥३॥ जो गौओंके पालक
हैं, जिन्होंने पृथ्वीपर लीला करने के निमित गोपाल-शरीर धारण किया
है, जो वंशदारा भी गोपाल (ग्वाला) हो चुके हैं, गोपियोंके साथ
खेल करते हुए गोवर्धनधारणकी लीलासे जिन्होंने गोपजनोंका पालन
किया था, गौओंने स्पष्टरूपसे जिनका गोविन्द नाम बतलाया था, जिनके
अनेको नाम हैं, उन गोप तया गोचर (इन्द्रियोंके विषय) से पृथक
रहनेवाले परमानन्दरूप गोविन्दको प्रणाम करो ॥४॥ जो गोपीजनोंकी
गोष्ठीके भीतर प्रवेश करनेवाले हैं, भेदावस्थामें रहकर भी अभिन्न भासित होते
हैं। जिन्हें सदा गायोंके खुरसे ऊपर उड़ी हुई टिदारा धूसरित होनेका
सौभाग्य प्राप्त है, जो श्रद्धा और भक्ति रखनेसे आनन्दित होते हैं, अचिन्त
होनेपर भी जिनके सद्भावका चिन्तन किया गया है। उन चिन्ताममिके
; समान महिमावाले परमानन्दमय गोविन्दकी वन्दना करो ॥५॥

श्रीकृष्णस्तोत्राणि ९५ स्नानव्याकुलयोपिद्धस्त्रमुपादायागमुपारूढे व्यादित्सन्तीरथ दिग्वना युपदातुमुपाकर्षन्तम् । नितद्वयशोकविमोई बुद्ध युद्धेरन्तस्थं सत्तामात्रशरीरं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ६ ॥ कान्तं कारणकारणमादिमनादि कालमनामासं कालिन्दीरातकालियशिरसि मुहुर्नृत्यन्तं नृत्यन्तम् । कालं कालकलातीतं कलिताशेपं कलिदोपघ्नं कालत्रयगतिहेतुं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ७ ॥ वृन्दावनभुवि वृन्दारकगणवृन्दाराध्यं वन्देऽहं कुन्दामामलमन्दसरसुधानन्द सुहदानन्दम् । स्मानमें व्यग्र हुई गोपाङ्गनाओंके वस्त्र लेकर जो वृक्षपर चढ़ गये थे और जब उन्होंने वन लेना चाहा तब देनेके लिये उन्हें पास बुलाने लगे [ऐसा होनेपर भी ] जो शोक-मोह दोनोंको ही मिटानेवाले शानस्वरूप एवं बुद्धिके भी परवर्ती हैं, उत्तामात्र ही जिनका शरीर है ऐसे परमानन्द- स्वरूप गोविन्दको नमस्कार करो ॥ ६ ॥ जो कमनीय, कारणों के भी आदिकारण, अनादि और आभासरहित कालस्वरूप होकर भी यमुनाजळमें रहनेवाले कालियनागके मस्तकपर वारंवार नृत्य कर रहे थे, जो कालरूप होनेपर भी कालकी कलाओंसे अतीत और सर्वज्ञ हैं, जो त्रिकाल- गतिके कारण और कलियुगीय दोपोको नष्ट करनेवाले हैं, उन परमानन्द- स्वरूप गोविन्दको प्रणाम करो ||७॥ जो वृन्दावनकी भूमिपर देवबन्द तथा गन्दा नामकी वनदेवताके आराध्य देव हैं, जिनकी इन्दके समान स्तोत्ररत्मावळी वन्याशेपमहामुनिमानसचन्यानन्दपदद्वन्द्वं बन्याशेषगुणान्धिं प्रणमत गोविन्दं परमानन्दम् ॥ ८॥ गोविन्दाटकमेतदधीते गोविन्दापितचेता यो गोविन्दाच्युत माधव विष्णो गोकुलनायक कृष्णेति । गोविन्दामि सरोजभ्यानसुधाजलधौतसमस्तापा गोविन्दं परमानन्दामृतमन्तःस्पं स समम्येति ।। ९ ।। इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं श्रीगोविन्दाष्टकं सम्पूर्णम् । ४६-अच्युताष्टकम अच्युतं केशवं , रामनारायणं कृष्णदामोदरं वासुदेवं हरिम् । निर्मल मन्द मुसकानमें सुधाका आनन्द भरा है, जो मित्रोंके आनन्ददायी हैं उन भगवान्की मैं वन्दना करता हूँ। जिनका आमोदमय चरणयुगल समस्त वन्दनीय महामुनियोके भी हृदयका वन्दनीय है, उन सम्पूर्ण शुभ गुणों के सागर परमानन्दमय गोविन्दको नमस्कार करो ॥ ८॥जो मगवान् गोविन्दमें अपना चित्त लगा गोविन्द ! अव्युत !माधव ! विष्णो ! गोकुल- नायक! कृष्ण !' इत्यादि उच्चारणपूर्वक उनके चरणकमलोंके ध्यानरूपी सुधा- सलिलसे अपना समस्त पाप धोकर इस गोविन्दाष्टकका पाठ करता है, वह अपने अन्तःकरणमें विद्यमान परमानन्दामृतरूपगोपिन्दको प्राप्त कर लेता है ॥९॥ अच्युत, केशव, राम, नारायण, कृष्ण, दामोदर, वासुदेव, हरि श्रीधर) माधव, गोपिकास्लम तथा जानकीनायक रामचन्द्रजीको मैं भजता .

श्रीकृष्णस्तोत्राणि श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लम जानकीनायकं रामचन्द्रं भजे ॥१॥ अच्युतं केशवं सत्यमामाधवं माधवं श्रीधरं राधिकाराधितम् । इन्दिरामन्दिरं चेतसा सुन्दरं देवकीनन्दनं नन्दनं सन्दधे ॥२॥ विष्णवे जिष्णवे शहिने चक्रिणे रुक्मिणीरागिणे जानकीजानये। वल्लीवल्लमायाचिंताशात्मने कंसविध्वंसिने शिने ते नमः ॥ ३॥ कृष्ण गोविन्द हे राम नारायण श्रीपते वासुदेवाजित श्रीनिधे । अच्युतानन्त हे माषायोक्षन हूँ॥१॥ अच्युत, केराव, सत्यभामारति, लक्ष्मीपति, श्रीधर, राधिकाजी. द्वारा आराधिता लक्ष्मीनिवास, परम सुन्दर, देवकीनन्दनः नन्दकुमारका विसे पान करता हूँ॥ २॥ जो विभु विजयी है, चक्रधारी , रुरिमणीजीके परम प्रेमी हैं, जानकीडी जिनकी धर्मात्री हैं तथा जो मजावनाओं के प्रभार है उन परमान, आत्मस्वरूप, कंधविनायक मुरलीमनोर आरो नमातार करता हूँ॥३॥! हे गोपिन्द! हे राम! हे नारामप! हे रमानाप ! हे वासुदेव ! अबेर ! हे शोभापान ! अमुअनन्त र माधव! भयोधन (दिपाठीव) कानाप!

स्तोत्ररत्नावली द्वारकानायक द्रौपदीरक्षक ॥ ४॥ राक्षसक्षोमितः सीतया शोमितो दण्डकारण्यभूपुण्यताकारण: लक्ष्मणेनान्वितो वानरैः सेवितो- ऽगस्त्यसम्पूजितोराघवः पातु माम् ॥५॥ धेनुकारिष्टकानिष्टकवेपिहा केशिहा कंसहृवंशिकावादकः । पूतनाकोपका सूरजाखेलनो बालगोपालकः पातु मां सर्वदा ॥६॥ विद्युदुद्योतवत्प्रस्फुरद्वाससं प्रायडम्मोदवत्प्रोल्लसद्विग्रहम् । हे द्रौपदीरक्षक ! (मुझपर कृपा कीजिये) ॥ जो राक्षसोंपर अति कुपित है। भीसीवाजीसे मुशोभित है, दण्डकारण्यफी भूमिकी पवित्रताके कारण । भीलक्ष्मणजीद्वारा अनुगत है, यानरोंसे मेयित है और भीअगस्पनीले पूजित हैं, ये रघुवंशी श्रीरामचन्द्रजी मेरी रक्षा करें ॥ ५ ॥ धेनुक और अरिष्टासुर भादिका भनिष्ट करनेगले, शत्रुओका ध्वंस करनेवाले सी और कसका वध करनेपाले, वंशीको बजानेवाले, पूरानापरकोप करने पा, यमुनातविकारी बालगोपाल मेरी मदारधारे। विप्रकाश सारा बिनका पीतामर विभारित दोसा, पांचाळीन मेघों के समान जिना अति शोभायमान घर जिनका बाल मनमायाने विवि और परणयुगळ भाणवण १ उन कमलनयन भौरिको

श्रीकृष्णस्तोत्राणि
चन्पया मालया शोमितारःस्थलं
लोहिताधिद्वयं वारिजाक्षं मजे ॥ ७॥
कुञ्चितः कुन्तले जमानाननं
रत्रमौलि लसत्कुण्डलं गण्डयोः ।
हारकेयूरक कङ्कणप्रोज्ज्वलं
किङ्किणीमञ्जुलं श्यामलं तं मजे ॥८॥
अच्युतस्याष्टकं यः पठेदिष्टदं
प्रेमतः प्रत्यहं पूरुषः सस्पृहम् ।
वृसतः सुन्दरं कर्तृविश्वम्भर-
स्तस्य पश्यो हरिर्जायते सत्वरम् ॥ ९॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतमच्युताष्टकं सम्पूर्णम् ।
भजता हूँ ॥ ७ ॥ जिनका मुख धुंधराली अलोंसे मुशोभित है,
मस्तकपर मणिमय मुकुट शोभा दे रहा है तथा करो.पर कुण्डल
सुशोमित हो रहे हैं। उज्वल हार, केयूर (आजूबन्द), कक्षण
और किङ्किणीकलापसे मुशोभित उन मञ्जुरमूर्ति श्रीश्यामसुन्दरको
भजता हूँ॥ ८॥ जो पुरुष इस अति सुन्दर छन्दवाले और अभीष्ट
फलदायक अच्युताटकको प्रेम और श्रद्धा नित्य पढ़ता है, विश्वम्भर
विश्वकर्ता श्रीहरि शीघ्र ही उसके वशीभूत हो जाते हैं ॥९॥

सोत्ररत्नावली ५०--कृष्णाष्टकम् थियाश्लिष्टो विष्णुः स्थिरचरवपुर्वेदविषयो धियां साक्षी शुद्धो हरिरसुरहन्वाब्जनयनः । गदी शही चक्री विमलवनमाली स्थिररुचिः शरण्यो लोकेशो मम मयतु कृष्णोऽक्षिविषयः ॥१॥ यतः सर्व जातं वियदनिलमुख्यं जगदिदं स्थिती निःशेपं योऽवति निजसुखांशेन मधुहा । लये सर्वस्वमिन् हरति कलयायस्तु स विभुशरण्यो०॥२।। असूनायम्यादौ यमनियममुख्यैः सुकरण- जो श्रीलक्ष्मीजीद्वारा आलिङ्गित हैं, व्यापक है, सम्पूर्ण चराचर जिनका शरीर है, श्रति संवेद्य हैं, समस्त बुद्धिोंके साक्षी है। शुद्ध हरि हैं, दैत्यदलन हैं, कमलनयन है, शङ्ख, चक्र, गदा और विमल वनमाला धारण किये हुए हैं और स्थिरकान्तिमय है, वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हो ॥१॥ (सृष्टिकालमें) आकाश और पवनादिसे लेकर यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे उत्पन हुआ है, स्थितिके समय भी जो मधुसूदन अपने आनन्दांशसे उसकी सर्वया रक्षा करते हैं तथा लयके समय जो लीलामाप्रसे उसे अपनेहीमें लीन कर लेते हैं वे विभु, शरणागतवत्सल निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्ण- चन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हो।॥२॥ जिससवनीय मायापतिको बुधजना यम. नियमादि उपायोंसे पहले प्राणोंको अपने अधीनकर फिर चित्तनिरोध द्वारा इस सम्पूर्ण जगतको लीन करके अपने अन्तःकरणमें देखते श्रीउष्णस्तोमाथि २०॥ निरुध्येदं विच हृदि विलयमानीय समलम् । यमीडथं पश्यन्ति प्रवरमतयो मायिनमसौ शरण्यो॥३॥ पृथिव्यां दिछन् यो यमयति महीं वेद न घरा यमित्यादौ दो वदति जगतामीशममलम् । नियन्तारं ध्येयं मुनिसुरनृणां मोक्षदमसौ शिरप्यो। महेन्द्रादिदेवो जयति दिविजान्यस्य वलतो नकस खानन्य कचिदपि कृतीयत्कृतिमृते । कवित्वादेर्ग परिहरतियोऽसौ रिजपिनः । शरण्यो०॥५॥ विना यस्य ध्यानं व्रजति पशुतां सूकरमुखां हैं वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हो ।। ३ ।। पृथ्वीमें रहकर जो पृथ्वीका नियमन करते हैं परन्तु पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती (यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिवी यमयति यं पृथिवी न वेद ) आदि अतियोंसे थेद जिन अमलस्वरूपको जगतका स्वामी, नियामक, ध्येय और देवता, मनुष्य तथा मुनिजनोंको मोक्ष देनेवाला बसलाता है वे शरणागतपालका निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हो ।। ४।। जिनके बलसे इन्द्रादि देवगण दैत्योंको जीतते हैं, जिनकी कृतिके बिना किसी कार्यमें कोई मी स्वतन्त्र नहीं है वपा जो कपियोंके कवित्वाभिमानको और विजयियोंके विजयाभिमानको इर लेते हैं वे शरणागतवत्सर निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्ण चन्द्र मेरे नेत्रोंके विषय हो ॥५॥ जिनका ध्यान किये बिना मनुष्य सूकपदि पशु-योनियों में पड़ते हैं, जिनके ज्ञान दिना जनता जन्म-मरणके मयको प्राप्त होती है वथा जिनका स्मरण किये बिना सैकड़ों कीट-पतहादि

स्वोपरमापली
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विना यस मान जनिमृतिमयं याति जनवा ।
विनायव स्मृत्पा कमिशतजनियाविस विशामरायो॥६
नरातचीच शरमशरणो मान्तिहरगो
पनश्यामो यामो प्रजशिशुवयसोऽर्जुनसखः।
सपम्मताना जनक उचिताचारसुखदः शरण्योगा।
यदा धर्मग्लानिर्मपति जगता घोमकरणी
तदा लोकस्वामी प्रकटितवपुः सेतुगजः ।
सवां पाता स्वच्छो निगमगणगीतो ब्रजपतिः शरण्यो०८
इति हरिरखिलात्माराधिवः शङ्करेण
श्रुतिविशदगुणोऽसौ मातमोक्षार्थमायः ।
योनियों में गिरना पड़ता है वे शरणागतवत्सल, निखिल मुवनेश्वर
श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रों के विषय हो ॥ ६॥ जो प्राणियोंके भयको दूर करनेवाले
हैं, शरणागोंको शरण देनेवाले तया भ्रमको दूर करनेवाले हैं, मेघश्याम
हैं, सुन्दर है, बजबालकोंके समवयस्क माथी और अर्जुनके सखा है।
स्वयम्भू हैं, समत प्राणियोंके पिता है तथा उचित आचरोदारा सुख
देनेवाले हैं वे शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर श्रीकृष्णचन्द्र मेरे नेत्रों के
विषय हो ॥ ७ ॥ जब संसारको शुन्ध कर देनेवाला धर्मका वास होता
है उस समय जो लोक मर्यादाकी रक्षा करनेवाले लोकेश्वर, संत-प्रतिपालक,
वेदवर्णित शुद्ध एवं अजन्मा भगवान् उसकी रक्षा के लिये शरीर धारण
करते हैं वे ही शरणागतवत्सल, निखिल भुवनेश्वर ब्रजराज श्रीकृष्णचन्द्र
मेरे नेत्रोंके विषय हो ॥ ८॥ इस प्रकार अपनी माताकी मुकिके लिये

श्रीकृष्णस्तोत्राणि २०३ यविवरनिकटे श्रीयुक्त आविर्षभूव खगुणवृत उदारः शङ्खचक्राब्जहस्तः ॥९॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं कृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् । ५१-श्रीकृष्णाष्टकम् मजे बजैकमण्डनं समस्तपापखण्डनं खमक्तचित्तरञ्जनं सदेव नन्दनन्दनम् । सुपिच्छगुच्छमस्तकं सुनादवेणुहस्तकं अनगरङ्गसागरं नमामि कृष्णनागरम् ।। १ ।। मनोजगमोचनं विशाललोललोचनं विधुतगोपशोचनं नमामि पद्मलोचनम् । श्रीशङ्कराचार्यजीने श्रुतिकथित गुणोंवाले, निखिलात्मा आदि नारायण हरिकी आराधना की तो अपने उदार गुणों से युक्त श्रीभगवान् लक्ष्मीजी. सहित उनके निकट शङ्खः चक्र: पद्मादि लिये प्रकट हो गये ।। ९॥ मज-भूमिके एकमात्र आभूषण, समस्त पापेको नष्ट करनेवाले तथा अपने मोंके चितोंको आनन्दित करनेवाले नन्दनन्दनको सर्वदा मजता हूँ, जिनके मस्तकपर मनोहर मोरपसका मुकुट है, हायोमे सुरीली बाँसुरी है उपा जो काम-कलाके मगर हैं उन नटनागर श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ ॥१॥ कामदेवका मान मर्दन करनेवाले, बड़े-बड़े सुन्दर नेत्रों वाले क्या मजगोपोंका चोक हरनेवाले कमलनयन मगवान्को नमस्कार २०४ स्तोत्ररखायडी फरारविन्दभूधरं सितारलोकसुन्दरं महेन्द्रमानदारणं नमामि कृष्णवारणम् ॥२॥ कदम्बसनकुण्डलं सुचारुगण्डमण्डलं बजाङ्गनैकवल्लमं नमामि कृष्णदुर्लभम् । यशोदया समोदया सगोपया सनन्दया युतं सुखैकदायकं नमामि गोपनायकम् ॥३॥ सदैव पादप मदीयमानसे निजं दधानमुत्तमालकं नमामि नन्दवालकम् । समस्तदोपशोपणं समस्तलोकपोपणं समस्तगोपमानसं नमामि नन्दलालसम् ॥४॥ करता हूँ, जिन्होंने अपने करकमलोंपर गिरिराजको धारण किया या तथा जिनकी मुसकान और चितवन अति मनोहर है, देवराज इन्द्रका मान मर्दन करनेवाले उन श्रीकृष्णरूपी गजराजको नमस्कार करता हूँ॥२॥ जिनके कानों में कदम्ब-पुष्पोके कुण्डल हैं, परम सुन्दर कपोल । तथा प्रजवाटाओंके जो एकमात्र प्राणाधार है उन तुर्लभ कृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ; जो गोपगण और नन्दजीके सहित अतिप्रसमा यशोदासे युक हैं और एकमात्र आनन्ददायक हैं उन गोपनायक गोडसे नमस्कार करता हूँ॥ ३ ॥ जिन्होंने अपने चरणाम को मेरे मनरूरी मरोवरमें स्थापित कर रहा है उन अति सुन्दर अउवाले, नन्दकुमारको नमस्कार करता हूँ दया यमस दोषोंमे दूर करनेवाले समय लोका पाटन करनेवाले और समस्त प्रबगोपोंके हदय क्या नन्दीशी लाया प भीडम्पचन्द्रको नमस्कार करता है ॥४॥ भूमिमा भार उपरणेपासे श्रीछष्णस्तोत्राणि -- भुवो मरावतारकं भवाब्धिकर्णधारक यशोमतीकिशोरकं नमामि चित्तचोरकम् । दृगन्तकान्तभङ्गिनं सदासदालसङ्गिनं दिने दिने नवं नवं नमामि नन्दसम्भवम् ॥५॥ गुणाकरं सुखाकरं कृपाकरं कृपापरं सुरद्विपनिकन्दनं नमामि गोपनन्दनम् । नवीनगोपनागरं नवीनकेलिलम्पटं नमामि मेघसुन्दरं तडित्प्रभालसत्पटम् ॥ ६॥ समस्तगोपनन्दनं हृदम्बुजैकमोदनं नमामि कुञ्जमध्यगं प्रसन्नभानुशोमनम् । निकामकामदायकं गन्तचारुसायक संसारसागरके कर्णधार मनोहर यशोदाकुमारको नमस्कार करता हूँ अति कमनीय कटाक्षवाले, सदैव सुन्दर भूषण धारण करनेवाले नित्य नूतन नन्दकुमारको नमस्कार करता हूँ॥ ५॥ गुणोंके भाण्डार, सुखसागर, कृपानिधान और कृपालु गोपालको, जो देव शत्रुओंको ध्वंस करनेवाले हैं, नमस्कार करता हूँ; नित्य नूतन लीलाविहारी, मेघश्याम नटनागर गोपालको, जो बिजलीकी-सी आमावाला अति सुन्दर पीताम्बर धारण किये हुए हैं, नमस्कार करता हूँ॥ ६ ॥ जो समस्त गोपोंको आनन्दित करनेवाले और हृदयकमलको विकसित करनेवाले, देदीप्यमान सूर्य के समान योभायमान हैं, उन कुञ्जमध्यवर्ती श्यामसुन्दरको नमस्कार करता हूँ। जो कामनाओंको भलीभाँति पूर्ण करनेवाले हैं, जिनकी चार चितवन बाणों के मान है, सुमधुर वेण बजाकर गान करनेवाले ऊन कुलनायकको २०६ स्वोपरतायली रसालवेणुगायकं नमामि कुञ्जनायकम् ॥७॥ विदग्धगोपिकामनोमनोज्ञवल्पशायिनं नमामि कुञ्जकानने प्रवृद्धवहिपायिनम् । यदातदा यथा क्था व कष्णसत्कथा मया सदैव गीयवां तथा कपा विधीयताम् । प्रमाणिकाष्टकद्वयं जपत्यधीत्य : पुमान् भवेत्स नन्दनन्दने मवे मवे सुभक्तिमान् ॥८॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृवं श्रीकृष्णाष्टकं सम्पूर्णम् । +- 1 ५२-भगवत्स्तुतिः भीष्म उवाच इति मतिरुपकल्पिता वितृष्णा मगवति सात्वतपुङ्गवे विभूग्नि । नमस्कार करता हूँ ॥७॥ चतुर गोपिकाओंके मनरूपी सुकोमल शमार शयन करनेवाले क्या कुञ्जवनमें बढ़ती हुई दावाग्निको पान कर डानेवाळे श्रीकृष्णचन्द्रको नमस्कार करता हूँ, मेरे ऊपर ऐसी कृपा हो कि जब तर जैसी भी परिस्थिति में रहूँ, सदा श्रीकृष्णचन्द्रकी सत्कथाओंका गान करूँ । जो पुरुष इन दोनों प्रामाणिक अष्टकोका पाठ या जा करेगा वह जन्म-जन्ममें नन्दनन्दन श्यामसुन्दरकी मकिसे युक होगा।॥८॥ भीमजी बोले-जो निजानन्दमें मग्न है और कभी विहार (बीटा) करनेकी इससे प्रकविको स्वीकार करता है जब उसने धौछप्णस्तोत्राणिं खसुखमुपगते कचिद्विहत प्रकृतिमुपेयुपि यद्भवप्रवाहः ॥ १ ॥ त्रिभुवनकमनं तमालवणं रविकरगौरवराम्बरं दधाने। वपुरलककुलाहताननानं विजयसखे रविरस्तु मेऽनवद्या ॥ २ ॥ युधि तुरगरजोविधूप्रविष्वक्- कचलुलितश्रमवार्यलकृतास्ये । मम निशिवशरविमिद्यमान- त्वचि विलसत्कवचेऽस्तु कण आत्मा ॥ ३ ॥ सपदि सखियचो निशम्य मध्ये निजपरयार्यलयां रथं निवेश्य । iसारका प्रवाह घटता है ऐसे भूनास्वरूप, यदुझे भगवान् कम्पने नि अपनी तृष्णारहित बुद्धि समर्पित कर दी है ॥ १ ॥ त्रिभुवनमुन्दर मालवर्ण एफिरणों के समान उज्ज्वल और पवित्र पर धारण करनेवाल पा जिनका मुखकमल अलफावली आहत है, उन भईन-सरसामे मेरी माम प्रीति हो ॥ २ ॥ युदने घोड़ा टारसे उड़ी हुई रज धूसरित पर चारों ओर टिकी हुई अवाले, परिश्रम बार पीनकी सासे पोभित नुसवाजे और मेरे दीन कामोठे विदा हुई त्वचापा, दर वरभारी कम्पने मंरी आत्मा दश मे ॥ ३॥ सुखा गोंगे मनपर शोध ही भरनी और सिविन नामोर पोरने सोरजाम्सी गिति परसैनिकापुरमा इनाति पार्यससे रतिर्ममान्तु ॥४॥ वहिवरतनामुलं निरीक्षण सजनाधादिमुससा दोषयुद्धपा। उमतिमहरदात्मविषया यमरणरतिः परमस तस मेऽस्तु ॥ ५॥ म्वनिगममपहाय मत्यतिमा- मृवमधिकर्तुमाप्तुती रथस्सः । धृतरथचरणोऽम्पयाचलगु- हरिरिख हन्तुमिमं गोचरीयः ॥ ६॥ शिवविशिखहवा विशीर्णदंशः क्षवजपरिप्लुत आवतायिनो मे । रथको खड़ा करके अपने भृकुटि पिटामसे विपक्षी सेनिकोंकी आसुको हरनेवाले पार्थ-सखामें मेरी प्रीति हो ॥४॥ दूर सड़ी नाके मुखको निरीक्षण करके स्वजन-वधमें दोपबुद्धिसे निवृत्त हुए अर्जुनकी कुमतिको जिसने आत्मविद्या (गीता-ज्ञान ) द्वारा हर लिया था, उस परमपुरुष (कृष्ण) के चरणों में मेरी प्रीति हो ॥ ५॥ मेरी प्रतिज्ञाको सत्य करनेके लिये। अपनी प्रतिश ओड़कर ग्यसे उतर पड़े और सिंह जैसे हाथीको मारने दौड़ता है उसी तरह चक्रको लेकर पृथ्वी कॅपाते हुए कृष्ण 'मेरी ओर) दौड़े, उस समय शीघ्रता के कारण उनका दुपट्टा (पृथ्वीको देनेके लिये) गिर पड़ा या ॥६॥ मम आसायीके शीश श्रीधष्णस्तोत्राणि प्रसमममिससार मद्वधा स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः॥ विजयरथकुटुम्ब आत्ततोत्रे घृतहयरश्मिनि तन्ट्रियेक्षणीये। भगवति रतिरस्तु मे मुमूर्पो- यमिइ निरीक्ष्य हता गताः स्वरूपम् ॥ ८॥ ललितगतिविलासवल्गुहास- प्रणयनिरीक्षणकल्पितोरुमानाः कतमनुकतवत्य उन्मदान्धाः प्रकृतिमगन्किल यस्य गोपरयः ॥९॥ मुनिगणनृपवर्यसलेन्तः- बागोंसे विदीर्ण होकर, फटे हुए धाव और धिरसे सने हुए, जो भगवान् मुकुन्द मुझे हठपूर्वक मारनेको दौड़े, वे मेरी गति हो ॥ ७ ॥ अर्जुनके रपमें-चाधुक लेकर और घोड़ोंकी लगाम पकड़कर बैठे हुए. (!) ऐसी शोमासे दर्शनीय भगवान्में मुन मरणाकांकी प्रीति हो; जिनका दर्शन करके इस युद्ध में मरे हुए वीर भगवत-स्वरूप माप्त हो गये हैं।॥ ८॥ ललित गति, विलास, मनोहर दास्य और प्रेमपूर्ण निरीक्षणके समय बहुत मान धारण करनेवाली तया (कम्मके अन्तर्धान हो जानेपर ) उन्मच होफर भगवत् वरिषोंका अनुकरण करनेवाली गोपवधुएँ जिनके स्वरूपको निश्रय ही प्राप्त हो गयी ॥९॥ युधिष्ठिरके राजस्वपमें, मुनिगण और नृपतियोंके समक्ष जिनकी अप- स्वोपरतावली . सदसि युधिष्टिरराजसूय एपाम् । अहणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एप आविरामा ॥१०॥ तमिममहमर्ज शरीरमा हृदि हदि धिष्ठितमान्मकल्पिवानाम् । प्रतिशमिव नकधार्कमेक समधिगतोऽसि विधूतमेदमोहः ॥११॥ इति श्रीमद्भागवत महापुराणे प्रथमस्कन्धे नवमेऽन्याये मीप्मयता भगवरदतिः सम्पूर्णा । ५३--गोविन्ददामोदरस्तोत्रम् अग्रे कुरुणामय पाण्डवानां दुःशासनेनाहृतरस्नकेशा । कृष्णा तदाक्रोशदनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माघदेति॥१॥ पूजा हुई, अहो ! ऐसे दर्शनीय भगवान ही ये मेरी दृष्टिके सामने प्रकट हुए। ॥१०॥मैं भेद और मोइसे रहित होकर अपने ही रचे हुए प्रत्येक घरीरभारीके हृदयमें स्थित सूर्यकी तरह एक होते हुए भीनाना दृष्टिभेदसे अनेक रूपदीसने पाळे और जन्मरहिव इस परमात्मा (कृष्ण) की शरणमें जाता हैं ॥११॥ [ जिस समय ] कौरव और पाहनों के सामने भरी सभा पुस्यासनने द्रौपदी पख और सालेको पारसींचा उस समामिला में दूसरा नाय नहीं है ऐसी द्रौपदीने रोम पुत्रय गोकिन।

बौहष्णलीमाणि परीकृष्ण विष्णो मधुकैटमारे भक्तानुकम्पिन भगवन् मुरारे। यस मां केशव लोकनाथ गोविन्द दामोदर माधवेवि ॥२॥ वेतकामाखिलगोपकन्या मुगरिपादार्पितचिनचिः । पादिकं मोहवशादवोचद् गोरिन्द दामोदर माघवेति ॥३॥ उलूखले सम्भवतण्डुलांथ संघट्टयन्त्यो मुसलैः प्रमुग्धाः । गायन्ति गोप्यो जनितानुरागा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४॥ काचित्कराम्भोजपुटे निपणं क्रीडाशुकं किंशुकरक्ततुण्डम् । अध्यापयामास सरोरुहाक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५॥ हे दामोदर हे माधव Put || हे श्रीकृष्ण ! हे विष्णो ! हे मधुकैटमको मारनेवाले हे भक्तोंके अपर अनुकम्पा करनेवाले ! हे भगवन् ! हे मुरारे! हे केवय ! हे लोकेवर हे गोविन्द ! हे दामोदर | हे माधव ! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो ॥२॥ जिनकी चित्तत्ति मुरारिके चरणकमलों में लगी हुरं वे समी गोपन्याएँ दूध-दही बेचनेकी इच्छासे घरसे चली । उनका मन सो मुरारिके पार या अतः प्रेमवश सुध बुध भूल जाने के कारण पी लो दही इसके स्थान में जोर-जोरसे गोविन्द ! दामोदर माधव !! आदि पुकारने 31 ओखलीमें धान मरे हुए हैं, उनें मुग्धा गोष रमणियों मूसलोंसे कट रही हैं, और कूटते-कूटचे कृष्णप्रेममें विभोर होकर गोविन्द ! दामंदर ! माप ! इस प्रकार गायन करती जाती हैं॥४॥ कोई कमनयनी पाला मनोविनोदके लिये पाले हुए अपने करकमल- पर बैठे किंशाकुसुमके समान रचत्वर्ण चोचपाले मुग्गेको पदा रहो यो को को बधाोविन्द दामोदरम ॥५॥ प्रत्येक मय दामोदर माधय इस पदको ही गाती जाती थीं॥७॥ हायमें माखनमा छोटे भाई कृष्णको पालकोंके बीचसे पकड़कर पुकारा-अरे ग.शिद। सोपरतायली गृहे गृहे गोपधूसमूहः प्रतिक्षणं पिञ्चरसारिकाणाम् । स्खलगिरं वाचयितुं प्रवृत्तो गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६॥ पर्यविामाजमलं कुमारं प्रस्तापयन्त्योऽखिटगोपकन्याः। जगुः प्रवन्धं स्वरतालबन्धं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥७॥ रामानुज वीक्षणकेनिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् । आचालकं वालकमाजुहाव गोविन्द दामोदर माघवेति ॥८॥ विचित्रवर्णामरणाभिरामेऽमिधेहि वक्ताम्युबराजहंसि । सदा मदीये रसनेऽग्ररङ्गे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥९॥ अङ्काधिष्टं शिशुगोपगृढं स्तनं धयन्तं कमलककान्तम् । समूह-की-समूह गे.पाङ्गनाएँ पीज, पाठी हुई अपनी मैनाओंसे उनकी लड़खड़ाती हुई वाणीको क्षण-क्षणमे हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव? इत्यादि रूपसे कहलाने में लगी रहती थीं ॥ ६ ॥ पाउनेमें पोदे हुए अपने नरें यम्चेको मुलाती हुई सभी गोपकन्याएँ साल-स्वरके साथ गोविन्द ! गोटा लेकर मैया यशदाने आँखमिचौनीकी कौडामें पल पटरानो को दामोदर ! ओ माधय विचित्र वर्णमय आभरणोंछे मत्पन्न मुन्दर प्रतीत होनेवाली है मुखकमकी राजहंगरूपिणी मेरी रखने 11 उम्पयन गोविन्द ! दामोदर | माधव ! इसापनियादी विखार कर 10 अम्नी गोद में बैठकर दूध पीते हुए बालगोपाळरूपभारी भगवान् अमी. ठमेश्य प्रेमानन्दमें मम दुई पोदाममा रस चौकष्णस्तोत्राणि सम्बोधयामास मुदा यशोदा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥१०॥ क्रीडन्तमन्तर्वजमात्म स्वं समं वयस्पैः पशुपालचालैः। प्रेम्णा यशोदा प्रजुहाव कृष्णं गोविन्द दामोदर माधवेति॥११॥ यशोदया गाढमुलूखलेन गोकण्ठपाशेन निबध्यमानः । रोद मन्दं नवनीतमोजी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥१२॥ निजागणे कङ्कणकेलिलोलं गोपी गृहीत्वा नवनीतगोलम् । आमर्दयत्पाणितलेन नेत्रे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥१३।। गृहे गृहे गोपवधूकदम्बाः सर्वे मिलित्वा समवाययोगे। करती थी-ऐ मेरे गोविन्द ! ऐ मेरे दामोदर ! ऐ मेरे माधव ! जरा गेलो वो सही १ ॥१०॥ अपने समवयस्क गोपबालकोके साथ गोठमे बेलते हुए,अपने प्यारे पुत्र कृष्णको यशोदामेयाने अत्यन्त लेहके साथ कारा-'अरे ओ गोविन्द ! ओ दामोदर ! अरे माधव ! [ कहाँ चला या !] ॥ ११॥ अधिक चपलता करनेके कारण यशोदामेयाने गौ धिनेकी रस्सीसे खूब कसकर ओखलीने उन घनश्यामको बाँध दिया व दो वे माखनभोगी कृष्ण धीरे-धीरे [ आँखें मळते हुए ] सिसक- सककर गोविन्द ! दामोदर ! माधव !' कहते हुए रोने लगे ॥ १२ ॥ नन्दनन्दन अपने ही घरके आँगनमें अपने हायके कङ्कणसे खेलनेमें । हुए हैं, उसी समय मैयाने धीरेसे जाकर उनके दोनों कमळायनोंको नी हयेटीसे मुंद लिया तया दूसरे हायमें नवनीतका गोला लेकर पूर्वक कहने लगी-गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! [लो देखो, यह उन खा लो ॥ १३ ॥ बजके प्रत्येक घरमें गोपाननाएँ एकत्र का अपर पानेपर -सी- आपसमें मिलकर उन मनमोल स्तोत्ररतावली पुष्पानि नामानि पठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माघवेति।।१४।। मन्दारमूले वदनामिरामं बिम्बाधरे परितवेणुनादम् । गोगोपगोपीजनमध्यसंस्थं गोविन्द दामोदर माधवेति ।।१५।। उत्थाय गोप्योऽपररात्रभागेस्मृत्वायशोदासुतबालकेउिम्। गायन्ति प्रोच्चदधिमन्थयन्त्यो गोविन्द दामोदर माघवेति॥१६॥ जग्धोऽथ दत्तो नवनीतपिण्डो गृहे यशोदा विचिकित्सयन्ती। उवाच सत्यं वद हे मुरारे गोविन्द दामोदर माघवेति ॥१७॥ अभ्यर्च्य गेहं युवतिः प्रवृद्धप्रेमप्रवाहा दघि निर्ममन्य । माधवके गोविन्द दामोदर, माधव' इन पवित्र नामाको पदा करती हैं ॥१४॥ जिनका मुखारविन्द बड़ा ही मनोहर है, जो अपने पिम्प के समान अरुन अधरोंपर रखफर वंशीकी मधुर ध्वनि कर रहे हैं तया जो कदम्बके तडे गो गोप और गोपियोंके मध्यमें विराजमान हैं उन भगवान्का हे गोविन्द !। दामोदर! हे माधव !' इस प्रकार कहते हुए सदा स्मरण करना चाहिये ॥१५॥ नाचनाएँ ब्राह्ममुहूर्तमें उठकर और उन यशुमतिनन्दनकी पालनीदाओंकी बावोंको याद करके दही मयते-मयते गोविन्द | दामोदर ! माधप । इन पदोको उप स्वरसे गाया करती हैं ॥ १६॥ [दधि मथकर मावाने मासनका टौंदा रख दिया था। माखनमोगी कृष्णकी दृष्टि पड़ गयी. सट उसे धीरे उठा लाये ] कुछ साया, कुछ माँट दिया। जब दूँदवे-दूदते न मिजा तो यचंदामेयाने आपपर सन्देह करते हुए पूछा- मुरारे । गोविन्द ! । दामोदर! माधव ! ठीक-ठीक यता मापनका दाया हुमाए॥१७॥ जिसके इसमें प्रेमी याद आ रही है ऐसी माता पसंद पर छोपर को मदने गी। स और स नोमानार तथा राधियों न धौछष्णस्तोत्राणि. गायन्ति गोप्योऽध सखीसमेतागोविन्ददामोदर माधवेति॥१८॥ कचित् प्रमावे दधिपूर्णपात्रे निक्षिप्य मन्धं युवती मुकुन्दम् । आलोक्य गानं विविधं करोति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥१९॥ क्रीडापरं मोजनमज्जनार्थ हितैपिणी स्त्री तनुजं यशोदा । आजूहवद प्रेमपरिउताक्षी गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२०॥ सुखंशयानं निलपेच विष्णुं देवर्पिमुख्या मुनयः प्रपन्नाः । सेनाच्युते तन्मयतां व्रजन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२१॥ विहाय निद्रामरुणोदये च विधाय कृत्यानि च विप्रमुख्याः। गोविन्द ! दामादर ! माधव ! इस पदका गान करने लगीं ॥१८॥ किसी दिन प्रातःकाल ज्यों ही माता योदा दहीभरे भाण्डमें मपानीको छोड़कर उठी त्यों ही उसकी दृष्टि शय्यापर बैठे हुए मनमोहन मुकुन्दपर पड़ी । सरकारको देखते ही वह प्रेमसे पगली हो गयी और मेरा गोविन्द ! मेरा दामोदर ! मेरा माधव ! ऐसा कहकर तरह-तरहसे गाने लगी ॥१९॥ कीडाविहारी मुगरि बाळकोंके साथ खेल रहे हैं [अभीतक न स्नान किया है न भोजन ] अवः प्रेममें विल हुई माता उनें स्नान और भोजन के लिये पुकारने लगी-अरे ओ गोविन्द ! ओ दामोदर ! ओ माधव ! [आ टा!आ!पानी ठंडा होरहा है जल्दी से नहा ले और कुछ खा ले] ॥ २०॥ रद आदि ऋषि हे गोविन्द ! हे दामोदर! हे माधव !' इस प्रकार पर्थना करते हुए घरमै सुखपूर्वक गोये हुए उन पुराणपुरुष याउकृष्णकी रणमें आये, अतः उन्होंने श्रीअन्युवमें वन्मयता प्राप्त कर ली ॥ २१ ॥ बाण मात्रा कम और अपने नित्य-नैमिति में पूर्ण स्तोत्ररतापळी वेदावसाने प्रपठन्ति नित्यं गोविन्द दामोदर माधवि ।।२।। पृन्दावने गोपगणाध गोप्यो रिलाय गोविन्दवियोगविनाम् । रार्घा जगुः साश्रुविलोचनाम्यां गोविन्द दामोदर माघवेति ॥२३॥ प्रभातसवारगता नु गाास्तरक्षणार्य तनयं यांदा । प्रायोधयत् पाणितलेन मन्दं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२४॥ प्रबालशोभा इस दीर्घकशा वाताम्बुपर्णाशनपूतदहाः । मूले वरूणां मुनयः पठन्ति गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२५॥ एवं सुधाणा विरहातुरा भृशं ब्रजस्त्रियः कृष्णविपक्तमानसाः । वेदपाठके अन्तमें नित्य ही गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन मञ्जुल नामोंका कीर्तन करते हैं ।॥ २२॥ नन्दावनमें श्रीकृषभानुकुमारीको वनवारीके वियोगसे विहल देस गोपगण और गोपियाँ अपने कमलनयनोंसे नीर बाती हुई हा गोविन्द ! हा दामोदर ! हा माधव ! आदि कहकर पुकारने लगीं ॥ २३ ॥ प्रातःकाल होनेपर जब गौएँ वनमें चरने चली गयीं कर उनकी रक्षाके लिये यशोदामैया शय्यापर शयन करते मीठी-मीठी थपकियोंसे जगाती हुई बोलीं-'बेटा गोविन्द ! मुमा माधव ! लल्लू दामोदर ! [ उठ, जा गौऑको चरा ला] ॥ २४॥ केवल वायु, जल और पोंके खानेसे जिनके शरीर पवित्र हो गये हैं। ऐसे प्रवाटके समान शोभायमान लंबी-लंबी एवं कुछ अरुण रंगकी जटाओंवाले मुनिगण पवित्र वृक्षोंकी छायामें विराजमान होकर निरन्तर भगोविन्द ! दामोदर ! माधव ' इन नामोंका पाठ करते हैं ।। २५ ॥ श्रीवनमालीके विरहमें विहल हुई बजाजनाएँ उनके विषय में विविध प्रकारकी पार्वे कहती हुई लोक-माको विलालि दे बड़े आखरसे गोविन्द हुए बालकृष्णको श्रीकृष्णस्तोत्राणि विसुज्य लआरुरुदुःस सुखरंगोविन्द दामोदर माघवेति॥२६॥ गोपी कदाचिन्मणिपिचरस्थं शुकं वचोवाचयितुं प्रवृत्ता। आनन्दकन्द ब्रजचन्द्र कण गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२७॥ गोवत्सवालः शिशुकारुपक्षं वक्षन्तमम्भोजदलायनाक्षम् । उवाच माता चियुकं गृहीत्सा गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२८॥ प्रभातकाले वरवल्लवौधा गोरक्षणार्थ धृतवेत्रदण्डाः । आकारयामासुरनन्तमाय गोविन्द दामोदर माधवेति ॥२९॥ जलाशये कालियमर्दनाय यदा कदम्यादपतन्मुरारिः । गोपाङ्गनाश्चुकुशुरेत्य गोपा गोविन्द दामोदर माधयेति ॥३०॥ दामोदर ! माधव !' कहकर जोर-जोरसे रोने लगीं ॥ २६ ॥ गोपी श्रीराधिकाजी किसी दिन मणियोंके पिंजड़ेमें पले तोतेसे बार-बार 'आनन्दकन्द ! ब्रजचन्द्र ! कृष्ण ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामोंको बुद्धवाने ठगी ॥ २७ ॥ कमलनयन श्रीकृष्णचन्द्रको किसी गोपरालककी चोटी बछड़े पूंछके बालोंसे बौधते देख मैया प्यारसे उनकी ठोदीको पकड़कर कहने लगी-'मेरा गोविन्दामेरा दामोदर(मेरामाधव' ।२८॥ मातःकाल हुआ, ग्वाल-बालोंगी मित्रमण्डली हायोंमें रेतकी छड़ी और लाठी वे गौओं चराने के लिये निकली । तब वे अपने प्यारे सत्ता अनन्त आदिपुरुष श्रीकृष्णको गोविन्द ! दामोदर ! माधव ! कह-कहकर बुलाने गे॥ २९ ॥ जिस समय फालियनागा मर्दन करने के लिये कसा कदमके से कूदे, उस समय गोराबनाएँ और गोरगम पहा आरा गोपिन्दा दामोदर मावा मम्मे गोरखे ने सो !

कोपरतापडी अफरमासाप पदा मुकुन्दनापोत्सवार्थ भयुरो प्रविष्टः । पदा स पौर यदीपमापि गोविन्द दामोदर मापवेति ॥३१॥ फैसस दतेन यक्ष नीती पुन्दावनान्चाद् वसुदेवयन् । सोद गोपी मानस मध्ये गोविन्द दामोदर माधोति ॥३२॥ सरोवरे फानियनागवई शिर्श पचोदातनयं निशम्य । चकुठेठन्त्यः अधिगोपाला गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३३॥ अकूरयाने यदुवंशनार्थ संगच्छमानं मपुरी निरीक्ष्य । उचुर्वियोगा कैल गांपचाला गोविन्ददामोदरमायवेति॥३४॥ चक्रन्दगोपी नलिनीयनान्ते कृष्णेन हीना कुसुमे शयाना। जिस समय श्रीकृष्णचन्द्रने कसके धनुर्पोत्सवमें सम्मिलित होनेके लिये अरजीके साय मधुरामें प्रवेश किया, उस समय पुरवासीजन है गोविन्द । हे दामोदर ! हे माधव ! तुम्हारी जय हो, जय हो' ऐसा करने लगे ॥ ३१ ॥ जब कसके दूत अक्रूरजी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण और बळामने वृन्दावनसे दूर ले गये तब अपने घरमें बैठी हुई यशोदाजी दा गोविन्द 1 हा दामोदर ! हा माधव !! कह-कहकर बदन करने लगी ॥३२॥ यशोदानन्दन बालक श्रीकृष्णको कालियहदमें काटियनागसे जमा हुआ सुनकर गोपबालाएँ रास्ते लोटती हुई हा गोविन्द ! दामोदर ! हा माधव ' कहकर जोसे रुदन करने लगी ॥३३॥ अङ्करके रथपर चढ़कर मथुरा जाते हुए श्रीकृष्णको देख उमख गोपबालाएँ वियोगके कारण अधीर होकर कहने लगी-हा गोविन्द । हा दामोदर ! हा माधव ! [ हमें छोड़कर तुम कहाँ जाते हो ] ॥४॥ भीराधिकाजी भीकृष्णके अलग हो जानेपर कमलपनमें मम पयार धीकणस्तोत्राणि प्रफुल्लनीलोत्पललोचनाम्यां गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३५॥ मातापितम्या परिमार्यमाणा गेहं प्रविष्टा विललापगोपी। आगत्य मां पालय विश्वनाथ गोविन्ददामोदरमाधवेति ॥३६॥ धृन्दावनस्थ हरिमाशु बुवा गोपी गता कापि वर्न निशायाम् । वाप्यवातिमयादवोचद् गोविन्द दामोदर माधवेति ॥३७॥ सुखं शयानानिलये नितेऽपिनामानि विष्णोःप्रवदन्तिमाः। ते निश्चितं तन्मयतां प्रजन्ति गोविन्ददामोदर माघवेति ॥३८॥ सा नीरजादीमालोक्यराधारुरोदगोविन्द वियोगखिन्नाम् । सोकर अपने विकसित कमसदृश लोचनौसे आँसू बहाती हुई 'हा गोविन्द! हा दामोदर ! हा माधव !' कहकर मन्दन करने लगीं ॥ ३५ ॥ माता-पिता आदिसे घिरी हुई श्रीराधिकाजी घरके भीतर प्रवेशकर विलाप करने लगी कि हे विश्वनाथ । हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव । तुम आकर मेरी रक्षा करो ! रक्षा करो !! ||३६॥ रात्रिका समय या किसी गोपीको भ्रम हो गया कि वृन्दावन-विशारी इस समय वनमें विराजमान हैं। बस फिर क्या था, सट उठी ओर चल दी किन्तु जब उठने निर्जन वनमें वनमाडीका न देखा वाडरसे कांपती हुई हा गोविन्द ! हा दामोदर ! हा माधव !' कहने लगी ॥३७॥ वन नभी जाएँ] अपने घरमें ही सुखसे ययापर न करते हुए भी जो लोग हे गोविन्द ! हे दामोदर !हेमाधव! न विष्णुभगवान् के पवित्र नामोंको निरन्तर कहते रहते हैं, वे निश्चय ही मावान का वनवा पास कर लेते हैं ॥३८॥ काठमोचना राधाको भीगोविन्दकी विपन्ययासे पीड़ित देख को दी अपने प्रफुल्ल कमलाप १२० स्तोत्ररसावली सखी प्रफुल्लोत्पललोचनाम्यां गोविन्ददामोदर माघवेति ॥३९॥ जिद्द रमजे मधुरप्रिया त्वं सत्यं हितं त्वां परमं वदामि । आवर्णयेथा मधुराक्षराणि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४०॥ आत्यन्तिकव्याधिहरं जनानां चिकित्सक वेदविदो वदन्ति । संसारतापत्रयनाशपीजं गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४१॥ वावाज्ञया गच्छति रामचन्द्रे सलक्ष्मणेऽरण्यचये ससीते । चक्रन्दरामस्य निजाजनित्री गोविन्ददामोदर माधवेति॥४२|| एकाकिनी दण्डककाननान्ताद सा नीयमाना दशकन्धरेण । सीता तदाक्रन्ददनन्यनाथा गोविन्द दामोदर माघवेति ४३५ नयोंसे नीर बहाती हुई 'हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !' कहकर रुदन करने लगी ॥ ३९ ॥ हे रसोंको चखनेवाली जिहे ! सुझे मीठी चीज बहुत अधिक प्यारी लगती है, इसलिये मैं तेरे दिक्की एक बहुत ही सुन्दर और सन्ची बात बताता हूँ। तू निरन्तर हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! इन मधुर मञ्जु नामोंकी आवृत्ति किया कर ॥४०॥ वेदवेचा विद्वान् गोविन्द ! दामोदर ! माधव !! इन नामोंको ही लोगोंकी बड़ी सेकसी विकट व्याधिको विच्छेद करनेवाला वैद्य और संसारके आधिभौतिक आधिदैविक और आध्यात्मिम्-तीनों वापोंके नाराका बदिया बीउ बवाते ॥४॥ अपने पिता दरपी आशासे माई लक्ष्मण और जनकनन्दिनी सीताके साय भीरामचन्द्रजी पीहड़ वनों के लिये चलने लगे, तब उनकी माता भीकोससाजी हे गोविन्द! हे दामोदर ! हे माधव ! [राम पनन्दना रेरापर!] ऐसा कहकर जोरोंसे विडार करने सगी ॥४२॥ जर रा राजपय पचपटीमें जानोजीमेडी देख उनेहरकर ले जाने लगा। म रामचन्द्रनी के सिरा जिन दूसरा कोई स्वामी नहीं है ऐसी सीता गोपन्द ! 7 दामोदर! हामाव! रामारएनन्दन राव! • पनपन एजेवियर धीउष्णस्तोत्राणि रामाद्वियुक्ता जनकात्मजा सा विचिन्तयन्ती हृदि रामरूपम् । स्रोद सीवा रघुनाथ पाहि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४४॥* प्रसीद विष्णो रघुवंशनाथ सुरासुरागों सुख दुःखहेतो । मोद सीता तु समुद्रमध्ये गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४५||* अन्तर्जले प्राइगृहीतपादो विसृष्टविक्लिष्टसमस्तबन्धुः। तदा गजेन्द्रो निवयं जगाद गोविन्द दामोदर माधवेति ॥४६॥ इंसप्वजः शङ्खयतो ददर्श पुत्र कटाहे प्रपतन्तमेनम् । कहकर जोसेरुदन करने लगी ॥४३॥ रपमें बिठाकर ले जाते हुए रावणके साया रामवियोगिनी सीता हृदयमें अपने स्वामी श्रीरामचन्द्रजीका ध्यान करती हुई श रखनाथ !हा गोविन्द ! हा दामोदर ! हा माधव ![हे राम! एनन्दन ईराघव ! मेरी रक्षा करो] इस प्रकार रोती हुई जाने लगीं ॥४॥ जर रावणके साथ सीताजी समुद्रके मध्यमें पहुँची सर यह कहकर जोर-जोरसे रुदन करने लगी-हे विष्णो ! हे रघुकुल्पते । हे देवताओंको मुख और असुरोंको दुःख देनेवाले !हे गोविन्द ! हे दामोदर । हे माधव ! (हे राम ! हे नन्दन ! हे राव ! ] प्रसन्न होइये, प्रसन्न हो॥४६॥ पानी पीते समय जलके भीतरसे जब पाइने गजका पैर पकड़ लिया और उसका समस्त दुखी बन्धुओंसे साय फूट गया, तब वह गजराज अधीर होकर अनन्यमावले निरन्तर हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! ऐसा का अपने पुरतिशमुनिके साथ राजा हंसम्बजने अपने पुत्र सुधन्वाको तप्त तैलकी कड़ाहीमें काहे रामनन्दन राति पनि पासपरम्।

परतावनी पुष्पानि नामानिहरेपन गोरिन्द दामोदर माधवेति ॥४॥ दुर्वासयो वाक्यमुपेत्य कथा सा चानचीत् काननगमिनीयम्। अन्तःप्रविष्ट मनसाजुहार गोविन्द दामादरमाधोति ॥४८॥ ध्येयः सदाय गिमिरप्रमेयः निन्नाइरथिन्वितपारिजातः । फरतरिकान्पिनीलयों गोविन्द दामोदर माधोति ॥४९॥ संसाररूपे पतितोऽस्पगाधे मोहान्धपूर्णे पियाभितप्ते । कारापतम्यं मम देहि विष्णो गोविन्ददामोदर माधवेति ॥५०॥ स्वामेव याचे मम देहि निवे समागते दण्डघरे कवान्ते । मदवे घोर रे गोविन्द । है दामोदर ! हे माधव न भगवान के परमावन नामोका जप करते हुए देखा ॥४७॥ [एक दिन द्रौपदीके भोजन फर लेनेपर असमयमें दुर्वासा ऋषिने शियोसहित आकर भोजन माँगा पर ] पनवासिनी द्रौपदीने मोजन देना स्वीकार कर अपने अन्त:करणमें स्थित श्रीश्यामसुन्दरको हे गोविन्द ! हे दामोदर ।। माषप !' कहकर मुराया ॥४८॥ योगी भी जिन्हें ठीक ठीक नहीं जान पाते, जो सभी प्रकारको चिन्ताओंको हरनेवाले और मनोवाडिन्त वस्तुओंको देने के लिये कपाक्षके समान है क्या जिनके शरीरका वर्ष कस्तूरीके समान नीला है, उन्हें सदा ही गोविन्द ! दामोदर! माधव ! इन नामोंसे सरण करना चाहिये ॥४९॥ जो मोहरूपी अन्धकारले व्याप्त और विषयोंकी ज्वालासे सन्तप्त है, ऐसे अथाह संसाररूपी रूपर्ने मैं पड़ा हुआ हूँ।हे मेरे मधुसूदन ! है गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव ! मुझे अपने हाथका मारा दीजिये ॥५०॥ हेजि! मैं सुशीसे एक मिश माँगता हूँ, तु ही मुझे दे। वह पति पर .

श्रीकृष्णस्तोमाणि वक्तव्यमेवं मधुरं सुमक्त्या गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५१॥ मजस मन्त्रं भवबन्धमुक्त्यै जिढे रसज्ञे मुलमं मन शम् । पापनार्मुिनिभिः प्रजातं गोपिन्द दामोदर माघवेति ॥५२॥ गोपाल वंशीधर रूपसिन्धो लोकेश नारायण दीनबन्धो। उच्चस्तरस्त्वं वद सर्वदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५३॥ बिहे सदैवं मज सुन्दराणि नामानि कणस्य मनोहरामि । समस्तमक्कातिविनाशनानि गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५४॥ गोविन्द गोपिन्द हरे मुरारे गोविन्द गोविन्द मुकुन्द कृष्ण । गोविन्द गोविन्द रथाङ्गपाणे गोविन्द दामोदर माधवेति ॥५५॥ दण्डपाणि यमराज इस शरीरका अन्त करने आयें तो बड़े ही प्रेम- । गद्द स्वर, हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !! इन मञ्जुल नार्मोका उधारण करती रहना ॥५१॥ हे जिहे ! हे रसजे ! संसाररूपी न्धनको काटनेके लिये तू सदा हे गोविन्द ! हे दामोदर ! हे माधव !! व नामरूपी मन्त्रका जप किरा कर, जो सुलभ एवं सुन्दर है और जसे व्यास, वसिष्ठादि ऋषियोंने भी जपा है ॥ ५२ ॥ रेजिडे। तू रन्तर गोपाल ! वंशीधर ! रूपसिन्धो! लोकेश ! नारायण ! दीनबन्धो ! विन्द ! दामोदर ! माधव ! इन नामोंका उच्च स्वरसे कर्मिन किया र॥ ५३ ॥ हे जिो! त् सदा ही श्रीकृष्णचन्द्रके गोविन्द ! मोरर ! माधव न मनोहर म[उ नामोको, जो मौके राख संकटोंकी निचि करनेवाले हैं, मजती रह ॥ ५४ ।। जिहे। गोविन्द ! गोविन्द हरे ! मुरारे ! गोविन्द ! गोविन्द ! मुकुन्द! या मोपिन्द ! गोविन्द ! रयानपाये। मोविन्द ! दामोदर माधव । से दोषणा सुस्वावसाने स्विदमेव सारं दासारसाने विदमेव गैयम्। देहावसाने विदमेव जाम्य गोविन्द दामोदर मावति ॥५६|| दुर्गारवाय परिगृप कष्णामृगीय मीता तु कय कयनित। समा प्रविटा मनसानुहार गोविन्द दामोदर माघवेति ॥५॥ थीकणराधार गौशलेश गोपाल गोवर्धन नाथ विष्णो। बिई पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माघवेति ॥५८|| श्रीनाथ विश्वधर श्चिम श्रीदेवकीनन्दन दैत्यशयो । जिट पिपस्वामृतमेवदेव गोविन्द दामोदर माघवेति ॥५९॥ गोपीपते कंसरिपो मुकुन्द लक्ष्मीपते केशव वासुदेव । इन नार्मोको त सदा अपती रह ॥ ५५ ॥ सुखके अन्तमें यही सार है, इसके अन्तमें यही गाने योग्य है और शरीरका अन्त होने के समय भी यही मत्र अपने योग्य है, कौन-सा मन्त्र ! यही कि हे गोविन्द ! हे दामोदर! माषष ! |॥ ५६ ॥ दुःशासनके दुर्निवायं पचनोंको स्वीकार कर मृगीके ख्मान भयमीत हुई द्रौपदी किसी-किसी तर समामें प्रवेश कर मन-ही-मन गोविन्द ! दामोदर! माषष P इस प्रकार भगवानका सरण करने लगी ॥ ५७ ॥ हे जिहे। भीकृष्ण | राधारमण | प्रजराज ! गोपाल ! गोषपन | नाय ! विष्णो । गोविन्द ! दामोदर!माधष ! इस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥५८॥हे जिडे। तू 'श्रीनाय ! धर! श्रीविष्णुस्वरूप । श्रीदेवकीनन्दन ! असुर निकन्दन ! गोविन्द ! दामोदर ! माघष दस नामामृतमा निरन्तर पान करती रह ।। ५९ ॥ हे आिहे! गोपीपते ! सरिपो ! मुकुन्द स्मीपते ! केशष ! वासुदेष!

गोविन्द ! दामोदर! माधव-इस नामामृतका निरन्तर पान करती
और गोपियोंको सुख देनेमें कुशल ! श्रीगोविन्द ! दामोदर !
धीरुष्णस्तोत्राणि
૨૧
जिद्द पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६॥
गोपीजनाहादकर ब्रजेश गोचारणारण्यकृतप्रवेश ।
जिहे पिपस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६१॥
प्राणेश विश्वम्भर कैटमारे वैकुण्ठ नारायण चक्रपाणे ।
जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६२॥
हरे मुरारे मधुसूदनाय श्रीराम सीतावर रावणारे ।
जिह्वे पिवस्वामृतमेवदेव गोविन्द दामोदर माधवैति ॥६३॥
श्रीयादवेन्द्राद्रिधराम्बुजाक्ष गोगोपगोपीसुखदानदध ।
जिहे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६॥
गोविन्द ! दामोदर ! माधव -इस नामामृतका निरन्तर पान करती
रह ॥ ६ ॥ जो प्रजराज प्रजाजनाओंको आनन्दित करनेवाले हैं, जिन्हेंने
गौओंको चरानेके लिये वनमें प्रवेश किया है; हे जिहे ! तुम उन्हीं मुरारिके
रह॥ ६१ ॥ हे जिहे ! त् प्राणेश ! विश्वम्भर ! कैटभारे ! वैकुण्ठ !
नारायण ! चक्रपाणे ! गोविन्द ! दामोदर ! माधव !-इस नामामृतका
निरन्तर पान करती रह ॥ ६२ ।। हे हरे ! हे मुरारे ! हे मधुसूदन ! हे
पुराणपुरुषोत्तम ! हे रावणारे ! हे सीतापते श्रीराम ! हे गोविन्द ! हे दामोदर!
१ माधव ? -इस नामामृतका हे जिहे ! त् निरन्तर पान करती रह ॥६३||
जिरे ! श्रीयदुकुलनाथ ! गिरिधर ! कमलनयन ! गो, गोप
!
चिव-रस नामामृतका निरन्तर पान करती रह ॥ ६४ ॥

२२६ स्तोत्ररतायली घरामरोत्तारणगोपवेप विहारलीलाकृतबन्धुशेष। जिह्वे पियस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६५।। बकीवकाघासुरधेनुकारे केशीकृणावर्तविघातदक्ष । जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माघवेति ॥६६॥ श्रीजानकीजीवन रामचन्द्र निशाचरारे भरताग्रजेश । जिह्वे पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६॥ नारायणानन्त हरे नृसिंह प्रहादवाधाहर हे कपालो। . जिह्वे पिवखामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥६८॥ लीलामनुष्याकृतिरामरूप प्रतापदासीकृतसर्वभूप।. जिन्होंने पृथ्वीका भार उतारने के लिये सुन्दर ग्यालका रूप धारण किया है और आनन्दमयी लीला करनेके निमित्त ही शेषजीको अपना भाई बनाया है, ऐसे उन नटनागरके गोविन्द ! दामोदर ! माधव!- इस नामामृतका हे जिहे! तू निरन्तर पान करती रह ॥ ६५ ॥ जो पूतना, रकासुर, अपामुर और धेनुकामुर आदि राक्षसों के शत्रु है और केशी तथा नृणावरको पाइनेवाले हैं, हे जिहे ! उन असुरारि मुरारिक गोविन्द ! दामोदर ! माधव !!-इस नामामृतका त् निरन्तर पान करती रह ।। ६६ ।। हे जानकीजीवन भगवान् राम! हेदैत्यदलन भरतामबचारेगोबिन्द ! दामोदर ! माधव !-इस नामामृतका जितु निरन्तर पान करती रह ।। ६७ ॥ हे प्रहारकी बाधा हरनेवाले दयामय नृसिंह । नारायण ! अनन्त ! रे ! गोविन्द । दामोदर । माय :- नामामाका गि निरन्तर पान करती रह ॥ ६८॥नि मिलाने टोलाये मनुष्योंगीमी आकति नार, रामसल प्रकर किया है और भरने पर श्रीकृष्णस्तोत्राणि २२ जिह्व पिरखामृतमेवदेव गोविन्द दामोदर माधयति ॥६९॥ श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव । जिद्द पिवस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥७०॥ वक्तुं समर्थोऽपि नवक्ति कथिदहो जनानां व्यसनाभिमुख्यम् । बिहे पियस्वामृतमेतदेव गोविन्द दामोदर माधवेति ॥७॥ इति श्रीविल्यमालाचार्यविरचितं श्रीगोविन्ददामोदरस्तोत्रं सम्पूर्णम् । पराममसे सभी भूपोंको दास बना लिए है, उन नीलाम्बुज पाममुन्दर श्रीराम के गोविन्द ! दामोदर ! माधन-सनामामृतकाही निरन्तर पान फरती रह ॥६९॥ हे जिहे ! तु श्रीकृष्ण ! गोविन्द ! हरे! मुरारे हे नाप ! नारायण ! यामुदेय तथा गोविन्द ! दामोदर ! माधव - म नामागतका ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती र ॥७॥ अओ ! मनुष्योंकी पिपलोडाता ऐसी भावना है ! बोलने में समय होनेरर भी भगरमामय उपारण नहीं मिली। मैं नुमसे काता हूँ। गोरिन्द ! दामोदर ! माय PA नामामबम ही निरन्तर प्रेमपूर्वक पान करती २६ ॥१॥ মৃত মুয়ায় ঘর মিলনায় না কি स्पर समास दुभा।

२२८
स्तोमानापली
।
५४-श्रीप्रपन्नगीतम्
(पयमस्वरमा भननम्, विशागरागेग गोगवे)
परमसल श्रीकृष्ण मयरमवाऽव्यय विनिमग्रम् ।
मामुद्धा श्रीकरलालितचरणकमलपरिधी लमम् ।।
वे
(भुवरदम् )
गुणगृगतृष्णाचलिवधिर्य विपयार्थसमुत्सुझदशकरणम् ।
परिभूत दुर्मविनरनिकरेमविभ्रमार्जितगुणशरणम् ॥
सतत समयमनो निवहन्तं परिपुमिनिखिलच्यगुरुम् ।
कालिन्दीरदयप्रियविष्णोचरणकमलरजसी
विधुरम् ॥
मनःशोकमतिमोदक्षतयेऽमिकासन्तमजमुखपमम्
हे परमसखे ! श्रीकृष्ण ! हे अन्युत ! श्रीलक्ष्मीजीके करकमलोदारा
सेवित आपके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए एवं भयंकर भवसागरमें
इयते हुए मेरा उद्धार कीजिये | त्रिगुणमयी मायारूपिणी मृगतृष्मासे
जिसकी बुद्धि चञ्चल हो रही है, जिसकी दसों इन्द्रियाँ विषयभोगों
लिये उत्कण्ठित रहा करती हैं, जो दुष्ट मनुष्योंदारा अपमानित हो चुका
है, अपनी बुद्धि मारी जानेके कारण जिसने भगवान्की शरण छोड़ गुणोंकी
शरण ली है। उस सदा भयभीत मनवाले, कामादि छः शत्रुओंके जालमें
फँसकर सबकी खुशामद करनेवाले, कालिन्दीके प्राणनाय आप (श्रीकृष्ण)
के चरणारविन्दपरागसे शून्य, मनके शोक और बुद्धिके भ्रमको नाश
करनेके लिये अजन्मा आपके मुखकमलके दर्शनाभिलापी तया लक्ष्मीजीके

श्रीकृष्णस्तोत्राणि
२२१
ra
मामुद्धर ते श्रीकरलालितचरपकमलपरिधौ लमम् ॥ १॥
कालिन्दीरुक्मिणीराधिकासत्याजाम्बवतीसुहृदम् ।
निजशरणागतभक्तजनेभ्यः कृपया गवभवभयवरदम्।।
गोपीजनवल्लभरासेघरगोवर्धनधरमधुमथनम्
चन्देऽहं निखिलाधिपति त्वामविशपसुन्दरगुणभवनम्।।
कृष्णलालजीद्विजाधिपं हे मनोऽनिशं वं मज यज्ञम् ।
मायुद्धर ते श्रीकरलालितचरणकमलपरिधौ लग्नम् ॥ २॥
इति श्रीकृष्णलालद्विजविरचित्मयां गीताभजनसमात्यां
अपनगीतं सम्पूर्णम् ।
करकमलोदारा सेवित आपके चरणकमोंकी शरणमें आये हुए मेरा
आप उद्धार कीजिये ॥१॥ कालिन्दी, पक्मिणी, राधा, सत्यभामा
और नाम्ययतीके मुहृद्, अपने शरणागत भक्तजनोंपर कृपा करके उन्हें
भव-भयसे मुक्त करनेवाला वर देनेवाले, गोपबालाओंके प्रियतम, रासके
अधिनायक, गोवर्धनधारी, मधुसूदन, सर्वेश्वर, अत्यन्त कमनीय गुणोंके
आश्रया आपको मैं नमस्कार करता हूँ, हे मन! तु सर्वदा
कृष्णलालदिजके खामी यज्ञेश्वर कृष्णका भजन कर; हे परमसखे! लक्ष्मीजी-
रकमलोदारा सेवि आपके चरणारविन्दोंकी शरणमें आये हुए,
मेरा उदार कीजिये॥२॥

२३०
स्तोत्ररत्नावली
.
५५-श्रीकृष्णः शरणं मम
श्रीकृष्ण एव शरणं मम श्रीकृष्ण एव शरणम् ॥
(ध्रुवपदम्)
गुणमय्येपा न यत्र माया न च जनुरपि मरणम् ।
यद्यतयः पश्यन्ति समाधौ परममुदामरणम् ॥१॥
यद्धतोनिवहन्ति बुधा ये जगति सदाचरणम् ।
सर्वापद्भ्यो विहितं महतां येन समुद्धरणम् ॥ २॥
भगवति यत्सन्मतिमुद्दहवां हृदयवमोहरणम् ।
हरिपरमा यद्भजन्ति सततं निपेव्य गुरुचरणम् ॥ ३॥
असुरकुलक्षवये कृतममरैर्यस्य सदादरणम् ।
भुवनतरुं धत्ते यनिखिलं विविधविषयपर्णम् ॥ ४॥
मेरे लिये श्रीकृष्ण ही शरण है, एकमात्र कृष्ण ही शरण है।
जहाँ वह त्रिगुणमयी माया और जन्म-मृत्यु नहीं है तथा योगीलोग समाधि
जिस आनन्दमयका यहीं दर्शन करते हैं॥१॥ जिनकी प्रासिके लिये विशन
लोग संसारमें अनेक धर्माचरण करते हैं और जिन्होंने सभी आपत्तियोंसे
महात्माओंका उद्धार किया है ॥२॥ जो भगवान्में साधि रखनेवालों के
हृदयका अनान्धर नष्ट कर देते हैं और भगवरजन गुरुचरणों की
सेवा करके जिना सदा भजन करते है॥३॥ अमुरों के विनाशके
लिये देवताओंने जिनग सदा आदर मिया है और जो अनेक
विषयरूती पत्रोंवाले इस संसार को धारण किये हुए ॥ ४ ॥

श्रीकृष्णस्तोत्राणि २३१ अवाप्य यद्भूयोऽच्युतमक्ता न यान्ति संसरणम् । कृष्णलालजीद्विजस्य भूयात्तदघहरसरणम् ।। ५॥ इति श्रीकृष्णलालजीद्विजविरचितं श्रीकृष्णः शरणं मम' नामकस्तोत्रं समाप्तम् । ५६-गोपिकाविरहगीतम् एहि मुरारे कुञ्जविहारे एहि प्रणतजनवन्धो हे माधव मधुमथन वरेण्य केशव करुणासिन्धो (ध्रुवपदम् ) रासनिकुन्जे गुञ्जवि नियवं भ्रमरशतं किल कान्त एहि निभृतपथपान्य। त्वामिह याचे दर्शनदानं हे मधुसुदन शान्त ॥१॥ शून्यं कुसुमासनमिह कुजे शून्यः केलिकदम्बः दीनः केकिकदम्बः। जिनको प्राप्त करके भगवद्भक्त फिर आवागमनके चक्रमें नहीं फैसते, उन्हींकी पापनाशक स्मृति कृष्णलाल द्विजके हृदयमें बनी रहे ॥५॥ हे मुरारे ! हे प्रणतजनोंके बन्धु ! विहार-कुञ्जमें आइये, आइये । हे माधव ! हे मधुमयन ! हे पूजनीय ! हे केशव ! हे करुणासिन्धो ! पधारिये । हे अद्वैतपयके पथिक ! हे नाथ ! रासनिकुञ्जमें सैकड़ों भ्रमर गूंज रहे है, पधारिया हे शान्तिमय मधुसूदन ! आपके दर्शनदानकी हम याचना करती हैं ॥ १ ॥ हे नाथ ! आपके इस क्रीडास्थल कुञ्जमें पिछा हुआ यह कुमुमासन और यह बीटा-कदम्र, सर २३२ स्तोपरक्षावली मृदुकलनादं फिल सरिपाद रोदिति यमुनासम्मः॥२॥ नपनीरजघरण्यामलसुन्दर चन्द्रकुमुमरुचिवेश गोपीगणहृदयेश । गोवर्द्धनधर पृन्दावनचर . वंशीधर परमेश ॥ ३ ॥ राधारजन कंसनिपूदन प्रणतिस्तारकचरणे निखिलनिराश्रयशरणे । एहि जनार्दन पीताम्बरधर कुन्जे मन्थरपवने ॥ ४ ॥ इति श्रीगोपिकाविरहगीत सम्पूर्णम् । . आपके बिना सूना मालूम हो रहा है। मयूर आदि पक्षीगण दोन हो रहे हैं। मृदु कटरय करता हुआ श्रीयमुनाजीका, निर्मल जल भी आपके वियोगमें शोकके साथ , रोता-सा जान पड़ता है ॥ २ ॥'हे नवीन कमल धारण करनेवाले ! हे मेघकी-सी श्यामल सुन्दरतावाले ! हे मोरपंख और पुष्पोंसे सुशोभित वेषधारी गोपीजनोंके हृदयेश ! हे गोवर्धनधारी ! वृन्दावन-विहारी ! मुरलीधर ! हे प्रभो ! पधारिये ॥३॥ हे राधिकाजीको करनेवाले 1 कंसको मारनेवाले ! सभी निराश्रयोंको आश्रय देनेवाले आपके चरणों में हम प्रणाम कर रहे हैं। हे जनार्दन ! पीताम्बरधारी ! हे प्रभो ! इस मन्दमन्द वायुवाले कुञ्जमें पधारिये ! पधारिये !! पधारिये !!! ॥४॥ प्रसन्न श्रीकृष्णस्तोत्राणि २३ ५७--मधुराष्टकम् अपरं मधुरं वदनं मधुरं नयनं मधुरं हसितं मधुरम् । इंदयं मधुरं गमनं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ १ ॥ वचनं मधुरं चरितं मधुरं वसनं मधुरं वलितं मधुरम् । चलितं मधुरं भ्रमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥२॥ वेणुमधुरो रेणुर्भधुरः पाणिर्मधुरः पादौ मधुरौ। नृत्यं मधुरं सख्यं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥३॥ गीतं मधुरं पीतं मधुरं भुक्तं. मधुरं सुप्तं मधुरम् । रूपं मधुरं तिलकं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ४ ॥ करणं मधुरं तरणं मधुरं हरणं मधुरं रमणं मधुरम् । भीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है। उनके अधर मधुर है, मुख मधुर है, नेत्र मधुर है, हास्य मधुर है, हृदय मधुर है और गति भी अति मधुर है | उनके वचन मधुर है, चरित्र मधुर हैं। वस्त्र मधुर हैं, अंगभंगी मधुर है, चाल मधुर है और भ्रमण भो अति मधुर है। श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥ २ ॥ उनकी वेणु मधुर है। चरणरज मधुर है, करकमल मधुर है, चरण मधुर हैं, नृत्य मधुर है और सख्य भी अति मधुर है। भीमधुराधि- पतिका सभी कुछ मधुर है ॥ ३॥ उनका गान मधुर है, पान मधुर है, भोजन मधुर है। शयन मधुर है, रूप मधुर है और तिलक भी अति मधुर है। श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है Irrit उनका कार्य मधुर है, ना मधुर है, हरण मधुर है, रमण मधुर है, उदार मधुर है

२३४
स्तोत्ररत्नापली
यमितं मधुरं अमितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ५॥
गुजा मपुरा माला मधुरा यमुना मधुरा वीची मधुरा ।
सलिलं मधुरं कमलं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ६॥
गोपी मधुरा लीला मथुरा युक्तं मधुरं मुक्तं मधुरम् ।
रष्टं मधुरं शिष्टं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ७॥
गोपा मधुरा गायो मधुरा यष्टिर्मधुरा. सृष्टिर्मधुरा । .
दलितं मधुरं फलितं मधुरं मधुराधिपतेरखिलं मधुरम् ॥ ८॥
इति श्रीमसमाचार्यकृतं मधुराष्टकं सम्पूर्णम् ।
1
.
और शान्ति भी अति मधुर है। श्रीमधुराधिपतिका समी कुछ मधुर है ।।५।।
उनकी गुमा मधुर है, माला मधुर है, यमुना मधुर है, उसकी वरने मधुर
हैं, उसका जल मधुर है और कमल मी अति मधुर हैं। श्रीनधुराधिपतिका
सभी कुछ मधुर है ॥६॥ गोपियाँ मधुर हैं, उनकी लीव्य मधुर है।
उनका संयोग मधुर है, वियोग मधुर है, निरीक्षण मधुर है और
शिष्टाचार भी मधुर है। श्रीमधुराधिपतिका सभी कुछ मधुर है ॥७॥
गोप मधुर हैं, गौएँ मधुर हैं, लकुटी मधुर है, रचना मधुर है, दलन
मधुर है और उसका फल भी अति मधुर है। श्रीमधुराधिपतिका सभी
कुछ मधुर है ॥८॥

श्रीकृष्णस्तोत्राणि .randuduad-edudhma ५८--श्रीनन्दकुमाराष्टकम् सुन्दरगोपालम् उरवनमाल नयनविशालं दुःखहरम् । वृन्दावनचन्द्रमानन्दकन्दं परमानन्दं धरणिधरम् ।। वल्लभवनश्याम पूर्णकामम् अत्यभिरामं प्रीतिकरम् । भज नन्दकुमारं सर्वसुखसारं तत्वविचारं ब्रह्मपरम् ॥ १॥ सुन्दरवारिजवदनं निर्जितमदनम् आनन्दसदनं मुकुटधरम् । गुजाकृतिहारं विपिनविहारं परमोदारं चीरहरम् ।। बल्लभपरपीतं कृतउपवीतं करनवनीतं वियुधवरम् मजा। शौमितमुखधूलं यमुनाकूलं निपटअतूलं सुखदवरम् । जिनके हृदयमें वनमाला है, नेत्र बड़े-बड़े हैं, जो शोकहारी, वृन्दावनके चन्द्रमा, परमानन्दमय और पृथ्वीको धारण करनेवाले है, जो सबके प्रिय, मेधके समान श्यामल, पूर्णकाम, अत्यन्त मुन्दर और प्रेम करनेवाले हैं। उन समस्त मुखोंके सारभूत, पब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन मनमोहना गोपाल श्रीकृष्णको ताव जानकर भजो ॥१॥ जिनका मुन्दर यमरके समान मुख है, जो अपनी कान्तिठे कामदेवको भी जीत चुके हैं, जो आनन्दके आगार, मुकुटधारी, गुञ्जाकी माला पहननेवाले, अन्दावनविहारी परम उदार और गोपियोंके चीर हरण करनेवाले हैं. जिनको पीताम्बर प्रिय है, जो मुन्दर पोपवीत धारण किये हुए और हायमें माखन सिये हुए हैं। उन समस्त मुखोके सारभूतः परमस्वरूप, देवेवर नन्दनन्दन, श्रीकृष्णको तव जानकर भो ॥२॥ जो यमुनातार मुंहमें धूल सरेरे शोभा पा रहे हैं, जिनमें की स्तोत्रालायती मुलमण्डितरेगुं पारितधर्नु बादितणु मधुरमुरम् ।। यल्लममतिरिमलं शुमपदकमलं नसरुचिअमलं तिमिरहरमामब. शिरमुकटमुदेशं कुश्चितकैशं नटवरवेश कामवरम् । मायाकतमनुजं हलघरअनुज प्रतिहतदनुज मारदरम् ॥ वल्लभवजपालं सुमगसुचालं हितमनुकालं माववरम् मित्रा। इन्दीवरमासं प्रकटमुरासं कुमुमविकासं बंशिधरम् । हतमन्मघमान रूपनिधानं कवकलगानं चित्तदरम् ।। मुलना नहीं है, जो परम मुसद हैं, जो धूलिधूसरितनुस हो. भेनु चराते और मधुर स्वरसे येणु जाते हैं, जो सबके प्रिय तया अत्यन्त विमल हैं, जिनके चरकमल मुन्दर है, नखोंको कान्ति निर्मल है, जो अशानान्धकारको दूर करते हैं, उन समस्त मुखोंके सारन्ता परनधास्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तार जानकर भजो ॥३॥ जिनके सुन्दर मस्तकार मुकुट है, पाल धुंधराले हैं, नटवर वेप है जो कामसे भी अधिक सुन्दर है, मायासे मनुष्य-अवतार धारण करते हैं, बलरामजीके छोटे भाई हैं, दानवोंको मारकर पृथ्वीका भार हरण करते हैं। जो ब्रजके रक्षक, प्रियतम, सुन्दर गतिशील, प्रविक्षण हित चाइनेवाले और उचम भाववाले हैं, उन सब सुखोंके सारभूत परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तव जानकर भजो ॥ ४ ॥ जिनकी नीलकमलके समान कान्ति है, जिन्होंने पवित्र रास-रसको प्रकट किया है, जो कुतुमोंके समान विकसित रहते हैं, वंशी धारण करते हैं। जिन्होंने कन्दर्पके दर्पको चूर कर दिया है, जो रूपकी राशि हैं, मधुर गायनके द्वारा मन मोह लेते हैं, जिनका मधुर हास प्रिय लगता है, जो श्रीकृष्णस्तोत्राणि २३- वल्लभमृदुहासं कुञ्जनिवासं विविधविलासं कैलिकरम् ।भज०। अतिपरप्रवीणं पालितदीनं मक्ताधीनं कर्मकरम् । मोहनमतिधीरं फणिवलवीरं हतपरवीरं तरलतरम् ।। वल्लभनजरमणं वारिजवदनं हलधरशमनं शैलधरम् |मज०६३ जलधरघुतिअङ्गं ललितत्रिभङ्ग बहुकृतरङ्ग रसिकवरम् । गोकुलपरिवार मदनाकारं कुञ्जविहारं गूढतरम् ॥ बल्लभवजचन्द्रं सुभगमुछन्दं कृतानन्दं भ्रान्तिहरम् ।भज०१७ चन्दितयुगचरणं पावनकरणं जगदुद्धरणं विमलधरम् । निकुओंमें रहकर नाना प्रकारकी लीलाएँ किया करते हैं, उन सर मुखोंके तारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तत्व जानकर मजो ॥५॥ जो परम प्रवीण हैं, दोनोंके पालक और भक्तों के अधीन कर्म करनेवाले, जो भस्यन्त धीर मनमोहन शेषके अवतार बलभद्ररूप, शत्रुवीरोंके नाराक-अतिशय चपल प्रेममय ब्रजमें रमनेवाले, कमल-वदन गोवर्धनधारी और हलधर- जीको शान्त करनेवाले हैंउन सब सुखोंके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तव जानकर भजो ॥ ६॥ जिनके अन्नको कान्त्रि मेघके सदृश श्याम है, उसमें ललित त्रिभंग शोभा पाता है, जो नाना रङ्गों में रहते हैं, परम रसिक हैं, गोकुल ही जिनका परिवार है, मदनके समान सुन्दर आकृति है, जो कुञ्ज विहार करते हैं, सर्वत्र अत्यन्त गूढभावसे किये हैं, जो प्यारे प्रजचन्द्र बहभागी और दिव्य लोलामय है, सदा आनन्द करनेवाले और भ्रान्तिको भगानेवाले हैं, उन सब मुसोंके सारभूत, परखन- स्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णको तव जानकर भजो || जिनके दोनों चरण (मशारा) वन्दित है, जो सबकोपवित्र करते हैं और जगत्काउदार करने स्तोत्ररानायली कालियशिरगमनं कवफणिनमनं यातितयमनं मृदुलवरम् ।। वल्लभःखहरणं निर्मलचरणम् अशरणशरणं मुक्तिकरमामज०।८ इति श्रीमहापामाचाचिरमितं भीनन्दकुमाराष्टकं सम्पूर्णम् । ५९--चतुःश्लोकी सदा सर्वात्मभावेन भजनीयो ब्रजेश्वरः। करिष्यति स एवासदैहिकं पारलौकिकम् ॥ १॥ अन्यायो न कर्वन्यः सर्वथा बाघकस्तु सः। स्वकीये स्वात्मभावश्च कर्तव्यः सर्वथा सदा ॥२॥ सदा सर्वात्मना कृष्णः सेन्यः कालादिदोपनुत् । . वाले हैं, निर्मल भक्तोंको हृदयमें धारण करनेवाले तथा कालियनागके मस्तक पर नृत्य करनेवाले हैं, जिनकी शेषनाग भी स्तुति करते हैं, जो कालयवनके पातक और अति कोमल हैं, जो अपने प्रियजनोंके झोकहारी, निर्मल चरणोंवाले, अधरणोंकी शरण और मोक्ष देनेवाले हैं, उन सब मुखौके सारभूत, परब्रह्मस्वरूप, नन्दनन्दन श्रीकृष्णका तस्वरूपसे भजन करो ॥८॥ सबके आत्मारूपसे व्याप्त, भगवान् ब्रजराज श्रीकृष्णका ही सदैवमजन करना चाहिये, वे ही हमलोगोंके लौकिक और पारलौकिक लाभ सिद्ध करेंगे ॥१॥ दूसरेका आश्रय नहीं लेना चाहिये, क्योंकि वह सर्वथा पाधक होता है। सदा स्वावलम्बी होकर, सब तरहसे आत्मभावका पालन करना चाहिये ॥ २॥ कालादि दोपको दूर करनेवाले भगवान्

थीकृष्णस्तोत्राणि
२३९
तद्भक्तेषु च निर्दोपमावेन स्थेयमादराव ॥३॥
भगवत्येव सततं स्थापनीयं मनः स्वयम् ।
कालोऽयं कठिनोऽपि श्रीकृष्णमक्तान याधते ॥ ४ ॥
इति श्रीविडलेश्वरोका (द्वितीया) चतुःश्लोकी समाप्ता ।
कृष्णका सदा-सर्वथा सेवन करना चाहिये और दोष-दृष्टिको त्याग कर,
श्रद्धापूर्वक उनके भत्तोंका सङ्ग करना चाहिये ॥ ३ ॥ भगवान कृष्णमें ही
सदैव अपने मनको लगाये रखना चाहिये, क्योंकि उनके भत्तोंको यह
कठिनकाल भी बाधा नहीं पहुंचा सकता ॥ ४ ॥

विविघदेवस्तोत्राणि ६०--श्रीगणपतिस्तोत्रम् जेतुं यखिपुर हरेण हरिणा व्याजालिं बघ्नदा. स्रष्टुं वारिमयोद्भवेन भुवनं शेषेण धर्तु घराम् । पार्वत्या महिपासुरप्रमथने सिद्धाधिपः सिद्धये ध्यान:पश्चशरेण विचजिठये पायात्स नागाननः ॥१॥ विघ्नधान्तनिवारणकवरणिर्विघ्नाटवीहव्यवाड विघ्नन्यालकुलामिमानगरुडो विघ्नेमपञ्चाननः । विघ्नोत्तुङ्गगिरिप्रमेदनपविविघ्नाम्बुधेडियो त्रिपुरासुरको जीतने के लिये चिवने, बलिको छठसे बॉघते समय विष्णुने, जगत्को रचनेके लिये प्रसने पृथ्वी धारण करनेके लिये शेषनागने, महिषासुरको मारनेके समय पार्वतीने, सिदि पानेक्रे लिये सिद्धोके अधिपतियों (सनकादि ऋषियों) ने और सब संसारको जीवनेकै लिये कामदेवने जिन गणेशजीका, ध्यान किया है, वे हमलोगोंका पाल फरें ॥ १ ॥ विघ्नरूप अन्धकारका नाश करनेवाले एकमात्र स्र्य, विप्नरूप वनके जलानेवाले अग्नि, वितरूपसर्पकुलका दर्प नष्ट करने के लिये गरुका विघ्नरूप हाथीको मारनेवाले सिंह, विघ्नरूप ऊंचे पहाड तोड़नेपाळे चन, विघ्नरूप महासागरके वदवानल, विघ्नरूपी मेप-समूहके उड़ा देने विविधदेवस्तोत्राणि २६१ विभाधौपधनप्रचण्डपवनो विघ्नेश्वरः पातु नः॥२॥ खर्व स्थूलतर्नु गजेन्द्रवदनं लम्बोदरं सुन्दरं प्रस्यन्दन्मदगन्धलुन्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम् । दन्तापातविदारितारिरुधिरैः सिन्दूरशोभाकर वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम् ॥ ३ ॥ गजाननाय महसे प्रत्यूहतिमिरच्छिदे । अपारकरुणापूरतरङ्गिवशे नमः॥४॥ अगजाननपार्क गजाननमहर्निशम् । अनेकदन्तं भक्तानामेकदन्तमुपासहे ॥ ५ ॥ श्वेताझं श्वेतवस्त्रं सितकुसुमगणैः पूजितं श्वेतगन्धैः वाले प्रचण्ड वायुसदृश गणेशजी हमलो!का पालन करें ॥२॥ जो नाटे और मोटे शरीरवाले हैं, जिनका गजराजके समान मुँह और संबा उदर है, जो सुन्दर हैं तथा बहते हुए मदकी सुगन्धके लोभी भौरोंके चाटनेसे जिनका गण्डस्थल चपल हो रहा है, दाँतोंकी चोटसे विदीर्ण हुए शुत्रुओंके खूनसे जो सिन्दूरकी सी शोभा धारण करते हैं, कामनाओंके दाता और सिद्धि देनेवाले उन पार्वतीके पुत्र, गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ३ ॥ विघ्नरूप अन्धकारका नाश करनेवाले, अथाह करुणारूप जल- राशिसे तरङ्गित नेत्रोंवाले, गणेश नामक ज्योतिको नमस्कार है ॥ ४ ॥ जो पार्वतीके मुखरूप कमलको प्रकाशित करनेमें सूर्यरूप हैं, जो भोको अनेक प्रकारके फल देते हैं, उन एक दाँतवाले गणेशजीकी मैं सदैव उपासना करता हूँ ॥ ५ ॥ जिनका शरीर श्वेत है, कपड़े खेत हैं। श्वेत फल, चन्दन और रतदीपोंसे क्षीरसमुद्रके तटपर जिनकी पूजा हुई है।

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२५२
स्तोपरमायली
धीराधी रनदीपैः गुरनरनिठकरजसिंहासनसन्।
दोभिः पाशाशाजामयवरमनसं चन्द्रमीटिं त्रिनेत्रं
ध्यायेन्छान्त्यर्थमीशं गणपतिममलं श्रीसमेतं प्रसन्नम्।।६।
आगाइये गणराजदेवं रक्कोत्पलामासमशेषयन्यम् ।
विमान्तकं विपहरंगणेशं मनामि रौद्रं पहिचसिद्धया।।७।।
यं वा वेदान्तविदो विदन्ति परं प्रधान पुरुष तथान्ये ।
विश्वोद्गतेः कारणमीश्वरं वातस्मै नमो विघ्नविनाशनाया८॥
विघ्नेशवीर्याणि विचित्रकाणि वन्दीजनर्मागधः स्मृतानि।
श्रुत्वा समुत्तिष्ट्र गजानन वं माझे जगन्मङ्गलकंकुरुष्व॥९॥
देवता और मनुष्य जिनको अपना प्रधान पून्य समझते हैं, जो रखके
सिंहासनपर बैठे हैं, जिनके हाथों में पाश (एक प्रसारकी डोरी), अंकुश
और कमलके फूल हैं, जो अभयदान और घरदान देनेवाले हैं, जिनके
विरमें चन्द्रमा रहते है और जिनके तीन नेत्र है। निर्मल लक्ष्मी के साथ
रहनेवाले, उन प्रसन्नप्रभु गणेशजीका, अपनी शान्ति के लिये ध्यान करे
॥६॥ जो देवताओंके गणके राजा है, लाल कमलके समान जिनके
देहकी आभा है, जो सबके वन्दनीय हैं, विघ्नके काल हैं, विघ्नके हरने-
वाले हैं, शिवजीके पुत्र हैं; उन गणेशजीका मैं सिद्धिके साथ आवाहन
और भजन करता हूँ॥ ७॥ जिनको वेदान्ती लोग ब्रह्म कहते हैं और
दूसरे लोग परम प्रधान पुरुष अथवा संसारकी सृष्टिके कारण या ईश्वर
कहते हैं। उन विघ्नविनाशक गणेशजीको नमस्कार है।॥ ८॥ हे विश! हे
गजानन ! मागध और वन्दीजनोंके मुखसे गाये जाते हुए अपने विचित्र
पराक्रमोंको सुनकर, ब्राझमुहूर्तमें उठो और जगत्का कल्याण करो ॥९॥

विविधदेवस्तोत्राणि २५३ -- गणेश हेरम्य गजाननेति महोदरस्वानुमवप्रकाशिन् । वरिष्ठ सिद्धिप्रिय बुद्धिनाथवदन्त एवं त्यजतप्रभीतीः॥१०॥ अनेकविप्रान्तक वक्रतुण्ड स्वसंज्ञवासिंश्च चतुर्भुजेति। कवीश दवान्तकनाशकारिन् वदन्त एवं त्यजत प्रभीतीः॥११॥ अनन्तचिद्रूपमपं गणेशं ह्यभेदभेदादिविहीनमाद्यम् । हृदि प्रकाशस्थ धरस्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं वनामः॥१२॥ विश्वादिभूतं हृदि योगिनां वै प्रत्यक्षरूपेण विभान्तमेकम् । सदा निरालम्बसमाधिगम्य तमेकदन्तंशरणं व्रजामः॥१३॥ यदीयवीर्येण समर्थभूता माया तया संरचितं च विश्वम्। 'हे गणेश ! हे हेरम्ब ! हे गजानन ! हे लम्बोदर ! हे अपने अनुभवसे प्रकाशित होनेवाले हे श्रेष्ठ 1 हे सिद्धिके प्रियतम ! हे बुद्धिनाय !! ऐसा कहते हुए, हे मनुष्यो ! अपना भय छेद दो॥ १० ॥ हे अनेक विघ्नों का नाश करनेवाले ! हे वक्रतुण्ड ! गणेश आदि अपने नामवालोंमें भी निवास करनेवाले ! हे चतुर्भुज ! हे कवियोंके नाथ ! हे दैत्योंका नाश करनेवाले ! ऐसा कहते हुए, हे मनुष्यो !अपने भयको मगा जो गणेश अनन्त है, चेतनरूप हैं, अभेद और भेद आदिसे रहित और सृष्टिके आदि कारण हैं, अपने हृदयमें जो सदा प्रकाश धारण करते हैं तथा अपनी ही बुदिमें स्थित रहते हैं। उन एकदन्त गणेशजीकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १२ ॥ जो संसारके आदि कारण हैं। योगियोंके हृदयमें अद्वितीय रूपसे साक्षात् प्रकाशित होते हैं और निरालम्प समाधिके द्वारा ही जानने केन्य हैं, उन एकदन्त गणेशकी शरणमें हम जाते हैं ॥ १३ ॥ जिनके बलसे माया समर्ष हुई है। द्वारा यह संसार रचा गया है।

२७४ स्तोत्ररत्नावली नागात्मकं धात्मताप्रतीतं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः||१५| सर्वान्तरे संस्थितमेकमूढं यदाज्ञया सर्वमिदं विभाति । अनन्तरूपं हृदि वोधकं तमेकदन्तं शरणं व्रजामः:१५॥ यं योगिनोयोगबलेन साध्यं कुर्वन्ति त का स्तवनेन नौति। अतःप्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तुतमेकदन्तं शरणं बजामः॥१६॥ देवेन्द्रमौलिमन्दारमकरन्दकणारुणाः विघ्नान् हरन्तु हेरम्बचरणाम्बुजरेणवः ॥१७॥ एकदन्तं महाकायं लम्बोदरगजाननम् । . विघ्ननाशकरं देवं हेरम्बं प्रणमाम्यहम् ॥१८॥ उन नागस्वरूप तथा आत्मरूपसे प्रतीत होनेवाले एकदन्त गणेसकी पूरणमें . हम जाते हैं।॥ १४ ॥ जो सब लोगोंके अन्तकरणमें अकेले गूदभावये शित रहते हैं, जिनकी आशासे यह जगत् विराजमान है, जो अनन्तरूप हैं और हृदयमें शान देनेवाले हैं। उन एकदन्त गणेशकी शरणमें इस जाते हैं ॥ १५ ॥ जिनको योगीजन योगरसे साध्य करते ( जान पाते) खतिसे उनका वर्णन कौन कर सकता है। इसलिये हम उनको केवल प्रणाम करते हैं कि हमें सिद्धि दें। उन प्रसिद्ध एकदन्तको शरणमे हम जाते हैं ॥ १६ ॥ जो इन्द्र के मुकुटमै [ये हुए मन्दारकममोंके मकरन्द कर्मोंसे लाल हो रही है, यह गणेशजी चरण-कमलोंकी रज विका हरण ॥ १७ ॥ एक दाँतवाले, ई रियाले, स्थूल उदाना। हाथी के समान मुसया और विनोगामा करनेवाले गणेशदेवको में .

विविधदेवस्तोत्राणि २४५ यदक्षरं पदं भ्रष्टं मात्राहीनं च यद्भवेत् । तत्सर्व क्षम्यतां देव प्रसीद परमेश्वर १९ इति श्रीगणपतिस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ६१-सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रम् नारद उवाच प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुत्रं विनायकम् । भक्तावासं सरेन्नित्यमायुःकामार्थसिद्धये ॥१॥ प्रथमं वक्रतुण्डं च एकदन्तं द्वितीयकम् । तृतीयं कृष्णपिङ्गाक्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम् ॥ २॥ लम्बोदरं पञ्चमं च षष्ठं विकटमेव च । प्रणाम करता हूँ॥ १८॥ हे देव ! जो अक्षर, पद अथवा माना छूट गयी हो, उसके लिये क्षमा करो और हे परमेश्वर ! प्रसन्न होओ ॥ १९॥ नारदजी बोले-पार्वतीनन्दन देवदेव श्रीगणेशजीको शिर झुकावर प्रणाम करे और फिर अपनी आयु, कामना और अर्धकी सिद्धिके लिये उन भक्तनिवासका नित्यप्रति स्मरण करे ॥ १ ॥ पहला पकनुण्ड (टेदे मुखवाले), दूसरा एकदन्त ( एक दाँतवाले )तीसरा कृष्णपिगाक्ष (काली और भूरी आँखोंवाले ), चौथा गजवक्त्र (हाथीके से मुन्चयाले ) ॥२॥ पाँचवाँ लम्बोदर (बड़े पेटवाले ), छठा विकट (विकराल), सातयाँ २४६ स्तोत्ररतावली - सप्तमं विमराजं च धूम्रवर्ण तथाष्टमम् ।। ३ नवमं मालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम् । एकादशं गणपति द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४। द्वादशैतानि नामानि त्रिसन्ध्यं यः पठेन्नरः । न च विनमयं तस्य सर्वसिद्धिकरं प्रभो ॥५॥ विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लमते धनम् । पुत्रार्थी लभते पुत्रान्मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥ ६॥ जपेद्गणपतिस्तोत्रं पड्मिर्मासै: फलं लभेत् । सवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशयः॥७॥ अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वा यः समर्पयेत् । विघ्नराजेन्द्र (विघ्नोंका शासन करनेवाले राजाधिराज) तथाआठवाँ धूम्रवर्ण (धूसर वर्णवाले) ॥ ३ ॥ नयाँ मालचन्द्र (जिसके ललाटपर चन्द्रमा मुशोभित है ), दसवाँ विनायक, ग्यारहवाँ गणपति और बारहवाँ गजानन ॥ ४ ॥ इन बारह नामोंका जो पुरुष (प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल) तीनों सन्ध्याओंमें पाठ करता है, हे प्रभो ! उसे किसी मकारके विघ्नका भय नहीं रहता। इस प्रकारका स्मरण सब प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाला है।५ ।। इससे विद्याभिलाषी विद्या, धनामिलासी धन पुत्रेच्छु पुत्र वथा मुमुक्षु मोक्षगति प्राप्त कर लेता है ॥ ६॥ इस गणपतिस्तोत्र का जप करे तो मासमें इच्छित फल प्राप्त हो जाता है ख्या एक वर्ष पूर्ण सिद्धि प्राप्त हो जाती है-इसमें किसी प्रकारका उन्देह नहीं है ॥७॥ जो पुरुष इसे लिखकर आठ बामणों को प्रणाम है॥१॥ सात घोड़ोवाले रथपर आरूढ़ हायमें श्वेत कमल उन महापापहारी महान वीर सूर्यदेवको मैं नमस्कार करता हूँ॥४॥ चिविधदेवस्तोत्राणि २४७ तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८॥ इति श्रीनारदपुराणे सङ्कटनाशनगणेशस्तोत्रं सम्पूर्णम् । ६२-सूर्याष्टकम् आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर । दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोऽस्तु ते ॥१॥ सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्ड कश्यपात्मजम् । श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ २॥ स्थमारूढं सर्वलोकपितामहम् । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ३॥ वैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम् । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ४॥ समर्पण करता है, गणेशजीकी कृपासे उसे सब प्रकारकी विद्या प्राप्त हो लोहित जाती है।॥८॥ हे आदिदेव भास्कर ! आपको प्रणाम है, आप मुझपर प्रसन्न हों, हे दिवाकर ! आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर | आपको धारण किये हुए, प्रचण्ड तेजस्वी कश्यपकुमार सूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ॥२॥ लोहितवर्ण रथारूद सर्वलोकपितामह महापापहारी सूर्यदेवको प्रणाम करता हूँ ॥ ३ ॥ जो त्रिगुणमय ब्रह्मा, विष्णु और शिवरूप में मैं स्तोवरसावली . पंदितं तेनापन्नं च वायुमाकाशमेव ना प्रन रातोकानां तं पूर्ण प्रणमाम्यहम् ॥ ५ बाप्पसमा हारण्डलभूषितम् । एकनकधर देव ..तं , सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ६ वर्षे जगत्कारं महातेजःप्रदीपनम् । महापापहरं देवं सूर्य प्रणमाम्यहम् ।। ७ तं एवं जगवां नाथं शानविज्ञानमोबदम् । महापापहरं देवं तं सूर्य प्रणमाम्यहम् ॥ ८॥ 'रति भीशियमोकं गांधकं सम्पूर्णम् । ६३-श्रीसूर्यमण्डलाष्टकम् नमः सवित्रे जगदेकचक्षुषे जगत्प्रसतिसिविनाशहेतवे । जो यदे हुए वेजके पुश हैं और वायु तथा आरायवरूप है, उन समस्त लोकोंके अधिपतिसूर्यको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५॥ जोबन्धक(दुपहरिया) पुष्पसमान रक्तवर्ण और हार तया कुन्टलेसे विभूषित हैं, उन एक चधारी सूर्यदेवको मैं प्रणाम करता हूँ॥ ६ ॥ महान् तेजके प्रकाशक जगत्के फर्ता, महापापहारी उन सूर्य भगवान्को मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ७ ॥ उन सूर्यदेवको, जो जगत्के नायक हैं, शान, विशन तया मोक्षको भी देते हैं, साथ ही जो बड़े-बड़े पार्पोको भी हर लेते हैं, मैं प्रणाम करता हूँ ॥८॥ . जो जगत्के एकमात्र नेत्र (प्रकाशक) है। संसारकी उत्पचि स्थिति और नाशके कारण हैं। उन वेदत्रयीस्वरूप, सस्वादि तीनों गुणों के विविधदेवस्तोत्राणि २४९ त्रयीमयाय त्रिगुणात्मधारिणे विरचिनारायणशङ्करात्मने ॥१॥ यन्मण्डलं दीप्तिकरं विशालं रत्नप्रभं तीवमनादिरूपम् । दारिद्रयदुःखक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥२२॥ यन्मण्डलं देवगणैः सुपूजितं विप्रैः स्तुतं भावनमुक्तिकोविदम् । वं देवदेवं प्रणमामि सूर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥३॥ यन्मण्डलं ज्ञानघनं त्वगम्यं त्रैलोक्यपूज्यं त्रिगुणात्मरूपम् । समस्ततेजोमयदिव्यरूपं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥४॥ यन्मण्डलं गूढमतिप्रबोधं धर्मस्य वृद्धिं कुरुते जनानाम् । यत्सर्वपापक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥५॥ अनुसार ब्रह्मा, विष्णु और महेश 'नामक तीन रूप धारण करनेवाले सूर्य मगवान्को नमस्कार है ॥१॥ जो प्रकाश करनेवाला, विशाल, रजोंके समान प्रमावाला, तीब, अनादिरूप और दारिद्रय-दुःखके नायका कारण है। वह सूर्य भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ २॥ जिनका मण्डल देवगणोंसे अन्छी प्रकार पूजित है। ब्राह्मणोंसे स्तुत है और मचोंको मुक्ति देनेवाला है। उन.देवाधिदेव सूर्य भगवान्को में प्रणाम करता हूँ और वह सूर्य भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ३ ॥ जो ज्ञानपन, अगम्य, त्रिलोकीपूज्य, त्रिगुणस्वरूप, पूर्ण तेजोमय और दिव्यरूप है, यह सूर्य भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ४ ॥ जो एश्म बुद्धिसे जाननेयोग्य है और सम्पूर्ण मनुष्योंके धर्मकी वृद्धि करता है तथा जो सबके पापोंके नाराका कारण है। वह सूर्य भगवान का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ५॥ जो रोगोंका।

२५० स्तोत्ररतायली यन्मण्डलं व्याधिविनाशदक्षं यदृग्यजुःसामसु संप्रगीतम् । प्रकाशितं येन च भूर्भुवः स्वः पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥ यन्मण्डलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।। यद्योगिनो योगजुषां च संघाः पुनातु मां तन्सवितुर्वरेण्यम् ।।७ यन्मण्डलं सर्वजनेषु पूजितं ज्योतिष कुर्यादिह मर्त्यलोके । यत्कालकल्पक्षयकारणं च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥८॥ यन्मण्डलं विश्वसृजां प्रसिद्धमुत्पत्तिरक्षाप्रलयप्रगल्मम् । यमिजगत्संहरतेऽखिलञ्च पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥९॥ यन्मण्डलं सर्वगतस्य विष्णोरात्मा परं धाम विशुद्धतचम् । जो ऋक्, यजु और साम--इन तीनों वेदोंमें सम्यक् प्रकारसे गाया गया है तथा जिसने भू भुवः और स्वः-इन तीनों लोकोंको प्रकाशित किया है। यह सूर्य भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥३॥ वेदशावा लोग जिसका वर्णन करते हैं। चारणों और सिद्धका उनए जिसका गान किया करता है तथा योगका सेवन करनेयाले और योगीलोग जिसका गुणगान करते हैं। यह सूर्य भगवान्का भेठ मण्डन मुसे पवित्र करे ॥ ७ ॥ जो समस्त जनोंमें पूजित है और इस मर्त्यलो में मकाय करता है तथा जो काल और कसके जयका कारण भी है। या सूर्य मगवान्का भेठ मण्डल मुझे पवित्र करे॥८॥ जो संसारकी सटि करनेवाले ब्रह्मा आदिमें प्रसिद्ध है जो सारकी उत्पविरसामोरमय करनेमें समर्थ है। और जिसमें रामख जगत् टीन हो जाता है। यह भगवान का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥९॥जो सान्तसामी विष्णु भगवान आत्मा तथा विशर वसवाला परमधाम है। और जोरुम मुश्विास बारा

२५१
विविधदेवस्तोत्राणि
यक्ष्मान्तरैयोगपथानुगम्यं पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥१०॥
यन्मण्डलं वेदविदो वदन्ति गायन्ति यच्चारणसिद्धसंघाः ।
यन्मण्डलं वेदविदः सरन्ति पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥११॥
यन्मण्डलं वेदविदोपगीतं यद्योगिनां योगपथानुगम्यम् ।
तत्सर्ववेदं प्रणमामि सूर्य पुनातु मां तत्सवितुर्वरेण्यम् ॥१२॥
मण्डलाटतयं पुण्यं यः पठेत्सततं नरः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा सूर्यलोके महीयते ॥१३॥
इति श्रीमदादित्यहृदये मण्डलाष्टकं सम्पूर्णम् ।
योगमार्गसे गमन करने योग्य है। वह सूर्य भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र
करे ॥ १० ॥ येदके जाननेवाले जिसका वर्णन करते हैं; चारण और सिद्ध-
गण निसको गाते हैं, और वेदशलोग जिसका सरण करते हैं; वह सूर्य
भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ ११॥ जिनका मण्डल वेदवेचाके
दारा गाया गया है, और जो योगियोंसे योगमार्गदारा अनुगमन करने योग्य
है। उन सब वेदोंके स्वरूप सूर्य भगवान्को प्रणाम करता हूँ। और
यह सूर्य भगवान्का श्रेष्ठ मण्डल मुझे पवित्र करे ॥ १२ ॥ जो पुरुष
परम पवित्र इस मण्डलाष्टकस्तोत्रका पाठ सर्वदा करता है, वह पापोसे
मुक्त हो, विशुद्धचित्त होकर सूर्यलोकमें प्रतिष्ठा पाता है ॥ १३ ॥

२५२ स्तोपरतायली ६४-वीरविंशतिकाख्यं श्रीहनुमत्स्तोत्रम् लालगृष्टवियदम्बुधिमध्यमार्ग मुत्प्लुत्य यान्तममरेन्द्रमुदो निदानम् । आस्फालितस्वकमुजस्फुटिताद्रिकाण्डं द्रामैथिलीनयननन्दनमद्य बन्दै ॥१॥ मध्येनिशाचरमहामयदुर्विपन घोराद्भुतत्रतमियं यददवचार। पत्ये तदस्य पहुधापरिणामदूत सीतापुरस्कृततर्नु हनुमन्तमीडे॥२॥ पादपङ्कजयुगं रघुनाथपत्न्या नैराश्यरूपितविरक्तमपि खरागैः। जो अपनी पूँउसे साफ किये हुए आकाश तया समुद्रके मध्यवर्वे मार्गपर उछलकर चलते समय इन्द्रक आनन्दका कारण हो रहे थे और आगेकी ओर फैलायी हुई जिनकी भुजाओंसे पर्वतखण्ड फूटते जाते थे, जानकीजीके नेत्रोंको शीघ्र ही आनन्द देनेवाले उन हनूमान्जीकी आज मैं वन्दना करता हूँ ॥१॥ जानकीजीने पतिके लिये जो निशाचरोंके पीच अत्यन्त भयके कारण दुःसह, घोर एवं अद्भुत मत किया या उसीके विविध फलस्वरूप दूतवेपमें सीताके सम्मुख अपने शरीरको प्रकट किये हुए हनूमान्जीकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ २॥ जिन्होंने श्रीरघुनाथपनी जानकी के दोनों चरणारविन्दोंको जो निराशारूप धूलिसे धूसरित होने के कारण रागशून्य हो . गये थे, पारंवार प्रणाम विरहयेदना [को बढ़ाने का कारण समझकर जिन्होंने लङ्कानगरीकी विविधदेवस्तोत्राणि २५३ प्रागेव रागि विदधे बहु चन्दमानो वन्देऽजनाजनुपमेप विशेषतुष्ट्यै ॥३॥ ताजानकीविरहवेदनहेतुभूतान् द्रागाकलय्य सदशोकवनीयवृक्षान् । लङ्कालकानिव घनानुदपाटयद्य- स्तं हेमसुन्दरकपि प्रणमामि पुष्ट्यै ॥ ४ ॥ घोपप्रतिध्वनितशैलगुहासहस्र- सम्भ्रान्तनादितवलन्मृगनाथयूथम् । अक्षक्षयक्षणविलक्षितराक्षसेन्द्र- मिन्द्रं कपीन्द्रपृतनावलयस्य वन्दे ॥ ५॥ करते हुए, अपने अनुरागोंद्वारा [पतिमिलनके-] पहले ही रागरञ्जित कर दिया; उन अञ्जनीनन्दन महावीरजीकी मैं विशेष सन्तोपके लिये वन्दना करता हूँ ॥ ३ ॥ सुन्दर अशोकवनके घने वृक्षोंको जानकीजीकी निन्ध अलकावली के समान उन्हें शीघ्र ही उखाड़ डाला, उन मुवर्णके सदृश सुन्दर गरीरवाले कपिवर हनुमान्जीको मैं अपने पाटन-पोषणके लिये प्रणाम करता हूँ ॥४॥ अपने गम्भीर घोपसे प्रतिध्वनित पर्वतोंकी सहस्रों कन्दराओंमें रहनेवाले सिंहोंके समूहको जिन्होंने सम्भ्रमवश शन्दापमान एवं विचलित कर दिया और अशकुमारके विनाशकाठमें राक्षसराज रावणको भी आश्चर्यमें डाल दिया, उन कपिराज मुग्रीवकी सेनाके नायक इनमान्जीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ ५ ॥ लोटासे ही महासागरको टॉप

स्तोत्ररतावली
हेलाविलक्तिमहार्णवमप्पमन्द
घूर्णद्दाविहतिविक्षतराधसे ।
स्वम्मीदवारिधिमपारमिवेक्षमाणं
वन्देऽहमक्षयकुमारकमारकेशम् ॥६॥
जम्मारिजित्यसमलम्भितपाशवन्धं
ब्रह्मानुराधमिव तत्क्षणमुद्वहन्तम् ।
रौद्रावतारमपि राणदीर्घदृष्टि-
सोचकारणमुदारहरि भजामि ॥७॥
दोन्नमन्निशिचरेश्वरमूर्धचश्च-
कोटीरचुम्बि निजविम्बमुदीक्ष्य हृष्टम् ।
पश्यन्तमात्मभुजयन्त्रणपिष्यमाण-
तत्कायशोणितनिपातमपेक्षि वक्षः॥८॥
जानेपर भी जो तीन गतिसे धूमती हुई गदाद्वारा राक्षसोंके क्षत-विक्षत
होनेपर अपने आनन्दसमुद्रको अपार-सा देस रहे थे, उन
अक्षयकुमारके मारकेशरूप महावीरजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ६॥
जिन्होंने इन्द्रजित् ( मेघनाद ) के हठात् फेंके हुए पागबन्धको बझाजीके
अनुरोधकी भाँति तत्काल प्रहण कर लिया और रुद्रका अवतार होने पर भी
जो रावणकी विशालदृष्टि के सहोचका कारण बन गये, उन उदार वानरवीरको मैं
जता हूँ |७|| जो अभिमानसे ऊपर उठे हुए रावणके मस्त्रकोपर देदीप्यमान
किरीटोंमें अपने प्रतिविम्मको देखकर उसमें अपने भुजयन्त्रद्वारा पीछे
जानेवाले रावणके शरीरके रक्तपातकी अपेक्षा रखनेवाली अपनी छातीकी
ओर निहारते हुए प्रसन्न हो रहे थे, उन्हें मैं प्रणाम करता हूँ ॥८॥

रेश दे चुकनेर, जिनको एमें निशादरराज रावणम पोशानल . विविघदेवस्तोत्राणि २५५ अक्षप्रभृत्यमरविक्रमवीरनाश- क्रोधादिव द्रुतमुदश्चितचन्द्रहासाम् । निद्रापिताम्रपनगर्जनघोरघोपैः संस्तम्भयन्तमभिनौमि दशास्त्रमूर्तिम् ॥ ९॥ आशंस्यमानविजयं रघुनाथधाम शंसन्तमात्मकृतभूरिपराक्रमेण दौत्ये 'समागमसमन्वयमादिशन्तं 'वन्दे हरेः क्षितिभृतः पृतनाप्रधानम् ॥१०॥ यस्यौचिती समुपदिष्टवतोऽधिपुग्छ दम्भान्धितां धियमपेक्ष्य विवर्धमानः । देवताओं के समान पराक्रम रखनेवाले अक्षकुमार आदि वारोंके नाराजनित मधसे ही मानो जिसने शीम ही बदला लेनेके लिये चन्द्रहास नामक तलवार उटा ली है। उस दशशीय ( रावण ) के शरीरका गम्भीर मेघगर्जनाको भी मूक पनानेराले अपने भयङ्कर सिंहनादसे सम्भन करते हुए हनुमान्जीये माम करता हूँ॥९॥ जो अपने किये हुए प्रचुर पराक्रमोदारा विजयकी आशंमा. से युद्ध करमचन्द्रजीके तेजका वर्णन कर रहे हैं और दूतधर्ममें मात होने समस्या [ अथवा समस्त शास्त्रोंके अन्वयका ] उपदेश करते हैं, उन राजा मुपीरको सेना के प्रधान सेनापति) वारसी में वन्दना करता हूँ॥ १० ॥ उचित उसय दम्भले अन्धी हुई पुद्धिक सहारे नदारद्वाजसनेमील्ममे यहाँ

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स्तोत्ररमावली
नक्तश्चराधिपतिरापहिरण्यरेता
लश दिधारपतत्तमहं गृणामि ॥११॥
कन्दनिशाचरकुलां जलनापलीः
साक्षागृहरिव पहिः परिदेवमानाम् ।
स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नपीटयोनि-
दन्दामाननगरी परिगाहमानाम् ॥१२॥
मूर्तहासुभिरिव धुपुरं प्रजद्धि-
योनि क्षणं परिगत पतगचलद्भिः।
पीताम्बरं दधतमुस्ट्रितदीप्ति पुच्छं
सेना वहद्विहगराजमिवाहमीडे ॥१॥
कूद पड़ा थाउन्हीं हनूमान्जीका मैं वरण करता हूँ ॥ ११॥ उनकी वनी
हुई पूँछके किनारे अमि लगी थी, उससे समस्त लकानगरी अत्यन्त
वेगसे जल रही थी, बाहर निशाचरकुलका करुणकन्दन मचा हुआ
था, उस समय ऐसा जान पड़ता या मानो अग्निज्वालासे झुलसे हुए
घर ही बाहर निकटकर रो रहे हैं, ऐसी लढामें चारों ओर दौड़ते हुए
हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ १२ ॥ प्रासादशिखरपर रहनेवाले तोता
और कबूतर आदि पक्षी जलते हुए जब आकाशमें उड़ते थे, तो ऐसा
मालूम होता था मानो उन दग्ध होनेवाले गृहोंके प्राण ही मूर्तिमान
होकर स्वर्गमें जा रहे हैं। उन पक्षियोंसे क्षगभर घिरकर ऊपर उठी हुई
ज्यालाओंवाली पूँछ धारण किये, जिनकी शोभा पीताम्बरधारी भगवान्
विष्णुको पीठपर चढ़ाकर अपना समूह साथ लिये विचरनेवाले पशि.
राज गरुड़की-सी हो रही थी, उन हनूमान्जीकी मैं स्तुति करता हूँ ॥ १३॥

घेजयन्तीको देवताओंकी प्रसन्नताके लिये मानो आज ही आकाशमें दिखलाते हुए महावीरजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १४ ॥ जिन्होंने सीताजीकी पीड़ाको, जो उनके दर्शनमात्रसे मर चुकी थी, एकमात्र रखस-समूहरूप काठ-कबाहोंसे बनी हुई लदारूपिणी चितापर सुलारा भानी पूछमी लगायी हुई अग्निसे उसका मरणान्त कालोचित दाह-संस्कार किसा, वेहनुमानजीहमारीप्रसन्नताके कारण हो ॥१५॥ विदेहनन्दिनी सीताकी शुदिक लिये श्रीरामचन्द्रजीके प्रति प्रेमके एकमात्र साडीपदपर स्थित विविधदेवस्तोत्राणि स्तम्मीभवत्वगुरुवालधिलग्नवद्वि- ज्वालोल्ललद्घजपटामिव देवतुष्ट्य । चन्दे यथोपरि पुरो दिवि दर्शयन्त- मथैव रामविजयाजिकवैजयन्तीम् ॥१४॥ रवश्ववैकचितकक्षकपूश्चिती सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः । दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं लाङ्गुलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु ॥१५॥ आशुद्धये रघुपतिप्रणयकसाक्ष्ये वैदेहराजदुहितः सरिदीश्वराय । एकानगरके ऊपर अपनी विशाल पूछरूपी खंभेमें टगी स्वाय ही जिसमें पताकाके समान है, ऐसी रामचन्द्रजीकी रणविजय. अग्निकी कूद पड़ा था. उन्ही हनूमान्जीका में घरण करता हूँ॥ ११॥ उनीम हुई पूछके किनारे अमि लगी थी, उससे समस्त लकानगरी *. वेगसे जल रही थी। बाहर निशाचरकुलका करुणकन्दन मचा हुआ पर ही राहर निकलकर रो रहे हैं, ऐसी सलामें चारों ओर दौर हनुमानजीको में प्रणाम करता हूँ।॥ १२ ॥ पाठादशिस्तरपर रहनेवाले सोग ओर कबूतर आदि पक्षी जलते हुए जय आकाशमें उड़ते थे, तो ऐसा मालूम होता था मानो. उन दग्ध होनेवाले गृहोंके प्राण ही मान होकर स्वर्ग में जा रहे हैं, उन पधियां धगभर घिरकर ार उग स्तोत्ररत्नावली नक्तश्चराधिपतिरोपहिरण्यरेता लङ्का दिधारपतत्तमहं घृणोमि ॥१- क्रन्दनिशाचरकुलां 'ज्वलनावलीः साक्षागृहैरिख यहिः परिदेवमानाम् । स्तब्धस्वपुच्छतटलग्नपीटयोनि- ... :.. दन्दधमाननगरी . परिगाहमानाम् ॥१२ मूर्तेहासुभिरिख धुपुरं, बजनि- योनि-क्षणं परिगतं पतंगबलद्भिः। पीताम्बरं दधतमुच्छ्रितदीप्ति पुच्छं सेना वहद्विहगराजमिवाहमीडे ॥३॥ था, उस समय ऐसा जान पड़ता था मानो अग्निज्वालासे हालसे र .. , . 4 जिनकी योभा पीताम्बरधारी भगान समूह साप लिये विचरनेपाले ** ९न..

ज्वाला ही जिसमें पताकाके समान है, ऐसी रामचन्द्रजीकी रणविजय- जयन्तीको देवताओंकी प्रसन्नताके लिये मानो आज ही आकाशमें दिखलाते हुए महावीरजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १४ ॥ जिन्होंने सीताजीकी पीड़ाको, जो उनके दर्शनमात्रसे मर चुकी थी, एकमात्र अपनी छकी लगायी हुई अग्निसे उसका मरणान्त कालोचित दाह-संस्कार किया, वेहन्मान्जीहमारीप्रसन्नताके कारण हो ।॥ १५॥ विदेहनन्दिनी सीताकी विविघदेषस्तोत्राणि २५७ यः स्तम्भीभवत्वगुरुवालधिलग्नवद्वि- ज्वालोल्ललद्ध्वजपटामिव देवतुष्ट्यै । वन्दे यथोपरि पूरो दिवि दर्शयन्त- मय रामविजयाजिकवैजयन्तीम् ॥१४॥ रखश्चयैकचितकक्षकपूश्चिती सीताशुचो निजविलोकनतो मृतायाः । दाहं व्यधादिव तदन्त्यविधेयभूतं लाङ्गुलदत्तदहनेन मुदे स नोऽस्तु ॥१५॥ आशुद्धये रघुपतिप्रणयकसाक्ष्ये वैदेहराजदुहितः सरिदीश्वराय । एकानगरके ऊपर अपनी विशाल पूँउरूपी खंभेमें लगी हुई अग्निकी राक्षस समूहरूप काठ-कवादोंसे बनी हुई लङ्कारूपिणी चितापर मुलाकर शुदिके लिये श्रीरामचन्द्रजीके प्रति प्रेमके एकमात्र साक्षीपदपर स्थित स्लोपरमारली न्यासं ददानमिव पाकमापतन्त- मन्धी प्रमजनतनजनु मजामि ॥१६॥ रवारस्वतिकडशान्तिविशेषयोग- माययक्षणविधानुमितात्मदात्यम् । मास्वत्प्रमावरविमानुमरावमासं लझामयश्रम मगवन्तमीडे ॥१७॥ तीवोंदधिं जनकजार्पितमाप्प चूडा- रनं रिपोरपि पुरं परमस दुग्ध्या । श्रीरामहर्षगलदवामिपिच्यमान तं ब्रह्मचारिखरखानरमाययेऽहम् ॥१८॥ पावफको मानो समुद्रके यहाँ धरोहर रसनेके निमित, उसमें कूद पड़ने वाले, वायुनन्दनको मैं मजता हूँ ॥ १६ ॥ राशनों [ के साथ संग्राम ] में तृप्त न होनेके कारण, क्रोध एवं अशान्तिसे जो विशेष रक्तवर्ण हो गये। अशकुमारके संहारकालके कार्योसे जिनकी दक्षताका अनुमान किया जा चुका है तथा जो प्रभातसमयके प्रभामय सूर्यके किरणों के समान कान्तिमान् हैं। लहाको मय देनेवाले उन भगवान् हनूमान्की में स्तुति करता हूँ ।। १० समुद्र लाँघकर, सीताके दिये हुए चूडारनको पाकर और शत्रुके महान् नगरको मी जलाकर, श्रीरामचन्द्रजीके आनन्दा से सींचे जानेवाले माहिती नाजो पूर्वजन्ममें गौतम . । - विविधदेवस्तोत्राणि २५९ या प्राणवायुजनितो गिरिशस्य सान्ता शिष्योऽपि गौतमगुरुर्मुनिशङ्करात्मा । हृयो हरस्य हरिबद्धरितां गतोऽपि घीधर्मशास्त्रविमवेऽतुलमाश्रये तम् ॥१९॥ स्कन्धेऽधिवाय जगदुत्रगीतिरीत्या यः पार्वतीश्वग्मतीपयदाशुतोपम् । तसादचाप च वरानपरानवाप्यान् तं वानरं परमवैष्णवमीशमीडे॥२०॥ उमापतेः कविपतेः स्तुतिर्वाल्पविम्मिता । हनुमवस्तुष्टयेऽस्तु वीरविंशतिकामिया॥ इति धीमविपत्युपनामकोमापतिधर्म द्विवेदिविरचितं वीरविंशतिकाख्य श्रीहनुमत्स्तोत्रं सम्पूर्णम् । पिके शंकरात्मानामक शान्त शिष्य होनेपर भी उनके गुरुके समान प्रदान ये; शङ्करजीके प्राणवायुसे जिनका प्रादुर्भाव हुआ है, जो हरि वानर) भावको प्राप्त होकर भी हरि (विष्णु) की माँति शङ्करजीके हार्दिक प्रेमी हैं तथा बुद्धि, धैर्य और शास्त्रके वैभवमें जिनकी कहीं ममता नहीं है, उन हनूमान्जीकी मैं शरण लेता हूँ ॥ १९ ॥ जिन्होंने आशुतोष उमानायको कंधेपर चढ़ाकर, अपनी लोकोचर गायनमौलीसे उन्हें प्रसन्न किया और उनसे पाने योग्य उत्तम वरोंको मी प्राप्त कर लिया. मैं उन परमवैष्णव भगवान् वानरवीरकी स्तुति करता हूँ॥२०॥ विपति श्रीउमापतिजीको बाउकामें रचित, यद वीरविशतिम नामी स्थति हनुमानजीकी प्रसन्नताके लिये हो। -- २६० स्तोत्ररतायली. ६५-गङ्गाष्टकम् मातः शैलसुतासपनि यसुधाशृङ्गारहारावलि स्वर्गारोहणवैजयन्ति भवती भागीरथि प्रार्थये । त्वत्तीरे वसतस्त्वदम्यु पिरतस्त्वद्वीचिंषु प्रेसत- स्त्वन्नाम स्मरतस्त्वदर्पितदृशः स्यान्मे शरीरव्ययः॥१॥ त्वचीरे तरुकोटरान्तरगतो गङ्गे विहङ्गो वरं त्वन्नीरे नरकान्तकारिणि वरं मत्स्योऽथवा कच्छपः। नैदान्यत्र ... मदान्धसिन्धुरघटासघण्टारण- कारत्रस्तसमस्तौरिवनितालन्धस्तुति पतिः ॥२॥ उक्षा पक्षी तुरग उरगः कोऽपि वा पारणों वा- पृष्पीकी शृङ्गारमाला. पार्वतीजीसी सपत्नी और स्वर्गारोहणके लिये वैजयन्ती पताकारूपिणी हे माता भागीरयि ! मैं आपसे यह प्रार्थना करता हूँ कि तुम्हारे तटपर निवास करते हुए, तुम्हारा जल पान करते हुए, तुम्हारी तरङ्गभङ्गीमें तरजायमान होते हुए, तुम्हारा नामस्मरण करते हुए और तुम्हामें दृधि लगाये हुए, मेरा' शरीरसात हो ॥१॥ गन्ने ! मुम्हारे तटवर्ती तरुवर के फोटर पक्षी होकर रहना अच्छा है। तपाहे नरकनिशारिणि ! तुम्हारे जमे मस्सया कम शेकर जन्म लेना भी रहुव अच्छा है, किन्तु दूसरी जगह मदमच गमरानोंके जमपटके घण्टारय भयभीत दुई महिलाओं से स्नुव पुम्योपवि भी होना अप्या नई ॥२॥ मातः! मैं भलेहीमा आरपार बनेगमा जम्म-मरणार विविधदेवस्वोत्राणि २६१ वारीणः स्यां जननमरणक्लेशदुःखासहिष्णुः । स्वन्यत्र प्रविरलरणकक्षणकाणमिश्र वारखीभिश्चमरमरुता वीजितो भूमिपालः ॥३॥ कार्निकुपितं श्चभिः कवलितं गोमायुमिर्लुण्ठितं स्रोतोभिवलितं तटाम्बुलुलितं चीचीभिरान्दोलितम् । दिन्यत्रीकरचारचामरमरुत्संवीज्यमानः कदा द्रत्येऽहं परमेश्वरि त्रिपथगे भागीरथि स्वं वपुः ॥४॥ अभिनपत्रिसवल्ली पादपास विप्णो- मदनमधनमालेमालतीपुष्पमाला जयति जयपताका काप्यसौ मोक्षलक्ष्म्याः क्षपितकलिकलका बाह्ववी नः पुनातु ॥५॥ क्लेशको सहन न करनेवासा कोई रेल, पची: घोड़ा सा अपवा दापी हो जाऊँ किन्तु [आपसे दूर किसी अन्य स्थानपर ऐसा राजा मी न हो, जिपर कारागनाएँ मन्द-मन्द झनकारते हुए. कङ्कणांकी मुमधुर ध्वनिसे युक्त चमर डुलारही हो ॥ ३॥ हे परमेश्वरि ! त्रिपयो! हे मारनरपि![मरने- के अनन्तर] देवागनाओंके करकमटोंमें मुघोभित मुन्दर चमकी हवा वित हुआ मैं अपने मृत शरीरको कामसे कुरेदा जाता हुआ कुत्रसे मक्षित होता हुआ, गीदड़ोंसे मुठिन होता हुआ, तुम्हारे सोतने पदर रहवा दुआ. कमी किनारे बस उसमें हिलता हुआ और मिशियोंसे आन्दोलिन होता हुआ पर दे गा ? ॥ ४॥ जो भगवान् विष्णु के चरण- समका नूतनमणाल (करना) तथा कामारि त्रिपुरारि सारी भाऊची माग है, यह माउनीकी विभाग विजारवास जस्मात शे। सरियाली नष्ट करनेपाली, वह माहोदने पविय रे॥५॥ो बालक

२६२
स्तोत्ररजापली
एतचालतमालसालपरलम्गालोलपल्लीलता-
ग्छन्नं सूर्यकरप्रतापरहितं शहन्दुकुन्दोचलम् ।
गन्धर्यामरसिद्धकिमयानुजस्तनास्मालित
स्नानाप प्रतिवासरं मरतु मे गाङ्गं जलं निर्मलम् ।। ६ ॥
गानं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् ।
त्रिपुरारिशिरवारि पापहारि पुनातु माम् ॥ ७॥
पापापहारि दुरितारि तरङ्गपारि
शैलपचारि गिरिराजगुहाविदारि ।
झहारकारि हरिपादरजोऽपहारि
गाझं पुनातु सवतं शुभकारि वारि ॥८॥
तमाल, पज, सरल वथा चबउ यालरी और लताओंसे आम्छादित है, सूर्य-
किरणोंके वापसे रहित है, गज, कुन्द और चन्द्र के समान उज्ज्वल है क्या
गन्धर्व, देवता सिद्ध और किन्नरोगी कामिनियोंकेपीन पयोधरसे आसालित
(टकराया हुआ) है, वह अत्यन्त निर्मल गङ्गाजल नित्यप्रति मेरेलानके
लिये हो ।। ६॥ जो श्रीमुरारिके चरणोंठे उत्पन्न हुआ है, श्रीशङ्करके
शिरपर विराजमान है तथा सम्पूर्ण पापोंको हरण करनेवाला है, वह मनोहर
गाजल मुझे पवित्र करे ॥ ७॥ जो पापोंको हरण करनेवाला, दुष्कर्मोन
सानु वरङ्गमया शैल-खण्डोंपर बहनेवाला, पर्वतराज हिमालयकी गुहाओंको
विदीर्ण करनेवाला) मधुर कलकल ध्वनियुक्त और श्रीहरिकी चरणरजने
धोनेवाला है, वह निरन्तर शुभकारी गङ्गाजल मुझे पवित्र करे ॥८॥

विविघदेयस्तोत्राणि गडाएकं पठति यः प्रयतः प्रभावे वाल्मीकिना विरचितं शुमदं मनुष्यः । प्रक्षाल्य गात्रकलिकल्मपपङ्कमाशु मोक्षं लभेत्पतति नैव नरो भवान्यौ ॥ ९॥ इति श्रीमहर्पिवाल्मीकिपिरचिवं गाएकं सम्पूर्णम् । ६६-श्रीगङ्गाष्टकम् भगवति तव तीरे नीरमानाशनोऽहं विगतविषयवष्णः कृष्णमाराधयामि । सकलकलपमङ्गे स्वर्गसोपानसले तरलवरतरझे देवि गझे प्रसीद ॥१॥ पुष्प पाल्मीकिजीके रचे हुए. इस कल्याणमद गनाएको प्रात:बाल एकामचिचसे पदवा है। यह अपने परीरकी कलिकमा मागे पोरसीम ही मोर पास करता है और रि संघर-सनाने नही हैदेशिमारे तीरपर केवल तुम्हारा समान बरामा पिर. पाररिव दो में भाजप्पर मारा KRबाराने सोनिविदेखि मो मुहार HINDI २६४ स्तोत्ररतापली भगवति भवलीलामौलिमाले तयाम्म:- कणमणुपरिमाण प्राणिनो ये स्पृशन्ति । अमरनगरनारीचामरग्राहिणीनां • विगतकलिकलशमधे लुठन्ति ॥२॥ ब्रह्माण्डं खण्डयन्ती हरशिरसि जटावल्लिमुल्लासयन्ती स्वर्लोकादापतन्तीकनकगिरिगुहागण्डीलात्स्खलन्ती। धोणीपृष्ठे लुठन्ती दुरितचयचमूनिमरं मर्स्यन्ती पायोधि पूरयन्ती सुरनगरसरित्पावनी नः पुनातु ॥३॥ मजन्मातङ्गम्भच्युतमदमदिरामोदमत्तालिजालं स्नानः सिद्धाङ्गनानां कुचयुगविगलत्कुमासङ्गपिङ्गम् । हे भगवति ! नुम श्रीमहादेवजीके मस्तककी लीलामयी माला हो, जो प्राणी तुम्हारे जलकणके अणुमात्रको भो स्पर्श करते हैं, वे कलिकलङ्कके भयो त्याग कर देयपुरीकी चैयरधारिणी अप्सराओंकी गोद में शयन करते हैं ॥२॥ ब्रह्माण्डको फोड़कर निकलनेवाली, महादेवजीकी जटा-स्ताको उल्लसित करती हुई स्वर्गलोकसे गिरती हुई, मुमकी गुफा और पर्वतमालासे महती हुई। पृथ्वीपर लोटती हुई, पापसमूहकी सेनाको कड़ी फटकार देती हुई समुद्रको भरती हुई, देवपुरीकी पवित्र नदो गङ्गा हमें पवित्र यरे ॥३॥ स्नान करते हुए दापियोंके कुम्भस्य उसे शरते हुए मदरूपी मदिराम गन्धके कारण मधुपसन्द जिससे मतवाले हो रहे बिॉफी नियों के खनोंसे रहे हुए कुमके मिटनेसे जो पिनलवर्ण हो रहा है तथा सार्व- विविधदेवस्तोत्राणि २६५ --- सायंप्रातर्मुनीनां · कुशकुमुमचर्यश्छमतीरस्थनीर पायानो गाङ्गमम्मा करिकलमकराक्रान्तरंहस्तरङ्गम् ।।४।। आदावादिपितामहस्य नियमव्यापारपात्रे जलं पश्चात्पनगशायिनो भगवतः पादोदकं पावनम् । मूयः शम्भुजटाविभूषणमणिहार्महपेरियं कन्या कल्मपनाशिनी भगवती भागीरथी दृश्यते ॥५॥ शैलेन्द्रादक्तारिणी निजजले मञ्जजनोचारिणी पारावारविहारिणी भवभय श्रेणीसमुत्सारिणी। शेपाहेरनुकारिणी हरशिरोवल्लीदलाकारिणी काशीप्रान्तविहारिणी विजयते गङ्गा मनोहारिणी ॥६॥ प्रातः मुनियों द्वारा अर्पित कुरा और पुप्पोके ममूहमे किनारेपर ढका दुआ है. हाथियोंके बचाकी मुंडोंसे जिनकी नरङ्गोंका वेग आक्रान्त हो रहा है, वह गङ्गाजल हमारा कल्याण करे ॥ ४ ॥ जहु महरिकी कन्या पापनाशिनी भगवती भागीरथी, पहले ब्रमाके कमण्डलुमें जलरूपसे, फिर शेषशायी भगवान्के पवित्र चरणोदकरूपसे और तदनन्तर महादेवजीकी जटायो मुशोभित करनेवाली मणिरूपसे दीख रही है ॥५॥ हिमालयमे उतरनेवाली, अपने जलमें गोता लगानेवालंका उद्धार करनेवाली, समुद्रवितारिणी, संसार-मंकटोका नाश करनेवाली, [विस्तारमें ] शेषनागका अनुकरण करनेवाली, शिवजी मस्तकपर लताके समान मुशोभित, काशीक्षेत्र में रहनेवाली मनोशारिणी गन्नाजी विजयिनी शे रही हैं ॥ ६ ॥ यदि तुम्हारी सांवरमायली कुती वीमिनिष पदि गवा ठोननपर्य त्वमापीता पीताम्बरपुरनियर्स पिठरसि। सदाझे गरे पति पदि कायस्तनुमृता बदा मावः शावक्रतवादलामोऽप्यतिठपुः ॥७॥ गरे लोस्पसारे समलमुत्रपौवरिस्तीगतोये पूर्णवनस्वरूपे हरिचरणरजोहारिणी वर्गमागें। प्रायधिर यदि सापजलकणिका महत्यादिपापे फस्त्वां स्तोतुं समर्थ निजगदपहरे देविगझेप्रसीद॥ ८॥ मात विशम्भुसत्वलित मौली निघायाचठिं त्वत्तीरे यपुपोऽवसानसमये नारायणाधिद्वयम् । उरत नेत्रों के सामने आ जाय, तो फिर संसारकी परत कहाँ रह सकती है। तुम अपना जलपान करनेपर वैकुण्ठयोरमें निवास देती हो, हे गट्टे यदि जीवों का शरीर तुम्हारी गोदमें छूट जाता है, तो हे मातः ! उस समय इन्द्र- पदकी प्राप्ति मी अत्यन्त मुग्छ मालूम होती है ॥ ७॥ तीनों लोकोंकी पार सर्वदेवाजनाएँ जिधर्म मान करती हैं, ऐसे विस्तृत जलवासी पूर्व बाखरूपिणी, स्वर्ग:मार्ग में भगवान्के चरणोंकी धूलि धोनेवाची...हे गझे ! जब तुम्हारे जरका एक कणमात्र ही ब्रह्महत्यादि पापोका प्रायविच तो हे त्रैलोक्यपापनाशिनि ! मुम्हारी खदि करने कोत समर्थ है । हे देवि गर्छ। प्रन शे॥८॥हे शिवकी संगिनी मावः गने। गरीर शान्त नेके समय प्राण-यात्राके उत्सव, तुम्हारे तीरपर, शिर नवाकर हाथ जोड़े ।

विविधदेवस्तोत्राणि २६७ सानन्दं सरतो मविष्यति मम प्राणप्रयाणोत्सवे भूयाद्भक्तिरविच्युता हरिहराद्वैवात्मिका शाश्वती ॥९॥ गङ्गाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत्प्रयतो नरः । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति ॥१०॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं श्रीगङ्गाष्टकं सम्पूर्णम् । ६७-श्रीगङ्गास्तोत्रम् सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे । रमौलिविहारिणि विमले मम मदिरास्तांववपदकमले॥१॥ रथि सुखदायिनि मातस्तव जलमहिमा निगमे ख्यातः। जाने तव महिमानं पाहि कृपामयि मामज्ञानम् ॥ २॥ आनन्दसे भगवान के चरणयुगलका स्मरण करते हुए मेरी अविचल से हरि-हरमें अभेदात्मिका नित्य भक्ति बनी रहे ॥७॥ जो पुरुष शुद्ध र इस पवित्र गनाएकका पाठ करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होकर वैकुण्ठ- में जाता है।॥१०॥ हे देवि गते । सुम देवगणकी ईश्वरी हो, हे भगवति ! तुम त्रिमुवन- तारनेवाली, विमल और तरल तरङ्गमयी वया शहरके मखकपर कार करनेवाली हो। हे मातः! तुम्हारे चरणकमलों में मेरी मवि यो ॥ १॥ हे मागीरपि ! तुम सब प्राणियोंको सुख देती हो हे मातः! पास्त्र में तुम्हारे जलका माइम्प वर्णित है, मैं तुम्हारी महिमा कुछ नध नवा हे दयामयि! मुझ अशानीकी रक्षा करो ॥२॥ हे गझे। तर २६८ स्तोत्ररतापली . हरिपदपायतरङ्गिाणि गङ्गे हिमविधुमुक्ताधवलतर। दूरीकुरु मम दुष्कृतिमारं कुरु कृपया भवसागरपारम् ॥३.। तव जलममलं येन निपीतं परमपदं खलु तेन गृहीतम् । मातर्गने त्वयि यो भक्तः किल तं द्रष्टुं न यमः शक्तः॥४॥ पतितोद्धारिणि जाझवि गङ्गे खण्डितगिरिवरमण्डितभङ्गे। भीष्मजननि हे मुनिवरकन्ये पतिवनिवारिणि त्रिभुवनधन्य।।५।। कल्पलतामिव फलदांलोके प्रणमातियस्त्वांन पतिशोके। पारावारविहारिणि गङ्गे विमुखयुवतिकतवरलापाङ्गे ॥६॥ तव चेन्मातःस्रोतःस्नातः पुनरपि जठरे सोऽपि न जातः। श्रीहरिके चरणोंकी चरणोदकमयी नदी हो, हे देवि ! तुम्हारी तरन् हिम, चन्द्रमा और मोतीकी भाँति श्वेत हैं, तुम मेरे पार्योंका भार दूर कर दो और कृपा करके मुझे भवसागरके पार उतारो ॥ ३ ॥ हे देवि ! जिसने तुम्हारा जल पी लिया, अवश्य ही उसने परमपद पा लिया, हे मातः गो! जो तुम्हारी भक्ति करता है, उसको यमराज नहीं देख सकता (अर्थात तुम्हारे भक्तगण यमपुरीमें न जाकर वैकुण्ठमें जाते हैं)॥४॥ हे पतितजनोंका उद्धार करनेवाली जहनुकुमारी गले! तुम्हारी तरङ्गे गिरिराज हिमालयको खण्डित करके बहती हुई मुशोभित होती है, तुम भीष्मकी जननी और ब्रह्नमुनिकी कन्या हो, पतितपावनी होने के कारण तुम त्रिभुवन में धन्य हो॥५॥हे मातः! तुम इस स्टोफर्म कपरताशी भांति पल प्रदान करनेवाली हो तुम्हें जो प्रणाम करता है, यह कमी धोकम नहीं पड़वा हेगळे! तुम समुद्र के साप विहार करती हो और मुम्हारा चाळ मपात (नेत्र-कोण) विमुस यनिवारी तरह है॥६॥गोनिसने तुम्हारे प्रवाइमें मान कर ठिया. यहरि मानुगर्भ में प्रवेश नहीं कर विविधदेयस्तोत्राणि २६९ नरकनिवारिणि जाहविगङ्गे कलपविनाशिनि महिमोत्तुङ्गे।। ७॥ पुनरसदङ्गे पुण्यतरङ्गे जय जय जाह्रवि करुणापाङ्गे । इन्द्रमुकुटमणिराजितचरणे सुखदे शुभदे भृत्यशरण्ये ॥ ८॥ रोगं शोक तापं पापं हर मे भगवति कुमतिकलापम् । त्रिभुवनसारे वसुधाहारे त्वमसि गतिर्मम खलु संसारे ॥९॥ अलकानन्दे परमानन्दे कुरु करुणामयि कातरवन्ये । तव तटनिकटे यस्य निवासः खलु वैकुण्ठे तस्य निवासः ॥१०॥ वरमिह नीरे कमठो मीनः किंवा तीरे शरटः क्षीणः । अथवाश्वपची मलिनोदीनस्तव न हि दूरे नृपतिकुलीनः ॥११॥ हे जाहवि ! तुम भक्तोंको नरकसे बचाती हो और उनके पापोंका नारा करती हो, तुम्हारा माहात्म्य अतीव उच्च है ॥ ७ ॥ हे करुणाकटाक्षवाटी जहनुपुत्री गौं ! मेरे अपावन अनोपर अपनी. पावन तरङ्गोंसे युक्त हो उल्लसित होनेवाली, तुम्हारी जय हो ! जय हो !! तुम्हारे चरण इन्द्रके मुकुटमणिसे प्रदीप्त है, तुम सबको सुख और शुभ देनेवाली हो और अपने सेवकको आश्रय प्रदान करती हो ॥ ८॥ हे भगवति ! तुम मेरे रोग, गोक) ताप, पाप और कुति-कलापको हर लो, तुम त्रिभुवनकी सार और वसुधाका हार हो, हे देवि ! इस संसारमें एकमात्र तुम्हीं मेरी गति हो॥९॥हे दुखियोंकी वन्दनीया देवि गङ्गे ! तुम अलकापुरीको आनन्द देनेवाली और परमानन्दमयी हो, तुम मुझपर कृपा करो, हे मातः ! जो तुम्हारे तटके निकट वास करता है, वह मानो वैकुण्ठमें ही वास करता है ॥ १०॥ हे देवि ! तुम्हारे जलमें कच्छप या मीन बनकर रहना अआ है, तुम्हारे तीरपर दुबला-पतला गिरगिट (ककलास) बनकर रहना अच्छा है या अति मलिन दीन चाण्डालकुलमें जन्म ग्रहण र राना अम है परन्तु ( तुमसे) दूर कुटीन नरपति होकर रहना भी सापरमारती मो परनेरि पुगे भन्ने देश मपि निसरकन्ये। गनास्वामिमममतं नि पठति नरयास जपनि सत्यम्।।१२।। येपो रदये गाभक्तिस्तेगा मरति सदा मुखगतिः। मधुराकान्नान्सटिकामिः परमानन्दकलितलतितामिः॥१३॥ गजास्तीत्रमिदं मासारं वाभिमतकलाद चिमतं सारम् । शुभरसेवकराकरमित पठति सुखी स्तव इति च समाप्तः ॥१४॥ सभीमराननिरनितंगनामो सम्पूर्णम् । ६८-श्रीयमुनाष्टकम् मपरिकायकालिमाललामवारिधारिणी राणीकवयिनिष्टपा त्रिलोकशोकहारिणी। पण नहीं ॥ ११ ॥ हे देवि ! मुम त्रिभुवनली ईश्वरी हो, मुम पाक्न और धन्य हो, जलमयी तया मुनियरकी कन्या हो; जो प्रतिदिन इस गग्नातवका पाठ करता है, यह निभय ही संसारमें जयलाम कर सकता २॥१२॥ जिनके हृदयमें गङ्गाके प्रति अचला मकि है, वे सदा ही आनन्द और मुकि लाभ करते हैं। यह स्तुति परमानन्दमयी सुललित पदावलीसे युक्त मधुर और कमनीय है ॥ १३ ॥ इस अठार संसारमें उक्त गमास्तर ही निर्मल सारवान् पदार्य है, यह भक्कोंको अभिलपित फल प्रदान करता है। शङ्करके सेवक शङ्कराचार्यश्व इस स्तोत्रको जो पदता है वह मुखी होता है इस प्रकार यह स्तोत्र समाप्त हुआ ॥ १४ ॥ जो मगवान् कृष्णचन्द्रके अोंकी नीलिमा लिये हुए मनोहर खोप धारण करती है, त्रिभुवनका शोक हरनेवाटी होनेके कारण स्वर्गलोकको

विविधदेवस्तोत्राणि
मनोऽनुकूलकूलकुञ्जपुञ्जधूतदुर्मदा
धुनोतु मे मनोमलं कलिन्दनन्दिनी सदा ।।१।।
मलापहारिवारिपूरभूरिमण्डितामृता
मृशंप्रशतकप्रवञ्चनातिपण्डितानिशम् ।
सुनन्दनन्दनाङ्गसङ्गरागरञ्जिता हिता। धुनोतु० ॥२॥
लसत्तरङ्गसङ्गभूतभूतजातपातका
नवीनमाधुरीपुरीणभक्तिजाउचाउका ।
तटान्तवासदासहंससंसृता हि कामदा। धुनोतु०॥३॥
तृणके समान सारहीन समझती है, जिसके मनोरम तटपर निकुओका पुष
सर्वमान है, जो लोगोंका दुर्मद दूर कर देती है। यह फालिन्दी यमुना पदा
हमारे आन्तरिक मलको धोने ॥१॥ जो मलापहारी सलिलसमूहसे अत्यन्त
मुसोभित है, मुक्दिायक है, सदा ही बड़े-बड़े पातको लूट लेनेमें अत्यन्त
भवीण है, मुन्दर नन्दनन्दनके अनपजनित रागसे रञ्जित है, सब
हितकारिणी है। यह यालिन्दी यमुना सदा ही हमारे मानसिक मलको
फोरे ॥ २ ॥ जो अपनी मुहावनी तरन्नोंके समसे समस्त प्राणियों के
पाको धो दारती है, जिसके वटपर नूतन मधुरिमाधे भो भक्तिरस
भनेने घातक रहा करते हैं, वट सांप पास करनेपाळे मी
से जो सैषित रहती है और उनकी कामनाओंगो पूर्ण करनेवाली है।
प्रटन्दरमा यमुना सदा हमारे मानसिक मटयो मिरा ॥१॥

स्तोत्ररत्नापली विहाररासखेदमेदधीरतीरमारुता गता गिरामगोचरे यदीयनीरचारुता। प्रवाहसाहचर्यपूतमेदिनीनदीनदा | धुनोतु० ॥४॥ तरङ्गसङ्गसकताश्चितान्तरा सदासिदा शरन्निशाकरांशुम मञ्जरीसमाजिता। मवार्चनाय चारुणाम्बुनाधुना विशारदा।धुनोतु०॥५॥ जलान्तकेलिकारिचारुराधिकाङ्गरागिणी खमर्तुरन्यदुर्लमाङ्गसङ्गत्तांशमागिनी । खदचसुप्तसप्तसिन्धुभेदनातिकोविदा । धुनोतु० ॥६॥ जिसके तटपर विहार और रास-विलासके खेदको मिटा देनेवाली मन्द मन्द वायु चल रही है, जिसके नीरकी सुन्दरताका वाणीदारा वर्णन नहीं हो सकता, जो अपने प्रवाहके सहयोगसे पृथ्वी, नदी और नदीको पावन पनाती है। वह कलिन्दनन्दिनी यमुना सदा हमारे मानसिक मलको दूर करे ॥ ४ ॥ लहरोंसे सम्पति वालुकामय तटसे जिसका मध्यभाग सुशोमित है, जिसका वर्ण सदा ही श्यामल रहता है, जो शरद् ऋतुके चन्द्रमाम किरणमयी मनोहर मञ्जरीसे अलङ्कृत होती है और मुन्दर सलिलसे संसारको सन्तोष देनेमें जो कुशल है यह फलिन्द-कन्या यमुना सदा हमारे मानसिक मलको नष्ट करे ॥ ५॥ जो जलके भीतर क्रीडा करनेवाली मन्दरी राधाके अपरागसे युक्त है, अपने स्वामी श्रीकृष्णके मार्ग जो अन्य किसीके लिये दुर्लभ है, उपभोग करती है, जो अपने मगन्त सत समुद्रोंमें हलचल पैदा करने में अत्यन्त मुगल है। कालिन्दी यमुना सा हमारे मात्तरिक मउने भोये ॥३ * ......... मखिमोंसे जिसकी शोभा बढ़ रही है, जो राधाके चञ्चल अलकोंमें गुपी पुष्प-परागसे जिसका वर्ण उज्ज्वल हो रहा है, जो अपने उसमें दुबकी कृष्णचन्द्रकी प्रेमिका, मंसारभीतिक टिये दारानस्वरूप, भत्तों वर विविधदेवस्तोत्राणि २७३ जलच्युताच्युताङ्गरागलम्पटालिशालिनी विलोलराधिकाकचान्तचम्पकालिमालिनी । सदावगाहनावतीर्णमभृत्यनारदा । धुनोतु० ॥७॥ सदैव नन्दनन्दकेलिशालिकुञ्जमजुला तटोत्थफुल्लमल्लिकाकदम्बरेणुमुज्ज्वला । जलावगाहिनां नृणां भवाब्धिसिन्धुपारदा। धुनोतुलादा इति श्रीमन्दराचार्यविरचितं श्रीयमुनाष्टकं सम्पूर्णम् । ६६--यमुनाष्टकम् तपनवनयां भवमयदवां मकवरदाम् । जलमें धुलकर गिरे हुए श्रीकृष्णके अङ्गरागसे अपना अङ्गस्नान करती हुई हुई चम्पक मालासे मालाधारिणी हो गयी है, स्वामी श्रीकृष्णके भृत्य नारद आदि जिसमें सदा ही स्नान करनेके लिये आया करते है, वह मलिन्द कन्या यमुना हमारे आन्तरिक मलको धो डाले ॥७॥ जिसके तटवर्ती मञ्जुल निकुञ्ज सदा ही नन्दनन्दन श्रीकृष्णकी लीलाओंसे मुोभित होते हैं, किनारेपर बदकर सिटी हुई मल्लिका और दम्पके लगानेवाले मनुष्योंको भवसागरसे पार कर देती है, वह कलिन्द-कन्या रमुना सदा हो हमारे मानसिक मलको दूर रहावे ॥ ८ ॥ जो कपाको समुद्र, सूर्यकुमारी, तापने शान्त करनेवाली, श्री कपापारावारां मुरारिप्रेयस्कां तापशमनी स्तोत्ररत्नापली स्पिालान्मुक्ता श्रियमपि मुसाप्तः प्रनिदिन मदा धीरो नूनं मजति यमुना नित्यसलदाम् ॥१॥ मधुवनचारिणि मास्करवाहिनि नाझविसतिनि सिन्धुमुते मधुरिपुभूपिणि माधवतोपिणि गोकुलमीतिविनाशकते । जगदपमोचिनि मानसदायिनि केशवकेलिनिदानगते भय यमुने जय मोतिनिवारिणि सङ्कटनाशिनि पावय माम् ॥२॥ अयि मधुर मधुमोदविलासिनि शैलविहारिपि वेगमरे परिजनपालिनि दुष्टनिदिनि वान्छितकाविलासघरे । मजपुरवासिजनार्जितपातकहारिणि विधवनोद्धरिके । जय० ॥३॥ मतिविपदम्युधिमग्नजनं मरतापरवाकुलमानसकं गतिमतिहीनमशेपमयाकुलमागठपादसरांजयुगम् देनेवाली और आकाशवालमे मुक्त लक्ष्मीस्वरूपा है, उन नित्यक- सायिनी यमुनाजीका धीर पुरुष नुसमातिके लिये निभयपूर्वक निरन्तर पतिदिन भजन करता है॥१॥ हे मधुवनमें विहार करनेवाली ! हे भास्करवाहिनि ! हे गाजीकी सहनरी ! हे सिन्धुसुदे ! हे श्रीमधुबदन विभूपिणि ! हे माधवतृप्तिकारिणि ! हे गोकुटका मय दूर करनेवाली ! हे जगत्पापविनाशिनि ! हे वाञ्छितफरदायिनि ! हे कृम्मकेलिकी आभ्य- भूता सकलमयनिवारिपी संकटनाशिनी यमुने ! तुम्हारी जय हो ! जय हो! तुम मुझे पवित्र कये ॥ २॥ अयि मधुरे ! अयि मधुगन्धविलासिनि ! हे पर्वतोंमें विहार करनेवाल्य ! परम वेगवती, अपने वीरवी भक्तजनोंका गलन करनेवाली, दुधेका संहार करनेवाली, इच्छित कामनाओंकी' विलासभूमि, ब्रजभूमिनिवासियोंके अर्जित पापोंको हरण करनेवाली क्पा सम्पूर्ण जीवोंका उद्धार करनेवाली, सकलभयनिवारिपी संकटनाशिनी यमुने ! तुम्हारी जय हो ! जय हो। तुम मुझे पवित्र करो ॥ ३ ॥जो महान् विपत्तिसागरमें निमग्न है, सैकड़ों सांसारिक संवारोंसे जिसका मन सेकड़ों-हजारों करोड़ प्रतिकारशून्य पार्पोका पुतला है, तुम्हारे चरणकमल संकटहारिणी यमुने तुम्हारी जय हो जय हो! तुम मुझे पवित्र करो॥५॥ है करोड़ों भास्करों के समान नवीन मणियोंकी कञ्चुकीसे सुशोमित वया वायवलीरूप हारसे युक्त, सकलभयनिवारिणी सङ्कटहारिणी यमुने! तुम्हारी जय हो जय हो ! तुम मुझे पवित्र करो ॥६॥ तुम्हारी विविधदेवस्तोत्राणि ऋणमयमीतिमनिष्कृविपातककोटिशतायुतपुञ्जतरं जय० ॥४॥ नवजलदयुविकोटिलसचनुहेममयाभरञ्जितके तडिदवहेलिपदाञ्चलचञ्चलमोमितपीतसुचैलधरे मषिमयभूषणचित्रपटासनरञ्जितगजितभानुकरे । जय० ॥५॥ शुमपुलिने मधुमत्यद्भक्रासमहोत्सवकेलिमरे उचकलाचलराजितमौक्तिकहारमयाभररांदसिके नवमणिकोटिकभास्करकञ्चुकिशोभिततारकहारयुते।जय॥६॥ करिक्रमौक्तिकनासिकभृपणवातंचमत्कृतचञ्चलके व्याकुल है, जो गति (आश्रय) और मति ( विचार ) से शून्य तथा सब प्रकारके भयोंसे व्याकुल है, जो ऋण और भयसे दबा हुआ तया युगलमें प्राप्त हुएं ऐसे मुझको, हे मकलभयनिवारिणी संकटनाशिनी यमुने ! तुम पवित्र करो, तुम्हारी जय हो ! जय हो !! ॥४॥ तुम्हाय शरीर करोड़ों नवीन मैघोंकी कान्तिसे सुशोभित तथा सुवर्णमय आभू पोसे विभूषित है, जिसका चञ्चल अञ्चल चपलाकी भी अवहेलना करता है, ऐसे पीत दुकूलको धारण करके तुम परम शोभायमान हो रही हो तथा मणिमय आभूषण और चित्र-विचित्र वस्त्र एवं आसनसे रञ्जित होकर सुमने सूर्यको किरणों को भी कुण्ठित कर दिया है। हे सकलभयनिवारिणी हे सुन्दर तटोंवाली ! हे मधुमत्त-यदुकुलोत्पन्न श्रीकृष्ण और बलरामके रासमहोत्सवकी क्रीडाभूमि ! हे ऊँचे ऊँचे कुलपर्वतोंकी श्रेणियोंपर शोभाय- मान मुकावलीरूप आभूषणोंसे पृथ्वी और आकाशको विभूषित करनेवाली! नासिकाली भूषणरूप गजमुका वायुसे चञ्चल होकर झिलमिला रही है।

२७३
स्तोत्ररलायती
मुसकमलामलसौरमनप्रतमत्तमधुवतलोचनिके
मणिगणन्डललालपरिस्फरदानुलगण्डगुगामलके जय० ॥७॥
कलरवन् पुरहेममयाचितपादसरोरुहसारुणिक
घिमिधिमिधिमिधिमितालविनादितमानसमञ्जुलपादगते ।
तव पदपङ्कजमाश्रितमानयचिनसदाखिलवापहरे । जय० ॥८॥
मयोचापाम्माधी निपतितजना दुर्गनियुतो
यदि स्वाति
प्रातः प्रविदिनमनन्याश्रयदया।
हयापैः काम
करकुमुमपुजैरविरत
सदा मोक्ता मोगान्मरणसमये याति हरिताम् ॥९॥
इति श्रीमउदराचार्यविरचितं यमुनाष्टकं सम्पूर्णम् ।
..-
तुम्हारे नेत्ररूप मववाले भीर मानो मुखकमलकी मुवाससे चञ्चल हो
रहे हैं तथा दोनों अमल कपोल हिलते हुए मणिमय कुण्डलोंकी झलकसे
झिलमिला रहे हैं। हे सकलभयनिवारिणी सङ्कटहारिणी यमुने ! तुम्हारी
जय हो जय हो ! तुम मुझे पवित्र करो ॥७॥ तुम्हारे अरुप चरणकमल
सुवर्णमय नपुरोंके कलरवसे युक्त है, तुम मनको प्रसन्न करनेवाली धिमि
धिमि' स्वरमयी मनोहर गतिसे गमन करती हो, जो मनुष्य तुम्हारे
चरण-कमलोंमें चिच लगाता है, तुम उसके सम्पूर्ण तार हर लेती हो।
हे सकलभयनिवारिणी संकटहारिणी यमुने ! तुम्हारी जय हो ! जय हो!
सुम मुझे पवित्र करो ॥८॥जो मनुष्य संसारके सन्तापसमुद्र में डूबकर
अत्यन्त दुर्गविग्रस्त हो रहा है, वह यदि प्रतिदिन प्रातःकाल,अनन्य
चिचसे ( इस स्तोत्रदारा श्रीयमुनाजीकी) स्तुति करेगावह (पावजी.
वन)घोड़ोंकी हिनहिनाहट तथा हायोंमें पुष्पपुञ्जसे सुशोभित होकर निरन्तर
सम्पूर्ण भोगोंको भोगेगा और मरनेके समय भगवद्रूप हो जायगा ॥९॥

संपाव (शरीर)मैं नहीं हूँ॥ १॥ जो मन और वागीसे अगम है,
जिम कृपासे समस्त पाणी भाम रही, जिसमा मेविनेति
पकीर्णस्तोत्राणि
७०-प्रातःस्मरणम्
(क) परब्रह्मणः
प्रातः स्मरामि हृदि संस्फुरदात्मतत्त्वं
सचित्सुखं परमहंसगति तुरीयम् ।
यत्वमजागरसुषुप्तिमवैति नित्यं
तहह्म निष्कलमहं न च भूतसमः ॥१॥
प्रातर्भजामि मनसा वचसामगम्यं
वाचो विभान्वि निखिलायदनुग्रहेण।
यन्नेतिनेतिवचनैनिंगमा अवोचं-
स्तं देवदेवमजमच्युतमाहुरग्रथम् ॥२॥
में प्रातःकाल, हृदयमें स्फुरित होते हुए आत्मवश्वका सरण करता
है जो सन्, चित् और आनन्दरूप है, परमहंसोंग प्राप सान है और
जामदादि तीनों अवसाओंसे पिलक्षण है, जो स्वप्न, सुएप्ति और जास्त
अवस्याने नित्य जानता है, यह फरणारहित कम ही में हूँ, परमून
पर निरूपण करते हैं, जिस अजन्मा देवदेवेवर अन्सुठ भार
(पादि) पुष मते में उसका प्रसार मान मता हूँ ॥२॥

स्तोपरलायली प्रातर्नमामि तमसा परमर्कवणे पूर्ण सनातनपदं पुरुषांचमाख्यम् । यसिन्निदं जगदशेपमपमूर्ती रज्ज्वां भुजङ्गम इस प्रतिमासितं वै॥३॥ लोकत्रयमिदं पुण्यं लोकत्रयविभूपणम् । प्रातःकाले पठेद्यस्तु स गच्छेन्परमं पदम् ॥ ४॥ इति श्रीमच्छङ्करभगवतः कृती परब्रह्मणः प्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् । (ख) थीविष्णोः प्रातःमरामि मवमीतिमहार्तिशान्त्यै नारायणं गरुडवाइनमजनामम् । ग्राहामिमूतवरवारणमुक्तिहेतुं चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ॥१॥ प्रातर्नमामि मनसा वचसा च मूर्धा पादारविन्दयुगलं परमस्य पुंसः। जिस सर्वस्वरूप परमेश्वरमें यह समस्त संसार रज्जुमें सर्पके समान प्रतिभासित शे रहा है, उस अज्ञानातीत, दिव्यतेजोमय, पूर्ण स्नातन पुरुषोचमको मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥३॥ ये तीनों दलोक तीनों लोकोंके भूपप है। इन्हें जो कोई प्रातःकालके समय पढ़ता है उसे परमपदकी प्राप्ति होती है ॥४॥ गरुडवाइन, कमलनाम, ग्राहसे ग्रसित. गजेन्द्रकी मुकिके कारण, सुदर्शनचक्रधारी नवविकसित कमलपत्र से नेत्रवाले नारायण म मयरूपी महान् दुःखकी शान्ति के लिये, मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ॥१॥ वेदोंका स्वाध्याय करनेवाले विप्रोके परम आश्रय नरकरूप, संसारसमुद्रसे पोमानान और नेमे आनन्द देनेवाले ३, औरगनापजीके है। भिटो रहे भा जे कर्णपर्यन्त विस्तृत हेबड़े नेले प्रकीर्णस्तोत्राणि नारायणस्य नरकार्णवतारणस्य पारायणप्रणविप्रपरापणास प्रातर्भजामि भजतामण्यङ्करं तं प्राकमर्वजन्मकृतपापमयापइत्यै । यो ग्राहकापतिताप्रिंगजेन्द्रधार- शोकप्रणाशनकरो धृतशङ्खचक्रः ॥३॥ ॥ इति श्रीविष्णोः अतःस्मरणम् ।। (ग)ीपमस्या प्रातः सरमि रघुनाथमुखारविन्दं मन्दसितं मधुरमापि विशालमालम्। कावलम्बिचलकुण्डलशोमिगण्डं कर्णान्तदीपनयनं नयनाभिरामम् ॥१॥ पारनेवाले, उस परमपुरुषले चरणारविन्दयुगळमें शिरएकाकर पचनसे प्रातःग्राउ नमस्कार करता हूँ ॥२॥ कि शुश्चक भारत रो प्राहके मुसमें पड़े हुए चरणपाले गजेन्द्र पर संकटका ना कियामधे अभय करनेवाले उन भावान्ग्रे मैं अपने पूर्वजन्नोंके म पका नाश करने लिये प्रातःकाल भजता हूँ॥३॥ जो मधुर मुसकानयुक्त, मधुरमारी और निगल भालसे मुसोभित मनोने टो र कुण्डली मिक दोनों को २८० स्तोत्ररलायली ... प्रातर्मजामि रघुनाधफरारविन्दं रखोगणाय मयदं वरदं निजेम्यः । यद्राजसंसदि विमज्य महेशचापं सीताकरग्रहणमङ्गलमाप सघः ॥२॥ प्रातर्नमामि रघुनाथपदारविन्द यदिशादिशुभरेखि सुखावहं मे । योगीन्द्रमानसमधुव्रतसेन्यमानं शापापहं सपदिमीतमधर्मपत्न्याः ॥३॥ प्रांतर्वदामि वचसा रघुनाथनाम वान्दोपहारि सकलं शमलं निहन्ति । यत्पार्वती स्वपतिना सह मोक्तुकामा प्रीत्या सहस्रहरिनामसमं जबाप ॥४॥ काल श्रीरघुनाथजीके करकमलोंका स्मरण करता हूँ, जो राधोंको भय देनेवाले और भोंको वरदायक है तथा जिन्होंने राजसभामें शङ्करका धनुष तोड़कर शीघ्र ही सीताका मङ्गलमय पाणिग्रहण किया था ॥२॥ मैं प्रातःकाल श्रीरघुनायजीकै चरणकमलोंकों नमस्कार करता हूँ, जो वन अकुश आदि शुभ रेखाओंमे युक्त, मेरे सुखदायी, योगियोंके मन-मधुपदारा सेवित और गौतम- पली अहल्याके शापको दूर करनेवाले हैं ॥३४ मैं प्रातःकाल अपनी वाणीसे श्रीरघुनाथजीके नामका जप करत हूँ, जो वाणीके दोषोंको नाश करने वाले और सर्व पापोंको हरनेवाले हैं तथा जिसे पार्वतीजीने अपने पति (शङ्कर) के साथ भोजन करनेकी इच्छासे, भवानके सहसमामके सहर प्रीतिसहित जपा या ॥४॥ मैं प्रातःकाल श्रीरघुनायनीकी वेदवन्दित " भकोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है॥ ५ ॥ जो पुरुष प्रावःकालनींदसे प्रकीर्णस्तोत्राणि २८१ प्रातः श्रये श्रुतिनुतां रघुनाथमूर्ति नीलाम्बुजोत्पलसितेतररत्ननीलाम् । आमुक्तमौक्तिकविशेषविभूषणान्यां ध्येयां समस्तमुनिभिर्जनमुक्तिहेतुम् ॥ ५॥ यः श्लोकपश्चकमिदं प्रयतः पठेद्धि .. नित्यं प्रमातसमये पुरुषः प्रबुद्धः । श्रीरामकिङ्करजनेषु स एव मुख्यो भूत्वा प्रयाति हरिलोकमनन्यलम्यम् ।। ६ ॥ ॥ इति श्रीरामस्य प्रातःस्मरणम् ॥ (घ) श्रीशिवस्य प्रातः सरामि भवमीतिहरं सुरेशं गङ्गाधरं वृपमवाहनमम्बिकेशम् । मूर्तिका आश्रय लेता हूँ, जो नीलकमल और नीलमणिके समान नीलवर्ण, स्टकवे हुए मोतियोंकी मालासे विभूषित, समस्त मुनियोंकी ध्येय तपा जगकर जितेन्द्रियमावसे इन पाँच लोयका नित्य पाठ करता है, यह श्रीरामजीके सेवकोंमें मुख्य होकर श्रीहरिके लोको, जो दूसरों के लिये दुर्लभ है, प्राप्त होता है ॥ ६ ॥ जो सासारिक भयको हरनेवाले और देवताओके स्वामी हैं, जो गवाजीने पारण करते हैं, जिनका दृषभ वाहन है, जो अनिका । तपा जिनके हाप, पटना, त्रिशुल और वरद तया अभयमुद्रा है, उन संधार-रोगने २८२ स्तोत्ररतावली खट्वाइशूलबरदामयहस्तमी संसाररांगहरमीपरमद्वितीयम् ॥१। प्रातर्नमामि गिरिश गिरिजादेई सर्गस्थितिप्रलयकारणमादिदेवम् । विश्वेश्वरं रिजितविश्वमनाऽमिराम संसाररांगहरमापघमद्वितीयम् ॥२॥ प्रातर्मजामि शिवमेकमनन्तमायं वेदान्तवैद्यमनपं पुरुष महान्तम् । नामादिभेदरहिवं पडमावशून्यं संसाररोगहरमोपधमद्वितीयम् ॥३॥ प्रातः समुत्थाय शिवं विचिन्त्य श्लोकत्रयं येऽनुदिनं पठन्ति । हरनेके निमित्त अद्वितीय औपधरूप ईशा (महादेवजी) को मैं प्रातःसमपने स्मरण करता हूँ ॥ १॥ भगवती पार्वती, जिनका आधा अङ्ग है, जो संसारकी सृष्टि, स्थिति और प्रलयके कारण हैं, आदिदेव हैं, विश्वनाय है। विश्व-विजयी और मनोहर हैं, सांसारिक रोगको नष्ट करने के लिये अद्वितीय औषधरूप उन गिरिश (शिव) को मैं प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ ॥२॥ जो अन्तसे रहित आदिदेव है, पेन्दान्तसे जाननेयोग्य, पापरहित एवं महान् पुरुष है तथा जो नाम आदि भेदोसे रहित छः अभावोंसे शून्य, संसाररोगको हरनेके निमित्त अद्वितीय औषध है उन एक शिवजीको मैं प्रातःकाल भजता हूँ ॥३॥ जो मनुष्य प्रातःगाउ उठकर शिवका ध्यानकर ते दुःखजातं मोतीकी चुलाक जिनकी शोभा बढ़ा रही है, उन श्रीशैलपर निवास जिनके मुखमें कपूरके रससे युक्त चूना और सैरको सुगन्धसे पूर्ण पानी •पोदो शंमा रे रही है, जो अपने चाल कटाक्षासे तरंगापमान करुणाकी प्रकीर्णस्तोत्राणि २८३ बहुजन्मसञ्चितं हित्वा पदं यान्ति तदेव शम्माः ॥ ४॥ ॥ इति श्रीशिवस्य प्रातःस्मरणम् ।। (ङ) थीदेव्याः चाश्चल्यारणलोचनाश्चितकृपां चन्द्रार्कचूडामणि चारुस्मेरमुखां चराचरजगत्संरक्षणी सत्पदाम् । चञ्चचम्पकनासिकाग्रविलसन्मुक्तामणीरञ्जिनां श्रीशैलस्थलवासिनी भगवती श्रीमातरं भावये ॥१॥ कस्तूरीतिलकाश्चितोन्दुविलसत्प्रोद्भासिमालस्थली कर्पूरद्रवमिश्रचूर्णखदिरामोदोल्लसद्वीटिकाम् प्रतिदिन इन तीनों लोकोंका पाठ करते हैं, वे लोग अनेक जन्मोंके सश्चित दातसमूहसे मुक्त होकर शिवजीके उसी कल्याणमय पदको पाते हैं ॥ ४ ॥ जिनके चाट और अरुण नेत्रोसे करुणा प्रकट हो रही है, चन्द्रमा और सूर्य जिनके मस्तकके आभूपण है, जिनका मुख मुन्दर मुसकानसे मुद्दोभित है, जो चराचर जगत्को रक्षिका है, सत्पुरुष जिनके विश्राम- स्थान है। गोमायमान चमाके समान सुन्दर नासिकाके अग्रभागमे मनेवाली भगवती श्रीमाताका मैं स्मरण करता ॥ १॥ जिनम लल्याट कस्तुरीकी मेंदीसे विभूषित और चन्द्रमाके समान प्रकारामान है। - २४ स्तोत्ररतायली. लोलापाङ्गतरङ्गितरधिकपासारैतानन्दिनी श्रीशैलसलवासिनी भगवती श्रीमातरं मावये ।।२। ॥ इति श्रीदेव्याः प्रातःस्मरणम् ।। (च) श्रीगणेशस्य प्रातः मरामि गणनाथमनाथपन्धु सिन्दूरपरपरिशीमितगण्डपुग्मम् उद्दण्डविपरिखण्डनचण्डदण्ड- माखण्डलादिसुरनापकवृन्दवन्यम् ॥१॥ प्रातर्नमामि चतुराननवन्धमान- मिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम् । तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयन्नयत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयोः शिवायं ॥२॥ धारावाहिनी वृष्टिसे प्रणत भोंको आनन्द देनेवाली हैं। श्रीशैल्पर निवास करनेवाली उन भगवती श्रीमाताका मैं सरण करत हूँ ।। २ ॥ जो इन्द्र आदि देवेश्वरोके समूहसे चन्दनीय हैं, अनाथोंके बन्धु हैं। जिनके युगल कपोल सिन्दूरराशिसे अनुरञ्जित हैं, जो उद्दण्ड (प्रबल) विघ्नोंका खण्डन करनेके लिये प्रचण्ड दण्डस्वरूप हैं; उनश्रीगणेश- जीको मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ ॥१॥ जो ब्रह्मासे वन्दनीय है। अपने सेवकको उसकी इच्छाके अनुकूल पूर्ण वरदान देनेवाले हैं, तुन्दिल हैं। सर्प ही जिनका यज्ञोपवीत है, उन क्रीडाकुशल शिव-पार्वतीके पुत्र (श्रीगणेशजी ) को मैं कल्याण-प्राप्तिके लिये प्रातःकाल नमस्कार गोकरूप वनके लिये दावानल (वनाग्नि.) है, गोंके नायक है, जिनका संयतचिचसे इन तीनों पवित्र श्लोकोंका नित्य पाठ करता है उसको जिनका मण्डल ऋग्वेद है, तनु यजुर्वेद है और किरणें सामवेद हैं और जो ब्रह्माका दिन है, जगतकी उत्पत्ति रक्षा और नाशका कारण है तया अलक्ष्य और अचिन्त्यस्वरूप है||१|| मैं प्रातःसमय शरीर वाणी प्रकीर्णस्तोत्राणि २८५ प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्काशीक- दायरानलं गणविखं वरकुञ्जरास्यम् । अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाह- मुत्साहवर्धनमहं सुवमीश्वरस्य ॥३॥ श्लोकत्रयमिदं पुण्यं सदा साम्राज्यदायकम् । प्रातरुत्थाय सततं यः पठेत्प्रयतः पुमान् ॥ ४॥ ॥ इति श्रीगणेशप्रातःस्मरणम् ॥ (छ) श्रीसूर्यस्य प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं रूपं हि मण्डलमृचोऽथ ततुर्यजूंषि । सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिन्त्यरूपम् ।।१।। करता हूँ ॥२|| जो अपने जनको अभय प्रदान करनेवाले हैं, भोंके मुख हायीके समान और मुन्दर है और जो अज्ञानरूप वनको नष्ट करने (जटाने) के लिये अग्नि हैं, उन उत्साह बढ़ानेवाले शिवसुत (श्रीगणेश- जी) को में प्रातःकाल भजता हूँ ॥ ३ ॥ जो पुरुष प्रातःसमय उठकर समान सुख देता है ।।४।। मैं सूर्य भगवान्के उस श्रेष्ठ रूपको प्रातःसमय स्मरण करता हूँ। - यह सोन सर्वदा साम्राज्यके २८१ स्तोत्ररजायली प्रार्नमामि पनि वनुवाधनोमि- चन्द्रपूर्वकगुरनमनितं न । वृष्टिप्रमाननविनिप्रदतुभूत प्रेलाम्यगलनपरं त्रिगुणात्मकंच॥२॥ प्रातमंजामि सवितारमनन्तशति पापीपशाभयरोगहरं परं च। 1 सर्वलोककलनात्मककालमूर्ति गोकण्ठबन्धनविमोचनमादिदेवम् ॥३॥ श्लोकत्रयमिदं मानाः प्रातःकाले पठेनु यः। स सर्वव्याधिनिर्मुक्तः परं सुखमवाप्नुयात् ॥४॥ ॥ इति श्रीयसंप्रातःस्मरणम् ।। और मनके द्वारा ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओंके स्तुति और पूजिता दृष्टिके कारण एवं अवृष्टिके हेनु, तीनों लोकों के पालनमें तत्पर और सत्व आदि त्रिगुणरूप धारण करनेवाले तरणि ( सूर्य भगवान् ) को नमस्कार करता हूँ ॥ २ ॥ जो पापोंके समूह तया शत्रुबनित मय एवं रो!का नाश करनेवाले हैं, सबसे उत्कृष्ट है, सम्पूर्ण लोकोंके समयकी गमनाके निमित्तभूत काल्वरूप हैं और गौओंके कष्ठरन्धन छुड़ानेवाले हैं उन अनन्तचिसम्पच आदिदेव सविता (सूर्य भगवान्) को मैं प्रातः काल भजता हूँ ॥ ३ ॥ जो मनुष्य प्रातःकाल सूर्यके सरपरूप इन तीनों दलोका पाठ करता है, वह सब रोगों से मुक होकर परम सुख प्राप्त कर सकता है ।

भीष्म, दात्म्य, रुक्माङ्गद, अर्जुन, वसिष्ठ और विभीषण आदि इन परम पवित्र वैष्णवोंका मैं ( प्रातःकाल ) स्मरण करता हूँ ॥१॥ वाल्मीकि सनका सनन्दन तक, व्यास, वसिष्ठ, भूगु, जाबालि, जमदग्नि, कच्छ, जनक, गर्ग, अङ्गिरा, गौतम, मान्धाता ऋतुपणे, पृथु, सगर, पन्यवाद देनेयोग्य दिलीप और नल, पुण्यात्मा युधिष्ठिर, ययाति और प्रकीर्णस्तोत्राणि २८७ (ज) श्रीभगवद्भक्तानाम् प्रहादनारदपगशरपुण्डरीक- व्यासाम्वरीपशुकशौनकमीष्मदात्म्यान् । रुक्माङ्गदार्जुनवसिष्ठविमीषणादोन् पुण्यानिमान् परमभागवतान् स्मरामि ॥१॥ (पाण्डवगीतायाः) वाल्मीकिः सनकः सनन्दनतरुासो वसिष्ठो भृगु- र्जाचालिममदग्निझन्छजनको गर्गोऽगिरा गौतमः । मान्धाता ऋतुपर्णवैन्यसगरा धन्यो दिलीपो नलः पुण्यो धर्मसुतो ययातिनहुपौ कुर्वन्तु नो मङ्गलम् ॥ २॥ (मङ्गलाष्टकात् ) ॥ इति प्रातःस्मरणम् ।। महादा नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुक, शौनक नहुये सब हमारा मङ्गल करें ।।२।।

२८८
स्तोत्ररतावली
७१-श्रीशिवरामाष्टकस्तोत्रम्
शिव हरे शिव राम सखे प्रमो त्रिविधतापनिवारण हे विमी।
अज जनेश्वर यादव पाहि मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥१
कमललोचन राम दयानिधे हर गुरो गजरक्षक गोपते।
शिवतनो भत्र शङ्करपाहि मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥२
सुजनरञ्जन मङ्गलमन्दिरं भजति ते पुरुषः परमं पदम् ।
भवति तस्य सुखं परमद्भुतं शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ३
जय युधिष्ठिरवल्लभ भूपते जय जयार्जितपुण्यपयोनिघे ।
जयमामय कृष्ण नमोऽस्तु ते शिव हरेविजयं कुरुमे वरम्।।४।
हे शिव! हे हरे, हेशिक हे राम, हे सखे ! हे प्रभो त्रिविध तापनिवारण
विभो ! हे अज, हे जगनाथ: हे यादव! मेरी रक्षा करो हे शिव !हे हरे ! मेरी
कल्याणमय विजय करो ॥१॥हे कमललोचन दयानिधे राम!हेर!
हे गुरो ! हे गजरक्षक!हे गोपते! हे कल्याणरूपधारी भव ! हे शङ्कर ! मेरीरक्षा
करो; हे शिव !हे हरे! मेरा उत्तम विजयसाधन कगे ॥२॥हे सबन.
मनरखान ! जो पुरुष नुम्हारे मङ्गलमन्दिर (शिव और विष्णुरूप)परमपदका
आभय लेते हैं, उन्हें परम दिव्य मुख प्राप्त होता, अतएव हे शिष !
हेहरे! मेरा वर विजयसाधन करो ॥३॥ युधिष्ठिरके प्रियतम ! रे
भूपते ! आप विजयी हो । है पुष्पमहासागरके आईन करनेवाले !आपकी
अप हो, अप हो दे दयामय कृष्ण! आपकी जय हो, आपको नमस्कार।
है शिव ! है हरे ! आप मेरी कल्याणमय विजय करें ॥४॥

जानीबीवन राघव ! मेरी रक्षा करो, हे शिव ! हे हरे1 मेरा वर विजय सम्पादन करो॥५॥ हे भूमिमण्डलके मङ्गलस्वरूप ! हे श्रीपते! पशिवरावन तुम्हारा नाम कल्पलता है। तुम्हारा यश नित्य मुर्वत्र गाया खा, उपापि हे माधव ! तुम मेरी उपेशा क्यों कर रहे हो!हे शिव! मेरा म विजय-साधन करो॥७॥हे देवोंमें श्रेष्ठ देव! सागर रमारते । सर्वत्र विजय पानेवाले तुझ परमेश्वरके नामरूपी पन्ध मादर्स कोष मेरे पास किस प्रकार सधित हो जायगा। ३ शिष!हेरे ! मेरा परम विजय-साधन करो।॥८॥ पिलरसाम मुन्दर ! हे राम! हे रमापते! हे वेदवर्णित गुण-सागर ! पेयर पारधारी प्रमो! हे धीयपर गवाजीको धारण करनेवाले प्रकीर्णस्तोत्राणि २८९ भवविमोचन माधव मापते सुकविमानसहंस शिवारते । जनकजारत राघव रक्ष मां शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ५ ॥ अवनिमण्डलमङ्गल मापते जलदसुन्दर राम रमापते । निगमकीर्तिगुणार्णव गोपते शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ६ ॥ पतितपावन नाममयी लता तव यशो विमलं परिगीयते । तदपि माधव मां किमुपेक्षसे शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ।। ७॥ अमरतापरदेव रमापते विजयतस्तव नामधनोपमा । मपिकथं करुणार्णव जायते शिवहरे विजयं कुरु मे वरम् ॥ ८॥ हनुमतः प्रिय चापकर प्रमो सुरसरिधृतशेखर हे गुरो। भवभयहारी माधव! हे लक्ष्मीपते हेसुकवि-मानस-हंस ! हे पार्वतोप्रिय! हे रोपवे ! है शिव ! हे रे ! मेरी कल्याणमय विजय करो ॥ ६ ॥ हे m स्तोमरतावली मम विमो किमु विसरणं कृतं शिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ।। ९॥ अहरहर्जनरञ्जनसुन्दरं पठति यः शिवरामकृतं स्तवम् । विशति रामरमाचरणाम्युजेशिव हरे विजयं कुरु मे वरम् ॥१०॥ प्रातरुत्थाय यो मक्त्या पठेदेकारमानसः । विजयो जायते तस्य विष्णुमाराध्यमाप्नुयात् ।।११।। इति श्रीरामानन्दस्वामिना विरचितं श्रीशिवरामाष्टकम् । N ७२-कैवल्याष्टकम् मधुरं मधुरेभ्योऽपि मझलेम्योऽपि मङ्गलम् । पावनं पावनेभ्योऽपि हरेन मैव केवलम् ॥ १॥ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सर्व मायामयं जगत् । देव ! हे विभो ! तुम क्यों मुझे भूल गये १ हे शिव ! हे हरे ! । परम जय-साधन करो ॥९॥ जो मनुष्य इस लोकप्रिय सुन्दर निन्द स्वामीके विरचित शिवराम-स्तवका पाठ करता है, वह राम-रमाके ग-कमलोंमें प्रवेश करनेमें समर्थ होता है । हे शिव ! हे शिव रे हरे ! श्रेष्ठ विजय-साधन करो ॥१०॥ जो प्रातःकाल उठकर एकाग्रचितो शिवरामसोत्र का पाठ करता है, उसकी सर्वत्र जय होती है और वह ने आराध्यदेव विष्णुको प्राप्त होता है ॥ ११ ॥ केवल हरिका नाम ही मधुरसे भी मधुर, मङ्गलमयसे भी मनलमप और से भी पवित्र है मासे लेकर सम्बपर्यन्त सारा संसार मायामय है, प्रकीर्णस्तोत्राणि २९ सत्यं सत्यं पुनः सत्यं हरेर्नामेव केवलम् ॥ २ ॥ सगुरुः स पिता चापि सा माताबान्धवोऽपि सः। शिक्षयच्चेत्सदा सतुं हरेर्नामेव केवलम् ॥ ३ ॥ निःश्वासे नहि विश्वासः कदा रुद्धो भविष्यति । कीर्तनीयमतो वाल्याद्धरे मैव केवलम् ॥ ४ ॥ हरिः सदा वसेत्तत्र यत्र भागवता जनाः। गायन्ति भक्तिभावेन हरनामैव केवलम् ॥ ५ ॥ अहो दुःखं महादुःखं दुःखाद् दुःखतरं यतः। काचार्थ विस्मृतं रलं हरेर्नामेव केवलम् ॥ ६॥ दीयता दीयतां करें नीयता नीयतां वचः। गीयतां गीयतां नित्यं हरे मैव केवलम् ॥ ७॥ केवल एक हरिका नाम ही सत्य है। नाम हीसत्य है, फिर भी [कहता हूँ कि] नाम ही सत्य है ॥२॥जो सर्वदा केवल हरिनामस्मरण करना ही सिखलाता है, वही गुरु है, वही पिता है, वही माता है और बन्धु भीवही है ॥ ३ ॥श्वासका कुछ विश्वास नहीं न मालूम कब रुक जायगा, इसलिये बाल्यावस्थासे ही केवल हरिनामका ही कीर्तन करना चाहिये ॥ ४॥ जहाँ मकान भक्तिभावसे केवल हरिनामका ही. गान करते हैं, वहाँ सर्वदा भगवान् विराजते हैं ॥ ५ ॥ अहो। शोक है जो .... रनको विहार श्रवणमें कान लगाओ, करो ॥७॥ . है !! सबसे बढ़कर गान २१२ तगीकरण जगरसः राजने सम्लोपरि। निदानन्दमयं शुद्ध हरेनमिन केवलम् ।। ८॥ इति भोxt पूर्णम्। ७३-साधनपत्रकम् वेदो नित्यमधीयतां वदितं कर्म वनुष्टीपतां तेनेशस विधीयतामपचितिः काम्ये मविस्त्यज्यताम् । पापीपः परिध्यतां मामुरी दोपोऽनुसन्धीयता- मात्मेच्छा व्यवसीयतां निजगृहानूर्ण विनिर्गम्यताम् ॥१॥ सनः सत्सु विधीयतां भगवती मक्किदा धीयतां शान्त्यादिः परिचीयतां दृढवरं कर्माशु सन्त्यज्यताम् । सम्पूर्ण जगत्को तृणनुल्य करके, सरके आर केवल एक हरिका गुद सचिदानन्दघन नाम ही विराजता है।॥८॥ सर्वदा वेदाध्ययन करो, इसके रताये हुए कर्मोका भलीभाँति अनुष्ठान करो, उनके द्वारा भगवान्की पूजा करो और काम्पोमें विचको मत जाने दो, पापसमूहका परिमार्जन करो, संसारसुखमें रोषानुसन्धान करो, आत्मजिज्ञासाके लिये प्रयत्न करो और शीघ्र ही छका त्याग कर दो ॥१॥ सजनोंका संग करोभगवान्की हद भकिका माश्रय लो, शमन्दमादिका भलीभाँति सञ्चय करो और कोका शीघ्र ही प्दतापूर्वक त्याग कर दो सच्चे (परमार्य जाननेवाले )विधान के पास निल प्रकीर्णस्तोत्राणि सद्विद्वानुपसर्पको प्रतिदिनं तत्पादुका सेन्यता प्रकावरमर्थ्यचां श्रुतिश्विरोपाप समाकपताम्॥२॥ वास्याश्च विचार्यतां श्रुतिशिरःपक्षः समाश्रीयतां दुस्तकात्सुविरम्यतां श्रुविमवस्तोऽनुसन्धीयताम् । चासि विमान्यतामहरहर्गः परित्यज्यता देहेऽहम्मतिरुदयतायुधजनैर्वादः परित्यज्यताम् ।। ३ ।। क्षुद्वयाधिश्व चिकित्स्यतां प्रतिदिन मिक्षाप, भुज्यता खाद्वन्लनतु याच्या विधिवशात्यानसन्तुप्यताम् । शीतोष्णादि विषयवां न तु पृथा वाक्यं समुचार्यता. मौदासीन्यममीप्सवां जनकपा नष्ठुर्यमुत्सृज्यताम् ॥क्षा जाओ और उनकी चरणपादुकास सेवन को उनसे एकाक्षरब्रह्म जिशासा करो और वेदोके महावाक्योंका श्रवण करो ॥२॥ महावाक्यके अर्यका विचार करो, महावाक्योंका आश्रय लो, कुतर्कसे दूर रहो और शुद्धि सम्मत तर्कका अनुसन्धान करो, मैं भी ब्रह्म ही हूँ'-नित्य ऐसी भावना को अभिमानको त्याग दो. देहमें अहंबुद्धि छोड़ दो और विचारवान् पुरुषों साथ वाद-विवाद मत करो।॥ ३ ॥शुधारूपव्याधिको प्रतिदिन चिकित्सा करो मिठारूप औषधका सेवन करो, स्वादु अन्नकी याचना मत करो, देवयोगले जो मिल जाय उसीसे सन्तोष करो, सर्दी-गर्मा, मुख-दुःख आदि द्वन्दों सदन करो और व्यर्थ वाक्य मत उच्चारण करो, उदासीनता धारण करो, अन्य मनुष्योंकी कृपाकी इच्छा तथा निठुरताकोत्याग दो॥ ४ ॥ एकान्दर्य

सावरलागली
पान्त गुसमासना परतरं पेतः समाधीवतां
पूरमा गुसमीक्षानां जगदिदेवाधिनं श्यताम् ।
प्रार्म प्रविलाप्पा नितिवलानाणुनरः सिम्यता
पारम्पं विहभन्यतामय.परनमात्मना स्वीयताम् ॥५॥
य: श्लोकपश्चकमिदं पठते मनुष्यः
सचिन्तयत्पनुदिनं सिरतामुपेत्य
तस्सागु संमृतिदयानलवीधार-
वापः प्रशान्तिमुपयाति चितिप्रसादाद।। ६॥
रवि भीमन्राचार्यविरचिवं साधना सम्पूर्णम् ।
नाथ
मुससे चेठो, परनझमें चिचको लगा दो, पूर्णात्माको अच्छी तरह
देखो और इस जगत्को उसके द्वारा साधित देखो, सचिव कोका
कर दो शनके यलसे क्रियमाण कमसि लिपायमान मत
होओ। प्रारब्ध फर्मको यहीं मोग बो, इसके बाद परब्रमरूपसे
इ.एकीभाव होकर ) स्थित हो जाओ ॥ ५॥ जो मनुष्य इन पाँचों
कोंको पढ़ता है और स्थिरचिचसे प्रतिदिन इनका मनन करता है,
उसके संसारदावानलके तीव घोर ताप, आत्मप्रसादके होनेसे सीन
शान्त हो जाते हैं॥६॥

प्रकीर्णस्तोत्राणि - ७४--धन्याष्टकम् तज्ज्ञानं प्रशमकरं यदिन्द्रियाणां वन्यं यदुपनिषत्सु निश्चिवार्थम् । ते धन्या भुवि परमार्थनिश्चितेहाः शेपास्तु भ्रमनिलये परिभ्रमन्ति ॥१॥ आदौ विजित्य विपयान्मदमोहराग- द्वपादिशत्रुगणमाइतयोगराज्याः । ज्ञात्वामृतं समनुभूतपरात्मविद्या- कान्तामुखारत गृहे विचरन्ति धन्याः॥२॥ त्यक्त्वा गृहे रतिमधोगविहेतुभूता- मात्मेच्छयोपनिषदर्थरसं पिबन्तः । जो इन्द्रियांका शान्त करनेवाला है, वही ज्ञान है । जो उपनिषदोंका निश्चितार्थ है। वही शेय है। जिनकी समस्त चेष्टाएँ परमादृष्टि से ही होती है, वे ही पृथ्वीतलमें धन्य है और सब तो भूलभुलैयेमें ही भटकते रहते हैं ॥ १ ॥ प्रथम विषयसमूह तया मद, मोइ, राग और द्वेष आदि शत्रुओंको जीतकर, योगसाम्राज्यको पाकर अमृतपदका शान प्राप्तकर, ब्रह्मविद्यारूपिणी कान्ताका सुखानुभव करते हुए, मानो घरमें ही विचरण करते हैं, वे योगीजन धन्य हैं ॥२॥ अधोगतिके हेतुभूत घरके मोहको छोड़कर, आत्मजिशासासे उपनिषदर्थंभूत वरलागली A नीनपहा विषयमांगपद विरक्ता पन्यापरन्ति विजन रितसङ्गाः॥३॥ त्यस्त्वा ममाहमिति बन्धकरे पदे दे मानापमानसशाः समदशिनन। कनारमन्यमवगम्य वदर्पितानि कुर्वन्ति कर्मपरिपाकालानि धन्याः ॥ ४ ॥ त्परत्वेषणात्रयमवेक्षितमोक्षमार्गा भवामृतेन परिकल्पितदेहयात्राः । ज्योतिः परात्परतरं परमात्मसंनं धन्या द्विजारहसि हृद्यवलोकयन्ति ॥ ५ ॥ नासन्न सन्न सदसन्न महन्न चाणु नसी पुमानच नपुंसकमेकबीजम् । ब्रह्मानन्दका पान करते हुए, निःस्पृह होकर, विषयभोगोंसे विरक्त हो, ज्ये निःसंगभावसे जनशून्य स्थानोंमें विचरते हैं, वे धन्य हैं॥३॥ जो मैं और मेरारूप दोनों कथनकारी भावोंको छोड़कर, मानापमानको समान समझते हुए, समदर्शी होकर तथा अपनेसे पृथग्भूत कर्ताको जानकर सम्पूर्ण कर्मफल उसको समर्पण करते हैं, वे पुरुष धन्य हैं ॥४॥ लोकैपणा, पुत्रैषणा तथा वित्तपणा--तीनोंको छोड़कर मुक्तिमार्गका अनुशीलन करके भिवामृतसे शरीरयात्रामा निर्वाह करते हुए, जो परमात्मसंज्ञक परात्पर ज्योतिको एकान्तदेशमें अपने हृदयमें अवलोकन करते हैं, वे द्विज धन्य हैं ॥ ५ ॥ जो न असत् है, न सत् है और नसदसत् है। न महान है, न अणु है। न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक है। संसारका प्रकीर्णस्तोत्राणि २९७ यैर्ब्रह्म तत्समनुपासितमेकचित्ता धन्या विरेजुरितरे भवपाशवद्धाः ॥६॥ अज्ञानपङ्कपरिमग्नमपेतसारं दुःखालयं मरणजन्मजरावसक्तम् । संसारबन्धनमनित्यमवेक्ष्य धन्या ज्ञानासिना तदवशीर्य विनिश्चयन्ति ॥७॥ शान्तैरनन्यमतिभिर्मधुरखभावै- रेकत्वनिचितमनोभिरपेतमाहैः। साकं वनेषु विजितात्मपदस्वरूपं शास्त्रपुसम्यगनिशं विमृशन्ति धन्याः॥८॥ अदिमिव जनयोगं सर्वदा वर्जयेद्यः कुणपमिव सुनारी त्यक्तुकामो विरागी। एकमात्र कारण है, उस ब्रह्मकी जिन्होंने उपासना की है, एकाग्रचित्त वे ही धन्य पुरुष सुशोभित होते हैं, और तो सर संसारबन्धनमें धे हुए है ॥ ६॥ जो पदमें सने हुए, अशान, निःसार, दुखरूप, जन्मजरामरणादिसमन्वित, संसारबन्धनको अनित्य देखकर उसको गनरूपी खड्गसे काटकर आत्मतत्त्वका निभय करते हैं, वे पुरुष धन्य हैं ॥७॥ जिन्होंने मनके द्वारा एकत्वका निश्चय किया है और मोहको त्याग दिया हे ऐसे शान्त, अनन्यमति और कोमलविच महात्माओंके साथ, जो लोग पनमें शास्त्रोंद्वारा आत्मतत्त्वका निरन्तर विचार करते हैं, वे धन्य हैं।॥ ८॥ जो जनसमूहको सदा सर्प-सहवास के समान त्यागता है, मुन्दर २९८ स्तोपरतापली विपमिव विषयान्यो मन्यमानो दुरन्तान् जयति परमहंसो मुक्तिभावं समेदि ।।९॥ सम्पूर्ण जगदेव नन्दनवनं सर्वेऽपि कल्पद्रुमा गाङ्गंवारिसमस्तवारिनिवहाः पुण्याः समस्ताः क्रिया। वाचः प्राकवसंस्कृताः श्रुतिशिरा वाराणसी मेदिनी सर्वावस्थितिरस्य वस्तु विषया दृष्टे परब्रह्मणि ॥१०॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छङ्कराचार्यविरचिवं धन्याष्टकं सम्पूर्णम् । ७५--कौपीनपञ्चकं स्तोत्रम् वेदान्तवाक्येषु सदा रमन्तो मिक्षानमात्रेण चतुष्टिमन्तः। अशोकवन्तः करुणकवन्तः कोपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः॥१॥ स्त्रीकी वैराग्यमावसे शवके समान उपेक्षा करता है, दुस्त्या विपर्योको विषके समान छोड़ता है, उस परमहंसको जय हो जय हो । वही मुतिको प्राप्त होता है ||९| जिसने परब्रमका साक्षात्कार कर लिया है, उसके लिये सारा संसार नन्दनवन है, समस्त वृक्ष कला , सम्पूर्ण जल गङ्गाजल है। उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र है, उसकी वाणी प्राकृत होअथवा संस्कृत हो वेदकी सारभूत है, उसके लिये सम्पूर्ण भूमण्डल काशी (मुक्तिक्षेत्र) ही है। वया और भी उसकी मो-जो चेष्टाएँ हैं, सर परमार्थमयी ही हैं ॥१०॥ सदैव उपनिषद्-यायोंमें रमते हुए, भिशाके अनमा । सन्तोष रखते हुए गोकरहित तथा दसानान्, कोपीन धारण करने याले ही माग्यवान हैं ॥१॥ केवल शलोंमें रहनेवाले, दोनों

फोपीनपारी ही भाग्यवान् ॥४॥ पवित्र पञ्चाशरमन्त्र (नमः शिवाय)
प्रकीर्णस्तोत्राणि
२९९
मूलं तरोः केवलमाश्रयन्तः पाणिद्वये भोक्तुममत्रयन्तः।
कन्यामपिस्त्रीमिव कुत्सयन्तः कौपीनयन्तः खलु माग्यवन्तः॥२॥
देहामिमानं परिहत्य दादात्मानमात्मन्यवलोकयन्तः ।
अहर्निशं ब्रह्मणि येरमन्तः कौपीनवन्तः खलु भाग्यवन्तः।।३।।
खानन्दमावे परितुष्टिमन्तः स्वशान्तसन्द्रियवृत्तिमन्तः ।
नान्तं नमध्यं नवहिः सरन्तःकौपीनवन्तःखलुभाग्यवन्तः॥४॥
पञ्चाधरं पावनमुच्चरन्तः पतिं पशूनां हृदि भावयन्तः ।
मिक्षाशनादिक्षु परिभ्रमन्तःकौपीनवन्तः खलु माग्यवन्तः॥५॥
इति श्रीमन्छङ्कराचार्यविरचितं कौपीनपञ्चकं (यतिपञ्चक) सम्पूर्णम् ।
हायोंको ही भोजनपात्र नानेवाले, गुदड़ीको भी नीकी भांति
इन बुद्धिसे देखनेवाले, कौपीनधारी ही भाग्यवान् है ॥ २ ॥
देशभिमानको दूरसे ही छोड़कर, अपनी आत्मायो अपने में ही देखते हुए
यतदिन बनमै रमण करनेवाले कौपीनधारी ही माग्यवान् है ॥३॥
आत्मानन्दमें ही सन्तुष्ट रहनेवाले, अपने भीतर ही सारी इन्द्रियों की चियाँ
अन्त कर लेनेवाले, अन्त, मध्य और बाहरी स्मृतिसे घन्य रहनेवाले,
का जप करते हुए, हृदयमें परमेश्वरकी भावना करते वया भिशाका भोजन
हुए सब दिशाओंमें विचरनेवाले, कोपीनधारी ही भाग्यान ॥५॥

३०० स्तोत्ररलावली ७६-परापूजा अखण्टे सचिदानन्दे निर्विकल्पैकरूपिणि । स्थितेऽद्वितीयभावेऽमिकथं पूजा विधीयते ॥१॥ पूर्णसावाहनं कुत्र सर्वाधारस चासनम् । स्वच्छस पायमयं च शुद्धस्साचमनं कुतः॥२॥ निर्मलस कुतः स्नान वस्त्र विवादरस्य च । अगोत्रस्य ववर्णस्य कुतस्तस्योपवीतकम् ॥ ३॥ निर्लेपस्स कुवा गन्धः पुष्पं निर्वासनस्य च । निर्विशेषस्य का भूपा कोऽलशरो निराकृतेः॥४॥ निरञ्जनस्य कि किं धूपदीपर्वा सर्वसाक्षिणः। निजानन्दकप्तस्य नैवेद्यं किं मवेदिह ॥५॥ अखण्ड, सचिदानन्द और निर्विकल्पकरूप अदितीय मावके स्थिर हो जानेपर किस प्रकार पूजा की जाय !॥१॥ जो पूर्ण है, उसका आवाहन कहाँ किया जाय ? जो सबका आधार है, उसे आसन किस वस्तुका दें। जो स्वच्छ है, उसको पाय और अh कैसे दें! और जो नित्य शुद्ध है, उसको आचमनकी क्या अपेक्षा ? ||२|| निर्मलको लान कैसा ? सम्पूर्ण विश्व जिसके पेटमें है, उसे वन कैसा ! भौर जो वर्ण तथा गोत्रसे रहित है, उसके लिये यज्ञोपवीत कैसा ? ॥ ३ ॥ निलेपको गन्ध कैसी ? निर्वासनिकको पुप्पोंसे क्या निर्विशेषको शोभाकी स्या अपेक्षा ? और निराकारके लिये आभूषण क्या? ॥४॥ निरञ्जनको धूपसे क्या ! सर्वसाक्षीको दीप कैसा तथा जो निजानन्दरूपी अमृतसे तृप्त मेरा आत्मा ही तुम हो, बुद्धि श्रीपार्वतीजी है, प्राण आरके गण हैं, निदा समाधि है, मेरे चरणोंका चलना आपकी प्रदक्षिणा है और मैं प्रकीर्णस्तोत्राणि ३०१ विद्यानन्दपितुस्तस्य किं ताम्बूलं प्रकल्प्यते । स्वयंप्रकाशचिद्रूपो योऽसार्कादि भासकः ॥६॥ प्रदक्षिणा ह्यनन्तस्य ह्यद्वयस्य कुतो नतिः । वेदवाक्यरवेद्यस्य कुतः स्तोत्रं विधीयते ॥ ७॥ खयंप्रकाशमानस्य कुतो नीराजनं विभोः । अन्तर्वहिश्च पूर्णस्य कथमुद्वासनं भवेत् ।। ८॥ एवमेव परापूजा सर्वावस्थासु सर्वदा । एकयुद्धथा तु देवेशे विधेया ब्रह्मवित्तमः ॥९॥ आत्मा र गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं पूजा ते विविधोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः । है, उसे नैवेद्यसे क्या ? ॥ ५ ॥ जो स्वयंप्रकाश, चिस्वरूप, सूर्य-चन्द्रादिका भी अवभासक और विश्वको आनन्दित करनेवाला है, उसे ताम्बूल क्या समर्पण किया जाय । ॥६॥ अनन्तकी परिक्रमा कैसी ! अदितीयको नमस्कार कैसा ! और जो येदवास्योंसे भी जाना नहीं जा सकता, उस सवन से किया जाय ! ॥७॥ जो स्वयंप्रकाश और विभु है, उसकी भारती केसे की जाय । तया जो बाहर-मीवर सब ओर परिपूर्ण है। उसका विसर्जन कैसे हो । ॥ ८॥ोशाओंको सर्वदा, सब अवस्थाओं में, इस्त्री समर एक दिसे, मगवान्की परापूजा करनी चाहिये ॥ ७ ॥ हे शम्भो ! पर भारी करिया है, नाना प्रकारको भोगसामग्री आपन पूजोपचार ३०२ स्तोत्ररतावली सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्व गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥१०॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यकृतं परापूजास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ७७--चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रम् दिनमपि रजनी सायं प्रातः शिशिरवसन्तौ पुनरायातः । कालः क्रीडति गच्छन्यायुम्नदपि न मुञ्चन्याशावायुः ॥१॥ मज गोविन्दं भज गोविन्दं भज गोविन्दं मूढमते । प्राप्ते सन्निहिते मरणे नहि नहि रक्षति डुकृञ् करणे ॥ (ध्रुवपदम्) जो कुछ भी बोलता हूँ यह सर आपके स्तोत्र है, अधिक क्या ? मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है ॥१०॥ दिन और रात, सायंकाल और मातःकाल, शिशिर और वसन्त पुनः पुनः आते है। इसी प्रकार कालकी लीला होती रहती है और आयु बीत जाती है, किन्तु आशरूपी यायु छोड़ती ही नहीं अवः हे मूढ ! निरन्तर गोपिन्दको ही भज, क्योंकि गरयुके समीर आनेपर 'हुम् करणे'. यह रटना रक्षा नहीं कर सकेगी ॥१॥ दिनमें आगे अग्नि और पीछे सूर्यसे घरीर तपाते हैं, राधिक समय जानु में ठोड़ी दराये पड़े रहते हैं, हापमें ही मिशा माँग लाते हैं। • श्यामने 'हम करणे' एक पातु , से एक मानणार र रेशर, शापानी या परेश शिक्षा जिसने भगवान कृष्णचन्द्रका अर्चन किया है, उसकी यमराज क्या चर्चा मृत्युके आनेर 'इकल करणे' रटना रक्षा न कर सकेगी ॥५॥ प्रकीर्णस्तोत्राणि ३०३ अग्रे वह्निः पृष्ठे भान रात्रौ चिघुकसमर्पितजानुः । करतलभिक्षातरुतलवासस्तदपि न मुञ्चत्याशापाशः। भज०१२। यावद्वित्तोपार्जनसक्तस्तावनिजपरिवारो पश्चाद्धावति जर्जरदेहे वातां पृच्छति कोऽपिन गेहे । भज० ॥३॥ जटिलो मुण्डीलुश्चितकेशकापायाम्बरबहुकृतवेषः। पश्यन्नपिचनपश्यति लोको युदरनिमित्तं बहुकृतशोकामज०४॥ मगवद्गीता किञ्चिदधीता गङ्गाजललवकणिकापीता। सकदपि यस मुरारिसम तस्य यमः किं कुरुते चर्चाम् ।भज०।५। सके तले ही पड़े रहते हैं, फिर भी आशाका जाल जकड़े ही रहता है। अतः हे मूद ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर 'हुकन करणे' यह रटना रक्षा नहीं कर सकेगी ॥ २ ॥ अरेजबतक तू धन कमानेमें लगा हुआ है तभीतक तेरा परिवार इससे प्रेम करता है, जब जरामस्त होगा तो घरमें कोई बात भी न पूछेगा अतः हे मूद ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके उमीप आनेपर दुक करो' यह रटना रक्षा न कर सकेगी ॥ ३ ॥ वटाजूटधारी होकर, मुण्डित होकर, लुचितकेश होकर, कापायाम्बरधारी रोकर ऐसे नाना प्रकार के वेष धारण करके यह मनुष्य देखता हुआ भी ही देखता और पेटके लिये ही नाना प्रकारसे शोक किया करता है। अतः हे ३ । निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह इक करणे' रटना रक्षा न कर सकेगी ॥ ४॥ जिसने भगवद्गीताको छ भी पढ़ा है, गङ्गाजलकी जिसने एक बूंद भी पी है, एक बार भी कर सकता है ? अतः हे मद ! निरन्तर गोविन्दको ही भज, क्योंकि ३०४ स्तांपरसायली अझं गलितं पलितं मुण्डं दशनविहीनं जावं तुण्डम् । गृद्धीयाति गृहीत्वा दण्डं तदपिन मुश्रत्याशा पिण्डम् मज०६ बालस्तायत्क्रीडासक्तस्तरुणस्तावचरणीरक्तः युद्धस्तावचिन्तामग्नः पारे ब्रह्माणि कोऽपि न लग्नःमज०७ पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम् । इह संसारे खलु दुस्वारे कृपयापार पाहि मुरारे । मज०८) पुनरपिरजनी पुनरपि दिवसः पुनरपि पक्षःपुनरपि मासः। अब गलित हो गये, शिरके बार पक गये, मुखमें दाँत नहीं रहे, बूढ़ा हो गया, लाठी लेकर चलने लगा, फिर भी आशा पिण्ड नहीं छोड़ती; अरे मूद ! निरन्तर गोविन्दको मज, क्योंकि मृत्युके समीप आनेपर यह 'दुर करणे' रटना रक्षा न कर सकेगी ॥ ६ ॥ चालक तो खेल-कूदमें आसक रहता है, वरुण तो नौमें आसक है और वृद्ध भी नाना प्रकारको चिन्ताओंमें मग्न रहता है, परनामें तो कोई संलग्न नहीं होता। अतः अरे मूढ़ ! त् सदा गोविन्दका ही भजन कर, क्योकि मृत्युके समीप आनेपर 'डुकृञ् करणे' यह रटना रक्षा न कर सकेगी ॥ ७ ॥ इस संसार में पुनः पुनः जन्म, पुनः पुनः मरण और वारंवार माताके गर्भमें रहना पड़ता है, अतः हे मुरारे ! मैं आपकी शरण हूँ, इस दुस्तर और अपार ससारसे कृपया पार कीजिये। इस प्रकार अरे मूद ! न तो सदा गोविन्दका ही भजन कर, क्योंकि मृत्युके समीप आने- पर 'डुकृञ् करणे' यह रटना रक्षान कर सकेगी ॥ ८॥रात्रि दिन पक्ष, मास, अयन और वर्ष कितनी ही बार आये और गये तो भी लोग ईयो और आशाको नहीं छोड़ते, अतः अरे मूढ ! तू सदा गोविन्दका भजन कर । ।

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स्तोत्ररतावली ने सझनमो चिर देयं दीनजनाप न विचम् । मज०।१३॥ यावसीयो निरमाते देह कगलं वारताच्छति गई। गपति वायो देहापाये मार्या विम्पति वसिन्काये।मब० ॥१४॥ सुखवः क्रियते रामामोगः पश्चादन्त शरीरे रोगः। यपपि लोके मरणशरणं वदपिन मुश्चति पापाचरणम् ।मज०।१५। रप्पाचर्पटविरचितकन्या पुण्यापुष्यविवर्जितपन्यः। नाई न त्वं नार्य लाकस्तदपि किमर्थ क्रियते शोकः। मज०॥१६॥ धन दान करना चाहिये और हे मूट! नित्य गोविन्दका हो मजन फर, क्योंकि मृत्युके निकट मानेपर दुका करपे' या रटना रखा न कर सकेगी ॥ १३ ॥ जबतक प्राण शरीरमें हैं तबतक ही लोग घरमें कुशल पूराते हैं, प्राण निकलनेपर शरीरका पदन हुआ कि फिर अपनी नी मी उससे भय मानती है। अतः हे मूद ! नित्य गोविन्दको ही भज, स्योंकि मृत्युके निकट आनेपर 'हुकम् करणे' यह रटना रक्षा न कर सकेगी ॥१४॥ पहले तो सुखसे ब्रा-सम्भोग किया जाता है, किन्तु पीछे शरीरमें रोग घर कर लेते हैं। यद्यपि संसारमें मरना अवश्य है तथापि लोग पापाचरणको नहीं छोड़ते; अतः हे मूढ । सदा गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर 'डुक करणे यह रटना स्वा न कर सकेगी ॥१५॥ गलीमें पड़े चिथड़ोंकी कन्या बना ली, पुण्यापुष्पसे निराला मार्ग अवलम्बन कर लिया, 'न मैं हूँ न तू है और न यह संसार है'-(ऐसा भी जान लिया ), फिर भी किसलिये शोक किया जाता है ! अतः हे मूढ! • गोविन्दका भजन कर, क्योंकि मृत्युके निकट आनेपर 'डुकृञ् करणे' रटना रक्षा न कर सकेगी ॥१६॥ चाहे गंगा-सागरको जाय, चाहे प्रकीर्णस्तोत्राणि ३०७ कुरुते गङ्गामागरगमनं व्रतपरिपालनमधवा दानम् । ज्ञानविहीनः सर्वमतेन मुक्तिं न भजति जन्मशनेन । मज०१७) इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितं चर्पटपञ्जरिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ७८-द्वादशपञ्जरिकास्तोत्रम् मूढ जहीहि धनागमतृष्णां कुरु सद्बुद्धि मनसि वितृष्णाम् । यल्लभसे निजकर्मोपात्तं वित्तं तेन विनोदय चित्तम् ॥ १॥ मज गोविन्दं भज गोविन्द गोविन्दं भज मूढमते ।। ( भुवपदम्) अर्थमनर्थ भावय नित्यं नास्ति ततः सुखलेशः सत्यम् । पुत्रादपि धनमाजां भीतिः सर्वत्रपा विहिता नीतिः । मबास नाना प्रोग्वालोंका पालन अथवा दान करे तथा बिना शानके न । सबसे सौ जन्ममें भी मुक्ति नहीं हो सकती। अतः हे मद सर्वदा गोविन्दका मनन कर, क्योंकि मृत्यु के निकट आनेपर 'हुक करणे (अथवा हा धन ! हा कुटुम्ब हा संसार !!!) यह रटना रक्षा न कर सकेगी ॥ १७॥ '! धनसमयकी लालसाको छोड़ सुबुद्धि पारण का मनसे तृष्णाहीन हो अपने प्रारम्भानुसार तुझे जो कुछ विन मिल आय, उनीसे चित्तको प्रसन्न रख और हे भूटमते ! निरन्तर गोविन्दको मज ॥१॥ अर्यको नित्य अनर्थरूप जान, उसमै सचमुच ही मुखका लेश भी नहीं है। अरे! सभी जगह ऐसी नीति देखी है कि धनवान्को वो अपने पुत्र भी मय रहता है। इसलिये सदा गोविन्द मन ॥२॥ कौन ३०८ स्तोत्ररतावली का ते कान्ता कस्ते पुत्रः संसारोऽयमदीव विचित्रः। कस्स त्वं कः कुत आयातस्तत्वं चिन्तय यदिदं प्रातः मज०३। मा कुरुधनजनयौवनगर्व हरति निमपात्कालः सर्वम् । मायामयमिदमखिलं हित्वाब्रह्मपदं त्वं प्रविश विदित्वा मजला कामं क्रोघं लोमं मोडं त्यक्त्वात्मानं भावय कोऽहम् । आत्मज्ञानविहीना मूढास्ते पच्यन्ते नरकनिगूढाः ।मज०।५। सुरमन्दिरतरुमूलनिवासः शय्या भूतलमजिनं वासः | सर्वपरिग्रहमोगत्यागः कस्य सुखं न करोति विरागः मज०६। शत्रौ मित्रे पुत्र वन्धौ मा कुरु यत्तं विग्रहसन्यो। नेरी स्त्री ? कौन वेरा पुत्र ! अरे ! यह संसार बड़ा विचित्र है, भाई! इसी तवका निरन्तर विचार कर कि, 'तू कौन है ? किसका है। और कहाँसे आया है। और गोविन्दको भज ॥ ३ ॥ धन, जन और यौवनका गर्व मत कर, काल पलक मारते ही इन सबको नष्ट कर देता है, इस सम्पूर्ण मायामय प्रपञ्चको अड़कर ब्रमपदको जानकर उसीमें प्रवेश कर और हे मूढ ! सदा! गोविन्दको भज |॥४॥ काम, क्रोध, लोभ, मोहको त्याग कर अपने लिये विचार कर कि 'मैं कौन हूँ, जो मूद आत्मशानसे रहित है। ये नरफमे पड़े हुए सन्तप्त होते रहते हैं, अतः सदा गोविन्दको भज ॥५॥ जहाँ देवमन्दिर अथवा वृक्षतलका निवास, पृथ्वीकी ही दशम्या मगवर्मका यख और सब प्रकारके परिप्रद और भोगोंका त्याग ऐसा पैराग्य किसको मुख नहीं पहुंचाता ! अतः सदा गोविन्दको ॥ ६ ॥ यदि विष्णुत्वको शीम प्राप्तिका अमिलाती है तो , पुष और स्पोंसे मेल अपना अनमेलका प्रपत्र मत कर और प्रकीर्णस्तोत्राणि ३०० मव समविचः सर्वत्र त्वं वाञ्छस्यचिराद्यदि विष्णुत्वम् ।मज०७ (स्वपि मयि चान्यत्रैको विष्णुर्व्यर्थ कुप्यसि सर्वसहिष्णुः। सर्वसिबपि पश्यात्मानं सर्वत्रोत्सृज भेदाज्ञानम् मिज०८) प्राणायाम प्रत्याहारं नित्यानित्यविवेकविचारम् । जाप्यसमेतसमाधिविधानं कुर्ववधानं महदवधानम् ।मज०।९। नलिनीदलगतसलिलं तरलं तद्वञ्जीवितमतिशयचपलम् । विद्धि व्याध्यमिमानग्रस्त लोकं शोकहतं च समस्तम् ।मज०।१०। का तेऽष्टादशदेशे चिन्ता वातुल तव किं नास्ति नियन्ता। यस्त्वा हस्ते सुदृढनिवद्धं वोधयति प्रमवादिविरुद्धम् ।मज०।११। सर्वत्र समभाव रख तथा निरन्तर गोविन्दको मज ॥७॥ तुझमें, मुझमें और अन्यत्र मी सबमें एक ही वासुदेव है, इसलिये कोप करना व्यर्थ है। सबको सहन करनेवाला हो, आत्माको ही सबमें देख, भेदरूपी अशानको सर्वत्र त्याग दे और सर्वदा गोविन्दका भजन कर ॥ ८ ॥ प्राणायाम, प्रत्याहार और नित्यानित्य वस्तुका विवेकपूर्वक विचार कर, विधिपूर्वक भगवनामस्मरणके सहित ध्यान करनेका निक्षय कर क्योंकि यही महान् निश्चय है और सदा गोविन्दका-मजन कर ॥९॥ कमलपत्रपर पड़ी हुई बूँद जैसे स्थिर नहीं होती है, वैसा ही अति चञ्चल यह जीवन है। खूब समझ ले, न्याधि और अभिमानसे ग्रस्त हुआ यह सारा संसार अति शोकाकुल है, अवः त् सदा गोविन्दका भजन कर |॥ १०॥रे पागल जीव ! तू अठारह जगहकी चिन्ता क्यों कर रहा है, क्या मुम्हारा कोई नियन्ता नहीं है ! जो मुम्हारे दोनों हाय खूब कसके बाँधकर तुम्हें जन्म-मरणादि विकारोंसे रहित आत्मतत्वका रोध करा दे। अरे मूद ! सर्वदा गोविन्दका मजन कर ॥ ११॥ गुरुदेवके चरणम्मलोंका स्तोत्ररत्नावली AL गुरुचरणाम्बुजनिर्मरमत्तः संसारादचिराद्रव मुकः । सेन्द्रियमानसनियमादेव द्रक्ष्यसि निजहृदयस्थ देवम् ।मजा द्वादशपञ्जरिकामय एपः शिष्याणां कधितो झुपदेशः। येषां चित्ते नैव विवेकस्ते पच्यन्ते नरकमनेकम् ।मजन इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं द्वादशपञ्जरिकास्तोत्रं सम्पूर्णम् । ७६-गौरीशाष्टकम् मज गौरीशं भज गौरीशं गौरीशं भज मन्दमते । (धुवपदम जलभवदुस्तरजल धसुतरणं ध्येयं चित्ते शिवहरचरणम् । अन्योपाय नहि न हि सत्यं गेयं शङ्कर शङ्कर नित्यम् । मज । अनन्य भक होकर संसारसे शाम ही मुक हो जा, इस प्रकार इन्द्रियोंके सहित मनका संयम करनेसे तु शीघ्र ही अपने हृदरस देवक देखेगा; अतः निरन्तर गोविन्दका भजन कर ॥ १२ ॥ यह दादशपरिका स्तोत्रं शिष्योंके उपदेशके लिये कहा गया है, जिनके हृदसमें विवेक न है, वे दीर्घकालतक नरकयातना भोगते हैं। अतः हे मृदुमते । निरन्ता गोविन्दका मजन पर ॥ १३ ॥ हे मन्दबुद्धिवा । तू सदा गौरीश ( शहरमगवान् ) का भजन कर । संसाररूप दुखर सागरसे पार लगानेवाले भगवान् शिके ही चरणका ध्यान कर, संसारसे उदार पानेका दूसरा कोई उपाय ही नहीं है। यह सत्य जाना सदा शरके नामका ही गान किया कर। हेमन्दम। सदा गोरीपति भगवान शिवको मन ॥१॥ी सन्तान क्षेत्र पन)

प्रकोणस्तोत्राणि
३१
दारापत्यं क्षेत्रं वित्त देहं गेहं सर्वमनित्यम् ।
इति परिमावय सर्वमसारं गर्भविकृत्या खमविचारम् ।भजारा
मलवैचित्ये पुनरावृचिः पुनरपि जननीजठरोत्पत्तिः ।
पुनरप्याशाकुलितं जठरं किं नहि मुञ्चसि कथयोश्चत्तम्।मज०॥३॥
मायाकल्पितमैन्द्रं जालं न हि तत्सत्यं दृष्टिविकारम् ।
ज्ञाते तत्वे सर्वमसारंमा कुरु मा कुरु विषयविचारम् ।मज०।४।
सर्पभ्रमणारोपस्तद्वद्रह्मणि जगदारोपः।
मिथ्यामायामोहविकारं मनसि विचारय वारम्बारम् ।मज०।५।
घरीर और गृह-ये सब अनित्य है; गर्भविकारके परिणामभूत इस
सारको सारहीन तथा स्वमवत् असत्य समझकर सबकी उपेक्षा कर
: हे मन्दमते ! सदा गौरीपति भगवन् शिवको भज ॥ २ ॥
लभूत संमारके रूपपर मोहित होनेसे पुनः संसारमें लौटना पड़ता है, फिर
ताके गर्भसे उत्पत्ति होती है, अतः पुनः आशासे भ्याकुल हुए अपने चित्त
कह दे कि रे चित्त ! क्यों नहीं इस पेटको चिन्ताको ओड़ता है ।
र हे मन्दमते ! तू सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ३ ॥
, यह सारा प्रपत्र मायासे कल्पित इन्द्रजाल है, इसका विकार प्रत्यक्ष
। गया है, इसे कदापि सत्य न जान, तत्वज्ञान हो जानपर सब कुछ
र ही ठहरता है, इसलिये विषयोपभोगका विचार कभी न कर
न्दमते ! सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ४॥ जैसे रज्जुमें
3 सर्पका आरोप होता है, उसी प्रकार शुद्ध प्रझमें जगत्का आरोप-
है, यह माया मोहका विकार असत्य है, इस बातको तू बारम्बार
विचार; हे मन्दमते ! सदा गौरीपति भगवान शिवको मज ॥५॥

३१२
तापरासी
अमरकोटीगागमनं उसने योग पेन्द्रियदना
भानविहीनः सर्वमतेन न मपनि मुली जन्मशतेन ।
सोऽहं हंसो नपाई शुद्धानन्दस्वचपरोध
अदेतोऽहंसनाविहीने नेन्द्रिय पात्मनि निखिले ठीने
शवरकिकर मारु चिन्ता चिन्तामणिना विरचितमेत
यः सद्भक्त्या पठति हि नित्यं
प्राणि लीनो मपति हि सत्यम् ।
पति भीचिन्तामणिविरचितं गोरीयार यापूर्वन् ।
4
लोग करोड़ों यश करते हैं, नानार्थ गवाजी जाते हैं, इन्द्रियों
करनेवाला योग करते हैं, परन्तु यह सरसा सिद्धान्तमत
ज्ञानहीन जीव सेकड़ों जन्म, मी मुक्त नहीं हो सकता। इस
मन्दमते ! त् सदा गोरीपति भगवान् शिवय मदन कर ।
जब सम्पूर्ण इन्द्रियाँ विषयोंसे निवृत्त होकर आत्मामें न हो
उस समय ऐसा मान होने लगता है कि में ही वह परमात्मा
शुद्ध भ्रम हो हूँ तथा इन पचभूतोंसे पृथक् शुद अति आनन्दल
हे मन्दमते ! सदा गौरीपति भगवान् शिवका नजन कर ॥
हे शिवके सेवक ! चिन्ता न कर, क्योंकि जो पुरुष चिन्तार्मा
रचित इस गौरीशाष्टकस्तोत्रका शुद्ध भक्ति नित्य पाठ करता
ब्रह्ममें लीन हो जाता है, यह सत्य बात है। इसलिये हे मन्दम
तू सदा गौरीपति भगवान् शिवको भज ॥ ८॥

प्रकीर्णस्तोत्राणि ३१३ AL ८०-सवश्लेकीगीता ओमित्येकावरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुसरन् । यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमो गतिम् ॥१॥ स्थाने हपीकेश तव प्रकीर्त्यां जगत्प्रहष्यत्यनुरज्यते च । रक्षांसि भीतानिदिशोद्रवन्तिसर्वे नमस्यन्तिच सिद्धसंघाा। सर्वतःपाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् । सर्वतःश्रुविमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति कवि पुराणमनुशासितारमणोरणीयांसमनुसरेयः । सर्वस्वधातारमचिन्त्यरूपमादित्यवर्ण तमसःपरस्तात् ॥४॥ 'ओम्' इस एक अक्षररूप ब्रसके नामका उच्चारण करता दुआ पोर ओङ्कारके अर्थस्वरूप मुसको स्मरण करता हुआ, जो मनुष्य शरीरको ग्रेडता (मरता ) है, वह परम गतिको मास हो जाता है ॥१॥ । हषीकेश ! आपके गुणोंके कीर्तनसे जो जगत् प्रसन और प्रेमान्वित हो रहा है, यह उचित ही है, ये राक्षस लोग भयभीव होकर सब दिशाओंमें नाग रहे है और सब सिद्गण आपको नमस्कार कर रहे हैं यह भी एक ही है ॥ २॥ वह सब ओर रहनेवाले हायों और चरोंसे युक्त. । तया सब ओर रहनेवाले आँखों, चिरों और मुखोंसे युक्त है एवं सब ओर ब्यापकरूपसे रहनेवाली प्रवणेन्द्रियोंसे भी युक्त है और समस्त जगत्- को व्याप्त कर स्थित है ॥ ३ ॥ जो सर्वश है और सबसे प्राचीन, जगतका शासन करनेवाला सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म है। सबका धाता (सब माणियाँको कर्मानुसार पृषक पृषक फल देनेवाला ) है, जिसके रूपका चिन्छन अन्य जो सूर्यके समान प्रकाशमय वर्णवाला है और जो अनसे अतीत, उसको जो सरण करता है। वह उस परमपुरुषको प्राप्त होता tirh ३१४ स्तोत्ररत्नावली ऊर्ध्वमूलमधाशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदविद ॥५॥ सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तः स्मृति नमपोहनं च। वेदेव सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकद्वेदविदेव चाहम् ॥६॥ मन्मना भव मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु । मामेष्यसि युक्त्वैवमात्मान मत्परायणः ॥७॥ इति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णा- र्जुनसंवादे सप्तश्लोकीगीता सम्पूर्णा । जिसका ऊर्य ( ब ) ही मूल है और नीने शाखाएँ ( अहङ्कार, तन्मात्रा आदि रूपवाली ) हैं, ऐसे इस संसाररूप अश्वत्यवृक्षको भव्यर्थ ( अविनाशी ) कहते हैं, ऋक्, यजु और सामवेद जिसके पत्र हैं। जो इस संसार-वृक्षको इम रूपसे जानता है, यह वेदोंके अयोंका जाननेवाला है ॥ ५ ॥ मै सम्पूर्ण प्राणियोंका आत्मा होकर उनके हृदयोंमें प्रविष्ट हूँ, उनके स्मृति, ज्ञान और इन दोनों का लोप भी मुझसे ही हुआ करते हैं। सम्पूर्ण वेदोंसे मैं ही जानने योग्य हूँ और वेदान्तका कर्ता तथा वेदार्थको जाननेवाला मी मैं ही हूँ ॥६॥ तु मेरेमें ही मन लगानेवाला, मेरा ही भक, मेरी ही पूजा करनेवाला हो और मुझको दी नमस्कार कर इस प्रकार चित्तको मुममें युक्त कर मपरायण हुआ मुझे ही प्राम करेगा ॥७॥ . १.धम्से मी मूक्षम, जगएका कारण निस्य भौर मदान् होनेसे रसको पोका गया है २.ममा तन्मात्रा भादि, इसके शामा होगा। ३. संथापर नारियो चसा मावा से सम्पय।। ४.रोसेसरी रक्षा है मतः इन (दो) को पत्रामसेमागया। समान नीचे प्रकीर्णस्तोत्राणि ३१५ ८१-चतुःश्लेकीभागवतम् धीमगवानुवाच ज्ञानं परमगुर्ष मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । सरहस्यं तदनं च गृहाण गदितं मया ॥१॥ यावान यथामावो यदूपगुणकर्मः। तथैव तम्वविज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ॥ २॥ बहमेवासमेवाने नान्यद्यन्सदसन्परम् । पवादह यदेवच योऽवशिम्पेत सोऽस्म्यहम् ॥ ३॥ ऋतेय यत्प्रवीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । श्रीमगवान् बोले-[हे चतुरानन ! मेरा जो शन परम गोप्य है, विज्ञान (अनुभव ) से पुल है और मक्ति सहित है उसको और उसके साधनको मैं कहता हूँ मुनो ॥१॥ मेरे जितने स्वरूप हैं, जिस प्रकार मेरी सचा है और जो मेरे रूप, गुण, फर्म है, मेरी पासे तुमको उभी प्रकारवस्वका विज्ञान हो॥ २ ॥ सष्टिके पूर्व केवल में ही था, मेरे अतिरिक्त जो स्थूल, सूक्ष्म या प्रकृति देइनसे कुछ भी न था, सृष्टिके पश्चात् भी मैं ही था, जो यह जगत् (दृदयमान) है, यह भी मैं ही हूँ और प्रलयकालमें जो शेष रहता है वह मैं ही हूँ || ३ ॥ जिसके कारण आत्मामें वास्तविक अर्थके न रहते हुए नी उसकी प्रतीति हो और अर्यके रहते हुए भी उसकी प्रतीति न हो, एमीको मेरी माया जानो; जैसे आभास ( एक चन्द्रमामें दो चन्द्रमाका स मतारजाली -A - तद्विपादारमना माया गया मासो यथा धमः ॥ ४॥ यथा महान्ति भूतानि मापारनेप्चनु । प्रविष्टान्पविष्टानि तथा . तेगु न तेष्वहम् ।। ५॥ एतावदेव जिलास्यं तवजिशामुनात्मनः। अन्वयव्यतिरेकाम्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥६॥ एतन्मतं समातिष्ठ परमेण समाधिना। मान् कल्पविकल्पेषु न विमुपति महिंचित् ।। ७ इति भीमादागवत महापुरामयादशसारसयां रिवायां यासियां रितीयस्कन्धे भगवानसंवादे चतुरलोकीमागवतं समातम् । Hसमा स्तोत्ररतावली ॥ भ्रमात्मक शान) और जैसे राहु (राहु जैसे प्रहमण्डलों में स्थित होकर मी नहीं दीख पड़ता ) ॥ ४ ॥ जैसे पाँच महाभूत उचावच मौतिक पदायाम कार्य और कारणभावसे प्रविष्ट और अप्रविष्ट रहते हैं, उसी प्रकार में इन भौतिक पदार्योंमें प्रविष्ट और अप्रविष्ट भी रहता हूँ [इस प्रकार मेरी सच है] ॥५॥ आत्माके तत्वजिज्ञासुके लिये इतना ही जिशास्स है, जो अन्वय- व्यतिरेकसे सर्वत्र और सर्वदा रहे वही आत्मा है॥६॥ चिचकी परम एकामतासे इस मतका अनुष्ठान करें, कसकी विविध सष्टियोंमें आपको कमी भी कांपनका अभिमान न होगा ॥ ७॥ ॥ हरिः ॐतत्सत् ॥

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Istrot Ratnawali

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Istrot Ratnawali
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Istrot Ratnawali
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Citation
1920
Published
2011/08
Publisher
Bikaner,adarash Prakashan Mandir
Language
Sanskrit
Pages
327
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
DLI number
310968
Barcode
99999990314404.00
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Banasthali University
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