Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Shri Varddhmancharitra

Pandit,gyanchandra Ji · 2011/04

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स्वर्गीय जनमुनि प. म्यामि ज्ञानचन्द्रजीमहाराज
141
जम १९५३ दीक्षा १९६७ म्वगवास १९७२
चत्र कृष्ण १२ वृहस्पतिवार यरनालामें

ॐ
श्रीवर्द्धमानचरित्र.
जिसको
श्री श्री श्री १००८ उपाध्याय आत्मारामजी
महाराजके सुशिप्य स्वर्गवासी जैनमुनि
प. ज्ञानचन्द्रजी महाराजने
अति परिश्रमसे तग्यार किया
प्रकाशक
मेहरचन्द लक्ष्मणदास जैनी
सस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष लाहौर (पजाव)
बम्बईमें निणयसागर' छापखानेमें छपाकर प्रसिद्ध किया
इ स १९१७ ] प्रथमावृत्ति २००० मि

( All rights reserved ) Pablished by Vebrchand Laxmandas Jain Proprietors Sanskrit Book Depot Labore and Printed by Ramchandra Xegu Shedge, at the Virpaya-Sagar Press, 23 holbhat Lane Boo bay श्रीवीतरागाय नमः ॥ ग्रन्थकर्ताका परिचय। - प्रिय महाशयगण | इस ग्रन्थके लेसक श्रीमान् जैनमुनि प० ज्ञानचन्द्रजी महाराज है, आपका जन्म जिला लाहौर पट्टी नामक नगरमे लाला अमीचन्द्र ओसवालकी धर्मपत्नी श्रीमती खुशालदेवीकी कुक्षिसे १९५३ मे हुआ था आपने पट्टी वा क्षेमकरणमे मिडिलपर्यन्त अग्रेजी स्कूलमे शिक्षा प्राप्त की । वि० सम्वत् १९६७ मे श्री श्री श्री १००८ गणावच्छेदक वा स्थविरपदविभूपित स्वामी गणपति रायजी महाराज, श्री ३ स्वामी शालिग्रामजी महाराज, श्री ३ उपाध्याय खामी आत्मारामजी महाराज और श्री ३ स्वामी खजान- चन्द्रजी महाराज ठाणे ६ लाला गौरी और बाबू पर- मानद बी ए वकीलकी हवेलीमे चतुर्मास स्थित थे। सो उन्हीं दिनोंमे आप भी लाला जविन्देशाह आशाराम अर्जीनवीसके गृहमे आये हुये थे। आपको मुनिराजोंकी सगतिसे वैराग्यभाव उत्पन्न हो गया फिर आपने १९६७ मार्गशीर्ष कृष्ण पचदशीको फिरोजपुरमे लाला माणकचन्द्र साहूकारकी कोठीमे दीक्षा धारण की, आप श्री उपाध्याय आत्मारामजी महाराजके शिष्य हुये फिर आपने प्रेमपूर्वक विद्या अध्ययन करना प्रारम्भ किया मरहरी प्रमुखी भादि भोंका भी शकर ।

२ विद्या अध्ययन के पश्चात् जो आपको अन्य समय मिलता था उस समय आप लेस वा पुस्तक लिसते थे जिसका प्रभाव समा- जमे बहुतही शुभ हुआ। आपने स्वामी गणावच्छेदक और उपाध्यायजीके साथ निम्न प्रकारसे चतुर्मास किये। १९६८ का चतुर्मास आपने अभ्याला नगरमे किया वहा पर आपने "जैनआस्तिक सिद्धि” नामक अन्य उर्दूमे लिखा। सम्वत् १९६९ मे द्वितीय चतुर्माम लुधियाना में किया, इस चतुर्मास मे आपने व्याकरणनिर्णय, सामायिकसूत्र हिंदी पदाथ वा भावार्थयुक्त और गृहस्थधर्म यह ग्रन्थ लिसे। १९७० का तृतीय चतुर्मास आपका फरीदकोट नगरमै हुआ जिसमे आपने "जैन बालोपदेश" बहुतही सुन्दर पुस्तक लिसा। १९७१ मे चतुर्थ चतुर्मास आपने क्सूरमे किया वहा पर आपने 'ब्रह्मचर्यदिग्दर्शन' पुस्तक लिसा । १९७२ मे पचम चतुर्मास आपने नाभा रयासतमें किया, जहा पर श्री पूज्य "मोतीरामजी महाराज का जीवन- चरित्र" लिसा और आपने इस चतुर्मासतक श्री उपाध्यायजी महाराजसे जैन धर्म के २४ सून पढे और कई शास्त्रियोंसे प्रति चतुर्मासमें सस्कृत पढे थे सो आपने व्याकरण प्रन्थोंमें शारटायन प्रक्रिया सग्रह उज्वरदत्तकृत उणादिवृत्ति, हेमचन्द्राचा- यकृत हेमलिङ्गानुशासन पठन किये । नीति और काव्य ग्रन्थोंमें आपने पचतन्त्र, हितोपदेश, मेघदूत, पार्धाभ्युदय, श्रुतयोध ३ - , इत्यादि अन्ध पढे । न्यायप्रन्योमे-आपने न्यायापिका, परीक्षामु- पसून, तत्चार्थनन, तर्फसाह दीपिपाटीका, न्यायमुपावली, स्याद्वादमसरी प्रभृति मन्य पढे प्राकृत अन्धोम-सूनोंके अतिरिक प्रास्त व्याकरण और देशीनाममाला पठन की । कोपोमें-अमर- पोप और धन सयनाममाला पढी आपको सस्कृतका बहुतही अच्छा घोध हो गया था इसी कारण आपने "आचारागसून" की सस्कृत रघुवृत्ति नामक वृत्ति लिसनी प्रारम्भ की थी। जि- सरे पेचल प्रथमाध्यायये पाच उद्देश मानही आप लिग्मने पाए और माथही उक्त व्याकरण युछ अंगोया हिंदी अनुवाद भी किया। आपकी यह भी एक अत्युग अभिलापा थी कि भगवान् बर्द्धमान स्वामीजीका एक ऐसा जीवनचरिन लिसा जाये जो प्रत्येक वर्ष भगवानके जन्म दिन पर परम उपयोगी हो इमी आशासे प्रेरित होकर आपने यह काम आपने हाथमे लिया किन्तु महाशोकमे लिसना पडता है कि आपको सघके दुर्भाग्य योग्य से विपमन्चर हो गया, फिर आप अपने गुरुओंसहित विहार करते हुये वर्नाला मडीमे लाला मगनीराम गगारामके स्थानमे विराजमान हो गये आपकी यथायोग्य साधुवृत्ति के अनु- सार हकीम लाला अमीचन्द्र, शादीराम और हेमराजजीने औपधी की परन्तु कालगति ऐसी विचित्र है कि इसमे किसीका भी वल नहीं चलता अतमे आप १९७२ चैत्रकृष्ण ११ बुधवार को दिनके ११ बजे अनशन ब्रत धारण करके डेढ़ १"" अनुमान इस नश्वर गरीरको छोडकर स्वर्गमें ३ ४ - १शा यह समय आपरे वियोगका प्रत्येक व्यक्फेि लिये हृदय- विदारक हुआ जो लेपिनीसे याहिर है फिर आपके द्वारीरका द्वादश (१२) बृहस्पतिवारको बडे महोत्मक्के साथ अमिसस्कार रिया गया सरकारसमय अनुमान ५००० गृहस्थ उपस्थित थे और सस्कार आपके शरीरका फेवल चदनमधुवृतके सायही किया गया था सरकारके लिये श्रीमान हकीम अमीचन्द्र शादी- राम फ्तेहचन्द, पाननरामजीने भूमि अपनी प्रदान की जो बहुतही सुन्दर स्थान है आपकी मदेवशाल स्मृति लिये पर्नाला जैन यरादरीने एक मनोहर स्थानी उस भूमिमे धनवा दिया है. जो आराम धाग से वेष्टित है किन्तु जैनसघरो आपके वियोगसे- अमीम सेद हुआ है क्योंकि भावी आगाए आपपर सघको बहुतसी थीं, आपकी स्मरणशक्ति इतनी प्रगल थी कि आप प्रतिदिन २०० या ३०० सस्कृत शेक कण्ठस्थकर लेते थे। आपने आप्तमीमासा जैन न्याय प्रन्यये सय मूल शोक एकही दिनमे कण्ठस्थ किये थे और व्याग्यानकी गैली आपरी ऐसी उच्च कोटिकी थी कि जो श्रवण करता था वही मोहित हो जाता था यहुतसे मागधी लेगोरे आपने हिन्दी अनुवाद किये किन्तु शोक इस वातकाही है कि आपके आयुष्यपर्मने बल न दिया। चार मास आप रोगावस्थामे रहे इस समय आपकी असीम सहन शीलताको देखकर प्रत्येक व्यक्ति आश्चर्य करता था । मैं मदैव काल श्रीजिनेन्द्र देवसे प्रार्थना करताहू कि आपके समान झानमूतियां अनेक जैनमतमे प्रगट हों जिनके द्वारा जैनमत उच्च कोटिम स्थित रहे।

इस समय मैं आपका लिसा हुआ श्रीवर्धमानस्वामीजीका
जीवनचरित्र जो कुछ अशमे अपूर्ण था उसको श्री उपाध्याय
आत्मारामजी महाराजसे पूर्ण कराके प्रसिद्ध करनेमे उद्यत
हुआ हूँ।
यद्यपि आपका उद्देश इस ग्रन्थको विस्तारपूर्वक लिखनेका
था परन्तु काल्की विचित्रतासे अब यह सदैव जन्मोत्सवके दिन
पठन करनेके लिये निबन्धरूपसेही बन सका इसलिये प्रत्येक
व्यक्तिसे विनयपूर्वक मेरी विज्ञप्ति है कि प्रतिवर्ष चैनशुम्ला तेरह
१३ के दिन भगवानका जन्मोत्सव मनाते हुये प्रसिद्ध मडपमे
एक उपदेशक सडा होकर इस निधिको पढकर अवश्यही सुनावे
जिसके प्रयोगसे समाजको भगवानका जीवनवृत्तात ज्ञात हो
जावे और उसकी शिक्षासे अपने जीवनको सुधारे।
भवदीय
खजानची राम जैन
मत्री-श्री श्वे० स्था. जैनकुमार सभा लाहौर

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98) श्रीवर्द्धमानाय नम जैनमुनि प ज्ञानचन्द्रजीमहाराजविरचित श्रीभगवान् वईमानस्वामीजी महाराज का जीवनचरित्र. य पाठकगण! श्रीमहावीर स्वामी जैन मतमें जैनियोके परमपूज्य परमात्मस्वरूप चतुर्वि- शति तीर्थंकरोंमसे अवसानके चौघीसवें तीर्थ- कर हुये है जिनका जीवनवृत्तात आज आपके सन्मुस प्रगट किया जाताहै- आज से २५१५ वर्ष पहिले (ईखी सनसे ५९९ वर्ष पूर्व) इसी आर्य भरतक्षेत्रमें "कुण्डलपुर" नामक एक नगर वसता था जिसकी मेदिनी (पृथ्वी, जमीन) पुरवासियोंके अति- - * रिक्त अन्य पुरुषोंको भी सुसदायिनी थी, जिसमें बहुत जल होनेके कारण अनाज भी उत्कटतासे उत्पन्न होता था जिस कारण दुर्भिक्ष श्रादि दु सोंका अभार था, यानत् वह नगर नागरिक समस्त गुणोंसे मण्डित तथा पुरुषोंको अलकापुरी के समान प्रार्थनीय था. वहा सफलकलाविशारद, प्रजा- पालक, न्यायशील, शराग्रणी, याचकों, दुःसियों, भयमीतों अशुभकर्मसे पीडितों की चिंताओं का भञ्जक तथा पूरक और न्यायाधीशोंका शिरोमणि, राजोंके असिल गुणोंसे विभूपित महाराजाधिराज अधिपति ज्ञातवशीय काश्यप- गोनीय "सिद्धार्थ महाराज" राज्यलक्ष्मी भोगते तथा अनुशासन करते थे। सिद्धार्थ महाराजका एक अनुजभ्राता भी था जो "सु- पार्श्व" नामसे नामाकित था । महाराज सिद्धार्थ की राणीका नाम "त्रिगलाक्षत्राणी" था जो विदेह देशमें विशाला नामक नगरीके अधिपति मुप्रसिद्ध, परम प्रभावक, द्वादश नतोके पालन करनेवाले, अत्यत दीर्घदर्शी महाराजाधिराज "चेटक" की पुत्री थी और लावण्यवती प्रौढयौपना तथा सर्वाह्नपूर्णा थी, पातित्रत धर्म जिसको परम रमणीय था, महिलाकी चतु:- पष्टी (६४) कलायोंमें निपुण तथा गृहस्थमाश्रमके नियमों से परिचिता वा प्रधान सतियोंकी भी शिरोमणि थी। महाराज सिद्धार्थ और राणीका परस्पर अयस्कान्तके सदृश अत्यन्त लेह तथा प्रेम था, जिससे गृहकी लक्ष्मी

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४ , ऐसे परम रमणीक प्रासादमें एक शय्या थी जो दोनो ओरमे उन्नत और मध्यमें गम्भीर थी, जिसके प्रत्येक पार्श्वमें अतीव सुकोमल तथा बहुमूल्य उपधान ( सहाने ) शोभाय- मान थे, उस शय्यापर ऐसे वस्त्र बिछे हुये थे जो कि मूल्यमें बहुत अधिक और भाग्में बहुत हलके थे परन्तु अति कोमल, स्पर्शयोग्य और सुन्दर थे, जिनपर प्रधान सुगन्धि- युक्त पाच वर्णके पुष्प बसेर हुये थे यावत् वह शय्या ऐसी थी कि जिसके देसतेही शरीर रोमाचित और मन प्रसन्न होता था। किसी समय अर्द्ध रात्रिके व्यतीत हो जानेपर और अर्द्ध रात्रिके शेष रहने पर जब राणी पूर्वोक्त प्रासादमें मागुक्त शय्या पर सुससे शयनकररही थी तो उसे निग्न प्रकारसे निम्नलिखित स्वप्न आने प्रारम्भ हुये । प्रथम स्वममें राणी क्यों देखती है कि एक हस्ती है जिसके चार दात हैं और शरीर वडा ऊंचा विशाल तथा महान् बलिष्ठ है, जिसका वर्ण इंग्रज वा दुग्ध और शशि- किरणोंसे भी अधिक उज्ज्वल श्वेत वर्ण है, वह गजराज चल और कातिसे महोन्मत्त हो रहा है। द्वितीय-एक वृपम (बैल) देखा जो महा शुक्लवीय, उन्नत स्कन्धयुक्त तथा तीक्ष्ण शूगधारक था जिसके रोम कोमल तथा मास उपचित और शरीरका गठन बडा प्रमोद- जनक था। तृतीय-सगमरमर पापाणसे भी अधिक निर्मल, श्वेत- --

चणीय, दर्शनीय, तीक्ष्ण नस वा दाढयुक्त, रक्तवर्णीय
जिह्वा वा तालु तथा पीतवर्णीय उन्मिलित नेत्रोंवाले ऐसे
प्रधान केसरी (मृगराज वा सिंह ) को देसा ।
चतुर्थ-चन्द्रमासे भी अधिक कातिवाली सर्वाङ्गपूर्णा,
परम आनन्द उत्पादिका, कमलवत् विकसितनेत्रा और
प्रफुलितवदना ऐसी श्रीलक्ष्मी देवीको म्बममें देखा।
पचम-एक मनोहर पचपर्णीय तथा प्रौढ सुगन्धित कुसु-
मोमे रचित पुप्पमालाको देखा।
पष्ठ-एक चन्द्रमा देसा जिसकी पोडश (१६) कला
चारो दिशाओम शीतल प्रकाशकर रही है जिसके दर्शन
मात्रसे चित्त प्रसन्न होता था ।
सप्तम-दश दिशाओका तिमिरनाशक, रक्ताशोक वृक्षके
ममान लाल, सूर्यमुसी कमलोका प्रतिनोधक, गगनदीपक,
शीतविध्यसक, उष्णतादायक और सहस्रकिरण ऐसे उदय
होते हुये दिवसनाथ अर्थात् सूर्यको स्वममें देसा ।
अष्टम-राणीजीने एक ध्वजा देसी जिसमें पावकमे शुद्ध
किये हुये प्रधान काञ्चनका दण्ड (डडा) है ऊपरके भागमें
विविध प्रकारके रत्न जटित है, ऊचाईमें वह धजा ऐसी
देसी कि जिसको गगनचुम्बी कहना भी यथोचित है।
नगम-रत्नासे विभूपित, पुप्पोंसे मण्डित परम मुशोभित
एक कलश देखा।
दशम-एक बडा दिव्य सरोवर देसा जो स्वच्छ वासना-
वाले तथा शीतल जलसे पूर्ण है, जिसमें पद्मकमल, शतपत्र,
,

महस्रपत्र आदि अनेक कमल वा पुष्प विकसित होकर अपनी तथा उस पद्मसरोवर की सुन्दरता दोगुनी चौगुनी कर रहे है, जिसपर चढने के लिये चारों दिशायोंमें नेत्र- रजक श्रेणिया बनी हुई हैं। एकादश-उदधि शिरोमणि तथा अथाह जलके धारक क्षीरसागरको स्वममें देसा। द्वादश-अधकारको तिलाजलि देनेवाला, बहुमूल्य मणि- योंसे अलकृत, प्रकाशकारक ऐसा श्राकाशस्य अनुपम देव- विमान व्योममे उतरकर मेरे मुसमें प्रवेशकर गया है यह द्वादश म्बममें देसा। योदश-विविध वय तथा अनेक प्रकारके रत्नोंकी राशिको देसा जो मनुष्योंको तो क्या सुरोंको भी प्रार्थनीय वा दर्शनीय है। चतुर्दश-मधु, घृत, तथा अन्य मुन्दर पढार्थीद्वारा सिंचित अग्निकी नाई परम शुद्ध, निर्मल, देदीप्यमान निधूम अग्नि शिसाको १४ । स्त्रममें देसा। इस अन्तिम समके पूर्ण होते ही राणीजीके नेत्र सुल गये, और निद्रा त्यागकर यह शग्यापर बैठ गई तन आये हुये समस्त स्वमोको स्मरण करने लगी जन सर्व स्वम सरण कर लिये तर मन बालस्यरहित हो गया। उम समय निशलादेवी (राणी) उठकर राजाजीके पास गई और प्रणाम करके बैठकर सविनय प्रार्थना करने लगी कि हे म्यामिन् ! मुझे आज रात्रिके समय पूर्वोक्त चतुर्दश

म्बम माये हैं मो कृपा करके सुनायो कि इनका फल
मुझे क्या होगा? महाराज सिद्धार्थ इन चतुर्दश समाको
सुनकर तत्काल गेमाचित तथा अत्यत हर्पवान हुये
और विचार कर बोले । हे देवि! यह ममल स्वम जो तुमने
रात्रि में देते है बडे प्राभाविक उत्तम और शुभकारी है उनमें
हमारे कल्याण, मुस, अर्थलाभ, भोगलामकी प्रभूत वृद्धि
होगी, अपितु नवमाम तथा साढेमात दिनरानि पूर्ण होने-
पर हमारे एक पुनरल उत्पन्न होगा जो स्वप्नोंसे निथिन
होता है कि वह बालक चक्रपती या धर्मचक्रवर्ती (अर्दव ,
देव) होगा क्योंकि यह स्वम इन दोनों पदधारियों की
माताओंफोही पाते है अन्यको नहीं. इसलिये हे राणी!
यह स्वम बड़े कल्याणकारी शुभ तथा मगलीक है अतः आज
से लेकर पहिलेमे भी अधिक हमारे पुण्योदयके दिवस थाये
है इस कारण इनसे प्रतीत होता है कि यह बालक हमारे
कुलका दीपक, कुलोचेजक, शकी वृद्धिकारक, महायशस्वी
और त्रिभुवनपूज्य होगा. इस कारण तुझे इस गर्भकी रडे
यत्न वा परिश्रमसे रक्षा करनी चाहिये। ऐसे स्वमफलको
श्रण करके राणी इतनी प्रमुदित (प्रसन्न) हुई कि मानो
उसे उसी समयही गुतरत्नकी प्राप्ति हो गई।
तदनतर निशलाराणी राजाको प्रणाम करके अपने प्रासादमें
आगई और उसी शय्यापर पाकर बैठ गई और उसी दिनसे
गर्भकी रक्षाके लिये निम्नलिखित प्रतिज्ञा करली कि-आजसे
लेकर मैं कोई भी ऐसा कार्य न करूंगी जिससे मेरे गर्भ

८ को किसी प्रकारसे कष्ट पहुचे अर्थात् अति उपण, अति शीत, अति रुक्ष, अति स्निग्ध, अधिक कटुक तथा मृदु श्रादि भोजन करना त्याग दिया और उसी दिनसे चिन्ता, शोक, भय, केश, दुःस आदि अनुभव करना भी त्याग दिया. इस प्रकार सुरू अथना गातिपूर्वक राणी गर्मकी रक्षा करने लगी। सो अन्यदा नवमास बहु प्रतिपूर्ण तथा माई समदिन रानि व्यतिकात होनेपर ग्रीष्म ऋतुके प्रथम मास द्वितीय पक्षमें चैनशुदि त्रयोदशीके दिन हस्तोत्तरा नक्षत्रका चन्द्र- मासे योग होनेपर श्रीश्रमण भगवान महावीर महा. राजका महान् आरोग्यपूर्वक जन्म हुआ जिसको अाज २५१५ वर्ष व्यतीत होगये है। श्रीभगवान् बर्द्धमान (महावीर) स्वामीकी जन्मकुडली (१२ १.३ म १सयु गु२ ४रा व ३ तर उसी समय चारो प्रकारके देव और ६४ इन्द्र अत्यन्त आनन्दसे एकत्रित हुये और बालकको मेरू पर्वतपर समानार्थ ले गये, स्नानके पश्चात् वादिनोंकी वनिक मध्यमें देवतायोने ९ प्रसन्नचित्तसे जन्मोत्सव मनाया तदुपरान्त निजमाताके पास स्थापन करके आकाशमें चले गये। फिर उसी समय सिद्धार्थ महाराजको सुखदायक जन्मकी सपर दी गई राजा सुनतेही असीम प्रफुल्लित तथा हपित हुआ और ममस्त नगरमें आनन्दोत्सर करनेके लिये प्राज्ञा भेज दी उसी समय सारे नगरमें प्रत्येक स्थानपर गन्धयुक्त उदक (जल) द्वारा रज (रास) को उपशान्त किया गया, विविध प्रकारके वादित्रोके वजनेसे आकाशमडल गूजने लगा, अनेक गायक अपने सुन्दर गीतोसे नागरिक जनोको प्रसन्न करने लगे चारों ओरमे मुगारिक वादी (धन्यवाद ) के नाद सुनाई देने लगे घर २ में मगलाचार होने लगा नारी पुरुप सरने शक्तिके अनुसार धनव्यय करके जन्मोत्सव मनाया। महाराज सिद्धार्थने कुमारके जन्मकी खुशीमें कारागारके चन्दियोंको छुडादिया तथा दशदिवसके लिये कर (महसूल) का लेना बन्दकर दिया. दानशालायें सोली गई जिनसे अनेक दुःसियो, अनाथो, धनहीनोंको अन्नपान मिलने लगा यानत् समस्त नगरमें यह उद्घोपणा करवाई गई कि कोई पुरुप किसीको दुःस न देवे, जिस किसीको किसी भी वस्तुकी इन्छा हो वह राजद्वारसे ग्रहण करे इस प्रकार कुण्डल- पुर नगरमें जन्मका महोत्सव किया गया । कुमारके माता पिताने प्रथम दिन कुलकी मर्यादाके अनु- सार स्थिति कर्म किया, तृतीयदिन चन्द्रसूर्यदर्शन सस्कारके लिये सप किया गया, पष्ठ दिवसमें " , जागरना की, एकादश दिवम व्यतीत होनेपर अशुचिकर्ममे निवृत्तिकी तथा द्वादशवें दिवम के प्राप्त होनेपर विस्तीर्ण तथा प्रभूत अन्नपान साध स्वाद्य श्रादि चारों प्रकारका श्राहार बनावाकर मित्र, जाति, सजन, सम्बन्धीयादि मकल (सब) को ग्रामन्त्रण दिया, इसके अनतर लानमे शुद्ध होकर प्रधान तथा विविध प्रकारके श्राभरण अथवा अलकार- द्वाग शरीरको विभूपित किया, इसके उपरान्त महागज सिद्धार्थने सर्व जातियोंसे मिलकर चार प्रकारके आहारका भोजन किया। भोजनके पश्चात् मर्व मम्मन्धियोंने परम सुन्दर, उज्वल, विशुद्ध, मुगन्धमय जलसे हन्तप्रक्षालन किये, पुनः भगवान् के माता पिताने यागत सम्मन्धियो, सञ्जनी और स्वजातियोंका विस्तीर्ण पुष्प, गन्ध, वखालकारोसे यथोचित मत्कार वा मन्मान किया और गोउनके मन्मुसमराजा राणी इस प्रका। रसे गोले । ह देवानुप्रियो ! जिस दिनसे यह कुमार गर्भमें पाया है उसी दिनसे हमारे राज्यमें हिरण्य, स्वर्ण, धन, धान्य, प्र- तिष्ठा, सन्मान और राज्यकी अतीर वृद्धि हो रही है अत' इमी कारणसे गुणानुमार हम इस कुमारका नाम “चर्द्धमान कुमार" ऐसे स्थापन करते हैं ऐसे आनन्दवर्धक शन्दोंको श्रमण करके सबने धन्यवाद दिया इस प्रकार कथन करके मर जनाको बडे सत्कार वा सन्मानसे विसर्जन कर दिया। तदनतर श्रीपर्द्धमान स्वामीजी कुमारावस्थामें पर्वतकी -- ११ कन्दरा (गुफा) में वृक्षके बढनेकी उपमासे निमेय तथा सुसपूर्वक वृद्धि पाने लगे। राणीजीने भगवान्की रक्षाके लिये पाच धायमाता नियुक्त कर दी यथा- प्रथम-दुग्ध पिलानेवाली द्वितीय-मंजन करानेवाली तृतीय-श्राभरणोंसे विभूपित करनेवाली चतुर्थ-अनेक प्रकारकी क्रीडा करानेवाली पचम-अकमें स्थान देनेवाली इस प्रकारसे पाच धात्रीमाता भगनानका पालन पोपण करनेमें उद्यत हुई ओर कुमार यथाक्रमसे पृद्धि प्राप्त करने लगे। इसके पश्चात् क्रम पूर्वक पालावस्थाको त्याग कर भगवान् यौवनावस्थाको प्राप्त हुए और सर्व कलाकुशल, *उद्भट दीर्घदर्शी, अत्यत बलवान् और महान् शूरवीरोके भी अ- ग्रणी (मुसिया) हुये। भगवानके अनेकनाम प्रसिद्ध हुये यथा-महावीर, नर्धमान, श्रमण, ज्ञातवशीय, ज्ञातपुत्र इत्यादि परन्तु विशेष करके उनके तीन नाम प्रसिद्ध हुए यथा-मातापिताने वृद्धिकारक होनेके कारण "वर्द्धमान" नाम दिया, तथा सहजही शाति प्रत्येक तीर्थकर भगवान्को निश्चय करके गर्भ में ही पाच ज्ञानों में से तीन ज्ञान होते है यथा-मति, श्रुति, अवधिज्ञान, सो इसी प्रकार भ्रमण भगवान् महावीरजीको भी तीन ज्ञान थे। - * क्षमा और शीतल स्वभाव होनेसे "श्रमण" नाम विरयात हुआ और महान् उत्कट वा उद्भट परिसह सहन करनेसे "महावीर" नाम प्रसिद्ध हुआ। यद्यपि पाल्यावस्थासेही आपका मन सासारिक मुसों वा भोगोंसे विरक्त या तथा स्पर्श, रस, गन्ध, शब्दरूपादि विषयोंसे निवृत्ति और वैराग्य भावमें अधिक प्रवृत्ति थी और आपकी यह अत्युच्च अभिलाषा थी कि गृहस्थाश्रमको त्यागकर मुनि श्राश्रममें प्रवेश करू, तदपि माता पिताके अत्यन्त आग्रहसे (अर्थात् मातापिताकी आज्ञाका पालन करना पुत्रका कर्तव्य है इस उद्देशको मुरय रस कर) आप- को गृहस्थाश्रममें ही निवास करना पड़ा, तथा परम विस्यात महाराजाविराज "प्रश्नजित" राजाकी शीलगिरोमणि, प्रिय पुत्री यशोदाजीसे विवाह भी करना पडा परन्तु तो भी आप निवृत्ति के मार्गसे पीछे नहीं हटे और वैराग्यभावको मनसे जाने नही दिया यथोक्तम्- घृष्ट घृष्ट पुनरपि पुनश्चन्दनञ्चारगन्धम् । छिन्न छिन्न पुनरपि पुनश्चक्षुकाण्ड रसालम् ॥ दग्ध दग्ध पुनरपि पुनः काञ्चन कान्तिवर्णम् । प्राणान्तेऽपि प्रकृतिविकृतिर्जायते नोत्तमानाम् ।। अर्थ-पुनः पुनः चदनको घिसने पर भी चन्दन पूर्वसे प्रधान सुगन्धि देता है, नारम्बार इक्षु (गन्ना) को हुदैन करनेसे इक्षु अधिक मीठा रस देता है ॥ अनेक वार वर्णको १३ अनिमें दग्ध करने पर भी काञ्चन अधिक कान्तिवर्ण युक्त (मनोहर रंगवाला) होता है, इसी प्रकार प्राणान्त कष्टके श्राने पर भी उत्तम पुरुषोंका स्वभाव परिवर्तन नहीं होता । इस वाक्यके अनुसार भगवान् मातापिताके अतीव आग्रहसे गृहस्थाश्रममें रहते हुये भी क्षान्ति, दान्ति, निरारम्भी और प्रमादरहित थे आपके मातापिताने बहुत वार आपको राज्यसिंहासन प्रदान करनेके लिये प्रस्तुत किया परन्तु बडे भ्राताके जीवित होने पर राज्यसिंहासन पर बैठना अयोग्य समझकर आपने यह बात स्वीकार न की। सदैव काल आपके मनमें साधु वृत्ति धारण करनेके तीन सकल्प भ्रमण करते रहते थे अतः आपने अनेक वार माता- पितासे दीक्षा ग्रहण करनेके लिये प्रार्थना की, परन्तु प्रा- पको आज्ञा न मिली तथा मातापिताने कहा, हे वत्स! जन- तक हम जीवित है तन तक तुम दीक्षा न लो, हमारी मृत्युके पश्चात् जो तुह्मारी इच्छा होवे सो करना । महाराज सिद्धार्थ और त्रिशलाराणी यह दोनों श्रीश्री सर्वज्ञ सर्वदर्शी परम पूज्य २३ वें तीर्थंकर भगवान पार्श्व- नाथजी महाराजके व्रतधारी श्रावक थे इसी कारण गृहस्थ धर्ममें परम दृढ तथा अनुरक्त थे, सदा धर्मध्यानमें समय- पूर्ण करते थे। प्रिय पाठकटन्द! कालकी गति बडी विचित्र है सर्व नर इससे भय खाते है क्योंकि यह इन्द्र, नरेन्द्र, भूपेन्द्र, चक्रवर्ती, अर्हन्त, बलदेव, वासुदेवादि समस्तके शिरोपरि रक्षाटन (पहरा) करता है काल सरसे बलि है तथा इसे किमीका मी पक्षपात (लिहाज) नहीं है यह न तो धनाटय देखता है और न धनहीन, न विद्वान् और न मूर्ख, न चालक और न वृद्ध, जिस किमीकी ग्रायु पूर्ण हो जाती हे चाहे वह कोई भी क्यों नहो शीन ही उसे स्लोफसे छुडाकर परलोकमें स्थान देता है। सजनों! इम परिवर्तीनि ससाग्में प्रत्येक जीरने पर- लोकरूपी पथका पथिक बनना है क्योंकि सदेव कालके लिये न कोई भूतकालमें स्थिर रहा है और नही भविष्यव कालमें सदाके लिये स्थिर रहेगा। इसी प्रकार महाराज सिद्धार्थ और त्रिशलादेवी धर्मध्यान में तीर सकल्पोंसे परिश्रम कर रहे थे कि अकस्मात् श्रायु पूर्ण होनेके दिन निकट आगये। इस लिये भगवानके मातापिताने समाधि मृत्युके लिये शातिपूर्वक सस्तारक अनशन करदिया और कालके अवसर पर काल करके परम शुभ प्रणामों अथवा अध्यवसायों और अत्यन्त शुद्ध लेश्याओं द्वारा द्वादश अच्युत नामक स्वर्गको प्राप्त किया मृत्युके पश्चात् यथाविधि अमिसस्कार किया गया नगरमें महाशोक छा गया क्योंकि महाराजसिद्धार्थ बडे न्यायशील ये और प्रजाके हितचितक वा पिताके स- दृश रक्षक थे। ऐसे समयमें श्रीश्रमण भगवान महावीरजीने अपने कोमल वचनाद्वारा अनित्य वा अशरण भावनायें सुनाकर १५ प्रजाके समाधासन बंधाये कुछ दिनोंके पश्चात् शोक दूर हुया आपके ज्येष्ठ भ्राता नदिवर्द्धनजी और समस्त प्रजाने एफ- त्रित होकर श्रापको राज्यसिंहासन देनेके लिये मार्थना की परन्तु आपने इसे स्वीकार न किया परन्तु इस प्रकार कहा, हे विजगणों! मेरी प्रतिज्ञा अन पूर्ण हो चुकी है इस कारण मैं अन मुनित्तिको अगीकार करूगा अतः यह राज्य मेरे ज्येष्ठ भ्राता नदिवर्द्धनजीकोही देना उचित है ऐसे शब्द भापण करके शीघ्रही भगवान्ने राज्यमुकुटको स्वहस्तसे नदिनर्द्धनजीके शिरोपरि स्थापित कर दिया और समस्त मजाके समक्ष अपने अपना मनोहर व्यारयान दिया, भ्रागण ! थाजसे लेकर महाराजाधिराज सिद्धार्थके पदपर श्रीयुत नदिचर्द्धनजीको नियत किया जाता है अतः नदि- वर्द्धनजी ही राज्य करेंगे इस लिये प्रत्येक जन का यह परम धर्म है कि वह नंदिवर्द्धनजीकी आज्ञाको शिरोपरि धारण करे ( इत्यादि)। इसके अनतर समस्त राज्यमें उद्घोपणा कर दी गई कि सर्व पुरुष उत्सव करे, ऐसे होने पर सारे नगर में वादिन वजने लगे घर २ में भगलाचार होने लगा, गायक गीतों- द्वारा नागरिक जनोको प्रसन्न करने लगे अतः ग्रानन्दसे पुनः समय व्यतीत होने लगा। जिस समय आपकी आयु २८ वर्षकी हुई तो आपने अपने ज्येष्ठ भ्राता नदिवर्द्धनजीसे सयम लेनेके लिये प्राज्ञा मांगी और एकान्तमें ऐसे कहा कि हे भाई! अब मैं ने आगार वृत्तिको त्याग कर अनगार धर्मको ग्रहण करने दृढ निश्चय कर लिया है इस लिये थाप मुझे आजाद जिससे कि मैं स्वजीवनको सफल करू । ऐमे पचन सुनते ही महाराज नदिवर्द्धन महादःसित हो- कर विलाप करने लगे और रुदन करते हुये ऐसे बोले, हे प्रातः 'अभी बहुत दिवस नहीं व्यतीत हुये है कि हमारे मातापिता स्वर्गनासी हुये हैं तथा इमी समय तुमने दीक्षाके लिये निश्चयकर लिया है यह उचित नहीं है मैं दो रियोग किम प्रकारसे महन कर सक्ता हु, मुझे प्रथममे भी अधिक दुःसित मत करो तुम्हारे बिना मेग और कोई दूसग सहो. दरभी नहीं है जिसके माय में कुछ सम्मति कर सकू तथा अपने दुस सुसको मुना मा इस लिये राज्यभवन में रह- कर ही जो कुछ करने की इच्छा हो कर सक्ते हो, क्या गृहस्थाश्रममें धर्म नहीं हो मक्ता? और मुनिवृत्ति में क्या विशेप धर्म होता है, जो पात्मा संसार में रहता हुश्मा भी राग, मोह, काम, कपट और विपयादि षणोको त्याग दे तो क्या वह साधु कहलाने के योग्य नहीं है, अवश्य है, तथा जो मुनि होकर भी रागादिमे निवृत्ति नहीं करता तो क्या वह गृहन्याश्रमका त्याग करनेमानमे ही मिनु बन सक्ता है कदापि नहीं, इस लिये, हे भाई! तुम गृहस्थमें ही रहो और अपनी इच्छानुसार धर्म करो। यथोक्त- बनेऽपि दोपाः प्रभवन्ति रागिणा | गृहेऽपि पञ्चेन्द्रियनिग्रहस्तपः ॥

१७ अकृत्सिते कर्मणि यः प्रवर्त्तते । निवृत्तरागस गृहं तपोरनम् ॥ अर्थ-विपयासक्त चित्तवालोंको चन में भी लोभमोहादि पाप वृत्तिया लगती हैं । चक्षु कर्णादि इन्द्रियोका सयमरूप तप नियम तथा धर्मानुष्ठान घरमें भी हो सक्ता है। जो पुरुप निन्दारहित पुण्यकमको करता है और जो विपयवासनादिसे विरक्त है ऐसे धर्मात्मा पुरुपके लिये गृह ही तपोवन है अर्थात् उसके लिये गृह ही धर्मानुष्ठानादि करनेका स्थान है इस कारण, हे भाई! मेरे ऊपर कृपा करके वीतराग भावसे गृहस्थाश्रममें ही जीवन व्यतीत करो अर्थात् भिक्षु बनने वा अटवीमें गमन करनेके सकल्प त्याग दो और मेरी इस दुःस- भरी प्रार्थनाको स्वीकार करो, जन भगवान्ने सर्वथाही प्रार्थना अस्वीकार की तर नदिवर्द्धनने दो वर्षके लिये अत्यंत आग्रह किया। यह प्रार्थना सुनकर भगवान्ने देशकाल देसकर अथवा ज्येष्ठ भ्राताकी आज्ञाको उच्च समझकर दो वर्षपर्यन्त और भी ससारमें रहना स्वीकार किया, किन्तु निर्जल तप कर्म वा इन्द्रियनिग्रह, सदाचार धर्म और आत्मा दमनादिमें पूर्वसे भी अधिक प्रवृत्त हुए। इम प्रकार सुसपूर्वक समय व्यतीत करते हुये जर आपको एक वर्ष अतिकान्त हो गया तर आपके मन में स्वीयदान यह एक स्वाभानिक नियम है-दि जब तीर्थकर भगवान्के दीक्षित होनमें एक वप रह जाता है तन वह एक वर्ष तक दान करते हैं।

१८ देनेके विचार उत्पन्न हुये, पुनः श्रापने महाराज नंदिवर्द्धन- जी की आजा ग्रहण करके सर्वन निम्न प्रकारसे उद्घोपणा करवा दी कि- वाजमे लेकर इम क्षत्रिय कुण्डलपुर नगरमे एक वर्पतक प्रतिदिन प्रातःकालसे लेकर ६ घडी पर्यन्त अन्न, वस्त्र, श्राभूपण, धनादिका याचकोंको यथेष्ट दान दिया जायेगा, जिस किसीकी इच्छा हो ग्रहण करे । इस घोपणाको सुनकर दूर • देश देशान्तरोंके अनेक याचक कुण्डलपुरमें एकत्रित हो गये, तर भगवान्ने दान देना पारम्भ किया, प्रतिदिन एक क्रोड आठ लास *मुनईये का दान करते थे इसी प्रमाणसे भगवान्ने तीन भरन, अहामी करोड अस्मी लास सुनईयोका दान किया । जब आपको पूर्वोक्त परिमाणसे दान देते एक वर्ष हो गया और दो वर्ष की गृहम्यस्थिति की प्रतिज्ञा भी पूर्ण हो चुकी, तर आपने सयम लेने के लिये अपना अभिमाय महाराज नदिवर्द्धनजीके सामने प्रगट किया,आपके ज्येष्ठ भ्राताने बहुत प्रकारसे नम्र भावसे फिर प्रार्थना की परन्तु श्रापने स्वीकार न की क्योंकि प्रतिज्ञाका समय पूर्ण हो चुका था। तन महाराज नदिवर्द्धनने (जिसको एक सहस्र पुरुष उठा सके) एक शिविका (पालकी) वडे ममारोहमे तय्यार कर- * एक मुनइया अनुमान १६ मासे या ८० रत्तीका सर्वाग खर्णमय होता है इस प्रमाणसे एक धप में दान दिये हुये समस्त सुनईयोंका प्रमाण (वजन) एक सास बत्तीस हजार चालीस १३२.४० मन होता है।

वार्ड जो विविध प्रकारके मणियों, रनों वा अलकारोंसे
विभूपित थी और भगवान् प्रधान सुगन्धियुक्त जलसे स्नान
करके वा अर्द्धहार, हार मुकुटादि अनेक प्रकारके भूपोंसे
अपने शरीरको अलकृत करके उस शिविकामें बैठ गये तथा
पडी ऋद्धिसे वा सहस्रों लक्षों देवो और पुरुपोके समुदायसे
प्रवृत्त हुए २ सैकडौं वादिनोंके गगनव्यापी नादोंद्वारा
बडे महोत्सवके साथ कुण्डलपुर नगरमे हेमन्त ऋतुके प्रथम
मासके प्रथम पक्ष में मार्गशिर पदि दशमीको सुव्रत नामक
दिवसके अपराण्ह समय विजय मुहूर्तमें हस्तोत्तरा नक्षत्रका
चन्द्रमासे योग होने पर बनकी ओर चल पडे ।
जन मा न्यात पड नामक उद्यानमें पहुचे तर पूर्व दिशा
की ओर मुख करके यह सहस्र पुरुष वाहिनी शिविका रखी
गई तर भगवान् श्रीवर्द्धमान स्वामीजी उसमें से उतर कर
बडे रमणीय वा मनोहर विरचित आसनपर पूर्व दिशाको
मुख करके बैठ गये और समग्र आभूपण उतार डाले तथा
स्वयही पच मुष्टि लोचकी अर्थात् शिरपर जितने भी केश थे
वह सन अपने हाथसे उखाडकर उतार दिये उस समय देवों
और मनुष्यों की परिपद् चित्र के समान चुप चाप एकान
मन से देख रही थी।
अनतर भगवान् ने उस परिपद् के मध्यमें निम्न लिखित
सूत्रद्वारा सामायिक चारिन ग्रहण किया-
"सिद्धाण नमोकारेणं करेति, सब्व मे अकरणिज्ज़
पाव कम्म त्तिकटु सामायियं चरित्त पडिवजितित्ता"
।

-- अर्थ-मे सिद्धोंको नमस्कार करके प्रतिज्ञा करता हूँ कि-- आज से लेकर मैं कभी #पाप कर्म नहीं करूगा तथा पाच महाव्रत अर्थात् अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को धारण करता ह, यनसे मैं कदापि विना देखे न चलूगा, विना विचारे न मोलगा, दोपरहित अन्न पानी ग्रहण करूगा, वस्तुओं को उठाते रसते सदा यनके साथ वर्ताव करूगा और मलोत्सर्गादि कार्यों में भी यथायोग्य यत्न करूगा में मन वचन काया इन तीनो गुप्तियों को धारण करता है यदि आजसे लेकर मुझे कोई देवता, देवी, मनुष्य अथवा तिर्यंच सम्बन्धी उपसर्ग होगा तो मैं उसे शातिपूर्वक सम्यक प्रकारसे सहन करूगा । यदि द्वाविंशति (२२) परिपहोमें से मुझे कोई परि- (१) प्राणातिपात (२) मृपावाद (३) भदत्तादान (४) मैथुन (५) परिप्रह (६) क्रोध (७) मान (८) माया (१) लोभ (१०) राग (११) द्रुप (१२) क्रह (१३) अभ्यारयान (१४) पशू य (१५) परपरिवाद (१६) रतिभरति (१७) मायामोपा (१८) मिथ्या दर्शन शल्य इनको १८ पापक्म कहते हैं द्वाविंशति परिपहोंके निम रिसित नाम है (दिगिच्यापारसहे) क्षुधाका परिपह १ (पिवासापरिसह) तृषाका पारपद २ (सीयपरिसह) शातपरियह ३ (उसिणपरिसह) उष्णपरिपह ४ (दममसगपरिसहे) दशमसकपरिपह ५ (अचर परिसहे) अचरपरिषद ६ (अरइपरिमहे) अरतिपरिपह ४ (इत्थीपरिसहे) स्त्रीपरिपह ८ (चरियापरिसहे) चय्यापरिपह ९ (निसीहियापरिसहे) बैठनेका परिपह १० (सिनापारसहे) शय्यापरिपह ११ (भक्कोसपरिराहे) अनोश परिषह १२ (वहपरिसह) बधपरिपह १३ (तायणापरिसहे) याचनापरिपह १४ (भलाभपरिसहे) अलाभपारपह १५ (रोगपरिसहे) रोगपरिषद १६ (तण फासपरिसहे) तृणपशपरिपह १७ (जालपरिसहे) प्रस्वेदकापारपद १८ (सका .

पह होगा तो मैं उसे नि:कपाय होकर सहूंगा और जातक मुझे केवल ज्ञान उत्पन्न न होगा तनतक में व्याख्यानादि नियात्रओं से भी पृथक रहूगा इस प्रकारकी प्रतिज्ञाकरके भगवान्ने वहांसे विहार कर- दिया तर श्रापके ज्येष्ठ भ्राता महाराज नदिवर्द्धनजी आपके वियोगमे परम दुःखित ना व्याकुल होकर पीछे लौटते समय महाविलाप करने लगे. हतोत्माह वा अधीर होकर अपने दुःसको निम्न प्रकारमे प्रगट करने लगे यथा- त्वया विना वीर कथ व्रजामो, गृहेऽधुना शून्यवनोपमाने । गोष्ठीसुख केन सहाचरामो भोल्यामहे केन सहाथ धो । अर्थ-हे भाई! तुझ यद्वितीय (अकेले) को छोडकर हम शून्य वन समान स्वगृहम तेरे बिना किस प्रकार जायें अर्थात् तेरे विना राजभवनमें जाने और राज्य का सुस भोगनेको हमारा मन नहीं चाहता है. हे वीर ! तेरे रिना मेरा कोई सहोदर भी नहीं है इस लिये किसके साथ मैं वार्तालापादि क्रियायोको करूंगा तथा किसके साथ बैठ कर भोजन किया करूंगा। रपुरकारपरिसहे) सरकारपुरस्कारपरिषह १९ (पन्नापरिसहे) प्रज्ञापरिपह २० (अनाणपरिसहे) अज्ञानपरिपह २१ (दसणपरिसहे) दशनपरिषह २२ इनके मशहोनेसे सम्यक् प्रकारसे श्रीभगवान्ने इनको सहन किया इनका पूर्ण विवण श्री उत्तराध्ययनजी सूत्रके द्वितीयाध्यायसे जानना चाहिए।

अर्थ--मैं सिद्धोंको नमस्कार करके प्रतिज्ञा करता हू कि- आज से लेकर मैं कभी #पाप कर्म नहीं करूगा तथा पांच महानत अर्थात् अहिमा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह को धारण करता हू, अनसे मैं कदापि बिना देसे न चलंगा, विना विचारे न गोलगा, दोपरहित अन्न पानी ग्रहण करूगा, वस्तुओं को उठाते रसते सदा यनके साथ वीव करूगा और मलोत्सर्गादि कार्यों में भी यथायोग्य यत्न करूगा में मन वचन काया इन तीनों गुप्तियों को वारण करता हू यदि आजसे लेकर मुझे कोई देवता, देवी, मनुष्य अथवा तिर्यच सम्बन्धी उपसर्ग होगा तो में उसे शांतिपूर्वक सम्पर प्रकारसे सहन करूगा। यदि द्वाविंशति (२२) परिपहोंमें से मुझे कोई परि- (१) प्राणानिपात (२) मृषावाद (३) अदत्तादान (४) मेथा (५) परिप्रह (६) क्रोध (७) मान (6) माया (९) लोभ (१०) राग (११) द्वेष (१२) कलह (१३) अभ्याग्यान (१४) पशून्य (१५) परपरिवाद (१६) रतिजरति (१७) मायामोपा (१८) मिथ्या दर्शन शल्म इनको १८ पापक्म कहते है + द्वाविंशति परिपहकि निम्न लियित नाम हैं (दिगिच्छापरिसहे) क्षुधाका परिपह १ (पिवासापरिमहे) तृपाका परिपह २ (सीयपरिसहे) शीतपरिषह ३ (उसिणपरिसह) उष्णपरिपह ४ (दसमसगपरिसहै) दशमसक्परिपह ५ (अचल परिसहे) अचरपरिपह ६ (अरइपरिसहे) भरतिपरिपह (इत्थीपरिरहे) स्त्रीपरिषद ८ (चरियापरिसहे) चयापरिपह ९ (निसीहियापरिसहे) चैठनेका परिए १० (गिजापरिसहे) शय्यापरिपह ११ (अहोसपरिसहे) अक्रोश परिपह, १२ (वहपरिसहे) वधपरिपद १३ (जायणापरिसहे) याचनापरिपह १४ (मलाभपरिम) अलाभपरिपह १५ (रोगपरिसहे) रोगपरिषद १६ (तण फासपरिसहे) तृणशपरिषह १७ (जल्लपरिसहे) प्रस्वेदकापरिषह १८ (सफा- * - पह होगा तो मैं उमे निकपाय होकर सहुगा और जनतक मुझे केवल ज्ञान उत्पन्न न होगा तबतक में व्यारयानादि नियाओं से भी पृथक रहगा इस प्रकारकी प्रतिज्ञाकरके भगवान्ने वहामे विहार कर- दिया तन आपके ज्येष्ठ भ्राता महाराज नंदिवर्द्धनजी आपके वियोगसे परम दुःसित या व्याकुल होकर पीछे लौटते समय महाविलाप करने लगे. हतोत्माह वा अधीर होकर अपने दुःसको निम्न प्रकारसे प्रगट करने लगे यथा- त्वया विना वीर कथ व्रजामो, गृहेऽधुना शून्यवनोपमाने । गोष्ठीसुख केन महाचरामो भोक्ष्यामहे केन सहाथ बंधो॥ अर्थ-हे भाई! तुझ अद्वितीय (अकेले) को छोडकर हम शून्य पन समान स्वगृहमें तेरे बिना किस प्रकार जायें अर्थात् तेरे विना राजभवनमें जाने और राज्य का सुस भोगनेको हमारा मन नहीं चाहता है हे वीर ! तेरे बिना मेरा कोई सहोदर भी नहीं है इस लिये किसके साथ मैं वार्तालापादि क्रियानोको करूगा तथा किसके साथ बैठ कर भोजन किया करूगा। रपुरकारपरिसहे) सरकारपुरस्कारपरिषह १९ (पन्नापरिसहे) प्रज्ञापरिपह (भनाणपरिसहे) अज्ञानपरिपह २१ (दसणपरिसहे) दशनपरिषह २२ इनके सशहोनेसे सम्यक् प्रकारसे श्रीभगवान्ने इनको सहन किया इनका पूर्ण विवण श्री उत्तराध्ययननी सूत्रके द्वितीयाध्यायसे जानना चाहिए। २० सर्वेषु कार्येषु च वीर वीरे- त्यामन्त्रणदर्शनतस्तवार्य । प्रेमप्रकर्षादभजाम हप निराश्रयाश्वाथ कमाश्रयामः ॥ अर्थ-हे धीर' असिलकार्यों के विषयों में तुमको वीर २ कहकर बुलाता था, तुझारे दर्शन मानसे मैं प्रफु- लित तथा हर्पित हो जाता था, हे आर्य! तेरे श्राश्रय होकर में भयरहित होकर सुख से श्रायु पूर्ण कर रहा था सो हे वन्यु ! अा में किसको वीर कहूगा, किसे देखकर प्रसन्न होऊगा और किसके आश्रित होकर समय व्यतीत करूगा। अतिप्रिय वाधव दर्शन ते सुधाञ्जन भावि कदाम्मदष्णोः। निरागचित्तोऽपि कदाचिदस्मान् म्मरिष्यसि प्रौढ गुणाभिराम ॥ अर्थ-हे माधव ! आपका दर्शन अतिप्रिय है इस लिये फिर कर अपने सुदर्शनरूपी अमृत शुद्वाजनसे हमारे नेत्री को तृप्त करोगे अर्थात् का दर्शन दोगे, हे मोहरहित मन- चाले तथा प्रौढ गुणवाले ! निस्सदेह आप रागादि दोपो मे वर्जित हैं तो भी स्नेहसे प्रार्द्र हृदयवाले! मुझे कभी न कभी याद करोगे। इस प्रकार बहुत विलापजनक शब्द बोलते हुये महाराज नदिवर्द्धन अन्त में सारे परिवार सहित निज नगरमें आगये और सर्व पुरुप भी अपने २ स्थानों पर चले गये । Meerum

२३
"
अनंतर श्रीश्रमण भगवान् महावीरजी महाराज
शंसके समान निरजन, जीवके समान अप्रति हतगति, वायुके
सदृश अप्रतिबद्ध विहारी और सिंहकीनाई निर्भीक होकर
कर्मरूपी शत्रुओंको हनन करते हुये विचरने लगे, जिन्हों ने
जीवित रहने की आशा और मृत्युके भयको मनसे नितात
उठा दिया. चाहे कैसा भी भीम से भीम कष्ट क्यों न
पाजावे, भगवान् लेशमात्र भी क्रोध नहीं करते थे परन्तु
उस परिपह वा उपसर्ग को बडे साहस वा धीरता से सहन
करते थे।
पुनः आपने तपकर्म करना प्रारम्भ किया ।
एकबार आपने ६ मास पर्यंत तपस्याकी अर्थात् पट्मास
तक आपने निर्जल तथा निराहार व्रत धारण किया पुनः
दूसरी वार आपने पाच दिन न्यून (कम) पट्मास पर्यन्त
तप किया. नर वार (९ दफा) आपने चार २ मासपर्यन्त
अन्नपान नही किया. दोवार तीन २ महीने या दो बार
ढाई २ महीने और ६ वार दो मासपर्यंत आप निर्जल व्रत
धारी रहे!
एक मास भर निरशन व्रती रहना ऐसे आपने द्वादश
(१२) वार एक २ मास किये, अर्द्ध २ मास तक (पद्रह २
दिनतक ) व्रतधारण करना ऐसे आपने ७२ वार १५-१५
व्रत किये । २२९ वार आपने दो २ दिन तक क्षुधा सहन
की, उपरोक्त तपमें आप दिनभर पद्मासन करके और रानि
को खडे न (कायोत्सर्ग) किया करते थे

२४
तपस्याके अतिरिक्त आपने अभद्रप्रतिमा (प्रतिज्ञा), महामद
प्रतिमा तथा सर्वतोभद्र प्रतिमा और भिक्षुकी द्वादशवीं
प्रतिमा ग्रहण की जो श्री दशाश्रुत स्कध के ७ वें अध्यायमें
सविस्तर वर्णन की गई है फिर आप अनेक देशो में पर्यटन
करते हुये एक ममय श्राप अनार्य देगमें पधार गये वहापर
आपको अनेक दुसवा परिपह सहन करने पडे जिनके मुनने
मानसे हृदय कापता है और रोम सड़े हो जाते है।
बहुत बार म्लेच्छ पुरषोंने आपके पीछे बडे वलनान् वा
तीक्ष्ण नस वा दातोके धारक धान लगा दिये वह श्वान
भगवान् के शरीर से माम के सड के गड सींचके ले जाते
थे और फिर म्लेच्छ पुरुप उन व्रणोपर (जयमोपर) क्षार
लवणादि भी डाल देते थे जिसमे भगवान्को यही तीन
और घोर ढना होती थी परन्तु आपने उन वेदनायोको
ऐसी धीरता से सहन किया कि मन से भी उन म्लेच्छोपर
तनक मात्र दुष्ट अध्यनमाय नहीं किए।
यदि आपको कोई दुष्ट असीम कष्ट भी देता था तो श्राप
उसे कुछ भी नहीं कहते ये परन्तु उसे निवारण करने के लिए
भी नहीं कहते थे और निम्न प्रकार से विचार करते ये यथा-
, हे आत्मन्! जैसे तूने पूर्वभवमें कर्म किये थे वैसे भोग
यह अनार्य मेरे शरीर के अतिरिक्त और किसी पदार्थका
*/* एक २ प्रहरपयत चारों दिशाआम ध्यान क्रोको भद्रप्रतिमा, दो प्रहर
पर्यंत प्रत्येक दिशाम ध्यान करनेको महाभद्र प्रतिमा और धार २ प्रहरपर्यंत
दिशामें ध्यान करनेको सर्वतोमा प्रतिमा कहते हैं।
"

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रूप भेषधारी नहीं देखा इसको ग्रामसे बाहिर निकाल दो, ऐसा नहो कि यह स्तेन (चोर) निकल आवे अथवा हमारा धन चुराले," इतना कहते ही सब एकत्रित पुरुष अनभिज्ञतासे भगवान्को मारने वा दु'स देने लगे तथा उन्होंने दड वा मुष्टि प्रहारोसे आपको चाहिर निकाल दिया। इस समय विसर्जन किये हुये भगवान् अन्य ग्रामको विहार कर गये, वहा किमीने पूछा कि "तू कौन है ?" तन श्राप चुपचाप ध्यान करके सड़े हो गये उसके चार २ पूछने पर भी नाप मौन रहे, इससे वह मनुप्य कुपित होकर श्राप पर यष्टिप्रहार करने लगा तथा क्रोधवश होकर दुर्वाक्योंसे कष्ट देने लगा परच आप ऐसे दृढवृत्ति थे कि-देवसमूह भी आपको वृत्तिमे च्युतकरनेमें समर्थ न था. अतमें वह पुरुष श्रान्त होकर चला गया फिर आप अन्यत्र गमन कर गये, चहा आपको ठहरने के लिये कोई स्थान न मिला और ग्राम- वासियोंने भूतप्रेत कह २ कर ग्राम में प्रवेश न करने दिया तब आप किसी निर्जन अटवीमें चले गये और वहा ही विश्राम कर लिया, फिर प्रातःकाल आपने विहार कर दिया, इसी प्रकार जहा कहीं भी आपको सूर्य अस्त हो गया चाहे वह निर्जन स्थान हो, अटवी हो, शून्य गृह हो, पित्वन (श्मशान) हो और विपम बन हो आपने वहा र रात्रि विश्राम लिया किन्तु अपनी दृढ प्रतिज्ञासे मुंह नहीं मोड़ा।

*आपके पास चीरमान भी वस्त्र नया तब भी आप शीत- कालमें जब कि शीतल पवनका वेग असह्य होता है, शरद् ऋतुके होनेमे दातसे दात बजता है ऐसी मतमें आप वनमें खडे होकर, दोनो भुजाओको फैलाकर ध्यान करते थे और समस्त रात्रि इसी दशामें सम्पूर्ण कर देते थे । ग्रीष्म ऋतुमें आप प्रचण्डसे प्रचण्ड धूपमें भी 'पद्मासन की रीति पर बैठकर सारा दिन व्यतीत कर देते थे. नउष्ण- ताकी ओर लक्ष है और न घामकी ओर ध्यान किन्तु श्राप तो अपने काम से काम रसते थे। जन कोई आपसे अत्यन्त आग्रहसे पूछता था कि-श्राप कौन है ? तो आप "मैं मुनिहूँ" (भिक्षुद्द) केवल इतना ही उच्चारण करके मौन हो जाते थे। इस प्रकार भगवान् महावीरजी निरतर विहारकरने लगे एकदा जन कि श्रापाढ मास का एक पक्ष प्रतिकात हो चुका या पाप बर्द्धमान ग्राम (अस्थिग्राम) में पधारे और चतुर्मास स्थिति का समय निकट आने के कारण और विहार अनवसर समझकर वहापर ही चतुर्मास करनेका निश्चय किया, ऐसा निश्चय करके आप ग्राम में गये और वहा चतु- र्माम करनेके लिये स्थान पूछा. ग्रामवासियोंने आपको * भगवान् वन नहीं पहनते हैं परन्तु वह वस्त्र पहरे हुये मनुष्य के समान दीखते हैं क्योंकि यह उनकी एक अतिशय है । 1 अज काल भी बहुत जैन मुनि ऐसे है नो इस प्रकार प्रीष्म ऋतुर्म तपस्या करते हैं।

२८
स्थान तो क्या देना था परन्तु आपको बहुत कष्ट देना
प्रारम्भ किया और आपको ग्रामसे भी बाध कर दिया, फिर
आप वहासे चलकर ग्रामके नाहर उद्यानके देवालयमें प्राज्ञा
लेकर ठहर गये तथा प्रथम चतुर्माम अस्थि ग्राममें कर दिया,
साथ में निम्न प्रकारसे प्रतिज्ञा कर ली कि-मै एक मास
पर्यन्त अन्न पान शयनादिका त्याग करता हू इस समयके
बीच यदि कोई उपमर्ग होगा तो मैं उसको सम प्रणामोंसे
सहन करूगा ऐसे कहकर आपने ध्यान कर लिया. व्याना-
वस्थामें इसी मदिरवामी देवने परीक्षाके लिये तथा प्रतिज्ञा
वा धर्म भग करनेके लिये आपको अनेक दुःस दिये परन्तु
वह देव आपकी प्रतिज्ञा भग करने में किसी प्रकारसे भी
समर्थ न हुग्रा, जन आपके ध्यानका समय पूर्ण हो गया तर
आपने ग्राममें जाकर निर्दोष भिक्षा ग्रहण करके अन्न पान
किया और फिर वहा ही अनुक्रम पूर्वक चतुर्मास सम्पूर्ण
किया।
अनतर भाप अन्यत्र विहार करते हुये मोराक सनिवेशमें
पहुचे वहा पर आपको अनेक उपसर्ग होते रहे परन्तु आपने
उनको समतापूर्वक सहन किया ।।
इसके उपरान्त आप कसल तापसाश्रम में पधारे, उस
आश्रमके समीप एक सर्प रहता था जिसे लोग चडकोसिया
कहा करते थे उस सर्पके नेत्रों में ऐसी उन विप भरी हुई थी
कि वह जिस पुरुप की ओर एक वार भी दृष्टि करता था
वह ही एक क्षण में भस हो जाता था इस लिये
दु.सित

होकर तपस्वियोंने वह पाश्रम और पथिकोने वह मार्ग छोड रसा था जब आप (भगवान्) उस मार्ग पर चलने लगे तब लोगोंने पूर्वोक्त सर्पका सर्व वृत्तात सुनाकर उस मार्गपर जानेसे रोका परन्तु आप तो बडे वली थे वज्र ऋपम नाराच सहननके धारक ये इस लिये आपने यथोचित द्रव्य, क्षेत्र- काल भाव देसकर, सथा काँके क्षय करने के लिये अथवा चडकोसिया नामक सर्पको बोध देने के लिये उन पुरुषाका कथन स्वीकार न किया और उसी मार्गपर चल पडे जहा उस सर्पकी विवर थी वहा पहुचकर उसके ऊपर आप ध्याना- रूढ हो गये, कुछ समयके पश्चात् वह सर्प विलसे निकला और उसने भगवान को देखकर फुकार शब्द किया तथा उनके चरणोंपर डक मारा उस हलाहल ने रुधिर निकाल नेके अतिरिक्त और कुछ कष्ट न पहुचाया। उस समय चडकोसिया अपने आक्रमणको असफल देस- कर परम रोप में भरगया तब श्री ज्ञात पुत्रजीने उसे बोध दिया और उससे जीनहत्या छुडा दी. सत्य है- । पूर्ण अहिमक का वचन किमपर असर नहीं करता अर्थात् पूर्ण दयालुका बचन बडा प्राभाविक वा शक्तियुक्त होता है वह सब पर अपना प्रभाव डालता है क्योंकि महा हिमक का मन भी दयामय कर देता है यथा- /अहिसाया प्रतिष्ठी तत्सन्निधौ वैरत्यागः। अर्थात् जो दयामें प्रतिष्ठित है उनके पास रहनेवाले हिसक जीय भी दयायुक्त हो जाते है । सो इसके पीछे अनुक्रमसे

३०
भगवान् विहार करके "श्वेताम्बिका" नगरीमें पधारे तथा
उसके बाहर उद्यानमें विराजमान होगये, तर उस नगरके
नरेश मदेशी राजा जी जो श्रावकधर्मके पालक और परम
धर्मात्माथे भगवान्के दर्शनार्थ आये जिस्मे समस्त नगर में
आपकी महिमा विस्तृत हो गई ।
पुन विहार करते हुये श्राप मुरमिपुरसे होकर गजगृही
नगरीके नालदापाडा में पधारे और द्वितीय चतुर्माम आपने
वहा ही कर दिया।
वहा आपको “गोगाल महलिपुन जो स्वय हीअन्यमतका
साधु हो गया था, मिला।
उसने श्रापकी विस्तीर्ण तथा महान् श्लाघा होती देखकर
ईपीके वश होकर आपको बहुत कष्ट दिये।
आपकी यश पा कीर्ति विनाश करनेके लिये गोशालाने
तन मन देकर अनेक उपाय किये, स्वय कष्ट सहन करने भी
स्वीकार किये परन्तु फिर भी वह इस कार्यमें सफलता प्राप्त
न कर सका।
यथोक्तम्-
मलोत्सर्ग गजेन्द्रस्य मूर्ध्नि काकः करोति चेत् ।
कुलानुरूप तत्तस्य यो गजो गज एव सः॥सुगम।
आप क्षमाके समुद्र और शांति की मूर्ति थे, कोई आपको
दुःस देवे या मुस, यापकी निन्दा करे या स्तुति, श्राप
इसका पूर्ण वरूप श्रीमद्भगवती सूत्रके पचदा (१५३) शत्तक
में देखना चाहिये।
-
*

इसमें सम भाव रखते थे सो आपने द्वितीय चतुर्मास राजगृही
में ही सम्पूर्ण किया।
सो चतुर्माम के पथात् अन्य देशोंमें विचरते हुये चतुर्मास
समयके निकट चम्पा नगरीमें पधारे तथा तृतीय चतुर्मास
वहीं कर दिया, और दो माम पर्यन्त कायोत्सर्ग कर दिया,
यहा जो २ उपसर्ग भगवानको हुये वह मव शांति प्रणामोंसे
अर्हन् श्रीवीर प्रभुने सहन किये ।
फिर चार मासका ममय पूर्ण करके निरंतर विचरते हुए
पीछे चम्पापुरमें विराजमान हुए और चार मासका कायो-
त्सर्ग करके वहीं चतुर्थ चतुर्मास किया । क्षुधा, सपा, शीत,
उष्ण, कर्कश शय्या, जलमल और घाम आदि अनेक
परिपहोको सम्यक् प्रकारसे सहन किया जन चतुर्मास
सम्पूर्ण हो गया तर आपने चम्पापासी अभिनव सेठके
घरमें पारणा किया. पुनः पाप कयगल देशमें विचरने लगे,
वहा से आगे लाट देशमें चले गये, इस प्रकार भ्रमण करते
२ श्राप भद्रिका नगरीमें पधारे तथा पचवॉ और छठा।
चतुर्मास इस नगरीमें किया पहिलेकी अपेक्षा आपको यहा
पर स्वल्प उपसर्ग हुये।
फिर सप्तम चतुर्मास श्रापने पालम्बिका नगरीमें किया,
यहा आपको शीतका अत्यंत घोर परिपह सहन करना पड़ा
इसके पीछे अष्टम चतुर्मास राजगृहीमें, नवम चतुर्मास
अनार्य देशमें किया यहां पर तो उपसर्ग परिपह, दुःख वा
कष्टान
मा न रही।

३२
थनार्योंने भापको वही निर्दयवासे यष्टि वा मुष्टि प्रहा-
रोंसे दुःस दिया, आपके परम मुकोमल शरीरको मृगयो-
त्सुक श्वानोंसे विदीर्ण करवाया, और घावोपर लवणसे भी
अधिक क्षारी वस्तु डाली परन्तु श्रापका मन ऐसा अडोल
था कि इन दुःसह्य कष्टासे रञ्चमान भी नहीं घपराये, परन्तु
आपने वहापर अपनी असीम धृष्टता वा सहनशीलताका
परिचय दिया।
श्राप दयाभावमें भी परमोच थे।
एकदा श्राप धर्म ग्राममें पधारे, जब कि गोशाला भी
आपके सगमें था, वहा पर एक बडी लम्बी २ जटाओंवाला
तपस्वी रहता था जिसे तपके प्रभावसे तेजुलेश्या शक्ति
उत्पन्न हुई २ थी।
जर भगवान् उमके पाससे जारहे थे, तब गोशालाने
उस तपस्वीका उपहास किया और उसे दुर्वचन बोले ।
अपनी निन्दाको सुनकर तापसको झट क्रोध आगया,
उसने गोशालाके सहारका दृढ निश्चय करके इसपर तेजुलेश्या
शक्ति छोडी।
तर भगवान्ने दया करके शीतललेश्या छोडकर उसकी
प्राण रक्षा की यदि पाप ऐसा न करते तो गोशाला जलकर
तुरन्त भन्मसात् हो जाता, परन्तु आप परम दयालु वा
करणासमुद्र थे अतः अापने कष्ट दाताकी भी दुःखमें
सहायता करके उसके प्राण बचाये ।

- उत्तम पुरुषों का लक्षण भी यही है यथा- ५ निर्गुणेष्वपि सत्वेपु द्या कुर्वन्ति साधवः । न संहरते ज्योत्स्ना चन्द्रश्चाण्डालवेठमनि ।। पुनः भगवान् वीर प्रभु विहार करते हुये श्रावस्ती नग- रीमें पाये तथादशवा चतुर्मास यहां ही कर दिया, चतुर्मासके पश्चात् एकदा भगवान् म्लेन्छ देशमें चले गये, वहा आपको ग्राम शार्दूलोंके पडे भयानक दुःस सहन करने पडे, वहा आपने दृढ भूमि (अनार्यधरती) के पेडाल उद्यानमें जाकर अष्टम भक्त करके कायोत्सर्ग कर दिया, देवकृत उपसर्ग भी आपने सहन किये. निरंतर दश मास पर्यन्त आपको वहा कप्ट पर कष्ट होता रहा, किन्तु आप अपनी दृढ क्रियाओंमें दृढ रहे और इन उपसर्गोंसे चलायमान नहीं हुये । फिर आपने एकादशवा चतुर्मास वेशाला नगरीमें किया, इसके पश्चात् आप कौशम्बी नगरीमें गये और वहां पोपवदी एकमको आपने अभिग्रह किया यथा- पृथिवी नाथस्य सुताभुजिपु चरितां जंजीरतां मुण्डिता क्षुति क्षमा रुदति विधाय पदयोरन्तर्गतां देहली। कुल्मापानुमहरदयव्युपरमे सूर्यस्य कोणे स्थिता नुध्यात्पार्णक तदा भगवते सोय महाभिग्रहे ।। (१) द्रव्यमे उडदके वाकुले जो शुष्क किये हुये हों उनका भोजन लूंगा। (२) क्षेत्रसे दाता का एक पग द्वारके भीतर हो और दूसरा द्वारके बाहिर ऐसे दातासे आहार लूंगा।'

J
अनार्योंने आपको बडी निर्दयतासे यष्टि वा मुष्टि ग्रहा-
रॉसे दुःस दिया, आपके परम सुकोमल शरीरको मृगयो-
सुक श्वानोंसे विदीर्ण करवाया, और घावोंपर लवणसे भी
अधिक क्षारी वस्तु डाली परन्तु अापका मन ऐसा अडोल
था कि इन दुःसह्य कष्टोंसे रञ्चमात्र भी नहीं घबराये, परन्तु
आपने वहापर अपनी असीम धृष्टता वा सहनशीलताका
परिचय दिया।
आप दयाभावमें भी परमोच ये।
एकदा आप कर्म ग्राममें पधारे, जब कि गोशाला भी
आपके सगमें या, वहा पर एक बडी लम्बी २ जटाओवाला
तपस्वी रहता था जिसे तपके प्रभावसे तेजुलेश्या शक्ति
उत्पन्न हुई २ थी।
जब भगनान् उसके पाससे जारहे थे, तब गोशालाने
उस तपस्वीका उपहास किया और उसे दुर्वचन बोले ।
अपनी निन्दाको सुनकर तापसको झट क्रोध आगया,
उसने गोशालाके सहारका दृढ निश्चय करके इसपर तेजुलेश्या
शक्ति छोडी।
तब भगवान्ने दया करके शीतललेश्या छोडकर उसकी
प्राण रक्षा की यदि आप ऐसा न करते तो गोशाला जलकर
तुरन्त भमसात् हो जाता, परन्तु श्राप परम दयालु था
करुणासमुद्र थे अतः आपने कष्ट दाताकी भी दुःसमें
सहायता करके उसके प्राण बचाये ।

उत्तम पुरुषों का लक्षण भी यही है यथा- निर्गुणेष्वपि सत्वेपु द्यां कुर्वन्ति साधवः । न सहरते ज्योत्स्ना चन्द्रश्चाण्डालवेश्मनि ॥ पुनः भगवान् वीर प्रभु विहार करते हुये श्रावस्ती नग- रीमें आये तथादशवा चतुर्मास यहा ही कर दिया, चतुर्मासके पश्चात् एकदा भगनान् म्लेच्छ देशमें चले गये, वहा आपको ग्राम शार्दूलोके पडे भयानक दुःस सहन करने पडे, वहा आपने दृढ भूमि (अनार्यधरती) के पेडाल उद्यानमें जाकर अष्टम भक्त करके कायोत्सर्ग कर दिया, देवकृत उपसर्ग भी आपने सहन किये. निरंतर दश मास पर्यन्त आपको वहा कप्ट पर कष्ट होता रहा, किन्तु आप अपनी दृढ क्रियाओंमें दृढ रहे और इन उपसगाँसे चलायमान नहीं हुये। फिर आपने एकादशवा चतुर्मास वेशाला नगरीमें किया, इसके पश्चात् आप कौशम्बी नगरीमें गये और वहां पोपवदी एकमको आपने अभिग्रह किया यथा- पृथिवी नाथस्य सुता भुजिपु चरितां जंजीरता मुण्डितां क्षुति क्षमा रुदति विधाय पदयोरन्तर्गतां देहली। कुल्माषानुप्रहरदयव्युपरमे सूर्यस्य कोणे स्थिता नुद्ध्यात्पार्णकं तदा भगवते सोयं महाभिग्रहे ॥ (१) द्रव्यसे उडदके वाकुले जो शुष्क किये हुये हों उनका भोजन लूगा। (२) क्षेनसे दाता का एक पग द्वारके भीतर हो और दूसरा ऐसे दातासे आहार लूगा।

परन्तु उनकी
(३) कालमे मध्याण्हके समय आहार ग्रहण करूगा।
(४) भावसे तन लगा, कि देनेवाली राजाकी कन्या हो
तथा दासीकी दशामें हो, शिरसे मुण्डित हो, तीन दिनके
उपवासका पारणा करने लगी हो, रदन करती हो, वा,
उसके पगोंमें जजीर पडी हो और उसके पाहार देनेके
विचार भी हो।
सो यदि पूर्वोक्त रीतिमे श्राहार मिलेगा तो लेलूगा नहीं.
तो में अन्न पानी ग्रहण नहीं करूगा।
इस प्रकार अभिग्रह करके भगवान् कालक्षेपण करने लगे
ज्ञाके अनुसार कहीं भी आहार न मिला।
- उस कालमें एक चम्पापुर नामक नगर था जिसके दधि-
वाहन अधिपति ये उस राजाकी धारणी राणी थी और
चन्दनवाला शीलशिरोमणि पुत्री थी तथा उसी कालमें को-
शम्बी नगरी (जहा भगवान्ने अभिग्रह ग्रहण किया था) के
अधिपति सन्तानीक महाराज थे, किसी कारण दधिवाहन वा
सन्तानीक राजामें परस्पर विरोध हो गया।
सो एकदा सन्तानीक राजा अपना कटक प्रस्तुत वा
सजित करके सग्राम के लिये चम्पा नगरीमें आगया तर
सग्राम होना प्रारम्भ हो गया, सहस्रों पुरुपोंका वध हुआ,
रुधिर नदियों की आकृतिमें बहने लगा, अस्थियोंकी राशिया
लग गई अतमें सन्तानीक राजाने जय प्राप्त करके नगर
लूटनेकी पात्रा देदी।

तर एक सैनिक पुरुप राजभवनमें घुमकर राणी और उसकी कन्या चन्दननालाको बलात्कारसे उठाकर कौशम्बी नगरीम ले पाया, किन्तु राणीने किसी शस्त्रादिके प्रयोगसे अपनी घात करली जिसमे वह ससार त्याग कर परलोक- वासिनी हुई। पश्चात् सैनिक पुरुपने विचार किया कि-एकतो मर गई यदि मैने दूसरीको विपयादिकी आशा पर कुछ कहा तो ऐसा न हो कि यह भी प्राण छोड दे और मेरे हाथ कुछ भी न आवे। यह विचार कर चन्दननालाको नाजारमें लेजाकर विक्रय करने लगा, पुण्ययोगसे वहां पर धन्ना नामक सेठ (जो बडा धर्मज्ञ वा सत्यवादी था) आगया, उसने चन्दननालाको मोल ले लिया, और उसे धर्मकी पुत्री बनाकर अपने घरमें ले आया। सेठजी की भार्याका नाम मूला था जो अति क्लेशप्रिया वा कलहकारिणी थी सेठजीने उससे कहा कि-हे सेठानी! यह अमला बडी दुःसिया है मै इमे अपनी धर्मपुत्री बनाकर लाया हूं अतः तू भी इसे निजपुत्री समझकर इसकी रक्षा कर. यह कहकर सेठजी अपने व्यवहारमें लग गये । इस प्रकार समय व्यतीत होने लगा किन्तु दुष्टा मूलाके मन में सदा दुष्टभाव रहते थे वह विचारती थी कि सेठजी इसे कन्या २ तो कहते है, स्यात् वह इसे अपनी जी त और प्रौढयौवना है.

चन्दननालाको मार दूं तो शंका जाती रहे. ऐसा विचार
कर वह छिद्र देसने लगी।
एकदा किसी कार्य के लिये सेठ जी कही अन्य ग्राममें
गये पश्चात् मूलाने सुअवसर जानकर कोधमें भर कर चन्दन
घाला का शिर मुण्डा दिया और उसके पगों में जजीर
डालकर वा कुत्सित वस्त्र पहनाकर, भूमिगृहमें (गुप्त घर या
भोरामें) डालकर बाहरसे तालक (जन्द्रा) लगादिया
और निर्भीक होकर दिवस पिताने लगी।
पुनः वह राजकन्या भोरे में पड़ी हुई *पचपरमेष्ठी का
जाप करती थी तथा अपने पापकर्मोंकी निन्दा करके
अनित्य भावना विचारती थी।
इसी दशामें तीन दिन अतिक्रात हो गये तब सेठजी
कार्य समाप्त करके स्वगृहमें आये और जर चन्दनबालाको
कहीं नहीं देखा तो मूलासे पूछा, कि "चन्दनवाला कहा
है" १ वह बोली "मुझे क्या सनर, क्या वह मुझे पूछकर
गई है" इतना कह कर वह क्रोधके वश होकर कहीं अन्यत्र
चली गई सेठजीने अपने समीपवासियोंसे वृत्तात पूछा, तब
एक रद्धा स्त्रीने समस्त वृत्तात कह दिया।
ऐसा हाल सुनकर सेठजी अत्यन्त घराये तथा त्वरित
ही भोरे में जाकर ताला तोड दिया और अपनी पुत्रीको
* नमो अरिहताण, नमो सिद्धाण, नमो आयरियाण, नमो उवज्झा
याण, नमो लोए सव्वसाहण एसो पच नमुकारो सम्व पावपणाशणो
मगलाणच स वैसि पढम हवा मगल (यह पचपरमेष्टीका जाप है जो सदा

ऐसी दुःसारस्थामें देसकर सेठनीकै नेनोंसे उष्ण जल भरणे लगा। चन्दनपालाको तीन दिनसे भूसी प्यामी जानकर उसे और कुछ विचार नहुना उमने शीघ्रही उडद के वाले जो समीप ही पडे हुये ये और अश्वके निमित्त बनाये गये थे, चन्दन पालाके मन्मुस रस दिये और कहा कि-हे पुत्री! तू इनको सा, में अभी तेरे सानेके लिये मिष्टान्न तथा जजीर काटने के लिये लोहकारको लाता हूं यह कह कर वह चला गया। तर चन्दननाला द्वारमें बैठकर तथा एक पग अन्दर और एक पग नाहिर करके उड़द साने लगी। अभी साने न पाई थी कि श्री श्रमण भगवान् महावीरजी भिक्षार्थ वहा आगये। फिर चन्दननाला भगवान के दर्शन करके परम हर्पित होकर इस प्रकारसे बोली, हे स्वामिन् ' मेरेसे यह उपस्थित शुद्ध वा निर्दोष आहार लीजिये। इम प्रकारके पचन सुनकर भगवान्ने अपनी प्रतिज्ञा का सरण किया तो निश्चय हुआ कि अभीतक मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण नहीं हुई ऐमा विचार कर तुरन्त लौट गये जब भगवान् आहारके विना ग्रहण किये चल पडे तर चन्दननालाको घडी अशान्ति तथा व्याकुलता हुई और उसके यह अध्यव- साय हुये कि-मै ऐसी निर्भागिनी जो ऐसे शुद्ध पात्र साधूको आहार न दे सकी, अपितु अपने पूर्वझत पापोंका पश्चात्ताप करके अश्रुपात करने लगी।

. उसकी ऐमी दशा देसफर और अपने अभिग्रहको पूर्ण हुया जान यहा पाकर आपने उमस याहार ले लिया यह प्रतिज्ञा पाच दिन न्यून पट् मासमें सम्पूर्ण हुई, अर्थात् भगवानको पाच दिन न्यून ६ मास पीछे यह उडट आहार मिला, जिससे आपने इस घोर अभिग्रहका पारणा किया। इसके अनतर भगवान्ने द्वादशवा चतुर्मास चम्पा नगरी में किया । चतुर्मास काल सम्पूर्ण होनेपर वीर प्रभु अन्यत्र विहार कर गये, तथा अनुक्रममे विचरते हुये एकदा रडग्राम के वाह्यस्थ उद्यान में पधारे और वहा पर ही त्रयोदशना चतुर्मास करके ठहर गये । तर अापको देवी मनुष्योने घोर उपमर्ग दिये जो कि परम दुम्माह्य वा भयकर थे अापने उन्हें नडी धीरतामे शान्तिपूर्वक सहन किया। इस प्रकारमे विचरते हुये श्री श्रमण भगवान महावीरजीको जो २ उपसर्ग वा * ऐसा गुद्ध आहार ऐस गुद पात्रम देनसे यहा दोंने मारे बारह कोटि मुनइयोंी दिव्य पपा की और चन्दनवाराकी रोहपरा (डोमा) काट दी तथा उसके शरीरको शुभारयुक्त कर दिया पश्चात् राजाने उसके पास आकर कहा, सि-हे पन्ये! तू धनको ग्रहण कर और मैं तेरा विवाह कर देता हू पर चदनवाराने यह क्थन स्वीकार न किया तथा उत्तर म राजासे कहा कि-"महारान में विवाह न क्राऊगा, परन्तु जयतक भगवानको केचर ज्ञान न उत्पन्न होगा तबतक मैं ससार मे श्राविकाकी गृत्तिम रहूगी, पश्चात् दाक्षा ग्रहण करूगी"। १ आपको एक सगम नामक देवने पट्मासपयन्त घोर उपसग रिया परंतु आपने वडाही शांतिपूरक उसको भी सहन दिया अतमं वह देव प्रात होपर चरा गया।

परिपह देव, मनुष्य तथा तिर्यच सम्बन्धि हुये यह समस्त उपसर्ग आपने अव्याकुल हृदयमे, अविक्षिप्त चित्तमे तथा अदीन मनसे तीनों योगोंद्वारा सम्यरु प्रकारसे क्षमण किये वा हितार्थ सहन किये, किन्तु कदापि अधीरता वा कायरता नहीं की, प्रत्येक परिपहके सन्मुस आप ऐसे होते थे जसे मदोन्मत्त हस्ती शबू की सेनामें निर्भीक होकर जाता है। इस विधिसे विहार करते हुये आपको १२ वर्ष और १ दिन न्यून ६ मास व्यतीत हो गये थे । एकदा आप जुभि नामक ग्रामके वाहिर अजुपालिका नदीके उत्तर कृलपर श्यामाक नामक गृहपतिके करपणके समीपस्थ वैयावृत्त्य चैत्य (उद्यान) की ईशान कृणमें शाल- वृक्षसे न अति दूर और न अति निकट स्थानपर विराजमान हो गये और कायोत्सर्ग करने लग गये। रात्रिके समय आपको अकस्मात् निद्रा प्रागई जिससे आप शयन कर गये। उस समय आपको दश स्वम आये जिनका विवर्ण सूत्र श्रीभगवती, शत्तक सोहवां उद्देश ६ में और सून श्रीमद् स्थानागजीके दशवें स्थानमें किया गया है। यथा- समणे भगव महावीरे छउमत्थ कालियाए अतिम राइयासि इमे दस महासुविणे पासि- ताणं पडियुद्धे तं जहा-एगं चण.महं घोररूव दित्तधर तालपिसाय सुमिणे परजियं पासि- त्ताणं पडिबुद्धे १ एग चणं महं सुफिल परकगं पुस कोइल सुमिणे पासित्ताण पडिबुद्धे २ एग चण मह चित्तविचित्त पक्सग पुंस कोइलगं सुमिणे पासित्ताणं पडिबुद्धे ३ एग चणं महं दामदुग सव्व रयणाय सुमिणे पासित्ताणं पडि- बुद्धे ४ एग चणं मह सेयगोवग्ग सुमिणे पासि- ताणं पडिबुद्धे ५ एग चण मह पउमसर सव्य उसमता कुसुमियं सुमिणे पासित्ताण पडिबुद्धे ६ एग चण मह सागर उम्मीचीया सहस्सक- लिय भुयाहितिण सुमिणे पासित्ताणं पडिबुद्धे ७ एगं चण महं दिणयर तेयसा जलतं सुमिणे पासित्ताण पडियुद्धे ८ एग चण मह हरि वेरू- लियदन्ना भेणं नियगेण अंतेण माणुसुत्तर प- व्वउ सव्वउसमता आवेढिय परिवेढिय सुमिणे पासित्ताण पडिबुद्धे ९ एग चण मह मदरे प- व्वण्ण मदर चूलिया उवरि सीहासण वरगर्य अप्पाण सुमिणे पासित्ताणं पडिबुद्धे ॥ १० ॥ जण समणे भगव महावीरे एग मह घोरवं दित्तधर तालपिसाय सुमिणे पाराजिय वा पा- सित्ताण पडियुद्धे तण समणेण भगवया म- हावीरेण मोहणिजे कम्मे मूलओ उग्धातित्ते जण समणे भगव महावीरे एग महं सुकिल + प जाव पडिबुद्धे तण समणे भगव महावीरे सुकज्झाणोवगए विहरति २ जणं समणे भगवं महावीरे एग महं चित्तविचित्त जाव पडिबुद्ध तण समणे भगव महावीरे विचित्त ससमय पर समयदुवालसंग गणिपडिगं आघवेति पन्नवेति परवेति दंसेति निदंसेति उवदंसेति तंजहा आ- या सूयगड जाव दिठिवाय ३ जण समणे भ- गवं महावीरे एग मह दामदुगं सव्वरयणामयं सुमिणे पासित्ताणं पडिवुद्धे तणं समणे भगवं महावीरे दुविहे धम्मे पन्नवेति तंजहा आगार धम्म वा अणगार धम्म वा ४ जण समणे भगवं महावीरे एगं महं सेयगोवग्गं जाव पडिबुद्धे तणं समणे भगवं महावीरे चाउवण्णाईणे समणसंघे पन्नत्ता तजहा समणाउ समणीउ सावयाउ सावियाउ ५ जणं समणे भगव महा. वीरे एग महं पउमसरं जाव पडिबुद्धे तण स- मणे भगव महावीरे चउविहे देव पन्नवेत्तितजहा भवणवासी वाणमंतर जोतिसियए चेमाणिए ६ जणं समणे भगवं महावीरे एग महं सागर जाव पडिबुद्धे तण समणेणं भगवया महावी- रेण अणादीए अणचदग्गे जाव ससार कंतारे तिणे ७ जण समणे भगवं महावीरे एग महं दिणयर जाव पडियुद्धे तण समणस्स भगवओ

४२
महावीरस्स अणते अणुतरे जाच केवलवर ना.
णदसणे समुप्पन्ने ८ जण समणे भगव महा-
वीरे एग मह हरिय वेरूलिय जाव पडिबुद्धे
तण समणस्स भगवओ महावीरस्स उराली
कित्तिवन्न सद्द सिलोया सदेव मणुयासुर लोगे
परियुवति इति खलु समणे भगवं महावीरे
इति ग्वल ९ जण समणे भगव महावीरे मदिरे
पव्वए मदरे चूलियाए जाव पडिबुद्धे तण स.
मणे भगव महावीरे सदेव मणुया सुराए परि-
साय मज्झगए केवलि पन्नत्त धम्म आघवेति
जाव उवदसति ॥१०॥ इति ॥
अर्थ-श्री श्रमण भगवान् महावीरजी छमस्थ का-
लकी अन्तिम रानिक अरसानके प्रहरमें यह दश महास्वम
देसकर जागृत हुये यथा--एक महा भयकर तथा विकराल
रूप धारी ताल पिशाचको स्वममें मैं ने पराजय कर दिया.
यह देखकर प्रतिबुद्ध हुये १ एक महा शुक्ल पक्षोंगाले पुरुष
कोकिलको स्वम में देसा २ एक महा चित्रविचित्र परोंवाले
पुरुष कोकिलको स्वप्न में देसा ३ प्रधान रनोंसे निर्मित
परम पवित्र मालायुग्मको स्वम में देसा ४ महाश्वेत वर्णीय
गोर्ग को स्वम में देखा ५ एक महापनसरोवरको देखा
जिसमें पट् मातुओंके कुमुम विकसित हो रहे थे जो परम
रमणीय तथा चित्ताकर्पक ये, सात खम में भगवान्ने देखा
कि एक महाविशाल वा अथाह समुद्र है जिसमें सहस्रों लों
।

उत्कट लहरें यारही हैं, ऐसे रत्नाकरको मैं भुजोसे तर गया ७ आठवें सहस्र किरणों करके देदीप्यमान एक महासूर्यको स्वम में देखा ८ ननमें स्वम में मानुपोत्तर पर्व- त्तको हरितवर्णीय वैडूर्य रनोंसे सर्व सीमतमें परिवेष्टित देसा ९ दसवें-मेरूगिरिकी सर्वोच्च चूलिका पर एक अतीय प्रधान सिंहासन है सो ऐसे सिहासन पर मै बैठा हू यह स्वम देखा ॥१०॥ प्रथम स्वम में जो भगवान्ने देखा कि मैने पिशाचको पराजय कर दिया है उसका फल यह हुआ कि ससारभर में प्राणियोको दुःसित करने वा एक गतिसे दुमरी गति में भटकानेवाला, और अनेक जन्मो में रुलानेवाला जो मोह- नीय कर्म है, जिसके प्रभावसे आत्मा अपने निजगुणकी परीक्षा में असमर्थ हो जाता है तथा मोक्षमार्गसे पराभुस रहता है, ऐसे मोहनीय कर्मपर भगवान्ने विजय पाई अर्थात इसका नाश किया। द्वितीय-जो आपने स्वम में शुरू पक्षोंवाले पुरुष कोकिल को देसा उसका फल आपको यह हुआ कि आपको परम शुरू व्यानकी प्राप्ति हुई जिसमे आर्त वा रौद्रध्यानका सदा के लिये तिरस्कार हुआ। तृतीय-जो आपने चिनविचित्र पक्षांवाले पुरुष कोकिल को स्वम में देसा उसका फल आपको यह हुआ कि-अापने चित्रविचित्र गूढ इखोंसे पूरित यथार्थ सिद्धान्तको वर्णन किया अर्थात् स्वसमय वा परसमयरूप आचारांग, सूत्रकृताग समय चन्द्रमा उत्तराफाल्गुणी नक्षत्र में आया हुआ था) अपराह काल में उत्तर पूर्व दिशाभाग में (ईशान कोन में) जन कि भगवान सूर्य की प्रातापना ले रहे थे तथा निर्जल छठ भक्त (वेले) के साथ ऊर्भ जानु अधोशिर करके स्थित थे और धर्मध्यानोपगत वा ध्यानरूपी गृहमें प्रवेश करके तथा शुलध्यान के अन्तर वर्तमान होते हुओंको निरावर्ण, सम्पूर्ण, प्रतिपूर्ण, निर्विध्यात, अनत, अनुत्तर केवल ज्ञान वा केवल दर्शन उत्पन्न हुआ। तदनतर स्वर्ग में इन्द्रों के आसन कम्पायमान हुये, इन्द्रों ने अवधि ज्ञान में उपयोग देकर देखा कि-हमारे श्रासन क्यों चलायमान हुये हैं, तब प्रतीत हुआ कि भगवान श्री वीर प्रभुको केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ है अनादि कालसे इन्द्रोंका यह जीत व्यवहार है कि वह तीर्थंकर महाराजके जन्मोत्सव, दीक्षोत्सव, केवलज्ञानउत्पन्नोत्सव तथा निर्वा- णोत्सव इन चार कारणोसे मर्त्यलोक में जाते हैं । इस लिये हमें योग्य है कि-हम वहा जाकर भगवान्को केरल ज्ञान उत्पन्न होनेकी महिमा करें यह विचार कर नोट-इसी प्रकार हेमचद्राधाग्यविरचित "श्रीनिपष्टिशलाकापुरुषचरिन" प्रथके १० वं पूर्वके ५ व सग में लिखा है तथाहि- जगनाथोऽथ तनजुपारिकोत्तर रोधसि । श्यामाक्नानो गृहिण क्षेने शालतरो सले ॥ १ ॥ अव्यक्तचैत्यस्यासने पष्ठे नोत्कटिकासनी। मुहूत विजये स्वामी तस्थावातापनापर 10॥ युग्मम् । शुक्लध्यानान्तरस्थस्य क्षपक्श्रेणिवतिन । स्वामिनो धातिक्माणि तुग्रुटुजीर्णरज्जुवत् ॥ ३ ॥ वैशाखश्वेतदशम्यां चन्द्र हस्तोत्तरगते । यामे चतुर्थऽहो मतुरुदपद्यत केवलम् ॥ ४॥ इति ॥

४७ समस्त इन्द्र देवसमूहके साथ परिवृत्त होते हुए अत्यन्त हर्ष- पूर्वक भगवानके पास आये और बन्दना नमस्कार की फिर एक योजन प्रमाण अनुपम समोसरण रचा। फिर भगवान् वर्द्धमान स्वामीने वहा पर विराजमान होकर धर्मोपदेश दिया परन्तु देव प्रवृत्ति होते है अर्थात् उनके देवभव में प्रत उदय नहीं होता इस कारण किसीने भी गत तथा प्रत्याग्यान ग्रहण नहीं किया। पुनः भगवान्ने वहा से विहार कर दिया और अनुकमसे अपापापुरी में पधारे। तन सुरोंने उस नगरीके समीपतरवर्ती एक सुन्दर उद्यान में बडा मनोहर रमणीय समोसरण रचा। तब भगवान् देववृन्दसे परिवृत हुए २ पूर्व दिशाकी ओरसे प्रविष्ट हुये और एफ पिचिर महासिंहासन पर बैठ गये. उस समय चारो श्रोरसे जयजयकारके शब्द सुनाई देते थे. देव हर्पित होकर भगवान्की स्तुति कर रहे ये तन निजगद्गुरु श्री भगवान महावीरजी अपनी पाणीरूपी पीयूपधारासे अमृतरूपी वर्षा करने लगे तथा आपने प्रतिपादन किया। हे आर्यो! यह ससार समुद्रके समान दारण तथा अप- रिमित है। कर्म इसके मूल कारण है जैसे वृक्ष वीजसे उत्पन्न होता है इसी प्रकार जो आत्मा इस संसारसागरम परिभ्रमण करता है उसका मूल कारण कर्म है अर्थात् कोंके प्राधीन होकर आत्मा इस भयकर ससारार्णव में पर्यटन करता है।

४८
जीव कर्म करने में सदा स्वता है अतः जब जीव विवेक
शून्यहोकर पापकमों में श्रासक्त हो जाता है तब वह कूप
सनक की नाई पापोंसे बोझल होकर अघोसे अधो गतिको
प्राप्त करता है अर्थात् जैसे कुत्रा खोदनेवाला पुरुष ज्यों २
कुया बनाता है त्यों २ पृथ्वीमें नीचेसे नीचे चला जाता है
इसी प्रकार पापोंमे गुरु होकर जीव भी सम्म अधोगति
(नरक) में चला जाता है और यही प्रात्मा निजसुस्तके
द्वारा उच्चसे उच्च गतिको उपलब्ध कर लेता है तथा श्रेष्ठ कर्मोंसे
इस प्रकार ऊपरसे ऊपर गमन करता है जैसे प्रासादकारक
ज्यो २ प्रासाद पनाता जाता है त्यों २ ऊंचेसे ऊचे होता
जाता है इससे सिद्ध हुआ कि-अात्मा जैसे श्रेष्ठ अथवा
निकृष्ट कर्म करता है तदनुसार फलको प्राप्त करता है ।
"सुचिन्ना कम्मा मुचिन्ना फला भवति दुचिन्ना कम्मा दुचिन्ना
फला भवंति" अर्थात् सुष्ट कर्म करनेसे सुस और निकृष्ट
(पापादि) कर्मसे दुःस उपलब्ध होता है अतः समस्त प्रा-
णियोंको अपने समान जानकर किमीको दुःस न देना चा-
हिये क्योंकि सर्व जीव सुसामिलापी हैं दु'स भोगना कोई
भी नहीं चाहता. इस लिये कर्म पन्धनका कारणरूप
प्राणातिपात पाप त्यागना चाहिये. मृपावादको छोडकर
मुनृत भापण करना चाहिये तथा किसीका धन हरण करना
(चोरी करना) कदापि योग्य नहीं, क्योंकि गृहस्थाश्रममें
गृहस्थियोंके लिये धन प्राणोंके सदृश है इस लिये किसीका
धन हरण करनेका पाप उसके प्राण हरणसे न्यून नहीं है,

इसी प्रकार बहुत जीवोका मर्दक मैथुनरूप महापाप भी त्यागना चाहिये। ब्रह्मचर्यत्रत सर्व ततोंमें प्रधान और मोक्षका कारण है इसको धारण करना चाहिये । इससे उभय लोकमें सुख प्राप्त होता है। ब्रह्मचारीको देसते ही मनुष्य नमस्कार करते है। कर्मरूपी मलके दूर करनेके लिये भी ब्रह्मचर्यव्रत धारण करना परमावश्यक है इसी प्रकार परिग्रहमें मूर्छित न होना चाहिये इसमें मुग्ध होनेसे जीव अनेक कष्टोंको सहन करता है अतः हे आर्य पुरुषो! प्राणातिपात ग्रादि पापोंको त्याग कर अहिसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचय्य, अपरिग्रहादि धर्मोको धारण करो, यदि तुम सर्वथा प्रकारसे साधुरत्तिको धारण नही कर सक्ते तो श्रानकटत्तिको ही ग्रहण करो। स्मरण रसो, धर्मके विना तुम्हारा कोई साथी नहीं होगा। धर्मसे इहलौकिक सुस अर्थात प्रशसा प्रतिष्ठादि और पारलौकिक सुस अर्थात् स्वर्गमोक्षादि की प्राप्ति होती है। जीव कर्म करनेमें सदा खतन्त्र है किन्तु जर कर्म कर चुकता है और उसका बंध निकाचित हो जाता है तब वह पराधीन अर्थात् उन्हीं कोंके वशीभूत हो जाता है, किन्तु यावत् काल पर्यन्त कर्मक्षय नहीं होते तावत् काल पर्यन्त जीव मोक्ष को उपलब्ध नहीं कर सका इसलिये प्रत्येक गृहस्थको द्वादश नियम ग्रहण करने चाहिये यथा- * थूलाउ पाणाइवायाउ रमणं । स्थूल जीवहिसा से निवृत्तिरूप प्रथम अनुत्रत है, क्योंकि

जीव कर्म करने में सदा स्वतंत्र है अतः जब जीन विवेक
शून्यहोकर पापकर्मों में आसक्त हो जाता है तब वह कूप
सनक की नाई पापोसे नोझल होकर अधोमे अधो गतिको
प्राप्त करता है अर्थात् जैसे कुत्रां सोदनेवाला पुरुष ज्यों २
कुत्रा बनाता है त्यों २ पृथ्वीमें नीचेसे नीचे चला जाता है
इसी प्रकार पापोंसे गुरु होकर जीव भी सनसे अधोगति
(नरक) में चला जाता है और यही श्रात्मा निजसुस्तके
द्वारा उच्चसे उच्च गतिको उपलब्ध कर लेता है तथा श्रेष्ठ कर्मोसे
इस प्रकार ऊपरसे ऊपर गमन करता है जैसे प्रासादकारक
ज्यों २ प्रासाद बनाता जाता है त्यो २ ऊचेसे ऊचे होता
जाता है इससे सिद्ध हुआ कि यात्मा जैसे श्रेष्ठ अथवा
निकृष्ट कर्म करता है तदनुसार फलको प्राप्त करता है ।
"मुचिन्ना कम्मा सुचिन्ना फला भवति दुचिन्ना कम्मा दुचिन्ना
फला भवति" अर्थात् सुष्ट कर्म करनेसे सुख और निकृष्ट
(पापादि) कर्मसे दुःस उपलब्ध होता है अतः समस्त प्रा-
णियोको अपने समान जानकर किसीको दु.स न देना चा-
हिये क्योंकि सर्व जीव सुसाभिलाषी हैं दु'स भोगना कोई
भी नहीं चाहता. इस लिये कर्म बन्धनका कारणरूप
प्राणातिपात पाप त्यागना चाहिये मृपावादको छोडकर
सुनृत भापण करना चाहिये तथा किसीका धन हरण करना
(चोरी करना) कदापि योग्य नहीं, क्योंकि गृहस्थाश्रममें
गृहस्थियोंके लिये धन प्राणोंके सदृश है इस लिये किसीका
धन हरण करनेका पाप उसके प्राण हरणमे न्यून नहीं है,

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५० सर्वथा जीनहिंसा की तो गृहस्थी नित्ति नहीं कर सक्ते, इसलिये प्रत्येक पुरुषको स्थल जीवहिसा का त्याग करना चाहिये अर्थात् जान बूझकर किमी निरापराधि जीवका वध न करना चाहिये । इस नियमसे न्यायमार्ग की अतीव प्रवृत्ति होती है । इस प्रतको राजाओसे लेकर सामान्य जीवों पर्यन्त मर्य आत्मायें मुसपूर्वक धारण कर सक्ती हैं। राजा- ओंके लिये सयपराधि जीवों को दण्ड देते ममय दयाका पृथक करना अयोग्य है क्योंकि ऐसा करने से नियममें दोप लगता है, इसलिये जिस प्रकार उक्त नियम में दोप न लगे उम प्रकारसे ही ग्रहण करना चाहिये अर्थात् दडके पश्चात् राजा की ओर से नगरमें उद्घोषणा करवा देनी चाहिये यथा--"हे मनुष्यो! इस व्यक्तिको अमुक दड दिया जाता है इसमें महाराज (राजा) का कोई भी दोष नहीं है, अपितु जिसप्रकार हमने पापकर्म किया है उसीप्रकार इसको यह दड दिया जाता है"। इस कथनमे भी न्यायधर्म की पुष्टि होती है। नियमधारी को इस प्रथम त्रत की शुद्धिके लिये पांच अतिचार भी वर्जने योग्य हैं जोकि प्रथम नतमें दोपरूप हैं अर्थात् प्रथम प्रतको कलकित करनेवाले हैं यथा- वघे १ व २ उविच्छेदे ३ अइभारे ४ भत्त- पाणवुच्छेए ५ अर्थः-कोधके वश होकर कठिन बधनोंसे जीवोंको बांधना १ निर्दयताके साथ उनको मारना २ अङ्गोपागको

छेदन करना ३ पशुकी शक्तिको न देसकर अप्रमाण भारका
लादना ४ अन्नपानीका व्यवच्छेद करना अर्थात् अन्नपानी
न देना ५ यह पाच अतिचार अवश्यही प्रतधारीको त्यागने
चाहिये क्योंकि इनके त्यागसे ही प्रथम नत की शुद्धि हो
सक्ती है।
द्वितीय अनुव्रत ।
। यूलाउ मुसावायाउ बेरमण ।
स्थल मृपावाद निवृत्तिरूप द्वितीय अनुत्रत है। कन्या
भूम्यादि और गवादि पशुओके लिये अथवा म्यापनमृपा
कूटमाली व्यापार तथा अन्य २ कारणोमें स्थूल असत्य
भाषण करनेसे प्रतीति का नाश हो जाता है, राज्यसे दड
की प्राप्ति होती है और प्रात्मा पापसे कलंकित हो जाती
है इसलिये असत्य भापी नहीं होना चाहिये, अपितु यह न
समझ लीजिये कि स्थूल ही मृपावाद छोडने योग्य है किन्तु
सूक्ष्म की आज्ञा है। हे पुरुषो! सूक्ष्म की आज्ञा नहीं है -
किन्तु दोष न लग जाने पर स्थूल शब्द ग्रहण किया गया
है अपितु असत्य सर्वथा ही त्यागनीय है और जीव की
सदैवकाल दुःसित करनेवाला है, संसारचक में परिवर्तन
करानेवाला सुकम्मौका नाशक है। इसलिये आत्मारक्षक
द्वितीय अनुनतकी पुष्टि अर्थात् शुद्धिके लिये पाच अतिचार
वर्जने योग्य है यथा-
१ रहसाभक्खाणे
३ मोसोवएसे ४ १३०
-
.

५२
अर्थः-विना विचार किये अकस्मात् भाषण तथा दोपा-
रोपण करना १ रहस अर्थात् गुप्ततार्चाओंको प्रगट करना
२ स्वमार्याका मत्र अर्थात् भेद प्रकाश करना ३ मिथ्या
उपदेश देना ४ असत्य और सोटे लेस लिसना ५ इन पाच
ही अतिचारो को त्याग कर द्वितीय नत शुद्ध ग्रहण करना
चाहिये ।
तृतीय अनुव्रत ।
यूलाउ अदिन्नादाणाओ वेरमण ।
तृतीय अनुप्रत स्थूल चोरी का परित्यागस्प है जैसेकि-
ताला तोडना, गाठ छेदन करना, भित्ति तोडना, मार्गोमें
लूटना, डाके मारना इत्यादि । यह निदनीय कर्म अधोगति
के देनेवाला वा दोनो गृहोंकी भयानक दशा करनेवाला है।
इसके द्वारा वधकी प्राप्ति होना तो स्वाभाविक नात है। इस
कर्मके द्वारा प्राणी दोनों लोकोंमें अनेक कष्ट भोगते है
इमलिये प्रतधारी पाच अतिचारोका भी परिहार करे यथा---
तेणाटे १ तकरप्पओगे २विरुद्धरनाटकम्मे ।
कृडतुडमाणे ४ तप्पडिस्वगववहारे ५
अर्थः-चोर की वस्तु लेना १ चोरकी रक्षा वा सहायता
करना २ राज्यके नियमोंके विरुद्ध कर्म करना ३ सोटा
तोलना और सोटा मापना (अधिक लेना न्यून देना) ४
प्रतिरूपक व्यवहार अर्थात् शुद्ध वस्तुमें अशुद्ध वस्तु एकत्र
करके विक्रय करना ५ इन पाचों अतिचारोंका परित्याग
करके तृतीय प्रत शुद्ध धारण करने योग्य है।
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चतुर्थ अनुव्रत । हे आर्यपुरुषो! काम और इन्द्रियोंको पशकरना यही परम धर्म है जैसे इंधनसे अमि शात नहीं होती केवल जलद्वारा ही उपशमताको प्राप्त होती है, उसी प्रकार यह कामानि संतोष द्वाराही उपशम हो सक्ती है अन्य प्रकारमे नहीं । ब्रह्मचर्य- जत आत्मशक्ति, मुक्तिके अक्षय सुस, शरीरकी निरोगता, उत्साह, हर्प का दाता और चिचको प्रसन्न रसनेवाला है। उमय लोकमें यशप्रद है। इसके धारण करनेवाले यात्मा खम्वरूप वा परस्वरूपके पूर्ण वेत्ता होते है। गृहस्थ लोगोंको पूर्ण ब्रह्मचारी होना परम कठिन है, इसलिये गृहस्थ लोगोंको स्वदारसन्तोपत्रत धारण करना अत्यावश्यक है और स्त्रियोंके लिये भी म्बपतिमतोप प्रत है जो उनको भी धारण करने योग्य है । इस व्रतके भी पाच अतिचार है यथा- इत्तरियपरिग्गहियागमणे १ अपरिग्गरिया- गमणे २ अणगकीड़ा ३ परविवारकरणे ४ कामभोगातिव्वाभिलामे ५ अर्थः-लघु व्यवम्यायुक्त स्वस्त्रीके साथ सभोग करना, २ वाग्दत्ता स्त्रीके साथ भोग करना २ कामके वश होकर कुचेष्टा द्वारा वीर्यपात करना ३ परपुरुषोंकी मागका अपने साथ विवाह करना ४ काम भोगकी तीन अभिलापा करना ५ इन पाचही अतिचारोंको त्यागकर खदारसंतोष त ना चाहिये।

पंचम अनुव्रत । हे देवानुप्रियो ! तृष्णाका कोई भी थाह नहीं मिलता। इच्छाके मशीभूत होकर प्राणी अनेक सकटोंका सामना करते है, रात्रि दिन इसकी ही चिन्तामें लगे रहते है । धनके लिये कार्य कार्य करते लझा नहीं पाते और अयोग्य कामोंके लिये भी उद्यत हो जाते हैं परन्तु इच्छा फिर भी पूर्ण नहीं होती । अनेक राजे महाराजे चकार्ती यादि भी इस तृप्णा- रूपी नदीसे पार न हुये और किमीके साथ यह लक्ष्मी न गई । इमलिये तृष्णारूपी नदीसे पार होने के लिये सतोपरूपी सेतु (सेतु-पुल ) पाधना चाहिये अर्थात् इच्छाका परि- माण होना चाहिये इम व्रतके भी पाचही अतिचार हैं यथा- खेत्तवत्युपमाणाइकम्मे १ हिरणसुवणपमा- णाइकमे २ दुपयचउप्पयपमाणाइफमे ३ घण- धाण्णपमाणाइक्कमे ४ कुवियपमाणाइकमे ५ अर्थः-क्षेन वस्तुके प्रमाणको अतिकम करना १ हिरण्य सुवर्णके प्रमाणको अतिकम करना २ द्विपद चतुप्पदादि पशुओंके प्रमाणको अतिकम करना ३ धनधान्यके प्रमा- णको अतिकम करना ४ गृहसामग्रीके प्रमाणको उल्धन करना ५ व्रतधारी गृहस्सको यह पाची अतिचार वर्जने योग्य है। पष्टम, मप्तम, अष्टम इन तीनों नतोको गुणनत कहते हैं, क्योकि यह तीनो गुणत्रत पाचही अनुव्रतोंको गुणकारी . है और पाचही अनुनत इनके द्वारा सुरक्षित है । हे देवानु- प्रियो प्रथम गुणवतका नाम दिग्नत है जिसका अर्थ 'पूर्ण, पश्रिम, दक्षिण, उत्तर, ऊर्ज, अधो दिशाओका परिमाण करना' है । पुरुष जितनी मर्यादा करेगा, उतनाही याम्रय निरोध होगा। सो इस नतके भी पाचही अतिचार समाच- रण अयोग्य है यथा- उदिमिपमाणाडयमे १ अहोदिसिपमाणाइ- फमे २ तिरियदिसिपमाणाइयमे ३ येत्तबुट्टिर सहअंतरद्धा५ अर्थः-ऊर्य दिशाके प्रमाणका अतिकम करना १ अधो दिशाके प्रमाणका अतिकम करना २ तिर्यग् (मध्य ) दिशाके प्रमाणका अतिकम करना ३ क्षेत्रकी वृद्धि करना ४ स्मृत्यन्तर्धा (शका होनेपर भी प्रमाणसे अधिक गमन करना) ५ यह पाचो अतिचार दिग्नतको कलकित करने- वाले हैं। द्वितीय गुणवत। जो वस्तु एकनार भोगने में आने तथा जो वस्तु वार- म्बार भोगनेमें श्राचे उमफा परिमाण करना सो ही द्वितीय गुणत्रत है। इसनतके अन्तर्गत ही पविशति २६ वस्तु- ओंका परिमाण अवश्य करना चाहिये जो इस प्रकार है:- १ जललूपणवस्त्र (शरीरके पंछनेका वस्त्र अर्थात् तालिया) र दतमलापकर्पणकाष्ट (दातन) ३ फल (केशादि धोन- नके वास्ते) ४ तेल ५ उद्वर्तन (उबटना) ६ मजन ७ वस्त्र अर्थात् वखोंकी जाति सरया ८ विलेपन (चदनादि) ९ पुष्प (शरीरके परिभोगनार्थ पुष्प ) १० श्राभूपण (रत्नादि ) ११ धृप १२ पेय (पीनेवाली वस्तु) १३ भक्ष (सानेवाली वस्तु) १४ अोटन १५ सूप (दाल) १६ घृतादि १७ गाक १८ माधुरक १९ जेमन २० जल (कूप या तालारका ) २१ ताम्बूलादि २२ वाहन २३ जूती आदि २४ शग्या २५ सचित्त वस्तु (पृथ्वी, पानी, अग्नि वायु- आदि ) २६ द्रव्योका प्रमाण करना चाहिये तात्पर्य यह है कि विना परिमाण कोई भी वस्तु ग्रहण करना अमणोपास- कको अनुचित है सो इसके पाच ही अतिचार है यथा- सचित्ताहारे १ सचित्त पडिवद्धाहारे २अप्प- उलिओसहिभक्खणया ३ दुप्पउलि ओसहि भक्खणया ४ तुच्छओसहि भक्पणया ५ अर्थः-सचित्त वस्तुका आहार १ सचित्तप्रतिबद्धका आ- हार २ अपक आहार ३ दुःपक आहार ४ तुच्छौपधिका याहार ५ इन पाच अतिचारोंको वर्जके फिर १५ कर्मादान भी त्यागनीय हैं क्योंकि इन पचदश कमौके करनेसे महाकाँका नध होता है सो गृहस्थोंको जानने योग्य है अपितु ग्रहण करने योग्य नहीं है यथा- १ अङ्गार कर्म (कोलोका व्यापार )२ वनकर्म (वन कटवाना)३ शकटकर्म (शकटादिका व्यापार ) ४ भाटक- कर्म (पशुओंको भाडे पर देना) ५ स्फोटकर्म (कुटाल हलादिसे भूमिको दारण करना) ६ दन्तवाणिज्य ( हस्ती आदिके दांतोका व्यापार करना )७ लाक्षा वाणिज्य (लास तथा मजीठाका व्यापार ) ८ रसवाणिज्य (घृत, तेल, गुड मदिरादिका व्यापार)९ विपवाणिज्य १० केश- वाणिज्य ११ यन्त्रपीडन कर्म (कोल्हु ईस पीडनादि कर्म) १२ निर्लाञ्छन कर्म (पशुम्रोको नपसुक करना वा अवयवों का छेदन भेदन करना) १३ दवाग्निदान (यनादि जलाना) १४ सरोहदतडाग परिशोपणता (जलाशयोके जलको शो- पित करना, इस कर्मसे जो जीव जलके आश्रयभूत हैं चा जो जीव जलसे निर्वाह करते है उन सबको दुःख पहुचता है और निर्दयता बढ़ती है) १५ असतीजन पोपणता कर्म (हिसक जीवोंका पालना यथा-मार्जार, श्वानादि) यह कर्म गृहस्थोको अवश्य ही त्याज्य है । तदुपरान्त तृतीय गुणवत धारण करना वाहिये। तृतीय गुणव्रत । हे देवानुप्रियो ! तृतीय गुणनत अनर्थ दड है । जो वस्तु ग्रहण करनेमें न आवे और किसीके उपकारार्थ भी न हो, निष्कारण जीवोंका मर्दन भी हो जाने ऐसे निंदित काँका अवश्यमेव ही परित्याग करना चाहिये । इस अनर्थ दण्डके मुख्य चार कारण हैं यथा- (अवज्झाण चरिय पमायचरियं हिमपयाणं पावकम्मो- वएस ) आर्तध्यान करना क्योकि इसके द्वारा महा काँका पध, चित्तकी अशान्ति, धर्मसे पराङ्मुसता इत्यादि कृत्य होते हैं इसलिए अपने सचित कमोके द्वारा सुख दुःस जीवोंको प्राप्त होते हैं, इस प्रकारकी भावनायो द्वारा प्रा- स्माको शान्ति करनी चाहिए । फिर कभी भी प्रमादाचरण न करना चाहिए जैसे घृत तैल जलादिको विना आच्छादन किये रसना यदि उक्त वस्तुओंमें जीवोका प्रवेश हो जाए तो फिर उनकी रक्षा होनी कठिनही नहीं किन्तु असभव है। हिमाकारी पदार्योका दान करना जैसे-शस्त्रदान, अग्निदान, और ऊसल मूमलदान इत्यादि दानोंसे हिसाकी प्रवृत्ति होती है, सुकर्मकी अरचि हो जाती है । चतुर्थ कर्म अन्य श्रात्माओंको पापकर्ममें नियुक्त करना, सो यह कर्म कदापि आसेवन न करने चाहिए फिर इस तृतीय गुणनतकी रक्षाके लिए पाच अतिचारोंको भी छोडना चाहिए जो निम्न प्रकारसे हे ॥ कंदप्पे १ कुकुडए २ मोहरिण ३ सजुत्ताहि गरणे ४ उपभोग परिभोग अडरित्ते ५ अर्थ:-कन्दर्प ( कामजन्य वार्ताओंका करना) १ को- त्कुन्य ( कुचेष्टा करना ) २ मौसर्य अर्थात् मर्मयुक्त वचन बोलना ३ प्रमाणसे अधिक उपकरण वा शास्त्रादिका संचय करना ४ उपभोग और परिभोगका प्रमाणसे अधिक सचय करना ५ यह पाच अतिचार छोडने चाहिये क्योकि यह दोपरूप हैं अर्थात् इन अतिचारोंके द्वारा नत कलकित हो जाता है और निर्जराका मार्ग भी यद हो जाता है । तदन- न्तर प्रत्येक गृहस्थको ४ शिक्षारत धारण करने योग्य हैं यथा--

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प्रथम शिक्षाबत।
यह मनुप्य जन्म यतीय पुण्योदय मे माप्त हुया है उसको
सफल करनेके लिये दोनों समय सामायिक करना चाहिये ।
* सम-यय-इक इन तीनोंकी संधि करनेसे सामायिक
शब्द सिद्ध होता है जिसका अर्थ यह है कि श्रात्माको
शान्ति मार्गमें आस्ट करना चा जिमके करनेसे शान्ति प्राप्त
हो उसीका नाम सामायिक है । सो डम प्रकारसे भाव
सामायिकको दोनो काल करे । फिर प्रातःकाल और सन्न्या-
कालमें सामायिककी पूर्ण विधिको भली भातिसे करता
दुया मामायिक सूत्रको पठन करके इस प्रकारसे विचार करे
कि-यह मेरा आत्मा ज्ञानस्वरूप है, केरल कोंके अतरसे
ही इसकी नाना प्रकारकी पर्याय हो रही है और अनादि
काल के कांके सगसे इस प्राणीने अनंत जन्म मरण
किये है। फिर पुनः २ दुःसरूपी दावानल में इस प्राणीने
परम कष्टोंको सहन किया है, और तृष्णाके वशमें होता हुआ
अतृप्त ही मृत्युको प्राप्त होजाता है । सो ऐमे परम दुःसरूप
ससारचकसे विमुक्त होनेका मार्ग केवल सम्यग् ज्ञान सम्यम्
दर्शन सम्यग चारित्र ही है । सोजन प्राणी यात्रवके मागाको
वध करता है और आत्माको अपने वशमें कर लेता है, तन
* सम शब्दके सकारका अकार, टण् प्रत्ययात होनेसे दीघ हो जाता है
क्योंरि-जिस प्रत्ययके ज्-ण्-इत्सज्ञक होते हैं उनके आदि अचूको आ-आर
। इसी प्रकारले सामायिक शब्दकी भी सिद्धि है

अवश्य ही करना चाहिये और इस नतके भी पाचों अतिचा-
रोको वर्जना चाहिये, जैसे कि-
मणदुप्पडिहाणे १ चयदुप्पडिहाणे २ कायदु-
प्पडिहाणे सामाइयरससइअकरणया४सामा-
इयस्सअणवढियस्स करणया .
अर्थः-
मनका दुष्ट प्रणिधान करना १ पचनका दुष्ट
प्रणिधान करना २ कायाका दुष्ट प्रणिधान करना ३ शक्ति
होते हुए भी सामायिक न करना ४ सामायिकके कालको
पूरा न करना ५ इन अतिचारोंका परित्याग करके शुद्ध
सामायिकरूप नियम दोनों समय अर्थात् सन्ध्या और प्रात:-
काल सेवन करना चाहिये । यही प्रथम शिक्षानत है ।
द्वितीय शिक्षाबत।
देशावकाशिक।
पष्टम मतानुसार पूर्वादि दिशाओके कृत परिमाणसे
नित्यप्रति स्वल्प करते रहना उसका नाम देशावकाशिक
जत है । इस व्रतमें चतुर्दश १४ नियमोको धारण किया
जाता है अपितु जिस प्रकारसे नियम किया जावे उसी प्रकार
से पालन करना चाहिये, किन्तु परिमाण की भूमिकासे
बाहिर पाचास्रव सेवनका प्रत्यारयान करना चाहिये । इस
ही कोंक बंधनोंसे विमुक्त हो जाता है । सो इस प्रकारके
सद्विचारोंके द्वारा सामायिक कालको परिपूर्ण करे। अपितु
मामायिक रूप नत दो घटिका (घडी) प्रमाण दोनों समय

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तके धारण करनेसे बहुत ही पापोका प्रवाहबंधहो जाता
है। इसके भी पाच ही अतिचार है यथा-
आणवणप्पओगे १ पेसवणप्पओगे २ सद्दा-
गुवाए ३ ख्वाणुवाए ४ बहियायोग्गलपक्खेवे ५
अर्थः-बाहिर की वस्तु याज्ञा करके मंगवाना १ परि-
माणसे वाहिर भेजना २ शब्द करके अपनेको प्रगट करना
३ रूप करके अपने आपको प्रसिद्ध करना ४ पुद्गल प्रक्षेप
करके प्रगट करना ५ यह अतिचार व्रत में दोपरूप है।
तदनन्तर पौपधनत अवश्य ही धारण करना चाहिये जिसके
धारण करनेसे कौकी निर्जरा वा तपकर्म दोनो ही सिद्ध हो
जाते है।
तृतीय शिक्षाबत।
उपाश्रयमें वा पौपधशालामें तथा स्वच्छ स्थानमें अष्ट
यामपर्यन्त एक स्थानमें रहकर उपवास प्रत धारण करना
उसका ही नाम पौपधात है। अपितु पौपधोपवासमें अन्न,
पाणी, खाद्यम, स्वाद्यम, इन चारो ही आहारका प्रत्याख्यान
होता है, और ब्रह्मचर्य धारण किया जाता है । अपितु मणि
वर्णादिका भी प्रत्यारयान करना पडता है, शरीरके शृगा-
रका भी साग होता है, अपितु शस्त्रादि भी पास ससे नहीं
जा सक्ते और सावध योगोका भी नियम होता है । इस
प्रकारसे पौपधोपवासनत ग्रहण किया जाता है। प्रतिमासमें
तथा शक्ति प्रमाण अवश्य ही,
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करने चाहिये । और पाचो अतिचारोंको भी त्यागना चाहिये-जैसेकि- अप्पडिलेहियदुप्पडिलेदियसिज्जासंथारे १ अप्पमज्जियदुप्पमञ्जियसिजासथारे २ अप्पटि- लेहियदुप्पडिलेयि उचारपासवणभूमी ३ अप्प- मजियदुप्पमजियउचारपामवणभूमी ४ पोस- होवयासस्स सम्म अणणुपालणया ५ अर्थः-शय्या वा सस्तारक प्रतिलेसन न करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे १ शय्या वा मस्तारक प्रमार्जित नहीं करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे २ पुरीप वा प्रवन स्थान पतिलेसन न करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे ३ उच्चार वा प्रस्रवन म्यान प्रमार्जित न करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे ४ पौषधोपनास सम्यक् प्रकारसे न पालन करना ५ इस प्रकारसे पाचोंही अतिचारोको वर्जकर तृतीय शिक्षानत आवकोको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करना चाहिये। चतुर्थ शिक्षाबत । अतिथि सविभाग। महोदयवर! चतुर्थ शिक्षानत अतिथि सविभाग है जि- सका अर्थ यही है अतिथियोंको सविभाग करके देना अर्थात् जो कुछ अपने ग्रहण करनेके वास्ते रस्सा है उसमेंसे अति- थियोंका मत्कार करना अपितु जो अतिथि (साधु ) को दिया जाये वे याहारादि पदार्थ शुद्ध निर्दोष कल्पनीय हों

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किन्तु दोपयुक्त अशुद्ध अकल्पनीय थाहारादि पदार्थ न देने
अच्छे है क्योकि नियमका भग करना चा कराना यह महा
पाप है । अपितु वृत्तिके अनुसार श्राहारादिके देनेमे कमाकी
निर्जरा होती है, वृत्तिके विरद्ध देनेसे पापका बंध होता है ।
इस लिये दोपोंसे रहित प्राशूक एपनीय पाहागदिके द्वारा
अतिथि संनिभाग नामक नतको सम्यक् प्रकारसे अाराधन
करे और पाचों अतिचारोंका भी परिहार करे, जैसेकि-
सचित्त निस्खेवणया १ मचित्त पेहणिया २
कालाडकम्मे ३ परोवण्से ४ मच्छरियार ८
अर्थः-न देनेकी बुद्धि में निर्दोष वस्तुको सचित्त वस्तुपर
स देना १ निर्दोपको मचित्त वस्तुसे ढाप देना २ काल
अतिकम करना ३ परको आहारादि देनेके लिये उपदेश
देना और स्वय लाभसे वचित रहना ४ मत्सरितासे देना ५
इन पाचों अतिचारोंको त्यागकर चतुर्थ शिक्षानत पालन
करना चाहिये।
सो यह पाच अनुनत, तीन अनुगुणनत, चार शिक्षानत
एव द्वादश नत गृहस्थी धारण करे, इसका नाम देशचारित्र
हैं, क्योंकि सम्यग ज्ञान, सम्यग् दर्शन, सम्यग् चारित्र,
तीन ही मुक्तिके मार्ग हैं। इन तीनोंको ही धारण करके
जीव ससारमे पार हो जाते है । इसलिये सदैवकाल सुकर्मों में
उपस्थित रहना चाहिये।
१ यह द्वादश नत जैन सिद्धातके आश्रयसे लिखे गये है परतु इनका पूर्ण
विवर्ण श्रीमद् उपासक दशा सूत्रसे देखना चाहिये

करने चाहिये । और पाचो अतिचारोंको भी त्यागना चाहिये-जैसेकि- अप्पटिलेहियदुप्पडिलेयिसिज्जासथारे १ अप्पमजियदुप्पमन्जियसिज्जासथारे २ अप्पडि- लेयिदुप्पडिलेहिय उच्चारपासवणभूमी ३ अप्प- मजियदुप्पमजियउच्चारपासवणभूमी ४ पोस- होववासस्स सम्मं अणणुपालणया ५ अर्थः-शय्या वा संस्तारक प्रतिलेसन न करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे १ शग्या वा सस्तारक प्रमार्जित नहीं करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारमे २ पुरीप वा प्रसनन स्थान प्रतिलेखन न करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे ३ उच्चार वा प्रस्रवन स्थान प्रमार्जित न करना यदि करना तो दुष्ट प्रकारसे ४ पौषधोपवाम सम्यक प्रकारसे न पालन करना ५ इस प्रकारसे पाचोंही अतिचारीको वर्जकर तृतीय शिक्षानत श्रावकोंको सम्यक् प्रकारसे ग्रहण करना चाहिये। चतुर्थ शिक्षात्रत। अतिथि सविभाग ॥ महोदयवर! चतुर्थ शिक्षाप्रत अतिथि सविभाग है जि- सका अर्थ यही है अतिथियोंको सपिमाग करके देना अर्थात् जो कुछ अपने ग्रहण करनेके वास्ते रक्खा है उसमेंसे अति- थियोंका सत्कार करना अपितु जो अतिथि (साधु ) को दिया जाये चे आहारादि पदार्थ शुद्ध निर्दोष कल्पनीय हों उस समय 'मिथिलापुरी' एक नगरी थी, वहा 'देव' नामक महार्दिक ब्राह्मण यमता था, उसकी भार्याका नाम 'जयन्ती' था, उसका 'अकंपित' नामक असिल विद्याप्रवीण पुन था। उस समय 'कोगलापुरी' में 'पमु' नामक ब्राह्मण रहता था जिमकी पवीका नाम 'नन्दा' और पुनका नाम 'अच- लभ्राता था। उसी समय 'वत्स' देशके 'तुगिकारय' मनिवेशमें 'टत्त' नामक विप्र था जिमकी 'करुणा' नामिका भार्या थी, उसके पुनका नाम 'मेतार्य' कुमार था तथा 'राजगृही' नगरीम 'पल' नामक द्विज की पत्नी 'भद्रा' के अगजात 'प्रमाय' नामक कुमार था। यह पूर्वोक्त एकादश ११ कुमार चार वेद अठारह पुरा- णादिक समस्त शाखोके ज्ञाता और सफल विद्याओंके पार- गामी प्रस्न्यात विद्वान् थे। इन मरने अपने २ नगरोमें पाठशालाए सोल रक्सी थीं और यह मत्येक सकडों विद्यार्थियों (शिप्यों) से युक्त थे तथापि इन मनमेंमे अधिक विद्वान् और महती कीर्तियुक्त इन्द्रभूति ही थे । जहा कहीं कोई धर्मकार्य होता था तो इन सनको चामत्रण पाया करते थे। एकदा अपापापुरीमें महर्दिक धनाढ्य सोमल ब्राह्मणने यज्ञ करवाना प्रारम्भ किया जिसके लिये यह पूर्वोक्त एकादश विद्वान् अपापापुरीमें पाये हुये थे।

भगवान्के ऐसे अनुपम तथा अमृतसदृश उपकारीव्यारया- नको सर्व सभासद् इस प्रकार दत्तचित्तसे श्रवण करते रहे कि-मानो सर्व पुरुष आलेख्यलिसित ही है अर्थात् चित्रित किये हुये हैं। उसी काल और उसी समयमें मगध देशके 'गोवर' ग्राममें गौतम गोत्रीय 'वसुभूति' नामक द्विज बसता या उसकी 'पृथ्वी नामिका पत्नी थी। इस ब्राह्मणके तीन पुन हुये १ इन्द्रभूति २ अग्निभूति ३ वायुभूति, यह तीनो द्विज- पुन व्याकरण, ज्योतिप, वैद्यक, काव्य, कोप, अलकारादि समस्त विद्यानोंमें निपुण थे। उसी समयमें कोल्लाग सन्निवेशमें 'धनुमिन' और 'धम्मिल्ल' नामक दो नाह्मण बसतेथे। इन दोनों की वारुणी' तथा 'भद्रिलामव' यह दो भार्या थी, दोनोंके दो पुत्र थे 'धनु- मित्र' के पुत्रका नाम 'व्यक्त' और 'धमिल्ल' के पुत्रका नाम 'सुधर्मा या। यह दोनों लडके बडे चतुर तथा प्रतिभाशालि वा विद्वान् थे। उसी कालमें 'मारिय' देशमें 'धनदेव' नामक नाह्मणकी 'विजयदेवी' नामिका धर्मपत्नी थी, उसकी कुक्षिसे 'मडक' नामक कुमारका जन्म हुआ और उसी समय तथा उक्त देशमें ही 'मौर्यक' विपके गृहमें एक कुमारका जन्म हुआ जिसका नाम 'मौर्यपुत्र' रक्सा गया यह दोनों कुमार अनु- क्रमसे पालित पोपित होते हुए सकल विद्याओमें अग्नेश्वर तथा प्रधान होकर यौवनावस्थाको प्राप्त हुये।

६७ गेरके सदृश क्या कोई अन्य वनचर पशु बलवान हो सक्ता है? कदापि नहीं । आश्चर्यकी बात है कि-भला मनुष्य तो किसीके दम्भमें फस जावे किन्तु देव तो ज्ञानी होते है वे कैमे लोभायमान हो गये, अस्तु ! अब मुझे योग्य है कि वहा उस सर्वज्ञके पास जाऊ और इन देवो तथा मनुष्योक देखते हुये इसकी सर्वज्ञताका अपहरण करू । यह निश्चय करके अहकारसे उद्धत होता हुआ तथा पाच- सौ ५०० शिप्याँसे परिवृत्त इन्द्रभूति भगवानके समवसरणमें गया, यहा जाकर भगवान्की ऋद्धि, रूप तथा प्रौढ तेजको देसकर आश्चर्यमागरमें निमग्न हुआ २ स्थाणु की नाई भग- वान्के मन्मुख सडा हो गया। तन त्रिजगरू श्रीभगवान् वर्द्धमान स्वामीजी अपनी अमृतस्पी वाणीसे प्रतिपादन करने लगे, कि-हे गौतम! किं तव स्वागतम् , इस वचनको सुनकर इन्द्रभूति विचारने लगा, कि-"मेरा नाम तथा गोन यह कैसे जानता है" और फिर स्वय वही सोचने लगा कि-"हा ठीक है मे तो सर्वत्र प्रसिद्ध ही ह, मुझे कोन नहीं जानता फिर यह मेरा नाम जान लेवे इसमें आश्चर्य ही क्या है हा, इसके ज्ञान की शक्ति तन जानू जन मेरे हदयस्थ सशयको भापण तथा छेदन करे, भला किसी जगप्रसिद्धका नाम पता देनेमें भी कोई कठिनाई अथवा चतुराई है"। जा इन्द्रभूतिके मनमें इस प्रकारके अध्यवसाय प्रारहे ये तर भगवान्ने प्रतिपादन किया, कि-हे गौतम! तेरे मन में यह प्रथम लिसा जा चुका है कि उस समय उक्त नग- रीमें श्रीस्वामी भगवान् पृज्यपाद श्रीमहावीरजी सुस सातासे विराजमान थे। और चतुर प्रकारके देवगण महाराज के दर्शनार्थ पा रहे थे । देवसमूहको प्राता हुग्रा देसकर इन्द्रभूतिजी अन्य ब्राह्मणोंके प्रति गोले। हे द्विजोत्तमो! यह सुर प्रत्यक्ष हमारे मनसे आह्वान किये हुये यज्ञमें आरहे हैं, अहोः हमारे मत्रमें कैसी अद्भुत शक्ति और आश्चर्यकारी प्रभार है !!! देखिये ! देखिये ! किन्तु वह समस्त देव यज्ञवाटमें न ठहरकर उमसे अतिकम होके भगवान्के ममवसरणमें जाते थे, उनको इस प्रकार देखकर लोग कहने लगे कि-"इस नगरीके बाहर उद्यानमें सर्वज्ञ, सर्वदर्शी सकल अतिशयोसे युक्त अर्हन भगवान् श्रीवर्द्ध- मान स्वामीजी पधारे हुये हैं उन्हींको यह देव और नाग- रिक प्रधान पुरुष वन्दना वा नमस्कार करनेके लिये उक्त उद्यानमें जा रहे हैं। इतना सुनते ही इन्द्रभूति अत्यन्त कुपित हो गया और मुह भाई बोलने लगा-"इन देवों तथा मनुष्योंको धिकार है जो मुझे त्यागकर उस असर्वज्ञके पास जाते है। यह बहुत मूर्स है जो अाम्रफलको छोडकर करीरफलको ग्रहण करते हैं। क्या कोई अन्य मेरेसे अधिक सर्वज्ञ है? कदापि नहीं, मैं ही सर्वज्ञ हूँ और दूसरा कोई सर्वज्ञ नहीं हो सकता। * इद्रभूतिजीका नाम गौतम स्वामी भी प्रसिद्ध है क्योंरिगौतम' इनसा गोत्र था।

तथा ब्रह्मचारी हो गये और अपनी आत्माका कल्याण करते
हुये समय व्यतीत करने लगे।
इसके अनंतर जन अग्निभूतिने सुना कि मेरा भ्राता दीक्षित
हो गया है तब उसने विचार किया कि वह बडा इन्द्रजा.
लिक है जिसने मेरे भ्राता इन्द्रभूति जैसे विद्वान्को भी
जीतकर निज शिष्य बनालिया है अतः मुझे योग्य है कि
मे वहाजाऊ और उम मर्वजवादीको जीतकर माया द्वारा परा-
जित अपने भाईको लाऊ । बडा आश्चर्य है कि मालशास्त्र
निष्णात, महान् उद्धियुक्त इन्द्रभृतिजी जो वाद विवादमें
मटा अजेय है फिर किम प्रकार उनके फटेमें थागये, सत्य
है मायाके जालमें कौन नहीं फस जाता, अस्तु ! में उसके
पाम जाता ह यदि उम सर्वजवादीने मेरे हदयस्य सशयको
छेदन कर दिया तो में अपने भाई इन्द्रभूतिकी नाई उमके
पास सशिष्य दीक्षित हो जाऊगा और यदि उसने मेरे
सन्देहका दूरीकरण न किया तो उसका अपमान करूगा
तथा अपने भाईको उसके मायाजालसे छुडाकर ले श्राऊंगा।
इस प्रकार अग्निभूति विचार करके ५०० शिप्योसे परिवृत्त
होता हुआ भगवान्के समवसरणमें गया और ,भगवानके
समीप जाकर सडा हो गया।
तन श्रीश्रमण भगवान महावीरजी ने प्रतिपादन
किया। हे द्विजकुलोद्भव गौतमगोत्रीय अभिभूते! 'कर्म है
या नहीं क्या तेरे मनमें यही सन्देह है तथा मूर्तिमान् होने
पर भी यह प्रत्यक्षादि प्रमाणों द्वारा अगम्य है फिर मूर्तित्व

यह संदेह है कि जीव है या नहीं? अर में इसका उत्तर
कहता हू सो ध्यानमे सुन । हे इन्द्रभूति ! जीव है और चित्त
चैतन्य, विज्ञान तथा सज्ञा आदि लक्षणो द्वारा ज्ञेय है यदि
जीव न होरे तो पुण्य पापका अधिकारी कौन हो तथा योग
दानादि समस्त कर्म निष्फल हो जाने फिर इनके करनेका
क्या कारण सो जब इनका फल है तो यह अवश्य मानना
पडेगा कि उस फलके भोगनेवाला भी कोई है सो वह
प्रमाणादिसे सिद्ध यात्मा है।
इस प्रकार भगवान्के वचनामृत सुनकर इन्द्रभूतिजीन
सन्देह तथा मिथ्यात्वको शीघ्र हीतिलाञ्जलि दी और महा-
राजको प्रणाम करके गोले । हे भगवन् ! मै अहकारान्ध
होकर आपकी परीक्षाके लिये पाया था, आपने अपनी
चाणीरूप पीयूपधागसे मेरे मलीन अन्तःकरण तथा मुआये
हुए हृदयकमलको स्वच्छ, पविन और विकसित किया है
अतः आप मेरे धर्मोपदेशक परम पूज्य है, इसलिये कृपा
करके मुझे ससारार्णनसे तारें और मोक्षके मार्ग पर थारुढ
करनेकी अनुग्रह करें।
तब भगवान्ने इन्द्रभूतिजीको भावि आधगणधर जानकर
उनके पाच सौ ५०० शिष्योंके साथ अपने करकमलोंसे
दीक्षित किया अर्थात् सामायिक चारित्र ग्रहण करवाया।
पुन सात ७ दिनके पश्चात् महाराजने आपको छेदोपस्थापना
चारित्र ग्रहण करवाया।
तब इन्द्रभूति आदि समस्त मुनि पाच समिति निगुप्तियुक्त

मूर्त कौके साथ सम्बन्ध होने किमी प्रकारकी क्षति नहीं 'अर्थात् अमूर्त जीवका मूर्तिमान् कमाके साथ सगम होनेमें कोई हानि नहीं अतः इनका सम्बन्ध अमूर्त आकाश तथा मूर्त घटके सम्बन्ध की नाई यथार्थ वा समीचीन है । यदि यहा पर कोई श्राशका करे कि-कर्म तो जड़ है वह चैतन्य जीवको किम प्रकार सुरादास दे सकते हैं (उत्तर) ससारमें देसा जाता है कि अमुरा अथवा अनेक विधिकी श्रीपधिया जड़ होने पर भी चैतन्य यात्माको मूर्छित वा च्यामुग्ध कर * यदि कोई यह प्रभ परे- प्रत्र-जो दृष्टात शराय घगैरहके पीनेमे नशा आनेगा दिया है यह टोर नही, क्योंकि मदिरा द्रव्य है और पीा कम है यदि पीने फर्मका फल यही तो जर पीनेम भी नशा होना चाहिये क्योंकि पीना वम तो इस जगह पर भी विद्यमान है। Vउत्तर-हे आय! पूर्वोचा दृष्टात अक्षर प्रत्यक्षर सत्य है, पर द्रव्य और कम दोनोंगे ही है, यदि द्रव्यमें ही माना जाये तो बोतलमें या किसी जीवके विना मदिरापानके ही उमको नशा होना चाहिये क्योंरि मद्य द्रव्यरा सद्भाव है। मर्म शब्द जीय यी रियाया वाचकही नहीं पर उसे कामाण स्कन्धरूप पुद्गल द्रव्य भी इष्ट हैं निरास पय जीवकी रागादिक कियागोंसे होता है। जिस प्रकार मद्य के रातमें पीने क्मका फल यह है कि वह मद्य द्रव्यको रिसी मनुष्यके उदर (पेट) में पहुचावे और पेदम पहुची हुई मदिरा व्यका पल यह है कि वह अपने उदयकाल्में नशा करे ठीक उसी प्रकार दाधन्तम जीव की रागादि पियाका फल यह है कि वह तीनों। लोकम भरे हुये कामाण वर्गणाओंका घध जीवसे करावे और इन यधावस्थाको प्राप्त कामाण वगणाओं (जिनम उनके वध करते समय जीवके मिन • परिणामानुसार भिन्न २ पर देनेकी शक्ति हो गई है) का पल यह है कि पह अपने उदयकालमें भिन २ फल वाध निमित्तानुसार दें।

७२
कोका अनादि अनत सम्बन्ध है. सो मुख्यतया कमौके
आठ भेद ह-यथा ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय,
मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र, अन्तराय, पुनः इनकी १४८
प्रकृतिया और अनेक भेद हैं । हे अग्निभूते! यह कर्म अति-
शय ज्ञानयुक्तोंके तो साक्षात् प्रत्यक्ष है तथा तेरे जैसे
अथवा सामान्य व्यक्ति इनको अनुमान द्वारा जान सक्ते
हैं। कॉफी पिचित्रतामे जीव सुखदुःस भोगते हैं, शुभ
कोके फलमे बहुत प्राणी हस्ती, अश्व, रथ, धन, धान्य
राज्य तथा अन्य राज्याभिषेकके योग्य सुसदायिका ऋद्धिको
प्राप्त करते हैं, और कई एक प्राणी पूर्वसचित अशुभ
काके फलसे दासत्वको प्राप्त होकर घर २ में भटकते है।
एक २ महर्द्धिक पुस्प अनेक प्रकारके सुख अनुभव करनेके
अतिरिक्त दान द्वारा अन्य सहस्रो पुरपोंके उदर पूर्ण करते
है, और कई एक तो समस्त दिन प्रात काल एक घरसे दूसरे
घर तक घोर पर्यटन करनेके पश्चात् भी सायको उदर पूर्ण
करनेमें समर्थ नहीं होते तथा क्षुधामे पीडित अथवा पिपामा
से व्याकुल और मुखसे "हाय रोटी" इन अक्षरोका जाप
करते है, और परलोकरूपी तीर्थधामके यात्री बन
जाते है । देखिये कर्मोंकी कैसी विचित्रता है कि तुल्यकाल
तथा देशमें दो व्यवहारियोंके व्यवहार करनेपर एकको
भूयिष्ठ लाम होता है तथा दूसरेका सर्वनाश हो जाता है
इत्यादि विचित्र प्रकारके कार्योंके कारण कर्म ही हैं क्योंकि
बिना कारणके कार्य उत्पन्न नहीं होता, और अमूर्च जीवका

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देती है तो फिर कर्म जड होने पर चतन्य जीवको मुस- दुःस दे इसमें आश्चर्यही क्या है। इस प्रकार भगवान्के प्रतिपादन करने पर अग्निभूतिजी के सर्व सशय दूर हो गये तथा स्तब्धता भी किसी दिशाको पलायन कर गई। फिर उन्होंने श्राप और अपने ५०० शिष्योके साथ भगवान् श्रीवर्द्धमानस्वामीके समीप दीक्षा धारण की। श्रीभगवान्ने उस समय उनको पाच महानत और छटा रात्रिभोजनविरमणत्रत ग्रहण करवाये । यथा- सव्वाउ पाणाइवायाउ वेरमण । सर्वथा मकारसे माणातिपात (हिसा) से निवृत्ति करना, अर्थात् मनसे दुष्ट विचार न करना, वचनमे किसीको दुःस- दायक शब्द न भापण करना, तथा काया से किसी जीवका सहार न करना, स्वय जीवहिसासे सर्वथा प्रकारसे निवर्तना, औरोंको हिसासे निवृत्ति करनेका उपदेश देना तथा जो प्राणी जीवहिसा करते हैं, उनकी अनुमोदना न करना, इसको दयानव या प्राणतिपात विरमणनत भी कहते है । यह हिसानत प्राणीमानका हितपी तथा सर्व जीवोंको सुसदायक है, सयम वा मुनिति- रूप वृक्षका मूल है, सत्य तथा ऋजुता इससे उत्पन्न होते है। यह दया दुर्गतिमें जाते हुये प्राणीका हस्तावलम्बन चन कर उसे कुगतिमें जानेसे रोकती है तथा जितने भी सुस हे चे सर्व दयासे ही उपलब्ध होते हैं अतः अहिंसा माताके समान सर्व जीवोंसे हित करनेवाली है और अमृतके सदृश आत्माको तृप्त करनेवाली है, तथा ससारमें दुःखरूपी प्रचंड दानानलको उपशान्त करनेके लिये यह दया मेघ- मालाके तुल्य है भवभ्रमणरूप महा व्याधिके वास्ते रोग- कुठार नामक परमौषध है। इस अहिंसावतके द्वारा समस्त ब्रह्माण्डवासी जीवोके साथ मैनीभाव हो जाता है, इसलिये मुनियोका सबसे प्रथम महानत प्राणातिपात विरमण है। इस महाव्रतकी पाच भावना है । जैसेकि- “वामानोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपान- भोजनानिपञ्च"॥ ( तत्वार्थ सूत्र अ०७) प्रथम भावना-वचनको वशमें करना, और कटुक, सावद्यकारी, परमर्मभिन्दक, क्लेहउत्पादक तथा दुष्ट वचन भापण न करना । मृदुभाषी वा सरके हितैपी होना। द्वितीय भावना-मनको वशमें रसना, और हिसादि कुकर्मोकी ओर जानेसे रोकना, अर्थात् मनके द्वारा किसी भी जीवकी हानि चितवन न करना, क्योंकि मनको शुभ धारण करना महानतोंकी रक्षाके लिये आवश्यक है। तृतीय भावना-प्रथम महानतधारी मुनि-उठना, बैठना, चलना, फिरना ( गमनागमन), शयन करना और शरीरके अवयवोंको सकोचना वा पसारना आदि समस्त क्रियाये विनायत्न कदापि न करे अर्थात् इन कार्योंमें अतीव यत्न वा विवेक करे ॥ दुःसप्रद, चतुर्थ भावना-द्विचत्वारिंगत ४२ दोपोंसे रहित निर्दोप अन्नपानी सेवन करे तथा ऐसे निर्दीप याहार परभी ममत्व भाव न करे अर्थात् मूर्छित न हो, गुरुकी प्रान्नाके अनुसार सदा अपनी क्रिया प्रवृत्त (मन) रहे। पचम भावना-मुनिने पीठ, फलक, सस्तारक, शग्या, वस्त्र, पान, काल, रजोहरण, चोलपट्टक (कटिनधन) और मुसपत्ति जो मुस गधनेका वस्ख होता है आदि उपक- रण सयमके निर्वाहके लिये ग्रहण किया हुआ है, उस उप- करणकी नित्यप्रति उभयकाल (सायकाल तथा प्रातःकाल) प्रतिलेसना करे, और प्रमादसे रहित होकर प्रमार्जन करे । उक्त उपकरणोंको यनसे रस तथा धारण करे । तात्पर्य यह है कि-विवेकपूर्वक सर्व कार्य करे । ये प्रथम महाव्रतकी पच भावना है। इनके द्वारा प्रथम महारत को शुद्ध धारण करे । सव्चाऊ मुसापायाउ रमण । मर्वथा प्रकारसे मृपावादका त्याग करना, जैसेकि-मुनि श्राप अनृतभापी न हो, औरोंको असत्य भाषण करनेका उपदेश न देवे, और जो असत्यभापी हैं उनकी अनुमोदना न करे तीनों योगोंमे अर्थात् मनसे, वचनसे तथा कायासे सत्यका पालन करे, इसे मृपावाद विरमण त कहते है। जो पुरुप इसको धारण नहीं करते, ससारमें उनका कोई मनुष्य विश्वास नहीं करता, उनकी प्रतीतिका नाश हो जाता है । असत्य मापण मनुष्योंकी परम अधोगति कर देता है। चैर, विरोध, केश, फूट, वा दुःस आदिके नवाकर इससे

७७
हरितवरणीय हो जाते है, असत्यवादी पुरुष उभय लोकमें
निन्दाका पात्र, निर्भर्सनीय वा कष्टोको सहन करता है।
इस लिये सत्यभापी बनना चाहिये । सत्यके माहात्म्यमे सर्व
दुसः नाश होते हे ओर दोनो लोकमें यश तथा सुसकी
प्राप्ति होती है। सत्यसे वाणीकी शुद्धि होती है सर्व वाचिक
शक्तियाँ इससे उपलब्ध होती है । सत्यवादि पुरुपका कहा
हुया वाक्य कदापि निष्फल नहीं होता, वह अद्भुत वा
आश्चर्यकारी कायोंके करनेमें समर्थ होजाता है । सत्यके
मुरयतया दो भेद है। द्रव्य सत्य और भाव सत्य । सासा-
रिक वा व्यवहारिक कार्यों में तो सत्य भापण करना, किंतु
सिद्धान्तमें नास्तिक होना, इसे द्रव्य सत्य कहते है। जो
व्यवहारमें असत्य तथा सिद्धान्तमें सत्य हो, उसे भाव सत्य
कहते है । सो द्वितीय महाव्रतको धारण करनेवाला मुनि
दोनों प्रकारसे सत्य धारण करे, और असत्यका परिहार
करे । अर्थात् द्रव्यमें भी सत्य और भानमें भी सर्वथा प्रका-
रसे सत्स ग्रहण करे । यह द्वितीय महानत है। इसकी भी
पाच भावना है-
यथा-
"क्रोधलोमभीरुत्वहास्यप्रत्यारयानान्यनुवीचिभा-
पणं च पञ्च"॥
(तत्वार्थसूत्र.)
प्रथम भावना-सत्यवादी क्रोधयुक्त वचन भापण न
करे क्योकि-क्रोधसे वैर, वैग्से पिशुनता, पिशुनतासे क्लेश

और केशसे सत्य, शील, विनय श्रादि सर्व गुणोंका नाश हो जाता है । इम लिये मुनि क्रोधके गीभूत न होवे । द्वितीय भावना-सत्यवादी मुनि लोभका परिहार करे क्योकि लोभके वशीभूत होता हुआ जीन सत्य, असत्य, योग्य, अयोग्य, और फर्तव्य, अकर्तव्यका विचार नहीं करता । इस लिये सत्यकी रक्षाके वास्ते लोभको त्यागना चाहिये। तृतीय भावना-सत्यमापी मुनिको भयका भी परित्याग करना चाहिये क्योकि-मययुक्त जीवके प्रणाम कदापि स्थिर नहीं रहते, भययुक्त जीन मारे डरके अपने नियमोंका भी उल्लघन कर जाता है, सयमको त्याग देता है । भीतिके वश होता हुआ सत्य तथा शीलसे भी पराड्मुस हो जाता है, इस लिये द्वितीय महाप्रतधारी मुनिको अपने द्वितीय व्रतकी रक्षाके लिये भय छोडना चाहिये । चतुर्थ भावना-सत्यवादीको चाहिये कि-किमीका उप- हास कदापि न करे । हास्यमे विरोध, केश, सग्राम और नाना प्रकारके दुःस उत्पन्न होते हैं। हासशील पुरुपकी प्रकृति ऐमी निगड जाती है, कि-जबतक वह किमीसे हसी ठट्टा भडचेष्टा कर्म न कर लेवे उसे गान्ति नहीं पाती। उसकी चिंता इतनी विस्तीर्ण होती है कि-जिसका थाह नहीं आता प्रत्युत प्रत्येक दिनमें नूतनसे नूतन चिंता उत्पन्न होती है । इस उपहास्यके करनेवाला पुरुष अपने सत्य व्रतकी रक्षा नहीं कर सकता अतः इसे छोडना चाहिये ।

पंचम भावना-सत्य व्रतकी रक्षाके लिये मुनिको चाहिये
कि-वह विनाविचारे कभी भापण न करे, तथा चपलता
युक्त कटुक, सावद्यकारी और कौतृहलमय वचन उच्चारण
न करे क्योंकि-इन वचनोके भाषण करनेसे सत्य प्रत नहीं
रह सकता इस लिये मुनि इसका भी त्याग करे और इन
पाच भावनाओं द्वारा द्वितीय मृपावाद विरमण महानतको
शुद्ध धारण करे ॥
सव्वाऊ अदिनादाणाउ घेरमणं ।
सर्वथा प्रकारसे अदित्तादान (चिना दिये लेना वा
चोरी ) का त्याग करना चाहिये, अर्थात् तीनो करणो तथा
तीनों योगोंस चौर्यकर्मका परित्याग करना, जैसेकि आप
चौर्यकर्म न करे, औरोंसे न करवाये, तथा जो चौर्यकर्म
करते हैं उनकी अनुमोदना न करे मनसे, वचनसे और
कायसे, इसे तृतीय महावत कहते है, जो पुरप इस व्रतको
अगीकार करते हैं उनकी इस लोकमें यशोफीर्ति वा प्रतिष्ठा
विस्तीर्ण हो जाती है, चाहे फिर वह कहींपर बैठे या कही
सडा होवे, लोग उससे घृणा वा सकोच नहीं करते । सनको
उस पुरुपका विश्वास हो जाता है । इस व्रतके धारी पुम्पको
किसीका मय नहीं रहता तथा उसका आत्मा सदैव
काल शाति, तृष्णाका निरोध, सतोप, परलाभकी अनिच्छा
और ज्ञान आदि सुगुणोंसे विभूपित रहता है। और जो
पुरुष इस व्रतको धारण न करके चौर्यकर्ममें लग जाते हैं,
उनपर समस्त संसारकी विपत्तिया आती है, तथा उनकी
,
.

८२ विद्या अध्ययन करे, क्योंकि विनय करना यह सबसे परम तप वा परमोत्कृष्ट धर्म है । यथा- एव धम्मस्स विणउ मूलं परमोसेमुखो जेणकित्ति- सुय सग्घ नीसेस चाभिगच्छई। इति वचनात् ।। सो विनयपूर्वक सीसा हुआ ज्ञान ही सफलीभूत होता है, अतः मुनि विनयसे अध्ययन करे । अपितु इन पच भाव- नाओसे तृतीय नतको शुद्ध धारण करे । सव्वाउ मेहुणाउ वेरमणं। सर्वथा प्रकारसे अर्थात् तीन करण वा तीन योगोंसे मैथुन विरमण चतुर्थ महाव्रतको धारण करे । यह नत समस्त तपों, जपों, मत्रों तथा नियमोमें उत्तम है, यथा "तनेसुया उत्तम बभचेर" इस आगम वाक्यसे भी सिद्ध है। इस महाव्रतकी भी पच भावना है। यथा "स्त्रीरागकथा- श्रवण तन्मनोहराङ्गनिरीक्षण पूर्वरतानुस्मरण वृष्ये- प्टरसस्वशरीरसस्कारत्यागाः पञ्च" ॥ (त० सू०) प्रथम भावना-समामें मुनि स्त्रियोकी कथा, कामजन्य कथा, मोहको उत्पन्न करनेवाली कथा, तथा मनको व्या- कुल करनेवाली कथा न करे अर्थात् चतुर्थ महानतधारी ऐसी कथा न कहे, जिसके श्रवण करनेसे मोताद विषय- मूर्छित वा विक्षिप्तचित्त हो जायें । १इस व्रतका सविस्तर स्वरूप मेरे लिखे हुये ब्रह्मचय दिग्दर्शन नामा पुस्तक्में देखना चाहिये।

८३
--
द्वितीय भावना-नारीके रूपको तथा यगोपागको अवलो-
कन न करे, और सियोके हास्य या लावण्यरूप यौवनपर ध्यान
न दे, तथा युवतियों के मनोहर गरीरामयमों, थोर उनके
कटाक्षयुक्त नेगो वा शेप चुचेष्टायोको निरीक्षण न करे,
क्योंकि-ऐमा करनेमे चित्त पिकृतिवाला हो जाता है। इस
लिये मुनि योपितायो रपको न देखें । यदि कदाचिन
स्त्रीके मुदर अंगोंपर दृष्टि पड़ भी जाये, तो "भग्वरपिव
दिह पहिसमाररे" अर्थात् जमे सूर्यको देसनेसे दृष्टि तुगत
हट जाती है, इसी प्रकार मुनि बहुत शीघ्र अपनी दृष्टिको
सींच ले।
तृतीय भावना-पूर्व वयमें छत काम क्रीडाओंको याद न
करे, क्योंकि-इनकी स्मृति करनेमे योग वशमें नहीं रह
सकते, तथा सयम पालन वा इन्द्रियनिग्रह करना बहुत
कठिन तथा दुप्फर हो जाता है, मनमें दुष्ट प्रणाम उत्पन्न
हो जाते हैं, जिनसे चित्त याकुल व्याकुल या विक्षिप्त हो
जाता है । अतः मुनिको चाहिये कि-पूर्वरत काम भोगोको
सरण न करे।
चतुर्थ भावना-ब्रह्मचारी निग्ध श्राहार तथा विषयो-
त्पादक भोजन या अन्य पदार्थ सेवन न करे, क्योकि-
स्निग्ध पाहाररूपी ईन्धनसे इन्द्रियरूपी चन्हिकुण्डमें विपयरूप
अमि जाज्वल्यमान वा सदीप्त हो जाती है, जिससे श्रात्मा-
दमन असभव सा हो जाता है । इस लिये ब्रह्मचर्य प्रतकी
रक्षाके
टिकारक वा बलिष्ट भोजन न राम
।

पंचम भारना-चतुर्थ महानतकी रक्षाके लिये मुनिको
चाहिये, कि-अपने शरीरका शृगार न करे, जैमेकि-
केगोंको ककतीसे (कवीसे) मार्जन करना, नस वा रोमा-
दिको सवारना क्योंकि ऐसा करनेमे इन्द्रिय बलवान हो
जाती है, फिर उनको वशमें करना कठिन हो जाता है।
इस लिये साधु मैथुन विरमण प्रतकी रक्षाके लिये शृगा-
रादि न करे और इन पच भाननायों द्वारा इस महानतको
शुद्ध करके धारण करे।
सत्याउ परिग्गहाउ वेरमण ।
मर्वथा प्रकारसे परिग्रहकी निवृत्ति करना, तीन योगों
वा तीन करणोंसे, इसे पचम महावत कहते हैं । इसको
धारण करनेसे जीन लोभरहित वा सतोपी बन जाते हैं ।
उनकी पाठ प्रहरकी भटकना पद हो जाती है । इस प्रतको
ग्रहण करनेसे पुरप अत्यत निर्भीत हो जाता है चाहे वह
कहीं चला जाये, उसे कोई कुछ नहीं कहता । चार्य कर्म
करनेवाले पुरुप भी ऐसे नतीकी कुछ हानि नहीं कर
सकते । लोभ समधि वा परिग्रह सरधि जितने दुःस ससा-
रमें भोगने पड़ते हैं वे समस्त कष्ट इस व्रतके धारण करने
पर काफूर हो जाते हैं । जो आत्मा परिग्रहमें मूञ्छित हो
जाते है, वे सदा दुःसित, शोकाकुल तथा चिंतातुर रहते
है, और ससारमें नाना प्रकारकी विकट पीडायोको सहन
करते हैं । भला परिग्रहमें रत पुरपोंको सुस कहा? सुस
तो संतोपमें है।

८५ यथा- सतोपाश्लिष्टचित्तस्य यत्सुखं शाश्वतं शुभम् । कुतस्तृष्णागीतस्य तस्य लेशोऽपि विद्यते ।। ७८९॥ यावत्परिग्रह लाति तावद्धिसोपजायते। विज्ञायेति विधातव्य सङ्गः परिमितो बुधैः ॥ ७२०॥ (अमितगति) अर्थ-सतोपसे आई चित्तको जो शुभ और अविनाशी सुख प्राप्त होता है उसका लेश मान भी सुस तृष्णामें निमग्न हुये जीवको कहामे हो सकता है ? जातक परिग्रहको रसेगा, तबतक हिसा उत्पन्न होगी, ऐसा जानकर उद्धिमा- नोको परिग्रहका परिमाण करना योग्य है ।। इति ॥ परिग्र- हसे केश, वैर, ईपी, असूया, तथा ग्रहकार श्रादि अपगु- णोंकी वृद्धि होती है और गग, द्वेप, क्रोध, मान, माया तथा लोम प्रादि दोप भी इसीसे उत्पन्न होते है । जन कोई यात्मा परिग्रहमें मुग्ध होता है तो फिर वह न्याय वा अन्याय, योग्य तथा अयोग्य किसी कार्यका विचार नहीं करता, केरल धनके सचय करनेमें ही मन रहता है। कहींसे मिल जाये और कैसे ही मिल जाये, चाहे चोरीका हो, चाहे लूटका, उसे तो धनसे काम है । इसी कारण उन पुरुपोंको कष्टों तथा विपत्तियोंका सामना करना पडता है । जिस समय आत्मा लोभके वशीभूत होता है, उस धर्म कर्मके विचार नहीं हो सकते । देखिये। एकके पास सदाके लिये स्थिर . २ R " चोर इसको लट कर ले जाते हैं, भूपति इसे छीन लेता है, अग्नि और जलके द्वारा भी इसका नाश हो जाता है, स्वजन, मित्र, ज्ञाति, मधु सर इसके हिस्सेदार है । भला फिर इससे लाभकी अाशा ही क्या है । लोभी पुरुषोंको न दिनमें सुस और न रानिमें शाति । न इस लोकमें चैन और न परलोकमें मुस । सतोप भान या निवृत्ति भाव तो लोभियोंके पाम तक नहीं फटकता । इसी लिये उनको शारीरिक वा मानसिक सुस भी प्राप्त नही होते । अाशा तो अनत है और धन असरय है, भला फिर धनसे तृप्णा कैसे पूरी हो ? सत्य लिखा है- सुवन्न स्वस्स ओपव्वयाभवे सियाहु केलास [केलासे] समा असंखया। नरस्स लुद्धस्स नत्तेहि किचि इच्छाटु आगास समा अणतिया ॥१॥ पुढवी सालि जवाचेर हिरन्न पसभिस्सह । पडिपुन्न नाल भेगस्स इति विजा तवचरे ॥ २॥ अर्थ-यदि मुरर्ण और चाढीके कैलाश सदृश पर्वत मी लोभी पुरपको दिये जायें, वे उसकी थोडीसी अाशाको भी युझानेमें समर्थ नहीं होते, क्योकि-याकाशकी नाई तृष्णा अनत है ॥ १ ॥ समग्र प्रकारके धान्यासे वा सुवर्णसे तथा मणि मोतियो और पशुओंसे सारी पृथिवीको प्रति- पूर्ण उपचित किया जाये, वह एक पुरुपकी पिपामाको भी उपणात करनेमें ममर्थ नहीं हो सकती, इस लिये इसके ८७ - M शमनार्थ सतोप धारण, विद्या अध्ययन और तपाचरण करना चाहिये । यही तीन पदार्थ तृष्णाको शात कर सकते हैं, क्योंकि-जैसे तृप्णा अनत है वैमे ये तीन भी अनत हैं । सो मुनिको परिग्रह विरमण पचम महारतद्वारा इसकी निवृत्ति करनी चाहिये । इस महानतकी भी पंच भावना हैं। जैसेकि- "मनोजामनोजेन्द्रियविषयरागद्वेपवर्जनानि पञ्च"- (तक सू०)॥ प्रथम भारना-मुनि श्रोन इन्द्रियको पशमें करे अर्थात् मनोहर तथा मनोज शब्दोंको सुनकर राग, और परुष तथा अमनोज्ञ शब्दोको सुनकर द्वेप न करे, क्योंकि-इन्द्रियोंमें शन्दोंका पविष्ट होना यह स्वाभाविक धर्म है। इनमें राग द्वेप करनेसे कौका वध होता है, इसलिये शब्दोंको सुन- कर शातिभाव रखे। द्वितीय भावना-मनोज्ञ वा अमनोज्ञ रूपको देख कर मुनि राग द्वेष न करे अर्थात् चक्षु इन्द्रियको वशमें करे। तृतीय भावना-मनोज दुर्गध के मिलनेपर राग द्वेष न करे अर्थात् प्राणेन्द्रियको वशमें करे । चतुर्थ भावना-मधुर ग्मादियुक्त भोजनके मिलनेपर मुनि अपनी जिहाको चशमें रसे अर्थात् स्वादु भोजन मिलनेपर रोग और अमनोज पाहारके मिलनेपर देप न करे।

पचम भावना-परिग्रह विग्मण महानतधारी मुनिको चा-
हिये कि वह स्पर्शेन्द्रियको वशमें करे। मनोज्ञ वा अमनोज्ञ
स्पर्शके माप्त होनेपर राग तथा द्वेष न करे । इस प्रकार पच
भारनायो करके पचम महानतको शुद्ध धारण करे ।
सव्वाउ राइभोयणाउ रमणं।
मुनि सर्वथा प्रकारमे पष्ठम गनिभोजन विरमण नत द्वारा
रानिभोजनका परिहार करे जैसेकि-अन्न, पानी, साद्यम
(साने योग्य मिष्टान्नादि ) और स्वाद्यम (जो साधुके लेने
योग्य-प्रास्वादन करने योग्य-लवग आदि) इन चार
प्रकारके आहागेका रात्रिमें तीन करण और तीन योगासे
त्याग करे, क्योंकि रानिभोजनमें अनेक दोप दृष्टिगोचर
होते हैं । रात्रिमें मूक्ष्म जीवोकी रक्षा नहीं हो सकती और
सानपान भी शुद्ध नहीं हो सकता । यदि भूलसे वा दृष्टि-
दोपसे भोजनमें ज़, पिपीलिका, कोलिका आदि जीव
भक्षण किये जायें तो जलोदर तथा कुष्टादि रोग उत्पन्न
हो जाते है । रात्रिभोजन त्यागनेसे सहजमें ही तप हो
जाता है तथा अन्य उपके मिना किये ही अर्द्ध श्रायु तपमें
लगती है । रात्रिभोजन त्यागियोको प्रायः विशुचिकादि
रोगोंसे शाति रहती है। उनके स्वास्थ्यमें किसी प्रकारसे
परिवर्तन नहीं होता । ना ही उनको आलस मा निद्रा आदि
सताते है । इम लिये रात्रिभोजन त्यागसे जीवरक्षा, स्वरक्षा,
आत्मममाधि, शाति, निरालय और ज्ञान ध्यान ग्रादि
अनेक लाभ उपलब्ध होते है । अतः मुनियोंको पष्ठम रानि-

८९
भोजन विरमण व्रत भी अपश्यमेव धारण करना चाहिये।
इसका ही नाम पष्ठम नत है।
इस प्रकार दीक्षा धारण करके अभिभूति जी उग्र तप
करते हुए विचग्ने लगे।
इन्द्रभूति वा अमिभूति जी की दीक्षाको सुनकर तृतीय
भ्राता वायु भूतिने विचार किया कि-जिसने मेरे दो भ्राता-
योंको जीत लिया है, तथा उनको दीक्षित करके निज
शिष्य भी बना लिया है ठीक वह सर्वत्र ही है इस में कोई
सशय नहीं अतः मुझे भी योग्य है कि-वहा जाऊ, उनको
वदना नमस्कार करू तथा अपने हृदयस्थ सशय का नि-
राकरण कराऊ।
इस प्रकार सोचकर वायुभूति भगवानके समवसरणमें
गया और प्रणाम करके बैठ गया ।
तर त्रिजगन्नाथ श्रीमहावीर स्वामीने प्रतिपादन
किया हे वायु भूते ! तेरे मनमें यह सन्देह है कि "जीन
तथा शरीर एक ही है, पृथक २ नहीं, प्रत्यक्ष द्वारा अगृहीत
होनेमे तनुसे जीव मिन नहीं, किन्तु आत्मा और शरीर
दोनो एकही है इसलिये जीवही शरीर तथा शरीरही जीव
है, यथाजलमें बुलबुला."।
हे वायुभूते! यदि शरीर और आत्मा एकही है तो
* श्रीमहामहोपाध्यायानमविरचित तसग्रह नामक प्राय की दीपिकाम
भी एसा लिसा है-तथा च पाठ सुपादिक जीवलक्षण ॥ ननु "मनुष्योह
ब्राह्मणोऽहम्" इत्यादौ सपनाहप्रत्यये शरीरस्यैव विप्यत्वाच्छरीरमेवात्मेति
RAM

९० . शरीरका नाश होनेपर जीवका भी नाश होना चाहिये, सो यदि जीवका नाश होना माना जाये वो शुभ कर्म करने और अशुभ कर्म त्यागनेका उपदेश व्यर्थ वा निष्फल होना चाहिये, जर ऐसा है तो पापी या अपराधी को दण्ड और धर्मात्माको यथेष्ट धन्यवाद देना अयोग्य है ऐसा करनेसे न्याय तथा नीति की कुछ आवश्यक्ता न होगी। प्रत्युत कोई व्यभिचार करे, कोई चोरी करे, अथवा कोई कैसाही कार्य करे उसे कुछ दण्ड न देना चाहिये, तात्पर्य यह है कि-जीव तथा शरीरको एक माननेसे पूर्ण नास्ति- कता आती है और यावत् सुकर्मीका करना अनावश्यक तथा निरर्थक ठहरेगा। हे वायुभूते! 'वही जीव और वही शरीर है। यह तेरा कथन मिथ्या है क्योंकि शरीरधारी जीवोके जीव देश प्रत्यक्ष हैं तथा वह अपने चैतन्यादि गुणों वा ईहादिकोंके द्वारा जाना जाता है किन्तु सर्वज्ञोंके हस्ताम्बल की नाई प्रत्यक्ष है। यदि शरीरही जीव होता तो मृत्युसमय जर पाचों इन्द्रिया तथा शरीर विद्यमान होता है, प्राग्मत् चेष्टा क्यों नहीं होती, अर्थात् उस समय देह आदि समस्त विद्य- चेन। शरीरस्य वरपादादिनाशे शरीरनाशादात्मनोऽपि नाशापत्ते । तापि इन्द्रियाणामात्मत्वम् । तथात्वे 'योह पटमद्राक्ष सोह इदानीं स्पृशामि इत्यनु सधानाभावप्रसगात् ॥ अ यानुभूतेऽ यम्यानुसधानायोगात् ॥ अनुभवस्मरणयो सामानाधिकर ण्येन कायकारणभावम्य नियतत्वात् । तस्माद्देहेन्द्रियव्यतिरिको जीव मुखादि वैविध्यात् प्रतिशरीर मिन ॥ इति ॥

११
मान भी होते हैं परन्तु ता भी चलना, फिरना, बोलना,
साना, पीना आदि चेष्टायें नहीं देखी जाती। इससे सिद्ध
हुआ कि उस समय अन्य सर्व वस्तुओंके (देह इन्द्रिया-
दिके) विद्यमान होते हुये भी जीवके न होनेसे पूर्वोक्त चेष्टा-
ओंका अभाव है अतः सिद्ध हुआ कि शरीर और इन्द्रियोंसे
आत्मा (जीव ) अतिरिक्त नित्य पदार्थ है वह तीन कालमें
शाश्वत रहता है किन्तु पर्यायकी अपेक्षामे तथा कोकी
अरलतासे ससारचक्रमें निरन्तर पर्यटन करता हुआ नाना
प्रकारकी योनियोको प्राप्त होता है और जर पूर्व पुण्योदयसे
कमी धर्ममार्गमें श्राता है वा सम्यग्ज्ञान, सम्यग दर्शन वा
मम्यर चारित्ररूप रतत्रयको ग्रहण करलेता है तर समस्त
विकराल काका नाश करके मोक्ष प्राप्त करता है।
इस प्रकार भगवान्के वचनामृत अवण करके वायुभूति
अपने पाचसी (५००) शिप्योके साथ दीक्षित हो गया
और अपने ज्येष्ठ भ्राताओंके सदृश साधु अाचार सम्यक
प्रकारसे श्राराधन करने लगा।
इसके पश्चात् व्यक्त भी सोचने लगा कि-यह वाह्य
वनस्थित भगवान् निश्चयही सर्वज्ञ है जिन्होंने इन्द्रभूत्यादि
जैसे अजेय विद्वान् क्षणमात्रमें जीत लिये, इस लिये यह मेरा
सदेह भी अवश्य छेदन कर देंगे यह मेरा दृढ विश्वास है
सो मेरा सदेह दूर होने पर मै भी इनका शिष्य हो जाऊगा।
ऐसे विचारकर व्यक्त नामक धनुमित्रका-पुत्र (इसका

वर्णन प्रथम आचुका है) समवसरणमें आया और वदना
नमस्कार करके नंठ गया।
व्यक्तको प्राया देखकर श्रीश्रमण भगवान्ने प्रतिपादन
किया कि-हे व्यक्ता तेरे मनमें यह सशय है कि-पृथ्वी, जल,
तेजु, वायु और आकाश यह पाच भूत जो माने गये है यह
मिथ्या हैं कोई भूत नहीं है और जो इनकी प्रतिपत्ति होती
है वह जलचन्द्रकी नाई भ्रमरूप है "सन कुछ शून्य ही है"
यह तेरा दृढ़ पिथास है
हे व्यक्त ! यह तेरी कल्पना नितात असत्य और प्रत्यक्षादि
प्रमाणों द्वारा वाधित है, क्योंकि किमी एकवस्तुके मद्भागमें
उमी वस्तुका असद्भार नहीं हो सक्ता. यथा भूतलमें घट
पटादिका सद्भाव होने पर "अपटपटवभूतल" यह नहीं
कह सकते, यदि कहें तो प्रत्यक्ष प्रमाणद्वारा वाधित होनेसे
असघटित है, अथवा जन तेरे मतानुमार सब कुछ शून्यही है
तो फिर स्वमावस्था तथा जाग्रतावस्या यह क्यों होती हैं,
जन इन दो अवस्थाओंका होना असम्भव है तन "सर्वशू-
न्यता" का होना केरल असम्भवही नहीं, प्रत्युत यह
नितात मिथ्या प्रमाण बाधित और स्वकपोलकल्पित अमत्य
कल्पना है।
इसप्रकार त्रिभुवननायक भगवान्के वाक्यामृत सुनकर
व्यक्तजी को वैराग्यभार उत्पन्न हो गया और अपने ५००
शिष्यों के साथ भगवान्के हस्तकमल से दीक्षित हो गये ।

इसके अनंतर अपने शिप्यपरिवार सहित उपाध्याय सुधर्मा भी अपने सन्देहोंको दर फग्नेके लिये भगवान् महावीर स्वामीके पास आये उनको देखकर भगवान्ने अपनी पीयूपधारारपवाणी द्वारा अमोघ वर्षा करनी पार- म्भ की, हे मुधर्मन् ! तेरा यह मन्तव्य है कि जैसा इस भवमें जीव होता है वैसाही परलोकमे जाकर बनता है, यदि पूर्व- भवमें कोई पुरुष है तो वह मृत्यु पाकर परमवमें भी मनुष्य होगा, जो पूर्व भरमें सी है वह परलोकमें भी स्त्री होगी और इसी प्रकार पशु मरकर पशु, देव मरकर देव, और नारफी मरकर नारकी होता है तात्पर्य यह है कि पहिले भनमें जैसा जीव जैसी योनिमें होता है ठीक वहासे मरकर वैमाही जीव सीही योनिमें जाता है, ऐमा नहीं कि पुरुप मरकर स्त्री हो सकती है या स्त्री मरकर पुरुप बन सकता है क्योंकि कारणके सदृश ही कार्य होता है, अन्यथा नहीं यथा कलमनीज (धान्यविशेष) को वीजने पर यवका अकुर कदापि नहीं हो सकता। हे सुधर्मन्! यह तेग कथन यथार्थ नहीं है क्योंकि पूर्व भवमें जो जीव जैसे कर्म करता है तदनुसार गतिको प्राप्त होता है यदि मनुष्यभवमें कोई पुरुष मानवजन्म लेनेके योग्य मृदुता, आर्जवता, सहनशीलता आदि सुकमाको सचित है वही परभनमें मनुष्य हो सकता है और जो त्योंसे रहित है वह पूर्वजन्ममें "प्य कदापि नहीं रन सक्ता - देव, नारकी गादि ममस्त योनिया कर्मानुमार प्राप्त होती है ऐसा नहीं कि जो पूर्वभवमे होवे वही परभवमें होने जिन २ कासे जिस २ गतिमें जीव जाता है वह तुझे सुनाता हू ध्यानसे सुनो। यथा- चाहि ठाणेहिं जीवाणे रतियत्ताए कम्म पगरेति, तंजहामहारम्भताते महापरिग्गहताते पंचेन्द्रिय यहेण कुणिमाहारेणं- (श्रीस्थानागसून, अध्याय ४, उद्देशा ४) भावार्थ-चार स्थानोम लगे हुये जीव नरकायुप्यको वाधकर नरकम जन्मलेते है। (१) महारम्भसे (२) महापरिग्रहमे (३) पचन्द्रिय जीवोका वध करनेसे (४) मास भक्षण करनसे (जीव नरकमें जाता है)। चरहि ठाणेहिं जीवातिरिस जोणियताए कम्म पगरति तजहा माइल्लताते, णिवडिमाइ- ल्लयाए, अलियययणेण, कृडतुल्ल कृटमाणेण (श्रीस्थानागमन, अध्याय ४, उद्देशा ४।) भावार्थ-चार प्रकारले कमामे जीव पशु योनि (तिर्यम् योनि ) में जाते है-(१) छल करनेसे (0) छलमें छल करनेसे अर्थात् छलको अमत्य भाषण द्वारा सिद्ध करनेसे (३) अमत्यवचन बोलनेसे (४) खोटा तोल मापा कर- , , नेसे,अर्थात् न्यूनदेना अधिक लेना अथवा न्यूनाधिक मापना इन चार कारणोसे जीच तिर्यश्च गतिको बाधते है। चर्हि ठाणेहि जीवामणुस्सत्ताते कम्म पग- रेति, तजहा पगतिभद्दया, पगति विणीयाण साणुफोसयाए, अभच्छरियाए। (श्रीस्थानाग सूत्र, अध्याय ४, उद्देशा ४)। भावार्थ-(१) प्रकृतिसे भट्ट होनेस (२) प्रकृतिसे विनयी होनेसे (३) सानुकोशी होनसे अर्थात् दुःसीको देख दुःखी होनेसे या उसका दुम्स दूर करनेसे (४) और किमीकी ऋद्धि तथा सम्पदा देखकर ईपी वा असूया न करनेमे जीय मनुष्य गतिको उपलब्ध करते है। तथा- चरहिं ठाणेहि जीवादेवाउत्साए कम्मं पग- रेति तंजहा सरागसजमेणं, सजमासजमेणा, चालतचोकम्मेण, अकामणिज्जरा। (श्रीस्थानागमूत्र अ. ४.४१) भावार्थ-(१) सराग संयमसे (माधुवृत्तिसे) (२) सयमामयमे (श्रावकधर्मके पालनमे) (३) अज्ञान तपकर्मसे (४) और अकाम निर्जरासे जीव देवायुके कोका संचय - करता है नाणं च दंसणं चेव चरितं च तवोतहा। पन्नत्तो जिणेहिं वर दंसिहि ॥ ध्ययनमुत्र अध्याय २८ गाथा

भानार्थ--चार कारणोंसे जीप मोक्ष प्राप्त करते है
(१) सम्परशानसे (२) सम्यग्दर्शनसे (३) सम्यकचारिनसे
(४) और तपसे।
यह चार मोक्षके मार्ग सम्यग्दर्शी भगवान् अर्हन्
देषोंने प्रतिपादन किये हैं इन्हींसे जीव मोक्ष गतिको प्राप्त
कर सकते हैं सो है सुधर्मन् ! इस प्रकार निजकोंके अनुसार
जीर शुभाशुभ गतिमें जन्मलेते है किन्तु तेरा यह कथन
"पुरप मरके पुरप और स्त्री मरके स्त्री होती है" यथार्थ नहीं
है तथा "कारणके सदृश ही कार्य होता है" यह भी ठीक
नहीं क्योंकि इसका सर्वथा नियम नहीं है यथा-
मदृश कारणस्यैव कार्यमित्यप्यसगतम् ।
शृगप्रभृतिकेभ्योऽपि शरादीना प्ररोहणात् ॥
कारणके मदृश ही कार्य होता है यह भी असगत है
क्योंकि पर्वत शृगपर शर ( अर्थात् शरको उसर कडा) के
उगने से। इस प्रकारके भगवान्के निःस्वार्थ वा निष्पक्ष
वचन सुनकर उपाध्याय सुधर्मा भी अपने ५०० शिष्योंके
साथ भगवान्के चरणारविंदमें दीक्षित हो गये।
पुनः मण्डिक भी अपना सन्देह दूर करनेके लिये सामी
के समवसरणमें शिप्यपरिवार सहित प्राया । तत्र देवाधिदेव
श्रीश्रमण भगवान् महावीर स्वामीजी नोले ।
हे मण्डिक! तेरे मनमें यह संशय है कि कौंका पन्ध
अथवा मोक्ष नहीं होता, सो यह कथन सत्य नहीं है क्योंकि

आत्माका कर्मबन्ध तथा उनका मोक्ष प्रसिद्ध है मिथ्यात्वादि कृत्योंसे जो काँका नन्ध होता है उसे नन्ध-कहते है। इसके प्रभावसे देव, मनुष्य, पशु और नरकादि योनियोमें प्राणी परम दारुण दुःस अनुभव करते है और ज्ञान दर्शन चारित्र प्रमुस हेतुअोद्वारा कोंके वियोग होनेको मोक्ष कहते है। आत्माके साथ कर्मीका चार प्रकारसे सम्बन्ध होता है जैसेकि अनादि अनत १ अनादि सात २ सादिसात ३ सादि अनत ४ अभव्य यात्माके साथ काँका अनादि अनंत सम्बन्ध होता है क्योंकि जीवकी आदि न होनेसे अनादि और अभव्य जीव कभी मोक्षमें नहीं जाते, इस अपेक्षासे अनत है अर्थात कभी भी दूर न होनेवाला अनादि अनत सम्बन्ध होता है। मोक्षमें जानेवाले जीवोंके साथ काँका अनादि सात सम्पन्ध है क्योकि भव्य जीन कर्मोंसे रहित होकर मोक्षमें जाता है, इस अपेक्षासे भव्य जीनके साथ कर्मोका अनादि सात सम्बन्ध है । जिस समय कोई कार्य किया जाता है वह दिन उस कर्मका आदि होता है और समयातरमें जन किसी दिन कर्मकी स्थिति पूर्ण होनेपर उसका फल मिलता है उसदिन उसका अन्तिम दिवस होता है इस अपेक्षासे कमौका सम्बन्ध सादिसांत है क्योंकि ऐसा कोई भी कर्म नहीं कि जिसकी स्थिति अनादि कालकी हो, सबसे अधिक स्थिति मोहनीय कर्मकी है परन्तु वह भी सरयेय (संरयावाली) अर्थात् सत्तर (७०) कोडाकोड सागरकी है इससे सिद्ध हुआ कि-जिसदिन किया जाये उस दिन आदि और जिस दिन-

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उमका प्रतिफल भोगा जावे उसदिन अंत होता है इस अपे-
क्षामे काँका सम्बन्ध सादिसात है और जब जीन मोक्षमें
गमन करता है तन कर्मोंका सात जीवकी अपुनरावृति हो
जाती है इसी कारणसे उसे सादि अनत कहते हैं । सो
इसी प्रकार अनादि कालसे चले आते हुये काँकी नाशा-
वस्थाको मोक्ष कहते हैं, जैसे अग्नि औषधि श्रादिसे स्वर्णकी
मल दूर होनेमे स्वर्ण निर्मल हो जाता है इसी प्रकार ज्ञानादि
आत्मगुणो द्वारा कर्मरूपी मल दूर हो जाती है, तन आत्मा
शुद्ध, निर्मल, अजन्म, सिद्ध, अजर, अमर हो जाता है और
सदाके लिये मोक्षमें रहता है।
भगवानकी इस अमृतरूपी वाणीको मुनकर मडिकजी
निःसशय हो गये और उसी समय अपने साडेतीनसौ
(३५०) शिप्योंके साथ श्रीश्रमण भगवान महावीर
प्रभुके चरणकमलमें दीक्षित हो गये और प्रताको शुद्धतासे
पालन करने लगे।
पुनः मौर्यपुनभी अपने सशयका निराकरण करने के लिये
अपने शिष्यपरिवारके साथ ममवसरणमें पाया ।
तन भगवान् वर्द्धमान स्वामीने प्रतिपादन किया,
कि है मौर्यपुन! तुझे यह सन्देह है कि "देव नहीं है
क्योंकि यह नेसे प्रत्यक्ष नहीं हैं" हे मौर्यपुन! यह कथन
मिथ्या है । देस! इस समवसरणमें स्वयम् आये हुये शकेन्द्र
आदि देवसमूह प्रत्यक्ष विद्यमान हैं। प्रत्यक्ष होनेपर अन्य
प्रमाणकी क्या आवश्यक्ता? हा इतनी बात तो अवश्य है

कि-देव पिना कारण मनुष्यलोकमें नहीं पाते क्योंकि एक
तो उनके सुखोंमें वित होता है दूसरे उनको मर्त्यलोकमे
अति दुर्गन्ध आती है इसलिये वह शेप कालमें नहीं आते
किन्तु तीर्थकर भगवानोके जन्म, दीक्षा केवलज्ञान उत्पत्ति
तथा निर्वाणादि कल्याणोंपर यह मनुप्यलोकमें आते हैं।
तीर्थंकरोंके पुण्यपुजका प्रभावही ऐसा है कि इनको अवश्य
ही आना पडता है, अतः इमसे अतिरिक्त समयमें देवोंके न
आनेसे उनका प्रभाव नहीं कहाजा सत्ता, किन्तु प्रत्यक्ष
प्रमाणद्वारा सिद्ध होनेसे इनका अस्तित्त्व स्वतःसिद्ध है।
इमप्रकार भगवानके परम प्रभावशाली पचनोंको सुनकर
मौर्यपुत्रजीका सशय दूर हो गया तथा वह शीघही अपने
३५० शिष्योंके साथ दीक्षित हो गये।
फिर इसीमकार अकपित भी अपने सन्देहकी निवृत्तिके
लिये भगवान्के निकट पाया।
तर भगनान्ने अपनी अमृतरस भरनी रसनामे प्रति-
पादन किया कि हे अकपित्त! तेरा यह मन्तव्य है कि-
"अदृश्यमान होनेसे नारकियोका अस्तित्वही नहीं है अर्थात्
नारकी नहीं है क्योंकि वह दृष्टिगोचर नहीं होते" मो हे
अकंपित ! यह तेरा कथन असत्य है नारकियोंका अस्तित्व
तो है किन्तु वह परतत्र होनेसे इसलोकमें नहीं श्रासकते,
जैसेकि-तेरे जैसे मनुष्य वहा नहीं जा सकते, छमस्थ मनु-
प्योंको नारकी अनुमानद्वारा जेय है किन्तु प्रत्यक्षोपलभ्य
नहीं हैं और जो भायिक, जानी यर्थात् सर्वन, सर्वदर्शी

१०० अर्हन् प्रभु है उसको करतलामलकवद प्रत्यक्ष हैं, और यदि तुम यह कहो कि-कोई क्षायिक ज्ञानी (सर्वज्ञ ) ही नहीं है तो यह भी कथन व्यभिचारी है क्योंकि इस पाशकाका मुझमें भी व्यभिचार है (अर्थात् में प्रत्यक्ष सर्वज्ञ हू ) अत: वह तेरा पूर्वोक्त कथन सत्य नहीं है इससे सिद्ध हुआ कि- सर्वज्ञत्व भी प्रत्यक्षसे सिद्ध है और अनुमान द्वारा नारकि- योंका अस्तित्व है। भगवान् महावीर स्वामीके इमप्रकार वचनामृतको श्रवण करके श्रापितजीको वैराग्य होगया, पुनः वह मग- वान्के चरणमरोजमें ३०० शिप्योंके साथ दीक्षित होगये । इसके पश्चात् अचलभ्राता वीर प्रभुके समीप पाया। उसको देखकर भगवान् गोले, हे अचलभ्राता! तेरे चित्त में यह सन्देह है कि-"पुण्य पाप कोई वस्तु नहीं" सो हे अचल ! इसविषयमं मशय मतकर, क्योंकि पुण्य पापका फल होता हुया लोकमें प्रत्यक्ष देखा जाता है, दीर्घ आयु, लक्ष्मी, मौन्दर्य, नीरोग्य, सत्कुलजन्म, आर्यक्षेत्र आदि शुभ वस्तुयोंकी प्राप्ति पुण्यके फलसे होती है और तुच्छ आयु, निर्धनता, कुरूपता, रोग, दुःस, दुष्टकुलजन्म, अनार्य क्षेत्र आदि अशुभ वस्तुओकी प्राप्तिका कारण पापकर्म है । यदि पुण्य पाप कोई वस्तु न हो तो कोई सुपी, कोई दुःखी, कोई खामी, कोई सेवक, कोई धर्मात्मा, कोई पापिष्ठ और कोई मदाचारी, कोई दुराचारी इत्यादि यह दो अनस्सायें " - न होनी चाहिये परन्तु यह तो ससारमें प्रत्यक्ष देसा जाता है। ९ कारणोसे जीव पुण्य संचित करते है-यथा- (१) अन्नदानसे (२) जलदानमे (३) मकानदानसे (४) शय्यादानसे (५) वखदानसे (६) मनशुभ वर्तानसे (७) पचन शुभ कहनेसे (८) कायाको धर्म कार्योमें लगानेमे (९) और अन्छे साधुयो वा तपस्वियोंको नम- स्कार करनेमे (जीन पुण्यका संचय करते हैं)। इनका फल प्राणी ४२ प्रकारमे मुसपूर्वक भोगते हैं और अष्टादश (१८) कारणोंमे जीर पापफर्मोपार्जन करते है यथा- (१) जीपहिसा (२) मृपाद (३) चौर्यकर्म (४) मैथुन (५) परिग्रह (६) कोध (७) मान (८) माया (९) लोभ (१०) राग (११) द्वेष (१२) कलह (१३) अभ्याख्यान (१४ ) पैशून्य (१५) परपरिवाद (१६) रतियरति (१७) मायामृपा (१८) मिथ्या- दर्शनशल्य। इन अष्टादश कारणोंसे जीव पापकर्मोका सचय करते हैं योर इसका परम दुःसफल ८२ प्रकारसे भोगते हैं। अमण भगनान् महावीरने इम अनुक्रम पापपुण्यका विस्तारपूर्वक भिन्न करके विवर्ण मुनाया, जिससे अचल- भ्राताको पुण्य पापके अस्तित्वका ज्ञान हस्तामलकरत् स्पष्ट वा मत्य प्रतीत होने लगा, तथा इस विषयमें उनका कोई सशय भी शेप न रहा।

१०० तब अचलभ्राताने अपने ३०० शिष्योंके साथ त्रिजग- नाथप्रभुके चरणोंमें प्रज्या ग्रहण की अर्थात् दीक्षित हो गये। इसके अनन्तर मेतार्यजी अपने सन्देहको दूर करने के लिये खशिष्यसमुदाय महित ममवसरणमें पाये। तर भगवान्ने अपनी मुधा रस वर्पिणी रसनामे प्रतिपा- दन किया-कि हे मेतार्य! तेरे मनमें यह समय है कि- पृथ्वी आदि पाच भूतोमे यह आत्मा उत्पन्न होता है और इनके अभानसे प्रात्माका भी नाश हो जाता है इसी कारण भवातर रूप परलोक मी कोई वस्तु नहीं, जहा कि यह जीन पर्यटन करता हो। हे मेतार्य ! यह तेरा मन्तव्य सत्य नहीं है, क्योंकि-कार- के सदृश कार्य होता है यथा मृत्तिकारूप कारणसे उत्पन्न हुया घटरूप कार्य अपने मृत्तिकारूप कारणकी नार्ड मिट्टीका ही रहता है किन्तु लोहे या पीतलका नहीं इमी प्रकार तन्तु कारणसे उत्पन्न हुया पटकार्य भी तन्तुओका ही होता है न कि पापाणादिका। सो इमी प्रकार पाच भूत तो जड है इनसे चैतन्य म्यस्प जीव की उत्पत्ति कैसे सभव हो मक्ती है, यदि यह कहा जावे कि-जमे घडी जड होनेपर भी शब्द करती तथा समय देती है और फोनोग्राफ (वादिनविशेप) चतन्यता- रहित होनेपर भी पुरुषांके सदृश गायन करता है इसी प्रकार जडरूप पाच भूतोसे चैतन्य जीवके होनेमें क्या भावार्य है ? इसका उत्तर यह है कि प्रथम तो घड़ी अथवा फोनोग्राफ स्वयमेव उत्पन्न नहीं हो सकते, किन्तु किसी चतन्य जी द्वारा निर्माण किये जाते है। द्वितीय-यद्यपि जीवके सगसे यह जीव की सदृश प्रतीत होते है परन्तु वास्तवमें जडही है क्योंकि-फोनोग्राफ चाहे मनुष्योंमे अच्छा गायन भी क्यो न करे उसको यह ज्ञान नहीं कि में क्या गाता हू, क्या मे शुद्ध गायन करताहू अथवा अशुद्ध घडी चाहे चापीके प्रभावसे एक दो तीन शब्द करती है तो मी उसे म्वयं यह चोध नहीं कि मैंने कितने जाये है? तात्पर्य यह है कि घड़ी तथा फोनोग्राफसे जीव अपना अर्थसाधन करता है अर्थात् घडीसे तो जीन यथार्थ समय ग्रहण करता है और फोनोग्राफसे गीत सुनकर अपना मन प्रसन्न करता है किन्तु यह दोनों जहही है, अथवा यदि पाच भूतोसे ही आत्मा उत्पन्न होता है तो जीवित पुरुपकी नाई उसके शवमें (मृतक शरीरमें) गमन, भाषण, सान पानादि क्रियायें क्यों नहीं होती, पाच तत्व (पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश) तो मृतक शरीरमें भी विद्य- मान होते है, इससे सिद्ध हुआ कि-जदरूप पाच भूतोंसे आत्मा उत्पन्न नहीं होता, आत्मा तो अनादि अनव चैतन्य- स्वरूप न तो किसीसे उत्पन्न होता ही होता है । कर्मरूपी मलसे ज्ञान दर्शन चारित्ररूप चन

"
का अभाव हो जाता है, उससमय यही आत्मा शुद्ध,
निर्मल, निप्फलक, सिद्ध, बुद्ध, अजर, अमर हो जाता है।
श्रीश्रमण भगवान महावीर स्वामीजीके इस प्रकार
वचनामृत सुनकर मेतार्यजीका सन्देह दूर हो गया, तो
मेतार्यजीने भगवान्से प्रार्थना की कि-हे स्वामिन् । मै आपका
शिप्य होना चाहता ह अतः मुझपर करणा करके मुझे
दीक्षित कीजिये।
तर त्रिलोकपूज्य स्वामीने मेतार्यजी तथा उनके ३००
शिष्यों को स्व करकमलोंमे दीक्षित किया अर्थाद उन सको
सामायिक चारित्र प्रदान किया।
इसके पश्चात प्रभासजी भी भगवान् चईमानस्वामीके
समवसरणमें याये, तर आपने प्रतिपादन किया कि हे
प्रभास' तेरे मनमें यह सशय है कि-निर्वाण है या नहीं,
सो इसमें सन्देह मतकर, क्योकि कर्मक्षयका नाम ही मोक्ष
(निर्वाण ) है और शुद्धज्ञान, शुद्धदर्शन, तथा शुद्धचारिन
द्वारा काँका क्षय होना प्रमाणोसे सिद्ध और युक्तिसगत
है। इमलिये निर्माणके अस्तित्वमें कोई सन्देह नहीं, अति-
शय ज्ञानवालोके मोक्ष प्रत्यक्ष है तथा अल्पज्ञ आत्मा उसे
अनुमान प्रमाण वा आगम प्रमाणसे जानते हैं मोक्षमें जीनको
अनत ज्ञान, अनत दर्शन, निजगुण वा प्रात्मीक सुसकी
प्राप्ति होती है। यह जीव जन्म, मरण, रोग, शोक, सयोग
वियोगादिक समारके ममस्त दुःखोंसे रहित हो जाता है, पुनः
मसारमें श्रागमन नहीं होता यथा-

१०५ दग्धे चीजे ययात्यन्तं प्रादुर्भवति नाङ्कुरः। कर्मचीजे तथा दग्धे न रोहति भवाङ्करः ॥ (वत्लार्थसार) अर्थात् जैमे पीजके दग्ध होनेपर फिर अकुर उत्पन्न नहीं होता, इसी प्रकार कर्मरूप पीजके दग्ध होनेपर जन्म (भव) रूप अकुरकी उत्पत्ति नहीं होती, और उसके सिद्ध, बुद्ध, अजर, श्रयर, अविनाशी, परमात्मा, ईश्वर, अशरीरी, सन शक्तिमान् इत्यादि नाम कहे जाते हैं। इस प्रकार भगवान्की योजन व्यापिनी सुधाकरणी मि- च्याल तिमिर विनाशिनी, लोकोचर परम दिच्यवाणीको सुनकर प्रभासजी निःसशय होगये। और उसी समय अपने ३०० अन्तेवासिओंके माय परम वैराग्यसे भगवानके पास परिनजित (साधु ) हो गये। यह पूर्वोक्त इन्द्रभूति आदि एकादश पंडित (जो कि महाकुलीन, महाप्राज्ञ, चतुर्वेद तथा पशास्त्र वा सागोपाग वेत्ता सकल कलानिष्णात, पदार्थविद् और विश्ववदित थे) भगवान् श्रीवर्द्धमान स्वामीके प्रधान शिष्य हुये इमसे ऊपर लिया जा चुका है कि-दधिवाहन राजाकी कन्या चन्दन- बालाजी जो कि अपने शीलरत्नके आश्चर्यकारी प्रभावको दि- साकर कौशाम्बी नगरीके महाराजाधिराज शतानीकके गृहमें इस प्राशासे ठहरी हुई थी कि भगवान् वर्द्धमानस्वामीको जन केवल ज्ञान हो जावेगा तन में महाराजकेपास दीक्षित हो जाऊगी चन्दनगालाके ऐसे प्रणाम की बहुतसी कुमारिया भी इसके साथ दीक्षित होनेको उद्यत हो गई और भगवान्को केवल ज्ञान होनेकी वाट देसने लगी सो इस अवसरमें उन्होंने आकाशमें बारम्बार आते जाते हुये देवसमूहको देसकर निश्चित किया, कि अब महाराजको केलज्ञान उत्पन्न होगया है। इसीलिये देवगण समवसर- णको जा रहे है। ऐसा विचारकर वह सर्व प्रत आकाक्षिणी होती हुई समवसरणमें आई और भगवान्को नमस्कार करके सन्मुस उपस्थित हो गई। तर चन्दननालाजीने महाराजसे प्रार्थना की, कि-हे भगवन् ! हम सबको जन्म, मरण, वृद्धावस्था, सयोग, वियोगादि असा य दुःसीका ससारमे भय उत्पन्न होनेसे वैराग्यभाव हो गया है। इसलिये हमारी इच्छा है कि-गृहस्थाश्रमको त्यागकर मुनिआश्रममें प्रवेश करें अर्थात् साध्वियां हो जायें, सो आप कृपा करके हम सबको दीक्षाप्रदान करें। तर महाराजने उन सनकी विज्ञप्ति सुनकर स्वयमेन उनको दीक्षित किया, अर्थात् अपने मुसारविन्दसे पाठ उच्चारण करके उन सबको सामायिक चारित्रप्रदान किया और उन सबमेंसे चन्दननालाजीको मुरय पद (प्रवर्तिनी पट) पर स्थापन किया तदनन्तर समवसरणमें उपस्थित श्रोता जनोंमेंसे बहुत नरों ने गृहस्थाश्रमके द्वादशनत धारण किये, तथा इसी प्रकार उपस्थित श्राविकाओने भी गृहस्थधर्मको अगीकार किया।

तो वहापर इस अनुक्रमसे चार प्रकार अर्थात् साधु, साध्वी, श्रावक, भाविकाके सपके होचुकनेके पश्चात् भगवान्ने इन्द्रभूति आदिक एकादश प्रधान शिष्योंको धान्योत्पाद व्ययात्मक त्रिपदी मत्र दिया अर्थात् यह बताया कि समस्त मंसारमें केरल ६ द्रव्य है जैसे--(१) धर्म (२) अधर्म (३) आकाश (४) काल (५) पुद्गल (६) जीच। इन ६ द्रव्योंमे अतिरिक्त अन्य कोई मातवां पदार्थ जग- में नहीं है और इन पद द्रव्योमसे प्रत्येक २ की तीन २ पर्यायें होती है यथा-उत्पाद, व्यय, धीच्य। कल्पना करो कि किसी पुरुषके घर कोई पालक उत्पन्न हुआ उमगालकके जीवकी उत्पत्ति कही जाती है और जहासे वह मृत्यु होकर पाया है वहा उसकी मृत्यु कही जाती है, परन्तु आत्मा वैसाही है न वह मरा है और न उसकी उत्पत्ति हुई है इसलिये वह धौन्य है क्योंकि जीन त्रयकाल अविनाशी, नित्य, द्रव्य है इसी प्रकार अन्य पाच द्रव्योकी भी तीन २ पर्यायें होती है इस त्रिपदी मत्रसे उनको मति, श्रुति, अवधि तथा मनः पर्यव चारो ज्ञान और चतुर्दश पूर्वकी विद्या प्रगट हुई तब उनके गणधर पदवी भी उदय हो गई अर्थात् यह एकादशही विद्वान् गणधर पदवीसे विभूपित हो गये। पुनः इन्होने द्वादश अग और चतुर्दश पूर्वकी रचना की + यथा- १०८ आचारांग सूत्रकृतं स्थानागं समवाययुक। पचम भगवत्यग, ज्ञाताधर्मकथापिच ॥१॥ उपासकांतकृदनुत्तरोपपातिकादश। प्रश्नव्याकरण चैव विपाक श्रुत मण्यथ ॥२॥ दृष्टिवादश्चेत्यगानि तत्रिपद्या तानि तैः। पूर्वाणि दृष्टिवादान्तः मृत्रितानि चतुर्दश ॥३॥ तत्रोत्पादाग्रायणीये वीर्यप्रथादमित्यपि । अस्ति नास्ति प्रवादच ज्ञानप्रवाद नामच ॥४॥ सत्यप्रवादमात्मप्रवाद कर्मप्रवादयुरु । प्रत्यारयान च विद्याप्रवादकल्याणके अपि ॥५॥ प्राणावायाभिधान च क्रियाविशालमित्यपि । लोकविन्दुसारमथ पूर्वाण्येव चतुर्दश ॥६॥ (श्री विपष्टिशलाकापुरप० पर्व १० सर्ग ५ भावार्थ-द्वादशांग के नाम- (१) श्रीयाचाराग (२) श्रीमूनकृताग (३) श्रीस्थ नागसून (४) श्रीसमवायाग (५) श्रीविवाहप्रा (भगवती) अग (६) श्रीज्ञाताधर्मकथाग (७) श्रीउप सक दशाग (८) श्रीअंतकृताग (९) श्रीमनुत्तरोपपाति दशांग (१०) श्रीप्रश्नव्याकरणाग (११) श्रीविपाका (१२) श्रीदृष्टिमादाग। चतुर्दश पूर्वोके नाम- (१) उत्पादपूर्व (२) अग्रायणीयपूर्व (३) वीर्य प्रवादपूर्व (४) अस्तिनास्तिप्रवादपूर्व (५) ज्ञानप्रवाद .

पूर्व (६) सत्यप्रवादपूर्व (७) आत्मप्रवादपूर्व (८) कर्मप्रवादपूर्व (९) प्रत्यारयानप्रवादपूर्व (१०) विद्या- प्रवादपूर्व (११) अवंध्य (कल्याण) पूर्व (१२) प्राणा- यायाभिधानपूर्व (१३) क्रियाविशालपूर्व (१४) लोक- विन्दुसारपूर्व । (१) आचाराग-इस प्रथम अंगमें साधु साध्वियों के आचार, भिक्षाविधि, विनय, विनयके फल, चारित्र, भापण योग्य अथवा अभापण योग्य भापा, समस्त अहर्निशके कर्त- व्यका, गमनागमन, समित्त, गुप्ति, तप, उपधान और सय- मादिका सविस्तर तथा सुप्रशस्त वर्णन है, तथा इसमें ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार और चलवी- याचारका भी स्पष्ट विवेचन किया गया है. इस अगमें दो श्रुतस्कन्ध, हैं जिसमें पंचविशति ( २५) अध्ययन हे तथा इन २५ अध्ययनोमें ८५ उद्देश है और १८००० अठारह हजार पद हैं। (२) सूत्रकृताग-इसमें लोकस्वरूप, अलोकस्वरूप, जीवस्त्र- रूप, अजीवस्वरूप, जैन मतका स्वरूप तथा अन्य मतमतान्त- रोका स्वरूप प्रतिपादन किया गया है और क्रियावादियोके १८० भेदों, प्रक्रियावादियोके ८४ भेदों अज्ञानवादियोके ६७ भेदों तथा विनयवादियोंके ३२ भेदोका वर्णन करके युक्तिया प्रमाणोंद्वारा न्यायनीतिसे सडन किया गया है, जैन मतमें माने ये मिद्धान्तोंकी सप्रमाण यथार्थता निरूपण की गई है।

२१० . अतएव यह मनकृताग सम्यक्त्व चक्षुविहीन मिथ्यात्वमें प्रवीण मनुष्योंके लिये यष्टिभूत, तथा अज्ञान अधकारके कारण दुरधिगम वा दुःसाध्य है, वोध जिनका ऐसे पद्व्य- रूप ज्ञानके प्रतिरोध करानेके लिये दीपकतुल्य है और दुरारुढ मोक्ष प्रासादपर आरूढ होनेके लिये निर्माणरोहण सोपान है अपितु जीव, अजीव, पुण्य पाप आसव, सम्बर, निर्जरा, पन्ध और मोक्ष इन नर तत्वोंका बड़ी सुगम रीतिसे विवेचन किया गया है, इस द्वितीय अगमें दो श्रुतस्कन्ध, २३ अध्ययन, तथा त्रयस्त्रिंशत् उद्देश हैं और छत्तीसहजार (३६०००) पद है। (३) स्थानाग-श्रीस्थानागजी मूनमें दश अन्याय वा एकविशति (२१) उद्देश है, प्रथम अध्ययनमें यावत् सूत्रपाठ है वह एक २ बातका विरेचन करते है, द्वितीयाध्ययनमें पक्ष तथा प्रतिपक्षकी अपेक्षासे दो २ बातोंका समावेश किया गया है, एव तृतीयमें तीन २ चतुर्थमें चार २ यावत् दशमें दश २ बातोंका अत्यत रोचक शैलिसे समावेश किया गया है। इस अगमें शाश्वत भवनों, विमानों, सागरों, द्वीपों, पर्वतों, नदियों, तथा शैलकूटोंके नाम उनके स्थान और उनके यायाम विष्कमादिका तथा भवनपति, व्यन्तर, ज्योतिपी, विमानवामी देवों वा इनके इन्द्रोका सविस्तर स्वरूप कथन किया गया है विशेष करके इस अगके चतुर्थ अध्यायमें तो गूढ इस्त्र तथा अत्यन्त शिक्षाप्रद मूगरूप सातसौ(७०० .)

१११ अनुपम मनोहर वर्णीय पुष्पोसे गुफित माला है जो प्रत्येक व्यक्तिके कण्ठाभरण बनानेके योग्य है अर्थात् कण्ठस्थ कर- णीय है नवमें अध्यायमें श्रीमान् श्रेणिक महाराजका पूर्ण इतिहास प्रतिपादन किया गया है, इस अगके ७२ हजार (७२०००) पद है। (४) समनायाग-इसमें एक दो तीन चार आदि संख्यासे प्रारम्भ करके शत, सहस्र, लक्ष, वा कोटि पर्यन्त गणनाके साथ पदार्थों, सुशिक्षामो, आचारसोधक मूत्रोको वडी सुंदरतासे दर्शाया गया है, द्वादशागका जो कि आचा- के लिये रत्नके समान है और तदन्तर गत विपयोंका विविध विस्तारसे वर्णन किया है और भी बहुत प्रकारसे नारकीय, तिर्यश्च, मनुष्य, वा सुरगणके थाहार, भोग, आवाम श्वासोच्छास प्रमाण (प्रायुनिस्पण) उत्पत्ति, च्युति, लेश्या, योगेन्द्रिय, कपाय तथा इनकी नाना प्रकारकी योनि- योंकी व्याख्या की गई है और इस अगमें महीधरों, कुल- गरों, तीन काल, तीर्थ करों, गणधरों, समस्त भरतार्धित चक्रवर्तियों, वासुदेवों बलदेवों तथाप्रतिवासुदेवके नाम प्रतिपादन किये गये हैं, समवायागका एक श्रुतस्कन्ध, एक अध्ययन, और एक लास चौरासी हजार (१८४०००) पद हैं। (५) विवाहप्रज्ञप्तिमग-इस सूत्रमें नानाप्रकारके ३६००० प्रश्न है और उनके ३६ सहस्र ही उचर है प्रत्येक २ विषयका सकिने विवेचन कियागया है और इसके १०

११२
--
है, दो लाय अठामी हजार ( २८८०००) पद है अपितु
जीव, अजीन, लोक, अलोक, बसमय, परसमय और
जीवोंके गमनागमन विषयमें भली प्रकारसे वर्णन किया
गया है अतएव ऐमा कोई भी विषय नहीं है जिसका इसमें
वर्णन न कियाहो।
(६) ज्ञाताधर्मकधाग-इस मूनके दो थुतस्कन्ध है, प्रथम
स्कन्धौ १९ अन्याय है, जिनमें शिक्षाप्रद १९ दृष्टात है
द्वितीय स्कन्ध साढेतीन कोटि प्रमाण धर्म कथायें है और
वह कथायें शिक्षाप्रद होनेसे अतिरिक्त विचारणीय भी है
क्योंकि इन दोनों श्रुतस्कन्धा ऐमै आश्चर्यजन्य उदाहरण
है कि-जिनके अपण या मनन करनेसे श्रात्मा अपना उद्धार
सुसपूर्वक कर सक्ता है और इसके पाचलास ७६ सहस्र पद
है ( ५७६००० पद)।
(७) उपासकदशाग-श्रमणोपासकोंके नगर राजा माता
पिता, नन सण्ड, भगवान्का विराजमान होना, नतोंका नहरा
करना फिर ११ प्रतिज्ञायोंका पालन करना इत्यादि विप.
थोंका भली प्रकारसे वर्णन किया गया है और द्वादश
व्रतोंका भी विवर्ण निस्तारपूर्वक किया गया है और इस
सुनके १० अध्याय हैं, एकादशलाए ५२ सहस्र पद होते
हैं और इसकी सरयातवाचनादि है।
(८)अतकृतदशाग-जो जीन अतकृतकेनली हुये है उनके
नगर, मातापिता, राजा, ऋद्धि, पनसण्ड, उनकी दीक्षा,
तप, अभिग्रह, इत्यादि विपयोंका सविस्तर स्वरूप वर्णन किया

११३
गया है और जिम प्रकार वह जीव मोक्षगत हुये है यह मर्य
वर्णन श्रवण करने योग्य है।
इस मूत्रका एक श्रुतस्कन्ध है और पाठ इसके वर्ग हैं
तेईसलास चार सहस्र ( २३०४००० ) इसके पद है,
सन्यात वाचनादि है, पाठ (८) उद्देश काल है।
(९) अनुत्तरोपपातिक-जो आत्मा पाच अनुत्तरों विमानोंमें
उत्पन्न हुये हैं उनके नगर, मातापिता, राजा, दीक्षा, इनकी
ऋद्धि, धर्माचार्य, तप, कर्म, अभिग्रह आदि करके फिर
अनुत्तर विमानोंमें उत्पन्न हुये थपितु वहांसे च्युत होकर
फिर आर्यफुलमें जन्म लेकर, फिर दीक्षित होकर, केवल
ज्ञानकी प्राप्ति होगी, फिर बह जीव मोक्षगमन करेंगे इत्यादि
विपयोंका सविस्तर वरूप वर्णन किया गया है, इस मनका
एक श्रुतस्कन्ध है और तीन इसके वर्ग है छयालीस लाख
पाठ सहस्र पद है (४६०८००० ) संख्यात वाचनादि हैं।
(१०) प्रश्नव्याकरणाग-इस मूनका भी एकही श्रुतस्कन्ध
पैतालीस ४५ इसके अध्याय है इसमें सैकडों प्रश्नों के उत्तर
है और नाना प्रकार के प्रश्न है नाना प्रकारकी विद्यामाका
भी इसमें विवर्ण किया है देवताओके भी साथ मुनियोंके
नानाप्रकार के प्रश्नोत्तर हुये है फिर आश्रय सम्बरका भी
पूर्ण विवर्ण किया गया है इस सूत्रके बयान- लास सोलह
सहस्र (९२१६००० ) पद हैं और व्याकरणसम्बन्धि भी
नानामकारकी सख्यात वाचनादि हैं।
(११) विपाकसूत्र-इसके दो श्रुतस्कन्ध है, बीम २०
"

अध्याय है प्रथम श्रुतस्कन्धके दस १० अध्यायोंमें दुःख- विपाकी जीवोंका वर्णन किया गया है, फिर जिस प्रकार उन जीवोंने दुष्कर्म किये हैं, उनका फल सविस्तर रतलाया है द्वितीय श्रुतस्कधमें मुसविपाकका विस्तारपूर्वक कथन है जिन २ जीवोंने जिस २ प्रकार शुभकर्माको उपार्जन किया है, फिर जिस प्रकार उनके फलोंको अनुभव करेंगे इत्यादि विषयोंको इस सूनमें वर्णन किया गया है और अनेक प्रकारकी शिक्षायें उपलब्ध होती हैं और इसके एक करोड़ चौरासी लास बाईस हजार (१८४२२०००) पद है सरयात वाचनादि हैं। (१२)दृष्टिवादाग-इसके पांच विभाग (अध्याय ) है जैसे कि-परिक्रम (१) सूत्र (२) पूर्व (३) अनुयोग (४) और चूलिका (५) और इसमें अनेक विषयों का विवर्ण है अपितु महान् इसकी सख्या है, ऐसा कोई भी विषय नहीं है जिसका इसमें वर्णन न किया हो और विशेप द्वादशा- गका विवर्ण समायांग सून वा नदिसूनसे जानलेना चाहिये इस प्रकार गणधरोंने अगस्नोंकी रचना की और फिर उपांग- सूत्र, छेदसूत्र, मूलसूत्र इत्यादि अनेक सूत्रोंकी रचना की और श्रीभगवान्ने स्थान २ में विचरकर अनेक भव्य प्राणि- चतुर्दश पूर्वो लिसनेमें १६३८३ हस्तियोंके प्रमाणमें (मपी) साही रगती है किन्तु यह विद्या क्षयोपशम भाव ही आधार पर है और पूर्वोमें प्रलेक २ विपयोंका पूर्ण विवर्ण किया हुआ है नदी आदि सिद्धा तोंसे इनका विवर्ण देखना चाहिए।

योंको संसारसे पार किया और अनेक राजामोंको जैन पनाया और पाठ महाराजाओंको दीक्षित भी किया यथा- वीरगतराजा, वीरयगराजा, संजपरांजा, श्वेतराजी, शिव- राजा, उदायनराजा, अलरखराजो, शामराजा, काशी- वर्द्धनराजा, और अनेक राजकुमारोंको भी दीक्षित किया यथा-मेषकुमार, अमयकुमार, सुवाइकुमार, अतिमुक्तकुमार, इत्यादि और अनेक राजायोंकी देवियोंने भगवान के समीप दीक्षित होकर काँके क्षय करनेहारी कठिन तपस्या की और भगवान्ने अपने सत्योपदेश द्वारा चतुर्दश सहस्र मुनि किए और ३६ सहस्र आर्याय की और एक लास उनसठ हजार मतधारी श्रावक बनाये और तीन लाख अद्यारह सहस्र श्राविकायें हुई। चतुर्दश पूर्वभृतां श्रमणानां शत त्रयम् । त्रयोदश शत्यवधि ज्ञानिना सप्तशत्यथ ।। चैफियलब्ध्यनुत्तरगतिकेवलिनां पुनः। मनोविदां पचशती वादिनां तु चतुःशती ॥ इन दो श्लोकोंमें यह वर्णन किया है कि श्रीमगवान के मुनि सघमें चौदह हजार १४००० मुनियों में से तीनसो (३०० ) मुनि चतुर्दश पूर्वधारी और तेरह सौ (१३००) अनधि ज्ञानके धारक थे. सातसौ (७००) मुनि क्रिय लब्धिके धरनेवाले और सावही सौ ७०० केवल ज्ञानके १ मुनिसपका पूर्ण वर्णन श्री उवधाई सूत्रो जानना चाहिये क्योंकि यहां पर भगवान के साथ रहनेवाले मुनियोंश भली प्रकारसे वर्णन किया गया है।

११६ धारी थे किन्तु मनः पर्यनज्ञानके धारक पाचसो (५००) और वादी (शास्त्रार्थ करनेवाले) चार सौ (४००) थे, जिनमें अनेक मुनि लब्धियोंके घरता शाप वा अनुग्रह करनेमें भी समर्थ ये किन्तु वह समर्थ होते हुये भी अपने खरूपमें निमग्न रहते थे। । भगवान्ने मुसारनिन्दसे धर्म, अधर्म, आकाश, काल, पुद्गल और जीव इन पद द्रव्योंका भली प्रकारसे वर्णन किया और जीवतत्व, अजीवतत्त्व, पुण्यतत्त्व, पापतच, श्रा- स्रवतत्त्व, सम्बरतत्त्व, निर्जरातत्त्व, बन्धतत्त्व, मोक्षतत्व इन नौ ९ तत्वोंका भी विरेचन किया, फिर नाम, स्थापना, द्रव्य, और भाव तथा प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और श्रागम, इस प्रकार निक्षेप और प्रमाणोको प्रतिपादन किया फिर सात नयों द्वारा पदार्थों के स्वरूपको दिसलाया यथा-नैगम, ग्रह, व्यवहार, मजुसूत्र, शन्द, समभिरूट और एवभूत । अतमें प्रतिपादन किया कि- "मुचिपणा कम्मा सुचिण्णा फलाभवति दुचिपणा कम्मा दुचिण्णा फला भवंति" अर्थात् शुभकर्मों के शुभ ही फल होते है और दुष्टकमीक अशुभ फल होते है किन्तु काँसे रहित होकर जीव मुक्त हो जाता है फिर उस जीवको किसी प्रकारका भी दुःखोका अनुभव नहीं करना पडता, किन्तु वह जीव आठ कमासे रहित सर्वज्ञ और सर्वदर्शी होता है। स- - भगवानकै समवसरणमें जो महामानी पुरुप पाते थे, वह भी भगवान की अतिशय देखकर अपने सशयोंको दूर करके श्री भगवान्के शिष्य हो जाते थे तथा उनका मान किसी निमित्त द्वारा दूर हो जाया करता था. यथा- दयार्णभद्र राजाका मान इन्द्र महाराजने दर किया और दशार्णभद्र नरेन्द्र दीक्षित हुया और परम सुकमाल शालिभद्र यादि शेठ भी भगवानके चरणारविन्दमें दीक्षित हुये श्री भगवान महावीर स्वामीजीने गोशालाजीके केरल होनहार यादका सण्डन करके काल, स्वभाव, नियति, कर्म, और पुरपार्थवादको स्थापन किया । उमी कालमें गौतमबुद्धने अपने अफलपादका प्रचार क- ग्ना प्रारम्भ किया हुआ था तर श्रीमगवान्ने अफलनादका भी सण्टन किया और आर्द्रकुमारादि राज्यकुमारोंने युद्धके साथ शास्त्रार्थ करके गौतमबुद्धको पराजय किया अपित भ- गवान्के कथन किये हुये मत्यवाद की (आत्मनाद ) चारों योर उद्घोपणा फग्दी लासों प्राणियोंको अहिसामय ध- ममें स्थापन करके मोक्ष अधिकारी बनाया। मुनियोंके पाच महानत दश प्रकारका श्रमणधर्म यावत् द्वादश प्रकारके तपकर्म प्रतिपादन किये और गृहस्सोंके द्वादश प्रत एकादश प्रतिज्ञायें प्रतिपादन की, असरय वा अनत पारमाओं के प्राण बचाये, अहिमा धर्मको उच्च कोटिमें थ- कित किया प्राणिमात्रको धर्माधिकार दिया गया. इसी का. * गोशालाका विवर्ण भगवती सूत्रके १५ वं शतक्में देखना चाहिये

११८
रणसे कमासे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र चारों वर्ण
स्थापन किये. सैकडो आत्माओंने अहिंसा धर्मका सर्वर
प्रचार करके शायपिहीत होती हुई हिंसाको दूर किया और
नास्तिक वादका सण्डन करके आस्तिक वादको ग्यापन किया
आत्माको स्वतन्त्र रतलाकर कर्मकर्ता ना भोक्ता बारमाही
है इस प्रकार वतलाकर लाखों जीनोंके सशयोंको छेदन
किया । इसप्रकार श्रीभगवान्ने धर्मप्रचार दूर देशोपर्यन्त
करके अन्तिम चतुर्मास पापापुरी नगरीमें हस्तिपाल नामक
राजाकी शुरूशाला दफ्तर में किया आपने इस चतुर्मासमें
कर्मपाद श्रात्मावाद ससार द्रव्यार्थिक नयापेक्षासे अनादि
पर्यायार्थिक सादि है इस प्रकार अनेक उपदेश दिये।
एक समयकी वार्ता है कि-श्रीभगवान् वर्धमान खा-
मीजीसे विनयपूर्वक गेहा नामफ आपके सुयोग्य शिष्य
निम्न प्रकारसे प्रश्न पूछने लगे और आपने उनके सशय दूर
किये जैसे कि-
प्रश्न-हे भगवन् ' प्रथम लोक है किम्वा अलोक है।
उत्तर-हे रोहा! यह दोनों पढार्थ अनादि है क्योंकि यह
दोनों फिसीके ननाये हुए नहीं हैं यदि इनका कोई
निर्माता मानाजाये तब यह पूर्व वा पश्चात् सिद्ध हो सक्ते
हैं सो जम निर्माताका अभाव है तव इनका अनादित्व स्वतः
१ रोहाके सक्ल प्रश्नोत्तर भगवती सूत्रके प्रथम शतकके ६ छटे उद्देशम
हैं उममें से पड लीजिये यह भी उसमे से लिये गये हैं।

११९
4
ही सिद्ध है अनादि होनेसे इनको प्रथम वा अप्रथम नही
कह सक्ते हैं।
प्रश्न-प्रथम जीव है वा अजीव है।
उत्तर-हे भद्र ! जीव और अजीव दोनों अनादि हैं
क्योंकि-जन इनकी उत्पत्ति मानी जाये तर कार्यरूप जी.
यका नाश अवश्यही होगा जन नाश सिद्ध होगया तर ना-
स्तिक वादका प्रसंग पाजायगा फिर पुण्य पाप बव मोक्षादि
आकाशके पुप्पवत् सिद्ध होंगे तथा दोनोंका कारण क्या है
इम प्रकारकी शका होनेपर-संकर वा अनवस्था दोपकी भी
प्राप्ति सिद्ध होगी इस लिये यह दोनों वस्तुए स्वतासिद्धा
होनेसे अनादि है।
प्रश्न-हे भगवन् ! प्रथम भव्य जीव हैं किम्वा अभय
जीव हैं।
उत्तर-हे रोह! मोक्षगमन योग्य वा अयोग्य यह भी दो
प्रकारके जीव अनादि हैं।
प्रश्न-हे भगवन् ! प्रथम मोक्ष है किम्वा संसार है।
उत्तर-हे रोह ! दोनोंही अनादि हैं।
प्रश्न-हे भगवन् ! प्रथम मोक्षात्मा है वा ससार आत्म
उत्तर-हे रोह ! ससार आत्मा वा मोक्ष प्रात्मा यह
अनादि है इनको प्रथम वा अप्रथम नहीं कहा जा
क्योंकि-आदि नहीं है इस लिये मोक्ष आत्मा और
दोनों अनादि हैं।

१२०
प्रश्न हे भगवन् ! प्रथम अंडा और पीछे चुकही है या
प्रथम कुकही पीछे पडा है।
उत्तर-हे रोह ! अडाकहासे उत्पन्न होता है हे भगवन् !
कुकडीसे फिर कुकडी कहासे उत्पन्न होती है हे भगवन् !
अडासे हे रोह ! जर इस प्रकारमे दोनोंका सम्बन्ध है तन
सिद्ध हुआ कि-यह दोनों अनादि है प्रथम कौन है इस
प्रकार नहीं कह सक्ते।
इसी प्रकार रोह नामक शिप्यने अलोकान्त सात नरक
सातही घनोदधि और नीचें सात आकाश धनवात पृथ्वी
द्वीप सागर भरतादि क्षेत्र नारकीय समय कर्म लेश्या दृष्टि
दर्शन ज्ञान अज्ञान, सजा, गरीर, योग, उपयोग द्रव्य, प्रदेश
पर्याय काल इत्यादि सर्व विषयमें प्रश्न किये श्री भगवान्ने
सर्वके उत्तरमें यही प्रतिपादन किया कि यह मर्व पदार्थ -
नादि है उनको प्रथम वा अप्रथम नहीं कह सक्ते क्योकि-
यह पदार्थ किसीके बनाये हुए नहीं है जन रोहा नामक मु-
निके सर्व सशय छैदन किये गए फिर श्री गौतमप्रभुजीने
श्री भगवानसे प्रश्न किया कि हे भगवन ! गर्भावासमें जीव
इद्रिय लेकर आता है वा अनिद्रिय होकर गर्मावासमें जीव (
प्रविष्ट होता है तर श्री भगनानन्ने प्रतिउत्तरमें प्रतिपादन
किया कि-
हे गातम ! इद्रियोंको लेकर भी आता है और छोडकर
भी श्राता है तर श्री गौतम प्रभुजीने फिर शका की कि-हे
१ यह गमागास प्रयोत्तर भगवतीसूमके प्रथम शतकये ८ व उद्देशमें से
लिये गये हैं।

१२१
भगवन् ! यह कथन किस प्रकारसे सिद्ध है तन श्री भगवान्
ने फिर उत्तर दिया कि-हे गौतम ! द्रव्य इद्रियोंको जीव
छोड़कर आता है और भारेंद्रियो (सत्तारूप) को जीव ले-
कर पाता है जिसके द्वारा फिर दव्य इद्रियो की निष्पत्ति हो
जाती है। गीतमजीने फिर प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! जीव
शरीरको छोडकर गर्भावासमें याता है वा शरीरको लेकर
गर्भागासमें पाता है श्री भगवान्ने उत्तरमें प्रतिपादन किया
कि-हे गौतम ! यात्मा शरीरको छोडकर भी आता है और
लेकरमी पाता है जैसे कि-ग्रौदारिक शरीर, वैक्रिय शरीर,
थाहारिक शरीर इन तीनो शरीरोंको छोडकर तेजम और
कार्मण्य शरीरोंको लेकर जीव गर्मागाममें प्रवेश करता है
क्योंकि-काँके भारसे जीव इमप्रकारमे भारी हो रहे है जैसे
कि-गाणी पुरुष ऋणके भारसे भारी होता है यद्यपि ऋणीके
शिरपर प्रत्यक्षमें कोई भी भार नहीं दीसता तथापि उमकी
आत्मा भारसे युक्त होती है उसी प्रकार जीवको काँका
भार है।
इस प्रकारसे श्रीभगवान् ३४ अतिशय युक्त और ३५
वापीसे विभूपित देश २ में धर्मोद्घोपणा करते हुए कु-
नाल देशकी कयंगला नामक नगरीमें पहुचकर कयगला
नगरीके वाहिर छत्रपलाश नामक उद्यानमें विराजमान
हुए तर नगरके अनेक लोग श्री भगवान के दर्शन करने वा
पवित्र पाणीके सुननेके लिये पाने लगे उसी समय
rinा मासीले समीपवर्ती एक श्रावस्ती नगरी में परि-

१२२ नाजक धर्म का पालन करनेनाला स्कंधक नामक सन्यासी वसता था वह पिंगल नामक निग्रंथ श्रावकमे प्रेरित होकर श्रीभगनानके समीप प्रश्न पूछनेके लिये आरहा था तर श्री भगवान्ने श्री गौतमजीसे कहाकि-हे गौतम ! श्राजतू अपने मियमित्रको देखेगा । तन श्रीगीतमजीने कहा कि हे भगवन् ! कौनसे प्रिय मिनको मै देखूगा तन श्रीमगनान्ने कृपाकी कि स्कधक परित्राजकको देखेगा श्रीगौतमजीने फिर पूछा कि-है भगवन् ! कर ? श्रीमगवान्ने कहा कि-आजही। इतनी वार्ता करतेही ये कि स्कधक सन्यासी मममसरणके समीपही आ पहुचेता गौतमजीउनको रडे प्रेमसे मिले और प्रेमपूर्वक उनका स्वागत किया और प्रश्नविषयक वार्ता सर्व कह सुनाई तर स्कयकजीने कहा कि- भो गौतम ! यह मेरी गुप्तवार्तायें तुम कैसे जानते हो तन श्रीगीतमजीने कहा कि हे कधक ! श्री भगवान् सर्वदर्शी है मैंने उनसे तुह्मारी वार्तायें सुनी हैं तन स्कवकजीने पडे हर्षपूर्वक श्री भगवान के समीप जाकर वदना नमस्कार की और भगवान्की दिव्य मूर्तिको देखकर घडे प्रसन्न हुए क्योंकि-श्रीभगवान् अतिशययुक्त नित्य आहार करनेनाले शरीरकी लक्ष्मीको उत्कृष्ट प्राप्त थे तर श्री भगवान्ने कहा कि-भो स्कधक! तुह्मारे से पिंगलने प्रश्न पूछे और उन्हीं प्रश्नोंकी जिज्ञासा करते हुए तुम यहापर आये हो क्या यह वार्ता सत्य है ? १ स्वयकजी के प्रश्नोत्तर भगवतीसूनके द्वितीय धनक के प्रथम उद्देश में से लिय गये है।

१२३ तर स्कवकजीने श्री भगवान्के सत्यवाक्यको स्वीकार किया और आनंदपूर्वक श्रीभगवान्के दर्शन करने लगे तब श्रीभगवान् योले कि-हे स्कंधक! मैं तुमको उन प्रश्नोंके उचर देता हूँ। मो स्कंधक! मैं लोकको चार प्रकारसे मानता हूँ जैसे कि-द्रव्यसे १ क्षेत्रसे २ कालसे ३ और भावसे ४ द्रव्यसे लोक एक है १ क्षेत्रसे असख्येयक योजन कोटाकोटि प्रमाण इस लोकका आयाम ( लगाई ) विष्कम (चौडाई) है और एतावन् मात्रही इसकी परिधि है २ कालसे लोक अनादि है क्योंकि इसका निर्माता कोई नहीं है इस लिये कालसे लोक ध्रुव है नित्य है वा अक्षय, अव्यय, श्र- बस्थित है ३ भावसे इस लोकमें वर्ण, गध, रस, स्पर्श, और सम्यानकी अनंत पर्यायें उत्पन्न होती हैं और नष्ट होती हैं इस लिये द्रव्य और क्षेत्रसे लोक मान्त है काल और भावसे लोक अनत है अब मे तुमको जीवविपय भी सु- नाता। द्रव्यसे एक जीव सान्त है क्योंकि-सर्व जीव अनंत है इसलिये जर अनंत जीवोंमेंमे एक जीवका वर्णन करें तर एक जीनको सान्त कहते हैं और आकाशके असंरयेयक मदे- शोंपर एकजीव स्थित है इसलिये भी जीव सान्त है कालसे जीव अनादि है क्योंकि-उत्पत्तिरहित है अतः जीव कालसे अनादि है भावमे जीव अनत ज्ञानकी पर्याय अनत दर्शनकी पय चारित्र कीपर्याय अनंत गुरु- + .

१२४ योय अनंत अगुरु लघुपर्यायसे अनत है इस लिये द्रव्यसे जीन सान्त, क्षेनसे भी सान्त, किन्तु काल और भाषमे जीव अनत है और हे स्वधक! द्रव्यसे मुक्ति सान्त है क्षेत्रसे पैतालीस ४५ लास योजन की होनेसे भी सान्त है अर्थात् श्रादिसहित है कालसे मुक्ति अनादि है भावसे भी लोकात अनादि है और द्रव्यसे एक मोक्ष प्रात्मा सान्त है और क्षेत्रसे यसरये- यक आकाशके प्रदेशोंपर ठहरने से एक मोक्ष प्रात्मा सान्त है और कालमे जर कोई व्यक्ति मोक्षगत हुया तर उस का- लकी थपेक्षासे उसकी आदितो है परतु उसका अनसान (अत ) नहीं है क्योंकि-मुक्ति अपुनरावृत्तिवाली होती है। भावसे मोक्ष आत्मा अनत ज्ञान, अनत दर्शन, अतन चारित, (स्वरूपमें रमता) अनत अगुरु लघु पर्यायोंसे युक्त है इस लिये द्रव्यसे क्षेत्रमे सिद्ध सान्त है कालसे गमनकी अपेक्षा सान्त है किन्तु अपुनरात्तिकी अपेक्षा अनत है और मापसे सिद्ध आत्मा अनत है और हे स्कषक ! द्वादश प्रका- रकी मृत्युओंसे जीव ससारकी वृद्धि कर लेता है जैसे कि- अपने निज धर्मसे पतित होकर मरनेसे १ विषयोंके वश होकर भरनेसे २ अन्तःकरणकी गल्यको दूर न करके मर- नेसे ३ मनुष्य मवकी आशा करके मरनेसे ४ पतसे गिरके मरनेसे ५ वृक्षसे पतित होकर मरनेसे ६ जलमें प्रवेश करके मरनेसे ७ अग्निमें जलकर मरनेसे ८ विप भक्षण करके मरनेसे ९ शस्त्र प्रयोगसे १० फासी लेकर मरनेसे ११ मृतकके बीच प्रवेश करके १२ इस प्रकार मृत्युगत होनेसे, हे स्वधक! जीव १२५ अनंत ससारकी दृद्धि करलेता है और नरक, तिर्यग्, मनुष्य, देवके अनत भवोके कमाका आत्मासे सचय कर लेता है फिर इस अनादि चक्रमें भ्रमण करने लग जाते हैं और जन आत्मा शातिके साथ कोध, मान, माया, लोभको छोड़कर अनशन त धारण करके पादोपगमन वा प्रत्याख्यानके साथ मृत्युगत होता है तब ससारचक्रमे पार हो जाता हैं इस प्रकार श्रीभगवान्के वचनोंको सुनकर स्कधक सन्यासी कात्यायन गोत्रीयको वैराग्य उत्पन्न हुया और उसने विज्ञप्ति की कि-हे भगवन् ! मुझे आप धर्म सुनायें। तब श्रीभगवान्ने पडे चि- स्तारपूर्वक स्कधकप्रमुस महासभासदोंको धर्मकथा सुनाई तर स्कंधकजीने उसी समय भगवान्से दीक्षा धारण की । फिर श्रीभगवान् धर्मोपदेश देते हुए अन्य समय वाणिज- ग्राम नगरके नाहिर घुतिपलाश नामक उद्यानमें विराजमान हुए तर राजा वा नगरवासी सहस्रो लोग श्रीभगवान्की पवित्रवाणीके सुननेके लिये गये । उसी समय उस नगरमें एक सोमलनामक ब्राह्मण वसता था जो परम विद्वान् और अध्यायकी वृत्तिमें था उसकी शालामें ५०० विद्यार्थी विद्या अध्ययन करते थे उसने भी नागरिक पुरुपोंसे श्रवण किया कि-नगरसे नाहिर श्रीभगवान महावीर स्वामी विराजमान हुए है । तन उसके यह भाव उत्पन्न हुए कि-मै श्रीभगवान्से जाकर प्रश्न पूछं यदि मेरे प्रश्नोका ठीक उत्तर १ सोमल ब्राह्मणके प्रश्नोत्तर भगवतीसूरके १८ वे शत्तक्के १० वे उद्दे. शर्म से लिये गये है।

मिला तव तो मैं उनको वंदना करूगा नही तो समाके ममक्ष उनका अपमान करूगा इस प्रकार वह विचार करें स्नानादि करके अपने साथ १०० सौ विद्यार्थी लेकर श्रीभगवानके पास गया और श्रीमगवानके सामने सड़ा होकर इस प्रकार प्रश्न पूछने लगा। हे भगवन् ! श्राप यात्रा मानते हो १ और यपनीय जाप ) कार्य मानते हो २ सपूर्ण सुखमानते हो ३ शुद्ध विहार (वसति) मानते हो ४ तय श्रीभगवान्ने उत्तरमें प्रतिपादन किया कि हे सोमल ! मैं उक्त चारों वस्तुओंको मानता हू तर फिर सोमलने कहा कि-श्राप इनका स्व- रूप वर्णन करें तर श्रीभगवान्ने उक्त चारों प्रश्नोंका निम्न- प्रकारसे उत्तर दिया । जैसेकि-हे सोमल! जो तप, नियम, सयम, स्वाध्याय, ध्यान, आवश्यक, श्रादियोगोंमें यल कियाजाता है उसे मैं यात्रा मानता ह। २ जो इद्रिय और मनको वश कियाजाता है उसे मैं (यपनीय कार्य) जाप मानता है। ३ और जो शारिरक वा मानसिक दुःसोंसे रहित होना है उसे मैं सुस मानताए। ४ जो यागोंमें, उद्यानोंमें, देवकुलोंमें, समाओंमें इत्यादि स्थानोंमें जो स्त्री, पशु, लीवरहित वा निर्दोष वसतियां हैं उनको मैं प्राशुक (शुद्ध) विहार (स्थान) मानता है। १ पूरकारमं धर्मस्थानों वा एकात स्थानोंको "विहार" संज्ञासे कहते थे अथात् उन स्थानों को विहार कहते थे १२७ जव सोमल अध्यापकने इन उत्तरोंको श्रवण किया तब उसके मनमें यह भाव उत्पन्न हुए कि उनकी बुद्धिकी भी परीक्षा करलूं तर अध्यापक जीने पूछाकि-हे भगवन्! "सरसव भक्ष्य है किम्वा अभक्ष्य है" श्रीभगवान्ने उत्तरमें प्रतिपादन कियाकि-हे सोमल! सरसव भक्ष्य भी है और अभक्ष्य भी है क्योंकि-माकृत भाषामें सरसव सादृश्ये मित्रका नाम भी है और सरसव (सरसों) एक धान्यका नाम भी है सो भगवान्ने साधुवृत्तिकी अपेक्षासे उत्तर दिया कि-हे सोमल! सरसव दो प्रकार से वर्णन किये गए है जैसे कि मित्र सरसव, और धान्य सरसव, सो मित्र सरसव तीन प्रकारसे वर्णन कियागया है जैसेकि-सा- थही जन्मा हुमा १ साथही वृद्धि पाया हुआ २ और साथ ही क्रीडा कीहई ३ सो वह मुनियोंको अभक्ष्य हैं किन्तु धान्य सरसव भी दो प्रकारसे वर्णन किये गए है जैसे कि-शस्त्र- परिणत १ अशस्त्रपरिणत २। एपणीय १ अनेपेणीय २ यांचित १ अयोचित २ लब्ध १ अलब्ध २ सो यह प्रथम पक्षवाले सर्व सरसव मुनियोंको अभक्ष्य हैं द्वितीय पक्षवाले भक्ष्य हैं फिर अध्यापकने पूछा कि हे भगवन् ! मास भक्ष्य है किम्वा अभक्ष्य है श्रीभगवान्ने उत्तरमें प्रतिपादन किया कि हे सोमल! मास भक्ष्य भी है और अभक्ष्य भी है किन्तु मास तीन प्रकारसे वर्णन किया गया है जैसेकि-- कालमास धान्य मास ३ सो द्रव्यमास चादी arr माप कहते हैं कालमास १२८ मामोंके नाम है सो यह दोनों प्रकारके मास मुनियोको अभक्ष्य है किन्तु धान्यमास ( माह ) धान्य सरसके ममान जानना चाहिये। फिर अध्यापकजीने प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! कुलत्थी भक्ष्य है किम्बा अमक्ष्य है श्रीमगमान्ने उत्तर दिया कि-हे सोमल! कुलत्थी भी दो प्रकारसे वर्णन की गई है जैसे कि-धान्य कुलत्थी और द्वितीय स्त्री कुलत्थी सो धान्य कुलत्थी सरसव धान्यरत् है किन्तु स्त्री कुलत्थी तीन प्रकारसे वर्णन की गई है जमे कि-कुलकी कन्या १ कुलकी वधू २ और कुलकी माता ३ सो यह अभक्ष्य है क्योंकि-प्राकृत भापामें 'स्थी' स्त्रीको कहते हैं तर "कुल" और "त्थी" का समाम करनेसे कुलत्थी प्रयोग न जाता है फिर सोमल नामणने पूछा कि-हे भगवन्! आप एक है किम्वा श्राप दो हैं या आप अक्षय, अव्यय, अवस्थित है वा अनेक भाविभूत हैं! तर श्रीभगवान्ने उत्तरमें प्रतिपा- दन किया कि-हे सोमल! में एक भी हु यावत् अनेक भी हु फिर सोमलने पूछा कि हे भगवन् ! किसप्रकार ? तर भगवान् निम्न लिखितानुसार कहने लगे कि-हे सोमल! द्रव्यसे मैं एक है क्योंकि-मेरी एक आत्मा है और ज्ञान दर्शनकी अपेक्षामे में दोभी हु और श्रात्म प्रदेशोंकी अपे- सासे मै अक्षय, अव्यय, अपस्थित भी है किन्तु उपयोग की (ज्ञानशक्ति) अपेक्षासे में अनेक भृत हु इस प्रकार श्रीभगवानके प्रतिपादन किये हुए उत्तरोंको सुनकर सोम- लने सहर्ष उन उत्तरोंको स्वीकार किया और सोमलने फिर विज्ञप्ति की कि हे भगवन्! अब आप मुझे धर्म सुनायें तब श्रीभगवान्ने महतीसभामें विस्तारपूर्वक पद् द्रव्य और नव तत्वोका स्वरूप सुनाया और अंतमें प्रतिपादन किया कि-हे आर्यो ! जैसे सुंदर भोजन विपमिश्रित सानेमें स्वादु और परिणाममें कटुक होता है इसी प्रकार पाप (हिसादि) कर्म करनेमें सुदर लगते हैं और फलमें दारुण होते हैं किन्तु जैसे सुंदर भोजन ओपधिमिश्रित सानेमें कटुक और परिणाममें सुंदर होता है इसी प्रकार शुभ कर्म (परोपका- रादि) करने तो कठिन होते हैं किन्तु फल उनका बड़ा ही प्रिय होता है इस प्रकारके पवित्र उपदेशोंको सुनकर सोम- लने श्रीभगवान्के समीप द्वादश तरूप श्रावकधर्मको धारण किया इसी प्रकार श्रीभगवान्ने अनेक जीवोंको ससारमार्गमे अपने सत्योपदेश द्वारा पृथक किया और प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, आगम, इन चारों प्रमाणोंका यथार्थ स्वरूप वर्णन किया फिर अनेक व्याख्यानोंमें आत्मवाद, लोकवाद, कर्मपाद और क्रियावाद के विप- यको प्रमाण सहित प्रतिपादन किया फिर गौतमजीने श्रीम- गवानसे प्रश्न किया कि-हे भगवन् ! लोक स्थिति कितने प्रकारसे वर्णन कीगई है श्रीभगवान्ने प्रत्युत्तरमें प्रतिपादन किया कि-हे गौतम! लोक स्थिति आठ प्रकारसे वर्णन की गई है जैसे कि-आकाश प्रतिष्टत वायु है १ और वायु प्रतिष्टत उदधि है २ उदधिपर पृथ्वी है ३ पृथ्वी ऊपर त्र अजीव जीवके आधारपर है ।। और स्थावर S कर्मके आधारपर है ६ यह ससारी जीवोकी अपेक्षासे कथन किया गया है सो जीवने अजीव सगृहीत किया हुआ है ७ और जीवको कमाने सगृहीत किया हुआ है ८ और इसकी सिद्धिके लिये जल आदिकी बोतलोके अनेक दृष्टान्त है जैसेकि-पानीकी भरी हुई बोतलके मुस धनको जब लोग दूरी करते हैं फिर उसके मुख पर वायु आ जाती है तर वह पानी वायुके आधारपरही ठहर जाता है इसी प्र- कार आकाशादिके ऊपर पदार्थ ठहरे हुए है तथा जैसे दृति (मशक ) वायुसे पूरित कटि भागके बघनसे लोग नदि- योको तैरते है इसीप्रकार लोक स्थिति है इस दृष्टान्तसे यह सिद्ध किया गया है कि-वायुकी शक्ति भार महारनेकी होती है और पदायाम परस्पर अाकर्षण शक्ति है इसी लिये वह परस्पर स्नेहभावनद्ध है और पदार्थ अगुरलघु, लघुगुरु, गुस्लघु, इत्यादि अनेक भेदोसे देखे जाते है इस प्रकार लोक स्थिति होती है श्रीगौतमजी श्रीभगवान्के उत्तरोंको सुनकर बडे प्रसन्न हुए। इस प्रकार भगवान्ने अनेक जीनोके सशयोंको छदन किया फिर यह भी प्रतिपादन किया कि-सघकी चैयावृत्य (सेवा) करता हुया जीव ससार बन्धनोंसे अवश्य छूट जाता है इसलिये परस्पर वैरभावको छोडकर क्षमाभाव धारण करो और सर्व जीनोंके हितपी बनो धर्मपतितोंको धर्ममें स्थिर करो और प्राणीमात्रके सहायक मनो जिस्से तुम अपना उद्धार करने में समर्थ हो सको।

१३१ इस प्रकार अनेक उपदेश दिये और यह भी सिद्ध किया कि-जैसे जीव और अजीव अनादि है तथा ससार और मोक्ष यह दोनों अनादि हैं इम ससारका कर्ता हर्ता कोई भी नहीं है, किन्तु जैसे चुम्नक पत्थरमें श्राफर्पण शक्ति होती है, उसी प्रकार प्रात्मा और कामें आकर्षण शक्ति है, इस लिये प्राणी नानाप्रकार की योनियों में भ्रमण करता है, जन डम प्रात्माके तप और सयमके द्वारा कर्म क्षय हो जाते हैं, तर यह आत्मा मुक्त हो जाता है फिर वह मुक्त आत्मा ससार चक्रमें भ्रमण नहीं करता और वह उम दशामें सर्वज्ञ और सर्वदर्शी हो जाता है और अक्षय मुसके अनुभव करने वाला वा अनत शक्ति सम्पन्न भी होता है इसलिये प्रत्येक व्य- क्तिको मोक्षके लिये परिश्रम करना चाहिये। इम प्रकार उपदेश देते हुये और आयुको पूर्ण होती हुई देसकर अापने दो दिनोंका अनशन (संथारा) त धारण किया, तर आपके दर्शनोंके लिये अष्टादश देशोंके राजा पाये हुये थे आपने उनको एक पद्मासन वैठकर पच- पन ५५ अध्याय दुःसविपाकके वर्णन किये जिनमें सिद्ध किया कि-प्राणी किमप्रकार अशुभ कर्म करता है और किस प्रकार उन्होंके दुःखोंका अनुभव करता है और ५५ अध्याय सुसविपाकके वर्णन किये जिनमें न्याय, नीति, धर्म, सदा- चार आदि कृत्योंके द्वारा प्राणी शुभ विपाकोंका अनुभव करता है और छत्तीस ३६ अध्ययन श्रीउत्तराध्ययन सूत्रके प्रतिपादन किये जिसमें शिक्षा, उपदेश, वैराग्यमय उपदेश, १३४ ग्राजकल यावन्मान श्रुतज्ञान विद्यमान है वह सर्व आपके मुसारविंदसे निकला हुया है जो प्रत्येक व्यक्तिको पठन करने योग्य है। इम समय हम आग्रह पूर्वक विद्वान् जनोंको निवेदन करते है कि यदि आपने अात्मवाढ और कर्मवाद वा जीय तत्व आदिका पूर्ण विवरण देखना हो तो श्रीभगवानके कथन किये हुये उपदेशोंको देसो जिससे आप लोगोंको निश्चय हो जावे कि वास्तवमें तत्व क्या है। श्रीभगवानके जन्मादि कल्याण उत्तराफाल्गुणि में होनेपर भी स्वाति नक्षनमें निर्वाण हुया उस समय श्रीभगवान् की जन्म राशिम भस ग्रह २००० वर्षकी स्थितिनाला बैठा हुआ था, जिसके कारण दो हजार वर्ष पर्यन्त श्रीभगवान्के शासनको पीड़ा हुई । अब भसग्रह भी दूर हो गया है, इस लिये प्रत्येक व्य- क्तिको श्रीभगवान के शासनको उच्चकोटिमें लाकर अहिसा धर्मका प्रचार करना चाहिये। श्रीभगवान्के कथन किये हुये तत्वोंका सर्वन प्रचार करना चाहिये, परस्पर प्रीतिभावसे भगवान्की शिक्षाओका अनुकरण करना चाहिये और यथाशक्ति दान, शील, तप और भावद्वारा अपनी आत्माको अलकृत करना चाहिये क्योंकि-इन चारों मागोंको भगवान्ने आसेवन किया है प्रत्येक मनुष्यको तपद्वारा अपनी इद्रियोंका भी निग्रह करना चाहिये क्योंकि-श्रीस्थानाग सूत्रके छठे स्थानमें लिखा है कि- समणे भगवं महावीरे छठेण भत्तेणं अपाणएण मुण्डे जाव पडए समणे भगवं महावीरे छठेण भत्तेणं अपाणएणं अणते अणुत्तरे जाव केचलनाणे समुप्पणे समणे भगय महावीरे छठेण भत्तेण अप्पाणपणं सिद्धे जाव सबदुरवप्पहीणे । अर्थात् दो उपवासके साथ श्रीभगवान् दीक्षित हुये, दो उपवासके साथही केवलज्ञानके धारक हुए और दो उपवास के साथहीश्रीभगवान् निर्माण हुये, इसलिये प्रत्येक व्यक्तिको तप कर्म धारण करना चाहिये। सो इस स्थानपर श्रीभगवानका जीवन वृत्तात पूर्ण किया गया है इस जीवनका माराश यह है कि अपने जीवनको भगवानके सत्योपदेश द्वारा पवित्र करना चाहिये शोर श्रीम- गवानके तत्वोंका सर्वन प्रचार करना चाहिये, जिसके द्वारा अनंत श्रात्मानोको अभयदान प्राप्त हो और आप सुगतिके अधिकारी हो। PeSRASTRA-SRO ॥ समाप्तोऽय प्रन्थ ॥

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निम्नलिखित ग्रंथ विक्रयार्थ तय्यार है जिनको जैनाचार्या श्री १००८ श्री पार्वतीजी महाराज ने निर्माण किया है सम्यक्त्वसूर्योदय अर्थात् मिथ्यात्वतिमिरनाशक यह ग्रन्थ श्राद्योपान्त विचारपूर्वक निप्पक्षपात दृष्टिसे अव लोकन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुपोंको मिथ्या भ्रमरूप रोग के विनाश करने के लिये योषधरूप उपकारी होगा इस प्रन्यमे ईश्वर को की का मानने के विषय में १५ प्रश्नोत्तर है जिनमें ईश्वर को कती मानने में चार दोष दिपाये गये ह और कर्म को कती मानने के विषयमें पदार्थशान अर्थात् जीवका और पुरुषका स्वरूप युक्तियों से सिद्ध किया गया है और जो चेदानुयायी ब्राह्मण वैष्णवादि है यह तो आवागमनसे रहित होने को मोक्ष मानते है परन्तु जो नवीन वेदानुयायी 'दयानन्दी' वर्ग है यह मोक्ष को भी आवागमन में दाखिल करते है इस विषयका भी यथामति युक्तियों द्वारा सडन किया गया है इसके अतिरिक्त वेदाती अतिवादी नास्तिकों के विपय में बीस प्रश्नोत्तर हैं जिनमें द्वैतभाव और प्रास्तिकता सिद्ध की गई हे अन्य मतानुयायियों ने जो २ वाजतक जैन धर्म पर श्राक्षेप किये है उनका उत्तर उन्ही के ग्रन्थों के अनुसार दिया गया है यह पुस्तक अत्युत्तम मोटे अक्षरों में छपा हुआ है जिन्द मूत्य फेवल १) एक रुपया मात्र है अति सुन्दर है

२
ज्ञानदीपिका
अर्थात्
जैनोद्योत
इस ग्रन्धमें स्वमत, परमत तथा देवगुरु धर्म का कथन थोर
चतुर्गतिरूप ससार का अनित्य स्वरूपादिक उपदेश हे थोर दया
क्षमा आदि ग्रहणरूप शिक्षायें हैं
इस पुस्तक के दो भाग ह प्रथम भाग में मुी श्रात्मारामजी
सवेगी रचित जैन तत्वादर्श मन्यम जो २ शास्त्रों से विरद्ध
अर्थात् सूत्रों से मिलत कथन हैं उनका सम्यक प्रकार से
अकाट्य युक्तियों द्वारा खण्डन किया गया है द्वितीय भाग में
जैनधर्म अर्थात् क्षमा दयारूप जो सत्य धर्म है उसकी पुष्टता है.
इस भाग के पढने से स्वमत और परमत का यहुत अच्छा बोध
हो जाता है यह आवृत्ति सतम होनेपर कागजकी तेजीके
कारण ग्रन्थ मिलना दुर्लभ हो जावेगा यह पुस्तक उत्तम विला
यती कागज पर सुदर मोटे अक्षरों में छपी हुई है सुन्दर कपडे
की जिद बधी हुई है पृष्ट भी ३१५ ह
मूल्य केवल ॥) है
प्राकृतव्याकरण.
ग्लण्डीय भाषानुवाद सहित श्रीहपिकेश भट्टाचार्य सक
लित मूल्य ॥

३ सत्यार्थचन्द्रोदय इस पुस्तक में प्राचीन जैनधर्म (श्रात्माभ्यासी स्थानकवासी मतका) यथोक्तरूपसे सूनोंद्वारा केवल सविस्तर वर्णनही नहीं किया वरच सून प्रमाण, कथा उदाहरण तथा युक्ति श्रादिसे सर्व साधारण के हस्तामलक कराने में किंचित् त्रुटि नहीं की वरच निक्षेपमूर्ति, भावनिक्षेप, मूर्तिपूजननिषेध, चेइय शब्द वर्णन साधु साधियों के शास्त्रोक्त आचरण वा लक्षण वर्णन करने के अतिरिक्त प्रश्नोत्तर की रीतिपर पूर्णरूपसे श्वेताम्बरा. माय, पीताम्बर धारियों के नवीनमार्ग का मूल सूनी, माननीय जैन ऋपियों के मन्तव्यों तथा प्रबल युक्तियोंसे खण्डन किया है और युक्तियं भी ऐसी प्रयल दी है कि जिनको जैनधारूढ नवीन मतावलम्बियों के सिवाय अय साप्रदायिक भी खडन नहीं कर सक्ते वरच बेडे २ विद्वानों ने भी श्लाघा की है इसपुस्तक में विशेष करके श्रीवात्मारामजी सगी मृत जैन मार्ग प्रदर्शक नवीन कपोल कल्पित प्रन्थों की पूर्ण आन्दोलना की है अधिक क्या लिये इस पुस्तक में मूर्तिपूजा का वडी २ अकाट्य युक्तियों के द्वारा सूय अच्छी तरह खण्डन किया गया है सर्व जनों को उचित है कि इसको पढकर सत्यासत्य का निर्णय करें यह पुस्तक मोटे कागज पर मोटे अक्षरों में छपकर तय्यार हुआ है पृष्ट २२८ हैं विलायती कपडे की जिल्द सहित दाम ॥ मात्र है

४
पद्मचन्द्रकोप.
अर्थात्
व्युत्पत्तिविषयसहित संस्कृत-भाषाकोप.
द्वितीयात्ति
इसमें २० हजार सस्टत शद प्रकृतिप्रत्ययसहित भाषा में
वर्णन है जिसको
श्रीमान् पंदित गणेशदत्त शास्त्री प्रोफेसर
ओरियटल कालिज लाहौर ने निर्माण रिया हे
यह पुस्तक जगत् प्रसिद्ध निर्णयसागर मुम्बई छापेखाने में
श्रतिउत्तम कागज पर छपा ह, और गवनमेण्ट इस कोष की
घडी २ प्रसिद्ध लाइनेरियों और कालिजों में एक कापी खरीद
फर रक्खी है।
इस कोप पर बडे • युरोप और भारत के प्रसिद्ध निद्वाों ने
भी सत्तम सम्मतिय दी है, मूल्य केवल ३)मान हैं महसूल
डाका)
ऊपर लिसे पुस्तक मिटनेका पता
मेहरचन्द्र लक्ष्मणदास जैन,
सस्त पुस्तकालयाध्यक्ष लाहौर
सर्व प्रकारके जैन पुस्तक मिल्नेका पता-
मैनेजर-श्री अमर जैन पुस्तकालय,
सैद मिट्ठा बाजार, लाहौर

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Shri Varddhmancharitra

Author
Pandit,gyanchandra Ji
Title
Shri Varddhmancharitra
File name
Shri Varddhmancharitra
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2011/04
Publisher
Lahora,pustakalya Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
152
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552290
Barcode
4990010033036.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
bK8iZHWlt2j
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