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अंतर्कथा बल्लभ डोभाल
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. नदी के उस पार, घाटी मे सुबह-शाम नागा बाबा की नागफणी धजती है। नागफणी की तीली आवाज आस-पास पहाड़ियो से टकरा कर हवा मे गूजती है और जड़-चेतन में विलीन हो रह जाती है। फिर शंख, घडियाल और नगाड़ों के निनाद से सारा वनप्रांत निनादित हो, उठता है । देर तक स्वस्ति-वाचन और वेदवाणी से दिशाए गूजती है । फिर सर्वत्र शांति.. शांति...परम शांति का वातावरण...! ज्योतिर्मठ का यह उत्तरी भाग। प्रकृति के सौदर्य को सहज उजागर करने वाला परिवेश। धरती की सारी सुंदरता को जैसे यहीं खोलकर बिखेर दिया है। एक ओर यह नैसर्गिक छटा छा रही है। दूसरी ओर घाटी की तह मे वसी हुई है-~-किन्नर नगरी। अंगूठी पर सुशोभित नग की तरह। बांज-बुरुश और हरित लता-गुल्मादि से परिवेष्टित पर्वत का यह कोना है । कालाबन और उसके पीछे सड़ी है, बर्फ लदी पहाड़ियां...1 किन्नर प्रदेश की रक्षा के लिए मानो चांदी की दीवार खड़ी कर दी हो। इन दिनों घाटी का तराई वाला भाग बुरुश के लाल फूलो से दहक रहा है । इस बुरुश-बन से लगकर बसी है, किन्नर नगरी । शीतल, सुखद और समृद्ध ...। भावुक लोगों को किन्नर नगरी-यह नाम पसंद है। प्रकृति-प्रेमी लोगो ने इस किन्नर प्रात के उन्नत वक्ष पर छोटे-बड़े घर बना लिए है । प्रायः गर्मी के मौसम में, जब कि बद्री केदार-धाम की यात्रा आरंभ होती है तब यहां रास्ते-पगडंडियों पर लोगो की भीड़ उमड़ आती है । तरह-तरह के लोग दिखाई देते हैं । देश- विदेशों से आए हुए, भक्ति और अध्यात्म से प्रेरित-निर्मल, स्वच्छ मन और तन के धुले हुए लोग। इस कालेबन के बीचों-बीच एक पगडंडी उभरती है और आगे चलकर सांप की लपलपाती जीभ के मानिंद दो हिस्सो में बंट जाती है। एक ओर कम ऊंची पहाड़ी पर बना डाक-बंगला, देवदार और बांज के सपाट पेड़ों की छांव में दुबका [५] .
है, दूसरी ओर आस-पास वसे गांव अपनी सादगी के कारण सवको आकर्षित करते लगते हैं । इस घाटी के बीचों-बीच एक सुला मैदान है। ऊंची-नीची पहाड़ियों पर प्राकृतिक समतल पसरा हुआ धरती का यह टुकड़ा, अपने आप में एक विशेषता लिए हुए है । इस स्थान का महत्त्व इसलिए भी है कि यात्रा-काल में दुनिया के हर कोने का आदमी यहा अपनी स्वाभाविक वृत्ति में दिखाई दे जाता है । यही से शैलराट् हिमालय की धवल शृंखलाओं के अनायास प्रथम दर्शन पाकर यात्री गद्- गद हो उठता है और अपनी आंखों को सार्थक हुआ पाता है। ऐसे अवसरो पर सांस्कृतिक कार्यक्रम और मेले-उत्सव आदि, आयोजन इसी मैदान में होते हैं। दुनिया के लोगो का संगम, अध्यात्म के नए अध्याय और देश-विदेश की खबरें, जैसे कि इस मिट्टी की तह मे बंद हैं । मैदान के दूसरे छोर पर-जहां से एक पहाडी आकाश की ओर उठनी है, एक बड़ा आश्रम बना है । यही पर भगवान त्रिनेत्र का विशाल मंदिर है। आश्रम के अंतर्गत साधु-संतों के ठहरने की व्यवस्था है । हर तरह की मुविधा पा जाने के कारण आश्रम में साधु-संतों का आवागमन रहता है। व्यवस्था का संपूर्ण उत्तरदायित्व यहां के महंतजी पर है । यात्रा-काल के प्रारंभ होते ही मिनेत्र आश्रम द्वारा इस मैदान मे कार्यक्रम शुरू किए जाते हैं । महीनों तक ये कार्यक्रम चलते हैं। इन दिनों बड़े-बड़े भजनानंदी भजन-कीर्तन का आयोजन करते है। कही हरिकथा और अखंड पाठ का कार्यक्रम चलता है। कही वेद-वेदाङ्गों पर भाप्य और अध्यात्म चिंतन पर चर्चा हो रही है, तो कहीं धर्मशास्त्र कथा-प्रवचन का पारायण है । यात्रा-काल समाप्त होने के बाद भी समय-समय पर इस प्रकार के कार्यक्रम होते रहते है। जीवन के समस्त भोगों को प्राप्त कर चुकने के बाद वृद्ध-जनो को आध्यात्मिक वृत्तियो को यही समाधान मिलता है। जीवन के अंतिम चरण पर ना ठहरने वाले व्यक्ति के मन में बराबर यही इच्छा शेप रह जाती है कि कुछ क्षण के लिए कही शांति मिले। शाति की खोज में लोग सब जगह पहुंचने लगे हैं। ऐसे वातावरण मे भी यदि शाति नहीं मिलती, तो फिर कहां शाति मिलेगी। मुबह-शाम नागा बावा की नागफणी और अनेक वाद्यवृदों की सम्मिलित गूंज चारों ओर फैली एकांतता को सजीव करती है। यह नाद-ब्रह्म जैसे कि शाति को भंग नहीं करता, बल्कि वातावरण को और भी गंभीरता प्रदान करता है। सुन [६] ? कर आत्मा तृप्त हो रहती है । सुबह-शाम नागा बाबा की नागफणी बजती है । सायरन-सी तीखी आवाज, बंद मकानो की परतों को खोल रजाई-गदेलों को गुडमुड़ में अलसाए, औरत-मर्द जिस्मो मे प्रवेश करती हुई सीधा दिल के पास पहुंचती है। इस आवाज के साथ जड़-चेतन सजग हो उठता है। आस-पास गावों के लिए यह आवाज चौथे पहर की समाप्ति का संदेश देती है। औरतें उठकर अपने काम में लगती है और फिर धीरे-धीरे कर्मक्षेत्र में एक बहाव-सा आने लगता है। शाम होती है फिर वही आवाज...। सूरज के डूबने-उगने की तरह इस आवाज का भी नियम है। यह आवाज बड़ी सार्थक है। जिस दिन नागफणी की आवाज कानो मे नही आती, उस दिन सुबह होने पर भी सुबह हुई मालूम नहीं देती। लोगों में चर्चा होने लगती है-आज नागा बाबा की नागफणी नही बजी । जाने क्या हुआ । कही बीमार तो नहीं पड गए लेकिन जब से महाराज यहां पधारे हैं, गायद कभी ऐसा हुआ हो । बीमारियां तो गिरस्तियों के लिए बनी हैं, जोगी-जोगटों को काहे की बीमारियां "हा, एक वार नागा बाबा बीमार हुए थे। सवको मालूम है कि तब बाबा ने अपने लिए समाधि तैयार करवा ली । अपने भक्तों से बाबा बोले-"शरीर अगर छूट गया तो इस गड्ढे में डालकर ऊपर से मिट्टी ढांक देना बच्चा लोगो...।" उन दिनों बाबा ने अपने चेले से नागफणी को वजवाया। वेला नागफणी में वैसी आवाज कहां से फूक सकता है जैसी कि नागा वावा पैदा करते है। बाबा को आदत है, तरीका आता है । खूब लेवी सांस लेकर खीचना पड़ता है, ताकि वह सायरन की तरह बज उठे। चीना जब घर में रहता है, तो इस आवाज कोसुनकर कहता है--नंगे साधू का सायरन बज उठा है।" चीना कभी साधु-संतो के पास नहीं जाता। उनसे डरता भी नहीं। उसके विचार में संत वन जाना बड़ी बात नहीं है। बीवी-बच्चे अगर नही, तो आदमी संत ही बनेगा। पर बीवी-बच्चों के साथ रहते हुए यदि कोई सत बनता है तो उसे हम मानते हैं। लोग कहते हैं कि चीना पागल है। अरे बीवी-बच्चों के साथ रहते हुए कोई संत कैसे बन सकता है ? "वन क्यों नहीं सकता?" चीना उन्हें समझाता है । "संत बनना बड़ी बात [७] ।
नहीं । आदमी कोशिश करे, तो गृहस्थ जीवन में भी उस चीज को पा सकता है जिसके लिए ये जोगी-जोगटे संन्यास लेते है और दर-दर भटकते फिरते हैं।" चीना के सिर में भूत की तरह जब कोई चीज सवार हो जाती है, तो फिर जल्दी से उतरती नही! उसका कहना है कि अगर ऐसी ही बात है, तो संतों का बस्ती में क्या काम है ? उन्हें जंगलो मे रहना चाहिए। पहाड़ की किसी गुफा के अदर या नदी के एकात किनारो पर वास करना चाहिए। लेकिन नहीं, ये लोग संत कहां है ? दुनिया के चक्करों में ये भी पड़े हुए है। लोभ-लालच से बंधे हैं और जाने कहा-कहा खप रहे है। संत समागम और उनके अध्यात्म की महिमा को चीना अपने ढंग से पेश करता है । नागा बाबा से चीना कुछ तो डरता ही है। संत का स्वभाव क्रोधी नहीं होना चाहिए । चीना की कुछ बातें तो समझ में आती है। शुरू-शुरू मे जव बाबा यहा आए थे, तो प्रिनेत्र आश्रम वालों ने उन्हे ठहरने की जगह दी । सब तरह की सुविधाएं इस आश्रम मे मिलती हैं। हर वक्त साधु-संतो का समागम रहता है । जैसा महात्मा, वैसो सेवा और आदान-प्रदान का भाव है। प्रिनेत्र आश्रम के महत श्री नीमगिरीजी को राजयोगी की उपाधि मिली है। उनको योग-साधना के फलस्वरूप दिने आश्रम का अपना महत्त्ववना है । साधक लोग हफ्तो-महीनो यहा आकर योगाभ्यास करते हैं और अपनी साधना को चिरंतन बनाते है। महंतजी से सब तरह के लोगों का साक्षात्कार नहीं होता। वे साधु-संत और जनता के सामने कभी नहीं आते। यदि कोई खास तरह का विचार-विमर्श करना हो तो आज्ञा मिलने के बाद ही उनसे मिलने दिया जाता है। आश्रम की हर जानकारी उन तक पहुचाई जाती है । आश्रम की संपूर्ण व्यवस्था उन्होने सेवा- दारों के हाय दे दी है। चीना तो मिनेव आश्रम के महंत को भी नहीं मानता। उसका कहना है कि महंतजी पूंजीवादी विचारधारा के मंत है । पूंजीवाद क्या है, इस बात को वह अक्सर लोगो को समझाता है। समाजवाद, साम्राज्यवाद, राष्ट्रवाद, पूंजीवाद... जाने क्या-क्या कहता है । उसका कहना है कि पूंजीवाद का दूसरा रूप पाखंडवाद में मिलता है। त्रिनेत्र आथम मे पाखंहवाद चलता है। उसे महतजी का पूनीयादी होना अखरता है। इस आश्रम में इतना पैसा कहां से याता है ? महंत जो जरूर क्सिी चक्कर में है। अब ये बादा लोग भी कुचक्री बनते जा रहे हैं। [] इस तरह वे-बुनियादी वात पर एक बार नागा बावा ने चीना पर चिमट फैक मारा । नागा लोगों को क्रोधाग्नि चीना को क्या मालूम था कि ये लोग इतने क्रोधी होते हैं। उस दिन चीना भाग खड़ा न होता, तो आज वहीं कही चीना की समाधि देखने में आ जाती। नागा बाबा उसे मोक्ष-धाम पहुंचा देते। यह चीना भी कम कुचक्री नहीं। इसे भला क्या लेना-देना है, कोई कुछ करे। अपनी इच्छा के मुताबिक आदमी सब कुछ करता है। कोई किसी धर्म में है, कोई किसी पार्टी में है, कोई संस्था चला रहा है, कोई देशन्मेवा के काम में लगा है। सबके अपने-अपने काम हैं, अपने धंधे हैं। इन लोगो को छेड़ने की भला क्या जरूरत है। लेकिन चीना का कहना है कि ये सब बातें आदमी से आदमी को अलग करने की हैं, जोड़ने की ये बातें नहीं हैं। न जाने चीना के दिल में रह-रहकर कैसा दर्द उठता है । वह आदमी की एकता चाहता है। सब लोगों को एक तरह का देखना चाहता है । सब लोग मिलकर रहे मिलकर काम करें। एक तरह का साना-कपडा सबको मिले । एक तरह का रहन-सहन हो, तभी कुछ बन सकता है । एकता की बात उसके मन में है ? यह अच्छी बात है, पर इस हिसाब से तो खीमू मिस्त्री और बद्री-केदार के पंडे में कोई भेद नहीं रह जाता। आखिर सब कुछ एक वरावर कैसे हो सकता है ? चीना का कहना है कि इस भेदभाव को मिटना पाहिए । इसे मिटाना जरूरी है। यह सबके फायदे की बात होगी। कभी-कभी तो चीना की बातें बिलकुल सटीक लगती हैं। नागा बाबा धिगडा हुआ आदमी है, वह क्रोधी महात्मा है। महंतजी पूंजी- वादी हैं और दूसरे महात्मा लोग भी कुचक्रों के शिकार बने हुए है। इस पर्वत प्रांत की भोली जनता पर ये लोग किसी-न-किसी रूप मे हावी है। अपने पाखंड के कारण गुलछरें उठा रहे है। चीना की बातें लोगों की समझ में नहीं पाती। जो लोग समझते हैं, वे समझकर भी समझने को कोशिश नहीं करते। चीना की बातों को वे लापरवाही के साथ भूल भी नहीं जाते। साधु-संतों को धन की क्या आवश्यकता है ? दो जून रोटी चाहिए। -वह कहीं भी मिल सकती है। लेकिन यहां इन लोगों को जमा करने की आदत पड़ गई है। इतना जमा कर रखते है, जितना कि गृहस्थियो के पास भी नहीं होता। तिस पर भी इच्छाएं बढती जाती है। ज्यादा-से-ज्यादा संग्रह करने की फिक्र मे रहते है । इनकी बातें चीना को विलकुल पसंद नहीं। [६] संत को क्रोध करना शोभा नहीं देता ! नागा बावा क्रोधी महात्मा है। शुरू मे इस महात्मा ने त्रिनेत्र पाश्रम में हंगामा खड़ा कर दिया था। लोगों को नागा बावा से इसी बात पर हमदर्दी है कि उसके साथ त्रिनेत्र. आश्रम वाले महंतजी ने अच्छा बर्ताव नहीं किया। शुरू में नागा वाया इसी आश्रम में लाए थे। नागा लोग नंगे होते है। लंगोट और एक चुटकी भभूत के अलावा इनके पास होता ही क्या है ! पर बस्ती में रहने के कारण नागा बाबा को अल्फी ओढ लेनी पड़ी। उज्जैन के नामी अखाडे में दीक्षा लेकर वही जोग धारण किया और फिर चल पड़े देशाटन के लिए। चारों धाम यात्रा कर चुकने के बाद यदि कोई साघु अपना एक निश्चित आश्रम बना लेना चाहता है, तो उसके लिए गुरु-आज्ञा लेना जरूरी नहीं। लेकिन चारों धाम जब तक सिद्ध नहीं होते, एक जगह टिकना उचित नही। नागा बाबा ने अभी चारो धाम यात्रा नहीं की। चले तो थे चारो धाम करने...। पर बद्री केदार की इस भूमि पर कदम रखते ही यात्रा स्थगित हो गई । आज भी जव बाबा गुस्से की डगर मे होता है तो ग्रिनेन आश्रम की तरफ उंगली उठाकर स्पष्ट कह देता है- "इस कुचक्री महात्मा ने हमको यहां बाघ के रख दिया है । इसने हमारी भक्ति- भावना को भिरष्ट किया है। हमारी यात्रा मे अडंगी मार रखी है ।" नागा बाबा का सकेत त्रिनेत्र आश्रम के महंत की तरफ होता है। "यह हमारा गुरुभाई है । हम लोग एक ही अखाड़े के चेले है, एक ही गुरु के...एक ही पथके. ..."। यह महात्मा हमसे पहले चला आया था। चारों धाम सिद्ध करके यहा बैठ गया है। अब यह महात्मा नहीं रह गया है। बड़ा आदमी बना है...।" कहते हुए दूमरे ही क्षण नागा बाबा का कोध शांत हो रहता। नागा बाबा इसी बात पर यहां टिक गया है कि महंतजी ने अपने इस गुरुभाई को दर्शन क्यों नही दिए। आज ही यदि उनके दर्शन मिल जाएं, तो नागा बाबा फौरन अपना दंड-कमंडल उठाकर चलता बने । बस, इतनी-सी बात है। यही जिद है जिसके कारण बाबा को त्रिनेत्र आश्रम के बराबर अपना आश्रम जमा लेना पड़ा है। तब विनेन आश्रम में दो हफ्ता समय गुजार लेने के बाद नागा धावा के जमाती आगे बढ़ने को तैयार हुए। चलते समय बावा ने दर्शनों की इच्छा प्रकट की। लेकिन सेवादारों ने यह कहकर कि महंतजी के दर्शन हर किसी को सुलभ [ १. ] नहीं, नागा बाबा को दर्शनों से वचित कर दिया। नागा वावा ने जिद की और बताया कि वे मेरे गुरुभाई है। वे सिद्ध योगी है, इसलिए उनके दर्शन करना यात्रा सफल करने के बराबर है। लेकिन सेवादारों ने उनकी बात जैसे सुनी ही नहीं । सिद्ध पुरुषो के दर्शन इतनी आसानी से कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? जिस पर प्रभु की कृपा होती है, वही दर्शन-लाम करता चीना का कहना है कि इस तरह सरलता को जटिल बना देना भी एक तरह का पाखड ही है । प्रादमी के लिए आदमी के दर्शन करने मे क्या कठिनाई है ? उसे जान-बूझकर कठिन बनाया जाता है। ऐसे पाखड रचकर, आम आदमी के लिए एक आदमी के दर्शन दुर्लभ बनाकर, उससे लाभ हासिल किया जाता है। यह शोषण का धार्मिक तरीका है। चीना की बातों में कितनी सच्चाई है । इसी बात पर एक दिन पांडे गुरु ने उसे निरुत्तर कर दिया था। चीना की बात को पांडेजी अच्छी तरह जानते हैं। उन्हें मालूम है कि यह आदमी विरोधी पार्टी मे रह चुका है, वह कभी चीनी खेमे का वर्कर था। उस दिन पांडेजी ने साफ कह दिया-"अगर ऐसी ही बात है तो साम्यवादी देदार में तुम्हारी पार्टी के लोगों ने क्या बना के रखा है ? सुना है, वहां की जनता अपने नेताओं के दर्शन किए बिना ही मर जाती है। नेता लोग कभी जनता के सामने नहीं आते।" उस दिन धौना की बोलती बंद हो गई । कोई उत्तर देते न बना। पर नागा बाबा के साथ वह ऐसी बातें करने मे नहीं चूकता। वादा को साधारण महात्मा जानकर, धर्म-कर्म की बात शुरू करते हुए राजनीति पर उतर आता है। रोज ही बावा के धूने पर बैठकर चर्चा होती है। बाबा की भक्ति में विश्वास रखने वाले लोगों के बीच, वह धर्म-दर्शन पर अपना भाषण शुरू कर देता और धीरे- धीरे खंडन-मंडन पर उतर आता। चीना में बोलने की हिम्मत है। अपने सामने दूसरे को वह कुछ बोलने नहीं देता । यह बात नहीं कि वह जो बोलता है, सभी कुछ ठीक है। न बोलने वालों के बीच एक बोलने वाला यदि गलत-बयानी करता है तो उसी को लोग कुछ-न-कुछ मान लेते हैं। तब चीना दिल्ली से लौटकर आया था। सन् उन्नीस सो पैतालीस से पहले की भात..तब वह घर से भाग निकला कि वर्षों तक लापता ही बना रहा । घर [ ११ ] । में पिता थे नहीं कि चीना की सोज-सवर होती। अकेली मां के पास रोने के अलावा दूसरा चारा ही क्या था । जव तक वह रही, अपने चुन्नी को याद करत रही 1 आसिर एक दिन वह भी चल बसी। इतने लंबे समय के बीत जाने पर चीना की याद लोगों के दिलों में कैसे रह सकती है ? पंद्रह वर्ष का समय किसी को भूल जाने के लिए बहुत होता है। लोग उसे भूल गए हैं । लोगों का भी इसमें क्या दीप है। अपने-अपने भाग्य की बात है । कौन जानता है कि किसके भाग्य मे क्या लिखा है। चीना के भाग्य में यही था। गांव मे आवारागर्द घूमता हुआ लड़का किसे अच्छा लगता है ! चीना आवारा नहीं था । गांव के लोग ही तंगदिल हैं। गरीब होना एक बात है और तगदिली दूसरी चीज है । नासमझी का भी अपना दायरा है । ये सब बातें जहां भादमी के स्वभाव में पल रही हों, वहां का आदमी कैसा होगा! गांव में अनेक तरह की तंगियों के कारण टूटे हुए इस परिवार में चीना ने क्यों जन्म लिया?यह बात उसके दिमाग में बराबर रही है। गरीब के लिए इस दुनिया में क्या घरा है, जहां अपना घर भी अपना-सा नहीं लगता। गरीबी-अमीरी की चर्चा सनातन बनी है । यह सवाल सब जगह पडा हो जाता है । आदमी की माप-तौल के ये दो ही पलड़े हैं। हर बात का निर्णय इन्ही पलड़ों पर तय है। यह बात नहीं कि गांव में तब समझदार लोगों की कमी थी। पुराने लोग जब कोई बात कहते, समझाकर कहते । वे पढ़े-लिखे नही थे, पर पढाई-लिखाई वालो से ज्यादा समझ उनमे थी। बात कहते थे कि पत्थर पर लकीर खिंच जाती। तिरलोचन शास्त्री ने एक बार पंचायती चौक में सात दिन का सप्ताह रचाया था । ऐसे ही मौके पर ज्ञान-ध्यान की बातें सुनने को मिलती हैं । तव तो वह कितनी ही बातें समझा गए। गरीवी-अमीरी की बात भी उठी थी। जी-भर किस्से-कहानिया सुनाने के बाद शास्त्रीजी ने कहा था--"दुनिया में सब चीजें बादमी के लिए बनी है, इसलिए किसी चीज से घृणा नहीं करनी चाहिए । यह आदमी को अपनी कमजोरी है कि वह मन में भेदभाव रखता है । आदमी आदमी के बीच दीवारें खड़ी कर दी हैं । गरीबी-अमीरी, ऊंच-नीच का भेद बनाया है। सुख-दुःख भी आदमी के लिए बने हैं। इन सब चीजों पर आदमी विजय पा सकता है । उसके अपने ही अदर बड़ी-बड़ी शक्तियां काम करती हैं। मन है, जहा कि विप भी अमृत में बदलता है और अमृत से हलाहल पैदा होता है । लेकिन यह सब [१२] - कुछ समझ के द्वारा ही हो सकता है । दुःख-तकलीफों का मुकाबला भी मन की शक्ति के जरिए किया जा सकता है...।" ऐसा शास्त्रीजी कह गए। पर उनके कहने से भी गांच के आदमी में कितना ज्ञान आया है । ज्ञान-ध्यान के लिए भी लोग पैसे की जरूरत महसूस करते हैं। आदमी के पास पैसा हो, तो सब कुछ अपने आप चला आता है। वरना आदमी अक्ल से भी जाता रहता है । इन गाव वालों को कब अक्ल आएगी। इनकी अक्ल को गरीबी ने मार दिया है। जैसे सूखा पड़ने पर फसल मारी जाती है । ज्ञान और अक्ल के सूखे ने दिमाग मे घास उगा दी है । घास चरने वाला पशु भी विना छेड़े सोग नही मारता । पर ये लोग... पशुओं से भी ज्यादा कुछ है। चीना पर लगने वाला लांछन... ऐसी-ऐसी बातें कि इस...। हर वक्त ऐसे घृणा वाले वातावरण में कैसे रहा जा सकता है। चीना तब चौदह वर्ष का रहा होगा। गरीबी को मार खाया हुआ, भूखा-प्यासा और थकान्हारा.."एक दिन गांव छोड़कर भाग निकला और फिर वर्षों तक उसका कही पता न चत सका। चीना का गांव से चला जाना गांव की औरतों के लिए दुःखद घटना बन गई। वे चीना को कैसे भूल सकती है ? गांव के बच्चे भी उसे अपने वीच न पाकर उदास बन गए ! यकायक कभी खेल के बीच उसकी याद ताजा हो आती, तो सारा खेल नीरस लगने लगता। बच्चे एक जगह इकट्ठे ही बैठ जाते । आपस में यातें करते-कहां गया होगा? क्या खाता होगा? पता नहीं, है भी या मर गया है ? उसकी याद टीस बनकर सबके दिलों को कचोटती है। गांव की औरतो को भी वह भूलता नहीं। जैसे कि मरने के बाद अपना कोई याद आता है। याद करते हैं और रो लेते हैं। उसके गुण-अवगुणों का बखान करते हैं। लगता है, मृत्यु ही जीवन की कसौटी है । इस कसौटी पर आदमी की भली-बुरी बात सामने आती है। लेकिन मरने के बाद क्या अच्छा, क्या बुरा । बादमी के रहते हुए उसकी अच्छाई-बुराई का फैसला हो सकता, तो उसमे सरावियां क्यों पैदा होती! गाव की औरतें चुन्नी को याद करती हैं। जब वह गांव में था तब कौन-सा काम उसने नहीं किया। गांव की बहू-बेटियों के साथ वह घास-सकड़ी के बहाने जंगल-जंगल घूमता रहता । अकेले चीना को सारे परिवार का प्यार इन्ही औरतो से मिलता। आरम्भ में उन्हें चौना को उपस्थिति अपने वीच अच्छी नहीं लगी। वह मर्द-बच्चा है। चौदह वर्ष की उम्र में सब कुछ समन भाता है। इसलिए [ १३ ] ।
चीना के साथ रहने से आपसी बातो का मजा जाता रहता है। औरतों के बीच उसका क्या काम! लेकिन बाद में जब चीना उनसे सूव हिल-मिल गया, तो सबकी हिचक जाती रही। तब कोई भेदभाव उनके बीच नही रह गया था। अपनी आपसी चुहल मे वे कभी चीना को ही पकड़ लेती और उसे अधनंगा बना कर छोड़ देती। चीना को नगा करने में कितना मजा भाता था। उनकी पकड़ में आकर वह अपने को सिकोड़ने की भरसक कोशिश करता। पर इतने सारे हाथों से वह बच भी कैसे पाता! औरतें उसका पाजामा खोलकर अपने पाम रख लेती और फिर हंसते-हंमते लोटपोट हो रहतीं। सबके लिए चीना एक तमाशा बन गया या। नगा कर देने वाली बात पर वह उन्हें हलकी-फुलकी गालियां सुना देता, कभी रोने लगता और कभी झाडी में घुसकर अपने नगेपन की रक्षा करता। उसे नगा करने में जो अपनत्व का भाव था, उसे चीना भी कभी नहीं भूल सकता। गांव की औरते घास-लकड़ी के लिए जंगल जाती, तो चीना को साथ ले जाती। किसी ऊंचे पेड़ पर उसे चढ़ा दिया जाता । वह हलका बदन.."बंदर की तरह लपककर पेड़ की आखिरी मंजिल तक पहुंच जाता और थोड़ी देर में सारा पेड़ पत्तो से रहित हो जाता । एकदम खंखड़..। नीचे घास के ढेर लग जाते। बैठे-बिठाए घड़ी-पल में इतना पास कहां से मिल सकता है ! चीना है, जिसके कारण गांव के इकले-दुकले घर की औरतों को यह सुविधा मिल गई थी। इन औरतों को वक्त से घर पहुचना है, बीसों काम करने हैं। जल्दी घर लौटने की सुशी में उसे जुग-जुग जीने का पाशीर्वचन देती हैं । लेकिन जब कभी चीना का दाव लग जाता, तो वह भी उन्हे कई तरह के नाच नचा देता। ऊंचे पेड़ की आखिरी मंजिल पर, किसी एक टहनी से दोनों पाव नीचे छोड़कर बैठ जाता। घोडे की-सी पीठ पर निश्चित सवार हो, जेब से चौड़ी का टुकड़ा निकाल खूब लंब करा खीचता । नीचे से औरतों के चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनता रहता। "क्या करता है रे काटता क्यों नहीं...?" पत्तों के बीच बैठा हुआ चीना कही दिखने में भी नहीं आता। ऊपर से केवल आवाज आती है, "काटता हू चाची, जरा बीडी पी रहा हूं।" बीड़ी पी चुकने के बाद भी चुपचाप बैठा कुछ सोचता रहता है। नीचे से जब कई आवाजें एक साथ उठती हैं, तो सुनते हुए भी अनसुनी करने के बहाने वह - । [ १४ ] अपना गीत शुरू कर देता- वजरू पड़ यान परदेसु व्यः अपणो विराणोह्र ऊंचे पेड़ को भाखिरी मंजिल पर, पतली भाष मो वह एक हलको हिलोर देता। पेड की लचीली शाय हवा में झूमने लगती। तब वह अपने गीत की लय को यूव लंबी सींचकर हवा में लहरा देता। आस-पास की पहाड़ियों से यह आवाज टकरा कर वापस लौट आती। उसके कंठ में लोच थी, आवाज मे दर्द होता। लोग यो भी पाम बिठाकर उससे गीत-मजन सुन लेते और उसकी आवाज में तन्मय हो जाते। एक बार पट्टी के पटवारी और कानूनगो साहब कहीं तहकीकात पर जा रहे थे। यही लय उनके कानों में पड़ी। कदम वही जाम हो गए । अहः ! कैसा दीला गीत है । लय भी सूब सुदर! समतल में बहने वाली नदी की तरह। मतलव भी ऐसा कि छाती को चीरकर रखने वाला~वज पड़ यान परदेसु 4.."। उस परदेश में विजली गिर पहे, जल जाए उस धरती का सीना"शहर की 'वह चकाचौंध वीराने में बदल जाए, जहां जाकर मादमी वेगाना बन जाता है । अपने घर-द्वार तक को भूल जाता है। पेड़ की जड़ में बैठी हुई घसियारनियों को तो जैसे नानी मर गई हो। "क्यू गाता है रे ब्यटा ऐसा गौत...? दिल में दर्द पैदा करता है यह । तेरी मावाज भी कैसी भीगी भीगी लगती है। इस गीत को मत गाया कर! आंखों में आसू भर माते हैं । अब जो आदमी परदेश चला गया है वह रोने से वापस नही आएगा। हमारे भाग मे ऐसा ही है । वर्षों गुजर जाते हैं, घर का आदमी घर नहीं लौटता।" गांव की औरतें सोचती है कैसा होगा वह परदेश...। जहां पहुंचकर आदमी अपने बाल-बच्चों तक को भूल जाता है । लेकिन अब चीना के वे रुलाने-हंसाने वाले गीत भी कहां हैं ! जब से वह गांव छोड़ गया है, सूना-मूना लगता है। उन गीतों को सुनने के लिए कान तरसते हैं । जंगल का कोई ऐसा किनारा नही, जहां पहुंचकर उसकी याद ताजा न हो आती हो। खेत-खलिहान, घाट, पनघट, घर, जंगल... सब जगह आखें उसे खोजती है। सब जगह उसका कोई-न-कोई गीत गूंजता है। लेकिन वह कही दिखने में नहीं आता। ये मदं लोग भी कितने कठोर-दिल हैं। सड़को को उचका कर, गांव से [१५] भगा देते हैं। नई उम्र मे आकर शोक सभी को लगता है। अच्छा खाना-पहनना कौन नहीं चाहता । लेकिन ये लोग.." । इनका मुख कभी बंद नहीं रहता। कुछ न कुछ जरूर बोलना है। कुछ बोलने के लिए मुंह खुजाता रहता है । एसे वातावरण में दमघुट कर रह जाता है। चीना गया। फिर वर्षों तक उसका कही पता न चल सका। पता करने वाला भी कौन था , जो दिल मे दर्द लेकर खोज-खबर करता। इन गांवों से निकल भागने वालों का पता किसने चलाया है । लोग कहते हैं कि ये भागने वाले रवाई जौलसार की तरफ जाकर अपना घर बसा लेते हैं । इस जगह जो एक बार पहुंच गया, वह फिर लौटने का नाम नहीं लेता। जादू के प्रभाव से उसे बांध लिया जाता है। भेड-बकरी या कुछ और बनाकर छोड़ देते हैं। भेड़-बकरी वह चाहे न भी बने, पर घर-जवाई जरूर बनता है। ऐसी मोहिनी उसकी आंखों पर छा जाती है कि हिलने का नाम नहीं लेता। ऐसा लोग इस क्षेत्र के बारे में कहते हैं । जादू- टोने वाली घरती है यह। चुन्नी भी शायद वही कही पहुंच गया है । लेकिन कुछ वर्षों के बाद वह एक दिन जब गांव लोटा, तो देखकर लोग आश्चर्य में पड़ गए। अब वह लम्बा-चौड़ा नौजवान खूब घनी काली मूछ रखने लगा था। शरीर भी खूब गठा हुआ। वगल वाली चाची ने उसे अपने मामने पाया, तो बहुत प्रसन्न हुई। तब तो वह चीना को गले लगाकर खूब रोई । सिर से लेकर पीठ तक, कई बार दोनों हाथ फेरती हुई वोली-'वेटा! तू आ गया है, तो अब मुझे किसी तरह की चिंता नही है। घर-द्वार सब तेरा है। तू बिना कुछ कहे चला गया था। मुझे तेरा सब कुछ संभालना पडा। दूसरा कौन संभालता?" चाची के मन में हजार आशंकाएं थी। जाने क्या कहेगा ? लेकिन चीना भला क्या कहता। उसे बचपन से ही घर-द्वार का मोह नहीं रह गया था। जिस मिट्टी मे बचपन उपेक्षित रहा हो, उसके प्रति मन कितना रह सकता है। चाची से चीना ने सिर्फ इतना ही कहा की यह घर-द्वार अव भी तुझे ही संभालना है चाची ! मेरा क्या है, कहां निकल जाऊं। वर्षों पुरानी वात । एक दिन में ही परिवर्तन आ जाता है। वर्षों बाद गाव के लोगों ने जव चीना को देखा तो देखते रह गए। अब वह काफी बदल गया था। भरा पूरा जवान । भरे चेहरे पर धनी काली मूंछे देखकर आंखें अपने आपसुक [१६] . .
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जवान अपनी घी की कुज्जियां उठाते । वे 'क्विकमार्च कर गए । फौजी डिसेपलिन के साथ हाथ हिलाते हुए दूर निकल गए। सोचा तो जरूर होगा उन्होने कि यह आदमी फिर कोई काशन देगा । मंगत भला क्यो काशन देने लगा। वह सीधे उतर कर सड़क पर आया और घी की दोनों कुज्जियां उठाकर अपने घर का रास्ता लिया। अब तक जवान लोग जाने कितनी दूर निकल गए थे। तब से यह बात उनके दिलों में वरावर खटकती रही। अपने अंग्रेज अफसर से यदि वे इस घटना का जिक्र करते तो नंगत क्या उसका सारा गांव हथकडियो मे बंधकर पौड़ी जेल में पहुंचा होता। लेकिन यह सोचकर कि चलो, अपने भाई-विरादर हैं, कभी स्वयं जाकर खबर ले लेंगे । पिछली बार जब वे लोग मंगत की खोज में आए, तो मंगत इस दुनिया में नहीं था। वेचारा तभी चल बसा। फोजी कायदे-कानून को लोग क्या समझते हैं । गांव के लोग हैं ।गाव मे देखने- मुनने को क्या रखा है । यही कि उलटी-मोधी बातें सुनते रहो। इसलिए गाव में दिल नहीं लगता। इससे तो फौज में भर्ती होना अच्छा। फौज में चीना को सुबदारी का रैक मिलने वाला है । सुबदारी जब मिले तब --लोग तो अभी से सुबदारजी ! कहकर बुलाने लगे हैं। "आओ, बैठो सुबदारजी!" अपने घर में दीवार को आड से लगी तिपाई पर मुपदारजी को बिठा कर दद्दा अपने हाथ से चिलम भर लाते हैं। हुक्के का पानी बदलते हैं, उसे माजते हैं और फिर चिलम चढ़ाकर सुवदार की तरफ बढ़ाते हैं। "ल्यो, हुक्का पियो सुवदारजी !" ये ही लोग हैं, जो तरह-तरह की बातें किया करते थे। गाव में रहना हराम कर दिया था और आज इज्जत से पास बैठाकर हुक्का पिला रहे हैं। देखकर चीना मन-ही-मन मुस्कराता है। "मैं हुक्का नहीं पीता बोडाजी! सिगरेट पीता हूं।" चौना जेब में हाय डालकर सिगरेट निकालता और उसे मूछों के अंदर मुंह में फंसाकर फर से दियासलाई रगड़ता । घुओं मूंछों से छन-छनकर फैलने लगता। लोग देखते रह जातं उमकी पूंछों की तरफ मुवदारजी को रोवीली मूं। "सो बोहा, तुम भी सिगरेट पियो।" सिगरेट हाथ में लेकर दद्दा गुग हो जाते । वहे गौर से उसे देखते । जीवन में पहली बार यह चीज हाथ आई है। वा! कमी बनी है। अपनी मिरजई की सलवट में दद्दा उमे रख लेते हैं। पर नहीं [१८] टिका पाया, यहां भी यह टूट सकती है । सोचकर ददा ने उसे कनपटी पर टिका दिया। शाम तक वह सिगरेट कनपटी पर टिकी रही । शाम के वक्त चीना ने जब वही उसे तो पूछा । दद्दा को तभी याद आया। कनपटी से उसे निकाल लिया और देखते हुए बोले, "बेटा, इस पर यकतरफा लंबर लगा है। मैं पूछना भूल गया था कि इसे लंबर वाली तरफ से पीना है या बगेर लंबर से ?" सुनकर चीना को हंसी छूट गई । वोला, "यह सरकारी चीज नही है वोडा! प्राइवेट चीज है । इसे कही से पी लो, फर्क नहीं पड़ता।" क्या जमाना था। कंसा अंघकार। सफेद सट्टे का पाजामा और कमीज पहन कर मुबह-शाम जब सुबदारजी हवाखोरी के बहाने निकलकर गांव की तरफ जाते, तो लोगों की आखें उनके चिट् उजले लट्ठे की चमक पर ठहर जाती। तब गांवों मे ऐसा सफेद कपड़ा कहा मिलता था! दुमूती का मोटा गाढ़ा, काले रंग की इटलीन और मलेशिया का मलखोरा...। बस, यही कपड़ा लोग पहचानते थे । बूढी औरतो के लिए त्यूखी, हाथ का बुना कंबल...! इनके बिना गाव में गुजारा नही। अह ! कैसा वक्त था। उन्ही दिनों गांव मे शम्भू का व्याह हुआ। पैसे का नशा तब भी कम नहीं था। नशे में चालीस वर्ष का शम्भूशाह चौदह वर्ष की कन्या कुवारी को ब्याहने चला। गाव मे शादी-ब्याह का मजा है। ऐसे मौको पर सभी सज-धज जाते है । पास-पड़ोस और दूर के लोग अपने गांव में आए भले लगते हैं । हमेशा अंधेरी रहने वाली रात, गैस के उजाले से जगमग कर उठती है। गांव के इन अंधेरे कोनों तक जब रोशनी पहुचती है, तो रात-भर नीद नहीं आती। सोने को मन नहीं करता। रात मे देर-देर तक नाच-रंग चलते हैं। बेटी का घर हो, तो ब्याह की तैयारी दो महीने पहले ही आरभ हो रहती। मुहूर्त मिल जाने के बाद का हर दिन, ब्याह का दिन लगता है। बच्चो की बात ही क्या... हसी-खुशी के साथ उस दिन का इंतजार सबको रहता है। चालीस वर्ष का शम्भूलाल" आदमी कितना ही बन ठनकर निकले, उम्र का पता लगाने वाले मालूम कर ही लेते है । शम्भू को लौडा बनाने की हर तजबीज सामने आने लगी। जरा घूमधाम से बारात निकले। दूर के लोगों को मालूम हो कि इस गांव से कभी बारात निकली थी। लोगो को लगे कि शम्भूशाह की बारात है। [१९] सज-धज कर शम्भूशाह की बारात खड़ी है । दूल्हे की पोषाक में सम्भू जच गया है। अचकन तो बहुत ही आला किस्म है, पर पाजामा..? इटलीन की काली अचकन के साथ लट्ठ का सफेद पाजामा होता, तो सोने मे सुगंध पैदा हो जाती। तभी यकायक किसी को सुबदारजी का ख्याल आया। वही ऐसा पाजामा पहनता है। सुबदारजी से पाजामा माग लाया गया। चिट्-सफेद पाजामा पहनकर दूल्हा सभी को जच गया। शम्भू इतना पैसेवाला आदमी है, पर ऐसा सफेद पाजामा पहली बार पहनने में आया है। सुवदारजी ने अपनी हरी जीन कलफदार पतलून के ऊपर लछे की उजली कमीज पहन ली। बारातियों के बीच उनको शान निराली थी। सफेद कमीज के कारण लोगों की पहली नजर या तो उसी की कमीज पर होती, या फिर दूल्हें के पाजामे पर जा ठहरती। कपड़ा भी इतना सफेद हो सकता है, यह बात उनके सामने पहली बार आई थी। शम्भूशाह की बारात है। गाजे-बाजे वाले, नाच-रंग वाले, निशान-झंडे वाले-बच्चे-बूढे सभी बारात मे शामिल है। दूसरे गांव के पास से बारात जब गुजरने लगी, तो देखने के लिए लोग नीचे उतर आए। बारातियों में सुवदारजी का अपना रंग अलग है। खूब धनीकाली मूछो के बीच से छन-छनकर निकलता हुआ वैट मिगरेट का घुआ...। सुबदार को ही बारातियो मे कुछ जानकर लोग उसी से पूछते है- "किस गाव की बारात है ? दूल्हे का नाम और किस गांव को जाएगी बारात ?" पूछने वालों की उत्सुकता पर सुबदार शम्भूगाह का परिचय देता है और अंत मे पाजामे का जिक्र भी छेड़ देता है। पाजामा था, जिस पर सबकी आखें लगती थी। इतना चिट-सफेद...। दूध भी क्या चीज है इसके सामने । यही पर पाजामे की बात खुल गई कि पाजामा शम्भूशाह का नहीं है। वारातियों को यह बात बिलकुल अच्छो न लगी । सुवदार को इशारा किया गया कि वह ऐसी बात न करे । इसमे सरासर दूल्हे की बेइज्जती है। सारा का सारा गांव जानता है। लोगों के समझाने पर सुबदारजी चुप हो रहे । मूंछों से बैट का घुओं उड़ाते रहे। [२०] वारात आगे चली। शम्भूशाह की बारात है। ढोल-दमाऊ, नरसिंघ, शिणेइ आदि-गाजे-बाजों की गमक के साथ। अगला गाव भी दूर नहीं। पास से गुजरते हुए फिर किसी ने दूल्हे के बारे में पूछ लिया। फिर वही परिचय- "दशम्भूशाह पैसे वाला आदमी है, पर जो पाजामा उसने पहना है, वह भी उसी का है।" इस बार बारातियों ने तकरार उठा दी। सुबदार से बोले कि वह पाजामे श्रा जिक्र हो न करे। जान-बूझकर सबकी बेइज्जती कर रहा है । मापिर वह पाजामा ही तो है. कोई ढाके की मलमल तो नहीं है। सुनकर सुबदार चुप रह गया । तीसरी बार फिर किसी ने पूछा, तो मुरदार ने आगे बढकर वहीं परिचय दिया। बोला-"पाजामे का यहां कोई जिक नहीं।" लोगों ने पूछा--"किस पाजामे की बात कह रहे हो, वह जो दूल्हे ने पहना है ?" "हा, वही । जो उसने पहन रखा है, वह पाजामा भी उसी का है।" अब की बार बारातियों ने दूल्हे का पाजामा उतरवा कर उसे सुबदार के आग फेंक दिया-ले ज्जा...! तब अपना वही पाजामा शम्भूमशाह को पहनना अगले दिन बारात लोटी। गांव की और दुल्हन को देखने आई। दुल्हन को सबने पसंद किया । सुंदर गोल चेहरा, गुलाब जैसे होठ, सुगे जसी नाक और खें तो जुगनू-सो दिपने वाली सुंदरतागी फूटी हुई अनार की कली जैसी दुल्हन । फिर शम्भूशाह की याद आती है । तब जिसने भी दुल्हन को देखा, उसी ने शम्भूशाह को फटकारना चाहा। लड़की की उम्र से भी छोटी दुल्हन उठाकर लाया है। इन दिनों शम्भूशाह ने गांव की खूब खातिरदारी की। लगातार तीन दिन तक सुबह-शाम भोज चलता रहा । ऐसा खाना कि लोग सब कुछ भूल गए। खाना ही सबको याद रहा। दुल्हन के बेजोड पड़ जाने की चर्चा वहीं दब गई। भव सुबदारजी का सफेद पाजामा ही चर्चा का विषय बना । धीरे-धीरे नई दुल्हन के कानों तक पाजामे की बात पहुंची और शम्भू अपनी सुहागरात भी शायद ठीक सेन बिठा पाया था कि सुबदारजी नई दुल्हन को लेकर चम्पत हो गए। [२१] - हजारों की रकम लगा दी है शम्भूशाह ने । बारात के सर्च से चौगुनी रकम उसकी पोज में लग चुकी है। पौड़ी में जाकर फौजी अफसरों से मिल चुका। लेकिन सुयदारजी का कोई सुराग नहीं लगता। अब जाकर मालूम हुआ कि.वह फौज मे नही था। दुल्हन को भगा ले जाने की बात को लोगों ने अपनी-अपनी समझ के मुताबिक लिया। इसमें किसी का दोप नही, जिसका जोड था, उसके साथ जुड़ गया है। लोग कहते हैं कि आदमी का पाप उसे जल्दी सा जाता है। शम्भूगाह । पापी तो नहीं था। आज उसे मरे हुए दो वर्ष हो चुके हैं । निःमतान मरे राजाजी- वाली बात लोग कहते हैं । अंत में यही बात उसके साथ हुई। अव तो, सुचदारजी भी घर लौट आया है। लंबे समय से वह घर पर ही रहने लगा है । एकदम घरेलू आदमी की तरह । चाची खाना बना देती है और वह चुपचाप काम में लगा रहता है । कहने वाले आज भी उसके बारे में कई कुछ कहते हैं, पर वह तो किसी की सुनता ही नहीं। उसे किसी की परवाह नहीं । गांव' के लोगो को आश्चर्य होता है। आदमी क्या इतनी जल्दी बदल सकता है ? चीना के दिमाग में जरूर कोई कमी आ गई है। हंसी-दिल्लगी में लोग कभी पूछ लेते हैं-"मुबदारजी ! तुम तो फौजी कायदे-कानून के आदमी थे, फोजी आदमी एकदम इतना घायल नहीं हो जाता। लेकिन तुम्हारी तो मुझे भी झुक गई है।" लोग कुछ भी कहते रहे, सुवदारजी का उत्तर मौन में मिलता है। सुबदारनी की याद दिलाते ही उसकी आंखों से टप-टप् आंसू निकल आते हैं। सुबदारनी के बारे में वह किसी को कुछ नहीं बताता कि उसका क्या हुआ। लोग पूछते हैं तो सुबदार वहां से उठकर चल देता है । कुछ कहते नहीं बनता। बेचारे की आत्मा दुःखो है । उस वेवारी का जाने क्या हुआ। वह नही रही, साथ ही चीना को भी बदल गई है। धीरे-धीरे लोगों को मालूम हो गया। पता चला कि चीना फौज मे नही था । वह चीन की साम्यवादी पार्टी का वर्कर रहा है। सन् उन्नीस सौ बासठ में जब हिंदुस्तान के चीनी खेमे में भगदड मची और उनके दफ्तर बंद तो सभी वर्करो ने इधर-उधर भागकर अपनी जान बचाई। भागते नहीं, तो मौत के घाट उतार दिए जाते, या जेलो के अंदर बंद पड़े सड़ते होते। उसी हबड़-दबड़ में चीना को भागने का मौका मिला और वह भागकर गांव [ २२ ] - चला आया। इसके बाद गांव वालों ने उससे कहा कि-चुन्नीलाल ! अब तो अपना नाम बदल दे। वरना चीनी समझकर कोई तुझे यहा से भी खदेड़ देगा। चीना किसी की बात नहीं सुनता । आखिर अपनी जगह अपनी ही है । अपना पहाई" "अपना गाव.. और अपनी जान-पहचान के सब लोग । अब चीना का कोई कुछ नहीं विगाड़ सकता। समय बीतता गया। धीरे-धीरे चीना ने अपनी बात लोगों से कहनी चाही। उसकी बातों से लगता है कि अब वह पूरी तरह बदल गया है। पर उसके विचार में वर्ण-व्यवस्था, जाति-धर्म, भक्ति-मुक्ति आदि नाम की कोई चीज अब भी नहीं। किसी ने बताया कि चीनी खेमे के लोगो पर इन बातों का कोई असर नहीं होता। उनके दिमाग में सबको बराबर करने की एक बात रहती ही है । सबके अधिकार एक बराबर रहे, तो यह भी कोई बुरी बात नहीं। साम्यवादी खेमे का हर आदमी लीडर है। अपनी ड्यूटी के ये लोग पाबंद रहते है । काम करने की क्षमता भी कम नहीं होती। चीना के स्वभाव मे ये बातें आज भी मौजूद है । लेकिन स्थान की अपनी विशेषता सबको बांधती है। जैसा देश, वैसा वेप..। पहाड़ आकर चीना के विचारों में और भी बदलाव आ गया था। यह आश्रमों और मठ-मंदिरो का देश है । धर्म-कर्म, पूजा और दान-दक्षिणा का देश है । इस वातावरण में पलने वाले रीति-रिवाजो को चीना चुपचाप देखता रहता। कभी-कभी उसके लिए यह सब कुछ जैसे असह्य हो जाता। देखकर वह भड़क उठता। उसे यह सब कुछ पसंद नहीं। पर किसी को नापसंदगी के कारण किसी चीज का मूल्य घट तो नहीं जाता ! किन्नर नगरी में त्रिनेत्र आश्रम की अपनी महिमा है। महंतजी की इच्छा के विरुद्ध कोई उनसे मिल नहीं सकता। उनके दर्शन-लाभ नही कर सकता। नागा बाबा इसी बात पर असंतुष्ट थे कि उन्हें महंतजी से नहीं मिलने दिया गया। सेवादारों ने आकर उन्हें पहुसवाहयो बाचनालयों में गार पोट भी चलती है, पर पिटना कोई सजा नहीं। इस अपराध को सगा है-अडंगी। वही सजा नागा बाबा को दी गई। घुटनो के बाहर दोनों हाथ रस्सी से बांध दिए और पिंडलियों के बीचों-बीच एक मोटा लक्कड़ फंसाकर उन्हे दीवार से अड़ा दिया गया। इसी का नाम अईगी है । इस सना की कम-से-कम अवधि चौवीम घटे की है। नागावाबा को चौबीस घंटे की अड़गी लगा दी गई। चौबीस घंटे तक वे दीवार से अड़े बैठे रहे। इस सजा की मुद्रा भी कैसी है। लगता है, आदमी माराम से बैठकर किमी की अविफल प्रतीक्षा कर रहा है। सजा की अवधि समाप्त होने के बाद महंतजी को खबर पहुंचाई गई। आदेश मिला कि नागा वाया को आश्रम की सीमा से बाहर कर दिया जाए, और फिर कभी इस मीमा मे कदम न रखने दिया जाए। आदेश के मिलते ही सेवादारो ने चावा को कलाइयों से रस्सी खोल दी और दो आदमी पकड़कर उन्हें आश्रम की सीमा से बाहर छोड़ पाए। आश्रम की सीमा के बाहर, मड़क के एक किनारे कुछ देर वावा चुपचाप खड़े रहे । सेवादारों ने उनका दंड-कमंडल हाय में देने के बजाय उनके आगे घर दिया और चरण छूकर वापस लौट आए। लौटते हुए सेवादारो को बाबा देखते रहे । इसके बाद त्रिनेत्र आश्रम की अट्टालिका पर बावा की आखें अगारे बरसाने लगी। इस अट्टालिका में उनका गुरुभाई रहता है । गुरुभाई के होते हुए ऐसी सजा मिल जाए । नागा बाबा सोचने लगे-हां, कभी वह गुरुभाई हो था। उसका स्नेह। धीरे-धीरे आखों मे धधकते हुए अंगार बुझने लगे। शरीर और ब्रह्मांड मे तेज चुसार की तरह चढ़े हुए क्रोध का ताप उतरने लगा। एक क्षण के लिए महंतजी का निर्मल और शीतल कर देने वाला स्नेह, दूध की तरह उफ़न आया। काठिया- बाइ-गुजरात की वह धर्म-परायण भूमि आंखों के सामने उतर आई, जहा निरंतर कई वर्षों तक अनेक माथमों में नागा वाया अपने इस गुरुभाई के साथ रहे। विह भी क्या समय था, कसा अद्भुत स्नेह...! चीना का कहना है कि साधु-मतों को माया-मोह से मुक्त होना चाहिए। उन्हे संसार को हर वस्तु से विरक्त रहना चाहिए। इन्ही सब बातो से अलग रहने के लिए जोग-रूप धारण किया जाता है। घर-गृहस्थ का त्याग करना होता है । पर नही, नागा बाबा को लगता है कि सब कुछ त्याग देने से आदमी के पास क्या शेष बचता है। साध-मंत मी आखिर आदमी ही होते हैं । यह महत भी [ २४ ] 1 पहले आदमी था। तब उसके हृदय में भी वही सव था जो आदमी के पास होता है। लेकिन आज उसके पास पहले से ज्यादा कुछ है । लोग कहते हैं, वह आदमी से देवता बन गया है । नर से नारायण वना है। इसलिए अब उसे किसी भाई- चारे की जरूरत नहीं है, किसी का स्नेह पाने की इच्छा मन में नहीं है। सोचते हुए नागा वावा की आखें गीली हो आती है । फिर स्यात आता है, इसमें गुरुभाई का भी क्या दोष है । आज वह भी एक कैदी की तरह रह रहा है । सेवादारों को सब कुछ सौंपकर स्वयं को एक किनारे रखे हुए है। महात्मा को एकांत चाहिए। वह एकांत उसने अपने लिए इस तरह से जुटा लिया, तो इसमें बुरा क्या है। सोचकर नागा बाबा ने अपना दंड-कमंडल उठा लिया और वही सड़क के किनारे एक कचे पत्थर पर जा बैठा। चौबीस घटे तक अडंगी लगने के कारण पिडलियों में थोड़ा दर्द उठने लगा था। पहली बार नागा वावा को ऐसी मजा मिली थी। लेकिन बावा ने इसे सजा के रूप में नहीं लिया। उस समय लगा कि यह संसार एक बड़ा जेलखाना है। इसमें जन्म धारण करने वाला प्राणी अपने आप मुजरिम ठहरता है और अपने पैदा होने की सजा पा रहा है। तन को सजा देने से आदमी का मन तो नही बदल जाता । मन को बदलने वाली सबसे बड़ी राजा तो क्षमा ही हो सकती है। क्षमा- दान से मन बदलता है। नागा वावा ने शारीरिक कष्ट महे है। गर्मियो में पंचानल साधा है, शीतकात मे गंगा की लहरों को तन पर झेला है । तब चौबीस घंटे की अडंगी उनका क्या विगाड़ सकती है। हां, थोड़ा-बहुत कष्ट इसलिए हो जाता है कि लंबे समय तक चिलम-पानी नहीं मिलता। चिलम का न मिलना अपने आप में बड़ी सजा है । नागा बाबा ने धीरे-से अपना कमंडल उठाया। उसमें रखी चिलम निकाल ली। फिर बगल के नीचे लटकती झोली से पत्तियां निकालकर उन्हें हथेलियो के बीच मसलने लगा। -कहते है कि जब जोगी अपनी जिद पर आता है तो उसे पूरी करके ही छोड़ता है। नागा बाबा ने मन में सोच लिया है कि जाऊंगा तो इस गुरुभाई के दर्शन करके ही जाऊंगा। दर्शन किए बिना अव वाबा कही नहीं जाएगा। इस घटना को अब बारह वर्ष पूरे होने जा रहे हैं। बारह वर्ष में एक कुंभ [ २५ ] जोगी का हठ- . .
पूरा हो जाता है । लेकिन नागा बाबा के लिए तो वही पर्व का दिन है, जिस दिन इस गुरुभाई के दर्शन होंगे। नागा बाबा की इस बात में अब कोई वजन नहीं रह गया है । गुरुभाई के दर्शन भी अब उतने महत्त्वपूर्ण नही रहे। जब तब चीना यही कहता है कि इन बावा लोगों की बात का भोई भरोसा नही । पर भरोसा क्यों नहीं ? नागा बाबा पर भरोसा रखकर ही गांव के लोगों ने उन्हें पंचायती खेत दिए हैं। उनके लिए वही गंगातट पर आश्रम बना दिया है। सुबह-शाम नागा वावा की नागफणी बजती है, तो लोगों को एहसास होता है कि उनकी सुध लेने वाला कोई है ? जो आने वाली विघ्न-बाधाओं को अपनी नागफणी की तीखी मार से भगा देता है । अव वह पुरानी हठ वाली बात नहीं है। लोग कहते हैं कि जोगी में विरक्ति का भाव होना चाहिए। पर कैसी विरक्ति ? नागा बाबा ने इन गांव के लोगों को परिवार की तरह मान लिया है। एक ही बात सबसे कहते है-बच्चा लोगो! विरवित की बात अपनी समझ में नहीं आती। हम विरक्ति वाले साधू नही हैं । जो भाव प्रेम-मुहब्बत मे है वह विरक्ति मे कहां मिलता है ! प्रेम करो बच्चा! प्रेम से रहो! .."सव प्रेम की महिमा है। वावा के मन में प्रेम है । मन सुख की तलाश में भटकता है । "सुख कहां है महाराज! इस मंसार मे सुख कहां देखने को मिलता है ?" (सुख-दुख की बात जब कोई भक्त-जन बाबा के सामने रखता है, तो यावा बड़े प्यार से उसे समझाते हैं, "अरे बेटा, आदमी अपने अंदर से तो सब कुछ पाता है । यह सच है कि कभी-कभी अपने अंदर भी कुछ नहीं मिलता। अपना मुख भी फीका लगने लगता है । इसलिए माया-मोह बनाया है, दुनिया बनाई है, कि जो चीज तुम्हारे अंदर नही, वह दूसरे से लो । सुख-दुःख तुम्हारा अपना नहीं, वह भी दूसरों से तुम्हें मिलता है। इसलिए दूसरों को सुखी देखने की इच्छा करो। उन्हें सुखी बनाओगे, तो उनसे ज्यादा सुख तुम पा जाओगे।" पते की बात कहता है यह महात्मा। यह जोगी विरक्त नहीं है। वावा का पहना है कि विरक्ति से बड़ी चीज सेवाभाव है, इसलिए किसी चीज से विरक्त नहीं होना । उन चीजों को प्राप्त कर यथायोग्य दूसरो की सेवा करना ही महात्मा का धर्म बनता है। शायद इसीलिए यावा की भाग-दौड़ दिन-भर बनी रहती है। कभी किसी के छज्जे में, चौक या चूल्हे के पास बैठा हुआ यह वाया बातों में मस्त दिखाई दे जाता है । घरों में जाकर सुख दुःख की बात सुनता है । अपने घर की [ २६ ] बातें बाबा को सुनाकर लोग मन को हलका कर लेते हैं । जैसे कि दूसरे का दुःख वह चुपके से अपने अदर खींच लेता है । दिन हो या रात-किसी भी वक्त, घबराए हुए चेहरे बाबा की कुटिया मे आ पहुंचते है। "जल्दी चलो महाराज ! भूत का झपट्टा पड़ गया है।" इन भूत-प्रेतो के करतब बावा अच्छी तरह समझते हैं । भूत की बात सुनते ही चिढ सवार होती है, "भूत का झपट्टा नहीं है बच्चा! यह तो तुम्हारी अक्ल का झपट्टा है । तुम्हारी अक्ल भूत बनकर तुमसे कुछ वसूलने आई है । कई वार समझा धुका हूं कि भूत-प्रेत कुछ नहीं होता। यह तो मन का अज्ञान है । अज्ञान और भय ही भूत-प्रेत बन आते हैं और तुम्हारी बहू-बेटियों को अकड़ा देते हैं। इन भूत-प्रेतों को तुमने देवता बनाकर अपने घरों में बसा लिया है। अब ये तुमसे कुछ न कुछ वसूलेंगे ही." लोगो को धीरज बंधाने के लिए नागा बाबा इस तरह की बातें कह तो देते हैं, पर मन-ही-मन इस बात को स्वीकार करते हैं कि कोई बात जरूर है, कोई ऐसी हवा इन घाटियों में चलती है, जिसके लगते ही आदमी बेकाबू हो रहता है और तरह-तरह की हरकतें करने के लिए विवश हो जाता है। पहाड़ों की इन तंग और फैली हुई घाटियों के बीच यह हवा किसी भी वक्त आदमी को जकड़ सकती है । तब से बावा ने इन चीजों पर नजर रखनी शुरू कर दी। भूत-प्रेत, छाया, छल छिद्र-हर तरह की विघ्न-बाधाओं की परख का विचार मन में रख. कर उन्हें अपने पास से देखा। मृत आत्माओं को बुलाकर उनसे बातचीत करते हुए बाबा कई बार देखे गए । भैरों, नागराजा, नरसिंह आदि देवताओं की पूजा अपने हाथ दे-दिलाकर उनके क्रोध को शांत किया। कुछ समय के बाद धावा को लगा कि देवी-देवता कोई चीज नहीं है, मात्र लोगों की कमजोरी है, मन की दुबैलता है । और इससे भी ज्यादा अगर कुछ है तो पुराने विश्वास और पुरानी परंपराओं की मार है । इन देवी-देवता और भूत-प्रेतो ने इस प्रदेश को आतकित कर दिया है । आदमी हर वक्त डरा-डरा रहता है । जाने कब कौन देवता सिर उठा ले और अपनी मांग ले बैठे ! मांग पूरी हो जाने पर ये देवता चुप हो जाते है। जैसे वेतन-भत्ता बढ़ जाने के बाद सरकारी कर्मचारी हड़ताल तोड़ देता है। लगता है, सरकारी कर्मचारी और भूत-प्रेत में ज्यादा अंतर नहीं। दुनिया की खबर नागा बाबा रखते हैं। उन्हें इस बात पर आश्चर्य है कि [ २७ ] दुनिया का आदमी कहां से वहां पहुंच गया है। रूस वाले चंद्रलोक पर राहू की तरह मंडरा रहे है, अमरीका वालों ने वैकुंठ याना शुरू कर दी है। एक अपना देश है कि मूरज सिर पर चढ़ आया, फिर भी आंसें नहीं सुल रहीं। कभी नागा बाबा को चीना की बातें याद आती हैं। वह आदमी चाहे कैसा है, पाखंडी विलकुल नहीं। वह सारी बातें समझता है । लेकिन हजारों में एक अकेला भादमी क्या कर सकता है पिछले दिनों इसी बात पर वह पांडे गुरु से बहस पड़ा था। भूत-प्रेत और देवी-देवताओं से बात शुरू हुई और मध्यात्म-चिंतन पर आकर रुक गई। यात करना भी ना करने के बराबर होता है। जिन लोगों को यह बादत है, वे किसी कीमत पर उसका मजा नहीं जाने देते। अपनी बात दूसरों से मनवा कर ही शांति मिलती है । पाँडे गुरु को बातो का नगा मार जाता है । वात- बात मे दुश्मनी पैदा हो जाती है और तभी तो सही बात भी सामने आ जाती है। उस दिन अपने वेदशास्त्रों की चर्चा उठाते हुए पांडे गुरु बोले कि दुनिया को अध्यात्म-दर्शन कराने वाला गुरु यही भारत देश है । इस देश ने दूसरे देशों को सभ्यता दी, उन्हें अपना ज्ञान-विज्ञान दिया। हमारे दिए हुए ज्ञान-विज्ञान द्वारा ही इन देशी ने धरती-आकाश को छान मारा है । वरना इनके पास क्या था ? उस दिन पांडे गुरु की बातों को चीना चुपचाप सुनता रहा। पर जब पाडे. जी ने ज्यादा ही शेखी बाघारना शुरू किया, तो चीना से न रहा गया। बोला, "अव रहने दीजिए पाडेजी! आपने दूसरों को सब कुछ तो दे ही दिया है, फिर अपने लिए क्या रखा है।" "क्या मतलब?" पांडे जी तेजी में आ गए। "मतलब यही कि आपके पास यदि कुछ होता, तो उसका प्रभाव किसी-न- किसी रूप में आज हमारे जीवन पर पड़ा होता। लेकिन यहाँ तो कुछ भी दिखने में नहीं आता। माना कि यह देश धर्म-प्रधान है। अध्यात्मवादी है, पर उस अध्यात्म के लिए हमने भौतिक की हत्या क्या नहीं कर दी है ? आप लोग मानते है कि हमारे ऋपि-मुनियो को भौतिक जीवन में दिलचस्पी नही थी, पर अपनी उस अध्यात्म-साधना के द्वारा उन्होंने ऐसी कौन-सी मंजिल हमे दिखा दी है कि जहा पहुंच कर हमें अपने होने का पूरा एहसास हो। हमें लगे कि हा हम हैं । लेकिन नही, उस दिशा मे भी आज हम भटके हुए हैं। कोई एक विश्राम हमें नहीं दीख रहा।" [२८] इतना कहकर चीना चुप हो गया। पर पाडेजी चुप रहने वाले नहीं हैं। उन्हें अध्यात्म की लगन लगी है। बात-बात में उनका अध्यात्म आगे आता है। देखकर चीना को और आगे बढ़ना पड़ा। बोला, "पांडेजी ! मुझे तो लगता है कि आपने उस अध्यात्म के चक्कर मे इस दुनिया को भी खो दिया है । उस अध्यात्म का ही कमाल है कि आज हम अपने लिए भोजन-वस्त्र तक नहीं जुटा 'पाए हैं। भोजन-वस्त्र के लिए उन लोगों से याचना करते हैं, जिन्हें हमारे पूर्वजों ने म्लेच्छ कह दिया था। सात समुद्रों को पार करना हमारी मर्यादा में कहां था ? जब कोई सात समुद्रो की यात्रा करके इस देश वापस लौटता, तो चाद्रायण कर्म के बाद ही उसके हाथ का पानी गरी उतरता था। आज उन्ही समुद्री मार्गों से हमारे लिए खाना आ रहा है। इन आगे बढे हुए देशो से हमे क्या नहीं मिल रहा है। हमे खाना दे रहे हैं, कपड़ा दे रहे है, दवाइया भेज रहे है । बच्चों की पढाई- लिखाई के लिए सब कुछ मिल रहा है । तिस पर भी यदि कर्जे की जरूरत पड़ती है, तो इन्हीं लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ता है। इस लेन-देन के अलावा वात- बात में दूसरे देशों के उदाहरण देकर हमें समझाया जाता है। हम विदेशी भापा और संस्कृति के गुलाम है । पर चूकि आप मानते है, यह देश सबका गुरु है । इस- लिए शायद गुरु-दक्षिणा के रूप मे ही यह सब चला आ रहा है । ठीक है न?" चीना की बातों से उस दिन पांडेजी के भीतर एक चोट पडी। पांडेजी ने चुपचाप इस चोट को सह लिया। वे किसी को महसूस नहीं होने देते कि दूसरे की बातों से उनके भीतर कैसी हलचल पैदा हुई है । कितना बड़ा घाव पहुचा है । उस दिन चीना की बात को तुरंत मेट देने के ख्याल से पांडेजी ने तत्काल विषय को बदल दिया। पांडेजी हार मानने वाले नहीं है । लेकिन लंबी चलती हुई बहस में यकायक विषय परिवर्तन का क्या अर्थ है, इस बात को सब लोग नही समझते । अपनी बात पर चीना के वजनदार शब्दों की मार से पाडेजी मन-ही-मन तिल- मिला उठे । चार भादमियो के बीच चीना कुछ और न कह बैठे, सोचकर वे एकी- करण की बात पर आ गए। । गांव में रहने के बाद चीना गांव के बारे में बड़ी तेजी के साथ सोचने लगा था। गांव की कमजोरियों को अपनी आंखों से देख चुकने के बाद उसने कुछ लोगों [, २६ ] से बातचीत की। एकता और आपसी सह्योग से ही गांव में कुछ हो सकता है। लोगो ने उसकी बात को समझा और एक कमेटी बन गई । जिसका नाम 'एकता कमेटो' रखा गया। इस कमेटी द्वारा आज भी एकता पर बल दिया जाता है, ताकि सब लोग एकजुट होकर काम कर सकें। चीना और उसकी एकता कमेटी द्वारा रखे गए एकीकरण प्रस्ताव के पक्ष में पांडेजी कभी नहीं रहे । इम वक्त चीना को सही रास्ते पर लाने के ख्याल से उन्हें एकीकरण की बात पर आना पड़ा। एकीकरण की बात पर चीना ने निराशा जाहिर की। विभिन्न जाति, धर्म और विचारधारा के लोगों में एकता कैसे लाई जा सकती है। जिस देश में जात- पांत, धर्म-कर्म और मान-मर्यादा की दीवारें तन कर खड़ी हों, वहां एकता की वात उठाना ही व्यर्थ है। एकीकरण के प्रति चीना के निराश वाक्यों को जव पाडेजी सुनते हैं, तो मन- ही-मन मुसकराते हैं । स्साला. वडा आया एकीकरण वाला। चीना जानता है कि पाडेजो एकीकरण के पक्ष मे नही है। गांव में कुछ लोग ऐसा नहीं चाहते । क्यो नही चाहते, यही बात समझ मे नही आती। शुरू में जब एकता कमेटी की स्थापना हुई तव पाडेजी भी इस कमेटी के सदस्य बने थे। कमेटी को कार्यकारिणी में दस आदमी रखे गए। साधारण सदस्यों की संख्या पच्चीस तक पहुच गई थी। इन सब लोगों ने मिलकर कमेटी का विधान बनाया। विधान के नियमो, उप-नियमों में एकता और संगठन की बात पर जोर दिया गया। धीरे-धीरे कमेटी का काम जोर पकड़ने लगा। लोगों की समझ मे बात आने लगी कि एकता और संगठन के द्वारा ही गांव और पिछड़े प्रदेश को उन्नत बनाया जा सकता है। इसलिए आस-पास पड़ने वाले सभी गांवों को इस संगठन मे लाना होगा। गांव के आपसी छोटे-मोटे झगड़े और मन-मुटाव के कारण एक तनाव-सा हर वक्त मन में बना रहता है। एकता कमेटी इन झगड़ों पर उचित निर्णय लेगी। इसके अलावा गांव में का काम, स्कूल, लाइबेरियां खुलवाना, सडक बनवाना, शराब की भट्टियों को बंद करवाना, त्यौहार, मेले, उत्सव आदि मनोरंजन कार्यों को सामूहिक रूप से संपन्न करवाना, कमेटी के विधान में सर्व सम्मति से स्वीकृत करा लिया गया। लोगों में उत्साह भर माया। एकता कमेटी द्वारा [ ३० ] पहला वार्षिक उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। सामुदायिक विकास के अधि- कारी लोगो ने उत्सव में भाग लिया । उत्सव में एक वरिष्ठ अधिकारी आए । अपने भाषण मे उन्होने इस कमेटी की प्रशंसा करते हुए कहा कि भारतीय गावों का विकास ऐसी ही कमेटियो द्वारा हो सकता है। पंचायत-राज का मकसद यही है कि गांव के लोग अपनी उन्नति का सही रास्ता अपना सकें। अधिकारी ने सामु- दायिक विकास का अर्थ लोगों को समझाया। गांव के बच्चे-बूढ़े सभी ने तन्मय होकर उनके भाषण सुने । सबको इस बात का विश्वास हो गया कि एक दिन यह कमेटी गांव के लोगों में नई जिंदगी भर देगी। अधिकारी लोगों ने आश्वासन दिया कि गांव के लिए विकास कार्यों में सरकार हर तरह से सहयोग देती है । इस कमेटी को जब भी सहायता की जरूरत पडे,हमसे सम्पर्क करना होगा। आश्वासन मिलने की देर थी कि कार्यकर्ताओ में जोश भर आया। लोगों में एकता की भावना जगने लगी।सामुदायिक ढग से विकास की शुरूआत होने लगी। लेकिन प्रश्न उठता है कि विकास कोन करे ? जिस धरती का बेटा पेट से निकलते ही शहर की ओर भागता है, उस घरती का कल्याण कैसे होगा ? विकास का क्रम तो आदमी के साथ जुड़ा हुआ है । इन गांवों में आदमी कहां है । इतना बड़ा गांव है लेकिन आदमी कोई नहीं। केवल स्त्रियां हैं, या फिर बच्चे-बूढे ही सर्वत्र दिखाई देते हैं । इनके द्वारा कैसे विकास संभव है। इस बात को देखते हुए एकता कमेटी में प्रस्ताव पास किया गया कि गांव के युवकों को जहां तक संभव हो, गांव में ही रोक रखना चाहिए। फिलहाल कुछ इस तरह से सोचा जाए कि उसकी रोटी. रोजी की समस्या गाव या उसके आस-पास ही हल हो सके । कमेटी ने यह भी नियम बना लिया है कि शहर से गांव लौटने वाले आदमी को गाव वालो की तरफ से कुछ सुविधाएं मिलनी चाहिएं। गाव की दिक्कतों को देखते हुए लंबे समय तक शहर में रहने वाला आदमी अंत में वही बसने की कोशिश करता है। गांव वालों द्वारा यदि ऐसे लोगों को सहायता पहुंचाई जाती है, तो वह खुशी से वापस आकर गाव में रहने लगेंगे। सह्योग न मिलने का नतीजा है कि आज गाव के गांव खाली हो चुके है । दरवाजों पर ताले पड़ गए है और थोड़ी-बहुत जो उपजाऊ. जमीन है वह भी वंजरभूमि में बदलती जा रही है। विकास की लहर है । सामुदायिक विकास की बातों को दयालजी माहब [ ३१ ] अच्छी तरह समझते हैं। इस महकमे में एक अधिकारी के पद पर उन्होंने काम किया है । नौकरी से अलग हो जाने के बाद दयालजी साहब को बहुत-सी यातों का ज्ञान हुआ। उन्होंने लोगों को बताया कि माम काम में फर्क होता है । कागजी कार्यवाहियों से किसी का कल्याण नहीं हुआ। अब जाकर उनके अनुभव मे बात आई कि अपनी कीमत पर, आदमी को जीने के लिए कड़ी मेहनत की जरूरत नौकरी याद दयालजी साहय का गांव लौट आना एक बड़ी बात थी। दयालजी साहब जाते भी कहां? जहाज का पंछी धूम-फिरकर वही आता है। वह अन्यत्र कहा जाएगा। जवानी का न सही, बुढापे का अनुभव भी अगर दूसरों को मिल जाए, तो बड़ी बात है। इस अवस्था में सेवा-भाव मन में रखना चाहिए । वक्त ने दयालजी साहब को वैमा ही कुछ बना दिया है। उनके अंदर यही सब देखते हुए इस बार दयालजी साहब को ही लोगों ने एकता कमेटी का अध्यक्ष चुन लिया है। दयालजी साहब को निगरानी में एकता कमेटी के कार्यक्रम चलने लगे हैं। उन्हे गाव की प्रगति मे कम दिलचस्पी नही। गाव का भविष्य उज्ज्वल दिखाई देने लगा है। अतीत को न भूलने वाला आदमी ही भविष्य द्रष्टा हो सकता है । दयालजी साहब अपने अतीत को भी प्रायः देख लेते हैं। उन्हें याद आता है--गांव लौटे हुए अभी ज्यादा समय नहीं हुआ था कि दिन-दिन भारी पड़ने लगा । दयालजी साहब इस भारीपन को झेलने के आदी हैं, पर बिरजा बहू का का क्या हो ! वह तो गांव में कदम रखते ही खासी तंगी महसूस करने लगी थी। दिन-भर सुस्त बैठे रहना और अपनी कलाइयों को देखना, उसका काम था। विरजा बहू की उजली गोल-गोल कलाइयां, मांसल-मोटी खूबसूरत कलाइया । इसी तरह विरजा बहू एकांत मे, रेसमी कपड़ों से लिपटी हुई अपनी स्वस्थ काया को उघाड़कर भी देखती होगी। जब वह शहर मे थी, तो हर वक्त शीशा उसके सामने रहता। शीशे में कभी अपनी खूबसूरत आंखों को, कंपो की मांसलता और कभी सारे बदन को वह देखती। आज भी विरजा को जाने कितना कुछ याद आता है और तब वह अपने आप में मगन बैठी रहती है। गांव में आकर दयालजी साहब को भी सुस्ती ने घेर लिया था। बिरजा कभी चाय बनाकर दे देती, तो उनकी मौनता भंग होती। चाय पीते और घर के [ ३२ ] आगे फैले हुए सेंमल के पेड़ की तरफ देखते रहते । विशालकाय सेंमल को टहनियों पर खिले लाल फूलो को देखते रहना ही उन्हें अच्छा लगता था। सैंमल के खिले फूलों को देखकर पुराने गीत को कोई पंक्तिया उनके ख्यालो में आ जाती- यो संसार फूल सेंवल को सुगना देत लुभायो... मारी चोंच जब निकसी रूई, सिर धुन-धुन पछतायो। -~~तूने हीरा जनम गंवायो...। अव तक यह मन का सुग्गा जाने कहां-कहां भटकता रहा है। कैसी-कैसी वाल्पनाएं करता रहा । जीवन सचमुच सेंमल के फूल की तरह लगता रहा। एक स्वप्न की तरह । जिसके टूटते ही दयालजी साहब को लगा कि अव सिर धुन-घुन पछताने की ही वात रह गई है । सारा जीवन शहरो मे खप गया। तब दयालजी साहब के मन में यह बात कभी नहीं आई कि जीवन सेंमल के फूल से अलग कुछ और भी हो सकता है। उन्होंने कहां सोचा था कि दफ्तर में कलम चलाने के अलावा दूसरे काम भी आदमी को करने पड़ते है। शहर की आबोहवा और रंगीनियो को देखने के लालच से गांव के लोग साल-छ: महीने मे एकाघ मर्तबा दयाल साहब की कोठी पर उतर जाते। अच्छी-खासी कोठी दयालजी साहब को मिली थी। कोठी के आगे लंबा-चौड़ा एक खेत भी उसी में शामिल था। जहां गुलाब के पौधे नजर आते थे। कोठी के भीतर दो नल थे । बाहर खेत में भी एक नल छोड़ दिया गया था। गांव के लोग उस गुलाब की फसल को देख ग्युश हो लेते। साथ ही उन्हें महसूस होता कि यह फसल किस काम की है। दयालजी साहब को गांव के लोगों ने कई बार कहा कि पानी तुम्हारे घर के आगे आया है। जमीन भी यह खासी अच्छी है । इसमे ढेरो साग-पात उगाया जा सकता है । क्यो नही यहां कुछ वो देते हो । लेकिन गाव वालों की बात पर दयालजी साहब मन-ही-मन मुसकरा 1 गांव के लोग कहते-चलो, ऐसा न सही, घर का मकान तो मरम्मत करवा लो साहबजी ! उसकी छत तो उतरती जा रही है। दीवारें फट रही हैं । उसकी मरम्मत न हुई, तो फिर मकान की पूरी कीमत में वह सड़ा हो पाएगा। गांव के बीच का मकान है, गांव की शोभा है। गांव के बीच कोई मकान खंडहर [ ३३ ] 'की शक्ल में नजर आए, यह किसी को अच्छा नहीं लगता। फिर आने-जाने वाले लोग मकान की हालत देखकर जो समझते हैं, वह यही कि इस घर का मालिक...। लेकिन दयालजीसाहब को न मकान को चिंता थी,न जगह-जमीन की। नौकरी ही कुछ सव है । नौकरी से जो मिलता है, वही सब कुछ है । उसी में दो लड़को को पढाया। लड़की की भी शादी की । और अब पचपन वर्ष की उम्र में आकर वह सब कुछ छूट गया । नौकरी गई, उसके साथ कोठी भी गई। शहर छूट गया। मजबूरी आ.पड़ने पर गांव की याद आई। सोचते हैं दयालजी साहब, गांव वालो के कहने मुताविक कोठी के आगे फैले हुए सेत मे सब्जी उगाई होती। घर का मकान ही मरम्मत किया होता। जगह-जमीन किसी के हवाले कर दी होती, तो आज वह किसी-न-किसी रूप में आवाद मिल सकती थी। अब जमीन की मेढ़ पर उगे पास और मोटी जडवाली काटेदार झाड़ियो को देखकर हिम्मत नहीं रह जाती। हवा में झूलती हुई मकान की छत और दीवारों पर उगे घास को देखकर वे बातें याद आती है कि इस घर का मालिक। गाव वालों को सहानुभूति भी तभी तक थी जब तक वे कोठी लेकर शहर में रहते रहे। नौकरी करते रहे। इन चीजों से अलग होते ही लगा कि दुनिया ही बदल गई है। गाव वालों का रुख बदल गया है। उनके दिल-दिमाग दयालजी साहब को वदले हुए लगते हैं। इतना ही नहीं,तरह-तरह की बातें ये गांव के लोग करते हैं। चालीस वर्ष तक शहर में रहने वाला परिवार गांव लौटकर क्या कर सकेगा?हां, जेब मे पैसा हो, तो दे-दिलाकर कुछ करवा लिया जा सकता है। लेकिन दयालजी के पास पैसा भी इतना कहां है। बच्चो की पढाई और लड़की की शादी में आधी से ज्यादा रकम तो निकल गई है। दयाल साहब समझते हैं कि गाव के लिए इतना पैसा कम नही । पैसा शहर के लिए जरूरी है। गांव पैसा नहीं मांगता। वह तो शक्ति चाहता है, तंदुरुस्ती और मेहनत मांगता है, साथ में गुजारे लायक, ईमानदारी भी... दयाल साहब के पास पैसा और ईमानदारी थोड़ी-बहुत मिल सकती है, पर मेहनत और तंदुरुस्ती कहा है। गाव के लोग तो उसी का साथ देंगे जिसकी भुजाओं में दो घोड़ी का बल हो और घर पर कोई जनाना जात ऐसी हो, जो दयालजी जैसे चार मदों का मुकाबला कर सके। ऐसा ही आदमी गाव का जन्मजात असली बसाकत है। शुरू मे दयालजी साहब से गांव वाले कतराते रहे। कहीं कुछ काम के लिए [ ३४ ] - न कह बैं। शायद इसीलिए कन्नी काट जाते। बड़े मतलवी लोग है। आना-जाना, मेल-मुलाकाल और बातचीत भी कुछ नहीं। बातचीत दयालजी साहब से भला क्या हो! वे करेंगे रूस-अमेरिका की बात और ये गांव वाले...। हलजोत की बात हो, कोई खेल-सलिहान की वात हो, गन्ने-गुड़ की बात हो, तो कोई बात हो सकती है। रूस-अमेरिका की बात हमारे किस काम आने वाली है। अब तो ये बातें दयाल साहब के काम की भी नहीं रह गई हैं। कुसियों पर बैठने का यह नतीजा है कि आदमी जमीन पर कदम रखते ही अपने को कही का नही पाता। दयालजी साहब के भीतर कुछ टूटता रहता है । हवा के झोंके से सेंमल की हर शाव थरथराती है । दयाल साहब की आखें छत की ओर उठती हैं । कहीं कोई स्लेट या छत का तखत तो हवा में नहीं लहरा रहा। लेकिन बरसात से पहले मकान का कुछ बिगड़ने वाला नहीं। सेंमल के लाल फूलों पर नजरें जा बैठती हैं। --मारी चोंच जब निकसी रूई.."। सच है, यह संसार सेंमल के फूल जैसा ही है । दिखने में खूब-सुदर..। लेकिन भीतर से खाली है । दयालजी की आत्मा सेमल के फूलो मे भटक रही है । धिरजा बहू चाय बना लाती है, तो पी लेते है । खाने पर बुलाती है, चले जाते है । कुछ कहती है, तो चुपचाप सुन लेते हैं। उनकी चुप्पी विरजा के लिए परेशानी का कारण बनी है। वह इसलिए भी परेशान हो सकती है कि अब उसकी नंगी कलाइयों पर दयालजी साहब की नजरें ज्यादा देर तक नहीं टिक पाती। नजरें मानो असमर्थता जाहिर कर रही हो। विरजा की कोमल बाहों को देख दयाल साहब भी बेचैन रहने लगे हैं । नौकरी में सारी उम्र 'निकल गई। आराम से वक्त कट गया। कष्ट क्या चीज है, इस बात को शरीर ने जरा भी अनुभव नहीं किया। लेकिन अब इस बदलते हुए वातावरण मे जिंदगी को एक मंदम भी आगे बढ़ाना, दुःख-तकलीफों से खाली नहीं लगता। आगे की तरफ नजर जाती है, तो अधेरा घना नजर आता है । इस अंधकार को तोड़ना है, वरना यही जीवन शेप हो जाएगा। शरीर में शक्ति हो, मुसीबतें सामने हजार हों और आदमी उनमे जूझता हुआ आगे निकल जाए। दयालजी साहब दिल को मजबूत बना रहे हैं। गाय के दुःख-दर्द और कठिनाइयों को आत्मसात् कर लेने की तैयारियां कर रहे है । गाव में आए हैं, तो [ ३५ ] ।
पूरी तरह गाव का बनकर रहना है। सफेद-पोशी को कम करना है, सिगरेट की जगह हुक्का इस्तेमाल में लाना होगा । रूस अमेरिका को भूलकर गन्ने-गुड़ की वात करनी होगी। भैस-ववारी की बात · | दयालजी सब करने को तैयार है, पर विरजा का क्या हो? उसका ख्याल बिलकुल पीछा नहीं छोडता। सोचकर दयालजी सुस्त हो जाते । कसा परिवर्तन है। विरजा को वह कितना प्यार करते थे। लगता है कि अब वह मन के उतने करीव नहीं, या वे स्वय ही उससे दूर होते जा रहे हैं। बिरजा की गोल-मोल उजली वाही से उनका ध्यान हटता जा रहा है। शहर में रहते हुए वे विरजा के सौंदर्य मे वृद्धि की कामना ही करते रहते । लेकिन गाव के इस वातावरण मे, उस तरह की चमक-दमक और खिंचाव से मन हट गया। यह मिट्टी ही ऐसी है कि मन मे वैसा कुछ नही रह जाता। बिरजा की अपेक्षा अव गाव को दूसरी औरतें ही दयालजी साहब को भली लगती है। अलगोजे-सी पतली कलाइया, वैगन जैसी गोल और उठी हुई नासिका और सबके चेहरे जैसे धूप मे सुखाए हुए गोभी के फूल हों। दिन-भर घोड़ों की तरह काम में लगी रहती हैं। धन्य हैं ये गाव की औरतें...! दयालजी के पास ये औरतें कभी आती हैं तो वात-ही-बात में कह देती हैं-काम सवको प्यारा है, चाम किसी को प्यारा नहीं। उनकी बातों का अर्थ विरजा समझ तो जाती है, पर कहती कुछ नहीं। समझ तो तभी गई थी, जव शहर से गाव लौटी थी। उसी दिन महसूस किया कि कलाइयो का यह गोरापन और गहने-कपड़ों को चमक-दमक गाव के लिए किसी काम की नहीं। ये बातें शहर के लिए जरूरी है। गांव वाले इन चीजों को बर्दाश्त नहीं कर पाते। गाव की सुंदरता शरीर में नहीं। शरीर के अंदर रहने वाली उस शक्ति मे है, जो गोबर कीचड़ से खेलती है । घास-पानी, चौका- वर्तन और फिर रात-दिन मिट्टी में लोटती है, उस शक्ति के विना सुंदरता का कोई मूल्य नहीं। काम सवको प्यारा है ! विरजा बहू मन-ही-मन उबलने लगती। क्या जिंदगी है इन गांव वालों की। रात-दिन काम। आराम का कहीं नाम नही। आखिर इतना सारा काम किसलिए है ? जीवन में कभी एक साथ मिल-बैठकर कुछ उड़ाया नहीं, तो क्या कमाया। रात-दिन कमाने पर जोर है । यकायक विरजा को ख्याल आता है कि यह खाने कमाने की बात जैसे उसी को लेकर उठ खड़ी हुई [ ३६ ], ।
। है । सब लोग तो अपना काम कर ही रहे हैं। मैं ही हूं, जो कुछ नहीं करती। खाते. कमाते सब अपने लिए हैं, पर दूसरे को बेकार बैठे भी नहीं देखना चाहते । गांव के रिवाज के मुताविक न चलने वाला आदमी गांव-भर के लिए एक तरह का बोझ बन जाता है। इन लोगों को मेरी सामथ्र्य पर सदेह होने लगा है। ये समझते है कि शहर में रहने वाला आदमी जैसे कुछ कर ही नहीं सकता। सोचती रही बिरजा बहू। सोच-सोचकर कममसाती रही। गांव के जीवन में उतरने की शुरूआत कहाँ से हो। सत्रको काम प्यारा है, तो यह भी अब पीछे नहीं रहेगी। तब पहली बार चीना ने विरजा बहू को घर से निकलते हुए पाया। चिट्- उजली कलाइयां और हाथ में पैनी धार वाला हसिया । देसूं, क्या करती है। सोचता हुआ चीना उसके पीछे हो लिया । कुछ ही दूर खेत में पहुंचकर विरजा ने देखा, उसके खेत कंटीली झाड़ियों से गुंथे हुए है। गांव की जिंदगी इसी तरह कांटों की सेज के मानिंद उसे लगने लगी। इन्ही काटों के ऊपर कदम रखकर चलना है। सोचकर उसने झाड़ियों पर दुहत्थी धावा बोल दिया। देखकर चीना मन-ही-मन मुसकरा उठा। वह जानता है कि शरीर की शक्ति मे बढ़कर यदि कोई चीज है, तो वह आदमी की हिम्मत ही हो सकती है। किसी काम के लिए यदि मन मे उत्साह पैदा नहीं होता, तो सारी शक्ति धरी की धरी रह जाती है। बिरजा बहू मे यह हिम्मत देखकर वह प्रसन्न हुआ। पास जाकर बोला--"क्यों भौजी, इन झाड़ियों को एक ही बार मे सफा करने की ठान ली है ?" बिरजा ने गुडकर देखा, चीना को अपने पास खडा पाकर वह धीरे-से मुसकरा दी। वोली, "जितना कुछ हो सकेगा, वह करूंगी।" चीना उसके पास बढ़ आया। बोला-~- "अच्छा, तो थोड़ा ठहर जाओ। यह हसिया मुझे दो। आज बैठकर तुम सिर्फ इतना देख लो कि किस तरह झाड़-झंखाड़ का सफाया किया जाता है। इसके बाद तुम सब कुछ सीख जाओगी। उसकी फूल-सी काया पर तरस साते हुए चीना ने उसके हाथ से हसिया ले लिया और देखते-देखते एक खेत की मेढ साफ कर डाती। फिर बिरजा भौजी को दूसरे खेत में ले जाकर, बातों-बातो मे उसने दूसरा खेत भी बना लिया। फिर । [ ३७ ] तीसरा और चौथा विरजा को गांव की बातों में लगाकर यह काफी काम कर गया। भूल गया कि उसे अपना भी कुछ काम करना है । लेकिन अपना क्या काम पड़ा है चीना का ! बीवी-बच्चे नहीं। आगे-पीछे कुछ भी तो नहीं है उसका । खेती की कुछेक टुकडियां है, उन्हें चाची के सुपुर्द कर दिया है। लोग कहते हैं कि वह सच्चा समाज सेवक है, पर साथ ही उनका कहना है कि ज्यादा मच्चाई भी किसी काम की नहीं। उस दिन शाम होने पर वह विरजा भौजी को अपने साथ घर लौटा लाया। आज वह कितना काम करके आई है, यह बात चीना ने जब दयालजी को बताई, तो वे प्रसन्नता से फूल उठे। मोना कसौटी पर खरा उतरने वाला है. सोच- कर उनका पुरुषत्व जाग उठा और तब वे विरजा के साथ स्वयं भी खेतों की ओर जाने लगे। एक ही दिन में हथियार चलाने की कला वे विरजा से सीस गए। तब अपनी जमीन मे रोज ही कुछ न कुछ कर आते। फिर कुछ दिनों के भीतर वह बीहड़ वाझ धरती अच्छे किसान की खेती जैसी लगने लगी। एक साथ मिलकर काम करने मे इन दोनो प्राणियों को जिस आनन्द का अनुभव होने लगा, वह जीवन में पहली बार मिल रहा था। तब से इस आनंद की खोज बराबर रहने लगी। बिरजा बहू की कलाइयां पहले जैसी आस्पंक नही रह गई थीं, पर दयालजी साहब अब उन बाहों में ज्यादा खूबसूरती पाते हैं । दयालजी के मन में संतोष है कि एक नई दुनिया का निर्माण होता चला जा रहा है । अब दयालजी साहब को एकता कमेटी का अध्यक्ष चुन लिया गया है। उनके अनुभवों मे फायदा उठाने की बात है। खेती में गाव वालो की दिलचस्पी बढने लगी है । जब उजडा घर बस सकता है, तो वसे हुए घर तरक्की क्यों न करेंगे। सरकारी अनुदान से सड़क और पानी की व्यवस्था गांवों में हो गई है। पास पडने वाली नदियो से छोटी-बड़ी गूलें निकाल ली गई हैं। पानी घर के पास तक पहुचने लगा है। लेकिन जमीन का क्या हो । लोगों के पास इतनी जमीन कहां है कि साल-छः महीने के लिए भी दाना मिल सके । जमीन की कमी के कारण भी लोगों को बाहर जाना होता है । शहरो की खाक छाननी पड़ती है। इस समस्या का हल क्या है? तब एक दिन चीना की नजर भैरोंधार पर पड़ी। उपजाऊ और इतनी लंबी- चौड़ी जमीन को लोगों ने बंजर बनाकर छोड़ दिया है। क्यों न इस जमीन को [ ३८ ] आवाद किया जाए। सोचकर चीना ने भरोधार की जमीन को आबाद करने का प्रस्ताव मीटिंग में रख दिया। मीटिंग में इस प्रस्ताव के आते ही हंगामा मच गया। सदस्यगण धवरा उठे। अब यह आदमी जरूर कोई अनिष्ट खड़ा करने वाला है। इस गांव मे रहे-सहे लोगों की जान लेना चाहता है। भरोधार पर हथियार उठाना भला किसकी मजाल है कि उधर देख भी सके ! भैरों महाराज के प्रकोप से आदमी क्या-पशु-पक्षी तक इस गांव में न वचेगा। हैजा, महामारी और तरह-तरह की विघ्न-बाधाओं को निमंत्रण देना है। कमेटी के सदस्यों ने साफ कह दिया कि उस जमीन के बारे में कुछ भी सोचना हमारे बस की बात नहीं है। कुछ सदस्य तो इस प्रस्ताव के आते ही मीटिंग से उठकर चल दिए। उस रात चीना को नीद नहीं आई। वह रात-भर सोचता रहा । भैरो देवता की यह कैसी पकड़ है जो आदमी को सोचने-समझने तक का मौका नहीं देती। इन देवताओं ने आदमी को जकड़ लिया है, या फिर स्वयं अपनी कमजोरियो के कारण आदमी जकड़ा गया है। सोचता है चीना-देवता देवता ही हैं। वे हवा में रह सकते है, पानी में निवास कर सकते हैं । देवताओ के लिए रहने-बसने की क्या कमी है । जरूरी नहीं कि देवता धरती पर ही रहे। धरती का वासी तो आदमी ही है । यह भैरो महाराज इतनी लंबी-चौड़ी जमीन को हड़प किए बैठा हुआ है। इन देवी-देवताओं ने भी गाव के आदमी को शहर का रास्ता दिखाया है। सोच- समझ की कमी के कारण आदमी बनमानुप की तरह इस धरती पर रह रहा है । शोषण का एक तरीका यह भी है कि आदमी को तत्र-मंत्र और अध्यात्म की तरफ मोड़ा जाए। उसे मोक्ष को घुट्टी पिला दी जाए। ताकि वह अपनी समझ की एक सीमा बनाकर रहे और बार-बार उसी सीमा से टकरा कर रह जाए। रास्ते बंद हो जाते हैं, तो चेतना अपने आप स्थिर हो जाती है । इसी बात को नागा बावा ने एक दिन अपने प्रवचन में बड़ी मंजीदगी के साथ रखा था। उन्होंने कहा था-"जहां नौवन है, मोक्ष भी वहीं है। मरने के बाद तो आदमी भूत-प्रेत ही बन सकता है।" सोचता है चीना-कहा है जीवन ? लोग केवल जिंदा है वह भी अपनी कीमत पर नही, देवी-देवताओं की कृपा पर। उनकी प्रसन्नता की भीख लेकर जिंदा है । अपने आप को कहीं-न-कहीं समर्पित कर देने के बाद जिंदा हैं । [ ३६ ] 1 भैरों देवता, नरसिंघ देवता, गोल्ला देवता । देवता नही, भूत-प्रेत"। चीना रात-भर सोचता रहा। इस मर्ज की क्या दवा हो सकती है, पर दवा हो क्यो नहीं सकती। कुछ दिनों बाद फिर मीटिंग बुलाई गई । भरोधार की जमीन पर हल जोत करने की चर्चा उठाने के पहले चीना ने अपना सपना सुनाकर सदस्यो को चक्ति कर दिया । आधी रात के वक्त भैरों महाराज उसके सपने में आए और अपना रूप दिखाते हुए बोले कि गाव की बूढी दादी ने मेरी थाती पर जो रेख खीच दी है उसके भीतर हलजोत करने से गढ़ा हुआ सोना मिल सकता है । तुम्हारे पुरुखों ने वहा मोने का गड़त कर रखा है । तुम चाहो तो उसे अव बाहर निकाल सकते हो। चीना का सपना सुनकर सदस्यों को आश्चर्य होने लगा। साथ ही विश्वास हो आया कि बात बिलकुल सही है। भैरोधार की इस बीहड़-बाझ घरती का त्यागन भी दादी के एक रात के सपने का कारण है । पच्चीस वर्ष पहले दादी को सपना दिया था भैरो महाराज ने। दादी के सपने में आकर बोले कि–गाव की अलावला मेरे ऊपर आ गई है, इसलिए मेरा ध्यान भंग हो गया है । दादी को यादेश दिया था कि-तू मेरी भक्तिन है । ऐसा काम कर, जिससे मेरा ध्यान फिर से जम जाए। मेरी जोत जगी रहे, तभी तुम गांव वालों को सुख-शाति मिल सकती है। सुबह होते ही दादी ने भैरोंधार के उस सारे इलाके पर लक्ष्मण-रेखा खीच दी और गाव-भर में ऐलान कर दिया कि जो इस रेखा का उल्लंघन करेगा, भैरो महाराज उसका जाने क्या अनिष्ट कर देंगे। इस बात को गाव के सभी लोग जानते हैं। मीटिंग में जब चीना के सपने की चर्चा उठी, तो बूढे लोगो ने उसकी बात का समर्थन किया। दादी का वह सपना बिलकुल सही था। सपने का बयान करते हुए, भैरों महाराज का आदेश दादी द्वारा सुनाए जाने पर भी लोगों ने भैरोधार पर डंगर छोड़ दिए। इत्तिफाक से जीतू की सजीली जोड़ी का एक बैल भैरोंधार से फिसल कर निकम्मा हो गया। उस पूरे वर्ष जोड़ी का वैल न मिलने के कारण उसकी जमीन बांझ रह जाती, यदि वह खीमू मिस्त्री के हाथ न जोड़ता तो...। खीमू मिस्त्री ने अपने ठाकुर से कई बार हाथ जुडवाए, मिन्नतें करवाई, तब जाकर अपना हल-बैल उसे दिया। [४] - आदेश का पालन न करने से भैरों महाराज वलि न लेगा तो क्या करेगा। वही हाथ ग्वीमू मिस्त्री के लिए जुड़ते हैं और वही भैरों महाराज के लिए। भैरों महाराज और उस अछूत में जैसे कोई फर्क ही नहीं। भली करें भैरों महाराज! देवता के प्रकोप से गांव बचा रहे, सोचकर दादी आज भी उस तरफ धूप-बत्ती दिखाती है, दूध मिले जल का अरघ चढाती है । और खाते-पीते उसका सिमरन कर लेती है। भैरोंधार के बीचों-बीच-टिप्पे मे, गांव का यह कुलंकारी देवता विराजमान है और ठीक उसकी नाक के नीचे है--सुंदर, समतल फैली हुई जमीन। । चीना ठीक कहता है। उसे जरूर सपना हुआ है। कभी-कभी यह देवता लोगो के सपने में माता है और कई बातें बता जाता है। चीना की बात में सच्चाई पाकर मीटिंग मे उस पर विचार करने का निश्चय किया गया। एक आदमी को भेजकर दादी को उसी वक्त बुलाया गया । दादी सपने का अर्थ निकालने में माहिर है। सपने के अलावा आंख की फड़क, दिल की धड़क और शब्द-सुगें का संकेत तथा उनका खुलासा, दादी के अलावा दूसरा कोई नहीं कर सकता। मीटिंग में आकर दादी ने सपने की बात जब सुनी तो उसे कुछ घबराहट-सी महसूस होने लगी। फिर चीना की ओर देखती हुई दादी बोली-~"तेरा सपना सच है रे ! तेरा बाप इसी भैरों महाराज का भक्त था। उसी भक्ति के कारण तू पैदा हुआ है । अव भैरों महाराज ने तुझे सपना दिया है, तो यह भी भक्ति का ही परताप है । भैरोंधार की खुदाई करने से गढ़ा हुआ सोना जरूर मिलेगा।" दादी की राय लेना जरूरी था। उसकी ओर से कोई रुकावट न होते देख मीटिंग में लोगो के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई। गढ़ा हुआ सोना मिल गया, तो सभी के भाग खुलेंगे । सब लोग मिलकर हिस्सा बंटा लेंगे। दूसरे दिन से दादी का प्रचार शुरू हो गया। दादी के पच्चीस वर्ष तक धूप- बत्ती दिखाने का नतीजा है कि भैरों महाराज ने गांव के लोगों पर कृपा की है और चीना को सपना दिया है । अगले दिन भैरोंधार पर खुदाई का काम शुरू हो गया। बन्ध्या धरतो की कुंआरी देह पर पहली चोट चीना ने अपने हायों से दी। इस पहली चोट में कुदाली की देह झनझना उठी। चीना के हाथ कांप गए। थोड़ी आशंका उसके मन में व्यापी ।भैरों महाराज की सरहद के भीतर उसने हथियार चला दिया है। कहीं कोई अनिष्ट देखना न पड़ जाए। निरंकार, भैरों महाराज [ ४१.]
को गरहद। राधमण-रेमा को तरह । महाप्रतापी रावण दम रेमा के इर्द-गिर्द टापता रह गया । उम रेगा को लापकर नीतर जाने की हिम्मत उसमें वहां थी ? लेकिन धोना को हिम्मत देगते ही बनती है। मिट्टी को तह के नीचे जमे हुए परयर पर यह चोट पड़ी। देवता की पानी पर हथियार उठाना फम साहस या काम नहीं। लेकिन कुछ न हुआ, होगा भी कुछ नहीं। धोना को लगा कि अब तक कलाइयो को जरर कर रणने वाली कोई जजीर तहमा कर टूट गिरी है। हाय की स्वतंत्रता के माय अब तो उसने मस्तिष्क को भी पूरी तरह स्वतंत्र पाया। - दूमरी घोट पड़ी। कुदाली का लोहा मिट्टी को जमी हुई परत को फाड गया। फिर तीसरी चोट और उसके बाद लगातार पोट पर चोट...। एक नहीं कई कुदालिया एक साथ भरों महाराज की याती पर चोटें करने लगी। रम-शोपक वृक्षो को गिराया जाने लगा। कंटीली झाड़ियों का इस तरह से सफाया किया गया कि जैसे तेज उस्तरे से दादी को पोट डाला हो । घरती के गर्भ में धंसी हुई काटेदार झाड़ियों की जड़ो को दु.मती दाढ़ की तरह गोमा सीप लिया गया और इसके बाद सारे गाव के मद-औरतों ने मिलकर भरोधार को उलट देने का लिम्चय कर लिया। दम जमीन के एक किनारे पर कमजोर चश्मा है। भैरों महाराज का पानी...। समतल धरती पर यह पानी कुछ दूर फैलकर रह गया है। जिसके कारण परती का यह कोना सदा हरा-भरा दिखाई देता है । इस पानी को कोई नहीं पीता । एक बार जिद मे आकर पुरुषोत्तम ने यह पानी पी लिया कि जिंदगी- भर गठिया-बात ने उमकी गठरी बनाकर रख दी और अंत मे बेचारा जव मरा, तो खूब झीक-झोक कर मरा । भरों महाराज के पानी को जूठा भरने का यही नतीजा उसे मिला। इस पानी की बदौलत झाड़-पिझाड और कांटेदार पेड़ इस देवता की धरती पर उग आए हैं । जंगली फूल-फलो वाले इन पेड़ों पर खूब सुदर फल निकल आते है। डालियां सद जाती हैं । "भैरों महाराज ही इन फल-फूलों को पाता होगा।" गांव के बच्चे आपस में बातें करते हैं । "हा रे भइ ! आजकल भैरों देवता पके हुए मेहलू, अंजीर और शहतूत के मजे चख रहा होगा। देखकर मुंह में पानी भर आता है।" छोटे-बड़े पड़ो पर नर्म पत्तियो की घास और जमीन पर उग पाने वाले [ ४२ ] .
मखमली घास को देखकर गांव की घसेरियां ललचा कर रह जाती। पर क्या मजाल कि घाम का एक तिनका भी छू ले । गाय-भैसों के थन से दूध के बदले खून की धार निकल आएगी। हर वर्ष यह घास यूं ही उगती है और वैसे ही सूख जाती है। हर वर्ष इन पेड़ों पर सुंदर फल-फूल आते हैं और झड जाते हैं। पच्चीस वर्षों से क्या कर रहा है यह देवता! इतनी बढिया जमीन को दबा कर बैठ गया है । दादी भी अभी जिंदा है । चीना को लगता है कि जब तक यह दादी और भैरो महाराज इस धरती पर रहेंगे, यह घरती वाझ ही रहेगी। गांव की घसेरिया घास-पात के लिए जगह-वे-जगह जाकर हाथ-गोड तुड़वाती रहेगी। शहतूत और अंजीर से लदी डालियों को देखकर गांव के बच्चे तरसा करेंगे और इन फल-फूलो का रस कीडे-मकोडे ही चाटेंगे। नागा बाबा का कहना है कि पुराने रीति-रिवाजों की लोक पर चढ़ने वाले लोगों के लिए यही सजा ठीक है । घर मे अन्न का दाना नहीं है, बाल-बच्चे भूख से तडपा करें और ये भक्त लोग कर्जा लेकर भूत-प्रेतो को खील-बताशे बांटे, उन्हें खसिया भेट करें-तब जाकर ये भूत-प्रेत प्रसन्न हों। इनसे अच्छा तो ब्लाक का प्रमुख या पटवारी है, जो एक बार की भेंट में पीछा छोड़ देते हैं। लेकिन ये कुलंकारी देवता भेंट चढाने के बाद भी छाया-छल-छिद्र बनकर पीछा नही छोडते। इन पच्चीस वर्षों में न जाने कितने जीवों का अंत इस देवता की थाती पर हुआ है, कितने नरसिंघ पूजे गए, कितनी छायाएं उतारी गई। चीना को लगता है कि जब तक यह दादी और उसका देवता इस धरती पर रहेगा, तब तक सूरज की किरणें भी उजाले के बदले अंधेरा ही बरसाती रहेंगी। वह मन-ही-मन मुसकरा रहा है । भैरों देवता "हुंह ""। देवता होकर भी आदमी को दुःख दे, तो आदमी और देवता में क्या फर्क रह जाता है। इस देवता की बदौलत गांव वालों को क्या-क्या नहीं देखना पड़ा है। लोगों की जिंदगी को इन देवताओ ने जिया है। हमारे पुरुषों का जीवन इन देवताओं के मनाने मे योता है और ये देवता है कि..। एक तरफ से खुदाई शुरूहुई है। अब तो गाव वालो के दिमाग में एक ही बात है। सोना है, तो सोने की सिल्लियां होंगी, या फिर मोहरें। कुछ भी हो, मिलेगा जरूर। भैरो महाराज का सपना कभी झूठा नही पड़ सकता । इसलिए सोच- [ ४३ ] समझ कर चोट करनी पड़ती है। यही से कुछ टूट-फूट न जाए। गोमू मिस्त्री ठीक कहता है । यह जमीन जरा नयां किस्म की है, इसलिए गुदाई करने में ज्यादा मेहनत नहीं। जरा-भर जोर लगाने की बात है कि मिट्टी के ढेले अपने आप उटकर दूसरी तरफ मुढ़क पड़ते हैं। इस मिट्टी की राह के अंदर भारी पत्थर जमे हुए हैं, उन्हें उगाह फेंकना जरूरी है। हो माता है, ऐसे ही किसी बडे पत्थर के नीचे सोना दया पड़ा हो । सोमू मिस्त्री उन उसई हए परयरों को ढलवान पर जमाता चला जा रहा है। "जय इन पत्थरों को सपाना ही चाहते हो, तो क्यों नही एक के कार दूसरे को जमा देते ?" चीना सीमू मिस्त्री को समझाता है। उसे ऐसा करने में कोई भापत्ति नही। दूसरे लोग युदाई कर रहे हैं और सीमू मिस्त्री पत्थर की छाती पर पत्थर को जमाता चला जा रहा है। निचली सतह से एक दीवार उटती चली जाती है। बीच वाली वाली जगह को दीवार के वरावर तक, मिट्टी के देलों से पाटा जा रहा है, जिससे ढलवा जमीन सब तरफ से समतल बनकर ऊपर उठती जाती है। आठ दिन"दस दिन. 'आज पंद्रह्वा दिन है। हर सुबह सोना मिलने की उम्मीद बनती है। लेकिन शाम तक सुदाई करने के बावजूद जब कुछ नहीं मिलता, तो थोड़ी निराशा होती है । कही भरों महाराज झूठ तो नही वोल गए ! राम राम ! छिमा करना देवता! तेरी करामात पर सुबह होने लगा है। शाम को थोड़ी-बहुत निराशा होती है, पर सुबह होते ही दुगुने उत्साह से लोग आ जुटते हैं । आज जरूर कुछ मिलेगा। न सही आज.. कल, परसो...। भैरोंधार की ढलवां जमीन समतल वनती जा रही है। गहरी और गद् गद एकसार मिट्टी किसी कुंआरी लडकी की सपाट देह की तरह मन मे गुदगुदी पैदा करती है। इस बार पानी बिखेरने वाले चश्मे को चारों ओर से बांध दिया गया। एक बडे तालाव के रूप मे पानी एक तरफ जमा हुआ जाता है। अब भैरोधार की चप्पा-चप्पा जमीन पर से कंकड़-पत्थरो को चुनकर एक जगह जमा दिया जाने लगा। कहीं सोने के बाहर मिट्टी जम गई हो और कुदाली की नोक से टूट- कर वह कंकड़ बन गया हो। बहुत खोजबीन की गई। जमीन को उल्था कर दिया। लेकिन सोना तो फिर भी नही मिला। सोना तो रहा दूर, कही लोहे का एक कण भी देखने में नहीं आया। [ ४४ ] झूठ...विलकुल झूठ."। झूठा है यह भैरों देवता। वाईस दिन तक अपने घर का काम छोड़कर दिन-रात यहां काम करने से क्या मिल गया हमको...? हम दादी से अपनी बाईस दिन को मजूरी रखवा के छोड़ेंगे। उस कलूटी बुढ़िया की गर्दन पर सवार होकर पूछना चाहिए कि कहां पर सोना दाव रखा है तेरे भरों महाराज ने? औरत जात.. । पच्चीस वर्ष तक किसी को भैरोंघार की तरफ झांकने नहीं दिया। ऐसा ही झूठ उसने तब भी बोला था। खीम मिस्त्री का गरम दिमाग...। अब वह दादी की ऐसी केर वाधेगा कि... साथ ही चीना की खैर नहीं, क्योकि सपना उसी को हुआ था। दादी सोचती है, भैरों महाराज या तो झूठ बोल गए, या फिर चीना की ही इसमें कोई चाल है। वह भैरों महाराज की पोल सबके सामने खोलना चाहता है। बहा वदमाग लौंडा है यह! दादी के पीछे पड़ गया है । इसी कारण दादी बीमार पड गई है । कही मर ही न जाए। मरती है, तो मरे । भाड मे जाए। हम तो चीना को ही पकड़ेंगे। सपना उसी को हुआ था। वही हमारी मेहनत-मजूरी देगा। लेकिन जान बची चीना की। अब तक गाव वालों ने मिलकर उसका गइंत कर दिया होता। ऐन वक्त पर मेहरवानी की। चीना को दूसरा सपना दिया है। अगले दिन कमेटी की मीटिंग में चीना ने फिर अपना सपना सबको सुना दिया। इस बार भैरों महाराज प्रसन्न थे, बोले कि इस जमीन के नीचे दबा हुआ सोना अब तक मिट्टी बन चुका है। यदि तुम लोग उसे पाना ही चाहते हो, तो कुछ दिन रुक जाओ। यह मिट्टी बना सोना अपने-आप बाहर निकल आएगा। मेरी जिस थाती को तुमने अपनी मेहनत से बनाया है, उसमें फिलहाल धान के पौधे उगाकर देखो। फिर देखना, धान की वालियों पर फूटने वाले बीजों मे सोने के बीज फूट पड़ेंगे और इस तरह गढ़ा हुआ सोना तुम्हें मिल जाएगा। घान की बालियों पर सोने के बीज लगने वाली बात लोगों के मन में संदेह पैदा करती है । यह कैसे हो सकता है। सदस्य लोग एक-दूसरे के चेहरे पर देखते हैं। मानो पूछ रहे हों कि क्या यह संभव है ? दयालजी साहब मीटिंग के अध्यक्ष बने है। ऊंची तिपाई पर बैठे मन-ही-मन [ ४५ ] ।
मुसकरा रहे हैं। उन्हें चीना की बुद्धि पर आश्चर्य होता है। चीना को अब वह अच्छी तरह पहचान गए है। यह आदमी हर तरह से काम लेना जानता है । काम लेने के लिए हर तरीके को अपना रहा है। जवाब नहीं है चीना का"। सदस्यो की अनिश्चितता को भांपकर दयालजी बोले, "चीना का सपना विलकुल सही है । तुम लोग मानते हो कि सोना-चांदी कही आसमान से छूटकर तो नहीं आता। सोना-चादी, हीरा-मोती सब इसी धरती में पैदा होते है। इस घरती की महिमा को समझने की जरूरत है। हमारे वेद-पुराणों मे धरती को माता कहा गया है। वह माता जो अपने बेटे की हर जरूरत को पूरा करती है, उसके लिए तरह-तरह के कष्ट झेलती है। हमारे पास आज जो कुछ है, वह सब इसी मिट्टी से उपजा है। भैरोपार को धरती में अगर कही सोना है, तो वह जरूर बाहर निकल कर आएगा। ऐसे ही, जैसे कि गन्ने में मिठास बनकर आती है। फूल मे खुशबू वनकर फूटती है। ऐसे ही धान को वालियो में सोना उगकर ऊपर आएगा। जरूर आएगा।" ठीक है, ऐसा करके भी देख लो। गांव वालो में फिर जोश भर आया। भैरों- धार की मखमल-सी मुलायम धरती पर धान के पौधे लहलहाने लगे। जरूरत के मौके पर बड़े तालाव के रूप मे जमा किया हुआ भैरो महाराज का पानी उस फसल को दिया गया। तंदुरुस्त पौधों के मुंह पर बालिया फट पड़ी। तब कुछ दिनों बाद उस तरफ से आने-जाने वाले की जुबान पर एक ही बात सुनने में आती-जमीन सोना उगल रही है । हां, सोना ही..। सुनहरे रंग के बीजों में झको बालिया। तब कौन कह सकता है कि वह सोना नही है ! बड़ा चालाक लौंडा है यह चीना.. । मन-ही-मन दादी प्रसन्न है। उसकी एकता कमेटी का यह पहला कदम था जिसने लोगों का ध्यान खेती की तरफ आकर्षित किया। इससे पहले खेती का महत्त्व गांव के लोग क्या समझते कहते हैं कि चीना को भी इस बारे में कोई ज्ञान नहीं था। उसके पास जमीन कहां है ? जानकर लोग कहते हैं कि चीनी खेमे मे रहकर उसने वहुत-कुछ यही वातें सीखी हैं। चीनी लोग खेती-बाड़ी करने में माहिर हैं। वे लोग अपने ही [ ४६ ].
तरीके से खेती करते हैं और अपने ही तरीके से रहते हैं। भरोधार की बंजर घरती की काया-पलट जिस तरीके से हुई उस पर लोगों को शक होने लगा है। देवता की जमीन को आबाद कर दिया है। इसी बात पर एक दिन तकरार बढ़ गई। लोगों ने कहायह आदमी देवी-देवता पर विश्वास नहीं करता । यह चीन देश का दलाल है। यह हमें उसी तरीके से मिलकर खेती करना सिखा रहा है । कुछ देर बाद यह हमें विरोधी पार्टी में बदल देगा। यहां चीनी खेमे को मजबूत कर देगा और फिर एक दिन...। नागा बाबा को इन्ही बातों पर ताव आता है। कौन लोग हैं जो इस तरह की बातें फैला रहे है ? वावा का क्रोध भड़क उठता है। गांजा पीते हैं, तो आंखें अंगारों की तरह दहकने लगती है। तब तो जुवान पर भी वश नही रहता । नागा बावा ने जब सुना कि गांव के लोगों ने चीना के तौर-तरीके अपनाने से इनकार कर दिया है और अपने ही तरीके से खेती करने की बात कर रहे है, तो बाबा जैसे पागल हो उठे । तब जो भी सामने आया, उसी पर टूट पड़े। ... स्सालो...अपना तरीका खोजते हो। अब तक कहां गया था तुम्हारा वो तरीका। पेट में भूख की ज्वाला भड़क रही है और तुम पोथियो में अपना तरीका टूडते फिर रहे हो । क्या दूसरे का तरीका अपनाने से तुम्हारी देश भक्ति खत्म हो जाती है ? ऐसी देश-भक्ति तुम मे है, तो दूसरे देशों से आया हुआ माल' कैसे हजम हो जाता है ?" दयालजी साहब से जाकर बाबा बोला, "महाराजगी ! काम करने वाला आदमी किसी एक तरीके पर बंधा नहीं रहता। जिससे कारज सिद्ध हो जाए, वही तरीका सबसे अच्छा है। इस बात में हम चीना की तारीफ करते है। इस आदमी ने भैरोंधार की जमीन को भूत-प्रेतों से छुड़ाकर इन्हें दिया है और साथ ही यह भी समझा दिया है कि खेती पर काम कैसे करना है । इन स्सालों को क्या पता था कि जमीन क्या चीज है कि उसमें किस तरह सोना उगाया जाता है।" बाबा दो टूक बात करते हैं। उनकी समझ में बात को बैठना चाहिए । बस, फिर वह सभी कुछ ठीक कर लेते हैं । इन गांवों में अपनी तरह की कमियां हैं । विगाह पैदा करने वालो की कमी नही । जरा-सी बात पर ऐसी अइंगियां लगाते हैं कि बनने वाली अच्छी-से-अच्छी योजना भी झगड़े में पड़ जाती है। एक चिनगारी मुलगती है. और वही लपट [ ४७ ] बन जाती है । बाबा ने ऐलान कर दिया कि एकता कमेटी के काम में जो अड्गी लगाएगा, उसे नहीं छोड़ेंगे । चीना गलत आदमी नहीं है। उसे काम करना आता है, गांव के हक में वह गलत काम नहीं करेगा। पिछले वर्ष सेतों में अच्छी पैदावार हो गई थी। इस बार भी अच्छी फसल हो जाती। लेकिन उसके लिए मेहनत चाहिए। पहाड़ पर खेती का दारोमदार मौसम पर बनता है। मौके से बादल पानी बरसा दें, ममय पर पाम पड़े तो अन्न का दाना हाथ आ जाता है । इस मंडुवा-दाना के लिए तन पर धूल-मिट्टी को धारण करना पड़ता है। धरती के अंदर रखा हुआ वीज और पेट में पलने वाले बच्चे की हालत एक जैसी है। इनकी जैसी देखभाल होगी, वैसा ही फल मिल जाएगा। यह बात नहीं कि खेत मे दाना छोड़ दो और कचहरी के चक्कर लगाते रहो। पौड़ी के मानसरोबर होटल में बैठा हुआ शेरसिंह यही कुछ सोच रहा -क्या हो गया है इन गाव वालों को-एकता कमेटी में कुछ लोग ऐसे घुस आए है जो बाहर से एकता की बात करते तो हैं, पर भीतर-ही-भीतर अपना काम भी कर रहे हैं। ये लोग तमाम कोशिशों को नाकामयाव कर देंगे। ये लोग कौन हो सकते है ? सोच रहा है शेरसिंह ! उठकर खिड़की से बाहर की ओर झांकता है । मौसम को आंख-मिचौनी और धूप-छांह को देख रहा है। खेती का समय है । लेकिन यह मौसम उसकी पकड़ में नहीं आ रहा। कल का सारा दिन भी यों ही वेकार चला गया। टिप टिप्...टिप्" "न ठीक तरह से वारिश हुई न कड़ाके की धूप हो । दिन-भर आसमान पर बादल तरते रहे, जो भीगे कंबल की तरह टिप-टिप च पड़ते। सुबह से शाम तक यही टिप-टिप् चलती रही और रात को आसमान शीशे की तरह निर्मल हो गया लेकिन सुबह उठकर जब देखा, तो आसमान का रुख फिर से बदला हुआ नजर आया। बादल हैं, पर वैसी टिप्. टिप्.."नहीं । सूर्य के मुख पर से बादलों का गोला कंबल कुछ देर के लिए हट जाता, तो पेड़-पौधों पर किरणो की असह्य मार पड़ जाती। भार्दो की तपन... कड़ी झुलसा देनेवाली गर्मी और धूप। कहते हैं, भादो को इस धूप में गडे की खाल तक चटख जाती है। जब-जब बादल छंटते, सूर्य की तेज किरण अग्निबाण [ ४ ] - की तरह धरती पर छूटती, तो शेरसिंह का दिल गैडे को साल की तरह चटख जाता। "अह ! मौके की 'बात' पड़ी है, पर यात विगाड़ दी है इन गांव वालों ने। अबके मंडुवा न हुआ तो खाएंगे क्या...? शेरसिंह सोचने लगा- 'बात' पड़े और मंडुवे को फसल में हलचीरा न पड़े, तो यह मोटा अन्न हाथ नहीं आता। शुरू-शुरू मे दुपत्ती वाले पौधे के साथ बैकार का घास-पात, काफी मात्रा में उग आता है। बारिश के बाद सारी फसल को हलचीरे से उलट दिया जाता है और इस तरह से उलटने वाली पास का काम- तमाम, भादों की एक घंटे की धूप कर देती है । खेती करने वाले लोग इसी को 'वात पडना' कहते हैं। पौड़ी के मानसरोवर होटल में बैठा शेरसिंह मुश्किल से हाथ आने वाले इस मौके को देख रहा है और पछतावे की उसमें भर रहा है । दो घंटे से शेरसिंह का दिल घास की उखड़ी जड़ो की तरह झुलस रहा है-मंडुवा न मिले इनके जन्म लेने वालों को-जिन्होंने इस वर्ष उसकी फसल मरवा दी है। सारे गांव वाले बदमाम हैं स्साले। अपने खेतो मे इस वक्त हलचीरा चला रहे होगे और मुझे यहा भेज दिया यहां कचरी में...। हाटल वालों से शेरसिंह ने एक कटोरी शोरया मांग लिया। गरम शोरवे के साथ वह मंडुवे को रोटी को गले में उतार सका। फिर एक गिलास पानी पीकर उसने जेब से बीड़ी खींच ली। गांव वालों ने ऐसी जल्दी लगाई कि चिलम उठाना भी भूल गया। खाना खाकर तुरंत चिलम को तंबाकू खीचने की इच्छा होती है । चिलम न मिले तो बढ़िया-से-बढ़िया खाना भी बेकार है। चिलम यहां कहां मिले। पौड़ी में अब भला कोई चिलम पिएगा? एक दिन था जब इस पौड़ी का कोई पूछने वाला नहीं था। देखते-देखते मीलों फैल गई है ससुरी। कोठियां-बंगले, गतियां-बाजार यहां भी बन गए हैं। एक-से-एक बढिया होटल । फैशन भी कम नहीं। शेरसिंह ने झटके के साथ दियासलाई को रगडा और बीड़ी सुलगाकर एक लंबा कश खीचा ! दो कश खीचने पर ही घोडामार बीड़ी का तंबाक वाला हिस्सा फुक गया। शेरसिंह ने पाया कि बीड़ी का आधे से ज्यादा हिस्सा खाली है- "धतेरे की...। बेमानी आ गई है सब तरफ.. [ ४६ ].
। - नाक से निकले हुए गंद की तरह उमने बोड़ी को जोर से एक किनारे फेंक दिया और दूसरी बीही निकाल उगका पेट दयाने लगा। वही यात इसमे भी दिसाई दी। उसे अपनी चिलम याद आने लगी। पहाडी तंवार के अपर रमी हुई 'छिलके की पक्की माग ! लेकिन पीढ़ी में कोई चिलम क्यो पीने लगा। यकायक शेरसिंह को याद आया । वकील ने ग्यारह बजे कचहरी में आने को कहा है । कहा था कि यह आखिरी पेशी है, प्राज फैमला होकर ही रहेगा। उसने हड़बडा कर सामने बैठे मानसरोवर के मैनेजर से टाइम पूछ लिया और चल पड़ा कचहरी की तरफ। कई वर्षों याद आज कचहरी का मुष देसने को मिला है। तोग कहते हैं, इस जगह आदमी को न्याय मिलता है। मिलता था कभी न्याय "। अपनी आंखो देखी बात है, तब बहुत कम लोग कोर्ट-कचहरियों में आते थे। गांव के लडाई- झगड़ो को वही मापस मे निवट लिया जाता। पंचों के फैसले पर आज भी विश्वास है। पच-परमेश्वर जहा बैठे, वही फैसला हो जाता । एकदम सही फैसला, सबकी तसल्ली वाला। गाव के अफसर हैं-प्रधान, पटवारी। उनकी बात मानी जाती है। गाव मे जरा किसी को शिकायत हुई कि पचायती चौक मे पंच मा बैठते। गांव की सुख-दुःख की बात सुनने वाला यह चौक है । मुद्दई-मुद्दाला दोनों को यहां हाजिर किया जाता और फिर सबके सामने 'दूध का दूध, पानी का पानी' फैसला हो जाता । तब गाव की प्रधानचारी शेरसिंह के पिता के पास थी) तीस वर्ष पहले की बातें हैं । अंग्रेजों का भी एक जमाना था इस देश मे । अंग्रेजी राज क्या बुरा था। शेरसिंह मोचने लगा-अंग्रेजी शासन से लोग किस तरह घबडाते थे । दिलों में डर था। लेकिन न्याय भी भरपूर मिलता था । आज भी अंग्रेजी राज के किस्से लोग पौड़ी मे दुहराते हैं । तब लोगों ने जो मजे लिए हैं वह आज कोई ले सकता है ? उनका शासन अपना था। जनता को शुरू में ही कस के रख दिया था उसने.."जैसे गंगापार से लाए मस्त बछड़ों की नाक में रस्सी डाल देते हैं, फिर वे चूं-चपड़ नही कर सकते। ऐसे ही अंग्रेजी राज का शासन अफसरों और कर्मचारियो की नाक में रस्सी डाल के रखता। जरा किसी ने कि मार-मार के हंटर साले की खाल खीच के रख दी। । इसलिए लोग बुरी नीयत नहीं रखते थे। बुरे कामों से डरते थे। अगर कोई कानून से बे-कानून चलता पकड़ा गया, तो शासन उसे घड़ी-पल में जकष्ट कर रख देता। उस घटना को लोग भूले नहीं हैं, जब अदवाणी के जंगल मे डाकिए को लूट [ ५० ] चू.चपड की लिया था। सरकारी पैमा लूटकर डकत चम्मत हो गए । डाकिए को मारकर वहीं एक गड्ढे मे डाल दिया। अंग्रेज शासन को हर चीज का फोरन पता चल जाता। चारों तरफ हल्ला मच गया । फिर अग्रेज शासन के खुफिया चल पड़े उसका पता लगाने । अदवाणी का वह धनघोर जंगल.. दिन में भी रात का अंधेरा नजर आता। जहां सुबह होती ही नहीं। फिर सात घाटियो की परत वाली जगह। पांच गज की दूरी पर आदमी का पता नहीं मिलता। ऐसी जगह जाकर डाकिए को मारने वाले आदमी का पता पाना, देवताओ के बश की भी बात नहीं। लेकिन वह अंग्रेजी का शासन था। आस-पास के गांव-घरों से पूछताछ होने लगी। बाहर-अंदर, नदी, घाट- पनघट, जगह-जगह अग्रेजी शासन के जादूगर बैठे थे । आखिर सुराग लगाकर ही छोड़ा। गाड वालों से पूछा गया । बताने से इनकार किया, तो मार-मार हटर चूतड लाल कर दिए। गाव पर उन दिनो हंटरो की बरसात होती रही। लोगों का टट्टी-पिशाब एक साथ छूट आया। शासन में जहाँ सब तरह की बातें है, वहां हटर भी काम की चीज है। जिस शासन मे डर नहीं, वह भी स्साला कोई शामन हुआ। वह तो भाई-भतीजावाद हो गया। 'चोर-चोर मौसेरे भाई' हो गए। फिर हंटर किस पर चलेगा? आखिरकार अंग्रेज सरकार को खूनी का पता चल गया। दस दिन के अदर शासन कर्मचारियों ने उसे पकड़कर इसी कचहरी में हाजिर किया। तव सुनकर लोग दातो तले उगली दबाए रह गए कि डाकिए के चाचा गंगाराम ने ही पैसो के लालच मे अपने भतीजे का खून किया है। आदमी का सून."वह भी चाचा के हाथो अपने भतीजे का... सुनकर लोग दात में बा गए । सरकारी पैसे के लिए चाचा भतीजे का खून कर दे। या फिर कोई पुरानी अदावत थी, पर शासन ने सारा कुछ उगलवा दिया। माबित कर दिया कि अदावत नहीं थी सिर्फ पैसे के लिए ऐसा किया है। एक-एक बात गंगासिंह ने अपने मुंह से कही है। मरने से पहले डाकिए ने अपने चाचा गंगासिंह से कहा कि अगर पैसे के लिए ही तू मुझे मारना चाहता है तो यह सारा पैसा ले और चला जा। सरकारी पैसे की सयानत में जो सजा मिलेगी, उमे मैं भुगत लूंगा। पर गंगा- सिंह के भीतर जाने कैसा राक्षस उठ खड़ा हुआ कि उसने कुछ सुना ही नहीं। [ ५१ ] सोचते पत्थरों से भतीजे का सिर कुचल दिया। मरते वक्त भतीजे ने कहा- "चचा, अब तो मैं मर ही जाऊगा। तू घर पहुंचकर मेरी मा को मेरे मरने की खबर तो कर ही देना। कहना कि पहाड से गिरकर मर गया है। वरना वह मेरा इंतजार करती रहेगी।" अंग्रेज शासन ने सारा कुछ उगलवा दिया था। इस साले ने बेटे का वह सदेश उसकी मा को नहीं पहुचाया और फासी पर चढ़ गया। अंग्रेज शासन का कमाल था कि बहुत कम समय में बड़े-से-बड़ा काम पूरा कर दिखाते थे। मुजरिम की दबी लाश तक को सुदवा कर उसे हर हाल कचहरी मे ला खड़ा करते । ऐसा था उनका शासन ! एक यह भी सामन है। आदमी आंखों के सामने मारा जाता है, लोग देखते है और साफ मुकरजाते हैं कि हमने कुछ देसा ही नहीं । सात खून करने के बाद मुजरिम हवाखोरी करता हुमा सीधे निकल जाता है, किसी को क्या मजाल कि उमे छू ले। अगर कोई घूस-रिश्वत लेते हुए पकडा गया, तो घूस-रिश्वत देकर फौरन छूट भी जाता है । सब जगह सच बोलने मे डर लगता है। सच बात मे उलटे ही फस जाने का डर है। यह कैसा शासन हुआ ? हुए शेरसिंह के चेहरे पर कड़वाहट आ गई और उसने मुंह में इधर- उधर फैले हुए थूक को इकट्ठा कर पच्छ से थूक दिया। इस कचहरी में जो भी आता है उसी के चेहरे पर कड़वाहट दिखाई देती है। वकीलो की आंखें कटवे को नुकीली चोंच जैसी लगती है। पौड़ी में आए आदमी के सीने में ये चोचें सीधी उतरती है । आदमी चाहे जैसा हो, आंषों की भाषा कौन नहीं समझता। इन कचहरी वालो के धंधे ही न्यारे हैं। शेरसिंह अभी पूरी तरह से कहां समझ पाया है कि यहा क्या-कुछ होता है। कि कोर्ट-कचहरी का काम रंडी पेशे से कुछ कम नहीं। रंडी जहा आकर बैठ जाती है, वही पैसा दौडा आता है। बचपन मे एक बार वह पौड़ी आया था। तब भी वह गाव का प्रधान नहीं था। बाप के रहते हुए वह कैसे प्रधान हो सकता है ? तव पहली बार वह पौड़ी आया था। अपने मामा के साथ। मामा पौडी दिखाने के लोभ से उसे साथ ले आए। दो रुपया उसके हाय मे यमाकर किसी की तरफ से गवाह बना दिया। मामा के साथ एक दुमरा गवाह था। मामा वकील नही थे, पर पौड़ी के वकीलों को मामा की हर वक्त बलाश रहती । वकीलों को ऐसे लोगो की जरूरत पड़ती है जो भूठ बोलने में माहिर हो। मामा ऐसे लोगो को [ ५२ .
खोज निकालते। कोई न मिलता तो दो रुपया पकड़ा कर भूठी गवाही दिला देते। बाद में शेरसिंह को सब कुछ मालूम तो हो गया था। लेकिन उस दिन मामा को जब कोई न मिला, उसने शेरसिंह को ही पकड़ लिया। पौड़ी दिखाने ले गए। दो रुपया जेब खर्च तब बड़ी वात थी । वह शेरसिंह को मिला। गवाही देने से पहले वकील ने गवाहों को मजबूत करना था। उन्हें बताया गया कि कचहरी में हाजिर होकर क्या कहना है । शेरसिंह को जो बताया था वह वैसा चोल गया। पर दूसरा गवाह एकदम गड़बड़ कर गया। कचहरी के दरवाजे के अंदर कदम रखते ही उसका दिल धक्क से बोल गया और गवाही देने तक उसने वही खड़े-खड़े पाजामे में पेशाब छोड़ दी। बाद में शेरसिंह के पूछने पर उसने बताया कि वकील ने मुझे झूठा पाठ पढा दिया था । मुझे मालूम था कि मैं झूठ बोल रहा हूं। सच को झूठ में बदलने का काम है। पेशाव नहीं छूटेगा तो क्या होगा। मामा की जालसाजी का कोई अंत नहीं । इसलिए मामा उसके घर नहीं जाते । शेरसिंह का बाप उससे नफरत करता है । ऐमे आदमी का क्या भरोसा है। कही भी फांस के रख दे। झूठ बोलने में जिन लोगों का पेशाब उतर आता था वे लोग अब तेज-तर्रार हो गए हैं । अब अंग्रेजी शासन नही है । इसलिए अब वे ही लोग कचहरी के आस- पास मंडरा रहे हैं । किसी को गवाह की जरूरत पड़ी कि झट से आ खड़े हुए। "कितना लेगा?" वकील ही सौदा कर लेता है। तीन रुपया.. दो रुपया"चलो, एक ही सही । पान-बीड़ी का पर्चा निकल आता है। इस बार गांव वालों ने कोई गवाह खड़ा नहीं किया। फिर भी काफी रुपया लग गया है इस मुकदमे पर । इतने रुपये में एक दूसरा गौचर खरीदा जा सकता था, पर अव एक तरह से झगड़ा गौचर के लिए न होकर दोनों गांवों की इज्जत का सवाल बन गया है। गौचर की घास वाली जमीन में दूसरे गांव वालों ने डंगर छोड़ दिए । एकता कमेटी वालों ने उजर की, तो उन लोगों ने गौचर फूंक दिया। आग की लपटें रात-भर धधकती रही। सुबह उठकर लोगो ने देसा, एक तिनका घास न बच सका। सारे गोचर मे जैसे राख बो दी है। इसके बाद मामला आगे बढ़ा। दोनों गांव गोचर के दावेदार बन गए । मुकदमेवाजी चल गई। धीरे-धीरे [ ५३ ] की एक गौचर की जमीन का मोह छूटा और अब ऐसी गांठ पड़ गई है कि खुलने में नहीं भाती। ससिया-ग्राह्मण को यात जो बीच में आ गई है। चौरा गाय के ससिए मोर कोटि गांव के ग्राह्मण । मुष दमेबाजी के यस्त भी यही सवाल उठा। प्राह्मण वकील किया तो ठीक तरह से मुकदमे की पैरवी नहीं करेगा। कोटि गाव के लोग उसके रिश्तेदार न राही, ब्राह्मण तो हैं। इसलिए गुमाई गुमानसिंह को उन्होंने अपना वकील चुना। दूसरी तरफ से पंडित सुशीराम वकोल आए। कचहरी जब दोनों वकील लड़े, तो रुपयों का चकनाचूर! वन्दगांठी मे सुलसुलकर रुपया कचहरी की तरफ जाने लगा। मुकदमा लड़ने के लिए गाव मे उगराई हुई। चंदे का पैसा खर्च हुआ, तो पंचायती रुपये से काम चलाया गया । पटवारी और उसके चाकर अब भी चक्कर काटते कहते हैं, "क्यो जी, ठंडे पड़ गए हो?" वकील जो घोखी रकम बना गए हैं, वह अलग.."। इतने पैसे में स्कूल बिल्डिग बन सकती थी। मोटर सड़क सोची जा सकती थी। गांव का हुलिया' बदला जा सकता था। कचहरी के आस-पास ही मंडरा रहा है शेरसिंह । अपने वकील की तलाश है उसे । कोटि गाव का रूपराम भी आया होगा। शेरसिंह सोचने लगा, वह भी गांव का मुखिया है मेरी तरह, जमीन-जायदाद वाला आदमी है । फर्क इतना है कि वह ब्राह्मण है और मैं हूं खसिया जजमान ! यह खसिया-ब्राह्मण को बात पुश्तों से चलती आई है । ब्राह्मण अपने को ऊंचा मानते हैं तो हम भी उनसे कुछ कम है। रूपराम के पास सत्ताईस रुपये का हिस्सा है, तो साढे सत्ताईस रुपया किश्त भेरी भी जाती है । साठ बोरी मंडुवे की मंडाई अपनी भी होती है लेकिन इस वर्ष फसल मारी गई है। शेरसिंह सोचने लगा, जैसी 'वात' पड़ी थी, उस हिसाब से कम-से-कम आधी जमीन में हलचीरा लगाया जा सकता था। गाव वाले अपनी खेती बना रहे होगे और यहां पड़े-पड़े रूपराम की छाती मेरी ही तरह छिल रही होगी। सोच ही रहा था कि यकायक रूपराम की सूरत उसके सामने आ गई। उसके हाथ मे चिलम देखकर शेरसिंह के मुह मे पानी भर आया। चिलम न पाने के कारण कुछ भी अच्छा नहीं लगता। बढ़िया खाना खाने के बाद तुरंत चिलम न मिले, तो लगता है कुछ खाया हो नहीं । रूपराम को चिलम मुट्ठी में थामकर चलने की आदत है, भले ही उसका तंबाकू चुक गया हो। जाने-अनजाने चिलम [ ५४ ] को मुंह लगाने की आदत जो पड़ गई है। लेकिन इस वक्त शेरसिंह देख रहा है कि चिलम में तंबाकू कार तक भरा हुआ है। आग भी ताजी ताजी रखी है। खालिस तंबाकू की गंध शेरसिंह की नाक तक पहुंच रही है । एक क्षण उसने चाहा कि रूपराम के हाथ से चिलम लेकर जोर को फूंक मारे। लेकिन ऐसा न कर सका वह। जेब से घोडामार बीड़ी निकालकर उसका पेट दबाने लगा। एक भी ठीक तरह से नहीं भरी है स्साली..।। कैसी धोखेबाज है यह पौड़ी। खरे तीन आने देकर सावुत बंडल खरीद लो और बीड़िया ऐसी कि पेट मे तंबाकू रत्ती भर नहीं । वीडियो की तरह यह पौड़ी भी देखने मे सुंदर है, पर पेट इसका भी खाली है। जेब मे पैसा न होने से कोई पूछता नहीं । नाते-रिश्तेदार लोग यहां भी रहते हैं। देखते ही मुह फेर लेते हैं । जब से मुकदमेबाजी चली है, तब से कितना रुपया डाल चुका है वह इस पौड़ी के पेट मे । लेकिन इसका पेट है कि भरता ही नहीं। उधर अनाज की पैदावार घट रही है । घटेगी क्यों नही, कचहरी की पैदावार जो बढ़ रही है। इसके अलावा खसिया-ब्राह्मण का भूत सबके सिर पर बैठा है। इस भूत ने सवकी सोपड़ी चाट डाली है और जितने बाल बच रहे हैं उससे ज्यादा कर्जे की रकम चढ़ गई है, तिस पर भी ऐंठ नही जाती। नागा बाबा ठीक कहते हैं, गांव में एक बुराई हो, तो उसे जड़ से धोया जा सकता है, पर जहां कई तरह के टंटे हों, वहां आदमी झगड़े से कैसे बच सकता है। दोपहर डलने लगी है। अभी तक मुकदमे की सुनवाई नहीं हुई । रूपराम. शेरसिंह नाम की कोई आवाज चपड़ासी ने आकर नहीं दी। तीन घटे से लगातार मूरज की किरणें गीली धरती पर हलचीरा चला रही हैं । गीती जमीन से उमस पैदा हो रही है और शेरसिंह को बैठे-बैठे पसीना चढ़ा आ रहा है । शायद अभी आवाज पड़े। दोनो वकील एक साथ कचहरी के अंदर गए कि लौटकर नहीं आए। वकीलगीरी कोई मामूली पेशा नहीं है। पित्तनी लड़-झगड़ करनी पड़ती है। जोर लगाना पड़ता है, तब जाकर हार-जीत का फैसला होता है। फैसला सुनकर आज ही वक्त से घर पहुंचा जा सकता है और दो-चार खेतों मे हलचीरा चलाया जा सकता है। रात को मानसरोवर की हजम न होने वाली रोटियों से पिंड छूटे तो अच्छा हो। दो जून की रोटियां वह घर से बांध लाया था, जिन्हे मानसरोबर को आधी कटोरी सोरवा के साथ वह खा गया और एक खाली चारपाई पर चार माना किराया देफर वही वरामदे में रात गुजार दी .[ ५५० ।
थी। रात-भर बबूल की रस्सियो पर पीठ खुजाता रहा । नीद नहीं आई। बदन में जैसे चीटियां चर रही हों । चमचमाहट भी होती रही और सुबह जब उठा तो लगा कि सारा बदन चिर गया है। जैसे किसी ने हलचीरा चला दिया हो। वह सोचने लगा, कब फैसला हो और कय वह अपने घर का रास्ता ले। कचहरी की आधी छुट्टी हुई। घंटे-भर के अदर वकील और अफसर लोग कुछ खाएंगे, पिएंगे और उनके बाद फिर काम चालू होगा। वकीलों ने बाहर आकर बताया कि अब इसके बाद सबसे पहले उन्ही के केस पर कार्यवाही चलेगी। इतनी देर कुछ खा-पी लिया जाए। मोचकर शेरसिंह मानसरोवर की तरफ लौरा । सुनते हैं, दुनिया को कमाई ये कचहरी वाले खाते हैं और कचहरी वालों को इस मानसरोवर ने खाया है। मानसरोवर के बारे में रूपराम ने बहुत कुछ मुन रखा था। देखने की गरज से वह भी उस तरफ जा निकला। मानसरोवर की पहली सीढी उतर कर रूपराम ने देखा, दोनों वकील एक साथ बैठे चाय-पानी कर रहे हैं । सिंघोरियां खा रहे हैं। मालू के पत्तों से लिपटी खुशबूदार सिंघोरियां । बराबर किसमिस, वादाम और नारियल के वुरादे से बनी ताजी मिठाई...। उन्हें आपस में इस तरह हंसते-खाते देख रूपराम को आश्चर्य हुआ। मानसरोवर की पहली सीढी पर पड़ा हुआ उसका कदम ज्यो-का- त्यों जाम हो गया । वह सोच न सका कि अंदर चला जाए, या वापस लौट आए। उसने निश्चय किया, भीतर जाना बेकार है । अब तक की सारी मेहनत उसे बेकार लगने लगी। वह लौटना ही चाहता था कि चीना सामने आ पड़ा। बोला, "पंडत ! वकीलो को चकाचक मानसरोवर मे दावत दिए जा रहे हो । अरे, कभी एकाध प्याला चाय हमें भी पिला दोगे, तो क्या हो जाएगा।" सुनकर स्पराम हंस दिया। पखला है यह, लेकिन प्रेम की बात कहता है। चीना कभी-कभी पौड़ी के चक्कर लगा लेता है। राजधानी है न! लीडर लोग आते हैं तो गाव मे कहां टिकते हैं। बस, पौडी का चक्कर लगाया और वापस लौट गए। नेताओं की नगरी है पौड़ी। नैनीताल, मसूरी, शिमला या फिर कुल्लू-काश्मीर । गर्मियो में नेता लोगों को कान्फ्रेंस इन्ही स्थानों पर होती है। पंद्रमयीस दिन. भापण और दूसरे कार्यक्रम चलते हैं और अंत में गजल-कब्बाली का दौर भी चल जाता है। चीना भी अपनी तरह का नेता है। पौडी मे जो घूमता है, यही नेता बन [ ५६ ] जाता है। पौडी के लोग चीना से कहते है, "नेताजी महाराज! पौड़ी में घूमते तो हो, पर पानी कव दिलवा रहे हो । यहाँ तो पानी के विना सूखा पड़ रहा है।" चीना कोई उत्तर नहीं देता। उत्तर किसी के पास नहीं है, इसलिए चुपचाप चल देते हैं । तव कोई आदमी चुपके से कहता है, "ये पाणी वाले नेता नहीं है भइ! ये नेता तो एकता वाले सामियावादी हैं। सबको एक बराबर करने वाले है। ये पाणी की फिकिर क्यों करेंगे। पाणी देगे तो कांगरेस वाले देंगे, जिनको तुम भोट देते हो।" पौड़ी में सब तरह के नेता आते हैं। कोई साम्यवादी हैं, कोई क्रांति पार्टी वाले हैं, कोई दीया दिखाते हैं, पर पौड़ी को पानी देनेवाला कोई नहीं। रूपराम मे एक प्याला चाय का तकाजा हुआ कि उसने चीना को वाह पकड़ ली और होटल की तरफ ले चला। "यार ब्यटा, आज तो जरूर तुझे चाहा पिलाऊंगा। तूने कब-कब मिलना है पौड़ी में । चाहा के साथ जो तेरी तबीयत हो, वह भी सा लेना। चल...", मानसरोवर से हटाकर रूपराम उसे बगल वाले होटल में ले आया। बोला, "मानसरोवर में नहीं जाएंगे, वह बड़े लोगों की जगह है ।" चीना को यहां की हर बात का पता है। वह जानता है कि इस वक्त मानसरोबर के भीतर दोनो पाटियों के वकील बैठे हैं, इसलिए रूपराम उसे यहाँ ले भाया है। वह रूपराम के आश्चर्य में पड़ने का कारण भी समझ रहा था। गांव के भोले चेहरों पर कौन-सी बात आसानी से नही उभर आती। उसकी मन बसी बात को चीना ने अंततः खोल ही दिया। बोला, "कका, मुझे सब मालूम है कि 'तुम लोग पौड़ी में एक पल नहीं ठहरना चाहते । पौडी अव पूरा शहर बन गया है। गांव के आदमी के रहने की यह जगह नहीं हैं । इस वक्त तुम्हारे वकील मान- सरोबर में बैठकर मिठाइयां सा रहे है। हंस-खेलकर बातें कर रहे है । देखने से तो यही लगता है कि उनकी आपस में गहरी दोस्ती है । तुम्हारे लिए वे अपनी दोस्ती की विगाड नहीं देंगे । देख लो, एक खसिया है, दूसरा है ब्राह्मण । लेकिन इस वक्त जैसे कि एक ही सिंघोरी के दो हिस्से हों। यह झगड़ा तो सिर्फ हमारे- तुम्हारे लिए है। गांव वालों के लिए...। वकीलों का तो आपस में कोई झगड़ा नहीं।" रूपराम चुपचाप उसको बातें सुनता रहा । चाय खत्म हुई और चीना वहाँ [ ५७ ] ।
से चलता बना। रूपराम भी बाहर आ सड़क के किनारे सड़ा हो सोचने लगा चीना ठीक कह रहा है। वकीलों का आपस में कभी झगड़ा नहीं होता । आज भी वे एक ही मेज पर बैठे मजे से सापी रहे हैं. अपनी बातचीत में लगे हैं। उसकी समझ में नहीं आया कि यह कुछ गया है। उमने चाहा, पोरसिंह भी उन्हें इस हालत में देख सके, तो कितना अच्छा हो। मानसरोवर के बाहर जलनेवाली अंगीठीपर चाय का पानी हर वक्तखोलता रहता है। बांज को पनी माग और अंत तक न बुझने वाली चिनगारियों को देखकर रूपराम ने जैव से चिलम निकाली, उसे ऊपर तक तंबाक से भरा और डरते डरते घोड़ो याग मांग ली। पौड़ी में आग भी शायद बिना पैसे के न मिले। हर चीज के लिए पैमा चाहिए। कचहरी का इलाका है, यहां किसी से कुछ पूछना हो, तो भी पैसा लगता है। पैसे के बिना कोई बात तक नहीं करता। जैसे कि मुह मे जुवान है ही नहीं। यह डर रहा था कि अंगीठी के पास खड़ा हुआ लौंडा कही आग देने से इनकार कर दे ! लेकिन उसने पैसा लिए बिना ही दो-तीन चिनगारियां रूपराम की ओर फेंक दी। उस परको आग को चिलम के ऊपर चढाकर रूपराम कचहरी के आगे आ बैठा और धीरे-धीरे चिलम का मजा लेने लगा। मानसरोबर मे एक प्याला चाय पीने के बाद शेरसिंह भी कचहरी के आगे या खड़ा हुआ और बीड़ी निकालकर उसका पैट दबाने लगा। भादों की तपन ज्यों-की-यो बनी है, किरणें आग बरसा रही हैं । अभी वक्त है,दस-पंद्रह खेतों को आसानी से उलटा जा सकता है। लेकिन कसे ? --मंडुधा न मिले इनके जन्म लेनेवालों को-वह मन-ही-मन गांव वालों को कोसता है । यकायक आखो में रूपराम की चिलम आ जाती है। देखकर मुंह में पानी भर आया। हां ब्वै...! वह धीरे-धीरे रूपराम की ओर बढ़ने लगा । शायद यह कहने के लिए कि आज के दिन पड़ने वाली यह 'बात' हमारे दिलों पर हलचौरा चलाने के लिए काफी है । इस वक्त हम लोग घर पर रहते, तो इस वर्ष भी अनाज की कमी नही थी। वह यह भी कहना चाहता है कि हम लोगों के ग्रहां आने से कचहरी की पैदावार बढ़ती जा रही है और हर वर्ष मंडुवे की फसल घटती जा रही है और शायद यह बात कहना भी जरूरी है कि मानसरोवर में धोखे की खपत बढ़ गई है। अब वह चार आने वाली शोरवा प्लेट की कीमत [ ५८ ] आठ आना लेने लगा है। इसके अलावा वह और भी कई एक बातें रूपराम से कहना चाहता है। कुछ देर बाद वकील लोग जब लौटकर आए, तो उन्होने वैसा ही कुछ पाया। शेरसिंह और रूपराम, दोनों में घुटकर बातें हो रही हैं। उन्हे आपस में चिलम का मजा लेते देख वकीलों का दिल जोर से धड़कने लगा । कचहरी की अगली कार्यवाही शुरू हुई। थोड़ी देर बाद रूपराम-शेरसिंह नाम से कचहरी के चपदासी ने आवाज दी। अपने-अपने वकील के साथ वे दोनो कलक्टर साहब के मागे पेश हुए। वकीलों को बहस शुरू हो, इसके पहले रूपराम-शेरसिंह ने आगे बढ़कर ययान दे दिए कि उन्होने अपना फैसला स्वयं कर लिया है। कलक्टर साहब के पूछने पर उन्होंने बताया कि भादों के महीने ऐसी 'बात' पडे तो किसान घर का मुर्दा बाहर निकालने के बजाय हलचीरा निकालकर खेत मे पहले पहुंचेगा। हुजूर कलक्टर साहब ! हम लोग दो दिन से यहा पड़े हुए है और गांव वाले अपनी खेती कमा रहे हैं, इसलिए हमने अपना फैसला स्वय बार लिया है। इस बार उनकी तरफ से राजीनामा लिखते हुए वकीलों को लगा कि दो दिन से वर्षा न होने और 'बात' पड़ जाने के कारण उनकी खेती का कोई हिस्सा सूख गया है। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि यकायक यह सब कैसे हो गया है! इस घटना के बाद एकता कमेटी में आए हुए वकीलों ने अपना इस्तीफा कमेटी के अध्यक्ष के नाम लिख दिया और अलग हो गए। दूसरे लोगो में भी चर्चा होने लगी। इस तरह से कही एकता हुई है ! यह चीना एकता और विकास की बात करता है, पर देखा जाए तो यह आदमी स्वयं इन बातो के विरुद्ध है । पहले की तरह गाव में अपनी न्याय-पंचायत कायम करने जा रहा है । बड़ी मुश्किल से नई हवा इन गांवों की तरफ फैल रही है और यह आदमी उसी पुरानी लीक को सबके सामने पीटता चला जाता है। उजाले के बजाय अंधेरी खाई की तरफ गांव को चला रहा है। यह पोड़ी की शान को मिटाकर रहेगा। पौड़ी प्रदेश की राजधानी है। यहां कोर्ट-कचहरिया हैं, स्कूल, कालिज मोर सरकारी दफ्तर हैं। इन सब चीजों के कारण खासी भीड़ रहने लगी है। गांव के लोगों ने अगर पौड़ी [ ५६ ] आना छोड़ दिया, तो फिर हो गया पौड़ी का विकास। एक तरफ पौड़ी के विकास की योजनाएं बन रही हैं, दूसरी तरफ कोर्ट-कचहरी को खत्म करने की साजिश है। यह बात ठीक इसी तरह है जैसे कि प्रदेश सरकार करोड़ों रुपया खर्च करके नशाबंदी कमेटियों की स्थापना करती है। एक तरफ लाखों रुपया नशावदी के खातिर लगाया जा रहा है और दूसरी तरफ शराब के ठेके भी दिए जाते है । सरकार ऐसा क्यों करती है, यह बात किसी की समझ में नहीं आती। लेकिन चीना का कहना है कि वक्त से सब कुछ समझ में आएगा। इन सब बातों पर बाद में विचार होगा और फिर जगह-जगह से सराव की भट्ठियों और ठेका को खत्म करवा दिया जाएगा। लोगो को सोचना चाहिए कि यह आदमी ऐसा क्यों कर रहा है । जरूर इसमें कोई बात है। हो सकता है, आने वाले चुनाव में उसका कोई विचार बना हो, जिसके लिए वह अभी से तैयारी कर रहा है। चुनाव वाले ही विकास की बात करते हैं । चीना इस प्रदेश का नेता बनेगा। वह समाज विरोधी तत्त्वों का विरोध करेगा और जनता के कमजोर पक्षों को मजबूत करने में उनकी सहायता करेगा। यह आदमी चीन का ऐजेंट है, साम्यवादी पार्टी का आदमी है । इस पार्टी की नीति रही है कि धीरे-धीरे आदमी को काबू करते है और फिर एक दिन ऐसा विद्रोह खड़ा कर देंगे कि संभलना कठिन हो जाएगा। लोगो द्वारा तरह-तरह की बातें उठाए जाने के बावजूद भी एकता कमेटी का काम पूरे जोर-शोर से चल निकला है। सदस्यों की संख्या भी पहले से ज्यादा हुई है। आस-पास और दूर के गावो में भी लोगो ने एकता कमेटी के नियम- कानून को अपनाया है। अब तो एक महिला मंडल' की स्थापना भी हो गई है। महीने मे महिला मंडल की दो बैठकों का विधान रखा गया है। मीटिंगों में महिलाओं की अपनी दिक्कतो के बारे में चर्चा होने लगी है। विरजा बहू को 'महिला मंडल' की अध्यक्षा बनाया है। गाव-परों की औरतों को विरजा तरह- तरह की बातें सुनाती है। गांव और शहर का अंतर समझाती है। एकता कमेटी में एकीकरण का प्रस्ताव भी कब से रखा हुआ है । लेकिन आज तक उस पर विचार नही हो पाया। एकीकरण के लिए कुछ और समय चाहिए। हर जाति, धर्म और दूसरे लोगों की रजामंदी जब तक न होगी, एकीकरण कसे होगा। लोगों का विचार है कि एकीकरण होने से अधिकाश भागहे अपने आप [६.]
। मिट जाएंगे। बिखरी हुई जनशक्ति को एकजुट लाना जरूरी है। तभी गांवों का विकास संभव है। महात्मा गांधी अपने चेलो से यही कहते रहे कि भारत देश गांवों का देश है। यह देश तभी फूलेगा-फलेगा, जब गावों का विकास होगा। । लेकिन गांधी बाबा की बात लोगों के दिमाग में तभी तक रही, जब तक वे जीवित रहे। उनके बाद नाम की महिमा चलती है। केवल नाम...। उन बातों को बिरजा बहू मंडल की मीटिंग मे सुनाती है। यह देखकर उसे आश्चर्य होता है कि लोगों ने गाधीजी का नाम तो सुना है, पर उनके कामों के बारे में किसी को कुछ पता नही। वे क्या चाहते थे और कैसे कैसे काम उन्होंने किए हैं, आदि, बातें बताने वाला जैसे वहां कोई नहीं था। आज भी वे बातें किसी को मालूम नहीं है । धीरे-धीरे विरजा की समझ मे बात आई। गांवो मे अब तक ऐसा ही चलता आया है। गाव के लोगो को सब कुछ समझाना जरूरी नहीं था। दे समझकर करते भी क्या? काम तो सभी शहर में होता है। शहर के लोग सब कुछ जानते हैं । गांव में केवल नाम का होना काफी है। नेता और प्रभु- दोनो का नाम स्मरणीय है । नाम को भजने से मतलव है। जब कभी वक्त आन पड़ा, कोई मुश्किल सामने आ खड़ी हुई, तो नाम का जाप कर, उसी में गाव के भोले प्राणी को सुख मिलता है । यही नाम की महिमा है। कहते है कि यात्रा के दिनों में एक बार बुनियादी गुरुजी भी इस तरफ आए थे । उन्होंने जगह-जगह अपने भाषण मे इसी बात को दोहराया था। कहा था कि शहर की कोई बुनियाद नहीं है और गांव अपनी बुनियाद पर अटल है। इसलिए गाव का विकास जरूरी है । लेकिन यहां तो बात एकदम उलट हो गई। राहरों का खूब विकास हुआ है और गांव में भजन-कीर्तन चल रहे हैं। नाम का गुणगान चल रहा है । शायद इसी से नया पार लग जाए। गांव की बहू-बेटियां जब शहर से लौटकर आती हैं और गांव में रहने वाली औरतों को वहां की बातें सुनाती हैं, तो बूढी औरतों का मुंह आश्चर्य से खुला रह जाता है। शहरो मे आरामदेह जीवन है । वहां ऐसे खेत-खलिहान नहीं हैं । घाट- पनघट, नदी, जंगल कुछ भी नहीं। औरतो को सुबह-शाम इतनी मेहनत नहीं करनी पड़ती। घास-लकडियो के लिए जंगल-जंगल नही दौड़ना पड़ता। शहरों में सब कुछ घर के अंदर ही मिल जाता है। यहां तक कि टट्टी-पानी के लिए भी बाहर नही निकलना पड़ता। घर के भीतर रसोई के पास, टट्टी वाला कमरा बना दिया. [६] जाता है, या फिर मकान की छत पर टट्टियां बनी हैं। गाव के लोगों को यकायक इन बातो का विश्वास नहीं आता। ऐसा कैसे हो सकता है, पर जव आंखो देखी बातें सामने आ रही हैं, तो उस पर विश्वास कैसे नहीं हो। फिर गाव की औरतें हंसते-हंसते लोट पड़ती हैं। च्छि- कैसे लोग हैं, बाहर जाने का काम भीतर ही कर लेते हैं। "इसमें घिरना की क्या बात है जी ! सारी बात तो विकास को है। गाव का विकास होगा, तो हमें भी घर के भीतर ही सब कुछ करना पड़ेगा। पर कहा हो रहा है गांव का विकास !" महिला मडल की मीटिंग में ये सब वातें चलती हैं। शहर की बात सुनने में मजा आता है। शहर से लौट आई हुई औरतों की बातों में सब दिलचस्पी रखते हैं । सुनकर लगता है कि शहर कोई दूसरी ही दुनिया है जहां आदमी बैठकर मजे ले सकता है । इतना परिवर्तन तो दूसरी दुनिया में ही पाया जा सकता है। सचमुच वह दुनिया, गांद की इस दुनिया से कितनी अलग है। गाव के लोग उस दुनिया को देखने के लिए कितने बेचैन हैं । उस दुनिया में रहने वाले लोग कैसे भले लगते हैं । आदमी इन पहाड़ों से निकलकर जाता है और देवता बनकर लौटता है। बहुत-सी बातें सीखकर माता है । बहू-बेटियां भी जाती रहती हैं, पर इन बूढ़ों को कौन उस दुनिया में पहुंचाएगा? क्या ये लोग वहां रहने-बसने के काबिल नहीं हैं? गांव की बूढ़ी औरतों के मन में जरूर कोई बात है। आखिर ख्याल या हो जाता है, क्यो न हमको भगवान ने उसी दुनिया में पैदा किया, जहां आदमी को बैठे-बिठाए सब कुछ मिल जाता है। अब आखिरी वक्त आया है। बिना कुछ देखे-भोगे ही इस संसार से विदा ले लेनी है । सोच-सोचकर पश्चात्ताप ही वढता है। तव नागा बाबा के धूने पर आ बैठती है। नागा बाबा का कहना है कि बड़ी मुश्किल से प्राणी को मनुष्य जन्म मिलता है । लेकिन उस दुनिया को देख पाना शायद मनुष्य जन्म धारण करने से भी मुश्किल है । अपने-अपने भाग्य की बातें है। अपने भाग्य में यही लिखा है कि पैदा होने से मरने तक, गोठ का गोवर ही छानते रहो। मिट्टी में तन को खपाकर क्या मिलता है। घास-लकड़ी के लिए जगल-जंगल भटकते रहो, तिस पर भी भरपेट खाने को नहीं मिलता। सुस क्या होता है उसका अनुभव कमी नहीं पाया। [ २ ] - अपने दुःख को मन में रखकर गांव की औरतें बाबा के पास पहुंचती हैं। बाबा दूर-दूर तक घूम आए हैं । सारा जीवन घूमने-फिरने में बीता है। भली- बुरी सगत देखी है। मठ-मदिर और तीर्थों का भ्रमण किया है। बावा ने पुण्य कमाए हैं। शिवरात्रि, संकट-चौथ या ऐसे ही पर्व-त्यौहार के मौके पर गांव की औरतें बाबा के पास माती है। ऐसे पर्वो पर साधु-ब्राह्मण और अतिथि को भोजन कराना, दान-दक्षिणा आदि, गृहस्थ का धर्म है। दूसरे के हाथ का बना भोजन पाने में बाबा को आपत्ति नहीं, पर अपने हाथ से बना खाने का मजा ही और है । कच्चा भोजन, अ'टा, दाल, चावल, मिर्च, मसाले और दक्षिणा, सब कुछ बावा के लिए वहीं पहुंच जाता है । दूध-घी की कमी नहीं रहती। तब कुछ दिन के लिए बाबा निश्चित हो जाते हैं। गांव की औरतें धूने के आस-पास घेरा बनाकर बैठती हैं, "कोई कथा सुनाओ महाराज ! संकट चौथ का दिन है । कथा हो, जो संकट को काटने वाली हो।" नागा बाबा धूने मे जल रहे भरकम ठेले को चिमटे से खुरचने लगते है । ठेले पर से बड़े-बड़े अंगार टूटकर झड़ पड़ते हैं और आग भड़क उठती है 1 ठेलों का मुख जोड़कर वे उसी पर पतीला भर पानी रख देते हैं। समझने की बात है कि चाय-पानी के बाद ही कुछ सुनाएंगे। वावा लोग अपनी धुन के हैं । झोली से पत्तियां निकाल उन्हे हथेली पर अंगूठे से रगड़ते हैं। चाय तैयार होने से पहले चिलम भरकर वही ठेले के सहारे खडी कर दी जाती है। ठेलों की तेज आंच में पानी उबलते देर नहीं लगती। वराबर दूध-पानी, चीनी-पत्ती मिलाकर उबाला जाता है। इतनी गाढ़ी चाय बाबा के पास ही मिलती है। ऐसा जायका कि क्या कहने...! चाय के साथ चिलम का जोड...। छिलकों की आग पिसकर चिलम के ऊपर पड़ती है और फिर वावा की चौकड़ी लगती है। सीना फैलकर आगे आता है-"बंम शंकर! खाने-पीने का ढंग कर बैरी-दुश्मनो को तंग कर लूट ले उसी को.. जो न दे किसी को.."। शिव शभू गिरा दे दुमहला लगा दे तंबू लेना हो. औ.. औ.. ओ औलख ! बम बम"फुः!" -और पहली फूंक चिलम पर पड़ती है, तो हाथ-भर जोत लपक उठती है चिलम के ऊपर। [ ६३ ] - 'पहली ही फूंक मे आंखें ब्रह्मांड भेंटने लगती हैं। लाल-लाल अंगार जैसी आखें। चिलम चुक जाने पर माई-लोगों से कहते हैं, "अव कहानी सुनाता हूं। संकट मोचन वाली कथा सुनना चाहती हो न ! सुनाता हूं। पर मेरी समझ में नहीं आता, कैसा संकट तुम लोगों के ऊपर आन पड़ा है ?' माई लोग-हंस पड़ती हैं। अव बाबा को चिलम लगी है। अब क्या कथा सुनाएंगे! "संकट तो है ही महाराज! घर-गिरस्ती का ही संकट क्या कम है। इससे तो आप लोग ही भले है । न किमो से लेना-देना, न कोई झगड़ा, न कोई टंटा...। -सब बातों से बेफिक्र हो बैठे है।" सुनकर बाबा को ताव आ जाता है । माई-लोगों के बीच बावा कुछ कह नही सकते। बाबा लोग कोई ऐसी बात कहते, तो झपट कर जवाब देते--तु भी क्यों नहीं आ जाता इस बेफिक्री में" सिर मुंडा के देख ! कि इस भेप में कितना आराम है। इतना कहने मे सकोच न था, पर माई-लोगों से क्या कहा जाए । वावा उन्हें समझाते हैं कि ऐसी बात नहीं। मनुष्य रूप घर कर जो प्राणी इस धरती पर आया है वह किसी दु.ख से छूटा नही सुख-दुःख कभी आदमी से अलग नही रहते । पर मैं पूछता हूं, सुख की ही खोज आदमी क्यों करता है ? सब लोग सुख ही चाहने लगें, तो दुःख कहां जाएगा? अकेले किसके सिर बैठेगा। वह भी मानव प्राणी के साथ आया है । तुम लोग देखते हो कि रात होती है, फिर दिन चढ आता है । रात के बाद दिन पाता है, तो अच्छा लगता है। सोचो, अगर दिन ही दिन रहे, सूरज ढले ही नहीं, रात कभी हो ही नहीं, तो तुम क्या करोगे ? सबके चेहरों पर बारी-बारी आखें जमाते हुए बाबा देखते हैं और अपनी बात का उत्तर चाहते है। माई-लोगों के पास उनकी बात का कोई उत्तर नहीं। उनके आश्चर्य है। जैसे वे सोचने लगी हैं कि मचमुच कभी ऐसा हो जाए, तो कैसे काम चलेगा। "तुम कुछ नहीं कर सकते, कोई कुछ नहीं कर सकता।" वावा उन्हें समझाते हैं। "जिसके हिस्से मे दुःख है, वह सुख कहां से पाएगा। दुःख या मुख कभी अकेला नहीं मिलता। जिस तरह दिन-रात है, वैसे ही दुःख-सुख है। हानि- लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश, सब साथ-साथ चलते हैं। ये सब चीजें जीवन में [ ६४ ] मुख पर एक बराबर चलती हैं। यह आदमी की अपनी बात है कि वह किस चीज को कैसे लेता है । तुम लोगों के पास दुःत को पहचानने के लिए आंखें है, शरीर है, सब कुछ है। पर मुख को पहचानने के लिए कुछ भी नहीं। है तो सभी कुछ। लेकिन पहचानने की कोशिश नहीं करते। माई-लोगों को बाया समझा कर कहते है कि यह जीवन एक अधेरे समुद्र की तरह फैला है । इस फैले हुए अंधकार में उजाले की एक किरण को पैदा करना है, अंधेरे को उजाले में बदलना है। समुद्र की गहराइयो में घुसकर एक लहर को पकड़ना है। वस, इतनी-सी बात है। सुख-दुःख कोई अलग चीज नही। अलग-अलग होते हुए भी एक ही है। क्योकि एक काज्ञान दूसरे से होता है । सोचो, अगर रात का अंधेरा न होता, तो दिन के उजाले का ज्ञान कैसे हो सकता था ? दु.ख का दर्द नही मिले तो सुख का आनन्द कैसे लिया जा सकता है ? इसके साथ यह भी निश्चित है कि समय वदलता है। पतझड़ के दिन है। पेड़-पौधो पर इन दिनों कोई पत्ता या फल-फूल नहीं दिखाई देता। लेकिन वसंत की बहार आने पर ये ही पेड कितने हरे-भरे और सुंदर लगते हैं। कैसी विचित्र लीला है उस प्रभु की जो ऋतुओ के रूप मे आकर धरती का रंग बदल देता है । इस तरह परिवर्तन आता ही रहता है । हमेशा एक जैसा मनुष्य भी नहीं रहता। आदमी के साथ दुःख-सुख के रूप मे उसी की देन है । उस प्रभु की दी हुई चीज को हम घृणा से देखें, उसका निरादर करें तो यह हमारे लिए अच्छी बात नहीं । इसलिए हर चीज को एक बराबर मानकर चलें, तो दुःख नहीं ये होगा। माई-लोगों के दिमाग में इन बातों को बिठाना बड़ी बात नहीं। ऐसी बातों को वे ध्यान मगन हो सुनती हैं और गांठ लगा लेती हैं। समझाना वहां कठिन है, जहां आदमी स्वार्थ से भरा है। स्वार्थ मन में है, तो दूसरी बात वहां नही जमती । बाबा को चिलम लग गई है। लेकिन चिलम लग जाती, तो इतना भी नहीं कह पाते । चिलम से बाबा लोगों के भीतर ज्ञान फूटता है ।चिंतन जगता है । अब सुन लो-चावा से तरह-तरह की बातें। लेकिन तरह-तरह की बातें माई-लोगों को मुनाने से क्या फामदा! इन्हे तो सुख की लगन लगी है, सुख चाहिए महाराज ! कहीं थोड़ा सुख मिले ! कहां से आएगा सुख ! सुख ऐसी चीज नहीं कि उठाकर किसी के हाथ में घर [.६५ ] दिया जाए। या दूध की तरह गिलास में फेंटकर पिला दिया जाए। वह तो जानने- समझने वाली चीज है। कहते हैं, गरीबी का दुःख है। गरीबी का दु.ख है, तो अमीर लोग फिर क्यो दुःखी हैं । बड़े-बड़े सेठ-साहूकार, जमींदार, जागीरदार और राजे-महाराजों के पास धन की क्या कमी थी। लेकिन उन्हें भी सुख की तलाश में दर-दर भटकते देखा गया है। मन मे शांति पाने की इच्छा लेकर लोग इन तीयों की ओर आते है । हर वर्ष तुम लोग देखते हो, हजारों-लाखों की संख्या में यात्रियों का आना होता है। किसलिए? निःस्वार्थ भाव से कौन यहां माता है किसी-न- किसी दुःख-दर्द से टूटकर ही आना होता है । दुःख और मन की अशांति ही खीच लाती है। कुछ न सही, पुण्य और मोक्ष की इच्छा तो रहती ही है । माई-लोगो को बाबा समझाते है कि मन मे इच्छा रखना ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है। आदमी की इच्छा प्रबल होती है और वह पूरी नहीं होती। इच्छाएं कभी पूरी हो भी नहीं सकतीं। हां, अपनी शक्ति और समर्थ के मुताबिक यदि इच्छा बनती है, तो वह पूर्ण हो भी जाती है। लेकिन आदमी का अज्ञान है कि 'वह ऐसी इच्छाएं मन में रखता है जो उसकी शक्ति और समर्थ से कही ऊंची पड़ जाती हैं। मानव-प्राणी की इच्छाएं अनन्त आकाश की तरह फैलने लगती हैं, इसलिए उनके पूर्ण होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। और यही बात उसके दुःख का कारण बन जाती है । इसलिए इच्छानही रखनी चाहिए। जो मिलना है, वह अनिच्छा से भी मिल जाता है और उसी से सुख उपजता है-~कहकर बाबा चुप हो जाते है। माई-लोग बाबा की बातों को मन लगाकर सुनती हैं । "हा, महाराज ! तो हम लोगों को क्या करना चाहिए ?" बाबा लोगो को छेडना पड़ता है, तभी वे कुछ बोलते है । सब चाहते है कि बावा कुछ-न-कुछ बोलते रहें। वावा अब कहने के मूड में नहीं। कहते हैं -अब दूसरे दिन आमोगी, तब बनाऊंगा कि तुम लोगों को क्या करना है। पर माई-लोग मानती कहा हैं । "कहां से सुख मिलेगा महाराज! कैसे मिलेगा?" वावा चिढ़ जाते हैं । "सुख कही विदेशों से थोड़े ही आता है कि लाकर कोई तुम्हारे अंदर डाल दे। वह सब तुम्हारे अंदर ही है, वही से उपजता है। तुम्हें परमात्मा ने सभी कुछ दिया है। इतनी कीमती चीजें कोई किसी को नहीं देता। लेकिन उस प्रभु ने सबको दी हैं। ये दो आंखें हैं, कान हैं, हाथ-पैर, दिल-दिमाग "क्या नहीं दिया है। इनसे जैसा [६६] - बरतन करोगे, वैसा पा जाओगे। यह जिभ्या है । देखो कैसी चीज है। इससे कठोर वचन निकलेगा तो पिट भी सकते हो। मीठी बात निकलेगी तो लोग तुम्हारी पूजा करेंगे । तुम्हें मानेगे और हर इच्छा पूर्ण होगी । इस तरह हर चीज के बरतने का तरीका है। मन है, तो समुद्र से भी गहरा है यह मन । इसके अंदर हलाहल भी है और अमृत भी। इसे जैसा बनाओगे, वैसा यह बनेगा। अमृत पीना चाहो, तो अमृत मिलेगा। इसी से आदमी बंधता है और यही मुक्ति का कारण बनता है । पर इन चीजों को समझता कौन है । झगड़ा इसी बात का है कि अपने पास पड़ी हुई दौलत को कोई नहीं देखता और बाहर लपकने की इच्छा रखते है । सब साले... दुनिया भर की बातें करते है । मोटर गाड़ी और हवाई जहाजों में घूमते है । रूस, अमरीका, चीन-जापान, जाने कहां-कहां जाते है। आकाश-पाताल की खबर ले रहे हैं, पर अपनी खबर किसी को नही। अपनी जमीन पर कोई नहीं उतरता। अपने दामन मे नही झाकता । वात करते हैं, दुनिया पर काबू पाने की और घर में अपने बीवी-बच्चों पर काबू नहीं। अपने मन पर काबू नही । जो अपने आपको न समझ पाए, वह दूसरों को क्या समझेगा।" इन बातों से बाबा का मन दुःखी हो जाता है। कहते है, "तुम लोगों को मुख चाहिए, तो पहले अपने को समझो। खुद को जानो कि तुम किस काविल हो। सुख कोई बड़ी चीज नहीं है। सुख बड़ा भी नहीं होता। तुम्हारा मन ठीक है, तो वही सुख तुम्हें सूखी रोटी के साथ प्याज को चटनी में मिल जाएगा, जो एक बड़े आदमी को नाना प्रकार के पकवान मे मिलता है। कंचे महल में रहने का सुख, भोपडे मे टूटी खाट पर पड़े रहने से ज्यादा कुछ नहीं है। बड़ी चीज में बड़ा सुख नही । भूस सबको एक ही तरह की लगती है । भूख, प्यास, नीद और हंसी-खुनी सब एक ही तरह की चीजें हैं । कुत्ते-मूअर को कीचड़ में लोटने से वही सुख मिलता है, जो रेशमी गदेलों को गुड़मुह मे अमीर के बेटों को मिलता है । मेरा मतलब सुख को ग्रहण करने से है कि आदमी उसे कब और कहा से ले सकता है, यह बात उसकी समझ पर ठहरती है । दुःख-सुख किसी को बपौती नहीं है कि वह उसे रोककर अपने पास रख ले। पैसे की तरह एक जगह टहरा ले । पैसा हो न हो, वह तो व्यापता ही है। उसकी कीमत पैसे से बढकर है, राज्य से बढकर है। शासन-सता से भी ऊपर। [ ६७] जो लोग दूसरों की तरफ देखते हैं, वे अपना सुख भी खो जाते हैं । दूसरों के सुख से कोई सुपी नही हो सकता। दूसरों के सुख-दुःख को अपने मे भरने वाले लोग भी है। लेकिन उनकी बराबरी हम लोग कर नहीं सकते । उनका अपना कुछ भी नहीं होता, या फिर सभी कुछ उनका अपना होता है । वे सब में अपने को पाते है और अपने में सब कुछ को." हम तुम लोग वहां तक नहीं पहुंच सकते। इसलिए छोड़ो...। ये सब बातें पागल बना देने वाली बातें है । तुम लोग जैसे हो, वही रहो । इसी में कल्याण है।" कहते हुए बाबा अपनी चिलम उठा लेते हैं। और माफ करने में लग जाते हैं। माई-लोग अब उठकर जाने लगी हैं। बावा की बातें सुनकर उदास मन सुख का अनुभव करता है । बाबा की चातें अदर ही अंदर गूजत्ती रहती है । गांव के लोग अव कुछ समझने लगे हैं। एक साथ मिल-बैठने से ही समझ आती है। चीना और उसकी एकता कमेटी के काम हैं। लोगों की नजरों मे चौना पहला आदमी है जो सबकी बात समझता है और जिसने लोगों को कुछ दिया है। गाव के दुःख-दर्द को वह जानता है। इस दुःख-दर्द को वही दूर कर सकता है। बातें सब तरफ से फैलने लगी हैं। इस बार लोगों का ख्याल है, चीना को चुनाव में खड़ा करने का...। वह नेता बन गया, तो समझो विकास हो विकास है। इन गांवों के लिए ऐसे ही लोगो की जरूरत है। एकता कमेटी ने एक-से-एक उदाहरण मबके सामने खड़े कर दिए है । लोग चाहते हैं कि इस तरह विकास के कदम बढ़ते रहे। क्षेत्र में घूमने वाले राजनीतिज्ञों में अब कुछ हलचल पैदा हुई है। चीना की मेहनत और उसके काम खूब कारगर सावित हो रहे हैं। यही बात रही, तो सब कुछ हाथ से निकल जाएगा। वह झाड़-झंकाड़ की तरह सब चीजो का सफाया कर देगा। इस बार चीना को कोई रोक नहीं सकता। लोगों ने अभी से उसे अपना नेता मान लिया है। उसे नेता बनाने की पूरी तैयारियां कर ली हैं। आदमी अपनी मेहनत से उठ रहा है। अपनी मेहनत से उठने वाले को कोई दवा नहीं सकता। [६] चीना को ये बातें पसंद नही । कौन लोग ऐसी बेकार बातें फैला रहे हैं । वह लगों से कहता है कि ऐसी अफवाह न फैलाएं। नेता नेता ही होता है, तब तो वह आदमी भी नहीं रहता । नेता बनने के बाद कोई कुछ नहीं कर पाता । उन लोगों को करने धरने की फुर्सत कहां मिलती है। चीना लोगो मे कहता है, पर तोग उसकी बात कहां सुनते हैं। चुनाव के लिए अभी वक्त पड़ा है। अभी से लोग आने लगे है, उसके कामों को प्रशंसा करते हैं। चीना को इन सब बातों से चिढ़ है। वह नेता नही बनना चाहता। कुछ दिनों से चीना लोगों से नहीं मिलता। मिलना ही नहीं चाहता, इसलिए कहीं चला गया है। लोग कहते हैं, पौड़ी की तरफ गया था। अभी लोटकर नहीं आया। उसे गए काफी समय हो गया। इतने दिन से वह पौड़ी में क्या कर रहा है ? ऐसा कौन-सा काम अटका है, जिसके लिए इतने दिन लगा दिए हैं। चीना की खोज में लोग पौड़ी पहुंचने लगे हैं। पौड़ी में कोई नहीं बताता कि वह कहां है । उन लोगों का कहना है कि बहुत दिनों से वह पौड़ी मे दिखा ही नहीं। कहां चला गया? लोगों की चिता बन आई है। किमी से कुछ कहकर नहीं गया, तो गया कहीं। लंबा समय बीतने आया है, चीना का कहीं पता नहीं। उसकी मर्जी के बिना नेता बनाने का यही फल है कि एक आदमी हाथ से निकल गया है। आज ही नागा बाबा उसे तलाश करके लौटे है । दूर-दूर तक हो आए हैं लेकिन उसका कोई पता नही । दयालजी साहब की परेशानी बढ़ गई है। इतनी बड़ी जिम्मेदारी उनके सिर डालकर वह चुपचाप कहीं निकल गया। यह अच्छा नहीं हुआ। एकता कमेटी के मेम्बर और दूसरे लोगों को इसमे कोई राज नजर नही आता है। चीना इस तरह से पलायन कर जाए, यह वात समझ में नहीं माती। बहुत देर के बाद पांडेजी को कुछ कहने का मौका मिला है। उनका कहना है कि जो आदमी ऐसा पलायनवादी है, वह कोई काम कैसे कर सकता है ? एक जगह जमकर काम करने वाला आदमी ही कुछ कर पाता है। जिम्मेदारी न लेने वाले लोग पलायनवादी होते हैं। विकास की बात लोग करते हैं, पर वे नहीं जानते कि विकास तो अपने घर से ही शुरू होता है । आदमी पहले अपना विकास करे, तभी वह दूसरों का विकास करने योग्य बनता है । लेकिन जिसका घर-द्वार नहीं है, सिर पर कोई जिम्मेदारी नही, वह दूसरों की परवाह क्यों करने लगा। उसे दूसरे के विकास से क्या मतलब? [.६६ ] बात-बात में पांडेजी लोगों को समझाते हैं कि इस धर्म-परायण भूखंड का विकास खोदने से नहीं होगा। धर्म से ही यहां का विकास संभव है। लोगों की मास्था जब धर्म में होगी, साधु-सतो के प्रति सेवा-भक्ति का भाव मन में भरेगा, तभी विकास होगा। पाडेजी आत्मा के विकास की बात पर जोर देते हैं। आत्मा-परमात्मा में कोई अंतर नहीं। अंतर है तो केवल समझने-सोचने का। चीना की प्रशंसा में उनका कहना है कि वह बाहरी विकास में यकीन रखता है। उसके मन मे भेदभाव नहीं । उसका कोई धर्म-कर्म भी नहीं, कोई नियम-बंधन उसके सामने नहीं था। इस तरह जो आदमी नास्तिक होता है, वह इस धर्म-परायण भूमि पर कैसे जम सकता है। अपने हिसाब से चीना ने जो किया, ठीक था। लेकिन अंत में भादमी जिस चीज को चाहता है, वह उसके पास कहां थी, उसमें आत्मज्ञान नहीं था। उस परमधाम तक पहुचने का मार्ग तो संत-समागम ही हो सकता है, जिसे चीमा ने कभी नहीं अपनाया। पांडेजी की वार्ते लोगों को जैसी लगें, पर इसमे झूठ नही कि अंत समय में आदमी मोक्ष की ही कामना करता है। चीना था जिसने कामना नहीं की, बल्कि जो चाहा, उसे पूरा कर दिखाया । काम करना जो जानता है वह कामना नहीं करता। चीना मे सभी कुछ था। इसलिए लोगो को उसकी तलाश है । सारे प्रदेश में उसकी चर्चा है। लोग उसे खोज लाने की हर संभव कोशिश में लगे हैं । वसंत फिर लौट आया है। पेड़-पौधे और वनस्पतियों में जीवन सरसने लगा है। शिशिर से पीड़ित किन्नर प्रदेश को कुछ राहत मिलने लगी है। छः महीने वर्फ और शीत-लहरों को झेलती हुई प्रकृति को कोमल काया को अब धीरे-धीरे पाक्ति मिलने लगी हैं। अब अपना शृगार रचने में धरती को किसी प्रकार का सकोच नहीं। फूल-पत्ते व बन-संपदा के रूप में उसका पूर्ण सौंदयं भड़क कर सामने आता । आखें इस सौंदर्य को देखती रह जाती हैं। किन्नर नगरी के आस-पास जमने वाली बर्फ भी साफ हो चली। धनी उपत्यकाओं के पीछे ऊंचे पर्वत शिखरों पर झूलती हुई बर्फ, किसी योगी की सफेद बटाओं के मानिद लगती है। समाधिस्थ मुद्रा में ये हिमशिखर अपनी [७.]
भव्यता के कारण सभी को आकपित करते हैं। बाहर से आने वाले यात्रियों के लिए उनका यही भव्य रूप अध्यात्म बन जाता है और उनका चितन ही अध्यात्म चितन । प्रदेश में यात्रियों का आवागमन हो चला है । देवधाम बद्री-केदार के पट खुल गए हैं। भीड़ सर्वत्र उमड़ने लगी है । हर बार यही होता है। पुराने मठ-मंदिर और देवालयो को स्वच्छ, सुंदर और दर्शनीय बना दिया जाता है। प्रदेश मे धर्माधिकारी, आचार्य, विद्वान, वैज्ञानिक सभी तरह के लोग मिल जाते है। चंदन, अक्षत- लेपी उन्नत ललाट पुजारी पंडों को देख, श्रद्धा के भाव मन में जगते हैं । यात्रियों के मार्ग-दर्शन में ये लोग तत्पर हैं। उनके लिए सब तरह की व्यवस्था जुटाने में लगे हैं। परंपरागत यही जीविका मिली है। भक्तों को भक्तिभाव के रास्ते पर लाने का काम सनातन से चलता आया है। यात्रा-काल प्रारंभ होने से अंत तक, किसी को फुसंत नहीं मिलती। जजमानों को तीर्थों के दर्शन-लाभ करवाना और दक्षिणा प्राप्त कर वर्ष-भर की जीविका उपार्जन कर लेना, हर प्रकार से सुखद है। यहां खेती का काम मंद पड़ गया है । इसी को अपनी खेती मानकर तत्परता से लगे हैं। कंचे बर्फान में जमीत कितना दे सकती है, इसलिए यात्रा-पर्यटन को ही अपनी खेती मान लिया है। यह खेती हरिद्वार से लेकर बद्री केदार तक फैली हुई है। गंगोत्री, यमुनोत्री और गोमुख तक ही नहीं, कभी तो सारा देश ही अपनी खेती के समान लगता है। त्रिनेन आयम वाले मैदान में यात्री उतरा कि वही नाम पूछ लिया और 'बही' निकाल कर आगे धर दी। आदिकाल से यात्रा पर आने वाले लोगों का नाम व वंश-परिचय इस 'बहीं' में देखकर यात्री आश्चर्य में पड़ जाता है। तब किसी तरह की दूरी आपस मे नही रह जाती। देखकर यात्री वही बंध जाता दुनिया के हर कोने का आदमी इस मैदान में सहज दिखाई देता है । दंड- कमंडलु और जटाजूटधारी संत-दिगंबरों के दर्शन-लाभ सर्वत्र होने लगे हैं । इस तरह माना सबके लिए फलदायक इस बार भगवान रतिनाथ के आश्रम में भी चहल-पहल दिखाई दे रही है। वहां भी यात्रियों का आना-जाना है। यह नई बात सबके देखने में आती है । सुनते हैं, वहां किसी संत ने आकर डेरा डाल दिया है। संतों को डगर है, जहां अच्छा [७१ 1 लगता है, वहीं रम जाते हैं । लेकिन वह कौन संत-महात्मा है ? किन्नर नगरी के इस बीहड़ भू-भाग में आसन बिछाने की हिम्मत किस में है ? यह आश्रम वर्षों से मूना पड़ा है । भक्तों को छाया देने वाले भगवान रतिनाय स्वयं नीले आसमान के नीचे विराजमान हैं। किसी सास पर्व पर ही आस-पास के गांव की स्त्रियां रतिनाय के दर्शन करने जाती है और घूप-बत्ती दिसाकर तुरंत ही वापस हो लेती हैं। आश्रम में अकेले पहुंच पाने की हिम्मत किसी में नही दिसती। चारों भोर गुंगी हुई झाड़ियां और घने जंगल से पिरा हुआ यह प्रदेश, यातंक ही मन में खड़ा करता है। इन आश्रमों से संबंधित अनेक कथाएं प्रचलित हैं । गांव से किसी बूढे आदमी के पास बैठकर सुना जाए, तो सारा इतिहास सामने आ जाता है। बूढे लोग बताते हैं कि पुराने समय में यहां एक महात्मा हुआ करते थे। यह पुजारी बाबा नाम से प्रसिद्ध थे। उनके किस्से-कहानियां आज भी लोग दिलचस्पी के साथ सुनते हैं । भगवान रतिनाय के आश्रम मे तव कुछ नहीं था। अपनी ही तपस्या के बल पर पुजारी वावा यहा रहे। पुजारी बाबा ने ही आकर इस स्थान को उजागर किया। भगवान रतिनाथ के ऊपर छाया करने के लिए एक छत बनवा दी । अपने रहने के लिए एक कमरा और एक छोटी धर्मशाला भी तैयार करवाई। पुजारी बाबा बूढ़े थे। लेकिन साहस की बात है। जब तक रहे, अकेले ही इस आश्रम में रहते रहे । तब उनके कारण लोगों का आना-जाना रहता था। दूर- दूर से लोग इस सिद्ध-पीठ पर आते । भगवान रतिनाथ की तत्काल फलदायक भक्ति के साथ-साथ उन्हें वावा की संगत प्यारी थी। लेकिन वे सब बातें कितनी पुरानी पड़ गई हैं। अब तो न वह कमरा है, न बाबा ही रहे । धर्मशाला के खंडहर भी शेप नही रह गए। देखकर विश्वास नही होता कि कभी कोई प्राणी इस जगह रहा होगा। उस रतिनाथ आश्रम में किसी संत-महात्मा के आसन जमाने की बात लोगों के आश्चर्य का कारण बनी है। यदि ऐसा है, तो अच्छी बात है। यह उजड़ा देवस्थान फिर से बसेगा। साधु-संत और गुणीजन आकर ठहरेंगे। कुछ ध्यान की चर्चा होगी । वृद्धजन-जो संसार के भोगों को प्राप्त हैं उनकी आध्या- त्मिक वृत्तियों को समाधान मिल सकेगा। लोगों का विचार है कि यह सब-कुछ तो होगा, पर मन में एक ही माशका. [ ७२ ] ज्ञान- . है कि इस बीहड़-वियावान मे कोई टिक सकता है ? बड़े-बड़े महात्मा-जन, त्रिपुंडधारी, जटाजूट-अवधूत यहां आए और इसी आश्रम को उन्होने अपनी साधना के उपयुक्त माना। उनका दावा था कि वे यही रहेंगे और आश्रम के उद्धार का कार्य पूर्ण करेंगे। पर्वो पर यत्र-तत्र लगने वाले मेले-उत्सवों का आयोजन भी रतिनाय आश्रम में हुआ करेगा। ऐसी बातें वे लोग साहस के साथ कह तो देते लेकिन एक ही रात में उनका यह दावा गलत सिद्ध हो जाता और अगले दिन चे भाग खड़े होते । कोई संत-महात्मा इस जगह क्यों नहीं टिक पाता, कारण अज्ञात है। नए आगंतुक के दर्शनों की इच्छा सबके मन मे है । यहा आश्रम जमाने वाला कोई सिद्ध योगी ही हो सकता है। पांडेजी इस महात्मा के दर्शन कर आए है। प्रदेश में आने वाली नई मूर्ति के दर्शन पाने की पहल पांडेजी को छोड़ दूसरा नहीं कर पाता। कहते हैं कि दर्शनो से पुण्य-लाभ होता है। जाने कब किस वेष में नारायण मिल जाते हैं । लोगों से कहते है कि वह नकली साधू नही है । कोई सिद्ध महात्मा हैं। देखने में भी सुंदर। खूब घनी दाढी और गेरुवा ओढे है। बातचीत से लगता है कि वाणी मे सरस्वती बास कर चुकी है। पाडेजी नाम पूछकर आए हैं । अपना नाम आचार्य आनंद स्वामी बताया है। मैदान में इस बार पिने आश्रम द्वारा विशेष कार्यक्रम की व्यवस्था चलाई. गई है । चुनाव का समय भी निकट आया है । इस धर्म-प्राण भूमि की जनता अब धर्म से विमुख होती जा रही है। धर्म धुरी समाप्त होती जाती है। धर्म से ही विकास संभव है । सुना है, इस बार त्रिनेत्र आश्रम की ओर से देश के सभी धर्म- प्रचारकों को बुलाया गया है । 'सवं धर्म-सम्मेलन' का आयोजन किया है । यात्रा- काल के अंतिम चरण तक इस मैदान में कार्यक्रम चलते रहेगे। अगले दिन त्रिनेत्र आश्रम द्वारा आयोजित कार्यक्रम में आचार्य आनंद के, प्रवचनों की सूचना पाकर लोग प्रसन्न हुए। ऐसे संतों की वाणी से पुण्य-लाभ करवाने का काम, आक्षम वाले ही कर सकते है । ऐसा समागम अन्यत्र कहीं नहीं, होता। भजन, कीर्तन, कथा-प्रवचन और अखंड-पाठ चलते ही रहते हैं। दूसरे दिन का प्रातःकालीन कार्यक्रम शुरू हो गया है । आज का दृश्य ही कुछ और नजर आने लगा है। सुबह-सुबह यानी ट पड़े है। किन्नर नगरी और दूर-दूर के गांवो के लोग भी आए हैं । देश-विदेशों के लोग, धर्म और संस्कारों में, [.७३ ]. - . पले हुए लोग... नई-पुरानी विचारधारा और विभिन्न जाति-धर्मों के लोगों से पांडाल पचाखच भर गया। आरंम में महामहोपाध्याय गौरीशंकरजी का व्याख्यान हुआ। विषय पा 'जीव और ब्रह्म जीव क्या है और यह ब्रह्म में कब, कैसे लीन होता है । विषय बड़ा गहन था, इसलिए पंडितजी को लगातार तीन घंटे तक बोलना पड़ा। संत, योगी और विद्वज्जनों के बीच 'जीव और ब्रह्म को चर्चा उठाना साहस को यात है, किंतु गोरीशंकरजी की मूझबूझ और पांडित्य ने श्रोताओ का पूर्ण ममाधान किया। उनके प्रवचनों से सभी संतुष्ट हुए । तदुपरांत एक भजनानंदी भक्त नै निर्गुण-सगुण भक्ति का स्वरूप जनता को समझाते हुए सूरदास और कबीर की धाणी से चुन-चुनकर भजन सुनाए । इसके बाद आचार्य आनंद के आने की सूचना भक्तजनों को दी गई। आचार्य मानंद को देखने की उत्सुकता सबकी आंखों में विद्यमान है। सबकी नजरें विशाल मुसज्जित मंच की उस पीठिका पर केंद्रित हैं, जहां से महामहोपाध्याय गौरीशंकरजी उठ गए थे और अब आचार्य भानंद आकर बैठने वाले थे। एक पतली चादर का कोना कंधे पर चढ़ाते हुए वह नवयुवक सत मंच पर आ विराजमान हुआ। लोगों ने देखा, ये ही आचार्य आनंद स्वामी हैं। इस वेषभूषा में आचार्य को तृप्ति की अनुभूति होती है। सिद्ध पुरुषों की पहचान है कि उनके मन-प्राणों की सुंदरता स्वभावतः शरीर में भी दृष्टिगत होने लगती है। आचार्य के मुख-मंडल पर फैलती हुई तरुणाई और मांखों मे छलकता हुआ कुतूहल-हजारों आंखों को बरबस अपनी ओर खीचने लगा। ऐसे अवसर पर चीना की बातें याद थाती हैं। संत-महंतो की पहचान वह करता था। उसका कहना है कि इन जोगी-जोगटों की आंखों में जादू होता है। अपनी आंखों में चमत्कार पंदा कर ये लोग दूसरो को बस में कर लेते हैं । इस तरह आदमी को वस में करना अच्छी बात नहीं। इस आचार्य ने भी पहली नजर में लोगों को वशीभूत बना दिया है । जन- समूह की तरफ एक बार अपनी प्रश्नवाचक नजरों से देखा और पलकें धीरे-से आंखों पर झुक आई। समाधिस्थ मुद्रा मे एक श्लोक का सस्वर पाठ किया और फिर एक बार अपनी विहंगम दृष्टि का जादू जन-समूह को ओर फेंका। अपने प्रवचन में पंडित गौरीशंकरजी ने जिस विषय को विद्वतापूर्ण ढंग से लिया था, उसी विषय को आचार्य ने व्यावहारिक-रूप प्रदान किया। उन्होंने तीन gunung । चातें थोताओं के सम्मुख रखी। भगवद् प्राप्ति क्या है ? किन लोगों को भगवद् प्राप्ति हुई है और जिन्हें यह प्राप्ति हो चुकी, वे कहां है ? इन प्रश्नों की विशद् व्याख्या आचार्य ने अपने प्रवचनों मे आरंभ कर दी। उनका कहना था कि यदि श्रोतागण धैर्य की वृत्ति बनाए रखें, तो वे एक ही प्रश्न पर महीनो तक अपना प्रवचन कर सकेंगे। लेकिन इतने लंबे समय तक यात्रियों का वहा बने रहना सभव न होगा, जानकर आचार्य ने सक्षेप मे ही बहुत कुछ समझाने की प्रवृत्ति अपना ली । उनको वाणी मे ओज था। भाषा संतुलित और शब्द-शब्द से आत्मविश्वास टपक रहा था। तीन घंटे तक अपने धारा प्रवाह व्याख्यान में आचार्य को स्वयं भी आनंद आने लगा था। श्रोताओं की तन्मयता को देखते हुए उनके बोलने का उत्साह बढ़ता ही गया। अध्यात्म के पीछे भौतिकता का प्रवल समर्थन ही आचार्य को अभीप्ट था। जिसे उन्होंने एक चौथे प्रश्न पर अंतिम रूप दिया। वह चौथा प्रश्न था --किन्हीं विभूतियों को भगवद् प्राप्ति होती है, सभी को नहीं । आचार्य का कहना था कि सभी भक्तजनो को भगवद् प्राप्ति होनी चाहिए । यदि ऐसा नहीं है, तो एक व्यक्ति की अपनी ही उन्नति का हमारी दृष्टि में कोई मूल्य नहीं है। अपना विचार है कि जीवन में सामूहिक रूप से जो प्राप्ति होती है, वही उत्तम है। किसी वस्तु को प्राप्त करने वाला यदि स्वयं ही उसका उपभोग करता है, तो दूसरों की दृष्टि में उसका क्या महत्त्व हो सकता है ? महत्त्व तभी है जबकि उसका लाभ दूसरे लोग भी ले सके। तभी उस वस्तु को प्राप्त करने वाले की महानता को स्वीकारा जा सकता है । अपने प्रवचनों को बनाए रखते हुए आचार्य बोले–मेरी दृष्टि मे वे लोग धन्य हैं जिन्हें भगवद् प्राप्ति की इच्छा नहीं है और जो संसार में आने के बाद अपने उन कर्तव्यों का पालन करने में तत्पर हैं जो जीवन को उन्नत और समर्थ बनाते हैं । जीवन में सामर्थ्य लाने की प्रक्रिया का नाम ही साधना है, वही सबसे बड़ा तप है और उसकी फल-प्राप्ति को ही मोक्ष कहा गया है। जो लोग उपासना मे डूब गए है वे किसी काम के नहीं रह जाते । उपासना का चरम लक्ष्य भी अंततः किसी इच्छित वस्तु की प्राप्ति ही है । भक्ति का चरम लक्ष्य मुक्ति को प्राप्त करना है । मुक्ति की इच्छा रखना भी एक प्रकार से लोभ [ ७५ ] को संवरण करना है । लोभ से क्रोध की उत्पत्ति है, क्रोध से काम और काम से मानव-प्राणी हमेशा दुःखी हुआ है। इसलिए इच्छा धारण करना सब प्रकार के सुखो से वचित हो जाना है। जीवन में ज्ञान की आवश्यकता है। ज्ञान के विना मुक्ति मंभव नही और ज्ञान की उपलब्धि वियावान जंगलो, मठ-मंदिरों या गिरि-गह्वरों के एकांत वास मे नही है । विश्व का विविध जन-समुदाय ही ज्ञान का अक्षय भंडार है । हम उस ज्ञान को प्राप्त करें। हमारा रास्ता गांव और शहरो का हो । संघर्ष और अभावों का हो । विभिन्न बाधाओ और विकट परिस्थितियों से घिरा हुआ हो। तभी हमें अपने जीवन मे सहज ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है और वही ज्ञान मुक्ति का मार्ग प्रशस्त कर सकेगा। आचार्य के धारा प्रवाह भाषण पर श्रोतागण मुग्ध हो उठे । आचार्य द्वारा अध्यात्म प्राप्ति के सहज मार्ग-दर्शन ने जनता की परंपरागत विचारधारा को छिन्न-भिन्न कर जैसे नया मोड़ दे दिया हो। अध्यात्म की जड़ता को तोड़ एक नया विचार श्रोताओं के मन में प्रवेश कर गया। धीरे-धीरे पांडाल खाली होने लगा। लोग अपने घरों की तरफ लौटने लगे। कुछ लोग वही मंच के पास आ जमा हुए। मंच से उतरते ही उन्होंने आचार्य को घेर लिया। भक्तो ने दंडवत् किया। बूढ़े महात्माओं ने सस्नेह आशीर्वाद दिया। स्त्रियां दूर से ही इस संत को प्रणाम कर सकी। कुछ देर बाद प्राचार्य चलने लगे, तो एक विशिष्ट जन-समुदाय उनके पीछे हो लिया। भक्ति-भाव से प्रेरित, उनके आचार्यत्व पर मोहित, भक्तगण पीछे- पीछे चले जा रहे हैं। बीहड वन-प्रात में ऊबड़-खाबड़ पगडडियों वाली तंग घाटी को पार करके ही रतिनाथ आश्रम में पहुंचा जा सकता है । एक ओर अलकन्दा के किनारे एक समभाग में भगवान रतिनाथ खुले आसमान के नीचे विराजमान है । नदी के उस पार का किनारा जब सामने पड़ता है, तो कटी-फटी चट्टानें और गहरी अंध-दरारें ही दिखाई देती हैं । इन चट्टानों को नीव को कुरेदती हुई यह नदी कब से प्रवाहमान है । बरसात में पानी का तीव्र बहाव चट्टान की जड़ों को साली कर जाता है। इस पुण्य सलिला ने धरती के वक्ष पर अनेक दृश्य अंकित कर दिए हैं। घाटियो को अपने में वापती हुई वह स्वयं दृश्यो मे बदल गई है। पृथ्वी पर [ ७६ ] नानाविध इसके रूप-स्वरूप का गुणगान है। भक्ति-भाव मन मे लेकर इसके तट पर बैठा हुआ योगी, अपनी साधना को सफल हुआ मानता है। आचार्य लोग अपने प्रवचनों में इसकी महिमा का वर्णन करने से नहीं चूकते। विविध तापों को दूर करने वाली इसकी पावनता को कौन नहीं जानता। जीवन को इस पानी से उपमानित किया जाता है। पानी की तरह जीवन भी प्रवाहमान है। पानी पवित्र है, जीवन भी पवित्र हो सकता है, किंतु वहने मात्र से यह जीवन, पानी की समता को कैसे पा सकता है। इसलिए जीवन की तुलना नदी से नही। प्रदेश में अनेक रूप और नामो को सार्थक करती हुई यह नदी सनातन बहती आई है और मानव-प्राणी के विश्वास को पूर्णता के अनत सागर में ले जाकर छोड़ देती है । इस पुण्य सलिला के कारण प्रकृति का रूप सज-संवर उठा है। इस किनारे दूर तक फैले हुए खेतों की हरियाली और जंगली फूलो की सोभा मन को उतना ही आश्वस्त करती है। लगता है, धरती का यह समस्त सौंदर्य और इससे इतर सभी कुछ पानी की तरह प्रवाहमान है जो अपने दोनों किनारों से खेलता हुआ वहता जा रहा है। जैसे कि उसे चलते ही जाना है। दिशा, काल और सीमाओं मे बंधकर भी वह निर्वध है, उसे किसी का बधन स्वीकार नहीं। आचार्य भी इस पानी की तरह बंधनमुक्त हैं । आश्रम में पहुचकर लोगों ने पाया कि एक शिला पर आसन बिछा है । एक समुद्री नारियल का जल-पान और आपस मे लिपटी हुई दो पुस्तकें वही पास में पड़ी है। इसके अलावा कोई तीसरी वस्तु वहां नहीं है। आचार्य अपने आसन पर जा बैठे। बैठने से पूर्व भक्तजनों को बैठ जाने का विनम्र संकेत दिया। सबके यथास्थान बैठ जाने पर मात्मीयता के साथ निवेदन करते हुए बोले--"मुझे यहा तक पहुंचाने का आप लोगो ने जो कष्ट किया है उसके लिए आपको धन्यवाद ही दे सकता हूं। यह भगवान रतिनाय को कृपा का ही फल है कि आप जैसे श्रद्धालु और विनम्र आत्माओं का सहज स्नेह मुझे प्राप्त हो रहा है। लेकिन यहाँ इस स्थिति में, मैं आप लोगों की क्या सेवा कर सकता हूं। अभी किसी प्रकार की व्यवस्था यहाँ नही बन पाई है।" आचार्य की वाणी से भक्तजन पुलकित हो उठे। उनमें से एक व्यक्ति ने बोलने का साहस किया, "आप ही हमें सेवा का अवसर दें महाराज! हमारे बड़े भाग [ ७७ ] हैं कि आप जैसे विद्वान-जन इस भूमि में पधारे हैं, किन्तु आपने ऐसा स्थान चुना है जहां इच्छानुसार आपके दर्शन सुलभ नहीं हो सकते। उचित तो यही था कि आप किन्नर नगरी में विधाम करते और हमें योग्य सेवा का अवसर देते।" सुनकर आचार्य बोले, "किन्नर नगरी-यह नाम मुझे प्रिय लगा है। यह नाम जितना प्यारा है उतने ही प्रिय यहा के बासी हैं । जीवन की सादगी में मेरा विश्वास है, इस प्रदेश में आकर यही दे रहा हूं। चाहता हूं, ऐसे लोगो का मंपर्क रहे।" कहकर आचार्य चुप हो गए । भक्त लोग आपस में बातचीत करने लगे। अब थोड़ी देर बाद संध्या उतर आएगी। घाटियों के बीच संध्या का अवतरण अपने- आप में एक दृश्य बनता है। कालेवन की ऊंचाई वाले भाग पर सूर्य की किरणें शनैः शन: मंद पड़ती जा रही हैं । भक्तजन बैठे हैं। उनकी आंखें बार-बार उस स्थान को टोह रही हैं, जो कभी एक कमरा और धर्मशाला के रूप में था। देखकर पहली बात यही मन मे आती है कि आचार्य के रहने के लिए एक कमरे का यहां होना जरूरी है । अभी इस संबंध में कोई बात उठी नहीं। लेकिन बहुत-सी वान अपने आप बन आती हैं । वातावरण में सारा कुछ समझा देने की सामर्थ्य है। स्थान का यह वातावरण सबके सामने था, जिसने भली प्रकार यह वात लोगों के सामने रख दी कि रहने की व्यवस्था वहां होनी चाहिए। व्यवस्था के अभाव में वहां कोई टिक न पाएगा। कुछ समय बैठे रहने के बाद भक्त लोग उठकर चलने लगे। आचार्य भी नदी की ओर उतर गए। एक गहरे जलाशय में ऊंचाई से पानी गिर रहा था, उसी के किनारे जा खड़े हुए। ऊंचाई से गिरने वाला पानी अपने गुरुत्व के कारण गहरे पैठ जाता और फिर फेन के रूप में ऊपर आकर आधे जलाशय पर फैल पडता । इसी क्रम को आचायं तन्मय हो देखते रहे । मानो पानी के ऊपर बिखरने वाले बुलबुलों के रूप मे जीवन-लीला दिखाई दे रही हो । देखते रहे और अंत में हसी छूट आई। योतती हुई घड़ियों मे सन्नाटा और गहरा होता जा रहा है। तापमान अभी अनुकूल है, लेकिन रात मे वह गिर सकता है। घाटी का वह शांत कोना अपने पूरे प्रभाव में है। चिटचिटचिटचिट्तिलचट्टों की यह कैसी आवाज है। तने के [ ७८ ] रंग से एकाकर झीगुरों ने मिलकर रात का संगीत छेड़ दिया है.''झन् झन्न " झन् झन् झन्न् "झन्"। उसकी झनकार और पानी के स्वर ने मिलकर अंधकार का करुण संगीत पैदा कर दिया है। हां, अंधकार का.. जो उजाले की मृत्यु का साक्षी है । वही संगीत इन धाटियों में बजता है। इन अंधेरी घाटियों में जीवन एक फूल की तरह खिलता है और झड़ जाता है। एक प्रकाश की किरण फैलती है और अधेरी तहों मे बंद हो जाती है। अंधकार के इस ऐकातिक संगीत को कोन सुनता है, इन सर्वाधिक भूक क्षणों का साक्षात्कार कौन कर सका है। इस महाशून्य मे मन को वृत्तियां रह-रहकर चंचत हो उठी है। ऐसे वातावरण में मन की स्थिरता संभव नही है । तब एक ही प्रश्न बार-बार सामने आता है। सोचते हैं आचार्य ! मैं यहां किसलिए आया हूं? कौन-सी प्रेरणा लाई है मुझे यहां ? प्रश्न अकेला नहीं। इसके साथ हजारों प्रश्न जैसे उठ आए हों। लेकिन मन में उठनेवाले इतने प्रश्नों के उत्तर किसके पास हैं। यकायक कुछ दूरी पर रोशनी का एक गोला आचार्य की आंखो में चमक उठा । प्रकाश का वह पुंज भड़कता-बुझता-सा इसी ओर बढ़ता आ रहा है । ऊंचे पहाड़ और गहरी घाटियों वाली इस धरती पर देवताओं का बाम बताते है। भूत-प्रेत भी इन्ही अंधेरों से उपजे हैं, यहां प्रकाश भटक रहा है, भय और संकोच से सिकुड़ गया है। कुछ देर बाद आचार्य ने पाया कि हाथ में लालटेन थामे नागा बाबा सामने खड़े है। देखकर वह मन-ही-मन मुसकरा दिए । शंकित मन को धैर्य मिला। बोले, "पधारिए महाराज ! कैसे कष्ट किया ?" बावा ने आचार्य के चेहरे पर आंखें जमा दी और फिर उत्सुक हो बोले, "तुम्हारे आचार्य-रूप के उदार दर्शन आज पहली बार सबने किए हैं। देखकर विश्वास होता है कि आदमी जितना दुर्बल और निरीह है उससे कहीं अधिक समर्थ और शक्तिमान है । ऐसा आदमी धन्य है। लेकिन अब हम लोगों पर कृपा करो महाराज ! एकता कमेटी के सामने कई संकट आन पड़े हैं। दयालजी साहब के सिर सारी जिम्मेदारी आ पड़ी है। लोगों को डर है कि एकता कमेटी द्वारा किया गया संगठन कही विखर न जाए।" अपरिचित भाव चेहरे पर लाते हुए माचार्य बोले, "कोन दयालजी साहब ! [७६ ] चौसी एकता कमेटी? यह बाप क्या कह रहे हैं, मेरी समझ में नहीं आता?" नागा बावा कुछ देर मौन बने रहे। फिर उनका विश्वास दृढ़ हो आया। इस रूप में भी चीना को पहचानना बड़ी बात नहीं थी । मुसकराकर बोले, "अब ज्यादा बनने की कोशिश न करो। अपना काम तुमने पूरा कर लिया है। त्रिनेत्र आश्रम द्वारा फैलाई जाने वाली आध्यात्मिक जड़ता को तोड़ने के लिए ही तुम भाग निकले थे न ! जनता को विकास का रास्ता दिपाने के लिए भरसक कोगिगें तुमने की। लेकिन उसे रास्ते पर लाने का काम अभी बाकी है । आज सबको तुम्हारी जरूरत है। इसीलिए रात में लेने आया हूं, ताकि किसी को मालूम न होने पाए।" नागा बाया ने पहचान लिया, तो चीना भी सुलकर सामने आया । बोला, "महाराज! अभी कुछ दिन रुक आइए । आप लोग ही कमेटी का काम देखें।" फिर कुछ क्षण रुककर बोला-"मैं अभी लौट न सकूँगा। अब इस आश्रम को चेतन करके ही लौटूगा। त्रिनेत्र आश्रम वाले भी अब विकास की बात करने लगे हैं। आश्रमों से ही विकास होता है, तो हर आश्रम को चेतन करना होगा। धरती के हर कोने को जगाना होगा। ताकि हर पोज दुरुस्त होकर सामने पाए। बरावर सबको अवसर मिले, शक्ति और सामय मिले। दूसरे को घटाकर अपने को कोई बढ़ाना चाहे तो बढ़ा नहीं सकता। दूसरों को रोककर स्वयं आगे बढना, विकास क्रम में शामिल नहीं है। इसलिए साथ-साथ खुलने दो सारा कुछ.। लहर को आने दो उसमे हम भी वहे, आगे बढ़ें और सबसे ऊपर निखर कर आएं। वही सच्चे अर्यों में विकास माना जाएगा। यही विकास की कसौटी है । ऐसा विकास कभी रुकता नहीं, रुकेगा भी नही...।" नागावावा स्तब्ध सड़े हैं। जैसे फिर से नई दीक्षा ले रहे हों। चीना की बातों से लगा कि वह लौटने वाला नहीं। चुपचाप उसकी बातें सुन लेने के बाद अंत में चोले, “यही तुम्हारी इच्छा है, तो करो जैसा मन मे माए । एकता कमेटी अब कमजोर नहीं रह गई । जनता सब कुछ समझने लगी है। इसलिए तुम रहो। जैसा मन मे आए."करो।" कहते हुए नागा बाबा ने मुसकान-भरी नजर से चीना को देवा, विदा मांगी और वापस लौट आए।
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'पूर्वोदय' के श्रेष्ठ उपन्यास निमल कुमार जनेन्द्र कामार .. " दिन उद्गम के स्रोत (दो मंहो में) अनाम स्वामी जयवद्धन यामा अनन्तर मुक्तिबोध मुसदा विवत व्यतीत त्यागपत्र " . " परख सुनीता कल्याणी अन्धी आग सुमंगल प्रकाश अमलतास স্বামিমা গান্ধী मिट्टी का पुतला कालिन्दीचरण पाणिग्राही केरलसिंह फा० म०पाणिक्कर भयभीता मू० ले० स्टीफन ज्वाइग, रूपा० दिलीपकुमार अन्तर्कथा बल्लभडो भाल आरुणी निर्मल कुमार