Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Kavi Shri Mala Gujarati
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फक्-िश्री माला
* गुजराती
कवि
दयाराम
तेवर-सम्पार
अन्नम्तराय रावल
पछि
राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा
मोहनकास भए
मम्मी
'राष्ट्रमापा प्रचार समिति
हिन्दीनगर, पा
सर्वाधिकार सुरमित
प्रपम संसरप-1..
मा १९६२
मुस्पन २/-
अमर
परमागरा प्रेग
हिमगर,
भामुख 71- हर्पन विषय है कि राम्दमाग-प्रचार-ममिति, पर्वा अपने कार्य जो " वर्ष सन् १९८० में कर रही है। इस उपलमयमै मनाये जानेवाले रसत-अयन्ती मात्मरके अपमर म मा मारतीय मापायक प्राम्य पियका तथा उनके अकृष्ट मध्यम परिक्य 'मप-पी मालदी एम पुस्तकॉम हिन्दी-गमनुवाद सहित प्रसारित म योगमा अन्तर्गत प्रस्तुत मन्य पार के समय का रहा है। पपिरिसीमो माय मर्वप्रष्ठ माध्य सर्वत्र निश्चय प्रना कठिन । सो असी मामाने ध्यानमें रमने गम्यमाम्य 5-उन मापाओके विद्याकी गयी ही पुण्य कार्य सम्मान दिया गया है। प्रत्येक पुम्टको प्रारम्मम जिम मा पदिय रचनाओन वा किया गया। म मा मास्पिन परिचय मोर करविषय परिचय दिया गया। जिसमापो वियोन पुन्नय किया गया है, उनम चुगव करते समय म १९२ मे पूज और १९२. सेबापत्र साहित्य-मरहम (विभाजनमा प्यानौ र गई। मन परप पार गमग मा १९२०० पूर्वी तया १९२ बारे मीत्पमें प्रशस्ति विपर-धामाम विशेष प्रसन अगाव- या जाम है। मी अनन्तरायण याने प्रमुख पुस्तक मंदानित माहित्यको पुगो पाल्प'नने मम्पति कमाये मामको म्म रूपमे प्राव कर मायोम दिया है। समूच मामयी गुजराती हिटीम अनूदित करनेमे भी गायली योनी एवं श्री रामअपक्षेत्री त्रिपाका अनाप मल्योग मित्र है। कुछ दिता अनुवादमें भी दामुप प्याम मी महापय दी है। पुम्तम्मे संजय मोम रेमापित गुरु की रविनती गवते मूधिर मापार की रमण विकार पर किया है। ममएकी भामम मिान नपटनम कीटकी ल, अमरकरी (24, सर टी आफ अपार मार्ट, बीच स्पर सहयोग मित्री उममिति मनीकी अमरी" मरे अतिरिक्त पा भन्दम्य इस्टमे मन-विना प्रत्यम एवं मस्या मायोग मित्रो के त मी ममित अग्नी ताना स्पश्त बरती।। मोहन मंस शो सविन एवं उम्मीठोग। hidarin an मगी राष्ट्रभाषा प्रसार समिति, बर्षा
अनुक्रमणिका
गुगराती-साहित्य-परिचय [प्रारम्भसे १९२० तक ]
कपि-परिचय
पृष्ठोस
काम्प-सम्पय
२१
कवि-श्री माला
गुजराती
दयाराम
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गुजराती साहित्य परिचय [प्रारम्मसे १९२० तक]
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गुजराती भाषा और उसका साहित्य पूर्वर रंग - मारो गर प्रान्तमें बपने पुराने नार्मोसे सुरक्षित रामास TE- सौराष्ट्र या पुपने जमाने विभिन्न पाप्तोर्मे-- मानत मुर्गा माम साट' मोर पारस माममे प्रग्यात प्रामापा ममारे हो पाता है। रोग .. वर्ष पूर्व म प्रवरा नाम मुगरात मा। हम गमपमा मुगगत माम तया इमर पूरी गुरवा मगत तपा मुर नामो मम्मम्प पुरवानिरे साप। पीपा गानि पापरी तापी रत्तराम * पापी पाम पर दीप भारतमें प्रविष्ट होमर सिम पचाप हार रामानेमें बन पा इमो बार नर्मदा तटपी प्राम एवं मापदर्भ मी। नगगिता पाहमा मिप्रमाण र राम्प वा। उत्तरी गरम मुमनमानौरमामागारम एमसी पामीर मध्य भागमें मरने मिप्रमाको पारामान उत्तर पुररानमें अपना निवाम बारम्म लिया। मोपत्री और पापेला पगोरे पीपा पार मुमरमान पामसार हो परिषम मार रथिमी मोर को मीमा विस्तार हुमा उमे ही पर्षमान पुनराम माना गया है।
सभी भापामोश नाम मिस वय प्रदेपपानी होता है, ठीक रखी गए गुगरणी भापा मुगल्ती है। उत्तर और मम्म भारतकी प्रादेशिक पापाक समान पह पापा भी भारतीय बार्य (Indo Aryan) मापाको संसात प्रास्त और अपप्रय भूमिकाओंके वारकी भूमिका स्प पापा है। इसका समीपवर्ती पूर्व रप परिचम भारतीय या पौरसेनी अपप्रमो कपापा और पस्मानीका भी मूस है। प्यापी तामासे पागली तामी तपमा काठ पुगराठी भापा उपभमा पास पराली पानी प्रारम्भ काम मा सोलही सवादी मध्यकालीन पुनरावीश कारमहा माना। १७की भवाम्दीसे मुगपतीकी बर्षालीम भूमिका पुरू होती है। सरो भाषाओं का प्रभाव इस प्रकार पुनराती पापा अपप्रम प्रान और सावक सार सम्बन्ध होने पारण ग्म परमगार तलम (संरके समान) और समय (समासे निप्पन ) पर अधिक हो या स्वाभाविक ही है। मन प्रदोई समान ही इममें प्राात मपप्रेस मुम प्रादेशि बस्ती तमा पुगेर ममान बाहरमे मामेवामी माविमो परम्परागत रेपर एमोरा भी ममिभन है। पुरानी मापा ममगारम भरवी-मारमा पम भी कम नहीं है। पुररान-मोपण ममुद्र तट साप बाप-प्यापारियों मोर मलाहाण मम्मम्म बहुत पुराना अति मुहम्मद पनी द्वारा सोमनामपर रिएमा मामी पहमेपा। १२९७६ में बलागीन गिमगीने पुराणको गीत लिया। पमोबा ४४. पर्पक मुरग्राम मुमतमानी प्रामन या और उन पामम पास भरली पापा शासन-सम्पादनकी पापा पी। माप्रमावबमवासीमापापर पौगा। कार' 'म 'दुनिया' मला 'मगर मे परमरपी पगार हवा नमीन' परिपा' 'गरीब' पर बारि नरमी पार पुरती मापा माने ही पण पर पए। गुगरानी मापारा उमर और रिसाम मुगलमानी शानन पाहमें ही हमा और पुरगती पापामें उमर प्रारम्भ पानी से में गणेश प्रयोगाने ममा है। मुगीन मन्य विदेशी राम भी माना है। मीर मम्मान र मार बमम पुरगामे ही। पगार पल्टन बटारा बारम पानी मे पुर्णपीर पर भी गुमगनी भागमे गा मिर्म है। और ये पाय मान भी मारम है। पर पाप अपनी भाषा गरमागनी बार बारमारा माम्पम गी। मिरे परिणाम-गरम र टेबल पाम भन मोरिम र मारि गरी ने भी गुगाती भागमें भारला पान बना पिया है। पुराण मने भी मुगाली भार पर बार पाहै।
५ पुनरावी मापा-माहिरपका या सौभाग्य है कि उसक पास बहुत मी हमासिनित मामपी tो गुरापती भापरि प्रत्येक सममिक विरासमा इतिहास नाम देती है मौर मम्मकासमें विकमित माहित्य प्रकारे अनेक नमूने प्रस्तुत करती है। इनमे यह मित्र होता है कि मुरापती भापा विधमहे साप-माप पुनरातीमें मने प्रभावशाहिरबका भी सर्जन एमाई। ईसाकी वाहनी पानीम लिवित साहित्यिक कृतियों मुद्रित पस्पमें प्रकामम गत साग्दीमें होने लगा। तब सरकार साहित्यको मामातीन माहिरप मोर उमर पार साहित्यको माधीन साहित्यका मा पाता है। इस तरह मुगरातो साहित्य दो भागाम घट गावा। मम्मकालीन पुनराठी साहित्य मपिता पधर्म ही लिवा ममा है। किन्तु इमस यह म समम मैना चाहिए कि उम समयमै गप वितार लिया ही नहीं गया। ममत प्रााव पर्म पक जलमार भाप्परप बालारपोष मार टवा मे गय है। इमी तह स्तर इप्टान्त साबो (पपरे माय गय भी) पृयीपत परिण मिहामन पीनी पारि कहानिना मप मिती मई है परन्तु ग्मा परिमान पकी तुमनाम कम पा है। दुनिया अधिकार साहित्पी कविता ही प्राम मिपी मी मराठीला प्रारम्भ भी परिणाम हमा है। उसमा एक मारग संत बपभ्रंश मारि साहित्योंकी परम्परा भी है। पर मुगरातमें मुाप मात्र महीना और साहिप रठोपाठ स्मरण रवा माता बाप उम्प करनेमें मपकी अपेक्षा पच ही मधिर मुविधासमा होता पा। यह उन समयमी परिस्थिनिस मरा कारनपा। इमी पारममे भम्पकालीन पुररानी चाहिपमें पपमें भी पानिकोपी मपेवा मात्रिक इत एवं य पुन रचनाझेरा मन अधिक मात्रा हुमा। मर्म-साहित्यका केम-दिनु मम्पसमीन नापिकी मुम्प विषिष्यमा पाहै कि उमदी विषय- परिधि मानिकी नाम बन सपु है मौर र धर्ममे पारित है। पग्रहये पता पूर्षगा या रमर बार म मापुगे ए लिया गया साहिप्प पामिरही है। उनकी धर्मनपाएँ पम-यमा प्राय पति पानापोप और मायामा मनास मी गंगा प्रसार प्रमों और पुनीषद पति' बम नाम सोपान पामिनाम दमा मत मपनी राम-बैमी रमारमर पुपनी पाएँ और गीलपती मा राम नी पहानियां भी बनतोपरमा धर्मम ही अनु भागितहै। मेमिनाप बाहपमि बोर मिरा-4म पामिर पुरावा मित मानी नमरमिह और बस्नुपालन और मनरेगा मेपर मे भारीपरिष गिन और नाबारी धर्मनिप्य ही रिलाती है। उस समय न धरे सिपाप और भार मी मुप्रतिष्ठित धर्म है हित गर्म। हिन धमकी मातो निमेपता महक अधिकार मेर प्रति पेशी अनुसार मूर्ति पूमामे पुरु कर निराधार निर्पण बहकी उपासना कभी समा कर्म पति मान और पोम-से विविध साधर्मोग इसमें उबार भाषसे स्वीकार किया गया है। हमारे पहा पियरकी उपासमा पमपमें गोपीगन मस्सम भीमबम्पपिपप तथा समित रूप भी पी पीर-चपत और परका वांत प्रतिपारित करनेपाना मेराम्त सिवन्त पी प्रतिष्ठित है। मध्यकालीन नेवर मुररावी पापितापर हम सबका प्रभाव पड़ा है। उनमें भरसि मीप और प्यायमके प्रेम बसपा पनि उत्तम पद भक्त भवमान पोर पतिका पौरप पानेवाले भारुप प्रेमानन मारि बास्मान है। शिव-भक्तिका साहित्य है। सप्तसतील मनुपाप बोर नामक परवा भी शिक-मक्सिको कविता है मानिस बया मारि, प्रीतम बारिकी राती भाममा पिताका प्रहार गोव पवार मामी मोर मामीनारायण सम्प्रदाय मन्तोंकी भवन-यापी भी है। मम्मपाहमें पारखिमों और मुमतमानो बागमन साप परमोत्ती मार इममाय बर्गध प्रमेय भी पुगराव हुमा। इस धक बनुमायी भी मोन नही ठे पे। गम्होले मध्यपाठ को सिवा है पास पर्म-भावमामे प्रेरित होकर सिपा। उस समय पारमियाँले मपले धर्म-सम्बमि संरतमें बार फिर ससदमे सामान पुरानी मापातर स्यिा है। मी तरह र सतार और पौरकारहीन मे सलाम उपरेकोष प्रमापसे विधर्मको छहार नाम धर्म ग्वीकार परमपानी योगा प्रतिपा सपा मोरानी पानियोन भी मारली पामिक गतिाएं हिदी पी। मापारियोंने पोर तथा भवन मिले उसमें कसीर, मामाकी भाषीको पनि विमान इतमाम और मुरपि (मुर पीर) की माला माई पारिताप बाहपाप, हिम् भवन-वानीपी ही प्रगामीरा मनुकरण है। ईमाई मर्न भी ..मी मरीयामीमें मुगणी भाषामें ममतालीन पुरानो मापिरो धमकी प्रापिमारमा अपित पमम बाया है। और मारप रानिहरमानानि भूमिााद। ११ी मनापीमेपासको गुरप्ली गापा और माहिरा मारगम पान माना पाता। मापार मौसी और बापतामोरा जाममा पा। न र पुरगत बीला माता, माप और नमार गो मापन नमपरे मरमे पपने मारिप मिगेम कहोमें अभियोगमा गमिऔर प्रमपमानासतापान मारे गम और समानार, १२004मीनही गाने पापपर अधिर पा रमे पर सपनामा मोदर font ७ सूबेरारीने भौर उमरबार गुजरात के स्वतन्त्र मुण्तानाने मौर उसके पन्चात् मुगत शनि प्रतिनिधिपनि पुरफापर हुपत की। मुमममान पामोंमें पुण्सामा पन्धि । मन्दिरकि वो-मो धर्म-परिवर्तन दौर मपनी सम्पत्तिकी एटमे गबनेके लिए हिंदू बस्तियो प्रदेणके भीतरी पिम्माडी मोर हटने मगी। उस कारमें पतत्रता प्राप्त होनेरी कोई सम्भावना नही पी मार जीवन संग्राम इना पटिस मही पाक मान्तिसे जीवन निर्वाह न हो मह। मा पैतृक म्पबमाप करोए. पानि मौर सम्तोपकी गिरवी म्पतीत करनेवार सोम धर्म पामनगरी वाकांक्षा नापत होती थी। मोगति बम्प घरै बारमणमे अपनी रक्षा परमकी साभाषिक प्रेरणामे पाएएकी तर मपनेको सेकुचित करके जाति मोर महामनाक बमॉमें छिपकर अपने पत-नियम प्या-पवन धर्म-पाहन तया पर्चाम्सब मनामे उपाठीर्य-यात्रा परमेम ही अपना मेय माना पा और मापार-विचारको परम्परागत प्रणालियो पारी खार लोगोंने बपने भौठरी बसम्पको पायम रया। ममसमान पामनि भी परमविक प्रस्पाश्मन नपरनेपामी पान्तिप्रिय प्रयाको सपने ममे एने देना मीव दिया था। ११पनाम गोर पानेवाले मोर मोमहर्षे शतक में मारे देगमें फैन जानेमाने भक्ति मान्दोमनने सपा ममम्ठ रेपमें सलामीन मतों और मोकी प्राट होनेवाली वेगमी परम्पराने भी धमकी और रमझमाहित्यको प्रेरक बस मानाया। संस्कार-प्रसान-साहित्य उप प्रारकी रानतिक मोर मामागिर परिस्थितिम हिन्दू रागाों द्वारा संगतको पो मन त राग्यामय प्राण पाबह बन ही पपा। सादिस्प सोसायी बना और इममे सोरमापा मारिया माम्पम बनी। जैन मापन पावदित लिए माम्प्रायिक माहिन्या बो सत्माह माय मर्यन लिया गौर रमो लिए पनति लानीनी-मापापा मापय लिया। प्णष भसि मार्गीपारण गमायम मामान से मोरप्रियता बाली मई। एम पारप देगी मापान में उन मनुमाशंकी मार पपा-परमकी मांग सनी पई। ऐमी परिम्पिनिमें पपारारी मोर पौगणिकॉनि मगरीमायोपियोंरो भरने हापोंमें रमा मौर उसको पपा पुरगती भापा डाग जननारी मुगाई। बारमानाने गमारण माभारत और मागम में मामग्री मी और ताण म्यास्यामापी रचना की। ऐम गाए गामेदार मापानों और साम्पानोरा जनतामा प्रचार लिया गना। इस प्रकार इन मोन चमनार पामिकममारीको नागरित पा मार गर्गसनापा। ममिह मसा और मीग पैमे मन भी अपने परोंग भरमै परे भाषीको पस पाने मोर मोर मानमरो पत्ति-सन्मे निम्नर नीरो पो। मम्मीन गुगनी सिने भागबन मिपाय और मार भी मुगतिप्टिा धर्म है धर्म। दिन धर्मसी माती विमेपना पह है कि अधिकार भेद प्राति-मेरो अनुसार मूर्ति पूगर्मि गुरु कर नियार निप्प गएकी सामना कर उपा पर्म भसि मान और योग मे विविध मानोगाइममें उदार भावमेम्मीवार पिया गया। हमारे पाय स्विरकी उपासमा पमपमें पापागम पस्सम भीपप्पपमें प्रिपरेपमें सपा पति कप की पी पीर-पपत मौर सिरतात प्रनिपारित परलेगाना राम्त मिसान्न पौ प्रतिष्ठिर है। मम्पातीन मैनेगर गुगपती पवितार बम सा प्रभाव पड़ा है। इनमें मरमिह, मीरा और मायमर प्रे मनपा मलिक उत्तम पर है मस मपबाम और पनि पौष पाममासे पाय प्रेमानन्द मानिक माम्मान है। पिप-मसिना माहिप है। सप्तमी बापार और पामर परवा भी कि भमिती पिता है परमिह बना मएदि प्रीतम मादि की बसन्ती मनमार्मी अगितामा प्रबाहीबार पोरब पनीर मार्गी और मामीनारायण सम्प्रदाम सन्तोषी भगमनापी भी। मम्मान पारमियों और मुमतमानो मायमनके साप परपोती और महाम पमा प्रवेश भी पुरराज हुमा। इस धर्मर मनुपायो भी मान नहीं बैठे है। नोने मम्ममाहमें गोपनियामा बर्म-भावनामे प्रेरित होकर होमिवा। म ममय पासिनि सपने धर्म अवाम मंसवमें मार फिर ससतसे सालीन पुषण्वीमें भाषान्तर यिा है। उमीतए नूर मवागर मोर पीरलमान पैसे सण-उपोपको प्रभाषसे जिधर्मको छोरर इमाम प्रम स्वीकार करनेपाली योगा मतिया तपादोयमी बानियाँले भी अपनी मार्मिर विताएं सिमी पौ। उपबियोंमे यो पर दया पवन हि उसमें गबीर, भामरकी पानीको मनि मिपमान इमलाम और मुरसिख (पुर पीर) की महिमा माई पई।पिसाबमापाप सि भगन-बाबीकी ही प्रणालीमा मनुकरण परी। माई धर्मने भी १९ परकी इमरी पामीमें अपराधी पापा 'बाहिरी। मम्परासीन पुगपती साहित्यको बर्मती प्ररमिपा करना ही अधिक पनन बापा है। मीर उमा पारप रारनैनिकमोर मामाणि भूमिका ही है। ११की पलानीसे १५पनापी र रामको पुरानी पापा और मारित्पना प्रारम्भ मा मामा पाताहै। महात सोनकी और बागोरा पामन-माल मा। परसराम पुमरान बीला व्यापार माहित्य और मला बारेमें मरमान पनपा। इम मम मबसे पुराने साहित्य मिरोम है अपने दोहोम बपिम्पनीरता पंध-भक्ति और प्रथम-मिया कलावीन बना पषम और उमासपा प्रतीक है। स १२९७ में बलादीनकी सेनाने पाटनपर अतितारकर हिमा सबसे पुराणकी परमिक नवा नष्ट हो गई। सो वर्ष तक रिस्पीक ७ मूबेदाने मीर उमरगार गुमराण मग मुलमानाने भार उमर पापात् मुगल पामा प्रतिनिधियोंने गुपयापर मन की। मुमरमान पामकमि छ घामक पन्धि । मदिरो तोर-मोर धर्म परिवर्तन धौर मपनी मम्पतिकी मरमे बचने के लिए हिन्दू पस्नियो प्रदेमके भीतरी हिम्मॉफी मोर हटने मगी। उम पाय नवना प्राप्त होनेगी कोई सम्भावना नहीं दी मार जीवन सग्राम लिना पटिम नहीं पा कि पान्तिमे गौरन निर्वाह न हो मरे। मन पतृक म्पसमाय करने पए, पानि मार मनोपको जिन्दगी पडीत मग्मेणाम भोगोंमें धर्म पामलकी भाषामा गाग्रत होती पी। होगनि मम्प धर्म मानमममे अपनी रक्षा करनी सामाषिक प्रेरणामे गएकी पण मपनको मचिम फरक गानि मोर महामनाक पर्नुको विपकर अपने इन-नियम पपा-पग धर्म-पानन ना पोम्मर मनाने उषा वीर्ष-यात्रा करने में ही मपमा पेय माना पा मोर मापार-विचारणी परम्परामन प्रभामियोको गारी मार कोोने मपने भीतरी सयका पायम रखा। ममहमान पामने भी एननिक प्रयामा परमयाबी शान्निप्रिम प्रमाको अपने ममे रहने रेला मीत लिया था। ११रमे जोर परगामे और मोह गवरमें मार रेगमें पर जानेबामे मसिमाम्दापनने मा ममम्न में तलालीन मन्नों और मोमी प्राट होनेपापी देगपी परमाने मौर्मको मोर उमर माएिपको प्रेरक मानावा। संस्कार-प्ररान-साहित्य म प्रसारको पति पर मामाविर परिम्पिनिमें गिरायोंरा संगतको गो माता सम्पापय प्राण पाबहान हो गया। माहिग्य होरापनी बना मौर इसम मोम्मापा माएिपमा माध्यम बनी। न मापुन पारको लिए माम्प्रदायिक माहिया ऐ रत्मारक माप मन पिया और उसके लिए उन्होंने हतासीन मोर मापापा मापप मिला। म मरिस पाकात भापकन समापग मामान पी भारपियना मी पर। उमर पापो भागमा उनले अनुमाफी और स्पा-पवनकी माली म। रोगी परिम्पिनिमें पारारी मोर पौगमिन ममरी कपा-मोपिया पर पाम या मोर रामली पपा पुराती भाग नारी नुनाई। बारपानसागाने गमापन महाभारत मौर भमत में मात्रा की और ममत्र दायानोरी रानी! ऐम पार पानेगा मामानोंऔर मायामोरा जनताम पारी प्रबार पिया का। इस प्रकार इन पति नता पानिमा ममागे मार्गस ग्पा मोर नहेगनापा। मर्गमा मालाबार मीरा पैसे मन भी माने पतंग भरन हार मात्र माबोर होन- मानो पति-गम निरनर मापन गये। मसारन पुरानी पिने इस प्रकार प्रमाई मार्मिक संस्कारसरमाँग काम किया। यह ठीक है कि मम्म कामीन पुनराती माहित्य मतिया मार्मिक भावनामसि प्रेरित होकरही सिवा पमा पा परन्तु यह माना ठी नही है कि मौतिक रफिी उस काम बिमत पर्चा ही नही हुई। नर पूर्वकासका प्रपम सक्षम परकोपले प्रति प्रेम बोर होने प्रति बाषि ऐसा करते समय बीर, पान और संपार रससे सरोबार हेमधमोमिक्षित अपनप रे बसन्त पिकाम मा बीवनका उत्सास पात करनेवाण गंगारिक प्रगू पाम्प सनप रासक सी एक मुसलमान कविको विप्रसम्म पारफी मेवातानुमारी रपमा एपमस्त म मोर कान्हा रे प्रसव' पैसे क्षत्रिय नारो पराकम मानेगा ऐतिहासिकबीर पाम्म मातम कारबरी का सरस पचानुगाव और मसापित नरपत समपति मामय बौर णामस से पर फपियोंका मानव प्रेम पराकम कठिनाई भगा-पुर्ण मादिपन परगामी ममुन सरस कहानियां इस समम विवाह कौकिक साहित्यको भुमापा नही जा सका। मम्पकालीन युगराठी साहित्य परिषीपतया पचपट होनेके पारप पर भावकी तए पच साहित्यकी भांति साहित्य सम्पानी मिविधताको म्पमत मकर पाये यह स्वाभाविक हो । पौ उसकारा रचित भिन्न प्रारही काम पिनियता कम नहीं है। मरसिंह बारि भक्तिमारी बप्पर कवियों पर पूर्वक बाई पठानो मपनी स्मृतिममी प्रवृत्ति पर रेनेगाडी न कविताने बिन काम्प-साहित्य-प्रसारका सर्जन किया उनमें रास प्रपू बापमासी काका विवाहला प्रबन्ध बीर मार्ता मुम्म है। पख बजरी स्तनों और सम्मायांकी रचनाएँ भी पाफी संस्पाम हुई है। फागू मौर रास रास पानी मुगेर काम्प-प्रबाय। उसकी रचना प्रथम वो उमिकाम्य-सी परन्तु कालान्तरमें यह पता मामान पतिकी बन पाई। एक ही बन्ध में सारी रचना निबनेकी मपेसा काये तमा नापा मामा मोटे मोम राम चिमत्त होने और विभिल बोंमे मिले पाते थे। एकमा मिचेप माम मासमेत पातिमोका सामान्य नाम और माविमो तवा सुपा गए वाह मोर ज्यमें बेबानेगा मेव उपस्पा मदीनों बॉमें मिमित समयाँमे रचित 'रास पम्पसे एप्स' राममाया ऐसा माना जाता। परपरस्प भीकमकी रात श्रीकाराला स्प ही या प्रकार होतो ताली बोर गिरतामा मायके मुपयती गरमा परमिोन प्रकारका पूर्वरही है। इस रास नलम गा रचना राम कि जिसमें जिसका मान हो। इस प्रकार रास पदका उपयोम काम प्रकारक मिएमा है। इस नाके प्रकार पार्मिक पुस्पों पर भार मापकों परिमों वा-पायों स्वपनों बार पोसाका मा पाइमें कहानियोकी रचना होनेस गुगरातको मम्पराममें काफी न राम माहिम प्राप्त हुमा है। रासपा महत पनी भाल्यानरमपमें मार उसके जनक नहीं तो प्रेरक पर्मे मधिक है। फाप-फानू मी पसरा ही एक प्रकार है। विस्तारमें यह छोटा है। इमलिए सपा उमका विषय मापर-नायिनारामार होनमारम मि तत्व मौर रामापिपारका उसमें अच्छा प्रकार है। उमम बसन्न जनुकी प्रहति-मौदर्यता बर्मन भी दिया गया है। या उमे 'तुपाम्य भी पहा या सपना है। बसन्त मियो दीपन विभाष बनारप्रेमी युगल विप्रसम्म-सम्भोग उमम गमारमा निरपण रममें होता है। मन उमे गंगार साम्पा या प्रगय काम्प भी कहा पाता है। जैन सारमा बारा नेमिनाथ मौर स्मृतिमा पर मिले पए का समापा मारम्मके मारफी पूपित तप और उपचममे करते है। नेटर पापियोंने मी मगू काप्प मिते है निमम पीरप्प विपपक रचनाोम मनिकी महिमा प्रमाहित है मौर बमन्न विताम से प्रमै पुर गंमार पणित है। फागू मिखनमात जैन मौर नेतर मह बठाते है कि मम्मपाठो कपि पन साहित्यिको सरमवारा विनियोग धमके लिए रिम पर करते थे। बापमामी' यह पातु काम्प तमा प्रनय मनि काम्पका ही एक प्रकार है। उममें पारा माम पानी ममी बनुभीता वर्मन भाता है। वन विपी गापिका करतीमा उममें विप्रसम्म गंगारका बाल भी होता है। मेमिनाप चतुष्परिता ( सन् १२४) गुजरातो भापाग प्रथम बारहमासी पाप पहा पाता है। उसो पचान् मेवर परियति उम काम्प प्रसारको का निमित पिया है। उनमे कई रचनामीम पपा या ममियोपण पिर गाए मापा वर्णन है। मरनिह प्रेमान रलार एमा बामण प्रेममवी पिपर मोर यारामने ऐमे पाम्प सिवे । र उपरान्त भिन्नी राम मीना गुरके मोर पिमान भी दायमामी पाप गिते गए है। गरा (पारहगी) में "म" से "ममसरोंपर पौरातिरेमें मुमापिट मी पनपा लियी जाती पी। न मामुमो नारा रमा प्रारम्म हमा और मेररबियाने नेपासिमित पिया। पीय प्रौद्यम और जीवमरामर मान रानपा रहामा यान (प्रेमानम)मा उमो उशहरम सम्प है। रिबान 4 माएनौं पारा लिये मए पेय तया पर्पना'मा एवं परिवारमा माम्प है। रोपा सामे पानी मपम नुमरी माप ए विगाया रममें पन रिया पपाई। पपरी और परम (पौल) गेप पर प्रसार है। इन माम और पबियाने प्रबग्य अधिा मिले है। प्रपर पानी निहामि मौर परिवार पम्पमा मान्यात पैनोरा प्यारमा पाम। गुर विमामा पर्ने म प्रयोग मार रिमस्त्रियांना पिपराना पारण पमहै। पानु मसरामीन मार जीवनरी उमम गीपण मागी है। एमापात बिमल मात्री १० - उवा पस्नुपात, नपामक चरित्र मध्यम जैन सामरि लिए एक धिप पाम्प विपय पे। रास परिष और प्रबन्ध कार्यो में कोई बहुत बड़ा मेरम रहनेक कारण पादमें ये तीनों नाम परस्सर एक दूसरे लिए प्रयुक्त ए है। इससे यह सप्ट है कि न पाहिल्यम माम्पान परतिक माम्मोके लिए "एस" पण एक प्रचमिन माम पा. कहामी साहित्य उपर्युक्त काम्प प्रकारों वपेमा मम्पकात कहानी साहित्य अधिक कोकप्रिय बना है। उस समारसम्म निर्माप पैनों और नेवर फरियाका समाम पोर रहा है । ममिसि कहानियाँ पचौ पुरापाई दोम मिदी भाती पी। मौर बीच नहीबही मार्मिक परिस्थितियत मिल्पर प्रसंगपर पर भी रखे पाते थे। मम्पकालीन महानिों में बस्तु मौर विमानकी एपिसे सानियाँ समय सम्पूर्ण मोर मम्मी कहानियां दी हरपसम्म 'हसाबमी' 'सहयवसाया' ' माला' 'पपई नयाधी' 'मनमोहना' इत्यादि। और पहानियाँ एकही मूममें पी गई कहानी मालाएँ माँ। "सिंहासन पपीसी' 'बेताल पच्चीसी' पम्पदप' 'सूगरहोत्र' इत्यादि रसके ग्राहण है। सम्पूर्ण सम्मो सानिया मी उपमानों और एप्यान मार्मोका समावेश होता पा। करमार नायक मानिकारों और साहसोसे ही विविध महानिपॉम रस उत्पल किया पाया था। कहानियॊमें मीठि म्पहार लता समाचार स्मारिका उपदेश देनेवाले सुभापित मौर मुवि विनोदपरक समस्याएँ ममरातीन पानिधि शान और मनोरम्मनको बहातीगी। विपकी दृष्टिसे रेवा पाए तो मध्यकाकी भिकास कहानियाँ प्रेम कमाएं भी उगरपापम्स-इंसाउनी माधवानकामकाज ' मागा कामावती' इत्यारि। नायक-नापिकार प्रेमोरपके लिए मुराण सण समस्या इत्यादि बारा कौतुकपूर्व परिस्थितिकी पम्पना की माती पीनार प्रेमोरयो पार पिनो और मुसीबतों पारा रन पिएका निस्पण करने मन्तम मिन मुषसे कहानिपोंको पूति होती थी। पिए मोर भापतिक रोचक समयका उपयोप मन परिपमा साहस चतुराई, परोपकार इत्यारिके लिए मा विप्रतम्भ पारी निश्पपाप उनके प्रेमकी त्स्टवाकी भमिम्मपिक लिए होगामा। गारपार पौर बौर मरमु मे मम्मगाठीन महानारे प्रिय रस में। पौर विकमर पर पुष मम्मा पराममाँकी कहानिपॉमें इन दोनों राजा बमिक उपदोपागाई। अमुक- रसका उपयोम मार होगा। पन अपरान मान-उब कमायूगा काची पा मारा स्वप्न नसो सम्बयम तत्कालीन मोटोपनमें प्रपति माम्यतामों का मौसममारियों में पतामाहानिया पुरती माती परम्पपसे दिए जाते है। कमाकी पटनाया गया समानता है।
करस कपि प्रतिमा मौर निस्पप सीको पर ही कहानियोंमें विदोपता दिखाई ली है। परन्तु मध्यकालीन मानीगर, पापि मपनी प्रतिभाको ममिक मफनापूषक पक्स मही रसक है। उनका प्रमान माय पिता नही कहानी पा। मम्मकामम ऐमा कहानी माहित्य १४ मतकमे १८ पनसानों तया मेटरों द्वारा मधिक पैमाने में लिखा गया है। बननपपमें स्पिन सनातन पिमुमो भइमन रमिक पपना पमा कहानी रमा पान कराकर, पानो प्रेम माम इस्पारिक माप ममग्मनामा बनुपम परमार, मोगोंकी प्रक्रिया मप्रयुक्त रम-पराकम-यामनाको रस्पना मागमे मोक्ष शिवाकर, उनी जीवन में लगातार रममियन फालेकी मेषा मम्म पाहीन पहानीकारोंने कम नहीं की है। पौराणिक कपावस्तु मम्परामान गुजराती माहिया ऐमा ही इमरा नाप्प-प्रसार मापान है। ऐमा समता है पैनो ग्रम-रामा रन लिए प्रेरणा ग्प मने हांगे। मापस बर्मने पुरापोंमेंमे पपरा कोमा मौर ममोंडी परिष बाकि मिए उमरा उपपोप मिया है। न रामानीकी तय पेय रामा मात् देगियामें मिले मए मोरपायोंमें पिमानित इन मास्यानोंकी कसाबस्तु मुस्मन एमापम मामास मागवत् मारि प्रमि और कभी-कभी मरमिद् मेला पैसे मोफ पित्यात पसारे जीवनम की गई है। बम्नु मोर पा रोनों पिम्मात पे ही। मर मास्यानाही उमही बमिम्पपिग्में ही अपनी विरोफता पठानी पी। प्रेमानन्दने रमया में रामप कुम्माको भाक स्पमें उपम्पित किया है तो 'मुरामा परित' में मुरामाकाएर मामाम्य पाप मोर मभिमन्यु-भास्पान में पााप्पको पहनापने सपने पति पिया पपा है। मौलिए मम्परामीन मायाम मान रचनायोगापम पार पे। मकाने पस्नुपाचा ही पुरामि ही मिपा है। उममें गम माम और प्राम अपने बमारे रानी। इसमे पौराणिक पात्र भाम्पानी मनीष नोरमाम्य गायनी पात्र बन पए है। १. परमे भारम्भ हुएम पाम्प-नारसे उमरगारोनोमें कमा सामे विराम पिया और १.६ लामें प्रेमानराम परियारको पारर रिसर उन मियाको प्राप्त पिसाईप्पा ममि मापने और माग्यानोको मार मुनानेपाम पाारों और मामभट्ट नेम साम्यसागका मपितापित मोरप्रिय बनाने में विमेप पांग दिया है। हमारे धर्म तापमान और सममिरे रतम मात्रा मिसीए उपौर रेनेगनी पपा-मापापियाही पारा रन-हायमें 1 . माममा-हाप, पाम पामर नारंगी परी बराते हुए मानपारे पौरामिर पारा १२ परेण पानेको पुरानोने की पेमा की। रही सपा मास्थाननि मम्माममें की। मौर प्रबारे धर्म-मस्तारको मापद एवा है। रास-प्रबन्ध हानी मोर माम्मान सी मम्मी कबारमा काम्प-ननामाफी तरह मुरयतम मम्मपालमें पा-माशिय भोपा सिया गया। जिस प्रकार पमही-सोमहमा पठामा गावि, मीरा पाम मातम बनाईन सपनाम से पापियोंकी रमिता पर मुरिमें ही बौर पर कवितामा प्रथमम मियोप सपने रिबाते है वैसे ही पाममसे र याराम परि भी बहुधा पर करिही है। पाम सिंह मेहताको प्रभाधियां भौर मत्य पर मौएम मलित गात धीराकी काफिमा भागार पायदे मातियाँ हामरण (कोरिया) भगन गरपी इन सब समावेश हो मम्वा है। प्यारापर भक्ति-बीवोंको गावियो का बापा है। ऐसी पद बयापम पहले भान्तिराम प्रीतम पणे गौर मिरपर मारिन पिये और ये परम पाहणने भी ऐसी ही एपनाएं की है। पाम्पम छोटी मार पमि पीव सभी पापोवामीप में बनाएं पीपमाला गान किए ही मिलीt है। गरमा गरमासे गया और कमीकमी कमरमर और वर्षनारमा पनाएं होती और ये नवयनि gf मावागावी उपासना रिमोंमे गाई बापी । इसकी पना कम मेवाड़ा भामर एक पिता उपासक्ने की और इन्हें गाकर अधिक कोछप्रिय बनाया। इसका मिपेप समय पक्ति पूगासे है। गरबी मौर गणा राषकी तरह बर्तुगार पति भूमते हए पुरपके स्वादुम्प बाते है। ऐसी रचनामोका मध्यकाल सारव विशिष्ट समान है। प्राचीन गुणपती करिता १५ वी जवानी करण्ती साहित्पकी पप्प पियॉमें मत रिप मपमे प्रास्त पाकरणमें अपप्रम विभाग अलिखित परमगारसिक और नुमापिनारमा अपप्रष्ट र पानिमारित पपरस्यति राम गाएमासीकाप्प मैमिनार पतुष्परिका बसन्त विजात फामु निमुपन पोप प्रमा की स्पा का वरती और पपपवत्सपरितका हानिरी ऐगिहाधिकार काप्प रपमा म्प और वियतन ममारणे मुसलमान ममि बारा एपित सरेप रामक पारितियाँ उल्लेखनीय है। १५ मा ११ पारकली भारिप-समृपि मरसिंह मेहता मोर मीराबारको प्रेम माना पतिको मपिता पमनामात बीराम बारे प्राध भासमका कारमारी सुपर पचानुमान महापान तथा सामान्य मागरमाम्मान नापति पार पपपहिली ममम ममलीमी और मामबान-कामकता की कहानियाँ मैन कविमनामकी मारक पा मामा-मामाकी और नमन मुम्हा की पावर रास की कहानियां नमन मुत्परम मसरमपन्ती राम । तया कापम्प समम त बिमम प्रबन्ध में सब गहमेवनीय है। उसके बाइक समममें नरसिंह तमा भवानी वेदान्त कविता अवा एप्पे प्रेमानावरे माम्मान एनेस्सर बार रलारे महीने पाममकी कहामियां गिनामार स्वामीको मारनिया पस्मक गरबा पीर पाबके सामुगाकी मगममापी यामको गरपिया मोर स्वामीनारायण सम्प्रदायक सापुमोदी भक्ति राम्पकी कमिया समा बचनामृत इत्यादि पप उसोवनीम है। मम्मामीन गुमरातो साहित्य काम्प-प्रकार, काम्प- सपीम्प मौर कम-अधिक प्रसिपास कई कवियोंके बिम्ममे मरा-पूरा पा। तरके मुदित साहित्यको मपेमा म्वनिचित पोषियोंमें संग्रहीत मम्पकालीन मुरराती माहित्य विपुमताको दृष्टिमे कम नहीं है। पुरममित्वमा प्टिसे रेवा पाए तो मध्यकालके पवियोम पर जाम्यान प्रपाष कहानियां इत्यादि मियानेबामे कोई चे कपि नही है। परमि मरसिंह मेहता मीराबाई मोर पारामकी पवि-प्रतिभा सम्म कवियोंमें गम रिवाईती है। मौतहमाम्यानपरोपी परन्तु उनमें ममर्थ पवित्व एशियो वा प्रेमानन्द में ही है। यानी-बकोंमें मामत बीर मानामयी कपियोंमें मना मापी है। परन्तु कविमा कपमें ऊपर बलाये चार माहे माय इम माम नही रखे मामले। मनमत्ता मध्यम मेभीको कवित्व पति प्ररमित पग्नेमामे कुछ कमियोगी कोई गो निया करिता में बासपाच कोटिको बन पाई फिर भी मुररानको अपने मध्यकालीन माहित्मपर गर्व है। म चोम गुजराती साहित्य ई सन् १८५ पारा मुगरासी माहिल्प मापने पूरी बाठ मोवो मारिएपको मक्षा मपने काम्प-उपवीम्यमे पबम-नीमें माहिरप प्रकारों सा उम मकी नीवन दृष्टि तमा सारिय भावमाम कोई मार हो प्राण फैलाता है। मपगारीकी छोर पुराना माहिरप बापा मार्मिक माहित्य पा। भघिीन मानिय को यह जौषमम एम है। पुराने माशियम परसा स्थान मापरिपा। मगीन भारिप बह म्यान मानपने प्राप्त दिया है। पुराने मारियमें मपका उपयोग पति भम्प हुमा है। बाधीन मायिने पपको बनाया है सिमित पिया है। पमने माग रानी पम्पाम निबग्ध इरसारि म मारिय प्रसार भी प्रस्तुत रिए है। नाराय बम धर्म मोरि गम्म इरपारि मानता माधन नही पाणु बाह अपने लिए उपामना करने पाग्य माम्य और पापापी मानन्मयो पमा है। पर दृष्टि भविीन गुगरानी मारिस्पमें है, यो मम्मामीन माल्पिमें नही रियाली। पपिमका प्रभाव में शिपिगमने गो मागपशी बह भा इम परिम्मिलित पिए रतनपी। विरामी पौतिर मिडिपारेगार उमरा उपयोग करने १४ पामे मा प्रत्यय सम्पमें बानेसे पा सम्होंने पो पिया देना पुर किया इससे उनके साहित्पमा यो परिषय हुमा उखसे हमारी प्रयाडो भया मनमा पौर हमारे लिए मषसायातमको विकी र गई। प्रभार या निप्पियाको पमं तत्व जान बारा उपस्ष्टि पावर निवृत्ति मान सिमा पपा मोर कर्म मिसान्तसे पुरपार्यो स्पानपर अधर्मप्यता तया निर्षि प्रारम परायणता और बस सन्तुष्टिम या इमा प्रगाश सराहमा बीपन मत पुन प्रवाहित हो उठा। पर अपने मौविक गोपनको बेहतर बनानेकी अमितापिनी और नए प्रकाप दिए निशानुबनी। मद ठिक पदयो समयपर पिपाम्या पुस्तामों मानियों सभागों, मुानातयो समाचार पत्रों म्मापार पत्यति साप पातापरण बापत हो उठा। कारता माास बाम सम् १५५. म विपरिपाय प्रस्थापित हुए और गुगपत मगबुगडा मारणामा। इस नरहला मापान गुगपती साहित्यका माम हुमा। भप्रेषी सिमा इस मभिनव युगकी अवमा सन्देमपाइ साहित्यको तीरमामी यमानेवाले सिटहए। मिपनरियों या उनके बारस्पापित होनेसाठी पाठपातायने म्पपस्थित पिना आय प्रमाके भौतिक मानका सीमा-विस्तार किया। पाठय पुस्तकों द्वारा गवडी प्रारम्मिा पनायो उससे सहायता मिली। अभिनव शिक्षण प्राप्त करोगाने सुमको मप (से बम्बानी परिपक समा") म्यापित (ए। इस समय प्रसपोषित यो गानेरासे भापों मित्रापन मैगाये मानेगामे निामी निबन्धों ननिर्मित पभूमि पारा प्रेरित मादप सेवनों माम मा समाचार पोका प्राणन एवं प्रम्ब प्रकासनकी सुविधाोंने पुषराठी पपको विकसित करने में मधिर महामना पहुंचाई। रुष समय बम्बई रिस्परिपालयकी स्थापनाये पान गुमराठी साहित्यको पोपण मिठ बार उस पर निर्माण पर मार पर। मेरमो मापा वोर साहिबके बम्पनर साप-पाप इस ऐपकी प्राचीन मापा संसार क्या परसीहा बम्पयन भी विद्यापीठको पतिपर बारम्भमा। इन तीनों भापामौके साहिरमाता पित्तपर जो संस्कार पड़ा पापहर बना। मा सामाषिक पा कि इस प्रकारको शिला पानेपाहे पर्वको समापामे बनुमार तवा बनुकरमकी प्रेरणा मिमे। संसय काम्प नाटक माषिकी एक-एक विध एक्से मरिक गराठी मनुमार भिमा साहितारों सारा मस्तुत किए गए। पानाकरने हाफिरकी बनताका गुबरावीमें मनुवार दिया है। बनेक मनुवारको मी तपा मवयीपारा पूरोपीय साहिम रचनाईका मनुमार पर किसी अंगण मराठी मारि भारतीय भाषाओंकी मेष्ठ रचनामा सा गुगपको बताया है। भवापान पुबराती साहित्यकी मोतिक रचनामापर संसार भरती या पिनीका प्रभाष पर्याप्त मात्रा पड़ा। संसम्पाप्य साहित्पर परिषर दमा परिसीमनको परिणाम महहा कि मम्मामीन मुबराती परिमों की अपेक्षा एसपनाम या मर्माचरने और न नोंकी अपेक्षा नरसिंहराव बाकायकर, मणिगत “कात" गोवर्धनराम हरितात भीमराम बापतराब कलापी मागि बमा उनी मावासक बनुमायिोन कविताम सप्तम व मृतॊषा उपमोम बधिक मात्रा पिया है। रबपतराम तपा नर्मदायकारवारमा कपियोंकी काम्म भापामें ( Diction ) मा पमियमई गप सेवको गय मधिक मात्रामें ससस मसान होते है। इस नए पुममें बहुत कुए सोच-सिवाकर अभिम्यक्त करते समय रामोरे जमाव बबा भनेकी एनोक पर्यायाधी उम्र देते समय संस्तकी परपोतोकी प्रवृत्ति साभाविक थी। प्रारम्भिक कातके गुगराती नाटकों- पर संसत नाटकका प्रभाव हम मान्दी सूत्रधार, मरण पाय निकम्मा प्रोसफ मारिकी पोजनामें बीच-नीषम रवी पानेवाही मोकारमा अषितामें क्या कॉफी सम्माम रेख तो है। अपनी रचना पमा मनेक मनूषित सामपियो मनिलाब दिपीका पाना मगमाईनीमा पमो पर्वत रसिकका परीवारा सिविल सरिक संसत नाटकाँका यनुसरण करने है। प्रेमानपके रपे हए सीन नाटक भी ससम्म माटप स्पा मारकर किसी बपीन मेवारा मिलो भए-से प्रतीत होते है। यह सर्वपिरित है कि सरन्त महाका मारक अनुसरमपर पप्पीराम रामा तया“ पन्नगीव बघ" काम्य मिलेगए है। काम्यक म्प रम मकार बारिक सम्पयनने बांधीन गुगराती काम्पको मापाको परिमर यिा। उससे साहित्य विश्चमकी रिणाम भी मम्ठी सहायता मिली। संसस्तके मम्पयनने और उपनिपद् राम्त पर्मन और पुरान मारिता प्रत्यय और गहरे अम्मपनको परिपुष्ट र मीन मोनोरा समर्म माम स्पष्ट बनाया। ਬਥੇ प्रारम्भिा नाम पिता पारवा पानुमारी मुधारणे प्रति मुगमतापूर्ग बार्पण कम हुमा बीर रस मानपर पूर्वाभिमुखता सससति-निष्ठा कमा सन्तुलम सपा ससमय दपेनका नापमन हमा। हो मोवनयम विपाठी ममिमाम दिगरी सामानमार पुगका प्रेरक स्रोत बना। पौरापी पतीसे ही गुगरातको घरमीमै परिचय होने सपा पा। सात रीगन मे गाने भरलीम पुणा भी मिली है। पूनिवमिगने परतीमारिप म्पपरिणत मनपनरा मवमर पिया। समाप परमो पा उई परितारा पो परिप मा उमम पुरती विनाम र मिनागी तपाइ मी सिामा और मॉनिवनेरी प्रति बनी। बामामार, मणिनाम रेरामरी पसासी गागर माथिो गया हो गत ही प्रमिति मिली। माप ही माप योगनराम पान मानालाप पाराकर मरीय विपीने मी परमी में लिाएं मियी है। गांधीयुपके अनिम गई गमें भी पान गाएर पूषा पर्प बन पपा है सपा मुशापरोमै मधिक प्रगना प्राण की है।
पारधारय साहित्यकी देन मेवी साहित्य रिम विसिव तवा मूर्तिपीत पा। सारा माप पाश्चात्य मापारि साहित्मका परिचम मी पोर-पोरेगा सस्ता गा। इसलिए उसका प्रमाण पनि गुगरावी साहित्पपर उत्तरोत्तर पर धमा। पगितयुगको समाप्ति के बार तो यह प्रभाष दौर भी यह गया है और पुररावी साहित्पने पाश्चात्य साहित्यकी प्रपतिसे ताल मिझाया है। बर्षापान भुगपती साहित्यपर संसात सपा सरसी साहित्यकी अपेक्षा अमेिरी साहित्यका रिप्रेप प्रभाव पड़ा है। मूनिवसिटी पिता प्राप्त करनेवानी पीही अपनी कविता सम्पर्कमे माई। फमत मजीका संसार कर बाहर निकमाने बाहाने पुगपतीसी ही कविता निबनेम प्रबल स्मिा। हम मरसिंहरावकी "सुममाला" को उसका परिणाम कर सकते है। बसन्तराम छापोरने मुगण्टीमें 'सुनीत (Sonnet) मिते। यह प्रमल पाफी सफम मा मौर कोकप्रिय बना। बप्रेमी कपिताके “ मौज " को मुगपती पप-रचनामें सान देनेका प्रयास ठाकोर, धमलाल मुष नानालाल मौर पररा रा प्रेयी कमिवार बाम्पयनसे प्रेरित होने के कारम बाप्पोपर योगी प्रसंग काम्पाचा तपा महापापोपर पश्चिमके एपिक (Epic) का प्रभाष दृष्टि पोचर होता है। हम मुगरातीम मत सताना अन्तर्गत प्राठि पेवाभिमान बार मास्मनिष्ठ कविताको यो बने अधिक परिमानमें मिवामा पाते है स्विरको कर प्रपय प्रापि भार मानपकी मनेर ऐहिर भाषानुभूतिको पिता को मार भीय स्थान मिण या सम बिगी विवाका ही प्रभाव का पाएगा। मधिीन गुगराती पचपर अंग्रेजी गचा प्रभाव भी कम नही है। गत सताबीमे हो गयको साहिरिपक प्रतिष्ठा मिझी वह मिपुत मात्रामे सिया पया मोर शिक्षित हमा। अोरी साहित्पक प्रभावसे हो माया पाली उपन्यास निवन्ध नियरिया बरिष धारि पोगाला बागमन पुषमता मागुपयाक बन सनी साहित्पपिनि सिम्प-विमानपर पश्चिमी सी साहित्यागके स्वरूप मार पिस्प-विधान मनुसरण की छाप सप्ट परिमक्षित होती है। प्रारम्भिक कामम गुपराठी नाटकोपर छोरम्पक मारप 'मबारका प्रमाण पड़ा और उससे भी अधिक संसास्त भाटमा मभाष पा। पितु उसके बारम लिये पानेमामे मारकोसे मेकर बारक एकामियों तक विकासमे मंदिगी बौर पश्चिममारकासा प्रभाष विचारता है। षण्वी साहित्यम समामोषमा प्रारम्म पर्यापीन पुसमे हमाई। उसपर संत टोलाकारोंकी विवेचन पाविमा प्रभाव नही पा यह पापपात्य साहित्य पाम बीर रिवन सिमान्तासे ही प्रभावित। शाना साटा प्रयास इत्यासिभ मा साप पीपमाली रेन है। इसखिए उसका विवेचन भी पारचात्य पतिते ही यह स्वाभाविक होगा। सर्वाचीन १० मुगरातकी काम्प मापना, साहित्यिक पि मा रमनधिको मेधारनेमें पारधारय साहित्य-भीमामाका निमेष हाप है। मभिमब प्रयोग विश्वविधालयको शिक्षामे संम्मत पारमीनौर मप्रेमी सामियने बर्माचीन पुराती साहित्यपर अपना प्रभाव वाय गता परनु प्राचीन माहिरपसे उसरा विम विच्छेद नहीं हुमा। प्राचीन पदाँका प्रवाह भब भी सपतरामकी परदियों और मोम नमरद पोंमें मिभुवन (मस कपि) से कर वायकर कवियों मरमा हानाहास मोर मोटारकरके राम मौर मीठोंमें तमा मेवानी मोमीनोंकी पति अनुसरणमें नए रूपमे बपिपियन या रहा है। पारामा *मन परिष" उषा मरमिारा “पुर परिष" में प्राचीन कथा-परविका प्रपोप हमा है। कपिदानातालके हरिमाला" काम्प पम्पमें ममत पुराप तपा मम्पकालीन पुनरावी या मनीष मनुमरण है। प्राचीन प्रतिपूर्ण कविताकी मनुर रूपन नमा पोलानाप मरमिाष रमभपाई कान न्हानालाल वारसार नुपरम् पूमाला मारि कवियाँधी पपितामोंमें मुनाई पाती है। भार भी ओम इपिराय समारणा कर महाराय और दुमा काग जैस बनेक मननीय पपिर्योकी रचनाओं मम्पकालीन मषित राम राम्गकी धारा प्रवाहित है। पामरकी नीति पर कवितामा मी ही कविताएँ रमपरामने मिली। और महीपतरामन अपनी पपात्रोमे मर्मावनिकी रचना मानोकोप-याका प्राह नए युपमें पुण नमम बम पने देने का प्रयत्न पिया है। प्रारम्भिक कालो नगरातो नाटको भनाईमा पुछ प्रमार रिवाईला है। - संसार सुधार पुग - पर्पत प्रमाणामो प्रष्ट कराते पिण्मे माप पकोट पुगती साहित्यको मामाम्पत तीन भागों में बार मने है। प्रेरप्पस तपा प्रधान मामाको प्पानम बने हुए प्रपम विपापको मेवार मुमार पुग पल । म मुक अपरम प्रभावी माहित्पारात मामाम ममपित परिपप देना हो तो हम एम नर्म पग मपपा लपन-मर्मर यम पर मरते है। इमर ममयसी ममि मा १९१ में नर्मदापमान (मन् १८८५) कर रही पा माली है। पालम नाहिय प्रगा गौचन माण तिवपा गानिक बाजारपम लिया परा है। भोगिक गीवनका मुरी नगर बनानेकी मिनापा रन परलेगाली माई गिराने पीपम्नता मग्म-निरपान निरागमा बारिपार गारि-सायन भियोग बनियापन मापारीय मागास प्रविषय तया ऐसी ही अन्य पाना र मुगाली-२ - प्रतिक मिए पाक माना और इमो निवारण के लिए बाबार पीकी। इस युगका साहित्य भविषधित इसी सोपका पाहक है। नर्मद जिस प्रकार पोरनमें मुगरके सेनानी ने उमा प्रकार साहित्यमें भी मुमार कपि बने। रहपतराम मोर-सिमम तथा मुमारिका। सुधारको माविम सरोवी " पिता दहपतराम बेमपरिष" मबारामत "मात मग्न गरपानसी महीपवराम त कहानी “सासु पनी मगई रमणे भाईका 'पपकुमारी विनम रुमा “मन्तिा एव गक माटक, मुमारको भावना सास फेती है। उस कामम मानो मुषार ही साहित्यमा प्रेरक मोत बन ममापा। परि पोफ पिनका पान अभया माम्पम बमनेवाला यह मामिल परेम्स पर बना हो और उसमे प्रसारमता कम पाई गावीहो, पोको बाच मही है। इस मुग साहित्य-निमातामोमें रखपतयम सरी अमेरी सिमासे माफी बनेगाने वा नर्मद नबनराम परीवे मोगी शिक्षा प्राव किन्तु विस्वविधालयको उपाधिसे पति सेवको गितमा उत्साह रिवाई देता। उधनी मम्भीरता नहीं मगर भावी । नाटक उपन्यास भारि साहित्यार्पोपर सानिमानकी एप्टिसे उनका हम अशी तण समा हुमा नही प्रतीत होता। इस पपर्ने साहित्य विपसको दृष्टिसे रसपतरामको उपरेशात्मक मुर समारबनी विधा मर्मरकी प्रति प्रथम रेशाभिमानकी कविताएँ मर्मर नगाराम मौर मनमुबराम निवम्म नर्मर पतराम बोर मादकरका पर रमणेरमा मौर नगारामके नाटक मनगरका करमोठा" मामका प्रथम गुजराती ऐवहासिक उपन्यास नगारामकी समामोचमा विष्ठेप उत्पनीय है। पणित पुग इसके पाचात पपिठ मुम बारम्प होता है। यदि इस युपका नामकरण महान् साहिरिया प्रतिमाके नामपर किया जाए इसे पोषन न करेंगे। इस पुरके साहित्य-निर्मागमा बने (हरिणत सबलासपुर का रमनमाई, मरसिहयम वानवाकर बसन्तराम मनिणत मारि) बम विश्वविद्यालयक उपाधिकारी। इस मगमें विश्वविधालयको शिक्षा समाप्त कर निकापूर्वक सम्मपन-मननमे स पनेमाले पारमा सबी सरस्पती भरत भी मनेानेक हुए है। इसीलिए इस पुपकी पिन-यमे पापिय परिपामा मम्मीफा मुममा और पापम्वा पिछले मुपसे यधिक माई। पाप मारना तमा कता-प्टिो विकसित होनेपर साहित्यिक रचनामें कलामाता रसमम्मा गौर पाहिस्पिक मानता माई। इसीलिए कविता तया परकी भाषा परिकाधिक सिट प्रार रसाबित मार्मिक मौर वर्षगाहा बनी। सन् १८९६ में नरम पधान हमा। उसके पार वर्प बाप ही सरहिरापका काम्प संग्रह "कुसुम माना गोवर्मनामा उन्याम मरपता पन" (प्रथम माय) सनक तान प्रमित वापराम्प मोपन "हमा और गिरतास या माराममा मनुवार मपनी मतिमा इण्यारि प्रकागित हुए। इस प्रकार ममइये देशाबमानः बार पणित युगमा प्रारम्भ मामा मया है। इस युपके माहॉर्मम बनेने मन १८८० माम-साममे विना बारम्म मिया बा। मनपसालाम रंगी रोमाधिकारियोक प्रभाषम सिबी मामरमिहराक, पाम बबनराव नापी ठगा हानानातकीविताएँ, ममिनमा हिरेरी तमा शबनाम मुबई ममा नाटकांक अनुसार बालागार, ममिकाम तमामापीकी गर्ने निा -मति विचारफ्ना मायारा माननीय दर्शन करानेवाले मोरवन मिर्गमा चार भापामें महपाय उपम्याम मरम्पती चन्द्र" नाम रचित "बस वियप भारि तीन अपूष गाम्प पूर्व और पश्चिम दोनॉक माटप- माममि ममपित मपिकासाठपाना तया रमपमा"मो पर्वत माटा परिकामा निषन मपिताल रमपमाई मानन्दनगर एवं मरसिंहरावरा मार रिसर मनिहाप मममाईतया मानम पारा मर्म चिमन भीमराव रोजराम या सापीरे महापाम्प मरमा भर मपिनाम रमपमाई प्रानमार मानि पषितगठ बिगिया मम्पन्न मच एम्पग्मको मुगरातकी एक मरणोप बिना मामा कमबमाम तपा नरमिहरामा भाषा पत्र पिया माम माम्पिरा तपा बिना लिए एक भम्प मारम उपम्बित करनेपामा बालनगन रित चिमन पम्प “मामर गौवन" मादिग्पनाएं गयराती मारियर म पुषको उगान बनाता है। पतिम मुग पिए पानी ही ममान नही हो गपा मपितु यस पालीम मरी तामीमें भी गाता रहा। पणित पुर मरमिदगप रेटिया मापार भुष बसवलराम ठाकोर, रमपमाई मीत्रा मानमार मुग रहनानाम पैम मगरपिपीत पगित यो परकार मायौ युगम मी मापन-मममम रचना की है। H गांधो पुग भगिन पुरानी मारिया पर नीमय पुम पापी युम पहा पा है। मारिएप क्षेत्रमा मन् १९३० मे माना गा माग है। कोपानी दविन शाम मन् १ मे भारत बा। पुष मसर में गाम रा। मा १९१९ में गत मायाम और “पगिरा"गुर पिए मोर उममें दिगते । पामगोमानानमारे माग ममन मा ऐमी भागने मगे। सी रपि भाग पिवार म्पस सना मापन मात्र है। रहने मानी माम मारी मनापरी माग्थिा भी प्रभारी पगारिरिया। मोग परेराला पी रिम ममम मो उम में पति पर समय पानी २० H साहित्य भावनाको सयों सामने रखा। इसके परिणाम स्वरुप साहित्यमें मापाची सारमी माई और भारी-भरकम सम्व प्रचुर पगित पलीकी प्रविष्ठा कम हु। पत्रिीयीको गुजराती साहित्यको प्रत्यक्ष सेवा उनकी गप लोके ममाषा सरपना प्रयोगो" नामक रमकी मारमामा । समान बर्तमी पार करपानेका भेय भी उनको ही है। साबरमती भापम कामा कासार महारेषभाई सारिपोर- साल मण्माण श्यारि मापके समीप पनेमा तया उनके गुरफ्त विपापीठो रामनारायमभाई पाठक रसिकलाक्त परीब पगित मुबहारमा परी प्राम्मापकॉकी और “मुन्दरम्" भनेर म इत्यादि विपासाटो माडाँकी सेगा गुगराठी बायको मिमी यह पाधीमीकी परोस साहित्य सेना ।। गांधी-साहित्यका मावश स्वयं गांधीजी उमा उनक नेतृत्वम कहा गया स्मातरम संपाम फपियों की रचनामा उपगीय बने। पाँधी पाकषिपनि समासम्म सामसे स्फुरित पुपुरसाकी स्थापन्याही अहिंसाको बलिदानकी भावना पात बड़े उत्साहसे गाए है। गांधीनीने रसिनारायण बार मार्गाकी सेवापर जोर दिया। इसलिए साहित्य पापी सहानुभूतिका क्षेत्र मिसाठ बन पपा। मर तक मोहातो तथा पिगी पातिक मानयोका जीवन साहित्यकारों रा उपेपित या उसकी बोर भी साहित्य- पाकी दृष्टि मई। साहित्यमें पीपन तथा वास्तविक जीरनके प्रश्नोंका निस्पम होता बपा मोर पिपरका विस्तार तथा नवीनता मा पानेसे साहित्य मी प्रापवान बना। प्रामोसार तमा बसम्मता निवारपकी प्रवृत्ति पारा कोरापानी (अस्पृश्यता निवारण सहायर होनेपाली माप) का तमा माटोका पर्यन एमा। साहित्य में किसानों एवं ममा मुखदुषको तमामेश्या-पीयन प्रलोकी भी स्थान रिया पमा। मोतीगीरा निषिष्ट मानव-मममें समानरापरी विचारधारा मा मिती। इस विचार-पाराने पिता सपागामी साहित्य रविकिपीपनको सपा अन्तिको भी समान दिलाया। बास्तबमापी साहित्यका ही रा परिणाम पा। माधीमी पारा बात की गई वतना तमा न बताए गए बमवा मेमड़े कारण तपा परेपी मारनामे प्रभावित होकर तोर-साहिरपमें मनुसौतन-सम्पारन प्रवृत्तिम बहुत बड़ी प्रति। यह उत्खनीय है कि इस कार्य, दृष्टि एवं पति तमा सम्पी पि बनेपाले मेवानी मानि मफ्नेछ-पर, काम या रसगी विवेचनास सोरठी साहित्यको लोकप्रिय बनाते हुए नसे प्रतिष्ठा भी रिहाई। सम्पी राष्ट्रीय पिनारे सम्बन्धमे काका कामतकर, विपरमार मपसमाजमा पश्चिममूर्ति भवन पिता निम्माताकी विचारधारा मौर निगुमाई मा मुमग्रम मा साफा बात साहित्य सपा मार पिमा पिपरक विचार-पाराका मेय भी गांधी रा तैयार किए गए पातापरणको ही है। - प्रारम्भिक साहित्य समन बोपोगिक काग्निके परिसामान नमी मनोधानिक वोगाने ज्या ममाम पारने परिचम माहत्यपर भमर गते गए उमे ममा सस्प देना शुरू मियापा। समका भी प्रभार मापी युमक मापीन मारित्यपर पड़ा है। हम युगड़े माहित्पम मनकोकी कमा-प्टि उपा प्रपोगनीमता नर्मद मुम तया पमित पुरक मेसे मंपिक समी। मम्मपकरणे करमपेसो" में महीपारामने “बनरामबागम 4मी वीन पपाप तमा मोवर्धनरामने "मरम्मतीचन में बहुव-मी ऐमी मामपानी है कि निमका मूल कथासे कोई सम्बन्ध नहीं है। उपम्पान महानी या नाटकम मूत बस्नुमैं बिना गुमिमग पिए, मूग पस्तुमाही रेश्य ममत लार कमारिधान करातिको मुश्किप्ट कला बनाने की प्रवृत्तिके प्रथम रान हमें पगित युग सपा मापी यसरीषकी कसौप का मांधी युममें मी मब तक सियवे एनेपाल भी पनपाठाम मुंगी पहन की पापी उपम्पाम बेग्मी ममुलाउ" मा "पाटन नौ प्रमुगा" में हाते है। इमो माप-माय । पहारे लिए कहा" दृष्टिकोम भी गर्मागीन पुराती साहित्यमें मा पमा है। गांधी युममें इस पिगन्न का कमी-कमी विरोध भी हुमा है। इस सुपौ पगित पुगको कवि म्हानापामामराम ठाकोरसी माम्प नापना पमती ही। म्हामासामने इस युपमें पहुव-मै मारक “पर" महाराष्प मौर मपुरा पुगमकाम्प "हरि महिला हिने है। श्री म्हानाहासक प्रारम्भ कासमें मरा प्रभाव नपारवानी पड़ीपर पीपम-म्पासा परेमा मसर राम तपा मीकि सरकपा म्यारा हुमा है। परनु माहिपिक प्टिम रमा पाए तो पाक युगदेवियोपर बसवन्नराप ठाकोरमा प्रमान मत्परिक है। बसराप ठाकोर मयतारालेबपेयतापरता मप मपय प्रवाही पपरलापर रमलिए भापक्ष्या मर्गनुमारी गतिमाम पुप्पी परपर, करिताको प्रारम्पगितार मोर पारिता विचार प्रधानता तपासर्पपनतापर म्याग और रिया। इसका अमर गांधी युगक परिपॉपर भी हमा है। परतु मुरम्उमाकर तपास एर माप मारपीने ठाकोरम प्रमारित होत हुए भी विपुल मात्रा माल मग लिया है। इस सुगम पारावी लिा ममेना सपा मभिम्पतिरापरेको विमना करते हुए. वा प्रमनिपीत पार प्रयागगीन भी पी। मपर मुगरानी माय मिस पर्व पर मरते है। गांधी युसने करिता ही नही बस्ति मय पानी उपम्पाम माटप निररपरिण मारमणि प्रमान पर्पन विषम हाम्प माहिरय मापा पाप इतिहास पुपकार प्रापान मम्म पालीन निपारा मापारम में पामो ममी सामाँगा मन रिया है कि रिममें मा प्रमिषापी मपा पम माम्म पिताम या एनी है। एम मरंगी मूती सनी मारी उमे पहा रेला मम्मर नहीं है।
२२ मराठी उपायाम पहानी सपा नाटक गोवन मोर मया खून कामेरामी पाते पो इस सुगमें हुई से “सापना भारा" तथा भागगाणी ने पहले बताया और उस पार निसा मनुसरप हमा है या "मोठी" (Dialect) का कहानी नाटिका उपयोग। गोली" साहित्य कृतिबाम उपयोग होनेसे उसके साप ग्स बोमीरे मोपनेशी उमरा मांगातिक प्रदेश म्मपिउगा तमा सामाजिक जीवन प्पबहार, उनके स्वभाव-संसार, रहनीपरनी पर्पए साथ बाते ही है। रपे मारे धाहित्यकी इस तरहड़ी वास्तविकताही मालो मारने लिए पम्मागत परेस पुनीलगा मडिया पर पेटाहार, पुपर चादरपारकर से गांवों में पके पराम मेवा गुगरातकोस मुगमें प्राप्त हुए। इसीका ही परिणाम है कि "मला जीर" "मुपपवा पूर माम टीप" वा "मानवी नी भाई जैसी पुस्तकोंने साहित्य रसिकोको अपनी मोर भापित रिया। । साहित्पमें विविधता तमा बिपुस्ता मांधी मुममें गुमराती साहित्पने बहुत ही सिरि प्राप्त की है। पपित सुगम पुरूईनानावादी उर्मि बविताने महाकाम्प तवा पुराव काम्पक बप मारम करनेका प्रपल इसी मुममें किया। पगित युग बमबत्तराम ठाकोरका प्रसिरमौर कीर्तिमान पाम सर्वन इस पुपमे ना पीड़ाके लिए प्रेरणादायी सिट इमा। मुन्धरम् रमापार वपा उनके कई समकालीन एवं मनुपामी कपि नामाहात कान्त मोर उमा पोवनाष ठाकुरकी एवं समकालीन पापात्य परिवार प्रभागही अपनाते हुए सतत प्रयोगशील ऐमा कपि-पकी धिप सनाउन सौन्दर्य पिपासा तथा समन्वय साबनाके प्रति निष्ठावान र सामाजिक बापम्पदा और मानवमर्मी समेहलवीताका म्यान रखते हुए कांगताका मन कर है। हमारतकी भिन्न-भिध मापाबों के बीच समुमा सापना है। उपप्पासमें मानमयात्मक कोप कान या उससे उभृत यस्ता दया पीवनका प्रसिम्बिया मुशी रममताह मनापी चुनीला पार और दूसरे सामाजिक उपम्मासमारोंमें मिलता है। ऐचिहासिक उपरपासोंमें ममी मौतु पुनीश शाह मुगवानराम मानार्म मेषानी तमा न बाकी विमोंमें मोमस्मिता है। पन्नालाल परेक नामात मरिया पिर पेटमीकर इत्यादि मनपरति मानेषा उपम्पासानिमीन कोष समाजका उपक मागोलिक सामाविक पक्तिमतमाम परिरेपो साथ उनके मुष पारिमा भाषानुभाषका वास्तविक चित्र बन उपभामा पिपित कर नया पागन भरा। पुरफ्ती साहित्यकी या बोपन्यासिक समृपि गत मण है। पहानी का सही विरास वी मधी युपमें होगमा। हानीकी सिवमी उतनी उम्पत। पुबराती पानी मोपासा खोप या माहुनि पारपारप मानी- कारोकी कममी पारा मनुसरण को हुई पिकमित हो पो। इमे मन, . शिरेष्ठ रमामरर वादि फेमस मेकर मागके मुरेश गोधी तपने बीमों कहानीया ने अपनी पिपि विश कर बताया है। माटप साहित्य मनमें मुषार मुगने बम प्रारम्भ ही किया पा। साहिरियम उतर्प दो पगित युग ममिकास विशीष कान्ता रमनपाई मीतकर “राई मो पब" नदी नाटकोंमें तबा मानामासरे भाग प्रमान माटकोंमें ही ब सरते ।। १९२. बार-बार इसका नाटक मात्पिपा झनामा माटक बनाया ममी बानगरन मेहता नाटकाने उषा पटमा उमरबारिया उमार जपन्ति साह भरिया मियमुमार बादिक एकारियाने काय समृग गिया है । साहित्यिक नाटकों और रंगभूमिके बीचबाए बन्तरको इन नाटकाने बहुत पुण्मम रिमा मनि(Amature)रगभूमिमे रियाने तपा मोपियन मात्वपून सापमपम इस ताकी प्रान्तीय मरकारले यो प्रोत्साहन दिना गुरु किया है इमसे गुगगती नाटपर विपासमें बार बा बम मिमेमा। मुगारातीका परिष माहमय भी परिपुष्ट है। पर जमानेरा परिचय रिझाने पाना "कबीश्वर रूपाराम" मा गौर कमर परमेयो मारिना" मोर पुक" नाटकमी ग्मारमा ममता गोमे भरी हुमी परिण लियो तमा स्मरण मुहर" रेवपित्रों" जैसे रेता पिप सपा परित नायकी महामना कारण माही परितः रमकी रचना एवं मत्यनिष्ठा अनुकरणीय स्वर पारण महाबपूर है। पगरावोकी ही नही समवकी मारमायामार्मे महत्वपून पाधीगोकी बारमामा मरपमा प्रयोपो" पाका रामसार, मुषी धमोतु पयान मेहता रममा माई मानभाई मह इन्दुमान पाख्रिा बारिको बाग्माषाएँ "परमिहराम" की रोमिमी महादेवमाई की गयरी मी देलन्दिनी लियो पुनराती ओपन परिण माहिपके पौरको गाती है। रमारमा प्रपाम पनाम पाताका हिमालय परेण पूर्वी प्रतिा पा गापानकी प्रणाम पुरमा पिम्सनारमा निधोम पापा पातार मांधीनी मामासार निबम्ब नपा मेय मिरमा रामनारापच पाप म्पतीत पिराप निकम मार गुरु गोमाग योनिमय सम्मेवनीय है। म भी मेपायो पिर मना पुरा यिा पपा मोगदमार मारिप पिपयर नपान ग्म प्ररागन स्पा मनुर्मन मार मी मियुमा मे गुर कार रममनाम गौती र मनर मेवारा निमिन रिपु पाप मागिय नदी युपरा मन।। माय पिन व म पुपरी पी गमनारायण पाय पियरगयप पिपना मह रिष्त्रमार पिसीना इमरमपिण्यार रिशान माम पिनाप या माने है। मायाम मानीय एवं पापाय माग्य पीमामारामारपन नया विनियोग पण पम परिणतिहा। बिमतिमी पे मगलानी दुर्गामार भी मिरकाम परीग गमगात मारी मधुमूल
२४
बमाणु
H
मोरी का मास्त्री नामाहात सडिसप रमाकर पोची इत्यादि विद्वानाने
सत्यमान इविदास पुरातत्व पापा शास्त्र अनुपीमन से वित्तापूर्ण सम-साम्म
विपोपर मेगनी पलार पगित पुप मा गांधी पुषा सातत्य बना रखा है।
गुरफ्ती पापाकी वर्तनीला मर गमप समान हो पाना इस सुपकी महान् सिदि।
पिम सौ पौर्य गुगराठी पाहिपको उपनीय सायोग लेगार पर
पत्रिपाम मुरुप है -बानमुपा' 'मुन्दरी मुबोम" "साहित्य
"बौसमी सरी" "गुमरान' "पमधर्म" "प्रस्पान'
"कौमुदी
'मार" "मुरि
प्राप" "गम- “संधि 'मुगराती" मपनीवन
'प्रगावन्यु'
* स्रोपट"। मुगरात विता-समा फार्मस पुगपती समा मुगराती साहित्य परिपा
नगरात साहित्य सभा साहित्य संसर सपा पुबराव पिपापीठ सौ संस्थानाने
गुमपती रमारमा एवं शास्त्रीय पारमय सत्कर्षमे अपूर्व प्रायोप दिया है।
माठ सौस भी अधिक समयका मुगराती साहित्यका यह पंक्षिप्त परिचय
मारतीय भमिनी मापाबॉो सच प्रतीत कराएगा कि मम्मकालीन एवं बालीन
साहित्यको सामानिक भूमिका रसके प्रेरक पर साहित्मक स्सस्म एवं रस
पिपासका इतिहास पातकी वर्तमान नापाक साक्षियके समान ही है। हतियों
और पाया नाम ही मिन्म है पेप समी माताम समानता है।
[मोर--सन् १९२ से भार तक गुगराती साहित्य का समिप्त
परिचय कवि-मी माण मुम्वरम् में दिया गया है।
दयाराम [कवि-परिचय]
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दयाराम पागमा म्पक्तिर एवं जीवन धर्मयाँको मार पुरगरपाई परिण मनक मारिन हुए है। मायाराम तिरो माम नवा गोरल ममापी मागम पटना ममय बारेमें गो मनमेरपा उमा जीवनको सम्प भरमार बार नही है। नर्मदा तपा म्पिन पामा मागेरग माग गाम्य भी प्रमुगम पुष पी रयागमा गम्ममा १७ सापा। मरें में मातारी बागवई गनमा नेवाब मिगणा वागमो परदगिरम- पापीगगेबानापमानामनिरामा मापन पाया। उनमगावन मगमपी पात्रामा ममा र नौवनग माग मन मोमें" रिलाया। मागी निमाम्पिोमे मनुमान मनपा साप मारपितासी अनुपम्प गप्पा पागम माता बादायी। पर मुनागिन पोपा गगन उम मुनाग्निमा उनी परोस पोति पापौरम भाम रामा पापा। पपनमे पागम का पुरी मगागंग गम मिता पा। परिणामम्माम ही नामुमागरम तरी मार पा। इस परिम्पिति में सारे मर गम बहा ममाम पागमो मारी गो पनात पापो पिरमा । गोरे म प्रयास और मामाने सागरी ममि मनापा और मारपसारो सपने पार रामराजापन सौनसा पाही।
२८ - रमाण्मकी मुगारठा मति पम्पका निमय करपाठी साम्प्रगति रतियोम माहित पाप मान मार सिशाम प्रमुखक मूममें उनके मम्पपन गोर मानमा ही कर पा होगा। परन्तु पाराम महगास प्राप्त की दृष्टि मोर पिसाप भी उममें समम्मम हुमा होगा। भट्टमीकी प्रेरणासे रसायमने भारी तीर्थयात्रा की। उन्होंने तीन बार भाखको मोर मी मापदायकी तो साज पार पाषाकोबी। दयारामकी पानी भनेक वर्प इस प्रकार मात्राम ही पतात हुए। इस तीपाटनमें उनकी पति और भगवान भाषकी मोटी स्पर्मे और उसे पुष्टि करमेषामे कई मनुपम प्राप्त हुए। या उनकी मारवाडी मराठी पम्पानी बिहारी सिन्धी और उर्दू काम्प रचनामि सममा पाता है कि दीपाटन कारमयारामको दूसरी प्राधिक मापार्योरा भी परिचय हुमा होपा। बाराम बगमापाके माने मात्रा में पौर उसमें उन्होंने लिखा भी है। पाएमके जीवनका उत्तराई रमाईम पौवा। यहां उनकी कौति उत्तरोवर मस करिकसमें पाती गई और उनके इर्द-गिर्द पामुक प्रसंसा मोर मनोश एक चुम्ब बमा होता गया पा। उत्तरापस्या छोटी-बड़ी बीमारियों तथा मप गावी हर मविकी कमजोरी भी कीर्तन करना कभी पूम्तेन और नए-नए पोती रचना करते थे। इनकी बोपन नीबाई सन् ११ प्रारम्ममें समान । याराम भाजीवन अविवाहित पे। पत्रपममें उनकी मैपनी (गाई) पी परमपरकाया पास्यास्वामही मर गई। उसके बार याराम भी पनाम बन पए, इसलिए करपा तकनी ममती (समाई) का कोई मोप ही सम्मान नईमाईका बब प्रसंग माया तरको यारामने अपरिचीत पकर मासक रूपमे जीवन मतीत पलेका निर्णय पर गम पा। पुष्टि सम्प्रदायको पतिले अनुसार छोटो एप बम सम्बम्ब प्राप्त करवाने मारामने मदयाईस बपकी राममे परकीपर मारा पोस्ट करनी पी। बयाएमई नियामन्दी एकाकी पौवनमे मामु उत्तराईमें एक स्त्रीने सेरिका रूपमे प्रवेश किया। पस्वीपा नाम पा रमनाई। इस विपना इविया मुनारिमने पसाराम रिए गए मापदक परतेमे याराम परको सम्हाण। यह प्रति दिन पूजा सामी तैयार रखी और की बीमारियो रिनो गा-मुभूमा करणी। अन्तिम पोम बयारामकी भावकी कमजोरी पर बस्ती पातब उनके ससमावको परास्त करते मी बह पनो सहारेको समदी बनकर सैषा करती पी। साराम बोपनी क्षेत्रकोने उनकी बार्पक कान्ति मदुर मठ रागियों बैंसी पोशाक प्रियता स्त्रिोम कोकप्रियता मापन-वादन कौसत पण मायक बार प्रति सम्मानको भावना बस्य पापय पुष्टि सम्प्रदाय-निष्ठाका समेत भिमा । इवना होए भी पौषनी मेवोन सम्प्रबार समकालीन युमाई - H महापगाके प्रति भनास्था मारमाभिमान सामने एकमो महारागार्योकी उपेक्षा बारमाभिमान विणल होनेपर भी मृत्यु मार अपनी पादुका पूरनेके बारेमें भारत रिफनमा सिप्प पत्रान्ठा मपनी सरिताक लिए रन्ध मभिप्राय सपा भन्तिम बीमायके समय भविष्यको चिन्ताका सोच किया है। इस बातकि माधारपर हमारी बात सामने श्यामकी जो मूति बड़ी होती है यह हाफिय और मायरन मी रमिक कमा बममस्त प्रतीत होती, मीर साम्मायिक प्रयोदो बह मूर्ति एक मार्म भक्त पपि सरीवी मात होती है। दयारामको समम्म पनाएँ उमड़ी दूसरे मकारकी मूर्तिको हाकी उपस्थित करती है। का भुपने परि घामको पाचार साहिरम निर्माणको दृष्टिमे गुप्त पासा उत्सव करते हुए पायम गरेमें लिया है 'इन मुफ का एक ही मेशिनब पम्लयो युक्त होकर नयन मोरवय धीत पाती है। इनर्मातटपर पैदा होते हुए भी मम्म देश और काफका बस पीकर पसी-फपी है।म मरसिंह भाषण बौर प्रेमानन्धका प्रमार परिचय दयाराम को पापा पाने है। यह मामन करि पिसीका करार नहीं पानरसिंह मेहणके नामसे नपा पर गौर, मान की पयम होता"का मपनी भाभीमें मान करके और प्रेमानन्द बोवा हरण "में पर्याप्त सम्पर्धन करने यापमने माझीग चुका-मा पिया है।' मामकी काम्पमा इनी ही नहीं है बसि यह तो रमा एप बरा मात्र है। गोने मैगनों ही नहीं अपितु सहस्रों पर भी बनाए है। मनके प्रयमकोने परोकी सम्मा सपा मावत बताई है। उनकी छोरी-बड़ी पुत्रों की संम्या भी समा सोमे भारी माता है। उसमें मुरायती उपागमापा दोनों हतियाँका समावेश होता है। पहा पाता है कि उनोंने संसा मीर मपटी परगावी गई मारवाड़ी बिहारी बोर सिन्धीमें भी कुछ पनाएं की है। उनकी पथ पनाएँ भी मिली है। मारामफीम पिपुम वाहिय-रापि मधिकाग सिवान्तारमा है। इसमें पिने अपनी निष्ठा विपर पुष्टि सम्पापा राम्त मा पुराना रिसे मार भी हो मोर म सराप पनि सिमाना पास्त्रीय फिल्मो मुमा सविन यिा। मरेम प्रकार साहित्यको सम्मापारी धाहित्य भी महापाताता है। "रसिकजन" 'भपित विधान मियान मार" 'मम्बराय मार" और "पुष्टि एप सार मपि राम" मी मापा मिणी नई सपनाएँ पर "रमिक पता" "षित पोरम" और "पुषिपा एम्प" मी मराठी सिनीमारपी। गुमराती पनाम "रनिमस्लम तप है।गमापा "रमिक न' ला बक्ति विधानमा "रमियममतुमा "अमिपोप भारी पुरणी तिमाही गमापा भाति मात्र प्रतीत होते है। 1 - इस प्रकार भक्तिकी महिमा तया उसका पास्त्र सममानेगा कपिपाराम मस्त ममि बने। उन्होंने “ भीकन माम माहारम्प मम्बरी "सी पुरराती कवि उमा भीष्ण स्सबमतिका माम प्रभाव बमोसी सी रमापा हिमोम भगवमामको महिमा पाई। मतबा" मोर चौरासी त्रयमा पोल जैसी गुबरावी रचनाएं कमा "पुष्टि नपा म्पमालिका "सीपभापा तिर्योम सम्प्रराय सम्माम्प भक्तों का माम संकीर्तन किया है। "श्री हरिमति पत्रिका जैसे काम्पमें मातादी सपना कहते-मरते भमाका हासन बताते है। झण भक्त रिवार नाटकमे-प्रस्मात सम्पाद काममे-बभक्त बामपको मपेमा प्वय चापापी भेष्ठ पोपित करते है। "मौरी मन मोहन माम्पु टेक्यामा प्रस्पात "मीरी परिम' गावे। पुखर पानि मामेर काम्ममें मरसिंह महाकी भरिकी महिमा पर्मन करनेका मबसर निकाम है। एयायमकी ऐसी मनमनमानुवादात्मक साहित्यकी कितनी ही कृतियाँ माम्पानात्मक है। उनका मुम्प मापार व भागवत है। सौर भापारपर उनोने किसिमभी बिगाई' 'पश्मिनी भीमम्ठ" "सत्यभामा विवाह 'नम्म पीती पियार “अगामिक माल्यान" इत्पारि रचनाएं की है। इन हतियोसे यह बात स्पष्ट हो पाती है कि पाराममें प्रेमामन्दकी माति माम्मान पटुता नही है। दयाराम परमा काम रमित मपनी "मीपम पम्म उप साम म्यानपर सरस बर्षसि सितम परिवारमा “सापलि तमा हीण" पत्र काला" "कमरकोना' 'रास हीना' "प होला" "मुरमी सीमा तया 'पाग पातुरी" सी एमसीमा विषयक पराबमिोमें विशेप सफारी पोकि इन सबका विपद पनके परमोपास्म मौहणी होता है। इन काम्पोमें रमारामको विस्तारमा कल्पनाने उनसे भापमतको अपेक्षा भिम राति मी निश्पष परामा से-कमत मोठा" में मारामने निस्पन किया है कि करने का मागबाग यमुनाकी बाराम विकसित कमल हाने किए नवरायको गारेस दिया। पसका पालन करने के लिए हम उस पापमप पाते है। मुरती मी में नित्य ही हमके भपरपर पनेमाती मुरणीपरा परवानी राभिरा तबा गोपियाँ बासरे सारै बनोंको बसाकर बाहरनेकी हम कती है। सामा" मन्तिा मनेक स्पमापका सपना साप पानीको बाकी मुनिता तमा ननकी निष्कामा उम्मेप है। पीकृष्णकी तरह ही राधा सम्बन्धी पायोंमें "पधामी ना विषारक" "राधिकाना पदाप या 'रापिका का स्वप्न" जैसे पायोमे यारामकी कवित्व-रसिकता पौरपासनाका मुन्दा निहामा है। पाराम रचित प्रेमरस बौता वा प्रेम परीक्षा बनाएँ भी हमारा मान मपनी मोर माकपिट करती है। दोनों विषय मारपठके प्रमर मौतम उसब सन्देस ता उसप पोती संबार है। सपने गोपियाँको शान इष्टिाप सर्व म्यापक, निराकार, परम पैतम्य भीक्षण सस्पमा ध्यान करने तथा उमरे दमन- मिना पोम प्राप्त रमेका उपदेश दिया है। मह उपदेस गोपियोंकि इसमें प्रविष्ट म ही सपा को पीकपड़ो ही अपना सर्वस्व समझतो पौर प्रती है- तमारा तो हरियो ६ ममारा तो एक स्पते, तमे रामो बाबर ६ अमो रीमा मते, गुने अबमोटी रे बोर # चित्तव्ये प्रकारे पेशी रे बहो सम्तोप परे ? -(प्रेम परोमा) [ तुम्हारा हरि मग है। हमारा धौ एम्वानपर है। तुम चाहनीपर रीमने हो मौरम पार रीमती है। पदमाको देवकर पकीरका चित्तपोवन होता है। यह मता प्रमगको देवरस सम्तार पारण करे?] मुर बमनेकी कामनामे बाए ए स्वर प्रेम-पगी गोपियाँ भस भोर प्रममा बनकर बापम कोरी है। मानमे प्रेम मामा मािको श्रेष्ठ प्रतिपारित परनेकाम दम पापकी पति पतिम मूर्त होनेवाली गोपियाँको ममीम जय मौविसे मन रम परिपूरित हो उठा है। पापमापकातनामा मारित्पमें ग्मोरप्टस उन परवी मामक पर मधिक मापं है। पारामकी प्रतिमा भान्यानाकी बरेमा मिगीत भापाकी है। ऐम पर उनी ममम्न माहिरपरि एक पोरे गेटेमे भानक होते हुए भी पित्व र धिवरसा मन पराई बारमारामको मन्त्री कार-सिटि पर मए है। यों तो मरमिरवमा मातपोखमम स हो पर समाहती मा रही पी मिन्नु रपारापने उनमें विविध राम-रागिनियारा ममाम सर पर कारको समूह पिया और मुणेमिन बनाया है। इन गरवियोषा बिपर राया और पापिर्यो परम प्रेम और भी मिकी पापियो नाप भी मरीमान रपाराम मावा मामने साथि हो उपम्पिन र यिा है। परिने पर्य गोपिमि सागरम्परा मनुमय पर कोई एरापणी मनामी गागना बन इण रनिरिसरीरिपे भार-विमार हीर पाया है। वमो रे पद सकने मरम मन म। मने परवियोडी मोरना एम प्रशारकी गई। माना गर्म पपिपारा मार ममान मोही उपमें अररमाही रिमने मोहरपार बाद रिया है म मामिपोगरासतौरेपो.-- पिप ठाम मोरनी मापीर मोहमी माध्येि डामे। माजातीलाही तीरभाषाने पानी सोमासनमा पालनामा सना शोभा बाबामहाहाहारी मांगी है। मामा पामती
१४
२रेबाजी हो (सामूरी नपरेम देती है कि बहुगी पसे रहो।) वैसे
पर सामूकी फपार और "बुनाबनमी बाट रमी रंप" (मरावनकी पर
रंप पेसपी) पमें साफ राम बहूमा उत्तर पेश पखी परदिया
पौपाङ्गनामोंको उत्तरम-भक्तिभामाठेवन करती है। ऐसो उत्तरम-मति
मौरको हिम्सेरारबनाना मला म्सेि पसन्द होगा? इसीसिए पिानुरागी परनारीको
ऐसी हिस्सा बटानेपानी पस्तु सोतके समान प्रतीत होती है। यह पाती है-
मानती मोहन तषी हो तिमी।
[हेगी। मोहनकी प्यारी है।]
मोबासही। रणबईहागीरेनीमारने।
[हे बदी ! तुमनारिपाकी रम हो गई।]
इन गाबियोकी कत्सना कितनी रसिक है।
मारामने मईया ऐसे ही प्रेमका मनुमन रमेनानी मति-बिना किसी
पोपीको सम्बोधित करते हुए एक परपीमे मिथाई- फूली मन्ती बाया महामा
फूमी मली।
इस गोपीका भाव स्ठिमा मनोरम
पारमिया बालाप मा मति रतापगो।
[पनमा! तुम पली मत जाना।]
मान्यो मननो मोहनब, पामियाँ कोरे।
[गो मनको पसन्द है ऐषा मोहन हमें बरसे स्पर्म मिम गया है।
ऐसी स्माधीन-पविका सन्दीपकी स्मृठिक सान अपने मुघर बनुपाको
पिस प्रकार माती है उसे जा पहाले मुग मा ? परम सुन्दर मसे
अपिम्पति मिली है। ऐसी गोपी प्रियतमसे प्रेम करने के साप मान भी रखी है।
वमारामने इन भाषोको प्रकट करनेवासी गलियां भी किया।
यामरप समापनबाई मारे ग्राम पी माम ष समापनबामा
[* बामसे साम रसके हमीप ही बापी माम के पास
भी नहीं पाती।
मा तमारे पेसा मोला, म भाले तमारे ते म्।
[ मतबाना मीण तुमारी पाठ माना है, तुम्हारा मनाया
मतबाग मानता है।]
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सायमने ससान-पानपर पिनोर चातुर्यनारी भी प्रवाहित को है।
ऐमा चातुर्य “मुग्ने मानो मा मात्रा होमहवेता पो मामो मा" *मी गरपियोंमें
दृष्टिपावर हाा है। महान पर काला ा माता माती पपी बाई
सानेपानी राधिकाकारा उत्तर देखिए
तु मुनने माता श्याम बीम तो अपम नहि बाम गोरो?
परी महतो र माता पाती, मुम मोरो तुम तोरो
[परि तू मुममे मिलकर पाम होगो ता में गोए परों नहीं होगा?
फिर मिननपर रप बारम्बार मेरा मुझे मार तेरा नुमे मिमेपा।]
एम प्रभार एक बार मानिमनमा ताम मन-है।
मी प्रसार म गातारा मागपुर रेलनेही बनता है
माठमान भव बाबाहोरेकोस।
[ मा ए मोर मब बारिमा है।]
सहारे बाग रेहो? माषा पुमानमो?
[तुम सबम्मिरिचमन हो? ऐमा क्या गुमान t?]
पनवाबना भरना पर पापो परेमा।
[हेमा म मरे नेहमपाते हुए मोरे ने बताया।]
याम समाप्तमा होशिधाप हो पानी की।
[हे पयाम | तुम मोघे ही मैगी मीनाई उम मान सो। ]
इम गरपियोंमें दपाण्मने गमको नम्बर मोर पतुर रमि पर काम
निषित दिया। मानिती रापा माप भपका प्रणय मान प्रापरलेषापी मम्म
पौपिपार मार मी पापिया रेगिए
रापे प्यारी बेबी बबर महोई
[हे ग! ही पारी है इमरी को पारो तरी मी मही। ]
बाबर मारेबोहे माननी मर्ना।
[1 मान्तिी! मानिस मन पर्ग मानी]
सारा मम मोताना तुमने ही पानी है।
[९वसी! तरी एप है मगे माम अधिरिप]
इन परवियों में या दानिय पितमा मुम्बर विनितामा। इसी
प्रगर सापक र पमनी मारी रखनी या रमौ भागीया" से समीके सेवारों-
बाची परपीमें हवा कमसी कई सारे मपटाबा' एपीला रप भर पा रमी
मापामारकोनी माला चोरीमाया" बारिमको सम्मानित करनेवाण मरश्मि
मी पपा और गोपियोको बारठिमें प्म-निए विप प्रकारमा रग भता
तली तो मानतो मुणस्नेहम।।
[हे पी! मै पामती पी किस्में मुख होमा।]
-
मु मैप मंग तामी साराम कोई कापे है।
[मेरे मन-बममे माप कमी हो। कोई काग्रेको काट रहा है।
प्रेमनी पौरात कोनेहाचे ममुपर प्रेमनी पौग।
[मपुकरी प्रेमकी पोय हो किससे करें]
म पमनके कार पोपिमा पिप मेला प्रकट कलेपाकी
परवी बिए
मो भोपानी बहाते वो वितारी ममने मेत्या
[हे उस! प्रियतमने मुझे विसार रिया।]
सा नमामो कोरी ममेरी बयोबी
[हे परम! मरका छोरा निर्मोही हो पना है।
पायो भाबपने देगो मेर
{हे सर! मापबसे इतना पाना]
पसको सम्मोमित करनेवाले ये पर च्या प्रेम रस पीता" *प्रेम
पपेशा पोको बोकार (प्रेम-समा भी ऐसी भरनी ही है।) योपिक पिप
पवरपकी भायोमियो ऐसे कामको हपसी बनाती है।
पमा वमा योपियों एवं कम्मो नगार मारपरलेगाने बनेगमाटपा-
रमक मि-काम्प (Iyric poetry) किन्तु ऐसी भी मरविमा सापमकी मिटी
हो मिती निवयं कपि मन करता मा पापा पाant| नौमेकी रसमाएँ
इसी कपनका प्रमान है
पर रवाने पोरी मिनी रेस
[मी होरिमा नरपा नृत्य परले निश्त पी।
रा। पानी, रतौली तारी माचरीबो [हे पो| तेरी गांव सुम्पर मोर रसीसी है। बागे एम्बापमा बसिगरेमो नो बयारे कान [पवारनमें पी बन रही है प्ण वा-बड़ा बना हा है।] हारे सावनमा बमकार [हो, पदावनमें सोई मृत्म हो पहा है।] इनमें रपारामा पवित्व रसिकता चित्रात्मक वर्णन या पम प्रभुत्वकी प्रतीति होती है। रापाका स्प-र्थन मग्य भनेक गाबियोंका भी विषय बना है। इस प्रकारसायमने गंपारिक मापनास रामा मोपियोसपारण समन्धी सम्मोग मार विमाम रानों प्रकारको भिन्न भिन्न परिस्थितियोंकी पम्पमा की है। उपहोने प्रियतम पदका उनकी पर प्रेमिकामोके परिम्मपूर्ण भाव-सम्मेनार्मो भार मनुभगेको पररियॉमें समगित होकर गाया है। पहाने इमसे हम-श्रीला मायनका सम्तोप प्राव विभोर मुगपतीको सुन्दर पर-माहित्यसे सम्म भी बनाया है। मगीत परामे विविध प्रकार राग और सासोंकी मार संक्षिप्त स्पमें गार भावसे वभिपात होगामी गण-मीठा पोपिर्योदयकी मुकुमार मौर कप्ट भाषोमिया है संपीठ तमा भायों मनुस्प मापुर्य मरित मापी उनमें पदि सम्हासपूर्ण मन्ति-रसके माप पारपार पातुर्य तपा बिनोसे परिपूर्ण हरिया स्परित काका है। इस प्रकार अपि गीतोरे उत्तम ममूनाको प्रकट करनेवाली पारामकी गरविवा परमिह मोर मीराबारकी मस्ति गंपारमपी मम्पालोन पर रचनाकी पकायापही या मरती है। ल परपियोंने ही पाराम बारेमें कमा मोगनराम म्हानामाम तपा पी मुमागीको नीचे सिवे मतिभवन पहनके लिए बाम्य किया है "So far as poctical power arc concerned, hc in undoubtedly the greatest genius since the days of Premanand Hus poems on hruhna and the maids of Gokul arc a stream of burning lara of realistic passion and love and if lewdness of writings do not take away from the merits of a poet he is a very great poct indeed He has a weird and fasanating way of bodying forth a host of over fondled spinu of uncontrollable will in a language which is not only atonce - ३८ адс popular and poetical, but drags society after him to adopt, a popular, the language be created for them He introduce the men and women of hu country to a luxuriance of metra, whose wild munc maka them boar with the flame of his sentiments, and there is a tabtlo naivete in overything that coma oat from him. [गोवर्धनयम Classical Poets of Gujarat -pp 67-8] गरी साहित्य सम्मको मरकर संपला राग भनेपामा परि कोtt तोरपाराम। जिसरीको इमने सबमें मस्समाचार्यगाने मोफुरुमे बजाया पा उसी रससौन्दर्पकी अमृत बपीको पाएममीने ममदा टपर बगापा। रपारामगीको परवियोंकी पनाम मानो बियतीकी चमक है मानो पे नर्मराठे मीठे मम्मी रस- परिणापकी परन परपिक्षिय महरिपा हो मानो ये पयायमगोको पौत्र-भाषा हो। बयाराम मर्वात् मुगरातका माधुर्य-म्पन बमा निसन्ता। गत मरते साहित्यमें गुगतने नारी संगीतका पुषरातको वरबिर्यो तवा मुजरातिनके पसका सान पदा बनुपम है मौर उन परवियहि सम्राट् पुनरातिनके हवपरास पारामरा भी स्पान मपूर्व उनकी एक-एक मखी पुनरावर मस्पपान रस-मोती है। [कपि मामालात मापना सामर प्ल-२] “पापाकी संस्कारिता समृषि मनवा संगीउमें पाकि बाइ मषषा प्रवाहमें भाष-विपकी रमविरंगी चमकम एपमा पग-माधुर्मकी मोहनीमे प्रणम्-पिपासाकी तीवतामे गुमराती साहित्यका कोई साधर पन्हे (पसाराम ) सर्प नही कर सका। यदि "चातुरी छत्तीसी सपा रास सहम परी' नरसिंह मेहता र माने बाएँ तो मरसिंह मेहताको छोर पुराने प्रपप-पानका पापा या एक वाराम ही पैरा किया है। [कनवाचार मुन्धी मम्म काठमा साहित्य प्रवाह प ३९] माये भी मुन्सीची मिचते है-"स्याएम यों तो ना कहे बाते है किन्तु समा कविही है। उनके काभ्य मक्ति-साहित्य पोषाते है किन्तु ये मानष प्रेमरे भक्ति साहित्य उदाहरण है। मिस युगमें मस्त पापे बिना भावाभिव्यक्ति सम्भव नही बी एस बमानेमे गले पर होना पा। रसबमाक्सिरे कृषिम मारमरम बन्नहित प्रमय मूर्तिक लिए समि पीठ गानेमाने कवियर पे।
“एक बया परम पाण्मको गरदिपा भक्ति गंगार मागत रा मौत मीनिम्न प्रमाभीपर रपी गई है। मुगपत इम प्रमानीकी कविताएँ नरसिंह मेहतासे राम तर पी गई है। दयाराम पुषि-सम्प्रदाय के प्मन पे। रसेश गको पुष्प मानकर उन्हें गोपी मापसे भगनेकी प्रमामीके पुगारो । पोरन यस्तम नहि स्वामी बीरा के निश्चयी पे। मानिनो रामारो ममापर प्रसय पारनेरासे एप्मकी मीठा माते हुए एक पदमें “ए बम्पनीनी सी बागाने पया भुग पाए" मार दूसरे परम तमे दया सनीने मम मापनो कहते है। एक कपि रे इमलिए उनको रसिकता तया फापनाने अत्यधिक प्रगस्मतामे पी-नरत बिहार मासेखनको मधिक विकासपूर्ण बना दिया है। उनहोंने सन्ने बस यह माना है कि स्वयं मपने स्वामी दया प्रीतम-की नौण मसि- विम गा है। उनको ममति सन्चो नसमें बतरकोसनेमामा झोई पर्दा नहीं है। विमानामारने एक मानपर मिया है कि यदि समाप्मा रमकीन पाना विषय-म्पटना माना पाय वर तो स्मामीनारापन सम्प्रदायक परम सापुपर नापारी को बाएंगे। इमो मम्मरमे उन्होंने दयारामको पुराराको गोरी कहा । मनमुम यही उचित मार्म है। मरे गरशेम हम कर मकोकि दयाराम पनी गाबियोम अपनी रस-वधिको मर्यादामाके माप पररातो पयरेव बन गए । उनके गंमारको म्यूमधामे परमिा मेलाका मार कम स्पून नही है। नरमिाने हरि सोमा पमगार व माता विषयी माहि कहेबाप" कार सपने सजनकी पादेयता नि पोंमें प्रतिपारित की है मा ही प्यारामने भी पस मेमे काम मोह पमापा रे ते प्रमु काम पम पाये। [बिनने समोपको मोलि मिया यह प्रमु कामबग होगा?] - प्पि हा रक गातानामरोग र बौ गाप [पीहा-रमको पाने-गाते इसमे पामरोम दूर पाता है।] पह स्मरणीय है दिपाराम इन पर स्पिाम पर उनको बनेर परबिया ममम्म पुगरातमें पिया मि महोष मारमे गाती है। उन माग राम्रो पर तमा रोमनामे गरी प्रायनाम मारेगारा विक गम्पिन वा है। परि रपारामा माहम एपना हो तो हमें नरं प्रार्थना पाको ऐपना चाहिए। हाप महा मान परमें उन्हाने मापा हत तमारो कामानिए पहो पर मारो [सवामिय' मा मानोमा म नुशाग राम (मरा) || मरा आप पर नो।]
Yo देना।] हरि का है। मारो मायाम मुग [हरि! यह मापा मुझे और नही पी है। मेरमा र] सामोर मग कापोरे पारो माय [हे दामोर। मैं तुमारे पार्मि पावा। मेरे मुरारो] रुपा सिपहायोपा मोरयममा करो! [बाल तोपामिण की पावे . फिर भूमपर पार्षी नही !] रमन रोती बासने मारा मुषमिपि पिचरमरा [है मेरे मुमनिधि मिसरवास सेरकको रन लिए । मारे मत सपने माता मुतने पुरणो मा [हे गोता' मुझे मन्तिम समय छोग इस प्रकार भक्ति-चाई प्रार्थनाको हारासारामने प्रमको पार किया है। ऐसे पर उन्होंने सब नि है। “मिति विलास" पॉये पमित मानों आप अपने स्वतन मौर मपाठाको स्वीकार करने प्री पा मात्रमा करनेवाले रोन मसको मूति हमें सो रसयमको साँकी करदी। नवा अपनेको हफाया पर पहार पर्पन करणेबाने रम विस्तात पदो मी रिसावी है। पीपन-मीण ममाप्तिक नमको प्रतीतिक अवसरपर M पा र पर रे पाहणे निवदेशबनी" हमारे मनमें जिस शानी मसकी मृद्धि पी कर तापमाररपीम है। नीचे लिये पर पति और पता रससे गाते प्रेमापी मनोका गौरव प्रापरते और पवित्रा मार्य भी पता बीको प्रेम-अस अबखरे प्रेमरतना गरम करे मोको प्रेम अपने माता होता है उसपमें प्रेमरस स्थिर होता।] मादरममा मा रतिराम ने कामना कर। निससमे रसिकरप ममगाना मग मामई से करना नही है। प्रपर माल्ये गुरुवार दो पिरवर प्रपा माले सुरबार [भगवान अलत पिटनेवे मुष मिश्ता है। श्री विप्र प्रापन मिल्ने सुमिमा है। कोचन मानोगे तोषन मानली होम गौर भनाभपका है। . 'मननी मुखापर निापना महेसमा बसे मारो पातमा [नि पय कपी महसमें मेरे प्रियका वास है।] हो मनमा पी हरि प्राप हेने [हे मनुवा! यी हरिकी परममें एना।] हरसाना हरिरासा बन पा हरिपामा [हरितामा हरिमामा तु हरिदामा बन गा। ]] सात सपन रे समय मन पाम तम् [ मन! स्पामको ही न ममा समा स्नेही ममम है।] दयारामने उपर्युक्त परकि सार-मार मनन्य मति तया परपागतिका उपरेप देनेगामे और हरिजनोंको चियामग्ने पराम रेनेगाने पाम ऐमे मक्सि मार्पा बनुमरप करनेगामे "ठाइमी पन"बीर “भगवती" समम बतलानेवाले पर भी मिले है। हामी जन तेने पापी एरे" यह पर रमिारे "प्पण बन तो तेने कहिए" पर स्मरण रिलाता है। मन्तामे को समापन हो पाए है ऐम मिप्पापारियोको मापा र मापकोंको- "तू ममी पर नहीं हो पाया है हरिवन नही हो पाया है फिर बभिमानमें मयों मन है?" भरे मनमें जा पट है परस्पट ब र नहीं पाता तर करि तुमपर प्रमन्न मे ही मरने है ? ऐमे परों आप ये टोरते है और प्ररना देते है। रमे विमुख बने हुए जीसका पतावनी देन "माँ पूलाहमा फिरसा' माना मा मूल गया है मोर भव-पी पाहुमा है।' रा भस्म बसमर म्पर्प हो पा पाणा है। मीबिन्दको गा! ऐम पण पूर्वी भार परिपाकी भतावनीको दुहराते हुए भक्तिपरगा उपदेश दिया गया है। ऐमा परेरया माहिर रयापमने पदोंमें मार नमी पपलियाम भी लिया है। "मन मनि मम्मा प्रबोरगावनी- और पिता पिता" नीतियां है। स्पारामनारपायाम पण यन पि"मामपा" और अन्य राम-सात और सितविपपर गोरिया मिरयापमा मामाम्प मान पाम्प-गापमान मोर मगीन मानसी प्रतीनि पराणी है। “पस्नुपरति परमे एक सी बाट हर को माराबारे बमनु गमता पदारमाना है। नमी M 'मा प्रबोर- P ४२ पप रपमा पो पितामहार बार प्रणामदारकी करामात और रस एनायिका पेपक लिम्पो साल का बान्तरिक भक्तिरस दृष्टिपोषर होता है उसकी प्रतीति “पसमा तातो से मधिक दोहसि होती है मार मह भी माना जाता है कि इस मक्ति मिल कविका परमापाकी ममिता सैकीपर भी पितमा परिवार है। इस सतया पर पप पयाराममे ही मराठीमें पप टोका सिथी। उस पराव होने इहिर खम्प' "मानवतसार "प्रानोचर मासा पछार ( मोर माप) और प्रश्नोत्तर विचार तो विपी पपमें लिया है। सायमने पपकार स्पम कोई प्रशंसनीय सिद्धि प्राप्त नही की। सवसमा बी टीका पो मप हि पासोको उरमठासे समपालेवासमा पापकोणी म्मामा छीरा पर है। मराठी पत्रका मानिस निर्माण और साहित्य क्षेत्र विकास दो पारामले अपसाम मार ही एमा। गो तो बारामा साहित्य विपास परतु मरमियमै ही उन्होंने बास्तविक सिद्धि प्रान की है न नरगिसोने ही उन्हें सोकप्रिय कवि बमाना। पनको मर्यो पुष्ट पाम्म प्रयोप मौर मरने बनाए हुए पर प्रयोगोला बाहम्म होने पर भी समम सम्म कोरिका बानी-पापूर्ण तया मापा-समुत्व पराहीम कारप हो। पुनरातके बम-दरसपर अधिकार र सिपा है। सबरविको प्रगत पिपिच राग- रापिनियों मीठे संपीवसे भामयत कारसे शव देखने कोमाम मोदिली पैरा करने माले रसेसर अप्पको गीता के पति और महार सी बलको सामेगाली सम्पनामसिमीर रसिक पापियाँको पूरी सुविधा देनेवानी काब-वस्तुसेवा यस बस्तुर एमे मनसे स्मए सए मामले पारामने गुजराव मामयपर बासन पमा लिया है। सारामकी यावियाँको सुनने के लिए परमादसे कोई वा पाई राती मावर महिना का प्रसङ्ग उनकी परविमोकी मोरप्रिक्तानी प्रतीति राव है। गपुर मानेमाती परिण"राकर मुटे थे, मै दो रचना मात्र ही कर पानेका पारामकी परबिपोहोचम से एही महिनाकोही परनु बुधराउका समस्त मारी समावका म मिनिसपर सवार होकर न पापियो मा पारम्पको पातति पुम्मित रखा। हम परपियोंने बालीन मुबके को प्रेरणा मोर पारेय मरान किया है। जिस पर मस्ति कविताका मारम्भ गरि महता सयमधे हमा एसमन्तिम रम पिबर रिवनमानी करिता सबसपा मायरकरित मसानो सार पुम्दी साहिवका सम्मान समाप्त होता है भार उसकारापान पुष प्रारम्भ होचाई पराव पापीन मुफ्ती पाको कार पाएमी रत्तरा होमहराने पी पी। परन्तु उनहरोमे पुरोगामी समकालीन सीपती प्रणाली मस्त म निको परा भी पर्ष भी मिा। इसीलिए वे नमागेन पुरफ्ठी साहिता मन्तिम वेषसी प्रतिनिधि बन पाए । .
दयाराम [काम्प सञ्चय]
कवि-भी माता
१ पारणं
माता बसोरा भूसावे पुत्र पारणे,
मूले कारकग पुस्पोत्तम मानम्बमरे
हरको मोरबीने गोपोगन बाये पार,
मति मामर भीनम्बाबी मे घेर । माता० ॥१॥
हरिना मुवा ऊपर बाई कोरिकपनमा,
पकमलोचन मुम्बर विशात कपोम,
बीपक शिवा सरसोशीपे निमस मासिका,
कोमल मघर मदम छे राताबोस । माता ॥२॥
मेघश्याम काम्ति म पुटी बांकी
नीटसियामा भाग उपर मूमें केश,
हसता पन्तूरी होसे बेउ होराकणी,
बोताका कोटिक मरन ममोहर बेम । माता ।
सिंहनके मवेतुं शोमे सोबण सांगतुं
भानु मानम सपका कम्पन, मोतीहार
परपजंगूठो पाये हरि के हाथे पही
कोई बोसाये तो करे किसकार । माता• ॥४॥
सास सहाटे कोपो छे कुमकुम बारलो,
शोभे गम्ति जाणे मरकरामभिमा हात,
ममनी धुगते मनि ममियातीत मावरी,
सुपर काजसकेई टपहुं कोर्ष गाम । माता. ॥५॥
साव सोनान गरित मगिमय पारण,
मुमो सभणन बोले पुषरो मो धमकार,
माता विविध पचने हरके गाये हासरस,
धमतियानो रोममरोरी सार । माता• ॥५॥
गराती
१ पालना
माता मनो। पुत्रको पाठनमें मुसा रही है। फारसे पुरुपोत्तम
बानन्दसे मूल रहे हैं। गोपियां देव देवकर इसे वलि पसि
पाती है। श्री नन्दगीके परम अत्यन्त मानन्द छाया हमा
है ॥१॥
हरिके मुखापर मरोड़ों पाद्र योछावर कर दूं। उमरे नमन मुन्दर
कमलोंके समान है और भारु विमा हनिमर नासिका दीपगिता
जैसी दमक रही है मोर कोमर अधर गहरे साल रंगके हैं ॥२॥
दहको पाम्ति स्यामस मेपी सी है मृकुटी यांनी ह उमरे
हुए मसाटपर पुपराल देश मूमते है। हसत समय दो दन्तुलिपी
हीरनीरी तरह दिखाई देती है और मनोहर देशको रेतकर परोहाँ
पामदेव सग्यित हो जाते है ॥३॥
पप्पफे गमेमें सोनेस मड़ा हुआ पपनस मामित हा रहा है।
कस्बन मोर मोतियोंके छोटे-छोटे भाभूपण है। हरि अपन दोनों
हायोंसे पार परपमा भंगूठा पूम रहे है। सब कोई माता है
तो किस्मारी सगाते हैं ।।४।।
रामा मसारपर पुमकुमका माल टोका लगाया गया है जो
मरमस मणिमें गो हुए सारके समान मुगामित हा हा है। मान
सुगमतापूर्वक बाको माया पाउर मीर गाम्पर मुम्दर पावसकी
रिपरी गा दी है॥॥
मणिोसे गहा हुमा पारना मानका ह पूरे झुमानेपर उममेसे
पनिॉकी प्पनियापननाना उरती है। माता गिरिध प्रगारमे होरी गा
गाररपित्र हाती है मौर पसनेको फूदेवारी रममाओरी मांगती है ॥६॥
कवि भी मासा-- ४५ हस कारपब म कोकित पोपट पारणे, बपैया में सारस चकोर मेना मोर, मूल्यो रमका रमया भी मोहनलालने, घमयम धूपर वजारे नम्रकिशोर । माता० ७ मारा कहानाने समापी कन्या लाबोस, मारा सासने परमापीश मोटे घेर, मारो नायो वररामा पई पोरे बसो, मारो कहानो करशे सबाय सीता रहेर । माता० ॥८॥ मारो तारकबायो सवा सम रमवा बशे सारी सुबह ह मापीश हरिमे हाप बमबावेमा रुमझुम करतो परमा बाबभे, ह तो घाईने मोरोपा गया साप । माता० ॥९॥ मेनो मकर शेष सरीचा पार पामे महीं, "नेति मेति कहे छे निगम पारम्बार, तेने नम्परागी हुमराबी गये हाती, मपी, मपी, एना माम्पतणो कई पार ! माता० ॥१०॥ अनवासी सौ सर्व पी सुमागी धर्मा तेपी मम्मशोबा केई माग्य विमेप, ते सर्बपी गोपीमनन माम्म अति घर्ष, बेनि करे प्रशसा ब्रह्मा शिव ने भेष । माता० ॥११॥ धम्य ! घम्प प्रमबाप्ती गोपीमम मम्मथसोमती! घरमा घम्य! मगवन हरिकेरोग्यो छेवास सरा चुगसहितार ग्यहाँ सोता करे, सा मसिहारी माये रयो पास ! माता• ॥१२॥ .
७
-गुजराती
पसनेमें इस कारणव, कोकिल पोता पपीहा, सारस, कोर,
मना मोरके विलीने मोहनरासक वेसनके लिए रखे गए हैं। नन्दकिशोर
अपने ऍपर्दाको छम-छम ममाते हैं ॥७॥
माता यशोदा कहती हैं कि भपने काम्हाके याम्य ही में कन्या
मामी मोर अपमे शलको कैसे पुटम्यम व्याहूंगी। मेरा बटा बररामा
बनकर घोड़ेपर बैठेगा। मेरा कान्हा सदा ही थानन्द करेगा ॥८॥
मेरा मासा अपन सखाओंगे साप देएने गाएगा। में हरिके
हाप अपने सारे सुखोंका सौप दूंगी। वह भाजनने समय रुममम करता
परमें पाएगा और में दोरकर उसे अपनी छातीस एगा लूँगी ।।९।।
मिसपा पार सफर और शप जैसे भी नहीं पा सकते जिस वेद
वारमार नति-नेति कहते हैं। उसे नन्दरानी मूसा मुमार गरियो
गाती है। सचमुप उसके सौभाम्पको काई मीमा ही नहीं है ॥१०॥
प्रजवासी सभीसे अधिम सीमाम्प गाली हैं। उनमें भी अधिक
मन्द मोर मघोदापा सोमाम्य है। उन सबम गोपीना भाम्य पेप्ड ह
मिसको प्रसा ब्रह्मा घिय मोर पप भी परस है ॥११॥
प्रवामी गोपीजन, नम्व और माता यात धन्य है। जहाँ
हरि निवास करत ह यह इन्दावन भी धन्य है। यहाँ युगमकिशोर
सदा सीसा-रत रहते हैं। दयादास सदा उनपर परिहारी है ॥१२॥
कवि-भी माला-
३ मौरासी रम्य मनोहर पाई
मोरती रम्प मनोहर पाई, मनोहर बाई
मोरती रम्प मनोहर बाई, मनोहर वाई मोरती० (रेफ)
मवत्रय ताप हो रे साम्ममता,
चम्चत मम हरि परगे बसता
साम्पा प्यास खास प्रपञ्च पी (२)
कमस मयन कमस परम परम रसिक-
सप्तस्वर प्राम वेर धूनी गाई
मोरमो० ॥१॥
विधि मर गहन गति मब बाणे,
शुक समकारिक कीरति बसाने,
तप
मार तुमर (२)
सारोमम पधमीनीघपगरोसा ससारीरीरी
गगनरोरीरोरी सगोत चतुराई
मोरती० ॥२॥
मोहरिनो या दरा रंप साप्यो,
मा सप्तारमो मप सह भाग्यो,
फरी फरी ममम नबी ममताएं (२)
भवण मनन हरि कीरतन मनन-
सेवन ग्याम नाम नवनिधि सुभाई. मोरमी० ॥३॥
-गुमराती
३ रम्य मनोहर मुरली वजी
गम्य मनोहर मुरसी वजी मनोहर मुरसी बसी। मुरसी रम्प
मनोहर बजी, मनोहर मुरली बजी।
इस मनोहर मावासले कानमें पढ़ते हो संसारके तापत्रय मप्ट हो
गए और पम्पस मम हरि परणोंकी मोर मुक्ते हुए संसारके प्रपञ्से
उदासीन पनगर प्यानमें तस्मीन हो गया। सप्तस्वर तीनपाम सुस्त
पनिमें ससपे पाने मसके समान नेत्रवारे कमसके समान मुखवाले
परम रसिक भगवान कृष्णका गुणमान किया है ॥१॥
सनकी गहन गतिको ब्रह्मा नपा देवगण भी नहीं मानते । गुरदा
तया सनकादिन उनकी कीतिका गान करते हैं। उन्हींक सिए गिरवप
करते है तपा मार मपमे सम्पूरे पर सारीगम पघमीमो धपगरीसा समा
रीरीरी पपनरोरीरो रीरीके दपमें संगीतरी पतुराकि साप कीतिगान
करते है ।।२।।
पवि दयाराम कहत है कि भगवामका पोडासा रंग सगा मौर
समारसे सभी भय दूर हो गए। बार-बार पम्म ग्रहण परना सिए मम
इस संसारमें पुन महीं माना होगा। धवप, मनन, पोतन भगन सभी
रूपमें मनाम मवनिधियोंरे मुवोंको दनेबारा है ॥३॥
कधि-मी माता-
रासलीला
पागे पृन्दाबना पासप्ती मो म्मो पगारे कहान,
मारे वेधी मुनिपरपसिसी रे, मब रहो कोने सान
बागे० ॥१॥
पागे.॥२॥
बापे० ॥३॥
तम्नी प्रासामी मुमी ही थे पर नमबाने काम,
येती म सा मुमी पी . भाप्प हमारी मान
बममा मोर पासे महीं ६ मृगने मन मोह पाय,
पंखी मामामा महाते नहीं रे, नाव सूनी न ऐवाय
पापर कान पईने सांभरे रे, करे नहीं पयपान,
गम्पो गामा तोरी त्यहाँ पसे 2 मार सममाने काम
फूल्यो कमात मल टाटरी रे, से मारियो रे भाग ।
कांवर समाध मती रमा रे, पर्यु मगत मे नाम
बाये • ॥४॥
बागे० ॥४॥
बागे० ॥६॥
पामे० ॥७॥
काने परियो ते प्रसनी नारने पहलाजीमो रे नाव
तार पर पामे निम घामने रे, पाई गयो सौ सार
एके नेपूर कामे भासि[ २ बरसे पहरी घे माम,
एके ककर माथे पासियु ऐबी पी बेहास
एके कुमकुम कामत रोति , टपहुं की के पास
एक चा पाल्पं मंचले रे, बोवा बानरयास बागे० ० ॥८॥
एकना करमा कोप्सियो पीती बासी एफ मोर,
एक मोर ररता मेती गई रे, पासी सममाने तीर
एकना स्वामीने मन मामलो दे पागा बोधी म्ही मार,
कर मोरी कहे ये कामनी रे, "ममे बागा पो निरधार मागे ॥१०॥
बामे० ॥९॥
२३
-गुमराती
8. रासलीला
वृन्दावममें वंशी यर रही है। काम्हा उसे दो-बड़े पगा रहा
है। उसका नाव मुनिवरोंकी पसलियोको भेदकर हदय तक चला गया
है। किसीको होश नहीं रहा ह ।।१।।
परणपर नमन करनके लिए यमपी शाखाएं गेह रही हैं। पृथके
साप मताएं झूम रही है और साप ही हमारा भाग्य ।।२।।
यमुमाका नीर भी स्थिर हो गया है। पशुमोके मन भी मोहित हो
उठे हैं। नाव सुनार पक्षियोंसे अपमे पोससमें नहीं रहा पाता ।।३।।
गणे कान देकर बंधी-नाप सुन रहे है उन्हाने दूध पीना छोड़ दिया है।
गायें अपन मघन तोमर कानसे नाव सुनमको वहाँ दोगे पा रही है॥४॥
मलने घरातल्पर कमर विस उठा, मानो उसने सूर्य दर्णन लिए
हों। कर उस नादपी समाधिमें निमग्न हो उठ किन्तु ससारको इसकी
खबर न परी ॥५॥
प्रियतमका वशी-नाद वनारिमों मानोंमें पड़ा। वेरा पद मपने
ही परमें, इसी माकमें पाने सिए सब ममि मुनकर दौड़ी गई ।।६।।
मल्दीमें एपने कानमें मूपुर पहमा तो दूसरीने परगम कभफूल ।
एमने वणको मापेमें गला । सव इस प्रकार यहास हो गई ।।७।।
एकमे मुगुम कायम मौर रोलीका तिलक मारपर रिया, एक
दीमदयाएको देखनेको जस्सीम भोजनमा मापसमेंगसफर पर परो ।।८।।
पिसी हापम कोर है तो काई गत पीती-पोती पसीना रही है।
गोई यो रोता हुमा छोड़कर यमुनाफे तोरसी बोर भाग पसी ॥६॥
एमके पतिका मन प्पिसि पर उटा मौर उसने मपनी पत्नीको
नहीं जाने दिया। उसरी पत्नी हाप गोहपर महती है कि मुझे पा
करके गाने दीजिए।॥१०॥
कवि-भी मासा
५४
मंगमामी पोती सर्व मामनोरे, पछी वेठो प्रसवा हाय
रोस तबीमे रीसासरे रे, दीन पी पीनानाप बागे. ॥११॥
समें पहेली नई से मसौ रे, तेनो येह परी घर माझ
मोहममीना मंगा मई मही रे, माय मबरण सहस्पधि पागे० ॥१२॥
कुसमो मम मपी मो मारीमो, वाओ पोताने ठाम,
घम्प पम्प तमारी रीतने मेस्पा घरमा तेकाम!
पा.।।१॥
H
मापमा परमा से काबम मूकीमे मावी करो काम,
बचन बहामानीनं सामसी रे गोपी मोम्या साह पहाल बाये ॥१४॥
"हाया देम ए मरिर फरी, ममे तबीई तन,
देवी गोपीनममी प्रोत रे, हरल्या मी भगवन वागे ॥१॥
हावा माबो आपम साहु महो २ रमीए सोरो रास,
एक एक पोपी पन्चे माप ने रे, नीरा दी पेरे पास पापे ॥१॥
महो महि मरावी नापने रे, कहो, "हम पाए घेर ?'
बर्मा कोपा बसी नाप ने सपए की पेर मागे० ॥१७॥
दिमासे मामले श्यामनी रे, प्ररनो रूटी से माल,
पापी बारममनो स्वर्ग रे, कीपी भी र, पोपात पा० ॥१८॥
सीता देवी गुरुमधामनी ६ पवन पयो पतिभप,
देवता पुष्टि कर प्रसनबरे, मेची प्रममी उमग बामे० ॥१९॥
ब्रह्मारिक माने गोपए कई रे मोसा गोमुतचंद,
प्रेम अघ बिपे मोपाई घेरे तारा बच्चे प्रेम इनु बामे ॥२०॥
ए रासलीला में पापे ने सामते ते पामे मिव धाम
पातको समाजो रे, कोबा माराम
बागे. ॥२१॥
१५
गुजराती
संगवारी सारी स्त्रियां यहां पहुंच गई है।' उसका पति हाप मसते
बैठा हो रहा । ऐसी जो पत्नी पी उसने अपना क्रोध छोड़ दिया। यह
दीन भावसे दीनानापके पास सबसे पहले पहुँचीं ॥११॥
यह मोहनसे सदापार होकर मिली। उसका शरीर ही परमें पर
रहा। यह देखकर सबको अचम्मा हुआ ॥१२॥
रण समझाते ह कि नारियों । यह तुम्हारा पुरुघम महीं है।
तुम अपने पर लौट पामो। तुम्हारी इस रीतिको धन्य है कि परके
सारे काम-कार साफपर रख दिए ॥१३॥
अपने परफे मामाको दूसरे दिन भरनेकी माता पर नहीं छोड़ना
चाहिए। प्रियतम बमन मुनते ही सब गोपियो प्रेमपूर्वक बोली ॥१४॥
यवहम वापस घर से बाएँ हम अपना शरीर यहाँ छोडेमी।'
गोपिर्योको ऐसी प्रीति देखकर भी भगवान हपित हुए ।।१।।
पे बोले मियामो, हम सब मिलकर मुन्दर पस रचाएँ। हर एम
गोपी अपने पास प्रियतमको अच्छी तरह निरख रही है ॥१६॥
ये परवाही पर महती है कि कहो पर फैस माएँ ? ने बीपमें
पप्णको मेकर उना मुन्दर स्वरूप दय रही ह ॥१७॥
प्याम मौर राधा मठवासे बन गए ह मौर उनकी छातीरी मालाएँ
टूट गई ह । श्री गोपारने परव पूनमको रातको सम्बी बना दिया ।।१८।।
पुरधामको इस मीसागो देखकर पवनी गति एक गई। बरसी
उमंगको देयर देवता प्रसन होकर पुष्प-ष्टि करने मगे ॥१९॥
ब्रह्मा रयादिने पाकर गोकुलवाकी मीमा देयो । पण पेमे ही
दियाई देते है जैसे पादसाकी ओग्म तारों वीच पदमा दिखाई देठा
है।॥२०॥
जो यह रास-पीसा गाठा मोर मुमता है वह वैकुष्-धाम पाया है।
दयाराम पाहते है कि इसमे उमरे मारे पावर मिट जाये ह ॥२१॥
कवि-धी मासा- १६ ५ भासना कामण कामण से छे मामा ! तारी मखमा रे! मोसं मार मा रे, कामण दीसे छे भासा ! टेक।। मम्ब हसीने वित्तई बोएं कुटिस कटाले कासम कोयु, अपरियाली माये मीनुं मापमा रे, मोतुं मार । कामगा॥१॥ मतशिवस्प षणु रहियातु, करहुं सपर कामनपाल, छानो पम्मन राजे पकम पांचमा रे, मोनु माव । कामण॥२॥ कामम०11 म्हातारी रसबरणी मामी, सारणीनु मन तानी, प्रकुटीमा मटकाबी मूरकी मांग मा रे, मोसं भाव । बयाप्रीतम मिरव्ये ने पाय ते में मुबारे मब कहेवाये, मा बिमती मातुरता मावए साध मा रे, मोसे मार। कामम॥
-गुमराती ५ औसका मादू मोरे असले! मेरी आंवमें मादू भरा हुआ है। कुछ योस मत सेरी आँचमें जादू दिवाई देता है । तुममे मन्द मन्द मुस्कराहटसे चित्त पुरा लिया ह और कुटिस कटालसे बसेको भद मिया है। तुम अघ-खुली आँखसे मेरी भोर मत देखो ॥१॥ तुम्हारा मवसे शिव तकका रूप अत्यन्त सुन्दर है । सुम्हारी सारी मवाएँ भादूसे भरी हुई है। तुम अपने पकष पांवमें पम्मनोनो छिपाये हो ॥२॥ तुम्हारी रसीसी वाणी प्यारसे भरी हुई है वह तमियोंका मन पुरा रेती है। अरे भौहोंको मटकाकर मुरपी मत गल ।।३।। रयाराम महते हैं नि प्रियतमको देखनेसे नो मानन्द होता है उसना वर्मन मुतसे नहीं किया जा सकता । विनय इतना ही है कि तुम मातुरता पूर्पक बायोंमें समा गायो ।।४।।
ऋषि-यो माम्भ-
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६ मोहनमीनी मोहनी
द्र
.
कीये ठामे मोहनी म पाणी रे, मोहमजीर्मा ।
मगुटोमो मटका के, मासपानी स्टफर्मा,
के मुं मोहमी मरेती बानो रे। मोहममी०।।१।।
बीटसीमाता फेवामा के मनमोहन कार्मा,
के मोरती मोहननी पीछानी रे। मोहनमी०॥२॥
ऐ मुखारविरमा के, मम्म हास्य फर मा,
के पटाक्षे मोहनी बवाणी रे। मोहनधी०॥३॥
केन बंगेमंपा के, ललित निर्मपा,
के मुं मंगषेती करी स्पापी रे। मोहननी०॥४॥
पपम रसिक मेनमा के छानी छानी सेनमा,
के बोबमर्नु प करे पाणी रे। मोहनमी०।।३।।
बयामा प्रीतम पोते मोहनी स्वल्प छ,
तन मन धन है सूटाणी रे। मोहनबी०॥६॥
-गुजराती
६ मोहनजीकी मोहिनी
या
या
मोहननी मोहिनी किस स्मानपर है मह में महीं गान पाई।
यह माहिनी भूपटी मटकानेमें है या देखनको अगमें?
नकी मीठी मीठी बातोंमें है? ॥१॥
पह मोहिनी पुपरास बालोम है या मदम मोहन देशम ह ?
मोहनकी मुरसीमें फिर उसे पहिचाना जा सकता है। ॥२॥
यह मोहिमी उनके मुखारमिन्दमें है या मन्द मन्द हास्परे फन्देमें
है? या फिर यह मोहिमी पटाक्षम भरी हुई है
पया यह मग-अंगमें है या ललित विभगमें है ? उसने सयामीको
रागस कैसे बना दिया है ॥४॥
क्या यह माहिनी पपर रसिम नयनामें है या गुपचुप किए मामेगास
इमारोंमें है ? या यौवनर इसम्पमें है जो पानी-पानी बना देता है!
॥५॥
.
बाम्तबमें दयाराम प्रीतम स्वय मोहिमी-सस्प है। इसलिए मैं
पन मम धनसे उमपर मपन आपको एटा की ॥६॥
कयि-श्री मामा-
६०
७ पेली मुने कीधी!
पेसी मने कीधी श्रीनरमोना मर! घेसी मुने कीधी। ॥टेक।।
सती हैं तो मममानी गई हतो पानी,
स्या में मम्बबरमे मीठो म सोमाणी,
मे पण मारा मस्तरनी पात गयो भागो
घेसी० ॥१॥
हालागी हे बांकी मगर बरे मोयं,
साहेती, माय स्मारे तो मधिक मन मोह.
मा कुटिस कटाक्षे प्रोयु
पेसी० ॥२॥
हास वशीकरण भरी मीठी वाणी,
सणी है तो भूत बिना रे पेवाणी,
पाने मग प्रीत-पीग चायना पसागी।
घेली.॥॥
पेली ॥४॥
सपी रे एमी मस्ती मांच ममिमामो,
परसरंगमी मरेली रतनाली,
भूरकी मी भरी बांकी भकुटी में मासी
सवी! अनु मुबई मनमोहनकारी,
मंगो मम माधुरी मनोहर भारी,
मम मा ममुरे हसो भने मारी।
प्रेमी० ॥४॥
मटपर ए मामी कामणे मर्यो छे,
मावगे पासो एने कोगे कया ?
मैं तो मारा मन पकी एने पर्यो । पेसी.
10॥६॥
-पुजराती मुमे वापती बनाया पीनन्दगीके नन्दनने मुझे यापली बना दिया ! मरे, मुझे वापसी बना दिया !! सखि रौ! मैं तो यमुनागी पानी भरने गई थी। वहाँ मैंने मन्दबरसो देखा और मोहित हो गई। उन्होंने भी मेरे हृदयकी बास पान ही ॥१॥ प्रियतमन प्रमभरी पांकी पिसपनसे मेरी बोर देखा। मोरी सखी तो मेरा मन बोर भी अधिक मोहित हो गया। अपने कुटिस कटासि उन्होंने मेरा कसेगा छेद दिया है ।।२।। प्पारमरी, मीठी बपोकरणयुक्त पाणी सुनते ही में बिना मूल्प रिक मई। प्रीतिको बैरनाको मन ही जानता है। यह सही नहीं मा सपती ॥३॥ %3D भरी सपी ! उनकी मां माली, नुकीली है, रूप रस रंगसे भरी ६, रवनारी है। मैंने उनकी पादू भरी तिरपी भौहाँको देखा है। सग्री ! उममा मह मन्मका माहित फरमेवाता है। उनर म प्रत्यग मरयधिक माधुरी भरी हुई है। उन्दोंने अपनी मन्द मन्द मपुर हेसीस मुझे मार गरा॥॥ नटवरके नएस विणा तक पार भरा है। मरे रतना रूपवान मे रिमन पनामा मैने हो अपने ममसे इसे पर मिया
कधि भी माता-
सची | एनो मोरमीमा मोहनी मरो छ,
सेमे मुने पमी बेहविकल करो छ,
सबी! मारो सुधबुध एगे हरी छे!
मेसी० ॥
कासमानु मपो कोई कहेपात,
लागी काइरोमेरोम, नपो में हेवातु ।
कर करो उपाय हो मपी में ऐगातु ! पेसी०॥८॥
तासावेसी सागी, सरफई , में मराशे,
फेम करो मेमो मोहन मुख पामे,
सामने मार परी। बीय मारोबाझे ।
प्रेती॥९॥
विरह बहि ममा बसे छे समाप्ती गई साहेती,
बानपान मान की गयी, काब मेसी
रखे एनो पाय मबरपा ऐसी 1.. घेती० ॥१०॥
एपे समे बयाना
प्रोतमयी पधार्मा,
मंक मरो कुममसरना सधार्या,
माप्यो मामल, ग्रहताप चौ निमार्या ।
प्रेती.॥११॥
गुजराती । हे सखी! उसकी मुरतीमें मोहिनी भरी है। उसने मुझे विरहसे विकस कर दिया है। सखी! मेरी सुधबुध उसने हर सी है ॥७॥ कलेगेका दर्द किसीसे कहा नहीं पाता । हे राम ! रोम रोममें माम लगी है मुमसे रहा नहीं जाता। कोई उपाय करो अम मुमसे रहा मही जावा ॥८॥ में ताप रही हूँ। बरे मै मर गामी। किसी भी प्रकार मोहनसे मिमा तभी मुमे सुख मिलेगा । लम्मानो छोर नहीं तो मेरे प्राणं पसे पाएंगे ॥९॥ सखी समा गई म यह विरहमें पर रही है। इसे धानपानका कुछ स्पास नहीं, इसने एग्बा भी दूर यहा दी है। शायद यह इसको अन्तिम दशा है ॥१०॥ इसी समय दयाराम प्रियतम मा गए और उस गोपीगो गोवमें उठावर कुन्जसम्म पझे गए। उसे मानन्द देकर कृष्णने उसके सारे बिरहतापमो दूर पर दिया ।।११।।
कवि-भी माता- ९ मारु माठ मुखाने मय बावली रे लोक, सोतसे पनिहारीमी हार मारा मामानी हो, हावा महि बार मही बेषवारे सोस । टेक सोना ते के माई बेरहरेतोस सेणो रत्ननगम मारा.॥११॥ मारा० ॥२॥ केर मरतीने घरो में मर्यो रे सोल तुटपो मारो मवसर हार काय ते रमो कहामनी रे होस, भाई मने पासो हगव मारा." हे तुमे पडतो पग रे होस, पास मारा पर फेरी मार मारा. inxn तुम सरखा गोगामिया रे होत, ते तो मारा बापमा गुप्ताम मारा० ॥५॥ तुम सरखी गोपालमी रे सोम, ते तो मारा पगनी पेमार मारा० ॥६॥ गयाना प्रीतम प्रमु पातमा रे होत, तेवो भारा प्राणना मायार मारा०1४॥
६७
-गुजराती
९. मेरा
आठ कुएँ और नौ बावरियाँ है, मौर है सोलह सौ पनिहारिनोंकी
कतार । मेरे प्रियतम मैं वही वेचन बब नहीं जाऊँगी।
मेरा पड़ा सोनेका है मौर गॅदरी (पड़े नीचे रखी जानवाली
कपकी गोस मेरा) रत्नजटिव है ॥१॥
मैने कमर मोरकर पड़ा भरा है जिसमें मेरा नौडियोंवाला
हार टूट गया है ॥२॥
तटपर पान्हा वड़ा था। उस देख मैने कहा कि माई परा
पड़ेको सिरपर उठा दो ॥३॥
उसने कहा-तू मेरी परपी नार (पत्नी) वन ना, तो में तेरा
पहा पहा ॥
मने कहा-तरे पैस ग्वाम मो मरे पिताके गुस्म
हैं ॥५॥
उसने महासेरी जैसी ग्यासिन मरे परकी नूती
है ॥६॥
दयारामो प्रभु छरहरे पदमके हैं मार ही मेरे प्राणाधार
है ॥७॥
कवि भी माता
९.मार
माठ कुबाने नब पावरी रे सोस, सोमः पनिहारीनी हाप
मारा पासामो हो, हागा महि गाउं मही पेचवा रे मोल । टेक
सोना ते के मा बेरमरे सोस उडेजी रत्न मगव मारा० ॥१॥
मारा० ॥२॥
को मरीने घरो मे मर्यो रे मोस
तुटपो मारो मवसर हार
काठ ते उमो कहातमी रे मोस,
भाई मने परतो म्हणाय
हं तुने पडसो पगई रे मोत,
पाय माप पर देरी भार
मारा० ॥
मारा. In
मारा० ॥२॥
सरवा गोबासिया रे सोस,
ते तो मारा बापमा गुमाम
तुम सरखी गोवासपी रे लोत,
से तो मारा पमनी पेवार
बयामा प्रीतम प्रमु पातमा रे मोत,
तेवो मारा प्राममा आधार
मारा० ।।६।।
मारा० ॥७॥
६७
-गुमराती
९. मेरा
माठ कुएँ और नौ वापड़ियाँ हैं और है सोलह सौ पनिहारिमोंकी
कतार । मेरे प्रियतम मै दही घेभने अब नहीं पाऊँगी।
मेरा मग धोनेका है और गॅरी (पके मीचे रखी गानेवासी
पपरकी गोल घेरा) रत्नपटित है ।।१।।
मैने कमर मोरकर पग भरा है जिसमें मेरा मौलहियोगमा
हार टूट गया है ॥२॥
वटपर कान्हा वड़ा पा। उस देव मैने कहा कि माई गरा
परेको सिरपर उठा दो ॥३॥
उसने कहा-तू मेरी परपी नार (पानी) वन ना, तो में तरा
पड़ा पढ़ा In
मने कहा-तेरे जैसे ग्वाले तो मेरे पिसाके गुलाम
है ॥शा
उसने कहा-तेरी
जैसी ग्वासिन मरे परकी जूती
पयाराम प्रभु धरहरे बदमरे हैं मोर पे हो मेरे प्राणाधार
है ॥७॥
-
कवि-श्री माता-
६८
१० [ नाj
है शु पाणु रे म्हासे मुबर्मा शं पोर्क
पारे बारे सामु मासे, मुख कागे मी.
हंशु० ॥टेक॥
हना बस भरवा स्या पुंठे पुंठे माये,
पसर बोसाम्यो हासो बेस पराये
हो० ॥१॥
बने सरछोड़ तोए रीस म हाये,
काईकाई मीसे मारे पेर माबीने बोलाये
• ॥२॥
गुरपी देखोने मने बोग्यो मावे होटे,
पोतामी माला कहागे पहेरा मारी कोटे.
मुं० ॥६॥
एकतरी देखे या मुमे पाबते रे मागे,
रंक पनि काई काई मारी पाते मागे
मुं. in
(मुने) बो ना मातीमागे, त्या त्या ए मारो भाबी के,
पेनी बयानो प्रीतम मारी के मन मुके. j• ॥१॥
-गुमराती
१० मैं क्या जाने
मुझे क्या पता मि प्रियतमने मममें क्या देखा है
यह वार
पार मरी ओर देखता है। मेरा मुख उसे मधुर मगता है।
में सब पानी भरने पाती है तो यह मेरे पीछे-पीछे आता है। वह
प्रियसम विना कहे मरा पड़ा पड़ा देता है॥१॥
मैं उस मिटमारती हूँ फटमारती हूँ, फिर भी उसे बुरा नहीं
स्गता । किसी म पिसी बहाने वह मरे पर पापर मुझे पुलाता है ॥२॥
मुझे दूरसे देवार यह वीरता हुआ पास घसा आता है बीर
कमी-अभी अपनी मासा निकाकर मेरे गसेमें पहना देवा है ॥३॥
मुझे मकली देखकर वह मरे पैरों पड़ता है और रफ समार
मुमसे पुछ-कुछ मांगता रहता है |
मुप्त पहा-यहो पाती हई देवता ह यहाँ-वहाँ बारे ापर यह
मौकता है। सपि दयारामा यह प्रियतम पिसी तरह मेरा पीण
मही छोड़ता ॥५॥
कक्-िश्री माता-
७०
२१ प्रज पहाल रे
प्रम महासू रे ॥१॥
प्रजबहाम्र॥२॥
बेनी,
वन बहानु रे ॥३॥
प्रज बहाल रे ॥४॥
प्रम पहास रे कुठ नहीं मावं,
मुने मा गमे र चतुर्भून पाई,
त्यो भो नम्बळूबर कोपी साई
बोईए सस्मित त्रिभंगी मारे गिरिधारी,
संगे होईए श्री राधा प्यारो,
विना नब ठरे मोच मारी
स्या मी अमुना गिरिवर छेनी,
मुने भासक्ति छे ए
बिमा मारो प्राण प्रसम्न रेमो
रयां भी वृन्दावन एस मपी,
वन बनिता संग बिमास मपी,
विष्णु देणु माय मम्यास मपी
बत
वृक्ष बेणुधारो,
पत्रे पर हरि मुग चारी,
एक बम रज को मुक्तिवारी
ज्या बसवाने शिव सबी म्प पया,
हा मन बन रब मे तरसता रया,
ग्सब सरणा न हम मया
सुब स्वर्ग हष्ण बिना कर,
मुमे ना गमे ब्रह्म सबन मम्,
धिक सुख बने पामी पर
हूं का भीगी । सायुग्प पामी,
एकतामा तमो मारहो स्वामी
मारे पासपमार्मा शी वामी
प्रब बन बकुण्ठ मुख होईपस्या,
ना गम्यं ब्रह्मसबममाहे मस्या,
घेर स्वम्मानम्म सुबमति गस्या
गुम्बन गोकुलवासो पाप
भी बस्तममरणे निस्प पशु
या प्रीतम सेवी रस मा गाभु
मर बहा रे॥५॥
प्रा बहा रे ॥६॥
बमबहान रे॥७॥
प्रय बहा रे ॥८॥
अब वहान रे ॥९॥
रे॥१०॥
गुजराती
११ व्रज प्यारा रे
सकते ॥३॥
मुझे प्रबही अत्यन्त प्रिय है, मै वैकुण्ठ नहीं पाएंगा। धतुर्मुग
होमा भी मुझे पसन्द नहीं है। भमा उस बैकुण्ठमें में मन्दकुँवरको
कहाँसे पाऊँगा ॥१॥
मुझे तो रहित विभगी गिरिधारी पाहिए और सापमें उनकी
प्यारी राधा पाहिए। उनके बिना मरी मा तृप्त मही हो
समतीं ॥२॥
उस पगमें थी यमुना तपा गिरिवर गोवर्धन ह । इन दोनामें ही
मुझे बड़ी आसक्ति है। इमो पिना मेरे प्राण प्रसम्म नहीं रह
उस पैमुष्ठ लोपमें वन्दावनकी रासोग महीं है व्रजनी मनिता
मोक साप प्मा विसास नहीं है। उस वैकुण्ठवासी विष्णुको
मेगपादनमा अम्मास भी तो नहीं है ॥४॥
जिस वजपा प्रत्या वृक्ष वणधारी पीण है प्रत्येक पत्तमें
हरिमा घतुभुज प है उस प्रो एक एक रक्कमपर वैकुण्ठमी
मुमित न्योछावर है ॥२॥
प्रगमें बसनेरे लिए शिवने मग्री रुप धारण गिया । ब्रह्मा
आर भी उसी रबर मिए तरम रहे है। वहाँके तण भी उबर
समाम राणमय हैं॥६॥
पगो विना म्वाका सुख भी पाया है। उना विना वैगुष्ठक
बा-मदनमा म्प भी मुझे पसन्द नहीं है। जिस मुगुका पापर भी
पतन हो उमगरी धिषकार है ॥७॥
हे पी पी ! सायुग्य (मुषित) को पापर भी मैं पया करूंगा?
हे स्वामी! उस एकतामें ता मार महीं रहेंग । सब पर इस
दाम भायमें क्या रमी है भगवन् ? ॥८॥
मन शेग एष्ठका मुर दयार मोट आए मिला हुषा ग्रह्म
और उन्हें अन्डा नहीं मगा। पर पर रहते हुए ाण सम्पन्ना
आननमा मु' उम्हें अतिगम मन्छा मगा ॥९॥
गुरुतो पाने मसमे गामनिवामी बनूंगा घी पम्मानार्पगी में
परपम निरन्तर रहूँगा। वि दयाराम महम है कि प्रियतम श्रीयाणवी
सेवार रमपूर उनकी बीतिमा गान पगा ॥१॥
करि-भी माता-
७२
१२ एयाम रंग समीपे न जाएं
श्याम एग समोपे म भावं, मारे माव पकी,
पयाम रम समीपे म ना(क)
मेमा कासा ते सह एप सर सरपर्मा कपट हशे मावं,
मारे ॥१॥
कस्तुरीनी विम्मी का नहीं, कायम मा मोवर्मा अबार्नु
मारे ॥२॥
कोकिसानो शम्य सुपे नहीं, कागवानी सकुनमा म का
मारे ॥॥
मीमाबर काली कम्युको म पहें नमनाना नीरमा न नहाये
मारे ॥४॥
मरक्त मनि मे मेष दृष्टे म बोषा, बाबु त्याफ नाबाई
मारे ॥३॥
बयामा प्रीतम सापे मुझे मीम मोधो, पन मन कहे (अ) पता-
मा निमा मारे ॥१॥
-गुजराती
१२ पयाम रंगके पास नहीं जा
.
में प्ण वर्गरे पास नहीं पाऊँगी, आजस में कृष्ण वर्णके
पास नहीं पाऊंगी।
जिनमें कालापन है वे सभी एप समान होते ह उन सभीमें
ऐसा ही कपट भरा रहता है ॥१॥
पाणी रस्तूरीरी विदो नहीं मगाऊँगी, पारो राजसमो में
नहीं मांगी ॥२॥
काली कोयसा घम्य नहीं सुनूंगी कासे कोवैको वाणीको भून-
रूपमें नहीं मानूंमी ।।३।।
मीती साड़ी सपा कासी पम्मी नहीं धारण पलंगी। यमुनाके
कास जममें स्नाम भी नहीं कहेंगी ॥४॥
मरसत मगि तपा मपनी मोर दृष्टि नहीं चामे दूंगी। पयामवर्ण
के जामुन सपा मंगन भी नही पाऊँगी ॥५॥
प्यारे प्रियतमके मारेमें मुण्से तो मन यह मियम से मिया
है परन्तु मन पहता ह हि मे तो प्मके बिना एक पल भी नहीं
निभा सपता ॥६॥
कवि-भी माला- १३ पेरण पौसलही मो बाससरो! पेरण पई सागी , प्रगनी मार में of शोर करे? भातसो तारो त मन विचारने तुं मंगल काष्ठतमो कटको रणरसिये कोयो रंगघटको, मसो, त पर भाषणे शो कटको? मो बसिमडी! तमे कहानबर करा राजे, तुमघरतगा रस नित्य चावे, तु सो ममने पर्ग बह गये मो बाँसतो! ॥२॥ तं मोहममा मुखपर महाले तुम पिमा मापने नप चासे, तं तो शोषय पर अमने सासे मो पोसलरी ! ॥३॥ है तुमने पायो नव जाणती, महि तो तुन पर म्हेर न मागतो, तारी गल साहीने मूल ताणती, मो बांसलरी | ॥४॥ गया प्रोतमने पूरण प्यारी, तुने मसगी म मूके मुरारी, सारा मवगुण दोसे भारी ओ बांसप्तरी ।
-गगराती १३ वैरिन बाँसुरी ? री घाँसरी! तु प्रग-नारियोंकी दुश्मन बन बैठी है। क्या शोर मपाती है? पिस बासिकी तू है बरा मनमें मिपार सो पर। सू पगम पाठका टुकड़ा, रंगरसिएने तेरा रग घटक बना दिया । पस इसपर वेरा इतना मखरा ॥१॥ तुझे कम्हैया हापमें लिये रहता है तू निरय उनका अपरामृत पखती है। तू हमको बहुत दुख देती है, री यसरी ॥२॥ तू मोहनके मुखपर मोर उहावी है। तेरे विमा नामका नाम मही परता। री वौसरी सू सीत बनकर हमको सताती है ।।३।। मै तुझे ऐसी नहीं मानती पी वर्ना तुमपर दया नहीं करती। में तेरे मूसोंको गावाओं सहित उखाः नसी ॥४॥ दयारामके प्रियतममी तू बहुत प्यारी है। प्रभु तुप्त परा भी दूर नहीं रयते । री वाँसुरी! सेरे अवगुण मो मारी विवाई देते हैं ।।५।।
कवि-पी माता- १४ दोसतहीनो उत्तर मो प्रबमारो! मा माटे तु ममने मात पाये? पुष्प पूरबतणा, तेपो पातलियो ममने हार गये में पूरण तप साम्यो वममा, में टास्सरका बेदपा तनमा, स्मारे मोहने महेर माभी मनमा, मो प्रमनारी! ॥१॥ भोमारे पाचर रहती, पपी मेघमणी शरीर सहती, सुबएप का रिसमा नव रुहेती, मो प्रबमारी! ॥२॥ मारे मंरे बार बारिया, बसी है संपारे राबिया, ते पर मेर पापिया, मो असनारी ॥ स्यारे हरिए हाप करी सीधी सौ फोमा बिरामणि कीसी, रेह भी मई जंग रोधी ओ प्रमनारी ॥४॥ माटे स्याप्रीतमने ई प्यारो, निस्प मुबपी बारे मूरारि, अवगुष पीसे भारी! मो प्रबनारी ॥
४७ -गुगरा १५ बाँसुरीका ठा भो प्रमनारी ! तू मुझे दोप क्यों देती है ? मह सो पूर्व पर पुण्य है कि पासिया (एडा) प्रियतम मुझसे Bा पाता है। मने पनमें पूर्ण तपश्चर्या को है। सरीरसे सरदी-धूप । है। तभी तो, ए इनमारी मोहनने मुझपर रूपा की है ॥१॥ में चार महीमेतम सुलेमें रहकर पारीरपर मूसाधार मेरती रही है। हे प्रमनारी! में मनमें सुख-पुषी कोई पर नहीं करती पो ।।२।। मैंने मंगोंपर पाब एगवाए हैं उसे, पराद पर बढ़वाय वीर उसने या उसमें छेद छिदवाए है ।।३।। तन ता हरिने मुन्स (मुरलीका) हापमें उठाया है सबमें शिरोममि बनाया है। मैमे पूरी येह सौप दी तब मुमब मिरा ॥४॥ इमरिए म दयारामरे प्रीतमको अधिर प्यारी हूँ। मुरारी मपन मुगसे मुझे बजाते है। प्रजनारी ! इमीसिए मरे भ भी भारो है ॥२॥ ।
कृषि-भी माता-
१५ मारे मन मोह
म्हार मन मोह बाससमोने शम कामर काता,
है तो ऐसी पी, म्हारा परमा नपी यमतु म्हारा म्हासा (टेक)
अधर उपर पाने में सुणो अम्तर म्हाई मासे,
एहमो शम गगना गाये छे महार मन मोहप ॥१॥
ए बनमा ग्यारे पाये छे, मुने वाग सरीखी मागे छे,
मुने बिरहमी बेदना मागे छ
मन मोहप ॥२॥
हुँतो बोहोप्ता दोणी भूमी छु, पती बमता मधुरोमूती छ,
हा मुखबोई बोई फुसी छु महा मन मोहपु ॥३॥
एपे तपनो साथमा कीधी, हम्मे पाप्ताम्य करीबीपीछे
माटे याप्रीतमे कर सोपीछे म्हा मन मोह ॥४॥
-गुमरातो १५. मेरा मन मोह लिया पार कन्हैमाने बेसी-नादसे मेरा मन मोह लिया है। में तो पगरी हो गई हूँ। हे प्रिय मुसे मरे परमें बच्छा नहीं गया । बह दोनां मधरोंपर बन रही है। उसे सुनार मेरा हृदय सड़प उठता है। बरे, उसका धम गगनमें गूंज रहा है ॥१॥ पर वह बनमें बनती है तो मुम बाणकी तरह भेद देती है ॥२॥ समोरी आभाग मुनकर में दूध दुहते-दुहते दूहना भूल गई हूँ और मोमन करते-करते उठ गरी हुई हूँ। प्रियतम, तेरा मुख दव- देगकर म प्रसन्नतासे फूस उठी है ॥६॥ उस बसोने तप-साधना की है इसलिए गने उसे कपा-पात्र बना मिया है मौर इसीरिए दयारामक प्रियतमने उसे अपने हायमें पका है।
कवि-भीमासा-
१६ नमेरो नंदनी छोरी
ग्यप नबमो छोरोते ममेरो पयोमो,
मने एमासी मुकीने मपुरा पयो चो
पने मूको माता क्या मब अपनी नो,
मुने मान्ति परी छे एमा रुपनी बो
कोईए काम को फटकार्यों फरेबो,
हेम रोस एन मुग उपर मा ठरेमो
रसप सम्बेशो कहीने मेहेता भावगो को
सारेयाना प्रीतमने तेरोलापमोचो
-गुजराती
१६ निर्मोही नन्वका छोरा
उदगी यह नन्दका छोरा निर्मोही हो गया है। देवो तो वह
मुझे मकप्ती छोड़कर मपुरा पहा गया है ।।१।।
मन छोड़कर जाते समय उसके मनमें दया तक नहीं आई। इधर
मैं उसकेप, दीवानी हो गई है ।।२।।
क्या किसीने उसपर कोई जादू-टोना कर दिया है मा पिसीन फट
कार दिया है जिससे कि वह दूर-दूर फिता है ? उसका दिल मुमपर
क्यों नहीं ठहया ॥३॥
देया उसवगी, मेरा सम्देशा पहुँचाकर पस्दी आ जाना और
सापम दयाराम प्रीतमको भी वुसार ले आमा ॥४॥
दि-थी माता- ८२ १० सखी, हूं तो नाणती बे सबी, हे तो बागती दे सुबहो स्नेह मो। (टेक) माणु से प्रान परवा परमो मम्मि रखने भाषी रेहमा, पीग पामेरे, परोपयोग मारे, पागे एको कोई एहमा। समो. ॥१॥ प्य ने गुण साह तेमाचे, मे, मन माम्प मेहमा स्वाधीनने पराधीन करी नाच, नेह बिना पूह बल कोहमा । सपी ॥२॥ हेपी यहा (महा) ने महाप्लो विकलत्या, मुली मा मसे कोई बहमा, रयाना प्रीतम सरा समीप बसे तो भीगी फ मानना महमा ।
५
-मुबराती
१७ ससी में तो जानती थी
सदि। मैं तो मानती थी कि स्नेहमें मुख होगा।
मुझे क्या पता कि उसके कारण प्राण परपक्ष हो पाएंगे और सारी
देहमें म्यालाएं उठने ममगी। पीग हो रही है, फिर उससे दूर हटना
अन्छा नहीं एगता, इस प्रेममें कुछ ऐसा पादू है ॥१॥
निसका मन बिस सग गया यह नसीम स्प-गुण सब कुछ
देखता है। प्रेम स्वाधीनको पराधीन पर गसता है। सिगा स्नेहके
मसा यह सामग्रं पिसमें है? ॥२॥
यहाँ में दुःखी हूँ मौर प्रियतम वहाँ निरास है। हम दोनॉमसे
गोई मुम्बी मही है। दयारामके प्रियतम यदि हमेशा समीप रहें तो मैं
मानदवी बाम सदा भीगा करंगी ॥३॥
कपिम्धी मासा- CY १८ हाले तो पिसारी अमने मेहरा मो स्ववची, मासे तो बिसारी ममने मेहस्पो ममो हुं कहाय ? रास रमाटी, तेगेने तरघोग्या (टेक) पहेत म्हेसी प्रीत अमर्श कीधी, मुरमीमा एणे वश फरोसीयो पोपी सोने विकृत करी शेयी, यो ग्यपणी ॥१॥ प्रीतमयी तो करता पहेमी, प्रभु देखीमे पाई घेसी, पण मतो मोहन बमने मन मेसी, मो ग्यवनी ॥२॥ एने हंगना तोहरि तीर्घा, कान तो कामग कीयो, पेर घर बषी मखम पीर्घा मो उबपनी ॥३॥ एकागेकामण पासो, एनी मावस्मीनो छेचालो, प्रीतिवन्त प्रत पी निहालो भो ग्वनी पेसी बना तो कामनणामी, तेनी सापे हामी बहु तासी, एगे पाकीधा छे बनमाली, मो खपशी ॥४॥ ममे समिमीपानी सगे रमतां प्रब पन बममा पूंठस ममता, अमो मेमा सीमे मोजम मा मो उसममी मपुरामा नई एमे कंस रोस्यो, एक आंगसीये गोवर्धन तोल्यो सस्प पची अम्पादित पोस्यो यो खवमो वयारामना स्वामीने केहबो मपुरा मुको गोकुक्त रहेको सौ पोपिमाने परमन यो, ओ उखानी ॥७॥ 10 -गुमराती १८ प्रियतम तो हमको मुलाकर भला गया मा रखपगी प्रियतम तो हमको भुमार चछा गया। पहले तो समुत्रीदाएँ की बार फिर छाए निया, प्यारसे घुमार दुलार दिया । पाहम रमन हममे प्रीति को, मुरलीमें हमें ११ कर स्पिा मोर जिवनी गापियां पी उन्हें बिहस पर गता || प्रियतमने पहली प्रीति की तो में उस देवार गावठी हो गई। मोहन तब हमसे दिल दोसकर मिठा पा ॥२॥ अरे पन्हपान मेरा हृदय पुरा लिया है और हमपर जा कर दिया है। ओ उद्धवी उमने पर परमें दही-मक्खन चाया है ॥३॥ पह कन्या का पादूगर है। बाद सभी बावा खेल है। वह प्रेमीका मार का प्रमम देखता है irrit मोर पह गुम्बा मी बड़ी बादूगरनी है। उसके साथ प्रियतमका मि पहन रम गया ह। उसने बममामीको बागमें पर लिया है ॥२॥ यो उरी हम श्यामो साप पर पे। बजने पनोंमें उसके पोटे घूमा करते प । माजन भा हम साप-माप किया करते पे ॥६॥ विपतमन मपुरा कमको मा0 अगसी पर गोवर्धन दठाया। एमा बह मग्यापनी उम्प गाव कम बाग ह दर दयागमा स्वामामे कहना कि मपुरा छाा, गोकुसमें मारर यह नया सभी गापियामागोदान ॥८॥ 1७11 कबि-श्री मारमा 68 १९ प्रेमनी पीड़ा प्रेमनी पीयर से कोने कहिये हो ममुकर प्रेमली पीगते पातो मामी प्रीस मावा ग्राम जाये, झापना कयो साम्या हाप रे हो मकरः भने कहिले ते तो सर कहे मुष, पस्वापो पामीमे सही रहिये रे हो मकर० ॥२॥ धीमीये क्या रातरियस मतरमा, मित्रामा मप सहिये रे हो मपुकर० है ही धीमे हासो सुखमहि माहामे, पप समोवरप का यहा बाए रे, हो मधुकर हास्या पर सूम बीधु ए पामोररे, पैमी सोसणी सुगीने कातक पहिये रे हो मकर. भबसानो परामीण एक कस्पाये पण कहाँ पाए रे हो मका। स्मेहमी प्रमाणे धमो मरणपको माठो मुं करिये भारपा तेने बहिये रे, हो मकर। याप्रम् माने तो तो सब सुख पापे, मुमेर हर्ष ए मम्मवीने ये हो मधुकर यवार 11७11 E1
पुमराती
१९. प्रेमकी पीहा
-
रै मधुपर! प्रेमकी पीडाको किससे कहा बाय?
बब प्रीति हुनी तो कुछ मारम नहीं पड़ा, लेकिन बब वह माने
समी तो प्राग ही माने सगे। हायका किया तो भुगतना हो पठेगा ॥१॥
जिनसे कहती हूँ वे सभी मूर्व ठहराते हैं। मग मव पथ्याफर
सह सेनेके मसाबा क्या उपाय हो ॥२॥
रास-दिन बन्दर-ही-अन्दर पसे रहना मोर भूख तथा नींदको
यो बैठना घस यही वाकी बचा है ॥३॥
यहाँ में दुखी हूँ मौर उघर प्रियतम मुवमें मगन है। मत हम
दोनों समान स्पसे मुखनी पीससताना मनुभव नहीं कर पाते ।।४।।
इतना ही नहीं दामोदरने मरूपर नमक छिसका है। उस सौत
यसरीको बगात मुनकर कसेगा धधकता है ॥२॥
मरसा बग्म ही पराधीन है। हम रंक दूब रोते कलपते हैं, पर
कहो ना सकते हैं? ॥६॥
स्नेहको पलन तो मौसम भी म्यादा कठिन होती है। क्या करें
पा किया है उसको भुगतना हो परेमा ॥७॥
अब तो दयारामा प्रमु मा पाएँ तो तुरन्त सुन हो पाए।
मुझे इस मन्दगीक छारेने बहुत दुध दिया है ॥८॥
पक्मिी मामा- 55 २० प्रेम-परीक्षा परमाणे ॥२॥ स्वपन मम ध्यापै, सरपणी (मोअपनी)छे ममपी रे, वात (एस) ए प्रेमतपी, हो मम्मी मामे रे, बहेता मा भाये पपी ॥१॥ प्रसुतानी पोग ६ बमा ते ४ मा ? मा माये है मापाने वाधी रे, गुमाने पर्यु, माणे देनीमाने मय जाय का ॥३॥ पायसमा दुबमे रे, कामर ते तो पीछे एम मानी हे मही रे, रतिमी गति शी ॥४॥ मेम सपता मासे ६ प्रेम ज्यारे नि भावी २, ते उत्तर कम मापे ॥५॥ मामुकमा गुम मा , पई मामे छे तेने रे, सबर ते मप पसे ॥६॥ गर्नु वित्त मां बोगरे, तेने वेषी पुप पामे, स्थार शो में पदिनीमा रे, बहोर पावे साये १५७ रीत प्रीतमी एवो २ तेनु सुप से गणे, मनुमपनी मनाम्या ऐ सेना मवगुण स्नेह मुबपी मर गाये २, देसी बेम मने पसगो मेली , वे तो फरी का मटे ॥९॥ धोये सामने म माये रे, ग्राम पयत प्रेमतपी, नमी परतो २ एनी मेले माये बनी॥१०॥ प्रीत बामे तो सहन ६ फूटे ना पछी छोरी, माछने इच रे छे , पल्या पछी मकोडी ॥११॥ माने 11 सराती २० प्रेम-परीधा है उसयों ! यह प्रेमका बात ही निराणह। म काम नहीं कहा जा सया, हाई वनुभदा ही मान साता है ॥१॥ प्रभूशाको पीसा बौम स्त्री कंस पान सरनी है। इमर पहने मारम टमस मनुभव गम किया जा सकता है? ॥२|| जिम प्रकार मंगा पार साए मपरा मपना दय का मनमें मर पुछ गाना हुए भी यह मरेम कह नहीं सकता, मी हा बात हमारी हा पम्ममा दुख पायर मसा क्या जान ? इमा प्ररार मानी(योगी) मह नही बान सकता कि रविकी गति (भाना) पाह?1101 पर प्रेम पाप्त हो जाता है र मार नियम नरहर पाव है। रिस निग्रा मा रही है मह ममा उत्तर किस प्रकार दे सरता ? वाभिक सपने माभूगमें सब रूपमार गुम एकता है किन्तु मे नम्हे एक दूसरे स्प-सुप दिनाई देते हैं. से दूसरा महीन माता ।।६।। निसका रिसविसमें गम मया है उस रसीसे सुख मिलता है । अनि- में मकाईमारहे? फिर भी पकार उस वा प्रयस खाता है ॥७॥ प्रीतिकी रीति ही एसी होती है। उसका मुन प्रमी ही पानवे है। पिसको प्रमका बनुनबमहीं है, से शा रस घामुणही नगर माते है स्नेह नशा मुषस दाता है, न बसे घटता है । मिस प्रकार वृक्ष सिटी सि उससे दूर नहीं होती, उसा तरह प्रेम भी नहीं टूटता ॥९॥ हेटदद ! प्रेमको पात सावन और मुम्नेसे नहीं पाती। इसमें कुछ करनेडी बापापाता महीं होती। वह वामपन यापही या पाती है॥१०॥ प्रीति होती ठो बहना है किन गादमें बह छगनपर भी नहीं एटसी। निपर बानेडे गाव ही कांग मध्ठीको Tam....
कवि-भी मासा-
८९
२० प्रेम-परीशा
स्वपन
ध्यापे,
उत्पनी (ओघवजी) मतगीरे, पात (एक) ए मेमसणी,
कोई मनुमयी नामे रे, कहता ना माये बनी ॥१॥
प्रसुतामी पोग रे, बसा है शं माने ?
फेम आवे रे, माण्याने
परमाणे ॥२॥
साकर बाधी
रे, गुंगाने
पयु,
मम माणे दे बोजाने नव नाय रहए ॥३॥
पामलना
रे, कापर ते तो प्रोणे,
एम सामी नहे महीं रे, रतिनी गति झो ॥
मेम सपला मासे दे प्रेम पारे
मित्रा
मापी
रे, ते रत्तर कैम मापे ।।।।
बापाक माशुका २ रुप
गुण सह
भासे से तेने २ अपर तेई नव पेसे ॥६॥
बेन चिस्स या बोट' रे, तेने तेपो पुरा पाये,
स्वार झो के अग्निीमा २ चकोर माये
बाये ॥७॥
प्रीतमी
एबी ऐ तेर्नु सुर ते जाने,
मनुमवपी मबाप्पा तेना मवगुण मापे ॥८॥
स्मेह मुखपी मब वाये रे, देसी व मब पटे,
मेम सुतमे बसपी देतो , ते तो फरी नो लटे ॥९॥
पीजे सामसे न माने ६ उखब। परत प्रेमतपी,
मपी परतो रे, एनी मेसे माये बणी ॥१०॥
प्राप्त
बामे तो सहन से छूटे मां पछी छोगे,
मन्डने गुसरे छे २ मस्या
पछी कोरी ॥११॥
८९ -बराती २० प्रेम-परीक्षा हे च्यवनी! यह प्रमको पात ही निराला ह। उन वानीमे नहीं कहा जा सकता का अनुभवी ही जान मुकता ह॥१॥ प्रसूताको पीसका वाम स्त्री कसे जान सकती है। नरक कहने मात्रम सका बनुनब मे किया ना माना ह? ॥२॥ जिस प्रकार गंगा कराए मपया मपना वोठा मनमें सब कुछ जानत हुए भी वह इनग्न कह नहीं सकता, वैसा ही वात हमारी है ।।। भापठका कापर मग क्या मान भी प्रकार मानी (मागी) यह नहीं रान मकता कि रतिको मति (मानद) का है ? जब प्रम पाप्त हा दावा है तब मार नियम नष्ट हा जा है। जिम निद्रा भा रही है वह भनागर किन प्रकार दे सकता ह॥॥ धानिक वपन मागफनें सवरूप बौर मुगदेखता है किन्नु पैसे टन् एक दूसरफ सप-गा दिवाइयत ह म इसरा नहीं देख सकता ॥६॥ जिममा चित्त पिसमें रम गया है टम न्मी मुख मिलता है। अग्नि- में मरा फाईबाव है? फिर मी चकोर -मबाप्रमस खाता है ।।७।। प्रीतिको रीति ही एमी हाती है। उसमा नुन प्रमी ही जानते हैं। जिमका प्रमका मनुनप नहीं है मेतो टममें अगमप ही नगरमा है ।।८।। म्नह मता मुखम माना है न ममे घटता है। जिस प्रकार गुलमें टिपटी ईनसिसमे दूर नहीं हाती -मी तरह प्रेम मी नहीं छूटता ॥९॥ हन्यव! प्रेमका पदवि मीलने वीर मुननस नहीं आती। इसमें पृष्ठ करनेकी एयरा नहीं हाली । महमा अपने सापहा आती है। प्रीति हाती तो महल है मेकिन बाद बहानपर भी नहीं छूटदी। निगम जानके बाद ही कोटा मछठीका दुत दवा है॥
बि-भी मासा ९. पाय पत, राग पाय साची प्रत तो प्राण से रे, साधारण रापुर बस बिन बीचे 2 मार्ग तो बाय मरी ॥१२॥ मोटी ममनी मोहमी २ प्रीत पी बीनी , मले, बुओ, सोई में चमक ने ऐसी बसे ॥१३॥ छीप छे छे सामरमा रे, इछा स्वाति मुरतणी भुमो दृष्टि पकोरनी रे, अचस हे छे इमुमगी ॥१४॥ सरमा सुधबुध सामग्य रे, प्रेमी बनमा म टके मधुकर बांस कोरे ये कमा मव मेडी क्षले ॥१॥ मृग सहेने मरे में रे, पलायन मम्यासी, मनुराग पाशे रे, बंधायो म के मासी ॥१६॥ दृष्टिः प्रीतनो मार्यो रे, पतप रोपकर्मा बसे, प्राण पोतानो रे तोये स्नेहीमे रे महे ॥१७॥ तरस्यो २ सरा मास पार सगो, पोए स्वातीमु पारि रे, मवर स्पर्श म ग्मी ॥१८॥ विपना व्यसनीमे रे, ममृत पण सुख ना करे, पय पाणी पी उत्तम ८ मोन तेमा मासे मरे ॥१९॥ बेनुं मन में माम्प रे, तेने सुत तेपी मते, ते दिला तेमी सार २, ना माने तेनी मोर तसे ॥२०॥ पैराटमा सोचा 2 पनु भानु मेरे को, घमे २ से रपि मेह पस्मो ॥२१॥ कछे यमगो न छूटे ने ए प्रेमतणी काची (कामो) होय तो सूटे रे, सुणी चमनी हाँसो ॥२२॥ छे मगम पप स्महनो रे, मोधपयो। मपी पीठो, त्या सगी मान गोठे रे, योग पम ताणे मीठो ॥२३॥ करमाप फोसी,
-
-गुनाती
सम्पी प्रीति प्राण ले लेती है, किन्तु आसानीसे छूटती नहीं।
मेरक बिना पानीके भी सकता है, किन्तु मछलियां मर पाती हैं ॥१२॥
ममकी मोहिनी गहन होती है। प्रीतिकी समानता दूसरेसे नहीं की
पाती। सोहेकी भरता भी चुम्बरको देवकर सिंचन लगती है ॥१३॥
सागरमें रहते हुए भी सोप स्वाति मूंदको इच्छा करती है।
यो पकोरको, उसको वृष्टि चन्द्रमाकी बोर मचल रहती है ॥१४॥
प्रेमी पन, सम्या सुध-बुध और सामर्थ्य नहीं टिकता। भौरा
गौसको छेद देता है, किम्सु क्मसको मही छेद पाता ॥१५॥
मागनेमें प्रवीण मृग रागके अनुरागमें बंधकर भाग नहीं सकता
मपितु अपना प्राण वासानीसे दे देता है ॥१६॥
प्रीतिसे आहत पसग दीपक बस पासाह। अपना प्राण देकर
भी यह प्रेमीसे पाकर मिस्ता है ।।१७॥
पातक वारहों महीमे प्यासा रहता है। यह स्वातिका ही पानी
पीता है। विचलित होकर बह दूसरे पसमा सर्च नहीं करता ।।१८।।
विषका म्पसनी अमृतसे भी सुब महीं पाता । यद्यपि दूष
पानीसे
उत्तम है, पिस्तु मएमी दूधमें परफर अपमा प्राण छोर देती है ।।१९।।
मिसका मन बिससे लगता है, उसे उसीसे सुध मिसता है। उसके
सिवाय उसे उससे मन्त्री बस्तु भी नहीं सुहाती ॥२०॥
इस मिराटचन्द्र-सूर्य दो लोपन है। उनमें क्या मेव है किन्तु कमस
पन्द्रमासे मुरझाता है औरस्नेह के कारण सूपको देखकर फूल उठता है।।२१॥
प्रेमकी यह फांसी काठमें छगनेपर छूती नहीं। हाँ यदि वह
कानी हो तो भगतके उपहाससे टूट पाएगी ।।२२।।
स्मेहका रास्ता मगम्य है । हे उसर तुमने उसे अब तक नहीं देखा
तब तक हो तुम्हें शान पसन्द आएगा मौर योग मोठा मगेगा ॥२॥
कदि-मी मासा- बोग तो तेने बोईए ऐ मेनें मन बगर्मा ममे, ते तो मस अमार दे चित्त रसियामा रमे |॥२४॥ मन मामे दे, जोग ते सुसे प्रहो, ममो तो एह मार्ग रे, प्रीतमयीशुं प्रोत हो ।।२।। तमारा हरि सममे अमारा तो एक (ब) स्वसे, तमो रीमा बारमे , ममो रो पर ममे ॥२६॥ अमुने मयतोकी २ बरोन हरे, से प्रकासने पेशी रे, कहो सु सतोप घरे ॥२७॥ एमा बम सुप्पीमे २, ओपबमी भाति की, योग बनात पुटी रे, पर्प मम स्नेहे मसी ॥२॥ मभिमाम मूकीमे ३ ष गोपी पाय पापा, मई (कहप) बमा प्रतिमनी रे, निाचे मेक तमने पापा ।।२९।।
-
गुजराती
निसका मनषगमें मटक्या रहता है उसको हो योगकी आवश्यकता है।
रामन तो मचल है वह सदा अपने रसीले रुप्ममें रममाण है ।।२४॥
मिसका मन योग, फगता हो वह मुझसे उसे ग्रहण करे। हमारी
मही याचना है कि प्रियतमसे प्रोति मनी रहे ।।२।।
सुम्हारा भगवान तो सर्वत्र है, किन्तु हमारा एक ही स्थानपर है । तुम
दनीको पाकर रीझते हो किन्तु हम तो चन्द्र पाकर खुश होती है ॥२६॥
मय पकोरका मन चन्द्रमाको देखकर ही स्पिर होता है व मला
इ अन्य किसीक प्रकासको देखकर क्या सन्तोप धारण करेगा ॥२७॥
ऐसे वचम मुनगर उववजीकी प्राम्ति दूर हो गई योगमा पनाम
ट मया मौर मन स्नहसे मर उठा ।।२८।।
उबवणी अभिमान छोरकर गोपियों के परपोमें जा परे मोर कहने
गे कि दयाराम प्रियतम निश्चयपूर्वक अकेले तुम्हें ही मिले हैं ॥२९॥
कवि-भी मासा--
१४
२१ उपपजी, विचारो रे !
उधमनी विधारो मम्तर मापणे,
पण समचे सो देवी रे मोब
बोवा कर कंकण मोईए भीर मारसी,
होय विचार तो पाप्ते परोष रखवयोगटेका
तमारो तो हरि म्यापक सर्वच छ,
स्पारे कोहो अधिक ने बोण काह,
नित रठी माईना एशोर करो प्या,
गट' छ मषुपुरी माह ? उपपबी० ॥१॥
मामर छे सोमी गम्ध कमत ने केतकी,
पर पको साये में सुपन्धी प्रही पाय,
तेटमेपी हम रम्मत म बस्तु होय तो,
शिबने घेराम शीव कष्टका बाम? उपवबी०॥२॥
रमे विशा रियो चोत मुतनो,
पण ज्या मगी मनने मोपे बम्ब,
सागर मोगरिक फूले तो फूल्यो,
पण चित्त चकोरने न उपमे मानन्द
उपपत्री० ॥३॥
विचारो तो मलने सेहेन र रुपनी,
कोण जाणे बरन अपुने पार,
प्यापकमो सामे करी कहो को बासरी,
पातरी विमा ते श्री सुननी हेर? उघबनी.in
स्पार सगी बयाना प्रीतम ममी बोसस्या,
ज्यार रूपी सत्य मपो साकार,
रप रस प्रेमनी पोग ते स्यारे प्रौषशो,
मनुभव पाशे मोघम कोई बार
पनमो० ॥५॥
५ -गुमराती २१ तमजी, जरा सोचिस्ता उदगी ! सपने दिसमें विपार तो परा। बिना समझे क्यों सीख देसे हो? हाप कगनक लिए बारसोकी क्या आवश्यकता है? यदि सोचनेकी शक्ति हो तो उसे अपने पास ही देखो। तुम्हारा हरी तो सर्वत्र म्यापर है न ? उसक सिए कहीं कम और कही म्यावा तो नहीं है? तब फिर वह हररोज पाता हूँ गाता हूँ' एसा क्यों कहता है ? मधुपुरीमें ऐसा क्या गग पग है? ॥१॥ प्रमर कमस और केतकीको मुगघका लोभी है न? यह सुगन्ध वायु पूरसे दोकर से पाती है। पर उससे उसका हृदय वृप्त नहीं होता। इसीलिए यह कटोंमें पाकर फंसता है। ॥२॥ दो रिणाओंमें पन्द्रमी दिनी फल गई। जय तक वापसोंकी आइमें पारा छिपा हुवा है तब तक सागर कुमुदिनि आदि मछे हो फूलें परन्तु पकोरफे वयमें वानम्र उत्पन्न नहीं होता ।।३।। सोपनेपर मासूम होगा कि मनका सहा विचार स्पके पीछे रहता है। लेकिन न मासम तुम्हें क्यों मुबो मौर दहसे दुश्मनी है ? यतामो तो पापा के साप घिसने बात की है ? विना पात पिए सुसकी छहर मासे ॥४॥ पब तक सत्य साकार नहीं होता तब तक दयारामके प्रीतमको नहीं पहनाना जा सकता। स्वमती ! सब तुम्हें इसका कमी प्रमाण होगा तभी तुम इस साफार ईश्वरके प-रस-प्रेमको विरह पीडाको पहिवाम पामोगे ।।५।।
कषि-मी माता- १२. प्रेमरस में कोई प्रेममा मबतरे प्रेम रस तेमा सरमा हरे सिंहम के पूष होम ते, सिंहम सुसने बरे, समकमान पाचे सह बस्तु फोरीने मीसरे प्रेमरस ॥१॥ सस्करसोरम सक्कर जीवन, रना प्राण महरे, मार सिंषुमु माउस ग्यम मोठा जसमा मरे प्रेमरस ॥२॥ सोमवेसी रसपान शुख साह्मण होप ते करे बगरू सीने बमन हरा, बवाणी म्वर प्रेमरस । सक्षम पस्तु अभिचार पिता मतापि अर्प मा सरे, मत्समोगी बमलो मुस्ताफा देवी मा मरे, प्रेमरस ॥४॥ एम कादि साधमे प्रेम बिना पुश्पोरतम मूठ मा परे, पमा प्रोतम भीगोवर्धमपर, प्रेममक्तिये बरे, प्रेमरस | २७ -गुजराती २२ प्रेमरस यो प्रेमका यश लेकर अवतीर्ण हुए है, प्रेमरस उन्हींके हदयमें स्थिर रह सकता है। सिंहनीका घ सिंहनी के पुत्रको ही हजम हो सपाता है। केवल समपात्रके सिमा वह (दूध) और किसीमें नहीं रखा बा सकता दूसरी धातुर्मोके पात्रों को फोरकर यह बाहर बह निक्षमता है ॥१॥ समकरसोरका मोवम ही क्षक्कर है परन्तु वही (शमकर) गधेका प्राम हर लेती है। उसी तरह सारे सागरमें रहनेवाला मस्स्म मीठे प्रम परकर मर जाता है।॥२॥ सोमलताका रमपान शुर व्राह्मण ही कर सकता है । यदि वर्ण वकर उसका पान करे तो यह वमनके द्वारा निपल भाता है , देव वामी कहती है ।।३।। उत्तम यस्तु अधिकारके बिना प्राप्त हो मी माय तो उसका कोई वर्ष नहीं। मछली पानेवासा पगमा मोतियोंको देख लेनेपर मी उमसे वपनी बर्बोच नहीं भरता ।।४।। इसी प्रकार, चाहे करोड़ों साधनाएँ क्यों न की पाएँ, परन्तु धिमा प्रेमके पुरुषोत्तम भगवाम वर्धन महीं देते। दयायम कहते है कि गोगर्वन धारी प्रीतम भगवान कृष्ण प्रेम भक्तिसे ही बरे पा सकते हैं ॥५॥ क. पथराती दक कवि-मी माता- एक्ष लोचन मननो मृगतो लोचन मननो सगरो होधन मननो, रसिया तेबमनो केमगोहोचम मननो ? प्रत प्रपम होणे करी ममगरमी साम मम कहे कोपन करी, लोबम कहे वारे हाप माहोलोचन० ॥१॥ मरमर मिरस्या मेन ते, मुष भाम्प दुम भाग पछी बधाम्यं मुमने, ममम तयारी माग गरोसोधन २। सुन पन है पगित माहार्द बाहन, निगम मगम कप सांभस्म, गोठा विना गरें मन? सगे सोचनः ॥३॥ भे कराप्यो में सने, सुपर पर सबोग, मने तबी नित मरे, ई र बिनोय. मागे कारन ॥४॥ बनमा बहातानी कने, बसु ई मुम्म मेन, पम तुजन मव मेतये । म भोगई म सगर्गसोचन० ११॥ ऐन मपी मन कपम तने मेरे श्याम अरोर, पुष माहार बामे जमता राम पिस पहे भीर मगरोलोचन० ॥६॥ मम कहे धीरे धूप प्रगट स्पा होय, ते तुमने कागे रे, मयन, तेहपकी तुं रोप भगगेसोचम०७॥ एरोह माया बुद्धि कमे, तेथे पुरुप्पो म्पाय, मम होचमनो मानत. मोचन मनकाय प्रपोझोपन मुखपी सुबगुपचपी, मम सोधन ए रमते, या प्रोलम दीकोपी प्रीत अपोशोधना॥९ ११ -गुजराती रह लोधन-मनका अगला यह तो मयन और ममका मगरा है। रसिक मनके लोचम नौर मनका यह मगग है। नन्यवरके साप प्रीति पहले किसने की ? मन कहता है कि सोमन! तूने पहमे प्रीति की मार सोनन कहता है कि वो कुछ किया तेरे साप रहकर किया ॥१॥ मन कहता है कि मयन! तूने नटवरको पेशा और तुझे सूब मिमा । बादमें तूने मुझे यहाँ बंधा दिया और अम्बर प्रेमकी आम मड़का दो।।२॥ व ! सुन में तो अपंग है। तू मेरा पाहन ह। अगम मिमममें क्या कहीं सुना है कि विना देखे मन कहीं गया हो? ॥३॥ मेरा उपकार है कि मेमे सुन्दर परके साप तेरा सयोग करा दिया। तू मुझे छोड़कर उससे निरप मिसता है और घर में वियोमो कारण वी रहता हूँ ॥ सून में तो बनमें प्रियतमके पास बसता मेकिन तुमे प्रियतमसे बिमा मिठाए मुझे पैन मही परती ॥५॥ मयन कहता है - मन, सू नित्य श्याम घरीरसे (नन्दवरणी) से भेंटता है फिर भी तुझे चैन नहीं है । ऐसा कैसे हो सकता है ? मेरा दुध तो बयत पानता है मेरे आंसू रातदिन बहते रहवे हैं ॥६॥ मन कहता है –मेरा हृदय बम्ला रहसा है। उससे मो ष्षी उठता है, हे नयन वही तुझे मगता है मौर उसीसे तू रोता है ॥७॥ तब दोनों पुरिने पास पाए मार उसने याय दिया । तू लोचनका प्राण है मौर सोपम तू मनकी काया है ॥८॥ सुखसे सुपी होना मौर वु खसे दुखी-मन मार सोचनती यही रीति है। रयाराम प्रीतम श्रीकृष्णको दोनों ही बहुत प्यार करते हैं ।।९।। दु मयन । मन कवि-मी माता- २४ निपपेनो महेल निघेना महेसमां, बसे मारो बहातमो, बसे प्रयातामो, मेरे नाय ते सांची पामे है मूस्या ममे से बीमा सदनमा शोभे रे, हरि मा मसे ठामे रे निरचे ॥१॥ सतसम रेममा भक्ति मगर छे , प्रेमनी पोत पूछी हे ताप पोतीमाने मती मोहोते पेसगोरे सेवा सीगे पठी , मेतो बाबो रे, निश्चे० ॥२॥ वीमता-पानमा, मममणि मूको मे, भेट भगवन्तबीने है भाव पु भाव मोछावर करीने, भौमिरिघरवर तमो बरखो रे निरपे० ॥३॥ एरे मणामने मुम हरि ठिा रे, कृपा सिद्धि मा पाय रे, पण मी वाम शरण पकी सह पो सेहेस रे, बो प्रति मो पाये रे निचे in
-गुजराती
२४ निएचयका महत
मेरा बासम दूर निश्चयके महल में निवास करता है। वहीं रहवा
है सब काला! जो वहाँ उसके पास पाता है उसे उसके दर्शन होते
है। मो भूले हुए हैं वे उसकी बोपमें दूसरे सदोंमें भटकते रहते हैं।
किन्तु हरि उन्हें एक भी मगह नहीं मिलता ।।१।।
सत्संग मामय देश भक्ति नामका नगर है। उसमें
माकर प्रेमकी गली पूछना। परम-ताप-रूपी पहरेदारसे मिमकर
महलमें घुसना और सेवा रूपी सीडीपर पाकर मजदीक पहुंप
खाना ॥२॥
फिर पीनवाके पात्र अपने मनकी ममिको रखकर उसे भगवानदी
मेंट चरा देना। मह तुपा पमण भावोंको यौडावरकर तुम
श्री गिरिधरको परण करमा ॥३॥
हरिकी म प्रत्येक कार्यारम्मका आधार है। उनकी कपा
बिना सिदि नहीं मिस्ती । फेकिन श्री पाकमकी परिणमें गानेसे
सब बातें सरस हो जाती है , भक्तपनोंके लिए प्याराम गाता
है ॥४॥
कवि-भी माला- १०२ २५. मारु हणकतुं डोर माव पकात पर रगड़े छे सह मप्रमा, सीम पेतर पहुं कोई न मूके, मा पार्नु माय स्याहा, ना साधुवाय ते, रव, मिल्प तेहेमा म के मार. (टेक) पाती का घेर ने गोतुं माई गस्प, सीतुं मीरंछ पण ते न सूपे, पेसा रामो घास कयह कुसका, मार बाई में पन तेज गे भा॥१॥ हेग्सो होरेरगे मारो माग्यो नहीं, मयु हरस्य, हावांतो हर्यो, वस मारे मषी तरपि मा कहार्प, माटे एंएं भयमीत चितानो मार्यों मार• ॥२।। हे गुर! हे गोपात! में मरप्पं ए बापने, वा करी राों मिल पासे माणु साधुप परिवादी वृम्पावन बारमो, सेझ मारा उसे पाप कार्ग मा० ॥३॥ हे हपिकेश एककेस भुग मन्तन तमा, आप टातो, करो शु साई, स्मरण सेवन बने महर्निश मापर्नु, अपत मानव मागे, एह ना मा. Iri मन मसि बगरता सव काई गरिएं, रघु बहु मापनी! या बाणो, मम पाना प्रीतम श्री गोवर्धनमरण, करणारप्टे चुमो, निन नो बानो मा० ॥
-३
गुगराती
२५ मेरा मापारा होर
मेरा आवारा हर सारे नगरमें भटकता है। जमल खेत
मिहान पिसीको महीं छोड़ता। वहां नहीं पाना चाहिए वहां पाता है
जो चीर नहीं बानी पाहिए, खाता है। वह नित्यका भटकना
ही छोड़ता।
उसे घेर पारपर पर मावा है मौर मीठी पी तानेको देता हूँ।
-किन वह हरे चारे सकयो भी नहीं संपता। मारनेपर भी वह पासमा
करव और मूसा वाता है ॥१॥
1
रोक्ने पामनेपर भी मेरी बात नहीं मामता। ऐसा आवारा
हो गया है वह ! अब तो मैं हार गया हूँ। वह मेरे वध नहीं पाता
पर महलाता मेरा ही है। इसलिए मैं चिन्ताके मारे भयभीत
रहता हूँ ।।२।।
हे गुरु ! हे गोपाल ! मैंने इसे आपको अपित कर दिया है। मैं
चाहता हूं कि आप इसे अपने वश करके अपने ही पास रखिए। इसे
साधुत्वकी शिक्षा देकर बम्बावनमें पराइए, जिससे मेरा कष्ट दूर हो
माए। में आपके पैरों पड़ता हूँ॥३॥
हे पीकेच मेरे मन-उनके इस क्लेसको दूर करो इसे
सुख और सल्ला वनामो। रात दिन आपका स्मरण सेवन होता
रहे मौर नसीम मचा आनम्दकी अनुभूति हो-पही मरी
प्रार्थना है l
मनके मिस हो पानेसे सब कुछ विमा मासा है इसलिए है
नाप बहुत पर मगता है। अपने दास पर दया कीथिए। हे दमारामके
प्रियतम गोवर्धनधारी भगवान परुण दृष्टिसे मेरी बोर निहारिए।
मुझे मपना ही मानिए ॥५॥
१०४
कषि-श्री माता-
२६ मदकता मया रे
मटका भवमा २ गया काह कोटि वही,
हर पीछे हावा रे, राखो हरि हाप प्रही ॥टेक।।
माम्यो शरण पितापमो गाम्यो, शीतम की श्याम,
करगरीक एहन पानिधि! राबोचरम सुखधाम,
पापा कटाक्षे रे, किस्विप कोप ही
भटकती॥१॥
बो मारा
एत समु बोसो तो ठरशे बराबरी,
एन गुंमा कयम होप समतोल, तो रफ मे तमे हरि,
माटे मम मोई रे, करो मुमे एक सही मटका० ॥२॥
माशा भर्यो माग्यो मबिनासी, समर्थ सही तम पास
धम पुरग्धर तम हारेपी हम मा निराम,
मिवनो करी तोरे मा" तो मुने कहेगो नहीं भटकता० ॥३॥
अरले सामसो मनाप बन-भी प्रबणे मी रणछोर,
एक बार सम्मुख मुमो शामसा पहोंचे मनना कोर,
इसी में बोलायो ६ पी तुं तो मारोही मटकता.॥४॥
-गुजराती २६ मवमें मदको इस संसारमें भटकते हुए करोड़ों मुग बीत गए। अब इसमी हद हो गई। हे हरि हाप पकाकर रक्षा करो। हे पयाम में पितापका बसा हुआ तुम्हारी परण वाया हूँ मुझे मीठछ करो।कृपानिधि कृष्ण ! हाय बोडकर कहता हूँ बापमपने सुखधाम परणोंमें मुझे स्थान वो। पाप करुणाकटाससे पापोका काप पस पाता है ॥१॥ परि मेरी करनीकी पोर देवोमे तो यह मुमसे वरावरो करना होगा।रस्न कौर पुषीकी तुलमा केसी ? मैं सो रफ हूँ मौर तुम भगवान हो। इसलिए मुन जैसे रमको अपनाकर उदार बनो ॥२॥ हे अविनाशी | में समर्थ देखकर आपके पास बामा लेकर पापा हूँ। हे धर्म धुरन्धर ! मैं तुम्हारे द्वारसे निराध केस वापस पाऊँ ? तुम मुझे अपना हो। ना तो कहना ही मत ॥३॥ श्री रगोर विपने कानसे मुसवमार पनकी प्रार्थना मुन सो। हे श्याम! एक वार मेरी मोर देश को मनके अरमान पूरे हो पाएँ । 'दयाराम तू मेरा है -पू कहकर हेसार पुमायो न! | कश्मिी माता १०६ - मूकपा मा मारे मत समे मलबेला, मुमने मूकमो मा, मारा मनमोहमपी छेसा अबसर कक्षो मा हरि! वेबो सेबो तमारो, मुममे मूकशो मा भोपुर साप्पो सम्मम्म विचारो, अबसर पूसो मा 1॥२॥ मारा रोप कोप समारी मुबने मूकपणे मा, धारणागतवत्सस गिरिधारी, मबसर एकमो मा 11 हरि मारे धर्म मपी काई सायन, मुबने मूगशो मा, मपो मसंग स्मरण माराम, अबसर फो मा ru ॥५॥ भीपति सस्मिा सर्वोत्तम मुमने मूकमो मा, मारा प्राणनीयम पुस्पोरतम, अक्सर शो मा समम कपमासिभ मीची, पामे मूकमो मा, मारे मोप नदी कोई बीवी, अबसर भूकमो मा un
गयराती
२७ छोड न देना
मेरे पलवले प्रमु' मने यन्त समय छोड़ न देना। मेरे मदन-
नजी, बन्तिम अवसरपर चाना नहीं ॥१॥
हेहरि ! मैं जैसा हूँ तरा ही है। मुझे छाए न देना। पी गुस्ने
आपको सौपा है इस सम्बचपर विचार करना और मवमर मत
पाना ॥२॥
मेरे दोपोंके समूहको याद करके मुझे छोर न देना। हे गरणागत-
8 गिरधारी अवसर पूष मत पाना ॥३॥
हे हरि। मरे पास धर्म-गर्मका कोई साघम नहीं है मुझे छोर
देना। मैने सरसग स्मरण पाराधन कुछ महीं किया है। इसलिए,
सर मत पूक जामा ॥४॥
हे श्रीपति सस्मिा सर्वोत्तम मुझे डोर न देना। मरे प्राण-
बन पुरुपोत्तम मबसर पूकना मत ॥४॥
समर्ष करणासिम्छु, भीगी! ययायमका छोरना नहीं। मरा
गई दूसरा सहारा नहीं है, इसलिए अबसर मत पुकाना ॥६॥
कवि-मी माता- १०॥ २८ मननी मुसाफर ने ममबी। मुसाफर रे|| पाठोने मिव देश भणी, मुलक पमा भोपा २ मुसाहरी पीछे भी (रेक) स्वपुर बबामो पम्प मापी , रपे भूसता भाई फरीने मा मारग मसको छे नहीं, एपी भवसाई, मादे समनी सुधारो, मो मोमो गया के बमची वी पासीमा पर मारबामे, बेठा छ बार, मारे बसावा राबोरेम, स्पारे तेनो महाँ माप मस्पो एक र ६ बाताबी गति सौ ते तपी ॥२॥ माम यहोरस्ते पहोरी क्षेठमा नाममो, रेया मावाय मटकाय, मापणो करता बोधम माये, कागे पापीको चाप मारे एटका साद रे, मो पाई महोत्तमा यमी. बोबो भूपत करीने बाई, करदो सम्मामाने काम, रास याने एम पुरे ,हावा पाए पोताने घाम सुझे में हाबी एवंदे मगध प मापनी
गुबराती
२८
मन मुसाफिरको
रे मन | यो मुसाफिर !! अपने देशकी बोर भलो म!
अब तक कई मुस्क पेव राठे महम्-सी मुसाफिरी हो गई।
अपने मगरका रास्ता पा गया है यह भूल न माना। फिर-
फिर यह मार्ग महीं मिलेगा। इसलिए सोच-समझकर ठीक-ठीक पतो।
पाएँ-बाएं मत देखो ॥१॥
रास्तेमें गो-पार पटमार बैठे हुए है अव सापर्मे दो-तीन रक्षक
ले लो। फिर इन बटमारोंगी कोई मिसात महीं। एक मेविया मिल गया
है जिसने उन सबकी गतिविधिका परिचय दे दिया है ।।२।।
।
मो कुछ परीदो बह सेठके मामसे परीपो पाकि कहीं रकापट न
माए। अपना कहनमें पोखिम है, पुगीवालेका दाम एम सकता है।
इसलिए बरीवके मालिक मत बनना ॥३॥
ध्यान रखना कि गुगत फरसे तरकीबसे जाना है, इसलिए सम्हसकर
काम करना । वास दयारामको यह सूझ रहा है कि अब अपने धाम पहना
चाहिए। ऐसा फगता है कि मपनी मवधि पूरी हो गई है ॥४॥
कवि-भी मासा-
२२. ताशी जन
1
तादृशी मन तेने पाणीए रे मेमा एका गुप होय रे,
निदास्तुति ना करे कोईनी, समले समष्टे बोय रे। (क)
वाम करता मात्र मा रे, भूताये प्रपम्बर्नु भाम रे,
स्मरण करावे मी पणन, मसारे अप मशाम रे. ताशो ॥१॥
सकस बराचरमे बिषे रे, यस्या देखे भयवान रे
मम इमो सरब मगतम, श नहीं मभिमान रे तादृशी ॥२॥
म गाता गोविरमा रे, पुतकित तनु पाय रे,
मेरे प्रवाह बहे प्रेममा, हराय धाय रे ताशी ॥३॥
परएचे पाले म रे, करे कोईनो नां द्रोह २.
इनिमित साधा सरा, मापामे माया मोहरे तादृशो .in
अकस सीमा मरसासमी २ तेमा सम्म बेनु मन रे,
प्रीत बहु पर उपकारमा, सा प्रप्सन बम रे तामी ॥५॥
मटबर सहके मेगा रे, काम्ति कामामय होय रे,
नाम्त स्वभाव सतोप बहु, गोप कोईमा न मोयरे ताशी ॥६॥
-गुमराती
२९. प्रमुमय
उसे ही प्रमुमय मानना पाहिए जिसमें ये गुण हों वह क्सिीकी
मन्दा-स्तुति नहीं करता है, सर्व समदृष्टिसे देवता है।
उसके दर्शन-मानसे सभी प्रपञ्च भूल जाते हैं श्रीकृष्णा
-मरण होने एगता है तथा पाप और ममान नष्ट हो मावे
यह समस्त पराघरोंमें भगवानको उपस्थित मानता ह और सम्पूर्ण
बगतके पुम की एन्छा करता है उसमें अभिमान हेत मात्र भी महीं
रहवा ॥२॥
गोविन्वका गुणगान करते-करते उसका घरीर पुलकित हो उठता
है, नेपोंसे प्रेमका प्रवाह बहने लगता है छपा हदय हर्पसे संघ
पाता है॥३॥
वह दूसरोंके दुःखसे दब दुखी होता है लेकिन स्वय किसीका द्रोह
नहीं करता है। यह सदा सम्मा रितेन्द्रिय रहता है सपा मायास मोहित
नहीं होता है ॥४॥
मम्दाको पीठाओंमें उसका मन पल्लीन रहता है।
वह परोपकारमें बहुत प्रीति रखता है वीर सदा प्रसम्न-यदन
रहता है ॥५॥
रसफे नेत्रा मटयर प्रमकता रहता है सपा घरीरमे करुणा
भारती है। पह गान्त स्वमाववासा ठपा मरयम्त सन्तोपो होता है और
मिसीमें कोई दोप नहीं देखता है ॥६॥
११४
करि-मी मासा
३० पिस ! तु बीवने चिंता घरे?
चिता हूं शोरमे चिन्ता धरे?ष्णने करहोय ते करे
कृप्यमे ॥१॥
स्थावर जगम पर पैतन्यमा, मायान बत ठरे,
समरण कर पीहमपन्द्रन, पम्म मरण भय हरे
कृष्णने॥२॥
म मास प्राणी इष्मवमान, प्यान गर्भमा घरे,
मायागु बावण कषु स्यारे, समचोराशी फरे
कम्ममे०॥३॥
तुं मन्तर गोग परे तेपी कारण मुं सरे?
ए वणीनो पार्यों मनसुबो, हर झापी ना फरे
कृष्णने
के दोरी सरवनी एने हाप सह भरायु रगसु मरे,
बजार बम्त्री, तेबो स्वर मोसरे
रुपगमे ॥१॥
तारक बो पातुं होत तो, सुध संबी दुर हरे,
मापपk अशाम फत
ए मूक विचारे
ताई कीषु पाप तेटस, हरि इभ्या मनुसरे,
सरा कात ते रोत ममे नहीं, शोर पर मन परे हममे०॥६॥
-गुजराती
२० पित! तू क्यों चिन्ता करता है?
पित्त, तू पिन्ता क्यों करता है? कृष्णको यो करना हो करे।
स्पावर सगम, गा, पेतन सभीमें मायाका वस रिवाई देता
है। सू श्रीरप्णपनका स्मरण कर मिससे बम-मरमका भय इट
पाए ॥१॥
प्राणी नव मास तक गर्भमें प्णचन्द्रका ध्यान करता है सपिन
पव उसपर मायामा आवरण पता है तो यह पौरासी काय योनियों में
प्रमण करता है ॥२॥
तू अपने हृदयमें म्याकुल होता है इससे भला क्या होगा?
उस सामीकी इच्छाको पिप्णु भौर शिष भी नहीं पल्ट
सकते ॥३॥
उसके हापमें सबकी नकों है। सभी उसकी इच्छानुसार कपम
उठाते है। पत्री (मजानेवाला) जैसा बनाता है वैसा ही स्वर माजेमेसे
निबसता है।
यदि तेरा किया हुआ ही होता तो तू सुखको सति से
दुखोगो नम कर देता। हमारा अभिमान हमारे मनानका फल है-
इम पूस बात पर विचार पर ||५||
तुम्हारा किया उतना ही होता है जिसना कि हरि पाहता है।
सदास ही यह रीति पसी मा रही है। सू यपने मनमें अहकार क्यों
परता है? ॥६॥
कक्षिी माता-
ने ठतु म्यम में काले, वे सेमे कर हो,
कोईमी फेर पो नहीं तेमा, मामे ष्टी मरे
हमने०110
पापान एगी मेरे पासे, मम पीफस पापी मरे
पामा एमी पेरे माशे, ग्यम गर कोई गरे
एमने।
(माटे) भावार्नु पम कीम पाशे, उपनिपर ऊपरे,
(त) राव मरोंसो रापाषरमो, हा माटे गया रे?
कृष्णार॥
११७
-गुजराती
तय
जिस कासमें बिठना मैसा मौर निस सरह होना मिचा है बसा
ही होता है। इसमें किसीके कुछ करनेसे फर्क नहीं परता
तुम क्यों मायापम्पी करके मरते हो ।।७।।
पो होनेवासा है यह उसीकी प्रेरणासे होता है जिस प्रकार कि
नारियममें पानीका मरा पाना । यो मात बामेवासी होती है वह उसीकी
प्रेरणासे पसी बाती है, जैसे हापी मपनी मुंग्से कोठा (एक प्रकारका
फक) निगम पाता है ।।८।।
उपनिषद् पुकारकर कहते है कि मो होनेमामा है यह
अपने माप होगा। रापावरपर भरोसा रस प्याराम रखा
क्यों है? ॥९॥