Adarsh Library, Jaipur
Ek Raat Ka Narak
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Jah
হানা
नरक
MARITES
Rati
रा
का नरक उपेन्द्रनाथ अश्क
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प्रकाशकीय एक रात का नरक परक जी का पहला उपन्यास है, जिसे उन्होंने १६३५ में लिखा था । वर्षों तक यह पाडुलिपि अश्क जी की फाइलो में रखी रही और पदक जी की प्रतिभा का प्रस्फुटन अन्य अद्वितीय उपन्यासों में हुमा। कुछ दिन पहले अश्क जी ने पुरानी फाइलें देखी तो उनके सामने यह पाडुलिपि भी पायी । लेकिन भश्क जी अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'गिरती दीवार' के तीसरे-चौथे सड को लिखने को योजना बना चुके थे और उन्होंने इम उपन्याम मे वरिंगत घटनामों को 'गिरती दीवारें' के इन अगले भागों में समाविष्ट करने की रूप-रेखा भी निर्धारित कर ली थी। लेकिन इस योजना के बावजूद हमने उनसे यह आग्रह किया कि वे इसे प्रकाशित करने की अनुमति हमे दें ताकि अश्क जी के पाठको के सामने हम उनकी यह पहली कृति रख सकें। पाठक-गण निश्चित रूप से प्रश्क जी की प्रसिद्ध गप-यात्रा के भारम्भ-स्वरूप इस उपन्यास को पढना पसन्द करेंगे और महब ही पे मन्जिलें भी पाठको के सामने स्पष्ट होगी जिनसे होकर परत जी की भोपन्यासिक प्रतिमा विकसित हुई ।
अश्क जी के प्रसिद्ध उपन्यास
गिरती दीवारें
गर्म राख
सितारों के खेल
पत्थरग्रल-पत्थर
बड़ी बड़ी आँखें
शहर में घूमता आईना
तथा शीघ्र प्रकाश्य
बाँधो न नाव इस ठाँव
और
एक नन्ही-सी किन्दील
आभास उस दिन 'इलस्ट्रेटेड वीकली' को देखते-देखते निम्नलिखित पक्तियाँ मेरी नज़र में गुजरी: 'मेला लोकप्रिय मालूम होता है । इस वार २८ पौर २६ मई को मेला लगा । शिमले से बहुत-से लोग मशोबरे गये और वहाँ से उस गहरी 'पाटी को मोर मुड़े, जो कोटी के राणा को रियामत में शामिल है। 'मेले को एक सूबी पहाड़ को सुन्दर युवतियां हैं, जो भडकीले कपड़े पहने हुए पहाडी के एक मोर बैठी हुई मेले में होने वाले सेल-तमाशी भार दूसरे कोतुकों को देखती हैं । मुनते हैं कि प्राचीन काल में इसी दो दिन को समारोह में शादियो पक्की होती थी और वधुएं चुनी जाती यो। 'कोटी के राणा राय बहुत-से मित्रों को मामन्त्रित करते हैं पौर पारने मतिपि-सत्कार के लिए सुप्रसिद्ध हैं । शिमले में पाने वाले प्राय. मभी लोग, चाहे वे कितने भी कम दिनों के लिए क्यो न पायें, मोपी पोर इसके प्रसिद्ध मेले को अवश्य देखते हैं।' (जून, १९३५) मेरा सोया हुमा संकल्प जाग उठा । एक वर्ष हुमा मैंने भी सी-पी के इस मेले के सम्बन्ध में कुछ लिसने की सोची थो, मुझे वहाँ जिम प्रतिषि-गकार का अनुभव हुमा या उसका वृत्तात निखने की इच्छा थी, पर जिन्दगी मोर उमको व्यस्तताएँ-शिमले से पाते हो कुट मा उलझा कि सब कुछ भूल गया । उस दिन इन पंक्तियों को पढ़ या .
फिर कुछ लिखने की प्रबल आकांक्षा जाग उठी-उन बातों को लिखने की, जिन्हें मेले में जाने वाले बहुत अर्से से जाने वाले भी प्रायः नहीं जानते। मैं इस बलवती इच्छा को नहीं रोक सका। कलम मैंने उठायी और पुस्तक मैंने लिख भी डाली, पर १९३५ से अब तक मेरी मुसीवतों और संवर्षों ने मुझे दोबारा इस पर नजर डालने का अवसर नहीं दिया। अब इसे दोबारा देख कर और डायरी की सहायता से कुछ भूले हुए व्योरों को साफ़ करके, मैं यह पुस्तक पाठकों के सम्मुख उपस्थित कर रहा हूँ। .-उपेन्द्रनाथ अश्क एक रात का नरक
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एक । कुछ पड्यन्त्र-सा हुआ । मैं इसे पड्यन्त्र ही कहूंगा, आप कोई दूसरा नाम दे लें । भोलानाथ ने रामलाल के कान में कुछ कहा या रामलाल ने भोलानाथ के अथवा इसका आरम्भ पण्डित तेजभान के प्रस्ताव से हुआ, कुछ भी हो, पड्यन्त्र हुआ -और हम इसमें ऐसे ही जा फंसे, जैसे मक्सी जाल के सुनहरी तारों में । इतवार की सुबह थी, रात शिमले में भी मैदानों जैसी गर्मी पड़ी थी और सुवह भी थी निखरी हुई, घुली हुई । मैं द्वार पर कुर्सी डाले सामने केलू के वृक्षों की ओर निनिमेप देस रहा था-उन लम्बे सीधे वृक्षों की ओर, जो न जाने यों स्थिर, अविचल, अटल सड़े किस प्रेयसी की प्रतीक्षा किया करते हैं। जाने किस निष्ठुर स्वामी की सेवा में खड़े रहते हैं ? नीचे खड्ड थी-गहरी और मौन ! और सामने था पहाड़-किसी प्रागैतिहासिक हाथी की भांति आराम से लेटा हुआ। धूप मेरे शरीर के आधे भाग को गर्म कर रही थी। शायद उसमें काफ़ी तेजी थी, पर मुझे घूप में बैठने की लत-सी है । पत्तों से धन कर धूप की किरणें मेरे शरीर को गर्म कर रही थीं। मैं कुछ सोच भी रहा था कुछ अजीव-सी वात !....लोगों का कहना है कि धनी-से-घनी वर्षा में भी केलू का वृक्ष नहीं भीगता । मैं १. फेलू-देवदार
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एक
एक
कुछ पड्यन्त्र-सा हुआ। मैं इरो पड्यन्न ही नहंगा, भाग
कोई दूसरा नाम दे सें । भोलानाथ ने रागलारा ये कार में गए
कहा या रामलाल ने भोलानाथ के गया राणा भाराम
पण्डित तेजभान के प्रस्ताय से हुआ, पुष भी हो, पगम हुमा
---और हम इसमें ऐसे ही जा पारो, जैसे गमगी जाप गुगहरी
तारों में।
इतवार की गुवह थी, रात शिमले में भी मैदानगी
पड़ी थी और सुबह भी थी निगरी हुई, पुषी मारा
कुर्सी डाले सामने केलू मे वृक्षों की और निनिगम देख रहा
था-उन लम्बे सीधे वृक्षों की और, जो ग जागी ,
अविचल, अटल राहे किस प्रेयगीगी प्रतीक्षा किमान
जाने किस निष्ठुर स्यागी यी गया में मई र ? जीने
सड्ड थी-गहरी और मौत ! और गागर्ग या महा-किसी
प्रागैतिहासिक हाथी यी गानि भागम गे पेटा थाymhi
शरीर के आधे भाग को गर्म पर नही पी। गायद की
तेजी थी, पर मुहरे धुप में बैठने की मतगी है । गमका
धूप की किरणें मेरे शरीर को गर्म कर रही थी। टीम
भी रहा पा-गुष अभीय-गी धार !...ोगों का धरना
कि धनी-से-पनी वर्ग में भी बन या वृक्ष नही भीमता।
१.पू-देवदार
--
१२ । उपेन्द्रनाथ अश्क
सोचता था कि तीक्ष्ण-से-तीक्ष्ण धूप में भी यह नहीं तपता ।
इसका आधा भाग सदैव शीतल वना रहता है। केलू वर्षा ही
पर विजय नहीं पाता, धूप को भी पराजित कर देता है। उस
समय मेरा मन उस तपस्वी, उस ऋषि, उस संन्यासी के प्रति
श्रद्धा से आप्लावित हो उठा !....कि तभी आवाज़ आयी।
"मास्टर जी!"
मेरे विचारों का क्रम टूट गया। भाग कर ऊपर गया।
लाला जी मेरी ओर ही आ रहे थे, रास्ते में ही सामना हो
गया । मैंने प्रश्न-सूचक दृष्टि से उनकी ओर देखा।
"सी-पी' चलोगे ?"
"सी-पी?"
"हाँ, सी-पी के मेले में !"
मैं जैसे अव नींद से जागा। बोला-"मैंने तो हाँ कर दी
"
थी।"
"वह तो ठीक है," लाला जी हँसते हुए बोले, "लेकिन वो
यमदूत आये हुए हैं....तो फिर मैं आपका चन्दा दे दूं, मेरा
खयाल था कि आप अपना इरादा....". और यह कहते-कहते
हँसते हुए लाला जी वापस कमरे में चले गये । मैं भी उनके
पीछे गया। वहाँ वही त्रिमूर्ति विराजमान थी-जो अपने
साथियों में 'मैसर्ज भोलानाथ एण्ड कं०' के नाम से याद की
जाती थी। एक अपनी मोटी तोंद को सम्हाले बैठे थे तो दूसरे
अपने (रात सिनेमा देखने के कारण) मुरझाये मुख को लिए।
हाँ, तीसरे महाशय हर प्रकार से चुस्त और चाक-चौवन्द थे,
जैसे मित्रों को मेला दिखा लाने जैसा महान काम उन्हें अकेले
सरंजाम देना हो।
मेरे सामने लाला जी ने इन महाशयों को तीन रुपये दे
१. सी-पी-सीपुर।
एक रातकामरका १३ दिये । एक अपना, एक मेरा और एक पण्डित तेजमान का। वे हमारी कोठी से तनिक दूर कसुमटी में रहते थे। वहां ये लोग जाने से कन्नी कतरा रहे थे, क्योंकि उन्हें अभी नहाना- धोना और दूसरे कामों से छुट्टी पाना या, फिर सब काम छोड़ केवल चन्दा उगाहने के लिए कहां तक मारे-मारे फिरते ? लाला जी ने भी उनकी कठिनाई को समझ लिया और इसलिए पण्डित तेजभान का चन्दा भी स्वयं दे दिया। इसके बाद हमारी दिलपसन्द मिठाइयों और फलों का नाम पूछकर यह 'तिगड्डम' रफ़ चक्कर हुआ, लाला जी बाय-रूम में चले गये और मैं अपनी कुर्सी पर आ कर निश्चेष्ट बैठ गया । यही था वह पड्यन्त्र हमें सी-पी के मेले में ले जाने, वहाँ की रोनक दिसाने, मिठाई और फल खिलाने का । आप इसे 'मीठा पड्यन्त्र' कह लें और सच्ची बात तो यह है कि ऐसे प्रयास को पड्यन्त्र का नाम दिया ही नहीं जा सकता, लेकिन बाद में जो घटनाएं घटीं, उन्होंने 'मंग भोलानाप एण्ड के०' के इस प्रयास को षड्यन्त्र बना डाला और उन्हें पड्यन्त्रकारी। सिलाये का नाम नहीं, रुलाये का नाम-कहावत ऐसी ही स्थिति में होंटों पर आती है। प्रश्न उठता है कि मैं इस साजिश में फंसा ही क्यों ? अब यह तो प्रकट है कि इस बहाने मिठाई खाने या फल उड़ाने का मेरा विचार कतई नहीं था। यह काम तो शिमले में भी भली- भौति हो सकता था। और न ही सर-सपाटे के सयाल से मैं उनके साप गया था, क्योंकि, सैर तो शिमले के जीवन का आवश्यक अंग थी । वात वास्तव में यह थी कि मैंने कभी पहाड़ी मेला न देखा था । लाला जी तो खैर हर वर्ष सरकारी दफ्तरों के साय शिमले आते थे और सी-पी का मेला देखते थे, लेकिन मैं तो गत वर्ष आया हो देर से था और इससे पहले कभी ४ । उपेन्द्रनाथ अश्क आने का सुअवसर ही नहीं मिला था। इस मेले के सम्बन्ध में तरह-तरह की किम्बदन्तियाँ, तरह-तरह की कहानियाँ सुनी थीं। इसलिए इसे देखने का औत्सुक्य भी इस साल दुगना हो गया था । सुना था वहाँ स्त्रियों की प्रदर्शनी होती है, वहाँ मेले में ही शादी-विवाह के मामले तय हो जाते हैं । इसलिए मैं देखना चाहता था कि सचमुच वह रियासत क्या अमरीका और इंगलिस्तान से भी दो पग आगे निकल गयी है अथवा पुरातन काल के रोम की तरह यहाँ भी स्त्रियों की मंडी लगती है और वर्वरता का दौर-दौरा है । कौतूहल, औत्सुक्य की आग पर तेल का काम दे रहा था । एक साल से दवी हुई चिनगारी चमक उठी थी। पिछले वर्ष, जैसा कि मैंने कहा, मैं पहुँचा ही देर से था। मेला समाप्त हो चुका था और मेरे भाग्य में वे कहानियाँ रह गयी थीं, जो साल भर लोगों की ज़वान पर रहती हैं-मेले में हारे हुए जुआरियों की, मदमत्त शरावियों की, वहाँ आये हुए अंग्रेज़ अफ़सरों को मीना बाजार की सैर करा के अपने आतिथ्य का प्रमाण देने वाले राजा की और वहाँ आयी हुई पहाड़ी युवतियों, उनकी वेश-भूपा, उनकी सुन्दरता और वेवाक़ी की कहानियाँ ! फिर यदि मेरी उत्सुकता इस सुअवसर को पा कर भड़क उठी तो इसमें मेरा क्या दोष है ? एक शहरी के लिए यह दृश्य एकदम नया है । उस मेले में, जहाँ जुआ हो शराव उड़े, गन्दे अश्लील गीत गाये जायें, वहाँ स्त्रियाँ भी आयें, इससे बढ़ कर अचम्भे की वात मैदानों से आने वाले ए: पंजावी युवक के लिए और क्या हो सकती है ? फिर यह ' सुना था कि न केवल स्त्रियाँ स्वयं जाती हैं, बल्कि उनके लि रियासत की योर से प्रबन्ध भी किया जाता है। हमारे य ऐसे मेलों-शहरों ही के नहीं, वरन् उजड्ड, अनपढ़ :
एक रात का नरक। १५
गंवार देहातियों के मेलों में भी स्त्रियां नहीं जाती, फिर यहाँ
लज्जा और सरलता को छोड़ कर स्त्रियों का मेले में आना
अजीव-सी वात लगती थी। सोचा, चलो सर के साथ-साथ
पहाड़ी संस्कृति और सभ्यता की भी जानकारी हो जायेगी।
शिमला सभ्य लोगों की वस्ती है, वहां रह कर पहाड़ी लोगों के
जीवन का अध्ययन नहीं हो सकता। इसके लिए पहाड़ी गांवों
में ही जाना पड़ेगा। सी-पी में सव ओर से आ कर पहाड़ी लोग
सम्मिलित होंगे। उनके जीवन की कहानी इससे अधिक और
कहाँ सुनी जा सकेगी।
अब इसे भाग्य का सेल समझिए कि औरों की कहानियाँ
सुनते-सुनते मेले में मेरी उपस्थिति एक ऐसी कहानी का विषय
बन गयी, जो औरों के लिए ही नहीं, मेरे मित्रों के लिए भी
वाद-विवाद तया दिलचस्पी का विषय हो गयी।
सरे दिन छोटे शिमले के पनवाड़ी की घड़ा न आठ बजे अपने सामने खड़े पाया। तय भी यही हुआ था, पर कोई काम ठीक समय पर कर लें, ऐसी बात तब क्या, अभी तक हम हिन्दुस्तानियों को नहीं आयी । प्रायः देखा गया है कि सभा हो रही है, लोग प्रतीक्षा बने खड़े हैं, औत्सुक्य है कि मूर्तिमान हो कर सभा पर छा गया है, पर प्रधान महोदय का कहीं पता ही नहीं। यहाँ भी कुछ ऐसी ही बात थी। पार्टी के सब सदस्य उपस्थित, पर संयोजक ऐसे गायव, जैसे गधे के सिर से सींग । लाला जी ठहरे समय के पावन्द और बन्दा भी इस मामले में अंग्रेजों के कान काटता है और यद्यपि रात को दो बजे ही सो पाया था और सोते में भी सी-पी के स्वप्न देखता रहा था, तो भी जब सुवह छै वजे लाला जी ने आवाज़ दी तो ऐसा उठ बैठा जैसे उनकी आवाज़ की ही प्रतीक्षा कर रहा था । झट उठा और शौचादि से निवृत्त हो कर पट स्नान किया और खाने की मेज़ पर जा डटा । चावल बने थे मटर वाले, सुगन्धि से दिमाग़ महक उठा। भूख नहीं थी तो भी लग आयी । बन्दे ने भी उनसे इंसाफ़ किया । सी-पी जा कर भी कुछ खाने के मिलेगा, इस बात को एकदम भुला दिया । प्लेट-पर-प्लेट च . कर गया। उधर लाला जी ने आवाज़ दी-आप अभी खान ही खा रहे हैं ? और इधर मैं झट हाथ-मुह धो, कपड़े पह कर तैयार हो गया। ठीक आठ बजे पनवाड़ी की घड़ी ने अपने सामने खड़े हुए पाया। "ह, ह, ह, हा, हा हा हा हा....
एकति का मरका १७
एक लम्बा कहकहा-एकदम मौलिक । पामोफोन
रिकार्ड की तरह। ऐसा लगा कि मिगी ने ठहाका लगाने वाली
मशीन को चायी दे दी है और यह ठठाये जा रही है।
हम मुड़ पर खडे हो गये।
पण्डित तेजभान ऊपर को मुह किये हरा रहे थे। हराते
समय उनकी आँखों की पुतलियाँ दायीं ओर को परणासी है
और मुह ऊपर को उठ जाता है।
"आप यहां आ पहुंचे हैं और उधर आपकी प्रतीक्षा हो
रही है," पण्डित जी ने हंसना बन्द करते हुए कहा ।
"किधर ?"
"कसुमटी में ?"
"लाहोल विला युध्यत," मैंने दिन में पहा । न गाहों
के लिए कसुमटी और छोटे शिमले में कोई अन्तरहीन)
एक उत्तर में है तो दूसरा दक्षिण में ! निम्नग हा गादोटे
शिमले इकट्ठे होने का और आप जमा हग कगमटी में !
"क्यों, वहाँ क्यों प्रतीक्षा हो रही है ?" लाला जी योग।
"उनका खयाल था कि आप कगुगटी में होंगे।"
"उन्होंने मुझे इतना मूर्ष गमन लिया है कि कामुगटी
को छोटा शिमला समझ लू?"
"उन्होंने समझा था बाप मेरी और बायेंगे।"
"उनकी समझ के क्या कहने !" और लाला जी ने बैठारी
से मिर हिलाया और 'है' की।
"हहह, हा हा हा हा...." पगिटन जी में फिर पाया
ठहाका लगाया।
"कही, या क्या इगद हैं ?" बाला जी ने पथा।
"मैंने उन्हें कह दिया था कि में लाला गया और गोला
हुना छोटे गिमले पहुँच जाऊंगा। वैपनि महालान
दो दूसरे दिन छोटे शिमले के पनवाड़ी की घड़ी ने हमें ठीक आठ बजे अपने सामने खड़े पाया। तय भी यही हुआ था, पर कोई काम ठीक समय पर कर लें, ऐसी बात तब क्या, अभी तक हम हिन्दुस्तानियों को नहीं आयी । प्रायः देखा गया है कि सभा हो रही है, लोग प्रतीक्षा बने खड़े हैं, औत्सुक्य है कि मूर्तिमान हो कर सभा पर छा गया है, पर प्रधान महोदय का कहीं पता ही नहीं। यहाँ भी कुछ ऐसी ही वात थी। पार्टी के सब सदस्य उपस्थित, पर संयोजक ऐसे गायव, जैसे गधे के सिर से सींग । लाला जी ठहरे समय के पावन्द और बन्दा भी इस मामले में अंग्रेज़ों के कान काटता है और यद्यपि रात को दो बजे ही सो पाया था और सोते में भी सी-पी के स्वप्न देखता रहा था, तो भी जव सुवह छै वजे लाला जी ने आवाज़ दी तो ऐसा उठ वैठा जैसे उनकी आवाज़ की ही प्रतीक्षा कर रहा था । झट उठा और शौचादि से निवृत्त हो कर पट स्नान किया और खाने की मेज़ पर जा डटा । चावल बने थे मटर वाले, सुगन्धि से दिमाग़ महक उठा। भूख नहीं थी तो भी लग आयी । वन्दे ने भी उनसे इंसाफ़ किया । सी-पी जा कर भी कुछ खाने को मिलेगा, इस बात को एकदम भुला दिया। प्लेट-पर-प्लेट चट कर गया। उधर लाला जी ने आवाज़ दी-आप अभी खाना ही खा रहे हैं ? और इधर मैं झट हाथ-मुंह धो, कपड़े पहन कर तैयार हो गया । ठीक आठ बजे पनवाड़ी की घड़ी ने हमें अपने सामने खड़े हुए पाया। "ह, ह, ह, हा, हा हा हा हा...."
एक रात का मरका १७
एक लम्बा कहकहा-एकदम मौलिक । ग्रामोफ़ोन के
रिकार्ड की तरह । ऐसा लगा कि किसी ने ठहाका लगाने वाली
मशीन को चात्री दे दी है और वह ठठाये जा रही है।
हम मुड़ कर खड़े हो गये।
पण्डित तेजभान ऊपर को मुंह किये हैस रहे थे। हँसते
समय उनकी आंखों की पुतलियां दायी ओर को चढ़ जाती हैं
और मुंह ऊपर को उठ जाता है।
"आप यहां आ पहुंचे हैं और उधर आपकी प्रतीक्षा हो
रही है," पण्डित जी ने हँसना बन्द करते हुए कहा ।
"किधर?"
"कसुमटी में ?"
"लाहोल विला कुव्वत," मैंने दिल में कहा । इन महाशयों
के लिए कसुमटी और छोटे शिमले में कोई अन्तर ही नहीं।
एक उत्तर में है तो दूसरा दक्षिण में ! निश्चय हुआ था छोटे
शिमले इकट्ठे होने का और आप जमा हुए कसुमटी में !
"क्यों, वहां क्यों प्रतीक्षा हो रही है ?" लाला जी बोले ।
"उनका खयाल था कि बाप कसुमटी में होंगे।"
"उन्होंने मुझे इतना मूर्ख समझ लिया है कि मैं कसुमटी
को छोटा शिमला समझ लूं?"
"उन्होंन ममझा या आप मेरी ओर आयेंगे।"
"उनकी समझ के क्या कहने !" और लाला जी ने बेजारी
मे मिर हिलाया और दी।
"हहह, हा हा हा हा...." पगिडत जी ने फिर एक लम्बा
व्हाका लगाया।
"कही, आकाश हैं?" लाला जी ने पूछा।
"मने उन्हें ऋदिया हिमलाला जी की ओर से होता
हमा छोट गिर पहरा दे पण्डित मंडालाल को
१८ । उपेन्द्रनाथ अश्क . तैयार कर रहे हैं। "झंडालाल को कल किसी ने कहा नहीं था।" "कहा तो था, लेकिन कल सुना था; उनकी पत्नी बीमार हैं, फिर शाम को खवर मिली कि उनकी लड़की को बुखार हो आया है, आज वे कह रहे हैं कि उनका छोटा लड़का अस्वस्थ है । यदि कुछ और ठहर कर जाने की रहे तो शायद उस समय तक स्वयं उनके बीमार पड़ जाने का समाचार मिल जाये।" लाला जी ने फिर बेज़ारी से सिर हिलाया और कहा, 'हुँ !....' उसी समय श्री दौलतराम अपनी सुन्दर मुस्कराती सूरत लिये अपने मकान की सीढ़ी से उतरते दिखायी दिये । तव तक पार्टी के दूसरे सदस्य भी इकट्ठे हो चुके थे। दौलतराम को सीढ़ी से उतरते देख मुझे कुछ प्यास लग आयी । मैंने कहा-“लाओ यार, जब तक मन्त्री महोदय आय पानी के दो-एक गिलास ही पिलवाओ।" वे हंसते-हंसते फिर वापस चले गये। इस बीच में ऐसा लगा कि यह प्यास का रोग बुरी तरह बढ़ने लगा, क्योंकि ज्यों ही दौलतराम पानी के गिलास लाये, लाला जी को प्यास लग गयी और फिर उस समय तक एक-न-एक को लगती चली गयी जब तक सारी पार्टी पानी न पी चुकी और प्यास के इस रोग को बढ़ने के लिए और व्यक्ति न मिला। पानी पी कर निश्चिन्त होते ही मैंने एक मारके की बात नोट की कि लाला जी की नेकर उनके अण्डे के समान पेट से नीचे खिसकती चली आ रही है। बात यह है कि उनकी पेटी उनकी इस अंडाकार तोंद पर टिकती न थी। यदि उनका पेट बहुत मोटा होता तो पेटी टिक जाती जैसे मुकन्दीलाल जी के पेट पर मज़े से टिक रही थी, लेकिन लाला जी का पेट अभी तक विकास की प्रारम्भिक मंजिलें तय कर रहा था। उनकी --- । -
एक रात का नरक। १९
.
१
नेकर इस प्रकार नीचे को खिसक आयी थी जैसे लोअर प्राइमरी
की पहली-दूसरी श्रेणी में पढ़ने वाले छात्रों के पाजामे। मैंने
लाला जी का ध्यान इस ओर आकर्षित किया।
लाला जी ने सिन्न-से हो कर अपने पेट को कोसते हुए नेकर
को ऊपर उठाने का प्रयत्न किया, लेकिन यह कमबस्त फिर
नीचे खिसक आयो। लालो जी हताश हो कर अपने पेट को
कोसने लगे। “यह पेट भी कमवस्त बुरी तरह बढ रहा है."
लाला जी बोले, "बहुतेरी सैर करता हूँ, बहुतेरी कसरत करता
हूँ, पर यह कम होने का नाम नहीं लेता। मुझे राजा इन्द्रमन
की भांति चालीस रोज़ का फाका न करना पड़े।"
मैंने कहा, "लाला जी, इस कोसने से काम न चलेगा, आप
किसी-न-किसी तरह गैलस मॅगाइए । यह पुराने फ़शन की नेकर
है, सहारा न होने से पेटी के ऊपर उलट गयी है, बटन तक
दिसायी दे रहे हैं । इस सूरत मे तो मेले नही चलना चाहिए।
आप गैलस क्यों नहीं मंगा लेते ?'
मेरे इस अमूल्य परामर्श का सबने समर्थन किया । अब यह
१. एक राजा था जो इतना मोटा हो गया कि चल फिर न सकता
पा। उसने बैंच को बुलाया। घेद्य या समाचार और साथ ही
ज्योतिषी । उसने कहा महाराज ४० दिन तक तो सिर्फ भापको
जीना है, फिर ज्योतिषशास्त्र के अनुसार आपको मृत्यु हो जायेगी।
अब आप इलाज क्या करायगे। पस उस दिन से राजा ने साना-
पीना छोड़ दिया। चिन्ता के कारण सवा महीने में ही काय
हो गया। जब पातीसवें दिन मृत्यु की याद जोहने पर भी वहन
आपो तो उसने वैद्य को युनामा। बंध हंसा । उसने कहा-
आपकी बीमारी को माराम भाया है या नहीं ? मौत मापके
दुश्मनों को आये । आपका इलाज यह पा मिam कम पायें।
यह इसी तरह सम्भव था।
२० । उपेन्द्रनाथ अश्क
सोच पैदा हुई कि गैलस आयें कहाँ से ? इस नाजुक वक्त पर
भी दौलतराम जी काम आये। उन्होंने झट से गैलस ला कर
लाला जी के हाथ में दे दिये । लाला जी झटपट पेटी को उतार
कर गैलस फिट करने लगे। लेकिन यह क्या ? यहाँ तो दो
बटन ही नदारद थे। झट उन्हें उतार कर गैलस दौलतराम
जी को वापस करते हुए लाला बोले-"इस बदकिस्मत निक्कर
के भाग्य में यों ही लटकना लिखा है।":
मैंने कहा, "हताश न हों, वो उधर देखिए, काम बन सकता
है।"
उधर दुकान पर चेचक के मारे सिख सरदार बैठे कपड़े सी
रहे थे। लाला जी ने मेरा अभिप्राय समझ लिया, क्योंकि दूसरे
क्षण वह दुकान पर बटन लगवा रहे थे।
इसी बीच संयोजक महोदय लाला भोलानाथ जी भी हाँपते-
हाँपते आ पहुँचे । खैर गुज़री कि वे पण्डित झंडालाल को साथ
घसीट ही लाये, नहीं तो वक्त के इस दुरुपयोग पर उन्हें जो-
जो बुरी-भली सुननी पड़तीं, उन्हें यहाँ लिखा नहीं जा सकता।
अब जो पनवाड़ी की घड़ी की ओर देखा तो दस बजने में
कुछ ही मिनट वाकी थे। पार्टी चल पड़ी। नौ मील की कठिन
मंजिल और सिर पर तेज़ धूप ।
चलते समय कोई विशेष घटना नहीं हुई, केवल लाला जी
के घुटने पर चोट आ गयी । वात कुछ न थी। रास्ते में महता
जी भी मिल गये। सवने उन्हें भी साथ चलने का आग्रह किया।
वे कुछ थके हुए थे, कुछ परेशान भी थे, लेकिन यहाँ मानने
वाला कौन था ? उनका घर रास्ते में ही पड़ता था। वे तैयार
होने के लिए चले गये और ये लोग 'जहाँ.सौ वहाँ सवा सौ'
के अनुरूप उनकी प्रतीक्षा करने लगे।
मैं दो घण्टे खड़ा-खड़ा कुछ थक गया था, इसलिए रास्ते के
एक रात का नरक । २१
।
किनारे लगी हुई तार पर बैठ गया। उस समय मालूम होता
है लाला मुकुन्दी लाल जी को भी थकावट महसूस हुई। हो
सकता है उन्हें मेरा यों आराम से बैठना अखरा हो । वे खम्बे
के दूसरी ओर अपने भारी भरकम शरीर के साथ बैठ गये ।
मेरी ओर तार सिंच गयी जैसे ची फिरने पर रेल के सिगनल
की तार और मैं मुंह के वल सड़क पर गिरता-गिरता बचा।
इस पर सव हँस पड़े। मुझसे यह अपमान सहन न हो सका।
दुवारा वहीं बैठ कर, मैंने जोर लगाया, पर कहाँ हाथी
और कहाँ चुहिया, तार ज़रा भर भी नीची न हुई । उन्हें
मेरी इस स्पर्धा पर, शायद क्रोध आ गया और उन्होंने तार
पर और भी जोर दिया। फल यह हुआ कि सम्वा ही टूट
गया । लाला जी उस पर पांव टिकाये खड़े थे। उनके घुटने
पर चोट आ गयी। हम दोनो खिन्न हुए, परन्तु लाला जी ने
'मामूली बात है' कह कर टाल दिया।
उस समय यद्यपि इसे साधारण घटना समझ लिया गया,
पर मेरा माथा उसी समय ठनका था। दिल ने कहा, यह बुरा
अपशकुन हुआ । आज किसी न किसी को खैर नहीं। मुझे क्या
मालूम था कि विधाता का नजला मुझी पर गिरेगा और मैं ही
उसकी कोप-दृष्टि का भाजन वनूंगा।
महता जी के आने पर सव हंसते-हँसते मेले की खुशी में
रवाना हो गये। सबने अपने-अपने साथी बना लिये और वातचीत,
हंसी-ठट्ठा करते चलने लगे। मैं इस पार्टी में नवागन्तुक था।
मेरा कोई साथी न बना। उस समय मेरी दृष्टि उस पहाड़ी
कुली पर गयी, जो मजे से सिर पर फलों की टोकरी लिये चला
जा रहा था। मैंने उसे अपना साथी बना लिया और धीरे-धीरे
ऐसा सान पर चढ़ाया कि वह खुल गया। यहां तक कि जब मैंने
उससे कहा, 'यार कोई..पहाड़ी गीत ही सुनाओ,' तो उसने
.
२२ । उपेन्द्रनाथ अश्क
ऊँचे स्वर में तान छेड़ी:
'तेरे दरदे वो मोहना
तेरे दरदे
वोल, गाला मेरा कट्टया
पैनिये करदे
सँजोली को जाने वाली केलुओं से ढंकी हुई टेढ़ी-मेढ़ी सड़क,
पहाड़ी गीत, सुरीला और पंचम तक उठ जाने वाला कंठ-सव
झूम कर रह गये।
तीन पण्डित तेजभान पार्टी की जान थे। उन में मज़ाक करने और दूसरों के मजाक को सहने को शक्ति पराकाष्ठा को पहुंची हुई थी। किसी जिन्दादिल के विना पार्टी पार्टी ही कहाँ कही जा सकती है ? रस के विना ईस को ईस कौन कहेगा? हमारी पार्टी भी भूसे नीरस लोगों का गिरोह न थी । उसमें अधिकाश लोग-जिन्दगी जिन्दादिली का नाम है-इसी मत के अनुयायी थे । पण्डित तेजभान इस पार्टी के नायक थे। लम्बे-चौड़े छः फुट तीन इंच के जवान, पगड़ी बांधते तो किसी रियासत के राजा मालूम होते, पर यारों के लिए वे महज विनोद का सामान थे। सब उनको हँसी उड़ाने में मस्त, सव उनको परेशान करने के दरपै। और वो ऐसे कि किसी की बात का ठीक उत्तर दे रहे हैं, किसी के व्यंग्य को सुना-अनसुना कर रहे हैं और किसी के प्रहार का जव जवाब नहीं दे पाते तो एक ठहाका छोड़ देते हैं । और यह ठहाका-यह भी एक हथियार से कम नहीं । जब वे निरुत्तर हो कर वात का रुख पलटना चाहते हैं तब ठहाका मार देते हैं और वह भी साधारण ठहाका नही । उनका ठहाका अपनी विशेषताएँ रखता है और इसका भी एक छोटा-सा इतिहास है। पण्डित तेजभान का ठहाका सारे सेक्रेटेरिएट में प्रसिद्ध है । वे एक बार जव हंसते हैं तब हंसते ही चले जाते हैं, उस यस्त उनकी आंखें चढ़ जाती हैं, और मुह इस तरह सुल जाता है कि कंठ तक दिसायी देता है। सिर को ये ऊपर उठा लेते हैं । प्रायः हंसते समय उनकी पगड़ी ने घरती पर गिर कर हम .
। उपेन्द्रनाथ अश्क डमपन के विरुद्ध जबर्दस्त प्रोटेस्ट किया है। यारों को इसमें भी मज़ाक की सूझती है। एक बार का ज़क्र है-वे इस प्रकार जव हँसने लगे तव लाला जी ने उनके मुंह में ईसबगोल का छिलका फेंक दिया। वह इस भांति तालू और हलक के साथ चिपका कि सन्ध्या तक वे उसे नीचे उतारने का प्रयत्न करते रहे, पर वह नहीं उतरा। उन्होंने दो-चार वार पानी भी पिया, पर नीचे खिसकने की जगह वह और फूल गया। फिर उन्होंने इस बदमज़ाकी पर जो दार्शनिक भाषण लाला जी को पिलाया, वह सुनने से ही सम्बन्ध रखता था। वास्तव में पण्डित तेजभान को 'दर्शन' का भी दौरा होता है। ऐसा ही दौरा तव हुआ, जव 'प्रास्पैक्ट हिल' की एक पार्टी में ठहाका लगाते समय उनके मुंह में रंग फेंक दिया गया था और ज्यों-ज्यों वे पानी पी-पी कर कुल्ले करते थे, दाँत और मुंह नीले होते जाते थे। उस वक्त इस तरह के भोंडे मज़ाक के विरुद्ध उन्होंने जो भाषण दिया, वह आज तक मुझे स्मरण है। उसमें पण्डित जी ने फ़तवा दे दिया कि उनके सब मित्र हास्य-रस के नियमों से सर्वथा अनभिज्ञ हैं। खैर उनके इ भाषणों का उनके मित्रों पर उतना ही प्रभाव पड़ता है, जितः तुती की आवाज़ का नक्कारखाने में, क्योंकि ज्योंही वे पि सी प्रकार मुंह खोले, सिर ऊपर को उठाये, आँखें वन्द f सते हैं यार लोग फिर ऐसी ही कोई हरकत कर बैठते हैं - एक रात का नरक। २५ - बहुतेरातवियत की नासाजी का रोना रोया, पर सुनता कौन ? घसीट ही लाये गये । हँसते-हंसाते पार्टी कुफ़री पहुंची। रास्ते में वर्षा होने लगी थी। शिमले में वर्षा का क्या ठिकाना और विशेषकर जून-जुलाई के महीनों मे, तडातड़ पड़ने लगती है उस दिन कुछ ओले भी पड़े थे, शीत में वृद्धि हो गयी थी। कुफरी पहुंच कर पार्टी ने वहां सराय में डेरा डाल दिया। नौ मील चल कर कुफरी की सैर को आने वालों के लिए यह सराय सर्दी में ठिठुरते हुए के लिए लिहाफ से कम नहीं । बरसातियां उतार दी गयी। छतरियां निचुड़ने के लिए टांग दी गयीं और "इंकी' खेली जाने लगी। ताश के इस खेल में लाला जी को सूब निपुणता प्राप्त है। सदा वे ही सबसे पहले जोतते हैं । उस दिन पण्डित तेजभान को जो शामत आयी तो आप 'डंकी' बन गये। लाला जी ने यह सजा तजवीज की कि नाक पर रुपया रख कर एक कंकड़ो ऊपर को इस तरह उछाली जाय कि उससे रुपये का निशाना हो जाय । यह न करना हो तो एक रुपया पार्टी के फंड में दिया जाय। पण्डित जी ने बीसियों तरह की फ़िकरेबाजी सुनते हुए रुपया दे दिया । नाक या आंस कौन तुड़वाता? इस पर मालूम होता है, लाला जी को शरारत सूझी। उन्होंने कहा, "भाई, इज़ारवन्द अथवा नेकर की पेटी में कोफ़' रस कर ऊपर को मुह कर, ककड़ी को ऐसे उचाली कि वह कीफ़ में गिरे। जिसे सफलता मिले उसे इनाम दिया जाय।" इनाम का नाम सुन कर पण्डित जी चोल उठे, "क्या । इनाम?" लाला जी ने कहा, "सब लोग कोशिश करें। जो असफल रहें, वे आठ-आठ आने दें। इस तरह जो रकम इकट्ठी को जार- १. कुनत, जिससे बोतस इत्यादि में तरल पदार्थ उपेन्द्रनाथ अश्क । सफल रहने वालों में बरावर-वरावर बाँट दी जाय ।" र यह कहते हुए लाला जी ने जानकीनाथ को आंख से शारा किया। प्रस्ताव वेहद दिलचस्प था । पण्डित जी बोले, “यहाँ कीफ़ कहाँ से आयेगी ?" महता ने कहा, "पिछले दिनों मैंने दुकानदार के यहाँ पड़ी देखी थी। यह कह कर वे दुकानदार से छोटी-सी कीफ़ ले आये । तव पण्डित जी ने एक लम्बा ठहाका छोड़ कर इस प्रस्ताव को पास कर दिया और इतनी देर में लाला जी और महता साहव में आँखों-आँखों इशारे हो गये। सबसे पहले लाला जी ने अपनी नेकर में कीफ़ रख कर कंकड़ी फेंकी। वह उनकी नाक पर इस ज़ोर से लगी कि आँखों से पानी निकल आया। सब लोग हँसने लगे और पण्डित जी तो बहुत देर तक ग्रामोफ़ोन बने रहे। लाला जी ने तत्काल आठ आने निकाल कर पण्डित झंडालाल के हाथ में दे दिये, जो सदा ऐसे मौकों पर कोषाध्यक्ष का कर्तव्य निभाते थे। इसके बाद सबने वारी-बारी कोशिश की। सब असफल रहे । केवल रामभरोसे किसी तरह सफल हो गये। उन्होंने कंकड़ी जव फेंक तो कोई आशा ही नहीं थी कि वह कीफ़ तो क्या उनके सि पर भी गिरेगी, पर वे पीछे को कुछ ऐसे भागे कि वह कीफ़ ही गिरी। उस वक्त सबने तालियाँ पीटीं। वाईस आदमि की पार्टी थी। दस रुपया जुर्माना आ चुका था । केवल पपि तेजभान जी रह गये थे। यदि वे जीत गये तो क्या कह पाँच रुपये ठस से उनके हो गये। उस दिन वर्षा और कारण उन्होंने चूड़ीदार पायजामा पहन रक्खा था । झट कमीज़ कसी, इज़ारवन्द और कमीज़ों के मध्य में कीफ़ और कहक़हा लगा कर ऊपर को मुंह करके ज्यों ही । - एक रात का नरका २७ । फेंकने लगे, तभी जानकीनाथ ने (जो पहले से ही तैयार थे) लोटा भर चश्मे का पानी भर-भर्र कीफ में उड़ेल दिया। एक तो बर्फ से भी ठंडा पानी,फिर चूड़ीदार पायजामा, न उतारा जा सके, न पहना जा सके । दोनों पांवों से पानी वह रहा था, फब्तियों-पर-फब्तियां कसी जा रही थीं और पण्डित जी थे कि पूरे जोश से अपना दार्शनिक भाषण झाड़ रहे थे। इसके बाद उन पर क्या गुजरी और वे किस प्रकार ठिठुरते-ठिठुरते नौ मील चल कर कमुमटी पहुंचे, यह एक लम्बी कहानी है। अजीव यात तो यह है कि ऐसे समय में देव भी पण्डित जी का विरोधी बन जाता था। शायद उसे भी ऐसे लाल- बुझक्कड़ से मजाक करने में आनन्द आता था। एक बार का जिक्र है कि लाला जी, जो पण्डित तेजमान के अभिन्न हृदय मित्र होते हुए भी सब शरारतों के वानी होते थे, जानकीनाथ के साथ कार्यवश स्टेशन को जा रहे थे। मार्ग में एक कुली ने, जो खुशबूदार आमों का टोकरा उठाये हुए था, उनके हाथ में काग़ज़ का एक पुर्जा दिया ताकि वे उन महाशय का पता बता दें, जिनका नाम उस पर लिखा था। पुर्जा देखते ही लाला जी की आंखें मुस्करा उठीं । हंसते हुए बोले, "हम तो इधर ही जा रहे थे।" फिर महता जानकीनाथ की ओर देख कर कहने लगे, "लो पण्डित जी, कष्ट से बच गये । यह आपके आम आ रहे हैं । आप इस काग़ज़ पर हस्ताक्षर कर दीजिए और आमों का टोकरा ले जाइए। आपके दोस्त ने आपको स्टेशन पर आने का कष्ट न दे कर स्वयं ही आग आपके घर भेज दिये । आप कह भी तो यही आये थे कि यदि मैं वक्त पर न पहुँचूं तो कृपा कर टोकरा मेरे घर भिजवा देना, चलो इस तकलीफ़ से बच गये, नहीं तो पूरा डेढ़ घंटा खराब हो जाता।" और जानकीनाथ को चुप सड़े देख कर आंस का इशारा ६ । उपेन्द्रनाथ अश्क ह सफल रहने वालों में वरावर-वरावर वाँट दी जाय ।" और यह कहते हुए लाला जी ने जानकीनाथ को आँख से इशारा किया। प्रस्ताव वेहद दिलचस्प था । पण्डित जी वोले, “यहाँ कीफ़ कहाँ से आयेगी ?" महता ने कहा, "पिछले दिनों मैंने दुकानदार के यहाँ पड़ी देखी थी। यह कह कर वे दुकानदार से छोटी-सी कीफ़ ले आये। तव पण्डित जी ने एक लम्बा ठहाका छोड़ कर इस प्रस्ताव को पास कर दिया और इतनी देर में लाला जी और महता साहब में आँखों-आँखों इशारे हो गये। सबसे पहले लाला जी ने अपनी नेकर में कीफ़ रख कर कंकड़ी फेंकी। वह उनकी नाक पर इस ज़ोर से लगी कि आँखों से पानी निकल आया। सव लोग हँसने लगे और पण्डित जी तो बहुत देर तक ग्रामोफ़ोन बने रहे। लाला जी ने तत्काल आठ आने निकाल कर पण्डित झंडालाल के हाथ में दे दिये, जो सदा ऐसे मौकों पर कोषाध्यक्ष का कर्तव्य निभाते थे। इसके वाद सबने वारी-बारी कोशिश की। सब असफल रहे । केवल रामभरोसे किसी तरह सफल हो गये। उन्होंने कंकड़ी जब फेंकी तो कोई आशा ही नहीं थी कि वह कीफ़ तो क्या उनके सिर पर भी गिरेगी, पर वे पीछे को कुछ ऐसे भागे कि वह कीफ़ में ही गिरी । उस वक्त सवने तालियाँ पीटीं। वाईस आदमिय की पार्टी थी। दस रुपया जुर्माना आ चुका था। केवल पण्डि तेजभान जी रह गये थे । यदि वे जीत गये तो क्या कहने पाँच रुपये ठस से उनके हो गये। उस दिन वर्षा और ठंड कारण उन्होंने चूड़ीदार पायजामा पहन रक्खा था। झट उ- कमीज़ कसी, इज़ारवन्द और कमीज़ों के मध्य में कीफ़ रख और कहकहा लगा कर ऊपर को मुंह करके ज्यों ही कं एक रात का नरक । २७ फेंकने लगे, तभी जानकीनाथ ने (जो पहले से ही तैयार थे) लोटा भर चश्मे का पानी भर-भर कीफ़ में उड़ेल दिया। एक तो बर्फ से भी ठंडा पानी, फिर चूड़ीदार पायजामा, न उतारा जा सके, न पहना जा सके। दोनों पांवों से पानी वह रहा था, फब्तियों-पर-फब्तियां कसी जा रही थी और पण्डित जी थे कि पूरे जोश से अपना दार्शनिक भाषण झाड़ रहे थे । इसके बाद उन पर क्या गुजरी और वे किस प्रकार ठिठुरते-ठिठुरते नौ मील चल कर कसुमटी पहुंचे, यह एक लम्बी कहानी है। अजीव वात तो यह है कि ऐसे समय में देव भी पण्डित जी का विरोधी बन जाता था। शायद उसे भी ऐसे लाल- बुझक्कड़ से मजाक करने में आनन्द आता था । एक वार का जिक्र है कि लाला जी, जो पण्डित तेजमान के अभिन्न हृदय मिन होते हुए भी सब शरारतों के बानी होते थे, जानकीनाथ के साथ कार्यवश स्टेशन को जा रहे थे। मार्ग में एक कुली ने, जो खुशबूदार आमों का टोकरा उठाये हुए था, उनके हाथ में कागज का एक पुर्जा दिया ताकि वे उन महाशय का पता बता दें, जिनका नाम उस पर लिखा था । पुर्जा देखते ही लाला जी की आंखें मुस्करा उठी। हंसते हुए बोले, "हम तो इधर ही जा रहे थे ।" फिर महता जानकीनाथ की ओर देख कर कहने लगे, "लो पण्डित जी, कष्ट से बच गये । यह आपके माम मा रहे हैं। आप इस कागज़ पर हस्ताक्षर कर दीजिए और आमों का टोकरा ले जाइए। आपके दोस्त ने आपको स्टेशन पर आने का कष्ट न दे कर स्वयं ही आम आपके घर भेज दिये । आप कह भी तो यही आये थे कि यदि मैं वक्त पर न पहुँचूं तो कृपा कर टोकरा मेरे घर भिजवा देना, चलो इस तकलीफ़ से बच गये, नहीं तो पूरा डेढ़ घंटा खराब हो जाता।" और फिर जानकीनाथ को चुप सड़े देख कर आंख का इशारा कर A
उपेन्द्रनाथ अश्क
"तो फिर अव खड़े काहे को हो ? मैं तो जाता हूँ माल
को । उन वकील साहब से मिल आऊँगा। अब तुम जानो
र तुम्हारे आम ।"
महता जानकीनाथ, जो ऐसे मामलों में लाला जी के दायें
थ थे, झट सव मामला समझ गये । आँखों-आँखों में सब कुछ
य हो गया। उन्होंने काग़ज़ पर हस्ताक्षर किये और कुली से
अपने साथ आने को कहा ।
लाला जी ने माल-रोड को मुड़ते हुए हँस कर कहा, "क्यं.
न हो भाई ! स्टेशन के वाबू मित्र हों और इतना भी आराम
न रहे ।" यह कह कर वे मानों उछलते हुए माल रोड की ओर
चल दिये।
पण्डित तेजभान बड़ी मुद्दत से इस बात का जिक्र कर रहे
थे कि सहारनपुर से उनके साले साहब बढ़िया आमों का एक
टोकरा भेज रहे हैं, लेकिन बदवख्ती देखिए कि जब आम आये
तो उनकी सुगन्ध भी न मिली, क्योंकि लाला जी के पहुँचते ही
महता साहब के मकान में सब मित्रों को निमन्त्रण दिया गया
और बड़े मजे से दावत उड़ायी गयी। जब आम समाप्त हो
चुके तब पण्डित जी भी घबराये हुए पहुँच गये। जिस समय
निमन्त्रण दिया गया था, वे घर पर नहीं थे। आते ही इधर
उधर देखे विना वोले, “यार, बुरा हुआ। किसी ने आमों के
मार्ग में ही हथिया लिया । मुझे कुछ काम था, इसलिए बिन
स्टेशन पर दे कर काम से चला गया। अपने घर का पता दे
माल बाबू से कह आया था कि टोकरा मेरे घर पहुंचा
इतने में मैं घर पहुँच जाऊँगा। जब घर आया, मालूम
कि कुली आया ही नहीं। काफ़ी प्रतीक्षा की, फिर भागा
स्टेशन पर पहुँचा । मालूम हुआ, रास्ते में ही कोई कु
ठग कर मेरे हस्ताक्षर करके टोकरा ले गया है।'
एक रात का नरक । २६ भोलानाथ ने कहा, "यानी तुमने हस्ताक्षर भी किये और तुम्हें आम भी न मिले। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि सोते में ही तुमने दस्तखत कर दिये हों और तुम्हें ऊंघते देख कर कुली टोकरा अपने साथ ही लेता गया हो।" इस पर फिर ठहाका पडा। झंडालाला वोले, "चलिए, यह अनिवार्य सैर हो गयी। दस मील का चक्कर पड़ गया होगा। आप बाहर निकलने से जो घबराते हैं, उसी का यह दण्ड परमात्मा ने आपको दिया है।" सब फिर हँसने लगे। इतनी देर में पण्डित जी मामला भांप गये। उन्हें महत साहव पर कुछ शक था। उनकी लिखावट वे भली-भांति पहचानते थे और महता साहब नीचा सिर किये हुए आम की गुठली ऐसे चूस रहे थे जैसे रस की अन्तिम बूंद तक चूस जाने में ही उनके जीवन-मरण का प्रश्न निहित हो । महता साहब से दृष्टि उठा कर जब पण्डित जी ने लाला जी की ओर देखा था तो उन्होंने चुपके से महता साहब की ओर संकेत कर दिया। जानकीनाथ ने भी देख लिया, मुस्करा दिये और उस टोकरे की ओर, जिसमें गुठलियां और छिलके पड़े थे, इशारा करके वोले कि उठा ले जाओ। उसी समय लाला जी ने कहा, "खुश-किस्मत हो तेज- भान ! वक्त पर ही पहुंच गये। यह एक आम बच गया है। लो, स्वाद तो चक्सो !" यह कहते हुए उन्होंने आम की फांक करनी शुरू की और जैसे बेखुदी में एक-एक फांक सवको बांटने लगे । जब गुठली हाथ में रह गयी तब बोले, "अरे ! सव बॅट गया, मैं तुमसे बातें करने में ही मग्न रहा । अच्छा यह गुठली ही देख लो, हिस्सा तो यह मेरा होता है, लेकिन, खर तुम्हारे लिए अब कौन-सी कुर्वानियां नहीं की और फिर गूदो तो सारा इसी में है।" - ३०१ उपेन्द्रनाथ अश्क पण्डित जी लहू के छूट भर रहे थे। उनकी आँखों में पानी छलक आया । एक चोरी, दूसरे सीनाजोरी! आम का स्वाद चखने को जी तो चाहा, पर जैसे चोरों से लुटा हुआ निराश व्यक्ति उनके हाथों किसी जेव में बचे रह गये चन्द पैसे भी क्रोध में उनके सामने फेंक देता है कि यह भी ले जाओ, उसी तरह बौखला कर पण्डित जी ने कहा, "इसे तुम्हीं रक्खो, इतनी बड़ी कुर्वानी क्यों करते हो !" तव'तुम्हारी किस्मत में इन सुगन्धित, सुस्वादु आमों का मज़ा चखना लिखा ही नहीं, यह कहते हुए लाला जी ने गुठली को चूसना शुरू कर दिया। उस समय फिर पण्डित जी का दाशनिक भाषण आरम्भ हुआ। दावत की हक़ीक़त खुलने पर यारों ने खूब कहकहे लगाये । वे सब अभी तक यही समझे हुए थे कि बच्चे की वर्ष- गाँठ पर महता साहब ने यह पार्टी दी है। पण्डित जी के क्रोध का सब नज़ला लाला जी पर गिरा। लाला जी ने झट उठ कर पण्डित जी के कान में कुछ कहा, जिससे वे कुछ शान्त-से दिखायी देने लगे और महता साहव को बदले की धमकी देते हुए लाला जी के साथ चले गये । यहाँ से इस नाटक का दूसरा अंक शुरू होता है । लाला जी ने पण्डित जी के सिर की कसम खा कर उन्हें यह विश्वास दिला दिया कि यह सव बदमाशी महता जानकीनाथ की है। "तुमने देखा नहीं लिखावट महता ही की थी," वे बोले, "मैं तो जैसे दूसरे गये, वैसे निमंत्रण पाने पर चला गया।" पण्डित जी को पहले ही महता साहब की लिखावट पर सन्देह था, इसलिए लाला जी की वातों में उन्हें सत्य की गन्ध मिली। इसके साथ ही लाला जी ने महता साहव को बुरा- भला कह कर उनसे बदला ले देने का यकीन भी पण्डित जी को दिला दिया।
एक रात का नरक । ३१
इसके बाद एक दिन सन्ध्या समय लाला जी ने पण्डित
तेजभान के कान में कहा, "लो भई, अव तुम्हारे बदला लेने
का वक्त आ गया है।"
"कसे ?"
"आज महता ने मुझे बताया है कि उसके मित्र देहरादून
से उसके नाम आम भेज रहे है। उसने मुझे बिल्टी (रेल की
रसीद) भी दिखायी है। बस वह आम मँगाये, मैं उसे अपने
कमरे में बुला कर बातों में लगा रक्स् , तुम उसके कमरे से
टोकरा उठवाओ और ब्राह्मण को नाऊ बन जाओ।"
पण्डित जी की आँखे चमक उठी । लाला जी के हाथ पर
हाथ मारते हुए हर्प के उन्माद मे उन्होंने कहा, "टिट फॉर
टंट!-जैसे को तैसा !" और इतना लम्बा कहकहा लगाया
कि पहले कभी न लगाया होगा। लाला जी की ओर से उनके
दिल पर जो घाव थे, वे सब भर गये। प्रसन्नता से बोले,
"ऐसे टोकरा उड़े कि वच्चा जी के देवताओं को भी पता
न लगे"
लाला जी ने कहा, "बस, वत्ती गुल और पगड़ी गायव ।
वह हमारे कमरे में और आमों का टोकरा तुम्हारे घर !"
वात तय हो गयी कि लाला जी महता को अपने कमरे में
बुला लेंगे और पण्डित तेजभान उसके कमरे से टोकरा उठा कर
घर ले जायेंगे । इस शर्त पर कि कम-से-कम एक चौथाई आम
लाला जी के घर अवश्य भेजे जायें।
उस दिन के बाद पण्डित तेजभान रोज दफ़्तर में लाला
जी के कान में कुछ पूछने लगे। एक दिन लाला जी ने बताया
कि टोकरा मा गया है और महता साहब के कमरे में पड़ा है।
तुम कुली का प्रबन्ध कर आओ। तब मैं महता को अपने कमरे में
बुला लूंगा। पण्डित तेजभान कमरे से निकलते मम हत
T
३२। उपेन्द्रनाथ अश्क । थे, मानो उनके हाथ कोई निधि आ गयी हो। दफ्तर के बाहर एक कुली भी जाता हुआ मिल गया। उसे वहाँ खड़े रहने का आदेश देकर उन्होंने लाला जी को सूचना दी कि कुली का प्रबन्ध हो गया है और फिर अपने कमरे में जा कर गम्भीरता से वैठ गये। मन में लड्डू फूट रहे थे, काम में कैसे जी लगता ? बेसब्री उन्हें महता जी के कमरे के सामने ले आयी । वे अभी काम कर रहे थे, पण्डित जी ने इधर-उधर निगाह दौड़ायी। कोने में एक टोकरा रक्खा था। मन की खुशी को मन ही में दवाते हुए वे फिर अपने कमरे में जा बैठे। उन्हें एक-एक पल एक-एक वर्ष के समान वीत रहा था। फिर महता साहब के कमरे की ओर गये । वे अब भी बैठे काम कर रहे थे । पण्डित जी दिल-ही- दिल में लाला जी को गालियां देने लगे, "ये मेरा मज़ाक उड़ा रहे हैं और कुछ नहीं । मुझे उल्लू बनाना चाहते हैं !"-उसी समय उन्होंने देखा, लाला जी का चपरासी आया और महता साहब उसके साथ हो लिये। पण्डित जी कन्नी कतरा गये। उनसे आँख न मिला सके। जब महता साहव निकल गये तव पण्डित जी भाग कर कुली को बुला लाये । उसका नम्बर लिया, धड़कते हुए दिल के साथ टोकरा उठवाया, अपना पता दिया और उसे रवाना करके अपने कमरे में जा बैठे। ऐसे चुप, जैसे साँप सूंघ गया हो। पूरी तरह गम्भीर बने बैठे थे, पर मन का आह्वाद चेहरे पर फूटा पड़ रहा था। दिल में वीसियों मनसूवे वाँधे जा रहे थे-क्यों न अभी सिर दर्द का वहाना करके खिसक जायें और देहरादूनी आमों का स्वाद चखें। नहीं, यह ठीक नहीं, कोई सिर हो जायेगा। यह महता भी खूब याद रक्खेगा ! चला था तेजभान से मजाक करने। मेरा टोकरा तो खैर आध मन का ही था। यह तो एक मन से कम न होगा । आम भी अच्छे मालूम होते ।
एक रात का नरक। ३३
कहा-
है । क्यों न हो ! देहरादूनी हैं ।
इसी तरह की बीसियों कल्पनाओं में उलझे पण्डित तेजभान
प्रकट बड़ी तन्मयता से काम में लगे थे। जब महता साहब ने
विलकुल समीप आ कर उनकी ठोढ़ी पकड़ कर मुंह ऊपर उठाया
और वोले, “वाह कैसे काम में लगे हो, जैसे यही शहीद हो
जाओगे?" तो और भी गम्भीर हो कर पण्डित जी ने
"नहीं, नहीं। आओ, आओ बैठो। यों ही आज जरा काम
ज्यादा है," यह कह कर उन्होंने महता साहब को कुर्सी दी।
उनकी इस धूर्तता पर जल कर महता ने कहा, "मियां,
सीधे हाथों टोकरा वापस कर दो। इन उड़नघाइयों से काम
नहीं चलेगा।"
पण्डित जी ने ऐसा मुंह बनाया, जैसे कोई समझ में न
आने वाली बात सुन रहे हों। आंखे फैला कर और मुंह को
तनिक-सा खोल कर हैरानी से बोले "क्या कहा ? टोकरा !
कैसा टोकरा? किसका टोकरा ?"
"मेरा आमों का टोकरा और किसका टोकरा ? पक्का
एक मन देहरादूनी आम थे । यों आसानी से हजम न होंगे।"
पण्डित जी ने आवाज में जरा सहानुभूति लाने का प्रयास
करते हुए कहा, "किसने उठा लिया तुम्हारा टोकरा । जरा
बैठो। कुछ ठीक तरह वताओ तो कुछ पता चले। मुझे तो
कुछ खवर ही नही !" यह कहते हुए उन्होंने कुर्सी महता साहब
के आगे सिसका दी।
महता ने खड़े-खड़े ही कहा, "वात यह है कि आज देहरादून
से मन पपके आम आये थे। मैं घर भिजवाने को था कि लाला
जी ने बुलवा भेजा । एक जरूरी काम था। वापस आया तव
आम नदारद...."
यह कहते हुए महता साहब ने कुछ ऐसा निराश मुंह बनाया
३४। उपेन्द्रनाथ अश्क
कि पण्डित जी अपनी हंसी न रोक सके, कहकहा छोड़ कर
वोले, "तुम्हारे साथ ऐसा ही होना चाहिए था। भगवान ने
मेरा वदला चुका दिया।"
महता साहब जैसे गिड़गिड़ाते हुए बोले, “परमात्मा की
सौगन्ध, उसमें मेरा ज़रा भी कुसूर न था। सब शरारत लाला
जी की थी। मैं तो एक टूल (साधन) था-महज़ एक टूल ।"
पण्डित तेजभान कुछ देर गम्भीर मुद्रा बनाये बैठे रहे, फिर
अचानक बोले, “वताऊँ ?" और महता साहब के कान के पास
मुंह ले जा कर कहने लगे, "यह भी लाला जी की ही शरारत
है, वस । मुझसे कसम ले लो। तुम्हारे आमों के आने का पता
भी नहीं।"
"अच्छा उनसे पूछ देखता हूँ।" यह कहते हुए महता साहब
मुंह लटकाये तेजी से बाहर निकल गये। जब वाहर वरामदे
में उनके पैरों की चाप दूर होते-होते बिलकुल बन्द हो गयी,
तव पण्डित तेजभान ने एक लम्बा कहक़हा लगाया और कुर्सी
में धंस गये । अब मालूम होगा बच्चा जी को, किस तरह दूसरे
की चीज़ उड़ायी जाती है ।
शाम को मित्रों ने वहुतेरा जोर दिया कि बड़े शिमले तक
हो आयें, पर पण्डित जी ने एक न सुनी। उनके मन में तो
आमों को देखने की, उनका स्वाद चखने की लालसा थी।
कहने लगे, “आज घर में तवियत खराब है, नौकर के हाथ
कहलवा भेजा था कि जल्दी आना, सो भाई जा रहा हूँ। मन
तो तुम्हारे ही साथ रहेगा, पर क्या किया जाय, मजबूरी है।"
ऐसे ही पीछा छड़ा कर पण्डित जी सरपट घर की ओर भागे।
उसी तरह जैसे त्योहार की शाम को स्कूल से छट्टी मिलने पर
लड़के घर को भागते हैं।
घर में पैर रखते ही बड़े रोव से उन्होंने पत्नी से पूछा,
एक रात का नरक । ३७
"उनकी पत्नी रात कहीं भाग गयी है न, थाने रिपोर्ट देने
गये हैं।" और गम्भीर मुद्रा के साथ आप वहां से चले गये।
अपनी लड़की के बारे में ऐसी बुरी खवर सुन कर उन सरल
हृदय वृद्ध के हाथ-पाँव फूल गये। यह तो भला हुआ कि
पण्डित जी की यह वात एक दूसरे क्लर्क ने सुन ली और वह
वापस भागते हुए वृद्ध को ले आया, नही तो उनके इस मज़ाक
से सरदार बूटासिंह और उनके ससुर और घर वालों को
कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता, इसका अनुमान
सहज ही मे किया जा सकता है
एक बार ऐसे ही किसी साहब ने रास्ते में पण्डित तेजभान
से लाला जी के बारे में पूछा, "सुनाओ पण्डित जी, कई दिनों
से लाला जी को नहीं देखा, कहां रहते हैं वे आजकल, उनके
घर तो कुशल है।"
श्मसान जैसा मुंह बना कर आपने कहा, "आपको नही
मालूम ?"
किसी अशुभ की आशंका करते हुए उन्होंने केवल आँखें
फैला दी।
"उनके पिता का देहान्त हो गया।"
"कब ?"
"चौथा भी हो चुका ।"
वह महाशय सब्जी लिये घर जा रहे थे। यह बात सुन कर
वहीं से लाला जी के घर को रवाना हो पड़े। वहां जा कर क्या
हुआ और उन्हें अपने बच्चों के साथ हँसते-हँसाते 'करम' खेलते
देख कर वे महाशय कैसे सकुचाये, यह बात बखूबी समझी जा
सकती है।
लाला जी और पण्डित जी में तो बचपन से चली आती
है। कॉलेज में दोनों इकट्ठे पढ़ते थे। वहाँ होस्टल में रात को
६। उपेन्द्रनाथ अश्क पण्डित जी ने अन्तिम रस्सी काटते हुए कहा, "तुम्हारी नाक सड़ गयी है । देहरादूनी आम हैं, देहरादूनी !" और जब पार्सल खुला तब दिमाग भन्ना गया। कमरे में सड़ांध फैल गयी। ऊपर दो आने पंसेरी वाले सड़े-गले आम थे और नीचे वह सब कूड़ा-करकट था, जो महता साहव ने जमादार से कह कर भरवाया था। पत्नी नाक पर हाथ रक्खे और 'देख लिये तुम्हारे देहरादूनी आम,' कहती हुई तिनकती दूसरे कमरे में चली गयी और पण्डित जी महता साहव और लाला जी को हज़ार- हज़ार मल्लाहियाँ सुनाते और शून्य में ही अपना दार्शनिक भापण झाड़ते मकान से बाहर निकल गये ताकि किसी को दस-बारह आने दे कर उस मन भर कूड़ा-करकट के अम्बार के कहीं दूर फिकवायें। वाहर महता साहब और लाला जी के सिवा बाकी स मित्र-मंडली और मासूमियत दिखाने और जले पर न छिड़कने के लिए मौजूद थी। किन्तु यह चित्र का एक रुख है। पण्डित जी भी मौका मि पर नहीं चूकते । उनका मज़ाक भी प्रायः असह य होत अन्तर केवल इतना है कि जिसे वे मज़ाक करें, उसके अनेकों होते हैं, परन्तु उनसे सहानुभूति के शब्द वाला कह नहीं होता । जो भी आता है, जले पर नमक छिड़क जा एक बार लाहौर की बात है, आप दफ्तर में अप के बाहर टहल रहे थे कि एक सफ़ेद-रीश बुजुर्ग जो बूटासिंह के ससुर थे, उन्हें मिलने दफ्तर में आये तेजभान को वाहर खड़े देख कर उन्होंने पूछा, सिंह कहाँ होंगे।" १. श्वेत दाढ़ी वाले "सर
एक रात का नरक । ३७
"उनकी पत्नी रात कहीं भाग गयी है न, थाने रिपोर्ट देने
गये है ।" और गम्भीर मुद्रा के साथ आप वहां से चले गये।
अपनी लड़की के बारे मे ऐसी बुरी खबर सुन कर उन सरल
हृदय वृद्ध के हाथ-पांव फूल गये। यह तो भला हुआ कि
पण्डित जी की यह बात एक दूसरे क्लर्क ने सुन ली और वह
वापस भागते हुए वृद्ध को ले आया, नही तो उनके इस मजाक
से सरदार बूटासिंह और उनके ससुर और घर वालो को
कितनी परेशानी का सामना करना पड़ता, इसका अनुमान
सहज ही मे किया जा सकता है।
एक वार ऐसे ही किसी साहब ने रास्ते में पण्डित तेजभान
से लाला जी के बारे में पूछा, “सुनाओ पण्डित जी, कई दिनों
से लाला जी को नहीं देखा, कहाँ रहते हैं वे आजकल, उनके
घर तो कुशल है।"
श्मसान जैसा मुंह बना कर आपने कहा, "आपको नहीं
मालूम ?"
किसी अशुभ की आशंका करते हुए उन्होंने केवल आँखें
फैला दी।
"उनके पिता का देहान्त हो गया।"
"कव ?"
"चौथा भी हो चुका।"
वह महाशय सब्जी लिये घर जा रहे थे। यह बात सुन कर
वहीं से लाला जी के घर को रवाना हो पड़े। वहाँ जा कर क्या
हुआ और उन्हें अपने बच्चों के साथ हँसते-हँसाते करम' खेलते
देख कर वे महाशय कैसे सकुचाये, यह वात बखूबी समझी जा
सकती है।
लाला जी और पण्डित जी में तो बचपन से चली आती
है। कॉलेज में दोनों इकठे पढ़ते थे। वहाँ होस्टल में रात को
३८ । उपेन्द्रनाथ अश्क
वड़ा शोर होता था। नित नये मज़ाक होते, एक-दूसरे को
तंग करने की नित नयी तरकीबें निकाली जाती थीं। आज सब
के जूतों का एक-एक पाँव गुम है, तो कल सव की ऐनके
ग़ायव । एक वार किसी ने मज़ाक की नयी तर्ज़ निकाली-
एकदम मौलिक ! वह यूं कि एक लड़के के सिरहाने रखी हुई
सुराही उठा कर उसके पानी में रंग मिला दिया और उसे बिस्तर
पर रख दिया। ज्योंही कुछ देर बाद उस छात्र ने करवट
बदली, सव पानी घर-घर करके बिस्तर पर बह गया और
वह छात्र सिर पीटता रह गया। इसके बाद यह रस्म आम हो
गयी। हर रात किसी-न-किसी छात्र का विस्तर भिगो दिया
जाता। एक रात लाला जी और पण्डित जी को एक ही समय
पर लघुशंका हुई। पहले लाला जी फ़ारिंग हो आये और जब
पण्डित जी लैटरिन गये तो लाला जी को शरारत सूझी।
होस्टल में एक सड़ियल मिजाज़ छात्र भी रहते थे । आज तक
किसी ने उनसे मज़ाक का साहस न किया था, जो मज़ाक सह
ही न सके उससे दिल्लगी करना बेकार है। रोज़ यही शरारत
होने से छात्रों ने सुराहियाँ ही रखना छोड़ दिया था। एक वे
महाशय अपनी अकड़ में सुराही रखा करते थे। लाला जी ने
चुपके-से उसकी सुराही उठा कर उनके सरहाने रख दी और
जा कर लेट रहे । जब पण्डित तेजभान इज़ारबन्द बाँधते हुए
आये तो लाला जी ने एक कंकर उठा कर उस लड़के को दे
मारा। वह हड़बड़ा कर उठा ।सुराही उलट गयी। विस्तर भीग
गया। एक तो कच्ची नींद में जागने का रंज, दूसरे विछौने के
भीग जाने का शोक, और विषैली तवियत, उसने आव देखा
न ताव, उठ कर पण्डित जी के मुंह पर इतने ज़ोर से थप्पड़
मारा कि पण्डित जी का दिमाग चकरा गया।
"पाजी कहीं का, रोड़ा फेंक कर इज़ारवन्द कसने लगा
एक रात का नरक । ३६
है।" इधर पण्डित जी बदहवास-से, भौंचक्के-से खड़े थे, उधर
लाला जी के पेट में बल पड़ रहे थे।
पण्डित जी चाहे कैसे कड़ियल जवान हैं, लेकिन उन्होंने
किसी पर हाथ उठाया हो, ऐसा कभी नहीं हुआ। भीगी विल्ली
बने सब कुछ सह गये । हाँ, लाला जी के साथ कई रोज़ तक
न बोले।
चार छोटे शिमले से सी-पी नौ मील दूर है, यह मैंने सुन रखा था और यह भी सुना था कि मार्ग सीधा-सरल, उतार-चढ़ाव से रहित, सुन्दर और सुरम्य है, किन्तु कभी इन नौ मीलों को, जो लम्बे होते हुए भी अपने सुन्दर दृश्यों के कारण प्रिय के मिलन-दिवस की तरह छोटे थे, तय करने का सौभाग्य नहीं मिला था। सी-पी के मेले ने मुद्दत से उस सड़क और शिमले के उस ओर के इलाक़ का नजारा करने की मेरी सोयी हुई इच्छा को जगा दिया। छोटे शिमले से चले तो संजौली तक कुछ चढ़ाई रही, लेकिन सड़क का यह टेड़ा-मेढ़ा ऊँच-नीच टुकड़ा भी सुरभ्यता में कम न था । एक ओर जाकू (पहाड़) मस्त हाथी की तरह लेटा था, दूसरी ओर गहरी खड्ड, जैसे उनकी महानता के चरणों में शीश नवा रही थी, धूप खूब तेज़ थी, किन्तु केलू के लम्बे-ऊँचे सघन छतनार पेड़ गर्म हवा का सारा ताप हर रहे थे। हल्की प्रसन्न हवा धीरे-धीरे रमक रही थी। रास्ते में संजौली के कुछ ही इधर दृश्य अत्यन्त मनोरम, किन्तु आतंक- पूर्ण था। वाई ओर पहाड़ एकदम सीधा और ऊँचा खड़ा था। दाहिनी ओर बहुत गहरी घाटी थी और मध्य में थी सड़क । ऊपर देखो तो सीधी ऊँचाई से हृदय पर आतंक छा जाय, नीचे देखो तो गहराई को देख कर मन में हौल पैदा हो जाय । डाइनामाइट में काटे जाने पर पहाड़ में जो खराशें पड़ गयी थीं, उनसे पानी चू रहा था। हवा के हल्के झंकोरों से हिल-मिल जाने वाले बूंदों के वेपरवा कण इस स्थान को अत्यन्त शीतल वना रहे थे। मैंने अनायास कहा, “वड़ी सुन्दर जगह है ।
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२। उपेन्द्रनाथ अश्क . रोज निकालते। वहाँ यदि आप पहाड़ के निकट से देखें तो आपको बहुत से ऐसे चिह्न दिखायी भी पड़ेंगे, जैसे किसी ने पहाड़ को खुरचा हो। ये किसी औज़ार के नहीं, वरन उन छेदों के हैं, जिनमें डाइनामाइट की बत्तियाँ रख कर पहाड़ को उड़ाया गया था। इसी डाइनामाइट के आविष्कार से करोड़, रुपया पैदा करके नोवेल साहब एक स्थायी पुरस्कार की व्यवस्था कर गये हैं, जो भारत में कवि-सम्राट रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रसिद्ध वैज्ञानिक रमन को मिल चका है....।" ला० गंडामल न जाने और कितनी देर तक नोवेल साहब तथा उनके पुरस्कार के सम्बन्ध में साथियों का ज्ञान-वर्धन करते रहे, पर मेरा ध्यान उधर से हट गया। संजौली आ गयी थी। सामने जहाँ जाकू के गिर्द घूमने वाली सड़क वायीं ओर को घूमती थी, वहीं सड़क से एक रास्ता निकल कर घाटी के ऊपर से हो कर संजौली के बीचों-बीच होता मशोबरे को जाता था। सामने घाटी के सिरे पर ऊपर से नीचे तक सँजौली के मकान बड़े खूबसूरत लग रहे थे । संजौली शिमले की एक छोटी-सी वस्ती है। शिमले की घनी आवादी से तंग आये हुए लोग यहीं शरण पाते हैं । शिमले में एक सड़क जाकू के गिर्द घूमती हुई यहाँ पहुँचती है। इन चक्कर को 'जाकू राउंड' कहते हैं। कुल छै मील का चक्क पड़ता है। छोटे शिमले से जायें तो केवल चार मील चलने ही संजौली के दर्शन हो जाते हैं। यदि 'लक्कड़ बाज़ार जायें तो दो मील के वाद संजौली दिखायी पड़ जाती है। सिलसिले में यह बात उल्लेखनीय है कि जाकू के गिर्द । वाली सड़क माल रोड से ही शुरू होती है और वहीं जा खत्म हो जाती है । चाहे किधर से जायें-छोटे शिमले 3 अ लक्कड़ बाजार से-यदि आप पूरा छै मील का चक्कर ल एक रात का नरक। ४३ तो जहां से चले हैं, वहीं आ जायगे । हाँ, एक और चक्कर भी है, जो गिरजे के मैदान से शुरू हो कर वही आ कर समाप्त हो जाता हैं। इसे 'छोटा जाकू राउंड' कह सकते हैं, किन्तु जाकू का पूरा चक्कर छ मील का ही है। जाकू राउंड लगाने वाले सैर के शौकीन कुछ पल सँजौली में ज़रूर रुकते हैं। संजौली के बाजार में कुछ खा-पी कर और 'हंटले एण्ड पामर्स' के विस्कुटों के तीन डिब्बे ले कर, जिनमें से एक रसास्वादन करते-करते ही समाप्त हो गया, हमारी पार्टी मशोबरे की ओर चली। क्योंकि सी-पी मशोबरे के नीचे घाटी में वसा है। कुछ ही दूर पर एक सुरंग मिली । यह सुरंग रेलगाड़ी की सुरंग की तरह अँधेरी नहीं, बल्कि इसमें एक सिरे से दूसरे सिरे तक सफ़े दी पोती गयी है और यात्रियों के सुविधा के लिए विजली के लैम्प भी लगे हैं। सुरंग में प्रवेश करते ही ठंडी हवा के एक मनोहारी झोंके ने हमारा स्वागत किया। प्रायः सवने अपनी टोपियां-पगड़ियां उतार ली और एक-दो लम्बे सांस खीचे । शिमले में उन दिनों प्रायः सर्दी होती है, लेकिन दो-तीन दिन पहले वर्षा का एक तरेरा पड़ा था, इसलिए सुरंग की ठंडी हवा में उतना ही मानन्द मिला, जितना प्यासे को पानी पीने पर । इतनी चौड़ी, सुन्दर और साफ़ सुरंग शिमले में नहीं है । माल के नीचे लोअर बाजार को ईदगाह से मिलाने वाली सुरंग इससे लम्बी चाहे फ्यादा हो, पर इतनी चौड़ी और साफ़-सुथरी नहीं। सुरंग से निकलते ही जब पीछे मुड़ कर देखा तो सिर पर एक रुंड-मंड टीला दिखायी पड़ा । उसका एक बहुत बड़ा भाग बाहर को बढ़ा हुआ था, जैसे सुरंग से पार जाने वालों को 'गुड-वाई' कह रहा हो । यहाँ से सड़क यद्यपि कई जगह मुड़ती है, लेकिन इसमें ऊँचाई-नीचाई नहीं। बड़ी चौड़ी, सली 1 उपेन्द्रनाथ अश्क तल सड़क है। सिर्फ एक दोप है। इस पर केल के गगन- म्वी छतनार पेड़ नहीं हैं । जैसे इस ओर की पहाड़ियाँ रुड- ड हैं, वैसे ही सड़क भी है। कुछ वर्ष हुए लेडी वेलिंग्डिन की कृपा से मार्ग में थोड़ी-थोड़ी दूर पर पौधे लगाये गये हैं, जो समय पा कर वृक्ष वन जायेंगे, किन्तु यह मनुष्य के हाथ से लगाये गये पौधे मनुष्य को बनाने वाले के हाथ से लगाये गये वृक्षों से सुन्दर होंगे या नहीं, यह निश्चय के साथ नहीं कहा जा सकता । हाँ, एक बात निश्चित है। यदि वे पौवे बड़े हो कर सुन्दर लगते तो इसका कारण होगा उनमें एक-दूसरे के वीच कृत्रिम अन्तर और यदि यहाँ प्राकृतिक वृक्ष होते तो उनकी नैसर्गिक घनिष्ठता। संजौली से सुरंग.कोई एक फ़र्लान्ग की दूरी पर है और सुरंग से मशोवरा कोई छः मील । सड़क पर खूब चहल-पहल थी। फ़ौजी गाड़ियाँ धूल उड़ाती चली जाती। कभी-कभी कोई कार भी गुज़र जाती; वरना पहाड़ी लोगों का एक रेला था जो अनवरत वह रहा था हमारे आगे-आगे एक पहाड़ी स्त्री नंगे सिर, वाल सँवारे, गले में वाटरप्रूफ़ ओवर कोट पहने पाउडर और सुर्सी से काले मुंह को चमकाये, कमर में तहवन कसे और पैरों में पम्प शू पहने अपने साथियों से हँसी-ठिठो करती हुई चली जा रही थी। किसी पहाड़ी रमणी को वेश-भूषा में देखने का मेरा यह पहला ही अवसर था। में मालूम हुआ कि वह जाकू पर रहने वाली वारांगना से एक थी। लगभग डेढ़ मील चलने पर एक जगह इस सड़क में से एक और सड़क आ मिली। यह रास्ता किधर को और किधर से आया है, यह जानने के लिए मेरा मन हो उठा और जव मुझे बताया गया कि यह मार्ग सँज
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४६ । उपेन्द्रनाथ अश्क । से भरी हुई दिखाई देती थीं। पार्टी के एक-दो आदमी दुकान पर सुस्ताने को बैठ गये। एक-दो नाशपातियाँ भी छोलीं और खायीं। इधर-उधर दृष्टि डालने पर दुकान के बाहर एक ओर खड़िया मिट्टी से हिन्दी में 'चरस' लिखा हुआ दिखायी पड़ा। दुकानदार की मदभरी आँखों का रहस्य अब खुला । तो यह अफ़ीम-चरस आदि का ठेका है ! पूछने पर इसका समर्थन भी हो गया। वहाँ भाँग, चरस, पोस्त और अफ़ीम मिल सकती थी। स्वयं दुकानदार महाशय पक्के नशेड़ी थे। 'मल्लाह दा हुक्का सुक्का' वाली कहावत के वे अपवाद थे। धनाभाव और फ़ाकामस्ती के वाद अभागे पहाड़ियों के शरीर में जो लहू वच जाता है, उसे वे नशे से समाप्त कर देते हैं । जान-बूझ कर करते हैं अथवा तल्ख जिन्दगी से पलायन उन्हें विवश कर देता है, यह कौन कहे। इस दुकान के साथ एक बूढ़ा कश्मीरी विसाती सस्ती चीज़ों की हाट सजाये बैठा था। उसकी गोल दाढ़ी, गंजा सिर, पिलपिला मुंह और पीले दाँत मुझे कभी न भूलेंगे। वह हँसमुख भी था। हमें कुछ लेना-देना तो था नहीं, तो भी हम उसकी हरेक वस्तु को उलट-पलट कर देखने लगे, पर उसने तेवर तक नहीं बदले। पण्डित तेजभान के मज़ाक पर वह केवल हंसता रहा । इस वक्त भी उसकी सूरत और उसकी वह हँसी मेरे सामने है और वह उसी तरह हँस कर कह रहा है-'कोई अपनी तवीयत खुश कर ले, हमारा क्या जाता है।' दाहिनी ओर एक छोटा-सा मार्ग नीचे को जाता था । वहीं एक नोटिस-बोर्ड लगा था, जिससे उस ओर जाने का निषेध १. एक पंजाबी मिसाल, जिसका मतलब है कि मल्लाह का हुक्का सूसा ही रहता है, याने, पानी में रह कर भी उसे पानी भरने का अवकाश नहीं रहता। - एक रात का नरक।४७ %3A था। पूछने पर भी इस मनाही का कारण मालूम न हो सका। शायद वहां पानी का बांध था या कोई और वात थी। यकीनी तौर पर इसका कोई पता न लगा सका। हां कुछ पीछे, जो सुन्दर मोटर का रास्ता सीढ़ियों की-सी तरह नीचे उतरता था उस पर जाने की मनाही होने के कारण का यहां पता चल गया । वह शिकारगाह को गया था, जो दाहिनी ओर की घाटी में बनी थी। वह सरकारी शिकारगाह थी और वहाँ शिमला के प्रभुओं के अलावा किसी दूसरे को जाने की इजाजत न थी। । आगे चलने पर दायीं ओर घाटी की बजाय पहाड़ शुरू हो गया और बायीं ओर वह सुन्दर घाटी दिखाई देने लगी जो मशोबरे तक चली गई है। इसमे मशोबरे की ओर सिर किये हुए पहाड़ लेटे दिखाई देते हैं । जिस तरह मनुष्य सिर के नीचे सिरहाना रखकर उसे ऊंचा कर लेता है और उसके पैरों की ओर हल्की ढलान बन जाती है उसी तरह इन पहाड़ियो के सिर भी ऊँचे दिखाई देते हैं और ये कई मीलों तक हल्की ढलान में लेटी हुई नज़र आती हैं। इन सोई हुई पहाड़ियों के पांवों में एक नाला वल साता हुआ दिखाई दे रहा था । उन दिनो उसमै ज्यादा पानी न था लेकिन जुलाई और अगस्त के महीनों में तो उसकी शान देखने के लायक होती होगी। उसी नाले के जरा ऊपर घाटी में उस रियासत की राजधानी है जिसकी सीमा में सँजोली, मशोवरा और सीपी आवाद हैं । राजधानी का नाम 'क्यार' है। कोटी सी-पी से परे स्थित है। दोनों को मिला कर रियासत का नाम 'क्यार-कोटी' प्रसिद्ध है। पर संक्षेप में इसे कोटी ही कहते हैं। किसी बडे पक्षी के फैले हुए डनों ऐसी घाटी में धूप में चमकती क्यार के मकानों की ४८ । उपेन्द्रनाथ अश्क । टीन की छतें बहुत भली लगती थीं। कोई ढाई मील चलने के बाद एक सड़क ऊपर चढ़ गयी है। यह 'वाइल्ड फ्लावर हाल' से होती हुई 'कुफ़री' को जाती है। कुफ़री तक चढ़ाई-ही-चढ़ाई है। सैर के शौकीन ठठ-के-ठठ बाँधकर कुफरी की सैर को जाते हैं। सारा दिन वहाँ बिताते हैं और साँझ को वापस लौटते हैं । वहाँ एक सराय भी है। वर्षा हो तो उसमें विश्राम किया जा सकता है । यदि रास्ते में वर्षा आरम्भ हो जाय तो भीगने में जो मज़ा आता है, उसे जवान लोग ही ले सकते हैं। रास्ते के इस ओर दूसरे प्रसिद्ध स्थानों में ढल्ली और मालेरकोटला के नवाव के महल उल्लेखनीय हैं। ढल्ली भी एक सराय है। वहाँ भी शिमले के लोग पिकनिक को जाते हैं। वहाँ आने वाले प्रायः परिवार समेत जाया करते हैं और विस्तर इत्यादि साथ ला कर रात को वहीं विश्राम करते हैं । मालेरकोटला के नवाव के महल के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता । अन्दर से देखने का अवसर नहीं था। हाँ, द्वार पर कुछ एक वर्दीपोश सिपाही चाक-चौवन्द खड़े देख कर सिर्फ यही कहा जा सकता था कि कोई ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा उसके अन्दर नहीं जा सकता। मशोबरे से कोई डेढ़ मील इस ओर वह स्थल है जिसके बारे मैं सुना था कि वड़ा सुरम्य है। इस जगह दाहिनी ओर पहाड़ बहुत ऊँचा है और सड़क के आधे भाग पर छाया हुआ है। रास्ता काटने वालों ने उसे बारहों महीने गिराना जरूरी नहीं समझा। आधी मेहराव-सा पूरी सड़क पर छाया, वह दिल में वेतरह हौल पैदा करता है। उसमें से पानी की बूंदें सड़क पर झरती रहती हैं और उस जगह को ठंडा रखती हैं। सड़क के एक रात का नरक। ४६ बायीं ओर मुसाफिरों के बैठने के लिए चौड़े-चौडे पत्थरो की टेरिस-सी बना दी गयी है । सारी-की-सारी पार्टी यहो कतार बांध कर बैठ गयी। एक बार और पगडियां और टोपियां उतारी गयीं और ठंडी हवा में लम्बे-लम्बे सांस लिये गये । मार्ग की धूप ने झुलस डाला था और फ़ौजी मोटरों को बेतहाशा चलने और अगणित तमाशाइयों की आमद रफ्त के कारण गर्द से चेहरे अट गये थे और कितनी ही मिट्टी कठ में उतर गयी थी । सामने पहाड़ के नीचे एक छोटा-मा झरना, छोटी- सी धार में निरन्तर वह रहा था। वहाँ हाथ-मुंह धो और चाक-चौबन्द हो हम फिर चल पड़े । सँजोली के समीप जो इसी तरह की जगह है, उससे यह कहीं अधिक सुरम्य है-हो, डरावनी भी ज्यादा है। डर लगा रहता है कि कहीं ऊपर से पहाड़ का कोई खंड निरन्तर पानी से सिंचते रहने के कारण अलग हो कर न गिर पड़े और नीचे जाने वाले की इह-लीला न समाप्त कर दे। यहां से मशोबरा केवल डेढ़ मील है। चीड़ के वृक्षों का इस जगह वाहुल्य है । टहनियो के सिरों पर हरे-हरे लम्बे- पतले लचीले कांटों के गुच्छे से हवा में फहरा रहे थे । ठंडी हवा रमकने लगी थी । कहीं-कहीं पहाड़ियों की टोलियों पहाड़ी गीत गाती हुई गुज़र जाती थीं। मशोबरा आ गया। इस घोटी-मी बस्ती में खूब चहल- पहल थी। यह भी संजौली की तरह शिमले ही की एक वस्ती है। नाबादी से किंचित दूर निवास करने के इच्छक अंग्रेज़ और अंग्रेज़-नुमा हिन्दुस्तानी वहां रहते हैं । एक वायसराय हाउस भी है। वहां वायसराय कभी-कभी आ कर ठहरा करते हैं। मुझे याद है कि बाद में हमने उसके बगीचे के सेबों को भी चमा था । संयुक्त शान्त के एक मुसलमान के पास उमका ठेका था।
1 उपेन्द्रनाय अश्क व दिलचस्प आदमी था। यहाँ 'गेवल्स होटल' के नाम से एक बड़ा भारी होटल भी है। एक अंग्रेज़ के संचालन में बड़ी अच्छी तरह चल रहा है। सम्पन्न लोग ही यहाँ ठहरते हैं । इसी होटल के नीचे सड़क से एक मार्ग सी-पी को जाता है, जो यहाँ से कोई डेढ़ मील की उतराई पर एक सुरम्य जगह में स्थित है । असली नाम सीपुर है । सी-पी उसका संक्षिप्त और प्रचलित नाम है । यहाँ रीडर तथा दूसरे अहलकारों को साथ लिये कोटी के टिक्का साहब मेहमानों की अगवानी को खड़े थे। राजपूतों-जैसी शिमले वाली लम्बी लाल पगड़ी, काला अचकन, चूड़ीदार पायजामा, नोक- दार जूता लम्बी-लम्बी मूंछे, पतले से नाटे कद के चुस्त आदमी थे । आयु कोई तीस-पैंतीस वर्ष की होगी। हमारे देखते-देखते एक मोटर वहाँ उतरी और एक लम्बी-सी वल्लम हाथ में लिये एक रमणी के साथ एक लम्बे ऊँचे साहब उतरे। पूछने पर मालूम हुआ कि ये जंगी लाट हैं । टिक्का साहब को उनक स्वागत करते हुए छोड़कर, मशोबरे में मोल ली हुई खूबानि खाते हुए हमने सी-पी को प्रस्थान किया। नीचे-बहुत न वाजों और मेले में आये हुए लोगों की चिल्ल-पों का मि जुला शोर ऊपर मशोबरे तक आ रहा था। मेरी उत्सुकता को पंख लग गये थे, किसी पहाड़ी मे देखने का मेरा यह पहला ही अवसर था। शहरों में ऐसे प्रायः होते हैं, जिनमें मदिरा-पान और जुआ होता है गीत गाये जाते हैं और लड़ाई-झगड़े भी होते हैं । कर्तार वैसाखी और जालन्धर का दशहरा ऐसे ही मेले हैं। इ में जाट प्रतिवर्ष नयी-नयी वोलियाँ (अश्लील गीत और गाते हैं और यहाँ से निकली हुई वोलियाँ सा गुण्डों और बिगड़े दिल वालों की ज़बान पर रहती एक रात का नरक। ५१ । । मेलों में स्त्रियां प्रायः नहीं जाती या जाती हैं तो गुरुद्वारे की चारदीवारी से बाहर नहीं निकलती । यहां सी-पी के बारे में सुना कि स्त्रियों का खासा जमघट होता है । इसके अतिरिक्त और बहुत-सी बातें सुनी थीं, जिन पर मन विश्वास न करता था। इन सब बातों को प्रत्यक्ष देखने की इच्छा ने पांवों में पंस लगा दिये थे। यह डेढ़-दो मील का उतराई का रास्ता पलक झपकते समाप्त हो गया और हम सी-पी पहुँच गये। मशोबरे से सी-पी को जाने का मार्ग सँजोली से मशोवरे को जाने वाली सड़क की तरह वृक्षों से रहित नहीं है। यहाँ खूब छतनार के पेड़ हैं । इस इलाके में पहुंचते ही केलुओं से छन कर आने वाली ठंडी हवा ने रास्ते का सारा ताप हर लिया। सीपी में तो खूब ठंड थी । यह जगह घाटी के नीचे एक छोटे-से मैदान में स्थित है, किन्तु मैदान इतना बड़ा नहीं कि सारा मेला उसमें लग सके । इसलिए वह ऊपर और नीचे की ओर फैल जाता है। बाजार भी पहाड़ी नदी की तरह एक- दो बल खाता हुवा नीचे मैदान को गया है। दुकानें प्रायः वृक्षों के नीचे सजती हैं। यहां पहुंचते ही इस गहराई में पानी के प्रवन्ध पर आश्चर्य हुआ। पानी यहां बहुत दूर से भाता है और टीन की एक बड़ी-सी टंकी में गिरता है, जिसमें टोटियों लगी हैं। यह पानी बहुत ठंडा था । वाद में मालूम हुआ कि यहाँ एक प्राकृतिक झरना है और मेले के लिए प्रति वर्ष अस्थायी टोटियां लगा दी जाती हैं । वास्तव में इस इलाके में कितने ही ऐसे झरने हैं, पर सीपुर के झरने का पानी जितना मीठा और स्वादिष्ट है, वैसा किसी का नहीं । सबने हाथ-मुंह धो कर एक- दो घुट पिये। पानी की टंकी के साथ ही एक खेमा लगा हुआ था, जिसके बाहर चाय के बर्तन पड़े हुए थे। यहाँ चाय के शौकीनों के लिए विस्कुट, तोश और चाय का प्रवन्ध था। इसके ।
उपेन्द्रनाथ अश्क तनिक नीचे दो मार्ग हो गये थे। एक जनता के लिए था, पदाधिकारियों के लिए.। दूसरे मार्ग पर एक दरवाज़ा हुआ था, जिस पर अंग्रेज़ी में 'वेलकम' लिखा हुआ लगा । यहाँ एक लोहे की डेढ़ रुपये वाली कुर्सी भी रखी थी और पर एक वृद्ध पण्डितों जैसी- पगड़ी वांधे बैठे थे । गले में रदौज़ी का चोगा पहने हुए थे और कमर में चूड़ीदार पाय- मा था । इनके पास ही एक वृद्ध, लेकिन चुस्त व्यक्ति श्वेत चकन पहने डटे हुए थे । दरवाज़े पर एक गोरे रंग का युवक वी ब्लू रंग का ब्लेज़र और वर्टेड की पतलून कसे खड़ा था। पूछने पर मालूम हुआ कि ये क्रमशः कोटी के राणा, उनके मन्त्री तथा रीडर हैं। किसी रियासत के राणा को एक टूटी-सी लोहे की कुर्सी पर बैठे हुए देख कर मैं आश्चर्य से उनकी ओर देखता रह गया। हम वहाँ कुछ देर तक के लिए खड़े रहे । हमारे देखते-देखते वहाँ एक अंग्रेज़ आये। उससे पहले रीडर, फिर मन्त्री ने बातें. की और फिर मन्त्री ने राणा साहब से कुछ कहा। इसके बाद राणा साहब ने खड़े हो कर उनका अभिवादन किया। इसके बाद वे भी राणा साहब की बग़ल में एक लोहे की कुर्सी पर बैठाये गये । ऐसा लगा कि राणा साहव अंग्रेज़ी नहीं जानते, इसीलिए उन्हें दुभाषिये की आवश्यकता रहती है । या यदि वे अंग्रेजी जानते हैं तो केवल काम-चलाऊ ही। मुझे यह बात किसी से पूछने की लालसा ही रही, लेकिन उस समय पार्टी के सब लोग आगे बढ़ कर मेला देखने और कहीं एकांत स्थान ढूंढ कर पेट-पूजा का प्रवन्ध करने के लिए वेताव थे। वहाँ से हम निचले मार्ग से बाजार की ओर बढ़े। कुछ दूर जाने पर ऊपर का मार्ग भी इस रास्ते में आ कर मिल गया दोनों के संगम पर तिब्बती लोग अपना सामान विछाये बै .
एक रात का नरक। ५३ । थे। उनके पास चीनी के वर्तन, कदाचित सेकेंड हैड पत्थर की प्यालियां और दूसरा विसाती का सामान था। इन सब में सबसे अच्छी विक्रेता एक स्त्री थी। उसका नाम लक्ष्मी था। वह शुद्ध हिन्दी और काम चलाने के लायक अग्रेजी बड़ी फुर्ती से बोल लेती थी। ग्राहक को बातों में उलझा कर उससे दुगने दाम ले लेना उसके बायें हाथ का खेत था। उसे अंग्रेजों और भारतीयों का अन्तर भी अच्छी तरह मालूम था। कुछ चीजें उसने फेवल अंग्रेजों के लिए ही रख छोड़ी थीं। हमारे देखते- देखते उसने एक पत्थर की हरे रंग की प्याली एक अंग्रेज युवती के हाथ दो रुपये में बेच डाली । मैं अथवा हमारी पार्टी मे से कोई दूसरा इस प्याली के लिए मुश्किल से चार आने भी न देता। उसकी अंग्रेजी बोलने की क्षमता पर चकित हो कर एक अंग्रेज अफ़सर ने अपने साथी से अग्रेजी मे कहा, "यह देखो, तिब्बती औरत कसे फ़रफर अंग्रेजी बोल रही है ।"....यह तिव्वती स्त्री शिलाजीत भी वेचती थी, जो गोन्द अथवा सडे हुए गुड़ के सिवा कुछ न था। लेकिन इस बात का पता तो मुझे बाद में चला । उस वक्त तो उसने हमसे चार-चार आने ठग लिये। आगे चलने पर हलवाइयों की दुकानें आयीं । तभी पण्डित तेजभान ने वायीं ओर संकेत करते हुए मुझे बताया-"वहाँ मीना बाजार लगता है।"...लेकिन उस समय सबको कहीं आराम से बैटने और नौ मील चलने से अपने थके हुए पैरों को विधाम देने की जल्दी थी, इसलिए उघर ध्यान न दे कर सीधे बाजार में उतरते चले गये। हलवाइयों की दुकानों के यागे जए की दुकानें थीं और उसके बाद जरा-सा खला मैदान था, जहां दरवार का शामियाना सजा हुआ था और चांदी की कुसियां लगी हुई थीं। दाहिनी ओर मन्दिर था और कुछ तम्बू ५४ । उपेन्द्रनाथ अश्क लगे हुए थे। सामने ही जंगी लाट की पार्टी के लिए प्रवन्ध किया गया था और कुछ क़नातें लगी हुई थीं। हम बायीं ओर किसी विश्राम-स्थल की खोज में बढ़ गये।
पाँच पेड़ों की घनी छाया में एक अच्छी-सी एकान्त जगह पर पार्टी गोल दायरा बना कर बैठ गयी । सुबह दस बजे छोटे शिमले से चल कर नौ मील रास्ते की चिलचिलाती धूप में भुनते और मार्ग का घूल फांकने के बाद थोड़ा आराम जरूरी थी। कुछ भूख भी लग आयी थी इसलिए ला० भोलानाथ और श्री रामलाल ने कुली के सिर से मिठाई और फलों का टोकरा उतरवाया। सबके आगे समाचार पत्रों का एक-एक पन्ना रख दिया गया । 'समाचार-पत्रों के जीवन की अवधि महज़ एक दिन होती हैं,' मैंने सोचा, 'लेकिन इस एक दिन में वे मनुष्य- माम को हर्प-उल्लास, दुःख-सुख, आवेश-आवेग, प्रास-आश्चर्य- सभी अनुभूतियों का स्पर्श देते हुए खत्म होने के बाद भी बड़े काम आते हैं। मनुष्यों में ऐसे कितने है, जो मरने के बाद केवल चिता की अग्नि का ग्रास बनने के अलावा भी किसी का कुछ सवार जाते हैं।" ला. भोलानाथ ने मिठाई परसनी शुरू कर दी। उसी समय निकट ही पेड़ों के परे चलते हुए पंगूड़ों में से किसी में वैठी हुई किसी पहाड़ो युवती ने झूलते हुए तान लगायो : 'तुप्स पिच्छियों में होई बदनाम लोका' लम्बी तान और ऊँचे स्वर से गाया जाने वाला दर्द-भरा पहाड़ी गीत, रमणी का युवा कण्ठ, झूलते समय की मस्ती, गीत वायुमण्डल के कण-कण में बस गया। रिक्शा ड्राइवरों ओर ग्वालों की मीठी आवाज से कई बार पहाड़ी गीत सुने थे। कई १. ऐ मेरे प्यारे, तेरे लिए में बदनाम हो गयी हूँ ५६ । उपेन्द्रनाथ अश्क वारीक स्वर रखने वाले युवकों के मुख से भी 'मोहना' सुना था, लेकिन इतनी लय, इतनी हृदयस्पर्शी तान सुनने में न आयी थी। सहसा पं० तेजभान ने मेरे विचारों का सिलसिला तोड़ दिया । "किसके विरह में कूक रही है ?" नीरस क्लर्कों में एक ठहाका गूंज उठा और फिर सव मिठाई पर टूट पड़े, लेकिन मेरे कान वरावर उस पहाड़ी गीत को सुनने में व्यस्त रहे । कुछ अच्छी तरह समझ में न आ रहा था, केवल तान का आनन्द लिया जा सकता था, फिर भी जो समझ में न आया, वह हृदय को द्रवित कर देने के लिए काफ़ी था। पहाड़ी गीतों में उर्दू कविता की रदीफ़ और काफ़िये की कैद नहीं होती और न ही हिन्दी की छन्द रचना देखने में आती है। उनमें हृदय होता है-पहाड़ी युवतियों का हृदय- और होते हैं हृदय के कोमल उद्गार ! पहाड़ी रमणियाँ सीधे- सादे सरल शब्दों में वह सब कुछ बयान कर देती हैं, जो कवि अपनी लालित्यमयी भापा में भी नहीं कर सकता, शायद इसलिए कि कवि का प्रेम-संसार, स्वप्न का संसार होता है और इन कान्त कामिनियों का वास्तविक ! १. 'गलां रियां मिट्टियाँ दिल्ला रियां पापने तुझ पिछियां में होई बदनाम लोका १. प्यारे, तेरी बातें तो मीठी हैं, पर तेरे दिल में खोट भरा लगता है। मैं तो तेरे कारण बदनाम हो गयी हूँ।
एक रात का नरक। ५७ २-थोड़ी-योड़ी बुरी मा-पियां री समदी सजना दे धुरे विजोग लोक ३-चिट्टे-चिट्टे कपड़े भगधे रंगा दे करि तेना जोगियां रा मेस लोकार कसा करुणापूर्ण गीत है ! था तो बहुत लम्वा, पर मुझे याद नहीं रहा । पहाड़ी गीतों में, गीतों में ही क्यों, पहाड़ के वातावरण में, समाज में, सभ्यता में, एक बात है और वह है- रूमान-जिस रूमान के हम किस्से पड़ते हैं, सिनेमा के पर्दे पर देख कर उल्लसित होते हैं, उसे यदि प्रत्यक्ष देखना हो तो पहाड़ी लोगों में देखिए। जहां प्रेम हवा की तरह वहता है, जहाँ पहाड़ी युवतियां छिप कर प्रेम के गीत नहीं गाती, बल्कि दूध के बर्तन उठाये चलती हुई गीत गाती जाती हैं । गायों को चराती हुई, ऊँचे पहाड़ों की चोटियों पर चढ़ कर प्रेम से सने हुए पहाड़ी गीतों से प्रकृति की निस्तब्धता को गुंजा देती हैं । मदों की उपस्थिति उन्हें गीत गाने से नहीं रोकती और प्रायः वे अपने पुरुषों के साथ-साथ स्वर-में-स्वर मिलाती हुई गाती चली जाती हैं। पहाड़ी ग्वाला मागं चलते-चलते अपनी वांसुरी में, पहाड़ो रिक्शा वाला काम से अवकाश मिलने पर किसी हवाधर में बैठ कर, पहाड़ी चमार जूतियां गांठता-गांठता किसी ऐसे ही मर्मसी गीत को अलाप उठता है। २. मां-बापमा वियोह दुखदायी होता है, बुरा लगता है, लेकिन प्रियतम के विछोह से उसकी क्या तुलना ?-कितना सत्य है-'सजना दे बुरे विजोग सोका।' ३. अपने श्वेत वस्त्रों को में भगवे रंगा संगो और तेरे लिए मोगिन का भेव धारण फहंगी। ४ ५८ । उपेन्द्रनाथ अश्क मुझे किसी अवसर पर सब तरह के पहाड़ी गीतों को सुनने की बड़ी लालसा थी। इस मौके को उपयुक्त जान कर मिठाई और फलों से जल्दी-जल्दी निबट, मैं उधर को चल पड़ा, जिधर से गीत की ध्वनि आ रही थी। जहाँ हम बैठे थे उस स्थान और पँगूड़ों के मध्य में वृक्षों के सामने जा खड़ा हुआ। कोई. दस पंगूड़े एक ही पंक्ति में लगे हुए थे, पर चल एक-दो ही रहे थे। अभी तक मेला भरा नहीं था। मेले के भरपूर होने का मतलब यह नहीं कि मेले में रौनक न थी। रौनक खूब थी। जूए का बाज़ार खूब गर्म था। भोले-भाले व्यक्ति अपनी जेबों को खासी तेजी के साथ खाली कर रहे थे। हलवाइयों की मिठाइयाँ भी खूब विक रही थीं। पकौड़ी वालों के हाथ भी विद्युत-वेग से चलते थे, लेकिन वह चीज़ न थी, जिसे देखने के लिए मेले के नब्बे प्रतिशत लोग आये थे । अभी तक 'मीना बाज़ार' नहीं लगा था। याने अभी पहाड़ी युवतियाँ काफ़ी संख्या में नहीं आयी थीं।....एक पंगूड़े पर एक पहाड़ी युवती मुंह पर पाउडर, चेहरे पर सुर्सी और आँखों पर चश्मा लगाये बैठी थी। चश्मा-हाँ, चश्मा ही । मैं भौंचक्का-सा देखने लगा। मेरे लिए यह अजीब बात थी। जब तक मैं खड़ा रहा, वह वरावर पंगूड़े में बैठी रही । मैंने समझा, इसने सीज़न पास ले रखा है, लेकिन बाद को मालूम हुआ कि वह एक पेशेवर औरत थी-वैसी ही, जैसी हमें रास्ते में मिली थीं, और पंगूड़े वालों ने उसे आकर्षण के लिए वैठा रखा था। मैं कितनी देर इसी आशा में खड़ा रहा कि वह अव भी अपनी सुरीली तान अलापेगी, पर लगता है, पहली गाने वाली कोई और ही थी। . वहाँ से निराश हो कर मैं वायीं ओर को मुड़ा । पहाड़ी स्त्रियों की नुमाइश के लिए जो स्थान नियत था, वहाँ केवल तीन एक रात कामरक। ५६ । औरतें बैठी थी । यह जगह जरा ऊपर पहाड़ी पर थी। नीचे विसातियों की सस्ती जापानी वस्तुओं की दुकानें लगी हुई थी। यह छोटा-सा बाजार था । इसमें अभी ज्यादा रोनक न थी। यह बाजार बड़े बाजार में मिल जाता था, जिसके आधे भाग में हलवाइयों और आधे भाग में जूए वालो की दुकानें थीं । मैं पंगूड़े के सामने से हट कर छोटे बाजार से होता हुआ ऊपर को चढ़ा, क्योंकि मैं उस तिब्वती स्त्री को फिर देखना चाहता था, जो बड़ी सरलता से हिन्दी वोलती थी और अंग्रेजी ग्राहकों को अंग्रेजी में उत्तर देती थी। मार्ग में मुझे एक बांसुरीवाला पहाड़ी मिला। बांसुरी पहाड़ियों का अपना साज है । मुझे याद है कि देश में जब भी कोई वांसुरीवाला मिलता था तो उससे प्रायः पहाड़ी' गाने के लिए ही अनुरोध किया जाता था। फिर मुझे भी कुछ वाँसुरी बजाने का शौक था और यद्यपि पांच बरसों मे कई बांसुरियां तोड़ चुका था, लेकिन था वही जहां से पहले चला था। मैंने एक बांसुरी ले कर उसमें फूंक दी। बांस की पोरी सुरीली आवाज से कूक उठी-शायद इस बात की फ़रियाद कर रही थी कि कृष्ण काले के अधरों से लग कर उसे जो आनन्द प्राप्त हुआ था, वह अब नहीं होता। वांमुरी खरीदने का तो मेरा कोई विचार नहीं था। मैं तो पहाड़ी गीत सुनना चाहता था। इस खयाल से कि बांसुरी वाले को ज़रूर पहाड़ी गीत आते होगे, मैंने उसे वांसुरी वापस देते हुए कहा : "क्यों भई, कोई पहाड़ी गीत भी आता है ?" "बीसियो आते हैं।" मैं बड़ा खुश हुआ। मैंने जेब से नन्ही-सी सुनहरी पाकेट, बुक निकाली और कामिनी-सी नाजुक श्वेत पेंसिल को हाथ में ले कर गीत लिसने के लिए प्रस्तुत हो गया।
६० । उपेन्द्रनाथ अश्क - पहाड़ी ने मेरी ओर आश्चर्यचकित आँखों से देख कर अपनी भाषा में पूछा-"क्या सुनना चाहते हो.!--'देवरा, 'छोरा,' 'मोहना ! ',' मैंने छोरुआ और मोहना सुने हुए थे इसलिए कहा-“देवरा सुना दो ! उसने मेरे निकट हो कर एक बन्द सुनाया । मैं स्तब्ध-सा खड़ा रह गया। गीत अत्यन्त अश्लील था । मैंने उसकी ओर देखा । वह हँस रहा था। "क्यों बाबू कैसा रहा?" मैंने कहा-"कोई सीधा-सादा गीत सुनाओ, गन्दा नहीं चाहिए।" पहाड़ी ने एक बार मेरी ओर देखा और फिर हँसता हुआ चला गया । मैं खिन्न-सा कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, फिर मैंने पाकेट बुक को अपनी जेब में रख लिया । शायद बाँसुरीवाले ने अपना बहुमूल्य समय मुझ-जैसे मूर्ख और नाक़द्र-शनास के लिए गँवाना उचित नहीं समझा। न मैंने उससे बाँसुरी खरीदी, न उसके गीत की प्रशंसा की। उसके गीत का पहला पद आज भी मेरी डायरी में उसी प्रकार लिखा हुआ है और पृष्ठ पर दस जून १६३४ की तारीख है, जिस रोज़ शायद हम लोग मेला देखने गये थे। पद यों है : 'भावो नहान गयो नरकंड' इसके आगे अश्लील था। बाँसुरी वाले को जो और बीसियों गीत आते थे, वे इस अश्लील गीत से बेहतर नहीं होंगे, इसका मुझे पूरा विश्वास है। शायद 'छोरुआ और 'मोहना में गन्दे बन्द न मिलते हों, पर 'देवरा के गीत इतने अच्छे, भावपूर्ण और मर्मस्पर्शी नहीं । वाँसुरी वाले के बाद ० प्रसिद्ध पहाड़ी गीत एक रात का नरक । ६१ मैंने वरड़ियों के कल-कएठ से देवरा भी सुना : भावो चली गयो है दूर पेटे पौड़ कलेजे सूर अरकी नेहे, शिमला दूर हकोम लियायी देवरा देयरा ये सोभियारे और एक दूसरा नमूना है : यागे लानी में तूत चिट्टा चिट्टा हे दा सूत में गजरेटो तूं रजपूत जोड़ी मिल गयी ये देवरा देवरा ये लोभिपार इन पहाड़ी मेलों में विशेष रूप से और दूसरी जगहों पर साधारणतया बरड़ियां दिखायी दे जाती हैं। इनमें अधेड़ उम्र की और जवान, दोनों होती हैं । पेशे के लिहाज से ये बिन्ने' १. पहाड़ों में गा कर भीख मांगने पालियां । २. ऐ देवर तेरी भौजाई (तेरे साथ सैर करते करते) दूर निकल मायी है । उसके पेट में जोर का दवं उठा है और कलेजे में शूल हो रहा है । यहाँ से अरको (पहाड़ी फस्या) समीप है और शिमला दूर है। तू शीघ्र हकीम-बंध को ले आ-ऐ मेरे लालची देवर ! ३. याग में शहतूत के यक्ष लगाये जाते हैं, रूई का सूत श्वेत उतरता है । ऐ मेरे लालची देवर ! मैं गूजरों को बेटी हूं और तू मारी-तुम्हारी जोड़ी सब मिल गयो है। ४, पानी भरते समय सिर के ऊपर पड़ी को रखने के लिए अथवा रस्सी के पटे हुए गोल आकार के बिन्ले, जिन्हें गुरु घरे के नीचे रख लेती हैं। इंडुरो।
। उपेन्द्रनाथ अश्क जाती हैं, लेकिन प्रायः मांगना ही इनका व्यवसाय ह रमात्मा ने इन्हें रंग चाहे अच्छा न दिया हो, लेकिन नक्श तोखे दिये हैं। स्वर तो इनका जादू-भरा होता है। ये गाती और मांगती फिरती हैं। बिगड़े दिल वाले इन्हें बैठा कर गाना सुनने के साथ अपनी आँखों और विलासी हृदयों की तृप्ति का भी कुछ सामान कर लेते हैं । ये हर प्रकार के व्यंग्य के मुस्कराहट में टाल कर प्रायः ऐसे लोभी भद्र पुरुषों की जेबें खाली कर जाती हैं। इनके सम्बन्ध में निश्चय के साथ कुछ नहीं कहा जा सकता, लेकिन मैंने यह देखा है कि जहाँ किसी ने किसी प्रकार की दराज़-दस्ती करने की कोशिश की, वहीं ये भाग खड़ी हुईं। सी-पी में भी इनकी दो-तीन टोलियाँ आयी हुई थीं। मैं बाँसुरी वाले की मूर्खता से निराश हो कर आगे चलने ही को था कि मेरे कानों में बारीक-सी, मधुर, मनोमुग्धकारी आवाज आयी। नज़र उठा कर देखा तो बाज़ार से ज़रा ऊपर पहार्ड पर एक वृक्ष के नीचे कुछ बरड़ियाँ गा रही थीं। एक-दो कानों पर हाथ रखे हुए थे। कमर में लहंगे, तन पर कमी उन पर जाकटें, सिरों पर रँगे हुए दुपट्टे, कानों में बालि काले मुख उबटन से चमकाये हुए, अधरों पर दातुन गहरा रंग, तीखे नक्श, छातियाँ तनी हुई, श्याम वर्ण के - भी आने-जाने वालों को आकर्षित कर रही थीं। सब भरे गले से मिल कर गा रही थीं। आने-जाने वालों के आंखों से देख भी लेती थीं। मैं उधर को चल पड़ा। वे एक-दो सिक्खों, दो-एक पहाड़ियों और तीन- मूक दर्शकों के घेरे में बैठी हुई थीं। चार सुवा थीं ए मैं इस टोली के पीछे जा.कर खड़ा हो गया। उस.
एक रात का नरक। ६३ एक सिक्ख सरदार की जेब से एक-दो पैसे निकालने के प्रयत्न में थी और सरदार साहब मुफ्त में आनन्द लेने वालों में से थे। गीत को वीच ही में बन्द करके एक ने, जो सबसे सुन्दर थी, कटाक्ष के तीर बरसाते हुए कहा : "दो, सरदार साहेब, एक-दो पैसे दो 'वाह गुरु' आपका भला करे !" "एक-दो क्या आठ आने लो, रुपया लो, पर जो मैं कहता हूँ, वो भी करो।" सरदार साहब वोले । "आप क्या कहते हैं ?" एक युवती ने मुस्करा कर कहा। "हमारे साथ चलो ! " और इसके साथ ही सरदार साहब ने आँस का इशारा किया, “यहाँ दिन-भर मे भी एक रुपया न मिलेगा।" वरड़ी ने कुछ लजा कर, कुछ हंस कर उनकी ओर से मुंह फेर लिया और एक सिपाही की ओर देख कर बोली : "थानेदार साहेब, आप ही एक-दो पैसा दें, परमात्मा आपका इकबाल दूना करे !" थानेदार साहब मूंछों पर ताव दे कर मुस्करा दिये । इस बीच में एक को दृष्टि मुझ पर पड़ गयी। उसने उस युवती को मुझसे मांगने का इशारा किया। वह मुझसे सम्बोधित "वाबू साहेब आप भी कुछ मेहरबानी कर, परमात्मा आपको पास करे, नौकरी दिलाये !" भारतवर्ष के युवकों में बढ़ी हुई बेकारी का हाल इन वरड़ियों से भी छिपा नाथा । इसी लिए उन्होंने दो ही बातें कही। उनके निकट मेरे जितनी आयु के युवक के लिए पढ़ना या वेकार फिरना, दो ही बातें हो सकती हैं। ये सिवस महाशय मेरे आगे बैठे थे। उन्होंने मंह ५ । उपेन्द्रनाथ अश्क र मेरी ओर देख कर कहा : "हाँ, ये ज़रूर देंगे, इनकी जोड़ी भी तुमसे मिलती है।" बरड़ी ने उस ओर ध्यान नहीं दिया। मैं कुछ खिन्न हो या । हँसा अवश्य, लेकिन मैं नहीं, मेरी लज्जा हँस रही थी। "पहले कुछ सुनाओ भी।" मैंने हैट उतार कर घुटने पर रखते हुए कहा। मेरे कहने के साथ ही उनका समवेत स्वर वायु में गंज उठा: 'ओ तो जान करन कुर्वान, जिन्हों ने दर्शन पा लये ने मैंने उन्हें रोक कर कहा, "यह गीत तो मैंने देश में भी वहुत सुने हैं । कोई यहाँ का गीत सुनाओ, 'छोरुआ, मोहना,' कोई और।" और वह 'छोरुआ' गाने लगीं।...'छोरुआ' सब पहाड़ों में गाया जाता है। गांव-गांव में इसके गाने की पृथक रीतियाँ हैं। उन्होंने जो गीत सुनाया, वह यों था : क-ब्राह्मणा देया छोरा ओ शिमले न जाना मंगी साना तू तो बेईमान बनिआ-होरुआ-ओनेने ख-ब्राह्मणा देया छोरुआ ओ १. जिन्होंने तुम्हारा दर्शन कर लिया, वे अपना तन-मन तुम पार सकते हैं। क-ऐ ब्राह्मण युवक, शिमले न जा, मांग कर खा लेना अ वियोग मुझे असह्य है। तू वेवफ़ा निकला है, जो मुझे शिमले जाने को तैयार हो गया है। ख-(दोनों कहीं भाग जाते हैं-प्रेयसी कहती है) ऐ ग्रामप यह देश वेगाना है। यहां अकड़ नहीं चलेगो, नम्रता सेना होगा एक रात का नरफ । ६५ देस बगाना नीवी चलना तू तो बेईमान बनिया-छोरा--ओ-ओने ग-ग्राह्मणा देया छोहा मो हसी के ना जाना मेरे जानीया तू तो येईमान बनिआ-छोहा-ओने एक और छोरुआ जो मैंने पहले किसी पहाड़ी के मुंह से सुना था, यों है : ब्राह्मणा देया छोरा, ओ येईमाना- नता दर गयों छोटे शिमले जू मेरी रोंदी दे मिज गये तिन्ने कपड़े ओ येईमाना- प्राह्मणा दा छोरआ सो, बेईमाना' पिछले जमाने में जब लडाइयों-भिडाइयों का समय था, रास्ते ऊबड़-खाबड़ थे, जो लोग परदेश जाते थे, उनके आने का ठिकाना नहीं होता था, तो देश की युवतियां, नव-विवाहिता वधुएं अपने पतियों को परदेश जाने से रोकती थीं। उनकी जुदाई से उनकी आत्मा सिहर उठती थी। पंजाब में महायुद्ध के समय के ऐसे अनेकों गीत मौजूद हैं। देखिए अपने प्रियतम की जुदाई में पंजावी दुलहिन रो कर, निराश हो कर सहेलियों से किस प्रकार उनकी शिकायत करती है : ग-ऐ ब्राह्मण युवक, मुनसे रूठ कर न जा, मेरे प्राण, येईमान श्यों बनता है? १. ऐ बेईमान साह्मण युवक, (प्यार के साथ प्रेमी को येईमान कहा गया है) तू तो छोटे शिमले प्रला गया और रोते-रोते. मेरे तीनों यस्य भीग गये हैं।
६६ । उपेन्द्रनाथ अश्क देखो सइयो नी मेरा ढोल कमला मेरा ढोल कमला आर गंगा नी सइयो पार जमुना विच बरेती धक्का देनी गया सी। : प्रेयसी के लिए अपने प्रियतम के प्रेम के आगे नौकरी भी कोई महत्व नहीं रखती। मारवाड़ी प्रेयसी अपने प्रेमी के साथ फ़ाके काट कर भी गुज़ारा कर सकती है । यह विचार कि सौ योजन पर बैठा हुआ उसका पति सौ रुपये प्रतिमास कमा रहा है, उसे तनिक भी सान्त्वना नहीं देता। वह उसके विरह में विह्वल हो उठती है और कह उठती है : अस्सी रेटका री ढोला चाकरी वे कोई लाख मोहर को नार, लाख मोहर को भोली नार, हो जी ढोला अब घर आय जा गोरी रा बालम हो जोर नौकरी को जाने वाले पंजावी युवक को देखिए, उसकी प्रेयसी क्या कह कर रोकती है-कितने विनीत शब्द हैं, करुणा से कितने सने हुए : १. ऐ मेरी सहेलियो ! (तुम यहां आओ तो देखो) मेरा भोला (फमला का अर्थ होता हैं भोला-भाला, पगला) प्रिय मुझे कहां छोड़ गया है ? इस ओर गंगा है, उस ओर जमुना है । वह मुझे वरेती (पुलिन) में छोड़ गया है । २. प्यारे, तेरी नौकरी तो केवल अस्सी टकों की है, लेकिन तेरे घर में तेरी जुदाई में जान देने वाली तेरी लाख मोहर की पत्नी है। ऐ गोरी के प्रियतम, अब देर न करो, अवश्य घर मा जाओ।
एक रात का नरकः । ६७ थे धोया, मजा ये में हरदम नौकर तेरी मा~यीया न जा ये बीया, न जा कुछ इसी तरह की स्थिति पहाड़ी युवतियों की है। शिमले के मौसम में निर्धन पहाड़ी युवक जीविकोपार्जन के निमित्त पांच-छ महीनों के लिए शिमला आ जाता है । उसके विरह में पहाड़ी प्रेयसी अलाप उठती है : शिमले में जाना मंगी ताना कांगड़े के पहाड़ में जो छोरुआ गाया जाता है, वह भी सुनिए : घाह्मणा देया छोरमा ला तेरे ताई लोको कहेंदे कंजरी भला ओ साजन मेरिया ला तेरे ताई लोकी कहदे कंजरी लम्बी तानें और दर्द-भरे गीत, जिनमें पहाड़ी युवतियों के हृदय के उद्गार होते हैं, उनके मुंह से ही मुनने के लायक है। इन्हें सुनते हुए कौन ऐसा मनुप्प है जो मन्त्र-मुग्ध नहीं रह जाता । आदमी को साक समझ नहीं आ रहा, लेकिन तानें ही कुछ ऐसी हैं, स्वर ही कुछ ऐसा है, पहाड़ी लोगों के गाने का ढंग ही कुछ ऐसा है कि वह चुप गुमसुम पड़ा मुनता रहता तीन-चार बन्द सुना कर ही वरड़ियों ने गीत बन्द कर १. ऐ प्यारे, में मित्रत करती हूँ, नू परदेश न जा। म (प्रतिताण) तेरी नौकरी करने याली हूँ। दूसरे शादों में तुम्हें नौकरी को क्या सस्रत है। ऐ मेरे मारे, परदेशन जा। २. ऐ ग्राहक पुर, नुनमे प्रेम म गुकारते हैं।
उपेन्द्रनाथ अश्क । श्या और पैसा मांगने लगीं। मैंने उन्हें कहा, “एक-दो वन्द और सुनाओ! "यह इतना ही है।" गीत बहुत लम्वा था, पर शायद उन्हें आता ही न था अथवा वे मुझे सुनाना न चाहती थीं, खैर मैंने एक पैसा फेंक दिया और कहा-“अव मोहना सुनाओ," और मोहना फ़िजा में गूंज उठा। -- उन गीतों में, जो पहाड़ियों में लोकप्रिय हैं, 'मोहना' सबसे प्रसिद्ध है । इसके अलाप की भी अपने-अपने गाँव की प्रथा के अनुसार भिन्न-भिन्न रीतियाँ हैं, लेकिन सब आकर्षक और मनमोहक ! इस गीत का अपना छोटा-सा इतिहास है। कई तरह की किम्वदन्तियाँ प्रसिद्ध हैं। कुछ लोगों का कहना है कि मोहना एक सुन्दर बलिष्ठ पहाड़ी युवक था। उसकी जोरू को किसी पदाधिकारी ने छेड़ा। मोहना इसे सहन न कर सका । उसने उसकी हत्या कर दी। मोहना को फाँसी मिली । पहाड़ी लोगों ने उसे शहीद का दर्जा दे दिया। उधर उसे फाँसी मिली, इधर घर-घर उसके गीत गूंज उठे। किस वजनी वो, मोहना किस बजनी तेरी वंदा वाली बंसी (ओ मोहना) किस वजनी' चन्ने पिपली वो मोहना चन्त पिपली तेरे वो विजोगे, बोल, बाहरे निकली १. ऐ मोहन ! अब तेरी सुन्दर बन्दों वाली (पीतल के तार वाली) बांसुरी को कौन बजायेगा ? २. ऐ मोहन ! पिछवाड़े पोपत का वृक्ष है। मैं तेरी जुदाई तंग आ कर चोराने की ओर निकल पड़ी हूँ।
एक रात का मरक । ६६ । तू नहीं दिस्सदा वो मोहना, न नहीं दिस्सदा मेरा पाइया-पाइया सहमा (ओ मोहना) रोजे सुक्कदा' लेकिन कुछ लोगों का खयाल है कि मोहन अविवाहित था और पदाधिकारी की हत्या उसके भाइयों ने की थी । वे सब वाल-बच्चों वाले थे। उनके फांसी पाने के बाद उनके बाल- बच्चों की क्या दशा होगी, इस विचार से मोहना ने अपनी कुर्वानी दे दी। उसने कह दिया यह हत्या मैंने की है-उसके भाई वच गये, पर वह फांसी के तख्ते पर चढ़ गया। कई गीतों में इस बात का ज़िक्र किया गया है तख्ते चढ़ी गया जो मोहना तख्ते चढ़ी गया बोल भाइयां दे जो कारणे मोहना, तख्ते चढ़ी गपार दोनों कहानियों में से अन्तिम अधिक सच्ची लगती है। और अधिकांश पहाड़ी लोग मोहना के सम्बन्ध में यही कथा सुनाते हैं । 'मोहना' के बहुत से बन्द भी इस कहानी का समर्थन करते हैं, जैसे: खाई ले बबरू यो मोहना खाई सं बबरू अपनी भावियाँ दे हायाँ दा यो पाई ले बयरूर तख्ते चढ़ी गया जी मोहना तत्ते चढ़ी गया अपने भाइयां दे वो कारणे मोहना तहते चढ़ी गमार १. ऐ मोहन ! तू कहीं भी दिखायो नहीं देता और तेरे विरह में मेरा पाय-पाय लहू रोज सूखता जा रहा है । २. हाय मोहन फांसी के तख्ते पर चढ़ गया, सुन्दर सलोना मोहन फांसी पर चढ़ गया। ३. ऐ मोहन (भाभियां उसको जुदाई में रो कर कहती हैं) अपनी भाभियों के हाय का वबरू (मोटी रोटी) ता से । ४. अपने भाइयों के पाप को छिपाने के लिए मोहन ने फांसी को गले लगा लिया।
उपेन्द्रनायं अश्क --- केन्तु जिस प्रकार पंजाब का हर प्रेमी 'राँझा' है और हर को 'हीर,' इसी तरह पहाड़ का हर युवक मोहना है और प्रेयसी मोहना की वियोगिन उसकी भाभी ! पहाड़ी प्रेमिका ने प्रेमी के विरह में मोहना के नाम से गीत गाती है। इस त के बीसियों वन्द हैं । लेकिन वरड़ियाँ ज्यादा नहीं सुनाती और पैसे माँगने लगती हैं । तो भी मैंने कई बन्द सुने । १. तेरे .दर्दे वो मोहना, तेरे दर्दे . बोल गला मेरा कट्टिया पैनिये करदे २. फुल्ली दड़ने वो मोहना, फुल्ली दड़ने बोल, खाया मेरा कादल जा वो तेरे झड़ने ३. खाना मौऊरा वो मोहना खाना मौऊरा एस पापिए नहीं रहना ओ ठल्ली दे शाहुरा इन सीधे-सादे गीतों में कितना दर्द है, कितनी टीस, कितनी हसरत है, यह वही लोग जान सकते हैं, जो दिल रखते हैं और जिन्होंने वियोगी हृदयों में कभी पैठ कर देखा है। . पहाड़ी गीतों में छोरुआ, मोहना, लोका, देवरा ही लोकप्रिय हैं और इसलिए उल्लेखनीय भी हैं । लेकिन पहाड़ों में नाटियाँ भी गायी जाती हैं । लालित्य, सुन्दरता और भावों की उड़ान के विचार से ये भी किसी अन्य पहाड़ी गीत से कमतर नहीं १. ऐ मोहन ! तेरी जुदाई का दर्द मेरे गले को तीक्ष्ण (चाकू), तरह काट रहा है। २. मोहन दड़न (अनार का पेड़) फूल उठा है, तेरा सुन्दर रूम मेरे दिल को खाये जा रहा है। ३. मधु साने का मौसम आ गया है । यह पापी युवक (देवर व्यंग्य छोड़ा गया है) इस बहार में तंग करेगा, इसे ससुराव दो (अर्थात इसका विवाह कर दो)।
एक रात का नरक। ७१ इनमें स्वर का उतार-चढाव अधिक होता है, कभी तार सप्तक तक उठ जाने वाला और कभी मध्यम से भी नीचा, कभी ऐसे जैसे नदी की लहरों पर तैर रहा हो और कभी ऐसे जैसे पहाड़ की चोटी पर उड़ा जा रहा हो । किसी नाटी को एक बार सुन कर उसी तान, लय और स्वर से गाना प्रायः असम्भव है। पहाड़ी नाटियां अधिकतर प्रेम और इससे सम्बन्धित विषयों पर होती है । हो सकता है दूसरे विषयों पर भी गीत मौजुद हों, पर बरड़ियों को प्रेम सम्बन्धी नाटियां याद थीं, शायद वे वही गीत गाती थीं, जो श्रोताओं को अच्छे लगते थे। उस समय जव वरड़ियां 'मोहना' गा रही थीं, उनकी एक दूसरी टोली कुछ दूर बैठी दो शरावियों का मनोरजन कर रही । तीनों युवतियां थीं। एक अधिक सुन्दर थी। एक पुरुष ने शराब का पंग पी कर उसको पान पेश किया, उसने पान ले कर खा लिया। फिर उसने नशे में मस्त हो कर उसकी ओर हाथ बढ़ाया । उस समय तीनों वहां से भाग खड़ी हुई । पैसे वे पहले ले चुकी थीं। तीनों हमारे पास आ खड़ी हुइ। मोहना के बाद नाटियां उन्ही ने सुनायी। मूशी दे हाथों दा काली डांडिए छाता बोल, कूनी पायो घुगलो ये, कूनो दोता पाता हाय यावू रेजरी कूनी बीता पाता' पानरे यो हाल्टो, ओ लोहे रे ना फाले टोपी पाई पाकेटे गरारा टांगे डाले १. मूशी के हाथ में डंडी की छतरी है। वह रेंजर से (जंगल) का रेंजर जिससे उसकी मुहम्बत हो जाती है) कहती है कि हाय प्यारे, हमारे भागने का किस पापी ने पता दिया ! किसने हमारी चगलो पायी।
७२। उपेन्द्रनाय अरक हाय वाबू जरो गरारा टांने डाले क-शफ चो भुल का, धनियाँ रे ना डाल म्हारे जाने नठेरो, वावा देगा गाले हाय बालू रेंजरो वावा देगा गालेर कहानी यों है कि मूशी रेंजर के साथ भाग गयी है । किसी ने रिश्तेदारों को उनका पता दे दिया। मूशी पकड़ी गयी। सूशी को खूब पीटा गया। तव मूशी चुगली खाने वाले को कोसती है कूनी पाई चुगली, वो तूनी दीता पाता दूसरी नाटी यों है: : साजन ख-चान्दी री चुलटी सोइने रे गढ़ी, १. इस पत्र में वहां के देहाती जीवन का चित्र है। मूशी फिर काम- फाज में लग गयी है। बांस की लकड़ी का हल है और उसमें लोहे का फल लगा हुआ है, मूशी ने टोपी जेब में डाल ली है और गरारा(खुला पाजामा) वृक्ष को ाली पर टांग दिया है, पर रेंजर की याद उसका पीछा नहीं छोड़ती। फ-इस पद्य में वह घर के काम-काज में व्यस्त दिखायी गयी है। मुलका को तरकारी वनाती है, पर ध्यान तो उसका अपने प्रेमी की ओर लगा हुआ है । शाक में धनिया डालना भूल गयी है। इसलिए कहती है-मैंने शाफ बनाया है, शाफ तो अच्छा बन गया है, पर वेध्यानी में पनिया डालना ही नूत गयी हूँ। अब वावा मुझे गाली देगा। मुलते तो यह काम न होगा। मैं तो भाग जाऊंगो, हां प्यारे रंजर, मैं तो भाग जाऊंगी। ख-पचिक पूछता है, "ऐ चतर युवती, तेरी अंगीठी तो चांदी की है और चूल्हा सोने का है, फिर त धरती पर क्यों बैठी है। हाँ रे ।
एक रात कारक । ७३ वोसे बोले शातिरो लल्ले भोई दिए पैठिए, मेरीए रो नहनिएं नैहनी जाखे रेया पण्डिता खोले पत्री सांचा ऐसी देनी सायतो कदे पट्टनी जानटा, मेरिया वे साजना। साजन -तारियो रे डाको दे होले गोने दे माऊ, माटी हेठ में वो सोरिगो ताहरे फड़के आवो, आयो मेरिए रो नहनिए नैहनी घ-छाए बोचरा घाछुमा, दुध बोचरा खोया, सच बोले रे साजना कूनी म्हारा ज्पुरा छड़ोया, मेरिया रे साजना महनी, तू परती पर क्यों बैठी है?" नहनी कहती है, "जाक के पण्डित से जा कर पूछ कि यह सच्चा ज्योतिष लगा कर ऐसी सायत बताये जम कि मैं यहां से उठू । (तात्पर्य) यह कि जाकू के पण्डित से पूछ कि कम मेरा प्यारा आयगा और कब मैं यहाँ से उठूगो, क्योंकि मैं उसी को प्रतीक्षा कर रही हूँ। हो, ऐ साजन जांक के पण्डित से पूछ । 1-प्रेमी कहता है, "ऐ मेरो प्यारो, तेरे और मेरे मध्य में तारा देवी काटोला (पहाड़ी) है और यहां मधु-मक्खियों ने छत मना रखे हैं, परन्तु मैं इस पहाड़ी में सुरंग निकाल कर मैं तेरे पास आ जाऊंगा -हाँ मेरी प्यारोनहनी, में सुरंग लगा कर तेरे पास आ जाऊंगा।" प्रेमिका कहती है: सस्सी का शेष छाछ होती है और दूध का रोप रहा जाता है खोया, ऐ मेरे साजन, सच बताओ मेरा दिल किसने लिया है !
उपेन्द्रनाथ अश्के. इस नाटी के और भी पद हैं, पर वे कुछांसमझ में नहीं आ । कुछ साजन के मुंह से और कुछ नहनी के मुंह से कहे गये । पर यह नाटी समझने में कुछ-कुछ मुश्किल है, इसे लिखने और समझने में भी मुझे बड़ी कठिनाई पेश आयी। बरड़ियों अजीव उच्चारण और मेरा अच्छी तरह पहाड़ी बोली न मझना इस सुन्दर और भावपूर्ण नाटी का आनन्द उठाने में बाधक हो गये। . इधर के पहाड़ों में, जैसा कि मैंने कहा, पहाड़ी गीत अधिकतर प्रेम, विरह और ऐसे ही दूसरे विषयों पर सुनने में आते हैं। विवाह-शादी पर, पानी भरते अथवा चक्की पीसते, खरास चलाते अथवा गायें हाँकते समय पहाड़ी स्त्रियाँ, अपनी सुरीली आवाज़ में ज़रूर ही सुन्दर गीत गाती होंगी, पर वे कैसे होते हैं, यह मैं नहीं जानता। हाँ, जो कुछ मुझे सुनने को मिला, उससे एक वात अच्छी तरह मालूम हो गयी और वह यह कि इन पहाड़ियों में रूमान हवा के साथ उड़ता है । जो लोग पश्चिमी सभ्यता पर, वहाँ के रूमानी वातावरण पर चकित रह जाते हैं, यदि वे इन पहाड़ों पर कोर्ट-शिप और विवाह की रीतियाँ देखें तो हैरान रह जायें। पहाड़ी युवती जिसे चाहे प्रेम करती है। जिससे दिल मिल जाता है, उस साथ भाग जाती है । यह वात कुँआरी लड़कियों के सम्वन में ही नहीं कही जा सकती, वरन विवाहित स्त्रियाँ भी पी व्रत धर्म पर आरूढ़ न रह कर अपनी इच्छा के अनुसार करती हैं और अवसर पाने पर अपने प्रेमी के साथ भाग ज हैं । इसका एक कारण यह भी है कि प्रायः लड़की के मां उसका विवाह वाल्य-काल में ही कर देते हैं । जब वह जाती है तो उसका मन अपने पति से नहीं मिलता, अ वड एक रात का नरकः । ७५ होती ही है, इसलिए वह भाग जाती है । भगाने वाले के लिए इन लोगों ने आर्थिक दण्ड के सिवा और कोई सजा नहीं रखी। यदि वह दो-तीन सौ रुपया दे सकता है तो किसी भी निकम्मे व डरपोक की पत्नी को भगा सकता है। इससे यह तात्पर्य नहीं कि पहाड़ में पतिव्रता स्त्रियों का सर्वथा अभाव हो गया है । पहाड़ी गीतों में भी 'प्रेम, 'विरह' के अतिरिक्त दूसरे गीत भी हैं । एक-दो बन्द ऐसे भी मैंने सुने । देखिए, पिता की आय अधिक नहीं, लड़की मूल्यवान वस्तुएँ मांगती है। गीत में किस प्रकार इसका उपहास उड़ाया गया है । शिमले बाजार ९ वी बोकोली न कड़ी बेटी मांगे दर्शनो मोनरे पाऊंदरी घड़ी हाय बेटी दर्शनो, पाऊंदरी घड़ी' शिमले यातार दू थी फेरे गये ऊंटों बेटी मांगे दर्शनी राबेरहो रे बूटो हाय बेटी दर्शनो राबेरड़ो रे बूटो इसी प्रकार का एक और गीत है। यहाँ मांग पति से की गयी है। डूंगी डूंगी वासी मेरे दिल दी विवासी उच्चा उच्चा बंगला पवादे बल्या अलबेलुआ वो १. शिमले के बाजार में तो लकड़ी का एक शहतीर भी नहीं विका और बेटी दर्शनो कलाई की घड़ी मांगती है । २ शिमले के वाचार को गये हुए ऊंट तो वापस आ गये हैं, लेकिन बेटी दर्शनो रबड़ के यूटों के लिए मचल रही है । ३. हमारे रहने की जगह बहुत नीची है, ऐ प्यारे ! मुझे ऊंचा बंगला उलया दे, यहाँ मेरा जी उदास रहता है ।
७६ । उपेन्द्रनाथ अश्क देवर के रूठने पर भौजाई की बेचैनी देखिए : चादर पुरानी मेरे देवरे दी निशानी देवरा मेरा रूसी रूसी जांदा, बल्या अलबेलुआ, वो इसी गीत का एक और दिलचस्प बन्द देखिए : ककड़ी दी रोटी मेरी किस्मत खोटी वागां दे झंजन मंगा देवल्या अलबेलुआ वो२ इन पहाड़ी स्त्रियों में मेलों में शामिल होने की बड़ी इच्छा होती है। इस सम्बन्ध में भी सी-पी के मेले में दो पद सुने । पहाड़ी युवती के हृदय में मेला देखने की कैसी प्रवल इच्छा होती है, वह 'लोका' के इन टप्पों से ज्ञात होगा: मेला भरया बीरे कंजूरे दा जाने जो दिल बोल्दा मेरा जी लोका और फिर देखिए मेले जाने से रोकने वाले को पहाड़ी युवती कैसे कोसती है : जिसने जो पापिए मेले ते रोकी उसनू पवे सराफ मेरा जी लोका? १. यह चादर जो पुरानी है, यह मेरे देवर की निशानी है । इसे बाहर मत फेंको । क्योंकि मेरा देवर रूठ-रूठ कर जा रहा है। २. मैं मंद भाग्य हूँ जो मुझे मक्की की रोटी खाने को मिल रही है ऐ मेरे प्यारे ! मुझे वागों के चावल मंगा दो। ३. कंजूरे का मेला भर रहा है और मेरा जी वहाँ जाने के लिए बेताब हो रहा है। ४. जिस पापी ने मुझे मेले जाने से रोका है, उसे मेरा शाप लगे छै अकबर ने, सुनते हैं, अपनी हुस्नपरस्ती के लिए 'मीना बाजार का आयोजन किया था। 'नो रोज़' के दिन शाही महलों के नीचे स्त्रियों का मेला लगता था। स्त्रियां ही प्रवन्ध करने वाली, स्त्रियाँ ही दुकानदार, स्त्रियां ही 'गुलफ़रोश, स्त्रियां ही सोंचेवाली। एक अनुपम दृश्य होता होगा। एक नयी उपज थी--एकदम मौलिक ! कल्पना भी नहीं की जा सकती। मुग़ल-सम्राट का वैभव और फिर राज-प्रवन्ध में मीना-बाजार का आयोजन-कितनी शान होगी, कितनी चकाचौध होगी ! इस सब-कुछ मे यदि अकबर की काम-वासना न होती, यह सब कुछ यदि अकबर के लिए महज एक तमाशा न होता, तो इसकी स्मृति सम्राट के नाम पर काला धब्बा न हो कर एक चिरस्थायी यादगार बन जाती....पर सम्राटों की पाप- वासनाएँ ! इनकी कहानी ही दूसरी है । यह सब कुछ इसलिए था कि वह अपने राज्य की सुन्दरतम युवतियों को अपनी वासनाओं का शिकार बना सके । 'मीना बाजार' में जो युवती सम्राट की आँखों में चढ़ जाती, वह महलों में पहुंच जाती। सी-पी में भी मीना बाजार लगता था। रियासत के प्रवन्ध में ही लगता था। केवल सभ्य और असभ्य का अन्तर या। वह एक-दो की आंखों की तृप्ति के लिए था । यह सहस्रों आंखों की तृप्ति के लिए । मेला भरते ही नये-नये कपड़े पहन पहाड़ी स्त्रियां कमर में तंग पाजामे, तन पर कमीजें, उन पर जाकेटें, सिर पर दुपट्टे, नाक में नयनियां, मांग में चांद, आँखों में -- ७८ । उपेन्द्रनाथ अश्क - काजल, होंठों पर अनार अथवा कीकर की छाल का रंग- दल-के-दल बाँध कर मेला देखने आतीं। मेले में एक ओर को एक ऊँची जगह, मेले में आने वाली स्त्रियों के लिए सुरक्षित होती, जहाँ से राजा अपने अंग्रेज़ मेहमानों को ले कर निकलते । सी-पी में वाज़ार के एक ओर एक जंगले के अन्दर पहाड़ी पर सीढ़ियाँ-सी बनी हुई हैं । ठीक सरकस के आखिरी दर्जे की तरह । इस पर पंक्तियों में आ कर पहाड़ी युवतियाँ बैठ जाती हैं और दर्शक इधर-उधर घूमते-फिरते उनकी खूबसूरती से अपनी आँखों की प्यास बुझाते हैं । जैसा कि मैंने पहले कहा, नब्बे प्रतिशत लोग इसीलिए जाते हैं कुछ यों ही उत्सुकता के कारण, कुछ महज़ दीदारवाजी के निमित्त और कुछ विगड़े हुए किसी को पटा कर अपनी भूख मिटाने को। कहते हैं कि यहाँ स्त्रियों का व्यापार होता है । कहते हैं कि यहाँ वदमाशी होती है । कहते हैं कि स्वयं राणा साहब अथवा टिक्का साहब इनमें से सबसे सुन्दर रमणी को चुन लेते हैं....इन सब बातों में कहाँ तक सत्य है, इसे एक मेरे जैसा सैर के लिए आनेवाला क्या वतायेगा ? हाँ, नित्य इस मेले में आनेवालों के मुंह से जो कुछ सुना है, वह इस ज़माने में भी अकबर के ज़माने की याद ताज़ा कर देता है। एक और बात है, जिसे मैं नहीं समझ सका। ये पहाड़ी युवतियाँ अच्छे-अच्छे कपड़े पहन कर उस मेले में आती हैं, जहाँ सरे-आम शराव के दौर चलते हैं, जहाँ दिन-दहाड़े जुए का वाजार गर्म होता है, जहाँ पंजाव-भर के गुण्डे इकट्ठे होते हैं, फिर ये स्त्रियां सूर्यास्त तक वहीं रहती हैं। कहीं मेले में धूम-फिर कर नहीं देखतीं, केवल वैठी रहती हैं-वैसे ही जैसे नुमायशी खिलौने । ये यहाँ आती हैं, इसका कारण भली-भांति समझा जा सकता है । कुछ संध्या समय अपने गाँवों को चली एक रात का नरक। ७६ जाती हैं, लेकिन बाकी कहां जाती है ? क्या करती हैं ? इसका अनुमान ही किया जा सकता है । इधर की पहाडियों में सुनते हैं स्त्रियों को गति-विधि पर वैसी कैद नहीं। रुपये ले कर अपनी पत्नी को बेच देने की भी प्रथा आम है और प्रेमी के साथ किसी के भाग जाने पर प्रेमी से कुछ रुपये ले कर समझौता कर लेना भी इधर मामूली बात समझी जाती है। लेकिन सौंदर्य का यह बाजार ऐसे मेले में लगे और फिर रियासत के प्रबन्ध में और फिर वहां पंजाब के लाट जायं, इस नुमाइश का निरीक्षण करें, यही आश्चर्य की बात है। वहां जाने वाले अंग्रेज, भारतवर्ष की असभ्यता को किस ढंग से पेश करते होंगे, यही बात बार-बार मेरे मन में आती। इस मीना बाजार में रियासत अथवा उसके कर्मचारियों को कोई लाभ न होता हो, यह वात नही । यदि सी-पी के मेले से, मीना बाजार उठा लिया जाता तो दूसरे दिन से से मेले में उल्लू बोलने लगते, फिर यदि कोई भूला-भटका मुसाफ़िर इन चौकीदार-नुमा रियासती सिपाहियों के हाथ लग जाता तो उस पर स्त्रियो को छेड़ने का अभियोग लगा कर उसकी जेवें किस प्रकार खाली की जाती, इस बात का अनुमान वही लोग कर सकते हैं, जिन्हें उनसे वास्ता पड़ा है। मैं इन बातों पर विश्वास न करता था, लेकिन दुर्भाग्य से मेरे साथ जो घटना घटी, उससे मुझे न केवल इस बात का विश्वास हो गया, बल्कि इस बात का भी पता चला कि स्थिति कही ज्यादा भयानक है। इसका कारण क्या है, यह जानना कठिन नहीं । ब्रिटिश इंडिया में यद्यपि सिपाहियों के वेतन कम होते, उन्हें नियमित रूप मिल तो जाते, पर भारत की रियासतों और विशेष कर के इर्द-गिर्द की रियासतों की जो दशा थी, वह किसी.मे। नहीं । जब बड़े-बड़े कर्मचारियों को ही वेतन न मि ६० । उपेन्द्रनाथ अश्क - सिपाही बेचारों की तो बात ही दूसरी है । वे इस मेले में जो कुछ हथिया सकें, वह सब कुछ उनका होता-अपने शिकार से अथवा उसके सम्बन्धियों तथा मित्रों से । सिवाय कुछ सिपाहियों के इन छोटी-छोटी रियासतों में वाकायदा पुलिस न रखी जाती और 'कोटी' भी इस सामान्य नियम का अपवाद न थी। इस मेले के समय जितने बेकार युवक कोटी में होते, सबको पुलिस की वदियाँ पहना दी जातीं। मेले का मेला देख जाते, चार दिन रोटी खा. जाते और यदि कोई शिकार फंस जाता तो दो-दो रुपये जेबों में डाल कर घर चले जाते। इस अंधेर नगरी में पुलिस वाले मीना बाजार का क्या लाभ उठाते हैं, इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कह सकता । हाँ, इतने अधिकारों के होते हुए, वे चुप रहते हों, ऐसा हो नहीं सकता।
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१२। उपेन्द्रनाथ अश्क । , कि अव भी रोमांच हो आता है। वात कुछ भी नहीं थी। फिरते-फिराते चार वज गये होंगे, तनिक भूख लग आयी, मिठाई और फलों का खयाल भी आ गया। वापस मुड़ा। वहाँ गया, जहाँ खाना खाया था और पार्टी को छोड़ा था। देखा तो पार्टी ही गायब । तीन-चार काग़ज़ इधर-उधर उड़ रहे थे और कुछ मक्खियों की भिनभिनाहट उस छोटी-सी ज्याफ़त का हाल बता रही थी, जो हमने वहाँ उड़ायी थी। मैंने बहुतेरा इधर-उधर देखा, एक- दो से पूछा भी, पर पता न चला । पता भी कैसे चलता ? पार्टी कुछ और आगे बढ़ कर पेड़ों के अगले झंड की ओट में ताश खेल रही थी । मैं इस जगह से नितान्त अनभिज्ञ था। आगे कोई जगह है भी या नहीं, यह मुझे मालूम न था, प्राण भूख से निकले जा रहे थे। मैं फिर मेले की ओर फिरा । एक सिरे से दूसरे सिरे तक चक्कर लगाया कि पार्टी का एक भी आदमी मिल जाय तो पूछ , पर कोई भी तो नज़र नहीं आया। आखिर जब भूख और तेज़ हुई तो फिर एक खोंचेवाले से मिठाई ले कर खाने लगा। मिठाई क्या, कुछ पेड़े और बर्फी थी। और यद्यपि खोये में चीनी का अंश अधिक था तो भी इससे कुछ हानि होने की सम्भावना नहीं थी। साथ के बाज़ार में पूरियाँ बन रही थीं, पर जाने क्यों मुझे पूरियों से बेहद नफ़रत थी। मिठाई भी गरिष्ठ चीज़ है, लेकिन पूरियाँ तो मेरे लिए नितान्त अपाच्य हैं। कभी एक-दो खा लूँ तो फिर तीन दिन तक 'ईसवगोल' फांकता रहता हूँ । ऐसी तवियत खराव होती है कि खुदा की पनाह ! अभी मुश्किल से वर्फी का टुकड़ा दाँतों तले गया होगा कि 'हटो-बचो' की आवाज़ और लोगों की रेल-पेल ने मुझे वहाँ ला खड़ा किया जहाँ एक चौकीदार महाशय उस बाड़े की चौकीदारी कर रहे थे, जिसमें एक रात का मरमा । ८३ - पहाड़ी युवतियों को नुमाइश हो रही थी अथवा जहाँ बैठी हुई वे तमाशाइयों के मनोरंजन का सामान जुटा रही थी। मैं उन चौकीदार साहब के पास जा कर खड़ा हो गया। कुछ यार लोग योंही यह नजारा देखने में व्यस्त थे। इतने में उँगलियाँ उठी, आँखों ने आंखों में ही बातें की और दिमाग ने समझ लिया कि राणा साहब आ रहे हैं । अब उधर नजर उठायी तो देगा राणा साहब जंगी लाट (कमाण्डर-इन-चीफ) मिस्टर वर्ग मे साथ आगे-आगे और टिक्का साहब और मन्त्री महोदय उगी अरदल में चले आ रहे है। उस वर्ष पजाब के लाट शायद बीमारी के कारण मेले की रौनक नहीं बढ़ा राये थे, इसलिए जंगी लाट ही आये थे। उनके हाथ में वही वा-गा वल्लम था और खाको कोट और निकर पहने हुए थे। उनके साथ शायद उनकी धर्मपत्नी थी, किन्तु निश्चय मे नही पाहा जा सकता, लड़की भी वह हो सकती थी। राणा साहब, मन्त्री महोदय और टिक्का माहब को मैंने मशोवरे और सी-पी पहुंचते ही देखा था। लेकिन पहली बार काफ़ी दूर से देखा था। अब वे एकदम सामने थे । गणा माहब काफी बूढ़े थे । दादी-मूंछे सफाचट यो । यद्यपि बाद में उनके फोटो में उनके बड़ी-बड़ी मूंछे देखी, लेकिन वह शायद जवानी का फ़ोटो था। उन्होंने एक जरदोजी का लम्बा नागा पहन रसा था । उसके नीचे क्या या, यह मैं नहीं यह मकना । हां, कमर में चूड़ीदार पायजामा था। पैरों में पग-शू थे अथवा नौकदार जूते, मैं नहीं जान मका । मीट में उनके पैर दियायी नहीं दिये । हाँ, गिर पर रेगमी पगड़ी पी, जो पण्डिनी-मी बंधी थी। शमला टॅगा हुवा था । टिक्का माहब कोई गनीग- बालीम के पतले छरहरे आदमी थे। मछे उनकी मम्बी श्री और नम वक्त कार को बदी हुई थीं। उनकी काली .. ।
। उपेन्द्रनाथ अश्क . और चूड़ीदार पायजामा अव भी मेरी आँखों में घूम रहा है। जपूती तर्ज़ से बाँधे हुए इन्द्रधनुषी रंग से रंगे साफ़ की पेक्षा उनकी दर्प-भरी आकृति उनके टिक्का होने का ज्यादा कीन दिला रही थी। रहे मन्त्री महोदय, सो वे बेचारे अधेड़ म्र के, ठिगने कद के भले-से आदमी लगते थे । वेश-भूषा भी नकी सीधी-सादी थी। सिर पर सरदई रंग का साफ़ा, सफ़ेद चिकन और चूड़ीदार पायजामा । उनको देख कर कोई और वाहे कुछ समझ लें, लेकिन वे किसी राज्य के मन्त्री हैं, यह नहीं समझ सकता। कम-से-कम मैं ऐसा नहीं समझ सका। उनके पीछे दो-एक रीडर थे नीले ब्लेज़र के कोट और फलालैन की पतलूने पहने, अच्छे खूबसूरत नौजवान थे। राणा साहव जंगी लाट के साथ-साथ जा रहे थे। कुछ बातें भी करते जाते थे। तनिक दूर होने तथा भीड़ के वेपनाह शोर के कारण मैं सुन नहीं सका । अचानक मेरे मन में शंका जगी। राणा साहब अंग्रेजी में वातें न करते होंगे। ये शिमले से नौ मील की दूरी पर रहने वाले पुराने विचारों के पहाड़ी राणा, कितनी अंग्रेजी बोल सकते होंगे। उनके ज़माने में तो शायद चीफ्स कॉलेज की नींव भी न रखी गयी थी। फिर गेट पर स्वागत के समय अंग्रेज़ के साथ उन्होंने रीडर द्वारा वातचीत की थी और उसी ने दुभाषिये का फ़र्ज़ अदा किया था। टिक्का साहब इस ज़माने के आदमी थे । खासे लिखे-पढ़े लगते थे। पर यह वृद्ध राणा-उनके समय में तो शायद इन रियासतों तक अंग्रेजी की गन्ध भी न आयी होगी। तो फिर यह किस भाषा में बात-चीत कर रहे हैं ? क्या उर्दू में ? नहीं, राणा उर्दू अच्छी तरह न जानते होंगे। तो क्या पहाड़ी वोली में ? शायद लाट पहाड़ी भाषा से अनभिज्ञ हों। तो फिर किस भापा में बात करते हैं ? मेरी उत्सुकता बढ़ी। वे आगे निकल एक रात का नरक। ८५ चुके थे । मैं उन चौकीदार साहब से पूछ बैठा । "क्यों जी यह आपके राणा कहाँ तक पढ़े होंगे?" वह महाशय नीली वर्दी डाटे, भू-मंग किये, कदाचित ज़माने की नाकद्र-शनासी के हाथों तंग आये-से खड़े थे । कोष से बोले : "तुम से मतलब?" "यों ही !" "यों ही क्या ?" मैंने उन्हें कुछ समझाने का प्रयास किया, लेकिन उन्होंने नहीं सुना और मुझे ज़ोर से धक्का दे दिया, "चल हट यहां से।" मैं गिरा, मेरा हैट घरती पर जा पड़ा। दर्शकों में एक ठहाका गूंज उठा। मैंने कुछ खिन्न होते हुए उठ कर कहा- "माई, सीधी तरह वात करो, धक्का क्यों देते हो ?" "चल....वे ! सीधी तरह लिये फिरता है।" गन्दी गाली ! मैं अपने-आपको काबू में न रख सका । मैंने उसे गले से पकड़ लिया। मैं कहता हूँ तमीज़ से बात करो।" चल तमीज़ के बच्चे ! " उसने मुझे फिर धक्का दिया। मैंने उसे फिर पकड़ लिया। उसने मेरे मुंह पर एक थप्पड़ जमाया मैंने छड़ी उठा ली। शायद एक जमायी या महज उठायी....) लेकिन दूसरे क्षण मैंने अपने-आपको दूसरे चौकीदारों के मध्य में घिरे हुए पाया। एक ने छड़ी छीन ली। दूसरे ने हंटर का वार किया। 'मार दिया, मार दिया !' का शोर मच गया। लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गयी। कुछ लोगों ने बीच में पड़ने का प्रयत्न किया । परन्तु दारोगा साहब, जो लगता है, जैसे इस मौके के लिए तैयार बैठे थे, लाल आंखें किये डट गये और सबको भगा " " ८६ । उपेन्द्रनाथ अश्क देने का हुक्म दिया। "क्या बात है ?" उन्होंने सिपाही से पूछा । वह व्यक्ति जिसे मैं चौकीदार समझा हुआ था, वास्तव में सिपाही था। उन पहाड़ी सिपाहियों की वर्दियाँ मैदानी चौकीदारों-जैसी ही नीली थीं। "यह लौंडा, वहाँ औरतों से मज़ाक कर रहा था । मैंने रोका तो मेरे चांटे मारने लगा।" उसने कहा । . मैं इस बात पर संज्ञाहत-सा खड़ा रह गया । इतना झूठा अभियोग और मुझ पर ! क्रोध के कारण मेरे मुंह से बात न निकली। मैंने कुछ सफ़ाई पेश करने का प्रयास भी किया, परन्तु असभ्य सिपाहियों के दुर्व्यवहार के कारण मैंने न बोलना ही उचित समझा । इस धकड़-पकड़ में मेरी ऐनक भी कहीं गिर पड़ी थी और मुझे सब कुछ धुंधला-धुंधला-सा दिखायी देने लगा। उस समय किसी ने कहा, “इसे हथकड़ी लगा . लो।" "लगा लो ! " मैंने क्रोध से कहा और हाथ आगे कर दिया। मेरे हाथ में हथकड़ी पड़ गयी। अब सोचता हूँ कि उस समय यदि मैंने एक दुनियादार की तरह किंचित धीरज और शान्ति अथवा खुशामद से काम लिया होता तो शायद मुझे वह रोमांचकारी कष्ट न सहना पड़ता, जिसकी याद शायद ज़िन्दगी-भर न मिटे, लेकिन मेरे जैसे भाव-प्रवण के लिए मौके की नजाकत को सोच कर बात एFuTRU खैर, कहना यह चाहता हूं कि मैं 'गुगाह दी। बता लिया गया और आगे-आगे मैं-एक हाथ में हमकड़ी और दूसरे में लटकता हुआ हैट-साथ में पापना गमदूरा-सरत सिपाही, पीछे शत-शत तमाशाइयों का हगूग, मुरदरा धान रोग जुलूस निकाला गया। इस भीड़ में, जहाँ गै गुमर पहले स्वतन्त्र घूम रहा था, उस तरह पन्दी कमी सरस गलना असरा तो बहुत, आंखें भी गाया गपी, पेनिम मा किया जा सकता था, कही विदेशी गपड़े का पायकाट मारते हुए गिरतार होता अथवा पत्र के किसी राष्ट्रीय रोग में गाय पाहा जाता तो सिर ऊँचा होता । पर पागयस्तो दना भीमा लगाया कि सिर उठाने के काबिल म घोटा। 4 भनागानुग सहस्रों की भीड़ में अपने आपको परित्रहीन मालागंगा कीर फिर अकड़ कर चलेगा। उस समय, जब मुझे नीचे थे. यागार मामा मामा, एक व्यक्ति ने जिमकी दुकान जगनी थी, गुरमे महामान दिखाते हुए मेरे हाथों में दृट्टी हो गया और गका माया दे दिया। उसकी दुकान पर मेरी गेनक गर्ग भी पानी अच्छा हुआ कि ऐनक टूट गयी, नही तो शायद नापामा के हंसते हुए चेहरों को देश कर ममंग पता भी न जाना।
प्राठ "अरे, वो तो मास्टरजी जा रहे हैं।" भोलानाथ ने मुझे इस हालत में जाते हुए देख कर कहा, और चाहे उन्होंने मेरी हथकड़ी का ज़िक्र तक न किया तो भी उनका कहने का ढंग कुछ ऐसा था कि समस्त पार्टी की निगाहें मेरी ओर उठ गयीं। मैंने भी कुछ अश्रुपूर्ण आँखों से उनकी ओर देखा और दूसरे क्षण सारी पार्टी ने मुझे घेर लिया। वे सिपाही, जो अपने एक भाई के अपमान का बदला चुकाते हुए, एक प्रकार से मुझे धकेलते लिये जाते थे, एक क्षण के लिए भौंचक्के-से खड़े हो गये। मुझे भी कुछ धीरज बँधा। पार्टी, जैसा मैं पहले कह चुका हूँ, पेड़ों के झुंड के पीछे ताश खेल रही थी और । सौभाग्यवश हवालात को रास्ता उसी जोर से हो कर जाता था, नहीं तो यदि उन्हें मेरा पता न चलता, तब न जाने जितनी परेशानी हुई, उससे कितनी ज्यादा परेशानी उन्हें होती? और यदि इस घटना से पहले, मैं उन्हें ढूंढता हुआ ज़रा और आगे बढ़ जाता तो यह घटना ही न घटती, लेकिन मालूम होता है, ऐसा होना ही था और जो होना हो उसे कौन रोक सकता atic लाला जी यद्यपि एक निकर और कमीज़ पहने हुए थे और उन्हें देख कर कोई न कह सकता था कि वे पंजाब सरकार के एक उच्च पदाधिकारी हैं, पर बड़े आदमियों के चेहरों पर न जाने कैसी चिकनाई और कैसा जलाल होता है, उनके हय कहने में 'क्या बात है भई' कुछ ऐसी बात थी कि सव खड़े एकामरा हो गये। कुछ उपहे-उगले गायों में गंगे अपनी आग बयान की, पर मेरी पथराहट, मोग और गुग और ge असाधारण परिस्थिति में मेरे मुंह में ठीमा पर भी नही निकलने दिये । सिपाहियों को सागरम uth, जो मुझे हवालात को ले जाने मी मागा कर गंगोजागी, एक ललकार दी, "ले जाओ और हवालात में परो!" लाला जी उन दारोगा गाहब पी और Eिt जबरदस्ती हवालात को पसे। नाग-नाग भीमा fm दारोगा की कर्फश आयात्र आयी, "याप मिका माग मिलिए।"
60 1 उपेन्द्रनाथ अश्क । हैं, उनका निर्णय आखिरी होता है । मुझे डेढ़-दो महीने जेल की सज़ा भी दी जा सकती है और सौ-दो सौ रुपया जुर्माना भी । जेल में बहुत तकलीफ़ होती है और पंजाब सरकार की जेलों के कष्ट उसके सामने गर्द हो कर रह जाते हैं। मैं चुपचाप उनकी कहानी सुनता गया और मुझे निश्चय हो गया कि अब जान मुश्किल से ही बचेगी। मैं उसी समय डेढ़-दो सौ रुपया दे न सकता था और कैद की राम जाने-इस पतले-दुवले शरीर में उन कष्टों को सहने की शक्ति है या नहीं, इसका अनुभव नहीं था। शायद ऐसी कैद में, जिसका उसने हाल सुनाया, चन्द दिन में ही आत्मा और शरीर का नाता टूट जाय । सिपाही ने बताया कि बाबू साहव यहाँ ज़रा- से अपराध पर तो अभियुक्त को काठ मार देते हैं, फिर बड़े अपराध की तो बात ही क्या । और यह काठ मारना-इसका हाल सुन कर ही मेरे रौंगटे खड़े हो गये । लकड़ी के दो तख्तों में अभियुक्त की टांगें रख कर उन्हें किस दिया जाता है और असह्य पीड़ा से अभियुक्त तड़पता है। लालजी ने आते-आते मुझे जो सान्त्वना दी थी, 'घबराइएगा मत !' उससे दिल को तसल्ली तो थी, पर इस बायीं आँख को कौन समझाये जो उस दिन इतनी फड़की कि उम्र-भर न फड़केगी और दिमाग ने ऐसे भयानक चित्र बनाये कि खुदा की पनाह ! हवालात आ गयी और हम सब एक क्षण के लिए रुके। मेले से कोई एक-डेढ़ फर्लाग की दूरी पर नीचे खड्ड में, राणा साहब के अस्थायी निवास-स्थान से कुछ पग और नीचे, यह हवालात थी। हवालात वाहर से एक झोंपड़ी-सी मालूम होती थी-साधारण पहाड़ी छप्पर-ऐसी ! उसके आगे थोड़ी-सी खुली जगह थी और उसके बाद फिर खड्ड थी, जिसमें केलू, तोस, वाँझ के पेड़ों का जंगल था और नीचे के गांवों को जाने वाली !
एक रात का नरक। पगडण्डियां उन घने पेड़ों में खो गयी थीं। वाहर से देखने पर कौन कह सकता था कि सीधी-सादी झोपड़ी में ऐसी हवालात है कि मनुष्य को असह्य यन्त्रणा देने में कोई भी शहरी हवालात इसका मुकाबिला न कर सके । मेरे साथी सिपाही मुझे इस छप्पर के अन्दर ले गये। अन्दर जाने पर मालूम हुआ कि यह सिपाहियों के अस्थायी तौर पर रहने की जगह है। मेले का प्रवन्ध करने के लिए रियासती पुलिस का जो जत्या कोटी से सी-पी आता, वह इसी छप्पर रहा करता था। वहां सिपाहियों के बिस्तर गोल किये हुए पड़े थे, कुछ सिपाही बैठे थे । फ़र्श लकडी के तहतों का बना हुआ था। एक चारपाई भी थी, यह कदाचित बड़े दारोगा की थी। मैंने माथे का पसीना रूमाल से पोंछा और एक सिपाही से कहा, "मई मेरो हैट कहीं टांग दो!" "हम तुम्हारे बाप के नौकर तो नहीं।" मैं चुप खड़ा रह गया । छप्पर के अन्दर प्रवेश करते समय मैं अपनी अवस्था को कद्रे भूल गया था-मूल गया था कि एक क दी हूँ-स्वतन्त्र पत्रकार या एक आजाद अध्यापक नहीं। कुछ थकावट-सी महसूस हुई । इसीलिए वही फर्श पर बैठ गया। अपनी इस हालत पर मेरे आंसू आ गये। लेकिन मैंने वरवस उन्हें अन्दर-ही-अन्दर पी लिया। "इधर बैठ जाओ! एक दूसरे सिपाही ने, जो किचित सहृदय दिखायी देता था, फर्श पर पड़े हुए एक कम्बल की ओर संकेत करते हुए कहा। लेकिन मैं नहीं उठा । अभी न जाने और कौन-सा उपहास, कौन-सा निरादर सहना शेप था। इसलिए मन को पहले से तैयार करना ज़रूरी था। और मैंने उस क्षणिक दुर्वलता को हटा कर मन को मजबूत बना लिया । अभी छोटे दारोगा साहब के आने की प्रतीक्षा हो रही थी।
१२। उपेन्द्रनाथ अश्क इसलिए सिपाही आपस में बातें करने लगे। बोली पहाड़ी थी, लेकिन मैं दूसरी दूसरी वार शिमले आया था, इसलिए उनकी . वातचीत को भली-भांति समझता था। वातचीत का सिलसिला उस सिपाही ने आरम्भ किया, जिसने मुझे कम्बल पर बैठने के लिए अनुरोध किया था। कहने लगा, “वावू बेकसूर लगते हैं।" एक दूसरा सिपाही वोला, "क्यों वे ने गाली क्यों दी थी?" सम्बोधन उस व्यक्ति की ओर था, जिसने मेरे साथ सगड़ा किया था। "मैंने गाली कब दी, इन्होंने मेरे थप्पड़ रसीद किये।" , उसने कहा। "जा बे, इन बाबू साहव का सिर फिरा है जो यह थप्पड़ लगाते । वेचारे भले घर के आदमी हैं।" वह कुछ लज्जा से सिर झुका कर खड़ा रहा। उनकी बातों से मेरे मन को कुछ सान्त्वना मिली। आखिर यहाँ सब पशु ही नहीं, यहाँ भी मानवता का वास है । मुझे कुछ चिन्तित देख कर उनमें से फिर एक बोला, “वाबू जी, आप चिन्ता न करें। आप ज़रूर रिहाई पा जाएँगे।" मैंने मुस्कराने की असफल.चेष्टा की। तभी खंट-खट जूतों की आवाज़ सुनायी दी और दूसरे क्षण नायव दारोगा साहब छोटे-से दरवाजे से सिर झुका कर अन्दर आये और मेरे सामने एक गोल किये विस्तर पर बैठ गये । मैं उनका नाम नहीं जानता, पर उनकी सूरत मेरे दिल पर सदा के लिए अंकित हो गयी। पतला-सा शरीर, जो दुवला होने के कारण कुछ लम्वा दिखायी देता था, लम्बी नाक, लम्बूतरा मुंह, यदि सिर ज़रा छोटा होता तो वे अच्छे-खासे दौले शाह के घूहे दिसायो देते । साकी वर्दी, पमर में अफ़सरों वाली पेटी, सिर पर साकी-साल पट्टी का साफा! इस वेश-भूषा, अफ़सरी की मस्ती और मेले के कारण मुरा पर आये हुए क्रोध ने अवश्य उनके चेहरे में कुछ सुन्दरता पैदा कर दी थी, नहीं तो उनकी सूरत तो कुछ ऐसी पी जैसे जन्म- जन्मान्तर से रोते आये हों और जिन्दगी से बेतरह पेजार हों। आते ही उन्होने मेरो तलासी का आदेश दिया। एक सिपाही ने बाकायदा मेरी तलाशी ली। एक पड़ी, कुप नकदी, पोष्ट बुक, एक-दो कागज मेरो जेब से बरामद हुए और फ़ई-परागदी की जीनत बने। घड़ी शायद वे सिसना ही भूल गये और बदहवासी में मुझे भी ध्यान न रहा । सूची तैगार हुई। हस्ताक्षर कराये गये, मैने समझा, नलो जान बचो । यहाँ माफ़ी जरह है, तीन दिन तक लाला जी कुछ-न-कुछ मदद करेंगे। परन्तु जव दारोगा के साथ आने वाले दो आदगियों में से एक ने दरवाजे के पास ही फर्श से एक लकड़ी का तस्ता उठाया तो मेरा हृदय धक-धक करने लगा। २. पंजाय मे एक पोर को कम है जिसे साई बोलेगाह को कम कहते हैं। जिन लोगों के सन्तान नहीं होतो ये यह मन्नत मानसे हैं कि ये पहला लड़का या सड़को साई दोसेशाह को भेंट कर देगे। जय परचा पंरा हो जाता है तो उसे मन्नत के अनुसार उन पर मुगाविरों के हवाले कर देते हैं। ये यच्चे के सिर पर लोहे का टोप घढ़ा देते हैं, जिससे याकी अंग तो या जाते हैं, पर रिपोटा हो रहता है। ऐसे तड़के तपा साकियां भीख मांगने के काम माते हैं और दिमाग उनका प्रायः अविकसित हो रह जाता है । मिसका सिर उसके शरीर को अपेक्षा महा पोटा हो, उसे भी बौसेगाह का पहा ही कहा जाता है।
१४ । उपेन्द्रनाथ अश्क हँसते हुए दारोगा साहव ने कहा, "वावू साहव को गर्मी बहुत जल्दी आ जाती है, अव तवीयत ठंडी हो जायगी।" मेरे देखते-देखते, एक आदमी उसमें उतरा । लगता है उसके पांव धरती पर लग गये, लेकिन सिर अभी बाहर दिखायी देता था। आशंका हुई कि कहीं यह अँधेरा भूगृह (तहखाना) ही यहाँ की हवालात न हो और इसमें मुझे फ़ैसले तक बन्दी न रहना पड़े। वही हुआ जिसका मुझे डर था। उस व्यक्ति ने वाहर निकल कर कहा, "अँधेरे और ठंड का राज है, यहाँ तो वेचारा मर जायगा।" "होश भी तभी ठिकाने आयेंगे, इसे गर्मी भी कुछ ज्यादा ही चढ़ी है ।" दारोगा ने कहा । मैं उठा । मन में आया कि मिन्नत-समाजत करूं, पर इन नरपिचाशों से मिन्नत । मैं चुपचाप बढ़ा। भूगृह के मुख पर आया तो दिल कांप उठा । सिर से पैर तक सिहरन-सी दौड़ गयी । लगा जैसे ज्वालामुखी के मुंह पर खड़ा हूँ और अन्दर शीत नहीं, आग धधक रही है। एक सीढ़ी भी पड़ी थी जो वृक्ष के एक साधारण से तने को एक-एक गज़ के फ़ासले पर पाँव रखने के लिए तराश कर बनायी गयी थी। जानते हुए भी मैंने पूछा, “इसमें मुझे रहना पड़ेगा।" "और क्या तुम्हारे लिए राणा साहव के महल खाली कराये जायँगे ?" मैं खिन्न हो कर रह गया। 'इनसे बात करना बेवकूफ़ी है, मैंने मन-ही-मन कहा । 'राणा के महल कोई बड़ी बात न थी। यदि मैं स्वतन्त्र रूप में राणा से मिलने आता तो शायद ऐसा ही होता, लेकिन भाग्य ने आज मेरे हथकड़ी डलवा दी थी और अव मेरे लिए यही काल-कोठरी निर्धारित थी !' मैं ।
एक रात का नरक । ६५ । उतरा । भगृह बहुत नीचा न था । मेरे पांव धरती पर थे और गर्दन वाहर । शीत इतना था कि शरीर कांप उठा । गर्मी के कारण सूती कोट, कमीज और निक्कर पहने हुए था। धरती नमदार यो । मैं चुप रहना चाहता था, पर कह बैठा, 'वैलूंगा किस जगह, धरती तो गीली है। "तुम्हारे लिए गालीचे कहाँ से लाये जायें ?" दारोगा ने कहा- मैंने कहा--"फिर भी कुछ तो चाहिए, कपड़ा न सही, कागज़ सही ।" मेरी प्रार्थना पर एक पत्र का पृष्ठ ला दिया गया, हिन्दी का कोई दैनिक पत्र था। मैं दरवाजे से आने वाले प्रकाश के सहारे चन्द क़दम जा कर, एक लकड़ी के खम्भे के पास कागज बिछा कर बैठ गया। "वस अव वन्द कर दे।" ऊपर से आवाज़ आयी। "खुला नहीं रह सकता?" मैने पूछा । "नहीं।" "पर यहां ठंड बहुत है, मुझे कम्वल चाहिए।" "बड़े दारोगा के आने पर कहना ।" इसके बाद दरवाजा बन्द हो गया। तहखाने में घटाटोप अंधेरा हो गया । दूर-बहुत दूर-~-गाने-बजाने का बहुत हल्का शोर सुनायी दिया । मैं सिकुड़ कर नंगी टांगों को बाहों से पेर कर और सिर को घुटनों में दे कर बैठ गया। उस समय देर से रुकी हुई आंसुओं की दो बूंदें मेरे घुटने पर वह चलीं।
नौ । दरवाज़ा फिर खुला। मेरे विचारों का तार टूट गया। इस थोड़े समय में न जाने दिमाग़ गत-आगत के बारे में क्या-क्या न सोचा गया-एक की स्मृति मन में हूक-सी पैदा कर देती थी, दूसरे का ध्यान दिल में आतंक का संसार बना देता । अभी कुछ देर पहले जो व्यक्ति इस विशाल पृथ्वी पर स्वतन्त्र विचर रहा था, जिसे इन पहाड़ियों पर सैर करने की, उनके निर्माता की कारीगरी को देखने की, उस पर मुग्ध होने की पूरी-पूरी आजादी थी, अय वह एक पंखहीन पंछी की तरह इस अँधेरे पिंजरे में बन्द था । पंछी भी शायद उससे अच्छे हाल में होगा। उसे कुछ रोशनी तो देखने को मिलती होगी, पर यहाँ तो सूचीभेद्य अंधकार था। इसी अंधकार में बैठा मैं सोचने लगा कि लाला जी की कोशिशें असफल रही होंगी और वे फिर ताश खेलने में जा लगे होंगे अथवा मुझे वहीं छोड़ उदास-से घर चले गये होंगे। मेरे घर पर तार दे देंगे। इससे ज़्यादा वे कर ही क्या सकते हैं। भाई साहब तार मिलते ही शिमले पहुँचेंगे। लेकिन इस बीच में मैं इस काल-कोठरी की भेंट हो चुकूगा अथवा कोटी की किसी गन्दी अँधेरी जेल में पड़ा सड़गा। निराशा में अनिष्ट मनुष्य के समीप आ जाता है और इष्ट मृगमरीचिका की तरह दूर होता चला जाता है और आशा, विजली के अस्थिर कौंधे-सी निमिष-भर चमक कर काले बादलों में गुम हो जाती है। मेरे सामने बाहर का चित्र खिंच गया । मेला उसी प्रकार एक रात का नरक ६७ भरा हुआ है । लाहौर के छात्र, जो वी० ए० को परीक्षा दे कर आये हुए थे और जिनकी टोली वरड़ियों के परे बैठी गा रही थी- 'यहाँ ले चल मेरा घरखा जहां चलते हैं हल तेरे' अव भी वैसे ही बैठे मस्ती से गीत अलाप रहे हैं। पंगूड़े उसी प्रकार चल रहे हैं । बरड़ियां उसी प्रकार गा रही हैं और हमारी पार्टी फिर उसी प्रकार ताश खेलने लगी है। सव मेले में हैं, केवल मै उस राग-रग से दूर इस तारीक, अंधेरी कोठरी में बन्द कर दिया गया हूँ। प्रकाश की कुछ किरणे भगृह की तारीकी को भेद कर मुझ तक पहुँच गयीं, पर मैंने इस ओर नहीं देखा । असीम निराशा ने मुझे नितांत उदासीन-सा बना दिया था । मुझे आशा ही नहीं थी कि मैं जल्दी छोड़ दिया जाऊँगा । इस निराशा से एक अजीब-सा वैराग्य पैदा हो गया था। "अजी ओ बाबू साहब !" कोई शिष्ट सिपाही लगता था, पर में नहीं बोला । फिर भी वही स्वर सुनायी दिया, "अजी ओ वाबू साहब !" "क्या बात है ?" "इधर आओ।" मैं बड़ी मुश्किल से उठा. पर लकडी की नीची छत से सिर फूट जाने के भय से झुका-झका ही दरवाजे पर पहुंचा । इन दो निमिपों में ही न जाने आशा ने कितने प्रासाद खड़े किये और निराशा ने कितने गिराये । कभी कल्पना करता, लालाजी ने टिक्का साहब से मिल कर मेरी रिहाई का आयोजन कर दिया है और टिक्का साहब ने अपने नौकरों को भूल महसूस करके मुझे तुरन्त रिहा करने का आदेश दे : । .
९| उपेन्द्रनाय अश्क ... उस समय दरवार का दृश्य मेरी आँखों के सामने घम जाता- टिक्का साहव मुझे सत्कार-सहित रिहा कर रहे हैं पर दूसरे क्षण यह आशा निराशा में परिणत हो जाती और मैं देखता कि मैं कोटी जेल में पड़ा सड़ रहा मैं झरोखे के समीप आ कर खड़ा हो गया। वाहर ऊपर के दरवाजे में एक सुन्दर-सा बारह-वर्षीय वालक खड़ा था-लाल उन्नावी रंग की चमचमाती हुई पगड़ी, गोरा, भरा हुआ मुख, गले में ब्लेज़र का कोट, कमर में निकर, पैरों में मोज़े और बढ़िया बूट ! मैं पहली नज़र में ही भाँप गया कि यह टिक्का साहव के कुंवर हैं और मेरा खयाल ठीक था। ऊपर भूगृह के मुंह पर खड़े हुए सिपाही ने कहा-"कुंवर साहव आये हैं, जो पूछते हैं वताओ !" आप भी पूछ लीजिए । अव तो दरवार का भंगी भी आये तो जो पूछे उसे बताना होगा । मुझे कुछ रुलाई-सी आ गयी। "तुम्हें क्यों पकड़ा गया है ?" बच्चे ने सरलता से पूछा। मैंने उसकी ओर देखा। वह कुछ मुस्करा रहा था, पर उसकी मुस्कराहट में व्यंग्य न था और न था तिरस्कार । उसमें सहानुभति थी। मैंने कहा- "तुम्हारे सिपाहियों ने पकड़ लिया ।" "क्यों पकड़ लिया ?" "यह उनसे पूछो ।" "वे कहते हैं तुमने सिपाही के मुंह पर थप्पड़ लगाया। "उसने गाली दी " "तुम हमसे कहते " इस बात का कोई उत्तर न था । शायद कुवर ठीक कहता था। क्या उत्तर देता, कैसे उसे समझाता कि परिस्थिति ही ऐसी थी, जव समझ और सोच की शक्तियाँ शिथिल हो जाती ।
एक रात का मरका १६ हैं, मनुष्य का धीरज जवाब दे जाता है । ऐसे में आदमी क्रोध को अपना पथ-प्रदर्शक बना कर उसके पीछे हो लेता है, फिर वह चाहे उसे पहाड़ की चोटी पर उड़ा ले जाय, चाहे गहरे सड्ड में गिरा दे। कुंवर चला गया । मैं फिर अपनी जगह आ बैठा । झरोसा बन्द कर दिया गया और फिर वही अंधेरा और मैं। इतनी देर तक लकड़ी के स्तम्भ का सहारा लिये रसने से मेरे दायें कन्धे में दर्द होने लगा। अब मैं पहलू बदल कर और निक हट कर बैठ गया । पहली बार मैंने इस अंधेरै को चीरने का प्रयास किया। उस समय मुझे लगा जैसे में इस अंधेरे में भी देख सकता हूँ । मैने और भी ध्यान से आंखे फाड़-फाड़ कर देखा । इस बार मुझे कुछ दूर इस तहखाने की दीवार दिसायी दी। मैं उठा, कुछ पग टटोल-टटोल कर चला। एक दूसरे स्तम्भ से मेरा सिर टकरा गया। इस अंधेरे में वर्षों से इसी प्रकार नमी में रहने से उस स्तम्भ पर, जो किसी वृक्ष की वेढंगी-सी मोटी शाख से बनाया गया था, कुछ नम-नर्म-सी वस्तु जम गयी थी-शायद काई है-मैने सोचा । कुछ और कदम चलने पर दीवार आ गयी। मिट्टी की सीली-लोनी दीवार, छ कर देखा तो लेप के-लेप हाथ लगाते ही झड़ गये । मै अधे की तरह टटोलता हुमा दीवार के साथ-साथ कुछ कदम बढ़ा । ऊपर फिर कंडी खुलने को आवाज सुनायी दी। मैं फ़ोरन अपनी जगह आकर बैठ गया। दरवाजा तुला, सिपाही का कर्कश स्वर, "दारोगा साहव आये हैं।" मैं कहना चाहता था, 'मैं क्या करू,' पर अपनी स्थिति का ध्यान करके चुप रहा और एक हाथ में पड़ी हुई हपकड़ी दूसरे हाय से सम्हालते हुए फिर झरोखे के पाम सोढ़ी मे कुछ दूर आ कर सड़ा हो गया।
१०० । उपेन्द्रनाथ अश्क वाहर बड़े दारोगा खड़े थे। कोई पचास वर्ष की उम्र होगी, बड़ी-बड़ी मूंछों के कारण चेहरे से रोव टपकता था और आँखें चढ़ी हुई-सी थीं। "क्यों कैसे हो?" "अच्छा हूं।" "अव होश ठिकाने आये या नहीं ? "किसके होश ?" "दारू तो नहीं पिया है ?" "मैंने ?" "और क्या मैंने ?" दारू आपने पिया हुआ है- मैं यह कहना चाहता था, परन्तु अपने क्रोध को रोक कर बोला-"मैं नशे के निकट नहीं जाता ।" "फिर लड़कियों से मज़ाक क्यों किया? सिपाही को चाँटे क्यों लगाये?" "मैंने दोनों में से कोई वात भी नहीं की।" "सिपाही को तुमसे वैर था, जो तुम्हें गिरफ्तार कर . लिया। मैंने स्वयं तुम्हें उसके गले को पकड़े देखा है।" "उसने गाली दी थी।" "क्यों दी थी ? "मैंने उससे पूछा था कि तुम्हारे राणा कहाँ तक पढ़े हुए "और यह भी पूछा होगा कि यहाँ स्त्रियों का व्यापार होता है, राणा साहव जिसे चाहते हैं, चुन लेते हैं।" "यह आप कहते हैं, मैं नहीं कहता, मैंने ऐसी कोई बात नहीं पूछी।" "फिर यह बात क्यों पूछी थी ?"
एक रात का मरक । ०१ "राणा बूढ़े हैं, मेरे विचार में उनके समय में अंगरेजी पढ़ाने का कोई प्रवन्ध न होगा। उन्हें अंगरेज़ लाट के साथ जाते देख कर मुझे ऐसा खयाल आया कि पूछ, वो जंगी लाट से किस भापा में बात करते हैं ?" "अच्छा आगे को दारू पी कर मत मेला देखने आया करो!" मैं जल उठा । समझा था, यह आदमी मुझसे सहानुभूति रखता है, इसलिए सब कुछ सुनाता चला गया। नहीं तो एक शब्द तक जवान पर न लाता। अब मालूम हुआ कि यह महाशय मुझे पूरा अपराधी सममे हुए थे । "और किसी चीज़ की ज़रूरत है ?" "यहाँ सर्दी बहुत है, बदन अकड़ा जाता है।" "कम्बल मिल जायेंगे ! और 'कुछ ?' "मैं अपने मित्रों से कुछ क्षण के लिए मिलना चाहता हूँ।" "नहीं मिल सकते, पर तुम्हें जिस चीज़ की जरूरत हो, हमें बताओ!" "शायद भूख लगे।" "बहुत अच्छा, खाने को आ जायगा।" "दारोगा साहब के कहने पर मुझे दो कैदियों वाले कम्बल मिल गये । वे ही जिन्हें हम छ ना भी पसन्द न करें, पर भाज वही जिन्दगी का साथ बनाये रखने का सहारा थे। मैंने उस छोटे-से झरोखे से आने वाले प्रकाश को रेखा में एक कम्बल विद्या लिया और लकड़ी के एक स्तम्भ का सहारा ले कर एक कम्बल से घुटने ढांप, चुपचाप बैठ गया, पर सर्दी कम न हुई। यह भूगृह सचमुच शीत-गृह था और सर्दी-- बन कर नसों में दौड़ती जा रही थी। मैंने क "दो कम्बल काफ़ी नही।"
१०२ । उपेन्द्रनाथ अश्क "तुम्हारे लिए कम्बलों का कारखाना तो नहीं खोला हुआ ।" A- तभी खटखट की आवाज़ आयी । मैने समझ लिया कि दारोगा साहव चले गये हैं और अब असभ्य सिपाहियों का सामना है, इसलिए चुप ही रहा । वह सिपाही स्वयं ही बोल उठा- "यह दारोगा साहब की कृपा समझिए कि दो कम्बल मिल गये हैं, वरना यहाँ ऐसे लोग आते हैं, जिनके कपड़े तक उतरवा लिये जाते हैं।" मेरा शरीर कांप उठा और. में अपनी हैट को सिरहाने रख कर सोने की कोशिश करने लगा।
दस । "चौकीदार साहव ! जब स्वयं भगवान विष्णु को होनहार के डर से पानी में छिपना पड़ा तो फिर हम-तुम किस बाग की मूली हैं । इस बाबू बेचारे का सितारा गर्दिश में है । नहीं तो यह भला क्या किसी को छेड़ता।" मैने ध्यान से सुना । ऊपर शायद मेरे सम्बन्ध में ही बात- चीत हो रही थी। मेला चूंकि सांझ ही को भरता है, इसलिए सिपाही तो सब जा चुके थे, हाँ चौकीदार रह गया था । वही उस समय शायद किसी से बातें कर रहा था। चौकीदार ने कहा, "हां गोविन्द, सव भाग्य का दोप है । लड़की को यह क्या छेड़ता, यह काम तो वे लोग करते हैं, जो हमेशा यहां के हालात से वाकिफ हैं और फिर मुझे तो चूनी ने बताया जो पहरे पर था और जिससे झगड़ा हुआ कि छेड़ा- बाड़ा कुछ नहीं, बात यह हुई कि उसने इसे हटाया, यह हटा नहीं, उसने गाली दी, इसे जोश आ गया और वस !" गोविन्द शायद बाहर बैठा था और आग ताप रहा था और शायद जाति से भी वह नीच था । हंस कर बोला-"इन वावू माहब को ही दरगुज़र कर देनी चाहिए थी । गाली का • क्या है, यह तो हम गवारों के मुंह में आम चढ़ी हुई है, कोई पढ़ा-लिखा गाली देता तो चाहे ये जितना कोच कर लेते।" मुझे अपनी ग़लती अब मालूम हुई । अब तक मैं उस सिपाही को अत्याचारी अन्यायी, जालिम, झूठा और न जाने क्या-क्या ममझ रहा था। अब जो देखा तो दोष मेरा ही १०४ । उपेन्द्रनाथ अश्क निकला। चौकीदार बोला, "भाई, इसमें न सिपाही का कसूर है, न इस बाबू का। सव दोष बुरे ग्रहों का है । इस बाबू का सितारा चक्कर में है। बेचारा मुसीबत में फंस गया ।... फिर कुछ क्षण ठहर कर लम्बी साँस छोड़, चौकीदार ने कहा-"हम पर भी गोविन्द ऐसी ही बुरी दशा आ गयी थी । और तब जो कष्ट हमें सहने पड़े, उनकी स्मृति-मात्र से आज भी रौंगटे खड़े हो जाते हैं।" मैं ध्यानपूर्वक चौकीदार की कहानी सुनने लगा। गोविन्द भी शायद पांव पसार कर आराम से बैठ गया। कुछ क्षण रुक कर और एक लम्बी साँस भर कर चौकीदार ने अपनी कहानी शुरू की। O "हाँ तो गोविन्द, मेरे साथ भी ऐसी ही दुर्घटना घटी थी और वह भी इसी मेले में । उस समय टिक्का साहब बहुत छोटे थे। अब तो उनकी आयु भी चालीस वर्ष होगी और मैं तो साठ- सत्तर का हो चला हूँ। मेला तब भी खूब भरता था। यहाँ आने वाली युवतियों की संख्या भी अधिक होती थी। और नाच-रंग भी खूब होता था। । "मैंने मेला कभी न देखा था। था तो मैं इधर ही का रहने माला, पर बचपन ही से अपने दादा के पास लाहौर चला गया था । वहाँ पन्द्रह वर्ष एक बाबू के यहाँ नौकर रहा, फिर उसने मुझे जवाब दे दिया । बात कुछ भी न थी । मुझसे कोई अपराध भी न हुआ या, पर मेरा उम्र में बड़ा हो जाना ही मेरे लिए बुरा हुआ। वहाँ भले आदमी नौजवान नौकरों को घर में नहीं रखते । मैंने और दो-एक जगह नौकरी करने का प्रयास किया और एक-दो जगह नौकरी पाने में सफल भी हो एक रात का मरका १०५ गया, पर मेरा मन न लगा । मैं अपने गांव लौट आया । मन उदास भी था और चंचल भी । इतने दिनों तक शहर के पिंजरे में बन्द रहने के बाद गांव की आजाद फिजा में सांस लेने का अवसर मिला था, पर शायद मेरा मन पिंजरे मे रहने का अभ्यस्त हो गया था, मुझे उस आजादी में भी शहर की याद आती थी, लेकिन गोविन्द, आजादी के अपने गुण है, आदमी उन्हें भी जल्दी जान लेता है । में भी गांव में आ कर खिल उठा । मेरी सारी उदासी और बेचैनी दूर हो गयी। यहां ठंडे पेड़ों के नीचे, ठंडी-ठंडी हवा में, बांसुरी बजाने में वह आनन्द आता था जो लाहौर की सख्त गर्मी अथवा सख्त सर्दी में, स्वप्न मे भी न आ सकता था । बांसुरी मुझे दादा ने सिखायी थी । लाहौर में उसे बजाने का अवसर ही न मिला था और यहाँ गाने बजाने के सिवा दूसरा काम ही न था । मै बांसुरी मे फूंक देता तो मीठी, मद-भरी तान दूर-दूर घाटियों को गुंजा देती। "गांव में आने पर मुझे एक और बात का भी आभास हुमा । वह यह कि मैं अब किसी का नौकर नहीं, किसी की इच्छाओं का गुलाम नहीं, बल्कि सब बन्धनों से मुक्त । हमारी थोड़ी-सी भूमि थी, उसको जोतना-बोना मैंने शीघ्र ही सीख लिया। लाहौर में में हेय समझा जाता था, यह! मैं मम का एरण्ड था। जिधर से गुजर जाता, सब की नजरें मुझ पर उठ जातीं। सब मुझे श्रद्धा की दृष्टि से देखते । मय मुझे अपने से बड़ा समझते । जब मैं गांव में आया तो घर-घर मेरी चर्चा हुई। कई युवतियों की नजरें भी मुझसे चार हुई । मुझे इन निगाहों में प्रेम के सन्देश भी मिले । पर मन कहीं नहीं अटका। मैं अपनी खेती-बाड़ी में मग्न और बांसुरी की तानों में मस्त रहा। "ठिठुरता शीत वीता और प्राणों को गर्मा देने वाल ७ १०६ । उपेन्द्रनाय अश्क आ गया। मई का महीना था। इन दिनों शिमले में वर्षा नहीं होती । मई और सितम्बर ही के महीने हैं, जिनमें इधर की पहाड़ियों का आनन्द लिया जा सकता है । सूरज में तनिक गर्मी आ जाती है और उसकी सुनहरी धूप से पतझड़ की सिकुड़ी हुई पहाड़ियां ज़िन्दगी की अंगड़ाई ले कर खिल उठती हैं । इन दिनों में काम न किया करता था। खेती-बाड़ी का काम अपने बड़े भाई पर छोड़ कर स्वयं ही ढोर-डंगरों को ले कर निकल जाता । सारा-सारा दिन गायें चराता । सन्ध्या को दूध दुहता और संजौली जा कर उसे वेच आता । मुझे केवल प्रातः और सन्ध्या दूध दुहने और बेचने का ही काम करना पड़ता था। वरना मैं एकदम स्वतन्त्र अपने ढोरों को चराता घूमता । थक जाता तो पेड़ों की घनी छाया में बैठ कर बांसुरी की तान छेड़ देता। "इन्हीं दिनों मूर्तृ से मेरी भेंट हुई। शाम का वक्त था। मुझे कुछ देर हो गयी थी। इसलिए जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता हुआ सँजोली को जा रहा था कि मुझे किसी ने आवाज़ दी, 'भैया, तनि ठहरना ।' "मैंने पीछे मुड़ कर देखा । पास के गाँव से आने वाली पग- डंडी से एक युवती कन्धे पर दूध के डिव्वे लटकाये, गले में धारी- दार गवरून की कमीज़, उस पर जाकेट, कमर में काली सुथनी, पांव में खाकी रंग का फ्लीट और सिर पर गुलाबी दुपट्टा बाँधे शपाशप बढ़ी चली आ रही है। उसकी नाक में छोटी-सी लौंग थी। उस शाम के धुंधलके में मुझे उसकी सूरत बहुत भली लगी-भोली-भाली, सीधी-सादी ! जब तक वह मेरे वरावर न आ गयी, मैं उसे मन्त्र-मुग्ध-सा देखता ही रहा । "निकट आने पर मालूम हुआ, उसे भी दूध देने संजौली जाना है और अँधेरा हो जाने से वह कुछ डर-सी रही है।
एक रातका नरक। १०७ - सहम के कारण उसकी हिरनी की-सी आंखें खुली थी और जल्दी-जल्दी चलने से सीना धड़क रहा था। मैंने उसे तसल्ली दी और हम दोनों संजोली की ओर चल पड़े। कुछ देर चुप चलते रहे । लेकिन सांझ का सुहाना समय, ठंडी-ठंही क्यार, सुन्दर पहाड़ी दृश्य, मार्ग का एकान्त-कोई अकेला हो तो चुप- चाप लम्बे-लम्वे डग भरता चला जाय । हम दोनों में धीरे-धीरे बातें होने लगीं। शुरू किसने किया याद नही, लेकिन संजोली पहुंचते-पहुंचते हम घुल-मिल गये । आते समय भी हम इकट्ठे ही आये । उसने कहा था-मैं दूध दे कर नल के पास तुम्हारे आने की प्रतीक्षा करूंगी और जब मैं वापस फिरा तो वह मेरा इन्तज़ार कर रही थी। अंधेरा बढ चला थां, हम वेघड़क चलते आये। बातों में मार्ग की दूरी कुछ भी नहीं जान पड़ी। जो रास्ता पहले काटे न कटता, अव पता भी न चला और खत्म हो गया । जब हम वहां पहुंच गये, जहां से हमें जुदा होना था, तो मेरा दिल सहसा घड़क उठा। मैंने साहस करके कहा- 'अंधेरा ज्यादा हो गया है। मैं तुम्हें तुम्हारे घर तक छोड़ आता हूँ। फिर अपने गांव को चला जाऊंगा।' वह मान गयी। मैं उसे उसके घर तक छोड़ने गया । उसके घर के समीप हम जुदा हुए। उसकी आंखों में कृतज्ञता थी। अलग होते समय उसने धीरे से पूछा-'तुम रोज़ उधर जाते हो क्या ?' 'हाँ। 'और तुम ।' 'मैं भी।" "बस इसके बाद वह पीठ मोड़ कर अपने घर की ओर चल दी। मैं जरा तेजी से वापस फिरा, पर शीघ्र ही मेरी चाल धीमी हो गयी और मैं अपने ध्यान में मग्न चलने लगा । जय चौंका तो देखा कि घर पहुंचने के बदले संजौली के समीप पहर १०८ । उपेन्द्रनाथ अश्क । । । । गया हूं। फिर वापस मुंडा । घर पहुंचा तो देर हो गयी थी। भाई को चिन्ता हो रही थी; मेरे पहुँचते ही प्रश्नों की बौछार उन्होंने मुझ पर कर दी। मैंने कहा-मेरा लाहौर का एक मित्र मिल गया था। उसका घर देखने चला गया था। जाते- आते देर हो गयी। वे सन्तुष्ट हो गये। "गोविन्द, उस रात मुझे नींद न आयी । सारी रात उसकी हिरनी-सी आंखें, उसकी सुन्दर-सलोनी सूरत, उसका गुबला- गुवला पर सुडौल शरीर, उसका पहाड़-सा वक्ष, उसकी मस्तानी चाल, उसकी मीठी-मीठी वातें, उसका सादगी से पूछना, 'तुम रोज़ उधर जाते हो क्या ?'--उसकी हर अदा मेरी आँखों में नाचती रही, उसकी हर बात मेरे कानों में गूंजती रही। एक- दो बार मैंने अपनी परिचित लड़कियों से उसकी तुलना की। कोई असाधारण वात न थी उसमें । शायद उससे भी अधिक सुन्दर रमणियाँ हमारे गाँव में थीं। पर न जाने उसमें क्या था, उसकी आँखों में क्या जादू था, उसकी चाल में कौन मोहनी थी, उसकी बातों में कैसी मिठास थी? मैं दीवाना-सा हो गया। वह दिन मेरे सारे जीवन की निधि है, जिसकी याद आज भी मेरी तन्हाइयों में मेरा साथ देती है। "दूसरे दिन हम फिर उसी जगह मिले । मैंने उससे मिलने के लिए कोई खास कोशिश नहीं की। अपने निश्चित समय पर चल पड़ा, तो भी हम उसी स्थान पर मिल गये। शायद वह भी कुछ देर पहले चल पड़ी थी। पहले दिन की तरह फिर हम इकट्ठे संजौली गये, फिर मैं उसे घर तक छोड़ने गया, फिर उसी प्रकार उल्लास से वापस आया। हाँ, आज एक और बात का पता ले आया। वह भी दिन को अपनी गायें चराया करती थी, पर दूसरी घाटी में । दूसरे दिन मेरी गायें भी उसी घाटी की ओर जा निकलीं, जैसे अचानक । पहले वह तनिक झिझकी, । एक रात का मरक।१.t लेकिन जब मैंने अपनी गायों को वापस मोड़ना चाहा तो उसने कहा-'इस घाटी में पास खूब अच्छी है। मैं रुक गया । उससे अच्छी पास कहाँ मिलती? इसके बाद हम प्रायः रोज साप ही गायें चराते, साथ ही दूध ले कर संजोली जाते और साथ ही वापस आते । बांसुरी का शौक भी उन दिनों कुछ बड़ गया । रात को प्रायः मैं अपने इधर की पहाड़ी पर, अपने घर के वाहर ऊंची-सी जगह बैठ कर, बांसुरी बजाया करता । एक शब्द में फह दूं, गोविन्द, मुझे उससे मुहब्बत हो गयी थी। जिस दिन मैं गायें ले कर पहले पहुंच जाता और वह देर से आती, उस दिन मेरे हृदय मे सहस्रों आशंकाएं उठने लगतीं । यही हाल उसका था। धीरे-धीरे हमारे प्रेम की चात गांव में फैल गयी। मेरे भाई और उसके माता-पिता को पता चल गया। उन्होंने हमारी सगाई कर दी। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा। परन्तु मेरे इस सुख में एक दुख का कांटा भी था। यह जान कर कि उसे मेरी पत्नी बनना है, मूर्तुं ने मुझसे मिलना छोड़ दिया था। मैं व्यर्थ ही अब अपने ढोर ले कर उस घाटी में जाता, जहाँ वह अपनी गायें चराया करती थी। बेकार ही उस चट्टान पर घंटों बैठा रहता, जहां हम दोनों बैठे गीत गाया करते थे। वेमतलब रात को बांसुरी बजाया करता । उसकी सूरत विलकुल न दिखायी देती । दूध देने को अब उसका छोटा भाई जाता। मैं उससे मूतूं की बातें पूरा करता । कभी वह सरल, अवोध बालक मुझे उत्तर देता और कभी मेरी बातें उसकी समझ में न आती। "इसी प्रतीक्षा में कुछ सप्ताह बीत गये। लेकिन मेरी वेचनी कम न हुई । मैं मूतूं की सूरत तक को तरस गया, उसे देखने के लिए मेरे सारे प्रयास असफल हुए। दिन खिल उठे। हमारे विवाह की तिथि भी नियत हो गयो। प ११०। उपेन्द्रनाथ अश्क बेचैनी नहीं घटी।" चौकीदार ने एक लम्बी साँस ले कर कहा, “तुम पूछोगे गोविन्द, जब मैंने मुहब्बत के कई सुनहले सवेरे और शामें उसके साथ गुज़ारी थीं और अच्छी तरह देखा-भाला था और जव उसे मेरे घर आना ही था तो फिर उसे देखने की वेचैनी क्यों! मैं स्वयं ठीक-ठीक इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता । बात शायद यह थी कि जिस दिन से हमारी मँगनी हुई थी, उसी रोज़ से वह मेरी आँखों से ओझल हो गयी थी और मैं सगाई के बाद उससे कई तरह की वातें करना चाहता था। यह वात जानने के बाद वह कैसी बातें करती है, उसका मुख लज्जा से कैसे लाल-लाल हो जाता है, कैसे उसका स्वर काँपने लगता है-मैं इस सब का आनन्द लेना चाहता था और भावी जीवन के सम्बन्ध में पहले से ही उसके साथ कुछ वातचीत कर रखना चाहता था । लेकिन उसने तो जैसे अपने घर से बाहर निकलने की सौगन्ध खा ली थी। मैं लाख इधर-उधर चक्कर लगाता, लाख बाँसुरी में आने का चिरपरिचित सन्देश देता, पर वह न आती। "उन्हीं दिनों सी-पुर का मेला आ गया। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा । मेले में वह ज़रूर जायेगी, इसका मुझे पूरा विश्वास था और फिर कहीं रास्ते में उसे देख पाना और अवसर पा कर उससे दो वातें कर लेना असम्भव नहीं था। "मैं कई दिन पहले से ही मेले की तैयारियां करने लग गया। दूध बेचने पर जो कुछ बचता, उसमें से भैया कुछ मुझे भी दे देते थे। धीरे-धीरे यह रकम जमा होती गयी और मेरे पास पचास रुपये हो गये । मैंने इनसे एक खाकी कोट और विरजिस वनवायी, अच्छे से बूट का जोड़ा खरीदा, अच्छी-सी धारीदार गवरून की दो कमीले सिलवायीं, दो रूमाल लिये, ।
एक रात का मरका १११ वारीक मलमल का इन्द्रधनुषी रंग का साफा रंगवाया और जव मेले के दिन पूरी तरह सज कर पठानों की तरह मैंने कुलरो पर नोकदार साफा बांधा और उसके तुरे का फूल बना फर शीशे में देखा तो गर्व से मेरा सिर तन गया और नेहरा साल हो गया। "रेशमी रूमाल को कोट के ऊपर की जेब से रस फर, कमीज़ के कालरों को कोट पर चढ़ा कर, हाथ में घोटा-सा चमड़े का हण्टर ले कर जव मैं मेले को रवाना हुआ तो गाय के सव स्त्री-पुरुष मुझे निमिमेप तकते रह गये । मुझे देख कर कौन कह सकता था कि यह रोज सुबह-शाम दूध ले कर संजौली जाने वाला ग्वाला है और इसका काम गायें पराना और उनकी सेवा करना है ? "मार्ग में एक पानी की सबील थी। याही कच्ची मिट्टी और पत्थरो से तीन दीवारें खड़ी करके उन पर टीन का छप्पर डाल दिया गया था। छप्पर पर बड़े-बड़े पत्थर रमे थे कि तेज़ हवा से वह कहीं उड़ न जाये । इस प्रकार बनी हुई यह कोठरी एक ओर से एकदम खुली थी। कोई किवाद वगरा भी नहीं था। इस ओर एक बड़ा-सा पत्थर रखा था, जहाँ एक अधेड़ आयु की स्त्री पानी पिला रही थी। यह मूर्तृ फे गांव की युढ़िया तुलसी थी। अपनी चुस्ती और चालाकी के लिए वह आस-पास के गांवों में प्रसिद्ध थी। मैं उम सयोल पर आ कर रुका, प्रकट कुछ सुस्ताने के लिए, लेकिन मेरी हार्दिक इच्छा वहाँ रह कर मूहूं की बाट जोहना थी। "वह सबोल, सड़क के दायीं बोर केलू के वृक्षों के मुट में बनी हुई थी। रास्ते के इस ओर कुछ ढलान थी। पहाड़ पर नीचे को सीढ़ियां मी बनी हुई थीं बोर गायों के घर-टपर.. चलने से छोटी-छोटी-सी पगडरियां दिसायी देती थीं। मैं - ।
उपेन्द्रनाथ अश्क के एक ओर मार्ग की तरफ पीठ करके नीचे को टांगें कर बैठ गया। साफ़ा उतार कर मैंने पास ही पड़े हुए रों पर रख दिया। लेकिन मुझसे देर तक इस तरह बैठा गया। मैं तुलसी से कुछ बातें करना चाहता था। पानी के बहाने उठा और वहाँ पहुँचा । पानी पीने ही लगा था उसने व्यंग्य का तीर छोड़ा: 'पानी से प्यास क्या मिटेगी, चाहे मनों पी जाओ। जिसे खने की प्यास है, वह अभी इधर से नहीं गुज़री।' "अब छिपाना व्यर्थ था। मैंने रहस्य-भरे स्वर में धीरे से पूछा 'आज मेला देखने तो जायेगी?' 'शायद ।' 'सहेलियाँ साथ होंगी?' . 'हाँ !" 'फिर मैं कैसे उससे बात कर सकंगा? 'केवल देखने से प्यास नहीं बुझ सकती ?' 'नहीं।' "बुढ़िया चुप रही। मैंने गिड़गिड़ा कर पूछा-'तुम प्रबन्ध न कर दोगी?' "बुढ़िया का हँसता हुआ पोपला मुंह मेरी ओर उठा। उसकी आँखें चमकने लगीं। वह बोली, 'कैसे ? 'मैं वहाँ पेड़ों के झंड में बैठा हूँ। तुम कह देना, तुम्हा एक सहेली वहाँ तुम्हारी बाट जोह रही है। उससे मि आओ।' 'नहीं, मैं यह नहीं कर सकती।' "मैंने कुछ कहने के बदले जेब से एक रुपया निकाल वुढ़िया के सामने रख दिया। उसने शायद अपनी सारी में रुपया न देखा था। उसकी वाँछे खिल गयीं। कहने 'अरे यह क्या करते हो? इसकी क्या जरूरत है ? भेज दूंगी उसे । आखिर वह तुम्हारे ही घर तो जायगी।' "मेरा मन खिल उठा। इतनी जल्दी यह काम बन जायगा, इसकी मुझे आशा नहीं थी। पानी पी कर मैं अपनी जगह आ बैठा और उसके आने की घड़ियां गिनने लगा। पांव को जरा- सी चाप भी मूतूं के आने का सन्देह जगा देती और मेरी आँखें सबील की ओर उठ जाती, लेकिन हर बार निराश हो कर लौट आती । प्रतीक्षा के ये क्षण युगों से लगे । वार-बार देशता, बार-बार ताकता । कहीं रेंगे हुए दुपट्टे की तनिक-सी झलक भी दिखायी देती तो दिल धड़कने लगता । यही अच्छा पा कि जहाँ मैं बैठा था, वहां से मैं तो सबको देस मकता था, पर मुझे कोई न देख पाता था। "आखिर मुझे उसकी आवाज सुनायी दी। तुलसी उसे मेरी ओर आने को कह रही थी और वह सुन्दरता-सी,सुपमा-मी, भोलापन-सा बनी पूछ रही थी। मेरा दिल'वेतरह घड़क रहा था। कहीं वह अपनी सहेलियों को साथ ले कर ही न आ जाय और इस 'प्रतीक्षा करने वाली सहेली' का भेद न खल जाय ! पर नहीं, वह अकेली आयी । हवा में उसका दुपट्टा उड़ रहा था, चमकी का चमकता हुआ कुर्ता उड़ रहा था, वह स्वयं उड़-सी रही थी। मेरे निकट आ कर वह भौचक्की-सी घड़ी हो गयी और क्षण-भर बाद स्वर्ण-स्मित उसके अधरों पर चमक उठी और वह वापस मुड़ने लगी। मैंने उसे पकड़ लिया और क्षणिक आवेश में उसे अपने प्यासे आलिंगन मन कर अधरों को चूम लिया। उसका मुख अरुण हो कर रह गया यौर वह मेरी बाहों के घेरे से मुक्त होने के लिए छटपटाने लगी। मैंने अपना रेशमी रूमाल उसकी जेब में टस दिया और उसे आजाद कर दिया । वह भाग गयी।न में कुछ कह सका।
उपेन्द्रनाय अश्क । कितनी बातें सोची थीं, कितने मनसूवे वाँधे थे, लेकिन र मिलने पर एक भी पूरा न हुआ । "वह अपनी सहेलियों के साथ चली गयी। अपने मुख की ली, अपने अस्त-व्यस्त दुपट्टे, अपनी घबराहट का कारण सने अपनी सहेलियों को क्या बताया, यह मुझे ज्ञात नहीं। किन उसके चले जाने के बाद मैंने साफ़ा सिर पर रखा और पेड़ों के मुंड से बाहर निकल आया। मेरे होंठ अभी तक जल रहे थे और हृदय वेतरह धड़क रहा था।" चौकीदार ने एक दीर्घ निःश्वास छोड़ाऔर बोला-"गोविन्द, हमारा गाँव सँजौली और मशोवरे के रास्ते में है। सँजोली वहाँ से कोई दो मील होगी। सवील तनिक आगे थी। मैं तुलसी से विना मिले ऊपर को चल पड़ा। सड़क पर पहुंच कर मशोवरे की ओर देखा । मूर्तृ अपनी सहेलियों के साथ दूर निकल गयी थी। मैं सिर झुकाये चल पड़ा। मन-प्राण पर उदासी-सी छा गयी। उस समय मैं इसका कारण न समझ सका, पर वाद की घटनाओं ने बता दिया कि वह उदास अकारण न थी। मूर्नु से मिलने के बाद मेरे मन में प्रसन्नत का जो तूफ़ान आया था, वह उड़-सा गया। होना इस विपरीत चाहिए था। लेकिन हुआ ऐसा ही । खुशी से तेज़- चलने के बदले में धीरे-धीरे चलने लगा। मन में आशंका मूर्तृ नाराज़ न हो गयी हो ! अव मेले में उससे आँखें मिला सकूँगा? दिल में चोर वस गया था और इच्छा थी, मेले में न जाऊँ। लेकिन नहीं, मुझे तो जाना था दिल में तो उसे एक नज़र और देखने का लोभ वना हु और इस लोभ को मैं किसी तरह संवरण न कर सका गया।
एक राताभरका ११५ । "मेले में पहुँचते-पहुंचते मेरे सब सन्देह दूर हो गये। मूहूं मुझे मेले से जरा इधर ही मिली। वे सब सुस्ता रही पी। प्रकट ऐसा ही लगता था, परन्तु मुझे ऐसा जान पड़ा, जैसे यह असल में मेरी बाट देख रही थी। मुझे देखते ही मुस्करा दी। उसकी आँखे नाच उठी। मेरा मन विभोर हो उठा। उसी समय मेरे गांव का साथी मेरे पास से गुजरा। मैंने उसे आयारा दी। वह वहीं खड़ा हो गया। 'किघर जा रहे हो ?' मैंने जोर से पूछा । 'मेले को,' उसने उत्तर दिया। "किपर रहोगे !' 'धूम-फिर कर देखेंगे।" 'हम तो भई वही आखिरी पेड़ों के झुंड के पीछे डेरा लगायेंगे । उघर आ सको तो आना ।' मैंने मूतूं की ओर देश कर कहा । वातें मैं साथी से कह रहा था, पर संकेत मूर्त को था। साथी चला गया, वह मुस्करा दी। उस समय यह पलगे के लिए उठी । मैं भी जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाता सी-पुर पहुँच गया।" ० "मेला खूब भर रहा था । मैं थका हुआ था। तनिक विश्राम करने का ठिकाना देखने लगा । आकाश पर बादल छाये हुए थे और मन का सारा ताप हरने वाली ठंडी-ठडी हवा चल रही थी। मैं उस जगह के पीछे, जहाँ आज चाय का संमा लगा है, जाकर बैठ गया। न जाने कितनी देर तक वहां वंठा कल्पनामों के गढ़ बनाता रहा । लाट अथवा किसी दूसरे पदाधिकारी के जाने पर जव बाजों की ध्वनि वायु-मण्डल में गूंज उठी, तो मेरी विचारधारा टूटी। मैं अपने जाने मूतूं को प्रतीक्षा कर रहा या। पर यह न सोचा कि अय उसे इस स्थान का ११६ । उपेन्द्रनाथ लश्क तो वह यहाँ आयेगी कैसे ? यह ध्यान आते ही उठा। इधर- उधर घूमता वहाँ पहुँचा, जहाँ स्त्रियाँ बैठी हुई थीं। मूर्त एक सिरे पर बैठी थी । मैं उसके सामने से गुज़रा, पर उसकी आँखें किसी दूसरी ओर थीं । मैं एक ओर हट कर खड़ा हो गया और इस वात की प्रतीक्षा करने लगा कि वह मेरी ओर देखे। उस समय मैंने देखा कि एक और पुरुष भी मूर्तृ की ओर प्रेम-भरी निगाहों से देख रहा है और उन निगाहों में कुछ अजीब-सी भूख है । वह था, कोटी का दारोगा । क्रोध और ईर्ष्या के कारण मेरी आँखों में खून उतर आया । लेकिन अपने-आपको सम्हाल कर मैं वहीं खड़ा रहा । उधर उस नर-पिशाच की निगाह वरावर मूर्त के सुन्दर मुख पर जमी रही। "आखिर मूर्तृ की आँखें मुझसे चार हुई। मैंने उसे हाथ से आने का संकेत किया । उसने इशारे से मुझे स्वीकृति दी। शायद दारोगा ने भी हमारे इशारेबाजी को देख लिया। दूसरे क्षण मैंने उसकी ओर देखा और उसने मेरी ओर । उसकी आँखों में ईर्ष्या थी, शायद विद्वप भी । मैंने इसकी परवाह न की और फिर एक बार मूर्तृ की ओर देख कर उसके सामने ही पेड़ों की ओट में हो गया। कुछ ही देर बाद वह आ गयी-चंचलता, उल्लास, प्रसन्नता की जीवित मूर्ति ! मैंने कहा- 'मूर्तु , तुम तो दिखायी नहीं देती, ईद का चाँद हो गयी हो।' 'और तुम्हारा कौन पता चलता है ? मैं उस झुंड के पीछे देख कर हार गयो।' 'पर मैं तो उधर था ।' 'मैं कैसे जान सकती थी ? मैंने उसका हाथ थाम लिया । कहा-'चलो छोड़ो इस झगड़े को। इन चार घड़ियों को बहस में क्यों खोयें ?' हम - फेंक दिया और कमर से पकड़ कर उसे धरती' पर दे मारा। हुआ ही था। मेने हंटर उसके हाथ से छीन कर दूर खड्ड एक रात का नरक।११७ पेड़ों की ओट में चले गये । निकट ही मेले में आये हुए लोगों का शोर कुछ स्वप्न-संगीत-सा प्रतीत होता था। अपनी बातों में मग्न, हम मेले और उसमें होने वाले राग-रंग को भूल गये। उन कुछ क्षणों में न जाने हमने भविष्य के कितने प्रासाद बनाये। पेड़ों की उस ठंडी छाया में, मदभरी हवा में, उस सालस-लालस एकान्त में, मूर्तृ मुझे मूर्तिमती सुन्दरता दिखायी दी और मैंने एक स्वर्गीय आनन्द से विभोर हो कर उसे अपनी ओर खोचा। उसी वक्त हमारे सामने किसी की गहरी छाया पड़ी। मैंने चौंक कर पीछे की ओर देखा । वही दारोगा ईर्ष्या और क्रोध से भरी आंखों से मुझे घूर रहा था। मैं तन कर उसके सामने खड़ा हो गया। मूर्तृ भी बैठी न रह सकी। "इस औरत को किधर भगाने की कोशिश कर रहे हो ?' उसने मूर्तृ का बाजू पकड़ कर अपनी ओर खींचते हुए कहा । "मेरी आँखों में खून उतर आया। मैंने कड़क कर कहा- 'इसे हाथ मत लगाओ ! 'क्यों, तुम्हारे बाप की क्या लगती है ?' 'मेरी मंगेतर है। 'चल मंगेतर के साले ! ज़रा राणा के पास चल, सब पता लग जायगा कि यह तेरी मॅगेतर है या आशना ? यहां मेला देखने आते हो या वदशामी करने ?'-यह कहते-कहते उसने वासना-भरी भूसी निगाह मूर्त पर डाली। वह खड़ी थर-थर काँप रही थी । क्रोध के मारे मेरी बाहें फड़कने लगीं। मैंने एक हाथ से मूर्तृ को उसके पंजे के छड़ाया और दूसरे से जोर का थप्पड़ उसके मुंह पर रसीद किया । उसने गाली दी और हेटर से प्रहार किया और सीटी बजायो । मुझे क्रोध तो आया ११८ । उपेन्द्रनाथ अश्क "एक चीख और वीसियों लोग उधर दौड़ पड़े। आगे-आगे कई सिपाही थे। आते ही उन्होंने मुझ पर हंटरों की वर्षा कर दी। मेरा गर्म खून भी खौल उठा ।यों चुपके-से पराजय स्वीकार करना मुझे स्वीकार न हुआ। मैंने हमला करने वालों में से एक को पकड़ लिया और सिपाहियों की परवाह न करते हुए उसे खड्ड में ढकेल दिया। फिर एक दूसरे की बारी आयी। उसे भी खड्ड में गिरा दिया। सिपाहियों ने सहायता के लिए सीटियाँ बजायीं । और लोग आ गये । मुझ पर चारों ओर से प्रहार होने लगे। मेरे शरीर से रक्त बह निकला । फिर भी मैं उस समय तक लड़ता गया, जब तक बेहोश नहीं हो गया ।" . "जब होश आया," क्षण-भर रुक कर चौकीदार ने कहा, "तो मैंने अपने आपको नीचे की हवालात में पड़े पाया । इस अंधेरे और एकान्त में मेरा दम घुटने लगा । मूहूं के साथ क्या बीती, इस विचार ने मेरे मन को अधीर कर दिया। भूत में क्या हुमा और भविष्य में क्या होगा, इन विचारों ने मेरे मस्तिष्क को घेर लिया । मेरा अंग-अंग दुख रहा था, लेकिन मुझे अपने दुख की अधिक चिन्ता न थी। दुख था तो मूर्तुं की जुदाई का। "दूसरे दिन सिपाही मुझे राणा साहब के आगे पेश करने को लेन आये, पर मुझसे तो उठा न जाता था। तीन दिन तक इसी नरक में पड़ा रहा। फिर कोटी ले जाया गया। वहाँ तनिक आराम आने पर मेरा मामला पेश हुआ। मुझ पर मेले से एक स्त्री को भगाने का प्रयास करने और सिपाहियों को उनके कर्तव्य से रोकने तथा पीटने का अभियोगलगाया गया। शिकायत करने वाला ही निर्णायक था। मुझे डेढ़ साल कैद की सज़ा मिली। मेरे भाई के सव उद्योग, सव मिन्नतें वथा एक रात का मरका ११६ गयीं। वे मुझसे मिल तक न पाये ।" चौकीदार दीर्घ-निःश्वास छोड़ कर बोला-"गोविन्द, गुण है, उन्होने मुझे काठ नहीं मार दिया, नहीं तो वे यही दंड देते तो कौन उन्हें रोक सकता था? इस डेढ़ वर्ष में मैंने जो कष्ट उठाये, वे अकथनीय हैं । यही समझ लो कि जब मैं डेढ़ साल के बाद अपने गांव पहुंचा तो मेरा भाई भी मुझे न पहचान सका । मैं शायद डेढ़ साल बाद भी वहां से छुटकारा न पाता, यदि वह दारोगा वहाँ से रियासत के किसी दूसरे भाग में न बदल जाता । गांव में आने पर मुझे मालूम हुआ कि मूर्त भी उस मेले से नहीं लौटी। वह निश्चय ही उस दारोगा और दूसरे कर्मचारियों को पाप-वासनाओं का शिकार बनी होगी, इस बात का मुझे पूरा विश्वास था और मेरा यह सन्देह सच भी सावित हुआ--जब.एक साल पश्चात् स्वस्थ होने पर मैं लाहौर गया तो मैंने धोवी-मण्डी को टकिहाइयों में मूहूं के दर्शन किये । वह एक बहुत छोटे-से घिनौने मकान में रहती थी। मैं उसके पास कई घण्टे तक बैठा रहा। उसने मुझे अपनी मर्मस्पर्शी कहानी सुनायी । किस तरह उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हो कर दारोगा अथवा दूसरे कर्मचारियों ने उस पर अनयं तोड़े और किस प्रकार अपने अत्याचारों का भण्डा-फोड़ होने के भय से उन्होंने उसे छोड़ दिया, किस तरह अपने सतीत्व को लुटा कर वह अपने गांव में जाने का साहस न कर सकी और किस तरह पेट की ज्वाला ने उसे धोवी मण्डी में आ वसने को बाध्य किया।" ० चौकीदार की आवाज़ भरी गयो । वह कहने लगा-"यह कहते- कहते गोविन्द, वह रो पड़ी। मैं भी रोने लगा। मैंने उसे अपने साथ चलने को कहा, पर वह राजी न हुई । आते समय उसने १२० । उपेन्द्रनाय अश्क मेरे सामने एक रेशमी रूमाल रख दिया और रोती हुई बोली: 'आज तीन साल से मैंने इसे सम्हाल कर रखा है, पर यह पाकीज़ा रूमाल अब मुझ-सी अपवित्र नारी के पास नहीं रहना चाहिए । इसे अपनी दुलहिन को भेंट कर देना ।' "उसके स्वर में कुछ ऐसी दृढ़ता थी कि मैं इनकार न कर सका और वहां से चला आया ।" . ऊपर कमरे में निस्तब्धता छा गयी। शायद कंठावरोध के कारण चौकीदार चुप हो गया था। कुछ क्षणों के बाद गोविन्द ने पूछा-"तो आप इस नौकरी पर कैसे आये ?, "यह बात पूछने से क्या लाभ ?भाग्य का चक्कर था, इधर ले आया ।" "फिर भी?" चौकीदार ने धीरे से कहा, "अब तो बताने में कोई हानि नहीं। वास्तव में उस नर-पिशाच दारोगा से बदला लेने की प्रवल-इच्छा से शिमले आया था। मेरे लिए मूर्तृ ही सब कुछ थी। मैंने अपने जीवन में केवल उसी से प्रेम किया। इसके बाद मैंने विवाह भी नहीं किया। जिस दारोगा ने इस तरह हम दोनों को जुदा कर दिया, मैं उसे सस्ते दामों न छोड़ना चाहता था । लेकिन भगवान ने मुझे उस नीच के मुझे उस नीच के लहू से अपने हाथ रँगने से बचा लिया। मेरे आने के दो दिन बाद ही वह सड़क पर चला जा रहा था कि वर्षा के कारण पहाड़ का एक बड़ा-सा भाग टूट कर उस पर गिरा और वह अपने गुनाहों को अपने साथ लिये सदा को संसार से चला गया। इसके बाद दिल में कुछ और आरज़ ही न रही, इसलिए यहीं बना रहा ।"
एक रात का नरफ। १२१ गोविन्द ने एक लम्बी सांस ली। वोला, भाग्य के सेल हैं, चौकीदार जी ! जिस प्रकार विधाता रखे, रहना चाहिए।" वाहर सिपाहियों के मजबूत जूतों की सड़बड़ाहट का शब्द सुनायी दिया और कई सिपाही कमरे में दाखिल हो कर सोने की तैयारी करने लगे। गोविन्द उसी समय वहां से खिसक गया।
यारह हरा सन्नाटा और मैं। ऊपर कुछ ही देर बाद सब सो गये। चारों तरफ़ खामोशी छा गयी। मेरी सब आशाएँ मिट गयीं। मैंने चौकीदार से पूछा था-'मैं कव रिहा हूँगा।' उसने मुझे सान्त्वना दी थी, 'वाबू, तुम्हारे लिए बड़ी कोशिश हो रही है । अव्वल तो अभी, नहीं तो सवेरे तुम ज़रूर छोड़ दिये जाओगे ।'....अव मैं रिहा न किया गया था, सवेरे की राम जाने और यह रात-इस नारकीय कोठरी में, कैसे कटेगी ? मैं सिहर उठा । रात के साथ सर्दी और भी बढ़ गयी थी। पिस्सू, जो अभी तक मुझ पर कृपा-भाव बनाये हुए थे, अब सब तरफ़ से पिल पड़े थे। मैंने टाँगों को आराम देने के लिए जरा पसारा, कोई ठंडी-सी लिजलिजी चीज़....और मेरा समस्त शरीर काँप उठा। सांप-एक निमिष के लिए मस्तिष्क में वह लम्बी भयानकता सरसरा गयी। मैंने जल्दी से पाँव सिकोड़ लिये। हथकड़ी छनछना उठी । मैं हँसा। एक वे-आवाज़-सी हँसी । मैं जिसे साँप समझा था, वह हथकड़ी थी। मैंने माथे पर हाथ फेरा। इस ठंडक में भी वहाँ पसीना आ गया था। उस समय सहसा मुझे एक खयाल आया हथकड़ी को उतार कर क्यों न रख दूं ! उसे कुंजी लगी सही, पर मेरी कलाइयां भी तो खासी पतली हैं । एक वार कोशिश कर देखें । मैंने कोशिश की। पहली बार ही पुल्क से हथकड़ी मेरे हाथ से निकल गयी। मैंने उसको-गोल मोल करके ज़रा परे रख दिया । ।
एक रात का मरका १२३ और फिर कम्वल को अच्छी तरह मोड़, नीचे के कम्वल को उस पर लपेट कर, हैट को सिर के नीचे रख कर लेट गया। दिल अभी तक धड़क रहा था। इस सील में सांप वगैरह का होना कोई बड़ी बात न थी । सुन रखा था कि पहाड़ के सांप बड़े विपले होते हैं । परसों मेरे पास से गज-मर लम्बा, हरे रंग का एक सांप गुज़र गया था। मैं एक पौधे से फूल तोड़ रहा था कि मेरी उँगली से केवल एक इंच के फ़ासले पर वह सरसराता हुआ गुजर गया । उसका ध्यान आते ही एक वार फिर रोमांच हो आया । सामने अंधेरे में सांप और विच्छ नाचते दिखायी दिये । मैंने आंखों को मला और हैट को दूसरी ओर करके, करवट ले कर फिर आंखें बन्द करके चुपचाप लेट गया। उस समय दाहिनी ओर से एक लम्बा, अंगूठे जितना मोटा सांप मेरी ओर पल-पल बढ़ने लगा । मैं कांप उठा । हिलने का प्रयास किया, पर हिल न सका । चीखने की कोशिश की, पर गले से आवाज तक न निकली । सांप मेरे पास पहुंच गया। मेरा गला सूख गया। रेंगता रेंगता वह मेरी छाती पर चढ़ने लगा । मैंने लाख चेप्टा की, पर हिल न सका-जैसे मुझे काठ मार गया हो, अधरंग हो गया हो, इस कोठरी की सर्दी ने जैसे मेरे शरीर को सुन्न कर दिया हो! उस समय बड़े जोर से सड़राड़ हुई। मेरे तन में भी शक्ति का संचार हो आया । मैंने झट से उसे सिर से पकड़ कर पूरे जोर से अंगूठे के नीचे दवा लिया । साँप मुक्त होने को दुम फटकारने लगा कि तभी आंख खुल गयी । देसा तो हयकड़ी मेरे हाथ में पी । मेरे पहलू बदलने के साथ, हो मेरी छाती तक आ गयी थी ।....मैंने हेसना चाहा, लेकिन मुझपर कुछ ऐसा आतंक छाया कि हँसना तो दूर रहा, मुस्करा भी न सका। वाहर शायद वर्षा हो रही थी अयवा तूफ़ानी हवा के कारण छप्पर सड़सड़ा रहे थे। पेड़ों ४। उपेन्द्रनाय अश्क रॉय-सांय इस शोर से मिलकर उस भूगृह में एक विचित्र-सी ज पैदा कर रही थी। मैं उठा। हथकड़ी को फिर परे रख दिया । अव के कुछ ज़्यादा दूर....और विचार-धारा बदलने के लिए गुनगुनाने लगा। धीरे-धीरे इस गुनगुनाहट ने गीत का रूप ले लिया। कौन ओवडावे मेरी पीर, तेरे बिना ना पल्ले पैसा, ना साहूकारा रामा क्या करिए तदवीर तेरे बिना भाई बन्द, कुटुम्ब बथेरा रामा न कोई तन का बीर तेरे बिना कोन ओ बँडावे मेरी पीर, तेरे बिना' न जाने कितनी देर तक गुनगुनाता रहा । बार-बार यही बन्द कौन ओ बँडावे रामा, कौन ओ बँडावे रामा कौन ओ वडावे मेरी पीर । न जाने उस समय मुझमें इतनी आस्तिकता, इतनी श्रद्ध इतना प्रेम, इतना अनुराग कहाँ से आ गया। उस समय मैंने अपने आपको संकटों कवीर ही की भांति परमात्मा से विनती करते हुए पाया उसी श्रद्धा से, उसी उपासना से, उसी विनीत भाव से। १. ऐ मेरे भगवान ! तेरे विना मेरा दर्द फौन बटायेगा। मेरे में तो नाम फो भी पैसा नहीं है, मैं साहूकारा भी तो नहीं कर फिर क्या तदवीर करूं? हे राम ! मेरे नातेदार तो बहुत हैं, पर कोई सगा नहीं बिना कौन मेरा दुख बंटा सकता है। घिरे हुए हुए भ एक रात का मरका १२५ ऊपर छत पर सरं-सरं की आवाज आयी। में कान लगा कर मुनने लगा । समझ गया कि मेरे लिए जो फल लालाजी ने भेजे थे, वे सब ऊपर ही रस लिये गये हैं और अब उन्हें काग़ज़ के लिफाफ़ों से निकाल कर बांटा जा रहा है। मुझे केवल एक आम, एक केला और कुछ जर्दालू और विस्कुटों का आधा डिब्बा मिला था । दुख और क्रोध के कारण मैं इनमें से किसी को छ न सका था और यद्यपि भूख तो अब भी नहीं थी, लेकिन यह सोच कर कि शायद डरावने सपने खाली पेट ही आ रहे हैं और शायद नींद भी इसीलिए नहीं आती, मैं फल साने लगा। केला चीला और सा गया । आम कलमी था, चाकू से तराश कर खाने की आदत थी, लेकिन गॅवारों की तरह छिलका उतार कर साने लगा। जर्दालू केवल एक-दो साये । मुझे वहम था कि इनसे मुझे गर्मी हो जाती है । विस्कुट यद्यपि बढिया थे, पर जी ही न था। इतनी वेवसी और हटले पामजं के बिस्कुट ! मैंने डिब्बे को परे फेंक दिया और फिर सोने की कोशिश की। अंग-अंग ददं कर रहा था । सारा दिन चलते रहने के कारण टाँगें यद्यपि थकी हुई थीं, पर आंखों में नींद का नाम तक न था। कई बार दिन की किसी घटना के कारण भावुकतावश रात को नींद न आती थी तो मैं अपनी दृष्टि को मस्तक में लगाने का प्रयास किया करता था । एकाग्रता हो जाने के कारण मुझे नींद आ जाती थी। यहां भी मैंने ऐसा ही किया, लेकिन मन को एकाग्रता न मिली । मस्तक में वीसियों चित्र एक के बाद एक आने लगे। लाख चाहा कि मन एक ओर लग जाये, परन्तु एक तरफ़ सर्दी शरीर में चुभी जा रही थी, दूसरी तरफ पिस्सुओं ने तन को काट कर रख दिया था, फिर सांप और बिर ने का। भय, शाम को दुर्घटना का रंज, वीसियों विचार १२६ । उपेन्द्रनाथ अश्क ? रहे थे। मन एकाग्र होता तो कैसे ? मैंने आँखों के पपोटों को धीरे-धीरे मला, शायद भारी हो जायं, नींद आ जाय, पर कहाँ ? घर पर ऐसे में सिर में तेल डलवाने की आदत पड़ गयी थी। यहां पत्नी कहाँ थी कि उसे जगा कर कहता, 'ज़रा सिर में दर्द है, नींद नहीं आती।' और वह उठ कर तेल लगा देती । वह तो जालन्धर में हमारे तीन मंज़िले मकान की छत के ऊपर ठण्डी हवा में सो रही होगी। मेरे सामने अन्धेरे की चादर पर मेरी पत्नी का चित्र आ गया।-मैं जैसे बीमार हूँ, मरणासन्न हूँ और वह मेरे पास आ बैठी है । मैं उसे सान्त्वना दे रहा हूँ....तभी वह लड़की मेरी चारपाई के पास आ कर खड़ी हो जाती है, जिसे मैं पढ़ाता हूँ। वह शायद मुझे देखने आयी है। उसकी आँखों में करुणा- भरा आश्चर्य है। पूछती है-'मास्टर जी, यह क्या हो गया आपको ?' मैं कुछ अजीव से बेपरवाह, लेकिन करुणपूर्ण लहजे में कहता हूँ: जिन्दगी क्या है अनासर का जुहूरे तरतीब, मौत क्या है इन्हीं अजजा का परेशां होना । वह कुछ नहीं समझती । मुटर-मुटर मुझे तकती रह जाती है । मैं करवट बदलता हूँ । पत्नी उस ओर बैठी दिखायी देती है। मैं उसे समझाता हूँ-'जिन्दगी और मौत एक ही चीज़ के दो पहलू हैं । कुछ तत्व इकट्ठे हो गये, ज़िन्दगी नाम पड़ गया, विखर गये, मौत हो गयी। फिर वीमार रह कर एक-एक इंच मरने के बदले एक ही वार समाप्त हो जाना कितना अच्छा है। ज्वाला की क्षणिक लपक लालटेन की लम्बी टिम-टिम से हज़ार दर्जे अच्छी है।" वह अब भी कुछ नहीं समझती, केवल रो देती है। तभी कोई पिस्सू ज़ोर से मेरी दायीं ओर काट देता है। ।
एक रात का नरक।१२७ - आँखें खुल जाती हैं । फाटे कोतनिक-सा मल कर में फिर आंखें वन्द कर लेता हूँ। इन दर्द-भरे सपनों में कुछ अजीब मजा आता है .....मैं फिर उसमें सो जाता हूँ...। इस बार कोई साफ़ चिन नही, एक हल्की-सी छाया सामने आती है। धीरे-धीरे यह छाया प्रकट रूप घर लेती है। मैं पहचान जाता हूँ-कुन्ती- वही-हंसती, मुस्कराती चंचल-चपल तन्वी ! वह मुझे कुछ नहीं कहती-केवल मेरे सामने आ कर खड़ी हो जाती है। मैं कहता हूँ, 'कुन्तो ! वह मुस्करा देती है। मेरे वालों पर हाथ फेरती है । मैं कहता हूँ, 'कुन्ती, तुम आयी भी हो तो कब जय मेरे हाथ शिथिल हो गये हैं, मेरा शरीर फूल गया है, जव में मौत की घड़ियां गिन रहा हूँ।' वह फिर भी कुछ नहीं कहती. मेरे सिरहाने बैठ जाती है । मैं फिर कहता हूं, 'इसे एक बीमार की बकवास न समझना । सच जानना, मैंने यदि किसी से प्रेम किया है तो वह तुम हो केवल तुम ! चाहे मुझे आज तक तुमसे यह कहने का अवसर ही नहीं मिला । तुम्हारे प्यार को मैंने मन के तारीक गोशों में छिपाये रखा है, लेकिन कुन्ती, तुम्हें मालूम तो है न, है न मालूम तुम्हें ! तुम सबसे पहली और आखिरी युवती हो, जिससे मैंने प्यार किया है-हृदय को समस्त शक्तियों से प्यार किया है। चाहे आज तक हम में बात नहीं हुई, चाहे आज तक हम ने किसी से कुछ नहीं कहा ।.... यह ओह ! यह उस समय कहां थी। और फिर पत्नी और प्रेमिका-दोनों का स्थान अलग है । एक के साय मनुष्य प्रेम के तार में बंधा है, दूसरे के साथ कर्तव्य के । तुम समझती हो न। फिर क्या तुमने मुझे प्रोत्साहन नहीं दिया ?उन मुस्कराहटों से, उन कटाक्षों से।'....वह हँस पड़ी। ....हां हां तुम ही ने तो....' 'चुप करो, सो रहो, तुम्हें इस समय नींद की जरूरत उसने मेरे मंह पर हाथ रख दिया। मेरे सारे शरीर में सर । न १२८ । उपेन्द्रनाथ अश्क दौड़ गयी। मैंने उसके हाथ को चूम लिया। वह गायब हो गयी। मेरी आँखें खुल गयीं । दिल की गहराई से एक लम्बी साँस निकल गयी। कुछ भी नहीं था-न प्रेमिका, न प्रेमी । केवल तहखाना था और वेचारा वन्दी ! o प्यार भी कैसा जादू है ! इसके सहारे मनुष्य काँटों पर भी आराम से रह सकता है । उन चन्द बीते हुए दिनों की स्मृति ने इस बेवसी की अवस्था में भी मुझे कुछ अजीब-सी शांति वर.श दी। मेरे हृदय से एक दीर्घ निःश्वास निकल गया। वे दिन भी क्या दिन थे जब हवा के पंखों पर उड़े फिरते थे, न किसी का दुख था, न किसी का ग़म ! प्रेम करते थे और प्रसन्न थे कि हम प्रेम करते हैं । कौन कहता है प्रेमियों की रात काटे नहीं कटती। जिसने ज़रा भी प्रेम किया है, उसे एक रात क्या, दतियों रातें विता देना आसान है। कल्पना उसकी सहायक है, फिर क्या डर है 1....पर यहाँ तो प्रेमी की रात न थी, बन्दी की रात थी ।.... - । मैंने फिर आँखें वन्द कर लीं, लेकिन फिर वह सुख-सपना नहीं लौटा। सिर फटा जा रहा था, आँखें दुख रही थीं, शरीर पर पिस्सुओं के काटने से घाव पड़ गये थे और अँधेरे में दम घुटा जाता था, इस पर भविष्य की चिन्ता सिर पर सवार थी। यदि मैं न रिहा किया गया, तो क्या होगा?--इस हवालात ही में (जवकि में अपराधी नहीं, केवल अभियुक्त हूँ) मैं तीन- चार दिन से ज्यादा जिन्दा नहीं रह सकता। तव रियासती वन्दीखाने में कैसे वसर होगी । मैं वेचैन हो उठा। आँखें भर आयीं। तभी ज़रा परे दीवार के साथ पानी के गिरने की आवाज़ आयी, ग्लानि से मेरा जी ऊपर को आने लगा । इन । .
की आमादान्द्री थी, उसमें ध्यान एक रात का नरसार वर्वर सिपाहियों के यहां शील कहाँ ? बाहर शीत है, नमक हुई होगी, अन्दर कोने में निवट लिये होंगे । मुझे जानी पर रोना आ गया । किसी ने ऐसा पृणित काम न हो, केवल पानी ही गिराया हो, पर मेरी बेयसी और कार तो सिद्ध थी। मैने एक बार फिर आंखों को भला, न जाने काम होगा? यदि नीद आ जाती, यदि ये सब कसा. यलेश-सब कुछ क्षणों के लिए सो जाते, निर दिन और दिन काटना इतना कठिन नहीं, इस एकाद- के शोर को नुन कर, दूसरों की बातचीत की ना कन, यह सोच कर कि यह 'दिन' है। सिर में न जाने इतना दर्द कहां से शा: जैसे कोई हयौहे मार रहा है । अंग-अंग र एकदम शिपिल हो रही थी। पिस्सूत्रों ने रख दिया था । एकान्त था, अंधेरा था की है. आँखें कुछ देर के लिए बन्द हो जाती, हर जाता, लेकिन नोंद कहां थी। मैने बानीको मस्तक में जमाया। पर नोट दो क्या आती, पर- सोचना शुरू लिया । उन दिनों की नाधिका कहा करते थे- १३० । उपेन्द्रनाथ अश्क थी। गरदन में बल-सा पड़ गया था, इसलिए उठ कर. वैठ गया-खम्भे का सहारा ले कर । 0 न जाने, क्या वजा होगा ? शायद तीन बजे होंगे। छै वजे लोग जाग जाते होंगे। तीन घण्टे हैं, कैसे बीतेंगे ? सहसा मन में एक विचार उठा। स्कूल में और प्रायः कॉलेज में भी, जब किसी टीचर अथवा प्रोफ़ेसर के सूखे लेक्चर से जी ऊब जाता था और घंटी बजने में न आती थी तो उस समय एक-दो गिनना शुरू कर देते थे। दो-तीन सौ गिनते-गिनते घंटी बीत जाती थी। तो क्या इसी प्रकार ये तीन घंटे न बीत जायेंगे। मैंने गिनना शुरू किया, एक सौ, दो सौ, तीन सौ, यहाँ तक कि छत्तीस सौ गिन गया। एक घंटा बीत गया । मेरा उत्साह बढ़ा। फिर पागल की तरह गिनने लगा और एक घंटे तक गिनता रहा । फिर वही ३६०० । मैंने ऊपर दरवाज़े की ओर देखा। प्रकाश की ज़रा-सी किरण भी न थी। मैं अपनी भूल पर हंसा। ऊपर जाने का दरवाजा वन्द था और उसके बन्द होने पर तो इस भूगह में दिन को भी रात बनी रहती थी, फिर अव तो रात ही थी। कुछ क्षणों के लिए मैं हतोत्साह हो गया। उस समय ऊपर किसी ने करवट ली। मुझे निश्चय हो गया कि दिन निकलने वाला है, फिर गिनने लगा। छत्तीस सौ । मैंने कान लगाये । शायद कोई जगा हो, पर नहीं, सब ओर निस्तब्धता थी, घोर सन्नाटा था-मेरे हृदय से एक लम्बी सांस, निकल गयी और हैट को सिरहाने रख कर मैं फिर लेट गया । अव हिसाव लगाता हूँ तो मालूम होता है कि उस समय मैं एक, दो, तीन करके दस हजार आठ सौ गिन गया। सोचता हूँ तो हैरान होता हूँ। जव पागलों की तरह महारनी रटने के वाद भी मुझे लगा कि अभी सवेरा दूर है तो मेरी निराशा एक रात का मरफ ! १३१ चरम-विन्दु को पहुंच गयी । मुझे लगा जैसे अव प्रभात न होगा हताश-सा पड़ा इस अंधेरे तहखाने में घुट-घुट कर मर जाऊँगा। रोशनी के लिए, हवा के लिए, किसी से दो बातें करने को तरसता हुआ अपने मित्रों तथा वन्धु-बांधवों को अन्तिम नमस्कार कहने की लालसा मन में लिये हुए ही इस ब्लैक होल में दम तोड़ दूंगा। मेरा सर चकरा उठा और मैंने क्रोध और आवेग के कारण उसे जोर-जोर से पीट लिया। कुछ देर चुपचाप लेटा रहा । मन तनिक शान्त हुआ तो मैं अपनी स्थिति पर विचार करने लगा। ज्यों-ज्यों सोचता गया, मन को धैर्य मिलता गया । आखिर सुख-दुख तो जीवन के साथी है । जीवन-संग्राम में कभी एक की जीत है तो कभी दूसरे की । जिन्दगी में यदि सुख ही सुख हो तो शायद मनुष्य का दिल उससे ऊब जाय । सदैव मीठा किससे साया जाता है। ज़िन्दगी के दस्तरखान पर दोनों का मजा चसना ज़रूरी है। शेक्सपियर ने कहा है-'sweet are the uses of adversity'- याने विपत्ति के फल बड़े मीठे हैं। नमक कडवा अवश्य है, लेकिन इसकी कद्र वही जानता है जिसे वर्षों से मीठा ही खाने को दिया जाता हो....फिर जीवन एक विशाल प्रयोगशाला है। इसके पग-पग पर नये-नये अनुभव होते हैं। यह भी इनमें से एक सही ।....पत्रकार के लिए किसी समाचार के सम्बन्ध में अथवा किसी राष्ट्रीय अभियोग मे जेल-यात्रा साधारण वात है, पर इस अभियोग में हवालात की सैर करने का तजरवा नि विरले पत्रकार को ही नसीव हुआ होगा।-फिर सम्म मीलों दूर, इस रियासती काल-कोठरी में रात गुजारे अनुभव ! यहाँ तो सैर के लिए आने वाले टूरिस्त आना पसन्द न करें। इसके अंधेरे को देख कर भी दहल जाय । मैं सी-पी के मेले में ।
१३२ 1 उपेन्द्रनाथ अश्क सामग्री इकट्ठी करने आया हूँ, यदि यह घटना न होती तो इन रियासतों के निवासियों की स्थिति का यह ज्ञान कैसे प्राप्त होता? यह सोचते-सोचते क्षण-भर को यही इच्छा हुई कि मुझे इस अभियोग का दण्ड मिल जाय । मैं देख सकूँ कि जहाँ की हवालात नरक से कहीं भयानक है, वहाँ की जेल कैसी है, चाहे इससे मेरा प्रोग्राम नष्ट हो जाय, चाहे मेरी कल्पनाओं के समस्त गढ़ ढह जायं ... । यह सब सोचते-सोचते न जाने कब मेरी आँखें वन्द हो गयीं। परेशानी में नींद भी गृहिणी की-सी हो जाती है । जितना ही आप उसे मनाते हैं, यह रूठती है, लेकिन ज्योंही आप उससे आँखें फेरते हैं, वह मन जाती है। कुछ ही क्षण बाद मैं गहरी नींद सो गया ।.... सोते-सोते मैं क्या देखता हूँ कि मैं घने जंगल में खो गया हूँ । घबराया हुआ इधर-उधर भटकता हूँ, पर मार्ग दिखायी नहीं देता। जंगली जन्तुओं के भय से तनिक-सी आहट पर : रोंगटे खड़े हो जाते हैं । उस समय ज़रा दूर पर शेर की गरज सुनायी देती है, मैं कॉप जाता। पास ही एक घना वृक्ष है, उस पर चढ़ने का प्रयास करता हूँ, पर इतना काँप रहा हूँ कि हाथ-पाँव फिसल-फिसल जाते हैं। शरीर पसीना-पसीना हो रहा है । शेर की दहाड़ समीप ही सुनायी देती है। मैं अन्तिम प्रयत्न करता हूँ। इस बार सफल हो जाता हूँ। शेर नीचे आ कर बैठ जाता है। मेरा हृदय भयभीत है, पर अपनी सफलता पर प्रसन्न हूँ । सिंह धरना दिये बैठा है । मैं एक टहनी तोड़ता हूँ। वह देखते-देखते बन्दूक बन जाती है। में सिंह से कहता हूँ, 'तुम चले जाओ, नहीं तो इसी बन्दूक से तुम्हें खत्म कर दूंगा।' शेर उठ कर ज़ोर से गरजता है । वन्दूक मेरे हाथ ।
"जाग पड़ा हूँ।" मै ऐसे वोला कि ने एक रात का नरक। १३३ से छूट जाती है । वह जोर का ठहाका मार कर हंसता है, कहता है, 'देखो यह सीढ़ी वृक्ष में लगी है। में इस पर चढ़ कर तुम्हें खा जाऊँगा।' में देखता हूँ कि पेड़ के साथ एक बांस की सीढ़ी लगी हुई है और शेर उस पर चढ़ना चाहता है । मैं फिर कांप जाता हूँ, पर तुरन्त ही सीढ़ी को ऊपर खींच लेता हूँ। दूसरे क्षण अपनी सफलता पर बड़े जोरों से हंसता हूँ।.... उस समय मेरे कानों में आवाज आती है-'अरे मई को. अरे भई उठो ।' और फिर कोई धीरे से कहता है, देवन सो गया है। मेरी आंखें खुल जाती हैं । देखता हूँ-सुबह हो गयी है। भूगृह का दरवाजा खुला हुआ है और उस हो, इस से रोशनी जैसे अंधेरे को धकियाती हुई बन्दर कई . वह जगल है, न सिंह, न वृक्ष "क्यों भई, सो रहे हो या जागते हो" बन्न देख कर एक सिपाही ने आवाज लगायो । क्षीणता पर स्वयं आश्चर्य हआ।
वारह "टिक्का साहव का हुक्म आया है। आपको अभी दरवार में पेश किया जायगा।" वाहर प्रकाश में लाये जाने पर, चौंधियायी हुई आँखों को मलते हुए मैंने अपने सम्बोधन-कर्ता को देखा और पहचान गया । यह बड़े दारोगा रामप्रताप थे । उनका नाम मुझे पिछली रात सिपाहियों की वात-चीत के दौरान मालूम हुआ था। मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही। कम-से-कम कल के दारोगा और आज के दारोगा में जमीन-आसमान का अंतर था। बड़ी-बड़ी मूंछे वही थीं, पर उन से रोव नहीं टपकता था। आँखें वही थीं, पर लाल डोरे नहीं थे। शरीर वही था, पर उनकी अकड़ गायव थी। इसका कारण मुझे उस समय तो नहीं, पर वाद को मालूम हुआ । अव जैसे पहली बार मैंने उन्हें अच्छी तरह देखा । उनका शरीर एक अधेड़ उम्र के बूढ़े का शरीर था और उस पर उन्होंने बटनों के विना एक कमीज़ पहन रखी थी, जिसके खुले गिरेवान से छाती की हड्डियाँ साफ़ दिखायी देती थीं । कमर में एक ढीला-सा पायजामा था, जिसमें टाँगों का पतलापन साफ़ प्रकट था । कुछ अजीव-सी दीनता उनके चेहरे पर विखरी थी। तभी मुझे मालूम हुआ कि दारोगा रामप्रताप जाति से ब्राह्मण हैं । कल के रामप्रताप दारू के घोड़े पर चढ़े हुए थे। अपनी दीनावस्था, अपनी निर्धनता, अपने घर की शोचनीय स्थिति को भूल कर हुकूमत के मद में मत्त थे, आज के रामप्रताप दीनता के गढ़े में गिरे हुए थे । झूठ उतर चुका था एकल कागरका ११५ और सत्य सामने था-कितना दीन, कितना विनस! मेरे सिर को फिर जरा-सा चक्कर आया, इसलिए if फर्श पर बैठ गया। "टिक्का साहब दो बार कह चुके हैं कि मेले जाने से पह तुम्हारे मामले का फैसला कर देना चाहते हैं, तुम्हें धौलादिक लिए जाना हो तो जाओ।" दारोगा ने सहन भाय पहा । मैं चल पड़ा-एक हाथ में हथकड़ी पहने उगी सिपाही ये गाए, जिससे मेरा झगड़ा हुआ था । मुझे याद थाया, जय हमारी पाठशाला के सामने पुलिसलाइन में मिपाही उगी प्रकार कादियों को ह्यकड़ी पहना कर शौचादि के लिए ले जाया करते थे, सी हम सब छोटे-छोटे बच्चे कौतूहल और करुणाभरी निगाहोंग उन्हें देखते थे। हमारे नन्हे-नन्हे दिलों में यही हमदर्दी उगगी थी, लेकिन मिपाहियों का तो यह प्रतिदिन का काम या धोर जिस प्रकार कसाई नित्यप्रति निदीप जानवरों का गला काटने से नहीं हिचकिचाता, इसी प्रकार इन मित्राहियों के दिलों में भी कैदियों की ऐसी लाचार, देवम और अमहाय अवस्या पर जरा भी हमदर्दी न बनती। दे याने काम को परम निका भाव से किये जाने। शौचादि ले निवृत होकरदार पाया रेकार के कमरे ही में बैठाया मन। तदला लगदा मसाला बार दण्डित रामप्रता की दृष्टिगहाली गयी। "इस हयकड़ी की कथा जद है!"न्टीमिटीडी ओर देव कर कहा, "साह है।" "हां, यह उतार देनी चाहिए।"
१३६ । उपेन्द्रनाथ नश्क मैंने समझा जैसे मैं स्वतन्त्र हो गया हूँ। यह भूगृह भी अजीव. चीज़ है ! जब इसके अन्दर था तो ऐसा निराश हो गया था कि वाहर आने को जी न चाहता था और जब वाहर आ गया तो उसके अन्दर जाने को इच्छा न होती । विचार मात्र से मन पर आतंक छा जाता था....और यह हथकड़ी....आप सर्वथा निर्दोष हैं, आपने कोई अपराध नहीं किया, 'आप अभी-अभी छोड़ दिये जायेंगे, पर यदि आप हथकड़ी पहने हुए हैं तो कुछ व्यक्तियों के अतिरिक्त, जिन्हें आपकी निर्दोषिता का पूरा विश्वास हो, वाकी सब आपको पक्का वदमाश, चोर, आवारागर्द, गुण्डा, लड़ाका कुछ भी समझ सकते हैं। यदि आप युवक हैं, आपके वाल धुंघराले हैं अथवा वेपरवाही से विखरे हुए हैं या आपके ऐनक लगी हुई है या आप पतले-छरहरे हैं तो जन साधारण सहज ही आप को एक उद्दड और खतरनाक क्रान्तिकारी समझ लेंगे। - हथकड़ी उतरते ही मैंने सुख की साँस ली। अब चाहे मैं अपराधी भी हूँ, चाहे अभी-अभी हत्या करके लौटा हूँ तव भी जन साधारण में से कोई मुझे अपराधी नहीं समझ सकता । चाहे मैं सिपाहियों के साथ भी जा रहा होऊँ, तो भी कोई नहीं कहेगा कि मुझ पर इस प्रकार का अभियोग लगाया गया है। साधारणतः लोग मेरी पोशाक को देख कर यही समझेंगे कि टिक्का साहब का विशेष अतिथि हूँ अथवा किसी अंग्रेज़ अफ़सर के साथ सेक्रेटरी के रूप में आया हुआ हूँ। रात की परेशानी के कारण मेरे चेहरे पर एक ही रात में दाढ़ी वढ़ आने से मेरे परेशान मुख और सिर के विखरे हुए बालों को वे मेरा काम में अधिक व्यस्त होना ही समझेगे । टिक्का साहव का बुलावा दो बार आ चुका था। केवल छोटे दारोगा की प्रतीक्षा थी। उनके आने पर हम दरवार को एक रात का नरक।१३७ चले । उस समय सव की वर्दियां उतरी हुई थी और वे पहाड़ी सिपाही अपने जीर्ण-शीर्ण कपड़ों में बड़े ही दयनीय लग रहे थे। हवालात से कुछ दूर चल कर सब रुक गये। मैंने आश्चर्य के इधर-उधर देखा। मैं कभी किसी रियासत में नहीं गया। किताबों में दरवारो के अजीव-गरीव वृतांत पढे थे। इसलिए मैं किसी बड़े न सही, छोटे दरवार की कल्पना कर रहा था। मैं यह जानता था कि यहां कोटी के राणा कुछ दिनों के लिए ही आते हैं, इसलिए किसी बड़े दरवार का आयोजन नहीं हो सकता, लेकिन फिर भी इसे, शिमले की इन छोटी-छोटी रियासतों के सम्बन्ध में, मेरी अनभिज्ञता कहिए अथवा मेरी अनुभवहीनता, मुझे इतने पूअर शो की आशा न थी। मुझे जहां ला कर सड़ा किया गया, वह जगह एक ओर से खुली थी और उसके तीन ओर कच्ची वैरिकेंसी बनी हुई थी। मुझे अपने स्कूल के होस्टल की याद हो आयी, जो जालन्धर में इसी प्रकार का बना हुआ था और जिसके विशाल आँगन में हम स्कूल के दिनों में खेला करते थे। हम वायीं ओर की कोठरियों में सबसे पहली कोठरी के सामने सड़े थे । उसके वाहर बरामदे में एक लोहे की कुर्सी पर टिक्का साहब केवल सलवार-कमीज और पैरों में नियागरा पहने बैठे थे। उनकी आंखें अभी तक खुमार से भरी हुई थी और उनमें एक अलसायी हुई-सो थकन थी । ठोड़ी पर एक बड़ा-सा घाव का निशान था, लम्बी-लम्बी मूंछे कानों की ओर बढ़ रही थी और चेहरे के मुकाबले में बहुत बड़ी थीं। चेहरे से दर्प टपका पड़ता था । मैंने उस कमरे में नजर दौड़ायी, जिसके बाहर वे कुर्सी डाले बैठे थे। जहाँ में खड़ा था, वहीं से केवल एक पलंग, रेशमी रजाई और उसके पास पड़े हुए एक टेवल का कुछ भाग दिसायी । ६ १३८ । उपेन्द्रनाय अश्क । दे रहा था। । में दुर्बलता के कारण खड़ा न रह सकता था। इसलिए मैंने टिक्का साहब से पूछा, "क्या में बैठ सकता हूं।" लाल-लाल आँखों के उठने और झुकने से मुझे बैठने की आज्ञा मिल गयी । में बैठ गया । मुझसे कुछ अंतर पर बरामदे के स्तम्भ के सहारे रीडर महाशय वैठे थे। वही गोरे-से युवक जो कल लाल ब्लेज़र और फ़लालेन की पतलून पहने हुए थे। उस समय केवल एक धोती और कमीज़ पहने हाथ में काग़ज़ लिये बैठे थे। नहा चुके थे, पर उन्होंने वाल नहीं बनायें थे । मैजिस्ट्रेसी का काम टिक्का साहव स्वयं करते थे। वे क्यार कोटी के चीफ़ मैजिस्ट्रेट थे। उन्हीं को मेरे मामले का निर्णय करना था। - सबसे पहले उस सिपाही का बयान हुआ, जिससे मेरा झगड़ा हुआ था । उसने कुछ ऐसा वयान दिया- "मैं अपनी ड्यूटी पर खड़ा था, जब यह दूसरे कुछ लोगों के साथ स्त्रियों के अखाड़े के पास खड़ा 'छेड़खानी' करने लगा...." मुझे प्रश्न करने की पूरी स्वतन्त्रता दे दी गयी थी, इसलिए में पूछ बैठा- "क्यों जी, में किस प्रकार छेड़खानी कर रहा था ?" वह कुछ उत्तर न दे सका । मैंने फिर कहा, "वे पहाड़ी स्त्रियाँ थीं और मैं पंजाबी। उनकी बोली भी नहीं जानता, फिर वे वाड़ के अन्दर थीं और में काफ़ी दूर वाहर । उनसे मेरी पहली जान-पहचान तो थी नहीं, मैं पहाड़ियों के हाव-भाव भी नहीं जानता, फिर मैंने कैसे छेड़खानी की ?" वह इसका भी कुछ उत्तर न दे सका । अपने पास खड़े हुए एक आदमी की ओर देख कर बोला, “इससे पूछ लीजिए, यह एक रात का नरका १३६ छेड़खानी करता था या नहीं ?" और वो महाशय, मुझे अच्छी तरह याद है, उस समय बहुत ऊपर काफी फासले पर बैठे बरड़ियों का गाना सुन रहे थे। खैर, उसने अपना वयान फिर जारी किया-"मैंने उन लोगों से हटने को कहा । और तो हट गये, पर इसने मेरे मुंह पर चांटा दे मारा" यहाँ पर मै फिर चुप न रह सका । मैंने उससे पूछा- "क्यों भई' चांटा किस हाथ से मारा था?" "इससे ।" उसने दायाँ हाय दिसा कर कहा । "क्या मेरे हाथ में और कुछ नहीं था?" "नहीं।" मैंने रीडर से कहा, "नोट कर लीजिए !" रीडर ने मेरी बात लिख ली तो मैं बोला, "मेरे हाथ में छड़ी थी । वह फ़रद बरामदगी में शायद मौजूद है । या तो यह हो सकता है कि मैंने इसके छड़ी रसीद की हो या वायें हाथ से चांटे रसीद किये हों, परन्तु बायें हाथ से मैं कैसे चोटे रसीद कर सकता? उसमें मिठाई का दौना था।" मेरी आपत्ति लिख ली गयी। वयान जारी रखते हुए सिपाही ने कहा, "उस समय मैंने सीटी दी और इसे गिरफ्तार कर लिया।" दो आदमियों ने इस बयान का समर्थन किया। इनमें से एक रियासत का खजांची था और दूसरा क्लर्क । खजांची साहब वही थे, जो उस समय वरड़ियों का गाना सुनने में व्यस्त थे और जिनकी ओर सिपाही ने अपने बयान का समर्थन कराने के लिए इशारा किया था। इन सबके बयान हो चुकने पर मेरा वयान हुआ। मुझे दारोगा रामप्रताप ने समझा दिया था कि यदि दचना चाहो १४० । उपेन्द्रनाथ अश्क । हो तो और चाहे जो वयान देना, पर यह अवश्य कह देना कि ग़लती हो गयी है, क्षमा कर दें । मैंने जो सच्ची बात थी, बता दी और जब मैंने कहा कि उत्सुकता के कारण मैंने पूछा 'आपके राणा साहब कहाँ तक पढ़े हुए हैं ?'-तो टिक्का साहब की भृकुटी तन गयी । मेरा दिल धक से हुआ। 'अव वचना मुश्किल है ।' मैंने सोचा। और 'हुजूर ग़लती हुई माफ़ करें' कहना भूल गया। लेकिन नहीं, बयान समाप्त होने पर टिक्का साहब ने धीरे से कुछ कहा और मुझे सिर्फ इतना मालूम हुआ कि मैं छोड़ दिया गया हूं। उसी समय एक आदमी को पेश किया गया। पता चला कि इसने रात को एक हलवाई की कड़ाही चुरा ली थी। टिक्का साहव ने उससे चोरी का कारण पूछा। गिड़गिड़ाते हुए उसने कहा, 'हुजूर ग़लती हुई माफ़ करें।' उसने जिस चालाकी से कड़ाही चुरायी थी, उसे जानते हुए और उसकी विनय का यह अभिनय देख कर सब हँस पड़े, पर मुझे हँसी नहीं आयी। शायद एक बार हवालात में जा कर हम वन्दियों को उनके दृष्टिकोण से देखने लगते हैं। इस्तगासे की कहानी यह थी कि उसने आधी रात के सन्नाटे में, जब सब लोग सो रहे थे, हलवाई की कड़ाही बड़ी सफ़ाई से चुरायी और मेले से तनिक फ़ासले पर जंगल में छिपा दी। एक आदमी ने उसे उधर कुछ छिपाते हुए देखा था। हलवाई ने प्रातःकाल ही शोर मचा दिया। वह महाशय. पकड़े गये । उन्होंने अपने अपराध को स्वीकार कर लिया और अव इधर लाये गये । हलवाई भी साथ लाया गया था। अभियुक्त को चोरी से इन्कार नहीं था । पर वह गरीब फ़ाकाकश आदमी था, मेले में काम देखने आया था। काम. । - एक रात का नरक । १४१ मिला नहीं और अपने साने का प्रवन्ध करने के लिए उसके पास कौड़ी भी न थी। उसने हलवाई से भीख मांगी। उसने गालियां दी, प्रतिशोध और कोच के आवेश में उसने हलवाई से बदलालेनै की ठानी और जब रात हो गयी तो उसने उसकी कड़ाही चुरा ली। उसने अभी तक कल से कुछ नहीं साया था और उसके पिचके हुए गाल इस बात के साक्षी थे। दोषी होने पर भी मैंने उसे निर्दोप ही समझा और जव टिक्का साहब ने आदेश दिया, 'इसे हवालात में बन्द रखो। मेले के बाद इसका फैसला होगा'-तो मेरा दिल भर आया । । . दरवार बरखास्त हो गया। टिक्का साहब उठ कर अपनी कोठरी में चले गये और वे लोग उसे हवालात को ले चले। मेरे हृदय से एक दीर्घ निःश्वास निकल गया-तो एक रात का नरक आज इसे भोगना होगा। एक रात क्या, शायद कई रातों का नरक । और एक ठंडी सिहरन मेरी रीढ़ की हड्डी तक उतरती गयी।
तेरह तेरह इसके बाद कहानी अत्यन्त संक्षिप्त है। मैं रिहा हो गया। मुझे मेरी चीजें वापस दे दी गयीं। सब कुछ-घड़ी, नकदी, नोट बुक, और विस्कुटों का आधा पैकेट भी, जो वहीं रह गया था। मैंने एक-एक विस्कुट सब को बांट दिया ! दारोगा रामप्रताप ने अत्यन्त विनय से क्षमा मांगी और अपनी विवशता का रोना रोया। उनके एक लड़का था, संस्कृत पढ़ाना चाहते थे। उसे कुमारसम्भव के कुछ श्लोक और व्याकरण की कुछ गरदानें कण्ठस्थ थीं। बहुत वारीक स्वर में उसने मुझे श्लोक गा कर सुनाये और सबसे विदा ले कर मैं ऊपर को चल दिया। हवालात से कुछ ही दूर आया हूँगा कि किसी का वारीक- सा स्वर सुनायी दिया। मैंने ऊपर को दृष्टि की। वरामदे में टिक्का साहव का लड़का खड़ा था-वही जो मुझको हवालात में देखने आया था। "क्यों रिहा हो गया ?" उसने सरलता से मुस्कराते हुए कहा। "हाँ।" "फिर इस तरह सिपाहियों से न लड़ना ।" मैं हँस कर चल दिया। ज़रा दूर आने पर प्रोफ़ेसर सिंह मिले जो उधर ही आ रहे थे। बोले- "सुनाओ भई, रिहा हो गये।" "हाँ" "मैं टिक्का साहव से तुम्हारी सिफ़ारिश करने जा रहा - एक रात का नरक।१४ था।" "आभारी हूँ।" प्रोफेसर सिंह शिमले के प्रसिद्ध गायक थे। यहां महफ़िल में गाने आये थे। मुझसे भेंट हो गयी, सोचा इन पर ही एहमान का बोझ लादते चलो, बाद में मुझे पता चला कि जब किसी मित्र ने उनसे इस घटना के सम्बन्ध में कहा था तो उन्होंने इस वेरुखी से 'अच्छा' कहा जैसे मेरा उनका छत्तीस का नाता भी न हो। तभी मेरे कन्धे को किसी ने थाम लिया। मैंने मुड़ कर देखा तो रीडर महाशय हैं। कहने लगे, 'माफ़ करना भाई, हम सब आपकी स्थिति से परेशान थे, पर कुछ कर नहीं सकते थे। छोटे टिक्का के मास्टर साहब और हम सबने आपको पुर- जोर सिफारिश की पर उस समय किसी ने सुनी नहीं ।' मैंने उनको धन्यवाद दिया। वे मुझे उस शामियाने तक ले आये जिसके नीचे पुराने जमाने की चांदी की कुतियां पड़ी हुई थों और जहां राग-रंग की महफ़िल जमी थी। वहीं कुतियों पर हम कुछ देर बैठे। वात-बात में मैंने उनका ध्यान उस ब्लंका होल की तरह के भूगृह की ओर आकर्षित किया, जिसमें मुझे एक गत बसर करनी पड़ी थी। "आपकी हवालात तो नरक से कम नहीं," मैने कहा, "मैं तो अपराधी के भी ऐसी कोठरी में रहने का हामी नहीं-फिर उस अभियुक्त को तो बात ही न पूछिए, जिसका अपराध अभी तक सिद्ध नहीं हुआ। उसे ऐमी काल-कोठरी में रखना तो सरासर जुल्म हैं।" "नाए शहर के रहने वाले हैं," वे बोले, "यहां प्रायः निडर पहाड़ी लोग, गुण्डे, शरावी और बदमाश रखे जाते हैं, जो ठण्ड होने पर भी कपड़े उतार कर फेंक देते हैं । चकित न हों, आप- को यहां रहना नहीं, वरना मैं आपको दिखा देता।"
१४४ । उपेन्द्रनाय अश्क । "फिर भी इस वीसवीं सदी में, जव पश्चिम में जेलों को वन्दियों के सुधारार्थ अधिक-से-अधिक सुखद बनाया जाता है और उनके जीवन को पंक में विलबिलाने वाले कीड़ों ऐसा न बना कर उन्हें अच्छा नागरिक बनने की शिक्षा दी जाती है, उनके स्वास्थ्य का पूरा-पूरा ध्यान रखा जाता है और अब अंग्रेज़ी सरकार ने भी जेलों के सुधार का प्रयास किया है, इस रियासत में ऐसी काल-कोठरी को हवालात बनाया जाना निहायत पिछड़ेपन की बात है।" "इस रियासत में ही क्या ?" रीडर महाशय बोले, "आप शायद कभी सोलन के मेले नहीं गये, नहीं तो वहाँ की हवालात देख कर चकित रह जाते । ऐसे जर्जर और जीर्ण-शीर्ण घरौंदे से हवालात का काम लिया जाता है, जिसे यदि एक हृष्ट-पुष्ट आदमी ज़ोर से लात मार दे तो भड़भड़ा कर जमीन पर आ रहे।" मैं एक सूखी हंसी हँसा । उनके कथन में चाहे अत्युक्ति हो, पर इससे रियासती हवालातों की यथार्थता का तो पता चलता था। मैंने उठते हुए कहा, "फिर भी रीडर साहव, इन ग़रीबों की तकलीफ़ को महसूस करना चाहिए।" "उनको इससे क्या?" वे बोले, "उनको एक रात इस नरक में काटनी पड़े तो शायद किसी सुधार की आशा भी हो सके।" रीडर ने सच ही तो कहा। यदि उन राजाओं और टिक्काओं को इन काल-कोठरियों में एक-दो रातें काटनी पड़ती तो उन जेलों में काफ़ी सुधार हो सकता था। मैंने अपने चेहरे पर हाथ फेरा, परेशानी के कारण सूख-सा गया था। होंठों पर पपड़ी जम गयी थी और बाल इतने बढ़ आये थे, जैसे कई दिनों से हजामत न बनवायी हो, ऐनक का फेम टूट गया था। चुनाँचे मैंने रीडर साहब से हाथ मिलाया एक रात का सरक। १४५ बाजार में एक दुकानदार ने शानाज दी, "मों बान जी, हिा हो गये।" मैंने सिर पर देखा-बही दुकानदार था. जिसने आते हुए मेरी ऐनक उठा कर पकामी भी। मैंने कहा, "हाँ गाई।" "आपणो गुरसा यहत भा गया था, नहीं तो मागला पर तो यगी इरानी गौवत महीं आती। पारा गिलान-गाना से काम चल जाता है और यदि बात बढ़ गगी हो नी एका-यो दे-दिला कर मामला सा-नाका हो जाता है। पर आगो तो स्वयं हृययाही गधा पी।" "कुछ ऐगा ही गुग्गा आ गगा गा ।" नेि कहा। "या ही जाता है, ऐ पोको पर " वह मेरी बात का समर्थन करते हुए बोला, "आगो मोर उरी गर्नन ही गे पकड़ा था, यही हमें वैमी गाणी दी होती ना पाने का गिरही नाह "नतीजा बच्चा नही निकलमा ।" "बाई गोही, गंगा अपमान सहा मही होता।" "दृध भी हो, माटम में भी पद छ, गहना ही पड़ता है। इबराते हैं दाः "TIMES गाधी समगा' मांटेए, बाकी से पाली तो नहीं कापका भाग मारहा। जिन्दगी में ऐसे अमरदानाद, जाट तादाद तो नया, भादमी का गुस्सा *सको भोरदार नही करता।
.१४६ । उपेन्द्रनाथ अश्क - मेले के स्थान से अभी कुछ ही फरलांग ऊपर चढ़ा हूँगा कि लाला जी शिमले के एक प्रसिद्ध वकील के साथ आते हुए दिखायी दिये। लाला जी को मुझे देखते ही अपार प्रसन्नता हुई। हाँ, वकील महोदय का चेहरा कुछ उतर-सा गया। तव तो नहीं, पर बाद में मुझे इसका कारण भी मालूम हो गया। हम तीनों वहीं सड़क के किनारे एक पेड़ के नीचे बैठ गये। वकील साहब ने पूछा, "मेरा टेलीफ़ोन पहुँचा था ? ' मैंने कहा, "मुझे तो मालूम नहीं, मुझे आठ बजे के करीव छोड़ दिया गया था। एक फीकी-सी मुस्कराहट के साथ वकील साहव ने यह बताने का प्रयास किया कि मेरी रिहाई उनके टेलीफ़ोन का ही नतीजा थी। खैर, लाला जी ने उन्हें तो मेला देखने जाने को कहा और मुझे साथ ले कर घर की ओर चल पड़े। मार्ग में लाला जी ने मुझे जो कहानी सुनायी, उससे मुझे मालूम हुआ कि वह रात मेरी ही परेशानी का कारण न थी, बल्कि प्रायः सारी मित्र-मण्डली.को उस रात नींद हराम करनी पड़ी। मेरे हवालात ले जाय जाने के बाद तत्काल लाला जी टिक्का साहब के पास पहुँचे, पर उन्होंने सूखा इन्कार कर दिया । लाला जी पंजाब सरकार के एक बड़े पदाधिकारी थे, पर उधर भी टिक्का साहब थे-एक खुद-मुख्तार रियासत के एक मात्र उत्तराधिकारी ! वे बड़े-से-बड़े आदमी को इन्कार कर सकते थे । लाला जी ने उनकी बहुत मिन्नत-समाजत की, सारी-की- सारी पार्टी ने उनसे कहा, पर उस समय दारोगा रामप्रताप और दूसरे सिपाहियों के अभिनय ने बना-बनाया काम विगाड़ दिया। वे सव कहने लगे-यदि आप उस उद्दण्ड युवक को,
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१४८। उपेन्द्रनाथ अश्क परिस्थितियों ने उनकी आशाओं पर पानी फेर दिया और मेरा उस हवालात में कम-से-कम एक रात काटना अनिवार्य दिखायी देने लगा तो उन्हें इस बात की चिन्ता हुई कि किसी-न-किसी तरह मुझे आराम पहुँचाने की फ़िक्र की जाय । वे दारोगा राम- प्रताप से मिले, पाँच रुपये उनकी भेंट किये, दो रुपये छोटे दारोगा की नज़र किये गये, एक-एक रुपया उन दो सिपाहियों को दिया गया, जिनकी ड्यूटी मुझ पर लगी थी। इसके बाद जो फल बचे थे, वे उनके हवाले किये गये। इस तरह हमारी पार्टी जो खुश-खुश आयी थी, विना खाये- पीये, मुंह लटकाये वापस हुई। उन सव फलों में जो कुछ मुझे मिला, उसका उल्लेख कर चुका हूँ। जब लाला जी से कहा तो वोले, “यही ग़नीमत थी कि आपको कुछ तो मिल गया।" मेरे खाने-पीने की व्यवस्था कर और सिपाहियों की मुट्ठी गर्म करके लाला जी मशोबरे पहुंचे । वहाँ उन्होंने तीन रिक्शा किराये पर लीं और दो और आदमियों को साथ ले कर पार्टी को वहीं छोड़ छोटे शिमले पहुँचे । घर में खाना तैयार था, पर वहाँ पहुँचते ही उन्होंने कपड़े वदले और फिर वाहर को चल पड़े। पत्नी ने कहा-'खाना तो खाते जाइए, अभी आये अभी "मास्टर जी गिरफ्तार हो गये हैं।" और जैसे आकाश से वज्रपात हुआ हो । सव मौन, स्तब्ध वैठे रह गये । मेज़ों पर खाना चुना-का-चुना रह गया । लाला जी वाहर निकल आये। उस रात घर में किसी ने खाना नहीं खाया । वच्चे मुझ से हिल गये थे, दोनों रोते-रोते सो गये, लाला जी की पत्नी भी उसी तरह वे- खाये-पीये करवटें बदलती रहीं। सारी रात लाला जी रिक्शा ले कर घूमते रहे। उन्हें पता चला कि वे सेठ साहब जिनकी कोठी लाला जी ने किराये पर चले।'
एक रात का नरक । १४६ । ने रखी थी, टिक्का साहब के लेनदार हैं, उनके सहस्त्रों रुपये टेक्का साहब की ओर निकलते हैं। चुनांचे वे उनके यहाँ हुँचे । उनकी दुकान माल रोड पर है। वे दुकान वढ़ा कर घर जा रहे थे, जब लाला जी ने उनसे सिफ़ारिशी चिट्ठी मांगी। लाला जी के चेहरे पर ऐसी परेशानी और स्वर में ऐसा निवेदन या कि वे इन्कार न कर सके। वहां से लाला जी कमिश्नर साहब की कोठी पर गये, जो सरकार की ओर से इधर की रियासतों के एजेण्ट हैं । उनसे भी लाला जी ने एक पत्र लिया। उस समय किसी ने एक वकील साहब का पता दिया, जिनकी टिक्का साहब मे गहरी छनती थी, दोनों हम-नवाला हम प्याला थे। वे शिमले के सिटी फादर भी थे और हिन्दू भी। लाला जी ने उन्हें अपने साथ ले चलने का विचार किया और इस खयाल से उन्हें पक्का करने मकान पर गये, पर वे अभी तक क्लब से वापस न आये थे । लाला जी क्लव पहुंचे। वहां से पता चला कि वे घर चले गये हैं। फिर घर आये, पर वकील साहब शायद रास्ते में ही किसी होटल में तशरीफ़ ले जा चुके थे । रिक्शा वालों को सवेरे आने के लिए कह कर लाला जी कपड़े उतारे बिना विस्तर पर लेट गये। रात नीद किसे आती। प्रातः ही रिक्शा वाले आ गये। लाला जी अपने एक मित्र के यहां पहुंचे, जिनकी उन वकील साहब से मित्रता थी। तीसरी रिक्शा उनके लिए साथ ही लेते गये । वहां पहुंचे तो मालूम हुआ कि अभी बाथरूम में गये हुए हैं। आप घंटा तक लाला जी आशा और निराशा के भंवर में गोते खाते रहे । खुदा-सुदा करके वकील साहब आधे घटे बाद स्नान से फ़ारिश हो कर बाथरूम से निकले । लालाजी ने उनसे मेरे दुर्भाग्य की कहानी सुनायी और जल्दी चलने को कहा। वकील साहब कहने लगे, "साना बन रहा है, अभी खा कर चलते १५० उपेन्द्रनायक लाला जी के लिए मह नायटा भी भाभी सभी के समान बीता । उन्होंने वकील साहब से प्रार्थना की, "आप किसी-ग- किसी तरह अभी चलने का कष्ट करें । राम जाने सगारे पर क्या बीती हो । इन सिपाहियों से भगवान ही बनाये। एक वार जिसके पेश पड़ जायें उसका बचना कठिन लाला जी की प्रार्थना वहरे कानों पर पड़ी। वकील साहन एस-से-मत न हुए। कहने लगे, 'कोई बात नहीं, सभी पान मिनट में चलते हैं ।' हाँ उन्होंने यह कृपाअवश्य की कि दिन टिमका साहब को यह फ़ोन कर दिया, कि वे इस केस में दिलगरपी रखते हैं। इसलिए वे उसका निर्णय उनके पहुँचने तकनगर, पर यह टेलीफ़ोन मशोबरे के डाकखाने से किया गया था। यहां से कोई आदमी टिक्का साहब तक यह सन्देश पहुँचाने गगा या नहीं, यह निश्चय से नहीं कहा जा सकता । शायद मैं उस समय तक छोड़ दिया गया था । खैर, वकील साहब ने खाना खाया, फिर कपड़े पहने और पूरे डेढ़ घंटे के बाद तैयार हुए । एक वकील, दूसरे सिटी फायर और वो भी शिमला जैसे नगर के। यदि वो शान न दिखाते तो और कौन दिखाता! एक बड़ी मोटी-सी किताब भी उन्होंने साथ ले ली। शायद भारतीय दण्ड-विधान, का पीली एडीशन था, ताकि ज़रूरत पड़ने पर काम आ सके । लेगिन उन्हें उरामा उपयोग करने का कष्ट न करना पड़ा, क्योंकि ये अभी सीपी पहुँचने भी न पाये थे कि मार्ग ही में मैं उन्हें मिल गया। 1 - . अपनी कहानी खत्म करने पर लाला जी ने गेवरा होटल मैनेजर और इन वकील महोदय को बड़ा धन्यवाद दिया I gar भी उन महानुभावों से युछ श्रद्धा हो गयी । सिटी फादर होती एक रात का नरक। १५१ ॥ ऐसा हो, जो किसी गरीब नागरिक के कप्ट को अपना कष्ट समझे । उसे कष्ट से छट्टी दिलाने के लिए अपना बहुमूल्य समय लगाने को तैयार हो जाय। उन वकील साहब के प्रति मेरी यह श्रद्धा उस समय तक बनी रही, जब तक कि उन्होंने वह सहानुभूति दिखाने की फ़ीस के तौर ५०) रुपये का बिल नही भेज दिया। बातें करते-करते हम सड़क पर आ गये। वकील साहब मेला देखने चले गये थे। उनके लिए रिक्शा छोड़ कर, दो रिक्शाओं मे हम घर की ओर रवाना हुए । वकील साहब ने वह रिक्शा रात के नौ बजे छोड़ी। मैंने भी पहली बार रिक्शा की सैर कर ली । वह सैर समझ लीजिए, मुझे २५) रुपये में पड़ी । घर जा कर जब लाला जी ने मुझे खर्च का हिसाव दिया तो मालूम हुआ कि ५०) के करीव खर्च आ चुका है । मैंने जो यह समझा था कि मेरे इस नये अनुभव का खर्च, मेरी ऐनक की कीमत और मेरा शारीरिक कष्ट है, गलत साबित हुआ। ऐनक की कीमत को मिला कर मेरे कोई साठ रुपये लग गये और यदि कही मुझे वकील साहब का ५०) रुपये का बिल भी देना पड़ता तो सौ से अधिक का जूता पड़ता और वह भी निर्दोष। घर आ गया था। लाला जी की पत्नी और बच्चे इस प्रकार आगे-आगे मुझे देखने आये जैसे मैं फांसी की रस्सी से वच कर आया हूँ। खाना आया और यद्यपि कल से कुछ न साया था, पर हाथ तक लगाने को जी न चाहा । मैंने सबसे पहले दातुन को, फिर हाथ-मुंह धोया । तब कुछ जल-पान किया। सारा दिन मित्रों का तांता बंधा रहा। सब को वही कहानी वार-बार सुनायी गयी। सब जानते थे, पर मुझसे पूछने में शायद उन्हे रस मिलता था । एक निर्दोप आदमी के लिए भी, १५२। उपेन्द्रनाथ अश्क दूसरों पर अपनी निर्दोषता सिद्ध करने की कठिनाई का पहली वार अनुभव हुआ। इन्हीं बातों में शाम हो गयी। लाला जी मेरी ऐनक बनवाने के लिए शिमले ले गये थे, मैं खाना खा कर थका-माँदा अपने नर्म-गर्म बिस्तर पर जा लेटा । पिस्सुओं से काटा हुआ शरीर और गुदगुदा विस्तर-कुछ अजीव से स्वर्गीय आनन्द का आभास मिला, पर जिस क्षण मैंने विजली वुझायी और रेशमी रज़ाई को ऊपर खींच लिया तो अंधेरे में मेरे सामने उस चोर का चित्र खिंच गया, जिसने उस काल-कोठरी में मेरी जगह ले ली थी। मेरी आँखें अनायास नम हो आयीं और मेरी नींद गायव हो गयी।