Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Sire Akbar Khand-i

Harshnarayan · 2012/08

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Front matter

मायामा
लखनऊ अकादमी को
-हर्षनारायण

१ समर्पण विषयानुक्रमणी विपय पृष्ठ 3 २ विषयानुक्रमणी 4.6 ३ चिन-शाहजाद दाराशिकोह और सूफी मुल्लाशाह वदरशानी ? ४ चित्र-शाहजाद दारोशिकोह और सम्राट औरगजेव ५ उपोद्घात ६ चित्र-शाहजाद दाराशिकोह . 8 9.26 27 28 ७ " 1 ८ दाराशिकोह का एक मस्कृत पत्र, सानुवाद ९ प्रकाशकीय १० सिरें अनबर को भूमिका ११ उपनिषदें-मूल, अनुवाद, सानुवाद सिरे अक्बर १७-२० २१-२७० - विपय पृष्ठ विषय १ ईशावास्योपनिषद १६-बुद्धि, विरापंग-बुद्धि (मत्र) २म और अनासक्ति (मत्र२)२२ ३ मारमहतामा को गति (मय३)२२ ४ाहा सस्य और बह्म दि (मत्र ४.८) २३.२४ ५ अषिण और विधा(मा-11)२५ २ नोपनिषद् २१.२८ ६ असम्भूति और सम्मति (मत्र १२-१४) २६ ७ प्रधान सत्य (मत्र १५) ८ सूर्य-ग्रह (मत्र १६) ९ मुमपं की प्रार्थना (पत्र१७) २७ १० अप्ति से प्रार्थना (मत्र १) २८ २६-४२ १पम मग ती मग ३ मृतोय पण ४ धतुयं लग 151 विषय पृष्ठ २द्वितीयोऽध्याय १प्रथमा बल्ली २ द्वितीया वल्ली ३ तृतीया वल्ली ७६-८२ २-८ ६७-१२८ विषय पृष्ठ ३ कठोपनिषद् १ प्रथमोऽध्याय १ प्रथमा वल्लो २ द्वितीया वल्ली ५८-६९ ३ तृतीया वाली ३ तृतीयोऽध्याय ४ प्रश्नोपनिषद् १ प्रथम प्रश्न २द्वितीय प्रश्न १००-१११ ३ तृतीय प्रश्न ५ मुण्डकोपनिषद् १ प्रथमो मुण्डक १ प्रथम खण्ड २ द्वितीयो मुण्डक १प्रथम खण्ड १४०-१४४ ३ तृतीयो मुण्डक १प्रथम खका १४९.१५४ ४ चतुर्थ प्रश्न १२१-१२४ १२४-१२० ६६ष्ठ प्रश्न १२६-१५४ १२९-१३९ २ द्वितीय खण्ड १४०-१४९ २ द्वितीय खण्ड १४४-१४९ १४९-१५९ २ द्वितीय सण्ड १६०-१६५ ६ माण्डूक्योपनिषद् ७ तैत्तिरीयोपनिषद् १शीक्षा वल्ली १ प्रथमोऽनुवाक २ द्वितीयोऽनुपाय १६७-१६८ ३ तृतीयोऽनुवाक १६८-१६९ ४ चतुर्थोऽनुवाद १६९-१७० ५ पञ्चमोग्नुचाक ६ षष्ठोऽनुवाक १७२ १६६-२०२ १६६-१७७ ७ सप्तमोऽनुषाक १७२१७३ ८ भष्टमोऽनुवाक ९ नवमोऽनुवाक १७४ १० दशमोऽनुवाक १७४१७५ ११ एकादशोऽनुवाक १२ हादशोऽनुवाक १७६-१७७ [0] पृष्ठ विपय १७७-१७९ १७१-१८० १००-१८१ ६ पष्ठोऽनुबायः ७ सप्तमोऽनुवाकः ८ अष्ठमोऽनुपाफः ९ नवमोऽनवाकः पृष्ठ १७७-१९१ १९४-१९५ १८५-१८६ १९६-१९० १९०-१९१ १८२ विषय २ ब्रह्मानन्दवल्ली १ प्रथमोऽनुवाक: २ द्वितीयोऽनुवाकः ३ तृतीयोऽनुवार ४ चतुर्योऽनुवाकः ५ पञ्चमोऽनवाकः ३ भृगुवल्ली १प्रथमोनयाक: २ द्वितीयोऽनुवाक ३ तृतीयोऽनुयाः ४ चतुर्थोऽनुयायः ५ पञ्चमोऽनयाम: १८२-१८३ १९२ १९२-१९३ १९२-२०० १९५-१९६ १९६ ६ षष्ठोऽनुराकः ७ सप्तमोऽनुवाकः ८ अष्टमोऽनुवाकः ९ नवमोऽनुवाक: १० दशमोऽनयाकः १९४ १९४-१९५ १९७-१९८ १९८-२०२ ऐतरेयोपनिपद् १ प्रथमोऽध्याय १प्रथमः खण्डः २०३-२०१ २ द्वितीयः खण्डः २०६-२०० २ द्वितीयोऽध्याय. ३ तृतीयोऽध्यायः २०३-२१६ २०३-२१३ २०४-२१३ ३ तृतीय खण्ड २१३-२१६ २१६.२१९ २२०-२७० ४ पतुर्योध्यायः ५पन्नमोऽध्यायः ६पठोध्याय २४६-२५५ २५५-२६१ २६१-२७० ६ श्वेताश्वतरोपनिषद् प्रथमोऽध्यायः २२०-२२९ २दितोपोऽध्यायः २३०-२३७ ३ ततोपोरयाय २३७-२४५ १२ शुद्धि-पत्र १३ मत्रप्रती-वर्णानुममणिका गावास्योपनिषद २०३ २नोरनियर २७३ पोनिपर २०४-२७५ मोनिया २३५-२०६ ५ मुमोनिया २०६.२० २७१-२७२ २७३-२८० ६ मास्योपनिषद् तिरोयोपनिषद २७६ ८तरेयोपनिषद २७८.९७१ ९नाश्वतरोपनिषद २३१-२८० טט?

माल्यार्पणा 43*4sh *mmumar वश के वाराणसी मे जिन महापुरुष के सान्निध्य * शाहजाद शिकोह ने तत्वज्ञान को शिक्षा पाई थी उही मुगलकालीन पण्डित प्रवर प० रामातद त्रिपाठी जी के पुनीत ता सुवण-कलश महामाननीय पण्डित कमलापति त्रिपाठी को शाहजाद दारा कृत ५० उपनिषदो को सिरे अक्बर नामक फारसी व्याख्या मे से ईश केन कठ प्रश्न मुण्डक माण्डूक्य प्र ऐतरेय तत्तिरीय और | श्न श्वेताश्वतर- इन नो * मुण्डक ** सिरे ** माण्डक्य * अ उपनिपदो के युगातर वब कारी हिदी रूपा तर से सादर माल्यापण । विद्व मूध य प० कमलापति त्रिपाठी भू० पू० मुख्यमन्त्री उत्तरप्रदेश और सम्प्रति मनी भारत सरकार भुवन वाणी ट्रस्ट के सरक्षक महान और परम अनुग्रहकर्ता है। टस्ट का समस्त परिवार इस माल्यापण से अपने को गौरवान्वित समझता है। *22*aaan * Naihar 1610 र १० जुलाई १९७५ रथयाता दिवस प्रतिष्ठाता-भवन वाणी ट्रस्ट लखनऊ--३ उपोद्घात की संख्या नाम वेदमन्न तीन प्रकार के है-ऋचा, यजुप, और साम (शतपथ ब्राह्मण ४६७१)। ऋचा पद्य है, यजुप गय है, और साम गान अथवा गीति है (मीमासा मूत्र २१ ३२-३४)। ये मन चार ग्रन्थमालाओ मे सगृहीत हैं, जिन वे नाम है भग्वेद, यजुर्वेद, मामवेद, और अथर्ववेद। ऋग्वेद मे ऋचा, यजुर्वेद म यजुप, और मामवेद म साम का प्राधान्य है, अथर्ववेद में प्राय सभी प्रकार के मत्र मिल जाते है । उक्त चारो ग्रन्थमालाओं में से प्रत्येक के कई कई मस्करण हैं जिन्हें 'शाखा' कहा जाता है। प्रत्येक शाखा के चार पाद हैं-सहिता, ब्राह्मण, आरण्यव, और उपनिपद । शाखाओं की मस्या सहस्री तक पहुंची थी (विष्णु-पुराण ३ ३ ४)। कई ग्रन्थों में उन की राम्या ११३० अथवा ११३१ स्थिर की गयी है (पातन्जल व्याकरणमहाभाष्य, पस्पशाह्निक, अहिर्बुध्न्य सहिना १२८-९, कुम पुराण, पूर्वभाग, अध्याय ५२, मुक्तिकोपनिदद् ११२ १३)। इन में से केवल लगभग दर्जन भर शाखाएँ पायी जाती है, पोप काल के गाल में समा गयो। शाखाओ का विवरण इस प्रकार है - प्रमाक वेद परिगणित शाखामा उपलब्ध शाखामा उपलब्ध शायाओ के की मध्या १ ऋग्वेद २१ (१) शारस शाखा २ युजर्वेद १००/१०१ २ (शुवनयजुर्वेद) (१)दाजमनेयी माध्यन्दिन शाया (२) काण्व शाखा ४ (कृष्ण यजुर्वेद) (१) तैत्तिरीय-शाखा (२) मैत्रायणी शाखा (३) कट-गामा (अपूर्ण) (४) कपिष्ठलक्ठ शाखा ३ सामवेद १००० (१) कौथुमीय शाखा (२) राणायनीय शाखा (३) जैमिनीय शाखा ४ अथर्ववेद (१) शौनक-शाखा (२) पप्पलाद शाखा योग ११३०/११३१ १२ इन में से शाकल शाया ही ऋग्वेद, माध्यदिन शाखा ही यजुर्वेद, बोथुम शाखा ही सामवेद, और शौनक शाखा ही अथर्ववेद कही जाने लगी है यद्यपि इस का कोई शास्त्रीय आधार नहीं है। प्रस्तुत लेखन ने शाखा निर्देश न कर के, महिपश, 'ऋग्वेद', 'यजुर्वेद', 'सामवेद', और 'अयव वेद शब्दा का ही प्रयोग किया है। हाँ ऐमा प्रयोग येवल सहिताओं के लिए दिया गया है, ब्राह्मण आदि के लिए नहीं। ३ [10] प्रसगत , ऋग्वेद-सहिता की ढेरो ऋचाएं अन्य सहिताओं ने लगभग शब्दम आत्मसात् कर ली हैं। ग्रामद-सहिता वा तो ७५ ऋचाओ को छोडकर समूना पलेवर ऋग्वेद की ऋचाओं से निर्मित हुआ है । कहते हैं कि प्रत्येक शाखा का अपना ब्राह्मण था, किन्तु केवल लगभग डेढ दर्जन वाहाण वारा-बयनित होने से बच गये है। उपलब्ध यारण्यो की सम्या और कम है। मुराित्रोपनिषद् (११४) के अनुसार प्रत्येक शाखा को अपनी उपनिषद् थी। पहन, प्रकाशित उपनिषदो का सर से बडा सग्रह 'ईशादिविंशोत्तर. शतोगनिषद' (१२० उपनिषदें) शीर्षक से निर्णय सागर प्रेस, बम्बई, ने पांच सम्बरणों में निकाला, बिस वा अन्तिम संस्करण नारायणराम आचार्य के सम्पादयत्व मे १९४८ ई० मे प्रकाशित हुआ। अब इस संग्रह मे ६८ उपनिपदो की वृद्धि पर के पुरा १६८ उपनिपदो या संग्रह 'उपनिषत्सग्रह' शीपंर से एप ही अन्ध में किन्तु दो भागों में जगदीश शास्त्री ने मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, पटना, वाराणसी, से प्रमाणित पराया है, जिस में उक्त १२० उपनिषदें प्रथम माग और ६८ उपनिषदे द्वितीय भाग के अन्तंगत हैं। अदगार लाइबेरी, मद्रास, ने भी प्राय १७९ उपनिषदो पा रई भागो में विभक्त एव सग्रत् प्राशित रिया था। शास्त्री गजानन शम्भु सापले द्वारा सम्पादित विशारा 'उपनिपटाक्यमहाकोश' (बम्बई गुजराती प्रिंटिंग प्रेग, १९४०) में निर्माण मे २२३ उपनिषदो का उपयोग किया गया है जिनमे से उपनिषत्स्तुत्युपनिषद् और देव्युपनिपद स० २ सर्वया अनुपलब्ध हैं और माण्डूक्यारिका के चार प्रकरणो-पागम, अलातगान्ति, चैतथ्य, गौर अद्वैत-यो पृथक्-पृथप और माण्डवयोपनिषद् से स्वतन्त्र रूप में परिगणित दिया गया है। इस प्रकार उपलब्ध उपनिषदो की सध्या २१७ ही रह जाती है। माण्डूक्यकारिका उपनिषद् नहीं अपितु माण्डफ्योपनिपद पर गौहषाद द्वारा रचित पारिका-ग्रन्थ है। 'उपनिषद्वाक्य महानोश मन उपनिषदा भी सूची भी दी गपी है। उसमें भालोपनिषद् (जिस की विशेष चर्चा आगे आयेगी) जैमी उपनिषदे सम्मिलित नहीं हैं। स्मरणीय है fr वर्नस जी.ए. जैरव ने भी एक ऐगे ही कोश या निर्माण किया था, किन्तु उस मै कुरा मितावर केवल ४५ उपनिषदो पा उपयोग किया गया था। उपन्य उपनिषो मे भी अधिकतर मवीन अथच जनामाणिक है, जैसे अल्लोपनिषद, जो एक गगृत-अरबी-गि उपनिषद् है और अश्वर यादशाह को अलाह फा रगूर (बल्लोरमून महमदाबरम्य) कहती है । प्रमगा, इम उपनिषद को गभयन सर्वप्रथम स्वामी दयानन्द सरस्वती ने (अपने 'गरपार्थप्रवाश' मे) प्रवाशिन पर इसपी अमामाणिकता की भोर ध्यान नावृष्ट निया या। इरामा एर पापा भिन्न पाठ उपन 'उपनिषत् गग्रह', द्वितीय भाग, को इगी शीर्ष की वयाननेवी उपनिषद मे ग में प्राप्त होता है। यह इमे गारत निपदो में अन्तर्गत माना गया है। उसमन्ध जानपदी मगे बौन-गो पानीन और प्रामाणिप है, इममा निर्णय गति है। नापमाण ११ उपनिषदा पर शामाधार्य ये गाम मे भाप्य प्रसिद्ध है- ईशागाय, भेन, मन, मुशा, माप, तत्तिरीय ऐतरय, छान्दोग्य, वृहदारपर, घोर ताश्वतर । इग वाधार पर पाय उनी उपसिया को महत्वपूर्ण मान लिया जाना। मग आपापा ने भी मगमग इन्ही उपनिपटी पर भाप्प इन। frरने पई अन्य उपनिषदो के पास भी पमाणम्वरूप उभिन ति।

[11] अत इन वा भाष्य केवल ११ उपनिषदो पर उपलब्ध पावार प्रामाणिक उपनिपदो की सध्या ११ ता परिमिति कर देना श्रान्तिमूलक है। मुस्तिोपनिषद् मे एक स्थल (१२६) पर एकमात्र माण्डूक्योपनिषद् को मुमुक्षुओ के लिए पर्याप्त बतलाया गया है, तथा दूसरे स्थल (१२७) पर १० और तीसर स्थल (१२८) पर ३२ उपनिषदो पा महत्त्व च्यापित करते हुए पौये स्थल (१४४) पर १०८ उपनिषदो को सभी उपनिषदो का सार घोषित किया गया है। उम (१२९-४०) में इन १०८ उपनिषदो की सूची भी दी हुई है ! किस उपनिषद् वे आदि और अन्त में शान्ति-पाट क्या होना चाहिए, इस का निर्णय भी इस के प्रथम अध्याय के अन्त में किया गया है । उपनिषदो की पहचान भी आज कदिन है। अधिकतर उपनिषदे स्वतन्त्र प्राप्त होती है, कुछ आरण्यकी के भाग है, दुध ग्राह्मण प्रन्यो के भाग है, और कुछ सहिताओ के भाग हैं। उदाहरण लीजिए। तैत्तिरीयापनिषद् कृष्णयजुर्वेदीय तनिरीयारण्य और ऐतरेयोपनिषद् ऋग्वेदीय ऐतेरेयारण्यक रा भाग (रमश ७-९ और २ ४-६) है। कृष्णयजुर्वेदीय तैत्तिरीयारण्यक का अन्तिम, दशम प्रपाठक ही चारायणोपनिपद कहलाता है । (यह अथर्ववेदीय 'महानारायणोपनिषद्' से भिन्न है, जो उक्त 'उपनिषत्सग्रह के प्रथम भाग यो उन्नीसवी उपनिषद् है।) बृहदारण्यकोपनिषद् उपनिपद भी है, भारण्यर भी है, और शतपथब्राह्मण या भाग भी है, अर्थात् अन्तिम पाण्ड १४ के अन्तिम छह अध्याय । सामवेद को कौथुमी शाखा के ब्राह्मण के कुल ४० भागा म से प्रथम २५ भागो को 'पञ्चविंश-बाह्मण' अथवा 'ताण्ड्य-महाब्राह्मण', भाग २६-३० को 'पड्विंश-ब्राह्मण', भाग ३१-३२ को 'मन- ब्राह्मणे', और भाग ३३-४० को छान्दोग्योपनिषद् महते है। ऋग्वेद के पापीतवी.' अथवा 'शाइखायन-आरण्यक' के अध्याय ३-६ का नाम 'बोपोतविब्राह्मणोपनिषद्' है। ईशावास्योपनिषद् शुतल यजुर्वेद की माध्यन्दिन- और नाव राहिलामी रा चालीसा अध्याय मान है। बात्यायन-वृत सर्वानुक्रमणो के अनुमार ऋग्वेद में प्रथम मण्डल बा १९१ वा मून एर उपनिपर है। शौन-त 'वृहदेवता' मा भी यही राकेत है।' दाराशिकोह नै यजुर्वेद की माध्यन्दिन-राहिता के मून १६, पुरपका (गृत्त ३१), गूक्न ३२, शिवसवल्पमूक्न (यूक्त ३४) में प्रथम छह मना, नौर ऐतरेयारण्यक (२११-२३३) को भी प्रमश शतरुद्रिय , पुरपगूक्त- तदेव- अथवा गर्वमेध-, तथा शिवसकरूप सज्ञक उपनिषदें मानबर उन की व्याख्या की है। शिवसाल्पो. पनिषद् उक्त 'उपनिषन्मग्रह' में द्वितीय माग की ४५ वी उपनिषद् है । वस्तुन जिस भी वेदमाग में ब्रह्मविद्या का निरूपण हो उस उपनिषद् माना जा सकता है अग्वेद और अथर्ववेद ये दर्जनो नारा उअनिषदो की दोटि मे ला सकते हैं। हो यह भी उन्नेमनीय है वि श्रीमद्भगवद्गीता के प्रत्येक अध्याय वो पुरिषदा म मे उपनिषद् मी मना दी गयी है। यातुन 'गीता' एप सीलिंग रिशरण है जिगर स्वीनिग विशेष्य होना ही चाहिए, जा 'उपनिषद्' है। पोडशोपनिषदाष्टममतृणसी यिशरारानगरस्य प्राइमोद दशम्यागास तिस्रो महापायो महायाती। मायन, सानुकमणी, वारशिप्य को पेवावा विकारमाया शस्तरको सनि.१० मानिस, स० (आक्सफो क्लयरेन मेस, १८८६), पृ. १२-१३, पृहस्पतेरनाग कडतोपनिषत् परम ।' मोना, गृहयला, रामकुमार राण, स०, की सात सौरोजपाया १६४ (वाराणतो. चौखम्बा हा सोरोव कार्यालय, १९६३),४६३ । - इंग दृष्टि में [ 12 ] उपनिषदो के महत्त्व के विषय मे बम दो-तीन पाश्चात्य मनीषियों के उद्गार उड़त कर देना पर्याप्त होगा। प्रसिद्ध जर्मन दानिक शोपेन्हायर लिखा है, 'यह [अर्थात् उपनिषद्] एए सर्वाधिक कृतार्थ वरने वाला और सर्वाधिक ऊंचा उठाने वाला पाठ है जो ससार मे सभव ही सरना है। उग.गे मुझे जीवन मे शान्ति मिलती है, और मृत्यु म भी मिलेगी।' (It is the most retarding and the most elevating reading which...there can possibly be in the world It has been the solace of my life and will be of my death) स्वनामधन्य वेदश मैक्समूलर लिखता है कि यदि शोपेनहायर के इन शब्दों के लिए पिसी समर्थन की आवश्परता हो तो मैं अपने जीवन भर के अध्ययन के आधार पर प्रसनतापूर्वक अपना समर्थन दूंगा ( If these words of Schopenhauer required any confirmation, I would willingly gave it as a result of my lifelong study. ) उपनिष-दर्शन अथवा मौलिक्य वेदान्त ये विस्थात व्याल्याता पॉल डायसन के अनुमार 'वेदान्त [अर्थात् उपनिषद् दर्शन], अपने अविकृत रूप में, शुद्ध ननिवता का सावततम आधार है, जीयन और मृत्यु पी पीजओ मे सब से बड़ी मान्त्वना है। भारतीया, इस मे निष्ठा रखो । (the Vedanta [viz the philosophy of the Upanishads], in its unfalsified form, is the strongest support of pure morality is the greatest consolation in the sufferings of life and death Indians, keep toiti) वेद का अन्तिम भाग होने से उपनिषद् वो वेदान्त नहा जाता है ।' दानुन. उपनिपद् म ही वेद का पर्यबसान होता है। उपनिषदा पर गव ने प्राचीन उपलब्ध पाप शराचार्य का है ।२ उन के नाम से कुल ग्यारह उपनिषदा पर भाप्य उपलब्ध होते हैं, जिन में से दो एक के विषय में सन्देह किया जाता है, कि वे कहीं विमी परवर्ती शबर की रचना तो नहीं है। परवर्ती आचार्यों के भाप्य भी प्राय दस-बारह उपनिषदो तक ही सीमित है। दाराशिकोह प्रथम विद्वान है जिस ने ५० उपनिपदो की व्याख्या का बीटा उठाया और इस नार्य को कर के ही दम लिया। और विशेषता यह है कि उसने अपनी व्याख्या फारसी मे लिखी है। इन ५० उपनिपदो की तालिका इस प्रकार है- १. ईशावास्योपनिषद् २ केनोपनिषद् ३. कठोपनिषद् ४. प्रपनीपनिषद ५. मुण्डकोपनिषद् ६ माण्डूक्योपनिषद् ७ ऐतरेयारण्यकोपनिषद् ८. तत्तिरीयो- पनिषद् ९ एतरेयोपनिषद् १०. जान्दोग्योपनिपद् ११. वृहदारण्यकोपनिषद् १२. श्वताश्वतरोपनिषद १३ मैनायल्यूपनिषद् १४ बोपीतक्युपनिपद् १५ जावालो- पनिपद १६ पंगतोपनिषद् १७ कैवल्योपनिपद् १८ पुरुपसूक्तोपनिषद् १९ शिवमकन्पोपनिषद् २० छागनेयोपनिषद् २१. गर्वमेघोपनिषद् (नदेवोपनिषद) २२ महानारायणोपनिपद २३. तारकोपनिषद २४. वावलोपनिषद् २५ राबों- पनिपर २६. शौनवापनिषद् २७ योगशियापनिषद् २. योगतत्त्वोपनिषद २९ गोपनिषद् ३० भात्मप्रबोधोपनिषद् ३१. नारायणोपनिषद् ३२ आरणिको- १'उपनिषदो वेदान्त । गौतमधर्ममूत्र, गणेश शास्त्री गोखले, सं०, आनन्दायम संस्कृत प्रन्यावलि, स०६१ ( पूना, १९१०), ३१.१२॥ २ शमूर ने प्राचीनतर भाष्यकारों का मी यत्र तत्र स्मरणया है, मा मायस्पारिवा-माष्य ३२० और वृहदारण्यरोपनिषद्-माप्य २.३ ६ में।

पृथक रया [ 13] पनिपट ३३ चूलिकोपनिपट ३४ अथव शिरउपनिपट ३५ अथवशिखापनिषद ३६ आ मोपनिपर ३७ ब्रह्मविद्योपनिषट ३८ अमृतयि पनिष ३९ तेजाविदू पनिषत ४० शतरघुपनियर ४१ गोपनिपट ४२ ध्यानविदूपनिपत ४३ मृगुलागूलोपनिपद ४४ हुगनादोपनिषद ४५ परमहसोपनिपत ४६ अमृत नादोपनिपद ४७ आयोपनिषद् ४६ प्रणवाप निपद ४१ क्षरिकोप निध ५० नरसिंहोपनिषत। प्रस्तुत प्रथम क्रमार १११ का प्रम दारा द्वारा गहीत क्रम से गया है क्यारि यही प्रचलित क्रम है निम ६ भग होने पर अनावश्यक अव्यवस्था उपन होगी। दारा ने तत्तिरीयोपनिषट की अतिम दो वल्लिया-आन दवल्ली और भृगुवल्लो-को पृथक् पृथय उपनिपत माना है जिस से उस के द्वारा पाण्यात उप निषा की सध्या ५१ हो जाती है। सम्भवत प्रथम वल्ली शीक्षावल्ली का उसे पता नही था। बरतुन उग ने जिन उपनिषदा यी व्याख्या की है उनम से कइये पाठ प्रचलित पाठ से पर्याप्त भिन्न है जिन की जोर प्रस्तुत अनुवाद म कुछ ही स्परा पर समेत किया जा सका है। उरा ने ऐतरेयारण्यव न कुछ स्वत व यश (२११-२३३) का भी अनुवाद किया है जिसे मिना वर ही मिर अपवर येतात अनुरित अथवा व्याख्यात प्रथो की सख्या ५१ होती है। धाराशिकोह को उपनिषद यारया का नाम है सिर अरवर अर्थात महत्तम रहस्य जो ही प्राय उपनिपद पद का भी बय है। इरा व्याच्या प्रथमा प्रथम अनुवाद एक ओक्वैतिन दु, परान (Anquetil du Perron) नामक प्रामीमी विद्वान न लटिन भाषा में किया को Oupnel hat शीषर से १८०९-२ ई० भ स्ट्रासबग और बाल्ट से प्रकाशित हुआ इस लग्नि अनुवाद वा जमन अनुयान इस्डन से १८८२ ई० म प्रवाशित हुआ। शापे हायर न लटिन अनुवार को ही परवर उपनिपता रेविषयम उपयत उगार या दिये थ। आवर्वनित पनि नफासीसी भाषाम भी मिर अक्बर वा अनुवाद किया वित वह कभी छपा ही नहीं। यह वही आरव तिन दुपेरान है जिम ने पारसी धमय अवेस्ना की खोज की थी। दाराशिकार इम देश म एक विलक्षण प्रतिभा और प्रवत्ति वा घना व्यक्ति हो गया है जिग वा यक्ति व और कृति व जिनना हा मह वपूर्ण है उतना ही अज्ञात अथवा अल्पज्ञात भी। यह दश व f दुर्भाग्य ही नग जा को भा बात है जसा कि आग स्पष्ट होगा। पारसी की उतम रक्षाना कई ज्यप्ट वरिक अध्यापर भी दारा कृतिय म मवथा अनभित पाय गात हैं । दाराशिकाह अयवा दाराशुवोह ' प्रसिद्ध मुगा समार शाहनी का ज्येप्ट और १ दाराशिकोह अथवा दाराशुकोह दारा शिकोह/पुरोह । बारा अयेषा दारयवर ईरान का प्राचीन समाट या। शिकोह का अर्थ होता है भय तथा गुकोह पा मनाप और सेज। इस दृष्टि से दाराशुकोह गाम मे स्वारस्य अधिर है और पई लोग यही नाम शुद्ध बताते हैं। दाराशिवोह के नाम से प्रसिद्ध सकृत प्रय सपुरम म मो मेखर का नाम महम्मद दारागुकोह अद्धित है। किंतु वाराशिकोह के एर सस्कृत पत्र का उदघाटन हुआ है जिस म उस ने अपना नाम दारा शिकोह दिया है। इम पत्र की चर्चा आगे आयेगी। जो हो दाराशिकोह नाम ही नयिर प्रचलित है दिनपत हिदी मे अत हमने यही माम स्वीकार किया है।

प्रेष्ठ पुत्र और युवराज तथा औरगजेब का अग्रज था। वह २० मार्च १६१५ ई० को पैदा हुआ। शाहजहाँ जब रोगग्रस्त हुआ तय औरगजेब ने अन्य भाइयों को मिलाकर राजधानी पर धावा बोरर दिया और अन्ततः दाराशिशोह पर 'काफिर' (इस्लाम का निधक) होने का आरोप लगा कर ३० अगस्त १६५९ ई० को उस का वध करा दिया और शाहजहाँ के जीते जी सम्राट् बन बैठा। दाराशिकोह राजनीति में असफलता का अवतार था। वह इस क्षेत्र में सर्वदा, सर्वत्र, असफल रहा। चाहे इलाहाबाद की सूबेदारी हो, चाहे कन्धार के रानाम में मुगल-सेना का सेनापतित्व, शौर चाहे उत्तराधिकार के लिए युद्ध-सफलता उसे कही नहीं मिली। इस का एक बड़ा कारण यह बताया जाता है कि वह यपने आगे किसी की नहीं सुनता था और सब पर अविश्वास करता था। किन्तु एक अन्य और नाही अधिक महत्वपूर्ण क्षेत्र में वह अपना सानी नहीं रखता था। इस्लाम के इतिहास में इतनी उदार आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि से सम्पन्न एक भी राजकुमार अथवा राजपुष्प दिखायी नहीं दिया। इस दृष्टि मे द्वारा और औरंगजेच दो एकान्तन विरोधी विचारधाराओं का प्रतिनिधित्व करते है। औरंगजेब की कितनी भी सफ़ाई दी जाय', मानना होगा कि वह हिन्दुत्व प्रेमी तो नही ही कहा जा सकता। वह हिन्दुत्व और इस्लाम के ममन्वय का तो स्वप्न भी नहीं देख राता था। विपरीत इस के, दारा का अबाघ हिन्दुत्व-प्रेम देखिए, कि उस ने ५० उपनिपदो की व्याख्या करके वह कार्य कर दिखाया जिसे उग ममय तक विसी हिन्दू ने भी नही ठाना था। और हिन्दुत्व और दरलाम, अथवा वेदान्त और तसम्युफ, के समन्वय के प्रयन्न मे तो उस ने एक पूरी पुस्तक ही लिख डाली। गह पुस्तक फारमी १ नौरंगजेब की येन केन प्रकारेण सकाई देने वाले भूल जाते हैं कि वे द्वारा शिकोह के साथ अन्याय करते हैं। शेख सादी गे ठीक दाहा-- 'न दानिस्त आँकि रहमत बाद बर मार कि इं जन्मस्त वर फन्दि आदम' अर्थात् जिस ने सप पर क्या को उस ने नहीं जाना कि उस ने मनु को सन्तान पर अत्याचार किया। वस्तुतः औरंगजेब और दारा में से एक हो को चुना जा सकता है। औरंगग्रेय के प्रशंसकः इपयाल ने अक्बर और धारा को मास्तिक फहू कर लताड़ाया- 'तुम इल्हादे कि अश्यर पर्वरोर अन्दर मित्रते दारा दमीब' एक बाल औरंगजेब को इस्लाम और युद्ध मे इस्लाम के तकंग का अन्तिम वाण मानते थे- 'दनियाने कारवारे पुफो दी तर्कदो मा रा खरगे आखिरी प्रसंगतः, यहाँ फारता-पादों को प्रायः उपमहाद्वीप मारत में रुद उच्चारण पति हो अपनायी गयी है, क्योंकि वह उर्दू में गृहीत उच्चारण पद्धति के अनुरूप बरती है। आधुनिक ईरानी उच्चारण-पद्धति बहुत बदल चुकी है, और वह भी चिरायु नही प्रतीत होनी । उन्ले पनीय है कि अपने दीवान 'गरनुकमाल' की भूमिका में अमीर खयो ने भासा में प्रचलित कारमी उच्चारण-पद्धति को मन्यत्र प्रचलित पद्धति से अंतर माना है और मुरातानियों को उच्चारण-पद्धति को निन्दा की है जो आज के ईरानियों के समान 'चः' को 'वि' और 'दुना' को 'कुजी' रहते हैं। वस्तुतः, अंसा गालिब ने लिखा है, सेही का अनुसरण भौटों का काम है।

- [15] मे भी उपलब्ध है और सस्कृत में भी, और दोनो पर लेखर देप से दाराशिवोह वा ही नाम अस्ति है। पारसी कृति का शीर्षक है 'मरमाऽन्वन (ममुद्रद्वय का मगम) और संस्कृत कृति का, 'समुद्र सगम'। फारसी पुस्तक को एशियाटिय सोसापटी ऑव बगाल ने मुहम्मद महा पुन्हक वे अपेजी अनुवाद और टिप्पणिया के साथ १९२९ मे प्रमाशित रिया था। डॉ अाहर अब्बाग रिजवी ने उस का हिन्दी अनुवाद भी प्रकाशित किया है। रास्कृन पुस्तक को अंग्रेजी टिप्पणिया आदि के माय डॉ० यतीन्द्र विमल चौगुरी ने प्रकाशित किया।' 'मज्मउत्बहरैन' अथवा 'समुद्र सगम ' अपने ढय का अफेला प्रथ है। इस मै पता चलता है कि दारा मा वेदान्त और तरा बुफ दोगो पर कितना अधिकार था और उन्ह समन्वित कर एक नयी सश्लिष्ट भारतीय गस्कृति को प्रतिष्ठापना की उसे स्तिनी स्पृहा थी। आज सयुक्त सस्कृति का नारा तो रोज लगता है, किन्तु दारा वह महापुरुप है जिम ने उस नी नैनारिक दार्शनिक आधारशिला के निर्माण या मुनियोजित (पद्यगि अमान) प्रयास किया था। उस के पूर्व केवल एवं महापुरप दिखायी देता है जिग ने कुछ इसी प्रसार का प्रयत्न मिया था। वह था अबरर दार मा वनि-सम्राट पंगी गिग गे फारगी में 'गारिकुलमारिफन' (ब्रह्मज्ञान-भाकर) गोएंव प्रन्य लिग वर मुस्लिम समार को वेदान्त का तत्वज्ञान देने का प्रयत्न किया था। पंची या अन्य अधिन- मौलिक और दार्शनिकतापूर्ण है। पेद है कि इस ग्रन्थ को सोग अब एन दम भून गये है और ग्रन्थ भी अब लुप्त ही है। उगे नवलकिशोर प्रेम, सपनऊ, ने प्रकाशित किया था। प्रस्तुन लेसर वो कुछ गमय पूर्व उक्त प्रेस से उग ग्रन्थ में विनीय, १९८५ मस्वरण की एक प्रति बडी बठिनना सप्राप्त हा सकी। हम मे कम मुस्लिम मगार में इन प्रया या प्रचार प्रसार अत्यत उपादेय मिड होगा। बैग मे ग्रन्थ रतामा लोप हो रहा है जिगवी चिन्ता रिसी योनही व्यापगी । भारतीय उपमहाद्वीप म हिन्दू और मुममान का सम्म लगभग १३०० वर्ष पुराना है, कि तु हिन्दुत्स और इस्लाम म उभयपक्षीय सम्पर्क सभी घटित ही नहीं हुआ। राममोहन राय और दयानन्द के पूर्व हिन्दुयो द्वारा दम्लाम को प्रामाणिव दग से समापने अथवा पण्डन मण्डन की दृष्टि स भी उग वा प्रामाणिम अध्ययन प्रस्तुत परने वी चेय या विशेष प्रमाण नहीं मिलता (गन्ता का सम्बन्ध देवरा गुफिया सपा), जबकि हिन्दू दार्शनिको ने बौद्ध और जन ही नहीं चावति और आमीवको जैम पोर नास्तिर और धर्महन्ता सम्प्रदाया पर भी सविस्तर विचार विमर्श विधा है। विपरीत इम पे, १ पुस्तक पुस्तकालयो मे मो कठिनता से ही प्राप्त होती है। उसका पूरा विवरण इस प्रकार है-'समुद-सङ्गम, यतीन विमल चौधुरो, स०, A Critical Study of Dara Shikul's Samudra sangama or रात २, STEHTT011- fiat, Comparative Religion and Philosophy Series, राण (कलकता प्रावाणी-मदिर, १९५४)। इस प्रकाशा का प्रया घड एक समीक्षा-प्रन्प है जिस को सेतिका है ० (पोमतो) रोमा चौधुरी । २ इरा मा अर्थ यह पदापि नहीं समता पारिए हि प्रस्तुत लेखर दारा के वृष्टिकोण अथवा कार्यक्रममा पूरा गमर्षक है । पस्तुन यह य इस यात पर दिया जा रहा है किधारा को कृति योर कतर ऐतिहासिक ही नहीं रामसागपिक मास्व को भी वस्तु है। सस्कृतिमो समन्वय के रवनारमा प्रपनो पर अवश्य विशर रोना चाहिए।

[16] मुसल्मानो मे हि दुश्व में अध्ययन और मूल्यावन के प्रयनो पे यई प्रवन्त उदाररण उपाध हैं। अवैसी ने 'विनायुजनहिन्द', अश्परत ने 'माईने अपवरी', और खुसी बिन आजर बयान अपरनाम जुल्लिाार अली मूविद' में 'दविस्तान मगाहिय' में हिन्दू धर्म-दर्शन और रामनि पा व्यापर अध्ययन प्रस्तुत किया था। इन में से प्रथम पुस्तव उई, अग्रेजी, और हिन्दी में भी उपलध है। द्वितीय पुस्तर, 'आईन सनबरी', तीन पण्डो में से एक में हिन्दुत्व का गोपाय वर्णन है। किसी भी एक पुरतर मे हिन्दुत्व सम्बन्धी गामग्री का उत। वरिष्य असभ्य है। यह पुस्तक हिन्दी में अवषय आनी चाहिए। यह अब मून फारमी म भो बाजार में अप्राप्य है। तीसरी पुगर की भी यही दशा है। पंजी को पुग्नर 'शारिरामारिपत' वी चर्चा आ ही चुनी है। इस्लाम ने अध्ययन की दिशा में मध्याातीन हिन्दुओ का योगदान कुल मिला पर शुन्य ही बंटता है।' हि दुआ में इस्लाम मे गम्भीर अध्येता आज भी नहीं हैं ' हमारे विश्वविद्यालया की बात न पूछिए। विदेश में जन्म लेने वाले धर्मो म वहाँ सारा जोर ईसाइयत पर है, मयावि पश्चिम वा प्रसाद उसी से प्राप्य है। अब इस स्थिति वा अविलम्ब अत हो चाहिए । 'ने शरीफ' और 'न्यू टेस्टामेन्ट' यी तुलना गलत सदर्भ में की जाती है । यह राही है कि 'युआन शरीफ' में इस प्रकार की शिक्षा नही गिनती कि यदि कोई एक गाल पर तमाचा मारे तो दूमरा गाल भी आगे पर दो। किन्तु ध्यातव्य यह है कि ननि शरीक एक नयी सरशी वा घोषणा पत्न है। उसे कोई गाने या न भान, यह मानना ही होगा कि उस वा प्रादुर्भाव एक नयी मवृति रो जन्म देने के लिए हुआ था, अव्यवहार्य, आपातरमणीय, भौर भोली-भाली वातास लोगो को रिनाने के लिए नहीं। ईसाइयत एक मत मात्र है, जब कि इस्लाम हिन्दुत्त्व के समान एक धर्म है- अर्थात् मत+रास्कृति । इम दृष्टि से इग्लाग या अन्यमन हिन्दुओं के लिए अधिक उपादेय होना चाहिए। यहाँ यह उल्लेखनीय है रि दाराशिमोह हनत मुहम्मद (स.) बो नन्तिम नयो (ऋषि) बोर 'कुने गरीफ यो अतिम आस्मानी पुस्तक मानता था। इम १ 'दबिस्ताने मजाहिब' के लेखक ने अपना नाम नहीं दिया है, थोडी-बहुत जीवनी दी है। सर विलियम जोन्स ने उस का नाम मुहिसन फानी कश्मीरी समझा। काजी भाऽस्वदूद ने 'फहंगे अन्जुमन-आरा-ए नासिरी' तथा अन्य ईरानी पुस्तको के आधार पर उस का नाम खुसी चिन भाजर कंवान अपवा तुल्फिकार अली विद ते किया है। वह पारसी था, और पारसी कभी-कभी अपना एक मुस्लिम नाम भी रख लेते थे। द्रष्टव्य अर्श मालिसमानी, 'नरम -ए सर्मद (नकोदर मजे तस्नीफ, प्रकाशन-तिथि अनिदिष्ट), पृ०९। २ इस्लाम के सम्बन्ध मे बौद्ध परम्परा मे १६०५ ई० मे भी कंसीभ्रान्त धारणा फैली हुई थी, इस का निदर्शन हमे लामा तारानाथ को तिब्बती भाषा में निबद्ध और लामा चिम्पा तथा अतरा चट्टोपाध्याय द्वारा अप्रेजी में अनूदित पुस्तक 'हिस्टरी ऑब बुद्धिम इन इन्डिया', देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय, स० (शिमला इन्डियन इन्स्टीटयूट आप ऐडवान्स्ड स्टडी, १९७० ), के पृष्ठ ११७ ११९ (१० १२१, १७६, और ३१० के साथ पप ) मे प्राप्त होता है।

[17] प्रकार वह इस्लाम धर्म से एकान्तत पराड मुख नहीं था। गाकी वृतिओ रा अवलोकन किये बिना ही उस के समसामयिक, मनूची आदि कई यूरोपीय यात्रिया ने लिए मारा है कि वह धर्म से सर्वथा विमुख हो गया था। वस्तुत वह इस्लाम और हिन्दुत्व में समन्वय का पोषक था। तथापि यह वात तो कहीं ही जा सकती है कि वह मश हिन्दुत्व की भोर अधिकाधिक आकृष्ट होता जा रहा था। एक उदाहरण लीजिए। उस के आरम्भ-काल के अन्य सकीनतुन्-औलिया और 'गफोननुल- औलिया' महात्माओ की जीवनी से सम्बन्ध रखते हैं। उरा में किसी भी हिन्दू महात्मा की जीवनी नहीं दी गयी है, जबकि उन म इस्लाम को अनुदार परम्परा के उन्नायक तत्कालीन भारतीय सूफी शैखे अहमद सरहिन्दी 'मुजदिदै भन्फे सानी' ता को नहीं भुलाया गया है। किन्तु बाद में वह एक कवीरपन्यो साधु बाबा लालदास बैरागी (बाबालास) के प्रभाव में आता है और उस पर वेदान्त का प्रभाव बढ़ने लगता है। इन दोनो महात्माओ के बीच जो प्रश्नोत्तर हुए है वे 'मुकालम ए दाराशिकोहो बाबा लाल' के नाम से दारा के मित्र प्रवर, फारमी ने महान् कवि, चन्दर्भान (चन्द्रभानु) 'बरहमन' द्वारा लिपिबद्ध कर लिये गये थे। वे उर्दू अनुवाद के साथ मूल फारमी मे सन् १९९६ ई० मे पुस्तताकार प्रकाशित हुए थे। यह पुस्तक अब बाजार में अप्राप्य है। पाराशियोह लगभग आधी दर्जन पुस्तन और लिखी हैं, जो अधिकतर सूफी साधनाभा और महात्माओ के सम्बन्ध म है । उस की फारसी कविताओ वा एक सत्रह (पीपान) भी 'अक्सीरे आजम' शीर्षक से उपलन्ध है, जिस मे १३३ प्रजाले और २८ रुबाइयाँ है। दारा के वाव्य को भी लोग एक दम भूल गये है। यह दीदान अभी तक अप्राशित है। 'खजीनतुश्त्-औलिया' का लेखक उस पी रविता को 'अद्वैत का समुद्र' (दरिया ए तौहीद), 'अद्वैत का अशुमाली' (खुर्शीदे वदानियन), जैसे विशेषणो में विशेषित करता है। दारा वा मान्य नाम 'कादिरी' या, और उसका दावा है कि उम ने १०२० गजल रही हैं - हजारों बीस्त गजल गुफ्त कादिरी दर इधक मगर चि मूद दिवस मन्तब न मी-वाशद उस में वाव्य-कौशल पी ए यानगी लीजिए- बहिश्त की जा कि मुल्लाए न दाशद गोगाए (स्वर्ग वहाँ है जहाँ मुल्ला नहीं होता, जहाँ मुल्ला का कोलाहन नहीं सुनायी देता।) इन क्षेत्र मे उस की प्रतिमा विशेष नहीं पमी। तथापि इन पे कुछ शेर तो बडे ही मार्मिक लगते हैं। उदाहरण लीजिए- रास्ननत सहलात, सूद रा आधना ए पत्र कुन, नत्र ता दरिया तबानद शुद चिरा गौहर शबर पद बाजी तु बर शरीअति सुद अहमदे मुसिल बज खुदाम्त मवा दस्ति जर-आलूद बव जानि जर्-आतूद रा अन, वाल पीरत' हर समे पेचे विशुद अउ तावि जुरूपे यार शुद दाम गुद नस्वीह शुद्धजनोर गुर,जमार शुरु बा दोरन रगीसम ( अज सेश गुगनीम अब रोग उस्तन नि मुबारस गपरे दूर । जि मुल्ला गोरो न बागद । , मी शवद [ 181] दारा को कुछ माइयां निश्चय ही प्रथम कोटि की नहीं जा सकती हैं। उदाहरण लें- हगिज न कुनद आब हिजाब अन्दर या याओं वि बुनद नविण हु बाब अन्दर परस हव बहि हकीकतऽस्तो कौनन दर चूं यस व मियानि आयो आव अन्दर यख हर दम व-रमद व आरिपां जीवि जदीद खुद मुन्तहिद अन्द, न जिअले तकलीद शेरा न खुरन्द जुन शिवारे खुद रा स्वाह गुरद फताद-ए लह मि कदीद कहते हैं कि दारा ने एक मस्नवी की भी रचना की थी, किन्तु उस का वही पता नहीं चलता। कहते है कि दारा ने गीता और योगवासिष्ठ का भी फारमी में पूर्ण या अपूर्ण जनुवाद किया था। गीता का एक अत्यन्त उत्कृष्ट और उदात फारसी-पद्यानुवाद फैजी के नाम मे बहुत पहले लाहौर से प्रकाशित हुआ था, और अब बाजार मे अप्राप्य है । कुछ लोग, जैस डॉ० इथे (Dr. Ethe), उसे दाराशिकोह की रचना सिद्ध करते हैं । यह मनुवाद इतना हृद्य और मार्मिक बन पड़ा है कि वह मूल रनना का मजा दे जाता उस की कुछ बानगी उपस्थित है- जि मुल्वे अदम मा हम आमदीम दमे पन्द अज जिन्दगानी जदीम व-आसिर व-मू ए अदम पी रवीम वबामे अजल यर कलम मी रवीम बराए खुदा न हम कारहा म-जू हेच पादाशे किरहा पए करते सल्क जग आफरीद दुकाहा ए किर्दारि विसियार चीद जि जगहा बिना ए अमल मुह कमास्त जि आमाल बुनियादि हर आलमऽस्त वुवद हिस्स-ए देवता दर ताम कि परिश एशोऽस्त खुर्दन हराम पए नफ्मि खुद हर कि ना मी पजद वर लानते मुत्तसिल मी मजद जनक-राज वो नीज अम्सालि शां हम वैगरज दर्द व-बागे जनां शादगां रफ्त अन्द अजी सार्जारे जहाँ रपत अन्द मन अज हर सि आलम जुदा गश्त अम तिही गश्त अक्ष खुद खुदा गश्त बम हम मारि मन अज मराए खुदास्त रजा ए दिले मग रमाए खुदाऽस्त वंदो नेत्र पेश म बराबर बुवद कि हर कार अज हु क्मि दावर नुवद चुं बुनियादि दी सुस्त गर्दद बसे नुमाईम खुद रा बशनले कसे कि द्विफ्ज़ रियाजतगजीना बुनम मराबाते उक्लतनशीना कुनम घ-रेजीम खने मितमपेश गां रा नुमाईम दारल्झमा भारतीय इस्लाम की उदारवादी परम्परा मे दारा का स्थान एक दृष्टि से सर्वोच्च है। यह परम्परा महमूद गज्नवी के दर्बारी विद्वान् अल्वस्नी से ही आरम्भ हो जाती है। इस म जमण अमीर खुस्रो, अदर के किञ्चित पूर्ववती, कश्मीर के बादशाह जंनुन आविदोन अकबर महान्, फैजी, अदुल्फरन, सर्भद आदि महापुरषो के नाम जुडते गये हैं। इस के विपरीत भारतीय इस्लाम मे जो अनुदारवादी परम्परा रही है उभ की एक पलन आप डॉ. सम्यिद अतहर अब्बाम रिजवी की प्रसिद्ध पुस्तक Iuslim Revivalist Movements in Northern India in the Sixteenth and Seventeenth Centuries' (आगरा विश्वविद्यालय, १९६५) से पा सकते हैं । यदि राष्ट्रसश्लेषण गरी प्रवृति वो मचमुच पुष्ट करना है तो हमे उन उदारवादी परम्परा के पुनरुद्धार की बात मारे जहाँ [19] सोचनी चाहिए। (पुनधार' पुरी चीज नहीं है, स्वस्थ परम्पराओ का पुनरुद्धार नवोन्मेप के लिए आवश्यक शतं है।) दरसाम की उदार और अनुदार धाराशे का प्रमश 'उदार' और 'अनुदार' नामकरण निजी पसन्द-नापसन्द की दृष्टि में नहीं किया गया है। यह नामकरण केवल इस तथ्य का परिचायक है कि अमुक धारा अन्य धर्मों के प्रति उदार रही है अथवा अनुदार, अयवा कि इस ने अन्तरग तथा बहिरग नये चिन्तन का उन्मेप महन किया है अथवा नहीं। इस्लाम की सूफी-परम्परा उक्त उदार धारा वा विशेष प्रतिनिधित्व बरती है, और उस मे भी प्रार्य वुजूदी (अद्वैतवादी) धारा ही। जैसा कि गर्वविदित है, तसबुफ (मूफी मत) की मूल धाराएँ दो हैं--बुजूदी (अद्वैतवादी) और शुहूदी (द्वैतवादी) । शाह वलीउन्लाह ने अपने 'फैसल -ए वदतुन्बुजूद-ओ शुहूद' में लिखा है कि इन दो धाराओ मे अन्तर केवल उपमा और रूपक का है, तात्त्विक नहीं। किन्तु यह मत एक अतिवाद है जो इतिहास से भी खण्डित हो जाता है। बुजूदी मूफियो का सिद्धान्त है 'वहदतुल्यूजूद'-यह मिद्धान्त कि सत्ता एव है, अहत है, अर्थात् यह कि ब्रह्म मत्ता से इतर अन्य कोई सत्ता नहीं। यह मिद्धान्त शाकर अद्वैतवाद जैसा लगता है। शुहूदी सूफियों का मिद्धान्त है 'वह्द तुरशुद'--यह सिद्धान्त कि सत्ता तो एक नहीं है, किन्तु समाधि को अवस्था मे वह एक ही लगती है। प्रसिद्ध शुहूदी सफी 'मुजद्दिदे भरम सानी' ने लिखा है कि जगत् की सत्ता ब्रह्म से भिन्न है, किन्तु समाधि में एक ऐसी भूमिका प्राप्त होती है जहाँ वहा से भिन्न सत्ताओ का लोप प्रतीत होने लगता है, यद्यपि उन का वस्तुत लोप नहीं होता। सूर्योदय के अनन्तर भागाश में तारे अदृश्य हो जाते हैं, किन्तु वे विद्यमान होते हैं। ठीक यही दशा जगत् यी है। ('मवतूबाते गुजदिदे अल्फे सानी', मक्तूब ४३ जीम, आदि) इस्लाम मे वदतुऽन्युजूद-सिद्धान्त का प्रवेश अबू यजीद बिस्तामी (१ वी शती) द्वारा हमा, जिन रे 'शहियात' (प्रलाप अथवा समाधि-भाषा के बनन) जव नस अस्सराज वी पुस्तक 'कितावुश्त लुम्भ' (तमव्वुफ की पहली सुग्रथित पुस्तर) में सुरक्षित उस पुस्तक में लिखा है कि बिस्तामी के गुरु का नाम 'अबू अली अस्मिन्दी' (सिन्धी) था, जो उन्हे अद्वैत की शिक्षा देते थे। इस के बदले विरतामी स उन्हें 'फर्ज' (आचार) की शिक्षा प्राप्त होती थी। विस्तामी पर भारतीय प्रभाव उन के इन वाक्यों में स्पष्ट झलकता है-- १ तकनु अन्त (अन्त् अ) चाक (जाक्-अ) (नत् स्वमसि । २ हाजा कुल्लहू खदअतन् (यह सब माया है)। ३ सुब्हानी (मह्यमेव नमो नम -सन्यासोपनिषद २५) । ४ अना हुव (हुब्-अ) (सोऽहम्) । इम के अतिरिक्त, वृहदारण्यकोपनिषद (४४७) म आय सर्प और वचुल का दृष्टान्त बिस्तामी भी देना है। इस सम्बन्ध म आर सी जेनर (RC Zaeliner) को पुस्तक 'Mysticism Sacred and Profane' (द्वितीय सस्करण, आरसफार्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, १९६१), पृ १६१ और उस से किञ्चित् आगे, दष्टव्य है। हुसन दिन भन्सर अल-हल्लाज (९ १०वी शती), अयू सभीद इन अयुखर भारतम [20] (१० ११ वी शता), मुहीउद्दीन इग्नु अरवी (१२ १३ वी शती), अब्दुलरीम अल जीली (१४ १५. वी शती) इसी माम के अनुगामी हुए। हल्लाज न हुलूल (अवतरण अथवा अबतार) और इत्तिहाद (एकीभाव ब्रह्मीभाव) + सिद्धात उद्भावित किय। इमाम गजानी (११ १२ वा शती) ने फना अन फना (लय का लय, नाश वा नाथ) की चर्चा को और बुनूदी हात होत रह गया, सभवत भय के कारण, और वहा नि ब्रह्मीभाव वास्तविक अद्वैत नहीं, बल्कि एमा है जैसे शराब म भरे शीश का देखकर काई भ्रम स मानन लगे कि यह शीशे में शराब नही शीगे का रंग है। इस सम्बध म उम का मिश्वातुल् अवार' द्रष्टव्य है, जिस का अंग्रेजी में अनुवाद भी निकल्सन न कर दिया है। वस्तुत इतिहाद (जीव और ब्रह्म का अद्वत) शिक (ईश्वर म अनीश्वर का समावेश) है ईश्वर की सत्ता म किसी भी प्रकार शरीक होना शिक है जिस का साहस गजाली म कहाँ ? मत उस आत्मा को शीशा और ब्रह्म को सुरा से उपमित रिना पड़ा। वह यह भी कहता है कि हल्लाज आदि मुत्र (मद) की दशा म इत्तिहाद की बात पर जाते हैं। अबुल्लासिंग अल्जुनैद बग्दादा (९१० वा शती) भी कहता है कि बिस्तामी मुक्र की दशा म अद्वैत वक्ता था, जो समाधि की मात्र एक प्रारम्भिक अवस्था है। (द्रष्टव्य सराज,३८१) बुदी परम्परा के मूफी कमि जलालुद्दीन स्मी ने मूसा और चरवाहा शीयक आख्यायिका में सब धर्मों के प्रति महानुभूति का भाव प्रक्ट किया है। इस परपरा के गूफी निजामुद्दीन औलिया ने एक बार एक शेर पढा था जो हसन दहलवीता भी माना जाता है-हर कौम रास्त राहे दान व क्टिल गाहे अर्थात हर कौम सत्पथ पर है हर धम हर उपासना-स्थल । दाराशिकोह के गुरु अपन समय के प्रसिद्ध मुफी मुल्ला शाह वदरगानी थे जिह वक्ष्यमाण शेर बहन के अपराध म वाफिर घोषित हो कर कश्मीर छाडमा पडा या- दर पज ए खुदा दारम मन चि पर्वा ३ मुस्तफा दारम (अर्थात में ईश्वर से सीध हाथ मिलाता हूँ मुझ हजत मुहम्मद (स.) को नया परवाह है ) मरलाशाह वनस्शानी के गुरु अर्थात दारा के गुरमह मियाँ भीर भी बुज़दी परम्परा के मूफी थे और ये इतने बड़े और उदार महात्मा गे कि गुरु गोविन्द सिंह को जब अमृतसर व स्वण मदिर की आधारशिला रखने के लिए एक उच्च कोटि के महात्मा की आवश्यक्ता हुइ ता उह मिया मार व बाग कोई नहीं जचा था । पलत इही महात्मा वे हाथा उक्त शिवा याम मापन हुआ। दाराशिकोह भारतीय तसव्वुफ के चार सजादा (पीठा)-चिश्तिय , कादिरिय सुहरावर्दिय और नवशन्त्यि -मे से काहिरी सज्जादे वा सूफी था। उस का कान्य नाम भी पारिरी था। इस प्रकार दारा पा सम्बध एवं लम्बी उदार परम्परा से था जिसे उम ने पराकाष्ठा का पहुचा दिया। उस ने तमव्वुफ की अनेक ऊंनी १ वसे मुल्लाशाह बत्तत दुनियादार सिद्ध हुए। दारा के औरगजेब द्वारा बध करा दिये जाने पर इहाँ ने औरगनव को बधाई देते हुए दारा की पराजय की असाय से गद समाप्त हो जाने से उपमित क्यिा या-हक जाहिर शुद गुवारि यातिल वा रफ्त' (सत्य प्रकट हुआ, असत्य अयवा मिथ्यात्व को धूलि समाप्त हो गयी।) पज [21] भूमि पार की थी और समाधि की स्थिति तक पहुंचा हुमा होने का दावा करता था। उस के अनुसार उम की कतिपय रचनाएँ उस की आध्यात्मिक अनुभूति (क्रफ) पर ही आधृत हैं। हम देखते हैं कि जो वुजूदी तसव्वुफ वेदात की प्रच्छन्न प्ररणा से प्रकट होता है यह दाराशिकोह की प्ररणा से दात से खुल्लमखुल्ला गले मिलता है और दो बड़ी सस्कृतिओ-हिंदुत्व और इस्लाम के परस्पर गले मिलने के लिए भूमि तयार कर जाता है। अब यदि उस भूमि की और हमारी दृष्टि ही न जाय, तो उस के लिए क्या कहा जाय? कुर्माने शरीफ की कई आयता में सकेत है कि कोई जाति ऐसी नहीं है जिस में ईश्वर ने अपन नबी या रमूल भारत या देशहर दिव्य वाणी या अपौरुपय प्रथ न भेजे हा (मूर बनी इस्राईल १५ फातिर २४ हनीद २५)। इन स देशहरो में से किसी किसी को विमो किसी पर वरीयता प्राप्त है (मूर कार २५३) लितुये सभी सर के लिए बिना किसी भेद भाव के माय हैं (मूर बर १३६, इम्रान ८४ भाति)। कुनि म यहाँ तर कहा गया है कि जो लोग इन म भेद भाव परतते है और कहते हैं कि हम कुछ को मानते हैं और कुछ को नही वे निश्चय ही माफिर (इस्लाम का शव) हैं (गर निगा १५० १५१)। ऐमी दशा म कुआत में अनुमार प्रत्येक महारमा और प्रत्येक अपौरुपयत्वेन शिष्टपरिगृहीत धमनय प्रत्येक के लिए अनिवायत माय हो जाता है। वस्तुन कुर्भान की स्पष्ट घोषणा है कि ईश्वर ने प्रत्येक जाति क लिए पृथव शरीअत (घम-माग धर्माचार धमशास्त्र) निर्धारित कर रखी है (मूर न ६७) । उस म एसे भी सकेन विद्यमान हैं कि कुआन और मुहम्मद (स.) मुख्यत अरव के लिए भेज गये ५ (मूर आम १५६, यूसुफ २ कमरा ४६ हाम अस्मन्द ४४) । बल्कि उस में यहाँ तर कहा गया है कि उस म वही बातें कही गयी है जो पिछले सदेशहरो मे रही गयी थी (सूर हाम अस्सन्द ४३) और कि उम उही छातो की तासीर है (मर पूनुस ३७)। तो इस प्रकार के वाक्य कि इस्लाम पे अतिरिक्त अय धम अमाय (सूर आल इमान ५५) अथवा निकृष्ट (भूर तौब ३३) हैं एकान्तत अथवा विशेषत अरब पे लिए चरिताय मान जा सकते हैं। सितनी मुस्पष्ट घोषणा है-कहो नि ईमान लाय हम ईश्वर पर [और उस पुस्ता पर जो अपन ईश्वर की ओर म हम पर उतरी जो इब्राहीम पर उतरी], और इस्मानीत इस्हार और पारस और उस नी मतान पर [उतरी] और जो मूमा और ीमा से दो गयी और जो [अय] नबिया को दी गयी, कि हम उन म र पिसी म कुछ भेद नहा मरते । (मूर बकर १३६) । इस महत्त्वपूण आयत में गभी धर्माचार्यों और यमनपो म समान असा सवधर्म-ममभाव या अथुनपूव उपदेश निबद्ध है। इसी प्रकार कुनि को कुछ बय आयना मे मभी धर्मों के पुष्पारमा अनुयायिया को सराहा गया है और बाश्वासन लिया गया है कि उन्हे (परमोर म) कोई भप नहीं शताया (गूर सर ६२ माय ६९)। यविर्भाने शरीफ का यह पहलू उजागर रिया गया होता तो इस्लाम का और पनन भारत महित दिश्य वा हनिहाय कुछ और ही होना। बने मरीफ के अतविरोधा रे गरिहार नाना (निरसन निषध पान) की पनाकी गयी है मि अनुसार उनकी कई आयतो साराय आपने मगरा (निरस्त निपिर पत्रित) हो गयी है। मगरा वायत दो कोरिपी है- [ 221 'मन्मूराऽत्तिमायन' (पार-वयं) और 'मन्यूएल हाम' (चोदना-वग्यं, विधिनिबंध. वर्मा)। प्रपन काटियो मामूरा आपने जिन वा पार यजित है, और जो पलत पी शरीफ गे मुहम्मद (स.) द्वारा ही निरान दी गयी थी। इन सी सम्पा ६० घनामी जाती है। प्रभार रे नाग ना आधार कान में ही उपलब्ध है। पर आयन है, 'जब हम एम ओयत यो बदन पर उम नी जगह दूगरी आफ्न ला देते है तो पापिर तुम ग] मदत है जिन तो स्त्य गढ़ माना है।' (मूर. नह स १०१)। एप और आयत है, 'हम निरा मायनों मो मन्गूस पर देने हैं या जिन को भुला देते हैं उन ग बन्टो अपया वन-गी हो [आपने] सा दी है। (गूर, बकर १०६) इन मायनों में उत्त पोष्टि के नाम की गत्ता स्पष्ट में बीमारी गपी है। मौलाना मुहम्मद अली और मौलाना अयुर वलाम आजाद में आधुनिर भाष्यवार 'नस्य गिदान' का विरोध परी ए पले हैं नि यही 'आयत' का अर्थ पुनि पी आया नहीं यन्धि पुरानी गरीमत है, पिन्तु यह एक सपा बटालियन अर्थ है गिग वा पोई आधार नहीं। उल्लेपनीय है ITओन मे ही गुम्मद (स.) द्वारा जल की आयतों के विस्मरण वी सभावना की और गन रिया गया है। तत्सम्बन्धी दो आयतें मिनी स्पष्ट है-'हे मुरम्मद 'हम तुणे ऐगा पा देंगे नि भूलेगा नहीं, उस के अतिरित जिस इलाह [भुलाना] पाहे । (गूर माना ६-७)। दूसरी पोटिनी मन्मूरा थायनें वे हैं जिन ये पार या विधान है और जो परत आने शरीफ मे आदि धान ग मगृहीत पती आ रही है, रिन्तु जिन वा पासन-आपरण वजित है। ऐसी आयतें माह सीउल्लाह के अनुसार हैं. कुछ में अनुसार ५००, भोर मुछ ये अनुगार इन पे वीच । पि वैचित्य ही रा मतभेदमा पारण है। यदि दारा या उदारवाद चिरायु हुआ होना ताम्भवत इस्लाम में भी युग-धर्म के अनुरोध से हिन्दुओं के पतिवयं-गिद्धान जस किमी मिसान्त की उतावना हो पर रहनी। अस्तु, यहाँ अधित विस्तार में जान का अवराग नहीं । इन आमतो या उदाहरण तो सभी दने रहे हैं, पितु दारा में ही इन्ह गम्भीरतापूर्वक लिया था। वह इनमें पायार पर वेदा-उपनिषदो को ईश्वरीय ज्ञान मान कर उन प्रचार-प्रसार म जुट गया था। बलि उस ने अपने निप्पा और गम्भीर स्वाध्याय, चिन्तन मना, और निदिध्यासन ने यस पर इन्ह एक प्रभार से सर्वश्रेष्ठ धर्मग्रय घोषित किया था। दाराशिकोह की उदारता का एक निदर्शन लीजिए। शाहजहाँ ने इलाहाबाद में कुम्म में अवसर पर तीर्थयात्रियो पर एर गया पर लगा दिया। इस पर हिन्दू रामान में बहुत कोलाहल मचा और काशी के पडितो न तत्कालीन मवप्रसिद्ध मन्यासी स्वामी कवीद्राचार्य के नेतृत्व में उन पर के विरुद्ध प्रत्यावेदन किया। दाराने इस कार्य में उन की भरपूर सहायता की और अन्तत माहजहां से भाग्रह पर पर समाप्त ही करा दिया। ऐसे युवराज को औरगजेब द्वारा निर्मम हत्या पर यहाँ के पण्डिता म रो केबल, उत्तरप्रदेश के वर्तमान मुख्य मनी ५० कमलापति दिपाठी के पूर्वज, ५० रामानन्द ने, जिन्हो न दारा के लिए सगुण ब्रह्म की सिद्धि नरो वाले एक अन्य 'विराइ विवरणम्' की रचना की थी, ये दो आँसू बहाय है- 'दारागाह विपत्सु हो । कथमहाप्राणा न गच्छन्त्यमो." दारा का 'गिरें अववर' किसी भगतब बहुत पहल भारत म प्रकाशित हुआ [23] था। उस का एक भाग सर्वप्रथम व्रजमोहन लाल द्वारा मेडिकल हॉल प्रेम, वाराणसी, मे १९०१ ई० मे प्रकाशित हुआ था। दूसरी बार पूरा अन्य तीन खण्डो में जयपुर से प्रकाशित हुआ। वाराणसो सस्करण का अब वहीं पता नहीं, जयपुर सस्करण की एक प्रति दिल्ली के किसी पुस्तकालय में उपलब्ध है। सम्पूर्ण अन्य सय्यिद मुहम्मद रजा जलाली नाईनी और डॉ० ताराचन्द के सम्पादकस्य म नयी सजधज के साथ तावान प्रिंटिंग प्रेस, तेहरान, ईरान, मे १९६१ ई.' में प्रशशित हुभा है, जिस का मूल्य ८०० रियाल (१०० रुपये के आसपाम) है । उस के बाद लखनऊ अकादमी ने ससार म शायद प्रथम बार दाराशिमोह दियम मनाया था, जिस मे प्रस्तुन वेष ने वाणी सरोवर के सम्पादक थी नन्दबुमार अवस्थी की उपस्थिति मे दारा के मममामयिक महत्त्व पर एक वार्ता दी थी और सिर अक्बर' हिन्दीरण की आवश्यकता पर बल दिया था। अवस्थी जी ने मूचित किया कि वे इस कार्य में साल-डेढ साल से लगे हुए हैं और कि उक्त अन्य के अनुवाद मा कार्य वे एक विद्वान् मे बरा रहे हैं । अन्तत बह पापं प्रस्तुत लेखक को सभालना पड़ा, और उस को पहली किस्त आप के सामने है । मिरे अववर' की रचना में कितना हाथ दारा शिकोह रा योर क्तिना पण्डित-मण्डली का, यह बहना कठिन है । इतना स्पष्ट है कि दारा ने वाराणसी में रहबर पण्डितो और सन्यासिया को जमा कर के इस प्राय भी रचना की थी, जैसा कि वह अपनी भूमिका मे स्वय कहता है। दिल्ली में जारर २८ जून १६५७६० को यह रचना छह मारा में पूरी हुई थी। उस वे दो वर्ष बाद उसकी हत्या कर दी गयी। वस्तुत यह पायं उग युग में पिसी एका महिन्दू के वश या नहीं पा, चाहे वह कितना भी विद्वान् वया न रहा हो। सम्भवत दारा मस्कृत उतनी ही जानता पा जितनी पण्डिता का शास्त्रार्थ समझने और तत्सम्बन्धी निर्णय देन के लिए आवश्यक थी। इस सम्बन्ध में एक महत्त्वपूर्ण तय्य प्रकाश में आया है। अदयार लाइब्रेरीकी शेफ स. XI. D4 पर, जिस का उल्लेख टेलॉग वण्ड II, १९२८६०, पृष्ठ २ (b), 2 'Padyakavyas' पीर के अन्तर्गत हुआ है, एक हस्तलिखित संस्कृत प्ररित-पन्न है जो दाराशिकोह की ओर से गोम्वामी सिंह सरस्वती को सम्बोधित है। इस को पौवीरावी कण्डिया म दारा शिकोह का नाम आया है। इस पर को मी बुन्न राज ने 'अक्ष्यार लाइग्रेरी बुलेटिन' (ब्रह्म विद्या) ये सप, भाग ३ (१ अस्तूबर १९४०), पृष्ठ ८९-९४ पर A Sansant Letter of Mohamed Dara Shukoh शोषक से अपनी एक टिप्पणी (१८७-८८) साप प्रकाशित दिया है। सन् १९४३ मे खण्ड VII, भाग २ (८ मई, १९४३), पृ. १०५-११४ तया भाग ३ (१ अक्तूबर, १९४३), पृ १९२ २०३ पर इम पत्रमा अनुवाद भी प्रकाशित खण्ड VI, भाग ३ (१मातूबर १९४२),पृ. १७२-१७७. पर पी. filt . The Identification of Gosvami Nrsimhasrama of Dara Shukob' Sanskrit Letter with Bramhendra Sarasvati of the Kavindra Chandrodayn (between A. D. 1628 and 1658) अतर्गत पत्र के सम्बोध्या निणय करने की चेष्टा की है। मानोच्य पत्र अनुवादसहित प्रस्तुन अन्य म १-१८ पर प्रकाशित है। १ माचर्य है कि मप्रेती मुख-पृष्ठ पर 'First Edition 1957' भरित है रितुनारसो पुष-पृष्ठ पर मुरित है। प्रत माप से प्रसन-पि १९६१ सिद्ध होती है।

[24] इस पत्र की भाषा इतनी ललित है कि उम का लेखक प्रथम कोटि मा संस्कृतम और सिद्ध कवि प्रतीत होता है। इस लेख को सब से बड़ी विशेषता यह है कि वह मुसज्जभ शैली अर्थात् दुर्भान तथा पारसी गद्य को उस प्राचीन शैलीम लिखा गया है जिस म मुरहफ (अन्त्पानुप्रासयुक्त) और मुवफ्फा (उपान्त्यानुप्रागयुक्त) पदो अथवा पदावलियो की भरमार होती है। 'वुनि शरीफ' आद्योपान्त इसी शैली में निबद्ध है। यह शैली सस्कृत गद्यकारो को प्राय अज्ञात है। दारा पी व्याषया उपनिपदो की मारमा के सर्वथा अनुरूप जान पड़ती है। किसी मुसलमान का उपनिषद् के रहस्या पार इतना अधिकार चषित कर देने वाली वस्तु है। यह विशेषता सस्कृत और उपनिषत् परम्परा के प्रामाणिर और गम्भीर परिचय के बिना आ नही सकती। मजा तो यह है कि दारा उपनिषद्-वाक्यो और सिद्धान्तो वा उद्घाटन हस्तामलववत् कर देता है, और अनुवाद अथवा व्याख्या की भाषा कही भी दुर्वाध नहीं होने पाती। वस्तुत व्याख्यान शैली की सहजता म दारा भाधुनिक टीकाकारो ये लिए भी अनुकरणीय है । वैसे, दारा मूल उपनिषदो को कितना समझता था, इस विषय मे मदेह होने लगता है जब वह अपनी मे यह दावा करता है, कि उस ने उपनिपदो का केवल अनुवाद किया है और वह भी शब्दश , जब कि बस्तुस्थिति यह है कि उस ने शाब्दिक अनुवादं मान न कर के कठिन तथा अपेक्षया अधिक महत्त्वपूर्ण स्थलो की व्याख्या कर डाली है। इस सम्बन्ध में, नमून के तौर पर प्रश्नोपतिपद् ११५ की व्याख्या द्रष्टव्य है। यही कारण है कि हम ने "सिर अववर' को उपनिषदो की व्याख्या माना है। दारा मे अनुवाद म पण्डितो मे पूरी सहायता ली है, किन्तु उस में एकसूत्रता एकवानयता लाने और विचारो ने उपवृहण का कार्य उस ने रवय निभाया है। यही कारण है कि उस की व्याख्या पूरी तौर पर न तो शकराचार्य की व्याख्या ना अनुगमन अनुवदन करती है और न किसी परवर्ती आचार्य की व्याख्या का। वह बहुत से महत्त्वपूर्ण स्थलो पर स्वतन्त्र व्याख्यान करता प्रतीत होता है। ईशावास्योपनिषद् (१२-१४) मे आये असभूति और सभूति तत्त्व पर विचार कीजिए। शकराचार्य 'असम्भूति' का अर्थ प्रकृति करते है और 'सम्भूति' का कार्यब्रह्म, जब कि दारा का किया अर्थ है निर्गुण ब्रह्म और सगुण ब्रह्म । प्रश्नोपनिषद् (५७) पर दी गयी अनुवादकीय टिप्पणी पर दृष्टिपात कीजिए, जहाँ शकराचार्य की एक भूल की ओर सकेत दिया गया है और दिखाया गया है कि दारा उस से कैसे बच गया है। दारा की भाषा व्याकरण और वाक्य रचना की दृष्टि से यत्र-तत्र सदोप होते हुए भी सहज, सरल, और सुस्पष्ट है। उपनिषदो की फारसी करते समय उस ने तसव्वुफ की लाक्षणिक शब्दावली से, जिम के व्यवहार में वह इतना निपुण और निष्णात था, अपने को कैसे बधा ले गया, इसे देखकर चक्ति हो जाना पडता है। अथ को सर्वसाधारण सवेद्य बनाने के लिए उम ने अत्यात सरल पदो से काम चलाने की चेष्टा की है। वह सस्कृत शब्दो के प्राय तत्सम रूपो का भी प्रचुर प्रयोग करता है। जीव जीवात्मा, आत्मा, परमारगा, ब्रह्म, प्राण, अपान, दान, व्यान, समान। पुरुष, अविद्या, हिरण्यगर्भ, जानी, मुक्ति आकाश अन्तर्यामी, सुषुप्ति जैसे बीसो तत्ममो का वह घडल्ले से प्रयोग करता है। यदि यह परम्परा आगे बढाती सो फारसी के शब्द भाण्डार म अल्पनीय वृद्धि होती फारसी और सस्कृत के साजात्य का नया युग आरम्भ होता, और यहाँ राष्ट्रीय एकता तथा एकराष्ट्रवाद की विकास प्रक्रिया को नयी दिशा गिलती।

[25] अवुरफल ने आईने अक्बरी' म हिन्दू मुस्लिम वैमनस्य से सात कारण गिनाय है- १. भापा-मम्बन्धी पार्थक्य २परस्पर मल-जोल का अभाव ३ स्वार्थपरता ४ आलस्य-प्रमाद ५ अन्धपरम्परा-न्याय ६ धार्मिक असहिष्णुता ७. उदारवादी नेतृत्व का अभाव। दागशिकोह का व्यक्तित्व और कृतित्व इन मातो वारणों के विरुद्ध खुली युद्ध घोषणा है। दारा जिज्ञामु प्रकृति का व्यक्ति था। उसे सभी इल्हामो-आस्मानी अथवा ईश्वरोका बन्यो का अवगाहन करने के बाद भी जर तृप्ति और णानि की उपलब्धि नहीं हुई तो वह उपनिषदो की ओर मुडा और कृतकृत्य हो गया। वह इम निष्कर्ष पर भी पहुंचा था कि 'कुआंने शरीफ' मे जिम किता बिम्मान निन्' (मूर ए वाकिअनि ७८) अर्थात् 'गुप्त पुस्तक' की ओर सरत है यह उपनिषद ही है। वह कहता है कि यह आयत न तो वाइविल की किमी पुस्तक के बारे में है और न उम 'लौह मह फूल' (भूर-ए अल्बुरूज २१-२२) अर्यात् 'सुरक्षित पद' के विषय म है जिस की प्रतिलिपि 'कनि शरीफ बतलाया गया है। उपनिपद में अध्ययन सदारा के लिए "अज्ञात" शात हो गया और "न ममया हुआ' गमज्ञा हुभा हो गया।' (सिरें अक्वर से भूमिरा, पृ. २०) । 'मिरे अवघर मे उपनिषद् के मूल वाक्य अथवा मन नहीं दिये गये हैं, उनकी वैवल फारसी टौवा दी हुई है। प्रस्तुत भावव ने यह कमी पूरी कर दी है। सा परते समय उस ने मन्त्री को एक प्रकार से भली भांति सम्पादित पर वे उन्हें एम नय ढग से प्रकाशित किया है। ऐमा करते समय इस बात का ध्यान रखा गया है कि व्यजन-मन्घिओ को तोडकर लिखा जाय तानि वाचक-पाठन पर अनावश्यक रूप से लम्बे सहित पदो का बोझ न पड़े और विरामचिह्नों के प्रयोग म भी मुविधा हो। उपनिषदो में विरामचिह्नो का इतना व्यापक प्रयोग शायद पहली बार हुआ है। और भी, परम्पत्या प्रयुक्त अनेक आवश्पत पूर्ण दिराम हटा दिये गये हैं। ध्यवस्था के कारण मूल उपनिषद्-वाक्यों को समझना प्राप्त मरल हो गया है। उपनिषदों में जो मन्न एक से अधिक स्थान पर आप हैं टिप्पणियाद्वारा उन की पुनरक्ति षा प्राय उल्लेख मी पर दिया गया है। प्रस्तुत तखरी आर में अन्य उपयोगी टिप्पणियो को भी प्पयस्था हुई है जिम से 'मिर अक्यर' को उपापिता बढ़ गयी है । प्रस्तुत लेखर ने मूल उपनिषद् वाक्यो वे अपन अनुवाद भी दे दिया है ताकि 'सिर अकबर के समीक्षात्मक अध्ययन में मुविधा हो और उपनिपत् मिदान्त का स्वतन्द्र रूप से प्रामाणिव परिचय भी प्राप्त हो जाय। अनुवाद मे जिम भूनापरस अनुसन्धान शैलीमा अवलम्बन किया गया है यह निश्चय ही दाराशिवोह युग म मुलभ नहीं थी। अस्तु, मत्री या प्रस्तुत लेखक द्वारा किया गया अनुवाद भी शक गनुमारी मात्र न हा कर उपनिषद् के मूल अर्थ की पकड वा आग्रही है। प्रस्तुन प्रय मे "तिर घर' या जो अनुवान हुआ है उस का उपजीप नहान इम सम्वरण वा पाठ इनम्नत नितान्न प्रहै और पम्पादकीय प्रमाद वे प्रमाण पदे पदे प्राप्य है। प्रानुन वा का मून का परिमार्जिन का अनुवाद परने म बहुत थम ररना पड़ा है। अम्नु इम प्रचार प्रस्तुत प्रय म चार प्रकार की सामग्री है- १. उपनिएको नवमम्पादित सवार अगवा मत्र इम विविध [26] प्रस्तुत प्रप २. उन वाक्यो अयवा मत्रो का प्रामाणिप अनुवाद ३. 'सिर अक्बर' या अनुवाद ४ उक्न तीनो प्रकार की गामग्री से सम्बद्ध उपयोगी टिप्पणियां इन मे स क्रमाक १, २, और ४ का नत्व प्रस्तुत सेखर का है और क्रमाल ३ का, दाराशिकोह का । पचासो उपनिपर्दै उक्त सामग्रो साथ पई पडी में पूरी होगी। उन का प्रथम खण्ड है। इस में अघोलिखित ९ उपनिषदें तत्सम्बन्धी उपरिनिदिष्ट मामग्री के साथ ममाविष्ट है- १ ईशावास्योपनिषद् २ केनोपनिषद् ३ वठोपनिषद ४ प्रश्नोपनिषद् ५ मुण्डकोपनिषद ६. माण्डूवयोपनिषद् ७. तत्तिरीयोपनिषद् ऐतरेयोपनिषद् ९. श्वेताश्वतरोपनिपद् । ये, अन्तिम को छोडकर, सभी उपनिषदें मुक्तिकोपनिषद् (१. ३०-३९) में निर्दिष्ट क्रम के अनुसार क्रमवद्ध की गयी हैं। प्रचलित श्रम भी यहीं है। बरी दारा ने क्रम एकदम बदल दिया था। श्वेताश्वतरोपनिषद का स्थान चौदहवां है, अत साधारणतया यह छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ब्रह्म, वल्य, और नावाल में भी अनन्तर आनी चाहिए, किन्तु चूंकि बृहदारण्यक के आगे केवल इस एक उपनिषद् पर 'शकराचार्य का भाष्य उपलब्ध होता है, जत इस के शकर द्वारा व्याल्यात उपनिषदा के ही साथ रहने म स्वारस्य है. और इस लघुकाय उपनिषद् का वृहदारण्यक जैमी विपुलकाप उपनिषद् के साथ प्रकाशित होना अटपटा भी लगता है, अत इमे प्रथम खण्ड में ही स्थान देना यावश्यक समझा गया । प्रस्तुत ग्रथ में मावधानी के बावजूद बहुत-सो भूलें दीख रही हैं। इन्हे अगले मस्सरण में दूर करने की चेष्टा की जायेगी। वैसे, पुस्तक के अत में एक कामचलाऊ शुद्धि-पत्र दे दिया गया है। दारा द्वारा प्रयुक्त 'तोहीद' का अनुवाद 'एवेश्वरवाद' अधया 'अद्वैतवाद किया गया है। अब लगता है कि 'ब्रह्म विद्या' अधिक उपयुक्त होता। ईशोपनिषद और केमोपनिषद में सिरें अक्वर' के प्रतीक के रूप मे सि० अ०' के स्थान पर व्याख्या' अथवा 'व्या०' छा गया है। पाठक कृपया इसे सुधार प्रस्तुत ग्रन्थ मे भाषा से सम्बन्ध म एक स्वतन्त्रता ली गयी है, वह यह कि 'आत्मा', 'अनि,' और 'वायु' जैसे शब्दो का प्रयोग प्राय पुल्लिंग के रूप म किया गया है।' ये शब्द संस्कृत में पुल्लिा है और हिन्दी गे स्त्रीलिंग । दयानन्द जैसे कतिपय लेखको ने हिन्दी में भी इन का प्रयोग पुल्लिंग के रूप में किया है। वस्तुत वैदिक-औपनिषद विषया पर लिखते समय इन्हे पल्लिा मान कर चलने गे स्वारस्य अधिक प्रतीत होता है। ये देवता परक शब्द हैं, जिन्ह स्त्रीलिंग के रूप में रखना किञ्चित अटपटा लगता है, पद्यपि देवता' शन्न स्वप स्त्रीलिंग है। सामान्य अर्थों में प्रयोग की बात और है। वर्तनी के सम्बन्ध में भी हमने एक स्वतनता ली है। हमने 'ऋषिओं लिखा है, 'ऋपिया' नहीं। जब हम तुओं' लिखते हैं 'ऋतुवो नहीं, तो 'ऋषिया क्यो लिखे ? हाँ दीर्घ ईकारान्त पदो की बात और है। अतएव हम ने प्रचलित पद्धति को रामीचीन मानते हुए नदियो लिखा है, मदिओ नहीं । वाराणमी हपनागरण अगस्त १९७२

शाहजादः दाराशिकोह
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[विगेरिया मेमोरियल काकत्ता के मौज य से ]

शाहजादः दाराशिकोह [क्टिोरिया मेमोरियम, कलाता के गौजन्य रो] - 'दाराशिकोह' का एक संस्कृत पत्र (विवरणार्थ उपोद्घात पृष्ठ 23 24 द्रष्टव्य) स्वस्ति श्रीमदनाहार्यदुनिवार्यशौयौदार्य-कार्यविचार्य शिरोधार्य- जगदप्रतार्यदेवात्यवहार्यविद्वदविदार्यसुधासोदर्यवच सौकुमार्यधैर्य गाभीयं - धुर्यवर्य - सौंदर्य - प्राप्तशाकर्यगतजातिसकय्यंतुर्यचातुर्य- प्राचुर्य - सौकर्यप्रभृतिगुणगणनिधानेषु ॥ १ ॥ स्वस्ति श्रीमनि प्रपचचिरतरचित्तसिंचितित -समुदचद्रोचि - सचयचाकचिक्यचमत्कारचर्चनचित चद्रविरोचनचित्रभानु- रुचिनिचयाच्युतचन्द्रचूडचरणचिंतामणिपु रुचिरतरवचनरचन- समुच्चरणचातुरीसचारसमचनवचितवाचस्पतिचतुराननपचान नेपु ॥२॥ 'दाराशिकोह' के संस्कृत पत्र का अनुवाद स्वस्ति अनाहायं और दुनिवार्य शौर्य, औदार्य, कार्य-काल मे विचार्य, शिरोधार्य, जगत् म अप्रतार्य (प्रतारणा के अयोग्य), देवताओ द्वारा अम्यवहार्य (सत्कार्य), विद्वानो के लिए [मो] अविदाय (अभेध), अमृत की बधुभूत पाणी के सौकुमार्य, धर्य, गाम्भीर्य, शौर्य वीर्य, सौन्दर्य, शाक्य (मागल्य, कल्याणरूपता) को प्राप्त, जातिसाकयं से शून्य, चातुर्य प्राचुर्य, सौकर्य प्रभृति गुणगण के निधान श्रीमन् ! ॥१॥ स्वस्ति श्रीमन् ! जो चद्रचूड (शिव) के चरणो मे चिन्तामणि [स्वरूप] हैं, जिस शिवचरण चिन्तामणि का निष्प्रपञ्च (भक्त चिर फाल तक चित म चिन्तन करते है, जो सहोस्थित रश्मि समूह की रौनक (चाकविषय) के चमत्कार के चर्चन से पचित है, जो अच्युत चन्द्र, अग्नि, और सूर्य की ज्योति के पुञ्ज से युति है, जो वृहस्पति, ब्रह्मा, और गिव को रुचिरतर वचनो की रचना और उच्चारण को चातुरी के सचार-माधुर्य द्वारा पछाड देते हैं ॥२॥ * पत्र को अविकल रुप में प्रकाशित किया गया है, जंसा प्राप्त होता है ठीक बसा ही, सुस्पष्ट लिपिकीय अशुद्धिओं को मो अक्षण्ण रखते हुए। हो, पुलाएँ (हाइफैन) तथा विराम अनुवादक ने पाठ को मुबोय और सरस बनाने के निमित्त अपनी ओर से लगाये है। पत्र को भाषा पाण्डित्यपूर्ण और सलित होते हुए भी बहुधा भ्रष्ट है, जिस के कारण अनुवादको पदे-पदे ठोकर लगती हैं और सेमलना कठिन हो जाता है। पत्र के अप्रेशौ भनुवादक सौ कुहन राज ने भ्रष्ट स्थलों पर अनेक टिप्पणियाँ दे कर इस कठिनाई को हल करने की चेष्टा की है, जिन से प्रस्तुत सेलक ने प्रभूत लाभ उठाया है। एतदपं वह थी राज सपा 'ब्रह्मविद्या के सम्पादक के प्रति अपना नामार प्रकट करता है ।

-
[२]
स्वस्ति श्रीमत्सर्वगुणग्रामधाम - चडाशुचडधाम-परमभिराम-
ध्यातनवावुदण्यादाशरथिराम · दानानुकृतपरशुराम - महीयाम-
धावयल्यानुकृतराम कृतसमधीतसाम • भूदेवदारिद्रयविराम-
वाग्देवताराम - वपुष्कातिविवशीकृतवरवाम - सौजन्यतिरस्कृतवाम-
विगतभाम - श्रितशुभाशीसुधाचाम - प्रपूरितार्थिसार्थसकलकाम-
सौदर्यविनिजितकाम विस्फुरत्कीर्तिदाम - महोदामनामप्रारब्ध-
द्विजतरप्रणाम पुण्यपरिणाम - विद्वल्ललाम श्रीतविश्राम-
विध्वस्तजगदु खपाम - सत्पामरोपकारकाम विवक्षामक्षितीश-
निप्काम रक्षकससमाचरितपार्थव्यायाम विद्याविनोदाति-
वाहिताखिलयाम - विहितभूतलस्वनाम - विजितरिपुसनामेणु ॥३॥
स्वस्ति श्रीमद्वद्यनाथपद्यारज प्रपद्यमानागम्यपुण्यसमासाद्य-
सत्तमाद्य प्रसाद्य - समाद्य - निगाद्य - कविकदवव दारकाधि-
पाभिवाद्य - निरतरास्वाद्य - सुधासवाद्य - सवित्सवेद्यानवद्य - हृद्य-
गद्यपद्यविधानवेशद्यशालि सर्वविद्याप्रद्योतनोद्योतसद्य.खद्योती-
कृतानिंद्यवद्यवादीद्रवृ देषु ।। ४ ।।
स्वस्ति गवंगुणग्राम के धाम, गर्भ ने समान प्रचण्ड, परम अभिराम, नवाम्बुदश्याम
दागरपि राम का ध्यान करने वाले, दान में परशुराम का अनुसरण करने
बाने, महिमायुक्त, घलिमा मे बलराम का अनुकरण करने वाले, गाम के सम्यक्
अध्यपन में बता पाह्मणो दारिद्रय का विराम करने वाले, वाग्देवता के लिए
पाटिकास्वरूप, शरीर को कान्ति द्वारा उतम वामाओ को विवश कर देने वाले, सौजन्य
दारा शत्रुओं को दबा देने वाले, त्रोध रहित, शुभाशीर्वाद की मुघा का पान करने वाले,
पाचवा रे समूह पी सरल वामनाया को पूर्ण वरल वाले, सौदर्य मे कामदेव को पछाड
देन बात, उगवल पोति वाल, द्विजवर्ग द्वारा महान् और उद्दाम नाम से प्रारम्भ किये
जाने याने प्रणाम क पाह, शुभ परिणाम वाले, विद्वानों के भूषण-स्वरूप, विधाम या
आश्रय करन वार, जगत् ने दुर अभिशाप रे विश्व से युक्त, माधारण सज्जनी
के मौ] उपकार की कामना करने वाले, [अन्य नपा] से घार्तालाप में उन से कुछ
भीन चारन वाल, अर्जुन वे समान व्यायाम करन वार, सारा समय विद्या विनोद मे
व्यतीत करने वाल स्वर्ग में प्राम पो भूगल पर प्रतिप्टिन भरने दाने, सयाम म रिपुत्रा
ो विनिय रन पाने श्रीमन् ' ॥३॥
स्वस्ति भगवान शिव के चरणों की रज में प्राप्य, अगम्य पुण्य से उपलभ्य,
भेष्टमम पुरपा पारा प्रगन्न दिये जान योग्य, विभोर होकर आस्वाद, अपनीय,
पविगणली देवतामा अधिपनि द्वारा अभिवादनीय, निरन्तर वास्थाच, गुधा की
ममता पल पाम्य, सविद् द्वारा शेय, अनपद्य योर हय गद गद रसना में ने पुष्प
से युक्त सभी विद्याओं को प्रमाद्वारा निदा वे अपाग्य और प्रशमनीय वादिगण
का पोन बना लवाोयोमन् ॥ ४॥

- - स्वस्ति श्रीमत्प्रचडोदडदोडमडलीसन्निसरदकाडप्रकाड- खाडवदाहसमयपाडवगाडीवविषयककृत्यस्मारकखडखडीकृतभूमडला- खडलसमारातिमुड पुडरीकखडबिमडित ताडवरसिका- खडब्रह्माडभाडमडपाधिप - प्रचडमुडादिवधकृच् - चडीहिंडीपिंड- धवलचडीश्वरेषु ॥ ५॥ स्वस्ति श्रीमदामूलकवलितकीलालप्रलयकालानलज्वालजाज्व- ल्यमानकरालकुटिलकालुष्यकाकोलकुलेषु ॥ ६ ।। समुल्लसदुद्वेल्लनिर्मललालिव्योल्लाल्यमानसमुल्लोललावण्य सिधुसकलकलाकलापलवायमानानुल्लघ्यलीलालबननिलयेषु ॥७॥ स्वस्ति श्रीमद्विहितत्रिभुवनविहार - निरुदाहारविस्फार- परिहिततुपारकर • मरीचिकानुहार - कीर्तिजगत्तारहार - दिगन्त- रसमागच्छनानोपहार - समासादितभगवत्कथामृताहार समा- चरितदुश्चरितसमाहारसहार - कृतदुर्जनप्रहार - प्रतीहारविज्ञा- पितानेकराजागमनव्यवहारप्रस्तुतशुभाशी सुधाभ्यवहार सदगहार- प्राप्तमुद - विस्फुरद्यश प्रहार - प्रणष्टदुराचारसनार - सततानु- स्वस्ति प्रचण्ड और समुत्थित भुज मण्डल के समान फैली अकाण्ड शाखाओ वाले प्रकाण्ड खाण्डव (वन) के दाह के रामय पाण्डव (अजुन) के गाण्टीव से राम्बद्ध कृत्य के स्मारक स्वरूप भूमण्डल के स्वामी के शत्रु का सिर खण्ड-खण्ड कर देने वाले, पुण्डरीक खण्ड से सुशोभित ताण्डव के रमिक अखण्ड ब्रह्माण्ड भाण्ड के मण्डप के अधिपति प्रचण्ड मुण्ड आदि का वध करने वाले चण्डीहिण्डी पिण्ड के समान घवल चण्डोश्वर (शिव) को समता करने वाले श्रीमन । ॥ ५॥ स्वस्ति जलराशि को आमूल कवलित कर मैने वाली प्रलयकाल की अग्नि ज्वाला के समान कराल और कुटिल कातुष्य काकोलकुल (काक कुल) को उद्भासित करने वाले श्रीमन । ॥ ६ ॥ उल्लासयुक्त उछलते हुए निमत कोमतता द्वारा लाल्यमान, समुज्ज्वल लावण्य के सिधु-स्वरूप सका कला कलाप द्वारा व्यवहृत अनुल्लघ्य लीला के आलम्बन के निलय।।७।। स्वस्ति त्रिभुवन को विहार (मठ) बगा देने वाले उदाहरण रहित समृद्धि वाल तुपारकर (चद्रमा) को मरीचिका के अनुकरण को घर लेने वाले (असम्भव बर देने वाले) जगत की मणियाला स्वरूप कौति बाले दिग दिगतर से नाना उपहार प्राप्त करने वाले भगवरकथामृत का आहार सम्पन्न करने वाो दुश्चरिता के समाहार का महार करने वाले दुजनो पर प्रहार करने वाले प्रतीहार द्वारा विज्ञापित अनेक राजाओ के आगमन ममाचार पर प्रस्तुत शुभाशीर्वाद-सुधा के भोवना बगो की शुभ गति वाल प्रसन्न रहने वाल उज्वल यश के प्रचार सयुक्त दुराचार के प्रचार को - [४] चरितसज्जनानुचार - सदाचार निविचार - ब्रह्मविचारतत्पर- सपूर्णभूमडलविख्यातसमाचार - निरस्तसमस्तव्यभिचार प्रहता- भिचार - गुणविस्तारजनितजननिस्तार - धर्मावतारसमारब्धभवा- भोधिपारोत्तार-समुल्लसद्वच । पीयूपधार-साधार-साहित्या- र्णवकर्णधार जगदाधार तीक्ष्णधारकरवालच्छिन्नसपरिवार- रिपुशिरोनिरर्गलविनिर्गलशोणितसार-विलसन्मतिप्रसार - विज्ञात- सार - परानदकासारव्यावलान्मनोविसार महीमडलालकार- धनुष्टकारप्रपलायितसाहकारवरवैरिविगतालकारभूकारवधूवार त्यक्तापकार - विविधप्रकारसदुपकारकारक - जगदगदकार - स्मृतो- कार निविकारनिराकारसाकारनारायणपरायण गुणप्राकार- सलन्धमहाधिकार - प्रारब्धहरिविमुखधिकार - प्रह्लादानुकार- निर्गशितकलिकालाधर्माहाधकार - निहितनीचन्यक्कार-खलनिचय- प्रहितनिकार - श्रितत्रिलोकीवियत्प्रतीकार - सदोदारसमापादित- विद्वद्गणदारिद्र्यविदार - परदारविमुखरूपवन्मार - सुकुमारविग्रह- विग्रहकुमार - महाराजकुमार - चतुर्दशविद्यागार - वदनकमल- विनियंत्सुगधीद्गार - विगतबोधपारवार - विध्वस्तदुर्निवारदुर्बोध- निजवपु सारहतदुर्योधनसमयोधनानेकशोभितवहुवार स्मृत- नष्ट पर देन वाले, मदा शिष्टाचार का आचरण करने वाल, सदाचारी, निविचार ब्रह्मविचार मे तत्पर, सम्पूर्ण भूमण्डल मै आचरण के लिए विख्यात, समस्त व्यभिचार का निरमन करने वाल, अभिनार रोकन वाले गुणविस्तार में अन्या से आगे,धर्मावतार, भवसागर से पार उतरना आराम कर चुक्ने वाले, वाणी की समुल्लसित पीयूषधारा वाने, आधारयुक्त, साहित्य सागर मे कर्णधार, जगत् के आधार, तीक्ष्ण धार वाले खड्ग स थिन सपरिवार रिपुगण वे सिरा स निरन्तर प्रवाहित शोणित चाले, उज्वल बुदिव्यापर वाले, सार-वेत्ता, हामी थे ममान परम आनद के सर में स्थित मनोव्यापार वाले, भूमण्डल के अलवार धनुष्टवार स भागे हुए अहकारी महाशानुओ को बधुओ द्वारा छोडे हुए आभूषण। वो पदणन वाने, अपनार का परित्याग करने वाले, राज्जना के प्रति विविध प्रकार के उपकारावे या, जगत को नीरोग परन वाले, भावार या स्मरण करने वाल, निर्विकार निराकार, साकार नारायण मे अनुरखन, गुण- वैभय रो महान् अधिवार (पाता) प्राप्त वरल वारे, हरि से विमुख नरो पर घिसार या उपक्रम वरन वाने, प्रहाद का अनुकरण परत हुए कलियुग के पोर अधकार का नाश करन वाल, नीचो वा यहिष्कार करन वार, सल गमुदाम स पार्यश्प मापन परल दाने, तौना लोगों के नाश ना प्रतिवार परने वाले, बिरगण दे दारिद्रय विधारक, परम्ची ग विमुक्त रूपवान् वामदेव स्वरूप, गुबुमार शरीर पाने, कुमार (स्वन्द) जैम पित्रह वात महाराजकुमारों वाले, चौदह विधामा भागार, गुप-यमन ग निमसने यान गुगयोद्गार वारे, शान से गमुद्र को पार पण वैभवाभिभूतभूभार - - द्वारिकाधीशप्रत्तसुवणसुवर्णसहस्रभारसभार ॥ ९ ॥ स्वस्ति श्रीमत्सद्य समुद्यदुद्दामदीव्ययोदयसमर्दसमुन्निद्रदि- दिरतुदिलदीवरदलद्रोणिद्रोहि चद्रचारु मनिस्तद्रायिण्ट- द्राग्गादोलनविद्रावित - द्रवज्जगदुद्रावकोपद्रवेपु द्रुततराद्रीद्र- हेमाद्रिद्रविणदानोत्पादितसमुद्रिक्तदृप्यदृढ दारिद्र्यद्रुमविद्राव- णेपु साहृदयासादितसाद्रभद्रमुद्रासमुद्रोद्ददीप्यमानवीरभद्रश्वर- रौद्रप्रत्तत्तह्यसौहादोद्दीपनद्रुहिणपु ॥ ० ।। स्वस्ति श्रीमत्परब्रह्मज्ञानध्याननिधान - प्राप्तनिरुपमानपरमा- नदभान - धरणीधरप्रधान - बाणसधानपाथसमान - रामुद्यद्विद्युद्वि- योतमानवृपाण - गुरुगधर्वगीयमानयशोवितान - कृतविद्युद्वरसमान- प्रयाणमाननिजितवैरिप्रतान भूमीसतान सुरत्राण - गीर्वाण- वृ दवद्यमानगुणसविधान क्षितिरक्षानिदान दत्तनानादान- विहितसाधुसमाधान - चतुदश विद्यानिधान ॥ ११ ॥ स्वस्ति श्रीमत्प्रचुरतरतीव्रत्वरतपश्चरणचातुरीचचुरेपु । याले दुर्निदार अज्ञान को ध्वस्त कर देन वाले निज शरीर की शक्ति से दुर्योधन के समान अनेक योद्धाओ का हनन करने वाले बहुधा स्मृत द्वारपातो के मुखियो द्वारा प्रदत्त अन त मुवण राशि वाले भूगार को ध्वस्त करने वार श्रीमन | ॥९॥ स्वस्ति सद्य समुग्थित उद्दाम रूप से जाज्वल्यमान दया के उप के सघप से निरतर जाप्रत पोन इदीबर दल द्रोणि को नीचा दिखाने वाले चद्रमा के समान मुदर इष्ट के प्रति नेत्रो के एक आदोलन (गति) स जगत को उपदुत करने वाले घोर उपद्रवो को भगा देने वाले पवतेद्र हमाद्रि (मेर) ये द्रव्य के दुत दान से सम्परा बद हुए दपयुक्न दढ दारिद्रय द्रम का नाश करने वाले कोमल हृदय म उत्पन्न घनी और भद्र मुद्रा स युक्त समुद्र में देदीप्यमान भगवान वीरभद्र के रौद्र रूप से भी अप्रतिहत सौहाद के उद्दीपन के विधाता थीमन I ॥१०॥ स्वस्ति परग्रहा के ज्ञान ध्यान के निधान-स्वरूप अनुपम परमानन्द बोर ज्ञान को प्रार परने वाले धरणी के धारको में प्रमान घाण सधान में अजुन के समान पमरती हुई बिजली के समान चमचमाते हुए कृपाण वाल उत्तम गधयों द्वारा गायी जाने माती यशोगाथा वार विदरो का सम्मान ररने वाले प्रयाण मान मे वैरियो के समुदाय को विजित कर नने वाले भूमि-सन्तान मुरा के भी नाता देवगण धारा बद्यमान गुणराशि वार पृथ्वी से रक्षा के निधान नाना प्रकार के पानी के दाता मत्पुरुषो को शाति का विधान करने वाले चौदह विद्यामाने निधान श्रीमन । ।।११।। स्वस्ति प्रचुर और उग्र तपस्या म निपुण पदचह (शिव) घरण-कमल के चपत भ्रमरो की सगता करन वान मुदर यहा विचार [वे वन] म सिंह - समुदंचच्चंद्रचूडचरणकमलाचचलचंचरीकायमानेपु, चारुब्रह्म- विचारसंचाननेषु, प्रकाडकीर्तिकाडधवलितब्रह्माडभाडेपु ।। १२ ।। स्वस्ति श्रीमन्महामहनीयमहिममहिमनिविहितजननिवह- मोहाहितसतापेषु । महदहिपु, समोहितसमीहितहितव्यूह- निष्प्रत्यूहदुरूहससच्चित्रप्रवाहेपु ।। १३ ॥ स्वस्ति श्रीमत्सकलकल्याणकलाकलापनिलयेषु, विमलतर- सल्लोकलीलाविलासकलनीलनलितेपु, रुचिरतरनखरचित्तचोरणचारु- चातुरीधुरेणेपु, स्मरहरचरणपरिचरणचिन्तनाचितेपु । १५ ।। स्वस्ति श्रीमदखाभूमडलपडितमडलीमंडनायमानेपु, समुदंड- प्रचडपाडित्यचडरोचीरोचि.सचयप्रकाशोकृताशेपब्रह्माडभाडेपु, प्रकाडवर्णनाकाडाकाडताडवितचडीश्वरेपु ॥ १६ ।। स्वस्ति थीमत्परभतपस्विमनस्वियशस्विवर्येषु ॥ १७ ॥ स्वस्ति श्रीमत्सकलगुणिगणगरिप्टेपु, विद्वद्वरवरिप्टेपु, ब्रह्म- गोप्टीकनिष्टीकृतवसिप्टेपु ॥ १८ ॥ स्वस्ति थीमदमदमदयतिवृ दवदितपदद्वद्वारविंदद्वद्वेषु, श्रीमद्- को समना दरले पाले, प्रचण्ड बीवि-प्रमार से पहाण्ड-माण्ड को धवलित करने वाले बीमन् ॥ १२ ॥ स्वस्ति महामहनीय जनों द्वारा गायी गयी महिमा की शीतलना से जन- ममूह में मोहननिन सनाप को नष्ट करने वाले, महापुरुषोचित अहंता वाले, अभीष्ट वस्तुजात भी प्रापक, वाघारहित, दुरुह बुद्धि-प्रवाह वाले श्रीमन् । ॥१३॥ स्वस्ति सफल कल्याणरागि के आगार, सत्पुरुषो से विमलतर लीला विलास. युक्त भर पे नील नलिनस्वरूप, उत्तम पुरुषाचे पिरतर चित्त की चोरी की चाय धातुरो मे धुरीण, बामदेव को भस्म परने वाले (शिव) के चरणों की परिचर्या के चिन्तन र उज्वल श्रीमन् । ॥ १॥ स्वस्ति असण्ड पुमाइन पी पण्डितमण्डली के अलारण-स्वरूप, प्रचण्ड पापितस्य में चण्ड अशुमाली को ऊपर उठने वाली पिरणो की राशि में गम्पूर्ण ब्रह्माण्ड- भाण्ड को प्रमाणित करने वाले, प्रवाण्ड वर्णता (स्तुति) की राशि द्वारा मण्डीश्वर (शिय) यो तात्प में प्रस्त बरने वाले श्रीमन् ॥ १६ ।। म्वम्ति परमनपस्वी, मनस्वी, और यशस्वियो में श्रेष्ठ श्रीमन् ! ॥ १७॥ म्वस्ति गास गुणिगग में गरिमावान, महाविद्वानी में परिण, प्राविचार- गोष्ठी में वमिष्ट को भी नीचा दिया.देने वार श्रीमन् ॥१८॥ म्यग्नि यतिपद द्वारा मारह वन्दिन परणयुगल-स्पी रमत-युगस पाने, भगवान पण विमान निपान आदि-मन्दोह र प्ररगुटन गे पूर्ण हृदय दाने, - गोविंदपचितनोद्यदानदमदोहकादतुदिलितहृदयेषु । द्राग्वि- द्रावितजगदुपद्रावकोद्रोहिकदवेपु, शरच्चद्रसुदरयशोभद्रेपु, श्रीमद- विद्यानिद्रादरिद्रेषु, सच्चिदानदध्यानविधानप्राप्तपरमानंदपु, सकल- कलाकलापकुशलेषु ।। १९ ॥ स्वस्ति श्रीमत्साक्षाद्विरूपाक्षायितेषु, पडितलक्षाधीशेपु, शास्त्र- कक्षासमुपन्यासविक्षेपितदक्षविपक्षाध्यक्षेषु, द्राक्षारसाक्षालितसुधा- सौदर्यमाधुर्यधारासमृद्धिसमृद्ध - समधिकमेधाप्रसिद्ध • प्रवर्धितशुद्धा- विरुद्धवाग्धाटीपरिपाटोसमुद्धवितमहोद्धतविबुबुधाधीशवसुधराधीश्व- रेषु ॥ २० ॥ स्वस्ति श्रीधरणीसमुद्धरणकिरिपु, निरतरास्मत्प्राणायितेपु, तत्समाधानादिरात्कियानिरतेषु, सशमितससारदुरितेषु ॥२१॥ स्मृति श्रीहरे धीकवीद्रोदिताशीमहापानवर्याय पर्यायतोऽस्ति। महौदार्यसौदर्यगभीर्यधात्रे ध्रुव तुर्यचातुर्यसिंधो विधाने ॥ २२ ।। स्वस्ति श्रीमद्भव्यभक्तिसभारसभावनासमासादनप्रसादित- थीदश्रीदुर्गेपु, ससभ्रम - निर्धम - निर्भर • विभावितश्रीभर्गेपु, समवाप्तदुरापापवर्गेपु, सुकृतकृतिससर्गेषु, किलविलसदनाविल- सत्सनिसर्गेषु, समालालितप्रतिपालितबधुवर्ग, मुदा सदा समाचारा- जगत् को उपद्रुत करने वाले अधम पुरुपो के समुदाय को शीघ्र भगा देने वाले शरद के चन्द्रमा के समान सुदर मगलमय यश वाले (केवल अविद्या को निद्रा मे परित, सचिनदानद के ध्यान विधान से परमानद को प्राप्त करने वाले सक्ल क्ला-कलाप मे कुशल श्रीमन । ॥ १९॥ स्वस्ति साक्षात विरूपाक्ष (शिव) स्वरूप लाखो पण्डितो के स्वामी, शारन मर्यादा के उपयास रो सम्पन्न विपक्षाध्यक्षों मे दक्ष द्राक्षा मे प्रक्षालित सुधा के सौदर्य और माधुर्य को धारा को समृद्धि से गमृद्ध प्रचुर मेधा के लिए प्रसिद्ध, शुद्ध और अविरुद्ध वाणी की घाटी की परिपाटी से अत्यत उदत जनो को विद्राधिन करन वाले देवराजस्वरूप पृथ्वी के स्वामी थीमन । ॥२०॥ स्वस्ति पृथ्वी के समुद्धार मे वाराहस्वरूप मदा हमारे प्राणस्वरूप सत्पुरुषो के शान्ति विधान आदि स-कमो मेनिरत, ममरण पाप को नष्ट कर देने वाले श्रीमत् ॥२१॥ कबीद्राचाय द्वारा प्रदत्त आशीवचन यो महापात्रोम श्रेष्ठ आप को श्री हरि की स्मृति पुन पुन होती रहती है। परम ओदाय सौदय गाम्भीर्य के वारक आप निश्चय ही तुर्यावस्या मे नैपुण्य के सिधु और सष्टा है॥1॥ स्वस्ति भव्य भक्ति समार-सपादन द्वारा घनद (वैश्रवण) तथा दुर्गा को प्रसन्न परने वाले अविलम्ब भ्रम से विरत रह कर सम्यक रूप में शिव का ध्यान करने वाले दुष्प्राप्य अपवर्ग को प्राप्त कर लेने वाले उत्तम पुरुषा से रारार्ग करने - [८] चरणकनिप्टीकृतवरिष्टवसिप्ट - गौतम - गालव-गाायण - गाधि- गर्येषु ।। २३ ॥ स्वस्ति थीमत्परमहसपरिव्राजकाचार्यश्रीशकराचार्यसमानेषु । वसिप्ट - विश्वामित्र व्यास - वामदेव - वात्स्यायन - पौधायन- वाल्मीकि - वरततु - वैजवाप - कपिल-कणाद - कात्यायन - कहोड- केनेपित कुकुश्रि - कौत्स - कौडिन्य - काश्यप - कौशिकायन- कार्णाजिनि · कण्व - कुथुमि-ऋतु-कुमार-हारीत-गोरक्ष-गालव- गर्ग - गार्य - गोभिल • गौतम - जावाल - जमदग्नि - जातूकर्ण्य- जैमिनि रत्कारु - पाणिनि - पतजलि पराशर - पिप्पलाद- पैठीन सि -पुलस्त्य -पुलह-भृगु-ऋज्यु -भागुरि-भृगि - भार्गव-भर- द्वाज - भुसुङ - भरत - भर्तृहरि - मनु - मनुमरीचि - माटि - मृकडु- मार्कंडेय - माडव्य - मैत्रायणीय - मेवावणि - मस्त्येन्द्र - मीननाथ- यम - यास्क - यासवल्वय लोमश - लौगाक्षि - रिवत - शुक- शौनक शाडिल्य -शातातप - शाटयायनि - शख - शाखायन- शुन पुच्छ शाकरय - शाकटायनेकऋपीश्वरमुनीश्वरसिद्धवद्भी- समानेपु, परब्रह्ममूर्तिपु, गगाजलनिर्मलमनो-वचन - काय - स्फूतिषु, सच्चिदानन्द - स्वरूपेषु, महापतिवर - भूपेषु, परिकल्पित- निर्विकल्पसमाधि-विध्वस्तससारमहाश्रमेपु, श्रीगोस्वामिनृसिंहाश्रमेषु वाले, सरपो के उज्ज्वल और अनाबिल सर्ग वाले, वयुवर्ग को यम्यक् रूप से सालित और प्रतिपालित करन वान सदाचार के आचरण द्वारा वरिष्ठ बसिष्ठ, गौतम, गालव गाायण माधि और गर्ग को नीचा दिखा देने वाले श्रीमन् । ।। २३ ।। स्वरित श्रीमत्सरगम परिवाजमाचार्य जो श्रीशाराचार्य के समान है। वसिष्ठ विश्वामिन, व्यास वामदेव वात्स्यायन बौधापन, वाल्मीरि, बरतन्तु वैजवाप, कपिल कगाद कात्यायन, बहोड नेपित, कुतुथि, दौत्स, कौण्डिण्य, वाश्यप, कौशिकायन, वार्णाजिनि, कण्द, कुयुमि, तु, कुमार, हारीत, गोरस, गालव, गर्ग, गाय, गोभिल गौतम जापान, जमदग्नि, जातूवर्य, जैमिनि जरत्कार, पाणिनि, पतम्जलि पराशर, पिप्पलाद पैठोनसि पुलस्त्य, पुलह भृगु भृज्यु, भागुरि, भृड गि, मागंद मरदाज ममुपिड मरन, मनहरि, मनु मनुमरीचि, गाटि, मृकण्ड, मारपडेय, माण्डम्य, मैत्रायणीय, मैवापारमि, मन्स्येन्द्र, मीननाथ, यम, यास्व, याज्ञवलय, लोमश, सौगाक्षि रिवन गुर, सोनपशानिइत्य, शातानप, भाग्यायनि, शख, साधायन, शुन पुग्छ, गावन्य, शाक्टायन-अना ऋषीश्वर-मुनीश्वर गिद्धो के ममार भासमान, परब्रह्म के प्राकार नाल गगाजल वे समान निमम मन, वचन, गाय, और स्पति दाल, मच्चिदानद-स्वरूप, महायलियों के अधिपनि, निविरल समाधि में अनुष्ठान स मसरण में महान् पमा विश्वस्त ने पाल यो गोस्वामिमिहाश्रम के प्रति परम

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[१]
प्रकटितपरमानदसदोहतत्वज्ञानदूरीकृतमहामोहसमवगतसप्तभूमिका-
समारोह - महम्मददाराशिकोहकृता ओन्नमोनारायणायेत्यष्टाक्षर-
मनपूर्वका नमस्कारा सन्ति ।।(२४॥)
स्वस्ति श्रीमत्सु ब्रह्मादिदैवताराध्यतमश्रामत्कमलाकात-
निताततातप्रेमभक्तिनिशातविश्रातस्वातसमास्वादिताभ्रातवेदात
सिद्धातपारावारीण भक्तजनजेगीयमानयशोवदानवितानतलमोद-
मानसन्मानसेषु ।। (२५।।)
दिगतस्थितविद्वज्जनचचच्चेतश्चकोरनिचयाचातचद्रिकाय
मानकीत्तिक्षीरोदपूरप्रमोदितनिखिलसुहृज्जनराजहसेपु ॥(२६॥)
निर्विशेषप्रज्ञाविशेषविशेषताशेयशिप्यनिवश्लाध्य पचो-
पनिपव्यारकानचातुरीकलाचित महोद्दडपाडित्यमडिताखड-
ब्रह्माडभाडोदरेपु० (॥२७॥)
पूर्वोत्तरमीमासार्थसारसारस्वतसागरसमवगाहनसोत्साहभारती-
वैभयमकरदभरविभूपितवदनारविदेपु० (।।२।।)
तत्तद्दिगतनिरूढसमस्तसामतचयशिरोवतसमणिमरीचिमजरी-
मालालालितधरणसरोजपीठपु० ।। २९ ।।
आनदराशि को प्रकट करते वाले परमतत्त्व के ज्ञान से महामोह को दूर करने वाले
[समाधि की] सातवी भूमिका प्राप्त कर लेने वाले मुहम्मद दाराशिकोह के 'यो नमो
नारायणाय इस अष्टाक्षर मन से युक्त नमस्कार निवेदित है ।। २४॥
स्वस्ति ब्रह्मा आदि देवताओ के आराध्यतम श्रीमुक्त कमलाकान्त (विष्णु)
के प्रति ऐकातिर और प्रवृद्ध प्रम और भक्ति में प्रतिष्ठित अन्त धरण द्वारा अभ्रान्त
वेदान्तसिद्धान्त में पारगत भक्तजन द्वारा गायी जाने वाली यशोगाथा के प्रसार में
मानदित होने वाले सच्चे मन वाने श्रीमन् । ॥२५॥
दिगत मे स्थित विद्वज्जन चञ्चल चित्त चोरो के समूह द्वारा पी ली गयी
पद्रज्योत्स्ना के सदृश भाममान कोति पे क्षीरसागर के भरने से अखिल मुहग्जन
राजहसों को हर्पित करने वाल ॥२६॥
अपण्ड ह्याण्ड भाण्ड के उदर (मोतरी भाग) को निर्विशेष प्रशाविशेष से
विरोपित सम्पूण शिष्य-गमुदाय द्वारा प्रशमित पान उपनिषदों की व्याख्या चातुरी की
पला से समुज्वल महान उद्दाम पाण्डित्य मे मण्डित करने वान ।। २७॥
पूर्वमीमासा और उत्तरमीमोमा के अर्थ-गार के मारम्बत सागर में समवगाहन
से
उत्साहित वाणी वे घेभव रूपी मार-द-गम्भार मे विभूपिन मुग्रवमल बात ॥२८॥
विविध गिनो में स्थित समस्त सामत समूह रे सिर पर मुशोमित मणियोनी
मरीचि मजरीवी मातारा सानिन चरणमनोपीठ॥२९॥

[१०]
कार्नाटद्रविडाधप्रभृतिसकलदाक्षिणात्यविबुधमहीगीर्वाणशिरो-
मुकुटमान्यतमश्रीश्रीमद्वेदान्ताचार्यसचिराख्यारूपसुधानिर्जरीकृत
निखिलश्रीवैष्णवजनेषु ।।(३०॥
श्रीगुरुचरणेषु निरतरप्रणतनिजकृपाकृता रामानुजाख्य-
दासानुदासकृता पारेपरार्द्धप्रणतिनुतिपरपरा वरीवृततुतमा-
चरीकरोमि च, मनसव सन्निधापितास्मत्प्रभून ध्यानविषयान् वरीभरीमि
च, मुहुर्भवद्दर्शनपीयूपविषयिणी वाछा । शुममन्न श्रीमता कृपा-
सदोहदोहदेन। तत्र तदेधमानमापास्तेतमा निजाघ्रिसरोरुहछायासु-
भगमन्यो दासजन । विशेपेणावत्या समाचारा श्रीसाहजीकाणा
पत्नतोवगता भविष्यति प्रभूणा। तथापि दासजन स्वाभिलाप-
सिद्ध्यर्थं यत्प्रार्थयते तदगीकरणीयम्। महाप्रभूणामन्त्र राजद्वारि
यत्पूर्वमतिकातेन राज्ञा रजतमुद्रामात्र प्रात्यहिक निवध्यकृतमस्ति
तद्राज्यपरावृत्तिवशेन रुद्धमपि श्रीमतामागनेन सतत भविष्यति ।
मितिराश्विन शुक्लतृतीयाया सवत् १८०५ अष्टादशशतोत्तर-
पचमाब्दे (॥३१॥)
वर्नाटर' द्रविड, आन्ध्र प्रभृति सकल दाक्षिणात्य मेधावी भू-देवताओ के सिर के
मुकुट द्वारा मा यतम और समस्त वैष्णव सम्प्रदाय को रुचिर व्याख्यारूप सुधा द्वारा
अमर पर देने वाले यी ५ वेदान्ताचार्य ॥ ३० ॥
श्री गुरुचरणो म निरन्तर प्रगत निज पायत रामानुज नामक दासानुदास-कृत
पराद से भी अधिक प्रणामो की परम्परा पहुंचे। मैं आप अपने प्रमु का
मन मे पुन पुन ध्यान करता हूँ और पुन पुन भाप के दर्शन की आकांक्षा
यहाँ थीमान् के वपासन्दोह के दोहद मे मव कुशल-मगल है।
आपके चरण कमल को छाया से सौभाग्यशाली यह दाम उस की वृद्धि की आशा करता
है। यहां से समाचार विशप रूप से श्री साहजी के पत्र से प्रभु को विदित होंगे।
तथापि यह दास अपनी अभिलापा वी सिद्धि के लिए जो प्राथना करे उस स्वीकार
अवश्य पिया जाय। महाप्रभु को यहाँ राजद्वार पर राजा ने जो रजतमुद्रा मात्र
दनिए वतन यांध रखा था और जो राज्य म उपलपुषन के कारण बन हो गयी यह
श्रीमान के आगमन से पुन चालू हो जायगी।
मिति आश्विन शुक्ला तृतीया सम्वत् १८०५ ॥ ३१॥

[११]
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4--0
शाहजाद दारा शिकोह और उन के गुरु मुल्लाशाह बदरशानी
[ सिरे अवघर की सहायता से ]
[ पृष्ठ 20 पर उपोदयात की पाद टिप्पणी द्रष्टव्य ]

[१२]
शाहजाद दाराशिकोह
सम्राट् औरगजेब
[ सिर अक्वर की सहायता से ]

प्रकाशकीय "सिरे अक्बर' (महत्तम रहस्य), शाहजाद, दारा शिकोह कृत ५० उपनिषदो की फ़ारसी व्याख्या का पुनीत नाम है । कलकत्ता विक्टोरिया मेमोरियल के संग्रहालय में यही ग्रन्थ सिरे' भिसार' (गुह्यतम रहस्य) नाम से बडे खुश खत अक्षरो मे मौजूद है, और यह स्वय दारा के हाथो का लिखा बताया जाता है। उपनिषत् (ब्रह्मविद्या) को गुह्यतम ज्ञान को सजा दी जाती है । "इति गुह्यतम शास्त्र (गीता य०१५ श्लोक २०" -इसलिए शाहजाद अजीम ने इस भाष्य का नामकरण सिरे अकबर' अथवा 'सिरे अिसरार' ठीक ही किया। यह ग्रन्थ, 'सिरे अक्बर' के हिन्दी रूपान्तर का प्रथम खण्ड है, जिसमे ईपा, देन, फल, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर, इन नौ उपनिषदो को प्रस्तुत किया गया है। हिन्दी सस्करण के अन्यकर्ता है हॉ० हर्पनारायण, दर्शन विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी। डॉ० हर्षनारायण, अरबी, फारसी, सस्कृत आदि विविध मापाओ के श्रेष्ठ विद्वान् है। प्रस्तुत ग्रथ के उपोद्घात पृष्ठ 9 26 मे, विद्वान् अनुवादक ने अय और प्रन्यकार शाहजाद दारा पर विस्तृत प्रकाश डाला है । यह पुस्तिका रूप में होते हुए भी एक सर्वाङ्गपूर्ण शोधनाप के लक्षणों से सम्पन्न है। उसके बाद ग्रन्थ के बारे में कुछ विशेष उल्लेखनीय नहीं है। फिर भी हिन्दी मे यह ग्रन्थरत्न कैसे आविर्भूत हुआ, अन्य के सम्बन्ध में उपलब्ध कुछ अन्य सूचनाएं, इस पुनीत कार्य म सहायता करनेवाली के प्रति आभार प्रदर्शन, और अन्त मे चिरस्मरणीय राजकुमार दारा के प्रति प्रक्षानि--इन कर्तव्यो से प्रेरित होकर कुछ पक्तिया पाठको के सामने प्रस्तुत करना मैंने अपना कर्तव्य समझा। लगभग ८.१० वर्ष की बात है, जब कुआन शरीफ़ के नागरी लिप्यातरण और हिन्दी अनुवाद के जटिल कार्य में में व्यस्त था। दोली हिन्दू इण्टर कालेज (बाराबवी) के प्रधानाचार्य स्व. श्री विद्याभिशु को यह समाचार कही से मिला । 4 अरबी और फारसी के विद्वान थे, और उस समय सिरें अकबर का हिन्दी तथा उर्दू | अनुवाद परने म वे व्यस्त थे। कुछ समानधर्मी जैसा वाम प्रतीत होने पर उत्कण्टादश लखनऊ आये। मेरे कुआन के काम को देख कर मुग्ध हुए। उसी समय उन्होने चर्चा की और सिरे अपवर' का अनुयाद, जो वे पर रहे थे, उसको मैं प्रकाशित करू, ऐसी अपनी इच्छा उहोने व्यक्त की। मुषको भी काम पसन्द आया, किंतु उस समय 'कुनि' म अतिव्यस्त होने के कारण मैंने असमर्पता प्रगट की। भगवान् की कृपा से सन् ६९ मे मैं अनि के विशद कार्य से निवृत हुआ। श्री विद्याभिदा जी पा सम्पर्क बीच मे बराबर कायम रहा। मिरे अपवरी और ध्यान दिया गया। उन्होंने कुछ उपनिषदो की अनूदित पाण्डुलिपि मुझे दी। यह निर्णय होता रहा कि हिन्दी रूपान्तर मे पारसी बा नागरी लिप्यन्तर भी दिया जाय या नही, अनुवाद केवल हिंदी मे हो, अपवा हिन्दी-अपशरीरे सहित। देवयोग नि पी विद्यामिदा जी, कुछ बीमारी के बाद दिवगत हो गये। इससे बार्य में एए और यवरोध बागा, वो दूसरी ओर स्वर्गीय थी विदामिन बी की मिसापा शाति और दारा की [१४] शाहजाद दारा के प्रति देश के आभार प्रदर्शन को व्यक्त करने के लिए सिरे अवघर का प्रकाशन अव अनिवार्य सा हो उठा। किन्तु मरवी गौर सस्कृत पर रामान अधिकार, साथ मे दार्शनिक पृष्ठभूमि- ऐसे विद्वान् का मिलना सरल न था। लखनऊ विश्वविद्यालय, और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में कई विद्वानो से सम्पर्क किया, किन्तु यात वाञ्छनीय ढग पर बन नही पाई। काशी में फारसी के पुश्तैनी विद्वान् वा० देदीनारायण एडवोकेट से भेंट हुई, उनका अलभ्य पुस्तको का विपुल समहालय देखा। उनके पास भी, सिरे अक्बर' की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि, उनके पूर्वजो के समय से सग्रहीत थी। इस कृति को हिन्दी मे लान में उनका भी आग्रह रहा। इसी दौडमाग के बीच लखनऊ अकादमी के अध्यक्ष, डॉ. हर्षनारायण से साक्षात् हुमा । उनमें कार्य के अनुरूप सर्वाङ्ग क्षमता मौजूद पाई। 'तपनक अकादमी' से ही हमारे नव-प्रकाशित हिन्दी कुआन का विमोचन हुआ। मैंने बहुभाषाई नागरी लिप्यन्तरण के समीचीन और दुस्तर कार्य की पूर्ति के उद्देश्य से 'भुवन पाणी ट्रस्ट' को लखनऊ में सस्थापना की। एक मासिक 'वाणी सरोवर' का प्रकाशन भी आरभ हुआ, उसमें विविध भाषाई लोकप्रिय समन्यो का धारावाहिक प्रकाशन होने लगा। डॉ. हर्पनारायण अति व्यस्त व्यक्तियो मे से हैं। फिर भी कुछ मेरे घम और आग्रह, तथा शाहबाद दारा का नाम उजागर करन की प्रेरणा से उन्हाने ट्रस्ट के लिए सिरे अक्बर' का हिन्दी रूपान्तर करना स्वीकार किया। कार्य चलता रहा। सन् १९७३ से १९७५॥ डॉ० हर्पनारायण ने उपर्युक्त नो उपनिषदों का प्रस्तुत हिन्दी रूपान्तर पूरा कर दिया और सन् ७३ मे नसके प्रकाशित हो जाने को पूरी सम्भावना पो। किन्तु देवयोग। कुछ अनिवार्य अवरोध उपस्थित हो गये। फल- स्वरूप सन् ७३ का समाप्तप्राय ग्रन्थ आज दो वर्षों बाद जनता के सम्मुख प्रस्तुत करने का सौभाग्य हो रहा है। स्व.हो. विद्यामिन बी को श्रद्धाजलि देने के बाद, इस पार्य में सभी सहायको और परामर्शदाताओ के प्रति हम बआभार प्रदर्शन करते हैं। काशी के दाबू देवीनारायण एडवोकेट, नो अनेक समाजसेवी संस्थाओ से सम्बद है, के भी हम अनुग्रहीत है। स्व. डॉ. ताराचन्द जी से इलाहाबाद में भेंट हुई थी। उनसे भी बड़ा प्रोत्साहन मिला। हमें दुख है कि प्रकाशन होने पर उनको प्रति भेंट परने का सौभाग्य प्राप्त न हो सका। यो इमामरहमान, सेक्रेटरी, पासिल आफ़ कल्चरल रिलेशस, दिल्ली के अनुसह से ही, स्व० डॉ० ताराचन्द के सम्पादकत्व में ईरान से प्रभाशित "सिरे अकबर की प्रति मुझको प्राप्त हुई थी, वे अतीव धन्यवाद के पात्र हैं। डॉ. हर्षनारायण तो "भुवन वाणी ट्रस्ट' को विवपरिषद् के मूल्यवान् सदस्य है, मिरे अपयर के द्वितीय खण्ड के अनुवाद मे बब भी लगे हुए हैं। ये दृष्ट- परिवार के सदस्य हैं, उन्हें धन्यवाद कोन दे? प्रस्तुत अन्य म सलग्न चिन्न, सिरे अगरर (कारसो प्रराशन) ईरान, और विक्टोरिया मेमोरिपल कलकत्ता के सोपर से प्राप्त है। हम उनके प्रति आभार प्रदर्शन करते हैं। कहा जाता है कि सरंपम सिरें आयर' वाराणसी में प्रकाशित हुआ। पाठ समझ में नहीं पाती, न मारे देश में कोई प्रति ही देखने से मिलती है। दूसरी बार जयपुर में प्रमाणित हुमा । रमाता विवविद्यालय के कारण विभागाध्यक्ष होरासास पोपड़ा का मुमसे पन है कि उन्होंने इसको स्वप देखा है, बत नया सापा। उसकी प्रति भी देखने में नहीं मिलती। बहरहाल यह तथ्य [१५] निश्चित है कि शाहजाद दारा के हार्यों यह महत्कार्य १६५७ ई. (२६ रमजान, १०६७ हिची) को शाहजाद के दिल्ली निवासस्थान 'मजिल निगम-बोध' मे पूर्ण हया और उसके बलिदान का भी प्रमुख हेतु यही साबित हुआ I दूसरा तथ्य यह है कि एक विदेशी अन्यधर्मावलम्बी शाहजादे की यह भारतीय कृति, यह ब्रह्मशान-गवेषणा भारत में नही, सर्वप्रथम योरुप मे प्रकाश मे आई। आधुनिक समय में भी इसका एक रमणीक सस्करण 'ईरान' मे ही छपा है । भारत मे, भुवन वाणी दृस्ट का यह उपक्रम प्रयम है। सामान्यत देश में यत्र-तत्र इसकी पाण्डुलिपियां मिलती हैं। (१) १७३८ ई. पृष्ठ संख्या ३६ लिपिक दरगाहीमल (अमरोहा, मुरादाबाद) याशी हि वि०वि० पुस्तकालाय श्रीराम सैक्शन PG 58 A (२) एक प्रति थी देवीनारायण एडवोकेट सुपुत्र श्री मुंशी जयकृष्ण जी के पास वाराणसी मे सुरक्षित है। यह १८२७ ६० से पूर्व की है। (३) एक प्रति थी धोराम सेक्शन (काशी हि० वि० वि०) पुस्तकालय P. G58 मे और समहीत है ।(४) यह प्रति कारमाइकेल लाइब्रेरी वाराणसी P 2029 में मौजूद है। (३.४}~-ये प्रतियां किन्ही मुसलमान लिपिको को लिखी हुई है। (५) यह प्रति श्री खानचन्द साहब, इलाहाबाद के यहां सुरक्षित रही। उनके सुपुत्र यो घोरेन्द्र वर्मा इलाहाबाद वि. वि. मे लेक्चरर रहे। इनके नाना थी उमाशकर सहाय सक्सेना(जहानाबाद जि. पीलीभीत)द्वारा लिखी हुई ५ प्रतियों में से यह एक है । (६) श्री स्व० विद्याभिक्षु जी के पास प्रति मैंने रुदौली (बारावकी) मे स्वयं देखी है। (७) विक्टोरिया मेमोरियल, कलकत्ता में एक प्रति अति खुशखत मौजूद है। मालूम होता है कि प्रकाशित न होने के बावजूद काफी लोगों ने दारा के इस मानवीय कार्य को प्रेम से सजो कर रखा। अत में एक विचिन बात उल्लेखनीय है। कुछ अतिवादी शोधको को शक्ति यह खोजने में केन्द्रित रही है कि शाहजादारा शिकोह को सस्कृत भाषा और उपनिपदों में नहीं तक पैठ रही है। यह फारसी व्याख्या 'सिरे अपकार' स्य दारा की रचना है, अपवा सस्ता और दार्शनिक पण्डितमण्डली की करतूत को अपने नाम से प्रस्तुत करके दारा ने अपने को गौरवान्वित किया है। ये शकालुजन, कभी कभी सकीर्ण मनोवृत्ति के भी शिकार होकर, अपने निर्णय की पुष्टि में दो तर्क रखते है- एक तो व्याकरण के दोष, दूसरे ब्रह्मज्ञान के दुरूह विषय में एक अभारतीय धर्मावलम्बी को तत्वज्ञान पर मौलिक और अद्भुत व्याख्या । इस शका के समय ये भूल जाते है कि ब्रह्मज्ञान का विषय चिन्तन मनन का। बह व्याकरण और शब्द-जमाल की बेडियो से स्वतन्त्र है। बीर, नानक आदिको दार्शनिक देन मापा-सौष्ठव मे परे है। रामचरितमानस की दोहा चौपाइयों की मानाओमी पटावकी, व्याकरण और शम्दो पी तोर-मरो के दोषो से 'तुलसी' की अक्षण महिमा पर आरोप नहीं पाता। अनेक विद्वानों, मदर्भ-ग्रन्पो और पुस्तकालयों की सहायता से एक स्नातर शोधग्रण तैयार करके 'गण्ट्रेट' की उपाधि से सम्मानित होता है। घेप उन मूलाधार विद्वानो, सदभप्रन्पो और पुतरालयों को नहीं दिया जाता। सुवर इन शोधको के ऐसे कपन, तत्वज्ञान के विषय म उनका मोखलापन और उनमें मिथ्या मारमश्तापाही दराते हैं। शाहजाद सो स्वय स्वीकार करता है किकामीर से वाराणसी पर्यन्त वह संन्यासियों, ब्राह्मणों और तस्वशानियों के पार [१६] 'तत्वज्ञान' की खोज में भटकता रहा है। विद्वानो से ज्ञान प्राप्त किया है। किंतु इससे दारा की तत्वज्ञान पिपासा, उसका ज्ञान गन्यन और उसकी देन-इन पर आरोप कहाँ से बाता है। जो लोग ब्रह्मज्ञान' को भाषा, व्याकरण, देश विदेश, अपना और विराना धर्म, इन बातो से जोडते हैं, वे उपनिषद के विषय से ही कोसो दूर हैं। दारा ने भूमिका में व्यक्त किया है कि 'ब्रह्मज्ञान का भण्डार 'उपनिषद' है। यद्यपि उसके सरक्षक हिन्दुओं में भी कोई ही कोई वस्तुत तत्वज्ञानी विद्वान् इस समय मौजूद हैं ।" धारा के इस लेप से उसको क्षमता मे सन्देह करनेवालो को अपनी दयनीय दशा पर विचार करना चाहिए। समरकद दुखारा का रक्त, इस्लाम धर्मावलम्बी, कल को मम्राट् बननेवाला युवराज, यदि अपने विचारों के कार्यान्वयन में सफल होता तो देश का इतिहास ही कुछ और होता। उसके प्राणो की बलि भी मानवमात्र के विचार सगम की वेदी पर हुई। हम शाहजाद को श्रद्धाञ्जलि अर्पित करते हुए उसके जनतनशीं बने रहने की प्रार्थना करते हैं। अगस्त, १९७५ ई० 1. Yomarwegia प्रतिष्ठाता-भुवन वाणी ट्रस्ट, लखनऊ-३ - पेमश वाराणोनिवासी यो देयोनारायण जी एस्योरेट के सौमम्य से प्राण

सिरे अक्वर*
(५१ उपनिपदो की फारसी-व्याख्या)
कर्ता--
दाराशिकोह
अनुवादक
(मूल संस्कृत तथा फारसी से)
डॉ. हषनारायण एम ए पीएच डी
सर्व खल्विद ब्रह्म
[विस्मिल्लाह की] 'वे' का विन्दु नित्य रहस्य के समान है
[भूमिका ]
१ स्तुति उस सत्ता की जिस की बिस्मिल्लाह' की ये का बिदु ममस्त आस्मानी
(अपौरुषेय) ग्रथो मे उस के नित्य रहम्यो मे से है और कुआंने शरीफ की शास्त्र-योनि
(सूरतुल्फातिह) [अलहम्द आदि १७] में सकेत इस्मे आजम [महनाम] से किया
गया है और जिस नाम के अवगत समस्त फिरिश्तो आस्मानी ग्रयो ईश-दूतो (नविओ)
तथा महात्माओ का उल्लेख है । परमेश्वर अपनी श्रष्ठतम गृष्टि मुहम्मद उन को सन्तान,
उन के मम्पूण मित्र मण्डल का मगल करे।
ॐ प्रस्तुत अनुवाद 'सिरे अस्वर' के तेहरान सस्करण पर श्रावृत है। दाराशिवोह
न उपनिषद् के मूल मत्र नहीं दिये हैं अनुवादक डॉ. हर्षनारायण ने उन्ह दे दिया है,
और उनका अनुवाद भी कर दिया है।
प्रस्तुत पुस्तक में यद शेठ [] में रखे शब्द हिन्दी अनुवादक शा अपनी
थोर से जोड़े गये हैं।
र्माने शरीफ़ का प्रथम पद, जिसका अर्थ है 'परमेश्वर के नाम के साथ
(घारम्भ ररता है।
२ अरबी में 'उम्मुनकिताब' जिम का शब्दार्थ है 'पुस्तक की
माता'। यह्मसूत्र(१ १ ३) का शब्द 'शास्त्र योनि' इस का मुन्दा पर्याय है। अनि की
प्रथम सूर', 'सूरतुलफातिह', को 'उग्मुलकिताब' या 'उग्मुजान' कहा जाता है।
३ सूरनुकातिहा 'श्ररहम्द से प्रारम्भ होती है..

१८] भूमिका २ इसके पश्चात् जब यह निर्द्वन्द्व भिक्षुक मुहम्मद दासशिवोह सन् १०५० हिज़ी में स्वर्गापम कश्मीर गया था तो नमै ईश्वर की अनुकम्पा और अनन्त अनुग्रह से सिद्धा में मिद्ध, ज्ञानियो मै वरेण्य, गुरुओ के गुरु, स्थविरो के स्थविर, शास्ताओ के शास्ता, तत्त्ववेत्ता, एकेश्वरवादी, महात्मा, मुल्लाशाह (जिन्हें परमेश्वर का सरक्षण प्राप्त हो) के शिष्यत्व का गौरव प्राप्त हुआ। क्योकि [विनीत को] प्रत्येक सम्प्रदाय को देखने तथा एकेश्वरवाद के उत्तम प्रवचनो के सुनने का चाव भी साथ था, और [उस ने] ब्रह्मज्ञान (तसव्वुप)की बहुत सी पोथियो का अनुशीलन और पुस्तकोका प्रणयन किया था, और अद्वैत को प्राप्ति की तृष्णा, जो एक अयाह समुद्र है, निरतर बढ़ती ही जाती थी और जटिल प्रश्न मन में आते ही जाते थे, जिन का समाधान ईश्वरीय वाणी तया अनन्त सत्ता-मावन्धी याप्त वचनो के विना सम्भव न था, और क्योकि महान् कुनि, उदार विवेकपुरस्सर ग्रय, प्राय रहस्यात्मक है और आज उन रहस्यो का ज्ञाता दुर्लभ है विनीत ने चाहा कि समस्त आस्मानी पुस्तको वा अनुशोजन करे जिस मे कि ईश्वरीय वाणी, जो अपनी व्याख्या आप है, यदि एक पुस्तक में सक्षिप्त है तो दूसरी मे विशद और विस्तृत रूप में उपलब्ध हो जाय और उम विस्तर मे वह सक्षेप ज्ञात हो जाम । ३ उस ने तोरात, इजील, हदूर, और अन्य प्रथा पर दृष्टि डाली, परन्तु अद्वैत का प्रवचन उन में भी सक्षिप्न तथा गूढ था। सरल अनुवादा से जिन्हें स्वाथियों ने दिये ये अभीप्ट की प्राप्ति नहीं हुई। तब इस बात की धुन मवार हुई कि हिन्दुस्थान में किस ओर से अत-तत्व प्रकाशित है, अद्वैतवाद की चर्चा इतनी अधिक है, और प्राचीन हिन्दुस्थान के पण्डितो और ज्ञानियो को ब्रह्म के एकत्व से नकार और एकेश्वरवादियों पर आपत्ति नहीं है, अपितु पूर्ण विश्वास है, वर्तमान काल के सूर्यों के विपरीत जो अपन आप को उलमा (धर्माचार्य) मान बैठे हैं, गाल बजाने तया ग्रहाज्ञानिओ और अद्वैतवादियो की यातना और तास्तिवीररण मे निरत हैं, अतवाद के उन समस्त वचनों को जो प्रशस्त, विवेकपुरस्मर ग्रथ [कुआने शरीफ] तथा नदी' की प्रामाणिव दीमो मै स्पष्टत मिद्ध है, टुकराते हैं, और ईश-मागं के बटमार हैं । ४ इन मोपानो की खोज के पश्चात् पता चला कि इस प्राचीन [हिन्दू] जाति में सारी आम्मानी पुस्तका से पूर्व चार आस्मानी पुस्ता, जो ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, तथा अपवेद है, समस्त विधि विधानो के सहित तलालीन ऋपिआ पर जिन मे भेटतम ग्रह्मा अर्थात् ईश्वर के मुहत्वरूप आदम हैं, प्रकट हुई और रि यह अर्ष इन्हीं पुस्तकों से प्रकट है। १ हवा मुहम्मद (स.)।

सिर अक्बर (फारसी) [१९ ५ और कुर्भाने शरीफ से यह भी विदित होता है कि कोई जाति ऐसी नहीं है जो निग्र थ और निदूत हो। जैसा कि उस का वचन है— व मा कुन्ना मुअज्जिबीन हत्ता नअस रसूनन्" [१७ १५] । दूसरी आयत मे—' व अिम्मिन् अम्मतिन जिल्ला खला फीहा नजीस्न्" [३५ २४], और अयन कहता है-"लकद् अर्सलना झलना बिल्लय्यिनाति व अन्जलना मअहुमुल् कितान बल्मीजान "[५७२५] पत' इस से निश्चित हुआ कि महान परमेश्वर किसी जाति को दण्डित नही करता जब तक उस जाति मे अपना दूत नही नियुक्त कर देता और कोई जाति ऐसी नही जिस म [परमेवश्र का] सदेशहर न हुआ हो। और निश्चय जानो कि उस ने दूतो को प्रकट चमत्कारो के साथ भेजा है और उन पर पुस्तक तथा [सत-असत् का] विवेक उतरा है। ६ और इन चार पुस्तको के सार को जिस मे ही एक ईश्वर की भक्ति और साधना का निरूपण है उपनिषद नाम से पुकारते हैं। और उस युग के पुरस्कर्ताओ ने उसे । पृथक कर उस पर सुव्यक्त और सुविस्तत भाप्य लिख हैं और [लोग] सदा श्रष्ठतम उपासना वे रूप मे ग्रहण करते हुए उस का पाठ करते हैं । ७ क्योकि इस आत्मदशन से हीन जिज्ञासु की दृटि मूल अद्वैत-तत्त्व पर थी न वि अरवी मुरयानी इबाती और मस्कृत पर ऐसी इच्छा हुई कि इस उपनिपदो को जो अद्वैत का भाडार हैं और जिन के ज्ञाता उस [हिन्दू] जाति में भी कम रह गये है फारमी भाषा में बिना न्यूनाधिक्य के नि स्वाथ भाव से वाक्यानुवाक्य शब्दानुशब्द अनूदित करखे समझ कि यह [हिन्दू समाज जो उसे मुसलमानो से इतना छिपा कर रखता है उस मे क्या रहस्य है। ८ क्योंकि आजकल वाराणसी नगर का जो इस जाति का विद्यापीठ है इस जिज्ञासु से सम्बध या [उस ने] पण्डितो और स यासियो को जो अपने काल के अग्रणी तथा वेद और उपनिषद के ज्ञाता थे जमा करके इस अद्वैत मार को जो उपनिपद अर्थान गोपनीय रहस्य है और जो परमेश्वर वे सभी भक्तो का साध्य लक्ष्य है मन १०६७ हियो मे नि स्वाथ भाव मे अनूदित किया। और हर कटिनाई तथा हर ऊँची शिक्षा जो [वह] चाहता था जिसे पाने को [उम वी] इच्छा थी जिसे वह] खोजता लेकिन पाता नही पा [उमे उस ने] पुरातन ग्रप के इस सार से जो निस्स देह आस्मानी पुस्तका में प्रथम सज्जान का आदि स्रोत और यदत-तत्त्व वा मागर है और कुर्माने शरीफ के अनुकूल बल्कि उस रा भाष्य हैं प्राप्त पिया। और स्पष्ट आभास होता है कि यह आयत साक्षात इसी प्राचीन पुस्तक के विषय २० भूमिका में है-"अिन्नहू लकुआनुन् करीमुन् ा (७७) फी कितात्रिम्-मनूनिन् ला (७८) सला यमरमुहू भिल्लल्-मुतहहरून : (wt) तन्जीनुम्-मिरब्बिल-आलमीन (८०)" ९. अर्थात् उदार कुनि एक पुस्तक मे है जो एक गुप्त पुस्तक है जिस की जानकारी पवित्र आत्माओ के अतिरिक्त विमी को नहीं होती। और वह ससार के पालनहार के द्वारा अवतीर्ण हुई है। और स्पष्ट ज्ञात होता है कि यह आयत जदूर, तोरात, और इजील के बारे में नहीं है । और शब्द 'तन्जील' [अवतरण] से ऐसा प्रकट होता है कि यह लौह महफूज [सुरक्षित पट] ' के सम्बन्ध में भी नहीं है । और क्योकि उपनिपद् जो गोपनीय रहस्य है, इस पुस्तक का मूल है और कुर्भाने शरीफ फी आयतें उस मे ज्यो की त्यो पाई जाती हैं, अत निश्चय जानो पि 'गुप्त पुस्ता' (रिताचे मानून) यही प्राचीन पुस्तक है और इस मे इस भिशुक के लिए 'अज्ञात' ज्ञात हो गया और 'न समझा हुआ' समझा हुआ हो गया। १० अनुवाद आरम्भ करते समय पुअनि शरीफ से शकुन निकालने पर उस की सूरए आराफर निकनी जिस का आरम्भ यह है-"अलिफ ला'म् मोम् सा'द् = (१) कितावुन अमजिल अिलैक फला यफुन् फी सद्रिक हरजुम्-मिनहु लिजिर विही य जिका लिल्मुमिनीन (२)" [७:१-२] अर्थात् "हे मुहम्मद (परमेश्वर उन का कल्याण और वाण करे । ) अलिफ लाम् मीम् साद् एक पुस्तक है जिसे तुम्हारी ओर उतारा गया है। यत तुम्हारे हृदय मे इस पुस्तक के विषय में सशय नही होना चाहिए, ताकि उस पुस्तक से लोगो को डराओ, और वह विशेषत आस्थावानो (मोमिनो) के लिए उपदेशप्रद है।" और स्वयं अपने, अपनी सतानी और मित्रो, भोर सत्य के जिज्ञासुओ के लाभान्वित होने के अतिरिक्त [उस का कोई अन्य उद्देश्य अथवा प्रयोजन नहीं था। ११ जो भाग्यवान् शुद्ध भगवान् वी प्रसन्नता के लिए क्षुद्र मन के स्वार्थ का परित्याग कर इस अनुवाद को जो सिरें अक्चर' नाम से अभिहित है ईश्वर-वचन का अनुवाद ममझकर और हटयर्मी छोहबर पढे और ममझेगा वह सपायरहित, निर्भय, निरापद, और सदा के लिए मुक्त हो जायगा । 1. कमाने शरीफ [मु. पारिप्रति ५६७८] के अनुसार यह स्वर्ग में एक सुरक्षित पट पर लिपिबद है। २. याने शरीफ़ पी साती सूरः । ३. भात्री मुल-'सस्तरका अनैहि व सरजम् ।

ईशावास्योपनिषद् ? - [शुक्लयजुर्वेदीय काण्वशाखीय] [पूर्णमद , पूर्णमिद, पूर्णात् पूर्णमुदच्यते; पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ।' [ॐ शान्तिः शान्ति शान्ति ] [अक्मल ऑ, वक्मल ई, जेऽक्मल हमी उपतद अक्मल; जऽक्मल अवमल चुं फतद, वाज बमानद अवमल ।' (हिन्दी अनुवाद) [वह (ब्रह्म) पूर्ण है, यह (जगत्) पूर्ण है, पूर्ण से पूर्ण निकलता है, पूर्ण से पूर्ण के निकलने पर पूर्ण ही शेष रहता है ।' ॐ ईशावास्यमिद सर्व यत्किञ्च जगत्या जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा, मा गृध , कस्य स्विद्धनम् ? ॥१॥ अनु०-धरती पर जो जगत् है वह ईश्वर द्वारा आच्छादित है। तू उस के त्याग से भोग कर, लोभ न कर, धन किस का (१) व्याख्या-"ईश' का अर्थ है सब का स्वामी और 'वास्य' का अर्थ है आच्छादित, अर्थात् समस्त जगत् जगदीश्वर से आच्छादित है। वह जगदीश्वर प्रकट है तथा जगत् उममे निहित है। जो कुछ नाम और रूप वाला है वह जगदीश्वर से निमृत हुआ है, जगदीश्वर में स्थित है, और जगदीश्वर मे लय हो जाता है। जगत् को मूल सत्ता जो आत्मा है ऋत और सत्य है, और जगत् का नाम-रूप जो अविद्या है असत और मिथ्या है। इस सत्ता में आत्मा जो ऋत और सत्य है व्याप्त हो रहा है और इसे भी ऋत और सत्य प्रदर्शित कर रहा है, अर्थात् जगन् का नाम और रूप सत्याभ असस्प है [अर्थात् सत्य के समान प्रतिभासित होता है, और कोई अस्तित्व नहीं रखता। १ यह मंत्र दाराशिवोह ने नहीं दिया है, यद्यपि इसे प्रायः उपनिषद् के भारग्म में कगा देने की परिपाटी है। २ उक्त मन का हिन्दी-अनुवादक का किया हुआ यह फारसी अनुवाद है। है अमत्य किन्तु २२ ] सिर मङ्गबर (फारसी) मत चाहिए कि इम सत्यवत् प्रतीत होने वाले असत्य को, जिस पी तू ने स्वय कल्पना कर ली है और जिस से दिल लगा लिया है, आमक्ति और कामना त्याग कर निष्काम भाव से और उस से बिना किसी आसक्ति के उन समस्त कर्मों, समस्त सुखो, और रामस्त व्यसनो का (जो अभीष्ट हो) उपभोग कर और हृदय में आसक्ति की भावना न रख । ससार और धन रिस का है ? और किस पा हुआ है ? देखा जाता है कि एक के पास से दूसरे के पास चला जाता है, और एक से दूसरे को प्राप्त होता है । [१] कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविपेच्छत समा । एव त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।। अनु०-संसार में सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा करे । ऐसा [ही है। ] इस के सिवा कोई और मार्ग नहीं है, जिस से मनुष्य में कर्म की आसक्ति न हो । (२) भ्या-यदि सौ वर्ष तक जीवित रहे तो भी शुभ वर्मों का त्याग न कर और उन के पल की इच्छा न कर । अर्थात् फ्ल की कामना से रहित साधना तथा फर्म मदेव परता रह, पाकि साधक को मुक्ति का मही मार्ग है और उम पे लिए कोई अन्य मार्ग नही है। जब तू शुभ कर्म बरे और उम वा फल दृष्टि में न रखें तो इम के कारण तुले दुष्कर्म भी हानि नहीं पहुँचायगे और तू मुक्ति लाभ कर लेगा। [२] अमुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसावृता । तास ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्मनो जना ॥३॥ अनु०-वे भगुरो वे लोप घोर अन्धकार से आच्छादित है। जो लोग आत्मा का हनन करने वाले है ने मृत्यु के पश्चात् उन्हें ही प्राप्त होते व्या-जो पोई इम अर्थ को नहीं समझता और समं पल के लिए करता है और उस बुद्धिवे होते हुए जिम मे वह आत्मा को जान सकता है, उस ने नहीं जाना और प्रमाद दिया, वह अगुराये तोर म, जो शैतानो का लोर है, और जिम सोर यो अपरार ने ऐसा आम्हादित कर रखा है कि उस म कोई भी वस्तु भवभामित नहीं होती, जाता है। उन्हाने अपना रक्त अपने ही हाय स यहाया है। [३] ईशावास्योपनिषद [ २३ अनेजदेक, मनसो जवीयो, नंनद् देवा आप्नुवन्, पूर्वमर्पत् । तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति ॥४॥ अनु०-[वह] नि सन्द है, एक है मन से भी तीब्रगामी है, उसे इद्रियाँ प्राप्त नहीं कर सकी, क्योकि यह पहले ही पहुंचा हुआ है। वह स्थिर होते हुए भी अन्य दौडने वालो का अतिक्रमण कर जाता है। उस में ही वायु जलो को धारण करता है । (४) प्या०-यह आत्मा यद्यपि गतिशू य है अद्वितीय है और दूसरा नहीं रखती और मन वे भाव से भी अधिक शोध्रगामी है उस तक समस्त बाह्य और आम्य तर पानेन्द्रियाँ नही पहुंच सकती । जहाँ कहो इद्रियां अपने को पहुंचा सकती हैं, वहाँ वह इद्रियो से पूर्व ही विद्यमान होता है। और यद्यपि नह गति नहीं करना तथापि वह समस्त द्रुत- गामियों के पूर्व वहाँ पहुँचा होता है। हिरण्यगभ जो सभी से कम कराता है और कर्मों के फल को प्राप्ति कराता है उसी आत्मा मे है । अर्थात् आत्मा सवव्यापक है। [४] तदेजति, तन् नजति , तद् दूरे, तद्वन्तिके । तदन्तरस्य सर्वस्य, तदु सर्वस्यास्य वाह्यत ॥५॥ अनु०-वह चलता है वह नहीं चलता है वह दूर है वह निकट है। वह इस सब के भीतर है, वह इस सब के बाहर भी है। (५) व्या०-गतिमान वही आत्मा है और गतिशूय वही दूर वही आत्मा है और निकट वही और भोनर वही बात्मा है और बाहर वही। [५] यस् तु सर्वाणि भूतात्यात्मन्येवानुपश्यति सर्वभूतेषु चात्मान ततो न विजुगुप्सते ॥६॥ अनु०-जो भी समस्त भूतो को आत्मा मे ही देखता है और समस्त भूतो मे आत्मा को, वह इस के कारण [किसी से] घृणा नहीं करता। (६) व्याo-जो कोई समस्त भूतो धौर समस्त जगत को अपने में देखता है और अपने को समस्त भूतों में और समस्त जगत में उस को कोई वस्तु कुत्सित नही दीखती और यह किसी वस्तु से घृणा नहीं करता और कोई भी वस्तु उसकी दृष्टि मे बुरी नहीं होती। [१] २४] सिरें अक्सर (फारसी) यस्मिन् सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद् विजानतः तत्र को मोह., क: शोक, एकत्वमनुपश्यत. ? ॥७॥ अनु०-जिस दषा में शानी के लिए समस्त भूत आत्मा ही हो गये उस मे एकत्व-द्रप्टा को क्या शोक और क्या मोह ? (७) व्या-जो शानी वि स्वय सवंगप हो गया है और जिस मे द्वैत की भावना नहीं रह गयी है, वह किस से मोह करे और पिस से घृणा प्रकट करे? क्योंकि वह आत्मा हो जाता है ।' [७] स पर्यगाच्छुत्रमकायमश्रणम्, अस्नाविरं, शुद्धमपापविद्धम्, कविर, मनीपी, परिभूः, स्वयभूर् याथातथ्यतोऽर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ।।८।। अनु०-वह सर्वगत, निर्मल, अशरीरी, अक्षत, स्नायु से रहित, शुद्ध, भ-पापग्रस्त, पान्तदर्शी, मगोपी, सर्वोत्कृष्ट, और स्वयंभू है। उसने युगानुयुग के लिए यपायोग्य रीति से अर्थों का विभाग किया है । (८) घ्यावह सर्वव्यापर है, वह पवित्र है, वह शरीर-रहित है, वह अथत है, जरा रा कोईण नहीं है, यह उत्पत्ति, जीवन, तया मरण तीतो गुणों से मुक्त है, वह निष्पाप है, वह निप्पर्म है, यह शुभाशुभ वर्षों मे परे है, वह सर्वज्ञ तया सर्वद्रष्टा है, यह महानो से महान् है, वह उच्चो में उच्च है, यह अपनी सत्ता से मतावान् [स्वयम्भू] है, और समस्त सोच-सोरान्नार को मृष्टि से विविध रूपों में उसी ने रहा है। [] 1 यह पास्य (झारसी मूल--'वाभारिक व ग्यानी कि मामा रामः) यस्तुगः इसी सातय मंत्र का भाग है पो (मूल प्रम में) मंगवे घारम्भ में आ गया है। किन्तु उस का रूप पो होना चादिः-क्योंकि यह ज्ञानी भारमा हो जाता है कि पारिक ५ ग्यानी मामा शुका भात)।

ईशावास्योपनिपद [ २५ अन्ध तम प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ विद्याया रता ॥९॥ अनु०-वे घोर अन्धकार म प्रवेश करते है जो अविद्या की उपासना करते है । [और] वे मानो उस से भी घोरतर अन्धकार मे [प्रवेश करते हैं] जो विद्या मे रत है। (९) व्या-जो लोग कर्मों के पल पर दृष्टि रखते हैं और उमी मे रत हैं वे घोर अधकार मे पड़ते है । और वे, जिन्होने कर्म नही किया है और जिन का अत करण साधना द्वारा शुद्ध नहीं हुआ है और बिना समझे हुए केवल अनुकरण मे ब्रह्म ज्ञान की बातें करते उन लोगों की अपेक्षा जो कमफल पर दृष्टि रखने के कारण घोर अधिकार में प्रवेश करते है, यधमतर हैं और घोरतर अधकार में प्रवेश करते हैं। [१] अन्यदेवाहुर् विद्यया, ऽन्यदाहुरविद्यया । इति शुश्रुम धीराणा ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥१०॥ अनु०-विद्या से अन्य ही [फल] कहते है और अविद्या से अन्य कहते है। ऐसा हम ने विद्वानो से सुना है जिन्हो ने हमारे लिए उस की व्याख्या की। (१०) व्या०वे हैं जो कहते हैं कि 'सुकर्मों का फल दूसरा है और ज्ञान का फल दूसरा । [१०] विद्या चाविद्या च यस् तद् वेदोभय स ह । अविद्यया मृत्यु तीर्खा विद्ययाऽमृतमश्नुते ॥११॥ अनु०-विद्या और अविद्या दोनो को जो साथ-साथ जानता है वह अविद्या से मृत्यु को तर कर विद्या से अमृत को प्राप्त कर लेता है। (११) व्या०-इसे स्वीकार न कर क्योकि दोनो का फल एक है। क्योकि उस कम से जो फ्लाकाक्षा के बिना किया जाता है निष्पाप बोर शुद्ध होकर ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, और साक्षान् ब्रह्म हो जाते हैं। [११] सिर अक्बर (पारसो) अन्ध तम प्रविशन्ति येऽसभूतिमुपासते । ततो भूय इव ते तमो य उ सभूत्या रता ॥१२॥ अनु०-घोर अन्धकार मे प्रवेश करते है असभूति की उपासना करते है, मानो उस से घोरतर अन्धकार मे [प्रवेश करते है] जो सभूति मे रत हैं । (१२) व्या०-जो निगुण वी उपासना करते हैं वे बसम्भूति है और जो सगुण की उपासना मे रत हैं वे मम्भूति हैं । [१२] अन्यदेवाहु सभवादन्यदाहुरसभवात् । इति शुश्रुम धीराणा ये नस् तद् विचचक्षिरे ॥१३॥ अनु०–सम्भव (सम्भूति) से अय ही फल कहते है। असम्भव (असम्भूति) से अन्य कहते हैं । (१३) ध्या०-दोनो ही दल कहते है कि निगुणोपासना का पल दूसरा है और सगुणो पासना का फल दूसरा । य दोना दल भी घार अधकार मे प्रवेश करते हैं । [१३] सभूतिञ्च विनाश च यस् तद् वेदोभय सह । विनाशेन मृत्यु तीर्खा सभूत्याऽमृतमश्नुते ॥१४|| अनु०-सभूति और विनाश (असभूति) दोनो का जो साथ साथ जानता है वह विनाश से मृत्यु को सर कर राभूति से अमृत को प्राप्त कर लेता है। (१४) व्या०-चाहिए कि असम्भूति और सम्भूति [निर्गुण और सगुण] को निरपाधि और सोपाधि ब्रह्म को, एका समझ र, चित्त से उस की उपासना से शुद्ध पर के, और ज्ञान प्राप्त कर के मुक्ति प्राप्त करें। [१४] [मन्न ९ से १४ का साराश-] (जो कोई शुभ कम करता है और पल उस वो दृषि का विषय नहीं रहता और जो कोई उपासना करता है और कम-फल पर दृष्टि नहीं रखता, और जिस रिसी न शान की प्राप्ति की है इन तीनो ही दला का परिणाम मुक्ति है जिसे ब्रह्म निर्वाण से अभिहित किया जाता है।)

ईशावास्यापनिषद् [२७ हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहित मुखम् । तत् त्व पूपन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये ॥१५॥ अनु०-चमकीले पान से सत्य का मुख ढका हुआ है । हे पूषन् (जगत् के पालक)| उसे तू सत्यधर्मा को दर्शन कराने के लिए अनावृत कर दे।(१५) । प्रजापति नन्दन व्या-सत्य का मुख सुवण के पान से ढका हुआ है। हे पूपन् । तू उसे खोल दे, ताकि हम, जिन्हे सत्य अभीप्ट है उस के दशन से वृतार्थ हो । [१५] पूपन्नेकर्षे । यम । सूर्य | प्राजापत्य ' व्यूह रश्मीन् समूह । तेजो यत् ते रूप कल्याणतम तत् ते पश्यामि । योऽसावसो पुरुष सोऽहमस्मि ।।१६।। अनु०-हे पूपन् । हे एकाकी गतिमान् । है यम हे सूर्य । है तू अपनी रश्मिओ को हटावर एक ओर वर ले। जो तेरा अत्यन्त कल्याणमय रूप है उस तेरे [रूप यो] देखता हूँ। यह जो पुरुप है, वह मैं हूँ । (१६) व्या. हे पूपन् । हे एकारी पथिक (एक्) । हे यम । हे मूर्य । हे प्रजापति- मन्दन ! अपनी रश्मिा मृष्टि मे विग्र और अपनी ज्योति को पुजीभूत कर ले, ताकि मैं तेरी मनोहारी छटा देखू। जो वह पुरुष है वह मैं हूँ । [१६] वायुरनिलममृतमथेद भस्मान्त शरीरम् । ॐ तो स्मर, कृत स्मर, कतो स्मर, वृत स्मर ॥१७॥ अनु०-वायु सूत्रात्मा को और यह भस्मान्त शरीर अमृत को [भाप्त हो] 1 हे सकल्पात्मक मन स्मरण कर, किये हुए का स्मरण कर, हे सकल्पात्मक मन । स्मरण पर, किये हुए का स्मरण वर । (१७) प्या०-मेरा जीवन उस अभर वामु म लीन हो जाय । और मेरा शरीर मम्म म विवर जाय! हे मन ! अपने कर्मों पा स्मरण पर । हे मन । अपने कर्मों को अपन ही मे देय । [१७] २८] सिरें अक्बर (पारमी) अग्ने | नय सुपथा राये अस्मान् विश्वानि देव । वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज् जुहुराणमेनो, भूयिष्ठा ते नम उक्ति विधेम ॥१८॥ अनु०-हे अग्नि ! हे समस्त ज्ञान-कर्म के ज्ञाता देव । हमे अभ्युदय के लिए सन्मार्ग पर चला। हमारे कुटिल पापो को नष्ट कर। हम तुझे वारम्बार नमस्कार करते है। (१८) व्या. हे अग्नि हे प्रकाश-स्वरूप देव । हम सन्मार्ग पर ले चल और मुक्ति स्पी महान् ऐश्वर्य को प्राप्त वरा। हे हमारे समस्त कर्मों के ज्ञाता | हमारे पापा को क्षमा कर तुर्य अनक नमस्कार । [१] [उपसहार-] जो कोई मुक्त हो जाता है उस की ममस्त बाह्य और आभ्यन्तर ज्ञानेद्रियाँ उस के सूक्ष्म शरीर के साथ मृत्यु के पश्चात हिरण्यगर्भ म, जो सूक्ष्म तत्वो की समष्टि होता है लय हा जाती हैं । और उस का जीवात्मा (परम) आत्मा के साथ एकीभूत हो जाता है। और उस का स्थूल शरीर भस्म हो जाता है। और मृत्यु के समय ज्ञानी अपने कर्मों और कम फला से कहते हैं कि हे हमारे कर्मों ' हम याद रखना, और है हमारे कर्मों के फ्लो । हमे स्मरण रखना क्योकि हमारी दृष्टि कभी कर्म और कर्म फन पर नहीं रही है, और ब्रह्म को ज्योति स कहते हैं कि हे ज्योति स्वरूप । अर्थात हे प्रकाश-स्वरूप देव हम समाग पर चला और मुक्ति के महान् ऐश्वय को प्राप्त करा क्योकि तू हमारे सभी फर्मों का ज्ञाता है, और हमारे पापो को क्षमा कर। तुये बहुत-बहुत नमस्कार, अर्थात तेरी वारम्बार वन्दना। ज्ञानी उप्स पुरुष को जानता है जो सूर्य में है और वह सत्ता है जो साक्षात ज्योति है। वह मैं हूँ। और निदाकाश जो निरपेक्ष तत्त्व है मैं हूँ, और ब्रह्म जो सवस्रष्टा । समाप्त हुई ईशावास्योपनिषद् जो महान् ब्रह्मविद्या है, अर्थात् महान् सप्टा की विद्या। [पूर्णमद , पूर्णमिद, पूर्गात् पूर्णमुदच्यते, पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते । [ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ] [ ॐ] केनोपनिषद् [सामवेदीय तलवकारोपनिषद] [ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि-वाक् प्राणश, चक्षु , श्रोत्रमयो वलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्व ब्रह्मोपनिषदम् । माह ब्रह्म निराकुर्याम् । मा मा ब्रह्म निराकरोत् । अनिराकरणमस्त्व निराकरणमस्तु। तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास् ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु । [ॐ शान्तिः शान्ति शाति] [मेरे अग पुष्ट हो-वाणी, प्राण चक्षु श्रोन, बल, और सभी इन्द्रियाँ । यह सब औपनिपद ब्रह्म है। में ब्रह्म का निराकरण' न करूं, ब्रह्म मेरा निराकरण न करे, कदापि न करे। निराकरण न हो, मेरा निराकरण न हो । उपनियदो म जो धर्म हैं वे आत्मा म निरत मुझ मे हो, वे मुझ मे हो।] ॐ केनेपित पतति प्रेपित मन केन प्राण प्रथम प्रति युक्त नेपिता वाचमिमा वदन्ति ? चक्षु श्रोत्र क उ देवो युनक्ति ? ॥१॥ अनु०-प्ररित मन किस के द्वारा प्रेरित होकर [विषयों पर पडता है ? प्रथम प्राण किस को प्ररणा से चलता है । विस से प्ररित होकर [प्राणी] यह वाणी बोलते हैं ? आँख और पान को कौन देव प्ररणा देता है । (१) व्या-प्रजापति रे जिगासुओ ने प्रजापति से पूछा नि मन किम सी आपा और प्रेरणा से किया करता और चलता है और प्राग जो सब रा मूल है किमी माना और निराकरण करना मत विमुख होना। ? 7 7 ३.] मिर अकार (फारसी) प्रेरणा से निया करता ओर चलता है, वाणो विम की आना और प्रेरणा से पाय वरती है, चक्षु और श्रोत्र क्मि देव के आदेश से अपना-अपना कार्य ररते हैं । [१] श्रोत्रस्य श्रोत्र, मनसो मनो, यद् वाचो ह वाच, स उ प्राणस्य प्राण , चक्षुपश् चक्षुरतिमुच्य धीरा प्रेत्यास्माल् लोकादमृता भवन्ति ॥२॥ अनु०-जो श्रोत्र का धोत्र है, मन का मन है, निश्चय ही वाणी को वाणी है, वहीं प्राण का प्राण है, चक्षु का चक्षु है। [ऐसा जानकर धीर पुरुष ससार से छूटकर अमर हो जाते हैं। (२) ध्या०-प्रजापति ने कहा-वान श्रवणो ने थवण की आज्ञा मे, मन मनो के मन से, वाणी वाणियो की वाणी से, प्राण प्राणा के प्राण स, चक्षु दृष्टिओ की दृष्टि से । जो कोई इस देवो वे देव को, जो ज्योतिआ की भी ज्याति है, जान लेता है, हे धीर और दृढ ज्ञानियो । वह इस शरीर को छाडने के पश्चात् अमर तथा मुक्त हो जाता है । [२] न तन चक्षुर् गच्छति, न वाग् गच्छति, नो मनो, न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् । अन्यदेव तद् विदितादयो अविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेपा, ये नस् तद् व्याचचक्षिरे ॥३॥ अनु०-वहां न चक्षु जाता है, न वाणी जाती है, न मन । हम नही जानते, हम नहीं समझते, कि उस का अनुशासन किस प्रकार करें। वह विदित और अविदित [अथवा विद्या और अविद्या] से ऊपर है। पूर्वाचार्यों से हमने ऐसा ही सुना है, जिन्हो ने हमारे लिए उस का व्याख्यान क्यिा था ।(३) च्या०-वह ऐगी गत्ता है जिस तक दृष्टि नहीं पहुंचती, जिम तक वाणी नही पहुंचती और जिरा तक मन नहीं पहुंचता। जो मन से नहीं जाना जा सकना और जो विद्या में नहीं जाना जा सकता उसे किम प्रकार ममयाया जा सकता वह ज्ञात तथा अज्ञात दानो के ऊपर है हम ने पूर्वाचार्यों से ऐसा ही सुना है । [३] 1इस मंत्र के अतिम वाक्य को सिर अक्बई में स्वतत्र, चौथे मत्र के रूप में परिगणित किया गया है, जिस के फलसस्य उपनिषद् के प्रथम खण्ड के मंत्रा की संख्या = के स्थान पर हो वाती है। अनुवाद में मूज म को ही मान्यता दी गयी है। + केनोपनिषद् [३१ यद् वाचाऽनम्युदित, येन वागभ्युद्यते, तदेव ब्रह्म त्व विद्धि, नेद यदिदमुपासते ॥४॥ अनु०-जो वाणी से प्रकाशित नही होता, जिस से वाणी प्रकाशित होती है, उसी को तू ब्रह्म जान, न कि इसे जिस की [लोक] उपासना करता है ।(४) व्या-जिम सत्ता तक वाणी नहीं पहुंचती और जो वाणी तक पहुँचती है उमी को तू ब्रह्म जान । और जो वाणी मे आ जाता है वह ब्रह्म नहीं है । वह असीम है, और जो वाणी में आ जाता है वह समीम है, योर जो मसीम होता है वह ब्रह्म नही यन् मनसा न मनुते, येनाहुर् मनो मतम् , तदेव ब्रह्म त्व विद्धि, नेद यदिदमुपासते ॥५॥ अनु० ०-जो मन से मनन नहीं करता जिस से मन मनन किया हुआ कहा जाता है, उसी को तू ब्रह्म जान, न कि जिस की [लोक] उपासना करता है । (५) व्या०-जिम सत्ता तक मन नहीं पहुंचना और जो मन तक पहुँचती है उसी को तू ब्रह्म जान । जो मन में आ जाता है वह ब्रह्म नहीं है। वह असीम है और जो मन में आ जाता है वह मसीम होता है और जो ससीम होता है वह ब्रह्म नहीं है। [५] यच् चक्षुपा न पश्यति, येन चक्षूपि पश्यति, तदेव ब्रह्म त्व विद्धि, नेद यदिदमुपासते ॥६॥ अनु०-जो चक्षु से नही देखता जिस से [लोक] चक्षुओ को देखता है, उसी को तू ब्रह्म जान, न कि जिस की [लोक] उपासना करता है । (६) व्या-जिस सत्ता तक दृष्टि नहीं पहुंचती और जो दृष्टि तक पहुंचनी है उमी को तू ब्रह्म जान । जो दृष्टि मे आ जाता है वह ब्रह्म नहीं है। वह असीम है और जो दृष्टि मे आ जाता है वह समीम होता है और जो ममीम होता है वह ब्रह्म नहीं है। [१] ३२] सिरै अवरर (पारमी) यच्छ्रोत्रेण न श्रृणोति, येन श्रोत्रमिद श्रुतम् , तदेव ब्रह्म त्व विद्धि, नेद यदिदमुपासते ॥७॥ अनु०-जो श्रोत्र से नहीं सुनता, जिस से यह श्रोत्र सुना जाता है, उसी को तू ब्रह्म जान, न कि जिस की [लोक] उपासना करता है । (७) व्या-जिस सत्ता तक थोत्र नहीं पहुंचना और जो थोत्र तक पहुंचती है, उसी को तू ब्रह्म जान । जो प्रोन म आ जाता है वह ब्रह्म नहीं है। वह असीम है और जो श्रोत्र में आ जाता है वह ससीम होता है, और जो समीम होता है वह ब्रह्म नहीं है । [७] यत् प्राणेन न प्राणिति, येन प्राण प्रणीयते, तदेव ब्रह्म त्व विद्धि, नेद यदिदमुपासते ॥८।। अनु०-जो प्राण से प्राणवान् नही है, जिस से प्राण प्राणवान् है, उसी को तू ब्रह्म जान, न कि जिस की [लोक ] उपासना करता है। (८) व्या-जिस सत्ता तव प्राणा की क्रिया नहीं पहुंचती, और जो प्राण तक पहुंचता है और जिस म प्राण क्रिया करता है उसी वो तू ब्रह्म जान । जिस तर प्राण की प्रिया पहुंचती है वह ब्रह्म नहीं है। वह असीम है जिस तर प्राण की त्रिया पहुँचती है वह समीम है और जो गगोग है वह ब्रह्म नहीं है। [4] ।। इति प्रथम खण्ड ।। यदि मन्यसे सुवेदेति, दभ्रमेवापि नून त्व वेत्य ब्रह्मणो रूपम् । यदस्य त्व यदस्य च देवेप्वय नु मीमास्यमेव ते । मन्ये विदितम् ॥१॥ अनु०-यदि तू मानता है कि अच्छी तरह जानता हूँ, तो तू ब्रह्म के रूप को निश्चय ही थोडा ही जानता है । इस का जो [रूप] तू है और इस का जो रूप देवताओ मे है वह निश्चय ही तेरे जानने योग्य है। मैं जान गया । (१) व्या-हे शिष्य । यदि तू समझता है कि तेरा गुरु बहुत अच्छी तरह समझ गया है, तो तेरी यह ममय कुछ नहीं है क्योकि तूने अपन पो अपने गुरु को और अपने गुरु वेनोपनिषद [ ३३ की ममय वो अलग-अलग पहचाना । उत्तम ममझ यह है कि तू स्वय को ब्रह्म जाने । हे शिष्य | चाहिए कितू ज्ञान ज्ञाता, तथा ज्ञात को बस एक समझे। यदि तू ब्रह्म को साकार तया देवताआ मे से किमी पर आश्रित जानता है, तो यह भी भ्रम है क्याकि वह सब म है। यदि दू ने समय लिया है कि वही मैं हूँ, तो यही सत्य है । समया' [१] वही ब्रह्म नाह मन्ये सुवेदेति, नो न वेदेति वेद च । यो नस् तद् वेद तद् वेद, नो न वेदेति वेद च ॥२॥ अनु०-मैं न तो यह मानता हूँ कि भली भाति जानता हूँ और न यही समझता हूँ कि नही जानता। हम में से जो उसे जानता है उसे [इस प्रकार]जानता है-'न तो नही जानता हूँ और [न] जानता हूँ।(२) व्या-शिष्य ने कहा, मैं नहीं समझा। गुरु ने कहा, यदि तू नही समया तो न ने कैमे कहा था कि मैं नही समझा ' क्योकि तेरे ऐसा कहने से ही विदित होता है कि तू ने अपने को जान लिया है, और अन्यथा कहा कि मैं ने नहीं जाना है। अस्तु तुझे दो चस्तुभा का ज्ञान हुआ-एक अपना दूसरे अपने को न जानने का। इस प्रकार तुझ मे दोना ज्ञान सिद्ध हुए। और ज्ञान ही साक्षात ब्रह्म है। अत तू इब कहता है कि मैं ने ब्रह्म को नहीं जाना, तब तू ने ब्रह्म को जान लिया। [२] यस्यामत तस्य मत, मत यस्य न वेद स । अविज्ञात विजानता, विज्ञातमविजानताम् ॥३॥ अनु०-जिस को अज्ञात है उसी को ज्ञात है, जिस को ज्ञात है वह उसे नहीं जानता। 'विज्ञानियो के लिए अज्ञात है 'अज्ञानियों के लिए विज्ञात । (३) व्या-इम गोष्ठी के बीच जिस में हम बैठे हैं, जो अपने को कहता है कि मैं ने नहीं जाना है उस न जानने वाले ने उतना ही अधिक जाना है और जो कहता है कि मैं ने जान लिया है उम ने नहीं जाना है, क्योकि बुद्धि को उस तक पहुंच नहीं है। जिस ने नहीं जाना उसने जाना और जिम ने जाना उस ने नही दाना । और जिम ने माना उस ने वणन नहीं किया और ३४] सिरे अवयर (फारमी) जिम ने वर्णन किया उम ने नहीं जाना । उम वा न जानना ही शान है और जानना दी अज्ञान । [३] प्रतिबोधविदित मतममृतत्व हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्य, विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥ अनु०-[जो उसे] प्रत्येक चोध मे जानता है वह अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। आत्मा से बल प्राप्त होता है, विद्या से अमरत्व प्राप्त होता है। (४) व्या०-जिस ने इस प्रकार समया वह अमर हो गया, यह मुक्त हो गया, और अपने ऐश्वर्य और बल की पूर्णता को प्राप्त हो गया। और यह जो कहा गया है कि ज्ञान मुक्ति का कारण है वह यही है। मान है अपने-आप यो पहवानना, और मुक्ति है अपने- आप वो प्राप्त करना। [४] इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति, न चेदिहावेदीन् महती विनष्टिः । भूतेषु भूतेषु विचित्य धीरा. प्रत्यास्माल् लोकादमृता भवन्ति ।।५।। अनु०-यदि इस जन्म मे जान लिया तो ठीक, यदि इस जन्म में न जाना तो भारी विनाश । धीर पुरुष [उसे] समस्त प्राणियों में उपलब्ध कर के ससार से छूट कर अमर हो जाते है । (५) व्याः यदि तू ने इस प्रकार जाना तो तू सत् और सत्य है, और यदि तूने इस प्रकार नहीं जाना तो तू असत् और मिथ्या है। जिस ने उसे सब में जाना, वह इस जगत् को त्याग कर मुक्त और अमर हो गया। [५] ॥ इति द्वितीय खण्ड ॥

येनोपनिषद [ ३५ ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये। तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ॥१॥ अनु०-ब्रह्म ने देवताओ के लिए विजय प्राप्त की। उस ब्रह्म की विजय म देवताओ ने गौरव प्राप्त किया । (१) प्पा.-जब देवो और असुरो म बवडा और युद्ध हुआ और देवा की विजय हुई तो देवताओ ने जाना कि विजय उ हा ने की है यद्यपि इस विजय को ब्रह्म ने उहे प्रदान दिया था। [१] त ऐक्षन्त-अस्माकमेवाय विजयो, ऽस्माकमेवाय महिमेति । तद्धपा विजज्ञो, तेभ्यो ह प्रादुर्वभूव । तन् न व्यजानत किमिद यक्षमिति ॥२॥ अनु०-उन्हा ने सोचा-हमारी ही यह विजय है, हमारी ही यह महिमा है। [वह ब्रह्म] उन के इस [अभिप्राय] को जान गया, उन के प्रति प्रादुभूत हुआ। [वे] न जान सबै कि यह यक्ष (पूज्य) कौन व्या--सप्टा ने जाना कि इन (देवी) के मन मे अभिमान उत्पन हो गया है। प्रत्येक देवता एक दूसरे मे समझने वूझने लग गया और उन मे झगडा-बखडा खडा हो गया। प्रत्येक यही कहना था कि यह विजय उरा ने ही की है। सप्टा उन के यगड को समाप्त करने के निमित्ति एक अदभुत पुस्प के रूप मे जो पून्य (यक्ष) था प्रकट हुआ। देवो ने उसे नहीं पहचाना । [२] तेऽग्निमब्रुवन -'जातवेद । एतद् विजानीहि किमिद यक्षम्' इति । तथा' इति ॥३॥ अनु०-उन्हो ने अग्नि से कहा- हे सवज्ञ ! पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है ? [उस न कहा-] बहुत अच्छा । (३) दवनाओं को असुरों पर विजय की प्रारथायिका बृहदारण्यकोपनिषद् (१३:०) में द्रव्य है। २ मूज अथ (सिरें अबर) में इस वाक्य का उत्तराई द्वितीय मनका पूर्वाद है।

३६] मिर अपयर (फारसी) ध्या-अग्निदेव म, जिम का प्रकाश उन वा तथा समस्त प्राणियों का मार्गदर्शक है, देवा ने जा पर पहा दि हे मार्गदर्शक अग्ने ! जा कर सात कर दि यह जो नया- नया प्रस्ट हुआ है, कौन है ' अग्नि न स्वीकार कर लिया। [३] तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत्-'कोऽसि' इति ? 'अग्निर् वा अहमस्मि' इत्यववीज्, 'जातवेदा वा अहमस्मि' इति ।।४।। अनु०-[अग्नि] उस के पास गया, उस [ब्रह्म] ने उस [अग्नि] रो पूछा-'तू कौन है ?' 'मैं अग्नि हूँ, उस ने कहा, 'मैं निश्चय ही सर्वज्ञ व्या०- -[अग्नि] गया। परन्तु उस पूज्य (यदा) से कुछ न पूछ मका। राब यक्ष ने अग्नि म पूटा-नू पोन है ? [अग्नि ने] उत्तर दिया-मैं अग्नि हूँ, प्रकाश करन वाला। [४] 'तस्मिस् त्वयि किं वीर्यम् ?' इति । 'अपीदछ सर्व दहेय यदिद पृथिव्याम्' इति ॥५॥ अनु०--[तब ब्रह्म ने पूछा-] 'उस तुझ मे सामर्थ्य क्या है?' [अग्नि ने कहा-] 'पृथिवी में यह जो कुछ है उस को जला सकता हूँ। (५) ध्या- यक्ष ने पूछा कि तुझ म क्या शक्ति और सामय्यं है। अग्नि ने यहा वि मुस म यह सामर्थ्य है कि मैं सब कुछ भम्म कर सकता हूँ। [५] तस्मै तृण निदधौ-'एतद् दह' इति । तदुपप्रेयाय । सर्व- जवेन तन् न शशाक दग्धुम् । स तत एव निववृते-'नंतदशक विज्ञातु यदेतद् यक्षम्' इति ।।६।। अनु०-[ब्रह्म ने] उस [अग्नि] के लिए एक तिनका रख दिया (और, कहा- 'इसे जला'। [अग्नि] रसू तृण के समीप गया । [परन्तु] अपन सारे वेग से भी उसे जलाने में समर्थ नहीं हुआ। वह तत्काल लौट आया और बोला- 'यह नही जान सका कि यह यक्ष कौन केनोपनिपद् [ ३७ व्या०-यक्ष ने घाम का एक तिनका उखाड कर उम के समक्ष रख दिया और कहा-इसे जला। अग्नि ने ममस्त शक्ति और सामर्थ्य जो उम में थी, उस तिनके के जलाने के लिए लगा दी, [परन्तु] उस एक तिनके को न जला मका, लज्जित हो गया। [वह] देवो के पास आ कर बोला-मैं इस विचित्र प्राणी को नहीं जान सकता। [६] " अथ वायुमब्रुवन्-'वायवेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षम् इति । 'तथा' इति ॥७॥ अनु०-तदनन्तर, [उन देवताओ ने] यायु से कहा-'हे वायो । पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है ?' [उस ने कहा-] बहुत अच्छा' । (७) व्या०—देवता वायु के पास जा कर बोले, 'हे वायो । तू जा कर इस अद्भुत पुरुष (यक्ष) का पता लगा कि यह कौन है ।' [७] तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत्-'कोऽसीति' ? 'वायुर् वा अहम- स्मि' इत्यव्रवीन्, 'मातरिश्वा वा अहमस्मि' इति ॥८॥ अनु०-[वायु] उस के पास गया। उस ने वायु से पूछा-'तू कौन है ?' 'मैं वायु हूँ उस ने कहा, 'मैं निश्चय ही मातरिश्वा (अन्तरिक्षगामी) व्या०-वायु स्वीकार कर यक्ष के सम्मुख गया और उस से कुछ पूछ न सका। तब यक्ष ने यायु से पूछा तू कौन है' [वायु ने] उत्तर दिया कि मैं वायु हूँ और मैं आकाण और पृथ्वी के बीच भ्रमण करने वाला हूँ। [८] 'तस्मिस् त्वयि किं वीर्यम् ?' इति । 'अपीदभ्सर्वमाददीय यदिद पृथिव्याम्' इति ॥९॥ अनु०-[तब ब्रह्म ने पूछा-] 'उस तुझ मे क्या सामर्थ्य है [वायु ने कहा-] 'पृथिवी मे यह जो कुछ है उस को ग्रहण कर सकता 71 व्या-यक्ष ने पूछा कि तुम में क्या शक्ति और सामर्थ्य है। घायु बोला कि मै मब को उठाने और उडा देने वाला हूँ। [१] ३] सिर अप्वर (फारमी) तस्मै तृण निदधौ-'एतदादत्स्व' इति । तदुपप्रेयाय । सर्वजवेन तन् न शशाकादातुम् । स तत एव निववृते-'नंतदशक विज्ञातु यदेतद् यक्षम्' इति ॥१०॥ अनु०-[ब्रह्म ने] उस [वायु] के लिए एक तिनका सखा [और कहा-] 'इसे ग्रहण कर ।' [वायु] उस [तृण] के समीप गया। [परन्तु] अपने सारे वैग से भी वह उसे ग्रहण करने में समर्थ न हुआ। वह तत्काल लौट आया [और बोला-] 'मैं यह नहीं जान सका कि यह यक्ष कौन व्या- यक्ष ने पूर्व की भाति पाय वा एक तिनवा उसाड पर उस वे मामन एप दिया और कहा कि इसको उठा : प्रवहमान वायु में जितनी भी शक्ति और मामर्थ्य थी उसे उस ने उम तिनये उठाने म और उदाने में लगा दिया, परन्तु घास की उस एक पत्ती को उहा न सका। [वह ] लज्जित हो कर देवताओं के पास मा कर बोला कि मैं इस प्राणी को नहीं जान सरता । [१०] अथेन्द्रमब्रुवन्-'मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षम्' इति । 'तथा' इति । तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोदधे ।।११।। अनु०-तदनन्तर [देवताओ ने] इन्द्र से कहा-'मघवन् (बलशालि) पता लगाओ कि यह यक्ष कौन है ।' [उस ने कहा-] 'वहुत अच्छा' [वह] उस के पास गया। [किन्तु वह] उस [इन्द्र] के सामने से तिरोहित हो गया। (११) ३. व्या--देवता इन्द्र के पास जा कर बोल है महाराज! आप जा कर इस प्राणी का पता लगाये कि यह अद्भुत यक्ष गया है। इद्र स्वीकार कर यक्ष के निकट गया और इन्द्र के वहां पहुंचते ही इससे पूर्व कि इन्द्र कुछ पूषे वह मक्ष मकस्मात् अन्तर्धान हो गया। [११] ? केनोपनिषद् स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाधहैमवतीम् । तामहोवाच-'किमेतद् यक्षम् ।' इति । ॥१२॥ अनु०- वह [इन्द्र] उसी आकाश मे [जिस में यक्ष अन्तर्धान हुआ था] एक अत्यन्त शोभामयी, सुवर्णाभूषणभूपिता (अथवा हिमालय की पुत्री) स्त्री उमा (पार्वतीरूपिणी ब्रह्मविद्या) के पास आया। वह उस [स्त्री] से वोला-'यह यक्ष कौन है ?' (१२) व्या०–इन्द्र ने यक्ष के स्थान पर एक मुन्दर स्त्री को देखा, जिस का नाम उमा था और जो महादेव की स्त्री और शक्ति पार्वती के समान थी । इन्द्र ने उस स्त्री से पूछा कि यह अद्भुत पुरुष जो अभी इमी स्थान पर था और अन्तहित गया पौन था । [१२] ॥ इति तृतीय खण्ड ॥ सा 'ब्रह्म' इति होवाच, 'ब्रह्मणो या एतद् विजये महीयध्वम्' इति । ततो हैव विदाग चकार-ब्रह्मेति ॥१॥ अनु०-उस [विद्यादेवी] ने कहा-'ब्रह्म, तुम ब्रह्म के ही विजय मे महिनान्वित हुए हो।' तभी से [इन्द्र ने] जाना कि यह ब्रह्म है । (१) -उस स्त्रीने जिम का नाम उमा था कहा कि वह ब्रह्म अर्थात् सृष्टिकर्ता था। और असुरो पर जिम विजय का श्रेय तुम सब अपने लिए समझे थे और जिस विजय से प्रसन्न हुए थे उम विजय का देने वाला यही था। इन्द्र ने जान लिया कि यह यक्ष ब्रह्म था। [१] तस्माद् वा एते देवा अतितरामिवान्यान् देवान् यदग्निर् वायुरिन्द्रस्, ते ह्येनन् नेदिष्ठ पस्पृशुस्, ते ह्येनत् प्रथमो विदान चकार-ब्रह्मेति ॥२॥ अनु०-इसी लिए ये देवता-अग्नि, वायु, और इन्द्र-अन्य देवताओ से बढ कर हुए, क्योकि उन्हो ने इस समीपस्थतम [ब्रह्म] का स्पर्श किया था, उन्हो ने ही उसे पहले जाना था-यह ब्रह्म है । (२) + ४०] मिर अगर (पारमी) ध्याo-इसी वारण यह तीनो देवता-अग्नि, वायु, और इन्द्र, महा शं प्राप्त हुए और महान् देवता बन गये। इन तीनो देवा मे भी इन्द्र मव स श्रेष्ठ हुमा मयोनि उसी ने सर्वप्रथम यक्षरुपी ब्रह्म को समया। [२] तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवान्यान् देवान्, स ानन नेदिष्ठ पस्पर्श, स ह्येनत् प्रथमो विदाञ् चकार-ब्रह्मेति ॥३॥ अनु०-इसी लिए इन्द्र अन्य देवताओ से बढ कर हुआ; क्योंकि उसी ने इस समीपस्थतम [ब्रह्म] का स्पर्श किया था, उसी ने पहले जाना था यह ब्रह्म है । (३) व्या-इन त्रिदेवा म इन्द्र सर्वश्रेष्ठ हुए, क्यापि सर्वप्रयम उन्ही ने यह ज्ञान प्राप्त किया कि यह यक्ष ब्रह्म है । [३] तस्यप आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यातदा ३ इतीन ग्यमीमिपदा ३ इत्यधिदैवतम् ।।४।। अनु०--उस [ब्रह्म] का यह आदेश (उपमोपदेश) है कि यह विजली कोंधी-ओह ।। [उस से] पलक झपर गयी-ओह ।।। यह [उस बहा का] अधिदैवत रूप है । (४)* ब्या-और वह वेद उसी यक्ष की वाणी है जो विद्युत् के समान इन्द्र की दृष्टि से तिरोहित हो गया। समस्त इन्द्रियो म वही जीवात्मा ब्रह्मरूपो विद्युत् के रामान है जो पुरुप के रूप में प्रकट हुई थी। [४] १ पादेश का शव्दार्थ है उपदेश अथवा वर्णन। उपनिषद् में यह शब्द उपमान का श्राश्रय लेकर किये गये उपदेश प्रथया वर्णन के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। शकराचार्य के अनुसार, 'निरुपम ब्रह्म का रिस उपमान से उपदेश दिया जाय यह प्रादेश कहा पाता है' (निरुपमस्य ब्रह्मणो येनोपमानेनोपदेशः सोऽयमादेश इन्युत्यने) । २ यह एक रहस्यमय मन है जिस का अनुवाद कठिन है। शकर भाष्य के आधार पर इस का अनुवाद यो किया जा सकता है-'उस [व] का यह आदेश (उपमोपदेश) है कि जो बिजली की चमक के समान तथा पला मारने के समान प्रादुर्भूत हुआ, यह अधिदैवत रूप है।' बह की उपमा विद्युत् से बृहदारपयकोपनिषद् २ ३.६,१८ राया मैत्रायण्युपनिषद् १५ में भी दृष्टव्य है।

केनोपनिषद् [४१ अथाध्यात्म यदेतद् गच्छतीव च मनो ऽनेन चैतदुप स्मरत्यभीक्ष्ण सङ्कल्प ॥५॥ अनु०-अब अध्यात्म [ विषयक आदेश] है कि यह मन म जाता-सा है और इसी से यह (मन) निरतर स्मरण करता रहता है। [यह] सकल्प है। तद्ध तद्वन नाम। तद्वनमित्युपासितव्यम । स य एतदेव वेदाभि हैन सर्वाणि भूतानि सवाञ्छन्ति ।।६।। अनु०-उसी [ब्रह्म] का तद्वन' नाम है। उम को तद्वन [नाम] से उपासना करनी चाहिए। जो इसे इस प्रकार जानता है उसे सभी भूत भली भाति चाहने लगते है । (६) व्या०—मनुष्य के शरीर से वही मन तो गतिमान प्रकाशन तथा इछावान है वही ब्रह्म है जो अदभत पुरुष के रूप में प्रकट हुआ और जिम की इछा से उमा उत्पन्न हुई थी। वही मन जो जीवामा से एक (अन य) है उस को ब्रह्म समझ कर उस की साधना करता है। तो इस शिक्षा को जिम का वणन किया गया है जानता है मन तथा जीवामा को ब्रह्म जान कर साधना करता है वह समस्त प्राणियो का मिन्न हो जाता है। [५६]२ उपनिपद भो । ब्रूहि इति । उक्ता त उपनिपद ब्राह्मी वाव त उपनिपदमब्रूम इति ॥७।। अनु०-हे [गुरो] ' उपनिषद कहिए। [गुरु ने कहा हम ने तुझ से उपनिषद कह दी निश्चय ही हम ने तुझ से ब्राह्मी उपनिषद कही । तदन एक रहस्यमय पद है जिस का अनुवाद कठिन है। शकर इस का य करते हैं- तस्य बन तद्वनम्। बननीय सभजनीयम् । यत तद्न नाम । अर्थात् बह्म का धननीय भजनीय होना । २ मूल ग्रथ (सि. य०) में मत्र ५ और ६ को ब्यारया एक साथ की गयी है।

४२] सिर अवदर (पारमो) - व्या-सब देवता इन्द्र से जो सभी का राजा है बोले कि उपनिषद् का, जिसमें द्वारा हम इस साधना को जाने और समय उस श, हम उपदंश कीजिए। [५] तस्य तपो, दम , कर्मेति प्रतिष्ठा, वेदा. सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥५॥ उस (ब्राह्मी उपनिषद्) को तप, दम, कर्म प्रतिष्ठा (आधार) है, वेद सारे अग हैं, और सत्य आयतन (निवास-स्थान) है । (८) व्या०-इन्द्र ने कहा, तप करो, इन्द्रिय-निग्रह करो, सत्यम निरन्तर पेदानुसार करते रहो, वदाध्ययन करो, और जो वेद विहित है उसे करते रहो, और सत्य था, जो सब का मूल है, सदैव याचरण करते रहो। यही उपनिपद् है, अर्थात् सन्मार्ग- दर्शक । [-] यो वा एतामेव वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्ग लोके ज्येये प्रतितिष्ठति प्रतितिष्ठति ॥९।। अनु०-निश्चय ही जो इस [उपनिषद्] को इस प्रकार जानता है [वह] पाप का नाश करके अनन्त और महान् स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है, प्रतिष्ठित होता है। (९) व्या-जो कोई इम उपनिषद् को जानता है, वह अपन ममस्त पापो को दूर कर के परग गद को प्राप्त कर लेता है और परम पद म प्रतिष्ठित हो जाता है । [१] अथववेदीय वेनोपनिषद समाप्त हुई । ॥ इति चतुर्य खण्ड ॥ [ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक्, प्राणश्, चक्षु, श्रोत्रमयो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि । सर्व ब्रह्मोपनिषदम् । माऽह ब्रह्म निराकुर्याम् । मा मा ब्रह्म निराकरोत् । अनिराकरणमस्त्व- निराकरणमस्तु । तदात्मनि निरते य उपनिपत्सु धर्मास् ते मयि सन्तु, ते मयि सन्तु।] । ॐशान्नि | शान्नि || शान्ति !

कठोपनिषद् [कृष्णयजुर्वेदीय-कठशाखीय ] प्रथमो ऽध्यायः प्रथमा वल्ली' [ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विपावहै । ॐशान्ति । शाति ।। [वह परमात्मा] हम [आचाय और शिप्य] दाना को साथ-साथ रक्षा करे। हम दोना का साथ-साथ पालन करे। हम साथ-माय [विद्या सम्बन्धी] सामयं प्राप्त यर । हम दोना का पढ़ा हुआ तेजस्वी हो। हम द्वप न कर । त्रिविध ताप की शान्ति हो । ॐ उशन् ह वै वाजश्रवस सर्ववेदस ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥१॥ अनु०-प्रसिद्ध है कि यज्ञ पन के इच्छुक वाजश्रवा के पुत्र न [विश्वजित् यज्ञ म] अपना सारा धन दान कर दिया। उस वा नचिवेता नामर एक पुत्र था। (१) मिया बाजधवम नाम एप पीश्वर रा है। एक या होता है जिम म पो कुछ भी पाम भ होता है उम दान कर दिया जाता है। ऐ7 पनपा अनुष्णन पर उसने अपनी सारी सम्पत्ति बच पर और गायें पर सब बीमत्र प्राह्मणा रोदे रासी। पह गायें रिहे उग ने ब्राह्मणा मोदी पद की सब हो और बार पी। इस ऋषीश्वर से नचिकेता नामक एक पुत्र था। [1] यहाँ दी हुई पाण्यापिका किन्चित् भेद क माय तिरीप गामण (1115 १)सकी गयी है। सि.."सिरे प्राप, निपदों की फारसीयाया।

४४ ] मिर अक्वर (फारमो) तह कुमार सन्त दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाऽविवेश । सोऽमन्यत-२॥ अनु०-जिस समय दक्षिणाएँ (दक्षिणास्वरुप गाय) ले जायी जा रही थी, उस मे कुमार होते हुए भी श्रद्धा (आस्तिक्यमुदि) का आवेश हुआ। वह सोचने लगा-(२) मि०अ०-यद्यपि वह छोटा और अल्पवयस्क था, तथापि जब उस ने देखा कि उस वे पिता ने ऐमी गाये ब्राह्मणा को दान करने के लिए मगायी है जो अब बच्चा भी नहीं दे सक्ती तब उस वे मन म आया कि मेरा पिता ऐसी गायें लोगा यो दान देगा तो अच्छा नही होगा। [२] पीतोदका, जग्धतृणा, दुग्धदोहा, निरिन्द्रिया, अनन्दा नाम ते लोकास् तान् स गच्छति ता ददत् ।।३।। अनु०-जो जल पो चुकी हैं, जिन का घास खाना समाप्त हो चुका है, जिन का दूध दुह लिया गया है, और जिन मे प्रजनन-शक्ति का भी अभाव हो गया है उन गायो कर दान करने से वह दाता, जो अनन्द (आनन्दशून्य) लोक है, उन को जाता है । (३) सि०अ०-यह (पिता) अच्छे फल की इच्छा करता है किन्तु इस प्रकार की गाया का दान करने से ऐसे लोर को प्राप्त होगा जहाँ अच्छा फल और आनन्द नहीं प्राप्त करेगा। [३] स होवाच पितर-'तत । कस्मै मा दास्यसि ?' इति । द्वितीय, तृतीयम् । त होवाच-'मृत्यवे त्वा ददामि' इति ॥४॥ अनु०--तब वह अपने पिता से बोला-'हे तात | आप मुझे किस को दंगे' [इसी प्रकार उस ने] दूसरी-तीसरी बार [भी कहा] । तब [पिता ने] उस से कहा-'मैं तुझे मृत्यु को दूंगा'। (४) सि०अ०-~फिर उस के हृदय म यह बात आयी कि उस (पिता) के पास जो कुछ था उस में दान कर दिया यदि मुये भी भगवान् की राह मे दान वर दे तो सम्भव है वठोपनिषद् [ ४५ कि अच्छा फल प्राप्त करे। इस भावना से वह पिता के पास जा कर बोला-है पित । आप मुझे किसे दान करेंगे? जब पिता ने उत्तर नहीं दिया, तो पुन ने यह बात तीन बार दुहरायी। पिता रुष्ट हो कर बोला-जुझे यमराज को दूंगा। [४] वहूनामेमि प्रथमो, बहूनामेमि मध्यमः । किछ स्विद् यमस्य कर्तव्य यन् मयाऽद्य करिष्यति ॥५॥ अनु०- o-[नचिकेता का अनुताप-] मैं बहुत से [शिष्य या पुत्रो] मे तो प्रथम (मुख्य वृत्ति से) चलता हूँ और बहुतो मे मध्यम (मध्यम वृत्ति से) जाता हूँ। यम का ऐसा क्या कार्य है जिसे [पिता] आज मेरे द्वारा सिद्ध करेगे ? (५) सि०अ०--पिता से यह सुन कर नचिवेता हृदय मे विचारने लगा कि मैं अपने पिता वे सभी शिप्यो और पुत्रो में श्रेष्ठतर हूं, मेरा क्या अपराध है वि पिता ऐसा बोले । और मुझे यमराज को दे डालने से उन्हे कौन सा लाभ पहुंचेगा? [५] 'अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे- सस्यमिव मर्त्य पच्यते, सस्यमिवाजायते पुन.' ॥६॥' अनु०-[नचिकेता ने पिता से कहा-] 'जिस प्रकार पूर्व पुस्प व्यवहार करते थे उस का विचार कीजिए तथा जैसे वर्तमानकालिक अन्य लोग प्रवृत्त होते है उसे भी देखिए । मनुष्य खेती की भांति पकता (वृद्ध हो कर मर जाता) है और खेती की भांति फिर उत्पत हो जाता है ।' (६) मि.--पिता ने रोष मे आकर ऐसी बात मुंह से निकाली अवश्य थी किन्तु वह उम से चिन्तित भी हो गया था। नचिकेता ने उसे चिन्तित पा कर कहा- हे पित। आप अपने पूर्वजो की ओर दृष्टि ले जायें, जिन्हो ने जो कुछ कहा उम से फिरे नही। आज भी सत्पुरुषो को यही परम्परा है। जो कुछ उत्पन्न हुआ है अन्तत नश्वर है । अतएव उत्पन्न अनाज पकता है, उस के पश्चात् सूख जाना है। [1] , मोजाना रूम के इस पद्य से मिलान कीजिए- 'हफ्त सद हाताद माजिब दीदः चम हन्चु समाः बारहा रोईदा घम' श्रर्थात् 'मैने ७७. योनिओं देखी हैं और वनस्पति के समान पुनः पुनः उत्पन्न हुमा हूँ।'

४६] सिर अबसर (पारसी) 'वैश्वानर प्रविशत्यतिथिर् ब्राह्मणो गृहान् । तस्यता शान्ति कुर्वन्ति, हर वैवस्वतोदकम् ॥७॥ अनु०-[यमराज के घर जा कर नचिकेता उपेक्षित रहा। तब लोगो ने यम से कहा-] ब्राह्मण-अतिथि हो कर अग्नि ही घरो म प्रवेश करता है। [साधु पुरुष] उस अतिथि की यह [अध्य-पाद-दानरूपा] शान्ति किया करते है। {अत ] हे वैवस्वत (विवस्वान् की सन्तान) । [इस ब्राह्मण अतिथि नचिकेता को शाति के लिए] जन ले जाइए । (७) मिअ-इस अनाधार जगत का यही व्यवहार है । अत' आप ने यह जो कहा है वि तुझ यमराज को दान कर दूगा मुझ उस दान कीजिए और असत्यभाषी न बतिर। पिता ने कहा----मैं न तुप पमराज के पास भज दिया। ननिकेता गमराज के पास गया। जब वह यमराज के घर पहुचा तो यमराज पर म नहीं था कहीं गया हुआ था। नचिक्ता तीन दिन उस के पर पर रहा और कुछ भी नहीं खाया पिया। जब यमराज अपने घर लौटा तो उसके घरवालो ने उस स कहा--जो ब्राह्मण किसी य पर अतिथि हाता है वह अग्नि के समान होता है जिसे शुथूपा के जल से शात करना चाहिए । आप उस से कुशल-क्षम पूछिए उस की गुश्रूषा कीजिए और पांव पखारने के लिए जल लीजिए। [७] 'आशाप्रतीक्ष, सगत सूनृता च, इष्टापूर्ते, पुत्रपशूधश् च सर्वान्- एतद् वृक्ते पुरुपस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन् वसति ब्राह्मणो गृहे ॥८॥ अनु०-- जिस के घर में ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस मद बुद्धि पुरुष को आशा प्रतीक्षा सम्बन्ध, प्रिय वाणी, [यागादि] इप्ट कम [उद्यानादि] पूत कर्म पुत्र, और पशु सभी को वह नष्ट कर देता सि०अ०-जिस मूष के पर ब्राह्मण अतिथि होता है और भूखा रहता है और वह ब्राह्मण की मेपा शुथपा नहीं करता उस स आशा दूर हो जाती है जो बस्तु प्राप्त कठोपनिषद [४७ होने वाली होती है वह हाथ नहीं आती, और वह सत्संग के पुण्य से वचित हो जाता है । और यदि वह स्वय भी अच्छी बात कहता है तो हृदयों में उस रा प्रभाव नहीं होता, वह यज्ञ और दान के फल से भी बचित रह जाता है उम की मतान और सम्पत्ति भी कम हो जाती है और वह इस प्रकार की विपत्तियो म फैम जाता है। [८] 'तिस्रो रात्रीर् यदवात्सीर् गृहे मे अनश्नन् ब्रह्मन्नतिथिर् नमस्य । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन् । स्वस्ति मेऽस्तु, तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीप्व' ॥९॥ अनु०-[तब यम नचिकेता से बोला-] हे ब्रह्मन् । तुम्हे नमस्कार हो, मेरा कल्याण हो। तुम नमस्कार-योग्य अतिथि हो कर भी मेरे घर मे तीन रात्रि तक विना भोजन क्येि रहे, अत उस [तीन रानिया के लिए [मुझ से ] तीन वर मांग लो। (९) सि०अ०-यमराज यह मुन कर नचिकेता के पास गया और बोला-है पूज्य प्राह्मण! हे प्रिय अतिथि | तुम जो हमारे घर पर तीन दिन भूखे-प्यासे रहे मेरा यह पाप क्षमा करो, तुम्हे मेरा नमस्कार तुम्हारे प्रताप से मेरे पाप दूर हो और मुन सुख-समृद्धि प्राप्त हो। यत तुम मेरे घर पर तीन रात भूखे रहे जो वर चाहो वह मांगो। [२] 'शान्तसकल्प मुमना यथा स्याद् वोतमन्युर् गौतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्ट माऽभिवदेत् प्रतीत- एतत्त्रयाणा प्रथम वर वृणे' ॥१०॥ अनु०-[नचिकेता बोला-] 'हे मृत्यो। जिस से मेरे पिता वाजश्रयस मेरे प्रति शान्तसक्ल्प, प्रसन्नचित्त, और क्रोधरहित हो जायं तथा आप के भेजने पर मुझे पहचान कर बातचीत करे-यह [मैं] तीन वरो मे से पहला वर मांगता हूँ।' (१०) सि०अ०-नधिोता ने रहा--मेरे पिता का मेरे आप से पाग आ जाने से जो यह सोच पर दुग हुआ है नि मेरा हाल क्या होगा उस दुख को आप उन मे दर पर मिरे अमबर (फारमी) उन्ह प्रमन्नचित्त कर दें, मेरे पिता को मेरे प्रति जो रोप उत्पन्न हुआ था उस से भी मेरे पिता को मुक्त कर दें, और मुझे पिता के पास दापस भेज दें। इस प्रकार भेजें कि मेरे पिना यह न समझें कि मैं आप के पास न आ कर रास्ते से ही लौट गया है, और वे जानें कि आप ने मुझे पिता के पाम वापस भेजा है। हे यमराग। यह मेरा एप वर है । [१०] 'यथा पुरस्ताद् भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर् मत्प्रसृष्ट । मुख रात्री शयिता वीतमन्युस् त्वा ददृशिवान् मृत्युमुखात् प्रमुक्तम् ॥११॥ अनु०-[मृत्यु ने उत्तर दिया-] 'मुझ से प्रेरित होकर अरणपुत्र उद्दालक-पुत्र पाजश्रवस तुझे पूर्ववत् पहचान लेगा और क्रोधरहित हो कर रात्रिओ में सुखपूर्वक सोयेगा, [यह सोच कर कि उस ने] तुझे मृत्यु के मुख से छूट कर आया हुआ देखा ।' (११) मि०२०-यमराज ने कहा-तेरा पिता मेरे वचन से पुन प्रसन्न हो जायगा जैसा कि वह तुझ से पहले प्रमन्न था और उम का क्रोध दूर हो जायगा और मृत्यु के मुख से पूट हुए तुम को देय र प्रसन्नचित्त हो जायगा। तेरा यह वर पूर्ण हुआ। [११] 'स्वर्ग लोके न भय किंचनास्ति, न तत्र त्व, न जरया विभेति । उभे तीवोऽशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१२॥ अनु०-[प्रथम वर मांगते हुए नचिकेता बोला-] 'स्वर्गलोर में कुछ भी भय नही है, वहां आप भी नहीं होते, और न वहाँ [कोई] वृद्धावस्था में ही डरता है। स्वर्गलोक में [पुरुष] भूख-प्यास दोनो यो पार पर ये, गोर से कार उठ पर, आनन्दित होता है।' (१२) मि.--नविरेता बाला-वर्गलोर में कोई भय नहीं है पावि आप ममरान पा उम में प्रवेश नहीं है। उग रवां में उरावस्था से भी चिन्ता नहीं है। यहाँ पुग्ण शुषा हो पर मदा आनन्द म रमण पलं है। [१२] सृपा नया शोर कठोपनिषद [ ४९ स त्वमग्नि स्वयंमध्येपि मृत्यो प्रब्रूहि त्वछ श्रद्दधानाय मह्यम्, भजन्त- एतद द्वितीयेन वृणे स्वर्गलोका अमृतत्व वरेण ॥१३॥ अनु०-[द्वितीय वर-] हे मृत्यो ! आप स्वग के साधनभूत अग्नि को जानते हैं सा मुझ श्रद्धालु के प्रति उस का वर्णन कीजिए [जिस के द्वारा स्वर्ग को प्राप्त हुए पुरुष अमृतत्व प्राप्त करते है। दूसरे वर द्वारा मैं यही मांगता हूँ । (१३) मि०अ०--जिस यज्ञ के अनुष्ठान से इस प्रकार के स्वगलोक की प्राप्ति होती है और जिम यज्ञ को आप जानते हैं मुझ भी उस का उपदेश कीजिए ताकि मैं आप मे पूण श्रद्धावान बनू । जो लोग उस म्दग में पहुंचते हैं वे अमर देवता बन जाते हैं। यह मेरा द्वितीय वर है । [१३] प्र ते ब्रवीमि, तदु मे निवोध, स्वर्ग्यमग्नि नचिकेत प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठा विद्धि त्वमेत निहित गुहायाम ||१४|| अनु०-[यम ने उत्तर दिया-] हे नचिकेत । उस स्वर्गप्रद अग्नि को अच्छी तरह जानन वाला मैं तेरे प्रति उस का उपदेश करता हूँ। तू उसे मुझ से अच्छी तरह समझ ले। इसे तू अनन्ततोक की प्राप्ति परान वाला, उस का आधार और गुहा में निहित (अर्थात रहस्यमय तथा दुरूह) जान । (१४) मि००-यमरार बारे में तुम उम का उपाय करता हूँ। उम या को जान जिप्त द्वारा अनन्तलोकपी प्राप्ति होती है। ममस्त जगन् उम या के देवता का स्वरूप है और वह देव बुद्धिमाना रेहाय में निवास करता है। [१४] ५०] सिरे अक्वर (फारमी) लोकादिमग्नि तमुवाच तस्मे या इष्टका, यावतीर् वा, यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद् यथोक्त- मथास्य मृत्यु पुनरेवाह तुष्ट ॥१५॥ अनु०-तब यमराज ने लोको के आदिकारणभूत उम अग्नि का तथा [उस के चयन करने मे] जो, जितनी, और जैसी ईटे होती हैं, [उन का] उस [नचिकेता] के प्रति वर्णन कर दिया। और उस [नचिकेता] ने भी जैसा उस से कहा गया था वह सब सुना दिया। इस से प्रसन होकर मृत्यु फिर बोला । (१५) मि०अ०----वह देव गव के पूर्व विद्यमान था। उग यज्ञरी पद्धति जमी किवेद म दी हुई है [ननिकेता ने] उन (यमराज) से मौखा। ननिकेता ने सब कुछ याद कर के यम को सुना दिया। महान् यमराज प्रसान हुए कि मैं न जो उपदेश दिया था उसे तू खूब समझा । [१५] तमप्रवीत् प्रीयमाणो महात्मा- वर तवेहाद्य ददामि भूय । तवैव नाम्ना भविता ऽयमग्नि, सृवा' चेमामनेकरूपा गृहाण ॥१६॥ अनु०-महात्मा [यम] न प्ररान हो कर उस से कहा-अब मैं तुझे एक वर और भी देता हूँ। यह अग्नि तेरे ही नाम से प्रसिद्ध होगा, तु यह अनेक रूपो वाली माला ले । (१६) सि०अ०-वे बोले-इस कारण कि मैं तुझ से प्रसन्न हुआ हूँ, तुझे एर बर और देता हूँ, कि यह वर्म, जगत् मे तेरे नाम से प्रसिद्ध होगा। उन्हो ने उसे एक माला भी दी जिस के बने पल थे और जिस स भांति भौति ये लाभ पहुँचते थे । [१६] 1 'मृका' का अर्थ शकर ने 'माला' अथवा 'गति' किया है। पास्तविक अर्थ निश्चित नहीं होता। यहाँ 'माला' से काम चल जाता है। कर १२३ में गति धर्थ अधिक समीचीन प्रतीत होता है। सस्कृत साहित्य में यह शब्द संभवा. धन्यत्र प्रयुग नहीं हुया है।

क्योपनिषद् [५१ निणाचिकेतस् त्रिभिरेत्य सन्धि त्रिवर्मकृत् तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजन' देवमीड्य विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥१७॥ अनु०-नाचिकेत अग्नि का तीन वार चयन करन वाला (अर्थात् त्रिणाचिकेत) [तथा इज्या, अध्ययन, और दान इन] तीन कर्मों को वरने वाला मनुष्य [माता, पिता, और आचार्य इन] तीनो से सम्बन्ध को प्राप्त हो कर जन्म और मृत्यु को पार कर जाता है । तथा ब्रह्म से उत्पन अथवा ज्ञानवान् और स्तुतियोग्य देव को जान कर और उसे अनुभव कर इस अत्यन्त शान्ति को प्राप्त हो जाता है। (१७) सि०अ०-[यम ने] इन यज्ञ वा नाम नचिकेता के नाम के अनुसार नाचित रखा और कहा—जो कोई तीन बार इस यन वा अनुष्ठान करता है, समझता है, पिता और माता और गुरु को प्रस न रखता है, और तीन प्रकार के मत्वर्मो-दान, इन्या और चदाध्ययन-वा अनुष्ठान करता है वह निम्न लोकी से ऊपर उठ कर मरने के बाद मुक्त हो जाता है। ममम्त जगत का रूपभूत देव, तो ही इस यज्ञ का अग्नि है ब्रह्मा अर्थात् साक्षात हिरण्यगर्भ मे उत्पन हुआ है । यह देव मवन तथा स्तुति योग्य है। उगे वेद से जान कर और उस रा निश्चय कर के [पुरप] उस आनद वो प्राप्त होता है जो वणनातीत है। [१५] त्रिणाचिकेतस् त्रयमेतद् विदित्वा य एव विद्वाधश् चिनुते नाचितम् । स मृत्युपाशान् पुरत प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥ अनु०-जो निणाचित विद्वान् अग्नि के इस वय को [अर्थात् यौन इंटें हो, कितनी सख्या मे हो, और किस प्रकार अग्निचयन किया जाय- इस यो] जान पर नाचिरेत अग्नि वा चयन करता है, यह देहपात से पूर्व 1बह पद शायरस का संपलीत होता है, जो प्रति ोिण के रूप में वेदो उपनिषदों में अनेक बार प्रयुक्त हुमा है।

गिरें अवबर (फारमी) ही मृत्यु के बन्धनो को तोड कर शोक से पार हो स्वर्गलोक में आनन्दित होता है। (१८) मि००--इम नाचिवत यन को जो कहता है समझता है, और जो इम का अनुष्ठान करता है और उम के पुण्या का ध्यान करता है, वह दुष्कम, अनान, काम, माध, मोह, ईर्या द्वेप आदि के बन्धनो से इसी लोक मे मुक्त होकर, शोक मे परे हो पर, और म्वर्गलोक को प्राप्त हो वर शाश्वत आनन्द का उपभोग वरता है। [१] एप तेऽग्निर् नचिकेत । स्वग्यों यमवृणीथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्नि तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्, तृतीय वर नचिकेतो वृणीप्व ।।१९।। अनु०-हे नचिवेत । तू ने द्वितीय वर से जिस का वरण किया था वह स्वर्ग का साधनभूत अग्नि यह है [अर्थात् उसे तुझे वतला दिया] । लोग इस अग्नि को तेरा ही कहेगे। हे नचिवेत । [अब] तू तीसरा वर मांग ले। (१९) मिअ--यह यज जिम तू ने द्वितीय वर दे रूप मे मुय से मांगा था, स्वर्ग की प्राप्ति कराने वाला है। उम यज्ञ को लोग तेरे नाम से जानेंगे। अब मुझ से तीसरा दर मांग। [१९] येय प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके। एतद् विद्यामनुशिष्टस् त्वयाऽह वराणामेप वरस् तृतीय ॥२०॥ अनु०-[नचिवेता ने कहा-] मरे हुए मनुष्य के विषय मे जो यह सन्देह है कि कोई तो कहते है रहता है और कोई रहते हैं 'नही रहता', आप से शिक्षित हुआ मैं इसे जान स।। [मेरे] वरो में यह तीसरा पर है। (२०) मि-ननिता चौमा-मेग नीमग वा यह है-मृन प्राणियों के विषय - कठोपनिषद् [५३ मे मतभेद है। कुछ लोग रहते हैं कि जो कुछ था यह शरीर ही था। जब इस या नाश हा गया तो कोई और वस्तु शेष नही रही। [इम मत को मानने वाले लोग] जीवात्मा को शरीर से पृथक् नहीं जानते और उसे शरीर के नाम के साथ ही नष्ट हो जाने वाला मानते हैं। अन्य लोगा का कहना है कि जीवात्मा शरीर, बुद्धि, मन, और इन्द्रियों से पृथक् है। शरीर के माश पश्चात् जीवात्मा अपन कर्मों व अनुसार लोकान्तर को प्राप्त होता है। मैं चाहता हूं कि आप मुझे उपदेश बरं जिस से कि इन दोना मतो को मैं समझ सई, कि कौन सत्य है और कौन मिथ्या । [२०] देवैरत्रापि विचिकित्सित पुरा, न हि सुज्ञेयमणुरेप धर्म । अन्य वर नचिकेतो। वृणीष्व, मा मोपरोत्सीरति मा सृजनम् ॥२१॥ अनु०-[यम ने उत्तर दिया-] पूर्ववाल में इस विषय मे देवताओ को भी सन्देह हुआ था, क्योकि यह सूक्ष्म तत्त्व मुगमता से जाने जाने योग्य नहीं है। हे नचिकेत | तू दूसरा वर मांग ले, मुझे न रोक (अर्थात् मुझ पर दबाव न डाल)। तू मेरे लिए यह वर छोड ६ । (२१) मि.-पम बोर कि इस विषय म देवताआ रो भी मशय है। यह विषय अत्यन्त दुम्ह है और बुद्धि म नहीं आता। है नचिना । कोई अन्य वर मांग और मुझे इस प्रश्न 4 उतर ग क्षमा कर । [२१] देवरत्नापि विचिकित्सित मिल, त्व च मृत्यो यन् न सुज्ञेयमात्य । वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो, नान्यो वरस् तुल्य एतस्य कश्चित् ।।२२॥ अनु०-[नचिकेता बोला-] हे मृत्यो । इस विषय में निश्चय ही देवताओं को भी सन्देह हुआ था, तथा इसे आप भी सुगमता से जानने योग्य नही बतलाते । और इस का यक्ता भी आप ये समान अन्य कोई नहीं मिल सरता। [अत ] इस ये समान कोई दूसरा वर नहीं है । (२२) ।

५४] सिर अक्बर (फारसी) सि०अ०--नचिकेता बोला-ह यमराज | आप ही ने कहा दि यह विषय दुरूह है, कि देवता भी इस सशय मे पड़े हुए हैं, और कि यह सरलता से रामझ म नहीं आता। अत में आप के समान गुरु कहाँ पाऊँगा वि मुझे उपदेश करे और मैं मग म मुक्त हो? यह वरा का वर है, जिम के समान में और कोई वर नहीं ममयता । [२२] शतायुप पुत्रपौवान् वृणीष्व, बहून् पशून्, हस्तिहिरण्यमश्वान्; भूमेर् महदायतन वृणीप्व, स्वय च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३॥ अनु०-[यम ने उत्तर दिया-हे नचिकेत 1] तू सौ वर्ष की आयु- वाले बेटे-पोते, बहुत-से पशु, हाथी, सुवर्ण, और घोडे मांग ले, विशाल भूमण्डल भी मांग ले, तथा स्वय भी जितने वर्ष इच्छा हो जीवित रह । (२३) सि०अ०-यमराज न उस को जिज्ञासा को दृढता पो जांच के लिए पहा-मुप मे तू बहुत सारी सनान और उग को सम्बी आयु का वर मांग, कि प्रत्येक सौ साल जीवित रहे। और मुय से दुनिया, धन, हाथी, घोडा, स्वर्ण, और सम्पूर्ण जगत् वा स्वामित्व मांग ले, और स्वयं जितनी लम्बी आयु चाहे मांग ले । [२३] एतत्तुल्य यदि मन्यसे वृणीप्व वित्त चिरजीविका च । महाभूमी नचिकेतस् । त्वमेधि, कामाना त्या कामभाज करोमि ॥२४॥ अनु०-इसी के समान यदि तू कोई और वर समझता हो तो उसे, तथा धन और चिरस्थायिनी जीविका मांग ले। हे नचिकेत । इस विस्तृत भूमि मे तू वृद्धि यो प्राप्त हो। मैं तुझे कामनाओं को इच्छानुसार भोगने वाला रिये देता हूं। (२४) मि०अ०-इन के समान तू और जो कुछ चाहे मांग ने। मह जो तू ने तीसरा वर मांगा है उसे छोड कर न जो चाहेगा मैं तुझे दूंगा। [२४] कठोपनिषद् [५५ ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान् कामाश् छन्दत प्रार्थयस्व । इमा रामा सरथा सतूर्या- न हीदृशा लम्भनीया मनुष्य । आभिर् मत्प्रताभि परिचारयस्व, नचिकेतो! मरण माऽनुप्राक्षी. ॥२५॥ अनु०-मनुष्यलोक मे जो-जो भोग दुर्लभ है उन सव भोगो को तू स्वच्छन्दता-पूर्वक मांग ले । यहाँ रथ और बाजो के सहित ये रमणियाँ है-ऐसी स्त्रियां] मनुष्यो को प्राप्त होने योग्य नहीं होती। मेरे द्वारा दी हुई इन कामिनियो से नू अपनी सेवा करा। परन्तु हे नचिकेत । तू मरण [सम्बन्धी प्रश्न ] मत पूछ । (२५) मि०अ०-जो-जो भोग इस लोक मे दुर्लभ हैं उन को मुझ से मांग। तू यह सन्देह न कर कि तू जो चाहेगा मै उसे दे नही सकूँगा। ये अप्सराएँ, सवारियां, बाजे गाजे जो किसी व्यक्ति को उपलब्ध हैं, मुझे सद्य प्राप्त है। वह सब मुद्रा से ले और अपनी सेवा करा। किन्तु मुझ स यह वात न पूछ कि मृत्यु के अनन्तर क्या होता है। मृतों के विषय में किसी ने प्रश्न नहीं किया है। [२५] श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैतत् सर्वेन्द्रियाणा जरयन्ति तेज । अपि सर्व जीवितमल्पमेव, तवैव वाहास् तव नृत्यगीते ।।२६।। अनु०-[नचिकेता बोला-] है यमराज । ये भोग 'कल रहेगे भी या नहीं'- इस प्रकार के हैं और मनुष्य की सम्पूर्ण इन्द्रियो के तेज को जीर्ण कर देते हैं। यह सारा जीवन भी वहुत थोडा ही है। आप के वाहन और नाच-गान आप के ही पास रहे । (२६) सि०अ०-नचिकेता बोला-हे यमराज । जिन वस्तुओ के विषय मे आप ने कहा कि मुझ से मांग वे सब नश्वर कोटि की हैं और पता नहीं कि ये क्ल तर रहेगी भी अथवा नहीं रहेगी। जो कोई इन की कामना करता है वह अपने सुख के लिए इन की कामना करता है, और यह स्वय इन्द्रियों के तेन को शांग करने वाली है। इन मे क्या मुख और आप जो कहते हैं कि दीर्घ आयु की रामना कर तो जब कि 7

,
५६]
सिरं अक्बर (पारसी)
अन्तत मरना ही है, दीर्घ आयु से क्या लाभ इस कारण यह दुनिया, धन,, हापी,
घोडा, स्वर्ण, दीपं आयु, बाजे-गाजे और जो अन्य भोग आप ने कहे हैं वे आप ही के
पाम रहें। [२६]
न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो,
लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत् त्वा ।
जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्व,
वरस् तु मे वरणीय. स एव ।।२७।।
अनु०-मनुष्य धन से तृप्त नहीं किया जा सकता। [अब] यदि
आप को देख लिया है तो धन तो म पा ही लेंगे। जबतक आप शासन
करेंगे हम जीवित रहेगे, किन्तु हमारा प्रार्थनीय वर तो वही है ।(२७)
सि०अ०-आप मुझे इन्हे लौकिक भोग के लिए दे रहे है, [परन्तु] धन-दौलत
स कोई वदापि तृप्त नहीं हो सकता। मैं जो आप से मांग रहा हूँ वह क्या है ?
जब मैं ने आप को प्राप्त कर लिया तो मानो सब कुछ प्राप्त कर लिया। आप ही
सब के प्रेरक है। यदि आप मुझ पर कृपालु हैं, तो हम सदा जीवत रहेगे ही।
मेरा बस वही पर है, आप उसी का उपदेश करें। मैं दूमरा कुछ नहीं चाहता।'
[२५]
अजीर्यताममृतानामुपेत्य
जीर्यन् मर्त्य क्वध स्थ प्रजानन्
अभिध्यायन् वर्णरतिप्रमोदा-
नतिदीचे जीविते को रमेत ? ||२८||
o-कभी जीर्ण न होने वाले अमरो के समीप पहुंच कर नीचे
पृथिवी पर रहने वाला कौन जराग्रस्त विवेकी [मनुष्य] होगा जो [वेवल
शारीरिक] वर्ण के राग से प्राप्त होने वाले [स्त्री-सम्भोग आदि] मुखो
।
अनु०-
१ 'जम' से लेकर 'चाहता' तक, सिर अपवर में, अगले मन, सख्या २८,
भन्तर्गत रखा गया है। अनुवाद य मूल संस्कृत के क्रम का अनुसरण क्यिा गया है।

कठोपनिषद् । ५७ को [अस्थिर रूप में देखता हुआ भी अति दीर्घ जीवन में सुख मानेगा? (२८) मिअ-प्रसिद्ध है कि देवताओं को जरा नही व्यापती, मृत्यु नहीं व्यापती ! वे महान होते हैं। इन बड़ों के पास जा कर कोई इन मुलभ वस्तुओ की कामना नहीं करता। मैं भूमण्डल का निवासी हूं और जरा तथा मृत्यु से भय खाता हूं। मेरी कामना है कि मुझे वह उपदेश करें जिस से मैं भी जरा और मृत्यु से मुक्त हो जाऊं। [२८] । यस्मिन्निदं विचिकित्सन्ति मृत्यो ! यत् साम्पराये महति ब्रूहि नस् तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान् नचिकेता वृणीते ॥२९॥ अनु०-हे मृत्यो ! जिस [विद्या में लोग ऐसा है या नहीं है] सन्देह करते हैं तथा जो महान् परलोक के विषय में है वह हम से कहिए । यह जो गहराई में अनुप्रविष्ट वर है इस से अन्य और कोई वर नचिकेता नहीं मांगता । (२९) सि०अ०-हे यमराज | मुझे यही उपदेश करें कि मृत्यु के पश्चात् क्या होता है। बडे-बडे सोग उस के विषय में सशयालु हैं। उस का परिमान मृत्यु के पश्चात परमपद की प्राप्ति कराता है। आप को छोड़ कर कोई ऐमा नहीं है जो मेरा यह वर पूर्ण कर सके। यह विषय अत्यन्त कठिन है। मैं नचिकेता इम वर के अतिरिक्त आप से कोई अन्य वर नहीं मांगता । [२१] ॥ इति प्रथमेऽध्याये प्रथमा वल्ली ।।

५८] सिरें अयर (फारसी) द्वितीया वल्ली अन्यच्छे योऽन्यदुतव प्रेयस्; ते उभे नानार्थे पुरुपध सिनीतः। तयो. श्रेय आददानस्य साधु भवति; हीयतेऽर्थाद् य उ प्रेयो वृणीते ॥१॥ अनु०-[यमराज ने कहा-] श्रेय (नि श्रेयस, भुक्ति) और है तथा प्रेय (अभ्युदय, भुक्ति) और ही है। भिन्न प्रयोजन वाले वे दोनो पुरप को बांधते हैं। उन दोनों में थेय ग्रहण करने वाले का कल्याण होता है और जो प्रेम का वरण करता है यह परमार्थ से च्युत हो जाता है । (१) मि०अ०-यमराज ने कहा-समार में दो पदार्थ हैं, एक प्रेय और दोनो मनुष्य को अपने अधीन रखते हैं। जो थेय का अभिलापी है वह धन्य है और नो प्रेय रा अभिलापी है वह परलोक के पल्याण से वचित रहता है, जो ही मूल वस्तु है। [१] धेय। भली श्रेयश् च प्रेयश् च मनुष्यमेतस्, तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीर । श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते, प्रेयो मन्दो योगक्षेमाद् वृणीते ॥२॥ अनु०-श्रेय और प्रेय मनुष्य के पास आते है। बुद्धिमान् पुरुष भाँति विचार कर दोनो मे विवेक करता है। विवेवी पुरुप प्रेय की अपेक्षा श्रेय का ही वरण करता है, [विन्तु] मन्दबुद्धि योग-क्षेम के निमित्त से प्रेय का वरण करता है । (२) सि०अ०-जो धौर और धीमान् है वह इन दो मूल्या (पुस्पार्थों) में से थेय दो ग्रह्म करता है और जो मन्दबुद्धि और मूर्ख है वह प्रेय को ग्रहण करता है और चाहता है कि प्राप्त पदार्थों का संग्रह [क्षम] करे और अप्राप्त को प्राप्त [योग] करे। और यह केवल प्रग है, क्योकि कोई भी वस्तु रहने वाली नहीं है । [२] कठोपनिषद [ ५९ स त्व प्रियान् प्रियरूपाश् च कामा नभिध्यायन नचिकेतो । त्यस्राक्षी नेताछ सृवा वित्तमयीमवाप्तो यस्या मज्जन्ति बहवो मनुष्या ॥३॥ अनु०-हे नचिकेत | उस तू ने [पुत्र वित्तादि] प्रिय और [अप्सरा आदि] प्रियरूप भोगो को विचार कर के अस्वीकार कर दिया है तू उस धनप्राया गति को प्राप्त नहीं हुआ जिस मे वहुत से मनुष्य डूब जाते हैं। (३) सि०अ०---हे नचिकेता | मैं जानता हूँ कि तू ने मुझ से अपने लिए नश्वर ससार की कोई भी वस्तु नही मागी और तू अपनी इच्छा को वाणी मे नही लाया। जिस की आसक्ति मे समस्त ससार डूबा हुआ है तू उस मे नही फसा। तू ने जाना कि लोक और परलोक परस्पर विरोधी है । [३] दूरमेते विपरीते वियूची अविद्या या च विद्यति ज्ञाता। विद्याभीप्सिन नचिकेतस मये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपत ॥४॥ अनु०-जो विद्या और अविद्या नाम से ज्ञात है वे दोना अस्यत विरुद्ध स्वभाव वाली और विपरीत फल वाली है। मै नचिकेता वो विद्याभिलापी मानता हूँ [क्योकि] तुद विविध भोगो ने नही तुभाया । (४) सि०अ०–इन दोनो मे भारी भेद है और इन के फल भी परस्पर विरोधी हैं। ज्ञानिया ने जाना है कि इन के बीच दिन और रात्नि का अतर है। हे नचिकेना । मैं जानता हू कि तू ब्रह्मज्ञान का ही प्रार्थी है क्याकि मैं ने तझ बहुत सारी वस्तुए बतायो कितु तू ने उहे स्वीकार नहीं किया। [४] अध ६.] सिर अबवर (फारसी) अविद्यायामन्तरे वर्तमाना, स्वयधीरा, पण्डितमन्यमाना दन्द्रम्यमाणा परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथाधा ॥५॥ अनु०-वे अविद्या के भीतर रहने वाले, अपने-आप बुद्धिमान् वने हुए, और अपने को पण्डित मानने वाले मूढ, अन्धे द्वारा ही ले जाये जाते हुए 'समान, भाग दौड करते हुए भटकते रहते हैं । (५) मि००----अनर पण्डित और बुद्धिमान हैं जिहो ने मूखता और अनान के कारण अपने का पण्डित और बुद्धिमान समय रखा है। उह ससार की कामना है और वे कुमाग पर आरूद हैं। वे दुःख भोगेंगे, जैसे कि अया अधे के पीछे चल कर दुख पाता है। [५] साम्पराय प्रतिभाति बाल, प्रमाद्यन्त, वित्तमोहेन मूढम् । अय लोको, नास्ति पर, इति मानी पुन पुनर् वशमापद्यते मे ॥६॥ अनु०-अज्ञानी, धन के मोह स अध, और प्रमाद करने वाले को परलाक-तत्त्व नही सूझता। यह लाक है, परलोक नहीं है, ऐसा मानने वाला बारम्बार मेरे वश (अर्थात् मृत्यु) को प्राप्त होता है । (६) मि००-परलाप का तत्त्व ये यानबुद्धि अज्ञानी अपनी बुद्धि स नहीं समझते। उन की ममझ यह है कि जो कुछ है यही लोप है और परलार का अस्तित्व नहीं। ये जो ऐगा समभने है मुझ यमराज ने बस म आ पडन है। [] श्रवणायापि बहुभिर् यो न लभ्य , शृण्वन्तोऽपि वह्वो य न विद्यु । आश्चर्यो वक्ता, कुशलोऽस्य लब्धा, ऽऽश्चर्यो जाता कुशलानुशिष्ट ॥७॥ न कठोपनिषद् [६१ अनु०-जो बहुतो को तो सुनने के लिए भी प्राप्त होने योग्य नहीं है, जिसे बहुत से सुन कर भी नहीं समझते। उस वा प्रवचन करने वाला आश्चर्यरूप है, उस को प्राप्त करने वाला [कोई] निपुण पुरुष ही होता है, तथा कुशल [आचार्य] द्वारा शिक्षित ज्ञाता भी आश्चर्य रूप है। [७] सि०अ०–ब्रह्मज्ञान वह वस्तु है जिस के थोता भी कम मिलते हैं, और जो सुनते हैं वे समझते नहीं। और इस तत्त्व का जानकार और प्रवक्ता भी दुर्लभ है और इस तत्त्व का प्राप्त करन वाला भी अलम्य है। जिम की बुद्धि बहुत तीक्ष्ण है उसे इस तत्व की उपलब्धि होती है और जिम का गुरु मिद्ध पुरुष है वह इस तत्व को समझता प्रोक्त एप नरेणावरेण सुविज्ञेयो, बहुधा चिन्त्यमान । अनन्यप्रोक्ते गतिरत नास्ति, अणीयान् ह्यतर्यमणुप्रमाणात् ॥८॥ अनु०-विविध प्रकार से विचारा जाने वाला यह [आत्मा] साधारण पुरुष द्वारा कहे जाने पर अच्छी तरह नही जाना जा सकता। [और] किसी अन्य [कुशल आचार्य] के उपदेश के विना इस आत्मा मे गति नहीं [हो सकती], क्योकि यह अणु परिमाण वालो (अर्थात् सूक्ष्मो) से भी अणुतर (अर्थात् सूक्ष्मतर) और दुर्विज्ञय है । (८) सि०अ०-यदि गुरु सदोष है और शिष्य कुशल, तब भी, शिप्य के पास चाहे जितनी भी बुद्धि हो, उमे ज्ञान नहीं हो सकता। जो ज्ञानी आत्मा के साथ एकीभूत हो चुका हो वही इस तत्व का ज्ञान करा सकता है, क्योकि वह तत्व अत्यन्त सूक्ष्म है और प्रत्येक सूक्ष्म म मूक्ष्मतर। तर्क उस तक नहीं पहुंच सकता। [] नेपा तण मतिरापनेया, प्रोक्ताऽन्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ ।- या त्वमाप , सत्यधृतिर् बतासि । त्वादृट् नो भूयान् नचिकेत । प्रप्टा ॥९॥ - ६२] सिरें अक्बर (पारसी) अनु०-हे प्रियतम। यह ज्ञान तक से प्राप्य नही, सम्यक् ज्ञान के लिए इस का प्रवचन [कोई] और ही करता है, यह जो तुझ प्राप्त हुआ है। अहा ! तू निश्चय ही वास्तविक धैर्य वाला है। हे नचिकेत । हम तेरे ही समान प्रश्न करनेवाला प्राप्त हो । (९) मि०अ०-वह इन्द्रियानुभव म नहीं आता।' गुरु के उपदेश हो तर वितव द्वारा खण्डित नहीं करना चाहिए। हे नचिकेता है मेरे मित्र । जिस ने वेद का अवगाहन किया है उस न उस तत्व का साक्षातकार किया है वही व्यक्ति अप को भलीमानि नान करा मरता है। तुय इस का ज्ञान हो गया है। वह व्यक्ति भी ममयता है कि तू जान गया है कि समार नश्वर है और दिल लगाने के योग्य नहीं। तुने सच्ची श्रद्धा है और तेरे समान जिनासु नही। मुझे वही इच्छा है कि तम सा जिलासु मिने और मुप से दातें पूछ । [९] जानाम्यह शेवधिरित्यनित्य, न ह्यध्रुवै प्राप्यते हि ध्रुव तत् । ततो मया नाचिकेतश् चितोऽग्नि- रनित्यर् द्रव्य प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥१०॥ अनु०-मैं जानता हूँ कि निधि अनित्य है, क्याकि अनित्य साधनो द्वारा वह नित्य [आत्मा] प्राप्त नही किया जा सकता। इसीलिए मेरे द्वारा नाचिकेत अग्नि का नयन किया गया। [इस प्रकार] अनित्य पदार्थो से मैं नित्य को प्राप्त हुआ हूँ। (१०) सि०अ०-मैं कर्मों की निधि और उसके फ्ल । अनित्य समयता हूँ। जब यह स्वय अनित्य हैं तो इन के द्वारा नित्य तत्त्व को कैसे प्राप्त किया जा सकता है। हे नचिकेता! मैं ने भी चूकि यज्ञ का अनुष्ठान लिया है इसी कारण स्वग के वधन म इस प्रकार पड़ा हुआ हूँ। यदि में वम की इच्छा न करता और केवल तत्त्व का अभ्यर्थी होता तो ब्रह्मभाव को प्राप्त कर मुक्त हो जाता। तेरा साहस इतना बढा हुया है कि तेरी दृष्टि हिरण्यगम पर भी नहीं है। [१०] १ मूल के अनुसार 'इंद्रिय' अथवा 'इद्रियानुमव' के स्थान पर 'तक' होना चाहिए था।

दठोपनिषद् कामस्याप्ति, जगत प्रतिष्ठा, ऋतोरनन्त्यमभयस्य पारम्, स्तोम महदुरुगाय, प्रतिष्ठा दृष्ट्वा धृत्या धीरो नचिकेतो । त्यस्त्राक्षी ॥११।। अनु०-हे घोर नचिकेत 1 तू ने बुद्धिमान् हो कर भोगो की प्राप्ति, जगत् की प्रतिष्ठा, यज्ञफल के अनन्तत्व, अभय की सीमा, महती प्रशसा, विस्तीर्ण गति, तथा प्रतिष्ठा को देख कर [भी] धैर्यपूर्वक अस्वीकार कर दिया। (११) सि०अ०-वह ऐसी अवस्था है जिस मे सारी कामनाएं प्राप्त हो जाती है। वह सभी लोको का ठौर, सभी लोको का फल सभी यज्ञो और कमों वा फल, और परम गति है। वह उच्चतम अभय-स्थान है। वह प्रशस्य है । उस मे परम ज्ञानियो के सभी स्थान और सिद्धिओं है। उस का मार्ग खुला हुआ और विस्तीण है। यद्यपि तू जानता है कि तू वहाँ नही पहुंच सकता, तथापि तू ने सद्बुद्धि और धैय के साथ उसे अस्वीकार कर दिया और उस की ओर ध्यान नहीं दिया । [११] त दुर्दर्श, गूढमनुप्रविष्ट, गुहाहित, गह्वरेष्ठ, पुराणम् अध्यात्मयोगाधिगमेन देव मत्वा धीरो हर्पशोको जहाति ॥१२॥ अनु०-उस कठिनता से दीख पड़ने वाले, गूढ [स्थान] मे अनुप्रविष्ट, गुहा (रहस्य अथवा बुद्धि) मे स्थित, गहन स्थान मे रहने वाले, पुरातन देव को अध्यात्मयोग की प्राप्ति द्वारा जान कर धीर [पुरुष] हर्प शोव को त्याग देता है । (१२) मि०१०-जिस तत्त्व के लिए तूने यह सब अम्वीकार किया है उस तत्त्व की प्राप्ति कमि है। वह अत्यन्त गुप्त और अव्यक्त है। उस का वास हुदय गुहा मे है। ज्ञान द्वारा उम को प्राप्ति हो सकती है। उम की प्राप्ति मे सहस्रो वाधाएँ हैं। वह स्वत सिद्ध है। ज्ञानी पुरुष इद्रियों को बाहर से भीतर खीच कर, हृदय में ध्यान करते हुए मन को जीवात्मा के साथ एकीभूत कर के और जीवात्मा को आत्मा में १४ ] सिरे अक्बर (फारसी) अभिन्न जानते हुए, उस परम ज्योति का ज्ञान प्राप्त पर वे मुख और दुम वो त्याग देते हैं। [१२] एतच्छ् त्वा सपरिगृह्य मर्त्य , प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य, स मोदते मोदनीय हि लब्ध्वा । विवृतः सम नचिकेतस मन्ये ॥१३॥ अनु०-मनुष्य इस [आत्मतत्त्व] को मुन कर और उसे भली भांति ग्रहण कर, धर्म-वर्म से ऊपर उठ कर इस मूक्ष्म [आत्मा] पो पाने से वृद्धि को प्राप्त हो कर, तथा इस मोदनीय की उपलब्धि पर मुदित हो जाता है। मैं [तुझ] नचिकेता को खुला ब्रह्मभवन समझता हूँ। (१३) मि०अ०--जिज्ञासु उस आत्मा को मिद गुरु से श्रवण कर इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि वह बात्मा हम हैं, और शरीर को जो रि नश्वर है आत्मा नहीं मानते । शरीर, इन्द्रिय, और मन से आत्मा को, जो अत्यन्त सूक्ष्म है और जिस से समस्त आनन्द प्राप्त होते हैं, पृथक् जान कर और प्राप्त कर वे सदा प्रमुदित और आनन्द मे परि- पूर्ण हो जाते हैं। है नचिकना । मैं ममझता है कि उम पर का द्वार नेर लिए पुल गया है। [१३] अन्यत्र धर्मादन्यनाधर्मादन्यतास्मात् कृताकृतात्, अन्यन्न भूताच् च भन्याच् च यत् तत् पश्यसि तद् वद ॥१४॥ अनु०-[नचिवेता बोला-] जिसे आप धर्म से पृथक्, अधर्म से पृयक, इस वृत और अकृत [वारंवारणरूप प्रपञ्च] से पृथक् और भूत एव भविष्यत् से अन्य देखते हैं उमे मुझ से कहिए । (१४) नि-नचिनेता बोला-वह बारमा जो पाप और पुण्य तथा पाप और पुष्प रेपन से पृपर है, सध्या तपा मृष्टि के गुर्गों से भी परे है, और भूत, वर्तमान, और भविष्य में पृथा है, उसी आरमारा सिमे आप जानते है मुझे प्रवचन मिग [१४] कठोपनिषद् [ ६५ सर्वे वेदा यत् पदमामनन्ति, तपासि सर्वाणि च यद् वदन्ति, यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति, तत् ते पद सग्रहेण प्रवीमि-'ओम्' इत्येतत् ॥१५॥ अनुः सारे वेद जिस पद का वर्णन करते हैं, समस्त तप जिस का बखान करते हैं, जिस की इच्छा करने वाले [मुमुक्षु जन] ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं, उस पद को मैं तुझ से सक्षेप में कहता हूँ-यह 'ॐ' है । (१५) मि०अ०-यमराज बोले-हे नचिकेत । सारे वेदो का सार जिस आत्मा के ज्ञान के लिए है और सारी तपस्याएँ और भोगों से वैराग्य जिस की प्राप्ति के लिए हैं उसे मैं तुझे सक्षेप मे बताता हूँ। वह क्या है ? * है। [१५] एतद्ध्येवाक्षर ब्रह्म, एतद्ध्येवाक्षर परम् । एतद्ध्येवाक्षर ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥१६॥ अनु०-यह अक्षर ही ब्रह्म है, यह अक्षर ही पर है। इसी अक्षर को जान कर जो जिस की इच्छा करता है वह उस का हो जाता है ।(१६) सि०अ०-यही अक्षर प्रणव ब्रह्म है, सब से महान है। इसी शन्द को समझ पर यदि ब्रह्मपद की अभिलाया होगी तो तू ब्रह्मपद प्राप्त करेगा। और यदि तू समीम की अभिलाषा करेगा तो ससीम को प्राप्त करेगा, क्योकि यह महान् शब्द असीम भी है और ससीम भी। [१६] एतदालम्वन श्रेष्ठमेतदालम्वन परम् । एतदालम्बन ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१७॥ अनु०-यही घेष्ठ आलम्बन है, यही परम आलम्बन है। इस आलम्बन को जान कर पुरुष ब्रह्मलोक मे महिमान्वित होता है । (१७) सि०अ०---वही तत्त्व परम आलम्बन है, जिस के समान दूसरा बालम्बन नहीं। जो कोई इस आलम्वन को जानता है वह साक्षात ब्रह्मलोक को प्राप्त कर परमानन्द हो जाता है। [१७] सिर अपर (पारसी) न जायते म्रियते वा विपश्चिन्, नाय कुतश्चिन्, न बभूव कश्चित् । अजो, नित्य , शाश्वतोऽय, पुराणो, न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१८॥ . अनु०-यह विपश्चित् (ज्ञानवान् आत्मा) न उत्पन्न होता है, न मरता है, यह न तो किसी कारण से उत्पन्न हुआ है और न [स्वत ही] कुछ बना है। यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत, और पुरातन है, तथा शरीर के नष्ट हो जाने पर भी नष्ट नहीं होता । (१८) सि०अ०-वह आत्मा न जम लेता है और न मरता है। वह सर्वश है। वह म किसी वस्तु से उत्पन्न हुआ है और न उस से कोई वस्तु उत्पन्न हुई है। उस को उत्पत्ति वा कोई कारण नहीं। वह स्वत सिस, शाश्वत अविनश्वर, और स्थायी है। वह पारीर के नए जाने पर भी नष्ट नहीं होता। [१८] हन्ता चेन् मन्यते हन्तुध, हतश् चेन् मन्यते हतम्, उभौ तौ न विजानीतो, नाय हन्ति न हन्यते ।।१९॥ - अनु०-यदि मारने वाला मात्मा को मारने का विचार करता है और मारा जानेवाला उसे मारा हुआ समझता है, तो वे दोनो ही उसे नहीं जानते, क्योकि यह न तो मारता है और न मारा जाता है । (१९) सि०५०-यो समशता है कि मैं हन्ता हूं और जो समझता है कि मैं हत हूँ, उन दोनो ने गलत समझा है। आत्मा को न होई मार सकता है और म आरमा मारा जाता है। हनन और नाश शरीर का होता है न कि जीव का जो आरमा है । [१९] १ मह मन्त्र किचित् पाठभेद के साथ गीता (२.२०) में भी आता है। २ यह मन्त्र सिचित् पाठभेद के साथ माता (210) में भी आता है।

कटोपनिषद् अणोरणीयान् महतो महीया- नात्माऽस्य जन्तोर् निहितो गुहायाम् । तमक्रतु पश्यति वीतशोको धातु प्रसादान् महिमानमात्मन ॥२०॥ अनु०-जीव की [हृदयरूपी] गुहा मे निहित आत्मा अणु से भी अणुतर और महान् से भी महत्तर है। निप्काम पुरुष विधाता के प्रसाद से, शोकरहित हो कर, आत्मा की उस महिमा को देखता है। (२०) सि०अ०-आत्मा सूक्ष्मो मे सूक्ष्मतम है और महानो मे महत्तम। वह आरमा सभी प्राणियो के हृदय मे है। यद्यपि वह मव मे है तथापि जो निष्काम है, जो कर्म का फल दृष्टि मे नही रखता, जो गोकरहित हो चुका है, और जिस ने चित्त को शुद्ध कर लिया है उस के अतिरिक्त दूसरे को उस का साक्षात्कार नहीं होता। जो ऐसा है वही अपने आत्मा की महिमा को देखता है । [२०] आसीनो दूर व्रजति, शयानो याति सर्वत । कस् त मदामद देव मदन्यो ज्ञातुमर्हति ? ॥२१॥ अनु०-वह स्थित हुआ [भो] दूर तक जाता है, शयन करता हुआ [भी] सब ओर पहुंचता है। मद (हर्प) से युक्त और मद से रहित उस देव को [भला] मेरे सिवा और कौन जान सकता है ? (२१) मि०अ०-वह आत्मा यद्यपि गति-रहित है, तथापि सारी गतिो उस वी गतिओं हैं। वह शयन में भी सर्वन पहुंचता है। यद्यपि वह साक्षात् आनन्द है तथापि १ मारतीय जीवन-दृष्टि में कर्म का प्राधान्य है। यहाँ तक कहा गया है कि ईश्वर- रपि भोक्तव्य कृत कर्म शुभाशुभम्' 'श्रर्थात् शुभाशुभ कर्मों का फ्ल ईश्वरों को भी भोगना पड़ता है। इसके विपरीत सामी (यहूदी, ईसाई, और इस्लाम) पों में ईश्वरानुग्रह का श्राग्रह देखने को मिलता है। अर्थात् कर्म के बिना भी ईश्वर का अनुग्रह अयवा प्रसाद जीव को कुछ से कुछ बना देता है। वैष्णवों में भी इस ईश्वरानुग्रहबाद का पर्यात महत्व है। इस का मूल प्रस्तुत मत्र तथा आगामी मंत्र २३ में विद्यमान है। श्वेताश्वतरोपनिषद् ३,२०, मुण्डकोपनिषद् ३.२.३, चिरीयारण्यक १० १०१ (अथवा महानारायणीयोपनिषद् ६३), और अम्वेद १० १२५ ५ में भी इस के बीज मिल जाते हैं।

६८] सिर अश्यर (फारसी) वह आनद से भी परे है। आत्मा चूकि साक्षात अहम है उसे मेरे सिवा कौन जान सकता है ? अर्थात आत्मा अपने को स्वयं समशता है । [२१] अशरीर शरीरेप्वनवस्थेष्ववस्थितम् महान्त, विभुमात्मान मत्वा धीरो न शोचति ।।२२।। अघुल-शरीरो में शरीररहित, अस्थायियो म स्थायी, महान और सर्वव्यापक आत्मा को जान कर धीर [पुरुप] शोक नही करता । (२२) सि०स०-आरमा प्रवाशस्वरूप अशरीर माति भौति वे शरीराम विद्यमान महान् और विमु है। जो कोई आत्मा को ऐसा जानता है वह शोक रहित हो जाता है । [२२] नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया, न बहुना ध्रुतेन । यमेवैप वृणुते तेन लभ्यस्, तस्यैप आत्मा विवृणुते तनूध स्वाम् ।।२३॥' अनु०-यह आत्मा न [शास्त्न के] प्रवचन, न मेधा, न अधिव पाण्डित्य से प्राप्त हो सकता है। यह जिस वा वरण करता है उसी द्वारा यह प्राप्त किया जा सकता है। उस के प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को अभिव्यक्त कर देता है। (२३) सि०अ०-उस सब लोग नहीं प्राप्त कर पाते क्योकि वह अभिधान (निरूपण) मोर उपलक्षण (इगित) में नहीं आता। वेद-वाक्यो वे पाठ मेधा और बहुत सारे रमों अनुष्यान मात्र से उसे प्राप्त नहीं किया जा सकता। जो आत्मा वी अभिलापा करता है यह यात्मा को प्राप्त करता है। आस्मा स्वप वपना स्वरूप उस पर प्रपट पर देता है । [२३] नाविरतो दुश्चरितान्, नाशान्तो, नासमाहित , नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेननमाप्नुयात् ॥२४॥ अनु०-जो पापकर्मों से निवृत्त नही जो अशान्त है, जो असमाहित १मत्र २०ी रिप्पणी दरम्य है।

कठोपनिषद् १९९ है, और जिस का चित अशान्त है वह इसे ज्ञान द्वारा प्राप्त नही कर सकता। (२४) सि०अ०-जो कोई दुष्कमों से निवृत्त नहीं होता जिस का हृदय शात नहीं है, और जिस को इन्द्रियाँ वश मे नही है वह आत्मा को प्राप्त नहीं करता। जो कोई इद्रियो को वश में कर लेता है और जिस का मन शाति प्राप्त कर लेता है वह ज्ञान और प्रज्ञा के कारण आत्मा को प्राप्त कर लेता है । [२४] यस्य ब्रह्म च क्षत्र च उभे भवत ओदन , मृत्युर् यस्योपसेचन, क इत्या वेद यन्त्र स ? ॥२॥ अनु०-जिस के ब्राह्मण और क्षन्निम दोनो ओदन (भात) है तथा मृत्यु जिस का उपसेचन (शाकादि, मिर्च-मसाला) है उसे वस्तुत कौन जान सकता है कि कहाँ है ? (२५) सि०अ०–समस्त ससार उस आत्मा के भोजन के लिए भात के सदृश है और मृत्यु उस मिच मसाले के मदश जिसे भात के साथ खाते हैं। ऐसे आत्मा को जिस के लिए मृत्यु सम्पूण मसार के साथ भोगन है कौन जान सकता है कि कहाँ हैं। [२५] ॥ इति प्रथमेऽध्याये द्वितीया वल्ली ।। च त्रिणाचिकेता ॥१॥ तृतीया वल्ली ऋत' पिबन्ती सुकृतस्य लोके गुहा प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपो ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो १ ऋत' शब्द एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण व्यापक और सारगभ वैदिक शब्द है। यह प्राय सत्य के साथ प्रयुक्त पाया जाता है । 'धम शब्द संस्कृत वाइ भय में जिन यापक अर्थों में प्रयुक्त हुआ है उन अर्थों में वह समदत ऋत का ही उपवृ हए है। इस का अनुवाद तो कठिन ही नहीं असमय है किन्तु सामान्यन इसे उन नियमों की समटि समभाना चाहिए जिव से विश्व सचालित है। इन नियमों में अन्तष्टि का नाम लाक्षणिक ऋथ में सत्य' है। परमेश्वर का नाम कहीं-कहीं 'ऋतम्मर भाला है (जैसे श्रीमागवत ६ १३ १७ में) जिस का ७०] सिरे अक्बर (फारसी) अनु०-ब्रह्मवेत्ता लोग कहते हैं कि वुद्धिरूप गुहा के भीतर परम पराध में प्रविष्ट कर्मफल को भोगने वाले छाया और धूप के समान दो [तत्त्व] हैं। जिन्हो ने तीन वार नाचिकेताग्नि का चयन किया है वे पन्नाग्नि की उपासना करने वाले भी यही बात कहते है । (१) सि०अ०–शरीर मे हृदयरघ्र मे, जहाँ बुद्धि का निवास है, दो आत्मा हैं- एक जीवात्मा और दूसरा परमात्मा। वर्मों के फल के भोता दोनो हैं और परमात्मा कौतुर द्रष्टा मान । किन्तु दोनो ही परस्पर एक हैं। अतएव कहा गया कि दोनो भोक्ता हैं। ब्रह्मज्ञो, ज्ञानियो, साघको, कर्मयोगियो ने इन दो आरमाआ मे प्रकाश और छाया का सम्बध माना है। परमात्मा प्रकाश-स्थानी है और जीवात्मा छाया-स्थानी।[१] अर्थ हुना सृष्टि का नियामक । मोगसूत्र में जित प्रज्ञा को 'ऋतम्भरा' (ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा 'च-१.४८) सशा दी गयी है वह इसी ऋत में अन्तष्टि को धारण करने वाली होती है। ऋग्वेद में यह भी कहा गया है कि 'ऋतम् च सत्यत्र चाभीद्वात् तपसोऽध्यजायत' (१०. १८०.१), अर्थात् ऋत और सत्य प्रज्वलित तप से उत्पन्न हुए। इम में ममवत सृष्टि की आद्य परिकल्पना की श्रोर इहित है। 'भूत' शब्द का निकटतम संस्कृतेतर पर्याय छठी शतान्दी ईसा-पूर्व के गूनानी दार्शनिक हेराक्लिटस का लाक्षणिक शन्द 'लोगस' है, जिसे हो वाइकिल में भी, अर्थान्तर से, ले लिया प्रस्तुत उपनिषद् के विचाराधीन मन में प्रयुक्त 'ऋत' शब्द का अर्थ कर्म अथवा कर्मफल प्रतीत होता है। इम मन्त्र में बुद्धि में दो तत्त्व बताये गये हैं। शकराचार्य के अनुसार ये दोनों तत्व जीवात्मा और परमात्मा हैं। उन का सकेत ऋग्वेद से प्रसिद्ध मा (११६४ २०)- द्वा सुपर्णा सुयुजा सखा'या समान वृक्ष पर पस्वजाते। तयोऽन्य पिप्पल स्वावृत्त्यनननन्यो अभि चाकशीति ।। भार है, जिस में प्राय दो यात्मात्री-माता और साक्षी का वर्णन सममा जाता । परन्तु उपनिषद् के आलोप्य मत्र में तो दानों का भाचा कहा गया है, जिस का यथावत् ममाधान शकर की व्याख्या से नहीं हो पाता। अनुवादक का मुचितित मत है कि यहाँ उन दा आत्माओं की ओर सन है जिन्हें महामाप्यकार पतम्मलि ने रागात्मा और अन्तरारमा की सज्ञा दी है। अन्तरात्मा के कर्म का पल शरीरामा और शरीरारमा के कर्म का फल अनरात्मा भोगता है। (दावारमानी-शरीराना अन्तरात्मा । अन्तरात्मा लन् कर्म कर ति येन शरीरारमा मुटु से अनुमति । शरीरात्मा तत्कर्म करोति मैनान्तरामा पुस्तु से अनुमति । महामाय ३ १८७१०, १.२.६७६)

कठोपनिषद
(०१
य सेतुरीजानानामक्षर ब्रह्म यत् परम्
अभय तितीर्पता पार नाचिकेत शकेमहि ।।२।।
अनु०-जो यजन करने वालो के लिए सेतु है उस नाचिकेत अग्नि
को तथा जो भयशून्य है और ससार को पार करने की इच्छा वालो का
परम आश्रय है उस अक्षर ब्रह्म को जानने मे हम समथ हो । (२)
सि० अ०है नचिकेत 1 नाचिकेत अग्नि वह सेतु है जो यजमान को इस लोक
के पार पहुपा देती है और परब्रह्म जो महासष्टा है और भपशूप और अव्यय है
उस पुरुष को ससार से पार कर देता है जो इस लोक से मुक्ति की कामना करता है।
इस महान सप्टा और इस महान् कम को मैं जानता हूँ। [२]
आत्मानध रथिन विद्धि, शरीर रथमेव तु,
बुद्धि तु सारथिं विद्धि, मन प्रग्रहमेव च ॥३||
अनु०-तू आत्मा को रथी जान [और] शरीर को रथ, बुद्धि को
सारथि जान और मन को लगाम । [३]
मि० अ०--परमात्मा की प्राप्ति के निमित शरीर रथ है इद्रियो रथ के वाहक
घोड मन घोडो के खींचने के लिए लगाम बुद्धि सारथि और जीवात्मा रथ का स्वामी
है जो उस पर आरूढ है । [३]
इन्द्रियाणि हयानाहुर्, विषयास् तेषु गोचरान्,
आत्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्तेत्याहुर् मनीपिण ॥४॥
अनु०-मनीषी इद्रियो को घोड बतलाते है उन की ऐसी स्थिति मे
विपयो को माग और इद्रिय एव मन से युक्त आत्मा को भोक्ता कहते
सि. अ.--इन्द्रियो के विषय रथ हाँकने के माग हैं। यही कारण है कि
जीवात्मा को जो इस रथ का स्वामी और सुधार है कमों के फल का भोक्ता कहा
जाता है। [४]
यस् त्वविज्ञानवान् भवत्ययुक्तेन मनसा सदा
तस्पेन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टावा इव सारथे ॥५॥

सिरे अक्बर (फारमी) अनु०-जो सदा अविवेकी एव अरायत चित्त से युक्त होता है उरा की इन्द्रियां उसी प्रकार उस के वश के बाहर होती है जैसे दुष्ट घोडे सारथि के [वश के वाहर होते हैं] । (५) सि०अ०—जिस की बुद्धि, जो रथ के सारथि के समान है, रथ हाँकने म निपुण है और [जिस पा]पोडो को वश मे रखने वाले लगाम वे सदृश मन [उस रय को] सम्यक रूप से ले चलता है अश्व उसी के वश मे होंगे 1 [५] यस् तु विज्ञानवान् भवति युक्तेन मनसा सदा तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथे ॥६॥ अनु०-परन्तु जो विवेकवान् और सदा समाहित चित्त से युक्त होता है उस की इन्द्रियां उसी प्रकार वश में होती है जैसे सारथि के अधीन अच्छे पोडे । (६) सि०अ०- ---[वह] रय के स्वामी और सवार अर्थात जीवात्मा को ऐसे उच्च पद पर प्रतिष्ठित करेगा जहाँ से लौटना नहीं होता। यह साक्षात ब्रह्मपद और परमपद है । [१] यस् त्वविज्ञानवान् भवत्यमनस्क सदाऽशुचि न स तत् पदमाप्नोति सध्सार चाधिगच्छति ॥७॥ अनु०-जो अविवेकी, असयतचित्त, और सदा अपवित्र होता है वह उस पद को नहीं प्राप्त कर सकता, और ससार को प्राप्त होता है । (७) यस् तु विज्ञानवान् भवति, समनस्क , सदा शुचि स तु तत् पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥८॥ अनु०-विन्तु जो विवेक्वान्, सयतचित, और सदा पवित्र होता है वह तो उस पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से यह फिर जन्म नही लेता। (८) १ सिरे अरमर में मत्र और पर सतय टीका नहीं प्राव होती। उन का मारोग मत्र ६ और कार्यका में गा गया है।

कठोपनिपद् [७३ विज्ञानसारथिर् यस् तु मन प्रग्रहवान् नर सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णो परम पदम् ।।९॥ अनु०-जिस पुरुष वा विवेक सारथि है और मन लगाम, वह (समृति) मार्ग के पार उस विष्णु के परम पद को प्राप्त कर लेता है ।(९) सि० अ०-यदि बुद्धि जो रथ के सारथि के समान है, अज्ञानी है, तो अश्व उम के वश में नहीं होंगे और उस परमपद को प्राप्त नहीं करायेंगे। वे अधम भूमि पर डाल देंगे जो नरक का द्वार है। [९] इन्द्रियेभ्य. परा ह्या, अर्थेभ्यश् च पर मन , मनसस् तु परा बुद्धिर्, बुद्धरात्मा महान् पर' ॥१०॥ अनु०-इन्द्रियो से विषय उत्कृष्ट है और विषयो से मन, मन से बुद्धि उत्कृष्ट है और बुद्धि से महान् आत्मा (महत्तत्त्व) । (१०) सि०अ०-परब्रह्म पद की प्राप्ति अति कठिन और सूक्ष्म है, जिस का प्रथम आवरण इन्द्रियाँ हैं और द्वितीय आवरण महाभूत हैं जिन से इन्द्रियों की उत्पत्ति १ इस मन्त्र में बुद्धि से श्रेष्ठ महानारमा कथित है। महानात्मा का अयं शकराचार्य महत्तत्त्व अथवा हिरण्यगर्म किया है। इस अर्थ की पुष्टि किसी न किसी रूप में महाभारत से भी होती है। महाभारत में यह शब्द कई स्थानों पर पाया है (अनुशासन पर्व १४.४१६-४१७, श्राश्वमेधिक पर्व ३५.४७, ४०.१-६; ४२.६१-६२, ५०. ३३-३६, ५४-५५)। कहीं-कहीं तो प्रस्तुत तथा अगला मत्र भी बहुत थोड़े पाठ-भेद के साथ श्राया है। यह मत्र किंचित् पाठ-मैद के साथ गीता (३०४२) में भी श्राता है, जिस के अन्तिम शन्द 'स' ('यो बुद्ध परतस्तु स')का अर्थ भी वस्तुन उपनिषन्मत्र को प्यान में रखे बिना नहीं सुन सकता । अस्तु गीताध के विवेचन का यह स्थल नहीं है । एक दूसरी दृष्टि से, उपनिषद् में प्रयुक्त महानारमा शब्द का अर्थ 'अहङ्कार', काम', अथवा 'मूल वासना' भी हो सकता है। वस्तुत महाभारत (शान्तिपर्व १७७५२) के एक श्लोक- 'आत्मना सप्तम काम हत्वा शत्रुमिवोत्तमम् प्राप्यावथ्य ब्रह्मपुर राजव स्यामह मुखी' के अनुसार ७ नम्बर पर काम का ही स्थान है। गीता के श्लोक में प्रयुक्त 'स' शब्द से भी काम का ही अध्याहार होता है, ब्रह्म अथवा आत्मा का नहीं, क्योंकि उस के पूर्वगामी श्लोक ४१ में काम का ही वर्णन हुआ है।

७४] सिरे अक्बर (फारसी) हुई है। इन से उच्चतर आवरण मन है, उस से उच्चतर आवरण बुद्धि, और उस से उच्चतर यावरण हिरण्यगर्भ है जो महाभूतो का अधिष्ठान है। [१०] महतः परमव्यक्तमव्यक्तात् पुरुपः परः। पुरुपान् न परं किंचित् सा काष्ठा सा परा गतिः ॥११॥ अनु०-महत्तत्व से अव्यक्त (मूलप्रकृति) उत्कृष्ट है और अव्यक्त से पुरुप उत्कृष्ट है । पुरुष से उत्कृष्ट कुछ नहीं है। वहीं पराकाष्ठा है, वही परागति है । (११) सि० म.उस से भी उच्चतर आवरण प्रकृति है जो गुणत्रय की साम्यावस्था है । उस से भी ऊंचा आत्मा है जो सर्वत्र व्यापक है। यही परागति और पराराष्ठा है। उस से उच्चतर और कोई पद नहीं है । [११] एप सर्वेषु भूतेषु गूढोऽऽत्मा न प्रकाशते। दृश्यते त्वग्रयया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ।।१२।। अनु०-सम्पूर्ण भूतो मे छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाशित (व्यक्त) नहीं होता। यह तो सूक्ष्मदर्शी पुरपो द्वारा अपनी तीन और सूक्ष्म बुद्धि से ही देखा जाता है । (१२) सि०अ०-य -यही आत्मा हिरण्यगर्भ से ले कर तृण तक सभी महाभूतो और प्राणियों में निगूढ है। इसी कारण उस का स्वरूप प्रकट नहीं है । जो पुष्प सूक्ष्मदर्शी और कुशाग्रवृद्धि हैं वे उस अद्वैत तत्त्व को देखते हैं। [१२] यच्छेद् वाङ्मनसी प्राज्ञस्, तद् यच्छेज् ज्ञान आत्मनि, भानमात्मनि महति नियच्छेत् तद् यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३॥ अनु०-विवेयी पुरष वाणी और मन का नियमन करे, उस (मन) को जानस्यरूप आत्मा मे नियुक्त करे, ज्ञान को महत्तत्व में नियुक्त करे, और महतव को शान्त आत्मा में नियुक्त करे । (१३) सि०अ०-पहले अपनी इन्द्रियों को एकाग्र कर के मन में सीन कर देते हैं, उसके पश्चात् मन को बुद्धि मे सीन कर देते हैं, युदि को जीवात्मा में लोन कर देते हैं, जीवारमा को महान् आत्मा मे सीन कर देते हैं, और महान् आत्मा रो आत्मा [आरम- तत्य अयवा परमात्मा] मे सीन पर देते हैं। [१३] ठोपनिपद् [७५ उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य वरान् निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस् तत् कवयो वदन्ति ॥१४॥ अनु०-उठो, जागो, सत्पुरुषो के समीप जा कर शान प्राप्त करो। तत्त्वज्ञानी लोग उस दुर्गम पथ को तीक्ष्ण और दुस्तर छुरे की धार बतलाते हैं। (१४) मि० अ०-इस के पश्चात् यमराज बोले-प्रमाद निद्रा, अज्ञान, और मूर्खता मे फंसे हुए और सोए हुए लोगो! जाग जाओ और प्रयत्न कर पे आत्मज्ञानी सिद्ध गुरुओ के पास जा कर आत्मज्ञान प्राप्त करो, क्योकि उस आत्मा तक पहुँचना कठिन है और छुरे की धार से भी तेज । उस के तेज होने के कारण उस पर पाँव नहीं रखा जा सकता। प्राशो और शानियो ने इस माग को ऐसा ही बतलाया है। [१४] अशब्दमस्पर्शमरूपमव्यय, तथाऽरस, नित्यमगन्धवच् च यत्, अनाद्यनन्त, महत पर, ध्रुव, निचाय्य तन् मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥१५॥ अनु०-गो अशब्द, अरपर्श, अरूप, अव्यय, तथा रसचून्य, नित्य, गन्धरहित, अनादि, अनन्त, महत्तत्त्व से भी महान्, और ध्रुव है उसे जान कर [पुरुप] मृत्यु के मुख से छूट जाता है । (१५) सि०अ०--यह मार्ग उस सत्ता तक पहुँचने का है जो अशब्द है और वर्ण, ध्वनि, स्पर्श, और रंग से परे। वह अव्यय है, अरस है नित्य है। उस मे गध नहीं है। उस का आदि और अत नहीं है। वह बुद्धि से भ्रष्ठतर है और घुव है। जो सन्मार्ग पर चल कर उस की जिज्ञासा करता है वह उसे जान लेता है और मृत्यु के मुख छूट जाता है। [१५] नाचिकेतमुपाख्यान मृत्युप्रोक्त सनातनम् उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ।।१६॥ अनु०-मृत्यु की कही हुई नचिकेता की सनातन क्था को कह और मुन कर मेधावी [पुरुष] ब्रह्मलोक मे महिमान्वित होता है । (१६) ७६] सिरे अक्बर (फारसी) सि०अ०-यह वार्तालाप जो यमराज और नचिकेता के बीच हुमा है सदा रहने वाला है। जो ज्ञानी पुरुष इस का प्रवचन करता है और सुनता है वह परब्रह्म को प्राप्त करके शाश्वत आनद मे मग्न रहता है । [१६] य इम परम गुह्य श्रावयेद् ब्रह्मससदि प्रयत श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते, तदानन्त्याय कल्पत इति ॥१७॥ अनु०-जो पुरुप इस परम रहस्य को सयत हो कर ब्राह्मणो की सभा म अथवा श्राद्धकाल म सुनाता है [उस का] वह [कर्म] अनन्त फल वाला होता है, अनन्त फल वाला होता है । (१७) सि० ३०-जो अपने गुल और अभ्यन्तर को पयिन पर के ब्रह्म के जिज्ञासुओ का इस गुह्य रहस्य को सुनाता है और श्राद्धकाल में अजिज्ञासुओ को भी सुनाता है वह अन त फल को प्राप्त करता है । [१७] ॥ इति प्रथमेऽध्याये तृतीया वल्ली ।। ॥ इति प्रथमोऽध्याय ॥ द्वितीयोऽध्यायः प्रथमा वल्ली पराचि खानि व्यतृणत् स्वयभूस, तस्मात् पराड् पश्यति नान्तरात्मन् । पश्चिद् धीर प्रत्यगात्मानमैक्ष- दावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥१॥ अनु०-स्वयम्भू (परमात्मा) नै इन्द्रिया को वैध पर ये बहिर्मुख कर दिया है। इसी से जीव बाह्य विषयो को देखता है, अन्तरात्मा को नहीं । अमरत्व की इच्छा परते हुए चा [आदि इन्द्रियो] को रोव लेने याला कोई धौर पुरुष ही प्रत्यगात्मा को देख पाता है। (१) सि०अ०-आत्मा को कोई नहीं देवता। इस का कारण यह है कि आत्मा ने उसकी इन्द्रिया का अपनी भोर स फर कर बर्हिमुय पर दिया है। इमरण से कठोपनिपद् [ ៤១ वह बाह्म विषयो को देखता है और आत्मा को नहीं देखता जो कि भीतर है, क्योकि वह स्वामी है, जो चाहता है करता है, सिवाय उस के जो परमात्मा नहीं चाहता। शानियो और धीर पुरुषो मे कोई ही मोक्ष की इच्छा से अपनी इन्द्रियो को बाहर भीतर से जा कर आत्मा को देखता है। [१] पराच कामाननुयन्ति बालास् ते मृत्योर् यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्व विदित्वा ध्रुवमध्रुवेप्विह न प्रार्थयन्ते ॥२॥ अनु०-अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगो के पीछे लगे रहते है। वे सर्वत्र व्याप्त मृत्यु के पाश मे पडते हैं। किन्तु धीर पुरप अमरत्व को ध्रुव (निश्चल) जान कर ससार के अनित्य पदायों में से किसी की इच्छा नहीं करते । (२) ति० अ० -वालवुद्धि अज्ञानी बाह्य विषयो मे फंस जाते हैं। इस कारण वे महामृत्यु के पाश मे फंस जाते हैं जो उहें सर्वत्र आबद्ध करता है और वे उस से बाहर नहीं निकल पाते। यही कारण है कि ज्ञानी पुरुष अमर और ध्रुव तत्त्व को जान कर नश्वर वस्तुओ की आकाक्षा नहीं करते। [२] येन रूप, रस, गन्ध, शब्दान्,स्पर्शाधश् च, मैथुनान् एतेनैव विजानाति, किमत्र परिशिप्यते ? एतद् तत् ॥३॥ अनु०-जिस इस [आत्मा] के द्वारा मनुष्य रूप, रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श, और मैथुनजन्य सुखो का अनुभव करता है उस [आत्मा] से इस लोक में और क्या बचता है ? [तुझ नचिकेता का पूछा हुआ] वह [तत्त्व] निश्चय यही है। (३) सि. वह जो इस शरीर मे इद्रियो का प्रेरक है रूप, रस, और गध का अनुग्राहक है शब्द का थोता स्प्रष्ट्या और मैथुन के आनद का भोक्ता है जीवात्मा है। प्रत्येक इद्रिय अपना नियत कार्य करती है, वह दूसरा काय नही कर सकती। यह इसी से जाना जाता है कि आत्मा शरीर से पृथक् है और सब का प्रेरक है। यह जीवात्मा आत्मा है । [३] मिर अक्वर (फारसी) स्वप्नान्त जागरितान्तं चोभी येनानुपश्यति, महान्त विभुमात्मान मत्वा धीरो न शोचति ॥४॥ अनु०-जिस के द्वारा मनुष्य स्वप्न के विषयभूत और जाग्रत् के विषयभूत, दोनो प्रकार के पदार्थों को देखता है उस महान् और विभु आत्मा को जान कर धीर पुरुप शोक नहीं करता । (४) सि०अ०--वह जो स्वप्न में देखता है, जागरण मे देवता है, वह महान और विभु है। धीर पुरुप उस की खोज कर के दुख से छूट जाते हैं। [४] य इमं मध्वद' वेद आत्मानं जीवमन्तिकात् ईशानं भूतभव्यस्य, न ततो विजुगुप्सते । एतद् वै तत् ॥५॥ अनु०-जो पुरुष इस कर्मफलभोक्ता, भूत-भविष्य के शासक, आत्मा को निक्ट से जानता है निश्चय यही वह [आत्मतत्त्व] । (५) मि० अ०-जो कोई इस जीवात्मा को, जो कि निकटतर है और कर्म के फलो का भोता है, भूत, वर्तमान, और भविष्य के शासर वे रुप मे जानता है, उम क्षण म मनुष्यो का भय तपा सभी भय छूट जाते हैं। क्या जाना ? कि यह जोवारमा वही आत्मा है। [५] पूर्व तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत गुहा प्रविश्य तिष्ठन्त यो भूतेभिर् व्यपश्यत । एतद् वै तत्' ।।६।। अनु०-जो पूर्वकाल मे तप से उतान्न हुआ वह जल [आदि भूतो] से पूर्व उत्पन्न हुआ था! जो प्राणियो की [बुद्धिरूप] गुहा में स्थित हो पर देखता है, निश्चय यही वह है । (६) मि० अ०-ग्रष्टा, जिस को प्रपम मृष्टि हिरण्यगर्भ है और सभी प्राणियो के हृदय की गुहा मै विराजमान है, महामूनो से आच्छन होने के कारण दृष्टिगोरर नही होता। यह यद पुष्प वही आत्मा है, यह प्रथम पुरुष वही आत्मा है। [1] १ भवन' शन्द अम्वेद (१.१६४.२३) में भी प्रयुक्त हुआ है। यहाँ इस का अर्थ है 'मg+मजल का शोषण करने वाला। यह 'सुपा (भा मिली) विशेषणा के रूप में भाया है। उपनिरुद मैं उसके अर्थ का किंचित् विस्तार होकर उसका तात्पर्य 'मोक्का' हो गया है। २ इस मद का पाठ विचिन् सए प्रतीत होता है।

कठोपनिषद् [७९ या प्राणेन सभवत्यदितिर् देवतामयी गुहा प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर् व्यजायत । एतद् वै तत्' ।।७।। अनु०-जो देवतामयी अदिति प्राण से प्रकट होती है तथा जो [बुद्धिरूप] गुहा मे प्रविष्ट हो कर रहने वाली और भूतो के साथ ही उत्पन्न हुई है, निश्चय यही वह है । (७) सि० म.--ब्रह्म जो साक्षात हिरण्यगर्भ बन कर सम्पूण सृष्टि के रूप में प्रकट हुआ है जिस में सभी देवता और इद्रियो के देव विद्यमान हैं, जो सभी ऐद्रिय विषयो का भोक्ता है और जो हृदय की गुहा में निवास करता है वह सभी प्रकार के महाभूत हो कर स्थित है। यह वही आत्मा है । [७] अरण्योर निहितो जातवेदा गर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभि , दिवे दिव ईडयो जागृवद्भिर् हविष्मद्भिर् मनुय्येभिरग्नि । एतद् वै तत् ॥८॥ अनु०--गभिणी स्त्रियो द्वारा भली प्रकार पोपित गर्भ के समान जातवेदा (अग्नि) दोनो अरणियो के बीच मे स्थित है और प्रमाद शून्य तथा होमसामग्री-युक्त पुरुषो द्वारा नित्यप्रति स्तुति किये जाने योग्य है। यही वह है । (८) सि० अ०-जो काष्ठ मे निहित है और जिस पर देवता सावधान दृष्टि रखते हैं वह गभ के समान है जो पेट मे छिपा होता है और जिस पर गर्भिणी सावधान दृष्टि रखती है । विद्वान ब्राह्मण प्रतिदिन हवनकाल में अग्नि की स्तुति करते हैं। यह अग्नि वही थारमा है। [] यतश् चोदेति सूर्योऽस्त यत्र च गच्छति त देवा सर्वे अर्पितास् तदु नात्येति कश्चन । एतद् वै तत् ।।९।। अनु०-जहाँ से सूर्य उदित होता है और जहाँ वह अस्त हो जाता है उस मे सम्पूर्ण देवता अर्पित हैं । उस का कोई भी बल्लघन नहीं कर सकता । यही वह है । (९) १ इस मत्र का पाठ किंचित् भ्रष्ट प्रतीत होता है। २ यह मत्र किंचित् पार भेद के साथ ऋग्वेद (३ २४ २) में भी जाता है।

८०] सिर अववर (फारसी) मि० अ०-सूर्य, जिस से देवता सम्बद्ध हैं, उन अरो के समान है जो रथ की नाभि में सुदृढ है। जिस स्थान से वह उदित होता है और जिस स्थान मे वह अस्त होता है उस स्थान से मागे कोई नहीं जा सकता। वह स्थान यही आत्मा है । [९] यदेवेह तदमुद्र यदमुन्न तदन्विह । मृत्यो स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥१०॥ अनु०-जो तत्त्व] यहाँ है वहीं वहाँ है और जो वहाँ है वही यहां है। जो विश्व को नाना रूप में देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को [अर्थात् जन्म- मरण को प्राप्त होता है । (१०) सि० अ०—जीवारमा जो अन्त करण में प्रतिष्ठित है, यही आत्मा है जो सत् है, चिद्रूप है, और आनन्दस्वरूप है। और भारमा जो सत् है, चिद्रूप है. और आनन्द- स्वरूप है, यही जीवात्मा है जो अन्त करण में विद्यमान है। जो कोई इम आत्मा को पृथक् देखेंगा, वह जिस लोक मे भी जायगा वहाँ मृत्यु के हाथ से छुटकारा नहीं प्राप्त करेगा। [१०] मनसैवेदमाप्तव्य, नेह नानाऽस्ति किंचन । मृत्यो स मृत्यु गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥११॥ अनु०-मन से ही यह तत्त्व प्राप्त करने योग्य है, इस मे नाना है हो नहीं। जो इसे नाना रूप में देखता है वह मृत्यु से मृत्यु को जाता है। (११) मि० अ०-होना यह चाहिए कि सदा अपन मन में यह चिन्तन परता रहे रि मैं वह हूँ, हि जीवात्मा आत्मा है, नि भेद कुछ नहीं है, और कि गो कोई मुझे और उस भिन जानेगा वह जिस लोक मे भी जाय उसे मृत्यु के हाथ से छुटकारा नहीं ।[११] अगुप्ठमान्न. पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति ईशानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्मते । एतद् वै तत् ।।१२॥ अनु०-अगुप्ठपरिमाण, भूत और भविष्य का शामक पुरुष शरीर रे मध्य में स्थित है। निश्चय यही वह है । (१२) सि.को कोई उस ज्योति को, जो हृदय के मध्य पुरुष अगुष्ठ बरादर निहित है, भूत, वर्तमान, और भविष्य का स्वामी जानता है, वह सभी भयो से मुक्त हो जाता है और उसे प्राग का भी भय नहीं होता। यह वही आरमा है । [१२] धे में 52796 , यथोदक दुर्गे वृष्ट कठोपनिपद [८१ अगुष्ठमात्र पुरुषो, ज्योतिरिवाधूमक, ईशानो भूतभव्यस्य, स एवाद्य स उ श्व । एतद् वै तत् ॥१३॥ अनु०-पुरुप अगुप्ठमान्न, भूत भविष्य का शासक, और धूमरहित ज्योति के समान है। वही आज है और वही कल रहेगा। निश्चय यही वह है । (१३) मि० अ०-वह पुरुष जो मनुष्य के अंगूठे के बराबर है, और जिस की ज्योति निर्धूम अग्नि के समान है और जो भूत वर्तमान और भविष्य का स्वामी है और जिस के लिए आज और कल बराबर है वही आत्मा है। [१३] पर्वतेषु विधावति, एव धर्मान' पृथक् पश्यस् तानेवानुविधावति ॥१४॥ अनु०-जिस प्रकार दुर्गम (ऊँचे) स्थान मे वरसा हुआ जल पर्वतो में वह निकलता है उसी प्रकार गुण धर्मों (अथवा पदार्थो) को पृथक्-पृथक् देख कर जीव उन्ही को प्राप्त होता है । (१४) मि० अ०-जिस प्रकार वपा पर्वत के ऊपर होती है और उस पर्वत के चारो और से पानी नीचे बहता है उसी प्रकार समस्त गुण धर्मों की सृष्टि वह एक आत्मा है । [१४] यथोदक शुद्ध शुद्धमासिक्त तादृगेव भवति, एव मुनेर् विजानत आत्मा भवति गौतम । ॥१॥ अनु०-जिस प्रकार शुद्ध जल मे डाला हुआ शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है उसी प्रकार, हे गौतम । ज्ञानी मुनि का आत्मा भी हो जाता १ यहाँ 'धर्म शन्द उसी अर्थ में प्रयुक्त प्रतीत होता है जिस में इसका प्रयोग चौर वाढ मप अथवा किसी सीमा तक न्याय-वैशेषिक शास्त्र में हुआ है। उपनिषद् अथवा वैदिक साहित्य में सम्भवत यह प्रयोग केवल यही मिलता है। मोटे तौर पर, यहाँ इसका अर्थ 'गुण धर्म अथवा पदार्थ सममना चाहिए।

८२] मिर अश्वर (फारसी) सिजो गुण धम का अभिलापो है वह गुण धर्मो म मा रहना है। जिस प्रकार शुद्ध जत स्वच्छ पान म स्फटिव के ममान स्पष्ट दिखायी देता है उसी प्रकार वह आत्मा शुद्ध बत करण म स्पष्ट दिखायो देता है और अशुद्ध अत करण म अस्पष्ट दिखामा देता है। [१५] ॥ इति द्वितीयेऽध्याय प्रथमा बत्ती ॥ द्वितीया वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतस ।' अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश् च विमुच्यते । एतद् वै तत् ।।१।। अनु०-उस अजन्मा यथावत ज्ञान वाले [आत्मा] का पुर ग्यारह द्वार वाला है। [उस का] अनुष्ठान करने पर [मनुप्य] शोक नहीं परता, और वह जीव मुक्त होता हुआ मुक्त हो जाता है। निश्चय यही वह है । (१) सि००-जीवारमा उत्सत नहीं हुआ है। उस नी ज्याति सवन एक्रम है। उस का निवारा उस भवन म है जिसमें ग्यारह द्वार हैं। वो वाद उस मात्मा की माधना परता है वह शोर रहित और निस्पृह हो कर मार प्राप्त कर लता है। यह वही आत्मा है । [१] हस शुचिपद्, वसुरन्तरिक्षसद्धोता वदिपदतिथिर् दुरोणसत् । नृपद्, वरसदृतसद्, व्योमसदन्जा, गोजा, ऋतजा, अद्रिजा, ऋत वृहत् ॥२॥ १ म्यारह बार ये है-दो घतु दो कान दो नयन, मुमा दा पस्यन्द्रियों नामि और विति। अन्तिम दा की उपना कर देने पर भारद्वार खारे पाते है, मा कि अपद (२० २.३१, ६४३) मा (८१३) और स्वारपतरोपनिष (१९८) में उलिनसित है। २ मह मत्र किंचित पार भेद के माम ऋम्पद (११०४) गुलियजुर्वेद (१०१ निरीयाहिता (३ २ १०२), और शतपयद्रावरा (६५) में भी पाया।

कठोपनिषद् [२३ अनु०-[वह] आकाशचारी हस (सूर्य) है, अन्तरिक्ष में विचरने वाला वायु है, वेदी मे स्थित होता (अग्नि) है, घर में स्थित अतिथि है। [वह ] मनुष्यो मे स्थित है, श्रेष्ठो मे स्थित है, ऋत मे स्थित है, आपराश में स्थित है। वह] जल मे उत्पन्न हुआ, गायो अथवा किरणो मे उत्पन्न हुआ, ऋत मे उत्पन्न हुआ, उदयाचल में उत्पन्न हुआ, [वह] महान् ऋत मि०अ०-वात्मा सर्वसहारक' है। वह सूर्य के मध्य में स्थित है, सब को बसाने वाला है, वायु के समान सर को गति देने वाला है आवाश म ओतप्रोत है, अग्नि के स्प मे पृथ्यो । स्थित है, अमृन वन बर सोमवल्ली मे स्थित है। वह मनुष्यो म, देवताओ ग, यज्ञो म, सत्य ग, भोर पूनाराम स्थित है। सभी पदार्थ जो जल से उत्पन्न है जाम स्थित होते है। जो कुछ पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है, जो कुछ यज्ञफल-स्वरूप है, और जो कुछ पर्वतो म उत्पन हुआ है वह मव आत्मा है। आत्मा सत्य है, अनन्त है, और वृहत् है । [२] अर्ध्व प्राणमुन्नयत्यपान प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीन विश्वे देवा उपासते ॥३॥ अनु०-वह प्राण को ऊपर की ओर ले जाता है और अपान वो नीचे की ओर ढयेलता है। हृदय में रहने वाले यामन की सब देव उपासना परते हैं । (३) मि००-यह प्राणवायु को ऊपर की ओर ले जाने वाला है और वह अपान वायु को नीचे की ओर प्रवाहित करने । वह हृदय के मध्य में स्थित है और सभी भानेन्द्रिय-स्वरूप देयता उस की उपासना करते हैं । [३] १ फारसी मे 'फानोकुनिए-ए हम'। दाराशिकोह ने पह पर इसी भय में अपत्र भी प्रयुक्त दिया है, जैसे प्रश्नोपनिषद् २१ को प्यास्या में, घ देवता के विशेषण के रूप में। पदि 'पानी' (अनित्य, नश्वर) के स्थान पर 'फना' होता तो मपं अधिक मुयोष होता। अस्तु, यहाँ दाराशिरोह ने इसे 'हस' के पर्याय रे रूप में रखा है, जो सर्वथा बागत है। 1 - सिर अक्वर (फारमी) अस्य विस्रसमानस्य, शरीरस्यस्य देहिन , देहाद् विमुच्यमानस्य किमन्न परिशिप्यते । । एतद् वै तत् ।।४।। अनु०-इस शरीरस्य देही के [देह से] च्युत हो चलने, देह से मुक्त हो नलने की दशा मे भला इस [शरीर में क्या रह जाता है। निश्चय यही वह है। (४) मि०अ०—वह उपामना योग्य है। शरीर त्यागने और ज्ञानेन्द्रिया के बिखर जान के पश्चात जो शेप दता है वही आरमा है। [४] न प्राणेन नापानेन मों जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाथिती ॥५॥ अनुल-मनुष्य न तो प्राण से जीवित रहता है और न अपान से । वे तो किसी अन्य से जीवित रहते हैं, जिस म ये दोनो बाधित हैं। (५) सि०अ०- मनुष्य जब ता जीवित है, प्राण और अपान से जीवित नहीं रहता, प्रत्युत उस का जीवन उस सत्ता रा है जिरा म प्राण और मपान भी जीवित हैं। [4] हन्त । त इद प्रवक्ष्यामि गुहा ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरण प्राप्य आत्मा भवति गौतम । ॥६॥ अनु० हे गौतम । अब में तुझे उस गुह्य और सनातन ब्रह्म का प्रवचन ररंगा, तथा मरण को प्राप्त होने पर आत्मा जैसा हो जाता है [वह भी बतलाऊँगा] । (६) मि०म०-4मराज बोले-ह नचिकेत । नुझे मैं उम ब्रह्म या प्रवचन करता हूँ जो शाश्वन और गुह्य है। मृत्यु के पश्चात पुरुष जो आत्मा हो जाता है उमरा भी तुमे प्रवचन करता हूँ। [६] । योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिन । स्थाणुमन्येऽनुसयन्ति यथावनं यथाश्रुतम् ॥७॥ अनु०-अपने पर्म और ज्ञान के अनुसार कितने ही देहधारी तो शरीर कठोपनिषद [५ धारण करने के लिए किसी योनि को प्राप्त होते हैं और कितने ही स्थावर भाव को प्राप्त हो जाते हैं । (७) सि०अ०—जिस किसी ने जिस प्रकार वा कम किया है और जो कामना की है मृत्यु बेला मे उमी कम और वासना के अनुसार उस लोक को जाता है जो उस कम और वासना के अनुरूप होता है। कोई इमी लोर ने बधन में रह पाते हैं । [५] य एप सुप्तेषु जागति काम काम पुरुपो निर्मिमाण तदेव शुक्र, तद् ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल लोका श्रिता सर्वे, तदु नात्येति कश्चन । एतद वै तत् ।।८।। अनु०-[अवयवो पे] सो जान पर जो यह पुरुष अपनी कामनाओ की रचना करता हुआ जागता रहता है वही शुक्र (शुद्ध) है वह ब्रह्म है वही अमृत कहा जाता है। उस मे सम्पूण लोक प्रतिष्टित हैं, कोई भी उस का उल्लघन नहीं कर सकता। निश्चय यही वह है । (८) मि०अ०-स्पप्न के समय मभी ज्ञानेद्रियां अतमुख होती हैं। पुरुप जो उस माल म जागता है अर्थात जीवात्मा और अपनी इच्छानुसार उस वाल मे वस्तुएं उत्पन्न कर लेता है वही शुद्ध है वही अमर है वही ब्रह्म है सारे लोक-लोकातर उसी पर आश्रित हैं उस मा अतिक्रमण कोई नहीं कर माता । यह वही थामा है [] अग्निर् यथदो भुवन प्रविष्टो रूप रूप प्रतिरूपो बभूव, एकस् तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूप रूप प्रतिरूपो, वहिश च ।।९।। अनु० जिस प्रकार भुवन में प्रविष्ट एक ही अग्नि प्रत्येव रूपये अनुरूप हो गया है उसी प्रकार सम्पूर्ण भूता का एक ही अन्तरारमा उन में रूप के अनुरूप हो रहा है और [उन रो] बाहर भी है । (९) मि०अ०--में अग्नि एस है उस म जो कुछ पड़ता है वह अग्नि भी उस पाय वा रूप ले लेता है चोर उसके बाहर भाने मूल स्वरूप म घिन होता है उमी प्रकार यह एप मारमा गभी म प्रविष्ट हो पर मभी के रूप में भामित होता है । [१] सिरें अक्बर (फारसी) वायुर् यथैको भुवन प्रविष्टो रूप रूप प्रतिरूपो वभूव, एकस् तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूप रूप प्रतिरूपो, वहिश् च ॥१०॥ अनु०-जिस प्रकार इस लोक मे प्रविष्ट वायु प्रत्येक रूप के अनुरुप हो रहा है, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूतो का एक ही अन्तरात्मा प्रत्येक रूप के अनुरुप हो रहा है, और [उन से] वाहर भी है। (१०) सि०अ०-जैसे एक वायु रथान भेद मे पाच प्रकार का हो जाता है और उसे प्राण अपान, समान उदान, और व्यान कहने लग जाते है और यह भीतर इन के रूप में स्थित है और वाहर मूल स्वरूप म स्थित है उसी प्रकार यह एक आत्मा जीवात्मा हो कर और प्रत्येक शरीर म प्रविष्ट हो कर विविध रूप धारण कर रोता है और बाहर गिज स्वरूप मे प्रतिष्ठित होता है । [१०] राबलोकस्य चक्षुर् सूर्यो यथा न लिप्यते चाक्षुपैर् बाह्यदोपै , एकस् तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदु खेन वाह्य ॥११॥ अनु-जिस प्रकार सम्पूर्ण लोप का चक्षु होकर भी सूर्य चक्षु सम्बन्धी वास दोपो से लिप्त नहीं होता, उसी प्रकार सम्पूर्ण भूता का एत्र ही अन्तरात्मा ससार के दुप से लिप्त नहीं होता, [चलि उस से] बाहर रहता । (११) सि०अ०-जैसे एव मूय सभी के नेना की ज्योति है, किन्तु नेता को ग्रस्त करने वाले दोप सूय को कोई हानि नहीं पहुंचाते और सूप अपवित्र और गदे पदार्थों पर पमरते भी इन अपचिन्नता और गधी को प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार एक आत्मा सव म है और इन सब के दाप कष्ट, और अपवित्र भाव उस मा सशाही मरते ।[११] कठोपनिषद [८७ एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एक रूप बहुधा य करोति तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास् तेषा सुख शाश्वत, नेतरेपाम् ॥१२॥ अनु०-जो एक, सब को अपने वश में रखने वाला, और सम्पूर्ण भूतो का अन्तरात्मा एक रूप को बहुत प्रकार का कर देता है, अपने में स्थित उस [देव] को जो धीर पुरुप देखते है उन्ही को नित्य सुख प्राप्त होता है औरो को नही । (१२) सि०अ०-वह सब के परे है । वह आत्मा अदत है। सभी उस के वश में हैं और वह किसी के वश में नहीं। वह सब के भीतर है। वह अपने एक रूप को अनेक कर देता है। जो घोर और ज्ञानी इस आत्मा को अपने भीतर देखते हैं शाश्वत सुख उही के लिए है दूसरे के लिए । [१२] नित्योऽनित्याना चेतनश् चेतनाना- मेको बहूना यो विदधाति कामान् तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास् तेपा शान्ति शाश्वती, नेतरेपाम् ।।१३।। अनु०-जो अनित्य पदार्थों मे नित्य स्वरूप तथा चेतना मे चेतन है और जो अकेला बहुतो की कामनाएं पूर्ण करता है अपने मे स्थित उस [आत्मा] को जो विवेकी पुरुष देखते है उन्ही को शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है औरो को नहीं । (१३) सि०अ०-वह आत्मा प्रयेक नित्य से नित्यतर है और प्रत्येक चेतन से चेतनतर है। वह अकेला सभी की कामनाएं और अभिलाषाएं पूर्ण करता है। जो धीर और ज्ञानी इस आत्मा को अपने भीतर देखते हैं शाश्वत शाति उही के लिए है न कि दूसरे के लिए। [१३] ८८ - ८] सिर अक्बर (फारसी) तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्य परम सुखम् । कथ नु तद् विजानीया ? किमु भाति विभाति वा ॥१४॥ अनु० ज्ञानवान् पुरुप अनिर्वाच्य परम सुख को 'वह यह है', ऐसा मानते हैं। उसे मैं कैसे जानूं? क्या [यह] प्रकाशित या जवभासित होता है ? (१४) सि०अ०-[ज्ञानवान् पुरुष] जानते हैं कि आत्मा परम आनन्द और महान है, और कि वह वाणी मे नहीं आता। वही आत्मा है। मैं उस परमानन्द स्वरूप आत्मा का तुयें कैसे प्रवचन कर सकता हूँ । नचिवेता ने पूछा-यदि आप प्रवचन नहीं कर सरते तो मैं कैसे जान सकता हूँ? [१४] न तव सूर्यो भाति, न चन्द्रतारक, नेमा विद्युतो भान्ति, कुतोऽयमग्नि ? तमेव भान्तमनुभाति सर्व, तस्य भासा सर्वमिद विभाति ।।१५।। अनु०-वहाँ सूर्य प्रकाशित नहीं होता, चन्द्रमा और तारे भी नही चमकते, और न ये विजलियाँ ही चमकती है, इस अग्नि की तो बात ही षया है ? उस प्रकाशमान से हो सब कुछ प्रकाशित होता है और उस ये प्रकाश से ही यह सब कुछ भासता है। (१५) सि०अ०~यमराज बोले---उस का जानना यही है कि जो कुछ दिखायी देता है वह सब वही है। सूर्य की ज्योति, चन्द्रमा को ज्योति, नक्षन्नो की ज्योति, और विद्युत् यो ज्योति उस तक नहीं पहुंचती। तो मला अनि उम तक वहाँ पहुँच सकती है ? इन वो ज्यानि से उसे नहीं दवा पा मरता। उमी की शाश्वत ज्योति म य ज्योतिष्मान् है, उसी को शाश्वत ज्योति स य मोतिष्मान् हैं । [१५] ॥ इति द्वितीयेऽध्याये द्वितीया वल्ली ।।

[८९ तदेव शुक्र, कठोपनिषद् तृतीया वल्ली ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एपोऽश्वत्थ. सनातन ।' तद् ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल लोका थिता सर्वे, तदु नात्येति कश्चन । एतद् वै तत् ।।१॥ अनु०-यह सनातन अश्वत्य (पीपल) वृक्ष ऊपर की ओर मूल तथा नीचे की ओर शाखाओ वाला है। वहीं विशुद्ध ज्योति स्वरूप है, वही ब्रह्म है, वहीं अमृत कहा जाता है। सम्पूर्ण लोक उसी मे प्रतिष्ठित हैं, कोई भी उस का अतिक्रमण नहीं कर सकता। निश्चय यही वह है। (१) सि०अ०-जगत् एक वृक्ष है जिस का मूल ऊपर है और शाखाएँ नीचे। इस वृक्ष का नाम अश्वत्थ है, अर्थात् वह वृक्ष जो नश्वर नहीं है और प्रलय तक स्थित रहता है। उस के पते सदा गतिशील रहते है। अत यह जगत् भी एक स्थिति में नहीं रहता और परिवर्तनशील है। यह ससार वृक्ष निकट अतीत मे पैदा नही हुवा है, पुरातन है। इस वृक्ष का मूल ब्रह्म है, जो पविन है और जिसे अविनाशी कहते है। सम्पूर्ण जगत उस के आश्रित है। उस का अतिक्रमण कोई नहीं कर सकता। वह आत्मा है । [१] यदिद किञ्च जगत् सर्वं प्राण एजति नि सृतम् । महद्भय वज्रमुद्यत य एतद् विदुरमृतास् ते भवन्ति ॥२॥ अनु०-यह सारा जगत् है वह प्राण से चेष्टा कर रहा है। वह ब्रह्म महान् भयरूप और उठे हुए वन के समान है। जो इसे जानते है वे अमर हो जाते है । (२) सि०अ०-सम्पूर्ण जगन् ब्रह्म से नि सृत और ब्रह्म ही से गतिमान है । ब्रह्म अनन है। उस से सभी उसी प्रकार भय खाते हैं जिस प्रकार उस पुरुप से जो अपने हाथ मे नगी तलवार लिये हो। जिन नरो ने उम पुरुष को समझ लिया है वे अमर हो जाते हैं। [२] १ यह उपमान गीता १५.१-३ में भी प्रयुक्त हुआ है और इस का मूल ऋग्वेद ११६४.२०, १०.३१.७, ८१.४, अथर्ववेद १०.८, २६६, तैत्तिरीपब्राह्मण २ ८.६, शतपथ ब्रावण १४.६.६.३०-३४ (अथवा बृहदारण्यकोपनिषद् ३.६.२८), ११.३.४ (अथवा बृ. उ. २.२.३), मुण्डकोपनिषद् ३१.१, श्वेताश्वतरोपनिषद् ४६ में पाया जाता है। सृत होकर उसी से ९.] सिर अक्बर (फारसी) भयादस्याग्निस् तपति, भयात् तपति सूर्य ; भयादिन्द्रश् च, वायुश् च, मृत्युर् धावति पञ्चम ॥३॥ अनु०-इस के भय से अग्नि तपता है, [इस के भय से सूर्य तपता है, तथा [इसी के] भय से इन्द्र, वायु, और पांचवां मृत्यु दौडता है । (३) सि०अ०-अग्नि उसी को भय से तपता है, सूर्य उसी के भय से तपता है, और इन्द्र, वायु, और पांचवां मृत्यु उसी के भय से अपने कार्य के पीछे भागते हैं। [३] इह चेदशकद् बोद्ध प्राक् शरीरस्य विनस । तत सर्गेपु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥४॥' अनु०-यदि [पुरुष] इस जन्म मे शरीर के पतन से पूर्व [ब्रह्म को] जान सका तो उस से इन जन्म-मरणशील लोको मे वह शरीर-भाव को प्राप्त होने में समर्थ होता है । (४) सि०अ०–जो कोई मृत्यु और देह त्याग के पूर्व उस पुरुप को जान लेता है वह ससार के वधन से छूट जाता है और मुक्त हो जाता है। जो मृत्यु के पूर्व उसे नहीं जान लेता वह अन्य लोको वे बधन में पड़ जाता है यर्थात इस लोक से तो निकल जाता है कितु दूसरे लोर मे पड जाता है। अत मरने के पूर्व ही आत्मा को जान लेना चाहिए। [४] यथाऽऽदर्श, तथाऽऽत्मनि, यथा स्वप्ने, तथा पितृलोके; यथाऽप्न परीव ददृशे, तथा गन्धर्वलोके, छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥५॥ १. इस मा में भी कुछ न कुछ पाठभश अवश्य हुआ है, क्योंकि इस के अनुसार श्रात्मशानी का पुनर्जन्म होता है, वह जन्म मरण के पास नहीं हटना, जो उपनिषदों की विचार माणिक सर्वथा विपीन है। इस की व्याख्या में शकर को अर्थान्तर सिद्ध करने के लिए अपनी पार से स्वच्छन्दतापूर्वक बहुत कुछ जोड़ना पड़ा है। अतएव इस मत्र के प्रथम चरण के अन्त में उन्हों ने 'संसारबन्धगद् विमुच्यते' (मसार-बन्धन से छूट जाता है) और द्वितीय चरण के प्रारम्म में 'म चेदशक बाद' (यदि न जान सका) की वृद्धि की है। मैक्समूलर ने इम के प्रथम चरण में मशद की दुटि मानी है। रॉय अर्नेस्ट एम का मत है कि सने पु के स्थान पर 'स्वर्ग' हाता ता मा अधिक सुबांध हाता । अस्तु मन्त्र की उपलन्य शन्दारली से जो अयं निकलता है वही यहाँ दिया गया है।

कठोपनिषद् [ ९१ । अनु०-जैसा दपण मे वैसा अपने मे जैसा स्वप्न में वैसा पितृलोक में जैसा जल मे कुछ कुछ दिखाया देता है वैसा गन्धवलोक में ब्रह्मलोक मे छाया और प्रकाश के समान । (५) मि०प्र०--जिस प्रकार कोई दपण म अपना मुख देखता है उसी प्रकार अपनी शुद्ध बुद्धि के दपण मे आमा का स्पष्ट दशन करना चाहिए। जो लोग अपनी बुद्धि के दपण में अपने को नहीं देख सकते वे पिट्टतोक में ऐसी वस्तु देखेंगे जो स्वप्न म दियायी देती है। यदि व ग घव लोर म जाते हैं तो उहे ऐसा दियापी देगा मानो अपने मुख को जल में हिलता-डुलता देख रहे हो। जो लोग ब्रह्मलोर को प्राप्त होते हैं वे ब्रह्म को प्रकाश के समान और जगत को छाया के समान देखगे। प्रथम और अन्तिम दशन मध्य म दो वार दशन की अपेक्षा उत्तम है क्योरि प्रथम दशन नानियो का दशन है जो दपण में अपने बाप को देखते हैं द्वितीय तथा तृतीय दान कर्मियो का है और अतिम दशन जिज्ञासुओ का दशन है । [५] इन्द्रियाणा पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत पृथगुत्पद्यमानाना मत्वा धीरो न शोचति ॥६॥ अनु०-पृथक-पृथक् उत्पन्न होने वाली इद्रियो के जो उदय और अस्त होने वाले विभिन्न भाव हैं उन्हे जान कर धीर [पुरुष] शोक नहा करता। (६) सि०अ०-जो नानो आत्मा से पृथग्भूत ज्ञानेद्रियो को ही प्रयेक वस्तु को उपत्ति फा हेतु और उन के नय को भी जानता है वह पानी शोक से मुक्त हो जाता है। [३] इन्द्रियेभ्य पर मनो मनस सत्त्वमुत्तमम् , सत्त्वादधि महानात्मा महताऽव्यक्तमुत्तमम अव्यक्तात तु पर पुरुपो व्यापकोऽलिङ्ग एव च य ज्ञात्वा मुच्यते जतुरमृतत्व व गच्छति ॥७८|| अनु०-इद्रिया स मन बढ कर है मन से बुद्धि उत्तम है बुद्धि से महत्तत्व बढ कर है महत्तत्त्व से अव्यक्त उतम है अव्यक्त से १ यहाँ मत्र १३१० को टिप्पणी टूष्टव्य है।

९२] सिरे अकबर (फारसी) भी पुरुष श्रेष्ठ है, और वह व्यापक तथा अलिंग है, जिसे जान कर जीव मुक्त होता है और अमरत्व को प्राप्त हो जाता है । (७८) मिअ.--जो जानता है कि इंद्रियो के ऊपर मन है, मन के ऊपर समष्टिबुद्धि है, समन्वुिद्धि के ऊपर हिरण्यगर्भ है, हिरण्यगर्भ के ऊपर गुणत्रय की साम्यावस्था [ अर्थात् अव्यक्त अथवा प्रकृति ] है, और उस के भी ऊपर पुरुष है जो सब मे विभु है, व्यापक है और अलिंग है वह इसी जीवन मे सभी बघना से मुक्त हो जाता है। यही जीवन्मुक्त है, अर्थात् जीवन में ही मुक्त। जब वह शरीर त्याग देता है तद अमर और विदेह-मुक्त हो जाता है। अर्थात वह शरीरहित हो कर और साक्षात ब्रह्म वन पर सदा के लिए मुक्त हो जाता है । [७८] न रादृशे तिष्ठति रूपमस्य, न चक्षुपा पश्यति कश्चननम् । हृदा, मनीपा, मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद् विदुरमृतास् ते भवन्ति ॥९|| अनु०-इस आत्मा का रूप दृष्टि में नहीं ठहरता, न इसे कोई आंख से देख सकता है। यह [आत्मा] हृदय, बुद्धि, और मन का विषय है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं । (९) सि०अ०-उस पुरुष को ज्ञानेद्रिया द्वारा नहीं जाना जा सकता और आप में नही देखा जा माता। जो कोई अपनी बुद्धि और अन्न वरण मे सशय और विनिनिरमा रूपी बागनाओ को दूर कर देना है दौर सदविचार द्वारा यदा लाभ कर आत्मा वो जान लेता है वह मुक्त हो जाता है। [९] यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह, बुद्धिश् च न विचेप्टति, तामाहु परमा गतिम् ॥१०॥ अनु०-जिस समय पांचो ज्ञानेन्द्रियां मन ये सहित स्थित हो जाती हैं और बुद्धि भी चेप्टा नहीं करती, उसे परमगति पहत हैं । (१०) १ इस के बार मत्र ८ का अनुगद आरम्म होता है। इन दोनों मों का अनुवाद पृथर-पृथम देना समाधान नहीं प्रतीत होता, पपि दाराशिकोह ने दोनों को पृथा हो रखा है।

कठोपनिषद् [ ९३ सि० अजब [साधा] अपनी पाँची ज्ञानेन्द्रियो को मन और बुद्धि द्वारा बाह्य विपयो से निवृत्त कर वे निश्चेष्ट जीवात्मा में दृष्टि लगाता है, तो इस सम्यक् दृष्टि को परमगति कहते हैं । [१०] तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस् तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥११॥ अनु०-उस स्थिर इन्द्रियधारणा को ही योग कहते है। उस समय पुरुष प्रमादरहित हो जाता है; क्योकि योग ही सृष्टि और प्रलय है । (११) सि०अ०-[जानने वाले] उसे योग जानते हैं। जब वह पुरुष ऐसा करता है तो वह सावधान होता है, भूल नहीं करता, और प्रमादरहित होता है, क्योकि प्रमाद ज्ञान का शव है। अत उसे चाहिए कि खोज करे, तारि ज्ञान हाथ से न जाय और प्रमाद न उत्पन हो। [११] नव वाचा, न मनसा, प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यन्न कथ तदुपलभ्यते ? ॥१२।। अनु०-वह आत्मा न तो वाणी से, न मन से, न नेत्र से ही प्राप्त किया जा सकता है, वह 'है' ऐसा कहने वाले से अन्यत्र (भिन्न पुरुषों को) कैसे उपलब्ध हो सस्ता है ? (१२) मिस-आत्मा को शान के बिना, शास्त्राध्ययन, मन, और चक्षु से प्राप्त नहीं किया जा सकता, और इस के अतिरिक्त कि वह कि 'है' कुछ वहा नहीं जा सकता और न जाना जा सकता, और इस के अतिरिक्त कि कहे दि है उस की प्राप्ति का दूगरा उपाय नहीं । [१२] अस्तीत्येवोपलव्धव्यस् तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धस्य तत्त्वभाव प्रसीदति ॥१३॥ अनु०-वह 'है' इस रूप मे तथा [गम्यता और अगम्यता, अस्तिता और नास्तिता] दोनो के तत्वमाय (तात्त्विक स्वरूप) से अधिगत हो सकता है। जिसे 'है' ऐसी उपलब्धि हो गयी है, उसे तत्त्वभाव प्राट हो जाता है। (१३) ९४] सिर अस्वर (फारसो) सिज-उस की प्राप्ति का उपाय दो प्रकार का है-या तो उसे 'है' इस प्रकार जाने या अपनी मूर्खता और अज्ञान को दूर कर के साक्षात् वहीं बन जाय । जो कोई पहले 'है' इस के द्वारा उस तक पहुँचा यह वही हो गया। [१३] यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः, अथ मर्योऽमृतो भवत्यन्न ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥ अनु०-जिस समय सम्पूर्ण कामनाएँ, जो इस के हृदय मे वसती हैं, छूट जाती हैं, उस समय मयं (मरणधर्मा) अमर हो जाता है और यही ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है । (१४) सि०अ०-पुरुष मर्त्य (मरणधर्मा) है। यह नव मन सी वामनाओ से छूट जाता है, तो इसी लोक में अमर और मुक्त हो जाता है और इमी शरीर मे ग्रह को प्राप्त कर लेता है । [१४] यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रत्ययः, अथ मोऽमृतो भवत्येतावद्धधनुशासनम् ।।१५॥ अनु०-जिस समय यहां हृदय की सम्पूर्ण ग्रन्यिा पट जाती हैं, उरा समय मत्यं अमर हो जाता है । वस [सभी वेदान्ती का] यही उपदेश जि०म०- जब पूर्णता और महान की अधिना, जो उनके हृदय में बंधी हुई है, गुल जाती है, तब वह मृत्यु में छूट कर समर हो जाता है। यही मूल अनुशामन है। [१५] शतं चंका च हृदयस्य नाड्यस्, तासां मूर्धानमभिनिःसृतपा । तयोर्वमायन्नमृतत्वमेति, विप्वड्न्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ अनु०-हृदय की सौ नाडिया होती है; उन में से पर मूर्धा सर पहुंचती है। उनके द्वारा उध्वं गमन परने याला पुरुष 'एक निरल सि०अ०-हृदय कठोपनिषद [ ९५ अमरत्व को प्राप्त होता। शेष विविध नाडियाँ] उत्क्रमण (प्राणोत्सर्ग) के लिए होती है । (१६) सौ एक नाडियां गयी हुई है। उन मे से एक नाडी सुषुम्ना मूर्धा तक पहुंचती है। मरण काल में जिस का प्राण उस नाडी के माग से मूर्धा से वहिर्गत होता है वह अमर पद प्राप्त करता है और जिस का प्राण दूमरी नाणियो के मार्ग से बाहर निकलता है वह उन लोगो को प्राप्त होता है जो उन नाडियो के अनुरूप हैं। [१६] अगुष्ठमात्र. पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनाना हृदये सनिविष्ट । त स्वाच्छरीरात् प्रवृहेन् मुजादिवेपीका धैर्येण । त विद्याच्छुक्रममृत, त विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥१७॥ अनु०-अगुप्ठमात्र पुस्प जो अन्तरात्मा है, सदा जीवो के हृदयदेश में स्थित है। उसे मूंज से वाणाग्र के समान अपने शरीर से धैर्यपूर्वक वाहर निकाले । उसे शुद्ध और अमर समझे, उसे शुद्ध और अमर समझ । (१७) सि००-गुरप जो सभी के हृदयो के मध्य स्थित है जिम को ज्योनि मनुष्य के अगुष्ठ के बरावर है और जो सब का जीवात्मा है उसे ज्ञानी पूर्ण वुद्धि द्वारा अपने शरीर से पृथक् जानना है। जैरो आवरण युक्त मूज को यावरण से पृथक वर बाहर निकानते हैं उसी प्रकार वह जीवात्मा को शरीर से पृथक जानता है और उसी जीवात्मा को शुद्ध और अविनाशी जानता है। [१७] मृत्युप्रोक्ता नचिकेत्तोऽथ लब्ध्वा विद्यामेता योगविधिं च कृत्स्नम्, ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद् विमृत्यु- रन्योऽप्येव यो विदध्यात्ममेव ॥१८॥ अनु०-मृत्यु की कही हुई इस विद्या और सम्पूर्ण योग विधि को अधिगत कर नचिकेता ब्रह्मभाव को प्राप्त विमल और मृत्युरहित हो गया । दूसरा भी जो अध्यात्मविद् होगा वैसा ही [हो जायगा] । (१८) सिरें अववर (फ़ारसी) सि०--इस ज्ञान और इस साधना का प्रवचन यमराज ने नचिकेता को किया और वह इम सारे ज्ञान को उपलब्ध कर और ब्रह्म को प्राप्त हो मृत्यु शरीर की अह्ह्वा और और पाप कर्मों के पास स धूट कर मृत्यु रहित और अविनश्यर हो पर साक्षात आत्मा हो गया। जो कोई नचिकेता के समान इस ज्ञान और कम का उपदश करता है और उस की साधना करता है वह भी साक्षात आत्मा हो जाता है । [१८] ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विपावहै ॥१९॥ ॐ शान्ति । शान्ति ।। शान्ति, I 11 अनु०-[परमात्मा] हम [आचार्य और शिप्य] दोनो की साथ-साथ रक्षा करे। हमारा साथ-साथ पालन करे। हम साथ साथ विद्या सम्वन्धी सामर्थ्य प्राप्त वरें। हमारा पढा हुआ तेजस्वी हो। हम द्वष न करें। (१९) ॥ इति द्वितीयेश्याय तृतीया वल्ली ॥ ॥ इति द्वितीयोऽध्याय ॥ 1 तृतीयोऽध्यायः सि०अ०---इग के पश्चात् या न यह प्रयना वी वि मुझ और तुझ दोना यो जो प्रवक्ता और थोता हैं परमात्मा अपनी रक्षा म ल ल इम मे जो नान प्राप्त हुआ है उस पान को हमारे हृदय म स्थिर बरे इगनान सको तेज प्राप्त हुमा है उन वह बनाय ररा विद्या जिसे हम न और तू न पड़ा है हमारे हृदय में प्रकाशित रहे और हमारे बीच द्वपदा प्रबंश न हो। इसके पश्चात् यम निहा पर मोउम' ना हर घोले-सब को शानि। सव को गाति!! ब्रह्मशानिया को नमस्कार! महा-जानिमा यो नमस्तार ।। अर्थात् सत्यद्रप्टानों का मुभ हो । नियम है प्रिपेर उपनिषद ये आरपत्र और समापन म यह प्रापका पड़ी जाय।[१९] [ॐ शान्तिः शान्नि शान्ति ] ॥ इति बटोपनिषन् समाप्ता॥ इस मंत्र को लेकर दाराहिलोर ने एक तीसरा अध्याय परिकलिस्त किया। शिम अन्तर्भ उस की व्याख्या दी जाती।

प्रश्नोपनिषद् देवा । पश्येमाक्षभिर यजत्रा, (अथववेदीया) शातिपाठ भद्र कणेभि शृणुयाम भद्र स्थिरैरङ्गस तुष्टवासस तनूभिर व्यशेम देवहित यदायु (ऋग्वेद १८९८) अनु०-हे देवगण | हम कानो से कल्याणी वाणी सुन यज्ञकम में समय हो कर नेत्रो से शुभ दशन कर स्थिर अग और शरीरो स्तुति करने वाले हम लोग देवताओ के लिए हितार आयु का भोग कर । प्रपा स्वस्ति नस तार्यो अरिष्टनेमि स्वस्ति नो वृहस्पतिर दधातु । (ऋग्वेद १८१६) ॐ शान्ति । शान्ति ।। शाति 111 अनु०-महान कीर्ति वाला इद्र हमारा कल्याण करे सवज्ञ (अथवा सर्वेश्वयवान) पूषा हमारा कल्याण करे जो अरिप्टो (आपत्तिओ) के लिए, चक्र के समान [घातक] है वह गरुड हमारा कल्याण करे बृहस्पति हमारा कल्याण करे। त्रिविध ताप की शान्ति हो । प्रथम प्रश्न ॐ सुकेशा च भारद्वाज शैब्यश च सत्यकाम सौर्यायगी च गार्ग्य कौशल्यश चाश्वलायनो भागवो वैदर्भ कवन्धी कात्यायनस- ते हैते ब्रह्मपरा ब्रह्मनिष्ठा पर ब्रह्मा वेपमाणा एप ह वै तत सर्व वक्ष्यतीत ते ह समित्पाणयो भगवत पिप्पलादमुपसना ॥१॥ अनु०-भरद्वाजनदन मुकेशा शिविकुमार सत्यकाम गगगोन मे उत्पन्न सौर्यायणि (मूय का पोता) अश्वनकुमार कोमल्य विदभदेशीय Pr

९८]
सिर अक्वर (फारसी)
भार्गव, और कत्य के पोते का पुन पबन्धी-ये ब्रह्म के उपासक, ब्रह्मनिष्ठ,
ब्रह्म के अन्वेपण मे तत्पर ऋषिगण भगवान् पिप्पलाद के पास हाथ मे
समिधा ले कर गये, कि ये हमे उस के विषय मे सव कुछ वतला देगे । (१)
सि० अ०-भारद्वाज पुत्र सुकेशा, शैब्य सत्यकाम, सौर्यायणि गार्य, कौशल्य
आश्वलायन, भार्गव वैदर्भि, बबन्धी कारयायन-इतने ऋपीश्वरो ने, ग्रह को महामहिम
जानते हुए यह समल्प किया कि उसे प्राप्त हा और सदा उसी म रहे । वे की
प्राप्ति के लिए समित्पाणि हो पर, जैसा गुरु की सेवा में उपस्थित होने का निमम और
आचार है उस प्रकार, कृषीश्वर पिप्पलाद के पास इस आशा से गये कि ये महान्, ज्ञानी,
और राज्ञ हैं, हम लाग इन स जो कुछ पूछेगे ये बतायेंगे । [१]
तान् ह स ऋपिरुवाच-'भूय एव तपसा, ब्रह्मचर्यण, श्रद्धया
सवत्सर सवत्स्यथ । यथाकाम प्रश्नान् पृच्छत । यदि विज्ञास्याम
सर्वं ह वो वक्ष्याम' इति ।।२।।
अनु०-कहते हैं उस ऋषि ने उन से कहा-'तुम तपस्या-, ब्रह्मचर्य-,
और श्रद्धा पूर्वव एक वर्ष और निवारा करो। [फिर] अपनी इच्छानुसार
प्रश्न परना। यदि मैं जानता होऊंगा तो तुम्हे सव वतला दूंगा' (२)
सिक ४०-उन महर्षि ने उन म कहा- यदि आप लोग साधना और तपस्पा करें,
सारे भोगो वा परित्याग पर दें, गर पास श्रद्धापूर्वर एव वप रहें, तो आप लोग जो
पूछंगे उम सब का उत्तर जितना जानता हूँ आप तोगा गो दूगा ।' [२]
अथ कावन्धी कात्यायन उपेत्य प्रपच्छ-'भगवन् । कुतो ह
वा इमा प्रजा प्रजायन्ते ?' इति ॥३॥
अनु०-तदनन्तर (एक वर्ष गुरुकुलवास के पश्चात्) पात्यायन
क्वन्धी ने [ऋषि के पास जा पर पूछा-'भगवन् ! ये प्रजाएं यहाँ से
उत्पन्न होती हैं । (३)
FRe t०- जब प्रतिज्ञा अनुसार गत वर्ष ममाप्त हुआ तो क्यामी नाम से
अपीश्वर न मब म आगे यद्वार यह प्रश किया, भगवन् । यह जगत् परी म उत्पन
हुआ है। [३]
तस्मै स होवाच-'प्रजारामो वै प्रजापति । म तपोनप्यत ।
स तपम् तप्वा ग मियुनमुत्पादयते-रयिं न प्राण च-, एतौ मे
बहुधा प्रजा परियत इति ॥४॥

प्रश्नोपनिषद् अनु०-उस से उन्हो (पिप्पलाद) ने कहा-'प्रसिद्ध है कि प्रजापति को प्रजा उत्पन्न करने की इच्छा हुई। उस ने तप किया। उसने तप, कर के एक मिथुन (जोडा) उत्पन्न किया-रयि और प्राण-, कि ये दोनो मेरी भांति-भांति की प्रजा उत्पन्न करेंगे । (४) सि०अ०-पिप्पलाद वोले-'प्रजापति ने, जो राब ना उत्पादन है, इच्छा को कि सृष्टि करूं। इस के पश्चात् [उस ने] तप कर के, अर्थात् चित को समाहित कर के और निदिध्यासन कर के, दो वस्तुएं उत्पन्न को-एक सोम जो चन्द्रमा है और जिस मे अमृत है. दूसरा प्राण जो मूर्य है और जिम में अग्नि है। उस ने इन दोनो को उत्पन्न कर के जाना कि इन दोनो से सम्पूर्ण सृष्टि हो जायगी और कि ये दो बहुत सारी सृष्टि कर डालेंगे। [४] 'आदित्यो ह वै प्राणो, रयिरेव चन्द्रमा। रयिर् वा एतत् सर्व यन् मूर्त चामूर्त च । तस्मान् मूतिरेव रयि ॥५॥ अनु०-'निश्चय आदित्य ही प्राण है और रयि ही चन्द्रमा। यह जो कुछ मूर्त (स्थूल) और अमूर्त (सूक्ष्म) है सब रयि ही है । अत. मूर्ति ही रयि है । (५) सि० अ०–'प्राण की उत्पत्ति के प्रसग मे, मूर्य और अता (खाने वाला) उत्पन्न हुआ और चन्द्रमा के प्रसग म, अमृत बन, और समस्त मूदम और स्थूल उत्पन्न हुए। अत मब का अत्ता सूर्य है और अन्न चन्द्रमा [५] 'अथादित्य उदयन् यत् प्राची दिश प्रविशति, तेन प्राच्या प्राणान् रश्मिपु सनिधत्ते, यद् दक्षिणा, यत् प्रतीची, यदुदीची, यदधो, यदूर्ध्व, यदन्तरा दिशो यत् सर्व प्रकाशयति तेन सर्वान् प्राणान् रश्मिषु सनिधत्ते ॥६॥ अनु०-'जब सूर्य उदित हो कर पूर्व दिशा में प्रवेश करता है, तो उस के द्वारा वह पूर्व दिशा के प्राणो को किरणो में धारण करता है, जब दक्षिण, पश्चिम, उत्तर अध, ऊर्ध्व, और अवान्तर दिशाओ को प्रकाशित करता है तो उस के द्वारा वह उन समस्त प्राणो को किरणो मे धारण करता है । (६) मि० अ०-यही कारण है कि सूय दिशाओ मे में जिन दिशा मे प्रवृत्त होता है उस दिशा में निवास करने वालो को अपने मे धारण करना है। अर्थात् जिग पूर्व से बह निकलता है उम दिशा के समस्त प्राणियो को अपनी रिरणो द्वारा अपने मे धारण १०.] सिर मनगर (फारणी) करता है। जब बह दक्षिण में आता है, तब उस दिशा में समस्त प्राणियो को अपनी किरणों द्वारा अपने मे धारण करता है। जब पश्चिम की ओर आता है, तो उस दिशा के समस्त प्राणियो वो अपनी विरणो द्वारा अपने में धारण करता है। जब पाताल की और गमन करता है, तो उस दिशा के समस्त प्राणियों को अपनी किरणो द्वारा अपने मे धारण करता है। जब ऊपर की ओर जाता है, तब उस दिशा के समस्त प्राणियो को अपनी किरणो द्वारा अपने में धारण करता है। चारो दिशाओ के मध्य जिस किसी पोण में जाता है और उस या प्रकाश जिघर भी जाता है, उघर के समस्त प्राणियो को अपनी किरणो द्वारा अपने मे धारण करता है । [६] 'स एप वैश्वानरो विश्वरूप. प्राणोऽग्निरुदयते । तदेतदृचाऽभ्युक्तम्-७॥ अनु०-'यह यह वैश्वानर विश्वरुप प्राण अग्नि हो उदित होता है । यही वात नक् ने भी कही है-(७) सि० अ०-'अत सभी उम का अन्न है। इसी कारण उसे वैश्वानर और विश्वरूप कहते है....वैश्वानर इसलिए रि उग मे नैसर्गिक उष्णता है और वह राव का भोक्ना है, और विश्वस्प इसलिए कि मारा जगत उसी से स्प ग्रहण करता है। प्राण भी नहीं है और अग्नि भी वही है। [यह] अग्नि वन वर ऊपर आता है और अग्नि बन कर नीचे जाता है, अर्थात् ऊपर भी प्रकाश हे ओर नीचे भी प्रयाश है। इमी के अनुसार वेदमन म है कि-1 [७] "विश्वरूप, हरिण, जातवेदस, परायण, ज्योतिरेक तपन्तम् । सहस्ररश्मि , शतधा वर्तमान , प्राण प्रजानामुदयत्येप सूर्य" ॥८॥' अनु०-' "सर्वरूप रश्मिवान्, ज्ञानसम्पन्न, परम आनय, तपसी हुई एकमात्र ज्योति को। यह सहल किरणो वाला, सैक्डो प्रकार से वर्तमान, और प्रजाओ का प्राण सूर्य उदित होता है ।" (८) मि० अ०-' 'मूर्य विश्वम्प है अर्थात् मब का स्प है। हिरण्यगर्भ भी है, अर्थात अपनी विरण से मव को अपनी ओर खीचता है। वही जातवेदा है, अर्थात् १ यह मा, जो मैनागएगुपनिषद ६.८ में भी आता है, किसी लुप्त वेद शाखा का हो सकता है। आगे भी कई श्ले क अथवा मा उड़ा है जिन के स्रोतों का पता लगाना । ।

प्रश्नोपनिषद् [ १०१ सब को जानने-समझने वाला है। वही परायण है, अर्थात परम पद। वही एकज्योति है, अर्थात् उम के ममान दूमरी ज्याति नहीं। वह प्रवाशय सहयरिरण है, अर्थात् महल किरणों वाला। वह शनधा है अर्थात् विविधरूप। वह जो उदित होता है, समस्त प्राणियो ना प्राण है।' [८] 'सवत्सरो वै प्रजापति । तस्यायने दक्षिण चोत्तर च। तद् ये ह वै तदिप्टापूर्ते कृतमित्युपामते ते चान्द्रमसमेव लोकमभिजयन्ते । त एव पुनरावर्तन्ते । तस्मादेत ऋषय प्रजाकामा दक्षिण प्रतिपद्यन्ते । एप ह वै रयिर् य पितृयाण ॥९॥ अनु०-'सवत्सर ही प्रजापति है। उस के दक्षिण और उत्तर दो अयन (मार्ग) है। निश्चय जो लोग "इष्टापूर्त [ही] वर्म है" यह मान कर उपासना करते है वे चन्द्रलोक को ही जीत पाते है। उन्ही की पुनरावृत्ति (पुनर्जन्म) होती है। अत ये सन्तानेच्छु ऋषिगण दक्षिण मार्ग को प्राप्त होते हैं । निश्चय यह रपि ही है जो पितृपाण है । (९) सि.अ.-'वह पूर्ण सवत्सर है, क्योंकि उसी म दिन और रात होते हैं। यही प्रजापति है, अर्थात् वर्ष, माम, दिन, थोर तिथि उसी स उत्पन्न होते है । अयन हैं, अर्थात् वह छह मास उत्तर दिशाम होता है और छह मास दक्षिण दिशा में। जो कोई तप और दान का अनुष्ठान करता है वह भरन के बाद छह माम के दक्षिणायन से चन्द्रमा को प्राप्त होता है, मुक्त नहीं होता, और च द्रमा को प्राप्त कर के जब पुण्य- कर्मों का पल समाप्त हो जाता है तब पुनरावृत्त हो पर पापों के फल वाले लोक को प्रयाण करता है जो नरक है। इसी कारण जिसे पुनपणा लोकपणा, और वित्तपणा' होती है, वह दान पुण्य करता है। इसी कारण चन्द्रमा को सब का मन कहा जाता है, क्योकि अपने कर्मों का फन चन्द्रमा के मार्ग से प्राप्त होता है। [९] 'अथोत्तरेण तपसा, ब्रह्मचर्येण, श्रद्धया, विद्ययाऽऽत्मानम- विष्यादित्यमभिजयन्ते । एतद् वै प्राणानामायतनमेतदमृतमभयमेतत् परायणमेतस्मान् न पुनरावर्तन्त इत्येष निरोध । तदेव श्लोक- उस के दो ॥१०॥ १ इन तीनों एषणाओं-पुषणा, तोषणा, और वितधणा-का उल्लेख बृहदारण्यकोपनिषद् ३५१ मे पाया जाता है। २ उत्तरायण और दक्षिणायन, देवपार और पिढपाए का विशीषण अम्वेद १०.२.७, १०१११, १०८-१५ छान्दोग्योपनिषद् ४१५५, बृहदारण्यकोपनिषद् ६.२,१५-१६, और गीता ८ २४-२६ में प्राप्त होता है ।

। १०२] सिरे अपर (पारगी) अनु०-'विन्तु तप, ब्रह्मचर्य, श्रद्धा, जोर विद्या द्वारा आत्मा की खोज करते हुए वे उत्तर [मागं] द्वारा सूर्यलोक को जीतते हैं। यही प्राणों का आश्रय है, यह अमृत है, अभय, यह परा गति है, इस से फिर नहीं लौटते, अत यही [ससार का] निरोध है। इस विषय में यह श्लोर है-(१०) मि० म०-'जो कोई तप करता है और समस्त मोगा रा त्याग करता है, फ्ल पर दृष्टि नहीं रखना, राच्ची धद्धा स ज्ञानमाग द्वारा आत्मा को प्राप्त रखा चाहता है, आत्मा म लीन है और आत्मा ही बन गया है, वह छह माम ये मार्ग रा, जब मूर्य उत्तर दिशा म होता है, गूय को प्राप्त होता है। यह मूय जा साक्षान आत्मा है, सभी आपतना (आश्रया) वा आयतन है। यह गूय अविनश्वर है। यह मूय अभय है और परायण (परम पद) है। उम प्राप्त कर कमभूमि पर लौटना नहीं होता। अज्ञानी उस तक नहीं पहुँचते। इसी के अनुसार वदमन म है कि- [१०] "पञ्चपाद पितर द्वादशाकृति दिव आहु परे अर्धे पुरोपिणम् । अथेमे अन्य उपरे विचक्षण सप्तचक्र' पडर' आहुर्पितम्" इति ॥११॥ २ ऋग्वेद १०१३३ और अथर्ववेद १८१४० में आये 'पञ्च पदानि' से तुलनीय । शकर, सायण और बङ्करमाधन के अनुसार 'पञ्चपाद' का अर्थ ह पाँच ऋतुओं वाला। प्रसिद्ध छह ऋतुओं में से हेमन्त और शिशिर को एक मान लेने पर ऋतुएँ पाँच ही रह जाती है। २ 'ससचा' का उल्लेख ११६४३, २४०३, अथरंद १६५३२. मैं भी पाया जाता है। 'सप्तचर अर्थात् सात चक्रों वाले में । वेङ्कटमाघव के अनुसार सात चक्र सात ऋतु है। सायण भी ऋग्वद ११६४१ और २५.१और अथर्ववेद १८५३२ मैं बाये 'सप्तचर' का ऋतुपरक अथ करता है-छह प्रसिद्ध ऋतुएँ तथा एक सर्वसाधारण ऋतु (षड् ऋतत, सर्वसाधारण पक, इति सप्तलम् ), अथवा दो दो मासों की छह ऋतुएँ और तेरहवें मास की एक ऋतु (उत्तरूपा मासदयात्मका पट, प्रयोदशमासात्मक सप्तम, इति रातत्वम् )। तैत्तिरीय सहिता (६१ : ४) के अनुसार तोहयों मास होता ही है (अस्ति बोदशी मास )। अथववद ८६ १८ में भी सात ऋतुश्नों का उल्लेख है (शेष पृ १०३ पर) १ षडरे (लह श्रओं वाले में) का श्रथ स्पष्ट नहीं है। प्राय t ऋतुओं को छह अरे माना गया है। वैसे अथववाद में अनक पटक उहिलसित हैं--छह पृश्चियाँ बह ग्रौलौक आदि आदि (४९११, ८६ १६ १७, १२२ ४८, १३१४)। ४ यह मा ऋग्वेद (१.१६४.१२) और अथर्ववेद (१२) से लिया गया है ।

प्रश्नोपनिषद् १०३ ~OP अनु०- "[कुछ विद्वान् ] पिता (पितृरूप आदित्य) को [ऋतुरूपी] पांच पैरो वाला, [मासरूपी] वारह आकृतियो वाला, धुलोक के पराई (उच्चतर अर्द्ध) मे [स्थित], [और जल वाला बतलाते है। किन्तु ये दूसरे [उस] दूरदर्शी को अन्य (पूर्वार्द्ध, निम्नतर अर्द्ध) में सात चक्रो और छह अरो वाले [रथ] मे अवस्थित बतलाते है ।" (११) सि. अ.--''यही सूर्य जो सवत्सर-स्वरूप है पांच पैर वाला है। यद्यपि वर्ष में छह ऋतुएँ होती है और प्रत्येक ऋतु म दो मास होते हैं परन्तु चूकि जाड़े के चार महीनी को एक ऋतु मान लिया गया है अत पांच पर हुए। सूर्य] के बारह अग होते हैं, जो बारह महीने हैं। छह माम दक्षिण की यात्रा में [वह] पानी बरसाता है- अर्थात् तीन महीनो में [उस ने] अवरोह का कारण वर्षा है और तीन महीनो में हिमकण । छह महीनो को उत्तर की यात्रा में सूर्य को विचक्षण कहले है, अर्थात् सब को जानने पाला। अत जो कोई इस पण्मास (छह मास की अवधि) मे मरता है वह सर्ववित् होता है। सूर्य की दक्षिण की ओर छह माम को पूरी यात्रा देवताओ की एक रात्रि है, और सूर्य की उत्तर दिशा में छह मास की यात्रा देवताओ का एक दिन है।" [११] 'मासो वै प्रजापति । तस्य कृष्णपक्ष एव रयि , शुक्ल प्राण । तस्मादेत ऋषय शुक्ल इप्ट कुर्वन्ति, इतर इतरस्मिन् ।।१२।। अनु०-'मास ही प्रजापति है। उस का कृष्णपक्ष ही रयि है, शुक्ल {पक्ष] प्राण। इसलिए ये ऋषिगण शुक्ल [पक्ष] में यज्ञ करते है, दूसरे (अन्नोपासक) दूसरे [पक्ष] में [यज्ञ करते है] । (१२) 'मास ही प्रजापति है, क्योंकि उसी से पितृलोक की रात्रि और दिन प्रकट होते हैं। चन्द्रमा के प्रकाश की बढोतरी के पन्द्रह दिन (शुक्ल पक्ष) पितृलोक की रात्रि है, क्योकि प्रकाश की बढोतरी (शुक्ल पक्ष) के दिनों में चन्द्रमा की ज्योति स्थूल जगत् की ओर होती है। और पन्द्रह दिन पितृलोक मे चन्द्रमा सरा प्रकाश क्षीण रहता है क्योकि प्रकाश की क्षीणता के दिलो (कृष्ण पक्ष) में चन्द्रमा की ज्योति पितृलाक की ओर होती है। इसी कारण कृष्ण पक्ष में जब कि चन्द्रमा को ज्योति क्षीण रहती है और पितृलोक की ओर होती है, यह विधान है वि जो दान (अथवा श्राद्ध) वमं पितरो के लिए किया जाता है उन दिनो में करें। [१२] (पृष्ठ १०२ से) (सप्त ऋनवो ह सप्त)। ऋग्वेद १० ५५ ३ का 'पन्च देवाँ ऋतुश सप्तसप्त' मी तुलनीय है। किन्तु प्रस्तुत ऋ । १६४ १२ की व्याख्या में सरयम के अनुसार साल नाका अर्थ है मा प्रकार को सूर्य मित्रों ११०५१ में सात रशिगों का स्पष्ट उसख है (अप्सी में सप्त रश्मय) । शकर के अनुसार सात चर से सूप के सात व अभिप्रेत हैं। इस अर्थ में सन्देह होने लगता है जब हम ऋ ११६४३ और अथर्व में सप्त अश्वा' का उल्लेख सप्तचर से स्वतार में पाते हैं। .

१०४ ] खिर अवयर (फारसी) 'अहोरानो वै प्रजापतिः । तस्याहरेव प्राणो, रातिरेव रयिः । प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या सयुज्यन्ते । ब्रह्मचर्यमेव तद् यद् रात्रौ रत्या सयुज्यन्ते ॥१३॥ अनु०-'दिन-रात ही प्रजापति है। उन मे दिन ही प्राण है, रात्रि ही रयि है। ये प्राण की ही हानि करते है जो दिन में रति के लिए [स्त्री से ] सयुक्त होते है। वह ब्रहाचर्य ही है जो रात्रि गे रति के लिए सयोग करते है। (१३) सि० अ०--'यही अहोरात प्रजापति है। दिन जो कि अत्ता है प्राण है और रात्रि अन्न । जो वोई दिन में अपनी स्त्री के साथ रति करता है वह अपने प्राण को सुखाता है और जो बोई रात्रि में अपनी स्त्री ये माद रति करता है मानो उस ने स्त्री के साथ रति नहीं की और उस का कुछ भी नहीं घटा । रात्रि की रति में बहुत साभ है । [१३] 'अन्न वै प्रजापति । ततो ह वै तद् रेतस्, तस्मादिमाः प्रजाः प्रजायन्त इति ॥१४॥ अनु०-'अन्न ही प्रजापति है। निश्चम उसी से वह पोर्य होता है, उस [वीर्य ] से ये समस्त प्रजाएं उत्पन्न होती है । (१४) सिं० अ०-'यह अन्न ही प्रजापति है। क्योंकि वीर्य उसी से पैदा होता है और वीर्य से ही सपूर्ण प्रजा उत्पन्न होती है । [१४] 'तद् ये ह वै तत् प्रजापतिनत चरन्ति ते मिथुनमुत्पादयन्ते । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येपा तपो, ब्रह्मचर्य; येषु सत्यं प्रतिष्ठितम् ॥१५॥ अनु०-'इस प्रकार, जो उस प्रजापति-व्रत का आचरण करते है वे [कन्या-पुनरूप] मिथुन को उत्पन्न करते है। यह ब्रह्मलोक उन्ही का है जिन मे तप है, ब्रह्मचर्य है, जिन मे सत्य स्थित है । (१५) सि० xo-'जो पुरुष रानि मे ही स्त्री के साथ रति करता है, दिन मै सहदास नहीं करता, वह अपने वीर्य की हानि नहीं करता, क्योकि उसने रात्रि में जो रति की है उसी वीर्य से पुत्र और कन्या उत्पन्न होती है। जो गुरुप रानि मे स्ती के साथ रति करता है वह चन्द्रलाक को जाता है, जो एर प्रशस्त लोक है। जब कोई रज स्राव से शुद्ध होने के चार दिन बाद सोलह दिन तक, जो गर्भ म वीर्य धारण की अवधि है, माय गे एक बार स्त्री के पास जाता है, तो यह कर्म ब्रह्मचर्य मे सम्मिलित है, अर्थात् उपासना और तप में सम्मिलित है, क्योरि यह कार्य नह भोग के लिए नहीं करता, प्रश्नोपनिषद् [१०५ बल्कि ईश्वर की आज्ञा से प्रजोत्पत्ति के लिए यह कार्य करता है। यदि [वह] दम अवधि में मास में एक बार नहीं जाना तो उसे ब्रह्महत्या लगती है अर्थात उस ने वाह्मण का रक्त बहाया। और न जाने से चूंकि पुत्र नही उत्पन्न होता तो मानो उस ने मनुष्य की हत्या की। वेद मे अन्यद उल्लिखित है यि यदि [वह] रज साव के बारम्भ की छठी रात, आठबी रात दसवी रात, बारवी रात चौदही रात, और सोलहवी रात, जो युग्म रात्रिआँ है, स्त्री के पास जाना है तो पुत्र उत्पन्न होता है, और पांचवी रात जो रज शुद्धि की प्रथम रान्नि है, तथा सातवी नवी, ग्यारहवी, तेरहवी, पन्द्रहवी रात्रि को यदि स्त्री से समागम करता है तो कन्या उत्पन्न होती है। विधान है कि इप्स अवधि में जिन रानिआ को पुन उत्पन्न होता है चाहिए कि स्त्री नियगित भोजन से कुछ कम खापे, क्योंकि अन्न कम सान मे स्त्री का रत्र कम होता है, और, चूंकि पुरुप का वीर्य अधिक होता है, इसलिए पुन उत्पन होता है। जो रानियां पुनोत्पत्ति के लिए • नियत हैं और रत्नी अधिक अन्न पा लेती है, तो, चूकि स्त्री रज पुरप के वीर्य से अधिक इक्ट्ठा हो जाता है, अत उस पुन्द्र में स्त्रण आकृति और प्रकृति उत्पन हो जाती है। यदि उन रानिओ मे जिन में कन्या की उत्पत्ति नियत है पुरुष का वीर्य स्त्री के रज से अधिक होता है, तो ऐसी कन्या उत्पन्न होती है जिस में पुरुषोचित आकृति और प्रकृति पागी जानी है। यदि रज और वीयं दोनो अयुग्म रात्रिओ मे जिन में निश्चित है कि कन्या होगी अथवा उन युग्म रादिओ मे जिन में निश्चित है कि पुत्र होगा, बरावर हो तो पुन नपुसक (हिजडा) उत्पन्न होता है। यदि युग्म राविभा मे होता है तो हिजडा पुरुषाभ होता है और यदि अयुग्म रात्रिओम होता है तो हिजडा स्त्रंण होता है। यदि स्त्री उस अवधि में जिस में युग्म रात्रिओ पुत्र-जन्म के लिए नियत है और अयुग्म रात्रियों कन्या के जन्म के लिए नियत है, पुरुष से रति न होने की दशा म स्वप्न देखे कि उस ने अपने पति से रति की है और स्खलित हुई है, तो, यदि सयोग से स्वी के गर्भ ठहर जाय और वह प्रसव करे, तो निर्जीव मासपिण्ड उत्पन्न होता है और, यदि प्रसव न करे और वह (मासपिण्ड) पेट मे ही रह जाय और उस का पेट फूल जाय, तो जब तक कि वह मासपिण्ड उस स्त्री के पेट से बहिर्गत न हो, तब तव उसे दूसरी सतान नहीं होती। कोई पुरुष मास म एक बार नियत विधि के अनुसार अपनी स्त्री से रति करता है, तो वह तप और ब्रह्मचर्य है, और राश सभी कार्यो म रात्य पा व्यवहार करता है। रेवल पांच अवसर अपवाद । यदि वह उन पर अवसरोपर १ इस मतव्य का आधार धर्मशास्त्रों में वर्तमान है, जैसे मनुस्मृति ३ ४५-५० और परामरस्मृति ४.१५ मे, यद्यपि यावरुवमस्मृति, आधाराप्याय १८८, मे जब जी में माये तय स्त्रीगमन की छूट दी गयी है। इस विधान के द्वारा परिवार को रिसी सोमा तक मर्यादित रखा जा सकता था। ऋग्वेद १०८५४५ मे स पुत्रों की प्रार्थना है, तथापि शास्त्रकारों ने (जसे मनुस्मृति ९ १०७ म) यह व्यवस्था दे पर कि प्रथम पुत्र ही घमंज (धर्म से उत्पन्न होता है न कि शेष पुत्र जो कामन (राम से १०६] सिरे अस्थर (फारसी) असरय भाषण भी करता है तो मानो सत्य ही बोलता है-प्रयम, विवाह के निमित्त जब कि ऐसे असत्य-भाषण की अनुमति है जिस से किमी का विवाह हो जाय, द्वितीय, किसी को प्राण-हानि में बचाने के लिए, जब कि कोई न्यथं मारा जाने वाला हो तो यदि असत्य-भाषण करे तो वह विहिन है, तृतीय, जहाँ विसी की सम्पत्ति व्ययं लुट रही हो, सम्पत्ति-रक्षा के लिए वह बोले कि यह माल मेरा है, तो इस प्रकार का असत्य-भाषण दिहित है, चतुर्थ, आनी स्त्री से सहवास काल मे यदि उस की प्रमनता के लिए असत्म भापण करे तो वह विहित है, पचम, यदि ब्राह्मण या गाम की प्रशसा अथवा मुक्ति के लिए असत्य-भाषण करे तो उस की अनुमति है।' [१५] उत्सम) बताये गये हैं, परिवार को नर्यादित और सुनियोजित रखने पर परोक्ष रूप से बस दिया है। ऋग्वेद १.१६४.३२ की जो व्याएया परिवाना-सज्ञक व्याल्याकारों ने की है उस के अनुसार तो वेदमन को स्पष्ट ध्वनि है कि जिसे अधिक सताने होती हैं यह कष्ट में पड़ता है। इस सबंध में निरुक्त २.२.४ इष्टव्य है। महाभारत,धनपर्व १८६.४१, मे सन्तान की बहुलता को पुगक्षय का लक्षण माना गया है। महाभारत, आदि-पर्व १२२.७७, के अनुसार तो आपत्काल में भी तीन से अधिक सतान उत्पन्न करने को आना शास्त्रों ने नहीं दी है। यहीं तक नहीं, चौथो संतान चाहने वाली स्त्री को स्वरिणी (व्यभिचारिणी) घोषित किया गया है, और पांचवें पुत्र के उत्पन्न होने पर कुलटा। श्लोक् इस प्रकार है- नातम् चतुर्य प्रसवमापत्स्वपि बदन्त्युन। सत. पर स्वरिणौ स्याद्, य•धको पञ्चमे भवेत् ॥ १ उक्त मतस्य यहाँ मनुस्मृति ८.१०४-११२ तथा महाभारत, आदिपर्व ८२.१६ कर्णपर्व ६९.३२-३४, ६०, ६२-६५; शान्तिपर्व १०९.१४-२०, याज्ञवल्वमागृति २.८३ पर भायल प्रतीत होता है। इन मे से अधोलिक्षित तीन लोक विशेष रोचक हैं- शूद-विट-सत्र-विप्राणा यत्रोक्तौ भवेद् वधः तत्र वक्तव्यमन्त, तद्धि सस्याद् विशिष्यते । कामिनीयु, विषाहेषु, गया भक्ष्ये, तयधने, साह्मणामुपपती च शपये नास्ति पातरम् । (मनुस्मृति ८.१०४, ११२) न मायुक्त वचन हिनस्ति, न स्त्री, राजन् । न विवाहनाते, प्राणात्यये, सबंधनापहारे- पञ्चान्तायाहरपातकानि । (महाभारत, आरिपर्व ५२.१६) पद्यपि हमारे शास्त्रों में सत्य और अहिमा दो धर्म का मूलाधार माना गया है (अष्टम्प महाभारत, वनपर्व २०७४४), तथापि विशेष अवसरों पे लिए सत्यको म्यावहारिक परिमापा या की है कि 'सत्य पर है जिस से प्राणियों का भरपात हित. मापन सम्भव हो ('पद् भूनहिल परयन्तं तत् सायमिति धारमा। महामारत, बनपर्व प्रश्नोपनिषद् [ १०७ 'तेपामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येपु जिह्ममनृत न माया च' इति ॥१६॥ अनु०-'वह विशुद्ध ब्रह्मलोक उन का है जिन में न कुटिलता है, न अनृत है, और न माया (क्पट)।' (१६) सि० अ०-'जो पुरष सदा मदवृत हाता है, कुटिल और कपटी नहीं होता, और न धूर्त, मक्कार और अहमारी होता है उस यह पवित्र और विशुद्ध ब्रह्म- लोक प्राप्त होता है जो मोक्षपद है, और नरवस्वरूप पापलाका मे वह पाप या पल भोगने ने लिए वापम नहीं आता। [१६] ॥ इति प्रथम प्रश्न ॥ 7 ? द्वितीय प्रश्न अथ हैन भार्गवो वैदर्भ पप्रच्छ—'भगवन् कत्येव देवा प्रजा विधारयन्ते ? कतर एतत् प्रकाशयन्ते ? के पुनरेषां वरिष्ठ ?' इति ॥१॥ अनु०-तदनन्तर विदर्भदेशीय भार्गव ने पूछा-'भगवन् । कितने देवता प्रजा को धारण करते है? उन में से कौन-कौन इसे प्रकाशित परते है। उन में से कौन वरिष्ठ मि० १०-इस के पश्चात ऋषीश्वर भार्गव वैदभि ने पिप्प नाद से पूछा-'भगवन् । शरीर में रक्षा कितने देवता है कौन कौन से देवता शरीर को प्रकाशित करने है, और इन देवताओं में कौन वरिष्ठ है ।" [१] तस्मै स होवाच-'आकाशो ह वा एप देवो, वायुरनिराप , पृथिवी, वाड्, मनश्, चक्षु , श्रोत्र च। ते प्रकाश्याभिवदन्ति, "वयमेतद् वाणमवप्टम्य विधारयाम" ॥२॥ अनु०-कहते हैं कि उस से उन्हो ने कहा-'वह देव आकाश है, वायु, २०९.४, 'यद् भूतहितमायतमेतत सरप पदोम्यहम ।' शातिपर्व २८७ २०, 'यह भूतहितमायतमेतत सत्य मतं मम ।' शातिपर्व ३२९ १३)। frतु यह ध्यान रहे कि उपचतम पारी प्रापेर शा में मरयमाण को माना है (इष्टप्य महाभारत, शान्तिएवं ११०११, अनुशासन पर्व १४१९) और कि प्रमशास्त्रों में उस स्थलों पर मप्तस्य भाषरे लिए भी प्रावित का विधान है (प्दार मनुस्मृति ८.१.५- १.६ यारवयस्मृति, व्यवहारासाय ४)।

१०] सिर अक्यर (फारसी) [ अग्नि, जल, पृथिवी, वाक्, मन, चक्षु, और श्रीन्न । वे [अपनी महिमा को] प्रकट करते हुए कहते है-"हम इस शरीर को सभाल कर धारण करते सि० अ०–पिप्पलाद बोले-'आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, बाद, मन, चक्षु, घ्राण, श्रोत- ये शरीर म अपनी महिमा दबानते हुए एक दूसरे से स्पर्धा करने लगे और प्रत्येक कहने नपा नि शरीर का धारक और प्रकाशक मैं ही हूँ। [२] 'तान् वरिष्ठ प्राण उवाच-'मा मोहमापद्यथ । अहमेवैतत् पञ्चधाऽऽत्मान प्रविभज्यैतद् वाणमवण्टभ्य विधारयामि" इति । तेऽश्रद्दधाना बभूवु ॥३॥ अनु०-'उन से वरिष्ठ प्राण ने कहा-“तुम मोह मे न पडो; मैं ही अपने को पांच रूप मे विभक्त कर इस शरीर को संभाल कर धारण करता हूँ।" उन्हे विश्वास नही हुआ। (३) सि० अ०–'उन से वरिष्ठ प्राण ने कहा कि तुम लोग व्यय विवाद न करो, क्योकि मैं ही पच महाभूत और पच ज्ञानेन्द्रियां वनवर शरीर का धारक और प्रकाशक हूँ। उन्हो ने प्राण को वात पर विश्वास नहीं किया। [३] 'सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव । तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्मामन्ते तस्मियंश् च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । मधुकरराजानमुत्क्रामन्त सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिश् च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिप्ठन्त, एव वाइ, मनश, चक्षुः, श्रोन च । ते प्रीताः प्राण स्तुन्वन्ति ॥४॥ अनु०-'तब वह अभिमानपूर्वक मानो ऊपर उठने लगा। ऊपर उठने पर और सभी उठने लगते है और उस के स्थित होने पर सभी स्थित हो जाते। जिस प्रकार मधुकरराज पे ऊपर उठने पर सभी मषिखयां ऊपर चढ़ने लगती है और उस के बैठ जाने पर सभी बैठ जाती हैं, उसी प्रकार वाक, मन, चक्षु, और धोत्र । वे सन्तुष्ट हो कर प्राण की स्तुति करने लगते है-(४) लि००-'प्राण ने रष्ट हो कर बाहा मिनिसन जाय। प्राण ये उसमग गे सभी निश्ष्ट हो गये। जव प्राण होता है तो ये भी होत है। अतएव ज्यों ही मधुबाराज प्रमाण करते हैं, सभी मविया प्रग्यान करने को विषय हो जाती है, और तद् यथा मक्षिका उस के प्रश्नोपनिषद् यदि वे रहते हैं तो सभी विवश हो कर रहते हैं। इसी प्रकार प्राप के रहने से चक्षु, वाक्, मन, प्राण, और थोत अपने अपने स्थान पर रहते हुए उस (प्राण) की स्तुति और प्रशसा करने लगे कि-[४] "एयोऽग्निस् तपत्येष सूर्य, एप पर्जन्यो, मघवानेप, वायुः । एप पृथिवी, रयिर, देव , सदसन्, चामृत च यत् ॥५॥ अनु०-'"यह [प्राण] अग्नि हो कर तपता है, यह सूर्य है, यह मेघ है, यह इन्द्र है, [और] वायु । यह देव पृथिवी है, रयि है, और जो सत्, असत्, एवं अमृत है [वह सब] । (५) सि. अ.---"अग्नि प्राण का प्रकाशक है, सूर्य प्राण का प्रकाश है, मेष प्राण की वर्षा करता है, देवराज इन्द्र प्राण हैं, महान् वायु प्राण है, पृथिवी प्राण है, वनस्पनि और अन्न प्राण है, जो कुछ है प्राण है, जो नहीं है प्राण है, मब का प्रकाशक प्राण है, और भगृत माण है। [५] "अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्व प्रतिष्ठितम्- ऋचो, यधपि, सामानि, यज्ञ , क्षत्र, ब्रह्म च ।।६॥ अनु०-- "रथ की नाभि में अरो के समान प्राण में सभी स्थित है- ऋक्, यजु, साम, यज्ञ, क्षत्र, और ब्रह्म । (६) सि०१०-' जैम रय के अरे उस को नामि के मध्य प्रतिष्ठित होते हैं, उसी प्रवार समस्त इन्द्रियाँ प्राण म स्थित है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, यज्ञ, क्षत्रिय, राजन्य, और ब्राह्मण प्राण है। [६] "प्रजापतिश्, चरसि गर्भ, त्वमेव प्रतिजायसे । तुभ्य, प्राण ! प्रजास् त्विमा बलि हरन्ति य प्राण प्रतितिष्ठसि ॥७॥ अनु०-' "[तू] प्रजापति है, [तु] गर्भ मे सञ्चार करता है, तू ही जन्म ग्रहण करता है। तुझे ही, हे प्राण | जो प्राणियो के माथ स्थित रहता है, ये प्रजाएं बलि अर्पित करती है । (७) गि० अ०-''हे प्राण । तू ही प्रजापति है और न ही गर्भ मे वीर्य को माता और पिता का रूप देने वाला है पुत्र रूप म तू ही है और वाक, चक्षु और श्रोन सभी तुझे भोग उपस्थित करते हैं। हे प्राण । सभी इन्द्रियों के साथ गमन करने वाला तू ही है। [७] १ तुलनीय यवैद ३११६ अथववेद १०८१३ २ तुलनीय अथर्ववेद ११.४१६ ११०] सिरे अक्बर (फारसी) . "देवानामसि वह्नितम , पितृणा प्रथमा स्वधा । ऋपीणा चरित सत्यमथर्वाङ्गिरसामसि ॥८॥ अनु०- "तू देवताओं के लिए वह्नितम (हवि पहुंचाने वालो मे प्रधान) है, पितृगण के लिए प्रथम स्वधा है। तू अथर्वाङ्गिरस ऋपिओ के लिए सत्य आचरण है । (८) सि० अ०-'' इन सब को परिचालित करने वाला तू ही है, सभी देवताओ को हवि पहुंचाने वाला तू ही है। पितृलोक को अन्नमयी स्वधा पहुंचाने वाला तू ही है, सब का अन्न भी तू ही है, शरीर में सभी इन्द्रियों का पालक तू ही है, और समस्त शरीर का सार तू ही है । [८] "इन्द्रस् त्व, प्राण 1 तेजसा, रुद्रोऽसि परिरक्षिता । त्वमन्तरिक्षे चरसि, सूर्यस् त्व ज्योतिषा पति ॥९॥ अनु०- "हे प्राण । तू तेज के कारण इन्द्र है, तू रक्षक रुद्र है। तू अन्तरिक्ष में सच्चरण करता है, तू ज्योतिर्गण का अधिपति सूर्य है । (२) सि० -'इन्द्र भी तू ही है, अर्थात् सव वा सम्राट तू ही है। श्रोध की दशा मे तू ही रुद्र है, अर्थात् मय या सहारख तू ही है। त हो विष्णु वन पर सभी रूपो मे सब मा परिपालक है। अन्तरिक्ष में सूर्य का रूप धारण कर तू ही भ्रमण करता है। तू ही प्रकाशो का प्रकाश है। राजाओ का राजा तू ही है। [९] "यदा त्वमभिवर्पसि, अथेमा, प्राण आनन्दरूपास् तिष्ठन्तिकामायान्न भविष्यतीति ॥१०॥ अनु०- "हे प्राण ! जब तू [मेघरूप मे] वरसता है तब तेरी प्रजाएँ यह समझ कर कि यथेच्छ अन्न होगा आनन्दरूप से स्थित होती हैं। (१०) मि० अ०-''जब तू मेप बन वर वरमता है तो मभी प्राणी जीवन धारण करते है और मानदित हो वर आशा करने लगते हैं कि अब हमारे लिए अन्न उत्पन्न होगा। [१०] "प्रात्यम्, त्व प्राणवपिरत्ता, विश्वस्य सत्पति । वयमाद्यस्य दातार, मातरिश्व । न ॥११॥ अनु०- "हे प्राण तू ग्रात्य(स्यभायत शुद्ध होने से मम्बार-निरपेक्ष) है, एकमात्र ऋषि (अर्थात् अग्नि) है, भाता है, विश्व या सच्चा स्वामी है। हम [तेरा] भक्ष्य देने वाले हैं। है वायो । तू हमारा पिता है । (१) । ते प्रजा पिता त्व, . - प्रश्नोपनिपद् [१११ सिं० अ०-"तू ही पिता और माता, और तू ही सम्पूर्ण पुण्य कर्म है। तू ही महान् अग्नि है, अर्थात् सम्पूर्ण जगत् की नैसगिक उष्णता है। तू ही सब का मोक्ता है। तू ही सत्पनि है। सारे भक्ष्य तेरे भक्ष्य हैं, पिता और माता तू ही है । [११] "या ते तनू वाचि प्रतिष्ठिता, या थोत्रे, या च चक्षुपि, या च मनसि सन्तता, शिवा ता कुरु, मोत्क्रमी ॥१२॥ अनु०-'"तेरा जो स्वरूप वाणी मे स्थित है, जो श्रोत्र में, जो नेव में, और जो मन मे व्याप्त है उसे तू मगलमय कर, तू उत्क्रमण न कर ।(१२) मि० अ०-'तेरी ही शक्ति वाक् चक्षु श्रोन्न, और मन मे है। चूंकि तेरी ही शक्ति इन मे है, अरा तू रादा इन का पालन कर, इन से उत्तमण न कर । [१२] "प्राणस्येद बशे सर्व, त्रिदिवे यत् प्रतिष्ठितम् । मातेव पुत्रान् रक्षस्व, श्रीश् च प्रज्ञा च विधेहि न" इति ॥१३॥ T०-' "यह सब प्राण के अधीन है, जो स्वर्गलोक मे स्थित है [वह भी] । जैसे माता पुत्र की रक्षा करती है पैरो] तू हमारी] रक्षा कर, हमे श्री और बुद्धि प्रदान कर ।' (१३) ति० अ०-' प्रकृति के हाथ में जो भी स्थित है वह प्राण है। जो कुछ स्वर्ग मे है वह सब प्रकृति के हाथ मे प्राण ही है। हे प्राण | जैसे कृपालु माता पुन की रक्षा करती है उसी प्रकार तू हमारी रक्षा कर और हमे बुद्धि की सम्पदा दे। प्राण को, जिस की इतनी स्तुति हुई है विद्वान और महात्मा कहते है-उम प्राण को गमस्कार, अर्थात् उरा प्राण को प्रणाम । [१३] ॥ इति द्वितीय प्रश्न । इम तृतीय प्रश्न अथ हैन कौसल्यश् चाश्वलायन पप्रच्छ-'भगवन् । कुत एष प्राणो जायते? कथमायात्यस्मिन् शरीरे? आत्मान वा प्रविभज्य कथ प्रातिष्ठते? केनोत्कमते? कथ बाह्यमभिधत्ते कथमध्यात्मम् ?' इति !!१॥ अनु०-तदनन्तर, उन (पिप्पलाद मुनि) से अश्वल के पुन कौसल्य ने यह प्राण कहाँ से उत्पन्न होता है ? विस प्रकार इस शरीर मे आता ? अपना विभाग कर के किस प्रकार स्थित होता है पूछा-'भगवन् । ?

११२] सिर अकबर (फारसी) किस कारण उत्क्रमण करता है ? किस प्रकार वाह्य [शरीर] को धारण करता है ? कैसे अध्यात्म (आभ्यन्तर शरीर) वो?' (१) सि०अ०-इस के पश्चात ऋपीश्वर कौसरय ने पिप्पलाद से पूछा-भगवन् जिम प्राण की इतनी स्तुति हुई है वह कहां उत्पन होता है, इस शरीर मे वैसे प्रवेश पांच रूपा म विभक्त हो कर इस शरीर में किस प्रकार रहता है किस प्रकार उत्क्रमण करता है बाहर कैसे है और भीतर कैसे है ? अर्यात [बह] देवताओ और महाभूता आदि मे किस प्रकार रहता है और उस का शरीर मे ज्ञानेन्द्रियो से क्या सबंध करता तस्मै स होवाच-'अतिप्रश्नान् पृच्छसि । ब्रह्मिष्ठोऽसीति, तस्मात् तेऽह ब्रवीमि ॥२॥ अनु०-उस से उहा ने कहा-'तू अतिप्रश्न (आत्यन्तिक, चरम प्रश्न) पूछता है। तू वडा ब्रह्मवादी लगता है, अत मैं तुझे बतलाता यह बात सय से कहने शि०स०-पिम्पनाद वोले-तू न वही बात पूछी। योग्य नहीं। चूमि मैं जानता हूँ कि तू ब्रह्म पा जिज्ञासु है अत तुझ से वहता हूँ।[२] 'आत्मन एप प्राणो जायते । यथेषा पुरुपे ायतस्मिन्नेत- दाततम् । मनोकृतेनायात्यस्मिन् शरीरै ।।३।। अनु०- यह प्राण आत्मा स उत्पन होता है। जिस प्रकार पुरुष म यह छाया है उसी प्रकार इस (आत्मा) म यह (प्राण) व्याप्त है। [यह] मनोहत (मानसी क्रिया सकल्पादि) से इस शरीर में आता है । (३) मि० भ०-- यह प्राण वात्मा राप्रपट होता है जैसे पुरुष की छाया पुरुष रो प्राट होती है। यह प्राण आरमा म व्याप्त हो पर रहता है जैस छाया पुरप में व्याप्त हो कर रही है। विह] मन घे सक ग गे शरीर में आता है । [३] यथा सम्राडवाधिकृतान् विनियुक्ते-एतान् ग्रामानेतान् आमानधितिष्टस्य-दति एवमवैप प्राण इतरान् प्राणान् पृथक पृथगेय मनिधते ॥४॥ अनु०- जिस प्रकार सम्राट ही तुम इन इन ग्रामा या प्रशासन परो' इस प्रकार अधिकाग्यिा या नियुक्त करता है, उगी प्रकार यह [मुख्य] प्राण अय प्राणा या पृथक पृथर अनुशासिन करता है। (४) प्रश्नोपनिषद् [११३ सि.अ.-'जमे सम्राट्, सामत (सूबेदार) को आदेश देता है कि इस नगर का प्रशासक तू रह और उस नगर का प्रशासक टू रह, इमी प्रकार मुख्य प्राण समस्त शानेन्द्रियो को यत्न-तन आदेश देता है कि वे सर्वत्र अपना-अपना कार्य करें। [४] 'पायूपस्थेऽपानं; चक्षु.श्रोत्रे, मुखनासिकाम्या प्राण' स्वयं प्रातिष्ठते; मध्ये तु समान । एप ह्येतद्भुतमन्नं सम नयति । तस्मादेताः सप्ताचिपो' भवन्ति ॥५॥ अनु०-'पायु और उपस्थ मे अपान है। गुख और नासिका के साथ नेन और श्रोन मे प्राण स्वयं स्थित होता है। मध्य मे तो समान रहता है। यह (समानवायु) ही खाये हुए अन्न को [पचा वर] सम कर देता है। उस से [दो नेत्र, दो कर्ण, दो नासारन्ध्र, और एक रसना] ये सात ज्वालाएँ फूटती है । (५) सि. म.---[वह] अपान हो कर उन दोनो अवयवो (उपरथ और पापु) में रहता है जो मून और पुरीप पे मार्ग हैं। चक्ष, श्रोन्न, नासिका, और मुख मे प्राण स्वय रहता है। [वह] अमाशय मे समान होकर रहता है और भोजन को पचा कर समरत शरीर में समान रूप से पहुंचा देता है। यही कारण है कि इस का नाम समान है। जब यह भोगन पर वर शरीर के अवयवो को पहुंचता है, तब सात स्थानों को शक्ति प्रदान करता और प्रकाशित करता है दोनों पशु, दोनो धोत्र, दोनो नामिता- रम, और मुन्न । [५] 'हुदि ह्येप आत्मा । अवतदेकशतं नाडीनाम् । तासा शतं शतमेककस्या, द्वासप्ततिर् द्वासप्तति प्रतिशाखानाडीसहस्राणि" भवन्ति । आमु व्यानश् चरति ।।६।। अनु०-'हृदय में ही यह आत्मा है। इम (हृदयदेश) में वे एक्सो एक नाड़ियाँ हैं। उन में से एक-एप की सौ-सौ शाखाएँ है, [उन में भी प्रत्येक यी] वहतर-बहत्तर सय प्रतिशाखा-नाडियां है। इन मे ब्यान सञ्चरण करता १ मुण्डनोपनिषद् २.१.८ में उल्लिमित २सिर अवर' के सम्पादक द्वारा यहाँ विराम-चिलों में प्रयोग में विशेष असावधानी हो गयी प्रतीत होता है, जिस से पाण्यार्य भरतप्परत हो जाता है। हिन्दी अनुदारक ने यह गारी दूर रने शे पेश की है। ३ कठोपनिन्द् २.३. १६, सान्दाम्य पनिषद ८६.३ में रल्लिनि र सादारपयाापनिषद् | १0 में उलिनगित । ११४ ] मिर अश्यर (फारसी) सि०अ०- -[वह] मूक्ष्म शरीर हो कर हृदय-कमल गै [रहता है] जिस मे एक सो एक नाडियाँ निहित है, उन एक सौ एक नाडियो में से प्रत्येक नाडी में सौ-सौ अन्य (नादियाँ) निहित है, और उन नाडियो में में प्रत्येक नाडी गे अन्य नाडियां निहित हैं, जिन नाडियों की सयुक्त मख्या वहत्तर सहब नाडी तक पहुंचती है। व्यान वायु इन बहत्तर सहन नाडियो में सचार करता है । [1] 'मर्थकयोर्ध्व उदानः पुण्येन .पुण्यं लोकं नयति, पापेन पापम्, उभाभ्यामेव मनुष्यलोकम् ॥७॥ अनु०-'अस्तु, एक [नाडी सुपुम्ना'] द्वारा ऊपर की ओर उन्मुख उदान [वायु जीव को] पुण्य-कर्म के द्वारा पुण्यलोक को ले जाता है, पापकर्म के द्वारा पाप [लोक] को, [और पुण्य-पाप] दोनो [अर्थात् मिश्रित] कर्मों के द्वारा मनुष्यलोक को। (७) सि० अ.-'उन एक सो एक नाडियो में जो हृदय में निहित है एक महानाटी कण्ठ से चल कर मूर्घा तक पहुंचती है। प्राण उदान वन कर उस मार्ग से मूर्धा तक पहुँच कर मृत्यु के समय उमी मार्ग से उत्त्रमण कर जाता है। यदि [पुरुष ने] पुष्प वमं निग्या है, तो पुण्य के भोग के लिए पुण्य लोरों को प्राप्त होता है; और यदि पाप किया है, तो प्राण पाप-पल भोगने के लिए उधर न पहुँच कर अन्य मागों से उत्क्मण करता है, और कर्मानुसार अन्य लोको को प्राप्त होता है। यदि उम पुरुष का पुण्य और पाग बराबर होता है, तो उस की वासना उस की सत्तान में आती है; ताकि उस की सतान से जो पुण्य-कर्म अनुष्ठित हो उन के द्वारा [वह] मोक्ष लाभ करे। अत. ऐसा पुष्प इमी लोक मे यद रहता है और यही लोक उस का लोग होता है । [७] 'आदित्यो ह वै वाह्यः प्राणः। उदयत्येप घेनं चाक्षुपं प्राणमनु-. गृह्णानः । पृथिव्या या देवता सैपा पुरुपस्यापानमवष्टभ्य, अन्तरा यदाकाशः स समानो, वायुर् व्यानः ।।८।। अनु०-'निश्चय आदित्य ही वाह्य प्राण है। यही इस पाशुप (नवेन्द्रियस्यित) प्राण पर अनुग्रह धरता हुआ उदित होता है। पृथियी गै जो यह देवना है वह पुरुष के अपान [वायु] यो धारण किये हुए है । इन के मध्य मे जो आकाश है वह समान है, वायु ब्याग है । (4) मि०म०--'बाह्य प्राण जो मूर्य है, बाम्यन्तर माण पर, ओ मा में निवाग परता है, अनुग्रह परताहमा उदिन होता है, क्योरि पशु फा देवता मूर्य है। यात्र १ नुलनीय वायएएपनिाद् ६.२१ प्रश्नोपनिषद [९११ अपान जो पृथ्वी का देवता है आभ्य तर अपान को जो दो विशिष्टि अवयवो (उपस्थ और पायु) मे स्थित है अनुगृहीत करता हुआ उस के अधिष्ठान पर दृष्टि रखता है । आकाश का देवता जो बाह्य समान है याभ्य तर समान पर जो भोजन को पचा कर सम्पूर्ण शरीर में पहुंचा देता है अनुग्रह करता हुआ उस के अधिष्ठान पर दृष्टि रखता है। वायु का देवता जो वाह्य व्यान है आभ्यतर व्यान पर अनुग्रह करता है। [८] 'तेजो ह वा उदान । तस्मादुपशान्ततेजा पुनर्भवमिन्द्रियैर् मनसि सम्पद्यमान ॥९॥ अनु०-'निश्चय तेज ही उदान है । अत जिस का तेज शान्त हो जाता है वह मन मे लीन हुई इन्द्रियो-सहित पुनर्जन्म को [प्राप्त होता है] । (९) सि०अ०-अग्नि का देवता जो बाह्य उदान है माभ्यनर उदान पर अनुग्रह करता है। यही कारण है कि मृत्यु के समय उदान वायु जब उत्क्रमण करता है तो शरीर को नैसर्गिक उष्णता न्यून हो जाती है और मरण काल मे सभी इंद्रियो की शक्तिओं अपने-अपने अधिष्ठानो का त्याग कर हृदय मे जमा हो जाती है। [१] 'यच्चित्तस्तेनप प्राणमायाति। प्राणस् तेजसा युक्त सहात्मना यथासकल्पित लोक नयति ॥१०॥' अनु०-इस का जैसा चित्त (सकल्प अथवा वासना) होता है उस से यह प्राण को प्राप्त होता है। प्राण तेज से युक्त हो [जीव को] आत्मा के सहित सकल्प किये हुए लोक को ले जाता है । (१०) सि.अ.--[प्राण हृदय से एकीभूत हो कर हृदय की वासना से चाहे भनी हो चाहे बुरी उन लोको मे शरीर धारण करता है जो उस वासना के अनुरूप है। वही प्राण पुण्य और पाप कर्मो का फल भोगने के लिए उदान वन वर भोगलोक (परलोक) को प्राप्त कराता है। [१०] 'य एव विद्वान् प्राण वेद न हास्य प्रजा हीयते,ऽमृतो भवति । तदेप प्रलोक -॥११॥ अनु०-'जो विद्वान प्राण को इस प्रकार जानता है निश्चय उस की सन्तान नष्ट नहीं होती, [वह] अमर हो जाता है। अतएव यह श्लोक है-(११) सि.अ.--जो कोई प्राण को जमा वर्णित किया गया है जान लेता है उसकी सतान का पदापि धाय नहीं होता और वह स्वयं अमर हो जाता है। इस विषय में वेद मन भी साक्षी है जो यह है -[११] तुलनीय मुषटकापनिषद् ३ ११० रीना ८६

११६ ]
सिरे अवयर (फारसी)
"उत्पत्तिमाति, स्थानं, विभुत्वं चैव पञ्चधा,
अध्यात्म चैव प्राणस्य विज्ञायामृतमश्नुते,
विज्ञायामृतमश्नुते" इति ॥१२॥
"प्राण की उत्पत्ति, आगमन, स्थिति, [वृत्ति-भेद से] पांच
प्रकार की व्यापकता, और अध्यात्म जान कर [मनुष्य] अमरत्व प्राप्त कर
लेता है, जान कर अमरत्व प्राप्त कर लेता है।" ' (१२)
सि० अ०-"जो कोई प्राण की पांच वृतिओ को जान लेता है जो है प्राण की
उत्पत्ति,शरीर में प्राण का आगमन, शरीर मे प्राण को अवस्थिति,[उस का] सभी इन्द्रियो
मे व्यापन, और [उस का] आत्मा की छाया होना-वह अमर हो जाताहै ।" ' [१२]
॥ इति तृतीय प्रश्न
?
चतुर्थ प्रश्न.
अथ हैन सौर्यायणी गार्ग्य' पप्रच्छ-"
-भगवन्नेतस्मिन् पुरुपे
कानि स्वपन्ति ? कान्यस्म॑िम् जाग्रति ? कतर एप देवः स्वप्नान्
पश्यति ? कस्यैतत् सुख भवति ? कस्मिन्नु सर्वे संप्रतिष्ठिता
भवन्ति ?' इति ॥१||
अनु०-तदनन्तर उन (पिप्पलाद मुनि) से सूर्य के पोन गायं ने
में
पूछा-'भगवन् । इस पुरुष कौन [इन्द्रियाँ] सोती है ? कौन इस
जागती हैं ? कौन देव स्वप्नो गो देखता है । पिसे यह सुख होता है ?
रिस मे सब प्रतिष्ठित हैं ? (२)
मि० अ०-इम के पश्चात मौर्यायणि ऋषीश्वर ने पिप्पलाद से पूछा-'हे भगवन् !
पुरुष ये परीर में कौन गोते है, पौन जागते हैं, पौन देवता है जो स्वप्न देखता है,
गुखानुभव पिसे होता है, और मय का आश्रय कौन है' [१]
तस्मै स होवाच-'यथा, गाग्यं । मरीचयोऽकंस्यास्त गच्छतः
सर्वा एतस्मिस् तेजोमण्डल एकीभवन्ति, ता पुन: पुनरदयतः
प्रचरन्ति, एव ह वै तत् सर्व परे देवे मनस्येकीभवति । तेन ताप
पुरुषो न शृणोति, न पश्यति, न जिघ्रति, न रायते, न स्पृशते,
नाभिवदते, नादने, नानन्दयते,
न विमृजते, नेयायते;
स्वपितीत्याचक्षते ॥२॥

प्रश्नोपनिषद् [११७ अनु०-तब उस से उन्हो ने कहा-'जिस प्रकार, हे मार्य । सूर्य के अस्त होने पर समस्त किरणें उस तेजोमण्डल मे एकीभूत हो जाती हैं, और उस पा उदय होने पर पुन फैल जाती है, उसी प्रकार वह सब परम देव मन मे एकीभूत हो जाता है। इस से तब वह पुरुष न सुनता है, न देखता है, न सूंघता है, न चखता है, न स्पर्श करता है, न बोलता है, न ग्रहण करता है, न आनन्द भोगता है, न मलोत्सर्ग करता है, न कोई चेप्टा करता है। [तव कहते है, "सोता है' । (२) सि० अ०-पिप्पलाद वोले-हे सौर्यायणि ! जब सूय अस्त होता है तो उस की समस्त फिरणे उम के मण्डल में लौर जाती है और फिर जब उदित होता है तो उम की समस्त किरणें जो उस के मण्डल म निहित रहती है दहिगत हो कर फैल जाती है। इसी प्रकार सभी इन्द्रियाँ जमा हो कर मन म प्रविष्ट हो जाती है जो इन्द्रियो म श्रेष्ठ है। उस समय यह पुरुप कुछ नहीं सुनना कुछ नहीं देखता कुछ नही संघता, रसना से कोई रस नही लेता, कुछ स्पर्श नहीं करता, कुछ नहीं बोलता, हाथ से कुछ नहीं ग्रहण करता, मैथुन में कोई रस नहीं लेता, और मलमून का उत्सगं नहीं करता। उस पुरुष को "स्पाप' कहते हैं, अर्थात् [इम ने] अपने को पा लिया है । [२] 'प्राणाग्नय एतस्मिन् पुरे जानति । गार्हपत्यो ह वा एपोऽपानो, व्यानोऽन्वाहार्यपचनो, यद् गार्हपत्यात् प्रणीयते प्रणयनादाहवनीय प्राण ॥३॥ अनु:- इस [शारीररूप] पुर में प्राणाग्नि ही जागते है। निश्चय यह गान ही गाई पत्य अग्नि है, व्यान अन्वाहार्यपचन (दक्षिणाग्नि) है, जो गार्हपत्य अग्नि] से ले जाया जाता है वह प्राण प्रणयन (ले जाये जाने) के कारण आहबनीय अग्नि है । (३) सि. 10- इस ब्रह्मपुरम जो किदह है यही पांच प्राण जागते रहते हैं जो पाँच वायु हैं और ज्योतिमय है-अपान एक अग्नि है प्यान द्वितीय अग्नि है, और प्राण इत अग्निओ में श्रेष्ठ अग्नि है । [३] 'यदुच्छ्वासनि श्वासावतावाहुती सम नयतीति स समान । मनो ह वाव यजमान इष्टफलमेवोदान । यजमानमहरहर् ब्रह्म गमयति ॥४॥ अनु०-'जो इन उच्छ्यास- और नि ध्यास- रूपी आहुतिमा पो सम ११८] सिरे अववर (फारसी) रखता है वह समान । निश्चय मन ही यजमान है। इष्टफल' ही उदान है। वह इस यजमान को नित्यप्रति ब्रह्म के पास पहुंचाता है। (४) सिं० अ०–'समान वह अग्नि है जिस में जो कुछ हवन करते है उसे वह भस्म कर देता है, अर्थात् भोजन का पाचक है, और अग्निहोत्र का उच्छ्वास और निश्वास है जिसे अग्नि मे हवन करते हैं, और हृदयरूपी यजमान है। अग्निहोत्र का फल उदान है, क्योंकि उदानवायु फ्ल को हृदय में पहुंचाता है। यह फ्ल यह है कि निरा प्रति सुपुस्ति-माल म शो आनन्दपूर्ण निद्रा है मन को व्र ह्य तक पहुंचा देता है । [४] 'अौप देव स्वप्ने महिमानमनुभवति-यद् दृष्ट दृष्टमनुपश्यति, श्रुत ध्रुतमेवार्थमनुशृणोति, देशदिगन्तरेश् न प्रत्यनुभूतं पुन. पुन. प्रत्यनुभवति, दृष्ट चादृष्ट च, श्रुत चाश्रुत च, अनुभूत चाननुभूत च, सच् चासच् च सर्व पश्यति; सर्व. पश्यति ॥५॥ अनु०-'इस [स्वप्नावस्पा] में यह देव अपनी महिमा का अनुभव करता है। जिस से [वह] देखे-भाले को [ही] देखता है, सुनी-सुनी बातो को ही सुनता है, देश-देशान्तर मे अनुभव किये हुए को ही पुन - पुनः अनुभव करता है, देखे और विना देखे, सुने और बिना सुने, अनुभव कि हुए और विना अनुभव किये हुए, सत् और असत् सभी को देखता है, सर्वरूप हो कर देखता है । (५) सि० अ०-पुरप जो मन में स्थित है और जो जीवात्मा है, रवप्नावस्था में अपनी विभूति या दर्शन करता है, जो चाहता है उत्पन्न कर लेता है, जो कुछ जागरण मे देखा हुआ होता है उसे स्वप्न में देखता है, जो पुछ जागरण में सुना हुआ होता है उसे स्वर्ण मे मुनता है, जो कुछ नगर मे अथवा अन्यत्न देखा हुआ होता है और अनुभव दिया हुआ होता है उसे पुन देखता है। दृष्ट और अदृष्ट, श्रुत और अश्रुत, ज्ञात और अशात, सत्य और असत्य-सब कुछ आप ही हो दर सब कुछ देखता है। चूंकि पारमा समस्त मायं परता है और सच्चा स्रष्टा है, [अत ] जीवात्मा भी को महज़ार-द्वारा आत्मा गे भिन्न हो गया है, स्वप्न मे समस्त पापं करता है और अपने स्वाभाविक स्वरूप का परित्याग नहीं करता। [२] ‘स यदा तेजसाभिभूतो भवति, अन्नप देव स्वप्नान् न पश्यति । अथ तदैतस्मिन् शरीर एतत् सुप भवति ।।६।। अनु०-'जब यह तेज से अभिभूत होता है तब यह देव स्वप्न नही उस समय इरा गरीर मै यह सुख होता है । (६) देखता।

प्रश्नोपनिषद् [११९ सि०अ०- स्वप्नावस्था म [जीवात्मा] जिम समय एर नाही मे जिम का नाम पुरीतत् है, जिम से पित्त उत्पन होता है, और जिस म मन प्रवेश करता है, पित्त के स्खलन का मार्ग अवरुद्ध करता है, उस समय जीवात्मा कोई स्वप्न नहीं देखता, क्योकि मन उस समय उस नाडी को बन्द कर देता है जो वासना का मार्ग है, और जब वासना-मार्ग बन्द हो गया तो स्वप्न नहीं देखता। जीवात्मा शरीर म उस समय भागा ही बन जाता है जो आनन्दस्वरूप है। [६] 'स यथा, सोम्य | वयासि वासोवृक्ष सप्रतिष्ठन्ते, एव ह वै तत् सर्व पर आत्मनि सप्रतिष्ठते-॥७॥ अनु०-'वह जिस प्रकार, हे सौम्य पक्षी अपने बसेरे वे दृक्ष पर बसेरा लेते हैं, निश्चय उसी प्रकार वह सब परम आत्मा में बसेरा लेता है-(७) सि० अ०-- हे सोम्य | जम सभी पक्षी वृटा के अपर विश्राम ररते हैं जो उन के बसेरे का ठौर है, उमी प्रचार यह सब परमात्मा अर्थात् महानात्मा म स्थित हो र विश्राम करते हैं जो जीयो का जीय है-[७] 'पृथिवी च पृथिवीमाना च, आपश् च, आपोमाना च, तेजश् च तेजोमाता च, वायुश् च वायुमात्रा च, आकाशश् चाकाशमाता च, चक्षुश् च द्रष्टव्य च, श्रोत्र च श्रोतव्य च, घ्राण च प्रातव्य च, रसश् च रसयितव्य च, त्वक् च स्पर्शयितव्य च, वाक् च वक्तव्य च, हस्तौ चादातव्य च, उपस्थश् चानन्दयितव्य च, पायुश् च विसर्जयितव्य च, पादौ च गन्तव्य च, मनश् च मन्तव्य च, बुद्धिश् च बोद्धव्य च, अहङ्कारश् चाहकर्तव्य च, चित्त च चेतवितव्य च, तेजश् च विद्योतयितव्य च, प्राणश् च विधारयितव्य च ।।८।। अनु०-पृथिवी और पृथिवी-माना (गन्ध-तन्माना), जल और जल. माना (ररा-तन्माना), तेज और तनोमाना (स्प-तन्मात्रा), वायु और वापु-मात्रा (स्पर्श-तन्माना), आकाश और आकाश-माता (शब्द सम्मावा), नेन और द्रष्टव्य (म्प), धोव और थोतव्य (शब्द) घाण और घ्रातय्य (गन्य), रसना और रमयितव्य (ग्स) त्वचा और स्पर्शयितव्य (स्पर्श- योग्य पदार्थ), वायु और वक्तव्य हस्न और ग्रहण करने योग्य पदार्थ, उपस्थ और भोग्य पायु और मन पाद और गन्तव्य स्थान, मा और मन या विषय, बुद्धि और वास्थ्य, अहमार और अहहार का विषय, वित्त है, चक्षु १२० ] सिर अक्बर (फारसी) और चित्त का विषय, तेज और प्रकाश्य पदार्थ, प्राण और धारण करने योग्य पदार्थ । (८) सि० अ०-'स्थूल और उद्भून पृथ्वी, स्यूल और उद्भूत जल, स्थूल और उद्भूत अग्नि, स्थूल और उद्भुत वायु, स्थूल और उद्भूत आवाश जो भूताकाश और हृदयावाश और जो कुछ दिखायी देता है, थोत्र और जो कुछ मुना जाता है, घाण और जो कुछ सुंधा जाता है, रम और जो कुछ चखा जाता है, स्पर्श और जिस का स्पर्श होता, है, वाणी और जो कुछ बोला जाता है, हस्त और जो कुछ उस के द्वारा गृहीत होता है, पर और स्थान जहाँ पर सजाया जाय, पायु और मल, उपस्थ और उस का आनन्द, मन और मनोरथ, बुद्धि और बुद्धि का गुण, अहकार और अहकार का गुण जिसे मह-अह काहते हैं, चित्त और चित्त का गुण अर्थात् हृदय और हृदयवृत्ति, प्रकाशमान और प्रकाश, शक्ति और शक्ति की निया ये सब सुपुस्तिमाल मे परमात्मा मे विश्राम करते हैं। [] 'एप हि द्रष्टा, स्प्रप्टा, श्रोता, घ्राता, रसयिता, मन्ता, वोद्धा, कर्ता, विज्ञानात्मा पुरुष. । 'स परेऽक्षर आत्मनि संप्रतिष्ठते ॥९॥ अनु०-'यही द्रष्टा, स्प्रप्टा, थोता, माता, रसयिता, मन्ता (मनन करने वाला), बोद्धा, कर्ता, विज्ञानात्मा पुरुष है। वह परम अक्षर (अक्षय) आत्मा में स्थित हो जाता है । (९) सि.न.-'वह परमात्मा इन सब का अधिष्ठान है। यही परमात्मा द्रष्टा है, स्रष्टा है, श्रोता है, प्राता है. रमयिता है, मन को त्रियाओ का पर्ता है, दुद्धि की किपाओ वा कर्ता है, वर्ता अर्थात् सर्परा है, विज्ञानात्मा है, और पुरुष है अर्थात् सब में "पुर" (पूर्ण, भरा हुआ) है। [९] 'परमेवाक्षर प्रतिपद्यते स यो ह वै तदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षर वेदयते-यस् तु, सोम्य ! स सर्वज्ञः सवों भवति । तदेप श्लोक-१०॥ अनु०-'वह परम अक्षर वो ही प्राप्त होता है जो कोई इस छायाहीन, अशरीरी, अलोहित, गुम अक्षर को जानता है-जो भी, हे साम्प ! वह सर्वज्ञ [हो कर] सर्वरूप हो जाता है। अतएव यह स्लोर है-(१०) मि० अ०-'इम आरमा छाया नहीं, गरीर नहीं, रग नहीं। [वह पवित्र मूक्ष्म, और शुभ है। {गे] जो कोई इस प्ररार जानता है वह सबंश और गरम हो भाता है। वेद-मन म इमी मयं मे अनुसार [भाता है. मि-[१०] प्रश्नोपनिषद् [ १२१ "विज्ञानात्मा सह देवैश् च सर्वे, प्राणा, भूतानि सप्रतिष्ठन्ति यन तदक्षर वेदयते यस् तु, सोम्य । स सर्वज्ञ सर्वमेवाविवेश" इति ॥११॥ अनु०-' हे सोम्य । जिस म समस्त देवो सहित विज्ञानात्मा, प्राण, और भूत सम्यक् प्रकार से स्थित होते है उस अक्षर को जो जानता है उस सर्वज्ञ की सभी मे गति हो जाती है ।' (११) सि. २०- यह आत्मा विनानात्मा है। जीवात्मा और समस्त पानेद्रियाँ और उन के देवता और विषय वसी तत्त्व म लोन हो जाते हैं । मोम्म! जो कोई उस तत्त्व को जान लेता है वह सवज्ञ हो जाता है सर्वात्मा हो जाता है। [११] ॥ इति चतुर्थ प्रश्न ।। पञ्चम प्रश्न अथ हैन शैब्य सत्यकाम पप्रच्छ-'स यो ह वै तद्, भगवन् । मनुष्येषु प्रायणान्तमोकारमभिध्यायीत क्तम वाव स तेन लोक जयति ?' इति ॥१॥ अनु०-तदनन्तर उन से शिविपुन सत्यकाम ने पूछा-'भगवन् । मनुष्यो मे जो प्राणप्रयाणपर्यन्त इस ओसार का चिन्तन परे, वह उस से किस लोक को जीत लेता है ' (१) मि० अ०---इस के अन तर सत्यवाम नामा ऋपीयर ने पिप्पलाद से पूधा-है भगवन् । सभी मनुष्यों में से जो मरणवालपय त प्रणव अर्थात् ओम् का ध्यान करता है वह ध्यान के द्वारा विस लोक को प्राप्त परता है। [१] तस्मै स होवाच- एतद् वै, सत्यकाम पर चापर च ब्रह्म' यदोहार । तस्माद् विद्वानेते वायतनेनैवतरमन्वति ॥२॥ अनु०-उस से उन्हों ने यहा- निश्चय हे सत्यराम मह जो ओकार है वही पर (निगुण) और अपर (सगुण) ब्रह्म है । अत विद्वान् इसी वे आश्रय से किसी एक [ग्रा] या प्राप्त हा जाता है । (२) शि.अ.-पिप्पलाद बोने-हे रास्याम । यही नाम पर बझ और अपराह्म १२२] सिरें अक्बर (फारसी) अर्थात निविशेष (निगुण) और राविशप (सगुण)", है । इस नाम को जानने वाला और इस नाम की साधना परन वाला इसी नाम के ध्यान से इन निविशेष और सविशेष दो तत्वा म से एक का प्राप्त करता है। [२] 'स यद्यकमातमभिध्यायीत, स तेनैव सवेदितस् तूर्णमेव जगत्यामभिसम्पद्यते । तमृचो मनुष्यलोकमुपनयन्ते । स तत्र तपसा, ब्रह्मचर्येण, श्रद्धया सम्पन्नो महिमानमनुभवति ॥३॥ अनु०- वह यदि [ओवार की] एक माना(अ)वा ध्यान करता है तो उसी से बोधयुक्त होकर तुरत ही ससार को प्राप्त हो जाता है। उसे ऋचाएं मनुष्यलोक म ले जाती हैं। वह वहां तप, ब्रह्मचर्य, और श्रद्धा से सम्पन्न हो कर महिमा का अनुभव करता है । (३) सि० अ०-- यह नाम साढ तीन मात्राएँ रखता है अर्थात इस म साढे तीन अक्षर होते हैं। यदि [उपासक] इस महाशब्द (प्रणव) की एक मात्रा से उपासना करे तो इस उपासना के पुष्य से ऋग्वेद उसे इसी लोक म भोगों से विरक्ति तप श्रद्धा और समाग प्राप्त वरा देता है और वह पुरुप मनुप्यो म महिमा प्राप्त कर लेता है। [३] 'अथ यदि द्विमानेण मनसि सम्पद्यते, सोऽन्तरिक्ष यजुभिरुनीयते सोमलोकम्, सोमलोके विभूतिमनुभूय पुनरावर्तते ॥४॥ अनु०- और यदि वह [ओकार की] दो मानाआ (अ+उ) से मन में समाहित होता है तो उसे यजु श्रुति साम-लोक में ले जाती हैं, [और] सोमसोरम विभूति का अनुभव कर वह फिर लौट आता है। (४) सि०अ०-- यदि [उपामर] इम महाशब्द की दो माताा म उपामना पर तो इस उपासना ये पुण्य स यजुर्वेद उम आपाश और पृथ्वी स पर ते जा पर चद्रता में पहुंचा पर और उस लाव ग महिमाबित कर दूसरे लोर म पहुँचा दता है । [४] य पुनरेत विमानणोमित्येतेनैवाक्षरेण पर पुरुषमभिध्यायीत, स तेजसि सूर्ये सपन । यथा पादोदरस् त्वत्रा विनिर्मुच्यत, एव ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्त । स सामभिरुनीयते ब्रह्मलोरम् । स एतस्माज जीवधनात् परात् पर पुरिशय पुरुषमीक्षते । तदेती श्लोकी भवत्-शा अनु०-जा पुन [आगार पी] तीन मात्रामा (अ+उ+म) स ॐ इम मुपरकापनिषद् ११८६मा और अपरा विवादिमाग से नुलनय प्रश्नोपनिषद् 1 १२३ अक्षर द्वारा इस परम पुरुप की उपासना करता है वह तेजोमय सूर्य [लोक] को प्राप्त होता है। जिस प्रकार सर्प केचुली से निकल आता है उसी प्रकार यह पापो से मुक्त जाता है। यह सामश्रुतिओ द्वारा ब्रह्मलोक मे ले जाया जाता है। यह इस जीवधन से ऊँचे से ऊँचे, हृदय में स्थित, परम पुरुप का साक्षात्कार करता है। अतएव ये दो श्लोक है-(५) सि० अ०–'यदि [उपासक] तीन मात्राओं से इस महाशब्द की उपासना करे तो उसे सामवेद इस नाम के पुण्य से तेजोलोक हे जा कर और वहाँ ऐश्वर्य और महिमा प्रदान कर दूसरे लोक मे पहुंचा देता है। यदि [उपासक] इस महाशब्द की पूरी साढ़े तीन मात्रामओ से उपासना करता है तो इम महाशब्द के पुण्य से इस नाम का उपामर महाज्योति को प्राप्त करता है। जैसे रार्प केंचुल को त्याग कर वेंचुल से पृथक हो जाता है, उसी प्रकार इस महाशब्द का साधक पापो से निकल आता है। अथर्ववेद उसे ब्रह्मलोक को प्राप्त करा देता है, जहाँ [वह] जीवघन को प्राप्त कर जीवा के जीव को देखता है जो सभी शरीरो मे पूर्ण है, अर्थात् परब्रह्म हो जाता है। ये [दो] वेद- मन इस में प्रमाण है-[५] "तिस्रो माना मृत्युमत्य', प्रयुक्ता, अन्योन्यसक्ता, अनविप्रयुक्ता । क्रियासु बाह्याभ्यन्तरमध्यमासु सम्यक् प्रयुक्तासु न कम्पते ज्ञ ॥६॥ अनु०-'" [ोवार की] तीनो मात्राएँ मृत्युयुक्त, मयुक्त, परस्पर सम्बद्ध, तथा अपृथक्सिद्ध हैं। बाहा, आभ्यन्तर, और मध्यम क्रियाओं मे [उन के] सम्यक् प्रयोग से ज्ञाता पुरुप विचलित नहीं होता। (६) सि. अ.- साधक ने इस नाम से तीन मानाआ तक ध्यान किया है, जो पृयक भी हैं और सयुक्त भी। उस साधक पर मृत्यु का वश नहीं चलता। इस महाशब्द वी साधना तीन प्रकार की है। प्रथम, जिह्वा से ऊंची प्वनि करना, जो दूसरे को मुनायी दे। यह आरभिक जपयोग का स्थान है। द्वितीय, जिह्वा से धीमी ध्वनि करता, जिसे स्वय सुने और दूसरा न सुने। यह मध्यम अपयोग का स्थान है। तृतीय, जिह्वा से बोले बिना और जिह्वा हिलाये बिना मन मे बोला जाय। यह उत्तम जपयोग कास्थान है। जो कोई इस साधना का ज्ञाता है और सदा इस उपामना का अनुष्ठान गहतर है और कुछ दिन कर के छोड देता है वह उपासर इस उपासना के पुण्य से निश्चल हो जाता है । [६] १ अगली टिपणी देखिए।

१२४ ] सिरै अवार (फारसी) . "ऋग्भिरेत, यजुभिरन्तरिक्ष, सामभिर् यत् तत् क्वयो वेदयन्ते । तमोकारेणवायतनेनान्वेति विद्वान् यत् तच्छान्तमजरममृतमभय पर" इति ॥७॥ अनु०-' "[साधक ऋग्वेद द्वारा इस (पृथिवी-लोक) को, यजुर्वेद द्वारा अन्तरिक्ष को, और सामवेद द्वारा जिस [लोक] को [प्राप्त होता है] उसे क्रान्तदर्शी [पुरप] जानते हैं [अर्थात् द्यो-लोक को]। उस ओकाररूप आलम्वन के द्वारा ही विद्वान् जिस लोर को प्राप्त होता है वह शान्त, अजर, अमर, अभय, एव परम (थेष्ठ) है ।" ' (७) सि०अ०- "ऋग्वेद उसे इस पृथ्वीलोव म महिला प्रदान करता है, यजुर्वेद उसे पगलोर में महिमा प्रदान परता है, सामवेद उम सूर्यलोष म महिमा प्रदान परता है। ज्ञानी और मारमाा न ऐसा रहा है जो पोई पूरी साडे तीन मात्रामो स इस महाशब्द यी उपाराना ररता है वह उपासक हिरण्यगर्भ-मोय को प्राप्त कर, शानी हो पर, उस तत्त्व को पा लेता है जिम जरा नहीं आती, जिस वी मृत्यु नहीं होती, जिस का क्षय नहीं होता, और जिम भय नहीं होना। यह पर भी है, वह अपर भी है। अर्थात् यह निविशेष भी है वह सविशप भी है।'' [५] 11 इति पञ्चम प्रश्न । पप्ठ प्रश्न अथ हैन सुवेशा भारद्वाज पप्रच्छ-'भगवन् । हिरण्यनाभ. कौसल्यो राजपुत्रो मामुपेत्यंत प्रश्नमपृच्छत-"पोडशक्ल, भारद्वाज तमह कुमारमझुव--"नामिम वेद । यद्यहमिममवेदिप, क्य ते नावक्ष्यमिति ? समूलो वा एप परिगुप्यति योऽनृतमभिवदति । तस्मान् नाम्यिन्त वक्तुम् ।" स तूष्णी रयमाएहा प्रवदाज ! त. त्या पृच्छामि, यवासी पुरप पुरुप येत्य ?" इति" ॥१॥ १ नुसनीय रहारम्यकोपनिषद १.५ ४-५, मिग ऋयाा सम्बध पियो, या। अन्तरिक्ष और सामवेड का सोसार मनालापा गया है। ये तीनों पर रिलागो हैभरिना सलोर रेमो मोनारो साधना ॥ प्राम। गत प्रश्नोपनिषद [ १२५ अनु०-सदनन्तर उन (पिप्पलाद से) भरद्वाज के पुत्र सुकेशा ने पूछ- 'भगवन् । कोसलदेश के राजकुमार हिरण्यनाभ ने मेरे पास आ कर यह प्रश्न पूर्ण था-"भारद्वाज ! क्या तू सोलह कलाओ वाले पुरुष को जानता " मैं ने उस कुमार से कहा-"मैं इसे नहीं जानता। यदि मैं इसे जानता होता, तो तुझे क्यो न बतलाता' जो मिथ्या भापण करता है वह मूलसहित सूख जाता है। अत में मिथ्या-भाषण नहीं कर सकता।" वह चुपचाप रथ पर चढ कर चला गया। सो अय मैं आप से पूछता हूँ, वह पुरुष कहाँ है ?' (१) मि० अ०--इम के अनन्तर उस सुफेशा ऋषीश्वर ने पिप्पलाद से पूछा-'हे भगवन् । कोसल के राजकुमार हिरण्यनाभ ने आ कर मुझ मे प्रश्न किया, 'हे भारद्वाज। क्या तू उस पुरुष को जानता है जिस पुस्प मे सोलह कलाएँ है?" मैं ने उतर दिया, 'मैं उस पुरुष को नहीं जानता, यदि उस पुरुष को जानता तो तुझे क्यो न बतलाता? वृद्धो ने कहा है कि जो मिथ्या भाषण करता है वह जड से मूख जाता है। अत में तुझ रा झूठ क्यो बोलूं। वह राजकुमार यह उत्तर सुन कर और कुछ कहे बिना रय पर सवार हो चल दिया। हे पिप्पलाद । मैं आप ये पूछना हूँ कि वह पुरुष कहाँ है "[१] तस्मै स होवाच-'इहैवान्त शरीरे, सोम्य स पुरुपो यस्मिन्नेता पोडश कला प्रभवन्ति' इति ॥२॥ अनु०-उस से उन्हो (पिप्पलाद) ने कहा-'इसी शरीर के भीतर, हे सोम्य । वह पुरुष वर्तमान है जिस मे इन सोलह कलाओ का प्रदुर्भाव होता है'। (२) सि० अ०-पिप्पलाद उस से बोले-'हे मोम्य' वह पुरुष इसी शरीर ये भीतर वतमान है। वह पुरुष जिस मे सोलह कलाएँ होती हैं वह उसी मे प्रादुर्भूत होता है। [२] तैत्तिरीयोपनिषद १५२ मे कम का विषयय हो कर यजुर्वेद का सम्बध धो-लोक से और सामवेद का अन्तरिक्ष से हो गया है। शकर ने द्यो लोक को एकदम उड़ा दिया है, और सामवेद का सम्बन्ध ब्रह्मलोक से स्थापित कर दिया है, जो बंदिक त्रिलोकी का स्वरूप ध्यान से उतर जाने के कारण हुआ है। दाराशिकोह को मत्र के वास्तविक अथ को पकड का थेप प्राप्त है । मागे, मात्र ४ में, परिगएिन, जिम की टिप्पणी भी दृष्टव्य है।

१२६] सिर मकबर (फारसी) ‘स ईक्षा चक्रे-"कस्मिन्नहमुत्तान्त उत्तान्तो भविष्यामि, कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि " इति ।।३।। अनु०-'उस ने विचार किया-"किस के उत्क्रमण करने पर मैं उत्क्रमण पर जाऊँगा, और किस के स्थित रहने पर मैं स्थित रहूंगा" (३) सि० अ.--'उस पुरुष के मन मे आया कि इन सोलह कलाओ के मध्य किस क्ला की प्रतिष्ठा से प्रतिष्टित होऊँ और किस के उत्क्रमण से उत्क्रमण कर जाऊं। [३] 'स प्राणमसृजत; प्राणाच्छ्रद्धा, खं, वायुर्, ज्योतिराप., पृथिवीन्द्रिय, मनो, नम्; अन्नाद् वीर्य, तपो, मन्त्रा., कर्म, लोका, लोकेपु नाम च ॥४॥ अनु०-'उस ने प्राण को रचा, प्राण से श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, [और] अन्न को; [तथा अन्न से वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, और लोको यो, एव लोको मे नाम को । (४) सिं० अ०--'अत [उस ने] उम पुरुष में प्राण को रचा: प्राण से यहाँ हिरण्यगर्भ अभिप्रेत है। [उस ने] प्राण से श्रद्धा को उत्पन दिया, श्रद्धा से भूतारारा को उलन किया, भूतानाश से वायु को उत्पत किया, वायु से अग्नि को उत्पन दिया, अग्नि से जल यो उत्पत किया, जल से पृथ्वी को उत्पन्न रिया, पृथ्वी रो समरत ज्ञानेन्द्रिया को उत्पन किया, इन्द्रिमा स मन को उत्सत पिया, मन मे अप्न को उत्पन दिया, अन्न से वीर्य को उत्पन्न निमा, वीर्य म तप को उत्पन्न रिया, तप से कर्म को उत्पन रिया, और कर्म मे नाम और रूप को उत्पन्न विया। [४] 'स यथेमा नद्य स्यन्दमाना समुद्रायणा समुद्र प्राप्यास्त गच्छन्ति, भिद्येते तासा नामरूपे, समुद्र इत्येव प्रोच्यते, एवमेवास्य परिद्रप्टुरिमा पोडश कला. पुरपायणा पुरुष प्राप्यास्त गच्छन्ति, भिद्यते चासा नामस्पे, पुरुष इत्येव प्रोच्यते। स एपोऽकलोऽमृतो भवति । तदेप श्लोक-शा अनु०- वह [दृष्टान्त] इस प्रकार है-जिस प्रकार वती हुई ये नदियाँ को प्राप्त हो र अस्त हो जाती हैं, उन वै नाम-रूप नष्ट १२ ही मन में हिनामित पद ग्ला है। तुलनीय-सुपात्रापनि ३.२.४ वृावारपाई पनिषद् १.५.११,१५ अथवा शापयामा १०.४...१७, हान्दाग्योपनिषद ६३, मर (वारगनयी महिता) ८.१६ प्रश्नोपनिषद् [ १२७ हो जाते हैं, और वे "समुद्र" ऐसा यह कर पुवारी जाती है, उसी प्रकार इस सर्वद्रप्टा की ये पुरुप मे वमने वाली सोलह कलाएँ उस पुरुप को प्राप्त हो वर लीन हो जाती हैं, उन वे नाम-रूप नष्ट हो जाते हैं, और वे "पुरुष" ऐसा कह कर पुवारी जाती हैं। वह कलाहीन और अमर हो जाता है। अतएव यह श्लोक है-(५) सि०अ०-'अतएव समस्त नदियाँ विशाल समुद्र से निकलती हैं, नाम और रूप ग्रहण करती हैं, और फिर नाम और रूप का परित्याग कर और विशाल समुद्र मे प्रविष्ट हो विशाल समुद्र बन जाती हैं। इसी प्रकार ये सोलह कलाएँ जीवात्मा से प्रादुर्भूत होती है जो सवंद्रप्टा है, उसी में रहती हैं उसी में लीन होती है, और जब लीन होती हैं तब उन के नाम और रूप जीवात्मा में लीन हो जाते हैं। उस समय जीवात्मा को पुरष कहा जाता है क्योंकि सभी उस मे 'पुर" (पूर्ण) हो जाते हैं । जय ने सोलह क्लाएं अस्त हो जाती है तो जीवात्मा आत्मा हो जाता है। [वह] उस समय अमर हो जाता है, क्योकि वह] सोलह लाभो के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इन मोलह बलाा का तात्पर्य है पांच बाहा ज्ञानन्द्रियां, पांच आभ्यन्तर शानेन्द्रिया, पच महाभून और एक मन जो मोलहा क्लाआ का योग होता है। जब तक ये सोनह तत्त्य पुरप में रहते हैं 'तब तक वह विदेहमुना रहता है, अर्थात्, विना ज्ञान और एकात्मभाव के जिन से इम शरीर के होते हुए जीवन्मुक्त हो जाता है, शरीर में मुक्ति नहीं प्राप्त करना। [५] "अरा इव रथनाभौ कला यस्मिन् प्रतिष्ठिता त वेद्य पुरुष वेद, यथा मा वो मृत्यु परिव्यथा" इति ॥६॥ अनु०- "जिस मे, रथ को नाभि मे अरो के समान, वलाएँ स्थित है उस ज्ञातव्य पुरुष को जानो, जिस से मृत्यु तुम्हे कष्ट न पहुंचा सके ।"' (६) सि.अ.---'इस विषय में यह वेद पत्र भी प्रमाण हैर-जिस प्रकार रथ के अरे रथ की नाहि स्थित उसी प्रकार ये सोलह कलाएँ पुरुष मे सुदृढ़ और भावद्ध १ दाराशिकोह ने यहां मत्रस्य 'समुद्रायण' शब्द का अर्थ सीधे-सीधे 'समुद्र जिस का पर है ऐसा किया है। शकर के अनुसार इस का अर्थ है-'समुद्रापणा समुद्रोऽयन गति आरमभायो पासा ता समुद्रायणा समुद्र प्रायोपगम्यास्त नामरूपतिरस्कार गच्छन्ति' अर्थात 'समुद्र जिस की गति अर्थात आत्मभाव हो, अथवा समुद्र को प्राप्त हो कर अस्त अर्थात नाम हप को खो देने वाली । २ यह वाय मूलत मत्र ५ का समापन-वाक्य है, जिसे दाराशिकोह ने मत्र ६ का आरम्मण वाक्य बना दिया है। .

को इतना १२८ ] सिर अक्वर (फारसी) हैं, जो वह आत्मा है। यदि इम पुरुष को जान लिया जो जानने योग्य है, तो तुम्हे मृत्यु का कष्ट नहीं होगा।"' [६] तान् होवाच-'एतावदेवाहमेतत् पर ब्रह्म वेद । नात परमस्ति' इति ॥७॥ अनु०-कहते हैं कि उन से [पिप्पलाद मुनि ने] कहा-'इस परब्रह्म को मैं इतना ही जानता हूँ। इस (ब्रह्म) से वडा अन्य कुछ नहीं है ।' (७) सि० अ०-यह बात पिप्पलाद ने अपने शिष्यों से कही कि मैं ही जानता हूँ और इस से अधिक ज्ञातव्य नहीं है।' [७] ते तमर्चयन्त–व हि न पिता योऽस्माकमविद्याया पर पार तारयसि' इति । नम परमपिभ्यो, नम परमपिभ्य ॥८॥ उन्हो ने उन की पूजा (स्तुति) की-'आप तो हमारे पिता हैं जिन्हो ने हमे अविद्या के उस पार पहुंचा दिया है।' परमपिओ को हमारा नमस्कार, परमपिओ को हमारा नमस्कार । (८) मि० अ०–समस्त शिप्या न यह बात सुनकर पिप्पलाद की पूजा की और वहा कि 'आप हमारे मा य है और हमारे पितृतुल्य हैं क्याकि [आप ने हम] इस अविद्या वे सागर से जो अनान है पार कर के दूसरे किनारे पर पहुंचा दिया।' महाशानिया को नमस्कार । महानानिया को नमस्कार ।। अर्थात ब्रह्मनिष्ठ महारमाा को दो बार प्रणाम । [-] भद्र कणेभि शृणुयाम देवा । भद्र पश्येमाक्षभिर् यजत्रा, स्थिरैरङ्गस् तुष्ट वासस् तनूभिर् व्यशेम देवहित यदायु' । स्वस्ति न इन्द्रो' बुद्धवा , स्वस्ति न पूषा विश्ववेदा, स्वस्ति नस् ताक्ष्यों अरिष्टनेमि , स्वस्ति नो बृहस्पतिर् दधातु । ॐ शान्ति । शान्ति 11 शान्ति ।।। ॥ इति प्रश्नपनिषत् समाप्ता ॥

ॐ
।
मुण्डकोपनिषद्
(अथर्ववेदीया)
शान्तिपाठ
ॐ भद्र कर्णेभि शृणुयाम देवा | भद्र पश्येमाक्षभिर् यजता ,
स्थिरैरङ्गस् तुष्ट वासस् तनूभिर् व्यशेम देवहित यदायु
(ऋग्वेद १ ८९८)
अनु०--हे देवगण ! हम कानो से कल्याणी वाणी सुनें, यज्ञकर्म मे
समर्थ हो कर नेत्रो से शुभ दर्शन कर स्थिर अग और शरीरो से स्तुति
करने वाले हम लोग देवताओ के लिए हितकर आयु का भोग करें।
स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा , स्वस्ति न पुपा विश्ववेदा,
स्वस्ति नुस् ताक्ष्यो अरिष्टनेमि , स्वस्ति नो बृहस्पतिर् दधातु ।
(ऋग्वेद १ ८९ ६)
ॐ शान्ति । शान्ति || शान्ति ||
अनु०-महान् कीर्तिवाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सर्वज्ञ (अथवा
सर्वैश्वर्यवान्) पूपा हमारा कल्याण करे, जो अरिष्टो (आपत्तिओ) के
लिए चक्र के समान [घातक] है वह गरुड हमारा कल्याण करे, बृहस्पति
हमारा कल्याण करे । त्रिविध ताप की शान्ति हो
,
प्रथमो मुण्डकः
प्रथम खण्ड
ॐ ब्रह्मा देवाना प्रथम सम्बभूव-
विश्वस्य कर्ता, भुवनस्य गोप्ता ।
स ब्रह्मविद्या सर्वविद्याप्रतिष्ठा-
मथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह ॥१॥

. १३० ] सिरे अवबर (फारसी) अनु०-देवताओं में पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुआ-सब का रचयिता, त्रिभुवन का रक्षर । उस ने अपने ज्येष्ठ पुन अथर्वा को समस्त विद्याओं की आश्रयभूता ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया। (१) सि० अ०-सभी देवतांना के पूर्व गहलै ब्रह्मा प्रस्ट हुआ, अर्थात् सृष्टि करने वाला देव-ऐसा ब्रह्मा जो लारो पा रचयिता है और ससार रास्वामी । उस ब्रह्मा ने अथर्वा नामधारी अपन ज्येष्ठ पुत्र को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया जो विद्याओ म सवनेष्ठ है और जिस मे सभी विद्याएँ [प्रतिष्ठित हैं। [१] अथर्वणे या प्रवदेत ब्रह्मा ऽथर्वा ता पुरोवाचाङ्गिरो ब्रह्मविद्याम् ,' स भारद्वाजाय सत्यवहाय प्राह, भारद्वाजोङ्गिरसे परावराम् ॥२॥ अनु०-ब्रह्मा ने अथर्वा को जिस का उपदेश किया था उस ब्रह्मविद्या का पूर्वकाल म अथर्वा ने अङ्गी को उपदेश किया। उस (अङ्गी) ने उसे भरद्वाज के पुन सत्यवह स कहा, तथा भरद्वाजपुन (सत्यवह)ने [इस प्रकार] ज्येष्ठ से कनिष्ठ को प्राप्त होती हुई वह विद्या अङ्गिरा से कही । (२) सिम.—उस विद्या का जिस का उपदेश ब्रह्मा ने अथर्वा को किया था अपर्वा ने अगी को उपदेश दिया, अगी ऋषि ने इस विद्या का भरद्वाज के पुत्र सत्यवह उपदेश किया, और इस का सत्यवह ने अगिरा अपि सो उपदेश किया । वह विधा है जिसे ज्येष्ठो से कनिष्ठो ने प्राप्त किया है। [२] शौनको ह वै महाशालोऽङ्गिरस विधियदुपसन्न पप्रच्छ- 'कस्मिन् नु भगवो । विज्ञाते सर्वमिद विज्ञात भवति ?' यह विद्या इति ॥३॥ अनु०-कहत है कि महागृहस्थ शोनक ने अङ्गिरा के पास विधिपूर्वक उपस्थित हो पर पूछा- भगवन् । किस के जान लिये जाने पर यह सव कुछ जाना हुआ हो जाता है । (३) सि० अ०- शौनक नामक ऋषीपवर न जो धनवान् थे स्तिगा और मोगो का त्याग कर शिष्यो की माति अगिरा ऋपि के पारा जा कर उन से पूछा-ह भगवन ! वह कौन सी एक परा है जिस पा ज्ञान हो जान पर सभी वस्तुएं मात हो जाती है ।।३] मुण्डकोपनिषद् [१३१ तस्मे स होवाच-द्वे विद्ये वैदितव्ये इति ह स्म, यद् ब्रह्मविदो वदन्ति-परा चैवापरा च ॥४॥' अनु०-उस से उस ने कहा-ब्रह्मवेत्ताआ ने कहा है कि निश्चय ही दो विद्याएँ जानने योग्य है-परा और अपरा। (४) सि०अ०-अगिरा वाले-ब्रह्मज्ञानिया का कथन है कि दो विद्याएँ हैं जिह जान लेना चाहिए. एक परा और दूसरी अपरा। [४] तत्रापरा ऋग्वेदो, यजुर्वेद, सामवेदो, अथर्ववेद , शिक्षा, कल्पो, व्याकरण, निरुक्त, छन्दो, ज्योतिपमिति,' अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते ।।५।। अनु०-उन मे अपरा है ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुत्ता, छन्द और ज्योतिप, तथा परा [वह] है जिस से उस अक्षर की उपलब्धि होती है । (५) सि०अ०-[उ हो न] अपरा विद्या कही-ऋगवेद, सामवेद यजुर्वेद, अपर्ववेद, और छह अग इत्यादि जो वेद के लिए आवश्यर हैं [(१) शिक्षा जो] वेदमतो ये पाठ और उन के निष्कर्ष के ज्ञान से सम्बद्ध है (२)] व्यावरण जो वारय और पर की विद्या है और शब्दार्थ को भी विद्या है 1(३) छद जो] वेदको मात्रामा, वर्गों, और पयो पी विद्या है [(४) ज्योनिप जो) पहा मी तिया है और जिस मे कर्मों के अनुप्टान पे काल का परिज्ञान होता है ।(५) और (६) वह विद्या जिग का सम्बध] उपाख्यान पनि पुराण ऋषियों के वचन तशास्त्र, मीमामा, और वा से है। यह सब अपरा विद्या है। परा विद्या यह विधा है जिम विधा स उस तत्व की प्राप्ति होती है जो अमर और अगर है । [२] - । यत् तदद्रेश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षु श्रोत्र तदपाणिपादम् । नित्य, विभु, गवंगत, सुसूक्ष्म, तदव्यय यद् भूतयोनि परिपश्यन्ति धीरा ॥६॥ और परख वायए गुपनिषद शान और परद प्रश्नानाद . २ में अपराम मर्थात् पदचतुएम और सह देशात ३ छह वेरागों को यह तासिरा निश्चित भगुर है। पेशा-शिक्षा, रस्प, पाररण, नियत, मोर रियण्ट ।

१३२ सिर अबर (पारसी) अनु०-वह जो अदृश्य, अग्राहा, अगोत्र, अवर्ण, और चक्षु श्रीनरहित है, हस्तपादरहित है। वह नित्य, विभु, सर्वगत, अत्यन्त सूक्ष्म, और अव्यय है जिस भूतयोनि (भूता के मूल) को धीर पुरुप सब प्रकार देखते सि० अ-यह वह तत्व है जिस अत करणा नहीं जाना जा सकता और बाह्य दद्रिया से नहीं प्राप्त पिया जा गवता। वह सत्ता किसी भी वस्तु में उत्पन नहीं है उस म कोई स्प नहीं है उस में कोई गुण नही है उस के चक्षुओ के समान कोई चक्षु नहीं धोना पे समान पोई श्रोत नही, हापो-पैरा के समान कोई हाथ पर नहीं। वह सनातन है। वह स्तय सब हो जाती है । वह पहा से म्तम्ब पर्यन्त सब म व्याप्त है और सब म व्याप्त होते हुए भी इतनी मूक्ष्म है कि उस प्राप्त नहीं किया जा मकता। उस स इतनी वस्तुएँ जम लेती हैं, परन्तु उस में कोई कमी नहीं आती। यह सभी महाभूता का गम-स्थान है। जो लोग ज्ञानी और धीर हैं वे उसे इमो प्रकार जानत हैं। [६] यथोर्णनाभि सृजते गृह्णते च, यथा पृथिव्यामोपधय सम्भवन्ति, यथा सत पुरुपात् केशलोमानि, तथाऽक्षरात् सम्भवतीह विश्वम् ॥७॥ अनु०-जैसे मकडी [जाले को] रचती और निगलती है, जैसे पृथिवी में ओपधिआ (वनस्पतिया) उत्पन होती है, जैसे सजीव पुरुष से केश और लोम [उत्पत होते है] उसी प्रकार अक्षर से यह विश्य उत्पन्न होता T T मि० अ०-जमे माडी तारा को अपन से ही उत्पन करती है और फिर बय निगल जाती है जैसे पृथ्वी समी ओषधिओ को अपने मे से ही निकालती है और जैसे जीवित मनुष्य से बड और छोटे बाल उत्पन होते हैं। उसी प्रकार उस अक्षर सत्ता से सम्पूर्ण जगत उत्पन्न होता है। [७] तपसा चीयते ततोऽन्नमभिजायते, अन्नात् प्राणो, मन , सत्य, लोका , कर्मसु चामृतम् ॥८॥ अनु०-तप के द्वारा ब्रह्म उपचय (वृद्धि) को प्राप्त होता है उस से अन उत्पन होता है अन्न से प्राण, मन, सत्य, और लोक लोकान्तर [उत्पन्न होते है] और कम म अमृग (फल) [उत्पन होता है] । (८) । A मुण्ठकोपनिषद् [ १३३ सि० अ०--वह मत्ता जपने गन म सकल्प करती है कि मैं बहुत हो जाऊँ। वह पहले अन्न होनी है, फिर अन से प्राण होता है अर्थात् जीव उत्पन हो जाता है, प्राण के बाद मन होता है, मन के बाद सत्य हाता है, सत्य वे बाद मारे लोक होते हैं, लोको के बाद वर्म होता है, और धर्म के बाद फ्ल होता है। शकराचार्य अपने भाष्य में यह वाक्य लिखते है कि-[उक्त मत्ता] जब पहले बहुरूप होती है तो अपने ज्ञान मे बहुरूप होती है, और जो अन कहा है उस का अभिप्राय है विगुणो की साम्यावस्था जिस से ही सब कुछ होता है, प्राण से सारी जीवात्माएँ अभिप्रेत है, मन से वह कमल अभिप्रेत है जिम से इच्छा और उत्पत्ति होती है, और सत्य से स्थूल पच- महाभूत अभिप्रेत हैं जिहं प्रजापति कहते है । यहाँ तर शबराचार्य का भाप्य था।'[] य सर्वज्ञ. सर्वविद्, यस्य ज्ञानमय तप , तस्मादेतद् ब्रह्म, नाम, रूपमन्त च जायते ॥९॥ अनु०-जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिस का ज्ञानमय तप है, उस से यह ब्रह्मा, नाम, रूप, और अन्न उत्पन होता है । (९) सि०अ०-वह सत्ता समान रूप से और ध्यास रूप से सब कुछ जानती है। जरा ब्रह्म का ज्ञान श्रमरहित और तपोरहित होता है अर्थान् उम ने इस ज्ञान बो तप द्वारा प्राप्त नहीं किया है। उस अक्षर पुरुप से हिरण्यगर्भ उत्पन होता है और उस से नाम रूप, और अन की उत्पत्ति होती है। [९] ॥ इति प्रथम खण्ड ॥ १ दराशिकोह ने शाङ्करभाष्य का यहाँ प्रामाणिक परिचय नहीं दिया है । भाग्य तपसा जानैनोत्पत्तिविधिनतया भूतयो यक्षर ब्रह्म चीयत उपचीयत उरिपपादयियविद जगदङ्क रमिव बोजमुच्छूनतो गच्छति पुत्रमिय पिता होंग। एव सर्वतया सृष्टिस्थितिसहारमाक्तिविज्ञानवतयोपचितात सतो ब्रह्मणोऽन्नमद्यते मुज्यत इत्यन्नमव्याकृत साधारण सारिणा स्यादिको पितावस्यारूपेण अभिजायत उत्पद्यते । ततश् च अध्यावृताद प्यादिकोषितावस्थात अन्नात् प्राणो हिरण्यगर्भो ब्रह्म गो शानकियारात्यधिस्टितजगत्ताधारणोऽविद्याकामकर्ममूतसमुदायबीजाकुरो जगदा- स्माभिजायत इस्यतुण्ड्ग। तस्माच च प्राणान मनो मन भास्य सङ्कल्पविकल्पसायनिर्णयाद्यात्मकम भिजायते । ततोऽपि सकल्पाचारमकान मतस सत्य सरपास्यमाणादि भूतपञ्चकम् अभिजायते । तस्मात सत्यात्पाद भूतपश्चताद अण्डकमेण सप्ततोहरा भूरादय । तेषु मनुष्यादिप्राणि वर्षाप्रमभमेण कर्माणि। दम घनिमित्त मूतेष्यमृत कर्मज पतम्। यावत मागि पोटिशातरपि न विनर्यात सावत् फलम विनश्यति डायमृतम् ।।८।।

१३४] सिर अरसर (फारसी द्वितीयः खण्ड तदेतत् सत्य- मन्त्रेषु कर्माणि कवयो यान्यपश्यंस् तानि त्रेताया बहुधा सन्ततानि । तान्याचरथ नियत सत्यकामा ! एप व. पन्थाः सुकृतस्य लोके ॥१॥ अनु०-वह सत्य यह है-ऋषियो से जिन कर्मों का मन्त्रो मे दर्शन किया था उन या बेतायुग में बहुत प्रचार प्रचार-प्रसार हुआ । सत्य की कामना करने वालो। उन का नियमित आचरण करो, लोक में यही तुम्हारे लिए मुकृत का मार्ग है । (१) मि० अ०---इसे सत्य जानो और उन कमों को भी जिन्हे 'शानियो ने वेदमत्रों में देखा। तीनो वेदो में वे कर्म यही है। उन कमों को तुम सर्वदा किया करो, क्योंकि इन्ही कर्मों से अपनी कामनामो को प्राप्त कर सकोगे। इस लोक मैं तुम्हारे लिए मुक्त का मार्ग यही है । [१] यदा लेलायते ह्यचि. समिद्धे हव्यवाहने, तदाऽऽज्यभागावन्तरेणाहुती. प्रतिपादयेत् ।।२।। अनु०-जव अग्नि के प्रदीप्त होने पर अचि (अग्नि-शिखा) चञ्चल हो उठे, उस समय दोनो आज्यभागों के मध्य [प्रात और साय] आहुति डाले । (२) सि० ३०-जब तुम अग्नि में हवन करना चाहो, तो जिस समय अग्नि मे बहुत सो शिखाएँ न हो और शिखाएँ छोटी छोटी हो चत्ती हो उस समय जो आहुति दी जाय, वह, जसा वि वेद में विधान रिया गया है, अग्नि में प्रतिदिन दी जाय [२] यस्याग्निहोत्नमदर्शमपौर्णमास- मचातुर्मास्यमनाप्रयणमतिथिवजित च अहुतमचन्वदेवमविधिना हुत- मासप्तमास् तम्य लोकान् हिनस्ति ॥३॥ १ दर्श-पौर्णमास यज्ञ मे आश्वनीय अग्नि के उत्तर भौर दक्षिण की ओर 'आनये स्वाहा' तथा 'सोमाय स्वाहा' इन मन्त्रों से जो दो घृतातिओं दो जाती हैं उन्हे आश्य- भागहते हैं और इनके बीच के भाग को आवापरभान'। . ।

मुण्डकोपनिषद् 52796 [ १३५ अनु०-जिस का अग्निहोत्र दर्श, पौर्णमास चातुर्मास्य, और आग्रयण [कर्मों] से रहित, अतिथि से रहित, अहुत (जिस मे हवन न किया जाय), वैश्वदेव से रहित, अविधिपूर्वक कृत (जिस मे विधि तोड कर हवन किया जाय) होता है [वह] उस के सात लोको का नाश कर देता है । (३) सि० अ०--जो कोई जैसा कि वेद मे विधान किया गया है उस प्रकार कम का अनुष्ठान नहीं करता उस के लिए स्वग के सातो लोको मे स्थान नहीं है। [३] काली, कराली च, मनोजवा च, सुलोहिता, या च सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी, विश्वरुची च देवी- लेलायमाना इति सप्त जिह्वा' ॥४॥ अनु०-काली, कराली, मनोजवा, सुलोहिता, सुधूम्रवर्णा, स्फुलिङ्गिनी, और विश्वरुची देवी-ये उस (अग्नि) को लपलपाती हुई सात जिह्वाएं त मि० अ०-अग्नि की सात जिवाए है। एतेपु यश् चरते भ्राजमानेषु यथाकाल चाहुतयो ह्याददायन् नयन्त्येता सूर्यस्य रश्मयो यत्र देवाना पतिरेकोऽधिवास ॥५॥ अनु०-जो पुरुष इन देदीप्यमान [अग्निशिखाआ] म यथासमय आहुति देता हुआ अनुष्ठान करता है उसे ये सूय रश्मिा यहाँ ले जाती हैं जहाँ देवताओ का एकमात्र अधिपति विराजमान है । (५) मि० अ०--जो कोई वेद मे प्रतिपादित समय पर उन जिह्वामा म बाहुति देना है वह आहुति उस व्यक्ति को सूय की रश्मि तक पहुंचा देती है और वहां से उमे देवराज इंद्र के पास पहुचा देती है जिन स्वग के उत्तम लोक म निवास है। [५] एह्येहीति तमाहुतय सुवर्चस सूर्यस्य रश्मिभिर् यजमान वन्ति । प्रिया वाचमभिवदन्त्योऽर्चयन्त्य- 'एप व पुण्य सुकृतो ब्रह्मलोक ' ॥६॥ २ तुलनीय श ११६.

१३६] सिरें अक्वर (फारसी) अनु०-वे दीप्तिमती आहुतियां यजमान को आओ, आओ यह तुम्हारे सुकृत से प्राप्त पवित्र ब्रह्मलोर है ऐसी प्रिय वाणी बोलकर अर्चना करती हुई, ले जाती हैं ॥६॥ सि० अ०---वह शाहुति उस व्यक्ति को स्वग ने जाते समय उत्तम पनार्थ प्रदान कर और मधुर वाणी योल कर वहाँ पहुँचाती है । [६] प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवर येषु कर्म एतच्छ्रे यो येऽभिनन्दन्ति मूढा जरामृत्यु ते पुनरेवापि यन्ति ।। अनु०-ये यज्ञरूप नाशवान् और अस्थिर है जिन में अट्ठारह' द्वारा प्रतिपादित जवर (होन) कम [प्रतिष्ठित] है। जो मूढ इसी 'श्रय का अभिनन्दन करते है व पुन पुन जरा मरण यो प्राप्त होत रहते है । (७) सिं० अ०-इस अपरा विद्या का रावध कममाग रो है। यह जो यज्ञ पर्म है वह एक हीन और टूट जाने वानी नौरा है। यह कम अट्ठारह साधनो के सभार से सम्पन होता है जो इस के लिए नियन है। यदि कोई इस वमं यो पन की कामना स रहित होकर और ईश्वर के लिए करता है ता वह उत्तम है और जो कोई इस कम पो ईश्वराय नहीं करता और जानता है कि इस स हमारा लाभ है और कि मह] हमारे लिए मुक्ति का माधन है वह और ऐसे मभी लोग अज्ञानी और मूख हैं। इह रादा जरा मोर मृत्यु घरतो हैं । [७] अविद्यायामन्तरे स्वय पण्डितमन्यमाना, जवन्यमाना परियन्ति मूढा अन्धेनव नीयमाना यथान्धा || १. कठोपनिषद् । । और मैग्नायएयुपनिषद ७६ (किञ्चित् पाटभट्स) १ इस अट्ठारह का निणय पटिन है। कार के अनुसार यहाँ सोलह पारिवा पनमान, और यममान-पत्नी (दुस अट्ठारह) अभिनत है । विष्णुपुराण (३६२८ २९) के अनुसार विद्याएं मट्ठारह हैं - अगानि वेदाश घरवारो मोमता यायविस्तर , पुराण एमगारन ध-विधा हताग चतुदर्ग। आपुषको धनुर्यदो गाग्यवश मयमात्र चतुर्ष तु विधा रागदगद ता । वर्तमाना, धीरा, १ चवते या . मुष्कोपनिषद् .[१३७ अनु०-अविद्या के मध्य रहने वाले, अपने को वडा ज्ञानी और 'पण्डित मानने वाले मूढ अन्ध के नेतृत्व में चलने वाले अन्धे के समान अत्यधिक कष्ट पाते हुए भटकते रहते हैं । (4) सि०अ०, जो लोग वि मोह और घोर अज्ञानस्वरूप अविद्या मे पने हुए हैं और अपने को विद्वान और बुद्धिमान समझते हैं उन्ह दुख और रोग सर्वनाश और मृत्यु की ओर इस प्रकार ले जाते है मानो विमी अन्धे रा हाय दूसरा अन्धा पकडार रास्ते में ले चल रहा हो और दोना कूप मे गिर पडते हो। [-] अविद्याया बहुधा वर्तमाना वय कृतार्था इत्यभिमन्यन्ति वाला । यत् कर्मिणो न प्रवेदयन्ति रागात् तेनातुरा क्षीणलोकाश् च्यवन्ते ॥९॥ अनु०-अविद्या मे बहुधा रहने वाले मूर्ख 'हम कृतार्थ (सफल, सिद्ध) है' इस प्रकार अभिमान किया करते है। चूंकि कर्मकाण्डो आसक्ति के कारण जान लाभ नहीं कर पाते इसलिए वे दुखार्त्त होकर लोक (कर्मफल) क्षीण होने पर [स्वर्ग से] च्युत हो जाते हैं । (९) मि० अ०-ये लोग इस अज्ञान के साथ-साथ वापबुद्धि और गूर्ण हैं जो यह समझते हैं कि हमारे लिए तो कुछ करणीय या उमे हम ने कर लिया है। और जो कोई ईश्वर को न पहचान कर समझता है कि कर्मों के द्वारा हमे ढेर सा पुण्य प्राप्त होगा ऐसे लोग इन कर्मों ने पन को प्राप्त कर के पुण्य क्षीण होने पर श्रम, दुख, और नरक में पड़ते हैं। [९] इप्टापूर्त मन्यमाना वरिष्ठ तान्यच्छे यो वेदयन्ते नावस्य पृष्ठे ते सुकृतेऽनुभूत्वे- म लोक हीनतर वा विशन्ति ॥१०॥ अनु०-इप्ट और पूतं [कर्मों को ही सर्वोत्तम मानने वाले महामूढ कोई अन्य श्रय नहीं जानते। वे सुकृत के फलस्वम्प स्वर्गलोन के उच्चतर प्रदेश का अनुभव यर इस [मनुप्य] लोक अधवा इस से भी हीन लोग मे प्रवेश करते है। (१०) प्रमूढा ।

१३॥ सिर अक्बर (फारसी) मि० अ०-वे का जिन से अच्छा फल प्राप्त होता है दो प्रकार के होते है- एक इष्ट अर्थात् यामादि और दूसर पूत अर्थात् दान आदि। जिस किसी ने इन दोनो का अपने करयाण को प्राप्ति हेतु श्रेष्ठ मान रखा है और आत्मा और आत्मज्ञान को मोक्ष वा साधन नहीं मानता वह इस दृष्टि से महामूर्ख है। चूंकि उस का मन सन्तान, स्त्री, सगार, और धन धान्य में अत्यधिक लीन है अत वह जो भी कम करता है इही पदार्थों की कामना से करता है और इन्ही पदार्थों की प्राप्ति पर दृष्टि रखता है। वह व्यक्ति चन्द्र लोक म जा कर शुभकर्मों के फल को प्राप्त कर के पुन नरक मे लौट आता है। [१०] तपथद्ध ये ह्युपवसन्त्यरण्ये शान्ता विद्वासो भक्ष्यचर्या चरन्त. सूर्यद्वारेण ते विरजा प्रयान्ति यत्रामृत स पुरुषो ह्यव्ययात्मा ॥११॥ अनु०-गो शान्त विद्वान् भिक्षावृत्ति का आचरण करते हुए वन मे तप और श्रद्धा का सेवन करते हैं वे निष्पाप हो कर सूर्यद्वार उत्तरायणमार्ग) से वहां जाते है जहाँ वह अमृत, अव्ययस्वरुप पुरुप है । (११) सि०अ०- जो लोग साधत और तपस्या करते हैं, सच्ची श्रद्धा रखते हैं, बता में समाधि लगाते हैं स्त्री और सतान नहीं रखते अथवा स्त्री और सतान रखते हैं और भान के भूखे हैं, और सन्यास ले लते हैं, वे गरने के बाद सूर्य की रश्मिो के मार्ग से शुद्ध हो पर मूर्य पे बीच से हो कर उम स्थान को प्राप्त होते है जहाँ उस अमर, अविनाशी, और नित्य पुम्प का निदास है। यहाँ इस पुरुष से हिरण्यगर्भ अभिप्रेत है अर्थात् महाभूतो वा अधिष्ठान । [११] परीक्ष्य लोकान् कर्मचितान् ब्राह्मणो निवेदमायान्, नास्त्यकृत' कृतेन । तद्विज्ञानार्य स गुरुमेवाभिगच्छेत् समित्पाणि थोनिय ब्रह्मनिष्ठम् ॥१२॥ अनु० याह्मण वर्मदाग प्राप्त लोगों की परीक्षा वर निवेद को प्राप्त हो जाय, [क्यो पि] वृत (पर्म) से अकृत (नित्य) [को प्राप्ति १ अकुत इमी अर्थ में छान्दोग्योपनिषद् - १३ में भी पाया है।

१३९ मुण्डकोपनियत सभव] नहीं। उस [नित्य का] परम ज्ञान प्राप्त करने के लिए हाथ मे समिधा ले कर श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ गुरु के ही पास जाना चाहिए । (१२) सि० अ०-जो कोई ब्रह्मवित अर्थात ज्ञानी होना चाहता है उसे चाहिए कि जाने कि समस्त कर्मों का फल ससीम है। अत उसे समस्त कर्मों वा त्याग कर देना चाहिए उन को कामना हृदय से दूर कर देनी चाहिए और जानना चाहिए कि कम इस पुरुष स उत्पन्न हैं। वे इसी कारण समाप्त हो जाते हैं और आमा सदा अपनी सता से नित्य और ध्रुव है तथा अज मा। [उमे] प्राप्त करने और स्वय वही हो जाने के लिए कम की अपेक्षा नहीं होती। उस की प्राप्ति का माग केवल ज्ञान है दूमरा माग नहीं। चाहिए कि नियत विधि से किमी गुरु के समक्ष उपस्थित होवे जो गुरु वेदज्ञ और ब्रह्मज्ञानी हो अर्थात ब्रह्मनिष्ठ श्रोनिय । [१२] येनाक्षर पुरुष उस पूर्णतया शान्तचित्त तस्मै स विद्वानुपसन्नाय, सम्यक प्रशान्तचित्ताय शमान्विताय वेद सत्य प्रोवाच ता तत्त्वतो ब्रह्मविद्याम् ॥१३॥ अनु०-वह विद्वान अपने समीप आये हुए जितेन्द्रिय [शिष्य को उस ब्रह्मविद्या का तत्त्वत उपदेश करे जिस से उस सत्य, अक्षर पुरुष का ज्ञान होता है । (१३) मि० अ०-उस गुरु को चाहिए कि वह जब शिष्य का सच्चा जिज्ञासु पाये और जाने कि उस की द्रियाँ उसके वश में है वह माधना और तपस्या का अभिमान और अहकार नहीं रखता और जैसे चाहिए उस प्रकार ब्रह्म की खोज में आपा हुआ है उस समय ब्रह्म विद्या का उपदेश बेशिसक पर और पुल वर बरे जिम से उस शाश्वत सत्ता की प्राप्ति होती है। पह है सच्चा भाग । [१३] ॥ इति द्वितीय खण्ड ।।

१४० ] सिरें अक्चर (फारसी) द्वितीयो मुण्डकः यन्ति ।।१॥ प्रथम खण्ड तदेतत् सत्य- यथा सुदीप्तात् पावकाद् विस्फुलिङ्गा सहस्रश प्रभवन्ते सरूपा । तथाक्षराद् विविधा सोम्य | भावा प्रजायन्ते तत्र चैवापि अनु०-वह यह सत्य है-जिस प्रकार अत्यन्त प्रदीप्त अग्नि से उसी के अनुरूप सहस्रो स्फुलिङ्ग (चिनगारियाँ) फूटते है, उसी प्रकार है सोम्य । अक्षर से विविध भाव (पदार्थ) जन्म लेते है और उसी में लीन भी हो जाते है । (१) सि० अ०-जिस प्रकार जो अग्नि अत्यधिक प्रज्वलित होती है उस अग्नि से सहस्रा चिनगारियाँ फूटती हैं और मभी प्रवाशा और वर्षों में यही अग्नि होती है, उसी प्रकार ह सोम्य | उस अक्षर अर्थान बव्यय पुष्प के सारे जीवात्मा अर्थात जीव प्रकट होते हैं और उसी भात्मतत्त्व म लीन हा जाते हैं । [१] दिन्यो, ह्यमूर्त पुरुप', सबाह्याभ्यन्तरो, ह्यज, अप्राणो, ह्यमना , शुभ्रो, ह्यक्षरात् परत पर ।।२।। अनु०-पुष्प निश्चय ही दिव्प, अमूर्त, वाहर-भीतर विद्यमान, अजन्मा, अप्राण, मन शून्य, विशुद्ध, एव परम अक्षर से भी परे है । (२) मि० अ०-वह गत्ता ज्यातिगंप है, वह मता अस्प है यह मत्ता सब के भीतर पुरुष है, वह मत्ता गनानन है अनुत्सप्न है उस सत्ता के बाद और आम्य तर इन्द्रियाँ नही हैं यह गना शुद्ध और मूम है, वह गत्ता हिरणगभ रा भी श्रेष्टनर है जिस । ममी वस्तु का उपन दिया है और वा मभी म बरिष्ट है। [२] एतस्माज् जायते प्राणो, मन , सर्वेन्द्रियाणि न, ख, वायुर्, ज्योतिराप पृथिवी विश्वस्य धारिणी ॥३॥ अनु०-दरा में प्राण उत्पन्न होता है, मन, समस्त इन्द्रिया, आकाश, बायु, तेज, जत, और सब यो धारण यरने वाली पृथ्वी । (३) १ मा 11.5'पुष तथा मीना क उत्तम पुरण (141) अथवा 'पुग्णातग' (1५14-16) मतुलनीय।

1 मुण्डकोपनिषद् [१४१ मि० अ०-वाह्य और आभ्यन्तर मभी इन्द्रियाँ जो प्राण और मन आदि हैं, भूनाकाश, वायु, अग्नि, जल, और लोका को धारण करने वाली पृथ्वी-सभी उसी सत्ता से उत्पन हुए हैं। [३] अग्निर् मूर्धा, चक्षुपी चन्द्रसूर्यो, दिश थोने, वाग् विवृताश् च वेदा, वायु. प्राणो, हृदय विश्वमस्य, पद्भया पृथिवी ह्येप सर्वभूतान्तरात्मा ॥४।। अनु-अग्नि इस का मस्तक है, चन्द्रमा और सूर्य नेन्न है, दिशाएँ कर्ण हैं, प्रसिद्ध वेद वाणी है, वायु प्राण है, विश्व हृदय है, पृथिवी इस के चरणो से [प्रकट हुई] क्यो नि वह समस्त भूतो का अन्तरात्मा है । (४) मि० अ०- सम्पूण जगत् उम वा रप है। सातवां लोक जो सब से ऊपर है उम का मस्तक है। सूय और चद्र उम की दोनो आँखें हैं । दिशाएँ उस के दोनों काग हैं। वेद गिन स सभी वस्तुओं का ज्ञान होता है उम की वाणी हैं। वायु उस का प्राण है, अर्थात् उस का श्वासोच्छवाम। सम्पूर्ण जगत उम का हृदय है। उस की मुपुप्तावस्या में सम्पूर्ण जगत नष्ट हो जाता है क्याकि सुषुप्ति सज्ञक निद्रा के समय मनुष्य का हृदय जो जगत के समान है जीवात्मा में लीन हो जाता है। पृथ्वी के साता तल उस के चरण है। वह सत्ता सब का प्राण है और प्राणा का प्राण है। उस सत्ता में ब्रह्माण्ड जो पूण पुरुष है और जिसे विराट पुरुष कहते हैं प्रकट हुआ। [४] तस्मादग्नि समिधो यस्य सूर्य, सौमात् पर्जन्य, ओपधय पृथिव्याम् । पुमान् रेत मिच्चति योपिताया, वही प्रजा पुस्पात् सम्प्रसूता ॥५॥ अनु०-उस म अग्नि [हुआ] जिस या समिधा सूर्य है, सोम से मेघ, और पृथिवी पर वनस्पति । पुरुष स्त्री म वीर्य सोचता है, [यह] बहुत-सी प्रजा पुरुष म उत्सन हुई है । (५) मि. म.-पांच विशिष अग्निमा जो स्वग बद्र पजन्य, पृथ्वी, और स्त्री-पुरुष हैं उस मे उत्पन्न हुई हैं। सूर्य प्रथम अग्नि है जो स्वर्ग रूप है और जिस रो सारी वनस्पति उदभून हो पर धरती पर उगनी है। पुरुष जारि वीयं मीचता है उसी मे उत्पन्न हुआ है। मार्ग प्रजाएं उमी मे उत्पन हुई हैं : [५] - १४२ - । सिर अश्वर (फारसी) तस्माद् ऋचः; साम; यजूंपि; दीक्षा; यज्ञाश् च सर्वे; कतवो; दक्षिणाश् च; सवत्सरश् च; यजमानश् च; लोकाः, सोमो यत्र पवते, यत्न सूर्यः' ॥६॥ अनु०-उस [पुरुष] से ऋचाएँ; साम; यजुः; दीक्षा; समस्त यज्ञ; क्रतु; दक्षिणा; सवत्सर; यजमान; और लोक, जहाँ चन्द्रमा तपता है, जहाँ सूर्य [तपता है-हुए] । (६) सि. २०-चारो वेद उमी से उत्पन्न हुए हैं। दीक्षा उसी में उत्पन्न हुई है। छोटे और बडे यज्ञ उसी मे उत्पन्न हुए हैं। दक्षिणाएं और इन अनुष्ठानो के प्रयोक्ताओं का काल-निर्धारण [अर्थात् कर्माग-वाल] उसी से उत्पन्न हुआ है । -जिन (कर्म-फलो के कारण स्वर्ग प्राप्त होता है वे उसी गे उत्पन्न हुए हैं। सूर्य और चन्द्र उसी के आदेश मे चलते हैं । [६] तस्माच् च देवा वहुधा सम्प्रगूताः, साध्या, मनुष्याः, पशवो, वयासि, प्राणापानौ, ग्रीहियवौ, तपश् च, श्रद्धा, सत्यं, ब्रह्मचर्य, विधिश् च 11७।। अनु०-उस से बहुत-रो देवता उत्पन्न हुए, तथा] साध्यगण, मनुप्य, पशु, पक्षी, प्राण-अपान, व्रीहि-यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्म, और विधि । (७) सि० अ०-भांति-भांति के देवता, भांति-भानि के मनुष्य, भांति-भांति के पशु, भौति-भांति से पक्षी, और भांति-भांति के वायु-प्राण, अपान, समान, ध्यान, और उदान-उमी में उत्पन्न हुए हैं। भांति-भांति के अन्न और तप, भांति-भौति की अदाएँ, धर्म, मत्य, त्याग, ब्रह्मचर्य, और विधि-निषेध [उसी मे उत्पन्न हुए हैं] | [] सप्त प्राणा.' प्रभवन्ति तस्मात्, सप्ताचिप, समिध., सप्त होमाः, सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहागया निहिताः सप्त ||८|| , 'पितृलोक' और 'देवला' हान्दोम्यापनितद् ५.१० में भी द्रष्टव्य तुलनीय १०८, प्रश्नोपनिषद ।। , मुण्डकोपनिषद् [ १४३ अनु०-उस से सात प्राण उत्पन्न होते है, सात अनिआँ (अग्निशिखाएँ) और समिधाएं, सात होम, [और] ये सात लोक जिन में गुहा में सात सात कर के स्थापित प्राण विचरण करते है । (८) सि० अ०–सप्तप्राण- दो नेत्र, दो श्रोन्न, दो प्राण, और एक मुखरन्ध्र- उसी से उत्पन हुए हैं और इन सातो को सात शक्तिओं उसी से उत्पन हुई हैं। सात वस्तुएँ जो इन सात शक्तिया से जानी जाती है और मात वस्तुएँ जिन का इन गात शक्तियो से ग्रहण होता है उन साता का अधिष्ठान जो सभी प्राणिया म [प्राप्त होता है] उसी से उत्पन हुआ है। इन्द्रियो से अपने-अपने विषय का ज्ञान होता है, किन्तु उन इन्द्रियो की शक्तिओ का अनुभव नहीं होता। स्वर्गलोक जिस म कम पल की प्राप्ति होती है उसी से उत्पन्न हुआ है । [6] अत. समुद्रा गिरयश् च सर्वे, ऽस्मात् स्यन्दन्ते सिन्धव सर्वरूपा , अतश् च सर्वा ओपधयो रसश् च, येनप भूतैस् तिष्ठते ह्यन्तरात्मा ॥९॥ अनु०-इस से समस्त समुद्र और पर्वत [प्रकट हुए] हैं, इस से सभी प्रकार की नदियां बहती है, इस से समस्त ओषधिओं और रस [प्रकट हुए.] हैं, जिस [रस] से यह अन्तरात्मा भूतो सहित स्थित है । (९) सिं० भ०-सातो महासमुद्र उसी म उत्पन हुए हैं छोटी और बडी गभी नदियाँ जप्ती से उत्पन्न हुई हैं पर्वत उमी से उत्पन्न हुए हैं मभी बनस्पतिमा उमी से उत्पन्न हुई हैं। दमी से जाना जाता है कि यद्यपि ये सभी वस्तुएँ उस से उत्पन्न हुई हैं, वह सर्वरूप है । [१] पुरुष' एवेद विश्व, कर्म, तपो, ब्रह्मपरामृतम् । एतद् यो वेद निहित गुहाया सोऽविद्यानन्यविकिरतीह सोम्य । ॥१०॥ अनु०-यह सब कर्म, तप, पर और अमृतस्य ब्रह्म पुरुष ही है। उसे जो गुहा मे निहित जानता है, हे सोम्य 1 वह इस लोक में अविद्या की ग्रन्थि को भङ्ग कर देता है । (१०) सि०अ०-यह मम्पूर्ण जगत् पुरुष ही है अर्थात् वह पुरुष सब म पूर्ण है। मभी कर्म और समरत तप यही है। वह साक्षात ब्रहा है। वह बहा राव री ज्येष्ठ और १मय २.११ की टिपणी एव्य।

१४४ ] सिरें अक्बर (फारसी) श्रेष्ठ है, और है मृत्यु रहित। इस ब्रह्म का जो कोई इस प्रकार जान लेता है कि वह मेरे हृदय म वर्तमान है, वह अपन अमान और. अविद्या की सभी प्रयिमो को खोल देता है । [१०] }! इति प्रथम खण्ड ॥ गुहा मे सवार द्वितीय खण्ड आवि , सनिहित, गुहाचर नाम महत्पदगनैतत् समर्पितम्, एजत्, प्राणन्, निमिपच् च यत् । एतज् जानथ सदसद्वरेण्य, पर विज्ञानाद्, यद् वरिष्ठ प्रजानाम् ।।१।।' अनु०-यह ब्रह्म प्रकाशस्वरूप, समीपस्थ, गुहाचर नाम वाला, और महत्पद है। यह जो चलता है, प्राणन करता है, और निमेपोन्मेप करता है इसी गे समर्पित है। तुम इसे जानो, जो सत् और असत् द्वारा वरण करने योग्य, प्रार्थनीय, विज्ञान से परे, और प्रजाओ मे सर्वोत्कृष्ट है । (१) मि०म०ह सोम्या वह प्रक्ट है, वह समीपतर है वह हृदय की करता है। ब्रह्म मे महान् कोई पद नहीं है। समस्त ससार म जो कुछ जगम, प्राणयान् और सजीव है वह उसी के भीतर है । उस सब स श्रेष्ठ समझना चाहिए। यह बुद्धि सभी वरिष्ठ है जिस स वस्तुभा या ज्ञान होता है। वही सब का मूल है । [१] यचिमद्, यदणुभ्योऽणु च यस्मॅिल्लोका निहिता लोकिनश् च, तदेतदक्षर ब्रह्म स प्राणस् तदु वाड्, मन । तदेतत् सत्य, तदमृत, तद् बेद्धव्य सोम्य । विद्धि ॥२॥ अनु०--तो दीप्तिमान् है अणु से भी अणु है, जिस में लोक और उन वे नियासी स्थित है, वह यह अक्षर ब्रह्म है। यही प्राण है, वही वाप और मन है। वही यह सत्य है, वह अमृत है। है सोम्य । उस पा [ध्यान द्वारा] वेधन होना चाहिए. तू वेधन पर । (२) गि अ-वह प्रराशपाप है। वह गुम्मो में मूक्ष्मतर है। सम्पूर्ण जगत् और जगत् में जो कुछ है पह मब उम के भीतर है। वह असार सना है यहा है, प्राण है, पाणी है, मन है, कार और गत्य है धमर है। र गोग्य ! यही मनोमाय रा सत्य है । तू उगीको आा मन या पक्ष्य बना। [२] तुलनीय--अावेद १९८६ [ १४५ मुण्डकोपनिपत धनुर गृहीत्वोपनिषद महास्व शर ह्युपासानिशित सन्ध्रयीत । तद्भावगतेन चेतसा लक्ष्य तदेवाक्षर सोम्य । आयम्य विद्धि ॥३॥ अनु०-हे सोम्य । महान अस्त्र उपनिपद रूपी धनुष् ले कर [उस पर] उपासना द्वारा तीक्ष्ण किया हुआ बाण चढा । उसे पाचकर ब्रह्मभावानुगत चित्त से उसो अक्षररूप लक्ष्य का वेधन कर । (३) सि०अ०-उपनिषदा को जो कि अद्वत वाक्य हैं धनुष बना कर उपासना का वाण उस पर सधान पर के उमे मन को शक्ति मे सीच पर जो उस का अभिलापी है और पिगी अय की ओर चलायमान नहीं है उस अक्षर सत्ता की ओर ले जाजो तेरी माधना का लक्ष्य है। [३] प्रणवो धनु शरो ह्यात्मा ब्रह्म तल् लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तन वेद्धव्य शरवत् त मयो भवेत् ॥४॥ अनु०-प्रणय धनुप आत्मा याण और ब्रह्म उस का लक्ष्य कहा जाता है । उस का सावधान हो कर वधन करना चाहिए [और] बाण के समान तमय हो जाना चाहिए । (४) गि अ.हे मोम्य मोम को धनुष बना कर जीवा मा को नीर बना कर और ब्रह्म को लक्ष्य बना कर समाहित और गावधान हो कर उग बाण के समान जो राक्ष्य को वैध देता है जीवा मा को ब्रह्म म प्रविष्ट करा ताकि तू स्वय लक्ष्य बन जाय । यह बुद्धि का नभ्य नहीं है कि चूर की आशका हो। यह वह लक्ष्य है जो सवन पूण है और जिस मे च की आशका नहीं जीवामा ऐसा वाश है जिस में प्रयेक दिशा में लक्ष्य साधा जा सकता है और वह जिधर भी पडता है उसी तक पहुचता है। दाण का मधान करने वाला भी स्वय सदन विद्यमान है। अत यह शका न कर । जहाँ इस प्रकार का धनुप इस प्रकार का वाण इस प्रकार का लक्ष्य और इस प्रकार का बाण करने वाला होता है वहां चक जाना सभव नहीं। ऋग्वेद को धनुष कर के यजुर्वेद दो भाग कर के और सामवेद को प्रयचा कर व सामवेद का गायन करते हुए मह्म को लक्ष्य बनाये जो ब्रह्म वेस्वरूप प्रकाशमान और शुद्ध है। [४] १४६ ] सिरे अक्यर (फारसी) यस्मिन् द्यौः, पृथिवी, चान्तरिक्ष- मोत मनः सह प्राणेश् च सर्वैः तमेवैक आत्मानमन्या वाचो विमुञ्चथामृतस्यैव सेतुः ॥५॥ जानथ अनु०-जिस मे द्युलोक, पृथिवी, अन्तरिक्ष, और समस्त प्राणो सहित मन ओतप्रोत है उसी एक आत्मा को जानो, अन्य बातो को छोड दो; यह अमृत (मोक्ष) का ही सेतु है । (५) मि० अ०-स्वर्ग, भूमि, अन्तरिक्षा, और मन ममस्त इन्द्रियो के साथ उस की मसी की डोर रो खिचे हुए है, जिग प्रकार मोती के दाने एक ही धागे मे ओतप्रोत होते हैं। उस एक धागे को आरमा जानो और शेष सभी बातें त्याग दो। वह आत्मा मुक्ति का सेतु है। [५] अरा इव रथनाभी संहता यत्र नाडय., स एपोऽन्तश् चरते बहुधा जायमानः । ओमित्येवं ध्यायथ स्वस्ति व पाराय तमस. परस्तात् ॥६॥ . आत्मानं, - अनु०-रथचक्र पी नाभि में अरों के समान जहाँ नाडियां जुड़ती हैं उसके भीतर यह विविध रूपो में उत्पन्न होने वाला [आत्मा) संचार परता है। आत्मा का 'ॐ' इस प्रकार ध्यान करो। अन्धवार (अज्ञान) पार करने में तुम्हारा रल्याण हो । (६) मि.-निम प्रकार रथ को नाभि में भी अरे मुदा होने है उसी प्रपार जो नाही हृदपनामा म प्रविष्ट होती है और जिस से माडियां जुड़ी होती है उस हदय चीन जिम रूप में चाह वह आत्मा विचरण करता है। उनी आत्मा को और जान र उपागना मगे, योनि वह तुम्हारे लिए अशान रे मागर गे पार कराने में मगारम] . मुण्डकोपनिषद् [१४७ य. सर्वज्ञ. सर्वविद्, यस्यैप महिमा भुवि, दिव्ये ब्रह्मपुरे' होप व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठित । मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोऽन्ने हृदयं सन्निधाय । तद् विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीरा आनन्दरुपममृत यद् विभाति ।।७।। अनु०-जो सर्वज्ञ और सर्ववित् है, जिस की यह महिमा पृथ्वी पर [स्थित] है, वह यह आमा दिव्य ग्रह्मपुर आकाश में प्रतिष्ठित है। वह मनोमय, प्राण और शरीर को ले जाने वाला पुरुष हृदय या आथय पर अन्न (अन्नमय देह) में स्थित है। धीरजन विज्ञान द्वारा उस का सम्यम् साक्षात्कार करते है जो आनन्दस्वरूप अमृत ब्रह्म प्रवाशित हो रहा है।(७) सि० अ०-वह सदन है और यह सब या प्रापर है। उग की महिमा पृथ्वी पर है. आपाग में है, और ब्रह्मपुर मे है--ब्रह्मपुर अपात मानव शगेर जो ब्रह्मनगर है और परम शान से उद्भासित है। उस रध्र में जो हृदय वे भीतर है आत्मा का निवाम है। उमीको उपामना करो। वह मात्मा मन के साथ पन बना हुआ है। वही शरीर और उसकी इन्द्रियो का गनिमान करता है। इम शरीर म जो अन्न स्वरूप है वह ममीपस्य हो कर बर्नमान है। जो ज्ञानी इन्द्रियो पर यश प्राप्त कर सत्रे हैं वे उसे पुद्धि से प्रमाण से देखते है। यह मारमा भानन्द स्यरूप है, अगर है, प्रद - भिद्यते हृदयमन्धिश्, छिद्यन्ते सर्वसशया, क्षीयन्ते चास्य वार्माणि तस्मिन् दृप्टे पगवरे || अनु०-उस पर और अवर (पारणगर्यप ब्रह्म) का माशालार हो जाने पर हृदय-प्रन्थि टूट जाती है, सारे सशय नष्ट हो जाते हैं, और इस [जीय] ये पमं शीण हो जाते हैं । (८) हान्दाग्योपनिाद ८११ २ राशिकोहने यस मोहोर एमए मत्र परिवारमा से है। सानुसार आगे भयो । साया मेक मदिरोगी को, बिस्नु मी मनुवारक मे उमेरलिया है।

१४८] सिरे प्रकार (फारसी) मि० अ०-उम वे दर्शन मे हुस्य पी ग्रन्धिआं खुल जाती है, सारे संशय दूर हो जाते हैं, और पुण्य-कर्म और पाप-कर्म उस मे दूर हो जाते हैं । [-] - हिरण्मये परे कोशे विरज ब्रह्म निष्कलम् ।' तच्छू भ्र ज्योतिषा ज्योतिस्,तद् यदात्मविदो विदुः ॥९॥ अनु०-निर्मल और निरश ब्रह्म हिरण्यमय (ज्योतिर्मय) परम कोश मे [विद्यमान है। वह शुद्ध, ज्योतिओ की ज्योति है। वह है जिसे आत्मज्ञानी पुस्प जागते है । (९) मि० अ०-निविशेषता में, यह निविशेषों में निर्विशेगतम है और, मविशेषता में, वह सविशेषों मे सविशेषतम है। ब्रह्म शुद्ध और पवित्र है, क्लायुक्त नहीं है, और इतना ज्योतिर्मय है कि यह ज्योतिआ की ज्योति है और इतना प्रकाशमान है वि पह प्रकाशो मा प्रकाश है। जो लोग विज्ञानमय छोय म जो नि ज्योतिष्मान है उस ग्रह्म को आत्मा जानते हैं अर्थात् जीवात्मा और आत्मा को एप जानते है केही उरो जानते हैं। [१] 1 न तत सूर्यो भाति, न चन्द्रतारक, नेमा विद्युतो भान्ति; कुतोऽयमग्निः ? तमेव भान्तमनुभाति सर्व, तस्या भासा सर्वमिद विभाति ॥१०॥ अनु०-वहां न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा या तारे । [यहाँ ] ये विजलियाँ भी नहीं नमपती, फिर यह यग्नि पिस गिनती मे है ? उस के प्राशित होने से ही सब प्रपाशित होता है और यह सब मुछ उसी के प्रकाश से प्रकाशमान है । (१०) सि०अ०-गूर्य, चन्द्र, तागपण, विशुन, और अग्नि में प्रबाश उमप्रकाश मो मही पागरते। उमीने प्रयाश में ये गय प्रकाशित है। मारे मनाए उगी, है, गूर्य और चन्द्र उग ता नही पहुंच मा, वायु उम ता नही पहन मक्ती, देवता उग त नही पहुँच बन। उग ना सा उपागना द्वारा पहुंचा जा सकता है। अन्य किसी भी मागे उसे नी पाया जा गाना। वह ममी गहाभूतो मा उत्पादन है, यह अपने ही प्रभाग गे पागिन है. या और मुहै। [10] १ ठानिन ... भावनानि ।

मुण्डकोपनिषद [ १४९ ब्रह्मवेदममृत पुरस्ताद्, ब्रह्म पश्चाद्, ब्रह्म दक्षिणतश् चोत्तरेण, अधश् चोर्ध्व च प्रसृत प्रौवेद विश्वमिद वरिप्ठम् ॥११॥ अनु०-यह अमृत ब्रह्म ही आगे है, ब्रह्म ही पीछे है ब्रह्म हो दायी वायी ओर है नीचे ऊपर फैला हुआ यह विश्व सर्वश्रेष्ठ ब्रह्म ही है 1(११) मि० अ० जो निखायी दता है वह ब्रह्म ही है। वह ब्रह्म अगर है वह आगे है वह पीछ है यह बात है वह दाएँ है वह ऊपर है वह नीच है वह सबन्न पूण है । कुछ दिखायी देता है वही परब्रह्म है । [११] ॥ इति द्वितीय खण्ड ॥ । तृतीयो मुण्डकः प्रथम खण्ड द्वा सुपर्णा संयुजा सखाया समान चक्ष परि पस्वजाते । तयोरन्य पिप्पल स्वाद्वत्त्य- नश्ननन्यो अभिचाकशीति ॥१॥ अनु०-साथ-साथ रहने वाल दा पक्षी सखा एक ही वृक्ष वा आश्रय पर के रहते है। उन ग एक तो स्वादिष्ट पिण्यल (षमफल) का भोग करता है और दूसरा भोग न कर के येवत देखता रहता मि० अ०-दो मुटर पक्षी है। वे दोना सा गाथ रहत हैं और एर गरे सखा है। वे एक पर निवाग क्ले हैं। उन म म एक उमारे पन को स्वादिय समग कर पाता है और दूगरा कुछ नही याता और इप्टा मात्र है। इन पो पक्षियो ग जिन म म ब या है और दुमरा मग बाटा और द्रण मात्र है ताताय यह है कि जो गाता है वह जीवात्मा है और जो नहीं माना और प्यमान है वह परमात्मा है। काम गरीर अमित और पतग निगम्यादिष्ट समर खाता है वमपन। [१] अवताश्वतरापनिषद ४६, कछ पनि 1.47 मीटिभी ट्राय १कावर.६४२० सयक्ष ।

१५० ] सिरे अक्वर (फारसी) समाने वृक्षे ' पुरुषो निमग्नो अनीशया शोचति मुह्यमानः । जुष्ट यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोकः ॥२॥ अनु०-[ईश्वर के साथ] एक ही वृक्ष से सलग्न जीव दीनता के कारण मोहित हो कर शोक वारता है । वह जिस समय अपने से भिन्न आनन्दस्वरूप ईश्वर और उस की महिमा को देखता है उस समय शोक- रहित हो जाता है । (२) सि. म.-वह पक्षी जो उस वृक्ष का फल खाता है अज्ञान के कारण अपने ही स्वभाव से अवगत नहीं है। वह इसी कारण शोक और दुख में है। जब वह उस पक्षी के तत्व को समझ लेता है जो कुछ नहीं खाता और कौतुक देखता है तो वह भी भोग से विरक्त हो जाता है और उसी में ममान हो जाता है। अर्थात् यह कर्म के वधन से मुक्त, गोक-रहित, और दुःख रहित हो जाता है। [२] - यदा पश्य. पश्यते रुक्मवर्ण, कर्तारमीश, पुरुप, ब्रह्मयोनिम्, तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय' निरज्जन परम साम्यमुपैति ॥३॥ अनु०-जिस समय द्रप्टा स्वर्णाभ जगत्कर्ता, ईश्वर, गुरुप, सर्वयोनि- स्वस्प को देखना है उस समय वह विद्वान् पाप पुण्य दोनो को त्याग कर निर्मल हो अत्यन्त गम भाव को प्राप्त हो जाता है। (३) मि० 40-जिस समय जीवा मा ज्ञानी हा जाता है उस समय आत्मा यो ऐसा दयता है कि वह पारमा रवषप्रवाश है मय रा उत्पादन है, पर या स्वामी है, गवंत्र पूर्ण है, गौर हिरण्यगम उसी । उतान हुआ है। जिग समय वह उसे इस प्रकार जान लता है का मानी शुभ और अशुभ कर्मों के पन का रयाग कर उस पपिन आमा से एकीभूत हो जाता है। [३] वारतर्गपति मामा ६१८ र ग्रादि से यहोर पाया जाता है।

. ? मुण्डकोपनिपद् [१५१ प्राणो ह्येप य. सर्वभूतैर् विभाति, 52796 विजानन् विद्वान् भवते नातिवादी । आत्मक्रीड', आत्मरति , क्रियावा- नेष ब्रह्मविदा वरिष्ठ ॥४॥ अनु०-यह प्राण है जो सम्पूर्ण भूतो के रूप में भासमान हो रहा है। [इसे] जान कर विद्वान् अतिवादी ( (बकवास करने वाला) नहीं होता। यह आत्मा में क्रीडा करने वाला, आत्मा में रमण करने वाला, क्रियावान् पुरुप ब्रह्मवेत्ताओ में श्रेष्ठतम है। (४) सि० अ०-वह प्राणो का प्राण है, वह सभी भूतो म भासमान है। जो कोई उसे जान लेता है वह ज्ञानी और यहाज हो जाता है। वह प्राज्ञ जो कुछ बोलता है उस के सम्बन्ध मे कहा जाता है कि वह अधिव नही बोलता। क्यो कि वह वहा की बात बोलता है। सब कुछ ब्रह्म मे है और ब्रह्म सब से महान है। वह ब्रह्मवित और ज्ञानो केमा है ? वह सदा आत्मा मे रमण करने वाला है, वह अपने आप से पीडा करने वाला और आनदिन होने वाला । वह अपना मित्र आप है। यदि यह वर्म और उगमना भी यदृच्छापूर्वक करता है तो वह ज्ञानियों और महान् ब्रह्म- वादियों के बीच महान होना है । [४] सत्येन लभ्यस् तपसा ह्येप आत्मा, सम्यग्ज्ञानेन, ब्रह्मचर्येण नित्यम्, अन्त शरीरे ज्योतिर्मयो हि शुभ्रो पश्यन्ति यतय क्षीणदोपा ॥५॥ अनु०-यह आत्मा सर्वदा सत्य, तप, सम्यक् ज्ञान, और ब्रह्मचर्य द्वारा प्राप्त किया जा सरता है। जिसे दोपहीन योगिजन देखते हैं वह ज्योतिर्मय शुभ्र आत्मा शरीर के भीतर रहता है । (५) मि० अ०--जम आत्मा की प्राप्ति मार्ग यही गत्म, तप, और उस का गभ्यन् ज्ञान है, तथा बाह्य भोगो से विरक्ति भी। [ज्ञानी] अपने इमी शरीर में सदा उस आत्मा को देखता है जो ज्योतिर्मय है। जो लोग सभी दोपो और दुटियो मै मुक्त हो गये हैं वै ज्ञानी ही देखते है । [५] १ छान्दोग्योपनिषद् ७ ५५.२ य जयति, १५२] सिरे अबसर (पारसी) सत्यमेव नानृत, सत्येन पन्था विततो देवयान , येनाक्रमन्त्यूपयो ह्याप्तकामा यन्न तत् सत्यस्य परम निधानम् ॥६॥ अनु०-मत्य ही विजयी होता है, मिथ्या नही, सत्य से देवयान' मार्ग का विस्तार हुआ है, जिन के द्वारा आप्तवाम ऋषिगण उस पद को प्राप्त करते हैं जहां वह स य का परम निधान [वर्तमान ] है । (६) मि० अ०–जा सत्यनिष्ठ है वहीं विजय प्राप्त करना है जो सत्यनिष्ट नही है वह विजय नहीं प्राप्त करता। जिन मार्ग म उम तक पहुँचने हैं वह माग भी गत्य है। जिन नानिया की बाइ सामना शेप नहीं रह गयी है वे इमी समाग स उस तर पचने हैं। यहाँ सप रा भागर है और वहां मस्स भरा हुआ है। [६] वृहच् च तद्, दिव्यमचिन्त्यस्प, सूक्ष्माच् च तत् सूक्ष्मतर विभाति । दूरात् सुदूरे, तदिहान्तिपे च, पश्यत्स्विहैव निहित गुहायाम् ॥७॥ अनु०-वह महान, दिव्य, अचिन्त्यरूप, और सूक्ष्म से भी मूक्ष्मतर भासमान होता है। [व] दूर से भी दूर और इस पारीर ग अत्यन्त समीप भी है। [वह] चेनम प्राणियों म इम शरीर के भीतर उन की बुद्धिस्प गुहा म निहित है । (७) मि. अवह महान है और अपने हीयवाागे राति । विचार म नही नाता । Tir वह गूमा ग भी मूमनर है अत यह दृष्टि म नहीं आना। ब' दूर रा भी दावा है और ममीप से ममी म भी गमापर। मानिया * तिा यह दूर म भी दूर है और नातिया के लिए वह ममीर में भी गमीपतर । बह अपनी हृदयपुग म यिायो दना है। [] न चक्षुषा गृह्यो, नापि वाचा, नायर दवम्, तपसा, कर्मणा वा। मानप्रमादेन विगुद्धगत्वन, ततम्, तु त पश्यते निप्पर ध्यायमान ॥८॥ १६पान' और 'रिपानरे सम्म ध मे प्रानोनिगरिमोदय है। उस का स्वरूप

निष्फल [आत्मतत्त्व
। मुण्डकोपनिषद
[ १५३
" अनु०-[यह आत्मा] न नेत्र से ग्रहण किया जाता है, न वाणी से,
न अन्य इन्द्रियो से, और न तप अथवा कर्म से ही। ज्ञान के प्रसाद से
पुरुष] विशुद्धनित हो जाता है, और तभी वह ध्यानावस्थित होकर उस
का साक्षात्कार करता है। (८)
सि० अ०---उसे चक्षु में नहीं दे जा सकता, उम का गुणगान वाणी से नही
दिया जा सकता, उस विगी भी इदिय स नही प्राप्त किया जा सकता उमे वप और
रम मे नहीं प्राप्त किया जा सकता उसे विशुद्ध ज्ञान और कैवल्य में प्राप्त किया जा
मरता है। जिन ने गन गान और ब्रह्मनिष्ठा ग शुद्ध और प्रकाशयुक्त हो गये हैं,
ऐसे ही मन से जय बे उम सता का ध्यान करते है जो क्लाभी से रहित है और
मुक्त,
, सभी वे उसे देखते है । [-]
दैतभाव से
एपोऽणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो,
यस्मिन् प्राण
पञ्चधा सविवेश।
प्राणेश् चित्त सर्वमोत प्रजाना
यस्मिन् विशुद्धे विभवत्येप आत्मा ॥९॥
अनु०-यह सूक्ष्म आत्मा, जिम [शरीर] में प्राण पाच प्रकार से
प्रविष्ट है [उस शरीर के भीतर] विज्ञान द्वारा जानने योग्य है। प्राण
द्वारा प्रजाओ का समस्त चित व्याप्त है जिस ये शुद्ध हो गाने पर यह
आत्मा प्रकाशित हो जाता है । (९)
FAO अ-उस मू"म आत्मा यो मुद मन के अतिरिक्त अप रिमो गायन में
जाना नहीं जा राना। उस शुद्ध मन मे जाकिम शरीर रहनाना है पांच प्राम-
प्राण, अपान, ध्यान, उदान और गमान-होते हैं और सभी इंद्रियां होती हैं। ये सब
उस मन धागे में
जब वह मन शुद्ध हो जाता है तो आमा हो पाता
है और अपने स्वामी को प्रवट पर देता है। [१]
यय लोग
मनसा सविभाति
विशुद्धसत्त्व कामयते याश् च पामान्
त त लो. जयते ताश् च कामास्,
तस्मादात्मज्ञ हायेद् भूनिवाम ॥१०॥

१५४ ] सिरे अक्बर (फारसी) अनु०-विशुद्धचित्त [आत्मवेत्ता] मन से जिस-जिस लोक की भावना करता है और जिन-जिन भोगो की कामना करता है वह उसो-उसी लोक और उन्ही-उन्ही भोगो को जीतता है। इसलिए ऐश्वयं की कामना रखने वाला [पुरुप] आत्मज्ञानी की पूजा करे। (१०) मि०म०-~इम शुद्ध मन सी विशेपता है कि वह जिस लोक की इच्छा करता है और जिम घस्तु की कामना करता है उसे प्राप्त कर लेता है। अत यदि वह आत्मा की इच्छा करे तो आत्मा को गयो न प्राप्त करे, जब कि सभी इन्छाएँ आरमा में निहित हैं ? जो कोई सासारिक ऐश्वर्य और पारलौकिक कल्याण चाहे वह ज्ञानी और यती की इसी प्रकार उपासना कर । [१०] ॥ इति प्रथम खण्ड ।। उपासते पुरुष द्वितीयः खण्डः स वेदैतत् परम ब्रह्म धाम यत्र विश्व निहित भाति शुभ्रम् । ये ह्यकामास् ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति धीरा. ॥१॥ अनु०-यह (आत्मवेत्ता) इस परम ब्रह्मधाम वो जानता है जिस में यह समस्त जगत् निहित हो कर उज्ज्वल रूप से भासमान हो रहा है। जो निकामभाव से उस पुरुष की उपासना करते हैं, वे [शरीर के वीजभूत] इस वीयं का अतित्रमण कर जाते हैं । (१) मि० अ०-जो मोई इस मन को ब्रह्म का घाम और इम धाम की मासात् ब्रह्म जानता है वह यह भी जानना है कि गारी इन्छाएँ, कामनाएँ, और अभिलाषाएँ क्ष्मी पाम म है, गमन सोर इमो घाम म है, उसी र प्रमाण में ममम्प्त लोष दृश्यमान है. और उमी में प्रकाश गमन सोर पवित्र दिखायी देत है। जो पोई इस प्रकार उमछा-रति और वामना रहित मारमा की उपासना मला है वह भरीर के वचन से मुसहा जाता है। [१] मुण्डकोपनिषद् [१५५ कामान् य. कामयते मन्यमानः स कामभिर् जायते तव तना पर्याप्तकामस्य कृतात्मनस् त्वि- हैव सर्वे प्रविलीयन्ति कामा. ॥२॥ अनु०-जो [भोगो का] चिन्तन करने वाला पुरुष भोगो की कामना करता है वह उन कामनाओ द्वारा वहाँ-वहाँ (उन की प्राप्ति के स्थानो मे) उत्पन्न होता रहता है। परन्तु जिस की कामनाएं पूर्ण हो गयी है उस वृत्तवृत्य पुरुष की तो सभी वामनाएं यही विलीन हो जाती हैं । (२) सि० अ०-जो कोई इच्छा और कामना के लिए उपासना करता है वह इच्छा और वामना प्राप्त करता है और जिम ने भी इच्छा रहित हो कर और निष्काम भाव से उपासना की है उम मे सभी इच्छाएँ लीन हो जाती हैं, क्योंकि उमे इच्छा आत्मा को है, उसे कोई अन्य इच्छा नही रह गयी है । [२] बहुना श्रुतेन । नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो, न मेधया, न यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्, तस्यप आत्मा विवृणुते तनु स्वाम् ॥३॥' अनु०-यह आत्मा न तो [शास्त्र के प्रवचन से प्राप्त होने योग्य है, न मेधा (धारणाशक्ति) से, [और न] अधिव पाण्डित्य से । यह जिस का वरग करता है उसी द्वारा इस की प्राप्ति हो सकती है। उस के प्रति यह आत्मा अपने स्वरूप को व्यक्त घर देता है । (३) सि० अ०--उग आत्मा को ब्रह्मविद्या के विना अधिव प्रवचन में प्राप्त नहीं विषा जा सरना, ब्रह्मशान के अतिरिक्त श्मिी अन्य ज्ञान से प्राप्त नहीं किया जा सवता, ब्रह्म के प्रवण के अतिरिक्त रिसी अन्य के पक्षण म उसे प्राप्त नही रिया जा गवता। वह जिम पाहना है अपने स्वरूप को उग पर प्रकट र देता है। जिम १६० पनिषद् १.२.२३

F-
-
१५६ ]
सिर अक्सर (फारसी)
शक्ति, ब्रह्मनिष्ठा, और ज्ञान नहीं है, जिस ने अपना मन भन्न बस्तुभा म लगा रखा है,
और जो साधना और उपासना की विधि नहीं जानता मह आत्मा को नहीं प्राप्त
करता । [३]
नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो,
न च प्रमादात्, तपसो वाऽप्यलिङ्गात् ।
एतरुपायर् यतते यस् तु विद्वास्
तस्यैप आत्मा विशते ब्रह्मधाम ॥४॥
अनु०-यह आत्मा बलहीन पुरष को प्राप्त नहीं हो सकत्ता, और न
प्रमाद से अथवा लिङ्ग (सन्यास) रहित तपस्या से। परन्तु जो विद्वान्
इन उपायों से प्रयत्न करता है उस का यह आत्मा ब्रह्मधाम में प्रविष्ट हो
जाता है । (४)
मि० अ०~-जिस ब्रह्म की शक्ति और ज्ञान है वह उस धाम म जो ब्रह्म घाम है
प्रवेश करता है और माक्षात वही हो जाता है । [४]
सप्प्राप्यनमृपयो ज्ञानतृप्ता
कृतात्मानो वीतरागा प्रशान्ता ।
ते सर्वग सर्वत प्राप्य धीरा
युक्तात्मान
सर्वमेवाविशन्ति ॥ur
अनु०-दसे प्राप्त कर ऋषिगण ज्ञानतृप्त, कृतकृत्य, विरक्त, और
प्रशान्त हो जाते हैं। वे धीर पुरुष उस सर्वगत [ब्रह्म] को सब ओर
प्राप्त कर समाहितचित्त हो सर्वरूप ब्रह्म म ही प्रवेश कर जाते है । (५)
सि०अ०भी ज्ञानी और यती उर्म प्राप्त कर के ब्रह्मनिष्ठा और ज्ञान से
तृप्त हो जाते हैं और जानने और समयन लगत हैं कि हमार लिए कुछ भी करणीय
शेप नहीं है जिसे हम करें। इस कारण वे विरक्त हो जाने हैं जान हो जाते हैं
देशानी जम, राज्याणी सता को गढ में पादर. राइस्प हो जान हैं। [५]
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्था
सन्यासयोगाद् यतय
शुद्धसत्त्वा ।
ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले
परामृता परिमुच्यन्ति सर्वे ॥६॥

[ १५७ मुण्डकोपनिपद् अनु०-जिन्हो ने वेदान्त के विज्ञान से अर्थ का अच्छी तरह निश्चय कर लिया है वे सन्यासयोग से यत्न करने वाले शुद्धचित्त पुरुष ब्रह्मलोक मे देहत्याग करते समय परम अमरभाव को प्राप्त हो सव ओर से मुक्त हो जाते हैं। (६) 1 सि० अ०-उन्हो ने उपनिपदो और ब्रह्मवाक्यो रो निर्णय कर लिया है और समझ लिया है कि आरमा सत् है और अनात्मा का ज्ञान मिथ्या है। जिन्हो ने भिक्षु. वृति, सन्यास, त्याग, और ब्रह्मचर्य धारण कर लिया है उन्हो ने तप से अपने को शुद्ध कर लिया है। वे उपासना मे रत है। जब ने इस लोक से उस ब्रह्मलोक को प्राप्त करते है तो उस लोक मे ब्रह्मा के साथ रह कर जब ब्रह्मा मुक्त हो जाता है तो वे भी मुक्त हो जाते है । [६] . गता: कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा, देवाश् च सर्वे प्रतिदेवतासु । 'कर्माणि विज्ञानमयश् च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति ॥७॥ : अनु०--पन्द्रह कलाएँ (देहारम्भक तत्त्व) अपने आश्रयो मे स्थित हो 'जाती हैं, समस्त देवगण (इन्द्रियाँ) अपने प्रतिदेवता (आदित्यादि) मे लीन हो जाते है। कर्म और विज्ञानमय आत्मा सब परम अव्यय [पुरुष] मे एकीभाव को प्राप्त हो जाते है। (७) सिं० अ०-ज्ञानी और ब्रह्मवित् जब शरीर छोडता है और उस की सभी इन्द्रियाँ और कलाएं अपने देवताओ को प्राप्त हो जाती हैं तो वह शुभ और अशुभ कर्म का फल नही जो स्वर्ग या नरक प्राप्त कराये, बल्कि उस का जीवात्मा अव्यय परमात्मा के माथ एकीभूत जाता है । [७] यथा नद्य स्यन्दमानाः समुद्रे- ऽस्त गच्छन्ति नामरूये विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद् विमुक्त परात्पर पुरुषमुपति दिव्यम् ।।८।। १. तुलनीय प्रश्नापनिषद् ६५ १५] सिर अवघर (फारसी) अनु०-जिस प्रकार वहती हुई नदियाँ अपने नाम-रूप को त्याग कर रामुद्र में अस्त हो जाती है, उसी प्रकार विद्वान् नाम-रूप से मुक्त हो कर परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त हो जाता है। (८) सि.अ.-जिस प्रकार नदियां यात्रा कर के और नाम-रूप त्याग कर महासागर के साथ एकीभूत हो जाती है उसी प्रकार ज्ञानी और ब्रह्मवित् अपने नाम-रूप को त्याग कर परात्पर पुरुष को प्राप्त कर लेते है। यह परात्पर पुरुष अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है, सर्वगत है, और सर्वव्यापक है। [] स यो ह वै तत् परम ब्रह्म वेद ब्राँव भवति,' नास्या- ब्रह्मवित् कुले भवति; तरति शोक, तरति पाप्मान, गुहाग्रन्थिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥९॥ अनु०--जो कोई उस परब्रह्म को जान लेता है वह ब्रह्म ही हो जाता है, उस के कुल में कोई अब्रह्मवित् नही होता, वह शोक को तर जाता है, पाप को पार कर लेता है, हृदयग्रन्यिो से विमुक्त हो कर अमर हो जाता है। (९) सि०अ०-जो कोई उस ब्रह्म को जान लेता है ब्रह्म हो जाता है। अर्थात् जो कोई ईश्वर को जान लेता है ईश्वर हो जाता है। उस के कुल मे कोई ज्ञान और अवगति से रहित नहीं होता। वह शोक, दुख, और कामना के समुद्र और कर्मों के समुद को तर कर और अपन हृदय की ग्रन्थिआ मे मुक्त हो कर अमरत्व प्राप्त कर लेता है । [२] तदेतद् ऋचाऽभ्युक्तम्- क्रियावन्त , श्रोत्रिया, ब्रह्मनिष्ठा., स्वय जुह्वत एकपि' श्रद्धयन्त तेषामेवैपा ब्रह्मविद्या वदेत, शिरोव्रत विधिवद् यस् तु चीर्णम् ॥१०॥ २ सिरे अस्वर' के लातीनी अनुवाद के वर्ता आटिल टुपेरान ने इस बार की उपनिषदों का सार बतलाया जा सर्वया समीचीन है। २. तुलनीय प्रश्नापनिषद् ०११ मुण्डकोपनिषद् [ १५१ अनु०-यही [वात] ऋचा ने भी कही है-जो [अधिकारी] निया- वान्, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, और स्वय श्रद्धापूर्वक एकपि [नामक अग्नि ] मे हवन करने वाले हैं तथा जिन्हो ने विधिपूर्वक शिरोव्रत का अनुष्ठान किया है उन्ही से यह ब्रह्मविद्या कहनी चाहिए। (१०) सिक अ.--यह विद्या उन्ही से कहनी चाहिए, उन्ही को समझानी चाहिए गिही ने वेद में प्रतिपादित कर्मों का अनुष्ठान किया है जो वेदाथ को समझते हैं और ब्रह्मनिष्ठ हैं। किसी अय से [यह विद्या) नही कहनी चाहिए। [१०] तदेतत् सत्यमृपिरङ्गिरा पुरोवाच । नैतदचीर्णवतोऽधीते । नम परमऋषिभ्यो, नम परमऋषिभ्य ॥११।। अनु०-उस इस सत्य का पूर्व काल में अगिरा ऋषि ने उपदेश किया था। जिस ने शिरोव्रत का अनुष्ठान नही किया वह इस का अध्ययन नही कर सकता । परिमषियो को नमस्कार । परमर्पियो को नमस्कार।। (११) सि० अ०-अपीश्वर अगिरा ने अपने शिष्य से ब्रह्म विद्या को इसी प्रकार कहा और रामशाया, और कहा कि जिले घेद में श्रद्धा नही उस से यह विद्या नहीं पहनी चाहिए । [११] शानियो को नमस्कार। शानियो को नमस्कार। अर्थात ब्रह्मवेताओ का शुभ हो । ब्रह्मवेताओ का शुभ हो । ॥ इति द्वितीय खण्ड ।। समाप्त हुई अथर्ववेदीया मुण्डकोपनिषद् कर्णभि शृणुयाम देवा | भद्र पश्येमाक्षभिर् यजत्रा, स्थिरैरङ्गम् तुष्ट वासस् तनूभिर् व्यशेम देवहित यदायु । स्वस्ति न इन्द्रो' वृद्धश्रवा , स्वस्ति न पूपा विश्ववेदा , स्वस्ति नुस् ताक्ष्यो अरिष्टनेमि , स्वस्ति नो बृहस्पतिर् दधातु । ॐ शान्ति । शान्तिः ।। शान्ति ।।। ॥ इति मुण्डकोपनिषत समाप्ता ॥

माण्डूक्योपनिषद् पूपा (अथर्ववेदीया) शान्तिपाठ ॐ भद्र कर्णेभि शृणुयाम देवा | भद्र पश्येमाक्षभिर् यजत्रा, स्थिरैरङ्गम् तुष्टुवासस् तनूभिर् व्यशेम देवहित यदायु' । (ऋग्वेद १८९८) अनु०- हे देवगण | हम कानो से कल्याणी वाणी सुनें, यज्ञकर्म मे समर्थ हो कर नेत्रो से शुभ दर्शन करे, स्थिर अम और शरीरो से स्तुति करने वाले हम लोग देवताओ के लिए हितकर आयु का भोग करे। , स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवा , स्वस्ति न विश्ववेदा, स्वस्ति नस् तार्यो अरिष्टनेमि , स्वस्ति नो वृहस्पतिर्दधातु । (ऋग्वेद १.६९ ६) ॐ शान्ति । शान्ति. ।। शान्ति ।।। अनु०-महान् कीर्तिवाला इन्द्र हमारा कल्याण करे, सर्वज्ञ (अथवा सर्वेश्वर्यवान्) पूपा हमारा कल्याण करे, जो अरिष्टो (आपत्तिओ) के लिए चक्र के समान [पाता] है वह गरुड हमारा कल्याण करे, वृहस्पति हमारा कल्याण करे। विविध ताप की शान्ति हो । ओमित्येतदक्षरम् । इदर्थ सर्वं तस्योपव्याख्यानम् । भता भवद्, भविष्यदिति सर्वमोवार एव । यच्चान्यत् त्रिकालातीत तदप्योङ्कार एव ॥१॥ अनु०-'ओम्' यह अक्षर है। यह सब उस की व्याख्या है। जो कुछ भूत, भविष्यत्, और वर्तमान है सब ओकार ही है। अन्य जो त्रिकालातीत है वह भी ओकार ही है । (१) माण्डक्योपनिषद् [१६१ सि०अ०-जो कुछ है प्रगव है। जो वह महाशब्द ओ३म है उम का वर्णन यह है जो हुआ है, जो हो रहा है, और जो होगा वह सब वही है। जो तीनो वानो- भूत, भविष्यत् और वर्तमान-से परे है वह सब वही है । [१] सर्वछ ह्येतद् ब्रह्म। अयमात्मा ब्रह्म । सोऽयमात्मा चतुप्पात् ॥२॥ अनु०-यह सभी ब्रह्म है। यह आत्मा ब्रह्म है। वह यह आत्मा चार पादो (कलाओ, आयामो, अशो) वाला है । (२) सि० अ०–जो कुछ है यही प्रणव है जो ब्रह्म भी है और आत्मा भी है। ब्रह्म की चार मात्राएं हैं और आत्मा को भी चार मात्राएँ है । [२] जागरितस्थानो, बहिष्प्रज्ञ , सप्ताङ्ग, एकोनविंशतिमुख, स्थूलभुग, वैश्वानर प्रथम पाद ॥३॥ अनु०-जाग्रत्-अवस्था का स्थानी (अभिमानी) बहिर्मुखी प्रज्ञा वाला (बाह्य विषयो को प्रकाशित करने वाला), सात अङ्गो वाला, उनीस मुखो वाला, और स्थूल [विषयो] का भोक्ता वैश्वानर पहला गाद है । (३) मि० अ०-प्रथम पाद जाग्रत् अवस्था । वह प्रकट अवस्था है और [आत्मा] उस अवस्था मे उस जगत् के सभी दृश्यो से अवगत रहता है। उम प्रथम पाद के सात अग हैं-रसना, त्वचा, श्रोत, चक्षु नाण, मन और बुद्धि-और वह एतदद्वारा दृश्यमान जगत् मे उनीस तत्त्वो की ओर उमुख जाता है। [ये तत्त्व ये है-सोलह बलाएं जो मानव शरीर मे विद्यमान है और तीन गुण जिहे सृष्टि, स्थिति और प्रलय कहते हैं। इन के द्वारा [आत्मा] स्थूल विषयो का अनुभव करता है। सभी प्राणियो का देवता अग्नि है जिस का दूसरा नाम वैषवानर है। जो सब का प्राणाग्नि है। जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है वह मात्मा का प्रथम पाद है। [३] स्वप्नस्थानो, ऽन्त प्रज्ञ , सप्ताङ्ग, एकोनविंशतिमुख , प्रविविक्तभुक्, तैजसो द्वितीय पाद ||४|| अनु-स्वप्नावस्था का स्थानी (अभिमानी) अन्तर्मुखी प्रज्ञा वाला, सात अङ्गो पाला, उन्नीस मुखो वाला, और प्रविविक्त [विषयोj का भोक्ता तंजस दूसरा पाद है । (४) - १६२ ] सिअपवर (फारमो) सि० अ०-द्वितीय पाद स्वप्नावस्या है । इम स्वप्नावस्था मै, जो अन्तरग होती है, [आत्मा] उन्ही ज्ञानेन्द्रियो से व्यवहार करता है जिन से वह जानत् अवस्था मे व्यवहार परता है। अत. जाग्रत् अवस्था मे [आत्मा] स्थूल पदाथों से ऊपर वहे गये उन्नीस तत्त्वो का रस ग्रहण कर इस अन्तर्जगत् मै उन उन्नीस तत्त्वो को शक्ति द्वारा मूक्ष्म पदार्थों से भोग प्राप्त करता है। इस जगत् के सभी प्राणियो के देवता का नाम तैगस है अर्थात् ज्योतिर्मय है। यह स्वप्नावस्या जिस के विषय में यह वर्णन किया गया है आत्मा का द्वितीय पाद है। [४] 17। यन सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते, न कञ्चन स्वप्नं पश्यति, तत् सुपुप्तम् । सुपुप्तस्थान, एकीभूतः, प्रज्ञानघन एवानन्दमयो, ह्यानन्दभुक्, चेतोमुखः, प्राज्ञस् तृतीयः पादः ।।५।। अनु०-जिस अवस्था में सोया हुआ पुरुष क्सिी भोग की कामना नहीं करता, न कोई स्वप्न देखता है, वह सुषुप्ति है। सुषुप्ति का स्थानी, एकीभाव को प्राप्त, आनन्दमय प्रज्ञानधन हो आनन्द का भोक्ता, चेतनोन्मुख प्राज्ञ तीसरा पाद है । (५) सि० अ०-तृतीय पाद सुपुप्तावस्था है। यह वह अवस्था है जिस में कोई सामना नहीं रह जाती और जो कुछ स्वप्नावस्था और जामत अवस्था में दृष्टिगोचर होता है वह इस काल में तनिक भी नहीं दिखायी देता। इसे ही मुपुप्तावस्या कहते है। इस अवस्था मे जीवात्मा और परमारमा एक हो जाते हैं। इस दशा में [जीवात्मा] साक्षात् ब्रह्म हो जाता है जो प्रज्ञानधन है, आनन्दस्वरूप हो कर भानन्द का भोता है, और ज्ञानस्वरूप हो कर सभी विषयो को जानता है। इस सुषुप्नावस्था के देवता की सज्ञा प्राज्ञ है, अर्थान् ज्ञात मा अधिकरण। यह आत्मा वा तृतीय पाद है। [५] एप सर्वेश्वर, एप सर्वज्ञ, एपोऽन्तर्याम्येप योनिः रावस्य, प्रभवाप्ययौ हि भूतानाम् ।।६।। अनु०-यह सर्वेश्वर है, यह सर्वज्ञ है, यह अन्तर्यामी है, और यह सव का मूल है, भूतो (स्थावर और जङ्गम जगत्) का उद्गम और लय-स्थल हो । (६) मि० अ०-यही सब का स्वामी है और यही सर्वज है। यही सर्वान्तर्यामी है अर्थात् सद में है और रहस्यो को जानने वाला है। यही है सब का उत्पत्तिस्थान, सब वा उत्पादव, और मव का सहा 1 [६] 1 माण्डूक्योपनिषद [ १६३ नान्त प्रश, न बहिष्प्रज्ञ, नोभयत प्रज्ञ, न प्रज्ञानघन, न धज्ञ, नामज्ञम् । अदृष्टमन्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्य- मेकात्मप्रत्ययसार, प्रपञ्चोपशम, शान्त, शिवमद्वैत चतुर्थ मन्यन्ते । स आत्मा, स विज्ञेय ॥७॥ अनु०-न अन्तर्मुखी प्रज्ञा वाली, न वहिर्मुखी प्रज्ञा वाली न उभयविध प्रज्ञा वाली, न प्रज्ञानघन, न प्रज, न अप्रज्ञ। चतुर्थावस्था को अदृष्ट, अव्यवहार्य, अग्राह्य, अलक्षण, अचित्य, अव्यपदेश्य एकात्मप्रत्ययसार (ऐफारम्ययोघ ही जिस का सार है), प्रपञ्च का उपशम शान्त शिव, और अद्वैत मानते है। वही आत्मा है वहा जानने योग्य है । (७) मि० अ०-आत्मा या चतुथ पाद तुरीपावस्था है। वह स्वप्न और जायत से परे है और उस सुपुप्तावस्था से भी पर है जो स्वप्न और जाग्रत से परे है। यह पैसा ही है जैसा ऊपर वणित हुआ है। यह वेद का वह मन ममूह है जो लिखा नही गया है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि वह ज्ञान से एकीभूत हो जाता है। वह तो शानस्वरूप है। यह भी नहीं कहा जा सस्ता कि वह सबज्ञ है और न उसे अज्ञानी ही कहा जा सकता है क्याकि ये दोनो गुण अपूग सत्ता में होते है। वह दृष्टिगोचर नहीं होता। उसे गुणो से विशेपित नहीं किया जा सकता। वह अग्राह्य है अलपण है उसे मन रा भी प्राप्त नहीं किया जा सकता वह मेरी वाणी मे नही आता और न उसे पुरुष कह सकते हैं और न स्त्री। उसे उसी से जाना जा सकता है । सम्पूण जगत् का अवमान उसी म होता है। वह आन दस्वरूप है। उस म द्वैत नहीं। इसे आत्मा का चतुथ पाद कहते हैं। यही है आत्मा और इसी आमा को जानना चाहिए। [] सोऽयमात्माऽध्यक्षरमोङ्कारो ऽधिमात्र पादा मात्रा मात्राश् च पादा-अकार उकारो मकार इति ॥८॥ अनु०-वह यह आत्मा अक्षर दृष्टि से आकार है माना-दृष्टि से पाद ही मात्राएँ है और मात्राएं ही पाद है-अबार उकार मकार । (८) सि०अ०-यदि नाम गुण और अक्षर रूप में इस आमा को जानना चाहो वो औकार हप प्रणव को यही आमा जानो। प्रगव के भी चार पात होने हैं जो उरा की चार मानाए हैं। आमा ने जिन चार गानो का वणन हुआ है व प्रणव की ..... - M १६४] मिर अक्बर (फारसी) चार मानाएं है, और प्रणव की जो चार मात्राएँ कही गयी है वे आत्मा के चार पाद हैं। वह चतुष्पाद प्रणव यह है-अकार, उकार, और भकार । जागरितस्थानो वैश्वानरोकार प्रथमा माना, sऽप्तेरादिमत्त्वाद् वा । आप्नोति ह वै सर्वान् कामानादिश् च भवति य एव वेद ॥९॥ अनु०-जाग्रत् अवस्था का अभिमानी वैश्वानर अकार व्याप्त अथवा आदिम होने के कारण [ओकार को] पहली मात्रा हैं । निश्चय ही [वह] सम्पूर्ण कामनाओ को प्राप्त कर लेता है और आदि (प्रधान) होता है जो ऐसा जानता है। (१) सि० अ०-अकार प्रणव का प्रथम पाद है। यह आत्मा के प्रथम पाद का प्रतिरूप है जो जानत अवस्था है और जिस का देवता वैश्वानर है। कार के विषय गे रहा जाता है कि वह सब का आदि है और सब कुछ उसी से प्राप्त होता है। जो कोई अकार को इस प्रकार जानता है वह सभी कामना को प्राप्त कर लेता है और सब म प्रथम हो जाता है । [१] स्वप्नस्थानस् तैजस उकारो द्वितीया मात्रा, उत्क- दुभयत्वाद् वा। उत्कर्षति ह वै ज्ञानसन्तति, समानश् च भवति, नास्याब्रह्मवित् कुले भवति य एव वेद ॥१०॥ अनु०-स्वप्न अभिमानी तेजस उकार उत्कर्प अथवा मध्यवर्ती होने के कारण दूसरी माना है। निश्चय ही [वह] ज्ञानसन्तान का उत्कर्ष करता है, [सव के प्रति] समान होता है, और उस के कुल में कोई ब्रह्मज्ञान से हीन नहीं होता जो ऐसा जानता है । (१०) सि०१०-उनार प्रणव को द्वितीय माता है। यह आत्मा के द्वितीय पाद का प्रतिस्प है जो रवप्नावस्था है और जिस वा दवता तेजस है। इम के विषय में कहा जाता है कि मार मय में महान है। प्रथम माना और प्रथम माता की स्तुतिमा भी इमी म है। जो कोई उकार को इस प्रकार जाना है बह जान द्वारा अनन्त को प्राप्त पर नेता है और सर्वत्र समान रूप से व्याप्त हो जाता है । के जानने वाल की मतान में कोई भी अज्ञानी नहीं होता । [१०] सुयुप्तस्थान प्राज्ञो मकारम् तृतीया माना, मितेरपोतेर् वा। मिनोति ह वा इद सर्वमपोतिश् च भवति य एव वेद ॥११॥ उमार . अद्वैत । माण्डूयोपनिषद् [ १६५ अनु०-सुपुप्ति का अभिमानी प्राज्ञ मवार नाप अथवा लय के कारण तीसरी मात्रा है। निश्चय ही वह इस सब यो नाप लेता है और [उस का] लयस्थान हो जाता है जो ऐसा जानता है । (११) मि० अ०--मकार प्रणव को तृतीय माता है। यह धारमा के तृतीय पार का प्रतिस्प है जो मुषुप्तावस्या है योर जिस का देवता प्राज्ञ है और म्'। इस के विषय में कहा जाता है कि यह सब को नाप लेने वाला है और सब का सहता है क्योरि सुषुप्तिकाल म सब कुछ विलीन हो जाता है। जो कोई मवार को इस प्रकार जानता है वह सब को नाप लेने वाला और सब को विलीन कर देने वाला होता है । [११] अमावश् चतुर्थो,ऽव्यवहार्य , प्रपञ्चोपशम , शिवो,द्वैत । एवमोद्वार आत्मैव । सविशत्यात्मनाऽऽत्मान य एवं वेद ॥१२॥ अनु०-अमात्र चतुर्थावस्था है, अव्यवहार्य, प्रपञ्चोपशम, शिव, इस प्रकार ओङ्कार आत्मा ही है। [वह] आरमा से आत्मा मे प्रवेश करता है जो ऐसा जानता है। (१२) मि० अ०-ऊपर तीन मानाआ की मीमामा के अवसर पर प्रणव की चतुर्थ अचमाना की भीमासा नहीं हुई है। उस का रारण यह है कि उसे माना कह ही नही सक्ते। वह तो सर्वरूप है, उस मे सभी विलीन हो जाते है उमे वाणी में नहीं लाया जा सकता वह आनदमय है और उस म द्वैत का अवकाश नही। वही आत्मा यह प्रणव है और यह प्रणय वही भात्मा है। जो कोई प्रणव को इस प्रकार जानता है वह आत्मा हो जाता है और स्वत अपने मे स्थित हो जाता है। जो कोई प्रणव को इस प्रकार जानना है वही शानी है वही ज्ञानी है। [१२] समाप्त हुई अथर्ववदीया माण्डूक्योपनिषद् भि शृणुयाम देवा । भद्र पश्येमाक्षभिर् यजत्रा, स्थिरैरङ्गस् तुष्ट वासस् तनूभिर् व्यशेम देवहित यदायु । स्वस्ति इन्द्रो वृद्धश्रवा , पूपा विश्ववेदा, स्वस्ति नुस् ताक्ष्यो अरिष्टनेमि , स्वस्ति नो बृहस्पतिर् दधातु । ॐ शान्ति । शान्ति ।। शान्ति 111 ॥ इति माण्डूक्योपनिषत् समाप्ता ॥ ॐ भद्र कणे स्वस्ति न

तैत्तिरीयोपनिषद्
(कृष्णयजुर्वेदीय-तैत्तिरीयारण्यक-प्रपाठकाः ७-९)
शान्तिपाठः
ॐ शं नो मित्रः, शं वरुणः, शं नो' भवत्वयंमा,
शं न इन्द्रो बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
(ऋग्वेद १.९०.९)
नमो ब्रह्मणे । नमस् ते वायो ! त्वमेव प्रत्यक्षं ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि, ऋतं वदिष्यामि, सत्यं वदिष्यामि ।
तन् मामवतु, तद् वक्तारमवतु । अवतु माम्, अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्तिः ! शान्तिः !! शान्तिः !!!
-
शीक्षावल्ली
प्रथमोनुवाकः
ॐ शं नो मित्रः, शं वरुणः, शं नो भवत्वर्यमा,
शं न इन्द्रो, बृहस्पतिः, शं नो विष्णुरुरुक्रमः ।
१ तैत्तिरीयोपनिषद मे तीन वल्लियाँ हैं-शीक्षावल्ली, ब्रह्मानन्दवल्ली (भाराशिकोह
के शमों मे, 'आनन्दवल्ली'), और मृगुवल्ली। इन मे दाराशिकोह ने केवल अन्तिम दो
वल्लियों को टोका पूर्ण की है, शीक्षावल्लों के प्रथम अनुवाक के अतिरिक्त शेष भाग को
उस ने छोड़ दिया है। हो सकता है कि उसे संपूर्ण शीक्षावल्ली उपलब्ध न हुई हो।
शीक्षावल्ली के प्रथम अनुवाक को भी उसने ब्रह्मानन्दवल्ली का 'शोक्षाध्याय' माना है,
और ब्रह्मानन्दवल्ली के शेष भाग को 'ब्रह्मवस्ती'। ब्रह्मानन्दवल्ली और भृगुवल्लो
को भी उस ने एक ही उपनिषद् के भाग न मान कर, स्वतंत्र उपनिषदें मानी हैं ।
इस का एक आधार मी है। प्रत्येक बल्ली के आदि और अन्त में शान्तिपाठ प्राप्त
होता है, जिस के कारण ये आपाततः एक-दूसरे से स्वतन प्रतीत होती हैं ।

तैत्तिरीयोपनिषद्
[ १६७
नमो ब्रह्मणे । नमस् ते वायो । त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि ।
त्वामेव प्रत्यक्ष ब्रह्म वदिप्यामि, ऋत वदिष्यामि, सत्य वदिष्यामि।
तन् मामवतु, तद् वक्तारमवतु । अवतु माम्, अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्ति । शान्ति ।। शान्ति }11 ॥१॥
अनु०-मित्र (सूर्यदेव) हमारे लिए सुखकर हो, वरुण हमारे लिए
सुखकर हो, अयंमा हमारे लिए सुखकर हो, इन्द्र तथा वृहरपति हमारे
लिए सुखकर हो, विस्तीर्ण पादविक्षेप (डग) वाला विष्णु हमारे लिए
सुखकर हो।
ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायो । तुम्हे नमस्कार है। तुम्ही
प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम्ही को मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा, ऋत कहूँगा, सत्य
कहूंगा। वह मेरी रक्षा करे, वह वक्ता (उपदेप्टा, आचार्य) की रक्षा
करे। रक्षा करे मेरी, रक्षा करे वक्ता की। (१)
ॐ शान्ति । शान्ति || शान्ति 111
सि० अ०-उपनिषद की यह प्रथम स्तुति है-हे मित्र (अर्थात हे मैत्री के
देवता)' हे वरुण (जन के देवता) । हे अपमन् (दिन के देवता)। हे इद्र (देवताओ
के राना)' हे वृहस्पवे (ज्ञानिया के गुरु बृहस्पति) । हे विष्णो (सब से महान्) ।
इस ब्रह्मशान द्वारा हमारा मगल कर ।
तुझ नमस्कार । हे वायो। तुझे नमस्कार | तू प्रत्यक्ष ब्रह्म है।
तुक्ष में प्रत्यक्ष ब्रह्म कहता हूँ तुझ सत्य कहता हूँ तुझ कर्मों का फल कहता हूँ। तू
मुझे अपनी शरण मे [ले कर मेरो] रक्षा कर वक्ता और श्रोता को अपनी शरण मे
[ले कर उन को] रक्षा कर। गुरु वो अपनी शरण मे [ने कर उन की] रक्षा कर,
प्रपचन और श्रवण का जो फल होता है उसे अपनी शरण मे [रख कर उन की रक्षा
कर, प्रवचन और श्रवण से जो प्रकाश प्राप्त होता है उसे अपनी शरण में [रख कर
उस की रक्षा कर। हम परस्पर शत्रुता मे न डाल । [१]
ॐ शाति । शाति 11 शाति "
-
हे ब्रह्मन्
द्वितीयोऽनुवार
शीक्षा व्याख्यास्याम । वर्ग, स्वर , माना बलम् साम,
सन्तान । इत्युक्त शीक्षाध्याय ॥१॥

अनु०-हम शिक्षा करेंगे। है १६८] सिर अवयर (पारमी) (उच्चारणशास्त्र) को व्याख्या [अकारादि] वर्ण, [उदात्तादि] स्वर, [हत्यादि] मात्रा, [शब्दोच्चारण मे प्राण का प्रयत्लरूप] वल, [एक ही नियम से उच्चारण-रूप] साम, [तथा] सन्तान (सहिता) [ये ही इस अध्याय के विषय हैं । इस प्रकार शीक्षाध्याय कहा गया। (१) तृतीयोऽनुवाक 'सह नौ यश । सह नौ ब्रह्मवर्चसम् । अथात सहि- ताया उपनिपद व्याख्यास्याम , पञ्चस्वधिकरणेपु-अधिलोकम- धिज्यौतिपमधिविद्यमधिप्रजमध्यात्मम् । ता महासहिता इत्याचक्षते ॥ अथाधिलोकम्-पृथिवी पूर्वरूपम्, द्यौरुत्तररूपम्, आकाश सधि , ॥ १॥ अनु०-हम [शिप्य और आचार्य] दोनो को साथ साय यश प्राप्त हो। हमे साथ साथ ब्रह्मतेज प्राप्त हो । अब हम [इन] पाँच अघि- करणो मे सहिता (वर्गों की सन्धि) की उपनिषद् (रहस्य) की व्याख्या करेंगे-अधिलोक, अधिज्योतिप, अधिविद्य, अधिप्रज, और अध्यात्म । उन्हे महासहिता कहते हैं ॥ अब अधिलोक (लोकसम्बन्धी) [दर्शन] कहा जाता है-[ सहिता का] प्रथम वर्ण पृथिवी है, अन्तिम वर्ण झुलोर है, मध्यभाग आकाश है, (१) -वायु सधानम् । इत्यधिलोकम् ॥ अथाधिज्यौतिपम्- अग्नि पूर्वरूपम्, आदित्य उत्तररूपम्, आप सधि , वंद्युत सधानम् । इत्यधिज्योतिपम् ॥ अथाधिविद्यम्-आचार्य पूर्वरूपम्, ॥ ३ ॥ अनु०-और वायु सन्धान (जोड) है । यह अधिलोक दर्शन कहा अव अधिज्योतिष [दर्शन] कहा जाता है-प्रथम वर्ण अग्नि है, अन्तिम वर्ण दिश्य है मध्यभाग अप्-तत्त्व (जल) है, और विद्युत् सन्धान है। यह अधिज्योतिप कहा गया । अव अधिविद्य [दर्शन] कहा जाता है-प्रथम वर्ण आचार्य है, (२) १ जिस शादोच्चारण रूप प्रयत्न से सधि घटित होती है उसे भी सधान पहले हैं। गया।

ततिरीयोपनिषद [ १६९ -~अन्तेवास्युत्तररूपम्, विद्या सधि , प्रवचन, सधानम् । इत्यधिविद्यम् ।। अथाधिप्रजम्-माता पूर्वरूपम्, पितोत्तररूपम, प्रजा सधि . प्रजनन, सधानम् । इत्यधिप्रजम् ।। ३ ।। अनु०-अन्तिम वर्ण शिष्य है, विद्या सन्धि है और प्रवनन मन्धान है-यह विद्यासम्बन्धी दर्शन कहा गया ।। अव अधिप्रज [दर्शन] कहा जाता है-प्रथम वर्ण माता है, अन्तिम वर्ण पिता है, प्रजा (सन्तान) सन्धि है, और प्रजनन सन्धान है-यह प्रजासम्बन्धी [दर्शन] कहा गया । (३) अथाध्यात्मम् --अधरा हनु पूर्वरूपम् उत्तराहनुरुत्तररूपम्, वाक् सधि , जिह्वा सधानम् । इत्यध्यात्मम् ।। इतीमा महासहिता । य एवगेता महासहिता व्याख्याता वेद, सधीयते प्रजया, पशुभि , ब्रह्मवर्चसेनान्नाद्येन, सुवर्गेण, लोकेन ॥ ४॥ अनु०-अब अध्यात्म [दर्शन] कहा जाता है-प्रथम वर्ण नीचे का हनु (नीने के होठ से ठाडी तक का भाग) है, अन्तिम वर्ण ऊपर का हनु (ऊपर के होठ से नासिका तक का भाग) है, वाणी सन्धि है, और जिह्वा सन्धान है। यह अध्यात्म [दर्शन] कहा गया। इस प्रकार ये महासहिताएँ कहलाती है। जो पुरुप इस प्रकार व्याख्या की हुई इन महासहिताओ को जानता है वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज, अन, और स्वर्गलोक से सन्धियुक्त किया जाता है । (४) चतुर्थोऽनुवाक यश् छन्दसामृषभो विश्वरूपश् छन्दोभ्योऽध्यमृतात् सबभूव स मेन्द्रो मेधया स्मृणोतु । अमृतस्य, देव ! धारणो भूयासम शरीर में विचर्पणम, जिह्वा विश्रुवम् । ब्रह्मण कोशोऽसि मेधया पिहित । श्रुत मे गोपाय । आवहन्ती, वितत्वाना, ॥ १ ॥ -कुर्वाणा चीरमात्मन वासार्थसि, मम गावश् च, अन्नगाने च सर्वदा । ततो मे श्रियमावह, लोमशा पशुभि सह । । मधुमत्तमा, कर्णाभ्या भूरि १७० ] सिरे अक्षर (फारसी) - - । स्वाहा आमायन्तु ब्रह्मचारिण-स्वाहा विमायन्तु ब्रह्मचारिण -स्वाहा प्रमायन्तु ब्रह्मचारिण -स्वाहा दमायन्तु ब्रह्मचारिण - स्वाहा शमायन्तु ब्रह्मचारिण- स्वाहा ॥२॥ अनु०--जो वेदो म ऋषभ (प्रधान) और सर्वरूप है, जो वेदरूप अमृत से आविर्भूत हुआ है, वह इन्द्र मुझे मेधा से अनुगृहीत करे। हे देव मैं अमरत्व का धारण करने वाला होऊँ। मेरा शरीर समर्थ हो। मेरी जिह्वा अत्यन्त मधुमती (माधुर्ययुक्त) हो। मै कानो से खूब श्रवण करें। तु ब्रह्म वा लोप है, बुद्धि से ढका हुआ। तू मेरी श्रवण की हुई विद्या को रक्षा कर। [श्री] मेरे लिए वस्त्र, गौ, और अन-पान को सर्वदा शीघ्र ही ले आने वाली और विस्तार करने वाली है। अत श्री को पशुओ के सहित लोम वाली लक्ष्मी को तू मेरे पास ला-स्वाहा । ब्रह्मचारी मेरे पारा आयें-स्वाहा । ब्रह्मचारी मरे पास विशेष रूप से आप स्वाहा ब्रह्मचारी मेरे पास प्रकट रूप से आयें-स्वाहा । ब्रह्मचारी लोग [इन्द्रियो का] दमन करे-स्वाहा ! ब्रह्मचारी लोग शम (मनोनिग्रह) करे- स्वाहा । (१-२) यशो जनेऽसानि-स्वाहा । श्रेयान् वस्यसोऽसानि–स्वाहा त त्या भग | प्रविणानि--स्वाहा | स मा भग प्रविश-स्वाहा । तस्मिन् सहस्रशाखे निभगाह त्वयि मृजे-स्वाहा । यथाऽऽप प्रवता यन्ति, यथा मासा अहर्जरम्, एव मा ब्रह्मचारिणो धातरायन्तु सर्वत -स्वाहा । प्रतिवेशोऽसि, प्र मा भाहि, प्र मा पद्यस्व ।। ३ ।। बनु०-मैं जनता म यशस्वी होऊँ स्वाहा । मैं अधिक धनवानो से भी अधिक धनवान होऊ-स्वाहा है भगवन् ' मैं उस तुझी में प्रवेश कर जाऊं-स्वाहा । है भगवन वह तू मुझ म प्रवेश कर-स्वाहा हे भगवन | उस सहस्रशाखायुक्त तुज म मै शुद्ध होता हूं-स्वाहा । जिस प्रकार जल नीचे जाता है तथा महीने सवत्सर म जाते है उसी प्रकार, हे ब्रह्मचारी लोग मब ओर से मेरे पास आयें-स्वाहा । त् आश्रयस्थान है, तू गुव पर प्रकाशित हो, तू मुझे प्राप्त हो । (३) । 1 - । घात , उन से तत्तिरीयोपनिपद [ १७१ पञ्चमोऽनुवाक भुर्, भुव , सुपरिति वा-एतास् तिस्रो व्याहृतय । तासामु ह स्मैता चतुर्थी माहाचमस्य प्रवेदयते-मह इति । तद् ब्रह्म । स आत्मा। अङ्गान्यन्या देवता । भूरिति पा अय लोक , भुव इत्यन्तरिक्षम्, सुपरित्यसी लोक , ॥ १॥ अनु०-'भू, भुव, और सुव '-ये तीन व्याहृति है। इस चौथी व्याहृति-मह -को माहाचमस्य (महाचमस का पुत्र) प्रख्यापित परता है। वही आत्मा है। अन्य देवता [उस के] अङ्ग हैं। 'भू' ही यह लोक है, 'भुव' अन्तरिक्ष [लोक] है, सुद' यह लोक है (१) -मह इत्यादित्य । आदित्येन वाव सर्वे लोका महीयन्ते ।। भूरिति वा अग्नि , भुव इति वायु , सुवरित्यादित्य , मह इति चन्द्रमा । चन्द्रमसा वाव सर्वाणि ज्योतीपि महीयन्ते ।। भूरिति वा ऋच , भुव इति सामानि, सुवरिति यधपि ।। २ ।। अनु०-'मह' आदित्य [लोक] है। आदित्य से ही समस्त लोर महिमान्वित होते है । भू' ही अग्नि है, 'भुव' वायु है, सुव.' आदित्य है, 'मह ' चन्द्रमा है । चन्द्रमा से ही सम्पूर्ण ज्योतिओं महिमान्वित होती है ।। 'भू' ही ऋचाएं है, 'भुव ' साम है, 'मुव' यजु है, (२) -मह इति ब्रह्म । ब्रह्मणा वाव सर्वे वेदा महीयन्ते ।। भूरिति वै प्राण , भुव इत्यपान सुवरिति व्यान , मह इत्यन्नम् । अनेन वाव सर्वे प्राणा महीयन्ते ।। ता वा एताश् चतस्रश् चतुर्धा, चतस्रश् चतस्रो व्याहृतय । ता यो वेद स वेद ब्रह्म । सर्वेऽस्मै देवा वलिमावहन्ति ।।३।। अनु०- मह' ब्रह्म है। ब्रह्म से ही समस्त वेद महिमान्वित होत है। 'भू' ही प्राण है, "भुव' अपान है, मुव ' व्यान है 'मह' अन है । बन से ही समस्त प्राण महिमान्वित होते है ।। इस प्रकार ये चारो चार- चार प्रकार की है, व्याहृतिओं चार चार है। जो इन्हे जानता है वह ब्रह्म को जानना है। सभी देवता उसे बलि (उपहार) अर्पित करते - १७२ ] सिर अक्वर (फारसी) पष्ठोनुवाक स य एपोऽन्तर्ह दय आकाश तस्मिन्नय पुरुषो मनोमय', अमृतो, हिरण्मय । अन्तरेण तालुके य एप स्तन इवावलम्वते मेन्द्रयोनि । यत्रासौ केशान्तो विवर्तते, व्यपोह्य शीर्षकपाले, भूरित्यग्नौ प्रतितिष्ठति, भुव इति वायौ, ॥ १॥ अनुत--यह जो हृदय के मध्य में आकाश है उस मे हो यह मनोमय अमर, हिरण्मय पुरुष रहता है। तालुओं के बीच में यह जो स्तन के समान लटका हुआ है, वह इन्द्रयोनि (आत्मा का द्वार) है।' मस्तक के कपालो को वैध कर जहाँ केशो का मूल अवस्थित है, वह [आत्म्ग प्रयाण परते समय] 'भू' रूप अग्नि मे स्थित होता है, 'भुव ' रूप वायु मे, (१) -सुवरित्यादित्ये, मह इति ब्रह्मणि। आप्नोति स्वाराज्यम् आप्नोति मनसस्पतिम् । वाक्पतिश्, चक्षुष्पति , श्रोत्रपतिर्, विज्ञानपति । एतत् ततो भवति-आकाशशरीर ब्रह्म, सत्यात्म, प्राणाराम, मनआनन्दम्, शान्तिसमृद्धममृतम् । इति प्राचीन- योग्योपाम्व ।। २॥ अनु०-“मुत्र' रूप आदित्य मे, 'मह' स्प ब्रह्म मे। [इस प्रकार वह] स्वाराज्य (आत्मराज्य) प्राप्त कर लेता है, मन के पति को पा लेता है । तथा दाणी या पति, नझु का पति, थोत्र का पति, और विज्ञान का पति [हो जाता है । इस से भी बडा हो जाता है-आकाश रूपी शरीर वाला, सत्यात्मा, प्राणाराम, मनआनन्द (जिस के लिए मन आनन्दस्वरूप है), शान्तिसम्पन्न, और अमर ब्रह्म। है पाचीनयोग्य (पुरातन योग में आस्था रखने वाले शिप्य) ' तू इस प्रकार उपासना कर । (२) सप्तमोऽनुवाक पृथिव्यन्तरिक्ष, द्यौर्, दिशो, वान्तरदिश , अग्नि, वायु- रादित्यश्, चन्द्रमा, नक्षन्नाणि, आप, ओपधयो, वनस्पतय, आकाश, आत्मा-इत्यधिभूतम् । अथाध्यात्मम्-प्राणो, व्यानो, पान, १ तुलनीय ऐतरेपोपनिषद ३ १२, १४ । , । तत्तिरीयोपनिषद् [ १७३ उदान , समान., चक्षु , श्रोत्र, मनो, वाक्, त्वक्, चर्म, मास, स्नावास्थि, मज्जा । एतदधिविधाय ऋपिरवोचत्-पाक्त वा इदथं सर्वम्, पाडतेनैव पातर्थ स्पृणोतीति ॥ १॥ अनु०-पृथिवी, अन्तरिक्ष, द्युलोव, दिशाएँ, और अवान्तर दिशाएँ [-यह लोरुपादक्त], अग्नि, वायु, मादित्य, चन्द्रमा, और नक्षत्र [-यह देवतापाइक्त], अप्तत्व, ओपधि, वनस्पति, आकाश, आत्मा [-यह भूतपाइक्त]-ये अधिभुतपाइक्त है। अब अध्यात्मपाक्त बतलाते है- प्राण, व्यान, अपान, उदान, और समान [-यह वायुपादक्त], नक्षु, श्रोत्र, मन, वाद, और त्वचा (-यह इन्द्रियपाक्त), घम, मास, स्नायु, अस्थि, और मज्जा) [-यह धातुपाडत] । इस प्रकार इस [पाइकोपासना का] विधान कर ऋषि ने कहा-'यह सब पाक्त ही है, इस पाइक्त से ही [उपासक] पाक्त को प्राप्त करता है । (१) अष्टमोऽनुवाक ओमिति ब्रह्म । ओमितीदर्थ सर्वम् । ओमित्येतदनुकृतिर ह स्म या अपि-~'ओ श्रावय'-इत्याश्रावयन्ति, ओमिति सामानि गायन्ति, ओथं गोमिति शस्ताणि शर्थसन्ति, ओमित्यध्वर्यु प्रतिगर प्रतिगृणाति, ओमिति ब्रह्मा प्रसौति, ओमित्यग्निहोत्रमनुजानानि । ओमिति ब्राह्मण प्रवक्ष्यन्नाह- 'ब्रह्मोपाप्नवानि'- इति । ब्रह्मवोपाप्नोति ।। १ ।। अनु०-2 ब्रह्म है, 'ॐ' यह सब है, 'ॐ' यह अनुरूप किया है। ऐसा भी निश्चय ही प्रसिद्ध है-[याज्ञिक लोग] 'ओ श्रावय' कह पर श्रवण कराते है, 'ॐ' कह कर सामगान करते हैं, 'ॐ शोम्' कह कर शस्त्रो (गीति रहित ऋचाओ) का पाठ करते हैं, अध्वर्यु प्रतिगर (प्रत्येक कर्म) के प्रति 3' उच्चारण करता है, ॐ' कह कर ब्रह्मा अनुज्ञा देता है। कह पर वह अग्निहोत की आज्ञा देता है, ब्राह्मण अ' उच्चारण करता हुआ कहता है-'मै ब्रह्म (वेद अथवा परमात्मा) को प्राप्त करूं।' वह ब्रह्म को ही प्राप्त कर लेता है । (१) १ तुलनीय बृहदारण्यकोपनिषद १४ १७ ॥ २ 'पावत' का अर्थ है पञ्चक, पांच को समष्टि ।

१७४ ] सिरे अपबर (फारसी) नवमोऽनुवाक ऋत च स्वाध्यायप्रवचने च, सत्य च स्वाध्याय प्रवचने च, तपश् च स्वाध्यायप्रवचने च, दमश् च स्वाध्यायप्रवचने च, शमश् च स्वाध्यायप्रवचने च, अग्नयश् च स्वाध्यायप्रवचने च, अग्निहोत्र च स्वाध्यायप्रवचने च, अतिथयश् च स्वाध्यायप्रवचन च, मानुप च स्वाध्यायप्रवचने च, प्रजा च स्वाध्यायप्रवचने च, प्रजनश् च स्वाध्यायप्रवचने च, प्रजातिश् च स्वाध्यायप्रवचन च । सत्यमिति सत्यवचा रायीतर , तप इति तपोनित्य पौरुशिष्टि , स्वाध्यायप्रवचने एवेति नाको मौद्गल्य । तद्धि तपस्, तद्धि तप ॥१॥ अनु०-ऋत तथा स्वाध्याय (शास्त्राध्ययन ) और प्रवचन (अध्यापन अथवा वेदपाठ), सत्य तया स्वाध्याय और प्रवचन दम (इन्द्रियदमन) तथा स्वाध्याय और प्रवचन, शम (मनोनिग्रह) तया स्वाध्याय जोर प्रवचन, अग्नि (अग्याधान) तथा स्वाध्याय और प्रवचन, अग्निहोन तथा स्वाध्याय और प्रवचन, अतिथि तथा स्वाध्याय और प्रवचन, भानुपर्म (लोक- व्यवहार) तथा स्वाध्याय और प्रवचन, सतान तथा स्वाध्याय और प्रवचन, प्रजन (ऋतु-काल म भार्यागमन) तथा म्वाध्याय और प्रवचन, प्रजाति (पौत्रोत्पत्ति) तथा स्वाध्याय और प्रवचन । सत्य' ऐसा रथीतर का पुत्र सत्यवचा (सत्यभापी) कहता है। 'तप , ऐसा नित्य तपोनिष्ठ पौरशिष्टि कहता है । स्वाध्याय और प्रवचन', ऐसा मुद्गल का पुत्र नाव कहता है क्योकि वही तप है, वही तप है । (१) दशमोऽनुवाकः अह वृक्षस्य रेरिवा, कीर्ति पृष्ठ गिरेरित। ऊर्ध्वपवित्रो, वाजिनीव स्वमृतमस्मि, द्रविण सवर्चसम् मुमेधा अमृतीक्षित'। इति विशङ्कोर् वेदानुवचनम् ॥ १ ॥ १ 'अमृताक्षित = प्रमृत से सिक्त अथवा भीगा हुआ। 'अमृताऽक्षित =अमर और अयम् ।

तैत्तिरीयोपनिषद् [१७५ अनु०-मैं वृक्ष का प्रेरक हूँ, [मेरी] कीति पर्वतशिखर के समान है। उच्चता के कारण पवित्र, मैं अन्नवान् सूर्य मे उत्तम अमृत के समान हूँ, प्रकाशमान धन, सुमेधा (सुन्दर मेधावाला),अमर और अक्षित (अव्यय अथवा अमृत से मिक्त)। यह त्रिशकु [ऋपि] का वेदानुवचन (वेद व्याख्यान) है। (१) एकादशोऽनुवाक वेदमतूच्याचार्योऽन्तेवासिनमनुशास्ति-सत्य वद्, धर्म चर, स्वाध्यायान् मा प्रमट , आचार्याय प्रिय धनमाहृत्य प्रजातन्तु मा व्यवच्छेत्सी । सत्यान् न प्रमदितव्यम्, धर्मान् न प्रमदितव्यम्, कुशलान् न प्रमदितव्यम्, भूत्यै न प्रमदितव्यम्, स्वाध्यायप्रवचनाभ्या न प्रमदितव्यम् ॥ १॥ अनु०-वेदाध्ययन कराकर जाचार्य शिप्य को उपदेश देता है-रात्य वोल, धर्म का आचरण कर, स्वाध्याय से प्रमाद न कर, आचार्य के लिए अभीष्ट धन ला कर [स्त्री परिग्रह कर और] सन्तान-परम्परा का उच्छेद न कर। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए, धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए, कुशल [आत्मरक्षा मे उपयोगी कर्म] से प्रमाद नहीं करना चाहिए, ऐश्वर्य मे प्रमाद नही करना चाहिए, स्वाध्याय और प्रवचन में प्रमाद नही करना चाहिए । (१) देवपितृकार्याभ्या न प्रमदितव्यम् । मातृदेवो भव, पितृदेवो भव, आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि रोवितव्यानि, नो इतराणि। यान्यस्माक; सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि, ॥२॥ अनु०-देवकार्य और पितृकार्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। तू मातृदेव (माता ही जिस का देव है ऐसा) हो, पितृदेव हो, आचार्यदेव हो, अतिथिदेव हो। जो अनिन्द्य कर्म है उन्ही का सेवन करना चाहिए, दूसरो का नहीं। हमारे (हम गुरुजनो के) जो शुभ आचरण हैं तुझे उन्ही की उपासना (अनुसरण) करनी चाहिए । (२) - १७६ ] सिरे अक्बर (पारसी) -नो इतराणि। ये के चास्मच्छेयासो ब्राह्मणा तेपा त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम् । श्रद्धया देयम्, अश्रद्धयाऽदेयम्, श्रिया देयम्, ह्रिया देयम्, भिया देयम्, सविदा देयम् । अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तिविचिकित्सा वा स्यात्, ।। ३ ।। अनु०-दूसरे प्रकार के आचरण की नहीं । जो पोई हम मे थप्ठ, ब्राह्मण है उन वा आसन [आदि] के द्वारा तुझे आश्वासन (श्रमापहरण) करना चाहिए। श्रद्धापूर्वक देना चाहिए, अश्रद्धापूर्वक नहीं देना चाहिए, [अपने] ऐश्वर्य के अनुसार देना चाहिए। लज्जापूर्वक देना चाहिए, भय मानत हुए देना चाहिए, सवित् (सहानुभूति) से देना चाहिए । यदि तुझे कर्म या वृत्ति के विषय मे सन्देह उपस्थित हो, (३) -ये तन ब्राह्मणा समशिन , युक्ता, आयुक्ता , अलूक्षा, धर्मकामा स्यु , यथा ते तत्र वर्तेरन् तथा तत्र वर्तथा । अथाभ्याख्यातेपु, ये तन ब्राह्मणा समशिन , युक्ता, आयुक्ता , अलक्षा, धर्मकामा स्यु , यथा ते तेषु वर्तेरन् तथा तेपु वर्तथा । एप आदेश , एप उपदेश , एपा वेदोपनिपत्, एतदनुशासनम् । एवमुपासितव्यम्, एवम् चैतदुपास्यम् ॥ ४ ॥ अनु०-तो वहाँ जो विचारशील, योग्य आयुक्त (कर्गपरायण), अरुक्ष (सरलमति) एव धर्माभिलापी ब्राह्मण हो, वहाँ के जैसा बरत वैसा ही वहाँ तू भी बरत । अव जिन के विषय में आरोप किया गया है उन के विषय में, वहाँ जो विचारशील, योग्य, आयुक्त, सरल- हृदय और धर्माभिलाषी ब्राह्मण हो, वे जैसा वरते तू भी वैसा ही वरत । यह आदेश (विधि) है यह उपदेश है, यह वेद का रहस्य है, यह अनुशासन है। तुझे इसी प्रकार उपासना करनी चाहिए-निश्चय ऐसी ही उपासना करनी चाहिए। (४) द्वादशोऽनुवाका ॐ श नो, मित्र , ग वरुण , श नो' भवत्वर्यमा, श न इन्द्रो बृहस्पति , श नो विष्णहरुम । -

[ १७७
ततिरीयोपनिषद्
नमो ब्रह्मणे । नमस् ते वायो' त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि
त्वामेव प्रत्यक्ष ब्रह्म वदिप्यामि, मत वदिप्यामि, सत्य वदिष्यामि ।
तन् मामवतु, तद् वक्तारमवतु। अवतु माम्, अवतु वक्तारम् ।
ॐ शान्ति ! शान्ति ।। शान्ति ।।।
अनु०-मित्र (सूर्यदेव) हमारे लिए सुखर हो, वरुण हमारे लिए
सुखकर हो, अर्यमा हमारे लिए सुखकर हो, इन्द्र तथा वृहस्पति हमारे
लिए सुखकर हो, विस्तीर्ण पादविक्षप (उग) वाला विष्णु हमारे लिए
सुखकर हो ।
ब्रह्म को नमस्कार है। हे वायो ' तुम्हे नमस्कार है। तुम्ही
प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम्ही को मैं प्रत्यक्ष ब्रह्म हूँगा, ऋत पहूंगा, सत्य
कहूँगा। वह मेरी रक्षा करे वह वक्ता (उपदेष्टा आनार्य) की रक्षा
करे। रक्षा करे मेरी, रक्षा करे वक्ता की।
ॐ शान्ति । शान्ति ।। शाति ।।। ।।१।।
।। इति शीक्षावल्ली ।।
ब्रह्मानन्दवल्ली
प्रथमोऽनुवाक
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु। सह वीर्य करवा-
वहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विपावहै।
ॐ शान्ति । शान्ति ।। शान्ति ।।1'
अनु०-[परमात्मा] हम [आचार्य और शिष्य] दोना को साथ
साथ रक्षा करे। हम दोना का साथ साथ पालन करे।
साथ साथ विद्या सम्बधी सामर्थ्य प्राप्त कर । हम दोनो का पढा हुआ
तेजस्वी हो। हम दोनो द्वेष न कर ।
ॐशाति 1 शनि।। शाति ।।।
हम दोनो
१ इस शान्ति पाठ की टीका मिरे अश्या में उपलब्ध नहीं।

- 1 १७८] सिर अश्वर (फारमो) ब्रह्मविदाप्नोति परम् । तदेपाऽभ्युक्ता--'सत्यं, ज्ञानमनन्तं', ब्रह्म यो वेद निहित गुहायां परम व्योमन् सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता' इति । तस्माद् वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः, आकाशाद् वायुः, वायोरग्निः, अग्नेरापः, अद्भ्यः पृथिवी, पृथिव्या ओपधयः, ओपधीभ्योऽनम्, अन्नात् पुरुषः । स या एप पुरुषोऽन्नरसमयः । तस्येदमेव शिरः, अयं दक्षिणः पक्षः, अयमुत्तरः पक्षः, अयमात्मा, इद पुच्छं प्रतिष्ठा। तदप्येप एलोको भवति ॥ १॥ अनु०- ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त कर लेता है। उस के विषय में यह [श्रुति] यही गयी है- 'सत्य, शान, और अनन्त ब्रह्म को जो बुद्धिरूप परम आकाश में निहित जानता है, वह रावंज ब्रह्म के साथ-साथ समस्त गोगो को प्राप्त कर लेता है।' उस इस आत्मा से ही आकाश उत्पन्न हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से ओपधिओं, ओपधिओ से अन्न, और अन्न से पुरुप । वह यह पुरुप अन्न-रस-मय ही है। उस का यही शिर है, यह दक्षिण पक्ष है, यह वाम पक्ष है, यह आत्मा है, यह पुच्छ (नीचे का भाग) प्रतिष्ठा है। उस के विषय मे ही यह श्लोक मि० अ०-ब्रह्मवेत्ता परम पद प्राप्त करता है और ब्रह्म हो जाता है। वेद के एक अन्य मन्त्र मे भी सल्लिखित है- 'ब्रह्म सत्य है, ज्ञानस्वरूप है, अनन्त है। कोई स्थान ऐसा नही जहां वह न हो, कोई पाल ऐसा नही जय वह न हो, कोई दिशा नहीं जिस मे यह न हो। वह बुद्धि-नामक हृदय-गुहा में प्रकट और प्रकाशित है। ऐसे ब्रह्म को ओ जान लेता है- सब्रह्म को जो सर्वज्ञ है और जिम में सन्नौ कामनाएं निहित हैं यह साक्षात् वही (ग्रह) बन कर मारी कामनाएँ प्राप्त कर लेता है।' १ 'अनन्त' के स्थान पर 'आनन्द' होता तो स्वारम्य अधिक होता। तम 'सचिदानन्द' रूप निष्पन्न हो जाता।

तैत्तिरीयोपनिषद [ १७९ ब्रह्म आत्मस्वरूप है। उस से प्रथम भूतावाश प्रकट हुआ, भूताकाश से वायु प्रकट हुआ, वायु स अग्नि प्रकट हुआ, अग्नि से जल प्रकट हुमा, जान से पृथिवी प्रकट हुई, पृथिवी मे ओषधिओं प्रकट हुई, ओपधियो मे अन्न प्रकट हुआ, अन गे वीर्य प्रकट हुआ, धीर्य में पुरुष और गभी प्राणी प्रकट हुए। जब पुरुष और सभी प्राणी अन के रम मे प्रकट हुए [तो सब अन रस ही है। जीवात्मा को पक्षी के सदृश है उस का माक्षात् मस्तक है। दाहिनी भुना ही उस का दाहिना पक्ष है, वायी भुजा उस का बायाँ पक्ष है, उम का यक्ष म्पल जिस म हृदय है और उस हृदय म जीव है, उस पक्षी का वक्ष स्थल आत्मा, जऔर हृदय है नाभि से नीचे का भाग उम पक्षी की पूछ के समान है, जो पूंछ उम का वाम स्थान है। इमो का अनुहरण यह वेदमन्न भी करता है-[१] वर्धन्ते । द्वितीयोऽनुवाक 'अन्नाद् वै प्रजा प्रजायन्ते या काश् च पृथिवी श्रिता । अथो अन्नेनैव जीवन्ति, अथैनदपि यन्त्यन्तत ।' अन्नयं हि भूताना ज्येष्ठम्, तस्मात् सर्वोपधमुच्यते । सर्व वै तेऽनमाप्नुवन्ति येऽन्न ब्रह्मोपासते। अन्नछ हि भूताना ज्येष्ठम्, तस्मात् सौंपधमुच्यते । अन्नाद भूतानि जायन्ते, जातान्यनेन अद्यतेऽत्ति च भूतानि, तस्मादन्न तदुच्यते' इति ।' तस्माद् वा एतस्मादन्न रसमयादन्योऽन्तर आत्मा प्राणमय । स वा एप पुरुपविध एव ।। विधतामन्वय पुरुषविध । तस्य प्राण एव शिर , व्यानो दक्षिण पक्ष , अपान उत्तर पक्ष , आकाश आत्मा, पृथिवी पुच्छ प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति- ॥ १ ॥ अनु०-'जो भी प्रजाएं पृथिवी के आश्रित है वे अन से ही उत्पन होती है, अन्न से ही जीती है, और अन्त म उसी म लीन हो जाती है। क्योगि अन ही प्राणिया ग बडा है इसी से वह सौंपध कहा पहाँ तक मेवायएयुपनिषद् ६ ११ में भी द्रष्टव्य है। २ 'अन्नाद् भूतानि में यहाँ तक मैत्रायपशुपनिषद् ६ १२ में भी द्रटन्य है। तेनंष पूर्ण । तस्य पुरुष- - १८० सिरें अक्बर (फारणी) जाता है। जो लोग अन्न हो को ब्रह्म मान कर उपासना करते है वे निश्चय ही सम्पूर्ण अन्न प्राप्त करते है। क्योकि अन्न ही प्राणियो में बडा है, इसलिए वह सवौषध कहलाता है। अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते है, उत्पन्न हो कर अन्न से ही वढते है । अन्न प्राणियों द्वारा खाया जाता है और वह उन्हे पाता है, इसी से वह "अन्न" कहा जाता है।' उस इस अन्नरसमय [पिण्ड] से भिन्न उस के भीतर रहने वाला प्राणमय कोश है। उस से यह (अन्तमय कोश) परिपूर्ण है। वह यह (प्राणमय कोश) भी पुरुषाकार ही है। उस (अन्नमय कोश) की पुरुपाकारता के अनुसार ही यह भी पुरुषावार है । उसवा प्राण ही सिर है, व्यान दक्षिण पक्ष है, अपान उत्तर पक्ष है, आकाश आत्मा (मध्यभाग) है, और पृथिवी पुच्छ-प्रतिष्ठा है । उस के विषय में ही यह श्लोक - मि० भ०—पृथिवी पर स्थित गभी प्राणी अन रो उत्पन होते हैं, अन स जीवित रहते है, अन में लीन हो जाते है। इसी कारण अन्न भूतो में श्रेष्ठतम है और अन सब का भेपज है। जो कोई अन की ब्रह्मभाव से उपासना नरता है, उसे सभी उत्तम अता की प्राप्ति होती हैं। चूंकि अन मब से श्रेष्ठ है, मप का भेपज है, सभी प्राणी उसी रा उत्पन होते हैं, उसी से बदते है, उमे सभी खाते हैं, और वह सभी को खाता है, इसी कारण अन्न को 'अन' कहत हैं, अर्थात् सब का खाद्य और अत्ता। अत शरीर अनमय कोश है, और अन्नमय कोश में प्राणमय कोश है, और प्राणमय कोश मे यह शरीर जो अनमय कोश है पूर्ण है। शरीर जैसा है प्राण भी उस म वैसा ही होता है। प्राणवायु शरीर पो मस्तक के समान है, व्यानवायु दाहिनी भुजा के समान है, उदानवायु बायी भुजा वे समान है। समानवायु जप्त के आत्मा के समान है, अर्थात जसे जीव रामस्त शरीर म पूर्ण है [मे ही] समान वायु भी समस्त शरीर मे पूर्ण है। पृथिवी उस की पूंछ और उस के आश्रयस्थान के समान है। इसी के अनुसार एव वेदमन भी है-[१] तृतीयोऽनुवाकः 'प्राण देवा अनु प्राणन्ति, मनुष्या, पशवश् च ये । प्राणो हि भूतानामायुः, तस्मात् सर्वायुपमुच्यते । सर्वमेव त आयुर् यन्ति ये प्राण ब्रह्मोपासते । प्राणो हि भूतानामायु , तस्मात् सर्वायुपगुच्यते' इति ।

तत्तिरीयोपनिषद् 52136 [१८१ तस्यप एव शारीर आत्मा य पूर्वस्य । तस्माद् वा एतस्मात् प्राणमयादन्योऽन्तर आत्मा मनोमय । तेनैप पूर्ण । स वा एप पुरुषविध एव । तस्य पुरपविधतामन्वय पुरपविध । तस्य यजुरेव शिर , स्टम् दक्षिण पक्ष , सामोत्तर पक्ष , आदेश आत्मा, अथर्वाङ्गिरस पुच्छ प्रतिष्ठा। तदप्येप श्लोको भवति-॥१॥ अनु०-'देवगण प्राण के साथ ही प्राणन किया वरते हैं, तथा जो मनुष्य और पशु [आदि] हैं। प्राण ही प्राणिया को आयु है, इसलिए वह 'सर्वायुप कहलाता है। जो प्राण यी ब्रह्मरूप से उपासना करते है वे पूर्ण आयु को प्राप्त होते है। प्राण ही प्राणिया की आयु है, इसलिए वह ' सर्वायुप" यह ताता है।' उस पूर्वोक्त (अन्नमय कोश) का यही देही आत्मा है। उम इस प्राणमय [पोशJ म भिन अन्तरात्मा मनामय [काश] है। उस से यह पूण है। वह यह [मनोमय कोश] पुरपावार ही है। (प्राणमय वोश) की पुष्पाकारता के अनुसार ही यह पुरुषावार है। यजु ही उप्त का शिर है, ऋक् दक्षिण पक्ष है माम उत्तर पक्ष है, आदेश आत्मा है अथवागिरस पुन्छ प्रतिष्ठा है। उस विषय म ही यह राव है- (१) उस सि०अ०-प्राण अप्न वा रग है। उसी माइदियो वे मभी देवता अपन अपने नियन पाय गमतगे हैं और सभी देवता मनुष्य और पशु प्राण ही में परिचारित हाने । मोवारण प्राण सबा जीया है। जो कोई प्राण को प्रा जानर उग पो आगना करता है यह प्रारतिर आयु लाभ करता है। चूंकि [चान सब मा जीवन है अत गरी आयु की अवधि प्राण सही प्रकट होती है। शरीर । मागी असमय है उगा आमा प्राणमय कोश है बीमाशात् प्राण ही है। प्राण मय कोश मे मनोमय योग या जागाशात मन ही है। वह भी हीरे गगान है यजुर्वेद उस ये शिर ममान है - उमगिण ! के समान है गागर उग पाम पक्ष र ममान है देशविधिक अनुगार यम बा भनुष्टान उमर धारमा गमान है अपम उम रीपूछ और आश्रयस्थान र समान है। इसी अनुमार एक अन्य पदमन भाई-11) १५२] सिरें अक्बर (फारसी) चतुर्थोऽनुवाद 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहा आनन्द ब्राह्मणो विद्वान् न विभेति कदाचन' इति । तस्यप एव शारीर आत्मा य पूर्वस्य । तस्माद् वा एतस्मान् मनोमयादन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयस्, तेनैप पूर्ण । स वा एप पुरुपविध एव। तस्य पुरुपविधतामन्वय पुरुपविध । तस्य श्रद्धव शिर , ऋत दक्षिण पक्ष सत्यमुत्तर पक्ष , योग आत्मा, मह पुच्छ प्रतिष्ठा। तदप्येप श्लोवो भवति-॥ १ ॥ अनु०- जहाँ से न पा कर मन सहित वाणी लौट आती है उस ब्रह्मानन्द को जानने वाला पुरुष कभी भय को प्राप्त नहीं होता। वही [मनोमय कोश] उस अपने पूर्ववर्ती [प्राणमय कोश] का देही आत्मा है । उस इस मनोमय स भित इस का अन्तरात्मा विज्ञानमय [काश] है। उस से यह पूण है । वह यह [विज्ञानमय] भी पुरुषाकार उस [मनामय ] की पुरुपाकारता के अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है। उस का श्रद्धा ही सिर है नहत दक्षिण पक्ष है सत्य उत्तर पक्ष है योग आत्मा (मध्यभाग) है और बल पुच्छ प्रतिष्ठा है। उरा के विषय म ही यह फ्लोक है-(१) सि०अ०--ब्रह्म तक मन और वाणी की पहुंच नहा वे उस तक न पहुँच कर लौट आते हैं। जो वाइ उम ब्रह्म को जा आन दमय है जानता है वह किमी सत्ता से नहीं डरता। मनामय कोश जो माक्षात मन ही है प्राणमय कोश अर्थात साक्षात प्राण का आमा है। मनोमय कोश अर्यात गाक्षान मन में विज्ञानमय कोश है। वह भी एक पक्षी के समान है श्रद्धा उमक मिर समान है मकर्मों का पर आने दक्षिण पथ के समान है सत्य उस के वाम पक्ष के समान है ब्रह्म-गमाधि अथवा योग उस को भात्मा के ममान है और ममप्टि बुद्धि उस की पूछ और आश्रयस्थान के समान है। इसी पे अनुसार एक अर पेदमन मी है-[१] पञ्चमोऽनुवार "विज्ञान यज्ञ तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च । विज्ञान देवा सर्वे ब्रह्म ज्येष्ठमुपासते।

तैत्तिरीयोपनिषद [१३ विज्ञान ब्रह्म चेद् वेद, तस्माच् चेन् न प्रमाद्यति, शरीरे पाप्मनो हित्वा सर्वान् कामान् समश्नुते' इति । तस्यप एव शारीर आत्मा य पूर्वस्य । तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयादन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमय । तेनैप पूर्ण । स वा एप पुरुपविध एव । तस्य पुरुपविधतामन्वय पुरुपविध । तस्य प्रियमव शिर, मोदो दक्षिण पक्ष , प्रमोद उत्तर पक्ष आनन्द आत्मा, ब्रहा पुच्छ प्रतिष्ठा । तदप्येष श्लोको भवति-॥१॥ अनु०- विज्ञान यज्ञ का विस्तार करता है और कर्मो का भी विस्तार परता है। समस्त देव ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्म की उपासना करते है। यदि [साधव ] विज्ञान को ब्रह्म जान जान जाय और फिर उस से प्रमाद न परे तो अपने शरीर के सारे पापा को त्याग कर वह रामस्त कामनाओ (भोगो) को पूर्णतया प्राप्त कर लेता है।' यह [विज्ञानमय] ही उस अपने पूर्ववर्ती मनोमय कोश का देही आत्मा है। उस इस विज्ञानमय से भिन इस का अतरात्मा आनन्दमय [कोश] है। उस [आन दमय] से यह पूण है। वह यह [आन दमय] पुस्पार ही है। उस (विज्ञानमय) की पुरुपाकारता के समान ही यह पुरुषाकार है। उस पा प्रिय ही सिर है मोद दक्षिण पक्ष है प्रमोद उत्तर पक्ष है आनन्द आत्मा है और ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा है। उसी के विषय में यह श्लोक है-(१) सि० अ०-जो कोई ज्ञान विनान से युक्त है वहीं यज्ञ और अनुष्ठान कर सकता है। देवगण गान विज्ञान यो परब्रह्म जान कर उस की उपागमा करते हैं। जो कोई ज्ञान विज्ञान को परब हा जानता है और उस विनान से प्रमाद नही करता वह अपने सभी शारीरिक पापो को दूर कर अपनी सभी कामनाओ और अभिलापानी को प्राप्त कर लेता है। पञ्चम कोश आन दमय कोश है जो साक्षात आनद है। वह विज्ञानमय कोश अर्यात साक्षान विज्ञान म निहित है और उम का आत्मस्थानी है। वह भी एक पक्षी के समान है प्रम उस के मिर के समान है प्रमपान से मोद की प्राप्ति उस के दक्षिण पक्ष के समान है उस मोद का आधिक्य उस क वाम पक्ष के समान है आन द उस की आमा के समान है और ब्रह्म उस की पूछ और आश्रयस्थान ये समान है। इमी के अनुसार एक बय वेदमन भी है-~-[१] १८४] मिर अस्वर (फारसी) पष्ठोऽनुवाकः 'असन्नेव स भवति, असद् ब्रह्मेति वेद चेत्; अस्ति ब्रह्मेति चेद् वेद, सन्तमेनं ततो विदुः' इति । तस्यैप एव शारीर आत्मा यः पूर्वस्य । अथातोऽनुप्रश्ना:-उताविद्वानमुं लोक नेत्य कश्चन गच्छती३? आहो विद्वानमुं लोकं प्रेत्य कश्चित् समश्नुता ३ उ? सोऽकामयत- -बहु स्यां प्रजायेयेति । स तपोऽतप्यत । तपस् तप्त्वा इदथं सर्वमसृजत यदिदं किञ्च । तत् सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् । तदनुप्रविश्य सच् च त्यच् चाभवत्, निरुक्तं चानिरुक्तं च, निलयनं चानिलयनं च, विज्ञानं चाविज्ञानं च, सत्यं चानृतं च, सत्यमभवत् । यदिदं किञ्च तत् सत्यमित्या- चक्षते । तदप्येय श्लोको भवति-- ॥१॥ अनु०-'यदि पुरुप "ब्रह्म असत् है" ऐसा जानता है तो वह असत हो हो जाता है; और यदि ऐसा जानता है कि "ब्रह्म है" तो [ब्रह्मवेत्ता] उसे सत् समझते है।' उस पूर्वकथित (विज्ञानमय) का यही [आनन्दमय ] देही आत्मा है। अव इस के अनन्तर ये अनुप्रश्न है-क्या कोई अविद्वान् मर कर उस लोक को प्राप्त हो सकता है ? अथवा कोई भी विद्वान् मर कर उस लोक को प्राप्त हो जाता है ? उस [ब्रहा] ने कामना की-'मैं वहुत हो जाऊँ। उस ने तप किया। उस ने तप कर के यह जो कुछ है इस सब की रचना की। इसे रच कर वह इसी में अनुप्रविष्ट हो गया। इस में अनुप्रवेश कर वह सत् और त्यत् हो गया, परिभापित और अपरिभापित, आश्रय और अनाश्रय, चेतन और अचेतन, सत्य और असत्य हो गया। यह जो कुछ है उसे [ब्रह्मवेत्ता] 'सत्य' नाम से पुकारते हैं। उस के विषय में ही श्लोक है-(१) यह 7 ततिरीयोपनिपद [१८५ मि० अ०--जो कोई ना को असत् जानता है उस ा प्रकट भस्तित्व भी अमन हो जाता है. मोर जो कोई ना को सत् पानता है घुमिमान उस को भी सत् जानते हैं। पांचाग जो आनन्दमय रोग है और साक्षात् भानद है विज्ञानमय मोगरे आरमारे समान है। प्रश्न-या जिन भजो ने ब्रह्म से नहीं जाना वे इम लोग को छोड़कर ब्रह्मलोग को प्राप्त होते हैं, मघवा ये मानो ही प्राप्तोक से प्राप्त होते हैं ' उत्तर-जब ब्रह्म अरेला पा तब उसे हटा हुई कि मैं बहुत होकर प्रकट हो गा। उम ने तप किया, इग समस्त जगत् को उत्पन्न रिया, रामस्त जगत् म अनुप्रविष्ट हुआ, स्वप गापार और निरारा बना अर्थात् निर्गुण और सगुण हो गया। मिम भी मत्ता के सम्बन्ध में यह' और 'वह' । प्रयोग हो सकता है और जिम भी सत्ता के सम्बन्ध में 'यह' और 'वह' का प्रयोग नहीं हो मक्ता, वह दोनो ही हो गया। यह साश्रय भी हो गया और निराश्रय भी हो गया, मूक्ष्म भी हो गया और स्यूल भी हो गया. सरप भी हो गया और भरारय भी हो गया। चूंकि वही सब कुछ हो गया है और उस मे सभी दन्त निहित हो गये है, अतएव सभी लोग उप्त सम्म जानते हैं। इसी में अनुसार एक अन्य वेदमन भी है-[१] सप्तमोऽनुवार. 'असद् वा इदमग्र आसीत्, ततो वै सदजायत ।' तदात्मान, स्वयमकुरुत, तस्मात् तत् सुकृतमुच्यते' इति । यद् वै तत् सुकृत रसी व स.। रसघं वाय लम्वाऽऽनन्दी भवति । को ह्येवान्यात् क प्राण्यात् यदेप आकाश आनन्दो न स्यात् ? एप ह्येवानन्दयाति । यदा ह्येवैप एतस्मिन्नदृश्ये, नात्म्ये, ऽनिरुक्त, ऽनिलयने, ऽभय प्रतिष्ठा विन्दते, अथ सोऽभयगतो भवति । यदा होवप एतस्मिन्नुदरमन्तर कुरुते, अथ तस्य भय भवति । तत् त्वेव भयं विदुपो मन्यानस्य । तदप्येप श्लोको भवति-॥१॥ । अनु०-'पहले यह [जगत्] असत् ही था, उसी से सत् उत्पन्न हुआ। उस [असत्] ने स्वयं अपने को रचा, इसलिए वह सुकृत (सुरचित अथवा स्वरचित) कहा जाता है। वह जो सुकृत है वह निश्चय रस ही है । १ तुलनीय-छान्दाग्योपनिषद् ६ २.१-२ ।

मिर अश्वर (पारसी) इस रम को पाकर यह [पुरुप] आनन्दी हो जाता है। यदि यह आकाश आनन्द (आनन्दस्वरूप आत्मा) न होता तो कोन व्यक्ति जीता और कौन प्राणन-क्रिया करता? यही तो उन्हे आनन्दित करता है। जिस समय यह [साधक] इस अदृश्य, अशरीर, अनिर्वाच्य, और अनाधार ब्रह्म मे अमय-स्थिति प्राप्त करता है उस समय यह अभय को प्राप्त हो जाता है । और जब यह इस मे थोडा-सा भी छेद-भेद करता है तो उसे भय प्राप्त होता है। वह [ब्रह्म] ही भेददर्शी विद्वान् के लिए भम रूप है। इसी अर्थ में यह श्लोक है-(१) सि० अ०-जगत् की उत्पत्ति के पूर्व जब नाम और रूप नहीं था तब कुछ भी व्यक्त नहीं था। जब नामी और रूपी प्रकट हुए तब नाम और रूप भी प्रकट हुए अात् उस काल में गुणधर्म गुणी में निहित थे। जव नामी ओर रूपी प्रकट हो गये, तव गुणो गुणो मे लुप्त हो गया । इस लिए गुण मी सत्य है। उस ने अपने को स्वय प्रकट किया। इस लिए उसे 'सुकृत' कहते हैं. अर्यात् [उस ने अपने को स्वयं ही भली भांति प्रकट किया। वह सभी रसो का स्रोत है। जो ब्रह्मवेत्ता उम यथार्थ रस को जो साक्षात् ब्रह्म है प्राप्त कर लेता है यह सुख प्राप्त कर लेता है और बानन्दी हो जाता है। यदि वह मानन्द जो मन में निहित है न होता, तो अपानवायु और प्राणवायु को कौन गति देता? वही थानन्दस्वरूप जो मन में है सब को आनन्दपुक्त करता है। जब शानी पुरुप उस आनन्दस्वरूप से एपीभूत हो जाते हैं तब ये निर्मप हो जाते हैं। वह ऐसा आनन्द है जो रादा एक दशा में रहता है। वह निराकार है, पाणी मे नही माता, और अनाश्रय है। जो कोई जीवात्मा को आत्मा से किञ्चित् मन्त्रि भी भिन्न जानता है उसे सदा भय होता है और ब्रह्म उस के लिए भय का कारण बन जाता है। जब भगवद्भाव और दासभाव बीच मे माते हैं तो उस के लिए भय का कारण बन जाते हैं। इसी के अनुसार एक अन्य वेदमन्न भी अप्टमोऽनुवाक: 'भीपाऽस्माद् वातः पवते, भीपोदेति सूर्यः, भीषाऽस्मादग्निश्, चेन्द्रश् च, मृत्युर् धावति पञ्चमः" इति । संपानन्दस्य मीमाशंसा भवति-युवा स्यात्, साधुयुवा, २ तुलनीय कठोपनिषद् ६.३।

तैत्तिरीयोपनिषद् [१७ ऽध्यायक, आशिष्ठो, दृढिष्ठो, बलिष्ठस्, तस्येय पृथिवी सर्वा वित्तस्य पूर्णा स्यात् । स एको मानुप आनन्द । ते ये शत मानुपा आनन्दा', ॥१॥ अनु०-इस के भय से वायु चलता है, [इसी के भय से सूर्य उदित होता है, इसी के भय से अग्नि, इन्द्र, और पांचवां मृत्यु दौड़ता है। अब यह आनन्द की मीमासा है-युवा हो, साधु युवा, सुपठित, अत्यन्त आशावान्, अत्यन्त दृढ, अत्यन्त बलिष्ठ, एव यह धन-धान्य से पूर्ण सम्पूर्ण पृथ्वी भी उस की हो। [उस का जो आनन्द है] वह एक मानुष आनन्द है। ऐसे जो सौ मानुप आनन्द है, (१) सि०अ०–ब्रह्म के मय से ही पायु चलता है, ब्रह्म के भय मे ही सूर्य उदित होता है. ब्रह्म के भय से ही अग्नि और देवराज इन्द्र और मृत्यु अपने अपने कार्य T उस मानन्द का वर्णन इस प्रकार है कि जो कोई युवा और सुदर होता है वेदाध्यापी होता है, स्वस्थचित्त होता है, बलिष्ठ होता है, वह समग्र भूमि का स्वामी होता है और धनाढ्य होता है। मनुष्य के लिए इस से बढ़ कर कोई आनद नहीं। यदि सौ आनन्द एक जगह जमा करें [१] एको मनुष्यगन्धर्वाणामानन्द, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शत मनुष्यगन्धर्वाणामानन्दा स एको देवगन्धर्वाणामानन्द, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शत देवगन्धर्वाणामानन्द स एक पितृणा चिरलोकलोकानामानन्द , श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शत पितृणा चिरलोकलोका- नामानन्दा स एक आजानजाना देवानामानन्द , ॥२॥ अनु०-वहीं मनुष्य-गन्धों का एक आनन्द है, और कामनाओ से अनाकान्त श्रोत्रिय का भी। वे जो मनुष्य गन्धवों के सौ आनन्द हैं वहीं देव-गन्धर्वो का एक आमन्द है और कामनाओ मे अनाक्रान्त थोत्रिय का भो। वे जो देवगन्धवों के सौ आनन्द हैं वही नित्यलोक में रहने वाले पितृगण का एक आनन्द है, और कामनाओ से अनाकान्त श्रोत्रिय का भी।

। १८८] सिर अपवर (फारसी) वे जो चिरलोक-निवासी पितृगण के सौ आनन्द है वही आजानन देवताओ' का एक आनन्द है, (२) सिं० अ--तो वे उम पुरुप के एक आनन्द के बराबर होते हैं जो पुण्यकर्म द्वारा मृत्यु के भनन्तर गान का देवता गन्धर्व बन गया हो। उस वैदश का मानन्द भी जिस ने वेदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। यदि उस पुरुष के सौ आनन्द, जिस ने पुण्यकर्म द्वारा गन्धर्व का पद प्राप्त किया है. एक स्थान पर जगा करें, तो वे गन्धर्व के एक आनन्द के वरावर होते हैं, जो गन्धर्व के स्वरूप में निहित हैं। उग वेदज्ञ का भानन्द भी जिस ने देदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। यदि गन्ध के सौ आनन्दो को जो गन्धर्व के स्वरूप में निहित होते हैं एक स्थान पर जमा करें तो वे उम पुरुप के एक आनन्द के बराबर होते है जो परलोक में निवास रता है और वहाँ चिर काल तक रहता है। उस वेदज्ञ का आनन्द भी जिस ने वेदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। यदि उस पुरुष के सौ आनन्द जो परलोकस्य है, एक स्थान पर जमा करें, तो वे उरा पुरुष के एक आनन्द के बराबर होते हैं जिस ने पुण्य कर्म द्वारा देवलोक को प्राप्त किया है और जिसे भाजानजदेव कहते हैं। [२] . -श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतभाजानजानां देवानामानन्दा. स एक: कर्मदेवानां देवानामानन्द:-ये कर्मणा देवानपि यन्ति-, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शतं कर्मदेवाना देवानामानन्दा. स एको देवानामानन्दः, श्रोनियस्य चाकामहतस्य। ते ये शत 'देवानामानन्दाः स एक इन्द्रस्यानन्दः, ॥३॥ अनु०-और वह कामनाओ से अनाक्रान्त थोत्रिय का भी। वे जो आजानज देवताओ के सो आनन्द हैं वही कर्मदेव' देवताओ का, जो (अग्निहोत्रादि] कर्म कर के देवलोक को जाते हैं, एक आनन्द है, और कामनाओ से अनाकान्त थोत्रिय का भी। वे जो कर्मदेव देवताओ के,सौ आनन्द है वही देवताओ का एक आनन्द है, और कामनाओसे अनाक्रान्त १'मानानज' वे देवता हैं जिन्हें जन्म से ही देवत्व प्राप्त है। २'कर्म-देई' अर्थात् म से देवत्व प्राप्त करने वाले देवता।

. 1 १८९ तैत्तिरीयोपनिषद् थोत्रिय का भी। वे जो देवताओ के सी आनन्द हैं वहीं इन्द्र का एक आनन्द है, (३) सि.ब.-उस वेदज्ञ का आनन्द भो जिस ने देदाध्ययन कम के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। यदि कर्मदेव के सो यानन्द एक जगह जगा करें तो वे उन देवताओं के एक आनन्द के बराबर होते हैं जो अपने स्वरूप से देवता बन गये हैं। उस वेदज्ञ का आनन्द भी जिस ने वेदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुमार होता है। यदि उन देवताओं के सौ आन द एक जगह जमा किये जायें जो अपने स्वरूप से देवता बन गय हैं तो वे देवराज इन्द्र के एक आनन्द के बराबर होते हैं । [३] -श्रोत्रियस्य, चाकामहतस्य । ते ये शतमिन्द्रस्यानन्दाः स एको बृहस्पतेरानन्दः, थोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शत बृहस्पतेरानन्दाः स एक. प्रजापतेरानन्दः, श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य । ते ये शत प्रजापतेरानन्दा. स एको ब्रह्मण आनन्दः, थोत्रियस्य चाकामहतम्य ॥ ४ ॥ अनु०-सथा कामनाओ से अनाकान्त श्रोत्रिय का भी। इन्द्र के जो सौ आनन्द हैं वही बृहस्पति का एक आनन्द है, और कामनाओ से अनाकान्त थोत्रिय का भी। वृहस्पति के जो सौ आनन्द हैं वही प्रजापति का एक आनन्द है, और कामनाओ से अनाकान्त थोत्रिय का भी। प्रजापति के जो सो आनन्द है वही ब्रह्मा का एक आनन्द है, और कामनाओ से अनाकान्त श्रोत्रिय का भी। (४)' सि०अ०-उस वेदश का आनन्द भी जिग ने वेदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। यदि इन्द्र के सौ आनन्दों को एक जगह जमा करें तो वे सदगुरु वृहस्पति के एक आनन्द के बराबर होते हैं। का आनन्द भी जिम ने वेदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। यदि वृहस्पति के सौ आनन्दो को एक जगह जमा करें, तो वे प्रजापति के एक आनन्द के बराबर होते हैं। उस वेदज्ञ का आनन्द भी जिस ने वेदाध्ययन कर्म के फल की इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुमार होता है। यदि १ तुलनीय बृहदारण्यकोपनिषद ४.३ ३३. लोकों के ऋमिक उत्कर्षागकर्ष के लिए बृहदारण्यकोपनिषद् ३.६.१ और कौषीतकिब्राह्मणोपनिषद् १.३ मी द्रष्टव्य है । उस वेदज्ञ , १९.] सिर अक्बर (फारसी) प्रजापति के सौ आनन्दो को एक जगह जमा करें तो वे हिरण्यगर्भ के एक भानन्द के बराबर होते हैं। उस वेदश का आनन्द भी जिस ने वेदाध्ययन वमं के फ्ल को इच्छा से नहीं किया है इसी के अनुसार होता है। [४] –स यश् चाय पुरुपे यश् चासावादित्ये स एकः । स य एवविदस्माल् लोकात् प्रेत्य एतमन्नमयमात्मानमुपसकामति, एत प्राणमयमात्मानमुपसकामति, एत मनोमयमात्मानमुपसकामति, एतं विज्ञानमयमात्मानमुपस कामति, एतमानन्दमयमात्मानमुपसका- मति। तदप्येष श्लोको भवति ॥ ५॥ अनु०-वह यह जो इस[पञ्चकोशात्मक] पुरुष मे है और जो यह आदित्य में है, एक है। वह जो इस प्रकार जानने वाला है, इस लोक से निवृत्त हो कर इस अन्नमय आत्मा को प्राप्त होता है, इस प्राणमय आत्मा को प्राप्त होता है, इस मनोमय आत्मा को प्राप्त होता है, इस विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त होता है, इस आनन्दमय आत्मा को प्राप्त होता है। उसी के विषय मे श्लोक है-(५) सि.अ.-ब्रह्म ना भानन्द जो मानन्दमय है, पुरुष का आनन्द जो पुरुष का आनन्द को सूर्य में है, ये सभी आनन्द एक आनन्द हैं। जो कोई इस आनन्द को इस प्रकार जानता है वह ससार के बघन से मुक्त होकर अपने अन्नमय कोश सहित जो साक्षात् शरीर है सभी रासार को एक जानता है, अपन प्राणमय कोश सहित जो साक्षात् प्राण ही है सभी रासार यो एक जानता है, अपने मनोमय कोश सहित जो साक्षात् मन ही है ससस्त ससार को एक जानता है, अपने विज्ञानमय कोश सहित जो साक्षात् विज्ञान हो है और वेदानुसारी है समस्त ससार को एक जानता है, अपने आनन्दमय कोश सहित जो साक्षात् आनन्द ही है समस्त ससार को एक जानता है, और जो सत्ता आनन्दस्वरूप है उसे एकीभूत कर के निर्भय हो जाता है। इसी के अनुसार एक अन्य वेदमन में भी उल्लिखित है-[५] नवमोऽनुवाक 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह । आनन्द ब्रह्मणो विद्वान् न विभेति कुतश्चन' इति । १तुलनीय २..। यह हृदय मे है, वैत्तिरीयोपनिषद् [ १९१ एत ह वाव न तपति–किमहर्क साधु नाकरयम् किमह पापमकरवम् ? इति । स य एव विद्वानेते आत्मान, स्पृणुते, उभे ह्येवेष एते आत्मान, स्पृणुते य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥१॥ अनु०-जहाँ से, न पा कर, मन सहित वाणी लौट आती है उस ब्रह्म के आनन्द को जानने वाला किसी से भी भयभीत नहीं होता। उस [विद्वान्] को यह विचार सताप नहीं देता-मैं ने शुभ क्यो नहीं किया ? पापमं क्यों कर डाला? जो ऐसा जानता है वह अपने को इन दोनो चिन्ताओ से मुक्त कर लेता है, निश्चय इन दोनो चिन्ताओ से अपने को मुक्त कर लेसा जो ऐसा जानता है। ऐसी यह उपनिषद् (रहस्यविद्या) है। (१) सि० अ० जो कोई ब्रह्म के विशुद्ध आनन्द को जान लेता है, जिस तक वाणी नहीं पहुंच सकती और मन नहीं पहुंच सकता, वह किसी से नहीं डरता, निर्भय हो जाता है। पुण्य कर्म ची इच्छा और पाप कर्म से भय उस ज्ञानी को कष्ट नहीं देते, क्योकि शानी और ब्रह्मवेत्ता पुण्य और पाप दोनों को आत्मा जानते हैं। जो कोई ऐसा जानता है, वह पुण्य और पाप से [मुक्त हो कर] आत्मा हो जाता है। यह उपनिषद् का वचन है, अर्थात् गोपनीय रहस्य है । [१] 11 इति ब्रह्मानन्दवल्लो ॥

इति । १९२] सिर.अकबर (फारसी) भृगुवल्ली प्रथमोऽनुवाक: भृगुर् वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार-'अधीहि भगवो ब्रह्म तस्मा एतत् प्रोवाच-'अन्न, प्राणं, चक्षुः, श्रोत्रं, मनो, वाचम्' इति । तथं होवाच-'यतो वा इमानि ' भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत् प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद् विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्म' इति । स तपोऽतप्यत। स तपस् तप्त्वा-॥ १ ॥ अनु० -वरुण का पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के पास गया [और बोला-] 'भगवन् ! मुझे ब्रह्म का ज्ञान दीजिए ।' उस से [वरुण ने] यह कहा-'अन्न, प्राण, नेन, थोर, मन, और वाक् ।' फिर उरा, से कहा-'जिस से निश्चय ही ये सब भूत उत्पन्न होते है, उत्पन्न हो कर जिरा ये जीवित रहते है, विनाशोन्मुख हो कर जिस मे ये तीन होते है, उसे विशेषरूप से जानने की इच्छा कर, वही ब्रह्म है।' तब उस (भृगु), ने तप किया और उस ने तप कर के-(१) सि०अ०-वरुण का पुत्र पिता के पास गया और बोला-'भगवन् । मुझे ब्रह्म का बोध कराइए।' पिता ने उस से कहा कि भन्न, प्राण, चा, धोन, मन, वाणी- पे छह वस्तुएँ ब्रह्म की प्राप्ति के साधन हैं। इस के पश्चात् उन्हो ने कहा कि जिस से समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, जिस से जीवित रहते हैं, और जिस मे लीन हो जाते हैं वही ब्रह्म है। उसी की जिज्ञासा कर और तप कर, क्योकि ब्रह्म की प्राप्ति का साधन तप ही है। भृगु नै तप किया और इन्द्रिय-निग्रह किया। [१] द्वितीयोऽनुवाक -अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात् । अन्नाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, अनेन जातानि जीवन्ति, अन्नं प्रयन्त्यभि- संविशन्तीति । तद् विज्ञाय पुनरेव वरुणं पितरमुपससार- 'अधीहि भगवो ब्रह्म इति । तथं होवाच-'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्म' इति । स तपोऽतप्यत । तप्त्वा-1॥१॥ . - . स तपस् तैतिरीयोपनिषद् [ १९३ अनु०-अन्न ब्रह्म है-ऐसा जाना, क्योकि निश्चय अन्न से हो ये सब प्राणी उत्पन्न होते है, उत्पन्न हो कर अस से ही जीवित रहते हैं, प्रयाण करते समय अन्न मे ही लीन होते हैं। ऐसा जान कर वह फिर [अपने] पिता वरुण के पास आया [और कहा-1 "भगवन् । मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' [वरुण ने] उस से कहा-'ब्रह्म वो तप के द्वारा जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है।' उस ने तप किया और उस ने तप कर के-(१) मि० अ०-~जाना रि अन्न ही ब्रह्म है। उमी से समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उसी मे जीवित रहते हैं, और उसी मे लीन हो जाते हैं। यह जान कर [भृगु ने] मन मे सोचा कि अन्न उत्पन्न [वस्तु] है, और कि जो वस्तु उत्पन्न हुई है यह यंसे ब्रह्म हो सकती है। [वह] पुन पिता के पास नापा और बोसा कि हे भगवन् । मुझे ब्रह्म का बोध कराइए । पिता बोले कि ब्रह्म-प्राप्ति का साधन तप है। तप कर, क्योकि ब्रह्म प्राणि का साधन तप है। भृगु ने पुन तप प्रारम्भ किया । [१] तृतीयोऽनुवाक -प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात् । प्राणाद्धयेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, प्राणेन जातानि जीवन्ति, प्राण प्रयन्त्यभि- सविशन्तीति । तद् विज्ञाय पुनरेव वरुण पितरमुपससार- 'अधीहि भगवो ब्रह्म' इति । तई होवाच-'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्म' इति । स तपोऽनप्यत । स तपस् तप्त्वा-॥१॥ अनु०-प्राण यह है-ऐसा जाना, क्योकि निश्चय प्राण से ही ये प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न हो कर प्राण से ही जीवित रहते हैं, और मरणोन्मुष होने पर प्राण में ही लीन हो जाते हैं । ऐगा जान कर वह फिर [अपने] पिता वरुण के पास आया [और बोला-] 'भगवन् । मुझे ब्रह्म का उपदेश वीजिए।' उस से [वरण ने] वहा-'तू तप से ब्रह्म पो जानने की इच्छा पर। तप ही ब्रह्म है।' तब उस ने तप किया और उस ने तप कर दे-(१) मि.--[उत ने माना कि यही प्राण प्रहा है। उसी ऐसभी प्राणी उत्तम होते हैं, उगी मे जीवित रहते हैं. उमो मे सीन हो गई है। यह बात र T . स तपस् गिर सक्यर (पारसी) [उग ने] गा म सोचा कि प्राण उप [पातु] है और वि जो वस्तु उत्पन्न हुई है वह रा बैग हो सरती है ? [वह पुन पिता के पाग आया और बोला कि भगवन मुमै जना ना बाध कराया। पिता वो पि ब्रह्म मानि का साधा तप है। तप कर, मोफि ब्रह्म प्राप्ति का माधन तप है। भृगु ने पुन तप आरम्भ दिया। [१] चतुर्थोऽनुवाक --मनो ब्रीति व्यजानात् । मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, मनसा जातानि जीवन्ति, मन प्रयन्त्यभि- सविश-तीति । तद् विज्ञाय पुनरेव वरुण पितरमुपससार-- 'अधीहि भगवो ब्रह्म' इति । तय होवाच-'तपसा ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्म, इति । स तपोनप्यत । तप्त्वा-१॥ अनु०-मन ब्रह्म है-एसा जाना, क्याकि निश्चय मन से ही ये जीव उत्पन्न होत हैं, उतान हो कर मन के द्वारा ही जीवित रहत हैं, और प्रयाण करते हुए मन म ही लीन हो जाते हैं। एसा जान कर वह फिर पिता वरुण के पास गया [और चोला-] मगवन कीजिए।' [वरुण ने] उस से यहा-तू तप से ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है। तव उस ने तप पिया और उस ने तप करके-(१) शि.अ.-[उम न} जाना नि यही मन ब्रह्म है। उसी से समस्त प्राणी उत्पन होते हैं उसी गे जीवित रहते है और उसी मे सोन हो जाते हैं। यह जान कर [उम ने] मन में सोचा कि मन उपन [वस्तु] है और जो कि वस्तु उत्पन्न हुई है वह नहा कसे हा सकती है। वह पुन पिता के पाम आया और बोला कि हे मुथ ग्रहा का बोध कराइए। पिता वोत कि ब्रह्म प्राप्ति का साधन तप है। तप कर क्यापि वहा प्राप्ति का माधन तप है। भृगु ने पुन तप मारम किया। [१] पञ्चमोऽनुवाक -विज्ञान ब्रह्मेति व्यजानात् । विज्ञानाद्धयेव खल्विमानि विज्ञानेन जातानि जीवन्ति, विज्ञान प्रयन्त्यभिसविशन्तीति । तद् विज्ञाय पुनरेव वरुण पितर- मुपरासार-नधीहि भगवो ब्रह्म इति । तय होवाच-तपसा मुझ ब्रह्म का उपदेश भगवन। भूतानि जायन्ते स तैत्तिरीयोपनिषद् १९५ ब्रह्म विजिज्ञासस्व, तपो ब्रह्म' इति । स तपोजप्यत । तपस् तप्त्वा-॥१॥ अनुभ-विज्ञान ब्रह्म है-ऐसा जाना, क्योकि निश्चय विज्ञान से ही ये सब जीव उत्पन्न होते है, उत्पन हो कर विज्ञान से ही जीवित रहते है, और मरणोन्मुख हो कर विज्ञान मे ही लीन हो जाते है। ऐसा जान कर वह फिर पिता वरुण के समीप आया [और बोला-] 'भगवन् । मुझे ब्रह्म का उपदेश कीजिए।' [वरुण न] उस मे कहा-'तू तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा वर । तप ही ब्रह्म है।' तब उस ने तप किया और तप कर के'-(१) मि० अ०--[उस ने] जाना कि यही विज्ञान ब्रह्म है। उसी में समस्त प्राणी उत्पन होते है उसी से जीवित रहते हैं और उसी म लीन हो जाते हैं। उम ने यह जान कर मन मे सोचा कि विज्ञान उत्पन्न बस्तु है और कि जो वस्तु उत्पन हुई है वह ब्रह्म कैसे हो सकती है ' [वह फिर पिता के पास आपा और वाला कि हे भगवन् । मुमें ब्रह्म का बोध कराइए । पिता बोले कि ब्रह्म प्राप्ति का साधन तप है। तप कर, क्योकि ब्रह्म प्राप्ति श माधन तप है। मृगु न पुन तप आरभ पप्ठोऽनुवाक -आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् । आनन्दायेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते, आनन्देन जातानि जीवन्ति, आनन्द प्रयन्त्यभि- सविशन्तीति । सपा भार्गवी वारुणी विद्या परमे व्योमन् स य एव वेद, प्रतितिष्ठति, अन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति, प्रजया, पशुभिर्, ब्रह्मवर्चसेन, महान् किया। [१] प्रतिष्ठिता। कीर्त्या ॥ १॥ अनु०-आनन्द ब्रह्म है-ऐसा जाना, क्योकि आनन्द से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते है, उत्पन हो कर आनद के द्वारा ही जीवित रहते हैं, और प्रयाण करने समय आनन्द म ही समा जाते है। वह यह भृगु की [जानी हुई] और वरुण की [उपदेश की हुई] विद्या परमाकाश म १ अनुवाक २.६ में प्रतिपादित पम्च-कोश-अनमय प्राणमय, मनोमय, विज्ञानगम, और यानन्दमय-नाबीज अथववेद १०२ २७ म अन्न प्राण, मन, शिर और देवकोश के रूप में विद्यमान है। अथर्वयेद १०२३१-३२ म 'देव कोश को हिरण्य-को पहा गया है।

सिर अक्चर (झारसी) स्थित है। जो ऐसा जानता है वह [ब्रह्म मे] स्थित होता है, वह अन्नवान् और अन्न का भोक्ता होता है, प्रजा, पशु, और ब्रह्मतेज के कारण महान होता है, कीति के कारण भी महान् । (१) सि० भ०--[उस ने] जाना कि केवल आनन्द ही ब्रहा है। उसी से समस्त प्राणी उत्पन होते हैं, उसी से जीवित रहते हैं, और उसी में लीन हो जाते हैं। यह जान पर और केवल आनन्द मे लीन हो कर इस ब्रह्मविद्या को भृगु ने उच्चतर लोकों में प्राप्त किया । जो कोई इस ब्रह्मविद्या को उसी मार्ग से जानता है जिस से भृगु ने तप और इन्द्रिय-निग्रह कर के जाना था, वह केवलानन्द-स्वरूप ब्रह्म हो जाता है और उसे प्रभूत अन प्राप्त होता है, वह उतम अन्न का भोक्ता होता है, उसे सन्तान और हाथी-घोडे बहुत होते हैं, उस के मुख से ज्ञान का प्रकाश फूटता है, और महान कीति वाला होता है। [१] सप्तमोऽनुवाक: अन्न न निन्द्यात् । तद् व्रतम् । प्राणो वा अन्नम्, शरीरमन्नादम् । प्राणे शरीर प्रतिष्ठितम्, शरीरे प्राणः प्रतिष्ठितः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदन्नमन्ने प्रतिष्ठित वेद, प्रतितिष्ठति, अन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति प्रजया, पशुभिर्, ब्रह्मवर्चसेन, महान् कीर्त्या ॥ १ ॥ अनु०-अन्न की निन्दा न करे। यह व्रत है। प्राण ही अन्न है और शरीर अन्नाद है। प्राण मे शरीर स्थित है और शरीर में प्राण स्थित है। इस प्रकार ये अन्न ही अन्न मे प्रतिष्ठित है। जो इस प्रकार अन्न को अन्न मे प्रतिष्ठित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान् और अन्नभोक्ता होता है, प्रजा, पशु, और ब्रह्मतेज के कारण महान होता है, कीति के कारण भी महान् । (१) सि. २०-जो कोई इस कार्य म लगा हुआ है उसे चाहिए कि अस को निन्दा कदापि न करे। चूंषि प्राण साक्षात् अन है, शरीर बन का मोक्ना है, शरीर प्राण से टिका हुआ है, और प्राण शरीर से टिका हुआ है अतएव दोनों एक दूसरे के अन हैं। जो कोई जानता है कि दोना एक दूसरे से प्रतिष्ठित हैं वह भी प्रतिष्ठित हो जाता है, उसे प्रभूत अन प्राप्त होता है, वह उत्तम अन्न का भोक्ता होता है, उसे सन्तान और हाथी-घोडे बहुत होते हैं, उरावे मुख मे ज्ञान का प्रकाश फूटता है और वह महान कोति वाला होता है। [१] ।

तैत्तिरीयोपनिषद् [ १९७ अष्टमोऽनुवाक. अन्नं न परिचीत । तद् व्रतम् ! आपो वा अन्नम्, ज्योतिरन्नादम् । अप्सु ज्योतिः प्रतिष्ठिनम्, ज्योतिष्यापः प्रतिष्ठिताः। तदेतदन्नमन्ने प्रतिष्ठतम् । स य एतदनमन्ने प्रतिष्ठितं वेद, प्रतितिष्ठति; अन्नवानन्नादो भवति; महान् भवति प्रजया, पशुभिर्, ब्रह्मवर्चसेन, महान् कीर्त्या ।। १ ।। अनु०-अन्न का त्याग न करे। यह वत है। जल ही अन्न है, ज्योति अन्नाद है। जल मे ज्योति प्रतिष्ठित है, ज्योति मे जल प्रतिष्ठित है। इस प्रकार पह अन्न ही अन्न मे प्रतिष्ठित हैं। जो इस प्रकार अन्न को अन्न मे प्रतिष्ठित जानता है वह प्रतिष्ठित होता है, अन्नवान और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु, और ब्रह्मतेज को कारण महान् होता है, कीर्ति के कारण भी महान् । (१) सि० अ०-जो कोई इस कार्य में लगा हुआ है उसे चाहिए कि मन को कदापि न फेके। चूंकि जल साक्षात अन्न है, अग्नि अन्न का भोक्ता है, और मरिन जस मे रहती है और जल अनि में, अतएव ये दोनो एक दूसरे के अन्न हैं। जो कोई जानता है कि दोनो एक दूसरे से प्रतिष्टित हैं वह भी प्रतिष्ठित हो जाता है, उसे प्रभूत अन प्राप्त होता है, वह उत्तम बग्न का भोक्ता होता है, उसे सन्तान और हाथी-घोडे बहुत होते हैं, उस के मुख से ज्ञान का प्रकाश फूटता है, और वह महान् कीर्ति वाला होता है। [१] नवमोऽनुवाक अन्न बहु कुर्वीत । तद् व्रतम् । पृथिवी वा अन्नम्, आकाशोऽनाद'। पृथिव्यामाकाशः, प्रतिष्ठितः, आकाशे पृथिवी प्रतिष्ठिता। तदेतदनमन्ने प्रतिष्ठितम् । स य एतदनमन्ने प्रतिष्ठितं वेद, प्रतिष्ठिति; अन्नवानन्नादो भवति, महान् भवति, प्रजया, पशुभिर्, ब्रह्मवर्चसेन, महान कीा ॥१॥ अनु०-अम को बहावे। यह अत है। पृथिवी से अम है, आवारा अन्नाद है। पृथिवी मे आपाश प्रतिष्ठित है और आकाश में पृथिवी प्रतिष्ठित है। इस प्रकार यह अन्न ही अन्न में प्रतिप्टिन है। जो इस प्रचार अग्न को अन्न में प्रतिष्ठिन जानता है वह प्रतिष्ठिन होता है, अनवान् १९८] सिरे अक्बर (फारसी) और अन्नाद होता है, प्रजा, पशु, और ब्रह्मतेज के वारण महान् होता है, कीति के कारण भी महान् । (१) सिं० १०-चाहिए कि अपने लिए प्रचुर मान प्राप्त परे। पृपियो भन्न है, भूतावाश अन का भोक्ता है, और भूतानाश पृथ्वी के भीतर है और पृथ्वी भूनाकाश के भीतर, अतएव ये दोना एक दूसरे का अन है। जो कोई जानता है कि दोनो एक दूसरे से प्रतिष्ठित हैं, वह भी प्रतिष्ठिा होता है, उसे प्रभूत अन प्राप्त होता है, वह उत्तम अन वा मोक्ता होता है उसे सन्तान और हाथी घोहे यहत होते हैं, उस के मुख से ज्ञान का प्रयाश फूटता है, और वह महान कौति वाला हो जाता है । [१] दशमोऽनुवार न कञ्चन वसती प्रत्याचक्षीत । तद् व्रतम् । तस्माद् यया कया च विधया बन्न प्राप्नुयात् । आराध्यस्मा अन्नमित्याचक्षते । एतद् वं मुखतोऽन्न, राधम्, मुखतोऽस्मा अन्नछ राध्यते । एतद् वै मध्यतोऽन्नभं राद्धम्, मध्यतोऽस्मा अन्नई राध्यते । एतद् वा अन्ततोऽन्नई राद्धम्, अन्ततोऽस्मा अन्न राध्यते ॥१॥ अनु०-अपने यहाँ क्सिी अभ्यागत का प्रत्याख्यान (निषेध) न करे । यह व्रत है। अत विसी न-किसी प्रकार से बहुत सा अन्न प्राप्त करे। क्योकि वह [अन्नोपासक उस अतिथि] से 'मैंने अन्न तैयार किया है ऐसा वहता है। जो पुरुप मुखत सिद्ध किया हुआ अत देता है उसे मुखत ही अत की सिद्धि होती है। जो मध्यत सिद्ध किया हुआ अन्न देता है उसे मध्यम वृत्ति से ही अन की सिद्धि होती है । जो अन्तत सिद्ध किया हुआ अन्न देता उसे निकृष्ट वृत्ति से ही अन की सिद्धि होती है । (१) शि० अ०-वह निश्चय करता है कि जो काई उस के घर आयेगा वह उस कहेगा, 'सन्न उपस्थित है , दि उसे मना नही करेगा कि उम मा ध्यान रखेंगा, और कि जैसे भी प्रचुर अन पहुंच सकता है पहुंचायेगा। जो कोई जिम रीति से किसी को अस पहुंचाता है वह आवश्यकता पड़ने पर उसी रोति स अन प्राप्त वरता है। यदि जग ने उराम रीति गा दिया है ना उत्तम रीति स पायेगा और यदि अधम रीति से दान क्रिया है तो अधम रीनि में पायगा। [१] से , तंत्तिरीयोपनिषद् [ १९९ य एव वेद । क्षेम इति वाचि, योगक्षेम इति प्राणापानयोः, कर्मेति हस्तयो, गतिरिति पादयो., विमुक्तिरिति पायो-इति मानुपी. समाजा। अथ देवी.-तृप्तिरिति वृष्टी, बलमिति विद्युति, ॥ २॥ अनु०-जो इस प्रकार जागता है। वाणी में क्षेम (प्राप्त वस्तु के परिरक्षण रूप से, योगक्षेम रूप से प्राण और अपान मे, वर्मरूप से हाथो गे, गतिरूप से चरणो मे, त्यागरूप से पायु मे-यह मानुपी उपासना है । अब देवी उपासना कही जाती है-तृप्तिरूप से वृष्टि मे, वलरूप रो विद्युत् मे, (२) सि० अ०-जो शक्ति वाणी मे है, जो शक्ति प्राण और अपान में है हाप मी पार और पांव की गति में है, जो शक्ति पायु मे है, नाहिए कि उसे भी ब्रह्म जानवर उपासना करे। यह उपासना अध्यात्म है, अर्थात् शरीर में ध्यान । प्राणियो को वर्षा से जो सुख मिलता है चाहिए कि उसे मी ब्रह्म जान कर उपासना करें। विद्युत् मे जो चमक है, चाहिए कि उसे भी ब्रह्म जागर उपासना करें। [२] -~-यश इति पशुपु, ज्योतिरिति नक्षत्रेषु, प्रजातिर- मृतमानन्द इत्युपस्थे, सर्वमित्याकाशे। तत् प्रतिष्ठेत्युपासीत, प्रतिष्ठावान् भवति । तन् मह इत्युपासात, महान् भवति । तन् मन इत्युपासीत, मानवान् भवति ।। ३ ।। अनु०-यश घे रूप में पशुओ में, ज्योति के रूप से नक्षत्रो में, पुतादि प्रजा, अमृतत्य, और आनन्दरूप से उपस्थ मे, तथा सर्वरूप से आरश में वह मह्म सर की प्रतिष्ठा (भआधार) है-इस भाव से उपासना करे । से [उपासब] प्रनिष्ठावान होता है। वह मह [नामा व्याहृति अथवा तेज] है-इस भाव मे उपासना परे। इस से [उपासर] महान् होता है। यह मन है-इस प्रकार उपासना करे। इस से [उपासर] मानवान् (मनन परने में समर्थ) होता है। (३) सि.अ.---धन धान्य मे जो या है, नक्षत्रो में जो प्रकाश है, स्त्री के सयोग में पो आनन्द है, भाग्यवान पुत्र की प्राणि मे जो आनन्द है-जो पुत्र पिता की मृत्यु में पश्चात् पिता की कामना पूर्ण वरना है-, और उग गमय जो पावर प्राप्त होता है, भूतारा जो परमो स्पिति वा आधार है [उम के द्वारा ग्रह्म गो गागा परे] ।

तद् ब्रह्मण. परिमर २००] सिरे अवयर (पारसी) यदि [पोई] ब्रह्म वो मर की स्थिति का आधार जानकर उपासना परे तो वह सब की स्थिति का आधार हो जाता है, यदि ब्रह्म को महान् जान पर उपासना करे तो सव मे महान होता है, यदि ग्रह्म को मन जानवर उपासना करे तो जान-विज्ञान-पूर्वर मात्मा को जानता है । [३] तन् नम इत्युपासीत, नम्यन्तेऽस्मै कामाः। तद् ब्रह्मेत्युपासीत, ब्रह्मवान् भवति । इत्युपासीत, पर्येण नियन्ते द्विपन्त. सपना , परि येऽप्रिया भ्रातृव्या । स यश् चाय पुरुपे यश् चासावादित्ये स एकः ॥४॥ अनु०-वह नम है-इस भाव से उपासना करे। इस से काम्य पदार्थ उस के प्रति विनम्र हो जाते हैं। वह ब्रह्म है-इस प्रकार उपासना करे। इस से वह ब्रह्मनिष्ठ होता है। वह ब्रह्म का परिमर है-इस प्रकार उपासना करे। इस से उस से द्वेष करने वाले उस के प्रतिपक्षी मर जाते है, [तथा वे भी] जो अप्रिय भ्रातृष्य (भाई के पुत्र) होते है । वह जो इस पुरुप मे है और वह जो इस आदित्य मे है एक है । (४) सि० अ०~जो कोई इसी ब्रह्म को नमस्य जानता है उस के प्रति सभी नमन करते हैं और कामनाएं भी उस के प्रति नमन करती है। जो कोई इसी ब्रह्म को स्वामी जानकर नमन करता है वह भी राव का स्वामी हो जाता है। जो कोई इसी ब्रह्म को महावाणु (परिमर) जानफर, जिस मे विद्युत्, वर्षा, चन्द्र, सूर्य, और अग्नि लीन हो जाते हैं, उपासना करता है उस के समक्ष भांति-भांति के शन्नु मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इस उपासना को लोक' कहते हैं, अर्थात् इन्द्रियो के देवताओ की उपासना । उस ब्रह्म को जिस के विषय में उल्लेख किया गया है कि सभी वस्तुओ को ब्रह्म जान कर उपासना करे-उस ब्रह्म को और मूर्य मै जो प्राश है तथा हृदय में जो प्रकाश है उसे एक जाने। [४] स य एववित्, अस्माल लोकात् प्रेत्य, एतमन्नमयमात्मान- मुपसड़कम्य, एत प्राणमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य, एत मनोमयमात्मान- मुपसङ्क्रम्य, एतं विज्ञानमयमात्मानमुपसङ्क्रम्य, एतमानन्दमय- मात्मानमुपसक्रम्य इमॉल लोकान् कामानी, कामरूप्यनुसञ्चरन्, एतत् साम गायनास्ते हा ३ वु, हा ३ वु, हा ३ ॥ ५ ॥ १ तुलनीय ऐतरेयजाह्मण ८२८, कौषीतक्युपनिषद २१२। ।

ततिरोयोपनिषद् [ २०१ अनु०-वह जो इस प्रकार जाननेवाला है इस लोक से निवृत्त हो.पर, इस अन्तमय आत्मा को सक्रान्त कर, इस प्राणमय ,आत्मा को सक्रान्त कर, इस मनोमय आत्मा को सक्रान्त कर, इरा विज्ञानमय आत्मा को सक्रान्त कर, इस आनन्दमय आत्मा को सक्रान्त कर, इन लोको में कामान्नी (कामचारी) और वामरूपो हो कर विचरता हुआ यह सामगान करता है-हा ३ वु, हा ३ वु, हा ३ वु। (५) सि०अ०- अन्नमय कोश को गो अन्न ही है समस्त जगत् के स्थूल शरीर के साथ, प्राणमय कोश को जो प्राण ही है समस्त जगत् के प्राण के साथ, मनोमय कोश को जो मन ही है ममस्त जगत के मन के साथ, वेदानुसारी विज्ञानमय कोश को जो विज्ञान ही है समस्त जगन् के विज्ञान के गाप, और अपने आनन्दमय कोश को बो आनन्द ही है समस्त जगत के आनन्द के माय एक जाने, समस्त लोको को आत्मा जान कर और आत्मा हो कर जगत मे रहे, और बस 1 ] सारे अन्न उस के अन्न हो जायेंगे और वह जो रूप चाहे धारण कर सकेगा। और वह इस मत को जो साक्षात् ब्रह्म है सदा ध्वनि- पूर्वक गाये-हा ३ वु, हा ३ दु, हा ३ बु । [५]' अहमन्नमहमन्नमहमन्नम्, अहमन्तादो३,ऽहमन्नादो३,ऽहम- न्नाद , अहई श्लोककृदहाई प्रलोककृदछ श्लोककृत् । अहमस्मि प्रथमजा ऋता इस्य, पूर्व देवेभ्योऽमृतस्य ना३भायि । यो मा ददाति स इदेव मा३वा. । अहमन्नमन्नमदन्तमाइनि। अह विश्व भुवनमभ्यभवा३म् । सुवर् न ज्योती. य एवं वेद । इत्युपनिषत् ॥ ६ ॥ अनु०-मैं अन्न (भोग्य) हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं ही अनाद (भोक्ता) हूँ, मै ही अन्नाद हूँ, मैं ही अन्नाद हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ, मैं ही श्लोककृत् हूँ। मैं ऋत (सम्यक् सृष्टि) में प्रथम जन्मधारी हूँ, देवताओ से पूर्व अमरत्व का केन्द्रस्वरूप। जो [अन्नस्वरूप] मुझे [अन्नार्थियो को] देता है वह इस प्रकार मेरी रक्षा करता है । [जो मुझ अनस्वरूप को दान न करता हुआ स्वय भोगता है उस] अन्न भक्षण १ सिरे अकबर' में मत्र ५ और मिला दिये गये हैं। अनुवाद में इन्हें पृथक कर दिया गया है।

२०२] सिरें अनबर (फारसी) करने वाले को मैं अन्नरूप से भक्षण करता हूं। मैं इस सम्पूर्ण भुवन को अभिभूत करता हूँ। जो इस प्रकार जानता है उसे सूर्य के समान प्रकाश प्राप्त होता है। ऐसी यह उपनिषद् [ब्रह्मविद्या] है। (६) सि.न.-मैं अन्न, मैं अन, मैं अन, मैं अन्न का भोक्ता, मैं अन का भोक्ता, मैं अन्न का भोक्ता, मैं सर्वकर्ता, मैं सर्वकर्ता, मैं सर्वकर्ता, मैं समस्त साकार और निराकार में प्रथम, मैं समस्त देवताओं में प्रथम, मैं समस्त अमरताओ का मूल | मैं अन्न हूँ। जो कोई बहुत देता है उस ने मुझे उत्तम रीति रो दिया, जो कोई मुगेन दे कर अकेले खाता है यह मुझे नहीं पाता, मैं उसे पाता हूं। मैं समस्त जगत् हूँ, और जिस लोक मे ममी दसते मैं उस का अभिभव करता हूं। जो कोई मुझे इस प्रकार जानता है वह सूर्य के समान तेजस्वी और ज्योतिर्मय हो जाता है। यह गोपनीय रहस्य उपनिषद् है । [६] - ॥ इति भृगुवल्ली ॥ शान्तिपाठ ॐ श नो मित्र., श वरुण, श नो' भवत्वयंमा, श न इन्द्रो वृहस्पति , श नो विष्णुरुरुकुमः । नमो ब्रह्मणे । नमस् ते वायो ! त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रह्मासि .! त्वामेव प्रत्यक्ष ब्रह्म वदिप्यामि, ऋत वदिष्यामि, सत्य वदिष्यामि । तन् मामवतु, तद् वक्तारमवतु । अवतु माम्, अवतु वक्तारम् । ॐ शान्ति. | शान्ति, !! शान्ति: ।।! ॥ इति तैत्तिरीयोपनिषत् समाप्ता । १ तुलनीप-ऋग्वेद १०.११७६, अथर्ववेद ३.२४ ५, रातपषमाण ११.५.६.२ मनुस्मृति ३८१, ११७११८; मनुपरिशिष्ट, पृ ५, गीता ३१३, धीमदभागवत 13 ऐतरेयोपनिषद् ॐ वाड (ऋग्वेदीयतरेयारण्यक २ ४-६) शान्तिपाठ मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् । आविरावीर् म एधि । वेदस्य म आणीस्थ । श्रुत मे मा प्रहासी । अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋत वदिष्यामि, सत्य' वदिप्यामि। तन् मामवतु, तद् वक्तारमवतु। अवतु मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ।। ॐ शान्ति ! शान्ति ।। शान्ति ।।। अनु०-मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में स्थित हो। तुम मेरे समक्ष आविर्भूत होओ। तुम मेरे प्रति वेद को लाओ। मेरा श्रवण किया हुआ नष्ट न हो। अपने इस अध्ययन के द्वारा मैं रात और दिन को एक कर दूं। मैं ऋत बोलूंगा, सत्य बोलूंगा। वह मेरी रक्षा करे, वह वक्ता की रक्षा करे, वक्ता की रक्षा करे। त्रिविध ताप की शान्ति हो। प्रथमोऽध्यायः प्रथम खण्ड ॐ आत्मा वा इदमेक एवान आसीत् ।' नान्यत् विश्चन मिपत्। स ईक्षत-लोकान्नु सृजा इति ॥ १ ॥ १ यह वाक्य वृहदारण्यकोपनिषद् { ४१ में भी आता है।

. २०४] शिरें अनवर (पारसी) अनु०-पहले यह [जगत्] एक मात्र आत्मा ही था, अन्य कुछ सक्रिय नही था। उस ने ईक्षण (विचार) किया-लोको की रचना करूं। (१) मि० अ०–समस्त सृष्टि ये पूर्व आरमा अपना पा, अन्य कुछ नहीं था । आत्मा ने इच्छा की कि जगत् को करूं। [१] स इमाल् लोकानगृजत-अम्भो, मरीचीर्, मरमापः। अदोऽम्भः, परेण दिवं, द्यौः प्रतिष्ठा; अन्तरिक्ष मरीचयः; पृथिवी मर, या अधस्तात् ता आपः ॥ २॥ अनु०--उस ने इन लोको की रचना की-~-अम्भ, मरीचि, मर, और आप 1 'अम्भ' यह है जो धुलोक से परे है और धूलोक जिस की प्रतिष्ठा (आथय) है, अन्तरिक्ष 'मरीचि है। पृथिवी 'मर' है; और जो नीचे है वह 'आप' है । (२] सि०अ०-[उस ने] इन ममस्त लोको को उत्पल किया। पहले उस ने चार सप्ताएं रची-अम्भ, मरीचि, मर, और आप। अम्भ जल है, जिस का आश्रय. स्थान धुलोक के परे है। मरीषि अन्तरिम-लोक है, जो धुलोक के नीचे है. मर पृथ्वी- लोक है, जहाँ प्राणी मरते हैं, आप जल है, ओ पृथ्वी-लोक के समस्त तलो के नीचे रहता है। [२] स ईक्षत-इमे नु लोका, लोकपालान्नु सृजा इति । सोऽद्भच एव पुरुप समुद्धृत्यामूर्छयत् ॥ ३ ॥ उस ने ईक्षाण (विचार) किया-'ये तो लोक हुए, अब लोकपालो की रचना करू। उस ने जल ही से पुरुष निकाल कर अवयवयुक्त किया । (३) मिस–पुन उम ब्रह्म न इच्छा की कि इम जगत की तो मैं मृप्टि कर चुका, अब इम के पाला की भी सृष्टि र, ताकि पालकों के अभाव मे जगत निखर न जाय । अतएव उम ने इच्छा वी नि लोपालों की भृष्टि करूं जो जगत् वे पातक हैं। उस ने] जल भ न एक लक्षवाहित विराट् पुल निकाला ३] तमभ्यतपत् । तस्याभितप्तस्य मुख निरभिद्यत यथाऽण्डं, मुखाद् वाग्, वाचोऽग्नि ; नासिके निरभिद्येता, नासिकाभ्या प्राण., प्राणाद् वायु, अक्षिणी निरभिद्यतामक्षिभ्या चक्षुश्, चक्षुप चन्द्रमा, ऐतरेयोपनिपद [२०५ आदित्य , कणौं निरभिद्यता, कर्णाभ्या श्रोत्र, श्रोताद् दिश , त्वड निरभिद्यत, त्वचो लोमानि, लोमभ्य ओषधिवनस्पतय , हृदय निरभिद्यत, हृदयान् मनो, मनसश् नाभिर् निरभिद्यत, नाभ्या अपानो, पानान् मृत्यु , शिश्न निरभिद्यत, शिश्नाद् रेतो, रेतस आप ॥ ४॥ अनु०-उस [विराट पुरुष] के प्रति उस ने तप किया । उस तप्त [पिण्ड] से अण्डे के समान मुख निकला, मुख से वाक और वाक् से अग्नि, नासिकारन्ध्र निकले नासिकारन्धो से प्राण, और प्राण से वायु नेत्र निकले नेत्रो से चक्षु (चक्षुरिन्द्रिय) और चक्षु से आदित्य, कान निकले, कानों से श्रोनेन्द्रिय और श्रोन से दिशाएँ तत्चा निकली, त्वचा से लोम और लोमा से ओपधि वनस्पतिआ, हृदय निकला, हृदय से मन, और मन से च द्रमा नाभि निकली, नाभि से अपान, और अपान से मृत्यु, शिश्न निकला शिश्न से वीय और वीर्य से आप। (४) सि. अ.---उस के लिए ब्रह्म ने इच्छा की कि मुख उत्पन हो। टूट जाने योग्य अण्ड के समान मुख निकला। उस मुख से वाणी प्राप्त हुई और वाणी से वाणी का देवता अग्नि प्रकट हुआ। उस छिद्र के अनतर नासिका के दो छिद्र प्रकट हुए। नासिका से श्वास प्रश्वास प्रकट हुआ और श्वास प्रश्वास से श्वास प्रश्वास का देवता वायु प्रकट हुआ। उस छिद्र के अनतर दो नेन प्रकट हुए चक्षुरिद्रिय प्रकट हुई और चभु से चक्षु का देवता मय प्रकट हुआ। उस छिद्र के अनन्तर दो श्रोत्र प्रकट हुए श्रोत से श्रोदिय प्रकट हुई और श्रोनन्द्रिय से श्रोत्रंद्रिय को देवता दिशाएँ प्रकट हुइ। उस के अन तर उम की त्वचा से स्पर्शद्रिय प्रकट हुई शरीर के लोम उत्पन्न हुए और उन स ओपधि बनस्पतिओं प्रकट हुइ। उस के अन तर हृदय प्रकट हुआ। उस के पश्चात हृदय म मन प्रकट हुआ और मन से उस का देवता चद्रमा प्रस्ट हुआ। उस के अनन्तर नाभि प्रकट हुई जिस के चारो ओर घाण और अपान परस्पर आयद्ध हैं। उम के अनतर मलमूनोत्सग के दो अवयव प्रकट हुए उम दे अन तर प्रजननेन्द्रिय प्रक्ट हुइ और उस से वीय प्रकट हुआ और उस वीय से उस का देवता जल प्रकट हुआ। [४] ।। इति प्रथमाध्याये प्रथम खण्ड ॥

सिर अवयर (फारसी) द्वितीय खण्ड ता एता देवता सृष्टा अस्मिन् महत्यर्णवे प्रापतन् । तमशनायापिपासाभ्यामन्ववार्जत् । ता एनमब्रुवन्नायतन न. प्रजानीहि, यस्मिन् प्रतिष्ठिता अन्नमदामेति ॥ १॥ अनु०-वे ये (इस प्रकार] रचे हुए देवगण इस महासमुद्र में पड गये। उस [पिण्ड] को [परमात्मा ने] क्षुधा-पिपासा से संयुक्त पर दिया। [तब उन [इन्द्रियाभिमानी] देवताओ ने उस से कहा-हमारे लिए कोई आश्रयस्थान वतताइए, जिरा में स्थित हो कर हम अन्न भक्षण कर सकें। (१) मि० अ०-यही देवता जो उत्पन्न हुए लोका के पालर है, लोको की उत्पत्ति से भवसागर के बधन म पट गये क्षुधा और पिपारा के वशीभूत हो गये, और आत्मा से बोले कि हमारे लिए स्थान बतलाओ जहाँ रहकर हम अन जल ग्रहण करें । [१] ताभ्यो गामानयत् । ता अब्रुवन्--न 4 नोऽयमलमिति । ताभ्योऽश्वमानयत् । ता अब्रुवन्-न वै नोऽयमलमिति ॥ २ ॥ अनु०-उन देवताओ के लिए गाय ले आया। वे बोले-'बिल्कुल 'नहीं, मह हमारे लिए पर्याप्त नहीं है। [फिर वह] उन के लिए घोडा ले आया। वै वोले- बिल्कुल नहीं, यह [भी] हमारे लिए पर्याप्त नहीं' । (२) सिं० अ०--[उस ने] गाय की भाति प्रस्तुत की, जिरा में प्रवेश पर [व देवता] अन्न जन ग्रहण करें। देवता बोले कि यह हमारे योग्य नहीं है। [उस ने] घोडे की आकृति प्रस्तुत की, जिप्स मे प्रवेश कर [वे देवता] अन-जल ग्रहण करें। देवता बोले शि यह भी हमारे योग्य नहीं है। [२] ताभ्य पुरुपमानयत् । ता अब्रुवन्-सुकुत वतेति । पुरुषो वाव सुकृतम्। ता अब्रवीद्-यथायतन प्रविशतेति ॥३॥ अनु०-[तव वह ] उन के लिए पुरुष ले आया । व बोले-'यह सुन्दर बना है निश्चय पुरुप ही सुन्दर रचना है । [उस ने] उन से कहा--- 'अपने-अपने आयतन (आश्रयस्थान) म प्रवेश पर जाओ'। (३) , - 1 ऐतरेयोपनिषद् [ २०७ सि० अ०—उस के पश्चात् [उस ने] मनुष्य की आकृति प्रस्तुत की, जिस शरीर मे प्रवेश कर [वै] बन्न-जल ग्रहण करें। देवता बोले कि हम उत्तम आश्रय पा गये, क्योकि शुभ कर्मों का कर्ता इसी के सदृश होता है। उस के अनन्तर आत्मा ने देवताओ से कहा कि अपने-अपने आयतन में प्रवेश कर जाओ । [३] अग्निर् वाग् भूत्वा मुख प्राविशद्, वायु प्राणो भूत्वा नासिके प्राविशदादित्यश् चक्षुर् भूत्वाऽक्षिणी प्राविशद्, दिशः श्रोत भूत्वा कणों प्राविशन्नोषधिवनस्पतयो लोमानि भूत्वा त्वच प्राविशश्, चन्द्रमा मनो भूत्वा हृदय प्राविशन्, मृत्युरपानो भूत्वा नाभिं प्राविशदापो रेतो भूत्वा शिश्न प्राविशन् ॥ ४ ॥ अनु०-- अग्नि वाणी हो कर मुख मे प्रविष्ट हुआ, वायु प्राण हो कर नासिका-रन्धो मे प्रविष्ट हुआ, सूर्य चक्षुरिन्द्रिय हो कर नेत्रो मे प्रविष्ट हुआ, दिशाएं श्रवणेन्द्रिय हो कर कानो मे प्रविष्ट हुई, ओपधि और वनस्पति लोम हो कर त्वचा में प्रविष्ट हुई, चन्द्रमा मन हो कर हृदय मे प्रविष्ट हुआ, मृत्यु अपान हो कर नाभि में प्रविष्ट हुई, जल वीर्य हो कर शिश्न मे प्रविष्ट हुआ । (४) मि०२०-अग्नि देवता वाणी बन कर मुख मे प्रविष्ट हुआ, वायु देवता प्राण वन कर नासिका में प्रविष्ट हुआ, मूर्य देवता पक्षुरिन्द्रिय वनकर चक्षु में प्रविष्ट हुआ, दिग्देवता श्रोत्रेन्द्रिय बन कर श्रोत्र में प्रविष्ट हुआ, ओषधि-वनस्पति का देवता लोम बनकर त्वचा में प्रविष्ट हुआ, पद्र देवता मन बन कर हृदय में प्रविष्ट हुआ, मृत्यु का देवता अपान बनकर नाभि में प्रविष्ट हुआ, और जल का देवता वीर्य बनकर उपस्थेन्द्रिय मे प्रविष्ट हुना। [४] तमशनायापिपासे अबूतामावाभ्यामभिप्रजानीहीति। ते अब्रवीदेतास्वेव वा देवतास्वाभजाम्येतासु भागिन्यो करोमीति । तस्माद् यस्य कस्यै च देवताय हविर् गृह्यते भागिन्यावेवास्या- मशनायापिपासे भवत ।। ५ ॥ अनु०-उस (परमात्मा) से क्षुघा-पिपासा ने कहा-'हमारे लिए आभय बतलाइए'। [नव उरा ने] उन से कहा-'तुम दोनो को मैं इन्ही देवताओ मे भागी करूंगा'। अत जिस किसी देवता के लिए हवि दी जाती है उस में ये क्षुधा-पिपासा भी भागी होती ही है । (५) २०० ] सिर अवघर (फारसी) सि० म०--जब ये देवता अपने-अपने आयतनो मे प्रविष्ट हो गये, सब क्षुधा और पिपासा ने आत्मा से कहा कि हमारे खाने की भी व्यवस्था करो। आत्मा बोला कि तुम्हे इन्ही देवताओ मे भागी करता हूँ और कि तुम अपना भाग इन्ही सब मे प्राप्त करो। जो कोई देवताओ को हवि देता है, क्षुधा और पिपासा उन में भागी बन कर अपना भाग प्राप्त करती हैं। इस का कारण यह है कि क्षुधा और पिपासा के बिना देवता हवि स्वीकार नहीं करते। [५] ॥ इति प्रथमाध्याये द्वितीय. खण्ड: ।। तृतीयः खण्डः स ईक्षत-इमे नु लोकाश् च लोकपालाश् च, अन्नमेभ्यः सृजा इति । ॥ अनु०-उस परमात्मा ने ईक्षण किया-ये लोक और लोकपाल तो हो गये, [अब] इन के लिए अन्न रचूं । (१) सि० अ०-वष्टा ने सोचा कि मैं ने लोव-लोकान्तर और लोकपाल तो उत्पन्न कर लिये भोर उन्हे क्षुधा और पिपासा भी दे दी, [अव] इन के भोजन के लिए भी कुछ उत्पन्न करना चाहिए। [१] सोऽपोऽभ्यतपत् । ताभ्योऽभितप्ताभ्यो मूर्तिरजायत । या वे सा मूर्तिरजायतान्नं वै तत् ॥ २ ॥ अनु०-उस ने आपो (जलो) के प्रति तप किया । उन अभितप्त आपो से एक मूर्ति उत्पन्न हुई। यह जो मूर्ति उत्पन्न हई वही अन्न सि० अ6--[उस ने] जल की चिन्ता की और उस जल से एक मूर्ति उत्पन्न की जो अचर यो और चर थी। और जो मूर्ति उत्पन्न हुई वही अन्न हुई। [२] तदेनत् सृष्टं पराडत्यजिघासत् । तद् वाचाऽजिघृक्षत् । तन् ना शक्नोद् वाचा ग्रहीतुम् । यद् धनद् वाचाऽग्र हैप्यदभिव्याहृत्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ।। ३ ।। अनु०-[लोकपालो के आहारार्थ] रचे गये उस इस अन्न ने [उन की ओर से] मुंह फेर कर भागना चाहा। तव उरा (आदिपुरुष) ने उसे वाणी द्वारा ग्रहण करना चाहा, [किन्तु] वह उसे वाणी से ग्रहण न उस थे ऐतरेयोपनिषद [२०९ कर सका। यदि वह इसे वाणी स ग्रहण कर लेता तो मनुष्य अन्न को बोल कर ही सृप्त हो जाया करता । (३) सि. 40--अन ने जब जाना कि मैं सब का भय है तो वह भागा। पुरुष ने जिम में इद्रिया के, देवता प्रविष्ट चाहा कि अन को वागिद्रिय द्वारा ग्रहण करे [किन्तु] नही कर सका। यदि उस अन वागिद्रिय द्वारा ग्रहण कर लिया होता तो अन का नाम ने कर ही वक्ता तृप्त हो जाया करता। अन विदित हुआ कि वागिद्रिय द्वारा अन नहीं ग्रहण किया जा सकता । [३] तत्प्राणेनाजिघृक्षत् । तन् ना शक्नोत् प्राणेन ग्रहीतुम् । स यद् धेनत् प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राण्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ।। ४ ।। अनु०-[फिर] उस ने इसे प्राण से ग्रहण करना चाहा, [विन्तु] इसे प्राण से ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे प्राण से ग्रहण कर लेता तो । मनुष्य अन्न के प्रति प्राणत्रिया करके ही तृप्त हो जाता। (४) उस ने] चाहा कि अन प्राणद्रिय द्वारा ग्रहण करे नही पर सका । यदि अन्न घ्राणेद्रिय द्वारा ग्रहण कर लेता तो अन की गय मे ही प्राता तृप्त हो जाया परता । [४] तच चक्षुपाऽजिघृक्षत् । तत् नाशवनोच् चक्षुपा ग्रहीतुम् । स यद् धेनच् चक्षुषाऽग्रहैष्यद्, दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ।। ५ ।। । 11. अनु०-उस ने इसे नेत्र से ग्रहण करना चाहा, [परन्तु] नेन से ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे नेत्र से ग्रहण कर लेता, तो मनुष्य अन्न को देखकर ही तृप्त हो जाया करता । (५) शि. म.-चाहा कि मन पारिप्रिय द्वारा ग्रहण करे नहीं कर सका। यदि अन पारिद्रिय द्वारा ग्रहण कर लेता तो मान के दर्शन मान से द्रष्टा तृप्त हो पाया 1 तच्छोनेणाजिघृक्षत् । तन् नाशक्नोच्छोत्रेण ग्रहीतुम् । स यद् धेनच् छोनेणानहैप्यच् छ् त्वा हैवानमनस्यत् ॥ ६ ॥ अनु०-उस ने इसे श्रोच से ग्रहण करना चाहा, [किन्तु] वह प्रोत्र ग्रहण न कर सका। यदि यह इसे पोज ग ग्रहण कर लेगा, ता मनुष्य भन्न यो सुनकर ही हप्त हो जाना ] {१) . से

२१.]
सिर अक्बर (फारसी)
तृप्त हो
मि० अ०-चाहा रिअन पोटेन्द्रिय द्वारा ग्रहण बरे न र सका। यदि
अन योनेद्रिय द्वारा ग्रहण कर लेता, तो श्रोता अन शब्द वे थवण मात्र से
जाया करता। [६]
तत् त्वचाऽजिघृक्षत् । तन् नाशक्नोत् त्वचा ग्रहीतुम् । स
यद् धैनत् त्वचाऽनहैप्यत्, स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७ ॥
अनु०-उस ने इसे त्वचा से ग्रहण करना चाहा, [किन्तु] वह त्वचा
से ग्रहण न पर सका। यदि वह इसे त्वचा से ग्रहण कर लेता, तो
मनुप्य अन्न को स्पर्श कर ये तृप्त हो जाया करता । (७)
सि० भ०-चाहा कि मन स्पदिय से ग्रहण करे न कर सका। यदि अन्न
स्पर्शद्रिय से ग्रहण कर लेता तो स्प्रप्टा अन के स्पश भान से तृप्त हो जाया करता ।[७]
तन् मनसाऽजिघृक्षत् । नाशक्नोन् मनसा ग्रहीतुम् । स
यद् धेनन् मनसाऽग्रहैष्यद्, ध्यात्वा हैवान्नमन्त्रप्स्यत् ॥ ८ ॥
अनु०-उस ने इसे मन से ग्रहण करना चाहा, [किन्तु] वह मन से
ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे मन से ग्रहण कर लेता, तो मनुष्य
अन का ध्यान कर वे ही तृप्त हो जाया करता । (८)
सि०अ०-चाहा रिअन मन म ध्यान द्वारा ग्रहण करे न कर सका। यदि
अन मन मे ध्यान द्वारा ग्रहण कर लेता तो ध्याता मन के ध्यान से ही तृप्त हो जाया
करता। []
तन् छिश्नेनाजिघृक्षत् । तन् नाशक्नोच् छिश्नेन ग्रहीतुम् ।
स यद धनच छिश्नेनाग्रहैष्यद्, रिसृज्य हैवानमनप्स्यत् ।। ९ ।।
अनु०-उस ने इसे शिश्न से ग्रहण करना चाहा, [परन्तु] वह
शिश्न से ग्रहण न कर सका। यदि वह इसे शिश्न से ग्रहण कर लेता
तो मनुष्य अन का विसजन कर के ही तृप्त हो जाता । (3)
सि० अ०-चाहा कि अन्न प्रजननेन्द्रिय से ग्रहण करे न कर सका। यदि
बन प्रजननेन्द्रिय से ग्रहण कर लेता तो [स्त्री से] समागम करने वाला समागम प्राप्त
कर के ही [अन से] तृप्त हो जाता। [२]
तदपानेनाजिघृक्षत् । तदावयत् । सैपोऽनस्य ग्रहो यद्
वायु । अनायुर वा एप यद् वायु ॥ १० ॥

ऐतरेयोपनिषद् [२११ अनु०-[फिर] उस ने इसे अपान से ग्रहण करना चाहा। [और] इसे ग्रहण कर लिया। वह यह अग्न का ग्रह (ग्रहण करनेवाला) है जो वायु है। [जो] अन्नायु (अन्न द्वारा जीवन धारण करने वाला) [प्रसिद्ध] है वह यह वायु ही है । (१०) सि० अ०-चाहा कि अन्न को अपानवायु द्वारा ग्रहण करे जो प्राण बन पर मुख । [तब उस ने] ग्रहण कर लिया और खापा । भन्न ना होता और भोक्ता यही अपानवायु है, और अपानवायु का जीवन यही बन्न है। [१०] स ईक्षत-कथं विद मदृते स्यादिति ? स ईक्षत-कतरेण प्रपद्या इति? स ईक्षत-यदि वाचाऽभिव्याहृत, यदि प्राणेनाभि- प्राणित, यदि चक्षुपा दृष्टं, यदि श्रोत्रेण श्रुतं, यदि त्वचा स्पृष्टं, यदि मनसा ध्यातं, यद्यपानेनाभ्यपानित, यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ? ॥ ११ ॥ अनु०-उस ने ईक्षण किया-'यह [पिण्ड] मेरे बिना कैसे रहेगा ?' यह सोचने लगा-'मैं किस मार्ग से [इस मे] प्रवेश कह ?' उस ने विचारा, 'यदि [मेरे विना] वाणी से बोल लिया जाय, यदि प्राण से माणन-क्रिया पर ली जाय, यदि चा से देय लिया जाय, यदि नान से सुन लिया जाप, यदि त्वचा से स्पर्श कर लिया जाय, यदि मन से चिलन कर लिया जाय, यदि अपार से अपान-विया कर ली जाय, (और] यदि शिवन से विसर्जन कर लिया जाय, तो मैं कौन रहा ? (११) गि.अ.-मह ने पुन मोपा दि यह सब तो मैं ने उतन्न कर दिया, रितु मेरे बिना इन सब का म्यवहार कम धनेगा। ममि मार्ग से शरीर में प्रवेश गोरा कि मेरे लिए कोई विशिष्ट मार्ग होना चाहिए। वागिन्दिर अपना वा मुग- माग करती है, प्रार्णनिय पारायं नामिरा-मार्ग में पानी है. पारिदिप माना पात्र मार्ग से पसी है, यांन्द्रिय अपना नायं पौत्रमाण में पली है, सन्द्रिय भानामा पर्श-माग में करती है, मन बना रिवार-मा मेरता है, बारा सपना कार्य एशिष मार्ग मेरला है. प्रसव-गि सामने माम में सा है। नवीर मेरा है। मोtin मेष मा है। [2] २१२] सिरं वरवर (फारसो) स एतमेव सीमान विदार्यतया द्वारा प्रापद्यत । संप दितिर् नाम द्वास्, तदेतन् नान्दनम् । तस्य वय आवसथास्, तय स्वप्ना-अयमावसथो,ऽयमावसथो, ऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥ अनु०-वह इस सीमा (मु ) को ही विदोणं पर इसी के द्वारा प्रवेश कर गया। वह यह द्वार 'विदृति' नामवाला है, यह नान्दन (ऑनन्द) है। इरा के तीन भावसथ (वासस्थान) और तीन स्वप्न' हैं-यह आवसथ [नेन], यह आवसथ [कण्ठ], यह मावसथ [हृदय], (१२) सि० अ०--तब आत्मा ने केशवि यासगन] मांग का जो मूर्द्धा भाग पर होती है और सिर के बाला को दो भागो में विभक्त करती है वेध पर मस्तक ने मूल द्वार से शरीर म प्रवेश किया। इसी कारण इस द्वार ने विदृति नाम पाया अर्थात विदीर्ण किया इस द्वार को आन दस्थल भी कहते हैं अर्थात आन द माग । अय द्वार इन्द्रिया के प्रवेश धार है। जो [इन्द्रियाँ] भृत्यो के समान हैं। यह आनद माग आत्मा का प्रवेश द्वार है जो [आत्मा] सब का ईश्वर है। शरीर में इस द्वार से प्रवेश करने वाले ईश्वर के तीन वास-स्थल है जो तीन अवस्थाएं हैं। यही घर है यही घर है यही घर है, अर्थात [वह] जाग्रत अवस्था म पारीर में रहता है स्वप्न म भी शरीर म रहता है और सुषपूर्वक सुषुप्ति मे भी शरीरस्थ रहता है । [१२] "स जातो भूतान्यभिव्यख्यत्-किमिहान्य वावदिपदिति ? स एतमेव पुरुष ब्रह्म ततममपश्यत-इदमदर्शमिती ३ ॥ १३ ॥ "अनु० - इस प्रकार शरीर में प्रवेश कर के जीवरूप से ] उत्पन्न उस परमेश्वर ने भूता पर दृष्टि दौडायी [और सोचा-] यहाँ अन्य किस की बात की जाय' और 'मैं ने इसे देख लिया है इस प्रकार उस न इस पुरुष को ही पूर्णतम ब्रह्मरूप रौ देखा । (१३) मि० अ०--जब वह आत्मा इस द्वार में प्रवेश कर महाभूता से सयुक्त होता है तब उस जीवात्मा कहन हैं ।। [उस पुरप ने] इस के अनन्तर सोचा कि क्या मैं यही १ जाग्रत, स्वप्न, और सुषुप्ति तोनों अवस्थाओं को मही 'स्वप्न कहा गया है। भारतविक जाग्रदयस्पा तो बहानान को अवस्था है। २ यहा तीनों प्रावसयों के नामकरण मे प्रह्मोपनिषद, सायणाचाय, और आनदगिरि का अनुगमन किया गया है। शङ्कराचाय के अनुसार ये आवसथ फाश दक्षिणा नेश मतमन, और हृदयाकाश है जो क्रमश जाग्रत स्वप्न, और सुषुप्ति से ऐतरेयोपनिषद [२१३ जीवात्मा हूँ या कोई और [वह] गुरु के पास गया, जिम ने उसे उपदेश दिया और [उस न इसी जीवात्मा को चिदाकाश के समान सवन्न व्याप्त जाना । [१३] तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम । तमिदन्द्र सन्तमिन्द्र इत्याचक्षते परोक्षेण । परोक्षप्रिया इव हि देवा , परोक्षप्रिया इव हि देवा ॥ १४ ॥ अनु०-इसलिए उस का नाम 'इदन्द्र हुआ, वह 'इदन्द्र' नाम से प्रसिद्ध है। 'इदन्द्र होने पर ही उसे परोक्षरूप से इन्द्र कहकर पुकारते, हैं। क्याकि देवता परोक्षप्रिय ही होते है, देवता परोक्ष प्रिय ही होते सि. अ.—जब भात्मा न यह सब प्राप्त कर लिया तो इसका नाम गा इदद्र का येता अर्थात उस ने] इस सब यो सब पर देखा। चूंकि देवता परोक्ष वचन पराद करते हैं अत उहो ने इस इदद्र को इद्र कहा। देयतामो को यह प्रिय है कि वचन परोक्ष रूप से बोलें वचन परोक्ष रूप से बोलें। [१४] इति प्रथमाध्याये तृतीय खण्ड ॥ इति प्रथमोऽध्याय ॥ द्वितीयोऽध्यायः प्रथम मुण्ड पुरुष ह वा अयमादितो गर्भो भवति । यदेतद् रेत तदेतत् सर्वेभ्योऽङ्गेभ्यस् तेज सभूतमात्मन्येवारमान विति । तद् यदा स्त्रिया सिञ्चत्यथैनज् जनयति । तद्रस्य प्रथम जन्म ॥१॥ अनु०-यह [आरमा] पुरुपशरीर में ही पहले गभ होता है। यह जो प्रसिद्ध वीर्य है वह [पुरुष के ] सम्पूण अङ्गो से उत्पन्न तेज अपने में ही अपने को धारण करता है। फिर जिस समय वह इसे स्वी म सोचता है तब इसे [गभ रूप म] उत्पन्न करता है। यह इस का पहला जन्म, १ अन्तिम बाप दृहदाएकापनिाद १०२ ऐतरेयप्राधा ३३३ २०१० मापयवाद भी माता है। या विम्बित् पाठ भर मे शतपथमाए ६११२११मैं भी दूर है।

। २१४1 सिर अक्बर (फारसी) मि० अ०-प्रथम गभ जो उत्पन्न होता है पिता की पीठ म वीय के रूप म रहता है। वीय शरीर के सभी अगा और अवयवो का सार है। वीय पिता की पीठ म उस के बिना ही जो पेट में रहता है अपनी रक्षा स्वय परता है और जब पिता को पीठ से माता के पेट म आता है तब वह माता से एकीभूत हो कार [चस की] कुक्षि म स्थित हो जाता है। अत यह प्रथम जाम है । [१] तत् स्त्रिया आत्मभूत गच्छति, यथा स्वमग तथा । तस्मादेना न हिनस्ति । साऽस्यतमात्मानमन्त्र गत भावयति ॥ २॥ अनु०-जिस प्रकार [स्तनादि] अपने अङ्ग होते हैं उसी प्रकार वह वीर्य स्त्री के आत्मभाष (तादात्म्य) को प्राप्त हो जाता है। अत वह उसे पीडा नहीं पहुंचाता। अपन उदर म गये उस (पति) के इस आत्मा का वह पोपण करती है । (२) सि.म. जैसे माता के अन्य अवयव होते है वैसे ही यह भी एक अवयव होता है। चूकि पति स्वय वीर्य वनकर स्त्री की कुति म प्रविष्ट हुआ है अत वह स्त्री को हानि नहीं पहुंचाता, क्योकि वह स्वय यही बना हुआ होता है । [२] सा भावयिनी भावयितव्या भवति । त स्त्री गर्भ विति । सोऽय एव कुमार जन्मनोऽग्रेऽधिभावयति । स यत् कुमार जन्मनोऽग्रेऽधिभावयत्यात्मानमेव तद्भावयत्येया लोकाना सन्तत्या । एव सन्तता हीमे लोका । तदस्य द्वितीय जन्म ॥ ३ ।। अनु०-वह [गर्भभूत पति वा] पालन करने वाली [गभिणी स्त्री अपने पति द्वारा] पालनीया होती है । [गर्भिणी] स्त्री उस गभ का पोपण करती है। यह (पिता) पहले हो, जम के पहले ही [स] कुमार का पोषण करता है। वह जो जम के पूर्व ही कुमार का पोषण करता है इन लोको (गुन-पौत्रादि) के विकास से वह अपना ही पोषण करता है। इसी प्रकार इन लोका वा विकास होता है। यही इस का दूसरा जन्म है । (३) सि०अ०-[वह] स्नी पर कृपा रखता है। स्वी भी उम का पालन और पोपण करती है क्याकि पति हो उस में प्रविष्ट हुआ होता है। चूकि जब रन्नी पति का पालन और पोषण इस प्रकार करती है तब पति को भी चाहिए कि वह स्त्री का पालन और पोषण करे। गर्भिणी कुक्षि में पुद्र का पालन और पोषण करती है और ऐतरेयोपनिषद् [ २१५ पनि स्तुति प्रार्थना और वेद विहित नियत क्यों द्वारा पुनोत्पत्ति के पूर्व और उत्पत्ति के पश्चात् उस का पालन करता है। पिता जो पुत्र का माता को कुसि मे और जन्म के मनन्तर वेद के विधान के अनुमार पालन करता है, वस्तुत अपना ही पालन परता है, क्योकि इन कर्मों द्वारा लोक मे उसे सन्तान अधिक होती है। जब माता ने प्रसव किया तब इस लोक मे दूसरा जन्म हुआ। [३] सोऽस्यायमात्मा पुण्येभ्य प्रतिधीयते। अथास्यायमितर आत्मा कृतकृत्यो वयोगत. प्रति । स इत प्रयन्नेव पुनर् जायते। तदस्य तृतीय जन्म ।। ४॥ । अनु०-इस [पिता] का यह [पुत्ररूप] आत्मा पुण्यकर्मों के अनुष्ठान के लिए प्रतिनिधिरूप से स्थापित किया जाता है। तदनन्तर इस का यह अन्य (पितृरूप) आत्मा कृतकृत्य हो वयोवृद्ध हो कर [यहाँ से] फूच कर जाता है। [यहां से] कूच करते ही वह पुन जन्म लेता है। यही इस का तीसरा जन्म है। (४) सि० १०-जब पुन इस सोर मे पिता का कार्य सभालता है, तो पिता को से निवृत्त हो जाता है। जब पिता वृद्ध हो कर और इस लोक को त्याग र परलोर मियारता है तो तीसरा जन्म होता है। वही पिता जो पहले अपनी ही पोट मे वीर्य हो कर स्त्री की कुक्षि मे प्रविष्ट होता है और इस लोक मे पधारता है, परलोक- गमन करता है। [1] तदुक्तमृपिणा- 'गर्भे नु सन्नन्वे मवेदमह देवाना जनिमानि विश्वा । पात मा पुर आयसीररक्षन्नध श्येनो जवसा निरदीयम् ।" इति । गर्भ एवंतच् छ्यानो वामदेव एवमुवाच ॥ ५ ॥ अनु०-यही बात ऋषि ने भी यही है-'मैं ने गर्भ म रहते हुए ही इन देवताओ के सम्पूर्ण जन्मो को जान लिया है। मैं सैव ही लोहमय शरीरो द्वारा अवरुद्ध था। अब मैं श्येन पक्षी के समान बाहर निकल आया हूँ। वामदेव ने गर्भ में शयन करते समय ही ऐसा पहा था। (५) मदर २७१ । फितु वैद में 'द नहीं है। २५ पुनर्गम-मिशान फासभान यह प्रथम पए है।

२१६'] सिरे अक्बर (फारसी) सि. ---वेदमन म इसी के अनुसार [उल्लिखित है-वामदेव ने कहा, 'मैं माता की'कुक्षि मे सभी इंद्रियों के देवताओ के जमा का हाल, जानता था और मैं भी जन्म और अमख्य शरीरों के वधन मे जो लोहे के पिंजडो के समान थे पड गया था। उन्हें मैं ने ब्रह्मज्ञान की शक्ति से तोड कर श्येन पक्षी के समान जो जाल को टुकडे टुकडे कर [खुली हवा में उड जाता है, जन्मो और लोहे के पिंजडो के उस बन्धन से निकल कर मुक्त हो गया। और वामदेव यह पचन माता की कुक्षि मे बोला था। [५] स एव विद्वानस्माच् छरीरभेदादूर्ध्व उत्कयोमुष्मिन्त्स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृत समभवत् समभवत् ।। ६ ॥ अनु०-वह [वामदेव ऋषि] ऐसा ज्ञान प्राप्त कर इस शरीर के नाश के अनन्तर उत्क्रमण कर अतीन्द्रिीय स्वर्ग लोक मे सम्पूर्ण भोगो को प्राप्त कर अमर हो गया, [अमर] हो गया । (६) सि.म.जो कोई वामदेव के समान इस वचन को समझ लेता है वह शरीर के बधन से मुक्त हो कर कार के लोका म पहुंचकर अमर और मुक्त हो जाता है । [६] 11 इति द्वितीयोऽध्याय ॥ तृतीयोऽध्यायः प्रथम खण्ड ० कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे ? कतर स आत्मा ? येर्ने वा पश्यति, यैन वा शृणोति, येन वा गन्धानाजिघ्रति, येन वा वाच व्याकरोति येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति ।। १ ।। अनु०-हम जिस की उपासना करते हैं वह आरमा कौन है वह कौन सा आत्मा है ?' जिस से [प्राणी] देखता है, जिस से सुनता है, जिस से गन्धो को संपता है, जिस से वाणी का विस्तार करता है, जिस से स्वादु-अस्वादु का ज्ञान करता है । (१) सि. अभी ऋषीश्वर इसढे हो कर एक दूसरे से वाले वि प्राण, इन्द्रिय, और उन के देवतायो म से जो शरीर म स्थित है, आत्मा कौन है, कि हम उस की १ अर्थात पूर्वोक्त परमात्मा अथवा जीवारमा ?

ऐतरेयोपनिषद् [ ૨૧૭ उपासना बरे? एक देव चरणो के मार्ग में प्रविष्ट हुआ है और एव देव गिर के मार्ग में, इन दोनो में में आत्मा बात है। उन्हा ने जाता विनिश्चय ही आत्मा वह है जिस से [पुग्प] देखता है, जिम से सुनता है, जिग से गूंधता है, जिस से बोलता है, और जिम से यह-मोटे का स्वाद पहचानता है। [1] यदेतद् धृदय मगश् चैतत् । सज्ञानमाज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान मेधा, दृष्टिर्, धृतिर्, मतिर्, मनीपा, जूति , स्मृतिः, संकल्प., ऋतुरसुः, कामो, वश इति सर्वाण्येवैतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति ॥ २॥ , अनु०-यह जो हृदय है वही मन है । मज्ञान, आज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीपा, जूति, स्मृति, सत्प, ऋतु, काम, और वश ये सभी प्रज्ञान के नाम है । (२) सि०अ०-हृदय उसी का नाम है, मन उसी का नाम है, सज्ञान उसी का नाम है, आज्ञान उत्ती का नाम है, विज्ञान उसी का नाम है, प्रज्ञान उसी का नाम है, सत्यामत्य का विवेक उसी का नाम है, स्वामी उसी का नाम है, जीवनदाता उसी का नाम है, धुति उसी का नाम है, सकल्प उमी का नाम है, भोक्ता उमी या नाम है, प्रतु उसी का नाम है, स्वास्थ्यवर्द्धन उमी का नाम है, स्मृति उसी का नाम है, और ये मभी नाम [उसी के हैं। उस का नाम साक्षात् प्रज्ञान है । [२] एप ब्रह्मष इन्द्र, एप प्रजापतिरेते सर्वे देवा; इमानि च पञ्च महाभूतानि-पृथिवी, वायुराकाश, आपो, ज्योतीपि-इति; एतानीमानि च क्षुद्र मिश्राणीव बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च; जारुजानि च, स्वेदजानि, चोद्भिज्जानि, नाश्वा; गाव.; पुरुपा; हस्तिनो-यत्किञ्चेद प्राणि, जगम च, पतनि च यच् च स्थावर सर्व तत् प्रज्ञानेनम्, प्रज्ञाने प्रतिष्ठितम् । प्रज्ञानेनो लोकः, प्रज्ञा प्रतिष्ठा, प्रज्ञान ब्रह्म ॥ ३ ॥ अनु०-यह ब्रह्म है, यही इन्द्र है, यही प्रजापति है, यही ये [अग्नि आदि] सारे देव, यही-पृथिवी, वायु, आकाश, जल, और तेज- पाँच भूत है, यही क्षुद्र जीव से युक्त उन के वीज, अन्यान्य, अण्डज, १ तुननौप-बान्दोग्योपनिषद ६.३.१ ॥

, २१८ ] सिर अश्वर (फारसी) जरायुज, स्वेदज, उद्भिज, अश्व, गौ, मनुष्य, हाथी-जो कुछ भी यह जङ्गम (पैर से चलनेवाले) और पक्षी है, जो भी स्थावर (वृक्ष, पर्वत, आदि) है वह सब प्रज्ञानेन्न है, प्रज्ञान म ही स्थित है । लोक प्रज्ञानेन है, प्रज्ञा ही उस का आश्रय है, प्रज्ञान ही ब्रह्म है । (३) सि० म०-वही ब्रह्मा है, वही इद्र है वही प्रजापति है, वहीं समस्त देवता है। वहीं पञ्च महाभूत है जा जल अग्नि, वायु पृथ्वी, और आकाश कहलाने] हैं । बडे छोटे वीज और अन्य जो कुछ पृथ्वी से निकलता है, अण्डे से निरलता है कुति से निकलता है जो कुछ नखर है-सब वही है। गो मनुप्य, हाथी, पशु-पक्षी, डमम-स्थावर-सव वही है। सब कुछ उसी से उत्पन होता है, उसी में रहता है, और उमी म लीन हो जाता है। वहीं जगत को गति देता है, और यही ससार ब्रह्म है। [३] अश्व स एतेन प्रज्ञेनात्मनाऽस्माल् लोकादुत्वम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वाऽमृत समभवत्, समभवत् ।। ४ ।। अनु०-यह (यामदेव) इस चैतन्य आत्मा से ही इस लोक से उत्क्रमण कर इन्द्रियातीत स्वर्गलोक में समस्त कामनाओं को प्राप्त कर अमर हो गया, [अमर हो गया । (४) शि० म०-जब यह जीवात्मा पूर्ण ब्रह्मवेता हो जाता है और अपने को जान लेता है तो वह इस ससार से मुक्त हो कर परलोक सिधारता है और सभी कामनाओं को प्राप्त कर अमर हो जाता है। [४] ॥इति तृतीयेऽध्याये प्रथम खण्ड ।। इति तृतीयोऽध्याय

[ २१९
ऐतरेयोपनिपद्
शान्तिपाठः
वाड् मे मनसि प्रतिष्ठिता, मनो मे वाचि प्रतिष्ठितम् ।
आविरावीर् म एधि। वेदस्य म आणीस्थः। श्रुत मे मा
प्रहासीः। अनेनाधीतेनाहोरात्रान् सन्दधामि । ऋतं वदिष्यामि,
सत्य वदिष्यामि । तन् मामवतु, तद् वक्तारमवतु। अवतु
मामवतु वक्तारमवतु वक्तारम् ।।
ॐ शान्तिः ! शान्ति: !! शान्ति. !!!
अनु०-मेरी वाणी मन में स्थित हो, मन वाणी में स्थित हो। तुम
मेरे समक्ष आविर्भूत होओ। तुम मेरे प्रति वेद को लाओ। मेरा श्रवण
किया हुआ नष्ट न हो। अपने इस अध्ययन के द्वारा मैं रात और दिन
को एक कर दूं। मैं ऋत बोलूंगा, सत्य बोलूंगा। वह मेरी रक्षा करे,
वह वक्ता की रक्षा करे, वक्ता की रक्षा करे।
त्रिविध ताप को शान्ति हो।
सि० अ०-वह शान्तिपाठ जो इस उपनिषद् का आरम्भ करने और समाप्त
होने पर किया जाता है यह है-
मेरी वाणी मेरे मन में प्रतिष्ठित हो, मेरा मन मेरी वाणी मे प्रतिष्टित
हो, वाणी का सार मुझ पर प्रकट हो और प्रतिदिन बढे । हे मन और वाक् | तुम
मार्ग-दर्शक बनो, मैं ने वेद से जो सुना है वह विस्मृत न हो, वेदाध्ययन द्वारा इन दिन
और रात्रि को एक देखू ! इसे अपने कर्मों का फल कहता हू और सत्य कहता हूँ।
यह मेरा रक्षक और आवार्य होवे ।
इत्यंतरेयोपनिषत् समाप्ता

ॐ श्वेताश्वतरोपनिषद् (कृष्णयजुर्वेदीया) शान्तिपाठ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवा- वहै। तेजस्वि नावधीतमस्तु । मा विद्विपावहै । ॐ शान्ति । शान्तिः !! शान्तिः !!!' अनु०-[परमात्मा] हम [आचार्य और शिष्य] दोनो की साथ- साथ रक्षा करे। हम दोनो का साथ-साथ पालन करे। हम साथ-साथ विद्या-सम्बन्धी सामर्थ्य प्राप्त करे । हम दोनो का पढा हुआ तेजस्वी हो। हम दोनो द्वेप न करे । त्रिविध ताप की शान्ति हो। - ? कुत स्म जाता? प्रथमोऽध्यायः ॐ ब्रह्मवादिनो वदन्ति- कि कारण ब्रह्म जीवाम केन? क्व च राप्रतिष्ठा ? अधिष्ठिता, केन सुखेतरेषु वर्तामहे ब्रह्म विदो । व्यवस्थाम् ! ॥१॥ ॐ ब्रह्मवेत्तानोग कहते हैं-[जगत् का] पारणभूत ब्रह्म क्या है ? हम frम मे उत्पन्न हुए है ' विम के द्वारा जीवित रहते हैं ? वहाँ स्थित हैं? और है ब्रह्मविद्गण | हम विस ये द्वारा गुग्य-दुप में प्ररित हो कर व्यवस्था (गमाग्याना) वा अनुवर्तन परते हैं ? (१) गि० अ० प्राय जिनागु गमन ओर पाने वर्ग-गगार जो उत्तम हमा है उम मा आरान रारण ब्रह्म है या कुछ और हम प्राणी वहाँ में प्रारदा B.inमरने, बिम मी शनि और मामय ग रियारलाप रते हैं, और रिम सारा हम मुग-दुग । परन' इम सब का मूर गया है। आत्री उग मा सपा नगा। [१] श्वेताश्वतरोपनिषद [ २२१ काल, स्वभावा नियतिर यदृच्छा, भूतानि, योनि पुरुप इति निन्त्या । सयोग एपा न त्वात्मभावाद आत्माऽप्यनीश सुखदु खहेतो ॥२॥ अनु०-काल स्वभाव नियति यदृच्छा भूत और पुरुष-ये [कारण के रूप में विचारणीय है। [अच्छा इन में से कोई एक अथवा पृथक पृथक प्रत्येव तो सब का कारण हा नहीं सकता ] आत्मा के अधीन होने के कारण इन का सयोग भी [कारण] नहीं [माना जा सकता । जीवात्मा भी सुख दुख के [अधीन होने के कारण [राव का] अधीश्वर नहीं है । (२) सि०अ०-यह जो बात उठी कि जगत की उपत्ति का कारण ब्रह्म है या कोइ और [उस पर] लोगा ने कहा कि यह कान ही जगत की उत्पत्ति का कारण है जिस से वह उत्पन्न होता है जिस म वह स्थिति रहता है जिस म वह तीन हो जाता है। कुछ लोग वहते हैं कि [जगा] स्वत आता है स्वत रहता है और स्वत जाता है। अन्य समुदाय कहता है कि मृष्टि का वारण कम है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रप्टा तो है किन्तु उस मे जगत स्थत उत्पन हो गया है। एर समुदाय कहता है कि सव का उपादक महाभूत है और कि जो भी है वह महाभूता से उत्पन हुआ है। एक अय समुदाय कहता है कि सब का उत्पादक तीनो गुणो को साम्यावस्था है जिसे प्रकृति कहते हैं। एव और समुदाय कहता है कि जगत की उ पत्ति का कारण पुरुष है जिसे हिरण्यगभ कहते हैं। विचार करना चाहिए कि ये सब सृष्टि के कारण हो सकते है या नहीं। एक समुदाय तो कहता है कि जिन वा वणन हुआ है उन सब का सयोग ही जगत की उ पत्ति का वारण है। यह सब मिथ्या है दसलिए कि इन का सयोग रिमी विशेप पारण में होता है। ये कसे उत्पत्ति के पारण हो सकते है क्या कि ये तो भोग के कारण और भोता है ? दूसरे इसलिए कि जीवामा ही उत्पत्ति का कारण क्यों नहीं हो सकता जो भोता है और ये जिस के भोग के माधन है। [कि तु] वह भा उ पत्ति का कारण नहा हो सकता क्योकि उस सुख और दुख दानों को प्राप्ति होती है अत उस के लिए कोई और होना चाहिए जो उसे मुख और दुख वा भोग कराये [२] ते ध्यानयोगानुगता अपश्यन देवात्मशक्ति स्वगुणैर निगूढाय- कारणानि निखिलानि तानि कालात्मयुक्ता यधितिष्ठत्येक ॥ ३॥ य २२२] सिरे अक्षर (फारतो) अनु०-उन्हों ने ध्यानयोग का अनुवर्तन कर अपने गुणो से आच्छादित परमात्मा की शक्ति का साक्षात्कार किया-जो (परमात्मा) कि अकेले ही काल से लेकर आत्मा पर्यन्त समस्त कारणो का अधिष्ठाता है । (३) सि०अ०-वे ब्रह्मवादी इन सभी मता की उपस्थापना करके अपने भीतर ध्यान- मग्न हो गये। [ध्यानावस्था में उन्हो ने] देखा कि जगत की उत्पत्ति का कारण वह सत्ता है जो प्रकाशस्वरूप है और जिस की शक्ति तीनो गुणो से आच्छन है। यही एक मात्र सत्ता जगत् की उत्पत्ति का कारण है जिस को यह महिमा है, और जो काल स ले कर जीवात्मा तक जिन तत्त्वा का उल्लख हुबा है उन सब को शक्ति प्रदान करती है । [३] तमेकनेमि, निवृत, पोडशान्त, शतार्धार विंशतिप्रत्यराभि, अष्टक पभिर् विश्वरूपैकपाश, निमार्गभेद, द्विनिमित्तैकमोहम् ॥४॥ अनु०-उसे [हम एक चक्र जानते हैं जिस में] एक नेमि है,' तीन घृत (टायर) हैं,' सोलह अन्त हैं,' वीस प्रत्यरो' सहित पचास अरे हैं, छह अप्टको' सहित एक बहुरूपी पाश है, तीन पृथक्-पृथक् मार्ग हैं, दो निमित्तों वाला एक मोह (अज्ञान) है । (४) १ प्रति । २ त्रिगुण, अर्थात सत्य, रजस, और तमस । ३ पञ्चमहाभूत, पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चश्मेंन्द्रिपा, और एक उमपेन्द्रिप (मन) । ४ पचनानेन्द्रिया, पञ्चकमन्द्रियों, और इनके रस विषय पचास भाव साल्पफारिका ४६-५१ मे परिगणित हैं। वे हैं-पांच विपर्यय (तम, मोह, महामोह, तामिल, और मन तामिय), अट्ठाईस भशक्तिमा (अहिरापन, स्पर्शन-शक्ति का नारा, भग्यत्व, जिल्हा. शक्ति का नाश, प्राणेन्द्रिय की विस्तता, मूक्ता, लूलापन, पाता, नपुसकता, पुरोष- शक्ति का नारा, और बुद्धि को मन्दता से होने वाल प्यार बुद्धि-यध, नौ प्रकार के तुष्टियों के विपरंय, और आठ प्रकार के दिनों के विपर्यय), नो तुष्टिका (प्रकृति-नुष्टि, उपादान-तुष्टि काल-तुष्टि, भाग्म तुष्टि, पार-तुष्टि, सुपार नुष्टि, पारापारन्तुष्टि, अनुतमाम्म, और उत्तमाम्भ), आठ तिदिनी (ह, शरद, अध्ययन, तीनों प्रकार दुखों का विपात, मुत्राप्ति, मोर दान)। ६ अष्टधा प्रकृति, आठ यातुएँ, माठ दिओ, माठ भाय, आठ देव, और आठ ऐवर्ष ७ तृष्णा धम, अधम, और ज्ञान ९ पुष्प-पस मोर पाण-पत।

श्वेताश्वतरोपनिषद् [ २२३ मि० अ०-उन्हो ने माया को देखा जिस से पचास तत्त्व निष्पन होते हैं---दरा इन्द्रियां, उनवे दस विषय, इन्द्रिया के दस देवता, पांच प्राण, मन, बुद्धि, चित्त, अनार, इन वे चार देवता, इन के चार विषय, और स्वप्न, गायत्, और सुषुप्ति के तीन देवता । पाया जय ब्रह्म से अन्वित हुई तब जगत् का कारण बनी। जगह, माया, और ब्रह्म परस्पर सयुक्त हुए तो इस सयोग को ब्रह्म चक्र बहते है, अर्थात् ब्रह्म का चक्र जो पूमता रहता है। माया रप के चत्र को नमि है। सृष्टि, स्थिति, और प्रलय के तीन धर्म पहिये के तीन वृतो टायरो] के समान है और परस्पर सयुक्त है। पांच प्राण, मन, और दस इदियां उन पदह लकडियो के समान है जो उस वृत में परस्पर जुड़ी होती है। पचास तत्त्व जो शरीर के लिए आवश्यक है उन पचास बरो के समान है जो रय चक्र की नाभि के चारो ओर लगे होते हैं। साल के बारह महीने और आठ दिशाएं उन चीस प्रत्यरा के सदृश हैं जिन से जोडो को सुदृढ करते हैं। इस ग्रहाचक्र में अडतालिस तत्त्व हैं, जो है स्वचा, चर्म, मांस रुधिर, मेद, अस्थि, गजा शुक [-धात्वष्टक], धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, अधर्म, अज्ञान, यवैराग्य, आश्वर्य [-भावाष्टक], दया क्षमा, अनसूया, शौच. मगल, अनायास, अकृपणता, और : अस्पृहा [-गुणाप्टक] अष्ट सिद्धियां जिन्हे अणिमा, महिमा, सधिमा गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व और वशित्व कहते हैं, पच महाभूत, महत्तत्व, तीनो गुणो की साम्यावस्था और अहकार[ प्रवृत्यप्टक] ब्रह्मा, प्रजापति, सभी देवगण, गधर्व, यक्ष, रादास, पितृगण और पिशाच [ देवाप्टक] । एक काम का जाल है जिस मे सभी बाबद्ध है और जिमम तीन माग है-प्रथम ब्रह्म-लोक की प्राप्ति का मार्ग, द्वितीय स्वर्ग लोक को प्राप्ति का माग, और तृतीय नख लोक की प्राप्ति का मार्ग । उस मे । एक ही निमित्त है जिस का परिणाम सुख और दुख है। उन ब्रह्मवादियो ने उस सता को देख लिया था जो जगत् की उत्पत्ति का कारण है। और उहो ने इन तत्त्वो को ब्रह्मचक्र में देखा जो उस [सत्ता] का लोक है । [४] पञ्चस्रोतोऽम्बु, पञ्चयोन्युग्रवका. पञ्चप्राणोमि, पञ्चबुद्धयादिमूलाम्, पञ्चावर्ता, पञ्चाशद्भदा, पञ्चपर्वामधीम ॥५॥ अनु०-पांच स्रोतो' वाले जल से जो युक्त है, पांच उद्गमस्थानों के कारण जो उग्न और वक्र है जिस मे पञ्चप्राणरूप तरङ्गे है, जो पांच प्रकार के ज्ञानो आदि का मूल है, जिस मे पाँच आवर्त (भंवर) हैं, जो १ पञ्चशानेन्द्रियाँ २ पञ्चमहाभूत ३ पन्चेन्द्रिय विषय । पञ्चदु खौघवेगा, २२४ ] सिरे अक्चर (फारसी) पांच प्रकार के दुःखस्पी ओघो के वेग से युक्त है, जो पांच पर्वो वाली और पचास भेदो वाली' [नदी] है उस को हम जानते हैं । (५) सि. अजमे जगत् ब्रह्मचर है, वैसे ही ब्रह्म माया एर नदी के समान है । पच ज्ञानेद्रियां उम के पांच योत है जो उग नदी से प्रवाहित हुए हैं । पचमहाभूत उम के आवतों (भंवरों) के समान है। पच प्राण उस को तरंगो के समान हैं। अहकार जो पचनानेन्द्रिय-स्वाप है उम वे उद्गम के समान है। पर स्थूलभूत उस की लहरों के समान हैं। पच अवस्याएँ-अर्थात् माता को कुक्षि में निवास, माता की कुक्षि से नि सरण, रुग्णावस्या, जरावस्था, और मृत्यु जो महादुःख हैं उस नदी के ओघदेग के समान हैं। पचाम अक्षर, कोई भी दात जिन के बाहर नहीं है और जिन के अतिरिक्त दूमरा अक्षर नहीं है, उन शापाओ के समान है जो नदो से फूटती हैं। पांच प्रकार की अविद्या-अर्थात् तमस्, मोह, महामोह, तामिय, और अन्धतामित्र'- उम नदी के पदों के समान है। ब्रह्मवादियो ने इस नदी को इसी रूप में वर्णित किया है। [५] सजीवे सर्वसस्थे बृहन्ते अस्मिन् हसो भ्राम्यते ब्रह्मवके, पृथगात्मान प्रेरितार च जुष्टस् ततस् तेनामृतत्वमेति मत्वा, अनु०-हस (जीव) अपने को और नियन्ता [परमात्मा] को पृथक मानकर सब के जीवनभूत और राब के आश्रयभूत इस महान् ब्रह्मचक्र में भ्रमिन रहता है, और जव उस का प्रसाद प्राप्त करता है तव अमृतत्व को प्राप्त हो जाना है । (६) । पञ्चवलेश २ दुराचापं के माध्य मे पचास को प्याल्या नहीं हुई है। ३ दाराशिकोह के शाद है-'पञ्ज विस्मे अविद्या हि गुस्स-ए जुरखो, द मिहनते दुल्लो, व नादानी-ए जुरबी, घ नारानीपपुल्ली वारद'। ये शय नितान्त अवाचा उसा तास विपर्यय के पांच भेदों से प्रतीत होता है जिन पो गणना शिवरण को साहारिका (es) में की गयी है। हम ने तनुमार हो पा है। मविद्या पाच मेव पोगमूत्र (२.३) में पतताये गप-प्रदियो, अस्मिता, राग, टेप, और अमिनिवेश, जो हो सांख्यशरिरा मे भिन्न सदावतो मे तमम् पहे है।

श्वेताश्वतरोपनिषद [ २२५ सि० अ०-उन ब्रह्मवानिया ने इस ब्रह्मचक्र की उत्पत्ति का कारण जौर रिपति का कारण और उम में सब प्राय का आथय तथा महान जीवामा को जिस का नाम हस है उस म भ्रमित जाना है। यह जीवात्मा तब तर ससरण करता स्ता है जब तक वह अपन को मव को परिचालित करने वा7 आत्मा म भिन्न समझता रहता है। जव जीवात्मा परमामा से एक हो जाता है तो अमर हो जाता है । [६] उद्गीतमेतत-परम तु ब्रह्म, तस्मिस् त्रय'-सुप्रतिष्ठा ऽक्षर च । अन्नान्तर ब्रह्मविदो विदित्वा लीना ब्रह्मणि तत्परा योनिमुक्ता ॥ ७ ॥ अनु०-यह गाया गया है कि ब्रह्म ही परम [सत्ता] है। उसमे तीनो स्थित है। वह [इन की] सुप्रतिष्ठा और अविनाशी है। इस का अन्तर जान पर ब्रह्मवेत्ता लोग ब्रह्म में लीन और तमय हो ज म मरण से मुक्त हो जाते है । (७) मि० अ०-मभी उपनिषदो में कहा गया है कि ब्रह्म परम है और स्वयम्भू है। जीवा मा माया और जगन उम ब्रह्म म ही स्थिन है। इस लिए ब्रह्म सब से बड़ा है और जिन वेदज्ञो ने इसे जान लिया है कि इन तीन म से प्रयक उमी में लीन होते हैं व शरीर के बधन से मुक्त हो कर उमी म लीन हो जाते है । [७] सयुक्तमेतत क्षरमक्षर च व्यक्ताव्यक्त भरते विश्वमीण । अनीशश् चात्मा बध्यते भोक्तृभावाज ज्ञात्वा देव मुच्यते सर्वपाशै ॥ ८ ॥ अनु०-ईश्वर परस्पर मिले हुए इस क्षर अक्षर और व्यक्ताव्यक्तरूप विश्व का पोपण करता है। परतत्र जीव भोक्तृभाव के कारण [उस मे] वैधता है और परमात्मा को जान कर समस्त पाशो से मुक्त हो जाता है । (८) मि० अ०-निविशेष और मविशप जब एक हुए तब यह जगत प्रकट हुआ। यह जगत दो प्रकार है-व्यक्त और अपन। वह सभी यस्ता पक्त जगन १वर और और प्रकृति अपना निपुण विन्दते, २२६ ]] सिर अपवर (फारसी) का धारण करने वाला है और स्वय इस से अतिप्त और इस जगत या धारस मान्न है। जब तमगाधर अपने नही पहचानसा तव तर भोगा के घधन म पड़ा रहता है और रामयता रहता है कि में ही खाता , में ही पीता हूँ, और में ही मोता हूँ। जब उग ने अपन यो जान लिया और समय लिया कि मैं ब्रह्म हूँ तब वह गुणो और शरीरो वे बधन में मुक्त हो जाता है। [1] ज्ञाज्ञी द्वावजावीशनीशा- वजा ह्येका भोक्तृभोग्यार्थयुक्ता । अनन्तश् चात्मा विश्वरूपो ह्यकर्ता। नय यदा ब्रह्ममेतत् ॥ ९॥ अनु०-ये [ईश्वर और जीन] दोनो अजन्मा हैं और है [क्रमश ] सर्वज्ञ और अज्ञ, ईश और अनीश । एव अजा [प्रकृति] [भी] है जो भोक्ता (जीव) के लिए भोगसम्पादन में नियुक्त है । आत्मा विश्वरूप, अनन्त, और अकर्ता है। जब इस लिए [ईश्वर, जीव, और प्रकृति] की उपलब्धि होती है, तो वही ब्रह्म है । (९) सि०अ०-परमात्मा और जीवात्मा दाना नित्य हैं। परमात्मा सवज्ञ है और जीवात्मा अल्पन्न। परमात्मा स्वतन्त्र है और जीवात्मा स्वतन्त्र नहीं है । वह माया जो ब्रह्म की इच्छा का धर्म है अनादि है पितु अनत नहीं है। वह प्राणिया को भोग प्रदान करती है। परमात्मा अन त है। सारा जगत उसी का रूप है। और यद्यपि सारा जगत् उमी का स्प है तथापि यह अकर्ता है अर्थात वह कुछ भी नहीं करता। जो कोई माया, जीवात्मा और परमात्मा इन सीना सताओ को इस रूप में जानता है वह केवल यहा हो जाता है । [१] क्षर प्रधानममृताक्षर क्षरात्मानावीशते देव एक । तस्याभिध्यानाद् योजनात्, तत्त्वभावाद् विश्वमायानिवृत्ति ॥ १० ॥ अनु०-परिणामी प्रकृति और अविनाशी तथा अपरिणामी-क्षर और आत्मा को हर सज्ञक एक देव नियमित वारता है। उस के पुन पुन चिन्तन से, योग करने से तत्त्व की भावना करने से अन्त मे विश्वम्प माया को निवृत्ति हो जाती है। (१०) भूयश् चान्ते - श्वेताश्वतरोपनिष [ २२७ मि० अ०-माया ससीम और नश्वर है जोवारमा असीम और अविनाशी है । जीवात्मा गान की शक्ति से माया जो नश्वर है और जीवा मा जो नश्वर नहीं है इन दोना का स्वामी वह ज्योति म्वरुप और अद्वत मता है। जो कोई उसे यथावत जानता है और अपन को उम से एव पर नेता है वह स्वरूगस्थ हो जाता है भ्रम को हटा देता है माया के वधन से निम्ल आता है और उस ज्योति स्वरुप की सत्ता को जान लेता है। वह सभी माया जाल अज्ञान के वधन अहकार वासना द्वप और भय से मुक्त हो जाता और इस मुक्ति स दूसरे लोगो म जन्म और मृत्यु छुटकारा पा लेता है। [१०] ज्ञात्वा देव सर्वपाशापहानि, क्षीण क्लेशैर् जन्ममृत्युप्रहाणि । तस्याभिध्यानात् तृतीय देहभेदे विश्वश्वर्य, केवल आप्तकाम ॥११॥ अनु०-परमात्मा का ज्ञान होने पर सम्पूण वधना का नाश हो जाता है और क्लेशो का क्षय हो जाने पर जम मृत्यु की निवृत्ति हो जाती है। उस का ध्यान करने से शरीरपात के अन तर सर्वेश्वयमयी तृतीय अवस्था की प्राप्ति होती है [और फिर जीव] आप्तकाम हो कर कैवल्यपद को प्राप्त हो जाता है। (११) सिकन--[पुस्प] जब उम मवव्यापर और अद्वत सत्ता को जान नेता है तव स्वगलोक और नरवलोक से मुक्त हो कर इमी लोन म अपनी समस्त कामना के साथ पहुच कर समस्त मृष्टि के स्वामी को प्राप्त कर के शरीर छोड़ने के ममय तृतीय लोक अर्थात ब्रह्मलोक म निवास करता है । समस्त शरीर और प्राण के मध्य एक सत्ता है जो गुप्त रहस्यो को जानती है और निय है। वही सब के जानने योग्य है और उस के सिवा कुछ नहीं है । [११] एतज जय नित्यमेवात्मसस्थ नात पर वेदितव्य हि किञ्चित । भोक्ता, भोग्य प्ररितार च मला सर्व प्रोक्त-विविध ब्रह्ममेनत ॥ १२ ॥ अनुभ-अपने म सबदा स्थित इस ब्रहा वो ही जानना चाहिए। इस से बढार और कोई नातव्य नहीं है। भोक्ता (जीव) भोग्य - ।

स तद् वोभय २२० ] मिर बक्वर (फारसी) (जगत्), और प्रेरक (ईश्वर) को जान लेने के अनन्तर सब कुछ कहा हुआ हो जाता है -यह विविध ब्रह्म है । (१२) मि० ज०-देताश्वतर ने कहा कि मेरे गुरु ने मुझे समझाने के लिए यह उपदेश दिया कि जीव भोवता है, जिम से वह उत्पन्न होता है वह माया है, और इन दोनों का प्रेरक ब्रह्म है । [१२] वह्नर् यथा योनिगतस्य मूर्तिर् न दृश्यते नैव च लिड्गनाशः, भूय एवेन्धनयोनिगृह्यस्, वै प्रणवेत देहे ॥ १३ ॥ अनु०-जिस प्रकार अपने आश्रय [काप्ठ] में स्थित अग्नि का रूप दिखायो नहीं देता और न [उरा के] लिङ्ग (गूदमस्वरूप) का हो नाश होता है, और फिर इन्धनरूप धारण के द्वारा ही उस का ग्रहण हो सकता है, उसी प्रकार दोनो [ब्रह्म और जीव] या देह में प्रणय के द्वारा ग्रहण दिया जा सकता है । (१३) मि. अ-बाष्ठ में अग्नि है किन्तु उन भा रूप दिखायी नहीं देना, और अग्नि का गुण-धर्म अर्थात् उष्णता और शुओं भी काष्ठ में विद्यमान है और ये भी दिखायी नहीं देते। किन्तु केवल इमलिए कि दिनायी नहीं देते यह नहीं कहा जा गरता दिनाप्ठ में ये सब नहीं हैं। उसी वाष्ठको यदि दूसरे नाटस रगडा जाय तो अग्नि, युआ, और उणना प्रकट हो जाते हैं। उसी प्रसार गरीर मे अजान भी है और वह ज्ञानस्वरूप ब्रह्म भी है, पिन्नु दिशायी नहीं देना । जब तम प्रणव के जप में मन को गति नहीं दी जाती नर तर वह ब्रह्म प्रघट नहीं होता। [१३] स्वदेहमरणि कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् ध्याननिर्मथनाभ्यामाद् देवं पश्येन् निगूढवत् ।। १४ ।। अनु०-अपने देह को अरणि और प्रणर को उत्तरारणि कर रे ध्यानम्प मन्यन के अम्याम मे परमात्मा को गिी हुई [अग्नि के समान देने । (१४) गि..- पो गन रो अरारगि परे और प्रणय को उत्तरारणि प्रणा वे मान से सम्याग तो बारारगि पे राम सेने १९ [गाधर] उम मोतिसम्म श्वेताश्वतरोपनिपद् [ २२९ सत्ता वो देख सता है [अन्यथा] मानो उस व्यक्ति के पूर्वजा ने खजाना छुपा रखा है और वह उसे नहीं पाता। [१४] तिलेपु तेल, दधिनीव सपि- राप स्रोत स्वरणीपु चाग्नि । एवमात्माऽऽत्मनि गृह्यतेऽसौ सत्येनेन तपसा योऽनुपश्यति ॥ १५ ॥ अनु०-जिस प्रकार तिल म तेल, दही मे घृत स्रोतो में जल, और काष्ठो म अग्नि होती है उसी प्रकार जो पुरुष सत्य और तप के द्वारा इसे बारवार देखने का प्रयत्न करता है उसे यह आत्मा आत्मा में ही दिखायी देता है । (१५) सि० अ०---ब्रह्म सव में निहित और पूर्ण है-जैसे तल तिल म घी दही म जल पाल और उदगमस्थान म और अग्नि काष्ठ म विद्यमान है वैसे ही वह भूतात्मा म। [माधक'] आत्मा को मय और तप द्वारा देख तता है। [१५] सर्वव्यापिनमात्मान, क्षीरे सपिरिवापितम आत्मविद्यातपोमूल, तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ।। तद् ब्रह्मोपनिषत् परम् ॥ १६ ॥ अनु०-आत्मविद्या और तप जिस का मूत है उस सर्वव्यापी आत्मा को [साधक] दूध में विद्यमान घृत के समान [देखता है] । वही ब्रह्म का परम रहस्य है वही ब्रह्म का परम रहस्य है । (१६) सि० अ०-आत्मा सब म व्याप्त है जैसे धो दूध में। तपस्या और ज्ञान आत्मा की प्राप्ति के बीज है। सभी उपनिषदों का मार यही परवा है । [१६] ॥ इति प्रथमोऽध्याय ॥

२३० ] सिर अक्बर (फारसी) द्वितीयोऽध्यायः युञ्जानः प्रथम मनस् तत्त्वाय सविता धिय. । अग्नेर् ज्योतिर् निचाय्य पृथिव्या अध्याभरत ॥ १ ॥ अनु०-सविता देवता ने पहले मन और बुद्धि को सत्य के लिए अग्नि की ज्योति को जानकर उसे पृथिवी से निकाला । (१) सि०अ०--परमार्थ सत्य की प्राप्ति का मार्ग यह है, इन्द्रिया और मन के निग्रह को मूर्यस्थानी कर ने समस्त जगत् को नैसर्गिक अग्नि स्वरूप वैश्वानर की ज्योति को आत्मसात् कर के अन्तरिक्षलोक को उस प्रकाश से प्रकाशित करे । [१] युक्तेन मनसा वय देवस्य सवितु सवे । सुवर्गेयाय शक्त्या ॥ २ ॥ अनुभ-हम स्वर्ग और शक्ति के लिए एकाग्न मन से सविता देवता की प्रेरणा मे [वर्तमान] है। सि.अ. यह महिमा तप रे प्रभार से प्राप्त हुई, जिस या अनुष्ठान अधिक किया गया। अब भी चो बाई ता करना चाहे उमे इस मनुनि ना पाठ पर के भूर्यदेव से साहाय्य की प्रार्थना पती चाहिए । [२] युक्त्वाय मनसा देवान् मुवर् यतो धिया दिवम् । बृहज् ज्योति. करिष्यत सविता प्रसुवानि तान् ॥ ३ ॥ अनु०-युद्धि द्वारा ज्योतिर्मय द्युलोव को जाने वाले देवो (इन्द्रियो) को वश में करने वाले मा से गयिता प्रेरित परे, ताकि वे वृहत् ज्योति उत्पन्न पर रहे। (३) मि० अ०-स्तुति गट है ज्योतिर्मय मूर्य ती गहायता स तप का मामध्यं प्राप्त हो जिस गे मैं ग्रा-लोर मे पहुँच वर मुविन लाभ वई। मरा मा गच्ची श्रया द्वारा एकाग्रता प्राप परे। गूर्य अगर दे दिमतोर म देताना | मम्मुम गमन परोने लिए अपने मार्ग पर उजाला करने वहां पहुंच राऊँ, पाf गुर्प हो पा द्वार है । [३] इस अध्याय रे प्रपम पान मत्र तंतिरीपमहिना (४.१.१.१-५) मोर विधिवत् पादातर से यड्यद (१११-५) रो पिये गये हैं। ये पद से रातपय- पालग (६.३.१.१२८ मा उदाट्त हुए है।

श्वेताश्वतरोपनिषद् [ २३१ युञ्जते मन उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्रित । वि होवा दधे वमुना विदेक इन् मही देवस्य सवितुः परिप्टुति. ॥ ४ ॥'। अनु०-महाज्ञानी विप्र के विप्र मन को वश मे करते है, बुद्धि को वश मे करते है। एक प्रज्ञावित् ने होतृसाध्य [यज्ञादि] क्रियाओ का विधान किया है। सवितृदेव की स्तुति वडी है । (४) मि० अ०---जो ब्राह्मण इन्द्रियों को वश में कर वे अपने मन को सूर्य मे एकाग्र करते हैं उन ब्राह्मणो में से जो तपस्या को पूर्ण कर लेता है उसे मूर्य अपनी किरणों के मार्ग से ब्रह्मलोन पहुंचा देता है, क्योंकि सूर्ग ही पुण्यकर्मों के पल को प्राप्त कराने पाला है। अतएव सूर्य यद्धय और स्तवनीय है। ब्रह्मलोर की प्राप्ति होने तक २-[४] युजे वा ब्रह्म पूर्व्य नमोभिर् विश्लोक येतु पथ्येव मूरेः । शृण्वन्तु पुत्रा, आ ये धामानि दिव्यानि तस्थु ॥ ५ ॥ अनुल-मै तुम्हारे पुरातन स्तोम मे [तुम्हे] नमस्कार करता हुआ तत्पर होता हूँ। सूर्य के पथ की भांति मेरा यह श्लोक (स्तुतिपाठ) लोक में फैले। समस्त अमृत के पुत्र श्रवण करे, वे भी जो दिव्य धामो में पहुँच गये है। (५) सि०अ०--मैं अग्नि, सूर्य, और ब्रह्म की ज्योति को एक कर के जानूं। मुझे ऐमी शक्ति प्राप्त हो कि मैं तेरी उपासना और स्तुति वर सर्व । तेरी जो स्तुति नौ उसे शौनक प्रभृनि ऋपिगण मुनें, जो हिरण्यगर्भ से उत्लान हैं और दिव्य धामी में निवास करते है । [५] १ पूर्वटिप्पणी में अकित सदर्भो अपिरिन, यह मा ऋग्वेद (५.८1१), यजुर्वेद (५१४ और ११४), शतपथ ब्राह्मणु (३५३ ११,१२) में भी द्रष्टव्य है। २ बावय अगले मन में पूरा होता है । ३ अध्याय के श्रादि में दी हुई टिप्पणी में अस्ति गर्मों के अतिरिक्त, यह मत्र ऋग्वेद (१०.१३.९) और यजुर्वेद (१५) में भी पाया जाता है। यह पाठान्तर में माय अपर्ववेद (१८ ३.३६) में भी द्रश्य है। विश्वे अमृतस्य २३२] सिरें अपर (फारसी) अग्निर् यत्राभिमथ्यते, वायुर् यत्राधिरुध्यते, सोमो पनातिरिच्यते, तर सजायते मन ॥६॥ अनु०-जहाँ अग्नि वा मन्थन किया जाता है, जहां वायु का प्रयोग होता है, और जहाँ सोमरस की अधिकता होती है, वहीं मन की प्रवृत्ति होती है । (६) सि० म०-व धाम य है जहां अग्नि का पिण्ड प्रकाशमान है जहाँ वायुमण्डल प्रतिष्ठित है, जहाँ से पदमा वहता पटता है और चन्द्रमा की उस ज्योत्स्ना म मन प्रफुल्लित होते हैं । [६] सविना प्रसवेन जुपेत ब्रह्म पूर्व्यम् । तत योनि कृणवसे, न हि ते पूर्तमक्षिपत् ।। ७ ।' अनु०-सविता देवता की प्रेरणा से उस चिरन्तन स्तोम का सेवन करना चाहिए। तुम उस ब्रह्म म निष्ठा (समाधि) परो, पूर्त वर्म तुम्हे लिपायमान वरने वाला नहीं होगा। (७) मि० अ०-चूंनि ब्रह्म स मप्रथम गूयं की उत्पत्ति हुई है, इसलिए मूर्य को प्रसन्न कर तापि उस की सहायता स तू ब्रह्म तक पहुंच सके। सूर्य की ज्योति वे मध्य ब्रह्म को जान पर उपामना बर। यदि तू समझे वो मूर्य की उपासना में ब्रह्म की ज्योति तक नू नहीं पहुंचेगा, तो ऐसा नहीं। वह बहा नुप से अपने को छिपाता नहीं, प्रत्युत मूय की ज्यानि के रूप म तुम पर प्रवट हुआ है। आशिष ज्योति साक्षात परम ज्याति है । [७] विरन्नत स्थाप्य सम शरीर, हदीन्द्रियाणि मनसा सनिवेश्य, ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान् स्रोतासि सर्वाणि भयावहानि ।। ८॥ अनु०-[शिर, ग्रीवा, और वक्ष स्थल-इन तीनो' को उचा रमते हुए, शरीर को सीधा रख मन के द्वारा इन्द्रिया यो हृदय में सन्निविष्ट पर विद्वान् ब्रह्म प नौका के द्वारा सम्पूर्ण भयानप जनप्रवाही को पार पर जाना है। () २.६१६१८ सदुलाया २ तुलनीय गोता ६१३।

शेताश्वतरोपनिषद् .[२१३ सि. ३०-यूपं को सहायता से ब्रह्म में ध्यान लगाने के रामय पद्माराम गा पर वक्ष स्थल, सिर, और ग्रीवा यो ऊंचा रखते हुए दृष्टि सीधी रघे, अगा रोपति न दे, समस्त इन्द्रियों को मन व वश में कर के हृदय गुहा में गिहित मह्म पाप्पा करे, और अन्त करण में जो भयावह वाघाभी की नदी प्रवाहित हो उन ग्रा पोही नौका कर वे पार कर जाए। [८] प्राणान् प्रपीड्यह सयुक्तचेप्ट क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत । दुष्टाश्वयुक्तमिय वाहमेन विद्वान् मनो धारयेताप्रमत्त ॥९॥ अनु०-[साधर को चाहिए वि] इसी शरीर मे प्राणो या निरोध कर और चेप्टाओ को समाहित वर जव प्राणशक्ति क्षीण हो जाय राय नासिकारन्ध्र द्वारा उसे बाहर निवाल दे। और फिर वह विद्वान् पुरण दुष्ट अश्व से युक्त रथ के सारथि के समान' सावधान हो कर मन गो वश मे करे। (९) के सि०१०-दूसग योग यह है कि प्राणायाम करे और उस अनुप श भोजन, पान, और निद्रा का विधान है उस का पालन करे। जब प्राणायाग द्वारा उस स्थान पर पहुंच जाय जहाँ अय कुछ दृष्टिगोचर नहीं होता, तब एप गाशिवा. रन्ध्र से प्राण को धीरे धीरे छोडे और नागिका और मुख से सांस न ते। शिग ime रिसो रथ ये घोडे उद्धत हा और उस का सारथी पूरी कुशलता से उगे माना। चले, उसी प्रकार इस साधना का अनुष्ठान करने वाले को चाहिए rिati सावधान रखे, ताकि मन उसे दुमाग पर ग से जाय । [९] समे, शुचौ, शर्करावह्निवालुका- विजिते, शब्दजलाश्रयादिभि, मनोऽनुकूले, न तु चक्षुपीडने, प्रयोजयेत् ॥१०॥ अनु०-जो समतल, पवित्र शर्वरा, अग्नि, पोर तथा शब्द, जल, और आश्रयादि से भी शून्य हो, मन ही । गुहानिवाताश्रयणे, पाव १तुलनीय-कठोपनिषद १३४ २३४ ] सिरे यसवर (फारसी) मि नेनो को पीडा देने वाला, ऐसे गुहा आदि वायुशून्य स्थान मे [मन को] युक्त गरे। (१०) सि० --निस भूमि पर साधक आसन ग्रहण करे यह नोची-ऊंची न हो, उस पर मरिनता न हो, उस पर बालू न हो, भूमि उष्ण भी न हो, वह धूलि धूसर न हो, वहां उगने वान तर गोलाहल न पहुंच सके, वह लोगो के रास्ते म न पडती हो। जहाँ भी उस दे मन को शान्ति मिले, जिस स्थान के देखने से उस वे नेवानी मष्ट न हो, जिस गुफा म यायु वा झोवा न आये, यही आसन ग्रहण पर के योग- साधना करनी चाहिए । [१०] नीहारधूमार्कानिलानलाना खद्योतविद्युत्स्फटिकशशीनाम् एतानि रूपाणि पुर सराणि ब्रह्मण्यभिव्यक्तिकराणि योगे अनु०-योगाभ्यारा आरम्भ करने पर पहले युहरे, धूम, सूर्य, वायु, अग्नि, स्वद्योत (जुगनू), विद्युत्, स्फटिकमणि, और चन्द्रमा का अनुभव होता है। इन पे रूप ग्रह की अभिव्यक्ति करने वाले है । (११) fromo-माधव के अन्त वरण पर प्रथम साधना में ब्रह्म की अभिव्यक्ति के लक्षण ये हैं कि कभी तो उस पे पान म नुहरे के समान अन्धकार या जाना है. सभी उग के ध्यान में धुएं के समान अधार आ जाता है, वभी उस ये ध्यान में एपं ये समान प्रकाश मा जाना है, सभी उस ये ध्यान म अग्नि वा प्रकाश आ जाता है, अभी उग में ध्यान म वायु वा शो आता है, सभी उरा ने ध्यान में जुगनू जमा हो जाता है, भी उरावे पान म विद्युत की नगर मा प्रकाश या जाता है, पभी उस ये ध्यान म सपदिा मणि को स्वच्छता और धवलिगा आ जाती है, और कभी उरा ध्यान पचद्रमा की ज्योरना आ जाती है। [११] पृथ्व्यप्लेजोऽनिलये समुत्थिते, पन्चात्मयो योगगुणे प्रवृत्ते, न तस्य रोगो, न जरा, न मृत्यु, प्राप्म्य योगाग्निमय शरीरम् ॥ १२ ॥ अनु०-पृथिवी, गन, अग्नि, वायु, और आवाश यो अभिव्यक्ति होने पर, योग व पञ्चामर गुण ये प्रवृत्त होन पर, जिम योगाग्निमय शरीर

श्वेताश्वतरोपनिषद्
[ २३५
प्राप्त हो गया है उसे न रोग होता है, न वृद्धावस्था प्राप्त होती है, और
न मृत्यु ही होती है । (१२)
सि०अ०-योग में आठ विषय निधारित है (अर्यात पाठ नगा का विधान है),
जिन म से पाच का उल्लेख हुआ। भय तीन जो शेष हैं उन म से एक धारणा है,
और धारणा का अर्थ है एक विशेष तत्त्व से चित्त को बांध देना। उस का प्रकार
यह है कि पहल चित का पृथ्वी में सयमन करे और समझे कि पृथ्वी महाभून में ही
हूँ, फिर चित्त का जल में सयमन करे और समये कि जन महाभूत मैं ही हूँ इस के
अनन्तर नित्त वा अग्नि म रायमन करे और रामझे कि अगि महाभूत मैं ही हूँ इस से
अन तर चित का वायु म सयमन करे और समझे कि वायु महाभूत मैं ही हूँ, इस वे
अनन्तर नित्त का भूताकाश में सयमन करे और ममरे कि भूताकाश मैं ही हूँ। जब
इन की धारणा सिद्ध हो जाती है तो साधक तद्रूप हो जाता है। जो कोई इस
धारणा म सिद्ध हो जाता है उसे रोग और जरा नहीं सताती और उस तक मृत्यु नही
पहुँचती, क्योकि उस का शरीर विशुद्ध योगाग्निमय हो गया होता है। [१२]
लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्व,
वर्णप्रसाद, स्वरसौष्ठव च,
गन्ध शुभो, मूत्रपुरीपमल्प
योगप्रवृत्ति प्रथमा वदन्ति ।। १३ ।।
अनु०-शरीर का हल्यापन, नीरागता विपयासक्ति की निवृत्ति,
शारीरिक कान्ति को उज्ज्वलता, स्वर की मधुरता, सुगध, और मल मूत्र
को न्यूनता- [इन्हे] योग को पहली सिद्धि कहते है । (१३)
सि० अ०-इस धारणा मे सिद्ध पुस्प [का शरीर] हल्का और सूक्ष्म हो जाता
है तथा सदा स्वस्थ रहता है। उसका मन विगी ओर चलायमान नहीं होता उस
का मुख कातिमय हो जाता है उम का स्वर मपुर हो जाता है उस के शरीर में
दुगध नहीं होती और उस मे मुगध आती है उनके मन मूत्र में यूनता हो जाती है।
यह योग की पहली सिद्धि का लक्षण है। [१३]
यथैव विम्ब मृदयोपलिप्त
तेजोमय नाजत तत् सुधान्तम् ।
तद्
वात्मतत्त्व प्रसमीक्ष्य
एक वृतार्थो भयते वीतशोक ॥ १४ ॥

२३१]
सिर पावर (फारसी)
अनु०-जिस प्रकार मिट्टी से मलिन हुआ बिम्ब (दर्पण आदि जिस
में मुख प्रतिविम्वित हो) मिट्टी धुल जाने पर तेजोमय हो कर चमकने
लगता है, उमी प्रकार देहधारी जीव जात्मतत्व या साक्षात्कार मर
अद्वितीय, कृतकृत्य, और शोकरहित हो जाता है । (१४)
मि० १०-जिस प्रकार स्फटिव पर मिट्टी विपका दी जाय और उप्त का तेज
मिट्टी से चिपक जाने के कारण प्रवीत न हो और जद उमे धो डाले तो उस की चमक
प्रगट हो जाय, उसी प्रकार भूल जीवात्मा ब्रह्म मावेज है जो अविद्या और अज्ञान की
मृत्तिका ये वारण प्रवाशिन नहीं होता, किन्तु जब उसे तप और ज्ञान से
हैं तो वह ब्रह्म तेज प्रकाशित और प्रकट हो जाता है। उम [माधक का शोक दूर
हो जाता है। उम के यार्य और वर्तव्य उस पर पूर्ण हो जाते है [अर्थात् वह कृत-
वृत्य हो जाता है,]। उस के लिए कोई पर्नव्य शेप नहो रहवा और वह अद्वितीय
हो जाता है। [१४]
यदाऽऽत्मतत्त्वेन
तु ब्रह्मतत्त्व
दीपोपमेनेह युक्त. प्रपश्येत्,
अज, ध्रुव, सर्वतत्त्वर विशुद्ध
ज्ञात्वा देव मुच्यते सर्वपाशः ।। १५ ।।
अनु०-जिस समय योगी दीपक यो समान प्रकाशस्वरूप आत्मभाव
से ब्रहातत्त्व पा साक्षात्कार करता है, उस समय उस अजन्मा, निश्चल,
और समस्त तत्त्वो से विशुद्ध देव यो जानबर वह सम्पूर्ण वन्धनो से मुक्त
हो जाता है । (१५)
मि.--जीवात्मा की ज्योति को दीप बना कर और पवित ब्रह्म का
साक्षालार पर वे उन से एकोमूत हो जाना चाहिए। यह भूस-सत्ता मजन्मा है,
निश्चल है, सभी मे विशुद्ध है, और प्रकाशस्वरूप । [साधा] उमे शान र पापी
ने सपन्न बन्धना स मुक्त हो जाता है। [१५]
है देव प्रदिशोऽनु सर्वा ,
पूर्वो ह जात , स उ गर्भ अन्त.,
स एम जात स जनिप्यमाण,
प्रत्यइ जनाम् तिष्ठति सर्वतोमुरा ॥१६॥

श्वेताश्वतरोपनिषद् 52796. [ २३७ अनु०-यह देव ही सम्पूर्ण दिशा विदिशा की ओर उन्मुख है, यही पहले उत्पन्न हुआ था, यही गर्म के भीतर है, यही उत्पन्न हुआ है, यही उत्पत होने वाला है, यह समस्त जीवो में प्रतिष्ठित और सर्वतोमुख सि० अ०-यह ब्रह्म समस्त दिशा विदिशा म व्याप्त हो पर स्थित है, सब से पहले प्रकट हुआ है, समस्त जगन् के भीतर वही है, ओ भी हुआ है वही है, जो भी है वही है, जो भी होगा वही है। हे मनुष्यो । चाहे जिधर देखो उधर ही उस का मुख है । [१६] यो देवो अनौ, यो अप्सु, यो विश्व भुवनमाविवेश, य ओपधीपु, यो वनस्पतिपु, तस्मै देवाय नमो नमः ॥ १७ ॥ अनु०-जो देव अग्नि मे है, जो जल में है, जिस ने सम्पूर्ण भुवन को व्याप्त कर रखा है, जो ओपधि और वनस्पतिओ मे है, उस देव को नमस्कार है, नमस्कार है । (१७) सि० अ० अग्नि में जो प्रकाश है वह वही है। जल में जो प्रकाश है वह वही है। उस का प्रकाश सभी सोका में व्याप्त है। उस वा प्रकाश राभी भोपधि- बनस्पतिभो में व्याप्त है। उस प्रकाशस्वरूप सत्ता को नमस्कार | नमस्वार ।। [१७] ॥ इति द्वितीयोऽध्याय ।। य च तृतीयोऽध्यायः य एको जालवानीशत ईशनीभि, सर्वाल् लोकानीशत ईशनीभि., एवैक उद्भवे सम्भवे य एतद् विदुरमृतास् ते भवन्ति ।। १ ॥ अनु०-जो एक जालान् (मायावी) [अपनी] ईश्वरीय शक्तिओ से शासन करता है, जो [अपनी] ईश्वरीय शक्तिमा से सभी लोको का शासन परता है, जो ही [उन थे] उद्भव और विकास में अवेला [स्थित रहता है]-उसे जो जानते हैं वे जमर हो जाते है । (१) २३८ ] सिरअक्बर (फारसी) सि० अ०---जो एकमात्र सत्ता है, जिस म द्वैत नहीं है जो विविध प्रकार की शक्ति से सब का शासन धरता है, जो सभी लाका और सभी प्राणिया पर अपनी ही शक्ति से शासन करता है वह राय के माविर्भाव के पूर्व एव था और आविभाव काल म भी एक ही है। जो कोई इस अद्वैत सत्ता को जानता है वह अमर हो जाता है। [१] एको हि रुद्रो-न द्वितीयाय तस्थुर- य इमाल् लोकानीशत ईशनीभि , प्रत्यङ् जनास् तिष्ठति, सञ्चुकोचान्तकाले ससृज्य विश्वा भुवनानि गोपा ॥२॥ अनु०-रुद्र एक ही है-[ज्ञानी] दूसरे के लिए नहीं होते-जो [अपनी] ईश्वरीय शक्तिओ द्वारा इन लोको का शासन करता है, [जो] प्राणियो के समक्ष स्थित है, जो समस्त लोको की रचना कर पालन करते हुए प्रलयकाल में उन्हें समेट लेता है । (२) सि० अ०-वह रुद्र एक है जो सब रा सहर्ता है। उस के सदृश कोई और नहीं। वह अपनी ही सामध्य से समस्त लोगो का स्वामी है। वह महाप्रलय म समस्त लोकाया अपने भीतर लप पर ना है और समस्त लोगो को उन लोगों के भीतर जो कुछ है उम के साथ उत्पन कर ये एव उम के अनार [उन का] पालन पर वे अपने म लीन कर लेता है। [२] विश्वतश्चक्षुरुत, विश्वतोमुखो, विश्वतोबाहुरुत, विश्वतस्पात् । वाहुभ्या धमति' स पतनैर् द्यावाभूमी जनयन् देव एक ॥ ३ ॥ अनु०-[वह] सर ओर नेत्रा वाला, सर आर मुषा पाला, सब आर भुजाआ याना, और सम ओर पैरा वाला है। वह एकमान्न देव धुलोष और पृथ्वी की रचना करता हुआ दोना भुजाओ और पनता (पया) से शब्द करता है। (३) तुलनीय वाम्बेद १०७२। २ अम्वेद १०१३ यहुवेद १७१ अपनवेद १३० २६ तरिहीयमाना १६१८ तिरपारपया १०.१४ मैरायोमरिना .... (अन्तिम बार सलों परहिचा पाठभेद के गाय) । स महपि, श्वेताश्वतरोपनिषद् [ २३९ मि० अ०-मभी और उसी के नेत्र है सभी आर उभी के मुख हैं सभी और उसी गो मुजाएं हैं सभी जोर उसी वे पर हैं। यह सभी से अपने हापा से काय कराता है, सभी पमिया को पा से उडाता है। पृथ्वी और आवाश को उत्पन्न कर व उन के मध्य यह अवेला प्रकाशित हो रहा है। [३] यो देवाना प्रभवश् चोद्भवश् च, विश्वाधिपो, रद्रो, हिरण्यगर्भ जनयामास पूर्व, स नो बुद्ध्या शुभया सयुनक्तु ॥ ४ ॥' अनु०-जो देवतामा या उद्गम और उत्स है, [जो] जगत्पति, स्ट, और सर्वज्ञ है, जिस ने पहले हिरण्यगर्भ को उत्सन दिया था, वह हम भुम बुद्धि से सयुक्त गरे । (४) मि० अ०-सभी देवता उसी में आविभूत हुए हैं और सभी देवता उसी मे लीन होते हैं। वह गभी लावा रा स्वामी है और सभी लोगा पा राहा भी है। वह महामानी है। उसी न सब स पहो हिरण्यगम को उत्पन्न किया। वह एकमात्र प्रकाशस्वरूप सत्ता जिस ने हिरण्यगम से उत्तम किया है हम ज्ञान प्राप्त कराये ताकि हम जानें कि हम दही हैं। [] या ते शिवा तनूरघोरापापकाशिनी तया तस् तनुवा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि ॥ ५॥' अनु०-हे रुद्र । हे गिरिशन्त (पर्वतो मे बसने वाले) ' तुम्हारी जो मङ्गलमयी, शान्त, और पुण्यप्रकाशिनी मूति है, उस मङ्गलमयो मूर्ति के द्वारा तुम [हमे] देखो। (५) गि १०-टेर। सबगहारक । तुम्हारा जो रूप मगलमय है भयावह नही है पापा का नाशक है जिस रूप से आना प्राप्त होता है और क्लास पवत म मगल होता है उसी रूप स हम पर दष्टिपात कर । [१] पामिपु गिरिशन्त । हस्ते विभयंस्तवे शिवा गिरिन ' ता कुरु, मा हिड सी पुरुष जगत् ॥ ६ ॥ १ किञ्चित् पाठा तर से ४१२ श्रयववेदीय महानारायणोपनिषद् १०३ । २ किमिचन् पाठान्तर से यजुवेंद६२।

! २४. ] सिर अक्बर (फारसी) अनु०-हे गिरिशन्त । है गिरिन (पवता रे रक्षक) ' तुम प्रहारार्थ अपने हाथ म जो वाण धारण क्येि रहते हो उसे मङ्गलमय करो, पिसी पुरुष या पशु की हिंसा मत करो। (६) सिं० म०--है महाशैलवासी। उस याण से हमारा मगल पर और अपने माग में किसी पथिक पर उस वाण का प्रहार न र अर्थात अपने गाम के प्रति अनानी । पना। [६] तत पर, ब्रह्मपर, वृहन्त, यथानिकाय सर्वभूतेषु गूढम्, विश्वस्यक परिवेष्टितार- मीश त ज्ञात्वाऽमृता भवन्ति ॥ ७॥ अनु०-उस [रुद्र, जगत अथवा हिरण्यगर्भ] से परे जो परब्रह्म है महान है जो समस्त प्राणिया म उन से शरीर के अनुसार छिपा हुआ है, तथा विश्व का एक मात्न माच्छादव है उस परमेश्वर ने जान कर [जीवगण] अमर हा जाते हैं । (७) सि०अ०-वह परब्रह्म है हर स म वही रूप धारण किये हुए है उराम माहित है समस्त जगत में व्याप्त है। जस अग्नि जिस वस्तु म व्याप्त होती है उगे अपने ही रुपमा पर नेती है उसी प्रकार वह भी गिरा रिसी वस्तु म ध्याप्त होता है उसे अपने ही रूप ना पर देना है। ईश्वर को इस प्रकार जान पर मनुष्य अमर हो जाता है। [७] वेदाहमेत पुरप, महान्त- मादित्यवर्ण, तमस परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति, नान्य पन्या विद्यतेऽयनाय ॥ अनु०-मैं इग अपानातीत प्रयाशस्वस्प महान् पुरुप को जानता है। उस ही जान पर [पुरप] मृयु गो पार करता है परगपद र पिए माई और माग नहीं है। (4) १गद ५१ -- तेनेद पूर्ण श्वेताश्वतरोगनिषद [२४१ मि० अ०-- श्वेताश्वतर ने शिष्यों रो रहा कि इस महान् पुरप को जाता है। यह महान् पुरष ज्योर्तिमय सूर्य के समान है और अज्ञानात्यकार से परे। जो कोई इस प्रसर जानता वह मृत्यु को तर कर, अमर हो कर, अक्षत रहता है उस तक पहुंच जाता है। उस की प्राप्ति का दूसरा मार्ग नहीं है। [] यस्मात् पर नापरमस्ति किञ्चिद्, यस्मान् नाणीयो न ज्यायोऽस्ति कश्चित्, वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्, पुरपेण सर्वम् ।। ९॥ अनु०-जिस से उत्कृष्ट और कोई नहीं है, जिस से छोटा और बडा भी कोई नहीं है, जो धुलोक मे वृक्ष के समान अकेला निश्चलभाव से स्थित है, उसी पुरुप ने इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है । (९) मि० अ०-हिरण्यगर्भ मे बडी कोई और सत्ता नही है। कोई भी मत्ता या तत्त्व उस से बड़ा नहीं है। और उस से सूक्ष्मनर भी कोई मत्ता नहीं है। वह एक वृक्ष है, सीधा और निश्चल । समस्त जगत् म वह वृक्ष अोना है। उम मे समस्त जगत् पूर्ण है और वह अपनी ही महिमा में प्रतिष्ठित ततो यदुत्तरतर तदरूपमनामयम् । य एतद् विदुरमृतास् ते भवन्त्यथैरे दुखमेवापि यन्ति ॥ १० ॥ अनु -उस से जो उत्कृष्टतर है वह अरूप और अनामय है। उमे जो जानते है वे अमर हो जाते हैं, अन्य दुख को ही प्राप्त होते सि०अ०-जो हिरण्यगर्भ से उत्कृष्टतर है वह निराकार और निर्गुण है। यही निर्गुण जगत् के प्रादुर्भाव के समय एकातन सगुण हो पाता है और जगत् के लय हो जाने पर एवातत निगुण। वह निगुण दुव से शुय है । [१०] सर्वाननशिरोग्रीव, रार्वभूतगुहाशय , सर्वव्यापी स भगवास् , तस्मात् रावंगत शिव ॥ ११ ॥ अनु०-वह भगवान् समस्त मुखा वाला, समस्त शिरो वाला, और समस्त ग्रीवाओ वाला है, वह ममस्त जीवो के अन्त करण में स्थित और सर्वव्यापी है। इसलिए [वह] सर्वगन और मङ्गतस्प है । (११) १ अन्तिम वाक्य वृहदारण्यकोपनिषद् ८ ८ १ ४ में भी प्राप हाना है।

- -- सनिविष्ट , २४२] मिरे अपयर (फारसी) शि० अ०-गमस्त आनन उसी के आनन हैं, समस्त सिर उमी वे सिर हैं, शमस्त ग्रीवाएं उसी की पीया हैं। वह सभी प्राणियों को हृदय-गुहा में निहित है, सर्वव्यापर है, उपास्य है। इसी कारण यह आनन्दस्वाप सर्वगत है। [११] महान् प्रभुर् वै पुरुप., सत्त्वस्येप प्रवर्तका. सुनिर्मलामिमा प्राप्तिमीशानो, ज्योतिरव्ययः ॥ १२ ॥' अनु०-यह पुरुष महान्, परमसमर्थ, इस निर्मल प्राप्ति के उद्देश्य से अन्त करण नो प्रेरित करने वाला, सब का नियन्ता, प्रवाशस्वरूप, और अविनाशी है । (१२) मि० अ०---वह प्रभुओ का प्रभु है और सर्वत्र पूर्ण है। वह सभी प्राणियों का प्रेस है। वह परम मुक्ति का स्वामी है, ज्योति स्वरूप है, और अव्यय है । [१२] अङ्गुष्ठमात्र. पुरुपो,' ऽन्तरात्मा, सदा जनाना हृदये हृदा, मन्वीशो,' मनसाऽभिक्लुप्त.। य एतद् विदुरमृतास् ते भवन्ति ॥ १३ ॥' अनु०-यह पुरुष अगुष्ठमान, अन्तरात्मर, सर्वदा जीवो के हृदय में स्थित; और हृदय, बुद्धि, और मन द्वारा निष्पा (अथवा प्रकाशित) है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते है । (१३) गि अ-दि यह मनुष्य वे अन्त वरण मे, जिस वे भीतर विद्यमान आराश पुरुर वे अगूठे के आवार का है. स्थित है, अत उसे 'अगुप्टमान पुरष' कहते हैं। अन्यथा वह पार के परे है। चूंकि यह समस्त प्राणियों में हृदय में उन में हृदयाकाश के बराबर है. अत वह उग मनीषा से जाना जाता है जो हृदय को अधिकृत किये हुए है। जो कोई बगे जाा लेना है वह अमर हो जाता है। [१३] सहनशी पुरुप , सहस्राक्ष , महवपात् । स भूमि विश्वतो वृत्वाऽत्यतिष्ठद् दशाङ्गुलम् ॥ १४ ॥' • 'मन शुद्ध प्रसार ४ा है जैगा ८१, और कापनिषद् . ३. में प्रयुन त्रा। • तुलनीय 1, 12, 13, २३॥ पर 10.1, यजुर्वेद" मामद.६१%, याद..., निरीसारया १२-कहीनी चिन् गायनरमाथ। - श्वेताश्वतरोपनिषद् [२४३ अनु०-पुरुप सहव सिर, सहस्र नेत्र, और सहस्र चरगो वाला है। वह भूमि वो सब ओर से व्याप्त पर उस का दस अगुल अतिक्रमण कर के स्थित है । (१४) जि० 20-उम पुरुष के अनन्त मिर है, बाह्य और आभ्य तर अनत नत्र है, और वह समस्त महाभूता ची व्याप्त करके दम अगुल ऊपर रहता है--नाभि स दस स्थल के भीतर हृदय तक। [१४] पुरुप एवेदथं सर्व, यद् भूत यच् च भव्यम्, उतामृतत्वस्येशानो, यदन्नेनातिरोहति ॥ १५॥ अनु०-जो कुछ भूत और भविष्यत् है एव जो अन के द्वारा वृद्धि यो प्राप्त होता है वह सब पुरुष ही है, तथा वही अमृतत्व का भी प्रभु है । (१५) सि०अ०-जो दिखायी देता है, जो कुछ हुआ है और जो कुछ होगा वह पुरुष ही है। वह मोनदाता है। वह माया अर्यात वासनाआ से बहुरूप भासता है। जो कुछ माया के कारण पृथक् प्रतीत होता है वह भी वही है । [१५] सर्वत पाणिपाद तत्, सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्, सर्वत श्रुतिमल् लोके, सर्वमावृत्य तिष्ठति ॥ १६ ॥ अनु०-[उस के] सब ओर हाथ-पाव है, सब ओर आँख, शिर, और मुख है, [वह] सर्वन कों वाला है, एव लोक में सब को व्याप्त कर के स्थित है। (१६) ३ सि० अ०-सभी ओर उस के हाथ है सभी ओर उस के पर हैं सभी ओर उम के नेन्न हैं सभी ओर उस के सिर हैं सभी और उम के मुख है मभी ओर उस में कान है। वह सब को व्याप्त किये हुए है । [१६] सर्वेन्द्रियगुणाभास, सर्वेन्द्रियविवर्जितम्,' सर्वस्य प्रभुमीशान, सर्वस्य शरण बृहत् ॥ १७ ।। ऋ १०१.२, यजुद ११२ मामवेद अयववेद १६.६४, तैत्तिरीयारण्या ३१२१-किञ्चित् पाठान्तर के साथ। २गीता १३१३॥ ३ यह चाल गीता १३१४ में भी जाता है।

२४.] सिरें अक्बर (पारसी) अनु०-[वह] समस्त इन्द्रिय-गुणो के म्प में अवभासित होता हुआ भी समस्त इन्द्रियो से रहित है, सब वा प्रभु, शासव', और सब का वडा आश्रय है । (१७) मि० अ०~-वह ममस्त इद्रिया और इन्द्रिय ज्ञाना को प्रकाशित परता है और समस्त इन्द्रिया से परे है। सब का स्वामी, सय वा ईश्वर, और सब की शरण वही है । [१७] नवद्वारे पुरे' देही हधंसो लेलायते बहि । वशी सर्वस्य लोकस्य स्थावरस्य चरस्य च ॥ १८ ॥ अनु०-सम्पूर्ण स्थावर-जगम जगत् का स्वामी यह हस (परमात्मा) नव द्वार वाले [देहम्प] पुर में वाह्य विषयों को ग्रहण करने के लिए चेप्टा रिया करता है । (१८) मि० अ०--वह सब ना क्षेत्र है। मनुष्य का शरीर एक नगर है जिस के मी द्वार हैं। उस मे जीवात्मा है जिस वा नाम हस है। वह जाग्रदवस्था, स्वप्नावस्था, सुषुप्तावस्या, और तुरीयावस्था इन चार अवस्थामा म विहार करता है। यद्यपि वह इन चार अवस्थामी म विहार करता है, तथापि वह सभी से परे, निलिप्त, और बाहा है। सभी जगम और स्थावर उस ने वशीभूत है । [१८] अपाणिपादो जवनो ग्रहोता, पश्यत्यचक्षु, स शृणोत्यकर्ण । स वेत्ति वेद्य न च तस्यास्ति वेत्ता । तमाहुरग्र्य पुरुप महान्तम् ।। १९ ॥ अनु०-यह हाथ-पांव से रहित हो कर भी वंगयान् और ग्रहण करने पाला है, नेत्रहीन हो पर भी देखता है, वर्णरहित हो पर भी मुनता है। यह ज्ञातव्य वो जानता है, किन्तु उसे जानने वाला कोई नहीं है । उमे आदि, पूर्ण, एव महान् पुरुष रहा है । (१९) मि.-यशी गाय और पर नहीं है, क्योगिक प्रहण परता और पाता है, और नहीं है और दगना है, का मी है और मुनना है। यह ममी मातम्य विषया का माता है और उग । माता कोई नहीं। वह सर्वत पूण है और गय वा मा। महागा II उमे गव मे बापहो । [१] १० मिन २१, नीना : १३ ॥

::महीयान्, १ वेताश्वतरोपनिषद [ २४५ अणोरणीयान्, महतो आत्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः । तमक्रतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान् महिमानमीशम् ।। २० ॥ अनु०-यह अणु से भी अणु और महान् से भी महान् आत्मा इस जोव के अन्तःकरण में निहित है। उस सकल्पशून्य महिमामय ईश्वर को जो विधाता की कृपा से देखता है वह शोकरहित हो जाता है । (२०) सि०अ०-वह सभी व्यापको में व्यापक है और मूक्ष्मो से सूक्ष्मतर है। वह हृदय-गुहा में बसता है। आत्मा ऐमा ही है। वह अकाम है। वह हमारी और कृपादृष्टि रखे। जो कोई उस का दर्शन कर लेता है वह शोकरहिन हो जाता है । वह ईश्वर है जो साक्षात् माहात्म्य-स्वरूप है । [२०] वेदाहमेतमजरं, पुराणं, सर्वात्मानं, रावंगत विभुत्वात्, जन्मनिरोध प्रवदन्ति यस्य ब्रह्मवादिनी हि, प्रवदन्ति नित्यम् ।। २१ ।। अनु०-ब्रह्मवेत्ता जिस के जन्म का अभाव बतलाते और जिसे नित्य कहते है उस जराशून्य पुरातन सर्वात्मा को, जो विभु होने के कारण सर्वगत है, मैं जानता हूँ। (२१) सि० अ०--श्वेताश्वतर ने अपने शिष्यों से कहा मैं उस पुष्प को जानता हूँ उसे जानने वाला । पुरातन है, अगर है, सर्वात्मा है, सर्वगत है, और विभु है। पुरुप किसी भी लोक में जन्म नहीं लेता। उस के विषय में ब्रह्मवादियों का कहना है कि उम का न आदि है और न अन्त, और कि वह नित्य है। [२१] । ।। इति तृतीयोऽध्यायः ॥ नैतियारएमक १०.१० १, प्रदीप गहानामगिद् ८.१; किन्चित् पाउने फे माय कठोपनिषद् २.२० ।

२४६ ] सिर (अपवर पारसी) चतुर्थोऽध्यायः य एकोऽवों बहुधा शक्तियोगाद् वर्णाननेकान् निहितार्थों दधाति वि चैति चान्ते विश्वमादौ स देव । स नो बुद्धचा शुभया सयुनक्तु ।। १॥ अनु०-जो एक अवण हा कर भी विविध शक्तिआ क् याग स और किसी गुप्त प्रयोजन से नाना वण धारण करता है और जिस अपन आदि और अन्त रूपी सत्ता म विश्व जोन हो जाता है वही दव है। वह हम शुम बुद्धि से सयुक्त कर । (१) सि०अ०-ग्रह एपमान सत्ता है। उस म काइ रग नहा रितु अपनी विविध प्रकार की शक्तिया र योग स विविध प्रकार व रगा का व्यक्त करता है। उस म जो बुछ उत्पन्न किया है उस सब वा यतत अपन म लय पर न पुन अपन म म प्रकट करता है। श्वेताश्वतर न वहा-वह एकमात्र ज्याति म्वरूप सत्ता है । पुष वह मान प्राप्त करा दे जिस स मैं जानने लगू कि मैं वही हू । [१] तदवाग्निम्, तदादित्यस्, तद् वायुस्, तदु चन्द्रमा तदेव शुत्र, तद् ब्रह्म, तदापत् तत् प्रजापति ॥२॥' अनु०-वही अग्नि है वही मूय है वही बायु है, वही चन्द्रमा है, वही तुक (शुद्ध) है, वही ब्रह्म है वही जन है वही प्रजापति है । (२) शि० --वहीं अग्नि है वही सूय है वही वायु है वही पहोपग्रह है अर्थात कुर्मी (देवायन)। वहीं हिरण्यगभ है वहीं वरण है अर्थात त का देवता वही प्रजापति है अर्थात ममा मृष्टि का पना। [२] त्व स्त्री व पुमानसि, स्य पुमार उत वा चुमारी, त्व जीर्णो दण्डन पन्चमि, त्व गातो भवमि विश्वतामुख ॥ ३ ॥ १०- स्त्री है पुष्प है न हो पुमार या कुमारी है न ही पद हा पर दपन व सहार चता है न ही [प्रपञ्चाय म] उतान हान पर रायतामुग (जयवा यहाप) हो जाता है । (३) मद, 1 (सन् पारस) । र देता है। नील पतङ्गो, ऋतव, समुद्रा। श्वेताश्वतरोपनिषद् [२४७ शि०१०-इस वे अन तर श्वेताश्वतर ने कहा-तू स्त्री है, तू पुरष है. तू बुमार है, तू कुमारी है, तू ही वृद्ध हो कर दण्ड के सहारे मनुष्य को कुमार्ग पर डाल तू ही आविर्भूत हो कर सर्वत्र प्रतिभात हो रहा है । [३] हरितो, लोहिताक्षस्, तडिद्गर्भ, अनादिमत् त्व, विभुत्वेन वर्तसे, यतो जातानि भुवनानि विश्वा ।। ४ ॥ अनु०-तू ही नीलवर्ण भ्रमर, हरितवर्ण, लाल आँखोवाला, मेघ, [ग्रीष्मादि] ऋतु, और [सप्त] समुद्र है। तू अनादि है, सर्वत्र व्याप्त हो कर स्थित है, तथा तुझ ही से समस्त भुवन उत्पन्न हुए है । (४) मि० अ०--श्याम वर्ण हा पक्षी तू ही है हरितवर्ण का पक्षी तू ही है, लान आँखो । वाला पक्षी तू ही है, बिजलियो पाला बादल तू ही है, ह नतुओ घाला तू हो है, समस्त समुद्र तू ही है, जिम का आदि नहीं है वह तू ही है, जिस का अन्त नही है वह तू ही है, समस्त लोक लोका तर तेरे ही द्वारा आविर्भूत हुए हैं, और तेरा ही अजामेका, लोहितशुक्लकृष्णा, वह्वी प्रजा मृजमाना सरूपा अजो ह्येको जुपमाणोऽनुशेते, जहात्येना भुक्तभोगामजोऽन्य ।। ५॥ अनु०- अपने अनुरूप बहुत सी प्रजा उत्पन्न करने वाली एक लोहित, शुक्ल, और कृष्ण वर्ण वी अजा (बारी-प्रवृति)को एक अज (बकरा-जीव) १ 'मनुष्य को कुमार्ग पर डाल देता है। यह मूल फारसी वाक्य 'मर्दुम राय गलत मी अन्दाजी का अनुवाद है। उपनिषद् का मुप्त वाप है 'दण्डेन पञ्चति । इस मे जो पञ्चसि किया है उस ने दारा को वञ्चना कर दी है ! 'पञ्च' पातु का अयं गमन करना भी होता है, और यहीं यहाँ अभिप्रेत है, ठगना या उन्मार्गगामी करना नहीं। अस्तु, इस मन को शकराचार्य ने टोका नहीं की है। • यहाँ कीचो बहु अपश रजप सत्त और नमक प्रती हैं। एक है जीवात्मा और दूमरा परमात्मा । यह मर मिश्चित् पाठभेद से तैत्तिरीयारण्यक (१०१०५) में भी माना है।

सयुजा सखाया वृक्ष पर २४८ ] सिरें अग्घर (फारसी) सेवा करता हुआ भोगता है [और एव] दूसरा बज उस भुक्तभागा (भोगी हुई) का त्याग देता है । (५) शि० म०-माया तेरी ही इच्छा है अनादि, अवेली। उस के तीन वण हैं- अर्थात् लाल श्वेत और श्याम । तेरी इच्छा के तीन गुण है जिस से भूतो म तीन गुण आविर्भूत हुए हैं। जीवारमा नित्य है अद्वैत है! माया जो तेरी इच्छा शक्ति है उस स एक हो कर विद्यमान है। जीवात्मा ही परमात्मा हो जाता है जब ज्ञानी उस [गाया] का भोग कर के उस स मुक्त हो जाते हैं। [५] सुपर्णा समान पस्वजाते। तयोरन्य पिप्पल स्वाद्वत्त्य- नश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥ ६॥ अनु०-साथ साथ रहने वाले दो पक्षी सपा एक ही वृक्ष का आश्रय वर के रहते है। उन में एक तो स्वादिष्ट पिप्पल (वर्मफर) 7 भोग परता है और दूसरा भोग न कर ये वेवल देखता रहता है । (६) मि० अ०- पनी है जो पुरुप और उम प्रतिविम्ब ये गमान प्रतिभात हाते हैं। उन मे मे प्रत्येक एक दूगरेमा राता है। एक हो शरीरया पर विराजमान हैं। उन म स जो प्रतिविम्बस्वरूप है यह उस वृक्ष के फलस्वरूप वर्म पल मा उपभोग बरता है दूसरा उपभोग नहीं करता और द्रष्टा मात्र है। [६] समाने वृक्षे पुरपो निमग्नो अनीशया शोचति मुह्यमान । जुष्ट यदा पश्यत्यन्यमीश- मस्य महिमानमिति वीतशोर ॥७॥ अनु०-[ईश्वर के साथ एक ही वृक्ष स सजग जीय दीनता ये पारण मोहित हा पर शोर करता है। यह जिरा समय अपन रा भिम आनन्द स्वरुप ईश्वर और उन पी महिमा पा दखना है उस समय शोर-रहिम हो जाता है। (७) १ मे १६८० मानित। २ मुपायापनि ११२।

श्वेताश्वतरोपनिषद् [ २४९ गि० 46-जो कर्मफल को प्राप्ति के लिए उस वृथा मे आसक्त हो जाता है और अपने स्वामी को भूल जाता है वह प्रमाद और अज्ञान के कारण शोकाकुल हो जाता है और अपने परमेश्वर को जान लेता है और यह भी] कि मैं जीवात्मा और प्रतिविम्य मात है और यह पक्षी हूँ जो परमात्मा है तो वह शोक रहिन हो जाता ऋचो अक्षरे परमे व्योमन्, यस्मिन् देवा अधि विश्वे निपेदु । यस् त न वेद किमृचा करिष्यति ? य इत् तद् विदुस् त इमे समासते ॥ ८ ॥ अनु०-जिस मे समस्त देवगण प्रतिष्ठित उस अक्षर परव्योम में हो [वेद की] वथाएं स्थित है । जो उस को नहीं जानता वह वेदो से ही क्या कर लेगा? जो उसे जानते है वे तो ये सम्यक् रूप से स्थित सि० य--वह जो अव्यप और विनु चिदाकाश है उगी मे समस्त वेद और देवता प्रतिष्टित हैं। जो कोई उसे नहीं जानता उसे मला वेद से क्या लाभ होगा। जो लोग उसे जान जाते है वे परमानन्दस्वरूप हो कर उसी म स्थित हो जाते हैं। [1] छन्दासि, यज्ञा, ऋतवो, व्रतानि, भूत, भव्य, यच् च वेदा वदन्ति- अस्मान् मायी सृजते विश्वमेतत् । तस्मिर चान्यो मायया सनिरुद्धः ॥ ९ ॥ अनु०-वेद, यज्ञ, अतु, व्रत, भूत, भविष्य, वर्तमान, तथा और भी जो कुछ वेद बतलाते हैं-वह सब मायावी ईश्वर इस [अक्षर से ही उत्पन्न परता है। और उस (प्राञ्च) में ही माया से अन्य (जीवात्मा) बँधा हुआ है । (९) मि० अ०-जितने भी वेद हैं, जितने भी यम हैं जितने भी दान है, जिनन भी का हैं जो भी हुआ है, जो भी होगा, वेदो के को भी आदेश हैं, यह सर उसी मे याविर्भूत हुआ है। उस ने अपनी मापा द्वारा जो उमी को इच्छा है यह गर आविष्कृत दिया है और उन आविणारा (दृश्या) म बंध कर ए गया है । [१] १ऋम्मेद ११६४ १६ भरा हुआ ~ २५० ] सिर अक्बर (पारसी) माया तु प्रकृति विद्यान्, मायिन तु महेश्वरम् । तस्यावयवभूतैस् तु व्याप्त सर्वमिद जगत् ॥ १० ॥ अनु०-प्रकृति को तो माया जानना चाहिए और महेश्वर का मायावी । उसी के अवयवभूता [अशस्वरूप जीवो] से यह समस्त जगत् व्याप्त सि०अ०--माया तीना गुणो मा सयोग और साम्यावस्था है और इस माया तथा इच्छा पा स्वामी मायी है अर्पोत महेश । समस्त जगत उम के प्रतिविम्वा से । [१०] यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको, यस्मिन्निद स च वि चैति सर्वम, तगीशान, वरद, देवमीड्य निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमति ॥ ११ ॥ अनु०-जो अवेना ही प्रत्यर योनि का अधिष्ठाता है, जिरा म यह सब सम्यक प्रयार से समवत हो कर लीन हो जाता है उस सवनियाता वर देने वाले स्तवनीय देव या साक्षालार पर पे [साधक] इस परम शाति को प्राप्त होता है । (११) मि० अ०--पदार्थों के वैविध्य वे बीच वह अवेना है। वे सय प्रलय-म उसी मनीन हो जाते है और सग वाल म उम से निगृत हो जाते हैं। वह ईश्वर परता पोतिमय है स्तवनीय हैं। जो कोई उसे इस रूप में निश्चित करने यह जान लेता हदि में यही हूँ पह मोगरूपी परम शान्ति को प्राप्त पर लेता है। [११] यो देवाना प्रभवश् चोद्भवश् च , विश्वाधिपो, रद्रो, महर्षि, हिरण्यगर्भ पश्यत जायमान, स नो बुद्ध्या शुभया सयुनक्तु ॥ १२ ॥ अनु०-जा दवताआ का उद्गम और उस है [जो] जगत् का स्वामी, रुद्र और रावन है जिसने हिरण्यगम र उत्पन्न हाते दया था, वह हम तुम बुद्धि से सयुत वर । (२) चित् पाटा३ । अरदाय महागरामापरिषद् १.३॥

२५१ श्वेताश्वरोपनिषद् सि० अ०-समस्त देवता उसी से आविर्भूत हुए हैं और उसी में लीन हो जाने हैं। यह सब से बड़ा है उस से बडा कोई नही। वह रुद्र है, अर्थात् सब का सहारक है। वह महाज्ञानी है। उस ने हिरण्यगर्भ को उत्पन होते देखा था। वह सत्ता मुझे उस पवित्न बुद्धि को प्राप्त करा दे जिस से मैं जानने लग जाऊँ कि मैं वही हूँ। [१२] यो देवानामधिपो, यस्मिल लोका अधिथिता., य ईशे अस्य द्विपदश् चतुष्पद कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥ १३ ॥' अनु०-जो देवताओ का स्वामी है, जिस मे लोक आश्रित है, जो इस द्विपद एव चतुष्पद [प्राणिवर्ग] का शासन करता है उस आनन्द- स्वरूप देव की हम हवि के द्वारा उपासना करें। (१३) सि० अ०-समस्त देवताओ के रहस्यों का ज्ञाता वही है। समस्त जगत् उसी मे स्थित है। वही समस्त द्विपदो और चतुष्पदा का स्वामी हैं। श्वेताश्वतर ने कहा कि मैं उसी सत्ता के लिए समस्त पुण्यो का अनुष्ठान करता हूँ छोड कर मैं किस देवता का यजन करूं? [१३] सूक्ष्मातिसूक्ष्म, कलिलस्य मध्ये विश्वस्य स्रष्टारमनेकरूपम्, विश्वस्यक परिवेष्टितार, ज्ञात्वा शिव शान्तिमत्यन्तमेति ॥ १४ ॥ अनु०-मूधम से भी सूक्ष्म, कलिल वे मध्य जगत के मप्टा, विश्व के एकमात्र आच्छादक शिव को जान कर [जीव] परम शान्ति प्राप्त करता है । (१४) १ इस मत्र का उत्तराई ऋम्वेद १० १२१३ में भी आता है। करने देवाय का अर्थ किम देवता की' तथा मानद के लिए देवता की भी हो सकता है। २विञ्चित् पाठातर के साथ ५.१३ तीसरा पाद ३७और ८१६। यहाँ 'कलिल' का अर्थ बललरम' (प्रॉटोप्लाभ) हो मकता है यया मृष्टि का मूल उपादान जिमे ऋग्वेद १० १२६३ में मलिल कहा गया है। कहीं यह कलिल अथवा 'मलिल' ही तो यूनानी दर्शन का दिली (hy le) नहीं है। हिली परवी में सूना हो गया है। ऐसी सत्ता को २५२] सिर मषवर (फ़ारसी) सि० ब०-वह मूक्ष्मातिसूक्ष्म है। वह समस्त जगत् में व्याप्त है। वह समस्त जगत् का रचयिता है। समस्त विविध रूप उसी के रूप हैं। वह समस्त जगत् वो व्याप्त कर के स्थित है। लोग उस आनन्दस्वरूप को जान कर परम शान्ति प्राप्त कर लेते है । [१४] स एव काले भुवनस्य गोप्ता, विश्वाधिपः, सर्वभूतेषु गूढः। यस्मिन् युक्ता ब्रह्मर्पयो देवताश् च, तमेवं ज्ञात्वा मृत्युपाशांश् छिनत्ति ॥ १५ ॥ अनु०-यह काल में विश्य का रक्षक है, [वहीं] विश्व का स्वामी है, [वहीं] समस्त भूतों में अन्तहित है। जिस में ब्रह्मपि और देवगण तल्लीन हैं, उसे इस प्रकार जान कर [पुरुष] मृत्यु के पाशों को काट डालता है। [१५] सि०अ०-वह एक समय जगत का अपने भीतर ही पालन करता है। वह विश्व का स्वामी है। वह समस्त प्राणियो मे अन्तर्हित है और गुह्य रहस्यों का ज्ञाता है। समस्त ब्रह्मपि और देवता उस का ज्ञान हो जाने के कारण उस से एकीभूत हो जाते हैं और उस को अपना ही स्वरूप जानते हुए मृत्यु के पाश को काट डालते हैं। [१५] घृतात् परं मण्डमिवातिसूक्ष्म, ज्ञात्वा शिवं सर्वभूतेषु गूढम्, विश्वस्यक परिवेष्टितारं ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापः ।। १६ ॥ अनु०-घृत के ऊपर रहने वाले उस के सार भाग के समान अत्यन्त मूषम और सभी भूतों में अन्तर्यामी रूप से स्थित जानकर तथा विग्य में एक मात्र आन्टादक देव शिव को जान कर [पुस्प] समस्त बन्धनों में मुक्त हो जाता है। (१६) गि०२०-जिस प्रकार पुत्र अत्यन्त सूक्ष्म होता है उसी प्रार वह गाना गूप्मता की सीमा है। यह गमस्त पूतों में अन्तनिहित है, यानन्दम्वरूप है. और समग्न गा में व्याप्त है। जो योग प्रकाशप और अंग गता मो जान रोता है पर गमन बन्धनों टना है। [१६] श्वेताश्वतरोपनिषद् । २५३ एप देवो विश्वकर्मा, महात्मा; जतानां हृदये सनिविष्ट.; हृदा, मनीपा, मनसाऽभिवलृप्तः । य एतद् विदुरमृतास् ते भवन्ति ।। १७ ॥' अनु०-यह देव जगत्का; महान् आत्मा; और सर्वदा समस्त जीवो के हृदय में अन्तनिहित; हृदय, मन, और बुद्धि द्वारा निष्पन्न (अथवा प्रकाशित) है। जो इसे जानते हैं वे अमर हो जाते हैं। [१७] सि० अ०-वह एक मान ज्योतिर्मय सत्ता समस्त जगत् का उत्पादक है। वहीं एकमान महात्मा है। वह प्राणियों के अन्त करण मे सदा समिविष्ट है। उस के अतिरिक्त सब कुछ का निषेध करते हुए शुद्ध प्रज्ञा द्वारा अपने को तद्रूप जार कर उरो प्राप्त दिया जा सकता है। जो लोग उसे जान लेते हैं वे अमर हो जाते हैं। [१५] यदाऽतमस् तन् न दिवा न रात्रिर्, न सन् न चासञ्; शिव एव केवलः ।' तत् सवितुर् वरेण्य, प्रज्ञा च तस्मात् प्रसूता पुराणी ॥ १८ ॥ अनु०-जिस समय तमस् नहीं रहता, उस समय न दिन रहता है ग रानि, न सत् रहता है न असत्; एकमात्र शिव रह जाता है। वह अविनाशी और सवितृ-देव का वरिष्ठ [रूप] है, तथा उसी से पुरातन प्रज्ञा का प्रसार हुआ । (१८) सि० ०-जब अज्ञान वा अस्पताभाव हो जाता है, तब न रानि होती है न दिन, न सत्य होता है और न मिथ्या--' एकमात्र वही आनन्दस्वरूप सत्ता होती है। वह अव्यय है। उस का प्रकाश मूर्य मे भी रहा है। प्रज्ञा को गति देने वाला वही है। [१] १ तुलनीय ३ १३, कठोपनिषद् ।। २ तुलनीय छान्दोग्योपनिषद् ३ ११३, ४१-२॥ ३ तुलनीय ऋग्वेद ३६.१० (गायत्रीमन)। ४ उपनिषद् के 'सन्' और 'ममत्' का अनुवाद 'सत्ता' और 'असता' होना चाहिए था, न कि 'सत्य' और 'मिस्या । तदक्षरं, ३ - न २५४ सिरै अवघर (फारसी) नैनमूचं, न तिर्यञ्च, न मध्ये परिजनभत् । न तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद्यश ॥ १९ ॥ अनु०-उसे न ऊपर से, न इधर-उधर से, न मध्य मे कोई ग्रहण कर सका है। जिस का नाम महद्यश (महान् यश वाला) है उस ब्रह्म की कोई प्रतिमा (बरावरी करने वाला) नहीं है। [१९] सि. अ०-उसे न तो अध्व कह सकते हैं और न अधर, और न उसे मध्य ही कह सकते हैं। उसे दिशा भी नहीं कह सकते। उसके वरावर कुछ नहीं है। उस का नाम 'महद्यश है । [१९] सदृशे तिष्ठति रूपमस्य, न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा हृदिस्थ मनसा य एन- मेव विदुरमृतास् ते भवन्ति ॥ २० ॥ अनु०-इस का स्वरूप दृष्टि म नहीं ठहरता, न इसे कोई नेत्रद्वारा देख सकता है। जो इस हृदयस्थित परमात्मा का हृदय और मन से इस प्रकार जान लेते हैं वे अमर हो जाते है । (२०) सि अ-जो कुछ दृष्टिगोचर होता है यह उस का रूप नहीं है। उसे नेत्र रो देख ही नहीं सकते। उस रामस्त अनीश्वर वे निपेध द्वारा ही प्राप्त रिया जा सकता है अथवा अपने को तद्रूप जानपर ही उसे प्राण किया जा सरता है। जो लोग इस प्रकार जानने है वे अमर हो जाते है । [२०] अजात इत्येव कश्चिद् रुद्र यत् ते दक्षिण मुप तेन मा पाहि नित्यम् ॥ २१ ।। तुम अजन्मा हो, इमलिए पोई [मुझ जैसा भय से रातर पुग्प तुम्हारी शरण लेता है और रहता है पि] तुम्हाग जो दक्षिण मुग है उम से मरी मवंदा रक्षा करो। (२१) गि सोलारकर न बहारि प्रमाद और अशान भय ग उम निरय मता पी शरण ता है। हे प्रधान गमगारा अपने उम जो पाता। का हरण सरन म ममध है गान दुग मे मेरी मारमा पर । [१] १ मदि३०१ (माका दार चराण और ३ का पूर्व पाण)। सामिषद् • ३६ (पागन्ता के साथ) पदीय दानारा पनिषद् ॥ ११ ॥ भीरु प्रपद्यते । अनु० है रुद्र ।

सनाश्वतरोपरिषद् [ २५५ मा नम् तोपे तनय, मा न आयुपि मा नो गोपु, मा नो अश्त्रेषु रीरिप । वीरान् मा नो रुद्र | मामितो वधीर, हविष्मन्त सदमित् त्वा हवामहे ।। २२ ।' अनु०-हे रद्र तुम युपित हा पर हमारे पुत्र पौत्र आयु गौ और अश्वा म पात न पला । क्रोध म हमारे वीरा का भी वध न करना। हम हव्य-सामग्री से युक्त हा वर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते है । (२२) मि० अ०--मेरे पुत्र-पौत्र मी आय मरे पशुओ को हानि न पहुँचे--उन या शुभ और मगर हो। हे सर्वमहारर । मरे वीर शस्त्रधारी योद्धाओं या वध न पर मेरे पापो ये कारण मुझ पर कोध न पर। हम हव्य-गामग्री हाय भ ने पर इस मभा म तेरा आवाहन करते है। [२२] ॥ इति चतुर्थोऽध्याय ॥ द्वे यन्न पञ्चमोऽध्यायः अक्षरे ग्रह्मपरे त्वनन्ते, विद्याविद्ये निहिते क्षर त्वविद्या ह्यमृत विद्या, विद्याविद्य ईशते यस तु सोऽन्य ॥१॥ अनु०-अविनाशी और अनन्त परब्रह्म म दो हैं जहां विद्या और अविद्या दोना गुप्त रूप से निहित हैं। [उन मे] क्षर अविद्या है अमृत विद्या है तया जो विद्या और अविद्या का शासन करता है वह कोई और १ किन्चित् पाठान्तर के साथ ऋग्वर १११४८ यजुर्वेद १६१६ तैत्तिरीयमहिता २ विद्या अविचा और ब्रह्म के त्रिक का दूरस्थ सकेत हमे अथववेद ११८२३ और पनुर्वेद ४० १२ १४ अयथा ईशोपनिषद १-११ मे प्राप्त होता है। यह त्रिक गोतीत त्रिक तर पुरुष अक्षर पुष्य और उत्तम पुरुष पुरुषोत्तम (गीता १५१७ १८) से तुलनीय है।

२५६] सिर अलवर (फारसी) सिम-दानदार सत्ताएं हैं जिनका नाश नहीं होता--एक माना जीवात्मा और दूसरा आनी जीवात्मा। ये दोना अनात है। ब्रह्म इन दोना रा बा है और उस म विद्या और अविद्या प्रत्येक निहित है। अविद्या नश्वर है और विद्या अविनाशी ब्रह्म जो विद्या और अविद्या या अधिष्ठाता है वह हा दोनो से परे है । [१] यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको- विश्वानि रूपाणि योनीश् च सर्वा- पि प्रसूत कपिल यस् तमने ज्ञानर विभति जायमान च पश्येत् ।। २ ।' अनु०-जो अकेला ही प्रत्येव योनि का अधिष्ठाता है-समस्त रूपी और समस्त योनिआ वा-तथा जिस ने सृष्टि के आरम्भ म उत्पन पपिल ऋपि या ज्ञान सम्पन दिया था और ज म लते हुए भी देया था [वही विद्या और अविद्या स भिन उन या शासक है] 1 (२) शि० अ०-वहीं एवामान सता छोटी और बड़ी समस्त योनिश्रा में निहित है। मपित मानी जो महर्षि है सब से पूर्व उत्पन्न हुए थे। वह सत्ता पपित को विविध प्रकार के शान वितान से सम्पन वरती है। कपिल ज्ञानी वो ही जो उस तास उत्पन्न हुए थे सव की उत्पत्ति का कारण जानना चाहिए । [२] एवं जाल बहुधा विकुर्वन् नस्मिन् क्षेने सहरत्येप देव । सृष्ट्वा पतयस् तथेश सर्वाधिपत्य कुरुते महात्मा ॥३॥ अनु०-इस ससार शन्न म यह देव एम एस जाल यो अनेक प्रकार बिछा कर [अन्त म] सहार करता है। यह महात्मा ईश्वर ही [पल्ल पे आरम्भ म] प्रजापति। यो पुन उत्पन पर सब पा आधिपत्य परता है। (३) १मय ४१२ स तुलना परी पर रिल और गिपगन गग नापा नीत हो हैं। मय ३४ भतुलन । 1 वष जसाचा: में मरीचि आदि पनि दिया है। कहीनदी परम मिलतारजापति रामनार लगता यहीद अमेर १० 0.हिएगो (Demiurges) ने अप में सामा 31 अगा की मुष्टि में सहायर हुए थे। २ नम रार्या गामारोपनिषद । २५७ गियर ज्योरिप freण ससा सिगुण पा मारा पता र और जा रे भातर उग सगेट पर विगुणगी साम्यावस्था में गीत पर देशा है। गुप यह प्राशस्वरूप महाा पारमा और ईश्वर नगर में रामरत प्रगापतिगोगो उत्पाप परमे सयमा शाराा और भाभिपण परता है । [१] दिश अर्बमधश् च तियर प्रकाशयन् आजते मानवान्, एप रा देवो भगवान् परेण्यो योनिस्वभायानधितिष्ठत्येा ॥ ४ ॥ आल-गिरा प्रसार गर्ग उपर, गीगे, राषा इधर-उधर सगरत दिशाओ यो प्रणाशित परता हुआ देदीप्यमात होता है, उसी प्रकार यह ईश्वर, राम्गीय भगया, अमेसा ही जन्म गो पातो मा सिमा रसा fire Ho-प्रसार गुर्य स्थान है और समरस i अध, और दिशाभी पो अपो प्रमाण रो प्रगित कर देता है उसी प्रसार पद मति, पहिगागाती, ज्योतिर्मग और वरेण राता जोटी भोर पहरामा योरिभोगreोर प्रत्येर को अपो सम प्रमाणित और प्रतिष्ठित परती है। [1] यम् च रयभाय परति विषयगोलि, पायो । रार्यान् परिणामयेद् य , रायंगेतद् विश्वमधितिष्ठत्येयो, गुणाश् च सर्यान् विनियोगद्य ॥ ५ ॥ अल-जो स्पभाषा पो परिणपप गरता है और पिशर मा मूल है, जो पायो (परिणामयोग्य पदार्थों) पो परिणाम है, जो अपेक्षाही इस सम्पूर्ण पिप गायिगा परता है जो शिरपा]ि सगरा गुणी यो जाये या परिसरणा है [पह परमाय ] 1 (4) frox--वही गया जो गयी उत्तिा गमात भूगो समानों ने भागार गाउ पूर्णमा तक पहुंचा देगी भार उन्हें गि और साव का परमा पानी! गाय परमार वहीत गा पार है और पहो तो गुणों मामी। [२] गूढ, २५८ ] सिरे सादर (फारसी) तद् वेदगुह्योपनिपत्सु तद् ब्रह्मा वेदते ब्रह्मयोनिम् । ये पूर्वदेवा अपयश् च तद् विदुस्, ते तन्मया अमृता वै बभूवु ॥ ६ ॥ अनु०-वह वेदा के गुह्यभाग उपनिपदो में निहित है उस वेद-योनि [परमात्मा] को ब्रह्मा जानता है। जो पुरातन देव और ऋषिगण उसे जानते थे वे तद्रूप हो कर अमर ही हो गये थे। (६) मि० अ०-वह ब्रह्म वैदिर उपनिपदों में जो गोपीय रहस्य हैं निहित है । ब्रह्मा उस ब्रह्म को अपना उत्पादन जागता है। पूर्व काल ये देवगण और ऋषिगण म से जो भी उस ब्रह्म को जान गये वे तद्रूप हो कर अमर हो गये । [१] गुणान्ययो य, फलकर्मकर्ता, कृतस्य तस्यैव स चोपभोक्ता, स विश्वरूपस् त्रिगुणस्, त्रिवर्मा, प्राणाधिप सञ्चरति स्वकर्ममि ॥७॥ अनु०-जो गुणा [सत्व रजस और तमस] से सम्बद्ध फलप्रद कम वा बता, और उसी रिये हुए कम का उपभाग करन वाला है वह विभिन्न म्मा वाला त्रिगुणमय, [धम अधम और ज्ञान नाम मे] तीन मागों से गमन परने वाला प्राणा TT अधिष्ठाता अपने कर्मों के अनुमार ससरण करता है । (७) मि० अ०--जो योई निगुण को गाम्यावस्था से अपन यो अविर परखा है यह फन दने वान रो वा पत्र्ता होता है अपन पमों व पन का स्वाद भी स्वय चगता है और विविध योनिआ म जम तता है। उग जीवात्मारे तीन माग हैं । या प्राण का गनि म अपन दो क यनगार आमटिमा सोरा वो प्राप्त होता है। [७] अगुप्ठमानो रवितुल्यस्प सङ्कल्पाहवारसमवितो बुद्धेर गुणेनात्मगुणन चव आराग्रमाला ह्यपरोऽपि दृष्ट ॥ ८ ॥ १तुनाय१४।

श्वेताश्वतरोपरिषद् [ २५९ अनु०--जो अंगूठे के वरावर, सूर्य ये समान ज्योति स्वरूप, सयल्प और जहकार से युक्त, तथा बुद्धि और शरीर के गुणो से भी युक्त है, वह अन्य (जीव) भी आर को नोर के यरावर आवार वाला देखा गया च - सि० अ-वह जीवात्मा पुरुष पे अगूठे वे बराबर हृदय रध्र के मध्य विद्यमान है और सूर्य के ममान अपने ही प्रकाश से प्रकाशित है, कि तु मन वे कारण अहकार और सकल्प के बधन म पड गया है। वही प्रकाश जो पुरुष के अगुठे के बराबर कतिपय सूक्ष्म प्राणिया के अन्त करणो म सुई के बरावर है। [4] बालाग्रशतभागस्य शतधा कल्पितस्य भागो जीव स विज्ञेय , स चानन्त्याय कल्पते ।। ९ ।। अनु०--केश के सौ भागो मे विभवत अग्रभाग वा जो सौवा भाग है [अर्थात् वाल की नोक का दसहजारवां भाग] उस जीव को उस के बराबर जानना चाहिए, और [फिर भी] वह अनन्त ही सिद्ध होता है । () सि०अ०--तिपय प्राणियो के अन्त करण म, जिस से भी वह सूक्ष्मतर है, उस का परिमाण ऐसा है कि एक बाल वी नोक सो भाग किये जायें और उन सौ भागो में से एक वे पुन सो भाग कर दिये जायें। [अर्थात् जीव बान की नोक के दम हजार भाग के बराबर है।] [वस्तुन ] वह प्राणियो मे अत्यत सूक्ष्म रूप में विद्यमान है, वही जीवात्मा महान भूतो मे उन भूतो के अत करण के अनुरूप अवस्थित है। जब वह अपने को पहचान लेता है तो अनत हो जाता है। [९] नव स्त्री, न पुमानेष, न चवाय नपुसक । यद् यच्छरीरमादत्तै तेन तेन स रक्ष्यते ॥ १० ॥ अनु०-यह न स्त्री है, 7 पुरुप है, और न नपुसा ही है। यह जो जो शरीर धारण करता है उसी-उमी से आविष्ट रहता है। (१०) सि० अ०-यह जीवात्मा स्त्री भी रहा है पुरप भी नही है नपुमा भी नहीं है-वह जिस शरीर म प्रवेश करता है उमी शरीर के अनुरूप नाम ग्रहण करता १ इस के आग के दो वाक्यों को लकर ' सिजवबर म एक नये मन की परिकल्पना की गपी है।

२६० सिरें अक्बर (पारसी) सङ्कल्पनस्पर्शनदृष्टिमोहैर् ग्रासाम्बुवृष्ट्या चात्मविवृद्धिजन्म । कर्मानुगान्यनुक्रमेण देही स्थानेषु रूपाण्यभिसप्रपद्यते ।। ११ ॥ अनु०-सङ्कल्प, स्पर्श, और दर्शन के मौह से तथा अन्न और जल के सेवन से शरीर की वृद्धि और जन्म होते है। यह देही [विभिन्न] योनिओ मे उन कर्मों के अनुसार एक के बाद दूसरा रूप धारण करता है । (११) सि०अ०-शरीर मन वे सकल और स्पर्श की इच्छा के कारण देखन और इन का विचार मन मे लाने के वारण सद्धित होता है, और अन्न और जल ग्रहण वरन से जो शुक्र बनता है वही शरीर की उत्पत्ति का कारण होता है। मृत्यु नै अन तर वही जोवारमा कर्मों के अनुसार शरीर धारण घर के कर्मफन वा स्वाद चखता है। [११] स्थूलानि, सूक्ष्माणि, बहूनि चैव रूपाणि देही स्वगुणैर् वृणोति । क्रियागुणरात्मगुणश् तेपा सयोगहेतुरपरोऽपि दृष्ट ॥ १२॥ अनु०-जीव अपने गुणो (पाप-पुण्यो) के द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, अनेक शरीरो या वरण करता है। उन के परवर्ती सयोग (देहान्तरप्राप्ति) का भी हेतु कर्म ये गुण और अपने ही गुण के रूप में देखा गया है । (१२) मि० अ०-तीना गुणो को भात्मसात् कर के जीवात्मा प्रत्येक अवस्था म स्युन मूक्ष्म ग्रहण करता है। पुण्य और पाप वमों में जो फल मिलता है तयाँ उपागना म जो फल मिलता है, उन्हीं के पारण म्यूत और सूक्ष्म शरीरा का मयोग होता है। माम शरीर प्रहण करने का दूसरा कारण है पर्माशय, जो अन्त र म मुद्दो जाता है। [१२] अनाद्यनन्न कनिनस्य मध्ये, ਕਿਧ सप्टारमनेकरूपम् । विश्वस्यक पग्विप्टितार ज्ञात्या देव मुच्यने सर्वपाश ॥ १३ ॥ दुलनगर च और और शारीर [ २६१ Tীনি अनु०-वलिल पे मध्य अनादि, अनन्त, विश्व वे बहुरूपी रचयिता, विश्व ये एरमात्र आच्छादा दो यो जान पर [जीव] समस्त पाशो से मुक्त हो जाता है । (१३) सि.--ब्रह्मभान आदि है न अत। यह समस्त ससार र म साक्षी सम स्थित है और समस्त जगत् का उत्पादक है। उम के रूप अनन्त है। वह समस्त जगत से अपने में परिवप्टित पिये हा है। वह अत और ज्योतिमय है। जिम पिसी को इस प्रकार मान और बोध हो जाता है यह समरत घनो और जाला म मुक्त हो जाता है । [१३] भावग्राह्यमनीडाख्य, भावाभावकर क्लासगंवर देव ये विदुस् ते जहुस् तनुम् ।। १४ ।। अनु०-भावनाय, अनिनेत (लामा), सृष्टि और प्रलय ररने वाले, शिवस्परप, एव क्साआ की मृष्टि परी वाले इस देव यो जो जान लेते हैं वे गरीर [के बन्धन को त्याग देते हैं । (१४) सि०अ०-यह गुट सत्ता अतरण भी शुद्धता और प्रकाश से जानी जाती है। उसका स्थान भी नहीं है और नाम भी नहीं है। वह पालक और सहारक है और आनदस्वरूप है। यह नित्य दया रो जगन् मी मुष्टि करता है। जो लोग इस ज्योतिर्मया सत्ता को इस प्रकार जान लने हैं वे शरीर को त्याग देते हैं। [१४] ॥ इति पञ्चमाध्याय ।। शिवम्, पप्ठोऽध्यायः स्वभावमके पवयो वदन्ति, काल तथाऽन्ये, परिमुद्यमाना । देवस्यप महिमा तु लोके येनेद भ्राम्यते ब्रह्मचक्रम ॥१॥ अतु०-वई मोहग्रस्त विद्वान स्वभाव को [कारण] बतलाते है और दुमरे कान को। यह तो भगवान को महिमा है जिम से यह ब्रह्मचक्र घूम रहा है । (१) कर्माध्यक्ष, २६६ ] सिरे भनबर (फारसी) सि०अ०-जिस प्रकार मक्डी स्वेच्छा से अपने मे से तन्तुओ का जाल बुनती है और [उस से] अपने को आवृत कर उसी म रह्नी है उसी प्रकार यह एकमान ज्योति स्वरूप और अक्षर सत्ता गुणत्रय यो साम्यावस्या का ततुजाल अपने म से स्वत उद्भावित कर स्वय वो उरा म आवृत कर वे स्थित है। वह अव्यय सता अपने को हम प्रदान करे अर्थात् हम अपने रूप का कर दे। [१०] एको देव, सर्वभूतेषु गूढ, सर्वव्यापी, सर्वभूतान्तरात्मा, सर्वभूताधिवास, साक्षी चेता, केवलो, निर्गुणश् च ।। ११ ।। अनु०-देव एक है, समस्त प्राणियो म निहित, सर्वव्यापक, समस्त भूतो का अन्तरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियो मे बसा हुआ, साक्षी, चेतन, पेवल, और निर्गुण । (११) शि० अ०-यह एक्मान प्रवाशरवरुप देव समस्त भूतो म अन्तनिहित है सर्व- व्यापक है रामस्त भूता का अतरात्मा है रामस्त पर्मों के पल पा विधाता है। समस्त भूत उगी में बसते हैं। वह सब का साभी है शानस्वरूप है फेदन है और निर्गुण है। [११] एको, वशी, निष्क्रियाणा बहूना- मेक बीज बहुधा करोति तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास् तेपा सुख शाश्वत, नेतरेपाम् ।। १२ ।' अनु०-जा एव, स्वतन्त्र, परमारमा वहुत-से निस्त्रिय तत्वो ये एप चौग पो अनय रूप वर देता है, अपने अन्त परण में स्थित उस [देव] को जो धीर पुरुप देखते हैं उन्हें ही नित्यमुग प्राप्त होता है, औरो यो नहीं। (१२) मि -भी उगने वाम। वही एज मात्र गत्ता चीन से स्मावर और जगम योनिभागो विविध रूपम उद्भाषित पानी है। जो ना उस सप्ताको आरमस्प देयते हैं माया मुग सही का है न कि दूसरे [१२] माय किमिमा पाटार गापामीरा।। य ।" से ? स्वेताश्वतरोपनिषद् [२६७ नित्यो नित्याना, चेतनश् चेतनानाम्, एको बहूना यो विदधाति कामान् तत् कारण साख्ययोगाधिगम्य ज्ञात्वा देव मुच्यते सर्वपाशै ॥ १३ ॥ अनु० जो नित्यो में नित्य, चेतनो में चेतन, और अकेला ही बहुतो के भोगो का विधान करता है, उस साख्ययोग द्वारा ज्ञातव्य सर्वकारण देव को जान कर [पुरुष] समस्त बन्धनो से मुक्त हो जाता है। (१३) सि० अ०-वह नित्यो में नित्य है, चेतनों में चेतन है। वह एक है और बहुतो को कामनाओ को पूर्ण करता है। वह समस्त जगत का रनयिता है। उसे साक्ष्य और योग से प्राप्त किया जा सकता है। जो उस देव को जान लेता है वह सभी पाशी छूट जाता है। [१३] न तत्न सूर्यो भाति, न चन्द्रतारक, नेमा विद्युतो भान्ति, कुतोऽयमग्नि तमेव भान्तमनुभाति तस्य भासा सर्वमिद विभाति ॥ १४ ॥ अनु०--वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है और न चन्द्रमा या तारें। (वहाँ ] ये विजलियां भी नहीं चमकती, फिर यह अग्नि किस गिनती मे उस के प्रकाशित होने से 'सव प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसी से प्रकाशमान है । (१४) सि०अ०-वह सत्ता जहाँ है वहा न तो सूय प्रकाशित होता है न चद्रमा और न तारे। विद्युत का प्रकाश भी वहाँ नहीं पहुंचता इग अग्नि का तो वहना ही क्या । वह सभी को प्रकाशित करती है और सब उसी के प्रकाश से प्रकाशित है । [१४] एको भुवनस्यास्य मध्ये। स एवाग्नि सलिले सनिविष्ट । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति । नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय ॥ १५ ॥ १ये दो पाद कठोपनिषद ५ १३ में विद्यमान हैं। २ कठोपनिषद् २०१५ मुण्डकोपनिषद २२१०। ३ अन्तिम दो पाद ३८ और यजुर्वेद ३११- मैं मी प्रा तय है। सर्व २६२] सिरें अक्चर (फारसी) मि० अ०-कुछ लोगों में प्रमाद और नशान भरा हुआ है किन्तु अपत को ज्ञानी समयत हैं और कहत है कि जात स्वत उत्पन्न हुआ है। इसी प्रकार कुछ लोग कहते हैं कि जो भी है वह काल है। नितु एमा नहीं है, बलि यह ब्रह्माण्ड उस ज्योतिर्मयो सत्ता की महिमा स घूम रहा है। [१] येनावृत नित्यमिद हि ज्ञ, कालकारो, गुणी, सर्वविद्य तेनेशित कर्म विवर्तते ह पृथ्व्यप्तेजोऽनिलखानि-चिन्त्यम् ॥२॥ अनु०-जिस के द्वारा यह सब सर्वदा जाच्छादित है तथा जो ज्ञानस्वरूप, काल का पर्ता, गुणवान् और सर्वज्ञ है उसी से प्रेरित हो कर यह पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, और जावाशरूप कर्म [जगद्रूप से] विवर्तित होता है-उस वा चिन्तन करना चाहिए। (२) मि० ब०-उम ने सदा स जगत को परिवेष्टित पर रपा है। वह सवम है, वान वा भी राहारस है मृत्यु वा भी मृत्यु है। समस्त गुण उसी में हैं। समस्त प्रियाएँ और पलाएं उमी म हैं। वही बम पल का विधाता है। वही है जो पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आगशवे रूप म माविमा हुया है। ऐसा समाना चाहिए कि सब वही है और समप्न मं उमी से निमित्त विये जाते हैं । [२] तत् कर्म वृत्या, विनिवर्त्य भूयस्, तत्त्वस्य तत्त्वेन रामेत्य योगम्- एवेन, द्वाभ्या, तिभिरप्टभिर् वा- पालेन चैवात्मगुणश् च मूक्ष्मै ॥ ३ ।। अनु०-उस पगं का पर ये, पुरा निवृत्त हो कर, जो उस सत्य पे साथ तत्य या याग पर पे-प, दो, तीन, या आठ [तत्त्वा र गाय] तथा यान और अत परण ये गूग गुणा ये साग, (३) गि ५०-पिता के अन तर याचा त्याग पर गया राय भोर मूमा ये मन गो जाता। उगमा माग -अपम गुर सीगम उपस्थित हाना तिीय गुरु और यह ग या परा प्रौर पीर गुर पगम का भारता मोर ग सात गुरमर का प्राजमरना और उग विमान में सका

उस ये वो वा नाश हो जाता है, और यमों का क्षय हो जाने पर वह
गि००-जिन वो रो पल की प्राप्ति होती है उनका अनुष्ठान करते।
स्यूत को उस मूक्ष्म ग एक बर ये समस्त द्वत को तीन गुणा की साम्यावस्था
और जर मनुष्य के सौ श नाश हो जाता है, तो वह स्वर पस्प हो जाना है।
वस्तुत अय ही हो जाता है । (४)
प्रत्येक
और भू, भुय और स्व तीनो लोडा से छूट नाता । [४]
आदि स, सयोगनिमित्तहेतु,
परस् त्रिकालादवलोऽपि
दृष्ट ।
त
विश्वरूप, भवभूतमोड्य,
देव
स्वचित्तस्थमुपास्य
श्वेताश्वतरोपनिषद्
[ २६३
मग्न रहना, अर्थात नित्य भक्ति [ची साधना करना] । दूसय [प्रकार है] अष्टाग-योग
का अभ्यास और पुन ज्ञान व अन तर प्रत्येव वर्म व पल बो उच्छिन पर लना, पुन
दया, क्षमा, और शुचिता या अभ्यास, सदा प्ररान रहना, निषाम दान पुण्य करना,
कों को अपने ऊपर महज (आसान) पर लेना, पिशुनता न रखना, और ब्रह्म की
अभीपा। इन गुणो से जीवात्मा आत्मा स एक हो कर मुक्त हो जाना है। [३]
आरभ्य कर्माणि
गुणान्वितानि
भावाश् च सर्वान् विनियोजयेद् य
तेपामभावे कृतकर्मनाश ,
वर्मक्षये याति स तत्त्वतोऽन्य ॥ ४॥
अनु०-जो [पुरुष] [सत्वादि-] गुणमय वर्म आरम्भ पर [उन या
और समस्त भावो वा विनियोग करता है, उन का अभाव हो जाने से
हए
मणीभूत पर दे। जय इस प्रकार ज्ञान हो जाता है, तो स्थूल और मूल्म सबका
नाश हो जाता है , जब हा का नाश हो जाता है, तो फर्मों का नाश हो जाता है,
.
पूर्वम् ॥ ५॥

कर्माध्यक्ष, २६६ ] सिर अक्बर (फारसी) मि० अ०---जिस प्रकार माडी स्वेच्छा से अपने मे से सन्तुओ या जाल बुनती है और उस रो] अपने को आवृत पर उसी म रहती है उसी प्रकार वह एकमात्र ज्योति स्वस्प और अगर सत्ता गुणनय वो साम्यावस्या का तन्तुजाल अपने में से स्वत उद्भावित कर स्वयं को उग म आवृत पर स्थित है। वह अव्यय सत्ता अपने को हम प्रदान गरे, अर्गात हम अपने रूप का कर दे। [१०] एको देव, सर्वभूतेषु सर्वव्यापी, सर्वभूतान्तरात्मा, सर्वभूताधिवास, साक्षी चेता, केवलो, निर्गुणश् च ॥ ११ ॥ अनु०-देव एव है, समस्त प्राणियो मे निहित, सर्वव्यापक, समस्त भूतो का अन्तरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियो मे बसा हुआ, साक्षी, चेतन, देवल, और निर्गुण । (११) सि० म०-~-वह एकमात्र प्रापरवरूप देव समस्त भूतो म अन्तनिहित है सर्व- व्यापक है समस्त भूता वा अन्तरात्मा है समस्त कर्मों व फर का विधाता है। समस्त भूत उसी म बसते हैं। वह सर का माक्षी है, ज्ञानस्वरूप है, देवन है, और निर्गुण है। [११] एको, बशी, निस्क्रियाणा बहूना- मे बीज करोति तमात्मस्थ येऽनुपश्यन्ति धीरास् तेषा सुख शाश्वत, नेतरेपाम् ।। १२ ।' अनु०-जो एर, स्वतन्त्र, परमात्मा बहुत-गे निनिय तत्त्वों के एल वीज को अनेक म्प पर देता है, अपने अनपरण में स्थित उस [देव] वो जो थोर पुरुष देखते हैं उन्ह ही नित्यमुप प्राप्त होता है, औरो यो नही। (१२) मि० अ०--ममी उग में दशम है। वर्गम मान ससा योग में स्पारर और जगम योनिश्रा से विरित रूपम उदावित पाती है। जा जानी उग गताको भारसम्म देने है शाश्वत मुग उरी है, न विदूगरको। [१२] १ मामा निम्मित् पाठार माग में भी बात है। बहुधा य 52730 श्वेताश्वतरोपनिषद [ २६७ नित्यो नित्याना, नेतनश् चेतनानाम्, एको बहूना यो विदधाति कामान् ।' तत् कारण सारययोगाधिगम्य ज्ञात्वा देव मुच्यते सर्वपाशै ॥ १३ ॥ अनु०-जो नित्यो मे नित्य, चेतनो म चतन और अकेला ही बहुतो के भोगो का विधान करता है उस साख्ययोग द्वारा ज्ञातव्य सबकारण देव को जान कर [पुरुप] समस्त बधनो से मुक्त हो जाता है । (१३) सि० अ०-वह नित्यो मे नि य ह चेतनो म चेतन ह। वह एक है और बहुतो की कामनाओ को पूर्ण करता है। वह समस्त जगत का रचपिता है। उसे साक्ष्य और योग से प्राप्त किया जा सकता है। जो उस देव को जान लेता है वह सभी पाशो से छूट जाता है। [१३] न तन सूर्यो भाति, न चन्द्रतारक नेमा विद्युतो भान्ति, कुतोऽयमग्नि ? तमेव भान्तमनुभाति सर्व, तस्य भासा सर्वमिद विभाति ।। १४ ॥ अनु०-वहाँ न गूय प्रकाशित होता है और न चद्रमा या तारै । [वहाँ] ये बिजलिया भी नहीं चमक्ती फिर यह अग्नि क्सि गिनती म उस के प्रकाशित होने से ही सब प्रकाशित होता है और यह सब कुछ उसी से प्रकाशमान है । (१४) सि० म०-वह सत्ता जहा है वहा न तो सूप प्रकाशित होता है न च द्रमा और म तारे। विद्युत् का प्रकाश भी वहां नहीं पहुचना इस अग्नि का तो कहना ही क्या । वह सभी को प्रकाशित करती है और सब उसो के प्रकाश से प्रकाशित है। [१४] एको हयसो भुवनस्यास्य मध्ये । एवाग्नि सलिले सनिविष्ट । तमेव विदित्वाति मृत्युमेति । नान्य पन्था विद्यतेऽयनाय ।। १५ ।। १ये दो पाद कठोपनिषद ५१३ में विद्यमान है। २ कठोपनिषद् २ २ १५ मुण्डकोपनिषद २२..। ३ अन्तिम दो पाद ३८ और चतुर्वेद ३११८ में भी प्राप्त म है। स २७० - सिर अक्वर (फारसी) तप.प्रभावाद् देवप्रसादाच् च ब्रह्म ह श्वेताश्वतरोऽय विद्वान्, अत्याश्रमिभ्यः परम पवित्र प्रोवाच सम्यगृपिसंघजुष्टम् ॥२१॥ अनु०-निश्चय ही श्वेताश्वतर ने तपोवल और परमात्मा के प्रसाद से ब्रह्म को जाना [और] ऋपिसमुदाय से रोवित इस परम पवित्र [ब्रह्मतत्त्व] का सन्यासियो को सम्यक् उपदेश किया। (२१)- सि० अ०-श्वेताश्वतर ने ब्रह्म को तप के प्रभाव से और उसी प्रकाशस्वरूप ससा के प्रसाद से जाना था। और इस परम पवित्र ज्ञान का उन साधको को सम्यक उपदेश किया जो चारो प्रकार के सन्यास का अतिक्रमण कर के ऊपर उठ चुके थे और जिन की परमहस सज्ञा है । [२१] वेदान्ते परमं गुह्यं पुराकल्पे प्रचोदितम् नाप्रशान्ताय दातव्यं ना पुत्रायाशिप्याय वा पुनः ।। २२ ॥ अनु०-वेदान्त मे परम गुह्य इस पूर्व कल्प में उपदिष्ट [विद्या को न तो अशान्त को देना चाहिए, न अपुत्र को, और न अशिष्य को ।(२२) सि०अर-इस विद्या के रण को ब्रह्मज्ञानी जानते हैं और पाते हैं। यह परम रहस्य गोपनीय उपनिषद् है और वे सदा से इस का उपदेश परते आये हैं। जिस का मन शान्त नहीं हुआ है उसे इस विद्या का उपदेश नहीं करना चाहिए, और यदि उपदेश ही करना है तो जो पुत्र योग्य हो और जो शिष्य सत्यनिष्ठ हो उसे उपदेश परना चाहिए। [२२] यस्य देवे परा भक्तिर, यथा देवे तथा गुरी, तस्यते कथिता ह्याः प्रकाशन्ते महात्मनः । प्रकाशन्ते महात्मनः ।। २३ ।। अनु०-जिस यो परमेश्वर में परा भत्तिा है, जैसी परमेश्वर में बसी ही गुरु में [भी], उस महात्मा के प्रति ही ये कथित अर्थ प्रकाशित होते हैं, महात्मा के प्रति ही प्रकाशित होते हैं । (२३) मि० अ०-विमे देव में परा भक्ति है और ती ही अदा आने गुरु में भी है उमो महारमा पर इन उपदेश मा मर्थ प्रकाशित होता है । [२३] ॥ इति पष्ठोऽध्यायः ॥ इति श्वेताश्वतरोपनिषत् समाप्ता ।।

३ पृष्ठ-सख्या जिहे शुद्धि-पत्र सिरअक्बर की भूमिका पृष्ठ संख्या कण्डिका सख्या अशुद्ध १७ १ सकेत जिस का सकेत १९ जिहे जो ३ किस ओर से किस हेतु से २० (टि०१) x सूर वाकिमति ५६ ७८ सू० अल्बुरूज २१ २२ उपनिषदें मन्न सख्या अशुद्ध ३ (सि अ) उस ने जिस ने ३१ ६ चलपि चषषि २ (सि अ) निमित्ति निमित्त १ (सि अ ७ (अनु०) पाद पाच ८ (सि ) शुश्रपा शुथूपा २१ जाने जाने जाना जाने ५ स्वयधीरा तद्विष्णो (अनु०) उस विष्णु के परम पद विष्णु के उस परम पद आत्मा जीवात्मा जानता है जानता है उसे उसके कारण भय नहीं होता ६ (ति अ) प्रछा प्रच्छन्न वक्ष्यतीत वक्ष्यतीति १२८ तमचपत चमचायत १३१ (टि३) छद और ज्योतिष १३१ १) चतुदश १३० १० (सि अ) मानता माना १४० ३ (अनु०) पृथ्वी पृथ्वी [उपन्न होती है] १४३ १० ब्रह्मपरामतम ब्रह्म परामृतम या यविकिरतीह प्राय विक्रितीह १४५ तस् लक्ष्यमुच्यते तल्लक्ष्यमुच्यते १ वद यद १७६ द्वादशोनुवाक विष्ण विष्णु १७९ १ (सि ) अनुहरण अनुसरण १८७ ૨ मानन्द मानदा २ (अनु०) श्रोतिय थोत्रिय १९७ ८१ प्रतिष्टतम प्रविष्टितम् स्वय धीरा तद विष्णो , १ ८ (e और निघण्टु चतुदश " १७५ [ २७२] पृष्ठ संख्या मव-मध्या अशुद्ध- २०५ ४ नाम्या ना गमोद् अतीन्द्रिीय २०६ २१६ २१७ २२१ २२६ ६ (अनु०) ३ (अनु २ (सि.) १० (अनु०) स्थिति परिणामी प्रवृति और अविनाशी तथा अपरिणामो नाभ्या नाशक्नोद अतीन्द्रिय देव है स्थित भर(परिणामी प्रवृति) और अक्षर(अविनाशी तथा अपरिणामी आत्मा) अरणि (अधरारणि) धुद्धिकोयोगयुक्त करने सत्य के लिए युवत वरते हुए अरणि २२८ २३० १४ (अनु०) १ बुद्धि को " सत्य के लिए " " " पृथिवी से " " " २३२ ६ (सिम) ७ (अनु०) १० प्रकाशमान लिप्त समतल हो २३३ " " " " पवित हा शरा (कवडी) " २३५ उमे पृथिवी से प्रकाशमान लिपायमान समतल पवित्र शर्करा चलायमान तस् रानूरपोरापापयाशितो ज्योतिमय भवन्त्यथेरे सर्वन जिस अपने नीलवर्ण भ्रमर लाल आँखा वाला चर्चल नस् तनूरपोरापापकाशिनी ज्योनिमय भवन्त्ययेतरे " १३ (सिन) ५ ८ (सि अ) १० १६ (अनु०) ४ (अनु) " ૨૪૧ " २४३ सब ओर " २४७ " " नीलवर्ण और लाल आँखा वाला पतग (पक्षी) है, [तू हो] बह्वी " ऋचाएं . ૨૪૧ २५० २५२ महर्षि तीन १२ १५ (अनु) १७ (सि.ब २२ (अनु.) १४ (मिय) वही कथाएँ महर्षि तल्लीन जगतरा अश्वों म ज्योतिर्मया जाता परात्पर जगत की अश्वों का ज्योतिमयी जाता है २६१ MAIT ७ (अनु.)

मन्त्रप्रतीक-वर्णानुक्रमणिका मन्त्रप्रतीकम् पृष्ठम् ईशावास्योपनिषद् पृष्ठम मन्त्रप्रतीकम् अग्ने । नय सुपथा राये २८ तदेजति, तन नजति अनेजदेक मनसो जवीय पूफ्नस् ! यम । पूर्य। अन्यतम प्रवितियाविद्याम २५ यस तु सर्वाणि भूतानि अथ तम प्रविशति यऽसम्भूतिम २६ यस्मिन सर्वाणि भूतानि अयदेवाहर विद्यया २५ वायुरनिलममृतमधेदम विद्यां चाविद्याच असुर्या नाम ते लोका २२ स पयगाच्छक्रमकायमवणम ॐ ईशावास्यमिद सवम २१ सम्मूतिञ्च विनाश च कुवप्नवेह कर्माणि २२ हिरण्मयेन पाण २७ २३ २४ अपदेवाह सम्मवाद पदाह २४ २७ मनप्रतीकम् अय वायुमनुबन अपाध्यात्म पदेतत अपेद्रमब्रुवन पृष्ठम् ४२ इह घेदवेदोदय ३३ ब्रह्म ह देवेम्यो वेनोपनिषद् पृष्ठम् मनप्रतीकम् ३७ तस्य तपो, दम, कति तेऽग्निमब्रुवन म तत्र घार गच्छति ३४ नाह मये सुवेदेति प्रतिबोधविदितम २९ पच घलषा न पश्यति परछोरन शृणोति यत् प्रागनन प्रागिति यदि मायसे मुयेवेति ४० यद् वाचाऽनम्युदितम ३९ पन मनसा न मनुते यायामत तस्य महम यो वा एतामेवम थोत्रस्य थोत्रम सप्तस्मिन्नयामागे ४० ता 'ब्रह्म' इति होवाच उपनिषद भो! यहि ॐकेनेपित पतति प्रवित मन त ऐक्षत-अस्माक्मेवायम तदभ्यद्रवत । तमभ्यवदत " तद्धता नाम तस्माद वा इन्द्रोऽतितराम तस्माद् वा एते रेवा तEिRAR Tीयम ३१ तस्मै हण निरी तरयंच आदेशो पदेतत् पृष्ठम् मन्त्रप्रतीयम् अग्निर यर्थको भवनम अष्ठमात्र पुरुष [२४] कठोपनिषद् मन्त्रप्रतीयम् । भानाम्यहोदधि त दुर्दशं गूढम् तह कुमार सन्तम् तदेतदिति मपते समत्रवीत् प्रोग्रमाण तां योगमिति मन्यते तिलो राधीर यदवासी ५० निणाचितम प्रयम् मिणावितस् त्रिमि ७९ दूरमेते विपरीते ६० देवरपापि विचिकिस्सितम 55 ५९ ५३ " ७५ ६८ अजीयताममृतानाम् अधोरणोपाल महत मनुपश्य यया पूर्वे धन्यच्छ योज्यदुतव अयत्र धर्मादन्यत्र अरण्योर निहित सविद्यायाम तरे अध्यक्तात पर भारमरपशम मशरीर शरीरेषु अस्तीत्येवोपलाध्य अरय विखममानस्य आरमाना रचिनम् आगाप्रतीक्षे, रगतम् आगीतो दूर बति दहिया वृपामावम् पानिहपानाह प्रियंम्प पर मन प्रिम्य परा ह पेवा योनम उसिष्ठत बापत प्रागमुन्नपति कायंगलोयाशाव मातस्य को वासना हराएमा एता एवा सपरिणर १२ ६० ६७ 5७ ९. ux न जायते नियते वा न तत्र सूपों माति नमरणावरेण नमान नापानेन न वितन सपंजीय मराहो तिष्ठति नसापराय प्रतिभाति माधिसतमुपात्यानम् नायगारमा प्रवचनेन मादिरतो दुधरितान नित्यो निरयानाम नंव थापा, म मनमा मंयागमति परामरामानुपरित पराधि तानि व्यतगत पीतोरस, अग्यमा पुरमेशदादरम प्रतेपर्गमितदु गनामविप्रथम भयाररयाग्निम् सपनि मनरावेरमाणायम मात पामायाम मापुमोर मारतोय यापदामम बम मशरम १ प्रत पियतो ५४ ४५ .. तपरिमा एतरातामाट एनवानर बल एपमिरमपिता एप सपुष पदारपदा पापयान्तिम १५ १२ ७४ r : .x [ २७५ पृष्ठम् मन्त्रमतोत्रम् पएप गुप्तेषु मागति यावेद वाइमनप्ती यमरा चोरेति मूर्य पधादाता पुरस्ताद मपिता ५ ७४ ४ ७३ पोरा दुतं पृष्ट एमोदक सुरेपुरम १२ पता पत्रावतिष्ठन्ते यसप्रमियन्ते मामय प्रमुष्यन्ते मन्वप्रतीयम् पेशामा दुसमा. पोनिमन्ये प्रपद्यन्ते सोशाहिमग्निम् वापुर पर्षको भवनम् विज्ञानमारपिए यस वैश्वानर प्रविशति पातं चंका व हृदयाय गतापुप पुत्रपौत्रान् शान्तसकल्प सुमना श्रवणायापि बहुभि थेवा च प्रेयश घ श्वोमाया मरस्य सत्वमलियाम् सत्य प्रियान् प्रियरूपामा व सर्व वेदा पत सह मावस्तु स होवाच पितर सूपों यया रायंसोकस्य स्वप्नारत जागरितान्त स्वर्ग सोरेन भयम् हसचिषद् ५४ ४७ ६० परिव किश्व जगत पदेवेह तदभुत्र ५५ ७२ 1 " यात मु विज्ञानवान यावविज्ञानवान् परिसिरिसन्ति पायबल पक्ष पः पूर्व तपसः य' सेतुरोमानानाम् या प्राणेन समति ७१ ७२ ५७ ६९ ७५ ४ E२ देत रुप रकम पेवितिनिसा हएततर प्रवदयामि हन्ता छन् मन्यते ५२ - पृष्ठम् ११४ प्रश्नोपनिपद् पृष्ठम् मन्द्रतीकम् अषयोऽवं उदान अयोतरेण तपसा १२२ अन्न प्रजापति सरा इय रचनामी १२१ अहोरात्री व प्रजापति १२४ आत्मन एव प्राण आदिश्योहप्राण मादिस्यो हवं वाहा मन्नमतीकम् अव देव स्वप्ने मथक्वन्धी कात्यायन अयं यदि द्विमाण अय हैन कौसल्या अब हैन मान्य अथ हैन शैम्प अथ हैन सुकेशा अय हैन सौर्यावणी अथादित्य उदपन् १०४ " १०४ पृष्ठम् मन्त्रप्रतीकम् इन्द्रस त्वं प्राण! तेजसा उत्पत्तिमायतिम् ऋग्मिरेत, यजुमिः एप हि दृष्टा, स्प्रया एषोऽग्निस तपत्यैष ॐ मुकेशा च भारद्वाजः तद ये हवं तत् तस्मै स होवाच १२० १०३ ११५ ११२ ११० ११७ १२२ " [ २७६] पृष्ठम् मन्त्रप्रतीकम् प्रजापतिश् चरसि प्राणस्येदं वशे १२४ प्राणाग्नय एवंतस्मिन् मासो वै प्रजापतिः य एवं विद्वान् प्राणम् यश्चित्तम् तेनैव प्राणम् १०४ यया सम्राडेव १८ यदा त्वमभिवर्षसि १०७ पदुच्छ्वाप्तनि:श्वासो ११२ य. पुनरेत निमाग ११६ या ते तनूर वाचि १२१ १२५ विश्वरूप हरिणम १०६ व्रात्यस, स्व प्राणपिरता ९६ स ईक्षांच १२० स एप वैश्वानरः १२३ स प्राणमसृजत ११५ स यथेमा नयः १२८ स यदा तेजसा ११० स पधेकमात्रम् संवत्सरो प्रजापतिः १२० सोऽभिमानाप्यम् हदि होप आत्मा 11 " " विज्ञानात्मा सह " " तान १२१ १०० ११० १२६ १०० वरिष्ठः प्राणः तान हस ऋषिः तानुहोषाच तिम्रो मात्रा मृत्युमत्या से जो ह वा उदानः ते समयन्तः तेपामतो पिरगः देवानामसि पह्नितमः पञ्चपादं पितरम् परमेवाक्षरम् पापूपायेपानम् पृषियो च पृथिवीमात्रा स यया, सोया १२६ ११९ १२२ १०१ १०६ पृष्ठम् मुण्डकोपनिषद् पृष्ठम् मन्तप्रतीवम् एतस्माज जायते प्राणः एने या धरते एकोमा तता १३५ मन्नप्रतीकम् भनिर मूर्घा मसपी मतः समुद्रा रियर अधणे यो प्रदेत अराव पनामा अविद्यायामन्तरे प्रणिधाया बहुधा भावित गनिहिलम यानं मायमानाः एरोहोति तमाहतपः १३५ १२६ बहा देवान प्रथम पामारामयते पातारासीम प्रियायत घोत्रिया १५५ १३५ पृष्ठम् १५२ १४९ मन्तप्रतीकम् गता कला पश्चदश तत्रापरा ऋग्वेद तदेतत् सत्यमृषि तदेततप्तत्य मन्त्रेषु तदेतत् सत्य यथा तपसा चीयते ब्रह्म तप पद्धे ये झपवसन्ति तस्माच च देवा बहुधा तस्मादग्नि समिध तस्मादच , साम, यजूपि तस्मै स विद्वानुपसन्नाय तस्मै स होवाच दिभ्यो ह्यमूतं पुरुष द्वा सुपर्णा सयुजा । २७७ ] पृष्ठम् मन्त्रप्रतीकम् १५७ बृहच च तद, दिव्यम् १३१ ब्रह्मवेदममृतम् भिद्यते हृदयन्यि यत तददेश्यमग्राहम १४० यथा नव स्यन्दमाना १३२ ययोर्गनामि सृजते १३८ यचिमद, यदणुम्योष्ण १४२ यदा पश्य पश्यते १४१ यदा लेलायते चि १४२ यय लोक मनसा य सवज्ञ सर्वविद १५७ १४४ १५० १५३ १४७ " " १३४ १५२ १४८ १३० १५२ धनुर गृहीत्वोपनिषदम नचक्षषा गाते न तंत्र सूर्यो माति नायमात्मा प्रवचनेन नायमात्मा बलहीनेन परीक्ष्य लोकान कर्मचितान पुरुष एवेद विश्व यस्मिन द्यौ पृथिवी यस्याग्निहोत्रमदर्शम वेदातविज्ञानसुनिश्चितार्या गौनको हवं महाशाल सत्यमेव जयति सत्येन लभ्यस तपसा सप्त प्राणा प्रमति समाने वृक्षे पुरुष समोहवं तत परमम सदैतत परमम सप्राप्यनमृषय हिरण्मये परे कोशे १३८ १४२ १५० १५० प्रणवो धनु, शर प्राणो ह्येष य सर्वमूतं प्लवा हते अड्ढा १४५ १५१ १५६ १४८ पृष्ठम् मन्तप्रतीकम अमात्रश चतुर्थी, व्यवहाय माण्डूक्योपनिषद् पृष्ठम् मन्त्रप्रतीकम १६५ पत्र सुप्त सब हातद १६० सुखप्तस्थान सोऽयमात्मा स्वप्नस्थानस तंजस वानस्थानो ऽत प्रज्ञ एप सर्वेश्वर १६४ ओमित्येतदक्षरम । इद सवम जागरितस्थानो, बहिप्प्रज्ञ जागरितस्यानो वैश्वानरोकार मात प्रजम १६४ १६४ २५१ २४५ se [ २८० ] मन्त्रप्नतीकम् पृष्ठम् - मन्त्रप्रतीकम् पृष्ठम् नवद्वारे पुरे देही २४४ युजानः प्रथमं मन. २३० म संदृशे तिष्ठति रूपमस्य २५४ येनावृत नित्यमिदं हि सर्वम् २६२ म तत्र सूर्यो माति, न चन्दतारकम २६७ यो देवानां प्रभवर चोद्भव घ २३९ न तस्य कश्चित पतिरस्ति लोके २६५ यो देवानां प्रमवश चोद्भवश च २३९,२५॥ न तस्य कार्य करणं च विद्यते २६५ यो देवानामधिपो, यस्मिन् नित्यो नित्यानां, चेतनश चेतनानाम्२६७ यो देवो अग्नौ, यो अप्सु निष्कलं निस्क्रिय, शान्तम् २६९ यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वम् २६९ नोलः पतङ्गो, हरितो, लोहिताक्षः २४७ यो योनि योनिमधितिष्ठत्येकः २५० नौहारघूमार्कानिलानलानाम् २३४ यो योनि योनिमधितिष्ठत्येकः२५०,२५६ ननमूवं, न तिर्यश्वम् २५४ लघुत्वमारोग्यमलोलुपत्वम् २३५ नव स्त्री, न पुमानेपः २५८ घहर यथा योनिगतस्य मूतिः २२८ पश्वस्त्रोतोऽम्बु, पञ्चपोन्पुप्रयकाम् २२३ मिश्वतश्चक्षुरुत, विश्वतोमुखः पुरुष एवेदं सर्वम् २४३ वेदाहमेत पुरुष, महान्तम् २४० पृथ्यप्तेजोऽनिलखे समुत्थिते वेदाहमेतमजरं, पुरागम प्राणान् प्रपोज्येह संयुक्तचेप्ट. २३३ वेदान्ते परमं गुह्यम् बालाग्नशतमागस्य २५९ स एव काले भुवनस्य गोप्ता २५२ मावग्राहामनीडाख्यम् २३४ सङ्कल्पनरर्शनदृष्टिमोहै: २६० महान् प्रभुर पुरुषः २४२ स तन्मयो, हामृत, ईशसंस्थः २६८ मा नस् तोके तमये, मा २५५ मयुक्तमेतत् क्षरमक्षरं च २२५ माया तु प्रकृति विद्यात् २५० समाने वृक्षे पुरुषो निमग्नः २४८ य एको जालवानीशत ईशनामि २३७ समे, शुचौ, शर्करावह्निवालुका० २३३ य एकोऽवर्णो बहुधा शक्तियोगात २४६ सर्वत पाणिपादं तत् २४३ पच च स्वभाव पति विश्वयोनिः २५७ सर्वव्यापिनमात्मानम् पर्थव विम्ब मृत्योपलिप्तम् सर्वाजोवे सर्वसंस्थे वृहन्ते २२४ या चवदाकाशम रावळ दिश अवमप्रश्न नियंक २५७ पदान्तमस् तन न दिवा न रात्रि २५३ सर्वाननशिरोपीव. २४१ पदारमतत्त्वेन तु ब्रह्मतत्त्वम् सन्द्रियगुणाभासम् २४३ यस तन्तुनाम इव तन्तुभिः २६५ सवित्रा प्रायेन जुर्पत २३२ यामात पर नापरमस्ति किञ्चत् २४१ स विश्वकृत विश्वविदात्मयोनिः २६८ पस्य देवे पराभक्तिः २७० स वृक्षालाकृतिमिः परोऽन्यः २६४ या ते रुद्र शिवा तन् राहस्रशोर्षा पुरुषः २४२ पामिषु गिरिगन्त ! हरते सूक्ष्मातिसूक्ष्म, कलिलस्य मध्ये २५१ युक्तेन मनसा वयं देवस्य २३० स्यतानि, सूक्ष्माणि, बहूनि चंद २६० युश्त्वाय मनसा देपान २३० स्वदेहमरणि कृत्वा २२८ युने वा ब्रह्म पूर्यम् स्यमावमेक क्ययो ववन्ति २६१ युजते मन उत युनते २३१ अरण्य देवनागरी लिपि के माध्यम से समस्त भाषाई क्षेत्र समस्त मापाओ के सत्साहित्य का समानरूपेण रसास्वादन करें। विविध मापाओं के अनमोल वृहद् ग्रन्ध जिनम उन भाषाओ के मूल पाठ को, तदवत उच्चारणा सहित, देवनागरी लिपि मे देते हुए सुन्दर हिन्दी अनुवाद दिया गया है मलयाळम - महाभारत- अल तच्छन् कृत--रचनाकाल-१५ वी शताब्दी लिप्य तरणकार एव हिदी-अनुवादक-थी के०ए० सुब्रह्मण्य अय्यर भू० पू० उपकुलपति सस्कृत विश्वविदयालय वाराणसी एव लखनऊ विश्व विदयालय नखनऊ । मलयाळम का मूल मधुर पाठ देवनागरी लिपि मे देते हुए हिदी भाषा म अनुवाद दिया गया है। पृष्ठ संख्या लगभग १२२५। मूल्य ४० ०० डाप व्यय पृषक । * बंगला - कृतिवास रामायण- (आदि अयोध्या किष्कि ध्या और सुदरवाण्ड) रचनाकाल-१५ वी शताब्दी मूल बंगला पाठ देवनागरी लिपि म तथा अवधी दोहा चौपाई में ललित पदयानुवाद । अनुवादक एव लिप्य तरणकार-- थी नदकुमार अवस्थी सम्पादक पाणी सरोवर एव प्रतिष्ठाता भुवन पाणी ट्रस्ट। देवनागरी अक्षरो मे अप का चाहे बगना पाठ सुवोध सुललित पयार छ दो म पढिये नाहे अवधी पदयानुवाद। दोनो का पृथक अदभुत आन द है। पृष्ठ संख्या लगभग ६२५ । मूल्य २५०० डार व्यय पृथक । * बँगला - कृत्तिवास (लकाकाण्ड)- रचनावारा-१५ वी शती भूत बंगला पाठ देवनागरी लिपि में तथा हिदी गदवानुवाद-क्रमश श्री नाकुमार अवस्थी एव श्री प्रबोध मजुमदार । पृष्ठ सख्या ४८८ मूल्य १५०० डाक व्यय पृथक । * कश्मीरी - रामावतारचरित- प्रकाशराम कुयमामी कृत । रचनाकाल १८ वी शताब्दी। देवनागरी लिपि में कश्मीरी पाठ का लिप्य तरण तथा हिंदी अनुवाद के कर्ता डा० शिबन कृष्ण रेणा हिदी विभागाध्यक्ष राजकीय महाविद्यालय नाथद्वारा। भूमिरा लेखक डा. युवराज कणसिंह स्वास्थ्यमन्त्री भारत सरकार । पृष्ठ संख्या लगभग ४८१ मूल्य २००० डाक व्यय पृधक।

साथ मे गीता के - * उर्दू - शरोफजादः (आर्यपुत्र)- 'उमरावजान अदा' के प्रख्यात लेखक मिर्जा रुस्वा द्वारा रचित अति रोचक उपन्यास । देवनागरी लिपि मे शखनक की सुमधुर उर्दू भाषा का आनन्द उठाइये। मूल्य ५०० । डाक व्यय पृथन् । * गुरमुखी - श्री जपुजी सुखमनी साहिब- गुरु नानकदेव और गुरु अर्जुनदेव की अमर वाणी देवनागरी लिपि में । सफल पदयानुवादक खानबहादुर ख्वाज दिलमुहम्मद का अति प्रसिद्ध प्रवाहमय पदयानुवाद । अनुवाद को पढते समय पाठक झूम उठता है । मूल्य ५००। डाक व्यय पृथक। * अरवी जादे सफर (रियाजुष्टालिहीन)- प्रसिद्ध प्रामाणिक हदीस (पैग़म्बर के कलाम) के उर्दू अनुवाद जार्दै सफर का देवनागरी लिपि में सारा पाठ देते हुए कठिन उर्दू शब्दो का हिन्दी अर्थ फुटनोट मे दिया गया है। इस्लामी धर्म के सदानार की स्पष्ट झांकी है। पृष्ठ सख्या ३३६ मूल्य १२०० । डाय व्यय पृथक् । * फारसी - सिरै अववर- (शाहजाद दाराशिकोह कृत-५० उपनिपदो की फारसी व्याख्या मे से ईश, वेन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, वैत्तरीय और श्वेताश्वतर- इन ९ उपनिषदो का अनुवाद । ग्रन्थ उपनिषदो का मूल सस्कृत पाठ, उनका भारतीय अनुवाद, साथ में शाहजाद दारा की स्पष्ट व्याख्या, पाद-टिप्पणी सहित। एक अभारतीय मुस्लिम शाहजादे की तत्वज्ञान मे पेठ देखते ही बनती है। हिन्दी रूपान्तरकार हैं कापी विश्वविदयालय के डॉ. हर्षनारायण । पुष्ट ३००। इस परिथमसाध्य ग्रन्थ का मूल्य २००० मान है। डाक खर्च पृथक् । * बाइबिल - सार- इस पुस्तिका म वाइविल मे दिये गये सालोमन के नीति-वाक्यो को देते हुए उनके समानान्तर भारतीय नीति-वचनो को उद्धृत किया गया है। मूल्य १०० मान । वाणी सरोवर ( अपने ढग का निराला वैमासिक पन ) हग पन म हिन्दी, उद् अरबी फारमी सहन पारसी बगला, मोडिया, मराठी, गुरमुयी तमिल मलयाळम अगमी गुजराती, तेलुगु कन्नर, मि घी गश्मीरी राजस्थानी नेपाली बादि के अनुपम प्रयो रा हिंदी अनुवाद सपा देवनागरी लिपि म उतरा मूल पाठ धारावादिन प्रकाशित हो रहा है। वार्षिक शुल्क १००० मात्र । नदीन पाहन बननेदाल गरगना को गन् १९७.7 अय तर पाप.... प्रतिवर्ष में हिमाद म गुन भेजा। उनए हित में होगा। बीते हुए पपी के मान मंगात पर धारावाहिक पलनवाष महल म गुरु बनेर पथ उन समहालय म अपूर्ण र पायेगे। बसे इस्टको आपत्ति नहीं है, बाप जिस यष म चाहें पाक बन सकते हैं।

" " पाणी सरोवर अथवा दुस्ट मे चल रहे सानुवाद देवनागरी लिप्य तरण प्राय १-तिमिळ) तिरुवकुरळ २-(तमिळू) कम्ब रामायण ३-(तेलुगु) रंगनाथ रामायण ४-(कन्नड) पम्प रामायण-जनसाहित्य ५-(असमिया)माधवकदलो रामायण ६-(कश्मीरी) रामावतार चरित ७-(नेपाली) रामायण भानुभक्त कृत ८-(गुजराती) गिरधर रामायण ९-(मलयाळम) तुञ्चत्त एळुत्तन्छन् कृत महाभारत तथा "अध्यात्म रामायण ११-(ओडिआ) वैदेहीश विळास-उपेन्द्र भञ्ज१२-(सिंधी स्वामी केसलोक १३-(मराठी) श्रीराम विजय-श्रीधर स्वामी कृत मूलपाठ अनुवाद सहित १४--(गुरमुखी) थीगुरुग्रथ साह्न १५-(उर्दू) गुज़रत लखनऊ-मौ० शरर १६-(फारसी) दाराशिकोह कृत ५० उपनियदो की फारसी व्याख्या का धारावाहिक हिदी अनुवाद १७-(राजस्थानी) रुक्मिणीमगल-पदम भगत कृत १८-(अरबी) रियाजुस्यालिहीन (हूदीस)-(जादे सफर) १९-रामचरितमानस (तुलसी)-सस्कृत पद्यानुवाद सहित, तथा २० ओडिया लिपि में लिप्यन्तरण एव ओडिया गद्य पद्यानुवाद प्रा० स्थान-भुवन वाणी ट्रस्ट ४०५/१२८ चौपटियां रोड, लखनऊ-३ imanavrevmaramanumarmanamerammamme maarivamvamre अन्यत्र प्रकाशित लिप्यन्तरण प्रन्यो का परिचय कान शरीफ़ [हिन्दी] बीस को मुसरसल मिल्मी मिहनत के बाद देवनागरी रस्मुलखत में वानि शरीफ भय मतन (मूल आयते) व हिदी तगुमा व तपसीरी नोटा छप कर अवाम की पेष नजर है। इसमे मिलते जुलते हुरूफ मसलन जाल में माद जो वगैर को अलाहद मुमताज करते हुए रुमूत्र औकाफ (विरामाविराम चिह्न) ब दीगर अलामतें गरज कि भारतीय अरवी पद्धति पर इमकानी सूरत में सही तिलावत (पाठ) का पूरा इहतियात मुहय्या किया गया है। हर सफ पर कुर्बान शारीफ के असली खत याने बरवी खत मे इन्तहाई सही ब्लाक भी देकर सकरा की गुञ्जाइश ही खत्म कर दी गई है। बलावा मौलाना सय्यद अबुल हसन अली अलहसनो अलमवनी बताब अली मियां साहब ने इस हिन्दी कुर्बान शरीफ पर पेश लफ्ज़ लिप कर मिहनत को जीनत वस्शी है। हदय महब ४०००। ३५० डाक खच। आडर के साथ १०००पेशगी जहर भेजिए। प्राप्तिस्थान-लखनऊ किताबघर ४०५/१२८ चौपटियां रोड, लखनऊ-३ १

BL 17
BHAVAN'S LIBRARY
BOMBAY-400 207
349178
NB - This book is issued only for one week till
Thus book should be returned within a fortnight
from the date last marked below
Datt
Dale
Date
10 JAN 1984
1 3 JAN 1984
1 9 JUN 2012

BHAVAN S LIBRARY
Kulapac K Munshi Mary
JOMBAYAW 007

Sire Akbar Khand-i

Author
Harshnarayan
Title
Sire Akbar Khand-i
File name
Sire Akbar Khand-i
Text
OCR done
Citation
1975
Published
2012/08
Publisher
Lakhnow.,bhuvan Vani Trust
Language
Sanskrit
Pages
306
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312085
Barcode
99999990320907.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
bX3lcxhR6ME
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