Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner

Anupan Darpan (bhasa Tika)

Khemraj Shri Kirshna Dass · 2010

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॥ श्रीः॥ अनुपानदर्पणस्थविषयानुक्रमणिका । विषय पृष्ठ. १ मङ्गलाचरण ग्रन्धारम्भ.. वैद्यविवेक आयुर्वेद विवेक २ पान ... शल्यतन्त्र Qui " ७ " शालाक्यनाम कायचिकित्सा भूतविद्या कौमारभृत्य अगदतन्त्र रसायनतन्त्र चाजीकरणतन्त्र आयुर्वेदनिरक्ति अथ मानविवेक औषधमात्राका मान नाटीविवेक अनुपानविवेक अनुपानविशेषवर्णन मदिरादि अनुपानवर्णन " " विषय पृष्ठ कितनेकरोगोंमें दुग्धानु १९ योगराज गुग्गुल अनुशन २२ नारायणचूर्णानुपान निर्गुडीअनुपान... २३ सकलरोगोंमे हरीतकीके अनुपान २४ गुटुची अनुपान २५ नेत्ररोगपर गुडूचीस्वरसका औषध २६ नेत्ररोगमें पुनर्नवानुपान २७ त्रिफलानुपान मृत्युजयादि रसधातूपधा- तुओंका अनुपानविवेक २९ वसतकुसमाकर रसको अनुपान लोकनाध रसका अनुपान स्वर्णमालिनीवसत रसके अनुपान २२ वृहन्मालिनी वसतरसके अनुपान पाशुपत रसके अनुपान २३ पर्पटीरमके अनुपान ६ १० १२ १४ १५ वर्गवर्गका पृथक् पृथक अनुपान वर्णन अनुपान पीनकी प्रशसा अनुपानविधिको पोग्या- १७ योग्यता .. ६८ प्रस्तावना शरीरके आरोग्य होनेको औषध सेवन करना चाहिये, सो वात आबाल वृद्धोंको मालूम है. परतु कौनसी दवाई किस अनुपानके साथ लेनी यह बात साधारण वैद्योंकोभी समझती होंगी.ऐसा नहीं कह सकते कि, अमुक रोग हुआ होय तो अमुक औषध लेना, परतु वह औषध यथायोग्य अनुपानके साथ नही लिया जाय तो उससे यथोक्त गुण आता नहीं. इसवास्ते हमने श्रीमद्दा- धीचवशभूषण श्रीबलदेवसूनु श्रीज्ञारसरामजी पडितबर्यजीसे सुश्रुतआदिक विविध आयुर्वेदीय प्रथोंके प्रमाणेसहित यह "अनुपानदर्पण" नामक नवीन प्रथरचना कराय स्वकीय " श्रीवेंकटेश्वर" छापाखानामें छापकर प्रसिद्ध किया है। समस्त वैद्य और सर्व लोगोंको प्रार्थना कीजातीहै कि, महाशयो ! इस प्रथमें कहेहुयेके अनुसार उस उस रोगमें औषध सेवनमें अनुपानकी ययोक्त योजना करके औषधका सेवन करके रोगको नष्ट करो, और शरीरका आरोग्य पाकर इस शरीरके द्वारा धर्म, अर्थ, काम, तथा मोक्ष इन पुरुषार्थोका साधन करो, और उक्त पडितजीके परिश्रमोंको सफल करो. किमधिकम् । आपका कृपाकाक्षी- खेमराज श्रीकृष्णदास, "श्रीवेंकटेश्वर' छापाखाना-मुंबई.

॥ श्री॥ अनुपानदर्पणस्थविषयानुक्रमणिका विषय. पृष्ठ. १ मङ्गलाचरण ग्रन्धारम्भ . वैद्यविवेक आयुर्वेद विवेक २ पान .... ५ शल्यतन्त्र aur " .. शालाक्यनाम कायचिकित्सा. भूतविद्या कौमारभृत्य अगदतन्त्र रसायनतन्त्र वाजीकरणतन्त्र आयुर्वेदनिरक्ति अध मानविवेक औषधमात्राका मान नादीविवेक अनुपानविवेया अनुपानविशेपवर्णन मदिरादि अनुपानवर्णन विषय. पृष्ठ. कितनेकरोगोमें दुग्धानु १९ योगराज गुग्गुल अनुशन २२ नारायणचूर्णानुपान निर्गुडीअनुपान... २३ सकलरोगोंमे हरीतकीके अनुपान २४ गुटूची अनुपान २५ नेत्ररोगपर गुड्चीस्वरसका औषध २६ नेत्ररोगमें पुनर्नवानुपान २७ त्रिफलानुपान मृत्युजयादि रसधातूपधा- तुओंका अनुपान विवेक २९ वसतकुसुमाकर रसको अनुपान लोकनाध रसका अनुपान ३० स्वर्णमालिनीवसत रसके अनुपान १२ वृन्मालिनी वसतरसके अनुपान पाशुपत रसके अनुपान १२ " . e .... १० १२ १४ १५ वर्गका पृथक पृथक अनुपान वर्णन " १७ अनुपान पानेकी प्रासा अनुपानविधिकी पोग्या- qi།ག १८ पर्पटीसके अनुपान (४) अनुपानदर्पणकी- विषय. पृष्ठ. जयाजयती इन्होंका अनु- पान oc ० ال م س ४ मृत्युजयरसनिर्माणविधि 20 ४ oC सुवर्णभस्मके अनुपान ३६ रौप्यभस्मानुपान ताम्रभस्मानुपान ३९ वगभस्मानुपान.. जसदभस्मके अनुपान ४१ नागर्भस्मानुपान लोहभस्मानुपान ४३ स्वर्णमाक्षिक अनुपान ४४ रौप्यमाक्षिक अनुपान तुत्य भस्मके अनुपान ... शिलाजतुके अनुपान पारदभस्मके अनुपान ४६ रसिदूरके अनुपान ४८ रसकर्पूरके अनुपान ४९ हिंगुलके अनुपान ५० अभ्रकके अनुपान हरितालके अनुपान ५२ मनशिलके अनुपान ५४ पपरके अनुपान हीरकमम्मके अनुपान ५५ चैत्रातभम्मके अनुपान विषय. पृष्ठ. नीलवक्रातभस्मके अनुपान प्रवालभस्मके अनुपान रोगविशेष अनुसनविशेष ५७ विषके पृयक् पृथक अनुपान २८ योगराज गुग्गुलविधि ६४ नारायगचूर्णविधि ६७ वसतकुसुमाकररसान- आणविधि . लोकनाथरसनिर्माणविधि स्वर्णमालिनीवसतरस- निर्माणविवि वृहन्मालिनीवसतरस- निर्माणविधि पाशुपतरसनिर्माणविधि पर्पटीरसनिर्माणविधि जयावटीनिर्माणविधि जयतीवटीनिर्माणविधि धातूपवातुरसोपरसरत्नोप- रत्नविषोपविका शोधनमारणविवेक ७८ सप्तवातुनामानि सप्तउपधातुनामानि ७९ उपरसनामानि ... ७४ गधकके अनुपान ७७ " सीवीरके अनुपान . रस वर्णन .. ..

अनुक्रमणिका । (५) पृष्ठ. ७९ " :: . .. . ८३ ८४ ८८ . " . विषय. नवरत्ननामानि उपरत्ननामानि .. विषभेद उपत्रिपकथन सप्तधातुशोधन उपधातुशाधन रससस्कार रसशोधन उपरसशोधन रत्नशाधन विषशोधन उपविषशोधन जैपालशोधन स्वर्णका मारणविधि रौप्यमारणविधि ताम्रमारणविधि वगमारणविधि ... जसदमारणविधि नागमारणविधि लोहमारणीवधि स्वर्णमाक्षिकमारणविधि रौप्यमाक्षिकमारणविधि तत्यमारणविधि सिंदूरमारणनिषेध शिराजमारणविधि হিন্দি " " विषय. पृष्ठ- हसमडूरविधि ९५ रसमारण ९६ रससिंदूरविधि . ९७ रसकवरविधि हिंगुलमारण ९८ अभ्रकमारण ९९ अन्य प्रकारसे अभकमारण हरितालमारण वजमारण १०० प्रवालमारण १०१ पक्क सुवर्णभस्मका गुण अपक स्वर्णभस्मका दोप पक रूपेके भस्मका गुण १०२ अपकरूपेके भस्मका दोष पक ताम्रभस्मके गुण अपक्क ताम्र भस्मके दोष... पक्कवगभस्म के गुण १०३ अपक्क वगभस्मके दोष पक्क जसदभस्मके गुण अपक्क जसदभस्मके दोष... पकनागभस्मके गुण अपकानागभस्मके दोष १०४ पक्कलोहभस्मके गुण अपवालोभस्मके दोप १०५ पक्कसुवर्णमाक्षिक भम्मके गुण अपवम्बर्णमाक्षिक मम्मके दोष " (९ ९० ९२ " . ९४ " " " ६ " (४) अनुपानदर्पणकी- विषय. पृष्ठ. ३४ ३६ ३७ ३ ४२ ४३ : : विषय. पृष्ठ. नीलचक्रातभस्मके अनुपान ५६ प्रवालभस्मके अनुपान रोगविशेष अनुनविशेष ५७ विषके पृथक् पृथक् अनुपान ५८ योगराज गुग्गुलविधि ६४ नारायगचूर्गविधि ६६ मृत्युजयरसनिर्माणविधि ६७ वसतकुसुमाकररसनि- र्माणविधि . ६९ लोकनाथरसनिर्माणविधि स्वर्णमालिनीवसतरस- निर्माणविवि बृहन्मालिनीवसतरस- निर्माणविवि पाशुपतरसनिर्माणविधि पर्पटीरसनिर्माणविधि ७५ जयावटीनिर्माणविधि जयतविटीनिर्माणविधि धातूपधातुरसोपरसरत्नोप- रत्नविषोपविषोंका शोधनमारणविवेक सप्तधातुनामानि सतउपधातुनामानि जयाजयती इन्होंका अनु- पान सुवर्णभस्मके अनुपान रौप्यभस्मानुपान ताम्रभस्मानुपान वगभस्मानुपान जसदभस्मके अनुपान नागर्भस्मानुपान लोहभस्मानुपान स्वर्णमाक्षिक अनुपान रौप्यमाक्षिक अनुपान तुत्य भस्मके अनुपान शिलाजतुके अनुपान पारदभस्मके अनुपान रसिदूरके अनुपान रसकर्पूरके अनुपान गधकके अनुपान हिंगुलके अनुपान अभ्रकके अनुपान हरितालके अनुपान मनशिलके अनुपान मीवीरके अनुपान सर्परके अनुपान हीरकमम्मके अनुपान चत्रातमम्मके अनुपान ४५ ४६ ४८ ७४ ७७ ६० ५२ . ५३ ५४ " रस वर्णन .... .. उपरमनामानि ... ...

अनुक्रमणिका । (५) . . : . . ... (३ १०० .. .. " विषय. पृष्ठ. नवरत्ननामानि . उपरत्ननामानि • .. विषभेद उपविषकथन सप्तधातुशोधन ८१ उपधातुशाधन रससस्कार रसशोधन उपरसशोधन .. ८५ रत्नशोधन ८८ विषशोधन उपविषशोधन जैपालशोधन स्वर्णका मारणविधि रौप्यमारणविधि ९० ताम्रमारणविधि वगमारणविधि ... ९२ जसदमारणविधि ९३ नागमारणविधि लोहमारणीवधि स्वर्णमाक्षिकमारणविधि . ९४ रौप्यमाक्षिकमारणविधि तुत्थमारणविधि सिंदूरमारणनिषेध शिलाजतुमारणविधि मरविधि विषय. पृष्ठ हसमडूरविधि ९५ रसमारण ९६ रससिंदूरविधि ९७ रसक विधि हिंगुलमारण ९८ अभ्रकमारण ९९ अन्यप्रकारसे अभ्रकमारण हरितालमारण वजमारण प्रवालमारण १०१ पक सुवर्णभस्मका गुण अपक्क स्वर्णभस्मका दोष पक्क रूपेके भस्मका गुण १०२ अपकरूपेके भस्मका दोष पक्क ताम्रभस्मके गुण अपक ताम्र भस्मके दोप .. पक्कवगभस्मके गुण १०३ अपक्क वगभस्मके दोष पक्क जसदभस्मके गुण अपक्क जसदभस्मके दोष... पवनागभस्मके गुण अपकनागभस्मके दोप १०४ पक्कलोहभस्मके गुण अपक्कलोहभस्मके दोप १०५ पक्कसुवर्णमाक्षिक भस्मके गुण अपहाम्वर्णमाक्षिक भस्मके दोष " " :: " ... " " " -- पृष्ठ. ११० अशुद्ध सोवीरके दोप खपरक गुण १११ " गुण तथा दोष ११२ .. " " " (६) अनुपानदर्पणकी- विषय पृष्ठ. विपय. पक रौप्यमाक्षिक भस्म- शुद्धसोवरिके गुण के गुण १०५ अपकरौप्यमाक्षिक मस्मके হৃষ্ট दोष १०६ | अशुद्धखर्परके दोप पक्क तथा अपक्क तुत्यभस्मके पक्क वज्रभस्मके गुण अशुद्ध अपक्क वनभस्मके शुद्ध शिलाजितके गुण दोष अशुद्ध शिलाजितके दोष पक वैक्रातभस्मके गुण कप पारदभस्मक गुण १०७ अशुद्ध अपक वैक्रातमस्मके अशुद्ध अपक पारदम- स्मके दोष दोष शुद्ध रससिंदूरके गुण शुद्ध प्रवालभस्मके गुण अशुद्ध रससिंदूरके दोष १०८ अशुद्ध प्रवालके दोष शुद्ध रसकरके गुण अशुद्ध रसकर्पूरके दोष अथ धात्वादिदोषशाति- शुद्ध गधकके गुण विवेक अशुद्ध गधकके दोप अपक स्वर्ण दोषशाति शुद्धहिंगुलके गुण अपक्क रौप्यदोषशाति अशुद्धहिंगुलके दोष अपक्क वङ्गदोपशाति पक अभ्रक भस्मके गुण १०९ अपक्क ताम्रदोषशाति अपक्क अभ्रक भस्मके दोष पक हारतालभस्मके गुण अपक जसददोषशाति अपक हारतालभस्मके दोष अपक्क नागदोषशाति शुद्ध मन:शिल भस्मके अपक्क लोहदोषशाति अपकलोहजन्यकटिशाति, गुण अशुद्ध मनाशलभस्मके अपक स्वर्णमाक्षिकदोष- दोष ११० शाति " विषके गुणागुण. ११३ . " ११४ .. " . .... .... ११० " " " . ११५ अनुक्रमणिका। (७) " विषय. पृष्ठ अपक रौप्यमाक्षिकदोष- शाति अपकतुत्थदोषशाति अशुद्ध शिलाजितदोषशाति अशुद्ध तथा अपक्कपारेकी दोषशाति,, अशुद्ध रससिंदूरके दोष- शाति अशुद्ध रस कर्पूरदोष- शाति ११७ अशुद्ध गधकदोपशाति अशुद्ध हिंगुलदोषशाति अपक्क अधकदोषशांति अपक हरितालभस्म- शाति विषय. पृष्ठ. अशुद्धमनशिलादोष- शाति ११७ अशुद्धसौवीरदोषशाति ... अशुद्ध खपरदोषशाति ११८ अशुद्ध अपक्क वजभस्म- दोपशाति अशुद्ध अपक्क वैक्रात भस्म- दोषशाति अशुद्ध प्रवाल दोषशाति अशुद्ध विषदोषशाति... जैपाल दोपशाति प्रथसमाप्ति १२० प्रथकर्ताका जन्मसवत्स- रादिवर्णन ... ११९ .. " इत्यनुक्रमणिका ॥

जाहिरात. नाम. की.रु आ.ट.म.रु.आ, ०-१० ०-१ 0-॥ ०-२॥ . .... .... १ ०- १ अपरोक्षानुभूतिसस्कृतटीका भाषाटीका सहित २ आत्मबोध भापाटीका ३ तत्वबोध भापाटीका ४ वेदातप्रथपचकम् ( बाक्यप्रदीप वाक्यसुधारस' हस्तामलक.निर्वाणपचक मनीषापचके ) स० ५ वेदस्तुति भाषा का सह ६ रामगीता मूल ७ श्रीमद्भगवद्गीतापचरत्नअक्षरमोटागुटकारेशमी ८ " पचरत्न अक्षरवडा खुलापत्रा छोटीसची.. ९ पचरत्न अक्षरवडा लवसिची खुला १० गीता श्रीधरीटीकासहित ११ गीता बडे अक्षरकी १६ पेजी गुटका १२ गीता बड़े अक्षरकी खुली १२ पेजी १३ गीता गुटका विष्णुसहस्रनाम सहित १४ गीता पचरत्न और एकादशरत्न १५" पचरत्न द्वादशरत्न .... १६ गीतापचरत्न नवरत्न पाकिट बुक १७ गीता गुटका पाकिट बुक १८ पाण्डवगीता भापाटीका सह १९ पाडवगीतादि ४ रत्न अक्षर बडा . ०-१ ०-१ ०-२ 0-11 १-४ १-८ १-० १-४ ०-३ ०-२ ०-१२ ०-२ ०-१ ०-१२ ०-२ ०-१० ०-१॥ ०-१ ०-11 ०-३ ०-३ ०-॥ . . । . . पुस्तक मिलनेका ठिकाना- खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर" छापाखाना (मुंबई) ॥ श्रीः॥ अथानुपानदर्पणनामायग्रन्थः। त्र प्रणम्य श्रीगणेश्वरं हरि हरं दिवाकरं शिवा गुरुञ्च लक्ष्मणाग्रजाह्वयं भिषग्वरम् ॥ गुणाकरं सुधाकरं गतस्पृहं दयाधरं करोम्यहं सतां मुदेऽ तुपानदर्पणं परम् ॥१॥ प्रारब्धत्रयस्य निर्विन्नेन परिसमाप्त्यर्थ सपञ्चामरगुरुनमस्कारात्मक मङ्गलमात. नोति पञ्चचामरवृत्तेन ग्रन्यकर्ता कवि.-अह ( जारसराम - ) बा 'अवबोधने'-. क्या० ५०-जानातीति ज्ञा बुद्धिः-रस आस्वादने-चुराद्यदन्तश्चास्माद्धातो:- अकर्तरि च कारके सज्ञायाम् ३-३-१९ ।' सूत्रेणानेन पञ्-रस्यते इति रस स्वादो हो वा ' रसो गवरसे स्वाद ' इति विश्व.-'रसस्स्वाटे जले वीर्ये'- इति हेम.-' रसो जल रसो हर्ष '--इन्यनकार्थध्वनि -रमु ऋडिायामस्माद्धातो बलतिकमन्तेभ्यो ण ३-१-१४०" सूत्रेणानेन ण -रमते इति राम ना बुद्धिम्तम्या रसोऽवबोवात्मकम्स्वादो हो वा तस्मिन् रमते इति (नारसराम) अनुपानदर्पण ( अनुपानप्रथाना मध्ये दर्पणमादर्शसमम् ) परम् ( उत्तम प्रथ) फरामि-कि वृत्वा-त्रीगणेश्वर ( श्रिया शोभया युक्ताना गणाना प्रमथानामी- श्वरस्त गणाविपन् ) हरि-(विष्णु ) हरिविष्णुहरिमरुदित्यनेकार्थध्वनिः । हर ( महादेव हरस्स्मरहरो भर्ग इत्यमर ) दिवाकर--( सूर्य सूरमार्यमादित्यद्वाद- शात्मदिवाकरा इत्यमर शिवा (दुर्गा-) च (पुनः ) गुरु (गृणाति हित- मुपदिदातीति गरम्तमायुर्वेदोपदेष्टारमियर्थ ) प्रणम्य ( नमस्कृत्य ) कीदृश गुरु-रमणारजात्य (लक्ष्मणानजी रघुनाथ आयो यस्य स त रघुनाथ- धामीण स्वामिनगि यर्थ )।

(२) अनुपानदर्पणः । पुन.कीदृश-भिषग्वर (वेद्यश्रेष्ठ भिषग्वेद्योचिकित्सके-इत्यमरः ) पुन'. कीदृश-गुणोकर (गुणानामाकरस्त सद्गुणसम्पन्नमित्यर्थ ) पुन.कीदृश-- सुधाकर (सुधा-अमृत करे यस्य स तपीयूपपाणिसिद्वहस्तमित्यर्थः। पीयूपममृत- सुधा-इत्यमर ) पुन.फीदृशातस्पृह (गता स्पृहा दीनेभ्यो धनप्राप्तिवाडा यस्यस.त सतुष्टमनसमित्यर्थः) पुन.कीहा-दयाधर ( धरतीतिधर'-ठयायाधरी दयाधरस्त कृपालु दुःखिनेष्वनुकम्पाशीलम् ( कृपाटयानुकम्पास्यादित्यमर. ) कस्मै प्रयोजनाय-सता ( विदुपासाधूनावा-सत्येसाधीविद्यमानेप्रशस्तेऽभ्यहिते चसदित्यमरः-सत्साधौधीरशस्तयोरिति मेदिनी । अनेन खलाना हर्षाभाव सूचितः । मुदे (हर्षाय-मुत्प्रीति प्रमदोहर्ष प्रमोटामोटसम्मदाइत्यमरः । भवति चात्र-नंदन्ति भोजनैर्विप्रा मयूरा घनगर्जनैः। साधव.परकल्याणै खला परविपत्तिभिः । परोत्कर्पाऽसहनत्वमेवासाधुधर्मत्वमिति भावः ॥ १ ॥ भाषानुवाद-इस प्रथकी निर्विघ्नसे समाप्तिकोलिये अथकर्ताकवि पचचाम रछदसे गणेशादि पञ्चदेवतोसहित अपने गुरुको नमस्कार रूप मङ्गल करताहे बुद्धिके विचाररूपी हमे जो रमण करे उसे ज्ञारसराम कहतेहैं सो मे-गणेश- विष्णु-महेश--सूर्य-देवी-और वेद्योमे श्रेष्ठ-सद्गुणसपन्न-अमृतके समान जिनका हाथ-लोभरहित-दयासहित जो पडित श्री १०५ रघुनाथशम स्वामीजी दोसोदनिवासी जिन्होंने मुझे आयुर्वेद (वैद्यविद्या ) पढाई उन गुरुजीको नमन करके सज्जनके आनदार्थ अति उत्तम अनुपानदर्पणनामक प्रयको बनाताह ॥ १॥ पथातो वैद्यविवेकं व्याख्यास्यामः ॥२॥ शास्त्रं गुरुमुखोद्गीर्णमादायोपास्य चासकृत् ॥ यःकर्म कुरुते वैद्यस्सवैद्योऽन्ये तु तस्कराः॥३॥ १ सत्यशीचदयाक्षातिस्त्यागस्सतोप आर्जवम् ॥ शमोदमस्तपस्साम्यतितिक्षोपरति अतम् ॥ गानविरचिरैश्वर्यशौर्यतेजोबलस्मृतिः ॥ स्वातंत्र्यकीशल कातिधैर्यमार्दव भवचेत्यादयोगुणाः।

प्रथम प्रमोदः १। (३) सुश्रुतसंहितायां सूत्रस्थाने अ०४ । एक शास्त्रसंधी यानो न विद्याच्छास्त्रनिश्चयम् ॥ तस्मादहुश्रुतः शास्वं विजानीयाचिकित्सकः ॥ ४ ॥ सुश्रु० सू० अ०४। अधिगतमप्यध्ययनसमभाषितम- र्थतः । खरस्य चन्दनभार इव केवलं परिश्रम- करं भवति॥यथा खरश्चन्दनभारवाही भारस्य वेत्ता न तु चन्दनस्य ॥ एवं हि शास्त्राणि बहू- न्यधीत्य चार्थेषु मूढाः खरवद्वहन्ति ॥५॥ सुश्रु० अ० ४ । भवन्ति चात्र-यस्तु केवलशास्त्रज्ञः कर्मस्वपरिनिष्टितः ॥ स सुह्यत्यातुरं प्राप्य प्राप्य भीरुरिवाहवम् ॥६॥ यस्तु कर्मसु निष्णातो घाटाच्छास्त्रवहिष्कृतः ॥ स सत्सु पूजा नाप्नोति वधञ्चार्हति राजतः ॥ ७ ॥ सुश्रु० सू० अ० ३ ॥ भापानुवाद- अन बंद्यक विवक ( विचार ) को वर्णन करंगे ॥२॥जो गुरु. मुग्वहारा नावग्रहण करके वारवार विचार, क्रियामें निपुण होकर चिकित्मा ( न्याविशमनापाय ) करनाहं वहीं वैद्य है ओर जो गुरुसे सपूर्ण ग्रन्थको पिनपढे ही बेटा वनजांवे वे वैद्य नहीं किन्तु ये चार है ऐसा वन्वंतरिजीने सुश्रुतसे पहा ॥ • ॥ गरुक मुखद्वाराभी एकहीं शास्त्र पटनेवाला शास्त्रके सारको नहीं जानसक्ता नम गिय वैद्यका रचितहे कि मत्र शास्त्रोके विषयको पट सुन और विचारकर अवश्य जानलेवे ॥ 2 ॥ जो पुरप सब शास्त्रकोभी पटले और उसे लई अनर्थका ज्ञान न हो तो वह कवट शास्त्रोका भार उठानेवाग है उसे (४) अनुपानदर्पणः । शास्त्री सद्वैद्य कहनायोग्य नहीं, जैसे गधेपर चढन लादनेसे वह केवल चदन भार (बोझ) को जानताहै परन्तु उसकी सुगन्धको नहीं जानता,इसलिये वैद्यक शास्त्र पढनेवालेको व्याकरण (पाणिनीयसूत्रो) का बोध अवश्य चाहिये जिससे अर्थानर्थको जानलेवे ॥ ५ ॥ भाषानुवाद-जो केवल वैद्यशास्त्रको जानताहो ओ कर्म ( अनुपानादिक्रिया ) में निपुण न हो वह वैद्य रोगीको प्राप्तहोकर मोहित (घबडाय ) जाताहे जैसे कायर रण ( सग्राम ) पाकर घबरा जाताहै तैसे ॥ ६ ॥ और जो क्रियाको जानताहो परन्तु शास्त्रके बोधसे रहित हो वह वैद्य सज्जनोंमें आदर नहीं पाता और राजाको उचितहै कि उस अनपढ वैद्यको अपनेराज्यसे बाहर करदे वा मरवाडाले नही तो वह बहुतसी प्रजाको नष्टकरदेगा ॥ ७ ॥ उभावेतावनिपुणावसमर्थो स्वकर्मणि ॥ अर्द्ध वेदधरावेतावेकपक्षाविव द्विजौ ॥ ८ ॥औष- ध्योऽमृतकल्पास्तु शस्त्राशनिविषोपमाः भवन्त्यज्ञैरुपहृतास्तस्मादेतौ विवर्जयेत् ॥ ९ ॥ यस्तूभयज्ञोमतिमान्ससमर्थोऽर्थसाधने ॥आहवे कर्मनिर्वोढुं द्विचक्रः स्यन्दनो यथा ॥ १० ॥ मुश्रु० सू० अ० ३-४॥ भापानुवाद-उक्त दोनों प्रकारके वैद्य अशिक्षित होनेसे चिकित्सा करने असमर्थ होतेहै, जैसे एकपखवाले पक्षी उडनेको असमर्थ होते, तेसे अथवा ई इन दोनोमें अर्थात् क्रिया और शास्त्रमें अशिक्षित हैं वे पारहित पक्षीके समा दुखित और असमर्थ होतेहैं ।। ८ ॥ जो औषधि अमृतके समानहैं वे उनअशि क्षित ( बिनपढेहुवे मूर्ख ) वैद्योंके हाथस-शस्त्र वन और विपके समान होजाती इसलिये सबको उचित है कि मूर्ख वेद्योंसे औपध कदापि न लेवें ॥९॥ बुद्धिमान शास्त्र और क्रियामें निपुणहे वहीं प्रयोजन सिद्धकरताहै अर्थात् उसीर रोग निवृत्त होताहे जैसे युद्धमे दोपहियेके रथसे कार्यासिद्ध होताहे तसे %D द्वितीयाप्रमादः २ । ) इसलिये अष्टाग आयुर्वेदको पढेहुए और क्रियामे निपुण ऐसे वैद्यसे ही सबनें औषध सेवन करना चाहिये, ये सब सुश्रुतके सूत्रस्थानके ३ रे तथा ४ थे अध्यायमें लिखाहै ॥ १० ॥ इति श्रीमत्पडितजारसरामविरचितसुभाषानुवादविभूषितेऽनुपान दर्पणे वैद्यविवककथने प्रथम.प्रमोद. ॥ १ ॥ अथायुर्वेदविवेकं व्याख्यास्यामः १ । इहखल्वायुर्वेदो नाम यदुपाङ्गमथर्ववेदस्यानु- त्पाद्यैव प्रजाःश्लोकशतसहस्त्रमध्यायसहस्रं च कृतवान् ॥ स्वयंभूस्ततोऽल्पायुष्टुवमल्पमेधस्त्व- ञ्चावलोक्य नराणां भूयोऽष्टधा प्रणीतवान् ॥२॥ शल्यं शालाक्यं कायचिकित्सा भूतविद्या को- सारभृत्यमगदतन्त्रं रसायनतंत्रं वाजीकरणतंत्र- मिति ॥ ३॥ अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः॥४॥ तत्र १ शल्यं नाम-विविधकाप्टपाषाणपांशुलो- हलोष्टास्थिवाल-नखपूयास्त्रावान्तर्गर्भशल्योद्ध- रणार्थयंत्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानव्रणविनिश्चया- र्थञ्च ॥ ५ ॥ मुश्रु० सू० स्था० अ० १॥ भापानुवाद-अब आयुर्वेदविवेकको वर्णन करेंगे ॥ यह आयुर्वेद जो अर्थर्ववेदका उपानहै उसको सृष्टिसे पूर्वही परमात्माने एक लक्ष श्लोक और एकसहज अध्यायमें निर्मित किया ।। १ ।। इतना बनानेके पश्चात् मनुष्योंकी अल्पायु डगर अल्पबुद्धि देखकर उस आयुर्वेदके पुन आठभाग किये ॥ २ ॥ उन बाठभागोंके ये नाम है-१ शल्य २ शालाक्य ३ कायचिकित्सा ४ भूत- विदा ५ कौमारभृत्य ६ अगदतत्र ७ रसायनतत्र और ( वाजीकरणतत्र ॥३॥ जब इस लायुवेदगे प्रत्येगभागका पृथकपृथक लक्षण कहतेंहै ॥ ४ ॥ ५ (४) अनुपानदर्पणः । शास्त्री सद्धेय कहनायोग्य नहीं, जैसे गधेपर चान लादनेमे वह केवल चदन भार (बोझ) को जानताहे परन्तु उसकी सुगन्धको नहीं जानता,इसलिये वैद्यक शास्त्र पढनेवालेको व्याकरण (पाणिनीयसूत्रो ) का बोध अवश्य चाहिये जिससे अर्यानर्थको जानलेवे ।। ५ ॥ भापानुवाद-जो केवल वैद्यशाम्नको जानताहो औ कर्म ( अनुपानादिक्रिया ) मे निपुण न हो वह वैद्य रोगीको प्राप्तहोकर मोहित (घबडाय ) जाताहे जसे कायर रण ( सग्राम ) पाकर घबरा जाताह तैसे ॥ ६ ॥ और जो क्रियाको जानताहो परन्तु शास्त्रके बोधसे रहित हो वह वैद्य सज्जनोंमें आदर नहीं पाता मोर राजाको उचितहै कि उस अनपढ़ वैद्यको अपनेराज्यसे बाहर करदे या मरवाडाले नहीं तो यह बहुतसी प्रजाको नष्टकरदेगा ॥ ७ ॥ उभावेतावनिपुणावसमर्थौ स्वकर्माणि ॥ अर्द्ध वेदधरावेतावेकपक्षाविव द्विजौ ॥ ८ ॥औप- शस्त्राशनिविपोपमाः भवन्त्यज्ञैरुपहृतास्तस्मादेतौ विवर्जयेत् ॥ ९ ॥ यस्तूभयज्ञोमतिमान्ससमर्थोऽर्थसाधने॥ आहवे कर्मनिर्वोढुं द्विचक्रः स्यन्दनो यथा ॥ १० ॥ सुश्रु० सू० अ० ३-४॥ भाषानुवाद-उक्त दोनों प्रकारके वैद्य अशिक्षित होनेसे चिकित्सा करने असमर्थ होतेहै, जैसे एकपखवाले पक्षी उडनेको असमर्थ होते, तेसे अथवा जे इन दोनोंमें अर्थात् क्रिया और शास्त्रमे अशिक्षित हैं वे पारहित पक्षीके समान दु खित और असमर्थ होतेहैं ॥ ८ ॥ जो औपधि अमृतके समानहैं वे उनअशि- क्षित (विनपढेहुवे मूर्ख ) वैद्योंके हाथसे-शस्त्र वन और विपके समान होजाती इसलिये सबको उचित है कि मूर्ख वैद्योंसे औपध कदापि न लेवें ॥९॥ बुद्धिमान शास्त्र और क्रियामें निपुणहै वहीं प्रयोजन सिद्धकरताहे अर्थात् उसी रोग निवृत्त होताहे जैसे युद्धमें दोपहियेके रथसे कार्यसिद्ध होताहै तो ध्योऽमृतकल्पास्तु द्वितीयाप्रमोदः २ । (५) सलिये अष्टाग आयुर्वेदको पढेहुए और क्रियामे निपुण ऐसे वैद्यसे ही सवनें औषध सेवन करना चाहिये, ये सब सुश्रुतके सूत्रस्थानके ३ रे तथा ४ थे अध्यायमें लिखाहै ॥ १० ॥ इति श्रीमत्पडितजारसरामविरचितसुभाषानुवादविभूषितेऽनुपान दर्पणे वैद्यविवेककथने प्रथम.प्रमोद. ॥ १ ॥ अथायुर्वेदविवेकं व्याख्यास्यामः १। इहखल्वायुर्वेदो नाम यदुपाङ्गमथर्ववेदस्यानु- पायैव प्रजाःश्लोकशतसहस्रमध्यायसहस्रं च कृतवान् ॥ स्वयंभूस्ततोऽल्पायुष्वमल्पमेधस्त्व- ञ्चावलोक्य नराणां भूयोऽष्टधा प्रणीतवान् ॥२॥ शल्यं शालाक्यं कायचिकित्सा भूतविद्या को- सारभृत्यमगदतन्त्र रसायनतंत्र वाजीकरणतंत्र- मिति ॥ ३॥ अथास्य प्रत्यङ्गलक्षणसमासः॥४॥ तत्र १ शल्यं नाम-विविधकाष्टपाषाणपांशुलो- हलोष्टास्थिवाल-नखपूयास्त्रावान्तर्गर्भशल्योन्द्ध- रणार्थयंत्रशस्त्रक्षाराग्निप्रणिधानबणविनिश्चया- र्थञ्च ॥ ५ ॥ सुश्रु० सू० स्था० अ० १॥ भापानुवाद-अब आयुर्वेदविवेकको वर्णन-करेंगे ॥ यह आयुर्वेद जो ' अर्थववेदका उपागहै उसको सृष्टिसे पूर्वही परमात्माने एक लक्ष श्लोक और एकमहन्त्र अध्यायमे निर्मित किया ॥ १ ॥ इतना बनानेके पश्चात् मनुष्योंकी अल्पायु और अत्पबुद्धि देखकर उस आयुर्वेदके पुन आठभाग किये ॥ २ ॥ उन आठभागोके ये नाम है- १ शल्य २ शालाक्य ३ कायचिकित्सा ४ भूत- विद्या ५ कौमारभृत्य ६ अगदतत्र ७ रसायनतत्र और ८ वाजीकरणतत्र ॥३॥ १३, व इस आयुवेदने प्रत्येकभागका पृथकपृथर लक्षण कहतेहै ॥ ४ ॥ तहै (६) अनुपानदर्पणः। शल्यका लक्षण-अनेक प्रकारके तृण ( कटोरघास वा गोखरू-नागफनी आदिकेकाटे) काष्ठ (टकडीकी फासआदि) लोहेकी कील-हड्डी-बाल-नख- आदिके लगनेसे जो घाव होजाताहे अथवा उक्त वस्तुओका कुछभाग ( अश) घावमे रहजानेसे जो घाव विगटजाताह उसके टूरकरनेको जो शस्त्र वा यत्रद्वारा उन वस्तुओंका निकालना या गर्भमेसे मरेनुवे वालकको शम्न वा यत्रद्वारा निका- लना अथवा घावके उत्तमप्रकारसे जाननेके हेतु जो यत कियाजाताहे उसको शल्याचकित्सा कहतेहैं ॥ ५ ॥ २ शालाक्यनाम-उर्ध्वजत्रुगतानां रोगाणां श्रव णनयनवदनघ्राणादिसंश्रितानांव्याधीनामुपश- मनार्थम्॥६॥३कायचिकित्सानाम-सर्वाङ्गसंस तानां व्याधीनां ज्वरातिसाररक्तपित्तशोषोन्मा दापस्मारकुष्ठमेहादीनामुपशमनार्थम्॥७॥मुश्रु० सू० स्था० अ० १।४ भूतविद्यानाम-देवासु- रगन्धर्वयक्षरक्षःपितृपिशाचनागग्रहाद्युपसृष्टचे तसां शान्तिकर्मबलिहरणादिग्रहोपशमनार्थम् ॥८॥सुश्रु०सू०स्था ०अ०१५ कौमारभृत्यं नाम- कुमारभरणधानीक्षीरदोषसंशोधनार्थं दुष्टस्तन्य- ग्रहसमुत्थानाञ्च व्याधीनामुपशमनार्थम् ॥९॥ भाषानुवाद-२ शालाक्यल० जो कण्ठसे ऊपरके अङ्ग जैसे-मुख-नाव नेत्र ओष्ठ कानआदिमें उत्पन्न हुवे रोगोके दूरकरनेको यत कियाजाताहै : शालाक्य कहतेहैं ॥६॥ ३ कायचिकित्सा ल० जो सपूर्ण अग (शरीर-देह में हुवे ज्वर-अतिसार-रक्तविकार-पित्तरोग-शोष (खुशकी) उन्माद (खपत पगला) अपस्मार (मृगी) कुष्ठ प्रमेह (परगा ) आदि रोगोंके दूरकरने यनफिया जाताहै उसे कायचिकित्सा कहतेहैं ॥७॥ ४ भूतविद्याल० जो देवता द्वितीयाममोदः२। (७) अनुर-गधर्व-यक्ष-राक्षस-पितर-पिशाच-सर्प और नवग्रह आदिमे चित्त लगनेसे अनेक भ्रमजन्य पीडा होतीहै उनकी शान्ति करनेको यन्न किया जाताहै उसको भूतविद्या कहते है ॥ ८॥ ५ कौमारभृत्यल० बालकोंका पालन पोषण-धायके दूधमें जो दोष होतेहै उनके तथा उस बिगडेहुवे दूधके पीनेमे जो बालकोंको रोग होतहैं उनके दूरकरनेके यत्नोको कौमारभृत्य तत्र कहतह ॥ ९ ॥ ६ अगदतंत्रनास-सर्पकीटलतावृश्चिकमूषिकादि- दृष्टविषव्यंजनार्थ विविधविषसंयोगविषोपहतो- पशमनार्थम् ॥१०॥ ७ रसायनतन्त्रनाम-वयः- स्थापनमायुर्मेधावलकरंरोगापहरणसमर्थम्॥११॥ सुश्रु० सू०स्था० अ० १ । ८ वाजीकरणतन्त्रं नाम- अल्पदुष्टविशुष्कक्षीणरेतसामाप्यायनप्रसादोप- चयजनननिसित्तं प्रहर्पजननार्थश्च, एवमयमायु वेदोऽष्टाङ्ग उपदिश्यते॥१२॥इइखल्वायुर्वेदप्रयो- जनंव्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य रक्षणञ्च आयुरस्सिन् विद्यतेऽनेन वा आयुविन्द- तीत्यायुर्वेदः ॥ १३ ॥ सुश्रु०सू०स्था०अ० १ ॥ भापानुवाद-६अगदतत्रल० साप-कीडे-बन्दर-मपे-आदिविपेले जीवोके काटनेसे जो मनुष्योंके शरीरमें विष फैल जाताहै उसको दूरकरनेको जो उपाय कियाजाताह उसे अगदतत्र कहतेहैं ॥१०॥ ७ रसायनतत्रलजिससे मनुष्योंकी जायु पूर्ण हो और बल बुद्धिकी वृद्धि तथा समस्त रोग निवृत्त हो उम उपायको रसायनतत्र कहतेहैं।।१६।। ८ वाजीकरणतत्रल० जिससे थोडे वीर्यवाले पुरुषकी की पदी विराट वीर्यमालेको वीर्य शुद्धि और क्षीणपार्यवाको पुन वीर्योत्पत्ति हो - --- - (८) अनुपानदर्पण । और उक्त तीनों प्रकारके मनुष्योको जो आनद देनेवाला उपाय हो उसे वाजी- करणतंत्र कहतेहैं, इसप्रकारसे यह आयुर्वेद अष्टाङ्ग कहलाताहै ॥१२॥ इस जग- त्में आयुर्वेद के प्रकाश करनेका यही प्रयोजन है कि रोगयुक्त गनुष्योको रोगसे छुडाना और रोगरहित मनुष्योंकी गेगसे रक्षा करना (बचाना) आयुर्वेदका अर्थ यह है कि,आयु अर्थात् शरीर इन्द्रिय और जीव इन तीनोका स्वस्थतापूर्वक सयोग हो जिसमें उसे आयुर्वेद कहतेहे अथवा २ आयुका जिससे विचार हो उसे आयुर्वेद कहतेहैं अथवा ३ आयु जिसके द्वारा जानीजाय उसे आयुर्वेद कहतेहैं अथवा ४ जिससे आयुःप्राप्तहो उसे आयुर्वेद कहतेहैं ये सब सुश्रुतके मूत्रस्थानके पहिले अध्यायमे लिखाहै ॥ १३ ॥ इति श्रीमत्पण्डितज्ञारसरामविरचिते सुमापानुवादविभूपितेऽनुपानदर्पण ह्यायुर्वेदविवेककथने द्वितीय प्रमोद. ॥ २ ॥ अथ मानविवेक व्याख्यास्यामः ॥१॥ न मानेन विनायुक्तिर्द्रव्याणां ज्ञायते क्वचित् ॥ अतःप्रयोगकार्यार्थ मानमत्रोच्यते मया॥२॥यतो मन्दाग्नयो ह्रस्वा हीनसत्त्वा नराः कलौ॥अतस्तु मात्रा तद्योग्या प्रोच्यते सुज्ञसम्मता ॥३॥ यवो द्वादशभिर्गोरसर्षपः प्रोच्यते वधैः॥ यवद्वयेन गुंजा स्यात्रिगुंजो वल्ल उच्यते ॥४॥ माषो गुञ्जा भिरष्टाभिस्सप्तभिर्वा भवेत्वचित् ॥ स्याच्चतु षिकश्शाणस्स निष्कं टंक एव च॥५॥ गद्याणो माषकैः षड्भिःकर्षःस्याद्दशमाषकः॥ चतुःकर्षैः पलं प्रोक्तं दशशाणमितं वुधैः ॥ चतुःपलैश्च कुडवं प्रस्थाद्याः पूर्ववन्मताः ॥ ६॥ शाईधर संहितायां खं० १ अ० १ ॥

तृतीयाममोदः३। (९) भापानुवाद-अब इसके आगे मानविवेक वर्णन करेगे ॥ १ ॥ मान ( तोला ) विनाद्रव्य (औपत्र ) आदिकी योजना ( युक्ति ) नहींहो सक्ती इसलिये इस प्रथमे प्रथम मान परिभाषा लिखतेहै ॥२॥ यद्यपि वैद्यकग्रथोमें १ मागध और २ कालिंग,ये दोप्रकारके मान दियेहैं परन्तु हम प्रयविस्तारभयसे तथा कलियुगमे मदाग्नि छोटे और हीनबल मनुष्य होनेसे उनके योग्य कालिंग मानानुसारही मात्रा वैद्योको मन्तव्य होनेके कारण इसप्रथमे कालिगमानही वर्णन करतेहै ॥३॥ १२ सपेद सरसोंका १ यत्र २ यवोंकी १ गुजा ३ गुजा (चिरभी) का १ बल्ल ॥ ४ ॥ ८ गुजा अथवा ७ गुजाका १ मासा ४ मासेका १ शाण जिसे निक तथा टकभी कहतेहै ॥५॥६ मासेका १ गद्याण १० मासेका १ कर्ष ४ कर्पका १ पल उस १ पलके १० शाण ( ४० मासे होतेहे और ४ पलका एक कुडव होताहै । इसके आगे प्रस्थआदि मान मागध परिभाषानुसारही प्रथातरसे जानना चाहिये ॥ ६ ॥ यह मान शाईधरसहिताके प्रथम खटके ( पहले ) अध्यायमें लिखाहे ।। स्थिति स्त्येव मात्रायाः कालमग्निं वयोवलम्॥ प्रकृति दोषदेशौ च दृष्ट्वा मात्रां प्रकल्पयेत्॥७॥ नाल्पं हन्त्यौषधं व्याधिं यथाम्भोऽल्पं महानलम् अतिमात्रंच दोषाय यथा सस्ये बहूदकम् ॥८॥ भावप्रकाशस्यपूर्वखंडस्यद्वितीयभागे चोक्तमिदम्। भापानुवाद-भव औषध मात्राका मान दतिह-यद्यपि १ स्वरस २ पाथ ३ फाट ४ हिम ५ कल्क ६ गुटिका ७ चूर्ण ( अवलेह ९ स्नेह ( तेल घृत) १० आसव ११ और रस ( धातुभग्म ) आदिकी मात्रा मधोम पृथक् २ वर्णनकीभी है, तथापि समस्त प्रापि मुन्यादि वैद्यक पंधकर्तामोका अतिम यही सिद्धातहे कि प्रथाक्तमात्रापरही वैद्य निश्चय न रवखे अनुपानदर्पणः। किन्तु काल (समय) रोगीको अशि-अनस्या-बल-प्रशनि-दोष (वात- पित्त-कफ) और देश (अनूपादि) को देखकर अपनी बुद्धि अनुसार ओपव मात्राकी योजना करे ||७॥ क्योकि जैसे वढीहुई अग्नि थोडे पानीसे शमन नहीं होती तैसेही बढाहुवा रोगभी नियतमात्रासे दूर नहीं होता तो वहा रोगानु- सार मात्राको बढाना चाहिये और जहा अल्परोग जानपडे वहा नियत मात्रा कोभी अल्प (थोडी ) करनी चाहिये क्योंकि जैसे यव आदिअन्नके छोटे २ अकुरोपर अधिक जल गिरनेसे वे अकुर गल जाते, तैसेही थोडे रोगपर अधिक मात्रा होनेसे वह हानिहीं पहुचातीहै इसलिये वैद्यको राचितहे कि मात्रा को विचारके देवे ॥८॥ ऐसा भावप्रकाशके पूर्व खडके दूसरे भागमें लिखाहै ।। अथ नाडीविवेकं व्याख्यास्यामः । करस्यांगुष्ठमूलेयाधमनीजीवसाक्षिणी ॥ तच्चेष्ट यासुखंदुःखंज्ञेयंकायस्यपण्डितैः ॥ ९॥ नाडीध तेमरुत्कोपेजलौकासर्पयोर्गतिम् ॥ कलिंगकाक मण्डूकगतिपित्तस्यकोपतः॥१०॥ हंसपारावत गतिधत्तेश्लेष्मप्रकोपतलावातत्तिरवर्तीनांगम नेसन्निपाततः ॥ ११॥ कदाचिन्मंदगमनाकदा चिद्वेगवाहिनी ॥ द्विदोषकोपतोज्ञेयाहन्तिचस्था नविच्युता ॥ १२॥ स्थित्वास्थित्वाचलतियासा स्मृताप्राणनाशिनी ॥ अतिक्षीणाचशांताचजी वितंहन्त्यसंशयम् ॥ १३॥ १ कालगभगधूभ्याटाइत्यमरः ।

तनीय प्रमीद' । (११) भाषानुवाद-अब नाडीविवेक वर्णन करतहे । रोगीको नाडी देखनेके समय वैद्य प्रसन्नबुद्धि स्थिरचित्तहोकर स्त्रीके वाम ( बाये ) और पुरुपके दाहन हाथके अगूठेके मूलमे प्राणवायुकी साक्षीभूत जो नाडी है उसपर अपने सीधे हाथकी तर्जनी आदि ३ अगुली रखके उस नाडीकी चेष्टा ( गति ) से शरीरके सुखदु खको जाने ॥ ९ ॥ वातप्रकोपमें सर्प और जोककी गति- समान पित्तप्रकोपसे कलिंग (पक्षिविशेष-वा-धुलबुल ) काक और मेडुककी गति सख्श ॥ १० ॥ कफप्रकोपसे हस तथा कबूतरकी गतिसमान सन्निपात (त्रिदोष ) प्रकोपसे लबा तित्तिर तथा बटेरकी गतिसम ॥ ११ ॥ और द्विदोष ( वातपित्त-बातकफ-पित्तकफ) प्रकोपसे कभी मद और कभी बेगसे नाडी चलती है और जो नाडी अपने स्थानको छोड देतीहै वह रोगीको नष्ट करदेतीहै ।। १२ ।। ठहर २ के चलनेवाली तथा अत्यत क्षीण और जो ठढी पड जाये सो नाडीभी रोगीके प्राणनाशिनीही जानो ॥ १३ ॥ . ज्दरकोपेनसनीसोष्णावेगवतीभवेत् ॥ काम क्रोधाद्भवेद्वेगाक्षीणाचिन्ताभयाप्लुता ॥ १४ ॥ मन्दाग्नेःक्षीणधातोश्चनाडीमन्दतराभवेत्॥असृ- क्पूर्णाभवेत्कोष्णागु:सामागरीयसी ॥ १६ ॥ लध्वीवहतिदीप्ताग्नेस्तथावेगवतीभवेत्॥सुखित स्थरिथराज्ञेयातथावलवतीमता ॥ चपलाक्षुधि लरयापितृप्तस्यवहतिस्थिरा ॥ १६ ॥ भाग्यम-नाटीपरीक्षार्थमेतेश्लोका शार्ङ्गधरस्य प्रथमखडस्य तृतीयाध्याये कथिता अताऽधिकाधापिसन्त्यनेकाआयुर्वेदीयग्रन्ये पुश्लोका. । परश्च तत्रतेप रेखन तदप्रथस्य विस्तारार्धमेव कृतो यथा रविनिश्चयो निदानेन भवति नभवति नधा नादया तदेवाह मिपावरावाग्भट कवीश्वरोलोलिंबराजश्च ।।

चतुर्थःप्रमोदः ४। (१३) यीभवन्ति ॥ तथाम्लयोगे मधुरेण तृतास्तेपाय थेष्टं प्रवदंति पथ्यम् ॥ २ ॥शीतोष्णतोयास वमद्ययवफलाम्लधान्याम्लपयोरसानाम्यस्या नुपानंतुहितंभवेद्यत्तस्मै प्रदेयंत्विहमात्रयातत्॥ ॥ ३ ॥ व्याधिश्चकालञ्चविभाव्यधीरैर्द्रव्याणि योज्यानिचतानितानि ॥ सर्वानुपानेषुवरंवदंति मेध्यंयदंभःशुचिभाजनस्थम् ॥ ४ ॥ लोकस्यज न्मप्रभृतिप्रशस्तं तोयात्मकाःसर्वरसाश्चदृष्टाः॥ संक्षेपएषोऽभिहितोऽनुपानेष्वतःपरंविस्तरतोऽ भिधास्ये॥५॥ भापानुवाद-अब इसके आगे अनुपानविवेक वर्णन करेंगे-अन्न औषध और रस आदिके पीछे या सगही जो सेवन ( पान ) किया जावे उसे अनु- पान कहतेहैं ।। १ ।। कई मनुष्य खटाईस विरक्त (अप्रसन्न ) ओर मिठाईसे अनुरक्त (प्रसन्न ) रहतेहैं और कई मिठाईसे विरक्त और खटाईसे अनुरक्त रहतेहै उनको यथायोग्य ( उनके स्वभावानुसार) पथ्य होना उचितहै ॥२॥ ठंडा तथा उष्ण पानी आसब ( अर्क ) मद्य ' मदिरा ) यूप ( मूग आदि वस्तुओ, फा ओटाके निकालाहुवा साररूपी रस फलकी खटाई-काजी-दूध-रस जो कि गीली औपधसे निकालागया हो । इनमेसे जिस मनुष्यको जो हित समझावे वही उसीको मात्रा । प्रमाणसे , अनुपान देना चाहिये ॥३॥ रोग तथा समयके अनुकूल खानेकी वस्तुओको विचारकर दे ओर शुद्ध व स्वच्छ पात्रमे रक्खाहुवा पानी सब अनुपानमे श्रेष्ट होनेमे पीनको देना चाहिये।।४॥ ससारको जन्मसे मरणपर्यन्त पानी हितही हे क्यो कि सब रसादि पानीसे ही होतेहैं इस दिये किसी अनुपानमे पानी वर्जित नहीं यह सक्षेपस अनुपान कह अब इसके आगे विस्तारसे कहतेह ॥ ५ ॥ १ पूपरस्मतो वेदलानामधादशगुणेभसि-मदनपालनिपटाविति ।

. ११२) अनुपानदर्पणः। रोगमादौपरीक्षेततदनंतरमौषधम् ॥ ततःकर्म भिषक्पश्चाज्ज्ञानपूर्वसमाचरेत् ॥१७॥वा०भ० आदौनिदानविधिनाविदध्यायाधिनिश्चयम् ॥ ततस्साध्यसमीक्षेतपश्चाद्भिपगुपाचरेत् ॥ १८ ॥ वै० जी० वि०१॥ भाषानुवाद-सामान्य ज्वरप्रकोपसे नाटी उष्णतापूर्वक अविक वेग चलतीहै, काम और क्रोबसेभी नाडी अत्यत वेगसे चलतीहै, चिन्ता तथा भर युक्त मनुष्योंकी नाडी क्षीण (बलहान ) चलतीहै ॥ १४ ॥ जिसकी अग्नि मन हो तथा धातु क्षीण हो उस मनुष्यकी नाडी अत्यत मद चलतीहै, रक्तप्रकोर युक्त नाडी कुछ २ उष्ण जड और भारी चलतीहै ।। १५ । जिस मनुष्यव जठराग्नि प्रदीप्त हो उसकी नाडी हलकी और वेगसे चलतीहै, रोगरहित मनुE की नाडी स्थिर और बलयुक्त चलतीहै, भूखे मनुष्यकी नाडी चचल औ भोजनादिसे तृप्त हुवे मनुष्यकी निश्चल (स्थिरतायुक्त) नाडी चलती हैं ॥१६ नाडीपरीक्षार्थ ये सब श्लोक शाधिरके प्रथमखडके तीसरे अव्यायमें वर्ण कियेहैं इनसे अधिकभी श्लोक कई वैद्यक प्रयोमें लिखेहैं परन्तु उनका लिखन केवल उसपथके विस्तारार्थही है क्यो कि रोगनिश्चय जैसा निदानसे होता पैसा नाटीसे नहीं होता अत एव वैद्यश्रेष्ठ वाग्भटजी तथा कवीश्वर लोलिंबरा जीने भी कहाहै कि प्रथम वैद्य निदानविधिसे रोगका निश्चयकरे फिर साध असाध्यका निश्चयकरे तदनतर ज्ञानपूर्वक चिकित्सा करे अर्थात् साध्यहो त उसका यत्न और असाध्य रोग हो तो उसका त्याग करदेवे ॥ १७-१८ इतिश्रीमत्पडितज्ञारसरामविरचिते सुभाषानुवादविभूषितेऽनुपानदर्पणे मानविवेकनाडीविवेककथने तृतीय प्रमोद ॥ ३ ॥ अथातोऽनुपानविवेकं व्याख्यास्यामः १ अम्लेन केचिद्विहितामनुष्या माधुर्यायोगेप्रण (१४) अनुपानदर्पणः। उष्णोदकानुपानंतुस्नेहानामथशस्यते ॥ ते भल्लातकस्नेहात्स्नेहात्तौवरकात्तथा ॥ ६ ॥ अ नुपानंवदन्त्येकेतैले यूपाम्लकांजिके ॥ शीतोद कमाक्षिकस्यपिष्टान्नस्यचसर्वशः॥७॥ दधि- पायसमद्यातिविषजष्टतथैवच ॥ केचिपिष्टमय- स्याहुरनुपानंसुखोदकम् ॥८॥ पयोमासरसोवा- पिशालिमुद्गादिभोजिनाम् ॥युद्धाध्वातपसंताप- विषमद्यरुजासुच॥९॥माषादेरनुपानंतुधान्या- ग्लंदधिमस्तुवा ॥ मद्यमद्योचितानांतु सर्वमांसे षुपूजितम्॥१०॥अमद्यपानामुदकं फलाम्लंवा प्रशस्यते॥ क्षीरं घध्विभाष्यस्त्रीकान्तानाम- मृतोपमम् ॥ ११॥ भाषानुवाद-भिलावा और तुर (-जिसके केशरके समान पत्ते और उड दके समान होतेहैं ) तेलको छोडकर समस्त तैलादि चिकने पदाथोंके भक्षण में उष्णपानी अनुपानहै ॥६॥ कई आचार्य कहतेहैं कि तैल-यूप-खटाई- काजी-सहत और पीसहुए अन्न ( सत्तुआदि के भक्षणमें ठढा पानी अनुपान है ॥७॥ मद्यपानजन्य पीडा और विपभक्षणमें दही और दूध अनुपान है कई आचार्य पीसे अन्नभक्षणका अनुपान सुखोदक (थोडा उष्णपानी) कहतेहै ||८|| वान, मूग आदि भक्षण करनेवालोंको दूध या मासरस अनुपान है,युद्धमार्ग धूप अग्निज्वाला इनसे यकेहुवोंको और विपज तथा मद्यज रोग युक्त पुरुपोंकोभी दूध या मासरसही अनुपानहे ॥ ९॥ उडद आदि का अनुपान कॉजी अथवा महाहै, मासभक्षणमें मद्यपीनेवालोंको मद्यही अनुपानहै ॥१०॥ मद्य न पीनेवा- लोंको जल या फलकी खटाई अनुपानहै, घाम ( धूप ) मार्ग ( वाट-पथ- रस्ता ) पढाने या पढने और स्त्रियोसे यकेहुवे मनुष्यको दूध अमृतके समान अनुपान है ।। ११ ॥

चतयः प्रसीदः ४। (१५) सुराकृशानास्थूलालाननुपानमधूदकम् ॥ निरा- मयानांचित्रंतुभुक्तमध्येप्रकीर्तितम्॥१२॥स्नि- ग्धोष्णंमारुतेपथ्यंकफेरूक्षोष्णमिष्यते ॥ अनु- पानंहितंचापिपित्तेमधुरशीतलम् ॥ १३ ॥हितं शोणितपित्तिभ्यः क्षीरसिक्षुरसस्तथा ॥ अर्को- लुशिरीषाणामासवास्तुविपार्तिषु ॥ १४ ॥ अतः परं तुवर्गाणामतुपानंपृथक्पृथक्॥प्रवक्ष्याम्यनु- पूर्वेणसपासेक्सेशृणु ॥१५॥ भाषानुवाद-मद्य ( मदिरा-दारू-शराब-बराडी) से दुबले और अत्यंत को जलयुक्त मधु ( सहत ) अनुपान है रोगरहित मनुष्योंको अनेक रकी वस्तु भोजनके मध्य २ (बीच २) मे खिलानाही अनुपान है ॥१२॥ रोगमें चिकना उप्ण कफरोगमें उष्ण बखा और पित्तमें मीठा तथा ठढा पान पर है ॥ १३ ॥ रक्तपित्तमें दूध और ऊस ( साठे ) का रस पान पध्य है, विषजनित रोगमें अर्क ( आकडा-अकौवा ) रीठा और (सका आसव अनुपान है ॥ १४ ॥ इसके पश्चात् वर्ग वर्गका पृथक् २ पान वर्णन करतेहैं ॥ १५ ॥ १ तत्रपूर्वसस्यजातीनांवदाम्लवैदलानांधा- न्यास्लम् ॥ १६ ॥ २ अन्लानांफलानापद्मोत्पलकन्दासवः॥१७॥ ३ कपायाणांदाडिमवेत्रासवः ॥ १८॥ १ मधुराणांत्रिकटुकयुनतः कन्दासवः ॥ १९ ॥ ५ तालफलादीनांधान्याल्लम् ॥ २० ॥ ६ कटुकानादूर्वानलवेत्रासवः॥२१॥ ७ पिप्पल्यादीनांवईष्ट्रावसुकासवः॥ २२॥ ९ कृप्माण्डादीनांदावकिरीरासवः ॥२३॥ ९ चंचुप्रभृतीनांलोध्रासवः॥ २४ ।।

(१४)
अनुपानदर्पणः।
उष्णोदकानुपानंतुस्नेहानामथशस्यते ॥ ऋते
भल्लातकस्नेहात्स्नेहात्तीवरकात्तथा ॥ ६ ॥
नुपानंवदन्त्येकेतैले यूपाम्लकांजिके ॥ शीतोद
कंमाक्षिकस्यपिष्टान्नस्यचसर्वशः॥७॥ दधि-
पायसमद्यातिविषजुष्टेतथैवच ॥ केचिपिष्टमय-
स्याहुरनुपानंसुखोदकम्॥८॥ पयोमांसरसोवा-
पिशालिमुद्गादिभोजिनाम्॥ युद्धाध्वातपसंताप-
विषमद्यरुजासुच॥९॥माषादेरनुपानंतुधान्या-
म्लंदधिमस्तुवा ॥ मद्यंमद्योचितानांतु सर्वमांसे
षुपूजितम्॥१०॥अमद्यपानामुदकं फलाम्लंवा
प्रशस्यते॥क्षीरं घध्विभाष्यस्त्रीलान्तानाम-
मृतोपमम् ॥ ११॥
भाषानुवाद-भिलावा और तुर (जिसके केशरके समान पत्ते और उड
दके समान होतेहैं ) तेलको छोडकर समस्त तैलादि चिकने पदार्थों के भक्षण
में उष्णपानी अनुपानहै ॥६॥ कई आचार्य कहतेहैं कि तैल-यूप-खटाई-
काजी-सहत और पीसेहुए अन्न ( सत्तुआदि के भक्षणमें ठढा पानी अनुपान
है ॥७॥ मद्यपानजन्य पीडा और विपभक्षणमें दही और दूध अनुपान है कई
आचार्य पीसे अन्नभक्षणका अनुपान सुखोदक (थोडा उष्णपानी) कहतेहै ॥८॥
धान, मूग आदि भक्षण करनेवालोंको दूध या मासरस अनुपान है,युद्धमार्ग धूप
अग्निवाला इनसे थकेहुवोंको और विपज तथा मद्यज रोग युक्त पुरुपोंकोभी
दूध या मासरसही अनुपानहे ॥ ९ ॥ उडद आदि का अनुपान कॉजी अथवा
माहै, मासभक्षणमें मद्यपीनेवालोंको मद्यही अनुपानहै ॥१०॥ मद्य न पीनेवा-
लोको जल या फलकी खटाई अनुपानहै, घाम ( धूप ) मार्ग ( वाट-पथ-
रस्ता ) पढाने या पढने और स्त्रियोसे यकेहुवे मनुष्यको दूध अमृतके समान
अनुपान हैं।॥ ११ ॥

चतयः प्रमोदः । (१५)
तुराकृशानाधूलानालनुपानमधूदकम् ॥ निरा-
मयानांचित्रंतुभुक्तमध्येप्रकीर्तितम्॥१२॥स्लि-
ग्धोष्णंमारुतेपथ्यंकफेरूक्षोष्णमिष्यते ॥ अतु-
पानंहितंचापिपित्तेमधुरशीतलम् ॥ १३ ॥ हितं
शोणितपित्तिभ्यः क्षीरसिक्षुरसस्तथा॥ अर्कशे-
लुशिरीषाणामासवास्तुविपातिषु ॥ १४ ॥ अतः
परं तुबर्गाणामनुपानंपृथक्पृथक्॥ प्रवक्ष्याम्यनु-
पूर्वेणलपासेक्सेशृणु ॥ १५॥
भाषानुदाद-मद्य ( मदिरा-दारू-शराब-बराडी ) से दुबले और अत्यंत
मोटोको जलयुक्त मधु ( सहत ) अनुपान है रोगरहित मनुष्योको अनेक
प्रकारकी वस्तु भोजनके मध्य २ (वीच २) में खिलानाही अनुपान है ॥१२॥
वातरोगमे चिकना उण कफरोगमें उष्ण म्खा और पित्तमें मीठा तथा ठढा
अनुपान पच है ॥ १३ ॥ रक्तपित्तमें दूध और ऊस ( साठे ) का रस
अनुपान पव्य है, विषजनित रोगमें अर्क ( आकडा-अकौवा ) रीठा और
सिरसका आसव अनुपान है ॥ १४ ॥ इसके पश्चात् वर्ग वर्गका पृथक् २
अनुपान वर्णन करतेहे ॥१५॥
१ तन्त्रपूर्वसस्यजातीनांबदराम्लवैदलानांधा-
न्याम्लस् ॥ १६ ॥
२ अन्लानांफलानापद्मोत्पलकन्दासवः ॥ १७ ॥
३ कपायाणांदाडिमवेत्रासवः ॥१८॥
४ मधुराणांत्रिकटुकयुक्ताः कन्दासवः ॥ १९ ॥
५ तालफलादीनांधान्याल्लम् ॥२०॥
६ कटुकानादूर्वानलबालवः ॥२१॥
७ पिप्पल्यादीनांश्वदंष्ट्रावसुकासवः॥ २२ ॥
- कृष्माण्डादीनांदावकिरीरासवः ।। २३ ।।
९ चंचुप्रभृतीनांलोधासवः ॥ २४ ॥

(१६) अनुपानदर्पणः । १० जीवन्त्यादीनांत्रिफलासवः ॥२५॥ ११ कुसुंभशाकस्यसएव ॥ २६ ॥ भाषानुवाद-१ सस्यजाति (शूकधान्य-कुंवान्य-गमी वान्य ) खबर और बैदल ( जिनकी दाल बनतीहै जैसे, मूग, उडद, मसूर, मटर, तूबर, चने, आदि ) इनका काजी अनुपान है ॥ १६ ॥ २ खट्टेफलोंका नीलेकमलके कदका आसव अनुपान है ॥ १७ ॥ ३ कषले भोजनका दाडिम तथा वेतका आसव अनुपान है ।। १८ ।। ४ मीठे भोजनका सोंठ मिरच पीपल युक्त कदोंका आर,व अनुपान है।॥१९॥ ५ ताडफल-नारियल-कटहर और केलेका काजी अनुपान है ॥ २० ॥ ६ चिरपरे भोजनका दूब-नल-(देवनल) और वेत्र ( वेत) आस अनुपान है ॥ २१॥ ७ पीपल पीपलामूल-चव्य-( चाभ ) चित्रक (चीता ) अदरक काली मिर्च-गजपीपल-रेणुक-अजमोदा-इन्द्रजव-पाठा-जरा-सरसों-पहाडी नींव फल हींग-भारगी-महुआ-अतीस-बच-बायविडग और कटुकी इस पिप्प लादि वर्गका गोखरू वसुक ( बुक केदारगिरी वगहुलप्रसिद्ध) का आस अनुपान है ॥ २२॥ ८ कूष्माड ( कद्दु ) लौकी ( सफेद फूलका कहु ) और तरबूज आदि शाकोंका दाव: और करीनलका आसव अनुपान है ॥ २३ ॥ ९ चचु (लाली) जाई जुही जीवती (शाकभेद ) कुदरु करहारी भिलावा वृद्धदारुक वृक्षादनी ( वृक्षभेद ) फजी (वाड ) सेमर रीठा वनस्पति प्रसव ( वृक्षभेद ) शण ( अवाडेकी भाजी दक्षिणमें प्रसिद्ध ) और कचनार इनस. बोंका लोदका आसव अनुपान है ॥ २४ ॥ १०-११ जीवत्यादि वर्गका और कसूभ सागका त्रिफलेका आसव अनुपान हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ १ शुकधान्य और । २ कुधान्य कोदु सावा वासके बीज और प्रियगु आदिको कहते हैं । ३ शमीधान्य उसको कहते हैं जो कि विनही ऋतुमें उत्पन्न है। ४ जीवत्यादिवर्ग विस्तारपूर्वक सुश्रुतये देखो।

चतुर्थःप्रमोदः ४॥ (१७)
१२ मण्डकपर्यादीनांमहापञ्चमूलासवः॥२७॥
१३ तालसस्तकादीनासम्लफलासवः॥ २८ ॥
१४ सैन्धवादीनांसुरासवआरनालंच ॥ २९॥
१५ तोयं वा सर्वत्रेति ॥ ३०॥
भवन्तिचात्र-सर्वेषासतुपानानांमाहेन्द्रंतोयमु-
त्तलम् । सात्म्यंयस्यतुयत्तोयंतत्तस्महितमुच्यते
॥३१॥ उष्णंवातेकफेतोयंपित्तरक्तचशीतलम्॥
दोषवद्गुरुवाभुक्तमतिमात्रमथापिवा ॥ ३२ ॥
यथोक्तेनानुपानेनसुखमन्नंजीयति ॥ रोचनंळ-
हणंवृष्यंदोपसंघातभेदनम् ॥ ३३ ॥
भाषानुवाद-१२ ब्राह्मी हुलहुल पीपल गुरच गोभी वावची मटर दोनो
कटियाली बैंगन करेला एरड पित्तपापटा चिरायता ककोडा नीमतुरै वेतका
अग्रभाग और रूपादिका बृहत्पञ्चमूलका आसव अनपान है ॥ २७ ॥
१३ नाटक गूदे आदिका खट्टे फलोंका आसव अनुपानहै ॥२८ ।।
१४ सेधानोन ममुद्रनोन विटनोंन सौचलनॉन साभरानोंन और उद्भिदनोंन
( जो कही खारकी भूमीमेंसे निकाला हुआ पानी सूर्य की उष्णतासे या अग्निसे
जमाया जाताहे ) इन सबोंका मद्य आसव और आरनाल अनुपान है ॥ २९ ॥
१५ अथवा सर्वत्र केवल जलही अनुपान उत्तम है ॥ ३० ॥
यहा ऐसा जानो कि सब अनुशनोंमें अतरिक्ष (जो वर्पताहुवा पानीही पात्रमे
ललिया जावे ) वह उत्तम है या जिसको जो पानी अनुकूल हो उसको वही हित
है ॥११॥ वात और कफजनित रोगमे उण पानी पित्त जौ रक्तज रोगमें टढा
पानी अनुपानमे देना उचितहै, दोपयुत्त या प्रमाणसे अधिक खायाहुवा अन्नभी
॥ ३२ ॥ रचित अनुपानसे मुखपूर्वक पचजाताहै और उचित अनुपान
चिपक-वरण ( वीर्यवईका ) पराक्रमविकाशक दोपनागक ॥ ३३ ॥

(१८) अनुपानदर्पणः । तर्पणंमार्दवकरंश्रमलमहरंसुखम् ॥दीपनंदोषश- मनपिपासोच्छेदनंपरम् ॥ ३४ ॥ वल्यंवर्णकर सम्यगनुपानंसदोच्यते॥तदादाकर्शयेत्पीतंस्था- पयेन्मध्यसेवितम् ॥३५॥ पश्चात्पीतंबूंहयतित- स्माद्वीक्ष्यप्रयोजयेत् ॥ स्थिरतांगतमाक्लिन्नमन्न मद्रवपायिनाम् ॥३६ ॥ भवत्यावाधजननमनु पानमतःपिवेत् ॥ नपिवेच्छासकासातरोगेचा प्यूर्ध्वजत्रुगे॥ ३७॥ क्षतोरस्काप्रसेकीचयस्य चोपहतस्स्वरः॥ पीत्वाऽध्वभाष्याध्ययनगेयस्व प्नान्नशीलयेत् ॥ ३८॥ प्रदूष्यामाशयंतद्धितस्य कंठोरसिस्थितम् ॥ स्यन्दाग्निसादच्छादीना मयाञ्जनयेहहून् ॥ ३९॥ भाषानुवाद-तृप्ति तथा कोमलताकारक-श्रम भ्रमहारक-सुखदायक-अग्नि उन्नायक दोष (वात-पित्त-कफ) कोपसहारक तृपा (प्यास) दारक ॥३४॥ और वल तथा वर्णकारक होताहै सो अनुपान यदि भोजनके पहलेही पान किया जावे तो शरीरको दुर्बल और मध्यमें जैसाका तैसा ( घटावे न बढावे ॥ ३५ ॥ और अतमें पीनेसे शरीरको पुष्ट करताहे इसलिये विचारके अनुपान देवे जल आदि पीयेबिन भक्षित अन्न स्थिर और कडा रहनेसे तृप्ति देनेवाला नहीं होता ॥३६॥ वरन पीडाकारक हो जाताहै इसलिये भोजनके पश्चात् अनुपान पीनाही चाहिय श्वास कासवाला ठुड्डीसे ऊपरके अगमें जिसके रोग हो वह ॥३७॥ उर क्षती ( जिसके हृदयमें घाव होगयाहो ) प्रसेकी (जिमके मुखसे लारें गिरे वा पसीनेमें भीगाहुवा ) और जिसका स्वर ( शब्द ) बैठगया हो ये मनुष्य अनु- पान न पीवे और इनसे व्यतिरिक्त ( रोगरहित मनुष्य ) भी अनुपान पीकर मार्गका चल्ना आधिक बोलना पढना गाना और सोना ये कर्म कदापि न करें २८ ॥ रक्तकम्मोक करनेसे वर अनुपान आमाशयको दुपित करके उस चतुर्थः प्रमोदः ।। (१९) मनुष्यके कठ और हदयमें प्राप्त होकर कफलाव मदाग्नि और वमन ( उलटा) आदि रोगोको उत्पन्न करता है ॥ ३९ ॥ गुरुलाघवचिन्तेयंस्वभावंनातिवर्तते ॥ तथासं- रकारमात्रांतकालांश्चाप्युत्तरोत्तरम् ॥४०॥ संद कनिलारोग्याः सुकुमारास्लुखोचिताः॥ज- न्तवोयेतुतेषांहिचिन्तेयंपरिकीर्तिता॥४१॥ व लिनःवरभक्षाश्चयेचदीप्तानयोनराः॥ कर्मनि त्याश्चये तेषांनावश्यपरिकीर्तयेत् ॥ ४२ ॥ इद सखिलसुक्तंसुश्रुतसंहितायांसूत्रस्थानेषट्चत्वा रिंशेऽध्याये॥ भाषानुवाद-न्याका भारीपन-हलकापन-स्वभाव-सस्कार-मात्रा और समय ये कभी नहीं छूटते और सब एकसे दूसरा बलवान् हैं ।। ४० ॥ इसलिये विचा रक वैद्यन अनुपान देना चाहिये, क्यों कि आलसी मदाग्निवाले सुकुमार और मुखम्ने रहनेवाले मनुष्योंके लिये उक्त अनुपान विविका विचारना है।॥४१॥ और जो बयान कठिन भोजन करनेवाले तीव्राग्नि ( तेज अग्नि ) वाले तथा प्रति दिन परिश्रम करनेवाले पुरुषकि लिये उक्त विधिक विशेष विचारकी कोई आवश्यकता नहीं यह अनुपानविवि सुश्रुतसंहिताके सूत्रस्थानके ४६ ३ अध्या यमें लिखी ॥ ४२ ॥ अथ कतिपयरोगेषु दुग्धानुपानान्याह । क्षीरोचितस्यप्रक्षीणश्लेप्सणोदाहतृतः॥ क्षीर- पित्तानिलार्तस्यपथ्यसप्यतिसारिणः ॥ १३ ॥ तहपुलंघनोत्तहंप्लुष्टंबनसिवाग्निना ॥ दिव्यांव जीवरेत्तस्यबरंचाशुनियच्छति ॥ १४ ॥ सं स्पतशीनमुम्णवातस्माद्धारोष्णमेववा।। विस (२०) अनुपानदर्पण । , ज्यकालेयुजीतज्वरिणहत्यतोऽन्यथा ॥४५॥ प यःसशुंठीखर्जूरमृद्वीकाशर्कराघृतम् ॥ शृतशी तमधुयुतंतृड्दाहज्वरनाशनम् ॥ ४६ ॥ तद्वद्रा- भावलायष्टीसारिवाकणचंदनैः : ॥ चतुर्गुणेनांभ सावापिप्पल्यावाशृतंपिवेत् ॥ १७॥ भाषानुवाद-अब कितनेक रोगोंपर दूधके अनुमान कहतेहैं, दूध देने योग्य ( जिसके शरीरको दूध अनुकूल हो ) उसको-क्षीण -कफबालेको-दाह तथा तृषावाले को-पित्तवातसे पीडितको और अतिसारवाले मनुष्यको दूध देना पश्य है ॥ ४३ ॥ वह दूध जैसे ग्रीष्माग्निसे तप्त वनके समान लघनेसे तपायमान रोगीके शरीरको वर्षाके जलकी नाई जिला देताहै और उसके बरकोभी शीघ्रही नाश करदेताहै ॥ ४४ ॥ औषधोंसे सिद्ध किया हुवा-ठढा अथवा उग्ण गरम या धारोष्ण ( धारोंसे ही निकलाहुवा गरम २) दूधको ममयके अनुकूल रोगा- नुसार विचारकर जिसको जैसा हित समझे उसको वैसाही वैद्यने देना चाहिये, अन्यथा देनेसे अमृत समान दूध विषपानसदृश होकर ज्वरयुक्त मनुष्यको नष्ट करदेताहै ॥४५॥ सेंठि-खजूर (खारक) मुनक्का-मिश्री ( खाड) और घी इन्होंसे युक्त दूधको औटाकर ठढा करे और उसमें सहत मिलाकर पिलावे तो वह दूध दाह तृपा और प्वरका नाश करताहै ॥४६॥ इसीप्रकार दाख खरेंटी मुलट्टी सारिवा छोटी पीपल और चदन इन सर्वसहित औटाकर ठढा कियाहुवा दूध अथवा इनके काथमें सिद्ध कियाहुवा दूध अथवा चौगुने पानी करके मिद्ध कि- याहुवा दूध या केवल पिप्पलीसे सिद्ध किया हुवा दूध पिलानेसे वह दूध दाह तृपा और ज्वर का नाश करताहै ॥४७॥ कासाच्छासाच्छिरःशूलात्पार्श्वशूलाञ्चिरज्वरात्॥ मुच्यतेवरितःपीत्वापञ्चमूलीशृतंपयः॥ ४८॥ शृतमेरण्डमूलेनवालविल्वेनवाज्वरात्॥धारोष्ण वा पयःपीत्वाविवद्धानिलवर्चसः॥४९॥ सरक्त चतुर्थःप्रमोद ४। (२१) पित्तातिसृतेस्सतृछूलप्रवाहिकात् ॥ सिद्धशु- पठी वलाव्याघ्रीगोकण्टकगुडैः पयः॥ ५० ॥ शोफसत्रशकृतातविबन्धज्वरकासजित्॥ वृश्ची- बविल्ववर्षासूसाधितंज्वरशोफतुत् ॥ शिशि- पासारसिद्धं वाक्षीरसाशुज्वरापहम् ॥ ५१॥ वा- ग्भटेचिकित्सा स्थानेद्वितीयेऽध्याये ॥ भाषानुवाद-पञ्चमूलमें सिद्ध कियेहुवे दूधके पिलानेसे अरयुक्त रोगीभी कास श्वास शिरकी शूल पार्श्वशूल और पुराने बरसे छूट जाताहै ॥ ४८ ॥ एरण्डमूलमें अथवा कन्चे बेलके गुढेमें ओटाकर सिद्ध किये हुये दुग्धपानसे रोगी ज्यरस छूट जाताहै, वारोष्ण दूधके पीनेसे अधोवायुका रुकना-मलकी रुकावट ॥ ४९।। रक्त तथा फेनयुक्त आतिसार-और तृपा तथा शूलयुक्त प्रवाहिका ये सब रोग दूर होजातेहैं सोट-खरेटी कटियाली गोखरू और गुड इनकरके सिद्ध किया (बौटाया ) हुआ दूध पिलानेसे ॥५०॥ शोथ (सूजन) मूत्र तथा मलका रकना-घर और खासी इन सबका नाश करताहै तथा वृश्चिव, बिल्व, सॉटी इनसे सिद्ध दूध ससिमके गोदमें सिद्ध कियाहुवा दूध ज्वरको शीघ्रही नाश करताहै ऐसा वाग्भटमे चिकित्सास्थानके दुसरे अध्यायमे लिखाहें ॥ ११ ॥ सौभाग्यपुष्टिवलशुक्रविवर्धनानिकिंसन्तिनोभु विवहृनिरसायनानि ॥ कन्दर्पवधिनिपरंतुसि ताज्य युक्तादुरधाहतेनसमकोपिसतःप्रयोगः ॥५२॥ वै० जी० वि० ५। इतिदुरधानुपानानि । भाषानुवाद-लोलिमराजजी चपनी स्त्रीस कहतेहैं कि हे कर्पवानि (काम- देवकोबटानेवाली ) सुदरता-पुष्टना-बल और वीर्यको बटानेवाली रसायन प ज्या घनमी वस्तु पृथ्वीमे नहींहै किन्तु बहुतेरी है परतु मिश्री और ५ मारपणी (जिसे गांडदेदामे गार पाणीभी कहते)। २ पृश्चिपणी (जिगे मध्य- दगाम घवगे और पीटनी) २ छोटी कटियाली ४ वटी कटियारी और ५ गोर गे लघुपल करते।

(२२) अनुपानदर्पणः। वृतसहित दूध जैसा सुदरता-पुष्टता-बल और वीर्यको बढानवालाहे तसा में गतमे कोई दूसग प्रयोग (उपाय) नहींहै ॥५२॥ ये दूधके अनुपान वर्णन किये | अथ योगगजगुग्गुल्चनुपानानि । रास्त्रादिक्वाथसंयुक्तोविविथंहन्तिमारुतम् ॥ का कोल्यादिशतात्पित्तंकफमारग्वधादिना ॥५३॥ दारूशृतेनमेहांश्चगोमूत्रेणैवपाण्डुताम् ॥ मेदो वृद्धिं चमधुनाकुष्ठेनिंवशृतेनवा ॥ ५४॥ छिन्ना क्वाथेनवातासंशोथंशूलं कणागृतात् ॥ पाट लाक्काथसहितोविषंसूषकजंजयेत् ॥ ५५॥ त्रि फलाक्वाथसहितोनेत्रार्तिहन्तिदारुणाम् ॥ पुन नवादेः क्वाथेनहन्यात्सोंदराण्यपि ॥ ५६ ॥ शाई० खं० २ अ०७ । इतियोगराजगुग्गुल्बन पानानि॥ अब योगराजगुग्गुलुके अनुपानोंको वर्णन करतेहैं।रानादि काथ सग वातरो गको,काकोल्यादि क्वाथ सग पित्तरोगको, आरग्वधाधि काथ सग कफरोगको५३ दारुहलदीक काढे सग प्रमेहको गोमूत्र सग पाडुरोगको, सहत सग मेदोवृद्धिको निबके क्वाथ सग कुष्टको ॥५४॥ गुर्च (गुटवेल) के काथसग रक्तवातको,पिप लीके क्वाथसग शोथ तथा शूलको,सिरसके कायसग मूषकदश विपको ॥५५ त्रिफलाके वाथसग नेत्ररोगको और पुनर्नवा ( साठी ) के साथ सग देने समन्त उदरगेगको योगराज गुग्गुलु नागकरताहै ॥ ५६ ॥ ऐसा शाईवर दूसरे खण्डके सातवे अध्यायमें लिग्वाहै ये योगराज गुग्गुलुके अनुपान कहे ॥ अथ नारायणचूर्णानुपानान्याह। दद्याद्युक्त्वानुपानेनतथाध्मानेसुरादिभिः॥गुल्मे बदरनीरेणविट्संगेदधिमस्तुना ॥ ५७॥ उष्णा - चतुर्थःप्रमोदः ४ (२३) बुभिश्चजीणेचवृक्षास्लैःपारकर्तृषु ॥ उष्ट्रीदुग्धेनो दरेषुतथातकेणवागवाम् ॥ १८ ॥ प्रसन्नयावात रोगेदाडिमांभोलिरहसि ॥ द्विविधेचविषेदद्याद् वृतेनविपनाशनम् ॥ चूर्णनारायणंनामदुष्टरोग गणापहम् ॥ ५९ ॥ शा०सं० २ अध्याय ६ ॥ भाषानुवाद-अव नारायणचूर्णके अनुपानोको वर्णन करतेहैं, आध्मान पेटफूलने ) मे मदिरा आदिके सग गुल्ममें बेरके काथ संग मलबद्धमे दही के पानीनंग ॥१७॥ अजीर्णमें उष्ण (गरम ) पानीसग परिकर्त (गुदामे कत- रनेके समान पीडा करनेवाले ) रोगमें अमलीके फाथसग, उदररोगमे ऊटनीके दूधसग अथवा गजकी छाछसग ॥१८॥ वातरोगमें सुरा मडसग अर्श (मूल- गविले अनारके रससग और स्थावर तथा जगमविषमें घीके सग और उत्तरोगोगे व्यतिरिक्त रोगों में जैसा योग्य अनुपान समझ टस्के सग देनेसे यह नारायणचूर्ण उक्त रोगादिसमस्त दुष्टरोगोका नाश करताहै ॥१९॥ ऐसा शाई- धरसहिताके दूसरे खडके छठवे अध्यायम रिखाहै ।। इति नारायणचूर्णानुपानानि । अथ निर्गुण्डयनुपानानि । प्रस्थनिर्गुण्डीचूर्णस्यगोसूत्रेणसमंपिवेत् ॥ दशरात्रप्रयोगेणकुष्टनाशोसवेध्रुवम् ॥ ६ ॥ निर्गण्डीर्णमादायघृतेनसहमक्षयेत् ॥ कृशस्तु दुर्वलोवापिवलवीर्ययुतोसवेत् ॥ ६१॥ निर्गुण्डी चूर्णसादायपिवेदुष्णेनवारिणा ॥ सप्तरात्रप्रयो- गेणरोगसुक्तोभवेन्नरः ॥६२ ॥ निर्गुडीमूलमु- मृत्यगृहेचधारयेहुधः॥नश्यन्तिसर्वविघ्नानिगृहा- नागाश्चसर्वशः॥६३॥ इतिनिर्गुडयनुनानि॥ १ शरादोएप तहजोयमत्र विचक्षणः ॥ गरावाभ्या भवेत्प्रस्थश्चत प्रस्थस्तथा- || १ || गार (२४) अनुपानदर्पणः। अथशृंगराजानुपानानि ॥श्रृंगराजपत्ररसंकृष्ण- जीरसमंपिवेत् ॥ तैलेनसहसंदद्याद्वलीपलितव र्जितः॥६॥श्रृंगराजरसंचैवगुडूचीरससंयुतम्॥ मासमात्रप्रयोगेणसर्वव्याधिविनश्यति ॥६५॥ ॥ इतिश्रृंगराजानुपानानि ॥ भाषानुवाद-अब निर्गुण्डीके अनुपान कहते हैं १ प्रस्थ ( ५३ तोले ४ मासे भर ) निर्गुडीके चूर्णको गोमूत्र सग दशरात्रि पर्यन्त पिलानेसे कुष्ठ ( कोढ) दूर होजाता है । ६० ॥ निर्गुडी चूर्णको घी के सग सेवन करनेसे कृश तथा वलहीनभी . मनुष्य बलवीर्ययुक्त हो जाता है ॥ ६१ ॥ निर्गुडी चूर्णको गरम २ पानीके सग सात रात्रिपर्यंत सेवन करनेसे रोगरहित मनुष्य होजाताहै ॥६२॥ निर्गुडीके मूल ( जड को उखाडके यदि गृहस्थ अपने घरमे रक्खे तो उसके घरमें सर्प नही रहता और सब प्रकारके विन्न दूर होजाते हैं ॥६३॥ अव भृगराजके अनुपान कहते है,भृगराजके पत्तोके रसको कालेजीरेके अथवा तैलके संग पान करे तो वह मनुष्य वृद्धावस्थामें भी तरुणके समान बलवान् रहै ॥६॥ भृगराजके रसको गुर्चके रस सग १ मास पर्यन्त पीवे तो सब प्रकारके रोग दूर होय ॥ १५ ॥ अथ सकलरोग' हरीतक्यनुपानानि । सितायुक्ताचशरदिहेमन्तेनागरेणच॥ शिशिरेपि प्पलीयुक्तावसन्तेमधुनासह॥६६॥ग्रीष्मेचगुड- संयुक्तावर्षासुलवणेनच॥अनेनैवविधानेन भक्ष- येद्योहरीतकीम् ॥६७ ॥ तस्यवृद्धिर्वलंवीर्यमा- रोग्यस्थिरयौवनम् ॥ अग्निर्दहतिकाष्टानितनुरो गान्हरीतकी ॥ ६८ ॥ कदाचित्कुप्यतेमातानो- दरस्थाहरीतकी ॥ मातेवसर्वदाज्ञेयाहितदात्री हरीतकी ॥ ६९॥इदमखिलमुक्तंगौरिकांचलि- ॥ - चतुर्थःप्रमोदः ४। (२५) कातंत्रे ॥ अन्यच्च ॥ ग्रीष्सेतुल्यगुडांसुसैन्धवयु- तांमेघावनह्येम्बरे तुल्यां शर्करयाशरद्यमलयाशु- ण्ठ्यातुषारागसे॥ पिप्पल्याशिशिरेवसन्तसमये क्षौद्रेणसंयोजिताराजन्प्राप्यहरीतकीभिवरुजो नश्यन्तुतेशत्रवः॥ ७० ॥ सदनपालनिघंटौ॥ भाषानुवाद-अब सब रोगोपर हरीतकी (हर्ड) के अनुपानोको कहते है. शरदऋतुमें मिश्रीके सग हेमतमे सोंठके सग शिशिरमें छोटी पीपलके सग वस- न्तमें सहतके सग ॥६६॥ ग्रीष्मऋतुमें गुडके सग और वर्षामे सैंधव (सेधानोन) के सग हरीतकी ( हिरडा, हर्ड) को खानेसे ॥ ६७ ॥ मनुष्य रोगरहित और बलवीर्य सहित आयुपर्यन्त रहता है, जैसे अग्नि काष्ठको टग्ध करदेती है तैसेही शरीरके समस्त रोगोको हरीतकी नाश करदेती है ।। ६८ ॥ कोई समय अपने बालकपर माता क्रोधित हो जाती है पर पेटमें हरीतकी जाकर कुपित नहीं होती इस लिये माताके समान-हित करनेवाली हरीतकी (हर्ड ) को जानना चाहिये ॥६९॥ ये निगुंडी भृगराज और हरीतकी के उक्त अनुपान गोरिका- चलिका तत्रमें लिखे हैं और हरीतकीके अनुपान इसी प्रकार मदनपालनिघटुमें भी लिखहै ॥ ७० ॥ गुडूच्यनुपानान्याह। घृतेनवातंसगुडाविबंधंपित्तंसितादयामधुनाकफ ञ्च ॥ वातास्त्रमुग्रंरचुतैलमिश्राशुण्ठयामवातंश मयेद्गुडूची ॥ ७१ ॥ मद० निघं० अमृतास्वर सोहन्तिक्षौद्रयुक्तोहिकामलाम् ॥ शार्ङ्गधरेण चोक्तत्वाच्योकोयंरचितोमया ॥ ७२ ॥ समधु च्छिन्नास्वरसोनानामेहनिवारणः ॥ वदन्तिभि पजः सर्वेशरदिन्दुनिभानने ॥७३॥ वै० जी० ॥

(२६) अनुपानदर्पणः । विलासे ४ जीर्णज्वरंकफकृतंकणयासमेतदिछ नोद्भवोद्भवकषायकएषहन्ति ॥ रामोदशास्य- मिवरामइवप्रलंवरामोयथासमरमूर्द्धनिकार्तवी- य॑म् ॥७॥ वै०जी०वि० १॥ अमृताक्वाथकल्का- भ्यासक्षीरविपचेद्धृतम् ॥ वातरक्तंजयत्याशुकु ठंजयतिदुस्तरम् ॥७५॥ शाइखं० २ अ०९॥ | भाषानुवाद-गुडूचीके अनुपानोंको वर्णन करतेहैं घृतके सग वादी गुडके सग विवध ( मलके रुकने ) को मिश्रीके सग पित्तको मधु ( सहन के सग कफको एरडतल सग वातरक्तको और सोंठ सग देनेसे आमवाती गुडूची (गुर्च) दूर करतीहै, ऐसा मदनपाल निघटुमें लिखाहै ।।७१॥ गुडूचीव स्वरस ( गिलीगुर्चसे निकाला हुवा रस ) सहतके साथ पिलानेसे कामद ( कमल-पीलिया ) का नाश करदेताह ऐसा शाधिरजीने स्वसहितामे द्विती खडमें किसी एक लोकके चरणमे कहाहै, इसलिये यहा हमने लोक बनाव लिखाहै ॥७२॥ लोलिंबराजजी अपनी स्त्रीसे कहते हैं कि हे शरातुके चार मान मुखवाली स्त्री! समस्त वैद्योंका तथा मेराभी यही कहनाहे कि गुडूचीचा पत्र स्वरस सहतके सग सेवन करनेसे नाना प्रकारके प्रमेह ( परमे ) नावर होजाते हैं ॥७३॥ और गुडूची (गुरच)का काय छोटी पीपलके चूर्ण सग लेने कफकृत जीर्णचरको तैसे नाश करताहे जैस रामचद्रजी रावणका बलदेव प्रलंबामुरका और परशुरानजी सहमार्जुनका नाश करते भये यह वैद्यजीवन लिग्वाहै ॥७४॥ गुरचके काय या कल्कमे दूध सहत घृतको ओटावे जब ५ ( घी , मात्र शेष रह जावे उसे छानछे इमे गुडूचीघृत ( अमृतावृत ) कहते इसके सेवनमे वातरक्त और कुष्ट दूर होताह ऐमा शार्ङ्गधरमे लिखाहै ।। ७५ गुडचीस्वरसःकर्पक्षौद्रस्यान्माषकोन्मितम्॥ से- न्धोद्रतुल्यंस्यात्सर्वमेकत्रमर्दयेत् ॥ ७६ ॥ अंजयन्नयनंतेनपिल्लामतिमिरंजयेत् ॥ काचं चतुर्थःप्रमोदः ४। (२७) -- कडूलिंगनाशंशुक्लकृष्णगतान्गदान् ॥ ७७॥ शाई खं०३ अ० १३ ॥ भाषानुवाद-गुरचके १ कर्ष ( १० मासे ) रसमे १ मासा सहत और ? मासा सेधानोंन मिलाकर खरलकरे और इसको नेत्रमे लगावे तो॥७६॥पिल्लार्म रोग तिमिर ( दिनोधी ) काचबिदु खुजाल लिगनाश ओर नेत्रके श्वत तथा काले विभागमे जो कुछ नेत्र रोगहो सो सव दूर होय ॥७७॥ ऐसा शाईधरके ३ खडके ॥ १३ ॥ वे अव्यायमे लिखाहे ॥ अथ नेत्ररोगेपुनर्नवानुपानानि । दुग्धेनकडूंक्षौद्रेणनेनस्रावंचसर्पिषा ॥ पुष्पंतैले नतिमिरंकांजिकननिशांधताम् ॥ पुनर्नवाजय त्याशुभास्करस्तिमिरंयथा ॥ ७८ ॥ शाई खं०३ अ० १३ ॥ भाषा-अब नेत्ररोगपर पुनर्नवा साठी के अनुपानाकाभी कहतेहैं,पुनर्न- को दूधमे धमके नेत्रमें लगानेसे नेत्रोकी खुजाल सहतमें घसकर लगानेसे त्रिस्त्राव । नत्रास ज'का बहाव घीमे घसकर लगानेसे फूल्टी तेलगे टगानेसे तिमिर (दिनोधी ) और काजीमे घीसकर लगानेसे नक्ताध । रतोधी) रे सब नेत्रोके रोग दूर होते है ॥७८॥ येभी शाबरके ३ रे खटके १३ वे अध्यायमे लिखा है ॥ अय त्रिफलानुपानानि । एकाहरीतकीयोज्याद्वौचयोज्योविभीतको चत्वार्यासलकान्येवत्रिफलेषाप्रकीर्तिता ॥ ७९ ॥ त्रिफलाशोथहप्तीनाशयेद्विपसज्वरान् ॥ दीप नीलमपित्ततीकुष्टहन्त्रीरसायनी॥ सर्पिमधुभ्यां संयुक्तासैवनेत्रासयाञ्जयेत् ।।८०॥ शाई खं०२ अ० २। फलत्रिकोद्भवंक्वार्थगोसूत्रेणेवपाययेत् ॥ ॥ - (२८) अनुपानदर्पण। वातश्लेष्मकृतंहन्तिशोथंवृषणसंभवम् ॥ ८१॥ शाई खं० २ अ० २। क्षौद्रेणत्रिफलाक्वाथः पीतोमेदोहरःस्मृतः॥शीतीभूतंतथोष्णांवुमेदोह रक्षाद्रसंयुतम् ॥ ८२ ॥ शाई खं० २ अ० २। त्रिफलारग्वधक्काथश्शर्कराक्षौद्रसंयुतः ॥ रक्त- पित्तहरोदाहपित्तशूलनिवारणः ॥ ८३॥ शा० खं० २ अ० २। त्रिफलायारसः क्षौद्रयुक्तोजय तिकामलाम् ॥ शार्ङ्गधरेणचोक्तत्वाच्छ्लोकोयर- चितोमया ॥ ८४ ॥ मृतायस्त्रिफलायष्टिचूर्णम- धुघृतान्वितम् ॥ दिनांतेलेढिनित्यंसरतौचटक वद्भवेत् ॥ ८५॥ इति ग्रंथांतरात् ॥ भाषानुवाद-अब त्रिफलाके अनुपान वर्णन करतेहैं- १ हरीतकी ( हर्ड २ बहेडे ४ आवलेके योग को त्रिफला कहतेहैं, अथवा १ भाग हर्ड उससे दून वहेडा-उससे दुना आवला इनके योगको त्रिफला कहतेहैं ॥ ७९ ॥ त्रिफलाये चूर्णको नित्य सेवन करनेसे शोथ-प्रमेह-विषमज्वर-कफ-पित्त-कुष्ठ इन सबक नाश होताहै और अग्निदीप्त होतीहै तथा रोगरहित वह मनुष्य होकर अपन पूर्णायुको प्राप्त होताहै और उसका वलवीर्य नित्य वर्द्धितही होजाताहे इस त्रिफलाचूर्णको नित्य रात्रि समय सहत और घीके -सग यदि सेवन करे समस्त नेत्ररोग दूर होजातेहैं ॥८०॥ ओर त्रिफलाके क्वाथको गोमूत्र सग पनि वादी तथा कफसे उत्पन्न भई पोतोंकी शोथ सूजन) भी दूर होजातीहै ॥८ त्रिफला काय सहत सग पिलानेसे मेदोवृद्धि दूर करताहै और इसी प्रद गरम पानीभी ठदाहोनेपर सहत सग पनेिसे मेदका नाश करताहै ॥८२॥ य त्रिफलाके क्वाथको बहेटेकी भीतरकी गुठली ( मींगी बीजा ) शर्करा और स सग पिलावे तो रक्तपित्त दाह और पित्तशूल ये सब दूरहोय ॥ ८३॥ ये गाईधरके २ रे खडके २ रे अध्यायमे लिखाहै, यदि त्रिफल ग जरत पञ्चमःममोदः५। (२९ ) काथको केवल सहत सग पिलावे तो कामला दूर होय ऐसाभी शाईध- रजोन अपने ग्रथमे कहीं लिखाहै इस लिये हमने यहा श्लोक बनाकर लिखाहै || ॥८४॥ त्रिफला चूर्ण सहत, घी और कातिसार इन तीनोके सग नित्य रात्रिको सेवन करे तो वह पुरुष मैथुन (स्त्रीसग ) जैसे चटक (लाल) मुनियाके सग | करताहै तैसे करे अर्थात् कभी थके नहीं ॥ ८५ ॥ इति श्रीमत्पडितज्ञारसरामविरचितेसुभाषानुवादविभूपितेऽनुपानद- पणेऽन्नौपध्यनुपानविवेककथने चतुर्य प्रमोद ॥ १ ॥ . - अथातोमृत्युञ्जयादिरसानांधातूपधातूनाश्चानुपा- नविवेकंव्याख्यास्यासः ॥१॥ मृत्युविनिर्जितोय- स्मात्तेनमृत्युंजयोरसामधुनालेहनप्रोक्तंसर्वज्वर निवृत्तये ॥२॥ दध्युदकानुपानेनवातज्वरनिवर्ह णः॥आईकस्यरसैपानंदारुणेसन्निपातके॥३॥ जस्वीरद्रवयोगेनह्यजीर्णज्वरनाशनः। अजाजी- गुडसंयुक्तोविषमज्वरनाशनः ॥ ४॥ रसेन्द्रसार संग्रहेनराधिकारेचोक्तमिदम् ॥ भापानुवाद-अब इसके मागे मृत्युजयादि रसोंका तथा सप्त धातु और उप्तापधातुवोका अनुपानवियेक वर्णन करेंगे ॥ १ ॥ मत्युको जीतनेसे मृत्युजय स कहलायाहै, मृत्युजय रसको मधु ( सहत ) सग देनेसे सब प्रकारके ज्वर दूर होत ॥२॥ दहीके जल सग देनेसे वातवरका-अदरकके रससग देनेसे भयकार सन्निपात वा ॥ ३ ॥ जवारद्रव-(जवीरीका यत्रसे निकालाहुआ अर्क) लग देनेसे अजीर्णञ्चरका और जीरा व गुडसग देनेसे मृत्युजय रस विषम घरका नाम करताहै ॥ ४ ॥ ऐमा रसेन्द्रसारसग्रहमें चराधिकारमें लिखाहै ॥ अथवसन्तकुसमाकररसस्यानपानानि । शिलाजतुमधृपणैः क्षयगदेषुसर्वेष्वपिप्रमेहसजि रात्रिभिस्सनमधशर्कराभिस्सह ॥ सितामलयजद्र (३०) अनुपानदपर्णः । वैर्महतिरक्तपित्तेऽथवासितामधुसमन्वितैर्वृषभपल्ल- वानांद्रवैः॥५॥त्रिजातगजचन्दनैरपिचतुष्टिपु- प्टिप्रदोमनोभवकरः परोवमिषुशंखपुष्पीरसैः ॥ अभीरुरसशर्करामधुभिरम्लपित्तामयेपरेपुतुयथो चिनिनुगदेषुसंयोजयेत्॥६॥उक्तमिदंग्रन्थांतरे॥ भाषानुवाद-अव वसन्तकुसुमाकर रसके अनुपान वर्णन करतेहैं-शिलाजीत और कालीमिरचके चूर्ण सहित सहतमें मिलाकर देनसे समस्त क्षयरोगोंका- हलदी,सहत और मिश्रीसग देनेसे समस्त प्रमेहोंका-मिश्री और चंदनके काथसग देनेसे अथवा मिश्री,मधु और अडूसेके रससग देनेसे अत्यत बढेहुवे रक्तपित्तका वसतकुसुमाकर रस नाश करताहै ॥ ५ ॥ त्रिजात ( तज-पत्रज-इलायची गजपीपल और चदनके साथ वसन्तकुसुमाकरको सेवन करानेसे तुष्टि ( हर्ष) पुष्टि ( प्रबलता ) को देताहै और कामदेवको बढाताहै, शखाहोलीके रससग देनेसे वमनका शतावरीके रस मिश्री और सहतसग देनेसे अम्लपित्तका वसतकुसुमार नाश करता है उक्त रोगोंसे अन्यरोगों में वैद्यने अपनी बुद्धयनुसार अनुपानोंकी योजना करनी चाहिये ॥ ६ ॥ ऐसा प्रथातरमे लिखाहै ।। अथ लोकनाथरसस्यानुपानानि । अरुचौनिस्तुषंधान्यंघृतभृष्टंसशर्करम् ॥ दद्यात्त- थाज्वरेधान्यंगुडूचीक्वाथमाहरेत् ॥ ७॥ उशीर वासकक्वार्थदद्यात्समधुशर्करम्॥रक्तपित्तकफेश्वा -सेकासेचस्वरसंक्षये ॥ ८ ॥ अग्निभृष्टजयाचूर्ण मधुनानिशिदीयते ॥ निद्रानाशेऽतिसारेचग्रह- ण्यामंदपावके॥९॥ सौवर्चलाभयाकृष्णाचर्ण मुष्णजलैःपिवेत्॥शूलेजीणेतथाकृष्णामधुयुक्ता ज्वरोहिता ॥ १०॥ प्लीहोदरेवातरक्तछाँचैव 7 पञ्चमःप्रमोद: ५। (३१) / गुदांकुरे ॥ नासिकादिषुरक्तेपुरसदाडिमपुष्प जम् ॥ ११ ॥ दूर्वायास्स्वरसंनस्यंदद्याच्छर्कर यायुतम् ॥ कोलमज्जाकणंबहिपक्षभस्मसशर्कर म् ॥ १२ ॥ मधुनालेहयेच्छर्दिहिकाकोपस्यशा न्तये ॥ विधिरेपनियोज्यस्तुसस्मिन्पोटलीरसे ॥ १३ ॥ मृगांकेसगर्मेचमौक्तिकाख्येरसेतथा॥ इत्ययंलोकनाथाख्योरसःसर्वरुजोजयेत् ॥ १४ ॥ शाई खं० २ अ० १२॥ मापानुवाद-अब लोकनाथरसके अनुपानोंको वर्णन पारतेहैं । लोकनाथ उसको अरचिगेगगे निस्तुष धान्य (छिलेहुवे धनियो को घीमे भूजिके उसमे शटर मिलाकर उसके सग देवे, ज्वरमे धनिया और गुरचके काथसग देवे ॥ ७ ॥ रक्तपित्त-कफ-वास-कास-और स्वरभग इनरोगोमें सहतशक्करयुक्त स्वस और जटूसेफे कायसग देवे ।। ८ ॥ निद्रानाश अतिसार-सग्रहणी और मागिमे रेकी ई भागके चूर्णको सहतमे मिलाकर उसके सग रात्रिके समय दे ॥ ९ ॥ दाल और अजीर्णमे सोचरनोंन हर्ट और पीपलके चूर्णसग उष्ण- जल दवे,वग्में सत्त और छोटीपीपलसग देवे ॥ १० ॥शीहोदर-वातरक्त- उल्टी- गुदाकुर और नवासीर ( नासिकासे रक्त गिरना , इन रोगों में दाटिम- पुष्परममग देवे ॥ ११ ॥ तथा नासिकासे रुधिरम्बावमे दूबका रस शक्कर महित नाकामे सुघावे, वेरकी मांगी पीपल-मोरपखके चदवोकी भरम इन सत्रका महीनचूर्ण शर्करा सहित ॥ १२ ॥ सहतमें मिलाकर इसके सग लोकनाथ रसको उलटी ( वाति ) रोग और टुचकामे देवे तो इन अनुपानसे उत्तः समग्तरोगोका यह तो नायरस नाया करताहै, जैसी अनुपानविधि कनारसकी कोई वेनीही पोटलीग्सकी ॥ १३ ॥ मृगाककी जार गति गरमयी जी जानो, यह रंगकनाथरस समस्त रोगोंको दूर करनेवाला है। || ऐसा गाई परमहिताको दुतर खटके १२ वे अध्याय लिखा है ।। - } (३२) अनुपानदर्पणः। अथ स्वर्णमालिनीवसन्तरसस्यानुपानानि । जीर्णज्वरेधातुगतेऽतिसारेरक्तान्वितेरक्तजदृष्टि- रोगे॥घोरेव्यथेपित्तकृतेऽथरोगेवलप्रदोदुग्धयुतं चपथ्यम् ॥ १५॥ वसन्तोमालिनीपूर्वःसर्वरोग हरः शिशोः॥ गर्भिण्यादेयमेतञ्चजयन्तीपुष्पकै युतम् ॥ सर्वज्वरहरंश्रेष्टंगर्भपालनमुत्तमम्॥१६॥ ग्रंथांतरेचोक्तामिदम् ॥ भाषानुवाद-अव स्वर्णमालिनीवसन्त (जिसे अनभिज्ञ लोग सुवर्णवसन्त मालतीभी कहतेहैं उस ) के अनुपानोको वर्णन करतेहैं-स्वर्णमालिनीवसन्तको छोटी पीपल और सहत सग सेवन करनेसे जीर्णज्वर धातुगतज्वर रक्तातिसार अत्यन्त पीडायुक्त रक्तज नेत्ररोग और पित्तजनित सर्व रोग दूर होकर बलयुक्त वह मनुष्य होजाताहै इससे दुग्ध युक्त पथ्य देना चाहिये ॥ १५ ॥ यह स्वर्ण- मालिनीवसन्त रस उक्त अनुपानसेही वालकोंके रोगोको दूर करताहै और जयन्ती पुष्पके साथ देनेसे गर्भिणी स्त्रीके ज्वरको दूर करके गर्भकी रक्षा कर- ताहे ॥ १६ ॥ ऐसा प्रथान्तरमें लिखाहै ॥ अथ बृहन्मालिनीवसन्तरसस्यानुपानानि । वल्लप्रमाणंमधुपिप्पलीभ्यांजीर्णज्वरेधातुगतेप्रदेयः॥ छिन्नोद्भवासत्त्वसितायुतश्चसर्वप्रमेहेषुचयोजनीयः॥ ॥ १७ ॥कृच्छ्राश्मरीनिहन्त्याशुमातुलुंगाकद्रवैः॥ रसोवसन्तनामायंमालिनीपदपूर्वकः ॥ १८॥ भैष ज्यसारामृतसंहितायामुक्तम् ॥ भापानु० -अब बृहन्मालिनीवसन्तरसके अनुपानोंको वर्णन करतेहैं- रतीभर बृहन्मालिनीवसन्तरसको सहत और छोटी पीपलके सग सेवन कराने जीर्णज्यर और धातुगत-वर दूर होय गुरच (गिलोय ) सत्त्व और मिश्रीस -- पञ्चमःप्रमीद: ५। (३३) देनेसे प्रमेहमान दूर होय ॥ १७ ॥ अदरकका रस और विजोरेके रसके साथ देने से मूत्रकृच्छ्र और पथरी दूर होय ॥ १८ ॥ यह बृहन्मालिनीवसन्तरस भैषज्यसारामृतसहितामें लिखाहे ।। अथ पाशुपतरसस्यानुपानानि । तालमूलीरसेनैवद्युदरामयनाशनः ॥ मोचारसे नातिसारंग्रहणीतकसैंधवैः॥१९॥सौवर्चलकणा शुंठीयुतश्शूलंविनाशयेत् ॥ असिहन्तितके णपिप्पल्याराजयक्ष्मकम् ॥ २०॥ वातरोगनिहं त्याशुशुण्ठीसौवर्चलात्वितः॥२१॥ शर्कराधान्य योगेन श्लेप्सरोगश्चतत्क्षणात् ॥अतः परतरोना स्तिधन्वंतरिमतोरसः॥२२॥ रसेन्द्रसारसंग्रहे ऽजीर्णाधिकारेचोक्तम् ।। भापानुवाद-अब पाशुपतरसके अनुपानोंको वर्णन करतेहैं-तालमूलीके रससग उदररोगका मोचरससग अतिसारका-छाछ और सेंधनोंन सग संग्रह- णीका ॥१९॥ सोंचरनोंन-पीपल और सोंठ सग शुलका केवल छाछसग अर्श मसे-मूलव्यावि-बवासीर, का छोटीपीपल सग राजयक्ष्मा (क्षयी) का ॥२०॥ सोठ और सोंचरनोंन सग वातरोगका-मिश्री और धनियेसग पित्तरोगका॥२१॥ छोटीपीपर और सहत सग देनेसे कफरोगका पाशुपतरस नाश करताहै, इससे उत्तम कोई दूसरा रस नहींहै इसे धन्वतरिजीने सर्वोत्तम रस मानाहै |॥ २२ ॥ ऐसा रसद्रसारसम्रह्मे अजीर्णाधिकारमें लिखाहे ।। अथ पर्पटीग्सम्यानपानानि। लहिंगुजीरकव्योपैश्शमयेदहणीरसः ॥ दशमू लाभलावातवरंत्रिकटनामाकम् ॥२॥ज्वरमधु कतारंगपंचकोलेनतजम्यक्ष्माणमधुपिप्पल्या गोमुत्रेणगुदाकुरान्॥२४॥ शूलेचेरंडतेलेनपाण्डु

(३४)
अनुपानदर्पण' ।
शोथंसगुग्गुलुः॥ कुष्टानिभंगभल्लातवाकुचीपञ्च
निंबकैः॥२५॥ धत्तूरबीजसंयोगान्महोन्मादवि
नाशिनी ॥ अपस्मारंनिहन्त्याशुव्योपनिवदलै
स्सह ॥२६॥ स्तनंधयशिशूनांतुनितरांपर्पटीहि
ता॥ पथ्यायाश्चूर्णसंयुक्ताव्याधींश्चान्यान्सुदुस्त
रान् ॥ २७॥ ग्रंथातरेचेदमुक्तम् ॥
भापानुवाद-अब पर्पटीरसके अनुपानोंको वर्णन करतहै-होंग-जीरा
और त्रिकटु ( सोंठ मिरच पीपल ) सग देनेसे सग्रहणीको दशमूलके काय
संग देनसे वातज्वरको त्रिकटु सग देनेसे कफको ॥२२॥ मुलहीके सारसग
दनेसे ज्वरको पचकोलके काढे सग देनेसे सब प्रकारके ज्वरको सहत और
छोटी पीपल सग देनेसे क्षयीको गोमूत्र सग देनेसे अर्शको ॥२४॥ एरड तेल
सग देनेसे शूलको गुग्गुल सग देनेसे पाडु और शोथको भगरा भिलावा बावची
ओर नींबका पचांग इनके सग देनेसे कोढको॥२९॥धत्तूरेके वीजों सग देनेसे
उन्मादको त्रिकटु और नींबके पत्तो सग देनेसे मृगीको पर्पटी रस दूर करता
है ॥२६॥ यह रस दूध पीनेवाले बालकोंको अत्यत हितकारीहै और हिडेके चूर्ण
सग सेवन करनेसे यह पर्पटी रस अनेक प्रकारकी व्याधियोका नाश करताहे
॥ २७ ॥ ऐसा प्रथातरमे लिखाहै ॥
अथ जयाजयन्त्योरनुपानानि ।
जयन्तीवाजयावाथक्षीरैः पित्तज्वरापहा ॥ मुद्गा
मलकयूपेणपथ्यंदेयंघृतंविना ॥२८॥जयन्तीवा
जयावाथसौद्रमरिचान्विता। सन्निपातज्वरंह
न्तिरसश्चानंदभैरवः॥२९॥जयन्तीवाजयावाथ
विषमज्वरनुघृतैः॥सर्वज्वरंमधुव्योपैगवांसूत्रेण
शीतकम् ॥३०॥ चन्दनस्यकपायेणरक्तपित्तज्व

पञ्चम प्रमीद: ५। (३५) रापहा ॥ जयंतीवाजयावाथमाक्षिकेणचकास जित् ॥३१॥ जयन्तीवाजयावाथतण्डुलोदकपा नतः॥ अश्मरीहन्तिनोचित्रसूत्रकृच्छन्तुदारुण म् ॥ ३२ ॥ जयन्तीवाजयांवाऽथगोमूत्रेणयुतां पिवेत्॥ हन्त्याशुकाकणंकुठंसुलेपेनचतद्रुतम् ॥३३॥ द्विनिष्कंकेतकीमूलंपिष्ट्रातोयेनपाययेत्॥ जयंतीवाजयावाथमेहंहन्तिसुराह्वयम् ॥ ३४ ॥ जयन्तीवाजयावाथ मधुनामेहजिद्भवेत् ॥ लोन मुस्ताभयात्तुल्यंकट्फलंचजलैःसह ॥ ३५॥ क्वा थयित्वापिवेच्चानुमधुनासर्वमेहजित् ॥ जयंती वाजयावाथगुडैकोष्णजलैःपिवेत् ॥ ३६ ॥ त्रि दोपोत्थंहरेद्गुल्मं रसश्चानंदभैरवः॥ जयंतीवा जयाहन्तिशंठ्यासर्वभगंदरम् ॥ ३७॥ जयंती वाजयावाथ तक्रेणग्रहणीप्रणुत् ॥ जयंती- वाजयावाथरसश्चानंदभैरवः ॥ ३८ ॥ रक्त पिनेत्रिदोषोत्थेशीततोयेनपाययेत् ॥ जयन्तीवा जयावाथ गद्रावैनिशांध्यनुत् ॥ ३९॥ जयन्ती वाजयावाथष्ट्रास्तन्येनचांजयेत् ॥ सावर्णसर्व दोषोत्थंमांसवृद्धिचनाशयेत् ॥४०॥ कृत्स्नमिद सुक्तरसंन्द्रसारसंग्रहज्वराधिकार ।। मापानुवाद-भव जयाजयती वटीके अनुपानोंको वर्णन करतहै-जया तथा जवी वटी दूध सग देनसे पित्तवरका नाश करती है, इसपर घृत इसपर घृत विनापथ्य और जापलीक धूपमाय देना चाहिये ॥ २८ ॥ काली मिरच और वहत ना जया नया जयतीको देनम नन्निपातवर दूर होय और इसी अनु- (३६) अनुपानदर्पण। पानसे आनदभैरव रसभी सन्निरातका नाश करताहे ॥ २९ ॥ वृतसग विषम ज्यरका त्रिकटु चूर्ण और सहत सग समस्त अरमात्रका गोमूत्र सग शीतज्वरका ॥३०॥चदन काथसग रक्तपित्तवरका सहतसग खांसीका॥३१॥ दूध सग पाडु और शोथका चावलोंके पानीसंग टेनेसे पथरी और मूत्रकृच्छका जया तया जयती वटी नाश करती है ॥ ३२ ॥ यदि जया अथवा जयतीका गोमूत्र सग सवन करावे और गोमूत्रमें घसकर कुष्ठपर लेप लगावे तो काकणकुष्ट दूर होय ॥३३॥ दो निष्क ( ८ मासे ) केतकी मूलको पानीमें पीसकर उसके संग जया तथा जयतीको देवे तो सुराप्रमेह दूर होय॥३४॥ सहतसग अथवा लोट नागर- मोथा हर्ड और कट्फल ॥३६॥ इनके मधुयुत क्वाथ सग जया तथा जयतीका सेवन करानेसे समस्त प्रमेह मात्र दूर होय गुड और कुछ२ गरम पानीके सग जया या जयतीका सेवन करानेसे ॥३६॥ त्रिदोषज गुल्म दूर होय, और इसी अनुपानसे आनदभैरव रसभी नाश करताहै. जया तथा जयतीको सोंठ सग देनेसे भगढर मात्र दूर होय॥३७॥जया तथा जयतीका छाछ सग सेवन करानेसे सग्रहणी दूर होय जयन्ती जया तथा आनदभैरव ॥३८॥ इनमसे किसी एक ठढे जलके साथ देवे तो त्रिदोषज रक्तपित्त दूरहोय और जया तथा जयन्तीको भगरेके रस सग देनेसे रतोंधीका नाश होय॥३९॥जया तथा जयन्तीको स्त्रीके दूवमें घसकर नेत्रमें लगानेसे नेत्रलाव मासवृद्धि और सर्व दोषज कर्णरोगभी दूरहोय ॥ ४० ॥ ये सब रसेंद्रसार सग्रहमें ज्वराधिकारमे लिखाहै ।। अथ सुवर्णभस्मानुपानानि । मत्स्यपित्तस्ययोगेनस्वर्णतत्कालदाहजित् ॥ भृ इयोगाच्चतदृष्यंदुग्धयोगाइलप्रदम् ॥४१॥ पुन नवायुतंनेत्र्यंघृतयोगेरसायनम् ॥ स्मृत्यादिक द्वचायोगात्कान्तिकृत्कुंकुमेनच ॥ ४२ ॥ राजय माणपयसानिर्विष्याचविषहरेत् ॥ शुण्ठीलवंग मरिचैस्त्रिदोषोन्मादहारकम् ॥४३॥ मध्वाम लकचूर्णन्तुसुवर्णचेतितत्रयम् ॥ प्राश्यारिष्टगृही -- पञ्चमः पमोदः ५। (३७) तोपिमुच्यतेप्शाणसंकटात् ॥शंखपुष्प्या वयोर्थच विदार्याचप्रजार्थकः॥४४॥ इति ग्रंथांतरात्॥ भापानवाद--अब सुवर्णभस्मके अनुपान वर्णन करतह-स्वर्ण भस्म मत्स्य- पित्ता औषधीके साथ सेवन करने पे तत्क्षण दाहको दूरकरे भगरेके रससग सेवन करनेमे स्त्रीप्रसग ( मैथुन-मभोग--सहवास ) मे हितप्रद होय दुग्ध सग सेवनसे बल बढावे ॥ ४१ ॥ साठीके साथ नेत्रोको हित करे घृतसग सेवनसे वयस्थापन-आयु-बल-बुद्धिकी वृद्धि और समस्त रोगनिवृत्ति करे वचके साथ सेवनन्ने बुद्धि बढावे केशर सग सेवनसे काति ( तेज ) को करे ॥ ४२ ॥ दुग्धमग राजयक्ष्मा (क्षयी ) को हरे निर्विषी निर्विष सग विषरोगको और मोठ--लोंग-काली मिरचीके साथ सेवनसे त्रिदोषजन्य उन्माद ( खपतपिने ) को दूर करे ॥ ४३ ॥ आमलेके चूर्ण और सहत सग स्वर्णभस्म सेवन करनेसे प्रबल व्याधिगृहीत रोगीभी प्राणसकटसे छूट जावे अर्थात् आरोग्य होय शखाहुलीके साथ सेवन करनेसे आयु बढावे और विदारीकदके साथ सेवनसे स्वर्णभस्म पुत्रप्रद हाताहै।। ४४ ॥ ऐसा प्रथातरमें लिखाहै । अथ रौप्यभस्मानपानानि । भस्मीभूतंरजतममलंतत्समंव्योमभानुः सर्वैस्तु ल्यंत्रिकटुरसबरंसारमाज्येनयुक्तम् ॥ लीढंप्रातः भएयतितृणांयक्ष्मपाण्डूदरार्शश्श्वासात्कासान्न यनतिमिरंपित्तरोगानशेषान् ॥ ४५ ॥ इति ग्रन्थांतरात्॥ सापानुवाद -अब रोप्य (चादीकी)भस्गके अनुपान वर्णन करतेहै चादीको मम्म सगान अभ्य और ताभ्भम्म लेवे और इन सबके समान त्रिकुटाका रन अथवा चूर्ण रेपे और इन सबमे कुछ अनुरानानुसार लोह भस्म योजित करके इन सबको घृतमें मिला कर प्रातःकाल सेवन करे तो क्षयी-पाड- जन-धान-कास नत्रोका तिमिर और पित्तरोग ये सब दूर होय ॥ ४५ ॥ एन्ला प्रथातर लिखाद ॥

(३८) अनुपानदर्पणः।
इतऊर्ध्वमथतानभस्मानुपानानीतः प्रागनेकायु
वेदीयग्रंथाशयान्मन्निम्मिताः श्लोकाः ॥ दाहं
शर्करयाहन्त्यनिलंपित्तंचश्रेष्ठया॥त्रिजातनप्रमे
हांश्चगुल्मान्क्षारेणहन्तिवै ॥ ४६ ॥ कासेकफेवा
सकस्यरसेन्यूषणसंयुते. ॥ श्वासेपद्माविश्वयुतं
क्षयजिगिरिजेनवै॥ ४७ ॥रजतंभस्मीभूतंक्षीणे
पयसासदासमंपेयम् ॥ पलभोजिनांचपुंसांपिशि
तरसेनभिषजाथवादेयम् ॥ ४८ ॥ मृतरौप्यं
वराकृष्णासंयुतनात्र संशयः॥ यकृत्तीहहरंप्रोक्तं
यथाबलहराबला ॥४९॥ शोफेपृथ्वीकेनदेयंसु
वैद्यैः पांडौमंडरेणसाचचतूर्णम् ॥ भस्मीभूतंरौ
प्यमाज्येनयुक्तंज्ञेयंकांतिक्षुत्करंविस्रसाहम॥५०॥
भाषानुवाद -अब इसके आगे ताम्रभस्मके अनुपानसे पूर्व जितने श्लोकहैं।
वे सब अनेक वैद्यक ग्रथोके मतसे हमने बनाये हैं-मिश्री सग टाहका-त्रिफ़ला
सग वात और पित्तका-तज, पत्रज इलायचीके चूर्णसंग प्रमेहका-क्षार सग
गुल्मका ॥४६॥ सोंठ-मिरच और पिप्पलीके चूर्ण युक्त अडूसेके रससग कासी
और कफका भारगी और सोंठ सग श्वासका और शिलाजीत सग रौप्यमम्म
क्षयीका नाश करताहै॥४७॥क्षीणतामें रौप्यभस्म दुग्धके साथ पिलावे और मास
भक्षण करनेवाले मनुष्योंको क्षीणताम मासरसके साथ रौप्य भस्म वैद्य देवे तो
क्षीणता दूर होय!॥४८॥त्रिफला और छोटी पीपलके चूर्णसहित रोप्यभस्म यकृत
और शहारोगका नाश करताहै जसे कीटासे पुरुपके बलका नाश स्त्री कर देती
है तैसे ॥ ४९ ॥ शोथरोगमे पुनर्नवा (साठी ) के साथ और पाडुमें मडूरके सग
रोप्यभम्मको वैद्यने देना चाहिये और घृतयुक्त रौप्यभम्म काति तथा क्षुवाक
वृद्धि और जरा [ बुढापे ] का नाश करताहै ॥ ५० ॥

पञ्चमःप्रमोदः ५। मथ तानभस्मानुपानानि । दुग्धखण्डञ्चानुपानंप्रदद्यात्साज्यंभोज्यंत्याज्यस स्लेनयुक्तम् ॥वीर्यपुष्टिदीपनंदेहहदायदिव्या टिर्जायते कामरूपम् ॥ ५१ ॥ पूर्वेपामतमा लोक्यवैद्यैश्चाधुनिकैबुधैः ॥ स्ववुज्यादापयेत्ता यंरोगनाशनवस्तुभिः ॥५२॥ इतिग्रंथान्तरात् । भापानुवाद.-अत्र ताम्रभस्मके अनुपान वर्णन करतेहै-एक रती ताम्रभस्म समरसके रस सग सहत और घृतयुक्त नित्य सेवन करके ऊपरसे मिभीयुक्त दूध पीव तथा घृतयुक्त मिष्टपक्वान्न खावे और खट्टे पदार्थोको न खावे तो वीर्यपुष्ट- अग्नि दीपन देहदृढ-दिव्यदृष्टि और कामदेवके समान सुदरता होय ॥५१॥ ताम्र. भम्मको समरतरांगांपर छोटी पीपल और सहत संग देवे अथवा प्राचीन बंद्योंके मतानुसार अपनी बुद्धिसे रोगनाशक वस्तुओक साथ आधुनिक वैद्यने ताम्रभम्मका देना चाहिये ऐया ययातरमे लिखाहै ॥ ५२ ।। अथ बङ्गभस्मानुपानानि । जातीफलेनेतिकरोतिपुष्टिवनेसुगंधिस्फटिकेनचो नाम ॥ प्राचीनवैद्यैर्मृतरङ्गकोऽताम्लोकोमयाऽ यरचितोऽत्रनूनम् ॥ ५३ ॥ तुलसीपत्रसंयु क्तः प्रसेनाशयेद्धवम् ॥ घृतेनपांडुरोगंचटंक गैगुल्मनाशनम् ॥ ५४ ॥ निशयारक्तपित्त मधुनावलवृद्धिकृत् ॥ खंडयासहपित्तनाग उल्ल्याचवन्धनम् ॥ ५५ ॥ पिप्पल्याचाग्निमां यत्वंनिशयाचोर्वश्वासहत् ॥ चंपकस्वरसेनैव दुर्गधिनाशयेद्धवम् ॥ ५६ ॥ निंवकस्वरसेना ढवंदेहेदहनशांतये ॥ कस्तृरीसंयुक्तवंगभक्षणा इव ॥ (४०) अनुपानदर्पणः। वीर्यरोधकृत् ॥ ५७ ॥ खदिरवाथयोगेनचर्म पक्षिमलैस्सह ॥ पूगीफलेनसार्द्धवाऽजीर्णनाश यतेक्षणात्॥ ५८॥ नवनीतसमायुक्तमस्थिजीर्ण नवंभवेत् ॥ दुग्धसार्द्धभवेत्तुष्टिर्जययास्तंभनंभ वेत् ॥ ५९ ॥ लशुनैर्वातजांपीडांनाशयेन्नात्रसं शयः ॥ समुद्रफलसंयोगान्निर्गुण्ड्यासहभक्ष णात् ॥ ६० ॥ कुष्ठंनाशयतेक्षिप्रंसिंहनादेमृगा आघाटजटिकायोगात्षण्ढत्वनाशये ध्रुवम् ॥ ६१ ॥ देवपुष्पस्यसंयोगात्समुद्रफल योगतः ॥ नागपत्ररसैलेपाल्लिंगवृद्धिःप्रजायते ॥ ६२ ॥ गोरोचनलवंगेनतिलकान्मोहनंभवे त्॥ एरंडजटिकायोगेघर्षयित्वाचवंगकम्॥३३॥ लेपयेच्चललाटेवैतदाशीर्षगदंजयेत् ॥ कौब्जेऽपा मार्गमूलेनप्लीहेटंकणसंयुतम् ॥६४॥ रसोनतैल युङ्नस्यमपस्मारनिषूदनम् ॥पुत्राप्त्यैरासभीक्षी रैस्तकाढ्यंवातगुल्मनुत् ॥६५॥ यवानिकायुतं वातेवाजिगंधायुतंतुवा ॥ जलोदरेत्वजाक्षी रसंयुतंगुणकृद्भवेत्॥जातीफलाश्वगंधाभ्यांकटि पीडानिवारणम् ॥६६॥ इति ग्रंथांतरात् ॥ भापा०-अब उगमस्मके अनुपान वर्णन करतेहैं प्राचीन वैद्योंने ऐसा कहना कि वगभस्म जायफलके सग पुष्टता और कपूरके सग मुखमें सुगधि करताहै इसलिये हमने यहां यह श्लोक बनाकर लिखा है।॥५॥तुलसीपत्र सग प्रमे हका घृतसग पाडुका-मुहागे सग गुल्मका ॥५४॥ और हलदी सग देनेसे वग पञ्चमःप्रमोद: ५। (४१) भस्म रक्तपित्तका नाश करताहै,सहतसग देनेसे बल बढताहे मिश्री सग पित्तका नागरवेल के पानलग दहक जकडनेका॥५५॥पिप्पली सग अग्निमदका-हलदी सग ऊर्च श्वासका-चपाके रससग दुर्गधिका॥५६॥और निबके या नींबूके रस सग दाहका नाश करताहै,कस्तूरीके मग वगभस्म सेवनसे वार्य्यस्तभ होताहे ॥१७॥ खरके काध और पक्षिमल सग देनेसे चर्मरोगका-सुपारीसग अजर्णिका ।।५८।। और मक्खन सग अस्थिजीर्ण ( हड्डियोंकी जीर्णता ) का नाश करताहै, दुग्ध सग तुष्टि और भाग सग देनेसे वगभस्म स्तभन करताहै ॥५९॥ लहसुनसग वातव्याधि समुद्रफल और सभालूके सग देनेसे ॥६०॥ कुष्ठका और चिरचि- टाकी जडके साथ देनेसे नपुसकताका नाश करताहै ॥६१॥लोंग-समुद्रफल और वगभस्मको नागरवेलके पानके रसमें खलकरके लिंगपर लेप करे तो लिंग वृद्धि होय ॥६२॥ वगभस्मको गोरोचन और लवगमे मिलाकर तिलक करनेसे समोहन होय और एरटमूलसग वगभस्म घसकर ॥६३॥ ललाटपर लगानेसे शिरपीटा दूरहोय, कुब्ज ( कुबडेपनके ) रोगमें ऊगा ( आधाझाडे) की जड सग तापतिल्ली में सुहागेके सग ॥६४॥ यदि लहसुनके तैलमें वगभस्म मिलाकर नास देवे तो मृगी ( अपस्मार ) दूर होय, पुत्र प्राप्तिके लिये गधीके दूध सग चायगोलमें छाछसग ॥६५॥ वादीमें अजवान अथवा आसमध सग जलोदरमें वकरीके दूध सग और कटि ( कमर ) के दुखनमें जायफल और आसगव सग वगभस्म देना चाहिये ॥६६॥ ऐसा ग्रथातरमे लिखा है ।। अथ जसदभस्मानपानानि । शृणुसखेजसदस्यवदाम्यहंसुखकरंह्यनुपानमरंवर म॥विविधतंत्रमतसविचार्यवेनिधनगस्यगदाप हरंनृणाम् ॥ ६॥ जसदसस्मजयेत्रिसुगंधिनान ६ नुसखेत्रिसलोझवसामयम् ॥ हरतिशालिहिमेन तथाज्वरंसहमृदुच्छदयालघुसायुजम्॥६८॥शिख रदीप्ययुतंशमयेज्ज्वरंजसदभस्मसखेशृणुशीत (४२) अनुपानदर्पणः। जम्॥रुधिरजंत्वतिसारगदंवर्मिकणसितायुतमा शुनिहन्तिवै ॥६९॥ मथरसेनधनंजयमन्दतांनय नरोगमथोषसिचांजितम् ॥ सृणिकयाध्रुवमाशुस खेथवाहरतिगोहविषाप्रतनेनवै॥७०॥सुभसितं ह्यशितंजसदयदालघुनिहन्तिचमेहगदंतदा॥अ हिलतादलयुक्तमिदंसदासहसखेमहिषीहविपा- थवा॥७१ ॥ शिखरदीप्यकणैश्चसशर्करैर्हरतिशू लगदहिभयानकम् ॥ सहकवोष्णयवानिकयास खेजयतिचाशुविवंधगध्रुवम् ॥ ७२ ॥ भाषानुवादः-जसदभस्मअनुपान हे मित्र ! मनुष्यके रोग हरनेवाला मीर सुख करनेवाला जो जसदभस्मका अनुपान उसे में अनेक ग्रथों के मतको विचा- रके वर्णन करताह तू सुन ॥ ६७ ॥ तज, पत्रज और इलायची के साथ त्रिदो- पका चावलोंके हिम और खर्जुरके साथ पित्तज्वरका जसदभस्म नाश करताहै ॥ ६८ ॥ हे मित्र | औरभी सुनिगे लवग और अजवान सग शीत घरका तथा जीरा और शकर सग जसदभस्म रक्तातिसार और नमन (उलटी ) का शीघ्रही नाग करताहै ।। ६० ॥ अग्नी ( अग्निमय ) के रससग मदाग्निका और प्रा- न कार वा सी युके मग अथवा पुराने, गोघृत मग अजन करनेगे नेत्ररोगक मदभम्म नाग करताहे ॥ ७० ॥ मित्र | तांतल ( नागरबेल के पान) सर यता भैसके पीमग संवन करनेमे जमदभग शीनही प्रमेह ( परमा ) का नाश करताहै ॥ ७० ॥ दार्फगसहित लवग अजवान और जीरे साथ भयानक गा नया अनवान और कुल उणपानी सग वितनरोग ( मलकी स्कावर पत्नी) का जसदभम्म नाश करना ॥ ७२ ॥ अथ नागानुपानानि । मृतंनागंवायुहरतिमहमायुश्चलितया शिरोरोगं दाहायाचिमथनेत्रामयसम्म ॥ प्रलापंसन्ताप पंचमाप्रमोदः ५। (४३) विविधगदतापंजयतिवै सखे देयं वैद्यैर्ननुगदग ोऽन्येस्वमतिना ॥ ७३ ॥ भाषानु० --अत्र नागभस्मके अनुपान वर्णन करतेहैं-मिश्री साथ वातपिन रपीटा दाह अरचि नेत्ररोग प्रलाप सन्ताप और अनेक रोगजन्य पीडाको भस्म दूर करता है और हे मित्र ! इनसे व्यतिरिक्त रोगोपर वैद्योने अपनी ऐसे विचारके अनुपानके साथ नागभस्म को देना चाहिये ॥ ७३ ॥ अथ लोहानुपानानि । लोहंमृतंसर्वगदेषुदेयंसदासुवैथैश्चपलेनसाकम्। माहींमधुव्योषयुतंजयेद्वैकृत्स्नंतथाधातुविकार साशु ॥७॥ पुनर्नवाकाथयुतश्चपाण्डुसेहनिशा- झौद्युतंजयेद्वै ॥ कणामधुभ्यामथवानराणांशै- लेययुक्तंननुसूत्रकृच्छम् ॥७५॥ नूनंकफंगंधर सेन्द्रमाक्षिकैस्सा चतुर्जातिसितान्वितंजयेत्॥ रक्तपित्तंमृतलोहमाशुकंकुर्यात्पुनर्भूपयसात- थावलम् ॥ ५६ ॥ द्राक्षाकणासिंहकमाक्षिकैः वृताश्वासंजयेद्वैगुटिकासुखेधृता॥ पारावतस्या धमृतस्यसेवनान्सत्यसिवेच्चासयहीनविग्रहः ॥ ॥ ७७ ॥ जसदानुपानादारभ्यलोहानुपानपर्य्य न्तंसकृतिरियंज्ञेयाऽनेकायुर्वेदीयधंथाशयात् ।। भाषा०-सब लोभरमग अनुपान वर्ण फरते है-वैद्याने लोहमम्मको सब गंगोगे समस्त सम्भार शुद्ध पार सग अथवा पारदभस्म सग सढा देना पाहिये और मारगी-सहत-योप ( सोंट-मिरच-पीपल) इन सहित रोहभस्म समस्त पातविकारको र करताहे ॥ ७१ ॥ पुनर्नवा ( साटी , के छाथ सग पारको हल्दी और मान सग अधमा पीपल और सहत सग प्रमेहको और (४४) अनुपानदपणः। शिलाजीत सग मूत्रकृच्छ्रको लोहभस्म दूर करताहै ॥ ७५ ॥ शुद्र गधक शुद्ध पारा और सहत सग कफका तज-पत्रज- इलायची-नागकेशर और मिश्री सग लोहभस्म रक्तपित्तका नाश करता है और साठी ( पुनर्नवा ) के चूर्णयुक्त दूध सग बलभीर्यकी वृद्धि करताहै ॥ ७६ ॥ दाख ( मनुक्का ) पीपल अरुपा और सहत सग लोहभस्मकी गोली बनाकर पुखमें रखनेसे सब प्रकारका श्वास दूर होजाताहै और सर्वढा ताबूलादियुक्तानुपान सग लोहभस्मके सेवनसे मनुष्य रोगरहित आरोग्यसहित होजाताहै ॥ ७७ ॥ जसदभस्मके अनुपानसे लेकर लोहभस्मानुपानतक ये सब श्लोक मैंने अनेक वैद्यक ग्रन्थानुसार वनायेहैं ।। अथ स्वर्णमाक्षिकानुपानानि । अनुपानंवराव्योपंतीक्ष्णंसाज्यहिमाक्षिकम् ॥ ७८ ॥ भापानुवादः-अब तर्णमाक्षिकके अनुपान वर्णन करतेहैं-त्रिफला ( हर्ट- वहेडा-आपला ) व्योप ( सोंठ-मिरच-पीपल ) केवल काली मिरच मक्खन और ये सोनामक्खीके अनुपान हैं अर्थात् किसी रोगपर सोनामक्खी को देना हो तो उक्तवस्तुओं के साथ दे ॥ ७८ ॥ अथ रौप्यमाक्षिकानुपानानि । लीटोव्योमवरान्वितोविमलकोयुक्तोघृतैस्सेवि तोहन्यादुर्भगकृज्ज्वराश्वयथुकं पांडुप्रमेहारु चिम् ॥ मृलानिग्रहणीश्चशूलमतुलंयक्ष्मामयं कामलां सर्वान्पित्तमरुददान्किमपरयोगैरशेषा मयान् ॥ ७९ ॥ विपव्योपवराज्येन विमलासेवि नोयदि ॥ भगंदरादिकारोगानृणांगच्छन्तिदु- म्लगः॥ ८०॥ इति ग्रंथांतरात ॥ स्त्र रोप्यनक्षिक अनुपान वर्णन करती-अभ्रक-त्रिफलान *-*7 नकद माय स्पानमदीकी भम्मको पानसे-स्वरूपका ना सहत पञ्चमःप्रमोद: ५। (४५) - करनेवाली जरा (बूढापन ) शोथ पाडु-प्रमेह-अरुचि-अर्श (बवासीर । सग्रहणी- भयकरशूल-राजयक्ष्मा ( क्षणी , कामला ( पीलिया , और सर्व पित्तज तथा वातज रोग दूर होते हैं, इसी प्रकार पृथक् २ अनुपानसे रसामक्खीकी भस्म समस्त रोगमात्रोंको दूर करतीहै ॥ ७९ ॥ तथा सिगियाविष-त्रिकटु त्रिफला और घीके साथ रूपामक्खीकी भस्म सेवन करनेसे भगदर आदि असाध्य रोगभी दूर होय ।। ( ० ॥ ऐसा प्रथांतरमें उक्त अनुपान लिखे हे ॥ अथ तुत्थानुपानानि । घृतेनकण्डविषकुष्ठरोगास्तांबूलयोगेनकर्फतथो ग्रम् ॥ कृसिंकृसिप्लेनचतुत्थभस्मक्षौद्रांजितनेत्र गदंजयेद्वै ॥ ८१ ॥ सत्कृतिरियम् ॥ भाषानुवादः-गोवृत या माखनसग-कडू ( खाज ) विष और कुष्टोको ताबुल सग कफको वायविडग साथ कृमिको तुल्यभस्म दूर करताहै और महत . मग नेत्रोमें आंजनेसे नेत्ररोगोंका नाश करताहै ॥ ८१ ॥ यह लोक वैद्यक प्रयाशयानुसार मेरा बनाया हुवाहे ।। अथ शिलाजत्वनुपानानि । एलापिप्पलिसंयुक्तंसालमात्रंतुभक्षयेत् ॥ मूत्र कृच्छंसूत्ररोधंहन्तिमेहंतथाक्षयम् ॥ ८२ ॥ स ानुपानःसर्वत्ररोगेपुविनियोजिते ॥ जयत्यभ्या सतोतृनंतांस्तान्रोगान्नसंशयः ॥ ८३॥ भाषानुवाद -अब गिगजीतका अनुपान कहतेहै-छोटी इलायची और पीपरक लग एकमहीने पर्यन्त शिलाजीतका संवन करनेसे मूत्रन्छ, मूत्ररोध, प्रमेह और क्षण, ये सब दूर होये ॥ ८२ ॥ और इनसे व्यतिरिक्त रोगोंपर विचारपूर्वक पृथक २ अनुपान मग गिलाजीतका मेनन करनेमे रोगगात्र दर पता होजानह ॥ ८३ ॥ ऐसा प्रशातरमे लिखा इयको कम-गोलातृया तथा तृतियानी कहते। T (४६) अनुपानदर्पणः । अथ पारदभस्मानुपानानि । पिप्पलीमारिचैःशुंठीभारंगीमधुनासहाकासश्वा सप्रशमनः सालस्यचविनाशनः ॥ ८४॥ हरिद्रा शर्करासार्द्धरुधिरस्यविकारनुत् ॥त्र्यपणंत्रिफला वासा कामलापाण्डुरोगजित्॥ ८५॥ शिलाज. तुतथैलाचसितोपलसमन्वितः ॥ मूत्रकृच्छ्रेप्रश स्तोयसत्यनागार्जुनोदितम्॥८६॥लवंगंकुसुमंप- त्रीहिंगुलंचाकलंकरापिप्पलीविजयाचैवसमान्ये तानिकारयेत् ॥८७॥ कर्पूरादहिफेनानिनागाद्भा- गार्द्धकंक्षिपेत् ॥ सर्वमेकत्रसंमद्यधातुवृद्धौप्रदाप येत्॥८८॥ सौवर्चलंलवंगंचभूनिवंचहरीतकी॥ अस्यानुपानयोगेन सर्वज्वरविनाशनः ॥ ८९ ।। तथारेचकरःप्रोक्तःसौवर्चलफलत्रिकम्लवंगंकु सुमंचैवदरदेनचसंयुतम्।।९०॥ताम्बूलेनसमभक्ष्यं धातुवृद्धिकरंपरम्॥विदारीचूर्णयोगेनधातुवृद्धिक रोमतः ॥९१॥ विजयादीप्यसंयुक्तोवमनस्यवि- कारनुत् ॥ सौवर्चलंहरिद्राचविजयादीप्यकंतथा ॥९२॥अनेनोदरपीडांचसद्योत्पन्नांविनाशयेत्।। चतुर्वल्लीपलाशस्यबीजंचद्विगुणगुडः॥९३॥अस्या- नुपानयोगेनकृमिदोषविनाशनः।अहिफेनलवंगं चदरदंविजयातथा ॥९४॥ अस्यानुपानतः सद्यः सर्वातीसारनाशनः॥सौवर्चलेनदीप्येनअग्निमा शूल पञ्चमःप्रमोदः ५। (४७) धपरःपरः॥९५॥क्षुद्दोधजनकश्चैवसिद्धनागेश्वरो- दितमागुडूचसित्त्वयोगेनसर्वपुष्टिकरःस्सृतः।९६। भापानुवादः-अब पारेकी भस्मके अनुपान वर्णन करतेहै पीपल,कालीमि. रच, सोट, भारगी, और सहतसग, कास, श्वास, और रोगका पारदभस्म नाश करताहै।।८४॥हलदी और शक्करसग रुधिरविकारको, हर्ड, बहेडा,आवला, । सोठ, मिरच पीपल और अडूसके साथ कामला और पाडुरोगको ॥ ८५ ॥ शिलाजीत, छोटी इलायची, और मिश्रीसग मूत्रकृच्छ्को पारदभस्म दूर करताहे ऐसा नागार्जुनजीने कहाहै ।। ८६ ॥ लवग, केशर, तालीसपत्र, शुद्ध हिगुल अकलकरा, पीपल ये सब समान लेवे ॥ ८७ ॥ तथा कपूर, अफीम आधभाग लेने नागेश्वर १ भाग लवे और इन सबके चूर्णसग पारद भस्म सेवन करे ना बानुवृद्धि होय ॥ ८८ ॥ सौचलनोन, लोंग, चिरायता, हर्ड इनके चूर्ण सग सब चरका नाश करताहै!। ८९॥ और सौंचलनोन, त्रिफला, लोग, केशर और शुद्ध सिंगरफ इनके सग लेवनले पारदभस्म दस्त लाताहै ।।९०॥ ताबूलसग अथवा विदारीकढके चूर्णनग पारदभस्म धातुवृद्धि करताहै ।। ९१ ॥ भाग और अजवानसग बमन (उलटी ) को दूर करताहै, सौचलनोन ली, भाग, और अजवानसंग ॥ ९२ ॥ पारदभन्म उदरपीटाको शीत्र नाश करतहि, चारवल्ल- ( १२ गंजा ) पलासके बीज उनसे दूना गुड ॥ ९३ ।। इस अनुपानसे पारदमम्मका सबन कर तो मिरोग दूर होय, अफीम, लोग, शुद्ध सिंगरफ, और भाग ।। ६४ ॥ इस अनुपानके साथ सेवन करनेसे पारद भस्म शीघ्रही नमरत अतिसारोका नाश करताहै और सीचलनोंन और अजवान सग गालियां दूर करके ॥ ९५ ॥ क्षुधा बढाता तथा उत्पन्न करताहै, ऐसा सिद्धनागेश्वर ने कहा और गुरच ( गिलोय ) के सत्त्व सग सेवनकरनसे पारदमाग पुष्टता करताहे ॥ ९ ॥ पित्तशर्करयामलेनतहसागतंचकृष्णाससंदद्या- च्छेप्माण शृंगवेरसहितंजंवीरनीरंज्वरे ॥रतोत्थे - .. 4 (४८) अनुपानटपणः। मधुनाप्रवाहरुधिरेस्यान्मेघनादोदकेदयाचाथक तातिसारवितारोगार १५.. .. ५.. ॥ भापानुवादः-पित्तरागमें खाडक आर आंवटे चूर्णतग वातरागमें पीपल के सग कफरोगमें अदरककेसग ज्वरमे जबीरीके रससग, रुधिरजन्य विकार सहतसग, रक्तस्राव तथा प्रवाहिका और अतिसारमे चोलाईके रससग पारेक भस्मको देना चाहिये। ९७ ॥ अथ रससिन्दूरानुपानानि । वातेसक्षौद्रपिप्पल्यापिचकफरुजित्र्यूषणंसाग्निचू पित्तेशैलासितेन्दुबणवतिचवरागुग्गुलुश्चारुव द्धः॥ चातुर्जीतेनपुष्टौहरनयनफलाशाल्मलीपु- प्पवृन्तंकिंवाकान्ताललाटाभरणरसपतेस्स्यादनू पानमेतत् ॥ ९८॥ भाषानुवाद- अव रससिंदूरके अनुपान वर्णन करतेहैं वातरोगमें पीपल और सहतसग, कफरोगमें त्रिकटु ( सोंठ-मिरच-पीपल) और चित्रकके चूर्णस पित्तरोगमें, शिलाजित, मिश्री और कपूरसग व्रणरोगमें त्रिफला और गुग्गुलसन और पुष्टताके लिये, चातुर्जातके अथवा त्रिफला और सेमरकद (शाल्मलीमूल के सग रससिंदूरको देवे ॥ ९८ ॥ अथ रसकर्पूरानुपानानि। वल्लंवल्लार्द्धमानेनजीर्णेगुडसमंददेत् ॥यथोचिता- नुपानेनसर्वकर्मसुयोजयेत् ॥ ९९ ॥ दुग्धोदनंतुप यंदेयंचास्मिंश्चताम्बूलम्॥ हरतिसमस्तान्रोगा न्कर्पूराख्योरसोनृणाम् ॥ १०॥ भाषानुवादः-अब रसकपूरके अनुपान वर्णन करतेहैं पुराने गुडके स रत्ती अथवा टेढ रत्ती प्रमाण रसकपूर देवे अथवा रोगानुसार अनुपान वि पञ्चम.प्रमोद ५। (४९) र द ॥ ९९ ।। और ऊपरसे पानका बीटा खिलावे तथा दुग्ब, वावल, खानेको पश्य देवे तो समस्त रोगमात्र टूर होय ॥ १० ॥ अथ गंधकानुपानानि । इत्थंविशुद्धस्त्रिफलाज्य गमध्वान्वितश्शाणमि तोवलीढः॥ गृध्राक्षितुल्यंकुरुतेक्षियुग्मंकरोतिरो गोज्झितदीर्घमायुः॥१००॥] शुद्धंगन्धंनिष्कमात्र सदुग्धैस्सेव्यमासंशोर्यवीर्यप्रवृद्धथै ॥ षण्मासा- त्स्यात्सर्वरोगप्रणाशो दिव्यांदृष्टिं दीर्घमायुस्स्व- रूपम् ॥१०१॥ मोचाफलेनत्वग्दोषचित्रकेणमहा वलम् आढरूपकपायेणक्षयकालाञ्जयेदृशम् ॥ ॥ १०२॥मन्दानलत्वंजयतित्रिफलाक्वाथसंयुतः। ऊर्ध्वगान्सकलान्रोगान्हन्तिशीघ्रंसुगंधकः॥१०३॥ सर्वमिदग्रंथांतराल्लिखितम् ।। भाषानुवाद -अब गधकके अनुपान वर्णन करतेहै त्रिफला, घृत और गिरके रससग ४ माग्ने शुद्ध आवरासार गधक सेवन करनेसे गृध्र (गीव- त्रिका राजा- गुग्घु ) के समान दूरतककी वस्तु देखनेवाली दृष्टि ( नेत्र ) होवे नगर वह पुरप रोगरहित दीर्घायु होय [॥ १०० ॥] तथा दूधके सग निष्क ४ मासे ) मात्र शुद्ध गधकका एक महीने पर्यन्त सेवन करनेसे शूरता और यिकी वृद्धि होय इसी प्रकार ६ मास पर्यन्त खानेसे सब रोगोंका नाश, दृष्टि सार आयु तथा स्वर पकी वृद्धि होय ॥ १०१ ॥ मोचा फलके पथ खानेसे त्वचाके टोपोको चित्रसग निर्बलताको अड़सेके छायमग कास- सको ।। १०२ ॥ त्रिफलाक काटेसग मदाग्निको और देहके उर्बभागगत. गोको शुत गधका शानही दूर करताहै ॥ १०३ ॥ ये सब अनुपान प्रयातरमे नी या लिखेहै

सप्तमःप्रमोदः ७।
(८१)
सप्तधातुशोधनम् ।
स्वर्णतारारताम्राणांपत्राण्यग्नौप्रतापयेत् ॥
निषिञ्चेत्तप्तततानितैलेतकेचकांजिके ॥ ११॥
गोमूत्रेचकुलत्थानांकषायेचत्रिधात्रिधा ॥
एवंस्वर्णादिलोहानांविशुद्धिस्संप्रजायते॥१२॥
शा० सं० खं० २ अ० ११ ।
भापानुवादः-धातुशोधन १ सुवर्णादि धातुओं के पत्रोको अग्निमे तपातपा
कर तेल, छाछ, काजी, गोमूत्र, और कुलथीका काढा इन प्रत्येकमें क्रमश.
तीन तीन बार बुझाओ तो समस्त धातु शुद्ध हो विशेषतः सातधातुओंमेसे १
रागा २ सीसा और ३ जस्ता इन तीनों को गला गलाके तेल आदि उक्त
पाचों पदाथोमे बुझाना चाहिये ।। ११ ॥ १२ ॥ यह शुद्धि शाधिरके २ रे
खटकी ११ वी अध्यायमे लिखी है।
उपधातुशोधनम् २ ।
१ सुवर्णमाक्षिकशो०-मातुलुंगवैथिजम्बीरस्यद्रवैः
पचेत्॥चालयेल्लोहजेपात्रेयावत्पात्रंसुलोहितम् ॥
भवेत्ततस्तुसंशुद्धिस्स्वर्णमाक्षिकमृच्छति ॥१३॥
२ रौप्यमाक्षिकशो०-कर्कोटीमेष,ग्युत्थैवैजंबीरजैर्दि
नम् ॥ भावयेदातपेती।विमलाशुद्ध्यतिध्रुवम् ॥१४॥
३ तुत्थशो०-विष्टयामईयेत्तुत्थंमार्जारककपोतयोः ॥
दशांशंटंकणंदत्त्वापचेन्मृदुपुटेततः॥
पुटंदनापुटंक्षौदेयतुत्थविशुद्धये ॥१५॥
४-५कांस्यरीतिशो०-शोधनंकांस्यरीत्योश्चधातुशुद्धि-
समभवेत् ॥ १६ ॥

(८२) अनुपानदर्पणः। ६ सिंदूरशो०--दुग्धाम्लयोगतस्तस्यविशुद्धिर्गदितावु धैः॥ १७॥ भा० प्र० पू० ख० भा० ॥ ७ शिलाजतुशोधनम्-शिलाजतुसमानीयग्रीष्मतप्तशि लाच्युतम् ॥ गोदुग्धस्त्रिफलाक्काथैभृङ्गन्द्रावैश्चमर्दये त् ॥ आतपेदिनमेकैकंतच्छुष्कंशुद्धतांबजेत् ॥ १८॥ उपधातुशोधनम् २। १ सोनामक्खी शो०-भाषानुवादः-विजोरे नींबूके रसमें अथवा जबी रीके रसमे सोनामक्खीको डालकर लोहेकी कडाहीमे पकाओ जब रस जलकर कटाही लाल होजाये तब उतारके शीतल होजानेपर निकालो सोनामक्खी शुद्ध होजावेगी ॥१३॥ २ रूपागक्खी शो०-रूपामक्खीको, ककोडा, मेंढासिंगी और जवीरी इन प्रत्येकके रसमें एक दो दिन घोट घोटकर सूर्यकी तीक्ष्ण तापमे रक्खो तो रूपामासी शुद्ध होगी ॥ १४ ॥ ३ नीलाथोथा शो०--विल्ली और कबूतरकी बीठ (विष्ठा) मे नीलेयायेको पर करे पन्नात् उसमे उसीका दशाश सुहागा मिलाकर शरावसपुट करे जनतर जगली गोवर्गकी हलकी आच देवे पश्चात् निकालके दहीका पुट देकर पुन नाच दे इमप्रिकार पुन महतका पुट देकर आच देवे तो नीलायोया शुद्ध हो।। १२॥

सप्तमःप्रमोदः ७ (८३) ॥ रससंरकाराः । जवादशेवसंस्काराऊनविंशतिकाःकचित् ॥ संप्रोक्तारसराजस्यवसुसंख्याःक्वचिन्मताः ॥ १९ ॥ १ तत्राष्टादशसंस्काराः-स्यात्स्वेदनंतदनुमर्दनमृर्छ नंचस्यादुत्थितिःपतनरोधनियामनानि ॥ संदी पनंगगनभक्षणमानमत्र सञ्चारणंतदनुगर्भगति द्रुतिश्च ॥ २०॥ वाह्यद्रुतिस्सूतकजारणास्याद्रा सस्तथासारणकर्मपश्चात् ॥ संक्रामणवेधविधि इशरीरयोगस्तथाप्टादशधातुकर्म ॥ २१ ॥ २-३ अथैकोनविंशतिसंस्कारास्तदन्तरगताश्चाष्टौ स्वेदनमर्दनमूर्छनोत्थापनपातनबोधननियम नसंदीपनानुवासनगगनादिग्रासप्रमाणचारण गर्भद्रुतिवाह्यद्रुतियोगजारणरंजनसारणक्रामण वेधनभक्षणाख्या ऊनविंशतिसंस्कारास्सूतसि द्विदाभवन्ति दीपनान्ता अष्टौसंस्कारावादेहास विदाभवंति ।। २२ ।। ६० त० । भाषानुवादः-पारके कही १८ अटारह, कही १९ उन्नीस और कही । जाट सस्कार माने हे ॥१९॥ पारेके १८-१९-८-सस्कारोंका क्रम-तैसे ? पेदन २ मर्दन ३ मूर्छन ४ उत्थापन ५ पातन ६ वोधन (वोधन ) ७ नियमन ( सदीपन ९ गगनभक्षण १० सचारण ११ गर्भगति १२ गर्भ- इति १३ बाह्यति १ ४ सूतकनारण १५ ग्रास १६ सारणकर्म १७ सका- मणधविधि और १८ शरीरयोग ये पारेके अठारह सस्कार है, इनमें एक नसणादय सस्कार योजित करनेसे १२ उन्तीस और १ ले स्वेद नसे ।

(८४) अनुपानदर्पणः। सदीपन पर्यन्तके आठभी सस्कार माने हैं. ये ८ आठ सस्कार अथवा समस्त सस्कार होनसे पारा शुद्ध होता है ॥ २०-२१-२२ ॥ रसशोधनम् ३ । अथवाहिङ्गलात्सूतंग्राहयेत्तन्निगद्यते ॥ जम्बीर निंबुनीरेणमर्दितोहिङ्गुलोदिनम् ॥२३॥ऊर्ध्वपा तनयंत्रेणग्राह्यःस्यान्निर्मलोरसः॥ कंचकर्नागवं गायैर्निर्मुक्तोरसकर्मणि ॥ विनाकाष्टकेनैव सूतोऽयंसर्वकर्मकृत् ॥ २४ ॥ ग्रं० त०। भाषानुवादः-सूचना-यद्यपि पूर्वोक्त सस्कारोसे पारा शुद्ध होताहै ? रस- शोधन प्रकार तथापि उन सस्कारोंको प्रथविस्तारभयसे हम यहा न लिखकर साधारण प्रफारसेही पारेका शोधन दर्शाते हैं कि जिससे थोडे परिश्रमके साथ उस अ2 वा अष्टादश सस्कार शुद्ध पारेके समानही शुद्ध और गुणप्रद पारा से जाये. हींगुन्टू ( सिंगरफ) को जबीरी अथवा नींबूक रससे एकदिनभर पर करे पश्चात् टेमरूयाद्वारा उडाकर उससे निकले हुए पारेको ग्रहण करे, ५५ पारा पिना आठ सम्झारफेही सातो कचुकी और नागवग आदि दोप रहित नया निर्मट हो जाता है इसे समस्त कार्योंमे ग्रहण करना योग्यहे ऐमा नयनरमें लिवाहे ॥ २३ ॥ २४ ॥ अन्यच्च-निम्बरसैनिम्बपत्ररसैर्वायाममात्रकम्॥ पि वादरदमृध्वंच पातयेत्सृतयुक्तिवत् ॥ ततश्शुद्ध रमं तस्मानीत्वाकार्येषुयोजयेत् ॥ २५॥ शाह्न वं० अ०११॥

सप्तमःप्रमोदः । (८५) अन्यच्च-कुमारिकाचित्रकरक्तसर्षपैः कृतैः कषायैर्वृ हतीविमिश्रितः॥ फलत्रिकेणापिविमर्दितोरसो दिनत्रयंसर्वमलैर्विमुच्यते ॥ २६ ॥ भा० प्र० पू० खं० २ भा०॥ दूसरा प्रकार-शार्ङ्गधरमे ऐसाभी लिखा है कि शिंगरफको नीबूके अथवा नीबके पत्तोंके रससे १ एक प्रहर पर्यन्त खल करके डमरूयत्रसे २ तथा ३ प्रहरकी आच देके उडा लेवे और उस शिगरफसे उड़कर निकले हुए शुद्ध पारेको लेकर सर्व कार्योंमें योजित करे ।। २५ ॥ ३ प्रकार-कुमारिका ( गवारपाठा ) चित्रक, लालसरसों और भटकटैया इनके वायसे और त्रिफलासे तीनदिनपर्यन्त पारेको खल करनेसे समस्त मल रहित शुद्ध पारा हो जाता है ऐसा भावप्रकाशमें लिखा है ॥ २६ ॥ उपरसशोधनम् । १ तत्र गंधकशोधनम्-लोहपात्रोवनिःक्षिप्यघृतमग्नौ प्रतापयेत् ॥ तप्तेघृतेतत्समानंक्षिपेद्गन्धकजरजः ॥ ॥ २७ ॥ विद्रुतंगन्धकंदृष्ट्वातनुवस्त्रेविनिःक्षिपेत् ॥ यथावस्त्राद्विनिःसृत्यदुग्धमध्येऽखिलंपतेत् ॥ एवं सगन्धकश्शुद्धस्सर्वकम्मोंचितोभवेत् ॥ २८ ॥ २ हिंगुलशो०-मेषीक्षीरेणदरदमम्लवगैश्चभावितम् ॥ सप्तवारान्प्रलेपेनशुद्धिमायातिनिश्चितम् ॥ २९ ॥ ३ अभ्रकशो०-कृष्णाभ्रकंधमेद्वह्नौ ततःक्षीरविनिःक्षि पेत् ॥ भिन्नपत्रतुतत्कृत्वातण्डुलीयाम्लयोवैः ॥ भावयेदष्टयामतदेवमभ्रंविशुद्धयति ॥ ३० ।। ४ हरितालशो०-तालकंकणशः कृत्वातच्चूर्णकाञ्जिके (८६) अनुपानदर्पणः । चित् ॥ दोलायंत्रेणयामैकंततः कूप्माण्डजद्रवेः॥ ॥ ३१ ॥ तिलतैलेपचेद्यामंयामञ्चलिफलाजले ॥ एवंयन्त्रेचतुर्यामंपकंशुध्यतितालकम् ॥ ३२ ॥ ५ मनश्शिलशो०-पचेव्यहमजासूत्रे दोलायन्त्रेमन शिशलाम् ॥ भावयेत्सप्तधापित्तैरजायाःसापिशुध्य ति ॥ ३३ ॥ मा० प्र०॥ अन्यञ्च-अगस्तिपत्रतोयनभावितलवारकम् ॥ शृंगवेररसेर्वापिविशुद्धयतिमनश्शिला ॥३४॥यंत.। ६ खर्परशो-नरभूचगोमनेसताहरसकंपचेत् ॥ दो लायन्त्रेणशुद्धस्स्यात्ततः कार्येषु योजयेत् ॥२५॥ ७ कंकुष्टादीनांशोधनम्-कंकुष्टंगरिकशंखः कासीसं इन्द्रणतया ॥ नीलाञ्जनंशुक्तिभेदाःक्षुल्लकास्सबरा टकाः॥ ३६ ॥ जंवीरवारिणास्विन्नाः क्षालिताः कोणवारिणा ॥ शुद्धिमायान्त्यमीयोज्याभिपग्भि पानमिद्धये ॥ ३७ ॥ भा०प०। गनोपमानांशोधना-- विक्षारलवर्णदेयमम्लेनमें शिधापचेत् ॥ तदाचोपरसाइशुद्धाजायन्तेटोपन जिनाः ।। ३८॥ ग्रं० तक।

सप्तमःप्रमोदः७० (८७) डाले ॥ २७ ॥ जब वह गक घाम विवर जाये तब एक पाम तय भरके उस पात्रके मुहॅपर महनि कपडा बाधकर उसमे वह पिघला हुआ गधक डाल दे जिससे गधक छानकर दूधमें गिरे और जो कुछ ककर मट्टीहो सो सब बत्रमे रह जाये फिर वह गधक दूधमे गिरकर शीतल होजावे तब उसे ले। इस प्रकार गन्धक शुद्ध होता है ॥ २८॥ २ हिंगुलशो०--हिगुल ( शिगरफ ) को खलमे टालकर ७ सात पुट भेडीके दूध और ७ पुट नीवूके रसकी देवे तो निश्चय शुद्ध हो ॥ २९ ॥ ३ अभ्रक शो-काले अभ्रकको अग्निमे तपाकर गऊके दूधमे बुझाओ फिर चौलाईके रसमे अथवा चावलों के पानीमे और इमलीको खटाईमे आठ प्रहर ( एकदिनरात ) भिगोये रक्खो तो अभ्रक शुद्ध हो ॥ ३० ॥ ४ हरतालशो०-हरतालके छोटे २ टुकडे करके १ प्रहर काजीम १ प्रहर भूर कुम्हडेके रसमें १ प्रहर तेटमे और १ प्रहर त्रिफलाके कायमे दोलायत्रसे आच देओ तो हरताल शुद्ध हो ॥ ३१ ॥३२ ॥ ५ मनशिलशो०-मनशिलको वकरीके मूत्रसे दोलायंत्रमें ३ दिन औटावे पश्चात् खलमे डालकर बकरीके पित्तेकी ७ भावना देवे तो मनशिल शुद्ध हो, ये सब शोधन भावप्रकाशमें लिखे हैं ॥ ३३ ॥ दूसग प्रकार-मनशिलको अगस्तिपत्र रसकी अथवा अदरकके रसकी ७ नायना देवे तो मनशिल शुद्धहो ऐसा प्रथातरमें लिखाहै ॥ ३४ ॥ ६ खपरियाशां०-खपरियाको मनुष्यके मूत्रमें अथवा गोमूत्रमे दोला याने ७ सात दिन पकाओ तो शुद्ध हो ॥ ३५ ॥ ७ मुग्दासंग आदि ८ उपरसाका शोधन- १ मुरदाराग २ गैरूं २ भर ४ हीराकसीस ५ सुहागा ६ कालासुरमा ओर ७ सीप भेदरूप जो चोवा--कोटी र यादि ।। ३६ ।। इनको जवीरीके रसमे शोवन करके गरम । १ दोलायन उसे कहते हैं कि जिस पात्रमें काजी आदि उस पात्रके मुखसे युउ कामभरके उसम जिस भापधको शुद्ध करना हो उसे भोजपत्रमें लपेट तिहेरे कपोन पोटली र पसे बाप उसे एक लकडीमे डोरेसे वाधकर चीनॉनीच अघर रटका देवे पश्चात् उस पानको भट्टी या चूल्हेपर चढाके लिखेप्रमाण आच दे ॥

(८८) अनुपानदर्पणः। पाना बोडालो तो गे सब - उपरस शुद्ध हो जायेंगे ऐमा मा प्रकाशमे लि. पाहे ॥ ३७॥ ८शेप उपरसोका अथवा सर्वोपरसाका सक्षिप्त शोधन--सब उपरसो को जवाखार, सन्जीखार, सुहागा, नोन और अम्लवर्ग इन प्रत्येकमें तीन ३ चार पचाये तो समस्त उपरस दोषरहित शुद् होवे ऐसा ग्रयातरमें लिखाहै॥३८॥ रत्नशोधनम्। तत्रादौवजस्यशो०-कुलत्थकोद्रवकाथेदोलायन्त्रवि पाचयेत् ॥ व्याघ्रीकन्दगतंवजेत्रिदिनंतद्विश यति ॥ ३९॥ अवशिष्टरत्नानांशो०-वनवत्सर्वरत्नानिशोधयेन्मा रयेत्तथा ॥ ४०॥ आ० प्र० । विषशोधनम्-कृत्वाचणकसंख्यानगोमूलैर्भावयेत्य हम् ॥ समटङ्कणसंपिष्टंमृतमित्युच्यतेविष- म् ॥ ११ ॥ रसे • सा। उपविषशोधनम्-पञ्चगव्येषुशुद्धानिदेयान्युपविषा- णिच ॥ विषाभावप्रयोगषुगुणस्तुविषसम्भवः॥४२॥ जपालशा-नविविपमित्याहुर्जपालोविपमुच्यते। गोधितश्चविरकेपुचमत्कृतिकरःपरः॥ ४३ ॥ जी पालहितत्वगंकररसोभिर्मलेमाहिये निःक्षित व्यहनपणतीयविमलंग्वल्बसवासादितम् ॥लितं नननवोपविगतहारजालनिभो नियुका विनाविनश्चव शइशद्रागुणाच्छोभवेत् ॥४॥ घ..

-
सप्तमःप्रमोदः ७।
(८९)
भाषानुवादः-अब रत्नोका शोधन लिखते हैं १ हीरामो०-हारको छोटी
'फटियालीके मूलमें रखकर कुलथी और कोदोके काढेसे दोलायत्रमे ३ दिन
पर्यन्त पकावे तो हीरा शुद्ध हो ॥ ३९ ॥
शेषरत्नोंका शो०-शेपरत्नोका शोधन और मारण हीरेके समानहीं
जानो ॥ ४० ॥ ऐसा भाव प्रकाशमे लिया है।
विपोकाशो०-जिस विषका शोधन करना हो उसके छोटे २ वर्नक
समान टुकडे करके पश्चात् गोमूत्रसे दोलायत्रमे ३ दिनपर्यन्त आच देवे और
फिर उसके समान सुहागा मिलाकर खलकर लेवे तो वह विष निर्विप ( शुद्ध ,
होजाता है ऐसा रसेन्द्रसारसग्रहमे लिया है || ४१ ।।
उपविषशो०-समस्त उपविषोको, दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोवरमे शोधन
करके जहा विप न मिले वहा शुद्ध उपविपोंको योजित करना चाहिये ||१२||
जमालगोटेका गो-पटित ( सत् असत् विचार करनेवाले , या जैसा
; विषको विष नहीं समझते वसा जमालगोटेको विप ( जहर ) मानते हैं और
यही जमालगोटा शुद्ध होनेपर विरचन ( दस्त-जुलाब ) में चमत्कार प्रदर्शक
अतिश्रेष्ट होजाता है ॥४३॥ जमालगोटेके छिलकोंको दूर करके उसके भीतर
एक महीनपत्ती । जो जमालगोटकी जीभ ) होती है उसे निकालडाले पश्चात्
एक वस्त्रमे वाधक ३ दिनतक भैसके गोवरमें दवायरक्खे, फिर निकालकर गरम-
पानीसे वोटाले फिर दूसरे अच्छे बन्नमें बावके युक्तिसे खल करे कि जिससे
उमका तेल २ वस्त्र शोपले, पश्चात् नवीन खपरेपर उसका लेपदेवे, जब तेल
मात्र उसमें न रहकर बूलीके समान वह होजावे तब उसे नींबूके रसकी
भावना देवे, तो जमालगोटा शुद्धहो ये सब प्रयातरमें लिखाहै ।। ४४ ॥
अथ स्वर्णादीना मारणम् ।
१ सुवर्णमा०-स्वर्णस्यदिगुणसूतमम्लेनसहमईयेत् ॥
तगोलकसमंगंधं निदध्यादधरोत्तरम् ॥ ४५ ।।
गोलकं च ततोद्धा शरावं दृढसंपुटे॥ त्रिंशद्व
नोपलेईद्यात्पुटान्येवंचतुर्दश ॥ ४६ ॥ निरुत्थं
an-
जायतेभस्मगन्धोदेयःपुनःपुनः॥४७॥

(८८) अनुपानदर्पणः । पानांगे वोडालो तो गे सब - उपरस शुद्र हो जायेंगे ऐमा मा प्रकाशमें लि. ग्वा हे || ३७ ॥ ८ शेप उपरसोका अथवा सर्वोपरसाका संक्षिप्त शोधन--सब उपरसो को जवाखार, सज्जीखार, सुहागा, नोन और अम्लवर्ग इन प्रत्येकमें तीन ३ बार पचावे तो समस्त उपरस दोषरहित शुद्र हो। ऐसा प्रयातरमें लिखाहै।।३८॥ रत्नशोधनम् । तत्रादौवजस्यशो०-कुलत्थकोद्रवक्काथेदोलायन्त्रवि पाचयेत् ॥ व्याघ्रीकन्दगतंवजंत्रिदिनंतद्विशु द्वयति ॥३९॥ अवशिष्टरत्नानांशो०-वज्रवत्सर्वरत्नानिशोधयेन्मा रयेत्तथा ॥४०॥ भा० प्र० । विषशोधनम्-कृत्वाचणकसंख्यानंगोमूलैर्भावयेत्य हम् ॥ समटकणसंपिष्टंमृतमित्युच्यतेविष- म् ॥४१॥ रसे ० सा०। उपविषशोधनम्-पञ्चगव्येषुशुद्धानिदेयान्युपविषा- णिच ॥ विषाभावप्रयोगेषुगुणस्तुविषसम्भवः॥४२॥ जेपालशो-नविषविपमित्याहुजैपालोविषमुच्यते॥ शोधितश्चविरेकेषुचमत्कृतिकरःपरः॥ ४३॥ जै पालंरहितत्वगंकुररसैर्जाभिर्मलेमाहिषे निःक्षिप्त व्यहमुष्णतोयविमलंखल्वेसवासोदितम् ॥लिप्तं नूतनवर्परेपुविगतलेहोरजःसंनिभो निम्बूका बुविभावितश्चवहुशश्शुन्द्रोगुणाच्छोभवेत् ॥४४॥ ॥ ग्रं. त.

सप्तमःप्रमोदः ७। (८९) भाषानुवादः-अव रत्नोका शोधन लिखते हैं १ हीराशो०-होरेको छोटी 7 कटियालीके मूलमें रखकर कुलथी और कोदोके काढेसे दोलायत्रमें ३ दिन पर्यन्त पकाये तो हीरा शुद्ध हो ॥ ३९ ॥ शेषरत्नांका शो०-शेपरत्नोंका शोधन और मारण होरेके समानहीं जानो ॥ ४० ॥ ऐसा भाव प्रकाशमे लिग्वा है। विषोंकाशो०-जिस विषका शोधन करना हो उसके छोटे २ चनेके समान टुकडे करके पश्चात् गोमूत्रसे दोलायत्रमें ३ दिनपर्यन्त आच देवे और फिर उसके समान सुहागा मिलाकर खलकर लेवे तो वह विष निर्विप (शुद्ध) होजाता है ऐसा रसेन्द्रसारसग्रहम लिया है ।। ४१ ॥ उपविषशो०-समस्त उपविषोको, दूध, दही, घृत, गोमूत्र और गोवरमें शोधन फरक जहा विप न मिले वहा शुद्ध उपविपोंको योजित करना चाहिये ॥४२॥ जमालगोटेका गोर-पडित । सत् असत् विचार करनेवाले वा जैसा । विषको विष नहीं समझते वसा जमालगोटेको विप ( जहर ) मानते है और यही जमालगोटा शुद्ध होनेपर विरचन · दस्त-जुलाब ) में चमत्कार प्रदर्शक अतिश्रेष्ट होजाता है ॥४३॥ जमालगोटेके छिलकोंको दूर करके उसके भीतर एक महीनपत्ती ( जो जमालगोटेकी जीभ । होती है उसे निकालडाले पश्चात् एक वस्त्रमे बाधक ३ दिनतक भैसके गोवरमे दवायरक्खे, फिर निकालकर गरम- पानीसे बोटाले फिर दूसरे अच्छे पत्रमे वाधके युक्तिसे खल करें कि जिससे उसका तेल २ वन्त्र शोपले, पश्चात् नवीन खपरेपर उसका लेपदेवे, जब तेल मात्र उसमें न रहकर चूलीके समान वह होजावे तब उसे नींबूके रसकी भावना देवे, तो जमालगोटा शुद्धहो ये सब प्रयातरमें लिखाहै ।। ४४ ।। अथ स्वर्णादीना मारणम् । १ सुवर्णमा०-स्वर्णस्यदिगुणसूतमम्लेनसहमईयेत् ॥ नगोलकसमगंधं निदध्यादधरोत्तरम् ॥ ४५ ॥ गोलकं च ततोरुद्धा शरावं दृढसंपुटे॥त्रिंशद्व नोपलैर्दयात्पुटान्येवंचतुर्दश ।। ४६ ॥ निरुत्थं जायतेभस्मगन्धोदेय पुनःपुनः॥४७॥ , ९०) अनुपानदर्पणः । भाषानु०-अब सोनेआदिके मारण ( भस्म करने ) की विधि दर्शातेहै । १ सोनेकी भस्म-शुद्धकिये हुए सोनसे दुना शुद्ध पारा लेकर दोनो नीबूके रससे खल करके गोला बनावे और उस गोलेके समान शुद्ध गधकके चुरेको रावसपुटम नीचे, ऊपर और गोलेको वीचमें रक्खे पथात् कपडमट्टीसे शराप्त पुटको दृढकरके ३०जगली गोवरी ( कडों) की आच देवे, इसप्रकार चौदह पुट ( १४ हबार आच) देनेसे सोनेकी नित्य ( पक ) भम्म हाय, पर प्रत्येक आचके माथ गधक सपुटमे नीचे ऊपर अवश्य रक्खे ॥ ४५-४६-४७ ।। २ रौप्यमा०-भागकतालकमीशानमन्लेनकेनचित्॥ तेनभागत्रयं तारपत्राणिपारिलेपयेत् ॥ ४८ ।। धृत्वासूयापुटेरुद्धापुटेत्रिंशद्वनोपलैः ॥ समुद्धृत्य पुनस्तालंदत्त्वाद्धापुटेपचेत् ॥ एवंचतुर्दशपुटै स्तारभस्मप्रजायते ॥४९॥ २ भाषानु०-चादीकी भस्म २भाग शुद्ध हरतालको नीबूके रसमे१प्रहरपर्यन्त पल करके पश्चात् ३ भाग चादीके अत्यन्त पतले और छ टे२पत्रों (टुकडों) पर उसका लेपकरे और उनको शरावसपुटमे रखकर ३० जगली गोबरीकी आच इस प्रकार १४ चार आच देनेसे चादीकी भस्म होय ॥ ४८-४९ ॥ ३ तानमा०-सूक्ष्माणिताम्रपत्राणिकृत्वासंस्वदयद्रुधः।। वासरनयमम्लेनततःवल्बोविनिःक्षिपेत् ॥ ५० ॥ ? है ' भट्टी पदेहए दो सिकोरे (मगई दीये) को लेकर उनको युन्तिम पत्थर पर पकर दो को ऐसे जोडे कि निकी कोर गर मिलनाने और कुछ छी । दे डा को नम करनेकी वस्तु दोय उभे रखकर दानां सराईको जोद कदमट्टी रट फरदेफिनिममे भीतर रसपी हुई वस्तु बाहर न निकलने पाने माम? २ ने महत, नी और मुझगा इन कारके जान देनेसमी को जानिदो - जातो .

॥ सप्तमःप्रमोदः ७। (९१) पादाशसूतकंदत्त्वायामसम्लेनमदयेत् ॥ तत उद्धृत्यपत्राणिलेपयेद्दिगुणेनच ॥ ५१ ॥ गन्ध केनाम्लघृष्टेनतस्यकुर्याचगोलकम् ॥ ततः पिष्ट्वाचमीनाक्षींचाङ्गेरीवापुनर्नवाम् ॥ ५२ ॥ तत्कल्झनवहिर्गोलंलेपयेदङगलोन्मितम् ॥ त्वातदोलकंभाण्डेशरावेणचरोधयेत् ॥ ५३ ॥ वालुकाभिः प्रपूाथविभूतिलवणांबुभिः ॥ द स्वाभांडमुखेमुद्रांततश्चुल्ल्यांविपाचयेत् ॥५४॥ कमवृद्धाग्निनासम्यग्यावद्यापचतुष्टयम् ॥ स्वा गशीससुद्धृत्यमईयेच्छूरणद्रवैः ॥ ५५ यामैकं गोलकंतञ्चनिःक्षिपेच्छ्रणोदरे ॥मृदालेपस्तुकर्त व्यस्सर्वतोऽष्टमानकः॥५६॥पाच्यंगजपुटेक्षि तंनृतंभवतिनिश्चितम्।वमनंचविरेकंचभ्रमलम मथासचिम् ॥ ५७ ॥ विदाहस्वेदसुत्लेदनकरोति कदाचन ॥५८॥ ३ तावेकी भस्म-भापानुवाद -शुद्धतावेके महीन छोटे २पत्र (टुकडे) करके उनको ३ दिनपर्यन्त नीवृके रसमें टाटकर मंद २ आचसे पकावे पश्चात् उनको खरलम टाल ॥ ५० ॥ उन शुद्र ताम्रपत्रोंसे चतुर्थाश पाराभी उन्हीके साथ मिलाकर १ प्रहरपर्यन्त नींवृके रनम खल करे ' घोटे ), जब उसमा गोला बनजाये तव उसे निकालकर उसमे दुनी ॥ ५१ ॥ नींबूके रससे टीई शुद्ध गपकवा उस गोलेपर रेप कर तदनतर, मकोह, अथवा १ रसेन्द्रेणापि माताय करोतिपमानिन ॥ उदरेतस्यवोटानिजायन्तनानसशयः॥ ॥ १ ॥ । जो पुरविता पारपे. योगके ताकी पन करता उसमरमिरी । उ.पा ऐना गमतरन पिचाई ।

(९२) अनुपानदर्पणः । चन दस्त चूका अथवा सॉठी इनमेंसे किसीएकको पीसकर ॥ १२॥ उसके कल्कैका उसी गोले पर दो अगुल लेप करे पीछे उसे किसी भाडे ( पात्र ) में रखकर उसे सकोरेसे ढाकदे जिससे कि वह गोला वहीं रुकजाय ॥५३॥ पश्चात् उस पात्रको वालू रेतीसे पूरित और उसका मुख राख वा नमक पानीसे मुद्रित कर चूल्हेपर चढावे ॥ २४ ॥ पीछे क्रमवर्द्धित अग्निसे ४ प्रहरपर्यन्त उसे पकाने जव स्वागशीतल होजावे तब उस गोलेको निकालकर जमीकदके रससे मदित (खल ) करे |॥ ५५ ॥ जब एक प्रहर घोटते घोटते होजाय तब उसका फिर गोलाबनाकर उसे जमीकदके भीतर युक्तिसे रक्खे और उस जमाकदपर? अगूठे मात्र ऊँचा चहुंओर मृत्तिकाका लेप करे ॥ १६ ॥ फिर उसे गजपुटमें पकाये तो निश्चग ताम्र भस्म होजावेगा और यह शुद्ध ताम्रभस्म उलटी मिरे मग यकाहट अरुचि ॥ १७ ॥ दाह पसीनेका निकलना और का मटकना इत्यादि किसी उपद्रवको नहीं करता है ॥ १८ ॥ ४ बंगमा०-मृत्पात्रेद्रावितेवंगेचिञ्चाश्वत्थत्वचारजः।। क्षिप्वावङ्गचतुर्थांशमयोदयाप्रचालयेत् ॥ ५९॥ ततोद्वियाममात्रेणवङ्गभस्मप्रजायते ॥ अथभस्म समंतालंक्षिप्त्वाऽम्लेनविमईयेत् ॥६०॥ ततोग- जपुटेपक्त्वापुनरम्लेनमर्दयेत् ॥ तालेनदशमां- शेनयाममेकंततः पुटेत् ॥ एवंदशपुटैः पकंवगंभ- वतिमारितम् ॥ ६१॥ । रागे ( कथील , की भरम-भापानुवाद-मृत्तिकाके पात्रमें । मी व टिकट में शुदयीलको पिघलाकर उससे चतुर्थीश अमली और पीपल के के महीन चणको उसंप टालते जावे और लोहेकी कडछीसे हलाते जो ।। ६२ १स प्रकार २ प्रहरकी आचम वग ( रागा ) भस्मस्प - ॥ } है सप्तमःप्रमोदः ७॥ (९३) जावेगा फिर उस भस्मरूप वगकी समान शुद्ध हरताल लेकर दोनोको नींबके + रससे घोटे ॥ ६० ॥ जब दोनोंका एकजीव होजाय तब गोला बनाकर शराव सपुटमे रखके गजपुटमें फूक ( पका) देवे, स्वागशीतल होजानेपर उसे निकाल उससे दशमाश शुद्ध हरताल लेकर दोनोको १ प्रहरपर्यत पुन: नींबूके रससे घोटे पहिलेके समान पुन सपुटकर गजपुटमे फूकदे, इस प्रकार १० दशबार फूकनेसे चगभस्म होय ।। ६१ ।। ५ यशदमा०-यशदस्यवंगवन्मारणंभवति ॥ ६२ ॥ ६ नागमा०तांबूलरससंपिष्टशिलालेपात्पुनः पुनः ॥ द्वात्रिंशद्भिः पुटै गोनिरुत्थंभस्मजायते॥६३॥ ५ जस्तेकीभस्म-रागेकी भस्म करनेकी समान कियासेही जस्तेकीभी भस्म बनाओ ॥ ६२ ॥ ६ सीसकीभस्म-पानके रसमें मैनशिल घोटकर शुद्धशीशेके कटकवेधी पत्रीपर लेपकर शरावसपुटमें रखकर फूकदे, इसप्रकार ३२ बार फूकदनेसे ससिकी निरुत्थ भस्म होवे ॥६३ ॥ ७ लोहमा०-क्षिपेच्चद्वादशांशेनदरदंतीक्ष्णचूर्णतः ॥ मईयेत्कन्याद्रावैर्यामयुग्मंततःपुटेत् ॥ ६४ ॥ एवंसप्तपुटैर्मृत्युंलोहंचूर्णमवाप्नुयात् ॥६५॥ कृत्स्नमिदमुक्तंभा०प्रका०पूर्वखंडस्यद्वितीयभागे। इति सप्तधातुमारणम् । ७ लोहभस्म-भापानुवाद-शुद्धलोह ( पोलादके) चूर्णका द्वादशाश ( वारवाहिम्सा ) शुद्ध हिगुल लेकर दोनोंको गवारपाठेके रससे २ प्रहरपर्यन्त खराठ करे पश्चात् शरावसंपुट करके गजपुटमे फूकदे ।। ६४ । इस प्रकार सातवार फूकनेस रोह भरम होय ।। ६५|| यह सातोवातुमारणविवि भावप्रका- शक पूर्वखटके टूसर भागमें लिखी है ॥ सम्यगापधल्पानालोहरप, प्रशत्यते ॥ तस्मात्सर्वप्रयत्नेन लोहमादाविमार पत् ॥१॥ नाय. पचत्यचपलादी पत्रयोदशात् ॥ आदी मास्तन वर्तमम प्रया ॥२॥ मोजमृतोदवायस्वाहा इतिपथातरे। 7 ।

(९४) अनुपानदर्पणः। अथोपधातूना मारणम्। ८ स्वर्णमा०मा०-कुलत्थस्यकपायेणध्वातैलेनवापुटेत्। तकेणवाजमूत्रेणम्रियतेस्वर्णमाक्षिकम् ॥६६॥शाह ९ रौप्यमाक्षिकमा०-स्वर्णमाक्षिकमारणप्रकारेणरौप्य माक्षिकस्यापिमारणम् ॥ ६७ ॥ भापानुवाद.-अब उपवातु मारण दर्शाते हैं- ८ सोनामक्खीकीभस्म-शुद्ध सोनामक्खीको कुटियीक कायसे अथ ।। तेल्से अथवा छाउसे अथवा बकरीके मूत्रसे खठ करके शरावसपुटमे रखकर गजपुटमे फूकदे तो सोनामक्खी भस्म होय ॥ ६६ ॥ ऐसा शाईधरमे लिखाहे. रूपामक्खीकीभस्म-रूपामक्खीकी भस्म सोनामवखीकी भरम बनानेकी कियानुसार बनाओ ॥ ६७ ॥ १०तुत्थमा०-लकुचद्रावगंधाइमटणेनसन्वितम् ॥ वनामृयागतंद्वित्रिकुटेमृतिमाप्नुयाता६८॥गल्तका ११-१२ कांस्यरीत्योर्मा-कांस्यरीत्योरिणमनुपानं चापिताम्रबज्ज्ञेयम् ।। ६९ ॥ १३ सिंदूरमारणनिषेधः-सिन्दरस्यप्रयोगोहिनदृष्टः अचित्पृथक् ॥ तस्माद्युक्तस्थलेगोज्यमुपदेशोगुरो रिति ॥ ७० ॥० त० । १४ शिलाजतुमा-शिलायांगंधतालाभ्यांमातुलुंगर सेनन । घटितहिशिलाधातुम्रियतेप्टोपलेनच ७१|| 11 ग्रंशन सप्तमःप्रमोदः ७] (९५) - एकुल ( कठल ) के रसमें खरलकरके वज्रमूपामे रखकर कुक्कुटपुटम दो तीनवार फूक तो नीलथोयेकी भस्म होय ॥ ६८ ॥ ११-१२ कासे और पित्तलकी भकासे और पित्तलकी भस्म बनानेकी किया और उसके अनुपानादि तानेकी भस्म ओर उसके अनुपानोके समान जानो ॥ ६९॥ १३-सिदूरभस्म अभाव-सिदूर भस्म बनाने की विधि कही नहीं दृष्ट पडती इसलिये शुद्ध सिंदूरको महलम आदिमे युक्तकरना चाहिये ऐसा सवैद्योका उपदेश है ।। ७० ॥ १४ शिलाजीतभ०-शिलाजीतमें शुद्ध गधक और शुद्ध हरिताल मिलाकर विजोरे नींबूके रसम घोटकर शरावसपुटमे रखकर आठ उपली (जगली गांवरी । की आचदे इस प्रकार ८ आचदेनेसे शिलाजीतकी भस्म होय ऐसा तयातरमें लिखाहै ।। ७१ ।। अथ मण्डूरविधि । अक्षाझारेर्धमेकिलोहर्जतद्वांजलैः ॥ सेचये ततततंतत्सतवारंपुनःपुनः ॥७२॥ चूर्णयित्वात ताक्षाद्विगुणैत्रिफलाभवैः ॥ आलोज्यभर्जये द्वहौलण्डूरंजायतेवरम् ।। ७३॥ शाह । अथ हंसमंडूरविधिः। मण्डूरंमर्दयेच्क्ष्णंगोमूत्रेष्टगुणेपचेत् ॥ यूपणं त्रिफलानुस्ताविडंगचव्यचित्रकैः॥७४॥ दार्वी १ दोभागतृणभरम-१ भाग बाबीवी मिट्टी-१ भागलोकीट-१माग वेतपापाण- उमनुप्पके बाल रनसोंको ककि दूध औटाके पश्चात्दो प्रहरपर्यन्त अच्छे पारस पर पीसे जब सब एक जीवहोकर अत्यत महीन होजावे तर उसकी गांके सटा गो मार पीटपन रादित भुप बनावे इसे वामपा और अन्धमुपाभी ५.। मिर पापा जार उतारा गटा लोदवर उसने गोरी जातक नर 41 रापस ५८ उसने र१५ र उपर त गोवरीनरदे से कुटुपुट दत (९६) अनुपानदर्पणः। ग्रन्थीदेवदारुतुल्यंतुल्यविमर्दयेत् ॥ एतन्मण्डूर तुल्यंचपाकान्तेमिश्रयेत्तत्तः ॥ ७५॥ भक्षयेत्कर्ष मात्रंतुजीर्णान्तेतकभोजनम् ॥ पाण्डुशोफंहली मंचह्यरुस्तंभचकामलाम् ॥ अर्शासिहन्तिनोचि ग्रहसमण्डूरकाह्वयम् ॥ ७६ ॥ ग्रं० त० १ मंडूर बनानेकी विधि-भाषानुवाद.-बहेडेकी लकडीके कोलसोंकी अंगारमे लोहेके कीटको खूब तपा तपा कर ७ बार गोमूत्रमे बुझारे ॥ ७२ ॥ पश्चात् महीन पीसकर उससे दुने त्रिफलाके काथमें उसे मिलाके १ हंडीमें भरदे और हडीका मुख सराईसे बदकर कपडमट्टीसे दृढ करदेवे पीठे उसे गजपुटमे फकदे तो उत्तम मंडूर होय ॥ ७३ ॥ ऐसा शाईधरमें लिखा, इस मडूरके अनुपान लोहभस्मके समान जानो २ ममंडूर-पूर्वोक्तप्रकारसे बनाये हुए मटरको प्रथम त्रिफलाके काय स्टिकरके ए |त् अष्टगण गोमत्रमे मिलाकर हडीमे भरकर पकार । पूक्ति मिस केके , जब पककर स्वागशीतल होजाग तब सोंठ, मिरच, पीपल, रा, नागरमोथा, नायबिटग, वय, चित्रक, दामहलटी, पीपलागल, और देयान इन मव समानका महीन चूर्ण उसमे मिलाकर खरल करे जा एकगी। होगाय तब इसमेसे १ कप भर नित्य सेवन करे और उसके पचनेपर ऊपरसे T-5 पीप नो पाई,शोथ, हलीमक, ऊमरतम (पैरोका रहजाना) कॉमला और 0 । वासीर ) इन रोगों को यह हसमटर नाश करता है इसमे सशय नहीं हैमा मान्तरमे दिया ।। ७४ । ७५ । ७६ ॥ रसमारणमा काकोढुंबरिकादुग्धेरसंकिंचिद्विमर्दयेत्। तदुग्ध एहिंगोश्चमपायुग्मंप्रकल्पयेत् ॥७॥ क्षिप्त्वान संपुटेसृतंतत्रमुद्रांप्रदापयेत्॥ धृत्वातंगोलकंपा झोनन्मपासम्पुट धिके ।। ७८॥ पचेगजपुटेनेव मतम्यातिनस्मताम् ।। ७९ ॥ - - सप्तमःप्रमोदः ७॥ (९७) अन्यच-नागवल्लीरतेष्टःककोटीकंदगर्मितः॥ भासंपुटेपणत्वासूतोयात्येवसस्मताम् ॥८०॥ मा०० पू० सं० २ भा०॥ भाषानुवादः-अब पारेकीभस्म बनानेकी क्रिया लिखते हैं- १ पाराभस्म-कालेगृलरके दूधर्म शुद्रपारेको कुछ कालतक घोटे, जब उसकी गोली बनजावे तब गूलरके दूवमे होगको स्वरलकरके उसके २ मप बनावे और उसगोलीको मृपमे रखकर उन दोनो मूपोको गूलरके दूधमे खरल की हागतेही दृढजोड ( मुद्रा , दो, पश्चात् मुलतानीमट्टीकी मूमे या गरावसपुटमे उसपारकी गोलीसहित पूर्वोक्त भूपको रखकर पकी मुद्रा ( कपडमट्टी ) दृढ मुद्रित करदे और तुला र गजपुटम फकद तो पाराभग्म होय।।७७-७८-७९॥ २ प्रकार-शुद्धपारेको नागरवेली के पानक रसमे घोटकर वाझकके डीके कदमें रखकर उसे शरावसपुटमें रग्वे और उसे कपडमट्टीसे दृढकर सुखाये पश्चात् गजपुटमें फूकदे तो पारकी भस्म होय ॥ (० ॥ ऐसा भावप्रकाशमे लिग्वाहै. २ रससिद्गविधि । सूतंपञ्चपलस्वदोपरहितंतत्तुल्यसागोवलिबोटको नक्सादरस्वतुवरीकर्पश्चसंसदितः॥ कुप्यांकाच सुविस्थितश्चलिकतायंत्रेत्रिभिर्वासरेः पक्कोवह्नि निरुद्भवत्यरुणः सिन्दूरनामारसः॥८॥०तः। ३ रसकर्पूरविधि । दिपांशुमनाउनमलबजावुनाचैकसत्सृतंधातु एलटीपरितंतसंपुटेरोधयेत् ॥अंतःस्थलवण वाल्यवहिहटाद्धलंग्राह्यमथेन्दु सुन्दधवलंगस्मोपरिस्पंशनः ।। ।। ८२ ॥ ० त०। ५ (९८) अनुपानदर्पण । २ रससिदूराविधिः, भाषानुवादः-५ पल शुद्धपारा ५ पल शुद्ध गधकर टकनवसागर १ कर्षफिटकरी इन सबोको ३ दिनपर्य्यन्त घोटकर अग्नि सहन शीला (आतशी) शीशीमें भरदे और उसपर कपडमट्टी देकर ३ दिनपर्यन्न वालुकायत्रमें मद मध्य और तोत्र आच दवे तो रक्तवर्णका रससिदूर बनजायेगा ॥ ८१॥ ऐसा प्रथातरमें लिखाहै ३ रसकपूरविधिः-शुद्धपारेको खारीनोन और यूहरके दूध सग घोटकर लोहेके सपुटमे रक्खे ओर उस लोहसपुटका मुख खडिया मट्टीसे दृढ अदका इस सपुटको एकहडीमे रखकर उसमे नोन भरदे और उसे भट्टीपर चढाकर १ दिनभर आचदे, जब स्वाग शीतल होजावे तब उस सपुटको युक्तिसे निकाल- कर ऊपरके सपुटमे जो श्वेतभस्म जमे उसे निकालले इसे रसकार कहते ऐमा रसमजरीम लिखाहै ।। ८२ ॥ ४हिंगुलमा०-वल्लमात्रंतालपिष्टंशरावेस्थापयेत्ततः॥ तस्मिन्कर्षसमंदयंसकलंदरदस्यच ॥३॥ पूरये दाकरसेदिगुणंतत्रबुद्धिमान् ॥पुष्पाणिशाणमा वाणिपरितःस्थापयेत्ततः ॥ ८ ॥ शरावसंपुटेद त्वाचुल्ल्यांमध्याग्निनापचेत् ॥घटिकात्रयपर्यन्तं ततउत्तार्यपेपयेत् ॥ ८५॥ ताबुलेगुंजमानतुदेयं पुष्टिकांपरम् ॥ पांडभियेचशूलेचसर्वरोगेपुयोज यत् ।। ८३ ॥ ० त०।

सप्तमःप्रमोदः ७ । (९९) पश्चात् उसपर दूसरा शराब रखकर सपुट कपडमट्टीसे दृढ करदे और चूहे. पर रखके ३ घडी मदाग्निसे पकावे जब स्वाग शीतल होजाय तब सपुटमें से हिंगुल, भम्मको निकालके खरल करले, इसमेंसे १ रती भस्म पानके सग सेवन करे तो पुष्ट होय ओर पाडु, क्षयी, शूल ये सव रोग दूर होवें.इस भस्म- को समस्त रोगमात्रपर विचारके देना चाहिये ऐसा प्रयातरमे लिखा है । (३॥ ८४ ॥ ८ ॥८६॥ ५ अभ्रकमा०-कृत्वाधान्याभ्रकंतच्चशोषयित्वाथम- दयेत् ॥ अर्कक्षीरैदिनंखल्वेचक्राकारंचकारयेत् ॥ ८७ ॥ वेष्टयेदर्कपत्रैश्चसम्यग्गजपुटेपचेत् ॥ पुनर्मद्यपुनः पाच्यंसप्तवारान्पुनःपुनः ॥ ८८ ॥ ततोवटजटाक्वाथैस्तद्वद्देयंपुटत्रयम् ॥ म्रियते- नानसंदेहः प्रयोज्यंसर्वकर्मसु ॥ ८९ ॥ भा० प्र० पू० खं० २ भा० । अन्यच्च-पीतामलकसौभाग्यपिष्टचक्रीकृताभ्रकम्॥ पुटितंपप्टिवाराणिसिंदूराभप्रजायते ॥ क्षयाद्य खिलरोगनभवेद्रोगापनुत्तये ॥९० ॥ ग्रं० त०। ६ हरितालमा०-पलमेकंशुद्धतालंकौमारीरसमर्दि- तम् ॥ शरावसंपुटेक्षिप्त्वायामान्द्वादशकंपचेत् ॥९१॥ स्वांगशीर्तसमादायतालकंचमृतंभवेत् ॥ गलत्कुष्ठहरेञ्चैवतालकंचनसंशयः॥९२॥ ग्रं०त। भन्नकभरम-भाषानुवाद-प्रथम चान्योधकको आकडेके दूधमें १ १ सद अफसे चतुर्थाश चावल लेकर दोनोंकों कबलके टुकडेमें बाध ३ दिन रात पानीमें भीगनेदे पश्चात् उस पोटलीको उस पानीमे स्य मर्दन करे जब पाटलीमेसे सजक जलमे जाजावे तब उस जलके पात्रको टेटा करदे उसमें जो नाचे जनक जमजावे उसे लेले और ऊपरके पानीको फेकदे इसे पान्याप्रककइतेहैं।

(१००) अनुपानदर्पणः। दिन खरल करके उसकी छोटी २ टिकिया बनाके सुखावे ॥ ८७ ॥ पश्चात् उन टिकियोको आकडेके पत्तोसे लपेट २ कर गजपुटमे फुकदे, जब स्वागशी- तल होजावे पुनः अर्कदूधमे घोटकर पूर्ववत् फूके इसप्रकार ७ बार आकडे दमे घोटघोटके फूकतेजावे ॥ ८८ ॥ पीछे बडकी जडके कायमें गोट २ कर तीनवार फूके तो अभ्रकभस्म होय. इसे समस्त रोगोंमें पृथक् २ अनुपानोंसे देना चाहिये ऐसा भावप्रकाशमे लिखाहै ॥ ८९ ॥ दूसरा प्रकार-वान्यानकमे शुद्ध हरताल आवले का रस और शुद्ध सुहागा मिलाकर घोटे और उसकी छोटी २ टिकिया बनाकर सुखावे पाठे गजपुटमे फकदे, इसप्रकार ६ आचदेनेसे सिदूरके समान अभककी लालभस्म होग गह मम्म क्षयादि सकलरोगोंको नाश करनेमे समर्थ है ऐसा ग्रयांतरमे लिखाहे॥१०॥ हरितालभस्म-2 पल शुद्ध हरतालको गवारपाटेके रसगे घोटकर उनी छोटी २ टिकिया बनाकर उन्हे सुखाकर शरावसपुटमे रख १२ प्रहर- को जाच तो हरतालभाम होय यह गलित कुटादि रोगोका नाश करनी नमर्ग । ॥ २१ ॥ १२ ॥ १० त । ७ वजमारणम्-मेपशृङ्गभुजंगास्थिकर्मपृष्ठाम्लो- नसान् ॥ शशदन्तंसमंपिष्ट्राबजीक्षीरेणगोल. कम् ॥ कृत्वातन्मव्यगंवजम्रियतेऽमातमेनाहि 11 २.३ ॥ मा०प्र०॥

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अष्टमःप्रमोदः ८। (१०१)
८ प्रवालमारणम्-स्वर्णमाक्षिकवन्मुक्ताप्रवालानिचमा
रयेत् ॥ ९४ ॥ शाई।
८ मूंगेकीभस्म०-सोनामक्खाके समान क्रियासे मोती और मूगेभी भस्म
होनहें ऐसा शाईवरमे लिखाहै ॥ ९४ ॥
इति श्रीमत्पडितज्ञारसरामविरचिते भापानुवादविभूपितेऽनु-
पानदर्पणे धातूपधातुरसोपरसरोपरत्नविषोपवियाणा
शोधनमारणविवेककयने सप्तम प्रमोदः ॥ ७ ॥
अथातस्सुवर्णादीनांपक्कापक्कभस्मनोगुणागुणविवे
कं व्याख्यास्यामः ॥ १॥
१ पक्कस्यसुवर्णभस्मनोगुणाः-स्वर्णशीतंपवित्रंक्षयवमि
कसलयासमेहास्रापित्तं
क्षेण्यश्वेडक्षतास्त्रप्रदरग
दहरंस्वादुतिक्तंकपायम् ॥ वृप्यमेधाग्निकान्तिप्रद
मधुरसकं काहानित्रिदोपोन्मादापस्मारशूलज्व-
रजयवपुपोवृंहणनेत्रपथ्यम् ॥ २॥ ग्रं० त० ।
मुवर्णका पक्कामस्म-भापानुवादः- अब हम इसके आगे सुवर्ण आदिके
पक्क (पही ) भस्मके गुण और अपक ( कची ) भम्मक टोपोंको वर्णन
करेंगे ।। १ ॥
१ सुवर्णके पकेमस्मके गुण-सुवर्णभस्म शीतल ( ठटी, शुद्ध, स्वादिष्ट,
तीक्ष्ण, कसे, और मिष्ट है क्षयी, वमन, खाँसी, श्वास, प्रमेह, रक्तपित्त,
वीणना, विष, पार, रक्त ( लाल ) प्रदर, कृशता, त्रिदोप, उन्माद, अप-
रमार ( मृगी,, गूर और ज्वर इन रोगनाशक बल, बुद्धि, काति, पुष्टि,
दिगदर, प्रकाशमा है ॥ २ ॥
अपकस्वर्णभरमदोषाः--वलंचवीर्यहरतेनराणारोगतजा
पोपयतीहकाये ॥ असोख्यकार्यचसदेवहेमाडप
कंसदोपं मरणं करोति ॥ ३ ॥

(१०२) अनुपानदर्पणः। सुन्नेके कच्चेभस्मके दोष-भाषानुवाद-सुनेका कच्चाभस्म बल, वीर्य और सुखकीहानि रोगगणकी वृद्धि, और मनुष्योंको मरण करताहै ॥३॥ ग्र० त०। २ पक्कस्यरजतभस्मनोगुणाः-तारंचतारयतिरोगसमुद्रपा रंदेहस्यसौख्यदमिदं पलितंनिहन्ति ॥ हन्तीहरो गविषदोषमलंप्रसह्य वृष्यंपुनर्नवकरंकुरुतेचिरायुः॥ ॥४॥ ग्रं० त०॥ २ रूपेकेपक्केभस्मके गुण-रूपेका पक्काभस्म रोगसमुद्रसे पारलगानेवाला देहको सुखप्राप्त करनेवाला वृद्धता और विषदोपका नाशकरनेवाला तरुणता और आयुष्य देनेवाला है ॥४॥ अपक्चरौप्यभस्मदोषाः-अशुद्धंरजतंकुर्यात्पांडुकंडुगल ग्रहान् ॥ विविधंवीर्यनाशंचबलहानिश्शिरोरु जम्॥ ॥ग्रं० त०। रूपेकेकच्चे भस्मके दोष-भाषा०-रूपेका कचा भस्म पाडु, खुजली,गलग्रह, कब्जि, वीर्यनाश, बलहानि और शिरोरोगको करताहै ॥ ५ ॥ ३ पक्कस्यताम्रभस्मनोगुणा:-कुष्टप्लीह ज्वरकफमरुच्छास कासार्तिशोफस्तन्द्राशूलोदरकृमिवीपांडुमेहाति सारान् ॥ अशोगुल्मक्षयभ्रमशिरोव्याधिमेहा दिहिक्काइशुद्धंशुल्वंहरति सततंवह्निवृद्धिंकरोति ॥ ॥६॥ग्रन्त। अपक्कताम्रभस्मदोषाः-एकोदोषोविषताम्रत्वसम्यङ्मा रितेऽटते ॥ दाहःस्वेदोऽरुचिर्मू क्लेदोरेकोवमि भ्रमः ॥७॥ भा० प्र०। ३ ताबकेपक्केभस्मके गुण-ताबेफा पक्काभस्म कुष्ठ, पीहा, कृमि, नमन, पाडु, प्रमेह और हुचकीका नाश और अग्निवृद्धि करताहे ॥ ६ ॥ ऐसा अथातरमें लिखाहै अष्टमःप्रमोदः ८। (१०३) तांबेके कच्चेभस्म के दोप-ताबेका कच्चाभस्म दाह, स्वेद, अरुचि, मूर्छ, जीका मलकना, रेचन, वमन और भ्रम इन आठ दोपोंको करताहै ॥ ७ ॥ ऐसा भावप्रकाशमें लिखाहै. ४ पक्कस्यवंगभस्मनोगुणाः-बल्यंदीपनपाचनरुचिकर प्रज्ञाकरंशीतलं सौंदर्यकविवर्द्धनंहृतरुजंचारोगता कारकम् ॥ धातुस्थैर्यकरक्षयक्षयकरंसर्वप्रमेहापह वगंभक्षयतोनरस्यनभवेत्स्वप्नेपिशुक्रक्षयः॥ ८॥ अं० त०। अपक्कस्यवंगभस्मनोदोपाः-पाकेनहीनः खलुवंगको सौकुष्टानिगुल्मानिमहांतिरोगान् ॥ पांडुप्रमेहा पचिवातशोणितंवलापहारंकुरुतेनराणाम् ॥ ९ ॥ ग्रं० त०। ५ पक्कयशदभस्मगुणाः- यशदंतुवरंतिक्तंशीतलंकफ पित्तहृत् ॥ चक्षुष्यपरममेहंपांडुश्वासंचनाशयेत् ॥१०॥ भा०प्र०॥ अपक्कयशददोपाः-~-अपयशदरोगान्प्रमेहाजीर्ण- मारुतान् ॥वमिंभ्रमिकरोत्येनंशोधयेन्नागवत्ततः॥ ॥ ११ ॥ ग्रं० त०। ६ पक्वनागभस्मगुणाः-क्षयपवनविकारेगुल्मपाड्वामये पुभ्रमकृमिकफशूलेमेहकासामयेषु ॥ ग्रहणिगुदग देवेनष्टवहौप्रशस्तः शुभविधकृतनागः कामपुष्टिंद दाति ॥ १२ ॥ ग्रं० त०।

- (१०४) अनुपानदर्पणः। अपक्कनागभस्मदोषा:-कुष्ठानिगुल्मारुचिपांडुरोगान्क्ष यंकफरक्तविकारकृच्छ्रम् ॥ जनराश्मरीशूलभगंदरा ढ्यं नागत्वपक्कंकुरुतेनराणाम् ॥ १३ ॥ ४ कथीलके पक्केभस्मके गुण-भापानु०-वग ( कथील ) का पक्का भस्म वल, रुचि,बुद्धि, शीतलता, सौंदर्यता, कविता,आरोग्यता और वातुस्थि- रताकारक तथा क्षयी, प्रमेहादि समस्तरांगहारक और दीपन पाचन है. वंग- भस्म भक्षण करनेवाले मनुष्यका स्वप्नमेभी वीर्य स्खलित नहीं होता ॥ ८ ॥ कथीलके कच्चेभस्मके दोष-कथीलका कबाभस्म कुष्ट, गुल्म, पाड, प्रमेह, अपचि, वातरक्त इत्यादि महान् रोगकारक और वलहारक होता है॥९॥ ऐमा प्रथातरमें लिखा है ५ जस्तके पक्केभस्मके गुण-जस्तेका पक्काभस्म कसेला, कडवा और उढा है, कफ, पित्त, प्रमेह, कामला और श्वासनाशक तथा दिव्यदृष्टि प्रकाशक है ॥ १० ॥ ऐसा भावप्रकाशमें लिखाहै, जस्तेके कच्चेभस्मके दोप-जस्तेका कच्चा भस्म प्रमेह, अजीर्ण और भ्रमआदि अनेफरोगोंको उत्पन्न करता है ॥ ११ ॥ ६ शीशेके पक्केभन्मके गुण-शीशेका पराभस्म क्षयी, वादी, गुल्म, कामला, भ्रम, कृमि, कफरोग, शूल, प्रमेह, खासी, सग्रहणी, बवासीर, गुदारोग और मदाशिको दुरकरताह तथा वलको बढाताहै ॥ १२ ॥ शीशेके कच्चेभस्मके दोष-शीशेका कचाभस्म, कुठ, गोला, अरुचि, पाडु क्षयी, कफरोग, रक्तविकार, मूत्रकृच्छ्र, पर, पथरी, शूल और भगदर इन रोगोंको प्रगट करताहै ॥ १३ ॥ ७ पक्कलोहभस्मगुणा:-लोहंमृतंकज्जलसंनिभंतुसुंक्ते सदायोरसराजयुक्तम् ॥तस्यैवदेहेनभवन्तिरोगामृ तोपिकामः पुनरेतिधाम ॥ १४ ॥ आयुः प्रदाताव लवीर्यकर्तारोगस्यहर्तामदनस्वार्ता ॥ अवस्समा नंनहिकिंचिदन्यद्रसायनंश्रेष्ठतमंबदन्ति ॥ १५ ॥ .

- अष्टम प्रमोदः ८॥ (१०५) अपलोहमस्मदोवाः अल्पौषधस्तोकपुटेहीन धपारदैः॥ अपक्षलोहचूर्णमायुःक्षयकरंपरम् ॥ १६॥ पण्डत्वकुष्ठालयमृत्यदं भवेद्धृद्रोगशूलौ कुरुतेश्मरीच ॥ नानारुजानांचतथाप्रकोपंकरो तिहल्लासमशुद्धलोहम् ॥ १७॥० त०। ७ लोहे के पलंभस्मके गुण-श्यामवर्णवाले लोहेके पकेभस्मको पारदभस्म सहित जो नित्य सेवन करे उसके शरीरमें कभी रोग उत्पन्न नहीं होते और नष्टहोगया कामभी पुन शरीरमे प्राप्त होताहै ॥ १४ ॥आयु, बल, वीर्य और कामको बढानेवाला, रोगनाशक जैसा लोहभस्महै वैसा और कोई श्रेष्ठ रसायन नहींहै ऐसा बडे २ वैद्य कहते है ॥ १५ ॥ लोहकेकवेभस्मकेदोप-जिसमें लिखित औषध और पुटोंसे न्यून तथा पारे गवक रहित लोहेका कचाभस्म सो आयुको क्षीण करताहै ॥ १६ ॥ तथा नपुसकता, कुष्ट, हृद्रोग, शूल, और पत्थरी आदि रोगोको उत्पन्न करता पौर मृत्युको प्राप्तकरताहै ॥ १७॥ ये सब प्रथातरमें लिखाहै. ८ पक्षसुवर्णमाक्षिकभल्मगुणाः-स्यान्माक्षिकस्ति- कसुदीपनः कटुटुर्नामङ्गुष्ठाभयभूतनाशनः ॥ पांडुप्रनेहक्षयनाशनोलघुस्सत्त्वंमृततस्यसुवर्ण- बद्गुणैः ॥ १८ ॥ ० त०। अपकसुवर्णमाक्षिकभस्मदोपाः-अपकमाक्षिकेणाशु- देहः संक्रमतेरुजा ॥ तदोषविनिवृत्त्यर्थमनुपानं नवील्यहम् ।। १९ ॥ गं० त० । ९ परोपमाक्षिकलगुणाः-माक्षिकोरजतहाटक- प्रमशोषितोतिगुणदस्सुसेवितः ॥ मेहकुष्ठ- कृभिशोफपांडुतापस्मृतिहरतिसोश्मरीञ्जयेत् ॥ ॥ २०॥ ग्रं० त०। . ---- . ॥ (१०६) अनुपानदर्पणः । अपक्करौप्यमाक्षिकभस्मदोषाः-अपक्चरौप्यमाक्षिक- णामयाअनेकाश्चभवन्ति ॥ २१॥ १० पक्कापक्कतुत्थभस्मगुणदोषाः-तुत्थभस्मकफंह- न्तिपामांकुष्ठंविषंकृमीन् ॥ चक्षुष्यंलेखनंभेदि शुद्धिहीनं हि दोषकृत् ॥ २२ ॥ ग्रं० त० । ११ शुद्धशिलाजतुगुणाः-पांडुरंसिकताकारंकर्पूरा- भंशिलाजतु ॥ मूत्रकृच्छ्राश्मरीमेहकामलापाडु- नाशनम् ॥ २३ ॥० त०। अशुद्धशिलाजतुदोषाः-अशुद्धंदाहमूर्छादन्भ्रिमपि त्तास्त्रशोणितम् ॥ शिलाजतुप्रकुरुतेमांद्यमग्नश्च विड्ग्रहम् ॥२४॥० त० ८ सोनामक्खीके पक्केभस्मकेगुण-सोनामक्खी तीक्ष्ण, दीपन,कटु और हलकी है, यह, अर्श, कुष्ठ, पाडु प्रमेह और क्षयीका नाश करती है इसका पकाभस्म सुवर्णभस्मके समान गुणकारकहै ॥ १८ ॥ सोनामखीकेकच्चेभस्मकेदोप-सोनामक्खीके कच्चे भस्मके खानेसे रहमें अनेकप्रकारके रोग उत्पन्न, होतेहैं उनकी शातिका उपाय आगे ९ वें प्रमोदमें वर्णन करेंगे ॥ १९ ॥ ९ रूपामक्खीकेपक्केभस्मकेगुण-रूपामक्खी रूपे और सोनेके समान कातिमती होतीहै यह शोधित अत्यत गुणदात्री और इसके पकभस्मसेवनसे प्रमेह, कुट, कृमि, शोथ, कामला, अपस्मार तथा पथरी आदि अनेक रोग दूर होते हैं ॥ २० ॥ रूपामक्खीकेकच्चेभस्मकेदोष-रूपामखीके कच्चे भस्म भक्षण करनेसे अनेक रोग उत्पन्न होते है ।। २१ ।। १० नीलेयोथेकपकेभस्मकेगुणोरकच्चेकेदोप-नीलेयोथेका पाभरम का, खुजली, कुट, विष, नेत्ररोग और विश्वका नाश करताहै और नीले. थोषका कगनस्म रोगकारकहै ।। २२ ॥

अष्टमाप्रमोदः ८ (१०७)
११ शुद्धशिलाजीतके गुण-शुद्धशिलाजीत मूत्रन्छ, पयर्ग, प्रमेंद्र
कामला और पाडुका नाश करताहे ॥ २३ ॥
अशुद्धशिलाजीतकेदोप-अशुद्धशिलाजीत दाह, मू, श्रम, रक्तपित्त,
रुविरकोप, मदाग्नि और मलावरोध करताहै ।। २४ ॥
१२ पक्वपारदभस्मगुणाः-यावन्नहरवीजंतुभक्षयेत्या
रदमृतम् ॥ तावत्तस्यकुतोमुक्ति गाद्रोगाद्भवा
दपि ॥ २५॥
अन्य०-मातोगदहृत्तथैवखगतिधत्तेविवद्धोऽर्थ
दस्स्याद्भस्मामयवार्धकादिहरणहक्पुष्टिकान्तिप्र
दम् ॥ वृष्यंमृत्युविनाशनंवलकरंकान्ताजनानंद
देशार्दूलातुलसत्त्वकृच्चभुविजान्रोगानुसारीस्फु
टम् ॥ २६॥
अशुद्धापकपारदभस्मदोषाः संस्कारहीनःखलुसृतरा
जोयस्सेवतेतस्यकरोतिवाधाम् ॥ देहस्यनाशंवि
दधातिननंकुष्ठादिरोगाञ्जनयेन्नराणाम् ॥ २७॥
१२ पारेकेपक्केभस्मके गुण-भापानुवादः-जवतक मनुष्य पारेके भस्मका
सेवन नहीं करता तबतक भोग, रोग और ससारसे छुटकारा नहीं पाता॥२१॥
अन्यच्च-मूर्छितपा! रोगोंका नाश और आकाशमार्गमें चलनेकी शक्ति
करंदना, बद्ध (वधाहुआ , पारा धनप्रद होताहै मृतपारा तरुणता,
दिन्यदृष्टि, काति, वीर्य, बल, स्त्रीमभागमें आनद देनेवाला मृत्युनाशक
सिहसमान पराक्रम कारक और समस्त रोगहारक होताहै ॥ २६ ॥
अशुद्ध तथा अपकपारके दोप-अशुद्ध पारेके सेवनसे शरीरपीडा कुछ
आदि अनेक रोग और मृत्युभी होना सभव है ।। २७ ॥
१३ शुद्धरससिंदूरगु०-हरतिचरससिंदूरंकासश्वासा
ग्निमान्द्यमेहगणान् ॥ रक्तविकारंकृच्छ्ज्वरादिरो
गान्यथानुपानयुतम् ॥ २८ ॥

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(१०८) अनुपानदपर्णः।
अशुद्धरससिंदूरदोषाः-रससिंदूरमशुद्धाद्रसांद्विजातं
पारदवद्रोगान् ॥ कुर्याचेतच्छान्त्यैघृतमरिचरजः
पिवेत्तुसप्तदिनम् ॥ २९ ॥ ग्रं० त० ।
१४ रसकर्पूरगु०-देवकुसुमचन्दनकस्तूरिकुंकुमैर्युक्तम् ॥
खादन्हरतिफिरंगव्याधि सोपद्रबंधोरम् ॥ बिन्द
तिवह्वेर्दीप्तिपुष्टिवीर्यवलंविपुलम् ॥ रमयतिरमणी
शतकंरसकर्पूरस्यसेवकःसततम् ॥ ३०॥ भा०प्र०।
अशुद्धरसकर्पूरदोषाः-सेवितोऽविधिनाकुष्टंसन्धिवा
तंकफाधिकम् ॥ रसकर्पूरकंकुर्यात्तस्माद्यत्नेनसे
वयेत् ॥ ३१॥ ग्रं० त०॥
१५शुद्धगन्धकगुणाः-शुद्धोगन्धोहरेद्रोगान्कुष्ठभृत्यु
ज्वरादिकान् ॥ अग्निकारीमहानुष्णोवीर्यवृद्धि
करोतिहि ॥ ३२ ॥ ० त०।
अशुद्धगंधकदोषाः-अशुद्धगंधःकुरुतेचकुष्ठंतापंभ्रम
पित्तरुजांतथैव॥रूपंसखवीर्यवलंनिहन्तितस्माद्वि,
शुद्धोविनियोजनीयः ॥३३॥० त०।
१६शुद्धहिंगुलगुणाः-तिक्तंकषायंकटुहिंगुलस्स्यान्नेत्राम
यन्नंकफपित्तहारी ॥ हृल्लासकुष्ठज्वरकामलाचप्ली
हामवातीचगदंनिहन्ति ॥ ३४॥ ग्रं० त०।
अशुद्धहिंगुलदोषाः-अशुद्धोदरदःकुर्यात्कुष्ठंक्लैव्यंक्लमं
भ्रमम् । मोहंचशोधयेत्तस्मात्सिद्धवैद्यस्तुहिगुल
म् ॥ ३५॥ ग्रं० त०॥
१३ गुदरससिदृरकेगुण-शुद्धरससिंदूर कास, मदाग्नि, प्रमेह, रक्त-
विकार मूत्रकृच्छ् और घर आदि अनेकरोगोंका पृथक् २ अनुपानसे नाश
नाम्ना ।। ॥ २८ ॥

7 अष्टमाप्रमोदः ८। (१०९) अशुद्धरमसिंदूरकेटोप-अशुद्धरससिदूर अशुद्धपारकेसमान रोगीको उत्पन्न करताहे ॥ २९ ॥ यह सत ग्रथातरमे लिखाहे । १४ शुद्धरसकर्पूरगुण-लग चदन कस्ती और केशर सग गुद रस- कपूर सेवनकरनेमे घोरउपयोसहित फिरगरोग दूर होताहै और इसका सेवन करनेवाला पुल्प अग्निदीपन, पुष्टि, बल, वीर्य और शतस्त्रीरमणशक्तिको प्राप्त होताहै ऐसा भावप्रकाशम लिखाहै ॥ ३० ॥ अशुदरसकर्पूरदोप-अशुद्धरसकर्पूरसेपनसे कुष्ट, सधिनात ( गठिया ) और कफबाहुल्य आदि रोग उत्पन्न होते ॥ ३१ ॥ १५ शुद्धगंधकगुणा -शुद्धगधक कुष्ट, मृत्यु, घर आदि रोगनाश अग्निप्रकाश और वीर्यवृद्धिको करताहै ॥ ३२ ॥ अशुद्धगंधकदोप-अशुद्धगन्धक कुष्ट, ताप, भ्रम और पित्तरोगको उत्पन्न और रूप सुख वल तथा वीर्यका नाश करताहै ॥ ३३ ॥ १६ शुद्धहिगुल केगुण-शुद्धहिगुङ तीखा, कपैला और कटवा है, नेत्र- रोग, कफरोग, पित्तरोग हृद्रोग, कुष्टञ्चर, कम छ । पीलिया ) तापतिल्ली और आगवान इन रोगोका नाश करताहै ॥३॥ अशुद्रहगुलदोप-अशुहिगुल नपुग्नकता, परिश्रम भ्रम और मोह उ-पन्न करताह इमलिये इसे सदैव उत्तमप्रकारमें सोये ॥ ३५ ॥ १७ पकानकभस्मगुणाः-मृता कंकामवलप्रदंचविष- मरुच्छासभगन्दराख्यम्मेहभ्रमंपित्तकफंचकासं क्षयंनिहन्त्येवयथानुपानात् ॥ ३६॥ ग्रं० त०। अपक्षानकायस्मदोषा:-चन्द्रिकासहितमत्रकयदाजीवि तंझटितिनाशयेत्तदा ॥ व्याबरोनइवचोदरस्थि. तंवातनोवितनुतेगदान्वहन् ॥ ३७ ।। पं० न०। ।। म Hill it 1 4:1र दि. १ (ना 1 ॥

- (११०) अनुपानदर्पणः। १८ पकहरितालभस्मगुणाः अशीतिवातान्कफपित्त रोगान्कुष्टंचमेहंचगुदामयांश्च ॥ निहन्तिगुंजार्द्ध मितंततालं षडूवल्लखंडेनसमंचयुक्तम् ॥ ३८ ॥ अपक्वहरितालभस्मदोषाः-अशुद्धतालंखलुपीतवर्णसधू मकंवातचयंचपित्तम् ॥ पद्धत्वकुष्ठंतनुतेचतेनदेहस्य नाशंगकरोतिसद्यः॥३९॥ १९ शुद्धमनश्शिलागुणाः-मनश्शिलासर्वरसायनाख्या तिक्ताकदृष्णाकफवातहंत्री ॥ सत्त्वात्मिकाभूतवि पानिमांद्यकच्चकासक्षयहारिणीच ॥४०॥ अशुद्धमनःशिलादोषाः-मनश्शिलामंदवलंकरोतिजंतु न्ध्रुवंशोधनमन्तरेण ॥ मलस्यवन्धंकिलमूत्ररोगंस शर्करंकृच्छ्रगदंचकुर्यात् ॥ ४१ ॥ २० शुद्धसौवीरगुणाः-सौवीरंग्राहिमधुरंचक्षुष्यंकफवा- तजित् ॥ सिध्मक्षयात्रनुच्छीतस्रोतोञ्जनमपीदृशम् ॥ ४२ ॥ म०प०नि०। अशुद्धसौबीरदोषाः-अशुद्धसौवीरादेहेनेत्रेचभवन्तिरो गाः॥४३॥ १७ अभ्रकके पकेभस्मके गुण-अधकका पका भस्म काम और क्लप्रद तथा विप, वातश्वास, भगदर, प्रमेह, भम, पित्त, कफ, कास और क्षयी नाशकहै ॥ ३६॥ अभ्रक कच्चेभस्मके दोप-अधकका कच्चा चमकदार भस्म खानेसे थोदेही कामें अनेक रोग शरीग्में उपन्न होतेहै और प्राणहानि हो तोभी कोई आश्चर्य नही जैने निहका केटा (बाल ) पेटमे जानेसे अनेक रोग होजाते? me ने।।२॥

अष्टम प्रमोदः टा (१११) - १८ हरितालकपकमस्मकण-हरितालकापकाभस्म ८० प्रकारके वातरोग, पित्तरोग, कफरोग, कुष्ट, प्रमेह और गुदाके रोगोका नाश करताहे इसकी आधी चिरमिठी मात्रा ६ रती मिश्री सग खाना चाहिये ।। ३८ ।। हरितालकेकच्चेभस्मकेदोप-पीत अग्निपर डालनेसे जिससे धूवा निकले ऐसा हरतालका कच्चा भस्म वातव्याधि. पित्त पगुलरोग और कुष्ठको उत्पन्न करता तथा देहका नाश करता है ।। ३९ ॥ १९ शुद्धमनशिलके गुण-शुद्धमनशिल-सर्व रसायनमे, तीक्ष्ण, कटु, उष्ण और सत्त्व ( सत ) रूपहै यह कफ, वात, भूत, विप, अग्निमाद्य, खुजली, कास और क्षयर्याको दूर करताहै ॥ ४० ॥ अशुद्धमनशिलके दोप-अशुद्धमनशिल-अत्पबल, कृमि, मलावरोध, मूत्ररोग ओर पथरी सहित मूत्रकृच्छको उत्पन्न करता है || ४१ ॥ २० शुद्धकालेसुरमेकेगुण-शुद्ध काला सुरमा ( सोवीर ) ग्राही, मधुर, ठढा नेत्ररोगहारक, कफ, वात, सिव्या ( विभूति ) क्षयी और रक्तज रोग नाशक है. इसी प्रकार स्रोतोजनभी होताहे ॥ ४२ ॥ अशुद्ध कालेसुरमेकेदोप-अशुद्रकाले सुरमेसे देहमे और नेत्रमें अनेक रोग उत्पन्न होते हैं ।। ४३ ॥ २१ शुद्धखर्परगुणाः-त्रिदोपजित्पित्तकफातिसारक्षयज्य रनोरसकोतिरूक्षः ॥ नेत्रामयानांप्रकारोतिनाशं स्याद्रजकःकामलनाशनश्च ॥४४॥ ग्रं० त०। अशुद्धखर्परदोपाः-अशुद्धःखर्परःकुर्याद्वांतिंभ्रांतिवि शेपतः ॥ तस्माच्छोध्याप्रयत्नेनयावद्वान्तिविव जितः॥४५॥ ग्रं० त०। २२५पयजनस्मगुणाः-आयुः प्रदसगुणदंचवृप्यंदोपत्रय प्रशमनंसफलामयनमसतेन्द्रवंधवधसगुणदंप्रदी संमृत्युजयेत्तदमृतोपममेववत्रम् ॥ १६ ॥ ० त

4
(११२) अनुपानदर्पणः ।
अशुद्धापकरजभस्मदोषाः-पीडांविधन्नेविविधानराणां
कुष्टंक्षयंपांडुगदंचदुष्टम् ॥ हृत्पादपीकुरुनेशितः
स्सहामशुद्धवज्रगुरुवात्महत्यजेत् ॥४७॥ यतः।
२३ पक्कवैक्रांतभस्मगुणाः-वैकातवजासहशोदेहलोहक
रोमतः ॥ विषप्तोरसराजस्य ज्वरकुष्ठक्षयप्रणुत्
॥४८॥अंतः।
अशुद्धपक्कवैक्रांतभस्मदोषाः-अशुद्धवैक्रांतोवजयदो
पकर्ताभवति ॥ ४९॥
२४ शुद्धप्रवालभस्मगुणाः-प्रवालंमधुरंसाम्लंकफपि
तार्तिदोषनुत् ॥ वीर्यकांतिकरंस्त्रीणांवृतमंगलदा
यकम् ॥ ५० ॥
क्षयपित्तास्त्रकासनंदीपनंपाचनंलधु ॥ विषभूतादि
शमनविद्रुमनेत्ररोगहृत् ॥ ५१ ॥
अशुद्धप्रवालदोषाः अशुद्धप्रवालभक्षणाद्भवन्तिरोगा
ह्यनेकाः॥ ५२॥
२१ शुद्धवपरियाके गुण-शुद्र सपरिया रुखाहै त्रिदोष, पित्त, कफ,
अतिसार, क्षयी, ज्वर, नेत्ररोग कामला नाशक और कातिविकाशक है ॥४४॥
अशुद्रखपग्यिाके दोप-अशुद्ध खपरिया वाति चातकारक हो- है इस
डिओ वानिकारक दोष दूर होनपर्यन्त इसका शोवन करना चाहिये ॥ १६ ॥
२२ होये पकभरसके गुण-हीरका पक्का भन्म ८[यु मण, क. नाथ
कारक, त्रिदोष सकल रोग तथा मृत्युहारक, पारद मारक और अमृत समान
नमारक हे ॥ १६॥

अष्टमःप्रमोदः ८॥ (१९३) अशुद्ध हीरेकेतथाकच्चेभस्मके दोप-अशुद्ध हीरा तथा इसका कच्चा भस्म 1 मनुष्योंके अनेक प्रकारका पीडा कुष्ट, क्षण, पाडु, पीडा पार्वपीडा और मृत्युभी कर देताहै ॥ ४७ ॥ २३ कातके भस्मके गुण-वैक्रातका पक्का भस्म हीरेके भस्मसमान गुणकर्ता देह दृढ करनेवाला और पारेका विप, नर, कुष्ट, तथा क्षयी इनका नाशकरनेवाला है ॥ ४८॥ वैकातकाचेमस्मके दोप-बैकातका कचा भस्म हीरेके भस्म समान दोपकारक है ॥ ४९ ॥ २४ शुद्ध के गुण-शुद्धमूगा मधुर और कुछ अम्ल हे कफ पित्तजन्य पीडा क्षयी रक्तपित्त, काश विप, भूतबाधा और नेत्ररोग इनको दूर करनेहारा स्वियोके मगलदायक और दीपन तथा पाचन है ॥ ५० ॥ ११ ॥ अशुद्धमूगेकेटोप-भापानु०-अशुद्धमूगेके भक्षणसे अनेकरोग होतेहैं ५२ .५ २५ विपस्यगुणानुणप्रदर्शनम्-विषप्राणहरप्रोक्तव्य वाविचदिकाशिच ॥ आग्नेयंवातकफहृद्रोगवाहि मदावहम् ॥ ५३ ॥ तदेवयुक्तियुक्तंतुपाणदायिर सायनम् ॥ पथ्याशिनांत्रिदोषनंबृंहणंवीर्यवर्द्धनम् ॥५४॥ येदुर्गुणाविषेऽशुद्धेतस्थहीनाविशोधनात् ॥ तस्माद्वियंपयोगेषशोधयित्वाप्रयोजयेत्॥५५॥यंत. २५ विपदोपऔरगुणाकादर्शाव-अशुद्र विष प्राण हर्ता सर्व देहमें प्राम होवार पश्चात् पचनेवाला आजको मुग्वाकर सधियोको टीला करदेनेवाला पन्यन्त उष्ण, वाल, वफहारक, देहीं रमजानेवाला और मदकारक है ॥५३॥ और यही शुद्र विष युक्तिसे सेवित प्राण, वर, वीर्य, बुद्धिदायक, त्रिदोपनाशक और पव्याने खाने वाले का वीर्यवर्द्धक है ।। ५४ ॥ जो अशुद्ध विपमे दुर्गुण (दोष) वर्णन किया व सातदोष शोधनसे तर होनात इसलिये विपन्त शुद् कर- है जिनकारना ॥५२! यह सब पयातरमें लिखा. इति दिनचरसमितेका नुवादपिपितेऽनुपानपरेतपर्णा दानापमापकानम्मनोगुणागणाति कमायनेऽटग प्रमोद ॥ ८ ॥ प..।।

(११४) अनुपानदर्पणः। अथातोऽपक्वधात्वादिदोषशान्तिविवेकं व्याख्यास्यामः॥१॥ १ अपक्कस्वर्णदोषशांतिः अभयासितयाभुक्तात्रिदिनं नृभिरंगजेहेमदोपहरीख्यातासत्यंसत्यंनसंशयः२ २ अपक्चरौप्यदोषशांतिः-शर्करामधुसंयुक्तालेवयेद्यो दिनत्रयम्॥अपक्करौप्यदोषेणविमुक्तःसुखमश्नुते३ ३ अपक्वताम्रदोषशांतिः--मुनिव्रीहिसितापानंवाधा न्याकंसिताञ्चकैः ॥ ताम्रदोषमशेषवैपिवन्हन्यादि नत्रयैः॥४॥ ४ अपक्कवंगदोपशातिः मेषशृंगीसितायुक्तांयस्सेवति दिनत्रयम्॥वंगदोपविमुक्तोसौसुखंजीवतिमानवः५ ५ अपक्कयशददोषशांतिः-बलाभयांसितायुक्तांसेवये द्योदिनत्रयम् ॥ यशदस्यविकारोस्यनाशमायाति नान्यथा॥६॥ ६ अपक्वनागदोपशांतिः हेमाहरीतकींसेवेत्सितायुक्तां दिनत्रयम्॥अपक्कनागदोषेणविमुक्तस्सुखमेधते ७॥ ७ अपक्वलोहदोषशांतिः---मुनिरसपिष्टविडंगंमुनिरस - लीढचिरस्थितेधर्मे ॥द्रावयतिलोहदोपान्बहिर्नर नीतपिण्डमिव ॥८॥ ८ अपक्कलोहजन्यकीटशांतिः-आरग्वधस्यमज्जातुरेच नकीटशांतये ॥ भवेदप्यतिमारश्चपीत्वादुग्धंतुत- त्यजेत् ॥९॥ ५ - नवम प्रमोदः९। (११५) अब कचीधातु आदिके खानेसे जो विकार होतेहैं उनके शान्तिका विवेक वर्णन करेंगे ॥ १॥ अपक्कसुवर्णदोषशाति-भापानुवादः- हर्ड और मिश्रीको तीन दिन खानेसे अशुद्ध ( कच्चे ) सुवर्णभस्म सेवनसे जो विकार हुए हो वे सब शान्त होये ॥२॥ अपक्चरौप्यदोपशाति-मिश्री और सहतका तीन दिन सेवनकरनेसे चाँदीके कच्चे भस्मजन्य विकार शात होय ॥ ३ ॥ ३ अपकताम्रदोपशाति-मुनित्रीहि ( सावा ) अथरा धनियेको मिश्री सग मिलाकर जलके साथ ३ दिनतक पानकरे तो कवे ताम्रजनित दोप शात (दूर ) होय ॥ ४ ॥ अपक्कवंगदोषशाति-मेडासिंगीको मिश्री सग तीन दिनतक सेवनकरने ने कच्चे वग ( कपील) विकार शान्त होवे ॥ ५॥ ५ अपक्कयशददोपशाति--छोटी हर्ड और मिश्रीका तीन दिन पर्यन्त सेवन करनेसे कई जस्त भस्मके खानेसे जो विकार हुए हों वे समस्त शान्त होय ॥६॥ ६ अपकनागदोपशाति-चोख और हर्ड मिश्री सग३दिनपर्यन्त सेवनकरनेसे उपक नाग (सीसा ) विकार शात होय ॥ ७ ॥ ७ अपक्वलोहदोपशाति-अगस्त्यवृक्षके रसमें वायविडगके चूर्णको मिला कर सेवन करे और बहुत कालतक चूपमें बैठे तो कच्चे लोहभस्म जन्य दोष (विकार)दूर होय जैसे अग्नि माखनको पिघला देतीहै वैमही यह उपचार अपक्क रोहविकारको पिघलाकर जडसे दूर करदेताहै ॥ ८ ॥ ८ अपक्कलोहजन्यकीटगाति-अपक्क ( कच्चे ) लोह भस्मसे यदि पेटमे कृमि (क्रीडे) पटजावें तो अमलतासका गूदा खावे जिसमें रेचन (दस्त) होनेसे समस्त पेटके कीटे बाहर निकल जायेंगे पश्चात् दूधको पानकरे और उस अपक्क लोह- जस्म सेवनका त्यागनकरदेवे ॥ ९ ॥ ९ अपक्कस्वर्णमाक्षिकदोपशांतिः-कुलत्थस्यकषायणमा क्षिविकृतिशान्तिकृत् ॥ तथैवटाडिमंत्वग्वैदेयंदे हसुखार्थिने ॥ १० ॥० त०॥

(११६) अनुपानदर्पण। १० अपक्करौप्यमाक्षिकदोषशांतिः--विकारोयदिजायेत विमलायानिषेवणात् ॥ शर्करासहिताभक्ष्यामेष शृंगीदिनत्रयम् ॥ ११ ॥ अं. त. ॥ ११ अपक्कतुत्थदोषशांतिः-जंबीररसमादाययःपिवेच्चदि नत्रयम् ॥ तस्यतुत्थकशांतिःस्यात्तद्वल्लाजाजवारि णा॥ १२ ॥ ग्रं. त.। १२ अशुद्धशिलाजीतदोयशांतिः-मरीचंघृतसंयुक्तंसेवये दिनसप्तकम् ॥ शिलाजतुभवंदोषंशान्तिमानाति निश्चितम् ॥ १३ ॥ अं० त.। ९कच्चीसोनामक्खीकेदोषोंकीशांति-भाषानुवादः-कुलथीके काटेसे अथवा अनारकी छालके कायसे कच्ची सोनामक्खीके विकार शात होय ॥ १० ॥ १० कच्चीरूपामक्खीकेदोपोंकीशाति-मिश्री सहित मेढासिंगीका चूर्ण ३ दिन पानेसे कच्ची रपामाखीके विकार शात होय ॥ ११ ॥ ११ कच्चेनीलायोथेकेदोपोकीशांति-३दिनपर्यन्त जतीकेि रस अथवा लाही (वानकीपील के जल पानसे पचे नीलेथायजन्य विकारोकी शाति होय १२॥ १२ अशुद्धशिलाजीतकेदापोकीज्ञाति-काली मिरच और वृत ७ दिनपर्यन्त सेवन करनेसे अशुद्ध शिलाजीतके भक्षणमे जो विकार हुए हो उनकी शानि होय ॥ १३ ॥ १३ अशुद्धापकपारददोपशांतिः-विकारायदिजायन्तेगा रदान्मलतंयुतात् ॥ गन्धकंलेवयेन्द्रीमान्पाचितंवि धिपूर्वकम् ॥ १४ ॥ यं त । १? अशुद्धररासिंदृरदोगशालिः लसिंदृशान्त्येवृतम रिचरजःपिवेल्मतदिनम् ॥ १५॥ +

नवमःप्रमोदः ९। (११७)
१५ अशुद्धरसकर्पूरमेषशांति-महिपाशकृतानीरंवान्या
कंवासितायुतम् ॥ पिवेन्नीरेणमुक्तःस्याठसकपुरजें
गदैः ॥१६॥. त.।
१६ अशुद्धगंधकदोषशांतिः-विकारोयदिजायेतगन्धका
चेत्तदापिवेत् ॥ गोघृतेनान्वितंक्षीरसुखीस्यात्स-
चमानुषः॥ १७॥ ग्रं० त.।
१७ अशुद्धहिंगुलदोषशांतिः-उत्पद्यतेयदाव्याधिदरद-
स्यनिपेवणात् ॥ तदासूतकवत्सर्वाकुर्य्याच्छान्ति
प्रतिक्रिया ॥ १८॥ ग्रं. त.।
१८ अपक्काभ्रकभस्मदोषशांतिःउमाफलंबनेपिष्टासेवये
योदिनत्रयम् ॥ अशुद्धाभ्रकदोपेणविमुक्तस्सुखमे
धते ।। १९ ॥ ग्रं. त.।
१९अपकहरितालभस्मदोपशांतिः-अजाजीशर्करायुक्तं
सेवयेद्योदिनत्रयम् ॥ विकृतिस्तालजाहन्याद्यथा
दारिद्र्यमुद्यमे ॥ २० ॥ . त.।
२० अशुद्धमनश्शिलादोषशांतिः गोक्षीरंमाक्षिकयुतं
पिवतेयोदिनत्रयम् ॥ कुनटीतस्यदेहेचविकारंन
करोतिहि ॥ २१॥ गं.त.।
२१ अशुद्धसाबीरदोपशांतिः-निफलासेवनाद्भवतिसौ
वीरजनितविकाराणाशांतिः ॥२२॥

( ११८) अनुपानदर्पणः। २२अशुद्धखर्परदोषशांतिः रसकनिषेवणतोयदिरोगाः प्रादुर्भवन्तिमनुजानाम् ॥ तेनाशमाप्नुवन्तिपीतं गोमूत्रसप्ताहम् ॥ २३ ॥ ग्रं. त,। १३ अशुद्धतथाकञ्चेपारेकेदोषाकीशाति-शुद्ध गधकके सेवनसे अशुद्ध तथा अपक ( कच्चे ) पारेसे जो विकार उत्पन्न हुएहों उनकी शातिहोय ॥१४॥ १४अशुद्धरससिंदूरकेदोपोकीशाति-७ दिनपर्यन्त काली मिरचका चूर्ण घीके सग सेवनकरनेसे अशुद्ध रससिदूर खानेसे जो विकार उत्पन्न हुएहो उनकी शाति होय ॥ १५ ॥ १५ अशुद्धरसकर्पूरदोपशांति-भैसके गोबरका रस अथवा मिश्री सहित चनियाँ जलसे पान करतो अशुद्ध रसकर्पूर जन्य विकार शात होये ।। १६ ।। १६ अशुद्धगंधकटोपशाति-गोवृत सहित दूध पीनेसे अशुद्र गवफके विकार शात होय ॥ १७ ॥ १७ अशुद्धहिगुलकेदोपोकी शांति-अशुद्ध पारेके विकाराकी शातिको जो उपाय पूर्व कह चुके, वही अशुद्र हिगुलके विकारोकी शातिका उपाय जाना ॥ १८ ॥ १८ कच्चेअभ्रककेदोपाकीशांति-आचलेको पानीमें पीसके टंढाईके समान छानकर ३ दिनतक पीवेतो अशुद्ध अभ्रकजन्य दोप ( विकार ) शात होय ॥ १९॥ १९ हरितालकेकच्चेभस्मकेदापाकीगाति-जीरा और मिश्री मिलाकर ३ दिनतक सेवन करतो अशुद्ध ( कच्चे) हरितालके विकार शात होय ॥ २० ॥ २० अशुद्धमनशिलकेदोषाकीगाति-३ दिनपर्यन गौके धर्म सहत मिलाकर पीनेमे अशुद्र मनशिलके विकार शात होय ।। २१ ॥ २१ अशुदमरमंकेदोपाकीशाति-त्रिफला सेवन कग्नेस अशुद्ध सुरमक पिकार शात होय ॥ २२ ॥ २२ यशुदखपाग्यिकेदापांकीमाति- ७ दिनपर्यन्त गोमूत्र गानसे संयुः सारिका के दोय ‘विकार । शात हाय ।। २३ ॥

नवमःप्रमोदः ५। ( ११९) ३ अशुद्धापक्ववज्रभस्मदोषशांतिः-सितामधुघृतस्सा कंगोदुग्धदिनसप्तकम् ॥ विधिनासेवितंहतिवज्रदो पंचिरोत्थितम् ॥ २४॥ २४ अशुद्धापक्कवैक्रांतभस्मदोषशांतिः-शुद्धवैक्रांतभ स्मशांतिर्वजवज्ज्ञेया ॥ २५ ॥ २५ अशुद्धप्रवालदोषशांतिः- :-अशुद्धप्रवालमौक्तिकयोर पिविकारशांतिर्वजवज्ज्ञेया ॥२६॥ २६ विपदोपशांतिः-अतिमात्रयदाभुक्तंवमनंतस्यका रयेत् ॥ अजादुग्धंददेत्तावद्यावद्वांतिर्नजायते ॥ ॥ २७ ॥ ग्रं० त०। अजादुग्धंयदाकोप्टेस्थिरीभवतिदेहिनः ॥ विषवे. गंततोजीर्णजानीयात्कुशलोभिषक् ॥ २८॥ ग्रं. त. २७ जैपालदोपशांतिः-धान्याकंसितयायुक्तंदधिनास हयःपिवेत् ॥ देहेजपालजोव्याधि शमाप्नोतिनि श्चितम् ॥ २९ ॥ ग्रं, त.। २३ अगुद्धतथाकचहींरकेदोपाकीशाति-दिनतक मित्री सहत आर पामहित गोका ग्ध पीनेने अशुद्र तथा अपफ ( कये । हरिक समस्त पिकार शात होय ॥ २४ ॥ २४ अगुवकातदोपशानि-होरेके विकारशाति उपायमे वाति विका- रकी नाति होताह !॥ २५ ॥ २५ अशुद्धमुंगकंदापाकीगानि-अशुद्ध मृगे और मोतीके विकार निका उपचार नी अगुद हीरफे विकार शातिक उपचार समान जानो २६ ॥ ~ --- ( १२०) अनुपानदर्पणः। २६ विपदोपगांति-बच्चनाग आदि अशुद्ध पा राधिक माग आजाने तो उसे वमन (डल्टी ) करावे ओर बकरी के दूधका , न जाये ना वह दूध पचकर वमन न हो तब जानलो कि, विप दोष गातहुआ ॥२७॥ २८॥ २७ अशुद्धजमालगोटेकेदोषोकीशांति-वनिगा और मित्रो दहीम मिलाकर खिलानेसे अशुद्र जमालगोटेके समस्त विकार शात होय ॥ २९॥ ये सब उपाय प्रथान्तरमें लिखेहैं गीतिः । अडाध्यताब्जेव्देचैत्रेशुभ्रेचरामजन्भनियो । ज्ञारसरामश्चक्रेऽनुपानदर्यणममुंकुजेपूर्णम् ॥ ३० ॥ इति श्रीमत्पण्डितज्ञारसरामविरचितेभाषानुवादविभूषितेऽनुपानदर्पणे पापात्लादिदोपशातिविवेककयनेनयम प्रमोदः ॥५॥ समातोऽयंग्रन्थः। इस ग्रंथकाका जन्मसंवत्तादि । श्रीमद्विक्रमवत्सरेवसुधराकेन्दावभूदुद्भव स्तात:श्रीवलदेवसृरिरमलेवंशेदधीचःप्रभोः॥ चेपेविश्वतिथोविधासितदलेता हगाड्यामलो मेडतोतारसरामनामजगतिश्रीकानानाम॥१॥ पुस्तक मिटनेता ठिकाणा- खेमगज श्री 'विइंटर' स्टी .

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(५०) अनुपानदर्पण । अथ हिंगुलानुपानानि । वामावश्यकरस्तथामयहरस्संमारितोहिंगुलाक- न्दर्पत्रिसुगंधिनाशुतनुतेवह्निम्बलंसन्मतिम्॥ता म्बूलेनसखेनिहन्तिकसनश्वासंसमस्तावरान्दे योऽन्येषुविचार्यसद्गुणयुतैरोगेषुवैद्यैर्धिया॥१०४॥ भाषानुवादः-अव हिंगुलके अनुपान वर्णन करते है, स्त्रीवशका सफलरोगहारक, हिगुलभस्म त्रिसुगवि सग देनेसे कामको, अग्निको, वल : बुद्धिको बढाता है और ताबूल सग देनेसे हे मित्र कास, श्वास और सर ज्वरोंका नाश करता है इनसे व्यतिरिक्त रोगोपर अपनी बुद्धिसे सद्वैद्योंनें कि कर देना चाहिये ॥ १०४ ॥ यह श्लोक हमने अनेक वैद्यक प्रथाशयानु बनाकर लिखा है. अथाभ्रकानुपानानि । शुद्धाभ्रननुवल्लकद्वयमितंकृष्णामधुभ्यायुतंमेहंश्वा सविषंचकुष्ठमतुलंवातंचपित्तंकफम् ॥ कासक्षीण क्षतक्षयंग्रहणिकांपाण्डुंभ्रमंकामलांगुल्मायंचतथा नुपानविधिनामृत्युंचजेजीयते ॥ १०५॥ अन्य च ॥ अभ्रकंचनिशात्यक्तेपिप्पलीमधुनासह ॥ विंशतिंचप्रमेहानांनाशयेन्नात्रसंशयः॥ १०६ ॥ अभ्रकंहेमसंयुक्तंक्षयरोगावनाशनम् ॥ रौप्यमा भ्रकंचैवधातुवृद्धिकरंपरम् ॥ १०७ ॥ गोक्षीरशर्क रायुक्तपित्तरोगविनाशनम् ॥ शैलजपिप्पलीचर्ण माक्षिकैस्सर्वमेहहृत् ॥ १०८ ॥ अभयागुडसंयुक्तं वातरक्तं नियच्छति ॥ स्वर्णयुक्तक्षयंहन्तिधातु .

पञ्चमःप्रमोदः ५। (५१) द्धिंकरोतिच ॥ रक्तपित्तंनिहन्त्याशुचैलाशर्करया सह ॥ १०९॥ अन्यच्च ॥ सितामृतासत्त्वयुतमेहंना शयतेध्रुवम् ॥ वरामधुधृतश्शाकंवीर्यकृच्चक्षुरोग हृत् ॥ ११० ॥ एलागोक्षुरभूधात्रीशर्करासहितं तथा ॥ गोदुग्धेनयुतंहन्तिमूत्रकृच्छंप्रमेहकम् ॥ ॥१११॥ त्रिषुगन्धवराव्योषशकरानागकेसरम् ॥ माक्षिकेणनिहन्त्याशु पाण्डुरोगक्षयंज्वरम् ११२ अन्यच्च ॥ वल्लंव्योषसमन्वितंघृतयुतंबल्लोन्मितं. सेवितंदिव्याभ्रंक्षयपाण्डसंग्रहणिकाशूलंचकुष्ठा- मयम् ॥ सर्वश्वासगदंप्रमेहमरुचिंकासामयंदु- द्धरंमन्दाग्निंजठरव्यथांपरिहरेच्छोषामयानिश्चि तम् ॥ ११३ ॥ भाषानुवादः-अब अभ्रको अनुपान वर्णन करतेहै पीपल और सहतसग १ रत्तीसे लेकर ६ रत्ती पर्यन्त शुद्ध अभ्रकभस्म भक्षण करनेसे प्रमेह, श्वास, विप, कुष्ठ, वात, पित्त, कफ, खाँसी, क्षीणता, क्षयी, व्रण, सग्रहणी, पाडु, धम, कामला, और गुल्म,ये रोग दूर होय विशेषतो क्या, पर यदि उक्तानुपान विधिसे अभ्रक सेवन करनेवाला मनुष्य मृत्युकोभी जीतताहै ॥ १०५ ॥ प्रात काल पीपल और सहतसग अभ्रकभाम सेवनमे २० प्रकारके प्रमेह दर होय । १०६ ॥ सोनेक पत्ती ( वा) के सग क्षयीका नाश करताहै-चादी मिनाकी भस्मसग अभ्रकभस्म खानेसे धातुवृद्धि होय ॥ १०७ ।। गोदुग्ध और श्रीसग पित्तरोगका, शिलाजीत, पीपल, सुवर्णमाक्षिक भस्म इनके सग सब महोका ॥ १०८ ॥ ई और गुडके सग वातरक्तका-और सोनेके वकोके ग अबकभस्म क्षयीका नाश करताहै तथा धातुको वटाताहै तथा इलायची 'और शर्करासग रक्तपित्तका नाश करताहै ।। १०२ ॥ मित्री और गुरचसत्त्वके तुमग अबकभम प्रमेहको दूर करताहै-त्रिफला, सहत और घृतसग वीर्यको : । त (५२) अनुपानदर्पणः। बढाताहे और नेत्ररोगको हटाताहे ॥ ११० ॥ इलायची, गोखरू, भूआवला, मिश्री, और गोके दूध सग अभ्रकमस्म मूत्रकृन्छू और प्रमेहका नाश करताहे ।। १ १ १ ॥ त्रिसुगध, तज, पत्रज, इलायची, त्रिफला, त्रिकटु, मिश्री और नागकेशर इनके चूर्णको सहतमें मिलाकर उसके सग अभ्रकभस्म खाये तो पाडु, क्षयी और अर ये सब दूर होय ॥११२ । इसीप्रकार बायविडग,सोंठ, मिरच, पीपल, और गौका घी इनके साथ ३ रत्ती अभ्रकभस्म भक्षण करे तो, क्षयी, पाडु, सग्रहणी, शूल, कुष्ट, समस्त श्वास, प्रमेह, अरुची, कास, मदाग्नि, उदरव्यावि और शोपरोग ये सब दूर होय यह निश्चय जानिये ॥ ११३ ॥ अथ हरितालानुपानानि। अनुपानान्यनेकानियथायोगंप्रयोजयेत् ॥ गुडू- च्यादिकषायेणगदानेतान्व्यपोहति ॥११४॥ सो पद्रवंवातरक्तंकुष्ठान्यष्टादशापिवा ॥ सर्वरक्तवि- कारेषुदेयमाम्रहरिद्रया ॥ ११५॥ सुहालाहल जीराभ्यामपस्मारहरंपरम् ॥समुद्रफलयोगेनज- लोदरविनाशनः ॥ ११६॥ देवदालीरसैर्युक्तंभगं दरहरंपरम्॥फिरंगदोषजंरोगंजातहन्तिसुदुस्तर- म् ॥११७॥ मंजिष्ठादिकषायेणकुष्ठमष्टादशंज- येत् ॥ त्रिफलाशर्करायुक्तंपाण्डुरोगंजयत्यसौ ॥ ॥११८।। शुण्ठीचूर्णयुतंहन्यादामवातंसुदुर्जयम्।। सौवर्णभस्मयोगेनरक्तपित्तविकारनुत् ॥ ११९॥ तन्दुलीयरसैश्शाकंज्वरमष्टविधंजयेत् ॥ एवंस- पुरोगेषुस्ववुद्धयाकल्पयद्भिषक् ॥ १२० ॥ भाषानुवादः-अब हरितालभस्मके अनुपान वर्णन करतेहैं. हरितालभ रोगानुसार यथायोग्य अनुपान सग देना चाहिये.गुडूच्यादि काथ सग हरित १ गुच्यादि काय शार्ङ्गधरादि प्रन्यों में देखलो पञ्चमःप्रमोदः ५। (५३) भस्म॥११४ ॥ उपद्रव सहित वातरक्तका तथा १८ प्रकारके कुष्ठका नाश कर- ताहै,अविया हरिद्रासग सब रुधिरविकारमे हरितालभस्म देना चाहिये।।११५॥ विप और जीरेके सग अपस्मार ( मृगी) का समुद्रफलसग जलोदर (जिसे लोकमे जलधर ) कहतेहै उसका ॥११६॥ देवदालीके रससग भगदरका तथा फिरगवातका ॥११७।। मजीष्टादिक्काथसग १८ प्रकारके कुष्ठोंका त्रिफला और मिश्री सग पाडुरोगका ॥ ११८ ॥ सोठके चूर्णसग आमवातका-सुवर्णभस्मसग रक्तपित्तजन्य विकारका ॥ ११९ ।। और चौंलाईके रससग देनेसे हरितालभस्म < प्रकारके ज्वरोका नाश करताहे इसप्रकार सबगोमे वैद्य अपनी बुद्धिसे अनुपानोंकी कल्पना करके उनके साथ हरिताल भस्म देवे ।। १२० ॥ अथ मनश्शिलानुपानानि । मनश्शिलासुमाक्षिकेणशुक्रमाशुपिच्चिटंनिहन्ति वासरांध्यमामयंसखेनसंशयः॥कणामरीचचूर्ण संयुताशिलावुनांजितात्रिदोषजंज्वरंव्यथाञ्चभूत संनिवेशजाम् ॥ १२१ ॥ दध्यवुनाहन्तितथा बुदंशिलाश्वासंचभाींकटुभद्रसंयुता ॥ वासार सव्योषयुताजयेच्छिला कासंवलासकनकेनवैवि पम् ॥ १२२ ॥ मत्कृतिरियम् ॥ भाषानुवादः-अब मन शिला (मनशिल ) के अनुपान वर्णन करते हैं हे मित्र ! शुद्ध मनश्शिलाको सहतसग नेत्रमें लगानेसे, नेत्रों की फूली, तिमिर, (दिनोंधि) और नेत्रका चिपकना ये सब दूर होतेहैं तथा छोटीपीपल, और काली मिरचके चूर्ण सग शुद्ध मन शिलाका जलसे नेत्रमे आजनेसे त्रिदोपज ( सन्नि- पात ) ज्वर और भूतबाधा दूरहोय ॥१२१॥ दहीके पानीसग अर्बुदरोगका, मारगी और सोंटसग श्वासका, अडूसेके रम और त्रिकटसग खांसी तथा कफका और नुवर्णसग विपका शुद्धमन शिला नाश करतीहै शेपरोगोंपर वैद्य अपनी धुद्धिमे अनुपान विचारक देवे यह दोनो लोक गैने अनेक वेकप्रथोके आश्रयसे बनायहे ।। १२२ ॥ - , विचारकर (५४) अनुपानदर्पणः। भय सीधीगनुपानानि। नीलाजनंशुंठ्यभयागुडैःकफपित्तंनिहन्त्याज्यसि तायुतंध्रुवम् ॥ वायुंकणाविश्वमरीचमाक्षिकदेयं धियान्येषुगदेषुपण्डितैः॥१२३॥ मत्कृतिरियम्॥ भापानुवादः-अव सुरमेके अनुपान वर्णन करतेहै.शुद्धसुरमा नेत्रोंमें लगा- नेसे नेत्रोंके अनेकरोगोको दूर करताहै यह बात तो प्रसिद्धहीहे पर, सोंठ, हुई और गुडसग कफको घी शकरसग पित्तको छोटीपीपर, सोठ, कालीमिरच, और सहतसग बादीको शुद्धसरमा दुर करताहै. परागोपर बुद्धिमानेंने अपनी बुद्धिसे अनुपान देना चाहिये यह कभी मेरा बनायाटुमा है १९३ अय खर्पगनुपानानि । तद्भस्ममृतकांतेनसमेनसहयोजयेत् ॥अष्टगुजा मितंचूर्णत्रिफलाक्काथसंयुतम् ॥१२४॥ कांतपात्र स्थितंरात्रौतिलजपतिवापकमानिषेवितंनिहन्त्या शुमधुमेहमपिध्रुवम् ॥ १२५ ॥ पित्तक्षयंचपाण्डे चश्वय,गुल्ममेवच ॥ रक्तगुल्मञ्चनारीणांप्रदरं सोमरोगकम् ॥ १२६ ॥ योनिरोगानशेषांश्चविष मांश्चज्वरानपि ॥ रजःशूलंचश्वासञ्चहिमिना चविशेतः॥१२७॥ भाषानुवादः-अब खपरभरमके अनुपान वर्णन करतेहैं खपरियेकी भरमके समान कातलोहकी भस्म लेने और इनदोनोंको ८ गुजाप्रमाण त्रिफलाके काय ॥ १२४ ॥ और तिल के तेलमें मिलाकर रात्रिभर कातिलोहके पात्रमे रहने दे पश्चात् इसका सेवन करे तो मधुप्रमेहभी दूर होय ।। १२५ ॥ तथा पित्तरोग, १ जिस लोहे के पारमें दूध भरके मोटावे उसपात्रसे उफान खाकर दूप बाहर न निकलनेपावे उसे कातिलोहपात्र जानो।

पञ्चमःप्रमोदः ५। (५५) क्षयी, कामला, (पांडु ) शोध वायगोला, रक्तगुल्म, स्त्रियोंका प्रदर, सोमरोग ॥ १२६ ॥ सर्व योनिरोग, विषमज्वर, रज.शूल, ( मासिक धर्महोने के समय नियोंकी योनिमे शूल होताहै सो ) श्वास और हुचकी इन सब रोगोंको खापरियका भस्म उक्त अनुपानसे दूर करताहै ।। १२७ ॥ ऐसा प्रथातरमें लिखाहै. अथ हीरकभस्मानुपानानि । कुष्ठेखादिरत्वग्व्यथापवनजेसृक्श्रृंगवरंमधुदेयंका सबलासश्वासविकृतौवासोषणात्वकणा॥ पित्ते दाहसितासमंज्वरगणेछिन्नाजलेतितकेवघ्मा रितशुक्तभस्मगदहृद्योज्यंभिषग्यक्तिभिः॥१२८॥ भाषानुवादः-अब होरेकी भस्मके अनुपान वर्णन करतेहैं खैरकी छालके सग कुष्टरोगमें अदरख केसर और मधुमग वातव्याधि तथा वातरक्तरोगमे अडूसा, कालीमिरच, दालचीनी और पीपलसग कास, श्वास, और बलास, (कफ) इन रोगोमे मिश्रीके सग पित्त और दामे गिलोय और चिरायतके सग समस्तचरमात्रमें हीरेके भस्मको देनेसे उक्तरोग नाश होय और इनसे व्यतिरिक्त रोगोंमें वैद्य अपनी बुद्धिसे अनुपान विचारके उसके साथ देवे ऐसा प्रयातरमे लिखाहै ॥ १२८ ॥ अथ वैक्रांतानुपानानि । भस्मत्वंसमुपागतोविकृतकोहेम्नामृतेनान्वितोपा दांशेनकलाज्यवल्लसहितोगुंजोन्मितस्सेवितः॥ यक्ष्माणंज्वरणञ्चपांडगुदश्वासञ्चकासामयंदु- टांवग्रहणीमुरःक्षतमुखानोगाजयेदेहकृत्॥१२९॥ भाषानुवादः-अब चकातके अनुपान वर्णन करतेहै १ रती वैनातकी भस्मको उससे चतुर्थाग ( चौथाई रती ) सुवर्णभस्म, तथा पीपल, कालीमिरच - (५६) अनुपानदर्पणः। और मक्खनके साथ सेवन करे तो क्षयी,ज्वर, पाड, अर्श,श्वास, कास,असाध्य सग्रहणी, उर क्षत (छातीकाघाव) और मुखरोग ये सब दूर होय ॥ १२९ ॥ अथ नीलवैक्रातभस्मानुपानानि । सूतभस्मा संयुक्तंनीलवैक्रांतभस्मकम् ॥ मृता- भ्रसत्त्वमुभयोस्तुलितंपरिमर्दितम्।१३०। क्षौद्रा- ज्यसंयुतंप्रातगुञ्जामात्रंनिषेवितम् ॥ निहन्ति- सकलानोगान्दुर्जयानन्यभेषजैः॥ त्रिसप्तदिवस नृणांगंगांभइवपातकम् ॥ १३१ ॥ भाषानुवादः-पारेकी भस्म १ भाग नीलवैक्रातभस्म आधा भाग इन दोनोंक तुल्य अभ्रकभस्म ॥ १३० ॥ इन सबको मिलाकर खरल करे और उसमेंस ? रतीमात्र लेकर सहत और घृतके सग प्रात काल सेवन करे तो समस्त असाध्य रोगभी जो कि अन्य औषधियोसे दूर नहीं होसक्ते इससे दूर होय, यदि उक्त- भस्मका २१दिनपर्यन्त सेवन करे तो जैसे गगाजल समस्तपातकोंको नाश कर. देता है तैसेही यह भस्म रोगोंका नाश करदेताहे,ऐसा प्रथातरमे लिखाहै।।१३१॥ अथ प्रवालभस्मानुपानानि । प्रवालभस्ममाक्षिकेणमागधीयुतेनवैनिहन्तिमा रुतंचकोष्ठगंज्वरंपुरातनम्॥जयेत्सुपक्कवारणीफ लेनशुक्रसंक्षयंददाति पुष्टिमाशु शर्कराज्यसंयुतं नृणाम् ॥ १३२ ॥ सितापयोयुतंनिहंतिपित्तमा शुदारुणंसखे सुशालिजैर्हिमैश्चमूत्रकृच्छ्रमामय म्॥चिकित्सकैर्विचार्यदेयमामयेषुवैधियाखिले वनेकतंत्रसम्मतेनमत्कृतिस्त्वियम् ॥ १३३ ॥ भाषानुवादः-अब प्रवालभस्मके अनुपान वर्णन करतेहै छोटी पीपरी और महतमग कोटगत वायुका तया जीर्णचरका और पके फलसग वातुक्षयका पञ्चम प्रमोदः। (५७) प्रवालभरम नाश करताहे, शर्करा और घृतसग प्रचालभस्म पुरुषोको पुष्टता देताहे ॥१३२॥ मिश्री और दूधसग पित्तको और चावलोके हिमसग हे मित्र । भयकर मूत्रन्छूकोभी प्रवालभस्म दूर करताहै.शेपरोगोपर वैद्योने अपनी बुद्धिसे अनुपान विचारके प्रपालभस्म देना चाहिये, ये दोनों श्लोक मैने अनेक तत्रोके सम्मतसे बनाये ॥ १३३॥ अथ सामान्यतोऽखिलरसोपरसादीनांकति पयरोगेष्वनुपानान्याहग्रन्थकर्ता कविः श्रीलोलिवराजानुमतेनात्र । शूलेहिंगुघृतान्वितंमधुयुताकृष्णापुराणज्वरेवाते साज्यरसोनकःश्वसनकेक्षौद्रान्वितंत्र्यूषणम् ॥ शीतव्याललतादलंसमरिचमेहेवरासोपलादोषा णां त्रितयेऽनुपानमुचितं सक्षौद्रमाद्रोंदिकम् ॥ ॥१३॥ अन्यच्च-धनपर्पटकंज्वरग्रहण्यांमथितं हेमगरेवमीषु लाजाः ॥ कुटजोऽतिसृतोवृषोऽस्त्र पित्तेगुदकीलेवनलःक्रमोकृमिनः ॥१३५॥ वै.नी. भाषानुवादः-जब इसके अनन्तर प्रथकर्ता कवि कितनेक रोगोंपर सामा- न्य प्रकारसे सबरस और उपरस आदिके अनुपान लोलिंबराजजीके मतानुसार वर्णन करतेहै यद्यपि हम इस पाचवें प्रमोदमे मृत्युजयादि रसोके तथा सुवः गादि सप्तधातु उपवातुओके और पारदादि रसोपरसोंके पृथक् २ अनुपान वर्णन करचुकंह तथापि साधारणप्रकारसे प्रत्येक भम्मको निम्नलिखित अनुपा- नोके राग उन २ रोगोपर कि जिन २ के नाम दति, वैद्य दे सक्तेहै, शूल. रागमे घी और हीगमग, जाणज्वरमे छोटी पीपल्ट और सहतसग, वातव्यावि मे घी और लहसन सग, धाममे सोठ, मिरच, पीपल, और सहत सग, शीतागमे काली मिरच जोर नागरसेटके पानसग प्रमेहमें मित्री और त्रिफला लग और सन्निपातमे अदरकके रस और सहत सग प्रत्येक रसादिकी भस्म देना (५८) अनुपानदर्पणः। सग, प्रत्येक चाहिये ।। १३४ ॥ ज्वरम नागरमोथा और पित्तपापड सग सग्रहणीमें छाछ सग विपरोगमें धत्तुरेके पान सग, वमन ( उलटी ) में धानकी लाही (खील) के पानी सग, अतिसारमें कुडालकी छाल सग, रक्तपित्तमें अरुपके रस सग, अर्श ( मूलव्याधि ) में चित्रक सग, और कृमि रोगमें वायविडग सग, रसादिभस्म देना चाहिये ॥ १३५ ॥ऐसा वेद्यजीवनमे लिखाहे. अथ विषानुपानानि । शिखिकर्किरसोपेतंविषमज्वरजिद्विषम् ॥ विषय- टयाह्वयंरास्नासेव्यमुत्पलकंदकम् ॥१३६ ॥ तंदु- लोदकपीतानिरक्तपित्तस्यभेषजम् ॥रास्नाविडंग त्रिफलादेवदारुकटुत्रयम् ॥१३७॥ पद्मकंक्षौद्रम- मृताविषञ्चश्वासकासजित् ॥ सितारसविषक्षीर प्रवालमधुभिःकृताः॥१३८ ॥वान्तिनिहन्तिगु टिकामनुजानांनसंशयः। मधुमद्यनिशारेणुसैन्ध- वैःकुटत्वग्युतम् ॥ च्यवनप्राशनोपेतंविषंक्षपय ति क्षयम् ॥ १३९॥ भाषानुवादः-अब विष (वैच्छनाग आदि) के अनुपान वर्णन करतहैं- तथा, और शुद्ध, पारेके सग विषका सेवन करनेसे वर दूर होय मुलहटी, राना, कमलगट्टा ॥ १३६ ॥ इनके चूर्ण सग चावलोंके पानीसाथ विष सेवनसे रक्तपित्त दूर होय, राना, वायविडंग, त्रिफला, देहदारु, त्रिकटु ॥ १३७ ॥ कमलगट्टा सहत, और गिलोय( गुरच) सग विष, सेवनसे श्वास, कास दूर होय, मिश्री, शुद्धपारा, विप, दूध, मूगेकी भस्म, और सहत इनकी गोली बनाकर ॥ १३८॥ उसे खाये तो मनुष्योंकी वाती (उलटी) दूरहोय,सहत, शुद्ध नीला १ वन्छनागको सस्कृतमें वत्सनाम कहतेहैं विपके कहनेसे विषमात्रका अहण होताहे पर विशेषत, वण्ठनागकेही अनुपान जानिये ।

पञ्चमःप्रमोदः ५। (६९) मय, हलदी, पित्तपापडा, सेंधव, और कूडको छाल इनके साथ अथवा च्यवन- प्राश अवलेह सग विपका सेवन करनेसे क्षयी ( राजयक्ष्मा जिसे गुजरातीभी, कई कहतेहैं ) दूर होय ॥ १३९ ।। विजयापिप्पलीमूलंपिप्पलीद्वयचित्रकैः ॥ पुष्क राहसठीद्राक्षायवानीक्षारदीप्यकैः ॥ १४० ॥ सितायष्टीद्विबृहतीसैन्धवैःपालिकःपचेत्॥ सवि पार्द्धपलैःप्रस्थंघृताक्तंजीर्णभुपिवेत् ॥ १४१ ॥ दुर्नाममेहगुल्मार्शतिमिरक्रिमिपांडुकाः ॥ गल ग्रहग्रहोन्मादकुष्ठानिचनियच्छति ॥१४२॥ मु- स्तावत्सकपाठाग्निव्योषप्रतिविषाविषम् ॥धात- कीमोचनिर्यासंघृतास्थिग्रहणीहरम् ॥ १४३ ॥ कृच्छ्रनाविषपथ्याग्निदंतीद्राक्षाविषायाः॥ शि- लाजितुविषंत्र्यूषमुदावाश्मरीहरम् ॥ १४४॥ भापानुवादः-भाग, पीपलामूल, छोटीपीपल, गजपीपल, चित्रक, पोकर मूड, कचूर, दाख, अजवायन, जबाखार, अजमोदा ॥ १४० ॥ मिश्री, मुलहटी, दोनों कटियाली, सेंधानोंने, और पालिक ( पालका ) इन सब औपधियोंको आवा पल लवे ओर आधा पलही विप लेवे, पश्चात् सबका चूर्ण करके उसे १ प्रस्थ ( ५३ तोले ४ मासे ) घृतमें पकाये और उसमेसे अनुपानयोन्य नित्य सेवन करे जब वह चिप पचजावे तब ऊपरसे औरभी स्वशक्ति अनुसार घृत पानकरे ॥ १४ १ ॥ तो असाध्य मेह, गुल्म, तिमिर, कृमि, पाटु, गग्ग्रह, उन्माद, और कुष्ट सबरोग दूर हाये ॥ १४२ ॥ नागर- माथा, कडेकी छाल, पाटा, चित्रफ, त्रिकट, अतीय, धायटेके फूल, मोचरस, और आमको गुठली इनके सग बिष सेवनसे समणी दूर होय ॥ १४३ ।। हुई, चित्रक, दत्ता, दाख और अरपेके सग विप सेवनसे मूत्रकृच्छ- १ चवनप्राशन अवलेह प्रयातरसे जानो।

, अनुपानदर्पण। का तथा शिलाजीत सोंठ, मिरच और पीपल सग विष सेवनसे उदावर्त और पथरीका नाश होय ॥ १४४ ॥ गोमूत्रमारसिंधूत्थविषपाषाणभेदकम् ॥ वजा वद्दारयत्येतदेकतःपीतमश्मरीम् ॥१४५॥ त्रिफ लासर्जिकाक्षारैर्विषंगुल्मप्रभेदनम् ॥ पिप्पली पिप्पलीमूलंविषंशलहरंपरम्।।१४६॥ विपंद्रवंती मधुकद्राक्षारास्नासठीकणाः ॥ विषवेल्लामिशि क्षीरंगुल्मप्लीहानिबर्हणम् ॥ १४७॥ प्लीहोदरनंप- यसाशताह्वाकृमिजिद्विषम् ॥ वायसीमूलक्काथेन पीतंकुष्ठहरंविषम् ॥ १४८ ॥ पयसाराजवृक्षत्वक त्रायंतीवाकुचीबलात् ॥ प्लीहनवाकुचायांचविषं काथेनकुष्टजित् ॥ १४९ ॥ अवल्गुजैलाकजया विडक्षारद्वयंविषम् ॥ लेपस्ससैन्धवःपिष्टोवारि- णाकुष्ठनाशनः॥ १५०॥ भापानुवादः-सेंवानोंन, और पापाणभेद युक्त गोमूत्र सग विषको पान करे तो जैसे वनपर्वतोंको विदीर्ण करदेताहै तैसे विष पत्थरीको विदीर्ण करदेता है ॥ १४५ ॥ त्रिफला और सज्जीखार सग गुल्मका, पीपलामूल सग शूलका ॥ १४॥ वती,महुआ,दाख, राना, कचूर, पीपल, वायविडग, सोंफ और द्ध सग विष गोला ओर तापतिल्लीका नाश करताहै ॥ १४७ ॥ केवल दूधके साथ विप पीनेसे दाहोदर ( तापतिल्ली ) और सौंफ सग विप सेवनसे कृमिरोगका नाशहोय, कजेकी जडक काय सग विष सेवनसे कुष्ठभी दूरहोय ॥ २४८ ॥ अमलतासकी छाल वायती ( बायमाणा ) बावची, सरेंठी, इनके चूर्णसहित दुध सग,अथवा उक्तीपधियोंसे सिद्धकिये हुए दुग्धसम विषपान करे तो तापतिल्ली दर होय और उक्तीपवियों के काथमें सुहागे सहित विषपान करतो .

पञ्चमःप्रमोदः ५। (६१)
कुठभी दूर होय ॥१४९|| एलुवा सज्जीखार और जवाखार सेवानोन इनके सग
विष/सिंगियाविप) मिलाकर पानीसे खरलकर लेप करे तो कुष्ठ दूर होय।।१५०॥
एरंडतैलत्रिफलागोमूत्रंचित्रकंविषम् ॥ सर्पिषा
सहितंपीतंवातातित्वमपोहति ॥ १५१॥ स्वरसं
वीजपूरस्यवचाब्राह्मीरसंघृतम् ॥ वंध्यापिबतिस
विषंसुपुत्रैःपरिवार्यते ॥१५२॥ वीरालांगलिकी
दंतीविषपाषाणभेदकैः ॥ प्रयोज्यमूढगर्भाणांप्र
लेपोगर्भमोचनः ॥ १५३ ॥ देवदारुविषंसपिंगों
मुत्रकंटकारिका॥ वचावाक्स्खलनंहन्तिबुद्धेश्चप
रिवर्धनम् ॥१५४॥ विसर्पिःसिताक्षौद्रंतिमिरा
पहमंजनम् ॥ विषंचैकमजाक्षीरकल्पितंघृतधूपि
तम् ॥ १५५॥ विषंधात्रीफलरसैरसकृत्परिवारि
तम् ॥ अंजनशंखसहितंप्रगाढंतिमिरंजयेत१५६
विषमिन्द्रायुधंस्तन्येघृष्टंकाचभिदंजनम् ॥ बीज
पूररसैघृष्टंविपंतद्वत्सितान्वितम् ॥ १५७ ॥ विषं
मागधिकाद्वेचनिशेकाचन्नमंजनम् ॥ शुक्लार्मञ्च
विपकृष्णायुक्तंगोमूत्रभावितम् ॥ १५८ ॥ भल्ला
नकाग्निशम्पाकविपैर्वासूत्रपेषितैः॥ लेपोविचचिं
कादगुरसिकाकिटिभापहा ॥ १५९ ॥ स्वर्जिका
क्षारसिंधूत्थशुक्तशुक्तंवरंविषम् ।। कर्णयोः पूरणं
तीवकर्णशूलनिवर्हणम् ॥ १६० ॥ प्रपोंडरीकम
जिष्ठाविपतिंदुसमुद्भवैः॥ निहन्तिसाधितंतैलंगं
॥

(६२) अनुपानदर्पणः। डूषणमुखामयान् ॥ १६१ ॥शालाखदिरकंकाल जातीकर्पूरचंदनैः॥वोलाब्दवालैर्द्विगुणविषैस्सा रांबुपेषितैः॥ १६२ ॥ समूत्रवटिकाक्लुप्ताधृतान न्तिमुखामयान् ॥ कटुतैलंविधनस्यपलिकारुषि कापहम् ॥ १६३ ॥ गुंजाटंकणशिग्रुमूलरजनी शम्पाकभल्लातकस्नुह्यर्काग्निकरंजसैंधववचाकुष्ठा भयालाङ्गली॥वर्षाभूषडभूशिरीषवरणव्योषाश्व मारोविषंगोमूत्रंशमयेद्विलुतमपची ग्रंथ्यचुदेश्ली पदान् ॥१६॥ ग्रंथांतरादिदंलिखितमखिलम् ॥ भापानुवादः-एरडतैल, त्रिफला, गोमूत्र, चित्रक, और विषका घृतके साथ पान करे तो बादीको पीडाका नाश होय ॥ १५१॥ विजोरेका अगरम वच, ब्राह्मीका रस, नवीनघृत, इनमें विपको युक्त करके पान करनेसे वध्या- स्त्रीभी गर्भवती अवश्य होय ॥ १५२ ॥ सफेद कनेर, कलियारी, दतो, बच्छनाग, (विष) और पाषाणभेद इनका लेप करनेमे मूढगर्मकाभी विमो- चन (निकलजाना ) होय ॥ १५३ ॥ देवदारु, विष ( बच्छनाग ) कटियाली, और बच इनके सेवनसे जिह्वाके समस्तरोग ( विकार ) दूरहो और बुद्धि बढे ॥ १५४ ॥ घी, मिश्री, और सहतमे गुद्र विपको घिसकर नेत्रमे लगावे तो तिमिर ( दिनोंवी ) दूर होय, यदि केवल विपकोही बकरीके धमें घिसकर नेत्रमे आजे और वीकी वूनी दे तोभी तिमिर रोगका नाश होय ॥ १५५ ।। नया शखकी नाभीसहित, विषको आवलेके रसकी बहुतसी भावना देकर अजन प्रस्तुत ( तयार ) करे और उसे नेत्रमें लगाने तो घोर तिमिर रोगकाभी नाश होय ॥ १५६ ॥ हीरा और विपको स्त्रीक दूधमें विसकर नेत्रमे लगानेसे, सयमा विजोरके रसमें मित्री डालकर उसमे विपको विसकर नेत्रमें लगानेसे ।। १५७ ॥ तथा छोटीपीपल, दोनों हलदी, और विष इनका अजन बनाकर १ विपके अनुपानमें जद्दार विप लिसाद वद्दार शुद्ध कियाहुआ विष लेना चाहिये।

पञ्चमःप्रमोदः।
(६३)
बच्छनाग
खल
नेत्रमे लगानेसे नेत्रमे जो काचरोग होताहे वह दूरहोग, और छोटी पीपल सग
विपको गोमूत्रले घिसकर नेत्रपे लगानेस शुक्लार्म नामक नेत्ररोग दूरहोय
॥ १५८ ॥ भिलावे, चित्रक, अमलतासके गूदे सग विपको पीसकर लग
करनेसे विचर्चिका (व्योंचि ) दाद, रसिका, और किटिभकुष्ठ ये सब दूर
होय ।। १५९ ।। सजी, संधानान, शिरका, और काजी, इनके संग
विपको करके कानोमे डाले तो कर्णशूल
नाश होय ॥ १६० ॥ कमलपुष्प, मजीठ, विष, और कुचला इनसे तेलको
बनाकर उसके कुल्ला करे तो समस्त मुखरोग दूरहोय ॥ १६१ ॥ अथवा
शालकी छाल, कत्या, काल, जायफल, भीमसेनीकपूर, चदन, बोल, नागर
मोथा और मुगधवाला ये सब ओपधि समान लेवे और उक्त ओपधियोसे टूना
विष लेकर सरको ग्वेरसारके पानी ॥१६२॥ ओर गोमूत्रसे खल करके गोलिया
बनावे उस गोठीको मुग्वमें रक्ख तो मुखके समस्तरोग दूर होय, कडवे तेलमे
विष मिलाकर नासलेवे तो नासिकाके, पालिका और अरूपिकादि समस्त रोग
दूर होय ॥ १६ ॥ चिरमी ( गुमचीगुजा ) सुहागा, सहजने ( मुगने ) की
जड, हलदी, अमलतास, भिलावा, यूहर, आक, चित्रक, कना, सेंवानोन,
वच, कूठ, हर्ड, कलियारी, वर्षाभू (पुनर्नवा-सॉठी ) पटभू, शिरसकी छाल,
सोंठ, मिरच, पीपल, कनेर और वच्छनाग (विप ) इन सबको गोमूत्रमें पीस-
कर लगानेसे इद्लुप्त (मस्तकके वालोके न आने मयारोग) अपचीरोग, गाठ,
अर्बुद और श्लीपद ( हातीपावभी जिसे कहतेहैं ) इन सव रोगोका नाश होय
॥ १६४ ॥ ये विपके अनुपानके समस्त लोक हमने प्रयान्तरसे दिखेहैं, इनमें
कही पाठ अशुद्ध जान पडे तो विद्वान् मुझे दोप न देवें, मैंने जैसा पाठ या
वैमाही लिखदियौह ।।
इति श्रीमत्पण्डितज्ञारसरामविरचित भापानुवादविभूपितेऽनुपानदर्पणे
मृत्युजयादिरसवातूपधातुपारदादिरसोपरसाना विपस्य-
चानुपानविवेककथने पञ्चम. प्रमोद ॥ ५॥

(६४) अनुपानदर्पणः । अथातो योगराजगुग्गुलुनारायणचूर्ण- मृत्युंजयादिरसानां निर्माणविवेक व्याख्यास्यामः१। अथ योगराजगुग्गुलुविधिः। नागरंपिप्पलीचव्यंपिप्पलीमूलचित्रकैः॥भ्रष्टंहिं ग्वजमोदंचसर्षपाजीरकद्वयम् ॥१॥रेणुकेंद्रयवाः पाठाविडंगंगजपिप्पली॥ कटुकातिविषाभावि- चामूतिभागतः॥२॥प्रत्येकंशाणिकानिस्य व्याणीमानिविंशतिः॥द्रव्येभ्यस्सकलेभ्यश्चत्रि फलाद्विगुणाभवेत् ॥३॥ एभिश्चूर्णीकृतैःसर्वैस्स मोदेयस्तुगुग्गुलुः॥ वंगरौप्यंचनागंचलोहसारंत- थाभ्रकम् ॥ ४ ॥ मंडूरंरससिंदुरंप्रत्येकंपलसंमि तम्।।गुडपाकसमंकृत्वाइमंदद्याद्यथोचितम्॥५॥ एकपिंडंततःकृत्वाधारयेघृतभाजने ॥ गुटिकाः शाणमात्रास्तुकृत्वाग्रह्यायथोचिताः॥६॥ गुग्गु लुर्योगराजोयंत्रिदोषनोरसायनम्॥मैथुनाहारपा नानांत्यागोनैवात्रविद्यते ॥७॥ सर्वान्वातामया न्कुष्ठानांसिग्रहणीगदम् ॥ प्रमेहंवातरक्तंचना भिशूलंभगंदरम् ॥८॥ उदावर्तक्षयंगल्ममपस्मा रमुरोग्रहम् ॥ मंदाग्निश्वासकासांश्चनाशयेदरुचिं तथा ॥ ९ ॥ रेतोदोपहरःपुंसांरजोदोपहरः स्त्रि याम् ॥ पुंसामपत्यजनकोवंध्यानांगर्भदस्तथा ॥१०॥ ई० खं० २ अ० ७॥

पष्ठःप्रमोदः ६। (६५) भापानुवादः-अब इसके आगे योगराजगुग्गुल, नारायणचूर्ण, और मृत्य- जय आदि रसोको बनानेके विवेकको वर्णन करेगे-प्रथम योगराजगुग्गुल बना- नेकी विधि वर्णन करतेहै-१ सोठ, २ छोटोसिपल, ३ चव्य (चत्र) ४ पीपला मूल, ५ चित्रक, ६ अग्निपक हीग, ७ अजमोदा, ८ सर्पप ( शिरस-सरसो ) ९ सपेदीरा, १० कालाजीरा, ॥ १ ॥ ११ रेणुकीज, १२ इद्रजव, १३ पाठा, १४ वायविडग, १५ गजपीपल, १६ कुटकी, १७ अतीस, १८ भारगी, १९ वच और, २० मूर्वा ॥ २ ॥ यह २० प्रत्येक औषध शाण २ ( ४ मासे ) प्रमाण लेवे और इन उक्त सर्व औषधियोंसे दूना त्रिफला लेकर ।। ३ ।। सवका चूर्ण करे पश्चात् इस चूर्णके समान (बरावर शुद्धगुग्गुलू और वगभस्म, रौप्यभस्म, नागभस्म, लोहभस्म, अभ्रकभस्म, ||४|| मडूर और रससिंदूर चे सात भस्म पल २ प्रमाण लेय, पश्चात् गुडकी चासनी- की तुल्य शुद्ध गुग्गुल को चासनी बनाकर पूर्वोक्त औपधियोंका चूर्ण और उक्त- भस्मोंको उस शुद्ध गुग्गुलकी चासनीमें मिलावे ॥१॥ जब वे सब मिलकर एक पिंट बनाजावे तव उसकी चार मासेकी गोलिया बनाकर उन्हे घीकी मटकीमें रक्खें और उसमेंसे जितनी रोगीको सेवन करना योग्य समझे ग्रहण करे ॥६॥ इसे योगराजगुग्गुलु कहतेहैं, यह त्रिदोषको दूर करनेवाला और रसायन (आयु, बल, बुद्धि वृद्धिकारक और रोगसहारक ) है, इसके सेवनमें मैथुन ( स्त्रीसग) तथा किसी पदार्थके खाने पीनेकी मनाई नहीं है ॥ ७ ॥ यह योगराजगुग्गुलू समस्त वातजन्य रोगोंका, कुष्टोंका, अर्शो ( मूलव्याधि ) मसोंका प्रहणी ( सन हणी ) प्रमेह, वातरक्त, नाभिशूल, भगदर ॥ ८ ॥ उदावर्त, क्षयी, गुल्म, अपस्मार ( मृगी । उरग्रह, मदाग्नि, श्वास, कास, और अरुचि इतने रोगोंका नाश करताहै ।। ९ ॥ यह योगराजगुग्गलू पुरुषोंके चातुविकार स्त्रियोंके रजो- धर्मासवधी विकारोंको हरण करनेवाला तथा पुरुषोंकी धातुवृद्धिद्वारा पुस्पोंको पुत्र और पन्या स्त्रियोकोभी गर्भ देनवाला है ऐसा शाधिरके दूसरे खट के ७ अध्यायम दिग्वाहै ॥ १० ॥ १ दशमूल के अथवा निपलाये जाधगे गुग्गुलको शुद्ध करके लेना चाहिये ।

(६६) अनुपानदर्पणः। अथ नारायणेचूर्णविधिः। चित्रकस्त्रिफलाव्योषंजीरकहपुषावचा ॥यवानी पिप्पलीमूलंशतपुष्पाजगंधिका ॥११॥ अजमो दाशठीधान्यंविडंगंस्थूलजीरकम्॥हेमाद्वापौष्क रंमूलंक्षारौलवणपञ्चकम् ॥ १२ ॥ कुठंचेतिसमां शानिविशालास्याद्विभागिका ॥ त्रिवृत्रिभागा विज्ञेयादन्त्याभागत्रयंभवेत् ॥१३॥ चतुर्भागासा तलास्यात्सर्वाण्येकाचर्णयेत् ॥पाचनस्नेहनायै श्चस्निग्धकोष्ठस्यरोगिणः॥१४॥ दद्याच्चूर्णविरे कायसर्वशूलप्रणाशनम्॥ हृद्रोगेपाण्डुरोगेचका सेश्वासेभगंदरे॥ मंदाग्नौचज्वरे कुष्ठेग्रहण्यांच गलग्रहे ॥१५॥ शाङ्ग खं० २ अ० ६ ॥ भापानुवादः-अथ नारायणचूर्ण बनानेकी विधि वर्णन करतेहैं-१चित्रक,२ त्रिफला, ३ सोठ, ४ मिरच, ५ पीपल, जीरा, ७ हपुषा (हाऊवेर), ८ वच, ९ अजवान, १० पीपलामूल, ११ बडीशोंफ, १२ वनतुलसी, ॥ ११ ॥ १३ अजमोदा, १४ कपूर, १५ वनियाँ, १६ बायविटग, १७ कलौंजी, १८ चोग्य, १९ पोकरमूल, २० सज्जीखार, २१ जवाखार, २२ पाचों नोन, ॥ १२ ॥ और कूट यह २७ औषध बराबर, एकएकभाग तथा इंद्रायन दो- भाग, निसोत तीनभाग, तथा दती ( दात्युणी ) भी तीनभाग ॥ १३ ॥ ४ चारभाग पीले यूहरकी जड अथवा पीला थूहरही लेवे, पश्चात् उक्त समस्त औषधीको कुटके महीन कपड़छान चूर्ण बनावे और रोगीको प्रम पाचन १ इते महाराष्ट्रभाषामें शेरणीभी कहते हैं, यह नदीके समीप होतीहै प्रसिद्ध है। २ युदर पे प्रकारका होताहै पर नारायणचूर्णम कोडीदार यदर जिसकी शाखें काटी सपने दी शिकलता है कुछ पीठापनभी रहताद उसे लेना चाहिये ।

पष्ठःप्रमोदः ६। (६७) अनतर स्निग्ध (घृत ) पान विधिपूर्वक कराके जब उसका कोठा सचिक्कण हो- *? जावे तब यह नारायणचूर्ण रेचन (टस्त ) होनेके लिये देवे, इससे सब प्रकारके शूल हृद्रोग, पाटु, कास, श्वास, भगदर, मदाग्नी, ज्वर, कुष्ठ, सग्रहणी और गलग्रह आदि समस्त रोग दूर होतेहैं ॥ १५ ॥ ऐसा शाईधरके दुसरे खडके ६ व अध्यायमे लिखाहै ॥ अथ मृत्युंजयरसनिर्माणविधिः। अव्यक्तः सिद्धिदश्शुद्धो रोगन्नः कीर्तिवर्द्धनः॥ यशःप्रदश्शिवःसाक्षान्मृत्युञ्जयरसःस्मृतः।।१६।। विषस्यैकंतथाभागंमरिचंपिप्पलीकणा॥ गन्ध- कस्यतथाभागंभागस्याङ्कणस्यच ॥१७॥सर्वत्र समभागस्याड्यगुलन्तुद्विभागिकम् ॥ चूर्णये खल्वमध्येतुमुद्गमानांवटीञ्चरेत् ॥ १८॥ जंवी- रस्यरसेनाप्रकार्यहिङ्गुलशोधनम् ॥ रसश्चेत्सम भागःस्याद्दयंगुलंनेष्यतेतदा ॥ १९ ॥ गोमूत्र शोधितंचात्रवियंसौरविशोधितम् ॥मृत्युरूपंज्व- रंहन्तिमृत्युञ्जयरसस्स्मृतः ॥ २० ॥ तीव्रज्वरे महाघोरेपुरुपेयौवनान्विते॥पूर्णमात्राप्रदातव्या पूर्णवटीचतुष्टयम् ॥ २१ ॥ स्त्रीवालवृद्धक्षीणेषु- बर्द्धमात्राप्रकीर्तिता ॥अतिवृद्धेचक्षीणेचशिशो चाल्पवयस्यपि ॥ २२ ॥ तुर्यमानाप्रदातव्या- व्यवस्थासारनिश्चिता॥नवज्वरमहाघोरेयामैका नागयेवम् ॥ २३॥ मध्यवरेतथाजीणेत्रिरा- त्रान्नाशयेद्धवम् ॥ सप्ताहात्सन्निपातोत्थंज्वरंजी (६८) अनुपानदर्पणः। र्णकसंज्ञकम् ॥ २४ ॥ रसेन्द्रसारसंग्रहेज्वराधि कारेयुक्तमिदम् ॥ भाषा०-अब मृत्युजयरस बनानेकी विवि वर्णन करते हैं अतुलित प्रभार युक्त सिद्धिप्रद निर्मल ( दोपरहित) रोगनाशक, कीर्तिविकाशक, यश देनेहारा, कल्याणस्वरूप यह मृत्युजय रस है ॥ १६ ॥ इसको इस प्रकारसे बनाना चाहिये-१ भाग विष ( वच्छनाग ) १ भाग कालीमिरच १ भाग छोटीपीपल १भाग शुद्ध आवलासार गधक १ भाग शुद्ध सुहागा ॥ १७ ॥ ये सब समान लेवे और हिंगुल २ भाग लेवे पश्चात सवको नागरबेलीके पानके रसमें अथवा अदरकके रसमें खल करके मूगफे वरावर गोलिया बनावे ॥ १८ ॥ इस मृत्यु- जय रसमे जो हिंगुल डाले सो जबीरीके रससे शुद्धकरके डाले. यदि सब औषधियोंके समान १ भाग शुद्धपाराही डाले तो फिर हिंगुलको न डाले॥१९॥ और विप ( वच्छनाग ) जो इसमें डाले उसेभी गोमूत्र शुद्धकरके धूपमे सुखा कर डालना चाहिये. इसप्रकारसे बनायाहुआ यह रस मृत्युरूप ज्वरका नाश कर- ताहै इसीलिये इसको मृत्युजयरस कहतेहैं ॥ २० ॥ यदि रोगी तरुण ( जवान) अवस्थावाला हो तो उसे अतिवेगयुक्त भयकर अरमेंभी इस मृत्युजयरसकी पूर्ण मात्रा देनी चाहिये, चारगोलीकी पूर्ण (पुरी) मात्रा इस रसकी होतीहै ॥२१॥ स्त्री, बालक, वृद्ध, और क्षीणरोगीको अर्द्धमात्रा ( २ गोली ) तथा अत्यत बूढेको, अत्यत क्षीणको और अति छोटेबालकको ॥२२॥ उक्त रसकी चौथाई मात्रा ( १ गोली,) ही देनाचाहिये, क्योंकि मात्राका नियम अवस्थानुसारही निश्चय कियागयाहै-नवीन महाभयकर ज्वरको १ प्रहरमे ॥ २३॥ मध्यज्वरको अजीर्णज्वरको पुराणम्बरको, ३दिनमे,सन्निपातको और जीर्ण-क्को दिनमें यह मृत्युजयरस दूर करताहै ॥ २४ ॥ ऐसा रसेन्द्रसारसमहके ज्वराधिकारमें लिखाहै. १ घर आगमनसे ७ दिनतक तरुण (नवीन) ज्वर ७ दिनसे १४ दिनतक र १४ दिनसे २१ दिनतक पुराणज्वर और २१ दिन पश्चात् जीर्णजार कहाताद।

षष्ठःप्रमोदः। (६९) अथ वसन्तकुसुमाकररमनिर्माणविधिः । प्रवालरसमौक्तिकांवरमिदंचतुर्भागभाक्पृथक्ट थगथस्मृतेरजतहेमनीद्वयंशके ॥अथोभुजगरंग कंत्रिलवकंविमर्याखिलं शुभेहनिविभावयेद्भिय गिदंधियासर्वशः ॥ २५ ॥ द्रवैर्वृषनिशेक्षुजैः कमलमालतीपुष्पजैः पयःकदलिकंदजैमलयजै णनाभ्युद्भवैः॥ वसन्तकुसुमाकरोरसपतिवि ल्लोन्मितस्समस्तगदहृद्भवकिलनिजानुपानरय म्॥ २६ ॥ ग्रथान्तरतः ।। भाषानुवादः अब वसन्तकुसुमाकर रस बनानेकी विधि वर्णन करते है. मूगा, चद्रोदय, मोती और अभ्रकभस्म ये प्रत्येक ४भाग (४ तोले) लेवे रूपेकी और सोनेकी भस्म २ भाग ( दोदोतोला ) पृथक् २ लेवे लोहभस्म (सार) सीसेकी भम्म, और वगभस्म ' रागेकी भस्म ) ये प्रत्येक तीनभाग ( तीन तीन तोले) लेवे पश्चात् शुभदिन सुमुहूर्तमें वैद्य इन सबको एकत्रकर खल (खलपत्ते) में डाले और निम्न लिखित रसोकी यथायोग्य अपनी वुद्धिसे विचारके भावन देवे ।। २५॥ अदूसा, हलदी, साठेका रस, कमलपुष्प, मालतीपुष्प, गोदुग्ध, केलाकद, चदन, और कस्तूरी इनमेंसे जिसका रस निकलसके उनके रसकी और जिनका रस न निकलसके उनकी वैसही भावना देनेसे सब रसोका राजा यह वसत्कुसुमाकर रस वतनाहै इसकी ४ रत्तीकी मात्रा न्यारे २ अनुपानोके साथ देनेसे समस्त रोगोंका नाश होय ॥ २६ ॥ ऐसा प्रथातरमें लिखाहै अथ लोकनाथरसनिर्माणविविः। शुद्धीवुभुक्षितस्सूतोभागद्वयमितोभवेत् ॥ तथा गंधस्यभागीद्वौकुर्यात्कजलिकांतयोः ॥ २७ ॥ सूताच्चतुर्गुणेष्वेवकपर्देपुविनिःक्षिपेत्॥भागैकंटं

(७०)
अनुपानदर्पणः।
कणंदत्त्वागोक्षीरेणविमर्दयेत् ॥२८॥ तथाशंख
स्यखण्डानांभागानष्टौप्रकल्पयेत् ॥ क्षिपेत्सर्व
पुटस्यान्तश्चूर्णलिप्तशरावयोः॥२९॥ गर्तेहस्तो
न्मितेधृत्वापचेद्गजपुटेनच ॥ स्वांगशीतंसमुद्ध
त्यपिष्टातत्सर्वमेकतः ॥ ३० ॥ पड्गुंजासंमितं
चूर्णमेकोनत्रिंशदूषणैः॥घृतेनवातजेदद्यान्नवनी
तेनपित्तजे ॥३१॥क्षौद्रेणश्लेष्मजेदद्यादतीसा
रेक्षयेतथा ॥ अरुचौग्रहणीरोगेकाश्येमंदानलेत
था ॥ ३२॥ कासेश्वासेषुगुल्मेषुलोकनाथोरसो
हितः॥ तस्योपरिघृतान्नंच जीतकवलत्रयम् ॥
॥३३॥ मंचेक्षणैकमुत्तानःशयीतानुपधानके॥ अ
नम्लमन्नंसघृतं जीतमधुरंदधि ॥३४॥प्रायेण
जांगलंमांसंमदेयंघृतपाचितम्।सुदुग्धभक्तंदद्या
चजातेग्नौसाध्यभोजने ॥३५॥ सघृतान्मुद्गवटका
न्व्यंजनेष्वेवचारयेत् ॥ तिलामलककल्केनना
पयेत्सर्पिपाथवा ॥३६॥ अभ्यंजयेत्सर्पिषाचना
नंकोष्णोदकेनच ॥ कचित्तैलंनग्रहीयान्नबिल्वं
कारवेल्लकम् ॥ ३७॥ वार्ताकुंशफरींचिंचांत्यजे
द्वयायाममैथुनम् ॥मद्यसंधानकंहिंगुशुण्ठीमाषा
न्मसूरकान् ॥ ३८॥ कृप्मांडराजिकांकांपकांजि
कंचैववर्जयेत् ॥ त्यजेदयुक्तनिद्रांचकांस्यपात्रेच
भोजनम् ॥ ३९ ॥ ककारादियुतंसर्वत्यजेच्छाक

षष्ठःप्रमादः ६। (७१) फलादिकम् ॥ पथ्योऽयंलोकनाथस्तुशुभनक्षत्रवा सरे॥४०॥ पूर्णातिथौशुक्लपक्षेजातेचंद्रवलेतथा पूजयित्वालोकनाथंकुमारीभोजयेत्ततः ॥ ४१॥ दानंदद्याविघटिकामध्येग्राह्योरसोत्तमः ॥ रसा संजायते तापस्तदाशर्करयायुतम् ॥४२॥ सत्त्वं गुडूच्याग्रहीयावंशरोचनयायुतम् ॥ खर्जूरंदाडि मंद्राक्षामिक्षुखंडानिचारयेत् ॥४३॥ शाई खं० अ० १२॥ भाषानुवादः-अव लोकनाथरसके बनानेकी विधि वर्णन करते हैं २ भाग शुद्ध जो बुभुक्षिन पारा-और १ भाग शुद्ध गधक इन दोनोंको मिलाकर जब इनकी इनकी कज्जली जावे तव ॥ २७ ॥ पारने चोगुनी कौडियोंमें वह कन्जली भरे पश्चात् १ भाग मुहागा लेकर उसे गोदुग्ध खल करके उन कोडियोंके मुखपर लगाये कि जिसने उन कौडियोंमें भरी हुई कजली बाहर न निकलने पावे ॥ २८ ॥ पछि ८ भाग शखके टुकडे लेके मोके दो सिकोरे ( शराई ) जिसको भीतर चूनेसे पोत (लीप ) देवे और इन चूनेसे पोतेहुए दो सिकोरे से एकसिको- रेमें शखक ८ भाग टुकडोमेसे आधे टुकडे भरकर उनपर वे कज्जली भरीहुई कोटिया रखकर उनके ऊपर जो शखके शेष ( आवे ) टुकडे रहे सो रवखे पश्चात् दूसरा मिकोरा ऊपरसे ढाककर इस संपुटके मुखको कपडमट्टीसे दृढ बरकरकं ॥ २९ ॥ १ हाय गहरे खड्डे (गड्ढे) मे उस सपुटको रखकर रवट करे जब बन १ भुक्षित पारा उसे कहते हैं जो गधक आदि के जारणसे सुवर्णादि चातुओंके योम्य होय । २ मपुट उसे कहतेहै जो दोनो शराई (सिकोरे ) के मुख मिलाकर• बद किया नारे पर संपुट करनेक मट्टीके सिकोराको प्रथमही पापाणपर युक्तिसे ऐसे घिसलेने पाहियरि जिससे दोनों सिकोरोकी कार ऐसी मिलजावे कि जिसमे सघिमात्र न रहे।

(७२) अनुपानदर्पणः। गजेपुटसे पकाये ( आचदेवे ) जत्र पूर्ण शीतल होना तब उम सपुटगेसे शखके टुकडोंकी और कजली भरीहुई कौडियोकी समस्त भम्म एकलकर खलमें महीन पसिलेवे ॥ ३० ॥ इसे-लोकनाथरस कहते हैं इसमेंसे ६ रत्ती मात्र लेकर उसमे २९ काली मीरचीके चूर्णको मिलाकर पीके सग वातरोगमें नवनीत ( माखन ) के सग पित्तरोगमे ।। ३१ ॥ और सहत सग कफरोगम देवे तो उक्त समस्त रोग दूर होय, तथा अतिसार, क्षयी, अरुचि, सग्रहणी, कृशता, मदाग्नि ॥ ३२ ॥ कास, श्वास और गुल्म इन रोगोंपरभी यह लोक नाथरस अतिहितप्रद है इसको सेवन करनेवाला निम्नलिखित प्रकारसे आहार विहारका वर्ताव रक्खे उक्त रसकी पूर्वोक्त मात्रा लेकर उसपर घृतसहित चाव लोंके ३ ग्रास ( कवल ) लेवे ॥ ३३ ॥ पश्चात् मच ( खाट ) पर तकिया गद्दी ( बिछौने) विनाही एकक्षणभर सीधा सोवे-खटाईको छोडकर घृतसाहित मिष्टान्न और मीठे दहीकोभी खावे ॥ ३४ ॥ मासाहारी ( मासखानेवाले मनुष्य ) को जागल ( हरिणआदि जागलदेशज जीवोंका ) घृतपक्वमासभी खानेको देवे और सायकालके भोजनके समय यदि जठराग्नि प्रदीप्त होने, ( अच्छी भूस लगे ) तो दूध चावल खानेको देवे ॥ ३५ ॥ ओर मुख अच्छा होने तथा रुचि बढानेके लिये व्यजनोकी जगह घीमें बनाये ( तले ) हुए मुगके बडे खावे, तिल और आवलोंको पीसकर उनके कल्प ( पीठी ) से अथवा घृतसे ॥ ३६॥ शरीरको मलकर कुछ (अल्प ) गरमपानीसे स्नान करे और तेलको खानेपीने शरीरके लगाने कदापि स्वीकार न करे. बील, करेले ॥ ३७ ॥ कटेलीका फल, मछली, अमली, व्यायाम, ( कसरत) स्वसिग, ( मैथुन ) मदिरा, सधौन होग सोंठ, उडद, मसूर, ॥ ३८ ॥ कोला, राई, काजी, अयोग्यनीद, कासेके पात्रमें भोजन ॥ ३९ ॥ जिनके नामके आदिमें ककारहो ऐसे शाक और फल इन सबको त्यागन कर (छोट,दे १-३० अगुल ( सवाहाथ ) का एक शकु बनाके उसीके प्रमाण लगा चौटा गहरा गड्ढा खोदके उसमें ५०० गोवरी (आलनेकडा) भरके उन कडोपर सपुर रतके ऊपरते पुन. ५०० पूर्वोक्त गोगरी भरके आच देवे इसे गजपुट कहते हैं । २ सयान, यह मी एक मदिरा ( मया, दाल, शराब, बराडी) का ही भेद है.

. पष्ठःप्रमोदः ६। (७३) लोकनाथरसका पव्य वर्णन कियाहे, प्रथमारभक दिन शुभ नक्षत्र शु. ॥ पचमी, दशमी, पूनोतिथि, शुरूपक्ष, और चमक तम मुहूर्तमें लोकनाथ ( परमेश्वर और उक्तरस ) का पुजन कम मात्र जिन कराके ॥ ४ १ ॥ और स्वशक्त्यनुसार दोवटी पर्यन्त अन्न, जान्न स्तक, छत्र, भूमि, गो आदिका दान देकर, उस लोकनायरमनी नाग काम चाहिये, यदि इसके ग्रहण करनेपर कुछ उष्णता (ताप, हो तो, मित्री ।। ८२ गुरच { गिलोय ) सत्त्व और वशलोचन इनको मिलाकं प्रण गंगा खर्जूर, अनार, दाख, और इक्षु [ साठे ] के टुकटे इन्होमसे किसीका मा म करे ॥४३॥४४॥ ऐसा शार्ङ्गधरके दूसरेखडके १२ व अन्यायम टिवा अथ स्वर्णमालिनीवसन्तरसनिर्माणविधिः । स्वर्णभुक्तादरदमरिचंभागवृद्धयागृहीतं ग्वर्ष र्यष्टौप्रथममखिलंमर्दयेन्मृत्क्षयेण॥ यावत्स्नेहो बजतिविलयमर्दनेदीयतेऽसौ । गुंजाद्वंद्वंमधुमग धयामालिनीप्राग्वसंतः॥ ४५ ॥ ग्रं० त० । भापानुवादः--अब स्वर्णमालिनीवसतरसके बनाने की विधि वर्णन करता, १ मासा सुवर्णपत्र (सोनेकेपर्क, २ मासे अनॅवीधे मोती ३ मासे सिंगरफा मागे कालीमिरच ८ मासे शुद्ध खपरिया इन सबको १ प्रहर पर्यत मखनसे खरट करे ( खलपत्तमें घोटे ) पश्चात् महीन छिलकेवाले ( कागजी ) निंबूके रससे जबत- क मक्खनको चिकनाई दूर न हो तबतक घोटे, चिकनाई दूर होनेपर इसकी टिकिया वनालेये इसे स्वर्णमालिनीवसतरस कहतेहैं इस रसको पीपल और सहत सग २ रत्तीमात्र देवे तो सर्व रोग दूर होय ॥ ४५ ॥ अथ बृहन्मालिनीवसन्तरसनिर्माणविविः। वैक्रातम_रविताप्यरौप्यंगंधःप्रवालंरलभस्मलो हम् ॥ सटकणशंवुकभस्मसर्वसमस्तमेतञ्चवरी . " (७२) अनुपानदर्पणः । गजेपुटसे पकाये ( आनवे ) जब पूर्ण शीतल हाजाने तत्र उस सपुटगेगे गखके टुकडोकी और कन्जली भरीहुई कोडियोकी समस्त भस्म एकनकर खलमें महीन पसिलेवे ॥ ३० ॥ इसे.लोकनाथरस कहते हैं इसमेंसे ६ रत्ती मात्र लेकर उसमे २९ काली मीरचीके चूर्णको मिलाकर घीके सग वातरोगमे नवनीत ( माखन ) के सग पित्तरोग ।। ३१ ॥ और सहत सग कफरोगी देवे तो उक्त समस्त रोग दूर होय, तथा अतिसार, क्षयी, अरुचि, सगहणी, कृशता, मदाग्नि ॥ ३२ ॥ कास, श्वास और गुल्म इन रोगोंपरभी यह लोक नायरस अतिहितप्रद हे इसको सेवन करनेवाला निम्नलिखित प्रकारमे आहार रिहारका वर्ताव रक्खे उक्त रसकी पूर्वोक्त मात्रा लेकर उसपर घृतसहित चाव लोकं ३ ग्रास ( कवल ) लेवे ॥ ३३ ॥ पथात् मच ( खाट ) पर तकिया गदी (विछोने) विनाही एकक्षणभर सीवा सोवे-खटाईको छोडकर घृतसाहित मिष्टान और मीठे दहीकोभी खावे ॥ ३४ ॥ मासाहारी ( मासखानेवाले मनुष्य ) को जागल ( हरिणआदि जागलदेशज जीवोका ) घृतपकमासभी शानेको दो और सायफालके भोजनके समय यदि जठराग्नि प्रदीप्त होये, नायो भूग लगे ) तो दूध चावट खानेको देवे ॥ ३५ ॥ ओर मुग अन्ठा होने तथा चि वटाने के लिये व्यजनाकी जगह घीमें बनाये ( तले ) हुए भगके साये, तिठ और आपलोंको पीसकर उनके कल्प ( पीठी ) स मा उलने ।। ३६ ॥ शरीरको मलकर कुछ (अत्प) गरमपानीसे स्नान सेमोर तरको सानेपीने शरीरके लगानेम कदापि स्वीकार न करे. बीड, कोटे ॥ ३ . ! कंटेलीका फल, मछली, अमली, व्यायाम, ( कसरत ) लिग, नसुन ) मदिरा, सधान होग सोठ, उडद, मसूर, ॥ ३८ ॥ याई, गाजी, अनोन्यनीद, कासेके पात्रम भोजन ॥ ३९ ॥ जिनके दिम स.कारो ऐन याक और फल इन सबको त्यागन कर (छोट,द २-३ . नमुट (पादाय ) का एक अट ना उसी प्रमाण ला ची रदा देदो उम.. गोवरी (भाल्नेकदा) मरके उन कदापर सपुर नन. ५.. मानवी भर के मान देवे इसे म.पुट करता है। २.न, १६ ना नदग ( FI, दान, माराम, २. 31) काही मद इ. .

-- पष्ठःप्रमोदः ६। (७) ह लोकनायरसका पथ्य वर्णन कियाहै, प्रथमारभक दिन शुभ र शुभ- ॥र ॥ ४२ ॥ पचमी, दशमी, पूनोंतिथि, शुरूपक्ष, और बदल उत्तम मुहूर्तमें लोकनाथ ( परमेश्वर और उत्तरस ) का पूजन करने सन्या भोजन कराके ।। ४१ ॥ और स्वशक्त्यनुसार दोपटी पर्यन्त अन्न कर स्त्र पुस्तक, न, भूमि, गो आदिका दान देकर, इस लोकनाथरसको हरा कर चाहिये, यदि इसके ग्रहण करनेपर कुछ उष्णता (ताप, हो तो, मित्री ११४२।। गुरच । गिलोय ) सत्त्व और वशलोचन इनको मिलाके ग्रहण जया ग्व, अनार, दाख, और इनु [ साठे ] के टुकटे इन्होंमेंसे किसी को भी मा करे ॥४३॥४४॥ ऐसा शार्ङ्गधरके दूसरेखडके १२ वे अध्यायम विवाद अथ स्वर्णमालिनीवसन्तरसनिर्माणविधिः । स्वर्णमुक्तादरदमारचंभागवृद्ध्यागृहीतं वर्ष यष्टौप्रथममखिलंसर्दयेन्मृत्क्षयेण॥ यावत्स्नेही बजतिविलयंमर्दनेदीयतेऽसौ । गुंजाद्वंद्वंमधुमग धयामालिनीप्राग्वसंतः॥४५॥ ग्रं० त०। भापानुवादः--अब स्वर्णमालिनीवसतरसके बनाने की विधि वर्णन करते १ मासा सुवर्णपत्र (सोनेकेवर्क) २ मासे अनॅवीधे मोती ३ मास मिगरफमार कालीमिरच ( मासे शुद्ध खपरिया इन सबको १ प्रहर पर्यंत मनखनसे खरल करे (खलपत्तमें घोटे । पश्चात् महीन छिलकेवाले ( कागजी ) निंबूके रससे जवत. क मक्खनको चिकनाई दूर न हो तबतक बोटे, चिकनाई दूर होनेपर इसकी टिकिया बनाये इसे स्वर्णमालिनीवसतरस कहते, इस रसको पीपल और सहत सग २ रत्तीमात्र देवे तो सर्व रोग दूर होय ॥ ४५ ॥ अय बृहन्मालिनीवसन्तरसनिर्माणविविः। चक्रातम-रविताप्यरौप्यगंधःप्रवालंरतभस्मलो हम् ॥ सर्टकर्णशवुकभस्मसर्वसमस्तमेतञ्चवरी 13 शुद्ध- (७४) अनुपानदर्पणः। रजन्योः॥ १६॥ द्रवैविमद्यमुनिसंख्ययाचकस्तू रिकाशीतकरणपश्चात् ॥ तदाबृहत्पूर्वकमालिनी प्राग्वसंतनामारसदोरसोयम् ॥४७॥० त०। भापानुवादः -अब बृहन्मालिनीवसत रसके बनानेकी विधि लिसते है, वक्रात ( रन्नविशेप) की भस्म, अनकभस्म, ताम्रभस्म, चादीभस्म, गयक, मगाभन्म, चद्रोदय, लोहभस्म, सुहागा, शहभस्म ये सब बराबर देक पर करे पश्चात् शतावरीके रसकी और हलदीके रसकी ॥४६॥ सात २ मारना दे तदनन्तर कस्तूरी और कपुरकी यथायोग्य भावनादेकर अनुमानसे टिभिमा या पलेवे इसे वृहन्मा नीवसतरस कहते है यहरस-रस (हर्ग नेवाग और समस्त रोगोको दूर करनेवाला हे ऐसा प्रथातरमें लिखा है।॥१७॥ अथ पाशुपतरसनिर्माणविविः। शुद्धंसृतंद्विधागंधंत्रिभागतीक्ष्णभस्मकम् ॥ त्रि भिल्समविपदेयंचित्रककाथभावितम्॥४८॥धूर्त वीजस्यभस्मापिद्वात्रिंशद्भागसंयुतम् ॥ कटुनयं निभागंस्थाहनोलाचतत्समम् ॥ १९ ॥जाती फलंनथाकोपर्वतागंनियोजयेत् ॥ तथालय पञ्चस्नुदाकरण्डतिन्तिडी॥५०॥अपामार्गा अत्यचक्षारंदद्याद्विचक्षणः॥ हरीतकीयवक्षारं मनिकाहिंगजीरकम् ॥ ११ ॥ टंकणंचमूतत समन्व्यांगनमईयत ॥ भोजनांते प्रयोक्तव्यो मंतालप्रमाणतः ॥ ५२ ॥ रसगाशुपतानाम मायाप्रत्ययकारकः ॥ दीपनःपाचनोहृद्यस्सयो नितीचिकाम् ॥ ५ ॥रसेन्द्रसारसंग्रह- वितरचीनमिदम् ॥

? 7 पष्ठाप्रमोदः । (७५) नापानुवादः-अब पाशुपतरसके बनानेकी विधि वर्णन करतेहे, भाग शुद्ध पारा २ भाग शुद्ध गवक ३ भाग कातलोहभस्म और इन सबके बराबर शुद्ध विप (बच्छनाग) लेकर चित्रकके काथमें उक्त सबोंको खरल करे ॥ ४८॥पश्चात् ३२ भाग धतूरेके बीजोकी भस्म३भाग त्रिकटु ( सोंठ, मिरच, पीपल ) ३भाग तीनही भाग लोग ३ भाग इलायची ॥ ४९ ॥आवा भाग जायफल और आधा भाग जायपत्री अर्थात् दोनों मिलकर ३ (तीन)भाग तथा पाचो नोन, गृहर, आक, एरड इमली ॥५०॥ ऊगा (चिरचिरा, अधाझाडा अपामार्ग ) और पीपल इन सबका खार, हर्ड, जवाखार, सज्जी, हींग, जीरा ।। ५१ ॥ और सुहागा ये प्रत्येक शुद्ध पारेके बरावर (एकएक भाग ) लेके और इन सबको महीन पीस पूर्वोक्त चित्रकके काथमे खरल किये हुए रसोंमें मिलाकर निबूक रससे पुन खल करे जब सब घुटकर एक जीव होजावे तब इसे चीनी या काँचके पात्रमें रक्खे इसमेसे १ रत्ती भोजनके पश्चात् खिलावे तो ॥ ५२ ॥ यह पाशुपतरस तत्क्षणही अपने गुणको दिग्वाता है. यह दीपन, पाचन, हृदयको बलप्रद और विधूचिका : महामारी, हलकी बीमारी ) का शीत्रही नाश करनेवाला है ॥ ५३ ॥ ऐसा रसेंद्रसारसग्रहके ज्वराविकारमें लिखा है अथ पर्पटीरसनिर्माणविधिः। रसंत्रिगुणगंधेनमर्दयित्वास,गकम्॥लोहपात्रे घृताभ्यक्तेद्रावितंवदराग्निना ॥ ५४॥ ऊर्ध्वाधो गोमयंदत्त्वाकदल्याःकोमलेदले ॥ स्निग्धेपत्रेहा योदापर्पटाकारतानयेत् ॥ ५५ ॥ पादेलोहे विनिःक्षिप्तेलोहपर्पटिकाभवेत्॥ताम्रपादेविनिः क्षिप्तेताम्रपर्पटिकाभवेत् ॥ ५६ ॥ विषपादंचयु जीतत्वसाध्येप्वामयेषुच ॥ सुरसायाजयन्त्या श्वकन्यकाढकरूपयोः॥ ५७ ॥ त्रिफलायामुने (७६) अनुपानदर्पणः। र्भार्थामुंड्यात्रिकटुसंज्ञयोः ॥ शृंगराजस्यवढे श्चप्रत्यहंद्रवभावितम् ॥५८॥ आर्द्रकस्यद्रवेणाथ सप्तधाभावयेत्पुनः॥अंगारेस्वेदयेदीषत्पर्पटीरस मुत्तमम् ॥ ५९ ॥ गुंजाप्टकंददीतास्यताम्बूली पत्रसंयुतम् ॥ पिप्पलीरसकैश्चापिनिगुंड्याह्यनु पाययेत् ॥६० ॥ त्रिकंटकस्यमूलानिशुंठीछित्त्वा विनिःक्षिपेत् ॥ अजाक्षीरेसनीरार्द्धयावत्क्षीरंवि पाचयेत् ॥६१॥ तत्क्षीरंपाययेद्रात्रौसकणंभोज येदपि ॥ कूष्मांडंबर्जयेचिंचावताकंकर्कटीमपि ॥ ६ ॥ आरनालंचतैलंचमैथुनंचविवर्जयेत् ॥ मासत्रयंतुसेवेतकासश्वासापनुत्तये ॥ ६३ ॥ भाषानुपाद:-अब पर्यटोरसके बनानेकी विवि वर्णन करते है -४ तोले शुभ पाग और १२ ताठ शुद्धगक लेकर इन दोनोंको खल करे, जा गली जा त उन मगरे के रममें घोटे, फिर बीसे चुपडेहुए लोहपात्रमें भगरेक गे: काठीका सलार बरीकी लकडीकी आच देके पिवला॥१४॥ 14 नाना पीपर गोबर बिछाकर उस गोवरपर उत्तम चिकना केलेका 7 ! ६ र उस के पतपर पिपली दुई कजलीको डाल दी और उसके का स्वकार उमपे पुनः गोबर दालकर ऐसे प्रकार उमपित्री काली पाटीक समान बन जाय ।। ५१ ॥ + + at aior मेहरम मिलानेम, लोहापटी, और ताम्रमा " नानी संहिटाती है ॥२५ ॥ पश्चात इस पर्पटीम तयार i - 1, नियार, नाठमी, अरनी (अग्निमय सामान । ६. ! .अ, अगनि, नारगो, गोसायम", ५५० भनी तया नायना एकाप कम {rik 1 1 - , षष्ठःप्रमोदः ६। (७७) देवे ॥ ५८ ॥ फिर अदरकके रसकी ७ भावना देकर अगारपर कुछ स्वेदन करके रक्खे, यह असाध्य रोगोंपरभी उत्तम पर्पटी रसहै ।। ५९ ॥ इस रसकी १ मासे भरकी मात्रा पानमें अथवा १० पिपलीके चूर्ण सग देवे और ऊपरसे निर्गुडीके रसको ॥६० ॥ अथवा गोखरूकी जड और सोंठको बकरीके दुधमें डालकर उससे आधा पानी मिलाकर औटावे जब दूधमात्र शेष रह जावे तब छानकर ।। ६१ ॥ पीपलीयुक्त इस दूधको रात्रिके समय पिलावे और उत्तम प्रकारका भोजन करावे तो वह पुरुप रोगरहित दिव्यदेह होय. इस रसको सेवन करनेवालेने काट कोहला ) इगली बैंगन, ककडी ॥ ६२ ॥ काजी, तेल और मैथुन (स्त्रीसग व्यवाय ) इनको त्याग्न ( छोड) ही देवे. इस पर्पटीरसका यदि ३ मास पर्यंत सेवन करे तो समस्त कास और श्वासभी दूर होय ॥ ६३ ॥ ऐसा प्रथातरमें लिखा है। अथ जयावटीनिर्माणविधिः। विषंत्रिकटुकंमुस्तहरिद्रानिम्बपत्रकम् ॥ विडंग मष्टमंचूर्णछागमूत्रैस्समंसमम् ॥ चणकामा वटीकार्यास्याजयायोगवाहिका ॥ ६४ ॥ रसेंद्र० सं० ज्वराधि०॥ भापानुवादः-अब जयावटीके बनानेकी विधि वर्णन करते हैं. शुद्ध विष (सिंगया ) त्रिकटु ( सोंठ, मिरच, पीपल ) नागरमोथा, हलदी, नींवके पत्ते और वायविटग ये आठों समान लेकर इनका महीन चूर्ण बनावे फिर, उनको बकरीके मूत्रमें खल करके चनेके बरावर वटी (गोलिया ) बनाये इसे जयावटी कहते है, यह पृथक् २ अनुपानोंसे अनेक रोगोंको दूर करती है ॥६॥ ऐसा रसेंद्रसारसग्रह्म ज्वराधिकारमे लिखाहै ।। अथ जयंतीवटा निर्माणविधिः। विपंपाठाश्वगंधाचवचातालीशपत्रकम् ॥ मरीचं पिप्पलीनिम्बमजामत्रेणतुल्यकम्॥वटिकापूर्वव

(७८)
अनुपानदर्पणः।
का-जयन्तीयोगवाहिका ॥ ६५ ॥ रसे०
संग्र० ज्व० अ०॥
भाषानुवाद:-अव जयतीवटीके बनानेकी विधि वर्णन करते है. शुद्ध
पाटा, असगध, वच, तालीशपत्र,कालीमिरच,छोटीपीपल, ओर निव इन आठो
औपयाको रमान लेकर इनका कपडछान चूर्ण बनाने और उस चूर्ण को
बकरी के मुत्रने खल करके चनेके समान वटिया बनाते इसे जयतीवटी कहते है.
रही पृथक् अनुरानोसे अनेक रोगोको दूर करती है उक्त दोनों नटीमे समान
ही लोप और इन दोनोके समानही अनुपान होनेसे उक्त दोनो वटी योगनाही
। सामरी र नेसारी ।। , इगी ये इनको जगाजयन्ती वटी ऐसा एकसायभी
कम ॥ २५ ॥ ऐसा रसदसारसग्रहमे अराविकारमे लिखा है ।।
न हमने जो इस स्टो तरगमे गुग्गुलुचूर्ण,रस और नटी गर्णन की
नई १ अनुमान ।। ( ४ ये तथा ५ ले तरगमे ) ही देचुके हैं जिसे
८ नगरापाशीर देंगे
~
शाम 10 -मरामा पगित भागानुवाद-
पिनुमानदणे सागरा गुग्गुलुनारा-
१५. पादिरमनिर्माणविवेक-
पर प्रमोद ॥१॥
नानाधानपनामामामालापरलविषोपनि
मांगीवनमापनिवव्याख्याभ्यामः॥१
: नत्राटोमा-भायंचतानंचायशदमेवन ।।
मामलाइचमानवातवागिरिसंभवाः ॥ २ ॥
रयतामोपचातयः वर्णमाक्षिकतारमाक्षिका
नमविश्वनिन्दाजिनः॥ ३ ॥

.
सप्तमःप्रमादः ७।
(७९)
३ रसः-रसायनार्थिभिलाकैःपारदोरस्यतेयतः॥
ततोरसइतिप्रोक्तस्सचधातुरपिस्मृतः॥४॥
४ उपरसाः-गन्धोहिङ्गुलमनतालकशिलास्स्रोतोऽञ्ज
नंटङ्कणम् ॥ राजावर्तकचुम्बकौस्फटिकयाशं
खःखटीगैरिकम् ॥ काप्तीसरसकङ्कपदसिक
तावोलश्चकंकुष्टकम् ॥ सौराष्ट्रीचमताअमीउ
परसास्सूतस्यकिंचिद्गुणैः ॥ ५॥
५ रत्नानि-वजंगारुत्सकंपुष्परागोमाणिक्यमेवच ॥
इन्द्रनीलश्चगोमेदस्तथावैदूर्यमित्यपि ॥
मौक्तिकविद्रुमश्चेतिरत्नान्युक्तानिवनव ॥६॥
६ उपरत्तानि-उपरत्नानिकाचश्चकर्पूराइमातथैवच ॥
मुक्ताशुक्तिस्तथाशङ्खइत्यादीनिवहून्यपि ॥७॥
७ विपाः-विषंतुगरलक्ष्वेडस्तस्यभेदानुदाहरे ॥
वत्सनाभःसहारिद्रःसक्तुकश्चप्रदीपनः॥८॥
सौराष्ट्रिकाशृङ्गकश्चकालकूटस्तथैवच ॥
हालाहलोब्रह्मपुत्रोविषभेदाअमीनव ॥९॥
८ उपविपाः-अर्कक्षीरस्नुहीक्षीरंतथैवकरिहारिका ॥
कीरकोऽथधत्तरः पञ्चचोपविषाः स्मृताः॥१०॥
मा० प्र० पृ० खं० १ भा० ॥
मापानुवादः-अन इसके आगे धातु, उपधातु, रम, उपरस, रत्न, उपरत्न,
विप और उपनियों के शावन जार मारण नम्मफरने , का विक / विचार)
पूर्णन करने ॥ १॥

Anupan Darpan (bhasa Tika)

Author
Khemraj Shri Kirshna Dass
Title
Anupan Darpan (bhasa Tika)
File name
Anupan Darpan (bhasa Tika)
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2010
Publisher
Indiayan Press Limeted Pryag
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
DLI number
325940
Barcode
99999990007812.00
Scanning centre
Banasthali University
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