Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

Goraksh Siddhant Sangrah

Shastri,dravyesh Jha · 2012/08

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भूमिका 'नमोगुरुभ्योगुरुपादुकाभ्यो नमः शिवम्यः शिवपादुकाभ्यः। गोरक्षमत्स्येन्द्रजलन्धरम्यानमोनमस्तच्छिवपादुकाभ्या इहचेदवेदीदथसत्यमस्ति । नचेदिहरदीन्महतीविनष्टिः । सजातोयेन जातेन यातिवंशः समुन्नतिम् । परिवर्तिनि संसारे मृतः कोवानजायते ॥ सकललोकतन्त प्रसिद्ध दोलक्ष्य समस्त प्राणियों के लिए निश्चित है प्रथम स्वदेश जाति की उन्नति करना दूसरा पर- मात्मशान द्वारा नित्य मोक्ष धाम को प्राप्त करना । जो इन दोनों को पूर्ण करता है यह तो मनुष्य जन्म को पूर्ण सफल पनाता है इन में एक लक्ष्य को सिद्ध करने वाले का भी जन्म अंशतः सफल ही कशाता है किन्तु जो दोनों से पश्रित है उस का जन्म तो नहीं के ही परायर माना जाता है। इसलिए दोनों रयों का मार्ग दिसाने वाली इस पुस्तक का प्रकाश होना जाधु और सम्बन पुरुषों के लिए नाथ जी सही अवतार

[4]
होना माननीय है। अत जनता के लाभ के लिए इसका
प्रकाशन परमावश्यक है-
यह अन्य अनेक श्रुति स्मृति तन्त्र पुराण प्राओं
मगृहीत है। इसका सग्रह किसने किया इस विषय का कोई
निश्चय नहीं है। यह हस्तलिसित पुस्तक महामहोपाध्याय
श्रीमान् गोपीनाथ कविरान जी एम० ए० प्रिन्सिपल कीन्स
कालेन काशी के पास में है। उन्होंने उस वृहत् सग्रहीत
पुस्तक से सक्षेप करके सन् १९२५ ई० मै इसका प्रकाश सर
स्वती भवन द्वारा करा दिया है। इसमें प्रधान रूप से प्रत्या
श्रामियों का निरूपण किया गया है, जो कि अवधूत योगी
कहाते हैं। चतुर्थाश्रम नो सन्थास है यह साधनावस्था है,
उसमे तत्त्वज्ञान के सम्पादक यम नियम प्राणायाम उपासना
श्रादि कर्मों का अनुष्ठान करना ही मुख्य धर्म है जबकि उस
साधन को पूर्ण होने से योगी सिद्ध हो जाता है, तय उस
अनुष्ठान की भी आवश्यकता नहीं रहती है। जैसे जब तक
यावल रोटी असिद्ध रहते हैं तब तक अग्नि आदि का व्यापार
करना आवश्यक रहता है। जब सिद्ध हो जाते हैं फिर उन्
ध्यापारों की कोई आवश्यकता नहीं रहती है। उसी सिद्धावस्थ

[स] को प्राप्त किए हुए योगी प्रत्याश्रमी अवधून कहाते हैं। श्रय उनकी श्राश्रम में गणना नहीं रहती। श्राश्रम से प्रतीत हो जाते हैं उन में सर्वकर्तव्यता का निषेध ही वैदिक सिद्धान्त है। इस अवस्था के निरूपण करने का प्रकार निषेधात्मक है। जैसे सर्वातीत ब्रह्म के उपदेश का प्रकार नेति नेति निषेधरूप है। इसलिए परमार्थरूप से अन्य धर्मों का निपेध अवधूत के लिए किया जाता है न कि व्यावहारिक जनों के लिए। वास्तविक ( में तो साधनायस्था तक थवधूत योगियों के लिए भी संन्यास आश्रम में कहे हुये यमनियमादि धर्मों का पालन करना ही कहा गया है और यही विशेष सिद्धान्त योगियो के मत में है कि विना सिद्धि किये माधन का त्याग नहीं करना । केवल इन शाब्दिक अहंममारग जान कर उतने ही से तुष्ट होकर पृतन्य अपने को नहीं मानना । और जो लोग व्यावहारिक है उनके लिए श्रुतिस्मृति प्रतिपादित समस्त सनातन धर्म का आचरण फिरना ही कहा गया है। देवतावाद, मूर्तिपूजा, पर्णश्नम, इत्यादि सय धर्मों का उल्लेस करके प्रमाणित किया गया है। इसमें तो इतने जोरों से प्रतिपादन किया गया है कि मना- तन धर्म के प्रत्येक सिद्धान्त प्रत्यन सिद्ध है योगी लोग हसा. द

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मलक की तरह दिसा सकते हैं। और सब दर्शनों से
सिद्धान्त सर्वोच्च है। किन्तु क्सिी दर्शन का खण्डन न
किया गया है कि अमुक मत ठीक नहीं प्रत्युत उसको
दिसाकर प्रमाणित करके उससे भी आगे बढ़कर अपने सि।
की सप्रमाण उच्चता दिसाई गई है। उसको अपना अंग
'लिया है। यह चमत्कार अनुभवी दार्शनिक पुरुपों
पर बड़ा प्रभाव डालता है। इसीसे प्रभावित होकर सर्व
दायवलम्बी सजनों का हित इस ग्रन्थ से देख कर योगिराज
कविराज जी ने इसको प्रकाशित कर दिया है।
.
इस योगाश्रम महाविद्यालय के जन्मदाता महन्त श्रीपूर्णनाथ
जी महाराज हैं। आप वास्तविक में एक अद्भुत महापुरुप है
जो पक्षपाव छोड़ कर आपकी कृति का अन्यालोचन करेंगे
उनका अन्त करण ही स्वयं इनके अद्भुत महत्व को स्वीका
किए बिना नहीं रहेगा ? आप जव से इस गद्दी पर विराजमा
हुए हैं तब से यह स्थान चारों तरफ से घमक उठा। प्रधा
स्थान बोहर में हैं वहां अन्नक्षेत्र (जो कोई आवे सबको भोज
देना) यद्यपि स्थान के निर्माण समय से ही है परन्तु पहां
से उसका बहुत नियत ठोस प्रबन्ध कर दिया है । जिस

उसमें आगे किसी प्रकार से संकट आने की आशंका
नहीं रही। बीकानेर पेड़ी ग्राम में गोशाला की भी वृद्धि कर दी
है। वोहर और रोहतक में कितने विशाल भवन किले के
समान वनवा दिए हैं। चमत्कार यह है कि इतने काम करते
हुए भी आर्थिक उन्नति अर्थात् कईएक लाखों की स्थायी सम्पत्ति
करदी है। आपके गुरु महन्त श्री चेतनाथ जी महाराजा बड़े
धुरन्धर संस्कृत के विद्वान थे उनकी इस सम्प्रदाय में संस्कृत
विद्या की जागृति के लिए बड़ी अभिलापा थी ।
और इसके लिए उद्योग भी करते थे । वत्तमान
महन्त जो उस समय में विद्याध्ययन करते थे ।
इनके हृदय पर संस्कृत विद्या और धर्म के रस ने प्रगाढ़ रूप
धारण कर लिया था। मैं अनुभव और परीक्षा करके सच्चे
दिल से लिसता हूं कि जिस प्रकार संस्कृत विद्या का अनुराग
इनमें देसा। पैसा न मैं अपने में अथवा किसी अन्य में
देसता हूं। इसका परिणाम यह हुआ कि गद्दी पर बैठते ही
मापने योहर में पाठशाला सोल दी और नाधों के पढ़ने का
अत्यन्त सराहनीय मपन्य कर दिया। फिर पीछे विचार हुआ
कि यहां विद्यालय रहने पर जनता जितना लाभ उठाती है

[ग] मलक की तरह दिसा सकते हैं। और सब दर्शनों से इस सिद्धान्त सर्वोच्च है। किन्तु किसी दर्शन का खण्डन किया गया है कि अमुक मत ठीक नहीं प्रत्युत उसको दिसाकर प्रमाणित करके उससे भी आगे बढ़कर अपने सिद्धान्त की सप्रमाण उच्चता दिखाई गई है। उसको अपना अंग बना 'लिया है। यह चमत्कार अनुभवी दार्शनिक पुरुषों के हृदया पर बड़ा प्रभाव डालता है। इसीसे प्रभावित होकर सर्व सम्म दायवलम्बी सजनों का हित इस ग्रन्थ से देख कर योगिराज कविराज जी ने इसको प्रकाशित कर दिया है। इस योगाश्रम महाविद्यालय के जन्मदाता महन्त श्रीपूर्णनाथ- जी महाराज हैं। आप वास्तविक में एक अद्भुत महापुरुप है। जो पक्षपात छोड़ कर आपकी कृति का अन्वालोचन करें। उनका अन्तःकरण ही स्वयं इनके अद्भुत महत्व को स्वीकार किए विना नहीं रहेगा ? आप जय से इस गद्दी पर विराजमा हुए हैं तब से यह स्थान चारों तरफ से चमक उठा। प्रधा स्थान बोहर में हैं वहां अन्नक्षेव (जो कोई आये सयको भोज देना) यद्यपि स्थान के निर्माण समय से ही है परन्तु पह से उसका बहुत नियत ठोस प्रबन्ध कर दिया है । जिस

-
[घ ]
उसमें आगे किसी प्रकार से संकट आने की आशंका
नहीं रही। बीकानेर पेडी ग्राम में गोशाला की भी वृद्धि कर दी
है। वोहर और रोहतक में क्तिने विशाल भवन किले के
समान वनमा दिए है। चमत्कार यह है कि इतने काम करते
हुए भी आर्थिक उन्नति अर्थात् कईएक लासों की स्थायी सम्पत्ति
करदी है। आपके गुरु महन्त श्री चेतनाथ जी महाराजा बड़े
धुरन्धर संस्कृत के विद्वान् थे उनरी इस सम्प्रदाय में संस्कृत
विद्या की जागृति के लिए बड़ी अभिलापा थी।
और इसके लिए उद्योग भी करते थे। वर्तमान
महन्त जो उस समय में विद्याध्ययन करते थे।
इनके हृदय पर सस्कृत विद्या और धर्म के रस ने प्रगाढ़ रूप
धारण कर लिया था। मैं अनुभव और परीक्षा करके सच्चे
दिल से लिखता हूं कि जिस प्रसर सस्टन विद्या का अनुराग
इनमें देसा। पैसा न मैं अपने में अथवा किसी अन्य में
देसता हूं। इसका परिणाम यह हुआ कि गद्दी पर बैठते ही
आपने पोदर में पाठशाला खोल दी और नाथों के पढ़ने का
अत्यन्त सराहनीय प्रबन्ध कर दिया। फिर पीटे विचार हुआ
कि यहां पिनालय रहने पर उनवा जिवना लाभ उठाती है

[6] इससे कहीं अधिक लाभ तीर्थक्षेत्र में रहने से उठा मकेगी। और हमारे बारहों पंथ के नाथ तथा इतर साधु और गृहस्थी सब लाम उठायेगे इसलिए हरद्वार में यहां जमीन सरीद करके सवालास के करीव लागत लगाकर इम विशाल भवन योगाश्रम का निर्माण करवाया । और इसकी स्थायिता के लिए एक लाग्न की जमीदारी (यहां से ५ माइल पर इनाहीमपुर) सरीद कर के इसके नाम से अर्पण कर दी जो विद्यालय आज महा- विद्यालय रूप में परिणत है २० वर्ष के अन्दर हजारों छान पढ़कर इससे निकले है और सैकड़ों शास्त्री और प्राचार्य होकर अनेक स्थानों में अध्यापन और धर्मप्रचार कार्य कर रहे हैं। आश्चर्य यह है कि निज भुजबल से इस महाविद्यालय का जन्म और पालन दोनों ही अकेले कर रहे हैं न कि किसी की सहा- यता से हां इसके कार्यक्रम से संतुष्ट होकर गवर्नमेन्ट सौ रुपये मासिक सहायता देती है । साथ २ प्रधान वोहर स्थान में भी आर्थिक कोप उन्नत कर दिया है। और सम्राट् से भी सत्कार प्राप्त किया जो कि कैसरे हिन्द पद से विभूपित हैं । इसी से सजन पुरुप जान सकते हैं कि इस भारत माता ने ऐसे सुपुत्र एक महन्त जी यो उत्पन्न करके जनता का कितना महोपकार चा किया है। संस्कृत माता और उसके सेवक छात्र तथा विद्वान् लोग तो आजन्म इसके ऋणी रहेंगे। जो कि इस घोर विपत्ति में संस्कृत की इतनी बड़ी सेवा कर रहे हैं साधु समाज का भी मुख उज्ज्यलित कर दिया है नाथ सम्प्रदाय के लिए तो कहना ही क्या है । इस अमर वाणी अमृत से मूर्षित को सचेत फर दिया है यह कहना अत्युक्त नहीं होगा। इस विद्यालय में प्राचीन पुस्तक का प्रकाश करना और अन्वेषण करना यह विभाग रक्खा है जिससे साधु तथा जनता का उपकार हो । इसलिए इस पुस्तक से सर्वसाधारण लाभ उठा सके अतः इसकी हिन्दी भाषा करके प्रकाश किया जाय । और इस कुम्भ महोत्सप पर अनेक स्थानों से आए हुए सज्जन साधु महात्माओं फी सेवा में उपस्थित (अर्पण) किया जाय ऐसा विचार करके अपने पास से सय व्यय भार उठा कर इसका प्रकाश महन्त जी ने फरवाया। इन शुभ कर्मों के लिये महाराज जी का सहस्रशः धन्यवाद भी थोड़ा ही है परमेश्वर से प्रार्थना है कि महाराज जी की यह फीति आसूर्य चन्द्रमा संसार में विद्यमान रहे। किन्तु अल्प समय करीब एक महीना में ही इस समुद्र रूप मन्यरत्न को निकालना पड़ा इसलिए पाठक महानुभावों से प्रार्थना है कि सज्जन पुरुप हंस की तरह गुण मात्र पर ध्यान देगें। जिनका अभ्यास है कि नित्यप्रति दूसरे के दोषों को ही चुनना उनके प्रति दोषोद्घाटन करने के लिए ही मेरी प्रार्थना है क्यों कि उनकी गालियां ही मेरे सिद्धान्त को ईश्वर- यादत्व सिद्ध करेंगी। अन्त में उनका भी उपकार भार मेरे उपर हैं जिन्होंने इस कार्य में बड़ी सहायता की है इसलिए पं० श्री ज्ञानीराम शास्त्री को भी धन्यवाद देता हूं । धैद्यराज श्री श्रेयोनाथ जी पो भी धन्यवाद है जिनके प्रोत्साहन से यह शुभ कार्य अल्प दिनों में सफल हुआ है। इति शिवम् । श्री मदादिनाथपदपद्मेषु प्रन्यकुसुम ममर्यते । इति वियुध विधेयस्य झोपाहद्रव्येशस्य ।।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
*मंगलम्*
नो जालन्धरनाथाय नमः
निर्गुणं वाममागे च सय्यभागेऽद्भुवा निजा ।
मध्यमागे स्वयं पूर्णस्तस्मै नाथाय ते नमः ॥ १ ॥
अलि कुला कुल गएडक मंडलम् ।
अरुण विन्दु सुमंडित भालकम् ॥
निखिल सिद्धिकरं गिरिजा सुतम् ।
चहु नमामि शिवाय गजाननम् ।। १ ।।
भा० टी०-हे स्वात्मानन्द परिपूर्ण सर्वशक्तिमान नाथ जी
आपके पास भाग में निर्गुण, गौर अद्भुत आपकी शक्ति दक्षिण
भाग में है, अर्थात् निर्गुल और शकि दोनों आप में स्थित हैं।
माप इन दोनों पर शासन करते हुए इनफे मध्य भाग में
विराजमान है, ऐसे आप में सादर प्रणाम करता हूँ ॥१॥

२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह मुताः स्तुवन्ति पादाग्रे नखाग्रे जीव जातयः। मुस्तामुक्तगतर्मुस्तः मर्वत्र रमते स्थिर: ॥२॥ मा० टी०-अापके चरणों के अग्रमाग में स्थित होकर मुक और नयों के अम भाग में पानी समूह (अर्थात् समस्त ससार प्राणि) अापकी स्तुति करते हैं। श्राप मुक्न और अमुपत गति से स्वतन्त्र होकर फूटस्स गनि मे सय जगह रमण करते है॥२॥ वामभागे स्थितः शम्भुः सव्ये विष्णु सथव च। मध्ये नाथः परं ज्योति सज्ज्योतिर्मत्तमो हरम् ।।३।। मा० टो०-यह नाथ बरूप परम ज्योति, मेरे हृदय, हुए अन्धकार को नष्ट करे, जिसके वाम भाग में शम्मु. और दक्षिण भाग में विष्णु विराजमान है ॥ ३॥ अस्मिन् मागें सर्वश्रयोमूलभूतो गुरुरेव । सचाऽवधूत एव नान्यः। स कोऽयधृत इत्यपेक्षायामाह मा० टी०-इस मार्ग में समस्त कल्याणों का मूल गुरु ही है, और यह गुरु भी अवधूत ही होना चाहिये, अन्य नहीं। यह अवधूत कौन है इसका उत्तर नीचे के श्लोकों से मिलता है--- नोट-यहां पर इस प्रपम रोक का अर्थ सरेप से लिखा गया है, जो पाठक महानुभाव इसमा विन अर्थ देखना चाहे वह प्राय के अन्त में देखें।

३
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
वचने वचने वेदा स्तीर्थानि च पदे पदे ।
दृष्टौ दृष्टौ च विन्यं सोऽयधूतः श्रियेस्तु नः ।।४।।
एकहस्ते धृतस्त्यागो भोगवैककरे स्वयम् ।
अलिप्तस्त्यागभोगाभ्यां सोऽवधृतः श्रियस्तु नः॥शा
मा० टी०-जिसका प्रत्येक वचन वेद है, अर्थात् शान से
भरा हुआ है। जिसका प्रत्येक चरण तीर्थ है, अर्थात् जिसमें
दूसरों को तारने की शक्ति है, और जिसकी दया दृष्टि में
फैयल्प है। अर्थात् जिनकी दया दृष्टि पड़ते ही शिष्य के सय
दुःष दूर हो जाते हैं। यह अवधन हमको कल्याण का
मार्ग दियाए। जिसके एक हाथ में त्याग और एक हाथ में
भोग है, अर्थात् जिसकी दया दृष्टि से सब कुछ प्राप्त होता है
परन्तु आप दोनों से गिर्लेग हैं, यह अवधून हमें कल्याण का
रास्ता दिगाये ४,५॥
उक्ताहसिद्धसिद्धान्तपद्धती-
सनि प्रकृतिविकारानवधुनोतीत्यवधूतः ।
भा०-जो ममस्त प्राति विकारों से भिन्न है यह अवधूत
है। ऐसा सिद्धसिद्धान्तपति में कहा है।
प्रसरं मासयेच्यक्तिः संकोचं भासयच्छिवः।
तयोर्योगस्य कर्ता पः स मवेत् सिद्धयोगिरात् ।।६।।
.

- गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः यह सष्टि संकोच और विकास का पेल है। शक्ति के कारणा यह सृष्टि फैलती है और शिरसको सकुचित अर्थात् अपने में रोन कर लेता है, तात्पर्य यह है कि-जय शक्ति प्रबल होती है तप हिर्मुख होकर संसार को ग्चती है। और शिव प्रबल हो पर शक्ति को जब अपने में लीन कर लेता है । तब प्रलय होता है। इस संकोच-विकास अर्थात् सृष्टि और प्रलय रूप योगका जो पर्ता है वही सिद्धयोगिराजो में उत्तम है ।। ६॥ अवधूतगीतायामुक्तमू- प्राब्रह्मस्तम्मपर्यन्तं सम्पूर्ण परमात्मनि । भिन्नाऽभिन्नं न पश्यामि तस्याहं पंचमाश्रमी ॥ ७ ॥ ब्रह्मा से लेकर जड़वर्गपर्यन्त सृष्टि को उस सर्वाधार प्रभु. से न में मित्र देखता हून अभिन्न, मै उसी का रूप. श्रीर पर्णाश्रम से अतीत है ॥ ७ ॥ सूनसंहितायाम् - प्रति वर्णाश्रमी प्रोक्तो गुरुत्साधिकारणाम् । न कस्यापि भवेच्छिप्यो यथाऽहं पुरुषोत्तमः ॥८॥ यथाइ पुरुषोत्तम इति विष्णु प्रति शिववचनम् , अतिपर्णाश्रमी साताद् गुरूणां गुरुरुच्यते । न तत्ममोनाधिकथास्मिलोकेऽस्त्येव न संशयः Mel सूत सहिता में वर्णन किया है कि मय घणों धीर आश्रमों से जो अतीत है वही सव वर्णों और गानों का गुम है । यह

२
A
गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः
किसी का शिष्य नहीं है जैसा कि मैं पुरुषोत्तम किसी काशिष्य
नहीं हूँ । यह वचन शिवजी महाराज ने विष्णु जी से
फहा है।
जो वर्णाश्रम के अभिमान से मुक्त हो गय घिद गुरुओं
का भी गुरु है, उसके बराबर या उससे बढ़ कर संसार में कोई
नहीं है । इस में किसी को सन्देह न करना चाहिये ।।
• णितं ब्रह्मविन्दूपनिषदि-
पत्तपातचिनिर्मुक्तं ब्रह्म सम्पद्यते तदा ।
खरेण साधयेद् योगमस्वरं भावयेत् परम् ।।
श्रस्वरेण हि मावेन भावो नाऽऽभाव इप्यते ।
तदेवनिष्कलं ब्रह्म निर्विकल्प निरंजनम् ।।
तद् ब्रह्माऽहमिति नात्या ब्रह्म सम्पद्यते
योगी,स्वर से योग को सिद्ध करे । यहां योग पद का अर्थ
समाधि है, और स्वर पद के अनेक अर्थ हैं, नाक से जो श्वास
पाहर निकलता है भीर भीतर जाता है यह स्वर कहलाता
जैसे कि शिव खरोदय, में कहा है, उसके द्वारा अर्थात्
रेचक पूरक द्वारा कुम्मक मा समाधि को सिद्ध करे। मथया
स्पर इस पद का 'नादलय' अर्थ भी हो सकता है । पररातु उसकी
ममिया कठिन है अतः उसका यहां लिपना उपयुक्त नहीं ।
भयया सर से प्रकारादि निज २ गुरुओं के पनाए मंत्रों से।
यहां पर सर पद साधन है इस से सिद्ध दोवादे किसिद
ध्रुवम् ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः करने योग्य शुद्ध सच्चिदानन्द इस वरपद से अभिन्न है उसी की भावना करे । इस में किसी को सदेह हो कि स्वर से रहित हो जाने पर शून्य हो जायेगा, इस सदेह को हटाने के लिये कहते है-यह अभाव शून्य नहीं है किन्तु भाव रूप है उसका किस प्रकार ध्यान करे सो कहते हैं वह ब्रह्म सब प्रकार के भेद धर्म अधर्म संकल्प विकल्या इत्यादि संसार के व्यवहार से रहित है, वही में हूं । इस प्रकार अभेद भावना करे, ऐसी दृढ़ भावना हो जाने पर योगी अवश्य सच्चिदानन्दम्प हा जाता है। तत्राऽऽशङ्कते-पक्षपात क इति, देहाभिमान एव सः । सोपि क इति। ब्राह्मणोऽहं क्षत्रियोऽहं धैरयोऽह शूद्रोऽहं पुनरन्त्यजोऽहं ब्रह्मचारी श्रहं गृहस्थोऽहं चानप्रस्थोऽहं संन्यास्यहमुत्तमोऽहं मध्यमोऽहम- धम इत्यादि । संकल्प एव सः । त संकल्पं विहाय सर्व च्यापर्फ परमनाथ याथातथ्येन पश्यत्यथ मुक्तो भवति तादृश एव सादिति । तथा च वर्णाश्रमादिव्यबहारमतीत्य नाथं साक्षात्कुतो मुक्तिरिति । यहां कोई शंका करता है कि पक्षपात से क्या तात्पर्य है? देहाभिमान ही पतात है। देहाभिमान क्या है ? मैं ब्राह्मण हूँ, मैं क्षत्रिय है में वैश्य हुं शूद अंत्यज हूँ ब्रह्मचारीगृहस्थ घाम- . 1

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा
प्रच या संन्यासी हूँ, अथवा मैं उत्तम मध्यम और अधम है,
यही देहाभिमान और संकल्प है इस संकल्प को छोड़ कर
सर्वघ्यापक परमनाथ के दर्शन जय यथार्थ रूप से कर लेता
है तब यह वैसा ही होजाता है। तात्पर्य यह है किवर्गाश्रम
के व्यवहार से अतीत होने पर श्री नाथजी के साक्षात् कार से
मुक्ति प्राप्त होती है।
यदि कोपि वर्द वर्णाश्रमाचार व्यवहारं त्यक्तवतः परम
योगिनो मुक्तिर्भवतु नाम । वर्णाश्रमाचारवतः सा कथं
न भवेत् ? "कर्मणव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय"
इत्यादीनि कानिचिच्चास्त्रवाक्यान्यवलम्ब्य बदन्ति चा-
मुको गृहस्थो मुक्तचामुको भिक्षुरिति । तत्रोच्यते-गुणा-
नतीत्येव मुक्ती भवेन्न त गुणाभिमानाति सम्मतः सिद्धान्तो
भवत्येव । वर्णव्यवहारे तु न सम्भवति गुणातीतत्वम्
कथं ? वर्णमात्रस्यापि गुणनिर्मितत्वादिति । उक्तंच
गीतायाम् ."चातुर्वण्य भया सृष्टं गुण कर्म विभागशः।
तस्य कर्तारमपि मां विध्धकारमव्ययम्" वथा च गुण
सत्वे न मुक्तिरिति ।
वन यादी वदति-वर्णाभिमानिनःकि न त्यजन्ति
गुणानिति, यदि गुणां स्त्यजेयुस्तहि कथं वर्णसद्भावः,
गुणमूलकत्वादेव वर्णत्वस्य । तयाच'ऽऽश्रमिसं स्यात् । तदा
+

म गोरक्षसिद्धान्तसंग्नहा. बादी वदति भवद्भिस्त्वाथामिणोपि गुणातीतत्वाभावान्मु- क्तिर्नेत्युच्यते साच भवद्वचनक्रमेणाप्यायास्याति तत्र किमुत्तरामिति । उच्यते-नैवमाश्रमिणो मुक्तिरायाता, कथम् ? आश्रमाणामपि गुणमूलकत्वात् । प्रथमतो वर्णव्यवहारेण गुणभजनम् ॥ गुणवृतिषु च सत्वगुणवृत्तयः उत्तमाः, रजस्तमो वृत्तयस्ततोनिकृष्टा इति कृत्वा गुणेषप्युत्त- मादित्यस्यात् । परन्तु गुणवृत्तित्वं तु सर्वसाधारणम् । अतो नास्ति गुणवृत्तीनां मुक्तिसाधकत्वम् । यथा-वे स्त्रियौ रूपवत्यौ भवतस्तयोयोरपि संयोगे न भवेद् गर्भोत्पत्तिः । किन्तु तद्धर्मभिन्नत्वेन पुरुपेणैव सा भवेत् । किंच सौन्दर्यतारतम्यनैकस्सा अपरा अधिका न्यूना या भवतु नाम, परन्तु भोक्ता तु तयोरपि पुरुष एव । नास्ति तयो रन्योन्यं भोफ्तृभोग्यत्यम् । तथा नास्ति वर्णानां साचान्मुक्तिधिपयेऽन्योन्यंगुरुशिष्यत्यम् आश्रमिणोपि प्रथमतो वर्णाभिमानेन गुणमाज एव । ते चोत्तरत्रापि प्रारम्धमभिमत्य भोगभाजो भवन्ति, तेन तत्र दृष्टान्तो ६ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः च प्रारब्ध कर्मणां भोगोऽवश्य इतिकृत्या कर्मणां सत्यत्वं तावद् दर्शयति, यतो गुणलेश एतेपामपि न निवृत्तो यतो मुक्तत्वपुरुषार्थविहीनास्तपि नपुंसकप्रायाःसन्तो न मुक्तिश्रियमहन्ति । यद्यपि नपुसकाः पुरुपवेपिणो वर्तन्ते तथापि पुरुपत्वेन सन्ततिसम्पादका न भवन्ति । एवं चेप मात्रणाथमिणोपि सम्मानपूजाधर्हन्तु नाम गुरुत्वम् । अतोगुणाततित्वेन प्रत्याश्रमिण एव मुक्तिप्रदगुरुत्वम् । नाऽन्यस्स कसापीति बहुधा शास्त्रे निरूपितम् भा. टी-यहां कोई शंका करता है कि वर्णाश्रमों के आचार और व्यवहार को त्यागने पाले परमयोगी को यदि आप मुक्ति का अधिकारी मानते हैं तो यह ठीक है, परन्तु वर्णा- श्रमों के प्राचार का परित्याग किये यिना मुक्ति नहीं होती, यह कैसे हो सकता है। 'जनकादि फर्म से ही सिद्धि को प्राप्त हुए, इत्यादि शास्त्र पापो का आश्रय लेकर बहुत से कहते हैं, कि यह गृहस्थ मुक्त हो गया, यह संन्यासी मुक होगया, इसका उत्तर यह है कि-गुणातीत होकर ही मुक्त होता है । गुणाभि. मानी मुक्त का अधिकारी नहीं है ! यह सर्य सम्मत सिद्धान्त है ही, भीर वर्ण व्यवहार में गुणातीत होना सम्मय दो नहीं पों किला का तो निर्माण गुणों के माधार पर हुमा ।

१० गोरक्षसिद्धान्तसग्रह जैसा कि गीता में कहा है-मैने गुण कर्म के विभाग से चारों पर्ण उत्पन्न किये हैं। मैं यद्यपि पिकार रहित अकर्ता हत्तथापि चारों वर्णा का निर्माता तू मुझे ही समझा। इसलिए गुणों के रहते हुए मुक्ति कप्ती ? घादी फिर शका करना है कि वर्णाभिमानी क्या गुणों को नहीं छोडते ? यदि वे गुर्णा रोडोड दें तो उस २ वर्ण वाले पहला हो कसे सकते हैं। जयकि वर्णन्यवहार का मूल कारण ही गुण है इसा प्रकार आश्रमवादी भी, गुणानीत न हाने क कारण मुनि भागी नहीं हो सकते । यहां फिर वादी कहना है कि श्राप तो श्राधम बालों को भी गुणातीत न होने के कारण मुक्ति का अधिकारी नही मानते, परन्तु अापने वणी को गुण मूलक यताया है प्राथमों को नहीं। इस लिए थापक ही पचन स आश्रम पाल भी मुक्ति प्राप्त कर सफ्ते हैं। इसका फया उत्तर है ? सुनिये श्राश्रम घालों का भी मुक्त हाना हमारे वचन स सिद्ध नहीं होता फ्योंकि आश्रम भी गुणों के आधार पर ही निर्मित हुए है। पहले तो वर्णों के अभिमान में गुणों का सेवन होता है । याद में वर्ण व्यवहार से अाश्रम या अभिमान होने पर गुण सम्बन्ध नहीं छूटता। कोई कहे कि रजोगुण तमोगुण निकृष्ट हैं इस लिए घे यन्धन श्रेणी में माने जाय किन्तु सत्वगुण को तो सभी उत्तम मानते हैं उसको श्राप क्यों बन्धन कोटि में गिनते गोरक्षसिद्धान्तसग्रह है। इसका उत्तर यह है कि गुणों की वृत्तियों में भी सत्वगुण की वृत्तियां उत्तम हैं, रजोगुण और तमोगुण को वृत्तिया निकृष्ट है। इस प्रकार गुणों को वृत्तियो, म उत्तम, मध्यम ओर अधमपना है । यद्यपि सत्वगुण उत्तम है परन्तु गुण वृत्तपना उस में भा है इसलिए गुणों की वृत्तियां मुक्ति का सास स्वरूप नहीं है। इस बार में एक दृष्टान्त दिया जाता है। जन दाखियाँ चाह कितनो भा रूपवती हों पर उनक सयाग स ग त्यत्ति नहीं हा सातो। यह ता उनस भिन्न धर्म पाले पुरुष से ही हो सकता है। सौन्दर्य की न्यूनता या अधिक्ता स उन में कोई कम या ज्यादा हा, पर भोक्ता उनका पुरुष हो है। उनका आपस में भारत भाग्य सम्बन्ध नहीं हो सकता, इसी स पाभिमानियों या मुक्ति विषय में वापस में गुम शिष्य सम्बन्ध नहीं है। थाश्रम वालों में भी वर्ण का अभिमान हाना है। इसलिए ये भी गुणों की ही सरा करने वाले है, अगले जन्म में भी प्रारम्घ पर्म का फल उन्हें भोगना पडेगा, परोकि किये हुए पमों का भोग प्रायश्वर है इस प्रकार घे पों का सत्य मानते हैं। इसलिए अाधमरला में गुणरेशरहोर पारए मुनि याग्य पुरुषार्थ स रहिन ये नामों की तरह मुपितरुण सौभाग्य को प्राप्त करने योग्य नहीं है । नपुसा यद्यपि पुरष येर में पुरुष जैसा प्रतीत होता है, पर मन्तात तो उत्रन नहीं पर साना, इसी तरह पेप ये कारण प्राधम पालों का भी

१२
गौरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
सम्मान पूजा योग्त गुरुत्य वाहे हो तथापि गुणातीत होने के
कारण मुक्ति देने वाला गुरु तो वर्णाधमातीत अवधूत ही हो
सकता है, और कोई नहीं इसका शाखों में बहुत कथन किया
गया है।
उक्तं च कैरल्योपनिपदि-....
मू०-विविक्तदेशे च सुखासनस्थः शुचिः समग्रीव
शिरः शरीरः । अत्याश्रमस्थः सकलेन्द्रियाणि निरुध्य
भक्त्या स्वगुरुं प्रणम्य ।
भा० टी० जैसा कि फैवल्योपनिषद में कहा है-
भक्ति पूर्वक गुरु को प्रणाम कर एकान्त स्थान में सुखासन
लगाकर गर्दन यौर शिर और समस्त शरीर, को ठीक सीधा
कर श्राश्रम के अभिमान को छोड़ सब इन्द्रियों को रोक कर
पवित्र मन से अवधूत ध्यान करे।
तेजोयिन्दूपनिषदि-
म्० लोभ मोहं भयंदर्प कामं क्रोधं च फिील्यपम् ।
शीतोष्णे क्षुत्पिपासे च फिल्विपम् ।
न ब्रह्मकुलदप च न मुक्तिग्रन्थिसंचयम् ।
न भयं सुखदुःख च तथा मानाऽपमानयोः।।
एतद्भावविनिर्मुक्तं तद्ग्रायं ब्रह्म तत्परम् ।

३
.
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
भा० टी०-तेजोपनिषद् में भी कहा है-
लोभ मोह भय दर्प काम क्रोध पाप शीत गर्मी भूख प्यास
संकल्प विकल्प सब को त्यागदे। ब्राह्मण कुल का अभिमान
तथा मुक्ति का प्रन्थि संचय अर्थात् काम क्रोधादि का
समूह, भय और मानापमान इन से उत्पन्न सुष दुःख जिसने
छोड़ दिया यह ब्रह्म स्वरूप होजाता है, क्योंकि ब्रह्म भी इन सब
भावों से रहित है।
शमनस्केपि लिखितम्-
मू० कुलाचारविहीनस्तु गुरुरेको हि दुर्लभः ।
वर्णामित्वमुक्तं नास्ति वर्णाश्रमाचारे सर्वारम्भ
परित्याग इति।
पुनरेवं चायधूत एव सन्मार्गदर्शनशीलो भवति,
'स एव गुरुमुर्मुताभिः कर्तव्यः ।
फलितानेकपुण्यानां मुमुतूणां हितावहम् ॥
साधनं साधनश्रेष्टमाह योगमतः परम् ।।
मा०-भमनस्क नामक ग्रंथ में लिया है कि यह गुरु मति
दुर्लभ है, जिससे कुलाचार का अभिमान नहो, गुरु सरम्म
परित्यागी होना चाहिये, यांनमियों में यह यात नहीं हो
सकती, इसलिए अयधूत हो सथा मार्ग दिखा सकता है,

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह मुक्ति के चाहने वालों को यही गुरु बनाना चाहिये। पूर्वजन्मार्जितपुण्य के प्रभाव से मुक्ति की इच्छा करने थाले सय साधनों में श्रेष्ठ परमसाधन योग है। सिद्धसिद्धान्तपद्धती सन्मार्गश्च योगमार्गस्तदितरस्तु पापण्डमार्गः । तदुक्तमादिनाथेन- 'योगमागेपु तंत्रेषु दीक्षिता स्तांस्तु दूषकाः। ते हि पापण्डिनः प्रोक्ता स्तथा तैः सहबासिनः ।। योगमार्गात्परो मार्गो नास्ति नास्ति श्रुतीस्मृतौ । शास्त्रप्वन्येषु सर्वेषु शिवन कथितं पुरा ॥ भाo-सिद्धसिद्धान्तपति में कहा है कि योगमार्गही सच्चा मार्ग है यात्री सय पायपष्ट मार्ग है । यही श्रादिनाथ जी ने भी कहा है कि योगामार्ग में दीक्षित अर्थात् योग मार्गाधर म्पियों की जो निन्दा परते हैं। ये सब एपक श्रीर पायएडी है. भौर जो उनके साथ रहते हैं, ये भी पाखण्डी है। योगमार्ग से उत्तम मार्ग ध्रुति स्मृति तथा अन्य शाखों में नहीं है, ऐसा शिय जी ने कहा है। विषक मानगडे- - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः १५ योगशास्त्रं पठेन्नित्यं किमन्यैः शास्त्रविस्तरः । यत्स्वयं चादि नाथस्य निर्गतं ददनाम्युजात् ।। भा०-पिरेक मार्तण्ड में भी कहा है- योगशास्त्र को नित्य पढ़े अन्य वृथा विस्तृत शास्त्रों में क्या लाभ, क्योंकि शास्त्र म्वयं थादिनाथ जी के मुघकमल से निकला है। ध्यान विन्द्यनिषदि- यदि शलसमं पापं विस्तीर्ण योजनाद्वह। भिद्यतेध्यानयोगेन नान्यो भेटः कदाचन ।। वर्णाश्रमाभिमानेन वर्तते श्रुतिकिङ्करः । अभिमानविहीनस्तु वर्तते श्रुतिमूर्धनि ।। उत्सृज्यसर्वशास्त्राणि जपहोमादि कर्म च । धर्माधर्म विनिर्मुक्तो योगी योग समन्यसेत् ।। न वेदो वेद इत्याहुदा पैदा निगयते । परात्मा विद्यते येन स वेदो वेद उच्यते ।। पर्यधर्म च मन्ध्या विहिता तत्प्रतिरूपफमाह- -

k
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
जाता है, अगिरस ने शौनक से कहा-ग्रनगदी लोग
हैं कि दो विद्याएं जाननी चाहिए परा और अपरा, जिन
से ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद अथर्ववेद शिक्षा कल्प
निरुक्त छंद ज्योतिष इतिहास पुराण न्याय मीमांसा 4
शास्त्र यह सय अपरा विद्या है । और पग विद्या यह है :
से उस अविनाशी ग्रह्म का ज्ञान हाता है।
यहां जिस से अक्षर ब्रह्म का ज्ञान हो यह पप विद्या
ऐसा कहा गया है सो यह योगविद्या ही है, क्योंकि ध्रुति|
स्मृति पुराणादि सय विद्याए तो अपरा विद्या में गिनाई गई
हैं । परन्तु योगविद्या नहीं गिनाई गई है, इस लिये इन पूर्योत
विद्याओं से अलग योग विद्या का परा विद्या होना साफ२
जाहिर होता है।
मू० तदुक्तमात्मोपनिपदि--
अथ परमात्मा नाम यथातरमुपासनीयः ।
सच प्राणायामप्रत्याहारसमाधियोगाऽनुमानाध्यात्मचि
घटकणिक
कल्पनादिभिर्न लभ्यते न जायते न म्रियते न शुष्यते न
दह्यते न कम्पते निर्गुणः साक्षीभृतः । शुद्धो निरवयवात्मा
केवलः सूक्ष्मो निष्कलो निरंजनो निरभिमानः शब्द स्पर्श
-
श्यामाकतंडुलवालाग्रशतसहस्र

गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः रूप रस गन्ध वर्जितो निर्विकल्पो निराकांक्षः सर्वव्यापी सोऽचिन्त्योऽवयश्च पुनात्यशुद्धान्यपूतानि निष्क्रियः संस्कारो नास्ति संस्कारो नास्तीत्येप परमात्मेति । भा० टी०-श्रात्मोपनिषद् भी कहा है-परमात्मा को अक्षरों के अनुसार उपासना करनी चाहिये, उस परमात्मा को प्रत्याहार समाधि याग और अनुमान यथा सम्भव इन सयको , सहायता से आत्मचिन्तन करने घाला घट के चीज जैसा सावक के चीज जैसा याल की नोंक के सीवें हिस्स जैसा इत्यादि कल्पनाशों से नहीं जाना जा सकता, यह न उत्पन्न होता है। न मरता न सूखता न जलता और न कापता है। वह निर्गुण साक्षीभून है, वह शुद्ध निरययय बंघल सूक्ष्म कलारहित अव्यक्त निरभिमान शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध इत्यादिकों से रहित निकिलर निराकांक्ष सर्व व्यापक अचिन्त्य और वर्णनातीत है। पतित पाचन क्रियाओं तथा संस्कारों से रहित जो है सो परमात्मा है। म०-तंच अमृतनादोपनिपदि स्पष्टमाह- शास्त्राएयधीत्य मेधावी अभ्यस्य च पुनः पुनः। परमं ब्रह्म विज्ञाय उल्कायचान्ययोत्सृजेत् ।।

गोरक्षामद्धान्तसंग्रहः
२१
प्रापद को ढूढने घाला रुद्र के ध्यान में संलग्न साधक
यो काररूपी रथ पर चढ़ कर और विष्णु को सारथी यना
जहां तक स्थ से जाना चाहिये वहां तक रथ से जाय फिर
'टीक स्थान पर रथ को सडा कर और उसे छोड मागे
जाता है।
ओंकार में अ-उ-म् ये तीन मात्रा हैं इनके अध्यक्ष भी
विराट् १ हिरण्यगर्भ २ और माया सहित ईश्वर ये तीन हैं,
तीनों की भावना छोड कर केवल ब्रह्म रूप से भावना करे
उस भावना का फल अकारादि पर और कादि व्यवनों से
रहित विशुद्ध प्रल पद मास होता है।
शब्दादि गंच विषय और अतिचंचल मन इनको रोक
'पर शात्मा के प्रकाश का ध्यान करे इसको प्रत्याहार
पहते हैं।
मत्याहार ध्यान प्रापापाम और धारणा तर्क तथा समाधि
यह पडंग योग कहा जाता है। इस प्रकार समाप्ति तक योग
पाषर्णन है।
उक्तं च मनुस्मृती-
म्०--चरन्तिमरदिक्योजुहोतियजतिक्रियाः ।
यदरं दुष्करं ज्ञेयं ब्रह्म चर प्रजापतिः ।।
भाटोमायादि जिमनी येदिक क्रियाएं हैंधे सय मष्ट
देने पारो, मताइन से उस प्रजापति अतर कापान होना

२२
गौरक्षमिशाम्तसंप्रादः
असम्भय है किन्तु मनाओं का अधिष्ठान पापा मार
ही प्राय की प्राति का मुख्य माधन है।
उतागीतायाम्-
यथा पृतन वसन्य परमा किं प्रयोजनम् ।
एवं तत्यपदे प्राप्त घटे नास्ति प्रयोजनम् ।।
पुगग भारनं पदा धर्मशायाएपनकश ।
पुत्रदारादिगंगारी योगमार्गम्य विसरत् ।।
भामिपि यांगो नामाग्रे मनमा अपि ।
गरं नाति पाप नम्य जन्म शतास्यम् ।।
मधमधमापागि पाउँपयशनानि ।
एसमा ध्यानयोगग्य कला नाहन्नि पोरगीम् ।।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
२३
चो यपि सामानि वेदोपनिपदस्तथा ।
योगज्ञानादवाप्नोति बाह्मणोऽध्यात्मचिन्तकः॥
-
मा० री-वायु पुराण में कहा है-
ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और उपनिषद् इन सबको श्रात्मचि.
तक ब्रह्मशानी योगज्ञान से प्राप्त कर लेता है।
मू०- मार्कण्डेय पुगणेऽप्युक्तम्-
एतत्ते कथित ज्ञानं योगं चेमं नियोध मे।
यं प्राप्य ब्राह्मणो योगी शाश्यती मान्यतां प्रजेत् ।।
एवं यहुधा शास्त्रेषु योगस्य प्रशंसा विदितैय ।
तस्या दिङ्मात्रमिदं दर्शितम् ।
मा० टी.---मार्कण्डेय पुराण में कहा है-
यह मान आप से कहा-अयस् मुझ से योग को समझ
जिस को प्रास कर के योगी मनात प्रतिष्ठा को प्राप्त हो
जाता।
इस प्रकार शालों में योग की प्रशंमा सप जगह विदित है,
पद सोशल दिग्दर्शन मात्र किया गया है।
मु०-तस्य योगस्य लवणं तु पिकमाण्ड उक्तम्-
-

२४
गोरक्षसिद्धान्तमा
योग चात्र प्रवक्ष्यामि योगं चाऽष्टांगमंयुतम् ।
संयोगं योगमित्याहुः क्षेत्रज्ञपरमात्मनोः ॥
एतस्यैव योगादीन्यतानीति ज्ञेयम् ।
सन्मार्गत्वेन योगस्तु सच्यो हित्वान्यसाधनम् ।
मुमुक्षुभिर्यतस्तेषां पदप्राप्तिः परा भवेत् ।।
योगिनो यतिसंकल्पा निर्द्वन्द्वाः पुण्यदशनाः ।
योगरत्नकरण्डास्ते जयन्त्यविधिगोचराः ।।
भा० टो०-उस योग का लक्षण विवेक मानएड में
कहा-
-
अप योग का वर्णन किया जाताई। योग माठ अंगों
से युक्त है । जीयात्मा परमात्मा के संयोग (पक हो जाने को)
योग कहते हैं। हम अभेद के योगरत्यादि पात से अंग है।
ऐसा जानना, और साधनों को छोड़ कर मुमुक्षु लोगों को
योग का ही सेवन करना पाहिये, यही सर्घोत्तम मार्ग है।
योगी मयं श्रेष्ट है जो संग्रल्प विकला काम शोधादि
तया शीतोष्ण मुग दुस्पादिमप इन्दों से रहिन हैं जिन के
ऊपर पेद विधि का मनुशामन नहीं है। योगरूपी पत्तों की
माग गया जिन फे दर्शन मात्र से मनुष्य पवित्र हो

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह।
मृ० तद्वतामेव परमपदप्राप्तिरिति तेषां स्वरूप
प्रशंसां चाह कैवल्योपनिपदि-
विविक्तेदशे च सुखासनस्थः शुचिःसमग्रविशिरः शरीरः ।
प्रत्याश्रमस्थः मकलेन्द्रियाणि निरुध्य भक्त्या स्वगुरु
प्रणम्य ॥
मृत्पुण्डरीक चिरज विराविचित्य मध्यरिशदं विशोकम्,
अनन्तमव्यक्तमचित्य रूपं शिवं प्रशान्तममृतंयमयोनिम् ।।
तमादिमध्यान्तविहीनमेकंकीवीचदानन्दमरूप मद्भु
तम् । उमासहायं परमेश्वरं प्रभु त्रिलोचनं नीलकंठं
प्रशान्तम् ।
ध्यात्या मुर्निगच्छति भृतयोनि ममस्तसादि तममः
परस्तात् ।। स ब्रह्मा स शिवः सोऽचरः परमः स्वराद,
स एव विष्णुः स प्राणः स पात्मा परमेश्वरः । स एवं
सर्व यद्भूतं यमभव्यंसनातनज्ञात्वातंमृत्युमत्येति नान्यः
पंचा विमुक्तये॥

१०
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
सय रुप सय से विलक्षण और पृथक् होता है । इस प्रकार
जहा नहीं सिद्धसिद्धान्तपद्धति आदि योगग्रन्थों में वर्णन
किया गया है। अधिक जानने वाली का वही देखना चाहिए
विस्तार होजाने के भय से यहां अधिक नहीं लिया जाना। इस
प्रकार मुक्ति के सय साधनों में सर्वोत्तम योग की मूर्ति अय
घृत ही परम पुरुषार्थ में निपुण होते हैं ही सब के शिरोमणि
है, उनकी जय होती है।
मोक्ष मार्ग के साधक बधिम परिपाटी की परवाह न
करने वाले श्रवधूत योगियों का सक्षेप से घणन किया
गया है।
म्०-परमः पुरुषार्थस्तु मुक्तिरुत्ता ह्यतस्तु सा ।
निरुप्यतेमधूताना योगसाधनजं फलम् ॥ परमपुरुषार्थस्तु
मुक्तिरित्युक्तम् । सा च नाथस्वरूपेणाऽप्रस्थानम् ।
तत्स्वरूपन्तु गोरक्षोपनिषदि अद्वैतोपरि सदानन्ददेवता
प्रमोपनिषदि-सयममनस्कमश्रीरपाणिपादं ज्योतिर्विद तत्र
लोका न लोका पैदा न वेदा देवान देवा यशान यज्ञा माता
न माता पिता ने पिता स्तुपा न स्नुपा चाण्डालो न
चाण्डालापाल्कमो न पाल्कसः श्रमणो न भमणा,
पशवोन
पशयः तापसो न तापस इत्येकमेन परमिति ।

३३ गोरक्षासिद्धान्तसंग्रह ब्रह्म विन्दौच- नैवचिन्त्य नचाऽचिन्त्य मचिन्त्यंचिन्त्यमेव च इत्यादि । सर्वोपिनिषत्सारे- कथं वन्धः कथं मोक्ष, इत्यादि प्रश्ने अनात्मनो देहादीना स्मत्वेनाभिमन्यते सोभिमानमात्मनोबन्धस्तनिवृत्ति मौत इत्य नन स्वरूपेणाऽवस्थान मिति सिद्धम् । भा० टी० पहले कहा जा चुका है कि परम पुरुषार्थ तो मुक्ति है अतः वही अवधूतों के योग साधन से उत्पन्न होने वाला फल है, उम का निरूपण किया जाता है, यह मुक्ति या है ? नाथ रूप से स्थिति का ही मुक्ति कहते हैं। जैसा कि गरमापनिपद में कहा है- अद्वैत के ऊपर सदानन्द देवता है । प्रमोपनिषद् मे मी जो बिना कारण के म्ययं है तथा मन धोत्र हाथ पैर इन से रहित प्रकाश म्याप है यहां लोक लोक नहीं, यहां घेद घेद नहीं देय देय नहीं. या या नहीं, माता माता नहीं, पिता पिता नहीं, पुत्र वधू पुष वधू नहीं, चांगल चांडाल नहीं, अन्त्यज अन्त्य मदी, मिमिक्षु महीं, पशु पशु नहीं, तापस तापस नहीं फेयता होता है। मलपि भूपनिषद में भी कहा है- हिपहगमोधने पोय न पिगारने योग्य विधार योग्यम । यह सिद्ध गोरक्षासिद्धान्तसंग्रह होते हुए भी विचार योग्य है, इत्यादि। सर्वोपनिषत् मार में कैसे बन्ध्र और फैसे मोक्ष होता है इत्यादि प्रश्न करके देहादि अनात्मवस्तुओं में आरमापने का अभिमान ही वन्ध है, और उसको निवृत्ति हो मोत है। इससे हुभा कि आत्मा की अपने मपस्थिति ही माक्ष । उक्तंचाऽमनस्के भावाभावविनिमुक्तं नाशोत्पत्तिविवर्जितम् । सर्वसंकल्पनातीत परब्रह्म तदुच्यते ।। अवधूतगीतायां च- अद्वैतं के चिदिच्छन्ति द्वैतामच्छन्ति चापरे । समं तनविन्दन्ति द्वैताद्वैतविलक्षणम् ।। पदि सर्वगतो देवाः स्थिरः पूर्णो निरन्तरः । अहो माया महामोहो द्वैताद्वैतविकल्पना ॥ श्रीनित्यनाथकृतीमद्धसिद्धान्तपद्धतौ- न ब्रह्मा विष्णुरुद्रौ, न सुरपतिसुरा नैव पृथ्वी न चापी। नैवानि पि वायु नच गगनतलं नोदिशो नैव कालः ।। नो वेदा नैव यशानघ रविशशिनौ नो विधि नैव कल्पाः। खज्योतिः सत्यमेकं जयति तवपंदसचिदानन्दमूर्ने । तत्पदेनाऽवस्थानं मुक्तिरिति ।

गोरक्षासिद्धान्तसंग्रह
રૂપ
भा० टी०-अमनस्क में जो भावप्रभाव से विलक्षण नाश
और उत्पत्ति से रहित सब कल्पनाओं से परे है वही परब्रह्म
कहा जाना है।
अवधूतगीता में भी कहा है, कि कोई अद्वैत की और कोई
द्वैतकी इच्छा करते हैं परन्तु ये सब द्वैताद्वैत विलक्षण समतत्व
को नहीं प्राप्त कर सकते । जयको परब्रह्म बिना भेद के स्थिर पूर्ण
और सर्व व्यापक है तय बडा आश्चर्य है कि माया मोह के
वशीभूत होकर लोग उल में भी छैनात कल्पना करते
हैं। श्री नित्यनाथ कृत सिद्धसिद्धान्त पद्धति में कहा गया है
कि हं सच्चिदान्द स्वयं प्रकाश भगवान् ? आपके आद्वितीय
स्वरूप को जय हो । जहां न ब्रह्मा न विष्णु न रुद्र न इन्द्र और
न देव गण हैं। न पृथिवी है न जल है न अग्नि न वायु न
आकाश न दिशाएं न काल है, न घेद हैं न यश अव्यक्त
मशिदानन्द नाथ रूप में मचन्द्र न सूर्य न विधि और न कल्प
हैं ऐसे उस परमात्मा में लीन हो जाना ही मुक्ति है ।
मूल्नाथस्य लक्षणं राजगुह्ये-
नाकारोऽनादिरूप थकारः स्थाप्यते सदा ।
भुवनत्रयमेवैकः श्री गोरक्ष नमोस्तु ते ॥
शक्तिसंगम्तंत्रे-
-

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
श्री माक्षदानदत्तत्वान्नाथब्रह्मानुगोधनात् ।
स्थगिताऽज्ञान विभात् श्रीनाथ इति गीयते ॥
श्रीनाथकृत सिद्धसिद्धान्तपद्धता-
आदिनाथ महामिद्ध शक्तियुक्तं जगद्गुरुम् ।
तं वन्दे नित्यतो वक्ष्ये सिद्धान्तं सानुभावतः ।।
इत्यादीनि पुराण वाक्यानि प्रमाणानि ।
तस्स निदर्शनं शास्त्राणि सूर्यस्यदीपा इस कथं करि-
प्यन्ति, तत्तु पदं तादृग्योगिनामेछापरोक्षमिति सिद्धान्तः।
अन्येतु मतवादिन तत्पदमनालनमानाःसाभिप्राय
नुसारि तत्पदं विधाय विवादमाराकान्त मतयः क्लिश्यन्ति
नतु शाम्यन्तीत्याह सिद्धसिद्धान्तपद्वतौ-
भा० टी०-नाथ का रक्षण राजगुह्य नामक पुस्तक में
लिखा है ना शब्द का अर्थ है अनादि रूप, 'का है । अर्थ स्थित
होना । तीनों लोकों के एP कारण अनादि रूपमे स्थित
है गोरक्षनाथ जी में आप को नमस्कार करना है।
शक्ति संगम तंत्र में भी कहा है-आनन्द मा मोक्ष के देने
में उदार होने से तथा सर्याध्यक्ष ब्रह्म का अनुभव होने से और
अज्ञान का नाशक होने से सद्गुरु नाय जो कहे जाते हैं।

गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः
श्रीनाथरुत सिद्धसिद्धान्त पद्धति में-उस प्रसिद्ध महा सिद्ध
अध्ययशक्ति सहित जगदुरु श्री आदिनाथ को नमस्कार करके
अपने अनुभव से सिद्धान्तों का वर्णन करता है । इत्यादि पुराण
वाक्य प्रमाण हैं।
सूर्य को जैसे अनेक दीपक भी प्रकाशित नहीं कर सकते
वैसे ही शास्त्र उसका प्रकाशित नही कर सकते । यह तो महा
सिद्ध योगियों को ही प्रत्यक्ष अनुभव से सिद्ध है, यह
सिद्धान्त हैं।
अन्य सबमत बौदी लोग तो उस परम पद को न जानते
हुए, अपने अभिप्राय के अनुसार उस पदको समझते और बताते
हुए दुःख उठाते है शान्ति को प्राप्त नहीं होते। इसी बात का
वर्णन सिद्ध सिद्धान्त पद्धति में किया गया है। आगे देखो।
मू-वेदान्ती बहुतर्क कर्कशमतिग्रस्तः परं मायया।
भाट्टाः कर्मफलाकुला हतधियो द्वैतेन वैशेपिकाः ।।
अन्ये भेदरता विवाद विकलास्ते तत्वतो वंचिताः।
तस्मात् सिद्धमतं स्वभाव समयं धीरः पर संश्रयेत् ।।
अस्पार्थः- वेदान्तवित् उत्तर भाग शास्त्रवादी अद्वैते
वस्तुनि अध्यारोपाऽपवादाभ्यां द्वैत कल्पनां कुर्वन् बहुभि-
स्तः कर्कशा कठोरा मतिर्यस्य स अत एव परम केवलं

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः मायया ग्रस्तो यतो नियिक वस्तु बदन् मायापणं च तत्र ददाति । पुन मट्टिा मीमांसका अनीश्वरवादमारोपयन्तः कर्मफलप्येवाकुलिताः सन्तोगतधियो भवन्ति । तथा द्वैतेन द्वतवादेन वैशेषिका अपि गतधिय एव,तदन्यपिये भेदवादर- तास्तेऽपि विवाद निकला एव भवन्ति यत एते तत्वतो वंचिता भवन्ति नतु तत्त्वमालम्बन्ते, इत्यर्थः । तस्मान्महासिद्धानां स्वाभाविकं सहजावस्थामयं मतं धीरः पुमान् संश्रयेत् तदेव श्रेयस्करमितिमान्यम् । -घेदान्ती अर्थात् उत्तर मीमांसा यादी अद्वैतवस्तु अर्थात् शुद्ध ब्रह्म में अध्यारोप और अपवादों से बैत कल्पना करते हुए तों से कठोर मति पाले केवल परम तत्त्व को माया रहित होते हुए भी माया से दूषित करते हैं। भट्ट मतवादी पूर्व मीमांसक लोग मनीश्वर धाद से शास्त्री को कलकित करते हुए कर्मफल में ही प्याकुल होकर घुद्धिहीन हो जाते हैं । वैशेषिक शास्त्रमादी भो अद्वैत में हैत की कल्पना करते हुए युद्धि को तिलांजलि दे बैठने हैं। और अन्य मत. घादी 'मेदवाद के झगड़ों में पड़े रहने के कारण तत्य से पंचित रहते हैं। तस्य को नहीं जानते, इसलिये बुद्धिमान भा०-

मू०
गोरसिद्धान्तसंग्रहः
जिज्ञासु को महासिद्धों के स्व भाविक अमली मत का ही ग्रहण
करना चाहिये वही कल्याणकारक है यह निश्चित है।
सांख्या वैष्णव वैदिका विधिपराः संन्यासिनस्तापसाः।
सौरा वीरपराः प्रपंचनिरता बौद्धाजिनाः श्रावकाः।
एते कष्टरता वृथापथगतास्ते तत्वतो वंचिताः ।
तस्मात् सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः परं संश्रयेत् ।।
अस्थार्थः सांख्याः प्रकृतिकारणवादिनः कपिल
मतानुयायिन इति यावत् , वैष्णवाः पाश्चरात्राः । वैदिका
वेदानुवर्तिनस्ते च विधिपरा वाक्यकोविदा इत्यर्थः ।
स्पष्टमन्यत् ।
पुनः- प्राचार्या बहुदीक्षिता हुतिरता नग्न व्रता स्ता-
पमाः।नाना तीर्थनिसेवका जिन परामौनस्थिता नित्यशः।।
एते ते खलु दुःखभार निरतास्ते तत्त्वतो वंचिता. ।
तस्मात् सिद्धमतं स्वभाव समयं धीरः परंसंश्रयते ॥
अस्यार्थ:-प्राचार्यामंत्रव्याख्यातारो बहुदीक्षिता
अग्रिहोत्रदिकारः त एवाऽऽहुतिपरान तुतत्त्व परा अजि-
नपरा वल्कलाससस्ते तार्थनिपेवका यद्वा जपपरा. ।
.
शेष सष्टम् ।

४० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः भा०-प्रकृति को जगत् का कारण मानने वाले मांख्य पादी कपिल मतानुयायी वैष्णव पांचरात्र मत घाले नाना पाक्य विशारद वैदिक संन्यासी तापस योर पूजक सूर्योपासक और प्रपंच रचना में लगे हुए पौद्ध जिन और श्रावक ये सब असत् मार्ग पर चलते हुए व्यर्थ हो कष्ट को उगते हुए सत्य तत्त्व से वंचित रहते हैं, इस लिये सिद्ध मतको हो अपनामा चाहिये। मंत्रों की व्याख्ण करने वाले बहुन .से दीक्षित श्राचार्य आहुति देने में ही लगे रहते हैं, उन्हें तत्वज्ञान नहीं हो सकता पहुत से नग्न प्रतधारो तापस नाना तीयों के उपासक मृग चर्म और बल्कलधारी मौनी ये सय दुःखमार से पीड़ित हाने के कारण सत्त्व से वंचित रहते हैं । भतः सिद्ध मत हो श्रेष्ठ और मंगलदायक है। मू-हठयोग प्रदीपिकायां चोक्तम्-. केचिदागमजालेन केचिनिगम संकुलाः । केचिचणमुह्यन्ति नैवजानन्ति शाङ्करीम् ।। केचिदुवैखानसाचागमोक्ततत्वभ्रमास्तत्र- तत्वाभिमानिनो देहात्मवादिनरचार्वाक सधर्माणस्ते मनु- प्यास्तप्तचक्राङ्किता जीवन्तोऽपि मृतकमिव शरीरं सत्क- मानहं कुर्वाणा देवनिन्दका इति ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
कचिच्च, ऋग्यजुराादेवेदाऽऽमक्ताः कर्मज्ञानरताः
कर्मणवायुःपूर्णकुर्वन्ति ।
अथचतत्ववंचिता साधनेऽशक्तास्ते हिकातर्येणप्रारब्ध
शरणाभूत्वाशरीरसुखार्थमहंब तिवदन्तस्तिष्ठन्ति ।
'तेदवात्मानंचद्विजानीयात् , इत्यादावुक्तम् । एवंनि-
गमसंकुला इति।
केविचाऽतवर्थेपरमेवस्तुनिशुष्कतकानाश्रित्यपडितं-
मन्याभवन्तीतिकृत्वाशाङ्करी नजानन्तीति ।
'भा. टो०-हठयोग प्रदीपिका में भी कहा है-कुछ भागम
और कुछ निगमों के जाल में फसे हुए हैं कुछ लोग तर्क के
भ्रम में पड़े रहते हैं वे शङ्कर कथित योग विद्या को नहीं
जानते।
कुछ लोग वैखानसों की पुस्तकों में कहे हुए तत्त्याभासों से
भ्रम में पड़े हुए व्यर्थ यातों को तय समझने वाले चार्वाको के
समान देह को ही मात्मा मानने वाले तप्त चक्रादिकों से चिन्हित
होकर जीते हुए ही शरीर को मुर्दे के समान और सत्कर्मों के
भयोग्य यनाने वाले सय देवनिन्दक हैं।
कुछ ऋग् यजु आदि घेदों में फसे हुए कर्म करने में ही
समस्त आयु को नष्ट कर देते हैं। उनमें कुछ ऐसे भी हैं जो

४२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह साधन में अशक्त होने में शरीर मुग के लिये प्राग्थ्य की शरण लेते हुए अहं ब्रह्मास्मि इस प्रकार कहते रहने हैं, यही यान "मात्मानं चेद्विजानीयात्" इत्यादि वाक्यों में कही गई है। इस प्रकार निगम को न समझ कर दुप्प उठाने हैं। और कुछ लोग तर्फ सामग्री से रहित होने से पर ग्रम में शुष्क तकों का महाग लेकर अपने को बुद्धिमान समझते हुए शाङ्करी विद्या से वंचित रहते हैं। मू-सा शाङ्करी स्तूयते वेदशास्त्रपुराणानि मामान्यगणिका इव । सा पुनःशाङ्करीमुद्रा प्राप्ताकुलवधूरिव ॥ ऋग् यजुरादयो वेदा धर्मार्थकाममोक्षोपदेष्यारो ब्रह्म- चारि गृहस्थवानप्रस्थभिनुकाश्रमोपदेष्टारश्च भवन्ति । तेचमुख्येवस्तुनि गौणत्वमापादयन्त्यमुख्येच मुख्यत्व- मतोयत्रतादृशाअधिकारिणो वहयोलग्नास्ते चोत्तमपुरुपरमेवे- नीयाद्रव्यस्पृहःप्रवृत्तावेवाऽऽसक्ताभवन्ति । शास्त्राणिचवैशेषिकादीनितैः श्रममूलकैः कदापिवि- श्रान्ति स्ति। पुराणानिच नराणामात्मसाधनेषु, अशक्तत्वं- प्राय आपादयन्ति यतोपालकानामिव रुचितरासुकथामु- लोका नांचित्तवृत्तिंगमयन्ति । तेसवेपिसामान्यगाणकाइन- ।

४३ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः भवन्ति । तद्यथा गणिकागृहे शृङ्गारप्रधानाएववार्तामुख्याः स्युः, ऐश्वरीवारोतुगीणी। ताश्चगणिका बयोवहूनांधूर्तानां लम्पटानामुपरिचाऽऽसक्ताभवन्त्यः सत्यवादिनामकामिनां प्रियेश्वरकथानामुपरिनासक्तिकुर्वन्तीति । भाo--अब उम्स शाङ्करी विद्या की स्तुति को. जाती है। घेद शास्त्र पुराण ये सब सामान्य गणिकाओं (वेश्याओं) के समान है परन्तु शाङ्कगे विद्या कुलपधू के समान है। ऋग् यजु आदि वेद, धर्म अर्थ काम तथा ब्रह्मचारी गृहस्य बानप्रस्थ और भिक्षुक इन आश्रमों का उपदेश करते हैं वे सब मुख्य वस्तु में गौणत्व और गौण वस्तु में मुख्यत्व स्थापित करते हैं इस लिये जहां ऐसे धनामिलापी अधिकारो प्रवृत्ति में आसक्त होकर लगे रहते हैं, वे उत्तम पुरुषों से असेयनीय हैं। वैशेषिकादि शास्त्र भी श्रममूलक हैं, उनसे विश्राम नहीं मिलता, पुराण तो बालकों के समान अतिरुचिकर कथाओं में लोगों की प्रवृत्ति को बढ़ाते हुए मनुष्यों को आत्म साधन में प्रायः असमर्थ ही बना देते हैं वे सब सामान्य गणिकाओं के समान हैं। जैसे गणिकाओं के घर में शृङ्गार प्रधान ही चातें मुख्य होती हैं, ईश्वर सम्पन्धी या गौण होती हैं क्योंकि गणि- .

४३ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः पाएँ धूर्त रम्पट पुरुषों पर ही आसक्त होती हैं परन्तु ईश्वर भक्त सत्यवादी पुरुपों पर नहीं, इसी प्रकार ये सब सकाम पुरुषों के हो याग्य हैं, निष्कामों को इनसे कुछ प्रयोजन नहीं। मु०-किचइहखलुसंसारयोगांभोगश्चद्वापदार्थास्ता, एतद्वयंविना किमपि न स्यात्, सर्वस्याप्येतयोरन्तर्भूतत्वा- दिति । तयोर्मध्येयोगेलमामहासिद्धा भोगेतु सर्व संसारिणः, योगस्यफलं मुक्ति गस्यतु बन्धइति यद्यपि भोगाद्वन्ध- स्तथापिनानाविलासैर्विषयानन्दं पिलुएठयति, यदि दुःख- मपिभवेत्तहिमवतुनामेति । योगिनान्तु पुनःप्रथमतः किं- चिच्छ्रमोभवेत् । क्लेशोऽधिकतरस्तेपामव्यक्तासक्तचेतसा- मित्यायुक्तत्वात्पश्चात्त महानानन्दस्तत्र यहवः कथयन्ति किंचिदिति कथं योगेतुक्लेशोऽधिकतर इत्युक्तम् । भा० टी०-इस संसार में योग भीर भोग दो पदार्थ हैं, इन दोनों के बिना कुछ नहीं होसकता, पोकि इन दोनों में हो सय का अन्तर्भाव हैं। इन में से योग में महासिद्ध और भोग में सप संसारी संलग्न रहते हैं। योग का फल है मुक्ति और भोग का पन्ध तथापि अनेक प्रकार के विलासों से .

पदगए
गोर क्षसिद्धान्तसंग्रहः
निपयानन्द मनुष्यों को अपनी ओर सेत्र हो लेता है भले ही
उन को आगे चलकर दुःस हो क्यों न हो। परन्तु भव्यक्त में
चित्त रगाने वालों को अधिक क्लेश हाता है इत्यादि कथन
फे अनुसार पहले तो योगियों को कुछ दुःख होता है। परन्तु
पीछे महान् भानन्द दाता है।
यहाँ वादा शका करता है कि पहले कुछ दुःख होता है
ऐसा क्यों ? ऊपर के वचन में ना अधिक फ्लेश होता है ऐसा
है
म्० - तदुपरिमयाकथ्यतेमापुरुषा? गुरुहीनानांतेषांकष्ट
भीत् ,गदातादृशः पूर्वोक्तः पूर्णागुरुलभ्यंत तदामहदपि कष्ट
मनियल्पभवेत् ।
तादृष्टान्तः-यथामहाभारयुक्ताशिलायाभदतस्याउत्थापने
महस्त्राणामपि पुरुषाणांकष्टंभोत् , माचीद्धमतापुरुपण कृत
काष्ठादियत्नेनाऽप्रयामनेोत्याप्यतेतथागुरुमग्यावृश्चिक्या
सन्पनापि कष्टन महजसिद्धिर्मति यदिचमहत्कटमापभये
सदाकप्टोत्तरतुमहानानन्दोभवत्येा यस्त्वखंडनायस्पोम
पतिनारिएरायधीश्वरो भनतिनानास्पो भवति । प्रधादयः
सतम्पपूजापन्ति । योगासदोनानाभोगान्भुनास्ति नतु-

गोरक्षासद्धान्तसंग्रह
।
तेलिप्यते । योगविनाभोगोरोग्येवस्यात् । भोग्यपियोगीस
सारीयदृश्यतेनतुमंसारीववन्धनप्राप्नोति ।
इसका उत्तर यह है कि हे पुरुषो? जो गुरुहीन होते
हैं उन्हें अवश्य ही पड़ा भारी कष्ट होना है । यदि पूर्वोक्त
प्रकार का गुरु मिल जाय तो यह महान कट कुछ भी नहीं
गहता। जैसे य हुन भारो शिला को गदि बिना टाटू और
यिना गोल लकड़ियों की सहायता से उठाग जाए तो सहस्रों
पुरषों को भी यहा भारी कट होगा और यही शित किमी
घुद्धिमान पुरुष को यताई विधि के अनुसार टालू मादि की
महायता से महल में हो उठाई जा सकती है, इसी प्रकार
गुरुदेय की बताई कुलो २ थोड़े से ही कर के डाग पडी
भारो मिद्धिमान हो आनी है और यदि महान् कष्ट होना
भी मान लिया जाय तो भी कष्ट के बाद नो अवश्य ही पडा
भारी धानन्द प्राप्त होमाता है जो गुरु की कृपा मे अपण्ड
पानाथ पदयी को प्राप्त हो जाता है यह तो ब्रह्मा विगु आदि
देयों का भी अधीश्वर हा जाता है, और माना म्पों से
यतमाम रहता है। ब्रह्मा आदि सब देघना उमको पूजा
करने हैं।
योगारूद योगी भनेक प्रकार भोगों को भोगता हुगा

४७ गोरक्षसिद्धान्तसग्रहः भी उनसे लिप्त नहीं होता। योग के बिना जा भोगभोगता है यह रोगी हो जाता है । जो योगपूर्वक भोग करता है यह यद्यपि ससारीसा दिखाई देता है पर ससार के समान बाधन में नहीं पड़ता। - म्०-ननुकेचिच्छाखिणःकर्माद्युपासनंमाधनंकथयन्ति तदाम गकथ्यतेतेषांकथनमयाननिवार्यते तदेयकुर्वन्तुनाम परन्तु तत्करण फलांकिमिति । कथंकर्मणामयधिर्मीमांसका- स्ततु पठनपाठनात्तरपठनपाठनदापनिवृत्त्यामिष्टस्मरणंक- वन्ति । यस्यशास्त्रस्य पठन पाठने चापिदोपस्तस्य सेवनेन किंभविष्यतीतिपुनयस्वामिनभजत्मस्वतंत्रोभरेत्यरचप्रसन्न स्वयमेव यदिच्छतितद्ददाति मंत्रिभ्यः । अन्यस्यतुपुरुषस्य- नकस्याप्यपेक्षांकरोति । अयंदहःकर्मरचितःकर्माणिचसर्वाणि निगुणानामन्ति । गुणाश्चमापायाएवंच यदिअननेप्राणिना प्रारब्धंकर्माभिमतंतदामायामिमता, तदभिमानेचतत्रेचसमये ममतत्त्वात्पृथग्भूतः । ततश्वपूपवादपिगुणलेशविद्यतएव सचचाधक एव। तस्मात्प्रारब्धकर्मनिमूलकरणमवधूतानामेवकर्मादा-

म रक्षासान्तसग्रह
तैलिप्यते । योगविनाभोगोरोग्येवस्यात् । भोग्यपियोगीस
सारीवदृश्यतेनतुमंसारीसम्धनंग्राप्नोति ।
इसका उत्तर यह है कि हे पुरुषा? जो गुरुहीन होते
हैं उन्हें अयश्य ही यडा भाग कट होता है यदि पूर्वोत
प्रकार का गुरु मिल जाय तो यह महान कर कछ भी नहीं
रहना। जैसे पहुन भारो शिला को यदि बिना ठालू श्रीर
विना गोल लकड़ियों की सहायता से उठाग जार तो सहस्रों
पुरषों को भी यहा भारी का होगा और घही शिय किमी
घुद्धिमान् पुरुष की बताई विधि के अनुसार ठालू आदि को
सहायता से सहज में ही उटाई जा सकती है, इसी प्रकार
गुरुदेव की घताई पुथो र थाडे सहा कट फ डाग पड़ी
भारो मिद्धिमान हो जाती है । और यदि महान का होना
भी मान लिया जाय तो भी कर के बाद नो अवश्य ही पड़ा
भारी यानन्द प्राप्त होजाता है जो गुरु की दृपा से भापण्ड
पानाथ पदवी को प्रान हो जाता है यह तो ग्रमा विष्णु मादि
देयों का भी अधीश्वर हा जाता है और नाना रूपों से
धर्तमान रहता है । मल्ला आदि सब देवता उसको पूजा
योगारुद यागी अनेक प्रकार भोगों को भोगता हुमा

गौरतसिद्धान्तसग्रहः भी उनसे लिप्त नहीं होता । योग के बिना जा भोगभोगता है यह रोगी हो जाता है। जो योगपूर्वक भोग करता है यह यद्यपि ससारीला दिखाई देता है पर ससारा के समान बन्धन म नहीं पड़ता म्०-ननुकेचिच्छास्त्रिणःकर्माद्युपासनंमाधनंकथयन्ति तदामयाकथ्यततेपांकथनमयाननिवार्यते तदेवकुर्वन्तुनाम परन्तु तत्करण फलांकमिति । कथंकर्मणामवधिर्मीमांसका- स्तेतु पठनपाठनात्तरपठनपाठनदापनिवृत्यामिष्टस्मरणंकु- वन्ति । यस्यशास्त्रस्य पठन पाठने चापिदोपस्तस्य सेवनेन किंभविष्यतीतिपुनयस्वामिनभजेवमस्वतंत्रोभवेत्यश्चप्रसन्न स्वयमेव यदिच्छतितद्ददाति मंत्रिभ्यः। अन्यस्यतुपुरुषस्य- नकस्याप्यपेक्षांकरोति । अयंदेहःकर्मरचितःकर्माणिचसर्वाणि त्रिगुणानांमन्ति । गुणाश्चमाशायाएवंच यदिअननेपाणिना प्रारब्धंकर्माभिमतंतदामायाभिमता, तदभिमानेचतवसमये ब्रह्मतत्वात्पृथग्भूतः । ततश्चपूर्वपश्चादपिगुणलेशविद्यतएव सचबाधक एव । तस्मात्प्रारधर्मनिमूलकरणमवधूतानामेवकर्म । वेदा- गोरक्षमिद्धान्तसंग्रहः न्तीचित्तशुद्धयकर्माभिमत्य तदनन्तरंज्ञानसाधनमित्युपदिश ति । यतःसोपि सापतएर । मीमासकोमंत्रीवराजमापेक्षा वेदान्तीचराजयन्मंत्रिसापेक्षः, परन्तु सापेवतोभयोरेवास्ति । कस्याप्यतामकुर्वन् योग भावश्यकः सर्वेषांकर्तव्यो याम सर्वदास्वतन्त्रोऽस्ति। मीमांमको दैतमभिमन्यत्वेदान्तीत्व द्वैतमभिमन्यते । तदुपरिवयंवदामः। गनदुभयमपि प्रकृति विकारः प्रकृतिविकारश्चसर्वदाचंचलोनास्तिकदापि स्थिरः । ब्रह्मतु सर्वदास्थिरमेगास्त । तवद्वतवादिनोनिश्चलनास्तीविवदन्ति । तथाऽद्वैतमभिन्यता निश्चलं नास्तीतिकथं । यदिब्रह्माद्वैतमास्ति तर्हि द्वैतं कुत भागतं तदा मायाकल्पितमितिवदेयुस्ताहिकान्बदन्तोषयमवा चोऽक्रियाश्च कर्म तत् किमितिचेदुच्यते । अद्वैतंतुनिकिया- दित्याग्यस्ति । यतः कस्यापिवस्तुनोभोगोपियुष्माभिर्नकर्त- व्य इत्यायनेकषिधिीभरद्वैत खण्डनं करिष्यामः। महासिद्ध रुक्तं यद्वैताद्धताविवर्जितपदं निश्चलंदृश्यते तदेवमत्यमि- त्यभ्युपगमिष्यामः।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा
के लिये स्वतन्त्रता में करने योग्य है। मीमांसक त को
मानता है परन्तु वेदान्ती गन को। इस पर हम कहते हैं,
ये दोनों ही प्रकृति के विकार हैं प्रति के विकार मदा चचर
होने हैं कमी स्थिर नहीं होते। परन्तु ब्रह्म मदा स्थिर है।
यहाँ त पादी निश्चल नहीं है यह कहते हैं। इसी तरह
गत मानने वालों के मत में निश्चल नहीं है। यह कैरे
पहा जा साना है, यदि व्रम आर्द्धन है नी त कही
से आया यदि ये कहें कि कैन माग करियत है तो
हम उन के घाणी और कर्म से रहित कहते हुए कहेंगे कि
तुम कर्म किसे कहते हो? क्योकि अढन नो निष्क्रियादि
त्यागी है, इस लिये तुम्हें किपी यस्तु का भी भोग नहीं
करना चाहिये, इस प्रकार अनेक प्रकार में भवन का
पंडन परेंगे । महा सिद्धों ने कहा है कि हैन अद्वैत में
विधजिन जो निश्चल पद शास्त्रों में दिखाई देना है,
घही सत्य है यह स्वीकार करेंगे।
मू-तत्तु उग्रभैरवनामैककापालिकरूपतः
भैरवेण शङ्कराचार्याधुपरिकृतम् । कथं, चतुर्भिः शिप्यः
संयुक्तः शङ्कराचार्यों नदीतीरे स्थितस्तस्मिन्स्थले कापा
लिकः समुपागत्योक्तवान् । भो ? त्वत्त सन्यासी मित्रारि
.

गोरक्षासिद्धान्तसंग्रह ५१ पक्षतुल्यः सुखदुःखादिद्वन्द्वपदार्थरहितोऽसि । अस्माकं चायमभिप्रायो वर्तते तवशिरउच्छिद्यपश्चात श्रीभरवार्पण करिष्यामि तदाममप्रतिभा पुर्णा भाविष्यति । यतोभवान शिरोददात्विति । तदा शंकराचार्यणालोचतं नैवंकरिष्यते तदात्वद्वैत हानिः शत्र मित्र पक्षे तुल्यत्वं न स्यात् , कृते च पराजयो भवेदेतवयविचारेऽपि पराजयएवोतमत्या न किमपितेनोक्त शैथि ल्यंजातं तदा पद्मपादाचार्येण नृसिंह स्मरणं कृत मुन भैरवोपरि नृसिंहण प्रहारः कृतो यस्तु महा मिद्धस्तच्छरीरं त्यक्त्वा दृश्यमेव च शरीरं गृहीत्वा सम्मुखे मस्थितो भूत्वा प्रसन्न वदनो मेघगम्भीर गिरयोवाच-भो ? तपराजय इति । शत्रमित्रपक्षे यदवदस्तत्कुत्रगतम् , मदीयंतु यथा मल्लो नियुद्धेस्वयमेवनिपत्याऽन्यस्यपातनं करोति तथा स्वशरीरं त्यक्त्वा परसिद्धान्तहानिः कृतवति चरितम्. पुनः साम्प्रासं त्वदीय हानिः, अतः परमपि क्रियते उत्तिष्ठोत्तिष्ठ युद्धं कुर्वित्याह । तदा प्रारब्धकर्माचरणं वर्तते न्यासिनांमते यतः क्रियाकरणमिति सिद्धान्तो नास्ती तिकृत्यायुद्धेऽशक्तो जातः कापालिकोपदेशेनाफियवस्वासि द्वान्तेऽद्वैतस्थितियत् स्थितः, तदा कापालिकेन योगमाया ૨ गौरक्षसिद्धान्तसंग्रहा निर्मिता तया चचतुःशिप्यसंयुक्तस्याऽऽचायस्य मस्तक छिन्नं पश्चाच स संजीवितः कृतस्तर्हिविरागोजातः। पश्चि. मायां दिशिगतः शक्तिस्मरणं कृतवान् पूर्ववाता । शङ्कराचा- यस्योत्पत्तिदक्षिणस्यां दिशि । तत्रतु कर्म मेवनमेवऋविष्णु पासनादि । यदा चित्तशान्तिनजाता तद, पृथिवीप्रदक्षिण करणार्थ प्रयाणंकृतम् । पूर्वस्यां च दिशायामागत्य तत्र तु वैद्यनाथाख्यस्थलंगत्वा पूजांचकार, तदेश्वरेणनाङ्गीकृता- पूजा। किमर्थत्वयाविष्णुभक्तिव कृता अहंतु साक्षादीश्वरः सतु विस्मृतइति । तदा शङ्करणाऽपराधक्षमानामस्तोत्रंकृतं, पुनरपिशिवमक्तिविशंपण कृता तथापिचित्तशान्ति जाता। पश्चाच पश्चिमां दिशंगतस्तत्र शक्तिरहितोजातः । शक्त तान्तोदृष्टः। तदा च शक्त्योक्तं शिवएव सर्वकरिष्यतीति। तेनभया धुलोजातः सौन्दर्यलहरीनाम स्तोत्रंकृत्वा शाक्तोजातस्त- थापि पूर्णशान्तिनजाता। ततउत्तरांदिशंगतः। सातुमहा सिद्ध समुदायेनसर्यापिदिग्व्याप्ता। यत्र गतस्तत्रसरुपहास: कृतः । तत्र श्रीतारानाथेनोक्तं तीर्थाटनमेवकारिप्यतेवा किम

-
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
प्यात्मसाधनमपिकरिष्यतेतहाशङ्करणोक्तं भवद्भिर्यत्कथ्यते
तन्मयाक्रियते । तदा महासिद्धन योगोपदेशः कृतः। तेन
सर्ववाधानिवृत्तात्मा च प्रसन्नो जातस्तदा वज्रमूचिकोपनिपत्
कृता। सातुसापिनाथमार्गानुसारिण्येव । तत्र श्रीसिद्धसिद्धा-
न्तपद्धतिप्रमाणंदत्तम्-
'वेदान्ती बहुतर्ककर्कशमतिरित्यादि तस्मात् सिद्धमतं
स्वभावसमयंधारः परं संश्रयेदित्यन्तादानि पद्यानि इति ।
भा०-उसी द्वैता द्वैत धर्जित निश्चल पद का उग्र भैरव
नामक एक कापालिक के रूप में श्री भैरव ने श्री शंकराचार्य
फे ऊपर प्रश्न किया थ' उसका नीचे वर्णन करते हैं
चार शिष्यों के साथ एक समय शंकराचार्य एक नदी के
तीर पर बैठे थे वही एक कापालिक ने आ कर कहा
कि हे शंकराचार्य ? आप तो संन्यासी हो शत्रु मित्र पक्ष में
एक समान और सुप दुःसादि द्वन्द्व पदार्थों से रहित हो।
हमा अभिप्राय यह है कि तुम्हारा सिर काट कर श्री
भैरव की भेंट करें तय मेरी प्रतिक्षा पूर्ण हो । इसलिये
भाप अपना शिर दे दें। तब शङ्कराचार्य ने सोचा यदि
फापालिक का यचा नहीं किया गया तो अद्वैत सिद्धान्त
की हानि होगी और शनु मित्र पक्ष में समानता न होगी।

५४ गोरक्षमिदान्तमनदा और यदि इन का पचन किया गया तो पराजय होगी ये दोनों पातें विचार कर उन्होंने पराजय को ही अच्छा समझ कर कुछ न कहा इस मौनता से शंकराचार्य के मत में शिथिलता आगई । नय पमपादाचार्य ने नृसिंह का स्मरण दिया नृसिंह ने प्रगट हो उन भैरय फे. उार प्रहार किया परन्तु यह महासिद्ध था उस शरीर को छोड़ कर दूसरे दृश्य शरीर को धारण कर प्रसन्न मुसहोसामने भाकर मेघ के समान गम्भीर पाणी से कहा है शङ्कराचार्य ? अति का पराजय होगया, तुम अपने पापको शनु मिन पक्ष में समान कहते थे यह यात का गई, मैंने तो जैसे पहलघान नियुद्धनाम के दाय में अपने को गिरा कर दूसरे को गिराता है उसी प्रकार अपने शरीर के मूल्य पर तुम्हारे सिद्धान्त को हानि की है। इसलिये मेरा कार्य उचित है। तुम्हारी हानि तो में आगे भी करूंगा, अतः उठो और युद्ध करो। तय शंकराचार्य ने यह मान कर कि प्रारब्ध कर्मा का आवरण हम पर है पास्तव में किया करना सन्यासियां का सिद्धान्त नहीं है युद्ध में असमर्थता प्रकट की। अद्वैत सि. द्धान्त के अनुसार कापालिक के कहने पर भी क्रिया न करना हमारा सिद्धान्त है । यह जब उसने स्थिर किया तय कापालिक ने योग माया उत्पन्न की, उसने चारों शिष्यों के सहित ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः भावार्य का मस्तक काट लिया, और फिर उसको जीवित कर दिया। तब शङ्कराचार्य को वैराग्य उत्पन्न हो गया, फिर पश्चिम दिशा में जाकर शक्ति का म्मरण किया. (यह पहली बात है) शंकराचार्य को उत्पत्ति दक्षिण में हुई थी वहां उन्होंने विष्णु पूजा आदि कर्म हो किये, परन्तु जब उससे चित्त को शान्ति न मिली नय पृथिवी प्रदक्षिणा के लिये यात्रा की और पूर्व दिशा में भाकर वहां वैद्यनाथ नामक स्थान पर पूजा की वह पूजा ईश्वर ने स्वीकृत नही को। उन्हों ने कहा कि तुमने विष्णु की भक्ति को है, मैं जा साक्षात् ईश्वर हूँ तुमने मुझे को भुला दिया तव शकर ने अपराध क्षमापन नामक स्तात्र बनाया और फिर विशेष रूप से शिव भनि की परन्तु फिर भी चित्त में शान्ति नहीं हुई, फिर पश्चिम दिशा में गया, वहा शक्ति रहित हो गया । फिर शक्ति का वृत्तान्त देखा तब शक्ति ने कहा कि शिव हो सब कुछ करेगा, फिर शक्ति से भयभीत होकर सौन्दर्य लहरी नामक स्तात्र रचा और शांक पन गया। तप भी पूर्ण शान्ति नहीं हुई । फिर उत्तर दिशा को गया । यहां जाकर देखा तो यह दिशा महासिद्धों से भरपूर थी जहां गया वहीं सिद्धों ने उसका उपहास किया । यहां श्री तारानाथ ने कहा-तीर्थाटन ही करते रहोगे, या फुछ आत्मा साधन भी करोगे। तय शंकर ने कहा कि जो भाप कहेंगे ५६ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः घही करूंगा । तय महासिद्ध ने योग का उपदेश किया, उस उपदेश से शंकर का आत्मा सब बाधाओं से निवृत्त और प्रसन्न हो गया । तय उन्हों ने बन्न सूचिकोपनिषद् का निर्माण किया, यह उपनिषद् सर्वथा नाथमत के अनुसार है, यही उन्होंने 'वेदान्ती यहुतर्क फर्कशमतिः' इत्यादि सिद्ध सिद्धान्त पद्धति का प्रमाण दिया । म्०- यथामंडन मिश्रा सुरेश्वराचार्यो जातस्तथाऽय- मपि सिद्धोभूत्वा सिद्धान्तविन्दुप्रभृतिग्रन्थारचकार । सिद्धान्तस्तु सिद्धस्य तात्पर्यार्थएव नतुवादिप्रतिवादिभिनि- गीतोऽर्थः सिद्धान्तः । एतन्मध्ये—'नचैकंतद्न्यदाद्वितीयं कुतःस्यात् , तत्तुद्वैताद्वैत विलक्षणत्व वसिद्धान्तो जातः । न्यासिनान्त्वद्वैतमेवभवतीत्यपारीतिज्ञैया । अन्यैःसिद्धान्तः कथ्यते । तेषां मुख्यसिद्धान्तशब्दप्रवृत्तिर्महासिद्धानामुदाग- तोऽन्यमुखे सिद्धान्त केवलं रूदित एव । सिद्धानां मते रूढि- यौगिक इयमपि वर्तते । तर्हि सिद्धान्तःसिद्धस्यैव तात्पर्यम् । एतत्कारणात् सिद्धस्यैव सिद्धान्तोनस्वन्यस्य । अतएव शकरण सिद्धान्तविन्दुः कृतः। प्रथमं तु दक्षिणदेशे कर्मसेवने विष्णू गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः पासना कृता पश्चातपूर्वदेशे शिवर्दशने संन्यासो गृहतिः । पश्चिमे च शक्तिदर्शने शाक्तो जातः। तत्र तद्विपयकं प्रपंच सारादि ग्रन्थंकृतवान् । पश्चादुत्तर देशे सिद्धोपदेशेनाऽवधूताऽवस्थागृहीता । तेनमर्वश्रयो जातमिति । भा०-जैसे मण्डन मिन ने सुरेश्वराचार्य होकर बहुत से ग्रंथ बनाए उसी तरह इन्होंने भी सिद्ध होकर सिद्धान्त बिन्दु इत्यादि ग्रंथों का निर्माण किया। वहां सिद्धान्त शब्द सिद्धों के तात्पर्य का बोधक है न कि वादी प्रतिवादी द्वारा निर्णोत अर्थ का उस सिद्धान्त बिन्दु में लिखा है कि एक नहीं है तो उसके अतिरिक्त दूसरा कहां से हो सकता है यह सिद्धान्त तो द्वैताहत से विलक्षण ढंग का माना गया है। और सन्यासियों के मत में तो अति ही सिद्धान्त है। यह रीति जाननी चाहिये। उन योगियों के मत से मुख्य विषय में जो उन्हें आनन्द से प्राप्त हुआ है सिद्धान्त शब्द को प्रवृत्ति होती है, अन्य लोगों के मत में तो सिद्धान्त को प्रवृत्ति सार्थक नहीं। किन्तु रूढ़ि से है। और सिद्धों के मत में सिद्धान्त रूढ़ि और यौगिक

गोरक्षासिद्धान्तसंग्रह
दोनों प्रकार का है । इसलिए ये सिद्धि के नार्य
को ही सिद्धात्त कहते हैं। अन्य किसी के तात्पर्य को नहीं,
इसी से शड्गचार्य ने सिद्धान्त बिन्दु की रचना को है,
पहले दक्षिण में उन्होंने कर्मों का सेवन भीर विष्णु की
उपासना की फिर पूर्व देश में शिव जी का दर्शन करके
सन्यास प्रहण किया, पश्चिम में शक्ति का दर्शन करके शाक्त
हुए, यहां उन्होंने शाक्त सिद्धान्त क प्राश्चमार नामक अन्ध
मनाया, फिर उत्तराखण्ड में सिद्धों के उपदेश में अधूता.
चम्या प्राप्त की। उसी से उनको समस्त कल्याणों को प्राप्ति
मृ०. ननुकापालिकप्रसंगकथनादतेषां कापालिक
मतमिति कैश्चिज्ञायतइति, तत्तुनास्त्येव, अस्माकं मतन्त्व
वधूतमेव । परन्तु कापालिकमपि मतं नाथेनैव प्रकटीकृतम्।
एतन्मार्गस्य प्रकटकर्वा नाथएव ।
तदुक्तंशावरतन्ये-
धादिनाथो धनादिश्चकालश्चैवातिकालकः ।
करालो विकरालश्च महाकालश्च सप्तमः॥
काल भैरवनाथश्च पदुफस्तदनन्तरम् ।
-

५६
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
भूतनाथोवीर नाथः श्रीकंठो द्वादशोमतः॥
एते कापालिकाः प्रोक्ता रितुम्बामहाफलैः ।
गुरूणां र्यसंख्याचतानिहवाच्मसंशृणु ।।
नागार्जुनो जड़मरतो हरिश्चन्द्रस्तुतीयका ।
सत्यनाथो भीमनाथो गोरक्षश्चपर्टस्तथा ।
अवद्यश्चैव वैराग्यः कन्थाधारी जलन्धरः ।
मार्गप्रवर्तका घेतेतद्वधमलयार्जुनः ॥
भा०-यहां यह शंका होसकती है कि यहां कापालिकों का
रहुत कथन किया गया है, इससे जान पड़ता है कि योगियों
का कापालिक मत है, परन्तु ऐसा कदापि नही हो सकता ।
हमारा मत तो अवधूत ही है। हां कापालिक मत को प्रकट
नाथ जी ने ही किया है। जैसा कि शायर तंत्र में वर्णन किया है
शादिनाथ तथा अनादिनाथ,काल, भतिकालक,कराल,विकराल,
और सातयां महाकाल, काल भैरव, नाथ, और इसके बाद
घटुक, भूतनाथ, धीरनाथ, और बारहवां श्रीकंठ, ये वीर
तुम्बी महाफलो करके कापालिक कहे गये हैं। गुरुओं की
संख्या भी धारह ही है। उन्हें भी कहता हूं सुनो नागार्जुन,
जड़भरत, तीसरा हरिश्चन्द्र, सत्यनाथ, भोमनाथ, गोरक्ष

६०
गारक्षासद्धान्तसंग्रहा
और चर्पट, अवय, वैराग्य, कथा धारी, जलंधर मलबाजुन
ये सय मार्गप्रवर्तक है।
मु०-पुनः शवः शाक्तोपि मार्गस्तन्त्रानुसारी ।
तस्याप्युपदेष्टानाथ एव।नार्थनवरचितानि तंत्राण । तदुक्तं
पोडशनित्या तन्त्रे-
-
कादि संज्ञाभवेद् रूपा सा शक्तिः सर्वसिद्धये ।
तंत्र मदुक्तं भुवने नवनाथैरकल्पयत् ।।
तया ते भुवनेतंत्र कल्पकल्पे विजृम्भते ।
अवसानेतु कल्पानां सा तैः साधं वजेच माम् ॥
नामपर्यायतो व्याप्त कालायाप्तमिति द्वयम् ।
प्रसिद्ध वाहतो यच्च प्राणिनामानिसाधके ।
नमस्ते नाथ भगवन् शिवाय गुरु रूपिणे ।
विद्याऽवतार ससिद्धेय स्वीकृताऽनेकविग्रह ? ।।
नयाय नवरूपाय परमार्थकरूपिणे ।
सर्वशान तमोभेदभानवे चिद्धनायते ।।
स्वतंत्राप दयाशक्तिविग्रहाय रसात्मने ।
परतंत्रायसक्तानां भव्याय भव्यरूपिणे ।।
.

। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः पुनःयोगस्तु कस्यापि सापेक्षोनास्ति । परन्तु तांत्रिका णामयमेव सिद्धान्तो वर्तते यत्रोत्तरावस्थाऽवधूतएव । भा० टो०-शैव श्रीर, शाक्त मार्ग भी तंत्रानुसारी हैं । उन मार्गों का उपदेश करने वाला भी नाथ हो है। तंत्र ग्रन्थ भी नाथ जीने की रचे है। जैसा कि पोडश नित्या तन्त्र में कहा है। कादि मंज्ञा रूपा हाती है। वही शक्ति मय सिद्धियों की प्राप्ति के लिये होती है मेरे कहे हुए तात्र को नवनाथों द्वारा उस शक्ति ने प्रकाशित किया उमी शक्ति से नवनाथों हाग प्रत्येक कल्प में तंत्र प्रकाशित होता है। और कल्पान्त में वह शक्ति उन्हीं के साथ मुझे मान होती है । समानार्थ नामो में व्याम गौर काल से प्रात, दो ये और बाहर में प्रसिद्ध ये नोन नाम माधक में हैं । हे भगवन् नाथ आप शिव रूप हैं और गुरु रूप हैं। आपको नमस्कार है, विद्या के प्रकाश को सिद्धि के लिये आपने नाना प्रकार के रूपों को धारण किया है। आप नय नयरूप हैं परन्तु वास्तव में आपका रूप एक ही है। समस्त अज्ञान रूपी अन्धकार को नष्ट करने वाले विद् रूप आपके लिये नमस्कार है। आप स्वतंत्र दयाशक्ति रूप और रसात्मा हैं। आप अपने भक्तों के आधीन हैं, और परममनोहररूप धारी हैं योगतो किसी की अपेक्षा नहीं रखता । तान्त्रिकों का यह सिद्धान्त है है

• गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
मू-कापालिको मार्गः किमर्थप्रकटीकृत इत्यपेक्षा-
यामाह | विष्णोश्चतुर्विशति संख्यका अबतारास्तचकार्या-
न्तमदोन्मत्ताजाताः । कथम् ? यथान्ये तिर्यग् योनयो
जन्तवः क्रीडाः कुन्ति तथा वराहो नृसिंहश्चेत्त्यादयो भू-
दारणपन्यभय दानादिकरणे प्रवृत्ताः। पुरग्रामा दिताड़नं
केपांचित् समुद्रपातोऽपि । तत्रापि कृष्णेन व्यभिचारिभावो
विशेषेणधृतः । परशुरामेणेकक्षत्रिय दोपेऽनेपां क्षत्रियाणां
नाशः कृतः, इत्यादि विरुद्धाचारोपरिनाथेन कोपं कृता चतु-
विशत्यतारोपरि चतुर्विंशति कापालिकरूपाणिधृत्ता
चतुर्दिशत्यवतारैः मह समरं कृतम् । तन सपामनताराणां
कपालानिचिन्नानि कृतानि, स्वकरस्तानि धृतानि तेन कापा
लिका जाता।पुनस्तेसकपालच्छेदान्मदीना जाताः, तदा
बरंदच्या कपालानि तच्छरीरे धृतानि तेनजीवितापभूधुरीति ।
भा०-अप आगे कापालिक मार्ग फ्यो प्रकट किया इसका
उत्तर देते हैं-धि णु के धीयोस अवतार हुए ये अपने २.
कार्य के अन्त में मदोन्मत्त हो गए। कैसे ? जैसे अन्य जोय
जन्तु कोड़ा करते हैं पैसे ही घराह नहि आदि पृथियो

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः फाड़ना, जंगली जीवों को भयभीत करना, इत्यादि कार्यों में संलग्न हो गए। नगर और ग्रामों को पीड़ित करते थे, पहुनों को समुद्र में भी गिरा देते थे। कृष्ण ने तो बहुत ही ध्यभिचार फैलाया, तथा परशुगम ने एक क्षत्रिय के दोष से सभी क्षत्रियों को नष्ट करना भारम्भ कर दिया, इन विरुद्ध भाचरणों से श्रीनाथ जो ने क्रुद्ध होकर २४ अवतारों पर चीयोस कापालिक रूप धारण करके उनके साथ युद्ध किया और उनके सिर काट कर हाथ में लिये इसीलिए फापालिक यहाए। फिर ये सय सिर फट जाने से मदहोन होगए तब फिर उन्हीं को कपाल उनके ऊपर धर कर उन्हें जीवित कर दिया। मू-कानिचिच्छाखाणिमोक्षरक्षकाणि कानिचिच- ज्यवहाररतकाणि । तत्रमोवरक्षकाणियोगशास्त्राणिव्यव- हाररतकाणिश्रुतिस्मत्यादीनि । मुमुक्षवः पुरुपाः कोटीनां- मध्येद्वित्राएवभवन्ति, व्यवहारिणस्तुकोटिकोटिरेव । अतः कारणान्यवहाराविधिवाक्यशास्त्राणि वहृनिसन्ति । कथं व्यवहारिणांचाहुन्यात् । योगशास्त्रंतुसूचमम् । कथं? मुमुखपुरुषाणामल्पत्त्वात् । वेदादिशास्त्राणामपि योगो चर्ततएव । सर्वेपांच तात्पर्ययोगएवास्ति परन्त्वेतद्रीत्या, । यहाँपरशिरदिन में तापपं नहीं कि हास्य रसह ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा यथा समुद्रे रत्नानिशंखाः पापाणखएडानिजलंजलजन्तव- त्याधनेक वस्तूनि मन्ति । तथा वेदादिशास्त्रेप्पपियोगा- दीनिमन्ति । समुद्रचेतरवस्तुमुलभैरवन्तु श्रमणलभ्यते । एवंटादिशास्त्रव्यवहाराष्टि मुलमम् , योगम्तुभूरिश्रमेण लभ्यते । योगशास्त्रंतुयोगएप लम्यते नान्यदस्ति किञ्चि- दसार यथारनखनारतमति । सच योगोगुरुकृपयाल्पश्र- मेणवप्राप्तोभनेत् । यतोऽन्यत्मपरित्यज्ययोगएवमेवनीय इति। मा०-कुछ शास्त्रमाक्षरक्षा और कुछ व्याहार रक्षक है, उनमें योग शास्त्र माक्ष रक्षक है, और शुनिस्मृति श्रादि ध्यवहार रक्षक है । मुमुक्षु पुरुष रोडों में दो तीन ही होते हैं परन्तु व्यवहार रक्षक सभी होते हैं अत. व्यवहार रक्षा के लिये विधि याच शास्त्र यहुन से है, क्योंकि संसार में व्यवहारी लोग ही अधिक है। योग शास्त्र अत्यन्त सक्षम है, क्योंकि मुमुनु पुरुप ता होते ही यहुन थोडे है। येदादि शास्त्रों में भी योग है अवश्य, कांकि अन्त में सप का तात्पर्य योग में हो है। परन्तु रीति में भेद है, जैसे समुद्र में रत शव पत्थरों के टुकडे जल और जल जन्तु इत्यादि बहुत सी वस्तुएं होनी हैं। इसी . . गोरक्षासद्धान्तसंग्रहः प्रकार घेदादि शास्त्रों में भी योग आदि सभी वस्तुएं हैं, समुद्र में और चीजें सुगमता से मिल जाती हैं, परन्तु रत्न पठिनता से मिलते हैं, ऐसे ही वेदादि शास्त्रों में भी व्यवहार आदि सुगमता से प्राप्त हो जाते हैं, परन्तु योग चडे परिश्रम से प्राप्त होता है, योग शास्त्र में तो रनों की खान में रनों के समान योग ही योग है, अन्य असार वस्तुएं नहीं है। वह योग गुहकी कृश हो जाय तो थोड़े ही परिश्रम से प्राप्त हो जाना है। इसलिये सब कुछ छाड़ कर याग का हो सेवन करना चाहिये। मू-पृथ्वीक महादेवी नाथाः शास्त्रस्यबंधका । ब्रह्मतत्त्वविदित्याद्याः शरभाधास्तुरचकाः॥ ननुश्लोकेतुपृथ्वीकत्रीत्युक्तंभवद्भिन्तुनाथः कर्तेत्युच्यतेतक- थमितिचेदुच्यते । नाथाः शास्त्रस्यवंधकाइत्यनेन शास्त्रप्रवन्धक- स्वंतूक्तमेव, पुनः कर्तृत्वंतुथिव्या अपि नाथ स्वरूपत्वेनैव, चतुरशोतिसिद्धगणनायामादिकुमारीनामकसिद्धत्वेनोक्तत्वात् । सिद्धाश्वरूपत्वेनाऽप्रसिद्धाएवेतितथैव यत्साधनं कर्तव्यं यत्नेनैव साधनेनसिद्धिर्भवेदित्येवंतुयोगएचपरंसाधनमित्याशयेनोक्तं- योगमार्गात्परामार्गोनास्तिनास्तिश्रुतौस्मृताविति । - ६८ गोरक्षनिद्धान्तासंग्रह तदयन्तश्च श्रेष्ठाउता इति मर्वत्रलभ्यते । एवं चयोगिन भ्रष्टास्तेपधियंगम्यत्वेनाप्याह पद्मपुराणे मर्यादांस्थापयामास यथास्थानं यथागुणं । वर्णानामाश्रमाणांच धर्माधर्मभृतांवर ।। लोकाश्चमवर्णानांसम्यग्धर्मानुपालिनाम् । प्राजापत्यंत्रादायानांस्मृतस्थानतुपार्थिव ।। स्थानमन्द्रतत्रियाणांयतीनामूरतसाम् । स्मृततपान्तुयत्स्थानंतदेवगुरुवासिनाम् ।। सप्तपणाश्चयत्स्थान स्मृतिद्वैयनौकसाम् । प्राजापत्यंगृहस्थानांन्यासिनांब्रह्ममंजितम् ।। योगिनाममृतस्थानं ब्रह्मणः परमंपदम् । एकान्तिनः मदोयुक्ताव्यापिनोयोगिनाहिये । तैपतित्परमस्थानं यत्रपश्यन्तिमूरयः। गत्वागत्वानिवर्तन्तेचन्द्रादित्यादयो ग्रहा ॥ अद्यापिननिवर्तन्तप्राणायाम परायणाः ।। गीतायांच- गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः चेदेपुयज्ञेपुतपस्सुचैवदानेपुयत्पुण्यफलंपादिष्टम् । अत्यति तत्सवमिदं विदित्वा योगीपरंस्थानमुपैतिचाद्यम् ॥ - भाo-महादेवी पृथिवी कत्रों है, नाथ शास्त्रके निर्मापक हैं। ब्रह्मतत्वविद और शरभ अादि सिद्ध रक्षक हैं । यहां शंका होती है कि श्लोक में पृथियों को कर्जी बतलाया है आप लोग नाथ को कर्ता कहते हैं यह कैसे हो सकता है उत्तर नाथ शास्त्र के यन्धक है, इम से नाथों को शास्त्र का प्रयन्धक तो कहाही है। पृथिवी का कर्तृत्व भी नाथ रूप से ही है। क्योंकि चौरासी सिद्धों की गणना में श्रादि कुमारी नाम से पृथिवी को भी एक सिद्ध कहा गया है। सिद्ध तो असली रूप में प्रसिद्ध ही है उसी प्रकार जो साधन करना हो यत से ही उसकी सिद्धि होती है, इससे यह सिद्ध होगया कि योग ही सब से बढ़कर साधन है। इसी अभिप्राय से कहा गया है कि योग के समान साधन श्रुति स्मृति में नहीं है। उस योग के धारण करने 'घाले श्रेष्ठ हैं यह सब जगह देखा जाता है, इस प्रकार योगी 'श्रेष्ठ हैं, उनकी श्रेष्ठना गम्य रूप से भी कही गई है। जैसा कि पद्म पुराण में कहा है, हे धर्माधर्मधारियों में भेष्ठ ? स्थान और गुणके अनुसार वर्णों और प्राश्रमों की मर्यादा को खापित किया, धर्म के पालन करने वाले वर्णाश्रमों का स्थान 1 गोरक्षासद्धान्तसंग्रहः रोक है, और हे राजन् ? ब्राह्मणों का स्थान प्राजापत्य है। क्षत्रियों का स्थान ऐन्द्र है, और ऊर्ध्वरेता संन्यासियों का जो स्थान कहा गया है वही गुरु की सेवा करने घालों का स्थान बताया है, जो सप्तऋषियों का स्थान कहा है वही यनवामियों का है. गृहस्थियों का प्राजापत्य स्थान है और संन्यासियों का ब्रह्मनामक स्थान है। जो ब्रह्म का अमृत पद है वह योगियों का स्थान है। सदा उद्योगी और एकान्तवासी जो योगी है उनका वह स्थान है जिसको बह्मज्ञानी लोग ही देखते हैं। चन्द्र सूर्य आदि ग्रह नष्ट हो होकर वार २ उत्पन्न होते हैं परन्तु प्राणायाम में तत्पर योगी लाग फिर नहीं लोटते । गीता में भी कहा है वेदो यज्ञों तपों और दानों में जा पुण्यफल कहा है उस पुण्य फल को तत्त्ववेत्ता योगी पार कर जाता है उस फल से भी भागे बढ़ है। और मुख्य स्थान को प्राप्त हो जाना है। मूग--एवंसर्वनमस्कार्यमेतन्मतमिति । तवयूयंकेऽपियदेतभयन्मतेश्रुतिः साधिकानास्तीतितेपामज्ञा- त्वामतरहस्यमेवंवदतांयुष्माकंतात्पर्यमस्माभिर्विदितप्रायमेवेति । तदेवमस्ति । एवं प्रतोद्यमाना अपिकदाचिच्छ्रत्याश्रयत्यमशीकुर्व- न्तुनामैते । तन्नकरिष्यते । किन्वेतत्साक्षादनिर्वचनीयंतत् सत्य- स्वरूपंतत्त्वंयस्याऽऽनयत्वंसर्वसविदितमेयोतत स्यैव प्रवृत्तिशाखा- जाता . गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः श्रयत्वकेन प्रकारेणाङ्गीक्रियते । यदरमाकमत्रश्रुत्याश्रयाणाङ्गीक- रणराज्ञामियमंत्र्याश्रयणाङ्गीकरणंभवति । तथाचोक्तंमहाभारते मोक्षधर्म- ऋचायजूंपिसामानिशरीराणिव्यपाश्रिताः। जिह्वाग्रेषु प्रवर्तन्तेयवसाध्याविनाशिनः ।। नचैवमिप्यतब्रह्मशरीराश्रयसंभवम् । नयत्नसाध्यतद्ब्रह्मनादिमध्यनचान्तवित् ।। ऋचामादिस्तथा सामांयजुपामादिरुच्यते | अन्तश्चादिमतादृष्टोनत्वादिब्रह्मणः स्मृतः ॥ अनादित्वादनन्त्वात्तदनन्तमथाऽव्ययम् । अव्ययत्त्वाचीनदुःखं द्वन्द्वाभावस्ततः परम्॥ अन्यच, अग्नियथायुपायेनमथित्वादारुदृश्यते । तथैवात्माशरीरस्थोयोगेनैवात्रटश्यते ॥ - आदिज्ञानीभवेद्ब्रह्मायुगादिज्ञानियोगिनः । गीतायाम्- यामिमां पुष्पितांवाचंप्रवदन्त्यविपश्चितः ।

७२
गोरक्षसिद्धान्तसग्रह
वेदवादरताः पार्थ ? नान्यदस्तीतिवादिन ॥
कामात्मानः खर्गपराजन्मकर्मफलप्रदाम् ।
क्रियाविशेपरहुलांमागश्वर्यगतिप्रति ॥
भोगैश्वर्यप्रमक्तानातयाऽपहतचेतसाम् ।
व्यवसायात्मिकाघुद्धिः समाधौनपिघीयते ॥
येनचपरमवेदप्रणवस्यानयोऽङ्गीकृतोवातेनस्थूल्वेदस्याऽऽश्र
योनाङ्गीकर्तव्य ।
चतुर्वेदविदोविप्राः सूक्ष्मवाधिदन्तिन ।
वेदभारभराक्रान्तास्तेविप्राः पुरुषाधमाः ।।
एतदेवाभिप्रत्येकावेषयगीतायाम्-
दुर्वासा कश्चिन्मुनिर्वहुविधशास्त्रपुस्तकभारे सहमहादेवनम
सतुंमागत्यतत्सभाया नारदेनफेनचिन्मुनिनाभारयाहिगर्दभसाम्य
मापादित , कोपापुस्तकानिलवणार्णवपरित्यज्यमहादवेनाऽऽत्म
विद्यायाप्रवर्तितइति ।
गृहेगृहेपुस्तकभारभासः पुरेपुरेपंडिनयूथयूथा. ।
वनेचनेतापसन्दवृन्दाननमवेत्तानचकर्मकर्ता ।
एवचवहर प्रस्तावा सन्तीति, एकमुत्तरम् ।

गारक्षसिद्धान्तसंग्रहः भा०-इसलिये यह मत सयकं नमस्कार करने योग्य है। उस विषय में तुम में से कोई यह कह सकता है, कि आपके मत को सिद्ध करने वाला श्रुति का प्रमाण नहीं मिल सकता । उन योगियों के तात्पर्य को न जानकर आपलोग जो यह कहते हैं, आपके तात्पर्य को भी हम जानते ही हैं, वह ऐसे हैं कि इस प्रकार वार २ उकसाए जाने पर भी हम श्रुति का यह प्रमाण देकर यह स्योकन कर लेंगे कि हमारा प्राश्रय भी वेद है, परन्तु हम ऐसा नहीं करेंगे, क्योंकि साक्षात् अनिर्वचनीय जो सत्य तत्व है और सर्व प्रसिद्ध सयको श्राश्रय है, वह प्रवृत्ति शास्त्र के सहारे है यह माना ही कैसे जा सकता है । क्योंकि यह मोकार करना कि हमारा आप्रय भी चेद है, ऐसी ही बात है जैसे यह कहना कि मंत्री राजा के सहारे है। जैसा कि महाभारत में मोक्ष धर्म में कहा है- ऋग् यजु साम ये शरीरों के सहारे रहने वाले हैं बड़ा यत्व करने पर कंठस्थ रहते हैं और नाशवान है । परन्तु ब्रह्म शरीर के प्राश्रय रहने वाला नहीं है। यह न यत्न साध्य है, न आदि मध्य और अन्न युक्त है, ऋग्वेद यजुर्वेद और सामवेद का श्रादि मध्य और अन्त है, परन्तु ब्रह्म का आदि और अन्त न होने से यह अनन्त और श्रव्यय कहा गया है - गोरक्ष सिद्धान्तसग्रह. अनन्त होने से दुखरहित और द्वन्द्वातीन कहा गया है । और भी दे 'खये जैसे उपाय पूर्वक लकडी के मथने से उममें अग्नि दीख पडती है, इसी प्रकार योग स शरीर में प्रात्मा प्रक्ट हो जाता है, और देखिये-ब्रह्मा सृष्टि के प्रारम्भ से उसका ज्ञान रखता है, परन्तु योगी लागा को करप कल्पतरा का ज्ञान होता है। गीता में भी कहा है-जो चेद बाद में लगे हुए और कुछ नहीं है ऐसा कहने वाले कापनाओं स प्रस्त भोग ऐश्वर्य तथा जन्म कर्म फल देने वाली प्रियाओं से जटिल ( पेचीदो) चिकनी चुण्डो यातें करते हैं ऐसे लार्गा द्वारा जिन का मन हरण हो चुका है जो भोग और ऐश्वर्य के लालचा है उसका घुद्धि समाधि में निश्चयात्मक नही हो सकती। जिसने परमद रोकार का प्राश्रय लिया है यह पैस स्थूल चेद का श्राध्रय कर सकता है । चारों वदो फ ज्ञाता जा प्राह्मण सदा ब्रह्म को नहीं जानते ये पद के भारी याझ से व्यर्थ ही अपनी युद्धि का दया और घे प्राह्मणों में अयोग्य ह । यहा समझ कर काषय गीता में कहा है कि-दुयामा नाम का काई मुनि नाना प्रकार के पुस्तकों के बोझ को उठाकर महादेव का नमस्कार करने पाया तो नारद मुनि ने उसको गधे की उपमा दी तब उसने शोध में भार उन सय पुस्तकों का ज्ञार समुद्र में फेंक दिया और ।

७५ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः महादेव ने उसको श्रात्मविद्या में लगाया। घर २में पुस्तकों के योझ है। नगर २ में पंडितो के झुंड है जंगल २ में तपस्वियों की टोली है परन्तु न ता उनमें कोई ब्रह्म वेत्ता है और न कर्म फर्ता है। इस प्रकार बहुत से प्रस्ताव है उनमें यह पहला एक उत्तर है। मू०-पुनर्भवद्भिस्तु श्रुतयः पुनः पुनरुच्यन्ते, तत् किमिति। वेदास्तुकर्मनिरूपकास्तदधिकारिणामेयौचित्यदर्शयन्ति । एतेयोगि- नस्तुसंसारत्यागीनो निष्कर्माणः । किंचवेदेषुमुख्यत्वेनाग्निहोत्रादि यज्ञकम्माणि दृश्यन्तेतानिचाग्निसाध्यानि । एतेतुनाग्नेः स्पर्शमपि कुर्वन्ति ।['अग्नेरेवगृहपतित्वमिहाग्नेगृहंते' ] इत्यादि श्रुतेः । यतएतेपक्रिमाचरणमुपधार्येताननिरुपयन्ति । वाहुल्येनवेदविदा श्चते किप्रयोजनमगीकृत्याऽङ्गीकुर्यु चोविसावनंहितदित्यादिश्रुति वाक्यरेव । एवं विस्मृश्यसुधियोविरमन्ति। शब्दादित्यादिपुराण पाक्यैरयेचतदनगीकरणदर्शितम् । किंच ['नाऽयमात्माप्रवचनेन लभ्योनमेधयानवहुनाश्रुतिनेतिश्रुतेः । वहुशास्त्रकथाकन्यारोमन्थे न पृथैवकिम् । [अन्वेष्टव्यः प्रयत्नेनतत्त्वोतिरान्तरमिति] । अधीत्यचतुरावेदान् धर्मशास्त्राण्य नेकशः। ब्रह्मतसंनजानन्ति दर्वीपाकरसंयथा ॥

गोरक्ष सद्धान्तसग्रहः अनन्त हाने से दु.वरहित और द्वन्द्वातीन कहा गया है । और भी देखिये जैसे उपाय पूर्वक लकडी के मथने स उसमें अग्नि दीख पडती है, इसी प्रकार योग स शरीर में प्रात्मा प्रकट हो जाता है, और देखिये-ब्रह्मा सृष्टि के प्रारम्भ से उसका शान रखता है, परन्तु योगी लार्गा को क्लप कलप मरां का ज्ञान होता है । गोतामें भो कहा है-जो वेद पाद में लगे हुए और बुछ नहीं है ऐसा फहने वाले कामनाओं स प्रस्त भोग ऐश्वर्य तथा जन्म कर्म फल देने यात्री क्रियाओं से जटिल (पेचीदो) चिकनी चुपडो यातें करते है ऐसे लोगों द्वारा जिन का मन हरण हो चुका है जो भोग और ऐश्वर्य के लालचा है उसका युद्धि समाधि में निश्चयात्मक नहीं हो सकती। जिसने परमवेद शोकार का प्राश्रय लिया है यह फैस स्थूल घेद का श्राश्रय कर सकता है। चारों वेदों क शाता जो ब्राह्मण सूक्षम ब्रह्म को नहीं जानते थे घेद के भारी पाझ से व्यर्थ ही अपनी बुद्धि का दयातें और वे ब्राह्मणों में अयोग्य है । यहा समझ कर कावेषय गीता में कहा है कि-दुवामा नाम का काई मुनि नाना प्रकार के पुस्तकों के बोझ को उठाकर महादेव का नमस्कार करने वाया तो नारद मुनि ने उसको गधे की उपमा दी तब उसने मोध में धाकर उन सब पुस्तकों का तार समुद्र में फेंक दिया और ।

७५ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः महादेव ने उसको आत्मविद्या में लगाया। घर २ में पुस्तकों के बोझ है। नगर में पंडितो के झुंड है जंगल २ में तपस्वियों को टोली हैं परन्तु न ता उनमें कोई ब्रह्म वेत्ता है और न कर्म कर्ता है। इस प्रकार यहुन से प्रस्ताय है उनमें यह पहला एक उत्तर है। मूल-पुनर्भवद्भिस्तु श्रुतयः पुनः पुनरुच्यन्ते, तत् किमिति। वेदास्तुकर्मनिरूपकास्तद्धिकारिणामेवौचित्यंदर्शयन्ति। एतेयोगि- नस्तुसंसारत्यागीनो निष्कर्माणः । किंचवेदेपुमुख्यत्वेनाग्निहोत्रादि यज्ञकर्माणि दृश्यन्तेतानिचाग्निसाध्यानि । एतेतुनानेः स्पर्शमपि कुर्वन्ति । ['अग्नेरेवगृहपतित्वमिहाग्नेगृहंते' ] इत्यादि श्रुतेः । यतएतेपांकिमाचरणमुपधार्यतानिरुपयन्ति । वाहुल्येनवेदविदा रचैते किंप्रयोजनमङ्गीकृत्याऽङ्गीकुर्युवाचोविसावनंहितदित्यादिश्रुति वाक्यैरेय । एवं विस्मृश्यसुधियोविरमन्ति । शब्दादित्यादिपुराण वाक्यैरेवेचतदनङ्गीकरणदर्शितम् । किंच ['नाऽयमात्माप्रवचनेन लभ्योनमेधयानवहुनाश्रुतिनेतिश्रुतेः] । वहुशास्त्रकथाकन्थारोमन्थे न युथैयकिम् । [अन्वेष्टव्यः प्रयत्नेनतत्त्वोतिरान्तरमिति] । अधीत्यचतुरावेदान् धर्मशास्त्राण्यनेकशः। ब्रह्मतचनजानन्ति दर्वीपाकरसंयथा ।

। गोरक्षसिद्धान्तसन इत्यादि । किंच, एतेपासत्यस्वरूप भूताना महिमान निरूपयन्तो वेदामुह्यन्तीवचाऽऽवृत्तिविपयत्वात् । तथाचकर्मकाण्डे मुख्यमपि ज्ञाननमुख्यत्वेनदर्शयन्ति, दशितेचतस्मिन् कर्ममोहण्य सात् । एवज्ञानकाडेचयोगतन्महिग्निदाशतेजानमोह स्यादिति । सथा च वेदेपु तन्महिमानोपलभ्यतइत्येतदेवाभिप्रयोदोगपर्वणिमनत्सुजा तीयउक्तम्-आभातिशुल मिव लोहितमियाथोकृष्णमायसमकंव रणम् । नपृथिव्यातिष्ठतिनान्तरीक्षेनैतत्समुद्रेसलिलविभति । नता रकासुनचविद्युता श्रितनयाऽभ्रेपुदृश्यते रूपमस्य । नचापि पायो नवदवतामुनैनचन्द्रे दृश्यते नोतसूर्ये । नैव तन्नयजु पुनाप्य थर्यमुनदृश्यतेवेविमलेपुमाममु । रथ तरयाई वापिरानन ? महाप्रनेनैवदृश्यतेभ्रवतत् । अपारणीयतमस परलात्तदन्तको. प्येतियिनाशपाले अपीयरूपपुरधारयामममध्यरूपतपर्वतेभ्य । सा प्रतिष्ठावदमृतलोबास्तद्यतयशः। भूतानिजजिरेतस्मात्मलयान्तितरहि ।। अनामयतन्महदुयतयगोवाचौविकाररूपयांपदन्ति । तस्मिन्जगत्पमिदप्रतिष्ठितंयेतद्विदुरमृनास्तेभवन्ति । ननुतद्विदुरित्यनेनयोगोपमननशामेवोपामितिचेन तस्वय शाम्यस्याप्रिमेऽध्याये।

गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः
यत्तच्छुक्रमहज्ज्योतिदीप्यमानमहद्यशः ।
तदेवाउपासन्तेतस्मात्सूर्योविराजते ।
योगिनस्तंप्रपश्यन्तिभगवन्तंमनातनामत्यादि ।
सविस्तरमुक्तम् । अतोग्रन्थभारवहनंयथैवकिन्तु तदन्तर्गतसो
पयुक्तंसारमात्रगुरुवाक्याद्गृहीत्वायोगेनछत्तकृत्यो भवेदिति ।
- प्रात्मनस्तत्वमज्ञात्वायूढः शास्त्रेपुमुह्यतिः।
।' गोपकक्षागतच्छागेकूपेपश्यतिदुर्मतिः ।।
विदन्तोनात्मनोभावंवदन्तोपनिपगिरः ।
रहस्युपदिशन्त्यन्येस्वयंनानुभवन्तिते ।।
विहाययोगशास्त्राणिनानागुरुमतानिच ।
सहकारापताकंचिज्जावाशास्त्रसमुचयम् ।।
उपदेशनजानन्तिनग्रन्थशतैरपि ।
इति द्विनीपउत्तरम्।
मा-फिर श्राप दो बार ये६ ही पुकारते हैं, यह
स यात घेद तो कर्म का निरूपण करते हैं, इसलिये
कर्माधिकारियों के लिए ही उचित है ये यागी लोग तो
रहित संसार त्यागो हैं। दूसरे वेद में मुख्य रूप से अग्नि.
होत्रादि माँ का विधान है ये सय मिला है। ये लोग

40 गौरक्षासिद्धान्तसंग्रह - योगियों को ही उसका अधिकारी कहा गया है। इस रिप कितायों का योझ ढोना वृधा है। किन्तु उस से अपने लिये उपयुक्त सारमन गुरु के घचम से ग्रहण करके योग से मृतकृत्य हो जाय । आत्मा के तत्त्व को न जान कर मूढ ही शास्त्रों की मूल भुलैया में घूमता फिरता है । जैसे किसी का यकग उसी के मकान जा येटा पर यह मूर्ख उसे कुए में दुढता है। उसी सरह पहुन से लोग आत्मा के अस्तित्व को न जानने हुए उपनिषदो के वचनों को बोलते हुए दूसरों को रहस्य का उप- पेश करते हैं, पर स्वयं अनुभव नहीं करते। योग शास्त्र और गुरु याक्यों को छोड़कर अहंकार में फंसे हुए शास्त्रों के ढेर को भी जान कर सैंकड़ों ग्रन्थों से भी उपदेश को महीं जानते। यह दुसरा उत्तर है । मूल-पुनस्वदेवमुख्यतयोच्यते- श्रुतिस्त्वस्मिन्नपिमते साधिकैवास्ति, परन्त्येतन्मतस्य योधो. युष्माकंनास्ति । तेनयूयंशकरवैष्णवप्रवर्तितमागानुसारितत्त्व- मालम्ब्यवदथ-श्रुतिःसाधिकानास्तीति, तत्सत्यं शंकररामानुजा- दिश्रुतयश्चात्र साधिफामाभपन्तुनाम श्रुतयस्तुभविष्यन्येवसा- धिका इत्यय भावः। घेदस्तुशाखाभेदेरनेकधाविस्तृतः । ततपश्चा- . गौरक्षसिद्धान्तसंग्रह दुपनिषदां निबन्धाः कृताः, ततोप्यधिकाउपलभ्यन्ते । न नि- वन्धनप्रायो निर्णयव्यवहारः । तत्रापिशङ्करेण दशैवाऽभिमता- उपनिपदईसकेनेत्यादयः प्रसिद्धाः । रामानुजप्रमृतिभिस्तुदशस्व- पिशङ्कराभिमत्तादन्योर्थ प्रतिस्पष्टमुदीर्यते । एवमन्येऽपि स्वाभिप्रा- यानुसारियेदस्यतात्पर्यवर्णयिष्यन्ते । तावतातत्तात्पर्य तेपा- मेय, न तुवेदस्यति । यथाविरोचनः प्रजापतिनाऽनुशिष्टोऽपि स्वचित्तदोषेण्देहआत्मत्यबुदिढीकृत्याऽसुरान्माननुशशासेति- धान्दोग्यस्पष्टमाल्यायिकास्ति । यतोयोगिनास्थूलवेदे प्रयोजनमेव- नाम्नि, सर्ववेद मूलभूत ओंकारएयप्रयोजनंतात्पर्य च । तत्र सर्व पेदानांलयोदयोभवतोयतओंकारप्रतिपादिकाः सर्वाःश्रुतयोऽत्र सा. धिकाः तथाहिचेदस्यसारतरः प्रणयः । भूरियेवर्गवेदादजा. यनगुवतियजुवेदान् बरितिमामवेदान् , तानिशुक्राण्यभ्यतपत् नेभ्यप्रयोषणासप्रजायन्त प्रकारकारोमगारइति । ता अनेक- पासमभरत तदेतदोमिति। मा० टी०-पुनः मुग्य उत्तर इस प्रकार दिया जाता है। हमारे मत को भुनि सिट करती है, परन्तु तुमको इम मत का गान हो नहीं है।इमी से नुम शहर और येणयों के जलाए दुए मार्ग के गनुपाणी यग कर कहते हो कि.भुति तुम्हारे मत गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः फो सिद्ध नहीं करती । यह सत्य है कि शंकर और रामानुज के । मत की प्राधार भून थुतियां हमारे मन की मात्रक न हो परन्तु । श्रुतियां साधक अवश्य हैं। वेद तो नाना शास्त्राओ के भेद में यहुत विस्तृत है। वहां पचास उपनिपदों के निवन्ध किए. गए हैं। और उन से भी अधिक मिलते हैं। निबन्ध से निर्णय नहीं होता उन में से भी शंकर ने ईश, केन, आदि दश ही प्रसिद्ध उपनिषद् मानी हैं । रामानुजादि ने उन दशों में शंकर के किए अर्थ से भिन्न अर्थ का स्पष्ट प्रतिपादन किया है। इसी प्रकार और लाग भी अपने अभिप्राय के अनुसार घेद का तात्पर्य वर्णन करेंगे। उनका यह तात्पर्य उन्ही का समझा जापमा न कि वेद का, जे प्रजा पति ने विरोचन को उपदेश दिया नो भी वह अपने चित्त के दोष से देह में ही श्रात्म बुद्धि का निश्चय करके देह ही शात्मा है ऐसा असुरों को यताया । यह आणायिका छान्दोग्य उपनिषद् में स्पष्ट है। इस लिए. योगियों का स्थूल वेद से कुछ भी प्रयोजन नहीं है उनका प्रयोजन भौर तात्पर्य ना केवल थांकार में ही है। यहीं से सब वेदों की उत्पत्ति और लय होता है । इस लिये ओंकार के प्रतिपादन करने वाली सय भुतियां यहां साधक हैं। क्योंकि श्रोशर ही वेद का सार है, ऋग्वेद से भूः यजा .

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा भुवः और साम वेद से स्वः प्रजापति के निचोड़ने से उत्पन्न हुए और उन से अमार उकार और मकार ये तीन वर्ण और इन तीनों में ओंकार यना । मू०-बचब्राह्मणे-अस्यचप्रणवस्यओमित्येतदक्षामिदसर्व गिति माात्म्यश्रुतौतन्मात्राणांचाकारोकारमकाराणां क्रमातथूल कारणप्रपचवाचकयोरभेदात्पूर्वपूर्वस्योत्तरोत्तरत्रप्रविलापनेगुरुयु- पत्याक्रियमाणे स्थलस्यजगतो वेदस्ययामूक्ष्मेलवणोदकन्यायेन- प्रपिलयो भवति तथा मूदमस्यकारणेकारणस्यतुर्येऽर्धमावावाच्ये मावास्ये शियमद्वेतं चतुर्थमन्यन्ते, इतिश्रुतेर्गलिताखिलद्वैतभावे चाइमनमाऽतीतेप्रविलयोभवति। श्रतःप्रणव एववेद इत्यभ्युपगम्य तद्वारा तत्प्रवर्तक नादनम्मेत्यवलम्म्यनादब्रह्मणोयन्मूलंतत्तत्त्व मिति विश्वान्निमतांमते का वाश्रुतिः साधिकान भवतीति प्रसि- द्धितरमेव सर्वत्र मग येद के प्रालय भाग में इस प्रपत्र का महत्व प्रतिपादन किया गया है कि यह मय श जगत् अक्षर मरूप प्रोम् है सर्या नि में उसकी प्रकार उकार और मकार इन मामामों का स्यूस कारण और प्रपंच पाच के साथ प्रभेद होने से पूर्व २ का प्रागे २ में गुरु को युक्ति के अनुसार गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः . प्रविलय किये जाने पर स्थल जगत् और वेद का सूक्ष्म में पानी में नमक के समान प्रबिलय हो जाता है अर्थात् मिल जाता है । तथा सूदम का कारण और कारण का अर्धनात्रा के यार तुरीय में श्रद्धत शिव चतुर्थ को मानता है। इस श्रुति के अनुसार चाणो और मन से परे समस्त द्वैत से रहित ब्रह्म विलय होता है। इस लिये प्रणय हां येद है यह मान कर उसके द्वारा उस का प्रवर्तक नाद ही ब्रह्म है यह मान कर नाद ब्रह्म का,जो मूल है यह तत्व है इस प्रकार मानने वालों के मन में कौनसी प्रति साधक नहीं है अपितु सय ही हैं यह मय जगह प्रसिद्ध है। मू:-प्रणयप्रशंमा शियोपनिपदि- प्रणवः सर्वान् प्राणानुप्राणामयति चैतरमान प्रणयश्रतु घस्थित इति चेददेवयोनिध्येयश्चेति सन्धत्तासर्वेभ्यो दुःसहेभ्यः सन्तारयति तारणाननानि सर्वाणोति । ब्रह्माविष्णुधरुद्रय ईश्वरः शिवएव च । पंचधापंच देवत्यः प्रणवः परिपथ्यते ।। तयाधिक क्षणमेकमाम्यायक्रनुशतम्यापिफलमवाप्नोतिकृत्स्नमों कारगनंच मर्यशानेनेति । माण्डूक्योपनिपदि च- गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः . ओंकारच्छन्दसोज्ञात्वान किंचिदपि चिन्तयेत् । युञ्जीत प्रणये चेतःप्रणयोब्रह्म निर्भयम् ॥ प्रणये नित्ययुक्तस्यनभय विद्यतेक्वचित् । प्रणवोह्यपरंब्रह्मप्रणवश्वापरः स्मृतः॥ अपूर्वोऽनन्तरांबाह्यांनपरः प्रणवोऽव्ययः । सर्वस्यप्रणवोद्यादिमध्यमन्तस्तथैवच ।। एवंहिप्रणवंज्ञात्वाविशतेतदनन्तरम् । प्रणवहीश्वरविद्यात्सर्वस्य हृदयेस्थितम् ।। सर्वव्यापिनमोंकारंमत्वाधीरोनशोचति । शमानोऽनन्तमात्रश्चद्वैतस्योपशमः शिवः ।। ओंकारोविदिवोयेनसमुनिर्नेतरोजनइति । हदारयके सपथा:न्धानामेरभ्याहितात्तथापृथग्धूमाविनिश्चरन्त्ये वंबा, इत्यादि, छान्दोग्य श्रोमित्येतत्तदक्षरमुद्गीथमित्यादि । एतदेया मित्यमहाभारतेसनत्सुजातीयवचनम- यतो न येदा मनसासहैव मौनं प्रविशन्तिततोऽथ मौनम् यत्रासितो वेद शन्दस्तयाऽयं सतन्मयत्वेन विभाति राजन् ? भागयतेचाप्येवादारकन्य-- गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः सएपजीवोविवरप्रसूतिः प्राणेन घेपेण गुहाँ प्राविष्टः । मनोमयंसूक्ष्ममुपेत्यरूपमात्रा स्वरो वर्णइतिसाविष्ठः ॥ शन्दमझ मुदुर्बोध प्राणेन्द्रियमनोमयम् । अनन्तपारंगम्भीरंदुर्विगायंसमुद्रवत् ।। मयोपहिनभूसामागाऽनन्तशक्तिना। भूतपुपोपस्पेशसिपणेपलक्ष्यते ॥ यधोर्णनाभिहृदयादुर्गामुद्रमते मुखात् । भाकाशापोपवान्प्राणो मनसापशरूपिणा ॥ धन्दामयोमृतमपः महसपदींप्रभुः । ओंकारापंजितस्पर्शस्वरोमान्तस्थभूपिताम् ।। पन्यादि । अन्यथ-(वेद प्रणयापापे धर्मोऽपरूपः । पामते सपोनिष्टा समांमुफ्त गिरियषा) (नायुगेमहाभागप्राणा. मंदसागप्रयो । विप्रादुर्भूतम्या पदमार्गत्रिन्मया ) (विप्र- प्रिनिदादामुपयारगानाइत्यादि।) गीतायां च (प्रोमिलका मध्याहन मामनुग्मरम् । यःप्रयानि सजन्दसिया निपामांगनिम् ) ॥ एवममापि यामा प्राचितम गम विहार भियानल नितीरमुगमा .

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः भा० टी०-शिवोपनिषद् में प्रणयकी प्रशंसा की गई है। कि प्रणय ही सय प्राण की अनुप्राणित करता है इस लिये प्रणव चार प्रकार स स्थित है । वेद देव योनि और ध्येय इस प्रकार धारण करने वाला है । वह उन सघको दुःसह दुःखों से तार देता है। ब्रह्मा विष्णु रुद्र ईश्वर और शिव इस प्रकार से पांच देवताओं याला प्रणय पांच प्रकार से कहा जाता है। एक क्षण मात्र भी उसका ध्यान करने से सो यशों का समस्त फल प्रास कर लेना है। मांडूक्योउपनिषद् में भी भोकार से वेदों को जान कर कुछ भी न मोचे । प्रणव में ही मन को लगाये प्रणय ही निर्भय ग्रन है जो नित्य प्रणव में लगा रहता है उसको कुछ भी मय नहीं है प्रणव ही अपर और पर ब्रह्म है प्रणय अपूर्य अनन्तर और बाह है। अव्यय प्रणव से बढ़ कर कुछ भी नहीं है, प्रणय सय का शादि मध्य और अन्त है । इसप्रकार प्रणयको जान कर जिशामु फलता फूलता है । प्रणय ही सय के हृदय में स्थित ईश्वर है, सर्यव्यापी आकार को जान कर धैर्यवान् पुरुष शोक नहीं करता प्रणय मात्रा रहित और अनन्त मात्राओं पाला है त का माशकचौर कल्याण कारक है मोंकार को जिसने जान लिया पही मुनि है। अन्य नहीं गृहदारण्यक में भी वर्णन है-जैसे गीले इन्धन याले भग्नि से अलग २ धूमनिकलता है उसी प्रकार

८८
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
ओंकार रूप ब्रह्म से सय वेद निकलते है। छान्दोग्य में भी
कहा है कि ओम् यह अक्षर साम वेद स्वरूप है।
इसी अभिप्राय से महाभारत में सनत्मजात का वचन है।
कि जहां चेद मत के साथ ही मौन धारण कर लेते हैं हे राजन्,
जहां जाकर यह वेद शब्द, तन्मय रूप से शोभायमान
होता है।
भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध के यारहवें अध्याय में उद्ध्य
के प्रति श्री भगवान् का यचन है कि समस्त ससार का धारण
करने वाला यह परमात्मा ही उपाधि घश से
सूक्ष्म
और
स्थूल
उभय रूप वेद स्वरूप होता है। उस परमात्मा का विकाश
लिङ्गगुदा के मध्य मूलाधार १ लिङ्ग मूल में स्वाधिष्ठान २ नाभि
प्रदेश में मणिपूर ३ हृदय देश में अनाहत ४ कठ देश में यिशुद्ध
५८ मध्य में भामा ६ इन छः चक्रों में होता है । उन में पहले
नाद सहित परा नाम प्राणघायु के साथ मूलाधार रूप गुहा में
प्रविष्ट होता है, यह किसी मग इन्द्रिय का विषय नहीं है,
इस लिये उसका नाम 'पण' है फिर नाभि देश में आने पर
सूक्ष्म मनोमय रूप पश्यन्ती और हृदय देश में मध्यमा को प्राप्त
होता है, इतने तक सूक्ष्म घेद कहलाता है फिर एठ से ऊपर
मुख देश में वैखरी रूप
प्राप्त होता है, यहां हस्व दीर्घप्लुन
इन तीन मात्राओं उदात्त अनुदात्त स्वरित इन तीन स्वरों तथा

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः 1 ककारादि वर्ण ( अक्षरों ) के रूप को धारण करता है, यही चैपरी नाद सर के श्रवण गोचर होता है । वही स्थूल घेद हैं । साधारण मत से अकार से लेकर क्ष तक उनचास अक्षर हैं, दो लकार मानने वालों के मत में पचास वर्ण माने जाते हैं। व्याकरण शिक्षा में तो ६२ माने जाने हैं। उत्ती ११वें स्कन्ध के २१ – अध्याय के ३६ चे श्लोक में वर्णित है कि समस्त घेद परमात्मा को ही बताता है। वहां पर संदेह हुआ कि यदि ऐसा है तो चेदा जैमिनी आदि पि लोग क्यों नहीं यताते उस पर भगवान् ने उत्तर दिया है कि घेद रूप शब्द ब्रह्म अत्यन्त कठिन है, सिवाय मेरे इस यास्तविक रूप और अर्थ को और कोई नहीं समझ सकता यही मूलाधार में प्राणमय परा नाम वाला है, नाभि में पश्यन्ती नामक मनोमय सूक्ष्म रूप होता है, और मध्यमा नामक इन्द्रिय मय होता है। इसका अन्त और पार नहीं है । अर्थ से दुशेय है । भगाध समुद्र की तरह इस में युद्धि का प्रयेश होना कठिन है।यापक-विकाररहित-अपरिगणित शक्ति सम्पन मेरे से ही मारा परामर जगत् अधिष्ठित ह । जैसे कमल की डंडी में सूक्ष्म तार होते हैं उसी प्रकार समस्त प्राणियों में से सूक्ष्म रुप मुझ को हो गाद रूप से विद्वान् लोग पहचानते है। मप सोन श्लोको सेयपरी पाकके उत्पत्ति प्रकार - . ६० गोरक्षासद्धान्तसंग्रहः को दृष्टान्त द्वारा कहते हैं- जैसे मकड़ी हृदय से मुस के द्वारा तार निकालती है येसे ही हृदयाकाश खित सूक्ष्म भोकार रूप ध्वनि से उपाधि रहित होने पर भी प्राण उपाधि सहित हिरण्यगर्भ का घेद रूपी भगवान् चों के संबला करने वाले मन द्वारा अकारादिस्थर ककरादि स्पर्श, श ष स ह ऊष्मा यर लय अन्तस्थ इत्यादि अनेक रूप धारण करने वाली वृहती रूप चैखरी वाक की उत्पत्ति करना है। आगे के श्लोक मे इसका सम्बन्ध है-प्रणव रूप वेद है भीर युग के आदि में सर्वश्रेष्ठ धर्म रूप भी मैं हो हूँ। उसी की अहंभाव से धमाटमा लोग उपासना करते हैं। घेता युग में मेरे हृदयस्य प्राण से त्रयो घेद विद्या प्रकट हुई। उस में यक्ष रूप में ही था। मुख-बाहु-उरु-पाद से उत्पन्न ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र सय उसकी उपासना करते हैं इत्यादि। 'गीता में भी कहा है-कि श्रोम् इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करता हुआ और उस ओम् का पाचक जो मैं है मेरा स्मरण करता हुधा जो देह को त्यागता है यह परम गति को प्राप्त होता है। इस प्रकार अन्यत्र भी विस्तार के साथ प्रणय की महिमा वर्णन की गई है। यह विस्तार के भय से नहीं लिखी गई है। यह तीसरा उत्तर है।

. गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः , मू-पुनः वेदार्थस्यवोधस्तुकेपांचिन्नास्तिएव, केवलमभि-. मानमेवतिरस्कृत्ययेवदन्तितानप्रतिचतुर्थमिदमुत्तरम्- यद्भवद्भि- घेदोदइतिपुनः पुनरुच्यते । तस्ववेदस्यत्वभ्यासेऽप्यवधूतानां- दोपए यस्यात् । कथमितिचेदुच्यतेवेदस्यपूर्वभागस्तुवर्णानामेव, वेदान्तभागस्तुभितुकाणमेव । उभयविलक्षणायोगभागस्तु अवधू- तानाम् । वैदस्यपूर्वभागे ज्ञानं वाच्यार्थेननदर्शितम् । किन्तु तात्प- येतदस्तीतिभवद्भिरेवेच्यते । एवंवेदस्यपूर्वभागेज्ञानंयथातात्प- येऽस्तितधावेदान्तभागेयोगस्तात्पर्यार्थोऽस्ति । यद्यपियहुधावाच्या धेनापिदर्शितोयोगसथापिमुख्यमुत्तरन्तुमुख्यतात्पर्यएषास्ति, यतो- वेदवेदान्ततात्पर्य लक्ष्यञ्चायधूतएवास्ति । सर्वेवेदास्तत्पदमामन्तीत्यादिश्रुतयो । पदश्वस-रहमेयवेद्यइत्यादिस्मृतयो ।। रूपेइमेसदसतीतरचेदसृष्टवीजांकुराः विच नचान्यदरूपकस। युक्ताः समचमुभयत्रविचिन्ववेत्यायोगेन वद्विमिवदारपुना- न्यतः सात् ।। इत्यादिपुराणयाफ्यानिचाप्रसाधकानि । एतदेवाभिप्रेसमहा- भारतेसनमुजाताह- १२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह नवेदानांवदिताकश्चिदस्तिकश्चित्वंतानबुध्यतेवापिराजन् । योवेद, येदान नसवेदवेद्यसत्यस्थितोयस्तुसवेद, वेद्यम् ।। नवेदानांवेदिताकश्चिदस्तिवेधेनवेदनविदुवैद्यम् । योवेदेवंदसचवेदवेद्ययोवेदवेद्यनसवेदसत्यम् ।। योवेदवेदान्सचयेदवेद्यनतंविदुर्वेदविदोनवेदाः । तथापिवेदेनविदन्तिवेदं येप्राह्मणायेदविदोभवन्ति । धामांशभागस्यतथाहिदायथाचशाखाहिमहीरुहस्य । संवेदनचैव यथामनन्ति तस्मिन्हिसत्यपरमात्मनोर्थे । धृतराष्ट्र उवाच- आख्यानपंचमैदर्भूयिष्ठकथ्यतेजनः । तथाचान्येचतुर्वेदाखिवेदाश्वतथापरे । - तेपान्तुकतरः सस्याद् यमदद्विजम् । सनत्मजात उवाच- एकस्यवेदस्याऽज्ञानार्वेदास्तेवहवः कृताः । सत्यस्यैकस्पराजेन्द्री सत्येकश्चिदवस्थितः ।। एवंवेदमविज्ञायप्राज्ञोऽहमितिमन्यते ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः दानमध्ययनयज्ञो लोभादेतत्प्रवर्तते ।। सत्यात्प्रच्यवमानानां संकल्पश्चतथाभवेत् । ततोयनः प्रतायेतसत्यस्यैवाऽवधारणात् ॥ धृतराष्ट्र उवाच- ऋचोयजूंपियोवेद सामवेदचवेदयः । पापानिकुर्वन् पापेन लिप्यतेकिनलिप्यते ।। सनत्सुजात उवाच- नमामान्यचोवापि नयजूंप्यविचक्षणम् । जायन्तेकर्मणः पापान्नतेमिथ्यात्राम्यहम् ।। नछन्दांसिपृजिनाचारयन्तिमायाविनमाययावतमानम् । नीइंशकुन्ताइवजातपक्षाश्छन्दांस्येनप्रजहत्यन्तकाले । प्रयंचस्थूलचेदतात्पर्ययुप्माभिः सूक्ष्मयेदतात्पर्याणामस्मार्कम- समपिशाययोऽनुयोगसत्प्रतियाक्यमिदंचतुर्थम । मा-बहुतों को घेद के अर्थ का पान तो है नहीं, केवल भमिमान के पशीमन हाकर पातें करते हैं उनके लिये यह घोपा उत्तर है कि माप लोग पारंवार घेद पेद ऐसा कहते हैं, मपतों पोतो या के मम्पास से दोर लगता है क्योंकि उम 1 गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा घेद का पूर्वभाग तो घणों का है और उत्तर भाग मितुगो । अवधूतों का योग भाग तो दोनों से विलक्षण है । वेद के पूर्व म.ग में ज्ञान याच्यार्थ रूप से घर्णित नहीं है। किन्तु लक्ष्यार्थ रूप से है यह आप लोग ही कहते हैं। इस प्रकार घेद के पूर्व भाग में जैसशान तात्पर्यार्थ द्वारा है ऐसे ही उत्तर भाग में योग भी तात्पर्यार्थ द्वारा वर्णित है, यद्यपि अधिकतर वाच्यार्थ से भी योग दिखलाया है तथापि मुख्य उत्तर तो तात्पर्य में ही है। पोंकि वेद वेदान्त का राप तात्पर्य अवधून पद में ही है। रूप रहित तुम्हारी सृष्टि के दा रूप धीमाकुर की तरह म्धूल सूदम है उन ही को साधारण लाग जानते हैं इसमे तन घाम्तविक स्वरूप को नहीं, असली रूप को तो योगी जनही योग द्वारा प्रत्यक्ष करते है। जैसे मथने मे का में शनि पैदा करने है। अम्प उपाय से नहीं । इत्यादि पुगणपास्य श्रीर थुति स्मृनिया इसमें साधक है। इसी अभिप्राय से महाभारत में समासुजान ने कहा है-वेदों के जाने वाला कोई नहीं है। कोई विरला ही इनको जानता है.जो चेदों को जानता है यह घेद्यब्राह्म को गहीं जानता, ब्रह्म को यह जानता है जो सस्य में धित है। पदों को कोई नहीं जानता, जो वेद से जानने योग्य वो जानता है यह वास्तविक घेद्य को जानता ही नहीं, जो घेद -

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गोरक्षासिद्धान्तसंग्रहः
पो जानता है यह वेद्य को नहीं जानता, धीर जो वेद से वेद्य
को जानना
वह सत्य को नहीं जानता । जो वेदों का झाता
है येद के जानने वाले और घेद उम को नहीं जानते। तो भी
जो घेद जानने वाले ब्राह्मण होने हैं। ये वेद से ही वेद को
अर्थात ब्रह्म को जानते हैं। जैसे शामा वृक्ष का एक अवयव
माना जाना है धौर उम से उम्म वृक्ष का बोध होता है. इसी
तरह तेजः स्वमा रमात्मा का एक श्रययय वेद है. ये वेद
उस परमात्मा के यथार्थ कान कराने के लिये एक देश को
पहने है।
धृतगर मनराजात में पहना है कि येद और पांचों
थाण्यान रफ जानने याला मनुष्य अधिक पादर के योग्य है
ऐमा जाता है. यहुन में नार घेदों के शाना हैं और यहुन
मे प्रपोजानने वाले इन में में यह फोन है जिमको में
प्रपती प्राह्मण ममझ । तय समरसुजात मे कहा-घेद वास्तव
एकदी, warm जांगों में अनेक घेद यमालिये जैसे
गजेन्द्र गाम्नयिक साय को जानकर रोग अनेक प्रकार
पं.मामाने मधं का लेते हैं, उस समय में काई २ दाता है।
इस प्रकार पेद को न मानकर साधारण पुदियाला पुरुष
अपने पोपा पुदिनानु ममामला है। धान अध्ययन और यम
पे सोम में दो प्रहारो ६. माय जो पतित हो जाते हैं

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
उनके नाना प्रकार के संकल्प होते हैं। फिर उस सत्य का ही
निश्चय करके लोग यज्ञादि करते हैं।
धृतराष्ट्र ने कहा-जो ऋक् यजु और सास को जानता
हुआ पाप करता है वह उस पाप से लिप्त होता है या नहीं ?
तय सनायुजात ने कहा कि उस मूर्व का जो तीनों वेदों का
ज्ञाता होता हुआ भी पाप करना है ऋक् साम यजु कोई भी
नहीं बचा सकत। यह मे तुझ से सरप कहता हूँ। माषा में
वर्तमान मायावी पुरुष का वेद पार से नहीं बचा सकतं जैसे
पक्षी समय पर घाँसले में से उड़ जाते है अर्थात् उसको छोड़
देते है । उसी प्रकार उस मायारी पुरुष को अन्त काल में वेद
छोड़ देते हैं । इस प्रकार स्थूल घेद में तरपर्य रखने वाले तुम
लोगों ने सुक्ष्म वेद को मानने वाले हम लोगों के तात्पर्य को
न जानकर हम पर जो पाप किया है उस का यह चौथा
उत्तर है।
-
।
मू०-यांगांजे-
नानामार्गस्तुदुष्प्राप्यंकैवल्यपरमपदम् ।
सिद्धमार्गेयलम्यतेनान्यधाशिवभाषितम् ।।
पद्धापनधिमुच्यन्त नाथमार्गमतः परम् ।
तमईकथापिण्यामि तवप्रीत्यामुरेश्वरि ।।

७ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः अनेकशतसंख्यामिस्तर्कव्याकरणादिभिः । पविताशाखजालेषु प्रज्ञयातेविमोदिताः ॥ अनिर्वाच्यपदवक्तुं नशक्यते सुरैरपि । स्वात्मप्रकाशरूपं तत् किंशाणप्रकारयते ॥ विशुद्धएव परमात्माजीयाभिधइत्युक्त्याजीवस्यदोपाः काम धीमयंचिन्तेत्यादिचोक्त्या- तस्माद्दोपविनाशार्थमुपायंकथयामिते । मानकेचिद्वदन्त्यत्र केवलंतनसिद्धये ॥ योगहीनंकज्ञानमोक्षदंभवतीश्वरि ? अज्ञानादेवसंसारोजानोदयविमुच्यते ।। तत्र योगम्य किं फार्यमिति देव्यापृष्टईश्वरउवाच- अमादीपैविमुक्तः किंकामक्रोधभयादिभिः । गर्वदांपतोजविः कथंज्ञानेनमुच्यते ।। माननिष्ठोविरक्तोरा धर्मनोविजतेन्द्रियः। पिना योगनदेवोऽपि नमोचलमतेप्रिये ।। अपस्याः परिपक्वारच द्विविधादेहिनः स्मृताः। अपापोगनाम्नु पयायोगेनदेहिनः ॥

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
तस्माद्ज्ञानंचपैराग्यं जफास्यात्वलाश्रमः ।
शरीरेणजिता. सर्वेशरीरंयोगिभिर्जितम् ।।
तत्कथंकुरुतेतेपां सुखदुःखादिजं फलम् ।
देवैरपिनलभ्येत योगदेहामहाबलः ।
छेदान्धर्षिमुक्तोऽसौ नानाशक्तिधरः परः ।
यथाकाशस्तथादेह आकाशादपि निर्मलः ॥
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरोदेहः स्थूलात्स्थूलोजडाज्जडः ।
इच्छारूपाहियोगीन्द्रः सतन्त्रस्त्वजरामरः ।।
क्रीडति त्रिपुलोकेपु लीलयायकुत्रचित् ।
अचिन्त्यशक्तिमान् योगीनानारूपाणिधारयन् ।।
संहरेचपुनस्तानि मेच्छयाविजितेन्द्रियः ।
पुरैमृतएवाऽसौ मृतस्यमरणंकुतः ॥
मरणंयनसर्वेषां तनाऽसौसाख ? जविति ।
वर्तव्यनवतस्यास्ति कृतेनाऽमानलिप्यते ।।
जीवन्मुक्तः सदास्थः मर्पदोपविवर्जितः ।
विरक्ताशानिनश्चान्ते देहेनविजिताः सदा ॥

8 गोरक्षामद्धान्तसंग्रहः तेकथंयोगिभिस्तुल्या मांसपिण्डा कुदेहिनः । देव्युवाच- ज्ञानिनस्तुमृताये व तेषांभवतिकीशी। गतिः कथयदेवेश ? करुणामृतवारिध ? ईश्वर उवाच- देहान्तमानिनः पुण्यात्पापानफलमाप्यते । यादशतुभवेत्तत्र मुक्तोमानीपुनर्भवेत् ।। पुण्यात्पुण्येनलभते मिद्धेनसहर्मगतिः। ततःमिद्धस्यकृपया योगीभवतिनान्यथा ।। ततोनश्यति समारो नान्यथाशिवभापितम् ।। महाविष्णुमद्देशानां प्रलयेप्पपियोगिनाम् ।। नास्तिपातोलयस्थानां महातत्वविवर्तिनाम् ।। चेदान्ततकोक्तिभिरागमंचनानाविध शास्त्रकदम्बकैय। प्पानादिभिमरकरगनंगम्यंचिन्तामर्णित्वेकगुरुपियाँ मा०-गोग योग में कहा है पंधल्य परम पद जो कि माना मागों में प्रात नही किया जा सकता, मिद मार्ग में माrिपा मासा यह गिरोकथन है। जो पदाति १०० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः अन्यथा नहीं हो सकता। हे सुरेश्वरि जिससे युद्ध मुक्त हो जाते हैं वह नाथ मार्ग तेरी प्रसन्नता के पिये कहता हूं। सहस्रो तर्क और व्याकरणादि ग्रंथों के जालों में पड़े हुए, अपनी बुद्धि के अभिमान में चूर रहते हैं। जो भनिर्वाच्य पद है उसे तो देवता भी नहीं कह सकने जो स्वात्म प्रकाश वस्तु है यह शास्त्रों से कैसे प्रकाशित किया जा सकता है। विशुद्ध, परमात्मा ही जोय नाम से कहा जाता है ऐसा और जीव के दोष काम क्रोध भय तथा चिन्ता इत्यादि कह कर अब में जिस उपाय से उसके दोषों का नाश हो सकता है वह कहता है। इन दोपों के नाश का उपाय यहुन से लोग ज्ञान को पताते हैं। परन्तु हे सुन्दरि? योगहीन ज्ञान केमे मोक्ष दे सकता है संसार का कारण अशान है। और ज्ञान से यह मष्ट हो जाता है। फिर उसको नष्ट करने के लिये यांग का क्या प्रयाजम है इस प्रकार देवी के प्रश्न करने पर शिव जी ने कहा-शा यह जीव काम क्रोधादि दोषों से मुक्त है ? यह तो इनसे घिरा हुआ है, अतः कैसे ज्ञान से मुक्त हो सकता है । काई कैसा हो शाना धर्मात्मा और जितेन्द्रिय अथवा देवता भी क्यों न हो हे प्रिये योग के बिना मोक्ष को प्राप्त नहीं हो सकता। अपयय मौर परिपक्य दो प्रकार के मनुष्य हैं उनमें योगहीन अपरिः पक्य और योगयुन परिपक्य हैं इसलिये शान घेराग्य और - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः जप फेवल परिश्रम है समस्त संसार शरीर के वश में है और योगियों ने शरीर को जीत लिया है। यह शरीर योगियों को सुप दुःन का फल फैमे दे सकता है। महा घलवान योगयुक्त दद को देवता भी नहीं प्राप्त कर सकते। योगियों का देह छेद श्रीर बन्ध आदि से मुक्त है और नाना प्रकार की शक्तियों को धारण करने वाला है। उनका देह भाकाश की तरह निर्मल है, यह सूक्ष्म से सूदन स्थूल से स्थूल और भारी से भारी होता है। योगीन्द्र इच्छा रूप स्वतंत्र अजर और अमर होते हैं। योगी को शक्तिचिन्त्य होती है । यह नाना रूपों को धारण करता हुआ अपनी लीसा से जहां चाहे वहीं फोड़ा करता है जिनेन्द्रियह योगी उन रूपों को जय चाहे विलीन कर सकता । पुष मिन खो भादि सय प्राकृत पदार्थ के अभिमान को छोड़ पर योग साधन में लगा हुआ सिद्ध पुरुष संसार के व्यवहार से पहले ही मरा हुआ है गतः मृतका मरण केसे होसकता है, जिम प्ररूप काल में सब प्राणि अभिमान रहित हो जाने से मृत काहनाते हैं. उस समय में सिद्ध पुरुष सरूप मान युक्त होने से मोदित कलाताई। उसका कोई फत्घ्य नहीं यह कमी को मटिम नहीं होता यह जोयन्मुक्त स्वस्थ होता है। स्यतंत्र भीर मप दोषों से मुना होता है विरत और शानी सय देह के माधीम होते है पे रिसा देव पाले योगियों के मुल्य कैसे हो गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः ૧૨ सकते हैं। फिर देवीने कहा है कागामिन्धु हे देयेश ज्ञानी लोगों की मरने पर क्या गति होती है कृपया यह बनाइये तय शिवजी ने कहा-देहान्त फे पाद पानी को पुण्य और पाप का फल नहीं मिलता, यहां यह किसी भी जन्म को प्राप्त हो फिर भी शानी ही होता है । पुण्य से उस को सिद्ध की गनि प्राप्त होती है। फिर सिद्ध की कृपा से यह योगी होता है। अन्यथा नहीं फिर उसे मुक्ति प्राप्त हो जाती है। यह शिव का वचन सर्वथा सत्य है । महा विष्णु और महेश पदयो का प्राप्त हुए लय में स्थित और महातत्व में वर्तमान योगियों का प्रलय काल में भी पात नहीं होता जो योगियों को प्राप्त होता है यह घेदान्त तर्कोक्तियों वेदों नाना प्रकार के शास्त्र समूहों और ध्यानादि उपायों से नहीं प्राप्त हाता, यह केवल चिन्तामणि सदृश गुरु की कृपा से हो प्राप्त होता है। तात्पर्य यह है कि विना गुरु के खयं शास्त्रपठन और ध्यानादि साधन नहीं करना चाहिये नहीं तो अटसट हो जाने का डर है। मू-सिद्धसिद्धान्तपद्धतौ- शिवाझैरवः, भैरवाट्रीकंठः श्रीकंठात्सदाशिवः सदाशिवा. दीश्वरः, ईश्वरानुद्रः, रुद्राद्विष्णुार्पप्णोर्ब्रह्मा इतिमहासाकारस्य. मूर्यष्टकम् । प्राचारेब्राह्मणा वसन्ति शौर्येक्षत्रियाः, व्यवसाये वै. .

गोरामदान्तसंग्रह
१०३
। व्याः सेयामा शूद्राः।
अनन्नमितागति प्रयागे। अनिधित्परमाऽद्वतस्यभायः।
मायारमेति।
शियस्साऽम्पन्तरे शक्तिः शक्तरभ्यन्तरोशियः ।
अन्तरनवजानीपाचन्द्रनन्द्रिकोरिय ।।
नारंगद्गुरोर्वक्वान्नान्यथाशामकोटिभिः ।
ननशन्दपिशानायला वेदपाठनात् ।।
पंटान्न भागांना नत्यमम्यादिवोधनात् ।।
दयानाथपाया नाथमागांनपालनान् ।।
मन्यायागीम्पयंकना लीलयागाजराऽमरः ।
मापादपदत्यानां मीटतभरवायथा ।।
न गुरोरधिकं न गुगंगपिक शिवशागननः शिशामनतः ।
न गुगेगर्षिां न गुगंपिक शिरशासनतः शिवशामनतः ।।
फग्गामापानन विपापागाटशियोः ।
गारगानन्दजनरः मगुरुः गांभिर्धापन ।
पुनरागादिनाशामरानुमाननमुद्रपाराममोगुरु-

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः स्वविश्रान्तिनजानाति परेषां स करोतिकिम् । भा-सिद्धसिद्धान्त पद्धति में वर्णन किया गया है- शिव से भैरव भैरव से श्री कठ श्री कंठ से सदा शिव सदा शिव से ईश्वर ईश्वर से सद रद् से विष्णु विष्णु से ब्रह्मा ये महासाकार की आठ मूर्तियां है। आचार में ब्राह्मण शौर्य में क्षत्रिय व्यवसाय में वैश्य और मवा भाव में शूद्र रहते हैं। अनन्त सिद्धमान के प्रकाश में रहते हैं। परम श्रद्धत का जो भाव है यही आत्मा है । शिव के अन्दर शक्ति और शक्ति के भीतर शिर चन्द्र और चांदनी के समान इन में कोई भेद नहीं है । यह तत्व ही जाना जाता है, अन्यथा क्रोडों शास्त्रों से भी नहीं । यह तत्व न ज्ञान तर्फ न शब्द के ज्ञान न यार २ वेद पढ़ने न घेदान्त सुनने और न तत्त्वमसि ज्ञान सेन देवार्चन से न भक्ति और न श्राश्रमों के पालन से प्राप्त होता है। किन्तु स्वयं अपने स्वरूप में स्थित योगी स्वयं ही अपने भाग्य का विधाता होता है, और अपनी लीला से यह अजर और अमर होता है, देव और दैत्य सय से अवध्य होता है। यह भैरव के समान खेलता है शिव जी का यह शासन है कि गुरु से पढ़कर संसार में अधिक कुछ भी नहीं है । जो अपनी दया के लेश से शिष्य को अर्थात् प्राणि की बाठों पाशों को सद्गुरु के पास गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः १०५ काटकर उसे आनन्दित करता है वह सद्गुरु कहा जाता है। वह गुरुत्याज्य है जो नाना प्रकार के वचनों शास्त्रों के अनुमानों और तकों के झमेलों से शिप्प को भ्रम में डाल देता है। जिसका मन स्वयं विश्रान्न नहीं है वह दूसरों का क्या उपकार कर सकता है। क्या कहो शिलानों से शिलाएं नदी के पार उनारो जा सकती है । जो मयं पार हो चुका है वही दूसरों को पार उतारने में समर्थ हो सकता है। मू-सर्वदर्शनानांवरूपदर्शनेनसमन्वयं करोति सोऽवधूत- योगीस्यात् । शिलयाकिपरंपारं शिलासंघः प्रतार्यते । खयंतीर्णोमवेद्यस्तु पराविस्तारयत्यतम् ।। श्रत्याश्रमीचयोगीच ज्ञानीसिद्धश्च मुत्रतः। ईश्वरश्चतथाखामी धन्यः श्रीसाधुरेवच ॥ जितेन्द्रियश्चभगवान ससुघीः कोविदोयुधः । सर्वेपदर्शनानां च स्वरूपंचप्रकाशयेत् ।। सर्वतोमरिताकारं निबद्धयेनहितम् । परब्रह्मणियस्तु ब्रह्मचारीसकथ्यते ॥ मा०-स्व स्वरूप के अनुभव से सय दर्शनों को पकता कर लेता है यहो यास्तव में अयधूत है। जो पाश्रमों को पार

२०६
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
कर चुका है और जो योगो झानी सिद्ध समर्थ प्रतधारी
इन्द्रियों का स्वामी परकार्य माधक पविध ऐश्वर्य सम्पन्न
है घही मुधी और यही सब दर्शनों के प्रकाशित करने का
अधिकारी है। जो सर्वव्यापक संसार के रचयिता महान ग्रह्म
में विचरण करता है, वह ब्रह्मचारी कहाना है।
मू० गृहिणीपूर्णतानित्यं गेहव्योमसदाचलम् ।
यस्तयानियसत्यत्र गृहस्थः सोभिधीयते ॥
सदान्तः संस्थितायोऽसौ स्वप्रकाशमयेवने ।
वानप्रस्थः सविशेयो नवनेमृगवच्चरन् ।
परमात्माचजीवात्मा चात्मन्येवस्फुरत्यलम् ।
तस्मिन्न्यस्तः मदायेन संन्यासीसोभिधीयते ।।
नवन्दनीयास्त काष्ठा दर्शनम्रान्तिकारकाः।
वर्जयेचान्गुरून्द्राद् धीरः सिद्धमताश्रयः ।।
भा०-जो पूर्णतारूपी लो के साथ और पाशश के समान
सदा अचल ब्रह्मरूप घर में यास करता है यह वास्तविक
गृहस्थ है।
जो स्वप्रकाश मानरूप यन में सदा रहता है यही असली
पानप्रस्थ जानना चाहिये, नकि मृग की तरह जरूप जंगल में

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह १०७ विचरने वाला। सर्वक्षतादिगुण विशिष्ट परमात्मा और राग देषादिगुणयुक्त जीव जिस सच्चिदानन्द परमात्मा में प्रकाशित होते है, अर्थात् उसकी सत्ता से इनकी सत्ता है । उस ब्रह्म में जिसने सब कुछ छोड़ दिया वह संन्यासी है । जो नाना दर्शनी के जालों में लोगों को भरमाते रहते हैं उन पुरुष की तो दिशाए भी निन्दनीय हैं अर्थत् उधर भूल से भी गमन न करे श्रतः सिद्धमत का श्राध्य करने वाले को उचित है कि ऐसे गुरुओं को त्याग दे। मू-पद्मपुराणेकपिलगीतायाम्- दत्तात्रेयादिसिद्धानांनवनाथास्तथैवच । शङ्करोगुरुरूपेणबोधितश्चात्मतत्त्वाभिः ॥ ऋगवेदोऽथयजुवदः सामवेदोह्यथर्वणः । सूक्ष्मवेदोहिअध्यक्षः पंचवेदाः प्रकीर्तिताः॥ ईश्वरउवाच- ओंकारंविन्दुसंयुक्तं नित्यंध्यायन्तियोगिनः । तस्मिन्मध्येस्थितंतत्वं प्रदर्शयतिसद्गुरुः ॥ मोमित्येवंपरब्रह्म सर्वतत्वानुदर्शनम् ।

१०८
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
आब्रह्मस्तम्यपर्यन्तं सर्वानुग्रहकारकम् ।।
तारकंचभवेद्ब्रह्मा दण्डविप्णुरुच्यते ।
कुण्डल्याहितथारुद्रोऽर्धचन्द्रः स ईश्वरः ॥
विन्दुः सदाशिवः साक्षात् प्रणवपंचदेवता ।
निरञ्जनस्तदतीत उत्पत्तिस्थितिकारणम् ।।
दुर्लमोविषयत्यागीदुर्लभंतत्वदर्शनम् ।
दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना ॥
विचारोदर्पणयस अवलोकनमीक्षितम् ।
दृश्यतेतत्स्वरूपंच तत्रपृच्छफिनहि ।।
हृदयंदर्पणंयस्य मनस्तत्रविलोकयेत् ।
दृश्यतेप्रतिविम्बैनात्मरूपंसुनिश्चितम् ।।
भा-पद्म पुराण में कपिल गीता में वर्णन किया है-
दत्तात्रेवादि सिद्धों के नवनाथ और शिवजी ये सपनाम तय
के लिये गुरु रूप से माने जाते है। ऋग्वेद यजुद सामवेद
अथर्ववेद तथा इन सबका अध्यक्ष सूदमवेद ये पांचपद कहे
गए है । ईश्वर ने कहा- योगी लोग सदा पिन्दु संयुक्त
मोकार का ध्यान करते हैं। उस ओफार में सित तत्य को

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह सद्गुरु प्रकाशित करता है। प्रोम् यह सम्पूर्ण तत्त्वों का दिखाने वाला ब्रहा है। ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सय जीवों पर दया करने वाला यही है । ओंकार में जो तारा है वह ब्रह्मा है दण्डक विष्णु है कुण्डली में रद्द और अर्ध चन्द्र ईश्वर और विन्दु सदा शिव है, इस प्रकार ओंकार में साक्षात् पाच देयता विराजमान है । उत्पत्ति स्थिति का कारण जो निरंजन है यह उससे परे है। विषयों का त्यागा तत्व दर्शन और स्वाभा. पिक श्रयस्था गुरु की कृपा के विना दुर्लभ है। विचार जिस का दर्पण और यथार्थानुभय जिसकी दृएि है यहां वास्तविक खरूर दिख ई देता है वर्गाने श्रात्मा से पूछो कि क्या नहीं दीखना । हृदय जिसका दर्पण है अर्थात् योग से निर्मल होगया है वहां मन को देखे यहां निश्चय ही प्रतिविम्य से श्रात्मरूप दिखाई देता है। मू-अवधूतगीतायाम्- याब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं सम्पूर्णपरमात्मनि । भिन्नामिन्ननपश्यामि तस्याहपंचमाश्रमी ।। थाशापाशविनिर्मुक्तमादिमध्यान्तनिर्मलम् । अनन्तानन्दब्रह्मज्ञमकारतस्यलक्षणम् ।।

११०
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
वासनाजितायेन वक्तव्यं चनिरामयम् ।
वर्तमानेपुवतेंतवकारंतस्यलक्षणम् ।।
धूलिधमरगात्राणि धूतचितं निरामयम् ।
ध्यानधारणनिर्मुक्तं धृकारं तस्यलक्षणम् ।।
तत्वचिन्तायेनधूता चिन्ताचेष्टाविजिता ।
तमहंकारनिर्मुक्तं वकारं तस्यलक्षणम् ।।
शिवनजानामिकथंवदामिशिवंचजानामिकथंयदामि ।
अहंशिवश्चत्परमार्थरूपं स्वच्छस्वभावंगगनोपमंच ।।
वेदानलोकानसुरान यज्ञावर्णाश्रमानान कुलंनजातिः।
नधूममार्गोनचदीप्तिमार्गो ग्रोवरूपंपरमार्थतत्वम् ।।
च्याप्यव्यापकनिर्मुक्तं त्वमेकः सकलंयदि ।
प्रत्यक्षंचपरोक्षच प्रात्मानंमन्यसेकथम् ।।
श्रादिमध्यान्तमुक्तोऽहं नवद्धोऽहंकदाचन ।
स्वभावनिर्मल शुद्ध इतिमनिथलामतिः ।।
नवद्धानवमुक्तोऽहं नचाहंब्रह्मणः पृथक् ।
नक नवमोक्ताई च्याप्यच्यापफवर्जित ॥

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
नजातोऽहंमृतोवापि नमेकर्मशुभाशुभम् ।
शुद्धोऽहनिर्गुसंब्रह्म चन्धमुक्तोकथंमम ।
यदिमवंगतोदेवः स्थिरः पूर्णइति शिव ।
भावगम्यंनिराकारं साकारंदृष्टिगोचरम् ।
भावाभावविनिर्मुक्तं मन्तरालंतदुच्यते ॥
साकारंचनिराकार नेतिनेतीति सर्वथा ।
भेदाभेदविनिर्मुक्तं वर्ततेकेवलंशिव ॥
दिवानक्तंनतेचित्त उदयास्तमयौनहि ।
विदेहस्यशरीरित्वं कल्पयन्तिकथंबुधाः ॥
नतेचमातानपितानवन्धुर्नतेचपनीनसुहृन्नपुत्रः ।
नपक्षपातोनविपक्षपातः कथंहिमत्तासिरजोहिचेत.॥
धर्मार्थकाममोच्च द्विपदादिचराचरम् ।
मन्यन्तेयोगिनः सर्वमरीचिजलसन्निभम् ।।
विन्दतिविन्दतिनहिनहिमंत्रश्छन्दोलक्षणमिहनहितंत्रः ।
समरसमन्नोभावितसूतः प्रलयितमेतत्कथमवधूतः ।।
अद्वैतरूपमखिलंहिकथंबदामि-

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
नित्यंघनित्यमखिलंहिकथंवदामि ।
सत्यासत्यमखिलंचकथंबदामि-
ज्ञानामृतंसमरसंगगनोपमोऽहम् ।।
ब्रह्मादयः सुरगणाः कथमत्रसन्ति-
स्वर्गादयोवमतयः कथमत्रमन्ति ।
यद्यकरूपममलंपरमार्थतत्व
ज्ञानामृतंसमरसंगगनोपमोऽहम् ।।
मायाप्रपंचरचनानचमेचिकारः
कौटिल्यदम्भरचनानचमेविकारः।
सत्यानृतेतिरचनानचमेवि कारः
जानामृत समरमंगगनोपमोहम् ।।
नशन्यरूपनविशुन्यरूपं-
नशुद्धरूपनविशुद्धरूपम् ।
रूपविलंपनमवामिकिंचित्-
स्वरूपरूपंपरमार्थतत्त्वम् ।।
नाबाद नवविसर्जनंच।

११३
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
पत्राणिपुष्पाणिकथं भवन्ति ।
ध्यानानिमंत्राश्चकथंभवन्ति-
समंसमस शिवार्चनंच॥
मूखोपिनाईनचपंडितोह मौनंचवार्तानचमेकदाचित् ।
वितर्कतकंचकर्थवदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ।।
अस्तंगतोनवसदोदितोऽहं तमश्चतेजोनचमेविभाति ।
संघ्यादिकंकर्मकथंकरोमि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥
इह तत्वमासिप्रभृतिश्रातिभिः प्रहितमात्मनि तत्त्वमसि ।
स्वमुपाधिविवर्जितसर्वसमं किमुरोदिपिमानससर्वसमम् ।।
नहिकल्पितभागविभागइति नहिरागविरागविचारइति ।
पदसंधिविवर्जितसर्वसमः किमुरोदिपिमानस सर्वसमः॥
अविवेकविवेकमबोधइति अविकल्पविकल्पाविबोधइति ।
यदिचैकनिरन्तरवोधइति किमुरोदिपिमानससर्वसमः ॥
बहुधाश्रुतयः प्रवदन्तियतो, विददातरयंमृगतोयसमः ।
यदिचैकनिरन्तरसर्यसमः किमुरोदिपिमानससर्वसमः॥
सविभक्तिविभक्तिविहीनपरमणुकायविकायविहानपरम् ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा
यदिचकनिरन्तरसपाशवः यजनंचकस्तानंचकथम् ।।
दिनरात्रिविभेदनिराकरणमुदितानुदितस्यनिराकरणम् ।
यदिचकनिरन्तरमर्वशिवं रविचन्द्रममोर्चलनचकथम् ।।
तवाश्रमवर्णविहीनपरो नतुकारणकविहनिपरः ।
यदिवैकनिरन्तरसशिवं गुणदोपविचारवासिकथम् ।।
भा० टी०-अवधूत गीता में कहा है-
ब्रह्मा से लेकर स्थावर पर्यन्त समस्त जगत् को मैं अपने
मात्मा में भिन्ना भिन्न विलक्षण रूप से देयता अर्थात् अई.
भाव से अलग नहीं है इस लिए भेद नहीं कहा जाता देखा
जाता है इस लिये अभेद भी नहीं होताना विरोध होने से
दोनों नहीं हो सकते इस लिये मिरक्षा कहा गया है। मैं उस
का द्रष्टा पचमाश्रमी । आशा के पाशों में विमुक्त आदि
मध्य और अन्त में निर्मल अनन्त आनन्द म्यम्प प्रब के शाता
का लक्षणा मार है।
जिसने यामनाओं को जीत लिया है और जिस की वाणी
दोष रहित है, जो वर्तमान के अनुमार कार्य करता है यह
धकार का लक्षण है । जिसका शरीर धूलि से लिपटा रहता है
जिसने चित्त को विषयों से हटा कर पाप रहित कर लिया है
जो ध्यान और धारणा में लदा रहता है यह धूकार का लक्षण
-
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गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः है। अर्थात् अर्थ है तत्व की चिन्तावस्था को जिस ने पार कर लिया है चिन्ता चेष्टा और अहंकार से जो मुक्त है यह तकार का अर्थ है। १ मैं शिव को नहीं जानता यह कैसे पहुं और जानता है यह भी कैसे कह । मैं यदि परमार्थ रूप से स्वच्छ स्वभाव आकाश के समान व्यापक शिव है तो मेरे लिए न वेद न लोक न देय न यक्ष न वर्णाश्रम न कुल और ग जाति है। न वर्ग ले जाने वाला धूम मार्ग न सत्य लोक ले जाने वाला प्रकाश मान अचिरादि मार्ग है, मैं तो परमार्थ सत्त्व रूप केवल ब्रह्म है। याप्य व्यापक भाव से रहित यदि तू सब कुछ केवल एक प्रत्यक्ष है तो फिर अपने भाको परोक्ष क्यों ममझता है । मैं गादि मध्य और अन्त से रहित हैं, मैं कभी बद्ध नहीं है। मैं स्यभार से निर्मल और शुद्ध हूं यह मेरा अढल निश्चय है। जब में बद्ध नहीं है तो मैं मुक्त कैसे कहा जासकता है क्योंकि धंधा हुआ ही बंध से छूट फर मुक्त होता है। मैं ब्रह्म से पृथक नहीं है । न मैं कर्ता और न भोक्ताह में तो व्याप्य ध्यापक भाव से भी रहित हूँ। न में पैदा हुआ न कभी मरान ही मेरा फोई शुभाशुभ फर्म है । मैं तो शुद्ध निर्गुण ब्रह्म है बंध और मोक्ष मेरे हो ही कैसे सकते हैं, जय कि देय अर्थात् ब्रह्म

गोरक्षमिदानप्रहः
सर्व व्यापक पिर और पूर्ण है । जो माय गम्प है यह निगर
कार है और जो दृष्टिगोचर है। यह माार है और जो भाया
भाव से रहित है यह अन्तराल कहलाता है न यह साकार है
ननिराकार यह तो सर्वथा भेदा भेद से रहित केवल शिर उस
चिएप पान उदय है न अस्त न दिन न रान उस देह रहित के
शरीर को कल्पना पंडित कैसे कर लेने है।
धर्मार्थ काम मोक्ष और मनुष्यादि चराचर जगत् को
योगी लोग मृग तृष्णा में जल के समान जानते हैं। मंग छन्द
भीर तंत्र ये सब अयधून का लक्षण मही प्राप्त कर सकते
अर्थात् नहीं बता सकते। यह समरम में मन है यह भावना
भावित और पवित्र होता है ऐसा लक्षण भी प्रलापमात्र है
वह अद्वैत पूर्ण है यह कैसे कह बह नित्य या अनित्य है यह
भी कैसे कहूं वह सम्पूर्ण सत्य या असत्य है यह कैसे कह कयोंकि
घह तो सर्व व्यापक मेग रूप है। ब्रह्मा आदि देवता तथा म्यादि
वस्तियां यहां कहां हैं जब कि मैं एक म्प निर्मल परमार्थ तस
ज्ञानामृत आकाश के समान एक रस है । माग को प्रपंच
रचना मेग विशार नहीं है कुटिलना और पाखण्ड भो मेरा
विकार नहीं है । सच और भूट की रचना मेरा विकार नहीं
है क्योंकि मैं तो एक रस आकाश के समान व्यापक हूं। न
नमें
शून्य रूप न भाव प न शुद्ध रूप और न मैं
अशुद्ध

११७ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः हूँ न मैं रूप रहित और न रूपवान हूँ, मैं तो परमार्थ तत्व वास्तविक निज रूप हूं। मेरा आवाहन और विसर्जन नहीं हो साना पत्र और पुषों की तो बात ही क्या है ध्यान और मंत्र भी कैसे हो सकता है। सर्वत्र समरूप सर्वजगत ही शिव पूजा है मैं मूर्ख नहीं मैं पण्डित नहीं मेरे अन्दर चुप रहना और वार्तालाप भी सम्भव नहीं है? संशय और को भी मैं नहीं कह सकता ? में दुःख शुन्य निज स्वरूप में मग्न रहने वाला हूं । मैं कभी अस्त नहीं होना सदा उदित हो रहता हूं, मुझ में अन्धकार का लेश नहीं है मैं तो सदा तेज स्वरूप प्रकाश मान हूं। मैं सन्ध्या आदि कर्म कैसे करूं में तो अपने रूप में मग्न और मानन्द रूप है। 'तत्वमसि' आदि भुतियों में जो वर्णन किया गया है वह आत्मा तू है तू सय उपाधियों से रहित समान रूप से व्यापक है अतः हे आत्मा तू क्यों दुःखी हो रहा है। तुझ में कल्पित भाग और विभाग नहीं है तुझ में रागविराग का विचार भी नहीं है तू तो पद और सन्धि से रहित समान रूप से सर्व व्यापक है अतः क्यों दुःखी होता है । तू अविवेक का विवेक और अमेय है विकल्प रहित और विकल्प का कारण तथा ज्ञान स्वरूप है यदि त् एक निरन्तर और वोध रूप है तो क्यों तू मन के दुःखों को अपने में आरोपित करके दुःखी होता है । प्रायः श्रुतियां

गोरक्षसिद्धान्तसंग्राः
कहती हैं कि यह जगत् मृग तृप्णा के समान है और तू एक
निरन्तर और सर्व व्यापक है, तो क्यों दुःपी हो रहा है। तु
विभाग और अविभागपन से रहित है अणु सूर निराकार
और सब से परे है और यदि तृ एक निरन्तर और सदा
शिव रूप है तो यज्ञ करना और स्तुति ये कैसे हो सकते हैं।
दिन और रात का तुझ में अभाव है, उदय और अस्त भी
तेरे में नहीं हैं यदि तू एक निरन्तर और शिवरूप है तो तुझ
में सूर्य और चन्द्रमा का प्रकाश क्या अर्थ रखता है । तेरा रूप
आश्रम और वर्ण से विहीन और सय से परे है, तू जगत्
का कारण और फर्ता तथा सब से परे वर्तमान है, यदि तू
एक निरन्तर और सर्वदा कल्याण रूप है तो तुझ में गुण
दोष के वचन कैसे घट सकते हैं।
मू० हठयोगप्रदीपिकायाम्-
क्रियायुक्तस्यसिद्धिः स्यादक्रियस्य कथंभवेत् ।
नशास्त्रपाठमात्रेण योगासद्धिः प्रजायते ॥
वर्जयेदुर्जनप्रीतिं वह्निस्त्रीपथिसेवनम् ।
प्रातःसानोपचारादि कायक्लेशादितथा ।।
चलेवातेचलंचित्तं निचलेनिश्चलंवथा ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
योगिस्थाणुत्वमाप्नोति ततोवायुंनिरोधयेत् ।। ,
ब्रह्मादयोपित्रिदशाः पवनाभ्यासतत्पराः ।
तेनसिद्धिंगतास्ते च तस्मात्पवनमभ्यसेत् ॥
यावद्देहेमरुद्वद्धस्तावञ्चित्तनिरामयम् ।
यावद्दष्टिवयोमध्येतावत्कालभयंकुतः ॥
कलांपरांमुखीकृत्य त्रिपथेपरिवर्तयेत् ।
साभवेत्रवचरीमुद्रा च्योमचक्रंतदुच्यते ॥
एकंसृष्टिमयंबीजमेकामुद्राचखेचरी ।।
एकोदेवोनिरालम्ब धैकावस्थामनोन्मनी ॥
सुचिरज्ञानजनकं पञ्चस्रोतः समन्वितम् ।
तिष्ठतिखचरीमुद्रा तस्मिन्शून्येनिरञ्जने ॥
अयंयोगःपुण्यवतां धन्यानांतत्वशालिनाम् ।
निमत्सराणांसिथेतनतुमत्सरशालिनाम् ।।
राजयोगस्यमाहात्म्य कोवाजानातितत्त्ववित् ।
शानान्मुक्तिःस्थितिःसिद्धा गुरुवाश्येनलभ्यते ॥
अन्तलक्ष्यविलीनचित्तपवनोयोगीयदावर्तते ।
रष्यानिश्चलतारयावहिरसौपश्यन्नपश्यन्नपि ।

१२०
गोरक्षसिद्धान्तसग्रह
मुद्रेयंखलुशाम्भवीभवतिसायुप्मत्प्रसादाद्गुरो ?
शून्याशून्यविवर्जितस्फुरतियत्तत्त्वंपदंशाम्भवम् ।।
बोंद्वाटितलोचन:स्थिरमनानासाग्नदत्तेक्षण
चन्द्राविपिलीनतामुपनयन्निस्सन्दभावान्तरे।
ज्योतिरूपमशेप पावरहितदेदीप्यमानंपर
तत्त्वंतत्पद तिवस्तुपरमवाच्यक्मिनाधिकम् ।
चित्तंचरतिखेयस्माअिदाचरातिखेगता।
तेनरखेचरीनाम मुद्रासिद्धर्नमस्ता ॥
सूर्याचन्द्रममोर्मध्ये निरालम्बेऽनिलेपुनः ।
संस्थिताव्योमचया सामुद्रानामखेचरी ॥
निरालम्बमनाकृत्या नकिंचिढपिचिन्तयेत् ।
सवायाऽभ्यन्तरे ग्पोम्नि घटवत्तिष्ठतिध्वम् ।।
20-ठयोगप्रदापिका में भी लिया है-जा योगी मिया
म युग है उसका सिद्धि मार हानी है, मिया रहित को नहीं ।
कयल शाखपाठमा मता सिद्धि हो ही नहीं सत्ता।
दुर्जन की प्रोति, अग्नि, खो और बाट घरमा छोरद,
पार शरीर पर पहुंचाने वाले मान सानादि भी छाड दे।

१२१ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः जय घायु चल होता है तो मन भी चञ्चल होजाता है, जिस समय वाय निश्चल रहता है तो मन भी शान्त होजाता है। योगी निश्चल भाव को प्राप्त हो जाता है इसीलिये वायु को रोके । ब्रह्मा श्रादि देवता भी प्राणायाम के अभ्यास में तत्पर रहते हैं इसी से वे सिद्धि को प्राप्त हुए है अतः प्राणायाम का अभ्यास करे। जब तक शरीर यायु बंधा हुआ है अर्थात् निश्चल है तभी तक मन निर्विकार रहता है। जब तक योगी अपने ललाट में दृष्टि जमाए रहता है तब तक काल का भय होही फैसे सकता है । जिह्वा को पराङ्मुखी करके अर्थात् पश्चिम को औटा कर तीनों नाड़ियों का मार्ग जो कपाल का छिद्र है उसमें लगा दे वही खेचरी मुद्रा होती है और उस की ही व्योमचक कहते हैं । सृष्टिमयबीज एक है, खेचरीमुद्रा भी एक है निरालम्ब एक ही देय है और मनोन्मनो अवस्था भी एक ही है अर्थात् सय योजों में खेचरी मुद्रा सब मुद्राओं में निरा. लम्ब देव सब देयों में और मनोन्मनी अवस्था सव अवस्थाओं सृष्टिमयबीज में उत्तम है। यह योग ईO और अभिमान शून्य भाग्यवान् और तत्व. शानियों को सिद्ध होता है । अभिमानी और ईष्यालु भो को नहीं। राजयोग के माहात्म्य को कोई तत्त्वज्ञानी हो जानता है। छान से मुक्त अवस्था में स्थिति सिद्ध हो जाती.है और वह ૨૨૨ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः ज्ञान गुरुवारय से प्राप्त होता है । भीतर अनाहत चमादि में जो दृश्यमान ईश्वर की मूनि ग्रादि है उसमें जिसका चित्त और पवन विलीन हो गये है, ऐमी श्रयस्था में जय योगी वर्तमान होता है और जय स्थिरतारावती दृष्टि से बाहर देखता हुआ भी नही देखता यह शाभपी मुद्रा गुरु की कृपा से प्राप्त होती है इस अवस्था में शून्य और अशून्य से विलक्षण तत्व प्रकाशित होता है । जब योगी की आँखे थाधी खुली रहती है मन स्थिर हो जाता है, दृष्टि भी नासाग्न पर स्थिर हो जाती है और जय चन्द्र सूर्य को स्पन्द रहित भाव में लोन कर देता है तब उसे अशेप वाह्य से विहीन प्रकाशमान परमतत्व प्राप्त होता है । इस विषय में और अधिक पपा कहें। चित्त श्राकाश में विचरता है और रोचरी मुद्रा उसे यहां प्राप्त होकर वशीभूत करती है अतः खेचरी मुद्रा सब सिद्धों से पूजी गई है। सूर्य और चन्द्र के मध्य निरालम्य वायु में और व्याम चक्र में स्थित होने के कारण इस मुद्रा की पेचरी मुद्रा कहते हैं। मन को अवलम्पन रहित करले और कुछ भी न सोचे वह भीतरी और बाहरी अाकाश में अवश्य घट के समान स्थित होता है। मू०-अथारम्भावस्था। प्राग्रन्धिर्भवेभिन्न आनन्दा शून्यसम्भवः ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
-अथद्यटावस्था-
विचित्रकणिकोदेहेऽनाहतः श्रूयतेध्वनिः ॥
दिव्यगन्धोदिव्यचक्षुस्तेजस्वीस्यादरोगवान् ।
सम्पूर्णहृदयः शून्य प्रारम्भोयोगवान्भवेत् ॥
भा०--श्रारम्भावस्था में ब्रह्मपन्थि खुल जाती है फिर शून्य
में उत्पन्न हुई विचित्र अनाहत ध्वनि सुनाई देती है जिस
योगी को अलौकिक गन्ध और दृष्टि प्राप्त होजाती है। यह
तेजस्वी रोग रहित और सम्पूर्ण हदय चाला हाजाता है तय
समझले कि योग का प्रारम्भ होगया ।
मू-
द्वितीयायांघटीकृत्य वायुर्भवतिमध्यगः ।
दृढासनोभवेद्योगी ज्ञानादेवसमस्तथा ।।
विष्णुग्रन्थिर्यदाभिन्नः परमानन्दसूचकः ।
अतिशून्यविभेदश्च भेरीशब्दस्तथाभवेत् ॥
भा०-जय दूसरो अवस्था में घरित हो जाता है तय,
उसके मध्य में घायु यहने लगता है तय योगी का आसन दृढ़
होजाता है और देवों के समान ज्ञानी हो जाता है जब विष्णु
प्रन्थि खुलजाती है अति शुन्य का भेद हो जाता है तब परमा-
नन्द सूचक मेरो का शब्द होने लगता है।

गोरक्षसिदान्तसग्रह.
मूर-अथ परिचयावस्था-
तृतीयायांतताभित्वा विहायोमर्दलघनिः ।
महाशून्यंतथायाति सर्वसिद्धिममाश्रयम् ॥
चित्तानन्दंततोजिला सहजानन्दसम्भवः ।
दोपदुःखक्षुधानिद्रा जरामृत्युपियर्जितः॥
रुद्रग्रन्धिततोभित्वा सर्वपीठगतोऽनिलः ।
भा०--जय तासरी अरस्था में पहुचता है तर आकाश में
डमरु की पनि सुनाई देती है और सय सिद्धियों क आध्य
भून महाशन्य को प्राप्त हाता है । तय चित्तानन्द का जातकर
स्वाभाविक आनन्द का प्राप्त होता है तय योगी सब प्रकार के
दोष सुधा निद्रा युढापा धीर मृत्यु को भी जीत खता है।
तप घायु रद पन्थी को तोड कर सय चार स्थानों में
पहुंच जाता
है
मू-अधनिष्ठावस्था-
निप्पनांबणर- शब्दः दणद्वीणा कणाभात् ।
श्रस्तुवामास्तुवामुफ्तिरवारखण्डितं महत् ।।
लयामृतमिदं सारयं राजयोगादवाप्यते ।
राजयोगपदं प्राप्तं मुखोपायं मुचेतसाम् ।।

१२५
गौरक्षासद्वान्तसंग्रह
नादानुसंधानसमाधिभाजां योगीश्वराणांहृदयेप्ररुडम् ।
यानन्दमेकवचसामवाच्यं जानातितं श्रीगुरुनाथएव ।।
नादकोटिसहस्राणि बिन्दुकोटिशतानि च ।
सर्वतत्रलयं यान्ति यत्रदेवोनिरञ्जनः॥
योगिनांज्ञानविदुषामन्येषांच महात्मनाम् ।
प्राप्त कालपुरुष सुविज्ञाप्यं विचक्षणः ।।
यावन्नैवप्रविशति मरु विज्वरोमध्यमार्गे ।
यावद्विन्दुर्नभवतिदृढः प्राणवत्सुप्रयुद्धः ।।
यावद्व्योम्नः सहजसदृशंजायतेनैवतत्त्वम् ।
तावत्सर्व वदतियदिदं दम्भमिथ्याप्रलापः ।।
भाo-निष्ठावस्था में यांसुरीका सा शब्द और बजती हुई
सितार जैसा शब्द होता है, अब मुक्ति हो या न हो यहां पर हो
महत् अखउिन अानन्दस्वरूप हाजाता है । यह सुखप्रद लयरूपी
अमृत राजयोग से प्राप्त होता है राजयोग पर्दै की प्राप्ति बुद्धि
मानों के लिए सुख का उपाय है। नादानुसंधान समाधि को प्राप्त
होने वाले योगीश्वरों के हृदय में जो श्रानन्द उत्पन्न होता है वह
पाणी से वर्णन नहीं किया जा सकता उसको तो केवल श्रीगुप
.

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
गोरक्षनाथ जी ही जानते हैं । सहस्रों नाद कोटियां और सैकड़ों
विन्दु फोटियां ये सब निरंजन देव में लय को प्राप्त होती हैं।
योगियों तथा अन्य शानी महात्मानों को जो काल पुरुष प्राप्त
होना है वही धुद्धिमानों को जानना चाहिए। जय तय वायु
मुख पूर्वक मध्यमार्ग में प्रविष्ट नहीं होता और जय तक प्राण
के समान मान पूर्वक बिन्दुः दृढ़ नहीं होता और जय तक
याकाश के समान स्वाभाधिक तत्व नहीं प्राप्त होता तब तक
जो कुछ पहा जाता है यह दम्भ और मिथ्या प्रलाप है।
मू-हठ प्रदीपिकायाम्-दशमोपदेशे-
आदिनाथोदितं सर्वमाष्टश्वर्य प्रदायकम् ।
• बल्लभंसर्वसिद्धानां दुर्लभमहतामपि ।।
पीब्यतेनतुरोगेण नचलिप्यतकर्मणा ।
पाश्यते नचकालेन योमुद्रांवत्तिखेचरीम् ।।
ऊपपोडशपतपद्मगलितं प्राणादयाप्तहठात् ।
अवास्योरसनांनियम्यविवरं शक्तिपराचिन्तयेत् ।।
उत्कल्लोलकलाजलं च विमलंधारामृतयः पिपेत् ।
निर्दोषः समृणालकोमलवयुर्योगीपरंजीवति ॥
यत्पालेयंप्रहितमुपिरं मेरुमूर्धान्तरस्थं ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
तस्मिस्तत्त्वप्रवदतिसुधीस्तन्मुखं निम्नगानाम् ।।
चन्द्रात्सारः सवतियपुषस्तन मृत्युनराणाम् ।
विध्नीयात्सुकरणमयो नान्यथाकायसिद्धिः ॥
बद्धं मूलविलयेन तेनविमोविदारितः ।
अजरामरतांयाति यथा पंचमुखोहरः ।।
तत्रास्तिकरणं दिव्यं सूर्यस्यमुखवंचनम् ।
गुरूपदेशतोशेयं नतुशास्त्रार्थकोटिभिः ।।
येनसंचालिताशक्तिः सयोगीसिद्धिभाजनम् ।
किमत्रच नोक्तेन कालंजयतिलीलया ॥
मानं कुतोमनसिसम्भवतीहतावत्
प्राणोपिजीवतिमनोम्रियतेनयावत् ।
प्रागोमनोद्वयमिदविलयनयेद्योमोक्षं
सगच्छतिनरोनकथंचिदन्यः॥
इन्द्रियाण मनोनाथो मनोनाथश्चमारुतः।
मारुतस्यलयानाथः सलयोनादमाश्रितः ।।
अन्तलच्यं वहिदृष्टिनिमेपोन्मेपवर्जिता ।

गौरक्षसिद्धान्तसंग्रह
एपासाशाम्भवीमुद्राः सर्वतन्त्रैपुगोपिता ।।
शक्तिमध्येमनः कृत्वा शक्तिमनसिमध्यतः ।
भनमामनमालोक्य धारयेत्परमं पदम् ॥
अन्तः शन्यो वहि शून्यः शून्यम्भाइवाऽम्बर ।
अन्तः पूर्गो वहिः पूर्णः पूर्णकुम्भवाम्भारी ।।
संकल्पमात्रकलनय जगत् ममग्रं,
मंकल्पमात्रकलनोमिनो बिलामः ।
भकल्पमात्रकलनवकृतिस्तुतित्या,
संकल्पनिश्चयमवाप्नुहिचारमशान्तिः ।।
प्रयं ममतीतंच मानं च मन उच्यते ।
मान य मनश्चय नान्या पंधाद्वितीयकः ।।
श्रीयादिनाथेन मपादकोटिलयप्रकाराः कथिताजयन्ति ।
नादानुमन्यायकर्मवनान्यं मन्यामहे धन्यतमं लयानाम् ।।
मनः स्थस्थिरोवापुस्तताबिन्दुः स्थिराभवेत् ।
विन्दुस्पैचोदयात्मत्य पिएडस्य प्रजायते ।।
न्यामतः सुप्रमन्त्रात्मा निन्दोविजितेन्द्रियः ।
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१२६
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
कुरुते युक्तकमाणि नित्यनैमिात्रीकानिच ।।
योगेनपदमात्मानं गुहायां प्राप्यचेतसा ।
तारकंजपतनित्यं जितायुः कामवर्जितः ।।
युक्तासनसमारुह्य समकायशिरोधरः।
नासाग्रदृष्टिरेकाकी जपेदोंकारमक्षरम् ॥
तदुक्तश्रीगोरक्षपद्धती
भूर्भुवः स्वरिमलोकाश्चन्द्रसूर्याग्निदेवताः।
यस्यमात्रांसुतिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति ॥
त्रयः कालास्त्रयो वेदास्त्रयो देवास्त्रयोऽग्नयः ।
त्रयो लोकाः स्थितायत्र तत्परंज्योतिरोमिति ॥
इच्छा क्रियातथाज्ञानं नारौिद्रीच वैष्णवी ।
त्रिधाशक्तिः स्थिता यत्र तत्परंज्योतिरोमिति ॥
चचसा चजपे विद्वांश्चक्षुपाचसमभ्यसेत् ।
मनसासंस्मरोन्नत्यं तत्परंज्योतिरामिति ।।
शुचिर्चाप्यशाचापि योजयेत्प्रणवंसदा ।
नसलिप्यतेपापन पद्मपत्रमिवाम्भसा ।।
..
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१३०
गोरक्षसिद्धान्तसग्रहा
शरीरंनोत्यजेदेव कालःकस्यापिपुत्रचित् ।
अन्तः शरीररक्षार्थ यत्नः कार्यस्तुयोगिना ।।
ततोलक्ष्यमनोऽभ्यासमहं भावविवर्जितम् ।
मङ्गकल्पनाहीनं कथंकालोजयेत्तुतम् ।।
स एवकालः स शिवः स सानापिकिश्चनः ।
का केनहन्यतेतत्र प्रियते वापिकश्चन ||
ततोव्यततिममये कालस्य भ्रान्तिरूपतः ।
योगासुप्तास्थित इस योधयाति निनोधतः ।।
एसिद्धोभवेद् योगी वञ्चयित्वाविधानतः।
कालकलित समारं पारुंपणादभुतेन च ॥
तत्रापिभुवनेयोगा विरहत्येक एप सः.!
परयन् संमार पैचित्र्यं स्वच्छयानिरहंकृतिः ।।
द्वाराणा नवनिरुभ्यमरुतपीत्वाधारितम् ।
नीत्वाकाशमपातयति सहित शक्त्यासमुन्नलितम् ।
प्रात्मध्यानयुतस्त्वननविधिना विन्यस्यमूनिभुवम् ।
यापत्तिष्ठतिताचदेवमरुतां संघन संस्तूयते । ।
दृष्टिःस्थिरा यसविनापिटश्यवायुःस्थिरोयस्यविनाप्रयत्न
.

१३१
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
चित्तस्थिरयस्यविनाऽवलम्ब स एवयोगी सगुरुः स सेव्यः॥
गोरक्षोपनिपदि-श्रादौदेवोमहानन्दो निर्ममेदेवतास्वयम् ।
तस्मादिच्छा सुसम्पन्नाइच्छाज्ञानंततःक्रिया ।।
ततोव्यथांवरारोहेपिएडब्रह्माण्डवुवुदम् ।
'अव्यक्तब्यक्तभावेन विचरामिजगत्त्रयम् ।।
भा-हठपदीपिका के दशयें उपदेश में कहा है-श्रादि
नाथ जी का बतलाया हुश्रा योगमार्ग अष्टसिद्धियों के देने वाला
है यह मार्ग सिद्ध महापुरुष के लिए भी दुर्लभ है इस लिये सय
के लिये उत्तम है । जो खेचरीमुद्रा को जानता है वह रोग से
पाहित कर्मो से लिप्त और काल से भी अबध्य होता है।
सोलहपत्तों वाले कंठस्थित गद्म में चन्द्रमण्डल से गिरते हुए
। फेन के समान श्वेत चन्द्रकिरण के समान स्वच्छ अमृत जल
का ब्रह्मरन्ध में जिहयां का प्रवेश करके खेचरी मुद्रा के द्वारा पान
करे,उस योगो का शरीर मृशाल के समान कोमल और निर्दोष
हो जाना है। और वह चिरकाल तक जीवित रहता है। मेरु
पर्वत के समान सब से ऊंची सुपुम्णा के ऊपर भाग में जो
सुराख है। उसमें सोमकला जलं रहता हैं उसी को शुद्ध हृदय
घिद्वान् श्रात्म तत्व अर्थात् परमात्मा का अभिव्यक्ति स्थान

१३३
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
और जीवों की जीवन शक्ति कहते हैं। उसी के समीप
नीचे इडा पिगला आदि नाड़ियों का मुख है, उस में देह का
सार भार अमृत विन्दु चन्द्रमण्डल अर्थात् मस्तक के बीच
ऊपर भाग में स्थित दिमाक से टपकता रहता है। इस कारण
मनुष्यों की मृत्यु होती है । अतः उसको रोकने घाली खेचरी
मुद्रा को चांधे और साह से शरीर की सिद्धि नहीं होसकती।
जिसने इस मूल बिल को पालिया है उसने चिन्नी को
मष्ट कर दिया और वह देवाधि देव के ममान अजर अमर
हो जाता है। यहां मूल यिल में नाभि स्थित जठराग्नि रूप सूर्य
के मुख को वचित करने वाली प्रेचरी मुद्रा है जो गुरु
के
उपदेश से जानी जाती है करोड़ों शास्त्रां से नहीं । जिसने शक्ति
को सचालित किया है यह यागी सिद्धि को प्राप्त कर सकता
है अधिक क्या कहें यह सुगमता स काल को जात
सकता है।
मन और प्राण का स्वाभाविक पापार जब तक नहीं सकता
सय तक ज्ञान कैसे उत्पन्न हो सकता है । प्राण और मन को
जो विलीन करद यह मुक्ति प्राप्त कर सकता है और कोई नहीं
इन्द्रियों का स्वामी मन है और मन का स्वामी प्राण है प्राण का
स्वामी लय है और यह नाद में आश्रित है।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः भीतर की और लक्ष्य हो और निर्निमेय दृष्टि बाहर की इरफ हो यह सब तंत्रों में गुप्त रखने योग्य शाम्मवी मुद्रा है। पक्ति के बीच मन को और मन के बीच शक्ति को करके मन से । मन को देख कर परम पद को सिद्ध करे । भीतर और बाहर से शून्य श्राकाश में स्थित शून्य घट के समान भीतर से पूर्ण और बाहर से पूर्ण जल में भरे हुए घड़े के समान योगी की अवस्था होती है। यह समस्त जगत् संकल्प मात्र और मन का खेल है, यह नित्य को कृति भी संकल्प मात्र ही है, इस लिये है योगी तू एक आत्मा में तन के संकल्प का निश्चय कर यही आत्म शान्ति है । सम्पूर्ण भूत झय और शान मन ही कहलाते हैं और मग कोई मार्ग नहीं है, श्री आदिनाथ जी ने मन को लय करने को सवा करोड़ रोतियां कही है। परन्तु हम तो नादानुसंधान को ही लय का सर्वोत्तम साधन कहते हैं, अन्य किसी को नहीं, मन के स्थिर होने से वायु स्थिर होता है, वायु के स्थिर होने संबिन्दु स्थिर होता है बिन्दु की स्थिरता से यह शरीर सत्र मुच स्थिर हो जाता है । मन से सब, संकल्पों को छोड़ कर जिनेन्द्रिय होकर योगी सय नित्य नैमित्तक कर्मों को योग पूर्वक करता है । योग से हृदय गुहा में प्रात्मपद को प्राप्त कर के

१३४
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
निकामभाव से प्रायु को जीन कर तारक का नित्य जप करता
है। युक्तासन
से चैट कर सिर गर्दन और काया को एक
सीध में करके एकाकी नाक के अग्रभोग में दृष्टि टिका पर
पकान मन से ओंकार को जपे। जिस प्रकार को मात्राओं
भूचः स्व. ये तीनों लोक सूर्यचन्द्र और अग्नि ये तीन, इन
देवता स्थित हैं, ओकार यह सर्वोत्तम प्रकाश है। ओंकार पहा
परम प्रकाश है जिस में तीनों काल तीनों वेद तीनों अग्नि
और तीनों लोक स्थित है। इच्छा क्रिया और ज्ञान
तीन प्रकार की ब्राह्मी रौद्रो और वैष्णवी शक्तियां जिस
में तीन प्रकार से स्थित है वह परम ज्योति ओंकार है।
ज्ञानवान् योगी याणी से ऊपर परम ज्योति ओंकार को
जपे, नेत्र से उसका अभ्यास करे और मन से उसका स्मरण करे।
पधित्र या अपवित्र किसी अवस्था में भी जगत् के सर्घ कारण
ओंकार में मन लगाने वाला योगी पाप लिप्त नहीं होता।
काल किसी के भी शरीर को कहीं भी नही छोडता इसलिये
योगी को नित्य शरीर रक्षार्थ यत्न करना चाहिये । जो मन को
लक्ष्य पर एकाग्र क्येि हुए अहंकार से रहित और सर्वचार
कल्पनाओं से शन्य है उसको काल कैसे जीत सकता है जब
घही काल वही शिव और यही सब कुछ है तब फिर कौन रिस
को करता है और कौन मरता है। तय समय के पीतने पर
काल की भ्रान्ति से गुरु के उपदेश द्वारा सोकर उठे हुये

१३५ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः • समान ज्ञान को प्राप्त होना है। इस प्रकार संसार को नए करने .: चाले काल को अपने अद्भुत पौरुष और गुरु के उपदेश द्वारा लि को ठग कर सिद्ध होजाता है। वहां अपने भवन में संसार की विचित्रता को देखता हुआ अहंकार रहित होकर खच्छा विहार फरता है। नवों इन्द्रिय द्वारों को रोक कर कुम्भक करके प्राणों को निश्चलता के साथ मस्तिष्क के श्राकाश में ऐसी गति से कि वह न नीचे को गिरे और न उस में उष्णता भावे पहुंचाकर परा शक्ति की उमंग से परिपूर्ण और पर. मात्मा के धान में मन हाकर जितनी देर बैठता है उतनी देर देवता लोग भी उसकी स्तुति करते हैं। जिसकी दृष्टि चिना दृश्य के वायु बिना प्रयत्न के और चित्त बिना अवलम्म के स्थिर है वही योगो है वही गुरु है और वही सेवा के योग्य है। गोरक्षोपनिषद् में कहा है कि आदि में महानन्द देव ने स्वयं देवता को उत्पन्न किया, उससे इच्छा उत्पन्न हुई उससे शान और शान से क्रिया क्रिया से कष्ट और हे परारोहे ? उससे चुलबुले के समान स्थूल शरीर और ब्रह्माण्ड पैदा हुआ, और अतः मैं गोरक्षनाथ व्यक्ताव्यक्त भाव से तीनों लोकों में भ्रमण र রূপো ছু मू-एवं श्रीगुरुरादिनाथः । मत्स्येन्द्रनाथः । उदयनाथः ।

गौरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
यन्पीयूपत्रकारवीज सहितं युक्तंसदायिष्णुना ।।
प्राणंतत्रविलीय पंचघटिकचित्तान्वितधारयेन् ।
एपादुःसहकालकूट जरणा स्याद्वारुणीधारणा ॥
यत्तालुस्थितमिन्द्रगोपसदृशं तत्चंत्रिकोणंज्वलन् ।
तेजोरेफयुतं प्रवालरुचिरं स्टेणयत् संगतम् ।।
प्राणं तत्रपिलीयपंचर्घाटकं चिचान्वितधारयेत् ।
एपापद्विजपं सदाविदधतीवधानरीधारणा ॥
पभिमाजनमंनिभंशुभमिदं शोरन्तरे।
तत्त्वं वायुमयंयकारसहितं तत्रेश्वरोदेवता ।।
प्राणंसपिलीयपंचपार्टिकं चित्तान्वितं धारयेत् ।
एपारसंगमिनं करोठियमिना स्याद्वायी धारणा ॥
माफाशंगुपिशुद्धवारिसदशं यद्ममरन्धेस्थितम् ।
पन्नाधनमदाशियनसहिवं शान्तइकाराघरम् ।।
प्रापंतप्रपिायपंचपटिकं चिनान्वितंधारयेत् ।
एपामारकपाटपाटनपदा प्रोक्तानमोधारणा !!
यानंतनमहमतीधमतिलेद जिम्योधनम् ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः यज्ञानांचकृतं सहस्रमयुतं देवाश्चसंपूजिताः॥ सत्यतेनसुतर्पिताश्चपितरः स्वर्गचनीताः पुनः । यस्यब्रह्मविचारणेक्षणमपि प्राप्नोतिधैर्यमनः ।। भा० - इस प्रकार सव से प्रथम श्री गुरु आदिनाथ १ श्री मन्स्येन्द्रनाथ २ उदयनाथ ३ दण्डनाथ ४ सत्यनाथ ५ सन्तो. पनाथ ६ कूमनाथ ७ भवनार्जिनाथ - सुक्ष्मवेदो अद्वैत के ऊपर सदानन्द देवता समस्त सिद्ध मण्डलाधिपति सर्वादि ब्रह्मवेत्ता शियावतार श्री गोरक्षनाथ जी । अनाहत शृङ्गी खेचरी मुद्रा अर्थात् नादलय होने पर जो अनहद नाद सुनाई देता है वही इनकी शृङ्गी और खेचरी मुद्रा हो मुद्रा है विवेक मार्तण्ड में कहा है-जो योगी देह के भीतर निश्चलदीप शिखा के समान तेज रूप कुण्डालनी द्वारा मूलाधारादिषट् चक्र भेदन करने से युग कल्पादि रूप काल की गणना को जीतकर अमर रूप से गाया जाता है और जिस मत्स्येन्द्रनाथ में प्रानन्द सागर आदि नाथ महेश्वर ही ज्ञान रूप से प्रकट हुए (अर्थात् श्रादिनाथ जी के शिष्य होने से उनका समस्त ज्ञान भएडार उनमें आगया उस स्थल सूक्ष्म गुण रहित थी मत्स्येन्द्रनाथ जी को वार २ मणाम करता हूँ। अजपा नाम को गायत्री योगियों को मोक्ष प्रदान करने वाली है, इसके संकल्पमात्र से ही सब पापों से १४० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह मुक्त होजाता है। इसके समान विद्या इसके समान जप और इस के सदृश ज्ञान न हुआ है न होगा। इसके समान सुखदा. यक इसके समान तप और इसके समान जानने योग्य बस्तु म हुई न होगी। इसी कारण काल के भय से ब्रह्मा और सय योगी तथा मुनि लोग प्राणायाम के अभ्यास में संलग्न रहते हैं इसलिये प्राणायाम करे, जिस में सघ संकलों को नष्ट करके सब काम क्रोध लोग मोहादि द्वन्द्वो की पहुच से बाहर होकर अपने आत्मा को परमात्मा में लीन कर देता है वह समाधि कही जाती है। समाधि से युक्त योगी शास्त्रों से नहीं जाना जाना कोई प्राणी उसका भेद नहीं जान सकता और किसी प्रकार के मत्र तन्त्रों का उसके ऊपर कोई असर नहीं होता। हेतुओं और प्रान्तों से रहिन, मन और बुद्धि की पहुंच से परे यह अनन्त ज्ञानरूप जो भानन्द है उस तत्त्व को तत्व वेत्ता ही जानते हैं, जिस प्रकार घी में डाला हुआ घी और दूध में हाला हुभा दूध पहले घी और दूध में मिल जाता है और कुछ भी भेद मालूम नहीं होता, इसी प्रकार योगी भी ब्रह्मरूप ही होजाता है । जय पिन्दु देह में स्थित है तय मृत्यु का भय हो हो नहीं सकता, और जब तक खेचरी मुद्रा यांध रक्खी है,तम तक बिन्दु नहीं जासकता। विन्दु शिव है और रज शक्ति है, विन्दु .

प्रति उसका दाह नहीं कर सकती। गोलाकार कजल के ढेरके काल कूट विष का भी शरीर पर असर नहीं होता यह भी गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः चन्द्रमा है और रज सूर्य दोनों के संगम से ही परम पद प्राप्त होता है । जो पृथिवी हड़ताल और सुवर्ण के समान पीली अधिष्ठातृ देवता ब्रह्मा के सहित चतुष्कोणाकार और मध्य में (ले) बीज से युक्त है इम पृथ्वी तत्त्व का हृदय में ध्यान कर के उक्त भूमंडल में चित्त सहित प्राण को लोन करके पांच घडी तक स्तम्भ करने की धारणा करे इस धारणा के अभ्यास से पृथिवी तत्त्व अपने वश में हो जाता है । अर्धचन्द्राकार कुन्द पुष्प के समान श्वेत वर्ण अमृत रूप मध्य में 'व' बीज से युक्त अधिष्ठातृदेवता विष्णु सहित जल तत्त्व का विशुद्ध चक्र में ध्यान करे और उक्त जल तत्व में स्वयलीन हो तथा प्राण को लोन करके पांव घडी तक धारणा करे यह जल स्तम्भन करने चालो धारणा है इसके सर्वदा अभ्यास करने से महाभयंकर गरीर में ही भस्म होजाता है। इन्द्रगोप कीट के समान लालवर्ण त्रिकोणाकार मूगे के समान रमणीय मध्य में 'र' योज से शोभित अधिष्ठातृ देवता रुद्र सहित अग्नि तत्व की ताल में भायना करे उक्त अग्नितत्व में स्वयं और चित्त सहित माण को लीन करे और पांच घड़ी तक तन्मय हो,यह वैश्वानरी धारणा है इसके सेवन करने से योगी अग्नि को जीत लेता है १४२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः समान अतिनील वर्ण मध्य में 'य' योज युक्त अधिष्टात देवता ईयर सहित घायु तत्व का भ्र मध्य में ध्यान करे उसी वायु तत्व में स्वयं लीन होकर प्रामा सहित चित्त को लीन करे और पांव घड़ी पर्यन्त स्थिर रहे यह वायु तत्व को धारणा है इस धारणा 'फे नित्य अभ्यास करने से योमी श्राकाश में उड़ने लगता है। गोलाकार निर्मल जल के समान वर्णवाले मध्य में हं बोज और अधिष्ठातृ देवता शिव सहित आकाश तत्व का ब्रह्म र ध में ध्यान करे फिर स्वयं उनमें लीन हो और धिन सहित प्राणको उसमें लीन करे यह नभो धारणा मोक्ष द्वार के खोलने में समर्थ है नित्य इसका अभ्यास करने से मोक्ष का द्वार खुल जाता है। पह हजारों तीर्थों में स्नान कर चुका ब्राह्मणों को दान दे चुम हजारों यश भी उसने कर लिये, समस्त देवताओं की पूज लिया, और पितरों को तृप्त कर चुका नथा स्वर्ग में भेज दिया जिसका मन क्षणभर भी ब्रह्म विचार में स्थिर होगया है। भू० राजगुह्ये श्रीकृष्ण कृत गौरव नाथ स्तोत्रम्--- गकारोगुणसंयुक्तो रकारोरूपलक्षणः। प्वकारेणाक्षयंब्रह्म श्री गोरक्षनमोस्तुते ।। नाकारोऽनादिरूपाथकारस्स्थाप्यतेसदा,

१४३
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
भुवनत्रयमवैकश्श्रीगोरक्षनमोस्तुते ॥
ब्रह्मणांचपरब्रह्म रुद्रादीनांशिरोमणे ।।
त्रैलोक्यनिर्मितयेन अगिोरक्षनमोस्तुते ।।
सर्वगुणोगुणाभावो निर्गुणश्वगुणस्थितः ।
मामारोबानिराकारः श्रीगोरक्षनमोस्तुते ॥
मपूजयन्तिदेवास्तं मयलोकेचमानवाः।
पातालेनागलोकाश्च श्रीगोरक्षनमोस्तुते ।।
एकाविर्ततेनित्यं भवपाशविवर्जितः ।
परंब्रह्माऽक्षयज्योतिः श्रीगोरक्षनमोस्तुते ॥
नमन्तिब्रह्माविष्णुश्च सुरानृमुनयस्तथा ।
बानमारा खिलाः मिद्धाः श्रीगोरचनमोस्तुते ।।
श्रीगोरक्षस्यदस्तोत्रं स्वयंकृष्णेननिर्मितम् ।
भक्तिभावविनिर्मुक्तो दासोऽहमितिभावयेत् ॥
आकाशमन्दिरयस्य नानारत्नोपशोभितम् ।
हस्तमध्यस्थितंशम्भोरभयंवरदायकम् ।।
श्रीनाथंतुमहात्मानं नजानातिस्वयंहरिः।
किंचिकिंचित्विजानाति महादेवोनमस्कृतम् ॥

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा श्रीनायथाऽक्षयोदेवा देवानामप्यगोचरः । तत्पादौचिन्तयेद्योगी अक्षयोयोगनिश्चलः ।। कल्पद्रुमतन्त्रधीगोरक्षसहस्रनामस्तोत्र- शुद्धस्फटिकसंकाशं जटाजूटंत्रिलोचनम् । निरंजननिराकर निर्विकल्पनिरामयम् ।। , त्रिमूर्तिचत्रिलोकीशं विधिविष्णुमहेश्वरम् । विश्वस्पंसदाकारं गोरक्षनाथदयसम् ।। इत्यादि तथाच- विद्यापतिमन्त्रनाथो ध्याननायोनिरंजनः नित्यनाथोभूतपतिनित्यानन्दोमहीपतिः ।। साराष्पः पूर्णनाधो पुनिनायो पुतिप्रियः । सृष्टिनाथः स्थिनिनायो डारनायोमहागुरुः ।। रमपोरामभद्रश्च रामनाघोजनार्दनः । पटस्थापनकार्याणि मुस्तिकाविंशपतः ।। चिनागीरदमंत्रेण नरूपकदाचन । भागमोक्तानकागि यदिकानिनवच ।।

वर्तमान हैं और अक्षय ज्योति रूप परब्रह्म हैं हे श्रीगोरक्ष नाथ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः १४५ विनागोरक्षमत्रेण नासद्धचन्तिसाधयेत्तथा । श्रीकृष्णकृत अगिोरक्षनाथस्तोत्र भा० टी०-गकार गुण संयुक्त है रकार रूप का चिह्न है और क्षकार से अक्षय ब्रह्म लक्षित होता है ऐसे श्रीगोरक्षनाथ जो मैं पाप को नमस्कार करता है । आपः ब्रह्माओं के ब्रह्मा और रुद्रों के शिरोमणि हो, त्रैलाक्य की रचना करने वाले है गोरक्ष नाथ ? मैं आपको प्रणाम करता है। श्राप सर्वगुण युक्त और गुणातीत हैं और निर्गुण होते हुए भी गुणों में स्थित हैं आप साकार और निराकार हैं मैं आपको नमम्कार करता हूँ । स्वर्ग में देव मर्त्यलोक में मनुष्य और पाताल में नाग श्रापकी पूजा करते हैं ऐसे सर्वपूज्य आपको प्रणाम करता है। आप संसार वन्धन से रहित होकर एकाकी 1 । ऐसे आपको मैं प्रणाम करता । यह गोरक्षनाथजी का स्तोत्र श्रीकृष्ण ने बनाया है भक्ति भाव से युक्त होकर मैं गोरक्षनाथजी का दास है ऐसी भावना करे। जिसका मन्दिर नाना रत्नों से शोभायमान आकाश महादेव के हाथ में स्थित है । ब्रह्मा विष्णु आदि देवता मुनि मनुष्य और महा सिद्ध हानी आपको नमस्कार करते हैं ऐसे में आपको नमस्कार करता हूं । महात्मा श्रीनाथ को सयं विष्णु भी नहीं जान सकते उस सर्व नमस्कृत गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः नाथ को महादेव कुछ २ जानते हैं। श्रीनाथ देवों से मी अप्राप्य हैं और अक्षय देव हैं अक्षय योगी सदा योग में निश्चल होकर उसके चरणों का ध्यान करे। कल्पद्रुम में श्री गोरक्ष सहस्र नाम स्तान है । शुद्ध स्फटिक के समान शुभ्र जटाजूट धारी त्रिलोचन निरंजन निरा. कार निर्विकल्प निरामय त्रिमूर्ति त्रिलोकोश ब्रह्मा विष्णु महेश्वर रूप विश्वरूप सदाकार, नाथ देवगोरक्ष, विद्यापति मंत्रनाथ ध्यान नाथ निरंजन, नित्यनाथ भूनपनि नित्यानन्द मही पनि सर्याराध्य पूर्णनाथ द्यु तिनाथ घनिप्रिय सृष्टिनाथ, स्थितिनाथ हारनाथ महागुरु रमण रामभद्र रामनाथ जनार्दन, घट स्थापन के कार्य और विशेष रूप से मुक्ति के कार्यगोरक्ष मंत्रके बिना कभी नहीं करने चाहिये, शास्त्रों और वेदों में कहे हुए कोई भी फर्म गोरक्ष मंत्र के विना सिद्धनहीं होने इस लिये साधक को उचित है कि उन्हें गोरक्ष मंत्र से ही मिद् परे। मू०-मारसंग्रहेब्रह्माण्डपुराणललितापुरवर्णनेलाल- ताखएडे- तस्यचोचरकाणेतु पापुलोकोमहाद्युतिः । तत्रवायुशरीराश्च सदानन्दमहोदयाः॥ -

१४७
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
सिद्धादिव्यर्पयश्चैव पवनाऽभ्यासिनोपरे ।
गोरक्षप्रमुखाश्चान्ये योगिनोयोगतत्पराः ॥
द्वात्रिंशतमेऽध्याये-
नाथान्तरामिति प्रोक्तं हत्त विंशतिचोन्नतम् ।
चतुर्नल्चाविस्तारं प्राग्वत् सोपान मण्डितम् ॥
तत्र नाथामहादिव्या योगशास्त्र प्रवर्तकाः ।
सर्वेषां मंत्रगुरवः सर्वविद्या महार्णवाः ।।
चत्वारो युगनाथास्तु लोकानामभिगुप्तये ।
तुप्टाः कामेशदेवेन तेपांनामानि मच्छृणु ॥
मित्रीशोड्डीश पष्ठीश चयाख्याःकुम्भसंभव ? ।
तः सृष्टा बहवोलोका रक्षार्थ पादुकात्मकाः ।।
दिव्यौपा गुरवः प्रोक्ता स्तेषां नामानि मतृणु ।
मित्राद्यामानवाघाश्च मिद्धौघास्सुस्तापसाः ।।
प्रायः सालोक्यसारुप्य सायुज्यादिकसिद्धयः ।
महान्तोगुरवस्तांस्तु सेवेतचतुरोगुरून् ।
स्कन्दपुराणे काशीखएडे-

१४८
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
मम भक्तिप्रकुर्वाणा विश्वेशंद्वियन्ति ।
विद्विपोममतेशया: पिशाचपदगामिनः ।।
अध्यासतेऽन्ध तामिस्र मृतास्तेऽन्यत्रसन्ततम् ।
शिवनिन्दापरायेच येचपाशुपतनिन्दकाः ।।
विद्विषोममतेज्ञेयाः पतन्तिनरके शुचौ ।
अष्टा विशन्तिकोटीपु नरकेपुक्रमेणहि ।।
कल्पेकल्पे वसंयुस्ते विश्वेश्वरनिन्दकाः।
विश्वेशाऽनुग्रहं प्राप्य मुनेऽहमापिमुक्तिदः ।
मद्भक्तैस्ताशेपेण सेव्यो विश्वेश्वरोऽनिशम् ।
इयंवाराणसीया पाशुपतस्थस्थली ।।
भा०-सारसग्रह ब्रह्माण्डपुगण के ललितापुर वर्णन
ललिताखण्ड में लिखा है-उसके उत्तरकोण में प्रकाशमान घायु-
लोक है यहाँ सदा ब्रह्मानन्दशील महोदय लोग वायु शरीरधारी
सिद्ध और दिव्य ऋथि रहते हैं बहुत से प्राणायामी हैं और बहुत
से योग में तत्पर श्रीगोरक्षनायादि योगी है। वाइस अध्याय
में लिखा है कि यहां पीस हाथ ऊंचा चारसी हाथ घिस्तार
पाला और सीढ़ियों से युक्त लोकं है यहां महादिव्य योगशास्त्र
1

निमोनिष्ट देव हैं। ये सब सालोक्य, सारूप्य और सायुज्य शीखण्ड में लिखा है कि मेरी भकि करते हुए जो विश्वेश गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः १४६ के प्रवर्तक सबके मंत्र गुरु सव विद्याओं और तपस्याओं से युक्तमहासिद्धनाथ रहते हैं। यहां चार युगनाथ हैं जिनकी स्थिति संसार रक्षा के लिये कामविजेता देवाधिदेव स्वयं महादेव करते हैं। उनके नाम सुनो, मित्रीश, उडीश, पष्ठोशचर्या और हे कुम्भ सम्भवा उन्होंने बहुन से लोकों की रचना की है, वे उनकी रक्षा के वास्ते पादुका रूप में रहते है। उनमें जो देव लोक में मत्र आदि प्रचारक हैं उनके नाम मित्र आदि अन्यत्र कहे गये हैं वे दियौध कहलाते हैं जो सिद्धों में प्रचार करते हैं वे सिद्धौधं और मनुष्यों में प्रचार करने वाले मनुष्यौघ कहे जाते हैं ये सय आदि सिद्धियों के दाता और महागुरु हैं इन तीनों और अपने अवदाना गुरु की सेवा सबको करनी चाहिये। स्कन्दपुराण 'क मिहेश्वर शिव जी से रेप करते हैं वे द्वेषो समझने चाहिये । धे मरकर पिशाच बनते हैं, वे अगले जन्म में सदा के लिये घोर अन्धकार वाले नरक में रहते हैं । जो शिव को और पाशु मन मत को निन्दा करते हैं ये भी मेरे द्वषी हैं, वे अपवित्र एक में पड़ते हैं, वे २८ करोड़ वर्ष तक अपवित्र नरक में ही पड़े रहेंगे। विश्वेश्वर के निन्दक हरएक कल्प

१५०
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
में नरक में हो यास करेंगे क्योंकि हे मुने ? मैं विन्णु स्वयं
विश्वेश्वर के अनुग्रह से ही मुक्ति का दाता है। मेरे भक्तों को
सदा विश्वेश्वर की सेवा करनी चाहिये। यह वाराणसी नगरी
पशुपति के रथ की पली है अर्थात् पशुपति यहां सर्पदा
विहार करते हैं।
-
मू० तन्त्रमहार्णवे-
रक्तं नेत्रं हीनच्छाया रक्तंगानं तपस्विनः ।
मूर्तिः प्रसन्नवदना स्वल्पवाणी च कथ्यते ।।
चतुरशीतिसिद्धानां पूर्वादीनांदिशांन्यसेत् ।
एक विंशति संख्याकं स्थानंनाना च कथ्यते ।।
नवनाथादिशाधष्टावेकोमध्ये व्यवस्थितः।
नवनाधस्थितिञ्चैव सिद्धपगमेनकारयेत् ।।
गोरवनाथोबसे पूर्व जगन्नाथपनेस्थितः।
फ्रोशत्रये बसेमित्यमेकनाथः सउच्यते ॥
जलन्धरोबसेभित्य मुत्तरापथमाश्रिवः ॥
ज्वालामुखीपंचक्रोशं वनमुत्तरमाश्रितः।
नागार्जुनोमहानायो ज्यालयेशानसंश्रितः।

१५२ - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह नित्य रहे वह एक नाथ कहाता है । जालन्धरनाथ सदा उत्तर पथ में घसता है ज्वालामुखी उत्तर की तरफ पंचक्रोशी वन में रहता है, महा तपस्सी महानाथ नागार्जुन ज्वालामुखी से ईशानदिशा में सात कोश के यन में तपता है, सहस्रार्जुन गोदा. चरी के दक्षिण दशकोश विस्तृत वन में तप करता है। महानाथ दत्तात्रेय पश्चिम दिशा में सरस्वती के पश्चिम तौर पर नौकोश के धन में तपस्या करता है. देवदत्त अग्निकोण में पांच कोश के वन में रहता है । जड़ भरत वायव्यकोण में सात कोश के.पन में रहता है। पृथियो के मध्य देश कुरुक्षेत्र में तीन तीन कोश कोपन में श्री आदिनाथ जी निवास करते है और समुद्र से नेतकोण में मत्स्येन्द्रनाथ रहते हैं ये महासिद्ध उपास्य नार्थों के स्थान है यह गुप्त यात फिसी को यतानी नही चाहिये । मू-पोडशनित्यातन्त्र- कादिसंज्ञाभवेद्पा सा शक्तिः सर्वसिद्धये । तयातेर्भुवनेतन्वं कल्पैकल्पविज़म्भते ॥ अवसानेतु कल्पानां सातैः साधनजेचमाम् । नामपर्यायितोऽवाप्तं वालावाप्तमितिद्वयम् ॥ प्रसिद्धवाटतोयच त्रीणिनामानिसाधके। नमस्तेनाथभगवन् शिवायगुरु रूपिणे ।।

गोरतसिद्धान्तसंग्रहः
मू-रुद्रयामले रससाधन प्रकरणे-
शिवरात्रिदिने प्राप्त प्रारभ्यं कार्यसाधकः।
चतुः पष्ठीप्रमाणेनकोष्ठं कृत्यातुमरवम् ॥
पार्थयोर्तिमालांच मध्येमूर्तिचविन्यसेत् ।
तस्याग्रेजुहुयात्सवहेमसिद्धिप्रजायते ।।
रक्तोपवीत वामस्तुदद्यावद्विजपुंगवम् ।
कोष्ठसंख्यातायोगिनींतत्रपूजयेत् ।।
श्रृंगीनादेन ते सर्वे मनसाऽऽह्लाद कारिणा ।
रक्तार्णवहकरश्रेष्ठः स्कंघाग्रेशृङ्गमाश्रितः॥
मुखकमलयायुक्तं ने।कमल भूपणम् ।
पृष्ठे च कमलाकारं हंसगत्या पिराजितम् ।।
रक्तवासोचरीयेन वरमंत्रपुरोन्यसेत् ।
रक्तचन्दनसंघृष्टमपूपस्योपरिन्यसेत् ॥
स्वादयत् सप्तदिवसं पवात्पुण्येसमर्पयेत् ।
रसायिनी महाविद्यासिद्धिर्भवतिनिश्चितम् ।।
'तारासूक्तो-
प्रणयो निर्गुणः प्रोक्तः सर्चायोदगोचरः।
.

गोरक्षसिद्धान्तसग्रह.
मूर्ति के कन्धे पर लाल ऊन का वस्त्र रक्खे । कमल ने प्रसन्न
मुख पीठ में कमल के चिन्ह से युक्त और हस गति से मुशा
भित तथा लाल वस्त्रधारी भैरय की मूति का ध्यान करे।
और उसका पीज मत्र जपे । फिर रोट के ऊपर लाल चन्दन
सहित फूल रख कर भोग लगावे सात दिन के बाद विसर्जन
करके मूर्ति को पवित्र स्थान में स्थापित करे तब अवश्य रसा
यनी महाविद्या की सिद्धि हो जाती है । नाग सूफ्ति में प्रणव
का सय का श्रादि कहा है और वेदों से जाना जाता है गायत्री
घेदों की माता है वेदों में प्रणव ही मुख्य पहा गया है।
कुनगर्णय तत्र के धारहवें उल्लास में कहा है कि हे प्रिय जिस
दिशा में श्री नाथ जी के चरण विगजमान है उस दिशा को
प्रतिदिन भक्ति पूर्वक प्रणाम करे। गुरुपादुकाओं से बढ़कर काई
मन नहीं है। गुरु से पढ पर कोई देय नहीं है शाफ्त मार्ग
से उत्तम कोई मार्ग नहीं है और कुल पूजन से पढ़ कर
कोई पुण्य नहीं है।
मू०-वायु पुराणे शिवस्तोते-
अप्रमेयायगोपेच निर्गुणाय गुणाय च ।
यादप्रियाय सम्याय मुद्रामाणिधरायच ॥
देशकाल उपायेन द्रव्यश्रद्धासमन्वितम् ।

१५८
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
अस्मिन्नर्थेश्रतिः साध्वी समाप्तावेदवित्तमाः॥
अपकचित्तोतार्थ देवाविष्णवादयोपिच |
ध्येयाः पकः शिवोध्येयः साक्षात्संसारमोचकः ॥
रुद्रविश्वाधिकाविष्णुं ब्रह्माणंचान्यमेव च।
समंचिन्तयतःसाक्षासंसारः परिवर्तते ।।
महापापवतांपुंसां पूर्वजन्मसुसुव्रत ।
विष्णुः सर्वाधिकोभाति नमानास्परमेश्वरः ।।
विष्णु मर्वाधिकोभाति नारकीमनसंशयः ।
विष्णुः सर्वाधिकोनान्य इतिचिन्तयतांनृणाम् ।।
नास्तिमंमार विच्छित्ति कल्पकोटिशतरपि ।
तेपनिवचमोक्षाशाकल्पकोटि शतरपि ।।
प्रमादिदेवतानांच विश्वाधिक्यवदन्तिये ।
अधोमुखोर्ध्वपादास्ते यास्यन्तिनरकार्णवम् ।।
मा० टी०-घायु पुराणस्थ शिव स्तोत्र में वर्णन है कि--
अप्रमेय अर्थात् पक्षपात रहित परोपकारी मांसारिक भासक्ति
रहित औदार्य गुण युक्त सत्य सनातन सिद्धान्तायलम्बी सर
और धार्मिक पधारो सत्पात्र को देश का उपाय के अनुकूल
जो धन श्रद्धा के साथ दिया जाय यह धर्म का लक्षण है।

१६९
होता है यह शिव का अनादर करता है इस लिये यह माई
उनको पदापि मोक्ष की प्राप्ति नहीं होती । शिवजी से
ब्रह्मादि देवों को बड़े कहने वाले पुरुप नीचे मुख और अपए
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
ही ध्यान करना चाहिये जो सबसे अधिक शिवको प्रमा
पिष्णु आदि अन्य देवताओं के समान मानता है यह ससा
सागर से पार नहीं होता। जिसने पूर्व जन्म में पाप किया
उस पुरुष को विष्णु ही सब से अधिक प्रतीत हाता है मन
साक्षात् परमेश्वर शिवजी । जिस को विष्णु सर्वाधिक प्रतीत
में पड़ता है। सब से बडा विष्णु है शिव नहीं ऐसा समझ
चाले पुरुषों का करोडौं क्लो तक भी ससार से छुटकारा नहीं
होता।
पेर किए हुए नरक में पढ़ते हैं।
मू-आदिनाथ सहितायाम्---
कौलिकान् कुलमार्ग च कुलद्रव्यं कुलाङ्गनाः ।
ये द्विपन्ति जुगुप्मन्ते ये निन्दन्ति इसन्ति ये
येऽसपन्ते च शंफन्ते मिथ्येविप्रवदन्तिये ॥
तेशाकिनीमुखेयान्ति सदारसुतवांधवाः।
पिरन्ति शोणितं तेषां चामुंडामांसमुत्त्वचः ।

.. गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः अस्थानिचर्ययन्त्यस योगिन्यो भैरवगिणाः ।। पद्मपुराणेसृष्टिखंडे- धारयित्वात रुद्राक्ष म्रियतेयः क्षितीनरः। स यातियत्परंरम्यं सर्वदेवैः प्रपूजितः ॥ शैबोवा वैष्णवश्चान्यो गाणपत्योऽयसौरकः । पातालखंडे- अहंच ललितादेवी राधिकायाच गीयते । अांचवासुदेवाख्यो नित्यकामकलात्मकः ॥ सत्य योपित्स्वरूपोहं योपिच्चाहं सनातनी । अहंच ललितादेवी पुंरूपाकृष्णविग्रहा ॥ ब्रह्मवैवर्त- महाविष्णो रहंकारो बभूवसहसेति च । सर्व मल्लोमकूपेषु विद्यते चाहमीश्वरः ।। संहार भैरवोभूत्वा तं जग्राहसलीलया। स्थितेमू विशेपेण प्रसादंचचकार सः ॥ सर्वात्मानध्यायमानं स्तुतं भीतंकृपानिधिम् । तच्छरीरं सुसम्पन्न पुनरेवचकारसः

१६२.
गोरक्षमिद्धान्तसंग्रहः
शिवपुराणे-
क्वच भेरीकलापश्च कचशृङ्गारवः शुभः ।
कचाऽऽनकमयः शन्दो गल्लनादः क्यचापिहि ।।
शक्तिसंगमतंत्रे अष्टमपटले-
कदाचिदाद्या ललिता पुंरूपाकृष्णविग्रहा ।।
लोक मंमोहनार्थाय स्वरूपं विभ्रतीपरा ।
कदाचिदाद्या श्रीकाली सैवतारास्ति पार्वती ।
कदाचिदाद्याश्रीतारा पुंरूपारामविग्रहा ।।
राशक्तिरिति विख्याता मशिवः परिकीर्तितः ।
शिव शक्त्यात्मकं ब्रह्म रामरामेति गयिते ।।
योगासन समारूढ़ जटामंडल मंडितम् ।
विभूतिभूपितं देवं त्रिनेत्रं चन्द्रर्शखरम् ।।
तेजः पुजनिमां देवि तांतेजः स्वरूपिणीम् ।
गौरीरूपां परां सीतां महासाम्राज्यनायिकाम् ।।
भा--आदिनाथ संहिता में कहा है-कौलिक अर्थात् शात
फुलमार्ग कुल द्रव्य और कुलाङ्गना अर्थात् कुलीन स्त्री, F
शक्ति सम्बन्धी समस्त वस्तुओं को जो निन्दा करने हैं हंसते

पाव गाणपत्य वा सौर कोई भी क्यों न हा । पासालखण्ड के गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह १६३ हैं देष घृणा असृया और शशा करते हैं तथा यह मिथ्या है ऐसा जो कहते हैं वे स्त्री पुत्र और बन्धुओं सहित शाकिनी सुख में पड़ते हैं। चामुण्डा देवी योगिनी और भैरव के गण उनके रूधिर को पाते हैं मास को खाने हैं और हड्डियों को चया जाते हैं । पद्म पुराण के सृप्रि खण्ड में कहा है जो रुदाक्ष धारण करके पृथिषी पर प्राणत्यागता है वह सर्वोत्तम रूप को माप्त होता है और सब देवो का पूज्य हो जाता है वह शेय में कहा है में ललिता देवीद मैं हो राधा कहलाती है और मैं ही कामकला रूप होकर वासुदेव कहलाती हू। समस्त स्त्रियों में पतिव्रता और सदा रहने वाली में ही है। पुरुष रूप धारण करने वाली रण स्वरूप भी मैं ही ह । ब्रह्मवैवर्त में - महा विष्णु स सहसा महकार ( अर्थात् विराट् ) उत्पन्न हुआ उस विराट् रूप मेरे रोम रूपों में समस्त प्राणी विद्यमान हैं, में ईश्वर , फिर सहार भैरव रूप होकर क्रीडा से सयका सहार कर लेना ह।समस्त प्राणियों को मुड रूप होकर मुझ में विद्यमान हो जाने पर मैं प्रसन्न हो जाता ह, उस मैने सर्व स्वरूप, देवों सपायमान, प्रशसित दयासागर प्रसन्न रूप वह शरीर पनाया।

गोरक्षमिद्धान्तसंग्रहः शिवपुराण में वर्णित है-यह मेग मेरी इत्यादि याद्यमान समुदाय और शगी का शब्द कहां है तथादुन्दुभि का शब्द ओं गलनाद कहां है । शनिसंगमतंत्र के आठवें पट में कहा है- किसी समय आद्यासुन्दरी ललिता देवो ने लोगों के मोहर के लिये अत्यन्त सुन्दर पुरुष रूप कृष्ण शरीर धारण किया | कमी आद्या श्री कालीप पार्यनी कमीरामावतार भोर तागार धारण करती हैं। 'ग' का अर्थ शक्ति और 'म' का अर्थ शिः कहा जाता है भतः शक्ति सहित शिय रूप ब्रह्म ही राम कहलाता है, योगासन में आरूह जटाजूट भस्म विभूषित त्रिनेत्र चंद्रशेखर अर्थात् शिव और तेजः पुत्र के समान तेज रूपिणी गौरी रूप साम्राज्य देने वाली सीना का ध्यान करना चाहिये। मू० बृहदारण्ये- देवाय ब्रह्मणो रूपेमूतं चैवामूतंच महँचामृतंच स्थितं च यच्चसध्यत्यञ्च ॥ तदेतन्मूर्त यदन्यद्वायोचा- परिक्षाच्च तन्मत्यमेत स्थितमेतत् सत्तस्पतम्यमूर्तस्यैतस्यमय स्यैतस्य स्थितस्यैतस्य सत पपरसोयएषतपति सतोह्येपरसः ॥ अथा- मूतवायुश्चान्तरिक्ष चैतदमृतमेतद् यदेतत्यत्तस्यैतस्यामूर्तभ्येतस्या- मृतस्यैतस्य यत एतस्य त्यस्यैपरमो य एपएतस्मिन् मण्डलेपुरुष- स्त्यस्य परस इत्यधिदैवतम् ॥ अथाध्यात्ममिदमेवमूर्तयदन्यन् । प्राणाच यश्वायमन्तरात्मनाकाश एतन्मर्त्यमेनत् स्थितमेतत् ।

विशुतंसकृविद्युतेवह्वा गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः सत्तस्यतस्य मूर्त्यस्यतस्य मर्त्यस्यैतस्यस्थितस्यैतस्य सतएपरसो अनु. सतो परसः ॥ श्रथामूर्तप्राणश्च यश्चायमन्तरा- मनाफाश एतदमृतमेतद् यदेतत्त्यं तस्यैतस्यामूर्तस्यैतस्या- सुनस्यैवस्य यतएतस्य यस्यैपरसोयोऽयं दक्षिणेक्षन् पुरुष- विस्योपरसः ॥ तस्यहेतस्य पुरुपस्यरूपं यथामहारजनं वासो व्यापारड्याविकं यथेन्द्रगोपो यथाल्चर्यथापुण्डरीकं यथास- अस्य श्रीभवति य एवं वेदाथात यादेशो नेति नेतिनोतस्मादितिनेसन्यत् परमस्यथ नामधेयं सन्यम्य मत्समिति प्राणापैसत्यं तेपामेपसत्यम ।। यः पठित्वापिनजातं ब्रह्मतेनाविका इय । नयन्तिपारं येत्वन्यान् स्वयमवीचिसंस्थिताः ॥ शक्त्यातुसज्यतेनिश्वं शिवनपरिपान्यते । कालेनचसंहियते मुक्तिनाथनदीयते ॥ मा०-ग्रह के दो कराई एक मूर्त जिसका मययष घनीभूत सरा अमूर्त जिसका कोई अययष नहीं है। मयं मरनेवाला और मार्य न मरने पाला, स्थित अर्थात् परिमाण वाहा दारूप यत् (व्यापारिदिन) सत् (जिसमा मसा. परधर्म गोरधमनुष्यार पटरपारि मत्या से निर्णय किया गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः जा सके) त्यत् (जो प्रत्यक्ष करने योग्य न हो) इन में मूर्त, मयं, स्थित, सत् , ये चार नाम पृथिवी जल तेज इन तीन भूतों के हैं। दूसरी कोटि में अमूर्त, अमृत, यत् और त्यत् ये चार नाम भाकाश घायु इन दो भूनों के हैं इस तरह कल्पना से पांचों भूतों को ग्रह्म का रूप मान कर नेति नेति से इन्हीं का निषेध करके ब्रह्म का निर्णय क्यिा जाता है इसी विधि निषेध को अध्यारोप और अपवाद कहते है घेदान्त में पलाना से पहले रूप मान लिया जाता है पीछे उसका निषेध कर दिया जाता है इसका फल यह है कि पाच भूनों की सत्ता सप जगह से हटा देने पर अद्वितीय ब्रह्मसिद्ध होजाना है। इन तीन स्थल भूतों का सार यह सूर्य मंडल है, उस में जो सूक्ष्म लिंग शरीर है सो श्राकाश और वायु इन दो भूनों का सार है यह विचार देवशरीर के सम्बन्ध में है, अय मागे अध्यात्म वर्णन किया किया जाता है-इसा प्रकार शरार के भीतर प्राण और आकाश इन दोनों को छोड़ कर, तीन अर्थात् पृथिवी जल और तेज भूर्त, मर्त्य, स्थित, और सत् कहराने हैं, इनका सार नेत्र है, प्राण और हृदयोकाश ये दो अमूर्तादि कहे जाते हैं, इनका सार नेत्र में अभिमान करने वाला लिंग शरीर है, पासना इसो लिंग शरीर का धर्म है, यद्यपि चे लिंग शरीर अगणित है तथापि दृष्टान्त के द्वारा कुछ दिखाया जाता है। उस सूक्ष्म शरीर का.

१२जोस रहस्य को जानता है उसको श्री प्राप्त होती है।
सरजगह बिजली की तरह एक दम उसकी चमक फेल जाती
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
यह रूप वासनामय है उसकी उपमा केसर से रंगे हुए वस्त्र से
दी जाती है वह भूमले रंग की ऊन के समान भूसला है, धीर
परी ( अर्थात् तीजनामकजन्तु के समान लाल सफेद कमल के
ममान शुभ्र, चमकती हुई बिजली के समान चमकता हुआ,
.
भागे यह ब्रह्म का उपदेश है-यह पूर्वोक्त समस्त दृश्यमान
थत सूक्ष्म जगत् ब्रह्म नहीं है, 'नेतिनेति, इस निषेध रूप
उपदेश से दूसरा ब्रह्म जानने का उपाय नहीं है । अब युम का
मास नाम पताया जाता है, यह यह है- "सत्यस्य सत्यम्"
मा अर्थ यह है कि प्राण प्रादि भी महा प्रलय तक विद्यमान
रहने से व्यवहार में सत्य कहलाते हैं, किन्तु तीनों कालों में
असाध्य रूप यास्तयिक सत्य तो ब्रह्म ही है, मतः परम सत्य
मका पास नाम है।
.
जिन्होंने शास्त्र पढ़कर भी याद को नहीं जाना पेनायिकों
तरह जो दूसरों को पार उतारते हैं और म्ययं तरहों में
रहने । शक्ति में विश्व की उत्पत्ति होती है शिव
पालन करता है, पास उसका संहार करता है, भार
मापमान में मुति देता है।

गौरतसिद्धान्तसंग्रहः
मू-ब्रह्मण्यप्राप्तसति ब्रह्मतन्तुधारणमयुक्तम् ।
केचित्सूत्रधारकाः केवलजात्पभिमानिनः पुरुषाः ।।
प्रथचकाष्ठदंडधारका आश्रमिणो दण्डिनस्तेषां संडन करएं
उपनिषत्सम्मतिमाह ब्रह्मोपनिदि-
।
--
यज्ञोपत्तिं परमं पचित्रं प्रजापत्तेर्यत् सहज पुरस्ताद
अायुष्यमग्यूप्रतिमुञ्चशुभ्रं यज्ञोपवीतं वलमस्तु तेजः ।
सशिखबपनकत्वा यदिः सूत्रत्यजेद्बुधः ।
यदक्षरंपरब्रह्म तत्सूत्रमभिधारयेत् ।।
सूचनात्सूत्रमित्याहुः सूत्रनामपरंपदम् ।
तत्वविदितंपन सविनोवेदपारगः॥
येनसर्वमिदनातं सूत्रमणिगणाइव ।
तत्सूत्रधारयेद्योगी योगकृतत्त्वदर्शिवान् ।।
यहि सूत्रंत्यजेग्द्विान योगमुत्तममास्थितः।
जनभावदियनं धारयेद्यः सचेतनः ॥
धारणात्तस्यसूत्रस्य नोछिटोनाशुचिर्भवेत् ।
सूत्रमन्तर्गतयेषां ज्ञानपझोपवीतिनाम् ॥

१६६
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
त्वमूत्रविदोलोके तेचयज्ञोपवीतिनः ।
मानमेवपरंतेषां पवित्रज्ञानमुत्तमम् ।।
अमेरिवशिखानान्या यस्यज्ञानमयीशिखा ।
मशिखीस्युच्यतेविद्वान् नेतरेकेशधारिणः ॥
कर्मण्यधिकृतायेतु चैदिकबामणादयः ।
तैः सन्धार्यमिदंसूत्रं क्रियाअंतद्धिवस्मृतम् ।।
बाह्मएपंसकलंतस्य इतिब्रह्मविदोविदुः ।।
इदंयज्ञोपवीतंतु परमंयत्परायणम् ।
विद्वान् यगोपवीतिस्यात् सयशः सचसर्वचित् ।।
परमहंसोपनिषदि-
परमात्मनोरेकत्यक्षानेनतयो भैदएफएय विभप्रो या सा
मन्ध्या सर्यान्याफामान् परित्यज्याद्वैतेपरमस्थितिः ।।
मानदण्डोतोयेन एकदंडीसउच्यते ।
काप्टदंडोतोयन सर्याशीशानयर्जितः ।।
सपातिनरकान्योरान महारौरवमेव ।
शानारतपिपाम्याम मनानन्दः फेवलं शारा पाठ

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः मात्रेणवाभिमानिनस्तान् प्रतिवाक्यमेतत् इत्याह- द्वादशवर्षों भूत्वाविद्याभ्यासमर्हति ॥ ततश्च यापद्वादशवर्पशब्दयोधार्थ व्याकरणशास्त्रमध्येतव्यं ततश्चयावद्वादशवर्पमर्थवोधार्थ न्यायशाखमध्येतव्यं ततश्चयावद् द्वादशवर्ष वेदोऽध्येतव्यलतश्च पट्सुवर्षेषु वेदान्ताभ्यासः तन्य एवपट्सुवर्षेषु शास्त्रीयरीतिज्ञातव्या । पुनरभ्यासश्चकर्तव्य एव. मायुपोऽर्धन्तु गतप्रायमेव । ततः पुनरिन्द्रियाणां शैथिल्येऽरिष्टेच. सत्यभ्यासासक्तत्वं भवेत् ततः प्रथमत. साक्षरतामावं पाण्डित्य- मापाद्यमनुष्योगाभ्यासः कर्तुमुचितइति । भा०-प्रहातान के प्राप्त होने पर ब्रह्मतन्तु धारण करना अनावश्यक है, यहुत से सुत्र धारण करने वाले केवल जात्य- भिमानी हो होते है । और काष्ठ का धारण करने पाले जो अाश्रमी दण्डो है, उन के खंडन करने में उपनिषद् को सम्मति लिखी जाती है-- यज्ञोपवीत परम पवित्र है यह प्रादि सृष्टि में प्रजापति के साथ उत्पन्न हुअा, यह श्रायु के बढ़ाने पाला पूज्य पवित्र और मुन्न है इसको धारण कर यह यल और तेज के देनेवाला है। शिखा सहित हजामत करवा कर बुद्धिमान जिज्ञासु बाहरी शिवाधारी है साधारस फेशों को धारण करने याले गोरक्षसिद्ध न्तसंग्रहः इन को त्याग दे और जो अक्षर पर ब्रह्म है उससूत्र को धारण रे । सृश्चित करने से सूत्र कहाता है सून ही परम पद है । उस सूत्र को जो जानता है वह वेद का पार शाज्ञानी है । निसमें यह समस्त जगत् धागे में मणियों की तरह पिरोया हुअा है, तत्व दर्शी योगी उस सूत्र को धारण करे । विद्वान् यागी योग साधन करता हुआ बाहरी सूत्र को त्यागदे, समस्त जगत् का ब्रह्मरूप समझना यह जो सूत्र है इसे ज्ञान पूर्वक धारण करे, इस सूत्र के धारण करने से कभी झूठा या अपवित्र नहीं होना जो ज्ञान का यझोपवीत धारण करते हैं और जिनके है वे हो यास्तव में सूत्र के ज्ञाता है, और घे ही योपयोती है। अग्नि की ज्यालाओं के समान प्रकाशमान ज्ञान मपी शिया का जो धारण करता है यही विद्वान् घास्तव में मोतर ही सूत्र शिवाधारी नहीं कहे जा सकते । जो यालण आदि येदिक मों में अघियत है उन को वह यज्ञापयोत धारण करना चाहिये, पयोकि यह यज्ञोपवीत प्रिया का अङ्ग है। ज्ञानमयी जिस की शिक्षा और शानमय ही जिसा यझोपवीत है यह पातय में मालणत्य मधिकारी है ऐसा पेदेशाता कहने हैं । यह यज्ञोपयोत परमोत्कृष्ट स्थान है, गोरक्षसिद्धान्त संग्रहः इस यशोपयोत को जा विद्वान् धारण करता है वही यज्ञ और वही सर्वज्ञ है। परमहंसोपनिषद् में जीवात्मा परमात्मा के एकत्य ज्ञान से जा उन का भेद दूर हो जाता है वही वास्तविक सनया है, जो इस स्थिति को प्राप्त होगया हो यह सय काम नाओं को त्याग दे। ज्ञान दण्ड को जिसने धारण कर लिया यही एक दण्डी है । जो संयम रहित सर्वभती नशानी काष्ठ दण्ड को धारण करता है, यह घोर महारौरव नरक में गिरता है। जो शास्त्रों में वर्णित तत् तत् विषयों के अभ्यास को न जामते हुए केवल पठम मात्र से हो भभिमान में चूर रहते हैं उनके प्रति यह कथन है-पारह वर्षका होने पर विद्याभ्यास के योग्य होता है फिर पारह वर्ष तक शाब्द पोध के लिये व्याकरण फिर अर्थबोध के लिये न्याय, फिर यारह यपंतक घेद फिर छः थपी में घेदान्त का अभ्यास करना चाहिये, फिर छ वों में शास्त्र की रीति का ज्ञान होता है इस प्रकार आयु का आधा भाग तो चला ही गया, फिर इन्द्रियों की शिथिलता और रोगों के उत्पन्न हो जाने के कारण अभ्यास की शक्ति नहीं रहती इसलिये पहले ही पदपदार्थ का ज्ञान प्राप्त करके मनुष्यों को योगाभ्यास करना चाहिये। मू-येत्याचार वाहुल्यं दधतोपि वेश्याउपगम्य तत्संगंकुर्व- २७३ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः चन्ति, तान् प्रत्यरमाकमिदंकथनम, वाह्यविपयिफामुज्ज्वलतांप्र- दर्य मानसीमलिनताधार्यते । ततस्त्वियो यद् वैश्या संगोपि न पर्तव्यः, बद्धावारस्यापि प्रयोजनं नास्ति गौणोऽयमित्त्याचारं ज्ञा- त्याऽस्यत्यागोपीन कार्यः, यथायोग्यत्वेन विवेकपूर्वकं सेवनं चास्य पर्तव्यमिति । मवेयं मनुष्यो यदैकस्तु राजा यदाजन्तुरेको भवेयं मृगेन्द्रः। यदाशास्त्रमेकं तदायोगमेव यदादेव एकस्तदानाथएव ।। अस्मिन्मार्गेऽद्वतोपरिवर्तीनाथोदेवता प्राप्योनिराकार ज्योतिथिोध्येयः साकारनाथउपास्योऽथचादिगुरुः । माधनयोगः। अत्याश्रमीयोगीगुरुः। मुमुक्षुः माधकः । श्रवनगुरोर्मुख्य चिहनादोमुद्राभस्मशेली ऊर्णायज्ञोपवीत- मित्यादि, शक्तिर्जगत्कों, शिवः पालकः । कालः संहा- रकः । नायोमुक्तिदायकः । प्रणवावेदः। नादः मन्तानम् । नवनाथाः। विन्दुः सन्तानमीश्वरः । मनःशरीरं जीयोऽनु. भवः । चत्वारोगुरवः । मत्स्येन्द्रईश्वरचतुरंगी गोरचइतिस्व- रूपाः। भपक्षं वास्तविकपक्षमङ्गीकृत्येतरकन्पित परपनपा- । पएड खण्डनमित्यादि विषयः।

अधिक
१७४
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
भाल-जो घहुन अाचार विचार धारण करते हुए घेश्या
गमन करते हैं उनको हम यह कहते हैं कि उन्होंने बाहरी
उज्ज्वलता दिखाकर मानसिक मलिनता धारण की है, उससे
अच्छा यही है कि घेश्या संग भी न करे। यहुन
याचार के यन्धनों में जकडे रहना भी अनावश्यक
है, इसको गौण समझ कर इसका त्याग भी नहीं करना
चाहिये। किन्तु विवेक पूर्वक यथा योग्य इसका सेवन अवश्य
करना चाहिये। यदि मैं मनुष्य होऊं तो राजा बनू यदि पर!
योनि में जाऊं तो सिंह बनू यदि मुझे शास्त्र हो तो योग का
हो और यदि देव पूजा करूं तो केवल एकनाथ की। इस
मार्ग में अद्वैत मे भी ऊपर वर्तमान नाथ ही देवता है, प्राम
करने योग्य उसी निराकार ज्योतिस्वरूप नाथ का ध्यान करना
चाहिये, और श्रादिगुरु सामागनाथ को उपासना पानी
घाहिंपे। इस मार्ग में साधन योग है आश्रमों के अभिमान में
अनीम योगी गुरु है, मुक्ति का इच्छुक साधा है। अवधूत गुरु
का मुख्य चिह्न नाद, मुद्रा, भस्म, शेली, और ऊन का
जनेऊ इत्यादि है। शक्ति जगत् की की शियपालक काल,
संहारक नघनाथ मुक्तिदायक, ओकारवेद, और माद सन्तान
हैं। और ईयर विन्दु सन्तान है । मन शरीर जीय और

रहो और गोरक्ष है। किसी विशेष पक्षपात को न धारण परके अन्य कल्पितं पापण्डयुक्त पर पतों का खण्डन करना मोऽस्ति यतोनिकृष्टहंसस्तुपरमात्मा । उत्कृष्टहंसत्वन्तुपरमहंसस्य- गौरतसिद्धान्तसंग्रहः १७५ अनुभव, ये चार गुरु हैं जिनका स्वरूप मत्स्येन्द्र ईश्वर चतुः मू०-परमहंसइति परमहंसंवदन्ति-तत् किम् , उत्कृष्टहं- यह विषय है। कुनागतं यदाब्रह्मरूपत्वंप्राप्तः। ब्रह्मरूपत्वंचकुतः प्राप्तोयदिमाया, गुणरचित प्रारब्धकर्माभिमन्यते । एवंचायं तु निकृष्ट हंस- एसजीयोऽस्ति, ततश्चतम्य सत्यमरालत्यं कुतः । किन्तुकाकत्वमेव पदिशाकत्वं तहोकातोजातः । एकातःकोऽयमेकेनेवचक्षुपापश्यतियाय वर्णोतदामायामेव- मायादशा पश्येन् । यदाचाशमीजातता ह्यद्वनशैवपश्यन् वर्तते। यमप्यकैयदृष्टिस्तयापश्यति। यतोमहामि निश्चयः कृतोऽयफाकतु- क्योऽयदेवएकातकर्तव्यः । मत्यंप्रपंचकुर्वन्तो ब्राह्मणवाद तथा। कचिद्रजादेश प्राप्तापिपयामक्तमानमाः ॥ मिथ्यामिभ्योविन्तः फेचनमायाविमोहिताः, लयं सर्वसन्त भागाविषनाशकाः॥

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा
देदीप्यमानस्तरसस्य कर्तासाक्षात्याशवः ।
संरक्षन्तोविश्वमेव धीरा सिद्धमताश्रयाः ॥
तत्त्वरक्षन्तिचाईते द्वैतरक्षान्तसंसृतिम् ।
एकीभावेततोभिन्न द्वैताद्वैताविवर्जितम् ।।
मिथ्यावदन्तियतय सत्यचापिविरागिणः ।
सिद्धानामेपासिद्धान्तः सत्यमिथ्याविवर्जितः ।।
नियतेचकंथ मत्यं वर्ततेचेत्कथं वृथा ।
मृतिजीवनहनिंयत् कथंमत्यंकथं वृथा ।
एककाले भवेत् सत्य मेककालेतथाथा ।
कालभेदावृथा सत्यं न सत्यं न वृथा पृथक् ॥
भाल-परमहंम को परमहंम इस प्रकार जो कहा जाता
है तो पया यह उरए हम है परमात्मा निष्ट इस है, परम
हंस का श्रेष्ठ हमपना नो नमी होताता है जप कि यह ब्रह्म
रूप को प्राप्त हामाय, जब तक उसे माया गुणरचित प्रारम्ध,
कर्म का अभिमान है मग तक यह परबल होहो कै साना है,
अतः यह जोयरूप निकृष्ट हम ही रहा, हमको सपना और
मरालपमा पैसे प्राप्त हो सकता है, इमे तो पौयापन प्राप्त
है, पापकाक्षी होता ही है जो पाही ख में देने पर

दीपि में देखता है । जय आश्रमी हुआ तो श्रद्रत दृष्टि से हो
देमता है, यही एक दृष्टि है जिस से वह सब को अद्वत भाव
में देखना है, इस लिये सिद्धों ने निश्चय किया है कि इस
माकोताह एक श्राव से देखने वाले को परमात्मा के
5 को प्रपत्र शोर प्रल को भोजन बताते हुए रजोगुणी
गों में ही मन को लगाते रहते हैं। कुछ लोग माया से
मोहित होकर समस्त जगत् को मिथ्या मिथ्या कहते हुये अपने
देदीप्यमानशिप ही तत्व का फर्ता सिद्ध मत के अनुयायी
सागर्मसारकी रक्षा करते हैं अत में तत्त्व की औरत में
सन्तु सिदों का सिमारत यह कि यह मत्य भाग असत्य में
सन। यदि मनुष्य मरतातो यह मन्य मे पहाता
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
१७७
रही है जर यह वणों में रहता है तब तो माया को ही माया
दर्शन में एकाक्ष समझना चाहिये । कुछ लोग ऐसे हैं जो
का मसार का नेता समझने चल भारहे है।
पारको तया एकीभाव मे देतात से रहित तत्व की रक्षा
गत है । यमि सोग मिथ्या कहने विपपी सोग मत्य कहते है
अगर यह यतमान है तो पृथा फैसे माना
जा जीयन
मरण में रति । पद फैमे
वृषा दीमकता है। एक ही परंतु एक समय में माय
और एक समय में TMI दो माली है पास गेद में एक ही
तुमय और समयसमा २ नहीं।
REaik.
रम
---

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः.
-मनोवागतीतोमनोवाङ्मयश्वनाथः ओम् १ नाथः २
शक्ति: ३ कर्ता ४ अक्ता एतत्संचामिनि । क्रमेणतत्पंच
स्तौति-
अवाच्यमुच्यतकथं पर्दतदचिन्त्यमप्यस्ति कथं विचिन्तयेत् ।
अतोयदस्त्येवतदस्ति तस्मैनमोस्तुकरमवतनाधतेजसे ॥
भकततत्कतचतत्परंपदं प्रयान्ति योगामृततुप्तचेतमः
अकताकर्तृतया निरूप्यते नवास्तवावस्तुनितवीकृत ।।
अवाच्यरूपासदमद्विलक्षणा विचक्षणामाकृतलक्षणापिमा।
नमामितांशक्तिमकर्तृतामयीं स्वतःकरोत्येवयकर्ततामयीम्।।
निजेच्छयाकाण्डसमुद्भवाप्ययानुमानयादर्शितकर्तृतशिवम्
नमाम्यभित्तावपि चित्रितं जगद् विचित्रमतत्त्यनपेक्ष्यचेतम्म
ममेदमस्याहमहं मदक्रियः सदेवकतेत्यभिसन्धिपूरितम् ।
करोत्यकारमुदारलीलया य उच्यतेनाधइतिनियस्तुनः ॥
प्रमंगजकर्तृपदविहाययत् फणीवनिर्मोकमनायदास्थितम् ।
नमाम्यकर्तारमकतामयं यदस्तिमोऽस्मीत्यगुण स्वपंस्थितः
यस्यसाक्षादनुभव शास्त्रज्ञानेन तस्यकिम् ।
चेष्टास्वभावजास्त्रीणां कविभिवपर्यते श्रमैः ।
--
।

गोरक्षमिदान्तसग्रहः
१७६
जातमात्रः पिवद्वत्मो वालकोवाप्यपाठित ॥
यथामातुः स्तनपक्षी न तथापाठितोपिसन ।
पिनन्तोऽप्यमृतं नित्यममरानामराइह ॥
मिद्धायधूतासमरा गृहन्तोविषयानविपम् ।
मानेनविद्यमानंतु कर्माकुरमुपाददे ॥
नदेययोगछिनतु यातिनिर्मलतांदुतम् ।
मचितंक्रियमाणं च कर्मनश्यतितन्मते ॥
प्रारब्धंन पुनस्तत्र प्रमाणं श्रुतिरुच्यते ।
भूतकालोद्भकर्म मट्टाः सत्यं प्रकुर्वते ।।
सलचितयजम त्यजत्यत्याथमीद्रुतम् ।
पवं पुप्पं फलंशाखा छिद्यतेपि पुनः पुन ॥
नयापच्छियतमूलं तायपृतः प्ररोहति ।।
पुनः पुनभृतोगारा सूक्ष्मछिद्रय संयुत ।
निशोरिक्ततांपाति चिफल थमएवम ||
यातुगंगांगयांयात नमन्त्यरममयान गुरान ।
रापालपचिमात्यको जगदान्मामरिम्मन ।।

१८०
गोपिशानाप्रद
मंन्यामिनाविजामन्त कथयन्तु च पंटिना ।
अपनाः क्रियामिदानच म्पानिग्वना ।।
पांगमजन्यनं पानतिपयत्ययम् ।
हन्तिगायिरंदहं तनाव रहगधा ।।
मृजत्यञ्जाहगिः पाति हरः मंहग्ननगन् ।
तम्पाउन्यांमुक्निदम्ना गनः सिद्धयोगिनाम ॥
पतामः पथिभियांन्ति पवारा ज्योतिरालय ।
योगिनापटियालाराम्नागिराच्यादाग्गिः ॥
योगिनी योगयमन कालज्योनिम्नमम् ।।
इमायान्तीष्टमार्गग दुनंतपचगहन ।
स्वर्णाश्रमधर्मेण वैदिमाः ममुपास्यनत् ।
नियनिं परमायान्ति नद्भुमारित्रमानुपाः ।।
तान्तिः शुद्धविपणि पियान परिहायतन् ।
दुर्गमेनपधायान्ति जाराशाजनजनाः ॥
मंमारिणस्तु मंमारप्रलये प्राप्नुवन्तिनत् ।
कृतयानमियाशिं मसोका निरर्गलाः ॥

माम पदा जा सकता है जय पियोगी उसका चिन्तन
मारपरता हूँ। यह परम पदभकर्ता भीरपा दोनों ही
१८१
गोरक्षसिद्धान्तसग्रहः
नबुद्धिमान्प्रीतिं वृथावस्तुनिफल्गुनि ।
मृगतृष्णामयं माया जालकिमन्यतयत ॥
मोक्षशास्त्रकृतानेर दृष्टामुनिजनानृपा ।
नीतिशास्त्रकृत कान्ता श्रृङ्गारग्रन्थकारिका ॥
मूलमोक्षस्यावतो नीतिमूलनराधिप ।
कान्ताशृङ्गारमूलयद् वाचारम्भणमास्तिन, ।।
मा० टोo-मनवाणी से परे होते हुए भी मनोवारमय
है-श्रोम्-नाथ-शक्ति-कर्ता-अफ्र्ता इन
अनुनि की जाती है।
जी के ये पांच रूप
उम पद फो प्रयाच्य कैसे कहा जा सकता है, और अचि
है। इस लिये यह जो कुछ है में उसना तेज को
योगामृत से दप्त चित्त पाले उसका ध्यान करते है उस
पप और भास्य पारतय में दोनों ही नहीं है, क्योंकि
परंतु
में दो पात मे हो परती हैं। जो सत्
सन् से विरक्षण चिन्ह रहित और विन्द यासी

।" गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह १३ • समझने वाले सिद्ध पुरुप अमर है । ज्ञ न से कटा हुआ फर्म फिर धारित हो जाता है परन्तु योग से छिन्न हो जाने पर उस में यार उत्पन्न नहीं होना, घेदान्तियों के मत से सचित और प्रियमाण कर्म नष्ट हो जाता है पर प्रारब्ध नही इस में वे स्वयं भनि का प्रमाण देते है भट्ट मत के अनुयायी मीमांसक सोग पहले के किये हुए कर्म सत्य कहते हैं, परन्तु प्रत्याश्रमी अवधून उसशे भी छोड़ देता है । वृक्ष की शाखा और पन पुष्प मादिकों को कितनी बार काटो यह फिर उग पाता है परन्तु | जर म्ल कट जाता है फिर यह नहीं उगता । जिस घड़े में मम दिन है उस में चाहे जितनी पार जल भरो यह खाली । जाता है। और भरने वाले का श्रम व्यर्थ होता है । गहा में स्नान करते हैं गया में जाते है और पत्थर की बनी हुई मूर्तियों की पूजा करते है परन्तु इस शरीर रूपी घर में जो जग. मामाशमान है उसे याद नहीं करते। संन्यासी भलेही जानते हो और पंडित उसे येशक कहते हो परन्तु क्रिया सिद्ध अवधूत सिक विकार रहित रूप में तद् रूप होकर विराजमान रहत है । मि पाग देह से बहरोभ्यर नाप उत्पन्न करता है, काल के भयो यचाता और विषय रूप देह को नष्ट करता है। ब्रह्मा अगर को उत्पत्ति विष्णु जगत् की रक्षा और हर जगत् का हार करता है। इन तीनों से अन्य नाथ मुक्ति देता है यह १४ गोरक्षसिद्धान्तसग्रह योगियों का सरेत है। योगी वैदिक तान्त्रिक मोर व्यावहारिक ये चारों हो चार मागों से उस ज्याति रूप धाम में पहुंचते है । योगी लोग योग यज्ञ से उस उत्तम ज्याति को पूज कर पक्षियों के समान शीघ्र ही उस के पास पहुंच जाते हैं। तात्रिक लाग विषयों को धारण करके जेसे जार लोग जनता से परि पूर्ण माग को छाड कर चलते हैं उसी तरह इस शुद्ध विपणि में दुर्गम पथ से जाते है। परन्तु ससारी लोग ससार के प्रलय में उसे प्राप्त हाते है जैसे नाम लाग पडी यात्रा करके कष्टों से राजा तक पहुचते है । बुद्धिमान को व्यर्थसार हीन वस्तुओं में प्रीति नहीं करनी चाहिये पगे कि वह इस माया जाल को मृग तृष्णा के समान ही समझता है। मुनिजन और राजा लोग मोक्ष शास्त्र को नहीं बना सकते और शृगार रस में मन्न रहने पाली स्त्रिया मीति शास्त्र को नहीं यना सक्ती, अपितु मोक्ष शास्त्र का मूल अवधूत ही है नीति का मूल राजा और गार का मूल स्त्री है बाकी सब व्यर्थ वकवास है मू-एवतेवयोऽपि क्रियायामेव प्रसन्ना क्रिया युक्तंति कथने नापि प्रसन्ना परन्तु नतु मिया रहित कथनेन प्रसन्नात्रयेण वयोऽपि पुरपा स्वसग वर्जितास्तद् यथा-अवधूत इति विना-

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
नुभवेन शास्त्रारम्भकाः पुरुषा इति राजनीतिः । कर्तव्यता हीना
भृत्या इति । स्त्रीजन इति। पुरुपा अर्थहीना पुरुपा इति ।
तांस्त्रीन् बयोहसन्ति । कथम् ? एक कोऽपिपुरुपो मन्दकाम:
कस्यापिवद्यम्य गृहेगत्वा तं प्रतिस्वचेष्टोक्ता तदावेद्येनोक्तं
यत्नं करिप्यामीति तस्य वैद्ययधूः पार्श्ववर्तिनी सहसा जाता।
तस्या अभिप्रायोऽयम् । अयंममभर्ता वैद्यःस्वयंमपि नपुंसकोऽ
न्यस्य कामोदय यलं कथंकरिष्यतीति स्वयमसमर्थो ऽन्यस्यार्थ पाक
करिष्यतीति प्रतारणामावमिति ।।
ब्रह्मभृतोमुनि व्यासो मिथ्यामायोपदेशत ।
कृतानेकपुराणोऽभूत्तस्यैमायै नमोस्तुते ।।
वशिष्ठादिमुनित्रातस्त्यागस्यैवोपदेशकत् ।
स्वयमङ्गीकृतस्त्रीकस्तस्मै भोगायते नमः ॥
दासा प्रेमातुराभक्ति पुरुषार्थ वदन्त्यहो ।
सशरिंगते चित्ते भक्तिःप्रेम्णासमंगता ।।
योगः स्माता वैष्णवश्च धर्माभूपास्त्रयास्त्विमे ।
कर्मारिभ्यस्त्रिधाञ्यन्ति स्वात्मदेशंतु सुस्थितम् ॥
वैष्णवो नृपतिधों नित्यांमत्वा च संमृतिम् ।

गोरक्षासद्धान्तसमहः
कर्मद्विपः समाश्रित्य यातिखंदेशमात्मना ॥
स्मार्तस्तु नृपतिधर्म सत्यंप्रारब्धमात्मगम् ।
कारिम्पोनालिदया याति स्वदेशमात्मना ।
योगधोनृपस्सर्वान् जित्वाधर्मद्विपावली ।
मनश्च किंकरं कृत्वा यातिस्संदेशमात्मना ।।
एतद्ग्रन्थेवहुशास्त्राणा प्रामाण्य दीयते। तत्तु अम्मदीयार्थ
वा एतन्मार्गस्य शिष्याणा श्रद्धार्थदीयतइतिनास्ति । 'अस्मिन्नर्थेतु
योगशास्त्रस्यैवप्रामाण्यमेतच्छास्त्रज्ञानेन पूर्णम् । परन्तुवादिना.
हितायभो अन्यग्रन्थान्तरेऽपिभवदीयनानामतान्तरेऽपि चायमेवमा.
श्श्रेष्ठ । सर्वस्य लक्ष्योऽवधूत एवेतिहेतुर्नतु सिद्धान्तार्थ । अरमा
क्वन्यप्रमाण उपेक्षेति ज्ञेयम् ।।
भा०-इस प्रकार अनुभव के विना शास्त्र रचना करनेवाले
साधारणउन, राजनीति चलाने घाले राजा लोग, और शृङ्गार
शास्त्र धनाने पाले, ये तीनों व्यावहारिक काम में ही
खुश रहते हैं यहार करना चाहिये यहुन अच्छा है
ऐसे करने से भी बहुत प्रसन्न हाते हैं करने पर तो
कहना ही पता है। किन्तु व्यवहार अनित्य है इसका स्याग
ही अच्छा है ऐसा कहने से तो खुश नहीं होते हैं। इसलिए

गोरक्षसिद्धान्त संग्रहः
इन तीनों का सम्बन्ध अवधूत योगी छोड़ देते हैं। स्वयं जिसने
अनुभव नहीं किया किन्तु उस विषय का शास्त्र बनाता है।
जिन्होंने राजनीति अर्थात् कानून शास्त्र को बनाया किन्तु
उसके संचालक कर्मचारी नहीं है। स्त्री और जो धनहीन
पुरुष है इन तीनों को तीनों हंसते है। कैसे हंसते है इस पर
एक दृष्टान्न दिया जाता है किसी एक धातुक्षोण रोगी ते
किसी चैद्य के घर पर जाकर वैद्य से अपना राग कहा, तय
वैद्य जी ने कहा, कि अवश्य में इसका उपाय करूगा, यह
सुन कर उसके समीप बैठो हुई वैद्य की खो हंसने लगी,
उसका अभिप्राय यह था कि मेरा पति वैद्य स्वयं नपुसक
है तब दूसरे के लिए कैसे कामोद्दीपन का उपाय करेंगे।
जो स्वयं अपने लिये रसोई नही कर सकता वह कहे कि
दूसरे के लिए रसोई करूगा यह केवल ठगना है। यहां कोई
माया की पड़ी विचित्र घटना को देख कर उस माया को
नमस्कार करता है, जो माया सत्ता से रहित होते हुए भी
परमेश्वर को अपने व्यवहार में शामिल कर लेती है और हे
माया देयी ? तुमने ब्रह्मस्वरूप समाहितात्मा श्री व्यास जी
को भी अपना उपदेश देकर अपने यमाए संसार के व्यग्रहार
को दिखाने वाले पुराणों की रचना करवाई इसलिए तुमको

૧૮૮
गारक्षसिद्धान्तसंग्रहः
,
प्रणाम करता है। और भी देखिये जिन वशिष्ठादि मपयों
ने लोगों में त्याग का उपदेश दिया परन्तु अपने आप स्त्री
नादि सांसारिक भोगों का संग्रह किया, शत. हे माये तुम्हारे
भोग को नमस्कार है : उपासक लाग दास भाव से प्रेम म
विह्वल होकर भक्ति को ही मोक्षादि पुरुषार्थ का साधन कहते
हैं। परन्तु भक्ति तो शरीर में रहने वाले चित्त का धर्म है
इसलिए वे प्रेम के जाल में पडकर अपने स्वरूप बोध से
यचित रह जाते है। योग १ स्मात २ और वैष्णव ३ ये तीनों
धर्मराजा के समान है, और कर्म रूपी शनुनों से अपनी रक्षा
करते है किन्तु अात्मा तो वास्तव में सदा अपने स्वरूप में ही
रहता
है उसका नाश कहां इसलिए उसकी रक्षा की चिन्ता
करना यह भी माया काही धर्म है। अयथागे योग-मार्स
और वैष्णर इन तीनों का नाम से व्याख्यान करते हैं-जा
चैप्णय गजधर्म है उसके अनुयायो संसार को सत्य मान कर
कर्म रहित पुरुषों को भी विष्णु की शरण में पहुचा देते है ।
दूसरे जो धर्मशास्त्र राजधर्मावलम्बी हैं वे प्रारब्ध को सत्य
मान कर अपने पापों को नष्ट करने वाले देवताओं को यलि
देकर भभीष्ट लोक को चले जाते है। तीसरे यलो योग धर्माः
मलम्पी पुरुष सय धर्म पियों को जीत पर और मन को

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः जीत कर अर्थात् मन को श्राना दास बना अपने अभीष्ट लोकों को प्राप्त होते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि उपर्युक्त जितने साधन हैं, यह सब माया का खेल है अतः जब तक माया वश में नहीं होती तब तक मुक्त नहीं कहा सकता। इस ग्रन्थ में अनेक शास्त्रों का प्रमाण दिया जाता है। यह हमारे लिये अथवा इस मार्ग में रहने वाले शिष्यों की श्रद्धा के लिये दिया जाता है ऐपा नहीं समझना। क्योंकि इस विषय में योग शास्त्र को ही सर्वोत्तम प्रमाण माना जाता है, यह शास्त्र समस्त ज्ञान का भंडार है किन्तु वादियों के कल्याण के लिये कहा जाता है कि अन्य ग्रन्थों में और अन्य मतों में भी योगमार्ग ही श्रेष्ठ है। और सबा अन्तिम लदय अवधूत ही है यह युक्ति बताई जाती है न कि अपना सिद्धान्त स्मोंकि हमको अन्य प्रमाणों की ज़रूरत नहीं। मू०-अवधूतशिष्यविनेतरसाम्प्रदायिकशिघ्या मुग्धावर्तन्ते अवधूत सम्प्रदायस्य इयं रीतिः, पशिल्लक्षणसम्पन्नोगुरुभत्रिंश- लक्षण सम्पन्नः शिष्यस्ततश्चतुर्लक्षणन्यूनः । गुरुशिष्यलक्षणच-- अधिक तत्त्वोगुरुन्यूनतत्त्वः शिष्यः । एतादृड्न्यूनत्वंतुयोग्यनतु मूर्सशिष्योधिकलक्षणहीनो मोक्षमाग्भवेत् । पुराणे शौचक्रियादि फरणपर्यन्तक्रिया उपदिशतीतितन्महासिद्धा हसन्ति । अहोबुद्धि.

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह मन्तः शिप्यास्तान् गुरुन् एताष्ट्रक्रिया अपि कथयन्ति । शिष्यम्यबुद्धेः पराऽवधिरिति । एतादृश शिष्यकरणेगुरूणां दोपः प्रवर्तते ! अतएवमहासिद्धावहून्दीक्षितान् न कुर्वन्ति । कथं ? वहयोविवेकिनोनभवन्ति । यथास्त्रियां भ्रष्टायां पत्युलजा तथाशिघ्ये भ्रष्टे गुरूणांलमानिन्दापातकं च प्रवर्तते । अतएक्यहुदीक्षिता आचार्या गुरवस्त्याज्याः, महासिद्धएवगुरु कर्तव्यः । महासिद्धरपि चतुर्लक्षणन्यूनीशिष्यः कर्तव्योववश्च शिष्यावर्जनीयाः इति सिद्धान्तः। . भा०-अवधृती के शिष्यों की अपेक्षा इतर सम्प्रदायों के शिष्य निकृष्ट होते हैं । अब आगे अवधूत सम्प्रदाय की मर्यादा घताई जाती है- छत्तीन लक्षणों से युक्त गुरु होते हैं और बत्तीस लक्षणों पाले शिष्प, फरक हनना है कि चार लक्षण होने से शिष्य कहलाता है, गुरु और शि-य का लक्षण हो ऐसा है कि जो अधिक तस्य लक्षणयाला है वह गुरु और कम लक्षण घाला शिष्य होता है शिष्य में इतनी ही न्यनता उचित है पिरकुल मूर्ख होना ठीक नहीं। गुरु की अपेक्षा न्यून लक्षण याला शिष्य मोक्ष का भागी हो सकता है। पुराणों में शौच मादि - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः बाह्यक्रियाओं का उपदेश दिया गया है, उसको महासिद्ध हसते हैं। परन्तु आश्चर्य की बात है कि बुद्धिमान् शिष्य उन गुरुओं को ऐसे कर्मों का उपदेश देते हैं, इससे नो शिष्य की ही धुद्धि बड़ी हुई। ऐसे बकवादी शिष्य बनाने में गुरुओं को दोष लगता है । इसी लिये महासिद्ध बहुत शिष्य नहीं बनाते पयोंकि उनमें सभी विवेकी नही होते जैसे स्त्रियों के भ्रष्ट हो जाने से पति लजित होता है ऐसे ही शिष्त्रों के भ्रष्ट होजाने गुरु को लजा भाती है तथा निन्दा और पाय भी होता है। अनः यहुत शिष्य बनाकर उनके सुधार में ध्यान न देने वाले गुरुओं को भी छोड देना चाहिए । महासिद्ध को ही गुरु बनाना चाहिये । महासिद्धों को भी चाहिये कि चार लक्षणों से हीन चेला बना बहुत शि-य न बनायें यहो सिद्धान्त है। श्रय शिष्यस्य द्वात्रिंशल्लक्षणानि लिस्यन्तेप्रयमतोज्ञान परीक्षा निरालम्बः । निर्भमः २ निवासी ३ नि.शब्द. ४ । विवेक- परीक्षा--निर्मोहः ५ निधनः ६ निराक; ७ निर्विषयः ८ सर्वांगी। सावधानः १० सन् ११ सारग्राही १२ निरालम्ब परीक्षा- निष्प्रपंचः १३ निस्तरंग: १४ निद्वन्द्वः १५ निलेपः १६ । सन्तोपपरीक्षा-अयाचकः १७ भवांच्छकः १८ प्रमान, १६ - १६२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह अस्थिर: २. शील परीक्षा-शुनिः २१ संयमी २२ शान्तः २३ श्रोता २४ । महन परीक्षा-सुहृत् २५ शीतलः २६ सुम्पदः २७ स्वभावः २८ अष्टम शून्यपरीक्षा - लयः २६ लक्ष्यम् ३० ध्यानम् ३१ समाधिः ३२ इति द्वाशिल्लक्षणानि शिष्यस्य ममाप्तानि ॥ भा०-भय शिष्यों के बत्तीस लक्षण जो कि शिष्यों के लिये थाघश्यक है नीचे लिखे जाते है, इन बत्तोसों में से पाठ पस्तुओं की परीक्षा होती है। उन श्राठा में एक एक में चार २ विषय है इसलिये मिलाने पर पाठ चौक पत्तीस होते है। उन नामों का अक्षरार्य करने से ही उनमे सय लक्षण होजाते हैं, उन में पहले ज्ञान की परिक्षा है-निगलम्प, सहायता शून्य अर्थात् जो देशकाल महनारा शरीर भादि पाश्रय न करके केवल गुरु के उपदेश द्वारा अदृश्य पट् चकादि को जानने घाला । यह पहली परीक्षा है। दूसरा निभ्रम २ अर्थात् नम- रहित । निघासी ३ जिममें शान स्थिर रहे। निसन्द ४ संज्ञा- रहित केवल अर्थ के शानवाला । भय अयिक परीक्षा में चार बताए जाने हैं-सांङ्गो १ लक्ष्य के प्रत्येक अवयर सहित अर्थात् लक्ष्य के चारों तरफ ध्यान रखने याला । - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा ग . सावधान ? लक्ष्य पर डटने वालो। सत् ३ सत्वरूप अर्थात् कुतकी न हो । सारग्राही ४ उपयुक्त विषय महण करने वाला। भय संतोष में चार दिनाये जाते है-अयाचक १ सिवाय नत्वज्ञान के किसी से किसी चीज की याचना न करने वाला। अवांछक ! जिनके मन में सांसारिक वस्तुओं की वासना ने हो । श्रमान ३ जो धन विद्या बल आदि फै घमड से शन्य हो। अस्थिर ४ किसी स्थान में आसक्ति न करने वाला । अब शील की परीक्षा में चार दियाये जाते हैं- शुचि १ स्नानादि द्वारा वाघ शुद्धि और पवित्र अन्नादि के भोजन से अन्तःशुद्धि तथा पवित्र मन बाला। संयमी २ सांसारिक विषयों से जिसने इन्द्रियों को हटा लिया है। शान्त ३ सय श्रयस्थानों में धीर रहने वाला । श्रोता ४ अध्यात्मविद्या में प्रेम रखने वाला। श्रय सहम परीक्षा का वर्णन किया जाता है-सुहृत् १ सय मजनों से प्रेम रखने वाला और दुर्जनों से उदासीन रहने चाला : शीतल २ अपराध करने पर भी दोह बुद्धि न रखने चांला । सुखेर ३ सजनों को सुख देने वाला । स्वभाव ४ जिसका श्रारण किसी के विरुद्ध न हो। शुन्य अर्थात् विरक्तता को परीक्षा में भी चार कहे जाते हैं-- लय १ किसी में मन की वृत्ति न रखना। लक्ष्य २ अपने ध्येय का निश्चय ।

गोरक्षसिद्धान्तसंप्रदा
ध्यान ३ उस लक्ष्य के स्वरूप में चित्त को लगाना। समाधि
जिसमें में ध्यान करता हूँ इस प्रकार माता और ध्येय श्रादि
भेद भाव के टूटने से निल दीप शिवा की तरह केवल
ध्येय काही भाग हो। ये सब मिलाने से शियों के ३२ लक्षण
होते है सो समाप्त हो चुके ।
मू० अद्वतोपरिवर्तिनाथ उदितायवध्वनिस्सन्ततो।
नादौविन्दुस्तापि शक्तिरुदितामाचाईमातात्मिका ॥
ऊ रुद्रोहरिराविधिर्मितिसमध्ययोऽस्तुनित्यमहान् ।
श्रोङ्कारोऽखिलशब्दबीजमधुधरज्ञातरूपोमुढे ॥
अयमोङ्कारों महासिद्धानां ध्येयः, तस्यस्वरूपम् -
उकारोऽत्ररुद्रस्वरूपमर्धमात्राशक्तिस्वरूपं विन्दुर्नाथस्वरूपम
धमात्रयाजातीकारोविष्णुस्वस्पंचिन्दोर्जातोमकारोब्रह्मस्प
रूपं धनिाराकारनाथस्वरूपं व्यापकंध्वनिवर्णश्चोभयम
पिमिलितं पूर्ण यद्द्वताद्वैतविलक्षणं साकारनिराकारातीतम
देतोपारिवर्ति महानाथस्वरूपमिति । किंचात्राझार उकार
विन्द्र्धमात्रयोोगादेव । बिन्दुयोगान्मकारोऽर्धमात्रायोगा
दकार इति । तथा चोकार नाथशिवशक्तिरूपप्रायल्यविष्णु

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २६५ ब्रह्मरूपयोरपावल्यम् अतएवात्रैतद्देवतात्रय ध्यानमहासिदै मुख्यत्वेन क्रियते पुन निर्निराकारनाथरूपंवनिर्वणश्चो भयात्मकः पूर्णनाथस्तुसाम्प्रतमस्तितथास्त्येवेति ब्रह्म विष्णु ध्यान तोनाथशिवशक्तना ध्यान मुत्तममुक्तम् ,तत्रापि नाथ ध्यानं बलिष्ठम् उकारो यद्योकारः स्यात्तदामात्र शक्त्यैव • उकरोपि यद्योङ्कारः स्यात्त दिविन्दु शक्त्यैवविन्दुर्यद्यपिवर्ण- स्तथापि तत्र स्वरस्याधिक्य स्वरश्च वर्णापेक्षयाबलवानेव । कथं तत्रध्यानभागस्याधिक्यात् धनिश्च नाथरूपमेव, यतोनाथध्यानं बलिष्टमित्युक्तम् । तदुक्तं योगशास्त्रे- ब्रह्मग्रन्थिततोभित्वा विष्णुप्रन्थिभिनत्त्यसौ विष्णुग्रन्थि ततोभित्त्वा रुद्रग्रन्थिभिनत्यसौ ॥ रुद्रग्रन्थिततोमित्या छित्त्वामोहमयीलताम् । उद्घाटयत्ययंवायु ब्रह्मद्वारंसुगोपितम् ॥ इत्यादि-- -- भा० टो-अन के ऊपर नाथ है अर्थात् कार्य रूप दृश्य मान स्थूल जगत् और इसका कारण सूक्ष्म रूप प्राति और देसको समष्टि ये कार्य कारण के अभेद होने से अनपद से

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह
लिये जाते हैं। उसके ऊपर अर्थात् एक व्यापक और एक
व्यापध वस्तु है यहां आपस में अपर कहने का व्यवहार हो
सकता है जैसे श्राकाश के ऊपर पृथिवी और पृधियी
के ऊपर श्राकाश ऐसे ही यहां अगएड नाथ जी परिच्छिन
संसार के ऊपर हो सकते हैं और नाथ के ऊपर ससार
भो कहा जा सकता है । नाथनी म्बयं अम्बण्ड चिढ़ ग है और
उनकी शति भी चिद्रा है जिस में पनि अर्थात् स्फोट रूप
शब्द ब्रह्म नाद अर्थात् संसार के उपादान कारण शक्ति का
सम्बन्ध, बिन्दु का ससार को यनाने वाली आदि
प्रकृति ये नाना सृष्टि करने वाली शक्तिया प्रकट
होती है वह शक्ति आकार को अर्धमात्रा रूप अर्थात् ऊपर की
अर्धमात्रा उस शक्ति का लक्षक है, अकार वि•णु का उकार
रुद्र का मकार ब्रह्मा का वाचन है इन सय का ममुदाय
मधिष्ठान रूप अस्वएनु सच्चिदानन्द समस्त शब्दों का कारण
साधारण पुरुषों से अजात ओंकार परमानन्द के लिये मेरा
ध्येय हो ऐसी धारणा करनी चाहिये । यह प्रोकार महाबिड़ों
का ध्येय है। उसका स्वरूप इस प्रकार है उस में जो उकार है
यह रुद्र का है।
अर्धमात्र शक्ति रुप है विन्दुनाथ रूप है श्राधी मापासे उत्पादन

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः १६७ श्रकार विष्णु रूप है और विन्दु से उत्पन्न मकार ब्रह्मा है इन में ध्वनि निराकार नाथ रूप और वर्णरूप भी है वह सबका समु- दाय परिपूर्ण कहाता है जो कि द्वैत अद्वैत से विलक्षण साकार निराकार दोनों से अतीत है इस लिये अद्वैत के ऊपर वर्तमान श्री महानाथ स्वरूप है । श्रोंकार जो है वह उकार बिन्दु और अर्धमात्रा इनके योग से ही होता है । अनुस्वाररूप विन्दु से म्कार होता है इसी लक्ष्य को लेकर व्याकरण में स्वर के परे होने पर अनुस्वार को मकार कर दिया जाता है और लय दशा में मकार का अनुस्वार कर दिया जाता है अर्धमात्रा के सम्बन्ध से प्रकार होता है। इस से स्पष्ट होरहा है कि ओंकार में विन्दुरूप श्रीनाथ जी, अर्धमात्रा श्रीशक्ति, और उकार, तेज स्वरूप रुद्रये प्रधान हैं, अकाररूप श्री विष्णुजी और मकार रूप श्री ब्रह्माजी अप्रधान है परन्तु प्रणव पंचदेवात्मक ही है महासिद्ध लोग तो इस में प्रधान रूप से पूर्वोक्त नाथ-शक्ति- और रुद्र इन तीनों देवों का ही ध्यान करते हैं। ध्वनिरूप निराकार और वर्ण इन दोनों का समुदाय परि पूर्ण स्वरूप आदिनाथ जी प्रलय में जैसे विकार रहित रहते हैं वैसे ही सृष्टि समय में भी अधिकृत रूप से रुद्र स्वरूप हैं इसी लिये ब्रह्मा और विष्णु के ध्यान से नाथ, शिव, और शक्ति इन १९८ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा तीनों का ध्यान पडा कहा गया है। इन तीनों में भी नाथ का ध्यान विशिष्ट है । उकार जय मामा शक्ति का सम्बन्ध करता है तय ओंकार रूप हो जाता है। और जय विन्दु रूप से सम्बन्धक करना है तो कार रूप हो जाता है। बिन्दु भी यद्यपि वर्ण है तथापि उस में वर का भाग अधिक है, म्बर वर्ण से पलवान् है इस लिये स्पर के बिना वर्ण का उच्चारण नहीं होता। पर्यो कि ? उस में ध्वनि भाग अधिक है और पनि नाथ रूप है इस लिये नाथ का ध्यान यलयान कहा गया है। यही योगशास्त्र में भी कहा है- पहिले ब्रह्म गांठ अर्थात् स्वाधिष्ठान चक्र का भेदन करे फिर विष्णुमन्यि अर्थात् मणिपुर चक्र को भेदन करे, उसके बाद रुद्रनन्धि जो हृदय में अनहत चक्र है इसके बाद फण्ठदेशम्य विशुद्ध चक्र में विद्या जीव शक्ति की प्रन्थि का भेदन करके रोके हुए प्राणवायु द्वारा थाना चक्र रूप ब्रह्म द्वार में ज्ञान शक्ति के द्वार को न्योल कर उसको प्राप्त कर लेता है। मू- -योगसम्प्रदाय विनासर्वमतेविपरीतायाती वर्तते, कथं नाथांशोनादोनादांशः प्राणः शक्त्यशो विन्दुविन्दोरंशः शरीरम्, एवच योग सम्प्रदाये शिष्योधिको यो नादांशोज्ञायते- ऽन्यमते पुनोऽधिकः कथ्यते । सचाधिकः कथं भवेत् । कथं वपुर्वि- - + . गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः १६४ न्दुतो जानम् । पुनः पुनः नादांशः प्राण उक्तो विन्द्वशः शरीरमुक्तम् तत्रापि प्राणाच्छरीरमुत्तिष्ठति शरीरस्याधारः प्राणोभवति । तथाच नादस्यात्मजशिष्यएवाधिक इति । अन्यच्च कथ्यते- जनिता चोपनेता च यस्तुविधां प्रयच्छति । अन्नदाता भयत्रातापंचते पितरः स्मृताः ।। राजपत्नीगुरोः पत्नी मित्र पत्नी तथैव च पत्नीमातास्त्रमाता च पंचतामातरः स्मृताः ।। इत्येतत्कथने प्राधान्यपिसोरेवायानेतत्समीचीनं न भवति । इयरीतिः सांसारिकी नतु पारमार्थिकी वार्ता अतः कारणाद्गुरु- रेवमुख्योनादात्मजः शिष्य एयमुख्य इति सिद्धान्तः किं च धर्मो र्थःकामोमोक्ष इति ब्रह्मचर्यगार्हस्थ्यवानप्रस्थःसन्यामइतिः शृंगा- रोहास्यकरणोरौद्रोधीभत्सोभयानकोद्भुतंशान्त इति । पृथ्वीआ- परतेजोकायुराकाश इति ब्रह्मा विष्णुरुद्रादिश्च । एतत्प्रक्रिया- याअनुक्रमोनारित किन्तुन्यतिक्रमो वर्तते । किन्त्वनुक्रम- रत्वे रोत्या मोक्षोधर्मोऽर्थः कामः सन्यासोवानप्रस्थोगाई- रक्ष्यब्रह्मचर्यम् । शान्तःकरुणोऽद्भुतं वीरोरौद्रोहास्यभ- यानकोबीभत्सः शृंगारः । आकाशाद्वायुर्यायोस्तेजस्तेजसो जल जलात् पृथिवी । पुनः शिया भैरवो भैरवाच्छ्री कंठीक- २०० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः ठात् सदाशिवः सदाशिवात् ईश्वरः ईश्वराद् रुद्रोरुद्राद्विष्णुर्विष्णो ब्रह्मा। इतीय योगसंप्रदायरीतिः, साएवतांत्रिकी। परन्तु शिव भैरव श्रीकंठेति देवनयक्रमासूवे नं गृहीतः पञ्चैयदेवता सदाशियादयोः गृहीतास्तत्रापि पौराणिकेवैदिके देवतात्रयमेव गृहीतम् , तत्क- थ्यते-ब्रह्माविष्णू, रुद्र इति पुराण प्रक्रिया ब्रह्माविष्णु,:- रुद्र ईश्वरः सदा शिव एपा तांत्रिकी प्रक्रिया ॥ अवधूतैः कथ्यतेएपाप्रक्रियाकुत भागता सर्यायोगादेवागता, यतः सर्वस्यकारणं योगएव प्रवर्तते यतोऽवधूताद्भितुकोजातो- भिक्षुकाद् ब्रह्मचारी ब्रह्मचारिणो गृहस्थोजातः । कथं ? एकैकगुण लक्षण हीनो हासक्रमेण सम्भूतं सन्तानमेवेति मन्ये ।प्रथमतो गौणमुख्य प्रक्रियाकथिता, तत्रकाचिद् उत्पत्तिकमतो मुख्यागौणी- या ज्ञेया, काचिघ फलवृक्षरीसामुख्यागौणीवेतिज्ञेया । एकदा महासिद्धश्रीगोरक्षनाथशिष्येणसिद्ध विचारनाथेन भर्तृहरि नृपेण व्याकरणशास्रोपरिलक्षसंख्याःकारिकाःकृताः, नागेशेनताः श्रुताः। तदाप्रसन्नो भूत्वा ब्रह्माण्डेविहरन् समागतो यस्तत्र स्थितोमहाव- धूत भागत्यचादेशादिव्यहारकरणनन्तरं तेनोक्तमहो खामिन्न हंतुष्टोरिस यतः फांचित्यापनांकुरु । तदामहासिद्धेनोक्तंवव मिलने सुसंजातमन्यत्तु नास्त्यपेक्ष्यकृतकृत्य एयास्मि ! पुनः पुनस्तेनशेपे.

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २०१ णोक्त याचनीयमेवेति । तदा भर्तृहरिणोक्तं किं याचेयद्यैश्वर्य न्छा भवेत्तत्तुमहाराज्यत्यक्त्वाऽवधूतोजातः पुनर्मोक्षस्ययदि- वांछाभवेत् सातु अवधूतभावे सिद्ध्त्येवसंशयो नास्तीति । तदा शेपेोऽसन्तुष्टोभूत्वाममापमान कृतोऽत. शापंददामि, भवदीयका- रिका. प्रसिद्धानभविष्यन्तीति । तदाऽवधूतेनाप्युक्तं त्वदीयकृत व्याकरणशास्त्रकलौहत्त्यर्थ भविष्यति, पुनर्यत्रकुपिस्थलेसंशयो भविष्यतितदाममकारिका विनानिर्णयोन भविष्यतीति । एय परस्पर शापोजातः, तेनाऽऽधुनिकसमयेव्याकरणादिसाधनशास्त्रं परमार्थेन्यूनं भवतिचातुर्यादिप्रकारः प्रायशोभवतीति । भग० योग सम्प्रदाय को छोड कर अन्य सब मतों में विप- रोन चातें प्रचलित हो रही हैं । कैसे ? नाथ जी को अशनाद जिस का अंश इस शरीर में प्राण रूप है उसके ऊपर नाथ जी शासन करते हैं श्रत प्रारण शिष्य और नाथ जी उस के आचार्य है। शक्ति का प्रशविन्दु है, बिन्दु का अंश शरीर है यह उत्पन्न होने से पुत्र कहलाता है। इस योग सम्प्रदाय में प्राण घायु का विशेष महत्व है, अन्य मतों में पुत्र रूप शरीर अधिक माना जाता है इसी लिये वे शरीर का ही संस्कार प्रधान रूप से करते हैं। प्राण का अधिक महत्व कैसे है सो दिखाते हैं-शरीर २०२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः विन्दु से होता है प्राणनाद का अंश है यह पार बार कहा जा चुका है, प्राण से ही शरीर बढ़ता है और श्राना जाना बैठना खडा होना इत्यादि व्यवहार भी शरीर से ही होता है। शरीर का श्राधार भी प्राण है, इस लिये शिष्य रूप नादाश प्राण ही अधिक है। इसी विषय में और भी कहा जाता है -जन्म दाता १ यज्ञोपवीत संस्कार कर के गायत्री मत्र देने वाला २ शास्त्र पढाने घाला अन्न देने याला ४ भय से रता करने वाला ५ ये पांच पिता कहे जाते हैं राजा की स्त्रा गुरु की स्त्री मित्र की पत्नी अपनो स्त्री की माता और अपनी माता ये पांच माताए होती हैं। इस कथन स माता और पिता ही प्रधान होते हैं यह ठीक नहीं है क्योंकि यह मर्यादा सासारिक व्यवहार में है, परमार्थ में नहीं, इस लिए परमार्थ में पिता की अपेक्षा गुरु हो मुख्य है इसी तरह पुत्र को अपेक्षा शिष्य मुख्य है यह सिद्धान्त है। लोक में धर्म अर्थ काम मोक्ष,इस प्रकार व्यवहार होता है, इस से प्रतीत होता है कि धर्म प्रधान होने से पहले कहा गया है और मोक्ष प्रधान हाने से पीछे कहा है। इसी तरह ब्रह्मचर्य-गार्हस्थ्य वानप्रस्थ सन्यास, तथा श्रृंगार हास्य- करणरौद्र पौभत्स भयानक अद्भुत शान्त, इन दोनों दलों में गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २०३ ब्रह्मचर्य और श्रृंगार को प्रधान माना जाता है। इसी तरह पृथ्वी जल तेज वायु श्राफाश तथा ब्रह्मा विष्णु रुद्र इन में पृथियोऔर ब्रह्मा को प्रधान माना जाता है किन्तु यह सब क्रम उलटा है, यास्तव में तो उन पूर्वोक्तों में मोक्ष संन्यास-शान्त आकाश रुद्र ये ही प्रधान हैं इसलिये ऊपर का क्रम उलटा होना चाहिये अर्थात् मोक्ष धर्म अर्थ काम संन्यास वानप्रस्थ ब्रह्मचर्य गार्हस्थ्य, शान्त करुण श्रद्भुत घीर रौद्र हास्य भयानक बीभत्स शृङ्गार, आकाश वायु तेज जल पृथिवी इस क्रम से । इसी लिये योग सम्प्रदाय | की यह रीति है कि शिव से भैरव प्रकट हुआ, भैरव से श्री कंठ श्रावएठ से सदाशिव सदाशिव से ईश्वर ईश्वर से रुद्र रुद्र से विष्णु विष्णु से ब्रह्मा, यही रीति तंत्र की भी है। परन्तु सूत्र अन्य अर्थात् संहिता में शिव भैरव और श्री कंठ इनतीन देवों काक्रम नहीं कहा है, किन्तु सदा शिव १ ईश्वर २ स्द्र ३ विष्णु ४ ब्रह्मा ५ इन्ही पांच देवों का क्रम कहा है, उस में भी पौराणिक और वैदिक ग्रन्थों से रुद्र १ विष्णु ब्रह्मा ३ इन नीन ही देवों का क्रम संक्षेप से बताया गया है । ग्रह्मा १ पिणु २ रुद्र ३ यह पुराणों का क्रम है, और ब्रह्मा विष्णु रुद्र ईश्वर सदा शिव यह तंत्रों का क्रम है । इस पर अवधूत कहते हैं-कि यह कम कहां से आया? यह सव योग से ही आया अत. सय का कारण योग ही है। इसी लिये अवधूत से - २०४ गोरक्षसिद्धान्तसग्रहः भिक्षुक हुआ भितुक से ब्रह्मचारी, ब्रह्मचारी से गृहस्थ कैसे? एक एक गुण लक्षण हीन होकर हास के क्रम से जो हुआ है उसको सन्तान ही मानता है। पहले गौण धौर मुख्य कम कहा गया है, उनमें से किसी का उत्पत्ति कम से मुख्य या गोण जानना चाहिये । अथवा जैस काई उद्देश्य रूप होने से फल को मुख्य और साधन रूप होन से वृत का गौण कहते हैं। कोई कोई वृक्ष को कारण रूप होने से मुख्य और फ्ल का कार्य रूप हाने से गौण कहते हैं। यहां पर अपने २ अभिप्राय के अनुसार दोनों हो ठीक है, बहुत से तो गार्हस्थ्यादि को कारण होने से मुख्य ओर अवधून का साध्यरूप होने से गीण कहते हैं, सानीलरोग ता साधन होने से गार्हस्थ्यादि को गीण फल होने से अयधूत को ही मुख्य कहते हैं। एक समय महा सिद्ध श्रीगोरक्षनाथशिष्य विचारनाथ थी भर्तृहरि राजा ने व्याकरण महाभाष्य के ऊपर एक लाख फारिवाएं बनाई इस समाचार को पतञ्जलि भगवान् सुनकर बडे खुश हुए और ब्रह्माण्ड में विचरते हुए वहा पाये जहा अवधूत श्री भर्तृहरि जी बैठे थे। यहा याकर सनातन रीति स नमस्कारादि व्यवहार करने के याद कहा कि हे स्वामिन् भापके कार्य से मैं पहा प्रसन्न ह भतः आप मुझ से कोई पर मागो। तय महासिद्ध ने कहा कि आपके मिलने से ही मैं नितान्त प्रसन्न ह इस से गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह। २०५ । । अधिक कुछ नहीं चाहिये, मैं तो आपके दर्शनों से कृत कृत्य होगया। फिर पतञ्जलि ने कहा कि अवश्य कुछ न कुछ मांगना ही होगा। तय भर्तृहरि ने कहा मैं क्या मागू यदि मैं ऐश्वर्य चाहूं यह भी अनुचित है क्योंकि मैं साम्राज्य पद को छोड़कर अवधूत होगया है, अगर मोक्ष की इच्छा करू तो भी ठीक महीं क्योंकि वह तो अबधूत होमाने से हो ही गया है । उसमें कुछ मन्देह नहीं है। अतः मुझे किसी वस्तु के मांगने की आवश्यकता नहीं है। भर्तृहरि के इस प्रकार के कथन से पतञ्जलि जी अपना अपमान समझकर असन्तुष्ट होगये और शापदिया कि तुम्हारी कारिकाए. लोक में प्रसिद्ध नहीं होंगी उस पर अवधूत भर्तृहरि ने भी कहा कि आपके व्याकरण शास्त्र को कलियुग में लोग जीयिका के लिये पढेगे न कि धर्मबुद्धि से और जहां कही उसमें सन्देह होगा तो मेरी कारिकाओं को छोडकर अन्य प्रकार से उस का निश्चय नहीं होगा। इसप्रकार एक ने दूसरे को शाप दे दिया। इस लिये श्राजकल ध्याकर. गादि शास्त्र को परमार्थ सिद्धि में न लगा कर अधिस्तर चतुरता में हो उसका उपयोग समझते हैं। 'मू-श्राचार आचार इतिवदन्ति, याचारोड त्याचार सन्कथंनिर्वहन्ति भोजनेयघृततत्तुचर्मपात्रेणैवा- लौकिक " गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह। याति । गमनयेत्पादत्राणं तदपिचर्मजमेव, स्पृश्यते शयने स्त्रीसंगोभवतितस्यकथैवका | प्रातःकाले यद्यपिशुध्यधनानं क्रियतेतथापिचतुर्पप्रहरेषकरादिकस्यगुह्यादिस्पर्शनं स्वभा- पतएव मर्वदाजायते । किंचमर्यादिग्रहणे मृत्तिकापावाणि जलंचाशुचित्वेन, त्यज्यन्तेनतुधान्यघृतादिकंवस्तु । तदाएवंजायते जलाशयंजलं यहुलभ्यतकुलालानांगृहेषु मृत्पात्राणिचाल्पव्यपेन लभ्यन्त, तेनत दशुचित्वं कथं न क्रियते ? घृतधान्यादिनिवारणेतु बद्रव्यन्ययोभवेदित्याध. नेकप्रकारककिकिलिख्यते । तस्मादाचारवस्तुफल्पितमेय. तबुद्धिमन्तोजना न किंचिदपिनस्तुजानन्ति विचारणबमुख्य इतिसिद्धान्तः। तचर्वननंयमत्रमिद्धान्त याचारानास्तीति। कथं ? श्राचारोऽस्माकंमतेरर्तते, मग विचारपूर्वकइति । अन्यभाचारकुर्वन्ति तादृशम्तुप्रियते एवनास्ति, यथायोग्य स्तुफियतसचापिगाणंमत्याक्रियने, मुख्यम्तुतत्वविचारइति कृत्वाऽयमपिन्यवहारः मर्षयात्याज्योनास्तीति । भाग-लोग भागार भाचार इस प्रकार चिलाते हैं परन्तु, पर प्राचार भनाधार है ऐमा पदने मोम में शोधी है गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह। २०७ यह भी चाम के पात्र अर्थात् कुप्पों, में ही आता है, चलने के ममय जो जूता पहना जाता है वह भी चमड़े का ही है। और सोने के समय जो स्त्री का संग होता है उसका तो कहना ही क्या है, प्रातः काल यद्यपि शुद्धि के लिये स्नान किया जाता है नो भी दिनभर में अशुद्ध अगों का हाथ से स्पर्श होता ही रहता है। और सूर्यग्रहण आदि पर्व के समय मिट्टी के वर्तन घड़े वगैर अशुद्ध समझकर फेंक दिये जाते हैं परन्तु अन्न और घृतादि वस्तुओं को कोई नहीं त्यागता, इससे यह सिद्ध होना है कि तालाय आदि जल बहुत मिलजाता है और कुम्हार के घर से मिट्टी के वर्तन भी थोडे मूल्य में मिल जाते है । इमलिये उनको अपवित्र समझ कर त्याग देते हैं परन्तु धृत धान्यादिके त्यागने से बहुन हानि होती है अतः उनको पवित्र मानलेते हैं इत्यादि अनेक प्रकार है क्या क्या लिखें इस लिये आचार भी कल्पित है इस कारण बुद्धिमान् अर्थात् तस्य वेत्ता लोग, व्यर्थ वस्तु को महत्व नहीं देते उनके मन में विचार ही मुख्य है यही सिद्धान्त है। यहां यह न समझ लेना कि इस सिद्धान्त में श्राचार नहीं है, हमारे मतमें श्राचार है किन्तु विचार पूर्वक है अन्धपरम्परा नहीं है। अन्य लोग जैसा माचार करते हैं वैसा हम नहीं करते । हां गौण मानकर २०८ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा हम भी यथायोग्य कर लेते हैं किन्तु मुख्य तो सत्य विचार हो है ऐसा समझ कर हम भाचार व्यवहार को भी बिल्कुल त्याज्य नहीं मानते। मू०-प्राचारविधिः । प्रातरुत्थाय गुरुस्मरणं कृत्वा फाल स्मृत्वा शौचादि क्रिया दन्तधावनं स्नानं च कृत्वा नाथालये गत्वा पूजा कर्तव्या, पूजानन्तरं भोजनं कर्तव्यं सायंकाले च हन्तादिकं प्रक्षाल्य सायंकालोचित रीत्या पूजा कर्तव्या शौचं चैकादशवारंमृत्तिका जलेन हस्त प्रचा- लनं स्नान पैक कुम्भजलेन चा एप प्राचार इतरस्त्वत्या- चारोनिषेध एव, किमर्थ वृथाकार्य गौणकायें ममय नयनं क्रियते तेन च मुख्यकार्याऽनवमरो भवेन् , खेदं च प्राण- हरणं भवेत् । प्राणरतां विना मनःस्थिरं न भवेत् मन:- स्वैर्य विना कदापिकाले मोक्षो न भवेत् । अतःकारणाद् महासिद्धा योग एवं तिष्ठन्ति नत्ववास्तविके भ्रमन्तीति । भा०-भय आचार बताया जाता है-प्रातापाल उठ कर गुरु का स्मरण और समय का विचार करके शौचादि माया करे फिर दन्तधारन और स्नान करके शिव मन्दिर में गौरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २०४ "जाकर पूजन करे उसके घाद भोजन करना चाहिये । सायंकाल हाथ पैर धो फर तत्काल की विधि के अनुसार पूजन फरे। दिशा मैदान के बाद ग्यारह चार मिट्टी और जल से हाथ धोये फिर एक कलश जल से मान करे घस यही आचार है, अधिक नो अन्याचार है अतः निपिद्ध है क्योंकि गौण कार्य में व्यर्थ समय बिताने से मुख्य कार्य के लिये समय नहीं मिलेगा, और दुःप से जीधन पीतेगा। प्राणरक्षा के बिना मन स्थिर नहीं होना, और मन की स्थिरता के यिना मोक्ष कदापि नहीं हो मकता। इस लिये महासिद्ध लोग पोम में ही डटे रहने हैं अमत्य के भ्रमजाल में नहीं पड़ने । मू०-यदा प्रारब्ध कर्म मन्यत एवं तदा शङ्करस्य मएडनमिश्रेणजाते विवादे शाहरेण यत्रः किमर्थः कृतः । प्रारब्धकर्मणा किमपि भविष्यति तनुविनापि यत्नेन भविष्य- तांति ( पुन न भविष्यति तदापि किम् ? येतु प्रारब्धमो- गोऽवश्य इति सिद्धान्तिनस्तपां न भवनंनापि किंयत्यारन्य तत्तसिद्धान्तः श्रद्धयव निश्चिततयाग्रहणीयः । किमधयने प्रयामः । परन्तुपत्रस्थले प्रारम्धस्याऽनकाराद्धृतएव परा• २९० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा जयो भवेत्तदा योगशक्तिमेवगृहीत्वा राज्ञःशरीरे जीवप्रवेश- करणादिकृतमित्यादि बहुधाप्रसिद्धमेव, यतो योगाश्रयेणय विजयो जातः। पुनान्यासिनांमतेशृङ्गारोवार्जितः, इयत्तत् सत्यकथंजातं शरीरमन्यस परन्तु जविस्तु स्वयमेव ततोपि योगिनां सिद्धान्तएव निश्चलो भवतीति । . मा०-यदि प्रारब्ध कर्म ही माना जाय तो शङ्कराचार्य को मण्डनमिश्र के साथ विवाद में उद्योग क्यों करना पड़ा। विना उद्योग के प्रारब्ध कर्म से ही राय शुछ हो जाना। नहीं होता तब भी पपा ? जो कोई प्रारब्ध का भोग घाघ- श्यक है ऐसा सिद्धान्त मानते हैं उनके मन में होने में हो पला, जो जो प्रारब्ध है यह यह होता है यह सिद्धान्त अयश्य ध्रद्धापूर्वक प्रहण करने लायक है। गमें उद्योग की क्या आवश्यकता है परन्तु जहां पराजय भी होगा है यह भी प्रारम्ध यश से ही हुआ है। तब तो योग शक्ति का आश्रय लेकर राजा के शरीर में प्रधश फरना इत्यादि प्रसिद्ध कार्यों में योगयल से अर्थात् उद्योग से ही विजय हुई है यह कहना सार्थक नहीं होगा। मत प्रारब्ध के चम में पड़कर योग साधन को न छोड़े।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
।
संन्यासियों के मत में गृङ्गार घर्जित है यह ठीक है, तो टङ्गार
परिचय के लिये शड्डूर ने शरीगन्तरका ग्रहण क्यों किया। यदि
कोई कहे किशृङ्गार का परिचय तो दूसरे शरीर से किया
थान कि संन्यासी शरीर से इसका उत्तर है-कि प्रात्मा तो
दोनों शरीरों में एक ही है, इससे भी योगियों का ही सिद्धान्त
स्पष्ट हो रहा है जो सिद्ध सिद्धान्त पद्धति में वर्णित है।
म्वचिद्भोगी कचित्त्यागी इत्यादि ।
श्रीनाथ सूत्रे-आचार ब्रह्म विचारे योगाति ।
ब्राह्मण श्रागत्याचारं प्रवर्तितवान् ।
योगी चागत्य विचारं प्रथर्तितवान् । याचद् ब्राह्मण
आचाराद् विचार प्राप्तस्तावद् योगी ब्रह्म प्राप्त इति ।
अन्ये मांप्रदायिका प्राचार्या अधिकारिभेटेन मर्वस्यापि ममा
घानं दुर्गन्ति तनु महामिद्धानांमतेमधावाधकमेन कयंमधि-
पारिभदेनमम्यधर्म इति कथमन्त्यजानामपि तु पां धर्म
पति । तथा चाऽनर्ध एव स्यात्, यतो धर्मस्तुमुमुनुपुरपाया
मेर, अन्येषां तु मपामधर्म एव । मुमुतपश्चयोगीपकारित
पर । योगभोगी दो पदाधी, तर मुक्तये योगाधिरारी

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः अन्येवणश्रामिवैष्णवबौद्धा इत्यादयः सर्व व्यवहारिण एवेति । कुत्रचित्स्थले केपिजनाः स्थितास्तेषु केनचित्पाप- स्य वार्ता उक्ता सा वार्ता द्वितीयेनाभिनन्दिता तदातत्पाप मुक्तं कृतं तु प्रथमेनैव परन्त्यभिनन्दकन्यात् फलभागी तु द्वितीयो जात एव किकिं वा नेति । तत्त्वितरशास्त्रपि 'उप देष्टानुमन्ता च साक्षात्कामिनन्दिता चत्वारः फलभागिन इति लिखितमेव । तथाचैक उपदेष्टायपरः कर्ता एवं रीत्याचा धिकारि भेदेन समाधानमसमीचीनमिति प्रतिभाति ॥ भा०-धीनाथ सूत्र में भी पहा हिमाचार और प्रता विचार दोनों में योगी है। ब्राह्मण ने श्राकर प्राचार श्री योगी ने पाकर विचार को प्रचलित किया ग्रामण ने जय नए धाचार में विचार को प्राप्त किया तय तक योगी ने ब्रह्म के प्राप्त कर लिया। अन्य मन्त्र देने वाले प्राचार्य अधिकारी भेद से सबका समाधान करने हैं यह महासिद्धों के मत सर्वथा बाधक है, कैसे ? यदि अधिकारी भेद में कहो ? सपा धर्म है यह कैसे होगा पोभिन्स्यन के लिए ना माना जाता है। यदि उसका भी घद'धर्म ऐसा कहो । भनयं ही हो जायगा, अतः मुमुक्षु का ही धर्म है औ के लिए अधर्म है मुमुक्षु तो योग के अधिको - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २१३ होते हैं। यांग और भोग दो पदार्थ हैं, उनमें मुक्ति के चाहने राने योगाधिकारी हैं और सब व्यवहारी हैं। किसी जगह र श्रादमी बैठे थे उनमें किसी ने पाप की बात कही दूसरे ने उसा अनुमोदन किया, यद्यपि वह पाप पहले ने किया है किन्तु अनुमोदन करने से दूसरा भी उसका फलमागी हो ही जाना है। शास्त्र में भी ऐमा ही कहा है-उपदेश देनेवाला, अनुमोदन करने वाला, खुद करने वाला, और प्रशंसा करने ला ये चारों हो शुभाशुभ फल के भागी होते हैं, यह लिसा ही है। तब एक तो उपदेश देने वाला और दूसरा करनेवाला इस रीति में अधिकारी भेद करके समाधान करना ठीक नहीं मालूम पटता। मू-कृतयुगे केवलं प्रणवगायत्रीयोगानुसाारसाध- नन जीयो मुक्तिप्राप्तः, पश्चादन्य युग सपि ययेतद्धर्म बहेयु- नदामुक्ताएक्स्युस्तहि कथंसंसार प्रवृत्तिर्भवेदिति नार्थच्छ्या रमणावेदादिशाखाणि प्रकटितानि। तेन स्वस्वरूपात्सरावृत्तिः हनायेनच प्रणययोगेन स्वरूपानुमयः प्रकटितः सोऽप्रकटः अध्यारोपापवादादिप्रकारेण यदमायिकवस्तु तत्रमि- भाकल्पना बहुविधानेनकता मिथ्यवारयो मिथ्यवान्धवारो २१८ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह मतात्पर्यमिदं कर्म ईदृशंवर्तते यत्तद्वज मिति । तदातत्करण विना किंभोन् । केवलशाननकथं सिद्धिः । शनमपिक में ववर्तते । अन्तः करणस्यधर्मत्वात् तत्रापिकरण वर्ततएवंति भा० टी०–नाथ सूत्र में लिखा है-ब्राह्मण में येद प्रवृत्त हुए और सन्यासी तीर्थी, में निर्माण पद को कोई नहीं प्राप्त कर सका । फैसे ? मूक्ष्म व्रह्म की प्राप्ति के लिये एकाक्षर ओंकार सूक्ष्म वेद ही प्रकट किया, सूक्ष्म ही अक्षर द्वायरूप गायत्री की गई । साकार होता हुआ भी आकार का अभिमान न होने से निराकार के तुल्य नाथ रूप प्रकट हुना । उस नाथ के द्वारा सूचम योगाभ्यास रूप योग का उपदेश हुथा उसका धारण करने वाला सूक्ष्म अवधूत ही माना गया, उसके याद माया सहित स्थूल ब्रह्म को प्राप्ति के लिये एकाक्षर ओंकार रूप सूक्ष्म चेद से अनेकाक्षर स्थूल वेद प्रकट किया । अक्षर द्वय गायत्री से चौबीस अक्षरों को स्थल गायत्री की योग से स्मृति पुराण आदि अनेक शास्त्र रचे गये, इन सयका धारण करने वाले याह्मण परम हस और अन्य लोगों की रचना हुई। नाथ सूत्र में कहा है कि गुरु के पचम का एक घार उल्लंघन गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २१६ । होने से उसका युग युग में उल्लंघन हाता जाता है इस कारण गुरु के वचन को किसी काल में नहीं भूलना चाहिये । स्वय अनुपान न करने वाला पुरुप सभा में जाकर किसी देव अथवा किसी धर्म का पक्ष लेता है और स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर छोड देता है वह किस तरह मोक्षका भागी बन सकता है कदापि नहीं ऐसे शिष्य को सद्गुरु भी किस प्रकार अङ्गीकार कर सकता है यदि करे भी तो उसका इष्ट देव भी अप्रसन्न हो जाता है। कोई कहता है मैं स्मात हूँ, वैष्णव हैं जो कुछ भी हूँ. जय जय मैं कहता है स्मार्त कि तुम हो तब उसका यह तोत्पर्य हुआ कि स्मृ. सियों में कहा हुआ सारा आचार तुम में है। तय वह उत्तर देता है कि सय नाच र तो मुझ में नहीं है इस पर मेरा कहना है कि मैं मार्त है यह तेरा कथन मात्र रहा न कि श्राचरण, केवल कथन से पाप नहीं हट सकता रसो लिये .उस धर्माचरण से पाप नहीं हाता है यह कहा है न कि कथन से और मिथ्या दोप भी लगेगा। तय यह हार कर कहता है कि मैं स्मात नहीं उस पर मैं कहता है कि स्मार्त कुल में उत्पन्न होकर स्मार्च पर्मी न हो तो धर्म में विरोध पाजायेगा, इस पर यह उत्तर है। कि जैसा प्रारब्ध है वैसा ही में हैं। यदि मैं कहूँ कि प्रारम्य में हो श्रद्धा को पिर करे केसे-जैसा प्राणियों का भारव्य ह येसा .

२२० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः होता ही है किन्तु कहने से धर्य नहीं होता किसी का प्रारम्य है कि यह कूपमें गिरेगा यह अनजान में चाहे कूप में गिर पड़े विन्तु जब जान लेता है तो अवश्य उसके रोकने का उपाय करेगा। आखिर होता है यही जैसा कहा है कि जैसा प्रारब्ध है वैसा इं। फिर यह कहता है कि जो कुछ गुरु की प्राशा होती है यही मैं करता हूं। फिर मैं कहना ह कि गुरु जी ता उत्तमाधिकारी है तुम तो मन्दाधिकारी हो। तुम को गुरु घार में विश्वास रचना चाहिय, इस पर उसने कुछ नहीं कहा इत्यादि नाना प्रकार से पहुन थात चीत करने पर भी वर्ण भानम-स्त्री और पुरुष का कोई भी चिन्ह पिर नही होता है अतः अव्यन लि होने से प्रत्याश्रमी ही कहलाता है इस लिये असत्य बस्तु की कल्पना पों की जाय, महा सत्य पर अवधूत पने का हो ग्रहण करना चाहिये । जब मय वर्ण नहीं है मो माया भी तो कहा जाप तप यह कहता है कि कोई एक प्राधम्मानं धर्मनी मुझ में है ही उस पर मेगस्थन है कि एक स्मार्त धर्म है ना दूसरा किय का धर्म है। उस पर उसर देना है कि मेरे मन के अनुकूल है. इस पर मैं कहा कि जो तेरे मन के अनुकत है घर अधर्म नहीं किन्तु यह भी किसी का धर्म ही होगा, तब ता तुम में धर्म की विवड़ी हु। तप साचार होकर कहना पड़ता है कि मैं स्मान नहीं फिमैं कहता कि यदि मात कुल में उत्पन्न होने पर - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह भी स्मात धर्म म रहा तो धर्म से भ्रष्ट हो गया। उस के कहने का तात्पर्य यह है कि कर्म वज्र के समान अभेद्य है, वह धिना भोग के.नष्ट नहीं होता योगादि के उद्योग बिना नहीं हट सकता, कंयल ज्ञान से भी सिद्धि कैसे मिल सकती है । यह भी नो अन्तकरण का धर्म होने से कर्म रूप हो है, अतः का. नुष्ठान से ही सिद्धियां होती है। मु०-द्वैतवादिनः कथयन्ति-अस्माभिः किं प्रेरकंप्रतिकथ्यते द्वैतमिति नास्तीति। सत्वद्वतएव परन्तुद्वैतं शरीरयतः दारीर गरिती भावेन सोपि द्वैतएवास्तीति कथ्यते । अद्वैत वादिनश्चकिंफथय न्ति ? अद्वैतमेवास्ति, यच्छरीरंद्वतंदरयते तत्तमिध्यैवेति । महा मिद्धाः कथयन्ति-चैतन्यंजइंच शरीरादि उभयमपि मिलित्वाएकमेवपूर्णवस्तु यते परमा- द्वैतं यत्तु किमपिनाथतेजस्तचक्रवति मापरिवर्तते । कचि- स्कथयन्ति ज्ञानिनोज्ञानं निरपेक्षमेव कर्मणोऽपेक्षा पूर्वकालपि न करोतितत्तुनास्त्येव । भवदीयमतानि साण्यपिशास्त्राएयू. याहुत्यवयंवदन्ति कर्मणाचितशुद्धिः स्यादनन्तरं तत्त्या- गस्त्यागाच्चज्ञानप्राप्तिानान्मुक्तिरिय वाघिण्टापोपपद्- वियते इति ।

२२४ गौरक्षसिद्धान्तसंग्रह " चकार । सवेरमविष्णुरुद्रादयौदेवाः पादयोनागामन्याद- योनग अन्येचपशुपक्षिणीयविसीय मवेशीजिता, एकोनाथ एवमायाजेता । तदुक्तं महासिद्ध श्रीविचारनाथनमतहरिणा शम्भु स्वयम्भुहरयो हरिणक्षणानां, येनाऽक्रियन्तमततंगृहकर्मदासा । वाचामगोचर चरित्रचिचित्रिताग तम्मनमो भगवते मकरध्वजाय ।। श्रतः कारणाद् यदागाहम्ध्यं कृतं तदानीपोषणमन श्यमेयकतव्यं यदाचविरागन्यातदात्यवतनव भाच्यामिनि। भा-दगम्य धर्मशयन परत है, उसकी निमें बहसानी के यिना हाय प्रमं पल गादीमामा पा कि गाहस्थ परामुल ही स्त्री है । भार भी पहन है। हर महीम तीन गम प्रतु धर्म होता है, फिर शुद्ध दिनों में सन्तान थे कि अनुदान दिया जामा मुगलिग पदानि विषय भोग नहीं करना चाहिये यह भी पदों का उपदेश है, यदि ऐसा है तो पहले घर में नियार करना फिर इसमें भोजनादि कागा, उसमे शरीर का पुट होना, उसमें गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २२५ है बाद अवश्य कामोद्दीपन होता है तब यह शरीर कैसे अपने घश में रह सकता है। उसमें भी स्त्रियों का 'चित्त तो काम के . भोगे विना क्षणभर भी शान्त नहीं हो सकता। सो कैसे? स्त्रियों को तो काम ही इष्ट होता है उसकी पूर्ति न होने पर उनका चित्त व्यभिचार की तरफ दौडता है उस पाप से सारा कुल नष्ट होजाता है और लोक में हंसी होती है। इसलिये महासिद्ध लोग गार्हस्थ्य नही करते । सिद्धों का इष्ट देव नाथ है उन्होंने भी स्त्री का ग्रहण नहीं किया है। ब्रह्मा विष्णु रुद्र श्रादि समस्त देवता शेष आदि नाग मनु आदि मनुष्य और पशु पक्षी इत्यादि समस्त प्राणी अपने जीवनकाल में स्त्री के वश में रहे हैं, सिर्फ एक नाथ जी ने ही माया को जीता है। इसी पर महासिद्ध श्रीविचारनाथ भर्तृहरि ने भी कहा है- जिसने शिव ब्रह्मा और विष्णु सरीखे देवों को भी स्त्रियों का दास यनादिया अक्थनीय अद्भुत चरित्रवाले उस काम देव को नमस्कार है इसलिये जब गृहस्थ को धारण किया है तो स्त्री का पालन पोपण अवश्य करना चाहिये, यदि वैराग्य की इच्छा है तो अवधूत होजाना चाहिये। मू०- परमहंसास्तु कामंनिषेधयन्ति स निषेधोन भव- त्येवम् । कथम् ? तदुक्तं श्रीमीननाथेन- गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः चकार । सर्वेब्रह्मविष्णुरुद्रादयौदेवाः शेषादयोनागामन्याद- योनग यन्येचपशुपतिणोगांची मत्रीजिता, एकोनाथ एवमायाजेता। तदुक्तं महासिद्ध थीविचारनार्धनभर्तृहरिणा शम्भु स्वयम्भुहरयो हरिंगक्षणानां, येनाऽफ्रियन्तमततंगृहकर्मदासा। चाचामगोचर चरित्रविचित्रिताय तम्मनमो भगवते मकरध्वजाय । अतः कारणाद् यदागार्हस्थ्यं कृतं तदायोपोपणमय- श्यमेवकर्नव्यं यदाचीवरागच्यातदात्यवतनव भाच्यामिनि। ...अंदगृहम धर्मका वर्णन करते है, उसकी गमि में पहा - पिना गृहम्ध धर्मबल होगी कि गाईम्य का मल ही स्त्री है । भार भी कहते है। हर महीने तीन ग तु धर्म होता है, फिर युद्ध दिनों में सन्तान पं. हि गनुदान विषा गामा मुग के लिये पदापि विषय मांग नहीं करना चाहिये यह भी पदों का उपदेश है, यदि ऐसा है ना पहले घर में निवास करना फिर उसमें भोजनादि कामा, उसमें शरीर का पुट होना, उसमें गोरक्षसिद्धान्तसग्रहः २२५ याद अवश्य कामोद्दीपन होता है तब यह शरीर कैसे अपने पश में रह सकता है। उसमें भी स्त्रियों का चित्त तो काम के भोगे बिना क्षणभर भी शान्त नहीं हो सकता। सो कैसे ? स्त्रियों को तो काम ही इष्ट होता है उसकी पूर्ति न होने पर उनका चित्त व्यभिचार की तरफ दौडता है उस पाप से सारा कुल नष्ट होजाता है और लोक में हंसी होती है। इसलिये महासिद्ध रोग गार्हस्थ्य नहीं करते । सिद्धों का इष्ट देव नाथ है उन्होंने भी स्त्री का ग्रहण नहीं किया है। ब्रह्मा विष्णु रुद्र श्रादि समस्त देवता शेप आदि नाग मनु आदि मनुष्य और पशु पक्षी इत्यादि समस्त प्राणी अपने जीवनकाल में स्त्री के यश में रहे हैं, सिर्फ एक नाथ जी ने ही माया को जीता है। इसी पर महासिद्ध श्रीविचारनाथ भर्तृहरि ने भी कहा है-जिसने शिव ब्रह्मा और विष्णु सरीखे देवों को भी स्त्रियों का दास बनादिया अकथनीय अद्भुत चरित्रधाले उस काम देव को नमस्कार है इसलिये जव गृहस्थ को धारण किया है तो स्त्री का पालन पोपण अवश्य करना चाहिये, यदि वैराग्य की इच्छा है तो भवधूत होजाना चाहिये। मू०- परमहंसास्तु कामंनिषेधयन्ति स निषेधोन भव- त्यैवम् । कथम् ? तदुक्तं श्रीमीननाथेन- २२६ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः हरकोपानलेनैव मस्मीभूतः कृतः स्मरः । अर्धगौरी शरीरोहितेन तस्मैनमोस्तुते ॥ अतोमहासिद्धा विपयरीत्या तु त्यागमेव कुर्वन्ति । पुनः प्रकृतिरपि नौवार्तते शिवशक्त्योरस्माकंमतेऐक्यमेववर्तते तदुक्तं- - शिवस्याभ्यन्तरेशक्तिः शक्तेरभ्यन्तरे शिवः । अन्तर्रनवजानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ।। प्रसरंभासयच्छक्तिः संकोचमासोच्छवः । तयोर्योगस्यवर्ताय सभवतासिद्धयोगिराद् ॥ एवंत ऐक्यज्ञात्या काममपि भजन्त्येव। मतएवोक्त- कचिद् भोगी कचित्त्यागीत्यादि। त्यागिनामपेक्षया त्यागएचएतादृशः ॥ एतक्रियतेयाशस्त्यागिनामपिन भवेत् । कथम् । कर्म- राहित्योपरितुत्यागोनास्तितंदन प्रारब्धमपित्यज्यते । शून्ये लग्नः प्रारम्धमपित्यज्यते । यदाच मोगन्ति- गोरक्षसिद्धान्तसमहः २२७ तदा संसारिणोपि यादृर्शनकुर्वन्ति तादृशमेतेकुर्वन्ति कथम् ? संसारिणः प्रकृतिलगाएबयोगिनस्तुप्रकृतिब्रह्मो- भये पूर्णेलमा अतस्तेषांरीतिर्विलक्षणैव । भोगिभिः सुभोग- एवैकाक्रियतेतेषां त्यागो न भवति । भोगिनान्त्वेको भोग एव भवति नतुते त्यागे समर्थाः। पुनस्त्यागिनोयेभवन्ति तैःप्रथममेव त्याग कृतः। त्यागिनइति एपानामतः पुनभोंगः कथंक्रियतेकरणेचसर्वमेवनष्टस्यादिति। अथचाऽवधूतास्त्या- गिनामपिलाके त्यागस्याधिक्यं दृष्टिगोचरं कृत्वापुनः स्वे. च्छया भोगमपिकदाचित्कुर्वन्ति तथापि तेषांभोगोवधिको नभवेत् । भोगिनोभोगमेवकुर्वन्त्यवं त्यागिनस्त्यागमेवेत्पव- धूतानान्तुत्यागभोगयोद्वयोरपिपदार्थयो सामर्थ्यम् । त्यागं कयारीत्या कुर्वन्ति ? युगपर्यन्तमप्याहारादिकनगृह्णन्त्येवं त्यागिना नभवति । कथम् ? ते देहेनविजिताएतेतुदेहा- धीनाः सन्तियत इतिदिक् । भा०-परमहंस लोग तो काम का निषेध करते हैं परन्तु इस तरह केवल कथन से निषेध नहीं होता। कैसे? इस पर श्रीमीनगाथ जी ने कहा है कि शिा जो की फ्रोधाग्नि से .

२२८
गोरक्षसिद्धान्तसग्रह.
।
कामदेव भस्म हो गया, तथापि स्वय अर्धगौरी शरीर हैं
थर्थात् पार्वती हर समय उनके वाम भाग में विराजमान
है। ऐसे शिव जी को नमस्कार है। इस लिए महासिद्ध विषय
के वर्णन द्वारा भी त्याग ही कहते हैं। फिर प्रकृति भी तो
ब्रह्म ही है क्योंकि मेरे मत में शिव और शक्ति का अभेद ही
है। इसी विषय में कहा है कि शिव के भीतर शक्ति और
शक्ति के भीतर शिर है अर्थात् दोनों शापस में मिले हुए हैं
एक के बिना दूसरा नहीं रह सकता। चांद और चादनी की
तरह उनका भेद नहीं जाना जा सकता इन श्लोकों को हिन्दी
पहले ही हो चुकी है। इस प्रकार अभेद जान कर महासिद्ध
काम का उपभोग भी कर सकते है इसी लिये कहा है-कही
भोगी और वहीं त्यागी इत्यादि । त्याग भी जैसा महासिद्ध
करते हैं चैसा त्यागी कहलाने वाले अन्य लोग नहीं कर सकते।
कैसे, अन्य लोग सचित पोर-परिष्यमाण कर्मों के त्याग
से अधिक नहीं कर सकते, महासिद्ध तो मारब्ध का गो
परित्याग कर देते हैं। शून्य में लीन होने से प्रारम्भ भी छूट
नाता है । जय भोग करते हैं तो ऐसा करते है जिसको ससारी
लोग कर हो नहीं सकते। कैसे अन्य लोग तो प्रकृति में फसे
रहते हैं, और ये तो दोनों को मिलाकर पूर्ण में ही लीन रहते
-

मोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २२६ है. इसलिये इनको रीति निराली है। भोगी लोग सुन्दर २ भोग हो भोगते हैं उनका त्याग नहीं कर सकते। भोगियों को तो भोग ही मुख्य है वे उसके त्याग में समर्थ नहीं हैं, जो त्यागी होते हैं वे तो पहले हो त्याग कर देते हैं। जिनका नाम स्यागो है वे भोग केसे कर सकते हैं यदि वे भोगी हो जायें तो अपने स्वरूप से भ्रष्ट हो जायेंगे । अवधूत लोक में त्यागियों के त्याग की अधिकता को देखकर कभी अपनी इच्छा से भोग भी कर लेते हैं, तो भी उनका भोग उनके स्वरूप का पाधक नहीं होता है। भोगो भोग हो करते हैं और त्यागो त्याग ही। अवधून को सामर्थ्य तो त्याग और भोग दोनों में हो है । त्याग किस रोति से करते हैं ? देखो युग पर्यन्त भी भोजनादि कुछ नहीं करते हैं, त्यागो लोग ऐसा नहीं करते कैने अन्य लोग तो देह से जिते हुए हैं और इन्होंने तो देह को धपने अधीन कर रखा है। मू-अनयारीत्यापरमार्थस्तु प्रथममेवनष्टः । कथम् ? यदा स्त्रीगृहीता। पश्चादयंलो कोनष्टः । कदा ? यदाखीग्रहणेनगार्हस्थ्य- जातंतत्र च गृहस्थरीत्या प्रवृत्तोन । एवं च द्वावापिलोकौनष्टौ भोगो- पिनास्ति मुक्तिरपिनास्ति चंचलेन मनसा सर्वमपिनष्टीकृतम् । कथम् ? गार्हस्थ्यंत्यक्त्वा पाश्रमान्तरंगृहांतितत्रापि पुनः श्रमेण- २३० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः कातरोभूत्वादुःसेनसीदन् प्रारब्धस्साङ्गीकाराद्ययद्यथा प्रारब्धं- तत्तत् सर्वमपिफर्म फरोति । तदारुर्मणःसाकुरत्वादेवकदापि- फाले मुक्तिभागनभवत्येव, यथा मामेगर्दभा यनेवाशूगरास्तथाविप. यवशा पारंवारंजन्मादिगृलान्त । पुनश्चलेनमनसामुक्तोदस्तीप्रामा. द्वनंगच्छति किंचित्मग्यमेव भविष्यतीति यनाच्छगातो माम मागच्छतिमृतकाऽरध्यादि भक्षणार्थमितिनिर्देश इति । यधाराजा, राजस्त्रीगणाअनेके भवन्ति, स्वयंतु एकएयसतेपांसमसानांपाम गृत्ति पुर्यात् ? स्वचित्त प्रसादेनेययथेच्छं फ्रीतिनाम । यतस्तेषां तु महत्तरंदुःपमेयस्यात् । सेनदुःग्यजनिताऽपध्यानेनरा- शोऽवल्याणमेवभवेत् । अतएवोक्तं राग्यान्तेनरकइति । सधैये. सादृशएवाचार्यएकएप, शिप्यास्तुयपाहताः, तेपुफस्यफस्यपा हरेत् । पापहरणाऽसमर्थोवहूनां शिष्याणां पापेनापार्योऽपितुंगति मेव प्राप्नुयात् । तदुक्त सिद्धसिद्धान्तपद्धती श्रीगोरसनाथेनथाचार्य पदुदीसिता इत्यादि। तेतस्यतोवचिता इत्यन्तम् । यदास्यतो पंधितास्तदा मुत्पनरफभाजयन्यांदागतम् । यतो तोर्वगुशिष्यकरणंसिद्धानामसेवर्जितम् ।।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा २३१ - - भा०-इस रीति से परमार्थ तो पहले ही नष्ट हो चुका, फैसे ? जव स्त्री का ग्रहण कर लिया जाता है तो यह लोक बिगड़ जाता है । जव स्त्रो का ग्रहण करके गृवस्थी बना, और उस में गृहस्थ रीति से नहीं चलेगा तो दोनों ही लोकनिष्ट होजाते हैं, भोग भी नही हुशा, और मुक्ति भी नहीं हुई मन चचल होने से सय भ्रष्ट होजाता है । कैसे गार्हस्थ्य छोड़ कर दूसरे आश्रम का ग्रहण किया, वहां भी श्रम से थक कर दुःस्त्री होते हुए मारब्ध को सीकार किया, फिर जैसा प्रारब्ध होता वह वैसा काम करता है। जब कर्म के चक्र में पड़ने से कदापि मुक्ति नही होती। जैसे गांव में गधे पन में सूअर विषयासक्त रहते हैं वैसे ही चिपयासक्त होकर बार बार जन्म और मरण के चक्र में घूमते रहते हैं। मन की चंचलता से ही बंधन से छुटा हुश्रा हाथी मुझे सुप होगा इस लिये ग्राम से वन को जाता है, और गीदड़ मुर्दे की हड़ी खाने के लिये धन से गाय को पाता है । जैसे राजा एक है और उसकी स्त्रियां अनेक है, अकेग यह गजो उन अनेक स्त्रियों की कामचेष्टा को कैसे पूर्ण कर सकता है, हां अपना चित्त खुश करने के लिये यथेच्छ क्रीडा करता है । किन्तु उन स्त्रियों को तो महा कट होता है। उस दुःखजनित अपराध से राजा का अमंगल ही होगा। इस . , २३० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः - कातरोभूत्वादुःसेनसीदन् प्रारब्धस्साङ्गीकाराययद्यथा प्रारब्ध- तत्तत् सर्वमपिकर्म करोति । तदाकर्मणःसाकुरत्वादेवकदापि. फाले मुक्तिभागूनभवत्येव, यथा मामेगर्दभा बनेवाशुगरास्तथाविप- यवशा पारंवारजन्मादिगृहान्त।पुनवंचलेनमनसामुक्तोहस्तीप्रामा द्वनंगच्छति किंचित्सुखमेव भविष्यतीति वनाच्छृगालो प्राम मागच्छतिमृतकाऽरथ्यादि भक्षणार्थमितिनिर्देश इति । यथाराजा. राजस्त्रीगणअनेके भवन्ति, स्वयंतु एकएवसतेपांसमस्तानांकाम वृत्तिपूर्णाकथंकुर्यात् ? स्वचित्त प्रसादेनैवयथेच्छं फ्रीडतिनाम । यतस्तेपां तु महत्तरंदुःसमेवस्यात् । तेनदुःखजनिताऽपध्यानेनरा ज्ञोऽकल्याणमेवभवेत् । अतएवोक्तं राज्यान्तेनरकइति । तथैवै तादृशएवाचार्यएकएव, शिष्यास्तुयहवःकृताः, तेपुकस्यकस्यपाल हरेत् । पापहरणाऽसमर्थोवहूनां शिष्याणां पापेनाचार्योऽपिदुर्गा मेव प्रामुयात् । तदुक्तं सिद्धसिद्धान्तपद्धती श्रीगोरक्षनाथेनप्राचा घहुदीक्षिता इत्यादि। तेतत्त्यतोवचिता इत्यन्तम् । यदातत्त्वतो वंचितास्तदा मुख्यनरकभाजएवेत्यर्धादागता यतोहेतोहुशिष्यकरपंसिद्धानामतेवर्जितम् ।।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २३१ , ६ . भा०-इस रीति से परमार्थ तो पहले ही नष्ट हो चुका, पैसे ? जय स्त्री का ग्रहण कर लिया जाना है तो यह लोक बिगड़ जाता है । जव स्त्री का प्रण करके गृहस्थी बना, और उस में गृहस्थ रीति से नहीं चलेगा तो दोनों ही लोक नष्ट होजाते हैं, भोग भी नहीं हुआ, और मुक्ति भा नहीं हुई मन चचल होने से सय भ्रष्ट हो जाता है। कैसे गार्हस्थ्य छोड़ कर दूसरे आश्रम का ग्रहण किया, यहां भी श्रम से थक कर दुःस्त्री होते हुए प्रारब्ध को सीकार किया, फिर जैसा प्रारब्ध होता वह वैसा काम करता है । जब कर्म के चक्र में पड़ने से कदापि मुक्ति नही होती । जैसे गांव में गधे बन में सूअर विषयासक्त रहते हैं वैसे ही विषयासक्त होकर बार बार जन्म और मरण के चक्र में घूमते रहते हैं। मन की चंचलता से ही बंधन से छूटा हुना हाथो मुझे सुग्व होगा इस लिये ग्राम से वन को जाना है, और गीदड़ मुर्दे की हड्डी खाने के लिये धन से गाय फो नाता है । जैसे राजा एक है और उसकी स्त्रियां अनेक है, अकेगा यह गजा उन अनेक स्त्रियों की कामचेष्टा को कैसे पूर्ण कर सकता है, हां अपना चित्त खुश करने के लिये यथेच्छ कोडा करता है। किन्तु उन स्त्रियों को तो महा कट होता है। उस दु-जनित अपराध से राजा का अमंगल ही होगा। इस

૨૨૨
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
।
लिए ठीक कहा है कि राज्य के अन्त में नरक में वास होता
है। वैसे ही आचार्य भी अकेला हो है और शिष्य बहुत कर
लिए हैं उन में किस किस के पाप को हटायेगा। उन शिष्यों
के पाप न हटाने पर उसी पाप से गुरु भी दुर्गति को प्राप्त हो
ता है। सिद्ध सिद्धान्त पद्धति में कहा भी है नाथ जो ने जो
श्राचार्य यहुत से चेले बनाते हैं यह ठीक नहीं, और वे तस्य
से घंचित रहते हैं इत्यादि । जय तत्त्व से वंचित रहते हैं तो
अवश्य घोर नरक के भागी बनते हैं यह अर्थात् से सिद्ध
होता है।
इसलिए पहुत शिष्य बनाना सिद्धों के मत में वर्जित है।
मू०- पदपदार्थायत्रभवन्ति स भगवान् । के ते पट्
पदार्थायमी- समप्रैश्चर्यम् १ धर्मः २ यशः३ श्रीः ४
ज्ञानम् ५ वैराग्यम् ६ इत्येषांमध्ये एकोऽपिरुद्रविप्एवादिना
भगवत्पदवाच्यपुन । प्रथममंतु समवये योगरूपं
तदेवनास्ति कथम् ? सकामवशाः खीसगिनो यान्
योगिनोलोकाः कथयन्ति तेपास्त्री संगा, एतसुदास्यमेव ।
पुनर्धर्मः-पत्र यत्र स्थले छलः क्रियतेतदाधर्मभावः कथम् ?
छलस्तुनारदस्प वानरमुखकरणादिनाविष्णोः प्रसिद्ध

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह २३३ - एवेति । पुनर्यशः-तदपिकथम् ? रावणवधे लोककल्याणे यशोजातं तथैवस्वीहरणेऽप यशोपिजातं कथं रावणस्य पामरस्यवधेनकि, तस्यवालिवानरेण वन्धनं कृतं सहस्र याहुनार्जुनेन च बन्धनं कृतं पुनारामस्तु भगवानिति कथ्यते । जगत्कचिकथ्यते । तस्यस्त्रीहरणमेतत्तमहदपयशः। पुनः श्री:-यस्यपरमार्थे मुक्तिर्नास्ति ऐहिके च यशोनास्ति तस्य श्रीः कथम् । पुनर्ज्ञानम् - यदाज्ञानस्वरूपास्ते तदाऽज्ञानकार्ये संसारकार्ये किमर्थ प्रवृत्तास्ततो ज्ञानं कथम् । पुनर्वैराग्यम्- तत्तु सर्वथै तत्काल्पतेप्पीश्वरेपुनैवनैवेति । कथं पुराणेएतेषां लौकिकया त्वेवमायास्यति तत्तुवक्तुमशक्यम् । दास्यां वेश्या यामासक्ता इत्यादि किंकिंलिख्यते । तदावैराग्यकुत्र? अतः कारणात् पडेवपदार्थानाथे तत एव तिष्ठन्ति । समग्रैश्वर्यन्तु योगः, सतुसहजसिद्धएयपुनः । धर्मोऽपि स एव योमुक्ति रूपः, एतद्न्यतिरिक्तः स्मृत्यादि शास्त्राणि धर्म वर्णयन्ति सत्वधर्मएव, पुनर्यशोऽपि यस्यैव योमुक्तरूपस्तस्यैव बन्धरू- पस्य कथमयशः पुनः श्रीः शोभापि यस्यैव स मुक्तो बंध

२३२
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
-
लिए ठीक कहा है कि राज्य के अन्त में नरक में पास होता
है। वैसे ही भाचार्य भी अकेला हो है और शिष्य यहुन कर
लिए हैं उन में किस किस यो पाप को हटायेगा। उन शिष्यों
फे पाप न हटाने पर उसी पाप से गुरु भी दुर्गति को प्राप्त हो
ता है। सिद्ध सिद्धान्त पद्धति में कहा भी है नाथ जी ने जो
आचार्य पहुत से चेले यनाते हैं यह ठीक नहीं, और ये तस्य
से वंचित रहते हैं इत्यादि । जप तस्य से पंचित रहते हैं तो
अयश्य घोर नरफ के भागी बनते हैं यह अर्थात् से सिद्ध
होता है।
इसलिए पहुत शिष्य पनाना सिद्धों के मत में घर्जित है।
मू०- पदपदार्थापत्रभवन्ति स भगवान् । के ते पद
पदार्थाश्रमी- समग्रेश्वर्यम् १ धर्मः २ यशः ३ श्री ४
ज्ञानम् ५ पैराग्यम् ६ इत्येपांमध्ये एकोऽपिरुद्रविष्णवादिना
भगवत्पदवाच्येषुन । प्रथममंतु समोश्चर्य योगरूपं
वदेवनास्ति कथम् १ सर्वेकामवशाः स्त्रीसगिनो यान्
योगिनोलोकाः कथयन्ति वेषांसी संगः, एतत्तुहास्यमेव ।
पुनमः यत्र यत्र सले छलः क्रियतेतदाधर्मभावः कथम् ।
छलस्तुनारदस्य यानरमुखकरणादिनाविष्णोः प्रसिद्ध

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह २३३ एवेति । पुनर्यशः-तदपिकथम्? रावणवध लोककल्याणे यशोजातं तथैवत्रीहरणेऽप यशोपिजातं कथं रावणस्य पामरस्यमधेनकि, तस्यवालिवानरेण वन्धनं कृतं सहस्र बाहुनार्जुनेन च बन्धनं कृतं पुनारामस्तु भगवानिति कथ्यते । जगत्काचकथ्यते । तस्यस्त्रीहरणमेतत्तुमहदपयशः । पुन: श्री:- यस्यपरमार्थे मुक्तिर्नास्ति ऐहिके च यशोनास्ति तस्य श्रीः कथम् । पुनर्ज्ञानम् - यदाज्ञानस्वरूपास्ते तदाऽज्ञानकार्ये संसारकार्ये किमर्थ प्रवृत्तास्ततो ज्ञानं कथम् । पुनर्वैराग्यम्- तत्तु सर्वथैौतत्काल्पतेष्वीश्वरेपुनैवनैवेति । कथं पुराणेएतेपां लौकिकया त्वेवमायास्यति तत्तवक्तुमशक्यम् । दास्यां वेश्या यामासक्ता इत्यादि किंकिंलिख्यते । तदाराग्यंकुत्र? अतः कारणात् पडेवपदार्थानाथेतत एव तिष्ठन्ति । समग्रैश्वर्यन्तु योगः, सतुसहजसिद्धएवपुनः । धर्मोऽपि स एव योमुक्ति रूपः, एतद्व्यतिरिक्तः स्मृत्यादि शास्त्राणि धर्म वर्णयन्ति सत्वधर्मएव, पुनर्यशोऽपि यस्यैव योमुक्तरूपस्तस्यैव बन्धरू- पस्य कथमयशः पुनः श्रीः शोभापि यस्यैव स मुक्तो बंध - २३४ गोरक्षसिद्धान्तसग्रह. रूपस्यकविः कथं भवेत् ? यो लौकिकसुखदुःखमग्नइति ज्ञानं, तस्यैवानं पुनराग्यं तस्यैववैराग्यमेवच सर्वेपामा- धारीनाथ एव, अतः कारणात्महासिद्धानां तात्पर्यनाथपरमे वेति । कोपिकथयति-किनाथ एवमुक्तिरूपएते ईश्वरामुक्ता नमन्ति ततु प्रथममेरोक्तं येस्त्रीसंयुक्ताः संसारकार्येचा सक्तास्ते कथं मुक्तिरूपाइत्यत एराएतेषां मुक्तिधरूपत्वं कथयिष्यते भगवच्छन्दनिर्णयोऽपिकरिष्यते । अस्माकं मतेशक्तिः सृष्टिकरोति शिरः पालनंकरोति काल महरति- नाथोमुक्तिंददाति । ब्रह्माविष्णुस्तुशिवशक्तिकालानामवा- अन्तरभेदन कर्तृत्नादिशक्तिनतुस्वमत्तया यदा शिनादयः संसारप्रवर्तका जातास्तदा वन्धरूपाएवभूताः । कथम् । जीवरूपेणवन्धनम् , ईश्वररूपेणापि वन्धनं दत्तमिति भदोऽत- एवजीवात्मापरमात्मेति। परन्तुशुद्धात्मानास्ति। सतुशुद्धात्मा नाथ एव एतसंसारमज्ञानं प्रवर्तयन्ति । नाथस्त्वशानं निवत यति । नाथरूपेणसृष्टिकरण उपेक्षा । प्राचार्यायान्तुखण्ड खएडेपुपाण्डित्यं वर्तते पूर्णो धर्मोनास्ति संमार प्रवृत्तिकाण २३५ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः रूपंवस्तुचकं पूर्णोधों ननुमोक्षधमों यथाराशामेकं स्वार्थ सम्पादकत्वमेवपूर्ण नत्वन्यधर्माः । धर्माश्चतेक इति यश वैराग्यं तपस्तीर्थ व्रतंत्यागोज्ञानं योगइत्यादयः । शौर्यमौ- दार्य पुण्यंयशोऽभिलापः शास्त्रधारणमित्यादयः । ब्रह्मचर्य गृहीतं पुनर्हिस्प्यं करोति पुनर्गार्हस्थ्यं किंचित्संसेव्य त्यागं करोत्यतएतदन्तरे यद्धर्मरहितत्वेन कालोजातस्तत्रधर्मो न्यूनएबजायते तथायुपदिशति ॥ भा०-छहों पदार्थ जिसमें पाए जाएं वह भगवान् कह- लाता है। वे छ पदार्थ कौन से हैं सुनिये ? समग्र ऐश्वर्य १ धर्म २ यश ३ श्री ४ ज्ञान ५ और वैराग्य ६। इनमें से एक भी पदार्थ रुद्र विष्णु आदि भगवत् पद से पुकारे जाने पालों में नहीं हैं। पहले तो योग रूप जो समन ऐश्वर्य है यही नहीं है, के ये सब काम वश है और स्त्रो के साथी है, जिनको लोग योगी कहते हैं उनके साथ स्त्री है यह हंसी की बात है। धर्म भी उनमें नहीं है क्योंकि जहां छल है यहां धर्म कहां? विष्णु ने नारद को यौनर मुख बना कर उसके साथ छल किया यह प्रसिद्ध है। अय प्राया यश यह भी नहीं, रावण के मारने से लोगों का कल्याण हुआ इससे गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः यश हुआ तो पर साथ में स्त्रीहरणजनित अपयश भी तो हुआ। जिम रावण को बाली नामक वानर ने तथा सह- स्रार्जुन ने यांध लिया उस कायर रावण को मारने से कैसे यश हुआ। राम तो भगवान् तथा जगत् के कर्ता कहे जाते हैं, ऐसे महापुरुष की स्त्री का हरण होना तो और भी महा अपयश है । अय श्री को भी देखिये-जिसको परमार्थ में मुक्ति नहीं है और इस लोक में यश नहीं है उसके पास श्री कैसे कही जा सकती है। अय ज्ञान के विषय में दृष्टि डालिये- यदि ज्ञानस्वरूप घे हैं तो अज्ञान के कार्य संसार व्यवहार में क्यों फसे। थय रहा वैराग्य- -यह तो इन कल्पित ईश्वरों में है ही नहाँ । कैसेपुराणों में इनका लौकिक व्यवहार यताया गया है। यह अकथनीय है, दासी तथा वेशाओं में प्रासक्त थे । इत्यादि क्या फ्पा लिग्वा जाय। इस हालत में वैराग्य कहां । अतः उपयुक्त छही पदार्थ नाथ ही में है । समनैश्यर्य योग है सो तो उनको स्वभाव से ही सिद्ध है। धर्म मुक्ति रूप है। उससे मिन्न जिलको स्मृत्यादि शास्त्र धर्म कहते हैं, सो इनके लिए उपधर्म ही है यश भी उन्ही का है जिनका मुक्त रूप है, पन्धन रूप का फैसे यश कहा जा सकता है। श्रो उसी की है जिसका रूप मुक्त है उस पन्ध रूप की छवि कैसी जो लौकिक गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः सुख दुःख में डूबा हुआ है। और उन्ही का ज्ञान वास्तविक शान है वैराग्य वास्तविक वैराग्य है। सबका प्राधार नाथ ही है, इसलिए महासिद्धों का तात्पर्य नाथ ही में है। कोई फहता है-या नाथ हो मुक्तरूप है ये ईश्वर मुक नहीं हैं। यह तो पहले ही कहा जा चुका है, जो स्त्रीयुक्त हैं और संसार में फसे हैं ये कैसे मुक्त कहलायेंगे, इसीलिए आगे मोक्ष और यन्धन बताया जायगा । भगवत् शब्द का भी निर्णय भी किया जायगा हमारे मत में शक्ति सृष्टि करती है, शिव पालन करता है, काल संहार करता है और नाथ मुक्ति देता है ब्रह्मा विन्णु तो शिप शक्ति और काल इनके अवान्तर भेद से कर्तुत्यादि शक्ति वाले हैं, न कि अपनी सत्ता से, जय शिवादि संसार के प्रवर्तक बनते हैं तय धन्ध रूप ही हो जाते हैं। कैसे जैसे जीव भाय बन्ध कोटि में गिना जाता है वैसे ही ईश्वर भाव भी यन्यन श्रेणी में माना जाता है इसीलिये जीवात्मा और परमात्मा ये दो भेद हैं । परन्तु ये शुद्ध श्रोत्मा नहीं है, वह शुद्ध आत्मा तो नाथ ही है। ये संसार रूप अशान को पढ़ाते हैं। नाथ तो अज्ञान को हटाता है, नाथ रूप से सृष्टि करने में उपेक्षा है अर्थात् नाथ रूप से सृष्टि की रचना नहीं होती। आचार्यों का पाण्डित्य तो खण्ड खण्ड में है पूर्ण .

२५०
गारक्षसिद्धान्तसंग्रहः
मेव व्यापरुम् । पुनः निर्गुणन्तु शक्तिरहित मेव
तदाब्यापकधर्मएव तत्रकथं कथ्यते । एतद्रीत्या निर्गुणपे
बब्रोवद्वयमपि परात्परं ब्रम न भवति तस्मात् परम हंसाये
क्षयापि अवधूता उत्तमाः कथम् ? परात्परपूर्णोनाथो
लत्य इति ।
भा० टी०-तवादी लोग किया को ब्रहा कहते हैं ।
भरत यादी नो प्रह्म निष्क्रिय है ऐसा कहते हैं ये दोनों ही
ठोक नहीं क्यों कि ब्रह्म सदासकिय भोर फटस्य नहीं है । कैसे
जैसे हम लोगों में सदा क्रिया नहीं रहती और सदा श्रग्रिया भी
नहीं होती, तुम और हम प्रातःकालादि के समय स्नान
भोजनादि क्रिया करते हैं फिर मयाहादि समय में स्वस्थ
वित होकर सघ किया छोड़ फरम्य हो जाते हैं, फिर कार्य का
समय थाने पर किया करने लगते हैं ऐसे दो ईयर भी किया
और अधिया ये दोनों प्रल की शक्ति है। इन दोनों में रहता
हुआ यूह निरन्तर निघल-अविनाशी-सयात्मक और परिपूर्ण
पहलाता है। न कि एक तरफ से मान लेने पर अर्थात् सकिया
पा अमिया एक कोटि से परिपूर्ण पक्ष नहीं कहा जाता । अय.
घून गीता में कहा है जो अपने प्रशन से असर को संदित

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २४१ करता है इत्यादि । अखंडखड में भी वणित है-प्रखंड और खंड ये दोनों कैसे हो सकते हैं, अतः द्वैतवादियों के कैलास और बैकुण्ठादि स्थान हैं, अद्व सवादियों के लिये माया शबल यूह्मस्थान है। योगिर्या के लिये पन्धन का मनन करने के बाद मुक्ति होने से निर्गुण स्थान है । यन्ध और मुक्ति दोनों से रहित जो परम सिद्धान्त है उस के अनुयायी अवधूत योगियों का जो स्थान है वह तो निर्गुण और सगुण दोनोंसे अतीत ओर अद्वैन के ऊपर वर्तमान है। परम हस लोग कहते हैं कि हमारा स्थान निर्गुण है यह उनको कथन मात्रहै न कि उनके व्यवहार से सिद्ध होता है फैसे १ ये तो माया और गण दोनों से रहित युह्म में माया और गुणों को स्थापना करते हैं फिर नाना प्रकार से ससार की क्रिया प्रादिकों का उस में प्रारोप करते हैं और अनेक स्तोत्रों से उस की स्तुति करते हैं। सब कैसे यह निर्गुण और माया रहित हुआ । माहात्म्य वा प्रशंसा के लिये कहे जाने पर लक्ष्य का से निर्गुण यूह्म कहा गया न कि प्राचरण में देखा जाता है फिर कहने पर निर्गुण बृह्म भले ही इष्ट हो तब भी वह पूर्ण नहीं हो सका किन्तु एक देशी ही रहा जैसे योगियों का इष्ट है उस रोति से नहीं हो सका। कैसे पहले ब्रह्म शब्द का अक्ष. रार्थ ही टूट गया बृह्म पद का अर्थ घ्यापक है।

२४२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः सो द्वैतवादी को रीति से एक देश से निर्गुण यूा सर्व व्यापक नहीं हो सका कैसे चैतन्य रूप जीव द्वारा यह व्यापक कहा जाता है तय तो पंच भूनों में व्यापकता नहीं रही श्रात्म रूप हो व्यापक रहा, निर्गुण तो शक्ति रहित ही है तब भापक धर्म कैसे कहा जाय इस रीति से निर्गुण हो ब्रह्म परात्पर उभय रूप या नहीं हुआ । इस लिये परमहंस की अपेक्षा भी अवधून ही उत्तम है, कैसे उनका पर से भी पर पूर्ण नाथ हो लक्ष्य है। मू०-अद्वैतोपरिवर्तिनिराकारसाकाराऽतीतनाथात् निराका- रज्योतिनाथोजातस्ततः साकारनाथोजातः तदिच्छया सदा शियोभैरवोजावस्ततश्वशक्तिभैरवी च जाता तस्माद्विष्णुर्जातस्त. स्माद्ब्रह्माजातस्तेन सर्वसृष्टिरुत्पन्ना। नाथाद्विप्रकारासृष्टिर्जाता नादरूपा विन्दुरूपा च नादरूपाशिष्यममेणविन्दुरूपा च पुत्र. प्रमेण । नादानवनाथाजाता विन्दुतः सदाशियो भैरवोंजातः । पुनः शब्दसृष्टि प्रकारमाह-एकासूक्ष्मरूपिणी द्वितीया स्थूल. रूपिणी सूक्ष्मरूपिणी प्रणयो महागायत्री योगशास्त्रमिविश्थूलरू- पिणी प्राणगायत्रीवेदत्रयीति । पुनर्योगशास्त्रवतंत्रशास्त्रं जावेदात एमृत्यादिशास्त्रंजातम् पुनः नवनाथानां पश्चाद्वादशासिद्धाश्यतु गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २४३ रशीतिश्च द्वादशपन्थानोऽनन्तसिद्धाश्चजाताः । सदाशिव भैर- वाद्विष्णुर्ब्रह्मा सूर्यश्चन्द्र इन्द्रादिदेवताजाताः । पुनर्योगात् शेपयोगसांख्ययोगादयोऽनेकयोगा अनेकभेदैर्जातास्तेन योगेनग्यौ विपन्यायादिकं शास्त्र अतितः स्मृतिशास्त्रव्याकरणपुराणोपपुरा- णानेकेतिहासाजाताः । एवं विग्रहसृष्टिनिवृत्तिप्रवृत्तिरूपिणी- जाता । पुनः नादसृष्टिरपि सूक्ष्मस्थूलरूपिणीप्रकारद्वयात्मिका- जाता। भा०-अ त के ऊपर विराजमान निराकार और साकार इन दोनों से परे जोनाथ है उससे निराकार ज्योतिस्वरूप नाथ प्रकट हुप्रा फिर उससे साकार नाथ जी उत्पन्न हुए, उनकी इच्छा से सदा शिव भैरव हुए, उनसे भैरवी शक्ति, शक्ति से विष्णु विष्णु से ब्रह्मा ब्रह्मा से सारी सृष्टि हुई नाथ जी से दो प्रकार की सृष्टि हुई नाद रूप और पिन्दुरूप, नादरूप शिर फर से और बिन्दुका पुत्र फ्रम से । नयनाय हुए, भोर बिन्दु से सदा शिय भैरव हुमा। प्रय मागे शम्द सुष्टि के फ्रम को कहते हैं पहली सूक्ष्म रूप दूसरी स्थूल रूप । प्रणव महागायत्री और योगशास्त्र यह सूदम शब्द सृष्टि है। ब्रह्म गायत्री और तीन येद यह स्थल शब्द सटि है। फिर योगशाख से तंत्र शास्त्र हुआ, भोर येद. से नाद से २४६ गोरक्षसिद्धान्तसग्रहः वामभागे। सव्ये विष्णुस्तथैरच | याऽद्भुता निजाइच्छा शक्तिस्तस्या अंशन जातः । साकारःस विष्णुः संसारप्र- वृत्त्यर्थ यस्य सव्यभागे। पुनः मध्यभागेवयंपूर्णो निर्गुणस- गुणातीतसर्वशिरोमणिनाथस्तस्य यः साकाररूपी नाथी मध्यभागेस नाथो ज्योतिरूपोममहृदयान्धकारनिवर्तन करीत भाग--यहां से भागे मगलाचरण के श्लोकों का व्याख्यान किया जायगा, निर्गुण अर्थात् ब्रह्म सर्वोपरिवर्तिनाथ के धाम भाग में अर्थात् एक व्यवहार में है, यहां पाम भाग से क्या लिया जाता है सो कहते हैं- जैसे किसी के प्रति शास्त्र का कथन है कि कोई पुरुप ऊर्ध्वगति ब्रह्म पद को प्राप्त होगया। तय कहते है कि सर्व व्यापक एक रूप निर्गुण यूहा का भी ऊपर और नीचे यह व्यवहार प्रत्यय की कल्पना किए बिना नहीं हो सकता, अन्यथा किस देश में या किस दिशा में और कहा से पाक्य रचना की जायगी क्योंकि निर्गुण में कोई देश दिशा आदि तो है ही नहीं इस लिए कल्पना के बिना कुछ व्यवहार नहीं हो सस्ता है, इसी रीति ५ अनुसार निर्गुण पाम भागे यह कहा गया है । उस साक्षात् स्वरूप के एक व्यवहार में निगुण, और दूसरे व्ययहार में अपनी अद्भुत इच्छा शक्ति है, यही शक्ति सगुण ब्रह्म का मूल कारण है।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २४७ । मध्य भागे, इस का अर्थ सब का अाधार है या सर्व शिरोमणि यह नाथ है, या जिसमें निर्गुण सगुण दोनों एक हो जाते हैं। सत्य असत्य जड चैनम्य सघ भाव जिस में समता को प्राप्त कर लेते हैं, और जिस से द्वतात का भाव दूर हो जाता है। जो इस प्रकार सब से ऊपर रहने वाला वाक् मन से परे और याङ् मनोमय कैत और अद्वैत दोनों से रहित, जैसा ही है वैसा ही है इस तरह सब से विलक्षण उसे कह सकते हैं यह परिपूर्ण रूप नाथ ही सिद्धों का लक्ष्य है वह मेरा कल्याण करे। मोक्ष मार्ग में दक्षिण भाग से वाम भाग श्रेष्ठ है इसी लिये घाम भाग में निर्गुण कहा है । जीव सगुण और द्वैत रूप है इस लिए बद्ध कहलाते हैं वे उस नाथ के नखों के अग्रभाग में -रमण करते है और जो निर्गुण तत्त्वभून अद्वैत रूप मुक्त हैं घे चरणों के श्राप भाग में रमण करते हैं अर्थात् बद्ध की अपेक्षा मुक्त का साक्षात् सम्बन्ध है । ये दोनो व्यवहार मात्रसे दिखाये गये हैं सो भीषलानामान है वास्तवमै तो वन्ध और मुक्ति दोनों से रहित है। जो तस्य का अनुभव करने यास मुक्त हैं ये "तो नाथ जी के समस्त शरीर में रमण करते हैं, इस में संदेह ही पया है,क्योंकि वे नाश रूप ही है मिन्न रूप नहीं है। आगे कहा है कि धाम भागमें शम्भु स्थित है। इस का तात्पर्य यह है कि जो - २४ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः निर्गुण ब्रह्म का अंश शिय है यह संसार के कल्याण के लिए साकाररूप से उत्पन्न होकर दामभाग में स्थित है विष्णु दक्षिण भाग में स्थित है इस का अभिप्राय यह है कि नाथ जी की जो अद्भुत स्वकीय इच्छा शक्ति है उसके अंश से उत्पन्न होने वाले संसार को प्रवृत्ति के लिए साकार विष्णु नाथ जी के दक्षिण भाग में हैं मध्य में स्वयं पूर्ण तथा निर्गुण सगुण से अतीत सर्व शिरोमणि नाथ हैं उनश जो साकार रूप नाथ है यह ज्योतिस्वरूप नाथ जी मेरे हृदय से अज्ञान रूप अन्धकार को दूर करे। मू०---विश्वोत्पत्तिकरोति स्वस्याप्युत्पत्तिकषयति । एवं ब्रह्मण इच्छयापुरुषोजातः, स नरहतितनतपस्तप्तं, तेन शरीराम्न. लानि नाराइतिमातास्तत्रतेनशयनं कृततेन नारायएइति संज्ञको जातः । पुनरस्यैवावान्तर रूपाणि रामकृष्णादीनि मातानि तपा- मपि रामनवमी जन्माष्टमीत्यादि जन्मकर्मोत्सवाइति मन्यन्ते । तयाच उत्पतिमान् सनाशवान पुनयंत्रलोके गतास्त पुनरायान्ति । कपम् ! जयविनयोशापादसुरौनातौ । तर्हितेपास्पानं निर्भयंकषम् अथच-विश्वोत्पत्ति कारणमेवोस्तं तेनैवंज्ञायते । अन्यदेवापेक्षया संसाराऽपेक्षयाच सर्वोत्तम शिवएव परन्तुस्वस्मात्तुनिकृष्टएवेतिकृत्वा + गोरतसिद्धान्तसंग्रहः २४६ मंगलतुनायात्मकमेव कृतम् । आदिनाथो गोरसना पश्चांशांशि मावेन वास्वयमेक एवं परन्तुम्यवहारार्थमझांगिमावेन संन्यसेवकमावेन नाथात्मकमेव मंगल कृतं तेनैवसूचितं सर्वस्मादुत्तमः शिवः शिवा- दुत्तमोनाग इति योगे देवानामयन संसारे सर्वोत्तमोनाथ इति संकेतो रीत्या । नायस्योत्पत्तिरेव योगशास्त्रेण न कथिता, यतोजन्मकर्मापि न गीयते अतएव सिद्धसिद्धान्त पद्धतौ~श्रीगोरक्षनाथेन विश्वस्य- कतत्वं शिवस्य लिखितं न यस्य तु न लिखितम् । कथं विश्वकरणे सगुणत्वमायाति सोपाधीश्वरत्वं चायाति, नापास्तु निर्गुण एव निरुणाधिरूप एव तस्य प्राकृतिक कार्यकरणेन किं माहात्म्यं किं वा श्रीरिति । यदि पुन: शिव एव मुख्योदेवोमवेत्तर्हि मंगलं शिवात्मक किमर्थं न कृतम् , एवं रीत्या कपनं महासिद्धानां सिद्धान्तोवर्तते नतु स्थूलरीत्या प्रवृत्तिरीत्या कथनरीतिः । कथमेते तु निर्गुणा ऐश्वर्य बहुधागुप्तं कुर्वन्ति । अन्येतु ऐश्वर्य प्रकटी कुर्वन्ति । अहो-विपरीता यार्ता तस्याः श्रवणेपि ज्ञानेऽपि चाऽप्रियं भवति ।अस्मिन् मते श्रुतिर्न साधिका साधिका वैति वार्ता । श्रुतिधारमा मते साधिका न भवेत् , भवेदपि चेत्तहिमेरुः कम्पते 1 - गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः पृथिवी चलति । माकासात् सवें मायते पृषिष्पा एवं सतं मायते पितु पुत्रो मायते स पिनापि पुत्राजायते एवं सर्वमपि कार्य विपरीत रीत्या भान। यत एक न वतन्यं यन्महासिद्धानां तात्पर्य तदेव श्रुतिमिवतीत्यूनानि मिकीपति । परन्तु नाना वर्मनिरुपणातस्याप्यन्यपा वपनारसूक्ष्मात स्पूररूपनिरुपणात पातकिनी माता, माराफ्रान्ता व नाता, तेनतत्तात्पर्य पातुं न श. सपने । यदि किंचिद् वस्तु शक्यने मन्महामिद्धानां तात्पर्यमेवरदेव । याभुति प्रणवान सारिणी सात्तस्माकं मतानुमारिपयेव, या पप्रणव पिरोधिनी श्रुति यमज्ञान प्रतिपादिका साऽस्माकं मतानुगायिनीमा भानुनाम विन्तु सूक्ष्मस्य निगमयम् । प्रपमराउ श्रुतिरस्मा मते साधिकान सापि निद्वपमपिस्वादिति । कथं तदार नसाधिवामा । सरयेवम् । मामातुप्रयोमन्मेनास्ति । पम् ! यन्तु महाद पोगमाभिमास्तन प नाम्यायपेशा हर्म , परन्त एपामत स्थलदाः परम पदाइनि मन्यन्ते यदि च तदुधमाधम भापुस्ताऽस्माक मते दुपयागेपर युवन्ति तदिमेव पवारनीमनी गनि प्रतिपाति- मोमुनी मान्न मकाम इतितक्यमुनि ममत्वं पर्णगर, गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २५१ - . परन्तुतस्यत्विष्टमेवेति कृत्वा मनसातु मुनिस्तुष्यत्येवपरन्तुतदभिप्रायेण- वाह्यरत्यापि तुष्टएव भवेत्। कथम् १ यदि संग क्रियते तदातुलक्ष्यभ्रंशो- ऽतोऽज्ञतगाभूपणेपि दूषणमारोपयति । यतोहेतोर्न साधिकेत्युक्तंतह- वर्जनं चैतद्रीत्येति । पुनः साधक त्वेकोवादोपइति चेत्कथ्यते- साधकेति तु येकषयन्ति ते पुराणस्मृति किंकरा, वयन्तु स्थूलवेदानां पितृकारण महावेदस्तस्यानुसारिणोयोगसिद्धान्तिनस्ते कयं तदाश्रिता भवेमेतिरीत्या साधकत्वमपि वनितम् । पूर्वमप्युक्तगेव, वयन्तु महा- वेदयोगानुमारिणइति । अथ च श्रुतियद् वदति तदस्माकं महासिद्धानां मतं तदेव वदति सकलाया भपिश्रुतस्तात्पर्य प्रणवयोगपरमेव । तथाच याश्रुतयः प्रणवानुसारिपयस्तास्तु योगमेववदन्ति । ये च श्रुत्य- नुकूलास्ते प्रथममेव प्रयुक्ता इति । पुनः, ब्रह्मवेदस्य एकोनविंशति रुपनिषदोमण्डूक माण्डूक्य क्षुरिकाकैवल्य प्रभृतयः । छान्दोग्य वृहदारण्य मैत्रायण्यादयोऽन्यवेदस्यापियोगपराएगतास्तुसःप्रत्य- क्षतः । पुनः, वेदवेदान्तादिसर्वपरोक्षवादो यतोहेतोसतात्पर्यंतात्पर्य रक्षति प्रत्यक्षतः कथं तस्यतनमर्यादानास्ति, यतोहेतो कर्मोपासनां ज्ञानंच वर्णयति परन्तु कर्मतः सर्यस्य तात्पर्ययोग एगति ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः मा०-हिरण्यगर्भ ब्रह्मा संसार की उत्पत्ति करता हुआ अपनी भी उत्पत्ति मिद्ध कर रहा है। पहले ब्रह्मा की इच्छा से पुरुष उत्पन्न हुया यह नर है, उसने तप किया, उस तप से उस के शरीर में जल उत्पन्न हुमा, उन जलों का नाम नार हुधा पपीकि नर से उत्पन्न होने वाले को नार कहा जाता है । उन जलो पर इस नर ने शयन किया इसमे उस विष्ण का नाम नारायण यह प्रसिद्ध हुआ, फिर इसी के आयान्तर का गम कृष्णादि अघतार हुए उन्हीं की यादगार में रामनयमो जन्मा- एमी आदि उत्सव मनाए जाने है । जो जो उत्ति पाले है, उनका नाश भी होता है और जो नर लोकों में गये है या जाते हैं ये यहां से लौटते भी अवश्य हैं । कैप्से । सुनो-वैकुंठ में जय और विजय नाम के दो द्वारपाल थे ये शाप से असुर हो गए थे, सय उनके स्थान को निर्मम फैसे कहा जा सकता है इससे सिद्ध होता है कि जो संमार की उत्पत्ति का कारण है घे भी उत्पत्ति नाश घाले हैं और देवताओं की तथा ससार की अपेक्षा सर्वोत्तम शिय ही है, परन्तु नाथ का की अपेक्षा तो निकट हो है इसी लिये नाथ जी का स्मरण रूप मंगल किया गया है धीमादिनाथ जी और धीगोरक्षनाथ जो इन दोनों में अंशाशि भाव का सम्बन्ध होने से अपना स्वयं एक होने पर गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा २५३ भी व्यवहार के लिये अद्भांगिभाव को प्राप्त होने से नमस्कार्य नमस्कारक भाव मान लिया गया है, इसी लिये प्रन्थ के प्रादि में श्रीनाथ जी का प्राणमरूप से मंगल किया गया है उसी से सूचित होता है कि सप से उत्तम शिय है, और शिव से उत्तम नाथ है, अतः योग देव और संसार सय से श्रेष्ठ नाथ है । नाथ जी की उत्पत्ति योगशास्त्र में वर्णित नहीं है। इस से सिद्ध हुमा कि नाथ जी का जन्म और कर्म नहीं है । सिद्धसिद्धान्त पद्धति में श्रीगोरक्षनाथ जी ने संसार का कर्ता शिव जी को लिखा है, न कि नाथ जी को, क्योंकि संसार-रचना में सगणता और सोपाधिक ईश्वरपना आता है, नाथ तो निर्गुण और निरूपा. धिक हैं संसार सम्बन्धि कार्य करने से उनका क्या माहात्म्य होगा और क्या विभूति बढ़ेगी ।. यदि शिव ही मुख्य देव होते सो शिव का ही मंगल क्यों न किया गया, सूक्ष्म आशय से कयन करना महासिद्धों का सिद्धान्त है, स्थूल और प्रवृत्ति रीति से कथन की शैली नहीं है कैसे ? महसिद्ध लोग अपनी घड़ाई नहीं चाहते इस लिये अपनी सिद्धि को गुप्त रखते हैं । और अन्य लोग अपने माहात्म्य के लिये ऐश्वर्य दिखाते हैं, देखो कैसी उतकी बात है जिसको सुनकर और जानकर २५४ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा अप्रिय सा प्रतीत होता है । इस सिद्धमत में ध्रुति साधक है भी और नहीं भी ये दोनों हो पाते है सूदमनाथ तत्व के कथन करने में श्रनि की सामर्थ्य न होने से यह हमारे मत में साधक नहीं है, अगर ध्रुति असाध्य साधन करे तो मेरु पर्वत भी कांपने लगे और पृथिवी हिलने लगे । ब्रह्म से ही सय उत्पन्न होते हैं यह न हो कर पृथिवी से हो जायगा 1 पिता से पुत्र उत्पन्न होता है पिन्सु पुत्र से भी पिता हाने लगेगा इस प्रकार सय काम उलटे हो जायेंगे, ऐसा कहने पर भी कोई दोष नहीं इस लिये ऐसा नही कहना चाहिये क्योंकि जो महासिद्धों का तात्पर्य है ध्रु नि उसी का कथन हाथ उठा कर काना चाहती है, परन्तु थति माना कर्मों का निरूपण करने स लक्ष्य रूप के विपरीत जा रही है, और स्थून कर्म के निरूपण से नाथ मार्गानुकूल नहीं है, तथा मुमुतु पुरुष के लिऐ भारभून है. नाथ तस्य के निकरण में भ्रति असमर्थ हो जिस परमार्थ ताप का निरूपण धति करती है यह महासिद्धांपा तारार्य ही है। मो प्रणय (मोकार ) का उनुसरण करने पारी भुति है यह मेरे ही मत का अनुगमन कर रही है, और जो प्रणय के विरुद्ध होकर वर्म और शाम को यताने याली है यह हमारे मतानु पायो न हो किन्तु सूक्ष्म तत्य निरूपण करने वाली प्रति तो , २५५ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः हमारे अनुकूल ही है, पहले कह चुके हैं कि हमारे मत में श्रुति साधक है और नहीं भी, यह दोनों ही बातें हैं कैसे इसको उत्तर यह है कि श्रुति साधक नहीं कहलाती हमें उस भूति से कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि हम महावेद रूप योग श्राश्रित हैं अनः अन्य किसी की अपेक्षा नही रखते। ओ स्थल येद को ही परम पदार्थ मानते हैं उनके म्थूल वेद यदि हमारे मत के साधक न हो, इस पर जो लोग हमारे ऊपर दोषारोपण करते हैं वह तो हमें इष्ट ही हैं, जैसे कोई स्त्री निष्काम मुनि को कहती है कि हे मुनि जी आप सकाम है, ऐसा यद्यपि मुनि के लिये दोष है परन्तु उस स्त्री को तो इष्ट है। ऐसा मान कर यह मुनि भीतर से तो प्रसन्न ही होता है परन्तु याहर से असतुष्ट प्रतीत होता है, कैसे ! जय यह स्त्री का सग करता है तष तो उसको सफामत्व कहना उचित है, परन्तु विना सग के हो सकामत्व कहना भूषण में दोषारोपण करना है। इसी कारण से कहा है कि अति साधक नहीं है । और साधक मानने में क्या दोष है उसको भी कहते हैं-जो कोई ध्रुति को साधक कहते हैं ये शुतिस्मृति और पुराणों के दास है, हम लोग जो स्थूल येदों का कारण पिताप महाघेद ओंकार है "उसके अनुयायी है, इसलिये योग सिद्धान्तवादी प्रकार के - २५४ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः अप्रिय सा प्रतीत होता है । इस सिद्धमत में प्रति साधक है भी और नहीं भी ये दोनों हो पाते हैं सूदमनाथ तत्व के कथन करने में ध्रुति की सामर्थ्य न होने से यह हमारे मत में साधक नहीं है, अगर ति असाध्य साधन करे तो मेरु पर्वत भी कांपने लगे और पृथिवी हिलने लगे । ब्रह्म से ही सय उत्पन्न होते हैं यह न हो कर पृथिवी से हो जायगा । पिता से पुन उत्पन्न होता है किन्तु पुत्र से भी पिता होने लगेगा इस प्रकार सय काम उलटे हो जायेंगे, ऐसा कहने पर भी कोई दोष नहीं इस लिये ऐसा नही कहना चाहिये क्योंकि जो महासिद्धों । तात्पर्य है श्रुति उसी का कथन हाथ उठा कर काना चाहती परन्तु श्रुति नाना फर्मों का निरूपण करने से लक्ष्य रूप के विपरीत जा रही है, और स्थून कर्म के निरूपण से नाथ मार्गानुकूल नहीं है, तथा मुमुतु पुरुष के लिये भारभून है. नाप तस्य के निरूपण में ध्रुति असमर्थ हां जिस परमार्थ तस्य का निरूपण पति करती है यह महासिद्धों का तात्पर्य ही है । मो प्रणव (ओंकार ) का उनुसरण करने पानी श्रुति है पह मेरे ही मत का अनुगमन कर रही है, और जो प्रणय के विरुद्ध होकर कर्म और ज्ञान को पताने पाली है यह हमारे मतानु यायो न हो किन्तु सूक्ष्म तत्य निरुपण करने पाली श्रुति तो उसके अनुयायी हैं, इसलिये योग सिद्धान्तयादी घोबार के । लोग जो स्थल घेदों का कारण पिताका महायेद ओंकार गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा हमारे अनुकूल ही है, पहले कह चुके हैं कि हमारे मत में श्रुति माधक है और नहीं भी, यह दोनों ही बातें हैं कैसे इसका उत्तर यह है कि श्रुति साधक नहीं कहलाती हमें उस श्रुति से कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि हम महायेद रूप योग के प्राधित हैं अतः अन्य किसी की अपेक्षा नहीं रखते। ओ स्थल घेद को ही परम पदार्थ मानते हैं उनके स्थूल वेद यदि हमारे मत के साधक न हो, इस पर जो लोग हमारे ऊपर दोषारोपण करते हैं वह तो हमे इष्ट ही हैं, जैसे कोई स्त्री निष्काम मुनि को कहती है कि हे मुनि जी आप सकाम है, ऐसा यद्यपि मुनि के लिये दोप है परन्तु उस स्त्री को तो इष्ट है। ऐसा मान कर वह मुनि भीतर से तो प्रसन्न ही होता है परन्तु याहर से असतुप प्रतीत होता है, कैसे ! जय वह स्त्री का संग करता है तप तो उसको सकामत्व कहना उचित है, परन्तु विना सग के हो सकामत्व कहना भूषण में दोषारोपण करना है। इसी कारण से कहा है कि अति साधक नहीं है । और साधक मानने में क्या दोष है उसको भी कहते हैं-जो कोई श्रुति को साधक कहते हैं ये ध्रुतिस्मृति और पुराणों के दास है, हम L गोरक्षतिद्धन्तसंग्रहा पुत्ररूप स्थूल वेद के आश्रित कैसे हो सकते हैं। इस रीति से श्रु नि साधक नहीं मानी गई है । यह पहले कहा जा चुका है कि हम लोग महायेद रूप योग के आधित है। घ स्तष में पूछा आय तो जिस बात को ध्रुति कहनी है उसी को हमारा मन भी बह रहा है कि समस्त धुतियों का तात्पर्य प्रणव योग में ही है उसी प्रकार जो भुतिया प्रणयानुसारी हैं घे तो योग का ही कथन करती है, और जो फर्म प्रतिपादक ग्थल घेद के अनुयायी हैं उनका यएएन तो पहले ही हो चुका प्रपोधक घेद के मुण्डक माण्डूपप सुरिका और कैवल्य भादि उनोस उपनिषद और अम्प घेद के छान्दोग्य पृहदारण्य मैत्रायणी मादि उपनिषद् ये पूर्वोक्त सारे ही प्रत्यक्ष रूप से घोग का ही निरूपण करते हैं. इम्य कमाँ को यनाने वाले वेद घेदान्त श्रादि परोक्षरूप से अर्थात् परमारा रूप में योग के प्रतिपादक हैं घेवों में यह मर्यादा नहीं है कि योग का ही निरूपण करते है, अपितु कर्म उपासना और मान सपका ही निकाण करते है परन्तु सपा तात्पर्य सो याग दी है। मू-वैश्चित् कथ्यते-ग्रमा विश्व सृजति विष्णु. पाल- पति रुद्र. सहरति, सस्पनुफमोनास्ति । योगस्यत्यनुफमो योपर्वते सप्रथममुक्तएय । यदि धत्तेपामेवानुभमोरतितव्यस्तदात्ययमपि ૨૫૭ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः चानुक्रमोव्यतिक्रमएवयदाभवेत् तदा कंवानुक्रमं करिष्यामि । कथम् ?.. अन्नं ब्रह्मारसो विष्णुर्भोक्ता देवोमहेश्वर , इत्यादौ । तेषां मध्येभोक्तातुरुद्रएयोक्तः स एववलिष्ट एतौतुभोज्यमिति । तथैव रुद्रः सहरतीत्यत्र महाप्राबल्येन नैगुण्येन नित्यमुक्तस्वरूपेण च तद्दोपधारकोनभयति तदन्यौतु गुणपर्यव- सानौ गुणावधीयत एतत्कार्यकरणं तबाधकमेव भवतीति पुनरस्य विचारस्य वार्ता वद्धास्तास्त्वग्रे वक्ष्यन्तइति । - भी०-कोई कहता है कि ब्रह्मा संसार को पैदा करता है विष्णु उसकी रक्षा करता है और रुद्र संहार करता है, परन्तु वह अनुक्रम नही है। योग का जो अनुक्रम है वह पहले कहा जा चुका है, यदि लोक प्रसिद्ध अनुक्रम की ही रक्षा की जाय तो यह अनुक्रम उल्टा हो जायगा तय किस अनुक्रम का थाश्रय किया जायगा, अतः योग का ही अनुक्रम ठीक है, कैसे ? अन्न ब्रह्मा और रस विष्णु है, इन का भोक्ता महेश्वर है, सव में भोक्तो तो रुद्र ही कहा गया है यही बलिष्ठ है विष्णु और ब्रह्मा तो भोज्य हैं, रुद्र संहार करता है यदि इस पर कोई दोष की शंका करे तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि वह इन २५६ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहा प्रथल निर्गुण और नित्यमुक्तस्वरूप है इसलिये उस दोपका आधार पह नहीं हो सकता, ब्रह्मा और विष्णु ये दोनों तो गुणों के अन्तर्गत हैं अतः गुणों के आधार है, इसलिये शरीर इन्द्रियादि उन में वाधक है यह पात इस समयथगित की जाती है आगे इसका विस्तार से ध्याख्यान होगा। मू-सर्वे सम्प्रदायाः कथयन्ति-सहस्रशोपन्थाजाता इति वानप्रतिमयाकथ्यते- यदि भमोपदेशो मन्यतांतहि सर्वे मन्थाः पे निपात्यन्ताम् । कथमाधुनिकसमये स्वयमपि मुक्तान भवन्तितेह्यन्येषांमोतोपदेशेकथं समर्धा भवेयुर्यत आश्चर्यार्थ मभिमानार्थ च जीविकाथ व्यसनार्थ च यस्यकस्याप्यभिलापार्थ यतशालंकरोति तद्धर्मार्थिपुरुषायाममे कथं शोभनीयं भवेत् । तदुक्तं श्रीगोरक्षनायेन। शिलयाकिं परं पारं शिलासश्या प्रवार्यते । स्वयन्तभिवेद्यस्तु परान्निस्तारयत्यलम् ।। अतः कारणादाधुनिका अमुक्तपुरुषास्तैः कृतानि सहस्रशः शाखाणि तानित्याज्यानि । एवच्छास्त्रस्यामिमानो भवद्भिर्न रज- पीयइति ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह ૨૫૯ भाग-सय संप्रदाय पाले कहते हैं कि हजारों अन्य धन चुके हैं उन सय के प्रति मेरा कथन है कि यदि मेरा उपदेश मानो तो मैं कहूंगा कि सारे ग्रन्थों को कूए में फैंक दो क्यों ? इस आधुनिक समय में स्वयं भी मुक्त नही होते हैं तो दूसरों के लिये मोक्ष का उपदेश देने में कैसे समर्थ हो सकेंगे, क्योंकि लोगों को चकित करने के लिये अभिमान जीविका और ध्यसन आदि किसी प्रकार की भभिलापा के लिये जिस शास्त्र की रचना की जाती है वह शास्त्र धर्मार्थी पुरुषों के सामने किस प्रकार प्रशंसनीय हो सकता है, इसी आशय को लेकर श्रीगोरक्षनाथ जी ने कहा है--कि जो स्वयं पत्थर की तरह अज्ञानी है यह कैसे दूसरे को तारेगा! अतः 'याधुनिक अमुक्त पुरुषों के यनाये हुए हजारों शास्त्र हैं ये सप त्याज्य हैं, अन्यथा मायावियों के जाल से वास्तविक शास्त्र के गौरव की रक्षा नहीं कर सकोगे। मू-शंकरसम्प्रदाये विद्यारण्यस्त्यागीजातः पश्चाद् घेद मायकम्वदनन्तरं काशींगत्वा कस्यापि पंडितस्याग्रे स्वकृतभाप्यवार्ताकवा । तदा तेन सनिन्दितः। कथं त्यागी भूत्वापुनरपिव्यवहार उद्युक्तः वदापुनः परमहंसेनोक्तम् ?

२६० गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः मदीयः श्रमस्त्ववलोकनीयइति। तदा पंडितेन दृष्ट्वा अशुद्धि वाहुल्यमित्युक्तं तदा परमहंसो विरागो जातः । पुनः कदा चिद्वन भूमणेकस्यचित् प्रेतस्य कृपया संमेलनं जातम् । तेन माय कमण्डली धृत्वाऽशुद्धिरीकृतेतिवार्ताबहुप्रसिद्धा । पुनः कौमुदीकारो भट्टोजीदीक्षितः सोऽपि प्रेतत्वं गतः । पुनः चैष्णव संप्रदाये ताताचायणाप्ययदीक्षितस्योपारिकाप्यभि चारः संचारितः स तु तेन शिव भक्तेन शिवस्मरणे कृते तस्यैव भरणाय जातः। एवं यदा तदा मया कथ्यते यादृशानि प्रेत रूपैः प्रेत प्रसादाभिलापिभिः पुरुषः कृतानिशास्त्राणिपातायकथंभव- न्त्यतःकारणात् महासिद्धानांमते विद्याभ्यासेनकोऽपिग्रन्थन करोति किन्तु योगाभ्यासेनसिद्धोभूत्वा सिद्धत्वेन शाखें- करोति । स स्वयमपि मुक्तोऽन्येपामपि मुक्तिं ददातीति सिद्धान्तः । ग्रन्थस्य प्रकरणवन्धनादिरतोऽपिचनक्रियते कथमियमप्याशैव भवति नियम्यश्च भवति ज्ञानन्तु क्षण स्पापिनास्ति । तहिएतावसंकल्पः क्रियते । तस्यापि अहंकार गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः विलासितत्वात्तद्रूपमपिकमैवलग्नं भवेत् पुनः क्षणेनमरणे सत्यन्यत् कार्यम् । तावन्मात्रस्तु वन्धो जात एव यस्माद्यत प्रारम्भः कृतः सएवादिमान् न कृतः तत्रैवसमाप्तिः। स्वतंत्रा णां पुरुषाणां क्षणमात्रमपिबन्धनं प्रियं नभवेत् । पुनः संस्कृतो चर्तते सोप्यघटित पदार्थस्तुनास्ति सर्वव्यापकोऽपि नास्ति, कथम् ? स्वभावकापिनास्ति यदाशिष्यते तदाऽऽयाति । पुनर्यश्वशब्दः सोऽघटितोऽस्ति विनापि शिक्षां यत थायाति समन्दव्यापकोनास्ति यत्परात्परमघटितवरूपं तथैवतदंश एप शब्द एवाघटितो दृश्यते स एवग्राह्यइति । अतः कारणा- देवश्रीनाथेन शब्दमयीगिरेतिकृत्वा सर्वाभिरपि गिराभिः सर्वाणि शास्त्राणि कृतानि । साचसंस्कृतप्राकृतनागरमा- गयीभाषाभिरथच यवनभाषापर्यन्ताभिरपि यत एतेनव्यव- हारे तु सर्वज्ञत्वं सूचित सिद्धान्ते शब्दएवमुख्यइति । योऽ- घटितपदार्थो विशेपव्यापकः सएव नतुसंस्कृतोवाऽन्योऽपि यः कश्चित् एकसांकेतिक भापाशब्दः सएचसिद्धान्त इति ।

२६२ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः नकिन्तुशब्दएव सिद्धान्तइति शब्देब्रह्मणि शुद्धत्वाऽशुद्ध- त्वेनस्वाऽव्यक्त लिङ्गोपर्येव तात्पर्यमिति यतस्तद् प्रकारण सर्वमेकम् । यदादेवः चिन्तनीयस्तदा तेपांशास्त्रपठनेऽपि किम् ! तदुक्तं भर्तृहरिणा- तार्किका घटपटेतिरटेयुः शान्दिकाः खफछठेति पठेयुः। मादृशान्नुसततं स्मरणीयौ, चन्द्रचूड़चरणौ रमायौ ।। पुनरवधूतेपुकिंचिद् दोपारोपणं क्रियते निश्चितं तथा कुर्वन्तुनाम ततोऽवधूतानां नमनोविकारः । तदुक्तं महरि- णाश्रीगोरक्षनाथशिष्येण- चाण्डालः किमयंद्विजातिरथया शूद्रोऽधया तापसः । किंवातत्त्वनिवेशपेशलमतियोगविर. कोपि किम् ? इत्युत्पन्नविकल्पजल्पमुखरैः संभाष्यमाणा जनः । नोद्धाः पथिनैव तुष्टमनसो गच्छन्ति ते योगिनः ।। गालिप्रदानेऽपि नापधूतानां क्रोधादिरिति । भहरिणोक्तमेव- ददतु ददत गालिंगालिमन्तोमवन्तः ।

गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २६३ वयमपितदभावाद् गालिदानेऽप्यशक्ताः॥ जगति विदितमेतद् दीयते विद्यमानम् । नहि शशकविषाणं कोऽपि कस्मै ददाति ।। पुनः क्रोधो न क्रियते इदमपि नास्ति कथम् ? अक्रोध- स्तुपरमहंसानां धर्म पुनः क्रोधकरणमिति गृहस्थानां धर्मः। अस्माकं तुद्वयमपि धर्मएवेत्यत एवैकदा भर्तृहरि स्वेच्छया- सिद्धस्वरूपः कापोतीमाश्रित्यपण्याथिकायां कणानादाय चर्चयन् नृपतिना विक्रमार्केण दृष्ट । स ज्येष्ठोधातैय तथापि सिद्धरूपस्तेनाज्ञातो यतउक्तम् - अहोअस्यापि जननी ययै तादृशः पुरुषोजनिता यश्च स्वोदरभरणेप्यसमर्थ इति । तच्छ्रुत्वा किमुक्तं सिद्धन ? अहो तस्यापि जननी धिक् यः समर्थोपि परोपकारकरणेऽसमर्थ इति । यदाचैवं विवेकव- चनं श्रुत्वाराजा महान् विचक्षणः स्वकीयं ज्येष्ठमातरं परम पुरुषं ज्ञात्वाऽश्वः शीघ्रमेवावतीर्य तचरणपतितस्तदाश्रीभ- हरियोपदेशो दत्तस्तदनन्तरं परोपकार करणेऽसमथों- नृपतिः प्रवृत्तस्तेनच महाप्रतापवान् जातस्ततः कथ्यते-

२६४
गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः
महासिद्धा अकामिनोऽक्रोधिनो जिताहकारास्ते वचन
सहनं कथनकुर्वन्ति परन्तुपरमहंसरीत्येमेतु परमहंसा नसन्ति
गृहस्थाऽपिनसन्ति यथा काकोलूकमिति । तयोरेकस्तु
दिनएव पश्यति, तदन्यो रात्रावेवपश्यति । इमेतु योगिनी
यौगिकपरमहंसा मरालादृष्टिद्वयेनापि पश्यन्तो मुक्तिमु-
क्ताफलं गृहन्ति । शिवशक्त्योर्द्वयमपि चैकीकृत्य चरन्ति
तेऽवधूतयोगिनो भवन्तीति सिद्धान्तेन सर्वदारमन्ते ॥
इति शिवम् ।
भाo-शंकराचार्य के सम्प्रदाय में विचारण्य स्वामी स्यागी
हुप, फिर उन्होंने घेद का भाष्य बनाया उसके बाद काशी
जाकर किसी पंडित के भागे उस घेद भाष्य की चर्चा की,
उस पंडित ने उनको निन्दा की और कहा कि त्यागी होकर
व्यवहार में पयों फसगये, तय परम हंस ने कहा मेरा परिश्रम
तो देखो अर्थात् मेरे पनाये पेद भाष्प का अवलोकन तो कीजिये
फिर पंडित ने उसे देपा भीर पहुन भशुद्ध पताया तब परम
हंस थिरक होगया। फिर कभी घनमें घूमते हुए उसकी किसी
प्रेत से मेंट होगई उस प्रेत ने उस भाष्य को कमण्डलु में रख

२६५ गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः कर उस की अशुद्धिया दूर करदी। यह बात बहुत प्रसिद्ध है । व्याकरण कौमुदी के कर्ता भट्टोजिदीक्षित भी प्रेत होगये थे। फिर वैष्णव संप्रदाय के ताताचार्य ने अप्ययदी, क्षित के ऊपर मारणोच्चाटनादिकर्म किया, तब शिव भक्त अप्ययदीक्षित ने शिव का स्मरण किया और शिवजी की कृपा से ताताचार्य की हो मृत्यु हुई । जब इस प्रकार की यातें है तो मैं कहता है कि प्रत के प्रसाद के इच्छुक प्रेत स्वरूप पुरुषों के बनाए हुए शास्त्र कैसे मुक्ति दायक हो सकते हैं । इसकारण महासिद्धों के मतभेद में विद्याभ्यास के द्वारा कोई भी किसी ग्रन्थ को नही बनाता, हां योगाभ्यास से सिद्ध होकर सिद्धि के यल से सिद्ध पुरुष शास्त्र बनाता है, यह स्वयं भी मुक्त है और अन्यों को भी मुक्ति देता है, सिद्धान्त है, योगियों के बनाए ग्रन्थ प्रकरण आदि के पन्धन से मुक्त होते हैं, क्योंकि नियम के अन्दर रहना और आशा करना यह नाथ के स्वरूप से यहि त है, एक क्षण का भी पता नहीं कि क्या होगा इतना बड़ा संकल्प करना कि अय से प्रारम्भ कर के इतने दिनों के भीतर पूरा करेंगे। उस सपको अहंकार का सेल होने से यह भी कम हो का रूप है। फिर क्षण भर में मृत्यु होजाने पर यह सब काम उलट • यह गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः - जाता है। अर्थात् कुछ का कुछ हो जाता है उतना भी तो बन्ध हुआ ही, इसी तरह जहां से जो आरम्भ किया गया उसका वही श्रादि हुना और आगे जहां करना यन्ध हुआ वहीं समाप्ति होगई। किसी प्रकरण बंधनादि की आवश्यकता नहीं रखनी चाहिये क्यों कि स्वतन्त्र पुरुष को क्षण मात्र भी पन्धन अच्छा नहीं लगता है। संस्कृत यद्यपि पद पदार्थ से परिपूर्ण है। तथापि सय लोगों में यापक नहीं है इसी लिये यह जन्म सिद्ध भाषा नहीं है अपितु गुरु से सीखी जाती है। तब सस्कृत शब्दों का ज्ञान होता है । जो शन्द संस्कृत से भिन्न हैं अर्थात् व्याकरण के नियंत्रण से पहर हैं, वे विना शिक्षा.के हो याजाते हैं अर्थात् मातृ भाषा होने से अनायास ही घोले जा सकते है। और यह असंस्कृत शब्द मन्दव्यापक नहीं है अर्थात् सर्वत्र जनता में उसका व्यवहार है जो मय से यड़ा संस्कृत शब्द है उसका भी स्वरूप व्यापक नहीं है । पैसे हो उसका अंश भाषा शब्द भी अध्यापक देखा जाता है इस लिये सब भाषाओं का शान प्रायश्यक है। इसी कारण श्री नाथ जी ने शम्दमाश पाणो मान कर सय भ पात्रों में शास्त्र वनाए, यह रचना संरस्त प्राकृत नागर और मागध भाषामों में की गई है, यहां तक कहें उन्होंने तो यन भाषा में भी शास्त्ररचना की है इस से नाथ जी को व्यावहारिक सर्पक्षता स्पर प्रतीत होती है गोरससिद्धान्तसंग्रहः सिद्धान्त में तो शब्द ही मुख्य है । जो अपूर्ण और विशेष व्यापक है यह संस्कृत हो या एक देश की सांकेतिक भाषा हो ऐसा कोई नियत सिद्धान्त नहीं किन्तु शब्द ही ब्रह्म रूप है यह सिद्धान्त है क्यों कि शब्द रूप ब्रह्म में शुद्धाशुद्ध कुछ नहीं है अव्यक्त नाथ तत्व में तात्पर्य है और यह तो सब प्रकार से एक है। जब इष्ट देव की ही चिना करनी है तो शास्त्र पढ़ने से क्या प्रयोजन है। यही श्री भर्नु हरि ने कहा है-नैयायिक लोग घट पट शब्दों को रटते रहते हैं वैयाकरण ख फ छ ठ थ पढते है परन्तु हमारे जैसे विरक्तों को तो सदा श्री शिवजी के चरणा शिन्दों का ही स्मरण करना चाहिये। कुछ चादि लोग श्रयधूनों पर दोषारोपण करते हैं, सोबेशक कर उनसे अवधूतों क मन में कुछ खेद नहीं होता । श्री भर्तृहरि ने भी कहा है जिस समप योगी लोग अपने मार्ग मे चलते हैं उस समय उनको देख कर अन्य लोग नाना प्रकार के तर्क उठाते है कोई कहता है यह चाण्डाल है और कहते हैं कि यह तो ब्राह्मण है। बहुतसे कहने हैं कि यह शद है या तपस्वी है अथवा तच शानी योगी है परन्तुपे से कथनों से योगो न तो क्रुद्ध होता है न खुश ही होता है । गाली देने पर भी अवधूतो को फ्रोध आदि नहीं होता यह भी नाथ जो के शिष्य भर्तृहरि ने हो कहा है- २६८ गारक्षसिद्धान्तसग्रहः श्राप लोग चेशक गाली दें यों कि श्राप ग.ली वाले है, हमतो आप को गाली नहीं दे सकते क्यों कि हमारे पास गाला है ही नहीं ससार में यह बात प्रसिद्ध है कि जिस ये पास जी चीज होती है वह उसी का दान करता है अन्य घस्तु का नहीं जैसे कैसा भी दाता क्यों न हा यह सरगाश के सींग का दान नहीं कर सकता इसका तात्पर्य यह है कि जो दाप घाला है वही दूसरो पर दोपारापण करता है। अत तुम सदोष हा और हम निदोप । काध नहीं करना चाहिये हमारे मत म यह भी निश्चित नहीं है क्यों ? काध न करना यह पाम हसी का धर्म है और क्रोध करना यह गृहस्थियों का धर्म है हमारे ता दोनों ही धर्म है। एक समय सिद्ध भर्तृहरि जा अपनी इच्छा से पीत वृत्ति को धारण कर के बाजार की गलियों में अन्न फे दाने चुन २ कर यया रह थे। तर राजा विक्रमादित्य ने उन को देखा यद्यपि भर्तृहरि जी उनका ज्येष्ट भाई था तो भी उस सिद्ध रूप में ये उसको न पहचान सके और कहा अहो इसकी भी माता है जिसने ऐसे पुरुप को पैदा किया है जो अपनी उदए पूर्ति करने में भी समर्थ नही यह सुन कर सिद्ध ने कहा कि बडा पाश्चर्य है । जो पुरुष समर्थ होता हुश्मा भी परोपकार नहीं करता उसको माता को धिकार है। बुद्धिमान विक्रमादित्य गोरक्षसिद्धान्तसंग्रहः २६६ सिद्ध के ऐसे विवेक पूर्ण वचन सुन कर, यह मेरा ही जेप्ट भाई परम पूज्य है ऐसा जान और शीघ्र घोड़े से उतर उनके चरणों में गिर पड़ा। तव श्री भर्तृ जी ने उसको उपदेश दिया उस के बाद विक्रमादित्य ऐसा परोपकारी हुमा कि उसका प्रताप सर्वत्र फैल गया इसी से कहते हैं कि महासिद्ध काम क्रोध और अहंकार इनको जीत लेते हैं अतः ये दूसरों के वचन को सहन कैसे नहीं करेंगे । परन्तु यह नियम परमहंसो की रीति के अनुसार है, सिद्ध तो न परम हंस है और न गृहस्थ, जैसे कौश्रा और उल्लू इन दोनों में एक दिन में ही देखता है दूसरा रात में । परन्तु ये योगी तो यौगिक परमहंस है दोनों दृष्टियो अर्थात् ज्ञान और योग से देखते हुए मुक्तिरूप मोती का ग्रहण करते हैं । जो शिव और शक्ति दोनों को एक फरके उपासना करते हैं ये अवधूत योगी होते हैं वे सदा इसी सिद्धान्त में रमण करते हैं। इति योगाश्रम श्री पूर्णनाथ संस्कृत कौलेज प्रधानाध्यापक मिथिलान्तर्गतवसन्तपुरवास्तव्य श्रीपं० द्रव्येशभारतमापो टीका समाप्ता । - इति शिवम् समाप्तोऽयंग्नापा

Goraksh Siddhant Sangrah

Author
Shastri,dravyesh Jha
Title
Goraksh Siddhant Sangrah
File name
Goraksh Siddhant Sangrah
Text
OCR done
Citation
1968
Published
2012/08
Publisher
Voharadhipati Yogindra
Language
Sanskrit
Pages
259
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
311076
Barcode
99999990319999.00
Scanning centre
Banasthali University
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