Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai

The Gathasaptasati

Satavahana · 2012/08

PDF Proofread

Front matter

काव्यमाला. २१. VIDYA श्रीसातवाहनविरचिता TIYA S N.4.23 गाथासप्तशती LIBRARY गगाधरभट्टविरचितया टीकया समेता। जयपुरमहाराजाभिसेन महामहोपाध्यायपण्डितदुर्गाप्रसादतनयेन पण्डितकेदारनाथेन, मुम्बापुरवासिपणशीकरोपाह- लक्ष्मणात्मजवासुदेवशर्मणा च संशोधिता । (द्वितीयात्तिः) मुंबय्यां तुकाराम जावजी इत्येतैः स्वीये निर्णयसागराख्ययन्त्रालये मुद्रयित्या प्रकाशिता । शाकः १८३३, सिस्तान्द १९११. (मस मन्यस्य पुनर्मुद्रणादिविषये सर्वथा निर्णयसापरमुदायवाल्याधिपवे. देवाशिकर) मूल्यं साया सभ्यशः।

AMILLE VIDYA ATIYA गाधानुक्रमणिका su..423 ARYA ३१५३ अणुदिअह ५1८४ अणुहुत्तो फरफसो अइ उजुएण ७७७ | अन्जाइ पीलकधुके मोगमाहात अश्कोवणा वि सासू ५।९३ अजाएँ णवण अइ दिऔर किंग ६७० अणुऊल विअ वोत्तु ६।२३ अइदी हराई बहुए VIVY अणुणअपसा (विण्णस्स) ३१७७ अउलीणो दोमुह (परकमस्स) ३१६६ अकअण्णु घणवण अणुमरणपत्थिआए ३३ अकअण्णुअतुज्झ अणुवत्तण अक्खडद पिआ (रइराअस्स) १४४ (हालस्स) १६५ अगणिअजणाववाअ अगणिअसेस (गतलशिअस्स) ११५७ अण्णग्गामपउत्था છ૮૫ अग्धाइ छिवद ७१३९ अण्णण्ण कुसुम (अणुराअस्स) २१३९ अाण तणुआर (महरस्स) ४।४८ अण्णमहिला (अणिरुद्धस्स) १४८ अधासण्णविवाहे ५५ अण्ण पिकि पि अच्छउ ता जणवाओ (वाहवस्स) ३१ अण्णह ग तीरइ (अणवत्थस्स) ४।४९ अच्छउ दाव मणहरं २१६८ अण्णाण वि होन्ति अच्छीहि ता यइस्स (नस्सीहस्स) ११४ | अण्णावराहकुविओ ५1८८ अच्छेरे व णिहिं (रामस्स) २।२५ अण्णासआइँ (मअर दक्षस्स) ११२३ अच्छोडिअवस्थ (गुणस्स) २१६० भण्णेसु पहिल ७/२९ अजाणाह (मिअझस्स) २१८४ अण्णो को वि ५.३० अन्ज कइमो वि (हालस्स) २।१९ अण्णोणकडक्ख अन्न गओत्ति मन (पवरसेणस्स) ३१८ अत्ता तह रमणिज्ज (कुमारिलस्स) १८ भज मए ग तव्व (सुचरिभस्स) ३।४९ अत्थकरूसण भज मए तेण (केल्लाणस्स) ११२९ भद्दसणेण पुत्तम (बहुरसस्स) ३३६ अज्ज पि ताव एक ६२ | अहसणेण पेम्म (सामिअस्स) १९८१ अज मोहणमुहिम (जण्णन्दसारस्स) ४६. सहसणेण महिला (सामिअस्स) १८२ अन्न झि हासिआ (हालस्स) ३३६४ अद्धच्छिपेच्छिा (मअरदस्स) ३२५ अन वि बालो (विधिविग्गहस्स) २०१२ अन्तो हुत्त उज्जह (गाइपिस्स) ४१७३ अजम्वेअ पउत्योजन (अमीअस्स) २१९. अधअरबोरपत्त (अणुराअस्स) ३४० अजम्वेअ पउत्यो उजा(असरिसस्स)११५८ अपहुप्पन्त (उअहिस्स) ५।११ अज सहि केण (केसवस्स) ४१८१ अप्पच्छ दपहाविर (पवरसेणस्स) ३३२ १ 'गतलजस्य' चे २ 'शल्याणस्थ' चे. ७५९९ ૨ काव्यमाला। अप्पत्तपत्त (मउहस्स) ३।४१ अहरमहुपाण अप्पत्तमण्णुदुक्खो (......) २०५७/ अहव गुणविअ (चन्दहस्थिरस) ३।३ अप्पाहेइ मरन्तो ३१) अह सभाविअमग्गो (मोजअस्स) ११३२ अन्मन्तरसरसाओ २३ असरसदन्त (अहस्स) ३।१०. अमअम (हालस्स) १।१६ अह सा तहिं तहिं ४११८ अमिअ पाउअकव्व १/२ अह सो विलक्सहि (हॉलस्स) ५.२० अम्बवणे भमरउल ६१४३ अहिआअमामिणो (चुल्लोगस्स) ११३८ अम्हे उज्जुअसीला ६४ | अहिणवपाउससि अलिअपमुत्त (चन्दसामिणो) १।२० अहिलेन्ति सुर (वसन्तस्स) ४१६६ अलि अपसुत्तव ४६ | आअण्णाभट्टि अलिहिज्जइ पडअळे १९. आअण्णेइ अउभणा (मझ्झस्स) ४१६५ अवमाणिओ नि (अवन्तिवम्मरस) १२. आअम्बन्तकवोल २१९२ अवरज्ज्ञ (माउराअस्स) ४१७६, माअम्बलोभणाण ५१७३ अवरहागअजामा ८३ माअरपणामिओढे (वानिआरस्स) १२२ अवराहहिं वि (जअराअस्स) ४।५३ आअस्स किं णु १२१८७ अबलम्बहमा (दुद्धरस्स) ४८६ आउच्छण विच्छाअ अवलम्बिअमाण (रवाए) १८७आउच्छन्ति सिरेहि ७५८० अवस्थिऊण (देवस्स) २०५८ आखेवआई ३१४२ भविअपेक्खणिज्जेण. (बजस्स) ११९३ | आणत तेण तुर्म ७५८५ अविइपेच्छणिज (सिरिसत्तिभरस) १९९] भाम असइ छ (पालितस्स) ५१० अविरलपडन्तणव ५।३६ आमजरो मे मन्दो (कालस्स) १५१ अविहत्तसधिबन्ध १३ भाम बदला वणाली ६७८ अविहवलक्खणवल ६।३९ | आरम्भन्तस्स धुम (पलहस्स) ४२ भन्यो अणुण (सीहस्स) ४१६ आरुहइ जुण्णभ (सरलस्स) ३१७३ भालोअन्त दिखाओ असमत्तगुरुअकब्जे ६१३७ आलोअन्ति पुलिन्दा (हलिभस्स) २०१६ असमत्तमण्डणा (कोलिराअस्स) १२१ आवण्गाई कुलाइ ५।६७ भसरिसचित्ते (मण्डहिवस्स?) १५९ पासण्णविआहदिणे अह अह्म आअदों (अहमस्स) ४१ पासासेइ परिअणं (भलकारस्स) ३१८३ २।२७ इअरो जणो ण (वाहवरामस्स) ३।११ भद्दअ विओअतणुई ५।८६ इअ सिरिहाल १. 'मकरन्दस्य' चे. २. 'कलिराजस्व वे. ३. 'मुग्धदीपस घे. ४. 'शा- लिवाहनस्य' घे. ५ हालिकस्सवे. अब्यो दुकर ६॥४६॥ अहम लम्बा १.१ उअह तरुकोहराओ गाथानुक्रमणिका । ३ ईसंजणेन्ति (माहवसेणस्स) ४१२७एक चिअ अगुणं ईसामच्छररहिएहि एक पविणं (हईए) १८६ ईसालुओ पई (अरिकेसरिस्स) २३५९ / एकासमभो दिनीम ७॥१८ उअम लदिउण ५.९० एकभवइवेटण (मरिकेसरिणो) ३२. उस कोलिन ४./ एकेश वि वडी उअगअचउत्यि ४४|एको पहुअर पणो (हालस्स) ५९ उअणियल (वोदिसेस्स) १४ एको वि कालसारो (काल सारस्स) १२५ उस पोम्मराम ११७५ एहि पारेह जगो (सिरिसुन्दरस्स) १९६ उभरि हरदिह (पवरसेणस्स) १६४/ एसाइचिम मोहं (मोजमस्स) ५.१० उथ सभमविक्खित्तं ५.६७ एस्य चउत्थं विरमद ४।१०१ उअसिन्धवपल्वम vie/एत्थ णिमब ९७ ६।६२ एस्थ मए रमिअम्वं (गुणमन्दिअस्स)४।५८ उअह पालन्तरो (पालितस्स) १६३ पदहमेत्तम्मि जए (सिरिराअस्स) ३ उक्सिप्पद (हालस्स) २२. एइहमेते गामे उजागरअरुसाइभ ५१८१/ एसो मामि जुवाणो (मन्दसुअगस्स) ३९४ जुभरए ण तूयह ५७६ एद इमी णिअच्छह उज्झसि पिआर (इसाणस्स) ३।७५, एहइ सो विपउत्यो(सिरिधम्मअस्स) ११० उदन्तमहारम्भे (मत्तगइन्दरस) ४४८२ एहि त्ति वाहरन्तम्मि रहाणीससन्तो (अणहस्स) १३३ एहिसि तुम ति (अहस्स) ४१८५ उद्धच्छो पिअइ (भाइअस्स) २६१ ओसरह धुणइ साई उप्पणत्थे कजे (माणइन्दस्स) ३।७४ोसहिअजणो (मन्दरस्स) ४४६ उप्पहपहाविहजो ६।३५ ओ हिअअ मोहि ५.३७ उप्पाइअदव्याणं (पालितस्स) ३१४८ ओ हिअअ महह (महाएवस्स) २५ उप्पेरखागम (विस[म) सेगस्स) ४३९) ओहिदिअहागमा (पुण्णभोजअस्स) .३६ उप्फुलिभाइ (वच्छस्स) २९६ कण्डन्तेण भकण्डं ૬૨ उम्मूलेन्ति व (विजयगाणो) २४६, कण्डनुआ (कअलीहरस्स) ४५२ उमावन्तेण ण हो। ६.5/ कत्य गर्भ रइबिम्ब उल्हावो मा दिबउ १४ कं तुनथणु (पालितस्स) ३१५६ उवहहणवतण ६१७७ कमल मुअन्त (कट्टिदस्स) ५४ कमलाअराण (मिअएस्स) २०१० एकफमपगिरक्राण करमरि कीस ण एकरमसदेसा (......) ४२करिमरि अभाल (मअरन्दस्स) १५५ १. 'वोदितस्य' थे. २. पालितस्य'. ३. 'प्रहताया.' घे. ७.४१ एएण चि ४ काव्यमाला। पुरुणाहो विक्ष ५४३ | सैन्यरिंगणा १७७ क्लहन्तरे वि (हालस्स) ४।२१ सरपवणरअगल ६.८३ अल किर खर (निप्पटस्स) १४६) सरतिप्पिर (पसण्णस्स) ४.३० कस्स करो बहु ६०७५ साणेण च पाणेण ७६२ फस्स भरिसित्ति (सुरहिवच्छस्स) ४१८९ | खिण्णास उरे (अवन्तिवम्मस्स) ३.९९ कहँ णाम तीम (सवरसत्तिस्स) ३३६८ खिप्पड हारो ५२९ वह मे परिणइआले ६६८ खेम कन्तो खेम क्हें सा णिव्व (पव्वअकुमारस्स) ३१७१ | गमकलहकुम्भ (कहरामस्स) ३५० कहें सा सोहग्गगुण ५।५२ गअगण्डत्थल (गन्धराअस्स) २।२१ कहँ सोग (सष्ठरस्य) ५।१३ | गअवहुवेहव्वअरो फह तपि तु इण (सेहणाअस्स) ७९५ गन्ज मह चिम कारिममाणन्दवड ५/५७ गन्ध अग्धाअन्तम ६१६५ किं किं दे (गअसिंहस्स) ११५ गन्धेण भप्पणो (विअहस्स) ३१ किं ण भणिओ सिं (बहुराहस्स) ४७० | गम्मिहिसि तस्स किंदाद का (रेवाए) १९०, गरुअछुहाउलि कि भणह म सहीओ १७/गहवद गओ (विअट्टइन्दस्स) ३३९७ किं रुअसि (महिन्दस्स) १९ गहवाइणा (सच सामिणो) २०७२ किं स्वति किम ६१६ | गहवामुओ (हालस्स) ४५९ कीरन्ती वि (सरस्स) ३१७२ गामद्गणणिअडि कीरमुहसच्छ (सूरणस्स) 0 गामणिधरम्मि असा ५.६७ (हालस्स) ४१२६ गामणिणो सवासु ५.४९ के उव्वरिभा के ५।७४/गामतरूपीओ केण मणे भग्ग (मिअहस्स) २१ गामवडरस (खण्डस्स) ३९५ केत्तिअमेत्तं होहिद ६.८१ गिजन्ते मङ्गल ७१४२ केलीअ वि रूसे (पावच्छीरस्स) २९५, गिझे देवग्गि (वृद्धावहीए) १७० केसररभ ४.८७ गिरसोत्तो ति अवरहिम (रामस्स) २२२४ गेअच्छलेण (अहमस्स) ४।३४ कोरथ अम्मि (विलासस्स) १६४ गेह पलोअह (हरितउस्स) २०१०० कोसम्बफिसल (गजस्स) 115 गेह व वित्तरहिम ५।२३ गोतक्खलण सोऊण ५.९६ सणमेत्तं पिण (हालस्स) २१८३ गोलाअडहिम (अविभकणस्स) २७ १. 'लम्पस्य वे. २. विनयायितस्य' चे. ३ 'अनुरागस्य चे. . 'अलि- कस्य' चे. कुसुममआ वि खणभारेण चेम्मेण गाथानुक्रमणिका। गोषणइए (गरवाहणस्स) २१७१ ज ज पुलएमि दिस गोलाविसमो २१९३ ज जं सो गिज्झा (सन्तअस्स) ११७३ घरिणिपणत्यण (दुविडअस्स) ३१६१ ज तणुआअइ सा ७/११ घरिणीए (हालस्स) ११३ जन्तिअ गुल ६५४ घेत्तूण चुण्ण (कान्तफरस्स) ४११२ज तुम सई (अणुलच्छीए) ३१२८ चधुपुडाहअवि ६६ जम्मन्तरे विचलणं ५।४१ चत्तरपरिणी (महिलस्स) १॥३६ जस्स जह विश्र (अद्धराअस्स) ३१३४ चन्दमुहि (गग्गराअस्स) ३५२ जह चिन्तेइ परि ७२८ चन्दसरिस (वाहवराअस्स) ३११३ जह जह उव्यहइ (......) ३।९२ चरणोआसणि (भमरस्स) २८ जह जह जरा (पोटिसस्स) ३।९३ चाको सद्दावसरल ५।२४ जह जह बाएइ (घसिप्पहाए) ४४ चिक्सिसुस्त (चुल्लोहस्स) ४।२४ जाएज वणुद्देशे (असमसाहस्स) ३१३० चित्ताणिभदद (वैण्डहिवस्मर) ११६० जाओ सो वि (चन्दस्स) ४१५१ चिरहिं पि अ (पावच्छीलस्स) २१९१ जाणइ जाणावे (गोमउजस्स) ११८८ चोराण कामुआण ५९८ जाणि चअणाणि ४९ चोरा सभअसतण्ड ६.७६) जारमसाणसमुभव (हालस्स) 10 चोरिअरअसद्धालइ (वम्हमन्तरस) ५।१५/ जाच ण कोसवि ५.४४ छनइ पहुस्स (सुन्दरस्स) ३१४३ जिविअ असामअ (हालस्स) ३४. छिन्नन्तेहि (माणिकरामस्स) ४।४७ जिविअसेसाइ (अवशाहस्स) २।४९ ७२ जीहाइ कुणन्ति ६.४१ (चंदुराअस्स.) १६५ जुज्झचवेडामोडि जइ जूरइ जूर जे.जे गुणिणो १७१ ५८१ जेण विणा (रोहाएँ) २०६३ जइ भमसि भमसु ५४७ जे पीलभमर ५.२२ जइ लोकणिन्दिा ५१८० जेत्तिअमेश (मुखसीलरस) ११७१ जइ सोण पाहो (सुसीलस्स) ४४३ जेतिअमेत्ता (पालितस्स) ४९३ (मुहराअस्स) १६५ जे समुहागअ (वाहवराअस्स) ३१० जंजं आलिहद ५६ जो कह वि (लाइचस्स) २४४ जं करेसि ज ज (कालणसीहस्स)४७८) जो जस्स विइव (वाहवराअस्स२ जज ते ण सुहाभ १५ जो तीए अहर जज पिहुल (कुलउत्तस्स) ४९ जो विग आणइ १. मलोरव्य' घे. २. 'मुग्धदीपस्य घे. ३. 'धीरस्य'चे. ४. 'वसलक्स्य' ये, ५ 'प्रामकूटस्य' घे. ६. 'वलईपितस्सवे. जह कोतिओ जइ चिक्खल ७१८४ ७८ जइ ण छिवसि जइ होसिण (दामोअरस्स) २१६ ५।३० ६ काव्यमाला। जो सीसम्मि ४१७२] गिअवश्खारोवि ४२ झझावाउत्तिणिअघर (जअसेणस्स)७०णिकण्ड दुरारोह ५.६८ झञ्झावाउत्तणिए (राअहत्यिो) ४.१५ णिकमाहिं (पुण्डरीअस्स) २६६९ ठाणभट्ठा परि ७/१२ / णिकिव जाआ (हरिआलस्स) ११३० डज्झति उज्झसु (हालस्स) ५१ णिद्द लहन्ति कहिअ (देवएक्स्स) ५११८ ण ब दिहि णेई ४५ णिहामझो (हालस्स) ४४ अणब्भन्तर (हालस्स) ४१७१ | णिहालस (हालस्स) २०४८ गइऊरस (वणराअस्स) ११४५ णिपच्छिमाइ (सिरिवलस्स) २१४ ण कुणन्तो विअ (अद्धराअस्स) ११२६ गिप्पग्णसस्सरि ७८९ णपसक्खुडिअ (महाराअस्स) ४।३१ णिचुत्तरा (सगुणकलसस्स) २०५५ ण गुणेण (समरिणसरस) ४११० णिहुअणसिप्प णचणसलाहणणि (गुवरस्स) २११४) णीआई अज (धणजअस्स) ४२८ ण छिवह हत्थेण ६॥३२ णीलपडपाउअभी णन्दन्तु सुरअसुह (हालस्स) २१५६/णीसासुकम्पिक्ष (रोरएपस्स) ४॥६१ ण मुअन्ति (हारस्स) २।४७ णूण हिअभ (महाएवस्म) ४३५ गलणीमु ममसि MISणूमेन्ति मे पहुत (माधवीए) १९१ णवम्पिएण ७९२ | णेउरकोटि (अगमस्स) २८८ णवपद विसण्णा ६१८५) णोहलिअमप्पणो (मअरन्दसे नरस) ११६ णवल अपहर (पणामस्स) १।२८ तइआ कअग्य (माअस्स) १९२ णवबहुपेम्म (कण्णउत्तस्स) २१२२ | तइ बोलन्ते (हालस्स) ३१२३ ण विणा सम्भावेण (भोजअस्स) ३३८६ तह सुहा (मणोरहस्य) ४१३८ वि तह अगएण ५.८३ तडविणि हिअग्ग (हालस्स) ०९१ मवि वह अमालवन्ती ६४ तडसठि (माणस) २१२ ण वि तह छेअ (अणुलच्छीए) ३१७४ तणुएण वि (भाउत्स्स) ४।६२ ण वि तह पढम (भाणुसत्तिणो) ३९ तं मह जस्स (गिलास) २०५१ में वि तह दिएस ११७६ | तत्तो चिअ दोन्ति णास व सा कवोले (समिअस्स) ११९६ तं मित्तं काअवं (पालितस्स) ३।१७ पाह दुई ण (असुलझीए)! २२७८ | तम्मिरपसरिअहु शिअअणुमाण (केलासस्स) ४।४५ | तस्स भ सोहग्ग (मअरद्वअस्स) ३॥१॥ अिधणि ६.८२ तस्स कहाण्टइए 1. 'प्रवरराजख'वे. २. 'धुरस्य (1)वे. ३. 'प्राणामस्य थे. ४. 'भीमवि. क्रमस्य . ५, 'स्थिरसाहसस'चे..'शालिकस्य' चे. ७ गजरेवस्य प. 'कलङ्गम्य' वे. ४८ ८.

गाथानुक्रमणिका । ७ तह माणो तह सोण्हाइ तह तस्समाण (हालस्स) ५३१ । दइअकरम्गहलुलिओ तह तेणवि सा २५ | दक्खिण्णेण वि (आइवराहस्स) १९८५ तह परिमलिआ ७.३० दटूण उण्णमन्ते ६१३८ (सालिअस्स) २९ दटूण तरुणसुरअ (सुन्दअस्स) ३१५४ दर्ण रुन्दतुण्ड (विग्गहरस) ५।२ ताकिकरेउ (बम्हारिणो) ३१२१ दश हरिअदीह ७.९३ तामझिमो वि (हालस्स) ॥२४ | ददरोस (अवन्तिवम्मस्स) ४११९ तारुणं जा (वरसत्तिस्स) २०४१ दरफुडिअ (पम्हरामस्स) ११६२ तालूरममा (अवटचस्स) १५३५ दरवेविरोरुजुअलासु ७१४ तावचिार (कुलोहेस्स) ११५ दिअरस्स (हालस्स) १३५ सामवणे (हरिउद्धस्स) ३१८८ दिअहं खुफिआ (विच्छमस्स) ३।२६ ताविन्जन्ति (पवाराअस्स) १७ दिअहे दिअहे ७१९१ तागृहअविलम्ब १२ दिवा चुआ (कोन्तक्खरस्स) १९७ ती मुहाहिं (हालस्स) २१७९ दिढमाणु (मोत्ताहलस्स) १४ तुजाणे विसेस ५।२७/ दिढमूलयन्ध (अणुलच्छीए) ३१७६ मुमो पिथ (माउराअस्स) ३१४४/ दीसह ण घूम ६४२ तुज्झइराअ २१८९/दीसन्तोणअणसुहो(राअरसिअस्स) ५२१ नुज्झ घराह (मुदस्स) १४. दीसन्तो दिहिसुहो सुप्पाणणा (भलकस्स) ३२८९/दीसति पिआणि तुद दसगेण जणिो १०दीहुइपउर स८५ नुहदसणे सहा ६।५ दुक्खं देन्तो (सिरिसतिअस्स) ११.. नुह मुहसारिच्छ (राहम्मिणो) १७ दुक्षेहि लम्भह दुह विरहुजागरओ ५१८५दुग्गभकुटुम्प (तिरिधम्मअस्स) 110 (अणहस्स) ११३४ दुग्गअपरम्मि ५।७२ तेथ जुआयाता ६. दुविखेवा (साहिलस्स) २०१४ तेणण मरामि ४.७५ दुम्मेन्ति देन्ति (वसन्तवम्मस्स) ४।२५ (हन्दस्स) २०१३ दुस्सिक्सिमरन ते पोलिआ (नियमस्स) ३३२ दूर तुम विध (आहवसत्तिणो) २८१ भणजहणविभ (सबसेणस्स) ३३३ रन्तरिए वि पिए पोभ पिप (भिवसस्स) १४९, देवम्मि पराहुत्ते धोरमुएदि रणे ६२८/ देवाअत्तम्मि .. त्रिलोकम्य' घे. २. "मुझस'चे. ३. 'मरभिवत्सलस थे. ४. थिरमा इसस' थे. ५. 'पउरिन्यस'थे. ७११ नुह विरहे ते विरा सप्पु ७॥२७ ७५८ (अन्धस्स) ३.५ (भीवएवस्स) ३९ काव्यमाला। दे मुअणु पसि 1 । ५६ परिमलणसुहा ५।२८ दोअगुलअकवाल २.परिरकण धण्णा सा महि (मलअसेहरस्स) ४।९५ परिहूएण (विकमराअस्स) २१३४ धण्णा बहिरा ९५, पसिअ पिए (कुविन्दस्स) ४४ धण्णा वसन्ति ३५ पसुवइणो (हालस्स) ११ धरियो धरिओ (माणस्स) १ पहरवणमग्ग (अन्तराअस्स) १६३१ धवलो जिअइ ३० पहिअवह विवरन्तर धवलो सि जइ ६५) पहिउल्लूरण (अहराअस्स) २०६६ धाराधुवन्तमुहा ६।६३ पाअडिअ सोहग्गं धावइ पुरओ पासेसु ५।५६ पाअडिअणेह (मणिराअस्स) १९९ धावइ विमलिअ (माऊराअस्स) ३३९१/ पाअपडणाण मुद्दे ५.६५ धौरावलम्बिरी (वाहवस्स) ४१६५ पाअपडि (हालस्स) ४९. धुश्राव्य (विसमरामस्स) ३१८० पामपडिअस्स (दुग्गसामिणो) १११ धूलिमहलो वि ६।२६] पाअपडिओ ५।३२ पइपुरओ विध (मल्लसेणस्स) ३३७, पाणउडीअ वि (हालस्स) ३।२७ पउरजुवणो (हालस्स) २।९५ | पाणिग्गहणे (अणुराअस्स) १६९ पहमइलेण धीरेक ६५पासासष्टी (भोजमस्स) ३५ पचग्गफुल ६१९० पिअदरण (वसन्तसेणस्स) ४१२३ पन्समऊहावलि ७४ पिअसभरण (बम्हआरिणो) ३।२२ ५३ पिअविरहो (वसुआरिणो) १२४ पजरसारिं अत्ता ६१५२ पुच्छिजन्ती ण पडिवश्व (उद्धवस्स) ३६० पिञ्जइ कण्णा पढम वामणविहिणा ५।२५ पुद्धिं पुससु (पण्ठिणो) ४११३ पढमणिलीणमहुर ५१९५] पुणहत्तकरप्पालण ६४८ पणअकुविआण (कुमारस्स) १।२५ पिसुणेन्ति कामिणीणं ६.५० पत्तणिअम्बस्फसा ६५५ पुसइखण धुवद पत्तिअण पत्तिअन्ति (पवरसेवरस) ३.१६/ पुसउ मुहं ता ७१ पत्तो छणो ण (कालइवस्स) १।६८ पुसिआ अण्णा (कलसगन्धस्स) ४२ पफुलघणकलम्या ३६ पेच्छा मलद्ध (विअन्दस्स) ३२९६ परिओसवि (जीभएवस्स) ४४१ / पेन्ति अणिमिस (सुरहिवच्छस्स) ४ice परिओसमुन्दराई १६० पेम्मस्स विरो (म्महस्स) ११५३ 1. 'कालराधिपस्य'चे. २. सिरिराअस्स'चे. ३. ब्रह्मचारिण.' घे. ४. 'म- न्मथस्य' घे. पचूसागअ रजित ७४७ ६१८६ गाथानुक्रमणिका । पोपडिएहिँ (अझसीलस्स) ११८३} मग्गं चित्र पोह भरन्ति (अलकस्स) ३८५ मज्झड़पत्थिअस्स (मङ्गलकलसस्स) ४.९९ फग्गुच्छण (सूरस्स) ४१६९ मज्झे पअणुअ ७८२ फलसपत्ती (कुवलअस्स) ३१८२ मज्झो पिओ ६९७ पूलहीवाहण (पहिलस्स) २१६५ मण्णेआअण्णन्ता फालेइ अच्छभन्छ (कालसीहस्स) A९ मण्णे आसाओ विक्ष फुटन्तेण वि (राअवग्गस्स) ३३४ मन्द पिण आणइ ६.१०० फुरिए वामच्छि (सत्तिहस्पिस्स) २१३७ मरगअसूई (पालितस्स) ४१९४ बलिणो याआवन्धे (भोजअस्स) ५।६ मक्षिण चम्मन्ती बहलतमा (अहमस्स) ४१३५ महमहइ मलअवाओ बहुआइ गइ (अद्धरामस्स) ३१८ महिलाण चित्र बहुपुप्फभरोणा (माणस्स) २१३ महिलासहस्स (हालस्स) २२८२ बहुवालहरस.. (अलभिस्स) १७२ महिसक्खन्धवि बहुविहविलासर लिए ५१७७) महुमच्छिमार यहुसो वि (सुरहिवसेस्स) २॥९८ महुमासमारुआ (सालिअस्स) २।२८ बालअ तुमाइ दिण्ण (तुअस्स) ५१९ मा कुण पहिवरख (माअस्स) २३५२ बालअ तुमाहि (हालस्स) ३।१५ मा जूर दिआ (अलस्स) ४१५४ बालअ दे पच लहुं ६८७ माणदुमपस भग्गपिअसगम ५।९१ माणुम्मत्ताइ मए ६.२२ भजन्तस्स वि (हालस्स) २१६५ माणोसह व (वाहवस्स) ३१७० भण कोण (महोहिअस्स) ४.१०० मामि सरसक्सराण ५1५० भण्डन्दीभ (अत्यस्स?) १७९ मामि हिअब (वोलएक्स्स) ३४६ ममइ पलितइ जह ५५४ मारेसि क ण मुद्धे भम धम्मिम (.....)२।७५ मालइकुसुमाई ५२६ मरणमिअणील ५६. मालारीए वेल्लल मरिउधरन्त (विसेसरसीहस्स) ७७ | मालारी ललिउ भरिमो से गहिआहर 11७८ मा वच पु-फ (णन्दणस्स) ४१५५ भरिमो से सअप (उच्छउस्स) १६८ मा वचह वीसम्म ૮૬ भिच्छाअरो (ससिरामस्स) २०६२ मामपसूक्ष भुजसु ज साहीण (सिलोअणरस) 15 मुद्धे अपत्तिमन्दी मोइणि दिण्ण पहेग ७३ मुहपुण्डरीअडाआइ २४ मअणग्गिणो ध्य ६१७२ | मुहपेच्छओ पई ५।९८ 'कृतशील्स'थे. ४४४ (कइराअस्स) ३५९ १० काव्यमाला। १७८ मुहमाम्एण (पेसिस्म) ११८९/ यमपणा (कण्णस्स) 11५४ मुहविग्मवि (वमएयरस) ४१३३ वणदवमसि (हालस्स) २०१७ मेहमहिसस्स ६५८४ पणअघअलिप्पमुहि रइये लिहिअगि ५।५५ घण्णकमरहिमस्स ७.१२ रहविरमअविआभो ५।५९/ वग्गन्तीहिं तुह (सारसत्तिस्स) ॥५. रस्सेइ पुत्तों २१/चण्णयलिए विअत्यति रण्णाउण (अयण अरस्रा) ३१८० यन्तीम हिम (हालस्स) २०१८ रत्यापइण्ण (हारस्स) २० वमइ जाद (कित्तिराअरस) २।३५ रन्धणवम्मणि (भोमसामिणो) १११४ | वसणम्मि (प्रणालस्स) ४०० रमिऊण पा (मकरन्दस्स) १९८ वामआइ कि भपियर रतिभजण (हालस्स) 11.1 वाउदासिचा रतिअनण (हालस्स) २॥१.१ पाउरिआपरि २६ रसिअजण (हालस्स) ३१.१/वाउवेल्लिअसाउलि रसिअजण ५१.१/पाएरिएण (पालितस्स) २३७६ रसिअजण ६।१०१ वावारविसवास 1१६ रसि विभ (पद्मारिणो) ५।५ | वासारते उष्ण ५.३४ राअविरुद्ध (बहुम्लस्स) ४९६ वाहरर में ( सुमराअस्स) २३१ सन्दारविन्दमन्दिर ६१७४/ वाहिता पडियअण (रोरएवरस) ५१६ स्अ अच्छीमु (पद्मगतिण्णो) २०३२ वाहिच वेज (वामएक्स्स) ४।६३ सभ सिह चित्र ६१७३ वाहीहभरिम ६१८ रेहद गलन्तकेस ५४६ विविणइ माह (हालस्स) ३१३८ रेहन्ति कमुअदल ६६ / विनाविबह (अणुराअस्स) ५५ रोवन्ति व अरणे ५.९४ विमारहणालाब रसारआणे (अणुराअस्स) ॥११ विगाणगुण (सवरसत्तिस्स') ३६५ रवा चत्ता सील ६।२४ विरहकरवत्त (साहिस्स) २०५३ रहुअन्ति (गोविन्दसामिस्स) ३५५/ विरहाणलो (अमिअस्स) ४३ लुम्बीओ अङ्गण (पत्सस्स) ४२२ | विरहेण म-दरेण होओजूरह जूरउ कार विरहे विसव (हालस) ३।३५ वअणे बअगम्मि (असोअस्स) ४॥५६ विवरीअसुरभलेहल ५४ वदविवर (उद्धवस्स) ३.५५ दिसमद्विअपिके ६.९५ (महणामस्स) १६४ वीसत्यहतिभपरि ७६ साच्छिपेच्छि (वापसाम्मणो) २।७४ | वेविरसिग्ण (अन्धरस) ३४ 1. 'पोटस्य'. २. 'सोमराजस' वे. वर्षको पुलइ गाथानुक्रमणिका । बेसोसि जी ६।१० [ सहि ईरिसि (लअस्स) 190 वोडसुणओ विअण्णो ६४९ सहि दुम्मैन्ति (असुलद्धीए?) २१७७ वोलीणार क्खिा (पवरराअस्स) ४.४० | सहि साहसु सम्भा सवाहणसुहरस ५६४ सा आम सुहा सभणे चिन्ता २०३३ सा तुइ सहत्य २।९४ सअग्गदरह ६।५० सा तुज्झ वाहा (उजअस्स) २२२६ सकेरिओव (हालस्स) ९४ | सा तुह कएण (दुविअद्भुस्स) ३१६२ सच क्लहे कलहे ६।२१ सामाइ गरुष सच जाण (दुग्गसामिणो) ११२ सामाइ सामलि (.. ) १८० सच भणामि बालअ (देवराअस्स) ३.३९ सालोए दिवा (हालस्म) २०३० सच्च भणामि भरणे (विअगुस्स) ३।३९ साहीणपिअअमो ६.१५ सच साहमु १८८साहीणे वि पिअ (विराअस्स) १३९ सजीवणासह (विहलस्स) ४।३६ सिक्करिअमणि (नन्दिउद्धस्स) ४१६२ सझागहिअजलअलि १०० सिहिपिच्छलुटिस (वसरस्स) ११५२ सझाराओत्यइओ ६६९ सिहिपेहुणावअसा (पोटिसस्स) २०७३ सझासमए जलपू ५४८| सुअगाउरम्मि (देवराअस्स) २०३८ सणि सणि ५।५८ सुअणु वअण (णीलस्स) ३॥६९ सत सताइ (हालस्स) ३ । मुअणोज देस (हरकुन्तस्स) १९४ सन्तमसन्त दुक्रा ६।१२ | मुअणो ण कुप्पद (अजुणस्स) ३५० स भावणेह (होलस्स) १४१ मुक्खन्तवहर कदम ५.१४ समाव पुच्छन्ती (सरस्स) ४१५७ सुन्दरजुआणजण ५९२ समविसमणिव्वि ७३ | मुप्पउ तइओ वि (सिरिसत्तिस्स) ५।१२ समसोक्सदुक्स (वडरयस) २।४२ सुप्प डड चणआ रारए महददाण (विगहराअस्स) २८६ | सुइउच्छा जण (सग्गवम्मस्स) 1॥५० २२ सुहपुच्छिआइ (तिलोअणस्स) ४.१७ सरसा वि सूसइ ६३३ / सूइचइ हेम (अण्हअस्स) ४।२९ सम्वत्थदिसा (कमलस्स) २१५, सूईवेहे मुसल ६१ सव्वस्सम्मि वि दद्धे (भेच्छलस्स) ३२९ | सूरच्छलेण (विग्गहराअस्स) ४१३२ सव्वाअरेण मग्गह ५. सेअच्छलेण सहइ सहइ ति (कुसुमाउहस्स) १५६ सेनिअसम्पनी सहिआहि (पलाइचास) २१४५ सो अत्यो जो १. 'ब्रह्मगते' थे. २. नाधाया' ये. ३ 'अनीकस्य वे. ४. 'उजयस्य' वे. ५. कविराजस्य ये ..'वेशारस्स'चे. ७ 'हारकुष्ठस्य वे. सरए सरम्मि में (हालस्स) ३७० ५/४० (हालस्स) ३५१

सोको वि गुणाह
काव्यमाला।
७१/हासाविओ जो
(अणुराअस्स) २०१३
सो णाम संभरिनइ (वाप्पइराअस्स) 11९५ हिम हिअए
५८५
सो
तुज्झ कए (ईसाणस्स) १८४ हिअअ चेअ
(विकिरस्स) ३३९०
इंसेहि व तुद
५।७१ हिअअद्विअस्स (सच्चसेणस्स) ३९०
हत्यप्फंसेण जरग्गवी ५६२ हिअअण्णएहि (मण्डहिवस्स) १६१
हत्याहत्यि अहमह
.६१८० हिअम्मि वससि
हत्थेमुभ (पालितस्स) ४.७ हिअआहिन्तो पसरन्ति
हरिहिद पि (बद्दरबस्स) २।४३ हेमन्तिआसु
(कन्तेसरस्स) १९६६
इरफलहाण (केटिलरस) ११७९ हेलाकरग्गअद्विअ (पोटिसस्स) ५३
हसिअ अदिट्ठदन्त
६।२५, होन्तपहिअस्स (सिहस्स) १४७
हसिअ सहरथ (अणुलच्छीए) ३६६३, होन्ती वि णिप्फल (कन्दपुत्तस्स) २०३६
हसिएहिउवालम्भा ६।१३ हाणहलिहा (मअन्दस्स) १८.
१. 'वनराजसथे. २. करिश्रय घे. ३. 'मुग्धाधिपम्य' थे. १. धीरस्य' थे.
५. 'उजयस्स.

सातवाहनः । दीपकर्णिसूनुः सातवाहनो नाम कश्चन विद्वान्महीपतिः प्रतिष्ठानपुरे बभूव, यरसा बृहत्कथाप्रणेतृगुणाक्ष्य-कालापव्यापरणकर्तृशर्ववर्मप्रभृतयो भूयांसो विद्वासो मण्डयां- चकुरिति स्थासरित्सागरपष्टतरङ्गस्थितकथातः प्रतीयते. 'सोऽहं दरिदो वित्तार्थी प्रयातो दक्षिणापथम् । प्राप्तः पुरं प्रतिष्ठान नरसिंहस्य भूपतेः ॥' (१८५१०८) इत्या- दिकथासरित्सागरस्थश्लोकेभ्य एव दक्षिणापथे प्रतिष्ठानपुरमस्तीत्यप्यवगम्यते. तच्चाधुना 'पैटण'नाना प्रसिद्धमस्ति. 'क्तयाँ कुन्तलः शातकर्णि. शातवाहनो महादेवी मलय. वती [जधान]" इति वात्स्यायनप्रणीतकामसूतस्य द्वादशाध्यायोपान्ते समुपलभ्यते. डॉक्टपीटर्सनेन बुन्दीनगराधीशपुस्तकालयादानीते गाथासप्तशती(स्तके 'राएण विरआए कुन्तलजणवअइणेण हालेण। सत्तसई असमत्त सत्तममज्झास एअम् ॥ इति सप्तम शतकम् । इति श्रीमकुन्तलजनपदेश्वर-प्रतिष्ठानपत्तनाधीश-शतकर्णोप- नामक-दीपि(दीप)कात्मज-मलयवतीप्राणप्रियन्कालापप्रवर्तकशर्ववर्मधीसरा-लय- वत्युपदेशपण्डितीभूत-त्यक्तभाषाप्रयखीकृतपैशाचिकपण्डितराजगुणान्यनिर्मितभस्मीभ- घदृहत्कथावशिष्टसप्तमांशावलोकनप्राकृतादिवाक्पञ्चक (१)प्रीत-कविवत्सल-हालायुपना- मक-श्रीसातवाहननरेन्द्रनिर्मिता विविधान्योक्तिमयप्राकृतगीगुम्फिता शुचिरसप्रधाना काव्योत्तमा सप्तशत्यवसानमगात् ॥' एवं समाप्तिय वर्तते. एतद्विलोकनेन वारस्यायन- स्मृत. कथासरित्सागरवर्णितश्च सातवाहन एक एव तेनैवेय गाथासप्तशती प्राचीन- प्रन्येभ्य. सालिता. स च निस्ताब्दस्य प्रयमशतक आसीदित्याधुनिराना विद्वद्व- राणां निधय . युक्त चैतत्. यत. रामप्रवर्तक शालिवाहन एव सातवाहन इति निर्वि- १. राजशेखरसूरिग्रणोते प्रवन्धकोषे सातवाहनप्रयन्धे 'अधुना तु दक्षिणदेवास्थित प्रतिष्टानपुर शुल्लमप्रामतुल्यं वर्तते।' इत्यस्ति. २. डॉस्टपीटर्सनस्य तृतीये पोर्टा- स्यपुस्तके ३४९ पृष्ठे दटव्यम्. ३. 'कामगिरि समारभ्य द्वारकान्तं महेश्वरि । श्रीकु- न्तलाभिधो देशो हुणदेशं ऋणु प्रिये ॥' इति शक्तिसंगमतन्त्रम्. तस्मिन्समये च गुर्जर- देशेऽपि सातवाहनस्यैव प्रभुत्वमासीत्, यतस्तेन सतुष्टेन खसचिवाय शर्यवर्मणे भरुकच्छ- (मरोच)देशप्रभुव दत्तमिति राजाहरमनिचर्यरथ शर्ववर्मा तेनापितो गुरुरिति प्रण- तेन राशा। स्वामी कृतध विपये भरकच्छनाम्नि कुलोपकण्ठविनिवेशिनि नर्मदायाः।" भस्मात्कथासरित्सागरपष्टतरसमाप्तिस्थश्लोकादायते. ४. अनन्तराज-कलशदेव-इपदे- पादयः कश्मीरमहीपाला अपि सातवाहनकुलोत्पना आसग्निति कहणराजतरहिणीत: कथासरित्सागरसमातिस्थितप्रशस्वितय प्रतायत. सांजपं सातवाहनः कदाचिदया मेव स्यात.

२ काव्यमाला। वादैव प्रेयमातके तस्य स्थिति . अय गाथासप्रहकता सातवाहनोऽन्यै प्रत्नविभिर प्यभिधुत यया-'अविनाशिनमग्राम्यमकरोत्सातवाहन । विशुद्ध नातिभि कोष रमे वि सुभाषिते ॥' इति हर्पचारतारम्भे घाण कोपश्वायमेव गाथासमहरूपो वाणस्य विवक्षित 'जगत्या प्रथिता गाथा सातवाहनभूभुता। व्यधुर्धतेस्तु विस्तारमहो चिन परम्परा ॥' अय श्लोष केचित्सूक्तिमुक्तावलीपुस्तकेषु रानशेखरनाम्ना समुद्धृतो दृश्यते 'सच्च भण गोदावरि पुवसमुद्देण साहियासन्ती । सालाहणकुलसरिस जाते कूले कुल अस्थि ।। उत्तरओ हिमवन्तो दाहिणओ सालवाहणो राआ । समभारभर- कन्ता देण न पन्थए पुहवी ॥ एतद्राथाद्वय रामशेखरसूरिप्रणीते प्ररन्धकोष सात- वाहनप्रवन्धे समुपलभ्यते शतान दसूनुमहाकविश्रीमदभिनन्दप्रणीतरामचरिताख्यमहाकाव्यस्य सप्तमसनी न्ते पञ्चदशसर्गाते च 'नम श्रीहारवर्षाय येन हालादनन्तरम् । खकोप कविकोपा णामाविर्भावाय सभृत ॥' अय श्लोक , द्वात्रिंश सर्गसमाप्तौ च 'हालेनोत्तमपूतया क विवृष श्रीपारितो गल्ति रयाति कामपि कालिदासस्वयो नीता शकारातिना । श्रीहर्षा विततार गद्यवय्ये बाणाय वाणीपल सद्य सक्रिययाभिनन्दमपि च श्रीहारव- पोऽग्रहीत् ॥' अय श्लोक समुपभ्यते एतेन श्रीपारितविनैव धनलिप्पया खन भोहोलस्य नाम्नाय गाथासप्तशतक्मथ सगृहीत स्यादित्यप्यनुमीयते सातवाहनस्यैव हाल , शाल , साठवाहन , एते पर्याया सन्तीति हैमकोपादिषु सुव्यकमेव १ प्रवन्धकोपे तु 'महावीरस्वामिनि मोक्ष गते ४५० वर्षान तर विक्रमादित्य । तत्समकालीन एवाय सातवाहन । कारिकाचार्यसमकालीनोऽपि कश्चन सातवाहन , सोऽस्मादर्वाचीन ।' इत्यस्ति २ 'शालो हारे मत्स्यभेदे' इति, "हार सातवाहनपा- थिये' इति च हैमानेकाथ "शलति शाल । श्यति या। 'श्यामाश्या-' त ल । हार सातवाहनप । तत्र यया-'मझे शामिहीपाल प्रतिष्ठानपुरे पुरा।" इति, "यथा-दिव गते हालवमुधराधिप।' इति च तटोमा अनेकारवाकर कौमुदी 'हाल सात्सातवाहन ' इति हेमनाममाला. 'हलत्यरातिहृदय हाल । ज्वलादि वात् ण । सात दत्तमुख वाहनमस्य सातवाहन । सालवाहनोऽपि।' इति तोका अभिषा- नचिन्तामणि 'साहम्मि हाले' इति देशोनाममा 'हाल सातवाहन ' इति तटीका. 'शालो हालनृपेऽपि च' इति विकाण्डशेपानेकार्थ क्यासरित्सागरे तु सा तेन यस्मादूढोऽभूत्तस्मात्त सातवाहनम् । नाना चकार कालेन राज्ये चैन न्यवेशयत् ॥' इति सात्याहनपदस्य निरतिरकास्ति सातो नाम कश्चन यक्ष कुवेरशापेन सिंहता प्राप्त नाय खपृष्टेऽधिरोपित इति क्यापि तयास्ति वात्स्यायनीयकामसूने तु 'शातवाहन' इति तालव्यादि समुपउभ्यते वायु-मारस्य विष्णु-पुराणेषु भागरते व हारमहीपतेन म समुपलभ्यत इति विद्वदूरभाण्डारकरोपाह-रामकृष्णशर्मभि प्रणीते सातवाहनः। ३ सग्रहरूपेऽस्मिन्ग्रन्थे काश्चन गाथा हालप्रणीता अपि सन्ति यत कचित्पुस्तके चतुर्थगायामारभ्य द्वादशगाथापर्यन्त प्रतिगायाप्रे तत्तद्गाथास्तॄणां 'हालस्स (हालस्य), योडिसस्स, चुरोहस्स, मअरन्दसेणस (मकरन्दसेनस्य), अमरराअस (अमरराजस्य), कुमारिलस्स (कुमारिलस्य), सिरिराअस्स (श्रीराजस्य), भीमस्सामिणो (भौमसा- मिन), हालस्स, एतानि पष्टयन्तानि नामानि समुपलभ्यन्ते अनेच रेसक्प्रमादेन गलितानीति भाति. एतदन्यान्तर्गता गाथा धन्यालोके, तल्लोचने, सरख तीकण्ठाभ- रणे, काव्यप्रकाशे चोदाहता सन्ति कुलवालदेवनिर्मिता गङ्गाधरमनिर्मिता चास्य रीका समुपलभ्यते, तन गाधरभनिमितैर समीचीना टीकाक्नौर्देशकालो चानि- श्चितावेच. जर्मनीदेशे टीकारहितोऽयं अन्धो रोमलिप्या वेबरपण्डितेन मुद्रित . स च तद्देशी- यानामेवोपकारक इति गङ्गाधरभप्रणीतटीकारामतोऽस्माभिमुदयितुमारब्ध भविष्यति चायमतिप्रनो मनोहरश्च प्रन्यो रसिकाना हृदयावर्जन इति इदमाशासहे. अस्मन्मुद्रणाधारभूतपुस्तकानि त्वेतानि--- १. प्रथमं जयपुरराजकीयसस्कृतपाठशालाया न्यायशास्त्राध्यापकाना ओझोपनाम :- श्रीजीयनाथशर्मणा गाधरभटीकासमेतं प्राय शुद्ध 'नेतरामानभूशाके (१६३२), लिखित क-सज्ञकम्. २. द्वितीयमप्येतादशमेव अलवरमहाराजाश्रितश्रीभवानन्दोदयानन्दरामचन्द्र पण्डि- ताना नवीन नातिशुद्ध च स विद्धितम् ३. तृतीय बुरवाल देवप्रणीतटीकासमेतमस्मदीयं नात्यशुद्धं ग चिहितम् तच डॉ. पटीटर्सनेन कोटानगरादानीतस्य पुखवस्य प्रतिरूपकम्. ४. चतुर्थ जयपुरराजगुरुपर्वणीकरोपाडूनारायणभद्याना केवलं सस्कृतच्छायामान प्राय शुद्ध नातिनवीनं च ध-चिहितम् एतत्पुस्तकाधारेणानामाभि शुद्धान्येव पाठान्तराणि गृहीतानि सन्ति. यक्षिणप्राचीने तिहासनानि पुस्तके २५ पृष्ठे विलोक्नीयम् शातकणे सातवाहनस्स विस्तरेण वर्णन च तत एवावधार्यम्. १. पुस्तकान्तरे 'कुलनाथदेव' इत्यपि नाम दृष्ट मस्ति.

काव्यमाला। -extecaceeeee हालापराख्यमहाकविश्रीसातवाहनसंकलिता गाथासप्तशती। श्रीगङ्गाधरमप्रणीतया भावलेशप्रशशिकाख्यया टीकया सवलिता। नस्वा दुण्ढिपदाम्ज गाधरभनिर्मिता टीका । सप्तशतभावलेशप्रकाशिका शोध्यता विज्ञैः ॥ अथ तत्रभवान्यायतकविकुमुदकुमुदिनीनायकः शालिवाहनश्चितीर्पितगाथाकोपस्या- नपरिसमाप्तये कृतं मालं श्रोतृहितार्थमुपनिबध्नाति- पसुबइणो रोसारुणपडिमासकन्तगोरिमुहअन्दम् । गहिअग्रपङ्क विअ संझासलिलमलिं णमह ॥ १॥ [पशुपते रोपारुणप्रतिमासंक्रान्तगौरीमुखचन्द्रम् । गृहीतार्घपङ्कजमिव संभ्यासलिलाञ्जलिं नमत ॥] पमुबइण इति । मामुपेक्ष्य कथमयमन्यां ध्यायतीति रोपेणारुण प्रतिमया संक्रान्त धाकृते पूर्वनिपातानियमारसंक्रान्तप्रविमं वा यद्गारीमुख तदेव चन्दो यत्र ते पशुपतेः सध्यासलिलाजलिं नमतेत्यन्वयः । रफमुखप्रतिविम्वच्छलेन गृहीता?चितर तपकजा मिवेत्युत्प्रेक्षा । यद्वा मानिन्या' प्रणयरोपमसहमानं नायक प्रति दूरया रक्तिरियम्- 'अनभिज्ञोऽसि प्रेमव्यवहाराणा यस्त्व प्रियाप्रणयरोपलक्षणे हर्पस्थाने कुप्यसि । न पश्यसि कि देव्याः संध्यासलिलाशलावपि प्रणयरोपम्' इति । गाथाकोपविरचनप्रयोजनमाह- अमि पाउअकव्वं पदिउं सोउं अ जे ण आणन्ति | कामरस तत्ततन्ति कुणन्ति ते क ण लजन्ति ।। २॥ १. पकअम्मिभ' इति ख ग-पुस्तकयोः पाठः. २. अम' इति पग-पाठः, ३. 'कह' इत्यस्मिनदे 'हं'इति गुर्वक्षरस्यापि छन्दोभाभयालध्वक्षरवदुचारण विधेयम्,इत्यत्र प्रमाण प्राकृतपिङ्गले यया-'जइ दीहो वि अ वण्णो लहु जोहा पढइ होइ सो वि लहु । वो .

२ काव्यमाला । । [अमृतं प्राकृतकाव्यं पठितुं प्रोतुं च ये न जानन्ति । कामस तवचिन्तां कुर्वन्ति ते कथं न लज्जन्ते ॥] अमिअमिति । क्षाररसनिर्भरत्वेनाहादकत्वादमृतमिवामृतं प्राकृतकाव्यमवसरे प. ठितु परपठित च श्रोतुं बोर्बु ये न जानन्ति, अथ च-कामस तत्त्वचिन्तां तत्रवार्ता वा कुन्ति ते क्य न लबन्त इत्यर्थः । कामशास्त्रव्युत्पत्तिविधुरं प्रति विदग्धनायि- कोत्तिा । प्रेक्षावत्प्रवृत्तये खप्रन्यस्य सक्षिप्ततो साररूपता वाह- सत्त सताई कइवच्छलेण कोडीअ मज्झआरम्मि । हालेण विरइआई सालंकाराण गाहाणम् ॥ ३ ॥ [सप्त शतानि कवियत्सलेन कोटेमध्ये । हालेन चिरचितानि सालंकाराणां गाथानाम् ॥] सत्तेति । मज्झारो मध्य । कविगाथासप्रहेण तत्कीर्तिस्थापनात्कविवत्सलेन हा. लेन शालिवाहनेन सालकाराणां गाथाना कोटेमध्ये सप्त शतानि विरचितानि । संगृही. तानीत्यर्थ। गाथालक्षण तु-'पढमं वारह मत्ता बीए अट्ठारएहि सजुता । जद्द पढम तह तीअं दहपश्यविहंसिआ गाहा ॥' इति पिशलोत्त वोध्यम् । 'कलोलिनीकाननकदादी दु साश्रये चार्पितचित्तवृत्ति । मृदुवमारम्भमभिमधैर्य. लयोऽपि दीर्घ रमते रवेषु ॥' इत्यादि कामशास्त्राीर्घरमणार्थ नायकस्यान्यचित्तता पुर्वती पाचिदाह-- उअ णिचलणिप्पन्दा भिसिणीपत्तम्मि रेहइ वलामा । हिम्मलमरगअभाअणपरिटिदा सद्धसुत्ति व्व ॥ ४ ॥ वि तुरिअपहिओ दोतिणि वि एक जागेहु ॥' इति 'यदि दीर्घमपि वर्ण लघुकृता जिला पटति तदा सोऽपि वर्णो लघुरेव भवति । द्वौ वणी प्रयो वा घर्गास्त्वरितपटितासा. नेक एव वर्ण इति जानीत । इत्येतहीहा. एवं '' 'हिं' इति वर्णद्वयम्, 'ए' 'अ' इति यद्वय शुद्धम्, जवर्ण(अन्यवर्ण)मिलितं वा विकल्पैन सधु भवति, तथा रकारले हकारयुफे या व्यजने परे पूर्वाक्षरे विकलेन रघु भवति, इत्यादि नियमा. गोदा. हरणा. प्राकृतपिरले इटव्याः. अस्माभिरप्यत्र यस्य गुर्वक्षरस्य लापारवा घारणं भवति तदुपार एतादृशमर्धचन्द्राधार विहं स्थापितमस्ति. १. 'घोट्यामध्ये' इति घ-पुस्तके, 'कोटिमध्यात्' इति ग-पुस्तके पाठ.. २. 'शारवाहनेन' इति, शालिवाह नेन' इति च ग घ पुस्तकयो पाठी. ३. अयं श्लोक होकप्रणीते रविरहस्ये (५३) पर्वते. ४. 'परिद्विभा' इति सना-पाट:

१ शतकम् गाथासप्तशती। - [पश्य निश्चलनि.स्पन्दा विसिनीपत्रे राजते पलाका । निर्मलमरकतभाजनपरिस्थिता शशशुक्तिरिय ।।] उभ मिचलेति । निचलोऽचलस्वदनिःस्पन्दा वेगविधारणप्रयत्नवशात् । निश्चलेति पुरुपसंयोधन या । शङ्खघटिता शुक्तिः शक्तिः । तथा च यदि वेगविधारणपोऽपि तदैनां बलाकां पश्यन्नन्यमनस्कतया चिरं रमस्वेति भावः । यद्वा नि स्पन्दत्वेनाश्व- खत्वम् , तेन च जनरहितत्वम् वेन च सकेतस्थानमिति कयाचिकचित्प्रति व्यज्यते । अ- थवा मिस्या पदचि । न त्वमनागतोऽभूरिति व्यज्यते ॥ विपरीतरतप्रसङ्गे सदपों कोचिदुद्दिश्य कचिदाह- सावचित्र रइसमए महिलाणं विभमा विराअन्ति । जाव ण कुवलअदलसेछआई मेउलेन्ति णअणाइ ॥ ५ ॥ तावदेव रतिसमये महिलानां विभ्रमा विराजन्ते । यावन्न कुवलयदलसैच्छायानि मुकुलीभवन्ति नयनानि ॥] तावेति । यद्वा सुरतावसानोपचारायनभिज्ञतया रतान्तेऽपि कटाक्षभुजप्रक्षेपादि- विधर्म कुर्वन्ती नायिका प्रति सख्याः शिक्षोक्तिरियम् । रतिसमये श्रीगा विश्रमस्ता- वदेव विराजन्ते पुरुषाणां हृदयहारिणो भवन्ति यावत्पुरुषाणा नयनानि रतिप्राप्त्या मुकुलितानि न भवन्ति । अतस्तथाविधं नायकमुपलभ्याप्राप्तरतिमुसयापि प्राप्तरतिमु- सयेव राकविभ्रमया स्वया भवितव्य मिति॥ खको मेपवनरोपितस्य पुष्पफलरहितस्य पुरवक्तरोहिदमन्वेषयन्तं नायक प्रति नायिकायाः ससी वदति- मोहलिअमप्पणो कि ण मग्गसे मग्गसे कुरवअरस । अं तुह मुहग हसइ वलिआणणपङ्कभं जाआ ॥ ६ ॥ [दोहंदमात्मनः किं न मुंगयसे मृगयसे कुरबकस । 'ऐवं तव सुमग हसति पलिताननपङ्कजं जाया ॥] मोहलिअमिति । यद्वा गोहलिअं नवफलोद्ममित्यर्थः । मदालिगनेन कुरवकस्य फलोद्गमं मायसे भारमनः पुषरूपं फलं किमिति न प्रार्ययसे । अहो ते जाव्य. मित्यभिप्रायः ॥ १.तावम्बिा' इति क-पाठः. २. 'जावण्य' इति ग-पाठः ३. 'दलसछआई' इति ग-पाठः. ४. 'मउलन्ति' इति क-पाठ : ५. 'सदृशानि इति ग-घ-पाठः. ६. 'मुकुला. यन्ते' इति, 'मुकुलन्ति' इति ग-य-पाठी. ५. 'दोहलिभ' इति ग-पाठः. ८. 'एवं खु नुह' इति छन्दोमायुक्तःक-ख-पाठः. ९. 'नवदोहदमात्मनः' इति घ पाठः... 'मार्ग- से मार्गसे इति ग-पाठ.११. 'एवं राज मुभग साइति क-स-घ-पाठः, 'इयं सामु. भग' इति गपाठा ४ काव्यमाला। वसन्तसमये गमनोयन नायक प्रति कान्ताया सखी गमनाक्षेपार्षमाह- ताविजन्ति असोएहि लहवणिआओ दइहविरहम्मि । किं सहइ को वि कस्स वि पाअपहार पहुप्पन्तो ॥ ७॥ ताप्यन्ते अशोकैर्विदग्धवनिता दयितविरहे । किं सहते कोऽपि कसापि पादप्रहार प्रैभवन् ॥] ताविबन्तीति । अशोकैरननुभूतशोकत्वात्परपीडानिर्दयै । अन्योऽपि न सहते कि पुनरशोक । प्रभवन्नित्यवसर प्राप्त्या समों भवन् । कातसंनिधी तु सामाभावान ताप्यन्त इत्याशय । तथा च वरस्नीचरणताइनरूप दोहद त्वयेव कारितेय मत्ससी व. द्विरहे लब्धावसरै सानुशयरशोकस्वाप्यमाना जीवितमेव जह्यादिति भाव पितभर्तृकाया कान्त प्रति तत्सख्या लेखगायेयमिति कश्चित् ॥ कस्याधि केनचित्वामुकेन तिलवाटिका संकेतस्थानमासीत् । तत पक्केषु विलेषु सकेतस्थानातरं जार प्रति भावयन्ती श्वधू प्रत्याश्चयंकयनव्यानाह- अत्ता तह रमणिज्ञ अझ गामस्स मण्डणीहूअम् । लुअतिलवाडिसरिच्छ सिसिरेण फअ मिसिणिसण्डम् ॥ ८॥ श्रु तथा रमणीयममाक ग्रामस्य मण्डनीम्तम् । लूनतिलवाटीसदृश शिशिरेणं कृत बिसिनीषण्डम् ॥] अत्तेति । हिमदग्धपन्नतया दण्डमात्र शेष वाळूनतिलवाटीसदृशम् । तथा च पूर्व प श्राद्याहरणार्थं जनाना तर गतागतमासीद, तदपीदानी नास्तीति विजनव तस्य देशस सूचितम् । 'तिलक्षेत्रपद्मसर प्रभृति संकेतस्थानान्तराभावागृहमेव संकेतस्थानमित्यर्थ' इति कश्चित् ।। कस्याश्चिकेनचित्सम शालिक्षेत्र सकेतस्थानमासीत् । तत शालिपाके तद्पगम दृष्ट्वा रुदन्तीं तामद्दिश्य सकेतस्थानान्तरं सूचय ती सखी आह- किं रुअसि ओणअमुही धवलाअन्तेसु सालिछेत्तेसु । हरिआलमण्डिअमुबी णडि व्व सणवाहिआ जाआ ॥९॥ [कि रोदिष्ययनतमुखी धवलायमानेषु शालिक्षेत्रेषु । हरितालमण्डितमुखी नटीव शणवाटिका जाता ॥] किमिति । हरितालेन धातुविशेषण मण्डितमुखी नटीव । शणवाटिकापक्षे-पीतकुसु- १ 'असो इहि' इति ग पाठ २ 'मनोहरनिय' इति ग पाठ , 'ललितवनिता' इति घपाठ ३ 'पुपित' इति ग पाठ ४ 'गाअस्स' इति स-पाठ.५ 'राम- विलवाडिसरिस' इति ख-पाठ ६ 'हे मातस्तथा' इति ग पाठ १शतकम् गाथासप्तशती। मलयकनिकरनिविडशिखरशणतरनिवहनिरन्तरतया हरितालमण्डितमुखीवेत्युपमा । अथ च हरीणां मर्कटाना जालेन मण्डित मुख प्रवेशमार्गो यस्या इति निर्जनता व्यज्यते । अथवा पाकाभिमुरोपु शालिक्षेत्रेषु हर्षस्थानेष्वपि रुदितलक्षितशालिक्षेनाभिसारा कापि क्यापि परिहासशीलया एवमुपहस्यते। कलहान्तरितां नायिका कान्तानुवृत्त्यभिमुखी क्त सखी माह- सहि ईरिसिव्विअ गई मा रुव्वसु तंसवलिअमुहअन्दम् । एआण बालवालकितन्तुकुडिलाण पेन्माणम् ॥ १०॥ सखि ईदृश्येव गतिर्मा रोदीस्तिर्यग्वलितमुखचन्द्रम् । एतेषां बालकर्कटीतन्तुकुटिलानां प्रेम्णाम् ॥] सहीति । ईदृश्येवेति सनिहितमेवानुवर्तन्ते । वेष्टितमेव वेष्टयन्ति । मनागाकृष्ट्यापि नुव्यन्ति । तद्यावदन्यत्र दृढानुवन्धो न भवति तावदेव मानं विहाय कान्तमनुवर्तस्वैति सख्यामुपदेशः । तत्कान्ते च विरहविधुरेयं मानिनी तदेनामनुनयस्वेति व्यङ्गयोऽर्थः ॥ गृहीतमानायाः कस्याश्चिदनुनयार्थ चरणपतितस्य पत्युः पृष्ठमारूढ पुत्रं दृशा पन्ध- विशेषस्मरणात्तस्या हास्योद्मो जात इति काचित्सखीमाह । यद्वा कृतकलयोःपत्यो रानिवृत्तान्तमनुसंधायागता सपसी सपन्या पृष्टा तामाह- पाअपडिअस्स पइयो पुहि पुत्ते समारहत्तम्मि । दढमण्णुर्दुण्णिआएँ वि हासो परिणी णेकन्तो ॥ ११ ॥ पादपतितस्य पत्युः पृष्ठं पुरे समारुति । ₹ढमन्युनाया अपि हासो गृहिण्या निष्क्रान्तः ॥] पाएति । पत्युः खामिनः । न तु वाहमस्येत्यर्थः । पुने समाहतीसनेन पुत्रवसया गल्तियोबनायामप्यनुरक इति व्यज्यते । यहिण्या गृहम्वामिन्याः । भसदादीना- मोदासीन्यादिति भावः । दृढमन्युनाया इत्यनेन रोषोपशमाभावप्रतिपादनेन खाधीन- भर्तृकायाः सौभाग्यगत्पितिविषयेऽनादरः, पत्युश्च तादृदयामपि स्नेहातिशयः प्राटितः ।। प्रियविश्पोपतप्तया क्याचित्प्रेषिता निसष्टार्थी दूती नायकमुत्कर्षयन्दी भाया खस- सीमरण सूचयन्ती आह- सेंचं जाणइ दटुं सरिसम्मि जणम्मि जुजए राभो । मरट ण तुमं मणिसं मरणं वि सलाहणिजं से ॥ १२ ॥ १.'तिरिअवलिअ-इति ग-पाठः, २. 'पूणिमाए' इति ख-पाठ ; 'दुम्मिआई' इति ग-पाठः. ३. 'समारहमाणे' इति ग-पाठः ४.'ढमन्युदुर्मनस्यया.' इति ग. पाठ.. ५. ख-ग-पुखच्योरस्सा भप्रिमायाच गायाया व्यत्ययोऽति. .. ' AA खना-पाठ.. - काव्यमाला। - सित्यं जानाति द्रष्टुं सदृशे जने युज्यते रागः । प्रियतां न त्वां भणिष्यामि मरणमपि शाधनीयं तस्याः ॥] समिति । यतोऽनन्यरूपलापिनी स्वपमेव बहु मन्यत इत्याशयः । सदृशे जने युज्यते राग इत्यनेन रूपाभिजनादिभिरनुरूपे त्वयि तस्याः समागमौत्सुक्यं युकमेवेति नायि- कायाः स्तुत्यनुरागाभ्यां नायकपोत्साहनम् । नियतामित्यनेन नायकस्यानभ्युगमे स्त्रीव. धपातकम्, पारमनश्च प्रार्थनामहमीरत्वं दर्शितम् । मरणमपीसादिना चानुरूपानुष्टाना- स्वदतचित्ताया मरणे जन्मान्तरे त्वत्प्राप्तिसमवो व्यज्यते । चैखादिमालिन्यशष्टया गृहकृत्यपराङ्मुखी सखी प्रबोधयितुं काचिदाह- परिणीऍ महाणसकम्मलग्गमसिमैलिइएण हत्येण । छित्तं मुहं हसिजइ चन्दावत्थं गभं पइणा ॥ १३ ॥', [गृहिण्या महानसकर्मलममपीमलिनितेन हस्तेन । 'स्पृष्टं मुखं हसते चन्द्रावस्यां गतं पत्या ।] परीति । यस्य यदुचितं कर्म सच्छोलयतो वैरूप्यमप्यलंकारायैव भवति । यतो लामपीकालिमावि मुखं पत्या सपरिहार्य पदेणोपमीयते । अतः कुलस्त्रीणां गृहकृत्यप- रापुखत्वमनुचितमिति भाव. " फत्कारमारतेनाप्यप्रज्वलल्यमी यन्तीं कोचिरखामिला प्रकाशयन्नाह-- रन्धणकम्मणिउणिए मा जूग्सु रत्तपाडलसुअन्यम् । मुहमार पिअन्तो धूमाइ सिही ण पज्जलइ ।। १४ ॥ {रन्धनकर्मनिपुणिके मा कुष्यस्व रक्तपादलसुगन्धम् । मुखमारुतं पिबन्धमायते शिखी न प्रज्वलति ॥] धणेति । रन्धनपरतया त्वदवलोकनकौतुकोपगतमपि मां नावलोक्यसीति भावः । मा इति । तवाघरकृतेऽमिपूजोचितस्य रक्तपाटलाकुसुमस्येव मुरभिशीतलो गन्धो यस्य लम् । मुखेति । दोषारणत्वन्मुसदिक्षयेव धूमोगमचाटुमानरति । खन्मुखमाहतपा- नेच्छयैवायं न प्रजालति । ज्वलितस्य तत्प्राध्यसभवादिति भावः ॥ १. 'अस्याः' इति गधन्याठ:. १. 'कापि मलिनत्वाशश्या खामिसमर्पितगृहह- परापुरी इति ख-पाठः. ३. 'मइलिएण' इति ख-ग-पाठ::.'कोऽपि युवा कामुकधर्मममी समाधाय खाभिप्राय प्रकाशयन्माहतेनाप्रज्वलत्यप्तो कुध्यन्तीं नायिका- माह' इति ख-पाठः, ५."खिद्यख' इति ग-पाठः, . । 1 १ शतकम् गाथासप्तशती। नवोढायाः कन्याश्चिनूतनगर्भयोगिन्याः कान्तं प्रत्यनुरागातिशयं प्रतिपादयः काचिदाह- .किंकि दे पडिहासइ सहीहि इअ पुच्छिआएँ मुद्धाए । पढमुग्गअदोहणीए णवरं दइअं गा दिट्ठी ॥ १५ ॥ [किं किं ते प्रतिमासते सखीभिरिति पृष्टाया मुग्धायाः । प्रथमोद्गतदोहदिन्याः केवलं दयितं गता दृष्टिः ॥ किमिति। प्रतिभासते रोचते। दयितेऽभिलायमेव सूचितवतीत्यर्थः । यद्वा सपनों न सासूयस्य सपनीजनस्पोपालम्भवादोऽयम् । मुग्धाया इति मोहाद्गर्भायासमप्यग यन्त्याः । प्रथमेति । बहुप्रसूताश्च गर्भखेदखिनाः मुरतायासं परिहरन्ति । इय त्वननुः तप्रसूतिखेदा प्रियसंभोगमेव परमभिलपतीति भावः ॥ प्रोषितपतिका काचिद्विरहदाहदुःसहत्व व्यनयन्ती कान्तसमागमविपये सखोज स्वरयितुं चन्द्राभ्यर्थनच्छलेनाह- अमअमअ गमणसेहर रअणीमुहतिला चन्द दे छिवसु । छित्तो जेहिं पिअअमो मम पि तेहिं विअ-करेहिं ॥ १६ ॥ अमृतमय गगनशेखर रजनीमुखतिलक चन्द्र हे स्पृश । स्पृष्टो यः प्रियतमो मामपि तैरेव करैः ।। अमएति । देशब्दः सानुनयसंधोधने । अमृतमयेसनेन जगजीवन हेतुत्वम्, गगन खरेत्यनेनासिललोकलोचनानन्दकारित्वम्,रजनीमुखतिलकेत्यनेनायलाजनपक्षपातित्वम चन्देसनेनाहादकत्व व्यज्यते । एवविधोऽपि मां निर्दये दहसि, मत्कान्तं पुनरगृतशिशि करैः स्पृशसीत्यतोऽद्यापि नायातीति भावः ॥ सखि मुञ्च खेदम् । अद्य श्वो वा तवागमिष्यति कान्तः । किं स्वागतोऽप्यसौ त्वर सप्रणयरोपमुपालम्भः खेदयितव्य इति सखीभिरुका प्रोषितभर्तृका आह--- ऐहइ सो वि पउत्थो अहं अ कुप्पेज सो वि अणुणेज । इअ कस्स वि फलइ मणोरहाणं माला पिअअमम्मि ॥ १७ ॥ ऐध्यति सोऽपि प्रोपितो अहं च कुपिष्यामि सोऽप्यनुनेष्यति । इति कस्सा अपि फलति मनोरथानां माला प्रियतमे ॥] दोहलिणीए' इति ग-पाठः; "दोहलिण्णी' इति ख-पाठः, २. 'एहिद' इति खगभाट: २ मत प्राई नापाम: ५. 'अथाह' इति ग-पाठः. * समामधारी' शेती ग-पाठः.

काव्यमाला। ८ एहइति । कान्तस्य निरनुकोशत्वात, भात्मनश्च कान्तावधारणभीरत्वात्, इयचिरं प्रेमानुबन्धस्यासंभाव्यमानत्वाय सर्वमेतन्मनोरथमात्रमित्याशयेनाह-इतीति । कस्यापि धन्यजनुष एतत्सपथवे। मम तु मन्दभाग्यायाः कुत एतदिति भाषः।. कथमधुना दुर्वलोऽसीति मित्रेण पृष्टस्य कान्तस्स बहुमहिलाकृष्टिं कापि सेोपाल. म्भमन्यापदेशेनाह- दुग्गअकुटुम्यअट्ठी कह णु मए धोइएण सोढव्वा । दसिओसरन्तसलिलण उअह रुग्णं व पडएण ॥ १८॥ [दुर्गतकुटुम्वाकृष्टिः कथं नु मया धौतेन सोढव्या । दशापसरत्सलिलेन पश्यत रुदितमिव पटकेन ॥] दुग्गएति । सोढव्येसनन्तरं इति शया इति शेषः । तथा चैवंविधशङ्कामानेण खेदाइशागलजलच्छ नाचेतनोऽपि पटो रोदिति, अयं तु विदग्धो महिलाछन्दानुवृत्त्या कथं न खिन्न' स्यादिति भावः । यद्वा कापि वेश्या धनदानेन विना यहूना प्रामप्रधा- नानामाकर्षणादुद्वेगं कुनी प्रति सूचयन्तीत्यं कथयति ॥ कोऽध्यात्मनः पराधीनवृत्तित्वमनुरागाविशयं च नायिका प्रति ख्यापयनायिकागृह- गामिवत्समन्यापदेशेनाह- कोसम्वकिसलवण्णा तण्णा उण्णामिएहि कण्णेहिं । हिअअट्ठिों घर वञ्चमाण धवलत्तणं पाव ॥ १९ ॥ [कोशाप्रविसलयवर्ण तर्णक उन्नामिताभ्यां कर्णाम्याम् । हैदयस्थितं गृहं प्रजन्धवलत्वं प्रामुहि ॥] कोसम्बेति। धवलत्वं श्रेष्ठतां षण्डत्वं वा। स्वेच्छाचारितामिति यावत् अहमिव पराधी. नात्तिर्मा भूरिति भावः । अथवा या वृद्धो कामयसे तस्यास्त्वं तर्णक इवेति क्यारिक- चित्प्रत्युच्यते ॥ कापि भावजिज्ञासाथै कृतकनिद्रानिमीलिताक्षं कपोलचुम्बनपुलकिताहरवेन विदित- मिथ्याखापं कान्तमाह- अलिअपसुत्तविणिमीलिअच्छ दे सुहअ मझ ओआसम् । गण्डपरिउम्वणापुलइअङ्ग ण पुणो चिराइस्सम् ॥ २०॥ [अलीकप्रसुतकविनिमीलिताच हे सुमग ममावकाशम् । गण्डपरिचुम्बनापुलकिताङ्गन पुनश्चिरयिष्यामि ॥] १. 'कुटुम्बकृष्टिः' इति घपाठः, ०२. 'हृदयप्सित्त' इति ग-घ-पाठः ३. 'उणो' इति गपाठ. ४. 'ददख सुभग ममावकाशम्' इतिग पाठः, ५. चिरयिष्ये' इति गघ-पाठ १ शतकम् गाथासप्तशती। अलिएति । हे सुभग, ममावकाश देहोति शेषः। 'देसुधा मझ' इति क्वचित्पाठः। अत्र हे धव, ममावकाशं देहीति योज्यम् । केचित्तु-'देमु हअमज्म इति पदच्छे- दः। हतमध्य अगाविन्यासरुद्धमध्य देहि अवकाशम् । अर्यान्मम ।' इत्याहुः । गण्टेति । एवेन नायिकाया इतिज्ञानमन्योन्यानुरागश्च यूनोदर्शितः ॥ वेश्याह्वानार्थमागते नायकमित्रे गृहीतान्यभुजंगमाच्छादयन्ती वेश्यामाता दुहि- तरमाह- असमत्तमण्डणाविअ वध घर से सकोउहल्लरस । वोलाविअहलहलअस्स पुत्ति चित्ते ण लग्गिहिसि ॥ २१ ।। [असमाप्तमण्डनैन ब्रज गृहं तैस सकौतूहलस । व्यतिक्रान्तीत्सुक्यस्य पुति चित्ते न लगिष्यसि ॥] असमत्तेति । मण्डनकरणेनाम्या विलम्बो नान्यप्रसझेणेति भावः ।। कश्चिनागरिकः कामिनीजनचित्तहरणार्थ रजखलामुखचुम्बनेनात्मनः कामुक्त्वा- विशयं प्रकटयन्नाह- आअरपणामिओढे अघडिअणासं असंहअणिडालम् । वण्णघिअतुप्पमुहिए तीए परिउम्वर्ण भरिमो ॥ २२ ॥ [आदरप्रणामितौठमघटितनासमसंहतललाटम् । वर्णघृतलिप्तमुख्यास्तस्याः परिचुम्वन मरामः ॥] आअरेति । हरिद्रादिवर्णप्रधानं घृतं वर्णघृतम् । देशविशेपे रजखलामुखं चितार्थ वर्ण- धृतेन लिप्यत इत्याचार. । तस्या या मया त्वयि प्राकथितसौन्दयो । परि सर्वतः कपोलादौ । यद्वा प्रोपितः कश्चित्प्रियाया. स्पृष्टक नामानुरागातिशयसूचकमालिन स्मरमात्मान विनोदयतीति गाथा ॥ जनसबाधेऽपि त्रिय प्रत्युझटभावा सपी शिक्षयितु कापि प्रच्छन्नकामुकोकं कुल जायां गाम्भीर्यगुणमाह- अण्णासआई देन्ती तह सुरए हरिसविअसिअकवोला। गोसे वि ओणअमुही अंह सेत्ति पिआं ण सद्दधिमो ॥ २३ ॥ १. 'मण्डणे विभ' इति ग-पाट २. 'अस्य' इति ग-पाठ. ३. 'व्यतिक्रान्तर- णरणवस्य' इति ग-पाट; 'व्यविकान्तहलहलकस्य' इति घ-पाठ . 'हलहलक कामी- त्सुक्यमिति देशी' इति कुलवालदेव . ४. असघअलिलाइम्' इति ग-पाटः. ५. 'तु. पशब्दो देशी लिप्ते वर्तते' इति कुलबालदेव . ६ "निटिरम्' इति घ पाठ. ७. 'स्मरामि' इति ग पाठः. ८. 'सहसेति पिआ' इति ग-पाठ.; 'अहसैत्ति पिआ' इति पचित्पाठ । मह इयम । इस सा प्रियेति तदर्थः ।' इति कुलवालदेव . ९. 'सदहिमो' इति ग-पाट.. .

काव्यमाला- 4 [आज्ञाशतानि ददती तथा सुरते हर्षविकसितकपोला । प्रातरप्यवनतमुखी इयं सेति प्रियां न श्रद्दध्मः ॥] । अण्णेति । हर्षविकसितकपोला सटी। तथा आज्ञाशतानि गृहाणाधरं मुध विचरमि- त्यादीनि ददती । गोसे प्रात.। अह इयं सेयमिति । प्रथमैव न भवतीत्यर्थः । लोकसमक्षं गूढाकारतैव नायकप्रीतिहेतुः, न तु धार्य मिति भावः । काचित्पत्युरन्यस्यामनुरागमारमनि चाननुरागं कुलीनतानमस्कारच्छलेनाह- पिअविरहो अप्पिअदसणं अ गरुआ दो वि दुक्साई। । जीएँ तुम कारिज्जसि तीऍ णमो आहिजाईए ॥ २४ ॥ [प्रियविरहोऽप्रियदर्शन च गुरु के द्वे अपि दु खे । यया में कार्यसे तस्यै नम आभिजात्यै ॥] पिएति । करोतिरत्रानुभवार्यकः । अतएव देवदत्तो दुःसमनुभवतीत्यर्थे दु.ख करो तीति प्रयोगः। आभिजात्य कुलीनतायै । ऋतुम्नानादौ बन्धुजनाभ्यर्थना धर्म वानुरुन्धानः कुलीनतया मामुपागतोऽसि, न तु मेहेनेत्याशयः॥ कथमयं गमनाय वृतारम्भोऽपि न प्रस्थित इति कस्यचित्प्रश्ने तद्वयस्यः सपरि- हायमाह- ऐको वि कालसारो ण देइ गन्तुं ५आहिणवलन्तो । कि उण वाहाउलिअं लोअणजुअलं पिअअमाए ॥ २५ ॥ एकोऽपि कृष्णसारो न ईदाति गन्तुं प्रदक्षिणं यलन् । किं पुनर्वाप्पाकुलितं लोचनयुगलं प्रियतमायाः ॥] एक इति । पक्षे व्याधाकुलितम् । किं पुनरिति । लोचनयुगलमपि यतः कृष्णसार- मिति भावः। एतेन धान्तान्नेहनिगडबद्धोऽयं न गच्छनीति सूचितम् ॥ अनुनीयमानमध्यनुनयमगृहन्त प्रणयिनी सप्रेमदण्डमाह- ण कुणन्तो व्विअ माणं णिसासु सुहमुत्तदरपियुद्धाणम् । सुण्णइअपासपेरिमूसणवेअ] जइ सिजाणन्तो ॥ २६ ॥ १. सहसा प्रियेति न' इति ग-पाठ . 'असौ सेति' इति घ-पाठ . २ 'कारिन' इति क-पाठः ३. 'अभिजाखै' इति ग पाठः. ४. 'एको वि' इति क-पाठ:- ५. 'किण्णसारो' इति ख. पाठः, ६. 'पाहिशवलन्तो' इति क-पुस्तके, 'दआहिण- बसन्तो' इति च ख पुस्तके पाठः. ७. 'चलन्' इति ग घ-पाठः, ८. नयनयुगलं' इतिघ-पाट: ९. 'परिमुसण' इति ख-ग-पाठः.

१शतकम्] गाथासप्तशती। [नाकरिष्य एव मानं निशासु सुखसुप्तदरविबुद्धाम् । शून्यीकृतपाईपरिमोषणवेदना येवशास्सः ॥] गेति । निशामु खकान्तया सह सुखसुप्तानां किंचिद्वियुद्धानां ततोऽन्याभिसारिण्या तया शून्यीकृतेन पाचन यन्परिमोषण वचन तेन या वेदना तो यद्यज्ञास्य. सा वेदना यदि त्वया जाता भवेत्तदा त्व मानं नाकरिष्य एवेति संवन्धः। ममैवायं दोपः। यदहं पति- व्रता न स्या तदा कि त्वमेव क्रोपीति भावः। कृतकलहनोद॑पत्यो रानिवृत्ताक्लनार्थमागता प्रियसखी प्रणयरवेषभनार्थमाह- पणअकुविआण दोहे वि अलिअपसुत्ताण माणइल्लाणम् । णिञ्चलणिरुद्धणीसासर्दिण्णकण्णाण को मल्लो ॥ २७ ॥ [प्रणयकुपितयोयोरप्यलीकप्रसुप्तयोर्मानवतो. । निश्चलनिरुद्धनिःश्वासदत्तकर्णयोः को मल्ल ॥] पणएति । निश्चरेति । प्रयत्नधृत निश्वासत्वेन कृतकप्रसुप्तम्, तथाविधान श्वासाकर्णन- तत्परतया चाभिलापित्व सूचितम् । को मल्ल इत्युपालम्भप्रश्न । न कोऽपीयर्थः । परस्प- रावधारणासमों पृथैव युवामात्मान रोद्यथ इति भावः ॥ काबिहूती नायिकाया देवरानुरक्तत्वेनासाध्यत्व सूचयन्ती जारी प्रयाह- गवलअपहरं अड़े जहिं जहिं महइ देवरो दाउम् । रोमश्वदण्डराई तहिं तर्हि दीइ वहूए ।। २८ ।। [नवलताप्रहारमने ये यच्छति देवरो दातुम् । रोमाञ्चदण्डराजिस्तैन तन दृश्यते वयाः ॥] प्रोपितमका प्राणेशरामीपगामिनमध्वगं ससीजनं या तदानयनत्वरार्थमाह- अज मए वेण विणा अणुहूअसुहाइँ संभरन्तीए । अहिणवमेहाण रवो णिसामिओ यझाडहो ब्व ॥ २९ ॥ १. 'न पुर्वन्त्येव' इति घ पाठ:. २. 'वियदानाम्' इति ध पाठः. ३ 'परि- मर्पण' इति गघ-पाट. ४. यदि हि जानन्ति' इति घ पाठ . ५. 'दोए वि' इतिस-पाठ ६. दिह' इति ग पाठ ५. 'मानान्विनयो' इति ग पाठ, 4. 'ग- पलरपहारमई' इति स पाटा. १०. 'यलिन्य- स्मिन्महाति' इति ग-पाठः. समुरत' इति घ पाट. ९. 'देअरो दामु' इति स पाटः ११. 'तस्मिन् तम्मिन्' इति ग-पाट. १२ 'अनुभू- काध्यमाना। [अप मया तेन विना अनुभूतमुसानि संसान्या । अभिनयमेपाना वो निशामितो यप्पपरह इव ॥] अग्जेति गतियणापास्वनुभूतमुखानि मम्पान्या मया मेपानी राम्रो वापप- रहर वापरयान यमानस पपोशारटामनिरिव धुत इत्यर्थः। एतेन यशना- गच्छति सिमापात मे मरणगिलपगम्य यमुक तरिधीयतामिति सूचितम् ॥ मामलपुत्र प्रति शी कम्पाविर्सगमायोसाहयितुं सोपालम्भमाह- 'निशिव जामामीला दुसग णिम्यईडसारिन्छ। गामो गामिपिणन्दण सुम्झ एफ तह वि तणुभाइ ॥ ३० ॥ इनिर जायाभीरक दुर्दर्शन निम्यकीटसेंदृष्य । प्रामो प्रामगीनन्दन तय गते तथापि तनुकायते ॥] गीशिवति। अनुरस्कानिनीजनमुन्यात्रिएप । 'fairs' इति पाठे निष्किय किमान्य । जायाभोर भार्यापरतन्त्र । अत एवाखरछन्दमयारवादर्शन दुर्लभद. नि । निम्पनीरसस, जिसचिवादमुन्दरमहिलानुरागाय । अभव्यक्तिया द्वयोः साम्यम् । प्रामणीनन्दनेवि भयशून्यताप्रदर्शनपर स्योधनम् । प्रामो प्रामनिवारिविला. गिनीजनः कप स्परसंगम. म्यादिवि चिन्तया तनुकायते दुर्घायत इति कामिनीजनानु- रागडयनेन वमनीयत्व पर्मितम् ॥ कमपि मुभटयोपिदभिराविण विशश्यसारिणमु साहयितु तस्याः पत्यावनिच्च्या गु- रासाप्यतो पुरस प मुमनिर्गमप्रवेशतया निरपायता दूर्वी मुमटानुतियाजेनाह-- पदग्यणमग्गविसमे जाआ किन्रेण सह से गिद्दम् । गामणिउत्तस्स उरे पल्ली उण सा मुई मुंवइ ॥ ३१ ॥ [प्रहारमणमार्गविषमे जाया इच्छेण लभते तस निद्राम् । ग्रामणीपुरखोरसि पड़ी पुन. सी मुसं सपिति ॥ पहरेति । उरे इति उरसि पुरे वा । प्रहारमणकिणविषमे निम्रोमतकशे तस्योरति जाया कृच्छेण निद्रा लभते । अनिच्छन्यपि भयात्तमालिशप सपितीत्यर्थ । पुरपझे नु-प्रहरपनमार्गविषमे प्रहरगम्यो यो वनमार्गस्तेन पिपमे दुर्गमे । पानी, रक्षणया पाली- 1. णिनि' इति ग-पाट-. २ 'दुहस्सण' इति ग पाठः ३. निष्क्रिय इति घपाट. ४. "णिम्यकीः' इति स-पाट. ५ 'सहा' इति ग-घ-पाट. . 'तनूभवति' इति ग घ पाठ, 'से' इति क-स-पाटः, 4. "मुआई इदि ल १. 'तस्य' इविध पाट:. - पाट'.

१ शतकम् गाथासमशती। निवासी जन , सुखं खपिति ।म कोऽपि जगातीत्यर्थः । जाया पुन कृच्छेण । पहुव• भत्वात्तस्य तज्जाया सावसरैव । अतस्वत्र गच्छेति जारे प्रति दूतीवच ॥ अन्यनायिकानाना संयोध्यानुनयन्त खण्डिता सविनयोपालम्भमाह- अह समाविममग्गो सुहम तुए जेन्च णवर णिवृहो । ऐहि हिअए अण्णं अण्ण वाआई लोमस्स ॥ ३२ ॥ [अय समावितमार्गः सुभग त्वयैव केवल नियूंढ । इदानी हृदयेऽन्यदन्यद्वाचि लोक्स ॥] भद्देति । इदानी लोकस्स हृदयेऽन्यत् याच्यन्यत् । तव तु यदेव हृदये तदेव वाचि । यतो मा प्रति हृदयबाह्येनापि प्रियवचसा सैवानुनीता, न त्वमिति भाव ॥ प्रणयकुपिता काचित्पृष्टाभिमुखसुप्त कान्तमाह- उहाई णीससन्तो कि ति मह परम्मुहीऍ सअणद्धे । हिअअ पैलीविअ वि अणुसएण पुट्टि पलीवेसि ॥ ३३ ॥ [उप्पानि नि श्वसन्किमिति मम परामुख्या शयनार्थे । हृदय प्रदीप्याप्यनुशयेन पृष्ठ प्रदीपयसि ॥] उहाईति । शयनैकदेशे परामुर यास्त्वचितामकुर्वत्या इति भाव । मम हृदयम- नुशयेन सपत्नीसमुत्कर्षजनितेन प्रदीप्योष्णेनि श्वासमम पृष्ठ कि प्रदीपयसि । तामेव वालमामुपगच्छ । अलीकदाक्षिण्येन मामारमान च किं खेदयसीति भाव ॥ दूती कस्याश्चिद्विरहिण्या अवस्था नायक प्रत्याह- तुह विरहे चिरआरम तिण्णा णिवडन्ववाहमइलेण । रइरसिहरधएण व मुहेण छाहि दिवअ ण पत्ता ॥ ३४ ॥ [तव विरहे चिरकारक तस्सा निपतद्वाप्पमलिनेन । रविरथशिखरध्वजेनेव मुखेन च्छायैव न मासा ।] तुहेति । चिरकारक, अवधिदिवसलनात् । छाया कान्तिरातपाभावश्च । 'छाया सूर्यप्रभा कान्ति प्रतिविम्बमनातप' इत्यमर । तदेव विरहविधुरामानुकम्मस्वेत्याशय ॥ नववधू प्रति सतीत्तशिक्षार्थ कापि बन्धुवधूराह- दिअरस्स असुद्धमणस्स कुलबहू णिअअकुइलिहिआइ । दिअ कहेइ रामाणुलग्गसोमिसिचरिआइ ।। ३५॥ १ वेभ' इति खगराठ २ "णिब्युट्टो' इति ख पाठ पाठ ४ 'असा' इति घ पाट ५ 'पीस' इति स पाठ कपाठ, पलीअ विउ' इति ख-पाद ७ 'तिस्सा' इति कस पाठ हुआ' इविक पाट ९ "णिमई' इति क ख पाठ २ । ३ 'एहि हिं' इति ख. ६ 'पलीरिअ विअ' इति १४ काव्यमाला। देवरसाशुद्धमनसः कुलवधूनिजककुयलिखितानि । दियसं कथयति रामानुलग्नसौमिनिचरितानि ॥] दिअरस्सैति । अयमाशयः-कुत्रिया रामायणवृत्तान्तं गृहभित्तो विलित्य तन विमातृजेऽपि रामे सभायेंऽनुलमानि लक्ष्मणस्य चरित्राणि कथयित्वा दुष्टहृदयो देवरः प्रत्याख्येयः, न तु प्रकटम् । कुटुम्ब विघटनादिभयादिति भावः॥ सता सत्यपि विनाशकारणे विनाशो न भवतीत्यसती खदोषप्रच्छादनार्थमाह- चत्तरपरिणी पिअदंसणा अ तरुणी पउत्थपइआ अ । असईसपजिआ दुग्गआ अ ण हु सण्डिों सीलम् ।। ३६ ॥ [चत्वरगृहिणी प्रियदर्शना च तरुणी प्रोषितपतिका च । असतीप्रैतिवेशिनी दुर्गता च न खलु खण्डितं शीलम् ॥] चत्तरेति । चत्वरे राजमार्गे गृह यस्याः । प्रियदर्शना सुन्दरी । असत्याः कुलटायाः प्रतिवेशिनी । अत्र चत्वरगृहिणीवादे शीलखण्डनकारणस्य सत्त्वेऽपि तदभावाद्विशेपो. किरलकार:-'विशेपोकिरसण्डेषु कारणेषु फलावचः' इति तल्लक्षणात् ॥ नदीतटकदम्बनिकुञ्ज दत्तसकेन फान्तेन विप्रलब्धा नायिका 'तग्राहं गता, वं तु नागतः' इति तं धावयन्ती सखीजनमाह- तालूरभमाउलखुडिअकेसरो गिरिणईएँ पूरेण । दरघुइवुडणिबुड्डमहुअरो हीरइ कलम्बो ॥ ३७॥ [जलावर्तमाकुलखैण्डितकेसरो गिरिनद्याः पूरेण । दरममोन्मग्ननिमममधुकरो हियते कदम्वः ॥] तारेति । तालरो जलावर्त इति देशी । जलावर्तानां भ्रमो भ्रमण तेनाकुलः । मत एव खण्डितकेसरः । अत्र भ्रटकेसरतया गलितमकरन्देऽपि कदम्बे भ्रमरत्येयमीदशी दृढनेहता । तव तु अनु तावत्प्रेम्णश्चिरानुबन्धः, संप्रत्येवाहं त्वया छलिवेति सरोष उपालम्भः॥ दूती कामुकं प्रति कस्याश्चित्पतिव्रताया धनायसाध्यता प्रतिपादयन्दी आह- अहिआअमाणिणो दुग्गअस्स छाहिं पंअस्स रक्खन्ती । णिबन्धवाण जूरइ घरिणी विहवेण एत्ताणम् ॥ ३८ ॥ १. धरणी' इति क-पाठः. २. 'सहज्जिा' इति क पुस्तके, 'सअज्जिआ' इति च ख-पुस्तके पाठ.. ३. 'सहवासिनी' इति ग-पाठः, ४. 'भ्रमात्खण्डित' इति ग- पाठः. ५. 'स्फुटितशरो' इति च पाठः ६. 'दरमममनोन्मन-' इति ग-पुस्तके, 'दरममोन्मग्ननिर्मलमधुकरो' इति च घ-पुस्तके पाठः, ४. 'पइअस्स' इति क-पुस्तके, 'पिथस्स' इति च ग-पुस्तके पाठः.

१ शतकम् गाथासप्तशती। (आभिजात्यमानिनो दुर्गतस्स छायां पत्यू रक्षन्ती । निजेबान्धवेभ्यः अभ्यति गृहिणी विमरेनोगच्छया ।। अहिआएति । 'पत्ताणम्' इति पाठे प्राप्तेभ्य इत्यर्थः। छायां महत्वम् । पति- वित्तानुवृत्यर्थे बन्धुजनस्याप्युपहार न पहु मन्यते । किं पुनः कामिजनस्येति भावः । कामुकजनामियोगनिरासार्थ दूती स्वाधीनपतिकायाः सुवरितमाह- साहीणे वि पिअअमे पत्ते वि सणे मपिडओ अपा । दुग्गअपउत्यवइ समझि सण्ठवन्तीए ।। ३९ ॥. [खाधीनेऽपि प्रियतमे प्राप्तेऽपि देणे न मण्डित आत्मा । दुर्गतम्रोषितपतिको प्रतिवेशिनी संस्थापयन्त्या ॥ पाहीण इति । क्षणे मदनमहोत्सवादी प्राप्तेऽपि प्रतिवेशिनी संस्थापयन्त्या अनुद्विमा कुर्वन्या । कदाचिस्कृतमण्डनां मामवलोक्येयमुद्विमा खण्डितचरित्रा स्यात् इत्याराहया यामात्मानं न मण्डयति तस्या दूरे खशीलखण्डनसाहस इति भावः । अथवा प्रतिवे. शिनीस्थापनार्थमनया मण्डनं न कृतम्, न तु कामुकान्तर विरहसिखयेति समीदोपप्र. च्छादनार्थ सह्या वचनमिदमिति ॥ नायिकानुरागकयनेन दूनी नायकमनुकूलयितुमाह- तुझ वैसइ त्ति हिअअं इमेहि दिट्ठो तुमं ति अच्छीई । तुह विरहे किसिआई तिए अङ्गा वि पिआई ॥४०॥ तिव घसतिरिति हृदयमाभ्यां दृष्टस्त्वमित्यक्षिणी। तय विरहे केशितानीति तसा अङ्गान्यपि प्रियाणि ||] काचित्खण्डिता बहुधा कृतव्यलोकमनुनयन्तं नायकमाह- सम्भावणेहभरिए रत्ते रजिजइ ति जुत्तमिणम् । अणहिअए उण असं जं दिजइ तं जणो असह ।। ४१ ॥ 1. अभिजाति' इति ग-घ-पाठः. १. 'निजवान्धवाग्निन्दति' इति ग पाठः. ३. 'आगच्छतः। इति ग-पुस्तके, 'गच्छय.' इति ६ घ-पुस्तके पाठ:. ४. 'उत्सव' इति ग-पाठः. ५. 'स्थापयन्या' इति घ-पाठः. ६. 'वसहिति' इति क-पाठः. » छिछ' इति स्व-ना-: "किमिशास' इति कमा'हशितानीति' इति ग-पुस्तके, 'कृशानीति' इति घ-पुस्तके पाठः.

१८ काव्यमाला। रहस्यमुपायं पृदन्ती । अनेन अस्तु तावद्विरहः, तव गमनसमय एव मुग्धाया जीवि. ताशा सदिग्धेति ध्वनितम् ॥ काचिरस्वाधीनभर्तृका पत्युरनन्यपरताकथनेनान्यकामिन्यवकाशनिरासाय खसौभा. ग्यमाह- अण्णमहिलापसङ्गं दे देव करेसु अम्ह दइअस्स । पुरिसा एकान्तरसा ण हु दोसगुणे विआणन्ति ॥ ४८ ॥ [अन्यमहिलाप्रसङ्गं हे देव (र्चस्माकं दयितस । पुरुषा एकान्तरसा न खलु दोषगुणौ विजानन्ति ॥] अण्णेति । देशब्दः सानुनयसंबोधने । हे देव, अस्माकं दयितस्यान्यमहिलाप्रसर कुरुाखल यसात् पुरुषा एकान्तरसा गुणदोपौ न जानन्ति । अन्तशब्द. स्वरूपवाची । एकरसा इत्यर्थः । यद्वा पत्युरन्यासाप्रार्थनेनावसरमिच्छन्या प्रच्छन्नरताभिलायो जारं प्रति सूच्यते ॥ स्वयं दूती पथिकमाह-- थो पि ण णीसरई मज्झण्णे उह सरीरबललुका । आअवभएण छाही वि पहिअ ता किं वीसमसि ॥४९॥ स्तोकमपि न नि सरति मध्याहे पश्य शरीरतललीना । आतपभयेन च्छायापि पथिक तत्किं न विश्राम्यसि ॥] थोअमिति । भातपखिन्नाः पथिका यस्यां छायार्या विधाम्यन्ति, सा अचेतना छायाप्यातपभयेन बहिर्न निष्कामति, कि पुनवेतन इति । ततथ मध्याहे कोऽपि बहिर्न निर्यातीति विविकनिरपायमध्याहाभिसारसुखमनुभवाव इत्याशयः॥ विरहोत्कण्ठिता ज्वरश्लाघाटलेन चिरागतकान्तोपालम्भमाह- सुहउच्छअं जणं दुल्लहं पि दूरादि अम्ह आणन्त । अआरअ जर जी पिणेन्त ण कआवराहोऽसि ॥५०॥ [सुखपृच्छकं जनं दुर्लममपि दूरादसाकमानयन् । उपकारक ज्वर जीवमपि नयन कृतापराधोऽसि ॥] १. 'देव' इति कस्व-पाठ:. २. "विजाणन्ति' इति क-पाठ:. ३. 'अन्यत्रीप्रसार इति ग-पाठ:. ४. 'कुछष्वास्माकं' इति घ-पुस्तके, "कुरुष्वास्सद्' इति च ग-पुस्तके पाठः, ५. 'एकपरसा' इति ग-पाठः. ६. 'उव सरीरअल' इति क-पाठ, 'माणेत' इति ग-पाठः ८. 'उवभारम' इति कपाठः, ९. 'दूरान्मम ते' इति ग.पाठः १..'गृहा' इति ग पाठा.

-- १ शतकम्] गाथासप्तशती। सुहेति । सुहउच्छशब्दोऽस्वास्थ्यवार्ताकारके । तेन लोक्मयादागतम्, न तु नेहादिति भावः । अस्माकं दुर्लभमपि दूरादानयन् । अत एव दुर्लभप्रियानयनादुप- कारक अर, जीवमपि नयन कृत्तापराधोऽसि । एवं मां प्रसनेहे त्वयि मम,मरणमेव अयः। तच त्वदर्शनपूर्वक साधयताबरेण ममोपकार एव कृतो न त्वपकार इति भावः ।। सण्डिता काचित्सुखमनार्थमागत कान्तं प्रति सेयमाह- आमजरो मे मन्दो अब ण मन्दो जणस्स का तन्ती। सुहउच्चअ सुहम सुअन्धअन्ध मा अन्धि छिवसु ॥ ५१.॥ [आमज्वरो मे मन्दोऽथवा न मन्दो जनस्स का चिन्ता । सुखपृच्छक सुभग सुगन्धगन्ध मा गन्धितां स्पृश ॥] आमेति । अजीर्णोत्पनो ज्वर आमज्वरः । त्वयि क्रोधेन रात्री जागरणादिति भावः । भामशब्दः सेानुमताविति केचित् । जनस्योदासीनस्य मःखाददु खितस्य भवतः किमनेन प्रश्नेनेति भावः । हे सुखपृच्छक अस्वास्थ्यवार्ताकारक, बहुवल्लभवा- प्रियागसङ्गसक्रान्तपरिमलत्वात्सुगन्धगन्ध, गन्धिता संजातज्वरगन्धा मा मा स्पृश । मदास्पर्शसंक्रान्तज्वरगन्धः सन् प्रेयस्याः कृतापराधो मा भूरित्याशयः॥ रतिरभसात्तान्तमाक्षिप्यारब्धपुरुषायितां सौकुमार्यादपायासेनैव प्रान्तो कान्तः सहासमाह- सिहिीपच्छलुलिअकेसे वेवन्तोरु विणिमीलिअद्धच्छि । दरपुरिसाइरि विसुमरि जाणसु पुरिसाण जं दुःसम् ॥ ५२ ॥ [शिखि पिच्छलुलितकेशे वेपमानोरु विनिमीलितार्धाक्षि । ईपैत्पुरुषायिते विश्रामशीले जानीहि पुरुषाणां यदुःखम् ॥] पूर्व निष्कासितस्य पुनरूपार्जितवैभवस्य भुजंगस समागमाय प्रेरयन्ती जननी प्रति वेश्याह- पेम्मस्स विरोहिअसंघिअस्स पञ्चक्सदिट्ठविलिअस्स । उअअस्स वै ताविअसीअलस्स विरसो रसो होइ ।। ५३ ॥ [प्रेम्णो विरोधितसंर्धितस्य प्रत्यक्षदृष्टव्यलीकस । उदकस्सेव तापितशीतलस्य विरसो रसो भवति ॥] सुभग, १. 'गन्धिार' इति क-ख-याटः. २. 'गन्धशीला' इति घ-पाठः, ३. 'दरपुरुषा- यिते' इति ग-पुस्तके, 'दरपुरुयायितशीले' इति च घ-पुस्तके पाठः. ४, "विलअस्स' इदिकपाठी ५. "वि' इदि क-पाठः. ६. 'संहितस्य' इति ग-पाठः काव्यमाला। पेम्मस्सेति । प्रत्यक्षेति श्रुतेऽनुमिते च विप्रिये प्रतीकार सभवति । दृष्टे तु नास्तीति भाव । पर्युपास्यमानोऽप्यसौ नानुरको भविष्यति किमि त्यस्थाने मां प्रेरयसीति भाव ॥ बहुशोऽनुभूतेऽयें भविष्यत्यपि भूतवत्प्रत्ययो भवतीति निदर्शय कश्चिद्वन्द्या पतिशो र्यवहुमानमाह- वजपडणाइरिक्क पइणो सोऊण सिक्षिणीघोसम् । पुसिआइ करिमरिऍ सरिसवन्दीण पि अणाइ ॥ ५४ ॥ [वजपतनातिरिक्त पयु युवा शिजिनीघोषम् । प्रोन्छितानि बचा संदृशवन्दीनामपि नयनानि ॥] वजति परिमरी बन्दी । अतिचमत्कारकारित्वाद्वजपतनातिरिकम् । 'मौवीं ज्या शिशिनी गुण' इत्यमर । आगतो मे भर्ता भवतीरपि मोचयिष्यति । तत्किमद्यापि खेनेति भाव । वन्या साताभिलापथोरयुवा पतिशोयामिमानिन्यास्तस्या उसाहभनार्थमाह- करिमरि अआलगजिरजलआसणिपडनपडिरवो एसो। पइणो धणुरवकसिरि रोमञ्च किं मुहा वहसि ॥ ५५ ॥ [बन्दि अकालगर्जनशीलनलदाशनिपतनप्रतिरव एष । पत्युर्धनूरयाकाचणशीले रोमाञ्च किं मुधा वहसि ॥] भुजगातरप्ररोचनाय दुहितु सौकुमार्यातिशय सुरतक्षमत्व च स्यापयन्ती वेश्या- माता भुजगनि दाउलेनाह- सहइ सहइ ति तह तेण समिआ सुरअदुव्विअद्धण । पम्माअसिरीसाइ व जह से जाआई अङ्गाइ ॥५६॥ [सहते सहत इति तथा तेन रमिता सुरतदुर्विदग्धेन । अम्लानशिरीषाणीव येथाया जाता यगानि ॥] सहईति । सुरतदुर्विदग्धेन सुरतावसानानभिहेन ॥ नायक प्रति कस्याश्चिदनुरागातिशय प्रतिपादय वी ती भाइ- अगणिअसेसजुआणा घालअ वोलीणलोअमजाआ। अह सा भमइ दिसामुहपसारिअच्छी तुह कएण ॥ ५७ ।। १ अच्छोहि' इति ख-पाठ , 'अस्मूहि इति च क पाठ २ 'ज्याशब्दम्' इति ग पाठ ३ 'सम्बदीना' इति घ-पाठ ४ 'करमर्यकालगणितजलदा' इति ५ काहिणि इति ग पाठ ६ 'रमिआ'इतिक पाठ ७ दुविअड्डेण' इति क-पाठ . 'पम्माइस' इति पाठ ९ 'यथा तस्या' इति घ-पाठ ग पाठ अगणिएति । हे १ शतकम्] गाथासप्तशती। [अगणिताशेषयुवा वालक व्यतिक्रान्तलोकमर्यादा । अथ सा भ्रमति दिशामुखप्रसारिताक्षी तव कृतेन ॥] बालक, स्त्रीरत्नपरिहारात् धीवधपातकाचिन्तनाच हिता हितान- भिन, न गणिताः शेषास्त्वदन्ये युवानो यया सा, लज्जात्यागात्त्यक्तलोकमर्यादा, सा पू- बोकसौन्दर्यायनेकगुणा तव कृतेन त्वद्दर्शनेच्छया दिमुखेषु प्रसारिताक्षी सती भ्रमति । याबद्दशमीमवस्था गच्छति तावदेनामनुकम्पस्वेति भावः । बहुवल्लभस्य साध्वी काविनायिका श्वधू प्रति भर्तृशौर्य प्रकाशयन्ती असतीसपनी- नामभिसारसज्जता सूचयति- अज व्वेअ पउत्यो उन्नाअरओ जणस्स अब्जे अ. अजे अ हलिहापिञ्जराइँ गोलाणइतडाइं ॥ ५८ ॥ [अथैन प्रोपित उजागरको जनसाद्यैव । अद्यैव हरिद्रापिञ्जराणि गोदानदीतटानि ॥] अज्जेति । मम पतिरवि प्रोषितः । अर्थात्सङ्ग्रामप्रसङ्गेणेति लभ्यते। जनस्योन्जाग. रोऽद्यैव । चोरादिभयात् अभिसरणाभियोगाचेति भावः । गोदावरीतीराण्यद्यैव हरिद्रा- पिजराणि । हरिद्रोद्वर्तिताइप्रक्षालनेनासतीनामनरागमहणादिति भावः ॥ बन्धुवधू कुलवधूशिक्षार्थ सतीत्तमाह- असरिसचित्ते दिअरे सुद्धमणा पिअअमे विसमसीले। ण कहइ कुडुम्वविहडणमएण तणुआअए सोहा ॥ ५९॥ [असदृशचित्ते देवरे शुद्धमनाः प्रियतमे विषमशीले । न कथयति कुटुम्बविघटनमयेन तनुकायते स्नुषा ॥] असरिसेति । असशचित्ते दुष्टविसे । प्रकाइयमानं यद्दोषावहं तद्गोप्यमिति भावः ।। कलहान्तरितायाः सखी तत्कान्तेन तद्भावजिज्ञासाथै पृष्टा तमाह- चिणिअदइअसमागमम्मि कसमण्णुआ. भरिऊण । सुण्णं कलहामन्ती सहीहि रुण्णा ण ओहसिआ ॥ ६ ॥ १. 'अगणिताशेषयुवका' इति ग-घ-पाठ:. २. 'गोलाणइअ तूहाई' इति क-पु. खके, 'गोलाए तूहाई' इति च ख-पुस्तके पाठः. ३. 'उज्जागरणमपि' इति ग-पाठः. ४. गोदावरीनद्या- झोतासि' इति ग-पुस्तके, 'गोदावर्यास्तौराणि' इति घ-पुस्तके, 'गोदायाः कूलानि' इति च ख-पुस्तके, पाठः ५. 'शुद्धमनस्का' इति ग-पाठः. ६."चिन्ताणिअ' इति क-पाठा, २२ काव्यमाला। [चित्तानीतदयितसमागमे कृतमन्युकानि स्मृत्वा । शून्य केलहायमाना सखीमी रुदिता नो हैसिता ॥ चित्तेति । कृतो मन्युर्यस्तानि कृतमन्युकानि । मन्युकारणानीत्यर्थ । सखीभी ह- दिता शोचितेत्यर्थ । कार्येण रोदनेन खकारणीभूतस्य शोकस्य लक्षणात् 'हदि धातोर. कर्मकत्वाद्ययाश्रुतस्सासगते वदनुयानपरायास्तस्यास्तथाविध मन्मथोन्मादमवेश्य ससौभिसा प्रति शोक कृत , न पुनरुपहासकारणे सत्यप्युपहास इति भाव ॥ प्रच्छन्नरताभिलापिण नागरिक प्रति कुलजाभिसारिका सवैदग्भ्यमाह- हिअअण्णएहि सम असमत्ताइ पि जह सुहावन्ति । कज्जाइ मणे ण तहा इअरेहिँ समाविआइ पि ॥ ६१ ॥ हृदयझै सममसमाप्तान्यपि यथा मुखयन्ति । कार्याणि मन्ये न तथा इतरै समापितान्यपि ॥] हिएति । हृदयविहित । इतरैरनिहित रगूढाकारश्च । एतेन त्वद्विधविदग्न सम संकल्पसमागमोऽपि वरम्, न पुन पामरसमागम इति सूचितम् । यद्वा खपुरु पस पामरताप्रकाशनेन तद्विषयको विरागो जारे प्रत्यनुरागच सूचित । अधमानुरक्ता प्रति सखीवचन दा॥ कोमलामाकुरप्रदर्शनेन धनागम सूचय ती काता कान्तरस गमनाक्षेपार्षमाए- दरफुडिअसिप्पिस पुणिलुकहालाहलग्गछेप्पणिहम् । पकम्बढिविणिग्गअकोमलमम्वङ्कर उअह ।। ६२ ।। ईपरस्फुटितशुक्तिसपुटनिलीनहालाहलामपुच्छनिमम् । पक्षासास्थिविनिर्गतकोमलमाग्नाकुर पश्यत ॥] दरेति। हालाहलो 'बानिया' इति प्रतिको जन्नुविशेष । 'हालाहलो प्रभास इति मेदिनीकोष । निलीनान्त हालाहलविशेषणम् । 1 'तमन्यू संस्मृस' इति ग पार २ किलहायटी' इति गपाट ३ न पुनई सिता' इति घ-पाठ ४. पहिलअभएहिं' इति पाठ हाचेति' इति खना-पाठ. ६ 'समाप्तान्यपि गप पाठ कन्च-पाठ ८ निलप्त इति ग-पाठ 'औटनीति प्रसिदो ज' इति कुसवालदेव १ शतकम्] गाथासप्तशती। असत्वररतप्रवृत्तये गृहस्य जनसचारशून्यता सूयितु आरं वान्यमनस्कं कर्तु काचिदाह- उअह पडलन्तरोइण्णणिअअतन्तुद्धपाअपडिरग्गम् । दुल्लक्खमुत्तगुत्थेक्कउलकुसुम व मकडअम् ॥ ६३ ॥ (पश्यत पटलान्तरावतीर्णनिजकतन्तूर्ध्वपादतिलमम् । दुर्लक्ष्यसूनमाथितैक्यकुरकुसुममिव मर्कटकम् ॥] उअहेति । पटलातरादवतीर्णे निजकतन्तौ ऊर्ध्वपादै प्रतिलम मर्कटक लूता प. श्यत । 'अथ मर्कटक सस्यभेदे वानरलूतयो' इति मेदिनी । पुराणदेवकुलस्य निर्जना सूचयन्ती कुलटा जारमाह- उअरि दरदिट्ठथैण्णुअणिलुक्पारावआण विरुएहि । गित्यणह जाअवेअण सूलाहिण्ण व देलअम् ॥ ६४ ॥ [उपरीषदृष्टशकुनिलीनपारावताना विरुते । निस्तनति जातवेदन शूलामिन्नमिव देवकुलम् ॥] उअरीति । ईषदिति कलशस्य भग्नत्वास्किचिदवशिष्टकी ठक देवकुल निलीनाना पारावताना विरुतै स्तनति । एतेन रतिसमये पारावतस्तानकारि कण्ठकूजितमयन- सिद्धम् , क्रियमाणमप्यनुपलक्ष्यवादविरुदमिति सूचितम् । नायकस्य दीर्घरमणार्थ चमत्कारमुत्पादयितु शूलामिममिवेत्युत्प्रेक्षणम् । तथा च कामशास्त्रम्-'कलोलिनीकर- ननकदरादी दुखाश्रये चार्पितचित्तति । मृदुतारम्भमभिनधैर्य श्लथोऽपि दीर्घ रमते रतेषु ॥ इति । "निजभर्तुरेवाप्रियास्मि, तत्कि तव मया दुर्भपया' इति निरस्यन्ती नायिका प्रति सामिलाप कचिदाह- ज होसि ॥ तस्स पिआ अणुदिअह णीसहेहि अङ्गेहिं । वसूअपीअपेऊसमत्तांडिव्य किं सुपसि ॥ ६५ ॥ [यदि मयसि न तस्य प्रियानुदिवस नि सहेरने । मवसूतपीतपीयूषमत्तमहिपीवत्सेन किं स्वपिषि ॥] १ 'गुच्छेक' इति कख पाट २ 'परिलमम्' इति ग पाठ ३ 'खण्णुअणि लीण' इति कपाठ ४ 'दअउरम्' इति ग पाठ ५ 'उपरि दरदृष्टस्थाणुकनिलीन' इति ग पाठ ६ दिवलकम्' इति क-पाठ ७ 'ता दिअह' इति ग-पाठ ८ 'ए- हिष्व' इति ग पाठ ९ 'प्रिया तदिवस' इविग पाड काव्यमाला। जईति । यदि तस्य प्रिया न भवसि तर्हि निःसहैः सुरतश्रमखिन्नैरजरूपलक्षिता त्व नवप्रसूतायाः पीतेन पीयूषणाभिनवदुग्धेन मत्ता महिषीवत्सेव दि खपिपि । 'पीयूष सप्तदिवसावधिक्षीरे तथामृते' इति मेदिनीकोषः । 'पीयूषममृते नव्यसूतधेनोः पयस्यपि इति तु हैम. । सश्रमः सुरतजागर एव ते सौभाग्यं व्यनतीति भावः । पाडी महिप- पोत इति देशी ।। जनापवाद ता बन्धुवधू प्रोषितपतिका कुलटामाह- हेमन्तिआसु अइदीहरासु राईसु तं सि अविणिद्दा । चिरअरपउत्थवइए ण सुन्दरं जं दिआ सुवसि ॥६६॥ हिमैन्तिकातिदीर्घासु रानिपु त्वमसविनिद्रा । चिरतरप्रोषितपतिके न सुन्दरं यद्दिवा खपिषि ॥] हेमन्तीति । अविनिदेति जागरहेतोः प्रियसंभोगस्याभावानिद्राविच्छेदशन्येत्यर्थः । न मुन्दरम् । असतीशहाहेतुत्वादयुक्तमित्यर्थः ॥ कर्दमभयादुल्लुल्य मम पदस्थाने तया पदं न्यस्तं न त्वनुरागादिति प्रिया निढुवानं काचिदाह- जइ चिक्सहभउप्यअपअमिणमलसाइ तुह पए दिण्णम् । ता सुहा कण्टइजन्तमङ्गमहिं किणो वहसि ॥ ६७ ॥ . [यदि कर्दमभयोप्लुतपदमिदमलसया तव पदे दत्तम् । तत्सुभग ण्टकितमङ्गमिदानी किमिति वहसि ॥ जईति । अलसया मन्दगमनया । यदीयं तव प्रिया न भवति तदा कथमनया तव पदस्थाने स्पृष्टे रोमाश्चस्ते जात इति भावः ॥ अत्यन्तमनुरक्तस्यापि दानविमुखस्य भुजगस्योपालम्भायें दुहितृशिक्षार्थ च ये. श्यामाताह-- पत्तो छणो ण सोहइ अइप्पहाअम्मि पुणिमाअन्दों। अन्त विरसो अ कामो असंपआणो अ परिओसो ॥ ६८ ॥ प्राप्तः क्षणो न शोभते अतिप्रभात इव पूर्णिमाचन्द्रः। अन्तविरस इव कामो असंप्रदानश्च परितोषः ॥] 1. 'भइदीहतरामु' इति क-पाठ, २. 'हैमनीषु' इति ग पाट:. ३. भतिदीप तरामु' इति कख-पाठ.. ४. 'त्वमसि विनिद्रा' इति ग-पाठः. ५. 'भयत' इति ६. 'कण्टकायमानं' इति घपाठः. ७. 'किं वहति' इति घ पाठः, ८. 'खो' इति प-पाठः, ९.'प्राप्त उत्सवो' इति ग पाट:: १..'प्रभाते पूर्णिमा' इदिगपाट:. ११. 'अन्तविरसश्च' इति ग-पाठः. घ-पाठ:.

१ शतकम्] गाथासप्तशती। २५ पत्तो इति । प्राप्तोऽतिकान्त क्षण उत्सवो न शोभते । तत्र दृष्टात -३ -अतिप्रभाते पूर्णिमाचद्र इव । सप्रदानरहितश्च परितोपो न शोभते । अन दृष्टा त -अन्तविरस काम इव । एव च 'अइपहाअव्व पुण्णिमाअदो । अतविरसोत्र कामो इत्येव युक्त पाठ विज्ञा पक्म एव भद विरुद्ध च तान दीति दर्शय रश्चिदाह- पाणिग्गणे बिअ पव्वईऍ णाअ सहीहिँ सोहग्गम् । पसुवइणा वासुइकङ्कणम्मि ओसारिए दूरम् ॥ ६९ ॥ [पाणिग्रहण एव पार्वत्या ज्ञात सखीमि सौभाग्यम् । पशुपतिना वासुकिकङ्कणेऽपसारिते दूरम् ॥] पाणीति । पार्वत्या भयपरिहारार्थ वासुकेरपसारण दृष्ट्वा तस्यामनुरागातिशयरूप सौ भाग्य पातमिति भाव। नवमेधोदयदर्शनाद्रीष्मा तस्यावधेर्लहुन म वा दयितस्यान्यवनिताप्रसति सभाव्योति माया प्रोपितपतिकाया समाश्वासनार्थ सखी आह- गिम्हे दवग्गिमसिमइलिआई दीसन्ति विज्झसिहराइ । आससु पउत्थवइए ण होन्ति णवपाउसम्भाइ ॥ ७० ॥ [ग्रीष्मे वाग्निमषीमलितानि दृश्य ते विध्यशिखराणि । आश्वसिहि प्रोषितपतिके न भरति नवप्रावृडभ्राणि ॥] कापि प्रथमसगमेऽनुरागातिशय दर्शयन्त बहुवभ का तमादिमध्यावसानेष्वेकरूपत्र णयानुवृत्त्यर्थमाह- जेत्तिअमेत्त तीरई णि वोढुं देसु तेत्तिअ पणअम् । ण अणो विणिअत्तपसाअदुक्खसहणक्समो सव्वो ॥ ७१ ॥ [वाव मान शक्यते निवर्वाद देहि तापत प्रणयम् । न जनो विनिवृत्तप्रसाददु खसहनक्षा सर्व ॥] त्तिएति । विनिवृत्तो य प्रसाद प्रणयस्वन नात यहु स तत्सहनक्षम इत्यथ । ए नाननुभूतप्रणयखण्डना त्वदनुरक्ताह त्वया प्रणयसण्डने कृते न जीवामीति सूचितम् ।। १ 'णाण' इति स पाठ २ 'दुस' इति ग पाठ ३ निर्वाहयितु ददस्ख' इति पार ४ तापमान इति घ पाट' ३ २६ काव्यमाला। . "प्रिये, रिमेवमद्यापि प्रणयवमुख्यं तव' इति प्रियेणोता मानिनी तस्याः स्थिरस्नेह- तामात्मनश्चानुरागमाविष्वुर्वन्ती तमाह- यहुवल्लहस्स जा होइ वल्लहा कह वि पञ्चदिअाई। सा कि छटुं मग्गई कत्तो मिटु अ यहुअं अ ।। ७२ ॥ बहुबलभस्य या मयति यलमा कथमपि पञ्च दिवसानि । सा किं पठं मॅगयते कुतो भेष्टं च बहुकं च ॥] बहु इति । यहयो वल्लभा यस्य स बहुवल्लभस्तस्य या वल्लभा मयति सा कथंचित्पञ्च- दिवसानि मृगयते । सा विदितकान्ताभिप्राया पठं दिवसं किं मृगयते । नैव मृगयत इत्यर्थः । कुतो न मृगयत इत्याशझ्याह-कुतो मृष्टं च बहुक चेति । मुतातिशयल. भ्यमेतत् कुतो मे मन्दभाग्याया इलाशयः । 'दा तु क्लीवे दिवसवासरौ' इत्यमरः।यद्वा अभिमतप्रियस्य सदा संभोगालाभाखिद्य माना नायिका बोधयन्याः सख्या इयम्- तिरिति ध्येयम् ॥ कापि पलावन्ययोपावकाशनिरासाथै स्वसौभाग्यमात्मनश्च पलावनुरागमाह- जं जं सो णिज्झाअइ अगोआसं महं अणिमिसच्छो । पच्छाएमि अ तं तं इच्छामि अ तेण दीसन्तम् ।। ७३ ॥ [यद्यत्स निायत्यगावकाशं ममानिमिषाक्षः । प्रच्छादयामि च तं तमिच्छामि च तेन दृश्यमानम् ॥] जजनिति निर्ध्यायति पश्यति ।। क्लहान्तरितायाः सखी तत्कान्तमनुनयाय प्रोत्साथितुमाह- दिढमण्णु(मिआएँ वि गहिओ दइअम्मि पेच्छह इमाए । ओसरइ वालुआमुट्ठि उव्य माणो सुरसुरन्तो ॥ ७४ ॥ दृढन्मयुदूनयोपि गृहीतो दयिते पैश्यतानया। अपसरति वालुकामुष्टिरिच मानः सुरुसुरायमाणः ॥] दिवेति । दृढमन्यु(नयाप्यनया दयितया दयिते गृहीतो मानः मुरुमुरायमाणो पालु- कामुष्टिरिवापसरतीत्यन्वयः ॥ १. 'मग्गइ छ।' इति ग-पाठः २. 'बहुल' इति स पाठः, ३. 'मार्गयति' इति ग-पाठः, ४ 'मिष्ट' इति कस-पाठः. ५. 'अझं आसम्मि मह' इति ग-पाठ. ६. ' पा मम' इति ग पाठः. ७. 'दुम्मिआए' इति ग-पुस्तके, 'दूणआई' इति च ख-पु- स्तके पाठः, ८. 'इव्व' इति ग पुस्तके, 'ओन्छ' इति च स पुस्तके पाठः, ९ 'दुर्मन- स्कया' इति ग-पाठः. १०. प्रेक्षख' इति ग-पुस्तके, 'प्रेक्षम्य' इति च घ-पुस्तके पाठः, २७ - . १ शतकम् गाथासप्तशती। सुरतासका काचिञ्चिररमणाथै कान्तमन्यमनस्क कर्तुमाह- उअ पोम्मराअमरगअसंवलिआ णहअलॉओ ओअरइ। णहंसिरिकण्ठ-भट्ठ व्व कण्ठिआ कीररिन्छोली ।। ७५ ॥ [पश्य पद्मरागमरक्तसमलिता नमस्तलावतरति । नभ.श्रीकण्ठम्रप्टेय कण्ठिका कीरपङ्किः ॥] रएति । कीरपकिनभस्तलावतरतीति सवन्ध. । नभ श्रियः कण्ठाया कण्ठिके- वेत्युत्प्रेक्षा । कण्टिका 'कण्ठा' इति स्यात आभरणविशेष । पद्मरागर्मरक्तैश्च सवलि. वेति कण्ठिकाविशेषणम् । शुकाना हरितवर्णत्वान्मरकतसाम्यम्, तत्तण्डानां च लोहित. खात्पभरागसाम्य द्रष्टव्यम् ।। कापि विदितदुश्चरितेन पत्या दुर्गस्थानाभिरुद्धा जारप्रहिता दूतीमन्यापदेशेनाह--- ण वि तह विएसवासो दोरेंगचं मह जणेइ संतावम् । आसंसिअत्यविमणो जह पणइजणो णिअत्तन्तो ॥ ७६ ॥ नापि तथा विदेशवासो दौर्गत्य मम जनयति संतापम् । आशंसितार्थविमनो यथा प्रणयिजनो निवर्तमानः ।] णवीति । विदेशे कुप्रामे बन्धनस्थाने च वासोऽवस्थानम्, दौर्गसं दारिद्य गतिनिरो- धश्च मम तथा सतापन जनयति यथा आशसिते आशावेशयुक्के अर्थे धने प्रियसगमेच • विमना निष्प्रत्याश सनिवर्तमानःप्रणयिजनःसप्रश्रयो बन्धुजनः कान्तग्रहितदूतीजनश्च । इदानी नाभिसर्तुं समयस्तन निवर्तखेति जार प्रत्युक्तिवा ॥ पथिकच्च्लेनालिन्दकोपितस्य जारस्य रतामिलापं सूचयन्ती दूती कुलटामाह- खन्धग्गिणा वणेसुं तर्हि गामम्मि रक्सिओ पहिओ । णअरवसिओ गैडिनइ साणुसएण व्य सीएण ॥ ७७ ।। [स्कन्धाग्निना चनेषु तृणैामे रक्षितः पथिकः । नगरोषितः खेद्यते सानुशयेनेव शीतेन ॥] खन्धेति । स्कन्धामिना वृहत्काष्टाग्निना । 'स्कन्धामिः स्थूलकाष्टामि' इति हारावली। खेयते इत्यर्थे णडिजद इति देशी । अस्या शिशिरनिशायामनन्यगतिकस्यास्य पथिस्वरा- कस्य समेव शरणमिति भावः । यद्वा नगरे तृणकाष्ठादेर्दुर्लभखानागरिकाणा च निर्द- १. 'णहअलाहिं' इति क-पुस्तके, 'णहअलाउ' इति च ग-पुस्तके पाठ:. २. 'ओस- रई' इति क-पाठः. ३. "विदेस' इति कपाट . ४. 'दोगच ब' इति ग-पाठः,५. वि. महो' इति क ख पाठः. ६ 'दौर्गय वा' इति ग-पाठ, ५. 'गणिजई' इति ग पाठः, 4. 'न नीयते' इति ग-पुस्तके, 'न खेद्यते' इति च घ-पुस्तके पाठः, २८ काव्यमाला। यत्वाच्छीतभीतस्य तव मत्सनिधी खाप एव शरणमिति खयदूला पथिक प्रति खाश- याविष्करणमेतत् ॥ नागरिक कामिन्यन्तरप्रलोभनार्थमात्मनो विदग्धकामुकता दृढन्नेहता च प्रकाश- यमाह-- भरिमो से गहिआहरधुअसीसपहोलिरालआउलिअम् । वअण परिमलतरलिअभमरालिपइण्णकमल व ॥ ७८ ॥ [सरामस्तैसा गृहीताधर तशीपघूर्णनशीलारकाकुरितम् । वदन परिमलतरलितममरालिप्रकीर्णकमलमिव ॥] भरिमो इति । दशनक्षताथै गृहीवेऽधरे धुते शीर्षे प्रघूर्णनशीलरलकैराकुरित परिमलेन तरलिता इतस्ततो भ्रमती या भ्रमराणामालि पस्तिया प्रकीर्ण व्याप्त कमलमिव स्थित तस्या वदन सराम इति सब सहचरप्रलोभनाथै विट कस्याश्चित्सौभाग्यगर्वसूचक बिब्बोकमाह- हलफलहाणपसाहिआण छणवासरे सवत्तीणम् । अजाएँ मजणाणारेण कहिझ व सोहग्गम् ॥ ७९ ॥ [उत्साहतरल बनानप्रसाधिताना क्षणवासरे सपलीनाम् । आर्यया मैजनानादरेण कथितमिव सौभाग्यम् ॥] हालेति । हलफलमुत्साहतरलत्वम् । तेन मानप्रसाधितानां क्षणवासरे उत्सवदिवसे सपलीना मध्ये आर्यया श्रेष्ठयुवत्या मबनानादरेण मानावशया सौभाग्य कथितमिव । विवोकाख्येनालकारेण सौभाग्यप्रकटनादिति भाव । तपक्षण च साहित्यदर्पणे- "विन्धोकस्वतिगर्वण यतुनीटेऽप्यनादर' इति । हल्फर शब्द कदुष्णजलवाचक इति केचित् । पागन्तरे तु मार्जन प्रसाधन तनानादरेणावायेति व्याख्येयम् ।। काचिदरिद्रादिता नानीयद्रव्येण कृतनाना केशसमार्जनेन प्रकटितकुचबाहुमूर्य कम नीयदर्शनामुद्दिश्य कश्चित्सस्पृहमाह- हाणहल्दिाभरिअन्तराई जालाइँ जारवलअस्स । सोहन्ति किलिञ्चिअकण्टएण क काहिसी क्अत्यम् ।। ८० ।। १ 'पहुण्णआलआ' इति क पाट २ 'अस्या' इति ग पाठ ३ 'धूत' इति घ. पाट ४ 'प्रघूर्णमान' इति गठ ५ 'अनाइ' इति क स पाठ ६. चिदुष्णम् गन्धिचिकणजस्मान' इति ग पुस्तके, 'हारिदजरमान' इति च घ पुस्तके पाट 'उत्सववासरे' इति ग पाट ८.३श्वरमुतया' इति ग पाठ 'पलशब्द कोष्णचिक णमुगन्धिजले, अनाशब्दश्च देशी इश्वरसुतायो वर्तते' इति कुलबाल देवव्याख्यानम् ९. 'मदनानादरेण मार्जनानादरेण वा' इति स पाठ ..'फिलिरिछ'इति फ पाठ..

३० काव्यमाला। - [उदरपतिताभ्या दुख स्वीयत उन्नताम्या भूत्वा । इति चितयतोर्मन्ये स्तनयो कृष्ण मुख जातम् ॥] पोति । लोकेऽपि य प्रथम प्रणयमहुमानादिना उन्नतो भूबा दैश्वशाहर्गत सन दरभरणयग्रो भवति तस्यापि चि तया मुख श्याम भवतीति ध्वनि । अभियोज्यामभियोग प्राहयितु दूती नायवस्थानुरागाविशयमाह- सो तुझ कए मुन्दरि तह छीणो सुमहिलो हलिअउत्तो। जह से मच्छरिणीएँ वि दोच्च जाआएँ पडिवण्णम् ॥ ८४ ।। स तेव कृते सुदरि तथा क्षीण सुमहिलो हालिक्युन । यया तस्स मत्सरिग्यापि दूत्य जायया प्रतिपन्नम् ॥ सो इति । मुमहिल इसनेर रूपवद्भार्योऽपि त्यप्यनुरफ इति नायिकास्तुतिन्यते । हालिकपुर इत्यनेनाव धनिकत्व च श्वृत्या दशयति । मसरिण्यापि दूल्य प्रतिपत्र पतिमरणभयादिति भाव । तद्यदि नानुमन्यसे तदा पुरुषवधपातक ते भविष्यती खाशय। कलहातरिता विरागते काते सलहोपारम्भमाह- दक्खिण्णेण वि एत्तो सुहअ सुहावेसि अम्ह हिमआइ । णिकइअवेण जाण गओ सि का णिचुदी ताणम् ॥ ८५ ।। [दाक्षिण्येनाप्यागच्छ सुभग सुखयसम्माक हृदयानि । निष्वैतवेन यासा गतोऽसि का निर्वृतिस्तासाम् ॥] दक्खिग्गेणेति । यात्रा समीपमिति शेष ॥ पति प्रत्यन्ययोपावका निरासार्थ साधीनमतृका ताडितस्यापि प्रियस्योपचाराति शय प्रथय ती खसौभाग्यमाह- एक पहरुविण हत्य मुहमारुएण वीमन्तो। सो वि हसन्तीऍ मए गहिओ पीएण कण्ठम्मि ॥ ८६ ॥ [एक प्रेहारोद्विम हस्त मुखमारुतेन वीरयन् । सोऽपि हस त्या मया गृहीतो द्वितीयेन कण्ठे ॥] एकामिति । प्रहारेणोद्विममेक मदीय दस्त मुखमारतेन बीजय समयापि द्वितीयेन हस्तन कण्टे गृहीत इति सबध । १ भास्यते उन्नते का इति घ-पाठ २ 'तुद करण' इति ग पाट. ३ 'दीये' इति व पुस्तके, झिग्यो' इति च ख पुस्खरे पाठ ४ तव रुवेन' इति ग-पाट ५ प्रहारघात' इति घ-पाठ . - १ शतकम्] गाथासप्तशती। केलिकलहनिष्कान्तां कान्तानुगम्यमाना नायिका निवर्तयितुं तत्ससी आह- अवलम्बिअमाणपरम्मुहीऍ एन्तस्स माणिणि पिअस्स । पुट्टपुलउंग्गमो तुह कहेइ समुहठिअं हिअअम् ॥ ८७ ॥ [अवलम्धितमानपरामुख्या आगच्छतो मानिनि प्रियस्य । पृष्ठपुलकोद्गमस्तव कथयति संमुख स्थितं हृदयम् ॥] अवेति । अवलम्बितेन मानेन परामुख्या. न तु पारमार्थिनेति भावः। तव पृ. टपुलकोद्गमः समुसस्थितं हृदयमागच्छते प्रियाय क्ययतीति सबन्धः। तदलीकरोपमिम सजेत्याशयः॥ दीर्घोद्भटरोपा मानिनी शिक्षयितुं ससी मानिन्यन्तरस्तुतिमाह- जाणइ जाणावेउं अणुणअविद्दविअमाणपरिसेसम् । ओइरिकम्मि वि विणआवलम्यणं सचिअ कुणन्ती ॥ ८८ ॥ [जानाति ज्ञापयितुमनुनयविद्रावितमानपरिशेपन् । विर्जनेऽपि विनयावलम्बनं सैच कुर्वती ॥] जाणईति । विजनेऽपि एकान्तेऽपि रतिसमये इति यावत् । विनयावलम्ननं क्टा- क्षभुजप्रक्षेपाद्यकरणात् धार्श्वपरिहार कुर्वती सैव अनुनयेन विनावितस्य दूरीकृतस्य मानस्य परिशेषमवशेपं ज्ञापयितु जानाति । नान्येत्यर्थः । मानिनी मानावस्थायामपि प्रियमेवानुवर्तते न तु त्वमिव पारभवतीति भावः ।। एक स्यामेवानुरक्तं यहु वलभं नायकमु दिदय कापि कृष्णव्याजेनाह- मुहमारुएण तं कह गोरअं राहिआएँ अवणेन्तो । एताण वल्लवीणं अण्णाण वि गोरअं हरसि ॥ ८९ ॥ [मुखमारुतेन त्वं कृष्ण गोरजो रोधिया अपनयन् । एतासां बल्लवीनामन्यासामपि गौरवं हरसि ।।] मुहेति । हे कृष्ण, वं मुसमारतेन राधिकाया गोरजश्चक्षुरजोऽपनयन् । चक्षु.प्र- विटरजोऽपन यनच्छलेन चुम्याग्निवर्धः । एतासा पुरोवर्तिनीनामन्यासामपि बलवीना १. 'पुहि' इति स-पाठः. २. 'उग्गओ' इति क-पाठः, ३. 'सम्मुट्ठि इति क पुस्तके, 'समुद्दट्ठि' इति च स पुस्तके पाठः. ४. 'विद्दाविइ' इति क-पाठः. ५. वीरेकामे वि' इति स पुस्तके, ‘पद रिकम्वि' इति च ग-पुस्तके पाटः. ६. 'अ- 'तिरिक्तमेय' इति ग-पाटः. 'पहरिकशब्दोऽतिरिक्त । पहरिकेति विजने देशइति केचित् । तदा परिकस्मि वि इति पाठः । विजनेऽपौत्यर्थः । इति कुलवालदेव.. ७. 'सत्य' इति घ-पाट . ८. 'एआण' इति ख-ग-पाठः. १. 'राधाया' इति ग-पाठः. .

३२ काव्यमाला। गौरव हरसि । सौभाग्यगर्वखण्डनादिति भावः । यद्वा गोरमं गारता हरति । अपमानेन कृष्णीकरणादिति भावः॥ सण्डिता बहुशः कृतापराध क्षमखेति वदन्तं कान्तमाह- कि दाव का अहवा करेसि कारिस्सि मुहम एत्ताहे । अवराहाणं अलजिर साहसु कअए समिनन्तु ॥ ९० ॥ [किं तावत्कृता अथवा करोपि करिष्यसि मुभगेदानीम् । अपराधानोंमलजाशील कथय कतरे सम्यन्ताम् ॥] सिमिति । ये पूर्व कृता यानिदानी फरोशि वरिष्यसि वा एतेषां भूतयर्तमानभविष्यता मध्ये कतरे अपराधाः क्षम्यन्ताम् । न केीि क्षन्तु शत्रयन्त इति निषेधमुखेन के वा न सोडास्तवापराचा इति ध्वनितम् ॥ ती दुर्विदग्धं नायकं शिक्षयितुमाह- णूमेन्ति जे पहुतं कुविभं दासा व्य जे पसाअन्ति । ते व्विा महिलाण पिआ सेसा सामि यिअ अराआ ।।९१॥ [गोपायन्ति ये प्रभुत्वं युपिता दासा इव ये प्रसादयन्ति । त एव महिलानां प्रियाः शेषाः सामिन एव वराकाः ॥] णूमेन्तीति । ये खकीयं प्रभुत्वं कान्ताविषये गोपायन्ति न प्रकटयन्ति । दण्डादिक न प्रबुजत इत्यर्थः । ये च कुपिता नायिकामनुनयपूर्व प्रसादयन्ति त एव महिलाना प्रिया पालभाः । शेषाः ततोऽन्ये दण्डप्रयोकारोऽनुनय परापाथ महिलाना सामिन एव । न तु वाहमा इत्ययः । वराका. प्रेमयनावाप्राप्त्या चोच्या इलयः । पूर्वमादरेण प्रात्त पश्चाभदशासामुदागीन नायम्मुपाल दूनी प्रगरापदेशेनाद- तइमा फअग्प महुअर प रमसि अण्णामु पुंफजाईमु । पद्धफलमारगुरई माला एहि परियमसि ॥ ९२॥ तिक्षा कृतार्घ मधुर न रमसेन्यासु पुष्पजातिषु । पदफलमारगुपी मालीमिदानी परित्यजति ॥] १.कारित' इति कना-पार:. २. 'कहेगु' इति ग-पाठः. ३. करिष्यरि या मुभग एलापसाले'ले ग-पाउ.. ४. निर्म' इति ग-पुमके, 'भलमाशीराया मकर परि घसके पाटः. ५. 'न्ति' इति गगार:. .. पर इम-पाट:. • 'दागमति स-गर. ८. 'न यति' इति ग घ-पार. १. दागपती ग-पटः ... 'पुष्पाइस' ग-या: १. 'वदा गि-युमरे, 'तपा मा'चप पुस पाट " १ शतकम् गाथासप्तशती। तइआ इति । कृतोऽर्घः पूजाविधियेन । कृतादरेति यावत् । 'मूल्ये पूजाविधावर्ष' इत्यमरः । " किंघ' इति पाठे कृतमत्यर्थ । वद्धन फलभारेण ग्रामित्यनेन लताया मकरन्द्राहिसं नायिकायाश्च विपरीतरताक्षमस्व व्यज्यते । तेन प्रयम तथा वाटुशत- प्रचितप्रणयस्य तवेद स्वार्थपरतामात्रमनुचितमित्युपालम्भो व्याय संप्रति नोपभो- गयोग्येति जार प्रति दूत्या उक्किारेति कश्चित् ॥ नागरिकानुरोधेन प्रतिपनदूतीभावया मातुलान्या कथितसौन्दर्थं तं प्रत्यनुर का ना- यिका तामाह- अविअपेक्वणिनेण तक्पण मामि तेण दिद्वेष । सिविणअपीएण व पाणिएण तह व्विअ ण पिट्ठा ॥९३ ।। [अवितृष्णप्रेक्षणीयेन तत्क्षण मातुलानि तेन दृष्टेन स्वप्नपीतेनैव पानीयेन तृष्णैव नै भ्रष्टा ॥] अवीति । अथ वा तत्रैव स्थितं जारं प्रत्यन्यापदेशेन त्वदर्शनाभिलाषो मम न गत इति व्यज्यते ॥ सकेतस्थानान्तरानुसरणाय जार प्रति प्रथमसकेतमा धावयन्ती फुलटा मुजनप्रशं. साछलेनाह- सैंअणो जं देसमलंकरेइ सं विअ करेइ पयसन्तो। गामासण्णुम्मूलिअमहावडट्ठाणसारिच्छम् ॥ ९४ ।। [सुजनो य देशमलंकरोति तमेव करोति मवसन् । मामासनोन्मूलितमहारटस्थानसे दृक्षम् ॥] सुअणो इति । मुजनो यं देश निवासेनालंकरोति तमेव देशं प्रवसनरान् प्रामासन उन्मूलितो यो महावटस्त स्थानसदृश करोतीत्यर्थः । यथा प्रोपितमुजनो देशो रहोवृत्ति विधामाद्यभावाद्विदग्धान्दु सयति तथा उन्मूलितवटस्थानमपि दुखयतीत्यर्थ । स्मर्तव्योऽहमिति गमनसमये बदन्त भविष्यत्पथिक प्रति आहे-- सो णाम संभरिजइ पन्भसिओ जो खणं पि हिअआदि । संमरिअव्वं अंगअंच पेम्म गिरालम्बम् ॥ ९५ ॥ [स नाम सलयते प्रभ्रष्टो यः क्षणमपि हृदयात् । सर्तव्यं च कृतं गतं च प्रेम निरालम्बम् ॥] १. 'पेणिज्जेण' इति स ग-पाद . २. 'भगिनि' इति ग- पुस्तके, 'अतुलितेन' इति च य पुस्तके पाठ. ३. 'नापगता' इति गघ-पाठः, ४. 'सुजणो' इति ५. 'सदृशम्' इति ग घ पाठ, ७. 'स्मरणीयं च' इति ग-पुस्तके, 'संस्मृत्व च कृतं' इति च य पुनके पास ६.'राणम्मि हिमादि' इति ग-पाठ'. क-पाठ..

काव्यमाला। सो इति । प्रेम यदेव सतव्यमर्यात्रियस्सरणाई कृत तदैव निरालम्ब सद्गतम् । नि राश्रयत्वानमिति भाय ॥ दूती मन्दनेह विरलदर्शन नायक नायिकानुरागक्थनेनानुक्लयितुमाह- णास व सा कवोले अन वि तुह दन्तमण्डल वाला। उभिण्णपुलअवइवेढपरिगौ रक्सइ वराई ।। ९६ ॥ न्यासमिर सा कपोरेऽद्यापि तव दन्तमण्डल बाला । उनिन्नपुल्यवृत्तिवेष्टपरिगत रक्षति वरारी ॥] णासमिति । बाठा प्रथम त्वत्कृतशीलसण्डना सा वराकी उद्भिमपुलकरतिमण्ड. लेन परिगत सर्वतो वेष्टित तर दन्तमण्डल मण्डलाकार दन्तक्षत न्यासनिक्षेपामवा द्यापि रक्षति । शटे त्वयि तस्यास्वादशोऽनुरागो न युक्त इति वराकीपदेन ध्वन्यते। तदेवमनुरक्षामनुकम्पाहामनुवतखेति भाव ॥ कार्यगौरवाहितावधिले वालभस्वत्समाप्त्यनन्तरमेवागमिष्यतीत्साश्वारायन्ती मातु लानी प्रोषितभर्तृका सनिर्वेद सासूय चाह- दिट्ठा चुआ अग्याइआ सुरा दक्षिणाणिलो सहिओ। जाइँ व्विा गराइँ यामि को वल्लहो करस ।। ९७ ॥ [दृष्टाश्ता आमाता मुरा दक्षिणानिल सोढ । शर्याण्येर गुरुकाणि मादुलानि को वहम कस n] दिवति । मन्मथोन्मादहेतव आमाहरा घटा । वसन्वे छातेन सह पानकेरिशी लनाय परिष्कृताया मुराया गन्धोऽनुभूत । मलयानिल सोढ । अत कार्यान्यव गुरुका। दुरीकमागिन्या मम जीवितस्स एतान्येव महान्ति प्रयोजनानि । एतदनु भवाथमेव हतजीवित न त्यजामि । तथा च १ कस्य वभ । येनायापि तद्विरहे जोवामीत्यात्मान प्रति निवेदो व्यन्यते । यद्वा कार्यादेव गुरुकाणीति युक्त्यन्तरसमा गम सूचय खा सयदूया उक्तिरिति चिन् । कार्याण्येव तस बहुमतानि कथमन्यथा वसन्तेऽपि नागत इवि भाव किं च वाभ्यमपि कार्यनियधन न तु स्वभावद्धिमि सभिप्रेलाह--को वाइभ कस्येति । तथैव सनिहितया तस्य प्रयोजन न नु व्यवहितया मयेति ववभ प्रत्य सूया बयदे। नायचान्तरपिमोहनाय सनायके वैराग्य सूचय त्या खयला उक्तिरियमिति चित् ॥ 1 'वेष्टन' इति -सपाट, २ 'सूआ' इति ग-पाट घि पाठ. ४ 'मपिनि' इति ग-युमके, 'माधि' इति च घसके पट gu . १ शतकम्] गाथासप्तशती। सदा सनिहितपतिक न त्वमभिज्ञासि प्रवासगतप्रियप्रेमनिर्भरसुरतविलसितानामिति सख्योक्ता खाधीनभर्तृका तामाह- रमिऊण पोंपि गओ जाहे उचऊहिउँ पडिणिउत्तो । अह अं पंउत्थपइमा व्व तक्पणं सो पवासि व्व ॥ ९८ ॥ हरेन्त्या पदमपि गतो यदोपैगृहितु प्रतिनिवृत्त । अह प्रोषितपतिकर तत्क्षणं स प्रयासीव ॥] रमिऊणेति । मान वत्स्वेति बोधयन्ती ससी प्रति सस्य मानासामर्थ्य प्रमाशय-त्या नायिकाया उक्तिरिति कश्चित् ।। कस्मिमपि यूनि जाताभिलाषा कुलटा निनपति प्रति वैराग्य व्यञ्जयन्ती तमाह-- अविइहपेच्छणिज्ज समसुदुःसं विइण्णसभायम् । अण्णोण्णहिअअलग्गं पुण्णेहि जणो जण लहइ ।। ९९ ।। [अवितृष्णप्रेक्षणीय समसुखदु ख वितीर्णसद्भावम् । अन्योन्यहृदयलग्न पुण्यैर्जनो जन लभते ॥] अवीति । मम त्वकृतपुण्याया कुत एव विधप्रियमाप्तिरिलाशय । मन्दनेहस्य पत्यु- श्चित्तमनुकूलयितु पतिव्रताया इयमुक्ति रिवि कश्चित् ॥ क्थ दु खप्रदेऽपि पत्यौ न विरक्तासीति भेदय ती दूतीं प्रत्याप्यातु पतिव्रता पत्या- चनुरागातिशयमाद्द- दु स दे-तो वि मुह जणेइ जो जस्स यल्हो होइ । दुइअणहदूणिआण वि वडइ थेणाण रोमञ्चो ॥ १०० ।। [दु ख दददपि मुख जनयति यो यस्य बल्लमो भवति । दयितनखंदूंनयोरपि वर्धते स्तनयो रोमाञ्च ॥] १ "अवउहिर पडिणिअत्तो' इति ग पाठ २ 'पढाइअव्व' इति ग पाट. ३ 'रमित्या' इति ग पुस्तके, 'रमयित्वा' इति च घ पुस्तके पाठ ४ 'अवगुहितु' इति ५. 'प्रतिनिवर्तमान ' इति ग पाठ ६ 'अथाह' इति ग पाठ ७ कुल बालदेवस्त्वस्या गायाया प्राद 'धण्णा बहिरा अन्धा ते बिअ नीति माणुसे लोए। ण मुणन्ति पिसुणवअण सलपण ऋद्धि ण पेक्सति ॥' (धन्या वधिरा अन्धास्त एव जीवन्ति मानुषे लोके । न मृण्वन्ति पिशुनवचन सलानामृद्धिं न प्रेक्षन्ते ॥' इसका गाथामधिका पठति । घ पुस्तकेऽप्यस्या गाथाया 'धन्या बधिरा-' इत्यादिच्या वर्तते - 'दुम्मिआण' इति ग पाठ ९ 'यणआण' इति ग पाठ १० 'दुर्मनस्क- योरपि इति ग पाठ . घ पुस्तके 'दुःख दददपि-' इत्यादिगायाछाया द्वितीयशतकमा. रम्भे लिखितास्ति गघपाठ काव्यमाला। रसिअसणहिअअदइए कइवच्छल्पमुहसुकइणिम्मविए । सत्तसअम्मि समत्त पढम गाहास एअ॥ १०१॥ रसिकननहृदयदयिते कविवत्सलप्रमुखसुकविनिर्मिते । सप्तशतके समाप्त प्रथम गाथाशतकमेतत् ॥] द्वितीय शतकम्। मानमवलम्ब्य पयुरनुनयसुस तावदनुभवेति सससी शिक्षयेति वदती कामपि सखी सपरिहासमाह-- धरिओ धरिओ रिअलइ उअएसो पिहसहीहि दिजन्तो। मअरद्धवाणपहारजजरे तीऍ हिअअम्मि ॥ १ ॥ धृतो धृतो निगरत्युपदेश प्रियससीभिर्दीयमान । मकरमतवाणपहारजर्जरे तस्या हृदये ॥] तो शृत पुन पुनधृत । विगलति नावतिष्ठते ॥ नदीतटनिकुञ्ज दत्तसंकेतेन का तेन विप्रलब्धा नायिरा तमा मगमन नदीरेण सके सम्धानभर वीनातच प्रेमानुय पदान्य जारं प्रति श्रावय ती ससपीमाह- तडसठिअणोडेछन्तपीलुआरक्सणेकदिण्णमणा । अगणिअपिणिवाअभआ पूरेण सम वहइ काई ॥ २ ॥ तिटसस्थितनीडैवान्तरोनररक्षणक्दत्तमना । अगणितविनिपीतमया पूरेण सम यहति काकी ॥] तटसस्थितस्य नीडयैमा ते विद्यमाना ये शाववास्ता रक्षणे दत्त मनी यया एता शो काकी अगणितविनिपातभया तरुगा राहवान तरमावि सम्य मदनमगणय ती राती रेण नवनलीभेन सम वहति ।। , कुलवाल्देवस्तु अम्मिन्नव शतक यतमानामपञ्चाश सख्याकाम् 'त णमह जस्म वच्छ-' इलादिणायाम द्वितीयशतारम्भे मागचरणत्वेन परति २ धरि धरि ओ पि' इति क पुस्तके, पिरिभ धिरिभ इति च य पुस्तके पाट ३ 'रिए' इति. ४ घपुतरे 'धृतो धृतो-' इलादिगाथाच्छापान तर 'करयुगगृहीतयो दास्तनभरनिवगिताधरदास । सस्मृतपायवन्यस्व नमत कृस्य रोमायम् ॥ दय गाथारडायाधिकाति . 'पोलरक्षणैः' इति म-पाठ : पल शाबा' इति बुग्यालदेव ६ "पिनिपातमरा' इति घ पुस्तकपाट दपाठ २ शतकम्] गाथासप्तशती। मधूक्पुष्पावचयव्यानेन कृताभिसारा कुलटा जारे प्रसात्मनश्चिररताभिला सूचय- न्ती मधूकतरुमाह- बहुपुप्फभरोणामिअभूमीगअसाह सुणसुविण्णत्तिम् । गोलातडविअडकुडगमहुअ सणिअं गलिजासु ॥ ३ ॥ बहुपुष्पभरावनामितभूमीगतशाख शृणु विज्ञप्तिम् । गोदातटविकटनिकुञ्जमधूक शेनैर्गलिष्यसि ॥] बहुपुष्पभरेणावन मिता भूमिगताः शाखा यस्येति मधूकविशेषणम् । शनैः क्रमेण ग- लिप्यासीसनेन चिरे मया ते संगमो भविष्यतीति सूचितम् ॥ वस्थाश्चिन्मधूक्कुसुमावचयप्रसद्धेन मधूक्तसमीपनिकुञ्ज सकेतस्थानमासीत् । स चमेश कुसुमापगमे रावि मम इति परिशिष्टसुमावचय कुर्वती रुदती दृया नाग- रिक सहचरमाह- णिप्पच्छिमार असई दुःसालोआइँ महुअपुंफाई । चीए वन्धुरस व अद्विआई रुअई समुचिणइ ॥ ४ ॥ [निष्पश्चिमान्यसती दुःखालोकानि मधूकपुष्पाणि । चिताया बन्धोरिवास्थीनि रोदैनशीला समुश्चिनोति ॥] निप्पश्चिमानि परिशिष्टानि । दु सालोकानि तदवचयव्याजलभ्यजारसमागमस्य तदपाये दुर्लभत्वादिति भावः॥ नायकस्यास्थिरप्रेमतया तद्वचनमखीकुर्वती नायिकामभिमुखीकर्तुं कश्चिद्विदग्ध आह- ओ हिअ मडड्सरिआजलरअहीरन्तदीदार व्व । ठाणे ठाणे विअ लम्गमाण केणावि डम्झिहसि ॥ ५ ॥ हे हृदय खल्पसरिजलरयहियमाणदीर्घदारुवत् । स्थाने स्थाने एव लगत्केनापि पक्ष्यसे ॥] खल्पसरितो जलरयेण ह्रियमाण काष्ठ यथा स्थले स्थले लगत्केनापि दह्यते तथा त्वमपि कस्यामपि सुभगायो लभ सत्तया क्षणविरहेगापि लक्ष्यस इत्यर्थः । एवेना. भिमतजनाप्राप्त्या ममास्थिरनेहत्वम्, न तु दुर्विदग्धत्वादिति ध्वनितम् । मडहशब्दः . खरूपवाचकः ॥ १. शनैर्न गलिष्यति' इति घ-पाठ . २, 'उपाइ' इति क-ख पाठ . ३. 'रुदती' इति ग-पाट.. ४. हा हृदय' इति घ-पारः, ५. 'वदनदी इति ग-पाठः, ३८ काव्यमाला। . घन्धुजनं प्रति सख्याः सौभाग्य काचिदाह- जो 'ती' अहरराओ रत्तिं उन्यासिओ पिअअमेण । सो विअ दीसइ गोसे सवत्तिणअणेसु संकन्तो ॥ ६॥ [यस्तसा अधररागो रागायुद्वामित. प्रियतमेन । स एव दृश्यते प्रात. सपत्नीनयनेषु संक्रान्तः ॥] गोस त । तथाविधाधरदर्शनज नितेयया सपत्नीनयनेष्वरुणिमोदयादिति भावः। ए. स्या सौभाग्यवर्णनेन तत्सपत्नीनां मुखसाध्यत्वं सूचयन्त्या दूल्याइयमुक्तिरिति कश्चित् ॥ हलिक्वध्वा. पतिनेहपरीक्षोपायं दर्शयन्ती काचित्ससी शिक्षयितुमाह- गोलाअडट्ठिअं पेछिऊण गहवइसुअं हलिअसोहा । आढत्ता उत्तरिउ दुःखुत्ताराएँ पअवीए ॥ ७ ॥ [गोदावरीतटस्थितं प्रेक्ष्य गृहपतिसुतं हलिकनुपा । आरब्धा उत्तरीतु दु खोत्तारया पदव्या ॥] किमय मामवरम्यते न वेति जिज्ञासया विषममार्गेणावतरीतुमारग्धेत्यर्थ. ॥ अभिरपितनाय प्रोमयितु तं प्रलात्मसौभाग्य भावयन्ती कापि ससीमाह- चलणोआसणिसण्णस्स तस्स भरिमो अणालवन्तस्स । पाअङ्गुट्ठावेट्ठिअकेसदिढाअड्डणमुँहेल्लिम् ॥ ८ ॥ [चरणावकाशनिषण्णस तस्य स्मरामोऽनालपत । पादानुछायेष्टितवेशदार्पण खम् ॥] प्रणयकोपेनानुनयमगृहन्या मम चरणावकारे निपण्णस तस्य मदीयपादाहुटेना- वैटिताना वेशाना ढाकर्षणेन जातं यत्र तत्स्मराम इत्यर्थ ॥ सक्तस्थाने जारं प्रति पविवस्यावस्थिति भावयन्दी कुलटा ससीमाह- फालेइ अन्छभर व उअह कुग्गामदेउलदारे । हेमन्तआलपहिओ विन्झामन्तं पलालग्गिम् ॥ ९ ॥ [पाटयत्यच्छमहमिर पश्यत कुनामदेवकुलद्वारे । हेमन्तरालपथियो निभायमान पलालामिम् ॥ १. 'ती' इति श-ग पाटः. २. 'प्रभाते दृश्यते' इति घ-पाटः ३. 'भारताति ग पाटः ४. 'दुवसुताराई' इति गमग-पाट... 'अवतरित' इति घ-युस्तके, 'उसन' इति च ग पुस्तके पाठः, ६. 'दु.सोतारायाः पदया.' इति घ-पाटः ७. 'मुहम्' इति कपाट. ८. 'मुसलिम्' इति ग-पाट:.:. 'युग्नाअन्त' इति ग-पाट: १.निर्वा- प्यना' इति ग पुस्तके, निति' इति च घ-पुस्तके पाटा.

२ शतकम्] गाथासप्तशती। अच्छभल्लो भल्क । पाव्यमानस्य पलालक्षारकूटस्य यहि श्यामत्वात् अन्तश्च लोहिताकारवदिसंबन्धादयूकसाम्य योभ्यम् ॥ प्रामतडागसमीपनिमृतदेशे दत्तसकेतेन जारेण विनलब्धा विमरजलानयनस्टलेना- तिप्रभाते तयारमगमन त प्रति श्रावयन्ती तन याद्भुतस्यनच्चलेन पितृभगिनीमाह- कमलाअरा मलिआ हसा उझविआ ण अ पिउच्छा। केणॉवि गामडाए अन्म उत्ताण व्यूढम् ॥ १० ॥ कमलाक्रा न मृदिता हसा उद्धायिता न च सितम्बस । केनापि मामतडागे अभ्रमुत्तानित क्षिप्तम् ॥] विमलजलप्रतिविम्बितम्याकाशस्योत्तानतया मानादियमुत्प्रेक्षा । जारप्रवास श्रुत्या विमनस्का गृहकृत्यपरामुखी वधू प्रति श्वश्रूरुपालभच्छलेनाह- केण मणे भग्गमणोरहेण सलाविअ पवासो ति। सविसाइँ व अलसाअन्ति जेण बहुआएँ अगाई ॥ ११ ॥ किन मन्ये भममनोरथेन सलापित प्रवास इति । सविपाणीवालसायन्ते येने यच्या अन्नानि ।।] यहा पतिप्रवासवार्ताश्रवणेन विमनस्काया प्रोध्यस्पतिकाया पत्यायनुरागातिशय प्रतिपादयन्ती दूती तस्या असाध्यता जार प्रति सूचयतीति बोध्यम् । कापि ससीमिशिताकारगोपन शिक्षयितु गोपीना कृष्णतारुण्यानुभवाभिव्यजकहसि तगुतिमाह-- अजवि वालो दामोअरो ति इअ जम्पिए जसोआए। कहमुहपेसिअच्छ णिहुण हसिणं वअवहूहि ॥ १२ ॥ [अद्यापि बालो दामोदर ईति इति जल्प्यते यशोदया । कृष्णमुखप्रेषिताक्ष निभृत हसित ब्रजवधूभि ॥] अनुभूतविविधमुरतविमर्दै कृष्णे अस्य वचनस्यास्वायत्वेन हास्यहेतुत्वाबातोऽपि हासो वैदग्ध्यान प्रकाशित इति भाव । १ 'तलाए अम्भ उत्साणि' इति ख पाठ ३. 'उल्लाविभ इति ग पाठ ४ 'प्रगे प्रयासीति' इति घ पाठ ५ 'पेन' इति घपु स्तके नास्ति ६ 'इति किल जल्पित यशोदायै' इति घ पाठ. . 'प्रहिताम' इति २ 'उत्तानक' इति गपाठ ग-पाठ.

४० काव्यमाला। कापि सन्चनस्तुतिव्याजेन दृढम्लेहानुवृत्त्यर्थे नायकमाह- ते विरला सप्पुरिसा जाण सिणेहो अहिण्णमुहराओ। अणुदिअहवडमाणो रिणं व पुत्तेसु संकमइ ॥ १३ ॥ [ते विरला सत्पुरुषा येषा स्नेहोऽभिन्नमुख रागः। अनुदिवसवर्धमानो ऋणमिन पुनेषु संक्रामति ॥] अभिनेति । आदिमध्यान्तेषु तुल्यमुसप्रसाद इत्यर्थ ॥ कापि जनसमक्षमुद्भटभावा सखी शिक्षयितुं कृष्णानुरफगोप्या वैदग्भ्यमाह- णचणसलाहणिहेण पासपरिसंठिआ णिउणगोवी । सेरिसगोविआण चुम्बइ कवोलपडिमागअं कहम् ॥ १४ । । [नर्तनशाधननिभेने पाचपरिसस्थिता निपुणगोपी । संशगोपीना चुम्बति पोलप्रतिमागत कृष्णम् ॥] ननेति सम्यतीति कर्णे कथनव्याजेनेत्यर्थः ॥ कापि कान्तगममाक्षेपार्थे योगममाह- सव्वत्य दिसामुहपसॉरिपहि अण्णोण्णकडअलग्गेहिं । छल्लिं व्य मुअइ विझो मेहेहि विसंघडन्तेहिं ॥ १५ ॥ सिर्वन दिशामुराप्रसृतैरन्योन्यकटलमै । छलीमिव मुशति विन्ध्यो मेसिघटमानै..] अन्योन्य कटरे पर्वतनितम्बे लपविसपटमानविश्लिष्पद्धि । घल्ली यल्लम् ।खब. म्मति यावत् । 'छली वीधि सताने वल्कले मुमान्तरे' इति मेदिनीकोपः॥ तथैवापरगाथामाह-- आलोअन्ति पुलिन्दा पध्वअसिहरट्टिआ धनुणिसण्णा। हत्यिउलोहिं व विझं पूरिनन्त णयम्भेहि ॥ १६ ॥ [आलोक्यन्ति पुलिन्दा पर्वतशिखरस्थिता धेनुर्निपण्या । हलिकुलरिय विन्ध्य पर्यपाणं नग.n] १. 'ग' इति ग पाट. २. '' इति घ-पाठ... गोपी' इति य-पाठ. ५. 'सरिगोविआण' इति कस पाठ ५. 'व्याजेन' इति ग-याट . ६. "पारेष्ठिता हात ग-पुस्तके, परिस्थिता' इति च घ पुस्तके पाठ , ५. सहगोपीना' इव घ-पाट. ६. दम्मुह' इति ग पाठ : १. 'सर्वदिशामुसुप्रस्त' इति घ पुमके, 'सर्वत्र दिमुगः- सारिमि' इति च ग-गुसके पाठः... 'कमुकमिव' इति गपुसके, खचनिय' रति पुनके पाठ 1. पम्मिलिगुण्णा' इति कपाट. १३. अपने निपग्गा' इति घपाठ.

. २ शतकम्] गाथासप्तशती। ४१ पुलिन्दाः शयराः ! धनुपि निपणाः क्षितितलनिहिताटनी] धनुरवलम्ध्य स्थिताः सन्तो वर्णध्वनिमहत्त्वादिना हृतिकुलसदृशैर्नवमेधै पूर्यमाणं विन्ध्यं पश्यन्तीत्यर्थः । शवराणां पर्वतशिखरेऽवस्थानात् विन्ध्यवनेऽमिसारभयं प्रतिपादयन्त्या नायिकाया जारं प्रतीयमुक्तिरिति केचित् ॥ प्रोपितहकामाश्वासयन्ती ससी पथिकागमनयोग्यं वर्षात्ययमाह-- घणदवमसिमइलङ्गो रेहइ विझो गणेहि धवलेहिं । सीरोअमन्थणुच्छलिअदुद्धसित्तो व्ध महुमणो ॥ १७ ॥ [वनवमपीमलिनागो राजते विन्ध्यो घनर्धवलैः । क्षीरोदमथनोच्छलितदुग्धसिक्त इय मधुमथनः ॥] घनदवेत्यादिविशेषणेन तृणकण्टकादिदाहाद्वमनः सुगमता दर्शिता। धवलैरिति ज- लापायादिति भावः तस्मिन्नप्युजवलये दुसि जायायाया प्रीतिमुपलभ्य फुषित नायक योधयितु वि. नापि सुरतेच्छा वक्षरागो भवत्येवेति सखी निदर्शयितुमाह- वन्दीअ णिहअवन्धवविमणाइ वि पैकलो त्ति चोरजुआ। अणुराएण पलोइओं गुणेसु को मच्छर वहइ ॥ १८॥ [वन्या निहतबान्धवविमनस्कयापि प्रवीर इति चौरयुवा । अनुरागेण प्रैलोक्तिो गुणेषु को मत्सरं यह ति ।] निहतवान्धवत्वेन विमनस्क्यापि चन्या चोरयुवा प्रवीर इति हेतोरगुरागेण प्रलो- क्तिः । गुणानुरागादालोकितवती, नतु सुरताभिलाषादिति भावः ॥ नायकान्तरं प्रससाध्यत्वं सूचयन्ती दूती व्याधवधूसौभाग्यं वर्णयवि- अज कइमो वि दिअहो वाहवहू रूवजोव्वणुम्मत्ता । सोहागं धेगुरुम्पन्छलेण रच्छासु विकिरइ ।। १९ ।। (अद्य कतमोऽपि दिवसो व्याधवधू रूपयौवनोन्मत्ता । सौभाग्य धनुस्तष्टत्वक्छलेन रथ्यासु विकिरति ॥] सततमुरतासक्तिकृतदौर्बल्यादाष्टुमशपयत्वासतावतक्षणस्य धनुपस्त्वपछलेन सौ. १. 'छोरोअ' इति ग-पाठः, २. 'एकलो' इति फ-पाटः. 'पदल' इति.ग-पाठः, 'पदलशब्दो दर्पवति यूनि वर्तते' इति कुलवालदेवः. ३. विलोकितो' इति गपुस्तके, "विलोमितो' इति च घ-पुस्तके पाठः, ४. धनूरम्पछलेन' इति ग-पाठः 'रम्पशब्दः पच्छे वर्तते इति फुलबालदेवः. ५. 'रम्प' इति ग पाट.६. 'धनुस्वक्षय इति घ-पाठः । है ४२ काव्यमाला। - माग्यं विकिरतीत्यर्थः । रुम्पशब्देन तत्क्षणप्रमवमूक्ष्मत्वगुच्यते । अतिमुरतासक्तं मिः प्रति तनित्यय सहचरोकिरिति कश्चित् ॥ तमेवाथै भायन्तरेणाह- उक्खिप्पइ मण्डलिमारुएण गेहगणाहि वाहीए । सोहग्गधअवडाअ व्य उअह धगुरुम्परिन्छोली ॥ २० ॥ [उत्क्षिप्यते मण्डलीमारुतेन गेहागणाद्वयाधस्त्रियाः । सौभाग्यघजपताकेव पैश्यत धेनुःसूक्ष्मत्वस्पतिः ॥] मण्डलीमारवेन बातमण्डल्या । सौभाग्यमेव ध्वजस्तस्य पताकेव । आत्मनो विज्ञ- त्वत्यापनार्थ नागरिकस्य सहचर प्रतीयमुक्तिरिति कश्चित् ॥ अनुक्कमप्यर्थ लिङ्गदर्शनाननो जानातीति दर्शयन्दी काचित्ससीमितिरक्षणा- धमाह-- गअगण्डत्थलणिहसणमअमइलीकअकरसाहाहिं । एत्तीअ कुलहराओ णाणं वाहीअ पइमरणम् ॥ २१ ॥ [गजगण्डस्थलनिघर्षगमदमलिनीकृत करञ्जशाखाभिः । आगच्छन्त्या कुलगृहाज्ञातं व्याधनिया पतिमरणम् ॥] गजाना गण्डस्थलनिघर्षणे सति मदेन मलिनीकृताभिरित्यर्थः । कुलगृहारिपतृगृहात्। पतिभयेन पलायिताना गजानां पुनरागमनस्य पतिमरणाव्यभिचारित्वेन पतिमरणमनु- मितमित्यर्थः । नायिकान्तरासकस्य पूर्ववद्गजमारणसामाभावात्पतिर्मरिप्यतीति नि- चितमित्यर्थ इति कश्चित् ।। पूर्वप्रियाप्रेमानुतिशिक्षार्थ नागरिकः सहचर प्रति कस्यचिश्शाधस्य दक्षिणनाय- क्ता वर्गयति- णववहुपेम्मतणुइओ पणभं पढमघरणीअ रक्सन्तो। आलिहिअदुप्परिलं पि णेइ रणं धणुं वाहो ॥ १. 'धणहरोरम्प' इति ग-पाठः. २. 'मारुतैः' इति घ-पाठ:. ३. 'गृहाङ्गणाया- ध्याः' इति ग-पुस्तके, 'गेहाङ्गणाद्वाह्यात्' इति च घ-पुस्तके पाठः. ४. 'पश्यत' इति ग-पुस्तके नास्ति. ५. धनुर्मनोरम्परिश्छोली' इति ग-पुखके, 'पश्य धनुस्तक्षणरि. छोली' इति च घ-पुस्तके पाठ. ६. 'आगत्य' इति घ-पाटः, ७. 'व्याधववा' इति ग पुस्तके, 'व्याच्या' इति च घपुस्तके पाठः, ८. 'अलिहिअदुप्परि' इति ॥ ख-पाठः.

२ शतकम् ] गाथासप्तशती। ४३ निमनप्रेमतनूकृत प्रणय प्रथमगृहिण्या रक्षन् । तेनूकृतदुराकर्षमपि नयत्यरण्य धनुाघ ॥] तक्षणादिना तनूकृतमपि दुराकर्षमिसर्थ । प्रथमहिण्या साध्यत्र सूचयितु जार प्रति दूत्या उक्तिरियमिति कश्चित् ।। मुभगा प्रति क्थमपि कुपितस्य प्रियस्य पुन पुन सप्रतिज्ञ यत्तत्स गमोपेक्षावचन तस्यासद्धाथत्वेन हास्यैरहेतुतामपरा त महिला सोपालम्भमाह- हासाविओ जणो सामलीअ पदम पसूअमाणाए । वहवाएण अल मम त्ति बहुसो भणन्तीए ॥ २३ ॥ [हासितो जन श्यामया प्रथम प्रसूयमानया । वहभादेनाल ममेति बहुशो भणन्त्या ॥] यथा श्यामया वरलिया प्रथम प्रसूयमानया बठभसमागमस्य प्रसयदु खहेतु बालम वादेन भाभिधानेन । बल्लभस्य नामग्रहणेनापीति यावत् । ममाठ नास्ति प्रयोजन मिति पहुशोभण त्या पुन प्रियोपगमाल्लोको हासितस्तथा तवापीद वचनमिति भाव ।। अतवे प्रियेऽलमटीकासक्तिशफ्येयाश्वापयती मातुलानी प्रोपितमर्तृका सनि वेदमाह-- कैअवरहिम पेम्म पत्थि विअ मामि माणुसे लोए। अह होइ कस्स विरहो विरहे होतम्मि को जिअइ ॥ २४ ॥ तिवरहित प्रेम नास्त्येव मातुनि मानुषे रोके । अथ भवति क्स विरहो विरहे भैपति को जीवनि ] भवति जायमाने । कथमन्यथा तद्विरहेऽप्यह जीवामि स च मां परित्यज्य तिष्ट तीति भाव ॥ यस्वाधिदमीटनायिकाया मानावरारे प्रशालनार्थ यन्त्रपरिवर्तनोद्धाग्निावयवदर्श नेन तृप्त कामिनीजनमनोहरणार्थमा मन कामुक वातिशय फाधिदाह- अन्डर व णिहिं विअ सग्गे रज व अमअपाण व । आसि म्ह त महुत्त विणिअसणदसण तीए ॥ २५ ॥ १ "नेम्' इति ग-पाठ २ 'भनिसिन्दुरा-' इति ग घ-पार 'मनिसितमत नहतम्' इति दुरशालदेव ३ 'राए' इति ग-पाठ पाठ ५ 'रागेगाल' इति गघ-पाठ ६ 'भगिनि' इति ग पुन्के, 'मानुलि' इति च घ-पुताफे पाठ . 'मवरपिपग पार ४ श्यामलया' इतिघ ' 'मास इन ग-पाट काव्यमाला। ४४ . [आश्चर्यमिव निधिमिन स्वर्गे राज्यमिनामृतपानमिव । आसीदसाक तन्मुहूर्त विनिसनदर्शन तस्सा ॥] अस्माक तस्यास्तद्विनिवसनदर्शनम् । विवस्त्रायाखस्या आलोकनमिति यावत् । मुहूर्तमान नेनोलासहेतुत्वादाचर्यमिव । परमसुसहेतुत्वानिधिमिव । निधिरिवेलर्थ । प्राकृते लिङ्गविभक्त्यादेरनियमात् । निधीश्वरललाभात्वर्गराज्यमिव । अविशयितत प्तिकारित्वान्मदनानलकान्तसकल्शरीरनितिकरणाचामृतपानमिवासीदित्यर्थ ॥ आत्मन्यनुराग सपान्यां च विद्वेषमुत्पादयितु काप्यस्थिरप्रेमाण नायिकान्तरासत नायकमाह- सा तुज्झ वहा त सि मज्झ वेसो सि ती तुझ अहम् । वालअ फुडं भणामो पेम्म किर बहुविआरं त्ति ॥ २६ ॥ [सा तव वेल्लमा त्वमसि मम द्वेष्योऽसि तस्यास्तवाहम् । बालक सुट भणाम प्रेम क्लैि बहुविकारमिति ॥] स्वमसि मम वल्लभ इति विपरिणतानुपा ।तवाहमित्यत्रापि द्वेष्येति विपरिणता नुषा । बालक उचितानभिज्ञ । बहुविकारमिति प्रकृतिभेदेन बहुप्रकारमित्यर्थ । अ नुर को मां विहायाननुरक्तायां तस्यामासक्तिस्तव रसाभासावहेति भाव ॥ पयुर्वेदग्ध्यमात्मनश्च सौभाग्यविनयादिगुण सूचयन्ती खाधीनभर्तृका प्रसाधि कामाह- अहअ लजालुइणी तस्स अ उम्मच्छराइ पेम्माई । सहिआअणो विणिउणो अलाहि किं पाभराएण ॥ २७ ॥ अिह रज्जालुस्तस चोन्मत्सराणि प्रेमाणि । सखीजनोऽपि निपुणोऽपंगच्छ कि पादरागेण 1] उन्मत्सराण्यु टानि ! उदालतकादिष्यव्या प्रवृत्तानीत्यय । सखीजनश्च निपुण । किंचिचिहमानेण लक्षयतीत्यर्थ । अलाहिशब्दो निवारणे । अपगच्छेत्यर्थ । किं पा दरागेणेति चरणयोरारुण्यस्य खत सिद्धत्वात् । उदरादिषु चरणचिहोदयहेतुना लाक्षा- रसेन किं प्रयोजनमिति भाव !! १ "विनिवसन्' इति घपाठ २ 'वामा मम त्व द्वेष्योऽसि' इति ग पुस्तके, "वल्लभा त्वमसि मम प्रियस्त्वमति तस्या' इति च य पुस्तके पाठ . ३ 'खल विकार मिति' इति घपाट ४ अह अ' इति ग-पाट ५ 'अ' इति ग पाठ.६ 'अह च' इति ग पाठ 'लबालुकिनी' इति घ पाठ ८ 'अलाभि' इति घ पाठ.

२ शतकम्] गाथासप्तशती। . अरण्ये दत्तसंकेताया गोप्या विरहपीडा संकेतस्थानगमन च सूचयन्ती दूती जार प्रत्साह- महुमासमारआहअमहुअरझंकारणिभरे रणे । गाअइ विरहक्सरॉवद्धपहिअमणमोहणं गोवी ॥ २८॥ [मधुमासमारुताहतमधुकरझंकारनिर्भरेऽरण्ये । गायति विरहाक्षराबंद्धपथिकमनोमोहन गोपी 1] मधुमासमारतेन दक्षिणानिलेनाहते मधुकरझंकारैः परिते अरण्ये विरहाभिव्यक- रक्षरैरापद्धत्वात्पथिकमनोमोदनं यथा भवति तथा गोपी गायति । अस्मद्वनितानामपी दृश प्लेशो भविष्यतीति पथिकानां • मोहो भवदीति भावः । गृहगमनाय पथिकान्तरं त्वरयितु पथिकस्येयमुक्तिरिति केचित् ।। कलहान्तरिताया निधारणमानप्रहनिन्दाछलेन दूती जारस्यागमनावसरमाह- तह माणो माणधणाएँ तीस एमेज दूरमणुपदो। जह से अणुणी पिओ एफग्गाम ब्धिय पउत्यो ॥ २९ ॥ तथा मानो मानधनया तया एवमेव दूरमनुबद्धः । यथा तसा अनुनीय प्रिय एकग्राम एव पोषितः॥] एवमेव कारण विनैव । एकग्रामे विद्यमानस्यापि प्रियादर्शनाभावात्प्रवास एवेति भाव:। विदग्धाः पयुः परवनिताराक्तिमुपायेन वारयन्तीति कापि सी शिक्षयिनुमाह--- सालोए व्विा सूरे परिणी परसामिअस्स घेत्तूण । गेच्छन्तस्स वि पाए धुअइ हसन्ती हसन्तस्स ॥ ३०॥ [सालोक एव सूर्ये गृहिणी गृहस्वामिनो गृहीत्वा । अनिच्छतोऽपि पादौ धापति हंसती हसतः । असमय एवं पादप्रक्षालनादन्यत्रीसनीपगमनप्रतिपेधे गृहिप्यास्तापर्यमवगस हसतो हसामिन पादी गाणी विदिताभिप्रायाहमनेनेति हसदी सदी प्रक्षालयतीलयः । १. 'पर' इति घ-पाठ..२. 'माणहणाएं' इति ग-पाटः. ३. 'मानहताया इत्यने।' दव ग-पाटः ४. 'तस्या मे भरमनुया.' इति घमारः ५ 'ययासा' इवि गधा पाठ ६. 'गृहसानिकस' इति ग-पाठः ५. 'भावयति' इति ग-पुस्तके, प्रशालयति' सीप य-युखके पाठः. 4. 'सन्ती हसमानस' इवि घ-पाठः ४६ काव्यमाला। भाव ॥ अन्यत्रीनाना व्यवहरन्तं कान्त प्रति किं ते दृष्टिवलमपि क्षीणमिति वदन्ती सखों निवारयन्ती खण्डिता सविनयोपालम्भमाह- वाहरउ मं सहीओ तिस्सा गोत्तेण किं त्य भणिएण । धिरपेम्मा होउ जहिं तेहिं पि मा किं पिणं भणह ।। ३१ ॥ [च्याहरतु मा सख्यस्तसा गोनेण विमत्र भणितेन । स्थिरप्रेमा भवतु यत्र तत्रापि मा विमप्येन भणत ॥] गोनेण नाना । 'गोन तु नाग्निच' इत्यमर ॥ दुष्टदतीप्रत्यारयानार्थ कापि साध्वी प्रोपितभर्तृवा दैवोपालम्भटरेनात्मनः पला- वनुरागातिशयमाह- रूअ अच्छीसु ठिअं फरिसो अङ्गेसु जम्पिअ कण्णे । हिअहिए णिहि विओइअंक त्य देव्वेण ॥ ३२ ॥ [रूपमक्ष्णोः स्थित स्पर्शोऽङ्गेषु जापित करें। हृदय हृदये निहित वियोजित किमन देवेन ॥ तस्य रूपसौकुमार्यप्रियवचनसद्भाववर्तनानि भावयन्ती मा न विरह पीडयतीति प्रोपितमकाया सपो तत्वान्तसमीपगामिन पथिक प्रति सख्या विषमा विरहा- वस्थामाह- सअणे चिन्तामइअं काऊण पिकं णिमीलिअच्छीए । अपाणो उवऊढो पसिठिलवलआर्हि वाहाहि ॥ ३३ ॥ शियने चिन्तामय कृत्वा प्रिय निमीलिताझ्या । आत्मा उपगूढ प्रशिथिल्यस्याम्या याहुभ्याम् ॥] आनन्दातिशयान्मुकुलितनेत्रया विरहदावल्यात्प्रशिथिलयरयान्चा याहुभ्यामा मा उपगूढ । सशरीरमानिमितभित्सर्य 1 तद्यावद्दशमीमवस्था न गच्छवि तावदनुस्म्प- खेति तत्वान्त प्रति वक्तव्यमिति भाव ॥ कलहान्तरितयोयूनो रामप्रसकरणाय गतागतसिना दूती तानुकूरयितुमात्मनि- परिहूएण वि दिअहं घरपरभमिरेण अण्णाजम्मि । चिरजीविएण इमिणा सविअझो इसकाएण ॥ ३४ ॥ १. पेम्मो इतिग पाठ २. 'काह' इति ग पाठ ३. 'यत्र कुत्रापि' इति ग ४. "हिंअएण राम' इति य-पाट . ५. 'स्पर्श' इति फन पाद. 'कर्मयोति ग पाठ ७. 'विद्योजित मिस देवेन' इति घ-पाठ. स्मना पश्य स्ट'इविघ-पाठः न्दामाह- पाठ. ८. 'मा- २ शतकम् गाथासप्तशती। ४७ परिभूतेनापि दिवस गृहगृहभ्रमणशीलेनान्यकार्ये । चिरजीवितेनानेन क्षपिता सो दग्धकायेन ॥] पक्ष दग्धराकेन । रोपकटुवचनै परिभूतेनापि अन्य कार्थे परप्रयोजनार्थ गृहगृह- भ्रमशीन चिरनीवितेन वृद्धेनानेन दग्धकायेन क्षपिता म उद्वेजिता स । अ न्योऽपि लोटप्रक्षेपादिना परिभूतेन भन्नकार्य अत्रप्राप्त्यर्थमनुदिवस प्रतिगृह भ्रमता चि रजीविवेन दीर्घायुषा काकेन दध्याापातादुद्विमो भवतीति । अण्णकमम्मि दरा एण इत्यादि श्लिष्टशब्दशक्तिमूलको ध्वनि । क्षपिता स इत्यर्थे क्षुधा म इति वा ।। दुनसहपरिहारार्थ कोऽपि सहचरमाह- वसइ जहिं अ खलो पोसिजन्तो सिणेहदाणेहिं । त चेअ आलअ दीअओ व्य अइरेण मइलेइ ॥ ३५ ॥ [वसति यनैव खल पोष्यमाण मेहदाने । तमेवारय दीपैर इवाचिरेण मल्नियति ॥] हदानै स्नहपूर्वकैन । पक्षे तैलादिदान । पोप्यमाण सध्यमान । पक्षे सदी प्यमान सलो यनैव वसति । यदाश्रयेण सतीत्यर्थ । तमेवालयमाश्रयभूत न भूभाग चाचिरेण मलिनयति सापवाद साधकार च करोतीत्यर्थ ॥ भुनम दानो मुस चर्तुं नी कृपणनि दामाह- होन्ती वि णिप्फर चिअ धणरिद्धी होइ किविणपुरिसस्स । गिलाअवसतत्तस्स णिअअछाहि दा पहिअस्स ॥ ३६॥ (भव त्यपि निष्पलैय धैनसद्धिर्मयति कृपणपुरुपस । श्रीमातपसतास नितरच्छायेव पथिकस ]] यथा स्वीया छाया मनो न वा परस्य सताप हरति तद्वरकृपणधनमिति भाव ॥ स्फुरितवामोना घोपितभतृका श्रीणां वामाक्षिप दस उभसूचकतया प्रियाग मनगारय्य सपरितोपमाह- पुरिए वाम छ तुए सइ एहिद सो पिओ जता मुइरम् । समीलिअ दाहिणअ तुइ अवि एह पोइरसम् ॥ ३७॥ १ चिरजीविनामुना राता मो इनि ग-पाट २ वेथ इति बपाट ३ 'दीप इव' इति फसघ पाठ ४ घणनवी इति ग पाठ ५ 'पनदि रवि क स पुस्तक्यो, 'धनदि' इति च घ पुस्तके पाठ ६. 'तुए भरिइ पलोद रसम्' इति ग पाठ १८' काव्यमाला। ट - स्फुरिते यामाक्षि त्वयि यद्येष्यति स प्रियोऽद्य तत्सुचिरम् । समील्य दक्षिण त्वयैवैतं प्रेक्षिष्ये ॥] हे वामनेत्र, त्वया स्फुरिते स्फुरणे कृते सति यदि स प्रियोऽयागमिध्यति तदा दक्षिणमक्षि निमील्य तं त्वयैव प्रेक्षिष्ये । त्वामेकं प्रियावलोक्नेन कृतार्थयिध्यामी. सर्थ ॥ शुनकापदेशेन कामकान्तरसभोगभयं प्रदर्शयन्ती दूती नायकं प्रति नायिकाया म. नुरागातिशयमाह- मुणअपउरम्मि गामे हिण्डन्ती तुह करण सा वाला। पासअसारिव्व घरं घरेण कइआ वि सजिहि ॥ ३८ ॥ [शुनकप्रचुरे ग्रामे हिडमाना तव कृतेन सा वाला। पाशकशोरीव गृहं गृहेण कदापि सादिष्यते ॥] सुनकप्रायकामुक्प्रचुरे प्रामे त्वदर्शनार्थ प्रतिगृह भ्रमन्ती सा याला कदापि केनापि सादिष्यते । उपभोक्ष्यत इत्यर्थः । अतो नवयौवना एपा यावदन्येन नोपभुज्यते तार. देना भजखेति भाव ॥ यं युवान प्रति त्वं वशानुरागा सोऽस्थिरप्रेमेति कथयन्ती सखी नायिका ससीमा. ग्यगर्वमाह- अण्णण्णं कुसुमरसं जं फिर सो महइ महुअरो पाउम् । तणीरसाण दोसो कुसुमाणं णेअ भमास्स ॥ ३९ ॥ [अन्यमन्य कुसुमरसं यत्किल से इच्छति मधुकर. पातुम् । तन्नीरसानां दोष फुसुमाना नेत्रे अमरस ॥] यथा इच्छानुरूपस्य मधुन एकप्रायभान्मधुकरो भ्रमति तद्वदयमपोरछानुकूलना. यिकामलभमानधाधल्यमवरम्बते । तदेतस्य चाचस्य मया शमयितव्यमिति भावः। मन्दनेह नायकमभिमुखीकन दूनी नायियाया अनुरागाविशयमाह- त्यापइण्णणअणुप्पला तुम सा पडिच्चए एन्तम् । दारणिहिएहि दोहि वि मगटकलसेहि व यणेहि ॥४०॥ १. 'स्फुरवि' इति ग-पाट. २. 'यद्यागमिष्यति प्रियतमसदा मुचिरम्' इति 1. 'त्वया सविन प्ररोयिन्यै' इति ग-पाट. ४. "हिण्डवी' इति घ. ५. "सारीव' इति ध पाटा. ६. 'हे न'शी घ-पाठ. ७. 'पाणटो (यो' इति ग-पाठ.. 1. 'स महति पानरोपः' इति ग-पाठः. १'नेह' इति घ. १.. 'परशा' इति राग-पाट, गपाट. पाट. पाठ:.

२ शतकम्] गाथासप्तशती। [रल्याप्रकीर्णनयनोत्परा त्वां सा प्रदीक्षते आयान्तम् । द्वारनिहिताच्या द्वाभ्यामपि मगर कलशाम्यामिव स्तनाम्याम् ॥] 'तुम सा पढिच्छए एतम्' इति स्थाने 'तुम पुत्ति क पलोएसि' इति कवित्पुस्तके बाटो दश्यते । 'त्य पुत्रि क प्रलोकयसि' इति तस्यार्थ । तनेय व्याख्या--रम्या बलोकनद्वारस्थितिस्तनप्रदर्शने कलितशीलखण्डनां कुलवधू प्रवि दूती आह-र थेति । प्रय भाव ---नयनो पलाभ्या कृतरभ्यापूजा द्वारि कलशाविव स्खनौ निधाय यस्य पर्म प्रतीक्षसे त क्यय मया तदानयने यो विधेय इति । अग्रहीतानुनय विलक्ष पुनरनुनयविमुरा नायक प्ररोषयितु दूती कलहान्तरिताया नायिकाया पश्चात्तापमाह- ता रण जा रुव्वइ ता छोणं जाव छिजए अङ्गम् । ता णीससिों वराइअ जाव अ सासा पहुप्पन्ति ॥ ४१ ।। [तावद्रुदित यावद्रुद्यते ताव क्षीण यावत्क्षीयतेऽङ्गम् । तावन्नि श्वसित वराक्या यावत् [च] श्वासा प्रभवन्ति ॥] यावद्रोदिन शक्यते तावदितम् । अरु याव क्षीयते यतोऽधिक क्षीण न भवति तावत्क्षीणम् । यावच्छ्वासा प्रभवन्ति तावनि श्वसितम् । इदानी क्षीणाया श्वसितुमपि न शकिरिति त्वदुपेक्षया नियमाणा स्वरयनुरक्तामनुकम्पस्वेत्यर्थ ।। कश्चिदुपरतजायाविरविधुरमात्मानमनुशोचनारमन स्थिरस्नेहतासूचनेन नायिका- न्तर प्ररोचयितुमाह- समसोक्सदुक्सपरिवडिआण कालेण रूढपेम्माणम् । मिहुणाण मरइ ज त खु जिअइ इअर मुअ होइ ॥ ४२ ॥ [समसौयदु खपरिवर्धितयो कालेन रूढप्रेम्णो । मिथुन योनियते यत्तत्खलु जीवति इतरन्मृत भवति ॥] मिथुन जायापती । 'स्त्रीपुसौ मिथुन द्वन्द्वम्' इत्यमर । समुदायबाचशेऽप्यय लक्षणया जायायां पसौ च प्रयुक्त । तेनायमर्थ -समाभ्यामुभयो साधारणाभ्या मुखदु साभ्यां परिवर्धितयो कालवशेन स्थिरप्रेग्णोमिथुनयोःपत्योमध्ये यमिथुन जाया 'वा पतिर्वा म्रियते तज्जीवति । इतरजीव मृत भवति निरह्दु सदग्धानीवितान्मरणमेव वरमिति भाव । . 'मागच्छन्तम्' इति घ पाट २ 'णीससई' इति ग-पाट ३ 'यापति श्वासा' इति घपाठ ४ "सुखदु स' इति ग य पाठ ५० काव्यमाला। वसन्ते प्रियप्रवासगमनध्रवणविधुरां कुलवधूमाश्वासयन्ती विदम्पा सखी सानुनयमाह- हरिहिइ पिअस्स णवचूअपल्लवो पढ़ममारिसणाहो । मा रुवसु पुत्ति पत्थाणकलसमुहसंठिओ गमणम् ॥ ४३ ॥ हरिष्यति प्रियस्य नवचूतपल्लयः प्रथममञ्जरीसनाथः । मा रोदी पुनि प्रस्थानकलशमुखसंस्थितो गमनम् ॥] हे पुत्रि, शकुनच्छलेन मया प्रस्थानक्लशे स्थापितो नवचूतपल्लवः प्रियस्य गमनं हरिष्यति । अतो मा रोदीरित्यन्वयः । वसन्तागमनचिह दृष्ट्वा खयमेव स्थास्यतीति भावः॥ अनुनयार्थमागतं कान्तं दृष्ट्वा कलहान्तरितात्मनोऽनुराग सूचयन्ती सपरिहासमाह- जो कह वि मह सहीहिं छिदं लहिऊण पेसिओ हिअए । सो माणो चोरिअकामुअ व्व दिवे पिए पट्ठो ॥४४॥ [य कथमपि मम सखीमिश्छिद्रं लम्या प्रवेशितो हृदये । स मानश्चोरेवामुक इव दृष्टे प्रिये नष्टः ॥] प्रणयक्लहरूपं छिद्र लब्ध्या यो मानः सखीभिर्मम हृदये प्रवेशितः । न तु मया खीत इति भावः । स मानः प्रिये हटे सति चोरकामुक इव नः पलायितः ॥ कापि कुमुम्मपुष्पावचयाथै गतायाः सपत्र्याः शोलखण्डन जातमिति सूचयन्ती आह- सहिआहि भण्णमाणा थणए लग्गं फुसुम्भपुष्पं त्ति । मुद्धवहुआ इसिजइ पप्फोहन्ती गहवआई ॥ ४५ ॥ सखीभिर्भण्यमाना लेने लमं युसुम्भपुष्पमिति । मुग्धधूई म्यते प्रस्फोटयन्ती नमुपदानि ॥] 'शशतं पच नसणानि सान्दामि तचूचुचिःमाहुः' इत्यादिकामशानाभिदेन नायकेन स्तनकुद्मगले निहितं शरानं दृष्ट्वा सने कुमुम्भपुर्ष लममिति सखीभिर्भ- म्यमाना मुग्धवधूनसपदानि प्रस्फोटयन्ती प्रक्षिपन्ती हम्यते । मुग्धरित्युपाटम्भप वचनम् । प्रियदत्त नखक्षतमपि न जानातीति भावः ।। .."प्रियतमस' इति ग-पाट.. २. 'इदिहि' इति धन्याठ 1.प्रेषितो' इति घ-पाटः. ४. 'चोरियामुक' इति ग-पाट:. ५. 'सनयोः' इति ग-पाठ.. ६. वधू- सपहस्पते' इति ग-पुम्नथे, 'बधुशा प्रहसते' इति च घ-सुनके पाठः.

. २ शतकम् ] गाथासप्तशती। काव्यात्मनो मरणमय प्रदर्शयन्ती मन्दनेह नायकमनुकूलयितुमाह-- उम्मूलेन्ति व हिअअं इमाई रे तुह विरजमाणस्स । अवहीरणवसविसंतुलवलन्तणअणद्धदिट्ठाइ ॥ ४६ ।। [उन्मूलयन्तीव हृदय इमानि रे तर विरज्यमानस्य । अवधीरणवशविसालवलन्नयनार्धदृष्टानि ॥] रेशम्द साक्षेपसबोधने । विरज्यमानस्य देऽवधीरणवशाद्विसष्टुलमबद्धलक्ष्यं यथा भवति तथा क्लन्नयनार्धे येषु एतादृशानि दृष्टान्यालोकनानि मम हृदयमुन्मूलयन्तीवे- त्यर्थ । एतेनास्ता तव विराग । विरागसूचकेनावलोकनेनापि मम मरणावस्था भव- वीति सूचितम् ॥ काप्यात्मनो विरह विधुरता सूचयन्ती विरलदर्शनं नायकमाह- ण मुअन्ति दीहसासं ण रुअन्ति चिर ण होन्ति किसिआओ। धण्णाओ ताओ जाणं बहुवल्ह वल्लहो ण तुमम् ॥ ४७ ॥ र मुग्धन्ति दक्षसान सदन्ति चिर न भवन्ति । धन्यास्ता यासा बहुघल्लम वल्लभो न त्वम् ॥] भस्माभिस्तु त्वामासाद्य सर्वमिदमनुभूयत इति भाव ॥ श'यागारविनिर्गताया. प्रियाया परिवृत्त्यावलोस्न नायक खसौभाग्यस्यापनार्थ- णिहालसपरिघुम्मिरतंसवलन्तद्धतारालोआ । कामस्स वि दुव्विसहा दिट्ठिणिवाआ ससिमुहीए ॥४८॥ निद्रालसपरिघूर्णनशीलतिर्यग्वरदर्धतारकालोका । कामस्थापि दुर्विपहा दृष्टिनिपाता शशिमुख्या- 1] मुरतजागरानिदालस अत एव, परिघूर्णनशील , अनुरागातिशयात्तिर्यग्वलनर्धतार- कालोको येषु तादृशा शशिमुरया रष्टिप्रपञ्चा कामस्यापि धैर्यच्युतिं कुर्वन्ति, किं पुन. कामातुराणामिति भाव ॥ काप्यात्मनो आरं प्रत्यनुराग चिरपोषितप्रियागमने च निष्प्रत्याशता दर्शयन्ती हृदयोपालम्भच्छलेनाह- जीविअसेसाइ मए गमिआ कहूँ कहँ वि पेम्मदुद्दोली। पहिं विरमसु रे डबृहिअअ मा रजसु कर्हि पि ॥ ४९ ॥ १ अवहीरअसविसंटुल' इति ग-पाठ ३. "धण्णा ताउ' इति ग-पाठ ४ 'दीर्घश्वास' इति ग पाठ. इति य पाठ. ६ 'धन्यास्तु तासु' इति घपाठ. माह- . २. 'अवधीरितमविसष्टुल' इति ग-पाठ ५ 'कृशाय' ७ परिघूर्णमान' इति ग-पाठ..

काव्यमाला। [जीवितशेषया मया गमिता कथ कथमपि प्रेमदुदौली। इदानी विरम रे दग्पहृदय मा रेज्यस कुत्रापि ॥] पाशानामन्योन्यबन्धकृतो दुर्भाच्यो प्रन्यिदोलीति प्रसिद्धा । विरहक्षीणतया जी- वितशेषया मया प्रेमदुर्दोली तस्य मम च प्रेम्णः परस्परानुबन्धित्वादुाँचो प्रन्थि कथ कथमपि आगमिष्यतीति प्रलाशया सखीजनाभ्यर्थनया आत्मवधपातकभयाध गमिता। एतेन प्रियागमनप्रत्याशात्याग. सौभाग्यं दृढभक्तिता चात्मन, सूचिता । तादृशविरहदा- हमनुभूय पुनरन्यत्रानुरज्यस इति सनिर्वेदमाह-रे दग्धहृदयेति । इदानी विरम मा रज्यः कुत्रापि इत्यनेनागनुरकस्य निषेधायोगाचार प्रसनुरागः सूचितः ॥ नायकस्यानुरागवृद्धये दूनी कस्याश्चिन्तनखक्षतावलोकन कौतुकमाह- अज्ञाएँ णवणहक्सअणिरीक्सणे गरुअजोव्वणुत्तुङ्गम् । पडिमागअणिअणअणुप्पलच्चिों होइ थणवहम् ॥ ५० ॥ आर्याया नवनखक्षतनिरीक्षणे गुरुक्यौवनोत्तुङ्गम् । प्रतिमागतनिजनयनोत्पलार्जितं भवति सनपृष्ठम् ॥] आयाया वरत्रियाः ॥ स्त्रीसेवाविमुखं नायकमभिमुसयितु विपरीतरतानभिज्ञा च नायिका शिक्षयितु निस. टार्थदृती भगवत कृष्णस्य लक्ष्म्याश्च कामपरा नमस्कारच्छलेनाद- तं णमह जस्स वच्छे लच्छिमुहं कोत्यहम्मि संकन्तम् । दीसइ मअपरिहीणं ससिविम्यं सूरम्वि व्व ॥ ५१ ।। [त नमत यस वक्षसि लक्ष्मीमुखं कौस्तुभे संक्रान्तम् । दश्यते मृगपरिहीन शशिबिम्ब सूर्यविम्व इव ॥] विपरीतरतावस्थायां यस्य वक्षति कौस्तुभे प्रतिविम्यित लक्ष्मीमुस सूर्यविम्बे प्रति. बिम्बित निष्कलङ्क चन्द्रबिम्यमिव दृश्यते तं नमतेलन्वयः॥ प्रियाननुयाय दूती करहान्तरितामाह- मा कुण पडिवक्ससुई अणुणेहि पिपसाभलोहिल्लम् । अइगहिअगरुममाणेण पुत्ति रासि व्व लिजिहिसि ॥ ५२ ॥ . १. प्रेमदुर्गाया' इति घ-पाट. २. 'र' इति घ-पाट:. ३. ईश्वरमुताया' दई ग पाट... सनतर' इति ग-युस्त रे, 'सनपट्ट' इति च घ-युसन पाठ . ५. 'कोत्म अम्मि' इति ग पाठः. १. 'पिम्य' इति ग-पाठ. ७. 'अमुवि ग-पार', - २ शतकम्] गाथासप्तशती [मा कुरु प्रतिपक्षमुखमनुनय प्रिय प्रसादलोमयुतम् । अतिगृहीतगुरुक्मानेन पुनि राशिरिर क्षीणा भविष्यसि ॥] हे पुनि, प्रतिपक्षस्य सपनीजनम्यावकाशदानेन मुस मा कुरु । प्रसादाभिलाषिण प्रियमनुनय । अतिमहीतगुरुममानेन राशिरिय क्षीणा भविष्यति । मापादिराशिरपरि पापाणादिना नियन्त्रितो यथा क्षीयत इत्यर्थः । अनुनय उन्धोऽसी मानी न त्वामननेष्य- तीति भावः॥ विरहोकण्टिताया विरहाति व्यमयन्ती दूनी तत्कान्तमाह- विरहकरवत्तदूसहफालिजन्तम्मि तीम हिसअम्मि । अंसू फजलमइल पमाणमुत्तं व्य पडिहाइ ।। ५३ ।। [विरहकरपत्रदु सहपोट्यमाने तसा हृदये । अश्रु पजलमलिन प्रमाणसूनमिन प्रतिभाति ।] प्राइते पूर्वनिपातानियमा महविरहरक्षणकरपत्रेण पाट्यमाने तस्या हृदये कचल- मलिन मथु प्रमाणमूत्रमिय प्रनिमातीति सबन्ध । तदेव विरहविधुरामनुकम्पस्वैति माव:। विदग्धनायिकासगमोलमुकं नायक दूनी प्ररोचयितु निपेधमुखेनाह- दुण्णिक्सेवममे पुत्तम मा साहस के रिजासु । एत्थ णिहिताइ मण्णे हिसआई पुणो ण लभन्ति ॥ ५४ ॥ [दुनिक्षेपकमेतत्पुरक मा साहस परिप्यसि । अन निहितानि मन्ये हृदयानि पुनर्न लभ्यन्ते ॥] पुत्रवेति विश्वासार्थ राम्नेहसयोधनम् । एतदृदयनिक्षेपरूप साहस मा करिष्यसि । यतो दुनिक्षेपरमेतदिति योनना । रोकेऽपि यो निक्षेप पुनर्न लभ्यते स दुर्निक्षेप इत्यु- च्यते । एतेन चाटु चातुर्यसौन्दर्यादिभिर्नायिकाया मनोहरत्व व्यज्यते ।। रतावसाने नायिकाया अपरितोपमारण्य विलक्ष नायक बोधयितु दूती तस्याधि- ररततादोपपरिहारामाह- णिव्युत्तरआ वि वहू मुरअविरामट्टिई अआणन्ती । अविरअहिअआ अण्णं पि फि पि अस्थि ति चिन्तेइ ॥ ५५॥ १. 'प्रसादलोभिष्ठम्' इति ग-पाठ . २. 'क्षीयसे' इति ग पाट. ३ 'पाडि- जन्तरसती हिअअEस' इति ग-पाट. ४. 'पाव्यमानस्य तस्या हृदयस्य' इति गपाठ.. ५. करेजा इति गापाला. इत्य इति ग-पाट . ७. 'उणो इति ग-पाठ.. ..'इद' इति ग पाट. ९.'विणिवुत्त' इति स पाठ.

. ५४ काव्यमाला। [निवृत्तरतापि वधूः सुरतविरामस्थितिमजानती । अविरतहृदयान्यदपि किमप्यस्तीति चिन्तयति ॥] एतेन नायकेच्छानुपालन मौरभ्य च नाधिकायाः सूचितम् ॥ भुजंगजन रोचयितुं नी धेश्याप्रेमस्तुतिमाह- णन्दन्तु सुरअमुहरसतहावहराई सअललोअस्स । बेहुकैअवमग्गविणिम्मिआई वेसाणं पेम्माई । ५६ ॥ [नन्दन्तु मुरतमुखरसतृष्णापहराणि सकललोकस्य । बहुकैतरमार्गविनिर्मितानि वेश्यानां प्रेमाणि ॥] उत्तममध्यमाधमरूपसकललोकस्य मुरते यः सुसरसस्तन या तृष्णा तदपहारकानि ययाभिलषितसपादकानि तथा यहुभिः कैतवमागैर्हसितशुष्करदितचातुप्रमुसर्विनिर्मिता. नि वेश्यास्त्रीणा प्रेमानि नन्दन्तु । लामसत्कारादिमाधि भवन्विलयं. । 'मुस्तरसरभस- तृष्णापहराणि' इति पाटे सरभसानि च तानि तृष्णापहराणि पेति कर्मधारयः॥ किमिति त्वं कृशासीति सहास नायकेन पृष्टा विरहोलण्टिता तमाह- अप्पत्तमण्णुदुक्सो कि मं किसिमत्ति पुच्छसि हसन्तो । पावसि जइ चलचित्तं पिमं जणं ता तुह कहिस्सम् ॥ ५७ ॥ [अप्राप्तभन्युदुःख. किं मां कृोति पृच्छसि हेसन् । प्राप्स्यमि यदि चलचित्तंत्रिय" जनं तदा तय कथयिष्यामि ॥] प्रियापराधजयित्तशोभो मन्युः । न प्राप्त मन्युात दुःसं येन तास्वरत्वं हसन्सन् बिमा शेति पृच्छति । इसग्नित्यनेन लोहम्य हृदययावता सूचिता । तदेति । इदानी कवितेऽपि न ते प्रखयो भविष्यति । तवास्थिरहत्यान्ममेय दरोति भावः । विरागत जार बिरहोकन्टिता सनिवेदमाह-- अपहरियण सद्विजम्पिाइँ जाणं ऐकण रमिमोसि । एआई ताई सोक्राइ संसओ जेहि जीभस्म ॥ ५८॥ १. विनितरता' इति घ-पाठः. २. 'बहुमग्गविनिमआइ' इति ग पाटः, ३. 'मुरभाई' इति ग-पाठः. ४. 'मुरतगुमरम' इति घ-पाट:. ५. 'बहुपतिकाना मार्गनिनिमितानि' इति ग-पारः ६. 'येश्यावनिताना' इति घमाट. . 'मुरतानि' 4. 'मानस' इति गबारः. ९. 'इसमानः' इति ग-पार: ..'मादि सावमलवित प्रिय अनं तावश्याने' इति घगाउः. 19. 'प्रियाउन ततरतेपपिप्दै विग-परा. ११. 'ए दुर्म रनिभोगि-पाट:.

प्रपापालिकापि तथा तथा धारां तनुशामपि तनूक्रोनि ॥] पिपासापगमेऽपि जलपानच्छलेन मुसावलोकनवृतहरादूर्वाक्ष पथिने यथा यथा १. अपहत्य' इति घ-पाठः, २. 'कृते व रनित 'इदिग-पाट. ३. वालु। इति ग-पाठ...'अम्याः' इति गपाट.५.'खभाव.' इति धपाट... फोलिभ इति ग-पाटः ७. 'यात्' इति ग-युसरे नास्ति. ८. 'तन्वीमापि तुन्वों २ शतकम् गाथासप्तशती। [अपहस्तयित्वा सखीजल्पितानि येषां कृते न रमितोऽसि । एतानि तानि सौख्यानि संशयो यैर्जीवस ॥] अस्तु तावत्सुखम् , त्वद्विरदा दिदानी जीवितमेव सदिग्धमिति भावः ।। प्रतिवेशिन्यालापच्छलेन दूती मधूकनिकुशे दत्तसकेतं जारमाह-- ईसालुओ पई से रर्ति महुअं ण देइ उच्चेउम् । उच्चेइ अप्पण चिअ माए अइउज्जुअसुहाओ ।। ५९ ॥ • [ईर्ष्याशील. पतितेसा रात्रौ मधूकं न ददात्युच्चेतुम् । उचिनोत्यात्मनैव मातरतिऋजुकस्वभाव ॥] गृहे जायमानस्य जारसमागमस्याज्ञानाहजुखमावत्वम् मधूकनियुज मा गन्छ तस्या गृहमेव गच्छेति जारं प्रति व्यज्यते । धृतवाचलं बलादाकृष्यानुनयमगृहीत्ता गच्छन्ती नायिका नायक आह- अच्छोडिअवस्थद्धन्तपत्थिए मन्धरं तुमं वच्च । चिन्तेसि थणहराआसिअस्स मज्झस्स वि ण भगम् ।। ६० ।। विलादाकृष्टवस्त्रार्धान्तप्रस्थिते मन्थर त्व बज । चिन्तयसि स्तनभरायासितस्य मध्यस्यापि न मङ्गम् ॥] मलादाकृष्टं धनार्धान्त बनायलो यया सा चासौ प्रस्थिता चेति कर्मधारयः । अस्तु तावन्मम प्रणयभरा, इतगमनेन स्तनभरायासितस्य मध्यस्यापि मझ न चिन्त- यति अहो ते मौरभ्यमिति भावः ॥ नागरिकः सहचरे प्रत्यात्मनो विज्ञत्वाध्यापनाय पथिकप्रपापालिफयोरन्योन्यानुरा- गमाद- उद्धच्छो पिभइ जलं जह जह विरलङ्गुली चिरं पहिओ। पावालिआ वि तह तह धारं तणुई पि वणुएइ ॥ ६१ ॥ [उद्मशः पिबति जलं यथा यथा विरलाहुतिश्विर पथिक । रोति' इति ग पाठः.

काव्यमाला। अलगलनाय पिरताहुलि. सचिरं अतं पियदि तथा तमा पापालिशापि हरनुरोधान. न्मुसावलोकनकुतूहलार्थ तनुकामपि धारा तनगरोलीसः ।। कोऽपि पासुरः सामपि दुसभी नायिकामुपायान्तरेण मारामसमझे मिशास्त्रार्थन- ध्याजेन तदीयगृह गतः । सा च तं या स्वयमेव भिदा दातु गता। ततो भिमादा माय निर्गता यम् विमिति चिरयतीति जिज्ञायमाना व प्रति सपक्षी भिशाधादि शादापोरन्योन्यानुरायमाह- भिच्छा पेच्छइ णाहिमण्डलं सावि तस्स मुहअन्दम् । सं चटुअं अ करई दोह वि कामा विलुम्पन्ति ॥ ६२!! मिक्षाचः प्रेक्षते नाभिमण्डलं सापि तम्य मुखचन्दम् । तेचटुकं च परत द्वयोरपि काका पिलुम्पन्ति ॥] चटु भिक्षादानशनम् । दामिति यावत् । पर निहार्य का विड पन्ति । तद्तम सादन्तीत्यर्थः । द्वयोः परस्परदनमानेगानुरागसम्मेवार कानां निर्भयत्वमिति भावः। नियमनुनेतुं परोचयन्ती सती क्लहान्तरितामाद- . - २ शतकम्] गाथासप्तशती। मनोरयप्राप्ताविव मनोरथसिद्धिहेतावपि मनोविकारा मवन्तीति निदर्शयनागरिक सहचरमाह- परहीवाहणपुण्णाहमगलं लङ्गले कुणन्तीए । असईअ मणोरहगम्भिणीअ हत्था थरहरन्ति ।। ६५ ॥ कार्पासीक्षेत्रकर्षणपुण्याहमङ्गल रागले कुर्वत्या । असत्या मनोरथगर्मिण्या हतौ धेरथरायते ॥ कार्यामीनपणार्थे पुण्याहे गुमदिने यन्मङ्गलमाटेपनादिदा ताले कुवेसा नोरथगर्भिण्या अस्या कार्पासवाट्या मया रन्तव्यमिति हदि न्यस्तमनोरयाया अम. या कुलटाया हस्ती थरथरायेते कम्प प्राप्नुत.॥ सल्या शिक्षार्थे ससोजनो धूर्ताचरितमाह- पहिउहरणसवाउलाहिं असइहिं वहतिमिरस्स । आइप्पणेण णिहुअ वहस्स सित्ताइँ पत्ताइ ।। ६६ ॥ विधिकच्छेदनशङ्काकुलाभिरसःमिर्वहर तिमिरस । आरेपनेन निमृत वटस सित्तानि पत्राणि }] राथूरणं ठेदनम् । अन्धकार बहुलत्वेन सकेतस्थानस्य वटस्य पनाणि पधिकारटे. । दीति शश्या आकुगभिरसतीभिरालेगनेन द्रुततण्डुलपिटेन निमृत निवानि । वविद्याशक्या पान्या न सन्तीति भाव ॥ दन्तधावनार्थ सकेतस्थानकरअशासामपक पार्मिक कुलग सोगरम्ममाह--- मनन्तस्स वि तुह सग्गगामिणो णइकरसाहाओ। पोआ अज वि धम्मिा तुह कह धरणिं विअ दिवन्ति ॥१७॥ भंगतोपि तर सर्गगामिनो नदीकरञ्जशासा । पादावद्यापि धार्मिक तर क्थ घरणीमे स्मात ॥] ऋन्त्वैव वगै जिमिपुरमादिक्या स्थितो दूरस्थशाखामा चन् कथमद्यारि लगन गतोऽमीति भाव ॥ १ 'पहोवादनपुप्पाह-' इति ग-पाट. ३ पथिको नन' पनि ग पाए । 'आनोन' इति घ पाठः ५ 'मार कह पाया समिपन्निभ परति ग-पाठ - 'शासाया' इति ग-युस्तके, पखामि' इति च घ-सुनके पट पदारमारि धार्मिक परणीमेव' इवि ग-पाठ.. २ 'परयरायते' इति गधगाट. ६.'मधमानम्यामि' इति ग घ पट ८.'च्य 'यपि इति घ-पट.

५८ काव्यमाला। नायिकान्तरलोभनार्थमात्मनः स्थिरमेहता कामुकता र नागरिक सहयरमाह- अच्छउ दाव मणहरं पिआइ मुहदसणं अश्महग्यम् । तग्गामछत्तसीमा यि शत्ति दिट्ठा मुहावे ॥ ६८॥ [अस्तु तावन्मनोहरं प्रियाया मुखदर्शनमतिमहाघम् । तहामक्षेत्रगीमापि झटिति दृश मुसपति] सा या प्रामे सति दस प्रामस्य याशेन तस मीमापीरमर्थ । मृतायामपि जायायो हरिकम प्रेरण: प्रशसान्याजेन कापि मन्द नायरमभिः मुसीकमाह- २ शतकम्] गाथासप्तशती। कुलटाया सकेतस्थानगमनस्वरार्थ तवान्यगमननिषेधार्थ च ती राधिकापनचर्य- णाकुलमस्टापदेशेन यामातनायक्स्स सकेतगतस्य स्थितिमाह- गोलाणइए कच्छे चक्रान्तो राइआइ पत्ताइ । उप्पडइ मकडो सोक्सएइ पोह ह पट्टेइ ।। ७१ ॥ [गोदावरीनद्या कच्छे चर्वय राजिकाया पत्राणि । उत्पतति मैट खोक्खशन्द करोत्युदर च ताडयति ॥] मुहुमुहुरुद्रीचिक्या त्या पक्ष्यस्वयि विलम्बमानायां कामाति नाटयनस्तीति भाव ॥ पूर्वसुभगाया सखी तदलकारेणान्यामसमाना मण्डयिनुमिच्योतकान्तस्याक्षेपार्य खभर्नु होचितविधिस्थर्यमाह- गहवइणा मुअसैरिहड्डुण्डुअदाम चिर बहेऊण । वेग्गसआइ उण णवरिश अजाघरे बद्धम् ॥ ७२॥ गृहपतिना मृतसैरिभहदण्टादार चिरमदा । वर्गशतानि नीत्वान तरमार्यागृहे बद्धम् ॥] डण्डुभशब्दो वृहदण्टायो वर्तते । गृहपतिना मृत सैरिभस्य बृहद्रष्टायुक दाम चिर मूदा त सहशापरमहिपालपरणार्थे वर्गातान्यनेकमहिषयूयानि नी वा तरसदृशापरम हिपाशात्या आर्योगहे चण्डिकायतने वमित्यर्थ । मम भी मृतस्य पशोरपि मेदवशे- नैव कृतम् , व तु जीव सामेव प्रियभार्यायो तदलकारेणान्यामतदनुरूपामलातुमिच्छ सीत्यनुचितमेतदिति भाव।। सपरनीसपदु वर्षोद्विसामभिनव मुभगो सान्वय ती ससी विभवादपि सौभाग्य गरीय इति प्रदर्शयदी माह- सिहिपेहुणावअसा वहुआ वाहस्स गठिवरी भमः । गअमोत्तिभरइअपसाहणाण मन्झे सवत्तीणम् ॥ ७३ ॥ शिसिपिच्छारतसा यास गर्विता भ्रमति । गजमौक्तिकरचितप्रसाधनाना मध्ये सपतीनाम् ॥] , 'सादन' इति घाट २ 'मकर काशते उदरं चाति' इति घ-पाट "इण्डभह' इति सपाट ४ वग्गसआइ पि पेग्ण गवरं भवाहरे यहम्' इतिग-पाठ ५. सेरिभण्दुभदाम घिरे योटा । यथा तान्यपि नीवा' इति ग-पर 'इण्डभशब्दो होगायो पर्तत । रोगडा मारायिवो सो प्रतिद एव । वर्गशब्द पशु माहे वतंते' पति पुरमालदेव गठियणी ममए । गअनोतागदिशामा' इति गयेशीमति घपार । गाट मुच्चाईनप्रसा-'ले गए.

६० काव्यमाला। भाव ॥ . येन करिवरान्हत्वा तत्कुम्भमुक्काफ्लयूय प्रसाधिता स एवेदानी मत्सभोगातिप्रस तिक्षीगो मयूरमात्रमारणक्षम सवृत्त इति सौभाग्येन जातगर्वा भ्रमतीलथं ॥ कुटनी भुजगप्रोत्साहनार्थमाह-- वकच्छिपेच्छिरीण वकुलविरीण वकभमिरीणम् । वकहसिरीण पुत्वा पुण्णेहि जणो पिओ होइ ।। ७४ ॥ [वत्राक्षिप्रेक्षणशीलाना बोलपनशीलाना वनमणशीलानाम् । वक्रहासशीलाना पुनक पुण्यैर्जन प्रियो भवति ॥ वश्त्यादे कटाक्षनिरीक्षण साभिप्रायवचनप्रयोगो विभ्रममहुरे भ्रमणमाशयनिदशक हसित चाथ । पुण्यरिति धन्यस्त्वमसि येनैवविधापि मम दुहिता त्वा प्रत्येवमनुरोति विजने गोदावरीतीरलतागृहे ध्यानाद्यवस्थित्या सकेत विघ्नकारिण धामिन बुरटा काचिदाह- भैम धम्मिअ पीसत्यो सो सुणहो अज मारिओ वेण। गोलाअडविअडयुडङ्गवासिणा दरिअसीहेण ॥ ७५ ॥ [भ्रम धार्मिक विसव्य स शुनकोऽद्य मारितस्तेन । गोदातटविटयुआयासिना दृप्तसिंहेन ।] अत्र स्तागृहे सिंहसचारेण गमननिषेधो व्यज्यत ॥ विदिताभिप्रायोऽजि मयति बोधयविधि परिहासशील कमपि युयानमाह- वाएरिएण भरिअ अच्छि कणकर उत्पलरएण । किन्तो अयिह चुम्वन्तो को सि देवाणम् ॥ ७६।। [वातेरितेन भृतमक्षि पूर्णपूरोपरजसा । पूत्युर्वमवितृष्ण चुम्ब काऽसि देवानाम् ।।] पातरितेन कर्णावतसीकृतस्योरपरस्य रजसा भूत नायिकाया अक्षि ततोपनयना कुपन प्रकारव्याननवावितृष्ण चुम्यन् तदवरोदनकानुकनानिमिपनयतत्यादयान मध्य तमो दवस्त्वम् । प्रनिदानो दवानामेवविधपुष्यफ गामियामाया ति भार । १ 'चकोहीपनशिगना' इति य पाट , 'वहानसी ना इति च गए २'धम्मिा भम इति गगाट ३ धार्मिक भ्रम मिश्रन्ध वा व्यापारित म्देन । गोशारीतटनिकटकुप' इति ग-पाट ४ इयरअउपल' की ग-पट. ५ पुषन्तम दिगपार ६ 'युम्यता' इति ग पाट वरचिोरल रजसा विगसार दे . २ शतकम् गाथासप्तशती। कान्तानयनत्वराणे मदनातिममिनयन्ती प्रोपितभर्तृका सखीमाह--- सहि दुम्मेन्ति कलम्याइ जह म तह ण सेसकुसुमाइ । गूण इमेसु दिअहेसु वहइ गुडिआधणु कामो ॥ ७७ ॥ [सखि व्यथयन्ति कदम्बानि यथा मा तथा न शेपकुसुमानि । नूनमेषु दिवसेषु वहति गुटिकाधनु काम ॥] गुटिकाकारेण क्दम्बकुसुमेन कुममाखो मा तापयतीति भाव । एतेन वस तापे क्षयापि वपासले विरहिणा दु सह इति ध्वनितम् । विरहोत्कण्ठिताया सखी नीवधपातकभय दर्शयन्ती तत्कान्त तदुपगमनार्थमाह- गाह दुई ण तुम पिओ त्ति को अह्म एत्य वावारो। सा मरइ तुझ अँअसो तेण अ धम्मक्सर मणिमो ॥ ७८ ॥ [नाह दूती न त्व प्रिय इति कोऽस्माकमन व्यापार । मा प्रियते तनाशाम्तेन च धर्माक्षर भैणाम ॥ कोऽस्माकमिति नियत्वात्तवैव तदनुकम्पनमुचितमित्याशय ॥ कृतचरणपातमनुनयन्त कात सण्डिता युक्त्सन्तरसङ्गचिह्न दशयन्ती सोपाल म्भमाह- तीअ मुहाहिं तुद्द मुह तुज्झ मुहाओ अ माह चलणम्मि । हत्थाहत्यी गओ अइदुधरआरओ तिलओ ॥ ७९ ॥ तिस्सा मुखात्तन मुख तव मुखाच मम चेरणे । हस्ताहस्तिक्या गतोऽतिदुईकरवारकस्तिलक ॥] अन ति सोपालम्भच्छरेन युक्त्य तरसरचिह्नमाविष्कृतम् ॥ इयमस्मिननुरति नागरिक सहचरमवयमयभाह- सामार सोमलिजइ अद्धच्छिपरोइरीभ मुहसोहा। जम्यूदलकअण्णावअसभरिए हलिभपुत्ते ॥ ८॥ १ 'कअम्बाई' इति ग पाठ २ "दिअसेसु' इति ग-पाठ ३ 'दुमनाय ते पति गपाट, 'नयति' इति घ-पाट ४ 'विरहे' इति ग-पाठ वम इनि तद विरहे इति ग घ पाठ . भगामि' इति ग पार ८ 'हत्यिच' इति गपाठ 'चरण' इति ग पुस्तके, 'चरणयो ' इति च घ पुस्तके पाठ.. १. 'दुसर' इति ध पाठ 1. 'सामलीए' इति ग पाठ १२ "पनिरे हटिभउत्ते' इति ग-पाठ . गपाद ६ काव्यमाला। ૬િ૨ श्यामाया श्यामलायतेऽर्धाक्षिप्रलोकनशीलाया मुखशोमा । जम्वृदयकृतकर्णावतसभमणशीरे हलिकपुत्रे ॥] सकेतस्थानसूचकेन नम्वूपण कृत वर्णवतसो येन तादृशश्चासौ भ्रमणशील थेति कर्मधारय । तथाभूते हरिकपुन सति निस्वार्थमधाभिप्रेक्षणशीलाया श्यामाया मुखशोभा सकेतसमयस्सनलक्ष्यण सेदेन च श्यामलायवे । खयमेव मलिना भवती खध ॥ क्लहा तरिता का तानुनयाय दूतीमाह- दूइ तुम विभ पुसला क्क्सडमउआइँ जाणसे वोडुम् । कण्डूइअपण्डुर जह ण होइ तह त कैरेज्जासु ॥ ८१ ॥ [इति त्वमेव फुशला कर्कशमृदुकानि जानासि वक्तुम् । कण्डयितपाण्डुर यथा न भवति तथा त करिष्यसि ॥] यथा कण्डूयनकौशलेन वण्डू शाम्यति वैष्प च न भवति, तथा त्वमपि मृदुक्टु केन तथा वक्ष्यति यथासो नोद्विनत मा च भनत इलाशय ॥ कमपि बहुबलभ नायक प्रति ती कम्याश्चिदनुरागमाह- महिलासहस्सभरिए तुह हिअए सुहअ सा अमाअन्ती। दिअह अणण्णकम्मा अग तणुअ पि तणुएइ ।। ८२ ॥ [महिलासहसभृते तर हृदये सुमग सा अमाती। दिवसमैन या अङ्ग तनुक्मपि तनूकरोति ॥] अमाती स्थानमलभमाना • दिवस व्याप्य । प्रतिदिनमिति यावत् । प्रतिदिन वत्समागमोपायवितया क्षीयत हाथ ॥ वोऽपि कस्याचिदनुरागातिशय सूचय सहचरमाह- राणमेत पिण पिट्टइ अणुदिअहविइण्णगरअसतावा । पच्छण्णपारसके व्व सामली मझ हिअआओ ॥ ८३ ।। १ 'दयामायते श्याम नया इति ग पार ३ 'वतसे प्रमति इति ग पाठ ३ 'वत्तुम् । कण्डूइपण्डुराण इति क ख पाट ४ 'कुणेवामु' इति पाठ ५'वर टिनमृदुवानि इति ग पाठ ६ 'नानाप इति घ पाठ ७ 'कण्डूतिपाण्दुर' इति कस पुस्तक्यो, कण्डूयति पाण्डर' इति चघ पुस्तके पाठ ८ "मुझटापम लहटी इति ग पाठ ९ 'मुभगस्थानमरमती' इति ग पाट १० 'अनन्यव्या पारा' इति ग पाठ ११ हिअआहिं इति ग पाट - २ शतकम् . गाथासप्तशती। ६३ [क्षणमानमपि नापयात्यनुदिवसवितीर्णगुरुकसंतापा । प्रच्छन्नपापशव श्यामला मम हृदयात् ॥] अनुदिवसं वितीणों गुरुकः संतापो विरहतः पक्षे अनुस्मरणतय यया सा। तथा श्यामला श्यामा । काफि मुशीला नायिका कृतापराधमनुनयन्तं कान्तं सप्रणयरोपमाह- अजाणाहं कुपिआ अवऊहसु कि मुहा पसाएसि । तुह मण्णुसमुप्पाअऍण मज्झ मागेण विण कजम् ।। ८४ ।। [अज नाहं कुपिता उँपगृह किं मुधा प्रसादयसि । तव मन्दुसमुत्पादकेन मम मानेनापि न कार्यम् ॥] अनभिज्ञ सामिनि मानो निष्पल इति भावः ।। विरहोत्वण्ठितायाः समी तरकान्तमाह-- दी हपउरणीसासपआविओ वाहसलिलपरिसित्तो। सादेइ सामसवलं व तीऍ अहरो तुह विओए ॥ ८५ ।। [दीर्घोप्णप्रचुरनि.श्वासप्रततो वापस लिलपरिसिक्तः । साधयति श्यामशयल मित्र तसा अधरस्तनं वियोगे ।] श्यामशयले व्रतविशेषः । यनामो प्रविश्य जले प्रविश्यते । कापि मध्याहाभिसारिका 'सकेतितहदतीरलतागृहमह गता, त्वं तु न गत.' इति जार प्रति प्रतिपादयन्ती सत्यपि हृदयस्य स्थिरसेहता सज्जनहृदयप्रशसाधनाइ- सरए मतदाणं अन्ते सिसिराइँ वाहिरुलाई । जाऑइँ कुविअसजंणहिअअसरिच्छाइँ सलिलाई ॥८६॥ शरदि महाहदानामन्तः शिशिराणि बहिरुष्णानि । जातानि कुपितसजनहृदयसंरक्षाणि सलिलानि ॥] दूती कस्याश्चिन्मोरध्यवर्णनच्चलेन प्रथमाभिसारखीकारे सूचयति- आअस्स किं गु करिहिम्मि कि पोलिस्सं कहं गु होइहि[इमिति। पदमुग्गअसासहआरिआइ हिअअं थरहरेइ ।। ८७ ॥ १.नापति' इति ग पाठः २. 'उज्जुअ' इति ख-पाठः. ३. शुक' इति घ पाठः. ४. 'अवगृहस्ख' इति ग-य-पाट'. ५. 'प्रतापितो' इति घ-पाठः. ६. 'पारे- पिकः' इति ग-घ-पाठः. ७. 'साधयत्यमिपानीयव्रतमिव' इति ग-पाठः, ८. शीतानि' इति ग पाठ.. ९. 'सदृशानि' इति गघ पाठ:. .

काव्यमाला। [आगतम किं नु करिष्यामि किं यस्यामि कथं नु भविष्यति [इदम् ] इति । प्रथमोगतसोहसरारिवाया हृदयं थरथरायते ॥] समभिसरणशाहसम् । परपरायते कम्पदे । करटहान्तरितामा पहिलवशेषपरिहाराय दूती तरकान्तमगृहीतानुनयविलक्षमाह-- णेउरकोटिविलग्गं चिउरं दइअस्स पाअपडिअस्स । हिमश्र पउत्यमाणं उम्मोमन्ति विन कहे। ॥ ८८ ॥ निपुरकोटिस्लिमं चितुर दयितम पादपतितम्य । हदयं मोषितमानमन्मोचयन्त्येय कथयति ॥] नपुरकोटिक्लिम दयितस्य चिकुरमुन्मोचयन्लेव हृदयं प्रोषितमानं कथयतीति संवन्धः । अयमादायः-असण्डितप्रणाया मानिन्यो वाचा मुसरागेण वानाविष्कृतं प्रसादं चेष्टाविशेषेणाविष्कुर्वन्ति । तया च नपुरायला तप केशमुन्मोचयन्लेन हटपरि- रम्भलोप हृदर्य कथितमेव । पया तु तदनुरूप न कृतम् । मतस्तववेदमवैदग्भ्यम् , न तु तस्या महित्वदोप इति । दूती कम्पाश्चिदनुरागातिशय प्रतिपादयन्ती नायकमाह- तुझगराअसेसेण सामली तह सरेण सोमारा । सा किर गोलाऊले हामा जम्यूकसाएण ॥ ८९ ॥ तिवाद्वरागशेषेण श्यामला तथा सरेण सुकुमारा । सा किल गोदाकूले नाता जम्बूकपायेण ॥] कृतागोदर्तनस्य तवा रागशेषेण तीक्ष्णेन जम्बूकपायेण सा सुकुमारानी माते. त्यर्थः। फिलेति सानारची फिलान्दः । सानच्छलेन तया वासमाभिलापिण्या सकारागोच्छिमहणं कृतमिति भावः। पालमस्य गोष्टीनायक्ता वर्णय ती विरहोत्वण्टिता सखीजनमाह- अन वेअ पउत्यो अज विअ सुण्णआई जाआई। रत्थामुहदेउलचत्तराई अझं च हिअआई ॥ ९० ॥ [अद्यैव प्रोपितोऽथैर शून्यकानि जातानि । स्थ्यामुखदेवकुलचत्वराण्यसार्क च हृदयानि । १. वक्ष्ये' इति ग-पाठ, २. 'साहसिकाया हृदय भयेन कम्प' इति गपाउः. ३. 'उन्मूल्यन्त्येव' इति ग-पाटः. ४. 'तुमः' इति ग पाठः ५. 'श्यामली' इति ग- पाठा. ६. 'गोदावरीप्रवाहे' इति ग-पुस्तके, 'गोदावरीतीरे' इति च घ-पुस्तके पाठः २ शतकम् गाथासप्तशती। कस्याश्चिद्गणिकाया भुजगजनेन क्रियमाणां ग्लाघामसहमाना निजगुणगर्वमभिव्य. जय ती काचिदाह- चिरडि पि अवाणन्तो लोआ ोएहि गोरवन्महिना। सोणारतुले व्व णिरक्परा वि सन्धेहि उमन्ति ॥ ९१ ॥ [सिद्धिरस्तु इत्यादि]वर्णावलीमप्यज्ञान तो लोका रोकगौरवाभ्यधिका । सुपर्णकारतुला इय निरक्षरा अपि स्क् धैरुख ते ॥] यथोक्तार्थकश्चिरडीति देशीशब्द । निरक्षरा अक्षरेखारहिता । पक्षे अविया अपि स्व धैरह्यते । सादरै नीयत इत्यर्थ । क्लहा तरिताया पात उत्कण्ठाविनोदार्थ सहचरमाह-- आअम्वन्तकवोल खलिअक्सरजम्पिरिं पुरन्तोट्ठिम् । मा छिवसु त्ति सरोस समोसरन्ति पिअ मरिमो ॥ ९२ ।। [आतामात कपोला स्खलिताक्षरजल्पनशील स्फुरदोष्ठीम् । मा स्पृशेति सरोप समपसर्पती प्रिया स्मराम ॥] आमनो विज्ञवरयापनाय नागरिक सहचरमाह- गोलाविसमोआरच्छरेण अप्पा उरम्मि से मुफो। अणुअम्पाणिहोस तेण वि सा आढमुवऊढा ॥ ९३ ॥ [गोदायरीविषमावतारच्छेतेनारमा उरसि तस्स मुक्त । अनुकम्पानिदोंप तेनापि सा गाढमुपगूढा ॥] म दनेह नायक दूती नायिकानुरागक्थनेनानुकूलयितुमाह- सा तुइ सहत्यदिण्ण अज वि रे सुहअ गन्धरहिम पि । उव्वसिअणभरपरदेवदे व्व ओमालिअ वहइ ॥ ९४ ।। [सा यया स्वहस्तदत्तामद्यापि रे सुभग गधरहितामपि । उद्वसितनगरगृहदेवतेव अवमालिका वहति ॥] १ "विणई' इति ग पाठ २ "विनतिमप्यजान तो इति ग पुस्तके, 'वर्णमाया न तो इति च घ पुस्तके पाठ विनति सिद्धिपादिकां सिद्धिरस्तु इत्यादिकाम्' इति पुलवालदेव ३ गौरवाभ्याता' इति घस्तके, गौरवणार्चिता' इति च ग पुस्तके पाठ ४ अरेखारहिता इति युर । दव इति धपाट ६ “जस्पिनी एफुरदोष्टाम्' इति ग पाट ८ 'गाढ' इति ग पाठ ९ व्याजेन इवि ग पाट ११ 'हरदेवते इति ग पाठ ५ 'आताप्रायमाणकपोल" 'स्मरामि इतिगपाठ १. 'अपरहिअ इति ग ११ 'देवतामिद नवमालिको इति घ-पाट पाट काव्यमाला। . परिवानेन पर्युषितत्वेन च मर्दिता माला अवमालिका । रे सुभगेति सखेद संवो धनम् । सा मुन्दरी त्वया खकेशपाशादाकृष्य सहस्तदत्ता गन्धरहितामप्यवमालिका स्वत्करस्पर्शवहुमानादद्यापि वहति । उद्वसितनगरगृहदेवतेवेति । अयं भावः-वद्विर- हादिदानीमकृतप्रसाधना सहजसौन्दर्यमात्राभरणा त्वद्गतचित्ततया निर्जीवालेख्यपुनि. केव शोच्या दशामुपगता, अतस्तामनुकम्पखेति भावः ॥ मानप्रणाथै शिक्षयन्ती यन्धुपुरंध्री काचिदाह- केलीअ वि रूसेड ण तीरए तम्मि चुकविणअम्मि । जाइअएहि व माए इमेहिं अवसेहि अङ्गेहिं ।। ९५ ॥ [केल्यापि रुषितुं न शक्यते तसिंश्युतविनये । याचितकैरिय मातरेभिरवशैरङ्गैः॥] च्युतविनये रतिगेल्यलचितलने तस्मिन् याचितवैरिव अभ्यर्थ्यानीतैरिव एभिरव- शैरवाधीनर हे मातः, वेल्या परिहासेनापि रोप. कर्तुं न शक्यत इत्यर्थः । एतेन कान्ते प्रणयातिशयो व्यज्यते ॥ कामुक्जनानुरजनार्थमात्मनो विपरीतरताभिज्ञता सूचयन्ती काचिदुरपुलक्या कीइन्ती बालिका निवारयन्तीमाह-- उप्फुल्लिआइ सेल्लउ मा गं बारेहि होउ परिऊदा। मा जहणभारगरुई पुरिसाअन्ती किलिम्मिहि ॥ ९६ ॥ [उत्फुल्लिकया खेलतु मैना वारयत भवतु परिक्षामा । मा जधनभारगुर्वी पुरुषायितं दुर्वती फ्लमिष्यति ॥] पादोपविष्टानां मुहुः पतनो पतनरूपा क्रीडा उत्फुटित्युच्यते । भवत्विति । भ्रमेण जितश्वासा कृशमध्या च भवस्विति भावः॥ शीलखण्डनविलक्षाया. युलजायाचित्तसमाधानार्थ तत्पक्षपातिनी काचिदाह- पउरजुवाणो गामो महुमासो जोअणं पई ठेरो। जुण्णमुरा साहीणा असई मा होउ कि मरउ ।। ९७ ॥ १. 'जाअई अभिव माए' इति गराउ:. २. 'कोडयापि' इति ग-पाठः. ३. 'रो- पिन' इति घ-पाठ ४. शक्नोमि' इति ग घ-पाटः, ५. 'अपगतविनये' इति ग-पुस्तके, 'गतविनये' इति च य पुस्तके पाठ.. ६. 'जायतेऽस्मा मातरेभि इति ग पाठः, ५, 'परिगूडा' इति घ-पाठ. 4. 'पुरुषायन्ती ऋमिष्य वि' इति घ-पाठ, २ शतकम् गाथासप्तशती। . प्रचुरयुवा ग्रामो मधुमासो यौवन पति. स्थविर । जीर्णसुरा स्वाधीना असती मा भरतु किं प्रियताम् 1] तदेवमप्रतीमारदारणेपु विनाशकारणेषु सत्सु शीलसण्डन नापराधापादकमिति भावः। मायनस्य मनोहरणार्थ दूती नायिकाया अनुरागातिशयमाह-- बहुसो वि कहिजन्तं तुह अवणं मज्झ हत्थसंदितुम् । ण सुअ त्ति जैम्पमाणा पुणरुत्तसरं कुणइ अजा ॥ ९८ ॥ बहुशोऽपि कथ्यमान तव वचन मम हस्तसदिष्टम् । ने श्रुतमिति जल्पन्ती पुनरुक्तशतं रोत्यायी ॥] पुन पुन धवणानुरागाछुतमपि न श्रुतमित्येव वदतीति भाव ॥ दूती कस्याश्चित्कुल जाया कमपि युवान प्रत्यनुराग सवरणशलं चाह- पाअडिअणेहसम्भावणिभर तीअ जह तुम दिट्ठो। संवरणवावडाए अण्णो वि जणो तह व्वे ।। ९९॥ [प्रकटितस्नेहसायनिर्भर तया यथा स्व दृष्ट । मचरणव्यापृतया अन्योऽपि जनस्तथैव ॥] एतस्मिन्मनुरक्तेयमिति कश्चिमा ज्ञासीदिति सवरणार्थमन्योऽप्ति तथैव दृष्ट इत्यर्थ ॥ प्रसवानन्तरं खामिना सनिधि परित्याजिता काचित्पुनस्य दन्तोद्गस्थनच्छलेन सभोगपुसानुभवसमयमातिमाह- गेलह पलोअह इमं पहसिभवअणा पइस्स अप्पेइ । जाआ सुअपढमुभिण्णदन्तजुअलविअ योरम् ॥ १०॥ [गृहीत प्ररोकयतेद प्रेहसितवदना पैयुर्पयति । जाया सुतप्रधमोदिनदन्तयुगलाङ्कित बदरम् ॥] जाया ३६ घदर गृहित प्रोफयतेति पत्युरर्पयतीति सवन्ध । स्वयमेव क्षत सपाय सुप्रेण क्षतमिति मिध्येव दर्शयतीति प्रहसितवदनेति पदेन ध्वन्यते ।। १. 'प्रचुरयुवको' इति ग घ पाट २. 'स्मतु' इति घपाट . ३. 'जम्पमाण' इति ग पाट.४ 'न शृणोति जल्पमान' इति ग पाठ गघपाठ ६ निर्भरतया' इति ग घ-पाट गपुस्तके, 'जन क्थ तथैव' इति च घ-पुस्तके पट पाट. • विहसित' इति ग-पाठ . १०. 'पधुरात्मनि' इति घपाठ, ११. 'बदनम्' इति कघ-पाठ ५ 'करोतीधरसुता' इति ७ 'जनस्तथाविध एपम्' इति ८. 'मन्द प्रलोको निधन ६८ काव्यमाला। रसिअजणहिअअदइए कइवच्छलपमुहसुकइणिम्मइए । सससअम्मि समत्तं वीअं गाहास एअम् ॥ १०१ ॥ [रसिकजनहृदयदयिते कविरत्सलप्रमुखसुविनिर्मिते । सप्तशतके समाप्तं द्वितीयं गाथाशनकमेतत् ॥] तृतीय शतकम् । मिभ्या जनो घदतीत्यनुनयन्तं कान्तं मानिनी सप्रणयरोपमाह- अच्छउ ता जणवाओ हिअभं विअ असणो तुह पमाणम् । तह तं सि मन्दणेहो जहण उवालम्भजोग्गो सि ॥१॥ [अस्तु तापजनवादो हृदयमेवात्मनसर प्रमाणम् । तथा समसि मन्दनेहो यथा नोपालम्मयोग्योऽमि ॥] अयमस्सो मन्दन्नेह इलेवरूपो जनवादोऽस्तु तायत् । हृदयमेवेति । भारमहृदयेनैव त्व जानासीत्यर्थ । यथेति । निग्यो हि दाक्षिण्येनोपालम्भं सहवे, त्व तूदासीन इति नोपालम्भयोग्य इति भावः ॥ हृदयोपालम्भच्छलेन यथाभिमतकान्ताप्राप्ति सूचयन्ती पुलटा कमपि युवाने रोचयितुमाह- अपच्छन्दपहाविर दुहद्दछम्भ जणं वि सग्गन्त । आसपहेहि भमन्त हिअअ कइमावि भजिहिसि ॥ २ ॥ [आत्मग्छन्दप्रधायनशील दुर्लभलम्भं जन [अपि] मृगयमाण । आकाशपमद्धृदय कदापि मापसे ॥] सेवाय रिस्वसूचनार्थमारमच्छन्दप्रधावनचोरेति संबोधनम् । दुर्लगम्य गुरतमु. रास्य लम्भ. प्राप्तिर्यस्मात्तत् । आकारापनिरवलम्बनमार्गमत् । पूतीप्रमुखोपापा. दिति भावः । पाठान्तरे आयामशरिरथ, । कदापीसपिसन्द, गंभावनायाम् । सल मुभगो यसव भ्रमर्ग शमयिष्यदीति भावः। १. 'विनिर्मिती' इति ग-पाट'. २. तद इनिग पाटा. ३. 'भरमग्मन्दप्रमा विशतु दुईभरभ्य जन निमार्गमान :--पार दरमे ॥ी ग पुसरे, 'भाममा दप्रभावशोले दुलंमलभ्यं जनमवि मार्गमा । भशपश्यतियारि भागा भाति । इति च घपुसके पाट:.

प ३ शतकम्] गाथासप्तशती। कापि गुणगर्विता गणिका सकृत्यत्तं पश्चान्मन्दादरं भुजंगं निन्दन्ती दूतीमाह- अहव गुणविअ लहुआ अहवा गुणअणुओं ण सौं लोओ। अहव झि णिगुणा वा बहुगुणयन्तो जणो तस्स ॥ ३ ॥ [अथवा गुणा एव लैघयोऽथमा गुणज्ञो न स लोकः । अथवामि गुर्णानि घा बहुगुणवाञ्जनस्तस ॥] तस्य जनः प्रियारूपो पहुगुणवान्चेति योजना । येन मा न बहु मन्यत इत्यभिप्रायः॥ अन्यासकं प्रियमात्मनो दुःखाभिव्यञ्जनेन कयं निवारयसीति वदन्ती मातुलानी फापि प्रियस्यास्निग्धता सूचयन्ती रटान्तेन सनिर्वेदमाह- फुट्टन्तेण वि हिअएण मामि कह णिव्यरिजए तम्मि । आदंसे पडिविम्ब व्व जम्मि दुःखं ण संकमइ ॥४॥ स्फुिटतापि हृदयेन मातुलानि कथं निवेद्यते तस्मिन् । आदर्श प्रतिबिम्बमिब यस्मिन्दुःखं न संक्रामति ।] प्रयलसाधितामपि युवती विश्यकारितया नोपगच्छन्त नायकमुत्साहयितु दूती सोपालम्भमन्यापदेशेनाह- पासासवी काओ च्छदि दिण्णं पि पहिअघरणीए । ओअन्तकरअलोगलिअवलअमज्झटिअं पिण्डम् ॥ ५ ॥ पाशाशकी काको नेच्छति दत्तमपि एथिक्गृहिण्या। अवनतकरतलावगलितवालयमध्यस्थित पिण्डम् ॥] यथा पधिगृहिण्या दत्तमप्यवनतादधोमुसीकृतात्करतलादलितस्स क्लयस्य मध्ये स्थित भकपिण्ड काकः पाशशच्या नेच्छति तथा त्वमप्येना मया दीयमानामपि भय. शाया परिहरीति भावः। १. 'गुणअएलओ' इति ग पाठः. २. "पिरगुणाओं' इति ग-पाठः ३. 'गुणार्णको नस लोक । अथवा वय निगा अधिकगुणः स जनस्वस्य ॥ इति घ पुस्तके, 'गुणज्ञ एव न स जनः । अथवा वयमेव निर्गुणा बहुगुणवन्तो जनास्तस्य ॥ इति च ग पुस्तके पाठः. ४. महाए' इति राग-पाठः. ५. स्फुटिदेनापि हृदयेन कथं भगिनि नितीभूयते स्मिन् ।' इति ग-पुस्तके, 'स्फुट तेनापि हृदये मानुलि कप निवारिते तस्मिन् ।' इति च घ पुस्तके पाउ:... 'भपदा प्रतिविम्य मिव' इवि घ-पाटः. ५. 'णेच्छवई' हीतराना-पाठ ४. भेगना गा..."न स्मृति दसमीप बॉल इति १..'उन्मत' इति घसाठ:. ग-पाठ:.

७० काव्यमाला प्रोपितभतृकाया ससी तत्कातस्यागमन परार्थ त स्मीरग मिन पा यमाह- ओहिदिअहागमासकिरीहि सहिआहि कुइलिहिआओ। दोतिण्णि तहिं विअ चोरिआए रेहा पुसिजन्ति ॥ ६ ॥ [अवधिदिवसागमार्शतिनीभि सखीभि दुधलिसिता । द्विवास्तव चोरिक्या रेखा प्रो छ्यत ॥] अवविदिनेऽपि त्वयि नागच्छति नून मिय प्राणानपि पद्यानिति भार ॥ कोऽपि कामुक्थ द्रवर्णनस्टलेनामनोऽभिआप प्रकाशयनायिकामाह- तुह मुहसारिच्छ ण रहइ त्ति सषुण्णमण्डलो विहिणा । अण्णमअ व घडइउ पुणो वि सण्डिन्नइ मिअङ्को ॥ ७ ॥ [तन मुखसादृश्य न लमत इति सपूर्णमण्डगे विधिना । अन्यमयमिन घटयितु पुनरपि खण्यते मृगाद] अन्यमयमन्यप्रकारम् ॥ प्रामा तरगमनाय कृतप्रस्थानस्य गेहा तरे स्थितस्य नायकस्स गमन निषेधार्थ सखी तप्रियात्तातमाह- अज गेओत्ति अन्न गओत्ति अब गओत्ति गणरीए। पढम अि दिनहद्धे कुद्दो रेहाहि चित्तलिओ ॥८॥ [अद्य गत इत्यद्य गत इत्यद्य गत इति गणनशीलया । प्रथम एवं दिवसाय रेखाभिविनितम् ॥] तदेव त्वद्विरहविता ता विहाय गतु नोचितमिति माव ॥ पूधमकृतस्त्रीशराया पवाचिरप्रर्थनया सीमारे कृतवा प्रथमसमागम एव ना यकगुणरजिताया प्रथमाखीचारमनितविक्ष वदनमागस्य निजगुणगावतो नायक स इचरमाह- ण वि तह पढमसमागगसुरअमुह पायिएवि परिओसो। जेह वीअदिअह सपिलक्सलक्सिए वअणकमलम्मि ॥ ९ ॥ तीअ हिआए इति ग पाट सर्वतमीम रासाभिस्तस्यरस न्ला । दिवास्तलि परिकया रेसा प्रक्षिप्य ॥ इति गपाट ३ प्रति सिता नित्वमेव गता तस्या रेखा प्रसाय त ॥ इति घपार ४ 'पुन पुन इति घपाट ५ गओ इति इति ग पाट विसद्ध इति गगाट रेवाभिचित्रित इति ग-युमा भित्ता रेखाभिधिनिता' पति च घपुम्पक ८ 'मुहेगाव परिओसो इति ग-यार ९ अह वीनदिहरम्भे धुम्बाव टिए यअणकमलम्भि' इति स-पाठ २ १ कुग्यो पाठ ३ शतकम्] गाथासप्तशती। नापि तथा प्रथमसमागमसुरतसुख प्राप्तेऽपि परितोषः । यथा द्वितीयदिवससनिलक्षलक्षिते वदनकमले ॥ अपि सलं कुमुममया दाणा मन्मथस्येति सरया पृष्टा सखी सवैदग्ध्यं तामाह-- में समुहागभयोलन्दवलिअपिअपेसिच्छिविच्छोहा। अब ते मअणसरा जणस्स ने होन्ति ते होन्तु ॥ १० ॥ [ये संमुग्वागतव्यतिकान्तवलितप्रियप्रेषिताक्षिविक्षोभाः। अस्माकं ते मदनशरा जनस ये भवन्ति ते भवन्तु ॥] समुसागतेन व्यतिक्रम्य गच्छता परिवृत्तेन प्रियेण प्रेषिता ये अक्षि विक्षोमा रोलातरलकटाक्षा इयर्थः ।। कामपि रमणी प्रति सामिलापः कचिदात्मनोऽभिप्राय प्रकाशयमाह- इअरो जणो ण पावइ तुह जघणारुहणसंगमसुहेल्लिम् । अणुवइ कणअडोगे हुअवह्वरुणाण माहप्पम् ॥ ११ ॥ [इतरो जनो न प्रोमोति तर जघनारोहणसंगमसुखकेलिम् । अनुभनति कनकदोरो हुतरहबरुणयोर्माहात्म्यम् ॥] जय जयनारोहणपूर्वकेण संगमेन यत्सुख तदितरो जनोऽमिगनीयाध्यनतरहितो न प्राप्नोति । मुहुरमी मुहुर्जले प्रवेशस्य फलं कनकदोरोऽनुभवतीलर्थः । कामुक प्ररोचयितु दूती नायिकायाः सौभाग्यातिशयमाह- जो जरस विवसारो तं सो देइ ति कि त्व अच्छेरम् । अणहोन्तं पि खु दिणं दोहग्गं तइ सवत्तीणम् ॥ १२ ॥ [यो' यस विभवसारस्तं स ददाति शिमगाधर्यम् । अभवदपि सलु दत्तं दौर्भाग्य त्वया संपत्तीनाम् ॥] सभापत् अविद्यमानम् ॥ १ मुखेनापि भवति परितोप.' इति ग पुस्तके, 'मुझेन विद्यते परितोष' इति च पुसके पाटः, २. द्विवीयदियसविलक्ष लक्षिते' इति ग पुस्तके, "द्वितीयरतारम्भ उम्पपलिते' इति घ पुस्तके पाठः, ३. 'जे पमुहाग' इति ग-पाठः ४. ये नुपातम्युलामति नप्रियनेशिताक्षि' इति ग-पाठः ५. 'प्राप्यते' इति य पाठः, :. 'क्नकसूत्रं हुतबदवर्गमानमाहात्म्यम्' इति घ-पाठ. ५. 'अस्स विभवसार' इति पादः. ८. 'एल्प' इति ग पाठ.. १..'अविद्यमानमइति घपाट:. ११. 'सपनोय.' इदि घ-पादः, १. पदम्य रिभवसारे तत्व' इति गमाटः, काव्यमाला। . प्रोपितः कश्चिदुरकण्टाविनोदनाथ प्रिया सरन्सहचरमाह- चन्दसरिसं मुहं से सरिसो अमअस्स मुहरसो तिस्सा । सकअग्गहरहसुजलचुम्वणों कस्स सरिसं से ॥ १३ ॥ चन्द्रसदृशं मुखं संसाः सदृशोऽमृतस मुखरसस्तस्याः । सकचग्रह रंभसोज्वलचुम्वनक कस सदृशं तसाः ॥] विमृश्यकारिणं नायकमुत्साहयितु दूयाह- उप्पण्णत्ये कजे अइचिन्वन्तो गुणागुणे तम्मि । चिरआलमन्दपेच्छित्तणेण पुरिसो हणइ कज्जम् ॥ १४ ॥ [उत्पन्नाथै कार्येऽतिचिन्तयन्गुणागुणौ तस्मिन् । चिरकालमन्दप्रेक्षित्वेन पुरुषो हन्ति कार्यम् ।।]. उत्पन्नः सिद्धोऽर्थोऽभिलपितपदार्थो यन तस्मिन् । फलाभिमुख कार्य इति यावत्॥ विरहमसहमाना कापि प्रणयकुपितं कान्तमनुनयन्याह- वालअ तुमाहि अहिलं णिअ धिम वल्लहं महं जीअम् । तं तइ विणा ण होइ चि तेण कुवि पसाएमि ॥ १५ ॥ [बालक त्वत्तोऽधिक निजैकमेव वल्लभं मम जीवितम् । तत्त्वया विना न भवतीति तेन कुपितं प्रसादयामि ॥] प्रथमं कुपिता चरणप्रणामोत्तरं प्रसनां 'मिथ्याखलपचनदूपितचित्तया मया खेदि- तोऽसि' इति वदन्ती प्रिया प्रियः पुनरपि सलवचने प्रत्येष्यसीति कालत्या विधिमुखेन निषेधयनाह- पतिअ ण पत्तिअन्ती जइ तुझ इमे ण मन्झ रअईए। मुट्ठीभ वाहविन्दू पुलइन्भेएण भिजन्ता ।। १६ ।। १. 'रहसुवेञ्चुम्मणं' इति ग-पाठ . २. 'अस्याः' इति ग पाठः. ३. 'रमसो लचुम्बन' ग-पाठ.. ४. 'अस्था.' इति ग पाठ.. ५. 'भह सुन्दर सहच्छित्तणेण" इति ग-पाठ ६. 'उपन्यस्ते' इति य-पाठ . ७. 'चिन्तयमान' इति गपाठ ६. 'अतिसुन्दरलक्ष्णप्रेक्षित्वेन' इति ग-पुस्तके, 'चिरकालशून्यप्रेक्षित्वेन' इति च घ. पुस्तके पाठः. ९. त्वत्तोऽप्यधिक इवि ग-पाटः.१०. 'नियतमेव' इति घ-पाट. ११. 'पत पत्तअन्ती' इति ग-पाठः, १२. 'भिवन्तो' इति ग पाठः, ३ शतकम्] गाथासप्तशती। [प्रतीहि न प्रतीयन्ती यदि तवेमे न मम रोदेनशीलाया । पृष्ठस बाष्पविन्दव पुलकोद्देन मिद्यमाना ॥] प्रतीहि प्रलयं कुर्विति सशिरचालनकापल्या खल्वचसि प्रत्ययमयदापि न करि प्यसीत्यर्थ । एतदेव द्रढयमाह-न प्रतीयन्ठीत्यादिना । रोदनशीलायास्तव इमे बाष्प बिन्दवो सम पृष्टस्य पुलकोद्भदेन यदि न भिद्यमाना मिना नामविष्यन् , तदा त्वन प्रतीयन्ती प्रत्यय नाकरिष्य एवेत्यर्थ । तवाश्रुजलस्पर्शादपि मम पृष्ठ पुलक सजात । तत्किं खलवचसा मामननुरफ कलयसीति भाव ॥ नायकस्य दृढसौहृदमिच्छन्ती नायिका दूती सदृष्टान्तमाह- त मित्त काअव्व ज किर वसणम्मि देसालम्मि । आलिहिअभित्ति वाउल्लअ व ण परम्मुह ठाइ ॥ १७ ॥ [तन्मिन्त्र कर्तव्य यत्किल व्यसने देशकालेषु । आलिखितभित्तिपुत्तलकमिव न पराङ्मुख तिष्ठति ॥] व्यसने विपदि । देशे देशातरे काले यौवनाद्यपगमे । वाउल पुत्तलिकेति देशी । निभृतमपि धूर्ती क्लयन्तीति विज्ञत्व ख्यापयन्नागरिक सहचरमाह- बहुआइ गइणिउसे पडमुग्गअप्सीलखण्डणविलक्खम् । उद्देइ विगउल हा हा पक्खेहि व भणन्तम् ॥ १८ ॥ विध्वा नदीनिकुञ्ज प्रथमोद्गतशीरखण्डनविलक्षम् । उडीयते विहगकुल हा हा पक्षैरिव मणत् ॥] पक्षहहेति भणदिवेति योजना ॥ प्रोपितभर्तृकाया सखी तत्कातमागमनत्वरार्थमाह- सच भणामि वालअ णस्थि अंसक वसन्तमासस्स । गन्धण कुरवाण मण पि असइत्तण ण गआ || १९ ।। [सत्य भगामि बालक नारत्यैशक्य वसन्तमासस । गन्धेन कुरपकाणा मनागप्यसतीत्व न गता ॥] १ "प्रतीदिन प्रत्ययमस्या' इति ग पुस्तके, 'प्रतीय न प्रतिय ती' इति च । पुस्तके पाठ २ 'रुदत्या' इति ग पाठ ३ 'पृष्ठे' इति गपुस्तके, 'पृष्ठीय' इति च घ पुस्तके पाठ 'भियेरन् इति ग पुस्तके, "भिमा' इति च घ पुस्तके पाठ ५ 'वाउलो' इति ग-पाठ ६ 'यदेव' इति गपाट . 'देशकालयो' इतिघपाठ माहितितचित्रपकइति ग-पाठ १. 'सजा' इति ग पाट" 'असाय' इति ग-पाठ ९ 'उदयते' इति ग पाट ७ ७४ काव्यमाला। . नास्त्यशश्यमिति यथा वस्खलितमेव मन इति भावः। मनागपीति त्वदागमनप्रत्या- शया शीलं रक्षतीत्यर्थः । तद्यावदस्याः शीलखण्डन न भवति तावत्वरितं संभावयेना- मिति भावः। नायक प्रति दूती कस्याश्चिदनुरागातिशयमाह-- एकेकभववेठणविवरन्तरदिण्णवरलगअणाए। तइ बोलन्ते याला पसरसउणाइ तीए ॥२०॥ एकैतिवेष्टनविवरान्तरदचतरलनयनया । त्वयि व्यतिक्रान्ते बालक पारशकुनायित तया ॥] एकैकस्मिन् वृतिवेष्टनस्य विवरान्तरे दत्त तरल नयन यया एताच्या तया पत्र- राकुनवदाचरितम् । पथा पसरवद्ध. पक्षी प्रतिविवर दत्तEिमति तथा तयापि स्वर- पोनलालसया भ्रान्तमित्यर्थः॥ तहमार्गेण गतोऽप्यहं तया न हट इति यदन्तमुपनाया इती नायिकादोपं परि. हरन्याह- ता किं करेउ जइ तं सि तीस वइवेटपेल्अिथणीए । पाअनुहद्धक्सित्तणीसहगीय वि ण दिट्ठो ॥ २१ ॥ [तत्किं परोतु यदि त्वमसि तया वृतिवेष्टनप्रेरितसनया । पादानुष्ठाविसनि सहापापि न दृष्ट..] तिवेष्टनस्योषतया हतयनयापि तया यदि न हटस्तदा कस्तस्या दोष इति मावः । पपिकजायाभिलाषिण कामुक इती नायिकाया निधनायकेऽनुरागातिशयासूननेना. साप्यत्व प्रतिपादयितुमाह- पिअसंभरणपलोहन्ववाहधाराणिवामभीमाए । दिनद वग्गीवाएँ दीवओ पहिअर्जाआए ॥ २२ ॥ [प्रियसंसरणशद्वाप्पधारानिपातमीतया। दीयते यक्रमीयया दीपकः पविकमायया ॥] १. 'वेटणपिपरन्तरवर दिग्पणअशाए' इति ग-पठः. १. 'एकम्मतिर दिवरान्तरतरतदानयनया' इति घ पार:. ३. 'युरकामति' इवि ग-पाट. ४. इटिक-पाठः. ५. 'तया खमा' इति गपाठः...'प्रेरितसन्या विग. ७. निक्षिप्त इति ग पार, ..'परणीए' विग-पायः १. प्रियम्मरण- प्रत्यागतरूपग-पाठ. १..'प्रगल माप विघ-पाटः ११. 'पपिएपहिया' विग-पट:- पाठ'.

. ३ शतकम्] गाथासप्तशती। ७५ कमपि युवानमनुरजयितु दूती कस्याश्चित्लेहदैन्यसूचक परिवृत्यावलोकनमाइ- तइ बोलन्से बालअ तिस्सा अगाई तह णु वलिआइ । जह पुट्ठिमज्झणिवतन्तवाहधाराओं दीसन्ति ॥ २३ ॥ त्वयि व्यतिक्रामति बालक तस्सा अगानि तथा नु वलितानि । यथा पृष्ठमध्यनिपतद्वाष्पधारा दृश्यन्ते ॥] बलितानि परिवृत्तानि । कापि प्रियतमविरहस्य दु सहत्वमन्यापदेशेनाह- ता मैझिमो विअ वर दुञ्जणसुअणेहिँ दोहि वि ण कनम् जद दिट्ठो तवइ खलो तहे अ सुअणो अईसन्तो ॥ २४ ॥ तिन्मध्यम एव वरं दुर्जनसुजनाम्या द्वाम्यामपि नै कार्यम् । यथा दृष्टस्तोपयति खलस्तथैव सुजनोऽदृश्यमान ॥ काप्यात्मन पतिं सामिलापमवलोकय ती सेय॑माह-- अद्धच्छिपेच्छिअ मा करेहि साहाविअ पलोएहि । सो वि सुदिवो होहिंई तुम पि मुद्धा कलिजिहिसि ॥ २५ ॥ [अर्धाक्षिप्रेक्षित मा कुरु खाभाविक प्रलोकय । सोऽपि सुदृष्टो भविष्यति त्वमपि मुग्धा कलिष्यसे ।] अर्धाक्षिप्रेक्षित कटाक्षनिरीक्षणम् ॥ प्रोपित कश्चित्कुलपालिकाया निजवनितायाश्चरितमनुस्मरन्वयस्थमाह- दिअह खुडकिआए तीए काऊण गेहवावारम् । गरुए वि मण्णुदु खे मरिमो पाअन्तसुत्तस्स ॥ २६ ॥ [दिवस रोपकायास्तस्सा कृत्वा गेहव्यापारम् । गुरुकेऽपि मन्युदु खे सराम पादान्तसुप्तस ॥] सुविआ रोपमका । गुरुके मन्यु खे दिवस व्याप्य गेहव्यापार कृत्वा रोपका खिस्सा पादान्तशयन स्मराम इवि संबध ॥ १ 'व्यविकाते' इति ग पाठ ३ 'मनमो इति ग-पाठ ३ 'न मे कायम्' तिगपाठ ४ 'तपति' इति घ-पाठ ५ 'हो इहि' इति क-पाठ विग-पाठ ७ दिवस व्याप्य इति कस-ग-पाठ ८ 'इपिताया' इति -पाठ काव्यमाला। कमप्यनुरक्त धनिकमधमन्त्रीसहदोषेण परिहरन्ती दुहितर वेश्यामाता शिक्षाय- तुमाह- पाणउडीभ वि जलिऊण हुअवहो जलइ जण्णवाडम्मि । ण हु ते परिहरिअव्वा विसमदसासंठिा पुरिसा ॥ २७ ॥ पानकुट्यामपि ज्वलित्या हुतवहो ज्वलनि यज्ञवाटेऽपि । नै खलते परिहर्तव्या विषमदशासस्थिताः पुरुषा. ॥] पानकुटी चण्डालकुटी॥ खमर्तरि विराग सूचयन्ती कमप्यसती सती निजभायों पहुमन्यमानं युवान सवैद- ग्ध्यानुरागमाह- ज तुज्झ सई जाआ असईओ ज व सुहा असे वि । ता किं फुट्टउ वीमं तुज्झ समाणो जुआ णस्थि ॥ २८ ॥ यचव सती जाया असत्यो यच सुमग वयमपि । तरिक स्फुटतु बीजं तव समानो युवा नास्ति ॥] स्फुटतु प्रकटीभवतु । तदेव बीजमाह-तव समान । एतदेव बीजमिति भाव। कापि कस्सिनप्यनुरागातिशयं प्राशयन्ती दूतीमाह- सव्वस्सम्मि वि दढे तहवि हु हिअअस्स णिव्वुदि चेन । जं तेण गामहाहे इत्याहत्यि कुहो गहिओ ॥ २९ ॥ [सखेऽपि दग्धे तथापि खेल हृदयस निवृतिरेव । यचेन ग्रामदाहे हस्ताहस्तिकया कुटो गृहीत ॥] कुटो घट॥ गृहकर्मव्यापृता काचिदसटी कामुकमनोरयसपादनासमर्षा वाहिता दूतीमन्यापदे. शेनाह- जायज वणुसे कुनो वि हुणीसेहो झडिअपत्तो। मा माणुसम्मि लोए ताई रसिमो दरिदो अ॥ ३०॥ १. 'ज्वलयति' इति ग-पाठ. २. 'अपि विघयुस्तके नास्ति. १. 'नैव ते इति ग-पाठ, ४.' इति' घ-पुस्तके नाति ५. 'मुद्दा जे च' इति ग-पाठः- १. 'सुभग यच'इदिगमाठ, ७.'लसमोर ग-पाठः.८.'' विग-पाठ: ९. सालो गठितवतो इदि ग पाट. १..'बाई सरिसो' इति कमाउ.

। ३ शतकम्] गाथासघशती। [जायता बनोद्देशे कुम्जोऽपि सल नि शाखः शिथिल्पर । मा भानुषे लोके त्यागी रसिको दरिद्रश्य ॥] त्यागी दिरमु । रसिक सानुराग , Pारी च । दरिलो निधन । यसररहित। त्या गिरवादिगुणयुको मा जायतामिति संबन्ध ॥ भार प्रत्यनुरागातिशय सूचयन्ती कापि तन्मित्रमाह- तस्स अ सोहग्गगुणं अमहिलसरिसं घ साहसं मज्झ । जाणइ गोलाउरो वासारत्तोद्धरत्तो अ॥३१॥ [तस च सौमाग्यगुणममहिलासदृश च साहस मम । जानाति गोदापूरो वर्षारामाराप्रश्च ॥] वांखधराने उत्पूर्णगोदावरीतरण तदभिसरणार्य करोमीति भाव । कथमधुना सतीत्वमवर वितमिति केनापि कामुकेन सपरिहासमुक्ता कुलटा तमाह- ते वोलिआ अस्सा ताण कुडङ्गाण थाणुआ सेसा अझे वि गअवआओ मूलुच्छेअ गअ पेम्मम् ॥ ३९ ॥ ते व्यतिक्रान्ता वयस्यास्पा कुंजाना स्थाणव शेषा 1 वयमपि गतवयस्का मूलोच्छेच गत प्रेम ॥ ते वयस्या समानशीला व्यतिकान्ता दूर गता । येषु ते सह भुरतमुखमनुभूत तेषा रक्षागृहाणी स्थाणवोऽवशिष्टा । अतो मूलोरछेद्यमुच्छिन्नमूल प्रेम गतम् । ने मित्यर्थ ॥ कामपि गतयौवना कुलटा प्रति नागरिक अपरिहासमाह- थणजहणणिअम्मोगरि महरका गवआण उध्वसिआणगाणिवासमूलबन्ध ध्व दीसन्ति ॥ ३३॥ [सनजघननितम्बोपरि नखैरोका गतवयसा वनितानाम् । उद्वसितानगनिवासमूलबन्धा इव दृश्यन्ते ॥ , 'उत्पश्यामि' इति ग पुस्तके, 'जायेत' इति च घ पुस्तके पाठ २ 'कुब्जको ऽपि स्थाणुको गलितपत्र' इति ग पाठ ३ 'गलितपत्र' इति घपाद परीपूरे' इति कस-पाठ ५ 'अस्सा' इति ग-पाठ ७ 'कुरमाणा' इति घ-पाट ८ 'स्थाणुका' इति ग पाद , 'मूलो छेद' इति ग पाट १२. 'दशणका' इति ग पाठ पाठ्यध्या २ 'दशमाना गतवयस्क ना श्रीगाम्' इति ग पाट.. १३ 'बयमिव इति धणिआणम् । ६ 'व्यतीका चेतसा' इति ग-पाठ ११ "विलाणम्' इति सपा- घप काव्यमाला। ७८ उदसितस्य शून्यीकृतस्याना निवासस्य मूलय या श्वेत्यर्थ । बहुभिर्युष्मामिस्ता दृष्ट्वा भागतम् । तदुच्यता कीटक्तस्या रूपमिति नायकेन पृष्टा सहचरा प्राहु जरस जह विभ पढम तिस्सा अङ्गम्मि णिवडिआ दिट्ठी । तस्स तहिं चे ठिआ सन्वङ्ग फेण वि ण दिट्ठम् ॥ ३४ ॥ यस यैव प्रथम तसा अङ्गे निपतिता दृष्टि । तस तेनैव स्थिता साह केनापि न दृष्टम् ॥] अत्यनविरहसंतप्त प्रवासादागत प्रियासंगमेन संतुष्ट कश्चिदाह- विरहे विस व विसमा अमअमआ होइ सगमे अहिअम् । किं विहिणा समनिअ दोहिं वि पिआ विणिम्मिमा॥३५॥ [विरहे विषमिव विपामृतमया भवति सगमेऽधिकम् । किं विधिना सममेव द्वाभ्यामपि प्रिया विनिर्मिता ॥] द्वाभ्यो विपामृताभ्याम् ।। चिरप्रवासागतेन भुजगेनोपारधा वेश्यामाता भुजगा तरलमाया दुहितुर्दोष परिह रती आई- अइसणेण (त्ता सुगु वि णेहाणुगन्धपडिआइ । हत्यउडपाणिआई व फारेण गलन्ति पेम्माइ ॥ ३६॥ [अदर्शनेन पुनक सुष्वपि नेहानुष घर्घटितानि । हसपुटपानीयानीय कालेन गलन्ति प्रेमाणि n] स्त्रीणां बहुच्छलत्व दर्शय ती दूती कमपि युवान साभिप्रायमाह- पइपुरओ ब्धि णिजइ विच्छुद्वेत्ति जारवेत्रपरम् । णिउणसंहीकरगारिअ भुअजुअलन्दोरिणी याला ॥ ३५ ॥ [पतिपुरत एव नीयते वृश्चिक्दष्टेति नारवैयगृहम् । निपुणखीकरघृता मुगयुगलादोलनशीला बाला !!] 1 'यस्सिय' इति ग-पाठ २ 'अयु' रवि घ-पाट.. ३ 'तस्मिन्नेद' इति र पाठ, ४ 'अमृतमयी' इति गघ-पाट ५.कि सममेव विधिना' इति ग-पाट ६ बालमनगपाट ७ डिआणम्' इति ग-पाट ८ 'परितानाम्। ९ "विमानाति' इति ग पाठ... 'हरम्' इति ग-पाट• " द परतमिप्रकरवर अदोठिरी' इति सम्पाट १ 'ससीकरवन्धितकरवल्गना रचीला' इति घ-पाठ तिकम् गाथासप्तशती। पुष्णाभिरभिप्रायज्ञाभि ससीमि करे घृता विषजनितमूछिलेन मुजयुगरान्दो- बला । बालेति प्रगल्मायास्तु वैतव किं वक्तव्यमिति भाव ॥ वजनस्य कार्यकपरता सूचयन्ती पूर्वमुभगा नववधूसक्रान्तनद कान्तमन्याप- । विकिणइ माहमासम्मि पामरो पाइडिं वइल्लेण । णिभूमर्मुम्मुर व्विअ सामलीभ थैणो पडिच्छन्तो ॥ ३८ ॥ [वित्रीणीते माघमासे पामर प्रोवरण बलीवर्दैन । निघूममुर्मुरनिभौ श्यामल्या स्तनौ पश्यन् ॥] मारवेन शीतनिस्तारहेतुलानिधूमतुपामिसादृश्यम् । तवापीदानी लब्धाभिनवव 'किमया कार्यमिति भाव ॥ एकदापि विश्वासो न कर्तव्य, इति बन्धुजनशिक्षार्थ काचिदाह- सञ्च भणामि मरणे ट्ठिअह्मि पुण्णे तडम्मि तावीए । अजवि तत्थ बुद्धङ्गे शिवडइ ट्ठिी तह चेअ ॥ ३१॥ [सत्य मणामि मरणे स्थितामि पुण्ये तटे ताप्या । अद्यापि तन निकुञ्ज निपतति दृष्टिस्तथैव ॥] रणे स्थितास्मि गृहीतमरणवतारमीत्यथ । तनाभिसारस्थाने । तथैव अभिसारी व। अत स्त्रीषु न विश्वसेदित्यर्थ । असतीभिरभिसार्यमाणमर्तृका कुलवधू' सखीजनमाह- अन्धअरबोरपत्त व माउआ मह पइ विलुम्पन्ति । ईसाअन्ति मह विअ रेप्पाहिन्तो फणो जाओ।॥ ४०॥। [अन्धकरबदरपामिव मैतिरो मम पतिं विलुम्पन्ति । ईय॒न्ति' मखमेव लाङ्कलेम्य फणो जात ॥] १ 'पारिडिं' इति स पुस्तके, 'पावलिं' इति च ग पुस्तके पाठ . २ 'मुम्मुरसच्छ इति ग पाठ ३ 'यणए पडीच्छन्तो' इति ख पुस्तके 'यणएणिअच्छन्तो' इति ग-पुस्तके पाठ ४ "विक्रीणाति' इति गघ पाठ . ५ 'पर्टी' इति ग पुस्तके, पर' इति घ घ पुस्तके पाठ ६ 'निधूमाहारसदृशयो श्यामाया स्वनयोनियच्छन्' ग पुस्तके, "निघूममुर्मुराविव क्यामत्या स्तनौ प्रतीक्षमाण' इति च घ पुस्तके ७ 'कुरो' इति घ पाठ ८ 'पत्थि' इति खग-पाठ . 'भाजनमिव' इति पुस्तके, "प्रस्यमिव' इति च घ-पुस्तके पाट १०. 'मायाविन्य' इति सपाट. 'ईय॑न्ते मप्येव पुच्छादेव फणो' इति ग पुस्तके, ईर्ष्यायति मह्यमेव पुच्छाफ्णो' । चघ पुस्तके पाठ .

काव्यमाला। . . कृतप्रणयकलयोपयो. प्रणयरोपभनार्थे सखी माह- जिविरं असास विमण णिवत्तइ जोव्वणं अतिकन्दम् । दिअहा दिअहेहि समा ण होन्ति किं गिट्ठरो लोणो ॥ ४५ ॥ [जीवितॆमशाश्वतमेय न निवर्तते यौवनमतिकान्तम् । दिवसा दिवसः सेमा न भवन्ति किं निठुरो लोकः ॥] बहरहयौवनकालस्य च हासारिक रोषपारुष्येणात्मानं पथयथ इति भावः । वेश्योपभुज्यमानविभवं प्रियं कापि सासूयमन्यापदेशेनाह- उप्पाइअदनाण वि खलाण को भाअणं सलो क्षेत्र । पकाई वि णिम्बफलाई गवर काएहि खजन्ति ॥ ४८ ॥ [उत्पादितद्रव्याणामपि खलानां को" भाजनं खल एव । पंक्वान्यपि निम्बफलानि केवलं काकैः खाद्यन्ते ॥] उत्पादित द्रव्य येस्तेषा खलानाम् । भाजन दानपात्रम् ॥ इतिज्ञता ख्यापयनागरिकः सहवरमाह- अज्ज मए गन्तव्यं घणन्धारे वि तस्स सुहअस्स । अजा णिमीलिअच्छी पअपरिवाहिं घरे कुणइ ॥ ४९ ॥ [अद्य मया गन्तयं घनान्धकारेऽपि तस्स सुभगस । आर्या निमीलिताक्षी पदपरिपार्टी गृहे करोति ।) नाविकानुरागं प्रकाशयन्या दूयाः कामुक प्रत्युक्तिरियमिति केचित् ।। कृतविप्रिय प्रति प्रतिकूलाचरणप्रवृत्तस्य कस्यचिग्निवारणाय कश्चित्सुजनचरित्र व यति- सुमणो ण कुप्पइ विल अह कुप्पइ विप्पि ण चिन्तेई । अह चिन्तेइ ण जम्पइ अह जम्पई लैंजिणो होइ ॥ ५० ॥ १. 'जीअ भसासिम विभ' इति ग पाठ.. २. "गिमत्ता' इति ग-पाठः...'' बसन्त' इति स्वगसाठः. ४. 'जीवमाश्वातितमेव' इति ग-पाठः. ५. 'न भवन्ति समाः' इति ग-पाट: १. 'उपार्जितद्रव्याणामपि' इति ग-पाठः, ७. 'को भवति भाजन' इति ग-पाठः .. पानीव निम्मालानि काडेनेव सायन्दे' इति गु-पाठ , ९. वरमुता' इति ग-पाट:.१०. 'लग्दिरो' इति ग-पाट::

३ शतकम्] गाथासप्तशती। ८३ [सुजनो न कुप्यत्येव अथ कुप्यति विप्रिय न चिन्तयति । अथ चिन्तयति न जल्पति अथ जल्पति लज्जितो भवति ॥] तस्मादनुचितमिद सुजनस्य भवत इति भाव ॥ भाविधनप्रत्याशया भुजगे कृतानुरागा दुहितर वारयन्ती वेदयामाता धनादीनामुपा- देयताप्रयोजकमाह- सो अत्यो जो हत्ये तं मित्त ज णिरन्तर वसणे । त रूअ जत्थ गुणा त विण्णाणं जाहिं धम्मो ॥५१॥ [सोऽर्थो यो हस्ते तन्मित्र यनिरन्तर व्यसने । तप या गुणास्तद्विज्ञान यैन धर्म ॥] द्रव्यमादायैव त्वया भुजग खीकार्य इति भाव । यद्वा काचिद्रूपगर्वितो निर्गुणां निन्दन्त्या स्वगुणोत्कर्षे सूचयन्त्या इयमुक्ति । चिरप्रवासादागतो नायक प्रियतमाया परितोषार्थमाह- चन्दमुहि चन्दधवला दीहा दीहच्छि तुह विओअम्मि । चउजामा सअजाम व्व जामिणी कहँ वि वोलीणा ॥ ५२ ॥ [चन्द्रमुखि चन्द्रधवला दीर्घा दीर्घाक्षि तब वियोगे। चतुर्यामा शतयामेव यामिनी कथमप्यतिकान्ता ॥] मयेति शेष ॥ दुर्जनमैत्री न चिरकालस्थायिनीति सखी नायिका शिक्षयितुमाह-- अउलीणो दोमुहओ ता महुरो भोअणं मुहे जाव । मुरओ व्व खलो जिण्णम्मि भोअणे विरसमारसइ ।। ५ [अकुरीनो द्विमुखस्ताव मधुरो भोजन मुखे यावत् । मुंरज इव खलो जीर्णे भोजने विरसमारसति ॥] अकुलीनोऽसरकुलप्रसूत । मुरजपक्षे को पृपियां न लीन । द्विमुख समक्षपरोक्ष- वचनभेदात् । पक्षे उभयमुख । यावन्मुखे भोजनमाहार पक्षे पिष्टादिरेप । मधुर यवक्ता । पक्षे श्रुतिसुखावह । भोजने जीर्णे विरसमप्रियम् । पक्ष रूक्षध्वनिम् । रसति । यद्वा दुर्जनमुखपिण्डदानार्थ कुली शिक्षय त्या कुट्ट या इयमुक्ति ॥ ५३॥ 1 "कुप्यत एव' इति ग घ पाठ २ 'यस्मिन्' इति गमाठ ३ 'व्यतिकाता' ठे ग घ-पाठ 'जिण्णे' इति ग पाट ५. 'मधुर' इति य पाठ रक्षीणो भाजने' इति घपाठ काव्यमाला। . . दर्शनमात्रेप विदग्धा भावमाविकुर्वन्ति ल्क्षयन्ति चेति दर्शयनागरिकः सहचर. शिक्षार्थमाह-- तह सोहाइ पुलइओ देरवलिअन्तद्धतार पहिओ। जह वारिओ वि परसामिएण ओलिन्दए वसिओ ।। ५४ ।। [तथा सुपया प्रलोक्तिो देरवलितार्थतारकं पथिकः । यथा वारितोऽपि गृहखामिना अलिन्दके सुप्तः ॥] अलिन्दो पहिरप्रकोष्ठः ॥ कार्यमप्रसाध्य ग्लाघनपरस्य, प्रसाध्य वात्मगुणोत्कीर्तनपरस्य निषेधाय कश्चित्वरूपा- ध्यानेन विज्ञत्वं प्रक्टयमाह- लहुअन्ति लहुं पुरिसं पव्वअमेत्तं पि दो वि कजाई । णिव्वरणमणिध्यूढे णिव्यूढे जे अणिव्वरणम् ॥ ५५ ॥ लंघयतो लघु पुरुषं पर्वतमानमपि द्वे अपि कार्ये । निर्वरणमनिषूदे नियूंढे येच निर्वरणम् ॥] पर्वतमात्रमप्यत्यन्तगुरुमपि पुरुष व कार्ये लघु शीघ्रं रघयतो लघुकुरतः । अनि. यूंटे भकृते कार्ये निवरण निवेदनम् । अकृतकार्यस्य निवेदनयात् । कृते व कार्ये खयमेव प्रतिद्धिरित्यर्थः ।। द्वारस्थितिकलितशीलखण्डनो बुला फुटनी विश्वासयितमाह- कं तुगथणुक्सित्तेण पुत्ति दाहिआ पलोएसि । उण्णामिअकलसणिवेसिअग्पकमलेण व मुहेण ॥ ५६ ॥ किं तुगतनोरिक्षतेन पुनि द्वारस्थिता प्रलोकयमि । उन्नामितक्लशनिवेशिताकमलेनेर मुखेन । 1. 'मुण्डाई' इति ग-पाट..२. 'दरवलिअनारों' पनि ग-पाठः. १ 'उनि न्दए' इति ग-पाठः ४. 'मनाग्वरिततिवटारक' इति ग पुस्तके, 'दरवलितान्ता- रक' इति च य-पुस्तके पाठः. ५. 'गृहखामिकेन' इति घ-पाठः ६. 'मलिन्दले ३० पितः' इति ग-पुस्तके, 'अलिन्दे वरितः' इति च य पुस्तके पाठः. ७. 'लपयन्ति' इति क-स-पाठः, ८. 'भपि' इति कस ग-पुस्तकेषु नास्ति. .. 'पदनिरणम्', इति घ-पाठ..

३ शतकम्] गाथासप्तशती। दूरादवलोकनार्थ पूर्वकायस्सोनामितत्वात्तुस्तनोत्क्षिप्तेन उमानितयो कलशयोनि वेशितेनार्घकमलेनेव मुखेन हे पुत्रि, द्वारि स्थिता व क प्रलोक्यति क्थय । तमहमचि राव साधयामीति भाव ।। गुत्यथै निवेशितोऽपि खल प्रत्युत रहस्यमेव प्रकाशयतीति प्रदर्शयनागरिक सह चरमाह- वइविवरणिग्गअदलो एरण्डो साहइ व्व तरणाणम् । एत्य घरे हलिअवहू एदहमेत्तत्थणी वसइ ॥ ५७ ॥ [वृतिवियरनिर्गतदल एरण्ड साध्यतीव तरुणेश्य । अन गृहे हलिवधूरेताय मात्रलनी यसति ॥] धृतिघनौकरणाथै तदुपा ते रोपित यादृतिविवरेण निगत दल यम्य स । साधयति स्थयति । एरण्डव्यपदेशेन हलिकवध्वा स्तनौ वर्णय या दूया कामुक प्रतीयमुक्ति शित कन्धित् ॥ सवर तामानयति भुजगेनोक्ता कुटनी दुहितुगतगामि वगुणेन भुजग सामिलाप कु वाणा नि दाव्यानेन स्तनयो स्तुतिमाह- गमकलहकुम्भसणियणपीणणिरन्तरेहिं तुझेहिं । उस्ससिट पि ण तीरइ किं उण गन्तु हअथणेहिं ।। ५८ ॥ [गजकलमकुम्भसनिमघनपीननिर तराभ्या तुगाभ्याम् । उच्छसितुमपि न तीरैयति किं पुनग तु हतस्तनाभ्याम् । गज इव प्रौढ क्लभो गनकलभस्तदीयकुम्भसनिभी घनी निविडी पीनी स्थगै तएव निर तरौ यो तुझौ स्तनौ ताभ्यामित्यर्थ । तीरयति शनोति । क्वविद्गुणोऽपि सोपता यातीति निदर्शयनागरिकोऽभिसारिकाया सवरामिसरगमनविरोधिस्तनभार पयुद्वेगनेदमाहेति केचित् ॥ रम्याणा तत्तद्विशेषप्राप्त्या रम्यतातिशयो भवतीति प्रतिपादय वी कुहनी भुतग न ती व दुहितर प्रति सामिलाप कर्तुमाह- मासपसूअ छम्मासगम्मिणि एकदिअहज रिअ च । रगुत्तिण्ण च पिअ पुत्तभ कामन्तओ होहि ॥ ५९ ॥ २ वीयते इति. गपुस्तके. एकोतिर इति चय दासतीव' इतिघ पाट पुस्तके पाठ .

। काव्यमाला। मासप्रस्तां पग्मासगर्भिणीमेकदिवसज्यरितां च । रगोतीर्णा च प्रियां पुत्रक कामयमानो मय ॥] मासप्रसूतादीनामतिशयितसुरतमुखोत्पादकतायाः कामशास्त्रसिद्धत्वात् । नकी खदुहितर प्रति लोभयन्त्याः कुद्वन्या भुजगं प्रतीयमुक्तिरित्यप्याहुः॥ काचिदुत्तुङ्गपीनस्वनी नायिका कश्चिद्युवा स्वाभिलाष प्रकाशयन्नाह- पडिवरसमण्णुपुझे लावण्णांडे अणगगअकुम्मे । पुरिससअहिअअधरिए कीस थणन्ती यणे वहसि ॥ ६ ॥ [प्रतिपक्षमन्युपुझौ लावण्यकुटावनगगनकुम्भौ । पुरुषशतहृदयधृतौ किमिति स्तनन्ती स्तनौ वहसि ॥] प्रतिपक्षस्य सपनीजनस्य मन्युपुत्री चित्तक्षोभजननात् । लापण्यस्स वुटी (घटी) सौन्दयातिशयात् । अनालक्षणस्य गजस्य कुम्भौ । पुरुपशवेन हदये मनसि धृताव- भिलपितौ । एतादृशौ स्तनौ स्तनन्ती कुन्यन्ती किमिति यहसि । असद्विध जन कथ न कृतार्थयसीति भावः। विरोधिनोऽपि कदाचिदनुकूला भवन्वीति निदर्शयन्कधिदाह- परिणिघणत्थणपेलणसुहेल्लिपडिअस्स होन्तपहिअस्स । अवसउणङ्गारअवारविहिदिअहा सुहावन्ति ।। ६१ ॥ गहिणीपमस्तनप्रेरणसुखकेलिपतितस मविष्यत्पथिकम्य । अपशकुनाङ्गारकवारविष्टिदिवेसाः सुखयन्ति ॥] कमपि युवानं प्रति दूती क्स्याधिदनुरागातिशयमाह- सा तुह कएण वालअ अणिसं घरदारतोरणणिसण्णा । ओससई वन्दणमालिभ व्व दिअहं विअ वराई ।। ६२॥ [सा तव कृतेन बालकानिशं गृहद्वारतोरणनिषण्णा । अवशुष्यति वन्दनमालिक्व दिवसमेत्र वरावी ॥] सहजगुणहीनानामाहार्यगुणाधान न चिरकालस्यायीति काचिदन्यापदेशेनाह- हसिभं सत्यतालं मुक्खवह उवगएहि पहिएहि । पत्तअफलाण सरिसे उड़ीणे सुंअविन्दम्मि ॥ ३ ॥ १. 'ओ' इति ग पाटः. २. 'उले' इति ग-पाट:. ३. 'गृहिण्या' इति क-स-ग. पार . ४.विष्टिभद्रत्ययः. ५. 'उअगएहि' इति गसाठः... 'पूसकरगम्मि' इति ग. पाट.. 'मान्दः शुके वर्तते' इति कुलबालदेवः.

, ३ शतकम्] गाथासप्तशती। ८७ [हसितं सहसतालं शुष्कवटमुपगतः पपिकः । पंप्रफलानां सही उडीने शुकवृन्दे ।।] पत्रफलान्योऽयं श इति युमा विधामाय गुपयटमुपगतः पतिः पत्रफलसरसे शकसमूहे याने सति सहस्सतालं यया सातपा गितमित्यर्थः । सेकेनसाने जनाव. स्थिविसूचनाभिसारिका निवारयन्ला त्या इयमुचिरिति पेचित् ।। पला राह तकलहामाः सम्या राश्रितान्तमनुरांधायागना सखो मावलान्या पृष्टा तरमाभाग्यमाद- अन मि हासिआ मामि तेण पाएमु तह पड़न्तेण । तीए वि जलन्ति दीवयत्तिमभुण्णअन्तीए । ६४ ॥ [अद्यालि हासिता मातुलानि तेन पादयोसधा पतता। तयापि ज्वलन्ती दीपनर्तिमम्युत्तेजयन्त्या ॥] भन्येऽपि मम सौभाग्यं पश्यविति पुज्या दशेतजन पुरयाः। दिवा तथा पापका- दिनम्नस्य राम्रो तारिदय श तम्याच योवनानिमानलं पति प्रसनादर श मम हासो जात इत्यर्पः॥ पूर्वगुभगामनुवर्तमान पति या भीमाग्यमबहुमन्यमानो नयमुभगां सान्त्वयितु राखी मुजनसमावमाह- अणुनत्तणं पुणन्तो "वेसे विजणे अहिण्णमुहराओ। अप्पयसो यि हु मुअणो परव्यसो आहिआईए || ६५ ॥ [अनुवर्तनं कुर्वन्द्वप्येऽपि जनेभिग्नमुनरागः । आत्मयशोऽपि सलु सुजनः परयशः घुलीनताया आभिजात्या खदेवरतोऽपि कुलीनतया तामनुरन्धे, न तु मेहेनेति भावः ॥ मानिन्याः पूर्वमुमगायास्तिरस्कारेणान्यवनिताराफ दुर्विदग्धं शिक्षयन्ती जरद्ध- अणुदिअहट्टिाअगविण्णाणगुणेहि जणिअमाहप्पो। पुत्तम अहिआअजणो विरजमाणो वि दुरूसो ॥६६॥ १. "उपगतेन पथिकेन' इति ग-पाठः, २. 'फ्लपत्रसदृशे' इति ग-पाटः. ३. 'मामि इति ग-पुस्तके, 'मानुलि' इति च घ पुस्तके पाठः. ४. 'अभ्युग्नयन्त्या' इति व ५. 'देशे' इति ग पाट. ..'अत्तेवसो वि हि' इति ग पाठः, ५. 'आ- स्मशोऽपि हि ग-पार: ५. 'आभिजात्याः इति ग-पुस्तके, 'आभिजात्यस्य' इति च घ-पुस्त के पाठः. पाट..

काव्यमाला। ८८ . [अनुदिवसर्वधितादरविज्ञानगुणैजनितमाहात्म्यः । पुत्रकाभिजातजनो विरज्यमानोऽपि दुर्लक्ष्यः ॥] अनुदिवसं वर्धित आदरो यैरेवभूतविज्ञानप्रमुखर्गुणैजनितं माहात्म्यं महत्त्वं यस्य एता. दृशः कुली नजनो विरज्यमानोऽपि दुर्लक्ष्यः। सत्सपि कोपे कुलीनस्वादादरातिशय वि. दधानामिमां प्रणिपातेन प्रसादयेति भाव.॥ विदग्धं प्रति साभिलापा कापि खभर्तरि वैराग्यं सूचयन्याह- विण्णाणगुणमहग्घे पुरिसे वेसवणं पि रमणिजम् । जणणिन्दिए उण जणे पिअत्तणेणावि लजामो ॥ ६७ ॥ [विज्ञानगुणमहाघे पुरुष द्वेप्यत्वमपि रमणीयम् । जननिन्दिते पुनर्जने प्रियत्वेनापि लैजामहे ॥] ऽपि पीनोत्तुमकुचायां कस्याचिदनुरतोऽचिरेणेव कालेन तस्याः स्तनपतन दृष्ट्या वयस्यमाह- कह णाम तीअ तह सो सहावगुरुओ वि थणहरो पडिओ। अहवा महिलाण चिरं को वि ण हिअअम्मि संठाइ ॥ ६८।। [कथ नाम तस्यास्तथा स स्वभावगुरुकोऽपि स्तनभरः पतितः। अथवा महिलानां चिर कोऽपि न हृदये संतिष्ठते ॥] स्त्रीणामस्थिरप्रेमभावप्रकाशन वा ॥ नायकप्रलोभनाय सखी नायिकामुखं वर्णयति- सुअणु वअणं छिचन्तं सूरं मा साउलीअ वारेहि । एअस्स पङ्कअस्स अ जाणउ कअरं सुहाफसम् ॥ ६९ ॥ [सुतनु वदन स्पृशन्तं सूर्य या चमाञ्चलेन यारय । एतस्य पङ्कजस च जानातु कतरमुखस्पर्शम् ।। साउलोति वनाधलवाचको देशी ॥ १. 'वधितादर' इति ग-पाठः. २. 'लजाम.' इति ग-पाठः. ३. 'गरुओ'इति ग. पाठः, ४ स्तनभारः' इति ग पाट.. ५. 'हृदये कः संतिष्ठते' इति ग पुस्तके, 'हृदये न संस्थायी' इति चघ पुखके पाठः ६. 'साकुलीअ' इति ग-पाठः. ७. 'साकुल्या' इति ग-पुस्तके, 'पल्लवच्छत्रिकया' इति च घ-पुसके पाठः, 'साकुलीशन्दो पशु- '' इति कुलवालदेवः.

३ शतकम्] गाथासप्तशती। सीधुपानेन मत्ताया मानभङ्गमाकलय्य मानिनीमानशमनोपायशिक्षार्थ नागरिकः गहबरमाह- माणोसह व पिज्जइ पिआइ माणसिणीअ दइअस्स । करसंपुडवलिउद्धाणणाइ मइराइ गण्डूसो ॥ ७० ॥ [मानौषधमिर पीयते प्रियया मनैखिन्या दयितस । करसंटवलितोद्मननया मंदिराया गण्डूपः ॥] मुरापूर्णेन मुखेन मुखे दत्ता सुरा पीता सती मानमपनयतीति भावः । नायकप्रलोभनाय दूती नायियाः सौन्दर्यातिशयमाह-- कह सा र्णिव्यण्णिजइ जीअ जहा लोइमम्मि अङ्गम्मि । दिट्ठी दुबलगाई म पङ्कपडिआ ण उत्तरह ॥ ७१ ॥ कथं सा निर्यतां यम्या यथालोकितेऽङ्गे। दृष्टिबली गौरिव पश्यतिता नोत्तरति ॥] या पतिता तवावतिष्ठत इत्यर्थः। कम्यचिदर्थे बदन्ती दूती कापि तस्यास्थिरलेहतां वर्णयन्त्याह- कीरन्ती विभ गासइ उभए रेह व सलअणे मेत्ती । सा उण सुअणम्मि कआ अणहा पाहाणरेह व्व ॥ ७२ ।। [क्रियमाणैय नश्यत्युदके रेवेव सलगने मैत्री । सा पुनः सुजने कृता अनघा पापाणरेखेव 1] अनघा निरपाया॥ चिरप्रासादागत्य पुनरचिरागन्तुमिच्छन्त नायकं कापि सदैन्यमाह- अव्यो दुपारआर. पुणो वि तन्ति करेसि गमणस्स । अज वि ण होन्ति सरला वेणी तरहिणो चिउरा ॥ ७३ ॥ [अग्लो दुष्करवारक पुनरपि चिन्तां करोपि गमनस्य । अद्यापि न मयन्ति सरला वेण्यास्तरङ्गिणाधिकुंराः ॥] १. ' विआए' इति ग पाठः. २. 'उत्तागणाइ महराए' इति ग-राठ:. ३. 'मा- निन्या' इति ग पाठ.. ४, 'चलनोत्तानया' इति ग पाटः. ५. 'वदनमदिराया' इति घ-पाठः. ६. विनियमोउ' इति ग-पाठः. ७. 'यथावलोकिते' इति ग-पाठः. ८. 'दुर गरिव पति ग-पाठः ९. “दष्टं दुमर-शात गपाठः सवोदु सहयो- चन इति कुरवालदेवः, १.. 'केसा., इति ग पाट:.

काव्यमाला। अवो इति साचर्यचमत्कारे । दुष्करेति लीवधपातककारित्वादिति भावः । वेणीव- न्धेन तरङ्गिणः कौटिल्यभाजश्चिकुरा अद्यापि सरला न भवन्तीति संबन्धः॥ अव्युत्पनन्वादनुत्साहमानस्य दुर्विदग्धधनिकम्य प्रतिपाटवाथै धूता काचित्सद्भाव- मेहमशंसामाह- ण वि तह छेअरआइ वि हरन्ति पुणरुत्तगअरसिआई। जह जत्य व तत्य व जह व तह व सन्भावणेहेरमिआई ॥ ७४ ॥ नापि तथा छेकरतान्यपि हरन्ति पुनरुक्तरागरसिकानि । यथा यर या तर वा यथा या तथा वा अद्भावस्नेहरमितानि ॥] छेवानामपूर्वापूर्वरतशि पकुशलाना रतान्यपि तथा न हरन्ति । पुनरुके पुनः पुनः परिशीलिते रागे रचने रतव्यापारे रसिकानि ॥ किमिति कृशासीति नियण पृथा पूर्वमुभगा तमाह-- ईन्झसि पिआइ समरं तह वि हुँ रे भणसि कीस किसिमं ति । उवरिभरेण अ अण्णुअ मुअइ वइल्लो वि अगाई ॥ ७५ ॥ उबसे प्रियया समं तथापि खलु रे मणमि रिमिति केशेति । उपरि(भोण) च है" अज्ञ मुञ्चति बलीवदोऽप्यङ्गानि ॥] प्रवासादागतेन प्रियेणाय क्थं त्वरया रमितमिति वदन्ती सखी नायिका सानु- रागमाह- दिढमूलबन्धगण्ठि व्व मोइआ कहँ वि तेण मे वाहू । अम्हेहि वि तस्स उरे खुत्त व्व समुक्खआ थणआ ॥ ७६ ।। [मूलबन्धमन्धी इव मोचितौ कथमपि तेन मे बाहू । अस्माभिरपि तस्योरसि निखाताविव समुत्खातो स्तनौ ॥] १. 'अमुरआई' इति ग-पाठः. २. 'गेह' इति ग-पुस्तके नास्ति. ३. 'नैव तथा छेकसुरतान्यपि' इति ग पाठः, 'छैकशब्दः खिद्रवचन.' इति कुठबालदेवः. ४. 'r- सितानि' इति घपाठ. ५. 'सद्भावरमितानि' इति ग-पाठः. ६. 'वुज्झमि' इति ग-पाठ . ५. 'हु' इति ग-पुस्तके नास्ति. 4. 'युध्यसे प्रियायाः समय' इति ग-पाट. ९. 'खलु' इति ग-पुस्तके नास्ति. १०, 'कृशवेति' इति घ-पाठः. ११. 'भरेण च अजअ (१) मुशति वृषभो' इति ग-पाठः. १२. 'हे' इति घ-पुस्तके नास्ति. ३३. 'गूड यद्ध' इति स-पाटः. १४. 'दृढगूढवप्रन्यो' इति य-पाटः, १५. 'ग्रन्धि- रिव' इति ग-पाठः ३ शतकम्] गाथासप्तशती। अनुरागनिर्भरालिशनवशादन्योन्यलग्नौ मे बाहू तेन क्यमपि मोचिती अम्मानि- रपि स्तनौ निखाताविव कथमपि समुत्खाती । कलहान्तरितामनुनीयागता ससी तत्कान्तमाह- अणुणअपसाइआए तुन्झ घराहे चिरं गणन्तीए । अपहुत्तोहमहत्वगुरीभ तीए चिरं रुण्णम् ॥ ७७ ॥ [अनुनयप्रसादितया तवापराधाविर गणयन्त्या । अप्रभूतोभयहस्ताङ्गुल्या तया चिर रुदितम् ॥] अपराधाना बहुत्वादप्रभूता उभयहस्ताकुल्यो यस्यास्तया । क्यं कथमपि भया प्र- सादिना इत' पर मैवं वार्थी रिति भावः ।। नर्तनश्रमप्रखिमाङ्गा दुहितुः सौन्दर्यातिशयं कामुकचित्तप्रलोभनाय कुटनी य- णयति- सेभन्छलेण पेच्छह तणुए अङ्गम्मि से अमाअन्त । लावणं आसरइ व्व तिवालसावाणरत्तए।।७० ।। स्वेिदच्छलेन पेंश्यत तनुकेऽङ्गे तस्या अमात् । लावण्यमपसरतीव निवलीसोपानतिभिः ॥] तनुके तस्या अझै समानुमसमर्थ लावण्यं खेदच्छलेनापसरतीवेवि शोजना । चौर्य: रतगोपनार्थ सख्या उकिरियमिति केचित् ॥ गुजगमभिमुसीक्तु कुटनी र स्याश्चिदलब्धलामसत्कारतारूपं दोष परिहरन्ती मो. न्दोतिशयमन्यापदेशेन वर्णयति- देव्वाअत्तम्मि फले किं कीरइ एत्ति पुणो भणियो । कङ्केल्लिपलवाणं ण पट्या होन्ति सारिच्छा ।। ७९ ॥ देवायत्ते फले किं क्रियतामियत्पुनर्भणामः । कलिपल्लाना न पल्ला मवन्ति सदृशा ॥] करेलिरशोकः । अन्ये पल्या अशोकपालवानां सहशा न मवन्तीलधः । दैवाधीनी राभसत्कारी मा भाता नाम । तत्सदृशी सुन्दरी पुनरन्या नास्तीलाशय । १. 'पणं वराईए' इति ग-पाठ'. २. 'अप्रभवभय' इति घ पाठ.. ३ 'रदितं पराश्या' इति ग घ पाठ.. प्रेक्षते' इति ग-घ-पाठः. ५. 'मायमान' इति ग पुस्तके, अमायत्' इति चघ पुस्तके पाठ'. 'कोर एतिभ उण भणामो' इति ग-पाठ : .. करोतु इति ग पाट. ९. एतावत' इति ग-य-पाठा. १०, 'अशोकपालवानों नवपलवा' इति. घ-पाट. ६. 'परया' इति ग-य-पाठः, ५.

washes ९२ काव्यमाला। खसौभाग्यस्यापनाय विरहविधुरां कलहान्तरितां रुदती कान्ता दर्शयस्तदनुनया- यमागतः कान्तः सहचरमाह- धुअइ ब मअकलई कवोलपडिअस्स माणिणी, उअह । अणवरअवाहजलभरिअणअणकलसेहि चन्दस्स ॥ ८० ॥, धावतीव मृगकलई कपोलपतितस्य मानिनी पश्यत । अनवरतबाष्पजलभृतनयनकलशाम्यां चन्द्रस ॥] क्योलप्रतिविम्बितस्य चन्द्रम्य कल मानिनी धावदीव प्रक्षालयतीवेति योजना । एतेन प्रियायाः सौन्दर्यमात्मनः सौभाग्यं च वर्णितम् ।। बहुपनीकस्य भर्तुर्नेयमतीव वळमा मविष्यति, अतः पुनरागमिष्यत्वेवार तत्किमेवं विक्लवोऽसीति वयस्येनावास्यमानो ज्ञातिगृहात्पतिगृहं प्रस्थिताया जारस्तमन्यापदे. शेनाह- गन्धेण अप्पणो मालिआणं णोमालिआ,ण फुट्टिहइ । अण्णो को वि हआसाइ मसलो परिमलुग्गारो ॥ ८१ ॥ [गन्धेनात्मनो मालिकानां नमालिका नै च्युता मविष्यति । अन्यः कोऽपि ताशाया मांसलः परिमलोहारः ॥] नानापुष्पप्रथितमालिकानां मध्ये नवमालिकारय. पुष्पविशेष आत्मनो गन्धेन न च्युतो भविष्यति । यतो हवा आशा अन्य सा यया तस्याः । अन्य इतरविलक्षण: कोsपि मांसलो बहल परिमोदारः।। नष्टधनं भुजंगमुत्साहयितुं कुहनी सत्पुरुषप्रशंसामाह- / फलसंपत्ती समोणआई तुझाइँ फलविपत्तीए । हिअआइ सुपुरिसाणं महातरूणं व सिहराई ॥ ८२ ॥ [फलसंपत्त्या समरनतानि तुङ्गानि फलविपत्त्या । हृदयानि सुपुरुषाणां महातरूणामिव शिंखराणि ॥] समबनतानि नम्राणि । तुनानि रमतानि । प्रोपितभर्नुकायाः सखी तत्वान्तस्यागमनत्वरार्थं तत्समीपगामिन पथिकमाह- आसासेइ परिअणं परिवत्तन्तीम पहिअजाआए। णित्याणुवत्तणे वलिअहत्यमुहलो क्लअसद्दो॥ ८३ ।। १. 'पुरिइ' इति ग-पाट २. 'मालतीनो' इति ग पाटः. ३. 'न न्यूना' इति घ-पाठः, ४. 'हतारायां इति ग-पाटः. ५. 'मु उरिसाणं' इति ग पाठः शि- सराणीव' विग-पाटा.

३ शतकम् गाथासप्तशती । १३ [आश्वासयति परिजनं परिवर्तमानायाः पथिक जायायाः । नि.स्थामवर्तने वलितहस्तमुखरो वलयशन्दः ॥] परिवर्तमानायाः शयने पाश्वपरिवृत्ति कुर्च याः पपिाजायाया निःस्थाम नि.सहं यद्ग- तन वैन वलिवे हस्ते मुखरोऽनुबद्धझणकारो वलयशब्दः परिजनमाश्वासयति जीवय- तीति । द्वापयतीत्यर्थः॥ सोणविभवस्यापि नायकस्य महेच्छता सूचयन्ती दूती नायिकामनुरयितुमाह-- तुङ्गो चिज होह मणो मणंसिणो अन्तिमासु वि दसासु । अत्थमणम्मि वि रइणो किरणा उद्धं चित्र फुरन्ति ॥ ८४ ॥ तुगमेव मपति मनो मनखिनोऽन्तिमास्वपि दशासु । अस्तमनऽपि रवेः किरणा ऊर्ध्व मेव स्फुरन्ति ॥] एतेन निधनोऽप्यसौ वदान्यः न चाधमां कामयत इति सूचितम् ॥ সনাবান েলাবন্ধত্ত বন্যা বানো নোন্তর कृपणनिन्दा सत्पुरुषस्य च प्रशसामाह-- पोट्टे भरन्ति सउणा वि माउआ अप्पणो अणुब्विगा। विहलुद्धरणसहावा हुवन्ति जइ के वि सप्पुरिसा ॥८५॥ [उदर विधति शकुना अपि हे मातर आरमनोऽनुद्विमाः । विहलोद्धरणसभागा भवन्ति यदि केपि सत्पुरुषाः ।।] पक्षिणोऽपि परमांसभक्षणादिना खोदरपूरण कुर्वन्ति । दीनदुःसापहारधुरंधरास्तु ताशा विरला इति भावः। कृत्रिमेणापि भावेन भामिन्यः पुरुषाननुरजयन्तीति कयाचिदुका विदग्धवधू. स्वामा- ण विणा सम्माण ग्येप्पइ परमत्यजाणुओ लोओ। को जुष्णम बरं कसिएण वेभारि वरई ॥८६॥ नि विना सद्भावेन गृपते परमार्थनो लोकः। को जीर्णमाजार काक्षिकया प्रतारयितुं शक्रोति ।] १.नि स्थानोदर्तने' इति ग-पुस्तके, "नि.सहवर्तनवरित' इवि च य-पुस्तके पाठः । २. 'उयमेव' इति ग-पाठः, ३. विभदरणसमस्या' इति ग-पाठः ४. 'हे माव:' दी ग-पाठ.. ५. 'विछत्रप' इति ग-पाठः १. काशिनी गावाट काव्यमाला॥ अलंकारायदानादपरितुष्ट नायिकामनुकूलयितुं दूती अकारणबहुमान मन्याप. देशेनाह- रण्णाउ तणं रण्णाउ पाणिभं सव्वों सअंगाहम् । तह वि मआणे मईण अ आमरणन्ताइँ पेम्माई ॥ ८७ ॥ [अरण्यातृणमरण्यात्पानीय सर्वत. सयग्राहम् । तथापि मृगाणा मृगीणा चा मरणा तानि प्रेमाणि ॥] निरूपाधि प्रेम ठाध्यमिति भावः॥ सतापातिशयराण्डनाय चन्दनलेपाचुपचारं कुर्वाणा वारयन्ती विरहिणी काचिदाह- तावमवणेइ ण तहा चन्दणपको वि कामिमिहुणाणम् । जह दूसहे वि गिम्हे अण्णोण्णालिगुणसुहेल्ली ॥ ८८ ॥ तापमपनयति न तथा चन्दनपङ्कोऽपि कामिमिथुनानाम् । यथा दु सहेऽपि ग्रीष्मे अन्योन्यालिगनसुखकेलिः ॥] यदुपचारेण यस्योपशमनं भवति तत्रान्य उपचारो विफल इति भाव.।। सपल्या दुश्वारिश्यख्यापनार्य मुग्धवधूवृत्तविरुदा प्रथमरजोयोगसूचनव्युत्पत्ति तस्याः सूचयन्ती कास्सेिय माह- तुप्पाणा किणो चिट्ठसि त्ति पडिपुच्छिभाएँ वहुआए । दिगुणनेटिअजहणत्यलाइ लञोणअं इसिअम् ॥ ८९ ।। तलिसानना किमिति तिष्ठसीति परिपृष्टया वघ्या । द्विगुणाष्टितजघनस्थलया लजावनत हसितम् ॥ जघनस्थलप्रसादनेनैवार्तवमाविष्फुर्वला लज्जयावनतं यया स्यात्तथा हसितमित्यर्थ ॥ कुलनीत्तशिक्षार्थ बन्धुवधू फुलवधूमाइ- अिअ चे विलीणो ण साहिओ जाणिऊण घरसारम् । बान्धवदुन्वअणं विअ दोहलओ दुग्गअवहूए ॥ ९० ॥ हृदय एव विलीनो न बेथितो ज्ञात्या गृहसारम् । बान्धवदुर्वचनमिव दोहदो दुर्गतवध्या ] १. 'खय प्रायम्' इति य पाट . २ 'विगे मच्छिवि ति' इति सग पाठ- ३. 'घृत' इति ग पुस्तके नास्ति; 'पृतानना' इति घ-पाठ, ४. "किमिसमीति' इति घ-पाठ. ५. 'साधितो' इति ग-ध पाट . ६. 'दुर्विनयमिव पति ग-पाठ . . इदको' इति घ पाठ.

३ शतकम् गाथासप्तशती। बुरस्त्रीचरितविरुद्ध सपन्या धायै ख्यापयन्ती कापि बन्धुवधूजनमाह- धावइ विअलिअधम्मिल्लसिचअसजमणवावडकरग्गा । चन्दिलभअविवलाअन्तडिम्भपरिमग्गिणी घरिणी ॥ ९१ ॥ [धावति विगलितपम्मिसिचयसंयमनव्याप्तकराना । चन्दिलभयविपलायमानम्भिपरिमार्गिणी गृहिणी ॥] विगलितयो शिथिलयोधम्मिलसिचययो सयमने व्यायते कराने यस्या साच- न्दिो चापितस्तस्य भयेन विपलायमानस्य डिम्भस्य परिमार्गणशीला गृहिणी था- वति । 'चन्दिल पुसि वास्तूकशाके गर्भ च नापिते' इति मेदिनीकोष । एव च च- न्दिलशब्दो नापितवचनो देशीति कस्यचिदुक्ति कोपानालोचनमूलत्वादुपेक्ष्या । व्या- जेन स्तनबाहुतूलादिदर्शयितु धावतीति योजना वा ॥ भुजगमलोमनाथै दूती नायिकाया वय सथि सौभाग्यं चाह- जह जह उवहइ बहू णवजोव्यणमणहराई अङ्गाई । तह तह से तणुआअइ मज्झो दइओ अ पडिवक्खो॥ १२ ॥ [यथा यथोडेहते वधूर्नवयौवनमनोहराण्यगानि । तथा तथा तसानियते मध्यो दयितश्च प्रतिपक्ष ॥] चकारो मिनक्रम प्रतिपक्षचेति योज्य । स्वभावान्मध्य । अत्यासत्या दयित । ईयासतापेन प्रतिपक्ष ॥ उद्धपतिद्वेषिणी कुलवधू शिक्षयन्ती कापि पतिमतावृत्तमाह-- जद्द जह जरापरिणओ होइ पई दुग्गओ विरूओ वि। कुलबालिआण तह तह अहिअअरं वल्हो होइ ।। ९३ ॥ [यथा यथा जरापरिणतो भवति पतिर्दुगतो विरूपोऽपि । पुलपालिकाना तथा तथाधिक्तरं वल्लमो भवति ।। कमपि युवान प्रति साभिलाषा कामिनी समानवय शीलां मातुलानीमाह- एसो मामि जुवाणो वारंवारेण जं अडअणाओ। गिम्हे गामेकवडोअअ व किच्छेण पावन्ति ॥ ९४ ॥ १ मिग्गोसिणी' इति ग पाठ.. २. "विगठितदेशवन' इति ग-पाठ ३ 'नापि तभयपरायमान' इति ग-पुस्तरे, 'नापितभयविफ्लायमान' इति घ पुस्तके पा. ५. 'बालकमाविणी' इति ग-पाठ . ५ 'उहति' इति गघ-पाठ ६. 'पहिथित" इति ग पुस्तके, 'तनुशायदे' इति च घ पुस्तके पाट . ५. 'भ' इति ग पाठ.

काव्यमाला। . [एष मातुलानि युवा वारंवारेण यमसत्यः । ग्रीष्मे ग्रामैकवटोदकमिव कृच्छ्रेण प्राप्नुवन्ति ॥] अडणाओ असत्यः । वारंवारेण वारकमेण । पर्यायेणेति यावत् । यं युवानमरायः दृच्छ्रेण प्राप्नुवन्ति स मयानायासेन प्राप्यत इति स्वसौभाग्यप्रकटनम् ।। परवनितासुरतलम्पटस्य निजनायकस सकेतस्थानभन परितुष्टा कापि पतिनता पितृष्वसारमाह- गामवडरस पिउच्छा आवण्डुमुहीण पण्डुरच्छाअम् । हिएण समं असईों पडइ वाआइ पत्तम् ॥ ९५ ॥ [मामवटस पितृघस आपाण्डुमुखीनां पाण्डुरच्छायम् । हृदयेन सममसतीनां पतति वाताहतं पत्रम् ॥ प्रामवटस्य पत्रमसतीनो हृदयेन समं पततीति संवन्धः । इतिज्ञतामात्मन. ख्यापयनागरिक सहचरमाह- पेच्छइ अलरक्खं दीहं णीससइ सुण्ण हसइ। जह जम्पइ अफुडत्यं तह से हिअअट्ठिअंकि पि ॥ ९६ ।। वैश्यत्यलन्धलक्ष्यं दीर्घ नि.धसिति शून्यं हसति । यथा जल्पत्यस्फुटार्थे तथा तेसा हृदयस्थितं किमपि ॥] नागरिकः सहबरशिक्षार्थमसतीनां प्रत्युत्पन्नमतित्वमाह- गहवइ गोम्द सरणं रक्समु एमं त्ति अहअणा भगिरी। सहसागअस्स तुरिअं पइणो विभ जारमप्पेइ ।। ९७ ॥ गृहपते गतोऽसाकं शरण रक्षेनमित्यसती भणिया । सहसागतस त्वरित पत्युरेव जारमर्पयति ।।] नियमानोऽपि भावः समावादेवाविर्भवतीति प्रतिपादयन्ती कापि रासी शिक्ष. यिनुमाह- अिभट्ठिअस्स दिजउ तनुआअन्ति ण पेन्द्रह पिच्छा। हिमट्ठिभोम्ह फंतो भणि मोहं गा मरी ॥ ९८ ॥ 1. 'भगिनि' इति ग-पुस्तके, 'मानुति' इति च ग-पुसके पाटः. २. परत. नाः' इति ग-पाठ:. ३. प्रेस इति ग घ-पाठः, ४. 'शून्य' इति च-पार. ... 'भसा' इति ग-पाः... 'मनिउणा मनिउम्' इति ग-पाटः ५. 'गृहपतिः' इति 4. रासन मिसतिनिपुर्ण मदिरया' इवि ग पाठः, १. मनमौला' इन म-पाट: १..विडाछा' इति गसाठः ११. 'भरी' इति ग-पाठ:. ग-पाट:.

३ शतकम् ]] गाथासप्तशती। दियेप्सितस दीयतां तेनूभवन्तीं न पश्यथ पितृप्सः। हैदयेप्सितोऽमाकं कुतो भणित्वा मोहं गता कुमारी॥ भयमर्थ:-कौमारदशायामेव कस्मिन्नपि पुरुषे कस्याश्चिदनुराग दृष्ट्या कयापि विदग्धया पितृष्वसाई प्रत्युक्तम्-इयं हृदयेप्सिताय कस्मैचिदीयतामिति । ततः खाशयनिस्वार्थ तयारमा कुमारीणी हृदयेप्सितः कुत इत्युक्त्वा प्रियस्मरणावेगान्मोहः प्राप्त इति ।। भुजंगप्रलोभनाय दूती नायिकाया. मुरतावसानोपचारचातुर्यमाह- खिण्णरस उरे पैइणो ठवेइ गिम्हावरणहरमिअस्स। भोलं गलन्तकुसुमं ण्हाणसुअन्धं चिउरभारम् ॥ ९९ ॥ [खिनस्पोरसि पत्युः स्थापयति ग्रीष्मापराहरमितस्य । आई गलत्कुसुमं मानसुगन्धं चिकुरभारम् ॥] न्योत्सायो केलिरसिंको युवा कान्तायाः कपोलकान्ति वर्णयति- मह सरसदन्तमण्डलकवोलपडिमागओ मअच्छीर भन्तो सिन्दुरिअसलवत्तकरणिं वहह चन्दौ ॥ १०॥ [असौ सरसदन्तमण्डलकपोलमतिमागतो मृगाक्ष्याः । अन्तः सिन्दूरितशलपात्रसादृश्यं वदति चन्द्रा।] परसदन्तमण्डलं मण्डलाकार दन्तक्षतं ययोः कपोलयोः । प्रतिमागतः संकान्तपति- म्वचन्दः मन्तमध्ये सिन्दूरितं संजातसिन्दूरे यच्छापानं तत्सादृश्यं वहतीत्यर्थः । तक्षतस्पारकत्वासिन्दूरसाम्यम् । कपोलयोश्च स्वच्छत्वाच्छापानसाइयं बोध्यम् ।। रसिमजणहिमअदइए कइवच्छलपमहसुकइणिम्मए । सचसअम्मि समन् ती गाहास एअम् ॥ [रसिकजनहदयदयिते कविवत्सलप्रमुखसुकविनिर्मिते । सप्तशतके समाप्तं तृतीयं गाथाशतकमेतत् ॥] १. 'हृदयस्थितस्स' इति घ-पाठ. २. "दुर्वलायमाना' इति ग-पुस्तके, 'तनुकाय- जना' इति च य-पुस्तके पाठः. ३. हदयस्थितो' इति य-पाठः, 'हृदयेप्सितममा तहत भनितु मोहमुपागता' इति ग-पाठः, ४. 'वडणो' इति ग-पाठः, ५. 'मुग त पा१. 'मअच्छीआ' इति ग-पाठः. .. 'पात्रकरणि' इति ग-पुस्तके, पात्रममता' इति च घ-पुस्तके पाठः.

काव्यमाला। चतुर्थ शतकम् । अविदग्धे भवति यया तथा जारनिहव कुलटाः कुर्वन्तीति सहचरशिक्षा नाग रिक आह-- . अह अम्ह आअदो अज कुलहराओ त्ति छैन्छई जारम् । सहसागअस्स तुरिअ पइणो कण्ठ मिलावे ॥१॥ [असावसाकमागतोऽद्य कुलगृहादित्यसत्ती जारम् । सहसागतस्य त्वरित पत्यु कण्ठे लैंगयति ॥] छेन्छईत्यसतीवाचको देशीशब्द ॥ अविषयेऽपि पत्युरनुनयादरेण सखी नायिकाया सौभाग्य ख्यापयितुमाह-- पुंसिआ अण्णाहरणेन्दणीलकिरणाहआ ससिमऊहा । माणिणिवमणम्मि सकन्जलसुसङ्काइ दइएण ॥२॥ [प्रोन्छिता कर्णाभरणे द्रनीलकिरणाहता शशिमयूखा । मानिनीवदने सरजलाथुशङ्कया दयितेन ॥] नायकप्रलोमनाय दूती कस्यादि सौदर्यातिशय वयति- एदहमेत्तम्मि जए सुन्दरमहिरासहस्समरिए वि। अणुहरइ णवर तिस्सा वामद्ध दाहिणद्धस्स ॥ ३ ॥ [एतार माने जगति सुदरमहिलासहसभृतेऽपि । अनुहरति केवल तस्सा यामाधै दक्षिणास ॥] कृतापराधेऽपि प्रिये किं मानयिमुसी त्वमसीति सहयोका काप्या मनोऽनुराग स्थि रमेहतां च सूचयदी तामाह- जह जह पाएइ पिओ तह वह पञ्चामि चचले पेन्मे । वाही वलेइ अङ्ग सहावयद्धे वि रुक्सम्मि ॥४॥ [यथा यया चादयति प्रियस्तथा तथा नृत्यामि चञ्चले प्रेम्णि । वही वलयत्यङ्ग स्खमावतधेऽपि वृक्षे 1] पदा निरामयतया स्थानुमाया रता यथा सन्ध पक्षमाथिस तिष्टविसपाहमार 1 'भाषओ इति कत्र पाठ २ लिई इति प-पाठ दति ग पाट ४ 'अयमसावि ग-पाट ५. 'लागयति' इति कपाट पुटिम' इति ग-पाठ ७ 'विश्या' इति गपाद 'श्रीमहस' इति ग-पार . 'हिए' इविक पुस्तके, 'हे' इति च गगुसरे पाट. ६ ४ शतकम्] गायासप्तशती। नटयायमधममननुरफमप्याथिस तिष्ठानि यावदुत्तमं कमप्यासादयामीति दूती प्रति कु. लदायाः कस्याश्चिदियमुतिः। महता प्रयनेन लघस्य नायकस्यानभिज्ञता प्रस्टयन्ती कापि सखी पनिवेदमाह- दुक्रोहि लम्मा पिओ लदो दुक्सेहि होइ साहीणो । लदो वि अलदो दिवा जइजह हिअ तहण हो ॥ ५ ॥ दुःखलभ्यते प्रियो लन्धो दुःखमवति साधीनः । लन्धोऽप्यलन्ध एवं यदि यया हृदयं तथा न भवति ॥] उलहान्तरिता जातानुतापा प्रियसनीमाह- अव्वो अणुणअसुहकहिरी अकों क फुणन्तीए । सरलसहायो वि पिओ अविणअमग्गं घलण्णीओ ॥६॥ (कप्टमनुनयमुखकाचणशीलयाकृतं कृतं कुर्वत्या । सरलसमायोऽपि प्रियोऽविनयमार्ग बलानीतः ॥] करमित्यर्थे भयो उति देशी । करोतिरोधारणे । अकृतमप्यपराधं कृतमिति स- मुबारयन्त्येत्यर्थः। मयेति शेषः ॥ मोयितपतिकाया विरहाति मुग्धता च सूचयन्ती दूती नायकसमीपगामिन . पान्यमाह- । हत्येसु अ पाएसु अ अङ्गुलिंगणणाइ अगा दिअहा। एण्हि उण केण गणिजउ चि भैणिऊ रुभइ मुद्धा ॥ ७॥ हिस्खयोध पादयोश्चालिगणनयातिगता दिवसाः । इदानी पुनः केन गण्यतामिति मणित्या रोदिति मुग्घा 13 प्रवासोद्यतस्य नायकस्य गमनाक्षपाय काप्यपशकुनगर्भ वसन्तं वर्णयति- कीरमुहसैच्छहहिं रेहइ वसुहा पलासकुसुमेहिं । बुद्धस्स पलणवन्दणपडिएहि 4 भिक्खुसंघेहि ॥ ८॥ [कीरमुखसै राजते वसुधा पलाशकुसुमैः । बुद्धस्स चरणवन्दनपतितैरिव मि संधैः ।। अत्र युद्धस्त्यायुत्तरार्धमपशकुनसूचनार्थमेवोपात्तम् ॥ १. अन्यो' इति ग-पुस्तके, 'अहो' इति च घ पुस्तके पाठः, २. 'काहिण्या' इति ३. 'गणणाहि' इति क-पाठः. ४, मगेउ' इति ख-पाठः, ५, 'सच्छ- पाह' इति स-पाठ:- ६. 'न' इति क-पाठः, ५. 'सदृशैः' इति राम पातः इति घ-पाठः ग-पाठः, १००. काव्यमाला। अनुनयं प्राहयितुं सखी मानवतीमाह- जं जं पिॉलं अहं तं तं जा किसोअरि किसं ते । जं. तणुअं तं तं पि णिद्विअं किं त्य माणेण ॥ ९॥ [यद्यत्पृयुलमॉ तत्तजातं कृशोदरि कृशं ते । यद्यत्तनुकं तत्तदपि निष्ठितं किमन मानेन ॥] निष्ठितं निष्ठां प्रकर्षे गतम् । अतिदुर्वलं जातमिलर्यः । निजभर्तुरेव न सा वालमा तत्कयं तस्या गुणानस्तोपोरित्यभियोज्यनीका बूती तमाह- ण गुणेण हीरइ जणो हीरइ जो जेण भाविओ तेण । मोत्तूण पुलिन्दा मोचिआइँ गुवाओं गेहन्ति ॥ १०॥ नणेन हियते जनो हियते यो येन भावितस्तेन ।' मुक्त्या पुलिन्दा मौकिकानि गुना गृहन्ति ॥] हियते वीक्रियते॥ गमनाय पृय किमिति किमप्युत्तरं न ददासीवि प्रियेणोकाया वयाः संवन्धिनी वृदा काचिदाह- "लवालआण पुचम यसन्तमासेकउद्धपसराणम् । ऑपीअलोहिआणं वीदेइ जणो पलासाणम् ॥ ११ ॥ [लालयानां पुत्रक वसन्तमासैक्लन्धरसग्रणाम् । आपीतलोहितानां रिमति जनः पलाशानाम् ॥] पलाशानामिति शेषविवक्षया पयम्पर्य पाटो । पलाशेभ्यः नियुपेभ्यो वधूमनो विभेदीत्यर्थः । भय च पलं मौसमदन्ति मश्यन्तीति पलाशा रसा। वेभ्यो जनो निभेतीति लेपः । पुष्पपक्षे सदा शारा । पक्षे सक्षमनगरी । ' रक्षापुरीशाया- शाकिनीकुलटासु च' इति मेदिनीकोषः । तथा (राक्षसप छाया) साप्रमाकलाप- प्रसराणाम् । पुणपक्षे आईपीतवर्णानि च तानि मोदितानि च । पा. मन्तात्पीत रोहित रपिर पाम् । वसन्तसूरपठारागुमभीता तब गमनं नाम: करोतीति भावः ॥ १. 'गु इति ग-पाट, १.''गुभाउ' इति कश-पाउ:. ग-पाट: ४. 'भावी' इति सम्पाट: ५ "बिहेविग-मा. 1. 'पुर 1403 १ शतकम्] गाथासप्तशती। १०१ . सखी सख्या कान्तं प्रत्यनुरागातिशयमाह- घेत्तूण चुण्णमुहिँ हरिसूससिआप वेपमाणाए । भिसणेमित्ति पिअअमं हत्थे गन्धोदअ जाअम् ॥ १२॥ [गृहीत्वा चूर्णमुष्टिं हैपोत्सुकिताया चेपमानाया । अयकिरामीति प्रियतम हस्ते गन्धोदक जातम् ॥] प्रियतम विच्छुरामीति चूर्णमाटं गृहौवा होत्सुकिताया चेपमानाया हस्ते गन्धो. दक जातमित्यन्वय । कान्तदर्शनजनितसात्त्विकभावात्मकखेदाचूर्णमुष्टिरेव गन्धोदक जात मित्यर्थ । चूर्णमुष्टि कर्पूरादिभुगन्धव्यधूलि । भिसणेमि इति विच्छुरणे देशी ॥ सपन्या देवराभिसार सूचयन्ती सपनो तामाह- पुढेि पुससु फिसोअरि पेडोहरकोलपत्तचित्तलिअम् । छैआर्हि दिअरजाआहि उजुए मा कलिजिहिसि ॥ १३ ॥ [पृष्ठ प्रोन्छ कृशोदरि पश्चाद्गृहाकोटपत्रचित्रितम् । विदग्धाभिर्देवरजीयाभि परजुके मा 'कलिष्यसे ॥] ऋजुके अभिसरणप्रछादनानभिज्ञे । पचाहे विद्यमानो योऽहोटयक्षस्वस्य पौधि- रत पृट प्रोञ्छ । पडोहरशन्द पश्चादहवचनो देशी । कृतापराधे प्रिये मान कारयन्ती सखी काप्यात्मनोऽनुरागातिशयेन मानाक्षमता- अच्छीइँ ता थइस्स दोहि वि हत्येहि वि तस्सि दिटे। अहं फैलम्बकुसुम व पुलइझं फहँ शु ढकिस्सम् ॥ १४ ।। [अक्षिणी तावत्यै गयिष्यामि द्वाभ्यामपि हस्ताम्या तमिन्दृष्टे । अग कदम्पकुसुममिव पुरक्रित कथ नु छोदयिष्यामि ॥) , 'भसिणेमि' इति ख पुस्तके, 'भसरेमि' इति च फ-पुस्तके पाठ . २. 'वर्ण ति घ-पाठ . ३. हर्षोच्छ्रसिताया' इति ग घ-पाठ, ४ 'मरिष्यामि प्रियतम मेति हस्ते इति ग पुस्तके, "विजहामीति प्रियतमहस्ते' इति च घ पुस्तके पाट . . 'पुलोहर, इति ग पाठ . ६.'छआई' इति क पाठ. ७.'जाआई' इति क ... 'प्रोग्छय' इति ग-पाठ १. 'छकाभि ' इति ग घ पाठ... 'भाया- भतिघपाठ." हिश्यसे' इति ग-पाठ . १२. 'अच्छीई' इति खगपात, १३.अम्ब' इति ग-पाठः, १. 'स्यामध्ये होते ग पाठ. १५. 'सादयिष्ये' इति गा-पाठ.

काव्यमाला। नायकसमीपगामुकपथिकमुखेन सखोजनो नायिकाया अवस्थां गृहस्स विशीर्णता च सदिशमाह- झन्झावाउत्तणिए घरम्मि रोऊण णीसहणिसण्णम् । दावेइ व गमवइ विजुञोओ जलहराणम् ॥ १५ ॥ [सम्झावातोत्तृणिते गृहे रुदित्वा नि.सहनिषण्णाम् । दर्शयतीवे गतपतिका विद्युदयोतो जलघराणाम् ॥] झावातो वर्षानिलः । तेनोत्तृणिते तृणशून्यीकृते गृहे नि सई यथा स्यात्तथा नि- पण्णां प्रोषितपतिको विद्ययोतो जलधरेभ्यो दर्शयति । भवदुदयादियमेतामवस्था प्राप्ता, तदस्याः पत्युरुत्कण्ठां कुरुत येनासौ झटित्यायास्यतीत्याशयेनेवि भाव.॥ प्राम्यस्त्रीसभोगे मन्दादर नायक प्रवर्तयितुं दूवी अन्यापदेशेनाह- भुखसु जं साहीणं फुत्तो लोणं फुगामरिद्धम्मि । सुहझ सलोणेण वि किं तेण सिपोहो जहिं पत्थि ॥ १६ ॥ [भुक्ष्य यत्वाधीन फुतो लवण कुमामरिने । सुभग सलवणेनापि किं तेन हो यत्र नास्ति ॥] लवण सामुद्रिकम् । रक्षे लावण्यम् । स्नेहो पृतादि । पक्षे प्रेम । यद्यपि माम. पासिलादियं कुवेषा तथापि त्वयि प्रेमातिशययुकेति भाव ॥ विरसमप्यनुरागवशात्सुरसं भवतीति कापि सखीमाह- सुहच्छिआइ हलिओ मुहपकअसुरहिपवणणिव्वविअम् । वह पिअइ पेअइकडुअं पि ओसहं जह ण णिवाइ ॥ १७ ॥ सुिखपृच्छिकाया लिको मुखपङ्कजसुरभिपवन निर्वापितम् । तथा पिबति प्रकृतिकटुकमप्यौषध यथा न तिति ॥ अयमर्थ-ज्वरितस्य नायकस्य सुखप्रश्नार्धमागतया नायिकया उष्ण कार्योषध . स्कारेण शीतल कृतम् । ततस्तेन तिकमपि तमि-शेप पीतमिति ॥ सा तत्र न गता, अह तु निकुझे चिरं स्थित्वा समागत इति वदन्त जार दूती ना यिकायास्तत्र गमन प्रतिपादयन्त्याह- अह सा तहिं तहिं विस वाणीरवणम्मि चुक्कसंकेआ। तुह दंसणं विमग्गइ पन्भट्टणिहाणठाणं व ॥ १८ ॥ 7. 'दावेद पउत्यपइअ' इति क पुस्तके, 'दावेइम' इति च स पुस्तके पाठ ३ 'इव' इति क ख घ-पुस्तकेषु नाखि ३ विद्युदुइयोतो' इति घ-पाठ . ४. 'इ. च्छिाई इति ग पाठ. ५. पकिदिकडुअम्मि' इति ग-पाठः ६. 'मुसपछिकया इति घ-पाठ... 'निवाति इति गध पाठ. .

१ शतकम् ] गाथासप्तशती। [अथ सा तेन तत्रैव वानीरवन विस्मृतसंकेता । तब दर्शनं विमार्गति प्रनष्टनिधानस्थानमिव ।] अप त्वद्गमनानन्तरं विस्मृत संकेतस्थानं यया सा एतादृशी सा यन व गतस्तत्रैव वानीरवने त्वामश्वेषयतीति भावः ॥ कृतापराधं नायकसहचरं भयानायकोपसर्षगविमुखमभिमुखयितुं काचिदाह-- दृढरोसकलुसिअस्स वि सुअणस्स मुहाहिँ विपिनं कन्तो। राहुमुद्दम्मि वि सतिणो किरणा अमअं विअ मुअन्ति ॥ १९॥ दृढरोषकलुषितसावि सुजनस मुखाःप्रियं कुतः । राहुमुखेऽपि शशिनः किरणा अमृतमेव मुञ्चन्ति ॥] कापि जाराभिमतर्गपादनासमर्था तत्कृतोपहार परिहरन्ती कोऽत्र दोष इति पदन्ती दूतीमाह- अवमाणिओ वि ण तहा दुम्मिजइ सजणो विहवहीणो । पैडिकाउं, असमत्यो माणिजन्तो जह परेण ॥ २० ॥ [अवमानितोऽपि न तथा यते सजनो विमवहीनः । प्रतिकर्तुमसमर्यो मान्यमानो यथा परेण ]] प्रतिक प्रत्युपकर्तुम् । मान्यमानो दानादिना सक्रियमाणः ॥ विश्वासकयनाय प्रोत्साहयन्ती दूती नायिकामन्यापदेशेनाह- फलहन्तरे वि अविणिग्गआई हिसअम्मि जरमुवगआई। सुअणकआ रहस्साई डहइ आउक्खए अग्गी ॥ २१ ॥ कलहान्तरेऽप्यविनिर्गतानि हृदये जरामुपगतानि । मुजनश्रुतानि रहसानि दहत्यायुःक्षयेऽमिः ॥] फलहान्तरेऽपि कलहमध्येऽप्यविनिर्गतान्यप्रकटानि । हृदयान्तरे हृदयमध्ये ज पगतानि बहुकाल स्थितानि । मायुःक्षये सत्यनिर्दहति । न पुनरन्यस्सिन्सकाम माव:॥ १. 'तस्मिन् तस्मिन्नेव' इति ग पाठ.. २. 'भ्रष्टसकेता' इति ग-पुस्तके 'मुक्क- सकेता' इति च घ-पुस्तके पाठः, ३. 'मार्गमति' इति ग-पाट:. ४. "वित्रियं इति गध-पाठः ५. 'पदिआउँ' इति ग-पाठ... 'दुर्मनायई' इति ग पाठः, ७. सं. मानितो' इति ग-पुस्तके, 'मन्यमानो' इति च ध-पुस्तके पाठः. 4. 'कृतानि इति गघ-पाठ:- काव्यमाला। - दूती प्रोषितभर्तृकागृहातपस्य माधवीलताकुजगहनखेन दिववाभिसरणयोग्यताम् , नायिकायाच वसन्तकालप्राप्योत्कण्ठातिशयेन सुसाध्यता प्रतिपादयन्ती नायकमाइ- लुम्बीओ अङ्गणमाहवीण दारग्गलाउ जाआउ । मासासो पन्थप्पलोअणे वि पिट्ठो गैअवईणम् ॥ २२ ॥ [स्तबका अङ्गणमाधवीनां द्वारार्गला जाताः । आश्वासः पान्यालोकनेऽपि नेष्टो गतपतिकानाम् ॥] मुम्बीति सबके देशी.। यदा पन्थपलोअणे वर्मप्रलोकने । अर्थात्पत्युः । एवेन वस- तोऽपि संवृत्तो वत्मावलोकन विनोदोऽपि नष्ट इति नायिकाया उत्कण्ठातिशयो व. नेतः॥ सखी सख्याः कान्न प्रत्यनुरागातिशयं नयनप्रशंसां चाह- पिअदसणसुहरसमउलिआई जइ से ण होन्ति अणाई। ता केण कण्णरेइ लक्खिजइ कुँवलनं तिस्सा ॥२३॥ [प्रियदर्शनसुखरसमुकुलिते यदि तसा न भवतो नयने । तदा केन कर्णरचितं लक्ष्यते कुवलयं तस्साः ॥] आद्यस्य नयनपदेन द्वितीयस्य च कुवलयपदेनान्वयात्तस्या इति पदवयस्य न वैय- ध्यमिति ध्येयम् ॥ अभ्युदयहेतुरपि कार्यक्शामुद्रेग जनयती ते प्रतिपादयन्नागरिकः सहचरमाह- चिक्खिल्लखुतलमुहकडणसिठिले पंइम्मि पासुत्ते । अप्पत्तमोहणसुहा धणसमझ पामरी सवइ ॥ २४ ॥ किर्दमममहलमुखकर्षणशिथिले पत्यौ प्रसुमे । अप्राप्तमोहनसुखा घनसमय पामरी शपति ॥] चिविखलः फर्दमस्तत्र सुतं मन यद्धलमुख तस्य काणेन शिथिले प्रान्ते पयो धमवशात्सुप्ते सति अप्राप्त मोहनसुखं सुरतसुसं यया सा पामरी घनसमय शपति । नि- ग्दतीत्यर्थः । यद्वा विद्यमानेऽपि पत्यो हलिकवध्वाः सुलभत्र प्रतिपादयन्या दूसा जार प्रतीयमुक्तिः ।। १. 'पन्यहिअपलोअगे' इति क पाठः. २. 'गअपहाण' इति क-पुस्तके, 'गअव. ईए इति च गपुस्तके पाट:. ३. "विगतो' इति घ पाठः. ४: 'लग्ग' इति क-पाठः. ५. 'कुभलभं' इति क-पाठः. ६. 'तत्केन' इति घ-पाठ:. ७."पिअम्मि' इति ग. पाठः, 4. 'कर्दमाक्षिस' इात ग-पाठः. ९. 'प्रिये' इति ग पाठः.

- १ शतकम् गाथासप्तशती। गमनोयतस्य भर्तुर्गमनाक्षेपाय विरहनुःसहत्वं प्रकाशयन्ती कापि सरचरनमस्कार- पउनाह- दुम्मेन्ति देन्ति सोक्खं कुणन्ति अणुराम रमान्ति अरइरइयन्यवाणं णमो नमो मअणवाणाणम् ॥ २५ ॥ (न्वन्ति ददति सौख्यं कुर्वन्त्यनुरागं रमयन्ति । अरतिरतिबान्धवेभ्यो नमो नमो मदनबोणेभ्यः ॥] विरहे दुःखदातृत्वासंगमे च सुखदातृत्वादरतिरतिबान्धवस्वम् । कापि कामवाणव्यापारवैचित्र्यवर्णनेन कमपि युधानं प्रत्यारमनो मन्मयव्ययामाह- फुसुममा वि अइखरा अलद्धफंसा वि दूसहपआवा । भिन्दन्ता वि रइअरा कामस्स सरा पहुविअप्पा ॥ २६ ॥ [कुसुममया अप्यतिखरा अलन्यस्पर्शा अपि दुःसहप्रतापाः । मिन्दन्तोऽपि रतिकराः कामस्य शैरा महुविकल्पाः ॥] बहुप्रकारा इत्यर्थः ॥ उत्कण्ठा विनोदनाथ प्रोपितमर्तृका प्रियगुणानाह- ईसं जगेन्ति देोवेन्ति मम्महं विप्पिों संहावेन्ति विरहेण देन्ति मरिउ अहो गुणा तस्स पहुमग्गा ॥ २७ ॥ [ईयों जनयन्ति दोषयन्ति मन्मथं विप्रिय सोहयन्ति ।' विरहे म ददाति मर्तुमहो गुणास्तस्य बहुमार्गाः ।] ईप्यो जनयन्तीखनेनान्यवनितानिः काम्यमानत्वासान्दतिशयः दीग्यन्ति मन्म- यमिति सुरतकरगकोशरम् । वित्रिय साहयन्तीखनुनयवादचातुर्यम् । पिरदे न ददति ममस्यनेन पुनः समागमाशानिबन्धः प्रेमसद्भावय म्यज्यते । तस्य प्रियस गुणा ब. हुमार्गा पाप्रकाराः । तस्य कामशरस गुणा इत्यर्थः ति कषित् ॥ स्वध्यनुरका सा वायरसदानन्याजेन गृह गई प्रमन्ती तशपि यह गता। तत्राति व तयान र इति दूनी गोपालम्भ कमन्याह- णीमाई भन णिविव पिणद्धणपरगद वराईए । परपरिवाडीस पहेणआई तुह सणासाए ॥ २८ ॥ १. दुमनायन्ते विग पुस्तके, 'नयन्ति' इपिघलके पाठः २'घरयन्ति रवि गगाट. ३. अनुराग घ.पा. ४. मिरवि गन्धदाना' ही गपाटः ५.माणानाम्नी-पाठः. १. "विभा'की ग-पाट ७. ग-पाठः ८. 'गागागर दीपेन्त इति गा.... 'दन्त की प.पा. ११. सन्ति' ही ग पुराणे, 'मान्दि विपके पार भन्दमान वि १०६ काव्यमाला। [नीतान्यद्य निष्कृप पिनद्धनवरङ्गकया पराक्या। गृहपरिपाट्या प्रहेगवानि तव दर्शनाशया ॥] नवरतकं नूतनरकवनम् । प्रहेणकानि वायनानि । 'प्रहेणकं वायनकम्' इति हारावली । भयं भावः धन्यस्त्वमसि यमुत्सवब्याजेन गृहपहप्रमणखेदमगणयन्ती सा वा दिक्षते । अतस्तामात्मदर्शनेनानुकम्पखेति ॥ दरिद्रनायकासको नायिका तल्लक्षणसूचनेन ससी निवारयितुमाह- सूइजइ हेमन्तम्मि दुग्गओ पुप्फुआसुअन्येण । धूमकविलेण परिविरलतन्तुणा जुण्णवडएण ॥ २९ ॥ [सूच्यते हेमन्ते दुर्गतः करीपार्मिसुगन्धेन । धूमकपिलेन परिविरलतन्तुना जीर्णपटकेन n] पुप्फुआ इति करीपानी देशी ॥ शिशिरसमये प्रवासोचतस्य नायकस्य गमनाक्षेपाय नायिका शिशिरप्रवासिनोऽवस्थ वर्णयति- सरसिप्पिरउल्लिहिआइँ कुणइ पहिओ हिमागमपहाए । आअमणजलोल्लिअहत्यर्फसमसिणार अगाई ॥ ३०॥ [तीणपलालोल्लिखितानि करोति पथिको हिमागमप्रमाते । आचमनजलादितहस्तस्पर्शमसृणान्यङ्गानि ॥] सिप्पिर पलालःोल्लिओ आदितः । देशी द्वयम् । यदीदानी त्वया गम्यते तद तवापीयमवस्था भविष्यतीति भावः ॥ परिगृहीतोत्तमन्त्रीकमधर्म चौरं कामुकजनेऽभिद्रवति सति कोऽप्युत्कृष्टनायिकाप रिप्रहसिकस्य निकृष्टस्य निषेधायान्यापदेशेनाह- णक्सक्खुड़िों सहआरमारं पामरस्स सीसम्मि । बन्दिम्भिव हीरति भमरजुआणा अणुसरन्ति ॥ ३१ ॥ निखोरखण्डिता सहकारमञ्जरी पामरस्य शीर्षे । बन्दीमिव,हियमाणां भ्रमरयुवानोऽनुसरन्ति ।] त्वयाप्युत्तमन्त्रीपरिग्रहे कृते युवान उपदावयिभ्यन्तीति भावः । यद्वा विपस्ताय १. 'परिपाला पथिनयनानि' इति घ पाठः. २. 'धुम्म' इति ग पाठः, ३.'' रत' इति ग-पाठः. ४. 'सुगन्धिना' इति ग पाठः, ५. 'सिपिलिहि' इति कर पाठः. ६. 'पुस' इति कख-पाठ:. . "तीक्ष्णतृणाम्रो' इति ग-पुस्तके, 'सरपलाल इति च घ-पुस्तके पाठः '१०७ . ४ शतकम्] गाथासप्तशती। कस्याविनायिकायाः सखी तस्या विपदुद्धरणायान्यापदेशेन नायकमाह-नवखण्डनपा. मरशिरोवस्थानरूपविपत्पतिर्ता सहकारमतरी तिर्यधो भ्रमरा अप्यनुसान्तीति रसिक- शिरोमणेत्तवौदासीन्यमनुचितमिसाशयः ।। विदिताभिप्रायोऽसि मयेति व्यञ्जयन्ती ती नायक विश्वासयितुमाह-- सूरच्छलेण पुत्तम कस्स तुम अल्ललिं पणामेसि । हासकडक्खुम्मिरसा ण होन्ति देवाण जेकारा ॥३२॥ [सूर्यच्छलेन पुत्रक कैमै त्यमञ्जलिं प्रणामयसि । हास्यकटाक्षोन्मिथा न भवन्ति देवानां जयकाराः ॥J जयकारा जयजयेत्यादिकाः तुतयः । बेकारो नमस्कारे देशीति करित् ॥ चौर्यरतप्रदसिया दूती नायिकामुत्कण्ठयितुमाह- मुहविज्झविअपईवं णिरुद्धसासं संसङ्किओलावम् । सवहसभरक्सिओटुं पोरिअरमिअं सुहावेइ ॥ ३३ ॥ मुखबिमारिताद बिरुद्धमा सशकिलापर। शपथशतरक्षितो चोरिकारमितं सुखयति n] मुखेन मुखवावेन विघ्मापितो निर्वापित प्रदोपो यत्र तत् ।। रहस्यकथया दूती नायिका विश्वासयितुमाह- गेमच्छलेण भरि फस्स तुमं रुअसि णिभरकण्ठम् । मण्णुपडिरुद्धकण्ठद्धणिन्वखलिअक्सरुसावम् ॥ ३४ ॥ [गेयच्छलेन स्मृत्वा कस्स त्वं रोदिपि निर्भरोत्कण्ठम् । मन्युप्रतिरुद्धकण्ठानियत्स्खलिताक्षरोल्लापम् ॥] फस्य स्मृत्वा त्वं रोदिपि । नैवविध गीतं भवतीति मया जातम् । यदर्थे खिइसे समई परियामीति भावः ।। खपती प्रतिपेशिजारे प्रति खावरारं स्यापयितुमाह- पहलवमा हराई भन्न पउत्यो पई घरं सुण्णम् । वह जागेसु सअनिअ ण जहा अम्हे मुंसिनामो ॥ ३५ ॥ १. 'देवाण' इति क-पाटा. २. 'जोमारा' इति स पुस्तके, 'जोहारा इतिष गुख पाउ:. ३. 'कस्य' विग घमाट..'हास' ति घ-पाटः, ५.जी. रा' इति ग-पाठः, मोवारसदो नमस्कारे वर्तते' इति कुनयालो . सं. रशवम्का ८'घोरत पाट:. १. 'निगच्छर विग-पाठः ..'मुविधामो इविक-पार:

काव्यमाला। बहलतमा हतरात्रिरथ प्रोषित पतिर्गह शून्यम् । तथा जागृहि प्रतिवेशिम्न यथा येय मुष्यामहे । बहल समो यस्यामित्यनेन गाढा धकार पागच्छन्त कोऽपि न लक्षयतीति सूचितम् । * भय प्रोपित इत्यनेन तदागमनशा निरस्ता । गृह शून्य मित्यनेने हैव खच्छदमाग. च्छेति प्वनितम् ॥ प्रोपितमर्तृपया सखी तत्वान्तस्यागमनत्वराथै सरसमीपगामिन पयिकमाह- संजीवणोसहिम्भिव सुअरस रक्खइ अणण्णवावारा । सासू णवन्मदसणकण्ठागअजीविम सोहम् ॥ ३६ ।। सिजीवनौषधिमिव सुतस रक्षत्यनन्यव्यापारा । वधूनवाप्रदर्शनण्ठागतजीवितां युपाम् ॥] धू सुर्या मुतस्य सजीवनौषधिमिव रक्षतीवि संपा पण्डिता प्रातरागतं मसदन्तयतापीत कान्त सेयेमाह- पूर्ण हिअअणिहित्ताह वसर्सि जाआइ अन्ह हिअमम्मि । भण्णह मणोरक्षा में सुहम कह तीम विण्णाआ ॥ ३७॥ [नून हृदयनिहितया वससि जाययासाक हृदये। अन्यथा मनोरया में मुमग कय तया विशाता ॥] जायया यहासाफ हदये वसरि । अन्यथा नसरातादिक यन्मया चिकीवित कप कृतमित्य ॥ पदी नायिकाया अनुरागातिशय सूरय टी नायकमाह- वह सुहम अईसन्ते तिस्सा अच्छीहि फण्णलग्गेहिं । दिण्ण घोलिरवाइहि पाणि सणसुदाणम् ॥ ३८ ॥ स्वियि मुमग अस्पमाने तसा अशिम्या कर्णमाम्याम् । दत्त घूर्णनशीलोपाम्यां पानीय दर्शनमुगेम्य ॥] भरश्यमाने दानपयमविकम्प गते । करमान्यो स्वानोनुकविचिताभ्यामि 1 बहरापारा' इति ग-पाट, २. 'बस्मा मुगयु इविग-पुराक, 'ब ममुदिशाम" इति च घ-पुरके पाठ- 1. जीवनोपनिय विकगमार.. ४ करोतविघ-पाठ.. ५. 'सामा विग पुन, गागुभ इति. दुसरे पट. (मे कथय कपीस-पसम्यो, ' मेरा घि ऽपरे पाठ 'भईसी कपाट, मराठे' वग-पर . 'पूर्णमाना-पार ...'बाधापी म-पाटा - १०९ -- १ शतकम् गाथासप्तशती। वर्यः । अतः परं त्वदर्शनं दुर्लभमिति मत्वा तस्मै परलोकगताय जलं दत्तमित्युत्प्रेक्षा। यद्वा त्वत्नेहान सदितं तया, किंतु सुखाय जलालिदत्त इत्यपगुतिः॥ प्रोपितभर्तृका कान्तं प्रति गाथया सदेशमाह- उपेक्खागअतुअमुहदसणपडिरुद्धजीविआसाइ । दुहिआइ मए कालो केत्तिअमेत्तो व्व अव्वो ।। ३९ ।। [उत्प्रेक्षागतत्वन्मुखदर्शनप्रतिरुद्धजीपिताशया । दुःखितया मया कालः कियन्मानो वा नेतव्यः॥] उत्प्रेक्षया भावनयागतस्य प्राप्तस्य तब मुरादर्शनेन प्रविरुद्धा स्थापिता जीविताशा यस्यास्तया । अन्यथा जीविताशा गच्छेदेवेति भावः ॥ गलितरूपयौवनां कामपि कुलटा कुटन्याह-- वोलीणालक्खिअरूअजोव्वणा पुत्ति कं दुम्मेखि . दिट्ठा पण?पोराणजणवआ जम्मभूमि व्य ॥ ४० ॥ यतिकारतालक्षितरूपसौरता पुति त न हुँनोति । दृष्टा प्रणटपौराणजनपदा जन्मभूमिरिव ।।] व्यतिकान्तमत एवालक्षितं रूपं यौवन च यस्याः सा । जनपदो लोकः ॥ वयस्यस्याभिमतं संपरस्यत इति नायकसहवरेण पृष्टा दूती तमाह-- परिओसविअसिएहिं भणिअं अच्छीहि तेण जणमझे । पडिवण्णं ती वि उज्वमन्तसेएहि अङ्गेहिं ॥४१॥ [परितोषविकसिताभ्यां मणितमक्षिभ्यां तेन जनमध्ये । प्रतिपन्नं तयाप्युद्वमत्स्वेदैरङ्गैः ॥] भणितमात्स्वाभिमतम् । प्रतिपानमनीकृतम् ॥ परस्परानुरागवतोरपि कयोश्चित्समागमयोग्यसकेतस्थलाभावादभिपत सिद्धिर्न जा- देति नागरिक सहचरमाह- एकाकमसंदेसाणुराअर्वडन्तकोउहल्लाई । दुक्खं असमत्तमणोरहाई अच्छन्ति मिहुणाई ॥ ४२ ॥ १. 'तुह' इति ग-पाटः. २. 'दुहृदया' इति ग-पाठः ३. “इवि' इति ग-पुस्त के, 'इव' इति च घ-पुस्तके पाठः. ४. “बोलीणोलैछिअ' इति ग-पाठ:: ५. 'दिटप्पण' इति क-पाठः. ६. 'व्यविकान्तोपलक्षित' इति ग-पाठः. इति गपुस्तके, दनयति' इति च य-पुस्तके पाठः . दृष्टा प्रनष्ट' इति ग-य-पाटा ९. 'वच्छन्त' इति क-पाठः.१०. 'अन्ति' इति ग-पाठः, 'दुर्मनायमाना भवसि' १० १२० काव्यमाला। [अन्योन्यसंदेशानुरागार्धमानकौतूहलानि । दुःखमसमाप्तमनोरयानि विन्ति मिथुनानि ॥] प्रियं प्रति जातमनुरागं गोपयन्ती नायिका सखी आह- जैइ सो ण वल्लहो धिस गोत्तरगहणेण वस्स ससि कीस । होइ मुहूं ते रविअरफंसव्विसदं व तामरसम् ॥ ४३ ॥ [यदि स न वल्लभ एव गोरग्रहणेन तस्स सखि किमिति । भवति मुखं तव रविकरस्पर्शविकसितमिन तामरसम् ॥] गोनं नान । विसदं विकसितम् । कथ पिता स्व प्रसत्रासीति मातुलान्या पृष्टा कापि मानापनयहेतुमाह- माणदुमपरसपवणस्स मामि सव्वगणिव्युइअरस्स । अबऊहणस्स भई रइणाडअपुध्वरङ्गस्स ॥४४॥ [मानद्रुमपरुषपरनस मातुलानि सर्वाङ्गनितिकरम्प । अपगृहनस्य भद्रं रतिनाटकपूर्वरद्स्य ॥] अवगृहनस्यालिशनस्य । मदं भवत्विति शेषः । प्रियालिनान्मानोऽपगत इति , भायः॥ . फपि युवान प्रति जातानुरागा कापि खहृश्यनिषेपच्चलेन संगमीत्युक्यमाह- णिअआणुमागणीसङ्क हिअअ दे विरम एचाहे । अमुणिअपरमत्यजणाणुलग्ग फीस म्ह लहुएसि ॥ ४५ ॥ [निजकानुमाननि शङ्क ईदय हे प्रसीद विरमदानीम् । अज्ञातपरमार्थजनानुलम निमित्यमांहघयमि ॥] निजकानुमानेन निःशति हृदयविशेषणम् । समिय परमपि पदुम्सद सितं ज्ञात्वा त्वकमनोरथमाभयेत्यर्थः । देशन्दः संशोधने । अशतपरमार्थे परव्ययानभिजने- ऽनुरण भारत॥ १. 'एकक्रमसंदर्शनानुराग' इति ग-पुस्तके, "एकरमसदेशानुराग' इति च ध. पुस्तके पाठः, २. 'सन्ति' इति घ-पाटः ३. इयं सटीका याथा क पुनके नासि. ४. "भिव्यदि' इति ग-पार:. ५, 'ममिनि' पति ग पुरके, 'मातुति' इति पध. इसके पाटः ६. है हृदय' इति क-ख-ग-पाट:. ५. "रिरमैतारतेय' विग-पार १ शतकम्] गाथासप्तशती। . नायिका तमाह- जारव्यामोहनाय दूती नायिकामाः सौन्दर्याविशयं स्यापयितुमाह-~- ओसहिभजणो पइणा सलाहमाण अइचिरं हसिओ ! चन्दो ति तुज्झ वमणे विईण्णकुसुमञ्जलिक्लिक्सो ॥ ४६ ॥ आवसथिकजनः पत्या साधमानेनातिचिरं हसितः । चन्द्र इति तव वदने वितीर्णकुसुमाञ्जलिविलक्षः ।।] आवसायिकश्चन्द्रार्थदानादिवतनियमस्थो जनश्चन्द्रप्रमेण 'वन्मुखे प्रक्षिप्तपुष्पाजलि: पत्या विहसित इत्यर्थः॥ किमिति दुर्वलासीति सखीभिः पृष्टया त्वया किमुत्तर दीयत इति धूर्तनायकेनोक्ता छिजन्तहि अणुदिणं पञ्चक्खंम्मि वि तुमम्मि अङ्केहिं । बालअ पुच्छिजन्ती ण आणिमो कस्स किं भणिमो॥ ४७ ।। [क्षीयमाणैरनुदिनं प्रत्यक्षेऽपि त्वय्यङ्गः । पालक पृच्छयमाना न जानीमः कस कि मणामः [1] बालक उचितानमिव । क्षीयमाणैररुपलक्षिता । पृच्छयमाना किमिति दुर्वला- सीति शेषः । पूर्व तर प्रयासो दुर्बलत्वे कारणमासीन, अधुना तु सनिहिते मयि तय दुश्वेशमप्रतीयतीषु सतीषु किं वक्तव्यं तन जानीम इति भावः । प्राकृवे वचनस्यानि यमात्पृच्छयमानेत्येकवचनं जानीम इति बहुवचन च न विरुद्धमिति ध्येयम् ।। प्रथमतः कृतशीलखण्डन ततो मन्दादर कमपि नायकमनुकूलयितु दूती सोपा- सम्ममाह- अजाणं तणुआरभ सिक्खावा दीहरोइअव्याणम् । विणआइकमारअ मा मा णं पम्हसिजासु ॥४८॥ [अङ्गानां तेनुकारक शिक्षक दीर्घरोदितव्यानाम् । पिनयातिक्रमकारक मा मा एनां प्रेसरिष्यसि ॥] तन्विति भावप्रधानो निर्देशः । तनुत्वकारकेत्यर्थः । विनयस्य शोलस्याविक्रमः सण्डनं तत्कारक। १. 'सुमहि सहिअणो' इति ग-पाठः. २. “विमुक' इति क-पुस्तके, 'विकिण्ण' इति च ग-पुस्तके पाठः, ३. 'सुमुखि सखोजना' इति गपाठः, ४. विकीर्ण' इति ग-पाठ. ५. 'दीयमानः' इति ग-पाठ: ६. स्वयाः' इति ग पाठ... ५. 'तनुत्व. कारक' इति य-पाठः .. शिक्षापक' इति ग-य-पाठः. १. 'प्रमार्जय' इति पुस्तके, 'प्रभंशय' इति च ध पुस्तके पाठः - ११२ काव्यमाला। . प्रवासोद्यतस्य नायकस्य गमनाक्षेपाय काचिदाह- अण्णह ण तीरइ चिअ परिवड्डन्तगरु पिअअमस्स । मरणविणोएण विणा विरमावेउं विरहदुक्खम् ॥ ४९ ॥ [अन्यथा न शक्यत एवं परिवर्धमानगुरुकं प्रियतमस । मरणविनोदेन विना विरमयितुं विरहदुःखम् ॥] प्रियतमस्य विरहदुःख प्रियतमविरहेण जातं दुःख खस्य मरणविनोदेन विना म.. न्यथा प्रकारान्तरेण विरमयितुं न शक्यत एवेत्यर्पः ।। काप्यात्मनोऽनुरागं तस्य चान्यासकि सूचयन्ती नायकमाह-- वण्णन्तीहि तुह गुणे बहुसो अम्हेहिं छिछईपुरओ। वालअ सअमेम कओसि दुल्लहो कस्स कुप्पामो ॥५० ।। [वर्णयन्तीमिस्तव गुणान्बहुशोऽसामिरसतीपुरतः । बालक स्वयमेव कृतोऽसि दुर्लभः कैमै कुप्यामः ॥] छिछई असती । सद्गुणमुखरायाः स्वकृत एवाय ममानर्थ इति भावः । कापि खसौभाग्यप्रकटनायात्मनः प्रियस्य चान्योन्या नुरागमाह--- जाओ सो वि विलक्सो मए वि हसिऊण गाढमुवगूढो । पढमोसरिअस णिसणस्स गठि विमग्गन्तो॥ ५१ ॥ जातः सोऽपि विलक्षो मयापि हसित्वा गाढमुपगूढः । प्रथमापस्तस निवसनस्स ग्रन्धि विमार्गयमाणः ॥] प्रथमेत्यनुरागातिशयेन प्रियस्पर्शात्पूर्वमेव स्खलितस्येत्यर्थः । लक्ष्यापनयनाय मयापि गाढमालिङ्गित इति भावः॥ अन्यासतं नायकमनुकूलयितुं दूती नायिकाया विरहवैधुर्यमाह- कण्डुजुआ वराई अन्न तए सा कावराहेण । अलसाइअरुण्णविअम्भिआइँ दिअहेण सिक्सविआ ॥५२॥ [काण्डर्जुका वराकी अद्य त्वया सा कृतापराधेन । अलसायितरुदितविम्भितानि दिवसेन शिक्षिता ॥] १. 'परिवहन्तस्स गरुअपेम्मस्स' इति क-स-पाठः, २. 'परिवर्धमानस्य गुर कप्रेम्णः' इति घ पाठः. ३. 'कस्स कुप्यामि' इति ग-पाठः ४. णिअंसनशन्द परिधानवनवाचकः' इति कुरबालदेवः. ५. 'विमार्गन्' इति ग-पुस्तके, "विमृगमाण इति घ-पुस्तके पाठः. ६. 'सिक्खइआ' इति ग-पाठः, ७. 'कर्णऋजुका' इति घ-पाठ १ शतकम् गाथासप्तशती। काण्डवहशुका । 'कण्णुज्जुआ' इति पाठे कर्णऋजुका वर्णदुर्वलेयर्थः । 'कन्या ऋजुका इत्यर्थः' इति कश्चित् ॥ वापि दाक्षिण्यादनुनयन्तं शठं नायकमाह- अपराहेहि विण तहा पत्ति जह में इमेहि दुम्मेसि । अवहत्थिअसन्मावेहिं सुहअ दक्खिण्णमणिएहिं ।। ५३ ॥ [अपराधैरपि न तथा प्रतीहि यथा भौमेभिर्दुनोपि । अपहस्तितसहावै सुभग दाक्षिण्यभणितैः ।। निद्राव्याजेन प्रियाशयजिज्ञासया परिभ्रमन्ती भुजी निर्भत्संयन्ती नायिका नायक मा र पिआलिङ्गणसरहसममिरीण वाहुलइाणम् । तुहिकपरणेण अ इमिणा माणसिणि मुहेण ॥ ५४॥ [मा जुध्यस प्रियालिगनसरमसभ्रमणशीलान्या याहुलतिकाम्याम् । सूनीकारुदितेन चानेन भनलिनि मुखेन । याहुलतिकाभ्यामित्यत्र 'क्रुधवासूयार्थाना यं प्रति कोपः' इति चतुर्थी । अब सापराधं प्रियं प्रति कोपामावेन विशेषोक्ति । अदोपी दोषी प्रति मोधन च विभावना दव्या । ता क्षण तु "विशेपोतिरसण्डेयु कारणेषु फ्लावच ' 'रियायाः प्रतिषेधेऽपि पलव्यक्तिर्विभावना' इति काव्यप्रकाशकारोकं इष्टव्यम् ।। पुष्पावचयच्छलेन सक्तस्थानं गच्छन्त कामुक कापि जरत्युदनी सपरिहासमाह- मा व पुष्फलाविर देवा उअअञ्जलीहि तूसन्ति । गोआभरीअ पुत्तअ सीलुम्मूलाई फूलाई ॥ ५५॥ [मा मज पुष्फलयनशील देवा उद्धाजलिभिस्तुष्यन्ति । गोदावर्या. पुनक शीलोन्मूलानि कूलानि ॥] पुष्पाणां लवनं छेदनम् । शीलं सच्चरितमुन्मूलयन्ति निर्मूलं कुर्वन्तीति तथाभूतानि ।। कस्मिन्नपि यूनि जाताभिरापां खामिलापं लखया गोपयन्ती नायिका सखी पाह- वअणे वअणम्मि चलन्तसीससुण्णावहाणहुंकारम् । सहि देन्ती गीसासन्तरेमु कीस म्ह दुम्मेसि ॥ ५६ ॥ १. 'दूमेसि' इति ग-पाठः. २. 'मामेतैरपदुर्मनायसे' इति ग-पुस्तके, 'मामेमिनी- दलसि' इति च घ-पुस्तके पाठः. ३. 'कूल' इति ग पाटः । 'अयि सुवसु मणशिणि सुहास इति ग-पाठ . ५. 'अयि खपिहि मनस्विनि सुखेन' इति ग-पाठः. ६. गि- समान्तरेण इति ग-पाठ.

काव्यमाला। प्रवासोद्यतस्य नायकस्य गमनाक्षेपाय काचिदाह- अण्णह ण तीरइ शिअ परिवहन्तगरु पिअअमस्स । मरणविणोएण विणा विरमावेउ विरहदुक्खम् ॥ ४९ ॥ (अन्यथा न शक्यत एवं परिवर्धमानगुरुकं प्रियतमस । मरणविनोदेन विना विरमयितुं विरहदुःखम् ॥] प्रियतमस्य विरहदुःख प्रियतमविरहेण जातं दुःखं सस्स मरणविनोदेन विना : न्यया प्रकारान्तरेण विरमयितुं न शक्यत एवेसर्थः ॥ काप्यात्मनोऽनुरागं तस्य चान्यासक्ति सूचयन्दी नायकमाह- वणन्तीहि तुह गुणे बहुसो अम्हेहिं छिन्छईपुरओ। वालअ सअमेअ कओसि दुल्हो कस्स कुप्पामो ।। ५० ।। [वर्णयन्तीभिस्तव गुणान्बहुशोऽस्माभिरसतीपुरतः । बालक स्वयमेव कृतोऽसि दुर्लभः कैसै फुप्यामः ॥] छिन्छई असती । त्यगुणमुखरायाः सकृत एवायं ममानर्थ इति भावः । कापि खसौभाग्यप्रकटनायात्मनः प्रियस्य चान्योन्यानुरागमाह- जाओ सो वि विलक्खो मए वि हसिऊण गाढमुवगूढो । पढमोसरिअस्त णिसणस्स गण्ठि विमग्गन्तो ॥५१॥ [जातः सोऽपि विलक्षो मयापि हसित्वा गाढमुपगूढः । प्रथमापसृतस निवसनस प्रन्थि विमोर्गयमाणः ॥] प्रथमेत्यजुरागातिशयेन प्रियस्पर्शापूर्वमेव स्पलितस्येत्यर्थः । वैलझ्यापनयमाय मया गाढमालिक्षित इति भावः। अन्यासकं नायकमनुकूलयितुं इती नायिकाया विरहवैधुर्यमाह- कण्डबुआ बराई अब तए सा कावराहेण । अलसाइझरुण्णविअम्भिआइँ दिअहेण सिक्सविआ ॥ ५२ ।। [काण्डर्जुका वराकी अद्य त्वया सा कृतापराधेन । अलसायितरुदितविजृम्भितानि दिवसेन शिक्षिता ॥] १. परिवहन्तस्स गइअपेम्मस्व' इति क-न-पाटः, २. परिवर्धमानस्य गुम कम्प:' इति घ-पाठः. ३. 'कस्य कुष्यामि' इति ग-पाठः ४. " शिवनशन्दः परिधानवनवाचकः' इति कुलवालदेवः. ५. 'विमानन्' इति ग-पुस्तके, "विमूगमा: इति घ-पुस्तके पाठ सिक्खदा' इति ग-पाठ... 'कर्णऋतुका' इति घसा १ शतकम्] गाथासप्तशती। काण्डवाजका । 'कण्णुजुआ' इति पाठे वर्णकजुफा कर्णदुर्बलेसर्थ । 'कन्या जुवा इत्यर्थ ' इति कश्चित् ॥ कापि दाक्षिण्यादनुनयन्त शद नायकमाह- अवरादेहि वि ण तहा पत्ति जह में इमेहि दुम्मेसि । अवस्थिअसमावेहि सुहझ दक्षिण्णमणिएहिं ।। ५३ ॥ [अपराधैरपि न तथा प्रतीहि यथा मामेभिर्दुनोपि । अपहस्तितसगावै सुभग दाक्षिण्यभणिते ॥] नेदाव्यानेन प्रियाशयजिज्ञासया परिभ्रमन्ती भुती निर्भत्संयन्ती नायिका नायक मा जूर पिआलिङ्गणसरसभमिरीण बाहुलइआणम् । तुहिकपरुणेण अ इमिणा माणसिणि मुहेण ।। ५४ ॥ [मा अभ्यस प्रियालिगनसरमसभ्रमणशीलाम्या बाहुलतिकाभ्याम् । तूष्णीकारुदितेन चानेन मनखिनि मुखेन ॥ बाल विकाभ्यामित्यत्र 'कुधदुहेासूयार्थाना य प्रति कोप' इति चतुर्थी 1 अर राध प्रिय प्रति क्रोधाभावेन विशेपोक्ति । अदोपी दोपी प्रति सोधेन च विभावना ज्या । साहक्षण तु विशेपोफिरसण्डेपु कारणेषु फरावच ' 'मियाया प्रतिषेधेऽपि व्यतिर्विभावना' इति काव्यप्रकाशकारोक्त द्रष्टव्यम् ।। पुष्पावचयच्छरेन सकेतस्थान गच्छन्त कामुक कापि जरत्कुनी सपरिहासमाह- मा व पुत्फलाविर देवा उअअझलीहि तूसन्ति । गोआअरीअ पुत्तअ सीलुम्मूलाई फूलाई ।। ५५ ॥ [मा व्रज पुष्परयनशीर देवा उदकाजलि मिस्तुप्यन्ति । गोदावया पुषक शीलोमूगनि कूलानि । पुषाणो लवन छैदनम् । शील सधरितमु मूलयन्ति निर्मूल कुर्वन्तीति तथाभूतानि ।। कस्मिन्नपि यूनि जाताभिलाषा स्वामिलाप रवया गोपयन्ती नायिका ससी पाह- घअणे वमणम्मि चलन्दसीससुण्णावहाणहुंकारम् । सहि देन्ती पीसासन्तरेसु कीस म्ह दुम्मेसि ॥ ५६ ॥ १. 'मेरि' इति ग-पाठ . २. 'मामेतेरपर्मनायसे' इति ग-पुस्तके, 'मामेमिना- नि' इति पध-गुस्तके पाट ३ 'कूल' इति ग पाट . ४ 'अयि मुदमु मणमिति ग' इवि ग पाठ. ५ 'भयि स्वपिहि मनस्सिनि मुखेन' इति ग-पाठ . ६.- पन्तरेण'इतिग-पाट.

काव्यमाला। 1 [पचने वचने चलच्छीर्षशून्यावधानहुंकारम् । सखि ददती नि.श्वासान्तरेषु किमित्यसान्दैनौषि ] कृतापराध कान्त प्रति प्रियाया अनझोकार पोधयन्ती दूती आह-- सम्मावं पुच्छन्ती पालभ रोआविआ तुह पिआए। णत्थि विस कासवहं हासुम्मिरस भणन्तीए ॥ ५७ ॥ [सद्भावं पृच्छन्ती वालक रोदिता तव प्रियया । नास्त्येव कृतशपथं हासोन्मिभ्रं मणन्त्या ॥] रोदिता अहमिति शेपः । नास्त्येवेसनन्तरं दूनीति शेपः । अपि नाम स्थिरस्नेहोऽयं तव पतिरिति पृष्टे नास्त्येव सद्भाव इति कथयन्या रोदिताहमिति मायः॥ संकल्पमानात्सात्त्विकभावा भवन्तीति कापि खवैदग्ध्यं यापयितुं सखीमाह- एत्थ मए रमिअव्वं तीम समं चिन्तिऊण हिअएण। पामरकरसेओल्लो णिवअइ तुवरी विजन्ती ॥५८॥ [अन मया न्तव्यं तया समं चिन्तयित्वा हृदयेन । पामरकरसेदानिपतति तुररी उप्यगाना ॥] सममित्खनन्तरपिवीति शेप । इति चिन्तयित्योप्यमानेति योजना । तुवरी आदी । 'आढकी तु नुवयों श्री परिमाणान्तरे नियु' इति मेदिनी ।। काप्यात्मनः पलौ कस्याधिदनुरार्ग सूचयन्ती सीमाह- गहवामुओशिएसु वि फलहीवेण्टेमु उअह वहुआए । मोई भमइ पुलाओ विटॅग्गसेमहुली इत्यो ॥ ५९॥ गृहपतिसुतावचितेष्वपि कसन्तेषु पश्यत यथ्याः । मोघं अमति पुलरितो फिलमसेदाङ्गुरिईसः ॥] १.नि.श्वासान्तरेण' इति ग-पाठः, ३. 'दुर्मनायते' इति ग-पाटः. ३. 'हार म्नीस' इति ग-पाटः, ४. दिवास्मि' इति ग-पाठः. ५. 'समा गया ६. 'अविवन्ती' इति स-पाठः. ७. 'रनितम्य' इति घ-पाटा. ८. 'नुवरी थपमारेर इति ग-पुस्तके, कोशातकी उप्यमाना' इति च य-पुस्तके पाहा. ९. 'सण्टेगुद क-पुलके, "वाटेमु' इस स-सुनके पाठ . ..'गरन्त इति ग-पाट:. “पाटेपुपति घ-पाट: ११. 'मर' इति ग-घ-पाटः. पाठ ४ शतकम्] गाथासप्तशती। . योऽप्यात्मनो विज्ञवं ख्यापयन्ससायमाद- अजं मोहणसुहिरं मुअत्ति भोत्तू पलाइए हलिए । दरफंडिअवेण्टभारोणआइ हसि व फैलहीए ॥ ६ ॥ (आयो मोहनमुखितां मृतेति मुक्त्या पलायिते हलिके । दरस्फुटितन्तभारावनतया हसितमिर कार्पासा ॥] माय? तरणी गुरवसेदेन निमीलितनयना मृतेति ज्ञात्वा हलिके पलायिते सति ईप- स्फुटितान्तभारया लबादशादिवावनतया कार्पास्या हसितमिर ॥ शाप्यात्मनो निन्दारलेन कान्त प्रत्यनुरागाविशयं प्रतिपादयन्ती सखीमाह- गीसासुफम्पिअपुलशएहि जाणन्ति णधि घण्णा । अम्हारिसीहि दिटे पिअम्मि अप्पा वि वीसरिओ॥६१ ॥ [नि.धासोत्कम्पितपुलरितैर्जानन्ति नर्तितुं धन्याः । असाशीभिदृष्टे प्रिये आत्मापि विस्मृतः ॥] अत्र ता अधन्या ययं तु पन्या इति व्यतिरेवालंकारो व्यङ्ग्यः । इसिद्धये इती नायिकाया व्याजम्नुतिमाह-- वणुएण वि तणुंइनइ सीएण वि सिनए चला इमिणा । मसत्येण वि मन्दोण पुत्ति कह मुन्झ पडिवक्सो ॥ १२ ॥ तिनुकेनापि तनूयते क्षीणेनापि क्षीयते बलादनेन । मध्यस्थेनापि मध्येन पुनि कथं तर प्रतिपक्षः ॥] यो दि मायस्थत्वादिगुणयुकास पर न पीडयति । अयं तु तव मध्यस्ततरपि सी. मिप्यस्थोऽपि पर पीडयदीसपिशब्दयोलो विरोधाभासः। पाया मनो वेदाध्यमनुराग च सूचयन्ती कमप्पाह- चाहिन्य वेचरहिओ धगरहिमो मुअणमझवासो व्य । रिउरिद्विदंसम्मिव दूसहणीओ तुह विओओ ।। ६३ ॥ 1. मोनु'शी रागसार. २. 'पुटिभ इति क-ग-पाठः. ३. 'पलहोरिए - ग-पारः ४.'सरगुता' इति ग-पुस्तके, 'बरतन' इति च य-पुसफे पाट:. + फरमारानतया दी ग-युनो, "न्तिभारावनतेन' इति च घ-युस्तके पाठः, सास: । पेशामरले एतत्' इति फुलयालदेर 'कपासन पनि ...मे रामबए' इति ग-पारः ७. 'तनुरेनारि तनुः किरते क्षामः : एनेविग-पाय.

काव्यमाला। व्याधिरिव वैधरहितो धनरहित स्वजनमेध्यवास इव । रिपुऋद्विदर्शनमिव दु सहनीयस्तव वियोग ॥ प्रिय प्रति नायिकाया सदेशगाथेयमिति केचित् ॥ पेश्यामाता स्वदुहितु पीनोन्नतपयोधरता प्रतिपादयन्ती चादकत्या राजानमनुकूल- यितुमाह- कोत्थ जअम्मि समत्यो थइउ 'पिस्थिण्णणिम्मलुत्तुद्गम् । हिअअं तुझ णराहिव गअणं च पओहर मोत्तम् ॥ ६४ ॥ [को जगति समर्थ स्थगयितु विस्तीर्णनिर्मलोतुङ्गम् । हृदय तव नराधिप गेगन च र्पयोधरान्मुक्त्वा ॥] पयोधर स्तन । पक्षे मेघ ॥ सकेतस्थानगत जार कुनी समाश्वासयितुमाह- आअण्णेइ अउअणा कुडङ्गहेटुम्मि दिण्णसकेआ। अग्गपअपेहिआणं मम्मरअ जुण्णपत्ताणम् ।। ६५ ।। [आकर्णयत्यसती पुंजाधो दत्तसकेता। अग्रपदप्रेरिताना मर्मर जीर्णपत्राणाम् ॥] मर्मर पत्रध्वनि । 'अध मर्मर । सनिवे वस्त्रपर्णानाम्' इलमर ॥ मुजगालोमनार्य दूती कस्याश्चिन्मुससौरभ वर्णयति- अहिलेन्ति सुरहिणीससिअपरिमलावद्धमण्डल भमरा । अमुणिअचन्दपरिहवं अपुवकमल मुह तिस्सा ।। ६६ ।। [अभिलीयते सुरमिनि श्वसितपरिमलावद्धमण्डल अमरा । अज्ञातचन्द्रपरिमवमपूर्वकमल मुख तस्या ॥] भ्रमरा श्रमणशीला कामुका मृहाय । मुरभि यनि श्वसित तस्य परिमलेनापदम ण्डल यस्मिन्कमणि यथा भवतीति क्रियाविशेषणम् । 'अहिलेन्ति अभियन्तीत्यर्थ इति कश्चित् ॥ १ औपधरहितो' इति ग-पाठ, २ 'यहवास' इति ग पाट ३ 'वित्थिण्ण जिम्मल समुत्तरम्' इति ग-पाट ४ 'क समयों भवति पिधापयितु विसी निर्मल समुत्तमम्' इति ग पाट ५ 'गगनमिव' इति गघ-पाठ ६ 'पयोधरौ' इति ७ 'अइपिटणा' इति ग-पाठ . ८. 'आवर्णयत्यति निपुणा' इति ग-पाट. ९. 'कुञ्जतटे' इति घ-पाठ १. 'मण्डला भमरी' इति कपाट ११. अभिस्पति सुरभिनिर्मथित' विग-पाट' ग पाठ:

४ शतकम्] गाथासप्तशती। . दूती नायिकाया अनुरागतिशय सूचयन्ती नायकमाह- धीरावलम्बिरीअ वि गुरुअणपुरओ तुमम्मि वोलीणे । पडिओ से अच्छिणिमीलणेण पम्हट्ठिओ वाहो ॥ ६७ ।। धैर्यावलम्बनशीलाया अपि गुरुजनपुरतस्त्वयि व्यतिकान्ते । पवितस्तस्सा अक्षिनिमीलनेन पक्ष्मस्थितो बाप्पः ॥] गुरुजनलजया तया नानुगमन कृतम्, बापेण पुन कृतमेवेति भावः ।। मानिन्या सस्मिन्ननुरागातिशयं खसौभाग्य च सूचयनागरिकः सहचरमाह- भरिमो से सअणपरम्मुहीअ विअलन्तमाणपसराए । कइअवसुत्तुव्वत्तणथैणकलसप्पेलणसुहेलिम् ॥ ६८ ॥ [सरामस्तसा. शयनपरामुख्या विगलन्मानप्रसराया । कैतवमुप्तोद्वर्तनखनकलशप्रेरणसुखकेलिम् ॥] कस्याधिदम जारेण कर्दमेनोक्षित वीक्ष्य कर्दमदातरि तस्या अनुरागातिशयं सूच- यन्ती सखी सपरिहास तामाह- फग्गुच्छणणिद्दोसं केण वि कद्दमपसाहणं दिण्णम् । थणअलसमुहपलोट्ठन्तसेअधोभ किणो धुअसि ।। ६९ ॥ फाल्गुनोत्सवनिर्दोष केनापि कर्दमप्रसाधन दत्तम् । स्तनकलशमुखर्मलुठस्वेदधीतं विमिति धावयसि ॥] धावयसि क्षालयीत्यर्थः॥ वचनादह तत्समीप गत , तया तु मां विलोक्यापि न किंचिदुफमिति नायकेनोर दूती तमाह- कि ण भणिओ सि वालअ गामणिधूआइ गुरुअणसमक्सम् । अणिमिसमीसीसिवलन्तवअणणअणदितुहिं ॥ ७० ॥ पुखके पाठ . ४. करमा- १. 'धौरमविलम्बिरी' इति ख-पाठ.. २. पर्यमवलम्बन्ला' इति ग पाठ. ३. 'यण. जुअलमुहपेपण' इति स-पुस्तके, 'यणकलसापीडन' इति च ग लिजनमुसोलिम्' इति गपुसके, 'कलशापीडनमुसम्' इति च घ-पुसके पाठ. * पावर' इह स. ६. 'प्रदर्तमान' इति अशा शार. ५. यावा व क-स-पाठ.

काव्यमाला [किं न भणितोऽसे बालक मामणी न्या गुरुजनसमक्षम् । अनिमिपमीषदीपलद्वदननयनादृष्टैः ।] बालक इशितानभिज्ञ । इषदोषद्लद्वदनं च नयनादृष्टानि चेति कर्मधारयः। धानि निरीक्षणानि । कटाक्षनिरीक्षणेन समावित एवाति । श्वशुरादिदर्शनाविर्भूत प्रपया बाधा केवल नोकोऽसीति भावः। उक्तमेवार्य भङ्गयन्तरेणाह- णअणन्भन्तरघोलन्तबाहभरमन्थराइ दिट्ठीए । पुणरुत्पेछिरीए बालअ किं जं ण भणिो सि ॥ ७१ ॥ नियंनाभ्यन्तरपूर्णमानबाष्पभरमन्थरया दृष्टया । पुनरुतप्रेक्षैणशीलया बालक किं यन्न भणितोऽसि ॥] क्यापि तारुण्यावस्थायां सुरतसमये गणपतिरुपधानीकृतः, सैव वार्धकावस्थायां ६ मेव गणपति पूजयन्ती अरामपालभते- जो सीसम्मि विदण्णो मझ जुआणेहि गणवई आसी। तं विअ एहि पणमामि हअजरे होहि संतुहा ॥ २ ॥ [यः शीर्षे वितीणों मम युवभिर्गणपतिरासीत् । तमेवेदानी प्रणमामि हतजरे भव संतुष्टा ।] कापि मृतचौरिकामहिला शौचन्तं कमप्यन्यापदेशेनाह-- अन्तोहुत्तं डेंजर जाआसुण्णे घरे हलिअउत्तो। उक्खाअणिहाणाई व रमिअट्टाणा येच्छन्तो ।। ७३ ।। [अन्तरभिमुखं दसते जायाशये गृहे हालिकपुत्रः । उत्सातनिधानानीव रमितस्थानानि पश्यन् [1] अन्तरभिमुख हृदय एवेसर्थः । मृतधर्मपनोकः पामरोऽपि बाह्याकारेण दुःसं मा- विष्कारोति, त्वं तु विझोऽपि सन्मृतचौरियामहिला प्रति शोचसीत्ययुक्तमिति भावः ।। १. 'भुपया' इति ग-पुस्तके, 'दुहिना' इति र घ-युख के पाटा. २. अनिमिय- तिर्यम्वदनवलित' इति ग-पाट:. ३. 'सिरीए' इति ग-पाठः. ४.म्टेचिएतकया' इंति ग-पाटः भ्लैच्छितं गुप्तमापितम्' इति कुलवालदेवः. ५. "कियन' इति ग-ध. पाठः ६. 'शिरसि इति ग-पाठ: ५. 'मुनई इति ग-पाठः, 4. 'अन्तरा दाते इति ग-पुस्तके, 'मन्तभूनं दह्यते' इति च घपुस्तके पाठः, ९. प्रेक्षन्' इति गमाः हे शतकम्] गाथासप्तशती। मान धरस्वेति शिक्षय ती सखी काचिदाइ- णिहाभङ्गो आवण्डुरत्तण दीहरा अ णीसासा । जाअन्ति जस्स विरहे वेण सम कीरिसो माणो ॥७४॥ निद्राभङ्ग आपाण्डुरत्व दीर्घाश्च निश्वासा । जायन्ते यस विरहे तेन सम कीदृशो मान ॥] कथ युपितासीति नायकेन पृष्टाया धीरानायिकाया उकिरियमिति केचित् ॥ मृतापराध कात वापि सप्रणयरोपमाह- वेण ण मरामि माणूहिँ पूरिआ अन जेण रे सुहअ । तोग्गअमणा मरन्ती मा तुज्झ पुणो विलग्गिसंम् ॥ ७५ ७५॥ तिन न प्रिये मन्युभि पूरिताद्य येन रे सुभग । वगतमना प्रियमाणा मा तव पुनरपि लगिष्यामि ॥] वदतचित्ताया मम मरणमेव युक्तम्, परं तु तव स्मरणादि मम मरण भवति तदा मातरेऽपि त्वमेव मम पतिर्दु सदो भविष्यसीवि भोला न म्रियेऽहमिति भाव ।। कापि धर्यमनुराग च व्यन्जय ती कृतापराध का तमाह-- अवरज्झसु वीसद्ध सच ते मुहअ विसहिमो अम्हे । गुणणिभरम्मि हिअए पत्तिा दोसा ण माअन्ति ।। ७६ ।। {अपराध्यख विसंन्ध सर्वे ते सुभग बिहामहे ययम् । गुणनिर्भरे हृदये प्रतीहि दोपा न माति] अपराध्यखापराध कुरु । गुरोत्त्वदीयनिर्भरे पूर्ण हृदये दोषा न मान्ति अवश नभते। अनुरफेन दोषो 7 गृह्यत इति भाव ॥ नायिवाया विरहाति प्रतिपादय ती पूनी नायक स्वरयितुमाह-- भरिचरन्तपसरिअपिसभरणपिमुणो पराईए । परिवाहो विभ दुक्खस्स बहर अणटिओ वाहो ॥ ७७ ।। मितोमरप्रस्तप्रियससरणपिशुनो पराक्या । 'परीवाह दु सस पति नयनस्थितो बाध्य 13 फेरियो' इति ग पाठ २ वी व निषितम्' इति ग पाठ ३ 'त्वद्र तमनस्का' इतिग पाट दीग पाठ विषयामहे इति ग पाठ ७ भारउन्मरत' इति पाठ ति गपुस्तके, 'मतोल १३ शके पाठ १. 'पीपाशीव इति पाठ १ स्थित पापम्' इति ग पाठ ५."विश्वख' इति घपाठ "मनोद्भियमान १ 'सूबो शव ग पाठ- काव्यमाला। अतः पूर्णः। उधरनिगच्छन् । प्रस्तः प्रमः । तथा नियसंसरणस्य पिशुनःसू. चरः । एतच परीवाहबाप्पयोरुभयोरपि विशेषणम् ॥ नायिकाया अनुरागातिशयं प्रतिपादयन्ती दूती नायकमाह- / करेसि जंजप्पसि जह तुम णिअच्छसि । तं तमणुसिक्खिरीए दीदो दिअहो ण संपडइ ॥ ७८ [यपत्करोपि यघजल्पसि यथा त्वं निरीक्षसे । तैतदनुशिक्षणशीलाया दीर्घो दियसो न संपवते ॥] त्वचेष्टितमनु कुर्वत्यास्तस्या, दिवसो लर्भवतीत्यर्थः ।। काचित्पपिकेन समं रात्री कृतसंभोगा तद्गुणातिशयेन विरहकातरा प्रभाव रोदितीति नागरिकः तस्य विज्ञत्वस्यापनाय, सहवरमाह- भण्डन्तीम तणाई सोत्तुं दिग्णाइँ जाइँ पहिअस्स । ताई चेअ पहाए अना आअदई रअन्ती ॥ ७९ ॥ [भर्सयन्त्या तृणानि सप्तुं दत्तानि यानि पथिकस । तान्येव प्रभाते आयी आकर्षति रुदती ॥] भण्डन्ती भरसंयन्ती । फलहं कुर्वागेति यावत् । कोऽपि सहचरस्य गाम्भीर्य शिक्षा सत्पुरपप्रसंसामाह- वसणम्मि अणुव्विग्गा विद्दवम्मि अगव्विआ भए धीरा। होन्ति अहिण्णसहावा समेसु विसमेमु सप्पुरिसा ।। ८० ॥ [व्यसनेऽनुद्विमा विभवेगर्विता मये धारी। भवन्त्यभिन्नसमावाः समेषु विषमेषु सत्पुरुषाः ।। फेनापि प्रवासिना पुरुषेण प्रेयसी स्मृन्या प्रभाते गानं कृतम्, तरट्रयणेनोदीरितथि रहानला कापि प्रोपितमनुका सीमाह- अज सहि केण गोमे फपि मणे यह भरन्तेण । अहं माणसराहअहिअभवमफोडनं गीमम् ॥ ८१ ॥ १. निम्यान' रवि ग-पाठ: १. 'तत्तदनुशिक्षन्ला' पनि ग-पाय... यित्व घ-पाटा ४.मरना भारयते इति गपुनरे बरतनुराकी इति च घ-पुमारे पार: ५. 'बमवे इवि ग-पाटः ६. 'यान्विताः विनमारः .

शतकम् गाथासप्तशती। १२१ [अद्य सखि केन प्रातः कामपि मन्ये वल्लमां मरता । .अस्माकं मदनशराहतहृदयव्रणरकोटनं गीतम् ॥] त खदर्शनेनारमा विरहदुःख स्फुटितवणवदधिकं जातमिति भावः ॥ पायतिखेदकर तदात्वेऽपि खेदयतीति निदर्शयन्कोऽपि सहचरमाह--- उदृन्तमहारम्भे थणए द₹ण मुद्धवहुआए। ओसण्णकवोलाए णीससि पढमपरिणीए ।। ८२ ॥ [उत्तिष्ठन्महारम्भौ स्तनी दृष्ट्वा मुग्धवष्याः । अवसनकपोलया निःश्वसितं प्रथमगृहिण्या ॥] अवसनकपोलया शुष्ककपोलया । पतितस्तनी मां विहायातः परमस्यामन्योन्या- लिष्टपनपीनकुचायामासक्तो भविष्यति कान्त इति चिन्तयेति भावः ।। कापि मन्दनेहं नायकमनुकूलयितुमन्यापदेशेनाह- गरुअछुहाउलिअस्स वि वल्लहकरिणीमुहं भरन्तस्स । सरसो मुणालकवलो गअस्स हत्थे शिअ मिलाणो ॥ ८३ ॥ [गुरुकक्षुधाकुलितखापि वल्लमकरिणीमुखं मरतः । सरसो मृणालकवलो गजस हस्त एव म्लानः ॥] मदविमोहितयुदिना विरश्था गजेनापि प्रियानेहाविशयान्मृणालक्वलस्त्यक्तः। पुनर्मामपहाय महिलासहस्रं रमयसीति ज्ञातस्तव नेह इत्युपालम्भो व्ययः ।। वाचापि प्रियो नोद्वेजयितव्य इति सखी शिक्षयितु कापि धीराया नायिकाया । यकेन सहोक्तिप्रत्युक्तिकौशलमाह- पसिअ पिए का विआ; मुअणु, तुमं; परअणम्मि को कोवे। को हु परो नाथ; तुमं;कीस अपुण्णाण मे सत्ती ॥ ८४ ॥ [प्रसीद प्रिये का कुपिता सुतनु त्वं परजने कः कोपः । कः खल परो नाथ त्वं किमित्यपुण्यानां मे शक्तिः ॥] विप्रलब्धाया अनुरागातिशयं विरहात च प्रतिपादयन्ती दूती नायकमाह- एहिसि तुमं त्ति णिमिसं व जग्गिअंजामिणीअ पढमद्धम् । सेसं संतापपरब्बसाइ बरिसं क वोलीणम् ॥ ८५॥ १. 'प्रभाते किमपि' इति ग-पाठः २. 'कपोलाया. इति घ-पाठः. ३. 'गृहिण्याः इति च पाठ:, ४. 'स्मरमाणस्य' इति ग-पाठः. ५. 'कुविदा' इति ग-पाठः रजने' इति घ-पाठः ११ काव्यमाला। १२२ एंप्यसि त्वमिति निमिपमिव जागरितं यामिन्याः प्रघमार्धम् । शेष सतापपरवशाया वर्षमित्र व्यतिक्रान्तम् ॥ भूतादिप्रस्तेर्य स्त्री परिभ्रमतीति शमान जन प्रति प्रोषितभर्नुकाया' सरा काचिदाह- अवलम्बह,मा सङ्कह, ण इमा गहलविआ परिम्भमइ।' अथवगजिउभन्दहित्यहिना पहिअजाआ ॥ ८६ ॥ [अवलम्बघ्य मा शङ्कघ्य नेय ग्रहलहिता परिभ्रमति । आकस्मिकगर्जितोद्रान्तप्रस्तहृदया पथिकजाया ॥] हित्य प्रस्तम् । प्रहा भूतादय ॥ खस्य गुणोत्सर्प स्यापयन्ती काप्यनेनीलम्परं कान्तं मधुकरव्याजेनोपालभवे- केसररअविच्छई मअरन्दो होइ जेन्तिओ कमले । जइ भमर तेन्तिों अण्णहिंपि ता सोहसि भमन्तो ॥ ८७ ॥ केसररंज समूहे मकरन्दो भवति यानान्कमले । यदि भ्रमर तावानन्यनापि तदा शोमसे भ्रमन् ॥] विच्छा समूह 'रम्याणां विकृतिरपि श्रियं तनोति' इति निदर्शयन्योऽपि राखायमाह- ‘पेच्छन्ति अणिमिसच्छा पहिआ हलिअस्स पिट्ठपण्डुरिअम् । धूभं दुद्धसमुदुत्तरन्तलच्छि विअ सअहा ॥ ८८ ॥ [प्रेक्षन्तेऽनिमिषाक्षाः पथिका हलिकस पिष्टपाण्डुरिताम् । दुहितर दुग्धसमुद्रोत्तरश्मीमिय सतृष्णाः ॥] धूआ दुहिता । पिटं तण्डुलादे । यथानिमिपाक्षा देवा रश्मीमपश्यखया पथिका अपीमामित्यर्थ । हलिकमुतामपि साभिलाष पश्यतामपा पासो न देय इति सहचर प्रति नागरिकस्योतिरिति केचित् ॥ कलहान्तरिताया. खेदातिशय सूचयन्ती दूती तत्कान्तमाह- कस्स भरिसि चि भणिए को मे अयि ति जम्पमाणाए । उन्विग्गरोइरीए अम्हे वि रुआविया तीए ॥ ८९ ॥ ..'आगमिष्यति' इति गमाठ, २. 'जात' इति ग-पाट, ३. 'भापक' इति ग-पाट.. ४. 'भमर होइन्तिओ' इति कग-पाट:. ५. 'रजोनिस्तृते' इति ग घ ६. 'तावानन्यस्मिन्' इति ध-पाटः. पाट १२३, १ शतकम् गाथासप्तशती। [कस सरसीति भणिते को मेऽस्तीति जैल्पमानया। उद्विमरोदनशीलया वयमपि रोदितास्तया 1] मानमहिला नायिका भयं दर्शयन्ती ससी मानभनाय सरोपमाह-- पाअपडिअं अहले कि दाणि ण उट्ठवेसि भत्तारम् । एवं विअ अवसाणं दूरं पि गअस्स पेमिस्स ॥ ९० ॥ [पादपतितमभव्ये मिमिदानी नोत्थापयसि भर्तारम् । तदेवायसानं दूरमपि गतस प्रेगः ॥] अमव्ये इति सप्रणयरोप संशेधनम् । अगृहीतानुनया द्वेष्या भविष्यसीति भावः ।। आत्मनो विपरीतरतामिलाप सूचयन्ती नायिका कान्तमाह- तहविणिहिअग्गहत्या वारितरङ्गेहि घोलिरणिअम्या । सालूरी पढिविम्ये पुरिसाअन्तिव्य पडिहाइ ॥ ९१ ॥ हरुप्रतिलिहिलपहला कारिरहपूर्णपसीननिरस्कार । शालूरी प्रतिविम्बे पुरुषायमाणेच प्रतिमाति ।। शालूरी भेकी । प्रतिविम्बे अर्थाःखीये ।। कुमुम्मवाटिकायां नसकेता काचिदात्मनचौर्यरतगोपनार्थमाह- सिकरिअमणिमुहवेविआई धुअहत्थसिनिअव्वाई। सिक्सन्तु वोडहीओ कुसुम्भ तुम्ह पसाएण ॥ ९२ ॥ सीत्कृतमणिर्तमुखपितानि धुतहस्तशिर्जितव्यानि । शिक्षन्तु कुमार्यः कुसुम्म युमित्प्रसादेन 1] बोडही कुमारी तरुणी वा । सीत्कृत सीत्कार. । मणित रतिपूजितविशेषः । मु- सवेपितमधरा दिधूननम् । एतानि नखक्षतमुष्ट्याघाताधरखण्डनैरपि भवन्ति कण्टकक्ष- तेन च भवन्ति । तथा च सीत्कारादयो मेम कुमुम्भकण्टकक्षतानाता न तु मुरतेने. त्याशयः ॥ १. 'जल्पत्या' इति घ-पाठः. २. 'उद्भटं रोदन्त्या' इति ग पाठः. ३. 'माणस' इति ग-पाठः. ४. 'इदमेव इति ग पाठः. ५. 'दूरं गतस्य' इति घ-पाठ:. ६. मा. नस्य' इति ग-पाठः. ५. 'मुहपरिवेविआइ' इति खना-पाठ.. ८. 'मुपपरिवेषितानि इति ग-पाठः. ९. 'शिषितानि' इति ग-पाठः १. विध्यन्तु ग्राम्या' इति ग-पाठः, ११. 'तकण्यः' इति घपाठः, १२. 'युष्माक' इति ग-पाठः, .१२४ काव्यमाला। , काप्यात्मनो जारं प्रत्यनुरागातिशयं श्रावयन्ती नितम्योपालम्भव्याजेनाह- जेत्तिअमेत्ता रच्छा णिअम्ब कह तेतिओ ण जाओसि । जं छिप्पइ गुरुअणलजिओ सरन्तो वि सो सुहओ ॥ ९३ ।। [यावत्प्रमाणा रथ्या नितम्ब कथं तावन्न जातोऽसि । येन स्पृश्यते गुरुजनलेज्जापसृतोऽपि स सुभग ॥] तृणलतागृह सकेतस्थानमिति जारं श्रावयन्ती काप्याह- मरगमसूईविद्धं व मोत्तिभं पिअइ आअर्भागीओ । मोरो पाउसआले तणग्गलग्गं अअविन्दुम् ॥ ९४ ॥ [मरकतसूचीविद्धमिव मौक्तिकं पिवत्यायतमीवः । मयूर. ग्रावृद्धाले तृणाग्रलममुदक विन्दुम् ॥] मन मरकतसूच्या मौकिकवेघस्यासमावितस्योपमया दुष्प्रापनायिकामाप्ति नाय. कस्य दूती सूचयतीति केचित् ।। अभिसारिकाया कृष्णपक्षाभिगारोचित नीलकणुकं भावयन्ती ती नायकमुत्तर लयितुमाह- अजाइ णीलकथुअमरिउव्वरि विहाइ थणवट्टम् । जलभरिमजलहरन्तरदरुग्गरं पन्दविम्ब व्व ॥ ९५ ॥ [आर्याया नीटकभुक तोर्वरित विमाति सनपृष्ठम् । जलभृतजेलपरान्तरदरोगतं चन्द्रविम्वमिव । कचुकं मृता महतादुर्वरित मित्सर्य. ॥ प्रवासोबतस्य परयुगमनाक्षेराय कापि यसन्तमारास पपिकमयहेतुता दर्शयति- राअविरुद्धं व कई पहिओ पहिअस्स साइइ संसम् । जत्तो अम्बाण दलं वत्तो दरणिग्गिभं किं पि ॥ ९६ ।। . १. जेण सिविना गुरुमणलग्जोसरियो' इति स पाठः. २. 'यावन्मात्राी ग-पाठा...'न तावन्मात्रो' इति ग पाठ. ४. 'यदी गपार. ५. 'लजया- पसरन्' इति ग-पाठ. . 'गीको इति कमाउ:. ५. 'ईश्वरगृताया' ही गयाठ.. 4. 'मवोद्रियमाणं' इति ग-पुसके, "मृतोदृत' इस व घ पुस्तक पाठ . परान्तरादीपतति ग-पाठ:. ... 'मुण्टो वि क-पाठः.

ধ সুবর্ণন্দু] . गाथासप्तशती। १२५ {राजविरुद्धामपि कथा पथिकः पधिकस कथयति सशङ्कम् । येत आम्राणां दलं तैत ईपनिर्गतं किमपि ॥] दलं पत्रम् । किमप्यवरः ॥ खो प्रियदर्शनेन विरहदुःख कथ न विनोदयसीति प्रतिवेशिनीभिरुका काचिदा- (मनोऽनुरागातिशय घ्यापयितुमाह-- घण्णा ता महिलाओ जो दइ सिविणए वि पेच्छन्ति । णि व्विा तेण विणा ण एइ का पेच्छए सिविणम् ।। ९७ ॥ [धन्यास्ता महिला या दयितं स्वप्नेऽपि प्रेक्षन्ते । निद्रैव तेन विना नैति का प्रेक्षते स्वप्नम् ॥ अन यूयमधन्याः, अहं तु धन्येति व्यज्यते॥ पूर्व समृद्धस्य कालवशेन गलितविभवस्य कस्यापि मन:समाधानाय दूसन्या- पदेशेनाह- . परिरद्धकणअकुण्डलगण्डस्थलमणहरेसु सवणेसु। तत्थ वि समअवसेण अपहिरन्नइ तालबेण्टजुअम् ॥ ९८॥ (परिरन्धकनककुण्डलगण्डस्थलमनोहरयोः श्रवणयोः । तंत्रापि समयवशेन [च] परिप्रियते तौलवृन्तयुगम् ॥] तालयन्त तालपरताटकम् ॥ कथमेतादृशे ग्रीष्मे मम प्रिय आगमिष्यतीति चिन्तयन्ती नापिका सख्याह- मज्झहपत्थिअस्स वि गिम्हे पहिअस्स हरइ संवावम् । हिअअद्विअजाआमुहमअङ्कजोहाजलप्पवहो ॥ ९९ ॥ मध्याह्वप्रस्थित सापि ग्रीष्मे पथिकस्य हेरति संतापम् । हृदयस्थितनायामुखमृगाङ्कज्योत्साजलप्रवाहः ।। १. वसति' इति घ-पाठः. २. 'यावन्यामाणा दलानि' इति गपाठः, ३. 'ता- वदोषत्' इति ग-पुस्तके, 'ततो दर' इति च ध-पुस्तके पाठ पाठः. ५. 'पश्यन्ति' इति ग घ-पाठः... कवोलदोळगम' इति ग-पाठ ७. 'अण्णअसम' इति क-ख पाठः. ८. 'परिहिम्नः' इति खना-पाठः, .. परि- बद्ध' इवि ग पाट: १०. 'इपोलतरल' इति ग-पाटः ११. 'मनोहरेषु कर्णेषु १२. 'तयोरपि समय' इति ग-पुस्तके, 'अन्यत्समयमवसन परिसियते , तालान्तयुगलम्' इति घ-पुस्तके पाठः १. तालपत्रयुगम्' इति ग-पाठः, १४.. न्ति' इति गमा::. १५. 'हृदयेप्सित' इति ग-पाठ, १. 'जालो' इतिख. घ-पाठः काव्यमाला। प्रापमासमा मला प्रियां दिक्षयोऽगणितमीममध्यंदिनदिनेशसंतापाः परिकाः पन्यानमतिवाहयन्तीत्यर्थः ।। असमयप्रार्थितया कान्तया क्षिप्तं नायक दूनी सान्त्वयितुमाह-- भण कोण रुस्सइ जणो पत्थिनत्तो अएसफालम्मि । रतिवाअडा रुअन्तं पिरं वि पुत्तं सवइ माआ॥ १० ॥ भिण को न रुष्यति जनः प्राय॑मानोडेदेशकाले । रतिव्यावृता रुदन्तं प्रियमपि पुत्र शपते माता ॥] एत्य चात्यं विरमइ गाहाण स सहावरमणिनम् । सोऊण जंण लग्गइ हिअए महुरत्तणेण अमपि ।। {अन चतुर्थे विरमति गाथानां शतं खभावरमणीयम् । श्रुत्या यन्न लगति हृदये मधुरत्यनामृतमपि n] पघम शतकम्। प्रणामकाद्विगी नायकानुरक खहृदयमाह-- उज्झसि डझसु फसि कट्टम अह फुडसि हिअस ता फुडसु । तह वि परिसेसिओ चिञ सोहु मए गलिअसम्भावो ॥१॥ [दखसे दसख धध्यसे कभ्यस्ख अध एटसि हृदय तत्रपुट । तथापि परिशेरित एव स सुलु मया गलितसद्धायः॥] परिशेषित परिरिछन । निर्णात इत्यर्थः । यवक्षेत्र सकेतस्थानमिति जार भावयन्ती काचिदन्येा गयप्रदर्शनार्थमाह- दटूण रुन्दतुण्डंग्गगिग्गों णिअसुभस्म दादग्गम् । भोण्डी विणावि फत्रेण गामणिअडे जवे घरह ॥ २ ॥ [दृष्ट्वा विशालतु दामनिर्गतं निजमुतस दंष्ट्रामम् । सूरी विनारि कार्येग मामनिकरे यांवरति ॥] १. 'याउला' इति कपाट. १. 'पद' विग पाठ: ..'अधकारयोरपितवि •ग पाठ:. .. आपति' इति ग घ-पार: ५.६यं गाया ग पुस्तके नास्ति. १. 'x' ग. ७. 'परिसेविअय्यो' ग. ८. 'अन मग. ९.'परिशेषितव्योऽयमया' ग. .. 'गुण्डाग ग. "तुम्हनुमान ग, 'यहत्तुराम' प. १२. 'कार्य' ग.

५ शतकम् गाथासप्तशती। १२७ . ईन्द विशालम् । भोण्डी सूकरी 1 यवक्षेत्रप्रस्थिताया अभिसारिकाया निषेधार्थ दल्या उक्तिरियमिति केचित् ।। अभिसारभीतां कामप्यनुकूलयितुं दूती नायकस्य ग्रामप्रधानता निमहानुग्रहक्षमता चान्यापदेशेनाह- इलाकरग्गअद्विअजलरिक साअरं पआसन्तो। जअइ अणिग्गअवडवग्गिभरिअगगणो गणाविई ॥ ३ ॥ हिलाकरामाकृष्टजलरिक्तं सागर प्रकाशयन् । जयत्यनिमबडवामिभृतगगनो गणाधिपतिः ।। हेलया राणाकृष्ट यजलं तेन रिजम् । जलनिग्रहाग्निष्प्रतिबन्धोत्थिवेन वडवा. मिना भूत गगन येन सः। गणाधिपतिविनायको मण्डलनायकश्च ॥ कोऽपि कामिनी नानुरशनायारमनः स्त्रीपरतामशोकपलयच्उलेनाह-- एएण चिअ ककेल्लि तुझ तं गत्थि ज ण पजत्तम् । उवमिजइ जंतुह पल्लवेण वरकामिणीहत्थो ॥४॥ एतेनैव ककेले तर तन्नास्ति यन्न पर्याप्तम् । उपमीयते यत्तर पलवेन वरकामिनीहस्तः । कक्षेलिरशोकः ॥ पूर्वगाथार्थमेव भजयन्तरेणाह- रसिअ विअट्ट विलासिस समअण्णअ सञ्चअं असोओ सि । वरजुअइचलणकमलाहओ वि जं विअससि सएहम् ॥ ५॥ [रसिक विदग्ध विलासिन्समय सत्यमशोकोऽसि । परयुवतिचरणकमलाहतोऽपि यद्विकससि सतृष्णम् ॥] समय आचार । नायिकाचरणघात. प्रमाद एव मन्तव्य इति नायक शिक्षयितु कु. हन्या उक्तिरियमिति केचित् ।। दौ.साधिकाभिशस्वस्य जारस्य परिहासकौशलं दूनी तत्प्रियामानन्दयितुमाह- चलिणो धावन्धे चोज जिउअत्तणं च पअडन्तो । सुरसस्थकआणन्दो वामणरूवो हरी जअइ ॥ ६॥ बलेची चाबन्धे आश्चर्य निपुणत्वं च प्रकटयन् । सुरसार्थकृतानन्दो वामनरूपो हरियति ॥ १. 'कमलाइयेण' ग. २. 'सत्यक' ग. ३. 'यमलघातेन' ग. ४. चित्र घ.

- काव्यमाला। बले त्यविशेषस्य, पक्षे बलिनो बलवतः । वाचा पचनेन पन्धो नियमनं निरु- सरीकरणं च । चोद्यमाश्चर्यम् । चोय स्यादढ़ते प्रश्ने चोदना तु वाच्यवत्' इति मे. दिनीकोपात् 'चोय' इत्येव मूलपाठः । निपुणत्वमिहितगुप्तिः। मुरसार्यों देवसमूहः शो. भनरसवदर्यकं वचनं च । वामनः साकारो न्यग्भावापन्नश्च । हरिविष्णुः परदाराप- हारी चेति यथायोग योज्यम् ॥ कापि प्रियवित्तानुरजनार्य स्त्रीणा मृतेऽपि पत्यावनुरागाविशय प्रतिपादयितुमाह- विनाविजइ जलणो गहवइधूआइ वित्यसिहो वि। अणुमरणघणालिगणपिअअमसुइसिन्जिरङ्गीए ॥७॥ [निर्याप्यते ज्वलनो गृहपतिदुहिना विस्तृतशिसोऽपि । अनुमरणघनालिङ्गैनप्रियतमसुखखेदशीताझ्या ॥] प्राकृते पूर्वनिपातानियमातिप्रयतमपनालिझनेति योज्यम् ॥ पापि जारचित्तहरणार्य पूर्वोत्ताभिप्रायिका गापामाह- जारमसाणसमुभवभूइसुहष्फंससिज्जिरङ्गीए । ण समप्पइ णेवकावालिआइ उद्भूलणारम्भो ॥ ८॥ [जारमशानसमुद्भवभूति मुखस्पर्शखेदशीलाझ्याः । न समाप्यते नवकापालिक्या उर्दूलनारम्भः ॥] नवकापालिक्या गृहीताभिनव कापालिकयतायाः। तत्तकारणसानिध्यादेकस्मिन्नने के भावा भवन्तीवि निदर्शयन्कोऽपि सहचरमाह- एको पहुअइ थणो वीओ पुलएइ णहमुद्दालिहिओ । पुत्तस्स पिअअमरस अ माणिसण्णाएँ घरणीए ॥९॥ [एकः प्रौति सनो द्वितीय पुलस्तिो मरति नरामुखालिखितः । पुषस प्रियतमस च मध्यनिपण्णाया गृहिण्याः॥] जारं प्रलनवसरप्रमंटनपरं दूत्या ववनमिदमिति केचित् ॥ प्रामणीपुश्या सामिलाप. कोऽपि प्रहसनमाह- एताइचिम मोहं जणेइ वालपणे वि वहन्ती। गामणिधूआ विसकन्दलिय बड़ीओं काहिह अणत्यम् ॥ १० ॥ 1. 'विता विनई स. २. "लिरित' ग. ३. "पित निवांप्यते' स, "शिमाप्यते' ग, 'विनिर्धाप्यवे' घ. ४. लिरितप्रियतममुसलिएदारा..' ग. ५. 'भयावाविभोर स. १. पुलकी' घ. ७. 'विमल अम्ब' ग.

५ शतकम् गाथासप्तशती। १२६ एतावत्येव मोह जनयति बालत्वेऽपि वर्तमाना। ग्रामणीदंहिता विषकन्दलीय वर्धिता करिष्यत्यनर्थम् ॥] विक्रमवन्धरतेन प्रियेण प्रीणिता कापि हरेर्वगत चरणं नमस्यन्यन्यापदेशे- नाह- अपहुप्पन्तं महिमण्डलम्मि पइसंठि चिरं हरिणो । तारापुप्फप्पअरश्चिों व तइ पणमह ॥ ११ ॥ [अप्रभवन्महीमण्डले नम सस्थित चिर हरे । तारापुष्पप्रकाराश्चितमिर तृतीय पद नमत ॥] भप्रभवसमात् । हरिविष्णु परदारापदारी २६ तारानेत्रमध्य नक्षत्र च । रस्थाविद्दुत्कण्ठितार्या सखीभिरुच सुप्यतामिति सा ताखाह- सुप्प तइओ वि गओ जामोत्ति सहीओं कीस मं भणह । सेहालिआणं गन्धो ण देइ सोत्तु सुअह तुझे ॥ १२ ॥ सिंप्यता तृतीयोऽपि गतो याम इति सख्य किमिति मा भणय । शेफालिकाना गन्धो न ददाति स्वस्तु सपत यूयम् । पसि, कथ तमेव निरनुकोश सरसोति सख्योक्ता विरहोत्कण्ठिता तामाद- कहूँ सो ण संभरिजइ जो मे तह संठिआई अगाई । णिव्यत्तिए वि सुरए णिज्झाअइ सुरअरसिओव्व ॥ १३ ॥ [कप स न समयते यो मम तथासस्थितान्यगानि । निवर्तितेऽपि सुरते निध्यायति सुरतरसिक इव ॥] निध्यायति पश्यति । तथासस्थितानीसनेनानुभवैगोचरोऽवस्थाविशेषो धोत्पते । कापि जार प्रति संकेतस्थानमाह- सुक्रान्तयहलकदमपम्मविसूरन्तक्मठपाठीणम् । विट्ठ अदिट्ठउव्वं कालेण तल सडामरस ।। १४॥ [शुष्यदहलपर्दमधर्मसिंधमानकमठपाठीनम् । "एमपूर्व कालेन तल तडागस ॥] कर्दमान्तस्प पाठीनान्तेन वर्मधारय । तसच पूर्व जलायाहरणार्थ गोवानी म 1. 'गुता पिलर माना' ग. ३. 'विशीयमाण लियत' प. १. 'मुमतु' ग.

१३० काव्यमाला। तागतमाप्तीत, इदानी तदभावाग्निष्प्रत्यूह विहरेति भावः । कस्यचिदतिसपसम्म पथा स्निीभूतस्यान्यारदेशेन काचिदनुशोचनमनया गायया करोतीति केचित् । मह सकेर स्थान गता न खमिति जारं प्रयुतिर्वा । अतृप्ता मुरतधान्त कान्तमुत्साहयितु पन्य मनस्क करोतीति था। . कापि सपरिहास कामपि चाटुवादमाह- चोरिअरअसद्धाइ मा पुत्ति भमसु अन्धआरम्मि । अहिअरं लक्सिजसि तमभरिए दीवमीहव्व ॥ १५ ।। [चौर्यरतश्रद्धाशीले मा पुत्रि भ्रमान्धकारे । अधिकतर रक्ष्यमे तमोमृते दीपशिखेय ॥] तमोमृते प्रदेश इति शेष ॥ सकेतस्थानदाहादसती दुसितेवि कारि राहवरमाह- वाहित्ता पहिवअणं ण देह रूसेइ एष मेफरस । असई कजेण विणा पइप्पमाणे गईयच्छे ।। १६ ॥ व्याहता प्रतिवचन न ददाति रुप्यत्येकैक्स । असती कार्येण विना प्रदीप्यमाने नदीच्छे ।] प्रदीप्यमाने दह्यमाने । व कुलटासीति प्रतिवेशियोक्का गरि तामाह- आम असइ छ ओमर पइव्वए ण तुह मइलिश गोत्तम् । किं उण जणरस जामय चन्दिलं वा ण फार्ममो ॥ १७ ॥ [आम असत्यो ययमपसर पतिव्रते न त्र मरिनिनं गोरम् । किं पुनर्जनस जायेर नापित ताबा कामयामहे ।) भामेति सप्यांनुमती । पतियते इति सोपारम्भ सयोधनम् । पाम जाया तमि. वेसर्य, भय भाव.-भवामो वय कुलटा,दि तूममनाया त धमिर मापितासति । अथ च सव गोत्र नाम न मलिनितम् । पुलमेवेति ॥ काप्यामनोऽनुरागातिशय प्रतिपादयन्ती नायस्माद- णिई लहन्ति फहि मुणन्नि सलिमपरं ण जम्पन्ति । जाहि ण दिडो मि तुम ताओ शिभ मुहम मुहिआभो ॥ १८ ॥ १. 'चारिकरप्रसार गध... चन्दियो नारि देशा' इति कुमादेश ५ शतकम्] गाथासप्तशती। [निद्रा लभन्ते कधित शृण्वन्ति स्सरिताक्षर न जल्पन्ति । याभिन दृष्टोऽसि त्यता एव सुमग सुखिता. 1] क्ष्य तु बद्दर्शनावातमन्मथासट्रिपरीता जाता इति भाव । एती क.साधिदनुरागातिशय प्रतिपादयन्ती नायकमाइ-~- वालभ तुमाइ दिणं फण्णे काऊण बोरसंघाडिम् । लेबालुइणी वि बहू घरं गा गामरच्छाए ॥ १९ ॥ बालक स्वया दत्ता कर्णे कृत्वा चेदरसपाटीम् । लैजालरपि वह गता ग्रामरथ्यया ॥] योर बदोपरम् । सघाटी युगलम् । एतेनासार यत्किंचिदपि त्वया दत्त धारयतीति . रातिशय सूचित । - काचिप्रिय प्रति गरितमाना पशत्तापन सखीविदमाह- अह सो विलसहिअओ मए भ व्याएँ अपहिआणुणो। परवजणशरीहि तुझेहि उवेक्सिजो गेन्तो ॥२०॥ अघ स विलक्षहदयो मया अमव्यया अगृहीतानुनय । पायाचनर्तनशीलाभिर्युप्मामिपेक्षितो निर्यन् ॥] अपेति प्रम। परस्म वायपूर्वक यानर्तन कुमार्गप्रापण मानशिक्षणरूप सरौलाभि निन् गरछन् । युष्माभिर्मानशिक्षावसरे मया यदाशदित तदिए जातमिलाशय । विदग्ध का तमलभमाना कापि ससीमाह- दीसन्तो अणमुद्दो णिब्युइजणओ करहिं वि छिवन्तो। अभत्यिो परम्भइ पन्दो व पिओ कलापिलो ॥ २१॥ [श्यमानो नयनसुखो नितिननन कराम्या अपि स्पृशन् । अभ्यर्भितो नरभ्यते चन्द्र इव प्रिय करानित्य ॥] नितिजननः मतापहा । कराभ्यो हसाभ्याम, पझे करे रिणे । अम्मति प्राति पक्षे बस्तिो गगन स्थित बालापनधि, पझे पोरा मपि कालस्स गर्दा प्रतिपय ती आई प्रति संकेतस्थानमा पापी- जे पोलभमरभागमोडमा भासि पइभडुनमले। शरेण वजुल पिसवभरस से एण्णुा जाभा ॥२२॥ 1 मम ममा ग, पदरमहातिम ग, मदरसंघ रोपरला. -टो' ग. ५. 'अपुरो गल्लन्' ग... मा "प... मिस ग.

काव्यमाला। [ये नीलनमरमरममगुच्छका आसनदीतटोत्सङ्गे । कालेन वैचुला- प्रियवयस ते स्थाणवो जाता ॥] स्थाणको निष्पनशासा ॥ अस्थिरोह नायक प्रत्युद्विमा कापि दृढप्रेमप्रियप्राप्तीच्छ प्रकाशनच्छरेन कस्य वकाशदानायाह- सणभारेण पेम्मेण माउआ दुम्मिअझ एचाहे । सिविणअणिहिलम्भेण व दिट्ठपणद्वेण लोअम्मि ॥ २३ ॥ क्षणमङ्गुरेण प्रेम्णा मातृष्वस दूना स इदानीम् । स्वमनिधिलम्भेनेय दृष्टपनटेन लोके ॥] फाप्यचिरेणैव सण्डितप्रणया धूर्ते कान्तमन्यापदेशेनाह--- घावो सहावसरल विच्छिषा सर गुणम्मि वि पडन्तम् वकस्स उजुअस्स अ संघन्धो किं चिरं होई ॥ २४ ॥ चाप स्वभावसरल विक्षिपति शरं गुणोऽपि पतन्तम् । पक्रस अनुकस्य च सबन्ध किं चिरं भवति ।" सरको ऋजु, पक्षे निष्कपट गुणो। मौवीं । पक्षे सौन्दर्यादि । "अप नियो ।। घापो' इत्यमर ॥ कस्याचित्स्तनयोरिवल्यायो सामिलाप कोऽपि धर्णयति ।- पढम वामणविहिणा पच्छा हु को विअम्भमाणेण । थणजुअलेण इमीए महुमहणेण व्य वलिपन्यो ॥ २५ ॥ (प्रथम वामन विधिना पश्चारसलु कृतो विनृम्भमाणेन । स्तनयुगले तस्या मधुमयनेनेव वलियन्ध ॥] वामन खल्प सर्वश्च । बालशिवलिरमुरभेदश्च । यवयोरभेद ॥ दुयो न केवल साधूनामपकारमान करोति, किं वसाधूनामुपकारमपीदि कोड: न्यापदेशेना-- मालइकुसुमाई लुधिउण मा जाणि णिचुओ सिसिरो। फासव्वा अजवि णिग्गुणाण बुन्दाग वि समद्धी ॥ २६ ॥ 1 'मोश प्रियावतसस्थानश'ग. २, "विघटपति' ध. 'गुने वर्तमाना ग, 'गुणे निपतन्तम्'घ... 'मरमरस' ग.५ 'मम्पस'ग, 'तसा' | ' परिण' क, 'हाभोग.

शतकम्] गाथासप्तशती। मालतीकुसुमानि दग्ध्वा मा जानीहि निवृतः शिशिरः । कर्तव्याधापि निर्गुणाना कुन्दानामपि समृद्धिः ॥] न केवलं तव दौर्भाग्य मया कृतं कि तु त्वत्सपत्नीना सौभाग्यमपि विधेयमियनि- यदादिनी नायिका प्रति कुपितनायकेन ध्वनितमिति केचित् ॥ कोऽपि.गलितयौवनायाः स्तनायालोक्य सपरिहासमाह- तुङ्गाण विसेसनिरन्तराण [सरस]वगलद्धसोहाणम् । कअफजाण भडाण व थणाण पडणं वि रमणिजम् ॥ २७ ।। तुगयोर्विशेषनिरन्तरयोः [सरस] प्रणलब्धशोभयोः । कृतकार्ययोमैटयोरिव स्तनयोः पतनमपि रमणीयम् ॥] तुझ्योरमतयोमानोगतयोग्य । विशेषेण निरन्तरयोरन्योन्यलप्रयोः. परसरनिर्षि- शेषयोच ॥ कोऽपि कस्याश्चियुवत्याः पौनोनतो स्तनी वर्णय ति- परिमलणसुहा गुरुआ अलद्धविवरा सलक्सणाहरणा । थणआ कव्वालांव म कस्स हिअए ण लग्गन्ति ।। २८ ॥ [परिमलनसुखा गुरुका अलन्धविराः सलक्षणामरणाः । सनकाः काव्यालापा इव कस्स हृदये न लगन्ति ॥ परिमल्न मदनं विचारश्च । गुरुकाः प'नोन्नता अर्थगुरुवाच । विवर रन्ध्र दूषणं । लक्षणं श्रीफ्ला दिसायं पाणिन्यादिप्रोकं च । आमरण हारादिकमुपमानुमा- उपादेयोऽपः कदाचिदनुपादेयता यातीति निदर्शयन्करिदाद-- सिंप्पड हारो थणमण्डलाहि तरुणीभ रमणपरिरम्भ। अधिअगुणा वि गुणिनो लहन्ति लहुअत्तणं काले ॥ २९ ॥ [शिष्यते हारः सनमण्डलातरुणीभी रमणपरिरम्भ । अर्चितगुणा अपि गुणनो लभन्ते लघुत्यं कालेन ॥] गुगः सूर्य शोर्यादिकं च ॥ बाप्पारमनः कस्मिनप्यनुराग मन्मपन्या व सूचयन्ती ससीमार- अण्गो को चि मुहायो मम्महसिहिणो हला हासरस । विशाइ णीरसाणं हिभए सरसाणे शचि पनलद ॥३०॥ 'सानानि कया' ग, 'सर्थ यमानानीय निांत.' प. २. य-पुस्तके जाना मिलार परन सर्वत्र पर्वते. ३. 'पिर' क.

फाव्यमाला। [अन्यः कोऽपि समावो मन्मपशिमिनो हेला हतासम्म । नियति नीरमानां हृदये सरसानां हारिति प्रज्वलति] हा सपि । हताशस्युगपूचरम् । नीरगानामनुरागरदिताना माण सरसानां रामिणमादीनां च ॥ कापि मानमहिलायाः राया गदित सौभाग्यं मानुलान्या रापिम्पयमार- तह तस्स माणपरिवटिमस चिरपणवद्धमूलस्म । मामि पडन्तस्स सुभो सदो वि ण पेम्मरक्सरस ।। ३१. (तथा तम्य मानपरिवर्धितस चिरमणपदमूलम्प । . मातुलाने पतनः शुरः शन्दोऽपि न प्रेमवृक्षम्य t] मानेन सागरेण परिवधिनस्य । पिरप्राय एव पलं मूलमस्य । पायभाय र अरागरस कस्यचिपायाश्यमुकिरिति फेचित् ।। अग्रहीतानुन या गमी सरो सवेदमाह--- पाअपहिओण गणिओ पि भणन्तो वि अपि मणिशो यन्तो वि ण गद्धो मग कम्म फर फओ माणो ।। ३२ । पादपवितो न गतिः पियं मगनप्यप्रियं मणितः । जनमदिन म्दो भैग कन्य यने यनो मानःn] पादपतियोsairaयतिप्रायम् । पापनादिकमेव मानप परम् । मेवेसर्गः । अपवारस्य वेमुवान रमपितु ससा माना नायगर गालि गोपालम्भं राध्या पचनम् ॥ सान्या दुचरितं सरयन्ती शारि गोपालम्भमाद- पुसद पपुवा शर्ण पप्पोडा तारणं अआणली। मुद्धबहू एणरहे दिगं पण महरपमम् ॥ ३३ ॥ होन्दति बक्षालयीन भागोटयो सेसनमानी। मुम्पर सर्पदे दस दर्वितन नगरपदम् ॥ नायरमुकाटायितु नारिकाया नायौरन सत्या समिती आमनःरहेनस्यनगमने आई प्रीि यायपन्दी सानिमार-- चामारसे उपणापमोहरे जोचणे व योसीने। पदमाफाममुर्म दीमा पलिभं व घरजीए ॥ ३४ ॥ १. 'नाम'... 'मगरमम् .. १, '' .

- ५ शतकम् गाथासप्तशती। १३५ वर्षाकाले उन्नतपयोधरे यौवन इयं व्यतिक्रान्ते । प्रथमैककाशकुसुमं दृश्यते पलितमित्र धरण्याः ॥ उनतपयोधरे उन्नतमेधे । पक्षे उन्नतसने । अहं तां काशभूमि गता स्व तु नागत इति भावः । यद्वा न केवलं मामेव वार्धक प्रसते रश्य धरण्या भपीमामवस्थामिति इसन्तं विरं प्रति जस्ट्रेश्यायाः कस्याश्चिदियमुफिः॥ प्रवासोद्यतस्य प्रियस्य गमननिधाय कापि वर्षाकालं वर्णयनि- कत्य गर्भ रइबिम्यं कत्थ पणट्ठाओ चन्दताराओ। गभणे यलाअपेन्ति कालो होरं व कढेइ ॥ ३५ ॥ [कुत्र गत रविविम्ब फुत्र प्रणष्टाश्चन्द्रतारकाः। गगने बलाकापति कालो होरामिवाकर्षति ॥] होरा कठिनीरेसा । अन्योऽपि ज्योतिर्विसूर्यादिप्रहप्रतिमाधनार्थ पटिनीरेखामा- कवीत्यर्थः । 'होरा समेऽपि राय) रेसाशास्त्रभिदोरपि' इति मेदिनी । सच जारे नि.शश क काचिदाद- अविरलपडन्तणय जलधाराग्जुघडिभं पअत्तेण । अपहुत्तो उत्तुं रसह व मेहो महिं उअह ।। ३६ ॥ (अविरलपतमनजलधारारजुघरिता प्रयत्नेन । अप्रभवमुत्क्षेप्तुं रसतीच मेपो महीं पश्यत "] अविरल पसन्सो नबजलधारा एष रखवताभिटितां पद्धा महीम शेतुमनभवन U- जन्मेपो ररातीय शन्दायत श्य । अतिष्टी जलप्रचाराभावामि. रमति भावः ।। झापि कान्तानयनाय राखी स्वरयितु हृदयोपसम्भन्याजेनात्मपीटा भावयति- ओ हिसा ओदिदिहं तहमा पडियन्निऊण दहशस्त । अत्येफाउल वीसम्मघाइ कि तइ समारदम् ॥ ३७॥ हे'दय अधिदिवसं तदा प्रतिश्य दयितस्य । अफसादापुल विसम्मघातिन् कि स्वया समारब्धम् ॥ ओरत दुरादूचनपूर्व संबोधने । प्रतिस्था रतमालयापा रापन्यापारिवगानं प्रवासयन्टी परिवार- जो विण आणइ तरस वि देव भग्गाई तेत यसमाई। भानुभा पराई मह व पिभो से एमासाए ॥ ३८॥ १.सिं सग.२.ओ विभाग.

काव्यमाला। . [योऽपि न जानाति तम्पापि पश्यति मानि तेन मलयानि । अतिश्जुमा यराशी अयया प्रियससा हताशायाः ॥] वलयानीमन्तो नीति शेषः । अतिरका पानीमाप्रशासनार मपति मया ममानि दलयानीवि जातोऽपि वटी मारः।। কীবি ফাহিম মান্নাননামিস নয়- सामाइ गगजोधणपिसेसमरिए फयोलमूलम्मि । पिनइ अहोमुहेण व फण्णभंसेण लावण्गम् ॥ ३९ ॥ श्यामाया गुरुयोरनसिपने कोटमले । पीयनेभोमु ने रायसेन सापण्यम् ॥ श्यामाया उत्तमनादिया. । बानिमिषा भते मारी। अल्लागाला याप्रमाता मावित की सगीतिक्षामाद- सेटल्तिमसम्पही गोनागाणेष सम्रा मुहारमा । दूई पट्ठापसी तरमेम परगपं पा ॥१०॥ म्बिादी तसाही गोरगहन तम्म मुमगा। दती प्रभापयनी (गदिशती पा) तर गृहाण प्रामा कापि मरममारण्यटनात्मनो महा विराम माय सीरन सरमिसुमार- ५ शतकम्] गाथासप्तशती। निजपक्षारोपितदेहभारनिपुणं रसं लभमानेन । विकास्य पीयते मालतीकलिका मधुकरेण ॥] यद्वा वामपीडयनेवासी रमयिष्यतीति नववधूमाश्वासयितुं नायकस्य नववधूसंभोग. कौशलमन्यापदेशेन प्रतिपादयन्या दूत्या इयमुक्तिः । चिरविरहिणी युवती सखी समाश्वासयितुमाह-- कुरुणाहो विअ पहिओ मिजद माहवस्स मिलिएण । भीमेण जहिछिआए दाहिणवारण छिप्पन्तो ॥ ४३ ॥ [कुरुनाथ इव पथिको दूयते माधवस्य मिलितेन। भीमेन येथेच्छया दक्षिणवातेन स्पृश्यमानः ।।] कुदनायो दुर्योधन । माधवम्य कृष्णस्य वैशाखस्य च । भीमेन भीमसेनेन भयान- केन च । दक्षिणपातेन मलयानिलेन, पक्षे दक्षिणपादेन । यसन्तवातमयादचिरादेवा- गमिष्यति ते प्रिय इति भावः । यद्वा आसने वसन्ते कान्तस्य प्रवासनिषेधार्भ नायि- काया इयमुक्तिः ॥ अज्ञातयोचनया जायया सह रममाण कापि सानुरागपरिहासमन्यापदेशेनाह-- जाव ण कोसविकासं पावइ ईसीस मालईकलिआ । मअरन्दपाणलोहित ममर तावशिम मलेसि ॥४४॥ [यारन कोपविकास प्रामोतीपैन्मालनीकलिका । मकरन्दपानलोभयुक्त भ्रमर तारदेव मर्दयमि [1] योष कुचलः, पक्षे युद्धलापार वराहम् । मारन्द पुपरसः, पक्षे रतिसुसम् । षयमाशय:-दुपिंदग्ध राल्वरि यस्त्वमस्मद्विध युवतिजन विदायास्थाने लियसीति । बदा-अस्यामेव दयायो त्रियः मुसावहा भवन्ति तस्मान्मदैयन्मा भैष्यसीति सखीव- नमेतत् ॥ कापि मन्दले जारमनुकूलयितु दुष्करसंदचचामाह-- अकअण्णुअ तुज्झ फए पाउसराईसु जे भए मुण्णम् । उपेक्पामि अलजिर अस वि तं गामचिक्सितम् ॥ ४५ ॥ [अतश तर कृते प्रायडाविपु यो मया झुण्णः । उश्याम्यलजाशील अद्यापि ते प्रामपक्षम् ॥] .. "दिहता' ग घ. २.दुम्मिमा' ग. ३. 'नाद; किरवे ग. ४. 'यह- पडया' ग घ.५. दक्षिणपने ग... रचन्' ग... 'मनागाप' ग... मित ग'दम' घ... 'उ' ग.घ.

काव्यमारा। उप्पैक्सामीलस्योत्प्रेक्षे म्मरामीति यार्थ । स्वनिमित्त मया यहुत दुसमनुभूत किमिति मा प्रत्युदासीनोऽसीति भाव ॥ विपरीतरते मुग्यवधूप्ररोचनार्थ नागरिक कस्याविरुपायित वर्ण यति- गेहइ गलन्त सस्वलन्तकुण्डलललन्तहारलआ। अद्भुप्पइआ विजाहरि न पुरुसाइरी वाला ।। ४६ ॥ [राजते गलत्वेशस्वलत्कुण्डलललद्धाररता । अर्घोत्यतिना विद्याधरीव पुरुषायिता याला । "उयुप्पइआ' इति पाटे ऊवोत्पतितेत्यर्थ ॥ आत्माराम निरतिशयानन्दनिधिमार मकाप्रदाय गृहोतडीलाविप्रई, रम्मितजार. भावं धाकृष्ण गौभाग्यगविता यग्नवी काचिदाह- जह भमसि मममु एमेभ रह सोहग्गगठिवरो गोहे। महिलाणं दोसगुणे विचारअ जइ समो सि ॥ ४७ ।। यदि अमसि भ्रम एउमेर कृष्ण सौमाग्यगवितो गोडे । महिलाना दोगुशी विचारयितु यदि क्षमोमि ।] मराहरी वलमा दुर्लभा तयेते मार । मानिन्या ससी लकान्तमनुनयपरायुसमन्यापदेशेनाह-- संज्ञासमए जलपूरिससलि विहडिएप वामअरम् । गोरीम कोसपाशुञा व पमहादिव णमह ।। ४८॥ [सप्याममये जररिता विघटितरवामकरम् । गौ कोपपानोयनामिर प्रमथाधिप नमत i] विघटितोऽर्याद्री या एको याम करो यम्य । जानपन्यन्तरवाया गौरी प्रालि कोरपानास्य दिव्य शंभुरी रोती ययातीयमरयमनुनयेत माय । चार सामाग्यस्योरादयता प्रतिसादयन्ती गस्तीमा- गाममिणो सयामु वि पिमासु अणुमग्णाहिमवेमामु । मम्मच्छेएमु चि वाहाइ उपरी पला दिट्टी॥४९॥ मोमण्या मानी पियामनुमरणगृहीतरेपाम् । मर्मच्छेदेवरि यछमाया उपरि पलते दृष्टि , 'पुरप दिसतोटा'य २ 'विवाएगमो भाविक हो।' ग. विधान म. चमे न.४ 'शोरगुपियारशनोऽसारिन भी ग, दोरगे यार. मिमीमधमोल घ.५ 'प्राममुध्यस' ग. -- .

. शतकम्] १३९ः गाथासप्तशती। यद्वायं रणदशामापनोऽपि सुभगामेव पश्यति युष्माखद्यापि विरतः तस्मादनु- रणामिवतध्वं कुरुध्वं च जारमित्यभिप्रायेण कुहन्या इयमुक्तिरिति ध्येयम् ॥ क्यमेवं प्रियवादिनमपि कान्तमवधीरयसीति वदन्ती मातुलानी काचिदाह- मामि सरसक्सराण वि अस्थि विमेसो पम्पिअव्वाणम् । हमइआण अण्णो अण्णो उवरोहमइआणम् ॥ ५० ॥ [मातुलानि सदृशाक्षराणामप्यस्ति विशेष. प्रजल्पितव्यानाम् । नेहमयानामन्योऽन्य उपरोधमयानाम् ॥] 'माल्पितव्यानां वचनानाम् । स्नेहं विनापि शठः परान्वञ्चयितुं मधुरं भापते । तथा. पनुभवसाक्षिक खरविशेष एवं भेदक इति भावः । 'मामि' इति स्थाने 'सुह' इति चित्पाठ । 'सुभग' इसर्थ । तन कथं मामाधीरयसीति वदन्त नायक प्रति नायिकाया इयमुफियोज्या॥ अन्यासक्त दाक्षिण्याप्रियवादिनं नायकं कापि सरोपमाह- हिअआहिन्तो पसरन्ति जाइँ अण्णाइँ ताई यअणाई। ओसरमु किं इमेहिं अहरुत्तरमेत्तमणिएहिं ।। ५१ ॥ हेदयेभ्य प्रसरन्ति यान्यन्यानि तानि वचनानि । अपसर विमेभिरघरोत्तरमानमणिः ॥] अपरेति मुसमात्रप्रवृत्तैर्न तु हृदयप्रवृत्तरित्यर्थ. ॥ गोनस्पलितं कान्त धीरा नायिका सपैदग्ध्यमाह- कह सा सोहग्गगुणं मए समं यहइ णिग्विण तुमम्मि । जीअ हरिजइ गोतं हरिऊण अ दिजए मज्झ ॥ ५२ ॥ [कथं सा सौभाग्यगुणं मया समं वहति निर्धग त्वयि । यस हियते नाम हत्वा च दीयते मह्यम् ॥] विरदजनितमात्मनः कार्य मज नती कार मोरितभर्तृका रासीमाह-- सहि सासु सम्भावेण पुनिउमो कि असेसमहिलाणम् । वडन्ति करठिआ व्विअ यलआ दइए पैउम्मि ॥ ५३ ॥ [सलि बघय सद्भावेन पृच्छाम. रिमशेषमहिलानाम् । वर्धन्ते रिस्थिता एव वलया दयिते प्रोषिते ॥] 'क्लयोनियाम्' इत्यमरः ॥ १. 'मुहम रा-ग. २. 'मुभग' ग घ. ३. हदयस्था' ग. ४. 'ग'सा 'पउत्पेक.६.'करस्था.' ग.

काव्यमाला। ६ . दुर्गत रोगिणं वा पति सक्तुमिच्छन्ती परपुरुषाभिमुखी निपेढुंकाचिदन्यापदेशेनाह- भमइ पलिता जुरइ उक्सिविउं से करं पसारेइ। करिणो पङ्कक्षुत्तस्स गेहणिअलाइआ करिणी ॥ ५४॥ [भ्रमति परित सिंद्यते उत्प्तु तेस कर प्रसारयति । करिण पङ्कनिममस्य सेहनिगडिता करिणी ।। कापि सत्या शिक्षाथै पार्वत्या लजायामपि स्नेहाभिव्यक्तिवेदाध्य वर्णयति- रइकेलिहिअणिसणकरकिसलअरुद्धणअणजुअलस्स । रुद्दस तहअणअणं पव्वइपरिउम्बिरं जअइ ॥ ५५ ॥ रिति लिहतनिवसनकरकिसल्यानयनयुगलस्य । रुद्रस तृतीयनयन पार्वतीपरिचुम्बितं जयति ॥] ताडनाभिलाषाकूतकलित हलिकस्य कस्याविदनुराग सूचयनागरिकस्तमाह- धावइ पुरओ पासेसु ममइ दिट्ठीपहन्मि संठाइ । पंवलइकरस्स तुह हलिअउच दे पहरसु वराइम् ।। १६ ।। धावति पुरत पाईयोमति दृष्टिपथे सतिष्ठते । नेवलतिसकरस्य तर हलिकपुत्र हे प्रहरख दराकीम् ॥ हेशन्द सुबोधने । यद्वा नबलताकुन सक्तस्थानं त्वं गतो न त्वियमिति कृताप- राधामेना प्रहरेति सोपहास कुटनीववनमिदम् ।। कृत्रिम सर्वमुपहासासद भवतीति निदर्शयन्त्रविरखस वैदरच्यख्यापनाय सहचर- कारिममाणन्दवडं भामिजन्तं यह सहिआहिं । पेच्छइ कुमारिजारो हासुम्मिस्सेहि अच्छीहि ॥ १७ ॥ [विममानन्दपट भ्राम्यमाण बघ्या सखीभि । प्रेक्षते कुमारीनारो हासोन्मियाम्यामक्षिभ्याम् ॥J १. गिअडीकिआ ग. २. 'परितप्ता' ग, 'प्रत्यावर्तते' घ. ३. खिद्यति' य. ४ 'अस्य' ग. ५. 'एनिखात' ग, ६. नेहे निकीकृता' ग, 'मनिगडा यिता' य. 'गवल आए तुह ख.८ 'पा' घ. १. 'नवलवाकरस्य तव ग, 'नवल तिकया तबघ.१०, 'बन्धूहि का.

५ शतकम् गाथासप्तशती। *१४१ आनन्दपटः प्रथमपुष्पवतीवत्रम् । प्रथमरजोदर्शने जाते तवं पन्धुभिलाकेषु प्रद. यंत इति देशविशेषे आचारः । जारसंबन्धष्टशोणिताया अस्थानं संभ्रमदर्शनेन जा. रस हास इति योध्यम् । शिशिरसमये अधरे मधूच्छिष्टं लापयन्ती तरणी वीक्ष्य कोऽप्यात्मनो वैदग्ध्य- स्थापनायाह-- सणिों सणि ललिअङ्गुली मअणवडलाअणमिसेण । वन्धेइ धवलवणवट्टों व वैणिआहरे तरुणी ॥ ५८ ॥ शनकैः शनकैर्ललिताङ्गुल्या मदनपटलापनमिपेण । बजाति धरलप्रणपमिव प्रणिताधरे तरुणी ॥] कापि कुलवधूरसं शिक्षयितुं सखीमाह- रइविरमलजिआओ अप्पत्तणिसणाओं संहस न्य। ढान्ति पिअअमालिगणेण जहणं कुलवहूओ ॥ ५९ ॥ रतिविरामलज्जिता अप्राप्सनिवसनाः सहसैव । आच्छादयन्ति प्रियतमालिङ्गनेन जघनं कुलवध्यः । कापि कस्याश्चित्मौभाग्यमन्यापदेशेनाह-- पाअडिअं सोहग्गं तम्बाए उअह गोटुमज्झम्मि । दुद्रुवसहस्स सिङ्गे अक्खिउड कण्डुअन्तीए ॥ ६०॥ [प्रकटित सौभाग्यं गना पैश्यत गोष्ठमध्ये । दुप्पभस्य शृङ्गे अक्षिपुटं केण्डूयन्त्या ॥] तम्या गौः॥ जारप्रलोभनाय दूती कस्याश्चिातलम्पटतामाह- उह संभमपिक्खित्वं रमिअव्वअलेहलाय असईए। णवरङ्ग कुडने अंच दिण्णं अविणअस्स ॥६१॥ पश्य संभ्रमविक्षिप्त तिव्यकलम्पट्या असत्या । नवरक्षक कुशे ध्वजमिव दत्तमविनयस ॥] १. 'भलीहि' ग. ३. वणिमहरा ख. ३. 'पष्टिकामिव' घ. ४. 'रणिताघरा' ख-घ. ५. सणा हसन्तीओ' क. ६. सहसत्ति' स.ग. ५. 'सहसेति ग. ८. “पश्यत' काख पुस्तकयो स्ति. १. 'कण्ड्यमान या' ग-य. १०.रतिरकलि- ग्धया" ग, रतिराहलया' घ. ११. निकग.

५ सतकम्। ५ गाथासप्तराती। मुखानानियादी चतुर्य पाटी । पादपतनादिभ्यः मुखेभ्यो भष्टासीलर्ध । दर्शनमा- ग सौ इति मुग्धाविशेषणम् । 'रभसो वेगहर्षयो ' इति कोष ॥ प्रणयकुपिता कान्तों कोऽपि प्रसादयितुमाह-- दे सुअणु पसिभ एहिं पुणो वि मुरहाई रूसिअन्याइ । 'एसा मच्छि मसलन्छणुजला गलइ छणराई ॥६६ ॥ हि सुतनु प्रसादेदानी पुनरपि सुलभानि रोषितव्यानि । एपा मृगानि मृगलाञ्छनोज्वला गलति क्षगरात्रि । रोमितव्यानि रोपा । क्षणनित्सवरानि । “दे मुद्दा' इति पाढे 'हे सुभा' इ. ल । तमान्योन्यग्रहीतमानी प्रति दूतवचनत्येन बास्येयम् ।। वाचातायात प्रतीकार कतै त्वमेव शक इसन्यापदेशेन की कमप्याह- आवण्णा कुलाई दो विधा जाणन्ति उण्णइ उम् । गोरीज हि अदेइओ अह्ह्वा सालाहणणरिन्दो॥ ६७ ॥ [आपलानि कुलानि द्वाय जानीत उन्नति नेतुम् । गौर्या हृदयदयितोऽथवा शालिवाननरेन्द्र ] आपमायापद प्राप्तानि । पक्षे आपर्णानि । अपनी पार्वती तत्वबन्धीनि ॥ विरमशीलकुग्लिनायिकामामास कमप्यन्यापदेशेन निवर्तयितु काचिदाह- जिंकण्ड दुरारोह पुत्तम मा पाडलिं समारुहसु । आरूढणिवडिआ के इमीण कआ हआसाए ॥ ६८ ॥ [निकाण्डदुरारोहा पुनक मा पारर्षि समारोह । आरूढनिरतिता के अनया न कृता हताशया ॥] कापड स्कन्धोऽधार तच्छ्न्यवाहुरारोहां दुराकमणीया प्रत्यायहेतुसगमा च ॥ प्रामणौवनितासको देवरो निवार्यतामित्यभिप्रायेण काप्यन्यापदेशेन वधूमाह- गामणिधरम्मि अत्ता एक व्विा पाडला इह गामे । बहुपाडलं च सीसं दिअरस्स ण सुन्दर एअम् ।। ६९ ॥ [मामणिगृहे थु एकैच पाटला इह प्रामे । बहुपाटल च शीर्ष देवरस न सुन्दरमेतन् ॥] यही पाटरानि पाटतिपुष्पानि यसिंवत् ॥ १.शाहो' ग.२ "रिकन्य' क-ख, 'कान्य ग. ३ "निष्कन्ध' कत. 'पारला' घ.५ 'समारह' कख. ६. 'मात 'ग.

काव्यमारा। भुजंगप्रलोभनाय दूती क्स्याश्चि कटाक्षतक्ष्ण्य वर्णयति- अण्णाण वि होन्ति मुहे पम्हलपवलाई दोहकसणाई । णअणाइँ सुन्दरीण तह वि हु दडु ण जाणन्ति ॥ ७० ॥ [अन्यासामपि भवन्ति मुखे पक्ष्मलधवलानि दीर्घकृष्णानि । नयनानि मुन्दरीणा तथापि खलु द्रष्ट न जानन्ति ॥ सहजा अपि गुणा भ्रूविलासादि वैदग्भ्य विना न शोभन्त इति भाव ॥ दण्डयानोरतस्य राज्ञ प्रतिषेधाय राजस्खतिव्याजेन वर्षापाल राही वर्णयति- हमेह व तुह रणजर असमअभअचलिअपिहलवसहि । परिसेसिअपोम्मासेहि माणसं गम्मइ रिहि ॥ ७१॥ हिंसरिव तब रणजल्दसमयमयचलितविहरूपः । परिशेपितपद्माशैर्मानस गम्यते रिपुमि ।।] हे राजन्, तब रिपुभिमानस मन । सवेत्यर्थात् । गम्यतेऽनुवर्त्यते । त्वत्सेवया स्थी यत इति यावत् । हसपक्षे मानस सरोविशेष । गम्यते प्राप्यते । वीरशै । रण एवज लदरामय तद्भयाचलिता पलायिता अत एव विहरा पक्षा सहाया येषा तै । इस पक्षे-रमन्त शब्दायमाना ये जलदास्तद्भयाचलिता पम्पिता पक्षादा येपाम् । पुन कीदृशै । परिशेषित्ता स्यक्ता पद्माया लक्ष्म्या । पक्षेपमाना कमलानामाशा ये । अनायाससाध्यमेव प्रार्थनीयमिति सयौं शिक्षयितु काचिदाह- दुग्गअघरम्मि घरिणी रक्षन्ती आउलत्तणं पदणो । पुन्छिअदोहलसद्धा पुणो वि उअअ विअ कहेइ ॥ ७२ ।। दुर्गतगृहे गृहिणी रक्षन्ती आकुलत्य पत्यु । पृष्ठदोहदश्रद्धा पुनरप्युदकमेव कथयति [1] दुर्लभवस्तुप्रार्थनायाममा व्याकुलो भविष्यतीति युध्धा उदामेव प्रार्थयत इत्यर्थ ॥ माता एवं युवत्यो प्रीष्मे रमय तीति वर्णय कोऽपि क्यस्यमाह-- आअम्बलोभणाणं ओलंसुअपाअडोरुजहणाणम् । अवरहाजिरीण कए ण कामो वैहइ धावम् ॥ ७३ ॥ [आताम्रलोचनानामाद्रशुक्प्रकटोरुजघनानाम् । अपराह्नमैजनशीलाना कृते न कामो वहति चापम् ॥] आदमुक्न प्रकटमूर जपन यासामित्यर्थ । ईगवस्थान युवतीनो रक्षणायमेव काम- थाप वहति । अन्यथा निरर्थक्वायतमेव स्यादिदि भाव ॥ १ "दुर्गतगृहस्थ' ग. २. 'धणु वहइ' क.३. 'नाताना' ग.

५ शतकम् गाथासप्तशती। १४५ योऽपि वैदयात्रीणी सकरव्यामोहक्ता प्रतिपादयितुमाह- के उच्चरिआ के इह ण सण्डिआ के ण लुत्तगुरुविया । पगइ वेसिणिओ गणणारेहा उव वहन्ति ॥ ७४ ॥ कि उर्वरिता के इह न खण्डिता के न लुप्तगुरुविभवा । नउराणि वेश्या गणनारेखा इस वहन्ति ॥] के उवरिता वेदयाभिरनाकृष्टा । के न सण्डिता । फेषां व्रतखण्डन न कृतमित्यथ । खराणि मराक्षतानि । 'नसरोऽस्त्रियाम् इयमर । यद्वा--जहराइ नखरातिम् । नस- तिपडिमिति यावत् । कामुरुदत्तनराक्षतपतिव्यानेन के उर्वरिता इयादि गणनारेसा हतीत्यर्थ ॥ प्रवासादागत कात प्रति विरहदु स निवेदयितु कापि सवैदग्भ्यमाह- विरहेण मन्दरेण व हिअअ दुद्धोहिं व महिऊण । उम्मूलिआई अव्वो अम्ह रअणाई व मुहाइ ।। ७५ ॥ [विरहेण मदरेणेव हृदय दुग्धोदधिमिय मथित्वा । उमूलितानि कैप्टमरनाक रत्नानीन मुखानि ॥] उन्मूलितानि दूरीतानि । अध्यो इति क्टसूचकमव्ययम् 1 'अवो सवुद्धिदु खयो ' इति देशीशेप । खद्विरहे दु समेव केवल मयानुभूतमत पर मा विहाय न ग नव्यमिति भाव ॥ पायु प्रियमेव सयदा क्तव्यमिति वदती सखी वापि पयुदग्भ्यमीयो च सोद्धेगमाह- उजुभरए ण तूसइ वक्वम्मिवि आअम विअप्पेइ । एत्य अहव्वाएँ मए पिए पिअ कहँ णु काअव्यम् ॥ ७६ ।। [रजुपरते न तुष्यति वक्रेऽप्यागम विकल्पयति । अत्रामव्यया मया प्रिये प्रिय क्थ नु वर्तव्यम् ॥] ऋजुके हावभावादिरहिते । वक्र हावभावमाणितसीकृतदतक्षतनराक्षतचुम्बनासन विशेषादियुक्त । कुतोऽनया शिक्षितमित्यागम विकल्पयति । 'आगम' इत्यस्य स्थाने भाशय' इति चित्पाठ ॥ रतिको गालदर्शनेनान्यथाभावशदिन काचिदाह- यहुविविलासरसिए मुरए महिलाण को उवज्झाओ। सिक्खइ असिक्खिाइँ वि सव्यो गेहाणुबन्धेण ॥ ७७ ॥ १ वैशिन्यो गणनारेखा उपवहन्ति' घ २ 'अहो ग घ. ३ 'आशय घ.

. काव्यमाला। बहुविघविलासरसिके मुरते महिलानां क उपाध्यायः । शिक्ष्यते अशिक्षितान्यपि सर्वः स्नेहानुवन्धेन ॥] नायकसौन्दर्य प्रस्टयन्ती दूती नायिका रोचयितुमाह-- वणवसिए विभत्थसि सचं विअ सो तुए ण संभविओ। ण हु होन्ति तम्मि दिट्टे सुत्थावत्याइँ अगाइँ ॥ ७८ ॥ वर्मवशिते विकत्थसे सत्यमेव स त्वया न संभावितः । न सुद्ध भवन्ति तस्मिन्दृष्टे स्वस्थावस्थान्यङ्गानि ॥ वर्णो गुणश्रवण देन वशीकृत इति सवोधनम् । 'वों द्विजादिशुशादियशोगुणकथा दिपु' इति मेदिनी । विकत्यसे मया दृष्ट इत्यारमटापा कुकरे। न संभावितो न दृष्टः अन हेतुमाद- सल्लिति । खस्थावस्थानि न भवन्ति, किंतु स्वेदकम्परोमाधम सभामोशयितादिभावालानि भवन्तीवर्थ ॥ अभिनव विषयानरत. पूर्वानभूतमवधीरयतीति निदर्शयनी समाह-~- आसण्णविआइदिणे अहिणवबहुसंगमस्मुअमणास । पढमपरिणी सुरअ परस्स हिआए ण संठाइ॥ ७९ ॥ {आसमविवाह दिने अमिनयवधूसगमोत्सुकमनसः । प्रथमगृहिण्या. सुरतं यरस हृदये न सतिष्ठते ।] अतिमदनाकान्तहृदयः कोऽपि दोप जाननपि रागीकण्ठया प्रेयस्या सहवरीमाह- जइ लोकणिन्दिों जइ अमगलं जइ विमुष मनाअम् । पुप्फवइदंसणं तहवि देई हिअअस्स णिव्याणम् ॥ ८॥ [यदि रोवनिन्दितं यद्यमगलं यदि विमुक्तमयांदम् । पुप्पयतीदर्शन तथापि ददाति हृदयम्य निर्माणम् || पुत्रवतीस्वादुद्विजमान कान्त कारि सविनयोपालम्भमाह-- जइण छियसि पुफाई पुरओ ता फीस वारिमा ठासि । हितोसि चुलचुलन्तेहिं धाविउण अम्ह हत्येहिं ।। ८१ ।। 1. रमिते' ग. २. एण्णरलिए ग. ३. 'राधरिमो' ग.."परम्परसि ग. ५. एचरित.' ग. ६. 'स्वस्थान्यज्ञानि' ग... 'दिमु ग.."दिन नरग. .. 'वह सदपि दे हिमग्मि' ग... 'लव स्यापि ददाविलये ग. 'ता पारि मम ददाति हृदये-'य. निर्वाण मुराम् ।।

५ शतकम् गाथासप्तशती। १४७ यदि न स्पृशसि पुष्पवती पुरतस्तत्किमिति पारितस्तिष्ठसि । स्पृष्टोऽसि चुलचुलायमानैर्धावित्यास्माकं हस्तैः ॥] चुलचुलेत्यनुकरणमुत्कण्ठातिशयसूचकम् । कण्ड्यमानैरित्यर्थ ॥ नायिकाया विप्रलम्भावस्थाकथनेन नायकापराधं प्रकटयन्ती दूनी नायकमाह- उजागरअकसाइअगुरुअच्छी मोहमण्डणविलक्सा । लजइ लजालुइणी सा सुहा सहीहि वि वराई ।। ८२ ।। [उज्जागरककपायितगुरुकाक्षी मोघमण्डनविलक्षा । लज्जते लेजाशीला सा सुमग सखीभ्योऽपि वराकी ॥] उबागरेण पायिते गुरुके अक्षिणी यस्या' । मोधेन निरर्थन मण्डनेन विलक्षा। गर्भमरेण साम्यन्ती सी सखी सपरिहासमाह- कवि तह अइगरुएण वि तम्मइ हिअए भरेण गम्भस्त । जह विपरीअणिहुअणं पिअम्मि सोहा अपावन्ती ॥ ८३ ॥ नापि तथातिगुरुकेणापि ताम्यति हृदये भरेग गर्भस । यथा विपरीतनिधुवनं 'प्रिये रनुपा अप्रामुवती ॥] गर्भिणीपीवरादीनां विपरीतसुरतस्य निपिद्धबादिति भावः ॥ नायिकानुरागप्रकाशनेन दूती नायकमुत्कण्ठयितुमाह--- अगणिअजणाववाभं अवहत्यिअगुरुअणं वराईए। तुह गलिअदंसणाए तीए वलिउण चिरं रुण्णम् ।। ८४ ॥ [अगणितजनापवादमपहस्तितगुरुजनं वराक्या । तय गलितदर्शनया तया धेलित्या चिर रुदितम् ॥] वादान्त जनान्तं च क्रियाविशेषणम् ।। घोषितपतिका, त सखी वा लेखमुखेन नायकमाह--- हिअ हिभए णिहि चित्तालिहिम व्व तुह मुहे दिट्ठी। आलिगणरहिआई णवरं खिचन्ति अङ्गाई ।। ८५ ॥ १. 'लक्षात घ. २. सनिा"घ. ३. ग... "मुरत' क-ख. ५. पि. यमपि' ग. 9. 'दर्शनाशया' कस. . ७.'चलित्वा' घ... 'दुहिआइ' ग.

काव्यमाला। हृदयं हृदये निहित चित्रालिखितेव तव मुखे दृष्टिः। आलिङ्गनरहितानि केपलं क्षीयन्तेऽङ्गानि ॥] 'आलिअणदुहिया' इति पाठे आलिङ्गनं विना दु.खितानीचः ।। काचिदतिविरह्दुखिता सुज्ञ सखोमाह- अहों विओअतणुई दुसहो विरहाणलो चलं जीमम् । अपाहिजउ किं सहि जाणसि तं घेव जे जुत्तम् ।। ८६ ॥ अहं वियोगतन्वी दु सहो विरहानलथलं जीनम् । अभिधीयता किं सखि जानासि त्वमेव यद्युतम् ।। प्रियानयनमेव युक्तमिति भावः ।। कलहान्तरिताया नायिकाया विरहदुखं प्रतिपादयन्ती दूती नायकमाह- तुह बिरहुजागरओ सिविणे वि ण देइ दसणसुहाई। वाहेण जहालोअणविणोअणं से हों तं पि ॥ ८७ ।। इतर विरहोजागरकः सोऽपि न ददाति दर्शनमुखानि । बाप्पेण योलोकन विनोदनं तस्सा हतं तदपि ॥] अनुरक कान्तं कापि सोपालम्भमाह- अण्णावराहकुविओ जहतह कालेण गम्मइ पसाअम् । वेसत्तणावराहे कुविरं कह तं पसाइस्सम् ।। ८८ ।। [अन्यापराधकुपितो यथातथा कालेन गच्छति प्रसादम् । द्वेष्यत्वापराधे कुपितं कथ तं प्रसादयिष्यामि ॥] अन्य भाज्ञाखण्डनादिरूपो योऽपराधस्तेन कुपितः । द्वेष्यात सहाजिको द्वैपस्त पेऽपराधे। भहृदयप्रचारिणं प्रियवादिनं नायक कापि सोपालम्भमाह- दीससि पिआणि जम्पसि सन्मावो सुहअ एत्तिा व्वेभ । फालेइऊण हिअ साहसु को दावए कस्स ॥ ८९॥ १. 'दुसितानि' ग-ध. २. 'सदिश्यला', 'आदिश्यता' घ. ३. 'शिहे जागरण' ग. ४. 'अवलोकन -ख... अतिस्वाहतं तत् ग... गम्यते' घ. ७. 'प्रसाद यिध्ये' ग-घ...'भणति' क-ख.

५ शतकम्] . मोद्वेग खातमाह- गाथासप्तशती। दृिश्यसे प्रियाणि जल्पसि सद्भावः सुभग एतावानेव । पाटयित्वा हृदयं कथय को दर्शयति कस 13 तवाकृतिवचनादिकमतिमधुरम्, हृदय तु कालकूटघटितमिवेति मावः ॥ छाप्यस्थिरनेहं पतिमुपालधुमन्यापदेशेनाह- उस लहिउण उत्ताणिआणणा होन्ति के वि सविसेसम् । रित्ता णमन्ति सुइरं रहयडिअ ब्व कापुरिसा ॥ ९० ॥ [उदकं लब्ध्वा उत्तानितानमा भवन्ति केऽपि सविशेषम् । रिक्ता नमन्ति सुचिरं हद्द(अरघट्ट)घटिका इव कापुरुषाः ।। रहो घटीयन्नं तसंयन्धिनः क्षुधा घटा इव 1 उच-'जीवनग्रहणे नधा गृहीत्वा मदमताः । कि कनिष्ठाः किमु ज्येष्ठा घटीयन्त्रस्य दुर्जनाः । इति । सुधामयसमयूखमण्डलीधवलिते दिखे पियसंगममलभमानान्धकाराभिसारिका भग्गपिअसंगम केचिों व जोहाजलं पहारम्मि । पॅन्दअरपणालणिग्झरणियहपडन्त गणिट्ठाइ ॥ ९१ ।। मिमप्रियसंगम कियदिव ज्योत्खाजलं नमःसरति । चन्द्रकरप्रणालनिहरनियहप्तन्न निसिएति ॥] भामा भियसंगमो येन तत् । तथा चन्द्रकरा एव प्रणालनिझरनिवहारतेभ्यः पतन नि शेष तिष्ठति । न समाभोवीत्वषः । नापिकानुराग सूचयन्ती दूती नायकमाइ- मुन्दरजुआणजणसंफुले वि तुह दसणं विभगान्ती । रण व्व भमइ दिट्ठी बराइआए समुश्विग्गा ॥ ९२॥ [मुन्दरपुरजनेसंकुलेपि तय दर्शनं विमर्शियन्ती । अरण्य इव प्रमति दृष्टिगकिवायाः समुद्विमा n] ययारण्ये शून्यप्रदेशे कमपि न पश्यति तथा त्वद्रतचिता सतोऽपि बहन्यूनो न प. स्यति रितु त्यामेवोदीक्षत इति भावः । प्रविण्णा' इवि शदे त्यदर्शनकौतुकाद. गाजितदेवपः । १. 'मणरि घ. ३. फारयित्वा' प. ३. निजहरयं ग... संग घ. ५. 'क यति' करा. . कापटिका घ... पन्त' ग.प. ८. 'न निति' ग, 'न विरविघ, १.करे.ग. १.."विमार्यमाणा' ग. ब १५० काव्यमाला। प्रोपितपतिया विरहावस्था सखी तरकान्तसमीपगामिन पथिकमाह- अइकोरणा वि सासू रुआविआ गभवई सोह्राए । पाअपडणोण्णआए दोसु वि गलिएसु वलएसु ॥ ९३ ॥ [अतिकोपनावि श्वश्रू रोदिता गैतपतिक्या लुपया । पादपतनावनतया द्वयोरपि गलितयोलययो ॥] द्वयोभुनद्वयविधृतयो । पलययोरिति सतिसप्तमी। एवसिय मत्सुनकृते कृशा जाता येनानया मत्पादवन्दनावनतया वलयपातोऽपि न ज्ञात इत्या ठोक्य निष्ट गपि वधूररो दीदिति भव ॥ प्रवासोद्यतस्य का तस्य गमननिषेधाय ग्रीष्मातरस्स दु सहत्व कापि वणयति--- रोवन्ति व्व अरण्णे दूसहरइकिरणफससतत्ता । अइतारझिल्लिविरुएहि पाअवा गिम्हमज्झते ॥ ९४ ।। रुदन्तीकारण्ये दुसहरविकिरणस्पर्शसतसा । अतितारशिल्लीविरुतै पादपा ग्रीष्ममध्याहे ॥ विही 'झौगुर' इति कान्यकुब्नभाषया प्रसिद्ध की विशेष । अचेतनाना पादपाना मपीयमवस्था किं पुनश्चेतनानामिति भाव । यदा सफेतवनोगत लेकागम शमान सात प्रत्यभिसारिकाया इयमुक्ति । नाय ननचरणसचरणवलि पत्रकनि , किंतु चिठी 'ध्वनिरिति नि शङ्क रमस्वेति भाव ॥ सकेतितसरस्तीरमह गला, व तु न गत , इति जार भावयन्ती कापि कमलबनवण नच्छलेन सखीमाह- पढमणिलीणमहुरमहलोहलालिउलयद्धझकारम् । अहिमअरकिरणणि उरम्बचुम्बिा दलइ कमलवणम् ॥ ९५ ॥ [प्रथमनिलीनमधुरमधुलुब्धालिकुलपयकारम् । अहिमारविरणनिकुरुम्बचुम्बित दरति कमलपनम् ॥ प्रथमनिटीनेन मधुरमधुलधेनाठिकुलेन बद्धो भकारो यत्र तत् । पाठान्तरे प्रथ मनिलीनमधुकरीधेलध । तत्र प्रथमनिलोनेति मधुकरीविशेषणम् । सुप्तस्य राज्ञ अबोधनाय नैतासिस्येद वचनमिति केचित् । साभ्यो विधिरनुष्टीयतामिति, सुरभयो मुच्य तामिति, विक्रयवस्तूनि प्रसार्यन्तामिति, नास्तीदानी पिशाचादिभयमिति, पथिक प्रतिष्ठरपेयादि प्रस्तावदेशकालरादिभदा पुनरनेकविधो व्यङ्गयोऽथ सहृदय खयमूहनीय ॥ १. 'गृहपतिस्नुपया' ग. २ 'महुअरीलरोहिल्लाठि' ग.

. ५ शतकम्] गाथासप्तशती। मानिनीमानापनोदाय नायक प्रेरयितु दूती नायकसहचरमाह- गोत्तक्खलणं सोऊण पिअअमे अन्न तीअ खणदिअहे । वन्झमहिसरस माल व्य मण्डण उअह पडिहाइ ॥ ९६ ॥ [गोरस्खलन श्रुत्वा प्रियतमे अद्य तस्या क्षणदिनसे । वध्यमहिषस्य मालेगु मण्डन पश्यत प्रतिभाति ॥] ध्रुत्वेयन तरं स्थिताया इति शेष । क्षणदिवसे उत्सादिवसे । वध्येति देव्यै उपहा- र वन कल्पितस्य महिपस्य कृतमपि मण्टन यथासन्नमरणतया न शोभते तथा अस्या अ. पीत्यर्थ । तथा च यावदभिमानेन न म्रियते त'घदेव शीघ्रमनुनीयतामियमिति भाव ॥ कापि कान्तानयनाय सखी त्वरयितुमात्मनो दु सहा विरहावस्थामाह- महमहइ मलअवाओ अत्ता वारेइ मं घराणेन्तीम् । अकोल्लपरिमलेण वि जो क्खु मओ सो मओ व्वेअ ॥ ९७ ॥ [महमहायते मल्यवात वधूरियति आरहाग्निन्तिीम् । अकोटपरिमलेनापि य खलु मृत सना यएन ।] महमहायते अतिसौरभमुद्दतीत्यथ । महोटेति । योटो गृहवाटिकायामेव प्रा. यशो भवतीति प्रसिद्धि । अयमाशय --मुरभिमलयमारतस्पर्शोहोषितविषम विषमयाण- दाणभिनहदया हृदयस्फोटेन विनयतीति सभाव्य श्वभूमा बहिर्ग-तु न ददाति । क्मेि तावता । गृहस्थिताकोटगन्धेनाप्यह मरिष्याम्येवेति । 'अहोटे तु निकोचर' इलमर ।। क्स्यचिदनियोगनिरासाथै दूती दपलो परस्परानुरागमाह-- मुहन्छओ पई से सा वि हु सविसेसदसणुम्मइआ । दोवि कत्था पुहई अमहिलपुरिस व मण्णन्ति ॥ ९८ ।। [मुखप्रेदार पतिस्तस्या सापि सलु सविशेपर्शनो मत्ता । द्वानपि कृतार्थों पृथिवीममहिलापुल्पामिन मन्यते ॥] प्रोक्तिपतिमा वाचिकयापि क्षेम पृष्टा तामाह- सेम कन्तो सेमं जो सो खुजम्बो घरदारे । तस्स किल मत्थलाओ को वि अणत्यो समुप्पण्णो ।। ९९ ।। [क्षेम पुत क्षेम योऽमी कुब्जानको गृहद्वारे । तस फिल मस्तकात्कोऽप्यन समुत्पन्न ॥] अनयों मुकुल । वसन्तराल समाप्त इति भाव ॥ १. 'माता' ग... 'पेच्छिरो' ग. ३. गावि च' ग. ४. 'दर्शनान्मत्ताग, . 'नोन्मादिता'घ.

काव्यमाला। प्रवासावमरमधिगम्य यस्यामप्पभियोतुर्जारस निरासार्थ दलाह- आउच्छणविच्छा जाआइ मुहं णिअच्छमाणेण । पहिण्ण सोअणिअलाविण्ण गन्तुं विअ ण इट्टम् ॥१०० ॥ [आपच्छनविच्छाय जायाया मुख निरीक्षमाणेन । पथिकन शोकनिगडितेन गन्तुमेव नेष्टम् ।।] आपृच्छन गन्तुमनुजानाहीति प्रश्न ॥ रसिअजणहिअअदइए कइवच्छलपमुहसुकइणिम्मइए। सत्तसअम्मि सम पञ्चम गाहास एअम् ।। [रसिकजनहृदयदयिते कविवत्सलप्रमुखसुखविनिर्मिते । सप्तशतके समाप्त पञ्चम गाथाशतकमेतत् ॥] षष्ठ शतकम् । जनापवादभयादप्राप्तय सह लोकना कुल्टा राखीमाह- सूईवेहे मुसलं विच्छहमाणेण दडलोएण । एकग्गामे विपिओसम अच्छीहि विदिवो ॥१॥ [सूचीवेधे मुसल निक्षिपता दुग्यलोकेन । एकनामेऽपि पिय समाभ्यामक्षिम्यामपि न दृष्ट.] सूचीवेप इति । अल्पमपि दूपण बहु पुर्वतेलयं । दग्धशब्दो निर्वेदसूबने । रा माभ्यां सर्वाभ्याम् । 'समं सहशि सम्मिन्' इति कोष ॥ कापि पतिगमनस्यात्ममरणहेतुता प्रतिपादय ती पायुगमन निषेधार्थ मसोमाह-- अजं पि ताव मा म वारेहि पिअसहि रअन्तिम् । कल्लिं उण तम्मि गए जइ ण मुआ ताण रोदिस्सम् ।। २ ।। [अद्यापि तावदेक मा मां वारय प्रियससि रुदतीम् । फ्ल्ये पुनस्तसिन्गते यदि न मृता तदा न रोदिष्यामि ॥ मपिरवधारणे । अवेयर्थ । एक दिनमित्ययाद ।। ऋतुमला युक्त्या वेदग्थ्य सूचपन्वी कापि सी शियितुमाह- एहि ति बाहरन्तम्मि पिअममे उअह ओणअमुहीए । विउणावेद्विअजहणत्यलाइ लजाणम इसिअम् ॥ ३ ॥ 1. निगडायितेन' घ. २, "रिच्छुइमागम्मि दलोअम्मि' ग. 1. 'विक्षिप्यमाणे ग, 'प्रक्षिश्ता'घ, ४. 'मास'ग. ५. मियेन रोदिये ग.

६ शतकम्] गाथासप्तशती। १५३ एहीति व्याहरति प्रियतमे पश्यतावनतमुख्या । द्विगुणावेष्टितजधनस्यलया लजावनतं हसितम् ॥] वोऽपि युवल्याः कटाक्षवर्णनेन सामिलाप प्रकाशयमाह--- मारेसि के ण मुद्धे इमेण रत्तन्ततिक्सविसमेण । भुलआचावविणिग्गअतिक्सअरद्धच्छिभल्लेण ॥ ४ ॥ [मारयसि कं न मुग्धे अनेन तान्ततीक्ष्णविपमेण । भूलताचापरिनिर्गततीक्ष्णतरार्धाक्षिमलेन ॥] भन्न. काण्डभेदः । रतन्ततिषस' इति स्थाने 'पेरन्तरत' इति चित्पाठः । तम. 'एन्तरक' इत्यर्थः । . नायिकाया अनुरागातिशय प्रकाशयन्ती दूती जारमाह- तुह दसणे समहा सदं सोऊण णिम्गदा जाई। तइ वोलीणे ताई पाइँ वोढविवआ जाआ ।। ५ ।। [तब दर्शने सतृष्णा शब्द श्रुत्वा निर्गता यानि । त्वयि व्यतिकान्ते तानि पदानि बोढव्या जाता ॥] शब्दं तव वचनम् । त्वदर्शनोसाइन गमनावसरेऽज्ञातलेशा स्वयि नेप्रपधातीते पुनर्ग. तजीवितेव परसंबाखर जावेत्यर्थः । रिमित्येव कृशासीति पृष्टा कापि मातुलानीमाह- ईसामच्छररहिएदि गिरि माहि मामि अच्छीहि । एहि जणो जणम्मिय णिरिच्छए कहूँ ण छिजामो ॥ ६॥ ईर्ष्यामत्सररहिताभ्या निर्विकाराभ्या भातुलान्यक्षिभ्याम् । इदानी जनो जनमिव निरीक्षते कथं न क्षीयामहे ।। जनः श्रियः । जननिय साधारणमिव । निरीक्षते अस्मानिति शेष. । ईमिरसरभ्रू भादिश्मनुरागज्ञापकमिति तदमावाक्षीणास्मीति भावः ॥ दुहितुः किंचिदपि सौभाग्यसूचक मातर तोषयतीति कापि कसविच्छिक्षार्थमाह- वाउद्धअसिचअविहाविओसदिगुण दन्तमग्गेण । 'वहुमाआ तोसिजई णिहाणकलसस्स व मुहेण ॥ ७ ॥ [वातोद्धतसिचयविभावितोरुदृष्टेन दन्तमार्गेण । वधूमाता तोध्यते निपानकलशसेव मुखेन ।] १. परन्तरत' स. २. पर्यन्तरक्त' घ. ३. 'सिनामो' फ. ४. 'मातुलि' घ. ५. 'तुष्यति' ग. .

१५४ काव्यमाला। दन्तमार्गेण दन्तक्षतेन । ऊरप्रदेशे दन्तनपघातादय सुरते क्तव्या इति व मनुसयेदमुक्तम् ॥ काप्यात्मन इादोप परिहर ती स्नेहानुवृत्त्यथै बलभमाह- हिअअम्मि यससि ण रेसि मण्णुअ तह विणेहभरिएहिं सट्विजसि जुअइसुहावगलिअधीरोहि अम्हेहिं ॥ ८ ॥ हृदये वससि न करोषि मन्यु तथापि स्नेहभृतामि । शक्ष्यसे युवतिखभावगलितधैयाभिरमामि ॥] यद्यपीदानी निसि तथाप्यो विरस्यस इति मनसि सशयो भवतीति भाव कापि कस्मिन्नपि यूनि जाताभिशापा तस्य भार्यापारत भ्य सूचय-ती सनिर्वेदमाह- अण्ण पि किं पि पाविहिसि मूढ मा तम्म दुक्समेत्तेण । हिअअ पराहीणजण मग्गॅन्त तुह केत्तिअ एअम् ॥ ९ ॥ अन्यदपि किमपि प्राप्ससि मूढ मा ताम्य दुखमात्रेण । हृदय पराधीननन मॅगयमाण तव क्यि मानमिदम् ॥] किमपीति । प्रियविप्रयोगवच्छरीरवियोगमपि प्राप्स्यसीत्यथ । मरणस्य पदा पादानममालदाग्यश्लीलाबहमिति किमपी युक्तम् ।। कान्तस्यान्यस्यामनुरागम्, तस्याश्च तस्मिद्वेषम्, आत्मनश्च तसिननुरागम चात्मनि द्वैए सूचय ती कापि नायकमा वेसोसि जीअ पमुल अहिअ., बझा तुज्झ । इस जाणिऊण वि मए ण ईसिभ दडपेम्मरस !! १० ॥ विष्योऽसि यसा पासुल अधिकतर सा खल्लु वल्लमा तव । इति ज्ञात्यापि मया न ईयित दुग्धमेण ॥] चतुयेथ पष्टी । प्रेम्णे इत्यथ । अयमाशय -अवगत मया यो यस्त्वा द्वेदि तब प्रिय । यथा मसपओ । मया तु त्वय्यनुरक्तया क्थ प्रियया भवितः प्रेम्णे क्थ नेा न तेति । यद्वा प्रम्ग इति पञ्चमी । ईपितामेति तु प्रमिति प्रेमवशादेषो न कृत इत्यर्थ । चिकीपतापीया प्रेम्णा प्रतिबधान निप्पनेति भा अपरां निपुणा प्रेयसी तुवत पात कापि सेय॑माह--- सा आम सुहझ गुणरूअसोहिरी आम गिरगुणा अ अहम् । भण तीअ जो ण सरिसो कि सो सयो जणो मरउ ॥ ११ १ नेहमृते'कख. २ 'ध'फख. ३ 'कामयमान तव दियदेता 'इच्छन् तब वियदेतत्' घ. ४. 'जीव'घ मावा १५५ ६ शतकम्] गाथासप्तशती। सा सत्यं सुभग गुणरूपशोभेनशीला सत्यं निर्गुणा चाहम् । भण तया यो न सदृशः किं स सर्वो जनो म्रियताम् ॥] आमेति सेानुमतौ । सत्यमित्यर्थः । अन विपरीतलक्षणया रागान्वस्व गुणरूपा- दिकं विवेक्तमेव न जानासि । यतोऽधमामपि तां बहु मन्यस इति व्यज्यते ॥ दुर्लभाभिलाषिणी स्वगृहबंधू प्रति वैराग्यजननार्थ कोऽपि पुत्रमाह- सन्तमसन्तं दुक्खं सुहं च जाओ घरस्स जाणन्ति । ता पुत्त महिलाओ सेसाओं जरा मनुस्साणम् ॥ १२ ॥ [सदसढुःखं सुखं च या गृहस्य जानन्ति । ता. पुनक महिलाः शेपा जरा मनुष्याणम् ॥] गृहस्य गृहपते । सद्विद्यमानम् । असदविद्यमानम् । यस्त्विति शेषः । यथा मुखं तुं स च या जानन्ति ता महिला गृहिणीपदाधिकारिण्यः । अन्यास्तु जरा. क्षयहेतु- सादित्यर्थः॥ कापि सम्याः शिक्षार्थ कुलवधूवृत्तमाह- हसिएहिँ उवालम्भा अवचारेहि सिजिअव्वाई। अंसूहि मण्डणाई एसो मग्गो मुमहिलाणम् ॥ १३ ॥ [हमितैरुपालम्भा अत्युपचारैः खेदितव्यानि । अश्रुभिः कलहा एप मार्ग. सुमहिलानाम् ॥] हसितैर्न तु रोदन, उपचारैर्न तु गृहकृत्यपरित्यागेन, अध्रुभिनं तु वनोभिरिति भावः।। जनापवादभयादकृतसभाषणे प्रेयस्यलमद्वेगेनेति वदन्तीं दूनी कापि राप्रणयरो- उल्लावो मा दिजउ लोअविरुद्ध त्ति णाम काऊण । समुहापडिए को उण वेसे वि दिढि ण पाडेइ ॥ १४ ॥ [उल्लापो मा दीयतां लोकविरुद्ध इति नाम कृत्वा । संमुखापतिते यः पुनःप्येऽपि दृष्टिं न पातयति ॥] लोर विरुद्ध इति कृत्वा उपो मा दीयता नामेसन्वयः । नाम का नामग्रहण- पूर्वमिति धार्थः । यदा परपुरुषसंभाषण लोकपिछमिति मा कियताम्, कथं पुनस्त- महाशीरपि नेति साध्वी प्रति कुन्या इयमुक्तिः॥ १. 'भाम' घ. २. 'शोगना' ग. ३. 'आम' घ. ४. 'करिऊण' ग. पमाह- काव्यमाला। म मतिकान्तसक्तसमया प्रिया प्रति कोऽपि सोद्वेगमाह- साहीणपिअअमो दुग्गओ वि मण्णइ कअस्थमप्पाणम् । पिअरहिओ उण पुहवि वि पाविउण दुग्गओ चेअ ॥ १५॥ [साधीनप्रियतमो दुर्गतोऽपि मन्यते कृतार्थमात्मानम् । पियरहित पुन पृथिवीमपि प्राप्य दुर्गत एव ।। खाधीना प्रियतमा यस्येति बहुमोहि । यद्वा किमेव कृशोऽसीति पृष्टस्यैच्छानुरूपा प्रियामलभमानस्य कस्यचिदियमुक्ति। कामप्यप्राप्तप्रियतमा लोभयावृदयस्थित स्नेह गोपायन्ती सख्याह- कि स्वसि कि अ सोअसि कि कुपसि सुअणु एकमेवरस । पेम्म विस व विसम साहसु को सन्धिर तरइ ।। १६ ।। कि रोदिपि किं च शोचसि कि कुप्यसि सुतनु एकैक्स्मै । प्रेम विषमिर विषम कथय को रोटु शक्नोति ॥] प्रेमवशाहुःखिता भवति, प्यास्मा प्रति कोप मा कृया इति भाव ॥ अनभ्युपगच्छ तीमभियोज्यामीकारयितु दूनी खानुभूतानामेवार्थानामनियता माह-- से अ जुआणा ता गामसपआ त च अम्ह वारुण्णम् । अक्साणअ व रोओ कहेहि अम्हे वि त सुणिमो ॥ १७ ॥ [ते च युवानस्ता ग्रामसपदस्वच्चारमाक तारुण्यम् । आख्यानकमिव रोक कथयति वयमपि ततृणुम ॥] तदेवमनिये ससारे तथाविधाविदग्धवालभसमागममुख विमिति परिहरसीति भाव ॥ कातेन सशपथमनुनीयमानाया कान्त प्रत्युद्वेगवाद ससी सखीमाह- वाहौभरिअगण्डाहराएँ भणि विलक्सहसिरीए । अज वि किं रूसिबइ सवहावस्थ गअ पेम्मम् ॥ १८॥ वाष्पौधभूतगण्डाधरया मणित विलक्षहसनशीलया । अधापि कि रुप्यते शपथावस्थां गतं प्रेम [i] "प्रियारहित 'ग. 'प्रासोच ३ कैसाति' ग ४. 'किं कृपासि' ग. कस्सय ६ 'पादोलफुरिग ५ 'वाभास्फुरित' म ८. 'मरित घ रक्ष हसम्याग.

६ शतकम्] गाथासप्तशती। 'याहोल्लफुरिअगण्डाहराए' इति पाठे 'बाप्पास्फुरितगण्डाधरया' इत्यर्थः । शपथेति । देवलं शपधेनैव प्रेम वर्तत इति ज्ञायते, न लनुभूयत इति भावः ॥ प्रियस्य मन्दनेहता सूचयन्ती सखी सनिर्वेदं सखीमाह- वण्णअघअलिप्पमुहिं जो मं अइआअरेण चुम्बन्तो। एहिं सो भूसणभूसि पि अलसाअइ छिचन्तो ॥ १९ ॥ वर्गकि घृतलिप्तमुखी यो मामत्यादरेण चुम्बन् । इदानी स भूपणभूपितामप्यलसायते स्पृशन् ॥] पूर्व पुष्पवतीमपि मामत्यादरेण योऽस्माक्षीत्स इदानीं शुद्धामपि मा स्पृशत्यपि नेत्यर्थ ॥ . कस्याधिन्मलिनवस्त्रतादो परिहरन्ती दूती वस्त्रस्य रतानुपयोगित्वमाह- पीलपडपाउअङ्गी ति मा हुणं परिहरिजासु । पहसु पिणद्धं रअम्मि अवणिजइथे ॥२०॥ नीलपटप्रावृताङ्गीति मा खल्वेना परिहर । पट्टांशुकमपि नद्धं रतेऽपनीयत एय॥] बद्ध परिहितम् । सहजो गुण ब्रीणामुपादेय , न त्वाहार्य इति भावः ।। अतिमाने दोषं प्रदर्शयन्ती दूती मानिनीमनुनेतुमाह- सचं फलहे फ्लहे सुरआरम्भा पुणो णवा होन्ति । • माणो उण माणसिणि गरमओ पेम्मं विणासेइ ॥२१॥ [सत्यं क्लहे क्लहे मुरतारम्भा, पुनर्नवा मवन्ति । मानः पुनर्भनखिनि गुरुक प्रेस विनाशयति । फलहानम्तरभाविनि गुरते यद्यपि रस विशेषो लभ्यते तथाप्यतिमानेन प्रेमिण गते के मुरतेनेति मुन्ध मानमिति भावः ॥ अगृहीतानुनयविलक्षेण प्रियेणावधीरिता पलहान्तारता सानुता इतीमाह-- माणुम्मत्ताइ मए अकारणं फारणं कुणन्तीए । आईसगेण पेम्मं विणासिभ पोढयाएण ॥ २२ ॥ मानोन्मतया मया अकारणं कारणं कुर्वत्या । अदर्शनेन प्रेम विनाशितं प्रौदवादेन ॥ १.भुम्बितवान' ग.

१५८ काव्यमाला। अकारणमिति । भदोपमेव दोपं कल्पयन्येस्सर्थ : माननिमित्त विनवामहेण निमित्त सपाय मानं विदधला मयानुनयमपि प्रियो नावलोक्ति सप्रलदरीनारस्नेह एवं गतः । क्थ तदर्शनं भवतीति भाव प्रौढवाद सम्पतिशमसात्यानम् ॥ कृतापराधमनुनयन्त कापि मचाटूपालम्भमाह- अणुऊलं विअ बोत्तु बहु बल्लह बहहे वि से वि। कुविरं अ पसाएर सिक्सह लोओ तुमाहित्तो ॥ २३ ॥ [अनुकूलमेर वक्तु बहुवल्लम यल्लभेऽपि द्वेष्येऽपि । कुपित च प्रसादयितुं शिक्षते लोकशे युष्मत्तः ॥] सर्वमिदं तब हृदययायमित्यर्थ । मन्दन्नेहस्य यान्तव्याकृतज्ञता सूचयन्ती कापि सखीमाह- लजा चत्ता सील अराण्डिअं अजसघोसणा दिण्णा । जस्स कए गं पिअसहि सो शेअ जणो जाओ ॥२४॥ लज्जा त्यक्ता शीत च सण्डितमयशोघोषणा दत्ता ) यस कृतेन (इते ननु) प्रियमखि म एव जनो जनी जान. 10] जनो दलभ । जन उदासीनो जात.॥ कापि सरयाः शिक्षार्थ पुरवधूरतमाह- इमिमं अद्विदन्तं भमिअमणियन्तदेहलीदेसम् । दिट्ठमणुक्सित्तमुई एसो मग्गो पुलबरणम् ॥ २५ ॥ हसितमदृष्टदन्त नमितमनितान्तदेहलोदेशम् । दृष्टमनुरिझसमुग्यमेप मार्ग फुलवधूनाम् ॥) निःपरिच्छदतया पेनापि निन्धमानस नायकम्यान्यापदेशेन गुणातिशय दुती ना. नियामनुकूरयितुमाह- धूलिगइलो नि पट्टिओ वि तणरइअदेहमरणो वि । तह वि गइन्दो गरुमत्तणेण टफ समुन्बाइ ॥ २६ ॥ [धूलि मरिनोऽनि पारितोषि तृपरचितदेहमरणोजवि । तथापि गनेन्द्रो गुरुकत्येन दहा समुद्हति ॥] तस्यैव परं यशोटिरियम इति माव । भरण पोषणम् । पुरश्य परिमाणविशेष इ. य॥ १. शिप्यते सोयरवत्त ए' ग. २ 'अयिभ' ग.. 'ग.

६ शतकम्] १. 'दरदिह' ग... 'वन्दिनि घ .. 'दार ग.४. 'निपीदगघ गाथासप्तशती। विपद्यपि महतामुन्नतचित्तत्वमेवेति सखी शिक्षयितुं कापि सुभटस्त्रियाचौरेण सहो. क्षिप्रत्युक्तिकौशलमाह- करमरि कीस ण गम्मइ को गयो जेण मसिणगमणासि । अहिवदन्तहसिरीअ जम्पिमं चोर जाणिहिसि ।। २७ ।। बिन्दि किमिति न गम्यते को गर्यो येन मसृणगमनासि । अदृष्टदन्तहसनशीलया जल्पितं चोर ज्ञात्यसि ॥] करमरी हठहृतमहिला । गमनासीत्यनन्तरमिति चौरेणोक्त सतीति शेषः । ज्ञास्य भौति । मम प्रिय आगच्छति क्षणादेयास्याविनयस्य फलमनुभविष्यसीति भावः । अ. हिंद' इति स्थाने 'दरदि' इति क्वचिरपाठ । तर 'ईपदृष्टान्तहसनशीलया' इत्यर्थः ।। कस्याप्चभियोगनिरासाथै दूती नायिकाया ऋतुकाठेऽप्यनवसरमाह- थोरेंसुएहि रुणं सवत्तिकग्गेण पुष्फवइआए । भुअसिहरं पइणो पेछिऊण सिरलग्गतुप्पलिअम् ॥ २८॥ स्थूलाभुमी रुदितं सपलीवर्गेण पुग्यवत्याः । भुजशिखर मत्यु प्रेक्ष्य शिरोलग्नवर्णनलिप्तम् ॥ रजस्वलामपि तामसी न सजतीति भाव । तुप्प वर्णवृत तेन लिहै तुम्पलिअम् ।। अनुरागातिशयाकोऽपि रजस्खलामाह- लोओ जूरइ जूरउ वणिज होइ होउ त णाम । एहि णिमजसु पासे पुष्फबइ ण पइ मे णिहा ।। २९ ।। लोक. खिद्यते खिद्यतु वचनीय भवति भवतु तमाम । एहि निर्मज पार्वे पुष्पवति नैति मे निद्रा । यवनीय परीवाद ॥ काप्यनुरागातिशयं व्यनयन्ती कमपि युवानमाह- जंज पुलएमि दिसं पुरओ लिहिम व्व दीससे दत्तो । तुह पडिमापहिवाडि बहइ व समलं दिसाञकम् ।। ३०॥ या यो प्रलोकयामि दिश पुरतो रिसित एव दृश्यसे तर । तव प्रतिमापरिपार्टी वहनीय सकल दिशाचरम् । प्रतिमा प्रतिबिम्बम् । परिपारी परम्परा १६० काव्यमाला। . एकनानुभूतव्यसनस्तरसदृशमन्यदभिलषितमप्युपादातुं विभेतीलन्यापदेशेन को. ऽप्याह- ओसरइ धुणइ साहं सोक्खामुहलो पुणो समुल्लिहइ । जम्बूफलं ण गेल्इ भमरो त्ति कई पढमडको ॥ ३१ ॥ [अपसरति धुनोति शाखा खोखामुखर. पुन, समुल्लिखति । जम्बूफल न गृह्णाति भ्रमर इति कपि. प्रथमदृष्टः ॥ खोखा ध्वनि विशेषः । डको दष्ट ॥ अभिमतमपि मूढः प्रतिकूलबुद्ध्या परिहरतीलन्यापदेशेन कोऽपि सहवरमाह--- ण छिवइ हत्थेण कई कैण्डूइभएण पत्तलणिउने । दरलॅम्बिअगोच्छकइच्छुसच्छई वाणरीहत्थम् ॥ ३२ ॥ [न स्पृशति हसेन कपि तिमयेन पत्रलनिकुन्छ । ईपल्लम्बितगुच्छकपिकच्छुर्सदृश यानरीहतम् ॥] पत्रल: पनबहुल । कपिकच्छ शूकशिम्निः । प्राकृते पूर्वनिपातानियमावपिक- छुगुच्छसदशामित्यर्थः ॥ नायिकाया विरहदु स सूषयन्ती दूती नायकमाह--- सरसा वि सूसइ शिअ जाणइ दुक्साइँ मुद्धहिअआ वि। रत्ता वि पण्डर चिअ जाआ वरई तुह विओए।॥ ३३ ॥ [सरसापि शुष्यत्येन जानाति दुःखानि मुग्धहृदयापि । रक्तापि पाण्डव जाता वराकी तब वियोगे 1] रस आर्द्रता इच्छा च । मुग्धत्वमचेतनत्यमितिकर्तव्यतानुद्धिराहिलं च ।रसर. वर्णता प्रीतिविशेषश्च । अब विरोधालकारेण त्वद्विरहे सर्वमेव मुखसाधनं दुःखमाधन जातं तस्या इति वस्तु व्यज्यते ।। कामपि गलितयोवना शीघुपानेन जातमन्मयविकारा शर्णनच्छटेनोपहसमाग. रिका सहचरमाह- आरुहइ जुण्ण खुज विजं उअह वहरी तउसो । णीलुप्पलपरिमलवासिअस्स सरअस्स सो दोसो ।। ३४ ॥ अण' खना. १. मुखरः समुल्लसति' घ, २. 'सोसा वानरशब्द.' इति कुर गालदेव . ३. 'कण्ड. ४. 'कण्डूयन' ग-घ. ५. 'दरलम्बित' ग घ. ६. 'सच्छवि' घ.

६ शतकम्। गाथासप्तशती। [आरोहति जीर्ण कुञ्जकमपि यत्पश्यत वेल्नशीला नपुसी । नीलोत्पल्परिमलयासिताया शरदः स दोष ॥] चोहनशीला चेटनशील । पक्ष वेथितारयालिगनशीला । पुसी कर्कटी विशेष । दोगे विकार । कर्वव्या पुनर्नवीकरण जालाच युवतीकरण विकार । शरत्काळे वंटोलता यदेव पुर स्थित गुष्कमाई सरल वक वा तदेवारोहति । तथा लतेव लता नायिका वृद्ध तरुण या यद्भत नायमस्या दोष । किंतु सरअस्स सरकस इथुम- यस्य । सरकोनी शोधुपाने शोधुपानेक्षुशीधुनो' इति मेदिनी । पुचमनुभूतमधू सवा कापि प्रियविरहिता पुन प्रवृत्ते मधूनसवे सखीमाह- उप्पहपहाविहजणो पविजिम्हिअकलअलो पहअतूरो। अव्यो सो शेअ छणो तेण विणा गामडाहो व्य ॥ ३५ ॥ [उत्पथप्रधावितजन प्रविजम्मितकलक्ल प्रहतार्य । हुँ ख स एव क्षणस्तेन विना ग्रामदाह इव ॥] रपयेति । उसषतरतया सभ्रमाचेति भाव । अब्बो इति दुसाभिनये आवर्य या ।क्षणो मधू सय ॥ पलसानिपधाय चापि ससीमाह- उल्हायन्तेण ण होइ कस्स पासहिएण ठड्डेण । सदा मसाणपाअवलम्यिअचोरेण व सलेण ॥ ३६॥ उहापयमानेन न भवति वस्य पार्थस्थितेन स्तब्धेन । राजा श्मशानपादपलम्बितचोरणेर खलेन ॥] दापयमानेन सभापमान पक्षेऽभिभवता । पाश्वस्थितेन सनिहिवेन, पजे पास हिए यास्थितेन । स्व धेन अहकारात, पक्षे प्राणवायुविहान् । शार वितर्क, पक्षे भयम् ॥ मोक्तिभतृका प्रियसखी समावासयितु सखी पितृभगिनीमाह--- असमत्तगुरअपले एहिं परिए घर णिअत्तन्ते । गयपाउसो पिउडा हसइ व मुडअहासेहि ॥ ३७॥ , 'कोणेसपि ग १ 'वेष्माना दुरि' ग, 'बाहरी पुसी घ. ३ 'वा तिस सररा ने दोष'घ ४ 'सूचित स एवं'घ जापान'घ ५ 'हाप्यमानन'ग, १६२ काव्यमाला। , [अममासगुरुककायें इदानी पथिक गृहं प्रतिनिवर्तमाने । नामाइट् पितृष्वसः हसतीन फुटाहासः ।।] मचिह्नदर्शनाद्रीत प्रियाविरह सोढुमशनुवनकृतवार्य एवाह गृह प्रति प्रस्थित इते हसतीवेत्यर्थ. । फुटजकुसुमान्यवाहासः ॥ कोऽपि वर्षोपक्रमे गृहगमनाय पधिक स्वरयितुमाह- दट्टण अण्णामन्ते मेहे आमुक्जीविआसाए । पहिअधरिणीम डिम्भो ओरण्णमुहीम सञ्चविओ ॥ ३८ ॥ [दृट्वा उन्नमतो मेघानामुक्तजीविताशया। पथिकगृहिण्या डिम्भोऽरुदितमुख्या दृष्ट..] अवरुदितेति । का गतिरस्य भवित्री केन पाय पालयितव्यइत्यादि चिन्तयेति भाव ॥ क्लहान्तरितया कोपोज्झितभूषणयापि न त्यतानि बलयानीति तस्याः मुशता वि रहकृशता च सूचयन्ती ससी तत्कान्तमाह-- अविहवलक्षणवलों ठाणं णेन्तो पुणो पुणो गलिअम् । सहिसत्यो चिअ माणसिणीअ वलआरओ जाओ ।। ३९ ॥ अविधवालक्षणरलयं स्थान नैयन्पुन पुनर्गलितम् । सखीसार्थ एर मनखिन्या वलयकारको जातः ।] वलयमारको वलयपरिधापकः॥ कोऽपि दुर्गतविरहिवध्वरस्थाप्रकटनेन प्रारपि पथिकं त्वरयितुमाह- पहिअवहू विवरन्तरगलिअजलोल्ले घरे अणोहं पि। उद्देसं अविरअवाहसलिलणिवहेण उल्लेइ ।। ४० ॥ [पथिक्वधूर्विवैरान्तरगलितजलार्दै गृहेऽनामपि । उद्देशमविरतबाप्पसटिलनिवहेनादयति ॥] उद्देश स्थानम् ॥ १. 'पीयूपा' घ, २. 'अवनतमुख्या' ग. ३. 'सत्यायित.' ग, 'सस्थापित.घ. ४. सत्यप्त्य्य अतिपय...'वीरपमत ...गावीहस्त' ग.घ...'धल्या- कारो' ग, 'वलवारजो घ... कान्तर' ख-ग. ९. 'कुञ्यान्तर' ग घ. १.. 'प्र.

. ६ शतकम्] गाथासप्तशती। अनुनेतुमागतं प्रिययादिनं कान्तं कलहान्तरिता सपरितोपमाह- जीहाइ फुणन्ति पिनं भवन्ति हिअअम्मि जिव्वुई काउम् । पीडिजन्ता वि रसं जणन्ति उच्छू कुलीणा अ॥ ११ ॥ [जिह्वायां (पक्षे-जिहया) कुर्वन्ति प्रियं भवन्ति हृदये निति कर्तुम् । पीध्यमाना अपि रमं जनयन्तीक्षयः फुलीनाश्च ।।] निहायामिति मधुरत्याप्रियंवदत्याच । भवन्ति प्रभवन्ति । निरति सतापस्यो - गस्य च प्रशमम् । पीयमाना दन्वेन निघुरवादेन च । रस द्रय प्रीति च ॥ वसन्तागर्म प्रति विप्रतिपयमाना श्वधू पधूराह- दीसइ ण चूअमउलं अत्ताण अ वाइ मलअगन्धवहो । पचं वसन्तमासं साहइ उक्कण्ठि धेभ ॥ ४२ ॥ दृश्यते न चूतमुकुलं श्वश्रु न च पाति मलयगन्धवहः । प्राप्त वसन्तमासं कथयत्युत्कण्ठितमे ॥ सष्टितमुत्कण्टा । 'उफण्टिा पे' इति पाठे "उत्कण्ठित चेत.' इत्यर्थः ।। आपतिहि प्रोषितपतिके न जातो पसन्तारम्भ इति यदन्ती सखी वसन्तागमसूचक सहकारारोद्गम प्रतिपादयन्ती नायिका माह-- अम्धवणे भमरउलं ण विणा कोण असुभं भमइ । कत्तो जलणेण विणा धूमस्स सिहाउ दीसन्ति ।। ४३ ।। आम्रवने अमरकुलं न विना कार्यगोत्सुक भ्रमति । कुतो घलनेन विना धूमस शिखा दृश्यन्ते ॥] कुसुमेन विना नालिनो श्रमन्ति । जाते चान सुमे प्रवृत एव वसन्त इति भावः। क्थमनलंकृतावना बहुमन्यस इति वदन्त सहचर विदग्धः कश्चिदाह- दइअकरगहललिओ धम्मिल्हो सीहुगन्धिों वअणम् । मअणम्मि एत्तिों चित्र पसाहणं हरइ तरुणीणम् ।। ४४ ।। दियितकरग्रहलुलितो धम्मिलः सीधुगन्धित वंदनम् । मैदने एतावदेव प्रसाधनं हरति तरुणीनाम् ॥] मदने वसन्तोत्सवे । मदन इति निमित्तसप्तमी था । मदननिमित्तमित्यर्थ.। एतावडे पति किमन्य. गुरतानुपयोगिभिर्भारभूतैरिति भावः । विमलंकारेण । शोनं वान्तमभिस- 'नि तीवचन मिति फक्षित् ॥ १. 'फरेन्ति' ख-ग. २. 'हरन्ति' प. ३. 'हरन्ति हृदय' घ, ४. '. 1. 'आगत 'ग. ६. 'चेत.' गय. ७. 'वचन' घ... - 'मदनोऽप्येतावदेव' ग.

काव्यमाला। प्राम्यत्रियोऽप्यत्र रमणीया भवन्तीति वसन्त स्तुपन्कोऽपि सहवरमाह- गामतरुणीऔं हिअ हरन्ति छेआण थणहरिलीओ। मअणे कुसुम्भरसिअकञ्च[]आहरणमेत्ताओ ॥ ४५ ॥ [ग्रामतरुण्यो हृदयं हरन्ति विदग्धानां तनभारवत्य । मैदने कुसुम्मरागयुक्तक कामरणमानाः ॥ प्राकृते पूर्वनिपातानियमात्कनुकमानाभरणा इत्यर्थ. एतादृश्यो प्रामतपण्योऽपिस्पृह- जीया भवन्ति किमुत परायभूषणभूपिता, प्रमदा इति भावः॥ कोऽप्यनभ्यस्तप्रवासस्याभिनवपधिकस्य विरवधुर्य कथयन्यवासनिषेधार्थ तमाह--- आलोअन्त दिसाओ ससन्त जम्मत गन्द रोअन्त । मुच्छन्त पडन्त खलन्त पहिअ किं ते परत्येण ॥ ४६ ।। {आलोक्यन्दिश. घसम्ममाण गायरुदन् । मूर्छन्पत-स्खलन्पथिक किं ते वसितेन [1] चमितत्वाहिशोऽवलरोस्यन् , प्रियामरणासन् , मदनायासेन जम्भमाण, दु.खवि. मोदाय गायन्, पुनश्च निदादन, तदेवासक्तचित्तवान्मूच्छांदिविकार प्राप्नुवन् है पथिक, ते प्रवतिवेन प्रवासेन किं परम् । गतोऽप्यकृतस एवागमिष्यसि । यतः संप्रत्येव तवैयमवस्था किंचिदूरगमने तु कीदृश्यवस्था भविष्यतीति न जाने । तस्मानिव- तखेति भावः। सख्या रहोत्तमनुसधातुं गता स्थमियधिरेणागतासीति सख्या पृष्टाससी तामाह- दट्टण तरणसुरसं विविहविलासेहि करणसोहिल्लम् । दीओ वि तग्गअमणो ग पि वेई ण लक्सेइ ॥ ४ ॥ [दृष्ट्वा तरुणसुरतं विविधविलासैः रणशेभितम् । दीपोऽपि तहतमना गतमपि तैल न लक्षयति ॥ विविधविलासैरालिझनचुम्वनादिभिरुपलक्षितम् । करणेानतिर्थविपरीतायास- नवन्धः कामशास्त्रोक्तः शोभितम् । तरगी व सरगश्च तरुणी । 'पुमान्सिया' इत्येक शेषः । तयो. सुरतम् । अचेतनो दीपोऽपि यत्र स्पृड्यालस्तन मद्विषो जनः कथ की. नुवाद्विरमतीति भावः। १. 'हरन्ति पीवरयणहरलीउ' ग. २. 'कुमुम्भराइस' ग. ३. 'काना घ. ४. 'प्रौढस्तनभारा.' ग. ५. 'मदयन्ति यमुम्भरपकरिमात्राभरमा.' ग, 'मन्ये मुम्भर पितरक्रियाहरणमामा' घ. ६. 'आलोक्यमान' ग. ७. 'गया'ग. ८. "पृच्छन्' घ... "किं त्वया' ग...'प्रोपिन' ग-घ. ११.'करणसोहिलम्' घ.

१ 'कर्षणशतानि' घ.२ 'हसते' घ ३ 'पइणवमुराए'स. ४. 'सरख. ६ शतकम् हेयमिति भाव ॥ रमाह- ६ 'पश्यत मानिनी सर. गाथासप्तशती। प्रौटकामिनीमुत्कण्ठायतु दूती सर्वदग्घ्य नायकस्य मुरतमात्वमन्यापदेशेनाह- पुणरत्तकरप्फालणउहअतडुलिणवडणसआइ । जूहाहिवस्स माए पुणो वि जइ णम्मा सहइ ॥४८॥ पुनरुतरास्फालनोभयतटोछिखनपीडनशतानि । यथाधिपस मात पुनरपि यदि नर्मदा सेहते ॥] पुनरुत्त पुन पुनर्यरकरेण गुण्डादण्डेन हस्तेन चास्फालन जलादी पृष्टादौ च । उम यतट कूलद्वय पार्थद्वय च यूथाधिपस्य गजमुत्यस्य गोष्टीनायक्स्स च । मानरित्या- अर्थप सोधनम् । नर्मदा नदी नर्म सुरा ददातीति व्युत्पत्त्या कीडानुकूला नायिका चे । यद्वा मुन्दरि, कान्तसमीप गच्छेति वदन्तीं सखी प्रति नायिकाया इयमुक्ति । यमह यदि तस्स मुरतदुर्विदग्धस्य सनतटनखक्षतोरस्ताडनमर्दनशतानि पुनरपि पूर्वसकेतितस्य कार्पासोक्षेनस्य सापायता स्वगृहस्यैव स्वच्छन्दप्रचारयोग्यता च गारं भावयन्ती कुल्टा सोद्वेगमाह- वोडसुणओ विअण्णो अत्ता मत्ता पई वि अण्णत्यो। फलिह व मोडिअ महिसएण को तस्स साहेउ ॥ ४९ ॥ [दुष्टगुनको विपन श्वश्रूर्मत्ता पतिरप्यन्यस्थ । कास्यपि ममा महिपकेण कस्तस्य क्थयतु ॥] वोडो दुष्टछिनकों वा । 'युट्टसुणओ' इति पाठे रद्धशुनक इत्यर्थ । अन्यस्थी देशा तरस्य । कापीसी पासवाटिश । तस्य निजपत्यु । 'भत्ता मत्ता पई वि अ- णत्यो इति स्थाने 'भत्ता मत्तो पद णवसुराए' इति क्वचित्पाठ । तर श्वश्रु इति सबोधनम् । पतिर्नवमुरया मत्त इत्यथ ॥ कान्तेन समुसेन दत्ता मदिरा मानिन्या मानमपनयतीति शिक्षयनागरिक सहच. सकअग्गहरहसुत्ताणिआणणा पिअइ पिअमुहविइण्णम् । थो थोअ रोसोसह व उअ मागिणी मइरम् ॥ ५० ।। सिंचनहरभसोत्तानितानना पिवति प्रिय मुखरितीर्णाम् । स्तोक लोक रोपापधमिव पैश्य मानिनी मदिराम् ॥] ५ सकचग्रहोनामितानना पिवत्याननविकीर्णम्' य. कम्घ.

काव्यमाला। सकचाहं रभसेनोत्तानितमाननं यस्याः सा । 'सर' इति पाठे सरकमिभुमय- मित्यर्थः॥ नास्वित्त्वविचारक्षमो भवतीति मध्याह्नवर्णनच्चलेन प्रदर्शयनागरिकः सहवरमाह- गिरसोत्तो ति भुअंग महिसो जीहइ लिहइ संतत्तो । महिसरस कहवत्यरझरो त्ति सप्पो पिइ लालम् ।। ५१ ।।. [गिरिस्रोत इति भुजगं महिषो जिहया लेडि सतप्तः । महिपस कृष्णप्रस्तरदार इति सर्पः पिबति लालाम् ॥] महिपस्य लालामिति संबन्धः ॥ शारिकाया रहस्याख्यानतः रालमा कुलवधूमौतुलानीमाइ~- पसरसारि अत्ता ण णेसि किं एत्थ रइहराहिन्तो। वीसम्भजम्पिआई एसा लोआण पअडेइ ॥ ५२ ॥ पिअरशारी मातुलानि न नयसि किमन रतिगृहात् । विसम्मजरिपतान्येषा लोकानां प्रकटयति ॥ पारशरी पारवा शारिकाम् । दिसम्भनल्पितानि गुरवगमयोदितवयनान । लोकाना लोकेभ्यः। प्रफटयति भावयति ।। दन्तधावनार्थे र निकुअपलवभ भिक्षाधमटन्तं धार्मिक भीपयन्ती फलदा तनिषेधार्धमाह- एहमेत्ते गामे ण पडइ भिक्स त्ति कौस मं भणसि । धम्मिम करनमाम संजीअसि तं पि दे बहुअम् ॥ ५३ ।। एतावन्माने ग्रामे न पतति भिक्षेति विमिति मा मणमि । धार्मिक करचमार यजीवसि तदपि ते बहुक्म् ॥] पर्यवचनपिन्यासेनानुरागं व्यजयन्ती कुलटा कृतगुडवेतननिपीडकमा-- जन्तिम गुलं विमग्गसि ण अ मे इच्दाइ पाहसे जन्वम् । अगरसि किण आणसि ण रसैण विणा गुलो होइ ।। ५४ ।। यान्त्रिक गुइं निमार्गयसे न प ममेच्छया याहयपि यत्रम् । आमिक किं न जानामि न रसन दिना गुडी भवति ॥ यान्तिको यन्त्रकर्मकारकः, यत्रं चंचपीडोरित मुरतोचित कारोवोऽनुग- १. 'गरे ति य-स. २. भू. घ. ३. Carrमाग्रेऽपिक... ' २. ५. 'गुलम्ह मम' क-श... 'अन्याशि'घ,५. 'गुको घ.

१६७ १. 'एसियातिप्पकरभोभो पि' स. २. 'गलित' ग, 'निपतित घ. ३. 'तरचना ६ शतकम्] गाथासप्तशती। गश्च । अरसिक पस्यानुरागस्य व निधानानभिज्ञ । रसेन द्रवेगानुरागेण च विना गुडो न भपति नोत्पद्यते न प्राप्यते चेयर्थः । अतो मय्यनुरज्यस्वेति भावः ॥ नानोत्तीणों श्यामानी सानुराग वर्ण यन्कश्चित्महवरमाह- पत्तणिअम्बफंसा हाणुत्तिण्णाएँ सामलङ्गीए । जलगिन्दुएहिँ चिहुरा अन्ति बन्धस्स व भएण ॥ ५५ ॥ प्रासनितम्बसीः नानोत्तीर्णाया श्यामलाया । जलबिन्दुकैश्चिकुरा रुदन्ति बन्धसेव भयेन II] मानावसरे लम्बमानाधिकुरा. प्राप्तसुन्दरीनितम्बस्पर्शसुसा. पुनर्वधनेन तस्पर्श- सुखविच्छेद शङ्कमाना गलजलविन्दुच्छलेन रुदन्तीवेति भाव ॥ निर्भयाभिसारयोग्यता जार प्रति सूचयन्ती कुलटा वटप्रशसामाह- गामङ्गणणिअडिअकड़वक्स वड तुज्झ दूरमणुलग्गो । 'तित्तिल्लपडिक्सकभोइओ वि गामो ग उम्विग्गो ॥५६॥ {सामाङ्गणनिगडितकृष्णपक्ष वट तब दूरमनुलाम । दो साधिकप्रतीक्षक मोगिकोऽपि ग्रामो नोद्विम ।। मामाङ्गणे निगडितो बद्ध । सर्वदा स्थापित इति यावत् । तत्कार्यकरवाकृष्णपक्षो पनेति वटविशेषणम् । निविडच्छायलेनाधिकारवाहुल्यात् । तव दूरमनुलम इति स्व- याच्छादितत्यादिति भाव । दो साधिक. प्रतीक्षको यस्य भोगिरस्य स दो साधिका- तीक्षक । तादृशो भोगिको भोगासक्त कामुकतनी यस्मिन् । एतादृशोऽपि प्रामी नोदिम । अनुपलक्षिताभिसारतया राजभयशून्यत्वात् । तितिगे दो साधिकः । 'त- नितलपडिखरभोइओ वि' इति पाटे तु चिन्तापरासहनभोकोऽपि । तन्तिचिन्ता तयुक्त प्रतिपरोऽमहनो भोका मामाधिकारी यत्रेत्यर्थ । तथा च ययप्येतस्स प्रा- मस्य प्रभुरतितीक्ष्णो म्यायान्वेषणतत्परच तथापि लत्प्रसादाममस्थ कुल्टाजनो नो- द्विवत इति भावः ॥ कापि पति धारयन्ती सपत्न्या सोपालम्भ दुचरितमाह- सुप्पं डई घणआ ण भनिआ सो जुआ अइयान्तो। अत्ता वि घरे पुविआ भूआण व वाइओ सो ॥ ५७ ॥ पि दग्ध चणका न भृष्टा स युगतिकान्त । श्वधरपि गृहे पुषिता भूतानामि यादितो वशः ॥] - प्रतिपदो गोरि गा 'उत्तीर्णदीमारी इतोऽ' घ. ४ 'दी सावित्रे द्वारपार विदिशाशशेष. ५. 'सूर्णे दरप' ग.

काव्यमाला। स इति । य द्रष्टुं निर्गता सोऽपीयर्थः । भूतानां ध्रुतिविश्लानाम् । तथा च यधिरा- णामधे वंशवादनवत्सर्वं तसाश्चेष्टितं व्यर्थमेव संवृत्तमिति भावः ।। निहतमप्यय विदग्या घुभ्यन्त इति योषयनागरिकः राहचरमाह- पिसुणेन्ति कामिणीणं जललुफपिआवऊहणसुहेल्लिम् । कण्डइअकवोलुप्फुल्लणिञ्चलच्छी वअणाई ॥ ५८ ॥ पिशुनयन्ति कामिनीनां अलनिलीनप्रियावगृहनसकेलिमें । देण्टस्तिकपोलोत्फुल्लनिश्चलाक्षीणि वदनानि 1] पिशुनयन्ति सूचयन्ति जलनिमानस प्रियस्य यदयगृहनमालिङ्गनं तेन यत्मुरां तो लिमिलर्धः । पटरिता संजातपुलकी कपोली येषा तानि । तथा हर्ष विशेषादुत्कुले स्तम्भायेन साविकभावेन निश्चले चाक्षिणी येपु तानि पदनानि ।। पनमयूरचित सवेतितलताहमह गता, व नु न गत इति जारं भावयन्दी पुलटा वाप्रशंसामाह- अहिणवपाउसरसिएमु साँहइ साआइएमु दिअहेसु । रहसपसारिअगीवाणं णधि मोरवुन्दाणम् ।। ५९ ॥ [अभिननप्राथमितेषु शोमते यामायितेषु दिवसेषु । रमसम्मारितमीवाणा मूलं मयूरन्दानाम् ॥] अभिनवानि प्रापो रसितानि मेघगजितानि येषु तेषु । मेघान्तरितभारत या श्यामायितेपु रात्रिसदृशेषु दिनपु नृसं शोभत इति संयन्धः । दिदैव संकेतस्थानस्याभि- सारयोग्यता प्रतिपादयन्ला दया इयमुक्तिरिति पश्चित् ।। महिपशारगयां रममाणा पापि जारोत्साहनाय दोपं गुणोकत्साह- महिसक्सन्धविलग्गं पोलर सिङ्गाहों सिमिसिमन्तम् । आइअवीणाहंशरसदमुलं मसावुन्दम् ।। ६० ।। [महिपस्कन्धपिलम पूर्णने रङ्गाहतं सिनेमिमायमानम् । आहतमीणाझंकारशम्दगुसरे मशकन्दम् ॥ घूर्णते भ्रमति न विमानमारमाननियनुकरणम् । सिमसिमसाद युक्लियः । आर. ताया वीणाया इस यो शंकारः सरदस्तेन मुरारम् ॥ 1. सूरयन्ति ग. २. 'जलस्रोमितावइगसकीयम्' प. ३. भीमग. ४. 'कन्दारितापोरोपनिरललनांगानि घ.. सामायमाने 'गा'सामाजिक घ...'ब' घ. .. "मितिमापतम्'ग; मिनिमन्तम् घ.

मुम'घ. २. 'निनाता'गः 'निहरा'घ.३ "प्रशमितस्य'ग. 'प्रन्यि रिव' घ. ५. 'निष्कामति मुकशताना ग.६.'प्रोकिएताना Rञ्ठोटिम् घ.७'घ- , . ६ शतकम्] गाथासप्तशती। कुमदसरस्वीरलतारहे चन्द्रोदयपर्यन्तमह स्थित , व तु न गतेति कुलटा धावयन्क- विदाह- रेहन्ति कुमुअदलणिञ्चलविआ मत्तमहुअरणिहाआ। ससिअरणी सेसपणासिअस्स गण्ठि व्य तिमिरस्स ॥ ६१॥ राजन्ते कुमुद निश्चलस्थिता मत्तमधुकरनिकोया । शशिकरनि शेषप्रणाशितस्य ग्रन्थय इव तिमिरस्य ॥] शाठिक्षेत्रे शुरुपताशङ्का सूचय ती शाठिगोपी सुरतसत्वरं जारमन्यमनस्क कर्तुमाह- उअह् तरुकोडराओ णिवन्त पुसुवाण रिन्छोलिम् । सरिए जरिओ व दुमो पित्त व्व सलोहिअ वमइ ॥ ६२॥ [पश्यत तरुकोटरानिष्का ता पुर्युकाना पशिम् । शरदि ज्वरित इव द्रुम पित्तमिव सरोहित वमति ॥] रममाणस्य जारस्य भयबरापनयनाथै दुर्दिनाभिसारिका दुर्दिनानुवन्धलिङ्गमाह- धाराधुव्वन्तमुहा लम्विअवक्सा णिउश्चिअग्गीवा । वइवेढनेसु काआ सूरगहिण्णा व्व दीसन्ति ॥ ६३ ॥ धाराधाव्यमानमुखा लम्बितपक्षा निकुश्चितग्रीना । तिवेष्टनेषु काका झूलाभिना इव दृश्यन्ते ॥] ऊर्यप्रसारितशूलाग्राकारचगुवाछूलेना समन्ताद्भिग्ना इत्यथ । एते च दुदि- नस्य चिरकालानुरत्तिसूचका इति भाव ॥ चभसंभाषणविमुखी कलहातरितां शिक्षय ती काचिदाह- ण वि तह अणालवन्ती हिअअ दूमेइ माणिणी अहिअम् । जह दूरविअम्भिअगरअरोसमझत्यमणिएहि ॥ ६४ ॥ नापि तथानालपन्ती हृदय दुनोति मानिन्यधिकम् । यथा दूरविजृम्भितगुरुकरोषमध्यस्वभागते ।] रोपपूर्वकापि यानि मध्यस्थभणितान्युदासीनवचनानि तरित्यर्थ । तदुक मातृगुप्ता चार्य -टुराणि न वक्तव्यो नातिकोध च दर्शयेत् । न मनोरम ॥ इति ॥ . वावयाच्चसमिधरुपालभ्यो राघरोन्मुस' घ .. 'न पितधमनालपन्ती' घ. ९ 'दुर्मनायते' काव्यमाला। वर्षामु प्रियतमाविनाशमाशमानं पथिक्मावासयंसत्सहचर वाह-- गन्धं अग्घामन्तअ पककलम्बाग वाहभरिअच्छ। आसमु पहिअजुआणअ परिणिमुहं मा ण पेच्छिहिसि ।। ६५ ॥ गिन्धमाजिघन्पककदम्बानां वाष्पभृताक्ष । आश्वासिहि पैथिकयुवन् गृहिणीमुखं मा न प्रेक्षिष्यसे ॥] न मेक्षिध्यम इति मा । किं तु प्रेक्षिष्यस एवेत्यर्थः ।। गर्जितप्रवणशक्तिप्रियतमाविनाशः पथिको जलधरमाह- गज महं चिअ उपरि सव्वत्यामेण लोहहिअअस्स । जलहर लम्मालइ मारे मारेहिसि बराइम् ॥ ६६ ॥ गिर्ज ममैवोपरि सर्वस्थाना लोहेहदयस । जलघर लम्बालविका मा रे भारयिष्यसि पराकीम् ॥] सर्वग्याना रायलेन । रे इति संबोधनम् । लोहपकोहदयस्वावर्जन सोह समर्थः । स पुनः शिरीपादपि मृदारी क्यं जीविष्यतीति भावः ।। हेमन्तोपक्रमवर्णनच्छलेन शालिक्षेत्रस्थाभिसारयोग्यता घावमन्ती बुलटा फा- चिदाह- पवमइलेण धीरेक गइणा दिण्णजाणुवडण । आनन्दिनइ हलिओ पुत्तेण य सालिछेत्रेण ॥ ६७ ॥ पिङ्कमलिनेन क्षीरकपायिना दत्तजानुपंतनेन । आनन्धते हालिकः पुत्रेणेव शालिक्षेण [I] और तण्डलारम्भई जलं दुग्ध च ! जानु का उपचारासाबनारपन्यिथ । प्रासरेपाहं सफेवस्थानं शाझिनं गता, स तु न गत इति जार भावयन्ती मीहारा- भिमारिका शालेरपि सलसंयोगादुगमाह- कह में परिणाझाले सलसङ्गो होहिद चि चिन्तन्तो। ओणमुद्दो ससूओ सह य माली सुमारेण ॥ ६८॥ [वयं में परिणतिशले उसको भविष्याति चिन्तयन् । अपनतमुसुः मशूको रोदिनीर शालिग्तुपारेग 1] १. 'मानापन्' घ. २. 'मरितास' य. ३. पधिरेशानी घ...'' माहिर ग... मारयति' घ... 'दलहस... पल्ला भानन्दयति' घ...'भरतीनि'घ.

१७१ मिष्यति'घ, ५. 'च'घ. ५. 'प्रहीतान'घ... 'रिहीस.८.'लोदृश्याःग-ध. ६ शतकम्] गाथासप्तशती। खलस्य धान्यमर्दनस्थानस्य दुर्जनस्य च सङ्गः । अवनतं मुखं शीर्षानं वदन च यम्य सः । शूकेन धान्यकण्टकेन सह वर्तत इति सशक्षः। अथ च ससूओ सशोकः ।। अभिसारस्थानगमनाय प्रदोशभिसारिका खरयन्ती दूती प्रदोषवर्णनयाह--- संझाराओत्थइओ दीसइ गअणम्मि पडिवआचन्दो । रत्तदुऊलन्तरिओ थणणहलेहो ब्व णवयहुए ॥ ६९ ॥ सिंध्यारोगावस्थगितो दृश्यते गगने प्रतिपच्चंन्द्रः। रक्तदुकूलान्तरितः स्तननखलेख इव नवचध्वाः] अर्धचन्दावलोकनौतुकादाकाशं पश्यन्त देवर कापि सपरिहासमाह- अइ दिअर किं ण पेच्छसि आआसं किं मुहा पलोएसि । जाआइ बाहुमूलम्मि अद्धअन्दाण परिवाडिम् ॥ ७० ॥ अयि देवर किं न प्रेक्षसे आकाश किं मुभा प्रलोकयसि । जायाया बाहुमूलेऽर्धचन्द्राणां परिपाटीम् ।।] जायाया बाहुमूलेऽर्धचन्द्राणां परिपाटी परम्परा किं न प्रेक्षसे इति योजना ॥ वक्ष्यसि मचनेन मत्प्रियमेवमिति प्रोपितभर्तृका प्रियममीपगामिनं पान्धमाह-- वाआइ कि भणिजउ केत्तिअमेत्तं व लिक्सए लेहे। तुह विरहे जं दुक्खं तस्स तुमं चेअ गहिअत्थो ।। ७१ ॥ वाचया किं मण्यतां कि यन्मानं या लिख्यते लेखे । तव विरहे यहुखं तस त्वमेव गृहीतार्थः ।] बहुत्वादु.खाना किं वक्तव्य किया लेग्यामित्यर्थः । गृहीतार्थों ज्ञासा । गृहीतो. ऽयों येनेति व्युत्पत्ते । मद्विरहेण त्वया यावर खमनुभूतमस्ति देनैवानुमीयता मदुःख- मिति भावः। कोऽपि कस्याश्चि केशपाशप्रशंसां सामिलापमाह- मअणग्गिणो व्य धूमं मोहपपिच्छि व लोअदिवीए । जोधणधव मुद्धा वहइ सुअन्धं चिउरभारम् ॥ ७२ ॥ मिदनामेरिव धर्म मोहनविच्छिकामिव लोकदृष्टे.। यौवनध्य जमिन मुग्धा वदति सुगन्धं चिकुरभारम् ॥]. मोहनेति । अन्योऽप्येन्द्रजालिका विच्छिक्या मोह करोतीति भावः। १, 'रागस्थगितो' य. २. प्रतिपदाच यः ३. 'आयास' घ. ४, वाचा किम- १७२ काव्यमाला। ससि, कथय तस्य रूपमिति पृच्छन्ती सखीमन्या काचिदाह- रूअं सिढे चिअ से असेसपुरिसे णित्तिअच्छेण वाहोल्लेग इमीए अजम्पमाणेण वि मुहेण ।। ७३ ॥ रूपं शिष्टमेव तस्याशेपपुरुपे निवतिताक्षण। बाप्पाणासा अजल्पतापि मुरोन ॥] शिष्टमेव कथितमेव ॥ प्रियेण मह कीडारसादविदितनिशावसानो ससी प्रबोधयन्ती ससो प्रभात- वर्णनमाह- रुन्दारविन्दमन्दिरमअरन्दाणन्दिआलिरिन्छोली । झणझणइ कसणमणिमेहल व्व महुमासलच्छीए ॥ ७४।। [हदरविन्दमन्दिरमकरन्दानन्दितालिपतिः । झणझणायते कृष्णमणिमेसले मधुमासलक्ष्म्या..] छन्द यहयदरविन्दं तदेव मन्दिर तथ मकरन्देन पुपरसेनादितसर्यः । उदीपन- विभायप्रविपादनेन संकेतस्थानस्तुतिपर दूल्या इदं वचनानिति केचित् ॥ जाताभिलापः कचिद्विलासी कामपि कामिनीमाह-- फस्स करो यहुपुण्णप्फलेकतरुणो तुई विसम्मिहह । थणपरिणाहे मम्महणिहाणकलसे आ पारोहो ।। ७५ ॥ किस करो बहुपुण्यफलकतरोलर विश्रमिप्यति । सनपरिणाह मन्मथनिधानकलश इस प्ररोहः ॥] परिणाहो विशालता। विशाल स्तन इत्यर्थः । पूर्वनिपातानियमा प्ररोहः पाल्य । मन्मथनिधानकलशे सब समपरिणाहे बहुपुष्पपरकन: कम्प र मोह इव विध. मिप्यतीत्यन्वयः॥ यो यच्छील. स तापायादपि तम्मान्मनो नियतीतुं न शनशति नियमाम रिकः सहवरमाह- घोरा सभअमतई पुणो पुणो पेसमन्ति दिट्टीओ। अहिरक्सिभणिहिकलसे व्य पोढवायगुडे ॥ ७६ ॥ चिोराः समयसतृष्णं पुनः पुनः पयन्ति दृष्टी । अहिरक्षितनिधिकलश इस प्रतिकाम्ननोग ..कथितमेव' घ, २. मादिरिन्छोठी घ.३. ' सक... कनिटा' ग. - ६ शतकम् गाथासप्तशती। १७३ प्रौट. पतिर्यस्या. सा ग्रीडातिका । चोराः परवीहारकाः परतापहारकाश्च । तथा च सर्पप्रायोऽस्या पनिरम्मान्धातयिष्यतीति भयास्पष्टुमसमा अपि सामिलाप पत्सन्तीसर्य.॥ प्रवासोन्मुखस्य कान्तस्य गमनप्रतिपेधाय कापि वर्षावर्णनच्छलेनाह- उध्वहइ णवतणडररोमञ्चपसाहिआई अगाई। पाउसलच्छीम पोहरेहि परिपेल्लिओ पिझो ।। ७७ ।। [उद्वहति नपतृणाकुररोमाञ्चप्रसाधितान्यङ्गानि । मालक्ष्म्या पयोधरै. परिप्रेरितो विन्ध्य ॥] पयोधरमेधे । अन्योऽपि कामुक कान्तया पयोधराभ्या स्तनाभ्या परिप्रेरित- स- रोमाचमुबहतीति पनि ॥ कोऽपि प्रियाया साभिरापमन्यापदेशेन प्रशंसामाह- आम बहला वणाली मुहला जररगुणो जल सिसिरम् । अण्णणईण वि ग्वाइ तह वि अण्णे गुणा के वि ॥ ७८ ॥ सत्य बहला बनाली मुखरा जलरङ्गयो जल शिशिरम् । अन्यनदीनामपि रेयायास्तथाप्यन्ये गुणा केऽपि ॥] आमेति स्वीकारे । वहला विस्तृता पनपक्तियनादिस्थानीया । मुखरा सशब्दा ज- लरव पक्षिविशेषा नूपुरादिस्थानीया । शिशिर अलममुखस्पर्शस्थानीयम् । गुणा गाम्भीर्यादय सौभाग्यादयश्च । अन्ये इतरविलक्षणा । नायकप्ररोचनाय दूल्ला इयमु- किरिति कधित् ॥ कोऽपि स्याश्चिरसामिलाप स्तनी वर्णयन्सहचरमाह- एह इमीअ णिअन्छह परिणअमालूरसच्छहे थणए । तुङ्गे सप्पुरिसमणोरहे व्व हिअए अमाअन्ते ।। ७९ ॥ [आगच्छतासा निरीक्षध्य परिणतमालूरसदृशौ स्तनौ । तुह्नौ सत्पुरुषमनोरथाविव हृदये अमान्ती ॥] मालरी विल्व । प्राकृते द्विवचनबहुवचनयोरक्यान्मनोरथानिवेत्यर्थ 1 अतएव प. चनभेदनिवन्धन उपमादोपोऽन्यत्र नेति ध्येयम् । पूर्ववल्या रतिर्वा ॥ भेषागमस्य कामोद्दीपक्ता सूचयन्ती कापि कान्तानयनाय सखी त्वरयितुमाह- हत्याहत्थि अहमहमिआइ वासागमम्मि मेहेहिम् । अव्यो फि पि रहस्स छणं पिणहङ्गण गलइ ॥ ८॥ १. 'भाप्रबहुला' य. २. 'एहि' क. ३. 'एतस्या' ग. ४. 'रथा इव' य. .

१७ काव्यमाला। . . हिसाहमि अहमहमिकया वर्षागमे मे । आश्चर्य रिमरि रहम उसमपि नमोगग गरति 1] मेघदछन्नमपीति योना गी, रिमेवमाशीचागलं नियमानुनयसौति यदन्ती रासी काचिदाह- फेत्तिसमेत्तं होहि सोदग्गं पिअअमरस भमिररस । महिलामअणदाउलझटक्सविस्येवप्पन्तम् ।। ८१ ॥ रियन्मान भविष्यात सामान्य प्रियतमाय भ्रमणशीलस । महिलामदनक्षुधाकुर पटाक्षाविद्यगृपमाणम् ॥ मदनरक्षणाधयायुरेन मदिरानो फटाक्षविशेषण गृशमाणमि यर्थ । कगायत. धैर्यस्य स्वत एवास्स चायस्प यासति । रिमस्य प्रियापरणेनेति भाव ॥ कापि पर गा सर्वदापरटहपरवीसभोगलम्पट वात राग्रिशेपे अटशन्देन पावरातिश्या पलायनेरामाह- লিঙ্গখণিজ ও ওভেন ক্লাব ভিন্ন। पग्यसहिवाससकिर गिभए वि परम्मि मा भासु ।। ८२ ॥ निरहिणीपगृहम्म पुष्टशन्देन झटिति प्रतिबुद्ध । परवसतियासशक्षिनिजकेभी गृहे मा भैपी ॥] धणिआशब्द समायावचनो देशी । परवसठि परराहम् । पासोऽवस्थानम् ॥ दुदिनाभिरारिका कान्तमन्यमनस्क पर्नुमाह- सरपवणरअगलथिअगिरिऊडावरणभिण्णदेहस्स । धुषाधुप इ जीभ व विजुआ कालमेहस्स ॥ ८३ (सरपचनस्यगम्हसिनागिरिकूटाएतनभिन्नदेहस ! धुकधुवायते जीरें इव विद्युत्वालमेघस ॥] सरपवनेन रयेण वेगेन गलहस्तित प्रेरित अत एव गिरे यूटाचशायदापतन सेन भिनदेहो विशीर्णदेवो य कारमेषस्तस्य जीव इव विशुदुक्धुकायते । कम्पत इत्यर्थ । लोकेऽपि पळवता केनापिगरहखितस्योचस्थानापतितस्य विशीर्णदेहस्य हृदये कम्पो भवतीति भाव ॥ २. 'इस्साहतिकाभि' ग. २. 'मात 'ग, 'अहो' घ. ३. 'भ्रमत 'ग. ४ 'विक्षे पान्गृहत 'ग, विक्षेपवेपमानम् घ. ५, 'धन्या ग. ६. उपाहख रे' ग घ.. 'गि, रिचूडा' ग. 'जीवमिद' कख.

१७६ काव्यमाला ! विनाशहेतुमपि मुग्धाः सुखहेतुं वलयन्तीत्यन्यापदेशेन कोऽपि सहचरमाह--- तैम्मिरपसरिअहुअवहजालालिपलीविए वणाहोए । किंसुअवणन्ति कलिऊण मुद्धहरिणो ण णिक्कमइ ॥ ८८ ॥ तिम्रवर्णप्रसृतहुतवहज्वालावलिप्रदीपित बनाभोगे । विमुकवनमिति कलयित्वा मुग्धहरिणो न निष्कामति ॥ अन खतःसंभावना भ्रान्तिमदलंकारेण परस्त्रीलम्पटः पश्चिद्विनाशहेनुमपि परस्त्री- ससगै सुधाग्रायं मन्यमानतद्रहाम नि.सरतीति वस्तु व्यज्यते ॥ कापि जार प्रत्यात्मनो वैदग्भ्य स्यापयन्ती सखीमाह-- णिहुअणसिप्पं तेह सारिआइ उल्लाविलं म्ह गुरुपुरओ । जह तं वेलं माए ण आणिमो कत्थ बच्चामो ।। ८९ ।। निधुवनशिल्पं तथा शारिकयोलपितमस्माकं गुरुपुरतः । यथा तो वेला मातन जानीमः कुरा बजाम. ॥] निधुवनशिप सुरतचिश्यम् । ता वेला तस्यो वेलायाभू । 'कालकाधनोरखन्तसं. योगे' इति रामभ्यर्थे द्वितीया । न जानीम इति नीडावशादिति भावः। कारि नवयुवत्खनुरक्तवित्तं कान्तमन्यापदेशेनाह--- पञ्चग्गाफुलदलुल्लसन्तमअरन्दपाणलेहलओ। तं त्थि फुन्दफलिआइ ज ण भमरो महइ काउम् ।। ९० ।। प्रत्यग्रोफुटदलोलसन्मकरन्दपानन्धः । तन्नास्ति कुन्दकलिकाया यन्न अमरो थान्छति कर्तुम् ॥] चुम्बनादिक सर्वे कर्तुमिच्छतीत्यर्थ.॥ कापि कस्याधिमक्युवल्याः सौभाग्यातिशयमन्यापदेशेनाह- सो को वि गुणाइसओ ण आणिमो मामि कुन्दलइआए। अच्छीहि चित्र पाउँ अहिलसइ जेण भमरेहिम् ॥ ९१ ॥ [स कोऽपि गुणातिशयो न जानीमो भौतुलानि बुन्दलतिकायाः । अक्षिम्यामेव पातुमभिलभ्यते येन भ्रमरः ॥] अन्यास लताना पुर्ण मुख: पीयवे, इयं तु स्तवाक्षिभिवेत्युत्कर्षः ।। १. 'अविरम' ग. २ 'अविरत' ग; 'तपनशील हुतवह' घ. ३. 'वह' ग.४, 'तर' गय. ५. 'असत्' ग. ६. 'पाउम्' का. ७. शैलुप:'ग'सम्परः' घ...'महति' ग; 'इच्छा' घ. १, 'पातुम्' घ, १०. 'वहिणि दुन्दनिभाए ग. " 'महिल. भा' क-ग. ११, "जानामि भगिदि कुन्दालिशया' ग. ११.. मानुनि' घ.' ..

६ शतकम् गाथासप्तशती। १७७ नायस्पलोमनाय दूसी कम्याचि सौन्दयातिशयमाह-- एक चिम रूअगुणं गामणिधूमा समुन्यहइ । अणिमिसणअणो सलो जीए देवीको गामो ॥ १२ ॥ एकैय गुग मामणीदुहिता समुदहति । अनिमिषनयन संस्लो यया देवीकृतो ग्राम ॥] न निमिपतीत्यनिमिपम् । अनिमिष नयन यस्य स । प्रामस्थो जनोऽवलोकातु कादेवा पश्यन्कोऽपि निमेष न करोतीति भाव. ॥ अधरपानामिलाप सूचयकोऽपि वेदाध्यमभियोज्यामाह-- मण्णे आसाओ घिण पाविमो पिअअमाहररसस्स । तिअसेहि जेण रअणाराहि अम समुदरिअम् ।। ९३ ॥ [मन्ये आखाद एव न प्राप्त प्रियतमाधररमस। निदर्शयन रखाकरादमृत समुद्धृतम् ॥ प्राणालयहेतुरपि न तथा व्यथयति यथा मियविरह इत्सन्यापदेशेन बेहशिक्षार्थ को ऽपि प्रियामाह- आअण्णाअअिणिसिअर्भेल्लमम्माहआइ हरिणीए । अद्दसणी पिओ होहिइ ति वलिउ चिर दिट्ठो॥ ९४ ॥ [आवर्णाकृष्टनिशित समर्माहतया हरिण्या । अदर्शन प्रियो भविष्यतीति वैलित्वा चिरं दृष्ट ॥] न विद्यते दर्शन यस्ये यदर्शन । दर्शनागोचरं इति यावत् । 'दुइसण' इति कवि. स्पाट । तत्र दुर्दर्शनो दुर्लभदर्शन इत्यथ ।। कस्यविदास शौर्य स्यापयन्ती सेवाकुशला श्री राजानमुद्दिश्याह- विसमट्ठिअपिकेधम्पदसणे तुझ सत्तुपरिणोए । को को ण पस्थिओ पहिआण डिम्भे रुअन्तम्मि ॥ १५ ॥ वियमस्थितपक्वैकाप्रदर्शन तब शशुगृहिण्या | 4 को न प्रार्थित पाथिकाना डिम् रुदति ]] डिम्भे बालके रुदति सति तव शत्रुगृहिण्या पथिराना मध्ये क को न प्रार्थित । १ 'सूभागहवइणो हिलत्तण ग ३ 'मुतागृहपतेर्महिलात्व' ग, 'रूपगुणी' घ. ३. 'सा' ग. ४. 'मलसमहाहवाईग 'दुइसयो ग. ६. 'भलसमुसाहतया' ग. ७ 'वलित'घ.८ 'बालके'ग काव्यमाला। . अपि तुसर्थ एवेत्यर्थं । अयमाशय - वदागमनशवासपातवेपथुस्सरितचरणसचारम शपपरिवार विहाय बालकमादाय तव शविलासिनी महारण्य प्राविशत् । तत्र च धन पनायमानयनच्छदच्छायतसनिकरनिराकृतदिनकरोवरस्यामायिते वर्मनि गच्छ ती भुपीडितस्य वालकस्यादितमाकर म निपुणतरं निरीक्षमाणा विषमशापा तगतम कमात्रफलमदाक्षीत् । तत्पातनाय च पा धानयाचवेति ॥ कोऽपि सौन्दर्यादिगुणयुक्ता मालाकारस्त्रिय साभिलाप पश्य सहवरमाह- मालारी ललिउल्लुलिअवाहुमूलेहि तरुणहिअआइ । उहरइ सजुलूरिआइ कुसुमाइँ दावेन्ती ।। ९६ ।। [मालाकारी ललितोचलितबाहुमूलाम्या तरुणहृदयानि । उल्लुनाति सद्योऽवलूनानि कुसुमानि देशयन्ती ॥] मालयकारी मालकारस्त्री । ललिताभ्या मुदराभ्यामुहरिताभ्या चच अभ्यां बाहुमू राम्यामुपलक्षिता। उल्लुनाति व्याकुलीक्रोति ॥ वोऽपि व्याधस्त्रिया वनोद्गम साभिलाष वणय सहचरमाह-- मझो पिओ मुअण्डो पहिनुभाणा सरत्तीओ। जह जह वडन्ति थणा तह तह झिजन्ति पञ्च वाहीए ॥ ९७ ॥ [मध्य प्रिय कुटुम्ब पलीयुवान सपन्य । यथा यथा वर्धते सनी तथा तथा क्षीयन्ते पञ्च व्याप्या ॥] व्याध्या व्यावस्त्रिया ॥ यो यदभिलाषुक स छलैनापि स(तत्)कार्य साधयतीति निदशयन्योऽपि सह चरमाह- मालारीए वेहलवाहुमूलावलोअणसअहो । अलिअ पि भमइ कुसुमग्धपुच्छिरो पसुरजुआणो ॥ ९८ ।। [माललकार्या सुन्दरयाहुमूलावलोकनसतृष्ण । अलीकमपि भ्रमति कुसुमाघप्रश्नशील पासुलयुगरा ।] पामुल परस्त्रीगम्पट । अर्को मूल्यम् । वेहल इति मुदायें देशी॥ वस्मृतपूववृत्तमुरतसंकेतस्थानादिक तवाह न कोऽपीति वदत नायक कापि सोपा लम्भमाह- अकअण्णुअ घणवण्ण वणवण्णन्तरिअतरणिभरणिअरम् । जइ रे रे वाणीर रेवाणीर पिणो भरसि ।। ९९ ॥ १ मालाकारस्त्री ग २ 'व्याधु यति ग ३ मध्यस्थितानि घ. ४ 'ददर्दी ग ५ कुमममूल्यप्रनीलगा मुमाघच्छाशील य.

७ शतकम्] गाथासप्तशती। [मतज्ञ धनपण धनपर्णान्तरिततरणिकरनिकरम् । यदिरे रे पानर रेवानीरमपि न मरसि । धनवणे मेघश्यामम् । घननिविटः परन्तरित आच्छादिततरणिनिरः सूर्यर. दिमसमूहो येनेति वानीरविशेषणम् । रेरे इति साक्षेपसबोधनम् । वानौर चैतसकुञ्ज यदि नम्मरणि तहि मा मर । रेवाया नर्मदाया नीर जलमपि कथन स्परसीत्यर्थ. ॥ कापि गृहपतिमुना इलिश् मुक्तानुराग रिरहवैधुर्य व प्रतिपादयन्ती हलिरमुतोपार- म्मपुर सरमाह-- । मन्दं पिण आणइ हलिअणन्दणो इह हि उड्डगामम्मि । गहवइगुआ विवाइ अजए कस्म साहामो ॥ १०॥ [मन्दमपि न जानाति हलिकनन्दन इह हि दग्घनामे ! . गृहपतिसुता विपद्यते वैद्यके वस्स कथयाम..] मन्दमप्यल्पमपि । अवैद्य के वैद्यरहिते। हलिकपुत्रनिमित्तममन्दपञ्चायणप्रहारज- रेरितहृदया प्रामणासुता विपद्यते । हलि पुनश्च शुक्लप: । अत क्सै कथयामी- रसिअजणहिअअदइए. कइवच्छलपमुहसुकइणिम्मइए । सत्तसअम्मि समत्तं सट्ट गाहासहं एअम् ॥ [रसिरजनहृदयदयिते करिवत्सलप्रमुखसुविनिर्मिते । ससशतवे समाप्त पठ, गाथाशतकमेतत् ॥ सप्तम शतकम्। पशुन्द्रस्याप्येवमन्योन्यानुरागो न पुनस्त वेति दूती मन्दह नायकमुपालधुमन्या- पदेयोनाह- एछमपरिरक्षणपहारसमुहे कुरङ्गमिहुणम्मि । वाहेण मण्णुविअलन्तवाइयोअंधणु मुकम् ॥ १॥ [अन्योन्यपरिरक्षणप्रहारसमुखे कुरङ्गमिथुने । व्याधेन मन्युनिर्गलद्वाप्पधीत धनुर्मुक्तम् ॥] प्रहारसमयेऽन्योन्यस्य परिरक्षणार्थ करणमिथुने समुखे स्थिते सति मन्युना न्येन विगलन्यो बापस्तेन धीत प्रक्षालित धनुधेिन मुक्तम् । त्यक्तमित्यर्थ । 'मन्युदैन्य तो अषि' इति हेमचन्द्र.. १ मुत' ग. २. भवेद्य ग. ३. 'एक्कम' ग घ ४. 'असरदाप्प' ग.

काव्यमाला। मन्दनेह नायकमनुकूलयितु इती नायिकाया विरहवैधुर्यमाह- वा सुहा विलम्ब खण भणामि की विकएण अलमह वा । अविआरिअफजारम्भआरिणी मरण भणिस्सम् ।। २ ।। तित्सुभग विलम्बस क्षण भणामि कस्सा अपि कृतेनालमध वा । अनिचारितकार्यारम्भकारिणी नियता न भैशिष्यामि ॥] सेा काचिद्भनुप्रामव्यापारिक्मदिलानुराग सूधयन्ती सखीमाह- भोइणिदिण्णपहेणअचक्सिअदुस्सिक्सिो हलिअउत्तो। एत्ताहे अण्णपहेणाण छीयोहा देई ॥३॥ [भोगिनीदत्तप्रेहेणकाखादनदु शिक्षितो हलिक्युन । इदानीमन्यप्रहेणकाना छी इति वचन ददाति ॥] भोगिनी मामव्यापारिकली। तया दत्तानि यानि प्रहेणकानि मोदकादिवायनकानि तेषां वासणमाखादन तेन दु शिक्षित । 'ग्रहणर वायनकम्' इति हारावली। छो इति निन्दानुकरण लोके प्रसिद्धम् ॥ अज्ञातर पनि विरामा कीडाप्रसता सखी प्रयोधयितु कापि प्रमात वर्णयति- पशूसमऊहाबलिपरिमलणसमूससन्तवत्ताणम् । कमलाण रअणिविरमे निमोअसिरी महम्महइ ॥४॥ प्रत्यूषमयूखावलिपरिमलनसमुसत्पत्राणाम् । कमलाना रसनिधिसमे जिते लोकश्रीमहमहायते ॥] मयूषे या मयूसावलिरादादित्यस्य । पचूहशब्द आदित्यवचनो देशीति कश्चित् । जिता लोका यया सा तथा जीवलोरीरिति वाथ महमहायतेऽतिसुरभिर्भवती त्यथ ।। वापि कस्याश्चि परिक्षासव्याजेन सौभाग्यस्तुतिमाह- वाउन्येहिअसाउलि थएम फुडदन्तमण्डल जहणम् । चडुआरअ पइ मा हु पुत्ति जणहासिभ युणसु ॥ ५ ॥ घातोद्वेलितबसे स्थगय सुटदन्तमण्डल जघनम् । चटुकारक पतिं मा सलु पुनि जनहास कुरु ॥] जनैई स्वत पति जनहास्य । जनहासासादमिलथ । साउलीति वन्नवाचको देश॥ १ 'भगिध्ये गय. २ 'मोदकरक्षण'घ ३ "एतावताशेषप्रहेणकानां मुख विधूनन ददानि ग, "इदानीमन्यमोदाशनामक्षि वकारं ददाति' घ. ४ "बोपोषण मुख विकार' इति कुलवाल्देव ५. 'जीवरोकश्रीग, 'आमोदनी' घ.६ "प्रिय ग ५ 'जनहासित ग.

मिति भाव ॥ धति विद्यतु नाम भगिनि' ग, कुष्यति कुध्यतु नाम मातुनि घ. ३ 'सलिल'न्यो- ७ शतकम् गाथासप्तशती। कामुक्जनाकाश निरासाय दूती क्या पूर्वत्तान्यथाभावमाह-- वीसत्यसिअपरिसकिआण पढम जलसली दिण्णो । पच्छा पहूअ गहिओ पुडम्वभारो णिमनन्तो ॥ ६ ॥ [विसधहसितपरिक्रमाणा प्रथम जलाञ्जलिर्दत्त । पश्चाप्या गृहीत फुटुम्बभारो निमन्जन् ।।] परिमक्ति परिक्रमशम् । कुटुम्बभारानुरोधाद्विसभ्यहसितादिरूप चायव सक- कापि सख्या अपरिहास सौन्दर्यप्रासामाह- गम्मिहिसि तस्स पास सुन्दरि मा तुरअ वडउ मिअको । दुद्धे दुद्ध मिअ चन्दिआइ को पेच्छइ मुह दे ॥ ७॥ गिमिष्यसि तस पार्थ सुन्दरि मा त्यरस वर्धतो मृगाङ्क । दुग्धे दुग्धमिव चन्द्रिकाया क प्रेक्षते मुख ते ॥] कापि मामणीपुत्र प्रत्यनुरागातिशय सूचयन्ती समानशीला मातुलानीमाह-- जइ जूरइ जूरउ णाम मामि परलोअवसणिओ लोओ। तह वि धला गामणिणन्दणस्स वअणे वलइ दिट्ठी ।। ८ ।। यदि खिंद्यते खिद्यता नाम मातुला परलोकव्यसनिको लोका। तथापि बलाद्रामणीन दनस्य वदने वलते दृष्टि ॥] नायिकाया अनुरागातिशय प्रतिपादयन्ती दूती मायकमाह- गेह व वित्तरहिअ णिज्झरकुहर व सलिल्सुण्णपिअम् । गोहणरहिअ गोट्ट व ती वअण तुह् विओए ॥ ९॥ गृहमिव वित्तरहित निर्झरफुहरमिय सैलिर शून्यम् । गोधनरहित गोउमिव तस्सा बदन तर वियोगे ॥] नशोभत इति शेष ॥ क्साश्चिलनापारतन्भ्यमनुरागातिशय च प्रतिपादय ती दूती मायकमाह- तुह दसणेण जणिओ इमीभ लज्जाउलाइ अणुराओ। दुग्गअमणोरहो विअ हिअभ घिस जाइ परिणामम् ॥ १०॥ , 'विश्वम्भहलितपरिशिक्षिताना' ग, विश्वस्तहसितपरिशहिताना' स. २ कृतम्' ग.

काव्यमाला। . तिव दर्शनेन जनितोऽस्सा लेजारकाया अनुरागः । दुर्गतमनोरथ इव हृदय एव याति परिणामम् ॥] लजावशाकुनापि न बदतीत्यर्थः । किमिति कृशासीति विदेशादागस हासपूर्वकै पृच्छन्त कान्तं प्रति नायिकाया उकि- कौशलं कापि सखीशिक्षाधमाह- जं तणुआअइ सा तुह करण किं जेण पुच्छसि हसन्तो। अह गिम्हे मह पअई एव्वं भणिऊण ओरुण्णा ॥ ११ ॥ (या तेनूयते सा तव कृतेन किं येन पृच्छसि हसन् । असौ ग्रीष्मे मम प्रकृतिरिति भणित्ववारुदिता ॥] या महिला तन्वी भवति सा सर्वा वनिमित्तमिति नियमो नास्तीत्यर्थः । किंनिम्मितं तर्हि तव काय तवाह--असाविति । अह इलसावित्यर्थे देशी ॥ अविच्छिन्नप्रियालिगनाभिलापमात्मनः प्रकाशयन्ती काप्यन्यापदेशेन वलभमाह- वण्णफमरहिअस्स वि एस गुणो णवरि चित्तकम्मरस । णिमिस पि जंप मुखइ पिओ जणो गाढमुवजढो ॥१२॥ [वर्णक्रमरहितस्याप्येष गुणः केवलं चिकर्मणः । निमिपमपि यन्न मुञ्चति प्रियो जनो गाढमुपगूढः ॥] वर्णक्रमो हरितपीतादिवर्णविन्यासः । चित्रकर्मण आलेयस्य । चित्रे प्रिययोपगूढा प्रियः प्रियां क्षणमपि न मुन्धतीत्यर्थ, । यद्वा वर्णक्रमो गुणविशुद्धिपरम्परा तदहितस्य । चित्रस्य विचित्रस्य धर्मणः । धर्माधर्मादिरूपस्येत्यर्थः । आत्मा धर्माधर्मादिक क्षणमपि न मुशवीयर्थः । वे चितु ब्राह्मणादिवर्णक्रमरहितस्यापि चित्तअम्मणो चित्तजन्मनो मन्मथस्यायं कोऽपि गुणो येन प्रियः प्रिया क्षणमपि न त्यजतीत्यर्थ इति व्याचक्षते ॥ कोमलां नवोढामविदग्ध. कोऽपि रमयतीत्यन्यापदेशेन कापि सुसीमाह- अविहत्तसंधिवन्धं पढमरसुभेअपाणलोहिल्लो । उब्वेलिडंण आणह खण्डइ कलिआमुहं भमरो ॥१३॥ अविभक्तसधिबन्धं प्रथमरसोद्रेदपान न्धः । उद्वेलितुं न जानाति खण्डयदि कलिकामुर्ख भ्रमरः ॥] अत्र कलिकामधुपवृत्तान्तब्याजेनानुदिनस्य संधि माविकामविदग्धः कोऽप्युपमो. १. 'लजालो.'ग, 'लजावत्या. २. 'तन्वीमपति' ग. ३.'कृ' ग-ध. ४. 'अथ' ग, “एषा' घ. ५. 'एवं मणित्वा रोदितुं स्मा' ग... वित्तसम्मस्स' म. वितजन्मनः'ग. लोनिष्ठ'ग, सोमवा'... "उदेलयितु'.

७ शतकम्] गाथासप्तशती। अमिच्छति । न च जानाति केवलं पीडयतीति पतु व्यज्यते । उद्वेलित विकासयि- सम्, पक्षे संमुखीकर्तुम् ॥ विपरीतरताय प्रियामत्साहयितु कपिदाह-- दरवेविरोरुजुमलामु मटिअच्छी लुलिअचिहुरासु । पुरिसाइरीसु कामो पिआसु सजाउहो वैसइ ॥ १४ ॥ (ईपद्वेपनशीलोरुयुगलासु मुकुलिताक्षीपु ललितचिपुरासु ! पुरुषायितशीलामु कामः प्रियास मज्जायुधो वसति ।।] ममाप्रियं कर्तुं नाहसीति यदन्तं वान्तं मानिनी सोदेगमाह- जंज ते ण सुहाअइ तं तं ण करेमि ममाअत्तम् । अहरं चिम जंप सुहामि सुहात किं ममाअत्तम् ॥ १५ ॥ यद्यत्ते न सुखायते तत्तन्न करोमि यन्ममायत्तम् । अहमेव यन्न सुखाये सुगम तकि ममायत्तम् ॥] नमुखाये न मुखायामि ॥ कथालापाय प्रिय समुरसादयितु कुलटा लनाखभावमाद-~- वावारविसंवा सअलावअवाणं कुणइ हालज्जा । सवणाण उणी गुरुसंणिहे वि ण णिरुब्झइ पिओअम् ॥ १६ ॥ [च्यापारविसंवाद सक्लावयवाना क्रोति हतलना । श्रवणयो पुनगुरसंनिधारपि न निरुणद्धि नियोगम् ॥] विसंवादो व्याघातः। नियोगो व्यापार लिदासक्ततया नेत्रादिव्यापार: सर्व ए: विसंवादं प्रातः केवलं श्वशुरादिसनिधावषि त्वत्कथाश्रवणे श्रवणी व्यापारयतीति ना यक प्रति दूतीवचन मिदमिति कश्चित् ।। आगतप्रायस्ते प्रेयानिति सखीभिरावाहिता प्रोषितभर्तृका सनिर्वेदमाह-- किं भणह मं सहीओ मा मर दीसिहइ सो जिअन्तीए । फजालाओ एसो सिणेहमग्गो उँण ण होइ ॥ १७॥ [किं भणथ मा सख्यो मा प्रियस ईश्यते स जीवन्त्या । कार्यालाए एष हमार्ग पुनर्न भवति [1] २. 'दरवेपन' घ. ३. 'मुखयति' ग. 'मुखये घ. ५. 'विस' ग. ६. 'अक्ष्यसे प्रिय जीवन्दी' ग. ५. 'एव' ग. . ४. 'मुस्खयामि' ग, काव्यमाला। मवतीभियंदुच्यते तत्कार्यपालोचनयानुष्टातुं शक्यते। न च मेहः कार्य पर्यालोच. यतीत्यर्थः॥ मन्दस्नेहं निष्करणं च नायकमुपालन्धुमन्यापदेशेन काचिदाह- एकल्लमओ दिट्ठी मइअ तह पुलइओ सअहाए । पिअजामरस जह.धणुं पडिअं वाहस्स हत्याओ ॥ १८ ॥ एकाकी मृगो दृष्टया मृग्या तथा प्रलोकितः सतृष्णया । प्रियजायस्य यथा धनुः पतितं च्याधस हस्तात् ॥] मृग्याश्चधुनिभालनेनात्मीयप्रियाविलोचनमनुस्मरतो व्याधस्स हस्खाकरुणया धनुः पवितमित्यर्थः । अतिपामरस्य हितस्य व्यावस्याप्येवं करुणा स्नेहथ, नतु तवेति भावः। नायिकाया. सौन्दर्याविशयं प्रतिपादयन्ती दूनी चलतं नायकमन्यापदेशेन सोपा- लिणीमु भमसि परिमलसि सत्तलं मालई पि णो मुअसि । तरलत्तणं तुह अहो महुअर जइ पाइला हरइ ।। १९ ॥ नलिनीषु भ्रमसि परिसदासि सप्तला मालतीमपि नो मुश्चसि । तरलत्वं तवाहो मधुकर यदि पाटला हरति 1] 'सप्तला नवमालिका' इत्यमरः । कस्याश्चिनिकटे भ्रमस्येव काचित्पीडयत्येव को- चिद्वचनमात्रेण संभावयति । एतच तव चाचल्यं पाटलवर्णा सेवापहर्तुं समर्था ना. न्येति भाच.॥ कामुक्जनप्रलोभनाय दूती नायिकायाः स्तनौ वर्णयति- दोअगुलअकवालअपिणद्धसविसेसणीलाभुइमा । दावेद थणत्थलवण्णिों व तरुणी जुअजणाणम् ॥ २०॥ [द्वेषगुलककपाटकपिनद्धसविशेषनीलक किका । दर्शयति स्वनस्थलवर्णिकामिन तरुणी युवजनेभ्यः ।।] बालपरिमितं सधिबन्धस्थले कपाटवपार्श्वये यद्भवति तत्कपाटकम् । तेन पि.' नमो नीलक्भुको यस्याः सा । तथा च तत्र सनैकदेशदर्शनार्णिकामिव दर्शयतीत्यु- स्प्रेक्षा । वस्तुपरीक्षार्थं यद्वस्त्वेकदेशप्रदर्शनं तद्वर्णित्युच्यते ।। १. 'एकाकिमृगो' घ. २. 'प्रियजानेोरेत्युचितम्'. ३. 'कमलेमु' ग. ४. 'कइ- त्यपाइला' ख. ५. 'दमलेपु' ग. १. 'पित्यपाटला' घ. ५. 'बहुलकृतजालक' घ. ८. 'कमुका' ग... 'यून.' ग, 'यूनाम्' घ. ग ७ शतकम्] गाथासप्तशती। प्रवीकारोऽपि कचिदपाराय मवतीति निदर्शयकाचित्स्यायमाह- रक्सेइ पुत्त मस्थपण ओच्छोम पडिच्छन्ती। अंसुहि पहिअपरिणी ओहिजन्तं ण लक्रोइ ॥ २१ ॥ रक्षति पुनकं मस्तकेन पैटलमान्तोदकं प्रेतीच्छन्ती । अभिः पथिकगृहिणी आर्दीभवन्त न लक्षयति ॥ ओरछोरा इति रसुदिप्रान्तअलार्धको देशी शब्दः । प्रतीच्छन्ती गृढती ।। सरस्वीरस्य पथिकाकान्तादेन समेतस्थानमा जाई श्रावयन्ती कापि शरवर्णनच्छले- सरए सरम्मि पहिआ जलाई कन्दोसुरहिगन्धाई । धवलच्छाई सअहा पिअन्ति दइआण व मुहाई ॥ २२ ॥ शरदि सरसि पथिका जलानि नीलोत्पलसुरभिगन्धीनि । धवलाच्छानि सतृष्णा रिवन्ति दयितानामिव मुखानि ॥3 फन्दो नीलोत्पलम् । वेन मुगन्धीनि । पक्षे तद्वत्सुगन्धोनि । धवलानि व तान्य. छानि च । पक्षे धवलाक्षाणि । धवलनयनानीत्यर्थ । सतृष्णा. सपिपासा । पक्षे सा- भिलाषा ॥ पर्दममयादनागच्छन्तं नायक प्रति दूतीमार्गस्य सुगमलप्रतिपादनच्छलेन नायि- काया अनुरागातिवाय प्रतिपादयन्ती भाइ- अध्भन्तरसरसाओ उरि पव्वाअवद्धपढ़ाओ। घसम्मन्तम्मि जणे समुस्ससन्ति व्य रच्छाओ ॥२३॥ [अभ्यन्तरसरमा उपरि मेवातवद्धपक्षा। चक्रममाणे जने समुच्छ्रसन्तीव (था. 3] प्रवातेन प्रकृयातेन यद्ध पडो यासु ता । अन समासोक्त्यलंकारेण प्रवातपायगु- रजनभयेनोपरि सक्षम्यन्तानुरकत्व नायिकाया व्यज्यते । पिष्टक्कगादकीणों कस्याश्चितनी सामिलापं वर्णय नागरिक सहचरमाह-- मुहपुण्डरीअछाआइ संठिआ उअह राअहंसे व्य । छणपिट्टफुट्टणुच्छलिअधूलिधवले थणे वहइ ।। २४ ॥ १. 'अच्छोदकं ग घ. २. 'प्रतीक्षमाणा' घ. ३. 'कमल' घ. ४. 'धवलानि * आश्काप्रवद्धनका म, निष्कपदमा' .. ६. 'नमति ग... पान' ग.

काव्यमाला। (मुखपुण्डरीकच्छायाया सस्थितौ पश्यत राजहंसाविव । क्षेणपिएकुटनोच्छलितधूलिधवली सनौ वहति ॥] क्षण उत्सव.॥ कयोश्चिदन्योन्यानुराग प्रकटयनागरिकः स्ववैदग्ध्यख्यापनार्थमाह- तह तेणवि सा दिवा तीज वि तह तस्स पेसिआ दिट्ठी । जह दोण्ह वि समअं चिअ णिव्युत्तरआई जाआई ॥ २५ ॥ तथा तेनापि सा दृया तयापि तथा तेसै प्रेषिता दृष्टिः । यथा द्वावपि सममेव निर्वृत्तरतौ जातौ ॥] सममेव एक्कालमेव ॥ जारं प्रत्यभिसाररसिकता सूचयन्ती कुलटा प्रीष्मवर्णनमाह- बाउलिआपरिसोसण कुंडगपत्तलणसुलहसंकेअ । सोहग्गकणअकसवट्ट गिम्ह मा कह वि झिजिहिसि ॥ २६ ॥ [स्वल्पखातिकापरिशोषण निकुञ्जपत्रकरणसुलभसक्त । सौभाग्यकनकक्षपट्ट ग्रीष्म मा क्थमपि क्षीणो मरिष्यसि । वाउलिआशब्द खल्पखातिकाया देशी । स्वल्पखातिकाना परिशोषणेन निकुञ्जाना पत्रसपत्त्या च सुलभ सकेतो यन स तथेति प्रोमसबोधनम् ॥ दुर्जनससर्गादुद्विमं गुणशालिनं विदग्धा काप्यन्यापदेशेन प्रतिपाटवार्थमाह- दुस्सिक्सिअरअणपरिक्सएहि घिटोसि पत्थरे तावा । जा तिलमत्त पट्टसि मरगम का तुज्झ मुल्लकहा ॥ २७ ॥ दुशिक्षितरत्नपरीक्षकैधृष्टोऽसि प्रसरे तावत् । यावत्तिलमान वर्तसे मरकत का तब मूल्यकथा ॥] दुशिक्षिता अतत्त्वज्ञा दुर्विदग्धाश्च मह त्वविशयितव्युत्पना सर्वे तत्व आनामीति पाल्हीनिवासिन्या विलाविन्या दूती पाठीमाशयानागच्छन्तं तत्वान्त तत्समीपगम- नायोत्साहयितुमाह-- जंह चिन्तेइ परिअणो आसङ्कइ जह अ वस्म पडिवक्सो । घालेण वि गामणिणन्दणेण सह रक्सिा पली ॥ २८ ।। १.'धन' घ. २ 'तस्य' घ. ३. 'दयोरपि सममेव नित्तरतानि जातानि' घ. ४. पिउन' ख. ५. 'दापिस घ. ६. 'हयिष्यसि घ... 'तह' ग. नास्ति. माव ८.'तह PN ७ शतकम् । १८७ गाथासप्तशती। यथा चिन्तयति परिजन आशङ्कते यथा च तस प्रतिपक्ष । पारेनापि ग्रामणीनन्दनेन तथा रक्षिता पल्ली ॥] कपमनेन बालेन रक्षा फर्तव्येति परिजनश्चिन्तयति । बालोऽयमस्माभिग्राह्य इति प्र- तिपक्षश्चिन्तयतीत्यर्थ ॥ पायुविक्रमगुण व्यापयन्ती न्यायधू पृषतवर्म पृच्छन्त पथिकमाह- अणेसु पहिअ पुच्चसु वाहमपुचेसु पुसिअचम्माइ । अम्ह वाहजुआणो हरिणेसु घj ण णामेइ ॥ २९ ॥ [अन्येषु पथिक पृच्छ व्याधकपुरेपु पृपतचर्माणि । अस्माक व्याधयुवा हरिणेषु धनुन नामयति ॥J पतो मृगविशेष । 'गोकर्णपणश्यरोहिताश्चमरो मृगा' इत्यमर । प्रचण्डदोर्दण्ड- बलमदोदतोऽय रुपया मृगाम हन्ति । किंतु मत्तमातजानिति भाव ॥ वधू प्रति सासूया व्याधमाता पन्धुजनमाह-- गअवहुवेहव्वअरो पुत्तो मे एककण्डविणिवाई। तह सोहाइ पुलइओ जह फण्डवरण्डअ वहइ ॥ ३० ॥ गजवधूवैधव्यकर पुत्रो मे एक्काण्डविनिपाती । तथा चुपया प्रोस्तिो यथा वाण्डसमूह वहति । 'विडिओ इति चित्पाठ । नम्र विरहित शोषित इत्यर्थ । बरण्डक समूह । अयमर्थ -पूथमसो मापुत्र एवेनैव शरेण मत्तमातमा हत्वा तद्वधूना वैधव्य कृतवान् । सप्रति वधूसक्त शरसमूहमेव वहति, नतु किमपि कर्तुं क्षम इत्यर्थे । प्रामणीभार्या विजित्य महामादागतस्स शाभिमस्य भर्तमनखिनो मानग्ला. निश्रवणामरणमाशङ्कमाना तनिवारणाय परिजनमाइ-- विझारहणालाव पल्ली मा कुणउ गामणी ससइ । पचजिविओ जइ कह वि सुणइ वा जीविअ मुभह ॥ ३१ ॥ [विन्ध्यारोहणालाप पल्ली मा करोतु ग्रामणी श्चसिति । प्रत्युज्जीवितो यदि कथमपि शृणोति तजीवित मुञ्चति ॥] पल्लीनिावसिजनो भयाद्विध्यारोहणकथा मा करोतु । अस्मिजीवति कुतो भ्यमिति , 'तथा' ग. २ तथा' ग पुस्तक नास्ति । बाहादुम्बेसु' ग ४ 'याधक टुम्बेपुरा ५ 'विललिओ ६ 'विनिषाही' घ. . 'विलालतो अधिक यो घ, ८ काण्डक घ. १ 'यथा' घ. श काव्यमाला। भाव । वसिति जीवति । प्रत्युञ्जीवित प्रत्यागतप्राणो यदि शृणोति तदा पल्लीनिवासि- जनपलायनश्रवणजातमानमझो जीवितमेव जह्यादित्य ॥ यो यस्य निग्ध स प्रियमाणोऽपि तस्य हितमेवोपदिशतीति निदर्शयन कोऽपि सह- अप्याहेइ मरन्तो पुत्तं पल्लीवई पअत्तेण । मह णामेण जह तुम ण लजसे तह करेजासु ॥ ३२ ॥ शिक्षयति प्रियमाण पुत्र पल्लीपति प्रयत्नेन । मम नामा यथा त्व न लजसे तथा करिष्यमि ॥] अप्याहेइ शिक्षयति सदिशतीति वाथै । य खलु निर्गुणो भवति सोऽमुकस्य पुत्रो. ऽयमिति व्यपदिश्यते पूज्यते चेति नानो लज्जाहेतुत्वम् । गुणवास्तु खपौरुषेणैव ख्यातो भवतीति भाव ॥ अनुकूले विधावमङ्गलान्यपि मालानि भवन्तीति निदर्शयन्कोऽपि ससायमाह- अणुमरणपत्थिआए पञ्चागअजीविए पिअअमम्मि । वेहव्यमण्डणं कुलवहूअ सोहाग जाअम् ॥ ३३ ॥ [अनुमरणप्रस्थिताया प्रत्यागतजीविते प्रियतमे । वैधव्यमण्डन कुलवध्या सौभाग्यक जातम् [I] दन्तचित दृष्ट्वा परतीसगशझ्या पशुकल्पानां पामरीणामपालुं भवति निरपराधे पत्यौ, किं पुनरस्सा महाकुलीनाया शीलदार्यादिगुणसपनाया सापराधे लयि । मत. पादयो पतित्वैना प्रसादयेत्यनुनयविमुख नायक प्रति दूत्याह- महुमच्छिआइ दई दह्ण मुह पिमस्स सूणोदुम् । ईसालुई पुलिन्दी रुक्खच्छाअं गा अण्णम् ॥ ३४ ॥ मधुमक्षिकया दष्ट दृष्ट्वा मुख बियसोच्छूनोष्ठम् । ईर्ष्यालु पुलिन्दी वृक्षच्छाया गतान्याम् ॥] पत्या सह कृतकल्हा सा त्वत्समागमाभिलाषिणी तिष्ठतीति जार प्रति दूसा यमु. किरिति कश्चित् ॥ गिरिनामप्रसाछटेनासती जार प्रति स्वच्छ दाभिसारस्पृहामाह-- धण्णा वसन्ति णीसङ्कमोहणे बहलपत्तलवेइम्मि । वाअन्दोलणओणविभवेणुगहणे गिरिग्गामे ॥ ३५ ॥ १ "आयच्छति' ग. २ 'पत्यु' ग. ३ 'दायिता' ग. ४ 'वम्मि' ग.

७ शतकम्] गाथासप्तशती। धन्या वसन्ति नि शङ्कमोहने बहलपत्रलवृतौ । वातान्दोलनावनामितवणुगहने गिरिमामे ॥] निशा मोहन सुरत यन स । तथा यहलैरुञ्चतरै पत्रले पत्रबहुसैरातिवंटन यन। गिरिमामगमनाय नायकमुत्सादय ती दूती वर्षागमनकृत वेषा रामणीयकातिश- यमाह- पप्फुल्लयणकलम्या गिद्धोअसिलाअला मुइअमोरा । पसरन्तोज्झरमुहला ओसाहन्ते गिरिग्गामा ॥ ३६॥ प्रोत्फुल्छपनकदम्बा नितिशिलातला मुदितमयूरा । सरनिहरमुखरा उत्साह्यन्ति गिरिमामा ॥] अत्र प्रथमविशेषणेन सभोगोद्दीपन विभाव , द्वितीयेन शयनस्थलम्, तृतीयेन संभो- गानन्तरं विनोदसमार', चतुर्धन स्तनितमणितादिध्वनिनिहवश्व प्रतिपाद्यते ॥ मीरसायामपि रसोत्पादकत्वमन्यापदेशेन कथयन्ती दूती नायकस्य सुरतोपवारचा- सुर्य कामिनीजनानुरजानाथमाद- तह परिमलिआ गोवेग तेण हत्य पि जा ण ओल्लेइ । स थिम घेणू एहिं पेच्छसु कुडदोहिणी जाआ ॥ ३७ ।। (तथा परिमलिता गोपेन तेन हस्तमपि यायति । सैव धेनुरिदानी प्रेक्षप्य कुटदोहिनी जाता ॥] वथा तेन प्रकारेण स्तनपृष्टादिपरामर्शन, पक्षे करिहन्तादिविन्यासेन । पुगे पट । घटपूर्ण दुग्ध ददातीत्यर्थ । पक्षे बहुतर स्मरतल क्षरतीत्यर्थ ॥ कापि कस्याचिौभाग्यातिशयमन्यापदशेनाह-- धवलो जिअह तुह कए धवलस्स कए जिअन्ति गिट्ठीभो । जिम तम्ये अम्द वि जीविएण गोट्ठ तुमाअत्तम् ।। ३८ ॥ घरलो जीपति तर कृने घरलस कृते जीरति गैथ्य । जीव हे गौ अलाकमरि जीरितेन गोष्ट त्वदायत्तम् ।। शम्मा गो, धवलो पृपष्ट । 'धवला गवि । षष्ठे पुमान्' इति मेदिनीयोप गरिरेकवारप्रसूता गो । 'भप टि सकृत्प्रसूतगवि' इति मेदिनीडोर ॥ १. बने ग घ. २ 'याता क्षेसनवरदेणु' ग. ३ 'उअमादन्त, ग ४ 'प्रसान्तो मर'घ.५'गृथ्व'ग.

काव्यमाला। यो यस्य प्रियस्तस्य तदवयवानुकारिणि प्रोतिर्भवतीति निदर्शयन्कोऽपि । माह- अघाइ छिवइ चुम्बइ ठेवइ हिअअम्मि जणिअरोमञ्चो । जाआकवोलसरिसं पेच्छह पहिओ महुअउस्फम् ॥ ३९ ॥ आजिघ्रति स्पृशति चुम्बति स्थापयति हृदये जनितरोमाञ्चः । जायारूपोलसदृशं पश्यत पथिको मधूकपुष्पम् ।। मातस्तत्त्वविचारणक्षमो भवतीति दर्शयन्कोऽपि मध्याहवर्णनमाह-- उअ ओल्लिजइ मोहं भुअंगकित्ती कडअलग्गाइ । ओझरधारासद्धालुएण सीसं वणगएण ॥ ४० ॥ पश्योकियते मोघं भुजंगकृत्तौ कटकलमायाम् । निरधाराश्रद्धालुकेन शीर्य वनगजेन ॥] 'अप्पिनइ' इति पाठे अर्यत इत्यर्थः । मोघं निरर्थकम् । कृत्ती कबुके । वा नास्प्रिचण्डातपतप्तेन । जारस्थान्यमनस्कतासपादनार्य मध्याहाभिगारिकाया उचि पूर्वनायिका विहाय गुणान्तरलोभेन नायिकान्तरगामिनं नायक काप्यन्य ग्रेनाइ- फमलं मुअन्त महुअर पिककइत्याण गन्धलोहेण भालेक्सलड्डु पामरो व्व छिविअण जागिहिसि ॥ ४१ ॥ [कमलं मुँचन्मधुकर पककपित्थानां गन्धलोमेन । आलेख्यलमुकं पामर इव स्पृष्टा शाससि ॥]. यया ह्यनभिशः पामरश्चित्रस्थं मोदकादिकमालोकयन्मोदमानः करस्थं भक्ष्यमा तविक्षया गत. स्पृष्ट्वा तत्स्वरूपमवधार्य खियते, एवं त्वमरि नीरसशस्पर्श त्यस्य गन्धेनाकृष्टचेताः कमलं मुघन्स्पर्शनसमनन्तरमेतयोरन्तर शास्यसीति भायः काप्यासमविवाहाया सखीजनं सपरिहासमाह-- गिनन्ते मङ्गलगाइआहि वरगोत्तदिण्णअण्णाए । सोउं व णिग्गओ उअह होन्तवहुआइ रोमचो ॥ ४२ ॥ [गीयमाने मनालगायिकाभिर्वरगोनदत्तायाः । श्रोतुमिव निर्गतः पश्यत मविध्यदंघकाया रोमास. ॥] गोत्रं नाम । ..'आमाति' ग. २.'प्रकम्प'घ. ३. 'अवसर'घ. ५. गायनीभिः' ग. ६,'निर्गच्छवि' ग. ७. 'वस्या' ग.घ. ४. 'मुच्यमान' [अलीगुग यतमान मना नया पेपमानः | चतुर्थी' घ...'ग'ने ph'...tr तथापि खर किमपि रह नववधूगल प्रियो भाति ॥] अन प्रियत्वहेतुमन्तरेणार प्रियपणी पिभावनाएं कारः। किसाया. प्रतिरोधी बालाया वाम्येन कुपितं पर प्रमादपि कापि नववा खभावमाह- अलिअपमुत्तवलन्तम्मि जयवर णयथाभ येवन्तो। संवेल्लिओरुसंजमिअवटि गो एयो । ४६ ॥ अलीकप्रगुप्तयागी पणमानघायात पती यर्थ. शियानन्योन्यवर १. 'चेसियनग..माग.ग. मगर ७ शतकम्] गाथासप्तशती। भाममविवाहा व्यभिचारशीला काचिपुष्पितं संकेतवेतसनिकुञ्जमालोक्योत्प्रेक्षते- मण्णे आअण्णन्ता आसण्णविआमद्गलुग्गाइम् । तेहि जुआणेहिँ समं हसन्ति में असकुडगा ॥ ४३ ॥ मिन्ये आकर्णयन्त आसन्नविनाहमगलोद्गीतम् । तैयुवमिः समं हसन्ति मां घेतेस निकुजाः ] यैः समं पूर्व सुरतसौख्यमनुभूतं तः सममिलपः। बन्धुजनप्रीतये काचिदचिरवृत्तविवाहयोदंपन्योरन्योम्यानुरागमाह- उअगअचउत्थिमङ्गलहोन्तविओअसविसेसलग्गेहिं । तीअ वरस्स अ सेअंसुगहि रुण्णं व हत्येहि ॥ १४ ॥ (उँपगतचतुर्थीमद्गलमविष्यद्वियोगसविशेषलमाभ्याम् । तस्या वरस्य च वेदाशुभी रुदितमिव हस्ताभ्याम् ॥] उपगते चतुर्थीमङ्गले वियोगो मविष्यतीति भयेन सविशेष लामाभ्यामित्यर्थः । चतुर्थी कृत्वा जामाता खग्रह गच्छतीति रोकव्यवहारः।। नववधूसंगमस्यालोरिकचमरकारित्वं प्रतिपादयन्कोऽपि राहचरमाह- ण अ दिदि णेइ मुहं ण अ छिविउं देह पालाइ किसि। तह वि हु कि पि रहस्सं णवयसको पिभो होइ ॥ ४५ ॥ न च दृष्टिं नयति मुपं न च स्पष्टुं ददाति नालपति निमपि । फलव्यक्तिर्विभावना' इति ताक्षणात्।। वेष्टितोयमितवमान्य गनो हसा ]] .

१९२ काव्यमाला। भ्यामूरुभ्या सयमितस्य वयस्य प्रन्यि नववध्या हस्खो गत इति सबन्ध । खमाव एवार्य शलानाम् । नतु योरेनेति भाव ॥ नववधूविनम्भणानभिज्ञेन कान्तेन कोपिताया कस्याश्चिदवा कापि सखीमाह- पुच्छिजन्ती ण भणइ गहिआ पप्फुरइ चुम्विआ रुअइ । तुतिका णववहुआ आवराहेण उवउदा ॥ १७ ॥ [पृच्छयमाना न भणति गृहीता परपुरति चुम्विता रोदिति । तूष्णीका नववधू कृतापराधनोपद्धर ॥] समत्यभावेऽपि नववधूलादुपभोकव्येति नायक प्रति दूत्या उक्तिर्वा ॥ पुन पुन पस्यचित्वथा कुर्वती बामप्युपहस ती कापि मातृभगिनीमाह- तत्तो चित्र होन्ति कहा विअसन्ति तहिं तहि समप्पन्ति । किं मण्णे माउच्छा एकजुआणो इमो गामो ॥ ४८ ।। hत एव भवति यथा विक्सन्ति तेरे तन समाप्यन्ते । किं मन्ये मातृप्रस एकयुवकोऽय ग्राम ॥ किमन्यो युवा नास्ति येन तत्वथैव मुखरो लोक इत्याशय ॥ विरहोत्कण्ठिता काचिद्वल्लभवचनस्य वचनातराद्विशेषमनुभवसिद्ध प्रदर्शयति- जाणि आणाणि अम्हे वि जम्पिओ ताई जम्पइ जणो वि। ताइ चिन तेण पजम्पिआइ हिअअ सुहान्ति ॥ ४९ ॥ यानि वचनानि वैयमपि जल्पामानि जल्पति जनोऽपि । तान्येव तेन प्रजल्पितानि हृदय सुखयन्ति ॥] जारसगमायो साहयन्ती दूती पत्या सह कृतलहा नायिकामाह--- सव्वाअरेण मग्गह पिअ जण जइ सुहेण वो कजम् । ज जस्स हिअअदइअ ण सुह ज तहिं णस्थि ॥ ५० ॥ [संदिरेण मृगयध्व प्रिय जन यदि मुखेन व कार्यम् । यद्यस्य हृदयदयित तन्न सुख यत्र नास्ति ॥] तथा च यनानुराग स एव नायक सुखहेतुरिति भाव ॥ १ 'तत्रैव निगच्छति' ग. २ 'तत्रैव तत्रैव ग, 'तलिस्तमिन्समर्प' य. ३ वय जल्पामहे' ग ४ 'तान्येव' ग ५ 'सुखापयति' घ ६ ससादरेण ज स्पत'घ.. "मार्गयत'ग ८ 'यन तन' ग, 'यत्तस्मिन'घ ७ शतकम्] गाथासप्तशती। तथैवापरगाथामाह- यद्वा प्रसाधन विनैव कान्तदर्शनायागता दुहितर प्रति कुष्यन्ती सय कश्चिदाह- दीसन्तो दिट्ठिसुओ चिन्तिजन्ता मणवलहो अत्ता । उल्लावन्तों सुइसुहो पिओ जणो णिचरमणिजो ॥५१॥ [दृश्यमानो दृशिसुखश्चिन्त्यमानो मनोवल्लभ श्वश्रु । उल्लप्यमान श्रुतिसुख प्रियो जनो नित्यरमणीय ॥] उत्प्यमान कार्यमान । नित्यति । तथाचाल प्रसाधनायासेनति भाव ॥ क्षीणघनत्वात्पूर्व निष्कासित पुनरुपार्जितक्नो दुहितनेहमुपदर्शय त्या कुट्टन्यानुनीय मानो भुनग सोपारम्भप्रयाप्यानमात्मनिन्दाव्यानाह- ठाणभट्ठा परिगलिअपीणआ उण्णईअ परिचत्ता। अम्हे उण ठेरपओहर व्य उअरे चिअ णिसण्णा ॥ ५२ ॥ [स्थानम्रष्टा परिगलितपीनत्वा उन्नत्या परित्यक्ता । वय पुन स्थविरापयोधरा इबोदर एव निषण्णा ॥] धनवत एव युष्माक्मनुरूपा । वय तु हारितधनत्यादुदरभरणमानव्यामृता । तकि मन्माभिर्युष्मा प्रयोजनमिति भाव ॥ खण्डिता काचि सूर्यनमस्कारच्छलेन का तमुपालभवे- पचूसाग रशितदेह पिआलोअ लोअणाणन्द । अण्णत्तखविअसव्वरि णहभूसण दिणवइ णमो दे ।। ५३ ।। [प्रत्यूपागत रक्तदेह प्रियालरोक लोचनानद। अन्यत्रक्षपितशरीक नमोभूषण दिनपते नमस्ते ॥] प्रत्यूपे प्रभाते आगतो द्वीपा तरात्, पक्ष महिगतरगृहात् । रक्त आरक, पक्षे ऽनुरक्त । अन्यमहिलायामिलर्थात् । देहो यस्य स । तया प्रिय आरोको यस्य स । पक्षे प्रियालोक्स्य महिलाजनस्य लोधनान दो यसास । अन्यन द्वीपा तरे, पक्षे अ न्यस्यायें क्षपिता शर्वरी येन । नमसो भूपण, पक्ष परस्त्रीदत्तनसभूषण । दिनपते नमस्ते। भास्वानिव दूरादेवाभिव दनीयस्व न सभिगम्य इत्यर्ध । अन सूर्यनायक योरूपमानौर मेयभावो व्यङ्ग्य ॥ कि गर्भवती भवती इति प्रियेण पृष्टा काचिदाह- विवरीअसुरअरेहेल पुच्छसि मह कीस ग भसभूटम् । ओअत्ते कुम्भमुहे जरलवकणिमा वि किं ठाइ ॥ ५४॥ १ 'भगिनि' ग २ 'पयोधरौ' ग ३ 'रज्यमानदेह' | ४ "क काव्यमाला। [विपरीतसुरतलम्पट पृच्छसि मम किमिति गर्भसमूतिम् । अपवृत्ते कुम्भमुख जललवकणिकापि किं तिष्ठति ॥ अपपत्तेऽधोमुखीकृते ।। यामात खाजन्यमप्यपलपन्तीति निदर्शयनश्चिदाह-- अचासण्णविवाहे समं जसोआइ तरुणगोवीहि । पड़न्ते महुमहणे संबन्धा णिहुविज्ञन्ति ॥ ५५ ॥ [अत्यासझविवाहे सम यशोदया तरुणगोपीभि । वर्धमाने मधुमथने सबन्धा नियन्ते ॥] यशोदया सम ये सर पास्ते नियन्त इल वय । अनुरूपनायवालामेन निर्विष्णा कापि सोपारम्भ विधिमाह--- जज आलिहइ मणो आसावट्टीहि हिअअफल अम्मि । तत वालो व्ध विही गिहुअ हसिऊण पम्हुसइ ॥ ५६ ।। [यद्यदालिखति मन आशावर्तिकामिहदयफलके । तत्तोल इव विधिनिभृत हसित्वा पोञ्छति ॥] सण्डिता काप्यन्यापदेशेन कान्त सचमत्कारमाह- अणुहुत्तो करफसो सअलअलापुण्ण पुष्णदिअहम्मि । वीभासङ्गकिसङ्गअ एहिं तुह वन्दिमो पलणे ॥ ५५॥ [अनुभूत करस्पर्श सकलकलापूर्ण पूर्णदिवसे । द्वितीयासङ्गशाङ्ग इदानी तव वन्दामहे चरणौ ॥] करा किरणा , पक्षे करो हस्त । सल्लाभि षोडशकलाम पूर्ण, पक्षे चतु पष्टिक्लामि पूर्ण । पूर्णदिवसे पूर्णिमादिवसे, पक्षे पुण्यदिवसे । द्वितीया तिथि , पक्षे द्वितीया स्त्री। तस्या सोन कृशाङ्ग । 'द्वितीया सहधर्मिणी' इत्यमर र समासो- चललकारेण चद्रका तयोरुपमानोपमेयभावो न्याय ॥ विरहो कण्ठिता दूतीमाह- दूरन्तरिए वि पिए कह वि भित्ताई मज्झ णअणाई। हिअअ उण तेण सम अज वि अणिवारिअ भमइ ।। ५८ ॥ सुचःकरने आशा आसावति' ४ 'बारक इव' ग.५ 'प्रमुएवि'.

५'शब्दायमाने ग. ६ 'वेपिते' ग, 'वेपनशोरे'घ. ११. खैरिण्या' घ, १२. 'अभिनन्दयति शब्दायति स्वामिन्यागच्छमाने ग. ७ शतकम्] गाथासप्तशती। १९५ [दूरान्तरितेऽपि प्रिये कथमपि निर्तिते मम नयने । हृदयं पुनस्तेन सममद्याप्यनिवारित भ्रमति मान कर्तुमसमर्थो नायिका प्रति दूती सप्रणयकोपमाह- तस्स कहाकण्टइए सद्दाअण्णणसमोसरिअकोवे । समुहालोअणकैम्पिरि उपऊढा किं प्रवन्निहिसि ।। ५९ ॥ तिस क्याण्टक्तेि शब्दापर्णनसमपसृतकोपे। समुखालोकनकम्पनशीले उपगूढा कि प्रत्ससे ॥] संध्यासमयसूचनव्याजेन दूती काचिदभिसारिका सरथितुमाह- भरणमिअणीलसाहग्गखलिअचलणद्धविहुअवक्सउडा। तरुसिहरेसु विहंगा कह कह वि लहन्ति संठाणम् ॥ ६०॥ [भरनमितनीलशाखाग्रस्खलितचेरणार्धविधुतपक्षपुटा । तरुशिखरेषु विहगा कथ क्थमपि लभन्ते सस्थानम् ॥J भीलेयनेनार्दतया निग्धत्वम् । तच्च पदस्सलने हेतुरिति सूचितम् ॥ असती प्रशसता केनापि सगता काचिदसती तमाह- अहमहुपाणधारिलिआइ जं च रमिओ सि सविसेसम् । असइ अलजिरि बहुसिक्सिरि ति मा णाह मण्णुहिसि ॥ ६१ ॥ (अधरमपानलाल्सया यच रमितोऽसि सविशेषम् । असती अलज्जाशीला बहुशिक्षितेति मा नाथ मस्था ॥ असतीरक्षणस्य दु शकतामसती पति धावयन्ती काचिदाह- खाणेण अ पाणेण अ तह गहिओ मण्डलो अडअणाए। जह जारं अहिणन्दइ भुक्काइ घरसामिए एन्ते ।। ६२ ।। खोदनेन च पानेन च तथा गृहीतो मण्डलोऽसत्या । यथा जारमैभिनन्दति मुक्कति गृहस्वामिन्येति ॥] गृहीतो यशीकृत । मण्डल कुकुर । 'मण्डल परिधी कुठे देशे द्वादशराजमु । क्ली- १ निवृत्तेऽस्साक' ग, नितानि मम नयनानि' घ. २. वहति' ग. ३. वरि' ग.४ "विलिनिहिसिग विलायिष्यसि ग. ८.'चरणग्ग' ग. १ 'चरणाम' ग. १०, 'भक्षणेन' ग.

काव्यमाला। वेऽथ निवहे विम्ये निषु पुति तु कुकुरे ॥ इति मेदिनीकोपः। भुकवे शब्दायवे । एति आगच्छति । सविसप्तमी। नायिकान्तरानुरचनामातृदर्शनेन खदुहितरमनुशोवन्तीं व्याघवधू दृष्ट्वा का चिदाह- कण्डन्तेण अकण्डं पल्लीमज्झम्मि विअडकोअण्डम् । पइमरणाहिं वि अहिरं वाहेण रआविआ अत्ता ॥ ६३ ॥ इयता मकाण्डे पल्लीमध्ये विकटकोदण्डम् । पतिमरणादप्यधिक व्याधेन रोदिता श्वेथू ॥] कण्डूयता तक्षणेन सूक्ष्म कुर्वता ॥ किमिति रोदिपीति सरया पृष्टा काचिदाह- अम्हे उजुअसीला पिओ वि पिअसहि विआरपरिओसो । ण हु अण्णा का वि गई वाहोहा कह पुसिजन्तु ।। ६४ ॥ विय जुकशीला प्रियोऽपि प्रियसखि विकारपरितोष । न खल्वन्या कापि गतिर्बाप्पोघा कथ प्रोन्यताम् ॥] विकारेपु हावभावादिषु परितोषो यस्य स । हावभावाद्यमिज्ञाभिर्नायिकाभिरपहतह- दयोऽयम् । मया तु किमपि न ज्ञायत इत्यतो रुयत इति भाव.॥ अनुरकायामपि मयि नानुरकोऽसीति कापि नायक सोपालम्भमाह- धवलो सि जइ वि सुन्दर वह वि तुए मझ रजिअं हिअअम् । राअभरिए वि हिअए सुहअ णिहित्तो ण रत्तो सि ॥ ६५ ।। घवरोऽसि यद्यपि सुन्दर तथापि त्वया मम रञ्जित हृदयम् । रागभृतेऽपि हृदये सुभग निहितो न रकोऽसि ॥] धवल शुभ्र श्रेष्ठश्च । रागो लौहित्यमनुरागश्च ।। उलसत्कुङ्कुमादिपरिमलसमुज्ज्वलनेपथ्या गुणहोना कामप्यनुवर्तमान कामिजनमुपह सन्ती काचिदाइ- चक्षुपुडाहअविअलिअसहआररसेण सिचदेहस्स । कीरस्स मागलग्ग गन्धन्धं भमइ भमरउलम् ॥६६॥ १. 'कर्पता चकट' ग. २. वाष्पेण रुदिता' घ. ३. 'माता' ग. ४. "रज्ज्वल शीला' ग. ५ "विकारद्वेषी ग, 'विदारपरितोष 'घ, 'प्रसार्यवे' घ. . 'भ रिते' घ.

७ शतकम् गाथासप्तशती। १९७ [चसुपुटाहतविलितसहकाररसेन सिक्तदेहस । कीरस्य मार्गलग गन्धान्ध भ्रमति भ्रमरकुलम् ॥] जातानुरामा गृहिणी विदिताभिप्राय प्रवासिजनमाह- एत्थ णिमन्नइ अत्ता एत्थ अह एस्थ परिअणो सअलो। पैन्थिन रत्तीअन्धअ मा मह सअणे णिमन्जिहिसि ॥ ६७ ॥ [अत्र निमज्जति धश्रूवाहमन परिजन सकल । पर्थिक रात्र्यन्धाक) मा मम शयने निमइयमि ॥] निमज्जति खपिति॥ विरहानलस्य दु सहत्व प्रतिपादयन्ती विरहिणी काचिदाद-- परिओससुन्दराइ मुरएसु लहन्ति लाइ सोक्साइ । ताई चिअ उण विरहे खाउग्गियाइँ कीरन्ति ॥ ६॥ [परितोपसुन्दराणि सुरतेषु लभन्ते यानि सौरयानि । तान्येव पुनधिरहे खादित्तोद्गीर्णानि कुर्वन्ति ॥] लभन्ते । पामिन्य इनि शेष । तान्येवेति । तथा च नेमानि विरहद खानि किंतु पूर्व भुपानि मुसान्येवोद्रोनि । एतदूपेण परिणसानोलपत्रकारो व्याय ॥ कोऽपि सामिलाप कस्याजिपीनोमतपयोधराया हार वर्णयति- मागं चिअ अलहन्तो हारो पीशुण्णआण थणाणम् । उम्विग्गो भमइ उरे जमणाणइफेणपुलो व्च ॥ ६९ ।। [मार्गमिपालभमानो हार पोनोगतयो सनयो । उद्विषो भ्रमत्युरनि यमुनानदीफे ऍप इव ॥] अन यमुनापेनास्येन स्तनमुखदयामना व्यज्यत । तया च यत्वाधानम् , तेन चानुपभोग्यवेति खयमूदनीयम् ॥ रासंनिधी विधता तेन मम मिण सपादितमिति केनापि पृष्ट फरिदन्याप- देशेनाद- एपेण वि वडीअडरेण सभलपणराइमझम्मि । तह तेण को अपा जह सेसदुमा तले तस्स ।। ७० ॥ १. प्रकटित' ग. २. पक्षिण' प. ३ हे पा रतिभध' ग.४ " निति मथरमा जीपीदाम ग.. ५. निशेरियाग, 'निगमो भू' य... 'भरि पार ग.५. भारतोहीणोनि कीन्ने ग, उपनिनिमानि दीर्यन्वे' घ.. गघ. . 'पोपताना सनान ग घ... "पएच' घ. .

काव्यमाला। . (एकेनापि वटवीगाङ्कुरण सरलवनराजिमध्ये । तथा तेन कृत आत्मा यथा शेषगुमास्तले तस्य ॥] एकाकिनापि तेन सम्लविपक्षमध्ये तथोत्कर्ष सपादितो यथा तत्प्रभावेण सवऽपि विपक्षातिरस्कृता इति भावः । मूढेनापि तरुणा उत्कय चैटित व पुनर्महावशप्रभव. स्थ न यतसे इति नियोग कचित्म युपदेशो व्यय इति कश्चित् ॥ गुणिन प्रायो दरिदा भवन्तीति प्रतिपादयन्कबिहारिध सवोध्याह--- जे जे गुणिणो जे जे अ चाइणो जे विडडविण्णाणा । दारिद्द रे विअक्रमण ताप तुम साणुराओ सि ॥ ७१ ॥ [ये ये गुणिनो ये ये व त्यागिनो ये विदग्धविज्ञाना । दारिद्य रे विचक्षण तेषा व सानुरागमसि ॥ कोऽपि साभिराप क्स्याधि मुखचन्द्र वर्णयति- जइ कोत्तिो सि सुन्दर सहलतिहीचन्ददसणसुहाणम् । ता मसिण मोइजन्तरवुअ पेक्खसु मुद्द से ७२ ॥ यदि कौतुकिकोऽसि सुन्दर सकलतिथिचन्द्रदर्शनसुखानाम् । तन्मैसूण मोच्यमानकक्षुक प्रेक्षस मुख तस्सा ॥] सखाय प्रति सरयुरुक्ति । दूत्या चा नायक प्रत्युक्ति । ग्रीष्मात्ययेऽपि नायकस्यानागमने समाश्वासयन्ती ससी प्रति समुत्सुका नायिके दमाह- समविसमणिव्विसेसा समन्तो मन्दमन्दसचारा । अइरा होहिन्ति पहा मणोरहाण पि दुलहा ॥ ३ ॥ समविषमनिर्विशेषा समन्ततो मन्दम दसचारा । अचिराद्धविध्यन्ति पन्धानो मनोरथानामपि दुर्लया 1] अथवा सकेतस्थलान्तराभावेन मार्गासनकजादौ दत्तसंकेता पो विना जनसंचारेश वरस्थल सप्रति न संकेतयोग्यमिति बोधयन्ती काचिदिदमाह । २ 'अयाचका ये ये विज्ञप्तमद्भाया 'घ. ३ 'श्रीतुकोऽति' ग ५ मिटमाग्नुभ्यामा ५ असार 'अहीहा होन्ति' ग.. 'भतिदीर्घा भवतीव' ग.

७ शतकम्] गाथासप्तशती। चराको दत्तसताया पुत्रवध्यासन गत्वा प्रिय सभुज्य परावृती तत्पनादिसबन्धन स्फुटेऽपराधे तामुपहस ला श्वश्वा प्रति वन्दिमुखेन (१) वधूरिदमाह- अइदीहरॉइ बहुए सीसे दीसन्ति वसवत्ताई। भणिए भगामि अत्ता तुम्हाण वि पण्डुरा पुट्ठी ॥ ७४ ॥ [अतिदीर्घाणि वघा शीप दृश्यन्ते वशपत्राणि । भागते मणामि श्वेश्र युष्माकमपि पाण्डुरं पृष्ठम् ॥] अत्ता इति श्वसनोधने देशी । पृष्ठशब्दस्य नीलिमत्वमनुशासनात् ।। मानवत्या नायिकाया विरका सेति विरज्यन्त नायक बोधय ती नीदमाह- अत्यरूसण सणपसिजग अलिसवणणिबन्यो । उम्मच्छरसंतावो पुत्त पअवी सिणेहरत ॥ ७५ ।। आकस्मिक्रोधकरणं क्षणप्रसादनमलीकवचननिर्बन्ध । उन्मत्सरसताप पुत्रक पद्वी नेहस । अत्यति आकस्मिके अद्भुते या देशी । उन्मत्सरेति वहुले । 'उन्मूर्छन प्रतिकूल. बावा प्रकोपनम्' इति प्राचीनटीका । तथा च स्नेहबहुरतया त्वयि सा नानाविधानमा ममार्गनाचरवाति न तद्विरक्ति सभावनापीवि यथापूर्वं त्वया तस्या व्यवहर्तव्यमिति दूत्सा उति ॥ जनसमद जातदशना क्टाक्षादिमविक्षिपन्ती नायिकामनुरचे तिसदिहान नायक प्रोत्साहयन्ती सखी दूती चेदमाह- पिज्जा कण्णबलिहिं जणरवमिलिअ वि तुझ सलावम् । दुद्ध जलसमिलिअं सा वाला रामहसि च ॥ ७६ ॥ [पिबति कर्णाञ्जलि भिननरवमिलितमपि तव सलापम् । दुग्ध नलसमिति सा वाला राजहंसीर ।] अन पिवतीवि कथें पीयत इति धर्मा । प्राकृते रिङ्गवचनमा मिसाधनु- शासनात् । अय वा सा बाला रानड्सी वेति प्रथमा तया रामहस्येवेति तृतीयार्थे । तथा च पीयत इति यथाश्रुतमेव व्यारयेयम् । तथा च कोलाहलप्रविटस्यापि भवद- चसो वैनात्य प्रेमातिशयेन वुभुत्सया गृहीत्वा स्वदुक्तशब्दार्थ मनिटे वर्णयामासेति स्वचि सासन्तमनुरकेति यथापूर्व नेहो विधेय इति सख्युक्ति । २ 'पाण्डुरा पृष्टि' ग घ. ३ 'अकस्लादोषण' ग. १ 'मात'ग मूर्छन' ग.

२०० काव्यमाला। प्रियगुणविशेषा दूी प्रति पृच्छन्ती नायिका प्रति काचित्सखी वदति- अई उजुए ण लजसि पुच्छिजन्ती पिअस्स चरिआइ । सव्वङ्गसुरहिणो मरुवअस्स किं कुसुमरिद्धीहिं ।। ७७ ।। अयि ऋजुके न रजसे पृच्छन्ती प्रियस चरितानि । सपीगसुरभेर्मरुवक्स किं कुसुमद्धिमि ॥] 'पिण्डीतको मरुवक प्रस्थपुष्प पणिग्नक" इत्यमर । तथा च सहजसी गुणगाल कृतस्य कि गुणान्तर पृच्छसीति भाव ॥ साभाविक हिलवन्ती करौ धातुरागेण र काविति विभ्रमेण वारं वारं प्रक्ष मुग्धा निवारयन्ती दूत्याह- मुद्धे अपत्तिअन्ती पवालअङ्कुरअवण्णलोहिअए । णिद्धोअधाउराए फीस महत्थे पुणो धुअसि ।। ७८ ।। [मुग्धेऽयत्यय ती प्रचारादुरवर्णलोहितौ । निधीतधातुरगी विमिति सहस्तौ पुनर्घावयसि ॥] अप्रलयन्ती प्रत्यय विश्वासमकुर्वाणा । थावयति प्रक्षालयसि । नायिकामुग्ध स्तयो साहजिकरागवत्त्व तटस्थ नायक प्रति ख्यापय या मूल्या सध्या वा if वर्षागमनेन दुखिता नायिका शरत्कालोपगमेन स शीघ्रमायास्यतीति समाश्व ससोदमाइ- उअ सिन्धवपत्रअसन्छहाइँ धुअतूलपुञ्जसरिसाइ । सोहन्ति सुअणु मुक्कोअआइ सरए सिअभाइ ॥ ७९ ।। (पश्य सैन्धवपर्वतसदृक्षाणि धुततरपुञ्जसहशानि । शोभन्ते सुतनु मुक्तोदकानि शरदि मिताभ्राणि ॥] "सुमण' इति पाटे सुननेति पान्यसयुद्धि । वर्षाकालापगमेन पया यानाः गातरगमनेन द्रव्यादिनमर्जनीय गृहे न स्थैयमित्यादि भझ्या अधिदाहेति सकेनस्थानकुञ्जाना महिपसानिध्येन दुरासदत्वारिखद्य त नायक खियन्ती यिका प्रोत्साहयन्ती काचिदाह--- आउच्छन्ति सिरेहि विवलि एहि उअ सतिपहिं णिचन्ता । णिपच्छिमवलिअपलोइएहि महिसा कुडनाइ ॥ ८ ॥ १. अतिउक्त घ. 'अप्रतियन्ती ध.३ मिग्यलोहितो' .. इन्ति ग. ५. 'धौततूलराशिममानानि' ग.६ 'गुयन्तीव मुको ग. ५, । एहि ग.

.१. 'खण्डिकै. ग.२. 'निजपश्चिम' ग. ३. 'तावत्सुन्दर वाष्पाचरणपरिशेष' ग, • शतकम् गाथासप्तशती। २०१ [आपृच्छन्ति शिरोभिर्विवलितैः पश्य खजिकः] नीयमानाः । निश्चिमवलितप्रलोकितैमहिपाः कुलान् ॥] महिपापगमेन कुमा इदानीं निरावाधसंकेतस्थानतामुपगताः । पशवोऽपि महिपा नीमादौ यत्र स्थित्वा छायामुपलभ्य मुसमासादितवन्तस्तत्परित्यागे तेषामपि दु.सं नवति परात्य पुनस्तत्पश्यन्तीति सदयमाना (सहृदयाना) सुससनिधानस्थलमवश्यं वि- लोकनीयमत्याज्यं चेति भावः। नि:पश्चिमानि चरमाणि यानि वलितानि परावर्तनानि लोरितानि च ॥ निजदारिद्यणाश्रु विमुञ्चन्ती नायिका समाश्वासयन्ती दून्याह- पुसउ मुहं ता पुत्ति अ वाहोअरणं विसेसरमणिजम् । मा एअं चिअ मुहमण्डणं त्ति सो काहिइ पुणो वि ॥ ८१ ॥ प्रोन्छख मुख तत्पुनि च (पुत्रिके) बाप्पोपकरण विशेषरमणीयम् । भी इदमेव मुखमण्डनमिति करिष्यसि पुनरपि ॥] - मण्डनाभावेन समच विमुसि किंतु सहजसौन्दर्यशालिन्यास्तव अश्रु एव मण्डनं भवतीति कि मण्डनान्तरेण । अथवा दरिदेयं मण्डनमिच्छतीति धनिनो मण्डनादिदानेन सुरासाध्येति तटस्थ प्रति दूत्सा उक्तिः ॥ पथि कर्दमबाहुल्येन त्वद्गृहे कथमागन्तव्यमिति जिज्ञामु नायक नायिका वा बोध. यन्ती काचिदाह- मझे पअणुअपवं अवहोवासेसु साणचिक्सिल्लम् । गामस्स सीससीमन्तअं व रच्छामुहं जाअम् ॥ ८२ ॥ [मध्ये प्रतनु[क]पङ्कमुभयोः पार्थयोः श्यानकर्दमम् । ग्रामस्य शीर्षसीमन्तमिव रथ्यामुख जातम् ॥] प्रतनु वत्पं कं जलं यस्मिन्नेतादृशः पङ्को यन तादृशम् । तथा च रथ्योभयपार्श्वयोः श्यानकर्दमस्वम् । दिवा निरीक्षितेन पथा रानावागन्तव्यमिति काचिद्बोधयति ॥ वाचन नायिका पितृगृहे स्थिता क्वचिदासका । तद्भरि समागवे व्याकुलचित्तं नायक समादधती दूत्याह- अवरहागभजामाउअस्स विउणेइ मोहणुक्कण्ठम् । बहुआइ घरपलोहरमजणपिसुणो वलअसहो ।। ८३ ॥ 'तावत्पुनक बाष्पावतरण' घ. ४. 'मातस्तव' घ. ५. 'उभयपार्श्वयो. सरस' घ. ६. 'सीमन्तकमिव'.

२०२ काव्यमाला। [अपराहागतजामातुर्द्विगुणयति मोहनोत्कण्ठाम् । वघ्या गृहपश्चाद्भागमजनपिगुनो वलयशब्दः॥] मोहन मुरतम् । मजन शयनमहसंमार्जनं का। तस्य पिशुनः सूचकः । अपराहाग त्यनेन दिनसत्त्वे जामाता श्ववादिसानिध्यैन पथागृहे न गमिष्यति । सातु दिनशे एव तत्र स्खपिवि त्वया तन गन्तव्यं तत्र सा मुलभेति भावः ।। कृतकर्मग आरभटीदर्शनेनैव परे पलायन्ते तन भीरवन्तु मुतरां पलायन्त भीरता न कर्तव्येति कश्चित्तचिद्बोधयति- जुझचवेडामोडिअजजरकण्णस्स जुण्णमल्लस्स । कच्छाबन्धो चिअ भीरुमसहिाअं समुपसणइ ।। ८४ ।। युद्धचपेटामोटितजर्जरवर्णस जीर्णमछम्य । कक्षावन्ध एव भीरुमहहृदयं समुत्खनति ॥] पूर्व तत्पतिरतिशूरः समर्थच स्थितः । सप्रति वाकेन क्षीणशक्तिरिति यथापूर्व तने धारणमात्रेण तम्मान भतव्यम् । क्षीणशक्तित्वेन तस्या एव स म रोचते । सर्वप्रा कारसमर्थे त्वयि सा सेहमाचरिष्यतीति भीरुतामपहाय तस्या सया प्रार्तितव्यांग फाचन राहनमुन्दरी श्यातगुणपती च प्रियापमानितापि न लावता दीमाग्यम्य चिरकालानवस्थायित्वेन हपितेव तो घोधयन्ती सग्याह- आणत्तं क्षेण तुमं पइणो पहरण पडहसण । मल्लि ण रजसि गशसि दोहगे पाहिजन्ते ।। ८५ ॥ (आइतं तेन त्या पत्या प्रहतेन पटहराब्दैन । मलि न लबसे नृत्यसि दार्माग्ये प्रकटीक्रियमाणे ]] पता भयो पटहशम्देन डिण्डोरवण यहार्भाग्यमान न त मदिना न भवति, मूत. स्येवेति क्षमापति समति । अषया प-युरिचारितृलसीलनेन परमगुन्दरीयं ममीन्द. यंगम्तिा मुरासाध्यति तटस्थ कामुकं प्रति प्रलोभनोमिनः॥ एलम्य वासापुर्यमाण विधासो न विषेय इति विदाह - मा वयह वीसम्भं इमाण यहुचाकम्मणिदणाणम् ।. णियविभाजपरम्मुहाणे मुणआण घ सलागम् ॥ ८६ ॥ १. 'भौचमहाना हद समुपातयी ग, पटापमानानामपियं ममुगाना. २. 'भाषन्दीम नन' ग. ३. आनन्दपन्दी स्वं पयुः गच. ४. प्रस्ताव ग भावः॥

पारकाले शालीना पाकै हलिक स्वगृहे विति, तदपाके तरक्षाथ सय क्षमादी गाथासप्तशती। शतकम्] २०३ [मा प्रजत विलम्भमेषा बहुचाटुकर्मनिपुणानाम् । निवर्तितकार्यपराङ्मुखाणा शुनकानामिर खलानाम् ॥] सल्वभावोक्तिरियम् ॥ ग्रामान्तरं गच्छन्तीमसतीमनु ब्याजेन सह प्रस्थितान्वहून्कामुकान्दृष्ट्वा कापि परि- सपूर्वमिदमाह- अण्णग्गामपउत्था कड़न्ती मण्डलाण रिन्छोलिम् । अक्सण्डिअसोहग्गा परिसस जिअउ मे सुणिआ ॥ ८७ ॥ [अन्यग्रामप्रस्थिता कैर्षयन्ती मण्डलाना पतिम् । अखण्डितसौभाग्या वर्षशत जीतु मे शुनी ॥] मण्डला कुकुरा । रिसोलीति पक्षया देशी ॥ वाचन देवरेऽनासका, तेन च प्रियवाक्यशत प्रलोभ्य वशीकृता। ततश्च कु- तश्विनिमित्ताद्विरज्यति तस्मिस्तमुपालन्धुमिदमाह-- सर्च साहसु देअर तह तह चडुआरएण सुणएण । गिवत्तिअकजपरम्मुहत्तणं सिक्खिों कत्तो।। ८८ ॥ [सत्यं यथय देवर तथा तथा चाटुकारण गुनकेन । निर्वतितकार्यपरामुखत्व शिक्षित केसात् ॥] तथा च त्वत एवेदं तेन शिक्षितमिति मत्सरापुरात्व सर्वथा हेयमिते भावः ॥ तस्या गृहेऽनादिसमृद्धघा रात्री च तपतियतीलनेन त पतिसानिध्येन चन्द्रिा- शोभिवेन च रारप सा न गुखसाध्येति काविसचिवोधयति- जिप्पण्णसरसरिद्धी सच्छन्दं गाई पामरो सरए । दलिअणवसालितण्डुलधवलमिअवामु राईमु ॥ ८९ ॥ [निष्पामसद्धि मच्छन्द गायति पामरः शरदि। दलितनयशादितण्डुलधरलमृगाहामु रात्रिपु ॥] ती जिरवधू शररकालातिरिक्ष काले मुलभेनि कधि चिोधयतीति वा। २. विन्ती ग घ. ३. 'मवतु मालिका' ग. 1. 'इमान्-रालान्ग. ४ शुना' ग घ. ५. कुत.'गघ.

२०४ काव्यमाला। वर्षाकाले पूर्ववत्सरीयकलमगोपीपदाइितक्षेत्रक्पंगं दृष्ट्वा कश्चित्पान्य माह-- अलिहिजा पट्टअले हलालिचलणेण कलमगोवीए । केआरसोरुम्भणतंसट्ठिा कोमलो चलणो ॥ ९० ।। आलिख्यते पैङ्कतले हलालिचलनेन क्लमगोप्याः । केदारस्रोतोर्वरोधतिर्यक् (त्र्यंश) स्थित कोमलश्चरणः ॥] द्वितीयपाठे 'अभिलप्यते पाहबलुब्धालिवलयेन ॥ ग्यशेन भागनयेण स्थितः । असपूर्ण इति यावत् । यदा पूर्ववत्सरे क्षेत्रमध्यस्थितज रस्य शोष आरब्धस्तदा कलमगोप्याः शालिपान सकेतस्य लाभावयोधेन टु खोप चये सपूर्णश्चरणो न पमध्ये प्रतिविम्वितः । स च वर्षान्तरे वर्षणावसरे दृष्ट । तेनाः क्षेने कलमोत्पत्तिमारभ्य तपारपर्यन्तं क्लमगोपी पान्थादिसुलभा स्थास्यतीति तत्मा झ्याशा पान्यो निवेदयति स्मरति वा पूर्वानुभूतमर्थमिति भाव.॥ दिअहे दिअहे सूसइ सकेअअभङ्गवडिआसङ्का । आवण्टुरोणअमुही कलमेण समं कलमगोवी ॥ ९१ ।। [दिवसे दिवसे शुष्यति संकेतक्भगवर्धिताशङ्का । आपाण्डुरापनतमुखी क्लमेन समं क्लमगोपी ॥] यथा यथा कल्मक्षेत्रमापाण्डुर भवति, तथा तथा पलमगोपी सकेतस्थलापगमार न्तयावनतमुखी भवतीति कल्मक्षेत्रकाले सुखसाध्यैति तटस्थ प्रति कस्याश्चिदुतिः ॥ णवम्पिएण अपामरेण दगुण पाँउहारीओ। मोत्तव्वे जो अपग्गहम्मि अवहासिणी मुका ॥ ९२॥ [नवकैम्पितेन ह्तपामरेण दृष्ट्वा पादपङ्की. मोक्तुं वै एतावद्धसित्वा व्याक्रोशिनी मुक्ता 1] () विचार्यमेतत् ॥ १. 'अहिलिजई' ग. २. 'वल एण' ग. ३. 'रुन्धण' ग. ४. 'अभिलप्यते' ग 'अभिटीयते' घ. ५. 'पाजलब्धालिवल्येन' ग घ. ६. 'स्रोतोन्तरोधनतिर्यक 'सोतोरोधनतिर्य' घ. ७. "स्थितकोमलौ चरणो' ग. ८. 'कम्मिएण' ख... उस ग. १०. 'पाणिहारीओ' ग. ११. 'नेविभपग्ग' ग. १२ 'कर्मणा पश्य' ग, 'काम पेण हत' घ. १३. 'पानीयभवहारिकाम्' ग, 'भक्ताचाहारी' घ. १४. 'मोक्त निपुटप्रग्रहे भासिनी' ग, 'मोषध्ये योक्तकप्रग्रहेऽत्रकाशिनी' घ. + काव्यमाला। धन्या बधिरा अन्धास्त एव जीवन्ति मानुषे लोके। न शुण्यन्ति पिशुनवचन खलानामृदिन प्रेक्षन्ते ॥] असदस्यो कस्वाचिदासकर यश्चित्तम एवं सख्या पार्यमाणः सासूर्य त दति- एहि वारेइ जणो तइआ मूहल्लओ व गओ । जाहे विसं व जामं सव्वद्भपहोलिरं पेम्म ।। ९६ ॥ [इदानीं वारयति जनस्तदा मूलका कुनापि या गतः (आसीत् )। यदा विषमिर जातं सवीङ्गपूर्णित प्रेम ॥] कस्याधित्सखी सस्या अनुरागातिशयं नायकविषये सूचयन्ती नाय कामे कथयति- कह तंपि तुइ ण णाअं जह सा आसन्दिआण यहुआणम् । कारण उच्चवधिअं तुह दसणलेहला पढिआ.।। ९७ ॥ [कय तदपि स्वया न शातं यथा सा आसन्दिकानां बहूनाम् । कृया उच्चाचिका तव दर्शनलालसा पतिता ॥] रानिशेपे फाटः शब्दं करोतीति युसुटाना खाभाषिक सम् । तत्वा तव ' जनमुत्प्रेक्ष्य पिणोति कधित- चोराण कामुआण अ पामरपहिआण फुकुडो चभइ । रे रमह वहह वाहयह एत्य तणुआभए रअणी ।। ९८ ।। [चौगन्कानुका पामरपथिकाच फ्युटो वदति । रे रमत पहत बाइयत र तन्वी जयति रजनी n] यथायोगमन्वयः, न तु यथासंश्यम् । योनिमायियोरन्योन्य कलहंपतो. कटाक्षान्तरेप निरीक्षणं पुनटोरनन्दा मन्योन्य फटाक्षयोः मनिपाते सम प्रहनितयोटितमे पाया कथयति- अण्णोण्णाहसन्वरपेसिअमेठीणविहिपसराणम् । दो.धि मण्णे फअभण्डणाई समर्थ पइसिभाई ॥ ९९ ॥ अन्योन्यारावान्तरमेषितमिलिताभिसरी। परि मन्ने कृतम्टही समय हस्तिो।] मानन्दः रनविदोरे - .

वलयानिति --6tal गाथासप्तशती। ७ शतकम् ] २०७ अथ समाप्ती हरनमस्काररूप मालमाचरति- संझागहिअजलनलिपडिमासंकन्तगोरिमुहकमलम् । अलिअं चिअ फुरिओढे विअलिअमन्वं हरं णमह ।। १०० ।। [सध्यागृहीतजलाञ्जलिप्रतिमासमान्तगौरीमुखकमलम् । अलीकमेव स्फुरितोष्ठं विगलितमैन हर नमत ॥] हरस्थापि गौरीमुसकमलप्रतिविम्बं दृष्ट्या सध्यारूपनित्यकर्माहमन्त्रलोपो भवति, कि पुनरस्मदादेर्लोकस्य प्रियासानिध्ये व्याकुलचित्ततेति सर्वथा स्त्रीसङ्गः परिहरणीय इति तात्पर्यार्थः ।। इअ सिरिहालविरइए पाउअकव्वम्मि सत्तसए । सत्तमसमें समत्तं गाहाण सहावरमणिजम् ॥ [इति श्रीहालविरचिते प्राकृतकाव्ये सप्तशते । सप्तमशतं समाप्त गाथाना स्वभावरमणीयम् ॥] हाल इति राज्ञः शालिवाहनस्थ सज्ञान्तरम् । गाथेति च्छन्दः । इतिशब्दो प्रयप- रिसमाप्ती॥ इति गङ्गाधरभट्टविरचिता प्राकृतगाथासप्तशतीटीका समाप्ता।

The Gathasaptasati

Author
Satavahana
Title
The Gathasaptasati
File name
The Gathasaptasati
Text
OCR done
Citation
1911
Published
2012/08
Publisher
Bombay.,tukaram Javaji,nirnayasagar Press
Language
Sanskrit
Pages
217
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
313207
Barcode
99999990321917.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
bhR8rPOUEyF
Download PDF

The Gathasaptasati