Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
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सग्रहकर्ता- त्रिवेणीलाल श्रीवास्तव, पी० ए० प्रकाशक- हद कार्यालय, इसाधावाद मप्रैल, १९३० प्रथम बार, २०००] [मूल्य
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१
अफसर-~-क्यों जी, तुम फिर काम के वक्त मो रहे
क्लर्क-क्या फर्के साइय, कल रात भर मेरे बच्चे ने
मुझे सोने नहीं दिया।
अफसर-तब वेहतर तो यही है कि तुम यहाँ अपने
यच्चे को लेकर याया करो।
२
लालू मोहन से रुपया उधार लेने की यातें कर रहा था
ओर मोहन उससे ६ रुपया सरडा व्याज मांग रहा था।
लल्लू को यह रकम अधिक मालूम हुई और उसने मोहन
मे पहा-खैर, मुझे इसमें कोई श्रापत्ति नहीं, पर तुम्हारे
पुरखा स्वर्ग से जय देखेंगे कि तुम इतना व्याज ले रहे हो,
तब वे तुम्हें पता कहेंगे।
मोहन ने कहा-तुम इसकी चिन्ता न करो। उतनी
दूर से ६ उन्हें ३ ही दिखाई पड़ेंगे।
--
साहन-जब म वीमार था, तब मुझे देखने के लिए
तीन तीन डॉक्टर लगे थे, परन्तु तीनों की मेरे बार में
विचित्र ही राय थी।
मोहन-किसी बात में भी उनकी एक राय थी या
नही!
सोहन-थी, तीनों अपनी-अपनी 'विजिटिड फी'
छ छु रपए माँग रहे थे!
-
[ स्थान-नाट्यशाला]
एक हरज-महिला-(अपने पीछे बैठे हुए पक दर्शफ से)
श्राशा है कि मेरे हेट की वजह से यापको कोई परेशानी
न होती होगी।
दर्शक-जी हाँ, होती है। मेरी धर्मपली भी ऐसे ही
हैट के लिए मुझे बार-बार तह किया करती है ।
५
पालसी मजदुर-सरकार, मेरा दिल मेरे काम में ही
लगा है।
मालिक-दिल के साथ साथ अपने हार्था को भी
काम में लगाश्रो, तो अच्छा हो !
-
।
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بنے
६
।
गन्नू-(पक निटले आदमी से ) श्राज तुम इनने
उदास क्यों दीखते हो?
श्रादमी-एक श्रादमी ने अभी एक दुसरे श्रादमी को
मठा कह दिया। दूसरे ने कहा कि तुम इसके लिए
माफोन मॉगोगे तो झगडा हो जायगा।
गन्न-तो इसमें तुम्हारा क्या बिगडा?
श्रादमी-पहल यादमी ने उसमे माफी मांग ली।
-
चापा, इस गरीब "अन्धे को एक पेसा दे दो।"
"पर तुम तो एक ही आँख मे अन्ध हो।"
"तो एक अधेला ही दे दो।"
एक छोटा सा लडका बीडी पी रहा था। एक मदिला
ने उसे देख कर कहा-तुम्हारे पाप जानते हैं कि तुम
पीडीपीते हो?
लड़यों ने दो तीन मलगा पर उस स्त्री को बडे गोर
में देखा और बोला-तुम तो पर विवाहिता स्त्री होगी।
स्त्री-हाँ, हैं तो।
लडका-तुम्हारे पति जानते है कि तुम दूसरे से बात
करती हो।
४
8
पक सेनापति बहुत देर तक अपनी सेना के जवानों को
उनके कर्तव्य के विषय में उपदेश देता रहा । थोडी देर
में एक सिपाही से उसने पूछा-क्यों, वीर सिपाहियों
को क्यों सदैव टेश पर मरने के लिए तैयार रहना चाहिए?
सिपाही-चेशक, भला उसे क्यों नाहक मरने के लिए
तैयार रहना चाहिए?
दो नतकी बैठ कर अपने-अपने जोवरों की शेखी हाँक
रही थी । एक ने अपनी श्रमीरी दिखाते हुए कहा-
मैं अपने बेसर को दूध से साफ करती हूँ। अपने चन्द्रहार
को अङ्कर के सिरके से, दुलरी को गुलबकावली के पानी
से और सखी तुम क्या करती हो ?
दूसरी-में साफ नहीं करती-जव घे मैले हो जाते
है, तब उन्हें नौरगनी को देकर दूसरे बनया लेती हैं।
पक सजन रेलगाडी के पहले दर्जे के एक डच्चे में
यात्रा कर रहे थे। उन्हें फतेहपुर उतरना था। गाडी वहाँ
सवेरे पाँच बजे पहुँचती थी, पर चे सज्जन इस बुरी तरह
से सोने वाले थे कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि उनकी नींद
फतेहपुर में टूट जायगी , इसके लिए उन्होंने कई उपाय
.
-
५
चहल
मोचे, पर कोई भी ठीक न जॅचा। अन्त में उन्हाने एक
नरकीय हूँढ निकाली। अपने नाम से एक घेरन चिट्ठी
लिख कर गाडी के ही लेटर बॉक्स में छोड दी श्रोर पते में
लिप दिया-'इसी गाडी के पहले दर्जे में मुसाफिरी करने
वाले अमुक सज्जन को फतेहपुर में मिले ।' फतहपुर पाते
हो रेल के डाकिए ने वहाँ पहुँच फर श्रावाज दी और यह
-वैरङ्ग चिट्ठी दिखाई। सज्जन ने अपना असवाब नीचे
उतरवाते हुए कहा-में इसे नहीं लूंगा। लोगों में ऐसी
लापरवाही में नहीं बढ़ाना चाहता।
१२
"डॉक्टर साइय, मेने सुना है कि आपके पास जो
लोग मरीज ढूंढ कर लाते हैं, उन्हें श्राप कमीशन देते हैं।
डॉस्टर-हाँ, देता तो है। सा तुम भी कोई मरीज
लाए हो?
“जी हाँ"
"कहाँ हे"
एक श्रादमी उदासी के साथ बढी टर तक एक स्थान
पर टहल रहा था। लोगों को देख कर उम पर दया प्राई
श्रोर उन्हाने हंसी के तोर पर यहा-चलो जी, तुमको
६
-
तुम्हारे घर पहुंचा देंगे, ताकि तुम्हारी स्त्री से तुम्हारा
मन बदल जाय।
उसने कहा-महाशय जी, क्षमा कीजिएगा । यही से
हो तो यह दुर्भाग्य प्रारम्भ हुना है।
१४
एक-(सरकस में) शाबाश, देखो तो गधे की, स्या
सफाई दिखा रहा है। में ऐसा कभी नहीं कर सकता।
दूसरा-तुम अभी सिखाए हुए नहीं हो।
१५
एक शिक्षक अपनी कना में दया की शिक्षा दे रहे थे।
उन्होंने एक विद्यार्थी से पूछा-क्यों' राम्, अगर कोई
श्रादमी पक गये को पीट रहा हो और मैंने यदि उस
श्रादमी को ऐसा काम करने से मना कर दिया, तो मन
कैसा बर्ताव किया?
रामू-भाई जैसा।
"माई, मै तो अव ज्योतिषियों की बातों पर विश्वास
करने लगा है।"
"ना"
"कल उसने मुझे कहा कि निकट भविष्य में ही तुम्हें
कुछ श्रार्थिक हानि होगी और यह हो ही गई।"
--
"कैसे"
"उसने मेरे ग्रह नक्षत्र विगडे बता कर उनका
शान्त करने के लिए मेरी माँ से बहुत से पेमे हडप
लिए।"
१७
गणी-भाइ, माफ करना । इस हफ्ते में तुमको कुछ
न दे सकॅगा।
महाजन--यही ती नुमने गत सप्ताह भी कहा था।
ऋणी-मे एक बात का श्रादमी हूँ।
शिक्षक-सोहन, तुम अॉस्ट्रेलिया के किसी ऐस
जानवर का नाम बता सकते हो, जो रडा विचित्र हो।
सोहन-डा।
शिक्षा-गरात, गेंडा तो वहाँ होता भी नहीं।
सोदन-इसा मे तो यह वहाँ के लिए विचित्र दास,
क्योंकि गेंडा प्रॉस्ट्रेतिया म नहीं होता।
१६
"क्या महाशय जी, श्राप एक गरीष को एक रोटी
लिए दो पैसे दे सकते है "
"को देसे क्यों? एकरोरी तो एक ही सेम भिन्न
जाती है।"
तुहल
६
तुम्हारे घर पहुँचा देंगे, ताकि तुम्हारी सी से तुम्हारा
मन बहल जाय।
उसने कहा-महाशय जी, क्षमा कीजिएगा। वहीं से
हो तो यह दुर्भाग्य प्रारम्भ हुश्रा हे।
१४
पर-(सरकस मे) शाबाश, देखो तो गधे को, क्या
सफाई दिखा रहा है। ऐसा कभी नहीं कर सकता।
दुसरा-तुम अभी सिखाए हुए नहीं हो।
१५
एक शिक्षक अपनी कक्षा में दया की शिक्षा दे रहे थे।
उन्होंने एक विद्यार्थी से पूछा-क्या गमू, अगर कोई
श्रादमी पक गधे को पीट रहा हो योर मैने यदि उस
श्रादमी को ऐसा काम करने से मना कर दिया, तो मैंने
कैसा बर्ताव किया?
1
रामू-भाई जेसा
"भाई, मैं तो अब ज्योतिषियों की बातों पर विश्वास
करने लगा है।"
"क्यों"
"कल उसने मुझे कहा कि निकट भविष्य में ही उन्हें
कुछ पार्धिक हानि होगी और वह हो ही गई।"
७
"उसने मेरे ग्रह नक्षत्र विगडे यता कर उनका
शान्त करने के लिए मेरी माँ से बहुत से पैसे हडप
लिए।"
ऋणी-माई, माफ करना । इस हफ्ते में तुमको कुछ
न दे सकगा।
महाजन-यही तो तुमने गत मप्ताह भी कहा था।
ऋणी-म एक यात का श्रादमी हूँ।
१८
शिक्षा-सोहन, तुम यॉस्ट्रेलिया के किसी ऐस
जानवर का नाम पता सकते हो, जो पडा विचित्र हो।
सोहनाडा।
शिक्षक-गलत, गेंडा ता यहाँ होता भी नहीं।
सोहन-इसा से तो वह वहाँ के लिए विचित्र दागा,
क्योंकि गेंडा स्ट्रेिलिया में नहीं होता।
१६
"क्यों महाशय जी, शाप एक गरीम को एक रोटरी
लिए दो पैसे दे सकते हैं ?"
"दो ऐसे क्यों? एक रोटी तो एक ही पेम में मिल
जाती है।"
हल "मिल तो जाती है, पर में यिना घी के रोटी नहीं खा सकता।" - २० मास्टर साहय हमेशा अपनी घडी को अपने वेस्ट- फोट की दाहिनी जेब में रक्सा करते थे। एक दिन उन्हें वहाँ घडी नहीं मिली। उन्होंन क्लास के एक लडके को उसे घर से हूंढ कर लाने के लिए कहा । लडका जा ही रहा था इतने में मास्टर साहय ने अपना हाथ पाएँ जेव में डाला, वहाँ से घड़ी निकाली ओर देख कर कहा--देखो जी, श्रमी दो पज फर दस मिनिट है, अढाई बजे तक जरूर लोट ग्राना। २१ पति-पाज कल की औरतों का फैशन देख कर में तो ठण्ढा पडा जाता है। पत्नी-ौर मेगे भी यही दशा है, ग्यारे ! मेरे लिए पक श्रोवर कोट बनवा देना। २२ मेजिस्ट्रेट-मजा म तुम पर रहम क्यों करें ? तुम्हारा यह पहला अपराध तो हे नहीं। अपरावी-लेकिन हुजूर, मेरे वकील साहर का तो यह पहला ही मुकदमा है। ।
६ २३ मालिक-(नौकर से) मेरे साले साहब अपनी बहिन को लिवाने पाने वाले है । तुम शाम को स्टेशन जाना, श्रोर पर्च के लिए ये पाठ याने पैसे ले जायो। नोर-शोर सरकार, वे न पाएँ तो? मालिक क-तब तुम म एक रपया दूंगा। २४ व्यारयानदाता-पाज सवेरे मेरे व्यारयान में लोगा को सॉसी बहुत पा रही थी। मिर-खाँसी नहीं थी। व्याग्यान खतम कराने की सूचना थी। २५ व्यारयानदाता-लेकिन आज के व्यारवान का दाम पहले ही वसूल कर लेना चाहिए । "क्यों " "क्योकियाज 'कमवर्ची पर घोलना हे।" २६ जज-(अपराधो के एक गवाह से) तुम अाराधी को उसके जन्म में ही जाने हो। नूरीमो तुम उसका चाल- चला पता सपने हो? क्या तुम यह कह सस्ते हो दि उसने चोरी की है।
हल गवाह- जी हाँ, पर यह नहीं बता सकता कि उसने "क्तिमा चुराया था। जज-तुमको जूरी ने निरपराध करार दिया। तुम अब घर जा सकते हो। अभियुक्त--सरकार, जरा पुलासा कर दीजिए। जज-स्या अभियुक्त-छोटा या बडा? २८ पक नौजवान-(एक मैजिस्ट्रेट से) मेने एक तीनर पकडा है, श्राप उसे तीन रुपए में खरीदेंगे। मैजिस्ट्रेट-जरूर खरीदूंगा। कहाँ पकडा है। नौजवान-यापके बगीचे में। मैजिस्ट्रेट-मेरी इजाजत बिना धगीचे में घुस श्राने के लिए मैंने तुम्हारे ऊपर पाँच रुपए जुरमाना किया, इस- लिए तीतर और दो रुपए रस जाओ। २६ मैजिस्ट्रेट-इसके पहले तुमको कितनी बार सजा मिल चुकी है। अपराधी-पॉच धार । 4
।
हुल
मैजिस्ट्रेट-फिर भी तुम बाज न आए। इस बार
तुमको में कडी से कड़ी सजा देंगा।
अपराधी-सरकार, स्थायी ग्राहकों, के साथ श्राप
कुछ रियायत न करेंगे।
३०
अमेरिका में विवाह हो जाने पर नए प्रेमी प्रेमिका इस
भौति रहते है-पहले सप्ताह में प्रेमी बोलता रहता है,
प्रेमिका सुनती रहती हे , दूसरे सप्ताह में प्रेमिका बोलती
रहती है, प्रेमी सुनता रहता है , तीसरे सप्ताह में दोनों
अपनी बीती तलाक कचहरी के जज को सुनाते हैं।
३१
दो नवोढे एक बार अपनी अपनी स्त्री को लेर
पर ही मराय में ठहरे हुए थे। दोनों में मित्रता हो गई।
एक बार फिर किसी शहर के एक भोजनालय में उन
दोनों नवोढों में भेंट हुई। पफ ने दूसरे में पूछा-कहो
'मित्र, तुम्हारी धर्मपत्नी का क्या हाल चाल है'
दूसरा--यह तो स्वर्ग की अप्सरा है।
पहला-तुम बडे भाग्यशाली हो। मरीतो अब भी
जोती है।
दोचोर अपने अपने चोरी के मारा का अन्दाजा लगा
रहे थे।
पहले चोर ने कहा- मने जिस मकान को बतलाया था, वहां तुमको पुछ भी न मिल सका ? दूसरा-कुछ भी नहीं। घर के दोनों श्रादमियों को मने एक ही कमरे में, एक ही खाट पर सोए देखा, तो समझ गया कि ये जरूर गरीब यादमी होंगे। इनके पास युकभी न होगा। एक नामी पहलवान की पाँच में और सिर में बड़ी चोट या गई यो। वह एक डॉक्टर के पास गया । डॉक्टर ने पूछा-किसी कुश्ती में चोट आ गई होगी? पदलपान पोला-मेरे जोड का यहाँ फोई भी पदल- वान नहीं है। डॉक्टर-फिर? पहलवान-याज घर जाने में कुछ देरी हो गई, इसलिए मेरे घर में ही मेरी यह हालत कर दी गई। ३४ एक भले आदमी ने एक दर्जी से कुल कपडे सिल- वाए । दजी ने बहुत दिनों तक अपना बिल नही भेजा। वे एक दिन उसकी दुकान पर गए। पैसा उस वक्त भी न देना था, लेकिन दर्जी को बनाए रखने के लिए बोले- क्यों जी, तुमने अभी तक अपना विल नहीं भेजा। -
दर्जी-साहय, में किसी भले श्रादमी से तकाजा नहीं
'करता।
"और जब वह पैसा नहीं देता है, तब क्या करते
हो"
"तष में समझ लेता है कि वह भला श्रादमी नहीं दे
और उससे अपने पेसे मॉग लेता है।"
३५
एक सुन्दरी स्त्री एक कुरूप पति मिला था। वात
'करते-करते एक दिन पति योला-मेरा भाद, जो मुझसं
तीन साल वडा है, सब बातों में मुझसे विपरीत है
पर उसका विवाह अभी तक नहीं हुया है। तुम उसे
"जानती हो।
स्त्री-जानती तो नहीं, पर अब जानना चाहती हूँ।
पक मनुष्य किसी दिन एक महिला मित्र को लेकर
नाटक देखने गया। उसे विश्वास था कि इससे उसकी
स्त्री को ईर्षा न होगी। इसी से जब वह घर पाया, तो
उसने इसकी चर्चा अपनी स्त्री से भी की। इस समय
श्रीमती जी बडी नाराज हो गई । पति ने पहा-तुम जम
मेरे मित्रों के साथ चली जाती हो, तब तो में कुछ भी नहीं
कहता। फिर तुम्हारे जाने और मेरे जाने में फर्क क्या है?
स्त्री पाली-फर्क बडा भारी है। जब तुम दूसरी स्त्री
को साथ ले जाते हो, तो उसका पर्च अपने पॉकेट से देना
पडता हे और मैं जब पर पुरुप के साथ जाती है, तो अपना
पला बचा कर पाती।
पति-प्रिये, किमी जसरी काम से म जरा याहर जा
रहा है। अगर श्राज शाम को नया सका, तो तुम्हारे
पाम एफ चिट्ठी लिग्व कर भिजवा दूंगा।
पत्नी-उसकी कोई जरूरत नहीं है। उस कागज को
मैंने पहले ही तुम्हारे पॉकेट से निकाल लिया है।
एक दिन एक नौजवान नाव-घर में एक नर्तकी पर
मुग्ध हो गया। उसने अन्त में यही उचित समझा कि
उस नायिका को भी यह अपना इरादा बतला दे, इसलिए
बोला-तुम्हारे लिए में मौत का भी सामना करने को
तैयार हैं।
नर्तकी-वास्तव में तुमको इसके लिए तैयार रहना
पडेगा । कही मेरा पति तुमको मेरे पास देख न ले।
२६
पहला-जिसने मेरी स्त्री में विवाह किया है, श्राज
उसे में मार डालँगा?
AL
दुल
दूसरा-यह तो वन होगा।
पहला-नहीं, वह श्रात्म हत्या होगी।
पच्चा-क्या हम यह कल्पना कर मकने दे कि हमारे
साथ खाना खाने एक दूसरा बालक मी बेठा है।
मा-हॉ, कर सकते हो।
वञ्चा-तय फिर उसके लिए भी एक थाली में मोजन
मँगायो ।
४१
लुइम-विवाह होने के पहले तुम मुझे जितना प्यार
करते थे, उतना प्यार क्या श्रम भी करते हो?
जॉर्ज-यह तो तर और श्रर के पत्र को मिलाने मे
मादम होगा।
४२
चन्द्रिका-मुझ सी यडभागिनी श्राज कोई न होगी।
मेग विवाद उनी से हो रहा है, जिसे में चाहती थी।
मोहिनी-पडभागिनी तो यह है, जिसका विवाह में
पुरष से हो, जिसे सब चाहे।
४.
जेम्स-(अपनी प्रेममी से) प्रतिदिन प्रात काल में
फेवल तुम्हाग ही ध्यान करता हूँ, प्रिय ।
मरियम-स्टीफन भी यही कहता है।
जेम्स -घर में प्रतिदिन उससे दो घण्टे पहले ही उठ
जाता है।
४४
एक बार राह में ही बॉम्बे-मेल खड़ी हो गई। किसी
ने जधीर सीव दी थी। गार्ड पता लगाने पाया,
तो पहले
दर्जे के एक डिब्रे की जझीर ढीली हो रही थी, और एक
नौजवान झाँक रहा था। गार्ड ने पूछा-क्या मामला है।
नौजवान बोला-कुछ नहीं, ताश खेलने के लिए तीन
दी शादमी थे। चौथे की जरूरत थी । श्राप से हो
सकेगा?
४५
मित्र-क्यों? विवाहित जीवन कैसा होता है?
जव
तुम अविवाहित थे, तब नो घडे दुखी थे।
नव विवाहित पुरुष-भाई, बहुत अच्छा होता हे
पहले तो घर-बाहर-समा जगह दुखी था, परन्तु श्रर तो
घर से निकलते ही सुपी मालूम होता है।
४०
मालकिन-तुम जेल से बाहर रहने की कोशिश क्यों
नहीं करते?
नौकर-की तो मालकिन, पोर इसी कोशिश में भागते
।
-
m
यक्त जेलर से भिड गया, जिसके लिए तीन महीने की
सजा भोर मिती।
४७
शिक्षक-विष्णु, तुम यह यताओ कि लोग व्हेल मछली
के मास को पाते हैं या नहीं ?
विष्णु-पाते है।
शितर-योर उसकी हड्डी को क्या करते हैं?
विप्गु-याली के किनारे छोड़ देते हैं।
"प्यारे, जरा उठो-उठो। मुझे मालूम होता है कि
चूहा
"तो तुम इस बात की पल्पना कर लो कि घर में एक
बिल्ली भी है, फिर तो तुमको नींद आ जायगो।"
४६
पुलिस-प्रॉफिसर-तो तुम अफ्रिका में पैदा हुए थे।
अभियुक्त-जी हाँ।
पुलिस नॉफिसर-कोन सा हिस्सा
अभियुक्त-क्यो, मेरा सारा हिस्सायहीं पेदा हुयाया।
"अाज का उना मापण बढी जाप्रति पदा करने
न्याला था, क्यों"
हल
"जी हाँ। जब तक भापण होता रहा, कोई भी न सो
सका"
वीमार की हालत देख कर डॉक्टर ने उसको स्त्री से
पूछा-क्यों, यह वही साना साते हैं, जो मैंने उनसे कहा
था?
स्त्री बोली-जी नहीं, थोडे दिनों और जीने के लिए
इस तरह भूसी रह कर प्राण देना नहीं चाहते।
५२
दो महिलाएँ एक नाट्यशाला से निकलीं। एक ने
पूछा-क्यों घहिन, तुम्हें कौन-सा पात्र पसन्द आया ?
दुसरी-वही, जो मोटा-सा था, लाल साफा बाँधे था
योर जिसकी नाफ चपटी थी।
पहली -पर न तो वह ठीक तरह से नाट्य कर सकता
था, न गा सकता था और न उसका पार्ट ही अच्छा था।
दूसरी-इससे क्या हुआ ? उसने मुझे तो एक फ्री
पास दे दिया था पोर कल भी बुलाया है।
रात को माँ साहा को मोलम हुआ कि मुर्गीवाने
में कोई है। तमचा भर कर अपने कमरे की खिड़की से
माँक कर बोले-कौन है? कोई उत्तर न मिला, फिर
ललकारा। फिर भी कुछ उत्तर न मिला । तीसरी बार
योले -अगर कोई है तो वोल दे, नहीं तो गोली मार
दूंगा । तव अावाज आई "में ही है।" माँ साहब खिडकी
बन्द करके बिस्तर में घुस गए।
५४
"याशा है कि कल सवेरे मेरे साथ भोजन करने में
आपको कोई प्रापत्ति न होगी।"
"जी नहीं।"
"तो फिर फत दस बजे श्रापके यहाँ में पहुँच
जाऊँगा।"
प्रतिवादी के वकील ने वादो से, जो एक स्त्री थी,
पूछा-तो क्यों श्रीमती जी, क्या श्राप यह सिद्ध पर
सकती है कि उस घटना में प्रापफा जो अँगूठा फट गया,
उसका मूल्य हजार रपया था?
पादी ने कहा-उससे भी अधिक । उसो ठेसे में
अपने पति को दयाए रखती थी।
एक मुर्गी बाणे को बेटी का व्याह हुथा। मुर्गीनाना
घर के पिपाडे था। उसने घाम कह दिया फि येटी की
पिदा पिछले दरवाजे से करना।
स्त्री ने पूछा-खो!
वह बोला-जब लोग इन पर चावल डालेंगे तो वह
मुर्गीपाने के सामने ही गिरेंगे और मुर्गियाँ चावल मजे
सेखाती हैं।
पिता-मो, श्राप मेरी बेटी से व्याह करना चाहते
विधाहेच्छु-(बर से) जी नहीं। यह आपसे किसने
कहा?
पिता-क्यों, उस लडकी में फोन सी बुराई है ?
-
दो मित्र एक साथ बैठ फर किसी होटल में खाना खा
रहे थे। एक ने हसी करने के लिए अपने मित्र से कहा-
तुम मेरी मॉ धन जाश्रो ओर परसते जायो। यह सुन कर
लोगों में खूब कहकहा उडा।
खाना खाने के बाद दूसरे ने कहा-तुम मेरे बाप धन
जागो और मेरे खाने का दाम पटा दो।
५६
एक मालिफ का नौकर छिपे छिपे रोज शराब पिया
करता था। एक दिन मालिक ने नौकर की जगह पर
शराब का एक बड़ा सा पोपा देख लिया। पहले तो वह
-
.
खूब नाराज हुए, पर जब नोकर ने कहा कि स्वास्थ्य लाम
करने के लिए मुझे डॉक्टर ने इसक प्रयोग की राय दी है,
तर पुछ ठण्ढे हुप । उन्होंने पूछा-इससे तुमको कुछ
फायदा भी हुश्रा है ?
नौकर बोला-जी हाँ , परसा जब यह लाया गया
था, तब तो इसे मुश्किल से तीन बादमी उठा सकते थे,
पर श्राज मैं ही अकेला इसे लुढका देता है।
नन्हीं-क्यों, मछली बहुत जल्दी बढा करती है ?
लाली-जी हो, चाचा जी ने कल एक मदली पकडी।
जय-जय चे उसका जिक्र करते है, तरन्तर वह चढती ही
जाती है।
पक अफीमची अपनी बीवी की लाश को फंक कर
श्रा रहा था। रास्ते में किसी ने भूल कर कोठे से उसके
सिर पर पक कागज छोड दिया। उसने उस कागज को
देप कर कहा -तुमने वहाँ पहुँचने का कुशल-समाचार
नो भेज दिया। पर जाते ही तुम देव भाषा सीख गर ।
मैं तो तुम्हारी चिट्ठी पढ़ ही नहीं साता।
६२
एक फस मादमी किसी होटल से अपना डेरा डण्डा
.
.
"मेहरवानी करके प्राज के खेल का प्रोग्राम तो
दीजिए।"
"पर खेल तो करीब-करीब सतम हो गया।"
"कोई परयाह नहीं, बीवी को घर में तो कुछ दिखाना
ही पडेगा कि में सारी रात कहाँ रहा।"
दारोगा-(सडक पर काम करते हुए एक मजदूर से)
सिर में टोपी लगा कर काम करो फल्ल , नहीं तो सूरज
की तेजी से तुम्हारा दिमाग पराप हो जावेगा।
कल्ल्-जी धन्यवाद ! मगर मेरे जो दिमाग ही होता
तो यहाँ यह काम करने मां पाता ?
लडाई में अपना तजुर्वा बतलाते हुए चुड्ढा बोला-
तब फिर डॉक्टरों ने मुझेतोपखाने में रख दिया और
एक श्रोता-शायद श्राप भृलते हैं। तोपखाना न
होगा, शफाखाना होगा।
बुड्ढा सिपाही-जी नही, तोपखाना था । म गोलियों
से इस तरह से भरा हुआ था कि उन्होंने मुझे तोपसाना
में ही ले जाना अच्छा समभा।
विमला-क्नो, तुम्हारे घर वाले को बिल्ली से नफ- रत हे फ्या? सरला हॉ, ये कहते हैं कि में अडोस-पड़ोस की सारी बिल्लियों को जिमाती हूँ। श्राई हो तो कुछ खा पीकर जाधोन? 1 एक सजन वकीलों की जोरों से बहुत कुछ बुराई कर रहे थे। बोले-सच कहता हूं, मुझे एक वकील बता दो, में झट एक फायर घता दूंगा। इतना सुन कर पक तगडा सा यादमी सामने ही श्रा धमका और बोला-मै वकील हूँ, यतला कौन कायर है। घका महोदय ने बड़ी नम्रता से जवाब दिया-में! "वस जनाय, माँ के सरन्त बीमार होने की चार पाते ही मने जामगाँव से साइक्जि में हया भरी और चढ़ कर रायपुर के लिए रवाना हो गया। मन में यही सोचता जा रहा था कि डॉक्टर यही कद देता कि जामय की या इन लिए बहुत फायदेमन्द योगी" "तय तो श्राप उन्हें रायपुर से रखे गए होंगे।" "जी नदी, हालत बहुत सराय दोने मे ऐसा न कर
सका। पर साइकिल को भीतर घसीटा और दोनों पहिए
की हवा
कमरे में ही खोल दी। मेरी माँ श्रय भगवान् की
दया से अन्यी है।"
एक गिरहक्ट किसी का पॉक्ट काट कर उसमें
का मनी-वेग उठा ले गया था । वह बेचारा अपने दुर्भाग्य
की कथा कह रहा था। इतने में उसका एक मित्र बोल
उठा-मेरे साथ यह बात कभी न होने पाती।
पहला-जी हां, मौका पाता तो देखते ।
दूसरा-यहाँ तो ऐसा मौका पाने के पहले ही मेरी
स्त्री का हाथ उसमें पड़ जाता जनाब !
८८
एक रेलवे कर्मचारी के कान घटनावश बहरे हो गए।
पर रेल के डायरेक्टर लोग उसे नौकरी से अलग नहीं
करना चाहते थे। यही राय हो रही थी कि उसे दूसरी
नौकरी दी जावे या पेन्शन दे दी जाये?
एक जवान डायरेक्टर बोल उठा-उसे शिकायत
विभाग (कम्प्लेएट डिपार्टमेण्ट) में रस दीजिए।
८९
"अपनी स्त्री को मोटर चलाना सिखाने के लिए सब
से पहले मुझे क्या करना चाहिए ?"
"अपनी मोटर का वीमा करा लीजिए।"
.
३१
"जब तक पञ्च ने उस महिला को निरपराध करार
दिया, तब तक वह उनकी ओर मुस्कराती ही रही।"
"फिर?"
"उसने हंस दिया।"
डॉक्टर-चारे की आँख इतनी खराब हो गई थी
कि वह जो कुछ देसता, वह सब उसे डबल ही दीखता।
तब तो चारे को कोई नोकरी न मिली होगी?"
डॉक्टर-बडी सरलता से मिल गई । बिजली-
कम्पनी ने उसे मीटर पदोको फोरत रख लिया।
९२
"श्रगर जिन्दगी का सब से ज्यादा मजा उडाना है
तो या तो किसी बड़ी उलझन में पड जाये या किसी सी
के प्रेम में ही फंस जावे।"
"दूसरी यात ही क्यों न परे, जिसमें पहली बात आप
दी उपस्थित हो जाय।"
मेरेल-कल रात फ्लेरेन्म और फ्लॉड दोनों ने मुझमे
विवाह परोपाप्रस्ताय किया।
३२
मरियल-और तुमने दोनों को इन्कार कर दिया?
मैवेल-यह तुमने कैसे जाना?
मरियल-तुम्हारे यहां से निकल कर उन दोनों को
ने आपस में हाथ मिलाते देखा था।
एक बार वह एक नाटक में गुरु वशिष्ठ का पार्ट कर
रहा था। हेली करने के लिए वह उसी भेप में अपने पक
फ्लर के भीतर जाने लगा। दरवान ने उसे न पहचान
कर ललकारा-कौन है?
उसने कहा---गुरु वशिष्ठ ।
दरवान ने मेम्बरों का रजिस्टर उठा कर देखा। कहीं
वह नाम दिखलाई न पडा। बोला-अब श्राप मेग्यर नहीं
रहे।
९५
"जब-जब श्रापका व्याख्यान होता है, तप-तब में
जरूर सुनने श्राता है।"
"क्यों, मेरे ही व्यारयान में क्यों जाते हो"
"क्योंकि अापके व्याख्यान के दिन बैठने के लिए
खूप जगह मिलती है।"
-
उपदेशक-तुम लोगों को मालूम हो कि एक बार के
३३ चुम्धन से चालीस हजार प्राण घातक कीडे एक से दूसरे के मुँह में जाते हैं। नई जोडी-जी, पर हम इसके लिए चालीस लाप थार मरने को तैयार है। कुछ लोगों ने मिल कर फोटो लेने की ठानी और फोटोग्राफर से भी साथ में बैठने का अनुरोध किया। फोटोग्राफर ने सब ठीक कर एक लडके को उसका षटन दाना सिखा दिया और वह जाकर लोगों में बैठ गया। सब ठीक हो जाने के बाद फोटोग्राफर ने उस लड़के से पूछा-लों जी | तुमने यटन ठीक वैसे ही दवाया, जैसा कि मैने सिपाया था ? लडका पोला-जी हां, फोटो लेने के पक्ष मैने प्राधे दर्जन पार कोशिश करके देख लिया था। ९८ लन्दन में एक युवक अमेरिका के अपने एक मित्र को यहाँ यी कुछ इमारत वगैरह दिग्वजा रहा था । एक सुन्दर- सी इमारत दिसला फर उसने पूछा-कदो, यह कैसी है? अमेरिकन ने फहा-कुछ यगय नहीं है। पर यहाँ तो एक ही है। अमेरिका में नापो में ऐस सैकडॉ दिखा सकता है। ।
इगलिशमैन ने कहा-खैर इसकी कोई बात नहीं।
यह तो एक पागलसाना है।
९९
एक विवाहिता स्त्री-मेरे पति सदेव भाग्यशाली ही
रहे हैं। बचपन में घोडे की पीठ पर से गिर पडे, पर धाल
पॉका न हुश्रा । बढने पर उनके घर में भाग लगी, पर धे
जीवित ही रहे और
एक अविवाहित पुरुष-और अाज बीस वर्ष, हुए
तुमसे विवाह किया, पर अब तक जीवित ही रहे !
.
एक रईस को थोड़ी-थोड़ी देर बाद अपनी तबीयत
खराब मालूम होती थी और जहाँ भी होते, अपने डॉक्टर
को धुलवा भेजते। एक दिन बाजार में डॉक्टर से भेंट
होते ही वह घोले-डॉक्टर साहब, इस समय मुझे बडी
सुस्ती लग रही है। सर चक्कर खा रहा है और घर जाते
नहीं बनता , कहिए इसके लिए कौन दवा लूँ ?
डॉक्टर चोला-एक मोटर किराए पर कर लीजिए।
-
डॉक्टर साहब की दूकान पर मरीजों की खूब भीड
लगी हुई थी। उन्होंने दूकान खोलते हुए कहा-तुम
लोगों में सबसे ज्यादा देर तक कौन रुका हुया है?
4
m
३५
पक दर्जी अपने विन को आगे बढ़ाते हुए बोला-मैं।
जो कपडे श्राप इस समय पहने हुए हैं, उन्हें मैंने ढाई
वर्ष पहले घना कर दिया था, उसी का यह बिल है।
१०२
पक पार काउन्सिल में बहस करते-करते एक सदस्य
श्रापे से बाहर हो गए और घोले-इस काउन्सिल के
श्राधे सदस्य मूर्य है। इस पर सदस्यों ने घडी आपत्ति
की। उनसे माफी मांगने के लिए कहा गया।
उस सदस्य ने कहा-अच्छा, मैं अपनी यात वापस
खोता है और अब यह कहता हूँ कि इस काउन्सिल के
श्राधे सदस्य येवकूफ नहीं हैं।
१०३
"प्रोफेसर साहब, अगर में श्रापको 'गधा' कह दूँ,
तो इसमें अपमान हो जायगा?"
प्रोफेसर अवश्य ।
"और अगर एक गधे को 'प्रोफेसर' कह तो?"
प्रोफेसर-तय न होगा।
"ठीक है, प्रोफेसर साहय ।"
१०४
"अगर अापने अपनी मोटर के चोर को पहचान ही
जिया है, तो फिर उसे गिरकार क्यों नहीं कर देते?"
4
"क्योंकि अगर वह उसे पकाध दिन चलाएगा तो
उसे उस पर नए टायर चढ़ाने ही परेंगे। इसी से मैं थोड़े
दिन ठहरा हुआ हूँ।"
खाँ साहब-कहते हैं, योगी अरविन्द की जोड का
कोई भी व्यक्ति नही है।
मिस्टर पफ्स-यह सुन कर श्राज मेरा जी हलका
हुश्रा।
खाँ साहब-ली?
मिस्टर एक्स-योंकि पक से अधिक अरविन्द हो
जाते।
"प्रिये, मैं तुम्हारे लिए नरक में भी जा सकता है।"
"यह फैसे मालूम हो?"
"मेरी स्त्री होकर देख लो।"
१०७
मास्टर-सयोग का कोई अच्छा उदाहरण बतायो ।
-मेरी माँ और बाप का विवाह एकही।
दिन हुआ था।
एक लडका-
"मेरी स्त्री ने कल रात को मेरा पॉकेट टटोल डाला।"
-
३७ "उसे क्या मिला?" “वही, जो दूसरे खोजियों को मिलता है-शेक्चर के लिए खासा मसाला ।" - घोर वर्षा होने के कारण एक यात्री को एक सराय में घुस जाना पडा । यह दरवाजे पर बैठे हुए चौकीदार से पोला यह तो प्रलय-सी मालूम हो रही है चौकीदार-ौन प्रलय? यात्री नहीं जानते १ वही, जिसमें केवल विष्णु भग- वान् घालमुकुन्द के रूप में यड के एक पत्तै पर रह गए थे और जिन्हें देख कर मारकण्डेय मुनि विस्मित हो गए थे। चौकीदार-मुझे तो इसकी कुछ भी खबर नहीं । तीन- चार दिनों से इधर कोई अखगर भी नहीं पाता। ११० एक श्राशावादी नायिका-(अपने प्रेमी से) सौन्दर्य के इतने उपासक होते हुए भी श्रापने अध तक विवाह क्यों नही किया? निराशावादी प्रेमी-अगर अादमी फूल को प्यार करता है, तो उसके लिए माली होना जरूरी नदी है। १११ पत्ति-प्रिये, तुमको इस देश में देख कर मुझे घेदद गुशी होती है। पर इसमें बहुत पर्व है।
"क्योंकि अगर वह उसे पकाध दिन चलाएगा तो
उसे उस पर नप टायर चढ़ाने ही परेंगे। इसी से मैं थोड़े
दिन ठहरा हुश्रा है।"
खाँ साहब कहते हैं, योगी अरविन्द की जोड़ का
कोई भी व्यक्ति नही है।
मिस्टर एक्स-यह सुन कर श्राज मेरा जी इलका
हुश्रा।
खाँ साहब-क्यों?
मिस्टर एक्स-गोंकि एक से अधिक अरविन्द हो
जाते।
१०६
"प्रिये, में तुम्हारे लिए नरक में भी जा सकता है।"
"यह कैसे मालूम हो?"
"मेरी स्त्री होकर देख लो।"
१०७
मास्टर-संयोग का कोई अच्छा उदाहरण बतायो।
एक लडका-मेरी माँ और पाप का विवाह एक हो
दिन हुआ था।
"मेरी स्त्री ने कल रात को मेरा पॉकेट टटोल डाला।"
३७ "उसे क्या मिला" "वही, जो दूसरे खोजियों को मिलता है-लेक्चर के जिप खासा मसाला ।" १०९ घोर वर्षा होने के कारण एक यात्री को एक सराय में घुस जाना पड़ा। वह दरवाजे पर यैटे हुए चौकीदार से बोला-यह तो प्रलय-सी मालूम हो रही है। चौकीदार-ौन प्रलय यात्री-नहीं जानते १ वदी, जिसमें केवल विम्णु भग- घान् बालमुकुन्द के रूप में यड के एक पत्तै पर रह गए थे और जिन्हें देख कर मारकण्डेय मुनि विस्मित हो गए थे। चौकीदार-मुझे तो इसकी कुछ भी खबर नहीं । तीन- चार दिनों से इधर कोई शखयार भी नहीं पाता। ११० एक श्राशावादी नायिका-(पो प्रेमी से) सौन्दर्य के इतने उपासक होते हुए भी आपने अब तक विवाद क्यों नहीं किया। निराशावादी प्रेमी-अगर श्रादमी फूल को प्यार करता है, तो उसके लिए माली होना जरूरी नदी है। १११ पति-निये, तुमको इस देश में देख कर मुझे येहद खुशी होती है। पर इसमें बहुत पर्च है।
Am
पती-पैसे की क्या चिन्ता, स्वामी! मुझे तो तुम्हें
खुश
करने की चिन्ता रहती है।
११२
"सरोजिनी के पास शायद एक नया 'वेवी पाया है।"
"लड़की या लडफा"
"वेषी मोटरकार"
११३
(टेलीफोन से) "हेलो । हेलो !! जग डॉक्टर साहब
को जल्दी भेजो। मेरा बचा एक सुई निगल गया है।"
नौकरानी-(टेलीफ़ोन से) डॉक्टर साहब काम में
लगे हुप हैं । सुई की क्या अभी दी जारत है।
११४
श्रभ्यागत-(एफ छ वर्ष के घरचे से) क्यों बच्चे, मुझे
पहुँचाने स्टेशन तक न चलोगे?
घच्चा-जी नहीं क्योंकि श्रापके जाते ही हम सब
खाना खाने बैठेंगे।
११५
"श्रापके सिर की यह सूजन श्रापके सङ्गीत-प्रेम की
सूचिका है।"
“जी हाँ, यह सगीत की ही सूजन है । सिर पर तबला
गिर जाने से यह दो गई थी।"
.
प
३६
हल
बच्चा-क्यों दीदी, तुमने यह कहा था नकि तुम्हारी जो
एकनी खो गई है, अगर वह मुझे मिले तो उसे मैं रख लूँ।
दीदी-हाँ!
बच्चा-तब तो तुम मुझे ग्यारह पाई और दो । वह
'एफनी नहीं-एक पाई दी थी।
"विवाह होने के पहले तो तुम कहा करती थी कि
दुनिया में तुम्हारे घराघर कोई है ही नही।"
"जी हाँ, ओर श्रय तो ऐसा कहते मुझे ईषा होगी।"
११८
राहगीर--(एक नौकर से) क्यों जी, फलर साहय का
मकान पही है?
नौकर -यह तो नहीं है, पर इसी सडक पर है।
"उस मकान का नम्बर जानते हो"
नौकर-जी हाँ, उनके मकान के सामने ही लिखा है।
११९
एक बच्चा रोता हुप्रा स्कूल से भाया । माँ ने
पूछा-माफिर किसी से लड यैठे ! मैंने कहा था कि
जर तुमसे कोई छेड-धाड करे तब सबसे पहले मन में ही
१,२,३ करके १०० तक गिन लेना, फिर तुम्हारी जीव
अवश्य हो जायेगी।
बच्चा-मैंने तो ऐसा ही क्यिा। पर रामा की माँगे
उसे पचास तक ही गिनना सिपाया था!
१२०
मेजिस्ट्रेट--तुमने यह फजूल कर ही लिया है कि
तुमने पुलिसमैन पर उसी तरह से हमला किया था, जैसा
कि ययान किया गया है।
अपराधी-जी हाँ!
मैजिस्ट्रेट तो श्रप क्या करना चाहते हो?
अपराधी-उससे इन्कार करना चाहता हूँ।
१२१
स्त्री-शायद चोरों की आवाज पा रही है। जगते
तो हो?
पति-नहीं।
१२२
"उफ । श्राज मुझे सब से ज्यादा उधार देने वाले से
मेरा नाता टूट गया । ।
"क्यों, क्या वह मर गया?"
"नहीं, लाचार होकर कल मैंने उसका सारा कर्ज
श्रदा कर दिया।
--
हरी-भूमध्य-रेखा एक काल्पनिक रेखा है, जो एक
ध्रुव से दूसरे ध्रुव तफ खींच दी गई है और जिस पर
पृथ्वी घूमती है।
मास्टर साहब-पमा उस रेखा पर साइकिल चला
सकते हैं।
हरी-जी हाँ!
मास्टर साहय-कैसी साइफिल ?
-एक काल्पनिक साइक्लि ।
१३०
बचा-(माँ से, जिसे उसी समय लाक्र दिया गया था)
क्यों माँ, आप हमारे बाप कौन होंगे?
१३१
एक रईस एक होटल में ठहरे हुए थे। रात को सोते
वक्त अपने जूतों को उन्होंने कमरे के पाहर रख दिया।
उन्होंने सोचा था कि उन्हें मैले देख कर होटल का
नौकर पॉलिश कर देगा। पर सवेरे उठ कर अप उन्हें पैसे
दी पाया, तब नौकर को मुला फर फटफारा-पयों जी,
मैने जूतों को किस यास्ते कमरे के बाहर रख दिया था?
नौकर ने नरमी से जवाब दिया-युछ पह महीं
सकता हुजर । पेमदपी माफ करगे, मैंने तो यही समझा
स्टेशन पर खडी हुई। एक मुसाफिर दौडा हुना गार्ड
के पास गया और बोला-यहाँ चाय पीने का काफी
चवत है?
गार्ड ने कहा-हाँ-हॉ, क्यों नहीं ?
मुसाफिर-पर मुझे यह कैसे यकीन हो कि मेरे लौटे।
बिना गाडीन जायगी?
गाई -एक ही तरीका है, मैं भी आपके साथ चला
चलता हूँ।
१२७
"शायद श्रापके स्वामी की नौकरी छूट गई है ?"
"नहीं, अब घे मेरे नहीं रहे।"
"मी"
"क्योंकि अब उनकी नौकरी नहीं रही।"
१२८
दाँत के डॉक्टर की स्त्री-यह हमारी पुरानी नौकरानी
है। उसके जन्म-दिन के उपलक्ष में हमें उसे कुछ पुरस्कार
अवश्य देना चाहिए।
डॉक्टर-जकर, मैं उसके दो दाँत तक मुफ्त में ही
उपाड दूंगा।
१२९
मास्टर साहब-हरी, भूमग्य-रेखा किसे कहते हैं ?
.
हल
हरी-भूमध्य रेखा एक काल्पनिक रेखा है, जो पक
ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक खींच दी गई है और जिस पर
पृथ्वी घूमती है!
मास्टर साहब-क्या उस रेखा पर साइकिल चला
सकते हैं?
हरी-जी हाँ!
मास्टर साहब-कैसी साइक्लि ?
हरी-
-पक काल्पनिक साइक्लि ।
१३०
घद्या-(माँ से, जिसे उसी समय तनाम दिया गया था)
'क्यों माँ, अय हमारे बाप कौन होंगे।
१३१
एक रईस एक होटल में ठहरे हुए थे। रात को सोते
वक्त अपने जूतों को उन्होंने कमरे के बाहर रख दिया।
उन्होंने सोचा था कि उन्हें मैले देख कर होटत का
भोकर पॉलिश कर देगा। पर सवेरे उठ कर जब उन्हें पैसे
ही पाया, तप नौकर को घुला कर फटकारा-फ्यों जी,
मैंने जूतों को किस धास्ते कमरे के बाहर रख दिया था ?
मौकर ने नरमी से जपाय दिपायुच यह नहीं
सफ्ता हुजर । मदवी माफ फरगे, मैंने तो यही समझा
,
।
LA
था कि श्राप नशे में मस्त थे, इसीलिए अपना जूता बाहर
छोड गए होंगे!
१३२
मरीज-डॉक्टर साहय, कह नहीं सकता कि मुझे
क्या हो गया है, पर श्रय मुझे यह श्राशा नहीं रही कि
मैं अधिक दिन जी सकूँगा।
डॉक्टर-क्यों, तुम्हारो बीमारी ठीक उसी तरह की
है, जैसे कि कुछ दिनों पहले मुझे थी, पर अब मुझे देखो।
मरीज-हाँ, यह तो ठीक है , पर आपके लिए कोई
अच्छा-सा डॉक्टर मिल गया होगा। क्यों?
१३३
"क्यों, अब तक तुम्हारी शादी नहीं हुई है ?"
"नहीं"
"कुछ तय-वय हुश्रा?"
"नहीं।"
"तब क्या मामला है "
"मेरे बाप तो कहते हैं कि मेरी स्त्री खूबसूरत और
धनवान हो। माँ कहती हैं कि वह खूब काम करने वाली
हो और मेरी राय है, यह तन्दुरुस्त और पढ़ी-लिखी हो।
हम सब ऐसी ही लड़की की तलाश में हैं।"
४५ A - - १३४ बूढ़ा पति-मुझे उसकी बडी फिक लग रही है कि ऐसी मारी बारिश में वह बाहर ही घूम रही है। नौजवान मित्र-घयगी नहीं मियाँ, किसी न किसी मकान में अवश्य ठहर गई होगी। बूढ़ा पति-यस इसी की तो फिक्र है। १३५ निम्नलिखित बातें जल्दा समझ में नहीं पाती (१) पुरुष के कपड़ों में लम्बे बाल , (२) इनकम- टेपस का तरीका , (३) अमेरिका की भाषा , (४) छत्तीसगढ़ के रीति-रिवाज , (५) मौसम , (६) बेटे से स्पर्धा, (७) लोग पैदा क्यों होते हैं . (%) लोग विवाद क्यों कर लेते हैं। (६) लोग विवाद क्यों नहीं करते १(१०) स्त्रियों की उम्र ,(११) स्त्रियों की 'नहीं', (१२) नाई की जयान,और (१३) पैसा कहा जाता है? १३६ पकमला आदमी प्रति दिन सनग्या को एक मठियारिन के पास दिल बहलाने के लिए बैठ जाया करता था। उस भने श्रादमी के मित्र ने पफ दिन कहा-तुमको उससे इतनी मोहब्बत है, तो फिर उसी से विवाह क्यों नहीं पर
,
मला यादमी धोला-तब फिर अपना शाम का वक
कहाँ कादगा
१३७
मास्टर-अगर पानी को न उवालो तो तुमको फ्या
दो?
पफ लडफा-तपेदिक का ज्वर।
मास्टर-और अगर उबाल लो तो तुमको क्या
मिलेगा?
दूसरा लडका- नहाने को गरम पानी ॥
१३८
सजा पूरी हो जाने पर एक कैदी को जेलर ने उसे
छोडते हुए वहुत सा उपदेश दिया और कहा-अब अपनी
श्रादत सुधार कर रहना । परन्तु कैदी खडा ही रह गया।
जेलर ने कहा-श्रय किसके लिए सडे हो?
कैदी ने धीरे से कहा-अपने औजारों के लिए।
१३९
"तो तुमने उसकी ख़ातिर शराब पीना छोड दिया ?"
"हाँ"
"और उसी की खातिर तम्बाकू पीना भी छोड
दिया"
"हाँ"
-
1
"नाच-रह, जुश्रा वगैरह भी!"
"हाँ"
"तब फिर तुम उससे विवाह क्यों नहीं कर लेते"
"इतने सुधार हो जाने के बाद अब मैं उसकी जरूरत
ही नहीं सममता !"
२४०
गुरु--क्यों जी, जागना क्रिया का भूतकाल क्या है ?
शिष्य-सोना।
१४१
"श्रजी तुम उसकी सुरत तो देखते। बिल्ली भी उसे
देख कर खिलखिला पडती है।"
"तब तो तुम्हें खूब हँसी श्राई होगी ?"
१४२
"जय में नाटक में भरती होने गई, तो मैनेजर साहय
ने मेरी उम्र पूछी, पर मुझे कुछ याद नहीं रहा कि पीस है
या इकोसा"
"वव तुमने क्या कहा?"
"मैने कोई दुविधा की बात कहना ठीक नहीं समझा।
अपनी उम्र उन्नीस पता दी।"
१४३
दो वर्ष बाद एक नायक फिर अपनी नायिका से
।
।
।
किसी स्थान में मिला । नायिका को यह घटना याद श्याई,
जिसके कारण उस नायक को दो वर्ष की सजा हुई थी।
उसी को याद करते हुए जरा शर्म से नायिका ने पूछा-
कहो, तुम्हे वह दिन याद है, जब कि तुमने मुझसे अपना
इरादा प्रस्ट किया था और मैंने इन्कार कर दिया था?''
नायक-अच्छी तरह से । यह शुम दिन, जबकि में
सर्वनाश होने से घचा, अच्छी तरह से याद है।
१४४
भोज समाप्त हो जाने के बाद महिलाओं की ओर से
एक सज्जन को कुछ कहने को कहा गया। पर एकापक
उनसे कहते न धना । वह बहुत देर तक दीवार पर
टैगे हुए चित्रों की ओर देख कर योले-सजनो।मैं समझ
नहीं सकता कि इन चित्रों की क्या जरूरत थी, जबकि
हमारे सामने इतने सुन्दर-सुन्दर सजीव चित्र मौजूद हैं।
१४५
एक मसखरे ने एक सङ्गीतकार के पास लिख भेजा--
एक नया गीत कृपया लिप भेजिए । अगर अच्छा हुश्रा
तो एक चेक भेजूंगा।
सङ्गीतकार ने जवाब दिया-कृपया एक नया चेक
भेज दीजिए । अगर चेक अच्छा हुश्रा, तो एक गीत लिख
भेज़ंगा।
--
४६
१४६
"प्रिये, तुम फमी तो जनाने वेश में रहती हो और
कभी मर्दाने ?"
जी हाँ! यह तो मेरी वश-परम्परा की बात है।"
"वों"
"मेरे पुरखों में से आधे पुरुष थे शोर श्राधे खी।"
१४७
मास्टर-दर्पण क्या है, जानते हो हरी ? मुंह को घो
क्षेने के बाद फिर किस चीज को ढूंढते हो?
हरी-मुँह धोने के बाद तौलिया हूँ ते हैं,
सादव।
१४८
"और जब मैंने विदा मांगी, तो वह मुझसे चिपट
गई और पञ्चों की तरह सिसफने लगी। फिर मेरे गले में
दापसात कर
"मैं उसकी लय श्रादतें जानता है। एक बार मेरे
साथ भी उसने ऐसा ही पिया था।"
१४९
पति-देखो प्रिये, पिछले महीने ही तुम्हारे कपडे
मास्टर
1
४
.
पू०
यनाने वाले का एक ७४ रुपए का विल पटाया हे और
इस महीने यह दूसरा ६० रुपए का बिल आगया ।
पत्नी--क्यों प्यारे, क्या इससे यह मालूम नहीं होता
कि मैंने अपना खर्च कम कर दिया है ?
1
1
१५०
एक छोटा बच्चा--(एक बूढ़े से) महाशय जी, जरा
मेरी बीडी तो सुलगा दीजिए ।
बूढ़ा-धोंडी?
छोटा बच्चा-जी हाँ, माँ कहती है कि तुम अपने
हाथों से बीडी न सुलगाया करो।
१५१
बच्चा-क्यों दहा, राजा किसे कहते हैं ?
दहा-बेटा, राजा उसे कहते हैं जो दण्ड दे सकता है
श्रोर जिसकी वात लोग मानते हैं।
घच्चा-तो मेरी माँ भी राजा है ?
१५२
"श्रजी, अर तो मेरी बेटी एक आदमी की तनख्वाह
पाती है।"
"अच्छा ! उसने विवाह कय कर लिया?"
१५३
मास्टर-'मनुष्य चिना देश के'-इससे खराव और
क्या हो सकता हे?
लडका-देश यिना मनुष्य के !
१५४
"मेरे विचार में सब से उजड छोकरे वे है, जोकि
हरेक बात का जवाब, सवाल करके देते हैं।"
"श्रापका क्या यही विचार है ?"
"जनाय, मेरी मोटरकार चौदह वर्ष की पुरानी जकर
है। पर आज तक न तो वह एफ पार टूटी है, न कभी
चलने हुए अटकी है और न उससे कोई दुर्घटना ही
हुई है।"
"शायद अाज तक आपने उसे एक बार भी न चलाया
होगा ?"
१५६
घुड्ढा ग्राइफ-पके बाल के लिए अापके पास
दूकानदार-दिल में पड़ी भारी इनित ।
५२ १५७ मैजिस्ट्रेट-उसको जरा भी पता न लगा और तुमने उसके पॉक्ट से कैसे वह नोट चुग लिए? अपराधी-यह सारी क्रिया लिखाने के लिए मैं पांच रुपए फीस लेता हूँ। १५८ शिक्षक-शालको, तुम लोग हमेशा याद रक्खो कि 'स्तान' किसी शब्द के साथ जोड देने से उसकी जगह फा सूचक होता है। जैसे-अफगानिस्तान अफगानों की जगह, तुर्किस्तान तुको की जगह । इसी तरह के तुम लोग कोई दूसरे उदाहरण पता सकते हो? पक लडका-टेचस्तान देवों की जगह, घोडस्तान घोडों की जगह, जूतस्तान जूते की जगह । १५९ एक लड़के पर मुर्गी चुराने का धार-यार मुकदमा चलाते-चलावे एक मैजिस्ट्रेट साहर परेशान हो गए । जव वह फिर पकडा गया, तब उन्होंने उसके पाप से ही कहना ठीक समझा । बुड्ढे श्रादमी को बुलवा कर कहा-इसको मैं यहाँ धार-धार देख फर परेशान होगया। तुम इसको ठीक रास्ता क्यों नहीं बताते, ताकि यह फिर यहाँ न श्राप इजर ठीक रास्ता तो मैंने उसे बार- - बुढा बोला- १३ गारटर- बार घतलाया। पर क्या क्रु, उसके निकलते ही मुर्गियाँ जोर से फडफडा कर चिल्ला उठती है और वह पकड लिया जाता है। १६० -मूर्ति के आँखें होती हैं, पर वह क्या नहीं कर सकती? वोलो मोहन ? मोहन-देख नहीं सकती। मास्टर-उसके कान होते हैं, पर सोहन-सुन नहीं सकती। मास्टर-होठ होते हैं, पर मोहन-योल नहीं सकती। मास्टर-नाक होती है, पर लल्लू-पोंछ नहीं सकती। ? - 4 १ "किमी-किसी पुत्ते को उसके मालिक से भी ज्यादा । बुद्धि होती है।" "कमी नहीं।" "याद जनार, श्राप मेरे कुत्ते को नहीं जानते ।" १६२ "यह तो तुम्हारी प्रियतमा का चित्र है। इसे ससार का नरया क्या कहते हो" -
"क्योंकि वही मेरे लिए सारी दुनिया है।"
एक पण्डित जी अपने एक यजमान पर नाराज होकर
योले-तुम जानते हो, तुमको नरक मिलेगा। वहाँ तुमको
देख कर मुझे घडी सुशी होगी।
१६४
एक नामी चित्रकार ने एक पार सिविल सर्जन को
जरूरी काम के नाम से बुलवा लिया। उसके याने पर
बोला-डॉक्टर साहय, मेरा कुत्ता वीमार है। उसी के
बारे में सलाह लेने के लिए मैंने आपको कष्ट दिया है।
सिविल सर्जन को बडा क्रोध श्राया, पर चे फ्रोध करके
क्या करते ? 'विजिट' की फीस तो उन्हें मिल दी गई थी।
कुछ दिनों के बाद उन्होंने भी उस चित्रकार को एक
जरूरी चिट्ठी भेज कर बुलवा लिया। चित्रकार जब
पहुँचा तो घोले-एक श्राले को रेंगवाना था, इसी से
वुलवा लिया कि आपकी क्या राय है।
"मों श्रापसे दस अण्डे उधार माँगती है, ताकि उन्हें.
मुर्गों हमारे घर में सेवे। श्राप उधार देंगी?"
"मैं नही जानती थी कि तुम्हारे यहाँ मी मुर्गी है।
"जी नहीं, हमारे यहाँ मुर्गी नहीं है। आपके यहाँ
।
-
के अण्डों को सेने के लिए उन्होंने एक मुर्गी भी उधार
ली है, ताकि बच्चे हमारे हो जायें।"
.
।"
....
"क्या कर रहे हो प्रियतम"
"चतुर स्त्री अपने प्रियतम से ऐसा सवाल कभी नहीं
कर सक्ती"
पर एक चतुर पुरुष तो अपनी
"जी नहीं । चतुर पुरुष के स्त्री होती ही नहीं।"
१६७
पति-जरा हाथ संभाल कर खर्च किया करो। जरा
भविष्य को तो सोचो। मैं मर जाऊँगा तो फिर तुम
कहाँ रहोगी?
पत्ती-में तो यहीं रहुँगी। सवाल तो यह है कि
अगर ऐसा हो गया, तो तुम कहाँ रहोगे?
१६८
किसान-कहिए डॉक्टर साहब, क्या हाल-चाल है।
डॉक्टर-इन्फ्लुएन्जा की फसल पराध हो रही है।
"प्यारे में तुम्हारे पैरों पडती हूँ। तुम मुझे कमी
मत भूलना और जिस जिस देश में जाना, वहां-वहाँ से
मुझे अयश्य पत्र लिम्बना।"
हुल ५६ "प्रिये, सच कहना, तुम प्रेम से ऐसा कह रही हो, या भिन्न-भिन्न देश के टिकट इकट्ठा करने की इच्छा से।" . तरुणी-(लद कर और गुस्से में पाकर)मैं अपनी माँ के घर चली जाऊँगी। पति-(शान्ति से) अच्छा है, रेल-खर्च के लिए यह पेसे ले लो। तरुणी-पर वापसी मुसाफिरी के लिए तो इतने पैसे काफी न होंगे। १७१ पति-देखो, उधर नायक और नायिका दोनों कितने सुखी जान पड़ते हैं। पत्नी-उनका विवाह कय हुश्रा? पति-अभी तक नहीं हुआ है। १७२ मास्टर--(क्रोध से) मेरे घेत लगाने के पहले तुम और पुछ कहना चाहते हो? तुम्हें मारते हुए तुमसे ज्यादा मुझे चोट लग रही है। लडका-यापने तो कोई अपराध नहीं किया है, इस- लिए श्राप अपने को इस तरह सजान दीजिए । 5
१७३
लडकी-(जिसकी शादी होने वाली है) मा, तुम
मेरे
लिए जरूर ही एक नया मखमलो जैट बनवा देना।
माँ-(अपनी पुरानी जेकेट को देती हुई) यह जैकेट
मेरे विवाद में काम पा सकी, तो क्या तुम्हारे काम न
श्रापगी?
१७४
गार्ड-श्रीमती जी, जल्दी चढ़ जाइए । गाडी छूटने
'ही वाली है
श्रीमती जी-जरा अपनी छोटी वहिन को चूम लेने
दीजिए।
गाई-श्रापका यह फाम में किए देता है, श्राप चढ
जाइए।
१७५
पक बीज की दुकान से एक आदमी ने पन्द्रह पार
मटर के नमूने मुह मेंगाए । जब उसकी सोलहवी चिट्ठी
श्राई, तो दुकानदार ने परेशान होकर लिसा-क्या श्राप
श्रपोसारे गांव में सिर्फ मटर ही पोना चाहते है ?
उस यादमी ने जवाब भेजा-हम लोग उसे धोते.
योते नहीं, घर में उसकी तरफारी बनती है। कृपया
नमूना मुक्त शीघ्र ही भेजिए।
। एक डरपोक श्रादमी जब घर किराए पर लेता, तो हमेशा सबसे नीचे की ही कोठरी लेता। उसे यही फिक लगी रहती कि अगर घर में श्राग लगी, तो फ़ौरन निकल भागूंगा। एक बार उसे चौथी मजिल में कमरा मिला। उसके पिछवाडे एक छोटी सी खिडकी थी, उसे देख कर वह बडे सोच में पड़ा था। अन्त में उसके मुंह से यही श्रावाज निकली कि मीका थाने पर यहाँ से कैसे निकल भागूंगा! घर के मालिक ने यह सुनते ही कहा-घब- हाश्रो नहीं, वह मौका ही नहीं पा सकता। में किराया मेथा पेशगी ही ले लेता हूँ। १७७ एक फम्पनी का एजेण्ट बहुत ही चालाफ था। यह अपने माल के नमूने लेफर एक रईस के पास 'श्रॉर्डर' लेने गया और बोला-या साहय, निहायत ही चीजे हैं, पुछ गरीदिएगा? रईस-नहीं। एजेण्ट-पम से कम नमूने तो देख लीजिए। रईम-माई, इस वन माफ करो। एजेण्ट-वर, श्राप म देखें। मुझे दी तो देप लेने दोजए, मेंने स्यय भी इन्हें नहीं देगा है। -
.
५६
१७८
"श्राज मैने पाँच मच्छड मार डाले । दो नर थे और
तीन मादा।"
"ये तुमने कैसे पहचाना ?"
"दो तो एक कोने में भनभना रहे थे और तीन दर्पण
के सामने चकर काट रहे थे।"
१७९
एक अमीर के लड़के को उसके गणित के अध्यापक
ने एक सवाल गलत होने के कारण छुट्टी हो जाने पर भी
रोकना चाहा, क्योंकि उसका एक सवाल गलत था।
लड़के ने पूछा-कितने का फर्क है ?
अध्यापन-तीन रुपए का।
लड़का-तीन रुपए में आपको अपने पॉक्ट से दे
दूँगा, पर इस वक्त श्राप मुझे छोड दीजिए । इसी वक्त
एक जरूरी काम से बाहर जाना है।
१८०
पुलिस-श्राप फी घण्टे साठ मील के हिसाय से
मोटर चला रहे थे, इसलिए श्रापको अपना नाम और
पता पताना होगा।
मोटर बाला-श्रमी तो मेरा एक घण्टा पूरा मी नही
हो पाया है, श्राप मोटर की रहार फा पता कैसे लगा
६०
1
।
१८१
छमाही परीक्षामें श्यामू को एक कठिन सवाल करने को
कहा गया । सवाल यह था-यदि एक घोडा डेढ़ मिनिट
में एक मील दौर सकता है और दूसरा घोडा उतनी ही दूरी
दो मिनिट में तय करता है, तो यह बताया कि अगर
दोनों घोड़े एक साथ अपनी-अपनी रफ्तार से दो मील की
दौड, दौडें तो पहला घोडा कितना आगे निकल जायगा?
जय सवाल करते न बना, तो श्यामू को एक उपाय
सूझा । उसने जवाब में लिख दिया-मुझे बहुत अफसोस
है कि घुडदौड से किसी प्रार का सम्बन्ध रखना मेरे
सिद्धान्त के विरुद्ध है। इसलिए यहाँ उसके बारे में कुछ
भी में नहीं लिख सकता।
1
.
"महाशय जी, श्राशा है कि इस शुभ कार्य में श्राप भी
कुछ सहायता देंगे।"
"जी हाँ, यह चेक ले जाइए।"
"पर आपने तो इसमें अपना नाम ही नहीं लिखा।"
"में यह नाम के लिए नहीं दे रहा हूँ। में गुप्त दान
ही देना चाहता हूँ।"
१८३
शेखचिल्ली-मेने बन्दूक के छूटते ही देखा कि एक
भालू सामने मरा पड़ा है।
-
ह
शिकारी-बह वहाँ इस तरह कितनी देर से पडाथा ?
१८४
माँ-चों रे पाजी, अपने से छोटे कोतूने क्यों मारा?
लडका-उस वक्त कोई बड़ा मिला ही नहीं।
। मजदूर
एक गरीष मजदूर लोगों के मकानों की बाहरी सिडको
और दरवाजों को साफ करके ही पैसा-दो पैसा कमा तोता
था। एक कास के मकान में बहुत से जाले लग रहे
ने कहा-सरकार, श्रापके पिडकी-दरवाजों
को साफ कर,
फस ने अपना चश्मा नाक पर चढाते हुए कदा--
नहीं, अभी उन्हें साफ करने की जरूरत नहीं है।
मजदूर ने कहा-सरकार, श्रापके चश्मे को ही जरा
साफ कर+।
"जिन्दगी भर अब किसी भी औरत से व्याद करने
का इगदान फलंगा।"
"क्यों, फिर भी हताश होना पड़ा क्या?"
"नहीं, मेरा विवाह होगया।"
।
मेजिस्ट्रेट :-अप तुम मही पच सकते। तीन-तीन
६२ श्रादमियों ने गवाही दी है कि उन्होंने तुमको चोरी करते टेखा है। अपराधो-तीन श्रादमी क्या, मैं हजारों श्रादमी ला सकता है, जिन्होंने मुझे चोरी करते नहीं देखा है। १८८ धनी मित्र-मित्र, मेरे दिल में तुम्हारे लिए बड़ो दया है। गरीय मित्र-पर श्रापके पॉकेट में भी कुछ दया है या नहीं। १८९ मुवक्लि-(थपना वसीयतनामा लिखाते हुए) मैं अपनी खी के लिए पांच सौ रुपए छोडे जाता है। वकील- -पर अभी तो वह जवान है। शायद फिर विवाह कर ले। मुवक्लि-अगर वह दूसरा विवाह करे, तो उसे हजार रुपए देना चाहता हूँ। घकील-यह तो तुम दूना कर रहे हो। ऐसी हालतों में रकम बहुधा फम कर दी जाती है। मुवक्किल-लेकिन उस अभागे को भी तो कुछ हर्जाना मिलना चाहिए, जो इससे विवाह करेगा। J
-
१९०
पति-वह जिसे छूता है, वही सोना हो जाता
पली-नापने मुझे जो जेवर बनवा दिए हैं, उसे भी
चे छ देंगे?
१९१
मित्र-शाहिए डॉक्टर साहय, आपके अस्पताल की
क्या हालत है।
डॉक्टर-वीन बीमार तो मर गए
करने की
तरह से कोशिश करूंगा।
१९२
एक छोटा लडका-मास्टर साहब, श्राज मैने क्या
पढ़ा है?
-क्या अजीव सपाल हे?
लडका-लेफिन जय में घर जाऊँगा तो मुझसे तो
पर तरक्की
"
लोग यही पूछेगे।
१९३
थकील-अगर तुम्हें मेरी सची सलाह चाहिए तो
मुवकिल-नहीं-नहीं, मुझे श्रापकी वकालती सलाह
चाहिए।
१९४
स्त्री -बहुत
येचारे ऐसे भी होते हैं कि
से पुरुष
।
।
।
।
श्रॉख रहते हुए भी नहीं देखते और कान रहते हुए
भी
नहीं सुनते।
पुरुष-पर शायद ही कोई स्त्री ऐसी होगी, जो जीम
रहते हुए न बोले।
१९५
"हमारे इङ्गलैण्ड में अाजकल तलाक की प्रथा बहुत
चढ रही है।"
"चलो अच्छा है। उसकी रफ्तार अगर ऐसी ही
रही, तो हम नवयुवकों को विवाह का डर न रहेगा।"
१९६
"फल मेरी स्त्री का जन्म-दिन है, इसलिए उसे में
उपहार-स्वरूप कोई दुर्लभ वस्तु देना चाहता हूँ।"
"अपने बालों का एक गुच्छा दे दीजिए।"
१९७
सोहन-जय तक में पचीस वर्ष का न हो जाऊँगा,
तय तक ब्याहन ऊँगा।
मोहन जय तक मैं ब्याहन फर लूँगा तव तक पच्चीस
वर्ष का न होऊंगा।
१९८
श्रॉस्ट्रेलिया के एक नवयुधक ने फ्रान्स में जाकर
।
एक जहाज में नौकरी के लिए दरख्वास्त दी। जहाज के
कप्तान ने पूछा-तुम कभी समुद्र में गए हो?
नवयुवक बोला-तो क्या श्राप यह समझते हैं कि
मैं ऑस्ट्रेलिया से यहाँ तक साइकिल पर चढ कर पाया
१९९
लडका-मन्त्री के लिए तुमने हारमोनियम ले लिया
है दद्दा । तो मेरे लिए भी एक साइकिल ले दो।
दहा-क्यों?
लडका-ताकि जय वह हारमोनियम बजाने लगे तो
मैं भी चट घर से दूर भग जाऊँ, नहीं तो मेरे कान फट
जाएंगे।
२००
कुछ देदाती सरकस देखने गए। यहां एक आदमी
एक लडकी को तख्ते पर सुला कर और अपनी आँखों
पर पट्टी बाँध कर कुछ दूर से इस तरह धुरी फेंक्ता
था कि लडकी को तो न लगती, पर लडकी के फान,
बाँद, जाँघ श्रादि के पास दो तम्ने पर चुम जाती थी।
उसने पहली छी उसके गले के पास चलाई और यह
तरते में जा घुसी। देहाती दर्शक बोला-तिन भर ही
चूता है। दूसरी यार निशाना चूरु होगा ।
६६
T
२०१
"क्यों मन्ना, तुने लल्लो को उसके पेट में क्यों
मारा"
"क्या करूँ माँ, अपरे में निशाना ठीक न बैठा।" ।
२०२
कुछ लोग एक मुर्दा जलाने जा रहे थे। एक आदमी
सिसकते सिसकने कुछ दूर छूट गया। एक राहगीर ने
उससे पूछा-तुमको तो उसके मर जाने का सबसे
। ज्यादा दुख लग रहा है?
वह बोला-दुख क्यों न लगेगा । मेरे तीन हजार
रुपए इस गप, श्रव कौन देगा?
२०३
मैजिस्ट्रेट (मुई से) तो मुलजिम का व्यवहार
इतना खतरनाकाथा १
मुद्दई-जी हॉ, वेहद खतरनाक था-यहाँ तक कि
लाचार होकर मुझे उसे फस कर दो लात लगा देना पड़ा।
२०४
"ते लँगडे, ये चार पैसे ले जा। लंगडा होना बुरा
है, पर अन्धा होना तो बेहद ही धुरा है।"
भित्रमदा-जी हाँ ! जब मैं अन्धा था, तो लोग मुझे
खोटे पैसे देकर ही ठग लिया करते थे।,
r
६७
२०५
एक बुढिया की ऑखें कमजोर थी। एक दिन वह
अपनी यह को लिवाने गई। उसके घर एक घडा सापाईना
रखा था, उसे देख कर वद एक चीख मार कर बोली-
“बह तुम भी अपने घर में कैसी भयङ्कर तस्वीर रसती हो।
या ने धीरे से यहा-माँ जी, श्राप पाइने में अपना
-चेहरा देख रही है।
२०६
एक विद्यार्थी किसी अपराध में परडा गया। मेशिट्रेट
पूछा-तुम्हारा कोई वकील है?
विद्यार्थी घोला-जी नहीं, में वकील नहीं करूंगा। म
सारी यात सच-सच कह देना चाहता है।
--
।
एक आदमी सियालदह एक्सप्रेस से सफर कर रहा
था, उसकी तेज रफ्तार को देख कर पास के एक दूसरे
मुसाफिर से योला-वस, इसी को तुम तफा मेल
करते हो? रायपुर धमतरी लाइन की गाडी तो इतनी तेज
चलती है कि तार के खम्भे एक साल की तरह दीखते हैं।
दूसरा मुसाफिर पोला-आप हमारी गाड़ी को नहीं
पा सकते। हमारे उघर की गाही से प्राप सरसों के खेतों
६८, । - में होते चले जाइप, फिर लौकी के खेत, मूली के खेत वगैरह पार कर जाइप, पर सब रास्ते की तरह दीखते हैं। २०८ फ्लर्क-मेरी तो यही विनती है कि श्राप मेरी तन- रवाह बढ़ा दीजिए , क्योंकि मेग विवाह हो गया है। ऑफिसर-फिर इस बढी हुई गृहस्थी को चलाने के लिए पैसा मागोगे। फ्लर्क-जी नहीं, मेरी स्त्री जानती है कि मुझे कितना मिल रहा है। मैं तो सिर्फ अपने पॉकेट-खर्च के लिए गुप्त रूप से थोडा ज्यादा माँग रहा है। २०९ "प बोधी, जरा सराय का रास्ता तो घताना।" "श्रापने कैसे जाना कि मेरा नाम बोधी हे?" "महज एक अन्दाज था।" "इसी प्रकार मेहरबानी करके सराय का भी अन्दाजा लगा लीजिए।" २१० 1-अगर मे तुम्हें अपनी स्त्री बन जाने के लिए पहूँ, तो तुम नाराज हो जायोगी? अप्रसन्न प्रेमिका-नहीं, बल्कि यदि मैंने तुम्हारी बात स्वीकार कर ली, तो में अपने को ही फोगी।
२११
मॉ क्यों बेटा, मोजा पहन कर पॉव धो रहे हो ?
बेटा-लाचारी है, ठण्ड के मारे मोजा पहनना ही
"पडता है।
२१२
एक हवाई जहाज जोरों से नीचे उतरने लगा। उसमें
दो दी श्रादमी थे। एक चलाने घाला पोर दूसरा उसका
'मित्र । चलाने वाले ने कहा-इसको इस तेजी से उतरते
देख कर नीचे के पचास फी सदी लोग यह समझे होंगे
कि यह गिर रहा है।
मिन ने कहा-जी हाँ, और ऊपर भी पचास फी
सदी लोगों का यही ख्याल था।
२१३
"मैं तुम्हारे हित के लिए तुम्हें कहता है। मैंने सुना
है कि तुम याहुत सी कुंवारी कन्याओं के हदय में वृथा
ही श्राशा का श्रदर उत्पन्न कर रहे हो। शायद कुशालपुर
में तुमने पक कन्या के साथ अपना विवाद ठीक किया
है, कानपुर में दूसरा और यहाँ तोमरा। ताज्जुर की धात
है कि यह सब तुम कैसे कर सकते हो।"
"क्यों, मुश्किल क्या है ? इसो के लिए तो साइदिन
खरीदी है।"
।
।
-
-
.
२१४
"उस साडीका दाम क्या था ?"
"एक सौ तीस रुपए।"
"ऐसी बहुत सी साडियाँ बेची हैं क्या?"
"सैकडों, आपके लिए भी तैयार कराऊँ क्या?"
"नहीं, में इनकमटैक्स ऑफिस से पता लगाने श्राया
था कि तुम्हारा रोजगार कैसा चल रहा है।"
२१५
एक गुजराती पुलिस कर्मचारी विदेश गया था। वहाँ
एक दूसरे भारतीय को देख कर उसे बड़ी खुशी हुई
और उससे परिचय प्राप्त करते हुए बोला-लायो, हाथ
मिलायो।
भारतीय ने कहा-जी हॉ, में गुजरात प्रदेश से
श्राया है।
पुलिस-फर्मचारी वोला-तय तो दोनों हाथ लायो ।'
२१६
"इसके पहले कि तुमको मैं अपने यहाँ कोई नौकरी
हूँ, मैं तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा करना चाहता हूँ।"
"धुद्धि की परीक्षा? पर विज्ञापन में तो श्रापने सिर्फ
एक सगीत प्रेमी ही की जरूरत बतलाई थी।"
-
-
--
पत्नी-फल रात को बादल सूव गरजा और श्राधी
खूब चली।
पति-तो तुमने मुझे उठाया क्यों नहीं ? तुम नहीं
जानौं कि इस हालत में में कमी सो नहीं सकता !
२१८
"तो तुम कितने दिन के लिए फौज में भरती होना
चाहते हो?"
"जब तक जारी रहे।"
"पर श्राजफल कोई लडाई जारी नहीं है।"
"मेरा मतलय था कि जब तक शान्ति जारी रहे।"
२१९
प्रेमिका-
-जप से में पैदा हुई है, तभी से मेरे हरेक
जन्मोत्सव में मेरे बाप ने मुझे दस रुपए देने का पचन
दिया था। आज इस प्रकार मेरे पास १६० रुपए जमा है।
विवाद की इच्छा रखने वाला प्रेमी-शफी का रुपया
वे कर दे देंगे?
२२०
एफ अमेरिकन महिला एक पृद्ध धनी अमेरिका पुरुष
से विवाद की इच्छा से उसके पास गई। युद्ध ने पूला-
इसके पहले तुम्हारे कितने वियाह हो चुके हैं ?
महिला ने कहा-श्राप मेरी स्मरण-शक्ति की परीन
लेना चाहते हैं ? इसमें फेल न होऊगी। मेरे पाँव विवाद
हो चुके हैं।
२२१
वृद्ध-तुम दिन में कितने वोतल शराब पी जाते हो
नवयुवक-चार से ज्यादा नहीं ।
वृद्ध-इतना तो में पानी नहीं पी सकता।
नवयुवक-और मैं भी।
२२२
एक दक्षिणी धनारस की एक गली में जाकर अप
घर का रास्ता भूल गया। पास खेलते हुए लड़के
थोला-मैं हरिश्चन्द्र घाट १०३ नम्बर के मकान में जान
चाहता हूँ।
लडका बोला-तो क्यों नहीं चले जाते ?
२२३
"मेरी लडकी से विवाह करते ही उसने मुझ पर पार
हजार की नालिश ठोंक दी।"
"और तुमने उनसे कुछ लिया था?"
"जी नहीं, सिर्फ लडकी मेरे घर में रहती है।"
२२४
एफ मजेदार मुकदमा चल रहा था। मैजिस्ट्रेट धारह
1
-
जूरी के साथ मुद्दई की फरियाद सुन रहे थे। उसके चौबीस सुश्रर रेलवे कर्मचारियों ने मार डाले थे। अप- राध की गम्भीरता बताते हुए मुद्दई ने कहा-चोधील सुश्रर ! सरकार चौबीस । जितने आपके पास बेठे हैं, उससे दुगने सुअर थे। २२५ एफलड़का-जी नहीं, में इस मछली को येचना नहीं चाहता। चालाक श्रादमी-उसे नाप तो लेने दो, ताकि में -ठीक से बता सक कि मेरी मछली जो चुरा ली गई थी, वह कितनी बड़ीथी। २२६ घडे दिन की छुट्टी होने के पहले मास्टर साहब क्लास में घोले-जानो लडको, यूत्र मौज करना और जब छुट्टी के बाद श्राना तो खोपडी में जरा अवल लेकर पाना। लड़के-और आप भी मास्टर सादर ! २२७ एक यकील-तो तुम्हारा षदा भाई बडा येवकूफ है, यह पना करता है। एफ लडका-यह वकील है। .
- -
२२८
माँ-(नाराज होकर) पर तुमने उस छोकरे के हाय
उस वक्त क्यों नहीं काट लिए, जब वह जेवर की थैली
लिए हुए था?
बेटा-मा, तुमने ही तो यह सिपाया था कि किसी
के काम में बाधा न डालना चाहिए ।
२२९
एक फजूस श्रादमी एक जोडा धोती परीदने गया।
दुकानदार ने कहा-दोनों का दाम दो रुपए होगा।
कलस ने पूछा-उसमें से एक का दाम क्या होगा?
दूकानदार बोला-एक रुपया तीन श्राना।
कझूल प्रसन्न होकर बोला-अच्छा, तो मैं दूसरी
धोती ही ले लूँगा।
२३०
एक हकीम की दूकान के बाहर साइनबोर्ड में
"सफापाना" लिखा हुआ था। उसकी यह गलती एक
राहगीर को बहुत राटकी और वह हकीम जी से योला-
यहाँ "शफाखाना" लिखा जाना चाहिए। क्या श्राज तक
किसी भी श्रादमी ने आपको यह गलती नहीं बताई?
हकीम ने जवाब दिया-सैकडों ने श्राप ही की,
।
७५
तरह इस गलती ही को सुधारने, चे मेरो दूकान पर पाते
हैं और फिर मैं उन्हें अपना ग्राहक बना लेता हूँ।
२३१
उपदेशफ-क्यों जी, इसका व्याख्यान कैसा था?
पक श्रोता-बहुत ही उपदेशपूर्ण श्रापके यहाँ श्राने
के पहले हम लोग पाप का नाम भी नहीं जानते थे।
२३२
नाना-बेटी, श्रय में तेरा विवाह पर दूंगा। तू ससु-
राल चली जायगी।
नतिनी-लेकिन में अपनी नानी को नहीं छोडगा
चाहती।
नाना-उसे भी साथ ल जाना।
२३३
एक श्रादमी स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर उदास धूम रहा
था। उसके एक मित्र ने पूछा-याज इतने उदास क्यों
हो रहे हो।
श्रादमीया एफ मिनट पहले गाडी छूट गई।
पदा जरूरी काम था।
मित्र-याद 1 मिनट-दो मिनट की सा चिन्ता?
थएटा वाघ घण्टा होता, तो कोई बात भी थी।
२३४
पोता-पाया, मुझे अपच हो गया है ।
दादा-तो मैं क्या करूं?
पोता-कोई चीज पचाने को दीजिए । मुझे आराम
हो जायगा।
२३५
फेरी बाला-किसी को चाकू-कची तेज कराना है।
एक गृहस्थ-और तुम बुद्धि भी तेज कर सकते हो।
फेरी वाला--जी हाँ, आपके पास है क्या ?
.
एक नवयुवक अपनी नवविवाहिता पत्नी को छोड कर
विदेश जा रहा था। वह बोला--प्राणाधिके, जव में तुमसे
दूर रहूँगा, तब उस तारे की ओर देख कर तुम मेरी
याद किया करोगीन?
पत्नी-अवश्य प्रियतम ! उसमें और तुममें इतनी
समानता है कि उसे देखते ही तुम्हारी याद श्राएगी।
नवयुवक-यह कैसे?
पत्नी-क्योंकि यह यहुत रात पीते तो उदय होता
है और प्रात काल पीला पड़ जाता है।
२३७
"ईमानदारी किसे कहते हैं ?"
“यह तो समझाना कठिन है, पर हो, जैसे मैने चैङ्क
को पचास रुपए का एक चेक दिया और कर्म ने गलती से
मुझे साठ रुपए दे दिए। उसे ले जाकर मैंने घर में अपनी
स्त्री को पतला दिया, तो उसे ईमानदारी कहेंगे।"
स्त्री-मैं तुमसे विवाह करने के लिए व्याकुल नहीं
थी। मैंने तुमसे पांच बार इन्धार कर दिया था।
पति-तो भी मेरे दुर्भाग्य ने मेरा पीछा न छोडा!
२३९
नकली ज्योतिपो-तुम्हारा पति स्वर्ग से तुम्हें एकम
रहा है कि तुम इस गरेर प्राह्मण को पैसा दो।
एक विधवा-हुक्म दे रहा है ! वव वह मेरा पति
नहीं हो सकता।
२४०
पति-"हम लौ वर्ष कैसे जिएँ" शला लेख तुमने उस
अवशरसे काट लिया।
पती-जी हाँ, मुझे डर था कि कहीं श्राप उसेम
२४१
भर्फ-(नौकरी की तलाश में)सरकार, दत्तपत करने
के लिए मेरे पास कलम या पेन्सिल नहीं है।
म
प्रॉफिसर-बिना हथियार के लड़ाई के मेदान में
जाने वाले को तुम क्या कहोगे?
"ऑफिसर"
२४२
एक मोटर वाला अपनी मोटर तेजी से ले जा रहा
था। रास्ते में एक गधे की गाडी सामने आ गई और उसे
मोटर रोकनी पडी। दिल्लगी करते हुए उसने उस गाडी
वाले से पूछा-तुम्हारी और मेरी गाड़ी में क्या फर्क है ?
गाडी वाला वोला-बहुत थोडा। एक में गधा जुता
हुआ है। दूसरे में गाडी पर धैठा हुश्रा है।
२४३
एक मुसाफिर धवडाहट से हम लोग जरूर किसी
अादमी के ऊपर से मोटर चला श्राए
मोटर वाला-(जिसे कुहरे में कुछ नही दीख रहा था)
चलो, धीरज तो बँधा । श्रय तक इमारी मोटर सडक पर
ही है।
२४४
एफ शौकीन मोटर परीदने गया। उसने एक बडी-
सी मोटर सामने देप पर लोचा, शायद इसका दाम
ज्यादा हो, इससे उसने दूकानदार को एक छोटी गाडी
दिखाते हुए पूछा-सका क्या दाम है।
है
M
.
दूकानदार-सादे चार हजार !
उसने उससे भी छोटी मोटर को दिसा कर पूछा--
और इसका?
दुकानदार-पाँच हजार ।
शौकीन-और अगर
मैं बिलकुल ही कोई गाडी न
खरीदूं तो कितने दाम लगेंगे?
२४५
रामू-(टेलीफोन से) डॉक्टर साहब, जल्दी श्राइप,
मेरी बच्ची एक दुश्रन्नी निगल गई है।
डॉक्टर-(टेलीफोन से) फितने की हे ?
रामू-१-१ की है।
२४६
"लेकिन जब लुटेरों ने श्राग्विरी बात कही, तो मुझे
कुछ पुशी हुई
"पद क्या?"
"उन्होंने कहा-अगर तुम अपना बजाना न पतायोगे,
तो हम लोग तुम्हारी स्त्री को उठा ले जायेंगे।
२४७
खो-जब मं गाना गाने लगती है, तो तुम यादर क्यों
चले जाते हो? मेरा गागा तुमको पसन्द नहीं है क्या
पुरुष-यह बात नहीं है। में इसलिए चादर चला
"
P
EO
इल
जाता हूँ, ताकि लोगों को यह मालूम हो जाय कि मैं
तुमको मार नहीं रहा हूँ।
२४८
"तो तुम अमेरिका जा रहे हो। तुम तो जानते ही
होगे कि जब यहाँ रात रहती है तो वहाँ दिन रहता है।"
"हाँ, पहले-पहल तो पड़ा अचरज लगेगा।"
२४९
-
स्त्री-मेरी बहिन की उम्र चौबीस वर्ष की है।
पति-उसने तो मुझे बीस साल ही बतलाया था।
स्त्री-ठीक है, चार साल की उम्र तक वह गिनना
ही नहीं जानती थी।
२५०
एक नवयुवक घर जाने के समय पक खिलौने की
दूकान पर पाया। दूकानदार भीतर था और उसकी छोटी
लडकी बाहर बैठी थी। नवयुवक घोला-सिर्फ दिल्लगी
के लिए ही में अपनी स्त्री को कोई अजीव और बदसूरत.
सी चीज देना चाहता है। हे कुछ ?
लडकी' ने भीतर की ओर मुंह करके कहा-दहा
यहाँ श्रानो, तुम्हारी जरूरत है।
1
१ । २५१ प्रेमिका-चुम्बन के विषय पर तो बडे-बडे ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं। प्रेमी -~-एक नई लाइनेरी सोलने में क्या तुम मेरी सहायता करोगी? २५२ "श्रापने मुझे जो पद लिख कर दिए थे, यह मेने अपने बाप को दिखाए, ये बहुत खुश हुए। "क्यों" "उन्हें यह जान कर घडी खुशी हुई कि म एक कवि से अपना विवाह करना नहीं चाहती।" २५३ पली-प्यारे, तुम इतनी शराय मत पिया करो । मही जानते कि शराय मनुष्य का शत्रु है ? पति-तमी तो में उसको पतम कर देना चाहता है। २५४ एक किरापदार श्राधी रात को घरडाहट से मालिक- मकान के पास दौडा गया और उमे उठा पर पोला- अगर कोई योरत अपने पाविन्द से लड-लड कर पढ़ी- सियों की नींद म्पराम करती हो, तो क्या आप उसे रोष सकते हैं? ६ मालिक मकान-याप पडोसी हैं ? किराएदार-नहीं, मैं खाविन्द हूँ। २५५ मदोन्मत्त सनम, जिसने तुझे चाँद-सी सूरत दी है, उसी अल्लाह ने मुझको भी मुहब्बत दी है। एक सती स्त्री-और उसी अल्लाह ने पुलिस भी तो यनाई है। २५६ "कोई अच्छी से अच्छी ऐसी सस्था का नाम तो यतायो, जहाँ स्त्री-पुरप साथ ही उचित शिक्षा प्राप्त कर सके।" "विवाह।" २५७ "ड. ड...डॉक्टर साहव,श्र श्र आपके प पास म य मेरी इस वि विमारी की को कोई द दवाई हे डॉफ्टर-क्या तुम्हारी जयान हमेशा ऐसा ही लड- खडाती है? मरीज- हमेशा न नही ज वोलता है त तमी ल..ल लह ख खडाती है। जब यो वो
२५८
"फल शाम को मने तुम्हारे पति को देखा, पर उन्होंने
-शायद मुझे नहीं देखा।
"जी हाँ, फल यही बात वह भी कह रहे थे।"
२५९
टा-मो, इस गरीष श्रन्धी को एक धेला तो दे दो।
भूख के मारे वेवारा एक चवनी मांग रहा था।
माँ-हाँ, अन्धा हे तो पयः धेला दे दो।
२६०
मालिक-मकान-तुम यहां चार महीने से रद रहे हो,
पर श्राज तक एक पैसा किराया नहीं दिया।
किरापदार-मापने तो कहा था कि इसे घर ही
मालिक-फिर?
किरापदार-मैं अपने घर पर फमी किराया नहीं देता।
२६१
वाप-तुम लोगों की तरह कभी भी लोगों को लुभाने
के लिए तुम्हारी मां ने बनाव सिंगार नहीं दिया।
बेटी-तभी तो उन्हें श्राप मिले ।
दुहल
४
२६२
नुशामदी पति-प्रिये, एक बार तो वह बात कह
दो, जिससे स्वर्ग का सुस मिल जाय ।
क्रोधित पानी-जायो, अपने को गोली मार लो।
२६३
"श्रव स्त्रियों पर मेरा जरा भी विश्वास न रहा।"
क्यों ?"
"मैंने अपने विवाह का केअर श्रॉफ 'लीडर' विज्ञापन
छपवाया और जवाय देने वालियों में से एक मेरी स्त्री भी
थी।"
२६४
"क्यों ? पागलपने के कारण तलाक होता है क्या?"
"नहीं, वह विवाह का कारण है।
२६५
परदेशी-(बोगों को एक मुर्दा ले जाते देख कर) कौन
मर गया है?
एक लडका-बही, जिसके लिए आज सवेरे से चिता
बनाई जा रही थी।
२६६
मुलाकाती-(अपने मित्र के पांच वर्ष के लड़के की प्रशसा
परते हुए) उसकी नाक तो उसके वाप की ही है।
।
।
7
५
मित्र--और उसकी आँख उसकी मां की है।
लडका-और यह कोट मेरे भाई का है।
२६७
पुलिसमैन जय श्राप इतनी तेज मोटर चला रहा था
तो मोड पर आपको रोकते ही मैंने दिल ही में सोच लिया
'पंतालिस।
महिला-पंतालिस अापने कैसे समझा ? मेरी उन
तो अभी तीस ही है।
२६८
मरीज-डॉक्टर साइव, श्रापकी ही दया से मुझे
'भाराम हुआ है।
डॉक्टर :- सब परमेश्वर की कृपा हे।
मरीज-तय तो परमेश्वर के पास ही पैसा भेज दूंगा।
२६९
"तो क्या तुमको यह विश्वास है कि तुम्हारी स्त्री
जीयन सग्राम के लिए उपयुक्त है ?
"अवश्य, रोज सवेरे-शाम यह मुझसे लडती है।"
"पर यह तो जीव समाम नहीं है। इस तो पति.
सग्राम पहना चाहिए।"
"यह मुझको ही अपना जीवन फहती है।"
२७०
मॉ-पोर जब कोई मेहमान श्राता है, तब तो यह
लड़का दुगुना सा जाता है।
मेहमान-क्यों लड़के?
लडका-क्योंकि जब कोई मेहमान श्राता है, तभी
पूरा खाना भी तो मिलता है।
२७१
राम-ससे अधिक तुमको कौन सा लेसकपसन्द है।
प्रभू-मेरे पाप।
रामू-क्यों?
प्रभू-क्योंकि ये मेरी तमाम छुट्टी की दरख्वास्तों पर
अपना दस्तावन चुपचाप कर देते हैं।
२७२
एक करोडपति के घर में जुड़वां बच्चे पैदा हुए थे।
दूसरा पञ्चा केवल एक मिनट बाद ही हुआ था। पर जब
यह फरोडपति मरने लगा, तो उसने वसीयतनामा लिखा-
"जय तक पटा लडका (जो पहले पैदा हुआ या) जीवित
रहेगा, तब तक मेरी सारी जायदाद, ५३ लाख नकद.
४६ गॉच, ७५ लास रोजगार में, ६लास जेवर श्रादि का
मालिफ वही रहेगा।" जय छोटा भाई पंसठ वर्ष का हो
गया, तो उसका एक मित्र एक दिन उसे अपने व्यापार
-
,
।
का घाटा सुनाने लगा। वह पोला-मित्र ! गत वर्ष केवल
पन्द्रह मिनट की देरी होने के कारण मुझे एक हजार का
घाटा उठाना पडा।
छोटा भाई-तुमको तो पन्द्रह मिनट की देरी से
केवल एक हजार का घाटा हुश्रा, पर में तो पैदा होते समय
केवल पफ मिनट की देरी से प्राज पेंसठ वर्ष तक ५३
लाख नकद,४६ गाँच, ७५ लाख का व्यापार और ६ लाख
के जेवर के घाटे में पडा हुधा है जनाय !
२७३
"मेरी स्त्री सचमुच मेरी बडी सेवा करती है। यहाँ
तक कि यह मेरे जूते भी अपने हाथ से उतारती है।"
"तुम जब कहीं से श्राते हो तव"
"नहीं, जब में कही जाने लगता है तथ।"
२७४
एक दिन एक बच्चे के सिर में घडे जोर से दर्द हो रहा
या। उसकी दादी ने कहा-"मा पञ्चा, मैं तेरा मुंह चूम
लँ। तेरा दर्द दूर हो जावेगा।" कुछ दिन याद यद बच्चा
दौड़ाहुना प्राया और घोला-दादी, मेरेसाईस पोसिर
में बड़ा दर्द हो रहा है।"
दादी ने कहा-तो में क्या कर!
बच्चा घोल उठा-उसका मुँह चूम लो तो उसका दर्द
दूर हो जाय।
२७५
पत्नी-मैंने कल रात को सपने में देखा कि श्रापने मेरे
लिए एक नया चन्द्रहार वनवाया है। क्या मेरा सपना
झूठ ही निकलेगा?
पति-और मैंने भी सपना देखा है कि तुमने खुद ही
उस चन्द्रहार के दाम दिए है। क्या मेरा सपना भी झूठ
ही निकलेगा?
२७६
"श्राश्चर्य की बात है 'विजय' का द्योतक चित्र सदेव
स्त्री का होता है।"
"श्राश्चर्य की बात नहीं है। पुरुष और स्त्री में सदैव स्त्री
की ही विजय होती है, इसी से ऐसा वनवाया जाता है।"
হত
एक नाट्यशाला में एक श्रादमी अपनी स्त्री से बेहद
चाते कर रहा था। उसके पीछे एक सज्जन बैठे थे, जिन्हें
इन लोगों की बातचीत के मारे कुछ भी सुनाई नहीं पड़
रहा था। जब उनसे न रहा गया, तो उन्होंने उस यातूनी
से कहा-आप इस तरह से पातचीत कर रहे हैं कि जो
कुछ कहा जा रहा है, कुछ भी समझ में नहीं पाता।
पातनी ने कहा-महाशय जी, अपनी स्त्री से मैं जो
--
कुछ कह रहा है, उसके सुनने से आपको कोई भी लाभ
न होगा।
२७८
एक स्त्री-मेरी उम्र कोई तो पच्चीस बताता है, कोई
-तीस, श्रापकी क्या राय है?
उसका एक पुरुप-मित्र-दोनों मिला कर जोडो।
२७९
दो सज्जन एक मोटर पर चढ़ कर किसी स्थान को
जा रहे थे। एक गली के पास मोटर खड़ी हो गई। गली
बहुत ही तग थी। मोटर वाले ने कहा-साहय, यह गली
बहुत ही वन है। मुश्किल से इसमें दो गधे चल सकते
हैं। इससे श्राप लोग इसमें पैदल ही जाइए । तकलीफ तो
होगी, पर लाचारी है।
२८०
दो मित्रों ने श्रापक्ष में एक शर्त घदी। दोनों एक एक
बात खूप बढ़ा-चढ़ा कर कहेंगे। अगर किसी ने एक-दूसरे
को झूठा कह दिया, तो उसे पाँच रुपए देने पड़ेंगे। पहले
ने पाँच रुपए पाने की नियत से खूप धात पढ़ाई । घोला-
हम लोग यम्बई से जहाज में रवाना हुए । हमारे पीछे धी
कि मनुष्य ने समुद्र में गोता लगाया और भीतर दो
नीतर जहाज का पीछा करता रहा और हमसे पाँच
मनट आगे अदन जा पहुंचा।
-
दूसरा घोला-ठीक है, वह श्रादमी में हो था।
पहला-तुम नहीं थे। वह दूसरा
दूसरा-ग्राम श्रष लायो पॉच रुपए।
२८१
एक रईस ने मथुरा जी के चौवे से पूछा-सा श्राप
तामिल समझ सकते हैं ?
चौवे जी ने पेट पर हाथ फेरते-फेरते कहा-हाँ पर
कार, यदि वह भाषा में बोली जाये!
२८२
एक हसोड श्रादमी को किसी फोजदारी मुकदमे में
गवाही देने जाना पड़ा। एक वकील ने, जो जिरह
में बडे बदनाम थे, उससे पूछा-"जय लडाई हुई तो
तुम लडने वाला से कितनी दूर थे।" इसोड ने जवाब
दिया-"ठीक तीन फुट, पाँच इञ्च, चार अहुल
और
सात सूत की दूरी पर मैं पड़ा था।" वकील ने खोज कर
कहा-"यह बिलकुल झूठ मालूम होता है । भला यह फैसे
मुमकिन है कि तुमने इतना ठीक फासला नापा हो ?" उस
मनुष्य ने डपट फर कहा-"म पहिले दी से जानता था कि
कोई उल्लु का पट्टा मुझसे ऐसे सवाल करेगा।"
२८३
एक बङ्गाली महाशय छकौडो पाबू के मर जाने की
H
झूठी ग्ववर बहुत बार सुन चुके थे। अब उनका कहना
है कि जब तक यह मर मे रवयम् छकौडी वाबू के मुंह
से न सुन लँगा, कभी सच न मानूंगा।
२८४
"पिता जी, आपने उस बच्चे का विचित्र दाल सुना हे,
जिसका वजन हाथी का दूध पीने से केवल चार दिनों में
पचास पाउण्ड पढ गया?"
पिता ने झंझला कर कहा-यात विलकुल झूठी है।
मला वह बच्चा था किसका ?
लडके ने भोलेपन से कहा--पिता जी, वह हाथी का
घया था।
२८५
"वकील साहय । श्रापके दप्तर में तो इतनी ज्यादा
गरमी है कि में बैठ नहीं सकता। घर मट्टी की तरह तप
वकील
मदाशय
ने चट जवाघ दिया-भाई । इसका
मट्टी की तरह तपना यहुत जरूरी है, क्योंकि यही तो मैं
अपनी रोटी पकाता हूँ।
२८६
अध्यापिका ने श्रेणी में पडे होकर पन्यायों को एक
पेसा चित्र थमाने को कहा, जिसमें एक दरिया बहता हो
और उसके किनारे मछलियां बैठी हो। सभी ने अपना
कार्यश्रारम्भ कर दिया। सरला और कमला को चित्रकार
बहुत कम पाती थी, घे
चुपचाप
बैठी रहीं। अभ्यापिका
कॉपी मांगने पर उन दोनों ने दरिया का चित्र तो दिख
दिया, पर इस पर वे मछली न बना सकी। गुरू जी ने
,
वहुत डाटा।
फमला-देखें, मैने श्रमी किनारे पर दो मछलियाँ बना
थी, न मालूम रॉड कहाँ चली गई। मेरा ख्याल है, पर
फिर पानी में घुस गई होगी।
सरला-गुरू जी, क्षमा करें, मुझे चित्रकारी का बहुत
ज्ञान नहीं है। मैं किनारे पर मछली इसीलिए न वित
सकी, पर वहाँ लिख दिया है कि Tresspasser will be
prosecuted अर्थात्-"इधर पाने वाला गिरफ्तार क
लिया जावेगा।"
२८७
मोहन ने कहा-भाई घनश्याम, तुम्हारी स्त्री तो बहुत
ही नाटी है
घनश्याम ने कहा-माई, वला जितनी छोटी हो उतनी
ही अच्छी है!
२८८
श्रादालत में
एक मनुष्य का किसी के ऊपर आक्रमण
।
-
करने
का मामला पेश था। मुद्दई के वकील ने बडी जिरह
के साथ कई धार अभियुक्त से पूछा कि तुमने किस चीज
से मारा है, किन्तु अभियुक ने धार धार यही कहा-
"मैंने सिर्फ ढकेल दिया था।"
वकील ने पूछा-कितनी जोर से ढकेलाथा ?
श्रमियुक्त-बहुत धीरे से।
वकील अभियुक्त की चालाकी से खीझ गया और
घोला-श्रब्धा, जिसमें श्रदालत तथा जूरी अपनी आँखों
से देख सके, इसलिए तुम मेरे पास श्राकर और उली
तरह मुझे धक्का देकर बतलानो कि तुमने उसे पित
तरह ढकेला था।
अभियुक्त यह सुन कर धकील के पास चला पाया
और पास आते ही पहिले तो उसने वकील के मुँह पर
बड़े जोर का तमाचा मारा और इसके बाद धकील को
उठा फर उसने यडे जोर से जमीन पर टे मारा।
घकील को इस तरह पटफ चुकने के बाद यह अभि.
युक्त जज की ओर घूम फर कहने लगा-हुजूर । जिस
तरद मेंने यकील साहव को ढकेला है, इससे भी दसयां
दिल्सा धीरे उसे धका दिया था।
२८९
एक मिल के मैनेजर के पास एक पौसजाया हुश्रा
]
मनुष्य श्राफर कहने लगा कि-"आपके यहाँ जितने नौकर
है, उन सभों को देखते ही में घतला दुगा कि किस शमस
की शादी हो गई है और क्सिकी नहीं।"
मेनेजर ने पदिले तो उसे टाल देना चाहा, किन्तु
उसके
बहुत
जोर देने पर उन्होंने उसकी बात मञ्जूर कर
लो। मेनेजर की प्रामानुसार मिल के सभी कर्मचारी एक
एक करके मेनेजर के पास श्राते गए और वह मनुष्य
सचमुच व्याहे हुए मनुष्यों को अलग करता गया कि
इनका विवाह हो गया है ! इस प्रकार सयों की परीक्षा
हो चुकने के बाद जय सवकी जाँच की गई, तो मालूम
हुश्रा कि उसका अन्दाज बिलकुल ठीक 'उतरा। मेनेजर
यह देख कर चकरा गए और उन्होंने बडी नम्रता के साथ
उससे पूछा कि आपने किस बात से यह पहिचान कर
लिया?
वह शोला-यह तो घडी साधारण परिचान हे ।
जितने लोग आपके पास श्राए, उनमें जिनका-जिनका
विवाह हो गया था, उन्होंने तो पायदान पर अपना पैर
पोंछ कर आपके कमरे में प्रवेश किया और जिनका
विवाह नहीं हुआ, वे सब बिना पैर पोंछे ही धडधडात
चले पाए । विना ब्याहे मस्त मौला है और व्याहे हुनौं
को भय था कि कहीं नौकरी से हाथ न धोना पडे ।
-
२९०
सड़क पर खड़ने के कारण एक कॉन्सटेगिज ने विगडे
खाँ का चालान कर दिया। मैजिस्ट्रेट के सामने मामला
पेश होने पर मैजिस्ट्रेट ने पूछा--तुम क्यों फला आदमी
को मार रहे थे?
बिगडे याँ विगड फर बोले-हुजूर, उसकी औरत ने
मुझे गालियाँ दी थी , मैंने अोरत पर हाथ छोडना ठीक
न समझ कर, उसके मर्द की मरम्मत की। श्राप दी
फरमाइए, क्या येजा किया?
२९१
मुन्शी समचन्द घडे मक्खीचूस श्रादमी थे। जिससे
उधार लेते, उसे देना यह जानते ही न थे। एक दुकानदार
ने अपने नौकर को मुन्धी सूमवन्द के पास दस-शारद
मर्तये बिल वसूल करने के लिए भेजा, किन्तु बार-बार
चह हीला-हवाला कर दिया करते थे।
एक दिन चपरासी दुकान से बहुत बिगड़ कर चला
कि श्राज मुन्शो ने अगर रुपए म दिए, तो जबर्दस्ती
वसूल करूंगा। सयोग से मुन्शो जी भी घर में मौजूद
थे। नौकर जरा तेज होकर मुन्शी जी से पदने लगा-
सादप, बाज श्राप सय रुपए दे दीजिप, नहीं तो अच्मान
होगा।
लाला साहर घोले-यह इस तरह कि मैं तो श्रापक
१६
हुल
मुन्शी जी जरा गम्भीर मुंह बना कर बोले--तुम
कैसे पागल हो ? मैं तो तुम्हारी नौकरी कायम रखने के
लिये रुपए नहीं देता, अगर मैं तुम्हें रुपए चुका हूं, तो
तुम्हारे मालिक तुम्हें फल ही नौकरी पर से हटा दें।
जब तक में रुपए नहीं देता, तब तक झख मार कर उन
तुम्हे रखना पडेगा।
चपरासी मुन्शी जी की बातों में श्रा गया और उन्हें
इस कृपा के लिए धन्यवाद देते हुए लौट गया!
२९२
लाला बातूनीलाल बातें लडाने में बडे तेज थे 1 टेव
योग से एक दिन छत की मुंडेरी पर बैठे-बैठे श्राप नीव
श्रा गिरे और एक आँख इनको इस गिरने में काम हो
गई । आँख का इलाज कराने के लिए श्रापको अस्पताल
की शरण लेनी पड़ी।
एक दिन इन्होंने अपनी आँख में दवा छुड़ाते हुए
डॉक्टर से कहा-डॉक्टर साहर ! मैं शर्त लगा कर
कहता हूँ, श्रापके दो आँखें होते हुए भी मैं एक
से श्रापसे ज्यादा देख सकता है।
डॉक्टर ने श्राश्चर्य में होकर पूछा-कैसे ?
श्रोल
१
-
चेहरे पर दो गाँसें देखता है और आप मेरे मुँह ५
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.
मुन्शी जी जरा गम्भीर मुंह बना कर बोले-तुम
कैसे पागल हो ? मैं तो तुम्हारी नौकरी कायम रखने के
लिये रुपए नहीं देता, अगर मैं तुम्हें रुपए चुका दूं, तो
तुम्हारे मालिक तुम्हें कल ही नौकरी पर से हटा दें।
जब तक मैं रुपए नहीं देता, तब तक भख मार कर उन्हें
तुम्हे रखना पडेगा।
चपरासी मुन्शी जी को धातों में श्रा गया और उन्हें
इस कृपा के लिए धन्यवाद देते हुए लौट गया!
२९२
लाला बातूनीलाल बातें लड़ाने में बड़े तेज थे। देष
योग से एक दिन छत की मुंडेरी पर बैठे-बैठे श्राप नीवे
श्रा गिरे और एफ आँख इनकी इस गिरने में काम हो
गई । अखि का इलाज कराने के लिए श्रापको अस्पताल
की शरण लेनी पडी।
एक दिन इन्होंने अपनी आँख में दवा छुड़ाते हुए
डॉक्टर से कहा--डॉक्टर साहव ! मैं शर्त लगा कर,
कहता हूँ, श्रापके दो प्रॉसें होते हुए भी में एक ही प्राँख
से श्रापसे ज्यादा देख सकता है।
डॉक्टर ने श्राश्चर्य में होकर पूछा-कैसे ?
लाला साहय घोले-यह इस तरह कि में तो श्रापके
चेहरे पर दो श्रॉसें देखता है और श्राप मेरे मुँह पर
-
-
।
केवल एक ही श्राँख देखते हैं। इसलिए में श्राप से अधिक
देखता हूँ।
२९३
चन्द्रकान्त के यहाँ दौलतसिंह परत पाया-जाया
करते थे। एक दिन चन्द्रकान्त की स्त्री ने चन्द्रकान्त से
कहा-दौलतसिंह तो श्रापके बडे सच्चे मित्र मालूम होते
है। क्या सचमुच मेरा यह ख्याल ठीक है?
चन्द्रकान्त ने सर पुजलाते हुए कहा-में यह नहीं
किता, क्योंकि प्रभी तक तो मैंने उनसे रुपए कर्ज लेकर
उनकी परीक्षा नहीं की है।
२९४
श्याम को सिलक सिसक कर रोते हुए देख कर उसके
धारा ने उससे पूछा-याम, फ्यों रो रहे हो?
श्याम-ह ह हैं। केलाय ने छकर को उतू कया ऐ
और छकर ने कैलाद को गधा कमाऐ।
धारा-तो इसमें तुम्हारे रोने की कोम बात है।
श्याम-क्यों, लोने की बात क्यों मी ऐ । छकर उल्लू
गधा पे, तो में फिन क्या है? ॐ ॐ
२९५
बैलाश को सारी जलेबी पा जाते हुए देख पर
इसके पिता ने यदा-पयों फैलाश ! तुम सारी गोषी
रेऔर फैलाल
.
।
।
खा गए और अपने छोटे भाई का ख्याल जरा भी नहीं
किया?
कैलाश ने भोली शक बना कर कहा-पिता जी, में
जप तक जलेबी खाता रहा, वरावर मुझे शैलेन्द्र का
स्याल रहा कि कहीं वह पान जाय ।
२९६
म्युनिसिपैलिटी की ओर से सड़कों की मरम्मत हो रही
थी। एक मजदूर पत्थर तोड रहा था। पत्थर पर उसने
कई हथोडे चलाए, लेकिन वह न हटा । यह देख कर
मजदूरों की देख-रेख करने वाले मुशी जी ने उस मजदूर
से कहा-~-"अरे, तू कैसा गधा है कि एक पत्थर को
तोडने में घण्टों लगा दिए। इधर ला, मैं घतलाऊँ कैसे
तोडा जाता है। यह कह कर मुशी जी ने बडे जोर के
एक ही धन में पत्थर को तोड दिया।
मजदूर ने यह देख कर मुस्कराते हुए उत्तर दिया-
मुशी जी, तारीफ तय थी, जय पहिले ही एक हाथ
में
तोडते । मने चोरें लगा-लगा कर पहिले ही उसे मुलायम
कर दिया था, तभी तो एक ही चोर में भूसा हो गया!'
२९७
फिली पाठशाले में एक पण्डित जी छोटे बालकों के
दजे में पढ़ा रहे थे। ज्ञान-सम्बधी कई बातें बतलाने के
बाद पण्डित जी ने १०वप के एक वालक से प्रश्न किया-
"तुम्हें किसने बनाया है ?" वह वालक कुछ उत्तर न दे
सका। इस पर पास ही बैठो हुइ एक पढ़ी-लिखो माँ के
पाँच वर्ष के बालक ने उत्तर दिया-"ईश्वर ने हमें
बनाया है।"
इस छोटे वालक के उत्तर को सुन फर १० वर्ष वाले
खडके ने पण्डित जी से कहा-पण्डित जी ! रमेश ने इस
सवाल का जवाब टेकर क्या कमाल किया है । मूर्य पालक
बोला-ईश्वर को रमेश को बनाए हुए अभी केवल ५ वर्ष
हुए हैं, इसलिए उसे धनाने वाले का स्मरण अभी तक है
और मुझे तो १० वर्ष हो गए हैं, इसलिए मुझे याद नहीं
रहा।
२९८
पण्डित कमलाकान्त के मकान पर सन्या समय
मित्रों की गोष्ठी पेठा करती थी। पण्डित कमलाकान्न थे
तो बड़े विद्वान्, परन्तु साध ही कुरुप भी यात थे। एष
दिन घाट कामताप्रसाद ने पण्डित जी से मना करते
हुए पदा-पण्डित जी, परमात्मा जिस समय सुन्दरता
लोगों को बांट रहे थे, उस समय शायद पाप गैरहाजिरथे।
पण्डित जी ने हंसते हुए पदा-दा साहय, उसस
में वहा था, जहाँ परमेश्यर पुद्धि घाट रहे थे।
.
.
२९९
किसी गाँव में एक बडा गरीध किसान रहता था।
टेव-कोप से उसके मकान की दीवार गिर पडी। दीवार
के गिर जाने पर वह वेवारा अपने जमीदार के पास
दोडा गया और बोला-साहेच, मोरे घरया की एक भीत
गिर गइल है, साहेव से बिनती हो कि मोर, कुछ मदद
कीन जाय।
जमीदार ने कहा-उल्लू के पट्टे । हमारी प्राम गली
में तेरी दीवार पा पडी है, उसका हर्जाना तुझे देना पडेगा
और तू पाया है मदद मॉगने ।
किसान बेचारा दुखी होकर यह सोचते हुए चला
गया कि "श्राप थे नमाज को और रोजा गले पड़ा।"
-
बिरादरी में एक जगह मृत्यु हो जाने के कारण सेट
दामोदरदास ने अपने लड़के को मातमपुरसी के लिए
जाने को कहा। लड़के को मातमपुरसी करने का पहले
कमी इत्तफाक नहीं पडा था, उसने पिता से पूछा
कि
श्राखिर मुझे वहाँ जाकर क्या करना होगा?
पिता-अजब अहमक लडके हो। घडे श्रादमी के
यहां की बात है, सैम्डों लोग श्रावेंगे जो यह सब करें
घही तुम भी करना। लड़का चला गया।
१०१।
-
हल
गस्ते में उसने दो-तीन मनुष्यों को मृतक के सम्बन्ध
मैं ही बातें करते सुना। वे सब कह रहे थे-अच्छा हुश्रा
कम्बखन मर गया, बडा ही कौडी चिप्पस था।
विट्ठलदास ने क्या कहना होगा, सो समझ लिया।
सेठ
कालूराम
सिर मुहाप नारियल पी रहे थे। विट्ठलदास
बगल में बैठ कर बोला-लाला जी, भोला क्याथीमार था?
कालूराम-हाँ ! कई दिन से उसे दस्त आते थे।
विद्वत्त-चलिए अच्छा हुआ, मोहल्ले का पाप टला ।
कहिए कुछ, कम्बप्त था वडा कौडी-चिप्पस !
सेठ कालूराम--पुत्र-शोक से वैसे ही विहल हो रहे
थे, उस पर इस वेवकफ की पाते उन्हें घरदाश्त न हुई।
उन्होंने उसे पीटा भी भोर घर से बाहर धक्का देकर निकाल
श्राए । सेठ दामोदरदास ने जय अपने सुपुत्र के कारनामे
सुने, तो वे यात बिगडे और लड़के को बहुत डाँटी।
चूंकि दामोदरदास तथा कालूराम का घनिष्ट व्यापा-
ना सम्बन्ध था, श्रतपय घे तुरन्त दोडते हुए सेठ
कालूगम के पास पहुँच कर अपनी पगडी सेठ जी के
मेरों पर रख दी और बहुत गिडगिडा पर कहने लगे-
बेठ जी, माफ करो, लडका विलफुल गदहा , जरा भी
यदा नहीं जानता में उसे भेज कर बारम्बार पदता
-दा है। यदि अब कभी श्रापके यहां ऐमा हादसा होगा
मैं स्वय हाजिर होऊँगा।
-
,
से कहा
१०२
F
३०१
जज ने एक कैदी से कहा-क्यों, तुम्हारी शक्ल तो
पहचानी हुई मालूम होती है ?
कैदी ने इतमीनान से उत्तर दिया-हम और श्राप तो
लगोटिया दोस्त हैं, साथ-साथ खेले थे।
जज ने बिगड कर कहा-चुप उल्लू के पढे । मेरा और
तेरा साथ फैसा?
कैदी ने गम्भीरता से कहा- हॉ-हाँ, सरकार ! ऐसा
ही है, क्योंकि आपकी उम्र तिरेपन साल की है, और
इतनीही मेरी भी।
३०२
एक चोर कैदी का मुकदमा जज साहब के इजलास
में पेश हुआ। जा जज साहब को मालूम हुआ कि कैदी
की ओर से कोई वकील नही है, तो उन्होंने पास ही बैठे
हुए एक वकील से कहा-आप इसके मुकदमे की पैरवी
कर दीजिए और इसे बचाने के लिए श्रापसे जो कोशिश
दो सके, उसे कीजिए।
उक्त नवयुवक वकील कैदी को सला,
M
बन्द कमरे में ले।
7
१०३
यह सुन कर बाहर चले श्राए । वकील को अकेले ही
श्राते देख फर जज ने पूछा--"तुम्हारा मुवक्किल कहाँ
वकील ने बडे इतमीनान से उत्तर दिया-बद चला
गया।
जज ने ताग्नुव में श्राफर पूछा-वह चला गया।
इसका क्या मतलय कि बदचला गया?
वकील ने गम्भारतापूर्वक कहा-इसमें श्राश्चर्य की
बात क्या है ? आपने मुझे श्राक्षा दी थी कि जो सबसे
अच्छी सलाह में केदी को दे सफ, पद हूँ। मैंने उससे
पूछा कि तुमने चोरी किया है, उसने कहा-'हाँ, अवश्य
मेने चोरी किया है। इस पर मैंने सर्वोत्तम सलाद
उसे यह दी कि यह दरवाजा पोल कर भाग जाय । उसने
और चलता बना।"
३०१
जज ने एक कैदी से कहा-सों, तुम्हारी शक्ल तो
पहचानी हुई मालूम होती है?
कैदी ने इतमीनान से उत्तर रिया--हम और श्राप तो
लगोटिया दोस्त है, साथ साथ खेले थे।
जज ने विगड फर कहा-चुप उल्लु के पट्टे । मेराभोर
तेरा साथ कैसा?
कैदी ने गम्भीरता से कहा-हॉ-हाँ, सरकार ! ऐसा
ही है, क्योंकि आपकी उम्न तिरेपन साल की है, और
इतनी ही मेरी भी।
-
एफ चोर कैदी का मुकदमा जज साहब के इजलास
में पेश हुश्रा । जब जज साह्य को मालूम हुआ कि केवी
फी और से कोई घझील नहीं है, तो उन्होंने पास ही बैठे
हुए एक वकील से कहा-श्राप इसके मुकदमे की पैरवी
कर दीजिए और इसे बचाने के लिए श्रापसे जो कोशिश
हो सके, उसे कीजिए।
उक्त नवयुवक चकोल कैदी को सलाह-मशविरा करने
के लिए, एक घन्द कमरे में तो गए। जब यहुत देर हुई, तो
जज ने एक सार्जण्ट से कहला भेजा-"जल्दी करो, अफ
सर लोग मुकदमे की इन्तजारी में बैठे हुए हैं।" वकील
१०३
यह सुन कर बाहर चले श्राए । वकील को अशले ही
श्राते देख फर जज ने पूछा-"तुम्हारा मुवक्किल कहाँ
वकील ने बडे इतमीनान से उत्तर दिया-वह चला
गया।
ताज्जुव में श्राकर पूछा-यह चला गया !
इसका क्या मतलब कि वह चला गया ?
वकील ने गम्भारतापूर्वक कहा-इसमें श्राश्चर्य की
पात क्या है ? आपने मुझे श्राज्ञा दी थी कि जो सबसे
अच्छी सलाह में कैदी को दे सकँ, यह हूँ। मैंने उससे
पूछा कि तुमने चोरी किया है, उसने कहा-'हाँ, अवश्य
मैंने चोरी किया है। इस पर मैंने सवत्तिम सलाह
उसे यह दी कि वह दरवाजा खोल कर भाग जाय । उसने
मेरी सलाह ली और चलता घना।"
३०३
सेठ जी ने कहा-हमें तो ऐसा नोकर चाहिए, जो
'पाखर्च हो।
नोकर ने धनापटी हसी हँस कर कहा-सरकार, सी
क्मपर्च होने की वजह से तो मुझे मेरे मालिक ने निघाल
दिया है।
"यों? किसलिए!"-सेठ जी ने पूला।
नौकर ने कहा-सरफारमें फटने और गन्दे
V
-
डर से अपने कपडे तो नहीं पहनता था, मालिक के ही
कपडे पहना करता था।"
३०४
एक जहाज जापान से फ्रान्स को जा रहा था। रास्ते
में जहाज के पेंदे में सूगख हो गया और उसमें पानी
भरने लगा। यह देख कर जहाज का कप्तान बडा घबराया
और जहाज पर बैठे हुए लोगों से पूछने लगा-तुम लोगों
में से कोई प्रार्थना करना भी जानता है ?
उनमें से एक ने झट उत्तर दिया--हाँ, मैं जानता हूँ।
कप्तान ने खुश होकर कहा-अच्छा श्राप सय से आगे
जाइप और प्रार्थना कीजिए और बाकी हम लोग प्राण
रक्षक बोट पर बैठ कर अपनी जान बचाएंगे।
३०५
एक पाबू साहब बाजार से घी खरीद कर नौकर के
सर पर रखाप हुए श्रा रहे थे। रास्ते में घी का घडा
नौकर के सर पर से गिर पडा। पीछे से जोर की श्रावाज
सुन कर पाबू साहय चौक पडे और देखते क्या है कि घी'
षह कर नाली में भरा जा रहा है।
घावू साहय नौकर पर चेतरह विगड पडे और बोले-
यह फैसे और क्यों गिराया?
नौकर ने धीमी श्रावाज से उत्तर दिया-बाबू जी,
१०५
1
मेरे दिमाग और पुढे में यह झगडा हो रहा था कि दोनों
में कौन श्रेष्ठ है। पुटा कह रहा था कि में तुमसे ज्यादा
ताकतवर हूँ ओर बहुत दूर घड़े को ले जा सकता है और
दिमाग कहता था कि मैं ज्यादा दूर से जा सकता हूँ।
बस इसी झगडे में सर ने चिद फर घडे को गिरा
-
दिया।
कमला बडी जोर से गेती हुई श्राकर मां से कहने
लगी-मो, मेरी गुडिया का पैर टूट गया।
माँ ने पूछा-क्यों घेटी! क्या हुआ, कैसे तेरी गुडी
का पैर टूट गया?
कमला ने सितरते हुए उत्तर दिया-वाग में मैं और
वसन्त दोनों रोल रहे थे, मैंने इस गुट्टी से घसन्त के सर
पर मार दिया और इसका पैर टूट गया!
३०७
कैलाश ने यमुना नदी में डूबते हुए एफ वुड्ढ़े को
बडी होशियारी से तैर पर यचा लिया। जय बुड्ढ़े को
होश
हुना तो उसने कहा-तुमने मेरी जान पवाई है,
इसके बदले में तुमसे अपनी माधुरी को ध्याद दूंगा।
कैलाश ने माधुरी की तरफ देख कर युड्ढे को पर
फर उठा लिया। इस पर युड्ढे ने घबरा र पदायरे
मां यह क्या कर रहे हो?
१०६
-
कैलाश ने कहा- मैं तुम्हें फिर जमुना माहाल दूंगा।"
माधुरी वास्तव में बहुत बदसूरत थी।
३०८
मोटर का गहरा धका लगने के कारण एक वेचारा
बटोही मुँह की खाकर गिर पडा। बटोही को गिरा हुआ
देख कर, एक सजन ने सहानुभूति दिखलाते हुए कहा-
क्या डॉक्टर को बुलाऊँ?
बटोही ने कराहते हुए कहा-भैया, इस 'मोटर में
डॉक्टर साहब ही तो थे, अब दूसरे को बुला कर में अपनी
जान से हाथ धोना नहीं चाहता।
घडी चुराने के अपराध में एक मनुष्य गिरफ्तार कर
जज के पास लाया गया। जज को विश्वास नहीं हुआ
कि उसने घडी चुराई है। उसने कैदी से कहा-जानो,
तुम छोड दिए गए।
कैदी ने ताज्जुय में प्राकर कहा-क्या मैं छोड दिया
गया।
जज ने कहा-हाँ, जाश्रो तुम रिहा कर दिए गए।
फैदी-सरफार, श्रय घडी तो वापस न करना होगा?
+
।
कमल ने विमल से पूछा-क्यों भाह, तुम 'अपना
दुसरा विवाह क्यों नहीं कर लेते?
२०७
विमल-इसके चार कारण
कमल-बदमा
विमल-तीन लडकियाँ और एक लडका।
३११
दो व्यकि श्रापस में बेतरह झगड रहे थे।
पहिला-में फहता है सूरज, चाँद से अधिक रोशनी
करता है।
एक तीसरे सज्जन ने वीच पचावा करते हुए कहा-
तो भाई इसमें श्राश्चर्य की कौन सी बात है ? सूरज
चमकता भी तो दिन में है। रात में चमके तो हम भी देखें
फितनी रोशनी करता है।
३१२
एक मोटे ताजेसजन चन्दा मांगने के लिए व्याल्यान
दे रहे थे। बोलते घोलते पेट पर हाथ फेरने लगे। किसी
मसपरे ने ऊँचे स्वर से कहा-क्या महाराज ! क्या इसी
विभाग की उन्नति के लिए श्राप गला फाड रहे हैं।
३१३
राह चलते हुए एक व्यक्ति ने डारिए से उत्सुक होकर
पला-भाई, मेरा भी कोई खत है क्या?
डाकिया-नापका नाम !
"मत पर लिखा ही होगा, फिर पूरते क्यों हो?"
-
१०७
।
.
३१४
एके बिगडे हुए रईस जाडे की रात में बारह बजे
अपने सजे-सजाए कमरे में बैठे बाजा बजा रहे थे। अावाज
आई-'मलाई को घरफ।'
रईस महोदय ने चार पाने की घरफ ली और खाते-
खाते वरफ वाले से उन्होंने पूछा-क्यों थे, इस जाडे में
तेरी बरफ कौन उल्लू का पट्टा खाता होगा ?
परफ वाले ने धीरे से कहा- सरकार जैसन शौकीन
लोग खात हैं और भला कौन साई।
३१५
लन्दन के एक विख्यात बैरिस्टर एक मुकदमे की
पैरवी घडी दिलचस्पी के साथ कर रहे थे, मुकदमा तीन
महीने तक जारी था। एक दिन उनका मुन्शी कानून की
फरीष सौ पुस्तके लेकर, जिनकी उस दिन की पैरवी के
लिए जरूरत थी, अदालत में पहुंचा। श्रागे धागे वैरिस्टर
साहब चल रहे थे और पीछे-पीछे मुन्शी। वैरिस्टर साहब
के टेवुल पर पुस्तकों का ढेर देख कर न्यायाधीश ने
पूछा-महाशय, श्राप एक गदहे का घोम क्यों लाप हैं ।
वैरिस्टर साय ने मुम्भरा कर जवार्य दिया- "दूसरे
गदहे को कानून सिखलाने को न्यायाधीश ने सर नीचा
।
लिया।
२०६ जर्मनी के एक प्रोफेसर अपने विषय के अध्ययन में इतने दत्तचित्त रहते थे कि उन्हें उनकी पत्नी कपडे पह- नाया करती थी। एक दिन सुबह धोबी कपडे घोकर लाया, जिन्हें प्रोफेसर साहब के नौकर ने उस कमरे में लाकर रख दिया, जिसमें प्रोफेसर साहब पढ़ रहे थे। पढ़ना समाप्त कर चुकने पर जब उनकी दृष्टि घढी पर पड़ी तो देखा कि कॉलेज जाने का समय हो चुका है। जल्दी जल्दी में उन्होंने धुले हुए कपडों में से पहनने के कपडे निकाले और उन्हें पहिन कर वे कॉलेज चले गए। कुछ देर के बाद उनकी पत्नी उस कमरे में गई, जहाँ प्रोफे. सर साहब रोज अपने कपड़े पहनते थे, और देखा कि प्राफेलर साहेव के कॉलेज के कपडे खूटियों पर गे थे। शक्षा हुइ कि कही ये बिना कपडे पहने ही कॉलेज म चल गए हो। झट उन्होंने प्रिन्सिपल को टेलीफोन किया- महाशय, कृपा करके पतलाइए कि फलॉ प्रोफेसर साहय पॉलेज कपडे पहिन पर श्राप है या नहीं। उत्तर मिला-बद फपडे पहने हुए ३१७ एक लेपक ने विरहावस्या के ७ प्रकार बतलाए हैं। पहला प्रकार पत्नी की मृत्यु के कारण उपस्थित होता है।
- ॥ । इस विरह को "चिर-विर" कहते हैं। घर ही में पली की बीमारी के कारण जो विरह उत्पन्न होता है, उसे "प्रत्यक्ष विरह" कहते हैं। पत्नी जय मायके चली जाती है, उस विरह को "परोक्ष विरह" कहते हैं। घर में पत्नी से झगडा हो जाने के कारण जो विरह उत्पन्न होता है, उसे "प्रेम- विरह" कहते हैं। एक क्षण के लिए भी पली दृष्टि से हट जाने पर जो विरह भोगना पडता है, उसे "क्षणिक विरह" कहते है , और विवाह के लिए तरसने वाले युवकों और युवतियों को जो विरह भोगना पड़ता है, उसे "प्रारम्भ विरह" कहते हैं। . J 1 4 एक राजनीतिज्ञ, जोकि घर-घर घूम कर वोट मांग रहे थे, अचानक एक सेतिहर के मकान पर पहुंचे, जहाँ उन्होंने फाटक पर ही एक युवती को खडी हुई पाया। प्रार्थी ने घडी नम्रता से नमस्कार करने के बाद रमणी से पूछा--निश्चय ही आपके स्वामी घर में विराज मान है? रमणी ने उत्तर में कहा-"जी हॉ, वह घर में है।" फिर स्त्री से आपने पूछा-"क्या मैं उनसे मिल सकता है ?" स्त्री ने कहा-'मेरे स्वामी इस समय खेत में कुत्ते दफन करने गए हैं।
१११
उन्होंने कहा-"मुझे अापके कुत्ते की मृत्यु सुन पर
पदा शोक धुश्रा, उसे किसने मारा?" श्री ने मुँह धना
कर कहा कि कुत्ते ने स्वय अपने को उम्मेदवारों (जी
चुनाव के लिए खडे हुए है) की ओर भूफ-भूफ फर
मार डाला।
३१९
लन्दन की किसी कचहरी में एक गवाह से पूछा
गया--तुम अपने को विधवा बतलाती हो, क्या यह सत्य
है?
।
गवाह ने उत्तर दिया-जी हाँ, मैं तीन पतियों को
दफन कर चुकी है, इसलिए में विधवा कहलाने का अधि-
कार अवश्य रखती हूँ।
३२०
बंगला के सुयोग्य लेखक पफ पार पटने से फलकत्ता
जा रहे थे। जिस डिव्ये में वह बेटे थे, उसी में कॉलेज के
एक विद्यार्थी महोदय यैठे थे, जो वंगला-साहित्य की पड़ी
निन्दा कर रहे थे। दस मिनट तक तो लेखक महोदय
शान्ति के साथ सुनते रहे, परन्तु दस मिनट के बाद उन्होंने
विद्यार्थी जी से पूछा कि आपने गला की कौन-कौन सी
पुस्तकें पढ़ी है ?
~िआज तक मने बैंगला मापा की हजारों
पुरतर्फ पढ़ डाली होंगी।
विद्यार्थी-
1
लेखक-हाल ही में कौन-कौन सी पढ़ी है ?
विद्यार्थी-पुस्तक का नाम तो भूल गया ।
लेखक-क्या उस पुस्तक के लेखक का नाम बतला
सकते हैं।
विद्यार्थी-जी नहीं , लेखक का नाम भी नहीं मालूम ।
लेखा-क्या श्राप यह पतला सकते हैं कि उस
पुस्तक में क्या लिखा था ?
विद्यार्थी-यह भी भूल गया, परन्तु हाँ, यह अवश्य
पतला सक्ता हूँ कि उस पुस्तक की जिल्द लाल रक्त
की थी।
३२१
न्यायाधीश ने अभियुक्त से पूछा कि तुम पर पैदा
हुए थे ? अभियुक्त ने कोई उत्तर न दिया। चिढ कर
न्यायाधीश ने फिर कहा-अपना जन्म दिवस बतलाओ!
अभियुक्त ने धीमे स्वर में कहा-मेरे जन्म-दिवस के
उपलक्ष में आप कुछ मिठाई नो पाँटिएगा ही नहीं, फिर
जन्म-दिवस पूछ कर क्या कीजिएगा हुजूर!
३२२
एक क्सिान की पत्नी उसे बहुत गालियाँ दिया करती
एक दिन जय कि पानी घरस रहा था, फिसान खेत
परन्तु पत्ली के डर से घर में घुसने की उसकी
१३
हम्मत न हुई। इसलिए वह पानी में भीगता हुना सडक
र ही खडा रहा। थोडी देर में उसका एक मित्र वहाँ से
नकला। मित्र ने किसान से पता कि जय यो इतने जोर
की हो रही है तो तुम घर के अन्दर पयों नही चले जाते।
रिसान ने उत्तर दिया कि इस घर्षा से जान पच लपती
है, परन्तु घर फ अन्दर जो गालियों की वर्षा होती,
पचाना मेर लिए घडा मुश्किल होगा।
३२३
।
MA
११२
लेखक-हाल ही में कौन-कौन सी पढ़ी है ?
विद्यार्थी-पुस्तक का नाम तो भूल गया।
लेखा-क्या उस पुस्तक के लेखक का नाम बतला
सकते हैं।
विद्यार्थी जी नहीं, लेखक का नाम भी नहीं मालूम ।
लेखक-क्या श्राप यह बतला सकते है कि उस
पुस्तक में क्या लिखा था ?
विद्यार्थी-यह भी भूल गया, परन्तु हाँ, यह अवश्य
पतला सक्ता है कि उस पुस्तक की जिल्द लाल रङ्ग
की थी।
३२१
न्यायाधीश ने अभियुक्त से पूछा कि तुम क्च पैदा
हुप थे ? अभियुक्त ने कोई उत्तर न दिया। चिढ कर
न्यायाधीश ने फिर कहा-अपना जन्म दिवस बतलाओ!
अभियुक्त ने धीमे स्वर में कहा-मेरे जन्म-दिवस के
उपलक्ष में आप कुछ मिठाई नो घाँटिएगा ही नहीं, फिर
जन्म-दिवस पूछ कर क्या कीजिएगा हुजूर !
३२२
एक किसान की पत्नी उसे बहुत गालियों दिया करती
थी। एक दिन जय कि पानी बरस रहा था, किसान खेत
से लोटा, परन्तु पत्ली के डर से घर में घुसने की उसकी
हिम्मत न हुई । इसलिए वह पानी में भीगता हुवा सडक
पर ही खडा रहा। थोडी देर में उसका एक मित्र वहाँ में
निकला। मित्र ने किसान से कहा कि जब वर्षा इतने जोर
भी हो रही है तो तुम घर के अन्दर क्यों नहीं चले जाते !
विसान ने उत्तर दिया कि इस वर्षा से जान बच सक्ती
है, परन्तु घर के अन्दर जो गालियां की वर्षा होती है,
उससे जान बचाना मेरे लिए बडा सुशिल होगा।
३२३
एक ग्रामीण पाठशाला का प शिक्षक बडा निर्दयी
था। विद्यार्थियों को पुरी तरह माग करता था। एक दिन
इस स्कूल को देखने कलक्टर पहुंचे। पलक्टर ने विद्या-
पियों से कई प्रश्न पूछे। उन्होंने एक विद्यार्थी से, जिसे
एक दिन पदको इस शिक्षक ने बहुत मारा था, पूछा---
"दुनिया, सूर्य, चन्द्र ओर तारे किसने बनाए " विद्यार्थी
घबरा गया, वह समझा कि कलक्टर साहकल बीघटना
का हाल पूछ रहे हैं, जिसके पारण उसे मार पड़ी थी।
विद्यार्थी ने घबराते हुए उत्तर दिया-उजूर, मुगले
गलती दो गई अव ऐसी गलनी फिर न हंगा।
३२४
एक सम्पादक महाशय इत्तिफाक से मिा टिकट
गाड़ी में सफर कर रहे थे और यह इरादा कर लिया था
कि सम्पादन-क्ला की श्राजमाइश यहाँ भी करुंगा। यह
बात सम्पादक महाशय सोच भी न पाए थे कि टिकट
कलक्टर या धमका और उसने पहा-"साहब ! टिक्ट
दिखलाइए।" सम्पादक महाशय ने बडे इतमीनान से जवाय
दिया-"साहब । टिक्ट मेरी 'पॉकेट-बुक' में था, लेकिन
वह तो मकान पर ही छूट गई। मगर याद रखिए, मैं ,
"डेली न्यूज" के सम्पादकीय विभाग में काम करता हूँ।"
इस पर टिक्ट-कलक्टर ने कहा-"अच्छा, मेरे साथ
श्राइए। इस घगल वाले डरे में "डेली न्यूज" के सम्पादक
महोदय भी विराजमान है, वह सापकी शनारप्त पर
टेंगे। सम्पादक महाशय बेचारे टिकट-लक्टर के पीछे
हो लिए | क्या परते, दुसरा चारा ही न था। उस डरे
में पहुंचते ही सम्पादक जी यह सुन कर बडे चक्ति
हुए कि उन मनुष्य ने इन्हे देखते ही कह दिया-हाँ,
ठीक तो है ! यह तो हमारे सम्पादकीय विभाग में काम
करते है।
जब टिनद-कलस्टर चला गया, तब बेचारे सम्पा-
दक उस मनुष्य के पास जाकर इस सफाई से बचाने
पर धन्यवाद देने लगे। उस व्यकि ने मुस्कराते हुए
उत्तर दिया-श्रोह । धन्यवाद-यन्यवाद की पला जरूरत !
श्रजी जनार ! मैं भी "डेली न्यूज" का सम्पादक-वम्पादक
कुछ नहीं है।
,
३२५
सुशीला ने कहा-"अरी, बहिन माधवी ! मेरी सीने
वाली नई मशीन को न जाने क्या हो गया है, वह तो
चलती ही नहीं।" माधवी ने गोर से देख कर कहा-
"श्रापिर, उसमें क्या विगडा हुया है?"
वडी परेशान होते हुए सुशीला बोली-विगडा-उगडा
तो पुछ मालूम नहीं देता, लेकिन जब मैंने घटन के ऊपर
उसे चलाया, तो उसके पुरजे हट गए !
३२६
परिडत रमाशङ्कर पाण्डे की स्त्री रामपली अपने छोटे
लड़के लल्लन को थपक-चपक कर सुला रही थी। जब
ललन ऊघ गया तो गमाली कहती है-अरे, श्री ललन ।
श्राज तुमने ईश्वर-वन्दना की कि नहीं?
लल्लन ने चाक कर कहा-हाँ, अम्माँ। कर चुका।
और फिर सोने लगा।
इतने में रामपली फिर पलने लगी-भगवान् से
यद धिनती की फि नहीं-'कि मुझे एका अच्छा लडका
यना दो।'
लड़के ने जवाब दिया-हाँ जम्मा ! मैंने अपने को
नेकपनाने की प्रार्थना करते हुए परमारमासे यह भी मोती
मानी कि 'मेरी अम्माँ और घात को भी सुधार दो भगवन् ।'
।
।
-
३२७
अर्थ-शास्त्र के एक प्रोफेसर साहब एक समा में
व्याख्यान दे रहे थ। मनुष्य गणना के सम्बन्ध में उन्होंने कहा
कि अमुक प्रदेश में रियों की सख्या बहुत ही कम होती जा
रही है। बहुत स मनुष्य कुंवारे ही रह जाते हैं, त्रियों की
बहुत मॉग है। (अपने सामने बैठी हुई स्त्रिों से) यदि आप
चाहे तो उस देश में जा सकती हैं। एक स्त्री को यह सुन
कर बडा बोध श्राया और उसको असभ्य समझ कर, समा
को छोड कर जाने लगी।
प्रोफेसर साहब बोले-श्रीमती जी, मेरा अभिप्राय
यह नहीं था कि श्राप इतनी शीघ्र वहाँ पहुँचने की तैयारी
कर दें और मेरा व्याख्यान भी न सुने ।
३२८
पक अध्यापक ने पाठशाला में शिक्षा देते हुए एक
विद्यार्थी से पूछा-क्या तुमने शिवाजी का नाम सुना है'
छात्र-जी हो।
अध्यापक-अच्छा, यह बतलाश्रो कि यदि वे श्राज
जोवित होते तो क्या करते ?
छात्र-(कुछ समय तक सोने के पश्चात् ) उनको दृद्धा-
चन्था के कारण पेन्शन मिलती होती।
३२९
एक पुरुष बाजार में एक उल्लू और एक उल्लू का
-
-
बच्चा लिए हुए बैठा था। वह उनको येचना चाहता था।
एक मनुष्य न पूछा- क्यों भाई, इनका क्या मूल्य है ?
"उल्लू का पाठ पाने और बच्चे का बारह पाने।"
"वाह विचित्र युद्धि है। अरे घडे का मूल्य अधिक
धोना है कि छोटे का?"
"सरकार, श्राप हो सोच लें। बदा केवल उल्लू ही
है, दूमरा उल्ल भी और उल्लू का बच्चा भी।"
३३०
एक मनुष्य ने दो बढदयों को शारे से एक लहा
बीरते हुए देगा। यह उसके लिए पहला अवसर था,
जब कि उसने देखा कि क्भो श्रारे को एक अपनी ओर
को पींच लेता है कभी दुसरा । उन बढ़ायों में एक बहुत
लम्बा था, दूसरा नाटा । यह मनुष्य पद मिनट तक पड़े
ध्यानपूर्वक सोचता रहा। फिर भागे बद कर उसने लम्बे
मनुष्य के मुंद पर पय वपत जगाया।
यदा मनुष्य-ई-हैं, यद क्या।
यह मनुप्य-डरपोक, कायर में पन्द्रह मिनट से
देख रहा है कि तुम इस छोटे मनुष्य से थारा छीनने की
कोशिश कर रहे हो। परन्तु यह भी घलयान है। क्या तुम्हें
इसके साथ चल दिसलाने में लजा नहीं श्रासी ।
एक महाशय एक हलवाई की दुकान से धोकर का.
-
११८
हरे थे। वहाँ कुछ छोटे लडके मिठाई मोल ले रहे थे।
उन्होंने एक बच्चे से पूछा-यदि में इस दुकान में से
मिठाई लेकर निम्लता तो तुम मुझे देख कर क्या कहते ?
बच्चा फुछ देर तक ध्यानपूर्वक सोचता रहा, फिर
बडे भोलेपन के साथ उसने उत्तर दिया-योडो हमको भी
दे दो।
३३२
एक रोगी डॉक्टर साहश को अपनी प्रॉख दिपलाने
लगा और कहा-मेरी आँव में तकलीफ है।
डॉयटर-हॉ, में तुम्हारी आँख से भीतर का सब
रोग देख सकता हूँ। तुम्हारे पेट में दर्द रहता है, सिर भी
घूमता हे, जुकाम भी रहता है और आँख में तो तकलीफ
है ही।
रोगी-क्षमा कीजिए, तकलीफ दूसरी श्रॉप में है।
यह आँख तो शीणे को यनी हुई है।
डॉक्टर साहब को यह सुन कर अपनी भूल मालम
हुई। वे धनी हुई श्रॉप देख रहे थे, परन्तु थे बुद्धिमान ;
वे तुरन्त बोले-भाई, शीशे की प्रॉख है तभी तो शरीर
के भीतर के सब रोग दिखलाई पड रहे हैं।
३३३
रियासत बडोदा में प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य है।
'एक यार एक फिप्लान केविपय में शिकायत की गई कि वह अपने लड़के को पढने को लिए नहीं भेजतानोर जो अभ्यापक लडके को सुलाने के लिए गया था, उसको उसने मारा। किसान पुलिस में बुलाया गया और इसका उत्तर माँगा गया। वह बोला-श्रीमान्, प्रथम तो में यह कहना चाहता हूँ कि मेरे घर पर कोई अभ्यापरु महीं गया । दूसरी बात यह है कि यदि कोई गया भी है तो मैंने उसे कभी नहीं मारा और अन्त में में यह पहूंगा कि यदि उप- गेक्त दोनों वातों में श्राप मेरा विश्वास न करें तो यह तो श्रापको मानना ही पडेगा कि मेरे कोई लडफा भी नहीं है। ३३४ एक येवकूफ वा एक पैमा गुम हो गया । वह हाथ जोड फर परमात्मा से प्रार्थना करने लगा कि यदि मेरा सोया हुआ पैसा मिल जाय तो मैं एक नारियल श्रापको - चढ़ाऊँगा। ३३५ सेठ जा--(मामीण किसान मे) क्लजय न्यूनिति- पेलिटी में मेम्बरों का चुनाव होगा, तब तुम मुझे वोट (Vote) देना। किमान-(योट का अचं नाद समझकर) या सेठ जी, यदि मेरे पास बोट होता तो मैं अपना मात लगानी में मर पर क्यों ले जाता?
+-
३३६
वटील साहब श्रदालत में बैठे हुए थे। इतने में उनका
नौकर श्राया और कहने लगा-पदि श्राप कुछ पुरस्कार
द तो में आपको एक शुभ समाचार सुनाऊँ।
यील-(पुरस्कार में एक रुपया देते हुए) जल्दी सुनानो,
झ्या समाचार हे?
नौकर-श्रापके मकान में आग लग गई।
वकील-(नौकर पर दाँस पीसते हुए) क्यों रे हराम
जादा ! यही शुभ-समाचार है?
नौकर-हुजूर श्राप उस मकान को तोड पर नया
पनवाना चाहते थे। तुडयाने में व्यर्थ पैसे पर्च होते ।
वह स्वय हट गया । कहिए, इससे श्रापकी बचत हुई
-
--
या नहीं।
३३७
एक व्यापारी के यहाँ बहुत से मुनीम रहा करते थे।
उनमें से एक मुनीम की यह आदत थी कि वह विलम्ब
करफ दूकान पर पाया करता था। व्यापारी सदैव उसे
इस बुरी आदत को छोड देने के लिए उपदेश दिया करता
था। किन्तु जब-जय व्यापारी उसे इस विषय पर कहता;
तब-तब वह धूर्त उत्तर देता-सेठ जी, इसमें मेरा तनिक
मी अपराध नहीं है। सारा अपराध मेरी घडी का है, जो
ठीक टाइम नहीं देती।
-
-
.
इसी प्रकार कई दिन बीत गए। एक दिन जब वह
साया, तब व्यापारी ने उससे कहा-पल तुम्हें
यथा मुझे एफ नई वस्तु लेनी पड़ेगी
मुनीम ने उत्सुकतापूर्वक पूछा-कौन सी वस्तु !
व्यापारी-या तो तुम दूसरी घडी परीवो या
दूसरा मुनीम रक्खू।
३३८
एक मास्टर किसी विद्यार्थी को बहुत देर से पाठ
पढ़ा रहा था, परन्तु उसकी समझ में नहीं पाता था। इस
पर मास्टर साहय अमला कर घोले-अरे तुझे किस
पढ़ाया
विद्यार्थी-श्राप ही ने तो पढ़ाया है, माल्टर साक्ष।
३३९
घायू रजनीकान्त की छत पर से धन्दर धोती लेकर
मागा। पायू साय ने धारा पर नौकर से पुकार पर
कहा-"परे फलुश्रा, धोती यन्दर ले गया,
जवी हुमा।"
"अजी सरफार, यद मा खरीदने जाता। येवारामा
फिर रहा था, पहा लेने दो।"
गधे ने
३४०
एफबाग में दो शालती लेट रहे थे, उनमें में एक
छाती पर पक्ष याम पड़ा था। उधर से एक मुसाफिर
ल
1
रहा था। उनमें से ग्राम वाले ने कहा--"जरा मेरे मुँह ,
में ग्राम निचोड दो।" पथिक ने कहा-"तुम बडे श्रालसी
हो।" इतना सुनते ही दूसरा बोल उठा-"हाँ सरकार, यह
वडा बालली है, रात भर मेरे मुँह को कुत्ता चाटता रहा
और इसने 'दुत्त' तक भी नहीं क्यिा।"
३४१
कमलाशहर को गाली देने की बहुत यादत थी।
एक बार कमलाशङ्कर एक बड़ी पञ्चायत के पञ्च चुने
गए। लोगों ने कहा-सरकार, अब किसी को गाली न
देना।
वह बोले-अच्छा अब किसी साले को गालीन देंगे।
३४२
दो मुसाफिर नाव में सफर कर रहे थे। एकाएक नदी
में तूफान आया । एक ने कहा-यार कहीं इव न जाय ।
दूसरे ने कहा-डूव भी जाने दे, साले ने किराया भी
बहुत बढा रक्खा है।
३४३
घर के पास ही तालाब था। माता नहीं चाहती थी
कि छोकरा पानी के पास जाय । माता ने कह रक्खा था
कि अगर वह तालाब के पास जायगा उसे मार खा
। एक दिन जब छोकरा खेल-कूद कर घर में
।
.
१२३
तब उसके कपड़े भीगे हुए थे। माता को यह युग मालम
या । वह बहुत क्रोधित हुई।
माता-रामू ! तुम्हारे कपडे कैसे भीगे हुए हैं ? क्या
तुम फिर पानी के अन्दर गए थे?
राम-हॉ मा, श्यामा को पचाने के लिए पानी में
गया था।
श्यामा गम् की छोटी बदिन थी। माता अपने पुत्र
की वीरता मे बहुत प्रसन्न हुइ । यडे प्रेम पोर अानन्द से
उसे हदय से लगा कर माता ने कहा-चिरायु दो मेरे
प्यारे ! क्या जैसे ही श्यामा गिरी, वैसे ही तुम उसके
पीछे पानी में कूद पडे थे।
रामू-नहीं माँ, में तो पहले ही से इद पडा था
कि यह गिरे तो मैं शीघ ही पचा ले।
-
१२२
।
रहा था। उनमें से ग्राम वाले ने कहा-"जरा मेरे मुँह
में ग्राम निचोड दो।" पथिक ने कहा--"तुम बडे श्रालसी
हो।" इतना सुनते ही दूसरा बोल उठा-"हाँ सरकार, यह
बडा आलली है, रात भर मेरे मुंह को कुत्ता चाटता रहा
और इसने 'दुत्त' तक भी नहीं दिया।"
३४१
कमलाशङ्कर को गाली देने की बहुत यादत थी।
एक वार कमलाशङ्कर एक बडी पञ्चायत के पञ्च चुने
गए। लोगों ने कहा-सरकार, श्रष किसी को गाली न
-
देना।
वह बोले-अच्छा श्रय किसी साले को गाली न देंगे।
--
३४२
दो मुसाफिर नाव में सफर कर रहे थे। पकाएक नदी
में तूफान श्राया। एक ने कहा-यार कहीं इव न जाय ।
दूसरे ने कहा- इव भी जाने दे, साले ने किराया भी
बहुत घदा रक्खा है।
३४३
घर के पास ही वाला था। माता नहीं चाहती थी
'कि छोकरा पानी के पास जाय । माता ने कह रफ्ता था
"कि अगर वह तालाब के पास जायगा तो उसे मार सानी
पडेगी। एक दिन जब छोकरा स्नेल-कूद कर घर में श्राया
-तब उसके कपड़े भीगे नए थे। माता को यह बुरा मालम
हुआ। वह बहुत क्रोधित हुई।
माता-रामू ! तुम्हारे कपडे कैमे भीगे हुए हैं ? क्या
तुम फिर पानी के अन्दर गए थे?
रामू-हाँ माँ, श्यामा को बचाने के लिए पानी में
गया था।
श्यामा गम् की छोटी बहिन थी। माता अपने पुत्र
की वीरता से बहुत प्रसन्न हुई। बडे प्रेम और श्रानन्द से
उसे हृदय से लगा कर माता ने कहा-चिरायु हो मेरे
प्यारे ! क्या जेसे ही श्यामा गिरी, वैसे ही तुम उसके
पीछे पानी में कूद पड़े थे।
राम्-नहीं मां, में तो पहले ही से कद पटा था
जिससे यदि वह गिरे तो मं शीघ्र ही बचा लें।
३४४
श्यामाचरण ने अपने मित्र फघिराज जीयनदास में
'एक दिन पूछा-शविराज जी! आपने कभी अपने जीवन
में कोई भयकर भूल भी की है?
फविराज-हाँ, पेवल एक बार, मैंने एफ लपपती
को तीन ही दिन में आराम फर दिया!
३४५
एक अगरेज पना ये माननामा पा नाम था मुजीमु.
जमा खाँसाहब
लिए इस लम्दे और
RAS
१२४
नाम का उच्चारण परना एक बार ही असम्भव था।
उन्होंने बाहुन-कुछ चाहा कि खानसामा अपने उस नाम को
वदन कर कोई सीधा सादा नाम रख ले, पर खानसामा
राजी ही नहीं होता था। अन्त में साहय बहादुर के हृदय
में एक दिन नया विचार उठा -वे खानसामा को एक ।
तालाब के पास ले गए । उन्होंने खानसामा को पकड कर
उसे दो-तीन गोते लगाए। उसके उपरान्त उसे बाहर
निकाल कर साहय बहादुर कहने लगे खानसामा !
आज से तुम्हारा नामहुश्रा जैक (Jack ),अब तुम शुक्रवार
के दिन मास मत खाना।
ग्वानसामा भला क्यों मानने लगा। दूसरे ही शुक्रवार
को अापने मास का एक बडा टुकडा लेकर पाना प्रारम्भ
कर दिया। माहब ने जो देखा तो बहुत मिलाप,
कहने
लगे-क्यों जैक । यह क्या ? तुम फिर शुक्रवार के दिन
माल खाने लगे।
म्वानासामा-नहीं हजूर ! यह मास नहीं है । मैंने
इसे तालाब में डुबो लिया था । यह तो अब खरबूजा
1
-
गया।
३४६
पिता-बालू ! तुम्हें मारना मुझे अच्छा थोडे ही
लगता है। बेटा, मैं तुमसे अत्यन्तस्नेह करता है और तेरे
सुधारने ही के लिए मैं तुझे कभी-कभी मारता है।
1
१२५
पुत्र-(रोसे हुए) घावू जी । सो तो ठीक है, में
अभी छोटा है,नहीं तो अवश्य श्रापके स्नेह का बदला चुका
देता।
३४७
कसान साहय सिपाहियों के सामान का निरीक्षण कर
रहे थे । अगरेज सिपाहियों को दांत साफ करने के लिए
ब्रश दिया जाता है, पर जैक नामक सिपाही के सामान में
कप्तान को यह ब्रश नहीं दिखाई पडा । कप्तान ने पदा-
तुम्हारा दाँत साफ करने वाला नश कहाँ है?
जैक-"यह है हुजर १" यह कह पर जैफ न धानु
की ची साफ करने वाला बडा ब्रश दिपाया । कतान
उसे देख कर बहुत ही नाराज हुश्रा, उसने समझा कि
जैक मुझसे दिल्लगी करता है। उसने डाँट कर कहा-
"पयों जी ! इतना बड़ा प्रश तुम अपने मुख में कैम हम
नेते छोगे?"
जैक ने बडे शान्त भार मे उत्तर दिया-नहीं हुजूर,
मैं अपने दाँत ही बाहर निकाल कर साफ कर निषा
परता है।
३४०
सुशीला की माता ने कट होर मुग से पधा-में
मुझे मारते मारते थक गई, लेकिन तू पुछ सुनती ही
महीं। श्रय में तुझे तेरे पिता के सुपुर्द करती है।
सुशीला ने बडे भोलेपन से कहा--माता जी, जक
पिता जी थक जाएँगे तब?
३४९
एक रोगी वैद्य के पास गया। वैद्य ने पूछा-कैसी
हालत है?
रोगी--
स्वर तो टूट गया, लेकिन कमर बड़ा दर्द
करती है?
वैद्य-घबडायो नहीं, कमर भी टूट जायगी।
३५०
डॉक्टरकहो अब क्या हाल है!
रोगी-मङ्गलवार को घर आया था, बुद्धनार को
फिर नहीं पाया और श्राज फिर पा गया है।
डॉक्टर ने एक गोली देकर उसे मेवन करने की रीति
बतला दी।
गेगी डॉक्टर साहय । यह तो बतलाइए कि मुझे
कौन सा ज्वर है?
डॉक्टर-तुम्हें पारी का ज्वर हे और यह गोली खाने
से ठीक हो जायगा।
रोगी-सूय पारी का ज्वर तो तब हो कि श्राज
मुझे पाया फल श्रापको और परसों श्रापके बच्चे को!
लेकिन यह तो मुझे ही श्राता है।
-
. ३५१ श्रीमती जी कहीं निमन्त्रण में गई थी। चलते समय श्रापने दरवाजे में ताला लगा दिया , और चाबी दरवाजे के ऊपर वाले ताक में रख दी। जर पतिदेव सायबाल को प्रॉफिस से पधारे, तव आपने देखा कि दरवाज़ा बन्द है, और उसमें ताला पड़ा हुआ है। पहले तो बहुत चकराए, खेर, किसी प्रकार ताला तोड कर भीतर गए। कमरे में पहुँच कर जब श्राप कपडे उतारने लगे, तर आपली दृष्टि मेज पर रपसे हुए एक कागज पर पड़ी। श्राप उठा कर पढने लगे। कागज में लिखा हुश्रा था- -मेरी सहेली श्यामा के यहाँ मेरा निमन्त्रण है , मैं यहाँ जा रही है। रात को २० वजे तक या जाऊँगी। बाहर के दरवाजे की ताली वहीं ऊपर के ताक में रक्खी है। श्राप लेकर दर- वाजा खोल लीजिएगा। श्रीमती जी ने अपनी शिक्षा का जितना प्रयोग क्यिा, उतना अपनी बुद्धि का नहीं ॥ ३५२ एक देवता जी होटल से खाना पाकर पिना दिल चुकाए चम्पत हो जाया करते थे। एक दिन जेसे ही प्राप दरवाजे तक पहुँचे कि पीछे से मेनेजर ने प्रापको पकड लिया और कहा-याव दिनों में हाप सागे दो। यद पाँचवीं बार हे, जय तुमने होटल को घोसा दिया है।
भूल रहा है। फुच क्रोधित होकर देयता जी बोले-तुम भूलते दो! मैनेजरने देवता जी-भूल नहीं रहे हो तो क्या? मुझे अच्छी तरह याद है कि यह सातवी धार है। ३५३ श्रीमती मार्टिन ने एक दिन बड़े स्नेह के साथ मुस्क- हुए अपने पति से कहा-प्यारे ! जब मेरा देहान्त हो जाय, तब तुम मेरी समाधि (कर) पर यह पाक्य अङ्कित करा देना-'स्वर्ग में शान्ति का निवास है।' पतिदेव ने स्नेहमयी वाणी में उत्तर दिया-मेरी समझ में तो यह पाक्य अङ्कित करना उचित होगा- रवर्ग में कमी शान्ति का निवास था।' किसान-कहिए डॉक्टर साहव । श्राजक्ल फ्या हाल चाल है। डॉक्टर-बिलकुल पराय । इस साल मलेरिया की फसल अच्छी नहीं है। ३५५ । पावू जी-रामू । जग स्टेशन तक चले जानो। इस गाडी से मेरी सास श्राने वाली है। इसके लिए में तुम्हें चार पाने दूंगा।
१२६
द
रामू-बाबू जी! अगर वे न श्राई तो?
वाबू जी-तो तुम्हें पाठ पाने देगा।
३५६
मेजिस्ट्रेट-तुम दया के पात्र नहीं हो, क्योंकि यह
"तुम्हारा पदला अपराध नहीं है।
अपराधी-पर मेरे वकील का यह पहला ही मुकदमा
रहे हजूर!
३५७
सायकाल का समय था। पार्क में येठ फर चार-पाँच
अगरेज-छोकरियाँ यार्तालाप में अपने भावी पतियों के
गुण-दोप की विवेचना कर रही थीं। उनमें से सबसे
पडी ने कहा-पर यह निश्चित है कि में उस पुरष की
श्रीनिमी कदापि नहीं पनँगी, जो बहुत जोर से पर्राटे
नेता होगा।
उनमें से जो सयसे छोटी थो, घद पडी चञ्चज थी।
उसने फदा -पर उसके पास सोए विना तुम इस यात
का पता कैसे लगा पायोगी घहिन !
३५८
गया-भानू जी फल मेरे या एक दुर्घटना हो गई!
बाबू जी-तो क्या?
है
M m
गवैया-कल में घर में गा रहा था, उसी समय
सहसा मेरा पहरा भाई मूर्षित होकर गिर पड़ा।
बाबू जी-पोहो! कहीं उसका बहिरापन सहसा दूर
तो नहीं हो गया था।
३५९
सेठ जी कन्यादान लेने के लिए वेदी पर बैठे। पुरो-
हित ने ज्योंही श्रापके हाथ में जल और चावल दिए,
त्योही आप कॉप उठे , और ऐसा प्रतीत हुश्रा मानो सेठ
जी को कठिन पीडा हो रही हो। पुरोहित बेचारा घबडा
गया , उसने कहा-क्या-क्यों ? क्या बात है सेठ जी!
श्रापकी तबीयत तो ठीक है?
सेठ जी ने धीमे स्वर में उत्तर दिया-कुछ नहीं,श्राज
में जीवन में पहली बार दान कर रहा है, और कुछ बात
नहीं है।
३६०
माता-देखो रामू ! श्रव में फिर कभी तुम्हें इस
प्रकार लड्डू चुराते हुए न पकड पाऊँ , इसका ध्यान
रखना।
भरसक ऐसी ही कोशिश करूँगा।
३६१
माता ने रोगी बालक के कमरे में जाकर देखा कि वह
.
-
पुत्र-मैं
१३१ शोखें वन्द किए हुए लेटा है। माँ ने कहा-क्या सो गया रेरामू १ रामू-हाँ माँ ! और डॉक्टर ने कह दिया है कि सोते हुए दवा न खिलाई जाय। ३६२ युवती श्यामा ने बहुत सोच-विचार पर केतकी से पूछा-क्यों वहिन, स्त्रियाँ अपने पतियों को प्राय "प्राण- नाथ" कह कर सम्बोधन करती है, पर जिन घेचारियों के पतियों का नाम ही "प्राणनाथ" होगा, ये प्रमागिनी क्या कह कर पुकारती होंगी? पति का नाम तो तो नहीं सकती। केतकी ने लजा कर कहा-"कल पूछ कर यताऊँगी।" केतकी के पति का नाम था प्राणपलम ! ३६३ "कुमुद, तुम बडे बदमाश हो गए हो । तुमसे मना किया था कि अपना अमरुद दोपहर में खाना, इस समय सर्दी है, पर तुमने नहीं माना , आखिर सा दी डाला।" कुमुद ने सिर खुजलाते हुए माँ की ओर दयो निगाह से देख पर कहा नहीं अम्माँ ! मैंने तुम्हारी आज्ञा नहीं टाली है।यह तो मैं (फोटो यहिन कुन्ती की भोर इशारा कर) इसका अमरूद लेकरमा रक्षा हूँ और मैंने अपना पाला
१३२
इसे दे दिया है, तुमने इस अमरुद के लिए थोडे ही मना
किया था!
३६४
मिर्जा हिमाकत वेग बड़े अव्वल दर्जे के अफीमची
थे। अपनी जिन्दगी में यह पहली बार सफर करने को
निकले थे। एक सराय में डेरा डाला, लोगों ने कहा-"जरा
होशियार रहिएगा, यहाँ चोर बहुत हैं" बेचारे काँप
गए। अफीम का सारा नशा किरकिरा हो गया। पो
फटने ही घोडे पर सवार होकर अपने नौकर गफूर के
साथ भागे। रास्ते में पिनक या गई। एकाएक चिल्ला
उठे-“गफूर ! गफूर ! मेरा घोडा कहाँ गया ?"
ग़फर ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा- हुजूर, घोड़े
पर तो श्राप सवार हैं।"
मिर्जा
साहय ने श्रीठ चबाते हुए कहा-क्या मुजा-
यका है। बेटा, सफर में हमेशा होशियार रहना चाहिए !
"कुछ न पूछो मित्र, घडा परेशान हैं। जी में श्राता
है कि प्रारम-हत्या करके जान दे दूँ!"
"आखिर हुश्रा क्या ? पेरियत तो है?"
"जी कहॉ की खैरियत । घर छोड कर भाग जाने
की इच्छा होती है, आज चार रात सोए यिना गुजर
-
२३३
-
"सोए बिना ? इसका कारण ?"
"सुन कर तुम्हें भी बडा दुख होगा।"
"अरे भाई, मुझसे कहो भी तो "
"अच्छा सुनो। परसों रात को में और मेरी स्त्री
सोए थे। श्राधी रात के करीब बाहर कुछ खटका हुआ।"
"खटका हुया तो इससे क्या ? क्या चोर था ?"
"मैं तो नहीं, पर बीबी साहिया उठ येठी और बोली-
'वाहर खटफा हो रहा है, कोई चोर है। मैंने कहा-'तुम
बडी श्रदमक हो! चोर जब श्राते हैं तो खटका ही तो
नहीं होता-किसी को पता भी नहीं लगता और घे अपना
काम करके चले जाते हैं।"
"तब तो तुम्हारी स्त्री बेखटके सो गई होगी, क्यों?"
"श्रजी यहाँ। श्रय गेज खटफा तो होता नहीं, यह
समझती है कि रोज ही चोर पाते हैं। रात भर स्वय भी
जागती है और मुझे भी जगाती है !!
३६६
पाठ घर्ष की एक वालिश से उसकी पडोसिन ने
पूछा--सरला ! मैंने सुना हे कि तू सोने के पहले यात
देर तक प्राधना करती है। क्या यह ठीक है।
"जीदा"
"भला बतानो, प्रार्थना में क्या क्या यवती"
सरला ने नीचीगाह करके भोरेपन से यहा-
१३४
नहीं । केवल बार-बार यही कहती है कि क्ल अम्माँ मुझे
मार नहीं।
पाँच वर्ष की पालिका पहिले ही दिन स्कूल से पढ
कर पाई और मां से बोली-"मुझे लिखना सूब श्रा
गया।" मॉ ने प्रेम से बच्ची को गोद में बिठा कर कहा-
"लिख तो सही।" घच्ची ने सदा की भाँति स्लेट पर
लकीरें फेर दी।
मों ने कहा-यह क्या लिन मारा,जरा पढ तोसही।
पालिका ने कहा-अभी पढ़ना थोडे ही सीखा है।
३६८
एक जज साहब जूरी को मुकदमा समझा रहे थे।
उसी समय बाहर घडे जोर से एक गदहा बोल उठा।
जज साहब को कुछ नागवार मालूम हुया और उन्होंने
कहा-यह क्या है?
उसी समय एक सजन ने, जिनसे जज साहब थोडी
देर पहले विगड चुके थे, उठ कर कहा कुछ नहीं,
श्रीमान् ! यह केवल अदालत की प्रतिध्वनि है॥
३६९
पुत्र-माँ! बदला किसे कहते हैं ?
माँ-जब तुम्हारे पिता मुझे डाँटते हैं, तब मैं उन्हें
झाडू से मारती हूँ--यही बदला लेना है।'
१३५
.
३७०
एक जुलाहे की ओरत बीमार पड़ी। जब जुलाहा
अपना कपडा पेच कर शाम को लौटता, तव वह उसकी
खार के पास बैठ जाता ओर फूट-फूट कर रोने लगता।
एक दिन एक औरत, जो पास ही में रहती थी,
श्रोर कहने लगी-भैया, रज मत करो, पुदा
चाहेगा तो
यह जल्दी अच्छी हो जायगी।
उसने कहा-वहिन । में ठहरा काम-काजी श्रादमी।
सुबह होते ही में कपडा येचने चला जाऊगा । इस वक्त
मुझे कुछ काम नहीं है, मेरी फुरसत का वक्त है, इसलिए
में मन भर के रो रहा है। कौन जाने फिर ऐसा मौका
मिले या न मिल, और यह तुम जानती ही हो कि इस
वेचारी का मेरे सिवाय रोने वाला कोई नहीं है।
पुर-चायू जी! तुमने एक दिन फदा था कि अपने
से जो छोटा हो, उसे मारना नहीं चादिए ।
पिता-हाँ। कहा तो था।
पुत्र-तो तुम मास्टर को एक चिट्ठी लिख दो कि यह
मुझेनमारा करें।
३७२
एफ मिर-शस्तव में यह कदाचन ठीक है किजो
मज्ञानी होता है, यह सुपी होता है।
हल
१३६
दूसरा मित्र-सो तो मुझे मालूम नहीं, पर मित्र !
तुम तो बडे सुखी दियाई पडते हो।
३७३
डॉक्टर-तुम्हारे रोग का एक ही इलाज है-विश्राम !
तुम कुछ मत करो और शान्त होकर बैठे रहो।
रोगी-डॉक्टर ! कोई और उपाय बताश्री, यह
उपाय तो में जन्म से करता रहा है, जरा भी फायदा'
नहीं हुया!
३७४
प्रोफेसर महोदय अपने अध्ययन में तल्लीन थे, उसी
समय उनकी श्रीमती जी ने चिल्ला कर कहा-क्या कर!'
मेरी तो नाक में दम है। श्यामू ने सब रोशनाई पी ली।
प्रोफेसर साहब ने पुस्तक पर से बिना सिर उठाया
हो कहा-कुछ हर्ज नहीं, पेन्सिल से लिख लो।
३७५
एक मित्र-मुझे ५०) रुपए उधार दे दो ।
दुसरा मित्र-लो, यह २५) रुपए हैं।
पहला मित्र-मैंने तो ५०) रुपए मांगे थे।
दूसरा मित्र-देखो भाई, न्याय की बात तो यही है
कियाधा सोऊँ और श्राधा तुम
-
१३७
३७६
एक साहब जरा मजे में थे। सुरा देवी का उन पर
अधिक प्रभाव हो गया था। ऐसी दशा में झूमते हुए
श्राप डाकखाने पहुँचे और डाक बाब से कहने लगे-मेरी
कोई चिट्ठी है।
डाक-बाबु-आपका पॉक्स नम्बर क्या है ?
साहस-कुछ नहीं।
डार वा-यापका नाम क्या हे ?
साहष-हिश् ! कैसे चेयकूफ हो, वह तो चिट्ठी पर
लिसा दी होगा।
३७७
स्त्री-यह बात मने अनुभव की है कि स्त्रियों का
अपेक्षा पुरुषों के सिर के बाल शीघ्र गिर जाते हैं, क्योंकि
उन्हें मस्तिष्क से अधिक काम लेना पडता है।
पुरुष-ठीक है, यही कारण है कि नियों के दादो
नहीं निकलती, क्योंकि नियों की ठोडी से बहुत काम
लिया जाता है।
३७८
यचे शतान तो होते ही है घोर उनकी शैतानी उस
समय बहुत बढ़ जाती है, अब उनके दर्जे में कोई अभ्यापक
नहीं होता है। ऐसे ही एक कक्षा के लडके यहुत शोर
मचा रहे थे। उनकी श्रावाज सुन कर क्रोध मूर्ति अभ्या-
पक जी ने कक्षा में प्रवेश किया। रोप से भरे हुए स्वर में
उन्होंने लडफों से पूछा-इस कक्षा में कितने लडके हैं ?
लडके-उन्नीस!
अध्यापक-और उनमें से मूर्ख कितने हैं ?
लड़के-धीस!
३७९
श्रन्यापक--रामू । एक बटा पच्चीस (1) क्या ।
होता है।
शिष्य-मुझे नहीं मालूम।
श्रध्यापक-मान लो तुम्हारे यहाँ २५ लडके अतिथि
हैं और तुम्हारे पास केवल एक सेय
में
तुम क्या फरोगे?
शिप्य–में सेव को छिपा रक्यूँगा और जब लडके
चले जायेंगे तब खा लूँगा।
३८०
पति -आज मेने एक पत्रिका में पढा हे कि मूर्ख पुरुष
सुन्दर रमणी से विवाह करते हैं।
पती-पर तुम तो सदा मेरी सुन्दरता की
तो ऐसी दशा
-
हो।
९३६ ३८१ एक सम्पादक महोदय अपने अध्ययन में निमग्न थे। उसी समय दासी ने श्राकर पालक के जन्म का गुमसमा- चार देते हुए कहा-भगवान् ने अापके घर में एक सुन्दर चालक भेजा है। सम्पादक जी ने उसी प्रकार ध्यान-मग्न अवस्था में कहा-अच्छा ! उससे पूछो कि वह क्या चाहता हे? ३८२ रोगी-डॉक्टर साहब 1 मेरे बहरे होने का कुछ इलाज कीजिए। टॉक्टर- -क्या तुम विवाहित हो ? रोगी-जी हाँ। डॉक्टर-तब तुम क्यों इलाज कराते हो? ३८३ बच्चे की तबीयत अच्छी नहीं थी। माता ने पमरे में प्रवेश फरके धीरे से कहा-तल्ल ! क्या तुम जाग रहे हो? पुर-नहीं अम्माँ ! और डॉक्टर ने यह कह दिया कि यच्चे को जगा कर दयाई मत पिलाना। ३८४ पेटा-बा जी महाराजा रिसे फहते हैं?
मचा रहे थे। उनकी श्रावाज सुन कर क्रोध मूर्ति अन्या-
पक जी ने कक्षा में प्रवेश किया। रोप से भरे हुए स्वर में
उन्होंने लडकों से पूछा-इस कक्षा में कितने लडके हैं ?
लडके-उन्नीस!
श्रध्यापक-पोर उनमें से मूर्ख कितने हैं ?
लडफे-धीस!
३७९
श्रन्यापक-राम् । एक वटा पच्चीस (2) क्या
होता है।
शिप्य-मुझे नहीं मालूम !
श्रध्यापक-मान लो तुम्हारे यहाँ २५ लडके अतिथि
हे और तुम्हारे पास केवल पक सेव है, तो ऐसी दशा
में
तुम क्या करोगे?
शिप्य में सेव को छिपा रक्तूंगा और जब लडके
चले जायेंगे तब खा लूंगा।
३८०
पति-आज मैंने एक पत्रिका में पढा है कि मूर्ख पुरुष
सुन्दर रमणी से विवाह करते हैं।
पत्नी-पर तुम तो मदा मेरी सुन्दरता की प्रशला
करते हो।
९३६
३८१
एक सम्पादक महोदय अपने अध्ययन में निमग्न थे।
उसी समय दासी ने श्राफर पालक के जन्म का शुभसमा-
चार देते हुए कहा-भगवान् ने आपके घर में एक सुन्दर
चालक भेजा है।
सम्पादक जी ने उसी प्रकार ध्यान-मग्न अवस्था में
कहा-अच्छा ! उससे पूछो कि वह क्या चाहता हे ?
३८२
रोगी-डॉफ्टर साहय । मेरे पहरे होने का कुछ इलाज
कीजिए।
टॉक्टर-क्या तुम विवाहित हो?
गेगी-जी हाँ।
डॉक्टर-तव तुम पनों इलाज कराते हो?
३८३
बच्चे की तबीयत अच्छी नहीं थी। माता ने कमरे में
"प्रवेश फरफे धीरे से कहा- लल्लू ! क्या तुम जाग
रहे हो।
पुत्र-नहीं अम्माँ ! और डॉक्टर न यद कह दिया
है कि यच्चे को जा कर दयाइ मत पिलाना ।
३८४
पेटा-बायजी ! महाराजा रिसे पदते हैं ?
A
पिता-बेटा। महाराजा उसे कहते हैं, जिसके शब्द
ही कानून हो, जिसके कहने को कोई टाल न सके, और
जिसकी श्राज्ञा का पालन करना सबके लिए यावश्यक
हो।
बेटा-तो वाबू जी । अम्मा क्या महाराजा हैं ?
३८५
एक बार एक दरिद्र ब्राह्मण एक बहुत बडे धनाढ्य ।
के पास गया और उसने अपने दुख की कथा कुछ ऐसी
करुण भाषा में कही कि धनाढ्य के भी आँखों में आँसू
श्रा गए। ब्रह्मदेव को यह देख कर कुछ तसल्ली हुई और
उन्होंने समझा कि धनाढ्य कुछ न कुछ उन्हें अवश्य
देगा। उसी समय धनाढ्य ने अपने नौकर को बुला कर
कहा-नत्थू ! इस अमागे आदमी को यहाँ से निकाल
दो। इसने तो मेरे हृदय के टुकडे-टुकडे कर दिए हैं !
३८६
मालिक---देखो जी, मेरे सन्दूक में से १०) गायव हैं।
इस सन्दूक की एक चावी मेरे पास है और एक तुम्हारे ।।
तब यह क्या मामला है?
नौकर- श्राप मुझसे ले लीजिए और पाँच श्राप
दे दीजिए और इस मामले को यही समाप्त कर दीजिए।
पेसा न हो दूसरों को खबर हो जाय ।
२४१
३८७
एक मिर-क्या तुम स्वप्नों में विश्वास करते हो।
दूसरा मित्र-विवाह होने से पहले करता था, पर
अव नहीं।
३८८
डाइनामाइट (Dynamite) एक प्रकार का विस्फो-
टक पदार्थ है, जो श्राग लगते ही ममक उठता है। एक
सिपाही ऐसे ही एक डाइनामाइट के गोदाम के पास
बैठा-घेठा श्रानन्द से सिगरेट पी रहा था। उसी समय
उसका अफसर वहाँ श्रा पहुंचा और उसने डॉट कर
उससे कहा-पया फर रहा है रे मूर्ख ! तुझे मालूम
महीं कि अभी उस दिन एक आदमी तेरी ही तरह यदाँ
बैठा सिगरेट पी रहा था और उसके कारण डाइनामाइट
में आग लग गई थी, जिसका परिणाम यह हुआ था कि
१२ श्रादमियों की मृत्यु हो गई।
सिपाही-पर इस समय सीघटगा नहीं हो सकती।
अफसर-क्यों?
सिपाही क्योंकि यहाँ श्राप और में दो ही हूँ।
३८९
एक घका महोदय अपनी पकता दे रहे थे। विषय
कुछ रुखा था और वका महोदय भी तो परिभव दी
-
हुल
थे कि उसे रोचक बना सकते। इसीलिए श्रोताओं की
सख्या भी थोडी थी। आंघ घण्टे तक भापण कर चुकने
के उपरान्त उन्होंने श्रोताओं को सम्बोधन करके कहा-
महोदय ! मुझे भय है कि मैंने श्रापका बहुत ,समय ले
लिया है और आपको रोके रक्खा है।
उसी समय श्रोताओं की ओर से हास्य-वनि सुनाई
दी और उनमें से एक ने कहा--प्राप भाषण किए जाइए।
अभी पानी परस रहा है, हम लोग जा हो नहीं सकते।
३९०
प्रेमिका-क्या तुम मुझसे प्रेम करते हो?
प्रेमी--कैसा कुछ ? मैं तो तुम्हारे प्रेम में उन्मत्त हूँ।
प्रेमिका-क्या तुम मेरे लिए प्राण विसर्जन कर
सकते हो?
प्रेमी नहीं , मेरा तो श्रमर, अक्षय-प्रेम है।
३९१
पत्नी रोग-शय्या पर पडी थी। एक दिन एकान्त में
उसने अपने पति से पूछा-यदि मैं मर गई तो तुम क्या
करोगे?
पतिदेव ने गम्भीर स्वर में उत्तर दिया-अजी, मुझे
तो यह चिन्ता है कि तुम जीती रही तो में क्या करूंगा।
३९२
पत्नी-(पदोसी से)माराम नहीं क्या बात है कि मैं
२४३
ल
अपने पति को बहुत कुछ समझाती हूँ, पर रात को
मकान पर रहते ही नहीं है। मैं मव कुछ करके हार गई,
पर उनका रात का जाना बन्द नहीं हुआ।
पड़ोसी-एक बात और कर देखो। तुम स्वय रात
को बाहर जाना शुरू कर दो।
३९३
मुसाफिर-(रेलगादी में एक ब्रसकी से) बेटी । तुम्हारा
उम्र क्या है?
लडकी -क्या श्राप गार्ड हैं।
मुसाफिर नहीं।
लडकी -तब मेरी उम्र १३ वर्ष की है।
३९४
गृहिणी-(चोर से) यदि तुम शीघ्र ही यहाँ से नहीं
चले जानोगे, तो म अपने पति को बुलाऊंगी।
चोर-जी । मुझे इसकी चिन्ता नहीं है, क्योंकि
उनके सामने जब में एक दिन पाया था, तब उन्दोंने
श्रापको चुलाने की धमकी दी थी।
३९५
एक मित्र-क्या करूँ? मेरीखी दस्तानों पर बढी
रुपया पर्च करती है। उसके दस्तानों का विल चुकाते-
चुकाते तो मेरे नाक में दम हो गया है।
दूसरा मित्र-मेरा कहा मानो, उन्हें एक हीरे की
अंगूठी मोल ले दो।
३९६
पत्नी नहीं जी, कल से में श्रापको लिसने वाली मेज
पर भोजन नहीं करने दूंगी।
प्रोफेसर साहव-क्यों प्राणेश्वरी ! इसका कारण !
पत्नी-कारण ? कारण यह है कि कल श्राप दूध से
लिखने लगे थे और रोशनाई पी गए थे।
-
।
एक गॅवार श्रादमी का मित्र नगर में रहता था। उस
मित्र के पास एक मोटर थी। एक बार गॅवार देवता
अपने शहरी मित्र से मिलने आए । शहरी मित्र सायबाल
को उन्हें मोटर पर विठा कर हवा खिलाने ले चला और
शाइर के बाहर की सड़क पर पहुँच कर उसने मोटर सब
तेज कर दी। मोटर अभी थोडे ही दूर गई होगी कि वह
रास्ते के एक ओर लगे हुए पेड से टकरा गई। सोमाग्य
से चोट किसी के नहीं आई, पर मोटर का इसन अवश्य
विगड गया । गॅवार देव धीरे से मोटर से उतरे और मुँह
पना कर गम्भीरतापूर्वक कहने लगे-"सवारी तो अच्छी
है, पर यह तो बतायो, जहाँ पेड नहीं होते होंगे, वहाँ तुम
इसे कैसे रोकते होगे"मिन के पास इसका कोई उत्तर
महों था।
२४५
रामू-श्याम् ! तुम्हारा यह कोट तो बहुत ही अच्छा
मिला है। क्या तुम उस दर्जी का पता बता सकते हो
जिसने यह कार लिया है?
श्यामू-हाँ, बता क्यों नहीं सकता। पर एक शर्त
यह है कि वह चाहे कितना हो पूछे, तुम मेरा पता उसे
मत बताना।
३९९
ग्राहक-क्यों जी | तुम नित्य कितनी मिठाई बेच
लेते होगे?
दलवाई-यही कोई पक मन ।
प्राइक-मैं तुम्हें ऐसा उपाय बता सकता हूँ, जिससे
तुम डेढ मन नित्य वेच लिया करो।
हलवाई-सचमुच । वह क्या उपाय है।
मादक-और कुछ नहीं, यस पूरा मत तोला करो।
४००
माता क्यों जी, तुम फिर लड़ने लगे। नतीजा यह
हुधा कि तुम अपना एक दांत तो येठे।
पुन-कहाँ, मैं तो नदी खो बैठा । यद मेरी जेय है।
४०१
पिता-तुमने अपना गणित का पर्वा केला किया?
हल
पुत्र-बहुत अच्छा।
पिता-तुम्हारे कितने सवाल अशुद्ध हैं।
पुत्र-केवल एक।
पिता-ओर सय कितने थे?
पुर-चारह।
पिता-पाह ! बहुत अच्छा । तो तुम्हारे ११ सवाल
ठीक है।
पुत्र-नहीं जी, उन्हें तो मेने किया ही नहीं।
४०२
पुर–क्यों वैद्य जो, बाबू जी की अवस्था भयङ्कर
तो
नहीं है?
वेद्य-विलकुल नहीं। यदि ऐसा होता, तो अब तक
मैने अपनी दवाई के दाम कभी के वसूल कर लिए होते !
४०३
पिता--में जब बालक था, तब कभी झूठ नहीं
घोलता था।
पुत्र ने सरल भाव में पूछा-बाबू जी! श्रापने भूठ
घोलना प्रारम्भ कब से किया?
४०४.
किरापदार-जद में मकान छोडने लगा,
मेरा
पहिस्ता मालिक मकान बहुत रोता था ?
.
नया मालिक-मकान-पर श्राप निश्चिन्त रहिए, में नहीं
रोने फा, मै तो एक महीने का किराया पहले ही जमा
फरा लेता हूँ।
४०५
सेठ जी-हाँ, तो इसका तुम्हारे पास क्या सबूत
है कि तुमने सेठ घनश्यामदास के यहाँ ६ महीने भोजन
बनाया है?
रसोइया-मेरे पास ऐसे दस पाँच वर्तन हैं, जिन
पर उनके नाम खुदे हुए हैं।
पुत्र-पिता जी, खाली जेय किसे कहते हैं।
पिता-तुम्हारी माता का हाथ पड जाने के पश्चात्
-
मेरी जेय को।
४०७
-
एक व्यक्ति अपनी मोटर घेचना चाहता था। एक
दिन एक ग्राहक आया। उसको गाडी दिखा पर यह
व्यक्ति घोला-देखिए, इस गाडी यी काया पलट कर दी
-अय कौन कह सकता है कि यह पुरानी गाडी।
ग्राहक गाडी देस माल पर पोला-मालूम होता है,
इसका हर एक पुरजा आपने पदला है। ऐसी दशा में
ल
.
यदि मेकर के स्थान पर अपना नाम दे दें तो अधिक
अच्छा हो।
४०८
एक व्यक्ति हलवाई की दूकान पर जाकर बोला-तुम
ऐसा हलवासोहन बना सकते हो, जिस पर मेरा नाम
लिखा हो?
हलवाई ने कहा-हाँ!
वह व्यक्ति--तो बना रखना, क्ल में आकर देखूगा।
दूसरे दिन उसने हलवासोहन देख कर कहा-नाम
कुछ सुन्दर नहीं बना-खूब अच्छा बनायो ।
तीसरे दिन उसने हलधासोहन देख कर पसन्द किया।
हलवाई ने पूछा-चाँध दूं, ले जाइएगा?
वह व्यकि-ले कहाँ जाऊँगा, यहीं बैठ कर खाऊँगा।
स्वामी-देखो, मैं बडा मेहनती श्रादमी चाहता हूँ।
किसी समय में में स्वय बडा मेहनती था। लगातार दस
साल तक मैंने दम घगटे गेज काम किया है।
नौकर-श्राप क्सि जेल में थे? मैं नैनी में रहा हूँ।
"क्यों जी, इस समय क्या बजा होगा।
"बारह बजे हैं।
२५५
--
"बारह ! नहीं, ज्यादा बजे होगे।"
"बारह से ज्यादा तो कभा बजते ही नहीं।"
४११
"धैर्य से मनुष्य सब कुछ कर सकता है।"
"क्या धैर्य म छलनी में पानी रफ्ना जा सकता है ?"
"हाँ, यदि पानी के जम जाने तक धैर्य रक्खा जावे।"
४१२
"रामलाल का पहला उपन्यास प्रकाशित हो रहा है।"
"उपन्यास का नायक कान है"
“जहाँ तक मेरा थनुमान है, नायक प्रकाशक ही
होगा।"
हिन्दुस्तान से लौट कर एक अगरेज परिवार विलायत
गया । यहाँ बच्चा सिलाने के लिए एक अहरेज दाई रक्सी
गई । दाईने बच्चे की माता से कदा~यच्चा मेरे पास
नहीं रहता, रोता है।
पच्चे की माता घोली-ठीक है, दिन्दुस्तान में इसे
भो दाई खिलाया परती या यह काली थी। अच्छा व
अपने मुंद पर योढी जूते की कालो पॉलिश मल ले।
४१४
एफ अमेरिकन करोडपति खन्दन की सैर परमे
१५०
गया। लन्दन का चिडिया-घर देख कर उसके दोषालक
मचल गए, श्रतएव वह चिडिया-घर के सरक्षक के पास
जाफर बोला-मेरे बच्चों को तुम्हारा चिडिया-धर बहुत
पसन्द आ गया है। यदि तुम इसे बेचना चाहो तो मैं
खरीदने को तैयार है।
सरक्षक ने अमेरिकन को सिर से पैर तक देख कर,
किञ्चित् मुस्कराते हुए कहा-चिडिया-घर घेवा तो नहीं
जा सकता, परन्तु यदि आपके बच्चे चिडिया-घर को
इतना पसन्द करते हैं, तो मैं इतना कर सकता है कि उन्हें
चिडिया घर में ही रख लूँ ।
४१५
फ्यों साहय, आपके साहबजादे अाजकल कहाँ है ?
जेल में।"
"है। जेल में ?"
"जी हाँ,, वहाँ २०) महीने का फ्लॉर्क हैं।"
पुत्र-पिता जी, श्राप जो मेरे लिए दवाई बन्दूक लाए
थे, वह कहाँ से लाए थे?
पिता-याद नहीं कि कहां से लाया था।
पुत्र ओर वह गेंद?
पिता-यह भी याद नहीं कि किस दूकान से लाया
पुत्र-पिता जी, आपको कोई बात याद नहीं रहती।
श्राप थोडे दिल मेरे मास्टर साहब से पढ़ लीजिए, तो
फिर आपको याद रहने लगे।
डॉक्टर-(घायल) मे तुम अच्छे तो हो जानोगे,
पर काम करने योग्य नहीं रहोगे।
पालसी घायल-यह तो घडा शुभ समाचार है।
४१८
"याज मने पफ बडी सुन्दर स्त्री देखी।"
"इसकी सूरत शश कैसी थी?"
"रेशमी साडी और गुलाबी कमीज पहने थी।"
४१९
नोकर-मुझे श्रापके यहाँ काम करते हुए दो साल
हो गफ, में दो श्रादमियो का काम करता रहा है, श्रय
श्राप मेरी तनरवाह पढ़ाइए ।
मालिफ-तनख्याहतो म बढ़ा नहीं सप्ता, पर मिन
दो यादमियों का तुम काम करते रहे हो उनको गाम पता
दो तो में उन्हें पड़े-पडे निकाल सकता है।
४२०
है कि फल एफ उहाज यापी पर
श्राई"
"तुम्हें मालूम
૨૫૨
"मालूम फ्या, मे ही तोपफ श्रादमी है, जो बचा है।"
-
"में उस जहाज पर जाने वाला था, पर देर हो जाने
के करण मुझे यह नहीं मिला।"
४२१
किरापदार-देखिए जनाब, रात भर कमरे की छत
टपकती रही, तमाम कपडे भीग गए ।
मकानदार-कुन टपरती रही ! यह कैसे? यह छत
कभी नहीं टपक सकती।
किराएदार-तो शायद अपनी दुर्दशा पर रोती
रही हो।
४२२
"कल तुमने जो दृध दिया था, रहर नहीं, पानी था।"
दूध वाला-गनी होता ता सफेद। कैसे होती, पानी
में कहीं सफेदी होती है।
४२३
दो पहरे गस्ते में मिले । एक ने कहा-कहो, क्या
घूमने जा रहे हो?
दूसग बहरा-नहीं, धूमने जा रहा हूँ।
पहला बहरा-अच्छा, मैंने समझा शायद धूमने जा
रहे हो।
१५३
--
४२४
पुत्र-पिता जी, क्ल मैंने एक स्वप्न देखा । मने देखा
कि मेरा विवाद हो रहा है। अक्स्मात् में उठ पर खडा
हो गया, और मैंने कहा-मैं विवाह नहीं करूँगा, फिर
मन विवाह नहीं दिया। इसका क्या अर्थ है ?
पिता-
-इसका अर्थ यह है कि सोते में तुम्हारी बुद्धि
जागते की अपेक्षा अधिक ठीक रहती है।
४२५
मोहन-अरे भाई सोहन, हमने सुना है।कि तुम्हारे
उस दिन कोडे लगे थे?
सोहन--सच है, मुझे यह तो उसी समय मालुम हो
गया था।
४२६
माली-यापू जी, नन्नूराम की वकरीश्राज फिर अपनी
यगिया में घुस आई है।
पाय जी-तो शोर क्यों मचाता है, एक घर्तन ले जा
और उसे दुर ले।
४२७
"भाई सादश, पसगत यो मुफ पर धुरी पीती।
तीन-चार घण्टे तक बड़े घर की दया पामी पहा"
"श्या-क्यो, हुमा क्या"
२५४
"होता क्या, रात को सपना देखा था। मानो में जेल
में बैठा चपकी पीस रहा है और जेलर साहष सटासट
"हण्टर फटकार रहे हैं।"
४२८
डॉक्टर-देखिए, इस थर्मामीटर को अपनी स्त्री की
जयान के तले रख दीजिएगा और उन्हें फह दीजिएगा कि
श्राधे मिनट तक मुँह न खोले ।
पति-कृपया यदि आधे घण्टे वाला थर्मामीटर हो
तो दे दें।
४२९
सम्पादक-(एक नवीन लेखक से) श्राप ऐसे लेख
लिखने की चेष्टा करें, जिसकी भाषा ऐसी सरल तथा
सुवोध हो कि प्रत्येक मूर्ख से भी मूर्ख मनुष्य उसे भली
। 'प्रकार समझ सके।
नवीन लेखक-तो इस लेख में श्रापको क्या समझ
में नहीं पाया, महाशय ?
४३०
घडीसाज-स्या श्रापकी घडी गिरते ही रक गई'
बाबू साहब-(हंस कर) रुकती नहीं तो क्या भाग
जाती?
.
१५५
४३१
-जब मैं बालकथा तो बीस-पच्चास मोल पेदल
चलने की तनिक भी परवाह नहीं करता था।
भतीजा-(मोटर का हैपिटल घुमाते हुए) पोर न म
'पैदल चलने की परवाह करता है।
४३२
पत्नी-एक मिनट में कितने सेफण्ड होते हैं?
पति-तुम्हारा मतलब किस मिनट से है? क्या
सचमुच का मिनट अथवा तुम्हारे "एक मिनट ठहरो,
श्रमी आती हूँ" वाले मिनटों का मिनट?
४३३
एक रकल इन्सपेक्टर ने प्राय चार घण्टे स्कूल फा
निरीक्षण किया और पुश होकर बोले-कोई सदा
मुझसे कुछ पूछना चाहता है।
एक लड़के ने उठ कर पूछा-श्राप स्कूल से पत्य
जायेंगे?
४३४
घावू-(एक मिपुर से) क्या तुम्हें पैसा कोढ़ी मांगने
में लजा नहीं पाती।
भिमा विना मांगे क्या को
।
१५६
मॉगे कुछ ले लिया था, जिसपे छ महीने बड़े घर की
हवा सानी पडी थी।
४३५
श्रध्यापिका-(छोटी बालिका मे ) यदि एक काम को
अकेले तुम्हारे पिता तीन घण्टे में कर सकते हो और
तुम्हारी माँ भी तीन घण्टे में कर सस्ती हों, तो उसी
काम को दोना मिल कर कितने समय में करेंगे।
राधा-साढ़े चार घण्टे में।
अभ्यापिका-तीन घण्टे में परेंगे कि साढे चार घण्टे
में ? तु बडी मुर्खा है।
राधा ने गम्भीर होकर उत्तर दिया-मेरे उत्तर में
डेढ़ घण्टा वह भी तो शामिल है, जो दोनों आपस के
झगडने में लगाएंगे।
अभ्यापक-(लदों से) देखो, बिना किसी बात को
अच्छी तरह सोचे, झट से उत्तर दे देना मूर्खता होती है।
अपना नियम कर लो-किसी आवश्यक बात का उत्तर
देने से पूर्व ५० तक गिन र, तर उत्तर दिया करो।
यदि कोई बात विशेष गम्भीर और श्रावश्यक हो, तो एक
से १०० तक गिनने का निश्चय कर लो।
दूसरे रोज अभ्यापक महोदय चिमनी के पास खड़े
पढ़ा रहे थे कि सभी लड़कों ने एक साथ गिनती शुरू कर
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१६०
दूमरी स्त्रा-हाँ हिन, जप से मैं अपने हाथ से
खाना बनाती है, तब से मेरे पति पहले से श्राधा ही
खाना खाते हैं।
४४५
पहला मित्र-श्यों मोहन, अपनी पत्नी के भाग जाने
पर इतने दुखो क्या होते हो? जाने भी दो।
दुसरा मित्र-नहीं, इसका दुख नहीं है।
पहला मित्र-(घबरा कर) फिर तुमको किस धात
का दुख है।
दूसरा मित्र-वह क्म्वस्त कहीं फिर न चली श्रावे।
४४६
पुत्री-(अपनी माता से) माँ, स्कूल की पढाई समाप्त
हो गई। अब मैं कॉलेज जाऊंगी।
माता-नही, अब तू विवाह योग्य हो गई है, फिर
पुरुष तो इस बात की जग भी पर्वाह नहीं करते कि
उनकी स्त्री पढ़ी-लिखी है भी या नहीं?
पुत्री-माँ, तुममें यही तो बड़ा भारी दोष है। तुम
सब पुरुषों को मेरे पिता के समान ही समझती हो।
४४७
"मैं तुम्हारे प्रेम में जल रहा हूँ।"
"अरे भाई, तुम क्यों इंधन हो रहे हो?"
४४८
सखी-(अपनी बूढ़ी घोदिन सखी से ) वहिन, बधाई ।
सुना है, तुमने फिर विवाह कर लिया है। श्रर कपडा
धोना तो छोड़ ही दिया होगा?
धोधिन- अरे नहीं ! इसीलिए तो शादी की है।
गदहा मर गया था, घाट से कपड़े लाद कर लाने वाला
कोई था ही नहीं।
४४९
माता-(पुग्न से) वेदा! आज तुम्हारी मामी श्रा
रही हैं, हाथ मुँह धो लो और कपडे बदल लो।
पुर-और जो वह न पाई तो ?
४५०
मेजिस्ट्रेट--(भभियुक्त से) तुम घरी किए गए !
अभियुक्त क्षमा कीजिएगा, प्रापको मेरे पीछे न्यर्थ
कष्ट उठाना पड़ा।
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