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Parmanu Baccho Ke Liye
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परमाणु
ATOTIS
WORKIINI TIRIS
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परमाणु
ATOMS
WORK LIKE THIS
John Roland
BSc, FRSA
सेपर
जॉन रोड
वी एससी, एफ पार एस ए
चित्रवार
चाल्र्स ग्रीन
मनुवादक
एम शर्मा
अलकार प्रकाशन
666, झील, दिल्ली-110051
दो शब्द हिदी के विकास और प्रसार के लिए शिक्षा मत्रालय के तत्वावधान मे पुस्तको के प्रकाशन की विभिन्न योजनाएँ कार्यावित की जा रही हैं। हिदी मे अभी तक शान विज्ञान के क्षेत्र में पर्याप्त साहित्य उपलब्ध नहीं है, इसलिए ऐसे साहित्य के प्रकाशन को विशेष प्रोत्साहन दिया जा रहा है । यह तो प्रावश्यक है ही कि ऐसी पुस्तकें उच्च कोटि की हो, कितु यह भी ज़रूरी है कि वे अधिक महगी न हो ताकि सामान्य हिदी पाठक उहे खरीद कर पढ सकें। इन उद्देश्यो को सामने रखते हुए जो योजनाएं बनाई गई हैं, उनमे से एक मोजना प्रकाशको के सहयोग से पुस्तके प्रकाशित करने की है। इस योजना के अधीन भारत सरकार प्रकाशको को या तो वित्तीय सहायता प्रदान करती है अथवा निश्चित सख्या में प्रकाशित पुस्तको की प्रतियां खरीद कर उहे मदद पहुँचाती प्रस्तुत पुस्तव इसी योजना के अतगत प्रकाशित की जा रही है । इसके अनुवाद मौर कापीराइट इत्यादि की व्यवस्था प्रकाशर ने स्वय की है तया इसमे वैज्ञानिक मौर तकनीकी गन्दावली प्रायोग द्वारा निर्मित शब्दावली का उपयोग किया गया है । हम विश्वास है कि शासन और प्रकाशको के सहयोग से प्रकाशित साहित्य हिंदी को समृद्ध बनाने में सहायक सिद्ध होगा और साथ ही इसके द्वारा ज्ञान विज्ञान से सम्बपित पपिराधिक पुस्तके हिती पाठकों को उपलब्ध हो सकेंगी। पाता है यह योजना सभी क्षेत्रों में लोकप्रिय होगी। ए चाहाल निदेशक केन्द्रीय हिदी निगालय पिसा मवालय
Hindi translation of 'ATOMS WORK LINE THIS
Hindi edinon reserved by the Publisher
By arrangement with
JM Dent & Sons Ltd London
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय (शिक्षा-मत्रालय) भारत सरकार के सहयोग से
कार्यान्वित लोकप्रिय पुस्तकों की प्रकाशन-योजना' के अतर्गत स्वीकृत एव
कैपिटल बुक हाउस दिल्ली के निमित्त अलकार प्रकाशन से प्रकाशित
मूल्य
पचास रुपये (5000)
सस्करण
दूसरा 1990
अलकार प्रकाशन
666 मील दिल्ली-110051
मुबक
कावेरी प्रिटर्स प्रा०लि०, नई दिल्ली-110002
विषय-सूची 3 परमाणु का स्वरूप परमाणु के बारे मे प्राचीन मान्यता परमाणु भजक इलेक्ट्रॉनो की खोज रेडियो ऐक्टिवता रेडियम नाभिक का विघटन यूट्रॉन शृखला अभिनिया यूरेनियम का विखडन परमाणु बम परमाणु से ऊर्जा उत्पादन की विधि परमाणु भट्टी परमाणु भट्टी की कार्यपद्धति समस्थानिक चिकित्सा के लिए परमाणु का उपयोग नए तत्त्व हाइड्रोजन बम गाइगर गणित्र ऐक्स-किरणें परमाणु ऊर्जा या भावी म्प परमाणु उद्योग में रोजगार पुस्तक में प्रयुक्त पारिभाषिक शब्द 10 13 14 17 20 23 25 28 31 33 36 37 40 42 44 46 48 51 52 57 6 परमाणु का स्वरूप आजक्ल पत्र-पत्रिकामो मे परमाणु को काफी चर्चा रहती है। इनमै परमाणु शक्ति के प्रयोग मे इ जनो को चलाने की मभावना परमाणु बमो की भीषण सहार- शक्ति और कभी-कभी चिकित्सा मे परमागुमो के प्रयोग के सम्बत्र मे लेख प्रकाशित हाते रहते हैं । लेकिन लेखक प्राम तौर पर यह मानकर चलते हैं कि पाठको का परमाणु के बारे म पहले ही काफी जानकारी है। इसलिए वह परमाणु के बारे मे विना कुछ बताए हो सीधे इस बात का वर्णन गुरू कर देते हैं कि परमाणु ऊर्जा किस प्रकार उपलब्ध हो सकती है और उमका किस प्रकार उपयाग किया जा सकता है । वस्तुत इस विषय मे कम लोगो को सही जानकारी होती है। इस पुस्तक का मुरय उद्देश्य परमाणु के बारे म थोडी-बहुत जानकारी देना और यह बताना है कि किस प्रकार उसका मानव की भलाई के लिए प्रयोग किया जा सकता है। दो हजार वप से भी अधिक समय से, प्राचीन यूनानियो के काल से परमाणु के बारे मे यह आम धारणा रही है कि परमाणु पदाथ का वह छोटे से छोटा भाग है जिसका अस्तित्व हो सकता है। यह विश्व किस चीज़ से बना है? हम दिन प्रतिदिन जिन चीजो का इस्तेमाल करते हैं वे कैसे बनी हैं ? इन प्रश्नो ने उन्हे अचरज मे डाल दिया । अगर हमारे पास लोहे या सोसे का एक टुकडा हो और हम उसे काट कर दो हिस्से कर दे और फिर इन टुकडो के भी दो-दो हिस्से कर दे और इसी प्रकार नोडने की इस प्रक्रिया को बार-बार दोहराते जाएँ तो क्या कभी इस प्रक्रिया का कही प्रत होगा? क्या कभी ऐसी स्थिति आएगी (मान लो हमारे पास धातु वे सूक्ष्म से सूक्ष्म टुकडो को देखने के लिए बहुत अधिक शक्ति- शाली सूक्ष्म-दर्शी (माइक्रोस्कोप) भी है जब लोहे या सीसे के प्रति सूक्ष्म टुकडे को और अधिक काटने से वह धातु ही समाप्त हो जाए या धातु की बनावट ही कुछ ऐसी हो कि तोडने की यह प्रक्रिया निरन्तर जारी रह सके।
क्रिस्टलो मे परमाणुनों का विन्यास यह प्रश्न क्रिस्टलो के अस्तित्व के कारण उठा । हम हजारो वर्षों से इन क्रिस्टलो से परिचित है । क्रिस्टलीय पदाथ वे पदार्थ होते हैं जिनका एक निश्चित आकार होता है और किसी एक विशेष पदार्थ के क्रिस्टल हमेशा एक हा प्रकार के होते हैं। इससे यह सकेत मिला कि सभवत ठोस पदार्थों की रचना छोटे-छोटे कणो के समूह से मिलकर होती है और किसी क्रिस्टल मे ये कण किसी विशेष डिजायन के अनुसार निहित होते यूनानी विचारको का कहना था कि अगर किसी ठोस पदाथ के टुकडो को क्रमश अधिकाधिक छोटे टुकडो म विभाजित करते जाएँ तो प्रत में एक ऐसी स्थिति आ जाएगी जव उन टुक्डो को और अधिक तोडन से या तो वह पदाथ पूरी तरह से बदन जाएगा या नष्ट हो जाएंगा।ये अतिसूक्ष्म कण ही लोह या सोसे के परमाणु हैं । इसके सकडो वर्षों बाद ही परमाणु की समग्या को ठीक से समझा जा सका । अठारहवी सदी मे माचेप्टर के डारटन नामक एक रसायनश ने पहले-पहल यह बताया कि दुनिया के थोडे-से पदार्थों के, जिहे तत्व' (Element) करते हैं, परमाणुप्रो से ही विश्व की सभी व तुओ की रचना हुई है । डाल्टन ने इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए बताया कि केवल लोहा या सीसा ही नहीं अपितु लकडी और कागज, कपडा और 2 बमठा भी परमाणुओ से बने हैं। डाल्टन का परमाणु-सिद्धात जिसे आज भी स्कूलों मै पढाया जाता है यह दिखाता है कि कुछ तत्त्वो के परमाणु मिलकर 'अणु' (Molecule) भी बना सक्ते हैं । इ हे यौगिक परमाणु (Compound Atom) कर सकते हैं। ये परमाणु जिस प्रकार मिलते हैं उनकी सस्या के अनुपात और उनके मिलने के ढग के कारण विश्व के उन करोडो पदार्थों की रचना होती है जिनके सपर्क मे हम दिन-प्रतिदिन प्राते हैं। परमाणु के बारे मे प्राचीन मान्यता डाल्टन ने इस सिद्धात की विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की और गीघ्र ही भय रसायनज्ञो ने इसकी अन्य बातो का पता लगाया। उदाहरण के तौर पर उन्होने बताया कि विश्व के सभी पदाथ 92 तत्वो से बने हैं। यदि हम विभिन प्रकार के 92 पदार्थों की-92 प्रकार की ईटो के रूप मे कल्पना करे तो हम उनके द्वारा अनेक प्रकार की इमारत-मकान, गिरजाघर, सिनेमाघर-बनाने को भी करपना कर सकते हैं। बारटन ने यह भी बताया कि हम इस बात का भी पता लगा मकते हैं कि विभिन तत्त्वो के परमाणु विस अनुपात मे मिलते हैं। यदि हम परमाणुगो को द्रव्यो के नियन भार वाले छोटे-छोटे टुक्डे मान लें तो हम देखेंगे कि दो या दो से अधिक तत्वो से मिल कर बनने वाले किसी यौगिक में उन तत्त्वो का अनुपात भी नियन होगा। अगर हम हाइडोजन के एक परमाणु वे Hि और आवमीजन के एक परमाणु के vिo निखे (जमा वि रमायनज्ञ करते हैं) तो जब हम यह कहते हैं कि पानी हाइट्रोजन और प्रॉनमीन का यौगिक है नो यह स्पष्ट ही है कि पानी का गमायनिक सूत्र HO या H.O अथवा H,O को नरह ही कुछ होगा। म जानते हैं कि पानी का मन 3
पानी
H-0-H
• Na ~~CI
नमक
क्लोरोफॉर्म
CI
H-C-CI
GI
अलकोहल
HH
H-C-C-0-H
।
HH
H-हाइड्रोजन
Na-सोडियम
C-कावन
0:प्रॉक्सीजन
Cl=क्लोरीन
अणुओं की बनावट
H,Oनियत किया गया था । मी प्रकार अय साम्पो पदार्या के मा सून
मालूम किए गए।
इस दिशा मजा प्रगति हुई है यही इसका सक्षिप्त एव मरन
विवरण ही दिया गया है । इन पृष्ठो म मंबडो वर्षों के पग्यिम
पूर्वर एव मावपानी से किए गए पापों का मक्षिप्त इतिहाम दिया है।
4
इस विवरण को देखने से यह प्रत्रिया जितनी सरल प्रतीत होती है वस्तुत वैसी है नहीं। लेकिन ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के रूप मे परमाणु के सम्बन्ध मे जो आवश्यक बातें थी वे यहां बतादी गई हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि पहले-पहल परमाणुप्रो की कल्पना छोटी-छोटी विलियर्ड की गेदो के रूप में की गई थी जिनके अलग-अलग भार थे और जो परस्पर भिन-भिन स्थानो पर सबद्ध थे। इनमे से हाइड्रोजन गैस के परमाणु सबसे हल्के और यूरेनियम धातु के परमाणु सनसे भारी पाए गए। रेनियम के बारे में इसी पुरतक मे अधिक विस्तार से आगे चलकर विचार किया जाएगा । इन दोनो तत्त्वो के बीच और भी नव्वे तत्त्व थे जिनमे से कई के बारे मे आपने स्कूल विज्ञान के पाठ्य- क्रम मे पढा होगा। ये गधक, फॉस्फोरस और कार्बन जैसे अधातु पदार्थ, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन आदि गैसे तथा रोजमर्रा के इस्तेमाल की लोहा, चादी और ताबा आदि धातुएँ हैं। लेकिन अणुप्रो के बारे मे एक बात विशेष महत्त्व की है और वह यह कि सैक्डो वर्षों से वैज्ञानिक यह समझते रहे कि विभिन्न तत्त्वी के परमाणुप्रो को किसी प्रकार भी बदला नहीं जा सकता। वरतुत समझा यह जाता था कि ये तत्त्व इस समार के निर्माण के लिए मूल सामग्री हैं। इन्हें मिलाकर यौगिक वनाए जा सकते हैं और इन यौगिको को तोडकर पुन तत्त्व प्राप्त किए जा सकते हैं। लेकिन ऐसा समझा जाता था कि सयोजक की प्रक्रिया मे होने वाले इन सभी परिवतनो मे परमाणु मे किसी प्रकार का परिवतन नहीं होता। आज अधिकारी पुरानी मान्यताएँ बदल चुकी है और परमाणु के बारे मे विचारो मे परिवतन के कारण ही वतमान युग को 'परमाणु युग' कहते हैं। 5 परमाणु भंजक (Atom Smasher) यह बडे आश्चय की बात है कि वैज्ञानिक जिन विचारो को कई शताब्दियो तक मानते आए वे धीरे-धीरे कसे लुप्त हो गए। यहाँ स्वभावत यह प्रश्न उठता है कि वैज्ञानिको को इस बात का कैसे ज्ञान हुआ कि उनकी परमाणु मे परिवर्तन न होने की धारणा पूरी तरह से ठीक नहीं है । प्राज- कल हम बड़ी-बडी परमाणु भट्टियो के बारे मे (जिनका वर्णन आगे क्यिा जाएगा) पढते हैं। "नमे परमाणुप्रो को तोडा जाता है। इन नवीन खोजो के कारण परमाणु के बारे मे यह पुरानी धारणा, कि वे विलियर्ड की गेद के समान होते हैं, समाप्त हो चुकी है। यह बात चाहे कुत्र विचित्र ही क्यो न प्रतीत हो कि तु प्रारम्भ में वैज्ञानिको के मन में गैसो के माध्यम से विद्युत् के चालन (Conduction) के सम्बध मे किए गए कुछ प्रयोगो के कारण यह सदेह पैदा हुअा था। अगर हम कॉच की एक नली ले (जैसी चित्र में दिखाई गई है) जो दोनो । ओर से अच्छी तरह बद हो और यदि नली के दोनो मिरो से धातु पट्टिकाएँ (जिन्हे सामान्यत इलेक्ट्रोड कहते हैं), प्रविष्ट कराएं और इन्हे तार द्वारा एक शक्तिशाली बैटरी से जोड तो यदि वैटरी मे वोल्टता काफी होगी तो उससे विजनी की छोटी-सी चिनगारी निकलेगी, इस चिनगारी को मामा यत म्फुलिंग (Spark) कहते हैं । यह स्फुलिंग नली म से होकर एक इलक्टोड मे दूसरे इलेक्ट्रोड पर पहुँच जाएगा । अगर इस नली मे मे नगभग मारी की सारी हवा निकाल दे तो एकोमी अवस्था ग्राजाएगी जब स्पुलिग बिलकुल दिखाई नहीं देगा। अब इस नली म एक तरह की विमग्ति चमक फैल जाएगी। मर विलियम क्रुक्स ने प्रारम्भ मे गैमो मे से विद्युत् वियजन के बारे मे काफी अनुसधान किया जिसके आधार पर उसने एक ऐसा सिद्धात स्थिर करने का प्रयास किया जिसके द्वाग नली में होने वाली प्रक्रिया की व्याप्या यो जा सके। निति (Vacuum) नली म इस अद्भुत दीप्ति (Glov) (और विगिप्ट दाबो पर स्वय ननी को दीप्ति का अनोखापन) वास्तव में इस 6 निर्वात नलियों में विद्युत्-विसर्जन ऋणात्मक इलेक्ट्रोड धनात्मक इलेक्ट्रोड- परिरक्षक धनात्मक इलेक्ट्रोड (ऋणात्मक इलेक्ट्रोड -E ऋणात्मक इलेक्ट्रोड घुम्बकीय ध्रुव पनात्मक इलेक्ट्रोड, चुम्बकीय ध्रुव क सामान्य विसजन ख परिरक्षक द्वारा अवरोधित विसजन ग चुम्बकीय क्षेत्र द्वारा प्रभावित विसर्जन बात म था पिनी मे से विद्युत् धारा उस समय अधिक प्रासानी से गुजरती या जब उममे हवा या गैम का लगभग प्रभाव होता था। इस परिणाम की विलकुल ही आगा नही की जा सकती थी अगर हम ऐसी कल्पना कर वि कुछ नौकाएँ नदी के प्रवाह के माय बह रही हो तो यह कल्पना भी नहीं की जा सकती कि यदि नली का लगभग सारा पानी निकाल दिया जाए तो नौकाएं पहले से अधिक सुचारू रूप से बहने लगगी। नेविन जब क्रुक्स नली मे हवा भर दी जाए तो यह हवा विद्युत को एक स्फुनिग के रूप म ही गुजरने दगी और अव यह विद्युत् धारा नली मे से एक निर तर एव अपरिवर्ती प्रवाह रूप मे नही गुजरेगी। परन्तु यदि नली में से लगभग सारी हवा निकाल दी जाए तो विद्युत् धारा सतत रूप से और आसानी से गुजरेगी। 7 छाया ऋणात्मक इलेक्ट्रोड धनात्मक इलेक्ट्रोड -200 अब हमारे सामने यह समस्या इस रूप मे आती है कि निर्यात नली में ऐसी क्या चीज थी जिसके माध्यम से विद्युत् धारा एक सिरे से दूसरे सिरे पर पहुँचती है। क्रुक्स तथा अन्य वैज्ञानिको ने कुछ ऐसे ठोस पदार्थों के कणो की कल्पना की जो एक इलेक्ट्रोड से दूसरे इलेक्ट्रोड की पार गति कर रहे थे जिनमें से प्रत्येक कण पर किसी न किसी प्रकार कुछ विद्युत् प्रावेश लगा हुआ था। इस बात की पुष्टि एक प्रयोग द्वारा हुई, जिसे ऊपर दिए चित्र में प्रदर्शित किया गया है। कांच की नली के बीच में एक ठोस विशिष्ट प्राकार की परिरक्षक प्लेट लगा देने पर दीप्ति रुक जाती थी । इससे स्पष्ट हो गया कि वहाँ ठोस कणो का या प्रकाश की तरह का कोई प्रवाह था जो नली मे से होकर गुजर रहा था । विद्युत् धारा के मार्ग मे धातु की प्लेट लगा देने पर नली के सामने वाले भाग पर छाया प्राप्त हुई जिसके सुस्पष्ट कोने थे इससे यह सिद्ध हो गया कि नली मे से विद्युत् धारा का वहन चाहे कणो द्वारा हो रहा हो अथवा किरणो द्वारा परन्तु ये कण अथवा किरणें सरल रेखा में गति करते हैं। - 8 नरम लोह कोड LIEBER विद्युत् चुम्बक इस प्रकार यह प्रथम निष्कर्ष प्राप्त हुआ। इसके बाद यह अनुभव किया गया कि इस समस्या का एक और तरीके से भी अध्ययन किया जा सकता है। जिसे बिजली के बारे मे थोडा-बहुत भी मालूम हो तो वह जानता है कि विद्युत् और चुम्बकत्व मे परस्पर कुछ सम्बन्ध है। अगर लोहे या स्पात के टुकडे पर कुडली की तरह लिपटी हुई तार मे से विद्युत् धारा प्रवाहित की जाए तो लोहे या इस्पात का वह टुकडा चुम्बकित हो जाएगा, इसे 'विद्युत् चुम्वक' (Electromagnet) कहते हैं। और यदि चुम्बक के दो ध्रुवो के बीच एक ऐसी तार रखी जाए जिसमे से विद्युत धारा प्रवाहित हो रही हो तो कुतुबनुमा की सुई की तरह यह भी एक विशिष्ट दिशा मे घूम जाएगी। इस प्रकार जब वैज्ञानिक, नली मे विद्युत् पारा के इस अद्भुत विसर्जन की समस्या से परेशान हो रहे थे तो उन्होने सोचा कि देखें एक सशक्त चुम्बक को नली के पास रखने से क्या प्रभाव पड़ता है। चित्र को देखने से इसके परिणाम का पता चलता है। चुम्बकीय आकपण ने प्रवाह को दूसरी ओर मोड दिया। इससे निस्सदेह से यह मालूम हो गया कि नली मे दीप्तिमान पदार्थ किरणो के बजाय कोई ठोस द्रव्य था । क्योकि हम किसी प्रकार भी यह कल्पना नही कर सकते कि चुम्बक के द्वारा किरणो को भी कभी प्रभावित किया जा सकता है । 9 इलेक्ट्रॉनो की खोज इससे अगली अवस्था को समझना बहुत आसान नहीं है। सभवत इसकी व्यारया तभी अच्छी तरह की जा सकेगी यदि इसकी तुलना विसी बिलकुल ही भिन्न प्रकार से की जाए। मान लीजिए कि पाप फुटवाल खेन रहे हैं और आप भी अग्रपक्ति (फारवर्दो) मे से एक हैं, आप गेंद का विरोधी दल के फुल चैक से आगे निकालने के प्रयास में उसे अपने कधे से धक्का मारते हैं अब यदि वह हप्ट-पुष्ट और भरी हो और आप दुवले- पतल हो तो स्वाभाविक है कि धक्का दने के बावजूद आप ही पोछे धकेले L . जाएँ। इसके विपरीत यदि वह सामान्य कद-काठ का हो तो आप धक्का देकर उसका सतुलन बिगाडने में सफल हो सकेंगे। यदि इस समस्या पर वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाए तो आप अपने भार और वेग तथा अपने विरोधी खिलाडी के भार और वेग के बीच एक प्रकार का सम्बन्ध निकाल सकते हैं । अगर आपको अपना भार और वेग मालूम हो तो आप विरोधी पक्ष के खिलाडी को धक्का देने के बाद जो प्रतिक्रिया हुई अर्थात् उसे धक्का देने पर वह गिर गया या आपको धक्का लगा, इस तथ्य के आधार पर उसका भार और वेग मालूम कर सकते हैं। चुम्बर की सहायता से कणो का माग बदलने मे वैज्ञानिको ने इसी सिद्धात का प्राश्रय लिया था। इससे उन्हे पता चला कि विभिन सामर्थ्य 10 इलेक्ट्रॉन धारा ऐल्यूमिनियम द्वार धनात्मक सयोजन पनात्मक इलेक्ट्रोड इलेक्ट्रोनों का स्रोत (strength) वाल चुम्बको का प्रयोग करके इस बात का पता लगाया जा सकता है कि कणो का पथ किस प्रकार बदलता है। और अन्त मे वे धारा मे प्रवाहित होने वाले कणो का भार मालूम करने में सफल हुए। इससे कुछ अत्यधिक प्राश्चयजनक परिणाम निकले । एक तो यह कि नला मे चाहे जो भी गैस हो और चाहे जिस किसी भी पदाथ के इलेक्ट्रोड बने हो परन्तु प्रवाहित होने वाले कणो का भार हमेशा एक समान ही पाया गया और दूसरी बात यह कि इन कणो का भार बहुत थोडा होता है जो हाइड्रोजन के परमाणु के भार का 1/1800 होता है। यह बात काफी आश्चय चकित कर देने वाला और बिलकुल ही अप्रत्याशित थी। यही नन्हा-सा हल्का कण बाद मे इलेक्ट्रान कहलाया। शीघ्र ही सभी वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हो गए कि दरअसल जब विद्युत् धारा विसर्जित हुई तो इलेक्ट्रोड के परमाणुओ से कुछ अश छिटक कर टूट गए और यही टुक्डे जिन पर विद्युत् आवेश था नली मे तीव्र गति से चल रहे थे। यदि नली मे किसी उपयुक्त धातु का निर्गमन द्वार बना दिया जाए तो ये कण नली मे से बाहर निकल सकते थे। वे इस बात पर भी सहमत थे कि सभी परमाणुओ की सरचना मे कुछ इलेक्ट्रोन अवश्य होते हैं । इसलिए वैज्ञानिको ने परमाणु की सरचना 11 परमाणु का आलेख N-नाभिक E-इलेक्ट्रॉन N के विषय में जानकारी के लिए अध्ययन आरम्भ किया। यह बात निस्सदेह स्पष्ट थी कि परमाणु बहुत ही छोटे होते हैं इसलिए उनकी सरचना के बारे मे जो अध्ययन किया जाएगा वह अवश्य ही बहुत कठिन होगा। इसके अलावा यह भी मालूम था कि परमाणुगो का रचना केवल इलेक्ट्रोनो से ही नहीं हो सकती यद्यपि दूसरे मूलभूत कण-प्रोटॉन-की खोज इसके कुछ समय बाद हुई। (देखिए पृष्ठ 17 )। यहाँ इलेक्ट्रोन के बारे में एक और बात बता देना आवश्यक है । विदित हो कि विद्युत् धारा दो प्रकार की होती है, जिहे सामान्यत धनात्मक एवं ऋणात्मक कहते हैं। इसी बात को सूचित करने के लिए प्राय विद्युत् उपकरणो के लिए टर्मिनलो पर धन या ऋण चिह्न प्रक्त्ति होते हैं । चुम्बकीय क्षेत्र की सहायता से धनावेश वाले कण विपरीत ऋणावेशित कणो की अपेक्षा विपरीत दिशा मे मुड जाते हैं । इलेक्ट्रोनो के प्रवाह के चुम्बकीय परिवर्तन के प्रभाव का अध्ययन करने से शीघ्र ही यह पता चला कि सभी इलेक्ट्रोन ऋणावेशित होते हैं। यह भी सिद्ध हो गया कि इस आवेश में कभी परिवर्तन नहीं होता। वास्तव मै, प्रत्येक इलेक्ट्रोन मे विद्युत् की एक-सी मात्रा रहती है। 12 रेडियो ऐक्टिवता , फासीसी भौतिकी-विद् वैकरल ने 1896 मे ही यूरेनियम धातु के यौगिको के बारे में अध्ययन शुरू कर दिया था। इस समय तक ज्ञात तत्वो मे से यूरेनियम सबसे भारी था। उसने देखा कि इस धातु के यौगिक अधेरे मे चमकते हैं । एक इससे भी आश्चयजनक बात की और उसका ध्यान गया। आप जानते ही हैं कि प्रकाश के बचाव के लिए फोटोग्राफी की प्लेटो और फिरमो को काले कागज मे सावधानी से लपेटकर रखा जाता है, यदि फोटोग्राफी की प्लेट या फिल्म पर किसी भी तरह के प्रकाश का असर हो जाए तो नेगेटिव खराव हो जाता है, लेकिन एक और तथ्य की ओर बैकेरल का ध्यान अनायास ही चला गया, उसने देखा कि यदि काले कागज से लिपटी हुई फोटोग्राफी की प्लेट पर यूरेनियम के यौगिक का टुकडा रख दिया जाए तो नैगेटिव पर इसका चित्र खिंच जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि यूरेनियम मे से कुछ ऐसी चीज कण या किरणें-निकलती हैं जो आवरण के पार निकलकर प्लेट को प्रभावित करती हैं और प्लेट मे कुछ रासायनिक परिवतन हो जाता है। यह विकिरण यूरेनियम से निरन्तर होता रहा। इस धातु पर कोई भी क्रिया करने पर उसका विकिरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ऐसा मालूम पड़ा कि यह एक ऐसी शाश्वत किया है जिसपर रासायनिक परिवतनो का भी कोई प्रभाव नहीं होता। यह रहस्य वैज्ञानिको के लिए उसी प्रकार चुनौती बनकर आया जैसे कत्ल का कोई मामला स्कॉटलैण्ड यार्ड के लिए चुनौती होता है । शीघ्र ही इस सत्य के बारे मे कुछ जानकारी उपलब्ध हो गई। मालूम हुआ कि यूरेनियम मे से इलेक्ट्रोनो का प्रवाह लगातार आ रहा है । अब प्रश्न यह उठा कि क्या यही वह चीज है जिसने फोटोग्राफी की प्लेट पर क्रिया की थी? क्या यूरेनियम के परमाणु उन पर कोई क्रिया हुए बिना ही निरन्तर टूटते रहते हैं इन प्रश्नो से इस बात का सकेत मिलता है कि उन्होंने किसी नए रहस्य को खोज निकाला था। यहां यह जो नवीन परिवर्तन देखने 7 13 मे आया इसे 'रेडियो ऐक्टिवता' कहा गया । शीघ्र ही बहुत से वैज्ञानिको ने रेडियो ऐक्टिव परिवर्तन के बारे में अध्ययन शुरू कर दिया और कुछ ही समय बाद यह पता चला कि यूरेनियम और यूरेनियम के यौगिको (विशेष रुप मे पिच नंड नामक शिलापड जिससे यूरेनियम निकाला जा सकता है) के विभिन्न नमूनो की रेडियो ऐक्टिवता की सामथ्य बहुत अधिक भिन होती है। यह भी मालूम हुआ कि इनमें से कुछ यूरेनियम के नमूने समय की नियत अवधि में अय नमूनो की अपेक्षा अधिक इलेक्ट्रोन विसर्जित करते हैं। प्रारम्भ मै इस अतर सा कारण यूरेनियम को विभिन किस्मो के अंतर को समझा गया था, लेक्नि शीघ्र ही यह मदेह हुआ कि उनके साथ विमी नए पदार्थ के कुछ अधिक रेडियो ऐक्टिवना वाले नमूने मिल गए होगे जिन्हे परिशुद्ध रूप में प्राप्त करना सभव होगा और जो यूरेनियम से भी कहीं अधिक रेडियो ऐक्टिवता सिद्ध होगे। रेडियम यूरेनियम के नमूने को जिस पदार्थ ने अधिक रेडियो ऐक्टिव बना दिया अब उसे 'रेडियम' कहते हैं। पहले-पहल इसकी खोज 1894 मे फास मै पियरे क्यूरी और मेरीक्यूरी ने की थी । इस खोज के लिए क्यूरी दपती ने जो प्रयोग विए वे निस्सदेह इस कहानी के सबसे महत्वपूर्ण एव रोचक भाग हैं। ईव क्यूरी ने अपनी मा मादाम क्यूरी की जीवनी मे इसका विस्तृत वणन किया है। क्यूरी दपती ने टूटी-फूटी थापडी मे अनथक परिश्रम करके टनो पिच ब्लेड से बहुत थोडा-सा रेडियम का नमूना पाने म सफलता पाई। वे जिस पदार्थ से रेडियम का नमूना पाने का प्रयत्न कर रहे थे उन्होंने उसके प्रत्येक भाग को विद्युत् दर्शी (Electroscope) उपकरण द्वारा परीक्षा की। जब इम उपकरण के आसपास मिद्युत् प्रावेश होता है तो 14 स्वर्ण पत्र मावेशित विसजित विद्युतदर्शी इसमे लगे स्वर्ण पत्र फैल जाते हैं । स्पष्ट है कि उपलब्ध पदार्थ मे से शुद्ध रेडियम को अलग करने का काय क्यूरी दपति के लिए अत्यधिक कष्ट साध्य रहा होगा। जब शुद्ध रेडियम का बहुत थोडा-सा नमूना प्राप्त हुआ तो ज्ञात हुआ कि रेडियो ऐक्टिवता की समस्या को बैकेरल ने जितना जटिल समझा था यह उससे भी कही अधिक जटिल है । यहां केवल ऋणावेशित इलेक्ट्रोनो के प्रभाव से ही वास्ता नहीं था बल्कि धातु से तीन प्रकार की चीजें निकल रही थी। एक तो वहाँ तेजी से गति करते हुए इलेक्ट्रोन थे। दूसरे कुछ अपेक्षाकृत कही अधिक भारी कण ये जो 'ऐल्फा-कण' कहलाते हैं। ये हीलियम (जो हाइड्रोजन से चार गुना भारी एक दुर्लभ गैम होती है) के धनावेशित परमाणु थे। तीसरे वहाँ पर एक प्रकार की प्रखर किरणो का । 15
प्रवाह था जिसे बाद में ऐक्ग किरण पहा गया । जैसा कि स्वाभाविक
ही है ये भार हीन पी प्रोन उन पर किसी प्रकार या विद्युत् प्रावेश नहीं
था, लेकिन वे पागज तथा गय भोप यस्तुमों ये महज ही भार-पार जा
सरती थी । यूरेनियम गतिज ग नमूना यी (जिसम घोडी-मी रेडियम भी
मात्रा मिली थी) स्वत फोटो खिंच जाोया यारण ये ऐयस फिरणे ही
थी।
यह भी मिद हो गया कि रजियम का म्यायी प में एव निरतर
विघटन होता रहता है। इसके विघटन पी गति में तापमान, दाव और
यहाँ तप कि रासायनिय अवस्था म पग्यितन ये पारण भी बाई प्रभाव
नहीं पडता । जब विमी प्रय तत्व माय रेडियम मिली होती है तब भी
इममा विघटन उतनी ही गति से हरा है (उगसे अधिक सेजी से नहीं)
जितना कि गुर अवस्था म होने पर होता है । यह एक ऐसा परिवतन
था जिस पर वैज्ञानिया का कोई नियण 7 या ।
ऐक्स किरणें
इलेक्ट्रॉन
एल्फाकण
रेडियम
सोसा
रेडियम का विघटन
यहा एक और तथ्य की ओर ध्यान दिला देना आवश्यक है।
रेडियम का परमाणु भार(atomic weight) (अर्थात् सब तत्वो से हलके
16
तत्व हाइड्रोजन की तुलना में इसके परमाणुओ का भार) 226 है । अब यदि 226 भार वाले एक परमाणु से एक हीलियम का परमाणु कम कर दिया जाए जिसका भार 4 है, तो कोई ऐसा पदार्थ बच रहेगा जिसका परमाणुभार 222 होगा। इस पदार्थ की उपलब्ध मात्रा इतनी कम थी कि इसके बारे मे अध्ययन करना बहुत कठिन हो गया। लेकिा इसे बाद मे रेडियम प्रसर्ग या रेडॉन कहा गया और यह एक ऐसा तत्व ज्ञात हुआ जिसके बारे में पहले कुछ भी पता न था। नाभिक (nucleus) का विघटन - - क्यूरी दपती द्वारा रेडियम को अलग करने के बाद न्यूजीलैंड के महान वैज्ञानिक लार्ड रदरफोर्ड ही वह व्यक्ति था जिसने कई वर्षों तक कै ग्रिज मे अनुसधान काय करके परमाणुओ के सम्बन्ध मे जानकारी प्रदान करने मे सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण योगदान किया। रदरफोर्ड द्वारा परमाणु के अनुसधान का कार्य प्रारम्भ करने से पहले लोगो को यह मालूम था कि कुछ परमाणु इस प्रकार स्वत विघटित हो सकते हैं जिसका वणन ऊपर किया जा चुका है। उ हे यह भी ज्ञात था कि परमाणु मे ऋणावेशित छोटे-छोटे कण होते हैं जिन्हे इलेक्ट्रोन कहते हैं। उनका यह भी अनुमान था कि परमाणु मे धनावेशित कण भी होते हैं जिहे प्रोटॉन कहते हैं। लेकिन रदरफोड ने ही पहले परल-पहल यह पता लगाया कि प्रोटॉन के भारी कण परमाणु के ठीक मध्य मे सो द्रत होते हैं, और हलके इलेक्ट्रॉन या कुछ इलेक्ट्रॉन तो अवश्य ही इस के द्र के चारो ओर (जिसे सामा यत 'नाभिक', या न्यूक्लियस कहते हैं) चक्कर काटते हैं। इसके अलावा रदरफोड ही पहना ऐसा व्यक्ति था जिसने पर- माणुमो के सभावित कृत्रिम विघटन के सम्बध मे काय किया। उसे मालूम था कि उसे जो उपकरण उपलब्ध है उसकी सहायता से नाभिक 17 लार्ड रदरफोर्ड वेधन की एक ही विधि है और वह यह कि उपलब्ध मामग्री से नाभिक पर प्रहार किया जाए। सभवत यह विधि पूर्णतया असतोपजनक प्रतीत होगी जो दरअसल कुछ हद तक है भी। यह ऐसा ही है कि हम यदि एक ऐसे कमरे की कल्पना करें जिसमे फर्नीचर भरा हो और चारो ओर दीवारो मे बीच-बीच मे साली स्थान हो। यह भी कल्पना करें कि फर्नीचर अथवा जिस सामग्री से फर्नीचर बना है उसे पाने के लिए एक ही साधन उपलब्ध है वह है रिवॉवर के द्वारा कमरे के अन्दर गोलिया चलाना तथा उसमे प्रहार से टूटने वाले लकडी या धातु के ऐसे छोटे-छोटे टुक्डो 18 को प्राप्त कर लेना जो दीवार के खाली भाग से छिटककर बाहर निकल आएँ । इस उदाहरण से प्रारम्भिक प्रयोगो की कठिनाई का थोडा-बहुत अनुमान हो सकता है। क्योकि रदरफोड और उसके सहायको ने लग- भग यही कुछ किया । इनके पास ऐल्फा कण रूपी गोलियाँ थी (देखिए पृष्ठ 15) इस बारे मे उन्हे जितनी जानकारी पाने की आशा थी उतनी न मिल सकी, लेकिन फिर भी उन्होंने काफी ज्ञान प्राप्त कर लिया। ऐसे इलेक्ट्रानो को वेधन करना कठिन नही था जो केन्द्रीय नाभिक के चारो ओर उसी प्रकार चक्कर काटते थे जैसे ग्रह सूय की परिक्रमा करते हैं लेकिन नाभिक को विघटित करने की समस्या इससे भिन्न प्रकार की थी। अनेक कुशल सहायक इस कार्य मे उसकी मदद कर रहे थे। इनमे से सभवत सबसे विस्यात सहायक एक युवक था जिसका नाम डॉ. कॉकक्राफ्ट था जो बाद मे सर जान कॉकक्राफ्ट के नाम से प्रसिद्ध झा और ब्रिटेन के हार्वेल स्थित प्रथम परमाणु ऊर्जा अनुसंधान केन्द्र का अध्यक्ष बना। नीचे रदरफोर्ड के परमाणु भजक का चित्र दिया गया है । इसमे ऐल्फा कणो से नाइट्रोजन गैस पर प्रहार किया गया और यह पता लगा कि नाइट्रोजन परमाणुओ से कुछ कण बाहर निकले। और यर जानने के लिए सूक्ष्मदर्शी मे से जिक सल्फाइड के आवरण का प्रेक्षण किया गया जो विद्युत् प्रावेशित कण के टकराने पर चमक उठता था। ये कण प्रोटॉन सिद्ध हुए जो अवश्य ही नाइट्रोजन के परमाणुओ के नाभि को में से निकले होगे । इस प्रयोग को पूरी तरह मतापजनक नहीं कहा जा सकता। क्योकि वहत ही थोडे-से क्णो ने नाइट्रोजन के नाभिको पर सीधा प्रहार क्यिा । जसे सूय मण्डन के पूरे भाग मे से बहुत थोडे स्थान को घेरता है उसी प्रकार नाभिक भी बहुत थोडा-सा स्थान घेरता है। ऐल्फा के कण तो पहले ही विद्युत् प्रावेगित होते हैं । इस प्रकार विद्युत् प्रावेशित गोली से यदि किसी ऐसे लय पर प्रहार किया जाए जो स्वय भी विद्युत् ग्रावेशित हो तो उसके सफल होने को मम्भावना बहुत कम होती है । इस विद्युत् प्रावेश के कारण समस्या बहुत अधिक जटिल हो जाती है। 19
नाइट्रोजन
रजतपन्नी
जिक सल्फाइट
목
कामावरण।
प्रेक्षण सूक्ष्मदर्शी
भावेशित कणों
का स्रोत
रदरफोड का परमाणु भजक
लेकिन यह ऐसा प्रथम प्रयोग था जिसने इस बात को सिद्ध कर दिया
कि परमाणुमो को तोड़ा जा सकता है। यह प्रयोग 1920 मे हुआ।
न्यूट्रॉन
परमाणु के क्षेत्र मे सबसे बडी प्रगति उस समय हुई जब वैज्ञा-
निको को यह पता चला कि ऐसे उदासीन कण का भी अस्तित्व है जिस
सरल परमाणु
-
5
।
-
हाइड्रोगन का परमाणु
- इलेक्ट्रॉन G=प्रोटॉन
20
हीलियम का परमाणु
यूट्रॉन
पर विद्युत् प्रावेश नहीं होता । सन् 1920 मे ही लाई रदरफोर्ड को ऋणावेश युक्त इलेक्ट्रॉन और धनावेश युक्त प्रोटॉन के अस्तित्व का ज्ञान था। उसका अनुमान था कि धनावेशित इलेक्ट्रॉन का भी (जिसकी बाद मे खोज भी हो गई और उसे पॉजिस्ट्रान नाम दिया गया) अस्तित्व हो सकता है, साथ ही उसका यह भी विश्वास था कि यदि ऐसे कण मिल जाएं तो यह बात सर्वाधिक महत्व की होगी । क्योकि गैस की नली मे इसके द्वारा प्रहार किया जा सकेगा और इससे विद्युत् सम्बन्धी बलो से पैदा होने वाली पेचीदगियो से बचा सकेगा। 1920 मे इसके बारे मे रदरफोर्ड ने लिखा था कि यदि उदासीन कण की खोज हो गई तो यह कण विना रुकावट के पदाथ मे से होकर गमन कर सकेगा और इसे अच्छी तरह बन्द पान में रखना असभव होगा । यद्यपि रदरफोर्ड ने इस उदासीन कण की खोज का भरसक प्रयत्न किया लेकिन उसे इस प्रयास में सफलता नहीं मिली और यह एक महान् वैज्ञानिक की सृजनात्मक कल्पना की एक उडान मान रह गया।- फ्रासीसी वैज्ञानिक जोलियो क्यूरी और उसकी पत्नी पाइरीन (जो रेडियम धातु की खोज करो वाले क्यूरी दपती की पुत्री थी) ने ही सवप्रथम इस बात का सतोपजनक प्रमाण दिया कि ऐसे कण का, जिसे बाद मे न्यूदॉन कहा गया, वास्तव मे अस्तित्व है। विद्युत् प्रावेशित कणो का स्रोत बेरिलियम पराफीन मावरण पोलियो क्यूरी उपकरण का सिद्धांत वैयुत् ससूमक 21 जोलियो दम्पति ने अपने प्रयोगोमा वणन 1932 म दिया। इस प्रयोग के लिए उन्होने रेडियो ऐक्टिव पोलोनियम धातु को लिया, जो पई बातो मे रेडियम से भिन्न नहीं है और इससे होने वाले विकिरण को रेडियोऐक्टिवता हीन (non-radioactive) वैरिलियम धातु पर प्रहार करने दिया। इस समय तक ऐसी समस्याग्रो के अध्ययन के लिए प्रयोगशालामो मे कई तरीके खोज निकाले गए थे। इसका एक प्राश्चर्य- जनक परिणाम यह निकला कि पोलोनियम से होने वाले विषिरण ने जैसी कि माशा थी केवल वेरिलियम यो रेडियो ऐक्टिव ही नहीं बना दिया अपितु इसे मूल तत्व पोलोनियम की अपेक्षा भी अधिक रेडियोऐक्टिव कर दिया। दूसरे शब्दो मे हम यो कह सकते हैं कि सम्भवत पोलोनियम ऐसी किरणें या कण विजित कर रहा था जिनका वैद्युत उपकरणो द्वारा पता नही लगाया जा सकता था लेकिन फिर भी वे रेडियोऐक्टिवता पैदा कर रहे थे। वेरिलियम और ससूचक उपकरण (detecting instru ment) के बीच में विभिन्न द्रव्यो को जो आवरण लगा कर देखे गए तो उन्होने रेडियोऐक्टिवता को और अधिक बढा दिया। यदि ये आवरण किन्ही ऐसे पदार्थों के होते जिनमे अय तत्वो के साथ हाइड्रोजन मिनी होती तो उनसे रेडियोऐक्टिवता मे सबसे अधिक वृद्धि हो जाती। इनमे सबसे अधिक प्रभावशाली पदार्थ पानी, सेलोफेन या पैराफिन थे (इन द्रव पदार्थों का उपयुक्त पात्र मे होना तो आवश्यक है ही)। ब्रिटेन के भौतिक विद सर जेम्स चेडविक ने जो उस समय कैब्रिज मे कार्य कर रहा था उसी वष इसका स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया। उसने इसका समाधान यह दिया कि सम्भवत यूट्रॉन (जैसी कि रदर फोड ने बारह वर्ष पूर्व भविष्यवाणी की थी) बेरिलियम से आ रहे हो और शायद ये परमाणुमो को आवरण के अन्दर विघटित कर रहे हो। इस प्रकार परमाणुप्रो से विघटित होने वाले टुकडो पर विद्युत् आवेश होगा और ये रेडियोऐक्टिवता ससूचक विद्युत् दर्शी या अय उपकरणो मे माप सकने योग्य प्रभाव उत्पन्न करेंगे। 22 शृखला अभिक्रिया (chain reactions) व्यावहारिक स्प से शृखला अभिक्रिया का किस प्रकार प्रयोग करें, इस बारे में विचार करने से पहले एक अत्यन्त विशिष्ट प्रकार के परिवर्तन के बारे मे थोडा-बहुत जान लेना आवश्यक है । इस परिवर्तन को वैज्ञानिक शृखला अभिक्रिया कहते हैं । इस विश्व मे जो भी परि- वर्तन होते हैं चाहे वे उबलने या जमने जैसे भौतिक परिवर्तन हो या जस्ते पर गधक के तेज़ाब की या लोहे पर ताम्र सल्फेट (नीलाथोथा) की क्रिया की तरह के रासायनिक परिवतन हो, इन सभी के सम्बन्ध मे किसी न किसी प्रयोगशाला मे ही अध्ययन किया जाता है । ये परिवतन अपने आप मे सामान्यत पूण होते हैं । अगर पानी को उबाले तो भाप निकलती है। यह भाप या तो हवा में विलीन हो सकती है या इसे सघनित करके आसवित जल (distilled water) प्राप्त कर सकते हैं ।--अगर जस्ते (जिक) पर गधक का तेजाब (सल्फ्यूरिक एसिड) डाला जाए (जैसा कि शायद स्वूल मे आपने किया भी होगा) तो हाइड्रोजन गैस निकलती है और एक जिक सल्फेट नामक पदार्थ वच रहता है । सल्फ्यूरिक अम्ल के एक अणु से एक अणु हाइड्रोजन का और एक अणु जिंक सल्फेट का बनता है। इतना होने पर परिवतन समाप्त हो जाता है। शृखला अभिक्रिया इससे बिलकुल भिन्न प्रकार का परिवतन है । इसमे एक परमाणु से निमुक्त होने वाला न्यूट्रान अन्य परमाणु पर प्रहार करता है इसके परिणामस्वम्प और न्यूट्रान निर्मुक्त होते हैं फिर ये न्यट्रान अय परमाणुओ पर प्रहार करते हैं । इसका परिणाम यह होता है कि परिवतन क्रमश अधिकाधिक तेज होता जाता है, प्रस्तुत आलेखो मे इस प्रक्रिया को दर्शाया गया है। 23
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शृखला अभिक्रिया
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यूरेनियम का विखंडन दिए पालेख को देखने से पता चलता है कि यूरेनियम का एक परमाणु से विघटित होता है। इस प्रयोजन के लिए सबसे अच्छा वह पूरेनियम है जो सबसे अधिक सुगमता से विघटित होता हो । यह यूरेनियम 235 है। इसे 235 परमाणुभार के कारण यूरेनियम 235 कहते हैं । इसके अलावा विभिन्न परमाणु भारो वाले कई अय प्रकार के भी यूरेनियम होते हैं। जव यूरेनियम 235 विघटित हाता है तो इसका एक परमाणु सामान्यत तीन न्यूट्रान उत्पन्न करता है । इनमें से प्रत्येक न्यूट्रान यूरे- नियम के एक-एक और परमाणु को तोड़ सकता है। जिसमे से प्रत्येक परमाणु तीन और नए न्यू ट्रानो को उत्पन्न करेगा। इस प्रकार इस बात की सहज ही कल्पना की जा सकती है कि जब एक बार यह प्रक्रिया शुरू हो जाए तो यह क्रमश अधिकाधिक तेज होती जाएगी और चूंकि प्रथम न्यूट्रान के निमुक्त होने और इसके यूरेनियम के दूसरे परमाणु पर प्रहार करने तक सैकिंड से भी बहुत कम समय लगता है अत कम समय में ही शृखला अभिक्रिया के द्वारा शक्ति का एक विशाल स्रोत पैदा हो जाता है। इस परिवर्तन के दौरान बहुत अधिक गर्मी भी पैदा होती है । इसकी व्यारया एक बार फिर अत्यात सरल रूप मे कर दी गई है । यहाँ जिस बात का वणन किया गया है उसके अधिकाश का ज्ञान काफी लम्बे अरसे से अब तक निगूढ रहस्य के रूप मे विभिन देशो की प्रयोगशालामो की परिधि तक ही सीमित रहा। इसका कारण यह था कि 1939 में पहले पहल इस प्रक्रिया का-जिसे सामान्यत यूरेनियम का विखडन कहते है--विस्तार से अध्ययन किया गया। इस समय द्वितीय विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि तेजी से तैयार हो रही थी । वैज्ञानिको और राजनीतिक नेतालो ने इस सम्भावना को अनुभव किया कि यदि यूरेनियम 235 की शृखला अभिक्रिया का इस ढग से विकास किया जाए कि उसे नियत्रित किया जा सके तो इससे कोई न कोई देश ऐसा उच्च कोटि का युद्धास्त्र तैयार कर । T 25
पट्रॉन
पूरेनियम
का नाभिक
08
बेरियम
क्रिप्टॉन
पूरेनियम
कैसे
००० यूरेनियम की सहति मे न्यूट्रानो के मार्ग लेगा जो सामान्यत प्रयोगो मे आने वाले रासायनिक विस्फोटको से बने गोलो या वमो से कही अधिक शक्तिशाली और भयकर होगा। यूरेनियम का यह विखडन साधारण रेडियोऐक्टिवता नहीं है। जब रेडियम में से इलेक्ट्रॉन या अन्य कण निकलते हैं तो उस समय रेडियम के परमाणु का बहुत थोडा-सा भाग ही अलग होता है। रेडियम का परमाणु भार 226 है जब कि रेडॉन का 222 अर्थात् रेडियम के नाभिक का बहुत थोडा भाग ही टूटता है। लेकिन यूरेनियम 235 के टूटने से दो भाग अलग होते हैं जिसमे एक का परमाणु भार लगभग 100 होता है और दूसरे का लगभग 135, इस प्रकार जो मुख्य तत्त्व बनते हैं उनके नाम वेरियम और क्रिष्ट्रॉन हैं। आमतौर पर यूरेनियम 27 के टूटने से औसतन ये दो ही तत्त्व प्राप्त होते हैं, लेकिन यह परिवर्तन हमेशा पूरी तरह इसी रूप में नहीं होता। यूरेनियम परमाणु के लगभग दो भागो मे विभक्त होने से सिद्ध होता है कि यह परिवतन बहुत अधिक तीव्र होता है। कभी-कभी तो यह परिवतन इस स्प मे विलकुल भी नहीं होता। सन् 1951 मे ही यह देखने में आ गया था कि कुछ परमाणु बिलकुल भी खडित नहीं हुए। यूरेनियम 235 के कुछ परमाणुप्रो ने एक न्यूट्रॉन को अपने अदर मिला लिया और इस प्रकार यह एक और प्रकार का यूरेनियम बन गया जिसे यूरेनियम 236 रहते हैं । यह यूरेनियम 236 उस यूरेनियम की अपेक्षा बहुत कम रेडियोऐक्टिव है जिसके द्वारा शृखला अभिक्रिया शुरु हुई थी, लेकिन जिन परमाणुओ ने इस प्रकार आचरण क्यिा उनकी सरया बहुत कम थी। -- परमाणु बम द्वितीय विश्वयुद्ध (1939-45) के प्रारम्भिक वर्षों म ग्रेट ब्रिटेन, कनाडा और अमरीका के वैज्ञानिको का एक दल इस समस्या के समाधान के लिए प्रयत्नशील था। सन् 1944 तक उन्हें ने इस दिशा में जो प्रगति की उससे यह पता चल गया कि निकट भविष्य मे परमाणु बम का निर्माण समव हो जाएगा। इससे पूर्व जो कुछ बताया जा चुका है उससे यह अनुमान लगाना कठिन नही कि यह कार्य कसे सभव हुआ होगा। अगर हमारे पास रे- नियम 235 का एक टुक्डा हो तो केवल उस दुकडे- का आकार ही इस बात का निणय करता है कि शृखला अभिक्रिया और न्यूट्रॉनो का मोचन जो पहले ही प्रारम्भ हो चुका है वह तीव्र होगा या नहीं। यदि यह टुक्डा एक विशिष्ट आवार से छोटा हो (यह जानकारी आज भी रहस्य ही है) तो अधिकाश न्यूट्रॉन वा मे चले जाएंगे और धीरे-धीरे यूरे- 28 नियम भी विलीन हो जाएगा। परन्तु यदि यह टुकडा उस खास परिमाण से बडा होगा तो न्यूट्रॉन इसी मे रके रहेगे और शृखला अभिक्रिया क्रमश अधिकाधिक तेज होती जाएगी और एक सैकिंड या उससे भी कम समय मे यह विस्फोट बन जाएगा। यही परमाणु बम का तथाकथित रहस्य है। सन् 1945 मे ऐसे ही दो परमाणु वम जापान के दो शहरो पर गिराए गए थे जिसने जापान को शाति वार्ता के लिए मजबूर कर दिया । यह कोई बहुत पेचीदा रहस्य न था । वस्तुत यह इजीनियरी की समस्या थी कि इस बम को कैसे बनाया जाए। एक पयूज़ की सहायता से यूरेनियम 235 के दो टुकडो को (ये दोनो टुकडे इतने छोटे होते हैं कि उनसे खतरे की कोई प्राशका नही होती) परस्पर मिलाकर यूरेनियम 235 का एक बडा टुकडा बना दिया जाता है जो खतरे के स्थल से ऊपर चला जाता है । वस परमाणु बम का यही रहस्य है। सन् 1945 मे द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद कुछ ही वर्षों में अधिकाश बडे-बडे राष्ट्रो ने इसका अपने-अपने ढग से विकास कर लिया। लेकिन यह समझना भी एक भूल होगी कि कोई भी विज्ञान मे रुचि रखने वाला लडका या लड़की अपने घर के आंगन मे इस कार्य को कर सकता है । इसे बनाने की प्रक्रिया बहुत लम्बी, पेचीदा और खर्चीली है । उदाहरण के तौर पर विभिन्न प्रकारो के यूरेनियम में से यूरेनियम 235 को अलग करना बहुत कठिन काम है । लेकिन स्मरण रहे कि अगर किसी भी देश के वैज्ञानिको को इसके लिए पर्याप्त धन और समय दिया जाए तो वे इस कार्य को बखूबी कर सकते हैं । इस समय तक अधिकाश लोग परमाणु बम के विस्फोट से उठने वाले कुकरमुता की तरह के बादलो से भलीभाति परिचित हो चुके हैं। 1945 के बाद से दिभिन एकात स्थलो मे परमाणु वमो के परीक्षण किये जा चुके हैं। ये परीक्षण अमरीकी सरकार द्वारा प्रशात महासागर मे स्थित बिक्निी द्वीप के पास, ब्रिटिग सरकार द्वारा आस्ट्रेलिया के रेगिस्तान मे और रूस सरकार द्वारा साइवेरिया के उजाड प्रदेश मे दिए गए । सभी शातिप्रिय देशो की सरकारें परमाणु बमो के परीक्षणों 29
IWAN
प्रादि पर प्रतिवन्ध लगाने के पक्ष में हैं । अगर परमाणु ऊर्जा के इस
विनाशकारी उपयोग पर नियत्रण न लगाया गया तो इस बात का
भयकर खतरा है कि परमाणु का दुरुपयोग करके मानव फिर से कहीं
वर्षरता के प्रधकारपूर्ण युग मे न लौट आए।
साथ ही, यह भी न समझे कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल
परमाणु बम के निर्माण के लिए ही हो सकता है। इसका अनेक
रचनात्मक कार्यो के लिए भी उपयोग हो सकता है जिसका वणन आगे
चलबर दिया जाएगा।
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परमाणु से ऊर्जा उत्पादन की विधि अव परमाणु यदि परमाणु का मानव कल्याण के लिए प्रयोग करना हो तो निश्चय ही पहले परमाणु मे ऊर्जा का सचित होना आवश्यक है जिसे किसी न किसी प्रकार उन्मोचित किया जा सके । मनुष्य चाहे जिस किसी भी तरीके से मशीन का उपयोग करे, प्रथम आवश्यकता इस बात की है कि किसी प्रकार कामा पैदा की जाए जिसका मशीनो को चलाने के लिए प्रयोग किया जा सके। मूलत अब हमारे सामने एकमात्र समस्या ऊष्मा को गति मे परिवर्तन करने की रह जाती है। से यह कार्य किस प्रकार कराया जाए। प्रारम्भ मे ही हमे यह समझ लेना चाहिए कि इन सभी परिवतनो मे ऊप्मा उत्पन्न होती है चाहे वे परमाणु से एक इलेक्ट्रॉन निकलने जैसे सरल परिवर्तन हो अथवा परमाणु बम की तरह की शृखला अभिक्रियायें, परमाणु बम से वास्तव मे इतनी ऊपमा पैदा हुई थी कि मीलो दूर स्थित वस्तुय भी नष्ट हो गई । इतनी अधिक ऊष्मा मशीनें चलाने अथवा प्रय कोई उपयोगी कार्य करने के लिए व्यर्थ है। अगर परमाणु ऊर्जा का उपयोग इजनो को चलाने के लिए करना हो तो पहले इसे नियन्त्रित करना होगा। एक समय में इसकी थोडी मात्रा ही तैयार की जानी चाहिए क्योकि परमाणु विसडन की प्रक्रिया मे जो प्रावेशित कण निकलते हैं वे प्राणियो के जीवन के लिए हानि- कारक होते हैं । 1954 मे सयुक्त राज्य अमरीका की सरकार ने प्रशात महासागर मे एक बहुत अधिक शक्तिशाली परमाणु बम का विस्फोट किया था। बाद में पता चला कि इस परीक्षण स्थल से अनेक मील दूर समुद्र मे मछली पकडते हुए कुछ जापानी मछियारे इस विस्फोट के बाद माकारा से गिरने वाली रेडियोऐक्टिव धूलि के कारण बुरी तरह बीमार हो गए और उनमे से कुछ मर भी गए। उन्होने जो मछलियां पक्डी पी वे भी रेडियोऐक्टिव धूलि के प्रभाव से विपास्त हो गई थी। इसलिए इस बात की समुचित व्यवस्था कर लेना जरूरी है कि कोई भी विद्युत् सक्रिय कण बाहर न निकल पाए। यदि इसे रोकने का उपाय 31 और शृखला अभिनिया का नियमित किया जा सके प्रति इसे मर्यादा में रखकर विम्फोट न होने दिया जाए तो परमाणु मै सचित ऊर्जा का उपयोग सभव है। ऊर्जा के ऐसे बोनो को उद्योगो के लिए सुलभ बनाने के लिए ही सन् 1946 47 मे बक्शायर ये हार्वेल नामक स्थान पर प्रथम ब्रिटिश परमाणु-ऊर्जा-वेन्द्र स्थापित किया गया था। लाड रदरफोर्ड के एक योग्यतम सहायक सर जॉन कॉप ब्राफ्ट के हाथ मे इसका नियत्रण सौंपा गया था। इसी ममय लवागायर के रिमले नामक स्थान पर 1939-45 के युद्ध सामग्री के एक सफलतम प्रमुख सर विस्टोफर हिल्टन की देखरेख मे एक डिजाइन और इजीनियरी मुख्यालय की स्थापना की गई। इसके पश्चात् शीघ्र ही जनस्वास्थ्य की सुरक्षा को दृष्टि में रखते हुए एकान्त प्रदेशो मे कई अय कारखाने शुरू किए। इनया उद्देश्य प्रौद्योगिक उपयोगो के लिए परमाणु ऊर्जा का प्रयोग करने के तरीके ढूंढना था। कभी-कभी पत्रो में इस प्रकार के समाचार छपते हैं कि निकट भविष्य मे ही परमाणु-चालित कारो या जहाजो का प्रचलन हो जाएगा। अभी नो यह अमभव प्रतीत होता है, क्योकि कोई भी परमाणु-चालित गाडी चाहे वह स्थल पर चले या जल माग पर उसके यात्रियो की सुरक्षा तो आवश्यक है ही, परन्तु इसके अतिरिक्त चालक और कर्मीदल की भी परमाणु के विघटन के कारण पैदा होने वाले अत्यधिक तीक्ष्ण एव भयकर विकिरण से रक्षा के लिए, सवप्रथम उनमे बहुत मोटे और भारी आव- रणो की व्यवस्था होना आवश्यक है । कारो अथवा रेलगाडियो मे यात्रियो की मीटो के चारो ओर कई हड्रेडवेट की मोटी सीसे की चादरो के लगाने से निश्चय ही गाडियो की कायदक्षता अधिक नहीं हो सकती। फिर भी अमरीका ने परमाणु-चालित पनडुब्बी का निर्माण कर लिया है। इस प्रकार इजीनियरी की समस्यानो पर काबू पा लेना कोई ऐसी असभव बात नहीं है। परमाणु-चालित बिजलीघरो के सम्बध मे ऐसी कोई बड़ी बात नहीं है। ऐसे बिजलीघर इगलैण्ड के अलावा कई अय देशो में भी 32 स्थापित हो चुके हैं और सफलता से कार्य कर रहे हैं । इनमे परमाण- विक परिवर्तनो से उत्पन ऊष्मा को वद्युत् ऊर्जा में परिवर्तित कर लिया जाता है । यह वही वैद्युत् ऊर्जा है जिसे हम अपने सामान्य बिजलीघरो मे कोयला जलाकर या टर्वाइन चला कर प्राप्त करते हैं। ग्रिटेन का पहला पूर्णतया परमाणु ऊर्जा से चालित विजली घर कवरलैण्ड के काल्डर- हॉल नामक स्थान पर है (इसकी स्थापना 1956 मे हुई थी), दूसरा बिजलीघर जो पहिले बिजलीघर से बहुत बड़ा है स्कॉटलण्ड चपल- वास स्थान पर कार्य कर रहा है। इसके अलावा भी कई बिजलीघर हैं जो या तो विजली का उत्पादन कर रहे हैं या अभी उन्हे लगाने की योजना है। परमाणु भट्टी (Atomic Dile) परमाणु ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए जिस युक्ति का उपयोग किया जाता है उसे 'परमाणु भट्टी' (atomic pile) कहते हैं । नीचे दिए पालेख से इसकी बनावट के बारे मे कुछ पता चल सकता है। इसमे ग्रेफाइट के रूप मे सैकडो टन कावन की सिलें वाम मे पाती हैं। (यह वही पदाथ है जिससे पेंसिल का सिक्का बनता है)। ग्रेफाइट की इन सिलो के बीच मे झिरियां होती हैं जिनमे यूरेनियम की छडे रखी होती हैं, ये छडे शुद्ध यूरेनियम या यूरेनियम के यौगिक की होती हैं। इसके हानिकर विकिरण के किसी भी प्रश को बाहर जाने से रोकने के लिए चारो ओर कक्रीट की एक कई फुट मोटी दीवार होती है । परमाणु भट्टी का आकार इस बात पर निर्भर करता है कि यूरेनियम की कितनी मात्रा का उसमे उपयोग किया जाएगा। ग्रेफाइट की सिलें यूरेनियम को छोटे-छोटे भागो मे पृथक् किए रहती हैं । इसमे मोचित न्यूट्रॉन ग्रेफाइट को काफी अन्दर तक वेध देते हैं। लेकिन इनमे से अधिकाश अन्तत निष्क्रिय और हानिरहित हो जाते हैं। थोडे से । 33
मोटोकरीट की दीवार
उडा पानी
परेनियम
गरम पानी
न्यूट्रॉन
TRITIOFIPRITIHAR
रेडियोऐक्टियः पेरिलियम
MINITIATIHIND
परमाणु भट्टो का सरलतम रूप
न्यूट्रॉन ऐसे भी होते हैं जो ग्रेफाइट में से होकर पार निकल जाते हैं
जिन्हें कनोट की मोटी दीवार अवशोषित कर लेती है जो परिरक्षक का
कार्य करती है। जिन न्यूट्रॉनो को ग्रेफाइड या कक्रीट की परिरक्षक दीवार
अवशोषित कर लेती है वे न तो परमाणु भट्टी के काय मे सहायक होते
हैं और न ही शृखला अभिक्रिया मे ही और अधिक भाग लेते हैं ।
अगर इस काय के दौरान बहुत अधिक यूटान बच निकलें तो
शृखला अभिक्रिया मद हो जाएगी। वस्तुत एक यूनतम प्रकार से कम
प्राकार होने पर परमाणु भट्टी बिलकुल काम नहीं करती। प्रयोग द्वारा
ही यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-सा प्रावार सबसे सुविधापूर्ण
एव सतोपजनक है। हार्वेल मे सर जान कॉकक्राफ्ट तथा उसके सहकर्मियो
को परमाणु भट्टी के लिए उपयुक्त प्राकार का पता लगाने के लिए
34
सुरक्षा छ, निवप्रक यूरेनियम को छ एक परमाणु भट्टी सबप्रयम कुछ छोटी-छोटी प्रयोगात्मक परमाणु भट्टियाँ बनानी पड़ी थी। परमाणु भट्टी में प्रतिक्रिया की वास्तविक गति का नियन्त्रण मामा यतया बोरोन या केडमियम की सुरक्षा छडो को अदर प्रविष्ट कराकर किया जाता है, ये दोनो तत्त्व न्यूट्रॉनो को वडी अच्छी तरह अव- शोपित कर लेते हैं । यदि परमाणु भट्टी बहुत जल्दी गरम हो जाती हो तो और अधिक सुरक्षा छडो को अन्दर प्रविष्ट कराके इसे ठण्डा क्यिा जा सकता है । अगर शृखला अभिक्रिया बहुत मदगति से हो रही हो, तो कुछ सुरक्षा छडो को बाहर निकाल कर इसे तीव्र किया जा सकता है । परमाणु भट्टी की सारी की सारी प्रक्रिया का सामान्य प्रौद्योगिक सय गो-जैसे गैस घर या गैस सयत्र-की तरह ही अच्छी प्रकार नियत्रित किया जा सकता है। इसमे मदेह नही कि परमाणु भट्टी र 35 निकलने वाली रेडियोऐक्टिवता के समावित खतरे से बचाव के लिए अपेक्षाकृत अधिक सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है । बस इसके अलावा परमाणु भट्टी को नियन्त्रित करने मे ऐसे कारखानो की अपेक्षा कुछ अधिक कठिनाई नहीं होती जिसमे काम करते-करते लोगो को बीसियो साल हो चुके हैं। परमाणु भट्टी की कार्य पद्धति इस बात का उल्लेख किया जा चुका है कि यूरेनियम-विखडन की प्रक्रिया से प्राप्त ऊष्मा का ही परमाणु बिजलीघरों में उपयोग किया जाता है । यहां सरलता के लिए यूरेनियम के विखहन के बारे में ही चर्चा की जाएगी यद्यपि हाल मे तथा कवरलैण्ड में सेलाफील्ड्स के पास स्थित विंडस्केल के विदिश परमाणु बिजलीघर मे यूरेनियम की जगह कुछ अय पदार्थों का भी उपयोग किया गया है। यद्यपि परमाणु भट्टी मे पूर्व वणित विधियों से ताप पर नियन्त्रण पाया जा सकता है लेकिन इस गरे मे एक समस्या यह पैदा होती है कि परमाणु भट्टी मे से ऊप्मा को प्राप्त करना आसान नहीं होता। यदि कोयले को जलाकर आग पैदा की जाए तो यह समस्या सामने नहीं माती, क्योकि जहा भी ऊप्मा की आवश्यक्ता हो वहाँ ऊपमा पैदा की जा सकती है चाहे उसकी आवश्यकता भट्टी में हो या बॉयलर के नीचे । लेकिन ऐसी व्यवस्था परमाणु भट्टी के द्वारा समव नही है क्योकि उममे से निकलने वाले इलेक्ट्रानो या अय रेडियोऐक्टिव पणो से बचाव के लिए विशेष व्यवस्था की आवश्यकता होती है। इसलिए परमाणु भट्टी मे से ऊपमा पाप्त करने के लिए नीचे दी हुई विपि काम में लाई जाती है। इसमें पानी या किसी रासायनिक दृष्टि से निनिय गंस-जैसे नाइट्रोजन को पम्प कर दिया जाता है और फिर इसे पम्प पर बाहर निकाल लेते हैं। पानी या गंग परमाणु भट्टी जलाकर 36 के अन्दर ही ऊष्मा का अवशोषण कर लेते हैं (हालांकि यह जरूरी नहीं है कि ये यूरेनियम या अन्य रेडियोऐक्टिव पदार्थ के वास्तविक सपर्क मे पाएँ ही) और जब इन्हे फिर भट्टी में से पम्प करके बाहर निकाला जाता है तो या तो ये काफी ऊँचे तापमान पर होते हैं या इनकी भाप बन चुकी होती है । अव बॉयलरो को गर्म करने या जिन कारसानो में शक्ति की आवश्यकता होती है उनमे अय कार्या के लिए इसका उपयोग हो सकता है। सामान्य परमाणु सयन का सिद्धान्त यूरेनियम परमाणु भट्टी मुख्य तार या सचायी पैटरी को साइनमो वास्प टर्बाइन, भाय समस्थानिक (Isotopes) आपको स्मरण होगा कि यूरेनियम के कई रूप मिलते हैं जिहे साधा- रणत यूरेनियम 235, 236 आदि नामो से पुकारते हैं । इस तथ्य की ओर कि तत्त्व का एक से अधिक रूपो मे अस्तित्व हो सकता है जिनमे रासायनिक दृष्टि से भेद नहीं किया जा सकता, लेकिन जिनका परमाणु भार अलग- अलग होता है पहले ध्यान नही दिया गया था। पहले-पहल जब परमाणु भारो को परिकलित किया गया तो तत्त्वो की सूची में सबसे हलके तत्त्व हाइड्रोजन मे लेकर सबसे भारी तत्त्व यूरेनियम तक में यह देखा गया कि उनमे से अनेक तत्वो के परमाणु भार पूण संख्या मे नही थे । प्राय सभी मारी तत्त्व जिनके परमाणु भार भी अधिक थे रेडियोऐक्टिव रूपी 37
क्लोरीन के दो रुप
17
प्रोटॉन
18
न्यूदान
17
प्रोटॉन
क्लोरीन 35
20
प्रदान
श्लोरीन 37
मे मिल गए थे। लेकिन क्लोरीन गैस (जिसका परमाणु भार 351 है)
जैसे हलके तत्व रेडियोऐटिव रूप मे नही मिले इसलिए यह मान लिया
गया है कि ये स्थायी निश्चित परमाणु हैं जिन्हे साधारण रीति से तोडा
नही जा सकता।
जैसे ही गर पात स्पष्ट हो गई सभी परमाणु प्रोटॉनो,
यू (INTIT भार शात है) और इलेक्ट्रॉनो (जो निश्चय ही बहुत
होतेर) से यो होते हैं । यह बात बडी मनोखी प्रतीत हुई कि
पूर्ण संभो पारो परमाणु भार कैसे हो सकते हैं। विसी प्रोटॉन या
मुसाको भाषा ही किया जा सकता तो यह पसे सभव है कि
मसोम मा परमाणु भार 351 हो
इस रहस्ग गा पीप ही स्पष्टीकरण हो गया । क्लोरीन के दो
हादसा एप या परमाणु भार 37 है और दूसरे का 351
मेयोगोहीम्पमतोरी में प्रत्येक प्राकृतिक नमूने मे मिले हुए हाते हैं
पौर को मिलोमा भपात युछ इस प्रगर होता है रि उममे हलकी
पसोरी ये सी भाग मोर भारी फ्लोरीन या एक भाग हाता है इस
.
38
प्रकार इस मिश्रित क्लोरीन का परमाणु भार 357 प्राता है । आप एक बात स्पष्टतया समझ ले कि इन समस्थानिको (यह नाम एक ही पदाथ के भिन्न-भिन्न परमाणु भारवाले परमाणुओ को दिया गया है) मे और कोई अन्तर नहीं होता। उनके यौगिक भी वही होते हैं और रसायनन के लिए वे बिलकुल एक समान होते हैं । क्योकि परमाणु के रासायनिक गुणो को उन इलेक्ट्रॉनो की सरया और रचना निर्धारित करती है जो इनेक्ट्रॉन के द्रीय नाभिक के चारो भोर चक्कर लगाते हैं । समस्थानिको मे अन्तर वस्तुत नाभिक का ही अन्तर है। सामा यत एक या उससे अधिक न्यूट्रॉनो को उपस्थिति या प्रभाव जो नाभिक के विद्युत् आवेश को नही बदलता और इसलिए इसका चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉनो की संख्या पर भी कोई प्रभाव नही पडता । नाभिक पर धनात्मक विद्युतावेश के द्वारा इलेक्ट्रॉनो की संख्या निर्धारित होती है और परमाणु स्वय मे विद्युत् उदासीन होते हैं । परमाणु भट्टी का दूसरा सबसे महत्त्वपूर्ण उपयोग इन समस्था- निको का उत्पादन है । यदि किसी रेडियोऐक्टिवताहीन पदार्थ (nonradio active) जैसे कोबाल्ट धातु-के कुछ परमाणु, परमाणु भट्टी मे रख दिए जाएं और उन्हे यूट्रॉन उत्सर्जित करने वाले यूरेनियम के सपर्क मे लाया जाए तो कुछ गतिमान न्युट्रॉन कोबाल्ट के परमाणुप्रो मे प्रविष्ट हो जाएंगे। कुछ न्यूट्रॉन इसके साथ चिपट जाएंगे और कोबाल्ट का समस्थानिक बनाएंगे जिसका परमाणु भार प्रकृति मे मिलने वाले सामा य कोबाल्ट से भिन होगा। कुछ अय तत्त्वो के नमूने को परमाणु भट्टी में रखने का भी परिणाम यह होगा कि वह एक ऐसा नमूना उत्पन्न करेगा जो स्वय मे रेडियोऐक्टिव होगा। इसमे और प्रकृति मे मिलने वाले रूप मे कोई रासायनिक भिन्नता नही पाई जाएगी, लेकिन यह कुछ-कुछ समय के अन्तर से प्रोटॉन, न्यूट्रॉन या इलेक्ट्रॉन विसर्जित करेगा। 39 चिकित्सा के लिए परमाणु का उपयोग परमाणु भट्टी से प्राप्त इन समस्थानिको का एक अप्रत्याशित उपयोग चिकित्सा के क्षेत्र मे है । वीसवी सदी के प्रारम्भ मे इस बात का ज्ञान हो गया था कि रेडियम के प्रयोग से कसर (जो ऐसी बीमारी है जिसके कारण मानव-शरीर की कुछ कोशिकाएं बहुत तेजी से बढ़ने लगती हैं) का इलाज किया जा सकता है या उसको बढ़ने से रोका जा सकता है। अस्पतालो मे ऐसी खोखली एव छोटी सुइयां इस्तेमाल की जाती थी जिनमे रेडियग या रेडॉन होता था। इन सुझ्यो को रोगी के कैसर अस्त भाग में प्रविष्ट करा दिया जाता था जिसके प्रभाव से कोशिकागो की अवाछित वृद्धि या तो मन्द पड जाती थी या पूर्णतया रुक जाती थी। इसे रेडियम चिकित्सक नाम दिया गया जो कैसर मे कोशिकाओ की प्रवाछित वृदि को रोकने के कुछ ही सफल तरीको मे से एक है। लेकिन इसका तभी सफलता से प्रयोग किया जा सकता था जब कि कैसर शरीर की ऊपरी सतह के समीप ही हो, लेकिन इन सुइयो का निगर या फेफडो मै अथवा किसी अन्य अदरुनी भाग पर प्रयोग करना सभव नहीं था। फिर भी कुछ तत्त्व ऐसे भी हैं जो शरीर के किसी विशिष्ट प्रग में पहुंचते हैं । अगर किसी ऐसे पदार्थों को जिसमे ये तत्त्व ही खा लिया जाए या सुई लगाकर रुधिर प्रवाह मे प्रविष्ट करा दिया जाए तो वह शरीर के उस विशिष्ट भाग मे चला जाएगा और वहाँ रुक जाएगा। यदि उस पदार्थ के परमाणुप्रो को परमाणु भट्टी मे रखकर रेडियोऐक्टिव बना लिया जाए तो वे उस अग मे रेडियोऐक्टिव कणो को प्रविष्ट करा देंगे और अब तो लगभग सभी तत्वो को रेडियोऐक्टिव रूपों मे बनाना भी सभव ही गया है । अत यूरेनियम भट्टी चिकित्सा के क्षेत्र मे सभवत ऐसी काति ला देगी जिसके द्वारा इस अत्यन्त रहस्यपूण एव खतरनाक बीमारी का इलाज भी सभव हो जाएगा। निश्चय ही आज से पचास वर्ष इव जब अनुसधान कर्तामो ने परमाणु की सरचनामो के बारे मे खोज शुरू की थी तो उन्होंने इस बात की फल्पना भी न की होगी। 40 - चिकित्सा अनुसंधान मे समस्थानिगो का एक और तरह से भी प्रयोग हो सकता है। अनेक ऐसे पदाथ है जो किसी न किसी रूप मे मानव गरीर के लिए उपगेगी है । इसका एक उदाहरण नमक है, जिसकी सभी मनुष्यो और बहुत-से प्राणियो को बहुत थोडी मात्रा में आवश्यकता होती है । जब हम साद्य पदार्थ म नमक डालकर खाते हैं तो हम सभवत भोजन को स्वादिष्ट बनाने के लिए ऐसा करते हैं। इसमे सदेह नही कि इससे भोजन स्वादिष्ट हो जाता है, लेकिन हमारी पाचनक्रिया को ठीक बनाए रखने के लिए इसकी आवश्यकता होती ही है। रसायन में नमक को मोडियम क्लोगइड कहते हैं । यह सोडियम धातु और क्लोरीन गैस का यौगिक है। यदि सोडियम के एक रेडियोऐक्टिव समस्थानिक का प्रयोग करे और इसके कुछ भाग का नमक बना लें तो एक विद्युत् यन्त्र द्वारा शरीर मे सोडियम की गतिविधियो को देखा जा सकता है । 1947 मे दो अमरीकी रसायनज्ञो ने इसी तरह से मनुष्य की पाचनक्रिया सम्बन्धी समस्याओ का अध्ययन किया, इस प्रकार सभवत कुछ समय मे मनुष्य के शरीर को क्रिया प्रणाली से सम्बन्धित अनेक रहस्यो का भी पता चल सके । इसका यहाँ एक उदाहरण और दिया जा रहा है । एक अमरीकी विश्वविद्यालय के मेडिकल स्कूल ने रेडियोऐक्डिव लोह की बहुत थोडी- सी मात्रा लेकर अनुसधान काय किया। आपको मालूम ही होगा कि लोह स्वस्थ मानव के रुधिर का एक अत्यावश्यक प्रश है। रक्त दूषित होने का एक प्रकार रक्तक्षीणता (anaemia) की बीमारी हो जाना है जिसका कारण बहुत समय से रक्त मे लोहे की कमी हो जाना माना जाता रहा है । यह सभव है कि थोडे ही समय मे रेडियोऐक्टिव लोह के प्रयोग द्वारा रक्तक्षीणता का पूणरूप से इलाज किया जा सके । इन रेडियोऐक्टिव तत्त्वो की बहुत थोडी मात्रा ही मानव-शरीर में भेजी जाती है अयथा रेडियोऐक्टिवता शरीर के लिए हानिकारक भी हो सकती है। लेकिन गाइगर गणित्र (देखिए पृष्ठ 53) जैसे सुग्राही विकिरणमापी उपकरण के द्वारा विकिरण की बहुत कम मात्रा का भी पता लगाया जा सकता है और यह भी मालूम किया जा सकता है कि यह 41 विकिरण गगैरपिग भाग मे पा रहा है। इन्हें कभी भी रडियालेस्टिन अनुज्ञापय (tracer) कहते हैं । चिरमा अनुगधान मे अनुशापयो TT प्रयोग बहुन अधिक वटा जा रहा है । प्रारम्भ म अनुजापर अमरीका से मगाए जाते थे क्योरि विटन की ग्राक्षा अमरीका न विभिन्न प्रकार मी परमाणु भट्टिया रा बहुन ती स विनाम किया। जिन ग्रट प्रिटेन ये हाल तथा अन्य परमाणु ऊर्जा वहा ने जवम उत्पादन शुरु किया तब से ऐसे पदाथ चिरिन्गा अनुसधान के लिग अधिकाधिर मुलभ हान जा रहा है। उन अनुसधाना के द्वारा पौधो की समस्याग्रो को हल करने का भी प्रयत्न हो सकता है। प्राकृतिक रवड मे, जो कि पेड के ग्म से प्राप्त होती है, गधा मिला होता है। रबड के लचीलेपन को बनाने में जिसके कारण रबड की मांग है गधव का तिना योग होता है यह अभी तक गाचूम नहीं हा मना है। इस समस्या यो सम्भवन रेडियोऐक्टिव गधर की महायता स ज दी ही रन पिया जा सके जत्र वज्ञानिक रोमी वृत्रिम रबड भी बना मगे जा हूबहू प्राकृतिक रबड की तरह वो हो। - नए तत्व (New Elements) इस पुस्तक व प्रारम्भ म इस बात का उत्लेख किया जा चुका है कि सबमे हवे तत्त्व हाइड्रोजन से लेकर सबमे भारी तत्त्व यूरेनियम तक प्रकृति मे 92 तत्त्व मिलते हैं। परमाणु ऊर्जा के अनुसधान के फलस्वरूप एक अप्रत्यापित बात यह हुई है कि नए नत्त्वो का निमाण हुअा। ये तत्त्व ऐसे नही हैं जो पृथ्वी पर उपल ध तो हो, लेकिन कम मात्रा में मिलने के कारण दिपाई न पडे हो । ये पूर्णतया नए तत्व हैं, जिनके बारे म कुछ ज्ञात नहाँ था, क्योकि उनका पृथ्वी पर अस्तित्व ही नही था। यदि किसी परमाणु में से एक प्रोटॉन निकाल कर उस परमाणु 42 का अपेक्षाकृत सरल नत्व का परमाणु बनाना सम्भव है तो क्मिी परमाणु में एक और प्रोटॉन मिला कर परमाणु को अधिक जटिन तत्त्व का परमाणु भी बनाना मम्भव होना चाहिए । यह प्रक्रिया प्रामान नहीं है, लेकिन ऐसा वरना मम्भव है और क्यिा भी गया है। इनमे से प्रथम तथाकथित परायूरेनियम तत्त्व (अर्थात् यूरेनियम के बाद के तत्त्व) का निर्माण 1940 मे मैकमिलन और एवलमन नामक दा अमरीकी वानिको ने किया था। इसका नाम 'नेपच्यूनियम रखा गया। इसके बाद तत्त्वो की सूची में 94 वे तत्त्व प्लटोनियम का शिकागो में निमाण हुआ । यह तत्त्व यूरेनियम से भी अधिव रेडियाऐक्टिव हे पोर कुछ परमाणु भट्टियो मे इसका भी प्रयोग किया गया है। इसके बाद अन्य अनेव तत्त्व भी बनाए गए हैं इनमे से दो तत्त्व अमेरीक्यिम (यह नामकरण इम बानको सूचित करने के लिए रखा गया कि ऐसे अनेक तत्त्वो का सृजन अमरीको वैज्ञानिको की प्रतिभा से हुआ है) और क्यूरियम (इमका नाम पियरे क्यूरी और मरी क्यूरी के नाम पर रखा गया है) हैं । इममे सदेह नहीं कि भविष्य में और भी ऐसे तत्व बनाए जाएंगे यद्यपि ऐमा प्रतीत होता है कि उच्च परमाणुभार वाले तत्त्व कम स्थायी होगे और उनको बनाना और भी अधिक कठिन होगा। इनको सश्या सौ तक तो/पहुँच चुकी है । और 101वां तत्त्व पहचाना जा चुका है। इन नए तत्त्वो की अभी तक कोई विशेप व्यावहारिक उपयोगिता नहीं है (प्लूटोनियम को इसका अपवाद कहा जा सकता है )। लेकिन विज्ञान की अधिकाश शाखाप्रो मे यह नहीं कहा जा सकता कि कब किसी बिलकुल ही सामा य-सी वस्तु की कोई ऐमी अप्रत्याशित उपयोगिता सामने आ जाएगी जिसकी विसी को स्वप्न मे भी आशा न होगी। इन तत्वो के निर्माण का कम से कम इतना महत्त्व तो है ही कि मनुप्य अपनी प्रयोगशालामो मे ऐसे नवीन पदार्थों का निर्माण सफलतापूर्वक वर सक्ता है जिनको यदि वैज्ञानिक नही बनाते तो उनका कभी भी अस्तित्व ही न होता। 43
हाइड्रोजन वम
पिछले बुध पृष्ठो म जो चुन लिया गया है उसमे यह तो स्पष्ट
हो ही जाता है कि परगाणु ऊर्जा का उपयाग पूर्णतया या मुख्यतया भी
विनाशात्मक उद्देश्या तर ही मीमित नहीं है चाह इस बारे में सनसनी
फैलाने वाले समाचारपनो या युद्ध भी मत क्यो न हो । यदि परमाणु
का सही ढग से उपयोग किया जाए तो इसका कई प्रकार से मानवजाति
वे कल्याण के लिए उपयोग विया जा सकता है। यह हम नए और शक्ति
के समृद्ध स्रोत प्रदान कर सकता है । यह हमे शरीर को क्रिया प्रणाली
के बारे में नई अन्तट प्टि प्रदान करके घातक और रहस्यपूण रोगो के
इलाज की दिशा में महत्त्वपूर्ण योग दे सकता है।
क
स
हाइड्रोजन के समस्थानिक
क साधारण हाइड्रोजन
ख भारी हाइड्रोजी (डयूटेरियम)
ग ट्राइटियम
इलेक्ट्रॉन
न्यूट्रॉन
Q=प्रोटॉन
लेकिन लोगो का सबसे अधिक ध्यान परमाणु बम की ओर गया।
1953 और 1954 म समाचारपत्रो में एक नए वम की चर्चा भी चली
थी। इसे 'हाइड्रोजन बम' कहा जाता है। यह एक भिन्न प्रकार की
शृखला अभिक्रिया पर आधारित है, यह अभिक्रिया बहुत अधिक प्रचड
गति से होती है, एक बार शुरू होने पर इस क्रिया को रोकना सम्भव
नहीं होता, इससे बहुत ही भयकर विस्फोट होता है और बहुत अधिक
44
ऊष्मा पैदा होती है। इससे पूर्व (पृष्ठ 37 पर) जव समस्थानिको पर विचार किया गया था तो वहां हाइड्रोजन के समस्थानिक के बारे मे कुछ भी उरलेख नहीं किया गया। हाइड्रोजन सभी तत्त्वो से हलका तत्त्व है । इसकी रचना एक प्रोटॉन और एक इलेक्ट्रॉन से हुई है जिसमे इलेक्ट्रॉन प्रोटॉन के इद- गिद चक्कर लगाता है। यदि इसके नाभिक मे एक न्यूट्रॉन मिला दिया जाए तो इससे हाइड्रोजन के परमाणु मे रामायनिक दृष्टि से कोई परि- वतन नहीं होगा लेकिन इसका परमाणुभार दुगुना हो जाएगा । इसे 'भारी हाइड्रोजन' या 'ड्यूटेरिम' (deuterium) कहते हैं, और आवसीजन के साथ मिलकर इसका जो यौगिक बनता है उसे 'भारी पानी' (heavy water) कहते हैं इसके अलावा हाइड्रोजन का एक और भा समस्थानिक है जो दुलभ होता है, इसे 'ट्राइटियम' (tritium) कहते हैं और इसका परमाणुभार 3 होता है। यदि भारी हाइड्रोजन मे कुछ परिवतन हो तो इससे भयकर ऊप्मा पैदा होती है इससे इतनी ही मात्रा के यूरेनियम 235 से भी कही अधिक ऊर्जा निकलती है । अगर आपको याद हो वि यूरेनियम के एक परमाणु के बरावर भार प्राप्त करने के लिए भारी हाइड्रोजन के 117 परमाणुप्रो की जरूरत होता है और भारी हाइड्रोजन का प्रत्येक परमाणु एक न्यूट्रान मोचित कर सकता है तो पागे की सम्भावनामो का आप स्तय अनुमान कर सकते है । हाइड्रोजन बम का निर्माण इसी कल्पना के आधार पर हुआ। लेकिन इम बम के फ्यूज के रूप मे साधारण परमाणु वम या प्रयोग होता है। भागे हाइडोजन को हीलियम में परिवर्तित करने के लिए कम से बम लगभग 10 लाख डिग्री ताप की आवश्यकता होती है, इतना पृथ्वी पर ताप अधिक पैदा करने का एक ही तरीका है और वह है परमाणु बम के विस्फोट द्वारा। हाइड्रोजन बमो वे परीक्षा दिये जा चुरे हैं। 1954 मे ऐसे ही एक बम ने प्रशात महासागर मे रेडियोऐक्टिव धूलि विकोण कर दी थी। हाल ही के कुछ वर्षों में वैज्ञानिको ने हाड़ान से हीरियम मे परिवतन पा रचनात्मक कार्यों के लिए प्रयोग करने की कोशिश की है। जीटा 45 मगीन इमी दिशा में एा प्रयत्न है जिमवा 1958 मे हाल में परीक्षण दिया गया था। इस प्रयास में यद्यपि मफ्लना नहीं मिली थी लेकिन इस पारे म जग भी सदेह की गुजाइश ही है पिइम प्रयत्न म पभी न कभी मफनता अवश्य मिलेगी और फिर विन या अमीम योन सुलभ हो जाएगा । समुद्र के पानी मे भागे हाड्रोजन बहुत थोड अनुपात में होती है और यदि हम ममुद्र के पानी से ऊर्जा प्राप्त कर मव नो भविष्य म क्या कुछ हो जाएगा इमका अदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। शायद प्रापो यह प्रतीत हा यि पिउने दो तीन पाठो का विवरण कुछ निगगाजनर है। वास्तव में वैज्ञानिक और गजनीतिज्ञ दोनो ही इस बात पर सहमत हैं वि परमाणु ऊर्जा के विनावारी पक्ष पर नियंत्रण स्थापित होना चाहिये। वे न विनाशकारी नत्वो पर नियंत्रण स्थापित पग्ने मे कहाँ तर मफ्ल होते हैं मा बात पर विश्व वा विप्य निभर है। गाइगर गणित्र (Geiger Counter) इस गान की व पना करना कुछ कटिन प्रतीत होता है कि किम प्रकार कुछ (या एक ही) आवेशित वणो का पहचाना जा सकता है। फिर भी कभी-कभी यह जानना प्राव यर हो जाता है कि विमी द्रव्य मे थोडी-सी ही मात्रा मे कोई रेडियोऐक्टिव पदाय नो नहीं है। पाडी-सी भी मात्रा मे आवेशित कणा की उपस्थिति को मालूम करने के लिए जिम उपकरण का उपयोग होता है उसे 'गागर गणित्र (Geiger Counter) कहते हैं। इस उपकरण का यह नाम लॉट रदर- फोड के एक अन्य महायक है म गाइगर के नाम पर रखा गया है। इम उपकरण मे एक बेलनाकार कक्ष होता है (देविा आलेख) जिसम हवा या बाई अन्य गैस बहुत कम दाब पर भरी होती है इसके इलेक्ट्रोड (जिनमे एक पीतल की नली होती है और दूसग पतला नार जो वक्ष वे मध्य एक सिरे से मर मिरे तक जाता है) एक विश्लेपण धारामापी 46
मावेशित कण
-कांच वाला सिरा
मोम
पतला तार
मोम
कोच वाला,
सिरा
धातु इलेक्ट्रोड
विश्लेषण धारामापी
e
गाइगर गणित्र का सिद्धात
(Volta meter) से जुड़े हुए होते हैं। इसमे वोल्टता इतनी कम होती
है कि स्फुलिग गैस मे से होकर नही गुजर पाता। जव कोई प्रावेशित कण
कक्ष में प्रविष्ट होता है तो इसकी वोल्टता एकदम बड जाती है और
विलेपण-धारामापी इसे रिकाड कर लेता है।
शायद इसे बनाना कुछ जटिल प्रतीत हो, लेकिन इसका उपयोग
करना बहुत आसान है । इसके साथ यात्रिक गणन साधनो को (जैसे कि
डाकम्बानो मे टेलीफोन कॉलो की सख्या को अक्ति करने के लिए प्रयुक्त
गाइगर गणित्र (कार्य करते हुए)
प्रति मिनट गणन सल्पा
।
गणित
रेरियोऐक्टिव
स्रोत
47
होते हैं) भी सलग्न किया जा सकता है ताकि जब-जब विश्लेपण-धारामापी की सूई घूमे तब-तब एक अर अक्ति हो जाए। ग्रिज की कडिश प्रयोग- शाला मे एक मिनट म 10,000 कणो को अपित किया जा चुका है। विकरपत , परिपथ के बीच म लाउडस्पीकर भी लगाया जा सकता है। क्लिक की ध्वनि कणो के आने की सूचना देती है । ऐक्स-किरणे (X-Rays) परमाणु परिवतन TT U ऐमा पक्ष भी है जिमा अभी तक उत्लेयमार दिया गया है, लेकिन विज्ञान ी अनेक शाखामो मे इसके बहुत-से महत्त्वपूण उपयोग हैं। जब कोई रेडियोऐक्टिव पदाथ -उदाहरण के लिए रेडियम--विघटित होता है तो यह एक से अधिक प्रकार के कणी वो विसर्जित करता है । इनमे से कुछ पर विद्युत का धनावेश होता है और कुछ पर ऋणावेश। आपको याद होगा कि यह कुछ अत्यधिक तीक्ष्ण किरणे भी छोडता है । ये द्रव्य-कण नही अपितु किरणें या तरगें होती है जो प्रकाश की उन तरतो की ही तरह गति करती हैं जो आँस वे पश्च भाग मे स्थित सवेदी परत पर, जिसे डाक्टर रेटिना कहते हैं, पहुचने पर हमे विभिन वस्तुओं का बोध कराती हैं। ये किरणे वास्तव में प्रकाश तरगो के ही समान होती हैं, अतर केवल यही होता है कि इनका तरगदैध्य (Wne length) मिन होता है । एक तरग के शिखर से दूसरी तरग के शिखर तक की औसत दुरी माधारण दृश्य प्रकाश तरगो की दूरी से बहुत कम होती है । मनुष्य की अाखे तरग दैध्य के बहुत ही मीमित परास तक ही देख पाती है । बहुत कम तरंग दै य वाली तरगो को ऐवस-किरणे कहते हैं । ऐक्स-किरणो के विभिन स्रोत पाए गए हैं। इन्हे प्राप्त करने का एक स्रोत साधारण क्रुक्म नली मे से इलेक्ट्रॉनो का प्रवाह है । यह सभी अय स्रोतो से अधिक महत्त्वपूर्ण है क्योकि डापटरी काम मे इगी का प्रयोग स्क्रीनिंग स्टेर सुरक्षा पावरण सहित ऐक्स फिरण उपकरण (कार्य करते हुए) काउप स्टेड होता है । जब बुक्स नली मे इलेक्ट्रॉन निकलने वालेव इलेट्रोर के सामने वाले मिरे के इलेक्ट्रोड पर तेज प्रवाह वाले इलेक्ट्रॉनो को प्रहार करने दिया - जाता है तो इलेक्ट्रोड से ऐक्स-किरण पुज बाहर निकलता है। ऐवम-किरणो का तरग देय बदला जा सकता है। तरग देय के अनुसार पिरणा की वेधन-शविन भी बदलती रहती है । इनमे से जो सर्वाधिक तीक्ष्ण होती है वे 12 इंच मोटी धातु की प्लेट मे मे भी गुजर सकती हैं। चिकित्मा के क्षेत्र मे जिन ऐक्म-किरणो या प्रयोग होता है उनकी अपेक्षा ये बहुत अधिक तीक्ष्ण होती हैं । यस-किरणो का सवमे अधिक महत्त्व इस बात मे है कि उनका उपयोग मनुष्य शरीर की अवस्था की जाँच के लिए दिया जा सकता है अगर कोई बच्चा पिन निगल जाए तो उसके गले और पेट का ऐक्स- किरण फोटो लेकर यह पता चल सकता है कि पिन कहाँ है ? और फिर उमकी महायता से डॉक्टर ऑपरेशन करके इसे बाहर निकाल सकता है । पिछले कुछ वर्षों मे बडे पैमाने पर देश भर मे फेफडो की जांच के ऐक्म-रे फोटो लिा गए ताकि यह पता लग सके कि किसी व्यक्ति के तपदिक जैमी घातक बीमागे वे कारण या किसी गौर कारण से फेफडे रोगग्रस्त तो नहीं है और यदि ऐमी आगवा हो तो उनमा यथासमय इलाज किया जा मये । इम उदेश्य से यदि कोई व्यक्ति रोवम रे रवाना 49
diwale
112163
परमाणु ऊर्जा स्टेशन का एक दृश्य
रेडियोऐक्टिवता से रक्षा करती है। जब रेडियोऐक्टिव
के उन वस्तो मे से निकालना होता है जिनमे उसे बद कर
तो उस समय भी एक सरक्षी नकाब पहननी पड़ती है।'
में दिए हुए पालेरा से उन नए कारखानो के भावार, विस
में रामदासा लगाया जा सकता है जिनवा माजक्ल निती
जो भी व्यक्ति परमाणु के विकास के लिए काम
उसे इस पाप रे लिए विशेष प्रशिक्षण लेना होगा। इस
भी विश्वविद्यालय में पाया जा सश्ता है। इमरा पनि
पहले मॉनस से साप स्नातर परीक्षा पास करनी होग
संभयत पनिपत मपपि के लिए रिसी ऐमे प्राध्यापर
की देखरेग मे पाय परना होगा जो परमाणु सबपी
सपा में विपाता प्राप्त पर रहा हो।
मेर स्टेि मे ऐसी सभी नियुक्तियां गूनाइटेर
एगी मपॉरिटी द्वारा की जाती है जो ऐसी सभी ।
पर पामे सभीभारणानो परमपना निपारा
५
काउप स्टेड स्क्रीनिंग स्टेर सुरक्षा पावरण सहित ऐक्स किरण उपकरण (काय करते हुए) 1 होता है । जब उस नली में इलेक्ट्रॉन निकलने वाले इलेट्रोर के सामने वाले सिरे के इलेक्ट्रोड पर तेज प्रवाह वाते इलेक्ट्रॉनी को प्रहार करने दिया जाता है तो इलेक्ट्रोड से ऐवस-किरण पुज बाहर निकलता है । ऐवस-किरणो का नरग दै य बदला जा सकता है। तरग दैर्य के अनुसार किरणा की वेधन-शक्ति भी बदलती रहती है । इनमे से जो सर्वाधिक तीक्ष्ण होती है वे 12 इच मोटी धातु की प्लेट मे से भी गुजर सकती हैं। चिकित्सा के क्षेत्र मे जिन ऐक्म-किरणो का प्रयोग होता है उनकी अपेक्षा ये बहुत अधिक तीक्ष्ण होती हैं । वम-किरणो वा सवसे अधिक महत्त्व इस बात मे है कि उनका उपयोग मनुष्य शरीर की अवस्था की जाच के लिए किया जा सकता है । अगर कोई बच्चा पिन निगल जाए तो उसके गले और पेट का ऐक्स- विरण फोटो लेकर यह पता चल सकता है कि पिन कहा है ? और फिर महायता से डॉक्टर ऑपरेशन करके इसे बाहर निकाल सकता है । पिछने वछ वर्षों में बड़े पैमाने पदेश भर मे फेफडो की जाँच के गा तापि यह पता लग सके कि किसी व्यक्ति मारी के कारण या किसी यौर वारण से फेफडे दि ऐमी आशका हो तो उनका यथाममय से यदि कोई व्यक्ति एवम रे परवाना 49 होते हैं) भी सलग्न किया जा सकता है ताकि जब-जब विश्लेषण-धारामापी की सूई घुमे तव-तव एक अक अक्ति हो जाए। कैरिज की कवेडिश प्रयोग- शाला मे एक मिनट म 10,000 कणो को अक्ति किया जा चुका है। विकल्पत , परिपथ के बीच मे लाउडस्पीकर भी लगाया जा सकता है। क्लिक की ध्वनि कणो के आने की सूचना देती है। ऐक्स-किरणे (X-Rays) परमाणु परिवतन का एक ऐसा पक्ष भी है जिसका अभी तक उत्लेखमान किया गया है, लेकिन विज्ञान में अनेक शाखागो मे इसके बहुत-से महत्त्वपूर्ण उपयोग हैं। जब कोई रेडियोऐक्टिव पदाथ-उदाहरण के लिए रेडियम-विघटित होता है तो यह एक से अधिक प्रकार के कणा को विसर्जित करता है । इनमे से कुछ पर विद्युत का धनावेश होता है और कुछ पर ऋणावेश। आपको याद होगा कि यह कुछ अत्यधिक तीक्ष्ण किरण भी छोडता है । ये द्रव्य-कण नही अपितु किरणें या तरगे होती है जो प्रकाश को उन तरतो की ही तरह गति करती हैं जो आँख के पश्च भाग मे स्थित सवेदी परत पर, जिसे डाक्टर रेटिना कहते हैं, पहुचने पर हमे विभिन वस्तुओ का बोध कराती हैं। ये किरणे वास्तव मे प्रकाश तरगो वे ही ममान होती हैं, अतर वेवन यही होता है कि इनका तरगर्दध्य (Wave length) निन होता है। एक तरग के गिपर से दूसरी तरग के शिखर तक पी औसत दी माधारण दृश्य प्रकाश तरंगो की दूरी से बहुत कम होती है। मनुष्य की अखि तरंग दैध्य बहुत ही मीमित पगम तक ही देख पाती है । बहुत फम तरग दै य वाली तरगो को ऐवस पिरणे कहते हैं। ऐवम-विरणो के विभिन्न स्रोत पाए गा है। इहे प्राप्त करने या एक स्रोत माधारण युक्स नली मे से इलेक्टॉनो या प्रवाह है । यह सभी प्रय ग्योतो से अधिक महत्वपूर्ण है क्योकि टारटरी काम में इगी या प्रयोग 48 5 स्क्रीनिंग स्टेट सुरक्षा भायरण सहित ऐक्स फिरण उपकरण (कार्य करते हुए) पाउए स्टेड होता है । जर त्रुवम नली मे इलेक्ट्रॉन गिलने वालेय इलेट्रोट के सामने वाले सिरे ने इलेक्ट्रोड पर तेज प्रवाह वाले इलेक्ट्रॉनो को प्रहार करने दिया जाता है तो इलेक्ट्रोड से ऐक्स-किरण पुज वाहर निकलता है। ऐयस-किरणो का तरग दैय बदला जा सकता है। तरग दे य के अनुसार किरणा की वेधन-गविन भी बदलती रहती है। इनमे से जो सर्वाधिक तीक्ष्ण होती है वे 12 इच मोटी धातु की प्लेट मे से भी गुजर सकती हैं। चिकित्सा के क्षेत्र मे जिन ऐक्म-किरणो का प्रयोग होता है उनकी अपक्षा ये बहुत अधिक तीक्ष्ण होती हैं। गेक्स-किरणो वा सवसे अधिक महत्त्व इस बात मे है कि उनका उपयोग मनुष्य शरीर को अवस्था की जाच के लिए किया जा सकता है । अगर कोई बच्चा पिन निगल जाए तो उसके गले और पेट वा ऐक्स- किरण फोटो लेकर यह पता चल सकता है कि पिन कहा है ? और फिर उसकी महायता से डॉक्टर ऑपरेशन करके इसे बाहर निकाल सकता है । पिछले कुछ वर्षों में बड़े पैमाने प" देश भर मे फेफडो की जाच के ऐवस-रे फोटो लिए गए ताकि यह पता लग सके कि विमी व्यक्ति के तपेदिक जमी घातक बीमारी के कारण या किसी और कारण से फेफडे रोगग्रस्त तो नहीं है और यदि ऐमी आशका हो ना उना यथासमय इलाज किया जा मनै । इस उद्देश्य से यदि काई व्यक्ति ऐचम रे व वाना . 49 ऐक्स किरण उपकरण चाहे तो वह निश्शु क कग सकता है । धातुप्रो की बनावट का अध्ययन करने के लिए भी ऐक्स-किरणो का प्रयोग किया जाता है । ढलाई के सामान को उपयोग मे लाने से पूर्व उस मे यदि ढलाई के कोई दोष हो तो उहे भी मालूम किया जा सकता है। इन का निम्टलो की बनावट को ममझने के लिए भी उपयोग किया गया है जिससे यह पता चला है कि किमी पिस्टलीय पदाथ मे परमाणु जिम प्रकार विन्यस्त होते हैं उहे बताने वाले पारेख जैसे कि पृष्ठ 2 के पारेख विस्टलो की बनावट ठीक-ठीक दर्शाते हैं। 50 परमाणु ऊर्जा का भावी रूप इस प्रकार हम देखते हैं कि परमाणु ऊर्जा का उपयोग केवल बिनाश के लिए ही नहीं होता। यह सभव है कि यदि हाइड्रोजन बम का प्रयोग किया गया तो सभ्य जगत् का विनाश हो जाए, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वैज्ञानिको और राजनीतिज्ञो को अन्तत इसके प्रयोग को रोकने के लिए कुछ न कुछ अवश्य करना पडेगा क्योकि जिन्हे सिविल रक्षा के उपाय कहा जाता है वे वास्तव मे परमाणु आक्रमण के प्रभाव को कुछ कम करने का प्रयत्नमात्र हैं। अगर कभी परमाणु युद्ध छिड ही जाए तो ये उपाय न तो पूर्णतया प्रभावशाली सिद्ध हो सकते हैं और न ही ये किंचित भी सतोषपूर्ण ढंग से व्यापक सहार को ही रोक सकते हैं। एक अाधुनिक विशेषज्ञ ने तो यहां तक कहा है कि ग्रेट ब्रिटेन मे योग्य स्थलो पर डाले गये केवल पाठ हाइड्रोजन बम ही वहां के समस्त उद्योगो को समाप्त कर देने मे सफल होगे। यदि परमाणु सहार को गैर कानूनी घोषित कर दिया जाए तो जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है विश्व-कल्याण के लिए परमाणु के उपयोग की असख्य सभावनाएं हैं। अतीत मे कई निराशापूर्ण व्यक्तियों ने इस बात की सभावना की ओर ध्यान दिलाने का प्रयत्न किया था कि जब धरती के नीचे के सारे कोयले का उपयोग किया जा चुकेगा तो क्या होगा । कुछ ही समय पूर्व यही बात खनिज तेलो के भडार के बारे मे कही गई थी। इसमे जरा भी सदेह नही कि जितनी तेजी से खनिज तेलो का उपयोग किया जा रहा है उतनी तेजी से नए खनिज तेलो के क्षेत्रो की की खोज नहीं हो रही है। अब इस बात की सभावना दिखाई दे रही है कि पृथ्वी के सपूण कोयले और तेल के भडारो का उपयोग करने से पूर्व ही परमाणु भट्टी, जिसके द्वारा वडे-बडे विजलीघर चलाए जाने लगे हैं, मानव की ऊष्मा, प्रकाश और शक्ति की आवश्यक्तायो के स्रोत के रूप मे तेल के कमो और कोयले की खानो का स्थान ग्रहण कर लेगी । इसमें सदेह नहीं कि दुनिया मे यूरेनियम के स्रोत भी ऐसे नही हैं कि वे कमी समाप्त न हो, लेकिन फिर भी वे काफी प्रचुर हैं और इसके साथ ही साप । 51
ऐक्स किरण :
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चाहे तो वह निश्शुरक कग सकता है ।
धातुओ की बनावट का अध्ययन करने के लिए भी ।
का प्रयोग किया जाता है । ढलाई के सामान को उपयोग मे ल
मे यदि ढलाई के कोई दोष हो नो उहे भी मालूम किया जा
का विस्टलो की बनावट को समझने के लिए भी उपयोर
जिससे यह पता चला है कि क्मिी त्रिस्टलीय पदाथ मे पर
विन्यस्त होते हैं उहे बताने वाले पारेख जैसे कि
क्रिस्टलो की बनावट ठीक-ठोक दशति है।
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रेडियोऐक्टिव सामग्री का दूररथ नियत्रण अभी से परमाणु भट्टियो मे से प्रकृति में उपलब्ध होने वाले यूरेनियम के बजाए कृत्रिम रूप से निर्मित प्लूटोनियम का प्रयोग होने लगा है। यही बात अय देशो मे भी होगी। परमाणु बमो का निर्माण तो धन और समय की बरबादी है लेकिन परमाणु भट्टी मानव हित के लिए परमाणु प्रदान करती है और इसमे लगे धन के लाभ को अपेक्षाकृत कम समय मे ही अनुभव किया जाने लगेगा। हाल मे जीटा मशीन (देखिए पृष्ठ 52) के बारे मे किए गए परीक्षणो से भविष्य के बारे मे नवीन आशापो का मचार होता है। परमाणु उद्योग मे रोजगार यदि आप परमाणु उद्योग मे रोजगार चाहते हो अर्थात् हार्वेल, रिसले या विडम्केल में अधिक आक्षक पदो पर काम करना चाहते हो तो आपको किसी विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातक परीक्षा पास करनी होगी। इन सभी जगहो म अ य इजीनियरी मयत्रो के समान इजीनियरी नक्शानवीसो (डाफ्ट्समैन) तथा अय कामगरो के लिए भी काम की गुजाइश है । पृष्ठ 53-55 के चित्रो से सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि वहा कैसे काम होता है । जिन वम्सो मे रेडियोऐक्टिव अयसा (ore) आता है वे सीलनद होते हैं । इन वक्मो मे से अयस्क के निकालने में पर्याप्त सावधानी बरतना आवश्यक होता है। वस्तुत यहा प्रयुक्त होने वाली मामग्री के साथ प्र यक्ष रीति से मपक मे नही पा सकते, केवल उप- करणो की सहायता से ही इनका पयवेक्षण किया जाता है इत्यादि । इस प्रकार को सावधनियो को छोडकर ये रोजगार परमाणु ऊर्जा उद्योग के लिए कोई विशेप नहीं हैं । ये उसी प्रकार के काय हैं जिस प्रकार के विद्युत् उद्योग या सनन उद्योग महोते हैं। यहां जिन सामग्रियो से वान्ता पडता है उनमे से अनेक खतरनाक होती हैं। उन्हे तभी प्रयोग में ला सकते हैं जब उसका उपयोग करने वाला वर्मी मोटी दीवार के पीछे हो जो उसकी 52 रेडियोऐक्टिव सामग्री का दूरस्थ नियत्रण 11463 परमाणु ऊर्जा स्टेशन का एक दृश्य रेडियोऐक्टिवता से रक्षा करती है। जब रेडियोऐक्टिव सामग्री को धातु के उन बक्सो मे से निकालना होता है जिनमे उसे बद करके रखा जाता है तो उस समय भी एक सरक्षी नकाब पहननी पड़ती है। इस पुस्तर के प्रत में दिए हुए पालेख से उन नए कारखानो के आकार, विस्तार आदि के बारे में कुछ अदाजा लगाया जा सकता है जिनका आजकल निर्माण हो रहा है। जो भी व्यक्ति परमाणु के विकास के लिए काम करना चाहता है उसे इस काय के लिए विशेष प्रशिक्षण लेना होगा। इसका प्रशिक्षण किसी भी विश्वविद्यालय मे पाया जा सकता है। इसका अभिप्राय यह है कि उसे पहले ऑनस के साथ स्नातक परीक्षा पास करनी होगी और उसके बाद समवत कुछ नियत अवधि के लिए किसी ऐसे प्राध्यापक या स्टॉफ के सदस्य की देखरेख मे काय करना होगा जो परमाणु सबंधी समस्याओ के भनु- सपान मे विशेषज्ञता प्राप्त कर रहा हो। प्रेट ब्रिटेन में ऐसी सभी नियुक्तिया गूनाइटेड किंगडम ऐटॉमिक एनर्जी प्रभॉरिटी द्वारा की जाती हैं जो ऐसी सभी प्रायोजना पर काम करने वाले सभी कारखानो पर अपना नियत्रण रखती है। समाचारपत्रों 54 मे समय-समय पर पदो के लिए विज्ञापन निकलते हैं लेकिन इन स्थानो पर केवल प्रशिक्षण प्राप्त व्यक्ति ही चुने जाते हैं। ऐसे लोग जिनके पास पहले कोई योग्यता न हो उनके प्रशिक्षण की अभी कोई व्यवस्था नहीं है। इसका एकमात्र अपवाद ऐक्म-रे उद्योग है (जो इसो विषय को एक ऐमी शाखा है जिसमे अधिकाश साली स्थान होते हैं)। देशभर के अधिकाश बडे हस्पतालो मे ऐक्स-रे विभाग हैं। यह काम बडा आश्पक और लाभप्रद है, जो भी व्यक्ति इस कार्य मे रुचि रखता है उसे अपने निकटतम हस्पताल से सपर्क स्थापित करने की मलाह दी जाती है जहाँ से इम सबंध में प्रशिक्षण, वेतन तरक्की की सभावना आदि के बारे मे उसे सूचना मिल सकती है। यूनाइटेड किंगडम ऐटॉमिक एनर्जी अथॉरिटी का लदन स्थित कार्यालय 11 चाल्स II स्ट्रीट, लदन, एम डन्न्यू 1 मे है। रेडियोऐक्टिव पदार्थ के सीलबद यस को खोलना
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विहस्केल, कबरलैंड की परमाणु भट्टी
पुस्तक मे प्रयुक्त पारिभाषिक शब्द अणु (molecule)--तत्वो का सयोग । इलेक्ट्रॉन (electron)-वह छोटा कण जो सभी परमाणुप्रो मे पाया जाता है और जिस पर ऋण-विद्युत् प्रावेश होता है। इलेक्ट्रोड (electrode)-किमी ली या अन्य पान में प्रवेशित एमी प्लेट, छड या तार जो तार द्वारा विद्युत् स्रोत से पद हो । ऐक्स किरणे (X-rays )-रेडियो ऐक्टिव तत्वो द्वारा उत्मजित द्रव्य पर इलेक्ट्रॉनो के प्रहार के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कम तरग- देध्य वाली किरण। ऐल्फा कण (alpha particles)---अनेक रेडियो ऐक्टिव तत्वो से निकलने वाले हीलियम के आवेशित नाभिक । क्रिस्टल (crystal)-किसी नियत आकार के पदाथ का अग जिसके परमाणु विशेष क्रम और तरतीब मे विन्यस्त होते हैं । गाइगर गणिन (geiger counter )-किमी विशिष्ट स्थान आवेशित कणो को गणना करने का यत्र । तत्व (element)--एक ही प्रकार के द्रव्य से बना पदाय । नाभिक (nucleus)-परमाणु का केंद्रीय क्रोड । न्यूट्रॉन (neution)-परमाणुओ का वह घटक जिस पर किसी भी प्रकार का विद्युत् आवेश नहीं होता। परमाणु (atom)- --पदाथ का वह सबसे छोटा भाग जिसका अस्तित्व सभव है। परमाणु भट्टी (atomic pile)--रेडियोऐक्टिव तत्वो से ऊर्जा प्राप्त करने का एक साधन । परमाणु भार (atomic weight)--हाइड्रोजन के एक परमाणु की तुलना मे किसी तत्व के परमाणुओ का प्रोसन भार । परा-यूरेनियम तत्व (trans uranic elements)---ऐसे तत्व जा प्रकृति म सुलभ नही हैं और जिनका परमाणु भार यूरेनियम से अधिक होता 57
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विडस्केल, कबरलैंड की परमाणु भट्टी
पुस्तक मे प्रयुक्त पारिभाषिक शब्द अणु (molecule)--तत्वो का सयोग । इलेक्ट्रॉन (electron)-वह टोटा कण जो मभी परमाणुनो मे पाया जाता है और जिम पर रण-विद्युत् प्रावेश होता है। इलेक्ट्रोड (electrode)-किसी गली या अन्य पान मे प्रवशित मी प्लेट, छड या तार जो तार द्वारा विद्युत् सात से बद्र हो। ऐक्स किरणे (X-rays )- रेडियो ऐक्टिव तत्वो द्वारा उमर्जित द्रव्य पर इलेक्ट्रॉनो के प्रहार के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाली कम तरग- देध्य वाली किरणें । ऐल्फा कण (alpha particles).-अनेक रेडियो ऐक्टिव तत्वो से निक नने वाले हीलियम के आवेशित नाभिक । क्रिस्टल (crystal)-किसी नियत आकार के पदाप का अग जिसके परमाणु विशेष क्रम और तरतीब मे विन्यस्त होते हैं । गाइगर गणिन (geiger counter )-किसी विशिष्ट स्थान म आवेशित कणो की गणना करने का यत्र । तत्व (element)--एक ही प्रकार के द्रव्य से बना पदाय । नाभिक (nucleus)-परमाणु का केंद्रीय कोड । न्यूट्रॉन (neution)-परमाणुमो का वह घटक जिस पर किसी भी प्रकार का विद्युत् आवेश नहीं होता। परमाणु (atom)-पदार्थ का वह सबसे छोटा भाग जिसका अस्तित्व सभव है। परमाणु भट्टी (atomic pile)--रेडियोऐक्टिव तत्वो से ऊर्जा प्राप्त करने का एक साधन । परमाणु नार (atomic weight)- हाइड्रोजन के एक परमाणु को तुलना मे किसी तत्व के परमाणुओ का औसन नार। परा-यूरेनियम तत्व (trans uranic elements)-ऐसे तत्व जा प्रकृति मे सुलभ नहीं हैं और जिनका परमाणु भार यूरेनियम से अधिक होता 57 पॉजिट्रॉन (positron)-इलेक्ट्रॉन की तरह का ही एक कण जिसपर धन-विद्युत् प्रावेश होता है। प्रोटॉन (proton) सभी परमाणुप्रो के नाभिक का रचक जिस पर धन विद्युत् प्रावेश होता है। भारी पानी (heavy water)-भारी हाइड्रोजन और प्रॉक्सीजन का यौगिक। भारी हाइड्रोजन (heavy hydrogen) हाइड्रोजन का एक समस्या- निक जिसका परमाणु भार 2 होता है । इसे ड्यूटेरियम भी कहते हैं। रेडियम चिकित्सा (radium therapy)-कई बीमारियो की, विशेषते. कैसर की चिकित्सा के लिए रेडियम का उपयोग । रेडियोऐक्टिव अनुज्ञापक (radio-active tracers)-रेडियोऐक्टिव द्रव्य की बहुत थोडी-सी मात्रा जिसकी प्रक्रिया किसी प्राणी या मनुप्य के शरीर मे गाइगर गणित्र द्वारा जानी जा सकती है। रेडियोऐक्टिवता ( radio-activity)--कुछ तत्वो के परमाणुगो का स्वत विखडन। विखडन (fission)-किसी परमाणु का दो भागो मे विभाजित होना जिसमे दोनो भाग लगभग समान भाकार के होते हैं। विद्युत्-चुबक (electro-magnet)-ऐसा उपकरण जिसमे किसी मृदु लोहे के टुकडे को चुबकित किया जाता है, जिसके लिए लोहे के टुकडे पर कुडली की तरह लिपटे हुए तार मे से विद्युत् धारा प्रवाहित की जाती है। विद्युत्दर्शी (electroscope)-विद्युत् आवेश की बहुत थोडी-सी मात्रा का भी पता लगाने का उपकरण जिसमे दो बहुत पतले पतले स्वर्णपत्र लगे होते हैं। शृखला अभिक्रिया (chain reaction)-~-एक ऐसी अभित्रिया जो एक बार शुरू होने पर निरतर चलती रहती है और जिसमे प्रत्येक परि- वर्तन एक नए परिवर्तन को जम देता है। समस्थानिक (Isotopes)---ऐसे परमाणु जिनके रासायनिक गुण तो एक से होते हैं किंतु जिनका परमाणु-भार भिन्न-भिन्न होता है। 58 -
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