Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Sabad Nirantar
Front matter
वाग्देवी प्रकाशन, बीकानेर
~
सबदनिख्तर
रमेशचन्द्र शाह
रमेश चन्द्र शाह
प्रथम सस्करण 1987
मूल्य पसठ रुपये मात्र
प्रावरण तूलिकी
प्रकाशक
वाग्देवी प्रकाशन
सुगन निवास पदन सागर
बीकानेर 334001
मुद्रक
साखला प्रिटस
ISBN 81 85127 OS O
पदन सागर बीकानर
SABAD NIRANTAR by Ramesh Chandra Shah
Rs 6500
अनुक्रम
शब्द और सत्य भूमिका की बात 9
साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 19
आस्था, सशय और सृजन 45
ममकालिए वास्तविक्ता और भाषिक सम्प्रेपण 61
कविता और समाज 81
जनतत्र और समालोचना
89
क्ला और कुमारस्वामी 110
साहित्य और आधुनिक सवेदन 122
भविष्य और साहित्य 135
सृजन कम दष्टि और सम्प्रेपण 146
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सबदनिख्तर
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शब्द और मत्य भूमिका को वान
पर गिर आपुनिर मसिना fr'मानमा मार
पनापन है-गरी अगा। गा! मी ममगार
दूगरे रविवीगि भीमा आगी-मनगरनार विपर
परी मप सिपिटरी अपार मामी गरीबाग या गापाप नारे
भर गाती । दाना गिर पनि मन
और मा भाग नहीं कि भगामा भापित सममा पानी
मनुप्प और उगरी गीगामा चार मास और film
३१ पपा गामि भाप और गरी गागम पर म भी
मग ग्यादा बढ़ गारगया गया। प्रार की मागजिनसी
भाविर गामण और कागि भी गा मी मी।
मगर मरी पार गनुप्प पी गया जाना और पानी बिता
याई यम पुगनी मा म नगी ही। मगर।म भी सभी पभी परेरा
निम्म पे गपाग्रही पिर आ जा मत्य पी मागिर आने मेगरग्या
हीनय पर लगा देशमा नपार हो। दूर गया जा म्गय परमा
या गपगी प्रगरनाम मामन मान यात्रा पर भीसा अपन गामन
जिग अपज पयि का आगगा ये पता था यह विशियम पर भी तो
म्यय उमीर लाम'यया पातय सापीरता रहा, जय सर गाय
स्यय या निरस पर उगरे गागन प्रगट ही हो गया (रपीट अपान
वॉन/टिन दप आवर रिजवार) । यह विरोधाभाग गया जताता?
क्या हमारा दिली या आधुतिय पयि भी मी ना पाती दीन मही
मेंध लगाने की या उमे यिम्सोटा म उहादायी यात पर राम
और गत्य पे भी ये मम्म ध या व पर अगर पर है ता एप यह भी
है जो पुराने जमार के पथि (पा, पह लीजिए, नापि) 1 उपयोग किया
है 'मान पे धमरीन नयान गमत्य या मुग तया हुआ है, जगत् मा पोषण
करन पाल ह पूपन् । मुन सय में माजी ये कि तुम उग द्वारा पो हटा
दा' । यया य नाना बातें मूल मर ही हैं और पा मिप अभिव्यक्ति
-
9
7 का~ युगधमानुकूल अभिव्यक्ति का है ? मावि व मूलत भिन्न है परम्पर विरोधी ? क्या प्राथना की भाषा और विद्रोह की भाषा के बीच यही काई सम्बध नहीं दीखता? कहने को यह भी कहा जा सकता है कि उपयुक्त भावना हमारे समकालीन अनुभव का यग न हावर एक ऐमा उदगार है जो मानव-सभ्यता की अपेक्षा कृत बच्ची और मरल अवस्था में ही मभव है । पर क्या सचमुच क्या आधुनिकता ये दौर के बाद (और उमर बीचो बीच भी) समूची दुनिया म ऐसा दृश्य नही दिखाई देता जहाँ बला म्वय अपने ना होने से क्सिी कदर तग आकर तथ्य और मत्य रे दूसरे दावेदारा वे माथ कभी सीप, कभी आडे तिरछे रिश्त बनान का उपश्रम परती हुई अपने स्वभाव वा अतिक्रमण कर रही है और ऐसा वरत हुए जान बूझ कर अपनी स्वायत्तता वो जोयम मे डाल रही है ? मोने का चमकीला ढक्कन सच्चाई की असह्यय दीप्ति | क्या निरावत सत्य और जीवन की लीला कभी भी साथ-साथ चल मक्त हैं और जिम सत्य का जीते जी साक्षात्यार होता भी है क्या वह उन यथावत् अभिव्यक्त कर सकता है ? क्या मनुष्य की वाणी उस अनुभर की देहरी पर ही गूगी नहीं पड जाती? 'यता वाचो निवतते अप्राप्य मनमा मह निक कवि थोटस की एक कविता है - ए डायलाग विटवीन सेल्प एंड सोल जो ऐम ही जवाब कर देन वाले अनुभव की रपट देती है 'बट हैन आई थिक आव टट माई टग इज ए स्टान ।' अर्थात् उस अनुभव के बारे मे सोचते ही मेरी जवान पत्थर हो जाती है। योग माग के माधया ने भी इस अवाक् अनुभूति को जाना है और उसे जपन ढ़ग से यहा भी है । पर यह कहना क्या सचमुच उम अनुभूति वो कह पाता है ? क्या मत्य के साक्षात्कार की प्रतिमा हाना एक बात है और उसे कहने भाषा म भास्वर करने की क्षमता चिलकुल दूसरी बात है ? और ये दोना क्षमताए संयुक्त रूप से एक यक्ति म नही पाई जा सस्ती? पहाड की चोटी पर सुनाई देन वाली दिय आकाशवाणी को मूसा ही सुन पाता है। मगर जो उमन सुना, जो उसके साथ उम अनुभव के दौरान घटित हुआ उसकी अभिव्यक्ति म वह निता त असमय है। इस अभिव्यक्ति के काम वा अजाम देता है उसका माथी आरून । यह आरम ही मूमा वे अनुभव का उसके क्थ्य और मदश का वाणी दता है उसे जनता तक सप्रेषित करता है। यानी मूमा पगम्बर है और आम्न ववि । तो क्या कवि की यही और इतनी ही भूमिका है? यह ववि को भूमिका हुई कि वाग्मी अथवा आशु 1 आधु "लहाम मूसा को होता है- 10 मवर निर तर ? सिपिप की? और क्या यह मही भूमिया है ? अगर हाँ, ता वैदिर ऋपि की भूमिरा क्या है ? बामपि और व्याम पी भूमिका क्या है मध्य- कालीन सत ववि की भूमिका क्या है ? यह अनुयायी-वाग्मी की भूमिया है या स्वतत्र द्रप्टा रवि की ? ममूची भारतीय मस्कृति और धार्मिक दृष्टि क्या इसी प्रतीति पर नहीं सही है कि बिना किमी पगम्बर को मध्यस्थता के परममत्ता तब सीधी पहुंच सभव है और मत्रप्टा ऋपि या स्थान इमीलिए मर्वोच्च है ? गुरु की महिमा भी उमरी मध्यस्थता के कारण नहीं है । मगर सत्य के मुस यो ढवे रहन वाल हिरण्मय पात्र को हटान की प्राथना भी तो किसी ऋपि न ही की है। यही क्ला या यविता स्वय ही तो वह हिरण्मय पात्र नही है ? 'माया' जथवा 'आवरण वा ही एक और रुप? वितु क्या यह सत्य के स्वभाव म ही निहित नहीं है कि वह आवरण के द्वारा ही अपन को अभिव्यक्त गरे ? इम विरोधाभास म कसे पार पाया जाय वि आवरण ही सत्य के अनावरण की शत है। प्रमाद ये एव नाटय मे आता है - 'आवृत हो जतीत मब मरा/मैंने दना मव कुछ तेरा/परदा होने से । क्या भापा- ममथ स ममथ भापा - भी एप परदा ही नहीं है और पवि पी विशेषता क्या इमी परदे या अधिवाधिक पारदर्शी बनाते जान की ही नहीं है ? रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने भी एक जगह लिया है कि 'मत्य को तय्य की तग पोशाक राम नही आती। वह तो कल्पना और कहानी म ही मुक्त नाधव के साथ चल फिर मक्ता है ।' इसका मतलब यही न हुनामि सत्य की खातिर भी कल्पना ज़रूरी है । विना करपना ये, पिना काय भाषा के तो सत्य भी पकडाई नहीं देता। 'उस माया की छाया म/कुछ मच्चा स्वय बना था। तो क्या वाक शति माया शक्ति है? या कि माया का आवरण हटान वाली शक्ति ? ईश्वर की माया का काटने का क्या एक उपाय यह भी नहीं हो सकता कि मनुष्य भी अपने मिरजनहार का अनुकरण करता हुआ वसी ही माया रचे अर्थात् माया वो माया से ही काटे ? ऐसा प्रतीत होता है कि मानवीय चेतना म ही कहीं यह मौलिक विरोधा भास अनिहित है कि वह चीजा और सम्ब धो से प्रभावित, परिभापित और अभिव्यक्त हाते हुए भी दोना म पूरी तरह खप जान मे इनकार करता है । माना इन दोनो वी पेट खोलना भी उसके लिए उतना ही अनिवाय हो जितना दोना से बंधना। तो क्या चीजें और मम्बध भी हमारी चेतना पर अध्यारोप सरीखे ही हैं-उसका अग नहीं दूसरी ओर, यह भी तो सच है कि जीव मात्र एक दूसरे से और ममूची सृष्टि के साथ गुथे हुए है - एक अविन्केट मे । न केवल यह जमा कि चाइविल म वहा शब्द और सय भूमिका ची बात 11 गया है, कि 'वी थार आल मेभ्वस आव वन अनेदर', - बल्कि, विराट पुरुष की परिकल्पना और दशन के अनुसार भी- चराचर के साथ एकता का अनुनय किए बिना हमारी मुक्ति ही सभव नहीं । शायद यही कारण है कि ज्ञान का दशन भी मनुष्य के लिए काफी नहीं पडा 'भक्ति' और 'काम' के भी दशनो की रचना हुई और प्लेटो के आदशवाद को, उसके 'सिम्पानयिम' को भी लापते हुए 'प्रेम' की अनेकानर अवधारणामा का विकास हुआ। यही पर सवाल उठता है कि प्रेम - स्त्री पुरुष सम्बध - यदि सभी देशों और काला के साहित्य का स्थायी विषय रहा है तो क्यो ? क्या इसलिए, कि यह एक ऐसा नाजुक और सदाबहार क्षेत्र है जहाँ वैयक्तिक-सामाजिक सम्बधो की वास्तविकताएँ ही नही सामाजिक और वयक्तिक चेतना मे घटित हान वाले बालगत परिवतन भी सबसे पहले और सबसे अचूक ढग से प्रगट हात हैं ? निश्चय ही दूसरे विषय क्षेत्र भी यह सब अक्ति करत हैं पर मानव सम्बधो का यह क्षेत्र शायद इसलिए अधिक सूत्रमग्राही होता है कि वह आदमी को ज्यादा पूरेपन म पकडता है----उसकी चेतन अवचेतन मभी हरकता म । या इसे या वह कि उसकी भाविक मावेदनिन सत्ता यहाँ ज्यादा गहराई म और ज्यादा तीव्रता में घडती है। यदि एसा है तो हमारी चेतना मे निरित प्रवृत्ति और निवृति के द्वार का उसकी रचनात्मक दिशा और अथ का भी प्रामाणिर सूचन यहा होगा। या भी अप अनु शासना को अपेक्षा साहित्य की विशेष महत्ता और उपयोगिता इसी में मानी गई है कि वह सत्य को अनुभव वे तय्या काऔर अस्तित्व में पाइनल पैरटम को मात्र नौद्धिक ही नहीं बरिय भाविक सावेदनिय यथातथ्यता में परडता और प्राट परता है। मत्य को इमोशनल प्रिसिजन के साथ मूत्त पराहुए उसे मभाव्य के क्षेत्र म घटित करन का यह काम उस तरह और पोई नही रर मक्ता । क्या ऐमा नहीं लगता कि भाव जगत् का यथातथ्य एराय भाषिय सप्रेगण अधिक महत्वपूर्ण है-बनिस्वत उसकी मात्र वचारिक व्यवस्थिति के । वलि जो भाव जग र यी ज्या बड़ी अराजक्ता से जूझत हसव मूम मतुरन और व्यवस्था उत्पन र माता है वह प्रकारानर मजा-मी को बुद्धि-ऊजा वो भी उमकी सही जगह पर एपार और सतुलित पराम मदद करता है। क्या यह स्वानादिर नहीं मिमी अजित भावित यथातथ्याा अपन पजत की ही बौद्धिर यथातथ्यता को भी मनुप्प यो बुद्धि ऊर्जा लिए उमदी भाव उजा पी कसोटी पर भी गग उतरना आवया है। नीता मह युति कर्मा एकामी और 12 गरि ? अतिचारी अहकृति बनकर एक जीवन द्राही और जतत मानव द्रोही रूप ले सकती है और ले ही रही है । इसका मतलब यही हुआ कि साहित्य में सच्चाई की मांग को पूरा करना अनिवाय होते हुए भी कही अधिक दुस्साध्य है । एक कलाकार के लिए 'विकास' का- 'अनुभव परिपक्व' होने का - अथ और तक ठीक वही नही हो सकता जो एक वज्ञानिक के लिए, या, यहा तक, कि एक योगी के लिए होता है। योग साधना मे ता कभी कभार ऐसा भी देखा गया है कि साधक ने कई सीढिया एक बारगी फलाग ली । पर साहित्य की प्रक्रिया कुछ अलग तरह की प्रतीत होती है । वहा की 'कृपा या ग्रेस तथा यहाँ की 'प्रेरणा' या 'एपिफनी' एक ही तरह से काम नहीं करती । अब सवाल यह उठता है कि किसी अनुभव या सवेदन को-उसके मूल उद्वेग और उत्ताप म ही नहीं, बल्कि अनुभव करने वाली चेतना म उपस्थित और अनिहित दूसरे समवर्ती अनुभव सस्वारो की समकालिकता म पकडने और भलकाने की विधि क्या हो सकती है किसी भी अनुभव पर भाषिक सप्रेषण के दौरान असत्य हो जाने के दो किस्म के खतरे मंडराते प्रतीत होते है एक ओर भाव रूढियो की दलदल महज़ आत्माभिव्यक्ति की राहत के मोहपाश के जरिए उस अपनी तरफ खीचती है, तो दूसरी ओर अमृत विचारो का बौद्धिक आपण उसे आसानी से रागोत्तीण हो जाने की सुविधा तक से लुभाता है । 'सत्य की ओर ले जाने वाला पथ छुरे की धार सरीखा तीखा और कठिन होता है, यह बात यहा मार्मिक ढग से लागू होती है । निश्चय ही, जिसे ऐसी यथा तथ्यता की, ऐसी 'इमोशनली प्रिसाइज' अभियक्ति की दरकार है, उसे अपनी रचना याना मे बारम्बार इस तरफ या उस तरफ फिसल जान की इस या उस झूठ से घिर जाने की आशका रहगी। निमल वर्मा की एक कहानी याद आ रही है - 'एक दिन का मेहमान' - जिसका नायक आत्म ग्लानि और आत्म ज्ञान के एक चरम क्षण मे जो कहना चाहता है, वह एक 'बडा सच' है जो 'बहुत सारे झूठो के मिलने' से बनता है । यह सिफ इसलिए नहीं है कि वह इन झूठो को अपनी पश्चावुद्धि से देख पा रहा है। इसलिए भी नही, कि वह अपनी भावुकता और अपनी बौद्धिकता दोना की अपर्याप्तता से त्रस्त है । बल्कि इसलिए भी, कि उसका 'सत्य' वास्तव म उन जीकर जाने हुए 'झूठो के बीचोबीच से होकर गुजरता है । हमने देखा कि मनुष्य की चेतना चीजा और सम्वधा से प्रभावित और परिभाषित होते हुए भी दोनो से उबरने की छटपटाहट भी लिए हुए है। शब्द और सत्य भूमिका का वात 13 उसकी प्रकृति दद्वात्मरु है प्रवृत्तिमूलक और निवृत्तिमूल दोना। अगर यह सही है तो फिर भी सही होना चाहिए कि तब साहित्य म मानव सत्य को मानव अनुभूति की वास्तविकताओ को प्रत्यक्ष कर सकने वाली नापा वही होगी जो चेतना के इस उभय सम्भव धम कोप्रतिविम्बित करे । पानी एसी भापा जिसमें प्रकृति भी हो और पुरुष भी, जिसमे चीजें भी चोलें, सम्बन्ध भी, और उनसे लगाव या विलगाव का अनुभव करन वाली चेतना की तात्कालिक और समकालिक हरकतें भी। सभ्यता की प्रारभिक और अत्याधुनिक दोना ही अवस्थाओ म इस भाषा की हरक्त को देखा जा सक्ता है । जब चराचर सृष्टि के साथ साथ क सम्बध की अनुभूति मााव चेतना ममर्वोपरि सक्रिय थी तो साय का मतलर इस लगाव का उच्चारना भी था और कविता इस जुडाव की उत्सव धर्मी चेतना की अभियक्ति भी थी। अब या तो सभ्यता के विकास की गति सरल से जटिल की ओर-- अर्थात अनगाव और विशेषीकरण की दिशा में होती है और तब इस तक स कविता का महत्व-सब कुछ को जोड़ने, अथ देने वाले सत्य के सवाहन के रूप में घटत ही जाना चाहिए। पर देखा गया है कि आधुनिक साहित्य म भी साहित्यकार ने उसी जोडन वाल एकत्व स्थापित करने वाले, मगर चारा तरफ स आमत और विघटित सत्य की रक्षा के लिए अपने विशिष्ट मोचें सम्हाले हैं और शुद्ध वज्ञानिक या धमशास्त्री की अपेक्षा कहीं अधिक आतरिक मात्र सम्हाले है। यह भी स्पष्ट ही है कि स्वधम निर्वाह को मी तत्परता की बदौलत स्वय पश्चिम के साहित्यकामियो ने अपनी सभ्यता को मूल प्रतिनाआ की ही अनिवाय परिणत स्वरूप इस एकागी विज्ञान और राजनीति के अतिचारा घे बीच भी साहित्य वा उसकी अपनी धुरी पर यायम रखने की जी तोड काशिश जारी रक्खी है। कथा साहित्य का हा उदाहरण लें तो ब्रूनो शुल्ज और मिलान कुदेरा जस लेखको का तित्व अपनी परिस्थिति म लिए जा सकन वाले इस रचनात्मक और मौलिक प्रतिशोध का यथष्ट प्रमाण प्रस्तुत करता है। आमिर कोई भी लस-क्लासर क्या रखता है और क्या रचता है वह जीवन की पुनरचना करता है या स्वय इस सदिग्धता म पसी मानव मात्मा को स पुनरचना की जरूरत क्या पडती है । महज जीना महल स्थ रहना या पर्याप्त नहीं लगता क्या व्यापर जीवन की अपूर्णता-- विवारपस्तता चलत व्यक्तिगत जीवन की पूर्णता सम्भव है ? रचना का स्वभाव - रचन को प्रवृत्ति-क्या आतत आत्मदान द्वारा अपने असाध्य म मगन वाल अपूरपन और अरतायता र भाव म उबरन की प्रवृत्ति ही नहीं 14 सब निरतर १ है ? ? फिर प्रेम माहित्य का सनातन और अधुनातन विषय भी क्या न हो। आसक्ति और अनासक्ति के सारे दशन और द्वन्द्व क्या इस मूल द्वद्व से ही नही उपजते ? वह क्या है जो एक साथ ही मनुष्य जीवन का एक प्रमुख पुरुषाथ भी है और 'महाशन 'महापाप्मा भी? वह क्या है जिसे इस सदी का एक प्रमुख आधुनिक कवि 'द अनकाकरेवल मिस्ट्री आन द बीस्टियल पलार' कह के पुकारता है ? क्या कारण है कि भारतीय मानस को, जीवन के भारतीय अनुभव और मूल्य-बाध को मनुष्य की इस दुहरी जरूरत और वृत्ति को परिभाषित करन के लिए लीला और मयादा के दुहरे मिथको की जरूरत पडी? भारतीय जीवन और भारतीय धमकल्पना म, भारतीय पुराण और भारतीय साहित्य म भी नर नारी युग्म के सत्य को केद्रीय महत्व क्या मिला? पश्चिमी समाजा की तरह इस वास्तविक और मूलभूत द्वद्ध का साम्राज्यवादी पुरपत्व के एक नकली अद्वत म ही क्या नहीं घटा और घुला दिया गया मैने कहा कि वतमान युग साहित्य म सचाई के जिस आग्रह का प्रतिष्ठित करता है, वह एक ऐसी भाषा की माग करता है जो वस्तुओ और सम्बधा के एक बहुत बडे जाल को आवर्ती काल के वि यासा मे यथावत् अभिव्यक्त कर सके । विषय की दृष्टि स स्त्री पुरुष सम्बध की सूक्ष्मग्राहिता का भी उल्लेख हुआ । इसलिए, कि मानवीय अह लीला और अह मुक्ति की जरूरत भी यहा एक से एक विकट चुनौतिया प्रस्तुत करती है और युग सत्य को तथा उसस उलझने वाली चेतना के पुरुपाथ को भी हमारी चेतना के सबसे सवेदनशील परदे पर अक्ति करती है । प्रसगवशात् यदि हम बीसवी सदी के हिदी कथा साहित्य को इस कोण से भी देखे-परखें तो कई मामिक सकेत उभरेंगे। मसलन, 'क्काल मे ही भारतीय समाज की अधोगति और कुण्ठाकीणता का स्त्री पुरूप सम्बधा म घुस आए पाखण्ड और झूठ के जरिए इस तरह उघाडा गया है माना दोना के बीच एक वायकारण सम्बध हो । इसी तरह "तितली म भी भारतीय समाज और मूल्यदृष्टि के परिप्रेक्ष्य में वतमान दाम्पत्य सम्बध की विडम्बना को तीखे ढग से उभारा गया है । एक जगह तो प्रसाद ने 'स्त्री' को 'प्रेम करने के लिए लाचार' बना दी गई 'गृहहीन अपराधी जाति' तब कहलवाया है अपन एक पात्र के मुख से । समाज की अदरनी ग्णता का ऐसा पता दनेवाला कोई धर्माचाय या निरा समाज-सुधारक-विचारक नही हो सकता। यह अतदृष्टि तो, जिह हम लेखक कलाकार कहते हैं वही हमे दे सक्त है । पुस्प द्वारा कुण्ठित स्त्री की जीवन-ऊर्जा (या कभी कभार इसका शब्द और सत्य भूमिका की बात 15 - ठोर विपरीत भी) समाज और उसके मूल्यास विस तरह बदला ल सकती है, इसके सकेत प्रेमच द आर जनद्र के प्रथा माहित्य म जहाँ तहाँ देखे जा सकत है। क्या यह भी एक अनगल मयोग मर है कि इस नई नारी और नई नतिकता वा पर जा प्रश्नावुलता उभरी, उसया मवसे आग्रहपूण और पुनरावर्ती रुप भी किसी तथार थित पश्चिमा मुख लेखक के जरिए नहीं, बल्कि एक गाधीवादी बहे जाने वाले लवर की क्या मृष्टि के माध्यम से ही मामन थामा। इसी सिलसिले में आग जापर सस्वारगत रूढिया और रिश्ता की घुटन के बीच उस स्वाधीन मूल्या वेपी व्यक्तित्व की खाज का उपक्रम भी आकार ग्रहण परता दिखाई पडता है जो परपरा- गत सास्कृतिक मूल्यो को भी दिया की दलदल म निवाल पर यथाथ जीवन के जोखम भरे सुलपन म खीच ला सके । किसी भी समाज और सभ्यता र सकट (या कह लीजिए, रोग) उस सबसे सवेदनशील और अग्रगामी सदस्या में प्रकट हात है। माथ ही इस सफ्ट अथवा राग के लक्षण ही नहीं निदान और प्रतिकार के मरन मा समाज ६ इही सृजनधर्मी आत्म के दावे जरिए प्रगट हागे । क्या यह देख पाना- बिना विमी रोमानी अतिरजना सम्भव नही, कि कवि-~लाकार वग के ये बुद्धिजीवी जपन समाज वे बलि पुरुष भी बहे जा सकते है और आरोग्य- विधाता भी। जीवन के मूल्य स्वय जीवन की गति या गतिरता के फ्लस्वरूप विस्मृन या विकृत हा जा सरत हैं । परस्पर विराधी सरकृतियो और जीवन दृष्टियो की अधूरी अथवा पूरी टकराहट के फलम्वरूप जो अनिश्चय और दिग्भ्राति उत्पन होती है, उसके चलत भी एक मूल्यमूढता और मूल्यगत राजक्ता छा जाती है। इस परिस्थिति का वास्तविक रचनात्मक प्रतिकार अवेल मूल्यावपीचिंतन स या सास्कृतिक पुनरुज्जीवन ने कमवाण्डी उद्योग स नहीं हो सकता। यह सब भी अपनी जगह काम का हो सकता है, जितु महज आदर्शों पर बल देने से अथवा यथाथ का बौद्धिप आपलन भर करके अतीत के मिही सास्कृतिक मानदण्डो मे वत्तमान का माप लन या पीट देन भर स अघागति को नही थामा जा सकता।नतिक दायित्वा का निर्वाह भी, लगता है मात्र नतिकता क स्वय पर्याप्त वृत्त के भीतर सीमित नहीं किया जा सकता। जीवन का ऋणशोध जीवा दर ही हो सकता है । इस रचनात्मक जीवन ग्रहण और जीवन दान के लिए रचनात्मर बम चाहिए, उच्चवादि को भाविर सामथ्य और वल्पना शक्ति चाहिए । मृजनशील लेखर की चेतना एक गहर और विशिष्ट अप में प्रातिनिपिव वतना होती ह । व्यक्ति के रूप मवह चाहे मदद निरन्तर 16 जितने ऊचे सास्कृतिक-नतिर मानदण्डो का कायल हो, रचनाकार की हैसियत से उसकी चेतना और कल्पना अपने युग और परिवेश मे व्याप्त सामको से अछूती नही रह सकती । वह समाज में व्याप्त अनिश्चय, विकार और झूठ का द्रष्टा और भोवता दोना अपने ढग स होगा ही । यह परकाय प्रवश उसका स्वधम है । कह लीजिए, उसका अभिशाप है। पर यही वेध्यता तो उसके होने को उसके समाज के लिए अतिरिक्त रूप से मूल्यवान बनाती है। जीवन के झूठ सच म गहरी पठ और प्रत्यक्ष मुक्त - भाग सरीखी कल्पनाप्रवण भागीदारी ही उसके द्वारा उद्घाटित सच्चाई और मूल्य दृष्टि को एक सचमुच की राग प्रेरित, रागोतीण सच्चाई और एक सचमुच जाखम मे पडकर उबरी हुई परी मूल्य दृष्टि भी बनाती है। अपन समाज के जीवन मरण की-आदश और यथाथ के वीच के अतराल की-यह अस्तित्वसिद्ध पहचान ही तो उसे वह सूक्ष्मग्राही बोध य न बनाती है जो और कोई उस तरह बनाने वाला नहीं है । ऐसे सूक्ष्मग्राही वेदन तन से सम्पन लेखक को जहा एक ओर जीवन और जीवन मूल्यो के किसी अच्युत आधार की तलाश और प्रतीति हा सकती है, वही उसी जीवन और उसी मूल्य चेतना के स्खलन और विडम्बन के चरम रूपा की भी। इसी नात कही लगता है कि इस लेखक रूपी भोक्ता साक्षी की भूमिका आज के इस अस्थिर और दुचितेपन से ग्रस्त भारतीय समाज म विशेष रूप से अथवान है। न केवल इसलिए, कि वह मूल्यो के सकट का प्रामाणिक और यथातथ्य अत साक्ष्य रच सकता है, बल्कि इसलिए भी, कि जीवन मूल्या का जो परपरागत स्रात यहा कमोबेश एक लम्बे अरसे तक प्रवाहित रहा है, वह न केवल काफी कुछ अवरुद्ध हो चुका है, प्रत्युत दिशाहीन राजनीति और उपभोक्ता सस्कृति के तत्र के पीछे ओझल भी हो गया है । उसमे जो सत्त्व अभी तक शेप और क्रियाशील है वह भी समाज को प्रभावी ढंग से अनुप्राणित कर सक्ने की स्थिति मे नहीं दीखता। कालिदास की एक प्रसिद्ध उक्ति यहा बरवस स्मरण हो आती है कि विकार को परमाथत जाने विना उसके प्रतिकार की चेप्टा का आरम्भ भी नहीं हो सकता । पर यह परमाथत जानना क्या होता है और उस नान का अधिकारी कौन है ? क्या वह निरपेक्ष तक बुद्धि, जो किसी भी चीज का औचित्य गढ सकन वाली है ? विकार को परमाथत जानना तो उसी के लिए सम्भव है, जो मनुष्य को उसके हर काश की वास्तविकता म अनुभव कर सकता है और जो उसकी जविक वृत्तिया से लेकर मनोमय विनानमय शब्द और सत्य भूमिका की बात 17 मुक्ति चेप्टाओ तक का भोक्ता और साक्षी है । यानी, जिम न नो निबुद्धि हो जाने की छूट है, न तकजीवी बनकर समस्त विश्व प्रपच को एक बलात्कारी व्यवस्था में धुला और घटा दन की। अपनी संस्कृति और इतिहास को लिए दिए हमारा भारतीय समाज पिछले दो ढाई सौ बरसा से परस्पर विरोधी मूल्या और क्म प्रेरणानो को जिस टकराहट से, चेतना की जिस दुविधा और दिग्भ्राति से गुजरा है, उसकी पकी हुई पराकाष्ठा हो सभवत अब हमारे सामने है । कि तु आत्म नवीकरण की, सामाजिक आध्यात्मिक पुनज म की प्रतिमाएं कितनी कठोर होती है, कितने सतरे उसके लिए उठान हान है इसका सही सही अनुमान इस शताब्ती के आरम्भ से ही सक्रिय हमारे अग्रणी विचारणा और स्मज्ञा का नहीं था, यह मानना कठिन है। बहना न होगा कि ममाज म पवि कलाकारा की जिस भूमिका की बात यहा की गई, उसका निशित मम्बध इस खतरे उठाने वाले जीवन बाघ और मूल्य दृष्टि से भी है ही। गर-frrrr साहित्य और सामाजिक परिवर्तन कुछ विचारणीय मुद्दे साहित्य को अगर लिटरेचर के पर्याय के रूप मे ल ता लेसन क्ला के आरम्भ के साथ ही स्थितिशील सामाजिक सम्बधा म दूरगामी परिवतना की प्रक्रिया का आरम्भ देखा जा सकता है । मनुष्य की प्राकृतिक एक्ता स्वयसिद्ध है तो क्या ऐसी कल्पना सम्भव है कि सारा मानव समाज एक सास्कृतिक एक्ता की ओर बढ़ रहा है ?-उसी परिवतन, टकराहट और प्रगति के कारण, जिसन अलग अलग समुदाया की आदश एक्यमूलक सरचनाओ को भग किया? या कि इसके विपरीत यह कहा जाय, कि समूचे मानव समाज के सास्कृतिक एकीकरण का विचार एक विचार भर है-एक असभव स्वप्न, और केद्रीकरण की बजाय विकेद्रीकरण ही मनुष्य के साथ सामुदायिक जीवन की आधारभूत प्रतिज्ञा है ? सस्कृति से हमारा तात्पय उन सम्बधा से होता है जो क्सिी सभ्यता के सदस्य ससार के साथ बनाते है । समाज उन सम्बन्धो का नाम है जो वे सदस्य आपस मे एक दूसरे के साथ बनाते है । दोना मे साहित्य की-कहना चाहिए वाडमय की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है क्योकि 'वाद' का आरम्भ ही सस्कृति का भी आरम्भ है । साहित्य को यदि एक आर समाज के दपण के रूप में देखा गया है तो दूसरी ओर इसके एकदम विपरीत छोर पर उस 'रेवेलशन आफ ए हिडन लाइफ' माना गया है । लेवी स्लाउस सरीखे आधुनिक नतत्वशास्त्री तक को साहित्य से अपेक्षा का रूप यह है कि 'वह उसे मानव समाज से छुटकारा दिलाकर एक भिन समाज में प्रवेश दिलायेगा। इस अपेक्षा को पलायनवाद या प्रतिक्रिया- वाद कह दना आसान न होगा क्यानि व्यक्तिवादी तथा कलावादी कही जाने वाली प्रवृत्तिया के साथ सबसे ज्यादा गहरी और तात्विक लडाई नृतत्वशास्त्र की जमीन पर ही लडी गयी है । साहित्य अगर दपण है तो उसे हर सामाजिक परिवतन को प्रतिबिम्बित करना चाहिए और अगर वह 'जीवन की छुपी हुई सम्भावना का उद्घाटन' या एक वेहतर, सूक्ष्मतर जीवन का सूचन है तो भी 19 शायद पर विधायर प्रेरणा र म म गामागिर परिवतन या रिया निपार वन माना जाहिए। इन दाना परिभाषाआम वीर यह तोगरी परिभाषा भी है ना माहिय यो 'जीवन पी आलाचना मानती है। बालाना है, ता उमम स्वीकार पा निपेध उत्मवमिता तथा विद्रोहमिता दाना पाहागयार शक्ति ही समाज और सस्थति की रचना और स्थिरता र मूर म थी। पर विरोधाभास यह दि वहीं यार शक्ति जा आदिम समाज का एक जुट रगती है यही- नतत्वशाम्प की पाजा ये मुराविर-उसी समाज म वग और जातिगत वषम्य को स्वामित्व और अयाय वा भी जन्म देती है। यानी भाषा जहाँ एक बार मानयोग बीच पी एपता गिद्ध करती है यही दूसरी ओर वह अनेकता और अमामजस्म का भी निमित्त बनती है | वाया इमी अनपता और वषम्य साफिर म एक्ता और समता म परिवर्तित करन के लिये मानव पतना उस चीज का जन्म देती है, जिम विद्रोह यहा जाता है ? इस तरह देखा जाय तो सामाजिय परिवतन व पोछ भी दा विराधी प्रवृतियाँ वाम परतो हैं ए तो भोतिष ज्ञान की वृद्धि के साथ और सामाजिर विभवा तर चलते होने वाली प्रगति तथा दूसरी ओर इस दिशेपन और विभिवानर व विरद्ध- इसस उत्पन अस तुलन वी प्रतिक्रिया स्वरुप जमो विद्राह-वृत्ति । . आधुनिक उप यासकार कामू ने मनुष्य म निहित इस विद्राह-वृति का गहरा चितन किया है । क्ला उसके अनुसार सो दयमूलक सत्याग्रह वा, समष्टिगत ऐक्य मा और मनुष्य म अनिहित एक वहतर ससार पी मांग वा विशुद्धतम रूप है। फ्ला म ही वस्तुत अमाय के प्रति मनुष्य का वास्तविक विद्रोह अपनी मूल जटिलताओ की सशिष्टता में प्रकाशित होता है' ---- ऐसा उसका निष्कप है। कामू की प्रसिद्ध पहानी द आर्टिस्ट का नायर कई कई हप्ता तक एक चित्र के निर्माण मे जुटा रहता है। जव चित्र पूरा होकर उत्सुर दशका के समक्ष आता है तो वहां कोरे कनवस पर मात्र एक शब्द अस्ति है और वह शब्द है सॉलिडरिटी। सालिडरिटी यानी व्यक्ति की अपने समुदाय के साथ एक प्राणता हमार यहाँ साहिय का अथ ही 'सहित होने का भाव है। साहित्य पानी कम्युनिटी, सालिडरिटी। मगर किस के साथ सॉलिडैरिटी? मानव समाज के साथ ? अथवा चराचर सृष्टि के साथ | क्या सानिरिटी अथवा साहिय भाव को भी भारतीय और पश्चिमी अवधारणालोम कोई अतर है? दास्ताएवस्की वे द दस करमाजोव का दिमियी एक जगह कहता है Ifall सबद निरतर 20 are not saved what good is the salvation of one only? पूछा जाय तो विद्रोह की प्रेरणा का तात्विक आधार ही इस व्याकुल उद्गार में निहित मर्मानुभूति है जो किसी देश-काल तक सीमित नहीं, अलग अलग सभ्यताओम भी इस प्रश्न की टवार समान रूप से गूजती सुनाई देती है। ययाति की पुकार अथवा अवलोक्तेिश्वर की अवधारणा क्या मनुष्य-'मानवीय मध्यवर्ती'-की इसी व्याकुलता को ध्वनित नही करती? दूसरी ओर क्या इसी प्रश्न का एक रूप वह भी नहीं है जो मैत्रेयी ने याज्ञवल्क्यमे पूछा था-'येनाह नाऽ मृतास्याम किमह तन कुर्याम ?' क्या इन दो-ऊपर से विरोधी सी लगती, मगर वस्तुत एक दूसरे से अनिवाय रूप से जुडी-जिज्ञा- साओ मे ही मनुष्य की स्थितिशीलता और मनुष्य की प्रगतिशीलता का- मनुष्य की समूची अविराधग्रस्त विकास यात्रा का भी तक और मम नहीं ढूढा जा सकता? आखिर कामू के कथनानुसार भी 'प्रत्येक विद्रोह अपने आत्यतिक स्वरूप मे मनुष्य का अपनी मरणधर्मा नियति के विरुद्ध विद्रोह' ही तो है । इतना ही नहीं इस विद्रोह का एक मवथा घनात्मक और जीवनदायी मूल्य भी है । क्यानि विद्रोह वही मायक है जिसके द्वारा मनुष्य बलिदान- पूर्वक यह सावित करता है कि उसकी वास्तविक मुक्ति औरा की हत्या की छूट मिल जाने और उसे तक औचित्य दे देने मे नही है, बल्कि स्वयं अपनी मृत्यु के तथ्य से स्वाधीनता अजित कर लेने मे है। स्वाधीनता की - सापेक्ष मुक्ति की - यह अवधारणा न तो ससार त्यागी सयासी के लिए सम्भव है न निरे भौतिववादी-नकारवादी के लिए। क्या कामू का औपयामिर कृतित्व और क्या उसका दाश निर चितन दोनो ही इन दो सपाट विक्रपो की ऊमर विडम्बना को उजागर करते हैं । उमकी मारी शिकायत ही म बात को लेकर है कि जीवनदायी विद्रोहमूलर क्राति चेष्टा की परिणति एय विहिलिम्ट और सबसत्ताकामी प्राति वाद में क्या हुई ? यह अकारण नहीं है कि हमार स्वाधीनता-मग्राम के एप क्रान्तिकारी चितव को भी अपने पूण योग के रशन पी आधार भूमि स यास प्टि और भौतिकवादी दृष्टि दोना या प्रत्याग्यान बरवे मिली । वामू जिस एवता जिस सवाद वो अपने गृजन और विद्रोह चितन या मूलाधार स्वीकार करता है, वह ससार में मानव जीव को अवस्थिति बी-उसने अपने शब्ता म 'ह्य मन वण्डीशन यो-यूनिटी है । एसी एक्ता की प्रेरणा उसे एक ओर इतिहास की गुलामी ढोने से विरत करती है और दूसरी ओर उस एमोल्यूट' थी, जो मृष्टि से बाहर होत हुए भी मानव इतिहास के येद्र में होना चाहता है। हमारी परम्परा म यदि माहित्य वाएर मुग्य प्रयोजन 'शिवतरक्षति भी माना मागिय और गामाजिय परिपतन दुध विचारणीय मुद्दे 21 गया है तो उसका तात्त्विक आधार यही है कि जीवात्मा अपनी मुक्ति के लिय भी जीवलोर पर अवलम्बित है क्योकि सच्चिदानद स्वय स्वेच्छा से मृष्टि बधन स्वीकार करता है। ममवाशाजीवलोरे जीवभून सनातन 'आत्मा ईश्वर से वचित होना भले स्वीकार कर ले, जीवलोक से बहिष्कृत होना चाहना उमका स्वभाव धम नही है । आनद कुमारस्वामी के अनुसार तो पहला विकल्प ही कही अधिक वरणीय है इट इज मोर नससरी दट द सोल लूज़ गॉड दन दट शी लूज कीचस द सोल आनम गाड मोम्ट इन बीइग विवट ऑव गॉड' ऐसा प्रतीत होता है मानो स्थिति स्थापक्ता और विद्राह स्वीकार और निषेध, आनद बोध और दुस बोध मानवीय चेतना और सृष्टि दाना के तल म एक मौलिक द्वद के स्पम अवस्थित है, और हर सभ्यता को अपन भीतर में जहाँ एव यानवल्क्य की जरूरत पड़ती है वही एक गौतम बुद्ध की भी । क्याकि नतत्वशास्त्री क्ला को प्रकृति स सस्कृति म मचरण का सब म सक्त और अनिवाय माध्यम मानत है जत स्पष्ट हो क्ला को एक दोहरा दायित्व वहन करना होता है आदिम मनुष्य की एक्यमूलक सस्कृति म ही नही बलि सभ्य मानव समाज की अविरोधग्रस्त विराम यात्रा म भी। क्ला वा स्वभाव और घम विसी भी युग म मानव स्वभाव और धम म अलग नहीं । कुमार म्वामी के क्यनानुमार We are archetypal inwardly and phenomenal ou wordly Man is not called upon to deny any part of his nature but to bring higher and lower essence and nature into hormony यामू ये चितन म भी मानव नियति वीसी अनिवाय विशेषता या उमर अपन अम्नियवादी दशन ये गन्म म प्रतिपादन पिया गया है। निहाम और पवन तिहाम या परण करना नवारवा (निहिनिम्म) या दरणपरता 1 गाध्य म निहित विद्रोह तय कीरगम बरी विदम्बना और मया हा मानी है? वर विचार जिगा उत्पनेवर इपिगमम वर भी मनुष्य पामीन फेकाराऔर जीन के माधना म उतन ही नाम पचिपा निनानि यिपार जा निगम पो पूरी तर अग्यो मारपणा पाना गती पन परियाम प्रभावितहानी औरम्प उगरी निा निर्मा for रन म पु पापी' friमानिसमागमामन माग गTTET हाती। गालिब ममी उपाम TATorrn ग माग गुर्गा रानी मागि।
पर देखा गया है कि हर बडी उथल पुथल के समय कवियो के सामन भी यह सफ्ट उपस्थित हुआ ही है कि वे महज दृष्टा बने रह अथवा सग्राम में बूट पडें । स्पेन की मुक्ति के लिए 'इटरनेशनल ब्रिगेड में शामिल हो कर कई लेखको ने अपने जीवन की आहुति दी। एक शताब्दी पहले यूनानी स्वतत्रता के मोर्चे पर रोमानी रवि वायरन ने भी यही किया। पर जिन लागा ने ऐसा नहीं किया, उनश क्या दृष्टिकोण था? क्या वे कायर या सुविधाभोगी थे? क्या वे स्वधर्म की पहचान और उसके द्वारा निदिष्ट कम को चुनने के साहम से शूय थे ? मुझे यहाँ वडस्वयं के प्रिल्यूड का वह प्रसग याद आता है जहा वह अपनी युवावस्था की उस दुविधा का जिक्र करता है और मास की राज्य प्राति मे जपने भाग न लेने के निणय वा अतमुख मूल्याक्न करता है 11139 इस म स दह नहीं-मुझे उनका साथ देना था जिहोने अपनी आहुति दी । शायद मुझे भी बलि चढ जाना था पर पसी भेट होती वह मेरी नाचीज, गनत और भ्राता हाँ मुझे लौट जाना था प्रकृति की गोद मे । अपने सार सकल्पा और सम्भावनाआ के साथ केवल अपने लिए कवि और समूची मानवता मैं लिए" अनहुआ और निष्फल और तुझे भी बिना जान पहचाने ओ मिन मरी आत्मा के । वडस्वथ पाता है कि उसका निणय सही था एक निष्पन और अनावश्यक महादत से अधिक जरूरी था ऐम समय पूरे होशोहवास से जीते रहना और उस कठिन समय का जीवत साक्ष्य रचना । 917 १yari ३५ - - ( स पर क्या बीसवी शताब्दी के कवि के लिए इस प्रकार का निणय लेना- एक समाना तर और पिसी हद तक कठिनतर परिस्थिति मे - उतना ही सहज और औचित्यपूण हा मक्ता है, जितना रोमैण्टिक कवि वडस्वथ के लिए एक शताब्दी पहले था ? न सही अपनी, पर दूसरो की शहादत के प्रति कवि का प्टिकोण क्या हो सकता है इसका सबसे मार्मिक उदाहरण है यीटस की वह प्रसिद्ध कविता जिसमे उसने ईस्टर के दिन शहीद हुए दस क्रातिकारिया का स्मरण किया है। कवि की प्रतिक्रिया दोहरी है। एक जोर वह साहित्य और मामाजिक परिवतन धुछ विचारणीय मुद्द 23 शुभव परतालिए प्यय यो गपित हदय पत्थर की तरह हो जान हैं जो जीया -स्यामाथिर प्रयाह म बाधा उपस्थित परा है- Hearts with onc purpose alone enchanted to a stone To trouble the living stream तो दूसरी ओर यह ग घट। म यहुत गहरे विसतित हो उठा है और उम लगता है इस यनिदाा ये पाद अब दुनिया यथावा नहीं रह गयी पर भयानर सौरय पा आविर्भाव हो गया है । पूरी यविता यो टैप पो तरह यह परित ए टेरियल म्यूटोइज योन बार बार यदि ये भीतर, यदि ये वावजूर गूजती रहती है। निश्चय ही मामाजिक परिवनन ये प्रति पवि प्टि पा यह एव यही अधिर मामिप यही अघिय ऐतिहामिर और यही अधिर मूलभूत साक्ष्य है । इसलिए कि इम के पीछे रोमेण्टिर यवि की 'सिसिरिटी से वही बलवत्तर य आधुनिक कवि की ऑटिसिटी याल रही है। ऐसी 'आयेंटिमिटी जहाँ कवि माता अपने व्यक्तित्व से उपर वर सहसा एक पूरे समाज के अनुभव को,या कहना चाहिए एक मामूहिर अवचेतन वे अप्रकट सत्य को वाणी दन या माध्यम बन जाता है । यहना न होगा कि उसकी यह भूमिमा लादिम समाज के पुराहित या जाभा की तरह भी है और एक ऐतिहासिक समाज के प्रापेट सरीखी भी। वसे पातिवारिया पे प्रति एक तरह का सम्मोहित भाव कविया में ही क्यो, कथाकारो मे भी पाया जाता है । सुदूर वे रहस्यवाद की बजाय यह निकट का रहस्य लेखको के लिए उनकी अपनी वौद्धिक दृष्टि से असगत और अस्वी काय होते हुए भी रागात्मक स्तर पर स्पृहा का विषय ही होता है यह एक बडी स्वाभाविक सी यात है और इसका दृष्टान्त तास्ताएवस्की जस मुक्तभोगी लेखको म ही नही जनेद्र जी जमे अहिंसावादी लेखका म भी देखा जा सकता है। सवाल सिफ याति का नही है समाज जीवन मे उलट फेर करने वाली हर वस्तु और हर विचार का है सामाजिक परिवतन की घटनासो और प्रतिक्रियाओ का है जो 'रहस्य' नहीं है। साहित्यकार उससे प्रभावित होता ही है उसकी सवेदना पर उसकी छाप पडती ही है। चाहे वह उस परिवतन को इष्ट समझे अथवा अनिष्ट दोना ही सूरता म वह उसका सवेदनात्मक प्रत्युत्तर गढे बिना रह नही सक्ता । साहित्य का उद्देश्य शीपक अपने निवध मे प्रेमच द ने इसी अनिवायता को इसी विवशता को दज़ किया है। 'साहित्य का मब से ऊँचा आदश यह है कि उसकी रचना केवल क्ला की पूर्ति 24 सबद निरतर के लिए की जाय जब साहित्य की रचना किसी सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक मत के प्रचार के लिए की जाती है तो वह अपने पद से गिर जाता है, लेकिन आजक्ल परिस्थितियां इतनी तीव्र गति से बदल रही हैं, इतने नये नये विचार पदा हो रहे हैं कि कदाचित् अब कोई लेखक साहित्य के आदश को ध्यान म रस ही नहीं सकता।' प्रेमच द ने आज के समय मे साहित्य और साहित्य कार की जटिल समस्या को कुछ सरलीकृत रूप मे ही सही, मगर साफ साफ सामने रख दिया है। प्रेमवद कथावार थे और कथावृति-विशेषकर उप यास का सामाजिक परिवतना से साहित्य की अय विधामओ की अपेक्षा कुछ ज्यादा ही घनिष्ट सम्बध दिखाई देता है । सर्वातीज़ से डिवे स तक और डिफेन्स से दोस्ताएवस्की तक इस सम्बध की रूप रेखाएं देखी जा सकती हैं। शायद ही कोई उपयासकार ऐसा मिले जिसके बारे मे यह सौ फीसदी दावा किया जा सवे कि वह प्रेमच दीय अथ मे विशुद्ध कलावादी है । दूसरी ओर वॉल्तेयर सरीमे बुद्धिजीवी लेयक के उप यास को भी किसी सामाजिक, राजनीतिक या धार्मिक मत का प्रचारक ठहराना कठिन होगा। मगर प्रेमच द के वास्तव्य मे जिस मूल द्वद्ध को अक्ति किया गया है वह उन्नीसवी वीसवी सदी के उपयास- कारा की खास अपनी पहचान है, इसम स देह नहीं है । इस द्वद्व का सबसे तीखा प्रमाण यही है कि वह अपने मन से विकट रूप में स्वय इस युग के महानतम उपयासकार तॉल्स्ताय मे प्रकट हुआ क्ला और नतिकता के द्वद्व के रूप मे । प्रस्तुत विषय के सदम म तॉल्स्तॉय की अपेक्षा दॉस्तॉएवस्वी वा कृतित्व अधिक प्रासगिक लगता है ठीक उसी तरह, जिस तरह उनीमवी सदी के अंग्रेजी समाज और उसकी सवेदना वे इतिहास मे चाल्स डिकेस का औपयासिर कृतित्व जाज एलियट अथवा थकरे की अपेक्षा अधिक प्राति निधिक और अधिक लाक्षणिक महत्व का जान पडता है। अगर यह सच है कि उप यास साहित्य की सब से नयो, सब से ऐतिहासिक (इतिहास जीवी भी किसी सीमा तक) और सव से विद्रोहशील विधा है, तो इन दो उप यास- कारो की चर्चा इस सदम मे साथक होगी। डिस के उपयासो म तत्कालीन सामाजिक स्थितियो और समस्याओ का प्रतिविम्ब ही नहीं मिलता-वाछिन परिवतना का आग्रह और विद्राहमूलक क्षोभ तथा आक्रोश का स्वर भी बराबर सुनाई देता है। सामाजिक सोद्दे श्यता और मनोरजक लोकप्रियता का ऐसा विचित्र मगर प्रभावशाली गठ बधन शायद ही कही और दिखाई दे। शायद ही ऐसा दूसरा उदाहरण मिले जहाँ किसी लेखक ने अपने युग पे ययाय और अपने युग की रचि तथा मूल्यबोध को इतनी भावात्मक सहजता से अपनाया हो फिर भी इतनी साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 25 .
प्रकट सीमाआ के वावजूद वह एक 'क्लासिक' की तरह प्रतिष्ठित हा सका हो । आज भी बहुत सारे लाग डिकेस के उपयासा को तत्कालीन सामाजिक बुराइयो के विश्वमनीय दस्तावेज की तरह ग्रहण करते हैं -कुछ इस तरह, मानो वह उप यासमार न हारर एक महत्वपूण इतिहासकार अथवा समाज सुधारक हो। स्वय इतिहासकारो ने भी किसी अय अग्रेज उप यासकार को वह सम्मान नहीं दिया है जो वे डिके स को देते है। इग्लैंड के स्कूलो मे पढायी जाने वाली इतिहास की एक पाठ्य पुस्तक म डिकेस के हर उपन्यास का एक अध्याय उद्धत किया गया है और यह दावा किया गया है कि प्रत्येक अध्याय एक न एक सामाजिक अयाय का स्पष्ट निदशन ही नही उचित समाधान भी प्रस्तुत करता है। दूसरी आर एक समकालीन आताचा वा (और प्रशमा आलोचक का) अभिमत भी इस सम्बध म उल्लेखनीय है विडम्वना मगर यह है कि यह महान् लेखक बौद्धिक प्टिस कभी वयस्क हुआ ही नहीं । जहाँ भी डिके स सामाजिक सुधार की बात करता है - बल्कि जहा भी वह समस्या पर सोचना शुरू करता है वहीं वह औसत से भी निचले दरजे की समझ का परिचय देता है। इतना ही कहा जा सकता है कि अ याय के पति उसका आरोग एक सयान सवेदनशील आदमी की तरह ही व्यक्त हुआ है । पर वस इतना ही। न केवन नाज के आलोचको वल्लि डिक म के ममकालीन बुद्धिजीविया का भी एक प्रभावशाली वग लगभग इसी स्वर म डिकेम के सुधारवादी आग्रहा का मजाक उडाता था और उसे मिलावटी माल की तरह खारिज करता था। जब अवर म्युच्युअल फ्रड छपा ता उसी समीक्षा करत हुए एक पत्रिका म उम पर यह क्टाभपूण टिप्पणी की गयी सच्ची कला का जाखिर 'पुअर लाज' और 'पुअर ला वोड' सरीखे वती और लाक्ल मामला स भता क्या कोई सराकार हाना चाहिए। अगर महाशय डिवे स को पुअर ला पर अपनी टोमा टिप्पणी जाहिर करनी ही है तो हमारी उह सलाह है मि वह या ता पम्प रट निसना शुध्द कर दें या पानियामेट का रास्ता पक्. । यदि डिकेस को मनुष्य स्वभाव के बारे म जरा भी जानकारी है ना उह इतना तो मालूम होगा ही कि अग्रेज जाति बही व्यवहार कुशल जाति है और वह वास्तविर समस्या को वास्तविक्ता के धरातल पर ही निवगने वी अभ्यस्त है । उप यास म सुधारवादी आग्रह उसे बिलकुल नहीं मुहात । और जहाँ तक एक उप यास लिस कर पुअर ला' को मोधित करत 26 गवद निरनर का बीड़ा उठाने का सवाल है, यह उतना ही हास्यास्पद है जितना पशुओ मे फ्ले रोग की रोक्थाम के लिये फौज बुलाने की सोचना।" वात दरअसल यह है कि, डिवे स की करणा और डिकेस का गुस्सा दोना ही समकालीन समाज की एक मानसिक ज़रूरत की पूर्ति करते थे। सामाजिक समस्याआ के प्रति हजारा लोगो के भाव सवेदनात्मक दृष्टिकोण को उसने गहरे म प्रभावित किया । एक धम प्रचारक ने तो यहां तक कह दिया कि 'आज हमारे बीच कुल तीन ही सामाजिक प्रेरणा देने वाली शक्तिया हैं एक तो लदन सिटी मिशन, दूसरे हैजा और तीसरे डिवे स महाशय के उप यास ।' मगर यदि कोई पूछे कि क्या डिवे स के उपयासा के जरिये सामाजिक परि- वतन की दिशा मे कुछ ठोस नतीजे निकले? क्या उसके कृतित्व से सीधी प्रेरणा ग्रहण करके कोई सुधार वास्तव म हुआ-तो इस सवाल का जवाब एक निश्चित 'हां म नही दिया जा सकेगा। दरअसल जहाँ तक युगीन समस्याओ की बौद्धिक पक्ड का प्रश्न है, डिके स के विचार उन विचारा से अलग या आगे नहीं थे जो कि उसके समय मे कमजीवन से प्रत्यक्ष रूप में जुड़े लोगो के पास भी थे। इसलिये डिफेन्स ने इसमे कोई पहल की हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा जिन ठोस समस्याओ को लेकर उसने अभियान चलाया था, उनका भी ल निकालने म उसे सफलता मिली हा ऐसा नहीं लगता। डिवे स के जीवनकाल मे (सन् 1832 और सन् 1870 के बीच) इग्लैंड म सामाजिक परिवतन पी गति चाहे जितनी तज रही हो, सुधार की गति बहुत धीमी थी। यहां तक कि 'पुअर ला' जसी अपेक्षाहत सहज साध्य चीज़ भी जिस पर डिवे स ने लगातार आपत्ति उठायी उसे भी सशोधित करने का कोई गम्भीर प्रयत्न उसके जीवन काल म नहीं हुआ। सन् 1905 म जब रायल कमीशन की नियुक्ति हुई, तभी इसकी नौवत आयी । इसी तरह ऋण न चुका पाने के लिए कारावाम के दड की प्रथा का अत भी बहुत बाद मे जाकर हुआ-सन् 1869 म । सावजनिक स्वास्थ्य सम्बधी सुधार भी दरअसल डिनेस की मृत्यु के उपरात ही लागू किया गया। दफ्तरशाही को डिके सीय आलोचना भी उसके जीवनकाल मे रग लायी हो, ऐसा नहीं कहा जा सकता। क्याकि सिविल सर्विस का पुनगठन ही सन् 1870 मे जाकर हुआ। शिक्षा के मामले मे भी डिके स आजीवन जिस एक राष्ट्रीय योजना की पुरजोर वकालत करता रहा था, वह भी उसके जीवन काल म चरिताथ नहीं हो सकी। इन सारे तथ्यो को देखते हुए यह स्पष्ट है कि डिवे सके उपयासा का अगर कोई सीधा और तात्कालिक प्रभाव सामाजिक परिवतन के क्षेत्र म पडा भी हो तो वह नगण्य ही है । यह भी सच है कि शासन-कर्मी तया राजनीतिज्ञ उसकी साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 27 अनयरत पुरार में प्रति न यवल उदासीन बने रहे, वलि उलटे उसकी रचनामा म निहित प्रोपेगेंडामा मपोल भी उडात रहे। मार देर अबैर ही सही-किस की रचनाआय व्यापर प्रचार प्रसार के फलस्वरूप अग्रेज प्रजा में सामाजिय मवेदन म एर गुणात्मर परिवतन भाया- इससे इनकार नहीं किया जा सकता। रावेदनगत परिपतन और ठोस सामा जिक्रम के बीच एक अतराल स्वाभाविप है। लगभग तीस साल की रचना अवधि के दौरान डिवेस ने जिरा अभियान को जारी रसा उगया एक परिणाम तो यही देसन में आया कि सामा य पाठया तब मा उप यास विधा के प्रति दृष्टिकोण बदल गया। इसम भी सदेह नही वि डिये गये उपयामा ने अपने पाठको के मम को उस जगह पर पुरदा जहाँ उसस पूर्व येवल धार्मिक नेताओ की पहुंच थी। उप याम मिफ मनवताव या अनुकरण के अतिरिक्त कुछ होता है, इस विचार का उसन अरसे तक जिदा रखा। आज भी डिस जनमानम म प्रतिष्ठित है इसका कारण यह है कि उसकी सुधार भावना के मूल म यह दृढ विश्वास निहित है कि सामाजिक सस्थाओ से कही अधिक महत्व समाज म कुछ “यक्तियापी निजी अच्छाई है। अब यह दूसरी बात है कि डिवे स की यह अच्छाई स्वय एक सापेक्ष और परिवतनशील वस्तु है और डिनेस स्वय इम विषय में गहरी पठ का परिचय नहीं देता। दरअमल उसकी 'अच्छाई' उस युग की परिस्थितियो का अतिब्रमण करने में सक्षम नही कही जा सकती । वहा जाता है और यह सच भी है कि किसी बुराई का सवस प्रभावशाली यग्य उपयास तभी उभार सकता है जब पाठन उसस गुजरते हुए उस धुराई के लक्षण सुद अपने भीतर अनुभव वरने लगे। ग्रेट एक्सपैक्टेशस मै पिप की स्नाबरी का चित्रण इसका अच्छा उदाहरण है। आत्मानुभूत सत्य के कारण इस उप यास वा सामाजिक मम भी ज्यादा प्रभावकारी है। पर डिस की भावुक्ता और अतिरजनधर्मो कल्पना शक्ति किस तरह उसके विवेक पर छा जाती है इसका एक नमूना उस मार्टिन चजलविट नामक उप यास में देखा जा सकता है । अमेरिका यात्रा से पहते वह देश डिकेस के लिए एक ऐसा आदश प्रजातन था जहा यूरोप का वग वैषम्य खासकर अग्रेजा की स्नॉबरी विशेषाधिकार प्रेरित दम्भ और मामाजिक विकृतियो का नामनिशान भी नहीं था। मगर यात्रा से लौटने के बाद उसका उप यास छप कर बाहर आया तो उसमे अमेरीकियो की निदा के सिवा कुछ न था। इससे ऐसा लगता है कि डिकेस की भाव प्रतिक्रियाए, उसका भाव जीवन ही वस्तुत्त स्वावलम्बी और तथ्यपरक नहीं था। जिन लोगो और सस्थाआ के 28 सबद निरतर प्रति वह क्षोभ प्रक्ट करता है, उसके भावनात्मर अतर्जीवन को भीतर- भीतर उही से पोषण प्राप्त होता है । पर इसका यह अथ निश्चय ही नहीं है कि डिके स अपनी भाव रूढिया में आजीवन कैद रहा । उसरे व्यक्तित्व का वह पक्ष जो प्राक औद्योगिक जीवन स्थितिया से जुड़ा हुआ था, भले ही अतित्रात नहीं हुआ, उसका दूसरा पक्ष जो उसको निरीक्षण-क्षमता और स्मृति प्रतीका से प्रेरित था, लगातार पारदर्शी होता गया । डोम्बो एण्ड स स मे रेल के प्रति उसका दृष्टिकोण इसका प्रमाण है। ऐसा प्रतीत होता है कि हर रचनाकार म चाहे उसमे परिवतन की कसी ही तडप क्या न हा, एक सरक्षणशील वत्ति भी काम करती रहती है । वह उस अथ म रेडिकल हो नहीं सकता जिस अथ म एक राजनीतिक व्यक्ति रेडिकल होता है । जिस प्रकार समाज मे जो प्रगति और परिवतन आता है, वह समाज के भीतर के अतविरोध और विभवा तर के कारण आता है, उसी प्रकार एक रचनाकार वी सृष्टि भी उसी तक से उसके भीतर के ही अतविरोघ स विकासमान होती है। एसे भी प्रसग है जहा डिने स अपने समय से पीछे चलता है । वह उन बुराइयो पर क्षोभ प्रक्ट परता दीखता है जो कभी थी ज़रूर, पर अब खत्म हो गयी है। भला कोई समाज सुधारक कभी ऐसी गलती करेगामगर एक उपयास- कार के लिए उसके वचपन का ससार उसके व्यस्त दिनो के ससार की अपक्षा कही अधिक जीव त प्रत्यक्ष हो तो इसमे आश्चय की बात क्या है ? आखिर डिवे स की लोकप्रियता का रहस्य क्या है ? क्या वह सौ साल बाद के पाठको को भी सम्मोहित कर दे सकता है ? सन् 1867 मे कवि विलियम मारिस ने जब समाजवाद के प्रचार के लिए डिकेस की रचनाओ का इस्ते माल क्यिा, उस वक्त समाजवाद की कोई सवसम्मत परिभापा तक स्थिर नहीं हो पायी थी। एक रचनाकार चाहे अपन काल से आगे देख सकता हो चाहे नही, अगर उसको अपने परिवेश मे जडें गहरी हो और कल्पना शक्ति भी दुदम्य हो तो उसकी रची हुई दुनिया विश्वासोत्पादक होगी ही। इसीलिए किसी रचनाकार का राजनीतिक इस्तेमाल करने का प्रलोभन हम चाहे जितना हो, उसकी अनिहित जीव त जटिलता और अनेक स्तरीयता ही उसे बचाती है । उदाहरण के लिए डिवेस के प्रसिद्ध उपयास हाड टाइम्स मे जो सामाजिक दृष्टि है और जो नतिक सरचना है, उस क्या किसी भी राज- नीतिक 'वाद' में बांधा जा सकता है ? साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 29 एक समकालीन जालोचक ने टिके सवी सृजनात्मक कल्पना के बारे मे बडी पत की बात कही है। उसका कहना है कि किसी भी सामाजिक सस्था का डिकेस द्वारा किया गया वणन चाह तथ्य की दृष्टि से क्तिना ही त्रुटिपूर्ण हो, उसके बिम्ब और वस्तु विवरण इतनी गहराई से उभर कर आते हैं-इतने गहरे जुडाव म स-कि पाठन पर जो छाप पडती है, वह सिफ यथाथ वणन की नही एक अतिसमृद्ध और अतिविपुल (Super abundant) यथाथ की पडती है ।' यह अकारण नहीं कि लेवी स्याउस न भी एक जगह कला सृजन की चर्चा करते हुए वस्तु और उसकी कलात्मक अनुकृति के वीच अनिवाय अतराल की (डिस्क्रेपसी की) बात की है और यह मतय प्रकट किया है कि आदिम कलाकार के लिए वस्तु का रूप सवेदन सिफ वस्तु की दृश्यमान वास्त विक्ता तक सीमित नहीं रहता-बल्कि वह मूलत वस्तु की अदृश्य अजस्र सभावना से-उसमी 'सुपर एबडे स से प्रेरित होता है। एलियट न भी कही लिखा है कि रचना शक्ति का उत्स चेतना के उस विदु पर होता है जहाँ अत्यत आदिम और अत्यत सभ्य स्तर आपस मे सयुक्त होत हैं । साहित्य और राजनीति के ससार शायद इसी कारण कभी एक नही हो सकते । क्सिी न कहा भी है कि राजनीतिक अल्पकालीनधम है और धम एक दूरगामी राजनीति । ऐसा लगता है कि रचनाकार अपने स्वधम से इन दोनो की तरफ खिंचता है पर दोनो से समान दूरी भी बनाए रखने को प्रेरित होता है । धार्मिक मनुष्य और राजनीतिक मनुष्य अगर कही सचमुच मिलत और टक राते हैं तो साहित्य मे ही। व स्वथ की कविताआ मे पाठक ने प्रकृति का विस्फोट देखा था। हाड टाइम्स मे कोक्टाउन + चित्रण से गुजरते हुए पाठक को-हम कल्पना कर सक्त है- कि कुछ कुछ उसी तरह का सवेदनात्मक उत्तेजन मिला होगा। अतर केवल इतना ही कि वह प्रकृति का विस्फोट था और यह मानव सभ्यता की एक कारगुजारी का। क्या यह महत्वपूर्ण नही कि साहित्य मनुष्य की एद्रिक मानसिक सत्ता को प्रकृति के साथ क्यि गये हर मानवीय व्यवहार का ऐसा अनुभव करा सकता है ? अगर वह विकृति है तो उसकी प्रतिकूल वदनीयता का भी। कल्पना शक्ति बड़ी निष्पक्ष हाती है वह अनुकूल और प्रतिकूल से, सद्गुण और अवगुण स, बडे पुण्य और बडे पाप दोना म समान रूप से उत्ते जित हो सकती है । पक्षधरता भी उसकी होती है तो अपने ही ढग की हाती है उस वचारिक पक्षधरता स समीकृत नहीं किया जा सकता। एस अत्य त कल्पना प्ररित साहित्य का-उसम रचे गय यथाथ का भी-कुल मिला कर पाठर पर जा प्रभाव पडेगा वह लेखक का उद्दिष्ट प्रभाव ही होगा, 30 सबद निरतर यह कहना कठिन है । वडस्वथ के रचना ससार म डिके स से अधिक विचारो- तेजक्ता है। इसलिए अगर उसका अध्ययन किसी लेजनी स्टीफेन को धम जैसी तुष्टि दे सकता है और क्सिी मैथ्यू आनल्ड को एक समूचा जीवन दशन, तो हमे जाश्चय नही होता। मगर डिवेस? निश्चय ही औद्योगिक काति के बारे मे उनीसवी सदी के उत्तराध मे जो चितन विकसित हुआ, उस पर डिकेस के कृतित्व का कुछ असर जरूर पडा। पर वह वचारिक उत्तेजन उतना नही था जितना कल्पनात्मक । यह भी नितात सम्भव है कि डिके स के अध्ययन ने कुछ लोगो को एसी दिशाएं दी हा जिह डिवे स खुद न समझ पाता या सख्त नापस द करता । खुद डिके स क्सिी समस्या पर क्या दृष्टि- कोण अपनाता है, यह अक्सर तय नहीं होता। एक उदाहरण लें । उनीसवी सदी के राजनीतिक विवादा म एक प्रमुस मुद्दा यह था कि सामाजिक मामला म-नागरिक जीवन म-राज्य को हस्तक्षेप करना चाहिए कि नहीं । या क्सि सीमा तक करना चाहिए । इस चुनौती- भरे प्रश्न पर डिके स का पक्ष क्या था? एक जगह वह बडे जोर स कहता है कि राज्य कभी सही हा ही नही सकता । जव भी राज्य हस्तक्षेप करेगा, वह अनिष्ट ही परिणाम लायेगा।' मगर दूसरी जगह उतने ही आवेग के साथ वह राज्य की सुम्ती और अक्षमता पर प्रहार करता है कि वह इस मामले म चुप क्या है, तत्काल ठोस कदम क्या नहीं उठाता? लिटिल डारिट मे एक सरकारी दफ्तर है जिसका नाम डिवे स न 'सरकमलौक्यूशन जाफ्सि' रक्खा है । वहा के अफसर ऐस है कि वे गरजमदा को सरकारी नियमो से नही, अपनी वर्गीय स्नॉवरी से ही चलता कर देते है । मगर इन सारे दृश्यो की जो छाप हम पर पडती है, वह क्सिी स्पष्ट आलोचनात्मक दृष्टि की नहीं, डिकेम की सजीव कल्पना की, और हास्योद्रेक क्षमता की ही पडती है । पता नहीं चलता कि डिके म उस दफ्तर से आखिर चाहता क्या है ? क्या यह, कि वे अफ्सर सारे नियमो को तार पर रखके मनमाने ढग से कानून अपने हाथ मे ले के हर किसी का काम कर दे ? क्या डिके स एक सरकारी और साय जनिक सस्था वो व्यक्तिवादी बनने की सलाह दे रहा है तब फिर दूसरी जगह अयायी मालिका पर गुस्सा करते हुए यही डिवे स उमी सरकार का यह सलाह क्या दे रहा है कि वह फौरन हस्तक्षेप कर और इस प्राइवेट एण्टरप्राइज' नाम की चीज़ को ही जड से उसाड पवे क्या इन दो प्रतिक्रियाआ म कोई ताविक सगति नजर आती है ? डियेस आखिर क्सि पद्धति के पक्ष म है । वह कसा परिवतन चाहता है ? अपने प्रारम्भिर दौर म दॉम्तॉएवस्वी डिवेन्स से प्रभावित हुआ था। दोना साहित्य और सामाजिक परिवनन कुछ विचारणीय मुद्दे 31 2 के बीच कई समान सूत्र और समान खन्त भी हैं ही। पर डिके स जहाँ भटक जाता है, दॉस्ताएवस्की को असली याया उसी विदु से शुरू होती है। डिके स की कल्पना अनुभव को विचार तक ले जाने में अक्सर अपनी धुरी से खिसक जाती है जबकि दॉस्तॉएवस्की सामाजिक-राजनीतिक परिवतन मम्बधी हर प्रचलित विचार को उसकी ताकि परिणति तक पहुचाए बिना दम नहीं लेता । उसकी कल्पना शक्ति का असली काम तो मानो उसके बाद ही शुरू होता है। इग्लण्ड की सस्कृति ई एम फार्टर के मुताबिक मध्यवर्गीय सस्कृति है । मध्यवर्गीय मूल्या से प्रेरित मस्कृति के वृत्त मे साहित्य और सामाजिक परिवतन के बीच का सम्बध देखने दिखाने के लिए डिके स से अधिक उपयुक्त लेखक जिस तरह दूसरा नही मिलेगा, उसी तरह रूस की मूलत क्सिानी सस्कृति के वृत्त मे साहित्य और सामाजिक परिवतन के सम्बधो की जानकारी के लिए दोस्तॉएवस्की से ज्यादा उपयुक्त लेखक भी दूसरा नहीं दिखाई देता । डिके स के यहा हमने लक्ष्य किया कि अपने काल के सामाजिक यथाय के प्रति स्वय (परिवतन की दशा दिशा के प्रति भी) एक साहित्यकार का रुख इक्हरा नही हुआ करता उसम क सर्वेटिव और रेडिकल दोनो प्रवृत्तिया मिलती हैं । कामू ने द रिबेल मे लिखा है कि 'उप यासकार मानो ईश्वर की विफल सृष्टि से असतुष्ट होकर उसको पुनरचना करता है। वह नियति को नाप तौल कर उसे अपने नियत्रण में लाकर आदश सम्भाव- नामो के क्षेत्र में लागू करता है। मगर इस पर कोई कह सकता है कि जसे ईश्वर की सृष्टि भी प्रकृति की स्वायत्तता का अतिक्रमण करके उसे हर नुक्ते पर पूर्वनियोजित नही करती •उसी तरह उसके मानवीय प्रतिनिधि उप यास- कार के लिए भी यह कसे सम्भव है कि वह इस वास्तव के अराजक ससार को मनमाने ढग से अनुकूलित कर ले। भले। उसकी दुनिया वास्तविक दुनिया की अपेक्षा कही ज्यादा नियमित नियनित हो, उसके पात्र अपनी अलग धुरियां स्थापित कर ही लेंगे। ऐसा करके ही वे उसके अप्रकट और अचेतन उद्देश्यो को भी उजागर करेंगे और स्वय उसके लिए आविष्कार हागे। सस्कृति का स्वरूप ही नहीं, उसकी प्राचीनता का स्तर भी सामाजिक परि वतन की दिशा और गति को प्रभावित करता है। रूस की सस्कृति शेष प्रोप की तुलना म एव विशोर सस्कृति ही कही जायेगी। इस किशोर सस्कृति में जसा कि मथ्यू आनल्ड ने लिखा है एवं ताजगी है, उत्तेजनीयता है, एक अतिरिक्त-सी लगने वाली सवदनशीलता है।' वहाँ के चुद्धिजीवी वा चरित्र भी जरा भिन्न ढंग से विकसित हुआ है । इग्लड म बुद्धिजीवी का चरित्र आमतौर 32 सबद निरतर पर सरक्षणशील, व्यावहारिक तथा सस्था प्रिय है । जहा तक हिंदुस्तान की घपले मे पड़ी हुई, लेकिन मूलत आभिजात संस्कृति का प्रश्न है, यह कहा जा सकता है कि उसके बुद्धिजीवी का चरित्र फिलहाल अपरिभापित और दुविधा- अस्त है । रूस मे पुश्किन की मृत्यु के समय तक एक ऐसा बुद्धिजीवी वर्ग अस्तित्व मे आ चुका था जिसका आत्मबिम्ब हमेशा सत्ताविरोधी और आम जनता की तरफ से सोचने-वरने का दावा करने वाला था। भले ही शुरू-शुरू म ये बुद्धिजीवी समाज के उच्चतर वर्गों से आते रहे हो, पर सन् 1840 तक- जब दास्ताँएवस्की वयस्क हुआ-इस वग पर उन लोगो का वचस्व कायम हो चुका था जो उच्चवग के नहीं थे-नौकरीपेशा और कारीगर वर्गों से आये थे। इन बुद्धिजीवियो मे सबसे ज्यादा प्रभाव बेलिस्की का था। नास्तिक, पश्चि माभिमुख यूरोपियन समाजवाद के आदर्शों से प्रेरणा ग्रहण करने वाला बेलिस्को एक ओर व्यक्ति की स्वाधीनता का पक्षधर था और दूसरी ओर उस की मा यता थी कि साहित्य को सामाजिक अयाय वैषम्य के खिलाफ सघर्प के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए । बेलिस्की के विरोधी खेमे में वे लोग थे जिन्ह 'स्लावोफिल' कहा जाता था और जो यह मानते थे कि रूस को अपना भविष्य स्वय अपने देसी सस्कार और देसी धम-दृष्टि के भीतर से गढना चाहिए, उन्नीसवी सदी के यूरोप के प्रगतिशील और कातिकारी विचारा के प्रभाव से नहीं । ये लोग भी मूलत मानवतावादी थे और रूसी प्रजा की भयावह दरिद्रता इनकी मुख्य चिता थी। यह चिता दॉस्ताएवस्की को जसे विरासत में ही मिली थी। तग कोठरी मे बिताया गया बचपन उसके उप यासो के घुटन भरे, अतिस्नायविक मनोदशाओ को उसी तरह उत्प्रेरित करता दीखता है जिस तरह वि डिके स की रचनाओ को लदन की गदी बस्तियाँ, भीडें, , कोहरा और गदगी। वह युग ऐसा था जब रोमेण्टिसिज्म यथाथ- वाद से पराजित हो रहा था और दोस्ताँएवस्की के कृतित्व मे यह टकराहट साफ सुनाई देती है। दास्ताँएवस्की का पहला उप यास पुअर फोक जब छपा तो बलिस्को ने उसकी बड़ी सराहना की। उसमे वेलिस्की को सामाजिक रूप से प्रतिवद्ध यथाथवादी रचना दृष्टि की विजय दिखाई दी थी। इस उपन्यास का नायक माकर एक ऐसा चरित्र है जिसको अस्मिता उसकी यात्माभिव्यक्ति की चेष्टा से बिलकुल अलग नहीं की जा सकती। एक समूचे सामाजिक वग मे आत्मचेतना के उदय की असदिग्ध सूचना है यह उपयास । इसके बाद छपे दूसरे उप यास द डबल की विषय वस्तु एक्दम भिन्न है । विरोधी विचारो के प्रति दॉस्ताएवस्की के जीवन व्यापी आक्षण को इसम देखा जा सकता है । विरोधी लगावो ये साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 33 .
बीच ही उस मति, उस सयादी सत्य यी गाज यी व्याकुलता इम उपन्यास ो भी प्रेरित करती है जा समम्म मनुष्यामा विरादरी म वापस । इस उपयास स यह भी जाहिर होता है कि दास्ताएवस्ती की दिलचस्पी विचाराम तो है और उपग्रयो विचारा म तो सास पर, परतु उनके राज नोतिर अभिप्राया म उतनी नहीं जितनी उनी साहित्यिक सम्भावनाआमा हाउस आव डेड म दास्ताएवस्वी उस नरव या साक्षात्कार करता है जो व्यक्ति की निजी प्राइवेसी को एक्दम सत्म पर देन स उपजता है। दरअसल अपने बदी जीवन के मुक्त भोग न ही इस लेसव को मानवीय सम्ब घा की निपट जविक उरत का मर्माता अहसास कराया। साथ ही दिमाग में उठने वान तमाम तरह के विचारा को भी अपने दिमाग मच पर नाट्य सजीव परने का~चाहे व परस्पर पिता ही विराधी क्या न हो। यह एव हकीकत है वि दास्तोएवस्वी के सभी महत्वपूण उप यास समसामयिक घटनाआ और वचारिय हलचला म उसकी गहरी और निपट तालालिक दिलचस्पी से ही उपज हैं । परिवतनकारी विचारा का एसा ट्रामा, ऐसी सत्रामक तीमता विसी और उपयासकार म नहीं दीखती। उसम एक उप यास का पात्र कहता है (और यह स्वय लखक की ष्टि प्रतीत होती है) कि आदमी बडे उत्साह पूर्वक कि ही भावा और विचारा पा समर्पित सरता है । मगर इसके बावजूद यह निता त सम्भव है कि इस उलझाव और समपण के बावजूद वह अपनी आत्मा म एवं अविचल बिदु बनाये रख सके जहाँ से वह अपन आपको अपने तमाम विचारो अनुभूतियो और हरमतो को निहायत अनासक्त और साक्षी भाव से देखता रह मवे ।' नाटस फ्रॉम द अण्डर ग्राउण्ड का भी रचनात्मक अभिप्राय क्या है ? यही न कि मनुष्य जाति कभी भी स्वेच्छा मे वह लक्ष्य नहीं चुनती जो तक बुद्धि से उसके लिये फायदेमद दिखाई देता है । वह हमेशा उस उदात पीडा को चुनती है जो उसके व्यक्तिगत बरण स्वात य स जुड़ी हुई है। मनुष्य अपने स्वभाव स ही सामाजिक यूटोपिया द्वारा प्रदर्शित सस्ती सुख सुविधा को अस्वीकार करता है।' दास्तॉण्वस्वी की अतरात्मिक चिता अपन देश की नियति को लेकर थी यह देश जो पश्चिम यूरोपीय विचारधाराओ से आक्रान हो रहा था-नास्तिव समाजवाद जिसके बुद्धि जीविया को प्रेरणा दे रहा था। वह यह देश था जिस म उसपी आया व सामन आर्थोडॉक्स चच वे परम्परागत ईसाई जीवन मूल्या का लगातार क्षरण हो रहा था और मनुष्य को सवत न स्वतन मानने 34 सबद निरतर की प्रवृत्ति जड पाइ रही थी। मानो अपन लोगा की इस दुखद भावी के प्रतिकार स्वरूप ही उसने मिश्किन को गढा--एक साधु चरित्र को। मिश्किन म जो आशा है, जो दीप्ति है, वह मानो स्वय अपनी अनास्थामूलक प्रवृत्तिया से जूझते हुए दाम्तॉएवस्की की छटपटाहट है। जास्था के लिए छटपटाहट । इसके बावजूद दॉस्ताएवस्ती जपने देश के भविष्य को लकर गहरे म शकाशील ही बना रहा न केवल शकित, बल्कि हताश भी। अपने समकालीन कातिकारियो के प्रति-जो समाज व्यवस्था को आमूलचूल बदल डालना चाहते थे-दाँस्ताएवस्ती का क्या रख था? यहाँ भी हम एक तरह की भावात्मक द्विविधा देख सकते है जिसे हमने डिकेस में लक्ष्य किया था । अच्छे साध्य के लिए हर साधन को जायज मानने वाली विचार दृष्टिया उसकी धार्मिक सवेदना का सख्त नापस द थी। पर उसकी कल्पना इन खतरनाक विचारा और व्यक्तित्वो के आवपण से अभिभूत भी हो जाती है। एक तरफ ये बुद्धिजीवी उसी उसी तरह उसके व्यग्य विद्रूप और भत्सना का आखेट बनते है जसे कि का दीदका पादरी पैगलौस वाल्तेयर के लिए। दूसरी ओर भीतर ही भीतर उसके मन म इन आतकवादिया के प्रति एक अजीब से आक्पण और अद्धचेतन सराहना की वृत्ति भी काम करती रहती है । किसी निपिद्ध फ्ल के आक्पण की तरह । यह द्वैत, यह अतविभाजन उसकी महत्व पूण कृतियो मे वराबर दिखाई देता है-एक द डेविल्स को छोडकर । प्रदस करमाजोव मे ईवान का जो चरित्र है उसम स्वय दास्तॉण्वस्की के गहरे अतद्व ह का मत प्रमाण बोलता है । तीना भाइया के बीच जसे उसने अपने आपको बाट लिया हो। हत्या भले ही स्मड्याकोव ने की हो, पर ईवान मानसिक स्तर पर उसके अपराध का भागीदार है। इस भागीदारी स वह पिंड नहीं छुडा सक्ता। द पजेस्ड में जो आशावादी और सकारात्मक पक्ष है वह स्वानुभूत होत हुए भी सजनात्मक दृष्टि स बहुत आश्वस्त नहीं करता । इसके विपरीत उसका जो नराश्यमूलक, प्रोफेटिक स्वर है, वही हमारे और उसके भी सिर चढ के धोलता है । यह भवितव्यदर्शी अतर प्टि क्या है ? यही, वि उमके युग की प्राप्तिकारी महत्वाकाक्षाएं जा बिना किसी धार्मिक सवेदना या नतिक मानदण्डा के-कम को नतिकता के सवाल का ही पर हटा कर--मानव मुक्ति के सपने देखती हुई राजनीतिक स्वाधीनता के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहती है, उनकी परिणति- यह तय है कि बहुमत पर अल्पसख्यकावे निरखुश अत्याचार म ही होगी। बीसवी सदी की तानाशाही व्यवस्थामा ने दॉस्ताएवस्वी की इस अतह प्टि को सही साबित कर दिया है । अजीव लगता है कि जिस ने अपना साहित्यिक साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 35 जीवन गोगोल स भगडत हुए शुरू किया था, उसने अतत गोगोल से ही सधि कर ली। अदस फरमाजोव म उसने प्रासीक्यूटर से जूरी के सामने जो वक्तव्य दिलवाया है वह डेड सोल्स म व्यक्त विचारा स बहुत भिन्न नहीं है। . दास्ताएवस्ती डिस से प्रभावित जरूर था। पर सामाजिक समस्याओं के प्रति उसमा लगाव विश्लेपणात्मक है। सुधार नहीं है वह, उस के सरोकार ज्यादा दूरद्रप्टा और मूलगामी है । उसबै रचनात्मक चिन्तन की प्राधार रेसा मानवीय पतन की पराकाष्ठाआ स बनती है और ईसा मसीह के रूप में मनुष्य की आध्यात्मिक मुदरता उम विभुज का शीप है। द बदस करमाजोव म उसन दिमित्री के मुख से जहा एक ओर यह व्याकुल प्रश्न पुछवाया है कि अगर सब का उद्धार नहीं हो सकता ता एक अकेले की मुक्ति का क्या अथ है ? वही दूसरी जगह यही दिमिनी हम यह भी बतलाता है कि 'सो दय मानव भावनाओ का एक समूचा वणपट है जिस का एक छोर नतिक पवित्रता स और दूसरा छोर उसी मनुष्य की चरम विकृति और पापाचरण से बना है।' इमम स देह नहीं कि मनुष्य एक सामाजिक और राजनीतिक प्राणी है । रितु वह अपन सामाजिक राजनीतिक होने के अथ को भी अपनी वैयक्तिकता में चेतन बिदु पर ही अनुभव करता और समझता है। क्या ही विरोधाभास है गि उपयास विधा का जम जिस सामाजिक परिवतन की दहलीज पर- औद्योगिक क्राति के आसपास हुआ, उसी ने अपने विकास के अगले मोपानो पर इस विधा को अपने कायावल्प के लिय भी मजबूर किया। जिस उपन्यास ने मानव व्यक्तित्व और मानव-सम्व धा के बार में हमारे ज्ञान को गहरा और विस्तृत किया था, उसी ने कालातरम अपना ध्यान चरिन चित्रण, मनौवनानिय विश्लेषण और सामाजिक अध्ययन से हटा कर स्मृतिलोक और मिथवीय आयामा के अनुसधान पर लगाना शुरू कर दिया। सबसे इतिहास धर्मी विधा गबस अनैतिहासिक प्रणालिया अपनान नगी और किसी महज स्पताविप नवीनता की खातिर नही, वरिक स्वय यथार्या वेपण के दबाव से ही । क्या यह जवारण मयोग है कि जब उपयास अत्यात सामाजिक' था, तब उसम अत्यत गुपरिभाषित यति चरित्र हात थे और जब उपयास प्रस्त, जाइस कापा देना शुल्ज आदिवे जरिए उस सामाजिक यो धुरी स खिसक पर एव वयक्ति विजन को सप्नेपित करने लगा, तब उसय चरित्र और सम्पूर्ण सरचना भी अधिन रूपक्यात्मक स्वप्नचरित्री, समष्टिमूलर और मिपिक्ल होन लगाएर दूगरी नजर स दखें तो कहा जा सकता है कि उपयास बिना मा निरतर 36 अपनी औपयासिकता को-अपनी समष्टिगत प्रेरणा को-छोडे बगर, बल्कि और भी साद्र-एकाग्र ढग से समष्टिमूलक बनते हुए अपने प्रभाव म पाव्य के निवट आता गया एसा क्यो? इस लेख के आरम्भ मे वड् स्वथ का उल्लेस हुआ है । आधुनिक अंग्रेजी कवि स्टीफन स्पेंडर ने अपनी आत्म कथा वल्ड विदिन वल्ड में तीसी के दशक वे अपने अनुभवा को स्मरण करते हुए लिखा है कि उस वक्त कई लेखका ने 'इटरनेशनल ब्रिगेड' मे शामिल होकर मृत्यु का वरण विया मगर जो लोग पीछे बचे रहे, उन लोगा ने भी अपनी लेखकीय प्रतिभा को एव ऐस राजनीतिक उद्देश्य का अनुगामी बना दिया जो घोर तात्कालिक था। जव वि अमली जरूरत उस वक्त वयक्तिक राग सत्य की-इडिविजुअल पशन की-थी जो उस विकराल कालखड का एक जिदा साक्ष्य रचती-उस समय को अपनी निजी, प्रामाणिक अनुभूति के भीतर से अवतार देती । स्पेंडर ये शदा मे 'एक विभाजित पीढी के ये लेखक पहले तो अपनी अवस्थिति के प्रति जागरूक हुए और तत्पश्चात् अपनी उस दुलभ मूल्यवान् जागरूकता वो उहाने महज राजनीतिक उपाया की तलाश की समस्या मे अवमूलियत परवे रख दिया । जब कि उस वक्त जरूरत थी एव दोस्तॉएवस्वी की-जो उस समय ये आध्यात्मिक रक्त कोच म सना जाकर अपनी आवाज पाता, या फिर किमी वॉल्तेयर की, जो पातिवारी दष्टिकोण रखता हुआ भी दोना पक्षा को ममान दूरी से और एक सो निस्सग निममता मे पटवार सकता। स्पेंडर स्वीकार करता है कि एक लवर के लिए इस भरोमे म रहना, पि उमपी वयक्तिक स्वाधीनता को पुष्टि मिल मरती है अगर वह प्रगतिशील तापता के साथ अपो को जोडे, यह तो स्वाभाविक है। पर, उमये अनुसार-'यह विश्वास उस विश्वास से बुनियादी तौर पर भिन्न है जिसके तहत एक सय यह सोचन लगता है कि उस का जीवन अब एव यत्र भर है जिस राजनीति बर्मी एक साधन की तरह इस्तमाल कर मकता है । निश्चय ही एक बेहतर दुनिया के लिए सघप आवश्यक है । पर उस सपप ये भीतर एक और दूसरा अपिर दूरगामी सयप भी अनिवाय है । और यह दूमरा सघप उस दूरगामी मूल्या की चिता करने वाले व्यक्ति के तथा उन दूसरा के बीच होता है जा तात्कालिन राजनीनिय लक्ष्या की पूर्ति के लिए हर सम्भव माधन वा इस्तेमाल करन से नहीं हिचवत । इमसे कोई पर नहीं पड़ता कि व लय अपने आप में अच्छे हैं । सामाजिव मनुष्य की अवधारणा मानव व्यक्ति का ही न निगल जाय, इससी चिता भी जरूरी है ज्यादातर प्रातिरारी सुपारपाका रा बना और मृगाना मर माहि य ये mfarmins कm 11 प्रति द्रोहण रहा है। वा स्वयं अपन पर लगाय जात रहे एनिहामिन अभियोग व प्रति उसीन नहीं रह सकी है। आधुनिम युग मे ता स्वय क्लासाराम जपनी लार र बरवाशेम' अमर नजर याती है । नतत्वशास्त्रीय दृष्टियाण का उल्लस ऊपर हुआ है स्वय लवी पाउस पा प्टिकोण आधुक्ता प्रति अत्यत आलोचना मय है। उसके अनुसार जसला समस्या है समाज मपला या उसी जायज़ जगह दिलाने की~उस पूरे समुदाय र उपयाग यी वस्तु बनाने की-जमा पि आदिम समाज म हाता था। क्यारि पलार युट मन ही मन अपनी पला की सामू हित निष्प्रयाज्यता या समझता है और जान समाज के उपजाऊ कायपलापा रो, उसके जिय जा रह जीवन से अपने को बहिष्कृत-मा पाता है, अत वह दुनिया भर की कला शलिया पर हाथ नामाता फिरता है। अपनी बद हवासी मा लेवी स्नाउस के मुताबिक यह क्ला अमप्रेष्य और यथ है । अमृत पला ही क्यो, विता और उप याम कला तपब मार में वह यही आरोप लगाता है। लेवी स्माउस ने समूची आधुनिर कला के इतिहास म यह असगति दगी है, सामाजिक परिवतन के साथ क्ला के निरतर निष्प्रभावी हात जान की विडम्बना । चिाक्ला के सदम मे उसका विचार है कि इम्प्रेशनिश्म एक प्रतिक्रियावादी प्राति थी। पाश्चात्य कला का वही पजेसिव रिप्रेजेंटेटिव रख यहा भी लक्षत बचा रहता है । क्यविज्म को वह इतना श्रेय जरूर देता है कि उसने कम से कम बलाकृति के अथ सत्य (समेण्टिक टूथ) को फिर स खोजा तो सही। पर जो तीसरी सबस बड़ी चुनौती थी उसका हल ढूढन में वह भी असफल रही। लवी साउस के हो शता म-- बलात्मक उत्पादन की शर्ते व्यक्तिमूलक ही रही आई। इम्प्रेशनिरम ने एकेडेमिसिज्म को तोडा, क्युविज्म ने रप्रेजेंटशनलिज्म को।पर क्ला को साथ बनान के रास्ते का सबसे बडा रोडा यक्तिवाद ता जहां का तहा रहा।' लेवी स्याउस न यहाँ पर एक बडी विचारोत्तेजक बात कही है और वह यह कि शास्त्रीयतावाद और जनुकरणवाद से लडना आसान है क्याकि वे उस व्यवस्था का जग है जिसे माक्र्सीय शब्दावली मे सुपरस्ट्रक्चर' कहा जाता है । पर जहाँ तक कलाकृति की सामुदायिर साथक्ता कामामुदायिक मौत गर्भिता और साम्प्रेप्यता का पक्ष है वह तो 'इ प्रास्ट्रक्चर' स ही सम्बधित है । इस स्तर पर चला समाज वनानिक यथाथ स बंधी हुई है और उसे बदलने म-उस के साथ साथ चलत हुए उसकारचनात्मक नियमन कर सकते म बममय है । यही असली गतिरोध है। एक बात वह और कहता है इसी 38 सपट निरतर सिलसिले मे, कि सभी कनाओ म--साहित्य मे भी लोग बडे प्रयत्नपूर्वक नये नये रूपो शलिया की सोज करने में जुटे हुए है । पर वास्तविक परिवतन, वास्तविक सृजानात्मक सिद्धि तो अद्धचेतन स्तरा पर रूप सजना द्वारा ही सम्भव होती है। लेवी स्नाउस की इन वाता की प्रासगिवता को लश्य करते हुए भी यह स्वीकार करना कठिन है कि जिस वह 'अवचेतन का सहयोग' कह रहा है, वह द फैसिल, यूलिसीज या फिनिग स वेक जसे उप यासो मे अथवा यीटस की सेकण्ड कमिग जसी कविताओ म सक्रिय नही हुआ है । क्लात्मक सृजन की व्याख्या करते हुए वह जहा एक ओर वस्तु और उसके कलात्मक प्रतिरूप के बीच एक तकनीकी असमानता (टकनिकल डिस्परिटी) की बात करता है और विनान के जरिए उस क्ला सम्भव डिस्पैरिटी में लगातार क्षीण पडते जाने की शिकायत भी करता है, वही वह आदिम समाज की स्थिति में स्वय वस्तु मे निहित भूमा (सुपर एबडे स) का विचार भी सामने रखता है और कहता है कि यह 'सुपर एवडेस आफ द आब्जेक्ट उस मृजनात्मक अतराल का पुन सृजन कर देती है और इसका कारण यही है कि आदिम समाज के लोग सिर्फ एक प्राकृतिक समार मे नही रहते वे एम अतिप्राकृत (जलोविक) संसार में भी रहते है। यह सच है कि आरिम सस्कृति का यह जो सुपर नेचुरल सदा सुलभ था, यह आधुनिक सम्यता के सदस्य को नहीं हो सकता । पर दूसरी ओर यह भी है कि जिम वज्ञानिक प्रगति न वस्तु वी उस सुपर एवडाम' और रहस्यात्मकता को छीना जोर उस कला सम्भव अतरान को भी अधिकाधिक पाट दिया, उसी विनान का स्वय बीमवी सटी तप जाते-जाते कायाकल्प होता गया है। दूसरी तरफ साहित्य ने भी वस्तु वी इम सुपर एबडे म' को न सही वस्तु और उसके चला रूपातर के बीच अतराल का फिर म सोजने अत्यत मौलिक एडवेंचर तो क्यि ही हैं । क्या यह सच नहीं है कि जम्स जाइस की प्रौढ कला में सामाजिक और सामुदायिक दृष्टि से अत्यात समृद्ध साकेतिकता है और यह मतगी क्ला मान रूपताभिक उपलब्धि या असली समस्या से पलायन की चेप्टा हरगिज नहीं है । बत्वि कला की नमष्टिगत साथक्ता को उसे फिर से लौटाने की साधना है और वह मायना भी क्ला भी अपनी शतों पर ही। मुझे कम से कम ऐमा लगता है कि यूलिसीज इस दृष्टि मे वेस्ट लड से अधिर महत्यपूर्ण रचना है । इमो तरह मुझे यह भी लगता है कि रॉबट लॉवेल की काव्य कला की अपेक्षा सानवला की उपयास रचनामामाजिक परिवतन के अतरास्मिन परिणामो को न येवन ज्यादा गहरे सप्रेषित करती है बल्कि इम साहित्य और सामाजिक परिवतन कुछ विचारणीय मुद्दे 39 परिवतन के समतोल और ममरक्ष क्ला हप वो भी अवेपित करती है। इस तरह अमूत क्ला पर लगाया गया लेवी म्याउम का यह आरोप, कि वह क्लाकृति की सामुदायिक उपयोगिता और अर्थ या पुन मृजन नहीं करती, कम से कम चोटी के आधुनिक उपयासकारा पर लागू नही होता । यह अकारण नहीं कि आन द कुमारस्वामी या दृष्टिकोण भी नृतत्वशास्त्रियो की तरह ही आधुनिक बला के प्रति नकारात्मप ही है। उनका कहना है कि आज की परिस्थितियो मे क्ला एक विलास बन गयो है जब कि यही क्ला किसी समय ज्ञान का साधन थी-~~एसे 'ज्ञान' का, जिसके द्वारा मनुप्य की भौतिक और आध्यात्मिक जरूरता की पूर्ति होती थी। यह बात गौरतलब है कि कुमारस्वामी का यह अस तोप सुधारको वाले अस तोप से एक दम मिन है। उनके अनुसार 'वग चि तक और ममाज सुधारण सस्कृति के विषय म फ्ली भ्राति से स्वय कदापि मुक्त नहीं हैं । उनका आगोश केवल उस आथिर परिस्थति को लेकर प्रकट होता है जो उन्हे जिन्दगी की उन नियामता से वचित रखता है जो अमीरो को सहज सुलभ है। श्रमजीवी भी क्ला सग्राहको और क्ला प्रेमियो खोगलेपन को आर पार देखने की बजाय उनके प्रति इा भाव से परिचालित होने लगता है । सच्ची बात तो यह है कि समाज सुधारव और कातिवादियो का इप्टिकोण भी पूर्वा दृष्टिकोण की तरह ही भावुक और आदशवादी हुआ करता है। यथाथपरक या सत्यापही नहीं। जब कि जीवन की जिस धमष्टि की वे भत्सना करते नहीं पकत, वही वस्तुत सच्चे अर्थों मे व्यावहारिक और उप योगितामूलक दृष्टि है। कुमारस्वामी के मतानुसार आर्थिक लाभ की दृष्टि से सठित औद्योगिक समाज की सरस बडी विडम्बना यही है कि वह प्रत्येक मनुष्य को उस याय से वचित करता है जो उसकी वास्तविक मनुष्यता की असली ज़रूरत है। ऐसा हर समाज अनिवायत शेष मानव समुदाया के प्रति शतान का-सा सुलून करता है । लेवी स्त्राउस की ही तरह कुमारस्वामी भी व्यक्तितवाद के विरोधी हैं। वह कहते हैं 'वग वपम्य को मिटाना चाहले वाल व्यक्ति को जिस अघि कार की मांग सबसे पहले भरनी चाहिए वह है-~~-जो कुछ भी वह बना सकता है उसके निर्माण को पूरी मानवीय जिम्मेदारी।' और कुमारस्वामी मानत हैं कि ऐसी मांग सिफ शोपित की भूमिका पर खड़े हो के नहीं की जा मस्ती। इस माग का मतलब है कलाकार द्वारा ममाज मे अपनी वास्तविक भूमिका निवाहने के अवसर की मांग । 'शोपित यो यह समझ लेना होगा कि उत्पादन साधना के स्वामित्व का प्रश्न मुख्यत आध्यात्मिम धैय स जुड़ा हुआ है सरद निरन्तर 40 और गौणत ही आथिक याय से । अगर उसका लक्ष्य मान रोटी द्वारा जीने का है तो फिर वह उस बूर्वा पूजीपति से किस मानी मे बेहतर है, जिससे वह नफरत करता है ? कुमारस्वामी का क्ला चिनन मध्यकालीन ईमाई तत्त्वचि तन तथा पूर्वीय चितन का पास पास रख कर उनम सगति विठाता है। कामू ईसाई और मार्सीय चितन को लगभग पास पास रख के प्राचीन यूनानी विश्व दृष्टि को उन दोना के विरोध मे खडा करता है। उसके अनुसार यह चि तन की ईसाई पद्धति ही है जो इस निष्क्प पर पहुचाती है कि मनुष्य का इतिहास ही सर्वोपरि है । इतिहास की अवधारणा, पाप और दड की अवधारणा ईसाई- यत की ही तरह माक्सवाद को भी अनुपाणित करती है। कामू यह भी मानता है कि 'ईसाई प्टि ने मानवता और प्रकृति के बीच के नाजुक स तुलन को इतिहास नाम की चीज के हित म छिन भिन क्यिा।' यह भी, कि जिस क्षण ईसा की दिव्यता को अस्वीकार करत हुए जमन आइडियोलॉजी ने उसकी प्रतिष्ठा मानव देवता के रूप मे की उसी क्षण मध्यस्थता की अवधारणा विलुप्त हा गई और इतिहास पूजक यहूदी विश्व फिर से हावी हो गया। फिर तो सौ दयतत्व से ही विदकने वालो को नतिक आवेश की आड आसानी स सुलभ हो गयी। कामू इसीलिये व्यगपूवर माक्स को इस नये इतिहास देवता का 'जरमिया कहता है और सेण्ट आगुस्टीन का इस शाति- वाद का अग्रदूत । अर्थात् कामू ईमाई चि तन मे वह एकता की ('सोलिडरिटी' को) भावना नहीं पाता जो स्वय उसके कृतित्व और सोच विचार का मूलाधार है और जिसका उल्लख मन इस लेख के आरम्भ मे किया है । उसके अनुसार यूनानी वितन मध्यस्थता के विचार को अपनाता है और तथाकथित सम्पूणता (टाटलिटी) की उस एतिहासिक अवधारणा मे अनजान बना रहता है जिसे ईसाइयत न मिर पर चढाया और जो आज अपने घमस्रोत से उच्छिन हो कर समूचे यूरोप के जीवन और संस्कृति को नष्ट भ्रष्ट कर देने पर उतारू है। लेवी स्त्राउस ने भी यलपूर इस तथ्य को रेखाक्ति दिया है कि 'व्यष्टि और समष्टि (डिविजुअल और क्लेस्टिव) का पाथ वय वेवल पश्चिमी ममाजो के मदम म ही प्रासगिक है। एक और मानव व्यत्ति तथा समुदाय तथा दूसरी ओर चेतन तथा अवचेतन वे सहन सह्मोग से विस तरह एक आदिम सस्कृति मै वला का समष्टिमूलक मृजन और व्यवहार होता है, इसके साहित्य और सामाजिर परिवतन कुछ विचारणीय मुद 41 उदाहरण स्वरुप उमन बस्तर के आग्विामियों के बीच प्रचलित एव प्रथा का उल्लेख किया है जिमम ममाज मिमी मरम्य वो कोई शारीरिक अथवा मानसिक बप्ट हो पर एक विशिष्ट सम्म्य योजो ओभा और मलावार एव साय होता है-गुलावा भेजा जाना है। यह ओभा अतिमि वन पर एक रात रोगी घर पर ठहरता है। वहाँ उस रात वह जो स्वप्न देखता है उसो आधार पर पर वह रोगी की दीवाल पर चित्रावन करता है। इसका अभिप्राय यही हुआ रियला या ता र उम 'मान' से, उस मुक्ति विद्या और सहयोग विद्या में है जो मनुष्य को वयक्तिरता और सामाजिकता के बीच प्राकृतियता और सास्कृतियता के बीच सामजस्य उत्पन्न करती है। वामू के पूर्वोल्लिवित एक्य' (Solidarity) वे विचार से भी इस बात का सम्बध देखा जा सकता है। नतत्वशास्त्र यो उस मामता का भी यहाँ पर फिर से यार करना जरूरी होगा जिसके अनुमार सभ्यता के इतिहास में लेखन कला का आविष्कार सत्ता हथियाने भौतिक साधना पर कब्जा जमान और मानव समूहा पर शासन करने या हथियार बना। लेवी स्त्राउस जसे वजानिक इस घटना को क्ला के तिहास म एर दूरगामी अनिष्ट परिणामों वाली घटना मानते है और वतात है कि लेसन र आविष्कार नै ही क्ला को भी आकृति मूलकता को जोर उमुख क्यिा क्योमि लेखन के हथियार ने ही जादमी का यह सिखाया कि भाषिक मवेत सिफ बाहरी विश्व को सूचित परन के लिये ही प्रयोग में नही ताय जा सकत, बल्कि उस विश्व को स्वायत्त करने उस पर कब्जा जमाने के लिए भी बड़े कारगर सिद्ध होत हैं । स्पष्ट ही लेवी स्त्राउम की दृष्टि मे यह क्ता के मूल जय 7- योगिर मूल्यवत्ता ३-भ्रश की शुरूआत थी । यह गौर करने की बात है कि तेवी स्त्राउस इस पतन के लिए विशेष तौर पर पश्चिमी सभ्यता को ही जिम्मेदार ठहराता है । कुमारस्वामी का मत हम पहन ही यहाँ उद्धत कर चुके हैं । कामू वै विद्रोही चितन म निहित दाशनिक दृष्टि की चचा करते हुए उसकी आलाचना का उल्लेख भी इस लेख म हुमा है । उसम अब बस इतना ही और जोडना होगा कि लेवी स्नाउस के मतानुसार 'मानिका या कला दशको के हित मे वस्तु का हथियान व उस पर कब्जा जमान की यह तृष्णा और महत्वासाक्षा ही पश्चिमी सभ्यता द्वारा उपजायी गयी क्ला की सबसे विशिष्ट और मौनिक पहचान है। . हमार अपन परिवेश मजलि हमारा समाज उथल-पुथल के एक व्यापक दौर से गुजर रहा है माहित्य जार सामाजिक परिवतन के सम्बध की वास्त- 42 मरद निरर विक्ताओ का विचार आवश्यक है, मात्र इच्छित चितन से प्रेरित तक जार या वाग्विलास नहीं। इसके लिए उपरोक्त सदर्भो को ध्यान म रखना उपयुक्त होगा। न केवल माना पान की दृष्टि स, अपितु दिगा ज्ञान के लिए भो । अ तत दिशा ज्ञान हो और सारे क्षेत्रा की तरह इस क्षेत्र म भी महत्व रखता है। किसी भी समाज के मस्या को एक दूसर स जोडे रखने वाली चीज़ आसिर वह ऊर्जा हो तो है जो उ ह समान आदर्शों और लक्ष्यों की दिशा म गतिशील रगती है। क्या ऐसे समान आदश और लक्ष्य भारतीय समाज के सामन है और क्या वे उसे गतिशील बनाते है? क्या वे समान आरश और लक्ष्य वास्तव म ऐसे हैं, कि कहा जा सके उनमे पूरे समाज की सगुण मत्ता का स्पदन है-उसमी वास्तविक स्मिता का साझा है ? क्या उस ऊजा को हमारे साहित्य की सानी से पहचाना या परिभाषित किया जा सकता है । यह भी कि क्या आज साहिय वास्तव मे इम स्थिति म है कि वह जन-मानस को वाछित परिवतन की दिशा म प्रेरित प्रभावित कर सवे या कि उसे वसी (मसलन दास्तॉएवस्वी या डिके स जसी) जतरात्मिक चेतावनी और निशा नान सुलभ कर सके । एक प्रश्न यह भी कि हमारे यहा बुद्धिजीवी धग को क्या कोई वास्तविक भूमिका-स या फ्राम या कम से कम दग्लण्ड तुलनीय रही है ? अगर हा, तो इस बग का मृजनात्मक साहित्य से क्या कोई जागृत सम्ब व है ? अगर नहीं, तो लेयर और समाज के वीच यहाँ किस तरह का सम्बव(क्रिया प्रनिश्यिाओ और अपक्षाआ का)रहा है ? किमी अ य वचारिय भावनात्मक उथल पुथल के काल म मसलन भक्तिमाल मे-माहित्य और समाज का क्सा क्या सम्बव रहा? जाज की स्थिति म उसकी तुलना करने पर क्या कोई मागदशक सूत्र खोजे जा सकते हैं ? अय क्षेत्रा के सस्कृति कमिया के बीच हमारे साहित्यकार की क्या स्थिति है ? हमारी परम्परागन सस्कृति मे साहित्य की क्या स्थिति रही और आज के मास्कृतिक परिवेश में वह कमी है ? परिवतन के दो प्रमुग्न घरका-विज्ञान तथा राजनीति के प्रति भारतीय जनता या तथा भारतीय साहित्यकारो का विम तरह का दृष्टिकोण रहा है ? दानिक चितन के स्तर पर देश और ममाज के सम्मुख जो चुनौतियो रही है-उसका क्या मचमुच उत्तर दिया जा सका है मगर हो तो ऐमे चितन का माहित्यकारा की रचना पर कमा क्या प्रभाव पड़ा या नहीं पड़ा? स्वय ऐसे चितका के साथ, जो राजनीति के क्षेत्र म प्रभावशाली रह है-- लेमका के किस तरह के मम्ब घ रहे हैं ? दूसरे नाम-लेसका के बीच किस तरह का राजनीतिर चितन अधिक प्रभाव डालने वाला रहा है और क्या ? इन राजनीतिकर्मी चिता का देश की माहिय और मामाजिन परिवर्तन कुछ विचारणीय मुद्दे 43 सास्कृतिक परम्परा से किस तरह का सम्मघ रहा है ? विशेषपर आज के ममय मे हमारी राजनीति, माम्मृतिय परिस्थिति और रये जा रहे साहित्य के बीच क्या और कम सभ्य ध हैं ? क्यामि प्रस्तुत विषय के विवेचन के लिए यहा उप याममारो को विशेष रुप से चर्चा हुई है यह प्रश्न भी अतत विचारणीय होगा ही पि हमार पाठय समाज म मिस तरह के उप यास परे और सराहे जात है ? और यह भी, पि उपयास से हमार ममाज की अपे क्षाओ या धरातल क्या है ? वत्मल निधि मेखक शिविर दादावन १.९२ में पहा गया रेष । 44 सवद निरतर आस्था, सशय और सृजन औसत इसान को एकीकृत और समग्र रमने के लिए आस्था की आवश्यकता होतो है । आस्या वह तत्व है जो व्यक्ति के विभिन अगो और वृत्तियो को एव प्रयाजन मे जुटा देता है। लेकिन गतानुगतिक विश्वास म आस्था है, यह कहना मुश्किल है । आस्था थी कसौटी प्रश्न है उसकी खुराक भी यह प्रश्न ही है । जव मन म प्रश्न नही उठता तो यह आस्था नही, जडता है आस्था ही है जो बुद्धि और तक का पूरा लाभ उठाकर भी उह गति मे बाधक नहा बनने देती, उलटे साधक कर लेती है । जनेद्र कुमार [साहित्य और सस्थति] लागा की मूसता हर चीज़ का जवाब पालने मे स प्रकट हाती है । उप यास को बुद्धिमता हर चीज़ के आगे एक प्रश्न उठाने म निहित है। उपयास हम ससार को एक प्रश्न के रूप में स्वायत्त करना सिसाता है । इस दृष्टि में बुद्धिमत्ता है और सहिष्णुता । इसके विपरीत सवसत्तावादिया की दुनिया- चाहे वह माक्स, इस्लाम अथवा क्सिो भी अय बुनियाद पर क्यो न खडी हो-प्रश्ना के बदले बने वनाए उत्तरो की दुनिया होती है। वहाँ उपयास के लिए कोई जगह नहीं। मिलान कुदेरा [पिलिप रोथ से बातचीत] हिंदी के एक वरिष्ठ साहित्यकार न कुछ वप पूर्व एक समस्या सामने रक्खी थी वतमान हिदी लेसन मे जो नास्था, जो टूटन दीख पडती है, उसके बीज रहा है ? पश्चिम के साहित्य में अनास्था का भी एक लम्बा सिलसिला देखा जा सकता है कि तु भारतीय साहित्य की परम्परा में तो कही उस तरह भी अनास्था नहीं है, फिर एकाएक अनास्था यस प्रगट हो गई ? दो ही बातें हा सकती हैं । या तो यह अनास्था सकण्ड हैण्ड है अनुकारी है, या फिर मानना होगा कि जिसे हम आस्था का साहित्य, आस्था की परम्परा यहते है, यह वसा नहीं है उसी मे अनास्था के बीज थे। इस तरह उठाया जापर यह प्रश्न थोडा अटपटा भले लगे, अनगल यह हा कहा जा समता । या देखे तो मनुष्य को ध्याप सक्ने वाले समय की पौतशी 43 मारतिय परम्परा से मिग तरह या मम्म प रहा है ? विशेपवर आज र ममय म हमारी राजनीति, मामतिर परिस्थिति और रचे जा रहे साहित्य के बीच क्या और मम सम्बध हैं ? क्यापि प्रस्तुत विषय के विवचन व लिए यहां उप यामयारो की विशेष रूप सर्ग हुई है, यह प्रश्न भी अतत विचारणीय होगा ही वि हमार पाठा ममाज म पिस तरह वै उप यास परे और सराहे जाते हैं ? और यह भी, मि उपयास से हमार समाज की अपे क्षाआ का धरातन क्या है ? परमार निधि सेवक शिविर दादावन १९८२ पटा गया रोष । 44 मरद निरतर आस्था, सशय और सृजन औसत इसान को एकीकृत और समग्न रसन के लिए आस्था की आवश्यकता होती है । आस्था वह तत्व है जो व्यक्ति के विभि न अगो और वृत्तियो को एक प्रयोजन मे जुटा देता है। लेक्नि गतानुगतिक विश्वास में आस्था है, यह कहना मुश्किल है । आस्था की कसौटी प्रश्न है, उसकी खुराक भी यह प्रश्न ही है । जव मन मे प्रश्न नही उठता तो यह आस्था नही, जडता है । आस्था ही है जो बुद्धि और तक का पूरा लाभ उठाकर भी उ ह गति म बाधक नहीं बनने देती उलटे साधर कर लेती है। जैने द्र कुमार [साहित्य और सस्कृति] लागो को मूसता हर चीज़ का जवाब पा लने म से प्रकट हाती है । उप यास की बुद्धिमत्ता हर चीज के आगे एक प्रश्न उठाने म निहित है। उपायास हम ससार को एक प्रश्न के रूप में स्वायत्त करना सिखाता है । इस दृष्टि म बुद्धिमत्ता है और सहिष्णुता । इसके विपरीत सवसत्तावादिया की दुनिया- चाहे वह माक्स, इस्लाम अथवा किसी भी अन्य बुनियाद पर क्यो न खडी हो-प्रश्ना के बदले वने उनाए उत्तरो की दुनिया होती है। वहां उपयास के लिए कोई जगह नहीं। मिलान कुदेरा [फिलिप रोथ से बातचीत] हिदी के एक वरिष्ठ साहित्यकार न कुछ वप पूर्व एक समस्या सामने रक्खी थी वतमान हिदी लेखन म जा अनास्था, जो टूटन दीख पडती है, उसके बीज पहा है। पश्चिम के माहित्य मे अनास्था का भी एक लम्बा सिलसिला देखा जा सकता है कि तु भारतीय साहित्य की परम्परा मे तो कही उम तरह की अनास्था नहीं है, फिर एकाएक अनास्था कसे प्रगट हो गई? दो ही बातें हो सकती है । या तो यह अनास्था सकण्ड हैण्ड है अनुकारी है, या फिर मानना होगा कि जिसे हम आस्था का साहित्य, आस्था की परम्परा कहते हैं, वह वसा नहीं है उसी मै जनास्था के बीज थे। इस तरह उठाया जाकर यह प्रश्न योडा अटपटा भले लगे, अनगल वह नही कहा जा सकता । यो दखें तो मनुष्य को व्याप सकने वाले सशय की कौन सी 45 एगी याटियो । ना हमारी परम्पराम किपरिEिTITTEमर प्रमा माहि ताता। दुग' लहरि पुर व या निय ही गापारमा हाला अच्छी बारी है भात वि तुलसीरा की जा frar विश' जितना वामन हा गमता गोविताये अपर आराध्य म इमाम गमन सी भी अपक्षा परा है मन गुरुर ता विषाद' । उना राम चरित मानग या आरम्भ ही एक माप प्रगग ग हाता है सनी को राम र ईश्वरत्व पर ही ग? उपज आता है। शार लार गमभान हैं पर राम य ईश्वरत्व की परी । लने पल हो पाती है। अपने धग गाय को मामी पोमन उह गाना पडती है पर राम पथा पी पूर्णाहूति नी तर 'नाथ पा मम गत सदहा 4 विना और पस हाती गीता या आरम नीता अजुन वे साय ग ही हुआ है और उसमा समापन भी मजा ये 'स्थितास्मि गत म दह स । और ता और, एष प्रमिड लारथा य अनुसार एक बार स्वम राम को अपनी सामय पर, अपने ईश्वरत्व पर माय उपज आया था। उन्होंने एक पत्थर उठाया और मन ही मन यह दोय सात हुए उम ममुद्र मरने या उद्यत हुए पि यदि यह तर आए ता में राम, नहीं तो साधारण मनुष्य। तभी पास ही वठे हनुमान ने उनी यह हरपत भाप ली। तत्काल उहाने पत्थर राम वे हाय रा छीन लिया और उह फटकारा कि यह आप पर रया रह हैं ? जापका एसा नहीं वसा चाहिए ।' सोचिए, अगर स यथा म हनुमान जी राम म साय यो भांपपर भी सुद उस समय की प्रलोभनकारी गिरफ्त म आर खडे ही रह जात तो वहा मौन धाइविल वाला सडा था जाउ ह बताता रि दाउ शल्ट नाट टम्प्ट दार गॉड' ? श्री रामचन्द्र गाधी के आसार 'बौद्ध धम के उदय व उपरात हिदुस्तान का मन बहुत गहर मद्वद्वात्मक हो गया है।' जयशकर प्रसाद जो जनेन्द्र जीव ही शब्दाम पहल बडे नास्तिक लेखक है, उनके अनुमार भी भारत की चेतना का इतिहास दुरावाद और आन दवाद की धाराओवधीच निर तर सधप का इतिहाम ह । पश्चिम को भी चौद्ध धम हो अधिक रास आना रहा है और इसका भी क्या रहस्य है कि जब हमारे समाजवादी चिता देसी दिमाग की जहरत स प्रेरित होकर परम्परा के भीतर झाकते है तो उ ह भी बौद्ध दशन में ही शरण मिलती है । हो, साहित्य-सजका म जरूर दाना तरफ बराबरी का भुकाव लक्षित हाता है ममलन क्या प्रमाद मे क्या जनय म बहना बठिन हो जाता है कि किसका पलडा ज्यादा भारी है -- वदिप आन दवाद पा या बौद्ध क्रुणा का? माट तौर पर इनर भाव बोध के विकास का वियास दसन का यत्न करे ता इनकी गति विद्रोही बौद्धिक प्रश्नाकुलता से सबद निरतर 46 ? स्वीकारी सर्वाश्लेपी आस्था की ओर प्रतीत होती है । 'ट्रेजिक' का बाध दाना के सिर पर चढ के बालता है, कि तु मौन रह सकता है कि हमारे महाकाव्या में भी वह नहीं है आधुनिक हिंदी साहित्य में उस तरह आस्था का स्वर व्याप्त है यह कह सकना तो कठिन है, पर जो व्याप्त है वह सचमुच अनास्था ही है, यह कह पाना भी उतना ही कठिन लगता है । गतानुगतिक विश्वास को आस्था मानन म जनेन्द्र जी को भी दिवात हाती है। विपिन अग्रवाल की एर कविता ('नग पर' सग्रह की पहली र विता) याद आ रही है जिसमें इस शब्द का प्रयोग मृजन विराधी अथ म हुआ है। पाविता की ध्वनि यही है कि आस्था से सृजन नहीं हो सकता, अनुकरण ही हो सकता है । वहुत सारा साहित्य ऐसी ही सुरक्षित और प्रश्नविहीन आस्था म स आया प्रतीत होता है और उसकी अनुकरणात्मकता को मिफ यह कहकर सृजन का दजा नहीं दिया जा सकतावि वह आयातित नहीं है । जनद्र जी ने ठीक ही कहा है कि 'जर मन में प्रश्न नही उठता ता यह नास्था नहीं जडता है।' ध्यान देने की बात है कि वाग्देवी की पहचान ही हमारे यहा जडता को दूर भगाने वाली शक्ति' ('नि शेप जाडायपहा') के रूप म की गई है । यदि यह बुनियादी शत ही पूरी नहीं होती, तो इसका सीधा मतलब यही निकलता है कि इस लेखक यो अपनी 'वाक्देवी' पर ही आस्था नहीं है, और चाहे जिस पर भी हो । उस तरह की आस्था को फिर आस्था भी कम कहा जाय जा अजित नही की जाती, जो इम्तहान म भी नही पडतो? एलियट का कहना है कि नि यानव प्रतिशत से अधिक लोग। के लिए इस तरह का प्रश्न-यानी आस्था के सक्ट का प्रश्न उठता ही नही, क्याकि वे जास्था और सशय दोना से नीचे के धरातला पर ही जीने के अभ्यस्त हाते है । अर्यात गतानुगतिर विश्वास स उनका काम बखूबी चल जाता है । पर सजा का नाम तो इस तरह नहीं चल सकता । सजक का हो क्या, सृजनशीलता का व्यापक जथ ले, तो बहुत सारे सवेदनशील और बुद्धिशाली लागा का भी नही चलता । जब प्रसाद जी कहत है कि 'सवेदन, जीवन जगती को जो कटुता से देता घाट', तब क्या वे केवल आप बीती ही सुना रहे हैं? अपने जसे लाखा का हाल भी नही बता रहे हैं ? आस्था का वह जो ऋणात्मक, सृजन द्राही अथ विपिन अग्रवाल की कविता म है, वह अब रण नहीं है आस्या जडीभूत भी हो जा सकती है। किंतु क्या यही खतरा समय के साथ भी नहीं हो सकता? क्या सशय भी एक सीमा व बाद जडीभूत करन वाला नहीं हो सकता हर सशय सच्ची तीखी बुद्धि- मत्ता स ही उपजे यह क्यो जरूरी है। यह मोह से भी तो उपज सक्ता है- आस्था, सशय और सृजन 47 उस 'मोह' से, जो गीता के मुताबिक पहले स्मृति भ्रश और फिर बुद्धिनाश की ओर ले जाता है । गीता भी तो आसिर यही न कहती है कि जा अनान पूर्वक अश्रद्धापूवर मशयात्मा है उसका नाश होता है। पर हमने चेक उप यासकार मिलान कुदेरा का जो क्थन उद्धत किया है, वह क्या मुक्तिबोध की उस प्रसिद्ध उक्ति को आमश्रित करता सा लगता है कि 'प्रश्न का उत्तर वे सिंहासन पर नहीं बिठाया जा सकता' ? जनद्र जी भी तो प्रश्नाकुलता को सशयात्मकता से मतग करत हुए कहत है कि केवल प्रश्न सशय है । क्यो कहते है व ऐसा ? उपनिपद् म एक जगह याज्ञवल्क्य गार्गी को चेतावनी देत हुए कहत है गार्गी, यह अतिप्रश्न है। अतिप्रश्न मत बर। नहीं तो तेरा मस्तक भड जाएगा।' क्या जनेद्र जी का 'केवल प्रश्न', यही 'अतिप्रश्न' है ? फिर प्रश्न उठेगा कि आज के इस बुद्धिवादी युग म अतिप्रश्न से भी क्से बचा जाएगा? जनेन्द्र जी पहले यह बलपूर्वक कह चुके है कि आस्था की कसौटी प्रश्न है उसकी खुराक भी यह प्रश्न ही है। तब फिर क्या मिलान कुदेरा भी प्रकारातर से यही नही कह रहा है ? क्या आस्था और संशय को विपरीत ध्रुवा पर रखने के पीछे जनेद्र जी को श्रद्धा विषयक बुद्धि ही काम कर रही है ? वे प्रश्न को नास्था की सुराक मानत है । यह तभी हा सकता है जब प्रश्न भोज्य बने रह। जनेद्र जी का मानना है कि 'जिसकी कीमिया से प्रश्न अपनी दातदार काट झाड कर स्वय हविष्य बन जाता है, वह श्रद्धा द्वारा मम्प न होती है ।' अर्थात् श्रद्धा एक रूपावरकारी ऊर्जा -प्रश्न उठाने वाली तक बुद्धि जोर जीपन को धारण करन वाली आस्था के बीच । नगर यह ऊर्जा कुठित हो जाती है तो तक बुद्धि की केवल प्रश्नता आस्था को खा जाएगी और यह न मही तकशील मानव की, परतु सम्पूण मानव की, अर्थात् श्रद्धा वृद्धि समवित और चराचर सृष्टि स सवेदित मानव की पराजय होगी। वह सशय होगा जीवन की गति को अवरुद्ध और जडीभूत कर देने वाला, तथा सृष्टि के छद को भी विगाड देने वाला सशय। निश्चय ही जनेद्र जी यहाँ सिफ साहित्य और कला को ही सृजनशीलता के लिए चिंतित नहीं हैं। अयथा हम कह सक्त रिपश्चिम का उदाहरण ही पर्याप्त है यह दिखाने के लिए कि केवल प्रश्न वेवल सशय भी दशन और साहित्य वो मृजन गीलता को ठित भरता नहीं दिखाई देता । हम यह भी कह सकत कि इस मशयात्मा माहित्य और चितन न हमारे अपने साहित्य का हमारे अपन साच विचार का भी सिप अहित ही नहीं किया है काफी कुछ उपकारक भी हुआ है वह हमारी आत्मतुष्टि को भभोडत हुए। पर इतना तो 48 सबट निरतर जने द्रजी भी जानते है । वे तो यहा तक कहत है कि 'पुराने मत-विश्वासो का यह विसण्डन, आस्था का यह विघटन शायद किसी नई सम्पूणता समग्रता के उद्भव की भूमिमा है ।' अर्थात् अपने पश्चिमी समानधर्माआ की तरह- मसलन हेमिंग्वे की ही भाति - वे आधुनिक अनास्था और विघटन से आतक्ति नहीं है। हमारे मन म तब सहज ही प्रश्न उठता है कि उनकी आशा का, आस्था का आधार क्या है? जनद्र जी कहा कि 'आम्था में अलग उमके आधार को नहीं देखा जा सकता।' फिर भी उही के तक की संगति मे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सम्भवत उनकी आस्या स्वयं उस श्रद्धा वुद्धि में होगी जो तक बुद्धि का पूरा लाभ उठाकर भी उसे गति मे वाधक नहीं होने देती और जीवन की समत्रता म दरार नही पड़ने देती । कि तु क्या यह दरार मान दाशनिक सशय से पड़ सकती है । हमिग्व की एक कहानी यहा याद आ रही है दगम्बलर, द नन, द रडियो'- जिसके के द्र म एप जुआरी है, असाध्य जुआरी, जो कभी नही जीत सस्ता । मगर जो दाव लगाए पिना भी नहीं रह सकता। हमिंग्य की कई सारी अन्य कहानिया की तरह इस कहानी में भी साक्षी चेतना की तरह उपस्थित एक लेखकनुमा पात्र है-फेजर, जो अनुभूति की एक कौंध में देखता है कि धम ही क्यो, और भी बहुत सारी चीजें है जो जनता की अफीम कही जा सकती हैं 'यम, अर्थशास्त्र, देशभक्ति, मथुन, शराब, रेडियो जुआ, महत्वाकाक्षा, राज्य व्यवस्था की कोई नई सक्ल्पना सभी जनता को अफीम नहीं है । मगर 'फिर भी'- वह आगे सुद से सवाल करता है.~~ 'जनता की असली अफीम क्या है ?" उसे लगता है, वह जानता है। क्या है वह निश्चय ही राटी । रोटी भी जनता की अपीम है। स्पष्टता के इस क्षण में वह पुलिस वाले से प्रश्न करता है.---'व्हाइ आर नाट आल द ओपियम्स आव द पीपुल गुड ? व्हाट डू यू वाण्ट विद द पीपुन ?' 'हम इन लोगा को अनान से मुक्त करना है। पुलिसवाला जबाव देता है। 'वनवास बकरो • फेजर पुलिस वाले से कहता है। शिक्षा जनता की अफीम है । तुम्ह यह मालूम होना चाहिए।' क्या तुम शिक्षा म विश्वास नहीं करते?' पुलिस वाला चकरा जाता है । 'नही'-फेजर कहता है। हा, नान में जरूर मेरा विश्वास है । पर तुम्हारी शिलाम नहीं।' मेजर स 'शान का गुनासा नहीं करता । नारा स अमान मिग्वे भी महा परता। पर तथारमित अनान को तथापित ज्ञान स मिटान के क्या य -- आस्या, समय और मजन 49 उस 'मोह' स, जो गीता के मुतानिक पहल स्मृति भ्रश और फिर बुद्धिनारा की ओर ले जाता है । गीता भी ता आखिर यही न रहती है कि जा जनान पूर्वक अश्रद्धापूर्वक सशयात्मा है, उसका नाश हाता है | उपर हमने चेक उपन्यासकार मिलान कुदेरा का जो वथन उद्धत किया है, वह क्या मुक्तिबोध की उस प्रसिद्ध उक्ति को आमश्रित करता सा लगता है कि 'प्रश्न का उत्तर वे सिंहासन पर नहीं बिठाया जा सकता ? जनद्र जी भी ता प्रश्नाकुलता को सशयात्मक्ता से अलग बरत हुए कहत हैं कि केवल प्रश्न सराय है । क्यो कहते हैं वे एसा ? उपनिषद् म एक जगह याज्ञवल्क्य गार्गी को चेतावनी देत हुए कहत है गार्गी यह अतिप्रश्न है। अतिप्रश्न मत पर। नही तो तरा मस्तक भड जाएगा।' क्या जनेद्र जी का केवल प्रश्न ,यही जतिप्रश्न' है ? फिर प्रश्न उठेगा कि आज के इस बुद्धिवादी युग म अतिप्रश्न स भी कस बचा जाएगा ? जनेन्द्र जी पहले ही यह बलपूर्वक कह चुके है कि 'आस्था की कसौटी प्रश्न है, उसी खुराक भी यह प्रश्न ही है ।' तब फिर क्या मिलान कुदेरा भी प्रकारा तर से यही नही कह रहा है ? क्या आस्था और सशय को विपरीत ध्रुवो पर रखने के पीछे जनेद्र जी को श्रद्धा विषयक बुद्धि ही काम कर रही है ? वे प्रश्न को आस्था की खुराव मानत है । यह तभी हो सकता है जब प्रश्न भोज्य बने रह । जनद्र जी का मानना है कि जिसकी कीमिया स प्रश्न अपनी दांतेदार काट झाड कर स्वय हविष्य बन जाता है, वह श्रद्धा द्वारा सम्पन होती है। जथात् श्रद्धा एम रूपातरकारी ऊर्जा है प्रश्न उठाने वाली तक बुद्धि और जीवन को धारण करने वाली आस्था के बीच । अगर यह ऊर्जा कुठित हो जाती है तो तक बुद्धि की केवल प्रश्नता आस्था को खा जाएगी और यह न सही तक्शील मानव की, परतु सम्पूण मानव की, अथात् श्रद्धा बुद्धि समवित और चराचर सृष्टि स सवेदित मानव की पराजय होगी। वह सशय होगा जीवन की गति को अवरुद्ध और जडीभूत कर देने वाला, तथा सृष्टि के छ द को भी विगाड देने वाला सशय । निश्चय ही जनेद्र जो यहाँ सिफ साहित्य और कला की ही सृजनशीलता के लिए चिंतित नहीं हैं । अ यथा हम कह सकते कि पश्चिम का उदाहरण ही पयाप्त है यह दिखाने के लिए कि केवल प्रश्न, केवल सशय भी दशन और साहित्य की मृजनशीलता को कुठित करता नहीं दिखाई देता । हम यह भी कह सकत कि इस सशयात्मा साहित्य और चिंतन ने हमारे अपने साहित्य का, हमारे अपन सोच विचार का भी सिफ अहित ही नहीं किया है, काफी कुछ उपकारक भी हुआ है वह हमारी आत्मतुष्टि को झझोडत हुए। पर इतना तो 48 सबद निरतर - नन, जनेद्र जी भी जानते है । वे तो यहाँ तक पहत है कि 'पुराने मत विश्वासाका यह विखण्डन, आस्था का यह विघटन शायद क्मिी नई सम्पूणता समग्रता ये उद्भव की भूमिका है।' अथात् अपने पश्चिमी समानधर्माआ की तरह मसलन हमिग्वे पी ही भाति ये आधुनिक अनास्था और विघटन से आतक्ति नहीं हैं । हमारे मन म तर सहज ही प्रश्न उठता है कि उनकी आशा या, आस्था का जाधार क्या है ? जनद्रजी वहग कि आस्था से अलग उसके नाधार का नहीं देखा जा सकता।' फिर भी उही व तक की सगति में यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सम्भवत उनकी आस्या म्वय उस श्रद्धा बुद्धि म होगी जो तक बुद्धि का पूरा लाभ उठाकर भी उस गति म वाधव नहीं होन देती और जीवन की समग्रता म दरार नही पडने देती। कि तु क्या यह दरार मान दाश निर सशय से पड सकती है ? हमिद की एक कहानी यहा याद आ रही है 'द गैम्बलर, द द रेडियो'- जिसके वेद्र म एम जुआरी है, असाध्य जुआरी जो कभी नहीं जीत सकता । मगर जो दाव लगाए विना भी नहीं रह मरता। हमिंग्व की कई सारी अन्य कहानिया की तरह इम यहानी में भी साक्षी चतना की तरह उपस्थित एक लेसक्नुमा पात्र है-फेजर, जो अनुभूति की एक काध म देवता है कि धम ही क्यो, और भी बहुत सारी चीजें हैं जो जनता की जफीम कही जा सरती है 'चम, जथशास्त्र, देशभक्ति मथुन शराव, रेडियो जुआ, महत्वाकाक्षा, राज्य व्यवस्था की काई नई सकल्पना क्या य सभी जनता की अफीम नहीं है ? मगर फिर भी'-वह आगे सुद से सवाल करता है- 'जनता की असली अफीम क्या है ?' उसे लगता है, वह जानता है। क्या है वह निश्चय ही रोटी। राटी भी जनता की अफीम है। स्पष्टता के इस क्षण मे वह पुलिस वाले से प्रश करता है- व्हाइ आर नाट ऑल द ओपियम्स आव द पीपुल गुड ? व्हॉट डू यू वाण्ट विद द पीपुल" 'हम इन लोगो को अनान से मुक्त करना है। पुलिसवाला जवाब देता है। 'वनवास बाद करो फ्रेजर पुलिस वाले से कहता है शिक्षा जनता को अफीम है । तुम्ह यह मालूम होना चाहिए।' 'क्या तुम शिक्षा में विश्वास नहीं करते ? पुलिस वाला चकरा जाता है । 'नही -फेजर कहता है । 'हा, ज्ञान म जरूर मरा विश्वास है । पर तुम्हारी शिक्षा मे नही।' जर इस 'ज्ञान' ना सुलासा नहीं करता । नकारा से अक्रात हमिग्वे भी नहीं करता । पर तथाकथित अनान को तथाकथित नान से मिटान के . ? - आस्था, सशय और सजन 49
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, नास्तिक लखक है । प्रेमच द मूल म नास्तिक नही थे। उनकी नास्तिकता ईश्वर के आसपास चुक जाती थी। वस वह विश्वासी थे और वेहद मजबूती के साथ। प्रसाद न हर मत मा यता का सामाजिक हो कि नतिक हो, धामिर हो कि राजनतिक, प्रश्नवाचर के साथ लिया। ककाल' इसी से इतना भयकर हो उठा है शल्यक्रिया स भीतर के कदय और कुत्सित को वाहर ला विखरन म प्रसाद का हिचक नहीं है।' मैं नहीं समझता कि प्रसाद के किसी भी आलोचर न प्रसाद के बारे में ऐसी बात कही होगी । बीसवी सदी के पूर्वाद्ध का कौन दूसरा भारतीय लेसक आधुनिक भाव बोध म तभूत आस्था और सशय के मतदद को अपनी समूची परम्पराक परिप्रक्ष्य म इतन गहर झलकाता है, मुझे नहीं मालूम । इतिहास बोध और परम्परा बोध, यथाथ चेतना और मूल्य-चेतना, भरपूर ऐन्द्रिकता और भरपूर बौद्धिकता व समान रूप से सिर पर चढकर बोलन बाल तकाजा को इस तरह निभाना कितना मुश्किल है, यह प्रसाद के तुरत बाद की पीढी ने और उसके बाद भी अभी तक छा रहे विभक्त मान- सिक्ता के घटाटाप न अच्छी तरह हमार सामने उजागर कर दिया है । कितु क्या स्वय प्रसाद को लेकर हमार भीतर सशय नही उठता? क्काल' का लखक आसिर 'कामना', 'कामायनी और 'एक घूट' का लसक भी तो है। क्या हमम स क इया का 'कामायनी की आशा और आस्था की अपेक्षा गोदान का नराश्य अधिक सृजनात्मक नही प्रतीत हुआ है ? कही ऐसा तो नही, कि जन द्र जी प्रसाद म अपन ही एक पहलू का आभास पाते हुए सृजना- त्मक अतिरजना कर रहे हा मगर इसस पहते, कि हम किसी निष्प पर पहुच सके हम जनेद्र जी की पूरी वात सुननी पडेगी । प्रसाद प्रसग अभी पूरा नहीं हुआ । जनद्र जी आगे कहते है - 'नकार और निपध को लेकर उठन वाल दशना पा उहान प्राणपण से निराकरण किया और उस दशन को प्रतिष्ठित करना चाहा जो जीवन के प्रति निरपवाद स्वीकृति का निमत्रण देता है । हिदुत्व की उनकी ऐसी ही धारणा थी। वौद्ध और जन परम्पराआ म उ होन वजन पर बल देखा और वह उह किसी भी रूप ममाय नहीं था । मुझे लगता है, जसे यही उनके साहित्य का मूलभार, मूल कोण है । यहा पर पाठक के मन मे सहज ही शका उठेगी ओर उठनी चाहिए कि जनेद्र जी क्या अपनी ही पहले वाली बात का खण्डन नहीं कर रहे है ? कहाँ 'पहला वडा नास्तिक लेखक और कहा 'नवारवाद निफ्धवाद का प्राणपण १ आस्था, संशय और सृजन 51 . से निराकरण करन वाला' | दोनो के बीच जाग्दिर कम गति विठात है जनेद्र जी? जनद्र जी इस उत्तर म एव वडी विचारात्त जय यात पहत हैं- प्रसाद की अतिशय मप्रश्नता प्रसर बौद्धिकता जसा कि अनिवाय है उह उस जगह तक ले गई यहां खुद बुद्धि पर टिका रहना व्यक्ति के लिए सभव नही रहता। अपनी परिपक्व परिणति म बुद्धि यह दिगाए पिना नहीं रह सकती कि वह अपयाप्त है और श्रद्धा म ही पूरी हो सकती है। इसरा आशय यह न समझा जाय कि पहली वाली मरी स्थापना सदोष है। पल्लि यही, कि श्रद्धा की स्वीकृति प्रसाद को बुद्धि द्वारा ही हो सकी है । जस बुद्धि माध्यम है, श्रद्धा विना उसव अगम है । क्या इससे हमारा समाधान हो जाता है ? दश निय हगल कहता है कि मानव जाति का ही क्या विश्वात्मा का भी विकास और उसकी प्रौढावस्था पाश्चात्य तक बुद्धि के विकास का ही प्रतिपल है। श्रद्धालु भारतीय दशन और भारतीय सस्कृति तो उसकी स्वप्नावस्था है बचपन की मुग्धावस्था है । इसके ठीक विपरीत जने द्र जी की यह प्रतीति है कि अपनी परिपक्व परिणति म बुद्धि स्वय यह दिखाती है कि वह श्रद्धा म ही पूरी हा सक्तीहै । आरजन द्रजी के मुताबिक यह स्वय प्रसाद की अपनी प्रतीति थी। पर जनेद्र स्वय क्या सोचते है ? वे तो प्रसाद नहीं है । क्या उनकी स्थिति प्रसाद और प्रेमच द के बीच कही है ? प्रश्न भोज्य बने रह इस म्पा को मगति क्या बुद्धि की परि पक्व परिणति से वठती है ? प्रश्न जास्था की कसौटी है उसकी खुराक है, यह कहने म क्या आस्था पहले से दी हुई मिली हुई मान ली गइ है? की जिस स्पा तरकारी भूमिका का उ हाने पहचाना है वह अवचेतन है कि अतिचेतन प्रक्रिया है कि परिणाम । जसे बुद्धि माध्यम ह श्रद्धा बिना उसक अगम ह' क्या यहा जने द्र जी जान बूझ कर श्रद्धा और बुद्धि को कुछ ज्यादा ही ध्रुवीकृत स्प मे देख रह है ? और २स तरह आधुनिक मन स्थिति के हिसाव स तक्शील मनुष्य के लिए 'इरॅशनल' की स्वीकृति के लिए गु जाइश बना रहे है ? एम एन रॉय ने गाधीजी की मत्यु पर एक मा की वात कही थी, मि गावी भारत की सम्पूण परम्परा का प्रतिनिधित्व करत है उसके सर्वोत्कृष्ट नतिक तत्वो का भी और उसकी घार इरॅशनलिटी' का भी । मरे मन म प्रश्न उठता है कि जनेद्र जी के उपयासा म जो आद्योपात छाया हुआ प्रेमतत्व है वह वही उनकी नतिक्ता जौर इनलिटी के बीच की दुहरी खीर का परिणाम तो नहीं ? एक ओर बुद्धि विरोध का उनका स्थायीभाव और दूसरी ओर तशीलता का गहरा व्यसन-वया दाना म श्रद्धा 52 सवद निरतर अनविरोध नही? क्या इगी अनविरोध का शमन ये 'प्रेम' नामक तत्व में वीवात . निश्चय ही जनेद्र जी की आस्था 'प्रेम तत्व मे है पर यह प्रेम तत्व दो तरफ से घिरा हुनाह नान गरी तरफ म भी और कम की तरफ म भी। यह आरस्मिन नहीं है कि सप्रेम नत्व वा प्रताप भी उनके लिए गाधी हैं । यह भी मात्र सयोग नहीं है कि जिस तरह वे प्रमाद की बौद्धिर 'इटेग्रिटी' पर निछावर हैं, उमी तरह प्रेमच द की विशालहदय सरनता पर भी । प्रेमचद जहा अत करत हैं वहा मे प्रमाद ने आरम्भ किया था। प्रेमच द की आस्था जनेद्र के ही गाम यदि अत यो आर कुछ हिली हुई' जान पडती है तो वह शायद इसलिए कि वह प्रमाद को तुला म सरल आस्था थी-बुद्धि की मप्रश्नता और उसकी परिपक्व परिणति से उबरी हुई आस्था नही थी। पर वह महत्वपूर्ण नही है । मह वपूण है श्रद्धा और बुद्धि के मृजनात्मक मभ्यय के प्रति जनेद्रजी दृष्टिकोण । प्रसाद वाली उनसी से प्रतीत होता है निवे जिम तरह श्रद्धा के सत्य का मरलता के सत्य को मनमाने दिमागी तौर पर मरतीत परवे नहीं देखने, उसी तरह बुद्धि के सत्य को, अनिवाय जीवन की जटिलता ये मय को भी इच्छिन चितन में नहीं घुलाएंगे। कोई उनमे भग' सपना है रि वे जिस तरह प्रसार में कुछ अधिर पढ जात हैं उसी तरह गाधी म भी युद्ध अधिक देल जाते हैं। ऐसा अगर हो भी, तो वह एक तथ्य की ही रचनाधर्मी अतिरजना होगी । ऐसा प्रतीत होता (और जडता को नष्ट करने वाली वाक् शक्ति सरस्वती भी) एक उभयमुग्वी क्षमता रखती है । उमम रचनात्मक स्वोरार भाव और रच नात्मक अम्वीकार 'एफरमेटिव पविलिटी और 'नेगेटिव पविलिटी' दोना ही होनी चाहिए । नही तो वह मृजनद्रोही जास्था है गतानुगतिक विश्वाम है । जनेद्र गाधी को टगोर की आय से नही देसत गाधी उनके लिए एक कठोर नैतिक शुद्धतावादी या तथापित विश्व मानव की एकता म वाधव पश्चिम द्रोही पहिष्कारवादी नहीं हैं, बल्यि मचातेपी और आत्म- बलिदानी प्रेम के ज्वल त प्रतीक है । वे गाधी को सदातिक व्यक्ति नहीं मानते मात्र कमयागी भी नहीं मानते, प्रेम योगी मानते हैं। सवाल है, उनके यहा यह प्रेम विस तरह आता है जनेन्द्र का यह प्रेम अपनी वचारिस ही नहीं, औप यामिक अभिव्यक्ति में भी टाल्सटाय वाले प्रेम से भिन्न है । उमम एक लगभग जुआरी जमी टेव है पिसी विचार का उसनी जात्या तर परिणति तक पहुचाने की दोस्तॉण्वस्वी जसी ज़िद हम उनके उपन्यासो म पात हैं क्या 'सुनीता और 'त्यागपत्र म, है कि श्रद्धा ? आस्था, सशय और मृजन 53 । -- है और क्या उनके दशाव में सब कुछ छा जाने की यह तत्परता और प्रतिभा क्या जताती है । प्रमगवशात् यहा यह स्मरण रसना यावश्यक है कि जोद्र जी इस प्रतिभा नाम यी चीज म हो विदक्ते है । उह जीनियस मी अवधारणा, यहा तर कि क्ता जसी चीज की अवधारणा फिजूल बकवास लगती है। सबा क्या कारण है । साहित्यकार किसी भी तरह साधारण नागरिक से कचा और अलग नहीं है वे कहते है, और यह भी वि राज्य सर्वोपरि नहीं राज्य के ऊपर ऋपि - नितात स्वत्वहीन मानवता का प्रतिनिधि । यति साहित्यिक उस निरीह मानवता की मार बढता हो, तभी उसके लिए उपयुक्त है कि वह पद पुरस्कार के लिए राज्य के पास न जाए। पर वह रास्ता बीहड़ है। साहित्य काधम प्रेम का धम है। यहा पर प्रश्न उठता है क्या जनेद्र जी इस तरह प्रेम के धम को कपि के धम से व्यवहार क धरातल पर ही नहीं मूल्य चेतना के धरातल पर भी खतरनाक तरीक स अलग नहीं किए दे रह ह ? ऋपि धर्म की उनकी समझ रही तर ममीचीन है ? क्या वाक् धम (मृजन धम) और "पि धम को लगाया जा सरता है ? आधुनिर राज्य में आधुनिर भारत में राज्य सत्ता के ऊपर माने जाने वाल उस पित्व का प्रतिनिधित्व कोन करेगा? अगर वहाँ सोखल है तो क्या जने द्रजी का यह प्रेम धम उम भर सकता है ? आधुनिक काल म जहा राज्यसत्ता ही उस नितात स्वत्वहीन मानवता की पतिनिधि वनकर और विराट विश्व प्रेम की नी दावेदार बनकर उपस्थित है जने द जी का यह प्रेम क्या उमस टकरा सस्ता है ? क्या टकराने पर वह उसी म विनीत नहीं हो जाएगा? क्या जैनेन्द्र जी का प्रेम धम इस तरह अनजाने ही स्वय वाक तव का, और उस तरह रचना कम का भी दरजा नहीं घटा देता । उस नान में वियुक्त पर महज कम मे रिड्यूस नहीं कर देता हम यह मशय मानता है। पर जनेद्र जी को पता नहीं यह सराय उस तरह सालता है कि नही ? कम से कम उनके अभी हाल ही मछप उपयास दशाक को पढकर तामन पर यही छाप पड़ती है। कवि आलोचक साही ने कही लिखा है कि प्रसाद जी दशन का अनुभूति में घुलाने के बदले अनुभूति को ही दशन म धुला देते हैं । क्या जन जी के वार के उपयालो पर यह वात लागू होती है ? क्या मचमुच मृणाल' और 'सुनीता के सृष्टा, कल्याणी और असरानी जमे चरिया के जरिए मनुष्य नाम अंधेरे कुए मे छलाग लगा देने वाले जनेद्र एक हैं और मुक्तिबोध तया लियने वा और' या कि इस तरह वा विभाजन देश दश 54 सबद निरतर साहित्यिक अध्यारोप होगा' दिक्क्त कहा है ? स्वय आस्था मे, या आस्था और सशय के सृजनात्मक सम्बध की अबूझ और असूझ लीला मे। मृणान की कथा घोर दुखात थी। कल्याणी की कथा उससे भी अधिक दुग्बात थी उम रचना मे जने द्र जी मानो अधेरे को ही आखें फाड फाड कर देख रहे थे। वह दिन दहाडे दु स्वप्न था। मृणाल की जेडी को तो सह्य बनाने वाली फिर भी एक चीज वहा मिलती है वकील प्रमोद का त्याग पन', जो स्वयं गाधी जी द्वारा की गई एक बेमेल और शोषणधर्मी न्याय- व्यवस्था की बुनियादी आलोचना का सटीर और जीव त सदभ देता है और इस नाते सचमुच असहयोग जसा कुछ रचनात्मक मूल्य उभारता है। 'कल्याणी' के दु स्वप्न म तो कही कोई राहत ही नहीं है। इसलिए, कि वहा हमारा सामना असरानी से होता है जिससे हम नरपिशाच कहके भी पिंड नही छुडा सक्ते। इसलिए, कि असरानी को हम गहरे वही अपने भीतर ही पहचानत है उस कठोर हृत्य बुद्धिजीवी वग के एक साधारण सदस्य के रूप मे, जो पिछले पचास वरसा म खूब पनपा बढा है और जिसे गाधी ने अपने जीवन का सबसे लम्वा दुम्वप्न बनाया था । यह मान यथाथवादी यथाथ नहीं है बल्कि सत आग्रही स्वाथ है जिसे अनदेखा करना उस आस्थावान् लेखक के लिए भी कभी सम्भव नहीं होता, जिसकी आस्था प्रश्नाकुलता की खुराक पाकर ही जिदा रहती है । दशाव' सुना त है। रजना फिर से सरस्वती बनकर घर लौट आती है अभेदानद के मयामवम पर कटाक्ष करती हुई, जो वयिसिंग नहीं लगता। श्रद्धावान भारतीय सम्वृति के मुताबिक भी तो वह 'सरस्वती' ही है जिसके पास हम अपने जीवन में घुसपठ करती जडता के परिहार के लिए जाते है। 'दशाक' म जनेद्र जी ने मानो सुद अपनी सरस्वती को बाहर की अतलात असुरक्षा मे, झोक दिया है और वहा से उमे अक्षत घर लोटा लाए हैं । मन म प्रश्न उठता है सृजन की गुणवत्ता क्या आस्था के साथ साथ सशय की गुण वत्ता स भी अनिवाय रूप से नहीं जुडी है ? 'त्यागपन' दुखात होकर भी उदास नहीं करता। 'दशाव' सुखात होकर भी मन मे जमी उदासी की परता को नहीं तोड़ पाता । इसका क्या कारण है ? क्या हम इस प्रश्न का- इस निमित्त मे उक्माए गए अपने मशय का थोड़ी दूर तक और पीछा कर सकते हैं ? जसे साहित्य के क्षेत्र में भी मृजनात्मक गति साहित्यिक परम्परा से विचलित होकर ही आती है बम ही क्या विचारावी मृजनात्मकता के सदभ मे, दशन अरस्था, मराय और सृजन 55 के क्षेत्र में भी नहीं होगा? जपने मशय का सामना करना दोनो के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। इस जरूरत के आड याती है परम्परा-खासार तव जव वह तनी ममावेशी और विरोगो का सामजस्य करने वाली हो । पर हमे यह भी नहीं भूाना चाहिए जिम परम्परा का प्राणतत्व उसके केद्र म निहित एक खतरनाा सुलापन ही है जो न केवल मसीही धर्मों की केंद्रीय मतवादिता से अलग है बल्कि रीजन को केंद्र बनाकर उसी से विकसित होने वाली यूनानी सस्कृति से भी । यह खुलापन हमे जितना ही विचार और सवेदन के स्तर पर सहजवेध्य बनाता है इतना ही यह ही हमारे ऊपर सब कुछ के लिए जिम्मेदारी का बोझ भी डाल देता है । ऐमी और इतनी स्वा धीनता हमेशा अराजक्ता वी सम्भावना लिए होने के कारण एक तरह की सुरक्षा थि भी पदा कर सकती है जीवन और विचार दोना जगह बाडेबदी की शिकार हो जा सकती है । यह भी है कि वचारिक नवो मेप की कमी को साहियिर रचना मे नही भरा जा मरता न माहित्यकार खुद उम तरह विचारक का आपद्धम निबाह कर उस बातावरण को निर्मित कर सरता है जिम कृष्णचन्द्र भट्टाचाय ने वचारिक स्वराज्य का नाम दिया था । वचारिक म्वराज्य की समस्या आस्था और सशय के द्वद्व की मनोभूमि पर ही अपने उस खुलेपन को अक्षुण्ण रखते हुए उन प्रश्ना का सामना करने की है जो जाज के युग को मथ रहे हैं । जनेन्द्र जी का इधर जो एक नया मुहावरा मूझा है, आगामक प्रेम का क्या उसी दिशा यही है ? पश्चिम की विद्वता और धार्मिक दाशनिय साहित्यिक रचनात्मकता भी शुरू से ही अधिग्रहणशील (एप्रोप्रिएटिव) रहे हैं और उनकी इम प्रति म पिछ नी सदी और इस सती के दौरान वृद्धि ही हुइ है । क्या हमारी वतमान प्रति और गति दसवे विपरीत ही नही दिसाई देती? हमारी आस्था जोर हमारे समय दोना की ही गुणवत्ता पी माप हम पश्चिम व मानद डा म ही करने के इतने अम्यम्त हो गए है कि शायद “ग जोर हमारा ध्यान भी नहीं जाता। गुनेपन का मनलप एT आत्महीन नमुन उगरता नहीं है न निप्रिय जात्मगमपण और न प्रभाव ग्रहण की याविर दसना । पश्चिम हमारे लिए अपनी पहचान का निमित्त यन इम पालघमा निवाह गाधी जी ने भी दिया और विलकुल अपने दग में सनात्मर ढगम पिया। व निश्चय ही हमारे मानमिर जानस्य को काफी युग झना मवे। रितु ऐमा कोई दावा उहान कभी नही दिया कि य हमारी ववासि दरिद्रता का भी मान रन आए हैं । जीवा या विचार या रानात्म अधिग्रहण एष चीन है और आतावनात्मक चिति दूगरी । क्याएर र अभाव या दूमर ग पाटा जा गरता है? 56 गय गिरतर देश की जिस द्विविध मानसिकता को हमने पहले गाधी और अरविद के द्वद्व के रूप में, और फिर गाधी-टैगोर,माधी-नेहरू के दद्व के रूप म झेला है, क्या उस सदम मे हमने गाधी को लेकर परम्परा से उनकी सगति या विचलन का लेकर अपने प्रश्नो का सामना वचारिक धरातल पर किया है । क्या मुल्कराज आन द का अनटचेबल' या राजाराव का 'कठपुरा' ही इस मम्बन्ध मे हमारे आत्म मथन का पर्याप्त प्रमाण हो जाता है ? मुझे बरसो पूव रोगशय्या पर पडे मुक्तिबोध से हुई एक बातचीत याद आ रही है । वे और परसाई जी आपम मे सहमत हो रहे थे कि जनेद्र के चिंतन मे गडबडिया ही गडबडिया हैं । मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने बीच मे उहे टोका। पूछा क्या हम जनेद्र के चितन को उनकी रचना से अलग करके दोना के साथ अयाय नहीं कर रहे हैं ' मुक्तिबोध तत्वाल बोल पडे-'नहीं, नहीं। सजक के रूप म तो जनेद्र, वात्स्यायन जी से भी ऊचे हैं । मैं तो उनके चितक रूप की ही आलोचना कर रहा था। मुक्तिबोध के इस उत्तर से मेरा तब भी समाधान नहीं हुआ था और आज भी नही हो रहा है। मुझे लगता है प्रसाद को लेकर भी शायद मुक्तिबोध के मन में कुछ इसी तरह की बात रही हो । यह भी एक दिलचस्प सवाल है कि जहा एक ही व्यक्ति रचनाकार भी हो और विचारक भी, वहा उसके न दोनो पक्षो के बीच सम्ब ध सीधा होगा कि तिरछा ? जनेद्र रचनाकार होने से विचारक होने की ओर बढे है और अपनी जीवनानुभूति के मपीटन में से ही बढे है । पर अपने आप मे यह प्रश्न अवश्य उठता है कि क्या एक रचनाकार की जीवन यात्रा म यह अनिवाय है कि ज्यो ज्यो वह प्रौढ होता चले त्यो त्या उसकी रचना मे अनिश्चय, अपूर्वानु- मेयता, भावावेग की अतक्य गतिया छटती चली जाए और आस्था की तार्किक्ता दृढतर और स्पष्टतर होती जाए ? यानी अवचेतन की खीच कम होती जाय और चेतन का नियत्रण बढता जाय क्थ्य और चरित्र और वथा भाषा भी पूरी तरह आस्था निर्दिष्ट होते जाय? निश्चय ही एक दृष्टि से देखने पर यह आस्था की सशय पर विजय है और आदश तो यही सुभाएगा कि ऐसा होना ही चाहिए । वह रचना ही क्या, जो स्वय रचनाकार को सशय से न उवार सके ? पर मेरे मन मे सशप उठता है कि क्या ऐसा होना लाजिमी है ? हो भी तो, यह ऋषि धम से वियुक्त प्रेम धम क्या एक तरह के भावुक या बौद्धिव आग्रह मे ही जडीभूत नही हो जाता जडीभूत न भी वह उसे, तो यह सवाल तो उठता ही है कि क्या इस तरह की आस्था निदिष्ट रचनाम चाहे वह मुक्त प्रेम की आस्था हो क्या न हा- म जोसम उठाने वाले सुलपन और लचीलेपन की गूजाइश कम नहीं हो जाती जो -- आस्था, माय और सुजन 57 PAPER युग सत्य को चरितार्थ करती है, और उसके साथ कुछ करती भी है, कुछ हलचल भी मचाती है। ममनन शार' म रजा के अतद्वद्व का ही एक चित्र देखें "उसे अपने सम्बन्ध में एक और मशय हो निवना था। उसे लगता था वह जगत की है नही, हो नहीं पाती है । मिप वहा म मवाद प्राप्त करती है, स्वय असम्पृक्त बनी रहती है । मिफ द्रष्टा और दशव बने रहना उसे मजूर नही है। वह जग के सारे लोगा के सुग दु य म सम्मिलित हो रहना चाहती है पर देखती है कि वह जानती ही ज्यादा है जीती कम है। उसे यही शिकायत थी कि साहित्य और दर्शन और धम के न थ वस दृष्टि और द्रष्टा की अदा दे गए हैं जूझने की दृत्ति नही । उसे चिढ है निपट निस्सग सी बनी रहने से। लेकिन देखती है कही वह उसी माग पर तो फिसली नहीं जा क्या यह प्रेम वा दशन है ? क्या यह रचना का दशन है ? जनेद्र जी की अपने ही बारे म लिखी एक घटना याद आ रही है । वे बहुत अरसे से लिखना चाह कर भी नहीं लिख पा रहे थे। भीतर एव जडता यी लिखने की वेचनी थी, पर प्रेरणा नही । इसी मन स्थिति में एक दिन वे बाहर निकले और स्वय सेवको की टोली मे नाम लिखा जाए। यह निणय लेते ही उनकी कलम चल निकती और रचना वा अवरुद्ध स्रोत भीतर से फूट पडा। गने द्र जी अक्सर कहते भी रहे हैं कि मेरा लिखने का निमित्त हमेशा वाहर से आता है । इसका धनात्मण पक्ष तो स्पष्ट हो है जन द्र भल जितने ज तमुखी और व्यक्तिवादी क्लाकार माने जाते रहे हा पर रचना के मूल का ही इतना निविड सामाजिक आग्रह मुझे कही यत्र नहीं दिखाई दिया। माना सजा की प्रतिभा और समाज की प्रतिभा एक मेक हो । मानो सजा की मनीगा अपने परिवेश की हलचल से एकाकार हा । जसे यदि परिवश म जडता हो तो सजक भी जड हो जाएगा । माना रचना अकेले का आत्मनान न हो, केवल अनेक होने का महाभाव हो। कि यह धनात्मक पक्ष है । पर इमके ऋणात्मक पहलू की अनदेखी करना भी उचित नही लगता । रचना क्या केवल इमोशन आव मल्टीच्यूड है ? क्या वह ए लोनली इण्टलक्ट कम्यूनिंग वित गाड भी नहीं है? अपनी ही औपयासिक मृजनशीलता के प्रति जोद्र जी म जो एक उदासीन और विरक्त सा भाव नहां तहां -यक्त होता दिखाई देता है वह क्या है और क्या है ' एक छार वह है जहा एकमल्स कसिल का नायर कहना है - 'ऐज़ फार लिविंग, अवर सर्वेण्टम विन डू दट पार अस और दूसरा छोर यह है सवद निरतर मैंने कहा, 58 जहा पता नहीं कब कोई पात्र उठके घोपित पर दे कि 'ऐज फॉर राइटिंग, अवर सर्वेण्टस, और फॉर दट मटर ईवन अवर मास्टम विल डू दट फॉर अस ।' यहाँ मुझे कामू की एक प्रसिद्ध कहानी याद आ रही है जिसका नायक एक चित्रकार है । वह कई दिना तर वनवास पर झुका रहता है, पर चित्र नहीं बना पाता, केवल उस पर 'सोलिडेरिटी' लिख देता। कामू भी बमजीवन मे कूदा था । पर वह रचना कम को व मजीवन के साथ उस तरह सरल ढग से नहीं मिलाता। क्या रचना कम भी विशिष्टि और साथक कम ही है जिसका एवजी कुछ और नही हा सक्ता ? यह भी मुझे वडा विचित्र और रोचक लगता है कि विचार और जीवन-दृष्टि के लिहाज से कापी भिन हाते हुए भी जनेद्र और डी एच लारेस के बीच कम से कम एक मामले म मपूण सहमति है । अपनी रचना प्रक्रिया के बारे मे जाने पर जनेद्र जी दो टूक ढग से कहते हैं कि जो कुछ मुझे घोट रहा था उसे कागज पर निकाल कर मैने म्वास्थ्य लाभ किया।' और डी एच लॉरेंस की भी बिलकुल इसी तरह की स्वीकारोक्ति है 'वन शेड्म बन सिक्नेस इन बुक्स ।' सयोग ही कहिए कि लॉरेस भी ऐमा कवि उप यासकार है जो कवि उप यासकार के अतिरिक्त चिता भी है। उसकी भी एक जास्था है जो उसके लिए एक मिशनरी ध्यय बन जाती है । उसकी उत्तरकालीन रचनाओ में यह मिशनरी स्पिरिट एक अतिरिक्त बौखलाहट बनकर उस पर हावी होती चली जाती है । लॉरेस अशरीरी (प्लेटोनिक) प्रेम पा पैदाटशी दुश्मन है, जबकि जनेंद्र में उसके प्रति सासा सिंचाव दीखता है। दशा' मे भी रजना से यही कहलवाया गया है कि 'शरीर देना अपने को देने म तत बाधा बन जाता है। क्या यह सिफ प्लटोनिपम है ? जने द्र का प्रेम दशन, जैसा कि हमने ऊपर देना, नान और कम से घिरा हुआ प्रेम दशन है और इसलिए उससे अपेक्षा होती है कि वह रोमण्टिर अति की काट खुद ही होगा। वह व्यक्ति की स्वाधीनता को पूरा महत्व देता प्रतीत होता है, पर है पूरी तरह सामाजिक । रजना, मसलन, एक जगह कहती है- जानवर आजाद हैं । इन्सान प्यार से आजाद नहीं हो मरता। जनेद्रजी मानो लीला और मर्यादा को अपनी ही शत्तों पर इक्टठी चरिताथ देना चाहते हैं । क्या यह सभव है ? 'त्यागपत्र के जनेद्र इस प्रश्न के सम्मुन जिस ट्रजेडी को प्रत्यय देखत हैं, 'दशाक' के जनेद्र उसी प्रश्न को पराकाष्ठा तक ले जाकर भी मानो अपनी आस्था से ही उस ट्रेजेडी की भाड पूव कर देत हैं। फिर लॉरेस की अतिरिक्तना से इस अतिरिक्तता यो क्स अलगाया जाय? आम्था माय और सजन 59 तब क्या यह प्रेम का दशन भक्ति माग के समोर है ? भक्ति, जहा माया के व धन से छूटने और जीवन में बने रहने की दोना की गुजाइश है और जहा परम तत्व के साथ भी मानवीय सम्बध जोडे जा सकते हैं। जहां रस के माध्यम स ही मुक्ति भी साधी जा सकती है और जो भान और कम की अपेक्षा आदमी की रचनात्मक बत्ति से, उसकी भाव ऊर्जा से भी अधिक आसानी से जुडती है । तुलसीदास ने अपने 'रामचरितमानस' म गरुड को कागभुसुण्डि के मुख से एक बड़ी मजे की बात कहलवाई है कि 'भक्ति और माया दोनो ही स्त्री तत्व है किंतु भक्ति ईश्वर को माया से अधिक प्रिय है । इसलिए माया अगर डर सकती है तो सिफ भक्ति रूपी सौत से। क्या जनेद्र जी का प्रेम दशन और उसकी रचनात्मक परिणति यही है ? या कि वह कुछ और है, इससे भिन? निश्चय ही वह भी अद्वैत की ही साधना है एक तरह की। पर किस तरह की? 'अभेदानद सारी उम्र अद्वत का, प्रेम का ही प्रचार प्रसार कहते रहे । पर अब पूछ रह है केंद्र के बिना होता भी है किसी का आरम्भ कि प्रसार हो? अन त तो अन त है वो शूय है पर प्यार शूय को नहीं जानेगा क्योकि बिंदु को पहचानेगा।' तो क्या घर ही वह केन्द्र आस्था का केद्र जो बाहर को पानी सारे प्रश्ना और सशया को पचा सकता है और प्रेम ही वह मध्यस्थ रूपा तरकारी ऊर्जा है जो यह कीमिया करता है ? प्रसाद के सदम में जनेद्र जी ने बुद्धि की भी एक विधायक भूमिका पहचानी थी और कहा था कि अपनी परिपक्व परिणति म बुद्धि श्रद्धा तक पहुचाए बिा नहीं रह सकती। क्या इससे यह निकलता है कि स्वय बुद्धि के विकास मे भी प्रेम का योग आवश्यक है उस परिपक्व परिणति तक पहुचाने के लिए और सशय तथा प्रश्नाकुलता भी कही न कही प्रेम के ही अनिवाय जग है ? वसे भी सशय अगर मोह की उपज है तो प्रेम मे भी मोह की अव स्थाए निहित होती ही है। डी एच लारेस इसके विपरीत, 'इटलेक्चुअल मच्योरिटी और इमोशनल मैच्योरिटी' को एक दूसरे से पृथक् करता था और ऐसा नहीं मानता था कि वौद्धिव परिपक्वता अनिवाय रूप से भाविक परिपक्वता की ओर ले हो जाती है। क्या इसमे लॉरेस का अबुद्धिवादी पूर्वग्रह है ? जनेद्र जी भी ता अक्सर बुद्धि को सशय की दृष्टि से देखतं रह हैं। तब फिर उसी बुद्धि पर उसी बुद्धि की परिपक्व परिणति पर उनकी यह आस्था से जम पाती है कि वह श्रद्धा को निगल नहीं जाएगी बल्कि श्रद्धा तक पहचाने की सीढी बन जाएगी? यह प्रश्न कल्पना कीजिए यदि स्वय डी - इसनलिग्म का आधुनिक प्रवक्ता डी एच तारे स- उनसे पूछता, तो वे इसका क्या उत्तर देत? भारत भवन द्वारा प्रायोजित जनेर प्रसग जनवरी ८६ में एच लॉरेस प्रस्तुत बालेय 60 सबद निरतर समकालिक वास्तविकता और भापिक सम्प्रेषण समकालीन वास्तविक्ता एक बहुत बडा जाल है जिसकी बुनावट म न केवल बीसवी सदी के विनान, राजनीति और दशन की परिवतमान अवस्थायें हैं बल्कि जिसे हम भापित सप्रेपण कह रहे हैं, स्वय उसकी भी बहुविध स्थितियों जिनम वास्तविकता को वखानने का दावा करने वाले अनु शामना की अपनी अपनी रवय पर्याप्त और विशिष्ट दोभागम्य भाषाएँ विकसित हो जाने से लगाकर स्वय भाषा के अवमूल्यन तक की स्थितियां भी शामिल है । एक ओर अगर यह सच है कि पूरे ससार की नियति से हम जुड गये है और हर समय चारो दिशाआ से आने वाल व धन और मुक्ति के सम्मिलित प्रभावा म जीना ही आज के मनुष्य की विवशता है, तो दूसरी ओर यह भी सच है कि इन सम्मिलित प्रभावो को रचनात्मक मुक्ति के पक्ष में घटित करना ही उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती है । इस चुनौती के सामने आधुनिक मनुष्य का पुरुषाय जिस तरह अतविभक्त और दुविधाग्रस्त दीख पडता है, वह अपने आप में एक राचक विरोधाभास का दृश्य उपस्थित करता है। विज्ञान और राजनीति जहां इस चुनौती से निबटने के लिए स्वय को पूरी तरह पर्याप्त और सक्षम पाते - और बताते हैं, वहीं, दूसरी ओर साहित्य तथा दूसरी कलाओ का साक्ष्य देखें तो साफ प्रतीत होता है कि समूचे विश्व के स्तर पर आज का आदमी जिस कदर अपनी अपर्याप्तता की गहरी त्रासदी से ग्रस्त हो गया है, उता वह शायद पहले कभी नही था। इस सरासर अन्त विरोध से क्या यही नहीं भलक्ता वि मुक्ति का - व्यष्टि मानव और समष्टि मानव को मुक्ति का जो अथ साहित्य में बनता है, वह ठीक वही अथ कभी नहीं होता जो विज्ञान और राजनीति सरीखे अनुशासन और कम उसी मनुष्य के लिए -उसी मनुष्य के सामने परिभाषित करते है। और क्या इस बारे म सोचते हुए यह भी नहीं लगता कि ऐसा होना लाजिमी है क्यावि साहित्य -- विशेषकर काव्य में- शब्द और अथ का सम्बध जिस धरातल पर घटित होता है वह उस घरातल से बहुत अलग है जिस पर कि दूसरे अनुशासनो मे यह सम्ब ध चलता है । दाब्द और अथ के जिस औत्पतिक (नित्य) सम्बध की बात मीमासादशन में की गई है, क्या सारा कवि-कम 61 ? जाने अनजाने उसी से प्रेरित और उसी को चरिताय करने का उपक्रम नही जान पडता ? और क्या काव्य की इसी प्रकृति, इसी विशेषता मे उसकी विशेष मूल्यवता भी निहित नहीं है ? वह मूल्यवत्ता जो मनुष्य द्वारा अपने विकास तम मै जजित अनेक सभ्यताजा और जनेक अनुशासना को परस्पर सम्बद्ध और एकजुट रखती है तथा उ ह अपने मूल स्रोत से भी अविच्छिन रूप से जोडे रहती है। शब्द और जथ के नित्य सम्बध की यह कल्पना निरी कल्पना है या वास्तविक्ता प्राचीन विवेस ने उस क्सि धरातल पर स्थापित दिया था- काव्यानुभव के जरिए अथवा विशुद्ध तक मीमासा के धरातल ? क्या मानवीय ज्ञान और अनुभव के शताब्दिया के विकास क्रम ने उस प्राचीन विवेक को पिछडा जनावश्यक जौर निष्फल बना दिया है ? याकि नए सिरे से प्रासगिक ? क्या आधुनिक अनुभव और चिंतन से कही उसकी कोई सगति बैठती दीस पडती है ? क्या स्वय आधुनिक अनुभव और चिंतन अपनी एक परिणति तक पहुँचकर स्वय अपने को अतिकात करने की स्थिति मे नही आ गया है ? ये कुछ प्रश्न है जा सहज ही प्रस्तुत विषय के निमित्त स हमारे मन म उठते हैं । भले ही हम उनका यथोचित समाधान न कर पाएँ, उनकी चर्चा करत हुए कुछ सोचन का उपक्रम तो कर ही सक्त हैं । यह भी स्वाभाविक जान पडता है कि हमारा यह सोच विचार सरल रखिक न होकर कमोवेश वृत्तानुसारी हो -एक एसे वृत का अनुसरण करता हुआ जो हमारे लिए पूर्व और पश्चिम दोना के अनुभवा को मिलाने से बनता है। क्या आज की दुनिया म हर विषय का वास्तविक बतात एक वत्त ही बन जाने को बाध्य नहीं ? 7 यह गौर करने की बात है कि स्वय आधुनिक रवि इस विक्म के बारे म-- भाषित सप्रेषण की इस सर्वोच्च स्थिति तथा वास्तविक्ता के साथ उसके सम्बध के बारे म क्या सोचता है । जहाँ तक साहित्य म व्यक्त आधुनिकता का सवाल है उसकी देहरी पर ही हम मथ्यू नानाल्ड की उस प्रसिद्ध उक्ति की गूज अभी तक सुनाई द जाती है जो हम बताती है कि आने वाल युगाम कविता की अवश्यम्भावी नियति यही है कि वह उस मानवमात्र को जोडने वाली और जीवन को अय प्रदान करन वाली भूमिका वा निवाह कर जो कि अब तक धम निवाहता आया था और जिस अब विनान न (घम को पच्युत परते हुए) अमभव बना दिया है। यह कारण नहीं है कि उन्नीसवा सदी ये इस सस्थति चितर और कचर हीरा वा इस बीमवी सदी के उत्तराध ये बुद्धिजीवी फिर स अपन लिए प्रामगिर पा रहे हैं । एमे बुद्धिजीवी जिह 62 सबद निरतर क्लावादी अथवा रोमण्टिक उनके दुश्मन भी नहीं मान पाते । इसका क्या और इसका भी अतत क्या रहस्य है कि साहित्य में मथ्यू नानाल्ड का घोपित शत्रु टी एस एलिएट जहा एक बार टी ई हुल्मे के साथ सहमत होते हुए यह मानता है कि अतत जीवन और जगत के बारे म धार्मिक (और निराशावादी दृष्टि ही यथाथवादी दृष्टि है, मानववादी धारणाएँ तो अवास्त- विक और असत्य है वही वह वाव्य को सवस विशिष्ट विभूति - आडिटरी इमजिनेशन' (श्रुति कल्पना) की महिमा का बसान यह कहत हुए करता है कि 'कवि कम मे निहित यह श्रुनि कल्पना ही है जो हमारी चेतना क नितात आदिम और नितात आधुनिव स्तरा को एक साथ झकृत कर सकती है। क्या इस प्रतीति म आधुनिक जीवनानुभूति के बोचावीच शब्द और अथ की उसी बुनियादी और जादुई एकता के स्मरण और आवाह्न का ही उपक्रम नहीं सूचित होता? इसी प्रकार मालामें और यीटस जसे जाधुनिक युग की संशयात्मा से आर-पार विधेवियो का विनान द्वारा अपदस्थ धामिक्ता के 'जादुई तथा रहस्य वाले पक्ष के प्रति रुझान क्या जताता है ? एक आलोचक के मतानुसार एलियट को विद्यार्थी जीवन के दौरान मीमासादशन के उस शब्द और अथ के औत्पत्तिक सम्बध वाले सिद्धात न विशेष रूप से प्रभावित किया था। पर इस सयोग को हम निर सयोग में अधिक महत्व न भी दना चाह तो भी-ठेठ नृतत्वशास्त्रीय और मास्मृतिक तक सभी - आधुनिक कवि के अनुभव का यह भ तसाक्ष्य कोई कम मूल्यवान् नही ठहरेगा। विडम्बना मगर यह है कि इस धामिव सवंदना की मानवीय पहुच तथाकथित मानववादी संवेदना की पहुच से भी कम दिखाई देती है। एलियट की अत राष्ट्रीय आधुनिकता अतत 'समूचे यूरोप को आत्मसात् पर बालने तक ही सिमट जाती है और यह पूराप भी अतत ईमाई यूराप ही निकलता है, उसकी प्राक् ईसाई और पगन जडो के साथ एलियट वा वसा रिश्ता कहाँ है जसाकि ग्योएटे का - यहाँ तक कि मथ्यू आनाल्ड या तक निश्चय ही है। यह धार्मिक्ता की सीमा है अथवा आधुनिकता की? पलावाद या मानववाद सरीखी अवधारणाएं भारतीय चितन की शब्दावली मेक्सी लगेंगी? ऐसा क्या है कि साम्राज्यवादी किपलिंग की रचना का भारतवप उदार मानववादी फॉस्टंर वे भारत की अपेक्षा काही अधिर प्रत्या सजीर है ? अगर यह सच है दि मनुष्य की मनुप्यता मूलत उसकी मृजन गीलता म है और इस गृजनशीलता को असलो अभिव्यक्ति मूल्या की मृष्टि मे है तो इन मूरया का स्थायी सदम फिरो माना जाय ? मनुप्य की मानव वेद्रित, मानव-सीमित इष्टि म अथवा समकालिन वास्तविकता और भापिय सम्प्रेषण 63 सृष्टि और मनुष्य के सजातीय सम्य च तथा पार और अथ व नित्य-सम्बध में सभ्यता के विकास प्रम तथा इस नित्य सम्बप के बीच बया कोई बुनि यादी समति दीस पडती है या फि युनियादी विसगति ? क्या ऐसा कहा जा सकता है कि मनुष्य को सजनात्मक चेप्टाआ का एक हिस्सा (मसलन प्रापना या कवि यम) तो शब्द और अथ ये इस नित्य सम्व घ को टोहने-पकड़ने की कोशिश करता है और दूसरा अपेक्षाकृत विस्तृत हिस्सा शब्द और अप वे उस सम्बध से निकलता है जो नित्य नहीं, नमित्तिक है, स्थितिशील नही, प्रयोग- शील है ? भापा चूकि वस्तु जगत को ही नहीं, अपने आपको भी पहचानने का साधन है, अतएव वही मूल्या की सृष्टि को भी सभव बनाती है । य मूल्य सौदर्यात्मक, नैतिर और वीरोचित भी हो सकते हैं और इनकी प्रेराण मानवीय होते हुए भी मानव-सीमाआ का अतिक्रमण करने वाली भी हो सकती है। शब्द और अथ का सम्ब ध नित्य हो सकता है, शायद है भी, रितु भापा और अथ का सम्बध अनित्य ही हो सकता है भले ही उस अनित्य सम्बन्ध में कभी- कभार नित्य की कौंध उसी तरह अकस्मात प्रकट हो जाए जिस तरह वाक्य के वि यास के बीच एक शब्द कोध जाता है और गद्य के बीचाबीच काव्य झलक आता है । भापा के स्वभाव अयवा विकास म ही यह अतविरोध निहित है कि वह जितना जोडने वाली है उतना ही अलगाने वाली भी। एक ओर जहाँ भापा एक विशिष्ट सस्कृति के अतर्गत पूरे समाज को जोडती मिलाती है, वही वह उस पूरे समाज को दूसरी सस्कृतियो के दूसरे समाजो से अलग भी करती है। कि तु इसके साथ साथ यह भी गौरतलब है कि जिस भापा म किसी प्राचीन भापा के सस्कार को अथवा आदिम सस्कारको झकृत करने की जितनी ही ताकत होती है, उस भाषा मे मनुष्य की अतरात्मा को स्पश करने की और व्यापक मानव समाज को भी न सकने को उतनी ही सामथ्य होती है । भापा की यह स्थिति क्या कुछ कुछ धम की स्थिति स नही मिलती जुलती? आखिर क्या कारण है कि इतिहास क्रम मे जो धम जितना ही युवा है, वह उतना ही कट्टर और प्रतिक्रियावादी सिद्ध हुआ है ? क्या इससे यह विचित्र निकष निकाला जाय कि मनुष्य को प्रकृति मे ही एक अतविरोध मौजूद है कि मनुष्य की मनुष्यता के धार्मिक और कलात्मक आयामों के विकास का तक आर्थिक और राजनीतिक मनुष्य के विकास के तक से अलग और विपरीत दिशा में काम करता है। क्या यष्टि और समष्टि के बीच एक अनिवाप विरोध और द्वन्द्व अनिवाय है क्या कोई जोवन दशन ऐसा हो सकता है जो इन विप रीतगामी प्रक्रियाओ के बीच सामजस्य स्थापित कर सके। वह दशन होगा या जीवन मुक्ति का क्या जीवन की अद्वतवादी व्यवस्था उन जीवन का 64 सबद निरतर सारे अतविरोधा और घपला से मुक्त हो सकती है जो द्वंत के स्वीकार पर खडी सभ्यताओ मे पाए जाते हैं ? क्या उसमे भी अपने ढग के घपले और दूसरी तरह के अयाय नही होगे? मूलत अद्वैतमूलक प्टि मे भी क्या मनुष्य के ऐहिक और पारमार्थिक जीवन के लिए दोहरे मानदण्डो की व्यवस्था नही चलती रहेगी? क्या पारमार्थिक अद्वैत के लिए अपनी तक सगति को जीवन के स्थूलतम धरातल पर प्रतिष्ठित करना अनिवाय नहीं हो जाता? मोक्ष केन्द्रित चितन को अपनी जीवनी शक्ति सिद्ध करने के लिए अथवा अपनी मानवीय उपयोगिता सिद्ध करने के लिए अथ और काम के क्षेत्र में भी उसी अनिवायता के साथ प्रवृत्त नहीं होना पडेगा तब फिर उस दशा म आर्थिक और राज नीतिक मनुष्य के लिए भी धार्मिक और दाशनिक मनुष्य की तरह उसी कोटि और उसी उत्कटता के सत्याग्रह के सिवा और विकल्प ही क्या बचेगा? अपने-अपने जातीय अनुभवो के बल पर ससार के विविध मानव-समूह अभी हाल तक अपना सास्कृतिक जीवन कमोबेश धम बुद्धि के साथ स्वयपर्याप्त ढग से चलाते रहे । परतु सौदय-बुद्धि और याय-बुद्धि के बीच, प्रेम बुद्धि और पुरुषाय-बुद्धि के बीच वास्तविक सामजस्य स्थापित करने की सबसे बड़ी चुनौती तो अब जाकर पेश हुई है जब मानव समाजो की यह अलग थलग स्वयपर्याप्तता एक विराट अन्तनिमरता के अनिवाय तक के सम्मुख रूपातरित होने को या बिखर जाने को लाचार सी दिखाई दे रही है। आधुनिक जगत मे विज्ञान और राजनीति के अभूतपूर्व विस्फोटो के फलस्वरूप इन विविध समाजो के बीच चाहे अनचाहे जो परस्पर घाल मेल की प्रक्रिया तेजी से चल पडी है, उसस उन उन समाजो के परम्परागत मूल्या मे काफी उलट-फेर हुई है और इस कारण भी भापिक सप्रेपण के क्षेत्र मे खासी हलचल मची है। इस अराजक्ता को रचना-सम्भव बनाए रखने के लिए यह तक उपस्थित किया गया कि आधुनिकता स्वय मूल्य नहीं, बल्कि मूल्य के प्रति एक दृष्टि है । काफी दूर तक यह तक रचना सभव बने रहकर चला भी। पर अब इस तथाकथित मूल्यनिरपेक्ष वज्ञानिक दृष्टि की सीमाएँ न केवल दाश निको और क्लाकारो के लिए, बल्कि स्वय वैज्ञानिको के सामने भी क्रमश स्पष्ट हो चली हैं और उसके रचनात्मक दावे भी उसी अनुपात मे सिकुडते चले गए हैं । वह दौर भी बीत चला है और यह अनुभव किया जाने लगा है कि मूल्य के प्रति भी वही दृष्टि मूल्यवान हो सकती है जो स्वय मूल्य दष्टि या मूल्य खोजी दृष्टि हो । नहीं तो विसगतियो और विरोधाभासो से भिडते हुए किसी गहरे बुनियादी स्तर पर सगति बिठालने की चुनौती चुनौती हो रह जाएगी और दुनिया के छोटे होत जाने समकालिक वास्तविकता और भाषिक सम्प्रेषण 65 तथा मनुष्य काही अवमूल्यन हाते जाने के बीच सीधा समानुपात स्थापित हो जाने म जो थोड़ी बहुत पसर बाती रह गई है, यह भी न रह जाएगी। यदि हम यह माने कि सच्ची अतराष्ट्रीयता और कोरमयोर आधुनिकता ही आज की वास्तविकता में निकलने वाले मूल्य हैं ता उनी प्रतिष्ठा भी अतत सच्ची सवमाय भाषा के आधार पर ही तो होगी। यह वहाँ से आएगी? क्या वह एस्परेण्टो की तरह गढ ली जा सकती है ? इसी तरह मूल्या के बार म भी इस रामानी भ्रम से छुत्वारा पाना आवश्यक लगन लगा है कि उहखोजा नही गढा जाना है । साहित्यक शोध भी लगभग इसी निष्प पर पहुंचा है कि आधुनिस्तावादी आदोलन अपनी तमाम गर रोमाण्टिक प्रतिज्ञाओ के बावजूद उन्नीसवी सदी के रोमण्टिय जादोलन वा ही एक और प्रस्फुटन था । निश्चय ही इस तथ्य स उसकी धनात्मक उपलब्धियां कम नही हो जाती कि तु जो असली बात ध्यान देन की है वह यह है कि इधर यूरोप के विचारको म अपनी सभ्यता के इतिहास चत्र के -विशेषवर रेनसा और रोमण्टिर युगो के निमम पुनमूल्याक्न की प्रवति जोरा पर है। मसलन, इसाया बलिन ने ही जसे, यह अत्यत विचारातेजक स्थापना की है कि रोमण्टिसिज्म ही इस सतरनाक गोकि ऊपर से बडी निर्दोप और रमणीक लगने वाली धारणा के लिए जिम्मेदार है कि मनुष्य का काम मूल्या की सोज करना न होकर उह गढना या - वेण्ट करना है वे इस रामण्टिर विश्वास का मानव जाति के लिए अत्यत दुभाग्यपूण मानत है कि आदमी अपने जीवन को स्वय गढने के लिए स्वतन है किही शाश्वत प्रतिमाना वी पहचान अथवा अनुकरण उसका धम नहीं है । इसाया वलिन ही क्यो और भी दूसरे कई विवारका के अनुसार यह रोमण्टिक विचार यथाथवाद और वस्तुवाद पर ही नही, स्वय अनेकातिक सत्य पर ऐसा हमला था, जिसके दूरगामी दुष्परिणाम हुए - ऐस दुष्परिणाम, जिनसे तत्काल उबरने की फिलहाल कोई सभावना नज़र नहीं आती। कि तु मुझे ऐसा लगता है कि यूरोप के अग्रगामी दाशनिक चिंतन म वास्तविक्ता से इसी रोमण्टिक विचलन को ठीक करने का उपक्रम किया जा रहा है। उदाहरण के लिए विटग स्टाइन के यहा ही-- जो कि, रसेल और हार्डी के इन दावा का खण्डन कर देता है कि एक गणितज्ञ वास्तव में यथाथ के गणितीय रूप की खोज अथवा साक्षात्कार करता है। विटगे स्टाइन कम से कम गणितन का यह श्रेय देने को तयार नहीं है । उसका स्पष्ट अभिमत यह है कि गणितज्ञ भी वस्तुत एक इवेण्टर ही है खोजी (सत्य की खोज करने वाला) नहीं। - 66 सबद निरन्तर तव फिर समकालीन वास्तविकता के सम्मुल भापिक सप्रेपण के क्षेत्र म यह जो 'पोस्ट मॉडनिस्ट फेज़ चल रहा है उसका स्वरूप क्या है ? या कि क्या होना चाहिए -विशेपकर एतद्देशीय स दभ म । आधुनिकता और वज्ञानिक दृष्टि के उत्साह म हम बात शरूर अ तराष्टीय मानदण्डा की करते है पर व्यवहार में, वास्तव म होता यह है कि खेल के नियम तक तथाकथित विक- सित राष्ट्रा के हित मे ही बदलते चले जात हैं । जव हामी जसे खेल का यह हाल है, तब फिर जो उच्चतर वौद्धिक खेल है पला साहित्य और विनान आदि के - उही म कमे अपने जाप समता और स्वतन्त्रता का याय स्थापित हो जाएगा? विवसित राष्ट्रा के मूल्य जस्री नहीं कि सास्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी विकसित मूत्य हा ही। इसका ठीक उलटा भी हो सकता है। विकसित देशो के बुद्धिजीवी अपनी आधुनिक सभ्यता के दूपणो को जल्दी पहचान लते हैं। वे अपनी ही उपजाई चीजा तथा उनसे उत्पन व धना को साफ-साफ देख पाते है । इसलिए कि सरट भी सवस पहले उही पर आता है । इसके विपरीत विकासशील देश उम सक्ट को नहीं, उन नियामता को ही देखते है और जब उही के भीतर का काई दूरदर्शी दोना प्रवार की सभ्यताआ से अपने घनिष्ठ परिचय के आधार पर इस आधुनिक सभ्यता की तह म पठ- कर उसकी मूल प्रेरणा का पहचान कर उसम निहित असत्य का उद्घाटन करत हुए, अपने देशवासिया को ही नहीं, अपितु, समूचे मानव समाज को चेतावनी देने की जरूरत महसूस करता है, ता देखने म आया है कि स्वय उसी का समाज - बुद्धिजीवी समाज - उस जनसुना कर देता है। चूकि आधुनिक सभ्यता के उदय और विकास की प्रक्रिया म इन आपनिवेशिय बुद्धिजीवियो का उस तरह कोई योगदान नहीं है अत वे उस विकास की शों की अथवा उसकी सास्कृतिर आध्यात्मिक परिणतिया पो उस तरह देख ही नहीं पाते जिस तरह कि वे देय पाते हैं जिहान उस उपजाया है या उसकी कीमत चुवाई है। आचाय वृपलानी न अपनी महात्मा गाधी गोपर पुस्तक म एक जगह लिया कि 'भारत में सभी यचारिक व्यवहार नकली सिक्का के द्वारा चलाया जाता है जिनकी वस्तुत काई वीमत होती नहीं। इस आरोप को हम महज एप गांधीवादी अत्युक्ति रहार सारिज भी नहीं कर मक्त क्यादि हमारा सम• पालीन बुद्धिजीवन अनुवादजीवी हा गया है इसकी चिता दूमर हलवा में भी अक्सर को ही जाती रही है । यदि विचारक अनेय ने नी लगभग यही यात अपने ठग से उठाई है । उही ये शन्दा म आधुनिकीरण पे लिए अनुवाद - समकालिन वास्तविक्ता और नापिक सम्प्रेषण 67 - पभी उपाय नहीं हो सकता । हम आधुनिर होना है तो आधुनिक सभ्यता में मूल तब हम पहुंचना होगा। अनुवाद की समस्या यही है जहाँ हम अपनी सस्थति म विश्वास सोवर एक दूसरी सस्कृति के सामने हीन भाव स आत हैं और उससे जो युख मिलता है उसको एक छाते की तरह ओपर ममम लेते हैं कि हम उमवे अग हा गए। हम हमेशा जादूमर या है उमपा पपाय खोजत है। भूल जाते हैं हमारी भी बहुत सी एमी पूजी है जिसबा बाई पयाय दूसरी सस्कृति के पास नहीं होगा अगर यह अनुवाद करने चले।' तो समालीन वास्तविकता कम से कम इस देश की एक यह भी है, जिसरी ओर ध्यान जाता ही है और जो स्वय वास्तविरता को देख सपने की हमारी क्षमता को बुण्ठित करने वाली चीज है । एक दूसरी बात भी विचारणीय है और वह यह कि जहाँ पश्चिम का आधुनिकतम चिंतन और साहित्य अपनी नष्ट करवे निर्माण करने की परम्परा के वावजूद अपने अतीत चितन की शब्दावली और अवधारणाओ के साथ एक अनवरत लवीला और गतिशील सम्बध बनाए रख सका है, वहां भारत का बुद्धिजीवी समाज अपने ही अतीत के प्रति एक पराएपन के भाव से प्रस्त है जबकि भारतीय परम्परा के बारे म कहा जाता है कि वह नष्ट पर निर्माण करन की नहीं, बल्कि समवयात्मक परम्परा रही है । मम वय का मतलब ही यह है कि उसम शुद्ध तक की दृष्टि से परस्पर विरोधी लगने वाले विचाराका सगम होता है। निश्चय ही वास्तविक जीवन की चुनौनियो स सफलतापूर्वक निपटने की प्रक्रिया ही किमी परम्परा का जन्म देती है पर यह भी तो उतना ही सही है कि उस परम्परा को भी बार बार अपनी मोटी पर व सना पड़ता है और उसका रूपान्तरण भी होते चलना लाजिमी है अयथा बन बनाए समाधाना मे ही सतुष्ट हो रह्न की, विना किसी वौद्धिक ग्लानि के यथास्थिति का ही सवदनहीन सरक्षण दिए जाने की आदत पड जाती है। साथ ही एक लाइलाज किस्म के दुलमुलपन और बौद्धिक अराजकता को जान अनजान बढावा मिलता रहता है । सस्कार और सवेदन के बीच जीवत क्रिया प्रतिक्रिया का सम्बध ही जम टूट जाता है । एमे म एक चुनौती भरे वर्तमान का साहसपूर सामना करने और रचनात्मक आत्मालोचन को जोखिम उठाने की जगह बालगति से पिछड़ जाने की हडबडी मे जल्दी जल्दी छलाग लगाने को आतुरता दिखाई दे और अपनी ही परम्परा स अलगाव पदा हो जाए तो यह अचरज की बात क्या हो? हो सकता है, यह पराएमन और अलगाव की भावना, उस मोहमुग्ध चकाचौंध का ही उलटा पहलू हो जो पिछली सदी के पुनजागरण ने हमारे भीतर पदा की थी। जो भी हो, हम इस प्रश्न का सामना करना ही - 68 सबद निरतर पडेगा कि क्यो हम अपनी विरासत का निर्धात और आत्मविश्वासपूण उपयोग करने की स्थिति मे स्वय को नहीं पाते? भारतीय जीवन दृष्टि और साहित्य दृष्टि मानववादी है कि चराचरवादी ? वह कलावादी है कि समाजवादी? भारतीय साहित्य और दर्शन ही नहीं, साहित्य शास्त्रो का अध्ययन करने के दौरान क्या बहुत सारे चालू वर्गीकरण अपर्याप्त और अनगल से नही लगने लगते । साहित्य को 'सभी प्रकार की विद्यारूपी परिपदो का सदस्य' (भोजराज श्रङ्गार प्रकाश) मानने मे अत्याधुनिक विवेचक को भी क्या आपत्ति हो सकती है ? भामह को कविता की सब कुछ पचा सकने वाली शक्ति पर तथा कवि की भारोत्तोलन शक्ति पर जो आश्चय हुआ था- न सशब्दो न तद्वाच्य न स यायोन सा कला जायते य नकाव्यागमहो भारो महान् पवे काव्यालकार 5,4 क्या बीसवी सदी के महानतम् कवियो की सदम बहुल रचनाओ से गुजरते हुए सुद हमारा मन भी उसकी गवाही नही देता? वास्तविक्ता से हमारा क्या अभिप्राय है ? क्या वह विपयिनिरपेक्ष 'परम सत्' है जिसका अनुभव तो सम्भव है, पर वणन नही ? (यतो वाचो निवत ते अप्राप्य मनसा सह ) मगर तब फिर हमारे दशन के आदिकाल मे ही वार- शक्ति की इतनी महिमा क्यो वखानी गई है ? ईश्वर को ही वास्तविक कवि और जगत् को उसरा क्व्य क्या कहा गया? चेतना की जो स्वरूपगत सावतिय शक्ति है अयग्रहण करने की तथा अपने को अभिव्यक्त करने वी -उसी को ता वाक शक्ति का नाम दिया गया। अपनी बीइग एण्ड टाइम नामक पुस्तर मे बीसवी सदी का दाशनिय हाइडेग्गर भी तो मानवीय अस्तित्व के जरिये ही उस परम सत् (बीइग) तक पहुंचने या माग ढूढ़ता दिखाई देता है । हा उसका तक अवश्य अस्तित्ववादी है, जिसके अनुसार 'मानव में ही परम सत् पा वास हो सकता है क्यापि मानव ने ही स्वय को सत् (या सत्ता, 'वोदग') के प्रति इस प्रकार खोला है कि यह 'सत' उसम प्रविष्ट हो सकता है। यह अकारण नहीं है कि हाइडेग्गर भाषिक सप्रेपण मी सर्वोच्च अवस्था ये रूप म ही नहीं सत ये अधिष्ठान वे रूप में भी काव्य को परमयोटि सा महत्व देता हैं । बाय्य, उस के अनुसार "शन्द माध्यम से 'बीइंग' यी प्रतिष्ठा है।" इतना ही नहीं, आगे चलकर यह स्पष्ट रुप से यह भी घोपिन करता है कि पविकीप्रामाणिस्ता दागनिक को प्रामाणिकता से पिसी प्रकार ममरालिर याम्नविरता और भापिर सम्प्रेषण 69 कम नही बलि कुछ बढकर ही है। बल्कि वस्तुत एक दाशनिक के लिए प्लेटो के डायलाग्ज नहीं पारमनाइडीज की कविता ही अनुकरणीय आदश है।' देखा जाय तो हाइडेग्गर का असली सरोकार कविताई से नही शब्द और अथ ये नित्य सम्ब व वाली उस विशेष भूमि से है जहा स उच्च कोटि का काव्य ज म लेता है और जो दाशनिक को भी अपन ढग से इष्ट होता ही है । यह भी कहा सकता है कि हाट डेग्गर भी अपनी जतद प्टि से उसी शक्ति का सकेत पा रहा है जिसे हमारे यहा पश्य ती वाक के नाम से अभिहित किया गया है । जिस तरह विटगेस्टाइन की चिता के वेद्र मे रोजमर्रा के व्यवहार में आन वाले सामा य वाक्य है उसी तरह हाइदग्गर के चिंतन की अग्रभूमि म यह वाक' अथवा शब्द ह । एक और विचारोत्तेजक वात यूनानी भाषा के प्रति हाइडेग्गर का दृष्टिकोण ह। उसके अनुसार 'यह यूनानी भापा हमे अपनी जडो के भीतर ले जाती है । वह जया य यूरोपीय भापाला की भाति महज एक भापा ही नही है । समस्त भापाओ मे वही और एकमान वही साक्षात 'लागोस' ( नान अथवा कह लें-शदब्रह्म ) है। यही नहीं, सस्कृत को देववाणी कहने के पीछे जिस तरह की प्रेरणा रही होगी-लगभग वसे ही मत्रमुग्ध और आविष्ट स्वर में हाइडेग्गर भी हमे यह विश्वास दिलाना चाहता है कि प्राचीन ग्रीक भाषा ही वह भाषा है जिसमे परम सत्ता हमसे मवाद करती है। समकालीन जगत् म मानव की-और स्वय दशन की जो हालत है उसे देखते हुए हाइडग्गर की ये वाते एक्वारगो चकरा दन वाली लग सकती हैं। कितु हमारे अपन एक तुलनीय सदम म यदि हम जान दकुमार स्वामी के कृतित्व का स्मरण करें तो क्या एसा नहीं लगता कि यह युत्पत्तिमूलक शली-यह अपनी जडा को खोजती हुइ मूलगामी चिंतन पद्धति-भी कही न कही हमारी समकालीन वास्तविक्ता का ही एक प्रमुख लक्षण यादि जग होनी चाहिए? यह ध्यान देने की बात है कि विचार हाइडग्गर के अनुमार-धारणामूलक नही होता वह तो एक विशेष प्रकार का श्रवण ह रेवरेंशियल लिसनिंग है। इस तरह देखा जाय तो एसा प्रतीत होगा कि सत्य और श्रुति का समीकरण देश और पाल दाना ही प्टिया म दो नितात भिन सस्कृतिया और दाशनिक परपराआ को एक दूसर के करीव ल आता प्रतीत होता है और इस उभयनिष्ठ तय्य का रबाक्ति परता है रि दानिय जिनासा का प्रारभ वाक गक्ति के अनु भव से--मृष्टि को सन्दमूलरता की प्रतीति म ही जुडा हुआ है और फ्लिासपी विगिस इन वडर (भाश्चय वसरिचदनम अमोति) वाली बात यू ही नहीं 70 मवद निरतर है। हाइडेग्गर सरीखे दाशनिको का ही नहीं, उनके समकालीन आधुनिक कविया का साक्ष्य भी वागथ की इस प्रकृति को झलकाता है जैसा विवी' ऐस एलियट का उल्लेख करते हुए हमने देखा था। आधुनिक हिदी कवि को भी स्वीकारोक्ति है कवि हु/फहना सब सुनना है स्वर केवल सन्नाटा (अज्ञेय) एलियट वा परवर्ती कवि डब्लू एच आडेन भी एक जगह कहता है-'कोई कवि यश प्रार्थी कवि है या नहीं इसे जानने की मेरे पास एक ही कसौटी है। यदि वह मुभसे यह कहता है कि मेरे पास कुछ महत्व की बातें हैं जिह कहने के लिए मैं कविता करता हू, तो मुझे उसके कवित्व पर सदेह हो जाता है। कि तु यदि वह कहता है कि मैं तो शब्द का पीछा करता हू- शब्द पर कान लगाकर उसकी बात सुनने की कोशिश करता हूं, तो मुझे यकीन हो जाता है कि हां, यह आदमी जरूर कवि बन सकता है।' मैंने कहा कि यह विषय ही कुछ ऐसा है जो हमे अपनी परिक्रमा करने को विवश किये दे रहा है। यह भी, कि मेरे लिए यह वत उस समकालीन वास्तविकता का है जो पूर्व और पश्चिम की भरपूर टकराहट से बनता है । जिस निमित्त, जिस अवसर पर ये बातें मन मे उठ रही हैं, उसे देखत हुए भी - मुझे उम्मीद करनी चाहिए कि-यह चर्चा बहुत अनगल या बेमेल नहीं लगेगी। निश्चय ही यह मानने मे किसी को क्या आपत्ति हो सकती है कि आधुनिकता का अथ केवल भौतिक उनति से नही, आदमी की चेतना के विस्तार से भी जुडा हुआ है और माक्स प्रायड तथा आइ स्टाइन सरीखे मनीपियो ने इस विस्तार म अपना निश्चित योग दिया ही है यह भी, कि उनके विचार सावभौमिक ही प्रतीत होते है, एक्देशीय अथवा एकपक्षीय नहीं। पर तु इसके साथ ही साथ क्या यह भी सच नहीं है कि इन सावभौम विचारा के बावजूद इस समय समूचे विश्व मे जो उथल पुथल चल रही है, वह एक नए और आधुनिकतावादी दौर से भिन सतुलन की मांग कर रही है जिसे जाम देने म इस देश की दवी घुटी और अत विभाजित मगर अपने ढंग सत्याग्रही चेतना भी इस शताब्दी की शुरूआत से ही कुछ न कुछ सत्रिय देखी ही जा सकती है। पश्चिमी मानस वे अतद्वद्वको भी इसी जमीन पर परखना अनिवाय लगने लगता है विशेषकर दशन के क्षेत्र में जहाँ विचारो का सावभौमिक मूल्य सबसे कम सदिग्ध माना जाता रहा है । यह नहीं कि हमारे मन म अस्तित्ववादी विचारधाराओ के प्रति कोई विशेष पक्षपात हो । पपपात तो दागनिक चिंतन मान का होना चाहिए-समकालीन दशन के मुख्य सरोकारा के प्रति ही-निनम न सही मानव नियति का ना-मानवीय मेधा का पुरपाथ तो प्रतिविम्वित होता ही है। और इस लिहाज से-प्रस्तुत समकालिन वास्तविक्ता और भाषिक सम्प्रेषण 71 विषय के सदम मे भी हमारे लिए जितना हाइडेग्गर कोगाद और सात्र मननीय हैं, उससे कम विटगे सटाइन और उनके सम्प्रदाय का सामाय भाषा मूल दशन नही । अस्तित्ववादिया की चर्चा का औचित्य शायद यह भी हो कि उनके यहां वास्तविक्ता के दशन और उसके भापिक सप्रेषण के बीच कुछ कुछ उस तरह वा घनिष्ठ सम्बध स्थापित हुआ है, जसा कि साहित्य मे- विशेषकर आधुनिक साहित्य मे देखा जाता है । विचार और उसके रूपाकार के बीच-शब्द और अथ के बीच एक विशिष्ट प्रकार के द्वद्ध और एक विशिष्ट प्रकार के अद्वत की स्थिति भी उनके यहां लक्ष्य की जा सकती है। हाइडेग्गर का उल्लेख हमने ऊपर क्यिा ही है। कोर्केगाद का दशन उसकी खाम विधा जनल्स के जरिए ही प्रकट हो सकता था और सार तो 'साहित्यिक' है हो । बल्कि कहना होगा कि वह दाशनिको के बीच अपनी इसी साहित्यिकता को लेकर खासा बदनाम भी रहा है। अलावे इसके, आधुनिक भारतीय साहित्य के भी एक खासे सवेदनशील अश पर अस्तित्ववादी विचारणा का खासा प्रभाव बताया जाता है। इस समान सवेदन की कोई वजह, कोई पीठिका तो होनी चाहिए। वह क्या है ? समकालीन वास्तविकता चूकि विज्ञान और राजनीति से सबसे अधिक प्रभावित दीखती है अत यह प्रश्न भी उठता ही है कि स्वय दाशनिका और कवियो क्लाकारो का दृष्टिकोण इस सम्बध मे क्या है ? यह एक रोचक प्रश्न है और भारतीय तथा यूरोपीय साहित्य की तुलना की दृष्टि से भी इसके उत्तर को सोज बडी ही दिलचरप होगी पर उसका यहाँ अवकाश नहीं है । इतना समेत काफी होगा कि जहां तक पविया तेषको का प्रश्न है, अपने यूरोपीय विरादरो की तुलना मे आधुनिक भारतीय लेखको का रुस दोना ही मामलों मे-शायद अधिक स्वीकार भाव वाला, अधिक पॉजिटिव प्रतीत होता है । इसरा एक कारण तो यह हो सकता है कि उधर वाले अतिपरिचय के कारण दोना से ऊबे हुए हैं जबकि हम नएपन के कारण उनम अभी भी रचनात्मक सभावनाएँ दीसती हैं। दूसरा और शायद अधिक गहरा कारण यह हो, कि पश्चिम की परम्परा म साहित्य की स्थिति और गति विज्ञान और धम राजनीति दोनोस विविक्त एक स्वायत्त अनुशामन की तरह रही है जबकि हमारे यहाँ वस विशेषीकरण की नौवत कम ही-शायद अब भी नहीं आई है। ज्यादातर सेषक विज्ञान मे मातरित नहीं दीखत वे भी नही, जो उसके प्रति उदागीन हैं। जहां तर राजनीति का प्रश्न है भारतीय लेखक की दुविधा और अतः आज भी इस दिलचस्प मूक्ति म भनात प्रतीत हात है कि 'अप्रेजो न अरल दो, पर गूगा बनारर घोडा, गांधी ने हम वाणी दी पर अालय पर 72 गवद निरनर
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भी प्रकार के सारतिय मूल्य नजर आते हैं । उसरे मतानुसार 'विज्ञान एवं तपनीकी और कामयाजी चीज है । आत्मा या जानन या जमान की दिशा में उससे किसी तरह की मदद या प्रेरणा नहीं मिल सकती। बल्कि हकीकत तो यह है कि जो आध्यात्मिक अनुमघान म असमथ होते हैं, वे ही विनान की आर प्रवृत्त होते हैं।' हाँ काल यास्पस अलवत्ता जरूर विनान वो इतना हेय नही समझता वह इस सभावना के लिए थोडी बहुत गु जाइश रयके चलता है कि सत् के नान की दिशा म विनान भी शायद कभी कोई मूल्यवान समेत उभार सके । जहाँ तक सान की बात है सात्र विनान को एक तरह की ऋणात्मक स्वीकृति सिफ इसी आधार पर देता है कि आत्मपरकता की दलदल से बचने के लिए उस नग्न अकिंचन चेतना की अवधारणा को मुरक्षित रखना अनिवाय है जो एक वज्ञा निन के पास सहज ही और सदव होती है ।' अर्थात् असत् होने की मात्र दशक होो की चेतना। निश्चय ही यह एक प्टि तो है पर मूल्य दृष्टि नहीं। देकार्ते का यह उत्तराधिकारी एक जोर तो शुद्ध चतय की वात करता है और उसमे चरम स्वतत्रता के मूल्य का दावा पेश करता है और दूसरी तरफ हमारे रोजमर्रा के स्व' को खडा करता है जो उसके मुताबिक मेरे कारण नहीं दूसरो के कारण बनता है । इस द्वत की तुलना साक्ष्य के प्रकृति और पुरुप से की जा सकती है पर सात्र की चरम स्वाधीनता उस तरह मुक्ति का दर्शन नहीं है क्योकि उसमे अनासक्ति के विचार को कोई स्थान नही है। उसका कहना है कि 'दूसरे लोग या वस्तुएँ यदि मेरी स्वाधीनता के रास्ते म बाधक हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि मेरी स्वाधीनता सीमित है । मुझे तो बस अपने उद्देश्यो की पुनरचना भर करनी है । इन रोडो को हटाने के लिए मैं सदा सवथा स्वताहू। सात्र काही समकालीन विचारव माले पाते उनीसवी सदी के नियतिवाद और इस सार्थीय चरम स्वाधीनतावाद के बीच एक रास्ता निकालने की कोशिश करता है । उसके अनुसार मनुष्य न तो पूरी तरह व धनो में जकडा हुआ है और न सार्नीय अथ म पूरी तरह आजाद है। इसमे कोई सदेह नही कि हम एक सामाजिक परिस्थिति म ही जम लेत हैं माक्सवादी ठीक कहत हैं कि सामाजिक प्राणिया के रूप में हमारी जो अवस्थिति है, वह काफी हद तक हमारे पाय को निर्धारित करती ह और हम अपने इतिहास नियत्रित स्व को उतार पकने को पूरी तरह स्वतत्र नहीं है। वितु दूसरी ओर यह भी सच है कि हमारी कम प्रेरणाएँ पूरी तरह हमारी सामाजिक परिस्थिति से निर्धारित नहीं होती । अपने चारो आर के वस्तु जगत के 74 सबद निरतर 7 तयशुदा अर्थों से रोज ही हमारी मुठभेड होती है पर वे तयशुदा अथ कभी भी हमारे स्वतत्र अभिप्राय ग्रहण की क्षमता पर हावी नहीं हो सकते । स्वय भाषा-इस विचारक की दृष्टि मे-हमारे और हमारे जगत के बीच के द्वद्वात्मक सम्व धो का सर्वोत्तम उदाहरण है । यो तो जो भापा हमे मिलती है, वह पूरी तरह वैयाकरणो और कोपकारो द्वारा स्थिर दिये गये नियमो और अर्थो मे बँधी हुई होती है हम मनमाने ढग से शब्दो का इस्तेमाल नहीं कर सक्ते । परतु क्या हम इसी नियमवद्ध भाषा में अपनी सवथा निजी और नई शैली विकसित करने को स्वतन नहीं है। क्या प्रत्येक महान् कृति ऐसा ही नही करती आई है यह भी इस सदी का एक रोचक विरोधाभास है कि दशन के क्षेत्र मे भी काफी कुछ हलचल ऐसे लोगा द्वारा पैदा की गई जो मूलत दशनशास्त्री नहीं कहे जा सकते । एक ऐसे युग मै जबकि दशनशास्त्र का सरोकार उन समस्याओ से बिल्कुल कर गया था, जो तत्व चिता (मटाफिजिक्स) के नाम से परम्परागत दशन के केन्द्र म रहे आए थे यह सचमुच अचरज का विषय है कि दूसरे अनुशासनो से-विशेषकर विज्ञान और गणित से आए हुए लोगो ने यह जिम्मेदारी सम्भाली । विटगे स्टाटन एक मूलत इजीनियर था (और कुमार स्वामी भी मूलत भूगभशास्त्री थे)। ऐडिंग्टन और व्हाइट हेड जस मूलत गणितन लोगो का पूर्णकालिक दाशनिक बन जाना भी ऐसी ही घटना है । म्वय पाश्चात्य जगत् में इसकी अनुकूल और प्रतिकूल दोना तरह की प्रतिक्रियाएं हुइ और व्यग्य भी किया गया कि 'पराभौतियी या यह को उत्तराधिकार भौतिकी ने सम्हाला है, वह खुद ही दीवालिया है। जिस दशनशास्त्र ने फालतू बोझ की तरह उतार फेंका उसया दायि प्रग्य या भी क्या है। विनान तो सदा से दशन के उतारे हुए पपडे पहन कris रहा है । उससे तत्वनान के क्षेत्र में किसी नयी पहल की उम्मी- मी बेकार है ।' निश्चय ही यूरोपीय दशन के इतिहास पा 13m आपत्ति बिल्कुल निगधार नहीं लगती। यह निशाए- Farm दशन के विकास के लिए उसे पहले मनुष्य पी थाति Ptntr win कर एक स्वायत्त गति प्रदान करता है, वही अगरrinter धम के प्रतिपादन मे जुटा देता है। TUE, Oral और स्वायत्तता दशन को दे दी थी-47 यातिranik rayrala, अधीन रह पाती जो रि मुरगत नहीं थी उसे विद्रोह करनाशीका श्राr/" में पश्चिमी दशन के म यनियाय Aryan ... गmeinxidanthintri ही दिया। रोमाण्टिर आदोलन के रूप म जो अपना दौर उपस्थित हुआ, उसे भी इसी सुबराती 'रोजन पी एप अगली तारिक परिणति के रूप में देखा गया है। पर युछ विद्वाना के आसार यह रोमाण्टिर आदोलन दरअसल एक दूसरा पुनजागरण था जिस उहान 'ओरिएण्टल रेनेसांस' कहा है । उनके मतानुसार जहां पहला पुनर्जागरण युराप को अपने ही अतीत के बारे मे चमत्कृत वर रह गया था वहाँ यह दूमरा पुनर्जागरण इस आत्म तुप्टि का पश्चिमी स्वय पर्याप्तता में भ्रम को तोड़ने वाला था। पहली बार यूरोप को अपने वृत्त से बाहर की मानव मस्कृतिया का, उसकी बौद्धिक उपलब्धिया का सही पान हुआ। भले ही बहुत बाद तक भी इस ज्ञान का उपयोग वर आत्म मथन की दिशा मन परके आत्म विस्तार की दिशा में करता रहा हो। यहा पर हम अपने आप र स सवाल के सामने स्वय को खडा पाते हैं कि इस मामले में भारत की स्थिति क्या है ? परम्परागत और समकालीन दोनो ही स्थितिया का निमम निरूपण विय बिना हम इस सवाल का जवाब नहीं दे सरते। ऊपर हमने देखा था कि पश्चिम म दशन ने स्वय को धार्मिक्ता से वियुक्त कर ही अपना स्वायत्त विकास क्यिा और इसी क्रम म उसने विज्ञान को भी उ मुक्त पिया और बीसवी सदी तक आते आत स्थिति कुछ इस तरह उलट गई है कि अब विनान ही एक ऐसे बिदु पर पहुँच गया है जहा से वह इस सब ओर से घिर और फैंस हुए दशन को कुमुव पहुचाने की कोशिश मे है। टसी तरह हम यह भी देख सकते हैं कि धम की ही तरह काव्य से भी निरपेक्ष और स्वतम गति यूरोपीय दशन की रही है और अब आधुनिक काल मे विशेषकर अस्तित्ववारियो के यहाँ दशन लौटकर फिर साहित्य का आश्रय लेता प्रतात हाता है । ठीक वस ही जसे वह वज्ञानिक चिंतन से पुष्टि प्राप्त करता हुआ अपने क्षेत्र समोच से उबरने का यत्न करता दीख पडता है। कुल मिलाकर यह प्रकारातर से धम विज्ञान और पाय से विच्छिन दशन का पुन अपनी के द्रीय स्थिति को प्राप्त करने जसा उपक्रम कहा जा सक्ता है। भारत में दशन की स्थिति और गति इसस भिन तरह की रही है क्योकि यहा मूल मे ही यह अनुभव स्थापित है कि आत्म बोध की जमीन पर ही विषय बोध सभव होता है और विषय कल्पना के मूत्र आम क्ल्पना से ही नि मृत हात हैं । यहा न तो उस धार्मिकता से पूरी तरह अलगाया गया न काय से ! धम और विनान के बीच उस तरह के सघप की नौबत भी नही आई । निश्चय ही इस अखता के आग्रह वे अपने नुक्सान भी हागे किन्तु फायदे भी कम नहीं रहे हाग। मानव चेतना के सौंदर्यात्मक, बौद्धिक और 76 सबद निरन्तर नतिक स्तरा के बीच वैसे असामजस्य और विग्रह की नौवत भी नहीं आई जसी कि यूरोप के इतिहास म बार बार आई दीपती है। हम पाते हैं कि सौंदय की वैदिक धारणा ही नहीं कालिदासीय धारणा भी बौद्धिक और नतिक है । डा गोविद चन्द्र पाण्डेय ये शब्दा म 'भारतीय काव्य कला की परम्परा में मनुष्य की ऐतिहासिय रूपावली पी सोज नहीं है बल्यि उसके सनातन स्वस्पनी खोज है। उसकी मुरय धारा म प्राकृतिक-सामाजिक यथाथ के प्रति ऐतिहामिय और वैज्ञानिक कौतूहल के स्थान पर परम्परागत और परिचित रूपा के द्वारा पुरुषार्थो ये जनुचितन पर आग्रह है।' पाण्ड जी के इस निरूपण से असहमत हाने या कोई कारण नहीं दिखाई देता। पर सवाल यह है कि क्या आज के साहित्य के बारे म यही बात इतने विश्वास के साप कही जा सकती है ? क्या व्यापक भारतीय ममाज तथा उसके बुद्धि जीवियो के बीच कोई जीव तक्रिया प्रतिक्रिया का सम्बध सचमुच देसा जा सकता है । समकालीन वास्तविक्ता-उसके अनुभव और निर्माण म क्या लोक के सभी स्तरा की भागीदारी और जिम्मेदारी देखी जा सकती है। अगर नहीं तो क्या ? बौद्धिक और सामा य-जन के बीच इस अतराल और अलगाव के कारण सिफ वतमान मे हैं या इतिहास और परम्परा मे भी? क्या समाज के चोटी के नेताआ के भी परम्परा बोध और नियति-बोध परस्पर विरोधी नहीं रहे हैं ? क्या उन विरोधा के सामजस्य का कोई रचनात्मक धरातल पाया जा सका है ? याकि एक कामचलाऊ समझौतावाद और भीतरी अराजकता ही समकालीन परिदृश्य है ? अनेकता मे एयता का दाशनिक सिद्धात क्या नए युग बोध और नई परिस्थितिया की चुनौतियो के सम्मुख क्या आज भी पूरे समाज को रचनाशील बनाए रख सका है ? ? इसमे कोई सदेह नहीं कि अपने यहा नवीन विचारो और रूपो का भाष्या के नाम पर ही समावेश करने की परम्परा रही है और इन भाष्या के द्वारा रचनात्मक परिवतन भी हुए ही हैं। वितु इस सत्य को भी अनदेखा नही दिया जा सकता कि नई परिस्थितिया जिस सामूहिव कायाकल्प की, सगठित और अनुशासित कम की चुनौती प्रस्तुत कर रही है, उसके लिए सामूहिक मन को जसे कभी तयार ही नही किया गया था। भाष्या की परम्परा तो ठेठ बीसवी सदी तक सक्रिय रही आई है । अकारण नही कि श्री अरविंद से लेकर गांधी जी और विनोवा तक ने गीता की व्याख्यायें की। यदि हम इन भाप्या का तुलनात्मक अध्ययन करें और फिर पहले के भाष्या के साथ रखकर उह पढ़ें तो यह भी एक दिलचस्प अनुभव होगा कि परम्परा के साथ नई परि स्थितियो के सम्बध के लचीलेपन वा सही जदाज हम लग सकेगा। दूसरी समकालिक वास्तविक्ता और भापिक सम्प्रेषण 77 मोर दाशनिय भारतीयता और आचरणगत भारतीयता के बीच-फ्लिॉ साफिकल हि दुइम और रिहैवियरल हि दुइगम के बीच जिस पाप की चचा देशी विदशी विद्वाना द्वारा की जाती रही है, उसका भी निमम आत्मा लोचनापरख परीक्षण आवश्यर है। आखिर क्या कारण है वि बुद्धिजीविया के बीच भी यहा एक ओर लगभग अराजक्ता के स्तर काढुलमुलपन और दूसरी आर निहायत परोपजीवी किस्म की कट्टरता के दशन होते रहत है ? व्यापर समाज का कोई सवनिष्ठ और सुनिश्चित स्वरूप कल्पना म चरिताथ नहीं होता और सच तो यह है कि व्यापक समाज की ओर से उनके अपन जीवन और अनुभव की भाषा मे सोच सकने और बोल सकने वाले लोग विरल ही दीख पडत हैं और वे भी वास्तविक सामाजिक जीवन पर या सत्ताधारी नेतत्व पर किसी प्रकार का प्रेरक प्रभाव डाल सक्ने की स्थिति म नहीं हैं। यह भी नहीं कहा जा सकता कि बीसवी सदी म यह आत्मालोचन या परम्परा के नवीकरण का रचनात्मक काय हुआ ही नहीं। देखा जाए तो ज्ञान, भक्ति और कम तीनो स्तरा पर इस आध्यात्मिक परम्परा ने स्वय का समथ महापुरषो के माध्यम से जीवत सिद्ध किया है। कम के क्षेत्र का एक ही उदाहरण भी देखे तो क्या ऐसा नहीं कहा जा सकता कि गांधी जी ने अपने जीवन काय को 'सत्य के साथ मेरे प्रयोग की अनूठी, युगसम्मत और यथाथ सज्ञा देते हुए एक बुरी तरह से एठी हुई परम्परा को ही आधुनिक जरूरता के सदम मे पुनर्जीवन देने की कोशिश की थी कि तु जसा कि आचाय कृपलानी ने लिखा है, गांधी जी अपो कातिकारी विचारो जथवा कार्यों के लिए प्राचीन शब्दावती का ही प्रयोग करत थे। विदेशी और पारिभाषिक शदावली से बचने की कोशिश भी । इसी का नतीजा था कि भौतिकवादी और आध्यात्मवादी दोना ही प्रकार के बुद्धिजीवियो ने उन पर प्रहार किये। एक ने उन पर आध्यात्मिक जीवन में राजनीति और अथशास्त्र का समावेश कर उसकी शुद्धता नष्ट करने का आरोप लगाया तो भौतिकवादी कम्युनिस्टो ने उनका विरोध इस माघार पर किया कि सत्य और अहिंसा सम्बधी अपने विचारो तथा साधन साध्य के अद्वत सम्बधी उनके आग्रह ने आर्थिक और राजनीतिक समस्याओ के बार मे वुद्धिभ्रम पदा कर दिया है । पीछे कही मैंने कवि विचारक श्री विजयदेवनारायण साही की एक उक्ति उद्धृत की थी, उसे भी कृपलानी जी के इस कथन के साथ जाकर देखना दिलचस्प होगा । इसी सिलसिले म आग कृपलानी जी ने यह भी लिखा है कि 78 सबद निरतर 'आधुनिक मस्तिष्क गांधी जी के विचारा को समझकर उनकी कद्र तभी कर सकता है जब वह पहले अपने का इस शब्दजाल की दासता से मुक्त कर ले। मैंने यह उद्धरण यहाँ पर इसलिए दिया कि जब हम समकालीन वास्तविकता और उसके भापिक सप्रेषण की चर्चा करते हैं तो हमें दोना के वैश्विक और एतद्देशीय सदर्भो को देखते हुए अपने बौद्धिक क्रिया क्लापा और रचनात्मक प्रवृत्तिया का नए सिर से मूल्याक्न करना चाहिए। निमम आत्मलोचन की दृष्टि से विचार करे तो आचाय कृपलानी का उपरोक्त आरोप हम अपनी समकालीन वास्तविकता पर क्सिी ऊँचाई से थोपा हुआ नहीं लगेगा, बल्कि उस वास्तविकता का ही एक अग लगेगा तो इतना स्पष्ट ही हो गया होगा कि सवाल यहाँ गाधी जी का नहीं है, न उनके साथ हमारे सम्बध का। सवाल दरअसल उस दरार को देखने और उसे भरने के लिए कुछ करने का है जो हमारे नतिक जीवन, बुद्धिजीवन और कलात्मक जीवन म हर जगह दिखाई दे जाती है और जो हमे अक्षरश आत्मनिमर नही होने देती। इसी सिलसिले म स्वय भापिक सप्रेपण के सबसे सवेदनशील क्षेत्र-याव्य क्षेत्र का भी हवाला दिया जा सकता है क्योकि समाज की और राजनीति कर्मी के साक्ष्य की तुलना में एक कवि का साक्ष्य प्रस्तुत प्रसग मे अधिप अथवान लग सकता है । यू भी हमारे यहाँ प्रत्यक्ष और अनुमान से यही अधिक प्रामाणिक शब्द- प्रामाण्य को माना गया है। मुझे महा अज्ञेय की एक कविता याद आ रही है - इशारे जिदगी थे, जिसम हमारे वैयक्तिर सामूहिक मन का अतद्वन्द्व बड़ी मामिव स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त हुआ है। कविता के पूर्वाद्ध म कवि 'सस्कार की रगोन पट्टिया' को चचा करता है और कहता है और हमने यही जाना था कि रूपाकार ही तो सार है । आगे वह इस आत्म विभाजन की विडम्बना को स्पष्टतर होते हुए देखता है और पाता है कि-पर हमारे शब्द जनता के नहीं थे क्योकि जो उ मेप हमम हुआ/जनता का नहीं था/ सवेदना में ही विलग पर दी/हमारी अनुभूति हमसे यह जो लीक हमको मिली यो/अधी गली थी | इस विचलित कर देने वाले आत्म- स्वीकार और स्थिति बोध का अत कहाँ होता है, यह देखने की बात है । कवि इस 'अघी गली' के साक्षात्कार से नहीं कतराता, न उसे क्सिी अमूत आश्वासन मे घुलाता है । वितु साथ ही वह उसके सामने निनिय आत्माव साद की मुद्रा का भी नहीं अपनाता । वह इस विदु पर भी स्पष्ट पहचानता है कि जिंदगी की ललवार को सुनते रहनापवि कम की अनिवायता है । और इसी 'सुनते रहने म भविष्य की सभावना का सवेत भी वही छिपा है। मोड आगे और भी है-कौन उसकी ओट, देखो भाता है। यह समकालिक वास्तविक्ता और भापिय सम्प्रेषण 79 तो हुई अपनी काव्य याना एक पड़ाव पर कवि की अनुभूति । पर बरसा बाद एक विचारक के रूप म भी उसका निप्प इसी अनुभव की अगली कडी की तरह एक अनिवाय से लगते गत्यावरोध को दूर करने की उसी चिता और आस्था के अनुभव परिपक्व फल की तरह हमारे समक्ष प्रस्तुत होता है और यही इस लेख का उपयुक्त समापन भी होगा 'पूरा समाज जिस भापा के साथ जीता है उसमे और उसी के साथ जीते हुए अगर हम उस जीवन सदभ को पहचानते है और उस भाषा में रचना करते है तो हमारा समाज भी रचनाशील हो सकता है। जबकि दूसरी ओर अनुवादजीवी समाज के सामने जब कोई नई चीज़ आती है तो वह तुरत दूसरे का मुह देखने लगता है क्याकि अपनी शक्ति को पहचानना उसने सीखा ही नहीं। भाषा हमारी शक्ति है, उसको हम पहचानें वही रचनाशीलता का उत्स है व्यक्ति के लिए भी और समाज के लिए भी। वामम निधि द्वारा प्रायोजित रायाप्पा मेमोरियल व्याख्यान माला से मतगत पठित पाख्यान 80 सबद निरन्तर कविता और समाज [एक परिसवाद वल हमने कविता में आत्म सथप की बात की। आज हम पविता और समाज के दो खण्डा को परिकल्पना खडी वरवे दोनो का सम्बप देखने को प्रेरित हो रहे हैं। विचार की यह मजबूरी है कि वह वस्तुओ या सबधो ये एप बहुत बहे जाल के बाहर सडा होकर जब उसे देराना समझना चाहता है तो उसे अराड नहीं देख सकता-उसे तोडकर अलग वरखे ही देख सकता है । मगर विचार की यह भी मजबूरी है कि सिफ इस तरह चीजो को अलग कर, तोडपर ही न समझे, बल्कि उह फिर से आपस में जोडे-एक नयी एक्ता पदा परे । सारे सिस्टम इसी तरह बनते हैं । और चूवि आदमी की बुद्धि सीमित है इसलिए ये सिस्टम भी अलग होते हैं । अयथा अगर विचार सचमुच विचार है तो मनुष्य और ब्रह्माड की, सत्ता मात्र की एकता का अनुभव उसम से बोलना चाहिए । मगर ऐसा होता नही है । इस दृष्टि से आप हि दुस्तानी विचार और यूरोपीय विचारधाराआ की थोडी सी तुला। अपने भीतर पर ता एक असा रोचर दृश्य सामने आएगा । आप देखेंगे कि हि दुस्तानी विचार ये इतिहास में कापी वविध्य होते हुए भी हिदुस्तान अद्वत वे विचार यो अर्थाद भेदा म अभेद की दृष्टि को छोड नहीं पाता है । जववि पश्चिम ये इतिहास म शुरू म ही हेरेक्लाइटस और बहुत बाद मे भी माक्स हैं । वे जब मनुष्य और ईश्वर ये सबध की मीमासा करने चलते हैं तब भी ईश्वर और शतान, शताऔर ईश्वर पुत्र का द्वत खडा किए बिना अपनी धार्मिक जिजीविषा को परिताय नही कर पाते, और इसी तरह जब वे व्यष्टि मागव और समष्टि माय (रागाग) के बीच के सबध का चितन परते हैं तो वहाँ भी एव बुनियादी बद्ध और विग्रह को ही मानवीय स्थिति पर घटाने को विवश होते हैं । मैं समझता हूँ यह घरा मानसिकता म निहित था-मनुष्य और प्रकृति के सघषमूलय राम्ब घरो शुरू आत करने का ही यह नतीजा पा पि-इरापी परिणति एय' तरफ माक्स और दूसरी तरफ नीत्शे म होती। निश्चय ही मैं ऐसा नहीं मानता कि सत्य यी खोज पश्चिम की, हिंदुस्तान से कोई यम उत्पट रही है। मैं ऐसा भी नहीं कहता कि इतिहास विधाता ने, या कह लीजिए, याल पुरुप ने ही, जो ये दो 8 प्रयोग विए सत्य के साथ -पश्चिमी मानव और भारतीय मानय ये जरिए ये निरथ थे। पर इतना जरूर पहूंगा वि पश्चिम ने जा रास्ता चुना, वह अपेक्षाकृत आसान था। मगर इस सघपमूलक, हद मूलर रप्टि, सवेदन और विचार के साथ साथ एक अत सलिला के रूप म पश्चिम म भी एक समा तर विचार-पद्धति बरा बर मौजूद रही है, जो अद्वत ये अनुभव को ही प्रमाण मानकर चली है । हां, इतना जरूर है कि यह धारा वहां के इतिहास म कम बलवान, कम चारित्रिक रही है बनिस्बत उस धारा के, जो विग्रहमूलक है। हिदुस्तान के अनुभव म अपडता का विचार पयादा हावी रहा है । 'डिस्क्सिव रीजनिंग' पर एनाला. जिकल रीजनिंग' को, काव्यधर्मी विचार को हमेशा वरीयता दी गई है। क्याकि काव्यात्मर विचार म जोडने की सामथ्य पयादा होती है। विरुद्धा का सामजस्य' करने की शक्ति भी ज्यादा होती है । मुझे ऐसा लगता है कि जब भी किसी तक के पीछे कविता को चलाने की कोशिश हुई है, कविता की ऐसी तसी ही हुई है। और यह तक भी अमूमन एक घटिया विचार से प्रेरित होता है। यानि उस आदेश से, जिसम चराचर को तो क्या, सीमित मानव-सबधा के सत्य को भी यथावत् पक्डने और जोडने की ताक्त नहीं होती, देखा जाता है कि ऐसे विचारका का क्ला सवेदन भी बहुत घटिया होता है । भावुकता और इच्छित चितन स भरा हुआ। वे जब भी कला या कविता के बारे में बात करते देखे गए हैं-लगता है जसे क्षमादान कर रहे हैं उनके होने को। यह खेद की बात ह कि छोटा सत्य बडे सत्य से नफरत ही कर सकता है । या फ्यादा से ज्यादा उसके सामने एक झूठी नम्रता का उपचार ही बरत सकता है। परतु इस सारे घालमेल के बावजूद क्या हम इस तथ्य की उपेक्षा कर सकत हैं कि सृजन कम की बुनियाद ही उस दोहरी प्रक्रिया मे है जिसे 'एकोऽह बहुभ्याम्' तथा विरुद्धा के सामजस्य के रूप में पहचाना गया है ? प्रकृति और पुरुष के जिस सम्बध का साक्ष्य कविता देती है वह क्या दशन से भी ज्यादा प्रत्यक्ष और मूल्यवान नही ? सघप और सह योग के दुहरे स्तरो पर? इस मामले म भक्ति को लेकर किया गया चिंतन भी हमारे बडे काम का ऐसा कोई सामाजिक सबध नहीं है जिसके द्वारा हमने परम सत्ता से भी अपना सबध न जोडाहो । नवधा भक्ति के विचार पर थोडा इस दृष्टि से गौर करें तो वह समाज सत्य के बारे म की जाने वाली बहुत सारी लफ्फाजी मे सुरग लगावे घर देगा। और ऐसा क्तई नही है कि यह विश्व दृष्टि कोई दूर की कौडी है या महज़ कुछ विद्वानो या साधुआ का सरोकार है । हिदुस्तान के इस सहज विवेक ने 82 सबद निरतर 'यूरोप' के धार्मिक और राजनीतिक साम्राज्यवाद वे भीषण दवाव के बावजूद नए सिरे से आज की विश्व परिस्थिति के बीच अपने को प्रमाणित और पुन परिभाषित किया है । और ठेठ हि दुस्तानी शगवली में, ठेठ हि दुस्तानी सवेदन के साथ दिया है । साथ ही, इस कदर उसन पश्चिम की व्याकुलता को पश्चिम की प्रयोगशीलता को पचाया है कि स्वय बीसवी सदी के कुछ भारतीय चिन्तक उस पर पश्चिमी प्रभाव से दूपित होने का आरोप लगाते देखे गए हैं । मैं समझता हूँ जिस तरह पश्चिम के सघपमूलक मानववाद की एक तारिक परिणति कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो मे हुई यही जा सकती है उसी तरह हिदुस्तान के अद्वतमूलक मानववाद (चराचरवाद) की एक परिणति हिद स्वराज है । इस रष्टि से देखने पर मुझे जान पडता है कि बीसवी सदी की उपलब्धियो का जब भी कभी आगे जाके पुनर्मूत्यावन होगा तो उसमे गाँधी के 'सत्याग्रह की जगह मक्सप्लैक और आइस्टाइन की बगल म होगी। हो सकता है लोग इसी नतीजे पर पहचें कि यह सत्याग्रह उम भेदमूलक मताग्रह को बहुत पीछे छोड़ देता है, क्योकि उसके पीछे पश्चिम और पूरब दोना के सबसे मूलगामी चितन और अनुभव का बल है । आप सोच रहे होगे, विषय रविता और समाज है और यह कैसी दाशनिक चर्चा हो रही है । पर यह दाशनिय चर्चा कतई नहीं है, हाँ कविता और समाज के सबध की वास्तविक्ता का दशन करने की व्याकुलता जरूर है। अगर मुझसे कहा जाये कि गांधी का लिसा सब कुछ डूब रहा है सिफ एक वाक्य को बचा लो-तो मैं जिस वाक्य को बचाना चाहूगा वह यह है 'जब कभी तुम्हारे मन में अपने किसी कम, या विचार के बारे म सशय उत्पन्न हो तव तुम अपने सामने अपने जाने हुए सबसे दुखी और सताए हुए आदमी की भरत खडी करो और साचो, क्या तुम्हारा क्म या विचार ऐसा है कि जो उस आदमी को कही से कोई राहत दिला सके. -उसे भीतर या बाहर से कोई वास्तविक मदद पहुचा सके । अगर उत्तर हां है तो तुम्हारा वम और विचार सही है, नहीं तो गलत है।" हमारी शताब्दी के एक बडे पवि का कहना है कि आदमी की मेधा सिफ एक चीज को चुन सकती है या तो जीवन की पूर्णता को, या फिर रचना की पूणता को । दोनो का इक्ट्ठा निर्वाह एक आदमी नही कर सकता है। कुछ फांक तो रहेगी ही। उसने यह भी कहा है कि जब हम अपने आपसे झगडते हैं तब हम कविता करते हैं, जय हम दूसरा से झगडते है ता रेह टारिक उपजाते हैं।' यह एक विचित्र विडम्बना है कि इस सदी की शुरूआत में हमने जिस कम प्रेरणा को, जिस सत्याग्रह को समाज और राजनीति में सक्रिय देखा वह कविता और समाज 83 इस पविता के स्तर याम थापयामि यह अपने आप स भगडता था अपने वो सबवे पापो के लिए गुनहगार मानकर चलता था और इस सदी के अत में स्थिति इसके ठीय विपरीत है । यही सुद रेह टारिख को ही वविता रे सिंहासन पर बिठाया जा रहा है। यम की तो यात ही क्या? जहाँ वविता का मम ही मुलाया जा रहा हो, कविता के, सुली सम्भावामो वाले स्तर पर ही सारी चुनौतियां समाप्त की जा रही हो, वहां यम ठोस सामाजिक और राजनतिर कम -वी क्या अपागति होगी इसकी कल्पना की जा सकती है । ववि कम भी कम है पर वह उस सामाजिव रम का स्थानापन वन जाए, तो इससे बडी विडम्बना क्या हो सकती है। इस तरह तो यविता और समाज दाना पगु हात हैं और महज आत्म प्रवचना को बल पहुचता है। निश्चय ही कम-सामाजिक कम -की सीमाएं है क्यानि मानव स्वभाव की अपनी सीमाएं हैं और कविता की सीमाएँ असीम लगती हैं क्योकि उनम भाषा की गति सबसे ज्यादा उ मुक्त और अप्रतिहत होती है । ववि-कम की बिता भी इसीलिए जरूरी है कि कविता को यह वीजमिता ही उसे सबसे ज्यादा सम्भावनाशील बनाती है। जिस दिन यह सम्भावना समाप्त हो जाएगी मानव समाज की भी सम्भावनाएं समाप्त हो जाएंगी। आखिर सम्पता का इतिहास मानव और उसकी भाषा का ही इतिहास है। मगर भापा सिफ शब्द से वाक्य तक का मौखिक से लिखित तक का इतिहास ही नहीं है । शब्द केवल सभ्यता के साथ नहीं है, आदिम भावनाओ स भी उसका गहनतम सम्ब ध है । इसीलिए काव्य कल्पना की जो सबसे बडी विभूति है जिसे हमारे यहा 'ध्वनि' और उधर आडिटरी इमजिनेशन कहाँ जाता है, उसके बारे म यही प्रसिद्ध है कि यह आडिटरी इमजिनेशन वही काम करती है, जहा मनुष्य चेतना के ये दो छोर--प्रिमिटिव और सिबिलाइज्ड छोर, आपस में जुड़ जाते है । तभी मवसे गहरे वागथ की सृष्टि होती है । जो मानव और मानव समाज की सम्भावनाओ के लिए एक रचनात्मक अवकाश बनाए रखती हैं। यहाँ पर मुझे तुलसीदास याद जा रहे हैं । उहाने कवि कम को 'नाम निरूपण और नाम जतन' की सजा दी है और कहा है कि अगुन सगुन विच नाम सुसासी उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी।' यानी कविता साक्षी और दुभापिए का काम करती है कात्रीट और एक्स्ट्रक्ट के बीच, रूप और अरूप के बीच यक्ति और समाज के बीच मानव और प्रकृति के बीच । अगर ऐमा है तो कविता के इस स्वभाव और सामध्य की रक्षा करना हमारा धम है। रेटरिगिमन की तरह, राजनीतिको और पत्रकारो की जूठन उगते 84 सबद निरतर हुए हमे कविता की एक छोटी सी जबरदस्ती थोपी गई गवाही से सतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। निश्चय ही हम अपनी सामध्य भर कविता ही लिस मक्ते हैं पर अपनी सामथ्य से वविता यी सामथ्य को नापना, उसे मनमाने ढग से परिभाषित और सौमित वरना एक बहुत बडा झूठ है। क्योकि एसा करने से कविता की सामथ्य वास्तव म वसे ही कुठित हो भी जाती है । और दूमरे क्षेत्रो की ही तरह यहां भी अपने कर्मों के फल से हम वच नहीं सकते। सब बुछ नष्ट किया जा सकता है-मस्मृतिया भी, कविता भी। यह कहते हुए मैं खुद ही चौंक गया हूँ क्योरि कविता की सबसे बड़ी विशेषता ही यह मानी गई है कि वह 'काल वो जीतती है।' आँडैन ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में लिखा है कि 'काल जो किसी को नही वस्शता कविता को बख्श देता है। बल्कि वह कविता का आभार मानता है कि उसने काल के सवसहारव स्वभाव को ऐसा अहिंसक मगर अनुल्लघनीय प्रतिरोध दिया। निश्चय ही मैं किसी कालजयी कविता का आदश लेकर ये बातें नहीं कर रहा हूँ। आज आदमी जसी कविता लिख सकता है, उसी की बात कर रहा हूँ । पर इतना तो कहा ही जा सकता है कि अपनी गुलामी मे युट महायव बनने के लिए कोई वधा नहीं है। मुझे ऐमा लगता है कि आज हि दी कविता को आत्म हत्या का नुस्खा थमाया जा रहा है । यह असारण नहीं, कि इधर कुछ लोग तार सप्तक के बाद यो कविता को अनहुआ करने के लिए एक तक सांचा गढने को कुलबुला रहे हैं। इसके पीछे नीयत कुछ यह जान पडती है कि आज की कविता का जो मस्तक है उसे तो काटकर फेंक दिया जाय और बाकी जो धड बचे उसके लिए एक दूसरा मस्तक सोजा जाय । वसे तो इस काशिश मे कोई बुराई नहीं है। वाणी-विनायर की प्रतिष्ठा के लिए अपने यहां क्या क्या नही किया गया । मगर इन नए पुण्यात्माओ और अतीत के पौराणिका के बीच एक वडा पक है। उस पौराणिक कारवाई के पीछे एक जबदस्त काव्य त था- आदमी और पशु की बुनियादी एकता का। बल्वि पशु के सौ दय को वहां देवता की तरह प्रतिष्ठित करने की बात थी । क्योकि आदमी अपनी जिस तक शक्ति के कारण आदमी है वह अपने अतिरेक पर एक बडी सतरनाक चीज भी बन सक्ती है । अपनी महत्वाकाक्षा मे तक की यह तानाशाही मनुष्येतर सृष्टि के प्रति सवध के भाव को ही नष्ट कर दे सकती है। मगर आज मामला विल- बुल उलटा है । ये लोग अपनी परपरा को अपने ढग से यथावत् खोज करने की बजाय एक उधारी के ढग से, पराए तक की रोशनी मे अपनी परपरा की बाट पीट करके वह मस्तक गढा चाहते है। ये दिखाना चाहते हैं कि इन चालीस बरसा मे जो हुआ है वह हि दी कविता का स्वाभाविक विकास नही कविता और समाज 85 की दिशा म, युग की चुनौतियो के सम्मुस एक सवथा जीवन सम्मत और जीवनदायी सतुलन पाने के लिए पण्डुलम के दोना छोरा को सना अनिवाय नहीं लगता व्यक्ति का मारपर समाज को नहीं जिलाया जा सकता और समाज भी समाज शास्त्र की एक अवधारणा भर नहीं है। पविता भी सिफ "निटिसिज्म आँच लाइफ ही नहीं है, 'रवलेशन आव ए हिडन लाइफ' भी है । फिर यह मामूली सा तथ्य भी याद रखना जरूरी है कि कविता सिफ समाज या व्यक्ति भ से ही नहीं मिलती कविता, कविता से भी निकलती है। मापा यानी काव्य मापा की जो तत्कालीन परिस्थिति है, उसका भी प्रभाव पडता है। चालू छ दो मे सामयिक राजनतिक सामाजिक परिस्थितियो को गा लेना कतई पवि कम नही है । एक समूचे समाज मे भीतर सही आत्मनिणय की चुनौती के चलते सस्कार और सवेदन का जो वहुस्तरीय द्वन्द्व है वह एक यवि को सवेदना के ज़रिए जब कभी अभिव्यक्त होता है तो उसके लिए वागथ वे जिस सूक्ष्म सरचनात्मक संतुलन की आवश्यकता होती है, उसे महज तथाकथित गीतितत्व से या तथाकथित सामाजिक तत्व से अथवा दोना के क्सिी तदथ और मनमाने मेल से नही पदा किया जा सकता। भारत भवन द्वारा आयोजित परिसंवाद भ यिा गया ध्याध्यान 88 सवद निरतर जनतन और समालोचना जनतम और समालोचना सरीसे विषय की सूझ के पीछे यही 'साहित्य और समाज' 'साहित्य और राजनीति साहित्य और प्रगति पी अवधारणा जसी बहसा की अनुगूज भी शामिल है और उस इसी सिलसिले म देसते हुए उस पर विचार करना होगा। यहाँ जो सम्बधयारक 'और' है, वह कही जनता और आलाचना' के बीच एक सतही समीकरण निठान या दोनो के बीच घालमेल पदा बरन का निमित्त न बन जाय, इसका भी ध्यान रसना आवश्यक होगा। उदाहरण के लिए बहने को यह कहा जा सकता है गि जिस तरह समालोचना (साहित्यिय आलोचना के सीमित अथ मे) किसी देश की साहित्यिक सस्कृति का निमाण करने का सबसे महत्वपूण साधन है उसी तरह जनतत्र भी किसी देश की राजनीतिक मस्कृति का निमाण करने का सब में महत्वपूर्ण साधन है और इसलिए दाना के बीच ताल मेल या जत किया आवश्यक है । मगर सवाल यह उठता है कि अगर यह तथाकथित राजनीतिय सस्कृति के निर्माण की प्रक्रिया सब कुछ के राजनतिनीकरण की शक्ल अख्तियार कर ले जैसा कि हमारे यहाँ हो रहा है राजनीतिक सस्कृति स्वय विघटन और पतन के कगार तक पहुंच जाय, यहाँ तक कि सामाजिक सस्कृति स्वय उसके जपकप म हिस्सा बटाती दीपन लगे तो ऐसे म आलाचना क्म की मर्यादाएं कौन निधारित करेगा? जो करेगा वह क्या जनतात्रिय' या साहित्यिक भी बना रह सकेगा ? यह बात बिल्बुत अलग है कि साहित्यिक स्तर पर भी सच्चा और मूत्यवान बने रहन के लिए आज आलोचर को बुद्धिजीवी की उस व्यापक भूमिका से जुडना ही पडेगा जो महज जनता की एक बुद्धि विलासी जवधारणा के प्रति नहीं, बल्कि अपने देश और समाज की मस्कृति और परिस्थिति के प्रति एक दुहरे दायित्व भाव से अनुप्राणित हो । उसे तथाकथित जनतमी आदश की उस दोहरी विडम्बना को भी आर पार देखना होगा जो या तो ई एम फास्टर सरीखे उदारवादिया की तरह बबरता वे एक ही भावे से पस्त पड़ जाती है या फिर अमरीकी जडहीनता की तरह निरतर स्नायविक उत्तेजना स ग्रस्त रहती है। इसी बात का एक दूमरा पहलू भी विचारणीय है। जनता के बारे म कहा - और यह 89 गया है कि यह 'बहुमत के लिए बहुमत द्वारा, यहुमत वा शासन' है। क्या हम इस परिभाषा या आलोगना पर -या यहिए-आलोचना नाम की प्रिया यो ही इस परिभाषा तर घटा सक्त हैं ? यह मानते हुए कि आलोचना बहुमत पा बहुमत के लिए बहुमत द्वारा शासन है ? यू वात सुनने मे वही मजेदार लगती है और युक्तियुक्त भी ठहराई जा सकती है वहा जा सकता है कि श्रेष्ठ आलोचर पा मत शुरू म भले ही अल्पसस्यक या अवेला लगे वाद म तो वही बहुमत के प म प्रतिष्ठित हो सकता है, तो यह स्थापित यानी व्यवस्था बन चुकी आलोचना ही एक माम आलोचना है। पर जाहिर है कि यह अपने आप म अतविरोधी तक होगा। एप दूसरी तरह के लोग भी जनतत्र और आलोचना के इस हास्याम्पद समीकरण को यह कहके उचित ठहरा सकते हैं कि तथाकथित स्वय नियुक्त प्रातिकारी बुद्धिजीवी ही तो असली 'यहुजनहिताय वाले हैं उनका मत हो असली बहुमत है । इसलिए वही आलोचना सगत और जायज़ है जिस इस बहुमतवादी अल्पमत या निरकुश शासन बिलाशत स्वीकार हो । जाहिर है कि यह तक भी तशक्ति की ही एक दूसरी विडम्बना को उजागर करता है और वस्तुत इसवा सम्बध न जनता से है न आलोचना बुद्धि से। राजनीति मे बहुमत किस तरह बनता है, सब जानते हैं जरूरी नहीं वह लोक्मत का सही समेत हो । राजनीतिक मताधिकार के लिए अधिकार भेद के यथाथ को मानना न सभव है, न वाछनीय। पर आलोचक के लिए तो न केवल प्रबुद्ध होना अनिवाय है बल्कि नैतिक दृष्टि से साहसिक भी। विवेक सम्पनता इस ज़माने में पहले की अपेक्षा कही अधिक दुलभ्य और कही अधिव जोखम भरी चीज़ है। ऐसे अभूतपूर्व दबाव हैं जो स्वय बुद्धिजीविया को अबौद्धिव आचरण म लिप्त होने की छूट दे देते हैं और बौद्धिक ग्लानि से भी उह सुरक्षित कर दे सकते है । भारतीय बौद्धिक के लिए तो यह और भी कठिन समय है वह न तो विवेक की अपनी परपरा- गत क्सौटी के प्रति सवेदनशील रह पा रहा है न पश्चिमी परिभाषा का इण्टलिगेत्सिया' ही बन पा रहा है। वह एक तरह से दोनो के बीच सम झोता करके दोनो का लाभ उठाना चाहता है। सवाल यह उठता है कि जो अपने विचारो के लिए अकेले पड़ जाने या अलोकप्रिय हो जाने का जोखम नही उठा सक्ता, वह बुद्धिजीवी किस बात का है ? अगर उसका मताग्रही हो जाना उस सत्याग्रही होने की ज्यादा विस्तृत और गहरी ज़िम्मेदारी से मुक्त कर देता है, अगर उसकी बौद्धिक्ता एक सावरण और कवच की तरह स्वय उसकी विवेक बुद्धि को ही ग्रस लेती है तो वह आलोचक कहलाने का अधिकारी ही कस है ? क्या उसकी बुद्धि इस प्रकार एक यापक मूल्य भ्र श की सामा य ? 90 सवद निरतर ? प्रक्रिया म ही हिस्सेदार नही बन रही? तब फिर इस मूल्य मूढता के बीच उसपी आलोचना का मूल्य भी क्या है ? क्या वह स्वय मूल्य मूढ और मूल्य- द्रोही नही बन जाती? परिस्थिति के नाम पर सस्कृति या शोपण और सस्कृति के नाम पर परिस्थिति का शोपण क्या यही वह आचार महिता है जो हमने पिछले बरसो मे मालाचक नामक जीव के लिए बनाई है कहना न होगा कि साहित्य के क्षेत्र में यह समालोचना भी हमारे लिए उतनी ही नई चीज है जितनी राजनीति के क्षेत्र में जनतम । अनभ्यास के बारण नई चीज़ का नशा भी कुछ ज्यादा ही चढता है इस कारण और भी, कि दोनो के साथ जाने वाला, दोनो का वश मे रस सरने वाला जिस तरह का अनुशासन पश्चिम को के द्रो मुग्व सभ्यताओ मलनिहित हुआ करता है, उस तरह का अनुशासन हमारी विवे द्रीकृत जीवन व्यवस्था वाली मानसिकता के लिए उतना सहज नहीं होता-प्ट साध्य ही होता है। बहरहाल, पप्ट साध्य होतोहो, उसे स्वायत्त तो करना ही पडेगा और इस सोखे हुए अनुशासन को उस दूसरे अनुशासन के -अथात् अपने परम्परागत आत्मानुशासन के साथ सही सही सदभित भी करना ही पड़ेगा। इस तरह देखने पर दोना ही क्षेत्रो मे जहां हमारे लिए विशिष्ट सम्भावनाएं दीखेंगी वही विशिष्ट चुनौतियां भी महसूस होगी। तो विषय के निरूपण के लिए सबसे पहले तो यही पता लगाना चाहिए कि हमारे बुद्धि- जीविमा - विशेषकर साहित्य क्षेत्र के बुद्धिजीवियो के मन में इन चुनौतियो और सभावनाओ का किस तरह का नक्शा बनता रहा है आज और आज से पहले के उस आरम्भिक दौर मे, जब जनतत्र वी देहरी पर हम पांव रखने ही जा रहे थे । सन् 1945 म प्रकाशित निशकु के एक लेख म अज्ञेय ने इस नई परिस्थिति का विश्लपण करते हुए आलोचनात्मक विवेक के महत्व वो रेखावित किया था । स लेख से पता चलता है कि वैज्ञानिक प्रगति के प्रति अपने मुग्ध भाव के बावजूद हि दी का साहित्यवार उस समय भी साहित्य की समस्याओ को एक व्यापर सास्कृतिक और पारिस्थितिम सदम मे ही रख- कर देख रहा था और आलोचना को मान एवं अलग अनुशासन की तरह नहीं, बल्कि समूचे जातीय जीवन और साहित्य के पुननिर्माण के एक साधन के रूप में प्रस्तुत कर रहा था। "बिना गहरी और विस्तत अनुभूति के सस्कृति नहीं है और बिना वजानिक,आलोचना मूलव ट्रेनिंग के ऐसी अनुभूति नही है --अनेय के इस कथन म जोर जिस 'आलोचना मूलक ट्रेनिंग' पर है वह अपने आप म साध्य नहीं है अनुभूति को विस्तृत और गहरा बनाने के अनिवाय साधन के रूप मे ही उसका महत्व स्वीकार किया गया है । और वह इसलिए, कि सस्कृति स्वय ही आत्रात है । यह अवारण नहीं है कि जनता और समालोचना 91 . अज्ञेय ने यहाँ आलोचना यो 'परखने और मुकाबला करने की शक्ति' के रूप में प्रतिपादित किया है और यह प्रतिपादन आज भी उतना ही प्रासगिक लगता है । स्वय अज्ञेय के ही शब्दो म स्वस्थ सस्कृति मे हम नागरिक को स्वतन छाडपर आशा कर सकते हैं कि उसकी परिस्थिति से ही उसकी सस्कृति उत्पन और नियमित होगी। वितु आज यदि हम जीवन के गौरव की रक्षा करना चाहते हैं तो हमे परखने और मुकाबला करने की शक्ति को संगठित करना होगा । हमे एक आलोचक राष्ट्र का निमाण बरना होगा। यह अतिरिक्त जागरूकता ही बचने का एकमात्र उपाय है। अनेय का उल्लेख यहाँ इसलिए आवश्यक जान पडा कि नवीनतर सदम मे जिस जागरूकता का निरूपण प्रस्तुत विषय के प्रस्तोताना को अभीष्ट जान पड़ता है- उसकी पृष्ठभूमि के रूप मे त्रिशवु के लेखो का स्मरण स्वाभाविक है। मही विचार के लिए थोडा सवाद या परिमवाद भी आवश्यक जान पड़ता है - वासकर इसलिए भी, कि आधुनिक युग के जनतात्रिक आग्रहो के मेल मे हो-स्वय समालोचना क्म के लिए जो आदश स्वीकार किया गया है वह 'बॉमन पसूट ऑव टू जजमेण्ट ही है। हिदा साहित्य के आधुनिक दौर के इस प्रस्थान बि दु से आरम्भ करके, हम इस आवश्यक सवाद की भूमिका वनान के लिए मराठी कथाकार आलोचक भानचन्द्र नेमाडे तथा हिदी के तीन ठेठ समकालीन कवि विचारका मलयज, अशोक वाजपेयी तथा विपिन अग्रवाल द्वारा इस सिलसिले में व्यक्त किए गए कुछ विचारा का हवाला प्रस्तुत करेंगे और फिर थोरापीय समालोचना के सदर्भ को भी देखते हुए विषय वा अपनी समझ के मुताविक आगे बढान हुए यह आप पर छोडेंगे कि इस सवाद और एकालाप से विमो ट्र, जजमेट का मवेत उभरता है कि नहीं? अशोक वाजपेयी का बना है कि विसो दृष्टि की शक्ति की परम्प इससे भी होती है कि वह किस हद तक दूमरी दृष्टिया द्वारा प्रस्तुत चुनौतियो के प्रति जागरूप है और किसी नई सचाई के दबाव मे अपने को यपाचित सशोधित करने को तत्पर है। स्पष्ट ही, म मांग के पीछ जातम और समालोचना के सच्चे रचनात्मक सम्म घ की पहचान और आग्रह दोना हैं । मगर यहाँ एक कठिनाई सामने आती है जिस हमारे बुद्धिजीवियो न अपने अपने ढग से परिभापित किया है । मसलन वजानिक और कवि विपिन अग्रवाल के कथनानुसार विडम्बना यह है कि पिता व अभाव मे देश म एक प्रतिशत सभी कम लोग सजनारमा पार्यो म भाग ले पा रहे हैं और गिलिता के बीच 92 सवर निरतर - भी धम, विज्ञान और साहित्य के विशेषज्ञ गुट बन गए है जिनम पारस्परिव क्रिया-प्रतिक्रिया होती नही ।' विपिन अग्रवाल इस दुर्भाग्यपूण स्थिति को समाज से लेने ही लेने और बदले में कुछ भी नहीं देने की प्रवृत्ति, यानी इकतरफा फिजूल खर्ची मानते हैं और इस बात की सस्न जरूरत महसूम करते हैं कि 'य विशेषज्ञ गुट आपस म मिलें-टकराएं, इनमे आपसी सवाद हो । साथ ही इनम और राजकीय प्रशासका के बीच भी वार्तालाप हो। यह वार्तालाप क्या और कसे ज़रूरी है, इस बार में इधर साहित्य क्षेत्र के ही नही, अ य क्षेत्रो के बुद्धिजीवियो म भी एक नया सोच उभरता दिखाई दे रहा है । जो कि पुराने आदशवादी या रोमानी सोच स थोडा अलग पड जाता है- इस माने म, कि वह स्वात योत्तर भारत की परिस्थितिया के यथाथ दशन का, साहित्य वो सास्कृतिक प्रक्रिया या महज साक्षी न मानते हुए उसम सक्रिय भागीदार बनने का तकाजा महसूस करता है। भालचन्द्र नेमाडे स्पष्ट अनुभव करते हैं कि 'राजनीति और साहित्य एक ही समाज के दो पहलू होने के कारण उनमे तालमेल होना आवश्यक है।' निश्चय ही यहा साहित्य को राजनीति के पीछे चलाने का नहीं, बल्कि साहित्य की सामाजिक्ता को, साहित्य की समाज सापेक्षता को भी सही-सही पहचानने और अपने का आग्रह है जो हम एक दूसरे सदम म उनीसवी सदी के प्रसिद्ध आलोचक मैथ्यू आर्नाल्ड के सस्कृति चिंतन का स्मरण करा देता है वेशव अपने ही स्वाधीन तक और तेवर के साथ । जहाँ एक और नेमाडे यह मानते हैं कि 'समीक्षा साहित्यिक सस्कृति के निर्माण का सबसे महत्वपूण साधन है', वही वे इस असुविधाजनक और चौकाने वाले तथ्य की ओर भी हमारा ध्यान खीचना जरूरी समझते है वि 'राजनीति के नेता भी किसी देश की साहित्यिक सस्कृति का सदेत देत हैं ।' नेमाडे की यह टिप्पणी मुझे हि दी साहित्यिका के उस वतमान आवरण के सदम मे खासतौर पर विचारोतेजक लगती है जहा एक ओर तो राजनीतिकर्मी मात्र के प्रति एक निहायत आत्म-तुष्ट और आत्ममुग्ध हिकारत की भावना है और दूसरी तरफ उसी राजनीति के सम्मुख रीढरहित आत्म समपण की या गलीज़ समझौत की तत्परता भी। आचरण का यह अविरोध अपने आप मे चित्य है, वह राजनीति के साथ साहित्य सम्बध को मयादाआ का उल्लघन है । सच पूछा जाए तो यह राजनीति के साथ किसी तरह के रचनात्मक सम्बध की सम्भावनामा को ही नष्ट कर देना है। जय नेमाडे यह कहते है कि लेखको को राजनीति को आदर देना ही चाहिए, नही तो उनकी भी राजनीति म कोई कीमत नही होगी' तब वे निश्चय ही साहित्य के राजनीति के साथ, अर्थात् उसी जनता और समालोचना 93 मानवात्मा की एक आभ्यतरिक शक्ति, और उसी की एक वाह्य वितु सजातीय शक्ति के बीच एक ऐसे फलप्रद सम्ब ध पर जोर दे रहे हैं जो आखें चौतरफा खुली रखकर बनाया हुमा सभ्य है, जो प्रजातत्र के असली तात्पय से निकलने वाला सम्बध है, जिसमे एक दूसरे को मर्यादाओ का स्पष्ट विवेक और स्वीकार भी निहित है । जातत्र मे लेखक आलोचक की भूमिमा क्या है, इस बारे में नेमाडे की दृष्टि इसीलिए बहुत स्पष्ट है उही के शब्दो मे-- 'सामाजिक रूप से सतक रहते हुए व्यक्ति की मूलभूत स्वाधीनता की चेतना समाज मे निर्माण करना हो लेखक आलाचक की भूमिका है।' इस प्रकार जनतन के ये दोनो ही पहलू~~ सामाजिक सतकता' और 'व्यक्ति की मूलभूत स्वाधीनता की चेतना' नेमाडे के लिए जयोयाश्रित और समान रूप से महत्वपूर्ण ठहरते हैं । एक की कीमत पर दूसरे को पाने की बात न तो जनतन को रास आ सकती है, न उस मानवीय अनुशासन को, जिसका नाम साहित्य या समालोचना है। कुल मिलाकर इस तरह बात व्यक्ति और समाज के रचनात्मक सबध की आधारभूत शतों की बात बन जाती है एक गहरे अथ मे मानव मूल्यो की। और समालोचना इस सवाल से जूझने लगती है कि ये मूल्य कहाँ से तय होते हैं परम्परा से, समकालीन मूल्यबोध से राजनीतिक विचारधारा से अथवा धामिक सवेदना से जसी कि अशोक वाजपेयी की मायता है। 'आलोचना दुहरी सक्ति मांगती है परम्परा से भी और समकालीन मूल्य बोध से भी। इन दोना के बीच जो तनाव होता है वही आलोचना को उसकी रचनात्मक उत्तेजना देता है । इससे प्रतीत होता है कि जनतम समालोचकों के बीच जो भी दृष्टि वभिय होगा, वह इन दोना मुद्दा पर ही होगा। उदाहरण के लिए जब भालच द्रनमाडे यह कहते हैं कि "उस शासन का सत्ता में आना जरूरी है जो आज के पूजीवादी विधि विधान और पुरानी याय व्यवस्था को उठाकर फेंक दे, अयथा अपने हिन्दू लोरतत्र की मात्र मदिर जैसी मूलभूत अधिकारो की पाषाण पूजा करने का रिवाज चलता रहेगा', तब जाहिर है कि एक लेखक ये रूप म यह उनका समकालीन मूल्य बोध बोल रहा है । इसी तरह जब व कहते हैं कि 'वैश्विक सरकृति के युग में पदा होना अहोभाग्य है, मगर दुनिया मे भारतीया की पहचान हिद के रूप म हाना आवश्यक है', तब यह लेखक के रूप म उनका परम्परा वोध भी बोल रहा है। निशाय ही आलोचना को जिस दुहरी सक्ति को बात अगोक वाजपेयी कर रहे हैं, वह दुहरी सक्ति नेमाडे मे भी मौजूद है। इस दुहरी सपृक्ति चलत ही मोक वाजपेयी यी समालोचना जहा एक आर जातिप्रया, हरिजना के उत्पीडन, . 94 सबद निरन्तर साधारण मनुष्य को अपनी भाषा की दुनिया से काटने की अमानवीयता इत्यादि को भारत के प्रजातत्र की सही विसगतियो के रूप मे देखती है, वही वह दूसरी ओर यह भी पहचानती चलती है कि हमारी पविता मे मूल्य वत्ता और महत्व बोध के क्षय को धार्मिक सवेदना के ह्रास के साथ जोडा जा सकता है और यह भी कि 'काव्य रचना और धार्मिक सवेदना का फिर से जोड शायद कविता को एक मूल्यवान् मानव व्यापार के रूप मे सुरक्षित रख सकता है । सवाल यहा पर यह उठता है कि स्वय आज के भारतीय बुद्धि- जीवियो के बुद्धिजीवन का इस व्यापक धम चेतना से किस तरह का सम्बध है कोई सम्बध उस तरह है भी कि नही ? दूसरा सवाल यह उठता है कि 'फिर से जोड' कहने मे जिस टूटन की स्वीकृति निहित है, उसके कारण क्या थे या हैं ? क्या हमारी आलोचना साहित्य की तरह हमारे सामाजिक जीवन मे भी इस धार्मिक सवेदना के ह्रास को स्वीकार करती है ? अगर हाँ तो क्या वह उसका यथातथ्य और पर्याप्त आकलन कर सकी है? अय व्यापक सामाजिक तथ्या और प्रवृत्तिया से उसया सम्बध दिसा सकी है? अगर नहीं, तो काव्य सवेदना और धार्मिक सवेदना का जोड पहले तो सभव ही कसे होगा और हो भी गया तो उसका सामाजिक मूल्य क्या होगा ? निश्चय ही यह एक मुद्दे की बात है, मगर इसीलिए तो ये सारे सवाल भी सडे होते है जिनका उत्तर हमारी आलोचना हमे नहीं देती। क्यो नहीं देती, यदि उक्त चिंता का सीधा सम्बघ हमारी परिस्थिति और सस्कृति से है तो? दूसरी ओर इनसे जरा अलग किस्म की दृष्टि विपिन अग्रवाल और मलयज की जान पडती है । विपिन अग्रवाल के लिए समकालीन मूल्य बोध का सवाल आधुनिक चिंतन और आधुनिक रचनात्मकता का सवाल बन जाता है । वे इस एक मूलत खडित घटना के रूप मे पाते हैं जिसका अतीत के साथ बहुत ही दूर का सबध है। वे ऐतिहासिक दृष्टि और प्रणालियो को ज्यादा महत्व नहीं देते और परम्परा को लेकर उनकी चिंता उस तरह सीधे मूल्यचित्ता नहीं है । वे साफ कहते हैं कि 'जिस और जितनी परम्परासे विरक्त होकर उसे कच्चा माल हम आसानी से मान पाते हैं, उतनी ही परम्परा आधुनिकता मे प्रवेश करती है और वही हमारे काम की है?' इसी के साथ हमे मलयज की दृष्टि का भी उल्लेख करना चाहिए । मलयज का भी विचार है कि हमारी साहित्यिक परम्परा एक मूलत अदद्वमूलव सास्कृतिक चेतना से जुडी होने के कारण आज की रचना के लिए काम की नहीं है । 'पूर्व परम्पराओ से अब तक के हमारे मोह सबध से मुक्ति और बोष यत्र की नवीन परिस्थितियो की मांग के अनुरूप नयी पार पैदा करना ही मलयज को दृष्टि से, 'वस्तुत विज्ञान और जनता और समालोचना 95 प्रजात त्र की आधारभूत प्रतिज्ञाआ और चिंतन पद्धतिया की सजनात्मक परिणतिया' है। जहा विपिन अग्रवाल चुनायो की सम्भावना को बढाने वानी' आधुनिकता के आत्म विश्वासपूण स्वीकार में ही परिस्थिति का हल पात है वहा मलयज इसके साथ मानव सम्ब वो की सजग चेतना और ज़िम्मेदारी के भाव को भी महत्व देत है । मलयज की दृष्टि मे रचनात्मक अर्था वेपण का क्षेत्र वह मानव सम्बध है जो विज्ञान और प्रजातन की शक्तिया की बुनियार पर एक अपक्षाकृत अधिक ठोस यथाथ और सक्रिय धरातल पर व्यक्ति के प्रत्येक विवेकपूण निणय के साथ प्रतिबद्ध है।' अशोक वाजपेयी भी इम हिस्सेदारी के भाव को अपनी आलोचना दृष्टि मे महत्व देते दिखाई देते हैं। पर यही है कि परम्परा से सम्बध के बारे मे दोना मे गहरा मतभेद है । वहाँ मलयज, विपिन अग्रवाल के अधिक निक्ट जान पडत है । परम्परा से निरपेक्ष बोधयन की बौद्धिक सक्रियता' ही मलयज की दृष्टि मे 'हमे अपने परिवेश की गत्यात्मक मौ दयात्मक सम्भावनाआ से सपृक्त कर सकती है और विपिन अग्रवाल का आधुनिकता सम्ब धी चिंता भी कमोवेश इसी के मेल में है। सवाल फिर भी वचा रहा जाता है कि क्या परम्परा और समकालीन मूल्य वोध के दद्व का परिहार इतना महन है ? भालचन्द्र नेमाडे के विचारा का हवाला देते हुए हमने उस कठिनाई का कुछ आभास पाया था जो उनके अनुसार वश्विक सस्कृति के युग मे जीने क सौभाग्य तथा दुनिया में भारतीयो को अपनी पहचान एक हि दू के रूप मे होने की आवश्यक्ता दोना को एक साथ रेखाक्ति करती है जशोक वाजपेयी की समालोचना प्टि की चर्चा के दौरान भी हमने देखा कि उनके यहा भी एक दुहरी सपृक्ति की माग है परम्परा और समकालीन मूत्यबोध दोना के साथ । मगर इसी सिलसिले म आग जाकर उहाने ठेठ समालोचना के क्षेत्र की एक दिक्कत की चर्चा करते हुए कहा है कि अगर पश्चिम म मनुष्य की हालत को पहचानने का मतलब परिभाषाआ की बहुलता से जूझता है तो हमारे देश में ऐसी कोशिश वचारिक अस्पष्टताआ और अपरिभापित प्रसगो का सामना करना है। हो सकता है, ऐसा हो मगर यही पर तो सब सवाला का सवाल हमार सामने मुह वाए खडा मिलता है कि ऐसी स्थिति क्या है ? क्या विना वचारिक स्वराज्य की मूलभूत और लगातार स्थगित की जाती रही चुनौती को स्वीकार किए 'वचारिक अस्पष्टताआ और अपरिभाषित प्रमगा का सामना करना संभव है। वहीं ऐसा तो नहीं कि यह विभ्रम स्वय उस विफलता स ही उपजता हो । जसा कि अनेय ने भी अभी हाल म एव जगह लिखा है--- भारत की 96 सबद निरतर चौद्धिक परनरा पश्चिम की बौद्धिक परम्परा से भिन रही है और यह मैप बाज भी जेपनीर नहीं है यद्यपि हम पश्चिम की परिभाषाओ यो अधिम से अधिक स्वीकार करते आ रहे हैं। क्या इस सच्चाई को आदेखा निगा जा सकता है और क्या बगार वाजपयी द्वारा उठाई गई आलोचना गी ममस्या का सन्दव इसने भी नहीं है ? विश्वविख्यात इतिहासनई पी टोम्सन का क्या है कि 'भाररा गा गाग एक असाधाराम्पस सुला हुआ और अभी तप अधया समाज है।' देता जाय तो ये दानों ही गर्ने एक दूमरी से जुडी हुई है अगर उसम या भागारण खुलापन नहीं होता तो प्रतिरोध पैदा करने वाली जो पिविष पी पता है इस समाज की वह एक आरोपित और मिथ्या एपसा में गुरत पर पगा स्वस्प हा अब तक खो चुकी होती। मगर क्या असाधारण Tamil अपने जनाधारण जोखम नही होते ? विकास या जो गोराही, Artif, aut दसी सुरेन के चलते हमने स्वीकार किया ही है, या मया गारी wirut और वानविक्ताआ के साप समजस सिद्ध हो रहा है? सी (1) गार खुलपन की ही तरह, क्या हमारे अधबनेपा पर भी प्रगति गाही मागा जा सकता? वे कौन है जो समाज गो पात है? और Entertamil बनाता है ? क्या इस निर्माण मे-इस अभयभी-गम रस्ता को एमी भागीदारी है कि आखिरी आदगी मामी राग र माया ? टोम्सन का यह भी कहना है कि भारत गगन मिश्य गरम पाणी सुली हुई हाट है । दुनिया में पिसी भी हिस में पता रता मो गार ऐसा नहीं है जो किसी न पिसी हि पुरानी दिगारा rarelt ana हरक्त न कर रहा हो। टासा मे मुसाधिप' 'गा एम सी भात जो सोवियत रूस के वार मे या धीमे या महीमही जागमती । surat वस्तुस्थिति का यह एक सही आपणा है और दराम पोई सन्देह नहीं मि 'विचारो की यह खुली हुई हाट' ही गातन और गगासोपा मे लिए आदश स्थिति है। पितु प्रश्न यह है पियाहगार देशभ युधियी साहिरियम और साहित्यतर-इस स्यत तायाराही राही और जिम्मदार उपयोग पर पा रहे हैं । धया उनके सामने अपने सांस्कृतिा परिवेश और परिस्थिति रा उपभूत होने वाली चुनौतिया और राम्भायोपा पोई या स्पष्ट है । और क्या उनका आचरण वास्तय म एसा है कि पहा जा सये हि ये परसने बला करने को उस शक्ति योरागठित पर पा रहे हैं जिरो एव आलोप यो विशेषता ये पम पहचाना गया था। इस प्रश्न या उत्तर पाने जात और ।
हमे आधुनिक आलोचना के उस व्यापर सदम म भी थोडा भाक्ना होगा जहा से हमारे बुद्धिजीवी अक्सर प्रेरणा ग्रहण करने के अभ्यस्त रहे हैं । कभी कभी लगता है, उनीसवी से बीसवी सदी म जो सक्रमण हुआ है, उसम और और मूल्यो के साथ इस आलोचर बुद्धि र मूल्य भी बदल हैं । उनीसवी सदी या मैथ्यू आर्नाल्ड जव आलोचना कम को परिभाषित करता है तो इस नतीजे पर पहुंचता है कि निटिसिज्म इज द प्रोपेगेशन ऑव द बेस्ट दट इज पॉट एण्ड रिटन इन द वल्ड' । यह कोई उपदेश कुशल सदाशयता ही नहीं है, आर्नाल्ड की व्यापक अभिरुचि और जिनासा का प्रमाण सुद उसके अपने आलोचनात्मव व्यवहार म मिलता है । वह मास के दिमागी खुलपन और वचारिक तेजस्विता पर तो मुग्ध है ही यूनानी भाव बोध से भी उसने खासी नजदीकी हासिल की है और रोमन विचारव माक्स आरीलियस के 'स्टाइसिपम' के प्रति उमका लगाव उसको अनिवायत गीता की समत्वबुद्धि वाले दशन की ओर भी आकर्षित करता है । आर्नाल्ड आधुनिक जीवन और जनताभिक समाज के प्रति एक सकारात्मक और समावेशी दृष्टि अपनाना चाहता है । इसी चक्कर मे वह जगह जगह अतविरोधो स भी घिर जाता है । पर उसकी बुनियादी चिंता मानव आत्मा के भरपूर जीवन की सभाव नाआ पर एकाग्र है । साहित्य को वह जीवन का अलकरण नहीं, औजार मानता है और इस बात पर जोर देता है कि साहित्य केवल मात्र व्यक्ति के प्रयत्न का नहीं बल्कि एक पूरे समाज के पुरुषाथ का परिणाम होता है । उसका आदश वह शाक्त नतिक्ता है जो दुनिया को सुधारने म और सत्य को विजय मे पूरी आस्था के साथ कम करती है । इसी दृष्टिकोण से वह साहित्य को 'जीवन की आलोचना के रूप मे प्रस्तुत करता है । यह दृष्टि जो दो कसी टियां प्रस्तावित करती है, वे हैं पर्याप्तता और बल प्रदान करने की शक्ति । अर्थात साहित्य को एक तो जीवन की मांग का भरपूर प्रत्युत्तर होना चाहिए और दूसरे उसे मनुष्य के चित्त को स्थिरता व दृढता प्रदान कर सकना चाहिए। मगर बीसवी सदी म समालोचना का चरित्र कुछ सिकुडता प्रतीत होता है वह बाहर से बडी विश्व चेतस दिखती है पर भीतर से बहुत घरब द चालाक और मतलबी होती गई है। यह भी लगता है कि इस सदी की समालोचना के दिशानिदेशक और मूल्य निणायक एडमड विल्सन सरीखे व्यापक मानव निष्ठ भावबोध वाले लोग नहीं रहे बल्कि वे लोग रहे जिनकी शुरूआती प्रतिना भले ही एक वृहद मानववादी मण्डल की रही हो पर जो अपने चितन और व्यवहार में भी लगातार एक सीमित वृत्त के ही वदी होते गए भले ही उनके 98 सबद निरतर बचाव म यह कहा जा सके कि उनीसवी सदी के उदारवाद की विफलता की ही यह अनिवाय प्रतिक्रिया थी। एलियर का उदाहरण इस मामले म काफी होगा जिसका दावा भले ही यूरोप, बल्कि सारी दुनिया को आत्मसात् करके बोलने का हो, सक्रिय सहानुभूति का दायरा बाद में 'होली रोमन एम्पायर' से ही निर्दिष्ट होने लगता है। इसी तरह एक दूसरे स्तर को शुद्धिवादी सकोणता हमे एफ आर लोविस जैस आलोचका में दिखाई देती है जो अपने बहिष्कार प्रवण प्योरिटनिजम मे एलि यट को भी बहुत पीछे छोड जाते है । मसलन, एलियट की परम्परा की तुलना म सोविस की परम्परा और भी ज्यादा असहिष्णु और मकुचित है । जहा एलियट का परम्परा बोध उसे कभी कभी 'माटनर' को 'मेजर' बनाकर प्रस्तुत करने और इस तरह साहित्य के स्वदेशी विवेक मे जान बूझकर ऐठन डालन हुए उसे एक अपने पूर्वग्रह की धार्मिक सास्कृतिक रथयात्रा मे जुतने खायर बनाने को प्रेरित करता है, वहा एफ आर लीविस की 'ग्रेट ट्रेडीशन' या यह हाल है कि उस मडिके स सरीखा महत्वपूण रचनाकार भी महज़ एक आसिरी दिना म लिखी गई छोटी सी किताब लेकर ही घुस पाता है । कुन मिलाकर बीसवी सदी की यूरोपीय समालोचना को एक काफी प्रभाव शाली धारा का मिजाज वासा नपचढा, अनुदार और कट्टरपथी है। यह तप्प ओर भी ध्यान देने योग्य हो जाता है जब हम देखते है कि समालोचना मा यह चरित्र राजनीतिक दृष्टि से वामपथी कहलाने वाले साहित्यिको के मामले म भी नहीं बदलता। ऐसा नहीं है वि माक्सिस्ट समानाचना की दुनिया ही विचारों के प्रति ज्यादा उम्मुक्त और आतिथ्यप्रवण हो । बकि वहाँ तो सहानुभूति का घेरा कुछ और भी ज्यादा तग हो जाता है । उनीमवी सती मागे विनान के विस्पोट हुए उन्हाने यूरोप की मनीपा को अहीर ओर धामिर विश्वास के मकर म डाला, रही उसकी बुद्धि की स्वाधीन ऊर्जा और आतिथ्य क्षमता को भी उमुक्त किया। मगर जो यह तयार थित 'लिबरल इटलिजे से है यूरोपीय समालोचना की, उसकी सीमाओं का पता भी जल हो चल गया। उसे स्वय आगामी दिना की आशा थी यह इम 'लिबरल इटलिजेस' का अन्तविरोध कह लीजिए या आतरित समजारो वह लीजिए. यह र ई जगह से वध्य थी। उसे अपनी सभ्यता के उस अविराम का सही अदाज नहीं था जो धम की जबडव दी मे पवडापर प्रतिविया करती हुई एर मदन र स्वतत्र बौदिक्त्ता की आर भागती है और उम राम्नवापी दूर चले जाने में बार फिर अपनी ही स्वतत्रता स आतरित होरर पुन नई बजीरा यो आमश्रित करती है । धार्मिक उपहन मे छटो हई हमे आधुनिक आलोचना के उस व्यापक सदम म भी थोडा भावना होगा जहा से हमारे बुद्धिजीवी अक्सर प्रेरणा ग्रहण करने के अभ्यस्त रहे हैं । कभी कभी लगता है, उनीसवी से बीसवी सदी में जो सरमण हुआ है, उसम और और मूल्या के साथ इस आलोचक बुद्धि के मूल्य भी बदले हैं । उनीसवी सदी का मैथ्यू आनाल्ड जव आलाचना कम को परिभाषित करता है तो इस नतीजे पर पहुंचता है कि रिटिसिपम इज द प्रोपेगेशन आव द बेस्ट दट इज थाट एण्ड रिटन इन द वल्ड'। यह कोई उपदेश कुशल सदाशयता ही नहीं है, आर्नाल्ड की व्यापक अभिरुचि और जिज्ञासा का प्रमाण खुद उसके अपने आलाचनात्मक व्यवहार मे मिलता है । वह मास के दिमागी खुलेपन और वैचारिक तेजस्विता पर तो मुग्ध है ही यूनानी भाव वोघ से भी उसने खासी नज़दीकी हासिल की है और रोमन विचारक माकस मारीलियस के 'स्टाइसिपम' के प्रति उमका लगाव उसको अनिवायत गीता की समत्वबुद्धि वाले दशन की ओर भी आकर्षित करता है । आल्डि आधुनिक जीवन और जनतानिक समाज के प्रति एक सकारात्मक और समावेशी दृष्टि अपनाना चाहता है । इसी चक्कर म वह जगह जगह अतविरोधा से भी घिर जाता है । पर उसकी बुनियादी चिंता मानव आत्मा के भरपूर जीवन की सभाव नाआ पर एकाग्र है। साहित्य को वह जीवन का अलवरण नही, औजार मानता है और इस बात पर जोर देता है कि साहित्य केवल मात्र व्यक्ति के प्रयल का नहीं बल्कि एक पूरे समाज के पुरुषाथ का परिणाम होता है । उसका आदश वह शाक्त नतिकता है जो दुनिया का सुधारन मे और सत्य की विजय में पूरी आस्था के साथ कम करती है । इसी दृष्टिकोण से वह साहित्य को 'जीवन की आलोचना के रूप मे प्रस्तुत करता है । यह दृष्टि जो दी कसौ- टिया प्रस्तावित करती है वे है पयाप्तता और बल प्रदान करने की शक्ति । अर्थात माहित्य को एक तो जीवन की माग का भरपूर प्रत्युत्तर होना चाहिए और दूसरे उसे मनुष्य के चित्त को स्थिरता व दृढता प्रदान कर सकना चाहिए। मगर बीसवी सदी म समालोचना का चरित्र कुछ सिकुडता प्रतीत होता है वह बाहर से बडी विश्व चेतम् दिखती है पर भीतर से बहुत परवद, चालाक और मतलबी होती गई है। यह भी लगता है कि इस सदी की समालोचना के दिशानिदेशक और मूल्य निर्णायक एडमड विल्सन सरीखे व्यापक मानव निष्ठ भावबोध वाले लोग नहीं रहे बरिक वे लोग रहे जिनकी शुरूआती प्रतिना भले ही एक वृहद मानववादी मण्डल की रही हो पर जो अपने चिंतन और व्यवहार म भी लगातार एक सीमित वृत्त के ही बादी होते गए भले ही उनके C- बचाव मे यह कहा जा सके कि उनीसवी सदी के उदारवाद की विफलता की ही यह अनिवाय प्रतिनिया थी। एलियर का उदाहरण इस मामले मकाफी हागा जिसका दावा भले ही यूरोप, बल्पि' सारी दुनिया को आत्मसात् परवे बोलने का हो, सपिय सहानुभूति का दायरा बाद में होली रोमन एम्पायर से ही निर्दिष्ट होने लगता है । इसी तरह एक दूसरे स्तर की शुद्धियादी सकोणता हम एफ आर लीविस जैसे आलोचको मे दिखाई देती है जा अपने वहिप्यार प्रवण प्योरिटनिरम मे एलि यट को भी बहुत पीछे छोड जात है । ममलन, एलियट यो परम्परा की तुलना म सीविस की परम्परा और भी ज्यादा अमहिप्णु और सचित है । जहाँ एलियट का परम्परा बोध उस पभी भी 'माइनर का मजर बनाएर प्रस्तुत गरन मोर इस तरह साहित्य के स्वदेशी वियव म जान यूभरर ऐंठन हालते हुए उसे एप अपने पूर्वग्रह यी पार्मिक-मास्कृतिय रथयात्रा म जुतने लायक बनाने को प्रेरित करता है, वहाँ एफ आर लीविस यी 'ग्रेट ट्रेडीशन' पा यह हाल है पि उस मडिये स सरीसा महत्वपूर्ण रचनाकार भी महज एक आगिरी दिना म लिखी गई छोटी सी विताय लार ही घुस पाता है । मुल मिलारर बीसवी सदी पी पूरापीय ममालोचना की एक वाफी प्रभाव माली धारा पा मिजाज पासा नर चढ़ा, अनुदार और पट्टरपयो है। यह तथ्य और भी ध्यान देने योग्य हा जाता है जब हम देगत है कि समालोचना पा यह परित्र राजनीतिर रप्टिस पामपपी क्लान थाले माहित्यिया ये मामले में भी नहीं बदलता। एसा नहीं है कि मानिसस्ट ममालाचना की दुनिया ही विचारा प्रति स्याल उम्मुत और आतिथ्यप्रयण हा । बलि यहाँ तो महानुभूति या परा कुछ और भी ज्या तग हो जाता है । उन्नीसवी सदी म जो विगाम विस्फोट हुए उही पूराए पी मनीरा रा वहाएर ओर धामिर पिस्याग रे गरट म मा यही उसकी बुद्धि पी स्याधीन और आतिप्प-क्षमतामा भी उमुवा रिया। मगर जा पर सपारपित निवरनरलिजेम यूरोपीय गमातापामी उगरी मीमामा सपना भी जल्द ही पल गए। उस स्वर आगामी निा मी मागा भी पहम लिवरल टेलिजेम' मा अन्तपिरोध पर मीडिया मजरिर समोरोपरमोनिय पदमा नगर मे पम्प पी। उपपनीम"ता से म अतपिरोपकारी पदार नही पाओ५५पी सारी पर प्रतिलिम पाहिलापोभार है और उमराणेमारी दूर पसाने रेशर मनीता पति शेरपुन नई रीयामामति तोमर में पूरी उनए मोर गमानना 99 यह बुद्धि अपने ही अधीर वेग स एव आर्थिक साम्राज्यवाद के स्वनिर्मित व्यूह मस जाती है और उससे निकलने के लिए एक बौद्धिव आर्थिक धमकी रचना करती है जो बदले में उसकी स्वत त्रता की वलि ले लेता है। सवाल यह है कि भारत यूरोप की इस ऐतिहासिक लाचारी को उसी की शर्तों पर क्या ढोए ? क्या अब हम यह साफ साफ नहीं दिख जाना चाहिए कि यूरोप का प्रजातन्त्र उस परम्परा की उपज है जिसम ज्ञान चेतना और धम चेतना का सम्म च बुनियादी तौर पर गडबड है ? ? यह अकारण नहीं है कि पिछले बरसो म पश्चिम को आतोचक बुद्धि एलियट और लीविस से असतुष्ट होकर मथ्यू आनाल्ड की तरफ मुडी-1 केवल मैथ्यू आल्डि को साहित्यिक आलोचना के प्रति, बलि उसके सस्कृति सवधी चिंतन के प्रति भी। आल्डि की यह सास्कृतिय आलोचना दृष्टि निश्चय ही फिलिस्तीन (मध्यवग) और बारिय स (अरिस्टोरेंसी) के खिलाफ थी स्वय इग्लण्ड की मूतत वाणिग्सस्कृति म ऐसी प्टि कुछ अलग और विलक्षण लगती है। पर वही समालोचना की एक उपजाऊ दृष्टि है जो सस्कृति को सस्कृति बनाने वाले मूल्या की यथातथ्य चिंता कर सकती है जो समत्व बुद्धि के मानव मूल्य के प्रति भी उतनी ही सवेदनशील हो सकती है जितनी पाखण्डी को आर पार वैधा वाली व्यग्य शक्ति के प्रति । यह एक मार्मिक विरोधाभास है आनाल्ड के व्यक्तितत्व और भाव बोघ का, कि जहाँ एक विचारव की हैसियत से वह युग धम को आत्मसात करता हुआ निरतर विकाम करता जाता है और विक्टोरियन व्यक्तिवाद और धार्मिक रूढिवाद से लडता हुना अधिकाधिक समाजो मुख, भविष्यो मुख बनता जाता है, वही एक कवि वेम्प मे वह इस परिवतन और आत्म विकास का अतक्ष्यि नहीं दे पाता। प्रायोगिक आलाचना के स्तर पर भी प्रजातात्रि उमेप के प्रथम कवि वाल्ट व्हिटमन के प्रति उसको प्रतिनिया स्वय उसी के मादण्डो के मुताबिक न पयाप्त' है, न 'यथातथ्यात्मक' । प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि आखिर वह कौन सी कभी अथवा हृदय दौवल्य है जो कविता को जीवन की आलोचना मानने वाले इम समालोचक को स्वय काव्य म व्यक्त जीवन की नई सम्भावना और अभ्यथना के प्रति खुलने नहीं देती ? कही यह उदासी गहरे म मनुष्य के बुद्धिजीवन और धमजीवन के बीच कोई पुख्ता और विवेक सम्मत पुल न बना पाने की विवशता का ही परिणाम तो नही थी ? हम देखते हैं कि आल्डि का समूचा जीवन ही अपन युग के बुद्धिवादी सशय और धार्मिक आस्था के लिए छटपटाहट के बीच एक सतत जोर अशाम्य विग्रह से ग्रस्त रहा आया या । निश्चय ही उसकी प्रौढ आलोचना बुद्धिवाद 100 सबद निरतर
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यह स्थापना करता है कि 'जानोचना ही वह औजार है कि जिसके द्वारा हम इस सर्वोत्तम की पोज और नाप जोख करते हैं। मगर उसकी एक अत्यत महवपूण आलोचना पुस्तक वे केवल चार ही निवध साहित्य से सम्बद्ध है, वाकी छवि ध धम सम्बची विवेचन को समर्पित हैं और मनुष्य के बुद्धि जीवन और धमजीवन के बीच ये जतर को प्रकट करते हैं। यही वह इस निष्पत्ति पर पहुचता है कि मानव पुरपाथ की सम्पूणता के लिए अकेली बुद्धि पर्याप्त नहीं है कि अनेक ऐसे क्षेत्र है, जिनमे जनसामा य की पथ प्रदशक वह हो ही नहीं सकती -कि धम का महत्त्व अभी भी कायम है और उसे नकाग्ने या मिटाने की कोशिश बार होगी। आनाल्ड जानता है कि रूसो को भी मानव बुद्धि को सीमाओ के बारे में कोई गलतफहमी नही थी। रूसो ने खुद ही लिखा है कि 'सुकरात जसा कोई विरला भले ही बुद्धि के बूते धैय की साधना कर ले, जहा तक मनुष्य जाति का प्रश्न है वह कभी की सत्म हो चुकी हाती अगर उसी रक्षा हर आदमी को तवक्षमता पर निभर करती। आर्नाल्ड के अनुसार भी सामा य जनता दशन वे नहीं धम के त जीती है। वह दशन को धम स अलगाता है और कहता है कि इन दोना का एक दूसरे के क्षेत्र में लाल न देना ही उचित है । प्रोपीय चितन के इतिहास को देखत हुए यह अचरज की बात भी नहीं लगती। कि तु क्या हिदुस्तानी बौद्धि का भी यह विभाजन सहज और म्वीराय हो सकता है ? एक वार इस विभाजन को स्वीकार लेने पर फिर तो निस्राग आलोचना का जानाल्डीय आदश भी अतत चिंतन और व्यवहार के द्वत की अनुमति दे ही देता है। यानी श्रेयम को विचारा की दुनिया तर सीमित रवमो और व्यवहार की दुनिया के लिए शक्ति का उपयोग करो। वम फिर तो हगल का इतिहास रणन सुलभ है ही जो शक्ति के औचित्य या शस्ति की मफलता के आधार पर स्थापित करता है और इस तरह साध्य और साधन को एवता के विचार को, कमको नतिकता से जुडे-तात्विा प्रश्नो पी-जह ही काट देता है। तो क्या आल्डि भी~आधे मन से ही सही-- अतन हगल के साथ ही हो लता है । 'माधुय और 'प्रकाश' या यह साधर प्रेय पर येय पो तरजीह ता कर देता है कि तु श्रेय यी उसनी कल्पना-यदि औपनिषधि मादण्ड में उम नापा जाय--तो आप्यामिव रटि म यदुन केची नहीं है। वह एव धीर और उदार नतिरता से आगे नहीं जाती। यही कारण है मिसाधन और साध्य के महाप्रश्न मे जूमन की बजाय उसकी बुद्धि एप तरह य ममभौतावादग गतुष्ट हो जाती है और इस तरह गता गधार पर नाका ययानय्य मामना करने से कतरा जाती है। 102 गर तिर उदार वादी चितन की यही तो असली कमजोरी है जिसे बीसवी सदी मे वर्वरता के पहले ही विस्फोट ने उघाड कर रख दिया । - - मगर आर्नाल्ड का सस्कृति चिंतन जॉन स्टुअट मिल के स्वातन्य चिंतन की तुलना मे ताकि रष्टि से कम नीरध्र होते हुए भी एक मानी मे उससे आग बढ़ जाता है क्योकि उसे रीज़न की स्वय पर्याप्तता म वसा भोला विश्वास नहीं है। दरअसल वह एक शाक्त नतियता की खोज मे भटक रहा है जो यूरोपीय मानस का निर्माण करने वाली यूनानियत और यहूदियत की दो धाराओ को- अर्थात् अनेक्ता और वैविध्य की पक्षधर यूनानियत को और एकता की पक्षधर यहूदियत को किसी तरह परस्पर सयुक्त और एक कर दे। यह ध्यान देने योग्य वात है कि आर्नाल्ड उहें परस्पर विरोधी नही परस्पर-पूरक मानता है और इस बात पर खेद प्रकट करता है कि यूरोप के इतिहास चक्र मे ये दो प्रवृत्तियां एक साथ समवित रूप मे प्रकट होने की बजाय बारी बारी से एक के बाद एक प्रभावशील हुइ । यहां पर यह ध्यान देने की बात है कि हमारे इतिहास चक्र और हमारी दाशनिक दृष्टि के लिए इस तरह का विरोध बिलकुल असगत है । आखिर विश्व प्रपच की भूमिका म आचाय रामचद्र शुक्ल को इसी तथ्य को खासतौर पर रेखावित करने की जरूरत क्यो पड़ी कि 'भारत में अधिकार-भेद से एक और अनेक की उपासना साथ साथ चलती रही ? क्या यह आर्नाल्ड द्वारा प्रस्तुत यूरोपीय सभ्यता की दो परस्पर विरोधी प्रवत्तियो का सहज दाशनिक मेल ही नहीं है ? हम अनुभव करते हैं कि स्वय आनाल्ड वे कवि व्यक्तित्व के भीतर एक सतत असामजस्य रहा • सौदर्यात्मक और नतिष के बीच 'हलेनिज्म और 'हेवाइज्म' के बीच जिसे वह अतरात्मिक स्तर पर अत तक भी हल नहीं कर पाया। कि तु इसके बावजूद उसकी यह अतह ष्टि अपने युग की मानसिकता से निश्चय ही बहुत आगे थी कि थोडे से व्यक्तियो द्वारा उपलब्ध माधुय और प्रकाश तब तव अपूण ही रहेगा जब तक मानव जाति का बहुलाश भी उसे स्वायत्त नही कर लेता। यह दष्टि ही आल्डि के सस्कृति चितन को ठोस आधार प्रदान करती है। उसकी इस धारणा से भी सहमत हुआ जा सकता है कि व्यावहारिक उतावली से मानव मूल्यों की क्षति ही होती है। निश्चय ही वह मानता था कि मास को राज्यत्राति अठारहवी सदी के महार विचारो की चरिताथता नहीं, बल्कि प्रवचना है और इस प्रवचना के मूल मे वही 'बुद्धिप्रसूत विचारो को पौरन व्यवहार में उतारने की अधीरता है।' मालोचना आखिर आदश और यथाथ का आमना-सामना ही तो कराती है । आर्नाल्ड मानता है कि विज्ञान की तरह आलोचना भी क्सिी दल या किसी जनतन और समालोचना 103 उदेय मोगियर कीया गा 1 3A AT गार पर मोर गाय मन्माण पर ही पाय TITI पाहिए । गोमिया, पापणापा पिराप पराम्पर या I और महाfr मामा अपुरी पर पापम रहो करिया जारी यह प्यापारािजीया र गगगगह।' एक भारतीय पापही पर पाटी मटन महगूग हाती। शिमगा हमारे fro jी यातीय पर निगा मोहमारी अवधारणा आस पोटी अगा-गामा frपम पीहमारी जयपारणा भी नाम रियायतया मित्रो या हम म पर पिसार गराहा आसरा पग ती अपी अबधारणा बारे म-*गी गरी यति म उमरी गुर्गति और गुप्रमाणित जीयोr यार म ही साने सगत और माइग सग मारत हग AT और ससा पम पना और बुद्धिवाद गर्योनजर (यम्ट गप) और मामाया (आधिारी ग.) पी आडीय पोरिया ५ वी आरत विग्रह और यमामास्यो एप दूगर हो परिप्रेक्ष्य म दाने और सुनमापी गुनौती या गभावना गा भी अनुभव ही परत ? पया यह भी गही नही है जिआरपी तर प्रत्रिपा 'वस्ट गल्प पी अवधारणा या पीछा करत करते थेप और गति परामपय यो तो परत-परत असत राज्यसत्ता मी अपनी परिपूर्ति ग यो विवश प्रतीत होती है, जबकि मानवारमा पो सर्वोच्च सभावनाआ या जीवन म चरिताय परन या एतद्देशीम दशन इराके लगभग विपरीत निपप पर पहुँचता है और लगभग विपरीत मार्ग और पतति अपनाता है । यहाँ ताकि यीमयी गदी ये पूर्वाद्ध म भी-जब भारतीय चितव और पमश के लिए राजनीतिय स्तर पर भी इस परम्परागत दशन और प्रयत्न पो पुन परि भाषित और पुनमूल्याक्ति करने की अभूतपूर्व चुनौती पश हुई तर भी उसकी मूल वृत्ति और मूल निष्ठा म वसी दरार नही पड़ी। लगता है आर्नाल को भी अपने जीवन यापी आत्म मथन और आत्म पिण की बदौलत विसी सतुलन किसी सामजस्य का यही धुधला सा आभास मिला होगा। तभी न वह कहता है कि 'आलोचना का सबसे पहले धय मदोमित होना चाहिए, उसे प्रतीक्षा करना आना चाहिए। उसे यह विवेक होना चाहिए कि कस किस वत्त चीजो से जुडा जाय और कस किस वक्त उनसे तटस्थ हुआ जाय ।' निश्चय ही आर्नाल्ड की निस्सगता और हमारे अनासक्त वम के बीच खासी दाशनिक दूरी है । वितु इसके बावजूद दोना में कोई सम्बध नहीं है यह हम क्से कह सकते है ? मुझे लगता है कि हमारी आलोचना की भी 104 सबद निरन्तर आधुनिक परिस्थिति को समभने के लिए आर्नाल्ड का दृष्टात एक रोचर और विचारोत्तेजक दृष्टात है जो हमारे भीतर कई प्रश्न एक साथ उपजाता है । जसे यही, दि भारत के बुद्धिजीवी यूरोप के लिवरल और रेडिक्ल चिंतन स क्सि मानो मे कहाँ तक प्रभावित रहे है अपने समाज शन और आत्म दशन मे-अपनी आलोचना दृष्टि म भी भारत के निक्ट इतिहास मपरम्परा और आधुनिकता को लेकर भारतीय मूल्य दृष्टि और यूरोप को आधुनिक मूल्य दृष्टि को लेकर किस तरह के द्वद या मानस-मथन प्रकट हुए ? हमारी साहित्यिक सस्कृति म भी आत्म प्रत्यभिना और आत्म नवीकरण की सभावनाएं किस तरह प्रक्ट होती रही है । हमन इसी सिलसिले में अनेय के निशकु से आरम्भ करत हुए हिंदी समालोचना के ठेठ समकालीन परिदृश्य की चर्चा की थी और आर्नाल्ड के सस्कृति चिंतन का विश्लेपण करते हुए एक तुलनात्मक सदभ म श्री विजयदेव नारायण साही और आचाय रामचद्र शुक्ल का भी उल्लेख किया था। थोडा विषया तर ही मही, जव वात निकल ही पडी है तो हम आचाय शुक्ल की उस बहुचर्चित पुस्तक (विश्व प्रपच या अनुवाद और भूमिका) का थोडा और हवाला दने की जरूरत महसूस हो रही है । कदाचित् इस विषय के सिलसिले म यहां भी कुछ काम की बात हाथ लगे। शुक्लजी की यह भूमिका एक रोचक मिसाल है स बात की, कि एक देसी दिमाग किस तरह आधुनिक ज्ञान विज्ञान को अपनी भाषा मे और अपने परम्परागत नान प्रतीक के जरिए . • आत्मसात् करके प्रस्तुत करता है । आग्विर हिदी आलोचना के इस आदि पुरुप को यह क्या आवश्यक जान पडा कि वह एक विज्ञान की पुस्तक का अनुवाद करे उसकी इतनी विस्तत भूमिका लिखे और उस भूमिका में न केवल उस नए ज्ञान की विवेचना करे बल्पि धम तत्व और नान के सम्बन्ध के वार म जो भारत की अपनी दृष्टि रही है, उसकी तुलना यूरोपीय दृष्टि के साथ करत हुए जसदिग्ध रूप से इस तथ्य को सामन लाए कि दाना मे आधारभूत अतर क्या है और वह पिनना महवपूण है । भगा विश्व प्रपच जसो नास्तिक किताव को भूमिका लियत हुए धम चर्चा की क्या जरूरत थी। मगर स्पष्ट चितन के तकाजे से ही आचाय शुक्ल को अनुभव हुआ कि बुनियादी गफलत पर से अभी तत्काल परदा नहीं उठाया गया ता माग अनय ही अनथ होगा। इसीलिए उहोंने पश्चिम की धम दप्टि की बुनियादी आलोचना न श दाम की उह यहाँ उद्धृत परना जरी लगता है । वे कहते हैं जहा एकेश्वरवाद का पहले पहन तत्व दृष्टि द्वारा स्वाभाविक बम से विवाग - जनतत्र और समालोचना 105" - हुआ वहाँ तो बहुदेववाद के साथ उसका पूरा समवय रहा । पर जहां उसका कलम लगाया गया, वहाँ आफ्त सडी हो गई । वावुल के एकेश्वरवाद को यहूदिया न इसी तरह लिया । तीना शामी मता म व्यापकत्व का अभाव रहा। इस पगम्बरी एवेश्वरवाद के पहले ससार मे मतवादी युद्ध नहीं हुए। यूरोप मे ज्ञान की जो उनति हुई वह बहुदेवोपासक यूनानिया के प्रसाद से । अनाय ईसाई मत ने तो नान की गति म बाधा ही डाली।' थाडे ज्ञानमार्गी पूर्वग्रह (वह क्या पिशकु मे भी नहीं हैं ?) और उसके कारण ईसाइयत के प्रेमतत्व विपय मौलिक योगदान के प्रति अपर्याप्त सवेदन शीलता के बावजूद शुक्लजी वे उपरोक्त मतव्य में निहित आलोचनात्मक विवेक का कायल होना ही पड़ता है। हमने मथ्यू आर्नाल्ड की चर्चा के प्रसग म उस यूनानियत और यहूदियत विपय दद का उल्लेख किया था। काश, कि मथ्यू आल्डि को शुक्लजी की इस आलोचना की सबर लग पाती । स्वग म ही सही दोना के बीच जो सवाद घटित होता उसकी कल्पना रोचक लगती है। दूसरी ओर यह भी गौरतलब है कि आचाय रामचद्र शुक्ल ने उक्त निबंध म पश्चिम के लाधुनिक विनान का न केवल अपने परम्परागत नान प्रतीको के हिसाब से, बल्कि अपनी परम्परागत घम बुद्धि के हिसाब स भी भरपूर स्वागत किया है। क्या । इसलिए कि उही के शब्ना मे-'भेदो मे अभेट ही सच्ची तत्व प्टि है। इसी के द्वारा मत्ता का नाभास मिल सकता है । यही अभेद नान और धम दोना का लक्ष्य है ।' इतना ही नहीं दूरदर्शी आचाय ने मानो बीसवी सनी के भौतिक विज्ञान की अधुनातन प्रवृत्तियो को पहले से भांपते हुए अपनी भूमिका का समापन यह कह दिया है कि 'विज्ञान इसी अभेद की खोज म है । धम इसी ओर दिखा रहा है।' सच पूछा जाय ता मानव स्वभाव या कहिए, मानवीय बुद्धि मे ही एक दोहरी सम्मृक्ति की और दोहरे पुरुपाय की मांग है जिस मानव विकास की दृष्टि से एक उपजाऊ विरोधाभास के रूप म भी देखा जा सकता है । यह बुद्धि या आत्मा जहाँ एक ओर अपने लिए सपूण स्वाधीनता की माग करती है वही वह अपने लिए एक सर्वोच्च लक्ष्य को, श्रेय को खोज भी करती है जिससे वह प्रतिवद्ध हा सके और जिसके लिए जीवन भी उत्सग कर सके । अयात् ऐसी प्रतिवद्धता, ऐसी श्रेयमाधना जो उमे मम्पूण मानव समाज और मम्पूण मृष्टि के सदम से जोडकर साथ कर सके ! सभवत मानव चेतना की इसी दोहरी मांग के उत्तर मे धम खडे होते हैं। दूसरी ओर यह भी सच है कि जब बुद्धि स्वय अपनी स्वायत्त गति की ऊर्जा से धार्मिक विश्वास का असभव बना देती 106 सबद निरतर है, तव धम मे जुडी उसी अपदस्थ भाव ऊर्जा की जतक्य प्रेरणाए ही बुद्धि ऊर्जा म परिणत होकर ऐसी तक स्वरचााए (सिस्टम) सडी कर देती हैं जो जपने आप म भले ही धार्मिक विश्वास की प्रतिलोम लग पर मानव-चेतना से मानव बुद्धि से उसी कोटि का समथन और समपण वमूल करने लगती हैं जसा कि इतिहास मे धम करते आए है । उदाहरण के लिए उनीसवी सदी म यूरोपीय ज्ञान के विस्फोट न जिस तरह चच का तख्ता पलटा, उससे एक आध्यात्मिक शूय उत्पन हुआ और उसे भरने के लिए जहां एक ओर रहस्य वादी सम्प्रदाया की वाढ आई, उसी तरह नीती और माक्स की विचारधाराएँ भी प्रकट हुइ । समालोचना मे भी-मथ्यू आर्नाल्ड जसे सधि कालीन विचारयो के बाद इसीलिए परिवतन आना लाजिमी था। निश्चय ही यूरोपीय भाव योध के इतिहास म लिबरलिज्म की दुवलता और अपर्याप्तता का भी पर्दाफाश होना लाजिमी था और उसकी प्रतिक्रिया म दूसरी अत्याग्रही आलोचना दृष्टिया का पनपना भी । हमारे यहा, यह देखना दिलस्प है कि दस सदी की शुरूआत म ही एक ओर श्री अरविद और दूसरी ओर महात्मा गायी वा प्रादुर्भाव हुआ। उह भी इस देश की चिंतन परम्परा के इतिहास की वैसी ही अनिवाय परिणतिया के रूप मे देखा जा सकता है जैसे कि यूरोप के सदभ मे मावस और नीत्शे को। क्या श्री अरविंद और गांधी के बीच उतनी दाशनिक दूरी है जितनी माक्ग और नीत्शे के बीच यूरोपीय साहित्य और समालाचना म भी यूरोपीय चिंतन के विकास प्रम की इही आधुनिक परिणतियो के समाना तर परिवतन आए । भारत या आधुनिक साहित्य और समालोचना भारत वेदन प्रातिकारी चिता और यमों ये कृतित्व म पिम मानी म और कहां तय प्रभावित हुए हागे-पया यह एक पालतू सवाल लगता है ? क्या यह पूछना भी मात्र बुद्धि विलाग हागा वि एक 'कलमी एकेश्वरवादी' मस्मृति के अतविरोध या क्या हम भारत के भाव- योप और परिस्थिति पर ज्या या त्या घटा सकते हैं ? अगर नहीं, तो हमारे बुद्धिजीवन और हमारे जनत व यो गुनौतिया और मभावनामा वा मया स्वम्प यनता है ? यदि, जमा आचाय शुक्ल यो लगा पा- 'भेटो म अभेद ही सच्ची तत्य रष्टि है', और यदि यह मानव स्वभाव पी दोना मोगा को स्वाधीनता और प्रतियदना यो एप साप सतुष्ट पर मरती है तो इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है। इस दृष्टि से चलत निरपुरा राज्य सत्ता म मान मतिकता पा आश्रय याजना विलग्न ही वेमानी है और जननत्र ही उसरे लिए सही राजनीतिर परिवार है। जिस ताविर दृष्टि म frमुन ब्रह्म में माप साप देवताआरे एक भर-पूरे प्रजातत्र के लिए भी गुजा हा, “म . - जनारयोर ममानापना 107 मानवीय प्रजात को आधुनिर चुनौतिया या भी सामना करन म सक्षम शना ही चाहिए । मगर ऐसा तभी हो सकता है जब यह हमारा जनतत्र हा, मात्र पश्विम को नकल नही । यही बात समालाचना पर भी लागू होती है। हमारे आलोचनात्मक विवेच वे सामन यह स्पष्ट होना चाहिए कि हम जन तत्र क्या चाहते हैं और वसा चाहत हैं। इस 'क्यो और 'कस' का विवेक आधुनिक भारत के निर्माता में भी था, इसका युछ अहसास कराने के लिए मात्र दो उदाहरण काफी होगे। एक श्री अरविद या और दूसरा महात्मा गांधी का । आधुनिक भारत के इतिहास म इतनी परस्पर भिन और इतनी परस्पर पूरक विचार रष्टियां और कहां मिल साती हैं मैं नहीं जानता । तो लीजिए पहले श्री अरविद स्वाधीनता समानता और जनतब जस विचारो को हम मात्र इसलिए गण नही करत पि वे यूरोपीय है बल्कि इसलिए कि वे माननीय हैं इसलिए कि व आत्मा के सामने फलप्रत दृष्टिकोण रखते है और मानव जीवन के भावी विकास के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं । जनतत्र मा विचार हमारे यहाँ भी किसी न किसी १५ मे रहा था भले ही हम उसे उसकी ताविक परिणति तय नहीं पहुंचा सके । आज इसे ग्रहण करना हमारे लिए इसलिए आवश्यक है कि जो चीज़ जीवन और सता सम्बधी हमारी परि- कल्पना मे उसके उच्चतम आशम का समथन करती है, उसकी ओर हम जाना यहा यह बताना अनावश्यक होगा कि श्री अरविद नातिवारी, योगी और विचारक होने के अलावा उच्चकोटि की आलोचनात्मक प्रतिभा वे भी धनी थे। उनके इस समालोचक पक्ष का परिचय हम जितना होना चाहिए उतना शायद नही है । महात्मा गांधी भी अपने जीवन मे और विचारों में उतने ही प्रातिकारी थे जितने श्री अरविद । जब यह वात दूसरी है कि भारत में अधिकाश बुद्धिजीवी उह नतिकारी मानत है न लेसर या विचारक ही। मगर हमारे निशकु बुद्धिजीविया के बीच तो श्री अरविद की स्थिति भी मैं समझता हूँ कोई बेहतर नहीं है । चलो अच्छा है इस मामले मे भी एक मल तो है दोना मे । सन् 1942 मे जब सारी दुनिया म ए टी फासिस्ट सम्मेलन चल रहे थे गाधी से भी कहा गया कि व भी इस धमयुद्ध में मित्र- राष्ट्री के प्रति अपनी पक्षधरता का सावजनिक इजहार परें । तो रोमा रोला के घनिष्ठ मित्र गांधी उस नाजुक मौके पर भी यह बहने और लिखने से नही चूने कि 'पश्चिम वा प्रजातत्र भी जरा हलवे रग का नाजी और फासिस्ट ता ही है। जाहिर है कि यहाँ तक आते आते वै सासे मोहमग से गुजर चुके 108 सबद निरतर थे और उस प्रजातन की हूबहू नकल अपने देश म नही देखना चाहत थे। निश्चय ही उनीसवी सदी के यूरोप की सवश्रेष्ठ लिवरत विरासन का काफी घनिष्ठ परिचय उह हो चुका था, पर उनका चिंतन और कम उम उदार वाद का अनुवाद कभी नहीं था। वे अपनी तरह के रडिक्ल भी बने, पर उनका रेडिक लिज्म यूरोप के लिबरलिफ्म की यूरोपीय प्रतिक्रिया में निकता रेडिकलिषम नहीं था। वे व्यक्ति की स्वाधीनता के प्रवत्रतम समयमा म ये पर उनके इस आग्रह का पश्चिमी 'इण्डिविडुअलिग्म' म तनिय भी लना देना नहीं था। वे करोडो गूगा बहरो के जमजात प्रवक्ता थे पर उनकी यह प्रति- बद्धता किसी उधार ली गई विचारधारा और उमरे मुहावर को मुमापशी नही थी । क्या इस तरह के जीव त उदाहरणा से भी हो का मस्त नहीं मिलता कि भारत के प्रजातन मे समालोचना की-आलोचक विदेश की- क्या और कैसी भूमिका हो सकती है ? निश्चय ही हमार यानी की देहरी पर ही जिस 'आलोचक राष्ट्र' के निमाण का सपना nि दीखा था, वह महज़ खामखयाली नही थी । उममी नाव मात्र हामी जा चुकी थी। हि द स्वराज और भारतीय मतिपय यस्या उसी नीव के पत्थर नही हैं और जैसी गनीम उस नीव पर खडी की है, उस नीव को देखerangam स्थिति में हैं कि वह एक स्वाधीन रूप मे intr7, श्री निमिति है ?
कला और कुमारस्वामी हम सबको पला वस्तुआ के ममम ता हर देश और पाल म काफी तादाद में मिल जायेंगे लेकिन उसके मूल स्रोता तब जाकर मानवीय चेतना के इतिहास को मानवीय क्ला के इतिहास से जोडन और इस तरह वला के अतीत को ही नही, उसके वतमान को भी एक नए, समग्र परिप्रेक्ष्य म देख और दिसा सक्ने वाले मनीपी इक्के दुक्के ही होते हैं । आनद फैटिश कुमारस्वामी ऐसे ही चिरले मनीपिया म ये जिनके बारे म जोजेफ कम्पबेल ने लिखा है कि 'हम सब भारतीय कला के अध्यता और शोधकर्ता उसी अग्रज द्रप्टा के कन्धा पर खडे हैं ।' यह एक विशेषज्ञ द्वारा अपने क्षेत्र के अग्रगामी दूसरे विशेषज्ञ के कृतित्व के प्रति अर्पित श्रद्धाजलि भर नहीं है बल्कि एक ऐसा तथ्य है जिस -जो विशेषन नहीं हैं लेकिन आज के इस दिशाहीन और मूल्यमूढ समय मे जीवन मूल्या को सोज से किसी न किसी स्तर पर जुडे हैं हम सबको- - आन द कुमारस्वामी के व्यक्तित्व और कृतित्व के इस प्रेरणादायी अथ को अपने लिए नए सिरे से जानना और पहचानना जरूरी है। वह प्रेरणादायी अथ क्या है ? इसके पूर्व, कि हम इस महान व्यक्ति के कृतित्व का स्मरण करें, हम उससे जुड़े हुए इतिवृत्त को भी जन्म शता दी वष की इस प्रारम्भ वेला में व्यक्तित्व स्मरण कर लेना होगा और ऐसा करना महज औपचारिक्ता न होगी क्याकि पूर्व और पश्चिम की आध्यात्मिक प्रेरणाओ के बीच जिस मूलभूत एकता की खोज इस कृतित्व की प्रेरणा प्रत्रिया और उपलब्धि रही है, उसी मूलभूत एकता का सकेत हम कृतिकार के नाम और इतिवृत्त मे भी झलक्ता दिखाई दे जाता है । सयोग की ही बात है और फिर भी इस मात्र सयोग म मानो एक नियतिकृत और सुनिर्दिष्ट भावी का सकेत निहित था कि सिंहलद्वीपी पिता और स्काटिश माता की सतान थान द केंटिश कुमारस्वामी की शिक्षा दीक्षा यूरोपीय सभ्यता के गढ इग्लण्ड म हुई, क्मभूमि उसे इतिहास बोझ से मुक्त मूल मानव अधिकार की घोषणा घरने वाले अमरीका न प्रदान की और उस क्म को अर्थात् -कला की जमीन पर मानव एकता कास्वप्न और सत्य देखने की साधना कोप्रेरणा दी भारतन।
नई दुनिया के कोण से पुरानी दुनिया को यह खोज जहा एक जोर पश्चिमी प्रतिभा की एकाग्र, वस्तुपरक वैज्ञानिकता से प्रेरित थी, वही उसमे पूरब की अभेद दृष्टि भी बडे सहज और स्वभाव सिद्ध ढग से प्रतिफलित हुई। भारतीय पुरातत्व, धम दशन, मूर्तिकला, स्थापत्य, चित्रकला और साहित्य पर अनेक मौलिक और स्थायी महत्व के ग्रथो की रचना करते हुए उहोने सगीत, विज्ञान और इस्लामी कला पर भी अनेक विचारोत्तेजव निवध लिखे। 9 सितम्बर 1947 को उनकी इहलीला समाप्त हुई । तब तक उनके प्रिय भारत की राजनीतिक स्वतरता का स्वप्न साकार हो चुका था। लेकिन भारत की जिस सृजनात्मक स्वतनता का साक्षात्कार उहोंने उसके अतीत में किया था और स्वदेशी के माध्यम से उसके पुनविस्फोट का स्वप्न उसके पराधीन वतमान के भीतर किया था, वह उनके उच्चतम मानदण्डो को देखत हुए अभी अधूरा ही है। ये मानदण्ड ऐसे है जिन पर स्वय कुमारस्वामी का कृतित्व खरा उतरता है क्योकि 'पूर्वापरी तोयनिधीवगाह य' वाली कालीदासीय कल्पना को चरिताथ कर सके, ऐसी विद्वता भी उही मे देखो को मिली। प्राचीन आचार्यो की सूत्रशली तथा निर्वयक्तिक एकाग्रता को अधुनातन ज्ञान सदों मे अवतारणा करती हुई कुमारस्वामी की यह विद्वता जहाँ एक ओर उच्च कोटि की दाशनिक समझ से आलोक्ति है वही, दूसरी ओर वह वास्तविक जीवन-सदर्मों पर भी बराबर अपनी पक्ड बनाए रखती है। आज का आधुनिकोतर चिंतन जिस परम्परा के मूल्य को अब जाकर समझने लगा है, कुमारस्वामी की मूलगामी एव अग्रगामी मवेदना न मानो उसे अद्धशती पूर्व ही भांप लिया था। कुमारस्वामी वाक्ला चिंतन जीवन और पुरुषाय विषयक उनकी मौलिक चिता काही प्रतिफलन है । कला सृजन को व मानव समाज की एक बुनियादी जरूरत के रूप में देखते हैं । भारतीय जीवन मे क्ला की वह वसी ही जीवत भूमिका अब भी देखना चाहते हैं, जसी वह हमेगा अभी हाल तक रही थी। 'क्ला फ्ला के लिए जसी मा यतामा का उहाँने अपन लेखा म मात्र सण्डन ही नहीं दिया है, बल्पि' वला 'शिल्पवर्माणि' को मूलत उपयोगी वस्तु माना है और उपयोगिता तथा कलात्मकता के द्वत को अन्तविघटित समाज का, सच्ची मृजनात्मकता स भ्रष्ट हो चुके समाज का समग माना है । उहाने प्रारम्भ मे ही प्राचीन भारत मे स्वप सिद्ध रूप से स्वोरत इस तथ्य को रेसाक्ति पर दिया है कि एक सच्चे शिल्पपम म शिल्पी के रप्टिकोण से जो आन्तरिक बला मर सौष्टव निहिल होगा वही उस शिप क्ला और पुमारम्वामी 111 व उपभात्ता पी प्टि म उरावा उपयाग-मूल्य अर्थात् 'याग्यता' या 'पुण्यता' होगी। कोशीतवी उपरिषद् ने इस मूत्र वाक्य को उद्धत परत हुए मि'सारी अभिव्यक्तिया चाह व मनुप्यात हा, चाह अतिमानुपी श्रुतिमूलर सब एक ही साध्य स निर्दिष्ट होती हैं और यह साध्य वह अलक्ष्य प्रयोजन वसो प्रत्येक अभिव्यक्ति स बडा और उसब परे होता है', उनका विचार है कि क्लाति की प्रेरणा और प्रयाजन इसी परम प्रयोजन के मल म हो सकता है। वृहदा रण्यव उपनिपद् के अनुसार भी जसा उद्देश्य होगा बसा ही कम हागा, दूसरे शब्दा म साध्य के अनुसार ही साधना होगी। (यत्र तु तत्वम) इस प्रकार 'शुद्ध क्ला या 'ललित कला या व्यवहार क्ला जसी परिभाषाएँ अत्यत सीमित अवधारणाएँ हैं जिनका वास्तव मकाई अलग अस्तित्व है नही । प्रत्यक कलाकृति नामवत (अर्थात पानात्मक) भी हाती है और 'रूपवत् (अर्थात् भौतिर व इद्रिय प्रत्यक्ष) भी। वास्तव म क्ला कृतिया की साथक्ता इसी बात म है कि वे जीवात्मा मनुष्य को उसक अन्नमय कोष म भी परिपुष्ट करें और उसके मनोमय कोप म भी संघटित करें। कला की अनमयता इससे सिद्ध होती है कि सचेतन आत्मा का जाजीव पर है-पशु के समवक्ष, वह अन पर टिका है कलाकृति अनमय यू है कि मनुष्य उसके द्वारा अपने अभिलपित उद्देश्यो को पूर्ति करता है । दूसरी ओर मानव चूकि सिफ पशु जीव ही नहीं है, यवित अर्थात् पुरुप भी है, जत आमय कोप द्वारा अभिलपित उद्देश्या के अलावा भी उसके मनोमय और विज्ञानमय कोप की कई दूसरी अभिलापाए और उद्देश्य भी स्वय सिद्ध हैं, जि हे कि शास्त्र कारो ने पुरुषाथ कहा है यानी पुरुष होने वा अथ । इस अथ की सिद्धि म क्लाकृतिया साधनरूप होती है क्याकि स्वय कलाकृतिया उसी अथ से या कि उस अथ को समेटने वाले वृहत्तर अथ और प्रयोजन से (जो कि सृष्टि की समस्त अभिव्यक्तिया या साध्य या परमगति है) उससे प्रेरित और निर्मित होती हैं। इस प्रकार भारतीय क्ला की लौकिक साथक्ता का भारतीय श्रुति एव स्मृति साहित्य के भीतर से ही विवेचन करत हुए आन द कुमारस्वामी ने कला और मानव जीवन के अनिवाय सवध का विशद प्रतिपादन किया है। ध्यान देने की बात है कि उनके इस चिंतन मे परम्परा की मनमानी व्यारया या अथ की खीचतान कही नहीं है । सरलीकरण, इच्छित चिंतन या मतवादी घपला उनके यहा विनकुल नहीं है । उनको वितन प्रक्रिया मानवीय अथ के चिंतन को- अत उसके पुनराविष्कार की प्रक्रिया है । इस प्रक्रिया में वे न तो द्वत दृष्टि को सोचतान करते है, न अद्वत दृष्टि की मूल प्रतिज्ञाआ से किसी 112 सवद निरतर तरह वा समझौता या पलायन । एक सच्चे सोजी की तरह न तो वे नवीनता से आतकित हैं, न प्राचीनता से । क्ला के चितन म धम तत्व और दशन थे सूत्रा का उपयोग एक आग्रही बुद्धि कोसरलीकरणो की ओर ले जा सकता है कुमारस्वामी की सजग जिज्ञासु बुद्धि यदि इस ओर से हमे सदा जाश्वस्त रखती है तो इसका कारण यह है कि वे स्वय एक सच्चे और गहरे अथ में दानिक (तत्वचिता, बुनियादी चितन के अय मे) जिनासा से उमथित हैं । इसीलिये वे हर बार सीधे स्रोत तक जाते है पुष्टि के लिए नही, खण्डन मण्डन के लिए नहीं, बल्कि प्रकाश के लिये जभिव्यक्ति के लिये । इसीलिये उनके चिंतन में वह खुलापन है जो स्रोत म होता है । इसीलिये वे अपने द्वारा व्यवहृत प्रत्मक पारिभाषिक शब्द और अवधारणा को अधिकाधिक पारदर्शी बनाते जाते है ताकि उनका अभिप्रेत कही से भी घुघलाए नहीं । इमी से उनके विचारो का सार-सक्षेप प्रस्तुत कराा अत्यत कठिन पडता है। भारतीय जीवन मे क्ला की भूमिका पर जव वै विचार करने चलते है तो उह एप ओर तो क्लात्मक उत्कृष्टता के उच्चतम प्रतिमानो की रक्षा बिना कलाकार को हाथीदात की मीनार म बिठाए करनी है और दूसरी ओर जीवन व्यवहार के स्थूलतम व्यापारा से भी क्ला को जोडे रखना है। आरम्भ ही वे क्ला की परिभाषा से करते हैं 'क्लाकृतिया या शिल्पवम क्या हैं ?" क्लाकृतियाँ अस्तित्व या वि यह लीजिए, आजीविका के वे साधन हैं जिनको वि कलाकार रूपी मनुष्य (शास्त्र की शब्दावली म शिल्पी' 'कारख 'यवि' इत्यादि) सरक्षक या दशक रूपी मनुष्य की जरूरतो-मांगा की पूर्ति हेतु बनाता है । इस 'बनान' के लिए 'क्त' या 'सस्कृत' शब्द का प्रयोग किया गया है । इस पर कुमारस्वामी की टिप्पणी देखिए 'बनाना और करना, आट और एथिवम क्लागार के लिए दो अलग चीजें न होकर एक और अविभाज्य हैं क्यापि बनाना' ही कलाकार वा बम (शास्त्रीय शब्दावली म 'स्वधम या 'स्ववाय ) है। कलाकार मनुष्य की कोई विलक्षण कोटि नहीं है। बल्कि हर आदमी, अपने कम मे या कम से वम किही पिही अवसरा और किसी न पिसी हैसियत म-एप अलग विस्म का कलाकार अवश्य है।' यदि जीवा का सचार अन्नमय वोप से लगाकर मनोमय और उस भी अतिमात परते हुए आन दमय कोप तक है तो क्लारम नाम से प्रत्यय स्तर के साप अविच्छिन्न रूप स जुहा होना चाहिए। तभी इसकी साथक्ता और जीवन-सापता प्रमाणित हो सकती है। मानवीय जीवन और पलाये सम्बध म मोलिप भयन करा वाल कुमारस्वामी यदि यहाँ पर भारतीय मूल्य-दष्टि के घायल हैं तो यह इसलिय नहीं कि एक जीवित परम्परा या क्ला और कुमारस्वामी 113 प्रयाश उह अनायास ही उपलब्ध है यति इसलिए कि उनका स्वय का विवेय कला मूल्या और जीवन मूल्यो वे जिरा अहत को पाने के लिए वेचन है, वह उह निर तर मनुसबाा की प्रेरणा देता है। विवेर की यह चिनगारी ही जह अंधेरे में रास्त वा समेत दनी है और इस रास्त पर अपने ही परा चलत हुए वे उन चिनगारिया को परडत हैं जो अस्तित्य वे बुनियाली प्रश्ना से भूभत हुए मनुप्पा न पिसी समर अपनी चेतना म पाडी और लिपिवद्ध की थी। क्लाति तथाकथित सरक्षा के विलास की सामग्री भी तो बन जा सकती है। तव पलाको दम अन्नमय व्याख्या को स्वीकार करते हुए उसे उसमे निहित या सभाव्य विलाममय परिणति स बस उवारा जाय? यह प्रश्न जव कुमारस्वामी के भीतर उठता है तो वे आत्मविश्वास पूर्वक कह सरते हैं कि 'मन पी शिल्प कम को विलासितामूलय परिणति तभी दिमाग म आ सकती है जब क्ला के ससका यी भूख या प्रवृत्ति (काम) मानवीय अथ या अतिक्रमण वर जाप अथात् पुरुषाय विसवादी बन जाय । मनुष्य जीने के लिये अन्न ग्रहण करता है, इसलिये उसको अनाहार की स्वाभाविर प्रवृत्ति म विकार तभी आएगा, अनलुब्ध वह तभी बहलाएगा जब वह जीवन उद्देश्य और जीवन प्रक्रिया के स्वाभाविक सवार का खण्डित करेगा अर्थाद पाने के लिये जीन लगा। यहा पर अमिनीय उपनिपद् ब्राह्मण का यह दप्यात किस खूवी स सदभित हाता है। 'प्रजापति न दृष्टि में उपरात अपन बच्चा से पूछा - तुम्हारी क्या इच्छाएँ हैं ?' मनुष्या न उत्तर दिया - अनाधकाम 'हमारी इच्छा अनभक्षण करन की है । तो प्रजापति ने उह साम वेद का आहार दिया।' यह दष्टात प्रस्तुत करने के बाद कुमारस्वामी कहते है कि यह साम वेद शिल्प क्म' है अर्थाद वह अभियक्त क्ला जो कि जीवन का अग बनती है, जबपि ऋग्वेद वह 'शिरप है जो अभी कलाकार के भीतर अव्यक्त है, जब तक कि वह उच्चरित होकर व्यक्त नहीं हो जाता । भूख या इच्छाएँ जीवन की वे जरूरतें हैं जो उम जीव को जाति के अनुसार निर्धारित होती हैं । इस तरह इस भूख की नतिकता और जीवन- मात्र जथात् अस्तित्व को नैतिकता एव और अविभाज्य है। यह विवेक अपने ही जोर स एक ओर तो गीता के इस सून को खीचता है कि 'धर्माविरुको कामोऽस्मि भूतपु भरतपभ' और दूसरी ओर वह पुराणा की इस कथा में निहित मनोवैनानिन अतदृष्टि से भी जुड़ जाता है कि 'इच्छा या काम धम और श्रद्धा के मेल मे उत्पन सतान है, इसके विपरीत लोभ दम्भ और पुष्टि के सयोग का फल है। खोज प्रत्रिया के इस एक ही उदाहरण से यह समझ पाना कठिन न होगा कि कुमारस्वामी का क्ला चिंतन किस कोटि की - 114 सबद निरतर अर्था वेपिणी चेतना से निष्पन होता है । उह उस बुनियादी सवाद की खोज है जो क्ला को जीवन और मृत्यु दोना के सदम मे साथक बरे। इसीलिए उहोन शिल्पकम को एक छोर पर प्रकृति के रूपो से और दूसरे छोर पर देवशिल्पा से अलगाया है और साथ ही उसकी मानवीय सत्ताका अतिमानवीय और प्राकृतिक दानो के साथ आत्मीय ढग से जोडा है । देवशिल्प केवल बुद्धि- गम्य या ध्यागम्य हैं जबकि प्रकृति के रूपाकार प्रत्यक्ष सवेदना के विषय है। मानवीय शिल्प कम म दोना का योग है । उसकी स्थिति अतिप्राकृत और प्राकृत के बीच एक मध्यवर्ती की स्थिति है। हम पहले ही कह चुके हैं कि कुमारस्वामी कला और शिल्प उद्योग के बीच चौडी होती जाती दरार से अत्यत क्षुब्ध थे। उन्होने बलपूर्वक इस तथ्य को रखावित किया है कि भारत मे 'ललित' और 'व्यावहारिक' का विभाजन केवल साहित्य और नत्य तक सीमित रखा गया है । मात्र 'लयात्म हलचल' को 'नत्त' कहा गया और 'नृत्य' को सना पान के लिए उसका विसी ठोस 'वस्तु' का निदशन करना अनिवाय माना गया। इसी तरह मात्र घटित कथन को इतिहास और रसात्मक क्थन को काव्य माना गया । कला के क्षेत्र म यह विभाजन नही किया गया और यह अकारण नही है । कुमारस्वामी का विचार है कि इस बात पर भी मतैक्य हो ही नहीं सकता कि क्ला कहा समाप्त हुई और उद्योग कहा शुरू हुआ। ये जो दो कोटिया उच्चतर कला के नाम पर क्ला की और हीनतर उपयोगधर्मी क्ला के नाम पर तथाकथित शिल्पकारी या उद्योग पधे की खडी की गयी है कुमारस्वामी के क्थनानुसार काल्पनिक और अनधिकृत हैं । आज के तथा- कथित कलाकार के सामाजिक विलगाव की चचा करते हुए उन्होने उनकी तुलना मज्झिम निकाय मे वणित उस आदमी से की है जो चिन बनान की सारी सामग्री लेकर हवा पर चित्र आंका आता है । (आवाश स्पम् लिखेय्य) साप हो उ होने रस्किन के इस विचार को भी उद्धत किया है कि 'क्ला से विरहित उद्योग पाशविकता है।' समस्या के दाना पहलुओ के प्रति यह चितर सावधान है। कुमारस्वामी को यह जीवन सापेक्ष और उपयोगी 'पला अपनी प्रक्रिया के रहस्य' को भी स्पष्ट करती है वि तु वहाँ भी हर सभाव्य सरलीकरण और सपाटपन से बचकर । रचना प्रक्रिया या यि शिल्प कम का भारत मे जिस तरह उसके दो तात्विक पहलुओ मे देसा और विवेचित किया गया, 'मत्र शक्ति और 'उत्साह शक्ति' को शब्दावती मे, उरारो वुमारस्वामी या विधेयर पूरी तरह आश्वस्त हुआ । यहा पर 'शुभ नीतिमार' या भध्ययन उनके मला और पुमारस्वामी - बहुत उपयोगी सावित हुआ । मूर्तिकार को मदिर म प्रयोग की जान वाली प्रतिमाओ का निर्माण करने के लिए स्वाराध्य देवता के अनुरूप ध्यान करना चाहिए । प्रतिमा कारक इस ध्यान योग को सफलतापूर्वक साध सके, इसके लिए स्मृतियो म प्रतिमा लक्षणो का निर्देश दिया गया है। ताकि मूर्तिकार मूर्ति की चाक्षुप कल्पना म प्रवीण हो सके । प्रत्यक्ष माडल को सामने रख कर मूर्ति की रचना नहीं हो सकती घ्यान के द्वारा ही सच्ची निर्मिति सभव है । 'मूर्तिकार को चाहिए कि मन को सारी बाह्य प्रवृत्तिया से खीचकर अपने 'अतह दयाकाश मे उस बुद्धिगम्य मति की -'ज्ञानसत्व रूप की-एकाग्र धारणा करे और अपने को उसके साथ तदात्म करे। ('तदात्मान ध्यायेत्') और जब तक आवश्यक हो तब तक इस ध्यान मे रमा रह, इस सम्यक ध्यान के उपरा त ही वह उस ध्यान प्रत्यक्ष रूप को पत्थर, धातु या रगो मे साकार करने मे प्रवत्त हो। क्ला कम का यह सिद्धात निश्चय ही 'रेप्रेजे टेटिव आट' के विरुद्ध जाता है और कुमारस्वामी ने यह भी समझने की कोशिश की है कि क्यो इस्लाम मे 'रेप्रेजे टेटिव आट' की भत्सना की गई है । कारण स्पष्ट ही यह है कि वसी अनुकरणमूलक कला जीवन की सतही और प्रतीयमान चीजो को ही पक्ड सकती है जीवन की वास्ताविकता उससे छूट जाती है । ऐसी प्रतिकृतिया तयार करते हुए शिल्पकार विश्वकर्मा ईश्वर की तरह अपने भीतर से बाहर की ओर नही रच रहा है वह साथक स्पाकारो( नामानि') से प्रेरणा नहीं पा रहा है बल्कि प्रतीयमान यथाथ के कुछ पहलुआ को ही पक्ड रहा है । और चूकि वह इन पहलुआ वो जीवन से उठावर बदले में उन पर एक सादश्य भर थोप रहा है, अत वह दरअसल वस्तुनो की उनकी उस वास्तविक सत्ता से वचित कर रहा है जो कि जीवन की सारभूत आत्मा (रूह प्राण) से ही निर्मित और निर्धारित है । हिंदू बौद्ध या जन चिंतन भी अनुकरणमूलव वला को कला के रूप म उतना ही भत्सनीय मानता है। पर शुद्ध धार्मिक दाशनिक आधार पर उतना नहीं जितना की ऐसी क्ला म निहित 'थीम' की सासा रिक्ता भागवादिता के कारण । कुमारस्वामी जस आधुनिक कला चितक, जो भारतीय सिद्धात से सहमत हैं, रेप्रेजेटेटिव आट की भत्सना इसलिए करत हैं कि ऐसी कला का चरित्र मूचनात्मक, तथ्यपरक (शास्त्रीय शब्दावली म 'व्युत्पत्ति मात्र ) होता है और वह दशर को उसरे व्यक्तिगत भाव सवेदना स्मक प्रतिक्रियाआ की उत्तेजना तक ही सीमित कर देता है । हिंदू मूर्ति पायवादी रला नहीं है । व्यत्त मूति होत हुए भी वह अमूत और अव्यक्त की भावना है। भारतीय कला प्रति का अनुकरण न होकर उसका रूपा तरण है। 116 मवद निरतर इस प्रकार कुमारस्वामी ने क्ला को उपयोगितावादी दृष्टि से ('व्यापार- मात्र') भी विवेचित किया है और साथक विशिष्ट साधना की दष्टि से भी। और दोनो म अभेद प्रतिपादित किया है । चूकि मूर्ति लोकोत्तर और अव्यक्त के ध्यान से निर्मित हुई है, अत सहृदय दशक भी तादात्म्य प्रक्रिया द्वारा उस अनुभूति को पा सकता है और इस प्रकार मूर्ति का रसास्वादन सभव होता है । यह रसास्वादन वेद्या तर-स्पश शूय होते हुए भी आनद चि मय रूप, लोकोत्तर, अखण्ड और स्व प्रमाण होता है। इसीलिए इसे 'ब्रह्मास्वाद सहोदर' कहा गया है । कलाकार अपने क्म का उद्देश्य वस्तु से प्रारम्भ करता है और अभि यक्ति से पूव उसका वस्तु के साथ तादात्म्य हो जाना अनिवाय समभा गया है । इसी कारण विपरीत याय से दशक भी मूर्ति की वस्तु सत्ता मे लवलीन होकर उसकी अय भावना के जरिये ही उसके सौदय का साक्षा त्वार कर सकता है । कुमारस्वामी के अनुसार 'जिस प्रकार भारत मे 'कलाकार' की अवधारणा को विश्वकर्मा देवता के परम पुरुष रूप मै चरिताथ किया गया है, उसी पूणता के साथ दशक की अवधारणा को भी आत्मा, पुरुष- आत्मा के रूप मे चरिताथ किया गया है, जो कि अद्वत-दशन पर रहा है।' 'स्वात्मा निरुगण' नामक ग्रथ का हवाला देते हुए कुमारस्वामी इस नतीजे पर पहुचत हैं कि सच्चा पूण रसास्वादक कलाकार वही है जो आत्मा के विशाल पलक पर इस रगारग सृष्टि के सम्पूण वविध्य को आत्मरूप मे ही साक्षात्कार कर रहा है और इसमे महान् आन द की अनुभूति प्राप्त कर रहा रस प्रकार आनद कुमारस्वामी के अनुसार क्ला या शिल्पकम आदमी की हर जरूरत पूरी करता है चाहे वह ज़रूरत प्रवृत्तिगत हो चाहे निवतिगत । क्यापि बला-कम कलाकार, तया सहृदय दशप दोनो के लिए साधना वा एप माग है। आत्म साक्षात्कार का एक माध्यम । भारतीय बला साधना ये इस मम को कुमारस्वामी ने जिस तरह समभा और समझाया है, यह अपने आप म एव अत्यत मार्मिक अथ मे -पाश्चात्यो से कहीं अधिक स्वयं भारतीयो के लिये प्रासगिक है । वे विसो मौलिव रप्टि या व्याग्या का दाया पश नही परत, बल्कि अपने उद्देश्य ('काय स्वाय') की राह में इस प्रकार योध्यनिगत रुचियो और मायताआ यो बाधव समझते हैं। उनके अनुसार बलात्मर मृान या चितन या मूल्य उसम निहित मानव मूल्य (अर्थात् पुरपाय) से ही निर्धारित होता है । यता की समझ या विचषणत्व सिप अध्ययन या पला वरतुआ के मग्रह मे प्राप्त नहीं होता । समूचे व्यक्ति व मे पुरा गम्वार र द्वारा ही यह सभव है। दशप या आस्वादयत्व भी पता और युमारम्वामी 117 पत्तापार मे कोशल की तरह एक अजन है, मात्र शिक्षण नहीं । आज के जो सग्राहम और पलाप्रेमी यतातिया को साथरता समहालया और दीपा तर पर जाना भर मानत हैं उह उम व तारार यो सिगाने को नहीं, बलि उससे सीयन की जरुरत है जिमरी शिमितिमा पूजित और प्रयुक्त हैं जीवित मानवो द्वारा। आज की स्थिति पर विचार करत हुए युमारस्वामी या कहना है कि हमारी यह वतमान दरिद्रता विश्व के इतिहास में अभूतपूर्व है । इसका मतपय यह नहीं है कि हमारा पुरुषाय चुप गया है बल्कि यह है कि पुरुषत्व का कोई एक विशिष्ट पहलू ही हम सो चुके हैं । भारतीय परिस्थिति पर उनकी टिप्पणी यह है कि हमारा तथाकथित पुनर्जागरण सिफ प्राचीन शैलियो का अनुकरण है, प्राचीन अर्थों का अपने लिए पुनराविष्कार नहीं। हालत यही तर पहुंच चुकी है रि हमारी अपनी जातीय प्रतिमा स्वय हमार लिए सिप नृतत्वशास्त्रीय और ऐतिहासिक शोध में स्तमाल हो सकने वाला कच्चा माल बन कर रह गयी है। इससे अधिक विचलित करने वाली टिप्पणी और क्या होगी। पर क्या यह एक बडवी सचाई ही नहीं है। इस दुगति या कि विकृति को सागहरण स्पष्ट करत हुए कुमारस्वामी ने प्राचीन भारतीय क्ला म कमल के प्रतीक पाक्न की तुलना आज ये चित्रो मै चिनित कमल सकी है और इस चित्रण को हासशील निरूपित किया है। इसी तरह व्यक्तिया की मादश्यमूनर प्रस्तर मूतिया के प्रति बढ़ रहे-आक्षण को भी 'डिकेडे स का ही सवत उ होन मारा है। इसी तरह नक्शे में भारतमाता की मलि या चिर भी एक मामाय स्नी मक्त पर भारत के मानचिर रूपी प्रतीक का मनमाना आरोपण भर है। इस पर कुमारस्वामी की टिप्पणी है कि ऐसे आहार पर सिप राजनीतिन का ही टिकाया जा सकता है । वह जो उस माता को दुनिया के नक्शे म उसकी स्थिति से ज्यादा प्यार करता है वह तो इस आहार से सूख ही जायगा क्योकि वह उस पचेगा नहीं । उस भोडे आरोपण भ निहित 'विरुद्धत्व और अनिर्देशत्व' उसकी पाचनक्रिया को ही अवरुद्ध कर देंगे। यह ठीक है कि देखने वाले का भाव कभी कभी मृति के दोप को भी लांध जाता है मगर दशक की यह उदारता चित्रवार या मूर्तिकार के स्खलन की क्षमा नहीं है । कलाकार को सवस पहले यह जानना जरूरी है कि जानना क्या यह उसके स्वधम काही तकाजा है कि पलावस्तु कसे बनायी जाती है ? क्लारम है क्या ? क्ला क्षेत्र म व्याप्त यह हास और विघटन कुमारस्वामी के शब्दाम हमारे 118 मवद निरतर जीवन की अंधेरी दुव्यवस्था को प्रकट करता है ।' क्या इस तिमिराच्चन जडता के बीच जीवन का कोई चिह्न, पुन संघटन का कोई सकेत है। एक भी कोई ऐसी मला है जो हमारी सम्पूर्ण मनुष्यता, संपूर्ण भारतीयता को प्रस्ट कर सके 7' प्रश्न कुमारस्वामी का है और उत्तर भी उही का है कि-हाँ श्रुति और परम्परा के प्रतिमाना पर से इस प्रश्न का उत्तर देने को कहा जाये तो मैं कहूगा-'हो । चरसे से काते जाने वाले खद्दर मै मैं उस सभावना के दशन करता हूँ । प्रागतिहासिक प्राचीनता वाली यह क्ला ही सच्चे अर्थों में आज हमारे लिए एक सचमुच नमा, सचमुच का अनुभव है। यही वह एकमात्र क्ला है जो हमारे श्रुति और स्मृति परम्परागत प्रतिमाना के साक्ष्य पर सही उतरती है क्योकि यह हमारे अमुक अमुक उद्देश्या की पूर्ति करती है, हमारे देश काल मे जो मानव मूल्य निहित है. उनकी सेवा, उनकी रक्षा-सपना इससे हो सकती है। यही एक ऐसी मला है जो व्यावहारिय उपयोग यानी अनमय कोप ये स्तर पर हमारी भौतिक आवश्यक्ताओ की पूर्ति कर सकती है और इसके साथ ही साथ वह उस परम शक्ति या सत्ता की सगुण भूति भी है जिसे हम सदा उसके ऐश्वयमण्डित रूप में नही बल्कि आत्यति सरलता मे भी पूजते है । हम खद्दर के पास विसी सुरुचि के आग्रह से नहीं आए, न यह कोई बाहर से ओढी हुई दरिद्रता या सवहारापन है । देवत्व की अकिंचनता दरिद्रनारायण का - अनुसरण करना उसी आदमी के लिए सभव था जिसके माचरण मे और जीवन प्रक्रिया में बौद्ध विहारो जसी सादगी और निर्मलता आ चुको हो । आज जब हम अपने उस निणय की साथषता को अच्छी तरह समझने की स्थिति म है, हम स्पष्ट महसूस करते हैं कि इसके अलावा और कोई कम हमे शोभा नहीं देता, हमारे स्वधम के अनुकूल न होता। का कुमारस्वामी या उपरोक्त वचन आज से कोई तीस चालीस वप पूर्व का हागा। पर क्या आज भी हमारे दिलो दिमाग मे इसकी प्रतिध्वनि नहीं उठतो कुमारस्वामी ने एक दजन से ऊपर ग्रयो को रचना की, जिसमे पला और स्वदेशी नामक ग्रथ भी है। उनका भारतीय और हिदेशिपाई पला का इतिहास अपने विषय का सबसे अधिक माय और प्रतिष्ठित ग्रन्थ है जो हाइनरिख सिमर जसे विश्वविद्युत विद्वानो की पाठय पुस्तक थी। इस ग्रन्थ म कुमारस्वामी ने प्रभाव ग्रहण की ढरेवाली दृष्टि की बजाय एम नयी दृष्टि सामने रखखी है वहान सुमेरियन काल के आस पास एक प्रारभिक एशियाई क्ला की अवधारणा को बडे तक्सगत रूप मे प्रतिपादित करते हुए कहा है कि क्ला के इतिहास के इस सोपान की सारी उपलधियाँ एशिया और यूरोप क्ला और कुमारस्वामी 119 पी उभागप्ठ विगमा है और परय माप पर बाग ता पता ये गति हास में जो भी पता भारत म या अपत्र प्राटा हुए, उह भी मी सोत ग जाटार गमतर और परस्पर सम्पद री पुल गान यो शागाआ प प म ग्रहण दिया जाना चाहिए Tir दाता और प्रहीता की सरलीकृत और गदा यतीम। इस विलगण इतिहास प्रथप अलावा भी युमारम्वामी मी अनप महत्वपूर्ण दमें हैं जिनमें ट्रासपॉमॅगन आय नेचर इन माट प्रिश्चियन एड ओरिएण्टल फिलासफी माय माट, एलीमेण्टस आय युद्धिस्टिर माइफ्नोग्रपी तया ए एप्रोचट द येदाजपा उल्लपपास तौर पर जारी है। गहन पितन मथन के उपरात आन द युमारस्वामी दो महत्यपूर्ण निषों तक पहुंचे थे।एर ता यह नि योद्धघम और बौद्धरलायो भारतीय धम और भारतीय पलायी मुख्य धारा से अलग परना असभव है योद्ध प्रतीरा या एकाग्र अध्ययन हमें यह विश्वास दिलाता है पिय प्रतीप अकस्मात् भूय में स पदा नहीं हुए। इस अनुभूति स कुमारस्वामी या उन तमाम प्रतीरावा शोध नए प्टिकोण से भरने की प्रेरणा हुई जो वि भारतवप पे समूचे प्रारभिक परिव साहित्य में जोतप्रोत हैं । वे खोजना चाहत थे कि कही ऐसा तो नहीं कि जो अवधारणाएं प्रतीया सवेतो के बीज रूप म इस तमाम वदिर साहित्य में यक्त हुई हैं उही अवधारणाआ वो मूत अभिव्यक्ति पहले पहल बौद्धवला में मिली हो । कुमारस्वामी की दूसरी सोज यह थी की उ हे सत टामस मास्टर एकहाट, जेक्व योहमे जसे मध्यकालीन ईसाई धमतत्वना और रहस्यवादिया के लेखन मे बहुत सारी ऐसी बातें मिली जो ऋग्वेद के कई जशा म पायी जाने वाली बाता से मिलती जुलती थी। यह सादश्य महज सयोग कहके नहीं टाला जा सकता था क्याकि उन इसाई चितका के वाक्य उह माना ऋग्वदिक ऋषियो के सूक्ता के अक्षरश अनुवाद जसे प्रतीत होते थे। इसमे कुमारस्वामी के भीतर यह प्रतीति दृढ हुई कि रहस्यात्मक घम तत्व सारे ससार म एक समान है और मध्यकालीन ईसाई धमतत्व चिंतन की अवधारणा को प्राचीनतम भारतीय धम तत्व की सम्यक समझ के लिए औजार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है । जाम धारणा उन दिनो यही थी कि ऋग्वेद और उप निपटो के बीच कोई जटूट चितन धारा नहीं है और इन कृतिया का एक दूसरे से कोई अनिवाय सबंध नहीं है। कुमारस्वामी ने इस धारणा वा खण्डन किया । उनकी बुद्धिस्ट आइफनोग्रेफी वाली पुस्तक भी बौद्ध कला के बुनि यादी प्रतीका का स्रोत वेदो खासकर ऋग्वद मे खोजती है और यह दिखलाती है कि ये प्रतीक (अधमवट कमल धमचक्र अग्नि स्तम्भ आदि) एक 120 सबद निरतर सनातन और सावभौम भारतीय प्रतीक व्यवस्था और धार्मिक दाशनिक अवधारणाओ का पूरा प्रतिनिधित्व करते हैं । कहते हैं कुमारस्वामी ने एक बार अमरीका में प्रवासी भारतीय छायो को सम्बोधित करते हुए कहा था-'आप लोग यहां कुछ लेने ही लेने आते हैं कि कुछ देने के लिए भी अपने साथ लाते हैं ?" पता नहीं उन छाया को इस पर क्या प्रतिक्रिया हुई। वितु मान के क्षेत्र मे लेन और दो का क्या अर्थ होता है, इसका मम कुमारस्वामी अच्छी तरह समभन थे और इसलिए यह प्रश्न पूछन का अधिकार उह, सिफ उह था। कुमारस्वामी शताविप के दौरान साक्षातार में प्रकाशित जनतत्र और समालोचना 121 साहित्य और आधुनिक सवेदन - साहित्य की सबसे बडी उपयोगिता या साथक्ता इम बात म मानी गई है कि वह हमारे मवेदन का विस्तार करता है । इस पर सवाल उठता है कि हम क्या पडी है कि हम अपने मवेदन का विस्तार करें? सवेदन तो जीव मात्र की मजबूरी है सिवाय गहरी नि स्वप्न नीद की घडियो के, एक क्षण भी हमारे अस्तित्व का ऐमा नही जब हमारी इद्रियां मन और बुद्धि किसी न विसी सवेदन की गिरफ्त म नही आती । इस गिरफ्त से छूटने का एक रास्ता तो यही हो सकता है कि हम इस सवेदनशीलता को ही नकारें जो कि हमे इस चक्कर में डालती है । और इस तरह लपेट खोलत हुए उस प्राक सवेदन स्थिति को प्राप्त हो जहाँ प्रकृति नहीं है, सिफ पुरुप है. जनादि जनत और अविकाय । हिदुस्तान के अनुभव मे इस रास्ते चलने वाला की भी कोई कमी नहीं रही। नकार का रास्ता भी अपनी चरमता मे वीरोचित ही लगता रहा अग्रेजी के एक बहुत बडे जाधुनिक कवि ने जिस 'ईश्वर प्राप्ति की उतावली (Seeking God too soon) कहा है वह भी है तो आखिर पुरुषाथ ही । मगर इसके ठीक उल्टे रास्ते का तक भी उतनी ही दुनिवारता के साथ हिदुस्तान के सिर पर चढकर बोता कि स्वीकार के जरिये भी वही प्रयोजन सिद्ध हो जाता है और मनुष्य के लिए सहज माग भी यही है सवेदन सिप प्रकृति का ही नही पुस्प का भी अथ है और अनमय कोश म लगाकर जान दमय कोश तर की यात्रा उसके साथ निर्विघ्न हो सकती है। आँख न रूंधौं कान न रुधौं तनिक क्प्ट नहिं धारों खुले नन पहिचानी हसि हसि सुदर रूप निहारी (कबीर) क्सिका रूप है यह जिम खुली आख पहचानने और निहारने की ललक यहाँ अभिव्यक्त की गई है ? कुछ इस तरह माना वह सुटर स्प हो सार हो तत्व हो । दाशनिर मनीपा से हमने जिम साक्षी को अपने भीतर पहवाना या वह हम काफी नहीं लगा । हमन इस समार में अपनी अजीबो गरीब स्थिति मे एक मौनिक प्रतिशोध सा लिया। अपनी यथाथवानी दाशनिक्ता के चलत हम यह तो नहीं यह सवे वि हमसे अलग और स्वतन कोई है जो अपनी मर्जी से यह सब रच रहा है और प्रकृति के जरिए, शैतान ये जरिए हम मता रहा है । हमने अधिर से अधिर प्रकृति को आवरण ही रहा, अपने अज्ञान और विस्मृति की ही चर्चा की । मगर इम अशान और विस्मृति के प्रतिकार स्वरूप जिस ज्ञान और स्मृति की प्रक्रिया का, यानी गृजन प्रक्रिया का आह्वान हमने किया, वह सवेदन को सुलाने और बुभाने की नही, जगाने और उक्सान को प्रक्रिया थी । वह रचने की प्रक्रिया थी, जिसमे प्रकृति का अनुकरण नही, तिरम्बार भी नहीं, सहयोग चाहा गया । युछ पुछ उसी प्रकार, जिस प्रकार वि महाभारत में भीष्म सरीसे योदा पाण्डको यो अपनी वैध्यताका रहस्य खुद ही बता देते हैं, जि तुम इस तरह हमसे पार पा सक्ते हो, कुछ उस तरह पा सम्बद्ध प्रकृति के साथ साधा गया। हारने को प्रतिभा लेकर जीतने का। जविक परिस्थितिया की भिन्नता के कारण पश्चिम के मनुष्य का अनुभव जरा दूसरे किस्म का रहा और इस कारण उनकी ज्ञान सवेदन परम्परा ने भी- ~~अलग निम्म की चुनौतियो यो स्वीकारने ये फ्लस्वरुप हमसे कुछ भिन दिशा म अपना विकास किया। आमना मामना करने और पर- स्पर प्रभावित होने को नौरत काफी वाद म आई और जिमे हम आधुनिक सवेदन कहते हैं, उसका एक महत्त्वपूर्ण घटर यह भी है यह पूर्व और पश्चिम का एक दूसरे से टकराना । पिछले एक्-डेढ सौ साता के अदर पश्चिम के साहित्य में आधुनिकता के जो लक्षण प्रगट हुए और उनस हमारे मसग के फलस्वरूप हमार साहित्य में भी जी प्रवत्तियाँ भनकी उनमा विश्लेषण किया जाय तो दो यातें प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं । एक ता स्वय अपने व्यक्तित्व के साथ या वह 'ईगो' के साय सम्म य म गहरे परिवतना का घटित होना और दूसरे वाल के साथ मानव चेतना का सम्बध बदलना । देगा जाय तो इन दोना ही धाता में भारत का अनुभव पश्चिम की अपेक्षा यहुत अलग रहा है। कितना अजीय लगता है हम यह जानकर, रि अभी सौ एक साल पहले तर विक्टोरियन इनण्ड के बुद्धिजीवी मी विश्वाम म जीते थे शियात बा आरम्भ मिप छ हजार साल पहले हुआ था और यह पृथ्वी ईश्वर द्वारा ईसा से काई चार हजार साल पहल रची गई थी। पहले डाविन और फिर आइस्टानोवाल यी इस अवधारणा को जबदस्त धक्क्षा पहुँचाया । चूमि समय या बाद मप्य में लिए अपनी नश्वरता की चेतना का नापन का काम परता है, मलिए कल्पना की जा सकती है दिवाल की हमारी अवधारणा म माई भी गाया सारिय और माधुपिय गवेग 123 जीवन और मृत्यु के हमारे सवेदन ना काफी दूर तक प्रभावित कर देगा। इसी तरह फायट की पोजो ने आधुनिर साहित्य को पहले के माहित्य की तुलना मेन पिक अ तमुखता और आत्मपरकता की जोर प्रेरित किया। पर यहा हमे यह नहीं भूलना चाहिए कि पश्चिम मे स्वाधीन दाशनिक चितन और कलात्मर मृजन की प्रेरणा इतनी प्रबल रही है कि कई बार उसने बीसवी सदी के मनोविनान और भौतिकी भी उपतब्धियो को पहले ही भलका दिया है । पद्रहवीं सदी का ब्रूनो, अठारहवी सदी का लॉरे स स्टन और उनीसवी सदी के दॉस्ताएवस्की हम अपनी अ तदृष्टिया से उसी तरह चमत्कृत करते हैं जिस तरह क्रमश आश्स्टाइन, वगसा और फ्रायड। कभी कभी ऐसा लगने लगता है कि पश्चिम की आधुनिकतम वनानिव-प्राविधिक उपलब्धियां भी एक भारतीय लेखक के लिए उस तरह विस्मयकारी या स्पृहणीय नहीं होती, जितनी पि पश्चिम की यह स्वाधीन कलात्मक और तत्वयोजी तेजस्विता । मानव आत्मा के बारे मे या काल के बारे मे हमो जो अत द प्टिया अजित की थी वे आज भी हमारी पहुँच या पक्ड के भीतर है और स्वय पश्चिम के विचारका-नेसको ने उनसे प्रभावित होना स्वीकार भी किया है। पर जो चीज़ हम अपनी जरूरत के हिसार से सबसे ज्यादा आकर्षित परती रही है आधुनिक युग मे वह स्वय उनकी यह खोज-वत्ति और खोज- दष्टि ही है जो विनान और कला दोना ही क्षेत्रो मे फलीभूत हुई है। कहने का तात्पय यह कि आधुनिक युग की एक समान धरनालो और चुनौतियो के सामने आधुनिक साहित्य का सवेदन विसी हद तक समानशील होने के बावजूद अलग अलग सस्कृतियो मे अलग अलग ढग का भी हो जाता है। मनोविश्रेषण में वहा जो नाति घटित हुई उसमा प्रभाव हम पर न पडा हो, ऐसी बात नहीं। मगर हम देख सकते हैं कि वहाँ जाधुनिक क्या साहित्य ने व्यक्तित्व के विध्वस को रूपायिन किया जबकि भारतीय--मसलन हिदी के-- आधुनिक कथा-साहित्य की समस्या यक्तित्व की खोज की रही। इसी तरह अस्तित्ववादी विचारवा ने हमारे साहित्यकारा को कम उद्वेलित नहीं किया मगर किसी पश्चिमी यस्तित्ववादी उपन्यास की तुलना यदि आप अनेय के अपने अपने अजनी से यहा तब कि 'शेखर एक जीवनी' से भी करें तो भारतीय तेवर के आधुनिक मवेदन की बनावट पश्चिमी नेवर के मवेदन से बहुत भिन जान पडेगी। जटिलता दुरुहता व्यग्य विद्रूप तथा जादशवाद से ठोत्र विपरीत प्रतिनाओ को लेकर चलन वाला यथाथवाद इत्यानि तो पश्चिम की आधुनिक कविताओं की तरह यहां की आग लिखी जा रही कविताओ मे भी मिलेंगे । मगर यदि सोधे अनुकरण मे निक्ले 124 सबर निरतर साहित्य जीवी साहित्य को छोड़ दिया जाय तो साप दीख जायगा कि हमारी पविता म यही विशेपताएं काफी अलग कारणो से उपजी है और इसलिए उनकी प्रपिया और परिणमन भी भिन्न हागे। एक चलताऊ उदाहरण काफी होगा पहले अग्रेजी वि स्पेण्डर की पविता An 'I' can never begreat man This known great one has weakness To friends is most remarkable for weakness His ill-temper at meals his dislike of being contradicted His only real pleasure fishing 10 ponds His only real desire --- forgetting To advance from friends to the composite self Central 'l' is surrounded by 'I cating' 'I loving'. I angry', 'I excreting' And the 'great l' planted in him Has nothing to do with all these मैंने मनोविश्लेषण के फलस्वरूप उपजो व्यक्तित्व के विध्वस को आधुनिक समस्या का उल्लेख किया था और स्पेण्डर की इस कविता की विषय वस्तु वही है । वही मनोव नानिक दुश्चि ता 'मैं कौन हूँ '-जा धीरे धीरे एक आध्यात्मिय असुरक्षा-वोध म बदल जाती है और ईगो नाम ठोस इकाई के टुकडो-टुकडा म विसर जाने की लाइलाज दुघटना पर टिक जाती है। सवाल ह इस 'मैं' की जड कहाँ है ? क्या कोई केन्द्र ढूढा जा सकता है जिसके आस पास 'स्व की ये विसरी असम्बद्ध चिप्पियाँ पुन संगठित हो सकें। जब इसके बाद पढिए हि दी ये वनानिक कवि विपिन अग्रवाल की कविता जिसका भीपक है 'व्यक्तिरव' मैं तुम्ह पचानता हूँ पल्लू से कान है तुम्हार नाक गजव सी है अजब सी बात है तुम्हारी सोना सी आवाज है ? क्मा पट है सडव सी चाल है खिडकिया सी आँखें है साहित्य और माधुनिक सवेदन 125 और क्या क्या गिनाऊँ सभी कुछ तो किसी न किसी की नकल है, लगता है महज अपनी गठन को तुम मैं कहते हो क्या विपिन अग्रवाल की कविता मे वह मनोवज्ञानिक सक्ट बोध है ? नही है । फिर उसमे आधुनिक मवेदन कहा है ? स्पेण्डर की कविता की सान उस ग्रेट आई' के ज़िक्र पर टूटती है, जिसका 'मैं' की और तमाम जानी पहचानी आकृतियो से काई सम्बध नही। मनोवज्ञानिक सकट यहा एक मंटाफिजिक्ल आध्यात्मिक आयाम को टटोलता है और अनिश्चयग्रस्त हो रहता है । पश्चिमी अनुभव के अनुरूप ही है यह । जबकि विपिन की कविता के केन्द्र में असुरक्षा िथ नही, तक और व्यग हैं, वैज्ञानिक दृष्टि का स्वीकार है। यह वोध कि 'मैं अतत एक गठन है एक सरचना, उसके यहा किसी रूमानी विपाद को या सकट, बोध का नही उभारता, बल्कि एक तथ्य और उससे उपजने वाली सम्भावना का सकेत करता है । आधुनिकता वाध' शीपक एक लेख मे विपिन जी न लिखा भी है कि यह फिशन का युग है। क्रिस्टल की तरह बनी चीजें अपने आतरिक संगठन के कारण टूटने का विरोध आसानी से कर लेती हैं । टूटकर भी अपना आकार नहीं खोती। इस उदाहरण से क्या यह ध्वनित नहीं होता कि जहा पश्चिमी कवि का आधुनिक सवेदन एक ऋणात्मक आत्म स्थिति को सूचित करता है, वहाँ भारतीय कवि के सवेदन के लिए आधुनिकता एक धनात्मक स्थिति उभारती है एक चुनौती । सम्भावनाओ के बीच चुनाव करने की। मगर यही तो समस्या है। मनुष्य के वेदन तत्र और निस्टल के संगठन की इस नज़दीकी का अहसास क्या अपन आप म एक नतिक और सावेदनिक सक्ट नहीं है ? जसाकि अज्ञेय ने आधुनिकता बोध पर आयोजित एक परि सवाद के सिलसिले में कहा था, 'जीवन की प्रक्रिया का यह बढता हुआ ज्ञान, जीवन यन की यान्त्रिक गति का यह बढता हुआ परिचय अपने आप म एक समस्या है । जितना ही अधिक हमारा जीवन सतह पर आता जाता है, उतनी ही सतह बढती जाती है, अर्थात् उसके अनुपात म आम्यतर जीवन उतना ही छोटा होता जाता है । जीवन स्फटिक मे रचना ही रचना है गति ही गति है -तत्व कुछ है या नहीं, हम नहीं जानते।' तत्व कुछ है या नहीं यह तो विपिन अग्रवाल भी नही जानत । पर उनकी रचनामा या विचारो म इस न जानन की स्थिति का सक्ट-- उसके नतिक. सावेदनिय पहलुआ की चिता का पता नही चलता। हाँ, उनम दिनान यी सबद निरतर 126 उपलब्धियो को ग्रहण करने, साहित्य सजना के क्षेत्रा म उनका गहरा चिंतन- मनन करने की एक ऐसी सजगता ये दशन अवश्य होते हैं जो अयत्र मिलना कठिन है और जिसके अभाव में किसी भी भारतीय साहित्य की आधुनिकता के बारे म, बल्कि सच पूछे तो सवेदना के बारे म भी आश्वस्त नही हुआ जा सकता। यही पर सवाल उठता है कि हमारे सामने आधुनिक युग की चुनौतियां क्या हैं और पश्चिम की सजनशीलता से प्रभावित हमारी सवेदना ने अपने सस्कार- गत अस्तित्व और परिवेशगत यथाथ वे परिप्रेक्ष्य में उन चुनौतिया का प्रत्युत्तर किस तरह ढूढा या दिया है । यह तो एक मानी हुई वात है कि आधुनिकता सम्बधा और आारों के क्षेत्र में त्रिपाशील होती है। उसकी खोजा का क्षेत्र है स्वय भाषा और आदमी का वेदन तत्र, जिसमे बौद्धिकता अनिवायत गामिल है । वस्तु सत्ता और व्यक्ति-सत्ता के सम्बध भी, चूकि पाल और मन के बारे में हमारी अवधारणामो मे गहरा क्राति घटित हो जाने के फलस्वरूप बदल चुके थे, इसलिए 'वा' और 'अथ' सम्बध भी उससे प्रभावित हुए डांवाडाल हो गए। इस घटना को 'समेटिक डिस्टर्वेस' नाम दिया गया। भापा पर नए सिरे से विचार किया जाने लगा और स्वय रचनाकार यह अनुभव करने लगे कि भापा स्वय अपने आप म अथ का- नए जीवनदायी अथ सम्बधाका स्रोत हो सकती है। एडवड सापिर ने तो यहाँ तक कहा कि 'भापा स्वय विचारो का कैसेट है।' जसा पि विपिन अग्रवाल ने भी लिसा है 'यथाथ की नकल करने बजाय यथाथ प्रक्ट कसे होता है यह आधुनिकता खोजती है।' यह भी, पि 'आज आधुनिकता की वही मायताएं हैं जो भापा और प्रकृति की सीमाए है जसे बोलचाल के शब्द, , अमूत चित्रा में भाग लेने वाले आरभिक आकार इत्यादि। सवाल यह है कि हम जिन स्थितियो से घिरे हुए हैं, उनके चक्रव्यूह को भेदने और उससे बाहर निकालने वाली भाषा की ईजाद करने की चुनौती क्या हमारे साहित्य कारो न स्वीकार की है ? और क्या ये सिप भाषा का मसला है । या एक पूरे समाज की मानसिक और क्लात्मक मुक्ति का स्थिति हमारी यह है कि साक्षरता के अभाव मे देश के एक प्रतिशत लाग भी निर्माण काय मे हिस्सा नही ले रह हैं। जो ले रह है उनके सामने भी व नियानवे प्रतिशत नहीं हैं। उनके सोचन और अनुभव बरन की भाषा एव नहीं है । सारी चीजें एक गतिहीन सह अस्तित्व म लस्टमपस्टम चल रही हैं बल्कि घिसट रही हैं । घम और दशन के क्षेत्र म नया चिंतन तो कभी का बर हो चुका था रूढिग्रस्त सस्कार और एकेडेमिक अनुशासन की तरह हम साहित्य और आधुनिक सवेदन ? 7 127 उहसिफ बचावर रवसे रहे और जय विनान आया तो उसको भी हमन मजे मजे म अपना लिया। उसे अपनाने को पोई कीमत हमन नहीं चुकाई। हमारे सरकार और हमारी संवेदना वा बिना यही से भी बदल या तोडे पोडे यह विनाश वहाँ निर्विघ्न विराजमान हो गया। विपिन अग्रवाल की यह बात मुझे दिलचस्प लगती रही है वि एप ही चीज ऐसी थी जिसका निर्माण हम कर रहे थे और वह थी हमारी कविता और उसम भी बीस साल की तगडी हलचल के बाद न पेवत ठहराव आ गया, चरिक एर तरह की आधुनिकता- विरोधी प्रतिगामिता के लक्षण भी। यह तो सही है ही कि हमारे यहा न देवल विभिन पलाजो के सजर आलोचर, वल्कि धम, विज्ञान, दशन और साहित्य जैसे स्वभावत टन गने वाले विपया के विशेपज्ञ भी अपने अपने दडवा म अलग-थलग पड़े रहत हैं और उनके बीच कोई साथ सवाद जर यही जाता। हो सकता है कि धम और दशा के क्षेत्र में जो अतह प्टियां हमारे पुरखो न कभी कमाई थी वे उस तरह विज्ञान और तक के विरोध म न खडी हो जिस तरह कि पश्चिम की दमूलक परम्परा में हुआ। पर क्या इससे पुनमूत्यायन और आत्मालोचन की आवश्यता और भी ज्यादा दुनिवाय नहीं हो जाती ? क्या महज नान प्रतीतियो की समानातरता से क्लात्मक और नतिक सवेदन के क्षेत्र मे उपजन वाली सारी समस्याएं हल हा जाती हैं ? जब अपनी स्थिति के गम्भीर चितन के परिप्रेक्ष्य में इस तरह के सवाल हमारे मन म उठत है तो साहित्य म आधुनिक सवेदन की उपस्थिति और सक्रियता का सही मतलब हम दिखने लगता है । इस तथ्य के बावजूद कि ऊपर जिन खाइयो की बात की गई, उह भरना सिफ साहित्यिको वे बूते का नहीं है वह तो देश के समस्त बुद्धिजीवन की समस्या है । मगर माहित्यिक पर सृजनकर्मी होने के नाते एक विशेष दायित्व आता है और इसलिए आता है कि साहित्य सिफ अनेक अनुशासना के बीच एक और अनुशासन नही है । उसकी हैसियत के द्रीय है मौलिक रूप से केद्रीय । पश्चिम मे, जसा कि हमने पहले भी समेत क्यिा, यह हैसियत स्वयसिद्ध सो रही है और दूसरे अनुशासन द्वारा स्वीकृत भी । भारत मे-- कम स कम वतमान भारत मे :-- रचना वम की इस केद्रीय स्थिति की न तो समझ दिखाई पड़ती है, न स्वीति । पर भारत ने नगर पश्चिम की खोज सचमुच की है तो उस सोज का केंद्र बिदु यही है यह सजनशीलता, और यही हमारे आत्मविश्वासपूर्ण आधुपिक सदन का बुनियादी घटक है । इसे खान या अवमूरियत हात दखते रहन का यथ यही होगा कि हमने एक नवलचो गरीव विरादर बने रहने को 128 सबद निरतर मुहावरम उसर रचना-म्पन्दन वापरहना चाहते है। सह-मवदन दिखाई देता हाही सरना है मुद उसरा सम्बपनपन काल के साथ विरोघ और अमामजम्पका रहा हो। वहत ऊँचा लेखा वहन भा हा, उसकी इस प्रकार की मार्मिक्ता हमारे लिए इसीलिए बनती है कि हमारे देश के भाव बोध के इतिहाम य दुरएम क्षणा का पना हमे उसकी रचना से समता है जब सार ऊपरी अमन चन जोर का मगल के बीच हम अस्थिरता शकाग्रस्तता ओर आत्मालाचन के दौर से गुजर रह थे। या ऐगी स्थिति के चलन भी कोई बामालाचन नहीं कर रहा था मिवाय स आदमी के जो अपनी वेचनी और अमुमजसपूण यत वनवा साक्ष्य हमारे लिए रस गया। एमा लेपर, वह चाह जब भी पदा हुआ हो, हमार लिए आधुनिक है और नियति स्वीकार कर ली है । मगर मुट्ठी भर बुद्धिजीवी लोग अपन-अपने अनुशासना म सिकुडे रहें, वाकी पटेरि लोग अपनी आम तुष्टि और नव- घना यता म लिप्त रह, और जो असली समात्र है वह अपनी दिनोदिन क्षरित होती जातीवाचित सस्कार सम्पनता के साय निरपरवनारहतायह आधुनिक सवेदन सम्पन साहित्य भी आखिर विमरे नदेदन मा विम्नार करेगा? निश्चय ही माहित्य- -चूकि उनका माध्यम शब्द है-हमारे सवेदन का विस्तार करता है । वह नया संवेदन दिन म अभिव्यक्त नहीं कर मरने, हम अकुलाता और घाटता है हमारी मनुष्यता को नई परिम्पिनियों के सामने पगु करता है । हमे अपनी अग्नदियत न रस्त करता है । आधुनिर यवि या उप यासकार हमारी चेतना के सीमानो पर घटित होने वाली इस उपन- पुथल को अपने सवेदन से स्वायत्त करता है उने हमारी मामयं की पहुंच मे ला देता है । नापा की अभिव्यक्ति-मामयं की एक नवी ममावना को उद्घाटित करते हुए। यह दीलिए होता है कि भावुनिर रचनाकार किसी भी अय क्षेत्र के बुद्धिजीवी की अपेक्षा आपन देश-काल के प्रति अधिक मवे- दनशील होता है अपन समय के माय उसका रिता वत तीखा होता है और ज्यादा प्रत्यक्ष भी। इमलिए कि उसी ममक्ति अम्ति वसिद्ध और मश्लिप्ट होती है भाव ऊर्जा, बुद्धि ऊर्जा और स्नायविक ऊर्जा तीनों की घनिष्ठ एकाग्रता के कारण। आधुनिक संवेदन मिफ़ आज निव रह होन का पन नहीं हाता । अपने समय को पूरा कता के साथ जीन नाप्रमाग जो भी रचनाकार देता है, वह हम आधुनिक लगता है फिर चाह वह किसी भी युग का क्या न हा । उमकी रचना म हम अपनी आत्म स्थितियां वियित दीवती हैं, अपनी प्रश्नाकुरता का हम उसका पुनराविप्यार जमा यरत हैं। -आज की भापा और आज साहिय और माधुनिर मवेदन यह दिलचस्प है रि जिस हम आधुनिक भाव बोध रहत हैं, उसका एक प्रमुख घटक यह अतीत की चेतना भी है। न केवल अतीत के अतीतपन की, बल्कि उसी वतमानता की भी। यह कहना कि हम म इतिहास पोध की बडी कमी रही है, सच हाते हुए भी एक पिटी पिटाई बात है । इमसी गहराई मे गए बगर उस नकारना या पूरी तरह पश्चिमी तर से उस मान लेना दोना ही वस्तु स्थिति का सरलीकरण करना होगा । सत्य की साज के लिए तथ्या का रोमानीकरण जिस तरह लिपिद्ध , उसी तरह नए तथ्य खोजने के लिए स्वय सत्य का रामानीररण भी गलत है । साहित्य वा हो निक्ट उदाहरण लें ता अभी तप छापावाद से अपन सम्बध का लकर जिस तरह के 'सेल्प राइचस' वक्तव्य नए आलाचय और युवा व विया के यहां दिखाई दत हैं ये क्या हमारे इतिहास मेघ या तथ्या वेपी दृष्टि का प्रमाण देत है ? यह तो जगजाहिर बात है कि छायावादी कविता से हिंदी के आधुनिक पविया न विद्रोह किया और उस विद्रोह म म ही नई कविता निक्ली। मगर नई कविता के दौरा और स्वय छायावाद का पुनमूल्याकन करने के सिलसिले में यह देखा गया कि नई कविता म कापी कुछ ऐसा है जिसकी सगति न येवल छायावाद की काव्य सस्कृति से, बल्कि उसम उपस्थित ऐतिहासिक चेतना से भी माफ झलक आती है और यह रिश्ता अथगम है । निश्चय ही वह सचेत विद्रोह साथक न हुआ होता तो यह सगति भी निरथक हाती । अंग्रेजी म आधुनिक कविता की शुरूजात जि होन की उहाने भी इसी तरह पूरी उनीसवी सदी के आखिर तक चली आई गेमण्टिव पायधारा का विस्थापित करके, उसमे विद्रोह करके ही अपनी राह निकाली थी। मगर जैसाकि आधुनिक शोधकर्ताओ ने साबित कर दिखाया है, वह रोमण्टिक विचार धारा येटस, एलियट और ऑडन तक आते आते एक्दम उड नहीं जाती, बल्कि अत सलिल होकर एक नया विकास पा लेती है । निश्चय ही एलियट और येटस उस अथ में रोमानी नही हागे जिस अथ म वडम्वथ या शले रोमानी हैं । मगर आज का साहित्य चितक साफ देख और पहचान सकता है कि सन् 1800 के आसपास जो उथल पुथल हुई थी और सन् 1914 के आसपास जो नई उथल पुथल हुई, उन दोना के बीच एक सम्बध है, जो सिफ दूरारुढ नही है गहा और तात्त्विर है । इतना ही नहीं, आज का यूरोपीय चिंतक यह भी पहचान सक्न म सक्षम है कि बीसवी सदी की सभ्यता के बहुत सारे सवटो ने सभी जड पकड़ लो थी, जब मध्ययुगीन मानसिकता का पछाड खिलाकर यूरोप ने तथाकथित पुनजागरण के युग में प्रवेश किया था। क्लासिकी साहित्य मे महान् पर, आदश पर बल होता है क्योकि जिस युग म 130 सबद निरतर वह रचा जाता है, उस युग मे आदमी को अपनी बनाई हुई व्यवस्था पर तथा उसके टिकाऊपन पर विश्वास होता है। धम भावना और भौतिक प्रगति के बीच भी द्वन्द्व नहीं उपजता । रोमानी साहित्य मे साधारण जन की प्रतिष्ठा होती है, प्रकृति और मनुष्य के रिश्ते को नए सिरे से परिभापित करने की जरूरत महसूस होती है और विज्ञान का मनुष्य की मुक्ति-चेष्टा के बहुत बडे साधन के रूप मे स्वागत किया जाता है क्योकि स्वय रीजन' पर अत्यधिक विश्वास होता है। आधुनिक युग तक आते आते मानवीय बुद्धि के इस विस्फोट का एक चत्र पूरा हो जाता है, सृष्टि और मानव स्वभाव के रहस्य उघड जाते हैं, नतिक चेतना और धमभावना के सभी आलम्बन मिसक जाते हैं, और स्नायविक रूप से अस्वस्थ (एवनामल) व्यक्ति साहित्यिक सहानु- भूति के केद्र मे आने लगता है। बुद्धि जब अपनी विजिगीपा के चरम पर सब कुछ सतह पर ले आती है तो क्लासिकी ऊंचाई और रामानी आत्म- विस्तार दोना से वचित होकर आधुनिक कला इस सपाटपन से विद्रोह करती है और एक चौथे आयाम मे अपनी परिपूर्ति ढूढती है । जिस युग मे सबसे तेजतरार लोग विज्ञान, यानिकी या बिज़नेस मैनेजमेट मे जा रह हो, उस युग मे कविता सिफ पीछे छूटे लोगो का सरोकार भर नहीं रह सकती। अपन युग के वौद्धिक जीवन से सम्बध टूट जाने पर कविता अपनी सास ही खो देती है । प्राचीनकाल से ही कवि का बहुश्रुत होना जरूरी समझा गया है। हमारे यहां तो काव्य की गणना कलाओ में न होकर विद्याआ मे हुई और क्ला को उपविद्या माना गया । ईसाई परम्परा का कवि टी एस एलियट विनान की चुनौती का सामना स्वय धमशास्त्र और दशन को ज्यादा बडी बौद्धिक्ता का क्षेत्र मानकर कवि-कम और चितन दोना घरातलो पर कर सकता था और वनानिक मेधा को काव्य मेधा की तुलना म निकृष्ट ठहरा सक्ता या । कवि कम को अत्यत गभीरतापूर्वक निवाते हुए भी वह मनुष्य के धार्मिक सबदन को उस काव्य सवेदन की अपेक्षा बहुत अधिक महत्वपूर्ण मानता या-इतना महत्वपूण, वि एक जगह यह कविता को मनोरजन को एक श्रेष्ठतर विद्या भर' यह देता है । होन को हर सस्कृति म मानव मूल्यो का एक उच्चावच प्रम वार-बार आविष्कृत किया जाता रहा है नए-नए सन्दभो म उस सस्कृति के सबसे सर्वदनगील और सजग सजवा चितका द्वारा । आधुनिक युग भी अपनी सारी दुनिवाय मूल्यगत अराजक्ता ने बावजूद अपन सजक प्रतिभाओ कास आस्तित्विा न दायित्व स मुक्त नहीं कर देता । पर जसी हमारी स्थिति है, यस म एलियट जसा सेवर माई भारतीय पति अपनाए तो हमारी वनानिकता और हमारी पामिरता रे स्तर को दपते हुए अजूबा ही सगगा। साहिर और आधुनिर मवदा हमारे शास्त्रीय मगीत का एक प्रचलित शक है 'उपज' । मगीतकार एवं राग की दी हुई कठोर सीमाओवे Tठोर अनुशासन के भीतर किस प्रकार हर बार नए गुल खिलाता है, ए नए पग्म्युटेशन काम्बिनेश स पना करता है, उसका हम पर क्या असर होता है ? सगीत सिप मनोरजन की क्ला नहीं है वह भी उतना ही बौद्धिक है जितना गणित । और उसस मिलने वाल मानद की अप्रत्याशित समृद्धि हमारी भावनामा से ज्यादा सभावनाओ के गणित से तालुव रखती है, यह अगर हम मान लें तो कह सकते हैं कि आधुनिक साहित्य म सजनात्मक कल्पना की भूमिका और कायपद्धति लगभग वही है जो शास्त्रीय संगीत म उपज' की। जानकारिया के घटाटोप के बीच इतना तो स्पष्ट ही हा चुका है कि चीजा वे सम्म ध गहरे और जटिल होत हैं और सरचना का महत्व है, दावा या पूर्वानुमाना का नहीं । साहित्य म भी प्रक्रिया मा महत्व है और अपूवानुमेयता म ही जाधुनिक क्ला का वास है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि साहित्य की कला हमारे भाव सवेदनात्मक म तर्जीवन से सवथा स्वत न हो जा सकती है और भाव ऊर्जा महत्व नहीं रखती। वज्ञानिक बुद्धि के महत्व को रेखाक्ति करते हुए हम यह भी देखते रहना होगा कि कही हम साहित्य को विज्ञान का गरीव रिश्तेदार तो नहीं बना रहे हैं उसे किसी विचार दशन के अधीन तो नहीं किए दे रहे हैं । यह सतक्ता साहित्य के अस्तित्व की ही बुनियादी शत है। कुमारस्वामी ने कही लिखा है कि 'सच्ची क्ला जगत् की अप्राप्य पूणता से स्पद्धा करने नहीं जाती। अपन स्वय के तक और प्रतिमाना पर ही निभर रहती है। अगर यह सही है तो साहित्य की कला के भी स्वय जपो तक और प्रतिमान होने ही चाहिए, जो सद्घातिक भौतिक विनान या अमूत चित्रकला के पडौसी होते हुए भी अपनी निजी सता बनाए रख सकें। एक के तक को दूसर पर इसलिए भी नही घटाया जा सकता कि आखिर इस युग की सवेदना की सारी बौद्धिक प्रवृत्ति के बावजूद काव्य की और साहित्य मात्र की चालक शक्ति तो मनुष्य की भाव ऊजा ही है । बुद्धि ऊजा भी साहित्य मे आखिर भाव ऊर्जा के घरा के बल पर ही तो साथक सरचनाओ की खोज कर पाती है। नयी कविता के दौर के शिथिल पड जाने के बाद उपजी युवा कविता का विश्लेषण करते हुए विपिन अग्रवाल इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि इसमें माधुनिकता के लक्षण अनुपस्थित हैं, क्योकि इसमे चुनाव के लिए नयी राह खोलने की क्षमता नहीं हैं। उनके अनुसार यह 'युवा कवि अपन ससार की सचाई और अनुभवमयता को पाठन के सामन आदश के रूप म रसना पाना है और उसे इस आदत को स्वीकारने के लिए उकसाता है । चुनाचे 132 सबद निरतर
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हमारे शास्त्रीय सगीत का एक प्रचलित शटर है 'उपज' । सगीतकार एक राग की दी हुई कठोर सीमाओ के कठोर अनुशासन के भीतर विस प्रकार हर बार नए गुल खिलाता है, नए नए परम्युटेशन काम्बिनेश स पना करता है, उसका हम पर क्या असर होता है ? संगीत सिफ मनोरजन की क्ला नहीं है वह भी उतना ही बौद्धिक है जितना गणित । और उससे मिलने वाले आनद की अप्रत्याशित समृद्धि हमारी भावनाओ से ज्यादा सभावनाआ के गणित स ताल्लुक रखती है, यह अगर हम मान लें तो कह सकते हैं कि आधुनिक साहित्य म सजनात्मक कल्पना की भूमिका और कायपद्धति लगभग वही है जो शास्त्रीय संगीत म उपज' की । जानकारियो के घटाटोप के बीच इतना तो स्पष्ट ही हो चुका है कि चीज़ा के सम्ब ध गहरे और जटिल होते हैं और सरचना का महत्व है, दावो या पूर्वानुमाना का नही । साहित्य म भी प्रक्रिया का महत्व है, और अपूर्वानुमेयता म ही जाघुनिक कला का वास है। पर इसका मतलब यह नहीं है कि साहित्य की कला हमारे भाव सवेदनात्मक भतर्जीवन से सवथा स्वत व हो जा सकती है और भाव ऊर्जा महत्व नही रखती। वज्ञानिक बुद्धि के महत्व को रेखाक्ति करत हुए हमे यह भी देखते रहना होगा कि कही हम साहित्य को विज्ञान का गरीब रिश्तदार तो नहीं बना रहे है उसे क्सिी विचार दशन के अधीन तो नहीं किए दे रहे है । यह सतकता साहित्य के अस्तित्व की ही बुनियादी शत है। कुमारस्वामी ने कही लिखा है कि सच्ची कला जगत् की अप्राप्य पूर्णता से स्पर्धा करने नहीं जाती। अपने स्वय के तक और प्रतिमाना पर ही निमर रहती है। अगर यह सही है तो साहित्य की क्ला के भी स्वयं अपने तक और प्रतिमान होने ही चाहिए, जो सद्धातिक भौतिक विज्ञान या अमूत चित्रकला के पडोसी होते हुए भी अपनी निजी सत्ता बनाए रख सकें। एय के तक को दूसरे पर इसलिए भी नही घटाया जा सकता कि आखिर इस युग की सवेदना की सारी बौद्धिक प्रवत्ति के बावजूद काय की और साहित्य मात्र की चानक शक्ति तो मनुष्य की भाव ऊजा ही है । बुद्धि ऊजा भी साहित्य म आखिर भाव ऊर्जा के धक्का के बल पर ही ता साथ सरचनाआ की सोज कर पाती है। नयी कविता के दौर में शिथिल पड जान के बाद उपजी युवा कविता का विश्लेपण वरत हुए विपिन अग्रवाल इस नतीजे पर पहुँचत हैं कि इसम आधुनिकता के लक्षण अनुपस्थित हैं क्यानि इसम चुनाव के लिए नयी राह पालन की क्षमता नहीं हैं । उनके अनुसार यह 'युवा कवि अपो ससार यी सचाई और अनुभवमयता को पाठय के सामन आदश के रूप म रसना पाहना है और उसे इस आदाना स्वीकारने लिए उकसाता है। चुनाच 132 सबद निरतर
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. शक्तिशाली और राग प्रेरित वाक्य वि यास को रचने की है जिसमे वाक्य और पद अविच्छिन रूप से एक हो जाएँ । चूकि मुझे अपनी रागात्मक विषय वस्तु के लिए ही इस राग नियनित वाक्यवि यास की खोज है, इसलिए मैं उन परम्परागत छ दो म ही अपनी काव्यात्मक अभिव्यक्ति ढूढता पाता हूँ, जिसका विकास मेरी भाषा के विकास के साथ साथ हुआ है । एक बात, मगर मैं अच्छी तरह समझ चुका हूँ और वह यह कि जो केवल व्यक्तिगत और व्यक्तिबद्ध है उसे सडते देर नहीं लगती। उसे सडने से बचाने के लिए उसे बफ या नमक 'भरकर सुरक्षित करना होगा। मैं अपनी भाव-ऊर्जा गडेरियो, और विद्वानो को सौप देता हूँ। आखिर मैं कौन हूँ? एक भीड हूँ, मैं एक अकेला आदमी हू मैं क्या है ? मैं कुछ नही हूँ । इसीलिए मैं कहता हूँ कि यह जो प्राचीनतम लवण है, यही मानव भावनाओ को टिकाऊ बना सकता है। क्यो न हम अपनी कल्पना शक्ति को नृत्यशील रक्खें-पुरानी जानी पह चानी लयगतिया को अपने व्यक्तिगत भाव सवेगो वे उस प्राचीन लवण तक पहुँचन दें। यह प्राचीन लवण (ऐण्शण्ट साल्ट) क्या है ? अपने समकालीनो की युवतर पीढी की चर्चा करते हुए येटस ने इसका भी स्पष्ट सकेत क्यिा है ये कवि चूकि जिस वस्तु को प्रेषित करना चाहते हैं, वह उपनिपदा मे वणित यह अतिप्राचीन सनातन आत्मा न होकर उनकी अपनी व्यक्तिगत बुद्धि है इसलिए उहे पूरा अधिकार है कि वे भूमिगत रेल म बठे उकताए हुए आदमी की वस्तुगत सत्ता का अतिरिक्त महत्व देकर उछाले । वे महामत्स्य को मिटा देना चाहते है लियोनार्दो दा विंची को भी बुद्धिबल मे पछाड देना चाहते हैं । उनकी कविता लारचित्त म बसे हुए बिम्पो और विश्वासा का भी पूरी तरह सफाया कर देना चाहती है और फिर भी कविता बन रहना चाहती है। जहां तक मेरा सवाल है मैं तो अपने देश के लोकचित्त से ही जुडा हुआ हूँ और एक 'काउण्टर रनेसा' की आहट सुन रहा हूँ।' या शिविर लगनऊ 1981 में प्रस्तुन पाय 134 मर निरर भविष्य और साहित्य भविष्य फल निपिद्ध फन भले न हो सदिग्ध ता है हो । स्वस्थ मनुष्य की तरह स्वस्थ माहिय को भी देखा जाय तो भविष्य की चिता नही व्यापनी पाहिए। क्या हम नहीं देखते पि अच्छे साहित्य और महान् महित्य की भी विषय-वस्तु अतीत और वनमान से ही ली जाती रही और भविष्य जब भी रचनात्मक साहित्य का प्रेरक या प्रतिपाद्य बनता है, प्राय दूसरे दरजे की रचना वो ही जम देता है कोई यहाँ पर यह भी आपत्ति उठा सकता है कि वतमान युग मे तो तथावधित स्वस्थ आदमी और स्वस्थ साहित्य की बात ही करना बेकार है यहां तो अस्वस्थ पर आँस गडावर ही स्वस्थ के बारे मे सामा योमरण किए जात हैं । मगर यदि आधुनिक साहिय अस्वस्थ माहित्य है तो उसका उत्कृष्टतम भी भविष्य की बजाय अतीत पर ही अब भी अपनी आँख क्या गडाता है ? यल्कि, आधुनिक साहित्य तो पिछले युगा के साहित्य की तुलना मे पयादा ही अतीतग्रस्त जान पडेगा । आधुनिक साहित्य के रक्षण ग्रन्थ हम क्मेि मानेगे-पूस्त के रिमम्स आव यिज़ पास्ट या ब्रूनो शुल्ज के सेनेटोरियम अण्डर द साइन आव द आवरग्लास को या जांज आरवेल के नाइण्टोन एटो फोर को? मगर क्या यह अतीतग्रस्तता स्वय एक भविष्यग्रस्त वल्पना की ही प्रतिक्रिया नहीं हो सकती? वह प्रतिक्रिया है या उपचार? क्या आधुनिक साहित्य ही परम्परा के बारे में सबसे अधिव स्व चेतन नहीं है ? क्या परम्परा भी जाधुनिकता का ही एक आविष्कार नहीं है? आखिर क्या कारण है कि इम मदी का साहित्य इम पदर अतीतो मुख है ? ग्रूनो शुल्ज ये दोनो उप यास बचपन के अनुभवो पर मिथ और फण्टेसी के घरातल पर एकाग्र हैं । बशेविस सिंगर के कथा साहित्य वा तो स्थायीभाव ही अतीत और प्रेत-विद्या है । प्रसिद्ध चेव उप यासकार मिलान कुदेरा का दि जोक चेकोस्लोवाकिया की जातीय स्मृति के प्रतीत स्वरूप एक लोरगीत की शवयात्रा है । बोर्खेज तो इनसे भी एक कदम जागे है वे अतीत स ही नहीं अतीत के साहित्य से भी-सर्वातीज आदि से. एक अभूतपूर्व एकाग्रता और विह्वनता -- 135 स चिपटते है । लगता है आधुनिर पाम अतीत ने एक अतिरिक्त रचनात्मक मूल्य पा लिया है । ऐसा क्या? क्या भारत म भी एना है ? भारत मे, हम देते हैं, प्रनिया कुछ उमस उलटी चलती नान पडती है । जयशकर प्रसार या फ्याल पढिए । जन तमूर्ति का सस्कार पढिए, क्या लगता है ? दाना उप यास अतीत स पिण्ड छुडाना चाहन हैं। दोना उसकी भाड फूक पर देना चाहते है मानो वह सचमुच प्रेत बाधा हो। प्रेगच द का गोदान पटिए अगर उसे टजेडी की तरह देखा जाए या सिफ विपाद की तरह देखा जाए ता उस टजेडी, उस विपाद का आलम्पन क्या अतीत ही नहीं है-अतीत, जो वहा गाय की तानसा' के रूप में मूत हुआ है ? ककाल मे अतीत और परम्परा के प्रतिनिधि ही जीवन मूत्या के शनु वी तरह प्रक्ट हुए है फकार जो है वह मानो स्वय जीवन का ही ककाल है, समाज से वहिप्कृत । फिर भी लगता है, जीवनदायी मूल्य अगर कही है तो इस अराज- क्तावादी व्यक्ति विजय में ही है या फिर अनाथ घण्टी में जो 'बास जीड' है । दोना एक तरह से इस अतीतजीवी, परम्पराग्रस्त और पतित समाज के आउटसाइडर हैं । पर भविष्य की आशा भी उही मे है । दूसरी ओर हाल ही मे लिखे गए कनड उप यास सस्कार के नारणप्पा की स्थिति भी वमोबश वसी ही है और वहा परम्परा का प्रतिनिधि प्राणेशाचाय एक प्रत्यास न समस्या का हल शास्ना म नही पाता, देवता मे नही पाता। उसे हल तो नहीं अपने सकट से एक छुटकारासा मिलता है उसी भ्रष्ट और विद्रोही नारणप्पा की शूद्र रखल म र जोर वही अब प्तेग से उजडे गाव में उसकी साथिन यानी उसका भविष्य है । क्तिना भिन है यह 'वेस्टलण्ड' पश्चिम के आधुनिक कवि के बेस्टलण्ड' से | वहाँ जीवन की आधुनिक गति ने परम्परागत जास्था को उजाडा है तो यहा परम्परा पर ही जीवन को उजाडन का आरोप लग गया है। तो क्या पश्चिम का साहित्य अपने भविष्य से अस्त होकर अतीतमुपी हुआ जा रहा है और भारत का साहित्य अतीत की जक्ड से त्रस्त हाकर भविष्य मुखी? सवाल जगला पिर यह उठेगा रि यह भविष्य क्या है कसा है जिसकी ओर भारत हमारे जीवन और साहित्य के साक्ष्य के मुताबिक उमुख है जाजपल इक्कीसवी सदी का नारा सूब जोरा से उछला हुआ है और उन्नत प्रौद्योगियी तथा कम्प्यूटरी विवासवाद या भी। जिस तरह नहरू युग को हमारे एक आलोचक ने विनगा युग कहा है उसी तरह शायद यह युग याग चलकर टेक्नालाजी या कम्प्यूटर युग कहलाए-एसा प्रतीत होता है । राजाराव के उपयास कठपुरा का नायब ही क्या सारा वातावरण ही गांधी 136 गवर निरतर काई पहचान से मोतप्रोत है, पर उप यास वे अत में यह गवत उभरता लगता है कि देश का भविष्य नेहरू के हाथ म है, गांधी के हाथ म नही । उन्नीसवी सदी ये पूर्वाद्ध के हीरो राममोहन राय है ता उत्तराद्ध मे वरिम चटर्जी का राष्ट्रवादी चिंतन विजयी हाता दीप पडता है । वीसवी सती म हम पहले श्री अरविंद की आवाज सुनाई देती है और पिर गांधीजी की। उसस अगले दौर म दृश्य पहल गांधी और टगोर की दृष्टिया के बीच उभरे द्वदया ह और बाद में गांधी आर नहरू के बीच का । यहाँ तक कि भारत के भविष्य की श्री अरविद वी करपना क्या थी और भारत के भविष्य की गांधी कृत कल्पना क्या थी- शायद य दोनो ही अब उस भविष्य की कल्पना मे बहिप्प्त हैं जो टस ममय के हमार राष्ट्र निर्माताआ के मन में है। इतना ही होता तो भी एप बात थी साहित्य यति समाज का दपण होने का दावा वास्तव म कर सक्ता है तो समसामयिक भारतीय साहित्य हमार भविष्य का जो चित्र उमार रहा है वह क्या उस भविष्य मे अलग अपर रापित करता है जिसम पश्चिम का साहित्यकार और चिंतक प्रस्त है ? यह अकारण नहीं है कि आधुनिक साहित्य की तरह पश्चिमी दाशनिकता का भी सवमें दाशनिक और सृजनात्मर अश काल और मानव अस्तित्व के सम्ब घ की इस अनिवाय टेक्नोलाजिकल परिणति का स्रोत यूनानी चिंतन वी । शुरूआत म ही घटित एक दुर्भाग्यपूर्ण विचलन म पाता है। उसके मुताविक इस मूल पाप के फलस्वरुप ही पश्चिमी सभ्यता के इतिहास म कलकुलेटिव थिकिंग' मडिटेटिव थिंकिंग पर निरतर हावी होता चला गया। दाशनिय चिंता ने एक दूसर छोर पर हम विटगेस्टाइन सरीसा उदाहरण देखत हैं जो अपने जीवन काय से अलग एक टाल्सटॉय सरीख नतिक अतद्वद्व से आखिर तक ग्रस्त रहा। प्रथम महायुद्ध के तुरत बाद प्रकाशित अपन एक प्रसिद्ध पत्र म पाल वालरी न पूछा था- यह यूराप क्या कभी वह बनगा जो वह वास्तव म है - एशिया महाद्वीप का एक पिद्दी सा अ तरीप ? या कि वह वही बना रहेगा जो वह वास्तव म है नहीं, सिफ लगता है समूची पृथ्वी का एक अमूल्य अग, उसकी मुकुटमणि, इस वसु धरा की विराट देह का मस्तिष्क ।' दाशनिक हाइडेगर वालरी को इन पक्तिया को उद्धत करते हुए उस पर यह टिपप्णी करता है कि 'शायद अब एक अथ मे वालेरी का कहा सच हो गया है यूरोप एक पिद्दी अतरीप ही हाकर रह गया है। मगर इसके बावजूद वह अभी भी धरती का मस्तिष्क होन की अपनी हैसियत बाकायदा कायम रक्खे हुए है। यह वह मस्तिष्क है जो हमारी टेक्नोलाजिकल- इण्डस्ट्रियल, प्लनटरी इण्टरस्टलर सगणनाआ को निभाता है। हाइडेगर भविष्य और साहित्य 137 सोचता है रि चूमि समूचा ममार इस वक्त इसी टक्नोलॉजिर न सभ्यता की गिरफ्त म है, इसलिए इम बुराई का इलाज भी उसी के मात म निहित होना चाहिए यानी उसी यूनानी स्रोत की उन मभावनाओ म, जो अनछुई ही रह गई थी। क्या यह सम्भव है ? क्या एसे क्मिी भी उपक्रम पर पश्चिमी मुहावरे के ही 'ऑस्योरी टपम' का आराप नही लगेगा? हाइडगर निपचय ही दूसरी विश्व सभ्यताओ के आरम्भिक स्रोतो से जुडने सहयोग लेने की बात भी करता है, पर यहा पर सवाल उठता है कि क्या इन दूसरी विश्व सभ्यताआ मे 'मडिटेटिव और कलकुलदिव थिकिंग का उसी तरह का सम्बन्ध निहित रहा है, जिसकी शिकायत वह यूरोपीय संस्कृति के इतिहास से करता है ? अगर नही, ता यह पहल यूरोप की बजाय उन दूसरी विश्व सभ्यताओ की तरफ से क्या नहीं हो सकती या क्यो नही होनी चाहिए? अगर हम अपनी सभ्यता और संस्कृति के हिसाब से देखें तो यह निहायत जरूरी होगा कि हम सिफ एक दीघकालीन प्राचीन इतिहास को ही न देखें बल्कि पिछली सदी और खासकर इस सदी के भारतीय जीवन और चितन पर भी एकाग्र हो । निश्चय ही हमारा आज का सकट और आज की भविष्य चिंता का रूप भी हमारे निकट इतिहास का ही ज्यादा सीधा प्रतिफलन है और देश के भविष्य के बारे में लिए गए निणय भी इसी इतिहास की उपज है इसलिए भी हम इस सनी सबसे दूरदष्टा मनीषिया और क्मयोगियो पर अपना ध्यान द्रित करना पड़ेगा जो पश्चिमी जीवन और विचारो के प्रति पूरी तरह से खुले रहकर भी क्सिी सुरक्षा- िथ या मोह से परिचालित नहीं हुए और जिहोने ऐसा मौलिक चिंतन या क्म क्यिा जो उनकी अपनी सस्कृति और परम्परा से जुडा हात हुए भी समूचे विश्व के लिए अथवान् हो । ठेठ आज की बात करें तो ऐमा लगगा जस केलकुलेटिव थिंकिंग ही मैडिटेटिव थिंकिंग पर हावी हो रहा है । शिक्षा नीति के प्रस्तावित मसविदे को देखने पर भी मन पर वही छाप पडती है । क्या यह छाप सही है ? अगर हा, तो सस्कृति के क्षेत्रो म क्या स्थिति है ? क्या हमारी कविता और हमारे दारानिक चिंतन ने भी क्लकुलटिव थिंकिंग' की ही लीक पकड ली है ? यदि हा, ता उसका उन चितको और कमयोगिया में क्या और किस तरह का सम्बध है जिनका उल्लेग हमन अभी अभी क्यिा और जिहे हम राष्ट्र निर्माता और प्रातर्शी और जान क्या-क्या कहते रहे है ? और यदि नही, तो क्या कारण है कि हमार साहित्य और चितन का यह मैडेटेटिव रुयान या स्वरूप देश का भविष्य निर्धारित करने वाले उम 'क्लकुलटिव थिंकिंग' पर कोई प्रभाव नहीं डालता? क्या वह 138 सबद निरतर 7 शक्तिहीन है ? क्या वह दुविधाग्रस्त है ? क्या वह भविष्य निरपेक्ष है ? क्या उसका 'मैडिटेटिव थिमिंग' भी मौलिए न होकर एक छायाजीवी मस्तिष्क मी ही उपज है जसा कि मैंने आरम्भ म ही वहा भविष्य क्थन निपिद्ध तो नही, पर एक काफी मदिग्ध चीज है। फिर साहित्यिका से उसकी अपेक्षा क्या की जाती है? क्या इसलिए frवि को द्रप्टा, कातदर्शी और जाने क्या क्या कहा गया है ? क्या द्रष्टा कवि होना और प्राफेट या पगम्बर होना एक ही बात है ? दरअसल, मुझे लगता है साहित्यिका से यह अपक्षा कोई न करता यदि वे स्वय हो आ बैल मुझे मार वाली कहावत को चरितार्थ करने पर न तुले हाते । समय समय पर वे ही तो मनुष्य के भविष्य को लेकर या अपनी विधा के ही भविष्य को लेकर अटकलें भिडाते देखे जाते है । अब देखिए, यह श्री अरविन्द का ही कथन है कि 'मन और जीवन के किसी भी क्षेत्र में उनके भविष्यत् मोड या विकास को देखन का प्रयास करना सदव एक सतरनार व्यापार है, इसलिए नि जीवन और मन के देवता अकल्पनीय रूप से स्वतत्र और आत्म रचनात्मक होते हैं। पर मजे की बात यह है कि यह बात उहोन और कही नहीं, अपने द फ्यूचर पोएट्रो नामक ग्रंथ मे ही कही है जहा वे स्वय ही इस खतरनाक व्यापार म जुटे हैं । यह प्रवृति आधुनिक काल के लेखको मे विशेष लक्ष्य की जा सकती है पुराने कविया के लिए अपने अग्रजा को स्मरण 'द क्वेभ्यो पूर्वेभ्यो' कह देना पर्याप्त था, मध्यकालीन सत कवि को यह भी जरूरी जान पड़ा कि वह आगे आने वाला का भी स्तवन करे 'भए जे जहहिं, जे होइहहिं आगे प्रनवऊँ सबहिं कपट सव त्यागे'। मगर आधुनिक कवि का काम लगता है, इस स्वस्तिवाचन से भी नहीं चलता उसे समातिकालीन युग प्रवृत्तियो का विश्लेपण करना पडता है, युवतर कवियो मे भविष्य की आहट सुनते रहना पडता है, यह भी पूछना पड़ता है कि 'पाटनर, तुम्हारी पॉलिटिक्स क्या है ?" मुमीबत मगर यह है कि साहित्यिको की भविष्यवाणियां अक्मर गलत भी मावित हो जाया करती है । जेम्स ज्वाइस की यूलिसीज के प्रकाशन के माथ ही उपयास की मृत्यु की घोषणा कर दी गई मगर उपयास दि तबसे लगातार फल फूल रहा है और मेरा तो यही ग्याल है कि कविता से बहतर ही फल फूल रहा है । एक दूसरा उदाहरण भी देय लेना दिलचस्प होगा । आनाल्ड ने कविता के बारे म भविष्यवाणी की थी कि वह आने वाले युगो में धम की जगह ले तेगी । मगर वसा कुछ हुआ नहीं । इससे उलटे ही आसार नजर आ रहे है क्या यूरोप मे, और क्या भारत म ! यह उदाहरण दिलचस्प कर लेना भविष्य और साहित्य 139 होन के साथ साथ शिक्षाप्रद भी है इसलिए, कि आनाल्ड अपन समकालीना म सबसे ज्यादा आधुनिक और अग्रगामी था। फिर भी अगर वह प्रॉपेट के रूप में विफल हुआ तो इसस यही साबित होता है कि समसामयिक या अग्रगामी होना भी भविष्यदर्शी हाने के लिए पयाप्त नहीं है । श्री अरविंद भी एक अता प्टि सम्पन्न आलाचर की तरह आनाल्ड यो कविता कोकाव्यात्मक मूल्य की दृष्टि से सबसे सच्ची वतात हैं, इसलिए कि 'आल्डि समसामयिक चितन के गम्भीरतम स्वरो को छेडते है।' पि तु इस सराहना के बावजूद व यह कहने से नहीं चूकत कि 'आल्डि लेविन आग भविष्य म दखन म असफल हो जाते हैं।' साहित्य म प्रक्ट होने वाली भविष्य की चिता दो तरह की होती है एक ता मानव जाति के भविष्य की चिंता और दूसरे स्वय साहित्य या उसकी क्सिी विधा को लेकर चिता। कही कही वे इक्टठी भी मिल जाती हैं जस श्री अरविन्द की फ्यूचर पोण्टी म । आर्वाचीन काव्य पर विचार करते हुए श्री अरवि द अपने समय को सत्रमण का युग बतात हैं और उसक लक्षण या गिनात है मानवता के उवयुग की तयारी, अतीत के साचा, विचाग और क्षमताजा स अस तोप श्रम और कम की गरिमा का आग्रह, भाषा, लय, रूपविधान की गह्नतर शक्तिया को पान की कामना । वे लय की नई शक्ति के लिए किए जा रहे प्रयास को आने वाले परिवता का पहला सकेत मानत है और वाल्ट व्हिटमन की खूब सराहना भी करने हैं। पर उसके इस विचार म अपनी स्पष्ट असहमति जताते है कि आत्मशासित लोक्तानिक राजक्ता के लिए छद को बिल्कुल ही अलग फेंक देना है। यीटस को वे मात्र इसलिए नहीं सराहते कि उसकी कविता अदृश्य चत्यात्मक जीवन के साथ मानव के पार्थिव जीवन का सगुम्पन करती है, बल्कि इसलिए भी सराहते है कि वह 'परम्प रागत छ दो मे नए युग की लय को इस खूबी से पकड सका।' व भविष्य की कविता को ऐसी देखना चाहते है जो वैदिक मत्र की तरह साक्षात् दप्टिपरक श्रुति को मूर्तिमान करे और मानव पुरुपाथ के फलस्वरूप हुई अब तक की सारी प्रगति को भी ध्वनित करे । उनका यह भी कहा है कि भविष्य का यह नया विजन पुराने साक्षात्कारो की तरह धमतत्रीय या दीक्षागम्य रूप नहीं लेगा। वह एक ऐसी दृष्टि होगी जो जीवन और मन के देवताआ को धमदशन के मम में ही नहीं, विचार और क्ला मे ही नहीं, बल्कि सामाय जीवन और कम मे भी मूर्तिमान करेगी । मनुष्य अव व्यक्तिश ही नहीं, जातित एक बृहत्तर सत्य म जीने का प्रयत्न करेगा । निश्चय ही यह भी एक यूटोपिया है और इसमें पीछे योग और वदिक साहित्य का मर्मी अवगाहन ही रही सबद निरतर 140 उस युग के विचार प्रवाहा का भी सावभौमिक दवाव निश्चय ही होगा जिसने हाविन नीत्शे, मायड और बाल मास्म यो जाम दिया। वितु श्री अरविद ये यूटापिया वा अपना स्वतत्र स्थान है इन सवस अलग और विलक्षण खामकर गलिए भी, कि वे यह मानपर चलते हैं कि 'इम युग में मानव मन की जरुरत न सिप वाव्य मे, बलि स्वय विचार मे और आत्मा म, ताक्विता और आलोचनात्मय बुद्धि की नृशसता को कम करन की, जीवन की शक्ति और सचाई म लौटने की है।' हगेल की 'स्पिरिट रा उसके इतिहासवार से श्री अरविट की इस दृष्टि का स्पष्ट पाथक्य देखा जा सकता है । उसी तरह मायम और नीत्शे से भी। श्री अरविद जहां एक ओर यह मानते हैं कि 'आत्मा समस्त जीवन है, क्योकि वह जीवन से ज्यादा बडी है', वही वे यह भी बलपूर्वक दुहराते है कि जारमा और जीवन परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि आत्मा की वहत्तर शक्ति ही जीवन को वृहत्तर शक्ति को ले आती है।' एक पवि के रूप म उनका यह भविष्याटा रूप इसलिए भी ग्राह्य है कि वे मानकर चलत हैं कि काव्य और कला - स स य का बोधगम्य बनाने के लिए सबसे उपयुक्त और सशक्त माध्यम है क्यादि वे आत्मा और जीयन के बीच, अभौतिक और भूत के बीच जमजात मध्यस्थ हैं। उनके कथनानुसार यह मध्यस्थता भविष्य के वाव्य ये मुग्य कार्यों में से एक होगी । माहित्य की आवाज़ अपने विशिष्टि ढग से किस तरह धार्मिक शिक्षा और आध्यात्मिक अनुभव मे -पिना अपनी स्वतत्रता खोए अनायास जा जुडती है इसके दप्टात स्वरुप वे एण्टीगोने के उस वाक्य को उद्धत करते हैं, जो उनके पियॉन द्वारा अपने ऊपर लगाए गए देशद्रोह और कानून भग के आरोप वे उत्तर में कहा था मैं घृणा से नहीं, बकि प्रेम में जोडने को पैदा हुई थी। श्री अरविष्ट ने अपनी शिक्षा के दौरान जो परिवेश देवा या, वह उनीमवी सटी के प्रतिम दशको या यूरोप था । यह समय एक साथ ही वनानिक प्रगति- वाद रहस्यवाद तथा हामो मुग्वी क्लावाद का भी युग था। परस्परविरोधी जटरला और भविष्यवाणिया का एक घटाटोप ही छाया था उस वक्त । एक ओर हपट स्पेसर और एच जी बल्स मरीखे असीम प्रगतिवादी विनानवादी लोग थे तो दूसरी ओर यूटोपियन समाजवादी और तीसरी बार मला योटस सरीसे रहस्यदर्शी कवि । इस काल के अधिकतर आशावादी दाव और अटकलें बीमवी सदी के शुरू के दो दशवा म ही धराशायी हो गइ । कवि यीटस सन् 1916 के आयरिश विद्रोह पर लिखी एक कविता में 'एक भयानक सौदय को जम लेत देखता है और सेकण्ड कमिंग मे यूरोपीय सभ्यता के ईमाई चय वे अवसान की घोपणा करता है । यह अकारण नहीं है कि यीटस वे परवर्ती भविष्य और साहित्य 141 पाव्य स अपरिचित होत हुए भी श्री अमित ने द फ्यूचर पोएट्री में पीटस यो महत्वपूण स्थान दिया है और उसमे वृतित्व म भविष्य की कविता का पूर्वाभास पाया है। मैंने कहा कि उनीमयी सटी वी भविष्यवाणियां बीसवी सदी म धराशायी हो गइ । पर इस बधन म अतिव्याप्ति दोप है । यह ठीक है कि उनीसवी सदी के विनान और बोसमी सदी के विनानो बीच काफी अन्तर है यह भी ठीक है कि जिस वोटि की आलोचना इस बजानिय जाशावाट यी प्रौद्योगिकी की अब वह! होन लगी है, स्वय दाशनिक क्षेत्रा म, वह भी अभूतपूर्व है। किंतु यह वस पहा जा सकता है कि यूरोप के भूतपूर्व उपनिवेशा वे बुद्धिजीवी भी उसी तरह सोचते हाग । रूस और मारत व दप्टात कापी हागे । उन्नीसवी रादी का रूप नी रूसोपित बुद्धिजीविया की दृष्टि म यूरोप वा मास्कृतिक उपनिवश हुआ जा रहा था। पर यूरोफिल बुद्धिजीवी यूरोपीय विवाधाराओ के कायत थे। जीत अत मयूरोपिला को ही हुई पर एसी जीत, जिसकी स्वय उन्होने भी यत्पना नहीं की होगी। ऐसी जीत जिसन स्वय यूरोपीय संस्कृति को ही तडका के रस दिया। भारत म थी अरविंद और गांधी के बीच तथा गाधी और टैगोर के बीच ठीक उसी तरह का रूसी नमूने का द्वन्द्व था-- इण्डोफिल और यूरोफिल या यह कला तो जरा मुश्विल लगता है। पर क्या गाधी जोर नहरू के बीच बुध कुछ उस तरह का द्वन्द्व नहीं दिखाई देना? यदि हा तो क्या मौजूदा लक्षणो को देखते हुए हम यह भविष्यवाणी करेंग कि जिस तरह माक्म की भविष्यवाणी यूरोप मन फ्ल कर रूस में पली उसी तरह जब भारत म आगुस्त बॉम्ते या 'मैनजरियल रिवोल्यूशन' कामपना फलन जा रहा है । पर यदि साहित्य समाज वा दपण है तो क्या ये लक्षण उस दपण म दियाई देत है। तो, यदि यूरोप की भविष्यवाणियां हम पर लागू हो रही है तो इसका मतलब यही न हुआ कि राजनीतिक तौर पर मिरमौर न रहते हुए भी यूरोप का दिमाग विश्व का दिमाग बन हो गया है। तब फिर हमारे भविष्य का सवाल ही कहाँ है जा भविष्य उनका है वही भविष्य हमारा भी है । या फिर हम यही मनाएँ कि भारत अभी भारत बने रहने की लड़ाई नहीं हारा है और उसका भविष्य न काम्ते की मनजरिल प्राप्ति में है, न माक्स वादी नाति म । वह क्या होगा यह जभी भी तय होना है । पर यह तय करने की बात कही से आई जो तय किया जा सकता है वह भविष्य ही क्या और उसकी भविष्यवाणी भी क्या। दूसरी और जो पहले से तयशुदा हो कवि योट्स द्वारा बनाई गई जमकुण्डली की तरह यह भी एक सयट निर तर 142 - कrयात्मक नियतिवाट ही है। जो हमारे जयशकर प्रमाद की नियति' की तुलना म भी नही ठहरता । प्रश्न है, या इतिहास व लोह नियमो से अलग, हगल व 'ए सोल्यूट' यी जपाडवदी स भी अलग काल गति को परखा जा सकता है ? उदाहरण के लिए जव गाधी जी हि द स्वराज म वहत हैं कि 'जग्रेजो नी गुलामी से तो हिंदुस्तान आजाद हो जायेगा फितु जनीति से पसे वाला बना हुआ हिदुस्तान कभी गुलामी स नही लूटगा तो क्या वे उम तरह का इतिहासवानी भविष्यकथन कर रह हैं ? याकि वे जब उसी मिलसिले मे आग घोपित करते हैं कि 'अगर धनवान् लोग स्वेच्छा से अपने मग्रह रा वचिता के हित म त्याग करन को तयार न हुए तो सच मानिए इस देश में खूनी क्रान्ति हुए विना नहीं रहेगी, तो क्या उनकी दृष्टि और भाषा प्रापेटी जमी है ? इसी तरह जब श्री अरविन्द कहते हैं कि 'अव भविष्य न ता भौतिववाद का है प्राणिस्तावाद का और न दूरस्थ निस्मग अध्यात्मवाद का, भविष्य है मनुष्य की सत्ता की सामजस्यपूण सम्भूणता का तो क्या उनमा विकासवाद और भविष्यवाद हगलीय, नीशियन या जारतगो गामिया जसा है ? इस लिहाज से दसा जाय तो श्री रविश और महात्मा गांधी एक आर दिखाई पडेंग और डाविन कॉम्त मल आर मारम टूमरी ओर । तो क्या अमन पर भविष्य दप्टिया का नहीं बम दष्टिया अथवा विश्व दप्टिया के बीच होता है ? और क्या वही एक टप्टा और एक पगम्यर की भविष्य दप्टिया के बीच झलकता है ? कहा जाता है कि माश्म ने हगेल के रशन को उलट कर सर ये बल खडा कर दिया। क्या अरविद और गांधी की दप्टियो के बीच उस तरह का प्रतीक सम्बन्ध है ? कहा जा सरता है-कहा ही जाता रहा है कि गांधी जी सी दष्टि अतीतो मुखी है परविद को दष्टि भविष्यवादी, और इमलिए दोना ही अप्रामगिक हैं। एक राम राज्य के सपन में डूबा है तो दूसरा रिव्य जीवन का सपना दिखा रहा है। मगर यदि ऐमा हा हो तो इसम एक साहित्यकर्मों वे अपन अनुभव कोरप्टि से कहा कोई असगति है ? यदि तुलसीदास के लिए अपने काल यो चुनौती के सम्मुख राम कथा की पुनरचना म्वाभाविक और पर्याप्त प्रत्युत्तर हो सकती है तो गावी जी की भविष्य के भारत की कल्पना से अतीत म पलायनेच्छा है? फिर यह जो अतीतो मुखी और भविष्यवादी जसी कोटियां हैं, वे क्या पाल और सत्ता के साथ हमारे अपने सम्ब घ मे से गढी गई शब्दावली हैं ? क्या वह काल चन सम्बधी हमारे अपा ज्ञान प्रतीको स जुडती है ? हम एक ऐम ममय म रह रहे है जब राजनीतिक तरनीकी परिस्थितियो ने भविष्य और साहित्य 143 पश्निमी और भारतीय जीवन पद्धतिया यो माना एक ही माह में मार दिया है। निहाजाना ये बीच, दोराको मून प्रनिमाआय बीच मिमी प्रकार या गनुन और ममायामन ढूदन या यात अनगल नहीं लगती। तथ्य मगर यही है रिमा मतुलन और गमायो न ता अभी ताटा जा सका है, न निपट भनियम ही उसरी योद साम उम्मीद दोपती है। युगात जमी प्रतीति के सामने भविष्य की चिता स्वाभाविक है। वास्तविक और मनुष्य माध्य प्रलय यो गम्भावना का माशात् मनुष्य के भविष्य के बार म जिस तरह दनिया को चितिन करता है उमी तरह साहित्यकार को। ऐसा ही युगात सायद महाभारतकार कीपना को भी प्रत्यक्ष या तो क्या हम झरे महाभारत की स्थिति म हैं ' एक और नाका--महाभारत द्वारा उदघाटित युग शा भी -अत होन जा रहा है ? क्या कलिकाल की अवधि द्वापर से भी सभिप्ततर है ? क्या निगहन की रफ्तार और सुधरन की रपतार के बीच विलोम समानुपात होता है ? क्या भविष्य पुराण जमी भी कोई चीज होती है ? क्या है यह भविष्यपुराण' भविष्य म हान वाली घटनामा का वणन ? तब फिर वह भविष्य पुराण कैसे हो सकता है । मजे की बात यह है कि इस नाम से जाने जानेवाले युगण की उल्लेखनीय विशेषताएँ दो ही है एक तो सूर्योपासना और दूसरे उद्भिज्ज विद्या का वणन । मुम्य कथा तो वही है द्वापर वे यग पुरप कृष्ण के पुत्र साम्ब का कुष्ठरोग से पीडित होना और उसकी चिकित्सा के लिए शारदीप से ब्राह्मणो को बुलाया जाना। में बाह्मण मूयमतिर म जावर मय की पूजा करते हैं जिसके फलस्वरूप माम्ब की रोगमुक्ति सम्भव होती है। एकाएक सय या माहात्म्य क्या पहते नम्बर पर आ गया और रोगमुक्ति र पुरोहिता का भी ऐसा अकाल कस पड गया fr उद शारद्वीप से बुलाना पडा-~~ऐस प्रश्नो वा मन म उठना अस्वा भावित नहीं है? यह भी, कि उभिन्न विद्या के वणन की यहाँ पर प्रेरणा । ? वेटटो हैमन का कहना है Fि भारत को जीवन -प्टि 'बाद ताजिकल' है । जिस तरह एक नहा सा बीज धीर वीर उगता बढता हुआ अपने फ्लागम माल तक पहुँचता है उसी तरह मानवी प्रवृत्तियां भी जसग्य पुनम मोम विकसित होती रहती है जब तक उसका पूर्ण प्रस्फुटन या परिपाक नहीं हो जाता। महन माठ मनर वर्षा की उम्र का जीवन इतिहास इन अनिहित प्रवृत्तियो और मभावनामा के पूर्ण प्रस्फुटन के लिए क्मे पूरा पडेगा? उसके लिए लगगी परस्पर सपद्ध जीवनो की एक तबी क्तार जो अतीत म भी बहुत पीछे गई हो और जाग भी भविष्य म वहुत दूर तर जाने वाली हो । 144 सवत निरतर पश्चिमी सभ्यता मे-वामतौर पर उसके अधुानिक काल म समय के मूल्य को अत्यधिक महत्व दिया गया है । नात इतिहास कीयाल सीमा से परे देसना कठिन है इसलिए एक सीमित वतमान और सीमित, पूवानुमेय भविष्य पर ही अपना पुरुषाथ एकाग्र करना है। भारत, इसके विपरीत कात के सभी चरणो को परस्पर सबद्धता और परस्पर सापेक्षता म देखता है। योगदशन के मुता- बिक भी प्रत्यक्ष सीमित वतमान या हाल का अतीत मिणायक महत्व नहीं रखते । वहाँ भी बल प्रविष्य की असीमित क्षमताओ पर ही है, क्याकि इस ष्टि के अनुसार काल का एकमात्र उवर क्षेत्र भविष्य ही है। इस तरह देखा जाय तो भविष्य के प्रति भारतीय चेतना का लगाव दूसर लोगा की तुलना में कुछ विलक्षण जान पडता है और यह स्वाभाविक भी है क्याकि इस चेतना की विशेषता ही यह है कि यह व्यक्त की अपेक्षा जयक्त से अधिक सवदित होती है और स्थिति की अपेक्षा गतिशीलता ही हमारी कल्पना को अधिक उत्तेजित करती रही है। हमने आधुनिक पश्चिमी साहित्य की अतीता मुग्यता की चचा करते हुए लक्ष्य किया था कि अतीत यू तो सलाही साहित्य का उपजीव्य रहा है पर आज स कुछ अतिरिक्त सजनात्मक मूल्य प्राप्त हो गया है। मगर दूसरी जोर, यदि हम उस साहित्य को देख जो भविष्य पर ही एकाग्र होता है, ता हम पाते है कि वह भी एक तरह से भविष्य को ही अतीत बना देता है उसे एक तरह की फैण्टेसी या भविष्यपुराण का रूप देकर । सजनात्मक कल्पना की यह भी एक मौलिक प्रतिक्रिया हो सकती है । हक्सले वाफ्का और किसी सीमा तक नाइण्टीन एटी फोर का लेखक या द बुक आव लाफ्टर एण्ड फोरगेटिंग का मिलान कुदेरा इस प्रक्रिया के कुछ दिलचस्प उदाहरण है । यह भी एक तरीका है उस भविष्य से एक मौलिक प्रतिशोध लेने का, जो यात्रिक ढग से पूवानुमेय बना दिया जा रहा है । याकि जिसे बनान मे स्वय साहित्य को ही उसकी अपनी भूमिका स वेदखल किया जा रहा है । क्या यह एक रोचक विरोधाभास ही नही कि भविष्य को इस तरह अतीत बनावर ही आधुनिक साहित्य अपन भविष्य की रक्षा का उपरम करता है। वरसनिधि द्वारा आयोजित लेषक शिविर मानसर (जम्मू) अक्तूबर १९८५ म दिया गया लिधित व्याख्यान भविष्य और साहित्य 145 सृजन-कर्म दृष्टि और सम्प्रेपण द हैप्पी करक्टरिस्टिक दट बिलास टु एवरी क्लासिक, दट व्हिव मक्स इट क्लासिक एण्ड इम्मौटल इज द एब्सौत्यूट हामनी ऑफ द टू फोर्सेज पाम एण्ड कण्टेण्ट । कीगाद (मोत्साट के बार म) हामनी विटवीन विजन एण्ड टेक्नीक्स वॉज़ दि कैरेक्टरिस्टिक आफ द ट्रेडीशनल कम्युनिकेशन सिस्टम इवॉल्ड पू. सेंचुरीज आफ एक्स पीरिय स एण्ड -नावेशन । दिस हामनी वाज आलसो दि वरक्टरिस्टिक आफ नेशनल कम्युनिकेशन आफ द हीरोइक एज आव इण्डियन नेपानलिज्म । वी मस्ट टप बाथ दि ऐशट एण्ड दि मोर रीसेण्ट नेशनल हरिटेज टुटे एण्ड करी इट फारवड बाई एडाटिंग इट टु द यू एरा आफ रपिडली एडवासिग कम्युनिकेशन साइस एण्ड टेक्नोलाजी।' पी सी जोशी ( कम्युनिकेशन एण्ड नशन बिल्डिंग पसपक्टव एण्ड पोलिसी) प्रस्तुत विषय की परिकल्पना जिन तीन शब्दाने सहार की गई है, उही को पहले परिभापित कर लेना जरूरी जान पडता है। लखक या कलाकार के भया य सक्टा के बीच एक सकट आज यह भी है कि 'मृजन या 'विजन' (दप्टि/दशन/स्वप्न) पर जिस प्रकार का दावा उसका रहता आया था उत्त प्रकार का दावा करने वाले बहुत म दूमर लोग भी हो गए हैं शिक्षाविद, राजनीतिज्ञ समाजशास्त्री, वनानिक-सभी 'निएटिव हैं सभी धडल्ले से अपन अपने विजन को चचा करते है और इतना ही नहीं, क्लावार के 'मृजन' और विजन की तुलना मे इन 'सृजन और विजन की साख निश्चय ही ज्यादा तगडी हा गइ जान पड़ती है, क्योंकि एक बहुत ही जाहिर और मोटे मायन म इनसा सृजन और विजन' मानव समाज का ज्यादा तात्कालिक ढग से और ज्यादा दिखाई दन वाल असर के साथ प्रभावित करन की स्थितिम आ गया है । अठारहवी सदी के प्रख्यात कवि अलेक्जण्डर पापन वमानिक "यूटन या श्रद्धाजलि दत हुए लिखाया कि प्रकृति और प्रकृति के नियम जब 146 रावद निरतर - पूरी तरह जंघरे में डूबे थे तभी यूटन न अवतरित होकर ईश्वर की तरह 'लट देयर बी लाइट' का मन फूका और बस, सब कुछ प्रकाशित हो गया। क्या हम आसानी से कल्पना कर सकते है कि बड़ी से बडी कलाकृति के वार म कोई वैज्ञानिक ऐसा उद्गार प्रकट कर सकता है ? यह मानो बिसमिल्लाह था -आधुनिक युग मे वज्ञानिक सृजन-कम के सामने क्लात्मक या साहित्यिक सृजन कर्म के अपेक्षाकृत निस्तेज पडत जाने का रोमण्टिक कवि कीटस न भले यह दावा अपनी कविता के भीतर ही जगाया हो कि 'ब्यूटी इज टूथ दुथ व्यूटी," वह दावा स्वय उसके प्रशसका को ही अतिरिक्त और अनगल लगता रहा । और जब बीसवी सदी के पवि एलियट न अपन उस प्रतिद्वद्वी दावेदार के सृजनकम और विजन से अपने सृजन कम और विजन को अलगाना चाहा-यह कहते हुए कि वनानिका की कल्पना- शक्ति तो दोयम दरजे की हुआ करती है, तो यह दाव भी उलटा पड गया । क्यो? एक तो इसलिए कि यह क्रिया नही, प्रतिक्रिया थी और वास्तव मे एलियट खुद अपनी नई क्लादृष्टि को, खुद अपने नए काव्य-विजन को परिभापित करने के सिलसिले में विज्ञान से ही रूपक उधार लेन को विवश हुआ था, और दूसरे इसलिए भी, वह उसी प्रतिक्रिया के चलते वैज्ञानिक दृष्टि को ललकारत हुए एक दूसरी-और उतनी ही साहित्येतर दष्टि के आगे समर्पित हो गया। इसे केवल कवि सुलभ नम्रता यहवे नहीं टाला जा सकता कि एलियट अपनी नई काय दष्टि और उसे फलीभूत करने वाले युगातरकारी सप्रेषण सम्ब धी जाविष्कारो के बावजूद यही मानकर चलता था कि 'काव्य अतत एक ऊचे विस्म का मनाविनाद ('ए सुपीरियर पाम आव एम्यूजमैण्ट )ही है ।' तो जहा सबसे समथ और सबसे अधिक दृष्टिवान् मान जाने वाल पविया का खुद कविता के बारे में ऐसा क्षमायाची भाव हा, वहा सप्रेषण-क्राति के इस युग म साहित्य और कला से ' सत्य को जानने और पाने की अपेक्षा भला क्सेि होगी ? ऐसे मे साहित्य या क्ला या सगीत को 'नान का एक विशिष्ट और विलक्षण प्रकार भी भला कौन मानन को तयार हागा' अधिक स अधिक यही हो सकता है कि हमारे सोशल साइटिस्ट अपन "विजन' का समाज बनाने के लिए आधुनिकतम सचार मा यमा से जा भी 'पाजिटिव'सदेश प्रसारित करन के कायक्रम सुझाएँ, उनमे साहित्य मी एक साधन सामग्री के रूप मे खप जाए। क्या पुराने जमाने से ही साहित्य का उपयोग इसी तरह मनारजन के जरिए जनता की नतिक-सास्कृतिक दीक्षा के लिए ही नहीं किया जाता रहा है ? किसी भी समाज को बनाने और बनाए रखन वाले मूल्य और आखिर क्स प्रभावी हात हैं ? 'ब्रह्मान द सहादर माना जान सृजन कम दृष्टि और सम्प्रेषण 147 वाला काव्य भी आसिर पहल सहृदय सामाजिक तक सप्रेपित होकर ही तो फिर धीरे धीरे परम्परागत सचार माध्यमा के जरिए व्यापक समाज की सास्कृतिक जरूरता को पूरा करन के लिए प्रयोजित होता रहा कि नही बल्कि, अपनी मूल प्रेरणा म जा रचना जितनी ही 'स्वात सुखाय' थी स्वय रचनाकर्मी के अनुसार-वह अपन सामाजिक फलितार्थो म उतनी ही 'बहुजनहिताय' सावित नहीं हुई ? मगर क्या यह समीकरण निर्दोष है ? क्या परपरागत संचार माध्यमा स जो काम जिस तरह लिया जाता रहा, आधुनिक संचार माध्यमा से वही काम उसी तरह लिया जा सकता है ? क्या दाना के उपयाक्ता और गृहीता समान रूप से स्वाधीन और समान रूप से समाज के प्रति (तथा सस्कृति, यानी सम्प्रेष्य वस्तु के उत्पादक सजका के 'विजन' के प्रति उत्तरदायी हा सकत है ? यह एक बहुत टेढा सवाल है। सृजन कम एक अपूवानुमेय घटना है और आधुनिक सचार माध्यमा का ही नहीं, आधुनिक ज्ञान मीमा साओ का भी पूरा जार और पूरी वत्ति इसके विपरीत जान पड़ती है। दोना के बीच प्रक्ट सहयोग की बजाय एक प्रच्छन द्रोह का दृश्य ही इस पूरे दौर मे उभरता दीख पडता है । तब फिर? यहाँ पर सृजन और सम्प्रेपण के तात्त्विक और व्यावहारिक सम्ब ध पर थाडा गौर कर लेना होगा । आधुनिक कवि एक दाहरी प्रतिश्रुति अनुभव करता है एक आर तो वह सृष्टि और सत्ता के उस 'रहस्य' से सवेदित हाता है जो मवाक है, जिसे कहा नहीं जा सकता--जो 'वड विदिन द वड 'अनबुल टु स्पीक एवर' है । दूसरी ओर वह अपने कविक्म की साथकता ही इस तथ्य म मानता है कि सामाय आदमी की पहुँच जहा तक नहीं हो पाती, चेतना के सीमा ता पर घटित होने वाले ऐसे अनुभवा को कवि ही भाषा निबद्ध करके मानव चेतना या विस्तार करता है। भापा की सामथ्य को बढाकर इस तरह वह मनुष्य की अनु भव सामथ्य को ही बढा देता है।' कवि अज्ञेय भी कहते है कि 'साहित्य हमारे सवेदन का विस्तार करता है। स्पष्ट ही यह 'सवेदन का विस्तार' या 'चेतना के सीमाता का विस्तार वाला साहित्यिक मृजनाम वज्ञानिक या दाशनिक की सजनशीलता से गुणात्मक रूप से भिन्न होना चाहिए । अनेय न एर जगह साहित्य रचना और दशन के बीच अतर करत हुए यह म त य प्रस्ट किया है कि 'दशन की खोज उस सत्य की है जो किसी एक चौखटे म नहीं है और साहित्य सार उस सत्य को पकडता और प्रस्तुत करता है जो उस चौखट म ही सत्य है, लविन उस चौसटे म वह अद्वितीय रूपम और नया सत्य है।' प्रश्न उठता है-क्या यहाँ दशन दे अतगत विनान या भी गामिल कर लिया जा सकता 148 सबद निरतर है ? पूछा जा सपता है कि चौसट स यहाँ क्या अभिप्राय है? अज्ञेय इसी सिलसिले म आगवत हैं कि 'साहित्यार एस एस सत्य का देखता है जागि चौमटे म है और उसको सम्प्रेप्य रूप म देसता है, दूसरे तक पहुंचाता है जबकि दाशनिय का सत्य दूसरे ता नहीं भी पहुंचाया जा सकता है।' दूसर गलाम, माहित्यिक सृजन-यम यो विभेदर विशेषता यही है कि साहित्यकार पा सत्य सम्प्रेष्य होता है और सम्प्रेपण की प्रेरणा उसम मूलभूत महत्व रखती है। इस तरह मृजन-यम और सम्प्रेषण अविभाज्य हो जात है एक यो साध्य और दूसर यो साधन नहीं माना जा सकता। सत्य को एक चौसट म देखना उस मगुण, जीव त रूप म दसना है और यही उसे सप्रेप्य बनाता है। दूसरे नाम यह अल्प वो रूप देना है, अभूत वा मूत करना है । नाम रूपात्मक गृष्टि वे समाना तर जोर समरूप ही यह सृजन कम है। नाम रूप के सहार जो जीवन चलता है, उसी के सहार, उसी के चौखटे म साहित्य सृष्टा का मत्य भी मप्रेप्य हाता है । इस तर यह चौसटा सत्य की विकृति या विसण्डन न होकर उसी का एव सद्य स्पूत अवतार है । दशन सत्य स इस मृजन कम के सत्य का सम्बध इसीलिए, देखा जाए ता उस तरह सीधे विरोध या न होकर कुछ कुछ यसा ही है जसा विशिष्टाद्वत का अद्वत से । गीता के दाशनिर काव्य में इसीलिए जहां एक ओर श्री कृष्ण पहत हैं कि 'अव्यक्त व्यक्तिमापन मयत मामबुद्धय वही दूसरी ओर वे यह भी कह सकत है कि सभवामि युग युग'। चौखटे का सत्य सृष्टि सत्य है, मानुप सत्य है, जा निगुण निराकार सत्य का प्रत्यास्यान उस तरह न होकर उसका मानवीकरण है याषि जीवनलीला के पा म उसका आवाहन है । साथ ही वह मनुष्य के समूचे वेदन तन स ताल्लुक रखता है, न वि मात्र उनकी तक बुद्धि से । तुलसीदास ने अपन रामचरित मानस के प्रारम्भ म ही नाम और रूप यी चचा करत हुए एक मम की बात वहीं है कि 'अगुन सगुन विच नाम सुमाखी/उभय प्रवीधर चतुर दुभाषी ।' यह उभयप्रबोधक्ता ही नामकरण का, अर्थात् मृजन कम नौर सप्रेपण का जसली मम और प्रयोजन है । आचाय पितिमोहन सेन ने मध्यकालीन सत ववि रज्जव का इप्टात देत हुए प्रकारातर से इसी बात को आगे बढाया है। मूल उद्धरण जग्रेजी में है, यथावत् देना ठीक हागा व्हैन इट वाज नोन दट रज्जब हैड रिसीव्ड हिज 'इल्यूमिनशन , मैनफोम फार एण्ड नियर वेम टु हिम एण्ड जास्वड "हाट इज इट दट यू सी? व्हाट इज इट दट यू हियर' ही आ सड 'आइ सी द इटनल प्ले आव लाइफ। आई हियर हैव ली वॉयसेज़ सिंगिंग, गिव पाम टु द यट फॉम्ड, स्पीक आउट एण्ड एक्सप्रेस ।' सृजन कम रष्टि और सम्प्रेषण 149 रज्जव को यह कथा, जाने क्या फिर से मुझे बाइबिल में वर्णित हजरत मूसा और उनके साथी आरन की उस कथा की याद दिला रही है जिसका उल्लेख मने भूमिका म किया था। मूसा को भी रज्जब की तरह प्रकाश मिला, उन पर भी सुदा का नूर बरसा, उ हान भी इस अरूप अनुभव को रूप देने और उसे कह डालने की व्यग्रता अनुभव की। पर यही पर उनके और रज्जब के बीच फक है । रज्जब को जो साक्षात्कार हुना, वह जीवन की अनादि अन त लीला का साक्षात्कार था। वह दृष्टि भी थी और श्रवण भी। मूसा का साक्षात्कार इससे भिन था। कदाचित् इसीलिए रज्जव को जो सदेश सुनाई दिया, वह चूकि नर का अपन जाप मे स्वय नारायण की तरह सृजन धम निबाहने का, अरूप को रूप दन का, स्वधम निवाहन का सदेश था, इस लिए रज्जब उसे न केवल जनता को स्वय अपने मुख से बता सके बल्कि उस सदेश को खुद भी अमल में ला सक, खुद ही जीवन लीला की दिव्यता को बता और गा सके । मूसा के साथ दिक्कत यह थी कि व दिय सदेश को ग्रहण तो कर सकते थे कि तु सप्रेपित नही। रज्जब का साक्षात्कार एक सवाक और सप्रेष्य अनुभूति थी मूसा का साक्षात्कार एक अवाक और असप्रेष्य अनुभूति । रज्जव का सत्य चौखटा मे अवतरित मूत्तिमान, मूत्तिप्रेषणीय सत्य था, मूसा पा सत्य उह तोडने वाला। ( 'एन इमज आस्क्स फार नम्स बिलीव इन द स्पिरिट, चाजन वन ') अकारण नहीं कि मूसा का जो मिला था उसे जनता तक पहुँचान के लिए उह एव वाग्मी की जरूरत पड़ी जो खुद ता दिव्य अनुभव के लिए अक्षम है किंतु जो दूसरे के अनुभव को सप्रेप्य बना सकता है, उसे वाणी दे सकता है । मूसा का यह प्रयोजन पूरा करता है-आरून । इस दाना का सम्बध गणेश और व्यास जसा याकि कृष्णाजुन सरय जसा न होकर बहुत विचित्र और विरोधाभासी है। क्या वह सत्य और सत्ता के साथ मानव जीव के सम्बय की जमजात विडम्बना को दरसाता है ? उसकी अनि वाय ट्रजिडी को इसकी क्या गारण्टी है कि यह भाषा का धनी आरून मूसा के साक्षात्कार को यथावत् सप्रेषित कर सकेगा? उस विकृत नहीं कर देगा? वाइबिल मे इस प्रकरण से गुजरत हुए हम इन दोना के बीच द्वन्द्व को-मूसा के असतोप और आरून के आत्मविश्वासी हठ को भी जगह जगह अनुभव करते हैं और यह अकारण नहीं है कि एक प्रत्यात जमन सगीत कार ने इस विषय का लवर जा ऑपेरा रचा है मोजेज एण्ड आरन- उसम मूसा को जिव हीरा के रूप म ही चित्रित किया गया है । नर नारायण सवध की जा भी व्याख्याएं या रूपर प्रतीक मिलेंगे, उनम परस्पर सामजस्य हो ही नहीं सकता, उनके बीच अनमल और विग्रह ही हो सकता है, ऐसा शाएनवग व सगीत नाटक का क्थ्य है । जाज स्टाइनर का यह मानना है कि दाउ शल्ट 150 सवद निरतर मूल पाम निहित विरट द दया परवर्ती पुरोहिता र काफी कुछ दवा और मिटा दिया है। उस सगीत नाटप म मूमा और आस्नर यीचर असामजस्य वा अत पार पराजय और एप हताश चीत्कार के बाद पी चुप्पी म होता है । यह चुप्पी पाएनवर्ग के मूसा को भी है जो गाता है और आख्न की भी है जो योलता है । अपन लोगा ये लिए, यानी यहूदी प्रजा य लिए जिस निराली नियति या स्वप्न मूसा देता है, वह एक ऐरा देवता की एकनिष्ठ उपासनाया स्वप्न है जो मत्य मानव के लिए परम अगोचर है, जो मानवी अनुकरण की किसी भी क्लास पिसी भी तरह उसकी परड म नहीं आ सकता। यया यह वही समस्या नही है एप आर अमूत सत्य और दूसरी जोर चौखटे म देसे गए सगुण सत्य के सम्बध की दशन पो नतिमूलक्ला और यला साहित्य की सप्रेषणमिता दोना पया अपनी-अपनी जगह स्वाभाविक और जरूरी नहीं। दोना म विग्रह का सबध अथात् एप की कीमत पर ही दूसरे का प्रमाणित होना क्या अनिवाय है ? बल्यि देसा जाए तो मानय चेतना और मानव सस्कृति के विकास की दृष्टि से यह दूसरा सत्य-सप्रेषणधर्मी मृजन कम- ही अधिक महत्वपूर्ण ठहरता है । क्यापि वह हमारे सवेदन और चेतना का विस्तार करता है, इसलिए उस अगोचर सत्ता की दिशा म भी अधिक लयवद्ध तरीके स स्वय जीवन मे निहित और कायरत सत् चित् आन द की गति से ही आगे बढ़ता है और इस तरह अमूत सत्य की मात्र बौद्धिक व्यारयाआ या तक सरचनाआ म जो एकागिता होती है-परमाथ चितन की नतिमूलक जनासक्ति के विपरीत इन सिस्टमा मे जो आग्रह और विजिगीपा होती है उसगा वह परिहार और सतुलन भी करता है। निश्चय ही, व्यक्त और जव्यक्त, सगुण और निगुण के बीच का द्वद्व हमारी दाशनिर परम्परा म भी रहा है पर एक ओर सभ्यता के प्रारम्भ म ही वाक शक्ति के बारे मे हमारे यहां किया गया चिंतन और दूसरी ओर उसकी परिपक्व अवस्था म उपजा हुआ भक्ति का दशन भी सभयत निर्गुण और सगुण ये एक अधिक सतोप जनय और अधिक फ्लप्रद विवपूण सबंध की ओर इगित करते हैं। यह अकारण नहीं है कि वेदा के अनुसार भी यह जगत् उस परम सत्ता का काव्य है और मत्य कवि अपने सृजन कम मे उस दिव्य कवि का ही अनुकरण करता है । यह भी आकस्मिक नहीं है कि मध्ययुग के तुलसीदास ने भी नाम और रूप की महिमा पर नए सिर से रचनात्मर बल दिया है 'नाम रूप दुई ईस उपाधी । अक्थ अनादि सुसामुझि साधी । कि तु परम्परा की बात करना सजन और सम्प्रेषण की समस्या के आधुनिक रूप से एक तरह का पलायन सा लगने लगता है । आखिर आधुनिक कला का सृजन-कम दृष्टि और सम्प्रेषण 151 ? तो जाम ही उस अमगति शुभव म स हुआ था जो बलापार की नतिष मनस्तात्विक अतवस्तु और परम्परागत क्लारूपा के बीच पदा हो गई थी। ऊपर हमने जिस सगीत नाटय की (मोजेज एण्ड आरन की) चचा की, यह सिफ एक पौराणिक क्या म भोग्न भर के लिए नहीं की थी। इस विषय वस्तु के निर्वाह और चुनाव दोना के पीछे एक आधुनिा कलाकार की जो अतविवशता रही है वह व्या है ? क्या वह भाज को जटिल चेतना के मदम म स्वय गप्रेषण बी ही सभाव्यता पर प्रश्नचिह नही लगाती प्रतीत होती वीसवी सदी व पलापार के वेदन तर पर जो अभूतपूर्व दयाव पडे-उनके चलत कई बार उमे अपनी क्ला पर, अपनी विधा की सप्रेपणशमता पर ही सदेह हा आपा और कई बार उसने इस सदह के निराकरण के प्रयल म ही जो रचना की, वह उसे एव पूरी तरह सप्रेप्य सत्य को प्रकट करने का सतोप दे सी होगी- उसे अपन जीवनानुभव से उबरन वा सापेक्ष मुक्ति • अनुभव दे मकी होगी, यह वह सकना जरा गठिन लगता है। मोजेज एण्ड आरन ऑपेरा का रचयिता शाएनवग भी अपनी सगीत बला की सप्रेपणक्षमता के बार म कुछ उसी तरह प्रश्नावुल दीखता है जिस तरह वरफवा उप याम-विधा के बारे म, या पान पली चित्र कला के बारम। थाखिर क्या वजह है कि स्वय कविता या विषम ऊपर जितनी कविता वीसवी सदी के कविया न लिखी है, उतनी पहले कभी नही लिखी गई? दूसरी ओर, अरूप को रूप देने की वृत्ति या जहरत सृजन कम और सप्रेपण की ही नही सामाय जीवन के कम कौशल की भी प्रेरणा और सायरता है। मगर आधुनिक जीवन की गति ही ऐसी है कि वह सामाग्य जीवन मे भी मनुष्य की इस स्वाभाविक प्रवृत्ति को नही उभरन देती। नियक्तिक यानिक्ता और एकरूपता के आग्रह ने, लोकप्रिय पारिता, सिनेमा तथा संचार माध्यमों के द्वारा आरोपित छाया जीवन न सृजनधर्मी सप्रेषण को और उसकी समझ को चारो ओर से जानात कर लिया है। जहाँ पुरान नीतिशास्त्र की मीमा यह थी कि वह मनुष्य के प्रति मनुष्य की उदासानता के प्रति पर्याप्त राजग नहीं हो पाता था, वहा नए नोतिशास्त्र मे इसके ठीक विपरीत मानवीय सरोकार का एक ऐसा प्रचण्ड बौद्धिक अहकार उभर कर आया जो मनुष्य के स्वयं अपनी मानवीय सीमाओं के विवेक को ही निगल पर उसे मानव नियति का और सारे वस्तु जगत् का एकमात्र नियामक मान चठने के दम से भरने लगा। इसके साथ ही, प्रजासत्र में भी जिस ऋणात्मक और सृजनद्रोही पहलू का खतरा ताकदिल न देशा था (कि समाज का जातात्रिक सगठन मानव मन की जिस आदश स्वाधीनता के लिए यो सबस मुफीद है, मुझे भय है, वही उसी का प्रजातत्र अतत सकट मान डाल दे। सबद निरतर 152 । कही ऐसा न हो कि अपने ऊपर लगाए गए पिछले सारे बधनो को तोड चुकन के बाद मनुष्य का मन इस तथाकथित बहुमत की जजीरो मे ही न जक्ड जाए)-वह खतरा भी साफ ही मडराता दीखता है। कुल मिलाकर पश्चिमी समाजो की ओर उनकी देखादेखी हमारे भद्रलोक की भी हालत मानो हना अरेण्ट के दु स्वप्न को ही चरिताथ करती लग रही है इट इज क्वाइट क सीवेवुल दट द माडन एज व्हिव बिगैन विद सच एन अनप्रिसीडेण्टड एण्ड प्रामिसिंग आउटवस्ट आव ह्य मन ऐक्टिविटी मे एण्ड इन द डेडलिएस्ट, मोस्ट स्टराइल पसिविटी हिस्ट्री हैज़ एवर नोन' [द ह्य मन कण्डीशन, 1958] 1 बहरहाल, इसके बावजूद, यह स्वाभविक ही है कि आज के लेग्यक कलाकार भी सामाजिक और आनुभविक सजगता भी युगधमानुकूत काफी बढी हुई है। यह भी, कि समाजशास्त्री के बढत हुए महत्व को भी वह अनदेखा नहीं कर सकता हालानि उसकी सामाजिक आनुभविक जागरूकता उसके मृजनकम म जिस भेप में प्रकट होती है वह समाजशास्त्री के "विजन' से स्वभावत बहुत भिन्न होती है । हमने ऊपर चौखटे म देखे गए सगुण सत्य का सृजनशील कलाकार का स्वधम निरूपित किया था। इस प्रकार का दावा अ य जनुशासना का भी हो सस्ता है विशेष कर समाजशास्त्रिया का। पर इस सदी का साहित्य इस तथ्य का गवाह है कि सृजनशील लेखक जपने स्वधम से ही आधुनिक मनुष्य की चेतना को जक्डबदी परन वाली इन नई तकवादी विवेयवादी रूढियो को अस्वीकार करता है और इस प्रकार उमा सप्रेष्य सत्य, उमका यथाथ भाव चेतना के जिम धरातल पर सक्रिय होता है वह वज्ञानिक समाज शास्त्री द्वारा उपलम्य यथाथ के स्तर से कहीं अधिक आम्यतरित कही अधिक गहरा धरातल है । समाजशास्त्री जहा यथाथ को बौद्धिक अवधारणाओ के रूप म स्वायत्त करता है, वहा मृजनकर्मी लेखक भावना और बुद्धि की संयुक्त अत क्रिया के जरिए अपन सृजन मे प्रवत्त होता है और यह अत क्यिा, यह समग्र भाव बोध भाषा की भाविक मूमताओ के जरिए स्वय को स्पायित करता है। स्थितिया को बाहर से बौद्धिक विश्लपण द्वारा स्वायत्त करने की बजाए उसकी स्वाभाविक वृत्ति उनमे अत प्रविष्ट होकर उह भीतर से उजागर करने की होती है। इस लेख के प्रारम्भ मे दो उद्धरण टाये गए हैं एक म दाशनिक का दृष्टिकोण है और दूसर मे आधुनिन समाजशास्त्री का। दोना रूप और कथ्य की, "विजन' और 'कम्युनिकेशन की सवादिता पर जोर दे रहे हैं उसे अपने आप में एक मूरय की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं। एक इस सवादिता को कालजयी मृान कम दृष्टि और सम्प्रेषण 153 पृति ग और गजर रिमपियालग-ग रहार, सागरा ममा वसा ग गमान iran विज्ञा' और गगामी दग रामर तापीमा पर सपा Tam और पिया पा मवप गाजा गा" मोरंगाः मासो परिमो विIIT मरमा है fr उगम पाम' और गहरा को पूTIगि होता है। ]ि निशय ही पालनयी गृति माहिती Proता उगरी मप्रप्या अर युगा अरिहा रही पाती। और दूगर, गति भी मि उमरा सम्प्रेप्य मत्य भीय पूर ममान और गतिमात्म TT पा प्रपट या प्रेरित करा यारा ह-जग यति मा . या या मीrि r रामायण । शिय हो गृपा राजर तिमाही कमरे, समाजमा नहीं। यिन्तु मया पासजयी सिर में ग ग म प्राट हा सपत है जो आत्म विमारा विही हो, निग्रतया परापजीयो हो ? र गाँउन यामिर (१) यी त्रिएटिविटी भी पया उगमूया गरिप हा गातो 1ो रिसी समाज पो अप्राणि परत आए है ? सभी तो यह नारा मूल्या पी भी उदभावना म समय होगा। गारा अय यही हुआ मि मजा व्यक्तित्व ये योण ग भी, मह यपूण गृजन यम य लिए ममूचे रामाण पोरानागीता आवश्यक है । समाज म रचीलता तभी होगी जब अधिरतम वविध्य म अधिरतम एयता या चरिताय परा पाली मूल्य दृष्टि और रिशायोध उसे अनुप्राणित पर रहा होगा । यह मूल्य प्टि जहाँ नई चुनौनिया ये जात्मविश्वासपूण स्वीवार म प्रयत्त होती है, वही वह ग्वय अपन आप म स स्वीनार यो परम्परा यानी गृजन वमी परम्परा से प्रेरित और प्रभावित हाती है। पालायी गति जहाँ जीवन सत्य के माधब रूपाकारो वो सोज का परिणाम होती है, वही वह उसगा प्रेरय कारण भी ता बाती देखी गई है । पीगाद फॉम और पोपट यी शायली मे (जनेय जी के चौखट वाले सत्य की तरह) वात पर रहा है तो प्रा जोशी विजन और 'तस्नीर की शावली म । प्रो जोगी के जनुमार सप्रेपण के माधनो की अभूतपूर्व प्राति चे युग की विडम्बना यह है कि हम उपयुक्त सम्प्रेप्य वस्तु के ही नाले पड़ गए है-उस सप्रेप्य वस्तु के जो पूरे समाज को एक नतिर 'विजन दे सके दिगा-बोध दे सके उस आथिक-सास्कृतिक नव निर्माण के लिए प्रेरित कर मर । वे पात है कि परम्परागत नतिर विजन और परपरागत सप्रेषण साधना के बीच एक आदश तालमेल या हमारे यहा जिसे अग्रजो की गुलामी ने बिगाड दिया पर जिसे मत्याग्रह युग म गांधीजी न फिर से योज-- सबद निर तर 154 अपनाकर एसदभ मे और नए सिरे से प्रामगिव और प्रभावशाली बनाया। वे यह भी मानते है कि परपरागत नतिक मूल्य-दृष्टि के समतुल्य परपरागत सप्रेपण साधन भी अचानक नही पदा हो गए हागे। उह कई सदिया के लगातार प्रयोग और अनुभव से ही विवसित किया गया होगा। इसलिए आज आधुनिक काल मे जब 'विजन' की यानी सचाई के बोध की परिस्थिति भी बदल गई और सप्रेषण की परिस्थिति भी बदल गई तो फिर से एक नए विजन' और उसके अनुकूल सप्रेपण का तालमेल खोजने के लिए हमे सचेत प्रयत्न करना पडगा और इसम हमारे लिए न केवल हमारा परपरागत अनुभव, बल्कि हमारे निबट इतिहास का राष्ट्रीय स्वाधीनता आदोलन का अनुभव-विशेषकर गाधी जी द्वारा प्रयुक्त सप्रेपण विधिया का अवलबन- विशेष रूप से उपयोगी होगा। 'फाम और 'काटेण्ट के बीच पूण एक्ता (ऐब्सौल्यूट हामनी) की बात तो आधुनिक युग की परिस्थितिया के चलते हुए एक दुलभ आदश लगने लगी है जमा वि हमने देखा वयक्तिव और सामाजिक दोनों ही स्तरा पर यह 'कम्युनिकेशन गप एक तथ्य के रूप म हमारे सिर पर चढ़ के घोलता है। सजक व्यक्ति अपनी समस्या का समाधान या तो स्मृति अथवा भविष्य स्वप्न (या दु स्वप्न) के जरिये करने का प्रयत्न करते हैं और समाज ? इस अराजक आपाधापी ये मूल्यमूढ युग मै कौन सा 'विजन पूरे समाज को अनुप्राणित कर सकता है 'प्रा जाशी जी का कहना है कि लोगो म इतिहास बोध जगाना [~ खासकर उनमे जिह स्वाधीनता आदोलन की कोई स्मृति नहीं है उनमे राष्ट्रीय अपमान और दलन के बुनियादी पारणा भी समझ जगाना परमावश्यक है । उ होने अपने परचे म आतरिक उपनिवेशवाद' के खतरे की आर ध्यान दिलाया है । जो हमारे आज के समाजवादी विचारको के लिए भी पिता का मुख्य विषय है। उसके प्रतिरारम्वरूप हमारी पर- म्परा म निहित नतिर मूल्या की 'बहुजनहिताय के आदर्शों की भी जाणीजी ने विस्तार मे चर्चा की है। साथ ही बाहरी उपनिवेशवाद मे कारगर ढग से लड़न की चेतना और जनता मे जुडने हतु सत्तानिरपेश सम्प्रेषण-साधन वित्रमित करने लिए महात्मा गाधी वा आदश उहाँ प्रस्तुत किया है । प्रश्न यहाँ पर मन में यह उठता है कि क्या ये चीजें गाधीजी के लिए वैवल साधन थी । क्या वे उनके माध्य ये अनुरूप और उसी की दृष्टि मे भयोजित नहीं हुई थी? क्या उनका ममाज-स्वप्न वही था जो जोगी जी वा है? षमा गाधीजी का विजन और रचनात्मा वम एव स्वत सम्पूर्ण 'शानिटी' के आग्रह पर आधारित है ? क्या मानव मूल्यों को अवधारणा गृजन बम रप्टि और सम्प्रेषण 155 - 7 मे वही 'इगनल' को भी भ तमुक्त नहीं होना चाहिए। मृजन कम के पीछे भी जसा पि स्वय जनेय न लक्ष्य दिया है क्या कवि की वतमान क्षण वे जीते जागते अनुभव मे ही 'अपने बड कुछ' को पहचानन जोर सप्रेपित करने की क्षमता ही नहीं होती ? क्या ममाजशास्त्री के सप्रेषण दशन म इस 'अपने से बडे कुछ वा मूल्या के ही स्रोत स्वरूप उन अनात प्रेरणाआ का भी स्वीकार और समझ होती है ? क्या हम परम्परा को भी सत्य और शद दुहरे स्तरो पर केवल साधन की तरह इस्तेमाल करके अपने सक्ट का समाधान पर ले जा सकते हैं ? हम इन प्रश्नो का उत्तर भी तो चाहिए। निश्चय ही वदले हुए सदभ मे 'निएटिव विजन' और मप्रेपण के अय का पुन खोजने और स्थापित करने की जरत से इनकार नहीं किया जा सकता। पर इम दायित्व के निवाह के लिए जिस मूरयष्टि की जरूरत है, उसका तात्विक आनुभविक स्रोत और नतिक सापेक्ष्यवाद से मुक्त अमटिग्ध जाधार क्या होगा? इन प्रश्ना को ध्यान में रखते हुए ही हम श्री जोशी को स साथक चिंता को सचमुच रचनात्मक स्तर पर स्वायत्त पर मक्ते हैं कि 'वही इन अत्याधुनिक सचार माध्यमा ये फलस्वरूप हम जागे प्रगति करन की बजाए ववरता के जाधुनिक रूपा म वापस न लुढक जाएँ ।' निश्चय ही, हमारी अपनी नान परम्परा म दाशनिक वैनानिक सत्य और साहित्यिक-वलात्मक सत्य के बीच उस तरह के सामजस्य की स्थिति नहीं होनी चाहिए और इसलिए यह आशा वरना जनगल नहीं है कि हमारे सृजन-कर्मी और हमार समाजशास्त्री एक दूसरे की अतट प्टियो से लाभावित हो सकते हैं और जिस सास्कृतिक दलदल मे हम जाज फम गए है उम बटाने की बजाए उमे मुग्वान के लिए रचनात्मक मह्याग पर मक्त हैं । 111304 जातिका 156 सबद निरनर
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A रमेशचन्द्र शाह जम -1937, अलमाडा (उप्र) निक्षा - अलमोडा ओर इलाहाबाद मामग्रेजी साहित्य में एम ए पी एच डी। सम्प्रति - हमीदिया कनिजम अग्रेजी विभाग के अध्यक्ष । प्रकाशित कृतित्व- कविता-संग्रह पटुए की पीठ पर हरिपचद्र नानी, पवत म नदी । गाल के मामा (धान-कविता)। उपवास गोवरगणेश विस्मा गलाम । कहानी-सग्रह जगल में आग, मुहल का रावण । निबध साह मतान के बहान, आइ कापड, रचना व वरत। समालोचना छायावाद वी प्रामगिरता ममानावर वागय, जयशकर प्रसाद । शाधन थ 'यटम एण्ड एलियट पमपपिटब्ज ऑन दण्टिया अग्रेजी म प्रकाशित । नाट मारा जाई खुमरा, मटियागुन ('गशामन या हिदीस्पान्लर) ।