Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Leftinenth

Beg,mirja Agim · 2011/02

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लेफ्टिनेन
तथा
महारानी का सपना और खतों की दिल्लगी
लेसक
स्वर्गीय मिर्जा अजीमवेग चगताई
प्रकाशक
छात्रहितकारी पुस्तकमाला
दारोगज, प्रयाग
प्रथम सस्करण]
मितम्बर १६४६
[भू०॥)

प्रकाशक
श्री केदारनाथ गुप्त, एम० ए०
प्रोप्राइटर-छात्रहितकारी पुस्तकमाला
दारागज, प्रयाग
जयपुर के सोल एजेएट
प्रभात प्रकाशन, जयपुर
जोधपुर के सोल एजेण्ट
भारतीय पुस्तक भवन, जोधपुर
मुद्रक
सरयू प्रसाद पाडेय 'विशारद
नागरी प्रेस, दारागज,
प्रयाग।

लेफ्टिनेन्ट - यह उस समय की बात है, जब मैं अहुत छोटा सा था। हमारे पड़ोस में एक शेष जी रहते थे। प्राय दोपहर दो चे चारपाई पर नीम के नाचे दुक्का पोते, और दो चार श्रादमियों से बातें करते। एक दिन म भी खेलता हुआ पहुंचा। यहाँ मैने उम्र में पहती भार लेफ्टि नेट की चर्चा सुनी । उनका दामाद किसी लेफ्टिनेन्ट के यहाँ नौकर *या। किस मजे से वे दूसरों से, अपनी ऐनक के ऊपर से देखकर दूसरे साहन को श्रोर हुक्का बढ़ाते हुये महते थे। "गोरों का सबसे बड़ा अफ्सर होता है यो काँपती है पल- ने!" हाथ हिला कर कैंपकपी का दृश्य अताते। पढ़ी काँपती है गोरी पलटन। और इस लेफ्टिनेट को हुलिया भी सुन लीजिये ! अजी लाल यह मजबूत जूता, कि मारे ठोकर तो नौकर की पैडुली दृट जाय । भला हमारी पार भापको मजाल है, कि जो उसकी नौकरी नजाये । मिट मिट, गिट पिट गोलना है। क्या समझे कोई १ यह ता उही लोगों का (अपने दामाद के लिए) बहादुरी है, जो उससे निपटते हैं। एक दूसरे साहा ने, जो कर्नल और जनल को श्रोहदे म ऊँचा ताया तो सिर हिला कर नाराज होकर बोले पड़े भख मारते है . पन्देल और जईल । सर सर उगमे नीचे ग्रजी घागरा पलटन का बादशाह कोई दिल्लगी है " प्रगट है, कि लेफ्टिनेट की इज्जत किस तरह और कितनी मेरे दिल में होगी ! केवल सोचते ही होश उड़ जाते थे, कि भगवान ने एक लेफ्टिनेन्ट से पाला पड़ा दिया । पूर्व इसके, कि मैं कुछ निवेदन करूँ, लेफ्टिनेन्ट के बारे में कुछ कह देना चाहता हूँ । वास्तव में चीवियों की तरह लेफ्टिनेन्ट मा दो तरह के होते हैं, लड़ाका और गैर लड़ाका। अपनी कम उम्री और अनुभवहीनता के कारण, या यों कहिये कि अपनी निरीक्षण शक्ति की कमी के कारण में इस घोखे में था, कि लेफ्टिनेन्ट केवल लड़ाका होते हैं। और ओपियाँ केवल गैर लड़ाका । लेकिन लेफ्टिनेट.. के बारे में एक बहुत बड़ी लड़ाई के बाद और बीवियों के बारे में एक विशेष घटना के बाद यह मालूम हुना कि लेफ्टिनेन्ट और I दोनों लड़ाका यौर गैर लड़ाका होती हैं। लेकिन इस समय चूंकि मुझे बावियों के बारे म कुछ नहीं कहना है, इसलिये अन अपना किस्सा मुगाता हूँ। स्वर्गीय पिता जी नये नये नौकर हुये थे कि दूसरे शहर के लिए नदली हो गइ । सत्र को घर ही पर छोड़ दिया और केवल मुझे लेकर नई जगह पहुँचे, कि मकान का प्रबन्ध हो जाय तो सबको बुला लायें। डाक गले में जाकर ठहरे। वहाँ कई आदमी मिलने के लिए आये, और बहुत-सी बातें हुई । बातें मकानों के बारे में थीं। मालूम हुश्रा कि एक अंगला अच्छा तो माला है, लेकिन पडोम के बँगले में एक पाजा लेफ्टिनेट ऐसा रहता है, कि किसी को बँगले में टिकने नदा Man - । -- बस ठाक । देता । जो भी श्राता है, अगला छोड़ कर भागता है। जो साहब अभी बगला छोड़ कर भागे थे, उन्होंने पिता जी को इस लेफ्टिनेन्ट के नौकर की बातें बताई । "नौकर को मारता है, शोर नहीं मचाने देता, जानवर नहीं पालने देता, गोली मार देता है ! नगला बड़े सस्ते किराये पर मिल जायगा।" पिता जी शीघ्र नॅगला लेने के लिए तैयार हो गये। उन्होंने जब भय से अधिक सतक रहने के लिए कहा, तर पोले-- "जानते हैं आप इन गोरों को ठीक करने की तरकार ? चले उनको । मेरे साथ तनिक भी चों चपड़ की, तो उठाके दे मारूँगा।" उहोंने पिता जा के चौड़े चक्ने साने और दृढ नाजुओं की ओर ईर्षा से देश और कुछ कह न सके । मैं सनाटे की हालत में था, कि भगवान, पिता जा का क्या हो गया ? ( २ ) बमला बहुत ही खूबसूरत और आराम देने वाला था। दूसरे ही दिन उस बदमाश लेफ्टिनेट का माली श्राया, और मालूम हुआ, कि उसने यह कहा, कि लेफ्टिनेन्ट साहन ने यह हुक्म दिया है, कि इस मैंगले का भी तय पर दस रुपये महाने तनरवाह लो। माली पिता जी के सामने लाया गया ! मुझे ठीक पार नहीं कि क्या बातें हुई, लेकिन शायद उसने कुछ गुल्लाखो का होगी, तो पिता जी ने हुक्म दिया कि इसकी मूंछे उखाद लो, लेकिन लेफ्टिनेन्ट रे डर के मारे क्सिी नौकर की हिम्मत न पड़ी तो उसे डाँट कर निकाल दिया। हफ्ते ही भर के भीतर उसने झगड़े की बातें शुरू कर दी। एक दिन दोपहर को नौरों को बुलाकर कदा, कि शोर न करो। पिता जी श्राये, तो नौकरों पर बहुत बिगड़े, कि तुम सब गये ही क्यों ? पिर 1 एक दिन कहला मेजा, कि गले में झाड धीरे से 'दिलवानी, धून उहती है। पानी भरने से फुये की गारी जोर से बोलती थी, इस पर कहला मेजा कि इमे ठोक फरायो । चूँकि नौकर ही कहने पाते थे, इसलिये उन्हें जमानी ही डाँटकर जवाब दे दिये गये। एक दिन सुना, कि उसने अपने घोड़े को गोली मार दी। फिर यह सुना, कि किमा का गधा अँगले में श्राया, तो गोली मार दी। शाम को और मवेरे रॉबर नन्दूक चलता । मजाल क्या, जो कुत्ते और तोते बँगले से होकर निकलें और वह न मारे । जिन्दे घायल होकर बँगले में ही गिरते और इसी सम्बन्ध में वह अपने नौकरों पर गरजता और उन्हें मारता । ये नाते चल ही रही थी, कि हमारी सारा ने उसके गले में हमला बोल दिया। भगवान जाने सच, कि झूठ, पर हमारे नौकरा का काना था, कि गलत नात थी। उनके माली ने झठा नी डागजाम लगाया है, बल्कि उसका कुत्ता हमारे नँगले में माता और बकरा पर झपटता । कुछ हो लेफ्टिनेन्ट ने पिता जी को कड़ी चिट्ठी लिखी, कि तुम्हारी वकरी हमारे तार के पास श्राकर चिल्लाती है, हम उसे गोली मार देंगे । पिताजी ने जवार में लिखा, कि हम तुम्हारे कुत्ते को गोली मार देगे । उसने लिया, कि अगर कुत्ता मर गया तो में तुमसे स्वय लगा । इस पर पिता जी ने लिसा, कि अगर यही विचार है तो बारी और कुत्ते की जान क्यों आये, लड़ना चाहते हो, तो पहले ही लड़ लो । उसी दिन झी शाम की आर्त है, कि रात को नौकर आया, उसने पिता जी से कहलवाया, कि "रोशनी बुझा दो, साहव सो रहा है, उसकी श्रॉसों में रोशनी लगती है। नहीं तो साहर कहता है हम गोली मार देगा" यास्तव में वह नशे में चूर हा रहा था। पिता जी ने ।

नौकर को डॉटकर भगा दिया। वह अभी गश ही था, कितिकी में, जहाँ से रोशनी चमक रही पो, गोलो पाकर नगी, और शीशा नूर चूर होकर उड़ गया । उसका प्रादमी दौड़ा श्राया, कि साँहर कहता है, कि हम तुमको गोली मार देगा। नई तो रोशनो मुम्मा टोपिताजा का कोप के मारे बुरा हाल हो गया, लपक कर गये और असा एक्मप्रेस राहपल निकाल लाये। श्राव देखा न तार सामने ही उसकी बैठक का दरवाजा था, जिसके शीशों में से रोरानी चमक रही थी। निशाना • साध कर जो गोली मारी तो गोली दरवाजे को तोड़ती, भीतर के कमरे में उसके सिङ्गार ये धारने के टुकड़ों को उड़ानी हुई दीवार में घुस गई । एक इल्लड़ मच गया। उपर से वह गरजता हुया उठा, और इधर से पिता जी भी उसी तरह लपके। वह हाने में घुस श्राया, लेकिन खाली हाथ था। पिता जी भी उसी तरह पनियाइन पहो मलटे। नौकर साथ में रोशनी लिए हुये थे। दोनों में कुछ रातचीत हुई । शायद उसने पिता जी को अच्छी तरह देस लिया, कि कैसे ताकतवर श्रादमी हैं। वे यह कहते हुये झाटे थे, कि "इस गोरे को उठा कर दे मारूंगा। शामत श्रार है इसकी "दोनों ने हँस कर हाथ मिलाया। यह अपनी तरस चला गया, और पिता जी हँसते हुये अपनी तरफ चले थाये। पिता जी हालत डर के मारे बुरा हो चुकी थी, और बेहोशी के लगभग थी। जब पिता जी आये तो सूब हँसे । इस घरना के बाद तो नौकरी ने उल्टी चल्यो चला दी प्रगट है, फिसेर को सवा सेर मिल गया था और फिरतो हम बहुत दिन तक रहे, किन्तु वह कुछ न बोला । बल्कि शुभरात को उसको हलुभा भेजा गया, तो वह स्वय इलये का टुकड़ा हाथ में लेकर साता ।

हुथा चला पाया और पिता जी ने भीतर से मैंगार और खिलाया। ईद गे सेवइयाँ सिलाइ । पिता जी का शोध यहाँ से तबादिला । 11 । होगया। - - - सयोग की गात, कि परसों बीत गये। पिता जी के तबादिले पर तनादिले हुए, और ये जगह जगह घूमते हुये न जाने कहाँ पहुँचे, कि यही लेफ्टिनेन्ट फिर मिला। हमारे अँगले के पास हो एक अँगरेज को मोटर बिगड़ गई । तोर की सी अावाज हुई, टायर या ट्यू ध फट गया । हमारा बँगला शहर में दूर था । नौकरों ने जो देखा, तो उसे पहचान लिया । यह तो वही लेफ्टिनेट पी। दिन के दो बजे होंगे । वली मुहम्मद खानसामा झट कुर्सी सिर पर रखकर दौड़ा और उसकी खातिर की । उसने झट हुक्म दिया, कि खाने को लायो । वली मुहम्मद ने झट शालू उबाले और दो मुर्गी के बच्चे जरह करके कच्चे-पक्के तैयार क्येि! चार अडों का पुडिग बनाया 1 नाश्ता उसने खूप इटकर किया । वला मुहम्मद को ठोकरें भी मारी (लेकिन बाद में मालूम हुआ कि वली- मुहम्मट ने केवरा धमह के कारण ऐसा कहा था, एक भी ठोकर नहीं मारा थी। ) इनाम में दस काये उसको दे गया और पिताजा को सलाम कह गया। में स्कूल में पढता था। इस फिस्से को धमड के साथ तरह तरह से बनाकर कहता पिरता था । यहाँ तक कि इसकी भनक मास्टर साहन के कान तक पहुँचा । और उन्होंने भी इस किस्से को आश्चर्य के साथ मुना, दर्जनों दूसरे लड़कों ने मी। वास्तव में यह घटना अपने दग के अनुसार क्या कम था, कि शहर के इस तरफ समीप से एक लेफ्टिनेट पास हुआ। ये बाते आपको अजीप सो मालूम गेती होंगी। इसनिये कि अब तो लेफ्टिनेटों की भरमार है। बहर हाल, यह एक लड़ार लेफ्टिनेन्ट था। इन घटनाओं पर विचार करने से आपको पता चलेगा, कि लेफ्टिनेन्टी कैमी सही कसौटी है। यह पहला लेफ्टिनेन्ट था, जिससे मुझे वास्ता पड़ा । वास्ता भी क्या ? लेकिन मैं लेफ्टिनेटी के बारे में सही और सची कसौटी स्थिर करने के योग्य होगया था, कि मुझे एक और लेफ्टिनेन्ट मिले। समय बीत चुका था। मैं अब बच्चा न था, वल्कि कालेज का विद्यार्थी था । मालूम हुआ, कि सरकार ने यह ते किया है, कि श्रम हिन्दुस्तानी भी लेफ्टिनेट हुश्रा करेंगे । बल्कि कहना चाहिए, कि होगये । इनमें यह पहला लेफ्टिनेट मैंने निकाह की एक दावत में देवा। वे अवध के एक रइस के लड़के थे। न मालूम क्या देपने को तैयार था, कि देखा चले आ रहे हैं एक नवजवान सिर पर दुपल्ली टोपी, खान्दानी अंगरसा, चूड़ीदार पायजामा और इस पर काला पम्प । चले आ रहे हैं सचमुच ठुमक ठुमक । ये लेफ्टिनेट ये, असली लेफ्टिनेन्ट थे। सचमुच अच्छे सजीले जरा थे। लेकिन मैं जो कुछ लेफ्टिनेटी का नमूना देख चुका था, उसे देखते हुये तो सिर्फ 'छम्मीजान' ये । और फिर तबाही पर तगाही यह, कि यह बड़े खुश मिजाज, नरम दिल और मिलनसार थे। कौवाली के बहुत बड़े शौकीन । भला ये भी कोई लेफ्टिनेट में लेफ्टिनेट हुये। मैं लेफ्टिनेन्ट की कसौटी पर कोई राय जाहिर न कर के पाठकों से केवल इतना हो पूछना चाहता हूँ, कि यह लेफ्टिनेंट अगर बिना किछो कारण के बिगड़ लेकिन मुलायम - कर किसी निरपराध राही के चूतड़ों पर लात मारे, तो उसके कमजोर पम्पश की क्या हालत हो। अवध के एक यसवे के स्टेशन पर क्या देखता हूँ कि वेटिङ्ग रूम के सामने कुसी पर एक इस तरह ज्यादा मोटे, कोमल रोटी के गाले की तरह एक साहब गैठे हुये हैं । येहद डाला पतलून, मानरमीला ! पेटी तोंद के ऊपर इतने जोर से क्सी, कि जैते धुनक्ती हुई रुई की गठरा को जोर से कस दो । रेल प्राइ, डाक गाड़ी सेकन्ड क्लास प्लेदपार्म से बाहर दूर जाकर सड़ा हुया । ये हजरत दौडते, या दौडने और लुढ़कने के बीच वाली कार्रवाई को प्ररते हुये चले हैं, कि इञ्जन सीटी दे देता है । होश- हवास गायन ! क्यों-त्यों करके पहुंचे । डिब्बा प्लेटफार्म से बाहर । दोनों हाथ ऊँचा परके दोनों ओर की हेन्डिलों को एफड कर तरते पर पैर रखपर चढ़ने के लिये जो जोर लगाया तो ढीली पतलून जमीन में और झुक गई । फिर श्राप झुकरर पेटी, सहित पतलून को सँभालते है और इसी बीच में गाड़ी यह जा, वह जा! लौटे चले या भा रहे हैं । हर एक प्रादनी उन्हें देख रहा है । मुंह मोड़कर हँस रहा है । कुली में मिर पर होलटाल पर दृष्टि बाती है । लिसा है-लेफ्टिनेन्ट बनरजी । म सदा देसता का देखता रह गया । लेफ्टिनेट गैर लदाका भी होते है ये डाक्टर धं, लेकिन लेफ्टिनेन्ट । मोटेपन के खिलाफ स्थानीय खेल में लेक्चर देने आये थे । सोचे होंगे,-कि चलो एक लेक्चर मुसाफिरों को भी सदा । । यह लेफ्टिनेन्ट अगर किसी को लात मार दे, नहीं अगर लात मारने में कोशिश करे, तम स्सा हो । कम से कम, मैं क्या, श्राप यदि स्वय करीब दो तो शायद हटकर स्वयं लेफ्टिनेंट को लात के निशाने में श्रा जाय । इसलिये कि सबसे सुरक्षित स्थान वही हो सकता है। नहीं तो दूसरी अवस्था में लात की चोट से अधिक डर तो स्वय लेफ्टिनेंट की चोट मौजूद ! इसलिये, कि लात मारने की अवस्था में लेफ्टिनेंट का चैलेंस बिलकुल अाउट हो जायगा, और वह न मालूम किधर और पिस जोर से गिरे । यह सही है, कि मुलायम होगा, लेकिन उसका वजन। श्राप सोचेंगे, कि लेफ्टिनेंट है, ता यह क्या जरूरी है कि लात मारे ही, लेकिन मैं कहता हूँ, कि हजरत न क्यों मारे १ प्रारिसर कोई कारण। घास्तव में में इस मजमून के द्वारा उन विचारों को फैलाना चाहता हूँ, जिनका उल्टा-सीधा लेफ्टिनेंटी से क्मिी प्रकार का पाल्पनिक या या असली सम्बध रह चुना हो । हो सस्ता है, कि में यह भी सोचता हूँ, कि अगर आप खुद लेफ्टिनेंट बनना चाहते हैं, तो इस मसले पर विचार करने में आपको कुछ मदद मिले। जिस जमाने की चर्चा में करता है, लेफ्टिनेंटी का शौक पैल रहा था। रईसों और डाक्टरों में गैर लड़ाका लेफ्टिनेंट दिखाइ पदने लगे थे । तरक्की चाहने वाले, और नये विचार के श्रादमियों में बहुतों ने सामने यह सवाल था, कि नाम के साथ लेफ्टिनेंट का अच्छी उपाधि ठीक होगी, या शब्द लेफ्टिनेंट! लेकिन इसके अतिरिक्त सर्वसाधारण, और स्वास खास लोगों के लिये भी लेफ्टिनट अपने लात के सहित श्रर भी वही अन्य देशीय चीज था । नहीं, बल्कि बुरा न होगा, अगर में कहूँ कि, अब भी है। ૨ 1 - ( १ हे साता है, कि अापका विचार हो, कि अब वह अवस्था नहीं रही । जिधर देखो, स्वय हम लोगों में लडाका और गैर लडाका लेफ्टिनेंट दिपाई देते हैं ! और श्रय निकुल वह अवस्था नहीं है। सभव है, आपका विचार ठीक हो, लेकिन मैं अपने विचार के समर्थन में उससे सम्बन्ध रगने वाला एक नवीनार कहानी सामने रक्यूँगा, जिसक पढ़ने से न केवल मेरे विचार का समर्थन होगा, बल्कि लेफ्टिनेंटी ने, उपाधि और विजय की दुनिया म घमन्द पैदा करने वाली जो स्थिति पैदा करती है, उसके विशेष पहलू पर भी काफी रोशनी पड़ेगी। लेफ्टिनेन्ट का पहला दिन बहुत दिन नहीं बीते, कि सयोग की खूनी से एक डाक्टर साहन के पड़ोस में रहना हुया । कोई पचास वर्ष की उम्र, गठा हुअा दोहग दा। अच्छा गौरा सिलता हुआ रग, शेरवानी पर तुर्की टोपा और वाला ढीली मुहरी का घसिटता हुआ पायजामा । गले म "यस्टाना कोप ।" एक विचित्र ढङ्ग से जमीन की तरफ देखते हुये चलते 14 खिचड़ी दाढ़ी थी तो फ्रेंचक्ट, लापरवाही के कारण "विनाम्पेयर कट" होने से जबर्दस्ती रोकी जाती। बड़े सपल और अनुभवी दाक्टर थे। डाक्टरी म्यूब चलता थी । दिन रात फुरसत न मिलती। एक साथ ही दुनिया की सेवा करने के विचार ने जो जोर मारा तो सेरों सोडा नाईकार सरीद कर उसके कई हिस्से किये । क्सिी हिस्से मे नमक मिलाया तो किसी मे पिटकिरी, और क्सिी म इसी तरह की तरह की सलाई हो रही थी, कि शाम हा बनने के तयारी कर m अभी अधिक रे- हुर, कि यार दिया साइर का नौकर धमा धाया । ये डाक्टर साइम के बहुत बड़े दोस्त पे और नौकरों का भी दिन-रात श्राना-जाना था। छका ने भी रे हो पहलवान से छेड- चाड की । डाक्टर को पूछा और हँस र एक ही गाँस में बोला-कहा भाई पहलवान, अब तो ठाट है! शन भला क्यों गोलोगे ? पहलवान ने बताया, कि टास्टर साहर नहीं है। लेक्नि उससे यह जानकर पहलवान का गुस्सा भड़क उठा कि इस कारण से न योलोगे, कि तुम्हारे डाक्टर साइम लेफ्टिनेन्ट हो गये। लेफ्टिनेन्ट को गाली देकर पहलवान ने कहा-"लेफ्टिनेट की ऐसी-तैसी ! याद रमना मन्चू, हड्डी पसली तोड़ दूंगा छका ने कहा भाइ निगड़ते क्यों हो? हमें तो डिपी साहम ने " "क्सिलिये" "इसलिये, कि डाक्टर साहब को हमारी सरस से मुबारकबाद दे पात्रो।" कैसा कैसा मुबारकबाद ! कोई शादी हुई है, कि कोई लड़का हुआ है " "वे लेफ्टिनेट हो गये।" "पिर उहूँ।'--पहलवान ने रजाई अलग करते हुये कहा- "श्रमावर तार वाला पाया तुम लोगों ने छेड़ने की सलाह कर . । ठेघर तो जा . 1 - ली है। हाडी पसली एफ कर दूंगा किसी धोखे में न प्राया यहाँ से लेफ्टिनेन्ट का बघा छपा घरावर नोला-"यार, तुम तो नाहक बिगड़ते हो ! अच्छा भीतर कहला दो।" "क्या कहला" "यही, कि डिप्टी साहब ने मुबारकबाद दी है, कि डाक्टर साइम लेफ्टिनेन्ट हो गये।" "तेरी ऐसी तैसी ।" यह फर पहलवान झपटा, और एक जूता उतार कर फेंक कर मारा, और सुनाइ सैकड़ों गालियाँ । वह भाग गया । ये जले-भुने पिर अपनी जगह पर श्राफर बैठ गये लेकिन अधिक समय न बीत पाया था कि कोतवाल साहब का नौकर पच्चू चला पा रहा है । यह इनका पुराना, और उन्हें बहुत छेड्ने वाता था। क्षमा न करने लायक उसने सरसे बड़ा जुल्म किया था, कि पहलवान को उस्ताद बनाया । मिठाई न सिलाई और कसरत करने का लॅगोट चुरा ले गया, हार खाने के बाद तो बहुत तङ्ग करता था। पहलवान वैसे भी बहुत जलते थे । "हो माई पहलवान !" उसने पाते ही कहा । उसे क्या मालूम कि अभी अभी पारा एक सौ दस तक पहुंच चुका है। पहलवान कुछ न बोले । डाक्टर साहब को पूछा तो दनी जबान मे यह दिया, कि मरीज देखने गये हैं। "कैसे पाये ?"-इतना जरूर पहलवान ने पूछ लिया। "भइ मुबारकबादी देने के लिये आये हैं ।"-उससे पहा । पहल- - 1

चन कर
वान ने सोचा, कि ऐसा झपेटू, कि निकल जाय । श्रत
पूछा--"कैसी मुबारकबादी?"
"तुम्हारे डाक्टर साहर लेफ्टिनेन्ट हो गये।"
"अच्छा".--पहलवान ने गुस्से को छिपाते, रजाई को अलग
रखते और हुक्के को अलग सरकाते हये कहा-' "लेफ्टिनेट हो गये
हैं । तुम्हारे कोतराल साहय नहीं हुये"
पूर्व इसके कि वह सतर्क हो जाय, पहलवान ने यार उसे दबोच
लिया--"डाक्टर साहब तो नाद में होंगे, पहले तुझे लेफ्रिनेट
बना दूं।"
वह 'अरे अरे' कहता रहा और पहलवान ने उसे उठा कर
दे मारा। 'पहले पहले ।"
दे चूसा, दे चूसा। यह दुहाई देता है । वह छुड़ा कर निकला है,
कि पहलवान ने पिर उठा कर पटसनी दी और अच्छी तरह पीट कर
का-"जावो भैया, हो गये लेफ्टिनेन्ट
सवेरे से परीशान कर रक्सा है।"
उसे गोनने न दिया और फिर जो गुस्मा पागा तो उसने भी कुछ
कहा, और ये मारने दौड़े ! वह गालियां देता पौर कोतवाल साह से
शिकायत परने के लिये कहता हुआ चला गया ।
सलाह कर रखी है
x
x
कोतवाल साहब के नौकर को गये हुये देर हो चुकी थी और पहल
थान का गुस्सा भी ठडा हो चुका था, कि डाक्टर साह भागये ।
मकान के बरामदे की सीढ़ियाँ चढ़ते हुये उहोंने अहमद को पुकारा
और मालिक तथा नौकर में कुछ इस तरह की बातें हुई
३

( १८ )
डाक्टर-अहमद,
अहमद-जी हुजूर (दौड़ता आता है ) तार मिल गया हुजूर" ।'
दाक्टर-( कुर्सी पर बैठने हुये ) तार तो मिल गया, लेकिन तुम
यह बताओ कि तुमने कोतवाल और डिप्टी साहन के नौकरों को क्या
मारा ? तुम्हारे ऊपर पर मुकदमा चलेगा।
अहमद-(घबड़ा कर) मुकदमा !
• डाक्टर-हाँ, सजा होगी।
अहमद-और मेरी कुछ सुनवाई न होगी। मेरे साथ भी इन्साफ
होना चाहिये।
डाक्टर-(बिगड़ कर ) तुमने क्यों मारा ?
अहमद-सरकार • मेरी सुर्ने तो कहुँ नासूर पैदा कर दिये हैं
इन दोनों ने यह कोतवाल साहब का नौकर पुत्तू और डिप्टी साहब
का नौकर छका "
डाक्टर-क्या हुआ?
अहमद-हुप्रा यह सरकार कि ये हमेशा मुझे छेड़ते हैं।
डाक्टर ~ छेड़ते हैं!
अहमद-जी सरकार!
डाक्टर-( बिगड़ कर , क्या छेड़ते हैं ?
अहमद-मुझे पहलवान पहलवान कह कर देते हैं और
डाक्टर-तुम हो जो पहलवान ।
अहमद-तो सरकार इसलिये हैं कि हमारा मनाक उड़ायें।
छेड़ें, हॅरो और हमारा लँगोट चुरा लें।
दाफ्टर-बस यही बात है। इसीलिये मारा।

प्रामद - नही सरकार प्राप मुने गो! मुझे देरते हैं और
पुरमधार का नमक साते हैं, प्रारको दुराममा करते है।
सरर-में करते है, हमें !!
महार-जी सरकार, समोनर णहर पाना म्याने गये हैं। या
था सो पद लिया भाय!
सारवर पाते ।
अमर-समी परसों की यात है, यह पुत्र पो मुप भला
भाने लगा।
टारटर-(पिग पर क्या करने लगा !
पारद-यह पहने लगा, कि मारे पोतवाल साहब तुम्हारे
हादर यादव को मिरों में स्पादियों पहना सकते हैं। फिर सरकार
मी भी कर दिया।
मास्टर-क्या पर दिया ।
अहमद-मैंने यह दिया, कि तुम्हारे कोतवाल साप पोई चीज़
नहीं। हमारे डाक्टर साहम चाहे सो कोतवाल साहस और सारी
कोतयाली पो एफ म्यूगक में अटाचित्त पर।
टास्टर-चुर मातमीन पड़े बेहूदा हो तुम |
अहमद-हुनर में जो झूट कहता हूँ तो यही सजा जो चोर की ।
डाक्टर-गुप रहो। श्राज क्या हुना तुमने मारा क्यों
अहमद-प्राज सरकार
इन दोनों ने मुझे छेदने की सलाए
कर ली है। श्राज टोनों ने डाकिये को भी मिला लिया--उस तार
पाले को
डाक्टर-तार वाला1

-
अहमद-हाँ सरकार । वह तार वाला बड़ा दमाश है सरकार ।।
मैं उसका सिर फोड़ देता, लेकिन निकल गया ! सरकार हम खरी
खोटी सुन लेंगे, लेकिन आपको
डाक्टर-तुम चकवाद दिये जा रहे हो। यह बतायी कि तुमने
पुत्त और लका को क्यों मारा ? जमाने भर की कहानी हम नहीं
सुनना चाहते।
अहमद-पुत् श्राया तो पहले उसने मुझे छेड़ा और लगा
आपको कहने तो मने मारा ।
डाक्टर-क्या कहा?
अहमद- सरकार प्राप की हँसी उड़ाने लगा
डाक्टर-~( चिल्ला कर ) क्या हॅसी उड़ाने लगा ?
अहमद-यापको लेफ्टिनेन्ट पहने लगा सरकार हँसी दिल्लगी
रानर वालों में होती है।
डाक्टर - वो क्या हुआ ? लेफ्टिनेट ही तो कहा।
अहमद-कुछ हुआ ही नहीं १ साहब, इतनी बड़ा नात कह कर
हँसी उड़ाता है श्रापकी हँसी उड़ाये और
डाक्टर लेफ्टिनेन्ट कहने में हँसी उड़ाई'
अहमद---ये तो सरकार श्रापको लेफ्टिनेट बना दिया।
डाक्टर तो फिर । लेफ्टिनेन्ट क्या बुरा होता है ?
श्रदमद--(परीशान होकर) सरकार, किसा भले श्रादमी को
लफ्टिनेट कह दिया और कुछ दुश्रा भी नहीं। मुगर और कुत्ते का
गोश्त साते हैं लेफ्टिनेट।
+-

-- मटर पाने में बिना या मारा, रोमियो भइमर- नग्मा पे नही मारा। उगने प्रारी पर भी ना , टोरा भामर-मनीको हो? राकरर--सा होता है। अहमद-गोरा पाटन का प्रामर होता है। डास्टर-गन बेपर, हम सचमुच सकिोट दो गये। - अहमद-प्राप! सास्टर-हाँ हम। प्रदमद-लेक्टिोटा दास्टर-हाँ हम, लेस्टिोर हो गये हैं। अहमद-चो सरपार फिर अय दाक्टर-श्रवक्या' अहमद-यायनी में चल कर रहना होगा और सरफार गोरों में सो मेरी एक मिनट न बनेगी। टास्टर -छावनी में क्यों रहना होगा। यहीं रहेंगे। गृहमद---और क्वायद परे। सरकार प्रापसे स्थायद परेड

+
डाक्टर-कवायद परेड कुछ न करनी होगी। हमें कवायद परेड
से कुछ मी मतलब नहीं।
अहमद सरकार यह कैसे हो सकता है। गोरा सलामो न
उतारेगा आपकी।
डाक्टर-सलामी क्यों नहीं देगा ? लेकिन कवायद परेड से
मतलब नहीं।
अहमद-सरकार यह कैसे हो सकता है ?
डाक्टर-अरे वेवस, हम श्रानरेरी लेफ्टिनेन्ट है।
नहमद---पच्छा सरकार, यो कहिये, जैसे अपने छुहन लाल जी।
यह म्यूब रही। बड़ा परेशान कर रक्खा है इक्केवालों ने भी सरकार ।
सिर्फ फाजलू इक्केवान पर जुर्माना न फीजियेगा।
डाक्टर-क्या पकता है वेवकूप ।
छुटन लाल जी तो
श्रानरेरी मजिस्ट्रेट है। हम लेफ्टिनेन्ट हैं। खैर, तुमको इससे मतलब
नहीं । प्राज से कोई पूछे तो लेफ्टिनेन्ट साहब का फरना ।
अहमद-और डाक्टर साहब नहीं ।
डाक्टर-(कुछ सोच कर) हूँ! डाक्टर साहन। हाँ डाक्टर
साहन भी, लेकिन नहीं, अगर तुमसे हमें कोई पूछे, तो यही कहो कि
लेफ्टिनेन्ट साहम बाहर गये हैं। लेकिन तुमने जो फोतवाल साहब
नौकर को मारा है, तो उससे बाकर माफी माँगो और उसे खुश परो।
नहीं दो मुकदमा चल जायगा।
अहमद-सरकार, हमें मालूम तो था नहीं ! हम तो यही समझे
कि हमें छेड़ रहे हैं। पिर उन्हें मी तो मना कर दीनिये कि छेदा
न करें!

डास्टर-तुम अभी जाकर उसे मनाली, नहीं तो मुकदमा चल
जायगा।
अहमद-जैसी सरकार की मरजी।
डाक्टर साहब अहमद का सनझा-बुझा कर घर के भीतर गये।
यहाँ रग ही दूसरा था। बीबो भीतर क कमरे में जाने के लिये
कपड़े वगैरह ठीक कर रही थीं। वल्लू आया बाभरचाखाने में सलम
थी । डाक्टर साहब बरामदे से होकर सीधे कमरे में पहुंचे और खुशी
के मारे बीबी से बोले-तो भई, मिठाई खिलायो। तार हाथ में लिये
हुये थे।
पीबी, जो बेहद काम में लगी हुई थीं, चौंक पड़ी। डाक्टर साहब
के हाथ में तो तार, चेहरे पर लेफ्टिने टी की मुमुकुगहर और उनका
मिठाई खिलाओ कहना ! वेगम साहब के ऊपर मानों खुशा की
बिजली गिरी। मारे सुशी के साँस न समाई और सहण खुशी की एक
श्ररक्षित हालत में मुँह से निकल पड़ा-
"ही हैं बज छज छल जो
छज
लड़ लड़ ऐ खल्लू पाया खल्ल पाया गे ।"
इधर डाक्टर साहब ने नाराज होकर कहा-क्या छज, छज लगा
रखी है।
"सल्लू पाया, तार आ गया।" यह कह कर कमरे से बरामदे में
आई और फिर डाक्टर साहब की तरफ लौटी । “ऐ तुम्हे हमारी
क्सम कब हुआ लड़का
तुम तार तो पढ़ो
"है हैं, यह तुम्हें क्या हो गया है ? खैरियत तो है | तुम क्या
सकती हो"
.
.

- "सा लडका - - " "छन्नू भइया के लड़का हुना है।" क्या अपती हो।" तुम मजाम करते हो ! यह तार जो पाया है।" इतने में खल्लू पाया भी तेजी से पहुँची, यह कहती हुई-"मैं पहती या न • मैं कहती थी न लड़का होगा, लड़का हो । । “सा लड़या क्या कह रही हो 'यह'तार तो और है ।" "देखो खल्लू पाया परेशान कर रहे हैं, मजाक कर रहे हैं। अभी अभी मिटाई माँग रहे थे।" सल्लू पाया बोली-“भला मिठाइ क्यों न लेंगे? कायदे से तो 'यमरजन्य सापा मय अंगरसा के बहनोई का हक होता है । मैं अँगरखा दूंगी तुम मुझसे लो अँगरग्वा · ।" "यह क्या वाहियात है फैसा लड़का 'क्या धपती हो?" शीघ्र ही गातफहमी दूर हो गई। यह छज्जू भैया का बिलकुल तार नहीं है । यह तो दूसरा ही तार है। शिमले से श्राया है कि मैं लेफ्टिनेन्ट हो गया हूँ, "ह !" ग्रॉसे दोगों की पटी की पटा रह गई । "लेफ्टिनेन्ट" सल्लू पाया ने यहा- "लेफ्टिनेट ! कौन हो गया?" 'म हो गया।" "लेफ्टिनेन्ट! वेगम साइन ने कहा-इससे क्या मतलब ? क्या पह रदे हो" "यह यह रहा हूँ कि सरकार का तरफ से म लेफ्टिनेन्ट हो गया हूँ । आखिर इसमें सन्देह क्यों है ?" दोनों चुप होकर एक दूसरे को देनती हैं। , । ।

"प्रापिर चुप क्यों हो पात क्या है। यह सब यात है कि में
लेफ्टिनेर हो गया है।"
"ऐ, लोभी यो ! तुम नहीं कर पे! इमने हमेशा लेफ्टिनेन्ट ही
देसा तुम्हें।"
"क्या
क्या मतशय!"
"मतलब यह कि तुम भी श्रोता रद हो मेफिटोट, लेफ्टिनेट,
'तो भाया रतायो, कि तुम लेफ्टिनेट ये पर ! पर दो समझो।"
"मैं तो नहीं था।"
"नहीं होगे भइया माप घरना । इतना तो मैं भी पहूँगी कि
नुम उस समय तो अच्छे भी लगते, अब इमारी बहन ने तुमसे
~ मी किया होता। किसी काम में 'ना' की होती ऐ मइया कभी
उलट पर मात की होती। कभी लड़ी होती, या जुबान चलाये होती
या सिदमन में कोर पसर ।
"अरे, अरे, तो मैं कर कहता हूँ,!"
"तो इस गरीब दुग्विया पर लेफ्टिनेटरी अपारते हुये तुम कुछ
अच्छे नहीं लगते।"
"लाहौल पिलाकूह - कैसी भारत में जान है । अरे साहय, यह
सरकारी श्रोहदा होता है और यह श्रोहदा मुझे सरकार से मिला है।
यह तार इसीलिये श्राया है।"
"और हमारे छज्जू वेचारे का मूठ ही निकला। लड्पा-यड़का
कुछ नहीं।"
"कैसा लड़का किसने कह दिया ! यह तार लो! न मानो
किसी दूसरे से पढ़वालो।"
:

1
H
दी तो
( २६ ).
"इस तार में क्या लिसा है ?"
"यह लिया है कि तुम लेफ्टिनेन्ट हो गये।"
"फिर वही मुर्गे की एक टाँग "
"अरे खल्लू श्राया यह तुम्हें क्या हुआ है
"ऐ, चल खल्लू नन्दा | तुझे क्या १ तेरी तो वह कहावत है-
फाम न धाम, दही में मूसल।" वह ठहरे मियाँ और वह ठहरा
उनकी बीमी । लेफ्टिनेन्ट नहाँ, चाहे जो ने! तू बन्दी कौन ? तुझ
मरदी को क्या तू चल अरनी हँडिया देख
यह चली । भया, ये तुम्हारी बीनी है। वघारो सूज, लेफ्टिनेन्टी
अरे हाँ नही तो
"अरे, अरे, सुना तो अरे सुनो तो सल्लू श्राया
हमारी कसम
"
"क्या व्यर्थ की बातें करते हो?"
श्ररे फिर वही, नासिर क्यों नहीं यकीन करते ?"
क्या यकीन करूँ"
"कि मैं लेफ्टिनेन्ट हो गया"
"देतो भइया, तुम जो समझते हो, कि निलकुल मूर्स हूँ तो
निश्चय पर लेफ्टिनेन्टी कहानी को मैं भी जानती हूँ । दुनिया मैंने
भी देखी है।"
"क्या जानती हो?".
"सब जानती हूँ"
"लेफ्टिनेन्ट क्या होता है ? जानती हो?"
"हाँ, जानती हूँ।"

"जानती फह दिया, कि खाक • अच्छा यतानो, तुम
क्या मानो, मला "
"मैं क्या जानें यह लो नदी बानगी, लेफ्टिनेन्टी के मारे
में तो फौन जानेगा लगा रखी है लेफ्टिनेट, लेफ्टिनेट यह
मुंछ दादी तो हो पहले।"
"भूध दादा।"
"यह पूँछ दाढ़ी लेफ्टिनेन्ट पे पर होती है। मुदवायो न ।”
"क्यों, मुंडवाऊं?"
"और लेस्टिोर मन जानोगे।"
"इससे क्या होता है।"
"यह लो। लेफ्टिनेट को मूंछ दाढो रसो का हुक्म कहाँ है?
तान खून उसे मार होते हैं । गोरों का बड़ा कसान होता है मैं सब
जानती हूँ।"
क्या यक्ती हो ? तीन सूर मार ! निलकुल गलत ! जाने क्सिने
तुम से उड़ा दी है। खून भी रिसी को माप हो सकते हैं ? बिलकुल
.
गल्ता"
यह लो, लेफ्टिोट बनने चले हैं, अभी इतना भी नहीं
जानते।"
"मार होते हैं। अभी कल ही की बात है, दीना का ससुर!"
'अरे, वही दाना (डाक्टरनी से)"
"अरे, वह कल्लू का दामाद न !"
"अरे, हाँ वही, फ्ल्यू निगोड़ा । लेप्रिटनेंट र यहाँ कृलियों में जो
काम करता था। मार डाला लेफ़्टिनेंट.ने।

है
फाड़ देना
.
(: २८ )
"कैसे मार डाला"
"लात जो मारा, तो कलेजा फट गया। मर गया निगोड़ा तड़प
के । फिर थाना कोतवाली सन कुछ तो थी। लेकिन कह दिया गया
कि लेफ्टिनेन्ट के तीन सून माफ हैं । कुछ भी न हुआ लेफ्टिनेंट का।"
"उसकी तिल्ली फट गई होगी । उसमें सून की सजा थोड़े हो
मिलती है।"
"तो फिर क्या है ? तुम भी लेफ्टिनेंट हो गये
किसी की तिल्ली । तुम्हें भी कोई कुछ नहीं कहेगा। तुम्हारी क्या बात
है ? तुम्हें तो चौदह खून माफ हैं । दिन रात यों ही मुइयाँ कोंच कोंच के
मारते हो। डाक्टर ही न,
श्रम लेफ्टिनेंट हो गये
भैया मुबारक हो।"
"बड़े अफसोस की बात है, कि यह खुशी प्रगट करने का समय
था, जो कि मैं लेफ्टिनेंट हुश्रा । और घर में यह अरताव हो रहा है।
अभी कुछ और होता तो घर में सभी प्रसन्न होते
"सुना भैया, खुशी तो उसे होती है, जिसके मन में सुख होता है।
फलेजा ठडा होता है। इस घर से तो सुशी उट गई ?"
"नमर्दस्ती
"जबर्दस्ती क्या ? देस लो हमारी बहन को । श्राज शादी हुये
पन्द्रह साल हो गये, पर गोद खाली । जिस घर में औलाद नहीं, वहाँ
खुशी कैसी"
"लाहौल मिलाकूह ! फैसी वाहियात यातें हो रही है।"
"अच्छा फिर क्या मतलया है ग्यल्लू बन्दी क्या परे
नाचे, कि थिरपे
कि दे । नासिर क्या करे ? जा की, उसे

.
पद पन्दी करने को तैयार है। मनाप्रोन एशिया, किसी ने मना
किया है। या बहारा मीकिगो ने दो-बाल बाणिका
किरा-लोहम पुरा गे हमारा मापान "
"राविमा मैंने। गाकर घर में कहा "
इतने में अहमद दरवाजे से पुकारला है, दार ले पायो ।
अम्मा दौडामा गया, और चिट्टियाँ लाया । सल्लू पाया
चली गई। वारदर णम ने साफ ली । मासिक पत्र और कई
साइयों को नोटिभो । एक निट्टी भी थी।
साक्टरनी येली-पाई गिट्ठी मी है।"
यह चिट्ठी
माटर सादच ने चिट्ठी पदी, और चहकते हुये घोले-लो मुगा
रक हो । लहफा लटका चीरा रही थी 14 माया के यहाँ चौदद
तारीख पो दो लडकियों हुई है।"
"इयाँ।"
"-माँ और रचियाँ दोनों सैरियत से है
डाक्टरनी कुछ कटी हुई अावाज से-"लपियाँ दो-
सल्लभाया
"भाई फिर माय सल्लू भाया की सूरत पर
'क्या है
भावरचीसाने से खल्न पाया । झाँक्कर कहा ।
" भैया की चिट्ठी आई है। दो लडकियाँ हुई है
"
J
"ए"
हास्टरनी-"जुइ लडकियाँ हुई है
राल्लू श्राया दौडी र पाई और उमा तरह परामदे के पास
खठिया जन प्रधापति

.
।
रुक गई, जैसे शंटिग के लिये बाते हुये ईनन को लाल झरी दिखा
मोला- लडकियाँ
दो.
".
"चौदह तारीख की रात को माँ और बरिचयाँ दोनों सैरि-
यत से हैं।"
सल्लू पाया चुप रहीं।
"अरे, तुम तो चुप हो गई"-डाक्टर बोले ।
"झाड पर जाय लडकियों का सूरत पर उड जायें ये लड़-
कियाँ लडकियाँ । लडकियाँ ।। जिधर देसो, आफत जोत रक्खी
है, भगवान, भगवान पर फजलू क यहाँ दिन गिने | क्या हुआ ?
लड़की । ऐनुद्दीन क यहाँ अत्लाई ने सैरियत से पूरे फिय कि
यह लो लड़की • मसीता के यहाँ भी लड़को-और यहाँ भी लड़का
लड़क्यिों न होगई, इलाही तोबा • वेचारा छज्जू ।"
"भइ वाइ, लड़कियाँ ऐसा बुरी होगई।"
"यह लो ! भला लड़कियाँ क्यों बुरी होने लगा झालू दें, चूल्हा
के, तकदीर को रोयें, और लड़के तुम्हारी तरह बने फिरे लेफ्टिनेन्ट ।"
"मुझे तो ज्यू वेचारे पर तरस ग्राता है छन छन ।"
"अरे तो क्या हुआ
"कुछ हुश्रा हा नहा
लो पद जो किसी ने कहा है माला
पर भाला ! घार पर घाव ! छज्जू नदे शनाश है। तेरी जिवनी
तारीफ की जाय, थोड़ी है। तुमने घाव पर घाव साये, पर उफ जो
भी हो।"
"कैसे पाव?"
"घाव ! अरे घाव नहा तो क्या १ लड़का हुआ एक हुआ

चाँद-शा, पर मर गया । दूसरा हुअर और के सगे-सा, वह भी कर गया। तीमरी यह लदली श्राइनो सपोसाय ही साप माँ को भी लेती गई । शायाश दे धान फो ! मटर छी दुलहिन और कशी पहाद सो लाश थी-लो साहर, घर का गाया ही होगया फिर होने परसों शादी स्यों नहीं की। "और तुमने फी तो फौन सी अक्लमन्दी को • अब पाद तकदीर में होती है तो शादी भी होती है अब ये श्रार नई दुलदिन मरने वाली की जूती जराबर नहीं और दिमाग ले लो आसमान पर निगोड़ी कहीं की और गाय, हम समझे ये, कि चलो जैसी भी बुरी भती है ठीक है, कि प्राज सुन लो एक छोड़ दी थरे बाहरे मालिक, मैं तो तुम्हारी खुदाई को मानती हैं और पिर भैया मैं कौन ! ये खड़ी हैं। नाखुश हो भगवान ने एक साथ ही दो-दो भत्तीजियों की भी बना दिया ! “और पिर मैं अपना इंडिया चूल्दा देखें साक पड़ जाये, पालू लाया है कि पत्थर ! गलते ही नहीं !" इतना ही कह पाया है, कि सामने बावरचौसाने से रहीमन घुया जोर से चिल्लाई । जुम्मन ओर से भागा, और रहीमन उसने पीछ। उन्होंने दिया एक चिमटा घुमा कर । वह एक चीज में उलझ कर गिरा और फिर उठकर भागा, रहीमन बुमा चिल्लाई-ठहर तो जा मरदुये तेरा कुरमा बना कर छोड़ । हैजा ले जाय इसे देखती हो बेगम साहमा, गवार ने चिमटा गरम करके मेरे पैर म लगा दिया उसे तो कोई कहने ही वाला नहीं है। मुश्रा बना पिरता है लेफ्टिनेट ।

- " । T - . १ देखो यह क्या वाहियात है। डॉक्टर ने कहा-मना कर दो, इनको, लेफ्टिनेन्ट क्यों कहती है ? "हमसे काम नहीं होता 'दंपती हो धीवो 'पहले तो लकड़ियाँ घीट-घसीट कर चूल्हा ठंडा किये देता था, फिर मेरा पैर जला दिया।" "बुलायो जुम्मन को ?" , वह अपने आप ही श्राया, और दरवाजे के पास रुक गया ! रहीमन बुझा मपटो-"ठहर तो जा मूंडीकाटे!" सल्लू पाया ने पुकारा जुम्मन, जुम्मन !! "वद लेफ्टिनेन्ट बने पिरते हैं परते फिरते शरारतें बच्चा ! :: "फिर वही-" डाक्टर ने बिगड़ कर कहा- मना कर दो उनको । सल्लू अाया ने रहोमन धुया से कहा-ऐ बुया लेफ्टिनेन्ट, रोफ्टिनेन्ट न कहूँ . "दाँ!" "और यह मेरे पैर चला दे लेफ्टिनेन्ट तो है ही वह ।" पल्लू पाया-ऐ घुश्रा, हमारे माई लेप्रिटनेट होगये है "कौन?" डाक्टर साइन स्वय परामदे से उतरं फर नरमी से गोले-ऐ बात यह है, फि में लेफ्टिनेन्ट होगया हूँ । "तुम" सरकार से खिताब मिली है अब इस छोकरे को मत कहो " (महपादकर)" इसे कुछ न कहूँ आवेटा मेरा पर दाग दे।" * . 1 . . और यह मुई

.
.
"लेपिरनेट मत को इसे तुम समझी नहीं बुधा
"मैं सब समझ गई लेफ्टिनेन्ट नहीं तो इस मुये को चहेता
और प्यारा कहूँगी ."
(पात काटकर ) "व्यर्ष चकती हो ! सुनो तो "
"मैं स्वय लेफ्टिनेन्ट हो गया हूँ। और तुम इस छोकरे को लेफ्टि-
नेन्ट कहो
यह उचित नहीं है"
"और यह उचित है, कि यह मरदूद मेरा पैर दाग दे
मैं कुछ न कहूँ "
अरे मैं यह कब कहता हूँ ! मेरा मतलब तो यह है कि मैं को
लेफ्टिनेन्ट हो गया है। सरकार ने मुझे लेफ्टिनेट बना दिया।"
"तुम मुझ निगोड़ी से क्या कहते हो। एक तुम क्या, यहाँ जिसे
देखो, वही लेफ्टिनेट बना पिरता है। प्रक्ष्मद को देख लो, मलाश
क्या वो सखी लड़कियाँ लायें । गीली लड़ियाँ 'फते 'कते अधी
हुई पाती हूँ, पर नहीं मानता • वह भिश्ती है, फितनी चिल्लाती
हूँ, पर वह चूल्हे के सामने तालाब बना जाता है, और एक नहीं सुनता ।
यह तो वही है, उस मुई भगिन को देखो। अाज तीन दिन से
चिल्ला रही हूँ, पर शलजम के छिलके पड़े सड़ रहे हैं। मजाल क्या
जो वह सुने तू मियाँ मेरे ! भगिन क्या मिश्ती क्या
अहमद क्या जुम्मन क्या, मेरे लिये सभी लेस्टिनेट है। श्रय
तुम भी आये मुझी को डॉटने उला चोर कोतवाल को डॉ
उस सँपोले को तो कुछ नहीं, जो मेरा पैर जला गया। उल्टे मुझी पर
बरस पड़े तो मियाँ, तुम तो घर के मालिक ठहरे
"क्या बकवास लगा रखी है
५

. 4 "मियाँ बकवास नहीं । इस घर से अन दूर ही रहना चाहिये, वह मुया, सँपोला मेग पैर जलाकर हू-हू करता फिरे, और तुम उमे डाँटने मारने से तो रहे, आये वहाँ से कहने, कि मैं लेफ्टिनेन्ट हूँ।" "लाहौल दिलाह ! श्ररे, इसको कोई समझायो।" "नही नहीं, सुन लो प्राज तो फिर मेरा कहना है कि उसे मारने के बजाय, जो तुम कहो, कि लेफ्टिनेन्ट हूँ तो मियाँ पिर ये लोग मुझे क्यों चैन लेने देंगे मारने से रहे, उल्टो उसकी इस तरह तरफदारी की जाय ना नाना, अाज चालिस रस होने को प्राये कि इसी घर में है पर यह रङ्ग कभी न देसा "इनको समझायो सल्लू अाया।" "समझाऊँ क्या टॉग बराबर छोकरे ने मेरा जीना मुश्किल कर दिया, और तुम करो उसकी तरफदारी अच्छा बाना जो जी में श्राये, करो । मुझे मौत भी नहीं थाती निगोड़ा (चिल्ला कर) ले घर में घिस तो क्या, अन तो घर का घर लेफ्टिनेन्ट होगया खाक पड़े ऐसे जीने पर ।" पड़ती चावरची गाने में चली गई। डाक्टर ने कहा-"यह तो बड़ा वाहियात नात है। सल्लू पाया उनको अच्छी तरह सममानो। स्वय सोचो, कि भगी और भिश्ती को लेफ्टिनेन्ट कहना कहाँ तक ठीक है।" "ऐ ठीक तो कहती है बेचारी श्रव समझेगी क्वत जापर फा में । तुम्हें जा नाज फुरसत है। निगोड़े मरीज भी मर गये सारे । साने को कैसा चैवत हुअा जाता है फाम | मुझे तो परशो । भैया नुम जानो, तुम्हारा ..

( ३५ )
यह कह कर सल्लू याया भी चल दी वावरची साने की तरफ
और डाक्टर साहब बेगम साहिना के सहित रह गये। दोनों कमरे में
आकर निश्चिन्तता से बैठे। डाक्टर साहब ने शिकायत के स्वर में
कहा- "बड़े अफसोस की बात है, कि तुम बिलकुल खुश नहीं हो।"
"तुम सोचते हो छोकड़ियाँ होने से में खुश नहीं हूँ। दो छोड़
चार हो, मेरी बला से
"यरे लड़कियों की बात नहीं क्या श्रादमी हो?"
"पिर ।"
"मेरे लेफ्टिनेन्ट होने पर ।"
"लेफ्टिनेन्ट होने पर"
"और क्या ? यह कोई साधारण बात है ? भला हर कोई
लेफ्टिनेंट हो सकता है ! तुमको तो बहुत खुश होना चाहिये
था। जन तुम्ही खुश न होगी, तो तुम्ही स्वय सोचो, मेरी खुशी कहाँ
रह गई "
"मैं तो यह जानती हूँ, कि जिसमें तुम खुश, उसमें हम खुश ।"
"पिर क्यों खुश नहीं हुई।"
"अच्छा लो, हुई।"
"हाँ, पिर और क्या ? जो तुम कहो, वह करूँ
"है, लीजिये मैं ऐसी बनावटी खुशी से बाज पाया। श्राप कुछ
भीम करें।"
हो गये।"
Meg लो, यह लो, तुम सठिया जैन यघोषय,
पीकानेर।

खालो तुम "म क्यों सा होता ! हाँ, दुख मुझे अवश्य है, कि तुम्हें खुशी नहीं हुई। "ऐ, मुझे डालो तुम चूल्हे में।" इतने में सल्लू पाया कमरे में श्राती हुई वोली-“यह लो खाना गरम गरम तहरी मैंने कहा उडी हो जायगी।" और साथ ही पीछे बुना रहीमन श्राती हैं, बडनढाती हैं, साने फा रतन लिये हुये-साक पड़े दुनिया को मौत आ रही है, पर आती है नहीं तो रहीमन को रहीमन ने भोजन के बरतन रक्खे तख्त पर और डाक्टर साहब ने कहा-"धुश्रा तुम नाराज न हो सल्लू नाया जुम्मन की खून समर लेना" सुनो तो . "और हाँ बुआ मैंने जो तुमसे कहा या, कि तुम उसे लेफ्टिनेन्ट न कहना तो इसलिए, कि जन मै लेफ्टिनेन्ट हो गया तो छोकरे को लेफ्टिनेन्ट कहना तो स्वय तुम्हें भी बुरा लगेगा। साथ . चस चल रहीमन बुधा तख्त पर चमचे पटककर नोली-ऐ मियाँ, खुदा तुम्हें सलामत रक्खे । यहाँ तो यहीं चख-चख है लगी हुई है निगोड़ी दम और इस रहीमन् नन्दी को न चैन है, न मौत दिन है तो रात है या मान तुम लेफ्टिनेन्ट कह तो चुकी मियाँ घर का घर लेफ्टिनेंट सन लेफ्टिनेन्ट ! खुदा की शान है, यह टाँग परापर छोकरा मेरे सिर पर चढ कर भूते और जुबान सोनू नो लेपिनेन्टी बीच में ! और देख लो उसे अच्छी तरह, अपने डन्डा ऐसा पड़ा है, कि घूम रहा है

और कहता फिर ररा है ! और यहां पर कहा-
यस कि, मेरे दाँव को सबलेफ्टिनेट ।"
उभा रहीमन यह करती हुई अगाउटटनं हो गई । डास्टर
साहब ने कहा-"अरे सल्लू आया, तुमने भी न समझाया।"
"मेरे दिमाग में खुद भूसा भरा है"-पल्लू पापा ने कहा ।
"तुम तहरो सानो-ठडी हुई जाती है।"
दास्टर साहरबाह भी औरता वायद साल" कहते हुये
खाना खाने के लिए बैठे । खल्लू पाया मी चैठ गई । मजेदार साना ।
थोड़ी देर के लिये लेफ्टिनेरी भूल गये । पल्लू पाया योली-"भैय्या
तहरी कैसी है?"
"बहुत अच्छी है, गरम-गरम ।"
गरम-गरम कहा था, कि जैमे तूफान था गया। श्राई उपर स
चिल्लाती हुइ रहोमन वुश्रा और दूसरी तरस नाहर से खिड़का से
अहमद की आवाज आई।
"अन्येर है या नहीं
मेरी कोई सुनवाई नहीं।" और
फमरे में रहीमन बुना ने प्रवेश करते हुये कहा-"मैं सिर पीट पर
निकल जाऊँगी घर से "
"वैरियत तो है !"-खल्लू पाया ने कहा ।
"क्या हुश्रा"-दाक्टर साहब बोले ।
इतमें में सिड़की की तरफ से अहमद बोला--हजार सौ बाते
सुनाई हैं और कहती हैं, कि अब जो आपको लेफ्टिनेन्ट कदा, तो
मुँह तोड़ दूंगी, मुँह तोड़ दूंगी"
"नाहक मुँह तोड़ देगा !"

.. - । . - - (३८) रहीमन धुना बीच में बोली-लो और सुनो. सूप तो सूप चलना भी बोले, जिसमें बहत्तर छेद हुश्रा गुलमरा "साहन मनाकर दो इनको "यह क्या वाहियात है " • "मुझे यह धींगड़े या धींगड़ा भी लगा छेड़ने, ", "अरे क्यों छेड़ते हो अहमद ।" "सरकार, मेंने तो कुछ नहीं छेड़ा । मैं तो सिर्फ इतना गुनहगार कि मेने इनसे पूछा कि रहोमन बुया, लेफ्टिनेन्ट साहब क्या कर रहे है १ इन्होंने कहा कि तेरी लाश पीट रहे हैं और अन कहती हैं कि फिर जो लेफ्टिनेन्ट कहा तो जूती से मुंह तोड़ दूंगी।" "तोड़ नहीं दूंगी तो क्या धो शकर से भरूँगी सुन लो मियाँ कान खोल कर, मैं तुम्हारी सह लूँगी पर इस गुलमरे को मारूँगी जूती ।" "रहीमन बुया, यह तुमको क्या हो गया एक तो स्वय नहीं समझती और दूसरों से लड़ती हो • भाई, इनको समझायो ।" "मुझी को समझा डालना अरे पम्पख्त तुझे मौत भी नहीं श्राती रहीमन निगोड़ी ।" रहीमन मुश्रा मनाई हुई कहती चली गई.--"साफ पडे ऐसी जिन्दगी पर । डाक्टर साहन ने अहमद से कहा-तुम वकने दो इसे ! अहमद चला गया। और अप खल्लू ची ने बात पहुँ।" "वह च्या १ कहो।" "भैया एक

या
"तुम्हारे होश-हवास जा रहे हैं उस लेफ्टिनेन्टी से जो
भगवान, यह लेफ्टिने टी न हुई मुइ वह होगई "
"क्यों ?"
"तुम्हारा तो वही हाल हुआ, कि कोई थे फक्त । एक दिन फक्त
धीची की छाती पर सवार हुये कि “कहो हमें पतह बहादुर खाँ।"
डाक्टर साहब ने कहकहा लगाया। और हँस कर पूछा-फिर
क्या कहा बीवी ने?
"श्रीबी वेचारी क्या कहती ? बोल बन्दा किसका, कि तेरा
बीना का क्या है ? उसी दिन और उसी समय किसी ने झट पुकारा,
पत्त । तो मिया, यह बतायो कि दूसरे लोग तुम्हें क्या कहेंगे ?"
"दूसरे लोग भी लेफ्टिनेट कहेंगे?"
"अच्छा मान लिया मैने पर कुछ तनख्वाह बनरजाह ।"
"तनख्वाह तो कुछ नहीं।"
"ऐ दैया (चौंक कर गोली ) कुछ भी नहीं । अरे इस पर यह
हुल्लड़।"
"देखती भी हो, इज्जत कितनी है । श्रोहदा कितना बड़ा है ।"
"खाली इज्जत को लेकर क्या कोई चाटे ! पैसा कौड़ी एक न दे
और नाम दारोगा धर दे वही तुम्हारा हाल हुश्शा।"
"याया, तुम जानती नहीं हो । श्रोहदा बहुत बड़ा होता है।"
"खाली बम्बूली।"
"यही क्या कम है "
"होगा भैया !"

( ४२ )
पर बैठी थीं और सल्लू पाया, नावरची खाने में थीं। पाते ही नीची
फो रोगी के मर जाने की सूचना दी।
"रदमत खाँ मर गये वेचारे "
"अरे सच
"वहीं तो गया था। दोपहर को तीन इन्जेक्शन दिये, लेकिन
बेकार ।"
"तो यों क्यों नहीं कहते कि मार पाये उसे भी ..।"
"पागल हुई हो !"
"श्रो खल्लू पाया-सल्लू अाया अरे, यह चल से वेचारे
रहमत माँ "
"अरे क्या सच 'दूर से चीसी और दौड़ी हुई पाई चल
चल क्या हुया ?"
हाथ उठा कर डाक्टर साहब की तरफ बताया |-"खड़े हन,
पूछ लो, लारर बार कहा कि तुम रहने दो “उस बेचारे को रहने
दो सुई मत भोंकना' गरम दवाये न देना पर वे तो नहीं
क्यों ? मेंने जो कहा था मेरी जिद ।"
"पागल हुई हो तुम तो
"अरे मुझे भी तो नताशी सहसा क्या हो गया निगोड़े को "
"होता क्या
'दिल में दर्द पैदा हुआ था । जब तक पहुँचू
।"
"और कोई दवा नहीं दी।"
"दी क्यों नहाँ"
"कौन सी दवा दी"
कन
स्चतम

"इन्नेक्शन।
"ऐ है'-चौककर सल्लू उछल सी पड़ा। और डाक्टरनी के
मुँह से निकला-सुई भोंक दी
खल्लू बोली-दिल में
"दिल में क्यों भोक्ता
भगवान हा बचाये तुम लोगों से।"
"दिल में ही तो उसके दद हो रहा था पिर कहा और
दे दिया
"
"हाथ में दिया 1"
डाक्टरनी गोलीं-यह लो! कहो पाया कैसी रही वेमौत
मरा निगोड़ा ! नज्जू के लड़के का सा ही आल हुया बिलकुल
नाजू के लड़के का सा हाल !
डाक्टर
नन्नू के लड़के का सा
'अरे भूल गये इतनी जल्दी ! पीठ में दर्द पैदा हुआ था निगोड़े
के और तुमने दो सुइयाँ उसकी रान में भोंक दी ! "पीठ का दर्द ज्यों
कानों और रान का दर्द घाटे में।"
"और मैं हाँ हाँ करती रह गई"-सल्लू पाया बोली।
"तुम क्या जानो १ लाहौल दिला कह !"
हम क्या जाने ? अरे भैया दिल में निगोड़े पे दर्द हुमा, और
हाथ में सुइ लगाई । वही हाल हुआ "मा घुटना, झ्टे आँख
श्ररे किसी राह चलते को पकड़कर गोद दिया होता थाहरे
"
डाक्टर-तुम जानती नहीं हो । क्या फहं ? हाथ का इन्जेक्शन
पून में मिलकर शीम पहुँच जाता है।"

डाक्टरनी-मतलन, कि क्या कहूँ ! निगोड़े को मुलस कर रख
दिया। यह तो फहो कि इशर गर्मियों में मैंने बचा लिया था
तरकीबों से।
डाफ्टर-यापने अापने बचा लिया था। क्या कहते हैं ? जरूर ।
और इतनी समर नहीं, कि वह इसी टिचर से ठोक हुश्रा । वरानर
टिचर ही दिया गया उसे ।
डाक्टरनी-सल्लू याया, तुम तो मेरठ में थीं । वह छोकरा दया
लेने पाता, तो दवा लेकर सीधा मीतर ही श्राता मैं बहन उसमें
सत्त गिलोय बसलोचन और दरियाई नारियल मिला देती ! तन
कहीं जाकर उसकी छाती की गरमी दूर हुई।
डाक्टर-है ! यह क्या ? गजब किया तुमने !
डाक्टरनी -लो और मुनो ! गजन वह था, या यह कि सुइयाँ
भौक्कर सातमा
लाख बार कहा, कि ऐसे मरीज को तो रहने दो।
डाक्टर-यह क्या गजन दाया था।
डाक्टरनी -तुम थोड़े देखते हो कुछ ! बहन, यह नहीं देसते,
कि त्योहार पर तो और अाये गये यह तो जर देखो बहन तोहफे
भेंट की चीजें ! भगवान झूठ न बोलाये, साल में डेढ़-दो सौ रुपये
पीस के इसी रहमत खाँ से श्राते थे। ऐसे मरीज को अगर सुइयाँ न
भोकते तो अच्छा या ]
डाक्टर-इस तरह की हरकत मेरे साथ की गई है, कि मुझे
अधिक श्राश्चर्य होता है, और मुझे यह मिल्कुल पसन्द नहीं ।
डाक्टरनी और मुझे यह पसन्द है ?
डाक्टर-क्या?

(6)
डाक्टरनी रहमत खाँ वह सेट वेचारा महीने के महीने
गाँव से धो भेजता।
खल्लू-अरे, वद चिरौंजी लाल ! वह मर गया ।
डाक्टरनी-कब का! भोंक दो उसे भी सुई हाँ तो चिरौंजीलाल
और वह ठीकेदार ये तीनों के तीनों मरीज ऐसे थे, कि उनसे
लगी बैंधी श्रामदनी होती थी। पसल बदलने पर मामूली खाँसी बुवार
हुआ । चलो सौ पचास रुपये पीस के आये और दवा के दाम ऊपर
से । बराबर सिलसिला चला जाता था। पिर मुझे यह कैसे पसन्द हो ?
सल्लू-ऐसे मरीज का इलाज तो ठडी दवाओं से किया
बाता है।
डाक्टर-मुझे यह तो बताओ, दवा बदलने की हिम्मत कैसे हुई ?
डाक्टरनी-जान बचाने के लिये। अब घर का सर्च कैसे
चलेगा १ आमदनी वाले सब मरीज तो गायब ।"
डाक्टर-मैं कुछ नहीं जानता, श्रामदनी बोमदनी।
इतने में नाहर से आवाज आई, कि कम्पाउण्डर साहब आगये।
मानों चौक से पड़े | "श्रापरेशन"-मुंह से निकला।
खल्लू-अरे जल्दी जाश्रो, आपरेशन !
डाक्टर तेजी से बाहर पहुँचे । वहाँ कम्पाउण्डर साहब मौजूद
थे-"अजीब मामिला--कम्पाउण्डर माहब ने कहा।
कम्पाउण्डर-आप कहाँ ये?
डाक्टर क्यों ! यही तो था। इन्तजार ही कर रहा था । तुम
कैसे पाये ? मोटर कहाँ है १ चलो न !
कम्पाउण्डर-चले कहाँ ? श्रापरेशन हो भी चुका।
।

। . 1 - - . अहमद । डाक्टर हैं | क्या कहते हो ? हो चुका ? कम्पाउण्डर-और क्या ? वहाँ सन सामान तैयार था। दो बार श्रापको लेने के लिये मोटर भेजा ! अहमद ने कह दिया कि नहीं हैं। फिर डाक्टर बनर्जी तो मौजूद ही थे । लाचार होकर उन्हीं से आपरेशन कराया। डाक्टर-है ! यह क्या गजन अहमद दौड़ते हुये आते हैं। अहमद-जी सरकार ! डाक्टर-मोटर श्राया था ? अहमद-पाया तो था साहब दो गार । श्रापको पूछता था। डाक्टर-फिर ! अहमद-मेंने दोनों पार कह दिया, कि लेफ्टिनेन्ट साहर - नहीं है। डाक्टर-अरे, मैं तो भीतर था । तुम्हारे सामने ही तो गया था। अहमद-थे तो साहब। डाक्टर-तो फिर तुमने यह फैसे कह दिया कम्बख्त ! अहमद-सरकार, श्रापही ने तो सबेरे हुक्म दिया था, हमें अगर कोई पूछे तो कह देना, कि लेफ्टिनेन्ट साह नहीं है। और यह सुनकर डाक्टर साहन गरज पड़े तो कम्पाउण्डर साहब परस पड़े । श्रन श्रापही सोचिए, कि वह हाल हुश्रा, "मरे पर सौ दरे।" पहा तो जरूर था, लेकिन यह थोड़े ही कहा था, कि लेफ्टिनेन्ट साह घर में हों तो तब भी फह दे कि नहीं हैं। अहमद ने हाथ जोड़ कर कहा-"गलती हुई, कुसूर हुआ!" पिर अब परते भी क्या ? 1

(४६)
गर्दन मुशाये सोये घर में पहुंचे। धोनी ने पाश्चर्यचकित होकर
कहा-अरे श्रापरेशन
"रे तुम तो लौटे पा रहे हो-" खल्लू गोली।
"अरे, गये नहीं ।"
"अरे गोलोन ।"
"अरे, यह चुप क्यों हो "
।"
डाक्टर साहन ने मोठे पर बैठते हुये सब कुछ तुना दिया ।
"बरे है !" सल्लू पाया ने चासकर कहा और माथा पकड़ार
डाक्टरना ने कुछ नपरा । स एक अोर को गदन झुक गर ।
रसीमन बुधाप मुंह से निकला--"हाय अलाह" और रोटी तवे
पर अलकर छाता पाड़ कर रह गई । तथा मुंह पाडकर देसती की
देग्नती रह गइ कि रोटी जलकर कोयला हो गई।
डाक्टर ने एक जुभाई ली । सिर कुछ चपरा-सा गया। प्रारमान
का तरफ देसा । बगल, तोते और कौवे कतार जॉवर तेजी से सेरा
लेने चले जा रहे थे।
उगलों की तार जैसे पौग सिपाही
एक उनम
सनसे धागे उसकी दुम नोची हुइ था
लेफ्टिनेट न हो
अाज ही हुया हो शायद
एर धुंधला सा मालूम हो रहा था । जाडे। म शाम मिस तेजी
से सरम हो रही थी। ग्रासमान पर एक कालिमा सा फैनती जा रही
भगवान जाने

( ५० ), थी। असल में इस समय बो श्रापरेशन होते हैं, उसमें बिजली की तेज - रोशनी की जरूरत होती है । जुम्मन ने सहसा उधर बरामदे की तरफ सामने सट से बिजली जला दी । डाक्टर जैसे चौक पड़ा । पास के बगीचे से चिड़ियों के बसेरा लेने की आवाजें पा रही थीं। लेफ्टिनेन्टी का पहला दिन खुदा की मेहरबानी से अच्छी तरह खतम हो गया था।

महारानी का सपना मेरी उम्र जर दो साल की थी, तो कई जगह से मेरी शादी के पैगाम श्राये। उनमें एक ऐसा पैगाम था, जो एक रियासत को यहाँ से श्राया था, लेकिन लड़की बहुत बड़ी यो। वास्तव में उसकी उम्न पन्द्रह सोलह साल की थी और मैं केवल दो साल का बच्चा । चूंकि यह स देश एक महाराज की राजकुमारी का या, इसलिये पिताजी महाराज ने इन्कार तो नौं किया, पर चुप हो गये। जन मेरी उम्र पाँच साल की हुई तो इसी रियासत के वारिस की लड़की के लिए पिताजी महाराज ने रिश्ते की बात चीत चलाइ। उन्होंने तो अपनी लड़की के लिए पैगाम भेजा था, और यहाँ से उनकी पोती के लिए पैगाम गया। बहुत सात-चीत के बाद उन्होंने इस शर्त पर रजामन्दी प्रगट की, कि पहले लड़की से शादी कर लो। जब पोती जवान हो जायगी, उसे भी न्याह देंगे। मानों पोती से शादी करने की शर्त ही यही निश्चित हुई, चूँकि पिताजी महाराज पोती से शादी होना जरूरी समझते थे, इसलिए उहोंने इस शर्त को मजूर कर लिया। और मेरा सम्बध लड़की और पोती, अर्थात् फूपी और भतीजी, दोनों से पका कर लिया। क्योंकि ऐसा काम राजपूतों में बुरा नहीं समझा जाता। मेरी शादी से पहले हो, पिताजी महाराज का स्वर्गवास हो गया । उनको बरसी के बाद जब मैं गाठ साल का था, तो मेरी शादी हुई।

और (५२) मैं अपने माँ-बाप का एकलौता बेटा था। न मेरी कोइ बहन थी, न कोई भाई । बाप की मौत के बाद में गद्दी का मालिक हुआ। मैं चूंकि नाबालिक था, इसलिए रियासत' का इन्तजाम कौन्सिल और एजेन्ट के हाथ में या। मेरी शादी रड़ी धूम धाम से हुई। दोनों रियासतों की तरफ से दिल सोलकर रुपया पर्च किया गया और मैं महारानी को ब्याह लाया । उस समय मेरी उम्र पाठ साल की थी और मेरी, महारानी की उम्र कोई इक्कीस नाइस साल की होगी। x म बैगनी रज का बनारसी प्रचकन पहने हुये था, और शनती रज की कमस्वाव का पायजामा। प्याजी रङ्ग का सापा सिर पर था जिसमे हीरों की कन्नगी लगी हुई थी और चारों तरफ मूल्यवान जवाहिरात टके हुये थे। मेरे जोड-जोड़ पर हीरे और अवाहिरात के गहने थे, और गले में पचहत्तर लाख की कीमत का सच्चे मोतियों का यह प्रसिद्ध सतलरा हार था, जिसे बादशाह जहाँगार ने मेरे परदादा को दिया था। यह हार मेरे घुटने तक था। आजकल उसकी कीमत का ठीक ठीक श्रन्दाज लगाना बहुत मुश्किल है। मैं महारानी के सामने कुर्सी पर बैठा था। महारानी गुलाबी रङ्ग के कपड़े पहने थी और गुलानी ही शाल नोडे हुये। बिजली की रोशनी से सारा कमरा जगमगा रहा था। जितने झाड़-फानूस थे, सभी प्रकाशवान थे और दिन सा हो रहा था। मैं चुपचाप बैठा अपने बायें हाथ से दाहिने हाथ की उँगली कुरेद रहा था। कभी कभी नजर उठा कर महारानी की तरफ देख लिया करता था । जो गुलार कपड़ो में इस तरह लिपटी हुई थी, कि उनके हाथ की उँगलियों के अलावा और कुछ भा निवाई न देता था। नारों तरण सन्नाटा धारा हुमा था! पेरल कमरे की घड़ा टिक टिक गागराज सुनाई देती थी। मुझे नौद-सी मालूम हो रही था, कि घड़ी ने भारह नजाये। महारानी जैसे कुल चौक मी पड़ी । मैंने भी घड़ी की तरफ देखा, और महाराणा की तरफ । उहोंने अपना दुशाला उतारकर अलग रस दिया। प्रपती चूंघट को कुछ ऊपर को सरकाया। मैंने उनके सूबसूरत चेहरे की एक झलक सी देखा, कि वे उठ खड़ा हुई। मेरे पैर छकर अपना हाथ तीन नार माये पर लगाया और प्रेम से हाथ पाड़ पर मुझे मसहरी पर बिठाया । सुराही से शराब का प्याला उँडेल र सामने उपस्थित किया । मैंने उनका तरस देखा, और पिर प्याले को तरस । म चुप था। 'पी लो।" उन्होंने धीरे ने कहा--पी लो। यह एक प्रथा ही है।" यह कह कर मेरे पास श्राकर उन्होंने अपने हाथ से शरान का प्याला मेरे मुंह से लगा दिया । मैंने दो एक पूंट पिये। मुझे शराब से बेहद नफरत थी। उन्होंने देसा कि मैं नहीं पीता तो फिर कहा- "पी लो।" मैं पी गया, तो उन्होंने कहा--"अब एक प्याला मुझे दो।" उहोंने स्वर भरकर मेरे हाथ में दिया, और कहा-"यह मुझे दे दो। मने उनकी तरफ देखा। ये मुमुकुरा रहा थी और मे उल्लू, काठ का उल्लू बना बैठा था। मैने हाथ म लेकर उनसरी तरफ बढ़ाया तक नहीं। उन्होंने मेरे पैर छूकर स्वय हाथ से ले लिया और पीकर फिर मेरे पैर छुये और प्याला रख दिया । में नजर उठाकर फिर उन्हें देसा। अब वे बेहद गुस्ताखी से मुसुकुरा रही थीं ! "तुम चुर क्यों हो ?" महारानी ने हँस कर कहा--"मैं तुम्हारी कौन हूँ? ।

( ५४ ) तुम जानते हो।" उन्होंने उसी तरह हँसते हुये कहा-"बोलो, चुप क्यों हो । जानते हो, मैं कौन हूँ" बन उहोंने मुझे बहुत नहलाया, तो मैंने सिर के इशारे से कहा- "हाँ जानता हैं।" "पिर मुँह से चोलो। बतायो कौन हूँ तुम्हारी महारानी है। कहो।" "महारानी"-मैने धीरे से कहा । श्रन उनसे जब्त न हो सका, और हँस पड़ी। मेरे गले में हाथ डाल कर उन्होंने कहा-"तुम्हें नींद श्रा रही है । सो रहो।" यह कर मेरे सभी गहने एक एक करके उतारे और अचकन उतार कर मुझे मसहरी पर लिटा दिया । मैं मसहरी पर लेटा, तो मुझे चित लिटा कर हाथ पकड़ कर कहने लगीं-"तुम शरमाते क्यों हो ? मैं तुम्हें गुद गुदाती हूँ ।" गुदगुदी से मुझे हँसना पड़ा। मेरी शरम उन्होंने इस तरह दूर कर दी। और फिर हम दोनों दो बजे तक बातें करते रहे-"क्या पढ़ते हो ? क्या ग्वेलते हो, और किसके साथ खेलते हो ! खाना किस समय साते हो।" इत्यादि, इत्यादि । और फिर नसीहतें दी जाने लगी, कि क्या करना चाहिये। फिर मैंने कहानी सुनाई, कि किस तरह शादी से कुछ ही दिन पहले मैंने अपनी हवाई बन्दूक से एक पाख्ता मारी, और मैने अपनी विलायती खिलौने की चर्चा की। यदि वे मना न कर देती तो मैं उन्हें उसी समय अपने साथ ले जाकर अपनी बन्दूक और दूसरी सारी चीजें दिसाता। उन्होंने कहा, कि सवेरे देखेंगे। x - ( ५५ ) बहुत जल्दी महारानी से सधौ और गहरी दोस्ती हो गई। ये मेरे सभी मेलों में सम्मिलित होती। बसों और नागौरदारों के एक उम्र के लदकों की पौर फी पौर थी! मारानी के गया और लड़कों लड़कियों वया दूसरी औरतों के साय पिने में दिन रात प्राँस मिचौनी सली जाती। प्रन्दे अच्छे स्वाँग यने जाते और तूप मेल समारो होते। महारानी राजा धनती और मैं रागी। किले के भीतर ही भीतर पनुष भाप की छोटी-छोटी लदारयाँ भी होती। पौने मना करती और किले जीते जाते। मतलब यह, कि महारानी मेरे यचपा पे एमी खेलों में दिलचस्पी लेती, कि अब जो विचार करता हूँ तो बुद्धि पाम नहीं करती, कि किस तरद इन देकार बातों में भी लगता होगा। मुझे महारानी बहुत जल्द मुहम्मत होगई। मैं दौड़ा-दौड़ा भाता तो उन पर कूद पड़वा और ये मुझे गोद में उठाकर चाकर दे देती। और मैं चिल्लाता, कि मुझे छोड़ दो। वे छोड़कर गुदगुदा कर मेरा पुरा हाल कर देती } मतलब, कि मैं कह नहीं सकता कि इन दिनों उनके साथ मेरे कैसे मनोरक सम्बध थे। पहुत शीपू ये किले याहर ऊँची इमारतों में ले गई। और हम दोनों अब सबसे अलग रहने लगे। यदि मुझे कोई जरूरत होती तो महारानी से कद देता। यदि कोई शिकायत होती तो महारानी से पहता। रियासत के प्रबधकों को बुलाकर ये मेरे सम्बन्ध में ग्यास हिदायत करती और मेरे सभी निजी मामलों के बारे में दखल देकर हुस्म जारी करती। रक्षेपत यह कि वे मेरी महारानी और गार्जियन अर्थात् निरीक्षिका, दोनों थौं । मुझे बेहद चाहती थी। मेरे दिल में उनकी मुहम्मत ऐसी बैठ गई, कि कह नहीं सकता, कि ये किस तरह मेरा - (५८) से कोई नया राग गाती । उनको सुन्दर श्रावाज झील के श्राप पास की पहाड़ियों में गुनगुनाती और गूंजती चली जाती। रात के बारह बजे पिर सजी हुई नावों में बैठते ! नावे चाँदनी रात में पानी के ऊपर गाने और साज के साथ हिलोरे लेती और महारानी की रागिनी तथा उनकी सुरीली और ऊँची अावाज पानी में झन झनाती मालूम देती। और देसते ही देसते सारी झील को अच्छे स्वरों से भर कर तरगित सा कर देती । एक तो जवानी का उन्माद, फिर सिर पर प्रेम और फिर हो याग । यह राग और यह समा, फिर मेरा दिल लगा हुश्रा महागनी से और महारानी का मुझमे । बार बार मैं चौक पड़ता कि मैं कहाँ हूँ और मेरे इधर उधर क्या हो रहा है। क्या इसी को तो स्वर्ग नहा कहते १ आराम से जीतता हुया जीवन स्वप्न की एक स्थिति सा मात हो रहा था। मेरा, और महारानी, दोनो का प्रेम और दोनों की सामक्ति जमाती पर थी। सोच और दुम तो बड़ी चीज है, दिल में इनका विचार तक न था कि इसो समय 'महाराना की भताजा से मेरी शादी के दिन निकट आ गये । इतने निक्ट, कि हम दोनों चौंक से पड़े। जैसे कोई सहसा स्वप्न देसता देसता चौंक पड़ता हो । दुनिया को देखिये, कि सत्रको यही मालूम होता था, कि इस शादी का समय इससे अच्छा दूसरा नहीं ! हालाकि ध्यान से देखा जाय तो इससे अधिक वेमौके की बात शायद ही कोई दूसरी थी ! पिर अगर ससुराल वाले यह सोचते और कहते तो अच्छा भी था । लेकिन वहाँ तो रेजीडेन्ट से लेकर रियासत के मामूली नौकर तक की जुबान पर यही था, कि माशा अल्लाह महाराजा साहब बहादुर नौजवान हो गये और श्रम जूनियर महारानी को शीघ्र व्याह लाना चाहिये। .

( ५६ ) जन शादी के दिन निकट आ गये, तो उसका बुरी चर्चा से भी कान टुसने लगे । महारानी और मेरे प्रेम का यह हाल था, उस, एक जान नौर दो शरार थे । इस शादी का स देश ही दिल में दु स पैदा करता था। महारानी का एक ही भाई था और उसकी यह एक ही लड़की थी। किसा ने कहा है, कि फूषी भतीजी एक जात । इसलिये महारानी को भी अपनी भतीजी से अधिक प्रेम था । वे स्वय इस उरी चर्चा को छेड़कर मेरे पहलू में एक सजर सा मोंक देती थी। x x X एक दिन की बात है, कि झीन के किनारे गाने जाने का मानद से भरा हुआ समारोह हा रहा था । नतकियाँ सुनहली टोपियाँ दिये हुये मम्ती से नृत्य कर रही थीं। कभी कभा मेरी आँख, नाच के झमारे के साथ, नाच, की और चली जाती थीं, नहीं मैं तो इससे कहीं अच्छा नाच देखने में तन्मय था।मैं महारानी की आँसों का नृत्य देख रहा था। या उस प्रेम का जो उनके चेहरे पर उछल रहा था । और जिससे उन अोठों पर ऐसा ऐसा कम्पन हो रहा था, कि मालूम होता था, कि उन सारे चेहरे पर मुसुकुराहट नाच रही है। गाने में, नाच के झमाके के साथ, मैं स्वय भी ताल देने लगता था । मतलब यह कि एक अनोखा हा रङ्गान परिस्थिति थी । तबीयत अानन्द में वेहोश थी कि इसी मस्ती की दशा म मेरी शादी की चर्चा छिड़ गई । मुझे क्या मालूम था, कि यह महफिल इस प्रकार अस्त-व्यस्त हो जायगी । इस असाम- यिक चर्चा का प्रारम्भ एक सेहरे से हुआ, जो गाया जा रहा था । शीघ्र उसी सेहरे का एक पद मुझ पर लागू क्यिा जाने लगा। नौबत बातचीत तक पहुंचा।

( ६२ ) . राजकुमारियाँ रियासत के तरत और ताज का आभूपण होती है। एक रड़ी रियासत की बेटी, या एक महाराजा की बेटी को महाराजा के हा घर जाना चाहिये । महाराजा गिने-चुने हैं और राजकुमारियाँ बहुत अधिक हैं। मेरे भाई की बेटी किसी ऐसे वैसे के यहाँ नहीं जा सकती। मुहब्बत दूसरी चीज है, और शादी दूसरी चीज है । तुम्हें अगर मेरा भतीजी से प्रेम नहीं है तो न हो, मुझसे तो है । बस, यही प्रेम इस • बात का प्रमाण है, कि तुम शादी अवश्य करोगे । तुम्हें शादी करती पड़ेगी । तुम आत दे चुके हो । तुम गजब करते हो । भला सोचो तो, कि मेरा भतीजी एक बड़ी रियासत की पोती और एक बड़ी रियासत का लड़की है । वह बड़ी रियासत में न ब्याही जाय, और फिर मेरा वजह से ! यह असम्भव है!" मैने इस लेक्चर को सुना और सुनकर महारनी को सिर से पैर तक देसकर कहा 'तो क्या, तुम सचमुच दिल से चाहती हो, कि मैं तुम्हारे ऊपर तुम्हारी भतीजी को सौत बनाकर ले अाऊँ ? क्या सचमुच तुम यह दिल मे चाहती हो? महारानी ने कुछ अजीन ही ढङ्ग से कहा-"बेशक मैं दिल से चाहती हूँ | और क्यों न चाहेगी, मेरा एक ही भाई है और एक ही भतीजी है।" "लेकिन मुझे उससे बिलकुल प्रेम न होगा।" । महारानी ने मुसुकुरा कर कहा-"तुम श्रमी रच्चे हो। बच्चों की सी बातें करते हो । बाटो दिल मिलेंगे, तो श्रासिर क्यों न प्रेम शेगा? सुना न रगस्ता, तुम औरत तो हो नहीं !"

मोमुरा मानर मुंझला पर कदा-गुम मेरे प्रेम पो टारा रही हो।स्या में छोटा है ? क्या मैं तुममे नकली प्रेम करता हूँ। - महारानी ने दो बार मेरे पैर छूकर हाप अपनी प्राों और मस्तक पर लगाया, और दोनों सल नाम दार कर कहा-"दरगिज नहीं, हरगिज नहीं । तुम वास्तव में समझने नहा । दारा प्रेम मुझमे लदयपने का प्रेम है । तुमो तो मुझमे प्रेम का सरफ सीग्रा है। श्रमन में सच्चा यात यह है, फि एफ औरत पा एक नई उम्र के लइये ये साथ तो अन्तिम प्रेम । सरना है, लेपिन यर श्रावश्यक नहा कि एक लड़ये का भा यही हाल हो। और फिर एक ऊँची रियामत ये महाराजा, जो पेमे भी एफ दिल नहीं रखते। उनके दिलों में ।" महारानी ने एक विनित ग स मुमुत्सत हुये कहा- ये दिलों में तो पातरमा की तरह गाते हैं।' मदारानी ने ता यह मुमुदरा पर कहा, और मैं इन सभी पचड़ा पो छोड़ कर टाक मुर चेहरे पर लगे हुये सुगधित, चमार और सफेट पाउडर को गमय पो देख रहा था। उसकी मुमराहट न जाने मेरे लिये क्या थी ? उनए चेहरे की टमक, और फिर उनका आँखा का असाधारण चमक ! उफी बड़ा बड़ी पलकों से मानों चमक का चिनगारियां सी निकल रहा थीं । सौदय को यह अधिक्ता, और पिर ये गाते । म पैचेन सा होगया। मैंने येचैन होकर उनमा मुन्दर हाथ उठा कर चूम लिया और उसे अपने दिल पर रसकर शिकायत के स्वर मे कहा-इस दिल में तो रस एक ही खाना है और उसमें केवल तुम हो।

"केवल मैं दबी हुई श्रापान से महारानी ने पलकें झपण पर कहा। तुम तुम -धीरे से मैंने लम्बी लम्बी सॉस लेते हुये महारानी मेरे दिल की रानी दिल की कहा-'मेरी मगरानी॥ घे धारे वीरे मरी तरफ वेकानू तोर मुकी चली ग्राई १ प्रेम रे नशे में हम दोनों चूर थे , उनका मुझने और मुझे उनसे प्रेम था। मैने उनके सूबसूरत बालों को उँगुली से लाया, कि उनके चेहरे पर सुनहले मुगधित पाउडर की वर्षा मा रोगई। ये मुसुकुरा रही थीं। मने कहा, कि एक जल्सा और हो, पिर सायें ! महारानी की हँसी की यावान से एक जीवन सा पैदा होगया । उनकी ताली बजते सी छमा- छम और भनाभन की श्रावाजे होने लगी और नर्तकियों का नाच शुरू होगया! बहुत शीघ्र नाच सतम करके महारानी ने श्रले गाना शुरू क्यिा । पहली ही लय पर मुझे एक मूर्छना सी श्राई । फिर जो उन्होंने तान यांची और प्रेम का गीत जो गाया तो मुझे ऐसा मालम होने लगा, कि जैसे उनकी सुरीली श्रावाज लक्ड़ी चीरने का एक बड़ा श्रारा है जो मेरे दिल को चीरे डाल रहा है ! उनकी श्रावाज में एक विचिन सोज और एक विचित्र वेदना थी । मैं झपकी पर झपकी ले रहा था । और मेरे इस हाल को देख कर उनकी श्रावाज का मनाया और भी अधिक तेज होता जा रहा था। वे ऐसा गीत गा रही थी, ताकि दिल पिघलाये दे रहा था । एक स्त्री अपने पति के वियोग में व्याकुल थी। मै चुप होगया, और सिर पकड़ कर श्रॉर्ख भन्द करके । - - मुनने लगा। उनी अावाज और भी अधिक पीड़क होगई और मेरा दिल न जाने क्यों ऐसा पड़ाया, और ऐसी याकुलता पैदा होगइ, गि मने घपड़ा वर सहसा हाय से साज रोक दिया । महारानी भी स्क गद । मने दशारा किया, और ममी नाचने वालियाँ परधाइ की तरह अदृश्य होगा । मेंने महारानी की तरफ देगा। उनकी पलकों में दो नाम थे ! मेरा दिल मसल उठा, और मैंने कहा-"यह क्या ?" 'कुछ नहीं"-~-महाराना ने का- गीत ही कुछ ऐसा था।" "हाँ"-मने कहा--में भी परीशान हो गया और मेरा भी दिल धड़ा उठा , या पाराम करो।" मैंने ग्रॅगडाई लेकर झाल के चारो सोर दृष्टि डाली। चाँदना खिली हुई थी। दूर तक भयानक पदाड़ा की श्रेणी पैली हुई थी। एक विचिा सनाटे की स्थिति थी। मुझे कुछ ऐसा मालूम होता था, कि जैसे सारी झील और पगड़, मानों धारा वायु मडल ही रोने के स्वर से परिपूर्ण था, जो अभी अभी चन्द दुआ था। मने दिल में पाश्चर्य प्रगट किया, कि गाना भी पिचिरा जादू है । वेदना से भरे हुये पीड़क गीत ने सारे वायु मण्डल को प्रभारित कर दिया। X महारानी बड़ी तेजी से अपना भतीजी की शादी की तैयारियाँ पर रहीं थीं। सभी प्ररथ और सभी काम उनकी ही मरजी के अनुसार हो रहे थे । लाखों रुपये के गहने और कपड़े खरीदे गये और लाखों रुपये ५ दूसरे सामान भी सरीदे गये । महल का एक खास भाग सजाया गया। हाही प्राधों के समय में महारानी अपने भाई के यहाँ भी गई और उधर क प्रभाव में भी उन्होंने दखल दिया । मतलब x x ( ६६ ) कि वे अपनी भतीजी की शादी में इस प्रकार लगी हुई थी, जैसे, कि एक फूली को लगना चाहिये । मैं इन सभी प्रबन्धों को देख कर दुसी सा होता जाता था। उनकी इस तन्मयता से मेरे दिल पर मोट-सा । लगती थी । वास्तव में उनकी भतीजी के प्रति अपने दिल में विरोध का भावना पाता था । क्योंकि यह मुझे स्वीकार न था, कि महारानी के प्रेम का भाग किसी दूसरे को भी मिले। मैं यह कहना चाहता था, कि महारानी मुझे छोड़कर दुनिया में किसी दूसरे से प्रेम ही न करें। मैं यह चाहता था, कि वे मेरे प्रेम के कारण अपनी भतीजी से जलने लगें। किस तरह मूर्खता से भरा हुआ यह विचाराथा। लेकिन मैं अपने दिल को क्या करूँ ? उनका इस तरह शादी में भाग लेना मेरे लिये बहुत बड़ी मुसीरत थी। मैं उनसे कहता था, कि "अगर तुम्ह मुझसे मेरे ही जैसा प्रेम है, तो तुम्हें अपनी भतीजी से जलना चाहिये।" वे इस पर मुसुकुराती और कहती-"सच कहते हो। तुम्हाग जैमा प्रेम मुझे नहीं हैं । क्याफि जितना तुम मुझमे प्रेम करते हा, उमसे फहाँ अधिक मैं करती हूँ।" और फिर वे एक अजीब दङ्ग से मुझे देखती, कि जैसे उन्हें मेरे हाल पर दया श्राती हो और वे मुझसे सहानुभूति रखती हो । वे हँसकर कह देती-"अभी तुम नासमझ हो । तुम्हें यदि मुझसे प्रेम है तो यासिर मेरी भतीजी से क्यों डरते हो ? x एक दिन की रात है, कि रात में किसी असाधारण सरसराहट से मेरी आँख खुल गई । ऐसा मालूम हुश्रा, जैसे एक परछाई थी, जो जागने के बाद, लेकिन शाँख खोलने से पहले ही लाँखों के सामने थाई और चली चली गई । मैने सिर उठा कर देग्वा तो कुछ भी न x था। महारानी निद्रा म बेहोश थी। दूसरे दिन भी ऐसा ही हुआ। और तीसरे दिन भा ऐसा ही हुआ । मतलब, कि प्राय ऐसा ही होता और फिर घड़ी पर दृष्टि जाती तो समय भी पिछले पहर का होता। जर यह बार ऐसा हुआ तो मैंने महारानी से कहा, लेकिन उन्होंने टाल दिया कि यों हा तुम्हें सन्देह होता है । मे सोच विचार में ही था, कि यासिर यह पहेला अपने आप हल हो गइ। रात को एक दिन एसा ही हुया और मेरे चेहरे पर गरम गरम दो गाँसू गिरे। क्योंकि महारानी मेरे चेरे को बड़े ध्यान से देख रही थी। रे कुछ घबड़ा मी गइ और मेरा नरप स मुंद मोड़ लिया और अपना मसहरी पर लेट गई। मैने शाघ्र ही उनका हाथ पकड़कर कहा-"क्या ?" मैंने उन्हे घसाद र अपने पास चिटा लिया । क्याकि मेरी तरफ मुंह करने से भाग रही थौ । में उनकी रोनी सूरत देसी! मेरा दिल कर गया। और मने बेचैन हाकर कहा-"मेरा जान !" मने उहे छाती से लगा कर पृचा--"क्यों रोती हो १ क्या हुआ ?" लेकिन वे कुछ न गोला और रोने लगी । म हैरान हो गया। और ज्यों ज्यों कारण पूछता, व गौर मा वेकानू होती जाती । यहाँ तक, किं हिचका बंध गई । और मुझे उन्ह संभालना य यन्त कठिन होगया । म उनसे बेहद और बहुत ज्यादा प्रेम करता था। मने उन्हें कमा रोते नहीं देखा था। उनका इस बुरी हालत को देवर म्यय भी अपने को रोक न सका और उन्हें कलेज से लगा कर सय इस प्रकार रोया कि वेहाल हो गया । जर दोना यूर आँसू नहाये तो कम से कम मुझे तो मालूम हो हो गया कि हम दोना क्सि लिये गये हैं ? अर्गत् शादी के कारण । मै अर रो धोकर प्रसने था, कि उनको भी मेरी इस बात से डर है।

व व. . व वह ( ७० ) है। उसके गले की रगें तनी हुई हैं। नगे सिर, अधिक परीशान चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही हैं । गाँसें मारे डर के निकली पड़ती है। यह इस प्रकार पदहवास होकर कमरे में चीरपती चिल्लाती याती है,दि मैं निल्कुल परीशान मी हो जाती है । कमरे में उसका पाना हलचल सा मचा देता है । यह महसा मेरे सामने याकर घुटने टेक्कर गिड़गिड़ाती है । कुछ कहना चाहती है, लेकिन मारे डर के चौक रही है और उसके मुंह से कुछ शब्द नहीं निकल पाते। नड़ी कठिनाई से, जिस ओर से श्रारही थी, उस तरफ से मुंह मोड़ कर कहा-वह वह. श्रा रही है। वह यो श्रो " में परीशान होकर उससे पूछती हूँ, "अरी कम्बख्त, यासिर वह कौन है ?" लेकिन उसकी पुबान से इसके वह वह के कुछ निकलता ही नहीं है। वह रह रहकर जिधर से पाई है, उसी ओर देग्यती है, और 'वह वह' से अधिन कुछ कह ही नहीं सक्ती । पूर्व इसने, कि मैं पूछ सकूँ, नाहर से भी चिल्लाने की ग्रावाजें याती हैं, कि मारे डर के सर दहल उठते है । एक बहुत हगामा सा पैदा हो जाता है। चीखने चिल्लाने रोने- पीटने और टोड्ने-भागने की अावाज से सारा महल गूंज उठता है । देखते ही देखते प्रलय के बाढ़ की तरह चीमनी, चिल्लाती रोती पाटती मारे महल की स्त्रियाँ वादियाँ, नर्तक्यिाँ इत्यादि धाकुल हो हो कर भगदह की तरह इस प्रकार अपने को भूल कर एफ के ऊपर एक गिरती पद्दती इस कमरे में प्रवेश करता है, कि सहसा मिलकुल अँधेरा हो जाता है। मारा इजलास - खतम हो जाता है और कमरे म यापलता मल जाता है 1 में ठहोश होकर बड़ी हो जाती हूँ। और शालावा वह । .

चिल्लाती है, कि तुम्हें कोई सबर करे और पाज बुलवाई जाय । क्योकि साफ प्रगट है, कि कोई मुसोबत इस कमरे की तरफ चला आरही है। क्योंकि इस शोर गुल का भी यही मशा है, कि "वह श्रा रही है।"" इस शोर गुल में मेरी कोई नहीं सुनता। क्योंकि सबके होश हवाश गायब हैं । इसा समय एक भयानक महारानी इतना कह कर डर-सी गई, उनका चेहरा जो हमेशा चमकता रहता था, मिहो के रंग की तरह हो गया। वे मेरे और भी अधिक निकट श्रागई। मैंने उन्हें अपने और निकट खींच कर कक्षा "घड़ाओ नहीं, घबड़ानो नहीं।" उहोंने कुछ साँस लेकर फिर अपनी बात जारी की इसी बीच में एक भयानक, बहुत ही भयानक । लेकिन, लेकिन वह हंसा, कि दिल को हिला देनेवाली । घृणा से भरी हुइ श्रापान इतने जोर मे गूंजती हुइ श्राई, कि सर अपना, अपनी जगह पर सिमट कर रह गये । मुझे स्वय ऐसा मालूम हुआ, कि जैसे मेरा सून मेरे शरीर म बिल्कुल जम गया हो। जो अभी अभी इस शोर गुल की तेजी के कारण गरम-गरम शीशे की तरह मेरी रगों म इस तरह सौड़ रहा था, कि मालूम होता था, कि रगा को तोड़ कर किसा तरफ निकल जायगा भय की अधिकता के कारण कैंपरपा फे साथ एक मूच्छना सी श्रार) आपदा निकट थी ग्राहट सुन फर शरार के रागटे पड़े हो गये । कहाँ तो सारा कमरा शोर गुल म उड़ा जा रहा था और कहाँ यह हाल हुअा, कि एक ऐसा सन्नाटा छा गया, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता। ऐसा सन्नाटा, कि अगर सुई भी गिरता तो उसको आवाज मो सुनाई पड़ जाता । अब । भय ( ७२) यह हाल था कि न दरवाजे की तरफ देखा जाता था, और न उधर से निगाह हटाते बनता था, कि जिधर से यह आपदा श्रा रही थी। इनने म एक फुकार-सी ग्राई और दरवाजे पर कालिमा सी छा गई । साह वह बला यागई, मेरे सामने ग्रागई।" महारानी का चेहरा भय से पीला पड़ गया। हल्क में काँटा सा पड गया, और वे मेरी तरफ इस प्रकार घबड़ा कर खिसक पाई, कि मैं घनड़ा गया | मने उन्ह क्लेजे से लगा लिया- "डरो नही, डरो नहीं । तुम क्यों डरती हो" महारानी श्राँसे बन्द क्येि मेरी गोद में पड़ी कॉप रहीं यों । मैंने धीरज बॅघाया, और फिर पूछा-"पाखिर वह कैसी चला थी, मुझे भी तो बतायो ! क्या थी १ कैसी शकल थी ?" महारानी ने मयभीत स्वर में कहा --"नहीं, नहीं, मुझसे कहा नहीं जाता। मुझे बचायो।" यह कह कर वे डर के मारे मुझसे लिपट गई। मैने तकिये के नीचे से रिवाल्वर निकाल कर कहा-"डरो नहीं, इरा नहीं । तुम्हारे दुश्मन के लिये एक गोली ही काफी है। क्या पौज बुला लूं। टेलीफोन करके तोपखा। बुलया लूँ" "नहीं नहीं-मैं समेरे बताऊँगा।" मैंने घड़ी देख कर कहा-"अब सवेरा होने में क्या देर है "" मेरे कहते ही किसी दूर की मस्जिद से सवेरे की श्राजान की अावाज याइ। "लो सवेरा हो गया।"-मैने कहा -"देसो याजान हो रही है । श्रम समेरा हा है।" यह कह कर मैने घटी या बटन दगा दिया, जो मसहरी के सिरहाने लगा हुआ था। शीघ्र एक नौकरानी दौड़ती हुई श्राइ और मैने कहा, कि-"देखो, किसी सवार को जल्द दौड़ानो,

( ७३ )
कि उस आदमी को जो श्राजान दे रहा है, अाज दस बजे दिन
हमारे सामने हाजिर करे ।
"उसे क्यों बुलाते हो"-महारानी ने मुझसे पूछा।
वास्तव में इस अावाज को मै बहुत दिनो से सुनता पा रहा था।
इस आवाज को अच्छा तरह पहचानता था। न मालूम क्यों, प्राय
यही पाल होता था, कि इस ग्रामाज से इनका पुराना सबध है।
लायो इस बारमा सो तो तूं। कई बार विचार किया, पर रह
गया।" महाराना मे मने कारण ना कर कहा-तुम अपना
सपना कहो।
महारानी का दर दूर हा चुका था। उन्हाने निश्चितता मे
चात रहनो शुभा-3 उसको शकन
उस प्रापद को शकन
बहुन हा बुरी, भाना और डरावनी था। उसका चेहरा बिलकुल
काला था। और मुंह पर फुस्सियों और मुहासे ये। ये मुहासे बहुत
ही गन्दे और डरावने थे। उनमें काई लाल था पार काई पोना ।
बहुत मजबूत, लेकिन एक ठिगना भारत या। एक छोटी सा धोती
पहने हुये था। उसके करा पर पाल हिवरे हुये थे। मिना
अतिशयाक्ति के उसमें गान शेरिनो को तरह का था और वैमा
हो उसका सिर था। लेकिन उसका सारा चेहरा बेदन खुरा, हर
भयानक और वेहद घृणा के योग्य था। उसका वडा रहा अखि
ला नारगी की तरह गोल गेल थीं, निकली पड़ता था श्रोर उनमें सके।
और स्याहा के स्थान पर पीनापन था, जिसमें से पोनो प्रतिच्छायान
मालूम होता थीं। बहुन ही मनहूस और भयानक मुँह था।
बड़ा बदसूरत नाक था और नाफ और मुँह, दोनों से गदगा यह
निकलती

।
.
(७४)
रही थी। उसकी ठोड़ी इस तरह मिली हुई थी, कि जैमे जानवर
जुगाली करता है। उसके गले फी मोटी-मोटा रगें उसके चेहरे को
और भी अधिक भयानक बनाये देती थी। उसने कमरे में प्रवेश
फरते ही एक पुफार सी मारी। यह उसकी मसखरी से भरी हुई
मुसुकुराहट थीं। मैने देसा, कि जैसे उसका जबड़ा उसके कानों
तक फैल गया। उसके भयानक दाँत जो बड़े बड़े थे, गन्दे और बुरे
दातों के सहित दिमाई दिये। उसने कमरे में आते ही अपनी लकड़ी
जोर से पटक कर कहा-"महारानी रामावती कहाँ है ?" यह कह कर
मेरी तरफ देखा और फिर मसापरा पन के साथ पहा-"रामावती!
रामावती ।"
महारानी रुककर मेरी तरफ देखने लगी।
मैंने कहा-क्यों ? क्या हुआ ? कहो ? •
में नहीं कह सक्ती।"
"क्यों, क्यों नहीं कहती १ कहो, कोई डर नहीं । पारिसर ऐसी
कौन सी बात है, जो तुम नहीं कहतीं। में समझ गया और मैंने बड़े
प्राग्रह के साथ कहा- स्वप्न है । तुम कहो, जरूर।।
महारानी ने कुकर कर कहा--"उसने कहा महारानी तू ।"
महारानी फिर रुकी तो मेने फिर कहा-"हो
तू रॉड हो गई !-महारानी ने कहा-उसने मुझसे
कहा-चिता में पैठ, त्राँड हो गइ।यह सुनते ही मेरा कलेजा
धक से हो गया और चेहरा पर हो गया। उसने फिर मेरी तरफ
उसी दग से देस कर यही शब्द दुहराये और अन मने देसा,
कि उसके गन्दे हाथ पजे की तरह ये और उसके नाम्वून चारह के
"

। ( ७५ ) पजों की तरह तेज ये । इतने में मैंने तुमको दूर से आते देसा । तुम वही कपड़े पहने हुये हो, जिहें पहन कर तुमने अभी हाल में अपनी बड़ी रगीन तसबीर पिचाई है ! मैंने आत काट कर कहा-यह स्वप्न तो तुम मेरे उन कपड़ो के तैयार होने से पहले से देस रहा हो। क्या सदा से यही पड़े देख रही हो? महारानी ने कहा-~-हाँ । रग रही देखता हूँ। सुनहरी बूटे भी वही और गहने तथा हीरे जवाहिरात भी वही। मतलब कि सब वहा । अधिक से अधिक यह सम्भव है कि अचानक फूल और बूटे मुझे याद न रहे हो और मैंने ध्यान न दिया हो, लेकिन जहाँ तक मुझे ख्याल है, बूटे भी मुझे याद हैं, और पिर जब तसवीर ननकर आई है, और वे कपड़े देस लिये हैं, तब से तो बिल्कुल यही देखती हूँ। मैंने कहा-अच्छा, तुम अपनी कहानी पूरा करो। महारानी ने सिलसिला शुरू किया तुम मुसुकुराते हुये कमरे में श्राय । तुम बहुत ज्यादा खूबसरत मालूम हो रहे थे। तुम्हें देसतें हो मेरा टाढस बँधा । लेकिन मेरे श्राश्चर्य की सीमा न रही, जब मैने देखा, कि उस मनहस मुसायत से लड़ने झगड़ने के स्थान पर उससे बातें करने लगे। यह सिर और ठोड़ा हिलाहिला कर तुमसे चुपके चुपके कुछ बातें करके मुमुकुग रही थी। तुमने मेरी तरफ देखा और फिर उसका तरफ देखकर मुसुकुराकर मुझसे कहने लगे-त् बेला हो गइ तू रॉड हो गई, और अब तुमे सती हो जाना चाहिये । "मैं तुम्हारी तरफ अाकर्षित होकर जो न देखता हूँ तो चला गायन । लेकिन तुमने पिर मुझने कहा--तू वेसा हो गइ, और अब शीघ्र सती हो जा।" अब + । सदा (७८ । में इस सपने से अधिक प्रभावित हुश्रा | लेकिन मैने हॅसकर महारानी से कहा-तुम भी अजीब बहकी हो । ऐसे ऐसे न जाने कितने सपने दिखाई पड़ते हैं और कुछ नहीं होता । तू बड़ी नादान है।" "लेकिन एक ही स्वप्न और वह भी राबर दियाइ पड़े, तो तबियत क्यों परीशान न हो । एक बात और मुनो ! अाखिर क्या कारण है, कि तुम जन कभी दिसाई दिये, तो एक ही लबास में दिखाई दिये । शक्ल का तो अच्छी तरह ध्यान नहीं,, लेकिन हाँ तुम्हारी उम् इतनी ही दिखाई पड़ी। इस स्वप्न में अवश्य कुछ न कुछ रहस्य है।"-महारानी ने चिन्तित होकर ये शब्द कहे। मैंने कहा-"तू पागल हो । लामो, मैं तुम्हारे स्वप्न की व्याख्या कर दूं।" महारानी ने कहा-"बतायो!" -तुम खूब हँसोगी ! "तुम हर बात में मजाक करते हो।" "मैं सच कहता हूँ ! इस स्वप्न का यही फल है, कि तुम खूब हँसोगी।" यह कहकर जो मैंने महारानी को पकड़कर गुदगुदाना शुरू पिया, तो चूँ कि उन्हें गुदगुदी अधिक मालूम होती थी, वे मछली की तरह तड़पने लगी और मैंने उन्हें इंसाते हँसाते वेहाल कर दिया। x दिन के दस बजे श्राजान, देने वाला हाजिर किया गया । गरीब अादमी था । मैंने उससे कहा, कि एक अामान रात के दो बजे दे दिया करो। मैं तनख्वाह दूंगा । इससे उसने इन्कार कर दिया । इस पर मैंने कहा कि जिस तरह समय हो सके, पहले वक्त श्रानान दिया करो। मैंने कहा- x । { ७६ ) वह कहो लगा, कि मै तो पहले यक हो देता है। मैने उमे व देखने के लिए एक घड़ा दी और पचास रुपये इनाम देकर छुटी दी । यास्तर में नाजान सपेरे का सन्देश होता है। और इस नाजान से ग्राज महा रानी के दिल को एक बेहद तारत-सा मिली थी। इसलिये मैंने करा, कि यदि बाजार जल्दी हो जाय तो माछा है। याजान देने वाला चला गया और अब उसका ध्यान भी न रहा। पेशल उसी दिन उमका ध्यान पिर होता, जिस दिन महारानी स्वप्न देसी, और हम दोनों को बेचैता से अजान पा प्रतादा होती । महारानी एक महीने के भीतर चार बार इस स्वप्न फोटेस चुपी थी, कि एक दिन रात म वे स्वप्न देखने प समय पनड़ा कर उठों और सहसा मुझे जगाकर कहा-"यह तुमने गजम किया।" मैंने उनफे चिन्तित चेहरे को देखा और मुमुकरा पर पहा--पागल हो गई हो! क्या गजब क्यिा, और कैसा गजब । "तुमने श्राजान देने वाले को मरवा डाला।" मैंने कहा--"न जाने तुम क्या उक्ती हो! अश्विर ताश्री तो सही, अाज क्या तमाशा देसा?" इस पर उन्होंने एक विचित्र स्वप्न सुनाया । यह यह, कि उसी स्वप्न वाली ला ने शाजान देने वाले की तुमसे शिकायत की और तुमने उस दुष्ट बला मे कहा, नन्छा उसे मार डालो।" मैं बड़े जोर से हँसा और महारानी से गोला, कि यासिर तुम्हें 'यह क्या हो गया है।" इस पर उहोंने एक विचित्र दङ्ग से कहा, कि मैं झूठ नहीं कहती। यह सब स्वप्न मैं सच कहती हूँ, यह स्वप्न । (८०) प्रवश्य सच होगा | तुम देस लेना, श्राज अजान को यावाज न सुनाई पड़ेगी।" सवेरे तक मुझे और महारानी को, अजान के आयाज की प्रतीक्षा रहा । ज्यों ज्यों समय बीतता जाता था, महारानी की परेशानी बढती जाती थी। मेरे आश्चर्य की सीमा न रही, जब दिन निकल आया और अजान न हुई । मेंने दिन निकलते ही सवार दौड़ाया, कि पता लगाये, कि अजान देने वालों ने क्यों नहीं नाजान दी। मालूम हुआ, कि रात को ही मर गया। उसकी मौत उसी समय हुई, जब महारानी ने मुझसे कहा था। पता चला कि वह परीशान होकर उठा। अपनी बागी को बुलाया, और बहुत शीघ्र किसी भयानक कट के कारण मर' गया। अब मै विचिन परीशानी में था। और मैंने शीघ्र सिविल सजन को बुलाकर हुक्म दिया, कि उसको लाश का जॉच करके बताये, कि मौत कैसे हुई ? सिविल सर्जन ने रिपोर्ट दी, कि मौत दिल की धड़कन बन्द हो जाने के कारण हुई । सौ रुपये मैने उसके कफन दफ्न के दिये ! मेरी चिन्तित और परीशान श्राकृत देख महारानी का चेहरा और भी पक हो गया और वे शीघ्र जान गइ, कि सचमुच आजान देने वाला मर गया । उन्होंने भर्राद हुई आवाज में कहा-"मै कहता यो न, कि मेरा स्वप्न सच्चा है । तुमने उसे मरवा डाला ।" मैने ये शब्द सुने और मूर्ति की तरह चुपचाप महारानी को देखता रहा । मुझे ऐसा मालूम हो गया, मानो सचमुच मैने श्राजान देने वाले को मरवा डाला। उसके घर श्रामी भेज कर सूचना दिलवाई, कि उसकी विधवा को दस रुपये मासिक जीवन पर्यन्त मिलेगा और बच्चे जब बड़े हागे, उनको पढ़ने के लिए वजीफा अलग से दिया जायगा। 1 - - अब मैं और महाराणी, दोनों परीशान थे। महाराना ने बहुत ही रात दिया। अपने नैहर से पर पति और मौलयो बुलवाये और दूसर जगहों में भी युलवाये और उससे ताबीज़ तथा गण्डे लिए। मैं स्यय न ढकोसलों को न मानता है, और न मारता था। लेकिन इस समय दाल हा दूसरा था। इसके अतिरिक्त यह प्रध किया गया, कि ग्यारह, बारह और एक बने न सोकर शाम होते ही सोने लगते, और बारह बज उठ र सगीत की महपिल लगाते। सबसे अधिक लाम इस उपाय से दुया। लेकिन यह जान लेवा स्वप्न ऐसा था, कि पिसा न किसी समय थोड़ा बहुत अवश्य कभी न कभी दिखाई दे जाता था। मतलब, कि रात के बदले दिन यो सोते । स्वप्न म महुत कमी हो गई थी। और पिर चूँकि मेरी शादी निकट प्रागइ थी, इसलिये महारानी का ध्यान कुछ इस तरह इस तरप सिंचकर पा गया था, कि अगर स्वप्न देम्वती भी थी तो उसे कुछ अधिक महत्व न देती थीं। x जूनियर महारानी को श्रासिर न्याह कर लाना ही पड़ा। न्याह की ररमों में मैंने न तो उन्हें देखा था, और न देखना चाहता था। सीनि- यर मारानी ने अपना भताजा व लिये माल का एक विशेष माग सजाया था, जिसम जूनियर महारानी लाकर उतारी गई । मैं प्रारम्भ से ही महल के उस भाग से जान बूझकर कवर कर निगल जाता। क्योंकि उसमें वह लड़को श्राने वाली था, जो मेरे और मारानी के मेम में बाधक होने वाली थी। मुझे इस विचार मात्र से ही घृणा थी । । x X x x पाकर रात पीतने पर जब सोनियर महारानी ने सभी रस्मो से - पूरा किया। - - । । - ( ८६ ) मुझे दिये, जिहें मैने पी लिया । और एक प्याला उन्हें देकर इस रम्म को बहुत शाम दो चार नातें हुई कि बात का सिलसिला जारी होगया और जूनियर महारानी ने अपनी जादू का जाल मेरे ऊपर फेंकना शुरू कर दिया। अपनी तबीयत को क्या करूँ ? मै झल्ला-सा गया और उन्हें शायद दुरा मालूम हुआ । जब मुझे सानियर महारानी का ध्यान पाया, और मने बात काट कर कहा--"सो जायो" और यह कहकर अपनी मसहरी पर जो लम्बी तान कर सोया तो फिर सबेरे ही साँस ली। साढे आठ बजे होंगे, जर सीनियर महारानी ने मुझे उठाया, और शीघ्र लड़ाइ शुरू कर दी। म सूब खूब रोया, और वे भी खून-न्यूब रोई । म भी विवश या, और वे विवश थीं । वास्तव में भतीजी ने मेरी कठोरता की शिकायत को थी और फफी अपनी भतीजी की तरफ से वकील होकर सम्मिलित पति से लड़ने श्राई थी। मतलब, कि सीनियर महारानी से सूर लड़ाई हुई। x x किसी ने कहा है, और ठीक कहा है, कि श्राग लगे धुश्रा न हो। जूनियर महारानी का सौंदर्य 'अपूर्व और फिर फी भतीजी, दोनों की कोशिश । चाहे जिस तरह से, मैं जूनियर महारानी से घुल मिल गया। लेकिन मुझे मालूम न था, कि घुलना मिलना कुछ का कुछ कर देगा और वह भी इस प्रकार जल्द । -पी तो जैसा गाती थी, गाती थी ही, लेकिन भतीजी तो गाने में और भी अधिक अभ्यस्त या । इतनी सुदर और थापक लड़की नई नई जवानी और फिर नई शादी । मेरा उसको और मे सिंचाय, और १ । । 1 उसका मेरी ओर सम्मान । क्या क्हे, कि जूनियर महारानी क्या हो गई । वे मुझमे मिल कर प्रेम और आसक्ति साक्षात् पुतली पन गई । एक विचिन हालत में थीं, और फिर मुझे भा अपने साथ सींचे लिये जा रही थीं। उनका वश न था कि मुझे अपने दिल में छिपा लेता। आखिर यही भार तो सीनियर महारानी में भी ये । और औरतों में होते ही हैं। लेकिन जूनियर महारानी में न तो इतनी समझ, कि ये भाव क्या है, और न बुद्धि । वे मुझे देखतीं तो उनका यॉखें चुगुलखोरी करती। उनकी नियार्य, उनकी बातें, उठना, बैठना, चलना पिरना, खाना, पीना, हँसना, गाना, मिलना-जुलना, मतलब, कि उनके सभी काम भाव के मातहत में थे, और प्रत्येक पग पर अपने दिल के चौट का भेट प्रगट करते थे । उस, मानो जूनियर महाराना क्या थीं, कि श्राग और पारा थी । बल्कि इस प्रकार कहिये, कि एक दहकना हुअा अाग का अङ्गार । बहुत शीघ उन्होंने मेरी हस्ती को कुछ का कुछ कर दिया । वे स्वय मिट गइ और मुझे भी मिटा दिया । या यों कहना चाहिये, कि मुझे भी पागल बना दिया । जरा सोचिये तो, सीनियर महारानी इन सब बातो और अपनी भतीजी की जिन्दादिली का देखती और बहुत प्रसन्न होती और जहाँ तक सम्भव होता, अपना भताजा के ऐश में दखल न देती। वही नाच रङ्ग की मदपि ों, और वही रग रेलियाँ ! जूनियर महारानी और सीनियर महारानी, दोनों मेरे साथ होती । पी और भतीजी, दोनों मिलकर सूर गातीं । जल्से में दोनों शामिल होती ! तरह-तरह के नाटक मैले जाते, स्वाँग बनाये जाते, सालियर महारानी रामा अना, भूनियर महाराना राजकुमार बनती , ( ८८ ) मैं राजकुमारी बनाया जाता । मेरे साथ शादी होती । सूर-सूर उल्टा गङ्गा बहाई नाती, लेकिन सानियर, महारानी का यह हाल अधिक दिन तक न रहा । वैसे भी अपनी भतीजी पर अपना सुख पग पग पर म्यय निछावर करती थीं। लेकिन बहुत शीम उन्होंने अपने प्राप इन'जल्लों 'से दूर रहना प्रारम्भ कर दिया। कभी सिर के दर्द का बहाना, कभी तबीयत की खराबी, कभी नींद की अभिलाया और कभी दिलचस्पी का अभाव । मतलब, कि कोई न कोई बहाना महफिल से उन्ह जल्द उठा देता! धीरे धीरे उन्होंने नागा करना प्रारम्भ कर दिया । वास्तव 'में उनके मन का रुझान कुछ पूना पाठ की श्रोर अधिक हो गया था । मैंने समझा, कि शायद यह इसका कारण हो । प्रगट है, कि इन सभी बातों का क्या परिणाम होगा ? में अपने को भूलकर जूनियर महारानी में डूब गया । श्रन मुझे मालूम हुया, कि सीनियर महारनी ने सच कहा था, कि जूनियर महारानी मेरे जोड़ 'की है। मेरा उमू सोलह और सत्रह साल के नोच था, और जूनियर महा- रानी की पन्द्रह और चौदह के बीच म । महत शीघ्र मुझे सीनियर महारानी की जगह पर जूनियर महारानो का ख्याल हो गया। हमेशा वही तसवीर सामने रदती, I भातर हूँ, चाहे बाहर, । सोते जागते उन्हीं की याद रहती, धीरे धीरे ऐसी शिक्षा ग्रहण करने योग्य दशा ग्रा पहुँचा, कि सानियर महारानी का रहना और न रहना एक-सा मालूम होने लगा। और फिर यहीं तक समाति नहीं, बल्कि एक पदम और भी श्रागे पढ़ा और सीनियर महारानी की उपस्थिति, श्राफरक हान होकर दुखदाइ मालूम हाने लगा। ऐसा मालूम होने - ।

(८६ ) लगा, कि ये तो कोई बुजुर्ग है । वे सुद चिनी विची दिखाई देती। थोड़े ही दिनों में नाच-रग का रहार फेवल जूनियर महाराणी रह गई। वही झील माफिनारा, सङ्गमरमर का यही बतरा, यही हँसती हुई मौन चाँदनी, और "ही रास-रग ! लेकिन अब पुराना प्रेमी मजलिसों में मौजूद न रहता । पर मेरे ध्यान में एक दूसरी मूर्ति थी, जिसकी सुष्टि ने उसरे जोड होने का डडा या दिशा का सभा मेरा दिल मेरे ऊपर घृणा करता, और सानियर महराका कर देता। लेकिन इसमें रचमान भी मेरा अपराध न था। अगर सत। यर महाराना के यहाँ इस विचार से जाऊँ कि रात को उन्ही के यहाँ रहूँ, और वहीं जल्ला हो तो वे मुझे टिकने न देती और हँस हँसकर लड़ता और धो देकर निकाल देती । और जब बड़ी मुश्किल से तैयार ही होगी तो बहुत शीघ्र कहती, कि लीलावती को भी बुला लो।" जूनियर महा रानी शीघ्र या जाती । वास्तव में उनसी मजाल न थी, कि अस्वीकार करें । उनके आने ही अपने आप इनमे सिर में दर्द होने लगता और परिणाम यह होता, कि सीनियर महारानी के माल में स्वय उनको अनु पस्थिति हो जाती और बेल जूनियर महारानी रह जाता । लेकिन जूनियर महारानी का सन्न होते हुये भा मुझे ऐसा मालूम होता था, कि सीनियर महारानी का प्रेम एक अपूप परतु है । मेरे दिल में अब भी उनकी बेहद चाह थी। लेकिन इसकी एक पिचिन हा हालत थी। जन कमी उदे सीने से लगाता, या उनका मस्तक चूमता तो उनके ऑसू निकल पड़ते और बहुत शीघ्र हालत बिगड़ जाती और हिच कियाँ मैंध जाता। मानों एक प्रकार से उन्होंने मेरे लिये प्रेम प्रगट फरना ही नसभव सा कर दिया । क्योंकि उनकी हालत ऐसा बिगड़ ११ ।

(६०) जाती कि सँभालना कठिन हो जाता | उनसे कमा अगर उस बुरे स्वप्न का हाल पूछता तो वह बड़ी निश्चिन्तता प्रगट करती। कभी कभी नहीं, बल्कि ऐमा प्राय दिखाई देता था। लेकिन अब वे स्वय मुझसे कहती थीं, कि केवल वहम है और दूसरी बातें करो । मे रह-रहकर यह भी सोचता था, कि आखिर यह किस ढल का प्रेम है, वो मुझे सीनियर महारानी से है। क्योंकि जूनियर महारानी फा प्रेम अगर एक श्रोर प्राण लेने वाला था, तो दूसरी तरफ सीनियर महारानी के लिये दिल टुक्रे टुकड़े हुया जाता था। और उनकी भोली भाली आँखें दिल में तराजू सी रह जाती थीं , वास्तव में मेरा जी चाहता था, कि सीनियर महारानी पर अपनी जान निछावर भरता रहूँ। X धीरे धीरे सीनियर महारानी की दशा में एक बहुत बड़ा परिवर्तन पैदा हो रहा था । वे अधिक्तर चुर रहती थीं । मालूम हुश्रा, कि रात में भी उठकर टहलती। उनके चेहरे की वह असाधारण ज्योति यन मुरझाई हुई थी। लेकिन चेहरे पर अत्र भी एक ऐसी सुन्दरता मौजूद थी, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। जब उन नालों में यह सुगधित और चमकदार पाउडर भी न था, जिसकी उनके सुन्दर चेहरे पर वर्षा सी होती रहती थी। उनकी त दुरुस्ती भी अब पहले से बुरी मालूम होती थी और वे दुवली हो गई थी। x x वास्तव में श्रादमी मुखों का अनुचर है, चाहे अमीर हो, चाहे गरीन । पिर सुसों और विधासों की भी कोई सीमा नहीं । हम सर लोग चाहे किनाा दीपाराम स्यों न करें, यही समझते हैं, कि पर्याप्त नहीं है। मेरी श्री नीवर महार के 37 और चैन से भरे हुए दिन पलों तरह गोते मालूम होते हैं । यह मानूम होता था, कि हम दोनों एक रात में, ससार के प्रारदा म ये हुये इससे भा अच्छे किसी स्थान को जा रहे हैं। मेरी शादी का मरा सान प्रारम्भ हो गुरा था। लेकित ऐसा लूगा या हि पूनियर महाराणी माकन ही प्राइहै ! ज्यों को पाना प्राता नाना भी प्रेम और प्रासशि प्राधिक पढ़ती जाना पी। यास्तसमें मैं 31 में * हुना था और यही हाल जूनियर महागनो फा भा गा। परमात रा मौरान पापा । झाले गाले नाल, रिल को सुरा परी पाला यायें । मोल पारिनारा, और एकान्त प्रौर इस पर प्रेम और श्रा का उपान । दिन रात मेल तमारो महावीतते थे। शोर दिन रात तरह-तरह २ च तथा रारतियाँ मार जाती थी। रोज नइ सलाह और उसका पूर्ति ! यस जीवन का उद्देश्य हा यहा था। जूनियर महारागीरोपलाइदा कि झोन * बीमा यीच मनायें जोड कर या किमी दूमरी तरह एक द्वीप नाग जार। और उस पर एक प्रस्थायी सरादरी ना जाए और वहाँ पगा: मर राना हो । दिन रात यही रहे । सलाद तुरा हा मरअप पी। हुक्म की देर थो, वि संरदा श्रादमी ला TT दि रात काम होने लगा और पद्रह-बार दिन बाद यह नानी महल बापर तयार हो गया । प्रथम जरस से दो टिन झोल चारों तरफ झमाझम पानी गरस रहा था और वहाँ महागनो का यह हाल था, कि अपना मस्त कर देने वाला अावाज म झम झमकर रूम झूम गा रही था ग्यून --- ( २ ) माल फ्ये खाये और तरह तरह की शरारें लुढ़काई । दिन को सोते और रात भर रजलियाँ मचाई जाती । तरह-तरह के नाच होवे और तरह-तरह के नाटक किये जाते । रि कमो परसते हुये पानी में नहाते और कभी कल में, मतलब, कि सूर धूम चौकड़ी रही। इस ऐश और आराम के जल्मे में अधिक हठ करने पर भी सीनियर महारानी नहीं आई। 'तुम जानो।" उन्होंने कहा- • 'लीनारती है तो।" इसके जवान मे मैने उन्हें छाती से लगाया। और कहा-"नहीं, तुमको जरूर ले चलूँगा।" उस यह कहना, कि मानों निखर गई । सूब रोई, शौर मुझको भी रुलाया । विवरा होकर चला आया। श्रन इस जल्से में उनकी मौजूदगी का विचार तक न था । वास्तव में अवकाश ही कहाँ था ? नाच कुद से भी चार-छ दिन म पराशान से हो गये कि अन्तिम दिन था गया और यह सोचा गया, कि नस, बाज का जल्सा और हो, नौर क्ल सतम ! सूची यह, कि बादल भी उमड़ कर ऐसे घिर आये, कि अाकाश और पहाड़ एक हो गया । और फिर चर्पा भा खून-सून हुई । मिजली की तरह-तरह का रोशनी से दिन हो रहा था। दिल को पड़का देने वाली श्रानन्ददायक हवायों के झोंक पा रहे थे । और धूम का नृत्य विचिन ढश से हो रहा था। खूबसूरत और चुलनुली नर्तक्यिाँ शे की तरग में बदमस्त होकर अपनी सुरीली आवाज मिला कर फूलों के द्वार पहने और हाथों में मोर पसड़ी की सब्ज साखें लिये बल ग्या-साफर साज की थाप पर ममा के साथ कदम मिला मिला कर नाच रही थी। जूगियर महारानी ताल पर वारा दे रही थीं ! खुदा ने, उन्हें गजन की मूबसूरती दी है। उनके जरी के कपड़े और उस पर । कलॅगोदार टोपी जवाहिरों से जगमगा रही थी। मेरा दिल छीने लेती थी। खुशी और उमङ्ग से उनका सुन्दर चेहरा चमक रहा था। और उस पर वह लम्बी लम्बी दिल खोंचने वाली तानें और फिर रूम भूम के गीत और पिर रूम झूम के गीत पर उनका स्वय झूमना और धूम के नाच का नया-नुला झमाका, जिसके साथ उनके सुदर चेहरे पर सुगषित और चमकदार पाउडर की वर्षा होती थी । श्राज रात का अन्तिम जल्सा था । धड़े के घड़े शरान खाली हो रहे थे। "और पियो और पिला" गो गालियाँ, जाने गालियाँ, महारानी, और नर्तकियाँ सभी नशे में चूर थीं। प्याला पर प्याला पालो हो रहा था । "पोर लायो" की कमी न होती थी। मैं भी इसी नाढ में कहा जा रहा था। सक्षेपत यह कि हर एक ने इतनी पी कि अक्ल और होश गायर ! बहुत शीघ्र मह पिल का क्रम निगड़ गया । किसी ने किसी की चोटी पकड़ी, किसी ने किसी को घसीटा, मने स्वय अधिक कोशिश की, कि सँभलू, और जल्से की प्रस्त व्यस्तता को सँभालू, लेकिन वहाँ तो प्रत्यक नर्तकी अपने को महारानी समझ रही थी। कोई इधर गिरा, फोई उधर गिरा । रात के दो पैसे हा बज चुके थे । हप्ते भर की क्द फाँद और फिर नशा, और उस पर जवानी का नींद । थोड़े ही देर में मुर्दनी पैल गई । जो जहाँ था, यहीं पड़कर चित्त हो गया। शा और नींद ने ऐसा दवाया, कि सब वेहोश हो गये। x x नींद और नशे की हालत में मैंने एक स्वप्न देखा । वही रूपन, जो सीनियर महारानी को दिखाई दिया करता था । क्या देखता हूँ, कि मैं दरवार पाले कमरे की तरफ जा रहा हूँ। वहाँ पहुँचा तो अक्षरश x खुली, तो कुछ भी न था । या फिर इस प्रकार कहिये, कि एक रंगीन प्रेम, जिसकी सक्षिप्त जिन्दगी एक हलकोर से सतम हो गई । एक पतङ्ग था, जो थोड़ी देर दीपक से सेलने के पश्चात् उस पर निछावर होगया। थोड़े दिन तक तो सिर पीटता और धूलि उड़ाता रहा, और जूनि । यर महारानी का भी अपनी फूपा के शोक में यही हाल रहा । रात म भी मुझे स्वप्न म टिसाई देती और में, हाय रामावती कहकर चाख उठता, लेकिन समय बीतने लगा, और बीतता ही गया । वही महल वही झील, वही जूनियर महारानी, और वही रङ्गरेलियाँ, है । सीनियर महारानी की याद गुजरे हुये दिनों की एक कहानी हो गई है। - 1 M .

सलो की दिल्लगी चीनी मी कैसा मधुर और जादू से मरा हुमा श्राद है, जो एक नवजवान को सच्चार के पन्दों से निकालकर मिलकुल वेवसी की शान्ति ने मरे हुये बायुमएडल में ले जाता है। भवनमानी जपानी और तालो. नरमपाती और पदकता हुआ दिल | भड़कते हुये मार ( यद सन विरा लिये है। नजरानी! एफ नवजवान, और जिन्दादिल की रोमांचकारी कपकपी वियरे लिये है। मतलब यह कि सारी चीजें शायद एक प्यारी और हृदय को बहुत ही प्रिय लगने वाली बीवी के लिये हैं! थीनी । वह जो श्रादमी को अपो प्रमर प्रेम से श्वर के पार पहुँचा देता है। बहुत से 'इश्यर के नगर' पहुँच भी गये । इसीलिए कि ना धानों को देखिये, तो वह एफ प्रिय और मथुर यीचा को खोब में इधर से उधर परीशान मिरते हैं। इतनी कोशिश करते हैं, कि अगर उसकी श्राधी मिहनत रूस के भार या सिंहासन प्राप्त करने में करते तो आज बोल्शेविम का रोना ही न होता। X x X यह उस समय की गत है, जब कि मेरा भी यही हाल था। बीवी और बादशाहत में कोई बहुत बड़ा अन्तर ही समझ में नहीं पाता था। यह तो बाद में मालूम हुआ, कि प्यारा तो दोनों ही चीजें हैं, . ( १८) लेकिन दोनों में बड़ा फरक है । एक लड़ने से मिलती है, लेकिन स्वयं नहीं लड़ती, लेकिन दूसरी लड़ने से नहीं मिलती, लेकिन स्वय खूब लड़ती है । सक्षेपत मेरा मतलर यह है, कि जिस समय का कहानी मुनाना चाहता है, उन दिनों गावो के मसले पर मुझे बहुत हा सोच विचार करना पड़ता था। ईश्वर के नाम पर जरा सोचिये । सवेरे का सुहावना समय है 'प्यारी प्यारी हवा चल रही है। श्राराम कुसी पर लेटा हुग्रा ऑसे श्राधी खुली और श्राधी बन्द ! भावों में डया हुया हूँ, या बीवी की प्रिय और मधुर कल्पना दिमाग में छाई हुई है। दुनिया एक जादू से भरा हुना स्वप्न है ! सोते जागते का, हृदय खींचने वाला ससार !• • बच्चों के छोटे झूले की तरह हिलना शुरू हिलना "मक्सिों की भिनभिनाहट "ग्रहा हा मुर्गियाँ बीवियों की तरह टहलती दिखाई दे रही हैं। मुर्गियों पर अपने का प्रिय धोसा हो रहा है। हर चीज रज से भरी तैरती सा जान पड़ रही है। देखते देखते सारा मैदान बीवियों से भर गया। जीवियाँ ही गावियाँ! बीवियाँ ही जीविया ! पचीस सौ नीवियाँ। या मेरे ईश्वर । दिमागी कल्पना ने ऐसी दैवी मनिल पर पहुँचा दिया, कि दुनिया की छोटी सी-छोटी चीज भी बीवी दिखाई देने लगी। मानवी सृष्टि ! मालूम हुई, कि स्वय एक मोटी छो धीवा है। जरा सोचियेगा, कि कहाँ यह प्रानन्द का समुद्र, मधुर स्वप्न, और कहाँ उसका यह हृदय कँपा देने वाला वर्णन, कि दिया जो मेरे सिर पर हुनक कर एक लट्ठ "प्रल्सलाम् श्राले कुम" , का तो सारा दिमाग हो टुकड़े-टुकड़े हो गया । हड़बड़ाकर जो देसता हूँ तो या मेरे कर दे .

ईश्वर. घोसो दाढ़ीदार लाहौल लिकह । एक पूरे मियाँ सादर है, जो बीवी की मधुर कल्पना और स्वप्न फे भरानक परिणाम स्वम्प या मौजूद हुये । श्रप यहाँ यह साबित करने की जरूरत नहीं, कि चीनी की मधुर फल्पना और साक्षात् एक दाढ़ीदार के ठोस और भयानक अस्तिल म महुत बड़ा अन्तर है। इतना, कि प्रगर ध्यान से दाढ़ी देम ली जाय वो पिर यह हो नहीं सस्ता, कि श्राप प्रासं पन्द परफे चीनी के बारे में सोच सकें। पिर मजेदार बात यह मुगिये, कि बड़े मियाँ की बाते शादी पे सम्बध में । यस, जा में थाया, कि इनका और अपना सिर पद पर टकरा दिया जाय, जिससे इनको मालूम हो, कि इस नइ बात का भी दुनिया में कोई इलाज है, कि नयजवान को पीवी न मिल सक्ने के पारे में भविष्य भाषण किये चले जानी-मार डालो न झगड़ा, सतम हो जाय। ये घड़े मियाँ मेरे कान में लकड़ा में छेद परने याले परमे को तर यह ही रहे थे, कि एक देवदूत श्राया-पोस्टमैन । चिट्ठी लाया, जिससे बड़े मियाँ कातिल बन गये। दरवाजा इदने भोर के साथ पुला, कि कह नहीं सक्ता उस वसपल पोशिश को । यहाँ केवल सर सरी तौर पर इन शब्दों म दुहराना है, कि एक आदमी ने, जिसका नाम हमान अली था, और जो एक बहुत ही अमीर घराने का आदमी था, अपनी छोटी बहन के विवाह का न केवल विज्ञापन ही दिया, यल्कि इसरे लिये मेरा चुनाव भी किया, और टुण्डले के स्टेशन पर मुझे देखने के बहाने से चुलाकर वेवक्ष बनाकर, और मजाक उदा कर ऐसा लौटाया, उम कि मर न भूलूंगा । इस असफलता का चित्र ( १०० ) खींचना यहाँ उद्देश्य नहीं, केवल इजाज अली से परिचित कराना था, जिसने अपने मनोरमन के लिये मुझे बेवफ नाना। [ २ ] शादी की इस असफल कोशिश के बाद जी तो यही चाहता था कि इस मधुर उन को अकेले रह करके ही निता दे, लेकिन सौभाग्य कहिये, या दुर्भाग्य से अचानक कानों में यह अावाज पड़ी-- अगर पहले हमले में शादी न हो, किये जायो कोशिश मेरे दोस्तों! और इस तैमूरी बुद्धि ने मेरे अच्छे काम को यद्यपि कोड़ा तो नहीं लगाया, लेकिन यह बात जरूर है कि जिन्दगी के चिन्हों को निलकुल मिटने न दिये । इसी से तो मनोरजन समझिये, या मनोरसनहीन समझिये, प्राज एक कहानी सुनाने की नौनत अाती है । मेरी पहली हार ऐसी थी, कि कोई नवजवान श्रासानी से भूल जाता, और खासकर ऐसी हालत में नत्र कि यार दोस्त और मुहल्ले वाले इस अप्रिय घटना को हमेशा ताजी बनाने की फिक्र में रहें। इस घटना के बाद ही की बात है, कि इस असफलता के सम्बन्ध में मेरा पत्रव्यवहार एक ऐसी स्पष्ट विचार और जिन्दादिल अमीर लड़का से हुआ जिनकी क्रिगी कदरदान के साथ जबरदस्ती शादी की जा रही थी। और जिस तरह यह वात सच है, कि अगर किसी बातूनी शादमी को ठोकिये और जेल भेज दीजिये, तो वह लीडर बन जाता है, उसी तरह यह भी सच है, कि अगर किसी खूबसूरत लड़की की उसकी पसन्द के बिना शादी कर दो तो वह जाति का सुधार करने वाली बन जाती है। घा भिन्दादिल अमीरजादी से पनव्यवहार मेरे एक गहरे और बच्चे - दोस्त के द्वारा हुया । शायद जनार को मालूम होगा कि ईश्वर ने मनुष्य को अनेक अच्छी चीजें दो है } एक चरेती भीगी से ग्याँखें तोड़- कर देखा जाय तो इदी नियामतों में मौत और रोजी भी हैं, जो किसी का राह नहीं देसतो । साप बात है, कि सब को सब नियामतें मिनने से रहीं, लेकिन कहना यह है, कि इन को नियामती अर्थात रोजी और मौत से जब श्रादमी निराश हो जाता है, तो आमतौर पर या तो वह एडी टरी करेगा, और या फिर वकालत, प्रत मेरे दोस्त को जम भूख लगती ही चली गई तो उन्होंने एडीटरी की। और बहुत जल्द ही उन्हें 'स्त्रियों का पक्षपाती' भी बनना पड़ा। जी हाँ स्त्रियों का पक्षपाती, श्राप ने शायद देखा होगा, कि जो बड़े बड़े ल दोनों हैं ! उनके सींग लवे लबे होते हैं ! लेकिन वे किसी को मारते नहीं ! जब मवियाँ उनकी नाक में फुटबाल टूनामेट शुरू कर देती हैं, तर बहुत किया तो थोड़ा कान दिला दिया । वास्तव में औरतों के हामी होते हैं और पनी ने कन्धों पर औरतों के हामीपने वा छाड़ा चलता है। उनके अखबार की ये अमीरजादी लेखिका थी। उहोंने प्रसबार में एक कहानी लिपी जिसका मतलब यह या, कि मटों को चाहिए कि लड़कियों से जबरदस्ती शादी करना छोड़ दें। और माँ सप को चाहिये कि लड़की की राय के बिना उसकी शादी न करें। यह कहानी इसी पवित्र उद्देश्य को लेकर लिखी गइ था। सारी कहानी इहीं बातों से भरी हुई थी, कि माँ माप और जबरदस्ती शादी करने वाले कान खोल कर सुनलें, कि अगर लड़कियों के साथ इस ढग का परताय किया गया तो वे सब को सर घुल धुल कर मर जायगों । इन कहानी लिखने वाली अमीरजादी का नाम 'व' था।

- इसी अखबार के मेरे ही समान मूर्स एक और भी लेखक थे । उनका नाम और पता जो कुछ भी भा, यह केवल "रशीदी" था। इन हजरत ने 'य' साहिता की कहानी की समालोचना की, और इस समालोचना वाले लेख को पढ़ कर व साहिना ने एक जोरदार पत्र "रशीदी' साहब को लिसा । पता तो मालूम नहीं था, एडीटर साहन पास मेज दिया, कि रशीदी साहब के पास पहुंचा दें। लेकिन चूँकिं, रशीदी साइन का पता स्वर एडीटर साहब भी न जानते थे । इसलिये यह पन उसकी मेज पर रक्खा रहा । हँडला की टे जड़ा से निराश होकर वापस लौट रहा था। रास्ते में दिन भर के लिये इन गहरे दोस्त से मिला और बातों ही बातों में उस पा की बात चीत चली । मैंने उनसे यह कह कर पत्र ले लिया, कि चूँ कि मेरे और रशीदी साहब के विचार मिलते जुलते हैं इसलिये अच्छा होगा कि पत्र मुझे दे दो। इस तरह जब मुहल्ले वालों की हरफतों से परीशान होकर मुझे कोने में रहने के सिद्धान्त पर विचार करना पड़ा तो इस पत्र की तरफ भी ध्यान गया । पन और कहानी को देख फर हर एक श्रादमी यही कह सकता था, कि स्वय कहानी लेखिका की ही जबर्दस्ती शादी की जा रही है। इसका समर्थन इस कारण से और भी अधिक होता था, कि पन में अपना पता एक "और किसी" के मार्फत लिखा या। मागों कहानी लिखना और पत्र व्यवहार घर वालों से छिपकर हो रहा है। और शायद उनके इन विचारों के पेलने की घर वालों को जानकारी नहीं है । जब मैने यह अनुमान लगा लिया तो इन', साहिबा को एक पत्र लिसा - 1 प्रिय - भाप कृपा पन मिला | आपकी पहाना और लापता पर ध्याा से पढ़ने के बाद इस परिणाम पर पहुँला हूँ, कि शायद स्वय पाप हो की शादी बदली की जा रही है। मो साप-सा कह कर जो गुस्तासी की है, उसे मार फरें। साथ ही यह कहने का भी श्राग दे, कि अगर सचमुच ऐसा है तो उस तरसीव यो काम में लाना किसी प्रकार मी उचित नहीं, जिसे दुहराने के लिए नापने अपनी कहानी भ कहा है । अर्थान् घुल-युल कर मर जा! लाहौल मिला कूह ! मुसलमानों की लड़कियाँ न हुई , बताशा हो गइ , कि धुली जा रही है और फिर इस हरकत को तो महात्मा गाँधी भी पसन्द न करेंगे। जो सत्याग्रह और पारस्परिक सहायता के पक्षपाती है। क्योंकि यह काम किसी भी तरह 'सत्तामह' की परिभाषा में नहीं पा सकता । अगर लड़तियाँ "कानी" के सामने 'हाँ' की जगह पर 'ना' कह दें और उन्हें कोई पकड़ ले लाय तत्र नगर ऐमा दिया जाय तो एक पात भी है। लेकिन स्वय अपनी शादी में एक पार्टी के हैमियत से शोमा रढ़ाकर दाढ़ीपार गाहों ये सामो 'हाँ' कह दिया, और पिर मरना श्रारम्भ कर देना बेहद गलती है । रह गई जबर्दस्ती की जात, तो उसके लिए निवेदन है, कि हरएक सूबसूरत लड़की इस लायक है, कि उससे जबर्दस्ती शादी फर ला जाय । हर एक मर्द का, चाहे वह मेरी ही सूरत शकल का क्यों न हो, यह पैदाइशी हक है, और दुनिया की कोई ताकत इस मुनासिब अधिकार को किसी मर्द से नहीं छीन सकती कि जान लड़की को यह अधिकार प्राप्त नहीं, कि मदों के इस काम पर राय भी प्रगट करे । हाँ, अगर किसी दुढ़िया के साथ कोई नवनवान जबर्दस्ती शादी करना J , भाई बना डाला । मैं क्या करता ? लाचारी थी, भाई बनना पड़ा । पर नीचे लिखे हुये के अनुमार था माननीय भाई साहन नमस्ते । श्रापका हमदर्दी से भरा हुश्रा पर मिला । अापका विचार ठाक नहीं है। मेरी शादी का सवाल ही नहीं है और न मुझे अपनी शादी से कोई विशेष दिलचस्पी है । हॉ, मेरी एक सहेलो अलमत्ता है, जिनकी शादी उनकी मरजी के अनुसार नहीं हो रही है। माफ कीजिये, वह समय अभी नहीं पाया, कि लड़कियाँ साफ-साफ काजी से इन्कार कर दे या बाप से लिम्बवा दे । रह गई वह तरकीन, जो आपने नहीं बताई, तो जब तक मालूम न हो उसके बारे में कोई राय कायम नहीं की जा सकती । मुझे जानने की इस प्रकार जरूरत भी नहीं है । मेरे कोई माई नहीं है, इसलिये मैं आपको अपना भाई बनाना चाहती हूँ। मुझे श्राशा है, कि श्राप कभी कभी अपनी अपरिचित वहन को याद करते रहेंगे । यह न मालूम हो सका, कि 'प्रापका नाम क्या है, और श्राप करते क्या है ? क्या मैं पूछ सकती हूँ। अगर कोई हर्ज न हो तन श्रापकी बहन । "" इस पत्र का मैने ध्यान से पढ़ा । हानाकि यह बहुत अच्छी तरह जानता हूँ, और शायद आप भी जानते होंगे कि मुंहबोले नहन और मँगोले भाई को छोड़ रिश्ते के भाई बहा या उस समय तक कोई विश्वास नहीं, नत्र तक, कि एक विशेष जाति दुनिया मे मिटा न दी जाय ! या ईश्चर, काजी भी एक विचित्र चीत्र है। मैंने सय यह भयानक दृश्य अपनी इन्हीं दोनों प्रांतों ने देगे हैं, कि अच्छे खासे - बहन भाइयो को इसा जाति के एक आदमी ने सौ रुपये के पीछे बर्बाद कर दिया । जरा सोचिए, हमारे दोनों चचानों की मन्तान दोनों के यहाँ एक लड़का और एक लड़की। क्त की बात है कि एक साहिना का मुँह सूखता था कहले कहते 'अनवर भाइ, अनवर भाई और अनवर भाई की बड़ी बहन थीं। चचा के वेटे को, जो तीन चार साल छोटा था, शायद अलगू कहती था और वह शिष्टाचार के साथ उन्हें श्रापा कहते थे। लेकिन पड़े जो ये चारों काजी के पल्ले तो जनाब एक साहिबा श्रा 'अनवर भाई न कहकर 'उन' कहती हैं तो दूसरी साहिबा भलाई से मरे हुये अपने 'अलचू' को "वह कहती हैं । लेकिन इन भयानक घटनाओं के होते हुये भी में सच निवेदन करता हूँ, कि मैंने इन 'ब' साहिबा को सचमुच अपनी बहन के बराबर बना लिया । या कम से कम जहाँ तक नियत का सवाल है। मैने मन में सोच लिया, कि यह मुझे माइ बनाती है, तो में भी उनको बहन ही समदूंगा। मैने पत्र का जवाब बहुत ही सक्षेप म दिया- रहन साहिमा-श्रादार । श्रापका पत्र मिला । मुझे अापकी सहेली के साथ कोई हमदर्दी नहीं । वे उचित राले पर है, या उनके होने वाले नियत पति । इसका फैसला मैं उस समय तक नहीं कर सकता, जब तक कि अापकी सहेली को तसवीर मेरे सामने न हो। रह गया काजियों से इन्कार का समय तो नाप बुलाइयेगा, तो वह भी श्रानायगा । आपका यह सवाल, कि मैं क्या करता हूँ ? इस सबध में निवेदन है, कि चलता हूँ, खाता हूँ, पहनता हूँ, गोलता हूँ, इत्याद, इत्यादि, नाम मेरा मिल कुल "रशीदी" है। इसम "प्रसाद" या "मल" वगैरह छोड़कर "हानन" 'अली' वगैरह जो जो में आये, जोड लें। ईश्वर जानता है, है १ - ( १०८ ) काम चल जायगा। आपके नाम की इतनी जरूरत नहीं । पन और क्यन से पता चलता है, कि ग्राप मजेदार वेगम हैं। चलिये कुछ हुई। यह जान करके सुशी हुई, कि आपको शादी से कोई विशेष दिल चस्पी नहीं है। यह प्रमागी चीज भी ऐसी ही है। ईश्वर इस बुराई से बचाये ! स अापका भाई "रशीदी", इस पत्र के बाद दो पन और आये और तीसरा तो इस प्रकार नौरस और मनोरजन रहित था,कि जवान देने को भी मन नहीं चाहता था। लेकिन इसके बाद ही एक और पत्र पाया। उसमें और कोई विशेष बात तो न थी, लेकिन यह लिखा था कि मैं आपको अपना भेदश बनाकर एक छिपा हुश्रा मैद बताना चाहती है, लेकिन शर्त यह है, कि पसम खाइये, कि किसी से कहियेगा तो नहीं ।" और इसके बाद इस बात पर जोर दिया गया था कि यह भेद मुझे केवल अपना हमदर्द और पारा भाई समझ कर बताया जा रहा है । अब इस पन को पढ कर मै चौंका। वह कौन सा भेद है, जिसे मैं यहाँ बैठे-बैठे जान गा। मैने पत्र में ऐसी मोटी मोटी करामे साई थी, कि अगर अब लिखा गया होता तो पहली अमेत की दासरवाना की रियायत कुछ काम न पाती। अपने पत्र का मैं बड़ी श्नाकुलता के साथ इन्तजार कर रहा था, कि इसी बीच में एक पर ग्राया । खोलकर जो पढ़ा, तो एक दूसरा ही मामिला । जरा सोचिये । यह मेद यह या, कि बहन साहिता के पिता बहुत बड़े बदमाश हैं। उन्होंने एक नीच जाति पी औरत से शादी कर ली है । और वहन साहना तथा उनकी माता ( १०६) की ओर से बिलकुल येरपर रहते हैं, और बहुत तकलीफें देते हैं। मैंने इस पत्र को कई बार पदा ! दोगों पर मेरे सामने थे। पहले याले पर की गभीरता, और उस पर या उममी इदारत देशकर और यह पत्र देव पर मैं इस परिणाम पर पहुँचा कि मेर तो कोर जरूर है। लेकिन वह मे और है । यह कि बहन सादिया ने जिस समय मुझे पहला पन मुझे लिसा या, उप समा उनका पिनकुन यह विचार रहा होगा कि मुझे असली भेद से परिचित रा दें। लेकिा माद में विचार बदल दिया। जिला भी मो इस मसले पर सोचा, उनना हो मुझे हद विश्वास होता गया। सैर, मुझे कोई अधिकार न था, कि इस स देव का यान हैं। मैंने इस भेद को मेद स्वीकार करये राय भी दी और हमदर्दी भी प्रगट की। इस संध में उनके 'पौर मेरे कई पर धाये और गये। और प्रापसी दोस्ती तथा नेकनियता दियाई गई। दो नाद कुछ ऐसा हो गया कि पत्रों से जहाँ तक अनुमान लगाया जा सकता है, सचमुच अपना भाइ समझता। मुझे उनये पनों का जोह रहती और जरा सी भा परीशी होती तो उनका लिखता और उनसे हमदर्दी चाहता। वे राय भी देती। मेरे उन्हें और उन मुझे सारे हाल मालूम होते रहे । लेकिन अपना नाम और पता उहोंने मुझे न सताया, और न मैं उनसे किसी तरह कम था, प्रत मै हो क्यों नतावा ? वैसे दोनों के पत्र व्यवहार से हम दोनों को एक दूसरे की सादानी बातों का पता लग जानासान या मेगे समझ में इस प्रकार का पत्र व्यवहार दोनों ही श्रादमियों के लिये अकेले में मनोरजन का साधन होता है। अपो पत्रव्यवहार में हम दोनां विभिन ( ११० ) पर वादा विवाद करते थे यह पन व्यवहार चल ही रहा था । कि एक विचिन मामिला सामने थाया। , मैं नहीं कह सकता ! लेकिन यह सच बात है, कि बैठे-बैठे कुछ मनोरजन करने की सूझी, प्रत नीचे लिखा हुया विज्ञापन अखबार में छपवा दिया- वर की जरूरत एक नवजवान लड़की के लिये वर की जरूरत है। लड़की बहुत ही ऊँचे विचार की तथा पढी लिसी है। हिन्दुस्तानी और अँगरेजी सगीत को भली भाँति जानती है। पढ़ने लिखने की ओर बेहद प्रेम रसती है । अपनी माँ का इकलौती लड़की है, और माँ की जायदाद दो सौ रुपये महीने आमदनी की है। इसके अलावा लड़की के नाम स्वय दाई लाख रुपये बैक में जमा है। लड़की की माँ एक्ट्रेस थी। लेकिन अब वह अपना पेशा छोड़ चुकी है। उसने लड़की को सदा से अपने पेशे से अलग ही रक्सा है और लड़की स्वय इससे घृणा करती रही है। माँ यह चाहती है, कि लड़की की शादी किसी नेक और सभ्य, लेकिन अच्छे खान्दान के लड़के के साथ करदे, जो पढ़ने- लिखने का शौक रसता हो और लड़की के साथ विलायत पाकर स्वय शिक्षा प्राप्त करे और लड़की को भी तालीम दिलाये । लड़का गरीब हो तो कोई हर्ज नहीं। नीचे लिखे हुये पते पर रजिस्ट्री के द्वारा पन व्यवहार फरें-पन के साथ फोटो जरूर हो, नहीं तो कोई ध्यान न दिया जायगा। मार्फत सपादक "शाहजहाँ" देहली।। ।

। इस विज्ञापन को केवल दो तीन ही बार छपाया था, कि रजिस्टरियों का अभार लग गया। भगवान ही बचाये, मैं क्या निवेदन करूँ, कि कैसे कैसे पन आये हैं। मौलवियों से लेकर बदमाशों तक रे पर थे। कोइ सौ रुपये की नौकरी पर हैं तो इस्तीफे देने को तैयार, कोइ तिनारत करते हैं तो उसे लात मारने को तैयार और फिर एक से एक ऊँचे खान्दान के प्रादमी मौजूद । ऐसे, कि यदि कहीं मैं लड़का होता तो एक बार मुझे उम्मीदवारों में से कई के साथ शादी कर लेनी पड़ती। फिर उन पनों के लिखने का दम । या ईश्वर, मानों भीख माँग रहे हैं । बिना कहे सुने गुलामी का चिट्ठा लिसने को तैयार हैं। मानों केवल लड़की को ऊँचा खान्दान का होने के कारण इस तरह 'उत्तारू' हो रहे हैं । फिर तसवीरें तो फिर देखते हा रहिये । एक से एक “गल यूश" और "पारिन्दे" मौजूद । ऐसा, कि बस देखते ही रह जाइये। इनमें से अगर खास ग्यास पनों की चर्चा की नाय तो एक बहुत बड़ा दीवान तैयार हो जाय। यह तो सब कुछ था, लेकिन मेरे आश्चर्य की कोई सीमा न रही, जर एक लिपारा सोलकर क्या देखता हूँ, कि जनार इजाज अली खाँ साहा का फोटो सामने है पर के साथ। कौन इजाज अली ग्वाँ १ वही हूँ डले पर, जिन्होंने मुझे व्यर्थ में परीशान किया था, इस समय मेरे सामने उनकी येनपी से भरा हुई अर्जी या दरख्वास्त मौजूद था। इस पत्र को पाकर में उछल पड़ा। वह मारा है अनाड़ी को । अब सवाल यह था, कि क्या कारण है, जो मैं इन साहर को हँडले के हो स्टेशन पर न बुलाऊँ। यह काम पड़े सोच विचार का था, और सच पूछिये तो बहुत बुरी तरह पंसा । इन पत्रों में से मैंने नुन कर थोड़े से अलग किये और उनसे एक उचित टग x x पर एक गुम नाम कायदे से पन व्यवहार शुरू किया। यह सिलसिला जारी ही था, फि और भी मनोरखफ मामला सामने श्राया। x [ ५ ] वहन 'त्र' साहिना से पन व्यवहार वारी ही था, कि उन्होंने उस विषय पर बहस शुरू कर दी, कि एक लड़की क्सि प्रकार का पति पसन्द करती या कर सकती है । दुख की बात है, कि उन्होंने पतियों के जितने प्रकार नताये थे, मैं अपने को उनमें किसी में भी शामिल न कर सकता था। लेकिन यह बात सच थी, कि अगर वहन साहित्रा सचमुच मुसलमान लड़कियों के विचारों का ठीठीय प्रदर्शन कर रही थी तो इससे यही अनुमान लगता था, कि अगर लोग चाहेंगे, कि अपनी लड़कियों के लिए ऐसा पति हूँदें जो उनकी मरजी के अनुसार हो तो वह दिन दूर नहीं, जन बहेलियों और अवारों के दिमाग बिगड़ जायँ, और "उल्लू' तथा "गो" की नीयत का ठिकाना न रह जाय । दूसरा मसला, निस पर बहन साहिया से बहस चरा रहा था, यह था कि वे कहती थीं, कि नवजवान ग्रामतौर पर जुरे ख्याल के, बुरी समझ के और बुरी चाल चलनाफे होते हैं तथा बुरी नीयत भी रखते हैं। इस सम्बन्ध में वे मेरी इतनी तारीफ करती थी, कि जोश में आ जाती थीं। कहती थी, कि मुके छोड़ार और सब नवजवान उदमाश है । इनके पर के रङ्ग दङ्ग से यह स देह होता था, कि शायद उन्हें इस बात का. बहुत कड्या अनुभवाया है। जब मैंने इसना जोरदार नवाब दिया- तो बहन साझिा ने मुझे लिखा कि अगर मैं भेद न बताने, की फसम साऊँ और इमानदारी से जोक्छ दस्तावेनी सबूत-वे मुझे दें, मैं ज्यों - का त्यों लौटाल दूं तो वै मुझे पायल कर देगी । प्रगट है, कि घटनाओं ने अजीब पराट ली। और मैंने इर कसम का उन्हें वचन दे दिया । श्रापिर एक मोटी ठी रजिस्ट्री मेरे नाम पहुँची। खोलकर देखता हूँ तो बहन साहिया का पत्र था। और उसके साथ एक बेहूदा और बदमाश नरगपान के पत्रों का पुलिन्दा, जो बिलकुन बहन सादिया के पीछे हाथ धोकर पद गया था। किसी तरह जान ही न छोड़ता था । श्रर ये पौन हजरत ये! या ईश्वर, जरा विचार तो कीजिये, घायल प्रेमी वही जनाब इजाज अली खाँ साहन थे। थोड़ी देर लिए इस सयोग पर में खुशी के मारे पागल हो गया। समझ म न पाया, कि क्या करूँ। और क्या न करूँ! मामिलों ने घटनाओं को एक मनोरजक गुत्थी । दिया था। महन साहिवा, मालूम होता है, कि एक दिलचस्प श्रादमी थी। जो पर उन्होंने इजाज अली नसाहन को लिग्वे थे, उनसी नकलें घर एक पत्र के साथ थीं। इस पत्र-व्यवहार को पढ़कर मालूम हुश्रा, कि बहन साहिश ने पहले तो इजाज अली खाँ को उपदेश दिया था, लेकिन जब वे न माने तो लाचार होकर चुप्पी धारण कर ली और वह भी ऐसी, कि इजाज श्रली खॉ के दस मारह पत्र श्राये। लेकिन उन्होंने कोई जवाब न दिया । ग्राग्निर वे थक पर बैठ गये। मने इन सभी पनों को ध्यान से पढा, और पिर उसका जवाब लिसा । मैंने पहले बहन साहिता को मुबारक राद दी, कि उहें एक ऐसा चादने वाला मिला । इजाज अली खाँ साहन के पन व्यवहार को मैंने अपनी टोर से यह ठहराया कि हर नवननान को एक लदकी पर रीमने का अधिकार प्राप्त है।

( ११४ ) शर्त यह है कि रीझने वाला जर उचित रास्ते पर चले अर्थात् त शादी करने की नीयत हो। कसूरवार मैंने स्वय बहन साहिना को नौर सारी लड़कियों को ठहराया। केवल इस कारण से कि नवजवान बेचारे प्रकृति की तरफ से लाचार है,जो कि एक शक्ति है जो उन्हें अपनी योर सींचती है । इजाज अली सॉ भी एक नवजवान हैं, और उन्हें प्रकृति श्रापकी ओर सींचती है। अब रह गया यह सवाल, कि इस सिंचाव के बश में होकर उन्होंने क्या किया ? आपको पन लिसा बहुत अच्छा किया । लेकिन कोई पर उन्होंने श्रापको ऐसा नहीं लिखा, जिसमें वे यह पूछते कि आपका प्रतिष्ठित खान्दान क्या है ? जिससे मैं आपको प्राप्त करने का प्रयत्न करूँ और न यह लिखा कि मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। और अगर इसे मजूर करो तो सफलता का रास्ता दिसायो तथा मेरी मदद करो । केवल एक यह बात थी जिससे पता चलता था कि इजाज अली साहन की नीयत ठीक नहीं है । अन्त में मेने नहन साहिना को यह भी लिखा, कि इजाज अली श्रापको चाहने वाले हैं। आपके लेख उन्होंने देखे, और आपकी लेखन शैली की रात्रियों का उनके दिल पर असर पड़ा । नापको उनकी इजत परनी चाहिये और उनको पदमा या बुरे विचार वाला बिलकुल न समझना चाहिये। मेरा पन बहन साहिबा को जो मिला तो उन पर विशेष असर या। मैो उनके पत्र ज्यों के त्यों लौटाल दिये थे उहोंने मेरे जवाब योध्या से पढ़ा और इनाज अलीयां या जो मैने पक्ष लिया या उस पर उन्हें श्राश्चर्य हुश्रा । अत उनका पर पाया, और उसपे साय इलाज अलीसा का प्राप्तिरी पत्र मी श्राया, जिसे उन्होंने सोच ( ११५ ) समझकर रोक लिया था । क्योंकि उसमें प्रेम को प्रगट करने में बहुत ही खुलकर बाते की गई थीं। इस पत्र में जो कुछ भी लिसा था उसकी नकल यहाँ देने से कोई लाभ नहीं। एक खास बात को बताना चाहती हूँ। वह यह कि उसम इजाज अली साहब ने दो खास निवेदन किये थे। एक तो बहन साहिबा की तसवीर माँगी थी और दूसरे पैर का नाप माँगा था इसलिये कि उनके शहर में औरतों के जूते बहुत अच्छे बनते थे और वे चाहते थे कि अपनी प्रियतमा को भेंट करे । बहन साहिवा ने इस पत्र को यह कह कर भेजा था, कि आके दिल ने उन्हें फटकारा, कि आपने "हमदर्द भाई" (खाकसार) से कोई नात छिपाये रवी । फिर वह भा राय ली थी, कि क्या तसवीर भेज देनी चाहिये । साथ ही तसवीर भेजने में जो आपत्तियाँ थीं, उन्हें भी प्रगट पर दिया था। यह पन जब मुझे मिला है, तब पहले तो मेरी तबीयत खराब थी, और दूसरे हन मामिलों की उलझनों में बे तरह पड़ा या, कि मुझे क्या करना चाहिये १ मैं कह नहीं सकता, कि दन मनोरञ्जक बहन से मुझे रिस तरह प्रेम हो गया था। दुनिया म मेरा कोई साथी और हमदर्द था तो यही गुमनाम रहन । ना मैं सोचता था, कि कैसी भोली माली और सच्ची लड़की है, मुझमे क्सि सादगी व साथ पश पा रही है, मेरी किस तरह हमदर्द है, और कितनो मनोरजक है तो मेरे दिल में अकथनीय प्रेम का लहर पैदा हो जाती । क्या उससे अधिक मनोरनक और उससे अच्छा दोस्त मुझ मिल सकता है। असम्भव । उसको जिन्दादिली ने मेरे विचारों को चमश दिया है । उसका मुन्दर लेखन शैली पर और उसका तबीयत की तेजा मे मेरा दिल पटों खुश ( ११६ । ईश्वर को लाख लास धन्यवाद है, कि उसने मुझे ऐसा मेहरबान और हमदर्द दोस्त दिया है, जो मुझे कभी मुयस्सर नहीं हुअा। मतलन यह कि कुछ कारणों से पन का जवार जल्द न दे सका। और इस बीच में बहन साहिया का एक छोटा सा पन श्राया जिसमें जवान न मिलने पर चिन्ता प्रकट की गई थी। पन से आवश्यकता से कुछ अधिक जल्दबाजी प्रकट होती थी। इस पर को पाते ही मैंने रहन साहिबा को एक पत्र लिखा , और सभी बातों के अलावा मैंने उन्हें लिखा, कि देखो तुम मेरी हमदर्द बहन और मैं तुम्हारा हमदर्द भाई हूँ। अब अगर भाई के लिये तुमने इतना भी न किया, कि एक अच्छा-सा जूता बनवा दिया तो कुछ न किया । श्रत तुमको चाहिये, कि मेरे पैर का नाप लेकर इजाज अली को भेजकर एक अच्छा सा जूता बनवा दो । रह गइ तुम्हारी तसवीर, तो उसका इन्तजाम मैं कर लूँगा । बाजार से एक ऐसी अच्छी सी तसवीर लेकर इजाज अली साहब को भेजूंगा, कि उनकी तबीयत भी खुश हो जायगी । प्रकट है, कि इस राय से सनको पायदा होगा । और तुम्हारा कुछ नुकसान न होगा । मुझे जूता मिल जायगा, इजाज अली को तसवीर मिल जायागी, मै भी तुम्हारा एहसान मन्द हूँगा और इजाज अली पर भी तुम्हारा एहसान होगा। अत मुझे जूता पहनाने पर तैयार हो तो अपने पैर का नाप भेजूं । यह पन लिसकर मैंने डाल दिया । अभी पन वहाँ पहुँचा भी न होगा, कि एक हद से ज्यादा मनोरजा और अजीव मामिला सामने था पहुँचा । लेकिन पूर्व इसके कि उसकी चर्चा करूँ कुछ उन पनों की चर्चा भी सुन लीजिये, जो एक्ट्रेस वाली लड़की के विज्ञापन से प्रास हुये थे। - x मैंने अपने दोनों को इस मनोरजऊ पत्र व्याहार में और शामिल कर लिया। अब मेरी सलाह छ और ही थी। मैंने दो उम्मीदवारों को अभ्यास को पटा बनाने के लिये चुना । एक तो इजाज अली साहब ये और दूसरे एक और साहब थे, जिनका नाम मान लीजिये कि श्रदमद था। इन दोनों हजरलों की तसार मेरे पास भी हो ! और मी प्रपना म अरसा नहीं बताया था। अब मैंने सोचा, कि इन हनग्नों की ऐसी मुलाकात फगई लाय, कि जिससे दोनों यहा समझे कि मुझसे मिल रहे हैं। प्रत मैंने इन दोनों साहयों का समय एक्ट्रेस का लड़की के लिये चुनार दोनों को पत्र लिख दिये । x सेवा में भाई इजाज अली खाँ साहब ! अल्सलाम वालेकुम । मेरे लिये सबसे अधिक प्रसन्नता की बात है कि मैंी और बहन साहन अर्थात् एक्ट्रेस (लड़की की माँ) ने स्वय लड़की की मरजी के मुतामिक अलग चुनाव कर लिया है । ईश्वर इस इरादे में हमें कामयान को अब तक मैं गुमनाम रहा । श्राज अपना न केवल नाम प्रकट कर रहा हूँ, बल्कि अपनी तस्वीर भी श्रापको मेजता हूँ। मुझे आशा है, कि श्राप एक हमदर्द और मुहब्बत करने वाले रिश्तेदार साबित होंगे ! मैं अभी तक अपने सम्बधीरे यहाँ था । श्रर घर जा रहा हूँ। वहाँ पहुँचकर पूरे पते के साथ सूचना दूंगा और आपको एक दिन के लिये वहाँ मुझसे मिलने श्राना पड़ेगा । यहाँ आपके ठहरने का मुनासिब इन्तजाम डाक बंगले में कर दिया जायगा । क्योंकि श्राप I । -- ( (२२ ) मैंने जब देगा, कि सचमुच अपनी राय में यह ठीक कह रहा है और कुमारी लड़की के लिये ऐमी हिम्मत करना कठिन है, तो मैन एक और चाल चली । यह जानता ही था, कि बड़ी जिन्दारिल लड़की है। लड़की होने के कारण लाचार है, नहीं तो न मालूम क्तिनी शरारत करती । इसलिये मैंने इस ग्रानन्द और मनोरजन का हवाला दिया, जो इस प्रकार की बातों से जरूर ही पैदा होता है। अपनी पहली शादी की कोशिश में मेरे ऊपर जो कुछ बीती थी, वह किसी दूसरे पर घटा कर स्वय जो कुछ सामने आया था, उसे अपनी शरारत बताया और वर्तमान एक्ट्रेस की लड़की के विज्ञापन की चत्रा मैंने की, कि यह सब मैने केवल मनोरजन के लिये कर रम्बा है और यह भी लिग दिया, कि दर्जनों तसवीरें और अर्जियाँ प्राई हुई हैं और उन सभी उम्मीदवारों को मैं उल्लू बना रहा है । अगर तुम इम । मनोरजन में मेग साथ देना चाहती हो तो विसमिल्लाह । वदनामी के डर को 'झोंको चूल्हे म । ग्रावो, और हमारे साथ इन अजाय मनोरजनों में शामिल हो जायो । हम जूता पहनायो, स्वर हमा, और सो हमायो, कि यहा जिन्दगी है । शादी तो कोई न कोई वेवकुफ तुमसे पर हो लेगा, लेकिन खुदा जाने इस प्रकार का मनोरजन फिर नसीन हो या न हो। सास तौर पर जर कि तुम अब भी गुमनाम हो, इसलिये कोई डर नहीं है। मेरे इस लम्बे चौडे पत्र को उस दिल्ागीबाज और शोख लड़का ने पढ़ा और इन शरारतों के विचार ने ही उसे राजी कर दिया । लेकिन उसने यह लिखा कि 'मुझे ' पहले उन बातों में शरीक करो और वे मनोरजक पत्र और तसवीरें मेरे पास देखने के लिये मेनो।

(१२३) श्रत मैंने इजाज अली साहब और अहमद अली साहब के पत्रों को छोड़ कर शेष सभी पत्र और तसवीरें रजिस्ट्री से बहन साइमा के पास भेज दी । श्रन शपथ है मुझे अपने 'झूठ मक्कारी' और दगयाजी' फी, कि ये पर जब हमारी शास और ममसरे बाज बहन के पास पहुँचे हैं तो मनोरजन का एक भूचाल मा आगया । असल बात यह थी, कि इन दर्जनों पत्रों म एक पर उन साहर का भी था जिनका सम्बन्ध इमारी प्यारी और मनोरजक बहन से तै पार, मामिला पक्का हो गया था और जिनसे शादी करने की अपेक्षा पहन साहया मर जाना अस्या समझती थीं । फाश, मैं न हुना । जो स्वयं अपनी आँखों से देखता, कि बह्न साहना का अपने भावी पति की दरख्वास्त तसवीर के साथ देखकर क्या हाल हुश्रा होगा। परिणाम यह निकला, कि उहोंने अपने भायी पति का असली पत्र ज्यों का त्यों एक जबर्दस्त पन के साथ मुझे भेज दिया, और यह हिदायत की, कि मैं वह पन और तराचीर फ्लॉ फलाँ साहब के पास मेज दूं। और एक गुमनाम पत्र भी लिख दूं, कि आप ऐसे वे ममता यादमी के साथ अपनी लड़की की शादी कर रहे हैं जो रडियों के पैसे के लिये ऐसी वेशर्मी का पन लिख सकता है। ये साहर बहन साहवा के कौन थे? मैं नहां कह सकता। यहन साहबा ने केवल इतना ही लिखा था, कि मेरे सम्बधी हैं और इस होने वाले सम्बन्ध के बड़े विरोधी हैं। लेकिन दूसरे रिश्तेदारों के आगे उनका एक न चली। मैंने सबसे पहला काम यह क्यिा, कि बहन साहबा के हुक्म की तामील की और एक बनावटी नाम से पर लिख कर इन साहब का पत्र और तमपोर रजिस्ट्री से भेज दी । यह पर सचमुच एसी बेहयाई के । .

- ( १२६ ) का पैर इजान साहब का पैर है। मैंने नम्रता की तारीफ करके जूता पहना जो बिलकुल ठीफ श्राया। हालाकि मेरा पैर बड़ा नहीं है, लेकिन फिर भी छ नम्बर का पैर काफी बड़ा होता है । लेकिन तोगा कौनिये, इन कामों की तरफ भला कहीं प्रेमियों का ध्यान नाता है ? यह कम्बख्त महकमा ही ऐसा नालायक है, नहीं तो जो तसवीर उनके पास पहुँची यी अगर जरा भी उसे ध्यान से देसते तो उन्हें मालूम हो माता, कि स्वय तसवीर वाली ही ६ नर के साइज की नहीं। कहाँ उसका पैर और कहाँ यह जूता। इसके बाद कहने लायक बात यह है, कि बहन साहिना ने इस माँग पर जोर दिया, कि इजाज अली साहा की भेंट करा दी जाय । शैतान को उँगुली दिसाना कापी था । मैं स्वय इस श्रावश्यक मसले पर विचार कर रहा था। इस तरह श्रम इजाजबली और अहमद अली की मुलाकात का हाल सुनिये । किस्से को इस तरह सलेप करता हूँ, कि दोनों साहन एक दूसरे के असली नामों से परिचित थे । एक की दूसरे के पास असली तसवीर थी । यह दूसरी बात है, कि प्रत्येक दो साहयों में से हरएक को फर्जी एक्ट्रेस की दामाटी का उम्मीदवार और दूसरे को एक्ट्रेस का भाई अर्थात् लड़की का मामा समझता था । एक पन अहमद अली के नाम से इजाज अली साहब को कि पला दिन धाइये और इजाज अली साहब की तरफ से अहमद अली साहब को एक तार, फि पला वक्त पहुँच रहा है। इसके लिये कापी प्रबन्ध था, कि दोनों की मुलाकात डाक बंगले में हो जाय । मैं एक ट्रेन पहले ही अपने एक दोस्त के साथ पहुँच गया । डाक बैंगले के एक कमरे में मेज पर'चाय या सामान लदालद रखा था और अहमद

( १२७ )
अली साहम अपने प्यारे इजाज अली साहब को अभी अभी स्टेशन
से जाकर लाये थे। यह माफसार अपने दोस्त के साथ बराबर पाले
कमरे से झाँक रहा था। बीच के कमरे का दरवाजा इस चालाकी के
साथ कुछ खुला रखा था, कि सब दिमाई दे सके, कि क्या हो
रहा है।
दोनों एक दूसरे से अधिक गभीर ठोस मिजाज और शरमीले थे।
पहले दो एक फजुल बातें हुई । लेकिन चूँकि हर दो साहब एक दूसरे
को एक्ट्रेस का भाई और लड़का का मामा समझो थे, अत बहुत
जरत सिनेमा की बातों पर था गये।
शहमद अली साहब बोले-शायद सिनेमा से तो जनाब को पा
दिलचस्पी होगी।
"वेद ।'-हजाज अली साहब चाय का घूट लेकर बोले-कह
नहीं सकता
।"
अहमद अली साहब कुछ नशे में पावर बोले-"यही मेरा हाल
है । माफ कीजियेगा, जनाब ने स्वय कभी ऐक्टिङ्गम या किसी फिल्म
में दिलचस्पी नहीं ली।
इजाज अली साहब बोले -~-या निवेदन करूँ । कह नहीं सकता,
मुझे इसका कितना शौक है, लेकिन तमना पूरा न हुई । जनाब को
शायर मौका मिला होगा या कम से कम शौक तो होगा ही !
अहमद अली साहब मुसुकुरा कर बोले-कौन श्रादमी ऐसा है,
जिसे ऐक्ट्रेस बनने का शौक नहीं, लेकिन जनाब हर किसी के भाग्य में
यह कहाँ?
इजाज अली साहब लड़की की मौसो की अहमद अली

( १२८ )
वहन समझ हो रहे थे, और यह भी जानते थे, कि वह भी अपनी
महन अर्थात् लड़की की माँ की तरह एक्ट्रेस का पेशा छोड़ रही है,
श्रत उनके बारे में बोले-
"जनान बहन साहबा ने पक्का इरादा कर लिया है, कि अब
रिटायर हो जायेंगी।"
इजाज अली साहब को चूँकि मैं यह लिख चुका था, अत उन्होंन
इस समय यह सवाल किया, लेकिन अहमद अली साहब सवाल को
सूचना समझ कर बोले-मेरी समझ में तो अभी न रिटायर होगा
चाहिये।
इजाज अली साहन को मैंने लिखा था, कि फिल्म कम्पनियाँ खुशा
मद कर रही हैं । अत वह बोले-खासकर जन कि कम्पनियाँ खुशामद
कर रही हैं।
अहमद अली साहब इस सूचना पर जार देकर बोले-ऐसी हालत
में तो किसी तरह भा उचित । चाय उँडेलकर पीने लगे और रुक
गये। फिर मात को नये सिरे से उठाकर बोले-जनाय का कोई छोटी
चहन भी है।
मानों यह तो निश्चित बात है, कि लड़की को मां और मौसी
उनकी बड़ी बहन है। दुर्भाग्य से इजाज साहब ने "भी" शब्द को
सुना नहीं, या समझे नहीं और बिना सोचे समझे जवाब दिया-
जी हाँ!
श्रच्छा !- अहमद अली साहब ने चाय की प्याली को चमचे से
हिलाते हुये कहा-शायद
सीमा से उन्हें भी प्रेम होगा।
इजाज अली साहय कुछ,येचैन से दो गये, लक्नि उनके पास
।
-

+ ---जा - ( १२६ ) इस पात पे घमावा और बवार दो क्या था, कि नाले मुकाकर कुछ भैंसफर फह दे-'जी हाँ। (अर्थात् देखती है और अहमद अली साहय को पैदाइशी इक था कि ये इस 'जी हाँ' का यह मतलब लगा लें कि वय ये भी एक्ट्रेस हैं) इस तरह ये इसी धोरो में पहपर बोले- माशा अल्लाह ! उरि पिल्म में पार्ट पते का अवसर मिला। इजाज अली साहब का चेहरा बिलकुल लाल पीला हो गया । चेहरा देखने पे लायक था। कुछ सीझ के साथ उनके मुग्य से निफ्ला ।" अहमद अली सादर बोले शायद यहा साहिब के साथ किसी फिल्म में तो भाग ले चुकी होंगी। "कौर पहन सादिया !"-इजाज साहब घबहार बोले । "अर्थात् मेरा मतलब ।" अहमद अली साह ने शर्माकर कहा-"जनाब मौसी साहना !" "कौन मौसी साहया!"-इजाज अली ने परीशान होकर कहा- "माप कौजियेगा!"-लजाकर, अहमद अली साहब नीची नजर परये बोले-मेरा मतलब 'साहब जादी की मौण साहया या शरीप मों से है। अर इजाननली सादर कुछ चौक्ने हुये। चाप' की प्याली पगैरह से ध्यान खींचफर उहोंने अहमद अली साहब की तरफ देखा शायद जो शरमा रहे थे। और देखकर बोले-मार कीजियेगा । मो कुछ समझा नहाँ।" जवाब में अहमद अली महर ने इजाज अली साहब को देखा, जिनके चेहरे से कुछ कुछ नपरत प्रगट होनी शुरू हो गई थी । अहमद - । ( १३२ ) पर पड़ी । ईश्वर जानता है, मुझे तनिक भी आशङ्का न थी, मगर जरा सोचिये तो, कि वह जालिम अहमद अली को छोड़कर मुझ पर जो झपटा है, और यह साकसार बरामदे की सारी सीढ़ियों को लाँघता हुश्रा जो डाक गाड़ी की तरह स्टार्ट हुआ है तो फिर पीछे मुड़कर भी न देखा, पीछे फिर कर देसने की मुहलत ही किसे थी। हाते की दीवाल को फाँद कर जो खेतों खेत भागा हूँ, तो फिर स्टेशन पर ही पहुँच कर दम लिया । गाड़ी के आने में इतनी देर थी, कि इजाज साहब झगड़ा खतम करके श्रा न सकते थे । श्रत. इतमीनान से पौरन घर की राह ली, क्योंकि विश्वास था, कि वह जालिम इजाज जो मेरे ऐसे तीन आदमियों के लिये कापी है, मुझे जीता न छोड़ेगा । दूसरे दिन मेरे दोस्त भी लौटकर आ गये । कहने लगे, कि यार,, उसने तो मारते-मारते छोड़ा। बड़ी मुश्किल से उन्होंने सामित किया, कि मुझसे बिलकुल अप रिचित हैं ! अहमद अली साहब को समझाने में इजाज साहब का... काफी समय लगा, और वे. समझ भी गये और न समझते कैसे, क्योंकि पहले तो दाँव पेंच इजाज अली साहब को अहमद अली साहन - से अधिक मालूम थे और फिर वैसे भी वे इजाज अली साहब की अपेक्षा ताकतवर फम थे । श्रत विवश होकर उन्हें मामिले को समझना ही पड़ा । इस घटना को तो केवल बीच का एक भाग समझिये, कहानी के मुत्य भाग को तो मै अब ले रहा हूँ। x, किसी ने कहा है, मेरी जान चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है। - , । ११t x X V व । .

" शायर ने इन कठिनाइयों पर विचार कीजियेगा । एक मदारी को बन्दर बड़ी मुश्किल से मिलता है। "शाको" को 'चुगताई" या चुगताई को खूबसूरत माशूक ! एक बैल को हल चलानेशला । बहुत खूब यह न देवा, कि चाहने वाला और बिलकुल चाहने वाला" एक ऐसी चीज है, जिसे आसान समझना वैसा ही मुश्किल है, जैसे किमी करे को इनलिस्तान का प्रधान मन्त्री बना देना, किसी रैल को जर्मनी के युद्ध मन्त्रित्व के पद पर बिठा देना, या फिर किसी बैल को सुन्दर सी स्त्री मिल जाना, या किसी मुर्गे को रूम का बादशाह बना देना । प्रश्न तो केवल यह है, कि इन चाहने वालों और बिल्कुल चाहने वालों के मिलने की कठिनाइयों को अलापने की क्या जरूरत, और फिर इनका उद्देश्य !! लाहौल विलाह ।। असली चीज तो एक राय होता है । एक राय होना अलबत्ता बहुत ही मुश्किल है । मुश्किल से मतलब दण्ड पेलने या कुस्ती लड़ने से नहीं, बल्कि सौभाग्य, या सुनसर इत्यादि अब जरा ध्यान दीजिये, कि हन "ब" साहिबा की जाति वाली बूलियाँ मेरे लिये एक नियामत और बहुत बड़ी ईश्वरी भेंट सी मालूम होने लगी। चिट्ठी पत्री एक ऐसी चीज है, कि न केवल सम्बध और वैचारों का ही पता लग जाता है, बल्कि दोनों तरफ के लोग एक दूसरे की दिली इच्छाओं तक को जान जाते हैं । एक ही मजाक को पसन्द करने वालों, एक सम्बन्ध के मनुष्यों, और एक ही विचार के हृदय लों की अपेक्षा विचारों का एक में मिल जाना सबसे अधिक अच्छा :) इसी का नाम ससार में रक्खा ही क्या है। एक राय वालों में म्भक की सी एक आकर्षण शक्ति होती है, जो दोनों को एक-दूसरे . 1 (१३६ ) की जो देखने में श्राइ हैं, कि किस तरह एक "नदगी” काजी ने दो चचाओं की सन्तान को, जो बहन भाई कहे नाते थे, बिना किसी चौं चपड़ के गड्-बकर दिया । मेरी इस चिट्ठी का जवाब उन्होंने और भी कटुवा दिया और मुझे इस प्रकार पाड़े हाथों लिया, कि मैं किये पर पछताया, और कोशिश की, कि अपने शक वापस ले लूँ, और वही पुराना सम्बध ज्यों का त्यो कायम रह जाये, लेकिन असम्भव हो गया। उन्होंने लिसा, कि श्रन मै बे पर्द हो गया, और अच्छा हुआ, कि मेरी असलियत मालूम हो गई, इसके अलावा मुझे हर तरह से लथाहा । परिणाम यह निक्ला, कि चिट्ठी पनी केवल नसीहतो का ढेर होकर रह गई ! घर मैं भी कहाँ तक जन्त करता ! और कहाँ तक बुरा भला सुनता। अंत मैंने लिख दिया, कि जो श्राप कहें, ठीक है। मैं इस लायक नहीं, कि कोई शरीपजादी मुझ पर भरोमा करे । अच्छा हो, कि श्राप मेरे सभी अपराधों को माफ कर दे । और मुझे बहनुम में डाल दे । किस्सा खतम!- इसके बाद उनका एक और पन पन्यवाद का श्राया, कि मैंने उनके साथ जो एहसान किया है, वे कभी भूल नहीं सकती। मैं स्वय चददिल हो गया था। फिर न उनका कोई पर आया, और न मैने ही उन्हें कोई पत्र लिसा। दरा पर व्यवहार के बन्द होने के बाद मुझे सहसा ऐसा मालूम हुश्रा, कि मानों सबसे अच्छे दोस्त ने मुझे छोड़ दिया । एकान्तता सी मालूम होती । वबीयत इमेशा भारी रहती, और एक हमदर्द और साथी विचार दोस्त की 'जुदाई का बहुत बड़ा अफसोस हुआ ।'यह' J -- . - , x x ( १३७ ) सोचकर, कि मजदूरी है, मैंने दिल पर पत्थर रख लिया, और जिस तरह श्रादमी दूसरी बातों को भूल जाता है, मैं मी दो-तीन महीने में अपने साथी विचार और प्रिय दोस्त को भूल गया । विचार करके देवा तो वहाँ का वहीं था। कौन लड़की थी ? क्या नाम था । किस खान्दान की थी ? क्या उन थी। क्या करती थी १ कैसी भूरत शक्ल थी ? पहेली बिलकुल पहेली ही बनी रही। न मैं उमे जानें, और न वह मुझे । पैर अच्छा हुअा, जो हुआ । x इस पत्रव्याहार को बन्द होने के कोई तीन महीने बाद ही म एक और जरूरी काम में लग गया । वह यह, कि यादमी, बैल और पाबू, इन तीनों मे मे सबसे अच्छा कौन ? पाठक, श्राप तो श्रीख चन्द कर कह देंगे, कि "हम ।" यह पिलासपी थी। एक पेचीदा गुत्थी। क्योंकि ध्यान से देखा जाय तो उसका सुलझाना बहुत कठिन है। बैल और बाबू को लीजिये । मिहनती दोनों, और खूबसूरत भी दोनों । बल्कि बाबू एक बैल से कहाँ अधिक खूबसूरत । हाँ, सोगों के बारे में अवश्य मानना पड़ेगा, कि बैल के दो सौंग होते हैं और बापू के एक । उसके सिर पर और इमरे हाय में, जिसे लगाये वह श्रामतौर पर कागज पर घिसता रहता है । कोड कोई फैशनेत्रुल चैल भी (कोल्हू याले) ऐनक लगाते हैं। श्रादमी भा ऐनक लगाते हैं। बैन और बाबू दोनों चरिन की दृष्टि से बुरा चाल-दाल के होते हैं। श्रादमी भी बुरे चरित्र के होते हैं। मतलन, कि यह मसला कुछ पेचीदा है और इस मसले के हल + लिये खुदा ने मुझे श्रादमी से बार बनाकर एक रेलने स्टेशन के कमरे मे ला बैठाया ? जहाँ दिन रात मैठा या तो 1 ( १३८ ) 'गिट मिट' करता हूँ और या टिकट वेचता रहूँ। एक छोटा सा अस्पताल भी स्टेशन से मिला हुआ था और यही सभ्यता और मनुष्यता की वस्ती थी। एक सी नौकरी करने वाले इन गानों के क्वार्टर दूर तक बने' हुये ये | डाफरमाने वाले के कार्टर हमारे क्वार्टरों से कुछ अलग थे। अस्पताल वालों की डेढ ईट की चहारदीवारी कुछ दूर पर थी। अधिक से अधिक दिल बहलाव का सामान यहाँ यह था, कि दो एक शादी शुदा या विनाशादी शुदा साथियों के साथ बैठ कर अपने अपने मुहकमों के बुरे प्रबन्ध पर निनाद कर लिया, कुछ बुराई करली, और कभी कभी चुगुलगोरी से दिल नहलाया । इन बातों को छोड़कर देखा जाय तो जिन्दगी कठिन हो रही थी । सुदा की पनाह ! लेकिन सभी दिन एक से नहीं रहते । पाखिरकार हम भी तो कभी पलों में से थे। अत सहसा घटनाओं और भाग्य, दोनों ने मिलकर पलटा खाया, बहुत जल्द एक निहायत ही मनोरजक । x एक दिन की बात है, कि ग्यारह बजे वाली सवारी गाड़ी मैंने निकाली। स्टेशन साला हो गया, कि प्लेटफार्म पर से एक बार एक श्राराज नाई-"कुली कोई कुली है।" चूँ कि अावाज किसी औरत की थी, श्रत मैंने टफ्तर की खिड़की से झाँककर देखा । क्या देखता हूँ, कि एक औरत बुको ग्रोढे हुये अपने सामान के पास सड़ी है और कुली को श्रावाज दे रही है। छोटे स्टेशनों पर यों भी रोशनी का इन्तजाम ठीक नहीं होता। और अँधेरा वैसे भी था | अत मैंने फौरन विजला का टार्च निकाल कर देखा कि यह कौन है । मने बहुत हा x x ।

सौ साधे दस मे और रेलवे के धाम को वरह उय शरोप औरत फै गुदर चेहरे पर रोशनी डाली । क्या देखता हूँ कि एक चाद मा नय उन्न और खुपसूरत चेहरा बिजली की रोशनी से चमानौध दोगया। और इस पदतमीजी से बनी के लिये उस शरीर औरत ने अपना मह मोह लिया। मी पौरन जमादार को बुलाया, कि कुलो या काम करे और स्वप भी कमरे मे यादर निकला, मुझे श्राश्चर्य हो रहा था कि यह पान औरत है । जमादार से उहोंने पोस्ट मास्टर मुहम्मद हुसेन के मकान पर जाने की छा प्रगट को । मेने शागे यह कर बहुत ही मभ्यता व साथ हुक्म दिया, कि अभी अभी पोस्ट मास्टर साहन ये क्याटर में समा लेजाया और उन्हें पहुँचा प्रायो। इस शरीप औरत में अपना चेहरा नकार से दक लिया था। लेकिन एक कोन से इस साक्मार को देख रही थी और में सय विवश होकर उनमा दशनाय उँगुलिरों और सुन्दर हाय को देखकर काले चूट को । तेजी के साथ ये मेरे बगर से शिकल कर मुझे ध्यान से देखती हुई चली गई। ग्रा साल यह था, कि यह कौन हैं ? उनके उतरने की शान को तो देखिये । नवजवान और बिजबुल नस्ली में टिकट मांगना भूल गया या वे देना भूल गई ! या शायद बिना टिकट होंगी। लेकिन यह कौन है । यह सगल एक विशेष कारण से भी पैदा हुश्रा । पोस्ट मास्टर मुहम्मद हुसेन साहर अजार यादमी थे ! पोस्ट मास्टर क्या, गरिक सूरत शकल और *चे गुणा का जहा तक सम्बध है, काल का दूत उन्हें इद दल का दुश्मना और १

( १४० )
रसते थे। कारण यह है, कि यहाँ आने के पहले म अस्थायी तौर पर
एक स्टेशन पर चार दिन के लिये गया। क्योंकि स्टेशन मास्टर
साहब ने छुट्टी ली थी। और इसी बीच में उनका तबादिला इस
'जगह' से उस जगह का हुश्रा । वे टिकट लेने पाये । मेरा नियम था,
कि दफ्तर का कमरा बन्द रसता था, कि कान साने वाले लोग कमरे
में न घुस आयें । अब ये टिकट लेने के लिये जो आये, तो
पूछते हैं:
"अजी बाबू साहब, यह साँभर वाली कब आयेगी ?"
अब इस सवाल के अर्थ पर ध्यान दीजियेगा ? साभर जाने वाली
या आने वाली ? मैंने जवाब दिया -इस प्रकार की कोई गाड़ी
नहीं पायेगी।
बोले-जी हा।
मैने कहा हूँ।
क्रोध से जलकर बोले-माशो अल्लाह, सबीयत में मजाक कुछ
अधिक है।
मैने कहा-अपने प्यारे सिर की कसम, मुझे मजाक से क्या
मतलब
इसके बाद जब उन्हें विवश होकर ठाक से अपना सवाल फिर से
करना पड़ा, तो मने भी ठीक समय बता दिया। अब कहने लगे-
श्राप तो बहस और हुज्जत करते हैं ।
मैने जवान दिया मेरे नाना वकील थे।
मता पर बोले-"सूच" ! और चले गये। लेकिन पिर बहुत
मल्द पाये और उस स्टशा का टिकट मांगा, जिस पर म और में,

।
( १४५ )
दोनों थे। हालांकि रए जानते देंगे, कि तीन रण्टे पहले रिकट हाँ
मिलना चाहिये । मैंने तिमी दो मे उनकी तरफ ध्यान से देखकर
कहा- रिपर विप गये।"
वे चोले-कैसे।
मैंने कहा- लोग दूने और मोठे दाम देगर लेगये।
मेरी इछ गुल्लातीमा ३ शुल बुरा माने, अिधके लिये मी
बहुत ही उप दिल से उनमे छुट्टी मांगी पिर स्वयं ही कुछ सोच
पर बोले-पयों बनाम, क्या एक भी टिकट नहीं ?
मैंने कहा-एक भी नहीं।
"तो बना दीजिये टिकट!"
"टिकट बनाना जुर्म है।"
"पिर मुशाफिर कैसे जायेंगे।"
मैंने कहा-~-आपको मुसाफिरों से मतलब"
वे मोले-"अरे साहब, मैं स्वय जाऊँगा।"
मैंने कहा-आप जायेंगे ! श्राप श्राप
कहने लगे-जीदा।
मैंने कहा-मैं बताऊँ।
मुँह पाड़कर बोले-बताइये।
मैंने कहा-अगर न जाइए।
मेरा यह कहना था कि बहुत बिगड़े और जब बहुत लहे तो
मैने उन्हें समझाया, कि वक्त के पहले आपको परीशान करने का
फोइ अधिकार नहीं।
इसके बाद जब मैं इस स्टेशन पर मुस्तकिल होकर न

( १४२ ) उनसे साहब सलामत दुई । उनकी बीवी साहबा ने एक दिन मौल्द शरीफ कराया था। मैं उनमे माफी मांगने के उद्देश्य से उसके इन्त जाम में इतने जोर शोर से हिस्सा लिया, कि वे शायद बहुत कुछ मेरे बारे में राय नढल देंगे । लेकिन वे मेरे सम्बन्ध में अपनी बहुत हा स्थिर राय कायम कर चुके थे, अर्थात् यह, कि मैं बहुत बड़ा बदमाश हूँ | उनके न लड़का था, और न लड़की । केवल उनकी नीली थी और ये उनके एकलौते शौहर । ऐसी हालत में यह घटना और भी अधिक श्राश्चर्य का कारण थी, कि उनके यहाँ यह नवजरान लड़की क्यों और कैसे आई १ लेकिन मुझे इससे क्या विवाद ? विचार मन में पैदा हुआ, और चला गया । लेकिन इस घटना को कठिनाई से दस ही दिन हुये होंगे, कि एक दूसरा ही मामिला सामने याया । एक तो पोस्टमारटर साहन स्वय ही आश्चर्यजनक ये पौर दूमरे उनके घर में यह एक और श्राश्चर्यजनक चीज या गई । मालूम हुश्रा कि पोस्ट मास्टर माहन की भाजी हैं और परामर पाती हैं । अत्र इससे अधिक मालूम होने से रहा १ किसकी शामत पाई थी, जो पोस्टमास्टर साहब से जाकर पूछे । अस्पताल, डाक्साना और रेलवे की युवक पार्टी में कुछ चर्चा जर चली और स, मतलन, कि मामिला बिलकुल सामने हो था, कि मामिले की दूसरी सूरत हो गई। एक दिन का बात है, कि में सवेरे की गाड़ी निकाल कर बैठा हुअा रजिस्टरों की मानापुरी कर रहा था, कि भिशतिन श्राई । यह उस भिश्ती की नीवी के दग की सास थी, जो क्वार्टरों में पानी भरता था । उसने मुझसे एक अनाग्या घात कही । रहस्यपूर्ण स्वर में चुपके से कहा कि-"पास्टमास्टर साहब की माँजी ने श्रापको सलाम कहा है १ .

और कहा है, कि अगर भार मेरा काम पर दे तो अच्छा हो । सेनि पोस्टमारर पाहम मे न पई।" अम श्राप सोनिये, कि यह धूल में लट्ठ तो और क्या मैं स देश मुनर चौरला गया । कुछ घरड़ा गया। जी म यही पाया, कि जल्मा से श्रादा दे। मी पस पायदा कर लिया और पौरन जा बात आTI नाही, गो गायब ! यह ता दम भी जानन है, भांजी है, लेकिन क्यों 'गार है ! क्मिका लदरी है, इत्यादि, इत्यादि । शला इस का, कि उमारी हैं, और कोई जवाब न मिल सका । तो पिर यह तो कोई बात न ६१ हम स्वय जानते थे, कि कुमारी गैर, मैने कहा कि मेरी तरफ से कह देना, किम हर तरह सेवा के लिये तैयार हूँ, और श्राप विश्वास रफ्रें। श्रर जरा सोचिये तो कि पहाँ तो में इस प्रतीक्षा में था, कि शीघ मुझमे किसी सेवा के लिये कहा जाता है और यहाँ यह बात, कि चुडैल भिश्तिन की सूरत देखने को तरस गया । शाम को मिला भी तो कहने लगी, कि मने जाकर कह दिया था। पिर, फिर कुछ नहीं कहा । न दूसरे दिन, न तासरे दिन और न चौथे दिन । मानों यह मामिला यही का यही ग्वतम हो गया। वेकार मेरे पीछे एक झगड़ा-सा लग गया । जब रात जहाँ की तहाँ खतम हो गइ, तो में भा चुप हो रहा । क्लिी से मैंने चर्चा तक न का। दस यारह दिन बीत गये और मने भी भिश्तिन से पृथा, कि क्या मामिला है, बल्कि इस बात का विचार मी जाता रहा था, कि एक और भा नया मामिला सामने आया । x x ( १४४ ) मेरा नियम था कि कभी-कभी शाम को रेल की पटरी पटरी दूर तक टहलता चला जाता था। एक दिन की बात है, कि शाम को जी घबडाया तो घूमने के लिये चला गया और रोज जहाँ तक जाता था वहाँ से कुछ दूर निकल गया। जब लौटने लगा हूँ तो भुटपुटा-सा समय था । स्टेशन पहुँचते पहुँचते अँधेरा हो गया। में तेजी से चला श्रा रहा था और बड़े सिगनल के इस पार निकल गाया था। और इसी चाल से एक बहुत गहरी सदक के पास से निकला । यह खन्दक क्या थी, यो कहिये, कि एक लबा-चौड़ा गदा था । पटरी एक जगह से कट गई थी। इस जगह से मजदूरों ने इतनी मिट्टी निकाल ली थी, कि एक गहरा गड्ढा बन गया था। यह गड्दा वैसे तो रेल की पटरो से काफी दूर था। लेकिन पंटरी की तरफ बरसात से किनारे कट जाने के कारण इस तरफ का किनारा इतना तग होगया था, कि अर्थात् गड्ढे की सतह तक' ढलुवाँ दीवाल सी बन गई थी । ऐसी तन कोई रेल की पटरी के किनारे किनारे जा रहा हो और इस तरफ पैर पड़ जाय तो फिमल कर सीधा गड्ढे की तह में जा पहुंचे । कइ बार ऐसा हुआ, कि मवेशी उसम जा गिरे। जितनी भी इस तरप से चढने की कोशिश करो, मिट्टी सिसक्ती जाती है। अब जो में तेजी के साथ इस गड्ढे से निकला, तो मेरे श्राश्चर्य की कोई सीमा न रही, जय मैने देसा, कि कोई हिलने वाली चीज उस गड्ढे में है । वह चीज भी क्या। विश्वास मानिये कि पोस्ट मास्टर साहब की माँजी । मेरे मुंह से निकला "श्ररे और मैं ठिठक कर रह गया । मैने दलुवाँ हिस्से को देखा। मालूम हुश्रा कि इस तरफ से चढ़ने की व्यर्थ कोशिशें बहुत सी हो चुकी थी। मैं खूब अच्छी तरह जानता था, कि तक ( mm ) इसमें न निस्लना असभव है, जबकि कोई ऊपर से मदद न करे । मुझे देखकर वे अधिक परीशा होगा । इतनी अधिप कि इज्जत के कारण मुझे बुद्ध पीछे हटग पदा। मी दयी जबान से गिरो का कारण पूया, Hिजार मिला, इस पर मैंने इस बात की धार टाध्या दिलाया कि सभा नहीं, पि प्रिना मदद थे वे बाहर निपल मरें, लेकिन उन्होंने इस बात की भी टिम न ली । इस पर मंने कहा- अगर श्राप दूसरी तरफ से कोशिश करे तो मैं मदद करूँ !' *सा मी कुछ जगार न मिला। उापा चेहरा दूसरी तरफ था । श्रर सिवाय हमारे और क्या उपाय था, कि मैं उ-ई दमो हालत म छोड़कर पास्ट मास्टर मारय यो खबर । श्रत ग्राम मैंने यह अन्तिम निवेटा दिया, जो मालूम हुश्रा, कि मुझे पहले ही कहना चाहिये था। मैंने कहा-"मैं श्रमी जावर पोस्ट मास्टर सादर को भेजता हूँ।" यह कह कर जो मै तेजी से मुड़ा हूँ तो जैसे घबड़ा कर बोली-~~ "नहीं" मै चक्ति होकर पड़ा का सड़ा रह गया। लेकित कुछ न बोला। और जब उ ह यकीन होगया कि मन बोलू गा, तो वे स्वय बहुत ही धोरे मे, नरमी के माथ बोली-"विधर से निक्लू।" जो म ता यह। अाया, कि यह दूंसी रहो" लेकिन में गढ्ढे के किनारे पर या गया और घुटने टकार झुककर मैंने हाथ रढाया और कहा • श्राप उघर मे या जादये। मरा हाथ पकड़ कर ऊपर चढ़ भाइये। उन्होंने पूछा तो फिर मैंने का~मै अभी पास्ट मास्टर को बुला लाऊँ!

जर तक कि हिन्दुओं का देवी की तरह हमारे चार हाथ न हों । उन्होंने इस तरफ ध्यान भी न दिया । यह मजमून, कि लाद दे, लता दे । पैर पकड़ने की हिम्मत न हुई । पजे के पास मे मने उनकी सलवार पकड़ कर पैर के नीचे अपने हार की उँगुलियाँ फंसाकर जरूरी हिदायत दे और हाथों को ऊपर सींचा । अव सिवाय इसके और क्या चारा था, कि या तो वे सिर के बल औधी गिरें या इस साकसार के गले म हाथ डालकर मेरे कन्धे पर अपना दूसरा पैर रक्खे । लेकिन उन्होंने इस खाक्सार के गले में हाथ डालने की अपेक्षा दीवार कुरेटने की टहराइ । काम चलता, जन कि वे फौरन ही अपने पैर से मेरे कन्धे को श्रादर दे देतीं, लेकिन उन्होंने यह सच्चाई भी पसन्द न की, और पेर भी दीवाल में अड़ाना चाहा । मैंने बहुत कुछ कहा, लेकिन ने मानी । परिणाम स्पष्ट है, कि मुझे छोड़ना और उन्हें लुढकना पड़ा । मेरी जान तो जल उठी । और साथ ही मेरा ध्यान अत्र दूरारी पोर ग्राम र्षित हुना । कोने की तरफ जाकर निश्चिन्तता के साथ बैठते हुये मेंने कहा -"अापकी अगर इच्छा यही है, कि रात गड्ढ़े में बीते तो मुझे कोई इन्कार नहीं।" "मुझे निकालिये।" "श्राप स्वय मुझे निकालिये !"-मैंने कहा--"इस गढे में गिरने के लिये बहुत सख्त मुमानियत है।" उहोंने कहा- ----"सुदा के लिये ', मेंने कहा-"लेक्नि अाप नहीं निकल सक्ती !" "मुझे निकालिये मैं उम्र भर इहसान न भूलूंगी !" मैंने कहा-इसमें हमें गिरना ही न चाहिये था। यह गड्दा

,
हमारे धोवा के गदहे को गिरने के लिये यास तौर से बनाया गया है ।
वे बोली-~-खुदा के लिये दया कीजिये।
मैो कहा- "मुनिये, अापरे जा म स्वय निकलने की इच्छा नहीं
है। दो सूरते हैं श्राप निक्लने की । या तो म यहाँ से चिल्लाऊँ
और कोई आये और हम दोनों को निकाले।"
"नहीं नहीं
"धड़ाकर बात करते हुये उन्होंने कहा-
"पोस्टमास्टर साहब को
मने यहा-हं बुला हूँ।
'नहीं, नहीं, उहै ग्वबर तक न हो।"
मैंने कहा क्यों?
वे चोला--मैं आपको पिर बताऊँगी।
मैंने कहा--
--"दूसरी मूरत यह है, कि श्राप
को मुझसे शायद
कठ स लगना पडेगा और बिना इसके अापका निकलना श्रसम्मर
अर्थात् जब तक आप मेरा सिर न पड़े।"
वे सकरुण स्वर में बोली-"कि खुदा के वास्ते रहम कीजिये
रहम
। कठ म अधिक श्राद्रता या गइ ।
मैंने परड़ाकर कहा-अजी लीजिये । और यह कहकर मैं उनका
तरफ रवा-~~"ग्नापट और लाज को झालो चूल्हे में!"-मैने हाथ
पकड़ते हुये कहा- इधर ग्राइये"
देग्यते हा देखते मने उँगुलियों म उँगुलियाँ फंसाकर उनरे लिये
रकार तैयार की। उन्हाने पैर रखा । लानार होकर उसे मेरी गईन
पकड़नी पड़ी। जोर जो लगाया तो गले से मिलना पड़ा। उनका कान
जो मेरे पास पाया तो जो मेरे जी में श्राया कह गया। आने

"हाँ जरूर
क्या ? दूसरा पैर मेरे कधे पर रखकर मेरे गले से हाथ निकालकर
ऊपर पहुँची और मेरे कन्धे पर से उठकर मेरी नाक के पास गुजरी
तो मेंने वेचैन होकर पकड़ लिया।
"छोड़िये !" उन्होंने बैठते हुये और जोर लगाते हुये कहा
मैंने कहा-"मुझ न निकालोगी तो मैं फंसा रह जाऊँगा"
घरडार उन्होंने कहा-छोड़िये ।
मेंने कहा-तुमसे कुछ बातें करना चाहता हूँ।
वे पोली-पिर कर लीजियेगा।
मैंने कहा-'मिलो गा फिर जवाब दोगा "
खुदा के लिए छोड़ो मुझे !"
मैंने पैर छोड़ दिया। और वे अँधेरे में गायब हो गई । मुझे
लगातार पन्द्रह निमट तक बराबर चिल्लाना पड़ा, तब कहीं जाकर
चौकीदार ने मेरी आवाज सुनी और मुझे उसमें से बाहर निकाला ।
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यह सच्ची बात है, कि इस प्रकार की मुलाकात श्राम तौर से
कप्टकर और बहुत ही कष्टकर होती है । रात भर मुझेअधिक कष्ट और
ता रही। मुलाकात इस तरह थोड़े समय की थी, कि बात तक
५२ सका । हरदम वही सूरत सामने थी। सवेरे काम में मन न लगता
र इसी उधेड़ बुन में था कि वही युढ़िया मिश्तिन आई और
एक चिट्ठी ले आई।
पहले तो मैने यह समझा, कि नूतन सामेन घे मकबरे का कोई
पुराना दस्तावेज नाथ लगा,लेकिन बहुत जल्द मालूम हो गया, कि नहीं।
बल्कि गढे चाले दोस्त की चिट्ठी है। इस चिट्ठी की लिग्वावट ऐसी
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थी, सिमी धनर और शर गौटे थे। इस मिट्टी मालिसा था कि एष रेग्नये पार्मल पार दुआरे पोंगाम से पाया हुश्शा है,अत रह मार्गल नाहिये ।" मुझे शीप पाल भा गया । एष दादा-सामाई दाइ मेर पर पार्सल कपड़े से मिलाया था। भीतर कपड़ा और यागज भरा दुना मालूम था । माप की मुहर लगी हुई गो । मो पार्सल दे दिया और प्रपो रजिस्टरों में वह गारंगार कर ली, जो दिल्टा पा जाने पर का जाता है । नौ पार हुमेन सावटा दस्तखत लेकर पानापूरी पर ।। मुझे लिखो या यह दस पसन्द पाया । श्रत मैंने भारसी जिनाती लिपापद में एफ पुर्वा भेजा और शायदे व नुसार मिलने के लिए तकाजा पिया । इसका जवार दूसरे दिन आया और उस चिट्ठी के भाते ही मेरी पेटी और भी बढ़ गई। क्योंकि उस चिट्ठी में दूसरी धातों के शराारा लिया था "जो गरीब और कमजोगें की मदद करता है, खुदा उसकी मदद करता है । मैं बिना किसी मदद और रक्षा कहूँ तथा आपकी मदद और सहानुभूति चाहना हैं। विस्तार पूर्वक पत्र फिर लिदूंगी। यह भी लिन गो, कि में गड्ढे में फिम तरह गिरी और यह भी लिगी, कि वर्तमान परिस्थिति मरे लिए क्तिनी पगशानी की है । स्वय मेरी जान सतरे म है । मुझे प्राशा है, कि श्राप मुझ गरीष की मदद कीजियेगा। - इत्यादि, इत्यादि।" इस चिट्ठी को पढकर म सनारे मया गया । या खुदा, यह केसा पहली है। मै इस गुस्थी को किस तरह सुलझाऊँ। मेरे दिल पर उस लिखावट का चिन-सा खिंचता जा रहा था। दो चार सतरा के पुरज खतरनाक चीज होने के अलावा और कुछ न थे। - 1 A को समाह भर इसा बचा में बीत गया कि एक बहुत हा छोग सा पुरजा भाया । यह कि गत को साढे नौ रजे मेरे घर में कोई न होगा | आप मेरी मदद कीजिये। पहानी को सक्षेप करना है ! श्रत उन मार्मिक बातों का चर्चा परना नहीं चाहता, जो इस अनोखे सन्देश क परिणाम स्वरूप नीं। स्सिी दूसरे के घर में इस प्रकार जाना एक बहुत कठिन काम था। इस लिए मुझे सलाह लेने की जरूरत पड़ी । और मुहम्मद उम साहन से मैंने इस इस विषय मे सलाह लो । सारा घटना प्रारम्भ से अन्त तक कर सुनाई। इस भलेमानुष ने सिवाय 'हूं' यो 'हाँ के मामिले म कोई सास, दिलचस्पी न ली । जब मैने बहुत कुछ साचा साँचा तो कहने लगे, कि चारपाई दीवार के पास रसकर उस पर मुठा दीवार पर चढ जानो और उस तरफ कूद पड़ो।" इसर नाद क्या होगा, देखा जायगा। रसकर x x x रात का य टी दूसरे क्लार्क की थी और करीब साढ़े नौ बजे में मुहम्मद उम्र साहर के क्वाटर म पहुँचा । चुरसे से चारपाई दीवार के करीब रसकर उस पर मुठा रक्सा और दावाल पर चढ़ गया । बिलकुल माटा था। हर जगह पता लगाने के बाद भी यह न मालूम हा सका,कि पोस्ट मास्टर माह र कहाँ है १ न तो कहीं बाहर थे, और एक श्रादमी से दरवाजा खटपटवाय ता उसने जगार दिया, कि नहीं है । थोड़ी बहुत कठिनाइ के नाद नीचे उतर गया । और सबसे पहला काम मैंने यह क्यिा, कि दबे पाँच दरवाजे पर पहुंच कर जजीर गोल दी, कि यहा भागो का मामिला मामने न पाये।

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बिलकुल सनाटा था। लेकिन दालान के पास उस पार कमरे में
नी दिखाई पड़ी। मैं धीरे से उस तरफ बढा। करीब पहुँचा तो
कान में धावाज श्राई-चोलो।
क्सि तरह नह पारे मे गोल रहा था। यह कौन है ? मैं घोरे धीरे
। दालान म पहुँचा । कमरे का एक दरवाजा बन्द था और एक
।। जो दरवाजा पद था, मैं उसके पास पहुँचा। उसकी दराज में
बँक कर जो मैने देसा, तो पैर के नीचे से जमान खिसक गई ।
ल में बात यह थी, कि कमरे में पोस्टमास्टर साहब थे और उनकी
। बीच म चारपाई थी। चारपाई के इस तरफ पोस्टमास्टर
थे और दूसरी तरफ लड़की-जवानी और सुन्दरता की एक जीती
ती तस्बार । व्याकुल, परीशान, हाथ म एक टूटी हुई कुर्सी का
पाया। इस तरह,
कि अगर जरा भी पोस्टमास्टर साहब रुख
तो कुर्सी का पाया सिर टुकड़े टुकड़े कर दे। यह भयानक दृश्य
कर में बेहट पराशान हो गया और पूर्व इसके, कि में यह निश्चय
, कि मुझे क्या करना चाहिये और क्या मामिला है, पोस्ट मास्टर
इस भयानक लड़की से कहा-
"बोलो बालो क्या मैंने तुम्हे शरण नहीं दी।" ये
बहुत हा धारे से कहा। लड़की ने इसका जवान नहीं दिया ।
एमास्टर ने फिर से कहा --म तुम्हारे मिना जिदा नहीं रह सकता।
आज वादा करना पड़ेगा। मुझने शादा करके तुम तकलीफ में
रहोगी।
"चुप'। लड़की ने बहुत ही सूची के साथ किन्तु धीरे से
अकि तम मझे जाने दो।"
मने मुझे धोसा दिया ।
१९

( १५४ )
।
.
"कहाँ"
"जहाँ मेरा जो चाहे।"
"यह असम्भव है !"
"तुम्हें शर्म नहीं पाता।"
यह सुनकर पोस्टमास्टर साहब गई तरस, को हटे | लड़की भी
उसी के अनुसार, सामो अपने बाये हाय की योर ग्विसका जिसमे कि
अन्तर उतना ही रहे। वे और सिसके और लड़की ने भी ऐसा ही
किया । यहाँ तक, कि वे इस पोजाशन पर ।श्रा गये, कि अगर कोई
कमरे में दूसरे दरवाजे से ( जो खुला था ) भीतर घुसे तो उसकी तरफ
पोस्टमास्टर साहब की पीठ रहे । इसा समय अचानक मरे रिल प एक
विचार पैदा हुया । एक कम्पन पड़ा था नड़ा सा । नगे पैर तो मैं
था ही । कम्बल लेकर बिजली की तरह मैं भीतर झपटा । पोस्टमाटर
साहन ने किसी मनोरञ्जक पिचार मे चारपाई पर अपना वायाँ पेर
रक्या ही था, कि पाँस दिया मैने माल में उनके सिर पर कम्बल
डालकर जो घसाटा, तो इसके पहले ही, कि वह गावाज निकाल सर्क,
मैने उनका सिर और मुंह पकड़ कर गिरा दिया । "मार डालूंगा"-
मैन के कान में घुटा हुई यात्राज में कहा ।
'कौन है !'-उन्होंने कहा ।
"मौत का दूत"--मैने कहा [-~चला जहन्नुम की तरफ ।
वे बोलें--"मुझे मारोगे तो नहीं।"
मैने उनको गर्दन एक कपड़े से इस तरह बाँधते हुये, जैसे बोतल
पर कपड़ा बाँधते हैं, कहा-"हरगिज नहीं।"
वे बोले-"तुम हो कोन १ शोर मत मचाना।"
1

सहसासद करणे में जो सगी की सरा देखा तो यह गापय । मैंने पुरर ने पो मार सपा पड़े रहो। लेक्नि थे बा उगने लगे, मी उन पर चारपाई चौधा दी और पमरे से निकल कर लापात पाया तो मैंग एर पड़ी 'कासे टपर दागद । उनी म "3" और "भू दीपाटे "रिहा जो अपना मशीनगन समालो तो मोपले क्याटर में भापर -म निया पास्ट मास्टर सादर ने कोर दस मिार तक शोर गुल मनाया है तो मुभी इपट्टा हो गये । मैं मा पहुँना, ध याद है कि मेरे ऊपर किसी का गह तक न था । मुहम्मद उम्र चादर ने भी कुशल पूर्वक चारपाई और मुंठा इस जगह से हटा दिया था रिस्मे ने इस तरह तल पकड़ा कि ग्यारह जे तक होहल्ला होता रहा। पोस्ट मास्टर ने यह कहानी गदी थी, कि भार श्राया, लेकिन जाग हो गई तो चोर भाग गया। श्रर प्रगट है, कि यह घटना मेरे लिए किस तरह पहेली होगई। यह तो निश्चय था, कि ने बड़ी नी' जो सिर काटा की रहती थी शेस्ट मास्टर की बोशा थी । लेकिन सवाल यह था, कि लड़का कहाँ गई ? और भोत्रा में होते हुए पोस्ट मास्टर का उसकी जरूरत कैसे पड़ गई। फिर वे कैसे मामा और २६ केसी भाजी । न तो मेरे समझ म नाया और न मुहम्मद उन साइन की बुद्धि कुछ काम किया। दूसरे दिन की बात है, कि यह काम भी जाँच की सीमा को पहुँच गया, कि पुराने जमाने में न केवल प्रेमियो की ही जान सतरे में रहती थी, बल्कि उसरे स देश ले जाने वाले भी अपने क्तव्य पालन के लिए कठोर दण्ड पाते थे। ने बुहिया को सावधान कर । A । १५८) । "समय बीत चुका । मुझे विश्वास है, कि मेरे सन्देश शायद श्राप तक नहीं पहुँचे, नहा तो ग्राप जरूर याते । और अगर पहुँचे भी हो तो अन तक्लीफ करने की जरूरत नहीं। नहा तो हिमायूँ की तरह पछताना पड़ेगा। मेरी और महारानी कविती की तक्दार कहीं एक सी तो नहीं है । पानी सिर से निकल चुका । अापस और शायर दुनिया से हमेशा के लिये विदा होती हूँ। श्रापमा "" मेरा रणथम्भौर पोस्टमास्टर का घर था । और मैं जरूर इस रिले को छोड़कर पहुँच जाता । लेकिन अब तो वेकार ही था । अत अपसोस पौर धेर्य धर कर बैठ गया। लेकिन इश्वर उदा कारसाज है । मामिले ने ऐसा जबर्दस्त पलटा खाया, कि एक एसा विचिन मामिला सामने श्राया है, कि बस सुनिये और उसे प्रणाम कीजिये। x जाडे के दिन थे। रेलवे का घड़घड़ाहट से श्याँसें बचाकर रात चुप और मौन थी। मैं अपने कमरे में पड़ा हुआ उँगुली के दर्द पराह रहा था, कि हल्की सी मौन सी मालूम हुई। लेकिन शाम ही किसी असाधारण अावाज से नींद खुल गई । कमरे की खिड़की पर ऐसी अावाज अाइ, जैसे कोई थपको देता हो । मै उठा, लता रहा । लेकिन फिर मनाटा हो गया। में उठा और मैने सिड़की खोलकर देना । वहाँ कुछ भी न था। केवल वहम था । लेकिन नहीं, मैंने पिदवी त्रट मी न की थी, कि पिर मन्देह हुआ। और अन खटका दरयाजे की तरफ मालूम हुया । मने रोशनी ली और दरवाजे, . X x और ग्राहट - ( १५६ ) को तरम पहुँचा!"कौन है ?' ५४कर मी दरवाजा सोला । लाल टेन ऊँची करके देवता जो हूँ तो चार में लिपटी लिपटाई "प्ररे" मेरे मुँह मे सहमा निाला और पूर्व इसके, कि मैं कारण पर म एक नयी हुइ अावाज मिली-"मुझे बचाओ।" मैं उनका रिचार समझकर एक किनारे हो गया, और वे भातर चली पाई । स्त्य दरवाजा पद कर लिया। अब मै परीशानी की तसवीर बना हुआ साच रहा था, कि यह स्वप्न तो नहा है । मैने कमरे में लाकर बिठा दिया। उनका मुँह उसी तरह लिपटा हुआ था। देखने के लिये सिर्फ एक सूराख था। मो उन्हे पलग पर बिठा दिया और उन्हें तकलीफ म देखकर स्वय दरवाजे के पास इस तरह बेठ गया कि आड़ रहे । पूर्व इसके कि मै पून् , उन्होंने स्वय कहा- "अाप मुझे हद से ज्यादा वैया और धृष्ट समझते होगे, लेकिन खुदा प लिये मेरा हाल सुनने के बाद काई राय कायम काजियेगा।" मैंने विश्वास दिलाया और हर तरह से मदद देने का वायदा क्यिा। इस पर उन्होंने सक्षेप म अपना हाल सुनाया । कहानो सचमुच बहुत ही अनोग्गी और विचित्र या । सक्षेप म इम प्रकार है-~~-पोस्ट मास्टर उमर सौतेले भाई के मामा 2 | माँ मर चुका थी। पाप और सौतेले भाई थे। बाप ने स्वय उनका और सौतेले भाइयों को मरजी के खिलाफ शादी ते कर दी। परिणाम यह कि दोनों सौतेले भाइयों ने राय परके अपने मामा के पास पहुँचा दिया। दोनों भाई अपने दूसरे मामा के लड़के के साथ सम्बन्ध जोड़ना चाहते थे, लेकिन मुसीबत अर यह भा गई, कि स्वय पोस्टमान्टर के दिल के क्लेि को उन्होंने अपनी सुन्दरता से जीत लिया। पोस्टमास्टर की वर्तमान बीबी M -- । -- ( १६० ) प्रसन्न और अच्छा जिन्दगा के होत हुये भी इस तरह लाचार थी, कि वह मजमून, कि टुकटुक्नीदम, दम न कशीटम । उनके घर या, न दर । अपने पति रे जुल्म और अत्याचारों को सहने के लिये ही वे उनर साथ वॉधी गई थीं । गड्डे म गिरने का कारण भी कम मनोरजक न था। पोस्टमास्टर माह ने न कवल प्रेम प्रगट किया, बल्कि उस दिन मेरे सौभाग्य से कोई ऐसी बदतमीजी का, जो उनका तायत के लिय परटाश्त म बाहर थी। और उन्होंने यह निश्चय किया, कि पोस्टमास्टर साहर से बचने के लिये मौत से मदद लेनी चाहिय । कुँय म झोपते दर मालूम हुअा। चुपक से रेल क नीचे कटकर मर जाने को सोचा । लेकिन रेल जो श्राई तो नदहवासों में गड्ढे म गिर जाने की नौमत श्राई । अब इसक बाद उतमान दशा यह थी, कि अब उनकी इज्जन, श्राबरू और जान तक खतरे म था । श्रत श्रम विवार यह था, कि मैं उन्ह कुछ रुपये कर्ज दे दूँ और टिकट दिला दूं, जिससे कि वे पिर अपने भाइयों के पास चली जायें। यह थी वह मदद, जो मुझसे चाहती थी। नर जनाब सोचिये, कि इस तरह की मदद मुझसे कैसे सम्भव थी १ जब वे अपना लेक्चर सतम कर चुकीं तो मैंने कहा, मेरे भी कोई नहीं है । तुम प्रकाश की सताई हुई हो तो में जमीन का सताया हुश्रा हूँ, इत्यादि । और यह, कि "खुदा के लिये मेरी मदन करो।" जन उन्होंने चतुराई से काम ली, तो मैंने स्पष्टवादिता मे काम लिया । शेक्सपियर ने कहा है, कि कुमारी जान से नहीं बोलती है, ता मालूम हुआ कि हजरत शेक्सपियर का मुलागत इसी तरह की क्सिी वजबान लडका से हुई होगा। मैर, कुछ भी हो, मैने उनकी . । - 1 ।

चुपी ने पूरा पायदा उदाया हर रियो को राजी करने का ठीका निरा । पोस्टमास्टर को ज्यादतियों का समसे पड़ा इलाज यही पतामा, कि मेरे ऊपर करें । भात उद भी न पी। भाइयों ने अपदस्ती यहाँ भेज दिया और पे दान मामा ने अपनी धुरी नीयत जाहिर की, कि वे अपनी जान बचाने के लिये रे पुरे हाल पर मेहरबानी करें। प्रगट है, कि ऐसी हालत में एक पाप अपनी पारी बेटी से खुश होने के अलावा पर ही क्या मकता है। उस अछे लगने वाले मका की ओर भी मैंने उनका ध्यान दिलाया, कि श्रार पहुँच गई अपने दुर्ग पिता पेपचे में तो वे हरगिज न मानेंगे, जब तक कि ये उन हजरत के निराह में न देदें जिनके साथ निकाह करने को थे पहले ही मौत का स देश मान चुकी थी। अब दा सारी बातों के सुनने के बाद भी व चुप रहीं तो मैंने अगला कदम उठाना चाहा । तकदीर साथ थी। इसी रात क्या, बालक दो-तीन घंटे पहले ग्यारह बजे की गाड़ी से मुहम्मद उम्र साहब की प्यारा बेगम साहिना पाई थी। सवान यह था, कि क्यों न मुहम्मद उम्र साहर के घर में पहुँचा दिया जाय । x पोस्ट मास्टर साहब की मजाल न थी, कि अपनी भानजी के बारे में सोच भी सकते, कि दीवार उच्च पार मुहम्मद उन साहब के मकान म मौजा है। और इस घटना के हफ्ते भर + मीनर मुहम्मद उन साहब को रिश्ते की एक माली ने इस खाकसार का निराह हो गया, जिसम पोस्टमास्टर साहत को अपनी बीवी के सहित शामिल होकर पुलाव धगैरह खाना पड़ा। और इसी दिन में अपनी प्यारी बीबी को अपने स्वार्टर में ले थाया। शादी की तारारा भी एक तरह से याद करने योग्य थी । अर्थात् यह, कि सधेरे मेरा उँगुन्नी काटी गई थी और शाम को इस खाक्सार तथा कपड़ों को मिलाकर दोस्तो ने एक थर्ड क्लास दूल्हा बनाया । यहाँ इससे बहस नहीं, कि पोस्ट मास्टर x ।

- , - ( १६० ) प्रसन और अच्छा जिन्गा के होते हुये भी इस तरह लाचार थी, कि वह मजमून, कि टुकटुकीदम, दम न कशीदम । उनके घर था, न दर । अपने पति के जुल्म और अत्याचारों को सहने के लिये ही वे उनक साथ बाँधी गई थीं। गड्डे मे गिरने का कारण भी कम मनोरञ्जन था। पोस्टमास्टर साहन ने न केवल प्रेम प्रगट क्यिा, नल्कि उस दिन मेरे सौभाग्य से कोई ऐसी बदतमीजी का, जो उनका तायत के लिये बरदाश्त मे बाहर थी। और उन्होंने यह निश्चर किया, कि पास्टमास्टर साहन से बचने के लिये मौत स मदद लेनी चाहिये । कुंये म झॉक्ते हर मालूम हुअा । चुपके से रेल क नीचे कटकर मर जाने को सोचा । लेकिन मेल जो भाई तो बदहवासो मे गड्ढे म गिर जाने की नौबत नाई । अब इसक नाद बर्तमान दशा यह थी, कि अब उनकी इज्जत, ग्राबरू और जान तक खतरे म थी । श्रत अर विचार यह, था, कि मैं उन्हें कुछ रुपये कज दे दूँ और टिकट दिला दूं, जिससे कि वे फिर अपने भाइयों के पास चली जायें । यह यी वह मदद, जो मुझसे चाहती थीं। अत्र जनाम सोचिये, कि इस तरह की मदद मुझसे कैसे सम्भव थी ? जब वे अपना लेक्चर सतम कर चुकी तो मैने कहा, मेरे भी कोई नहीं है । तुम अकाश की सताइ हुई हो तो मैं जमीन का सताया हुआ हूँ, इत्यादि । और यह, कि "खुदा के लिये मेरी मदद करो।" जब उन्हाने चतुराई से काम ला, तो मैने स्पष्टवादिता से काम लिया। शेक्सपियर ने कहा है, कि कुमारी जनाा से नहीं बोलती है, मालूम हुया कि हजरत शेक्सपियर की मुलाकात इसी तरह की किसी वेजबान लड़का में हुई होगा । वर, कुछ मा हो, मैने उनकी । - 1 - ता सुपी से पूरा फायदा उठाया। हर किसी को राजी करने का मौका लिग । पोस्टमास्टर की ज्यादतियों का सबसे बड़ा इलाज यही बताया, कि मेरे ऊपर करें। बात कुछ भी न यो भाइयों ने जबर्दस्ती यहाँ मेज दिया और डाके बदनात मामा ने अपनी बुरी नीयत जाहिर की, के वे अपनी जान नचाने के लिये मेरे बुरे हाल पर मेहरबाना करें। प्रगट है, कि ऐसी हालत में एक आप अपनी पारी बेटी से खुश हाने के अलावा कर ही क्या सक्ता | TR श्रच्छे लगने वाले मकान की और भी मैंने उनका ध्यान दिलाया, कि अगर पहुँच गई अपने बुजुर्ग पिता के कच्चे में तो वे हरगिज न मानेंगे, जब तक कि वे उन इजरत के निकाह म न दे दें. जिनके साथ सिकाई करने को ये पहले ही मौत का म देश मान चुकी थी। x x ४ जब इन सारी बातो के सुनने के बाद भा वे चुप रहीं तो मैंने अगला कदम उठाना चाहा । तकदीर माथ थी। इसी रात क्या, चालक दो तीन घटे पहले ग्यारह बजे को गाड़ा से मुहम्मद उम्र साहब की प्यारी बेगम साहिया आइ थी । सवाल यह था, कि क्यों न मुहम्मद उम्र साहब के घर में पहुंचा दिया जाय । पोस्ट मास्टर साहब की मजाल न थी, कि अपनी मानजी के बारे म सोच भी सकते, कि दीवार उस पार मुहम्मद उन साहम ये मकान म मौजूद हैं । और इस घटना के हफ्ते भर के भीतर मुहम्मद उम्र साहब की रिश्ते को एक माती से इस गामार का निफाई हो गया, जिसम पोस्टमास्टर साहब को अपनी बीवी के सहित शामिल होकर पुलाव यगैरह ग्वाना पड़ा। और इसी दिन में अपनी प्यारी भीयो को अपने क्याटर में ले आया। शादी की तारीफ भी एक तरह से याद करने योग्य यी । अर्थात् यह, कि मधेरे मेरा उँगुली काटी गई थी और शाम यो इरा पारसार तथा पदों को मिलाफर दोस्तों ने एक बलास दूल्हा बनाया । यहाँ इसमे दस नहीं, कि पोस्ट मास्टर प - - । , प्रसन्न और अच्छी जिदगी के होते हुये भी इस तरह लाचार थी, कि वह मजमून, कि टुकटुक्दम, दम न कशीटम । उनके घर था, न दर । अपने पति के जुल्म और अत्याचारों को सहने के लिये ही वे उनके साथ बाँधी गई थीं। गड्डे मे गिरने का कारण भी क्म मनोरञ्जन था। पास्टमास्टर साहब ने न केवल प्रेम प्रगट किया, बल्कि उस दिन मेरे सौभाग्य से कोई ऐसा मदतमाजी का, उनकी तबीयत के लिय बरदाश्त से बाहर थी। और उन्हाने यह निश्चय किया, कि पोस्टमास्टर साहब से रचने के लिये मौत से मदद लेनी चाहिय । कुँय म भक्तेि डर मालूम इना । चुपके से रेल क नीचे कटकर मर जाने को सोचा। लेकिन रेल जो श्राई तो बदहवासो में गड्ढे में गिर जाने की नौरत श्राई । अब इसके बाद बतमान दशा यह थी, कि अब उनकी इज्जत, अापरू और जान तक यतरे म थी। श्रत श्रम विचार यद था, कि मैं उन्ह कुछ रुपये कर्ज दे दूँ और टिकट दिला दूं, जिससे कि वे पिर अपने भाइयों के पास चली जायें । यह थी वह मदद, जो मुझसे चाहती थीं। अत्र जनार सोचिये, कि इस तरह की मदद मुझसे कैसे सम्भव थी ? जब वे अपना लेक्चर सतम कर चुकीं तो मैंने कहा, मेरे भी कोई नहीं है । तुम श काश की सताइ हुई हो तो मै जमीन या सताया हुश्रा हूँ, इत्याटि । और यह, कि "खुदा के लिये मेरी मदन करो।" जन उन्होंने चतुगइ स काम ली, ता मने स्पष्टवादिता से काम लिया । शेक्सपियर ने कहा है, कि कुमारी जान से नहीं बोलती है, मालूम हुआ कि हजरत शेक्सपियर की मुलाकात इसी तरह की सिा जवान लड़का से हुइ होगी । मेर, कुछ भी हो, मैंने उनकी . । । ता धगैरह पाना पड़ा और इसी दिन नपना प्यारी । बुजुग पिता के कब्चे में तो वे हरगिज न मानेंगे, जब तक कि वे उन हजरत के निराह मन दे दें जिनके साथ निकाह करने को ये पहले जर इन सारी बातो के सुनने के बार भी वे चप रहीं तो मैंने अगला कदम उठाना चाहा ।तकदीर साथ थी। इसी रात क्या, नाल्क दो तीन घटे पहले ग्यारह बजे की गादा से मुहम्मद उम्र साहन की प्यारी बेगम साहिबा माई थी | स्वान यह था, कि क्यों न मुहम्मद उम्र साहब के घर में पहुँचा दिया जाय। पोस्ट मास्टर साहब की मजाल न थी, कि अपना मानजी के बारे मे सोच भी सकते, कि दीवार उस पार मुहम्मद उम्र साहब' जिसमें पोस्टमास्टर साहन को अपनी बीवी के मंदिन शामिल साहब की रिश्ते की एक माली से इस ग्वामार का निकाह कि सधेरे मेरी उगुमी गगर को इस स्वाक्सार तथा कपड़ों को मिलती चुप्पी से पूरा पायदा उठाया। हर किसी को राजी करने का ठीका लिगा । पोस्टमास्टर की ज्यादतियों का सबसे बड़ा इलाज यही बताया, कि मरे ऊपर करें। बात बुछ भी न थी। माइयों जबर्दस्ती यहाँ मज रिया और उसके बदजात मामा ने अपनी बुरी नीयत जाहिर की, कि वे अपनी जान बचाने के लिये मेरे बुरे हाल पर मेहरयानी करें। प्रगट है, कि ऐसी हालत में एक बाप अपनी प्यारी बेटी से खुश दाने के अलावा कर ही क्या सकता है । उस अच्छे लगने वाले मकान की और भी मैंने उनका ध्यान दिलाया, कि अगर पहुँच गई अपने x - ही मौत का सदेश मान चुकी थी। - X के मकान मर ३ भीतर म मौजूट है। और इस घटना ये हफ्ते क्वाटर में ले थाया । शादी की तारीख भी योग्य थी। अर्थात् यह, २४ फ्लास दूल्दा यनाया ! यहाँ - ( १६४ ) तलाशी न लेने देने का क्या मतलब ये जिद्द पकड़ गई । निश्चय हुश्रा, कि इस समय चूँ की जिद और विवाद है, अत फिर कभी वे दिखाई टेंगा। इससे यह बदमजगी हुई । परिणाम यह, कि मैं स्टेशन पर ड्यू टी के लिए गया तो दिल में तरह तरह के सन्देह लेता गया । वह यह, कि अवश्य उनके पास स्सिा न किसी तरह के आपत्तिजनक पन हैं और यह भी, कि अवश्य मेरी गैरमौजूदगी से फायदा उठा कर वे श्राज ही उन पत्रों को प्रांद कर देंगी। यही हुश्रा भी। उहोंने कुछ कागज कमरे में जलाकर और रास को पानी में मिलाकर खिड़की से बाहर फेंक दिया । में जो लौटकर श्राया तो सबसे पहला काम मैने यही किया, और बहुत जल्द कमरे के फर्श पर ध्यान देकर पता चला लिया । जले हुथे कागज के टुकड़े, बिना किसी जरूरत के अँगाठी अपनी जगह से उठी हुई, उसमें कागज जलाये जाने के प्रमाण मौजूद ! शेष प्रमाण खिड़की के बाहर पानी से मिल गया। क्योंकि फागज के टुकड़े अच्छी तरह पानी में घुल नहीं गये ये । श्रत इस बात पर झगड़ा हुअा, और मेरे लगाये हुये अपराध की वे बिलकुल जवाब न दे सकी । लेकिन अपनी जिद पर अड़ी रहीं, कि फोइ कागज जलाया गया। इस झगड़े के बाद ही मेरी बुद्धि किसा दूमर श्रावर्पित हुई। शादी के दूसरे ही दिन की बात है। मेरी उँगली यो । दफ्तर का काम तो ज्यों त्यों करके कलम को भी नंगुली के पास याली उँगली से पकड़ कर चला ले क दोस्त को पन लिसने की जो जरूरत पड़ी तो लिसने को कहा । उन्होंने लिसना न जानने की यद्यपि चौखुटे अक्षर बना कर वे मुझे लिख के साथ जो पूछा, तो गुमुकराकर कहा कि वैसा जुलता चुरा भला लिम्ब सक्ती हूँ। समय ही २ नवेली बीवी की यह अदा भा गई। क्लेजे से | 1 - वैसा ही लिख दो । अत वैसा ही नहीं, लेकिन हाँ उसी तरह बुरा-मला वहोंने लिन रिया । यह एक बहुत ही साधारण परा थी, जिसकी तरफ शादी और प्रेम रे पान म कौन ध्यान दे सकता है, लेकिन अब चूँकि तरह तरह के सन्देह मौजूद थे, श्रत शीघ्र ही मैने यह इलजाम लगाया कि तुम जान बूझकर अपणी लिसाक्ट छिपती हो, जिसमे प्रमाणित है कि तुम्हारी असली लिखावट की शान कुछ दूसरा ही है और उस लिखारट म कुछ पर इत्यादि मौटू हैं या पर्वाद कर दिये गये हैं। यह कि वे अपगध को भी रदन कर सकों थों। क्योंकि मैंने एक नहीं, दर्जनों घटनायें गिना दी। जब उन्होंने लिपने से आस- मर्थता प्रकट की था और वे बराबर ही असमर्थता प्रस्ट करती रहती थीं। जितनी उनकी तालीम थी उससे साप प्रगट होता था, कि इनकी तरह शिक्षित लड़का केवल लिखने में इस तरह लाचार रहे। श्रत उस दिन से सचमुच पूछिये तो मुझे अपने औधी से घृणा हो गई। उमरे घर बाले मुझसे अपरचित थे। उन्हें विवाह की गयर तो मिल गई थी, लेकिा बाप उनके बहुत नाराज थे। इस तरह, कि उनसे मेरे मिलने की नौबत तक न आया थी, और उन्होंने समझ लिया था कि उनकी लड़की मर गई । अब इन घटनाओं पर मैने विचार किया तो साफ मालूम हुआ कि जरूर आप की शिकायत ठीक है और मामिला असल में कुल दूसरा ही है। इन सभी सन्देहों का संभव सुबूत एक दिन इस तरह मिल गया, कि अचानक मैंने उनकी सहेली का पर पकड़ लिया। जिसमें उसका पूरा प्रमाण मौजूद था, कि मेरा जोगी के कोई बेचैन मी हैं और उनकी सहेली ने उनसे पूछा था, कि क्या अब भी उससे पत्रव्यवहार करती हो या नहीं। लेकिन इसका जवान बेगम सादिया के पास मौजूद था । उहोंने मेरे दो पत्र इसा प्रकार के सामने रस दिये। जिसमे प्रमाणित होता था, कि मेरी भी कोई दूसरी प्रेमिका है। ये वे पत्र थे, ना मेरे दोस्त ने मुझे 'ब' के बारे में लिखे थे। क्रोध के वश में होते कारण मैंने स्वीकार कर लिया, कि जरूर और जरूर एक । - ( १६४ ) तलाशी न लेने देने का क्या मतलब ये जिद परड़ गई । निश्चय हुश्रा, कि इस समय यूँ की जिद और विवाद है, श्रत फिर कभी वे दिखाई देंगी। इससे यह पदमजगी हुई । परिणाम यह, कि मैं स्टेशन पर ड्यूटी के लिए गया तो दिन में तरह तरह के सन्देह लेता गया। वह यह, कि अवश्य उनके पास किसी न किसी तरह के श्रापत्तिजनक पन हैं और यह भी, कि अवश्य मेरी गैरमौजूदगी से फायदा उठा पर वे आज ही उन पत्रों को बर्बाद कर देंगी। यही हुश्रा भी। उहोंने कुछ कागज कमरे में जलाकर और रास को पानी में मिलाकर खिड़की से बाहर फेंक दिया । मैं जो लौटकर आया तो सबसे पहला काम मैंने यही किया, और बहुत जल्द कमरे के फर्श पर ध्यान देकर पता चला लिया । जले हुये कागज के टुकड़े, बिना किसी जरूरत के अँगाठा अपनी जगह से उठी हुई, उसमें कागज जलाये जाने के प्रमाण, मौजूद ! शेष प्रमाण खिड़की के बाहर पानी से मिल गया। क्योंकि कागज के टुकड़े अच्छी तरह पानी में घुल नहीं गये थे । अत इस बात पर झगड़ा हुया, और मेरे लगाये हुये अपराध की वे निलकुल जवाब न दे सकी । लेकिन अपनी जिद पर अड़ी रही, कि कोई कागज नहीं जलाया गया। इस झगड़े के बाद ही मेरी बुद्धि किसी दूसरी तरफ श्राकर्पित हुई। शादी के दूसरे ही दिन की बात है। मेरी उँगली तो बधी हुई यो । दफ्तर का काम तो ज्यों त्यों करके कलम को वीच वाली और छंगुला के पास वाली उँगली से पकड़ कर चला लेता था। लेकिन एक दोस्त को पत्र लिखने की जो जरूरत पड़ी तो बेगम साहित्रा से लिसने को कहा। उन्होंने लिखना न जानने की असमर्थता प्रकट की। यद्यपि चौखुटे अक्षर बना कर वे मुझे लिख चुकी थीं। मैंने अाश्चर्य के जो मुसुकराकर कहा कि वैसा ही या उमसे मिलता जुलता बुरा भला लिम्व सक्ती हूँ। समय ही ऐसा था। प्यारी और नई गोली भीमा को यह अदा भा गई। कलेजे से लगाकर मैंने कहा कि - साथ पूछा, तो उनकी लड़की मर गई। अब इन घटनाओं पर मैने विचार किया गोमा मालूम हुथा कि जरूर बाप की शिकायत ठीक है और मामिता अमल में कुछ दूसरा ही है। इन सभी सन्देहों का समय मुथून पप पिन छ तरह मिल गया, कि अचानक मैंने उनकी सहेली का पर पकड़ लिया। जिसमें उसका पूरा प्रमाण मोजूट था, कि मेरो पीपी ये कोई बेचैन प्रेमी हैं और उनकी सहेली ने उनसे पूछा था, कि क्या श्रव उससे पत्र-व्यवहार करती हो या नहीं? लेकिन इसका जवान साहिबा के पास मौजूद था । उन्होंने मेरे दोपत्र इस प्रथा के सामनेरल दिये। जिससे प्रमाणित होना था, कि मेरा भी कोई दुमा प्रेमिका' ये वे पत्र थे, जो मेरे दोस्त ने मुझे 'ब' के बारे में लिया वश में होने कारण मेंने स्वीकार कर लिया, कि जार और पैसा ही लिप दो । अत वैसा ही नहीं, लेकिन माग उहोंने लिय रिया । यह एक बहुत ही साधान पnimal तरफ शादी और प्रेम रे तूपान मे कौन ध्यान Hf अब चूँकि तरह तरह के सन्देह मौजू' प, अन पो मन इलजाम लगाया कि तुम जान बूझकर अपनी furt. , जिसमे प्रमाणित है कि तुम्हारी असली लिवाट मी गार व मी ही है और उस लिम्बापट में कुछ पर इत्यादि मो माया दिये गये हैं। यह कि वे अपराध को भी रद्द न कर मैंने एफ नहीं, दर्जनों घटनायें गिना दी', चटान निगम मर्थता प्रकट की थी और वे बराबर ही अममयता प्रार ar rti थी। जितनी उनकी तालीम थी उससे ग्राम प्रगट हाता या, तरह शिक्षित लड़की केवल लिसने मे इस तरह लाचार गं । अत उग दिन से सचमुच पूछिये तो मुझे अपने बीबी से घृणा हा गई। उनक पर वाले मुझसे अपरचित थे। उन्हें विवाह की खबर मिल थी, लेकिन बाप उनके बहुत नाराज थे। इस तरह, f+ उनगे मेरे मिलने की नौबत तक न पायी थी, और उन्होंने समम लिया था कि बैगन ( १६६ ) प्रेमिका और भी है। इस पर गुस्से में बेगम साहिया ने भी स्वीकार फर लिया कि जब यह बात है तो थोड़ी देर लिये मान लिया जाय, कि अगर मेरा भी कोई प्रेमी है तो रहने दो। परिणाम स्वरूप वेट पदमबगी पैदा हो गई। पौरन में तलाक दे देता, अगर कहीं खुदा का डर 7 होता । नतीजा यह, कि मैंने कह दिया, कि तुम मेरे काम को नहाँ, नायो अरने प्रेमी कपास और उपर उन्होंने कह दिया कि, नुम मेरे काम के नहीं, जाओ अपना प्रेमिका के पास । परिणाम यह हुधा, कि इस घृणा के योग्य नौया को रास्ते का सर्च देकर मैंने विदा कर दिया । और जहाँ का टिस्ट बताया,दिला दिया। वह अपनी महेली के यहाँ चलो गई । प्रकट है, कि मुझे क्या मतलर ? जायो जहन्नुम मैं । ये मेरे शर थे। फूल के बहार के दिन समात हो गये ! इस खूबसूरत लड़की से शादा करने का यह परिणाम हुश्रा । अपमोम और दुग होता था। जा ध्यान प्राता था कि ऐसी शक्ल श्रार सूरनवाली लड़की और चली ! फिर मैंने भी यह क्सम सा ला कि अब जन्म पर शादी न यऊँगा ! न ऐसौ सूबसूरत लड़गी जीना मुझे मिलगी और न मैं शादी फरूँगा। चलिये छुट्टी हुइ । वही मसल हुया कि “मोर कटा पैर गजी" मैने निश्चय कर लिया कि पलट कर कमी खबर न लूंगा। लेकिन निवेदन यह है, फि यह पूर्णतर अवकाश भला कहीं प्रणयो चित्त को चैन लेने देता है। तोमा कीजिये । श्रमी मुश्किल से बीस दिन भी न हुये होंगे, कि समय की गति ने फिर से एक नई और भोसी बात उठाई । अर्थात् यह, कि जब रिश्तेदारों को मालूम हो गया, कि मेरी अपनी इच्छा मे की हुई शारी का यह परिणाम हुना तो लोगों ने सोचा, कि लायो पिर उसे फाँसू । मेरी शादी करने का लोग 'विचार' पर रहे थे । यही नहीं, बल्कि बड़ा जोर मी रागाया गया । लेकिन मैंने फोरा जराव दिया । साप इन्कार पर दिया । क्योंकि अभी शादी की कड़ वाइट दूर न हुई थी । जिम वक्त अपनो चौवी का खूबसूरत चेहरा ( १६७ । सामने अाता था, दिल मसल कर रह जाना था, कि हाय तकदीर । चमनी हुइ चाँदी, लेकिन खोटी । सारी पटनाओं को सोनकर नान निरल जाती थी। 1 मैंने इमी महाने में दो महीने की छुट्टी ली और घर पहुँना। नई दिलचस्पी पैदा हो गई। वह यह, कि एक दिन "" साहिया की चिट्टी या धमकी। चूँकि अपने पुराने पते पर था, पर शीघ्र मिल गया । उनका पता अलपत्ता बिलकुल नया था 1 अत इन दोनों बातों में मैंने दिलचस्पी लेना शुरू कर दिया । शादी में भी और "ग" म भी । '" साहिमा का पत्र विचित्र था। पर में पुरानी जिदादिली की कापा झलक थी । मजा यह, कि अपनी बीता मुमोपतों की चर्चा तक थी। अनुमान लगाया गया था, कि में उनको भूल गया हूँगा, या यह सोचता हूँगा, कि उनक दुश्मा च कर गये इस सुन्दर दुनिया से । यह भी उम्माद की गई थी, कि अब तो मैं अपना नाम और पता भता दूंगा। मैने भी इस पर का बहुत ही जिन्दादिली से जवाब दिया । खास बात इस पर की यह थी, कि मुझे बजाय भाई वगैरह के मददगार की श्राक्पक उपाधि से सुशोभित किया गया था, और इसी हैसियत से मैंने उनको जवाब भी दिया । 'मददगार'शब्द किसी प्रसिद्ध रिश्ते से साथ करने का पूरा सबूत था। मेरा जवान पाकर उन्होंने अपना पुरानी सारी जिन्दादिला को न पेवल फिर से जावित कर दिया, कि बल्कि नवीन ढंग "मददगार" की पट्टी पर उहोंने ऐसा अकन किया, कि सारी खूबियाँ फिर से जाग उठी । वहा मैं था, और वही शब्द "मददगार" ने क्या से क्या कर दिया । परिणाम यह, कि एक दिलचस्प पार्षण था, जो मुझे इस गुमनाम शोर और कठोर लड़की की तरफ खींचता रहा था। प्रेम हरगिज नहीं । लाहौल ग्रिला कुद !! दिलचस्पी, जिन्दादिली, रंगीनी और चमकता हुया पत्र इस परवाने के लिए आग के समान होता या। नाम बताने के लिए उन्हें भी क्सम और मुझे भी कसम यह पत्र

( १७० )
उसने कहा-
4
मेरे सामने मेरी प्यारी बीवी पड़ी थी।
गर्मिदा, इस चिन्ता में कि इन दोनों में
मैने घरवाली से पूछा--"" कौन है।
उसने मुसुकुगकर कहा-और 'रशीदी'
मैंने कहा---
-मैं
.मैं
मालूम हुआ, कि जिनके साथ मैंने
मेरी श्रीनी की महेली थीं। और जब मेरी नी
पर मुझे देखा, और उन्हें बताया, कि मैं कौ
करने पर भी मुझे मेवकूफ बनाने आई । नती
पारण म
यहाँ इम पात को प्रगट करने की
उँगुली न क्टो होतो, तो मेरी लिसावट
लेती और मालूम कर लेती, कि कौन
मुक सामधार अर्थात् शीदी को उसने और
विवार में न रख लिये हाते, मेरे उन पनों के
पान्ट मास्टर के पन्ने म न पड़ जाते और वह
कही ये मेरे साथ न लग जाय ! अपनी in
लाचार हाती, बल्कि अपसोस इस बात
frगुराद होते हुये भी हम दोनों ने एक पू.
पतापा और भुगता।
में नौकरी पर नानी के साथ पहुंचा।
माहिया ने गन लाकर दिये, तो स्वय उसके
वेपन पास्ट मास्टर मेरे यह पर नहीं देता,
"" लिये । धाना ननकम यह हमारे
N

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Leftinenth

Author
Beg,mirja Agim
Title
Leftinenth
File name
Leftinenth
Text
OCR done
Citation
1946
Published
2011/02
Publisher
Nagri Press Daraganj Prayag
Language
Sanskrit
Pages
138
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
548671
Barcode
4990010028716.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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