Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Satyasasan Pariksa Of Acharya Vidyanandi

Gokul Chandra Jain · 2010/08

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स्व. पुण्यश्लोका माता मूर्तिदेवीकी पवित्र स्मृतिमें तत्सुपुत्र साहू शान्तिप्रसादजी-द्वारा संस्थापित भारतीय ज्ञानपीठ मूर्तिदेवी जैन ग्रन्थमाला इस ग्रन्धमालाके अन्तर्गत प्राकृत, सस्कृत, अपभ्रश, हिन्दी, कन्नड, तमिल आदि प्राचीन मापाऑम उपलब्ध श्रागमिक, दार्शनिक, पौराणिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक श्रादि विविध विषयक जैन-साहित्यका अनुसन्धानपूर्ण सम्पादन तथा उसका मूल और यथासम्भव अनुवाद श्रादिके साथ प्रकाशन हो रहा है। जैन भण्डारीको सूचियाँ, शिलालेग्य-सग्रह, विशिष्ट विद्वानोंके अध्ययन- ग्रन्थ और लोकहितकारी जैन-साहित्य ग्रन्थ मी इसी ग्रन्थमालामें प्रकाशित हो रहे हैं। ग्रन्थमाला सम्पादक डॉ हीरालाल जैन, एम ए, डी लिट डॉ आ० ने० उपाध्ये, एम ए, डीलिट प्रकाशक भारतीय ज्ञानपीठ प्रधान कार्यालय ९ अलीपुर पार्क प्लेस, कलकत्ता-२७ प्रकाशन कार्यालय दुर्गाकुण्ड रोड, वाराणसी-५ विक्रय केन्द्र ३६२०१२ 1 नेताजी सुभाष मार्ग, दिल्ली-६ मुद्रक सन्मति मुद्रणालय, दुर्गाकुण्ड रोड, वाराणसी-५ . - स्थापना फाल्गुन कृष्ण ९, वीर नि० २४७०,. विक्रम स० २००० . १८ फरवरी सन् १९४४ सर्वाधिकार सुरक्षित

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स्वर्गीय मूर्तिदेवी, मातेश्वरी
साहू शान्तिप्रसाद जैन
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SATYASASAN PARIKSA
of
ĀCHĀRYA VIDYANANDI
with
HINDI INTRODUCTION & APPENDICES
DITED BY
GOKUL CHANDRA JAIN
Acharya ( Sahitya - Jain Philosophy)
X'yayatırtha, Kavyatırtha, MA
VO
TRIAL
माह
BHARATIYA JNANPITHA PUBLICATION
VIRA SAMVAT 2490
V s 2020, 1964 A D
]

BHARATIYA JNANPITHA MŪRTideví
JAIN GRANTHAMĀLĀ
FOUNDED BY
SÃHU SHĀNTIPRASĀD JAIN
IN MEMORY OF HIS LATE BENEVOLENT MOTHER
SHRĪ MŪRTIDEVĪ
IN THIS GRANTHAMĀLĀ CRITICALLY EDITED JAINA ĀGAMIC, PHILOSOPHICAL,
PURANIC, LITERARY, HISTORICAL AND OTHER ORIGINAL TEXTS
AVAILABLE IN PRAKRIT, SANSKRIT, APABHRANSÁ, HINDI,
KANNADA, TAMIL LTC, ARE BEING PUBLISHED
IN THEIR RESPECTIVE LANGUAGES WITH THLIR
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CATALOGUES OF JAINA BHANDARAS INSCRIPTIONS,
STUDIES OF COMPETENT SCHOLARS & POPULAR
JAINA LITERATURE ARE ALSO BCING PUBLISHED
General Editors
Dr Hiralal Jain MA, D Litt
Dr AN Upadhye, MA, D, Litt
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पुण्यश्लोक डॉ. महेन्द्रकुमार जैन न्यायाचार्यकी स्मृतिमें
उनके अनन्य सखा
पं० दरबारीलाल कोठिया न्यायाचार्य
तथा
पं० दलसुखभाई मालवणिया को

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ग्रन्थमाला सम्पादकीय - बडे हर्पको वात है कि गत वीस-पचीस वर्पोमे जैन न्यायविषयक अनेक प्राचीन ग्रन्थ प्रकाशमे आये है जिनसे न केवल जैन दर्शनका यथार्थ स्वरूप प्रकट होता है, किन्तु भारतीय चिन्तनकी गहराई, सूक्ष्मता और विशालताका भी अच्छा परिचय प्राप्त होता है । जैन न्यायको परम्पराको विशेष व्यवस्था और दृढता प्रदान करनेका श्रेय आप्तमीमासाके कर्ता समन्त- भद्र एव न्यायावतार और सन्मतितर्कके कर्ता मिद्धसेनको है जिनका पूज्यपादने अपने व्याकरणमे सम्मान- पूर्वक उल्लेख किया है । यद्यपि पूर्वोक्त दोनो आचार्योके कालक्रम व पूर्वापरत्वके सम्बन्धमे मतभेद है, तथापि इसमे किसीको कोई सन्देह नहीं कि उन्होने समस्त जैन न्यायको परम्पराको प्रभावित किया है। समन्तभद्रकी कृतिको अकलकने अपनी अष्टशती-द्वारा अलकृत किया और विद्यानन्दिने अष्टसहनी रच- कर उनके न्यायविवेचनको चरम सीमापर पहुँचाया। प्रस्तुत सत्यशासन-परीक्षा भी इन्ही विद्यानन्दिकी कृति है जो अब प्रथम वार प्रकाशमे लायी जा रही है। दुर्भाग्यत यह रचना अधूरी है। स्वर्गीय डॉ० महेन्द्रकुमार न्यायाचार्य इसके शेप अशकी खोजमें अपने अन्त समय तक लगे रहे। इसीलिए वे इसे अपने जीवनकालमे प्रकाशित भी न देख सके। प्रसन्नताको वात है कि श्री गोकुलचन्द्र जैनने इसका सम्पादन अपने हाथमें लेकर इसे वर्तमान रूपमे प्रस्तुत किया। जिन प्रतियोसे यह सम्पादन-कार्य हुआ है वे सभी अपूर्ण है और एक ही प्रतिको प्रतिलिपियाँ मालूम पडती है, इस कारण इसमे कुछ त्रुटियाँ व कमियाँ रह जाना स्वाभाविक है पर आशा है अव प्रस्तुत व्यवस्थित रूपमे यह रचना आ जानेसे इसकी त्रुटियो आदिका शोधन भी क्रमश सरलतापूर्वक किया जा सकेगा। प्रस्तुत ग्रन्थमे जो आलोचनात्मक सैद्धान्तिक विवेचन पाया जाता है उसका विद्वत्तापूर्ण सुन्दर परिचय डॉ० नथमल टाटिया, डायरेक्टर, प्राकृत-जैन शोधसस्थान, वैशाली, ने अंगरेजीमे लिखकर इस प्रकाशनको वहुत उपयोगी बनाया है। इसलिए हम उनके विशेप आभारी है । भारतीय ज्ञानपीठकी मूर्तिदेवी ग्रन्थमालासे जैन न्यायविषयक अनेक ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके है जिनमे- से कुछ प्रथम बार ही प्रकाशमे आये है । अब समय आ गया है कि उक्त समस्त रचनाओका आलोडन करके भारतीय न्यायशास्त्रको जैन धर्मकी देनका यथोचित मूल्याकन किया जाये। श्री शान्तिप्रसाद जैन तथा उनकी विदुपी पत्नी श्रीमती रमारानी इस प्राचीन शास्त्रीय साहित्यके उद्धार और प्रकागनमे जो आर्थिक उदारता दिखला रहे है उसके लिए वे साहित्यिक ससारके विशेप धन्यवादके पात्र है । ग्रन्थमालाके मन्त्री श्री लक्ष्मीचन्द्र जैनका इम दिशामे प्रयास प्रशसनीय है। इसी सुसयोगके वलपर आशा की जाती है कि जैन साहित्यकी जो अपार निधि अभी भी उपेक्षित पडी है वह धीरे-धीरे प्रकाशमे आकर देशके सास्कृतिक भण्डारको सुसमृद्ध बनायेगी। हो० ला० जैन, जवलपुर आ० ने० उपाध्ये, कोल्हापुर ग्रन्थमाला सम्पादक . सम्पादकीय सत्यशासन-परीक्षा प्रस्तुत सस्करणमे सर्वप्रथम प्रकागमे आ रही है। इसके प्रकाशनके साथ ही विद्यानन्दिका सम्पूर्ण प्राप्त साहित्य प्रकाशमे आ चुकता है। सम्भवतया यह विद्यानन्दिको अन्तिम कृति है, जिमे वे पूरा नही कर सके। जो पाण्डुलिपियाँ वतमानमे प्राप्त है, वे सभी अपूर्ण है। जाश्चर्य यही है कि विद्यानन्दिके अन्य ग्रन्थोकी तुलनामे मत्यशामन-परीक्षाका प्रकागन इतने विलम्बसे हुआ । सत्यगासन-परीक्षाकी जानकारी सर्वप्रथम १० जुगलकिशोरजी मुख्तारने 'जैन हितपी' ( भाग १४, अक १०-११ ) मे दी थी। उसके बाद स्व० ५० महेन्द्रकुमारजीने 'विद्यानन्दिकृत मत्यशासन-परीक्षा' शीर्पक- मे एक विस्तृत निबन्ध 'अनेकान्त' (वर्ष ३, विवरण ११ ) मे लिखा था। वे उसका सम्पादन करना चाहते थे, किन्तु अन्य कार्योमे व्यस्त रहनेके कारण न कर सके और असमयमे ही उनका दुसद अवसान हो गया। पी-एच डी के लिए मत्यशामन-परीक्षाका मुमम्पादित मस्करण तैयार करनेके विचारसे मैने इसे मई १९६० मे हाथमे लिया था। कई कारणोसे यह पी-एच डी का विषय तो न बन पाया, किन्तु मनमे इसके मम्पादनका सकल्प अवश्य वन गया और मम्पादनकी स्परेसा मैने डॉ० आ० ने० उपाध्ये, कोल्हापुरको भेजकर सुझाव आमन्त्रित किये। उत्तर में डॉ० उपाध्येने न केवल रूपरेखाको हो ठीक बताया वल्कि पाण्डुलिपि तैयार होनेपर उसे ज्ञानपीठमे प्रकाशित करनेका आश्वासन भी दिया । मूडविद्रीकी ताडपत्रीय कन्नड प्रतियाँ प्राप्त करने तथा उनके पाठान्तर लेने आदिके कारण मम्पादन- कार्यमे विलम्ब आते दिखा। इसी बीच सयोगसे अक्तूबर १९६१ मे प्राच्य-विद्या मम्मेलन, श्रीनगरमे डॉ० उपाध्ये तथा डॉ० हीरालाल जैनमे मिलना हुआ। उनकी प्रेरणाके फलस्वरूप श्रीनगरसे लौटनेके बाद शोव्र ही इस कार्यको पूरा किया और २८ दिसम्बर, १९६१को पूरी सम्पादित पाण्डुलिपि प्रस्तावना तथा परिशिष्टो सहित डॉ० उपाध्येको भेज दी। मयोग ही कहना चाहिए कि सत्यगासन-परीक्षाको मुद्रित-प्रकाशित होते पूरे दो वर्ष लग गये। इस लम्बे अन्तरालमें जो नये महत्त्वपूर्ण तथ्य सामने आये, उनकी यहाँ चर्चा कर देना उपयुक्त होगा आचार्य विद्यानन्दिके समयका निर्णय करते हुए मैने प० दरवारीलालजी कोठियाके निष्कर्पोके आधार- पर विद्यानन्दिको उद्योतकरके टीकाकार वाचस्पति मिश्रसे पहले बताया है और कारण दिया है कि विद्या- नन्दिने उद्योतकरका तो खण्डन किया है पर वाचस्पति मिश्रका नहीं । वाचस्पति मिश्रका ममय ८४१ ई० माना जाता है । फलत विद्यानन्दि इसके पूर्व हुए। मत्यशासन-परीक्षाके ही साक्ष्यमे और जाँचने-देखनेपर ज्ञात होता है कि विद्यानन्दिने उद्योतकरके साथ-साथ वाचस्पति मिश्रका भी खण्डन किया है । सत्यशामन-परीक्षाके प्रारम्भमे ही पुरुपाद्वैतशासन- परीक्षाके पूर्वपक्षमे निम्नलिखित पद्य आया है, अनिर्वाच्याविद्याहितयसचिवस्य प्रमवतो, विवर्ता यस्यैते वियदनिलतेजोऽववनय । यतश्चाभूद् विश्व चरमचरमुच्चावचमिद नमामस्तद्ब्रह्मापरिमितसुखज्ञानममृतम् ॥ यह पद्य वाचस्पतिकी भामती टीकाका मगल पद्य है। इससे स्पष्ट है कि विद्यानन्दि वाचस्पति मिश्रके वाद हुए। इसी सन्दर्भमे तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकके इस उल्लेखको भी जाँचना-देखना चाहिए, "तदनेन न्यायवार्तिक- टीकाकारव्याख्यानमनुमानसूत्रस्य त्रिसूत्रीकरणेन प्रत्याख्यात प्रतिपत्तव्यमिति ।" (तत्त्वार्थश्लो० पृ० २०६) यहां न्यायवातिकटीकाकारसे विद्यानन्दिको वाचस्पति मिश्रका ही उल्लेख अभीष्ट है। इस प्रकार विद्यानन्दि वाचस्पति मिश्रसे तो निश्चित ही वादमें हुए मिद्ध होते है ।

सम्पादकीय वहुत है, मत्यगासन-परीक्षाका प्रस्तुत सस्करण तैयार करनेमे पुण्यश्लोक प० महेन्द्रकुमारजी न्यायाचार्यकी स्मृति पदे-पदे प्रेरित और प्रबुद्ध करती रही। उनके जीते जी कभी मै दर्शनशास्त्रपर अपनी लेखनी चलानेके लिए राजी न हुआ । जब भी वे किमी दार्शनिक ग्रन्थपर काम करनेको कहते तो मै उत्तर देता, 'दर्शनशास्त्र- पर काम करनेवाले आप लोग मै तो साहित्यपर काम करूँगा।' और उनके जानेके बाद पहले-पहल मेरी लेखनी दर्शनपर ही चली । जीवनके अन्तिम दिनोमें महेन्द्रकुमारजी हरिभद्रके पड्दर्शनममुच्चयका सम्पादन कर रहे थे । दस वर्ष पहले प्रारम्भ किया काम हम दोनोने मिलकर कुछ ही महीनोमें पूरा कर लिया था। उसी प्रसगमे मै उनके निकटतम सम्पर्कमे आया। और उस सम्पर्कके प्रतिफल मुझे यह दृष्टि प्राप्त हुई कि मत्यशासन-परीक्षाके सम्पादनका यह कार्य सम्पन्न कर सका । मत्यशासन-परीक्षाके मम्पादनमे अनेक विद्वानो एव मित्रोका सहयोग तथा शुभकामनाएं प्राप्त रही है। डॉ० आ ने उपाध्ये और डॉ० हीरालाल जैनको निरन्तर प्रेरणा न रही होती तो कदाचित् इतनी जल्दो सम्पादन-कार्य पूरा न हो पाता । ५० दलसुखभाई मालवणिया तथा प० दरवारीलालजी कोठिया न्यायाचार्यमें तो मै प० महेन्द्रकुमारजीके साय खोया स्नेह, प्रेरणा और साहाय्य खोजता-पाता रहा । श्री धर्मपाल शेट्टी मूडविद्रीने कन्नड लिपिकी दोनो प्रतियाँ उपलब्ध करानेमे तथा ५० देवकुमार जैन मूडबिद्रीने उनके पाठान्तर लेनेमे सहायता की। प० नेमिचन्द्रजी शास्त्रीके प्रयत्नसे जैन सिद्वान्त भवन, आराकी प्रति प्राप्त हुई । इन सबके प्रति कृतज्ञ हूँ। सम्पादनकालमे श्री पार्श्वनाय विद्याश्रम, बनारसके पुस्तकालयका मैने पूरा- पूरा उपयोग किया है । अतएव उसके अधिकारियोके प्रति कृतज्ञता ज्ञापन करना अपना कर्तव्य समझता हूँ। प० महेन्द्रकुमारजीके ज्येष्ठ पुत्र प्रिय पद्मकुमार जैनने पूर्व स्नेहवश पण्डितजीकी प्रतिलिपिमे मत्यशासन-परीक्षाकी प्रतिलिपि कर लेने दी, प्रिय भागचन्द्र जैन एम ए , माहित्याचार्यने अपना अमूल्य समय देकर सहयोग ही नहीं किया, प्रत्युत शीघ्र कार्य पूरा करने में हाथ भी वटाया। प्रिय लालचन्द्र जैनने प्रतिलिपि करनेमें तथा अन्य जिन मित्रोने जाने-अनजाने प्रेरणा दी, उन सबके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूँ। प० हुकमचन्दजी न्यायतीर्थ तथा श्रद्धेया वहन काशीदेवीने मुझे इस योग्य बनानेमे मदासे सब कुछ किया, उनका किन शब्दोमे आभार मानूं । वैशाली प्राकृत जैन विद्यापीठके वर्तमान डायरेक्टर डॉ. नथमल टाटियाने अपने व्यस्त समयमे भी सत्यशासन-परीक्षाका अगरेजीमें विस्तृत परिचय लिखनेका अनुग्रह किया, इसके लिए हृदयसे कृतज्ञ हूँ। भारतीय ज्ञानपीठके मान्य अधिकारियोका आभार मानना कैसे भूल सकता हूँ जिन्होंने पुस्तकको सुन्दर रूपमे प्रकाशित कर दिया। मेरी इच्छा थी कि प्रस्तावनामें मत्यगासन-परीक्षाके त्रुटित अशोपर भी विद्यानन्दिके अन्य ग्रन्योंके माध्यमे प्रकाश डालूं तथा विद्यानन्दिका समग्र अध्ययन प्रस्तुत करूं, किन्तु कई कारणोंमे वह न हो मका । कदाचित् यह पी-एच डी का विषय बनता तो कुछ और अधिक हो पाता। पुस्तकके रूपमे यह मेरी पहली कृति है, इसलिए सुझाव और शिकायत दोनोका ही स्वागत करूँगा। . काशी दिसम्बर १९६३

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A COMPENDIUM OF VIDYĀNANDA'S SATYAŚĀSANA-PARĪKSĀ Dr NATHVAL TATIA 1 Introduciry The Satyaśāsanaparil-a of Vidyananda, critically edited for the first time by Shri Gokulchandra Jam, M. A, is a critique of selected issiles uplied by a number of philosoplical schools of Indian plulosoply. It is written by a firstrate Jaina thuiker, Icārya Vidyānanda, who is famous for luis 4-tasaliasri and a number of other worhs on Jamna plulosophy and logic The critical incthod of Jamna plulosoplay adopted by Siami Samantabhadra in luis Āptamímāmsă culminated in the Astasalasri of Vidyānanda through thic Astašati of Alalanha Samnantabhacira's terse formulation of pluilosophical issues and cleani exposuic of the absurlities in the opponent's position gave rise to tlic procrlz 'anu Samanta bladrar tārhihül' (that is, all logical thmhers are inferior to Samantabhadra) 1 His works - composed in versc - ucre read and recited by all classes of peoplc, young and old, and that was responsible for thic procrb 'ā hunžiebhyo yasalı Samantabhadrasya' (that is, the fame of Samantabhadra citends to include the young folk as well)? Thic attachs of Samantabhadra on Buddlust pluilosophy were talen note of by Dharmahirti's Commentators3 ulo quoted his views for refutation Ahalanha, in his Axtašati, explains thic plulosophy of Samantabhadra with a special reference to the Buddhist positions, and Vidyānanda, in his Astasahasrī, includes also the opponents ulo flourished after Ahalanha up to the time of Vācaspati Misra whom hic quotes and routes in his Tattsārthaślukcie tarttihat and the Salyačásanapariksā,5 the worh under review Ahalanka's exposition is terse and brick and does not give the impression of being away fron the original test Vidyānanda, lionerer, introduces many later des clopments and clarifies the Jama positions 11 the light of thicse new issuics Siddhascna Divāhara, Pujyapīda Dusanandi and Stami Samantabhadra # 1 Jarendra-dfahavpils, I 4 15 2 Ibid, I 4 20 3 Arcata in his Hclubindutikā, pp 98-107, criticizes the contents of the Apta- 111imānsā, verses 71 and 72 Prajñākaragupta in lus Pramānavārtikabhâsya, p 224, appears to refer to the Aptamıámsī verses 10 and 11 Karnahagonin in his Pramānavārtikatika, p 109, quotes the Aplamımāmsā versc 11 a-b He also appears to refer to versc 10 -b on p 31 4 Page 206 where we find the expression Nyāyavarttıka-lihāhūia 5 Page 2 where the intioductory prayer verse of the Bhāmalı is quoted * This chronological ordor is controversial as mentioned in our General Editorial, H LJ, & ANU 12 SATYAŠĀSANA-PARIKSÃ are the three gicat cuponents of Jama plulosophy which was introduced to thic Sanskrit world by Vacaha Umāsvāti Siddhascna Diikara discussed logical problems in huis Nyilyīzvatāra and Pujyapada Duananı formulated clefimilions of Agamıc concepts in huis Sarvi thasicichi, which cierted mmenise wluence on tlic later developments of Jaina thought Siūmi Samantabhadra summcd up the faina positions 111 luis pregnant verses, sometimes giving them d 1411 mca). 11g I hus Siddhasena Dráhara's definition of 'naya' contained in the following verses anchantātmakanı vastu gocaiah sarvasanudām ckadesaussto'rtho nayasya visayo matalı. nayanāmekanıstanın payritch slutat artmamı , sampūnithaviniscāyi syadvādaśrulamucyate 1 and Pūjyapada Devanandi's characterization of it as "astuny anchantūtmany avirodhena heliarpināt sīdhyaviycsasya yāthītmyaprūpana-pravana-jirayogo nayah"2 aie summed up by Sumantabhadra, with his characteristic note of originality, in the veise vluch iuns as folloussadharmanana sādlıyasya sīdaimyad au olhatah syādi āda-piavibhaktārtha-1 iscsa-1 yaſljako nayah This is obviously the logical consummation of the positions held by Sildliasena Divakara and Pūjyapıda Devanands Samantalliadra's following statement of the respective spheres of application of scriptural cuidence and inſer- 3 ence- 3 vahtaryanapte yaddlctol sädhyan taddictusīdhitam , apte vahtarı tadvákyat sādlıyamāgamasādhitam 4 is a deſmite advancement on the following verse of Siddhasen. Diūlara on the same subjectjo hemûyapalkhammı heuo ūgame ya agamio so sasailldja-pannavao siddhantavırāhao anno Both these passages are cited by Vidyananda in huis Tattārthaílohavaittiha in connection with the Jaina theory of the validity of the initial enunciation of the subject-natter of a treatise, jointly based on scriptue and inference With Alalanka, Janna philosopliy reaches its period of adolescence and 5 1 1 Nyāyāvatara, verses 29-30 2 Sarvärthasiddhi on TS, 1 33 3 ANI, verse 106 4 ANI, 78 5 Sarmatiprakarnna, III, 45. 6 Page 3 VEDĀNTIC MONISMI 13 maturity that chaiacterized Buddhist philosophy of the age of Dhaimakirti Next to the Naiyāyihas, the Buddhists were the pioneers of logical thought, and the Jama logicians closely followed the Buddhists Alalanka finds the best exponent of his philosophy in Vidyānanda who may be considered the stabilizer of Jama thought which reached its pinnacle in Ahalanka It is not the occasion to make a comprehensive study of the contubution of Vidyānanda to the evolution of Jaina thought, based on his different works Noi do we propose to make a critical estinate of the Satyaśāsanapai īksā, the work under study We shall only enucliate select issues raised in the treatise, giung only a summary of a few others It is not impossible to arrive at a true doctrine Between two contradictorily opposed doctrines, one inust be true The Law of Euclucled Middle means that the negation of any proposition is an absolute alternative to it, that is, 110t only the proposition and its negative cannot both be fiue, but one or other must be truc 1 What is not contradicted by perception or logic (clistestāviruddha) is true The various doctrines taken up foi refutation are judged by this criterion of truth and found not to satisiy it 2 The Vedāntic Monism The Monistic Vedānta is taken up first This school makes avidyā (nescience) the prius of the subjective and the objective order of eustence Avidyā, in association with the eternal Bralıman is the material cause of the world It is of course not real lile the Bralıman, because it is subject to annilulation Only that is real which possesses existence as an intrinsic and walienable chaiacter Change is not piedicable of the ultimate reality It appeais in and upon the Bıalınan owing to the latter's association with avidyā As regards the natue of Brahman, it is limitless existence, consciousness, and bliss with no difference, intrinsic oi extrusic, in its being and is a unity- perfect, solid and simple Plurality is false It appcais so long as there is avidyā and it must disappear on the destruction of thel attei And this destruction of avidyā is spiritual liberation (moksa) In reply, the Jaina philosopher asserts that plurality is not capable of being repudiated as false appearance Absolute unity and absolute plurality are botlı contradicted by experience Difference is ás clearly given to experience as 1 Cf parasparam vipratısıddhayor dvayorapı vıdhivat pratisedhasyäpy asambhavena anyatarasya niyainena vidher upapattel kasyacıt satyasyāvasyam abhyupagantavyatıāt --SSP, p. 1 14 SATYAŠĀSANA-PARĪKSĀ 2 erroneous identity Monism is contradicted by thic Thic typcience of plınality 1 Vedāntist appcals to dreum experience 111 support of luis position that the mary sell-identical Bialuman appeais as the plurality of plicnonica It is argucci that in dicam a pluiality of facts is experienced though it is one Conscious that only evists and is felt Tlie Jamna clocs not agile with ilus interpretation of dream cxperience Even in clrcam, as in wakeful cypertence, the consciousness of action is different from that of the agent, because it is admitted even by the Vedāntist that clrcam contents ari produced by diftuent memory-iipressions The Vcdintist's appeal to illusory esperience in which one single inlily appears as many 15 also rejected by the Jaina philosopher An illusion is not a normal experience, because it is contradicted by a subscquent valid cognition But the cognition of pluality is a case of normal experience Ilicet is 110 contradiction 111 the fact that tlic potter fasluons a jelr with lus stall and cats luis meal suth his liand There is no reason why the normal cipcrience of plurality should be asserted as The Vedāntist may heic assert that the normal <sperience also is liable to contradiction on the attainment of final enlightenment But that is also not possible We do not know of any proof for the clistence of Brahman as different from plurality which is given to our normal cipelicnice Such proof itselt, by the very fact that it piores Bialıman as different from the object of normal experience, would prule the object along with the Brahman, much in the same way as the know ledge of shell as shell, while contradictmg the erione- Ous cognition of shiell as silver, proves the existence of the shell and the siker as two different cntities 3 The Vedāntist in clespai icfers to indeterminate (nuruhalpaha) cognition, which cognizes baie cuistcnice, as tlic proof of the cuistence of Biahman wluch is unity, pure and simple But the Jama philosopher refuses to believe in the possibility of such undifferentiated experience \Vhat we ime. diately perceive on opening oui eyes is specific existence dctermined by space, time, otherness and the like We never percene what is not detei niined by space and what is not other than the knowng self 4 Ou peiceptual experience thus is found incapable of proving the Absolute Bialimanı On the contrary, it proses difference to be as integral to reality as identity 1 bhedai abhäsinä сa pratyakseņādvaitasya viruddhatvät-SŚP, p 3 2 tatrānyad eva hi kriyāvisesa-samvedanam svavāsanottham, anyad era ca häiakay Isesa-samvedanam pratyahsam, na punarekam eva, taddhetu-vāsanābhedābhāva-prasamgat-SŚP, p 3 3 visayanyathatvasādliakasyaiva badhahatvopapatteh, suhtau rajatajñānasya suktikäſñanavat --SŚP, p 3 4 apratıniyatadesasya drastur ananyasyādaryanat -SŚP, P 4 VEDANTIC MONISM 15 ? The Vedāntist now seeks the aid of inference to prove the Absolute as pure consciousness The uneality of an independent objective world is cleduced from an analysis of even an ordinuy empiucal judgment fitke for instance the trite experience 'I see the pen' What is the status of the pen The pen is felt as an object no doubt But it is felt as the content of, that is, coincident vith its cognition Now, by the application of the principle 'whatevei 15 coincident with cognition is inside, 1. e, identical with it' it follows that the pen, being coinculent with its cognition, is inside, ie, identical with the cognition For instance, the character of cognitionhood, being coincident with the cognition, is identical with the latter 1 All things can sımıl urly be shown as coincident with cognition, and as such identical with it Theie is thus nothing outside consciousness which alone eusts But the Jaina considers the argument suicidal The Vedāntist infers 'identity' from 'coincidence' But how can the inference be valid unless botlı 'identity', the probandun, and coincidence', the probans, are admitted as two distinct facts existing in then own right ? Noi can the Vedāntist postulate absolute identity between the pi and the probandum He seeks to cleduce the identity of the content and cognition from the felt coincidence of the two The fact that they are felt as two should have made the Vedāntist pause before he drew the conclusion of their absolute identity If experience be the determinant of the nature of things, it cannot be gainsaid that not only the probans and the probandum are felt as identical-cum-different, but also the conclusion, viz the integration of the content, should be regarded as a case of identity-in-difference Even in the Buddhist philosopher's inference of 'momentariness' of a word (Sabda) and the like from their existence', the probans (112 existence) and the probandum (117 momentariness) are not felt as absolutely identical 2 1 obans The fact that one goes with the other necessarily is proof that they are not absolutely distinct and different But the other fact that one is the probans and the other is the probandum, and as slich is felt as distinct from the other should prove that the two are not absolutely içlentical The inference of absolute identity of content and consciousness by the Vedāntist on the ground of their invariable coincidence must therefore be rejected as ultia viies The Juna howe ei agrces with the Vedāntist when he asseits that the 1 yat pratıbhāsa-samānādlukaranam tat pratibhāsāntah-pravistam yatha pratibhāsa-svarūpam --SŚP, 4 2 sabdadau sattvånityatıajor apı kathancit tādātmyāt sarvathā tādātmjasiddheh, tatsiddhau sādhyasādhanabhāva-i irodhāt-SŚP p 5 16 SATYAŠĀSANA-PARIKSÃ pen is not object cannot remain absolutely distinct and different from consciousness when it is cognized The verbal proposition expressing the knowledge situation is of the forin "The pen is known' The pieclicate knownness' proves that the absolutely different from and so unconnected with knou lecige But the negation of absolute dilleience does not imply that the pen is absolutely inide identical with knowledge The proposition is entirely on a par with such factual pi opositions as the cloth is white' In both the propositions, the rclation of subject and predicate is one of substance and attribute The relation cannot be absolute identity as in that case it would be reducible to one of the terins, either the subject or the predicate 1 The relation is $141 generis which may be called identity-in-clifference for want of a better and more espressive name But the Vedāntist may ask What about the judgment The cognition per se shines' (pratibhasa svarūpam pratibhāsate), that is, "The cognition per se is known by cognition'? Here the content of the cognition is its own self, and so the position that the relation of cognition and content is one of identity-cum-difference cannot hold in the present case But the Jaina philosopher avers that the content is not the act of cognition as such but its specific character Cognition has both specific and generic attributes as constitutive of its natuie For instance, cognition is existent and thus shows that it has the attı ibute of existence in common with all other entities The attribute of cognition-lood is an uncommon characteristic In the said judgment the content is the specific character of cognition, and the specific character is not absolutely identical with the cognition There can be no judgment or proposition possible if the terms are absolutely identical or absolutely different, e g, 'gold is gold' and 'Himālaya is the Vindhya' are not logical propositions ? As regards the basic arguinent of the Vedāntist employed to prove the identity of cognition and content, it can be upset by the following argument IVhatever is coincident with cognition is somehow different from the cognition concerned, C. g, the nature of cognition itself All the contents, internal and external, such as pleasure and the chair are coincident with cognitions The efore, they must be somehow different from the cognitions concerned '3 1 na hi suhlah pața itjādāvapı sarvathā gunadravyayos tādātmye sämānadhiharanyam astı ----SSP, p 5 2 'pratibhasa-si arūpam pratibhāsate' ityatrápi na pratıbhāsa-tatsvaiüpay or lahsya-laksaņabliūtayoh sarvathā tādātmyam asti, pratibhāsasya sādhāranāsādhāraṇa-dharmadhikarazasya svasvarūpad asadhāranadharmāt hathañcid bhedaprasiddheh, anyathā tatsāmānādhiharanyāyogāt 'suvarnam sutarnam' iti jathā, sahya-rindhyavad vā-SSP, p 5 3 Cf yat pratibhasa-samānädhikarapam tat pratibhāsāt kathañcid arthantaram, jatha pratibhāsa-starūpam, pratibhāsasamanādhikaranam ca sukla-niladi sariam iti sadliyaviparita-sādhanad hetor nūdvaitasıddlih --SŚP, p 5 VEEINTIC MONISM 17 With the collapse of inference as the proof of monism, the Vedāntist in the last resort falls back upon revelation (Agama) in support of his position But the question arises whether revelation is ontologically different from the Absolute or not If it be absolutely different from thic Absolute, this will piore the dualism of ievelation and Bialıman at any iate 1 If on the contrary it he absolutely identical witli the Absolute Bralı'nan wluch it seeks to establish, then the revclation will be as much an improved fact as the monistic Absolute which is yet to be established Certainly, the means of proof and the object of pioof cannot be absolutely identical as in that case the two will be on the same level so fai as they are not established facts 2 3 Moicover, the meaning of the pioposition 'All that exists is the Absolute' (sarvam vai khalvidaŋ brahma) is not unqualified monism In it the subject is 'all existents' which are revealed to us in knowledge and thus a known factor The predicate is unknown In all jucigments the subject is a known fact and the predicate must be unknown If the predicate were equally known with the subject, it would not be judgment or a proposition So tlie very forın of a proposition implics that the subject and the piedicate cannot be identical The Vedāntist therefore cannot establışlı momsın cien by appeal to authoritative levelation It may be contended that the meaning of the preclicate is self-identity which is realved by a subject in his own self aur thuis self-identity is asserted of all that appears including self and not-self The logical implication of the proposition therefore is the negation of the appearance of plu ality as real Thus intei pieted the proposition is ncithici tautologous nor liable to signſy dualism The Jaina vould observe that even if the interpretation be accepted as true, the implication of dualısın is inescapable inasınuch as the cluality of revelation and ihe would appearance respectuely as the negator and the negated iemains uncontraclictec 4 If on the other hand ievelation were to be regardeci as the essence of the Absolute, that also would not prove their identity as essence and possessor of cssence must be runicuically different 1 Cf athagmas tatsīdhalo'styeva 'sarvam vai khalvıdam bralıma' tyädyigamasya parabralıma-sidhakasya sadblīvād iti cet, tadapı si avadhas a hityotthpanamcsa, adı aita-tadāgamayor di aita-prasangat --SSP p 5 2 Cf yadı punai ūgamopyadıayapurusa-sı abhāva c2, na tato vyatırıktah tada bralımavat tadāgamasyāpj asıddhattam syat -SSP, p 5 3 sarı atlā prasiddhasya vidhūnayogat --SSP, p 5 4 Cf hiacid atmavyaktau prasiddhasyaihatinya-Tüpass a brilmitsasya sar åtmasvanätmābhimatosu Vidhanad dvaita-prapinciropiviaiacchedcpı tadigamid ijaracchiedy a-1 yatacchcdah 2-sadbhavasiddhch hatham advaitasiddhili -SGP, PG 3 са 18 SATYASĀS4XA-PARIKSI The Vedāntist cannot also regud sell-intution as proof of the Absolute, because the proof must be clifferent from the object of proof Vor can thic Absolute bc taken as self-proico, for why not then plurality oi oiclity or the doctune of unicral illusion bc accepted as the ultimate truth 1 It has been aigued by the Vedāntist that our perceptual experiences are false because they are cognizant of difference, just as circam ciperience is But this infuence is utrated luy self-contradiction because the factors of inference such as the probans and the campic must 111 any cient be regarded as true li they are true, their difference also is true And if all these conitions of inferencc are fake and thus cognition of difference be declared to hc false, the inference will not prove the thesis, because no true conclusion can follow from false piemises The Vedāntist may contend that the conditions of furence are accepted as truc by the opponent and hence they are valid so fui as the opponent's 1cfutation is concerned But that would mean the recognition of the duality of acceptarice, 117, one's own acceptance and the acceptance of the opponen (svararābhyupagann-bheda-pratıblāsı) And again if this cluality also is assigned to another belief of the opponent, a second duality of acceptance would be required, and so on ad infrnitum And the result hould be the establishment of duality 3 Nor can the Vedantist assert the sellevident pure consciutisness as the contradictor of our normal coynution of plurality, because that would be a case of self-contradiction, being tantamount to the acceptance of the duality of the contradicted and the contradictor Vore. over the Vadāntist, being a monist, can accept the contradicted-contradictory relation only on the authority of huis opponent For him the relation is as unieal as anything other than the Absolute It is thus found that thicie is no proof against duality which is cognized in normal experience And this duality, being opposed to monisı, refutes the latter Fu the more, monism can be established only by the negation of dualism. -1 svatasiddham bralımetyabhy upagame dvaitam api statah sahalasadhanablia- Tepihim na sidhyet, tattvopaplavamātram vā nairātmyam ia-SSP, p 6 2 sjäd ähūtam--Viādāpannam pratyaksādi mithyaita, bhedapratibhasatiat siapnapratyaksādıad iti, tad asat, prakıtānumāne pahsa-hetu-drstānta-bhedapratibhāsasyāmithyātve tenaia hetor vyabhicārāt, tanmithyatre tasmad anuinânāt sādhyaprasıddheh-SŚP. р 6 3 parābhy upagamāt paksādı-bheda-pratibhāsasyāmithyāti cpi na dosa iti cet, na, si aparābhs upagama-bheda-pratibhäsena ı yabhicârât tasjāpi parābhyupagamântarād amithyāträd dosābhāve sa eva tadbhedapratibhasena y abhicāra it? na hracid saratisthet -SŚP, I P6, VEDĀNI IC MONISM 19 In fact, Sankara, the founder of the school of monistic Vidánta, has called huis philosophy the doctrine of non-dualısın The expression "11011-dualısı' can convey an intelligible ineaning only if dualisın be understood Now cualısın' is a whole (aklanda) espression and stands foi a whole concept It can be asserted as a universal proposition that the negation of a whole concept piesupposes the reality of the concept in some other contest 1 Of course, there are such expiessions as a square-circle' which clo not stand for anything i cal, and its negation by such a negative espression as a non-squaie-cicle' cannot be thought to piesuppose the reality of the negatum But this cloes not invalidate the universal proposition 'The negatum is always ieal’ The rule holds only 'in the case of whole words and whole concepts A squaic-cucle is only an attempt at combination of square and cucle, and it becomes a fiction because the two concepts are mutually repellent It is for this ieason that the rule is propounded to hold good of whole concepts quâ negata Nou monisin quâ negation of dualism is possible only if dualism be a false appearance. But dualism being a whole concept, its negation will necessarily presuppose the reality of the negatum (sc dualısın) 111 some context or other The Vedāntist however is not conunced by such linguistic arguinents Eicn if dualism is regarded as a concept, its negation cannot be inade the ground of its ontological reality The negation of dualısın does not in ieality belong to the Absolute The whole logical apparatus wluch is the cication of the professional logician is possessed of a piovisional value It is lalid until the ultimate truth is iealized But what is the necessity of negation of dualısın and what again is the reason for the adoption of the logical apparatus for the establishment of ionistic position by the Vedlántist ? The Vedāntist answers that the whole order of plurality is an unreal show which has decened the dualist and the plunalist into the belief of its ultunate ieality \Vhen the Vedantist tiles to conuince the dualist of lus elior, he has to adopt the logical appaiatus invented by the logicians of the realistic per suasion The clistinction of self and not-self is necessitated by avidyā and is not to be mistaken as possessed of ultimate validity So the charge of self-contradiction urged against the Vedāntist is the outcome of misunderstanding. But what is the natue of avidya 01 nescience ? Let us considlei the nature and 1elation of nescience as expounded by Sureśvara in the Bialiadāianykavārtusha 2 It is possible to conceive that the nescience, if it existed at all, 9 1 Cf advaitam na vinā dvaitad ahetur iva hetunā, samdñinalı pratiscdho na pratisedhyād ite hvacit -AM, 27, quoted in SŚP, p 7 2 Sambandhaväritika, 175-181, quoted in SSP, p 8 20 SA7 YASASANA-PARIKST The concepcan evist as the content of of the the Absolute or of tlic individual or as an independent entity Non the first alternative is not concciable tion of nescience in the Absolute wuch is of the natue of cognition and cl hapothesi omniscient molcs self-contradiction Nor can it bc supposed to subsist in the indudual, because the individual is not different from the Absoluto and as such is free from all taint of nescience How Can 11escience cuist in the individual self which also is of the nature of pure cognition ? Nor is the third alternative a tenable laypothesis, because nescience adınıtted as an independent entity, like the Absolute, cannot be supposed to be annslated by huowledge and so knowledge of the identity of the self and the Absolute, which is prescribed to be the condition of salvation, being the clmnator of nescience, will have no purpose to sei ve Knowledge of identity is believed to lead to the perfect emancipation of the self, because it is assumed to be destructie of nescience which induced bondage But if nescience bc an independent entity like the Absolute and be coetal with the Absolute from beginningless tune, It will be as eternal as the Absulule Self And the bondage aiso will be an eternal fact Surestara answers that the nature of nescience cannot be determined by an organ of knowledge Nescience is not capable of being determined by logic, yet it cannot be denied that it clists The individual fccis that he is ignorant of many things He is as certain of lus ignorance as he is of huis oun eustenice The individual is directly aware that lie is a conscious berg So consciousness and evstence are inalienable characteristics of the individual self. From the authority of iet elation as well as the evidence of logic, the self is known to be identical with the Absolute Brahman And we have scen that nescience is not possible in the Absolute and the individual alıke Surestara maintaus that this is not the correct approach for determining the relation of nescience lo deny the existence of nescience would be contradiction of a felt fact So, hower er irrational and illogical the concept of nescience may appear to be, its actual existence has got to be admitted by all It is true that the conception of nescience as an independent entity is an absurd hypothesis We find it from our study of the Upanisads that nescience is totally destroyed by knon ledge This is also the finding of incontestable cyperience Oui ordinary errors such as the perception of shell for the silver are found to be annihila. ted when followed by correct knowledge of the ieality This would be impossible and also unaccountable if nescience were eternal veuty It must be admitted that there is no tais 011 d'etre for error It is possible only when the conditions of knon ledge are given a false twist by something superadded to them It is absolutely unintelligible why should there be a deviation from the normal standaid Cei tainly this det iation cannot be the noi mal lav as this would make of the reality VEDANTIC MONISAI 21 the emergence of corect knowledge and cancellation of the false knowledge preceding it an impossibility What holds good of nescience operating in the individual must be true of it in its cosmic aspects also So nescience cannot be eternal verity like the Absolute Nor can it be an independent entity as slown above It is felt by us all that we are beset by limitations on all sides and we are not satisfied with our present condition We always try to transcend it as an undesuable obsession So nescience cannot have an independent existence outside consciousness The Vedāntist believes that consciousness, absolute and undifferenced, is the only reality and is the very stuff and essence of all that exists and appeais she appearance of plurality according to the Vedāntist is crioneous, and as such inust have a reason of its own This reason is found in nescience And so the nescience is not only subjective but also objective because it is co-pei vasite with consciousness in its entire range Now the individual is not the seat of ignorance accoi ding to Sureśvai a for twofold i eason In the first place, the individual is nothing different from Absolute Consciousness in point of reality And if the individual be regarded as ontologically different from the Absolute, which is not however the position of any section of the monistic school, then also the individual cannot be regarded as the locus of nescience Tlie individualization of the self is itself the result of nescience and as such cannot be the determinant of the incidence of nescience which is its very piesupposition Nescience inust have a local habitation of its own as the possibility of nescience as a floating entity would be absurd It must then have pure consciousness as its locus and abode and from the evidence of our own experience we find that nescience is a felt fact This shows that pure eternal consciousness cannot be opposed to nescience On the contiary, it constitutes the only evidence of its being Opposition is both a priori and empirical The opposition of being and non-being is felt a priori But other types of opposition are empirical and as such can be kuown only from exper 1- ence We have found that there is no opposition betweeni pure consciousness and nescience Pure consciousncss ineans consciousness which is not determined by any objective reference It is beieft of subject-object polarization Pure consciousness tius means unpolai ized consciousness It 15 not relevant to oui pui pose to prove that unpolarized consciousness is possible through it is stoutly opposed by Rāmānuja and also the realists of the Nyāya-Vaibesika school Tlie Sankhya-Yoga school and also the Jainas admit the possibility of puie consciousness at least in the final state of emancipation Granted that there is no opposition betucen pure bethcen pure consciousness and nescience But how to account foi the opposition of nescience as error with SATYASASANA-PARÍKSĀ 22 knou ledge? It is felt bcyond the shadou of a doubt that our erroneous perception of shell as the siler is cancelled and corrected by knowledge of the shell in its true character Our knowledge of shell is attender with negative judginent 'It is not silver' This shows that there is opposition between how ledge and error which is 11othing but a species of nescience This has puzzled many a respectable philosopher and it has been seriously asserted that the Vedāntist is guilty of self-contraclıction True pure consciousness is an eternal and transcendental entity As regards niescience, it is also assei ted by the Vedāntist to be associated with the Absolute Consciousness which is pure an: transcendental and undetermined by objectne ieference There can be no difference transcendental consciousness But the difference of consciousness from another is possible when it is made specific and particular ized by objectue rcference, in other words, when it is possessed of a specific content and is called know ledge Know ledge is consciousness in its essence, but it is ditterent as a specific determination is from the genius l'he opposition of error 15 with know ledge and not with pure transcendental consciousness which is rather the proof of it Eiroi is also a cognition with a distinct content and it is cancelled only by a cognition with an opposite content with reference to the sune situation It is the true cognition which cancels the false cognition truc cognition is here called knon ledge, and the false cognition error opposition only holds between them in One Tlie The 1 It has been argued by the opponent of the monist tliat there can be no nescience in the Absolute because of the a priori opposition between consciousness and nescience But the opposition is not a priori, and so the argument has 110 ralıcıty The very fact that we are conscious of nescience shows that thue is no opposition between them But though a felt fact and uncaused entity eusting concurrently with the Absolute, nescience is not regarded as an eternal verity like the Absolute Brahman, because it is liable to be concelled and corrected by the uneri ing realization of the nature of the self as identical with the Absolute It has been shown that nescience is destroyed by know ledge from the elample of common crroi and its correction The Vedantist cleduces from the fact the conclusion that nescience is not a reality in the true sense of the term A rcality is not capable of death or destruction Vescience being liable to extinction cannot be regarded as a co-ordinate reality But though not a reality, its actual existence is a fell fact and so cannot be denied without self-contradiction The denial of nescience as well as its assei tion is possible only within the lulation of nescience, because they are all judgments and as such have a clualistic rctcrcnce Of course, there can be no ieal relation between the Abylutt and nescience The Absolute is unattacheck and unrelated to VEDINTIC MONISM 23 anything within and without But whatever be the ontological 01 logical character of the velation of the nescience, its actuality cannot be disputed Eren an unreal relation is possible just as an unreal nescience is A difficulty las been raised that the Absolute has been descubed as omniscient and certainly nescience is incompatible with omniscience Anandagui has anticipated this difficulty and gren a solution It is this Omniscience does not mean empirical know ledge of all things, but the eternal perennial light of consciousness which makes all know ledge possible So there is no logical repugnance in the unreal association of unieal nescience with it By logical thought we can understand that this is not impossible, but the actual nature of it can be realved only by perfect know ledge When nescience is destroyed by knowledge, it becomes identical with the Absolute Nescience is a fact which refuses to be determined by logical thought Nescience cannot be said to eust unless the Absolute que transcendental consciousness is known In other noids, nescience cannot be felt without consciousness But nescience also cannot be intuited as existent if the true nature of the Absolute as pue consciousness is iealized Moreover, who will be the knone of it-the person who suffers from nescience or who has emancipatect himself from it? The dctermination of the nature of nescience is not possible foi the person who is subject to its sway, because this will mean that he is not fettei ed by nescience As regards the emancipated self, the logical distinctions of the subject, the, object, and the act of knowledge hare totally vanished for him foi eser, and so such deter mination is not possible An organ of hnowledge is not competent to guage unreality It is only the real that can be determined by it But nescience is ex hypothesi not a real because it does not stand the sciutiny of accredited cognitive organs Nescience is called nescience because it is incapable of standexamination with success In fact, the cuitei ion of nescience is nothing but this incapacity for standing the trial by accepted instruments of knowledge But the question may be asked “Why are we enamou ed of such an iriational concept"! You hare yourself admitted that it is not capable of being determined by the accredited organs of logic Why don't you adınit that the world is both different and non-different from the Absolute ? Both you and niyself admit the Absolute and the World, and the relation between them is asserted by us to be identity-cuni-chifter ence The meiit of this theory lies in the ing critical 1 1 + 1 avidyāya avidyātia idam eva ca laksanam, mänäghātasahisnutram asadharanain isyate --Sambandhaväiltika, 181, quoted in SSP, p 8 24 SATYAŚĀSANA-PARĪKSĀ consideration that it does not entail repudiation of anyone of the felt factsthe world and its cause the Absolute Why should you postulate an irrational and unreal principle as the cause of the world process 2 The Vedāntist answers that after all his theory is the simplest of all Morcover, it makes the postulation of a large number of iriational entities uncalled for Thus the opponent who believes in the reality of the would process has to adınıt that it is both different and non-different from the Absolute In the second place, he has to posit that bondage, though it is real and so uncaused, 15 liable to cessation In the third place, he has to posit that emancipation is the product of religious and moral activity and is yet eternal The monist only affirms nescience as the sole and sufficient condition of all these results And though it eusts from eternity alongside of and together with the Absolute, yet there is no logical difficulty in the fact that it is liable to annihilation, because it is felt to be unreal and so its disappearance does not entail logical contradiction which would be inevitable if it were real But it might be argued that simplicity is not by itself a recommendation for a theory If a multiplicity of things is necessitated by logical thought we cannot reject it for the sake of economy alone But the Vedāntist agrees that simplicity or multiplicity without the sanction of valid cognition is not a compelling consideration in the determination of reality But if the multiplicity of categories asserted by the opponent is found to be contradicted by accredited sources of knowledge, the postulation of it will be logically indeſensible Now the beliei er in reality of the world has to assert that the relation between the world and its cause is identity and difference both—a conception which is repugnant to all sources of knowledge Secondly, he admits that the worldly career is a reality bereſt of beginning in tune, and to say that it is annihilated by true knowledge is opposed to the unii ei sally accepted proposition that a real uncaused and undated is eternal Thurdly, it asserts emancipation to be the product of moral activity and yet to be eternal This is opposed by the unit ersal proposition that whatever is caused to happen at a particular time cannot but be liable to cxtinction These are the major contradictions in the theory of the opponent, and there may be many more, if minor details are to be taken into account As regards the Vedantist's theory, it only postulates nescience and this is not also an unwarranted assumption since it is endorsed by experience and scriptural authority alike 1 The Jaina frankly confcsses his inability to appreciate the arguinent of the 1 C: tratpakse bahu kalpyam sgat sarvam' manavirodhi ca, halpyāvidyana matpakse sã cânubhasa-samśraya --Sambandhavūritika, 182, quoted in SSP, P 9 VEDĀNTIC MONISM 25 Vedāntist In the first place, the postulation of nescience which the Vedāntist hunself adınıts to be incapable of any proof strikes him as an unphilosophical position) It is extremely puzzling that a plulosophei should subscibe to a position which is not amenable to test by any accredited organ of knon ledge Whatever may be the subject of dispute, call it truth or untiuth, science nescience, the matter can be finally decided by means of the acciecited soui ces of knon ledge available to us The Jaina does not dispute the existence of nescience, but he insists that this is also a matter of proof \Vhen the Vedāntist asserts nescience as an actual eustent, le is certainly aware of its existence And this as ai eness must be tue and valir Othei si ise, he will not be in a position to make the assertion The Vedāntist had to admit that nescience is a felt fact But hic chooses to call the awareness of nescience an alogical knowledge The reason seems to be the opposition of nescience with knowlerige which is also a felt fact That we commit erior is not open to dispute That this error is cori ected and cancelled by knowledge of the true character of reality such as of the shell as opposed to siler, is not also liable fo be disputed But the cancellation of error, which consists in the pioof that the picclicite does not belong to the subject 10 the context in spite of its reality in anothei context, need not be consti lied as esidence of the unrcality of erroi or of its content 'That we male erior is also capable of being established by a scudical knowledge This is appai ent from the consideration that the Vedāntist also cannot deny that we mispercer e shell as siker. This inisperception is a fact which can be known by an unchallengeable cognition And this cognition is possible if an oigan of cognition operates upon the fact But the Vedāntist may uge "Vell, if error be an object of verıdıcal cognition, it will be a real like truc cognition Not only this, it will also have to be admitted that the knou icdge of crior wll be true knowledge, and this will amount to the assertion that there is no difference between enor and truth' The Jama does not regard these objections as real difficulties In the first place, he admits that eiror is as much a fact and verty as truth In the second place, he aclmits that the cognition of ei roi is true cognition In other words, the Jaina believes that ei roi as a psychical event is a tilie occliience, and its cognition is the cognition of a true fact It has been obsei ved by Alalanka 'A cognition is true in i eſerence to a fact which is not contradicted by anothier cogntion' 1 The Vedíntist also endoi ses the factuality of en101 as a psychical fact, and he also admits that there is awareness of such crror But he refuses to give 1 na ca pramānānam avidyāvisayatı am ayuktam, vidyāvad avidyāyā apı kathaſcid vastutvāt tathā vidyātraprasanga iti cet, na liñcid anıstam 'yatha yatrāvisamtādas tathā tatra pramānatā' tyakalankades air uktatvat -S6P, p 9 4 26 SATYASİSANA-PARIKSI It 1112y this awareness the status of a true cognition, and he thinks the content of error, at lcast the predicative part of it, as neither ieal nor ureal, but something Ingically indeterminable The reason he adiances in support of lus position is that it is set aside by a true cognition following upon it Nobody denies that error is corrected by a subsequent valid experience But that should not be interpreted as cuidence of the uni cality of the cognition or of the content be file cognition but 11onetheless it is a cognition, and true so fai as its nccur. rence is taken into consideration It is regarded as erroi because the external object is not possessed of the predicate judged to belong to it in error The contradiction only proves that the predicate does not belong to the subject and nothing inore It has already been ciplamed that the contiadiction cannot inean that error did not happen Erroi is bound to be adımıtted as historical erent, and to be truc so far as it is a real happening The Vedantist has affirmed that the awareness of error is cſſected by pule consciousness, and as such cannot he assigned any logical value But this seeins to be a distinction without difterence Granted that error is felt by pure consciousness should thus awareness be not valid ? If the awareness of error be invalid, there will be no possible means of asse ting that it is a psychical occurrence The question of validity or 10112licity of a cognition is not capable of being decided by tirc intrinsic character of the cognition in question The validity of a cog.lltion can be decided by external evidence, at least in the initial stage nition is regarded as invalid only when it is found to be contradicted by a subsequent cognition showing that the piedicate does not belong to the subject The zwareness of error, no matter whether pure or empucal, is not contradicted hy any sulisequent congnition The subsequent cognition does not annul the lustoricity of crror as a cognition. It only shows, as Ne liare observed, that the prelicate does not belong to the subject Thus there does not scein to be any logical warrant for questioning the validity of awareness of error as a fact Whether it be classe as empirical or metempirical But why A cog. As regards the contention of Suressara that nescience or error 1$ not determinable by a valid cognition or an instrument of it, the Jaina does not think that it is based upon truth It has been observed that a cognition is proved to be false when it is contradicted by a subsequent cognition having the saine rcfcrence The contradicting cognition is hield to be true by all aren including the Vedāntist This shows that enor is proved by truth which 15 bied uijon a truc objectue clatum The Jaina accordingly thinks that the Vedāntist's interpretation of crror as an alogical fact is due to a hasty appraisal of the logical 155tic Eiror as well as truthi is always capable of being deterınıned only with reference to reality When the cognition is found to coricspond to VEDANTIC MONISM 27 as ncscience the objectic situation in all iespects it is called uuth When, on the other hand, it fails to conform to ieality in any respect it is called false So ncscience eno is always determinable with reference to scality, and that again by means of an accredited organ of knowledge As for the futher contention of Surestaia that nescience is not possible for a person possessed of knowledge, it is observed that nescience is not possible in a person who is possessed of perfect knowledge and as such is omniscient But thcie is no evidence to show that it is not possible foi a man whose hnou lecige is limited The assertion of Suiesiaia that knou ledge is futile in respect of a person free from nescience is also not based upon truth Freedom from nescience makes perfect knowledige possible, and this knowledge is not futile because everybody will adnut that it is covetable foi its own sake So how can knowledge be futile foi a person fiee from The assertion of Suresi ara again that the determination of nescience in a person is possible only so long as he is under the hypnotic spell of nescience is entuely wide of the mark The differentiation of ncscience fioni truth is possible only when a peison discovers the trutlı Were a person completely undei the spell of nescience, such differentiation would not be possible The ti utla of the proposition assei ted here is bui ne out by the evidence of cheam Tlie di caming man cannot distinguish between truth and c1101, because lie is completely cnincshed in nescience in ci eam 1 So Suieśvara's catagou cal afhuation that detei mination of nescience is possible only under the sway of nescience is entuely opposed to fact It might be contended that if nescience as enor be a true cognition, then thicie wll be 110 ieason ſoi its being contradicted by a subsequent cognition, but the fact that it is so contradicted shows that it is entirely false But the Jauna assei ts that there is no incompatibility in the situation Enol is regarded as a true cogn tion only in a sectional reference It is true so fai as its 1cference to the subject is concei ned, and also so far as it is felt by the person, that is, with icference to its own being Wlien the dcluded person thinks that he is ignoiant oiin erioi, he does not make a false assei lion This shows how a cognition though true so fai as it goes and so fa as its particular reference is concerned, can be contradicted by a subsequent experience and thus he false in somc particulai ielerciicc 'The dilemma raised by Su esi ara that nescience is not intelligible whether the self is known or not known proceeds upon partial appraisal of truth Theic is no incompatibility in the fact that a partially illumined person is subject to crroi and illumina- / 1 1 na caidyāyān cia sthitvā "asycyam aridye'ui prahalpyate, sallasja vidyavasthājām lāvidyutaravibhāgel-Viniscayāt, svapnāds ardyādasásam tadabhāvät-SSP, p I 28 SAISASASANA-PARĪKSİ tion alternately oi simultancously 1 Noscience is impossible of icalization only in the case of peilut knowledge and total ignoianico But the latter alternative is impossiblc because thue is 110 self which is totally devoid of kronliclyc, which is the possible outcome of total ignorance As icgards the formei alternative, the contention is only partially true A man withi perfect knowledge is not subject to niscience But he realies and transcends his nescience only with the dawn of such hnowledge Again, Sucásai a lias assuited that nescicncc is an national principle and the fact that it cludes all tlic epistemological resources is rather symptomatic of its truc ciaracter But the Jaina would puse a simile question 'Hou do you know that nescience is not aincnable to logical proof? Are you sure that it is so ? If so, what is the soucс of your conviction If the Ved.intist coniesses that belias no icsource which cnables him to make such assertioj, then he wll be guilty of unabashıcd clogmatisin ll, on the other land, the Vedāntist is sure of the truth of lus assertion, this wull mean that nescience is not altogether incapable of logical determination At any rate thic determination of nescience as alogical punciple inust be based upon truth and consequently secured by an accredited organ of knowledge Suresvaia has clamed that the postulation of nescicnice as thic prius of the would process mahes Vedānta philosophy the simplest of all systems But this simplicity is inore apparent than ieal The pluality of entities with tlieir infinite varieties is a felt fact Nescience was posited over and above the absolutely uindifferenced transcendent consciousness called the Absolute because it was felt that plurality, aren as appearance, cannot be cleduced from a simple unity But if nescience be only another unitary principle, it also will 110t bc competent to produce the appearance of plurality For thus it has been assumed that nescience possesses an infinite pluiality of powers Thus the claim of simplicity is based upon a quibble It lias however been claimed that nescience with its infinite resou ces and powers is an unreality and so the only reality is pure consciousness But the assertion of unreality of nescience is a puzzle which runs counter to the verdict of experience and logical thought The Vedāntist says that it is not real because it exubits selt-contradiction in every stage The tlungs of the world are subject to constant change and this ineans the extinction of the old order and einer gence of a new one But if a thing is to be real in its independent capacity and right, it cannot be supposed that it should dimislı or inci ease or cease to be or come into being Origin It may bc so 1 na catmanı hathamcıd av ditepyas dyeti nopapadyate, badha'virodhät kathamcid vijñātepi vāvidjeti nitaram glatate, viditātmana eva tadbadhahatiaviniscitch hathamed badhitāyā buddher mrsātvasıddhch --S$P, p 9 VEDANTIC MONISM 29 and destruction are unpredicable of a real A real is real always and so must iemain constant The erroneous siker is i cal because it ceases to be when it is contradicted by knowledge of the shell If a real were capable of origination and cessation like false silier, there would be no criterion possible for the distinction of real from unreal It must therefore be admitted that constancy and continuity and consequently the absence of lapse fiom unfoi inity are the true chaiacteristic of a real But these tests are incapable of being applied to the objects of experience The conclusion is inevitable that they cannot be real The Jaina pluilosopher asks What is the souce of the hnow ledge of this peculiar nature of reality ? The ultimate nature of things can be known by experience alone Well, what is the ground foi ou belief that consciousness is existent and also is the proof of the eustence of other things ? The answer must be that it is felt to be so Consciousness is its own guarantor and proof of its own reality As regardis unconscious matter, its cxistence is establislied by means of consciousness It cannot be asked why consciousness should be self-evidenced and matter be dependent upon consciousness for thic proof of its existence The question is a question of fact, and not of reason The nature of thing is inalienable and must be accepted to be what it is Can anybody answer why file should be hut and water cold, and not vice vei sa ? No, because it is a question of fact Sunularly the nature of rcality is to be decluced from the testimony of experience The existence of things which are experienced is obvious and self-evident If you call 111 question their credentials, the fact of eustence and consciousness which are posited by the Vedāntist to be the ultimate reality will not also be immune from such doubting intcriogation The iesult will be un eliciel scepticism or unn ersal negation The Vedāntist had the good sense and sanity not to acquiesce in this suicidal estimation The Jaina would i espectfully and earnestly ask the Vedāntist to carry his cletei mination of reality consistently to its natural conclusion He accepts evistence to be the ultimate truthi solely on the testimony of experience But as experience iecoids change as the integral character of eustence ou rather of things felt to be existent, it beats one's understanding why change should be declared as unreal appearance The Vedāntist has contended that change in olies lapse of being into non-being and this is a case of self-contı adıction Reality must not be self-contı adlıctory But as change is fraught with contracliction, it is to be unceremoniously thrown overboard as an unreal and unjustifiable appearance But the Jaina is a frank realist, and is candid in lus confession of faith in the verdict of experience The Vedāntist thmhs that there is pure being which is incompatible with puie nonbeing But pure being is an absti action, and we have no experience of it So also is the case with pure non-being What we find in experience, including 1 30 SATYASİSANA-PARIKSA the principle of consciousness itself, is concrete being which is a unity of dificrent cntities Thus we nei ci come across a pure substance clenuded of qualities and actions A substance is always a unity with the multiplicity of attributes (Vhy should the Vedāntist scent contradiction in it ? He should tahe the reality as a whole and the attempt to clip away a part of its character only bespeahs warranted zeal for abstract thinking It is no doubt tile that the diversity of reals encountered by experience exhibits existence as their unni ersal trait But the universality and continuity of this trait and the discontinuity of other traits are facts alike The former sliould not be ested witli truth and the latter dismissed as appcaiance Sularly, one should not read contradiction in the combination of identity and difference when they are endorsed by uncontradicted experience The Vedāntist accepts the aspect of identity and rejects the aspect of difference, because he thinks that the nature of reality is absolutely simple But this is only the outcome of luis bias for a prion logical thought in preference to and contradiction of experience We could accept thuis assessment of reality iſ the clictates of a p11011 logic were found to be confirmed cen in a single instance of our experience The Vedāntist is too astute a thunker not to be aware of this weakness 11 lis position Accordingly he aſpeals to dreamless experience He asserts that pure existence is felt in this state He also appeals to samadhi (ecstasy) in which the spiritual aspirant realizes the reality as a homogeneous simple unity berett of intrinsic and extinsic difference But the state of samadhi is not attainable by all If a gifted soul experiences , it, that does not aftord any help to men of luniteci knon ledge who arc enquirers after truth So it lias no philosophical value As regards dreamless experience, it is not also beyond dispute So the Vedāntist has to rely upon the nei ealed texts of the Upanısacs and upon pure logic So far as the Upanisaclic texts are concerned, the interpretation of the monist is not accepted as the last word There are other interpretations also It may not be out of place to remark that the Jaina scripturesI also have discussed tliese texts and have offered their own interpretation such 15 at variance with that of the monist As icgards pure logic, the Jaina attitude towards it hias been elucidated with as much clarity and precision as lias been possible for us The consequential objections of Surcúvara regarding bondage and emancipation do not cause much difficulty to thie Jaina The Jaina belicies that bondage is a real condition of the self, and though a sisting froin the beginningless tunc as cocral with the individual yet it is liablc to be transcended Emancipation is nothing but the disentanglcinent 1 Cf l'escavīvas jakabliīsja, 1596-1603 BUDDHIST IDEALISMI 31 of the self from the harnut inatter The harnic matter is not desti oyed but pulled out The pure nature of self which is realized in emancipation is not a 11CU creation 11 thic alsolute sense It was always there But the lamic mattci scried to oliscure it The juinn belietes in change because it is found to he the untersal character of all icals and if it means transition from being to non-being in a sectional refcience, the Jaina is not fughtened by it So thic objection of Suicia that emancipation, lieing il piocluct of a process, will be liable to destruc tion does not cause any difficulty The Veclantic solution that bondage and emancipation are both illusory cunot be regarded as the only satisfactory ovplanation, as it has been made abundantly clear that the clonal of plurality, in defiance of esperience, cannot escape from fall into the alyys of universal nululısın or scepticism vluch Vigirjina and his followers have shown to be the incuitable conclusion of pure logic The Buddlust Idealısın The subjective idcahsın of the Yogācāra Buddhist is to be distingrushed froin the l'edintic llons The Absolute Brahman of the Vedintist is cternal, (cognizable by all hinds of cognition), 711d enc But the uñana (consciousness) of the Yogācíra Buchast is momentary, subjectne or self-intuited (cognizable by seli alone), and numerically different in cach consciousness-stream 2 Vidyananda here iccords the thicories of know ledge propounded by the Sautrāntika Bucidhists, Yaugas (Xarjivihas and Vai-esilas), Simklıyas and the Jaunas These theorics are refuted by the subjectivist who thus proves that all definitions of the cognitum (vedya) and the cognizer (cdnha) are untcnable 2 He proves the ſalsity of all instruments of cognition by the following argument \Vhatever is of the form of cognitum and cognizer is false, e g, dreams and illusions, om perceptions and the lhe are on a par with these latter, and hence falsc' 3 Our pei ceptions and all other organs of knowledge being false, there is no proof of the reality of external objects The subjectivist hou ever does not deny the individual units of consciousness which he admuts as the source of appearance of our 1 Cf Vidyananda's statement samvidām sanıkatvena'nanya-vedyatiena nanāsantānati cna ca nity atrena sarıavedyatvenai'katı eneva parabrahmanah si asamveda nabhārat.--SSP, p 12 The printed text in SSP is corrupt Sec Aslasakasri, p. 241 2 Pide sŚP, p 11 sautrántihaparıhalpita-tajjanma-tādrūpya-tadadhyavasāyāh tatah hasyacıd api grahy a-grāhala-laksanasjãyogāt sarvam grāhya-grāhahāhära- Jñanam bhrāntam eva ---SSP, p 11 See also Aslasahası, p 240 3 yad grāhya-gráliahākāram tat sarvam blirāntam, yathā stapnendiajālādijñā. nam, tathä сa pratyahsādiham --SSP, p 11. 1 31 SATYAŠASANA-PARĪKSĂ ded from asserting a logically necessary relation between their corresponding negations as negations have no independent logical relation apart from that their opposite posita es The result will not be different eren if either of the terms be given a positie interpretation Thus if the probandum be asserted to be positive identity, it cannot be proved from negatn e probans, because there can be no relation betn een a positive and a negative terin. Causality and identity of essence are recognized to be the tuo types of necessary relation But these two relations are found to obtain betu een positive entities and not non-entities, nor betu een an entity and a non-entity The same difficulty will stand in the way if the probans is supposed to stand for a positive fact But let 115 see if the Buddhist can establish his position by mahing the probans and probandum both positive Thus it may be interpreted that the necessity of being known together' means 'identity of the cognition and the probandum is 'identity of the two But tlus interpretation would make the inference a case of tautology because the probans will not be different from the probandum What the Buddhist seeks to establish by this argument is that the content and the cognition are not different but identical. So 'identical cognition' is found to be the probandum and the probans is also nothing but “identical cognition' But the Buddhist may argue that the truth of the identity of cognition is, established by means of abolition of the, difference between content and the cognition, because an identical cognition is incompatible with the numerical difference of contents Thus in every cognition the content is cognized together with the cognition And the cognition is as much a content of itself as the content is supposed to be This necessary coinpresence of the contents in the same cognition is not intelligible without identity The felt difference must then be an illusion The Jaina avers that the necessity of compresence of two or more contents in one cognition proses neither the identity of the contents inter se nor the identity of the contents with the cognition Thus a substance and its qualities are always perceived together, but this identity of perception does not annul the difference of the contents, nor the difference of the cognition from them Nor is it our conviction that when many things such as the chair and the table and the other ſurniture in a room are percen ed together, their mutual differences are abolished But if this association be regarded as accidental, the example of substance and quality will rebut all doubt of falsity of inference The subjectivist hinself adnuts that the omniscient Buddha cognizes all the difterent consciousness-centres (which appear as so many subjects). But he does not conclude that all the different subjective centres are really identical with the Buddha Noi cover, we do not find any logical absurdity in the supposition that things may be perceived together and yet be different from one another Thus, for CĀRVĀKA MATERIALISM 35 It is 7 instance, then any subject is seen, it is seen together with light But nobody will conclude from this that light and the jar oi the pen are identical quite possible to argue that the relation between cognition and its content is one of illuminer and illumined And that they are felt together is due to the fact that without the cognition of the one the other cannot be cognized In other words, the relation may be one of means and end, condition and conditional The argument of the Buddhist is the piototype of the argument of the Vedāntist which we have considered before Thc Vedāntist has ai gued from the coincidence of the content and cognition to their necessary i lentity and integration The Jain explained this by asserting the relation to be one of identity-111-difference The same conclusion will follow from the Buddhist argument of necessary coinpresence 4 Thc Carväha Materialism science The Cārvāha philosopher denounces soul and the possibility of omni- The sciiptures that exist contradict each other and thereby prove their own falsits The so-called jiva or atinan ( soul ) is nothing but a temporary product of inaterial eleinents It was not before birth, nor will it continue to exist after death. There is no life hereafter. The Jaina philosopher observes that the materialist's denial of soul as an independent principle of consciousness goes against the law of causality The nature of consciousness is radically difterent from inatter and so it cannot be the product of material elements The effect must be essentially homogeneous with the cause and reducıble to the latter in turn. The law of causality demands that the cause and its eftect must be mutually reducible 1 Consciousness is not reducible to matter and hence cannot be a material product Moreover, the existence of soul is proved by self-intuition (svasamvedana) We feel pleasu e and pain, joy and sorron, which presuppose a conscious substance as their substra- The naterialist cannot deny self-intuition He must accept cognition as self-cognized in order to cognize the object It cannot be admitted that the cognition is cognized by another cognition, because the second cognition would require a third, the third a fourth, and so on ad infiniturn, leaving the object uncognized for ever Nor can the materialist regard the cognition as cognized tuun 2 1 Vidyananda cites examples of such reducibility in the following passage na ca tesām parasparam upādā nopādeya-bhāva-darśanam asiddham, pithivyātmakacandrakānta sūryakānta-kāstha-visesebhyo jalānalayor utpatteh -SŚP, p 16 2 sukha-duhhha-harsa-visādadyaneka-parināmātmahasyātmatattvasya svasamtedana praty aksena nırbādham anubhavât -SŚP p 16 32 SATYASASANA-PARIKSA 1 cognitions polarized as cognitum and cognizer Pure consciousness alone reai Even as paintings dranın on plane su face appear solid with depression and elevations, so does the pure consciousness appear as subject and object to th deluded person under the influence of nescience The idealist pioves his thes by the argument "The objects-chan and the lihe-are not different from the cognitions, because thet are cognized by them, eg, the cognution which cognized by itself.' And he refutes the iealist's position thus "The chair an the lile are not external mateial objects, because they are cognized, e g, pleasuj ard the lihe which are interial and material '2 The Jaina plulosopher obseries that the subjectiv ist establishes lus pos tion by mea is of inference, and elutes the validity of all instruments of know ledge in the same breath This is nothing but blatant self-contradiction Witl out the support of an organ of know ledge, the Buddhist cannot prove th falsity of the theories of rnal pluilosophers who believe in extra-mental reality Not only this, the subjectivist cannot prove the falsity of the differentiatio of cognition into an act and content He holds that our cognitions are inomer tury and self-intuited and that there are other epistemic subjects Certainly a these facts cannot be pioved by our intuitions The service of unfeience as a valı 111strument of huos lecige inust be requisitioned 3 A cognition may be felt b itself, but it is not felt as moinentary, or as not cognized by another MIo14 over, iſ the cognition lias no veridical reference to a icl extra-subjective fac how can the subjectivist believe in the eustence of othei subjects ? The denie of genuine extra-subjectie rcference must end in solipsısın If the entire logice apparatus including the clifference of probans and probandum and the necessar relation between them be a false creation of nescience, then the subjectius cannot prove anything including luis own position The subjectiust seeks 1 establish the identity of content slith cognitions on the ground of the two beini felt together But this very assertion piores that he believes in the dualit: of cognition and content Is this not a case of self-contracliction like the toca statement of a person 'I an an observer of the von of silence' 25 It has how 4 1 samvittir cya hhandasah pratibhasamānā sakala-edya-vedala-vyayahārāy halps te SSP, p 11 2 Cf niladih samledanad ayyatırıhtas tadsedyatvāt, tatsvarūpavat, na jad niladılı pratibhāsamănattat, suhbâdıs at --SSP, P 14 3 yogūcārena vijñanánām hsanikatram ananyai edyatsam nânāsantanatvar anumancnaita vyavasthapanjyam -SSP, P 12 C/ nila-tajjñanayor abhedah sahopalambha-niyamat --SSP, P 13 5 sadā mauna-1 ratiko'lam itsabhilaparat sia-vacanavirodhasyaiva sukara nat-Asjasalasri, n 242 BUDDHIST IDEALISM 33 2 ever been aigued in defence by the subjectivist that this line of attack on the part of the opponent is neither fair nor consistent How can the charge of a fallacy oi a self-contradiction be advanced against the subjectivist when the opponent knows that the former does not believe in the seality of anything other than consciousness ? The use of logic, will become superfluous after the ultimate truth 112, the reality of consciousness alone is realized Dignāga and his followers in spite of their ultimate conviction of the tiuth of puie consciousness alone have elaborated logical weapons and this is not inconsistent with their philosophical convictions They have frankly avowed that logic has its place and utility only on this side of realization of the ultunate truth and is necessary to combat the pievailing misconceptions of philosophers So the charge of self-contradiction 01 inconsistency is nothing better than argumentum ad hominen 1 The Jaina philosopher -obsei ves that his charges could be ineffective of the Buldhist idealist succeeded in proving that his conclusion was established by unimpeachable logical ground Dharmakīti assei ts that the identity' of cognition and content follows from the 'necessity of then being known together' (salopalambha-nıyamāt) But what is the meaning of the expression the necessity of being known together' and of the terın identity' ? The foi mer may possibly be interpieted as the absence of separate cognition' and 'identity' may be undei stood to mean 'absence of numerical diffe. ence' In other words, the 'negation of sepaiate cognition' may be made the ground foi the inference of 'negation of numerical difference' But this is not possible because there can be no necessary relation betu een tuo negations As regaids such negative inferences as of the 'absence of smoke' from the absence of fire', or the absence of triangle from the 'absence of figuie', they are legitunate only because they derive then cogency from the necessary concomitance between theni positive counter-terms Thus there is necessary concoinitance between effect and cause, and so the negation of cause leads to the inference of the negation of cffect Liken ise, there is necessary conconutance between 'figure' which genus and 'triangle' which is the species And so the negation of the foriner entails the negation 'of the latter There is no independent relation possible between two negations The Buddhist argument could be effective if the positive concomitance between 'separate cognition' and 'numerical difference were possible To be explicit, the Buddhist is the last person to assert that a separate cognition of the content from that of the cognition concerned is possible by means of which the numerical difference of the cognition and content can be established , for the admission of the possibility of the content, separate and numerically different from that of the cognition, will knock out the Buddhist positiri of identity of cognition and content The Buddhist therefore is preclu- 5 is the 36 SATYAŠĀSANA-PARÍKSA He is by inference, because he does not accept the validity of inference the efore compelled to admit self-intuition, and consequently the existence of the self or soul as the substratum of tliat intuition Being radically different in nature from the material products, the soul inust be eternal unlike the latter 1 The negation (pratısedha) of soul entails the reality of it, because in all genuine negations, the negatumn must be a positive fact Even the negation of square-circle piesupposes separate reality of square and circle elsewhere Thie figuratne usages ( gaunahalpana ) like his pictures lack soul also argue the existence of soul All simple words ( suddha-pada ) signify positive reals The word 'soul' is a simple word and so must stand for a positive fact There is also consensus of opinion among eminent men ( aneka-višista-jana-sanimatı ) and the testuinony of the omniscient souls (jina ) in favour of the existence of soul, which has been established by unimpeachable arguments of logic too 2 The material elements are known as esfernal objects while consciousness is felt as internal This argues their absolutely different nature Moreover, it is a common experience that a nen-born babe has desire to suck the breast of his inother This desire would be une plainable in the absence of his recognition of the breast as inılk-seci eting organ The recognition again presupposes memory and memory is based on past experience in a previous life There are also instances of ghosts appearing and telling their story and gifted persons remembering their past Ines 3 The obvious disparity and variation in the mental and moral faculties of diferent individuals inust have a cause, and this cause is asserted to be merits and demerits earned in previous lives And this is the Moral Law which is the proof of l.fe hcrcbcfore and hereafter As regards the possibility of an omniscient soul, the Jaina asserts that the materialist cannot adduce any proof against such possibility The materialist accepts perception alone as the valid instrument of knowledge And perccption, being capable of cognizing positre objects alone, cannot cognize the absence of omniscicnce Even if perception is adınıtted as capable of cognizing the absence, the inaterialist should clarify whether it is capable of 1 vidāpannam caitanyam anadyanantam prithivyādı-samudāya-sarirendriya- Visay ebhyo 'tyanta-sailahsanyasya 'nyathånupapatteh-SSP, P 17 2 pratisedla gaunahalpana-guddhapadă-neha sammatı-jinohtaihi, nirbâdha-laksapārthair lingai api bhavyate bhāvah -Quoted in SSP, P 17 3 tadaharja-stanchāto rabco-drster bhayasmrtch, bhūtäntayanāt siddhah prakrtijñah sanatanalı --Quoted in SSP, p 18 SAUTRÃNTIKA FLUXISME 37 cognizing thc absence of omscience in a particular soul at a particular moment, or in all souls at all times The first alternative will not refute our position, while the second would prove the omniscience of the materialist himself, and land liin in self-contradiction 1 7 5 The Sautràntika Fluvisi cause The Sautrāntika Buddhist is a realist in the sense that lie believes in thereality of the material atoms and the psychical factors like feeling, cognitions (deterınınate and indeterminate), names and concepts (samjñā) and predispositions (saniskára) These reals are discrete and momenatry They form conglomerates, but do not give up their disci eteness in any way Thiey last only a moment giving itse to their facsimile in the next moment The first moment is regarded as the material (upādāna ) and the second the effect ( upīdeya ) The combined stieam of these reals gives rise to the false notion of a permanent self, which is due to the absence of gap ( avyavadlıāna ) between the effect and the cause, extreme rapidity of producuon (laghūtpattı) of the former from the latter, and their close similarity ( sädrśya ) The recognition of identity betu een the effect and the cause also does not prove permanence It is an illusion u lich is on a par with the illusion of the identity of ever growing nails, hairs and the like Liberation ( moksa ) for these Buddhists consists in the disruption of the consciousness-stream by making it unproductive The practice of detachment and contemplation helps one to get rid of niescience ( avidyā ) and clinging ( tisna ) and finally suck dry the productivity of the consciousness-stream The aspirant to liberation should cultivate the four noble truths, víz, that existence is nothing but suffering (duhklia), that audya is the inain source ( samudaya ) of suffering, that cessation ( nurodha ) of suftering is possible, and that there is a way ( márga ) to the cessation of suffering Vidyānanda also mentions the eight constituents of the way to the cessation of suffering 2 But these do not appear to be faithful to the Buddhist enunciation Liberation is likened to the extinction of the light of the lanıp on the exliaustion of oil and wick. The Jaina philosopher considers this Buddhist view of things to be opposed 1 kim ca sarvajñatvābhāvah pratyahsena kvacit kadācit hasyacıd vyavasthapyate, sarvatra sarvadā saryasya vă tatradyapakse parasyestāpādanam, dvitiyapakse sarvatra sarvadā sarvasya sarvajñatvābhāvam pratyaksatah samvidan svayam sarvajñah syāt tathā satı vyāhatam etat sarvajñā avavacanam Carvakasya --SŚP p 19 2 SSP, p 21 Also see Asiasati on ANI 52, which appears to be the original source of the statement 38 SATYASASANA-PARĪKSA to experience and logic The objects that we percere are massive, permanent, and composite We never percere the atomic, momentary and simple objects.1 The Buddhist plulosopher cannot disiniss this perception as illusory unless he succeeds in pointing out a perception which cognizes the inoinentary simple atom Dharmakīrtı has defined perception as 'cognition which is free from conceptual constructions and non-erroneous' (pratyak-am kalpanzpodhain abhrúntam) If all our perceptions are dismissed as illusory, the definition would have no scope We do nerer percene the atoins and so these also cannot be regarded as the object of such perceptions The indeterminate perception also is not capable of cognizing the atoms Moreover, it is devoid of the certitude which, is an essential condition of the cognition being valid and non-discrepant ( avisamvādaka ). Eien as a person ignorant of the nature of poison fails to determine the poison as poison by perception, so an indeterminate perception is apso facto not capable of determining the nature of the object Nor can the indeterınınate perception determine its object by ineans of a deterınınate cogmition produced in the next moment, because the determinate cognition would require the production of another determinate cognition the its own determination, and so on ad iuftitim Moreover, it is impossible that an indeterminate perception should produce a determinale cognition in the next moment An ass cannot produce a horse Il a perception free from conceptual constructions could produce a determinate cognition which is conceptual, why should not the atomic real (svalaksana) itself be admutted - as capable of generating the determinate cognition directly without the intervention of the indeterminate perception 2 The Buddhist cannot set down the conceptual constructions to the activity of predispositions and perversities influencing the indeterminate perception in the production of the determinate cognition in the next inoinent These predispositions and perversities will ever remain active, and mahe the indeterminate perception itself vitiated and contaminated and incapable of cognizing the true nature of the object The indetermmate perception thus is found incapable of establishing the reality of atoms And the determinate cognition, being conceptual in character, is unfit to perform the function Inference, being based on perception, is also ncompetent to do the duty The Buddhist might contend that composite wholes are not real The eva 1 na hi pratyakse sūksma-ksanıkā-sadhārana-rūpāh paramānavah pratibhasante, sthūla-sthira-sadharanāhārätmanām ghatādinām pratibhāsanāt -SŚP, P 21. 2 abhılāpasūnyad apyadhyaksād yavasāya-halpanāyām svalaksanam nādhyavasāyam janayet svayam abhılāpasūnyam api --SSP p 22 SAUTRĀNTIKA FLUXISM 39 parts constitute the whole But what is the relation between the whole and the part ? The whole cannot reside in the parts individually or jointly The postulation of a pecular relation called samarāya in the inherence is also not helpful, because samarāya in the ultimate analysis is nothing but another name of what we call (residence' The cancept of a composite shole is thus an absurd notion The Jaina plulosopher postulates the relation of identity-11-clifference betu een the whole and its parts, which is exactly sınılar to the relation obtaining between a cognition and its two constituents, 17, the cognizing agent and the congnized content The cogmtion, the cognizer and the content are thiee distinct facts inseparably rolled into one 1 They are identical as well as different The relation is su generis and for want of a better name may be called identity-in-difference The whole is as much a real unity as each of its parts There is nothing repugnant in admitting the atoms as combining together to make one uut u hich is amenable to perception, And such unity must be admitted as real Othersise, there being no unity available at any stage, the unity of atom would also remain unestablished The question of the reality of unnt ersals is also raised by Vidyānanda in this content The Jaina pluilosopher identifies the unei sal with similarity or resemblance Sunilarity must be admitted as real Otherwise there could be no occasion for the erioneous cognition of shell as silver There is similarity between shell and siler, which is responsible foi the occuri ence of erroneous cognition in the presence of the other relevant conditions of erior philosopher does not admit the category of eternal and ubiquitous universals of the Nyāya-Vaibesiha philosopher, for he does not beliere in any valid experience of such category 2 This similarity is called horizontal universal (tiryak-sāmānya) in Jain philosophy 3 There is another called vertical universal (ūidlı ata-sāmānya) which relates to the identity of a substance through time 4 A substance changes but does not cease to be It is permanent and also one This permanence and unity is called vertical universal The Jaina philosopher does not find any difficulty in adınıttıng the same self running through difterent modes and preserving its identity He lihens this vertical identity to the unity of a cogni- The Jaina 1 yathaiva hi jñānasya vedya-vedakākārābhyam tādātmyam aśakyaviyecanatvāt, tathā avaya yāder apyavayavādıbhyas tādātmyam asakyavivecanatvād eva --SŚP, p 24 2 na ca sādharmyad aparam samanyam asti, tasya nitya-vyāpi-syabhavasya kvacid apyaprativedanat-SŚP, p 26 3 sadrsaparināmas tiryak khanda-mundādisu gotvavat --PKM, IV 5 (P 467) 4 parāpara-ivartavyāpı drar yam ürdhvatā, mrdiva sthāsādışu ---PKII, IV 6 (P 488) 40 SATYASASANA-PARIKSA 1S tion u hich has a variety of colours anil forms, spread in space, as its content Even as a single cognition can cognize a number of forins and colours in one sheep and be one unitary fact, so does a substance reinain one while passing through different modes in succession 1 Moreover, if causal efficiency is the criterion of reality; the real should be admitted as permanent and transitory both The momentary not capable of exercising causal efficiency either in succession or in nonsuccession and as such cannot be real 2 The same is the case with an absolutely permanent entity The Jaina accepts causal efficiency as the criterion of reality, u hich, according to luin, presupposes that the real should be both permanent and transitory The Buddhist has denied a permanent self underlying the course of psychical erents which happen in different times What eusts and is possible is only the present momentary unit The past is defunct, and the present is lost after its turn This makes the continuity of personal life impossible, and consequently the continuity of present life into ihe future and the necessity of the law of harman that the perforiner of good or bad act will have to bear the consequence become impossible of eiplanation The Buddhist has abolished the permanent soul and replaced it hy a series supposed to be governed by the law of causality. The past produces the present and the present pioduces the future, and in the pioduction the cause cominunicates its ethico-religious bias into the efect This seems to be a solvent of the difficulties involied in the breach of continuity But is causation possible in the absence of a real link between the past and the present ? The previous consciousness-unit is dead and defunct when succeed-, ing uut happens But hou can a defunct and non-existent fact be the cause of anything? Nobody can think that the present occurrence is due to an event which has occurred in the remote past The reason for this is that the past is not in existence to influence the present event It might be contended that the immediately precedent event can be the cause of the immediately succeeding one But how can the eftect come into existence in the absence of the cause and set be due to it ? In the Buddhist theory the cause ceases to be when the effect comes into being How can there be any relation between what is existent and what is not existent ? There can be no distinction between the immediate precedent and the remote precedent when both are equally non-existent at the time of the production of the effect. Tlie determinant of causality is the concomitance in presence and absence of 1 / 1 Cf sjádvádı-sammatah sthirähāralı paramartha eva, citrajñánasyaihasya gaugapad anekahára-vyāpitvavat kramenápyekasyātmåder anekakāra-vyapitvasiddheh-SŚP, P 26 2 pürottara-ksanānām sarvathā niranvayatve arthakriya-virodhāt --SSP, p 26 SAUTRĀNTIKA FLUXISM 41 the effect with the cause But in the Buddlust theory the effect does not happen when the cause is in eustence, and it lappens only when the supposed cause 15 non-existent How can there be concomitance ? How can agun the Buddhist explain that the effect should happen in immediately succeeding inoment and not in remote futurc or past when the cause has no cuistence at the time of the effect's occurrence ? There can be no difference, as we have sud, between a remote past and an inncdiate past, because the absence of the cause is uniform in both ases The question comes to be 'How can the non-existent be the cause of the evstent " One might equally affirin that an eternally existent might produce an occasional effect If it is urged that there 15 no concomitance between an eternally custent fact and an occasional event, because thic evstence of the effect is not concomitant with that of the cause, and the cause is present when the effect ceases to be But this is also the case with the Buddhist when lie affirms that the effect comes into being during the absence of the causc at a particular time and place, but not during the whole period of its absence in the uncounted past and in unending future And this amounts to the denial of the law of causality which was the cornerstone of the Buddha's religious and pluilosoplucal edifice Not only this, the self-contradiction obti udes itself most amabashedly when the Buddhist fluvist makes causal efficiency the criterion of reality and ends in the conclusion that the effect is independent of the cause, which is cleducible from the proposition that the effect comes into being wlien the cause is absent Thus causality is as inexplicable in the theory of Aus as it is in the theory of eternally unchanging cause There is another serious difficulty in the doctrine of Aus It is a natter of universal experience that the continuous identity of the self as well as of objects is felt by all This felt identity is asserted to be illusion by the fluxist But what is the basis of this illusion ? Illusion presupposes a previous cognition of the object A man who lias never experienced silver cannot mistake the shell for silei Identity is inseparable from continuity But as there is not real continuity anywhere according to the Buddhist, how can there be such illusion of identity possible ? The supposed continuity is said to be formed by discrete moments which come into being and pass out of evstence So there is no real continuity anywhere It is affirmed by the Buddhist himself that the discrete moments when not felt as distinct create the illusion of identity We have shown that this illusion is impossible But even admitting for the sake of argument that such an illusion may be possible, the question arises Hon can one continuum be distinguished from another continuum ?' Now it is a felt fact that the chair is different from the table It is not the 42 SATYAŠĀSANA-PARIKSA series discrete momentary chair that is different from the table But we feel that the table which appears to continue is different from the chair-continuum There is no difterence between the chair and the table so far as the appearance of continuum due to the non-cognition of the difference of the units is concerned. A question arises 'How can one continuum be felt as distinct from another continuun ? Each member of chair-series is distinct from its other members in the same way as the members of the table-series are from those of the chair- Yet the chali-series is felt as distinct from the table-series What is the reason of this? If the unbroken continuity of the emergence of the tablemoments be the reason of its distinction froin the chair, the same unbroken continuity is found in all the series It is difficult to understand, firstly, how absolutely distinct entities give rise to the appearance of identity, secondly, how one series can be distinguished from another series when the same absolute difference is found to obtain bein een them as is found between the members of a particular series If similarity be held to be an additional reason for this appearance of identity and continuity, then why should not the two table-series, closely similar, be not felt as identical ? There is similarity and also unbroken Sliccession between the different units You may say that one table is felt as distinct from another table and so their is no confusion between them But the appeal to perception is useless because what is percened is always the moment and not the series which is an unreal intellectual construction So again the appeal to recognition cannot be of help, because in the Buddhist theory of flur nothing continues, and there is no identity between the past and the present, which is to be known by recognition What is felt is always the moment, absolutely distinct and discrete from another moment So no question of identity of one moment with another moment anises In fact a plurality of units without a binding nexus can never account for the unity felt in an entity If an abiding unity is posited to connect and combine the different units, then recognition and also causality can be explained This is the position of the Jaina philosopher who asserts that a reality is a permanent unity which runs through the changing moments that appear in it The criterion of reality is thus continuty and change, that is to say, the fiu, and influx of states, 6 The Sāmkhya Evolutionism The Sāmhliya philosophy admits dualism of prakrti and purusa Prakrti is the material cause of the universe, and purusa is the inmutable and unchanging principle of consciousness Prakrti is one but purusas are infinite in nurnber Both are ubiquitous The prakrtı evokes in a definite order and the evolutes are tacnty-three in number The evolution starts with the unbalancing of the equilib- SAMKHYA EVOLUTIONISM 43 riun of the three constituents of prakıtı, vit, sattva (principle of buoyancy and illumination), rajas (energy) and tainas (inertia) The first evolute is inahat or buddhi (intellection) which is followed by ahamkāra (ego or selfhood) as the second Froin the aliamkāra are evolved the following sixteen---the five tanınātias (fine elements), the five organs of cognition, the five oigans of action and the mind From the five fine elements again the five gross elements arise These twentythree evolutes together with piakiti and the purusa make up twenty-five principles If the class of emancipated pui usas is added, the number comes to twenty-sit And Maheśvara is the twenty-seventh according to the Sārklıya school which accepts God Liberation, according to this school, consists in the reinstatement of the purusa in its own nature, wlich is attained by ineans of the ciscriminative know ledge of purusa and prakıtı It is likened to the state of dreamless sleep The Jaina philosophier has raised objections' against the Sāmkhya concept of prakıtı and its evolution Prakiti is eternal, ubiquitous and pai tless Being paitless, it sliould eust in its entirety everywhere and that would mean the existence of everything evei ywhere But this is opposed to experience We perceive different objects in different places and tunes, and not everything everywhere at all times 1 But the opponent might contend that though it is admitted that everything exists overywhere, it is the presence or absence of inanifestation I, which detei mines the perceptibility or otherwise of the object But then what is this manifestation ? If it stands for the cognition of the previously uncognized object, you have to state whether the inanifestation is eternal or occasional If manifestation is occasional, it inust be admitted to be freshly produced And consequently what is the harm if the objects are also aclınıtted as fieshly produced If, on the other hand, the manifestation is eternal, the original contingency of the perception of everything everywhere would revive 3 Moieover, what is the relation between the piaketi and its evolutes ? Are the evolutes the products of the prakıtı or only the transformations of it? If the evolutes are the products, they must be either pre-existent oi pre-iron-existent But the production of pre-existent pioducts is futile, and the production of the pre-non-existent products is impossible according to the Samhliya philosopher An absolutely non-existent object cannot be produced If, on the other hand, the evolutes are considered to be the transformations of the prahiti, they ace I na hi pratyaksena sarvam sai vatra disyate -SŚP, p 31 44 SATYASÅSANA-PARIKSA either absolutely different from the latter or absolutely identical with it In the latter case, the successive production of the evolutes would be impossible, because there is no corresponding succession in the prakıtı And in the former case, it would be illogical to regard them as evolved froin the prakrtı, there being absolute cleavage between ilie two. Nou if the Samkhya pluilosopher adınıts the transformation to be neither difierent nor identical, and asserts that the prahiti transformis itself as malrat and the like, much like the straight or circular shapes assumed by a reptile, he would be abandoning luis doctrine of absolutely eternal prakrti 1 This would be tantamount to the acimission of the doctrine of non-absolutism sponsored by the Jaina philosopher to the Jaina The Sāmhhya doctrine of unchanging purusa also does not commend itself The pui usa should be concerned as permanent-cuin-changing \Ve have already cliscussed the point in connection with ou esposition of the doctrine of Auvism 7 The Vaibesila Categoi ies and Theisin The Vaišesiha school postýlates si categories, viz, dray ya (substance ), guna ( quality ), harman ( activity ), sāınānya ( universal ), uśesa (particularity) and samavāya ( inlcrence ), and asserts that the discrinunative coinprehension of these categories of truth is the condition of liberation The soul has the nine specific qualities of buddhi ( knowledge ), sukha ( pleasure ), duhbha (pain), iccha ( desire ), dvesa (aversion ), prazatna ( effort ), cihai ma ( merit), adharnia ( demerit ) and samshāra ( predispositions) On the absolute dissociation of these qualities, the soul attains liberation and regains its natural state of freedom from containination with these specific qualities The school believes in the plurality of souls which are ubiquitous Tlie Jaina philosopher observes that the Vaisestha postulation of absolute chifference between the parts ( avayava ) and the whole ( avayav in ), qualities and their substratuin, action and the active, universal and the individual, is opposed to experience We do not percene the two terms as absolutely different from one another, though of course distinction is not denied They must be adınıtted 1 atha na blinno napj abhinnah parināmal hevalam mahadadırūpena pradhanam parinamati dandahundalady akāraih sarpavad iti cet, tadetat svestanityaikāntabadhakam-SŚP, P 32 VAISESIKA CATEGORIES AND THEISM 45 as somchon identical and different both The postulation of the relation of samavāya between the two would not solve the problem It would iather add another category equally unainenable to peiception Moreover, the relation of samarūya is accepted as eternal, ubiquitous and unitaiy, wheicas the terms ielated by it are transitory and limited in exterision, and different in different contests Agam, the samavāja itself would i equirc another samarāja to relate itself with the terins, and thus would Icaci to inſimitc regress leaving the terms unrelated Nor would the quality of conjunction ( samyoga ) sic the purpose Conjunction, being admitted as quality by the Vaiéesiha, can reside exclusively in a substance, and not in samavāya which is not a substance The substantie-adjectue elation is also not hulpful. Such iclation is possible only when the terms aic ali eady related by another relation For instance, thic stick can function as an adjective of the relation of conjunction between the person and the stich held by hum is known beforchand The l'aiścsiha might contend that the samaraya relates itself to the term by itself independently of any otha iclation Sanavāya is itself a ielation and therefore cloes not need another rclation for its relation with the terin But thic contention is not tonable Even as thic conjunction ( samyoga) 'and such other qualities requue a relation for the residence in thc substance, so the samasīja must also be admitted to be in need of another relation for its residence m the terms It cannot be accepted as self-ielated The Vaibesiha might argue “Self-relatedness is the intrinsic nature of samalaya, even as hotness is of fire There is no justification for comparing tic nature of conjunction ( sainyoga ) with that of samalūya F11C is liot and water is cold It is a question of fact One should not ash Wiy fire is not cold and water is not hot ?" But tiie faina pluilosoplicr docs not find any substance in the argument Had the self-relatedness of samajaya been established by perception, the Vaisesika could appeal to the nature of things But it is a question of logic which can be decided only by appeal to icason The case of conjunction was cited only for the sake of argument against the postulation of samarāya as an independent category and not as a proof against such postulation In fact, Prasastapāda proves sama rūya by inſerence ? 1 Vidyānanda lias adduced a numbei of cogent arguments against samarāya and the reader will find many interesting points in it With the refutation of Samavāya the quality of sanıyoga ( conjunction ) is also refuted The postulation of absolute difference is the besetting sını Some sort of identity between the terms 1 Vide SSP, p 36, § 14 46 SATYAŠĀSANA-PARIKSA must be admitted in order to make their relation understandable Otherwise atoins would never combine and our perception of unity by the side of difference would reinain unaccounted for Another important point of difference between tlie Vaibesiha and the Jaina is the question of personal God In the Nyāya-Vaiseşıka school, particularly in its later der elopment, the existence of Personal God is advocateci He is not the material cause of the world He is only the efficient cause The body, the sense-organs, the woild, etc are known to have a definite origin in time \Vho has created thein? It can be inferred that they were brought into being by ani intelligent person with the help of the material atoms just as the articles of daily use are manufactured by persons vested with knowledge and skill Such intelligent person is God God IS But the Jaina advances the counter-argument "God is 110t the creator of body, etc, because he is devoid of bodily organısın Whoever is devoid of bodily organism is not the creator, for instance, the einancipated self devoid of bodily organism And therefore He is not the creator" The Varsecha denies bodily organism to God Granted that God hias bodily organisin But eternal God must have an eternal body Now as the bodily organısın is a coinposite entity, it must cr hypothesi be a product created by an intelligent being, and this would prove it to be non-eternal If in order to avoid the contingency, the body is admitted to be created without any intelligent creator, this would contradict the doctrine that all products must have an intelligent creator 1 Now if the Vaisesika admits God as devoid of bodily organisin, the activity of creation would be inpossible of explanation And if he accepted the possibility of creative activity of a person devoid of bodily organism, it would be simpler hypothesis to admit the karman, thoughi unconscious, as capable of doing the function Possession of both 'intelligence' and 'bodily organısın' are necessary for the creation of an object, as illustrated by the instance of the potter Nou God, though possessed of intelligence, is devoid of bodily organisin and so does not satisfy the full condition of creation Karman, though unconscious, makes up a composite material body according to the Jamna, and so it is on a par with God in this respect Karman therefore is as much the satisfactory condition of creation as God of the Vaibesika philosopher The Vaišesiha might contend that the essential condition of creation is the presence of intelligence, desire and eftort The karman of the Jaina does not satisty these conditions and therefore creation cannot be set down to it But the Jaisia submits 1 nityasyapı taccharįrasya buddhimat-häranäpūrvahattve tenaiva käryattādıbietūnām vyabhıcārat -SŚP, p 39 NYAYA SALVATION AND MĪMĀMSĀ REALISM 47 that God also, being devoid of bodily organisin, is incapable of knowing, willing and effort, and hence of performing the function of cication The Vaišesiha's postulation of intelligence, desire and eftoit in bodiless God goes against hus doctrine of the disembodied emancipated soul as free from the specific qualities of knou ledge, pleasure, pain and the like The Vaisesha believes in God as the dispenser of justice in accordance with the micrits and demerits acquired by the person In other words, God giants the fruits of our own harman The Jaina thinks harinan as the sole and sufficient condition capable of producing the results of good and bad moi al acts 8. The Nyāya Salvation na The Naiyāyılas are in essential agreement with the Vaibesikas on all inportant philosophical issues, and so Vidyānanda refrains from giving any elaborate exposition of their philosophy Hc how ever refers to then conception of muktı which is of four types, vi, sālohya, sārūpya, sāmipya and sāyujya The first is attained by bhahti-yoga ulich consists in lifelong der otedness and dedication to Maheśvara the Supreme Deity, as His sei vant The second and third arc attained by means of kriya-yoga in the form of spiritual penance and scriptural study and the fourth by jñāna-yoga, that is, meditation on God by means of the eight factors of yogic disciplinc, 117, yama, niyama, etc ) 9. The Mīmāmsā Realism The Bhatta Alīmāmsaha admits eleven categories of reals, 117, earth, water, fire, air, space ( dik ), time, ākāsa, soul, mind, sound ( śabda ) and darkness ( tamas) Guna ( quality ), karian ( activity ), etc which reside in the reals are identical with the latter The Prabhākara Mimāizsaka adopts a different scheme and posits the following nine- dravya ( substance ), guna ( quality ), hriyā ( action ), jātt ( universal ), samkhyā ( number ), sādrśya ( similarity ), śaktı ( potency ), samavāya ( inherence ) and krama ( order ), instead of the following five of the Bhātta school-- substance, quality, action, universal and non-existence Two ends of human life are recognized, vi?, heaven and salvation The duties are fourfold- nitya ( compulsory ), naiinittika ( to be performed on particular occasions ), hāmya ( prescribed to serve specific ends ) and nisiddha ( forbidden ) The Miināmsalas do not admit renunciation as the essential conditon of salvation One can attain salvation even by following the life of a righteous householder earning his livelihood by honest means, der oted to self-enlightenment, hos- 48 SATYASASANA-PARIKSI 1 - pitable to guests, perforining oblation and truthful 1 The candidate for salvation should not perform the kāmya and nisiddha duties. He should how ever do the other tho types of duties in order to get rid of the obstacles that might obstruct his spiritual progress The Prabhdhara Vlīmanisahas include these two also under the kāmya duties and do not prescribe them for the aspirant to salvation Vidyānanda selects the Mímāmsaka concept of universal for iefutation at great length But as we have already elaborated the Jaina concept of universal, We do not propose to discuss them in the present context Abbrer lations ÃA= Iptamīmānsá [ see Astasalasri ] Aptamīmāmsa ( see Astasahasri,] Astasiliasrī, with Aptamīmāms, and Astašati, Gandhi Natharangji Jaina Granthamālā, Bombay, 1913 Astašati [ see Astasahasri ] Hetubindutikā, Gacknad Oriental Series, No CXIII Nyāyāvatāra, published by S ] Mahāsabhā, Bombay, V S 1985 PKNI = Prameyakainalainārtanda, Bombay, 1941 Pramā navārttıkabhāsya, published by K P. Jayastal Research Institute, Patna, 1933 Pramānavārttikatikā, published by Kitab Malal, Allahabad, 1943 Sanmatitarh arpraharana=Sarinatitai ka with English translation, Bombay, 1939 SSP-=Satyaſásana-pariksa, the edition under review Vibesdvaśyakabhāsya, Yaśovnjaya Jaina Granthainālā, No 35 $ I nyājārjita-dhanas tattvajñānanıstho'tithipriyah, stāddhakıt satyavádı ca gihasthopi v imuci ate Quoted in SSP, P, 44 विषय-सूची प्रस्तावना १-३४ ३-६ ३ १ सम्पादन परिचय २. ग्रन्थ परिचय ग्रन्थ-नाम विषय-वन्तु विपय-विभाग अहंतवादी दर्शन ईतवादी दर्शन ४ ४ मापा और शैली ५ ६-१६ ६ ८ ९ ३ ग्रन्थसार परमब्रह्मानशासन-परीक्षा गदातशासन-परीक्षा विज्ञानाद्वैतमासन-परीक्षा चित्रातशासन-परीक्षा चार्वाकशासन-परीक्षा बौद्धशासन-परीक्षा सारयगामन-परीक्षा वैशेषिकशासन-परीक्षा नैयायिकशासन-परीक्षा मीमामफशासन-परीक्षा ४. सत्यशासनं-परीक्षाकी अन्य ग्रन्थोसे तुलना ११ १३ १६-२८ जैन ग्रन्थ १६ ५८ नत्त्वार्थसूत्र और सत्यगासन-परीक्षा आप्तमीमासा और सत्यशासन-परीक्षा युक्त्यनुशासन और सत्यशासन-परीक्षा न्यायविनिश्चय और सत्यशासन-परीक्षा लघीयस्त्रन थोर सत्यशासन परीक्षा मिद्विविनिश्चय और सत्यशासन-परीक्षा यशस्तिलक और सत्यशासन-परीक्षा २० २१ जैनेतर ग्रन्थ कान्दोग्योपनिषद् और मत्यशासन-परीक्षा मैन्युपनिषद् और सत्यगासन-परीक्षा वृहदारण्यक और सत्यशासन-परीक्षा अमृतयिन्दु उपनिषद् और सत्यशासन परीक्षा २३ २ २३ २४ २५ २५ २६ २८ २८ २८ २८-३४ सत्यशासन-परीक्षा महाभारत और सत्यशासन-परीक्षा भगवद्गीता और सत्यशासन-परीक्षा ब्रह्मसूत्र और सत्यशासन-परीक्षा साख्यकारिका और सत्यशासन-परीक्षा न्यायसूत्र और सत्यशासन-परीक्षा सौन्दरनन्द और सत्यशासन-परीक्षा प्रशस्तपादमाप्य और सत्यशासन-परीक्षा शृगारशतक और सत्यशासन-परीक्षा मीमासाश्लोकवातिक और सत्यशासन-परीक्षा प्रमाणवार्तिक और सत्यशासन-परीक्षा न्यायविन्दु और सत्यशासन-परीक्षा हेतुविन्दुटीका और सत्यशासन-परीक्षा प्रमाणवार्तिकालकार और सत्यशासन-परीक्षा तत्त्वसग्रह और सत्यशासन-परीक्षा ब्रह्मसिद्धि और सत्यशासन-परीक्षा सम्बन्धवार्तिक और सत्यशासन-परीक्षा ५ ग्रन्थकार-परिचय विद्यानन्दि और उनका युग विद्यानन्दिका समय विद्यानन्दिकी रचनाएँ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक अष्टसहस्त्री या देवागमालङ्कार युक्त्यनुशासनालङ्कार विद्यानन्दि महोदय आप्त-परीक्षा प्रमाण-परीक्षा पत्र-परीक्षा सत्यशासन-परीक्षा श्रीपुरपार्श्वनाथ-स्तोत्र ६ विद्यानन्दिके समग्र अध्ययनकी आवश्यकता मूलग्रन्थ मगलाचरण और अन्य-प्रतिज्ञा पुरुषाद्वैत आदि चौढह शासन परब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षा [ पूर्वपक्ष ] ब्रह्म एक तथा अद्वितीय है एक ही ब्रह्म अनेक जड-चेतनमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे दिग्वायी देता है विवर्तवाद ब्रह्मसे प्रपन्चकी उत्पत्ति २९ ३२ ३० ३ ३३ ३४ ३ ४ ३४ ३४ १-४७ १ १-१० २ २ २ २ विषय-सूची २ ३ २ २ ३ ३ ३ ३ ३ ३ ६ ६ ६ अविद्या मायावाद अविद्या निवृत्ति ही मोक्ष है मोक्षक साधन-श्रवण, मनन और ध्यान साधनचतुष्टय ब्रह्म-साक्षात्कार [उत्तरपक्ष ] ब्रह्माद्वैतका प्रत्यक्ष विरोध स्वप्नसवेदन प्रत्यक्ष ऐन्द्रजालिक प्रत्यक्ष भ्रान्त प्रत्यक्ष नर्विकरपा प्रत्यक्ष नेपेध भी प्रत्यक्षका विषय हे साध्य और हेतुका द्वैत मागम और ब्रह्मका द्वैत स्वसवेदन और ब्रह्मका द्वैत ब्रह्माद्वैतको स्वत सिद्ध माननेमे दोष ब्रह्माद्वैतका अनुमानसे विरोध क्रिया-कारक भेट भ्रान्त नही वाध्य-बाधकका द्वैत द्वैतके बिना अद्वैतकी सिद्धि असम्भव ब्रह्माद्वैतवादमें पुण्य-पाप, स्वर्ग-मोक्ष आदिकी व्यवस्था असम्भव प्रमाण और प्रमेयका द्वैत अविद्याकी कल्पनामे अनेक दोष दाद्वैतशासन-परीक्षा पुरुषाद्वैतकी तरह शब्दाद्वैत भी अयुक्त ज्ञानाद्वैतशासन-परीक्षा [पूर्वपक्ष ] बाह्य अर्थक अभावकी सिद्धि सौत्रान्तिक्सम्मत तज्जन्य, ताप्य, तदध्यवसाय योगमम्मत कार्यनिमित्तकारणत्व ग्राह्य-ग्राहकज्ञानकी भ्रान्तता सवित्ति-द्वारा समस्त वेद्य-वेदक व्यवहार अनुमत्र द्वारा विज्ञानाद्वैतको सिद्धि [उत्तरपक्ष] विज्ञानाद्वैत प्रत्यक्ष-विरुद्ध है बाह्य अर्थ भ्रान्त नहीं है योगसम्मत विज्ञानको परिमापामे ढोष स्वसवेदन-द्वारा विज्ञानाद्वेतकी सिद्धिमें दोष अनुमानसे विज्ञानका वेद्य-वेदक भाव माननेमे दोष वासनाभेद माननेमे दोष ८ १० ११-१४ १२ १२ सत्यशासन-परीक्षा १३ m १३ १३ १४ १४ १४ १५-१९ १५ १५ ५ ६ ६ द्विचन्द्र श्रादि हेतु प्रसिद्ध और विरुद्ध है अभ्रान्त प्रत्यक्षसे वाह्य अर्थकी सिद्धि विज्ञानाद्वैत इष्ट-विरुद्ध है अनुमान-द्वारा बाह्य अर्थकी सिद्धि साधन-दूषण प्रयोगहेतु-द्वारा विज्ञानाद्वैत-सण्डन चित्राद्वैतशासन-परीक्षा चित्राद्वैतशासनमें भी बाह्य अर्थका अपह्नव विज्ञानाद्वैतकी तरह चित्राद्वैत भी प्रत्यक्ष तथा अनुमान-विरुन्छ चार्वाक शासन-परीक्षा [ पूर्वपक्ष] सर्वज्ञका अभाव आगम और अनुमानका अभाव वृहस्पति प्रतिपादित चार भूत चार भूतोंके योगसे चैतन्यकी उत्पत्ति मरणके उपरान्त और जन्मसे पूर्व आत्माका अमाव परलोकका अभाव जीवनका उद्देश्य [उत्तरपक्ष ] चार्वाक मत प्रत्यक्ष-विरुद्ध प्रत्यक्षसे पृथ्वी आदिक उपादानोपादेयभावकी प्रतीति स्वसवेदन प्रत्यक्षसे जीवकी सिद्धि मोक्तत्व जीवका असाधारण धर्म है अचेतन शरीर मोक्ता नही आत्मा अनादि-अनन्त तथा पृथिव्यादिसे सर्वथा विलक्षण है चार्वाकशासन इष्ट-विरद्ध भी है प्रतिषेध-द्वारा जीवसिद्धि गोण कल्पना-द्वारा जीवसिद्धि शुद्ध पदकी अपेक्षा जीवसिद्धि शिष्टसम्मति तथा आगमोक्किद्वारा जीवसिद्धि भूत और चैतन्य दोनो भिन्न प्रमाणग्राही है प्रत्यमिज्ञान और पूर्वानुमवकी सिद्धि पुण्य-पाप और परलोककी सिद्धि सर्वनामिति प्रत्यक्ष-द्वारा सर्वज निपेच असम्भव अनुमान-द्वारा सर्वन निषेध असम्भव बाधकके अमावमें सर्वनकी मिद्वि वौद्धशासन-परीक्षा [ पूर्वपक्ष ] रूप आदि पञ्च स्कन्ध मविकल्पकज्ञान निर्विकल्पकसान १६ १७ १८ १८ २०-२९ २० २० विपय-सूची २० २० २० २० २०-२१ १ २१ २१ २२ २२ २२ ३०-३३ . ३० ३ 3 . सन्तान अर्थात् चित्तसन्तति चित्तसन्तति ही प्रात्मा सन्तानोच्छित्ति मोक्ष मोक्षका स्वरूप मोक्षके उपाय चार आर्यसत्य-दुख, दु ख-समुदय, दु ख-निरोध, दु ख-निवृत्ति अष्टाङ्गिक मार्ग [ उत्तरपक्ष ] बौद्धमत प्रत्यक्ष-विरुद्ध है निरन्वय, विनाशशील परमाणुका प्रत्यक्ष नही होता आसन्न और ससृष्ट परमाणुओमे स्थिर, स्थूल आदिका ज्ञान नहीं बौद्धसम्मत प्रत्यक्ष लक्षण नहीं बनेगा निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे परमाणु प्रत्यक्ष नही परमाणु प्रत्यक्षका विस्तृत खण्डन साख्यशासन-परीक्षा [ पूर्वपक्ष ] समार प्रधानमय ह प्रधानका स्वरूप सत्व, रज और तमोगुण मसारकी उत्पत्तिका क्रम प्रकृति, प्रधान, बहुवानक आदि नाम महान् , अहकार, पन्चतन्मात्रा, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ निरीश्वर साख्योकी मान्यता संश्वरसारयोंकी मान्यता पुरुषका स्वरूप प्रकृति और पुरुषका भेद-विज्ञान मोक्षका स्वरूप और उसके उपाय [ उत्तरपक्ष ] साख्यशासन प्रत्यक्ष-विरुद्ध है सम्पूर्ण जगत प्रधानमय नही हो सकता 'मर्व सर्वत्र वर्तत' यह प्रत्यक्ष-विरुद्व है याविर्भाव माननमे अनेक दीप तिरोभाव माननेमे दोप साव्य-सम्मत सृष्टिप्रक्रियाम दोप महदादिको प्रधानका कार्य माननेमे दोष सत्कार्यवादका सण्डन असत्कार्यवाट मानने में दोप महदादिको प्रधानका परिणाम माननम दोष प्रधान परिणामोंका उपकारक नही महदादिको प्रधानसे भिन्नाभिन्न माननेमे दोप or or on ३० ३० ३ ३ ३१ ३१ ३५ ३ ३१ ३१ ३२ ३ ३२ ३२ सत्यशासन-परीक्षा New ૨૨ ३ ३ ३३ ३३ ३ ny ३ ३४ ३४ ३४ ३४ ३४ ३५ ३५ प्रधान आदि चौबीस तत्त्वोका खण्डन भाग्य के अभावमें मोक्ताका अमाव माख्यशासन इष्ट-विरुद्ध भी है पुरुषको कूटस्थ नित्य माननेमे अनुमान-विरोध भोग अनित्य है, क्योकि उत्पत्तिमान् है भोगोकी अनित्यतासे पुरुषकी अनित्यता वर्णाश्रमधर्म श्रादिका प्रतिपादर साख्यागम भी प्रमाण नही दृष्टेष्ट विरुद्ध होनेसे साख्यागम प्रमाण नहीं वैशेपिकशासन-परीक्षा [ पूर्वपक्ष ] बुद्धि आदि नव गुण गुणोंको अत्यन्त समाप्ति मोक्ष द्रव्यादि पदार्यका साधर्म्य-वैधर्म्यरूप तत्त्वज्ञान मोक्षका कारण पृथ्वी ग्रादि नव द्रव्य रूप, रस आदि चौबीस गुण उत्क्षेपणा आदि पॉच कर्म मामान्यके भेद पर और अपर सामान्य मोक्षप्राप्तिको प्रक्रिया पूर्वोपार्जित कर्माको भोगनेक विषयमें दो मत इक्कीस प्रकारके दुस [उत्तरपक्ष] वैगेपिकशासन प्रत्यक्ष-विरुद्ध है अवयव-अवयवी ग्रादिक भेदकान्तका खण्डन अवयव-अवयवी आदि कयचित् भिन्न है अवयव-अवयवीका समवाय माननेमे दोप वैशेषिकामिमत समवायका सण्डन समवाय समवायोके आश्रित है या नही परमार्थत समवाय समवायीके आश्रित नहीं हो सकता समवाय और समवायीका कौन-सा सम्बन्ध है समवायका स्वत सम्बन्ध माननेम दोप प्रत्यक्ष सिन्द पढाथमे प्रश्न अनुचित समवायको म्बपरक सम्बन्धका कारण माननमें दोप समवायमा नाना उपपत्तियो-द्वारा सण्डन समवाय अमावम सयोगका अभाव सम्बन्धी अभावमे सर्व वस्तुओका अभाव मयोगकै अभावमे सर्व द्रव्यांका अमाव प्रत्यक्ष विरोधका उपसहार वंगेपिस्यायन इष्ट-विरन्द मी है ईश्वरकर्तृन्व अनुमान तथा प्रागम-विल्द है ईश्वरको समारका कर्ता माननमे अनेक दोप अगरीग ईसर तन्वादिका कर्ता नहीं हो सकता ३ ३५ m ३६ ३६ m mm x 1 m ३० MY ३ MY ३९ ३९ ४० विषय-सूची ४० ४० ४० ४१ ४२ ४२ ४२ ४२ ४२ पृथिव्यादिको बुद्धिमद्धेतुक माननेमे दोष ईश्वरको कर्ता मान भी ले तो वह विचित्र घोर दुःख क्यो देता है यदि दुखमें प्राणियोके पाप कारण है तो तनुकरणादिमे भी ईश्वरको कारण माननेको आवश्यकता नही अचेतन कर्म मदिरा आदिकी तरह तनुकरणादि उत्पन्न करनेमे कारण है तनुकरणादि एक बुद्धिमन्हेतुक है या अनेक बुद्धिमद्धेतुमे सिद्ध-साधन और अनैकान्तिक दोष अधिकरण सिद्धान्तन्याय भी ठीक नही अनेक दोषयुक्त होनेसे वैशेषिकशासन इप्ट-विरुद्ध नैयायिकशासन-परीक्षा [ पूर्वपक्ष ] प्रमाण-प्रमेय-आदि तत्त्वोके ज्ञानसे मोक्ष भक्तियोग श्रादि योगत्रय सालोक्य, सारूप्य, मामीप्य और सायुज्य मुक्ति यम, नियम आदि योगके आठ अग [ उत्तरपक्ष ] नैयायिक मत प्रत्यक्ष-विरुद्ध है वैशेषिकशासनकी तरह इसमें भी अनेक दोप नैयायिक सम्मत पोडशपदार्थव्यवस्था सभव नही यौग आगम मी प्रमाण नही नैयायिक-वैशेषिक सम्मत सब दृष्टेष्ट-विरुद्ध मोमासक-भाट्टप्राभाकरशासन-परोक्षा [पूर्वपक्ष ] माटोके अनुसार पृथिव्यादि ग्यारह पदार्थ गुण आदि स्वतन्त्र पदार्थ नहीं प्राभाकरोके अनुसार पृथिव्यादि नव पदार्थ पदार्थोके याथात्म्य जानसे मोक्ष नित्य, नैमित्तिक, काम्य और निपिद्ध अनु धान स्वर्ग और अपवर्गके साधन मुमुक्षुको प्रवजित होना आवश्यक नही भाहोंके अनुसार मोक्षार्थीको काम्य और निपिन्द्ध अनुष्ठान वर्जित [उत्तरपक्ष ] मीमासक मत प्रत्यक्ष-विरुद्ध नित्य, निरन्वय, व्यापक सत्ता सामान्य प्रत्यक्ष-विरुद्ध सत्ता सामान्य माननेमे अनेक दोप सामान्य और व्यक्तिका तादात्म्य मानने में दोष सामान्यकी सिद्धिमें दिये गये हेतु दोषपूर्ण सत्ता सामान्यका विस्तारसे खण्डन ४२ ४३ ४३ ४४ ४४ . ४४ ४४ ४५ ४५ ४५ ४५ संकेत-सूची अमृतवि० उप० आप्तमी० चार्वाक० छान्दो० तत्वस नया० न्यायवि० न्यायविनि० अमृतविन्दु उपनिषद् आप्तमीमामा चार्वाकगासन-परीक्षा छान्दोग्योपनिपद् तत्त्वमग्रह नयायिकशासन-परीक्षा न्यायविन्दु न्यायविनिश्चय न्यायमूत्र परमब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षा प्रमाणवार्तिक प्रमाणवातिकालकार न्यायसू० परमब्रह्म० प्र० वा. प्रमाणवार्तिकाल प्रा. मा० प्रशस्तपादभाप्य ब्रह्मसू० बौद्ध . भगवद्गी० मी० श्लो० मैत्रा० यश. उत्त० युक्त्यनु० लघी० विज्ञान वैशे० ब्रह्मसूत्र वोद्धशासन-परीक्षा भगवद्गीता मीमामाश्लोकवार्तिक मैत्रायण्युपनिपद् यशस्तिलक उत्तरार्ध युक्त्यनुगामन लघीयस्त्रय विज्ञानाद्वैतगामन-परीक्षा वैशेपिकशासन-परीक्षा वृहदारण्यक श्लोक शृङ्गारशतक सत्यशासन-परीक्षा सवन्धवातिक साख्यकारिका माख्यशासन-परीक्षा सिद्धिविनिश्चय सौन्दरनन्द महाकाव्य हेतुविन्दुटीका बृहदा० श्लो० शृङ्गार० सन्य. सबन्ध० माख्यका साख्य सिद्विवि० सौन्दर० हेनुवि० टी० प्रस्तावना [१] सम्पादन परिचय [अ] प्रति परिचय प्रस्तुत ग्रन्थके मूल पाठकी शुद्धिमे निम्नलिखित तीन हस्तलिखित प्रतियोका उपयोग किया गया है- 'क'-यह श्री जैन सिद्धान्त भवन, आरा ( विहार ) की प्रति है। वहां इसकी ग्रन्थसख्या १०७ है। इसमे १३ x ६ इच साइजके कुल २९ पत्र है। एक पत्रमें एक ओर १२ पवितयाँ तथा एक पवितमे करीब ५० अक्षर है । लिपि देवनागरी है । लिखावट साफ किन्तु अशुद्ध है । ग्रन्थ उत्तम दशामे है। इसका प्रारम्भ इस प्रकार है- "ऊँ नम सिद्धेभ्य । विद्यानन्दाधिप. स्वामी विद्वहे वो जिनेश्वर. । यो लोकैकहितस्तस्मै नमस्तात् स्वात्मलब्धये ॥ अथ सत्यशासन-परीक्षा।" अन्त इस प्रकार है- "नहि मिन्नदेशासु व्यक्ति सामान्यसेकम् , यथा स्थूलादिपु वशादिरिति प्रतीयते, यतो युगपद- मिन्नदेशस्वाधारवृत्तित्वे सत्येकत्व तस्य सिद्धयेत्, स्वाधान्तरालेऽस्तित्व साधयेदिति तदेवमनेकबाधक- सद्भावाद् भादृप्राभाकरिष्ट "मद् भूयात् ।" प्रतिके आरम्भ अथवा अन्तमे कही भी लिपिकार या लिपिकालका सकेत नही है । सर्वप्रथम मैने इसी प्रतिसे प्रेसकापी की थी, इसलिए इसका सकेत चिह्न 'क' रखा है। अशुद्ध होनेके कारण इसे पूर्ण रुपसे मूल प्रति न माननेपर भी सम्पादनका प्रथम आधार यही प्रति रही है । 'ख'-यह प्रति श्री जैन मठ मूडविद्रीके शास्त्रभडारको ताडपत्रीय प्रति है। वहाँके शास्त्रोमें इसकी सख्या ६५२ है। इसमें २०॥४१॥ इचकी साइजके १९ ताडपत्र है। प्रत्येक पत्रके दोनो तरफ ग्रन्थ लिखा गया है। केवल पहले पत्रके एक ओर लिखा है। प्रत्येक पत्रमें प्राय ८-८ पक्तियाँ है, कुछमे ७ पक्तियां भी है । प्रति पक्तिमें ९८ से १०० तक अक्षर है। प्रति पत्रमें दोनो किनारे हासिया (मार्जिन) है और बीच- में दो जगहपर डोरी पिरोनेके लिए छेद बने है । ग्रन्थ उत्तम दशामें है । इसकी लिपि कन्नड है । अक्षर साफ, सुन्दर और सुवाच्य है। लिपिकारने कही-कही सुन्दर बेल-बूटे भी बनाये है। भाषा-सबन्धी अशुद्धियाँ इसमें भी हैं। ग्रन्थका प्रारम्भ 'ऊँ नम सिद्धेभ्य' के बाद पूर्वोक्त मगलपद्यसे ही होता है। अन्त भी 'क' प्रतिकी तरह ही है। आदि, मध्य या अन्तमें कही भी लिपिकारका नाम तथा लिपिकाल आदिका उल्लेख नहीं है । इस प्रतिका सकेत चिह्न 'ख' है। 'ग'-यह प्रति भी श्री जैन मठ, मूडबिद्रोके शास्त्र भडारकी है। वहाँ इसकी ग्रन्थसख्या ५५२ । इसमें १३४ २ इच साइजके कुल ४३ पत्र है। प्रत्येक पत्रमें एक ओर प्राय ७.७ पक्तियाँ है । कुछमें ६.६ पक्तियां भी है । प्रति पक्तिमें ५० से ५२ तक अक्षर है । प्रत्येक पत्रमे दोनो ओर हामिया ( माजिन ) छोडा गया है । बीचमे डोरी पिरोनेके लिए एक छेद भी है। ग्रन्थ उत्तम दशामें है। इसकी भी लिपि कन्नड है। अक्षर साधारण सुन्दर तथा सुवाच्य है। प्रथम पत्र थोडा-सा टूट गया है, जिससे दो-तीन अक्षर भी चले गये है। .

२ सत्यशासन-परीक्षा ग्रन्थका आरम्भ "ॐ नम सिद्धेभ्य., निर्विघ्नमस्तु" लिखकर पूर्वोक्त प्रकारमे ही किया गया है। इसके अन्तिम कुछ पत्र स्थानान्तरित हो गये प्रतीत होते है । मन्तिम ४३वां पृष्ठ निम्न वाक्योके साथ समाप्त होता है- "ससर्गहाने सकलार्थहानिर्दुनिवारावैशेषिकाणामुपनिपतति । तदुक्त स्वामिमिः' " भाषा-सवन्धी अशुद्धियोके साथ इस प्रतिमें एकाध अक्षर, शब्द और कही-कही वाक्य तक छूट गये है। इस सबके बाद भी यह प्रति उपर्युक्त दोनो प्रतियोको अपेक्षा अधिक शुद्ध है। इसका सकेत-चिह्न 'ग' है। अप्राप्त प्रति १ ہا सत्यशासन-परीक्षाको एक प्रति बम्बईके ऐलक पन्नालाल सरस्वती भवनमें भी है जो मुझे प्राप्त नहीं सकी । यह प्रति भी माराको प्रतिकी तरह अपूर्ण है । [ आ] मूल ग्रन्थ संयोजन- मूल ग्रन्थका सम्पादित विधान निम्न प्रकार किया गया है- [क] शुद्ध पाठ उपर्युक्त तीन प्रतियोके पाठोमे जो सबसे अधिक उपयुक्त एव मही प्रतीत हुआ उसे मूलमें रखकर दूसरी प्रतियोके पाठोको सकेत-चिह्नके साथ नीचे पाठान्तरोमें दे दिया है । तीनो प्रतियोसे मिलान करनेके बाद भी यदि कही कोई अक्षर त्रुटित प्रतीत हुआ तो उसे [ ऐसे कोण्ठकके अन्दर मूल पाठके साथ ही दिया गया है। उद्धृत वाक्योमें यदि कोई त्रुटि प्रतीत हुई तो उसके मूल स्थलको खोजकर उसके आधारपर पाठ- शुद्धि की गयी है। इस त्रिकोणात्मक प्रयत्नसे मूल ग्रन्थको पूर्ण शुद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है । [ख] उद्धृत वाक्योंके मूल स्थल तथा अन्य संकेत प्रस्तुत ग्रन्थमें विभिन्न शास्त्रोके अनेक उद्धरण आये है, उन सभीके मूल स्थलोको खोजनेका प्रयत्न किया गया है। अधिकाश जो मिल गये है उनके मूल स्थानोका सकेत तत्तत् ग्रन्थोके सकेतोके माथ उद्धृत वाक्योके साथ [ ] ऐसे ब्रेकिटमें दे दिया है, जो नहीं मिले उनके सामने ब्रेकिट खाली छोड दिया । इससे कमसे-कम इतना पता तो लग ही जायेगा कि यह उद्धृत वाक्य है । " दोहरे उद्धरण चिह्नके भीतर दिया गया है। दूसरे सकेत अन्य सिद्धान्त व सैद्धान्तिकोके है । ऐसे नामोके नीचे इस प्रकारकी रेखा दी गयी है। [ग] विषय विभाग सम्पादनके लिए जो तीन प्रतियां प्राप्त हुई उनमें से किसी में भी ग्रन्थमें कोई वर्गीकरण नहीं है। हमने सर्व-प्रथम पूरे ग्रन्थको पुरुषाद्वैत आदि विभिन्न शासनोके अनुसार-'पुरुषाद्वैतशासन-परीक्षा' इत्यादि नामसे वर्गीकृत किया है। तदनन्तर प्रत्येक परीक्षाको वाक्य खण्डो ( पैराग्राफस् ) में बांट दिया है। घ] अर्थवोधक तथा तुलनात्मक टिप्पण ग्रन्थके मूल पाठपर हिन्दीके अकका सकेत देकर नीचे दो प्रकारके टिप्पण दिये गये है। इनमें कुछ मर्थबोधक है कुछ तुलनात्मक । अर्थवोधक टिप्पण विशेष करके सर्वनाम शब्दों तथा क्लिष्ट शब्दोपर लिखे गये है। तुलनात्मक टिप्पण जो बहुत ही अल्प है, विद्यानन्दिके दूसरे ग्रन्यो तथा न्याय शास्त्रके अन्य जैन-जनेतर अन्योंसे लिये गये है। ये टिप्पण या तो विषय-साम्यके आधारपर हैं या शब्द-साम्यके आधारपर । १ पं, दरवारीलालजी कोठिया-आप्तपरीक्षा, प्रस्तावना, पृ० ४४ । उद्धृत वाक्योको " प्रस्तावना ३ [ड] पाठान्तर जैसा कि ऊपर पाठ-शुद्धि में लिखा जा चुका है-सम्पादनके लिए उपयोगमे लायी गयी तीनो प्रतियोमे-से सर्वाधिक उपयुक्त पाठ मूलमें रखकर अन्य पाठोको नीचे पाठान्तरोमे दे दिया है। पाठान्तरोके लिए अग्रेजीके अकोका सकेत है। [इ] परिशिष्ट- इस सस्करणमें निम्नलिखित परिशिष्ट जोडे गये है- मूल ग्रन्थके पद्योकी अनुक्रमणिका । मूल ग्रन्थमें उद्धृत वाक्योकी अनुक्रमणिका । ३. मूल ग्रन्थगत दार्शनिक तथा पारिभाषिक शब्द । मूल तथा प्रस्तावनागत विशिष्ट शब्द । - १ २ [२] ग्रन्थ-परिचय प्रस्तुत ग्रन्थ मध्ययुगके महान् जैन तार्किक आचार्य विद्यानन्दिकी अपूर्व कृति है । इस सस्करणमे यह सर्वप्रथम प्रकाशमें आ रही है। ग्रन्थके प्रारम्भमे ग्रन्थकारने एक अनुष्टुप् पद्यमे मगलाचरण किया है तथा उस मगल पद्यमै श्लेपसे अपने नामका भी सकेत कर दिया है । मगल पद्य के बाद ग्रन्थका नाम 'सत्यशासन-परीक्षा' दिया है । 'सत्यशासन-परीक्षा' इस नाममें तीन गब्द है-सत्य, शासन और परीक्षा। इन तीनो शब्दोकी व्याख्या विद्यानन्दिने स्वय की है। वे लिखते है-सत्यका अर्थ है प्रत्यक्ष तथा अनुमान आदिसे बाधित न होना, शासनका अर्थ है विभिन्न दार्शनिक सम्प्रदाय तथा परीक्षाका अर्थ है-यह धर्म इसवस्तुमें बनता है या नही ससारमे अनेक दार्शनिक सम्प्रदाय प्रचलित है, उनमे कौन सत्य हो सकता है, प्रस्तुत ग्रन्यमे इसी बातकी परीक्षा की गयी है । (६१-२ ) इस तरह 'सत्यशासन-परीक्षा' यह ग्रन्थका सार्थक नाम है। देखना यह है कि विद्यानन्दिने प्रस्तुत ग्रन्थका नाम 'सत्यशासन-परीक्षा' ही क्यो रखा, 'दर्शन-समीक्षा, 'सत्यदर्शन-समीक्षा' अथवा ऐसा ही और कोई दूसरा नाम भी तो हो सकता था? वास्तविकता यह लगती है कि विद्यानन्दिके सामने ग्रन्थका नामकरण करते समय केवल ग्रन्थकी अन्वर्थताका ही प्रश्न नही था प्रत्युत पूर्व-परम्परा तथा नवनिर्माणका भी प्रश्न था । पूर्व-परम्परामें विद्यानन्दिके सामने परीक्षान्त नामवाले अनेक बौद्ध ग्रन्थ थे। दिग्नागकृत आलम्बनपरीक्षा व त्रिकालपरीक्षा, धर्मकोतिकृत सबन्धपरीक्षा, धर्मोत्तरकृत प्रमाणपरीक्षा आदि परोक्षान्त नामवाले बौद्धग्रन्थ प्रसिद्ध थे। इसके विपरीत जैनदर्शनका एक भी ग्रन्थ परीक्षान्त नामवाला नहीं था। इसलिए विद्यानन्दिके समक्ष जैनसाहित्यकी परम्पराम एक नये नामकी पूर्तिका भी प्रश्न था । इसी कारण विद्यानन्दिने एक ओर जहां तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अष्टसहस्री तथा युक्त्यनुशासनटीका नामक भाष्य ग्रन्थ लिखे वही प्रमाण-परीक्षा, पत्र-परीक्षा, आप्त-परीक्षा तथा सत्य. शासन-परीक्षा परीक्षान्त नामवाले महत्त्वपूर्ण प्रकरणोकी रचना की। वादके कतिपय अन्य जैनाचार्योने भी विद्यानन्दिके अनुकरणपर अन्य ग्रन्थ भी परीक्षान्त नामवाले लिखे। उदाहरणके लिए नव्यन्याय युगके महान् विद्वान् उपाध्याय यशोविजयको अध्यात्मपरीक्षा तर्कशलोका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इस तरह प्रस्तुत ग्रन्थ सत्यशासन-परीक्षाके नामकरणमे विद्यानन्दिने अन्वर्थता, पूर्वपरम्परा तथा नवीनताके पूर्ण सामञ्जस्यका ध्यान रखा है। इसी प्रसगमें विद्यानन्दिने मकेतसे 'माप्तवत्' पदके द्वारा अपने दूसरे ग्रन्थ आप्तपरीक्षाकी भी सूचना ४ सत्यशासन-परीक्षा दी है। जिस तरह आप्तके विषयमे विवाद है कि कपिल, सुगत तथा अर्हन्त मादिमे आप्त कौन है, उसी प्रकार परब्रह्माद्वैत आदि शासनोमे सत्य कौन है यह भी विवाद एव परीक्षाका विषय है। विषय - इसके अनन्तर विद्यानन्दिने सत्यशासन-परीक्षाके प्रतिपाद्य विषयका स्पष्ट निर्देश करते हुए लिखा है कि वर्तमानमे पुरुषाद्वैत आदि अनेक दार्शनिक मत प्रचलित है, किन्तु वे सभी सत्य नहीं हो सकते क्योकि एक ओर उनमें पारस्परिक विरोध देखा जाता है और दूसरी ओर प्रत्यक्ष तथा अनुमान आदि प्रमाणोकी कसौटीपर भी वे सत्य नही उतरते । इसलिए प्रस्तुत ग्रन्थमे सभी शासनोको प्रमाणकी कसौटीपर कसकर यह देखा जायेगा कि कौन-सा शासन सत्य हो सकता है। (६२) इसी प्रसगमे विद्यानन्दिने एक प्रश्न उठाकर उसका समाधान किया है- प्रश्न-जव कि सभी दर्शनोमें पारस्परिक मतभेद देखा जाता है तो सभी असत्य होना चाहिए, कोई भी सत्य नही हो सकता ? उत्तर-प्रकाश और अन्धकारकी तरह एकान्त-अनेकान्त, द्वैत-अद्वैत तथा भाव-अभावके निपेव में भी विधि है, क्योकि जिससे जिसका निषेध किया जा रहा है उन दोनोमें-से किसी एकका सत्य होना नितान्त आवश्यक । एककी विधिके विना दूसरेका निषेध नही बन सकता। इसलिए यह कहना युक्तियुक्त नही कि पारस्परिक विरोध देखे जानेके कोरण कोई भी दर्शन सत्य नहीं है प्रत्युत जो शासन प्रमाणकी कसौटीपर सही उतरे वह अवश्यमेव सत्य है । (६२) इतना कहने के बाद विद्यानन्दिने प्रारम्भमें ही यह भी स्पष्ट कर दिया है कि मनेकान्त शासन ही सत्य- शासन है, क्योकि परीक्षा करनेपर वही प्रत्यक्ष तथा अनुमान आदि प्रमाणोसे वाधित नही होता (६४) इस पृष्ठभूमिके साथ सत्यशासन-परीक्षामे पुरुषाद्वैत आदि चौदह शासनोको परीक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की गयी है। प्रत्येक शासनके पूर्वपक्षमें उसके मूल ग्रन्थोसे उद्धरण देकर सर्वप्रथम उस शासनके मन्तव्योका वर्णन किया गया है, इसके बाद उत्तरपक्षमे उनकी समालोचना तथा अनेकान्त शासनको निर्दुष्ट सिद्ध किया गया है, जिसके लिए विद्यानन्दिने अपने तर्कोके अतिरिक्त पूर्वाचार्योके वाक्योको भी प्रमाण रूपमे उद्धृत किया है । प्रत्येक शासनके अन्तमै विद्यानन्दिको स्वनिर्मित दो या तीन कारिकाएं हैं। विषय विभाग सत्यशासन-परीक्षामें जिन शासनोको समीक्षा की गयी है उनका वर्गीकरण निम्नप्रकार है- १ पुरुषाद्वैत ८ निरीश्वर साख्य २ शब्दाद्वैत ९ नैयायिक ३. विज्ञानाद्वैत १० वैशेषिक ४ चित्रात . - ११ भाट्ट ५. चार्वाक ६ बौद्ध १२ प्राभाकर १३ तत्त्वोपप्लव ७ सेश्वर सास्य १४ अनेकान्त इन चौदह शासनोको विद्यानन्दिने दो श्रेणियोमै विभक्त किया है -१ अद्वैतवादी या अभेदवादी, २. द्वैतवादी या भेदवादी अद्वैतवादी-अद्वैतवादी शासनोसे प्रयोजन उन दार्शनिक सप्रदायोमे है जो केवल किसी एक तत्त्व- को मानते हैं। चाहे वे परमब्रह्माहतको माननेवाले वेदान्ती हो या विज्ञानाद्वतको माननेवाले वौद्ध । इस प्रस्तावना भाषा और सस्कृत भाषाके तरह प्रारम्भके चार दर्शन अद्वैतवादी या अभेदवादी हैं। द्वैतवादी-वैतवादी या भेदवादी शासनोंसे प्रयोजन उन दार्शनिक संप्रदायोसे है जो किसी- न-किसी रूपमें एकसे अधिक तत्त्वको स्वीकार करते है। चार्वाक पृथ्वी आदि पांच भूतोको स्वीकार करता है, इसलिए प्रत्यक्षकप्रमाणवादी होनेपर भी उसको गणना द्वैतवादी या भेदवादी दर्शनोमें की गयी है। वौद्ध अनात्मवादी होनेपर भी पञ्चस्कन्धोको स्वीकार करनेके कारण भेदवादी है। साख्यने प्रकृति और पुरुष दो तत्त्व माने है । इसी तरह नैयायिक, वैशेपिक आदि अन्य शासनोमे भी एकसे अधिक तत्त्व स्वीकार किये गये है । इसलिए इन मवकी गणना भेदवादी दर्शनोमें की गयी है। इस तरह उप- र्युक्त शासनोमे प्रारम्भके चार शासनोको छोडकर शेप दस शासन द्वैतवादी या भेदवादी हैं । उपर्युक्त चौदह शासनोमे-से प्रस्तुत सस्करणमे केवल प्राभाकर शासन तक ही ग्रन्थ मुद्रित हुआ है, वास्तवमें तो प्राभाकरशासन भी पूरा नहीं है। यह सस्करण जिन हस्तलिखित प्रतियोके आधारपर तैयार किया गया है, उन सभीमें ग्रन्थ इतना ही पाया जाता है । सभव है भविष्यमें इसकी पूर्ण प्रति भी कही उपलब्ध हो जाये । यह भी सभव है कि यह विद्यानन्दिको अतिम कृति हो, जिसे वे पूरा न कर सके हो । शैली सत्यशासन-परीक्षाकी भाषा सरल, सुवोध एव सरस सस्कृत है। उद्धृत वाक्य तथा विद्यानन्दिको स्वनिर्मित कारिकाओ ( जो कि प्रत्येक शासनके अन्तमे पायी जाती है ) के अतिरिक्त सपूर्ण ग्रन्थ सुन्दर गद्यमे रचा गया है। न्यायको शुष्क शैलीमे भी सस्कृतका माधुर्य सुरक्षित रखा जा सकता है, इसका सत्यशासन-परीक्षा अद्वितीय प्रमाण है। अष्टमहस्री तथा तत्त्वार्थश्लोकवार्तिकको दुरूह भापा लिखनेवाला व्यक्ति इतना सरल शब्द-विन्यास भी कर सकता है, यह विद्यानन्दि-जैसे महान् पण्डितके लिए ही संभव था। छोटे-छोटे वाक्योमें कठिनसे कठिन प्रमेयको उपस्थित करके विद्यानन्दिने सस्कृत और न्यायके गूढ तत्त्वोको समझानेका प्रयत्न किया है। सत्यशासन-परीक्षाकी भापा कही-कही साहित्यकी तरह आलकारिक भी हो गयी है। जैसे- "एव हि सर्वभावाना क्षणभङ्गसगममेवाङ्गशृङ्गारमनीकुर्वाणास्ताथागता सगिरन्ते ।" (वौद्ध०६१) "प्राक परमाणव प्रतिभासन्त इति परेपा प्रतिज्ञा पोप्लूयते ।" ( बौद्ध० ६ १८) इन उदाहरणोमे शब्दानुप्रासकी छटा दर्शनीय है । भापाके जालमें लपेटकर विद्यानन्दि साहित्यिक उपहास किये बिना भी नहीं रहते- "न चैते प्रत्यक्षवुद्धौ भिन्ना प्रतीयन्ते प्रत्यक्षताञ्च स्वीकर्तुमिच्छन्तीति तेऽमी अमूल्यदानक्रयिण ।" (वैशे० ६ ११) इस पक्ति-द्वारा किस कुशलतासे पूर्वपक्षीको मुफ्तखोर कह दिया गया है, यह देखने योग्य है । और भी- "तथा च हेयोपादेयोपायरहितमयमह्नीक केवल विक्रोगतीत्युपेक्षाह एव ।" ( बौद्ध० ६५०) इन शब्दोके द्वारा विद्यानन्दिने धर्मकोतिके निम्न शब्दोको सधन्यवाद लौटा दिया है- "एतेनैव यदह्रोका यत्किचिदश्लीलमाकुलम् । प्रलपन्ति ' . ।” (प्रमाणवातिक ३।१८२ ) इस प्रकार सत्यशासन-परीक्षाको भापा पाठकको न तो कही रुकावट पैदा करती है और न अरुचि । सत्यशासन-परीक्षाको शैली यद्यपि विषय-प्रतिपादनकी दृष्टिसे न्याय-अन्योके समान ही कही जा सकती है, फिर भी इसको एक अपनी अनूठी विशेषता भी है। जिस दर्शनको समीक्षाके लिए प्रस्तुत करना है सर्वप्रथम उसके सिद्धान्तोको उसी दर्शनके मूल ग्रन्योसे उद्धरण देकर विस्तारके माथ पूर्वपक्षको स्थापना की जाती है । पूर्वपक्षको पढते समय ऐसा महसूस होता है कि उसो दर्शनके मूल ग्रन्थको पढा जा रहा हो । उदाहरणके लिए ब्रह्माद्वैतको ही ले लें, पूर्वपक्षको स्थापना इस प्रकार की है- w सत्यशासन-परीक्षा "देशकालाकारव्यवच्छिन्ननिय॑भिचार-सकलावस्थाव्यापि प्रतिभासमात्रमखण्डज्ञानानन्दामृतमय परम- ब्रह्मकमेवास्ति न तु द्वितीयम्, 'एकमेवाद्वितीय ब्रह्म' इत्याद्याम्नायात् ।" (परम० ६५) "कथमेकमेव परब्रह्मास्ति, परस्पर भिन्नाना नानात्मना प्रतीतेरिति चेत्, न, एकस्यापि तस्य भूते भूते व्यवस्थितस्य जलेपु चन्द्रवत् मनेकधा प्रतिभाससभवात् । तदुक्तम्- "एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थित । एकघा वहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥" ( वही० ६६) इसके आगे और भी विस्तारके साथ ब्रह्माद्वैतका विवेचन है। इसे पढकर यह लगता है कि वेदान्तका ही कोई ग्रन्थ पढा जा रहा हो । यही प्रक्रिया प्रत्येक शासनमे अपनायी गयी है। पूर्वपक्षके बाद उत्तरपक्षमे उस शासनको विभिन्न तकों तथा पूर्व जैनाचार्योके शास्त्रोसे प्रमाण देकर दृष्ट और इष्ट विरुद्ध सिद्ध किया गया है। यथा- "तदेतत् प्रत्यक्षविरुद्धम् तथेष्ट विरुद्धञ्च यही शैली पूरे ग्रन्थमें अपनायी गयी है। . 4 [३] ग्रन्थसार १-४. विद्या ( अनन्तज्ञान ) तथा आनन्द ( अनन्तसुख ) के अधिपति जिनेन्द्रदेवको विद्यानन्दिस्वामी- का नमस्कार हो। इस ग्रन्थका नाम सत्यशासन-परीक्षा है। इसमे पुरुपाद्वैत, शब्दाद्वैत, विज्ञानाद्वैत, चित्राद्वैत, चार्वाक, वौद्ध, सेश्वरसाख्य, निरीश्वरसाख्य, नैयायिक, वैशेपिक, भाट्ट, प्राभाकर, तत्त्वोपप्लव तथा अनेकान्तशासनके सत्यत्वकी समीक्षा की गयी है । परस्पर विरोधी बातोका प्रतिपादन करनेके कारण सभी शासन तो सत्य हो नही सकते, कोई एक ही सत्य होगा। सत्यताकी कसौटी यह है कि जो गासन दृष्ट (प्रत्यक्ष ) तथा इष्ट अनुमान आदि) से बाधित न हो वही सत्य है। इसी आधारपर समीक्षा की गयी है। [ परमब्रह्माद्वैत-शासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्ष ] ६ ५ ब्रह्म, एक है, अद्वितीय है, अखण्डज्ञानानन्दमय है, सम्पूर्ण अवस्थाओको व्याप्त करनेवाला है एव प्रतिभानमात्रसे जाना जाता है । ६६ एक ही ब्रह्म अनेक भूतो ( जड-चेतन ) मे जलमे चन्द्रमाकी तरह भिन्न-भिन्न प्रकारसे दिखायो देता है। ६७. पृथ्वी आदि ब्रह्मके विवर्त है, भिन्न तत्त्व नहीं। इस चराचर समार (प्रपञ्च ) की उत्पत्ति इसी ब्रह्मसे होती है। ८ अनादिकालीन अविद्याके ससर्गके कारण परब्रह्मसे प्रपञ्च ( ससार ) की उत्पत्ति होती है। ६९ यह अविद्या सत् और अमत्से भिन्न अनिर्वचनीय है। ६१० जिस तरह भ्रमवश रस्सोमे सांपका ज्ञान होता है, उसी प्रकार मायारूप यह ससार उसी परब्रह्म में प्रतिभासित होता है । ६११. जवतक अविद्या रहती है तभीतक यह सब विवर्त दृष्टिगोचर होते है, अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर नहो । यही अविद्या-निवृत्ति मोक्ष है। ब्रह्मका साक्षात्कार मोक्षका उपाय है । श्रवण, मनन और ध्यानके द्वारा ब्रह्मका साक्षात्कार होता है। ६१२ उपनिपद् वाक्योका परमब्रह्ममे तात्पर्य निश्चित करना श्रवण है । सुने हुए अर्थका युवितपूर्वक विचार करना मनन है तथा श्रवण और मननके द्वारा निश्चित किये गये अर्थका मनसे चिन्तन करना ध्यान । यह ध्यान नित्यानित्य वस्तुविवेक, शम, दम आदि सम्पत्ति, इस लोक तथा परलोकसे वैराग्य और प्रस्तावना ७ मुमुक्षुपना, इन साधन-चतुष्टयोंसे सम्पन्न व्यक्तिके ही होता है। इसके होनेपर ब्रह्मका साक्षात्कार होता है । इस तरह मोक्षमें परमब्रह्मके साथ एकीभाव हो जाता है । [उत्तरपक्ष ] ६१३ यह परमब्रह्माद्वैत प्रत्यक्ष विरुद्ध है। प्रत्यक्षसे वाह्य अर्थ परस्पर भिन्न और सत्य दिखायी पडते है, इसलिए परमब्रह्माद्वैत नही माना जा सकता। ६ १४ स्वप्नसवेदनमे भी क्रिया और कारकोका भेद होता ही है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि स्वप्नसवेदनकी तरह एक ब्रह्ममें ही भेद दिखायी पड़ता है। $ १५ भेदावभासी प्रत्यक्षको इन्द्रजाल आदि प्रत्यक्षकी तरह भ्रान्त नही कहा जा सकता, क्योकि इन्द्रजाल तो अत्यन्त भ्रान्त है, इस बातको बच्चे भी जानते हैं, इसके विपरीत 'कुम्भकार दण्ड आदिसे घडा वनाता है' और 'वह हाथसे भात खाता है' इत्यादि क्रिया-कारक भेद भ्रान्त नही है, कारण यहां कोई वाधक नहीं है। १६ भेदको माने विना वाधक सम्भव नही, जैसे शुक्तिकामै रजत भ्रान्तिके लिए शुक्तिकाका भेद मानना आवश्यक है। ६ १७, १८ 'आंख खोलते ही निर्विकल्पक प्रत्यक्षके द्वारा सत्ता सामान्यके रूपमे परमब्रह्मका प्रत्यक्ष होता है', यह मानना ठीक नहीं, क्योकि नित्य, निरवयव, व्यापक सत्ता सामान्यका कभी भी अनुभव नही होता। आँख खोलनेपर भी प्रतिनियत देश और प्रतिनियतमें पदार्थोका देखा जाना काल आदि विशेषो सहित ही सामान्यका अनुभव होता है। जिस तरह विशेष सामान्यके बिना नही रह सकता, उसी प्रकार सामान्य विशेपके बिना नही रह सकता। ६ १९ 'प्रत्यक्ष विधि ( सद्भाव ) को विषय करनेवाला है निषेधको नही, इसलिए उससे ब्रह्माद्वैत- का निषेध नही किया जा सकता,' यह मानना ठीक नहीं, क्योकि विधिके समान निषेध भी प्रत्यक्षका विषय सम्भव है। ६ २० हेतुसे ब्रह्माद्वैतको सिद्धि करनेपर साध्य और हेतुका द्वैत हो जायेगा । ६२१ हेतु और साध्यमे सर्वथा तादात्म्य मानना उचित नही, क्योकि सर्वथा तादात्म्य माननेपर उनमें साध्य-साधनभाव नही बन सकता। $ २२. आगमसे अद्वैतको मिद्धि माननेपर आगम और ब्रह्मके द्वेतका प्रसग आयेगा । ६२३ आगमको ब्रह्मका स्वभाव माननेपर ब्रह्मकी तरह आगम भी असिद्ध हो जायेगा । ६ २४ 'सर्वं वै खल्विद ब्रह्म' इस वचनसे भी द्वैतको ही सिद्धि होती है। सर्व ( प्रसिद्ध ससार ) और ब्रह्म ( अप्रसिद्ध ) के भेदसे द्वैत मानना पडेगा। ६ २५. स्वसवेदन-द्वारा पुरुषाद्वैतकी सिद्धि माननेपर स्वसवेदन और पुरुष (ब्रह्म) का द्वैत मानना होगा। स्वसवेदनको पुरुपसे अभिन्न माननेपर वह साधन नहीं बन सकता । ६ २६ पुरुषाद्वैत विज्ञानाद्वैतकी तरह स्वत सिद्ध नही हो सकता, क्योकि स्वरुपका स्वत ज्ञान नहीं होता। ६ २७ यदि पुरुषाद्वैतकी सिद्धि स्वत मान भी ली जाये तो उसी तरह द्वैत भी स्वत सिद्ध मान लेना चाहिए। स्वत सिद्धि मानना तो मनमानी है, इस तरह तत्त्वोपप्लव और नैरात्म्य भी सिद्ध हो सकता है। इस तरह परमब्रह्मको सिद्ध करनेवाला कोई भी प्रमाण नहीं । २८ 'प्रत्यक्ष आदि मिथ्या है, क्योकि भेदप्रतिभासी है, जैसे स्वप्न प्रत्यक्ष आदि ।' इस अनुमानमें पक्ष, हेतु और दृष्टान्तके भेद-प्रतिभासको अमिथ्या माननेपर उसी हेतु भेद-प्रतिभासके साथ व्यभिचारी हो . 4 - - ८ सत्यशासन-परीक्षा जायेगा। यदि उसे मिथ्या माने तो मिथ्या अनुमानसे साध्यकी सिद्धि नही हो सकती। दूसरोके द्वारा माने गये पक्ष आदिके भेद-प्रतिभासको अमिथ्या मानकर उसमे प्रत्यक्षको मिथ्या सिद्ध करने में अनवस्था आयेगी। ६ २९ प्रत्यक्षमे प्रतीत होनेवाले क्रिया-कारक भेद भ्रान्त है, इसलिए वे ब्रह्मके वाधक नहीं बन सकते, ऐसा माननेपर बाध्य और बाधकको द्वैत मानना पडेगा। $ ३० इस तरह अभ्रान्त प्रत्यक्ष द्वारा प्रसिद्ध क्रिया कारकका भेद परमब्रह्माद्वैतको दृष्ट (प्रत्यक्ष ) विरुद्ध सिद्ध करता है। ६ ३१ उपर्युक्त विवेचनसे ही परमब्रह्माद्वैतशासन इष्ट विरुद्ध भी सिद्ध होता है, क्योकि ऊपर अनुमान और मागमके द्वैतकी चर्चा की जा चुकी है । द्वैतके विना अद्वैतकी सिद्धि उसी तरह मम्भव नही है जिस तरह हेतुके विना साध्यकी सिद्धि, क्योकि प्रतिषेध्यके बिना प्रतिपेव नही होता। $ ३२. इसके अतिरिक्त ब्रह्मवादमें तत्त्वोपप्लवकी तरह पुण्य-पाप, सुख-दुख, इहलोक-परलोक, विद्या- अविद्या तथा वन्ध-मोक्षकी व्यवस्था नही बनेगी। ६३३ इस तरह ब्रह्मवादियोका सारा कथन वन्व्यापुत्रके स्वरूप-वर्णनकी तरह व्यर्थ ही है, क्योकि किसी भी प्रमाणसे ब्रह्माद्वैत सिद्ध नही होता। यदि किसी प्रमाणसे माने तो प्रमाण और प्रमेयके द्वैतका प्रसग आयेगा । भ्रान्त प्रमाणसे अद्वैतको सिद्धि माननेपर स्वप्नमे देखे गये धुएंसे वास्तविक अग्निकी उपलब्धिका भी प्रसग आयेगा। ६ ३४ एक बात यह भी है कि यदि एक ही परमब्रह्म है तो वही क्यो नही सर्वप्रथम ज्ञात होता और यदि ससार-(प्रपञ्च ) खर-विषाणकी तरह सर्वथा अभाव रूप है तो वही क्यो अहमहमिकतया प्रतीत होता है । यह कहना ठीक नहीं कि अविद्याके कारण ऐसा होता है, क्योकि अविद्याको यदि सत् माना जायेगा तो ब्रह्म और अविद्याका द्वैत हो जायेगा, यदि असत् मानें तो वह मिथ्या प्रतीतिका कारण नही वन सकती और यदि सत्-असत्से भिन्न अनिर्वचनीय मानें तो यह उपदेश नही बन सकता कि-'अविद्या ससार दशामे है, क्योकि ससार अविद्याका विलास है, मुक्ति दशामें नही, क्योकि मुक्ति अविद्या निवृत्ति रूप है । यह कहना कि अविद्या अनिर्वचनीय है, उसी तरह है जिस तरह यह कहना कि 'मैंने जीवन-भरके लिए मौन धारण किया है, मेरे पिता ब्रह्मचारी है, मेरी मां वन्ध्या है' इत्यादि । ६ ३५-४१ इन सात वाक्य खण्डोमें मविद्याका विस्तारके साथ खण्डन किया गया है । [शब्दाद्वैतशासन-परीक्षा] $ ४२ परमब्रह्माद्वैतके उपर्युक्त विवेचनसे शब्दातका भी निराश हो जाता है। परमब्रह्माद्वैतकी तरह इसमें भी पूर्वोक्त दोष आते हैं, केवल प्रक्रिया मात्रका भेद है; इसी कारण उसका पुन विस्तार नहीं किया गया। [विज्ञानाद्वैतशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्ष ] १-५ सम्पूर्ण ग्राह्य-ग्राहकाकार ज्ञान भ्रान्त | जिस प्रकार स्वप्न और इन्द्रजाल आदि ज्ञान भ्रान्त होते है उसी प्रकार ग्राह्य-ग्राहकाकार आदि प्रत्यक्ष भी भ्रान्त है । भ्रान्त, प्रत्यक्ष आदिके द्वारा जाने गये बाह्य अर्घ वास्तविक नही है अन्यथा स्वप्नप्रत्यक्षको भी वास्तविक मानना होगा। इस तरह बाह्य अर्थ असम्भव है। स्वसवित्ति ( विज्ञान) हो खण्डश प्रतिभासित होती हुई समस्त वेद्य-वेदक व्यवहारको कराती है । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु क्षौर आकाश स्वसवित्तिसे भिन्न कुछ भी नही है। एक सवित्ति ही नील, पीत, सुख, दुःख आदि अनेक प्रकारसे ज्ञात होती है । इसलिए बाह्य अर्थ के अभावमें विज्ञानाद्वैत ही सिद्ध होता है। com प्रस्तावना ९ - [ उत्तरपक्ष] ६ ६. यह विज्ञानाद्वैत प्रत्यक्ष विरुद्ध है क्योकि विज्ञान-स्वरूप अन्तरग अर्थको तरह बाह्य अर्थका भीवास्तविक रूपसे प्रत्यक्ष होता है। इस प्रत्यक्षको भ्रान्त कहना युक्ति-युक्त नही, क्योकि ऐसा कहनेपर विज्ञानाद्वैतवादियोको सर्वथा क्षणिक, अनन्यवेद्य तथा नाना सन्तानवाले विज्ञानोकी सिद्धि अनुमानसे करनी होगी। स्वसवेदनसे सिद्धि माननेपर उसीसे पुरुषाद्वैतको भी सिद्धि हो जायेगी। वास्तवमें तो पूर्वोक्त प्रकारके विज्ञानोका अनुभव ही नही होता। इसलिए विज्ञानको सिद्धि अनुमानसे ही माननी होगी। ६ ७-८ अनुमानसे सवित्ति ( विज्ञान ) का वेद्य-वेदकभाव माननेपर बाह्य अर्थमें भी उसीसे वेद्य- वेदक भाव मान लेना चाहिए, क्योकि दोनोमे कोई अन्तर नही है। यहाँपर अनुमान-प्रयोग इस प्रकार होगा- "विमत्यधिकरणभावापन्न ज्ञान साक्षात्परम्परया वा स्वरूपव्यतिरिक्तार्थालम्बनम्, ग्राह्यग्राहकाकारत्वात्, सन्तानान्तराद्यनुमानवत् ।” यह कहना उचित नही कि इस अनुमानमे वाधित विप्लवज्ञानसे व्यभिचारदोष आयेगा, क्योकि ऐसा कहनेपर सन्तान आदि साधनके भी वही दोप आयेगा। ६९ यदि सत्याभिमतज्ञानसे वासनाभेद माना जाये तो बाह्य अर्थक विषयमे भी ऐसा ही मानना चाहिए। ६१० "बाह्य अर्थके प्रत्यक्षका वाधक नील और उसके ज्ञानका अभेद मौजूद है, क्योकि दोनोका एक साथ ज्ञान होता है, जैसे द्विचन्द्रज्ञान ।" यह अनुमान प्रत्यक्षका बाधक नही बन सकता, क्योकि इसमे किया गया हेतु विरुद्ध है। असिद्ध भी है । ६११ "सर्वे प्रत्यया. निरालम्बना , प्रत्ययत्वात्, स्वप्नप्रत्ययवत् ।" यह अनुमान भी वाह्य प्रत्यक्ष- का वाधक नहा, क्याकि साध्य और साधन दोनो विज्ञानमात्र होनेसे हेतु नहीं बन सकता। ६ १२ इस तरह विज्ञानाद्वैत प्रत्यक्ष विरुद्ध है। ६ १३ विज्ञानाद्वैत इष्ट विरुद्ध भी है, क्योकि अनुमानसे वाह्य अर्थ सिद्ध होते है । वह अनुमान इस प्रकार है- "सन्ति वहिरा , साधनदूपणप्रयोगात् ।" $ १४ -१५ इस अनुमानमें सावनसे प्रयोजन नील आदिके सवेदनत्वसे है, दूषणका अर्थ है बाह्य अर्थका निपेव, तथा इन दोनोके प्रयोगका अर्थ है प्रकाशन या विवेचन करना। इस तरह विज्ञानाद्वैत इष्ट विरुद्ध भी है। [चित्राद्वैतशासन-परीक्षा] ६ १६ उपयुक्त विज्ञानाद्वैतके निराससे चित्राद्वैतका भी निरास हो जाता है, क्योकि चित्राद्वैत- वादियोंके यहाँ भी विज्ञानाद्वैतकी तरह बाह्य अर्थका निपेध किया गया है । - [चार्वाकशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्ष ] ६१ "सुगतो यदि सर्वज्ञ कपिलो नेति का प्रमा। तावुभौ यदि सर्वज्ञौ मतभेद कथ तयो ॥" ( तत्त्वस० श्लो० ३१४९) -सुगत यदि सर्वज्ञ है, कपिल नही, तो इसमें क्या प्रमाण है ? और यदि दोनो सर्वज्ञ है तो उनके विचारोमें परस्पर भेद क्यो है ? , २ १० सत्यशासन-परीक्षा . जाता इसलिए कोई भी सर्वन नही हो सकता। ६२. आगम और तर्क भी प्रमाण नही, क्योंकि उनमे भी परस्पर विरोध देखा जाता है, अतएव धर्मानुष्टान भी सिद्ध नहीं होते। कहा भी है- "तर्कोऽप्रतिष्ठ श्रुतयो विभिन्ना नासो मुनिर्यस्य वच प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्व निहित गुहाया महाजनो येन गत स पन्था ॥" -विचार करनेपर तर्क टिकता नही, श्रुतियां ( मागम ) विभिन्न प्रकारको है, ऐसा कोई मुनि नही जिमके वचनोको प्रमाण माना जा सके । धर्मका तत्त्व गूढ है, इसलिए महापुरुष जिम मार्गसे चलें वही मार्ग श्रेष्ठ है। ६ ३ वृहस्पतिने प्रत्यक्ष प्रसिद्ध पृथ्वी, जल, तेज और वायु इन्ही चार तत्वोका वर्णन किया है। शरीर रूपमें परिणत हुए इन्ही तत्त्वोमे चैतन्य उत्पन्न हो जाता है, जिस प्रकार गुड आदि द्रव्योके सयोगसे मद शक्ति अथवा ताँत ( स्नायु ), तूंवी, दण्ड और अगूठे आदिके सयोगमे मधुर स्वर उत्पन्न है। यह चैतन्य गर्भसे लेकर मरण पर्यन्त 'जीव' 'आत्मा' इत्यादि नामोसे पुकारा जाता है । गर्भके पूर्व तथा मरणके उपरान्त इसका अभाव है। ६४ इस तरह ऐसा जीव नही जिसका परलोक हो, अतएव परलोकीके अभावमें परलोकका अभाव स्वत सिद्ध हो जाता है। मूर्ख लोग व्यर्थ ही ठगे जाकर परलोकके सुखानुभवके लिए शरीर और धनका अपव्यय करते है। मृत्यु अवश्यम्भावी है, भस्म हुआ शरीर फिरसे वापस नही आनेवाला, इमलिए जबतक जिन्दगी है, सुखसे जीना चाहिए । अग्निहोत्र, तीन वेद, त्रिदण्ड धारण करना आदि कार्य बुद्धि और पौरुषहीन लोगोकी आजीविका है। [ उत्तरपक्ष ] ६ ५-६ प्रत्यक्षसे पृथ्वी आदिका परस्पर उपादान-उपादेय भाव देखा जाता है। चन्द्रकान्त और सूर्यकान्त मणियोसे चन्द्रमा और सूर्य के प्रकाशमें क्रमश जल और अग्नि निकलना, अग्निरूप दीपकसे पृथ्वी- रूप कज्जल तथा जल ( स्वाति नक्षत्रके ) विशेषसे मोती बनना, पखेसे हवा होना, इत्यादि उदाहरण प्रत्यक्ष- से पृथ्वी आदि तत्त्वोका उपादान-उपादेय भाव व्यक्त करते है । ६ ७-८ 'जीव नही है' यह कथन भी प्रत्यक्षविरुद्ध है। स्वसवेदन प्रत्यक्षके द्वारा आत्मतत्त्वका अनुभव होता है। इस तरह अनुमानके बिना भी जीवका अस्तित्व सिद्ध होता है। हेतु तो उसके लिए दिया जाता है, जो प्रत्यक्षसे मिद्ध न हो । हाथमें पहने हुए ककनको देखनेके लिए दर्पण नहीं लिया जाता। ६ ९-१० जीव और शरीरमे भेद है, क्योकि जीव भोक्ता है और शरीर भोग्य । भोग्यके सद्भावमें भोक्ताकी स्वतन्त्र सिद्धि हो जाती है। गरीरको ही यदि भोक्ता मान लिया जाये तो मृतक शरीरमे भी भोक्तृत्वका प्रसग आयेगा। इस तरह स्वमवेदन प्रत्यक्ष तथा भोक्तृत्वके आधारपर जीवको स्वतन्त्र सत्ता मिद्ध होती है। ६ ११ चार्वाकशासन इप्टविरुद्ध भी है, यह बताते हुए सर्वप्रथम जीवको प्रतिषेध, गौणकल्पना, शुद्धपद, अनेक सम्मति तथा जिनोक्तिके द्वारा अनादि, अनन्त, शरीरमे भिन्न स्वतन्त्र तत्त्व सिद्ध किया गया है। ६ १२ किसी भी वस्नुका निपेव प्रकारान्तरसे उस वस्तुके अस्तित्वको सिद्ध करता है। उदाहरणके लिए यह कथन कि 'यहां घडा नहीं है' प्रकारान्तरसे यह बात सिद्ध करता है कि 'अन्यत्र घडा है'। ६ १३ इस सदर्भमें यह तर्क उचित न होगा कि-'जिमका सर्वथा अभाव होता है उसीका निपेध किया जाता है, जैसे गवेके सीग सर्वथा नहीं होते, इसीलिए उनका निपेध किया जाता है, क्योकि गाय आदिके सिरपर विद्यमान सीगोका ही गधेके सिरपर निषेध किया जाता है, न कि सर्वथा अभावरूप सीगोंका। 1 - ।

प्रस्तावना ११ १४. गौण कल्पनासे भी जीव सिद्ध होता है । पुरुष-चित्रको देखकर यह कहना कि 'यह सजीव चित्र है', अथवा किसी क्रोधी लडकेको देखकर कहना 'यह बालक सिंह है ये दोनो गौण कथन मुख्यरुपसे क्रमश 'जीव' तथा 'सिंह' के अस्तित्वको सिद्ध करते है। $ १५ 'जीव' यह अखण्ड पद प्रमाणपदकी तरह मुख्य रूपसे अपने वाह्य अर्थसहित है, क्योकि वह अखण्ड पद है ।' यह अनुमान भी जीवके अस्तित्वको सिद्ध करता है । १६ इसी तरह अनेक विशिष्ट जन समत होनेसे तथा आप्तके द्वारा उपदिष्ट होनेसे भी जीव सिद्ध होता है। $ १७ चैतन्य स्वरूप जीवके राग आदि तथा जड शरीरके बालक, युवा, वृद्ध आदि अलग-अलग धर्म देखे जाते इसलिए दोनोको एक नही माना जा सकता। यदि जीवको भूतोका धर्म माने तो 'उपादान कारणके समान ही कार्य होता है' इस नियमके अनुसार जीवके भी पृथ्वी आदि तत्त्वोके समान धारण, ईरण, द्रव, उष्णता आदि मूर्त धर्म हो होना चाहिए, अतएव जीव शरीरसे भिन्न ही है । ६ १८ तत्काल उत्पन्न वालकको स्तन्यपानमे रुचि होना, मृत व्यक्तियोका कभी यक्ष, राक्षस आदि योनिमें उत्पन्न होनेका स्वय कथन करना तथा किसी-किसी-द्वारा पूर्वभवका स्मरण किया जाना, इन तीनो बातोंसे परलोकका भी सद्भाव सिद्ध होता है । $ १९ जन्म आदि कारण समान होनेपर भी सुख, दु ख आदिकी विभिन्नता होना पुण्य-पापके अस्तित्वको सिद्ध करता है । $ २०-२२ चार्वाक केवल प्रत्यक्षको प्रमाण मानते हैं। प्रत्यक्षमात्र से सर्वज्ञका अभाव सिद्ध करना असम्भव है। प्रत्यक्ष-द्वारा किसी निश्चित स्थान और समयमे सर्वज्ञका निषेध किया जा सकता है सर्वत्र और त्रिकालमें नहीं । किसी स्थान और समय विशेपमे सर्वज्ञका अभाव माननेमे चार्वाकोके अतिरिक्त अन्य लोगोको भी विवाद नही, क्योकि 'इस समय यहाँ कोई सर्वज्ञ नहीं है' यह कथन अन्यत्र अन्य समयमे सर्वज्ञकी विद्यमानताको स्वयमेव सिद्ध कर देता है। इसी तरह सर्वत्र और त्रिकालमे यदि सर्वज्ञका अभाव कहा जाये तो अभाव सिद्ध करनेवाला सर्व (त्रिलोक ) और त्रिकालको जाननेके कारण स्वय सर्वज्ञ हो जायेगा, क्योकि सर्वज्ञकी परिभाषा भी यही है कि जो तीनो लोको और तीनो कालोके समस्त पदार्थोको एक साथ हस्तामलकवत् जानता है वही मर्वज्ञ है। ६ २३ इस तरह केवल प्रत्यक्ष प्रमाणके आधारपर सर्वज्ञका अभाव सिद्ध नही किया जा सकता, चार्वाकोको अनुमान मानना इष्ट हो नही, अतएव अनुमानसे अभाव सिद्ध करनेका प्रश्न ही नहीं उठता। इस- तरह सर्वज्ञके सद्भावमें कोई वाधक न होनेसे वह निर्विवाद सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार सक्षेपमें चार्वाकसिद्धान्तोका खण्डन करके कहा गया है कि उक्त प्रकार चार्वाकशासन दृष्ट और इष्ट विरुद्ध होनेके कारण बुद्धिमानोके द्वारा आदरणीय नही हो सकता तथा इसके द्वारा स्याद्वादका विरोध भी नही हो सकता । [ बौद्धशासन-परीक्षा ] [ पूर्वपक्ष ] ६ १ रूप, वेदना, विज्ञान, सज्ञा और सस्कार ये पांच ही तत्त्व है। रूप, रस, गन्ध और स्पर्शक परस्पर असवद्ध और सजातीय तथा विजातीय परमाणुओसे भिन्न परमाणु रूप-स्कन्ध है। सुख-दुख आदि वेदना स्कन्ध है । सविकल्पक-निर्विकल्पक ज्ञान विज्ञान स्कन्ध है । जाति आदिकी कल्पनासे युक्त ज्ञान सविकल्पक और उससे रहित ज्ञान निर्विकल्पक कहलाता है। वृक्षादिके नाम सज्ञा-स्कन्ध है । ज्ञान तथा पुण्य-पापकी वासना मस्कार-स्कन्ध है। इस प्रकार ये पांच स्कन्ध है ।

០១ . - १२ सत्यशासन-परीक्षा ६ २-३. इन पच स्कन्धोमे पूर्व-पूर्वके चित्तक्षण उत्तरोत्तर चित्तक्षणोको उपादानोपादेय रूपसे जन्म देते हैं । यद्यपि वे परस्पर भिन्न, निरन्वय, निरश तथा प्रत्येक क्षणमें विनाश होनेवाले है फिर भी भ्रान्तिके कारण उनमें एकत्वका प्रत्यभिज्ञान होता है, इसे ही सस्काररूपसे वर्तमान होनेके कारण आत्मा कह देते है। वाम्नवमें वे भिन्न ही है। अविद्या और तृष्णाके समाप्त हो जानेपर सन्तानकी पूर्ण उच्छित्ति होना मोक्ष कापाय चीवर धारण करना, सिर मुडाना, ब्रह्मचर्य पालन करना आदि मोक्षके उपाय है। ६ ४ मुमुक्षुको दुख, समुदय, निरोध और मार्ग ये चार आर्यसत्य अवश्य जानना चाहिए । दुख चार प्रकारके हैं-सहज, शारीरिक, मानसिक और आगन्तुक । क्षुधा, तृष्णा, काम, भय आदि सहज दु ख हैं, वात, पित्त और कफकी विषमतासे उत्पन्न होनेवाले गारीरिक दु.ख हैं, धिक्कार, अवज्ञा तथा इच्छाविघातसे उत्पन्न होनेवाले मानसिक दुख हैं तथा गीत, वायु, वज्रपात आदिसे उत्पन्न होनेवाले आगन्तुक दुख हैं । इन दु खोंसे युक्त चित्तक्षण ससारियोके दुख कहलाते है । खको उत्पन्न करनेवाले कर्मबन्धके कारण अविद्या और तृष्णा दु खसमुदय है। वस्तुकी याथात्म्य प्रतिपत्ति न होना अविद्या है, तथा इष्ट इन्द्रिय विषयोको प्राप्त करनेको तथा अनिष्ट इन्द्रिय विपयोको दूर करनेकी इच्छा तृष्णा है। अविद्या और तृष्णाका नाश हो जानेसे निरात्रव चित्तक्षण अथवा सन्तानोच्छित्ति रूप मोक्ष दु.ख- निरोध है। ६ ५ मोक्षके कारण मार्गणा है। मार्गणाके आठ अग है- १ सम्यक्त्व ६. अन्तर्व्यायाम ३ सज्ञी ७ आजीवस्थिति ८ समाधि पदार्थोका याथात्म्यदर्शन सम्यक्त्व है । वाचक शब्द सज्ञा तथा वाच्य अर्थ सज्ञी है। वचन और काय (शरीर)के कार्य वावकाय है । वायुधारणा अन्तर्व्यायाम है । आयुपर्यन्त प्राणधारण करना आजीवस्थिति है। सव दु ख रूप है, सब क्षणिक है, सब निरात्मक है, सव शून्य है, इस तरहकी सत्यभावना समाधि है । भावनाके प्रकर्षसे अविद्या और तृष्णाका नाश हो जाता है । समस्त पदार्थोका ज्ञान करानेवाले चित्त- क्षण निरालव हो जाते है । यही योगिप्रत्यक्ष है । योगी आयुपर्यन्त उपासकोको धर्मका उपदेश देकर अन्तमें निर्वाणको प्राप्त कर लेता है। आयुके.समाप्त हो जानेपर दीपकके वुझ जानेकै ममान आत्माका अन्त हो जाना निर्वाण है। जिस- प्रकार दीपक बुझनेपर न तो पृथ्वीको जाता है, न आकाशको, न किमी दिशाको और न किसी विदिशाको, प्रत्युत तेलके समाप्त हो जानेसे गान्त हो जाता है, इमी तरह निर्वाणको प्राप्त हुआ जीव न तो पृथ्वीको जाता है, न आकाशको, न किसी दिशाको और न विदिशाको, प्रत्युत मोहके नाश हो जानेसे शान्त हो जाता है । [उत्तरपक्ष] ६ ६ उपर्युवत बौद्ध सिद्धान्त प्रत्यक्ष विरुद्ध है । प्रत्यक्षमे निरन्वय, विनाशशील परमाणुका साक्षात्कार नही होता, इसके विपरीत स्थिर, स्थूल और साधारण आकारवाले घटादिका ही प्रत्यक्ष होता है। ६७ यह मानना युक्तियुक्त नही कि अत्यन्त आनन्न और ममृष्ट परमाणुओमे ही भ्रमसे स्थूल, स्थिर नादिका ज्ञान होता है, क्योकि ऐमा माननेपर प्रत्यक्षका प्रत्यक्ष कल्पनापोढमभ्रान्तम्' यह लक्षण नहीं बनेगा। ६८. परमाणुओमें भी यह लक्षण नहीं बनता। ५ कर्म २. सज्ञा ४. वाक्काय - प्रस्तावना १३ ६ ९ निर्विकल्पक प्रत्यक्षसे परमाणुओका प्रत्यक्ष नही हो सकता, क्योकि अविसवादरहित होनेके कारण निर्विकल्पक प्रत्यक्ष अनिश्चयात्मक है, अतएव अप्रमाण है । $ १०-५० इन वाक्यखण्डोमे विस्तारके साथ परमाणु-प्रत्यक्षका खण्डन है । [ माल्यशासन-परीक्षा ] [ पूर्वपक्ष ] ६१ यह समस्त ससार प्रधान (प्रकृति) मय है। सत्त्व, रज और तमोगुणकी साम्यावस्थाका नाम प्रधान (प्रकृति ) है। ६२ सत्त्व गुण इण्ट, प्रकाशक तथा लघु होता है । इसके उदयसे प्रशस्त ही परिणाम होते है। रजो- गुण चल, अवष्टभक, दारक और ग्राहक होता है । इसके उदयसे राग परिणाम होते है । गुरु, आवरण करने वाला तथा अज्ञानरूप तमोगुण है । इसके उदयसे द्वेपके कारण अज्ञानरूप ही परिणाम होते है । इन तीनो गुणो- की साम्यावस्था प्रकृति है । प्रधान व बहुधानक इसके नामान्तर है । ६३ प्रकृति ही ससारको उत्पन्न करनेवाली है। प्रकृतिसे महान्, महान्से बहकार, अहकारसे पच- तन्मात्रा, पांच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां और मन ये पोडशगण तथा पचतन्मात्रामोसे पचभूतोकी उत्पत्ति होती है। ६४ ये चौवीस तत्त्व है। पच्चीसवाँ जीव तथा छब्बीसवाँ मुक्त है। यह निरीश्वर साख्योकी मान्यता है । सेश्वर साख्योके अनुसार छब्बीसवाँ महेश्वर है तथा सत्ताईसा मुक्त है । ६५ प्रकृति और पुरुपके भेद-विज्ञानसे मोक्ष होता है। पचविंशति तत्त्वोका परिज्ञान मोक्षका कारण है। [उत्तरपक्ष ] ६ ६-७ यह साख्यमत दृष्ट (प्रत्यक्ष ) विरुद्ध है-साख्योने प्रकृतिको नित्य तथा सर्वव्यापी माना है। इसका अर्थ है कि सब कुछ सभी जगह रहना चाहिए 'सर्व सर्वत्र वर्तते' । किन्तु प्रत्यक्षसे ऐसा ज्ञात नहीं होता। ६ ८-१० 'सबका सब जगह सद्भाव रहनेपर भी जिमका जहाँ आविर्भाव होता है वही वहाँ दृष्टि- गोचर होता है ।' साख्योका यह कथन युक्त नही, क्योकि यह आविर्भाव किसी भी तरह सिद्ध नहीं होता। ६ ११ इसी तरह तिरोभाव मानना भी उचित नही, क्योकि वह भी आविर्भावकी तरह सिद्ध नही होता । इस प्रकार आविर्भाव और तिरोभावके असिद्ध होनेसे प्रधान भी असिद्ध हो जाता है । उसके अभावमे महत् आदि कुछ भी नहीं बनेगा। ६ १२ इसके बाद भी यदि महदादिका निरूपण करे तो प्रश्न होगा कि यह प्रधानका कार्य है या परिणाम ? कार्य माननेपर सर्वथा सत् अथवा सर्वथा असत् कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। $ १३ परिणाम माननेपर प्रश्न होगा कि परिणाम प्रकृतिसे भिन्न है या अभिन्न ? अभिन्न माननेपर क्रमसे वृत्ति नही होगी और भिन्न माननेपर प्रकृतिके साथ उनका सम्बन्ध नही माना जा सकता। ६ १४ प्रकृतिको परिणामोका उपकारी मानना भी ठीक नहीं, क्योकि अनेक दोप आते ६ १५ यदि यह माने कि परिणाम प्रकृतिसे न भिन्न है न अभिन्न, प्रकृति ही महदादि रूपमें परिणत होती है, तो यह मानना भी ठीक नही, क्योकि इससे स्त्रय साख्यमम्मत नित्यवान्तका विरोध होता है। ६ १६ इस तरह अनेक बाधकोके होनेमे प्रकृति (प्रधान ) सिद्ध नहीं होती। भोग्य प्रकृतिके अभावमे भोक्ता पुरुप भी सिद्ध नही होता । इस प्रकार साख्याभिमत सभी तत्त्व शून्य हो जाते है । $ १७-१८ साख्यमत इष्ट विरुद्ध भी है-कथचित् नित्यत्व साधक अनुमानसे कूटस्थ नित्य पुग्पका विरोध आता है। अनुमान इस प्रकार है - सत्यशासन-परीक्षा दृष्टम्, यथा - "विवादापन्न पुरुप स्यादनित्य , अनित्यभोगाभिसम्बन्धत्वात्, यदित्य तदित्य भोगस्वरूपम् ।" ६ १९ दृष्ट तथा 'इष्ट विरुद्ध होनेसे साख्यागम भी प्रमाण नही है, इसलिए उनका धर्मानुष्ठान भी नही बनता । इस प्रकार दृष्टेष्ट विरुद्ध होनेमे साख्यमत सम्यक् नही है । [वैशेषिकशासन-परीक्षा] [पूर्वपक्ष] १ बुद्धि, सुख, दुख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म और सस्कार इन नव आत्म गुणोका-अत्यन्त उच्छेद मोक्ष है । द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विगेप तथा समवाय इन पदार्थोके साधर्म्य और वैधयंका तत्त्व- ज्ञान मोक्षका कारण है। गैव, पागुपत आदि दीक्षाग्रहण, जटाधारण त्रिकाल भस्मोद्धूलन आदि तप और अनुष्ठान भी मोक्षके हेतु है। ६२-४ द्रव्य नव है-पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, काल, दिक, आत्मा और मन । रूप, रस, गन्व, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, सयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा आदि चौवीस गुण है । उत्क्षेपण, अपक्षेपण आदि पाँच कर्म है । पर और अपरके भेदसे सामान्य दो प्रकारका है । नित्य द्रव्योमें रहनेवाला विशेप है। अयुत मिद्ध तथा नाधार और आधेयभूत द्रव्योका सम्बन्ध समवाय कहलाता । इनके सावध-वैधयंका तत्त्वज्ञान मोक्षका कारण है। ६५-७ तत्त्वज्ञानसे मिथ्याज्ञान दूर हो जाता है, मिथ्याज्ञानके दूर होनेसे तज्जन्य राग-द्वेप, राग-द्वेपकी निवृत्तिसे तज्जन्य काय-वाड-मनोव्यापाररूप प्रवृत्ति तथा उसके दूर होनेसे कर्म-बन्ध-निवृत्ति हो जाती है । पूर्वो. पार्जित कर्माका नाश भोगनेसे ही होता है अन्यथा नही। इन कर्मोको भोगनेके विपयमे दो मत है—पहलेके अनुसार एक भवमे भी भोगे जा सकते है और दूसरेके अनुसार अनेक भवोमें । [ उत्तरपक्ष] ६ ८-९. यह वैगेपिकशासन प्रत्यक्षविरुद्ध है-वैगेपिकाभिमत अवयव-अवयवी, गुण-गुणी आदिका सर्वथा भेद प्रत्यक्षविरुद्ध है, क्योंकि प्रत्यक्षसे अवयव-अवयवी आदि कयचित् अभिन्न प्रतीत होते है । ६ १०-११ यह कहना उचित नहीं कि समवायके द्वारा दोनो अर्थान्तर प्रतिभासित होते है, क्योकि प्रत्यक्ष वुद्धि मे ऐसा कभी भी प्रतिभासित नही होता कि 'ये अवयव है, ये अवयवी है और यह उनका समवाय १२-२६ वैशेपिकाभिमत समवाय सम्बन्ध भी युक्तियुक्त नही, क्योकि इसके माननेमे अनेक दोप जाते है। [इन वाक्य खण्डोमे विस्तारके साय अनेक उपपत्तियो-द्वारा समवायका खण्डन किया गया है।] २७-२८ वैशेपिक मत इष्ट विरुद्ध भी है-वैशेपिकोने ससारको ईश्वरकृत माना है, जो कि अनु- मानविरुद्ध है। अनुमान इस प्रकार है- "नेश्वरम्तन्वादोना कर्ता, अगरीरत्वात् , य एव स एवम्, यथात्मा, तथा चायम्, तस्मात्तयैव ।" ६ २९ 'मशरीरी भी बुद्धि, इच्छा और प्रयत्नके विना कार्य नही कर सकता, इसलिए इन्हीको कारण माननेपर ईश्वर शरीरके बिना भी जगत्कर्ता बन सकता है।' वैशेपिकोका यह मानना उचित नही, क्योकि ईश्वरमे बुद्धि, इच्छा और प्रयत्न भी असभव है । मुक्तात्मामें जिस तरह इनका अभाव है वैसे ही ईश्वरमें भी। इसके अतिरिक्त घट-पट आदि बुद्धिमनिमित्तक है न कि पृथ्वी, पर्वत आदि । $ ३० इतना होने के बाद भी यदि हाग्रहमे ईश्वरको कर्ता माना जाये तो प्रश्न होगा कि ईश्वर मसारके प्राणियोको इतना दु ख क्यो देता है, जब कि अच्छे साधु आदि भी किसी प्राणीको दुख नही . -- प्रस्तावना । १५ कर्म ही देते तो फिर इतना महान् ईश्वर क्यो दुख देगा? ऐसे भयकर दुख देनेवाला तो कोई राक्षस ही हो सकता है ईश्वर नहीं। ६ ३१ यदि दुखका कारण कर्मोको माने तो फिर ईश्वरको माननेकी जरूरत नही, शरीरादिके भी कारण हो जायेगे। ३२ यह कहना उचित नहीं कि अचेतन कर्मोसे तनुकरणादिकी उत्पत्ति कैसे होगी, क्योकि जिस प्रकार मदिरा, मदन, कोद्रव आदिसे उन्माद आदि कार्य उत्पन्न हो जाते है, उसी प्रकार कर्मोसे शरीरादि भी। $ ३३-३४ वैशेपिकोके द्वारा ईश्वर कर्तृत्व सिद्धि के लिए दिया गया बुद्धिमन्निमित्तत्व हेतु भी ठोक नही, क्योकि यह एक बुद्धिमत् कारणको सिद्ध करता या अनेकको ? प्रथमपक्ष मे हेतु अनैकान्तिक है तथा द्वितीय पक्षमे सिद्धसाधन दोष आता है। $ ३५ बुद्धिमन्निमित्तत्वको जगत्कर्तृत्व सिद्ध करनेके लिए हेतु माननेपर और भी अनेक दोष आते है । इसलिए ठीक ही कहा है कि वैशेषिकगामन इष्टविरुद्ध भी है। है [ नैयायिकशासन-परीक्षा ] [ पूर्वपक्ष ] ६१ प्रमाण, प्रमेय, मशय, प्रयोजन आदिके तत्त्वज्ञानमे मोक्ष होता है । $ २ भक्तियोग, क्रियायोग तथा ज्ञानयोगसे सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य तथा सायुज्य मुक्ति होती है। ६ ३-५ महेश्वरमें स्वामी-सेवक भाव रूपसे तच्चित्त होकर जीवनभर उसकी परिचर्या करना भक्ति- योग है, इससे सालोक्य मुक्ति होती है । तप, स्वाध्याय, अनुष्ठान आदि क्रियायोग है। इससे सास्प्य या सामीप्य मुक्ति होती है । परमेश्वर-तत्त्वका अनवरत चिन्तन और पर्यालोचन ज्ञानयोग है, इसके यम नियम आदि आठ अग है, इससे सायुज्य मुक्ति होती है । [ उत्तरपक्ष ] ६ ६. वैशेषिकशासनमें जिस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान विरोध ऊपर प्रदर्शित किया गया है उसो तरह उक्त दोनो ही प्रकारका विरोध इस शासनमे भी आता है, अत• पुन यहाँ नही दुहराया गया । ६७ हां, इतना यहां विशेप ज्ञातव्य है कि नैयायिकोके द्वारा माने गये पदार्थोमें-से इन्द्रिय, बुद्धि और मन अर्थोपलब्धिके साधक होनेसे प्रमाण-कोटिमें आते है, इस कारण प्रमेयोमें उनका समावेश नहीं हो सकता। सशयादिको प्रमेयभिन्न माननेपर उनको व्यवस्था नहीं बन सकेगी। इसके अतिरिक्त विपर्यय तथा अनध्यवसायकी पोडश पदार्थोसे पृथक् प्रतीति होनेके कारण नैयायिकोकी पोडशपदार्थ व्यवस्था नहीं बनती। ६८ इस प्रकार नैयायिक और वैशेपिक सिद्धान्त दृष्टेष्ट विरुद्ध होनेसे उनका प्रतिपादक आगम भी प्रमाण नहीं बनता। इसलिए उनका लौकिक तथा वैदिक सभी कथन मिथ्या है । [ मीमासक या भाटप्राभाकरशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्ष ] ६१ मीमासकोके मुख्यतया दो सप्रदाय हैं-भाट्ट और प्राभाकर । इनमें भाट्टोको मान्यता इस प्रकार है- पृथ्वी, अप, तेज, वायु, दिक् , काल, आकाश, आत्मा, मन, शब्द और तम ये ग्यारह ही पदार्थ हैं । तदाश्रित गुण, कर्म आदि इन्ही पदार्थोके स्वभाव होनेसे पदार्थान्लर नहीं है। इस तरह पदार्थोके यथार्थ ज्ञानसे कर्मोका नाश होता है। - १६ सत्यशासन-परीक्षा भी है- ६ २ प्राभाकरोको मान्यता इस प्रकार है- द्रव्य, गुण, क्रिया, जाति, सख्या, सादृश्य, गक्ति, समवाय और क्रम ये नव हो पदार्थ है । इनमे पृथ्वी आदि द्रव्य है, रूपादि गुण है, उत्क्षेपण आदि क्रिया है, सत्ता, द्रव्यत्व आदि जाति है, एक, दो आदि सख्या है, गोका प्रतियोगी गवयगत और गवयका प्रतियोगी गोगत सादृश्य है, सामर्थ्यको शक्ति कहते है, गुण और गणी आदिका सम्बन्ध समवाय है, एकके बाद दूसरा, यह क्रम है, ये नव ही पदार्थ है, इनके यथार्थज्ञानमे नि श्रेयस (मोक्ष) की सिद्धि होती है । ६३ वेद पढकर, उसके अर्थको जानकर, उसमे बताये गये नित्य, नैमित्तिक, काम्य, निषिद्ध अनुष्ठान- का क्रम निश्चित करके तदनुसार प्रवृत्ति करनेपर स्वर्ग और अपवर्गकी सिद्धि होती है। $ ४ मुमुक्षुको प्रव्रज्या लेनी ही चाहिए, ऐमा नियम नही है। न्यायपूर्वक धन कमानेवाला, तत्त्व- ज्ञाननिष्ठ, अतिथिप्रिय, श्राद्ध करनेवाला, मत्यवादी गृहस्थ भी मुक्त हो जाता है । $ ५ भाट्टोके अनुसार मोक्षार्थीको काम्य और निपिद्ध अनुष्ठान नही करना चाहिए। प्राभाकरोके अनुसार करना चाहिए। [उत्तरपक्ष] $ ६ यह मीमासक मत दृष्ट ( प्रत्यक्ष ) विरुद्ध है । भाट्ट तथा प्राभाकरोके अनुसार पृथिव्यादि अर्थ सत्तासामान्यके द्वारा जाने जाते है। उन्होने सत्तासामान्यको नित्य, निरवयव, एक और व्यापक माना यह प्रत्यक्षविरुद्ध है, क्योकि इस तरहके मामान्यकी कही भी प्रतीति नहीं होती। ६ ७-८ इसके वाद भी यदि हठाग्रहसे वैसा ही माना जाये तो कहेगे कि एक व्यक्तिमे सर्वात्मना वर्तमान सामान्यकी अन्यत्र वृत्ति नही हो सकती, क्योकि अन्यत्र वृत्तिमे तद्देशगमन आदि जितने भी विकल्प हो सकते है वे सभी दोषयुक्त । इस तरह अन्य व्यक्तिमे सामान्यके अभावका प्रसग आयेगा। कहा "न याति न च तत्रासीदस्ति पश्चान्न चाशवत् । जहाति पूर्वमाधारमहो व्यसनसन्तति ॥" ६ ९ मीमासकोका कहना है कि यह दोप भेदवादियोके यहां ही आ सकते है, मीमासकोने तो मामान्य और व्यक्तिका तादात्म्य माना है, इसलिए उक्त दोप नही । यह कथन ठीक नही है, क्योकि व्यक्तिकी तरह सामान्यके भी साधारण और असाधारण रूप माननेका तथा व्यक्तिकी तरह इसके भी उत्पाद-विनाश माननेका प्रमग आयेगा। ६ १० सामान्यरूपता ही साधारणरूपता नहीं है । उत्पाद-विनाश भी नही बनते, इस तरह विरुद्ध धर्म-बाधा होनेसे व्यक्ति और इसका भेद हो जायेगा। $ ११-१६ इस प्रकार अनेक दोपयुक्त होनेसे मीमासकसम्मत सामान्य सिद्ध नहीं होता। [ इन वाक्य खण्डोमे विस्तारके साथ सामान्यका खण्डन है। ] [४ ] सत्यशासन-परीक्षा तथा अन्य ग्रन्थ [अ] जैन ग्रन्थ- [१] तत्त्वार्थसूत्र और सत्यशासन-परीक्षा तत्त्वार्थमून जैन साहित्यके आद्य संस्कृत साहित्यकार आचार्य उमास्वातिकी महान् कृति है। जैन तत्त्वज्ञान, प्रमाण, नय, भूगोल आदिका क्रमबद्ध सुव्यवस्थित विवेचन करनेवाला यह प्रथम संस्कृत ग्रन्थ है। तत्त्वार्थसूत्रपर स्वोपज्ञ' भाष्य, पूज्यपादकी सर्वार्थसिद्धि, भट्ट अकलकका तत्त्वार्थवार्तिक, श्रुतसागर सूरिकी तत्त्वार्थवृत्ति आदि अनेक महत्त्वपूर्ण टीकाएँ है। स्वय विद्यानन्दिने तत्त्वार्थसूत्रके एक-एक शब्दका तार्किक शैलीमें विस्तृत विवेचन करनेवाला तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक ग्रन्थ लिखा। १ श्वेताम्बर मान्यताके अनुसार ।

प्रस्तावना । सत्यशासन-परीक्षामे बन्धके विषयमें जनदृष्टिको स्पष्ट करते हुए प्रकारान्तरसे उमास्वातिके सूत्रोको ही प्रस्तुत किया गया है । तुलनाके लिए देखें- "स्निग्धरूक्षत्वाइन्ध न जघन्यगुणानाम्, गुणसाम्ये सदृशानाम्, द्वयधिकादिगुणाना तु ।" [ तत्त्वार्थसू० अ०५, सू० ३३-३६ ] "तै ( स्याद्वादिमिः ) परमाणूना स्निग्धरूक्षाणामजघन्यगुणाना द्वयधिकादिगुणाना विजातीयानां सजातीयानां च सक्तुतोयवत् सन्तप्तजतुखण्डवत् कथचित् स्कन्धाकारपरिणामात्मकस्य सवन्ध- स्याभ्युपगमात् ।” [२] आप्तमीमांसा और सत्यशासन-परीक्षा आप्तमीमासा स्वामी समन्तभेद्रको अमर रचना है । अकलकने इसपर गूढ तर्कशैलीमे अष्टशती नामकी टीका लिखी । विद्यानन्दिने अष्टशतीको पूर्णत अन्तर्हित करके आप्तमीमासापर अष्टसहस्री नामक वृहत् टोका लिखी। विद्यानन्दिकी प्रत्येक रचनापर आप्तमीमासाकी तर्कशैली, भाव और भाषाका स्पष्ट प्रभाव है। सत्यशासन-परीक्षामें प्रत्येक शासनको दृष्टेष्टविरुद्ध सिद्ध करनेका तर्क विद्यानन्दिको आप्तमीमासाके निम्न पद्यसे प्राप्त हुआ लगता है- "त्वन्मतामृतवाद्याना सर्वथैकान्तवादिनाम् । प्राप्तामिमानदग्धाना स्वेटं दृष्टेन वाध्यते ॥' विद्यानन्दिने इस कारिकामें आये दृष्ट और इष्ट गब्दसे प्रेरणा पाकर सत्यशासन-परीक्षाकी पृष्ठभूमि तैयार की होगी। विभिन्न प्रमगोपर सत्यशासन-परीक्षामें आप्तमीमासाकी आठ कारिकाएं उद्धृत है । पुरुपाद्वैतको समालोचना करते हुए विद्यानन्दिने जो तर्क उपस्थित किये है उनको साक्षीमे आप्तमीमासा- की चार कारिकाएं उद्धृत है- क] अतकी सिद्धि यदि किसी हेतुसे होती है तो हेतु और साध्यका द्वैत हो जायेगा और यदि हेतुके बिना ही सिट्टि हो जाती है तो वचनमात्रसे द्वैत क्यो नही हो जायेगा? १ "हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेत् द्वैत स्याद्धेतुसाध्ययो । हेतुना चेद्विना सिद्धिद्वैत वाड्मावतो न किम् ॥” [ आप्तमी० श्लो० २६ ] अद्वैतकान्त पक्षमें प्रत्यक्षविरोध दिखाते हुए निम्न श्लोकका प्रमाण दिया है- २. "अद्वैतकान्तपक्षेऽपि दृष्टो भेदो विरुद्धयते । कारकाणा क्रियायाश्च नैक स्वस्मात्प्रजायते [आप्तमी० श्लो० २४ ] १. सत्य. बौद्ध ० ६ २७ २ प्राप्तमी० श्लो०७ ३ सत्य० परमब्रह्म० ३२० ४ वही ६३० ३ सत्यशासन-परीक्षा २ 30 अद्वैतका निरास करते समय अनुमान विरोध दिखानेके लिए निम्न कारिकाका प्रमाण दिया गया है- ३ "अद्वेत न विना द्वैतादहेतुरिव हेतुना । सज्ञिन प्रतिषेधो न प्रतिपेध्याहते क्वचित् ॥" [ आप्तमी० श्लो० २७ ] प्रत्यक्ष और अनुमानसे विरोध दिखानेके उपरान्त अद्वैतकान्त पक्षमे विद्यानन्दिने एक और व्याव- हारिक कठिनाई यह बतलायी है कि अद्वैतको माननेपर अद्वैतवादियोका धर्मानुष्ठान आदि भी नहीं बन सकेगा। इमो वातका विवेचन करके आप्तमीमासाकी निम्नकारिकाका प्रमाण दिया है- ४ "कर्मद्वैत फलद्वैत लोकद्वैत च नो भवेत् । विद्या विद्याद्वय न स्याद् बन्धमोक्षद्वय तथा ॥" [ आप्तमी० श्लो० २५] [ख ] बौद्धगासन-परीक्षामें वत्तिदोपका निराकरण करते हुए निम्नकारिका उद्धृत की गयी है- "एकस्यानेकवृत्तिर्न भागाभावाद्वहूनि वा । मागित्वावास्य नैकत्व दोषो वृत्तेरनाहते ।। [ आप्तमी० श्लो० ६२] [ग] साख्यगासन-परीक्षामे कूटस्थ-नित्यताका निरास करते हुए आप्तमोमासाको दो कारिकाओके अर्धभाग प्रमाणरूपमे उद्धृत किये है- ६. "यदि सत् सर्वथा कार्य पुवन्नोत्पत्तुमर्हति । [आप्तमी० श्लो० ३९] ७ "यद्यसत्सर्वथा कार्य तन्माजनि खपुष्पवत् ॥ [प्राप्तमी० श्लो० ४२] [घ ] वैशेपिकशासन-परीक्षामें समवाय सम्बन्धका निराकरण करनेके प्रसगमें आप्तमीमासाका निम्न- श्लोकाध ८. "कार्यभ्रान्तरणुभ्रान्ति कार्यलिङ्ग हि कारणम् ।" [ आप्तमी० श्लो० ६८] [३] युक्त्यनुशासन और सत्यशासन-परीक्षा युक्त्यनुशासन भी स्वामी समन्तभद्रकी कृति है । जैसा कि लिखा जा चुका है, जैन न्यायको पृष्ठ- भूमि तैयार करनेवाले इस महान् आचार्यका समस्त चिन्तन विद्यानन्दिका उपजीव्य रहा है । युक्त्यनुशासनपर विद्यानन्दिने युक्त्यनुशासन टीका या युक्त्यनुशासनालबार नामक टीका लिखी। मत्यशासन-परीक्षामे विभिन्न प्रसंगोपर युक्त्यनुशासनके सात पद्य प्रमाणरूपमें उद्धृत किये गये है [क ] विज्ञानाद्वैतशामन-परीक्षामे वाह्य अर्थका समर्थन करनेके प्रमगमें अनेक उपपत्तियोके साथ ४" ५१ - उद्धृत है- १ वही ६३१ २ वहीं .६ ३२ ३ सत्य० बौद्ध० ६२५ १ सत्य० मार य०६ १२ ७ वही ६१२ ६ सत्य वेशे० S२१ प्रस्तावना " ३ युक्त्यनुशासनका निम्न पद्य उद्धृत किया गया है- १. "अनथिका साधनसाध्यधोश्चेद्विज्ञानमात्रस्य न हेतुसिद्धि । अथार्थवत्व व्यभिचारदोषो न योगिगम्य परवादिसिद्धम् ।।' [ युक्त्यनु० श्लो० १८] [ख] चार्वाकगासनमें चार्वाकाभिमत सिद्धान्तोका खण्डन करनेके बाद युक्त्यनुशासनके निम्नलिखित तीन पद्य उद्धृत है- २ "मद्याङ्गवद्भूतसमागमे ज्ञ. शक्त्यन्तरव्यक्तिरदेवसृष्टि । इत्यात्मशिश्नोदरपुष्टितुष्टैर्निहींमयर्हामृदवा प्रलब्धा । दृष्टे विशिष्टे जननादिहेतौ विशिष्टता का प्रति सत्वमेषाम् । स्वभावत कि न परस्य सिद्धिरतावकानामपि हा प्रपातः ।। स्वच्छन्दवृत्तेर्जगत स्वभावादुच्चैरनाचारपदेष्वदोपम् । निघुप्य दीक्षा सममुक्तिमानास्त्वदृष्टिवाह्या वत् विभ्रमन्ति ॥" [ग] बौद्धशासन-परीक्षामे स्वलक्षणके विवेचन प्रसगमे युक्त्यनुशासनका निम्न पद्य आया है- ५ "अवाच्यमित्यन्न च वाच्यमावाढवाच्यमेवेत्य यथाप्रतिज्ञम् । स्वरूपतश्चेत् पररूपवाचि स्वरूपवाचीति वचो विरुद्धम् ॥" [युक्त्यनु० श्लो० २९] इसी परीक्षाके एक अन्य प्रसगमें अविसवादी ज्ञानकी प्रमाणताका निरसन करते हुए निम्न पद्य आया है- ६ “प्रत्यक्षबुद्धि क्रमते न यत्र तल्लिङ्गगम्य न तदर्थलिङ्गम् । वाचो न वा तद्विषयेण योग का तद्गति कष्टमशृण्वता ते ।। [ युक्त्यनु० श्लो० २२] घ] वैशेपिकशासन परीक्षामे समवाय सम्बन्धके विषयमे विचार करते समय युक्त्यनुशासनका निम्न पद्य दो वार उद्धृत किया गया है- ७ "अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्व तव स्वतन्त्रान्यतरत्सपुप्पम् । अवृत्तिमत्त्वात् समवायवृत्तेस्ससर्गहाने सकलार्थहानि ॥"" [ युक्त्यनु० श्लो० ७] [४] न्यायविनिश्चय और सत्यशासन-परीक्षा न्यायविनिश्चय जैन न्यायके प्रस्थापक आचार्य भट्ट अकलकको कृति है। धर्मकीतिके प्रमाणवातिककी तरह इस ग्रन्थको रचना गद्य-पद्यमे की गयी थी, किन्तु पूरा ग्रन्य अभीतक उपलब्ध नही हुआ । पद्य भागपर वादिराजकी न्यायविनिश्चयविवरण नामक टीका है, उसी टीकामे से पद्योका सकलन करके प० महेन्द्रकुमारजी न्यायाचार्यने इसका सम्पादन किया था। विद्यानन्दिने अकलकके सभी शास्त्रोका अन्त प्रविष्ट अध्ययन किया था तथा अपने साहित्यका उपजीव्य भी उन्हे बनाया, इसलिए । प्रानन्दिके ग्रन्थोपर अक्ल कके शास्त्रोको छाप अस्वाभाविक नही है। - ४ . ६ . १ सत्य० विज्ञ ०६११ २ सत्य० चार्वाक०६ १९ ३. सत्य. बौद्ध ४ वही ६१७ ५ सत्य० वैशे ०१८, २५ ६. मारतोय ज्ञानपीठ, काशी-द्वारा प्रकाशित ।

२० सत्यशासन-परीक्षा सत्यशासन-परीक्षामें न्यायविनिश्चियकी निम्न कारिका भट्ट अकलकके नामोल्लेखके साथ उदधृत की गयी है- "तदुक्त मट्टाकलङ्कदेवैः इन्द्रजालादिपु भ्रान्तिमोरयन्ति न चापरम् । अपि चाण्डालगोपालबाललोलविलोचन ॥१ [ न्यायविनि० श्लो० ११५२ ] परमब्रह्माद्वैतवादीने भेदावभासी प्रत्यक्षको इन्द्रजाल आदिकी तरह भ्रान्त कहकर अद्वैतको सिद्ध करनेके लिए जो तर्क उपस्थित किया उमका निरसन करते हुए भेदावभासी प्रत्यक्ष तथा इन्द्रजाल आदि प्रत्यक्षका परस्पर भेद दिखाते हुए विद्यानन्दिने उपर्युक्त कारिका उपन्यस्त की है। [५] लघीयस्त्रय और सत्यशासन-परीक्षा लघीयस्त्रय भी भट्ट अकलककी दार्शनिक कृति है। संस्कृत पद्योके साथ स्वोपज्ञ विवृति सहित लिखे गये इस ग्रन्थमे प्रमाण, नय और प्रवचनका विवेचन किया गया है। लघीयस्त्रयपर आचार्य प्रभाचन्द्रको 'न्यायकुमुदचन्द्र' नामक विस्तृत टीका है जिसे लघीयस्त्रयालकार भी कहते है। सत्यशासन-परीक्षामे लघीयस्त्रयका निम्न पद्य भट्ट अकलकके नामोल्लेखके साथ उद्धृत किया गया है- "तथैवोक्त महाक्लङ्कदेव यथैक मिन्नदेशार्थान् कुर्याद्वयाप्नोति वा सकृत् । तथैक भिन्नकालार्थान् कुर्याद्वयाप्नोति वा क्रमात् ॥" [लघीय० श्लो० ३७ ] चौद्धशासन-परीक्षाके प्रसगमें सामान्यका विवेचन करते समय उपर्युक्त पद्य प्रमाणरूपसे उद्धृत किया है। [६] सिद्धिविनिश्चय और सत्यशासन-परीक्षा भट्ट अकलकको महान् दार्शनिक कृतियोमे सिद्धिविनिश्चय अनन्य कृति है। मूल ग्रन्थके प्राप्त न हो मकने के बाद भी स्व० डॉ० प० महेन्द्रकुमारजी न्यायाचार्यने सिद्धिविनिश्चय टीकाके आधारपर अथक परिश्रम करके मूल ग्रन्थका सयोजन करके पूर्ण समृद्ध सस्करण तैयार किया था। मिद्धिविनिश्चयमे विभिन्न १२ प्रकरणोमे अनेक दार्शनिक विपयोका विवेचन किया गया विद्यानन्दिने नि सदेह अकलक्के अन्य ग्रन्थोकी तरह सिद्धिविनिश्चयका भी गहन अध्ययन किया होगा। सत्यशासन-परीक्षामें इसका एक पूर्ण पद्य तथा एक आधा पद्य दो प्रमगोपर उद्धृत है । [क] पुरुषाहत या परमब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षामें अविद्याका विचार करते समय अकलकके नामोल्लेख- के साथ निम्न श्लोकार्थ उद्धृत किया है- "यथा यत्राविसवास्तथा तत्र प्रमाणता।" [सिद्धिवि० १.१९] इम पद्य का पूर्वार्ष निम्न प्रकार है- "प्रत्यक्ष विराट ज्ञान प्रसन्नाक्षेतरादिषु ।" [ सिद्धिवि० १११९] 3 - १. सत्य. परमब्रह्म०६ १५ २ सत्य. बौद ३१ ३ भारतीय ज्ञानपीठ, काशीसे दो भागोंमें प्रकाशित । ४ सत्य परमवा०६ ३७ प्रस्तावना २१ ورد - - [ख] बौद्धशासन-परीक्षामे ज्ञानका अविसवादित्व समर्थन करते हुए 'तदुक्तम्' कहकर सिद्धि- विनिश्चयका निम्न पद्य उद्धृत किया है- "विषदर्शनवत्सर्वसज्ञस्याकल्पनात्मकम् । दर्शनं न प्रमाण स्यादविसवादहानित [सिद्धिवि० १।२४ ] इम पद्यको प० महेन्द्रकुमारजीने टीकासे निम्नरूपमे सकलित किया है- "विषदर्शनवदज्ञस्य दर्शनमविकल्पकम् । न स्याव्यमाण सर्वमविसंवादहानित ॥२ यद्यपि अर्थको दृष्टिसे दोनो पद्योमे कोई विशेष अन्तर नहीं है तो भी निश्चय ही विद्यानन्दिको अकलक- का मूल पद्य प्राप्त रहा होगा। [७] यशस्तिलक और सत्यशासन-परीक्षा यशस्तिलक सोमदेवमूरि ( ९५९ ई० ) का महान् सस्कृत ग्रन्थ है। इसमें यशोधरकी कथाके माव्यमसे कला, साहित्य, संस्कृति, इतिहास, धर्म, न्याय, दर्शन आदि अनेक विषयोका महत्त्वपूर्ण विवेचन किया गया है। सोमदेवने यद्यपि न तो विद्यानन्दिका ही उल्लेख किया है और न सत्यशासन-परीक्षाका हो, किन्तु सोमदेवने चार्वाकमतके खण्डनमे जो तर्क दिये है वे स्पष्ट रूपसे सत्यशासन-परीक्षामें विद्यमान है । तुलना कीजिए. [क] यशस्तिलक- "सत्य न धर्म क्रियते यदि स्याद्गर्भावसानान्तर एव जीवः । न चैवम्- जातिस्मराणामथ रक्षसा च दृष्टे पर कि न समस्ति लोके । [ उत्त० ९२] सत्यशासन-परीक्षा- "मृताना केचिद् रक्षोयक्षादिकुलेपु स्वयमुत्पन्नत्वेन कथयता दर्शनात्, केपाचिद् भवस्मृतेरुपलम्भाच्च।" [चार्वाक० ६ १८] [ख] यशस्तिलक- "भूतात्मक चित्तमिद च मिथ्या स्वरूपमेदात्पवनावनीव" [ उत्त० ९३ ] सत्यगासन-परीक्षा- "भूतचैतन्ययो अमेदे शरीराकारपरिणतावनि-वन-पवन- सख पवनामप्येकत्वप्रसङ्गात् ।" [चार्वा० ६ १७ ] [ग] यशस्तिलकमे निम्न दो पद्य नीलपटके नामसे उद्धृत किये गये है, जो कि सत्यशासन-परीक्षामे भी पाये जाते है। - - - . १. सत्य० बौद्ध०६ १५ २ सिद्धिवि० १२४ ३ विशेष विवरण-यश० उत्त० पृ० २७२, सत्य०, चार्वा० ६ १७ २२ सत्यशासन-परीक्षा "स्त्रीमुद्रां झपकेतनस्य महती सर्वार्थसपत्करी, ये मोहादवधीरयन्ति कुवियो मिथ्याफलान्वेषिण. । ते तेनैव निहत्य निर्दयतर मुण्डीकृता लुन्चिता केचित्पञ्चशिखीकृताश्च जटिन कापालिकाश्चापरे । पयोधरभरालसा स्मरविघूर्णितान्ढेक्षणा , क्वचित्सलयपञ्चमोच्चरितगोतझङ्कारिणी । विहाय रमणीरमूरपरमोक्षसौरयाथिना- महो जडिमडिण्डिमो विफलभाण्डपाखण्डिनाम् इनमे से पहला पद्य भर्तृहरिके शृङ्गारशतकमे पाया जाता है। [घ] निम्न पद्य भी सत्यशासन-परीक्षा तथा यशस्तिलक दोनोमे पाया जाता है- "तदहजस्तनेहातो रक्षो दृष्टेभवस्मृतेः । भूतानन्वयनासिद्ध प्रकृतिज्ञ सनातन ॥ [ड ] चार्वाक सिद्धान्तोको विद्यानन्दिने जिस तरह उपन्यस्त किया है ठीक उसी तरह सोमदेवने भो। नि सदेह सोमदेवने विद्यनन्दिके ग्रन्योका गहन अध्ययन किया होगा अन्यथा भाव, भाषा और अर्थका इतना साम्य सम्भव न था। ارد २ , - [आ] जैनेतर ग्रन्थ- [१] छान्दोग्योपनिषद् और सत्यशासन-परीक्षा विद्यानन्दिने छान्दोग्योपनिषद्के निम्न लिखित दो वाक्य सत्यशासन-परीक्षामें उद्धृत किये है- १ "एकमेवाद्वितीय ब्रह्म" [छान्दो० ६।२।१] परमब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षाके पूर्वपक्षमे परमब्रह्मको अद्वैतता सिद्ध करनेके लिए यह वचन प्रमाण- त्वेन उपन्यस्त किया गया है। २ "अशरीर वा वसन्त न प्रियाप्रिये स्पृशत ।" [ छान्दो० ८।१२।१] वैशेपिकगासन-परीक्षामें ईश्वर कर्तृत्वका विचार करनेके प्रसगमें यह वाक्य उद्धृत किया गया है। [२ ] मैत्र्युपनिपद् और सत्यशासन-परीक्षा सत्यशामन-परीक्षाके परमब्रह्माद्वैत प्रकरणमे मैन्युपनिपद्का निम्न वाक्य उद्धृत किया गया है- "सर्व वै खत्विट ब्रह्म' [ मैन्यु० ४।६] यद्यपि यह वाक्य अद्वैतको मिद्धिके लिए ही प्रयुक्त होता है, फिर भी विद्यानन्दिने इसे द्वैतसिद्धिके समर्थन में उद्धृत किया है। विद्यानन्दिका तर्क यह है कि 'सर्वम्' अर्थात् ससार तो प्रसिद्ध है, किन्तु 'ब्रह्म' प्रसिद्ध नहीं है, इस तरह प्रसिद्ध और अप्रसिद्धका द्वैत हो जायेगा। १. सत्य, चार्वाक० ६४, यश० उत्त०, पृ० २५२ शृङ्गार० श्लो० ७९ ३ 'जीव' यठा० । ४ सत्य०, चार्वाक० ६१८, यश० उत्त० २२७ ५. विशेष विवरण-या० उ० पृ० २५२-७३, सत्य० चार्वाक० ६ १-२ ६ सत्य० परमब्रह्म० ६ ५ सत्य० चैो०६ २७ ८. सत्य० परमब्रह्मा० ६.४ -- प्रस्तावना २३ । - [३] बृहदारण्यक और सत्यशासन-परिक्षा बृहदारण्यकका निम्न वाक्य सत्यशासन-परीक्षामै उद्धृत किया गया है- "भात्मा वा रे द्रष्टव्य श्रोतन्योऽनुमन्तव्यो निदिध्यासितव्यः ।" [बृहदा० २।४५] परमब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षाके प्रकरणमे मोक्ष और उसके उपायोका वर्णन करते हुए श्रवण, मनन और ध्यानका विवेचन किया गया है, वहीपर उपर्युक्त वचनको 'तथैव श्रुति ' कहकर प्रमाण स्पसे उद्धृत किया गया है। [४] अमृतविन्दु उपनिपद् और सत्यशासन-परीक्षा सत्यशासन-परीक्षाके परमब्रह्माद्वैत प्रकरणमे पूर्वपक्षके रूपमे ब्रह्माद्वैतका विवेचन करते हुए अमृतबिन्दु उपनिषद्का निम्न वाक्य 'तदुक्तम्' कहकर प्रमाण रूपसे उद्धृत किया गया है- "एक एव तु भूतात्मा भूते मते व्यवस्थित । एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥" [ अमृतबि० उप० पृ० १२, पृ० १५ ] [५] महाभारत और सत्यशासन-परीक्षा महाभारत भारतीय साहित्यका अतिविश्रुत शास्त्र है। ज्ञान-विज्ञानके इस विशालकाय ग्रन्थसे विद्यानन्दिने सत्यशामन-परीक्षामे एक पद्य उद्धृत किया है- "तर्कोऽप्रतिष्ठ श्रुतयो विमिन्ना नामौ मुनिर्यस्य वच प्रमाणम् । धर्मस्य तत्व निहित गुहाया महाजनो येन गत म पन्था ॥"३ [ महाभारत ] चार्वाकशासनके पूर्वपक्षमें आगम, तर्क और धर्म आदिके अभावको स्थापना करते हुए चार्वाकोको ओरसे प्रमाणके रूपमे उपर्युक्त पद्य 'तदुक्तम्' कहकर उद्वत किया गया है । [६] भगवद्गीता और सत्यशासन-परीक्षा महाभारतका विशिष्ट अग भगवद्गीता एक सारभूत ग्रन्थ है। वैदिक मन्तव्योका प्रतिनिधित्व करनेपर भी गीता अपने-आपमे एक स्वतन्त्र दर्शन प्रस्तुत करती है । विद्यानन्दिने गीतासे निम्न पद्य उद्धृत किया है- "ऊर्ध्वमूलमध शाखमश्वत्थ प्राहुरव्ययम् । छन्दासि यस्य पर्णानि यस्त वेद स वेदवित ॥” [ भगवद्गी० १५।१] यह पद्य अद्वैतकी सिद्धिके लिए सत्यशासन-परीक्षाके परमब्रह्माद्वैत प्रकरणमे उद्धृत किया गया है। [७] ब्रह्मसूत्र और सत्यशासन-परीक्षा बादरायणका ब्रह्मसूत्र अद्वैतदर्शनका महान् ग्रन्थ है। इसमे अद्वैतका सागोपाग विवेचन किया गया है। विद्यानदिने सत्यशासन-परीक्षामें परमब्रह्माद्वैतके पूर्वपक्षका प्रतिपादन करनेके प्रसगमें ब्रह्मसूत्रका निम्न सूत्र बादरायणके नामके साथ प्रमाण रूपमे उद्धृत किया है। "तथैवोक्त भगवता बादरायणेन- जन्माघस्य यत [ ब्रह्मसू० १६१।२] १. सत्य० परमब्रह्म० ६ ११ २. सत्य० परमब्रह्म० ६६ ३ सत्य० चार्वाक० ६२ ४ सत्य० परमब्रह्म० २३ ५ सत्य० परमब्रह्म०६७ २४ सत्यशासन-परीक्षा -- - ब्रह्माद्वैतवादी ससारकी उत्पत्ति ब्रह्मसे ही मानते है । दूसरे शब्दोमै उसे वे ब्रह्मका विवर्त कहते हैं । यही बात प्रतिपादित करके उपर्युक्त सूत्रका प्रमाण दिया गया है। [८] साख्यकारिका और सत्यशासन-परीक्षा ईश्वरकृष्णकृत साख्यकारिका साख्यदर्शनका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। संस्कृत पद्योमे साख्य सिद्धान्तोका समग्र विवेचन करनेवाला अपने ढगका यह अनूठा अन्य सत्यशासन-परीक्षामे विद्यानन्दिने साख्यकारिकाकी चार कारिकाएं साख्यशासनके प्रसगमें उद्धृत को है। प्रकृतिके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए 'सत्वरजस्तममा साम्यावस्था प्रकृति ' इस कथनको साक्षीमें निम्न कारिका उद्धत की है- "सत्त्व लघु प्रकाशकमिष्टमवष्टम्मक चलं च रज । गुरुवरणकमेव तम साम्यावस्था मवेत्प्रकृति. ॥"" [ सांख्यका० १३] इस कारिकामे गुणोके स्वरूपके विषयमें जो विचार किया गया है उनका भी आगे गद्यमे विवेचन किया गया है। साख्य ममत सृष्टिक्रमका विवेचन करनेके प्रसगमे निम्न कारिका उद्धृत है- २ "प्रकृतेर्महास्ततोऽहकारस्तस्माद्गणश्च पोडशक. । तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥" [ सारयका० २२] इस कारिकाके विवेचनमें प्रकृतिके प्रधान और वहुधान नाम, महत् और अहकारका स्वरूप, पञ्च तन्मात्रा, पञ्च ज्ञानेन्द्रियां, पञ्च कर्मेन्द्रियां, मन तथा पञ्च भूतोकी सम्यक् व्याख्या की गयी है। साख्याभिमत पुरुपके स्वरूपका निरूपण करते हुए निम्न कारिका उद्धृत है- ३ "मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या प्रकृतिविकृतय पन्च। पोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृति पुरुष ॥" [ मारयका० ३] साख्याभिमत कूटस्थनित्यताका निराम करते हुए प्रसगवश सत्कार्यवादका समर्थन करनेवाली निम्न कारिका उद्धृत की है- ४ "असढकरणादुपाटानग्रहणात् सर्वसम्मवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणमावाच्च सत्कार्यम् ॥" [सांख्यका०६] [६] न्यायसूत्र और सत्यशासन-परीक्षा न्यायमूत्र न्याय और वैशेपिक सिद्धान्तोका विवेचन करनेवाला एक महत्त्वपूर्ण सूत्र ग्रन्थ है। इसपर वात्स्यायनका न्यायभाष्य तथा उद्योतकरका न्यायवार्तिक महत्त्वकी टीकाएं हैं। विद्यानन्दिने अपने ग्रन्थोमें न्यायसूत्रके अनेक सूत्रोको उद्धृत किया है। सत्यशासन-परीक्षामें नैयायिक तथा वैशेपिकशासनोके प्रसगमे न्यायसूत्रके चार सूत्र उद्धृत किये गये है- १. सन्य० साल्य०६१ • वही, ६२ ३ वही, ६४ ४ वही, ६१२ प्रस्तावना २५ - १. "प्रमाणप्रमेयसशयप्रयोजनष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डा- हेत्वामासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्नि.श्रेयसाधिगम ।" [ न्यायसू० १११११] यह सूत्र नैयायिकशासनके पूर्वपक्षमें नैयायिकाभिमत सामग्रीको प्रस्तुत करनेके ध्येयसे उद्धृत किया गया है। २ "दु खजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदन्तरामावादपवर्ग ।" [ न्यायसू० ११११२] यह सूत्र वैशेषिकाभिमत मोक्षके स्वरूपका प्रतिपादन करते हुए वैशेषिकशासनके पूर्वपक्षमें उद्धृत किया गया है। ३. "युगपज्जानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम् ।" [ न्यायसू० १११११६ ] यह सूत्र वैशेषिक दर्शनके समवाय सिद्धान्तका निरसन करने के प्रसगमें उद्धृत किया गया है । ४ "यसिद्धावन्यप्रकरणसिद्धि सोऽधिकरणसिद्धान्त ।" [ न्यायसू० १।१।३० ] यह सूत्र वैशेषिकशासनमे ईश्वरकर्तृत्वका विचार करते समय प्रसगवश अधिकरणसिद्धान्तके स्वरूप- को द्योतित करने के लिए उचूत किया गया है । उपर्युक्त चारो ही सूत्रोके साथ न तो ग्रन्थका नाम आया है न कर्ताका । [१०] सौन्दरनन्द और सत्यशासन-परीक्षा सौन्दरनन्द महाकाव्य बौद्धदर्शन तथा संस्कृत-माहित्यका एक महत्त्वपूर्ण ग्रन्य है । साहित्यको रस और मलकारपूर्ण शैलीमें अश्वघोपने सर्वप्रथम बौद्ध चिन्तनको जनमानस तक पहुँचानेका प्रयत्न किया । विद्यानन्दिने सौन्दरनन्दके निम्नलिखित दो पद्य सत्यशासन-परीक्षामें उद्धृत किये है- १ "टीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिश न काचिद्विदिश न काचित् स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ जीवस्तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनि गच्छति नान्तरिक्षम् । दिश न काचिद्विदिश न काचित् मोहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥"" [ सौन्दर० सर्ग १६, श्लो० २८, २९] उपर्युक्त दोनो पद्य वौद्धाभिमत मोक्षका विवेचन करनेके लिए वौद्धशासन-परीक्षाके पूर्वपक्षमें प्रमाण रूपसे 'तदुक्तम्' कहकर उद्धृत किये गये हैं। [११] प्रशस्तपादभाष्य और सत्यशासन-परीक्षा प्रशस्तपादभाष्य कणादके वैशेषिकसूत्रपर आचार्य प्रशस्तपाद-द्वारा लिखा गया भाष्य है। इसमें विस्तारके साथ वैशेषिक सिद्धान्तोका विवेचन किया गया है। प्रशस्तपादभाष्यपर व्योमशिवाचार्यको व्योमवती टीका है । इस टीकाके साथ भाष्य भी सूत्रग्रन्थ-सा बन गया है । सत्यशासन-परीक्षामें विद्यानन्दिने प्रशस्तपादभाष्यके अनेक सूत्र वैशेषिकदर्शनके प्रकरणमें उद्धृत किये है। [१२] शृङ्गारशतक और सत्यशासन परीक्षा महाकवि भर्तृहरिके तीन शतक १. नीतिशतक, २ शृङ्गारशतक, ३ वैराग्यशतक प्रसिद्ध है। १ सत्य नैया०६१ २. सत्य० वैशे० ६४ ३ वही ६२४ ४. वही ६३५ ५ सत्य० वौद्ध० ६५ ६ सत्य० वैशे० ६ १-३, प्रश० मा० पृ० ६,८,१०-१६ २ - २६ सत्यशासन-परीक्षा -- विद्यानन्दिने सत्यशासन-परीक्षामे शृङ्गारशतकका निम्न पद्य उद्धृत किया है- "स्त्रीमुद्रां कुसुमायुधस्य जयिनी सर्वार्थसपत्करीम् , ये मूढा प्रविहाय यान्ति कुधियो मिथ्याफलान्वेषिण । ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं नग्नीकृता मुण्डिता , केचित्पञ्चशिखीकृताश्च जटिला कापालिकाश्चापरे ॥" [ शृङ्गारशतक ७९] चार्वाक सिद्धान्तोका प्रतिपादन करते हुए इस पद्य को अन्य पद्योके साथ 'तथैवोक्तम्' कहकर उद्धृत किया गया है। [१३] मीमासा-श्लोकवार्तिक और सत्यशासन-परीक्षा मीमासकधुरीण कुमारिलभट्टका मोमासा-श्लोकवार्तिक मीमासादर्शनका मूर्धन्य ग्रन्थरत्न है । संस्कृतके अनुष्टुप् पद्योमें मीमासादर्शनके सिद्धान्तोका तर्कशैलीमे सागोपाग विस्तृत विवेचन करनेवाला अपनी कोटिका यह अकेला ग्रन्थ है। विद्यानन्दिने सत्यशासन-परीक्षामे मीमासासिद्धान्तोका तो खण्डन किया ही है, खास इस ग्रन्थकी कारिकाओको उद्धृत करके उनका भी खण्डन किया है । विभिन्न प्रसगोपर मीमासाश्लोकवातिक- की पांच कारिकाओको उद्धृत किया गया है- पुरुपाद्वैतशासन-परीक्षामें प्रत्यक्षसे पुरुपाद्वैतकी सिद्धि करते हुए निर्विकल्पकप्रत्यक्षको परमब्रह्मका साधक बताया गया है तथा ज्ञानको निर्विकल्पताके लिए मीमासा-श्लोकवार्तिकका निम्न पद्य उद्धृत किया है- १. "अस्ति ह्यालोचनज्ञान प्रथम निर्विकल्पकम् । बालमूकादिविज्ञानं सदृश शुद्धवस्तुजम् ॥ [ मी० श्लो०, प्रत्यक्ष० श्लो० १२० ] इसी प्रमगमे सामान्यका खण्डन करते हुए दूसरा निम्न पद्य आया है- २ "निर्विशेष न सामान्य भवेत्खरविषाणवत् । सामान्यरहितत्वाच्च विशेषास्तदेव हि ॥" [ वही आकृति० श्लो० १०] मीमासाशासन-परीक्षामें विभिन्न प्रमगोपर निम्न तीन पद्य है- ३ "तस्मात् पिण्डेपु गोबुदिरेकगोत्वनिवन्धना । गवाभासकरूपाभ्यामेकगोपिण्डबुद्धिवत् ॥" [वहीं वन० श्लो० ४४, ४५] ४ "न शावलेयाद्गोबुद्धिस्ततोऽन्यालम्वनापि वा। तदमावेऽपि सद्मावाद् घटे पार्थिवबुद्धिवत् ।।" ५ "मोक्षाथी न प्रवर्तत तत्र काम्यनिपिद्धयो । नित्यनैमित्तिके कुर्यात् प्रत्यवायजिहासया ।। [ वही सव० श्लो० १५० ] [१४] प्रमाणवार्तिक और सत्यशासन-परीक्षा प्रमाणवातिक बौद्धदर्शनके प्रस्थापक आचार्य धर्मकीतिका महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है । वौद्धन्यायको न्यायशास्त्र- की समुन्नत वैदिकापर लानेका कार्य अकेला प्रमाणवातिक कर सकता है। न्यायकी प्रौढ एव ताकिक भाषा सत्यः चार्वाक०६३ २ सत्य. परमब्रह्म ३ शशविपाणवत् , इति पाठभेद । ४ वही १७ - 3 १ cor प्रस्तावना व शैलीमे वौद्धचिन्तनकी सविस्तर और सागोपाग व्याख्या करनेवाला यह ग्रन्य भारतीय दर्शनोको महत्त्वपूर्ण देन है। , सत्यशासन-परीक्षामे विद्यानन्दिने प्रमाणवार्तिकमे प्रतिपादित सिद्धान्तोका खण्डन किया है। बौद्ध- शासन-परीक्षाके प्रसगमें प्रमाणरूपमें प्रमाणवातिकके निम्न वाक्य उद्धृत किये गये है- १. "अभिप्रायनिवेदनादविसवादनम् ।" [प्र. वा० ११३] परमाणु प्रत्यक्षका विचार करते हुए निर्विकल्पक प्रत्यक्षको अविसवादविक्ल होनेसे अप्रमाण बताया गया है, इसी प्रसगमें प्रमाणवातिकके एक पद्यका यह अन्तिम चरण उद्धृत किया है । २ "शुक्तौ वा रजताकारो रूपसादृश्यदर्शनात् ॥" [१५] न्यायविन्दु और सत्यशासन-परीक्षा न्यायविन्दु भी वौद्ध दार्शनिक आचार्य धर्मकीतिको कृति है । सम्पूर्ण बौद्धन्यायका सक्षेपमे परिचय करा देनेवाला यह ग्रन्थ न्यायशास्त्रमे महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। विद्यानन्दिने सत्यशासन-परीक्षामे न्याय- विन्दुका एक सूत्र उद्धृत किया है- "प्रत्यक्ष कल्पनापोढमभ्रान्तम् ।” [ न्यायवि० १।४] वौद्धशासन-परीक्षाके उत्तरपक्षमे परमाणुप्रत्यक्षका खण्डन करते हुए प्रसगवश उपर्युक्त सूत्र उद्धृत हुना है। १६] हेतुविन्दुटीका और सत्यशासन-परीक्षा हेतुविन्दु-प्रकरण बौद्ध दार्गनिक धर्मकीर्तिकी रचना है । इसीपर अर्चटने हेतुविन्दुटीका नामक टीका लिखी। इसमें आयो हुई निम्नलिखित चार कारिकाएँ विद्यानन्दिने 'तदुक्तम्' कहकर मीमासाशासन-परीक्षामे उद्धृत की है- "तादात्म्य चेन्मत जातेयक्तिजन्मन्यजातता। नाशेऽनाशश्च केनेष्टस्तद्वच्चानन्वयो न किम् ।। व्यक्तिजन्मन्यजाता चेदागता नाश्रयान्तरात् । प्रागासीन्न च तद्देशे सा तया सगता कथम् ।। व्यक्तिनाशे न चेन्नष्टा गता व्यक्त्यन्तर न च । तच्छून्ये न स्थिता देशे सा जाति केति कथ्यताम् ।। व्यक्तर्जात्याठियोगेऽपि यदि जातेः स नेप्यते । तादात्म्य कथमिष्ट स्यादनुपप्लुतचेतसाम् ॥ [१७] प्रमाणवार्तिकालंकार और सत्यशासन-परीक्षा प्रमाणवातिकालकार धर्मकीतिके प्रमाणवार्तिकपर लिखा गया सस्कृत भाष्यग्रन्थ है। इसके रचयिता प्रज्ञाकरगुप्तने धर्मकीतिके द्वारा प्रमाणवातिकमे चर्चित सभी मन्तव्योका विस्तारके साथ विवेचन किया है। सत्यशासन-परीक्षामे विद्यानन्दिने विज्ञानाद्वैत-परीक्षामे प्रज्ञाकरगुप्त-द्वारा चचित विज्ञानमात्रका विस्तारसे खण्डन किया है। निम्नलिखित अनुमान वाक्यको उद्धृत भी किया है- "सर्वे प्रत्यया निरालम्वना , प्रत्ययत्वात् , 3 १ सत्य० बौद्ध०६९ २ सत्य० वौद्ध०६ ३ मीमा० ६ १०, हेतुबि० टी०, पृ० ३२ तावुभौ यदि सर्वज्ञौ मतभेदस्तयो कथम् ॥ २८ सत्यशासन-परीक्षा स्वप्नप्रत्ययवत्" [प्रमाण० वातिकाल० पृ० ३५९ ] [१८] तत्त्वसंग्रह और सत्यशासन-परीक्षा शान्तरक्षितका तत्त्वसग्रह बौद्धदर्शनके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थोमे-से है। इसमे सभी भारतीय दर्शनोको पूर्व- पक्षके रूपमें प्रस्थापित करके उनका खण्डन किया गया है। विद्यानन्दिने सत्यशासन-परीक्षामे तत्त्वसग्रहसे चार्वाक दर्शनके प्रसंगमें निम्न पद्य उद्धृत किया है- "सुगतो यदि सर्वज्ञ कपिलो नेति का प्रमा। 3 किया है। [ तत्त्वसंग्रह ३१४९] [१९] ब्रह्मसिद्धि और सत्यशासन-परीक्षा ब्रह्मसिद्धि आचार्य मण्डनमिश्रकी कृति है। विद्यानन्दिने इसका 'आहुविधातृप्रत्यक्षम्' इत्यादि पद्य सत्यशासन-परीक्षाके परमब्रह्माद्वैत प्रकरणमे उद्धृत [२०] संवन्धवार्तिक और सत्यशासन-परीक्षा सबन्धवार्तिक सुरेश्वर मिश्र-द्वारा रचित वेदान्त सिद्धान्तोका विवेचन करनेवाली एक महत्त्वपूर्ण कृति है। विद्यानन्दिने सत्यशासन-परीक्षामे इसके आठ पद्योको परमब्रह्माद्वैत-परीक्षाके प्रकरणमे उद्धृत किया है। इन पद्योमे नाना विकल्पोके साथ अविद्याको सिद्ध करनेका प्रयत्न किया गया है। [१] ग्रन्थकार-परिचय विद्यानन्दि और उनका युग विद्यानन्दिने अपने विषयमे कही कोई स्पष्ट जानकारी नही दी। उनके शास्त्रोका अन्त परिशीलन फरनेपर हम इस निष्कर्पपर पहुँचते है कि- आचार्य विद्यानन्दिका आविर्भाव भारतीय दर्शनोके उस स्वर्ण-कालमे हुआ था जव न्यायशास्त्र अपने पूर्ण यौवनकी उत्ताल तरगोमे मदमाता झूम रहा था। न्यायशास्त्रकी अनेक मान्यताएँ स्थिर हो चुकी थी। शास्त्रकारोका उद्देश्य स्पष्ट हो गया था तथा पूर्वाचार्योंने प्रगतिकी एक लम्बी मजिल तय कर ली थी। विद्यानन्दिने पाया कि वैदिक, बौद्ध और जैन-न्यायके परस्पर तार्किक घात-प्रतिघातसे मंजकर प्रत्येक दर्शनके अनेक सिद्धान्त स्थिर, निश्चित और सुव्यवस्थित हो गये है। जैनदर्शनके जो मूल्य आगमोमें निर्धा- रित किये गये थे उनका दोहन करके गृद्ध पिच्छाचार्य उमास्वातिने तत्त्वार्थसूत्रमें उनका सकलन किया था। समन्तभद्र और सिद्धसेनने शुद्ध तार्किक शैलीमें उनकी प्रतिष्ठा करनेका सूत्रपात किया। उधर दिग्नागने बौद्ध चिन्तनको ऐसी सुदृढ पृष्ठभूमि तैयार की, जिसपर धर्मकोतिने बौद्धन्यायके महाप्रासादका निर्माण किया । कणाद, जैमिनि, अक्षपाद, वात्स्यायन तथा प्रशस्तपादके क्रमिक चिन्तनसे एक ऐसे धरातलकी रचना हुई कि मीमासकधुरीण कुमारिलने आते ही दार्शनिक जगत्मे धूम मचा दो। धर्मकीतिने प्रमाणवातिकमे तथा कुमा- रिलने मीमासाश्लोकवातिकमे सिद्धान्तोका पारस्परिक खूब खडन-मडन किया। जब अफलव का उदय हुमा, उन्हें जैन-न्यायके सितारे डूबते-से दृष्टिगोचर हुए, किन्तु उन्होने धर्मकीति और कुमारिलका सामना करनेके १. सत्य०, विज्ञान०६११ २. सत्य० चार्वाक०६१ ३. मत्य० परमब्रह्म० ६ १९ ४ सत्य० परमब्रह्म० ६३५, सम्बन्धवातिक, श्लो० १७७.१८२ प्रस्तावना २९ लिए जिस उन्नत सुमेरुका निर्माण किया उसकी पृष्ठभूमिमें आगमिक मूल्योसे लेकर उमास्वाति, समन्तभद्र, सिद्धसैन आदि सभी आलोकित हो उठे। इन पूर्वाचार्योके चिन्तनको पल्लवित और पुष्पित करनेवाले अकलक जैन-न्यायके प्रस्थापक आचार्य सम्राट् वन गये । धर्मकीति और कुमारिलके खण्डनका सयुक्तिक उत्तर देकर अकलकने जैन-न्यायको भारतीय न्याय-शास्त्र के इतिहासमें मूर्धन्य बना दिया । अकलक-न्यायको सम्पूर्ण रूपमै आत्मसात् करनेवाले आचार्य विद्यानन्दिको चिन्तनका एक अपूर्व भाण्डा- गार विरासतमे मिला । कुन्दकुन्द और उमास्वातिका विशुद्ध तत्त्वज्ञान, समन्तभद्र और सिद्धसेनको प्रसन्न तर्कशैली तथा भट्ट अकलंकका अपराजेय पाण्डित्य विद्यानन्दिको पैतृक सम्पत्तिकी धरोहरकी तरह प्राप्त हुए । अपनी तलस्पशिनी प्रज्ञाके वलपर सुयोग्य उत्तराधिकारीको तरह एक-एक कणको सुरक्षाके लिए विद्यानन्दिने एक ऐसे महाप्राकारका निर्माण किया, जिसके सिंहद्वारके सामने पहुंचते ही अभिमानीका मान चूर-चूर हो जाये। विद्यानन्दि अकलकके साक्षात् शिष्य रहे हो या नही, किन्तु उन्हें अकलकको जो विरासत मिली उमसे वे अकलकके उत्तराधिकारी अवश्य वन गये । अकलकका समस्त चिन्तन, भाव, भाषा और शैली विद्यानन्दिकी उपजीव्य बन गयी। अकलकको वौद्ध दार्शनिकोका सामना करनेमे अत्यधिक आयास करना पड़ा था, किन्तु उस आयासके प्रतिघातसे बौद्धन्यायको ऐसा धक्का लगा कि कमसे-कम वह विद्यानन्दिके सामने तो मुंह नही हो उठा सका। यही कारण है कि अकलकके ग्रन्थोमें बौद्ध सिद्धान्तोका जितना खण्डन है, उतना विद्यानन्दिके ग्रन्थोमे नही। विद्यानन्दिको सम्भवतया धर्मकीतिके शिष्योको अपेक्षा कुमारिलके उत्तराधिकारियोसे अधिक निपटना पडा, यही कारण है कि विद्यानन्दिका गास्न मीमासा और वैशेपिक सिद्धान्तोके खण्डनसे भरा पड़ा है। इतना होनेके वाद भी सम्भवतया विद्यानन्दिको परवादियोका उतना मुकाबला नहीं करना पडा जितना कलकको करना पड़ा था, इसी कारण अकलकके द्वारा प्रस्थापित प्रमेयोको विस्तारके साथ समझानेका उन्हें पर्याप्त अवसर प्राप्त हो गया। अकलकके एक-एक शब्दको विद्यानन्दिने अपनी प्रज्ञा प्रकाशसे ऐसा आलोकित कर दिया कि युगो-युगो तक वह आकाश दीपका काम करता रहे। जिस युगमें विद्यानन्दिका आविर्भाव हुआ उस युगमें शास्त्र-रचनाको एक विशेष शैली निश्चित हो चुकी थो। किसी भी अन्य दर्शनके सिद्धान्तको पूर्वपक्षके रूपमें अपने ग्रन्थमे प्रस्थापित करके उत्तरपक्षमे उसका खण्डन करना तथा तत्पश्चात् स्व-सिद्धान्तका स्थापन करना। शास्त्र-रचनाकी इस पद्धतिने दार्शनिक अस- हिष्णुताके उस युगमे भी शास्त्रकारको अन्यान्य दर्शनोका अध्ययन करना अनिवार्य बना दिया था । इस अनि- वार्यताका भी विद्यानन्दिके व्यक्तित्वनिर्माणमें उतना हो महत्त्वपूर्ण योगदान मानना चाहिए नितना अकलककी धरोहरका । विद्यानन्दिने अपने युगको इस अनिवार्य आवश्यकताको दृष्टिमे रखते हुए प्रत्येक दर्शनके मूल ग्रन्थोका मन्त प्रविष्ट अध्ययन किया और उनमे प्रतिपादित सिद्धान्तोके लचीलेपनको सामने लाकर उसपर तर्कका भयकर वज्र-प्रहार किया। विपुल विमल प्रज्ञाके धनी इस महान दार्शनिकका चिन्तन अपने युगपर सहस्ररश्मिके प्रकाशकी तरह ऐसा छा गया कि भारतीय चिन्तनके इतिहाससे उसे मोझल करनेकी कल्पना-मानसे भी सम्पूर्ण ज्ञानाकाश तिमिराच्छन्न-सा होने लगता है। [२] विद्यानन्दिका समय आचार्य विद्यानन्दिने अपने किसी भी ग्रन्थमे अपने समयका निर्देश नही किया इसलिए उनके ग्रन्योके अन्त परीक्षण तथा अन्य पूर्वोत्तर आचार्योके उल्लेखोके भाधारपर उनके समयका निर्णय किया जाता है।

३० सत्यशासन-परीक्षा - . आप्तपरीक्षाको प्रस्तावनामे प० दरबारीलालजी कोठिया, न्यायाचार्यने इस तरहसे सुन्दर विचार किया है, उसीका सार नीचे प्रस्तुत किया जाता है- पूर्वावधि- १ न्यायसूत्रपर लिखे गये वात्स्यायन ( ई० ३-४ शती ) के न्यायभाष्य और न्यायसूत्र तथा न्याय- भाष्यपर रचे गये उद्योतकरके न्यायवातिकका तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक (पृ० २०५, २०६, २८३, ३०९ ) मे नामोल्लेखपूर्वक तथा विना नामके सविस्तर समालोचन किया है। उद्योतकरका समय ६०० ई० माना जाता है, इसलिए विद्यानन्दि ६०० ई० के पूर्ववर्ती नही हो सकते । २ विद्यानन्दिने जैमिनि, शवर, कुमारिलभट्ट और प्रभाकरके सिद्धान्तोका अपने ग्रन्थोमे खण्डन किया है । कुमारिल तथा प्रभाकरका समय ईसाकी सातवी गताब्दी ( ई० ६२५ से ६८०) है। अन विद्यानन्दि ६८० ई० के पश्चाद्वर्ती है। ३ विद्यानन्दिने कणादके वैशेषिक सूत्र तथा उसपर लिखे गये प्रशस्तपादभाष्य तथा प्रशस्तपादभाष्य- पर रची गयी व्योमशिवाचार्यको टीकाका आप्तपरीक्षा (पृ० २४, २५, १०६, १०७, १४९ ) में खण्डन किया है । व्योमशिवाचार्यका समय ई० सातवी शतीका उत्तरार्ध ( ६५० से ७०० ई० ) माना जाता है, अत विद्यानन्दि ७०० ई० के पूर्ववर्ती नही हो सकते । ४ धर्मकीति और उनके अनुगामी प्रज्ञाकर तथा धर्मोत्तरका अष्टसहस्री ( पृ० ८१, १२२, २७८ ), प्रमाणपरीक्षा ( पृ० ५३ ) में खण्डन किया है । धर्मोत्तरका समय ई० ७२५ माना जाता है, अत विद्यानन्दि ७२५ ई० के पश्चाद्वर्ती है। ५. अप्टसहस्री (पृ० १८ ) मे मण्डनमिश्रका नामोल्लेखपूर्वक तथा श्लोकवार्तिक ( पृ० ९४ ) और सत्यशासन-परीक्षा (पुरुषा० ६ १९) मे उनको ब्रह्मसिद्धि की 'आहुविवातृप्रत्यक्षम्' कारिकाको उद्धृत किया है। शकराचार्य के प्रधान शिष्य सूरेश्वरके वृहदारण्यकोपनिपद्भाष्यवात्तिक (३-५) से अष्टमहस्री (पृ० ९३, १६१) में पद्य उद्धृत किये है । मण्डनमिश्र का समय ई० ६७० से ७२० तक और सूरेश्वरका समय ई० ७८८ से ८२० तक समझा जाता है । विद्यानन्दिके ग्रन्थोमें सूरेश्वरसे उत्तरवर्ती किसी भी अन्य या ग्रथकारका उल्लेख नही है । अतएव ८२० ई० विद्यानन्दिकी पूर्वावधि मानना चाहिए । उत्तरावधि- ६ वादिदेवमूरिने अपने पार्श्वनाथचरित ( श्लो० २८) और न्यायविनिश्चयविवरण ( प्रशस्ति २) मे आचार्य विद्यानन्दिकी स्तुति की है । वादिदेवका समय ई० सन् १०२५ सुनिश्चित है, अत विद्यानन्दि १०२५ ई० के पूर्ववर्ती है। ७ प्रशस्तपादभाष्यपर चार टीकाएं है जिनमे से विद्यानन्दिने केवल प्रथमका खण्डन किया है अन्यका नही । चौथी टीका लक्षणावली उदयनने मन् ९८४ मे बनायी, अत विद्यानन्दि इसके पूर्ववर्ती है । ८ उद्योतकरके न्यायवार्तिकपर वाचस्पति मिश्र की तात्पर्यटोका है। विद्यानन्दिने उद्योतकरका तो खण्डन किया, किन्तु वाचस्पति मिश्रका नही। वाचस्पतिका समय ई० ८४१ है । अत विद्यानन्दि उसके पूर्ववर्ती हैं। इस तरह अन्तरग परीक्षण द्वारा विद्यानन्दिका समय ई० ७७५ से ८४० तक निश्चित होता इस समयको पुष्टिमे और प्रमाण भी विद्यमान है- ९ विद्यानन्दि अकलकके सर्वप्रथम टीकाकार है। अकलकका ममय न्यायाचार्य प० महेन्द्र कुमार- जोने विगेप ऊहापोहके बाद ई० ७२०-७८० निश्चित किया है, अत विद्यानन्दि इसके उत्तरवर्ती है ।

प्रस्तावना ३१ १० अष्टसहन्त्रीको प्रशस्तिमे विद्यानन्दिने कुमारसेनका उल्लेख किया है । कुमारसेन ई० ७८३ के विद्वान् है, मत विद्यानन्दि उमके वादके है। ११ तत्त्वार्थश्लोकवातिकको प्रशस्तिमे निम्न पद्य आया है- "जीयात्सज्जनताऽऽश्रय शिव-सुधाधारावधानप्रभु , ध्वस्तध्वान्ततति समुन्नतगतिस्तीव्रप्रतापान्वित । प्रोज्योतिरिवावगाहनकृतानन्तस्थितिर्मानत , सन्मार्गस्त्रितयात्मकोऽखिलमलप्रज्वालनप्रक्षम ॥" प्रस्तुन पद्यमें विद्यानन्दिने उलेपसे शिवमार्ग-मोक्षमार्ग तथा शिवमार द्वितीयका यशोगान किया है। शिवमार द्वितीय गगवगो श्रीपुरुष नरेशका उत्तराधिकारी तथा उसका पुत्र था जो ई० ८१०के लगभग राज्यका अधिकारो हुआ। इमने श्रवणवेलगोलाकी छोटी पहाडीपर एक वसदि बनवायी थी, जिसका नाम "शिवमारन वसदि' था। चन्द्र नाथ स्वामी वसदिके निकट एक चट्टानपर कनडी भाषामे 'शिवमारन बसदि' यह अभिलेख अकित है। इस अभिलेखका समय भापालिपिज्ञानको दृष्टिमे लगभग ८१० माना जाता है । शिवमारने कुम्मडवाडमे भी एक वसदि बनवायी थी। इन प्रसगोसे ज्ञात होता है कि शिवमार द्वितीय अपने पिता श्रीपुरुषको ही तरह जैनधर्मका उत्कट समर्थक एव प्रभावक था। विद्यानन्दिने श्लोकवातिकको रचना इसी कालमे को होगी। १२. इस शिवमारका भतीजा और विजयादित्यका लडका राचमल्ल सत्यवाक्य प्रथम शिवमारके राज्यका उत्तराधिकारी हुमा तथा ई० सन् ८१६ के आसपास राजगद्दीपर बैठा। विद्यानन्दिने अपने अन्य ग्रन्थोमे इसका भी उल्लेख किया है- [क ] "स्थेयाज्जातजयध्वजाप्रतिनिधि प्रोद्भुतभूरिप्रभु , प्रध्वस्ताखिल-दुर्नय-द्विषदिमि सन्नीतिसामर्थ्यत । सन्मार्गस्त्रिविध कुमार्गमथनोऽर्हन् वीरनाथ श्रिये, शश्वत्सस्तुतिगोचरोऽनघधियां श्रीसत्यवाक्याधिप ॥ [ख] "प्रोक्तं युक्त्यनुशासन विजयिमिः स्याहाटमार्गानुगै- विद्यानन्दबुधैरलङ्कृतमिद श्रीसत्यवाक्याधिपै ॥"" [ग] "जयन्ति निर्जिताशेषसर्वथैकान्तनीतय । सत्यवाक्याधिपा शश्वविद्यानन्दा जिनेश्वराः॥ [घ ] "विद्यानन्दै स्वशक्त्या कथमपि कथित सत्यवाक्यार्थसिद्धथै ७ उक्त प्रमाणोके आधारपर विद्यानन्दिका समय ई० ७७५ से ८४० प्रमाणित होता है। ६ १ शिलालेस स० २५६ । २ मिडियावल जैनिज्म पृ० २४,२५ । ३ राइस-मेसूर और कुर्ग : पृ० ४१ । ४ युक्त्यनुशासनालकारप्रशस्ति । ५ वही। ६ प्रमाणपरीक्षा मगलाचरण । आप्तपरीक्षा श्लो० १२३ । ७ ३२ सत्यशासन-परीक्षा [३] विद्यानन्दिको रचनाएँ- अबतक विद्यानन्दिके निम्नलिखित ग्रन्थोका परिचय प्राप्त हुआ है- १ तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक -उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रपर कुमारिलके मीमासाश्लोकवार्तिक और धमकीतिके प्रमाणवातिककी तरह विद्यानन्दिने पद्यात्मक तत्त्वार्थश्लोकवातिक रचा और उसपर गद्यात्मक भाष्य लिखा । यह भाण्य तत्त्वार्यश्लोकवार्तिकभाष्य, तत्त्वार्थश्लोकवातिकव्याख्यान, तत्त्वार्थश्लोकवातिकालङ्कार और श्लोकवातिकभाष्य नामोसे प्रसिद्ध है । तत्त्वार्थश्लोकवातिक जैन सिद्धान्त और दार्शनिक मन्तव्योका प्रामाणिक विश्लेषण करनेवाला उत्कृष्ट कोटिका ग्रन्थ है। विद्यानन्दिने इसकी रचना करके कुमारिल और धर्मकोति-जैसे धुरघर तार्किको-द्वारा जैनदर्शनपर किये गये आक्षेपोका सयुक्तिक उत्तर दिया तथा जैन-चिन्तनको तर्कको कसोटीपर कसकर सिद्धान्त- शास्त्रको न्यायशास्त्रकी कोटिमें ला दिया । इस महान ग्रन्थका प्रकाशन सर्वप्रयम सेठ रामचन्द्र नाथारङ्गजी-द्वारा सन् १९१८ में हुआ था, उसके वाद कुन्थुसागर जैन ग्रन्थमालासे प० माणिकचन्द्रजी न्यायाचार्यकृत हिन्दी अनुवादसहित कई भागोमें प्रकाशित हो रहा है । नि सदेह न्यायके ग्रन्थोका हिन्दी अनुवाद अत्यन्त कठिन कार्य है-इस दृष्टिसे अनुवादक अभि- नन्दनीय है, किन्तु यदि मूल ग्रन्यका सशोधन सम्यक् प्रकारमे हो जाता तो सोनेमे सुगन्धका काम होता । २ अष्टसहस्री या देवागमालङ्कार-यह समन्तभद्र विरचित 'आप्तमीमासा' अपर नाम 'देवा- गमस्तोत्र' पर लिखा गया विस्तृत एव महत्त्वपूर्ण भाष्य है । विद्यानन्दिने अत्यन्त कुशलताके साथ अकलककी अष्टगतोको अष्टसहस्रीमें अन्त प्रविष्ट करके 'आप्तमीमासा' की प्रत्येक कारिकाका व्याख्यान किया है। अण्टमहस्रो न्यायको प्राञ्जल भापामे लिखा गया अत्यन्त दुरुह और जटिल ग्रन्थ है। स्वय विद्या- नन्दिने इसे 'कण्टसहस्री' कहा है। अकलकको अष्टशतीके प्रत्येक पदका हार्द विद्यानन्दिकी अष्टसहस्रीके बिना नहीं समझा जा सकता। मेरा तो यहांतक विचार है कि समन्तभद्र को समझनेके लिए भी विद्यानन्दिके शास्त्रोका सूक्ष्म अभ्याम आवश्यक है । अण्टमहस्रीमें 'आप्तमीमासा' तथा 'अष्टशती' में चचित विषयोके अतिरिक्त भी अनेक नये विषयोका विवेचन किया है। विद्यानन्दिको यह उक्ति केवल गर्वोक्ति नहीं है कि- "श्रोतव्याप्टसहस्री श्रुतै किमन्यै सहस्रसख्यानै । विज्ञायेत ययैव हि स्वसमय-परसमयसद्भाव ॥ अर्थात् हजार शास्त्रोको सुननेसे क्या, अकेली अण्टसहस्रीको सुन लेनेसे स्व-सिद्धान्त और पर-सिद्धान्तो- का ज्ञान हो जायेगा। अण्टसहस्रोका प्रकागन सन् १९१५ में सेठ नाथारङ्गजी गान्धी-द्वारा किया गया था। वर्तमानमे ग्रन्थ वाजारमें प्राप्त नहीं होता । इसका सुसम्पादित नवीन सस्करण नितान्त आवश्यक है। अण्टसहनीपर लघुसमन्तभद्र (वि० की १३वी शती) की 'अष्टसहस्री विपमपदतात्पर्यटीका' तथा यशोविजय ( वि० की १७वी शतो ) की 'अष्टसहस्रोतात्पर्यविवरण' नामक व्याख्याएँ है। ३ युक्तयनुशासनालङ्कार-यह आप्तमीमासाकार समन्तभद्रके द्वितीय ग्रन्थ युक्त्यनुशासनपर विद्यानन्दिको विगद टोका है। इसीलिए इसके युक्त्यनुशासनालकार तथा युक्त्यनुशासनटीका ये दो नाम २ " प्रसिद्ध है। आप्तपरीक्षाकी प्रस्तावनामें दिये गये १ श्री प० दरबारीलालजी कोठिया न्यायाचार्य-द्वारा परिचयके आधारसे। २ अष्टसहस्री, प्रशस्ति, श्लो० २ । ३ श्रष्टसहस्री, पृ० १५७ ।

प्रस्तावना ३३ - युक्त्यनुशामन ६४ पद्योका एक मक्षिप्त स्तोत्र है, परन्तु जैमा कि प० दरवारीलालजी न्यायाचार्यने लिखा है, इसका प्रत्येक पद्य इतना दुम्ह और गम्भीर है कि प्रत्येकके व्याख्यानमे एक-एक स्वतन्त्र ग्रन्थकी रचना हो सकती है। विद्यानन्दिने अपनी व्याख्यामे इन्ही पद्योका सक्षेपमें रहस्योद्घाटन किया है। युक्त्यनुगासनालङ्कारका प्रकाशन वि० स० १९७७ मे 'माणिकचन्द्र दिगम्बर जैन ग्रन्थमाला'से हुआ था, किन्तु अब अप्राप्य है। ४ विद्यानन्दिमहोदय-यह ग्रन्थ अनेक प्रयत्नोके बाद भी अबतक उपलब्ध नहीं हो सका। न्वय विद्यानन्दि तथा अन्य आचार्योके उन्लेखोके आधारपर यह कहा जा सकता है कि यह विशालकाय एव बहु- विपयचित अपूर्व ग्रन्य होना चाहिए। स्वय विद्यानन्दिने श्लोकवातिक तथा अष्टसहस्री-जैसे विशालकाय ग्रन्थोमें चर्चित कई विषयोको विस्तारके साथ 'विद्यानन्दिमहोदय'मे देखनेका परामर्श दिया है। वादिदेवसूरिने विद्यानन्दिमहोदयको निम्न पक्तियां उद्धृत की है- "महोदय च 'कालान्तराविस्मरणकारण हि धारणाभिधान ज्ञान सस्कार प्रतीयते' इति वदन् ( विद्यानन्द ) सस्कारधारणयोरेकार्थ्यमचकथत । इम महान् ग्रन्थके प्राप्त होनेकी आशा और प्रयत्न रखना चाहिए । ५ आप्तपरीक्षा-आप्तपरीक्षामें, जैसा कि इसके नामसे प्रकट 'आप्त'की परीक्षा की गयी है। न्यायको शैली में ममन्तभद्रकी आप्नमीमामाके बाद यह पहला मौलिक ग्रन्थ है, जिसमे नैयायिकादिसम्मत ईश्वर, सास्याभिमत कपिल, बौद्धाभिमत सुगत, अद्वैनके परमपुरुष एव जैनोके अर्हन्तकी परीक्षा करके उनमें- मे सच्चे 'आप्त'को सिद्ध किया गया है। आप्नपरीक्षाकी मूल प्रेरणा आप्तमीमासा तथा रचनाका आधार निम्न पद्य है- "मोक्षमार्गस्य नेतार भेत्तार कर्मभूभृताम् । ज्ञातार विश्वतत्त्वाना वन्दे तद्गुणलब्धये ॥" इस पद्यको निश्चल भूमिकापर आप्तपरीक्षाका विशाल प्रासाद निर्मित हुआ है। आप्नपरीक्षा सर्वप्रथम पत्रपरीक्षाके साय 'सनातन जैन ग्रन्थमाला' मे १९१३ मे प्रकाशित हुई थी, इसके बाद मन् १९३० मे जन-साहित्य प्रसारक कार्यालय, बम्बईसे केवल आप्नपरोक्षाका पुन मुद्रण हुआ । पुन मन् १९४९ में 'वोरमेवामन्दिर'से प० दरबारीलाल जो कोठिया न्यायाचार्य-द्वारा सुसम्पादित होकर महत्त्वपूर्ण प्रस्तावना आदि तथा हिन्दी अनुवादके साथ प्रकाशित हुई । विद्यानन्दिके सभी ग्रन्योके ऐसे प्रामाणिक एव सर्वोपयोगी सस्करण अपेक्षित है। ६ प्रमाणपरीक्षा-जैसा कि इस ग्रन्थके नामसे प्रकट है, इसमे प्रमाणकी परीक्षा की गयी है । प्रमाणका 'सम्यग्ज्ञानत्व' लक्षण करके उसके भेद, प्रभेद, विषय, फल तथा हेतुओकी विस्तृत एव सुसम्बद्ध रचना की गयी है । हेतु-भेदोके निदर्शक कुछ महत्त्वपूर्ण सग्रहश्लोकोको भी उद्धत किया गया है जो किन्ही पूर्ववर्ती जैनाचार्योंके प्रतीत होते है । विद्यानन्दिने इसकी रचना अकलकदेवके प्रमाणमग्रह आदि ग्रन्थोसे प्रेरणा एव पृष्ठभूमि लेकर को होगी। प्रमाणपरीक्षा सन् १९१४ में 'सनातन जैन ग्रन्थमाला से आप्तमीमासाके साथ मुद्रित हुई थी। इसका हेमचन्द्रको प्रमाणमीमामाकी तरह सुसम्भादित सस्करण अपेक्षित है । १ "इति परीक्षितमसकृविद्यानन्दमहोदये ।"-तत्वार्थश्लो०, पृ० २७२ । "यथागम प्रपञ्चेन विद्यानन्दमहोदयात् ।"-वही, पृ० ३८. । "इति तत्त्वार्थालङ्कारे विद्यानन्दमहोदये च ।"-अष्टस०, २९० । २ स्याद्वादरत्नाकर, पृ० ३४९ । ३ भाप्तपरीक्षा, का० ३ ।

सत्यशासन-परीक्षा ។ ७ पत्रपरीक्षा-इम ग्रन्यमें पत्रलक्षणोको समीक्षा की गयो है तथा जनदृष्टिमे पत्रका परिष्कृत लक्षण दिया गया है। पत्रपरीक्षाम विद्यानन्दिने प्रतिज्ञा और हेतु ये दो ही अनुमानके अग बताये है। प्रतिपायागयानुरोध से दशावयवोका भी समर्थन किया गया है, किन्तु ये दगावयव न्यायदर्शनमें प्रमिद्ध दशावयवोमे भिन्न है। विद्यानन्दिकी तर्कप्रधान रचनाओमे यह सबसे अधिक लघुकाय है। इसका प्रकागन 'सनानन जैन ग्रन्यमाला' मे बनारमसे सन् १९१३ मे आप्तपरीक्षाके माथ हुआ था। ८ सत्यशासनपरीक्षा-प्रस्तुत ग्रन्थ । ९ श्रीपुरपार्श्वनाथस्तोत्र-आप्तमीमामा या देवागमस्तोत्रकी शैलीमें लिखा गया यह एक ३० पद्योका स्तोत्र है । देवागमस्तोत्रकी तरह हो दुल्ह और जटिल भी है । इस स्तोत्रका विषय श्रीपुरस्थ भगवान् पार्श्वनाथको स्तुति है। कपिल आदिम अनाप्तता बतलाकर पावनायमें बाप्तता मिद्ध की गयी है और उनके वीतरागत्व, मर्वज्ञत्व और मोक्षमार्गप्रणेतृत्वको स्तुति की गयी है। श्रीपुरपार्श्वनाथस्तोत्र 'वीरमेवामन्दिर मे प० दरबारीलालजी कोठिया न्यायाचार्य द्वारा सम्पादित और अनुवादित होकर मन् १९४९ में प्रकागित हुआ है। इसके पूर्व मन् १९२१ मे मराठी टोका महित श्री पात्रकेसरीस्तोत्रके माथ प्रकाशित हुआ था। [६] विद्यानन्दिके समग्र अध्ययनकी आवश्यकता मत्यशासन-परीक्षाके प्रकाशित होनेके साथ विद्यानन्दिका मभी उपलब्ध साहित्य प्रकाशमें आ चुकता अब विद्यानन्दिके कृतित्व और व्यक्तित्वके समग्र अध्ययनको आवश्यकता है। मेरी इच्छा थी कि सत्यशामन-परीक्षाको प्रस्तावनामें इस प्रकारको कुछ सामग्री देता, किन्तु पी-एच० डी० के कार्यमें लगे रहते उतना सव सम्भव न हो सका । भारतीय दर्शनोका तुलनात्मक अध्येता कोई अन्वेषक यह उत्तरदायित्व संभाले तो वह निश्चित रूपसे पायेगा कि विद्यानन्दिका चिन्तन एक नहीं कई शोध प्रवन्धोको वस्तु है और उसे विद्वत्- समाजके समक्ष प्रस्तुत करके वह केवल उपाधि ही नहीं पायेगा, प्रत्युत साहित्य शास्त्रको महती श्रीवृद्धि भी करेगा। -गोकुलचन्द्र १ पत्रपरीक्षा, पृ० १० ।

-श्री- विद्यानन्दि-विरचिता सत्यशासन-परीक्षा विद्यानन्दाधिप. स्वामी विद्वद्देवो जिनेश्वरः । यो लोकैकहितस्तस्मै नमस्तात् स्वात्मलब्धये ॥ १ ॥ $ १ अथ सत्यशासनपरीक्षा । इयमेव परीक्षा यः 'अस्येदमुपपद्यते न वा' इति विचारः । सा च शासनस्य सत्यत्व 1एवोपपद्यते, तत्रैव विवादात्, वक्तुराप्तत्ववत् । न तु शासनत्वमात्रे, तदै- भावात्, वक्तृत्वमात्रवत् । $ २. इह हि पुरुषाद्वैत-शव्दाद्वैत-विज्ञानाद्वैत-चित्राद्वैत-शासनानि, चार्वाक-बौद्ध-सेश्वर- निरीश्वर-साख्य-नैयायिक-वैशेषिक-भाट्-प्राभाकरशासनानि, तत्त्वोपप्लवशासनम् अनेकान्तशासनं चेत्यनेकशासनानि प्रवर्तन्ते । न च सर्वाण्यपि तानि सत्यानि भवन्ति, द्वैताद्वैत-भावाभावादि- परस्पर-विरुद्धार्थप्रतिपादनात् । न च तत्र न किंचिदपि सत्य स्यादित्यारेकितव्यम् ; एकान्तानेका- न्तयोद्वैताद्वैतयोर्भावाभावयोर्वा तेजस्तिमिरयोरिव परस्पर विप्रतिषिद्धयोर्द्वयोरपि विधिवत् प्रतिषेध- स्याप्यसंभवेन अन्यतरस्य नियमेन विधेरुपपत्तेः कस्यचित्सत्यस्यावश्यमभ्युपगन्तव्यत्वात् । $३ तथा च तत्र किं नु खलु शासन स्यात्सत्यमिति परीक्ष्यते-इदमेव हि सत्यशासनस्य सत्यत्वं नाम यदृष्टेष्टाविरुद्धत्वम् । प्रत्यक्षानुमानादिप्रमाणविरुद्धस्यापि सत्यत्वे न किंचिदसत्यं जगति स्यात् । तेदविरुद्धस्याप्यसत्यत्वे किमपि न सत्य स्यात् । अतोऽव्याप्त्यतिव्याप्त्यसभवासंभ- वाददुष्टमिदं सत्यलक्षणमुपलक्ष्यते । ६४. तच्च दृष्टेष्टाविरुद्धत्वमनेकान्तगासने एवेति तदेव सत्यशासनधवीमारोढुमीष्टे एकान्तशासनं तु सर्वमसत्यमेव, दृष्टेष्टविरुद्धत्वात् । तथाहि- [ परब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्षः] ६५ तावत्परब्रह्माद्वैत दृष्टेष्टविरुद्धमेव । इद हि ब्रह्मवादिमतम्-देशकालाकाराव्यवच्छिन्न- निर्व्यभिचार-सकलावस्थाव्यापिप्रतिभासमात्रम् अखण्डज्ञानानन्दामृतमय परब्रह्मैकमेवास्ति न तु द्वितीयम् । “एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म' [ छान्दो० ६।२।१ ] इत्याद्याम्नायात् । १. तुलना-जयन्ति निर्जिताशेषसर्वथैकान्तवादिन । सत्यवाक्याधिपा शश्वविद्यानन्दा जिनेश्वरा ॥-प्रमाणपरीक्षा मगलाचरण । २ विवादामावात् । ३. विरुदयो.1 ४ प्रमाणाविरुद्धस्य । 1 त्वविदोपपद्यते क०। 2. सिल ख० । 3 शासनावेति ख०। 4 मारोढोमीष्टे क० । 5 मानस्वरूपम् ख०, ग० । - २ । - सत्यशासन-परीक्षा ६६. कथमेकमेव परब्रह्मास्ति, परस्परं भिन्नाना नानात्मना प्रतीतेरिति चेत् , न, एकस्यापि तस्य भूते भूते व्यवस्थितस्य जलेषु चन्द्रवत् अनेकधा प्रतिभाससभवात् । तदुक्तम्- "एक एव तु भूतात्मा भूते भूते व्यवस्थितः। एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥" [अमृतवि० उप० ५० १२ पृ० १५ ] इति ६७. तथा पृथिव्यादयोऽपि न ततस्तत्त्वान्तराणि, तद्विवर्तत्वात् । तच्चोच्चावचचराचर- रूपप्रपञ्चस्यास्य तत एव जन्मादिभावात् । तथैवोक्तं भगवता बादरायणेन-"जन्माद्यस्य यतः" [ ब्रह्मसू० १।१।२] इति । ६८ अथ कथं प्रपञ्चाध्यवसायविध्वसनकरात् परमपुरुषात् प्रपञ्चस्य जन्मादीति चेत् ; न; अनाद्यविद्यासचिवादेव तस्मात्तस्य भावात् । $ ९. अविद्या तर्हि द्वितीया स्यादिति चेत् ; तदसत् ; तस्या सदसत्त्वविचाराभ्या प्रमाणपदवीमविगाहमानाया , अनिर्वाच्यत्वात् । तदुक्तम्- "अनिर्वाच्याऽविद्या-द्वितय-सचिवस्य प्रभवतो विवर्ता यस्यैते वियदनिलतेजोऽवनयः । यतश्चाभूद् विश्वं चरमचरमुच्चावचमिदं नमामस्तद्ब्रह्मापरिमितसुखशानममृतम् ॥" ] इति ६१० नन्वेवमपि विवर्तविवर्ते' द्वैतस्य भावात् कथमद्वैतसिद्धिरिति चेत् ; न; विवर्ताना रज्यो' भुजङ्गाकारवत् मायारूपाणामेव तस्मिन् प्रतिभासनात् । तदप्युक्तम्- "यस्मिन् रज्जुभुजङ्गवत् त्रिभुवनं भाति भ्रमान्निर्भये । सोऽहं नित्यनिरामयामृतवपुः ससारसार' परम् ।।" ] इति ६ ११ सकलोऽप्येष विवर्त सत्यामविद्याया प्रतिभाति, नत्वविद्यानिवृत्तौ । सा चाविद्या- निवृत्तिरेव मोक्षः । तस्य चोपायो ब्रह्मसाक्षात्कार एव । सोऽपि श्रवण-मनन-ध्यानैर्भवति । तथैव श्रुति:-"श्रात्मा वा रे द्रष्टव्य श्रोतध्योऽनुमन्तव्यो निदिध्यासितव्य." [ बृहदा० २।४।५] तथा स्मृतिश्च- "श्रोतव्यः श्रुतिवाक्येभ्यो मन्तव्यश्चोपपत्तिभिः । मत्वा च सततं ध्येय एते दर्शनहेतव.॥" [ ] इति $ १२ तत्रोपनिषद्वाक्याना परब्रह्मणि10 तात्पर्यावधारण श्रवणम् । श्रुतार्थस्य युक्त्या विचारण मननम् । श्रवणमननाभ्या निश्चितार्थस्य मनसा परिचिन्तन ध्यानम् । तच्च नित्यानित्य- १ नानास्वरूपाणां घटपटाद्यर्थानाम् । २ मिलतत्वानि । ३. परमपुरुषात् । ४. परमपुरुषात् । ५ अविद्याया । ६ परमपुरुषे । 1 परमब्रह्म० स० । 2 -दनेदाताप्र-क०। 3 भगता ख०। 4 जन्मादिति ख०, ग० । 5.तीयस्थाहिति ख० । 6 यस्य विय० क० । यस्मैतत् विय० ग० । 7 विवाविवर्ति क०, ख० । 8. रज्जी क० । 9 दार क०, ग० । दारा ख०। 10 परमब्रह्मणे ख० । 1 ३ - १७] परब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षा वस्तुविवेकः शमदमादिसंपत्तिरत्रामुत्र च वैराग्य मुमुक्षुत्वमिति साधनचतुष्टयसंपन्नस्य संपद्यते । तस्मिंश्च ब्रह्मसाक्षात्कार । तत्र च परमब्रह्मैकीभावलक्षणमोक्षप्राप्तिरिति । [उत्तरपक्ष. ] $ १३. तदेतदद्वैतैकान्तगासनं प्रत्यक्षविरुद्धम् ; प्रत्यक्षेण देशकालाकारभेदविशिष्टाना क्रियाकारकाणा स्थानगमनादिग्रामारामकरितुरगादिरूपाणा नानावहिरर्थानां तद्विषयविचित्रप्रतिभास- विशेषाणा परमार्थाना परस्परतो व्यावृत्ताना प्रस्फोटमध्यवसायात् । भेदावभासिना च प्रत्यक्षेणा- द्वैतस्य विरुद्धत्वात् । सर्वथैकस्मिन् भेदप्रत्यक्षस्यानुपपत्ते. । १४. नन्वेकस्मिन्नपि 'क्रियाकारकभेदप्रत्यक्षादे संभवात् स्वप्नसंवेदनवत् कथमद्वैतं [प्रत्यक्ष] विरुद्धमिति चेत्, न, स्वप्नसंवेदनस्याप्येकत्वे तद्विरोधस्य तदवस्थत्वात् । तत्रान्यदेव हि क्रियाविशेषसवेदन स्ववासनोत्थम् , अन्यदेव च कारकविशेषसवेदनं प्रत्यक्षम्, न पुनरेकमेव, तद्धेतुवासनामेदाभावप्रसगात् । जाग्रद्दशायामिव स्वप्नादिदशायामपि पुसोऽनेकशक्त्यात्मकस्य क्रियाकारकविशेषप्रतिभासवैचिन्यव्यवस्थिते. । कस्यचिदेकरूपस्यात्मगगनादेरप्यनेकान्तवादिनाम् अनेकक्रियाकारकविशेषप्रतिभासालम्बनत्वा सिद्धेविरुद्धमेव तत्प्रत्यक्षेणाद्वैतम् । $ १५. ननु मैदावभासीद प्रत्यक्षं भ्रान्तम् , इन्द्रजालादिप्रत्यक्षवदिति चेत् ; तदेतद्धान्त- तरम्, उक्तदोषाऽपरिहारात् । सर्वथैकस्मिन् भ्रान्तस्याऽभ्रान्तस्य वा भेदप्रत्यक्षस्य दृष्टान्ताभावेना- संभवात् । भ्रान्तेनापि 'तेनाद्वैतविरोधस्य तदवस्थत्वात् । यथाकथञ्चिदुक्तमप्येतदयुक्तम् ?, यस्मा- दिन्द्रजालादिकमेव भ्रान्तम्, वाधकसनावात् । नहि 'करोति कुम्भं कुम्भकारो दण्डादिना, भुक्ते पाणिनीदनम्' इत्यादि क्रियाकारकभेदप्रत्यक्ष भ्रान्तम्, बाधकाभावादिति वालावलादयोऽपि प्रतिपद्यन्ते । तदुक्त भटटाकलदेवै. "इन्द्रजालादिपु भ्रान्तमीरयन्ति न चापरम् । अपि चाण्डालगोपालवाललोलविलोचनाः॥" [ न्यायवि० ११५२ ] इति ६ १६. नन्वत्रापि बाधकमस्त्येवेति चेत् , तदसत् ; प्रत्यक्षविषयमेदान्यथाभूतपरमब्रह्माद्वैत- साधकस्य कस्यचिदपि प्रमाणस्यासंभवात् । विपयान्यथात्वसाधकस्यैव बाधकत्वोपपत्ते. शुक्ती रजतज्ञानस्य शुक्तिकाजानवत् । $ १७ ननु च प्रत्यक्षमेव परमब्रह्मसाधकम् , अक्षिविस्फालनानन्तर निर्विकल्पकस्य सन्मात्रविधिविषयतयोत्पत्तेः, सत्तायाश्च परमब्रह्मस्वरूपत्वात् । "अस्ति झालोचनाशानं10 प्रथमं निर्विकल्पकम् । वालमूकादिविज्ञान11 सदृशं शुद्धवस्तुजम् ॥" [ मी० श्लो० प्रत्यक्ष० श्लो० १२० ] , १. । भेदप्रत्यक्षेण । 1 मुमुक्षत्व क०, ग० 12 प्रस्फुट ग०। 3 क्रियाकारभेद० ख०। 4 -कत्नै तद्वि० के० । 5 कारक सवेदनम् क०, ख० । 6 -लम्बनात्वा० ख० ।-लम्बकत्वा० ग०। 7 तदप्रयुक्तम् क०, ख० । 8 बाधकस्योपपत्ते क.। 9. ग प्रतौ 'च' नास्ति । 10 -नज्ञानम् क०, ख०1 11 -विज्ञानस० ग० ।

100 با सत्यशासन-परीक्षा [१८- इति वचनादिति चेत्, तदेतत्सुतरा प्रत्यक्षबाधितम् ; सकलविशेषरहितस्य सर्वथा नित्यस्य निरव- यवस्य व्यापकस्य सन्मात्रस्य परोपवर्णितस्वरूपस्य जातुचिदप्यननुभवात् । अक्षिविस्फालनानन्तर- मपि प्रतिनियतदेशकालद्रष्टव्यत्वादिविशेषविशिष्टस्यैव सत्तादिसामान्यस्य साक्षात्करणात् ; अप्रति- नियतदेशस्य द्रष्टुरनन्यस्यादर्शनात् , अन्यथा प्रतीत्यपलापप्रसगात् । दण्डकुण्डलाद्याकारकुण्ड- लिनोरिव सामान्यविशेषयोरन्योन्यपरिहारेणावस्थानानुपपत्तेः, अन्यतरस्याभावेऽन्यतरस्याप्यभावाच्च । तदुक्तम्- "निर्विशेषं न सामान्यं भवेत् खरविपाणवत् । सामान्यरहितत्वाचन विशेष स्तद्वदेव हि ॥" [ मी० श्लो० आकृति० श्लो० १० ] इति $ १८. ततो न प्रत्यक्ष परमब्रह्मसाधक प्रत्युत तद्बाधकमेव स्यात् , विधिवत् परस्परव्या- वृत्तेरप्यध्यक्षतः प्रतीतेः। $ १९ ननु न प्रत्यक्षमद्वैतबाधकं तस्य विधातृत्वेन निषेधृत्वाभावात् । "आहुर्विधात प्रत्यक्षं न निषेधृविपश्चितः । नैकत्व आगमस्तेन प्रत्यक्षेण प्रवाध्यते ॥" [ ब्रह्मसिद्धिः इति वचनादिति चेत्, तदसगतम् ; प्रतिनियतार्थविधिविषयस्य प्रत्यक्षस्यागमस्य वा निषेधृत्वो- पपत्ते., केवलविधिप्रतिपत्तेरेव अन्यप्रतिषेधप्रतिपत्तिरूपत्वात् , केवलभूतलप्रतिपत्तरेव घटाभावप्रतिपत्ति- रूपत्वसिद्धे । नह्ययं प्रतिपत्ता किंचिदुपलभमानः पररूपै. सकीर्णमुपलभते, यत. प्रमाणान्तरा- तत्पतिषेधः साध्यते । ततो विधात्रेव प्रत्यक्षमुपनिषद्वाक्यञ्चेति नियमस्यासभवः, अन्यथा ततो विद्यावद विद्याविधानानुषगात् । सोऽयमविद्याविवेकेन सन्मात्र कुतश्चित् प्रतीयन्नेव' 'न निषेद्धृ- प्रत्यक्षमन्यद्वा' इति ब्रुवाणः कथ स्वस्थः १ कथ वा 'प्रत्यक्षादेनिषेद्धृत्वाभावं प्रतीयात् ? यतस्त- पतिपत्तिः तस्यैवाऽभावविषयत्वसिद्धेः । प्रत्याक्षादेविधातृत्वप्रतिपत्तिरेव निषेद्धृत्वाभावप्रतिपत्तिरिति तहि सिद्ध भावाभावविषयत्व तस्य । तथा च प्रत्यक्षेणाद्वैतैकान्तो बाध्यत एवेति कथं तत्तस्य साधक स्यात् ? ६ २० नन्वनुमान तत्साधकमस्ति-'विवादापन्न सर्व प्रतिभासान्त प्रविष्टम् , प्रति- भाससमानाधिकरणत्वात् , यत्प्रतिभाससमानाधिकरण तत्प्रतिभासान्त प्रविष्टम् ; यथाप्रतिभास- स्वरूपम्, प्रतिभाससमानाधिकरण च सर्वम्' इति निर्दुष्टत्वाद्धेतो प्रतिभासमात्ररूपपरमब्रह्मसिद्धि- रिति चेत् ; तदेतत् स्ववधाय11 कृत्योत्थापन ब्रह्मवादिनाम् , प्रतिभाससमानाधिकरणत्वाद्धेतो. सर्वस्य १ विधिविपयकत्वेन । २ परमपुरुषनिषेध । ३ विधातृत्व । ४ प्रत्यक्षस्य । ५ अद्वैतस्य । ६ कृत्या-पिशाचिनीति । “कृत्याशब्देनाथर्वमन्त्रै पावके होमविधानेन कृतेन पुरुषो यो निष्कामति स. कर्तु शत्रु व्यापादयति यदि वा ,शत्रुर्बलवान् भवति जपहोमदानैस्तदा सा येनोत्यापिता तमेव विनाश- यति ।"-नीतिवा० सं० टी० पृ० १३५ । 1 -तत्वामविशे-क० । 2 विशेषास्त० ख०। 3 -अद्वैत क०, ख० । 4 -मस्ति न क० । 5 माध्येत ग०। 6. प्रतिपनेव ख०, ग० । 7. प्रत्यक्षाधे नि-क०। 8 -भासत क०, ख०। 9 मास. 10 निर्गुष्टाद्देतो क०। निर्दुष्टाद्धेतो स०, 11 सवधायदाकृत्यो-क० चेत; . ग०। स्व-क०, ख० । -धायधायन्स०।

५ .- -२४] परब्रह्माद्वतशाग्न-परीक्षा प्रतिभासान्तःप्रविष्टत्वेन1 पुरुषाद्वैतसिद्धौ हेतुसाद ..य दुर्निवारत्वात् । तदुक्त स्वामिसमन्त- भद्राचार्य- "हेतोरद्वैतसिद्धिश्चेत् द्वैतं स्याद्धेतुसाध्ययोः । हेतुना चेद्विना सिद्धिद्वैतं वाङ्मावतो न किम् ॥" [ आप्तमी० श्लो० २६ ] इति २१. ननु हेतोरद्वैतसिद्धावपि न हेतुसाध्ययोद्वैत भविष्यति, तादात्म्योपगमात् । न च तादात्म्ये साध्यसाधनयोस्तभावविरोधः; सत्त्वानित्यत्वयोरपि तथा भावविरोधानुषंगात् । कल्पना- भेदादिह साध्यसाधनधर्मभेदे प्रकृतानुमानेऽपि कथमविद्योपकल्पितहेतुसाध्ययोस्तद्भावविघातः; सर्वथा- विशेषाभावादिति चेत्, न; शब्दादौ सत्त्वानित्यत्वयोरपि कथचित्तादात्म्यात्सर्वथातादात्म्या- सिद्धे , तत्सिद्धौ साध्यसाधनभावविरोधात् । न चासिद्धमुदाहरणं नाम, अतिप्रसङ्गात् । किं च न सम्यगिदं साधनं विरुद्धत्वात्, प्रतिभास-तद्विषयाभिमतयो. कथञ्चिद्भदे सति समानाधिकरणत्वस्य प्रतीतेः सर्वथा प्रतिभासान्त. प्रविष्टत्वाऽसाधनात् स्वविषयस्य । न हि 'शुक्ल. पटः' इत्यादावपि सर्वथा गुणद्रव्ययोस्तादात्म्ये "सामानाधिकरण्यमस्ति, सर्वथामेदवत् । 'प्रतिभासस्वरूप प्रतिभासते' इत्यत्रापि न प्रतिभास 'तत्स्वरूपयोर्लक्ष्यलक्षणभूतयो सर्वथा तादात्म्यमस्ति; प्रतिभासस्य साधा- रणाऽसाधारणधर्माधिकरणस्य स्वस्वरूपादसाधारणधर्मात् कथञ्चिद्भदप्रसिद्धेः, अन्यथा तत्सामानाधि- करण्यायोग्यात्11 'सुवर्णं सुवर्णम्' इति यथा, सह्यविन्ध्यवद्वा । तदेव यत् प्रतिभाससमानाधि- करणं तत्प्रतिभासात् कथञ्चिदर्थान्तरम् ; यथा प्रतिभासस्वरूपम् ; प्रतिभाससमानाधिकरण च सुख- नीलादि सर्वमिति साध्यविपरीतसाधनात् हेतो द्वैतसिद्धिः । $ २२. अथागमस्तत्साधकोऽस्त्येव “सर्व वै खल्विदं ब्रह्म' [ मैत्रा० ४।६] इत्याद्यागमस्य परमब्रह्मसाधकस्य सद्भावादिति चेत् , तदपि स्ववधाय कृत्योत्थापनमेव, अद्वैत-तदागमयोद्वैतप्रसगात् । $ २३. यदि पुनरागमोऽप्यद्वयपुरुषस्वभाव एव न ततो व्यतिरिक्तो येन द्वैतमनुषज्यते , . . इति मतम्, "ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्त वेद स वेदवित् ॥" [ भगवद्गी० १५।१] इति वचनात् । तदा14 ब्रह्मवत्तदागमस्याप्यसिद्धत्वं15 स्यात् , 1 सर्वथाप्यसिद्धस्वभावस्य सिद्धत्व- विरोधात्, सिद्धाऽसिद्धयोर्भेदप्रसक्ते. । $ २४ किंच "सर्व वै खल्विद ब्रह्म" [ मैत्रा० ४।६ ] इत्याद्याम्नायादपि द्वैतसिद्धिरेव स्यात्, सर्वस्य प्रसिद्धस्याऽप्रसिद्धेन ब्रह्मत्वेन विधानात् । सर्वथा प्रसिद्धस्य 1'विधानायोगादप्रसिद्ध- १ सत्त्वमसत्त्वव्यावृत्त्यात्मकम् , अनित्यत्वञ्च नित्यन्यावृत्त्यात्मकमिति व्यावृत्तिभेदात्तयोमेंदे। 1 -प्रतिविष्टत्वेन क० । 2 सर्वथाविशेषादिति क० । 3. सत्या क०, ख० । 4.-नित्ययो ग०। 5. कथचित्तादात्म्यासिद्ध क०। 6. तद्विषायामि-क० । 7. प्रतिमासत ग० । 8 इत्यादि- नावपि क०, ख० । 9. सामाधिकरण्यमस्ति क० । 10 प्रति तत् क० । 11. योगात् ख० । 12 विन्ध क०। 13 तदेव ग०। 14 तथा क०, ख० । 15 -मस्यासि-ग० । 16 सर्वप्य क० । 17. विधा- नयोगात् क०, ख०।

६ . सत्यशासन-परीक्षा [२५- वत् । क्वचिदात्मव्यक्तौ प्रसिद्धस्यैकात्म्यरूपस्य ब्रह्मत्वस्य सर्वात्मस्वनात्माभिमतेषु च विधानात् । द्वैतप्रपञ्चारो पव्यवच्छेदेऽपि तदागमाद् व्यवच्छेद्यव्यवच्छेद कसद्भावसिद्धेः कथमद्वैतसिद्धिः ? आम्नायस्य परमब्रह्मस्वभावत्वे न ततस्तदद्वैतसिद्धि.4 । स्वभाव-स्वभाववतोस्तादात्म्यैकान्तानुपपत्तेः। ६ २५. अथ स्वसवेदनमेव पुरुषाद्वैतसाधकमिति चेत् ; न; स्वसवेदनात्मनोद्वैतप्रसगात् । न हि स्वसवेदनमपि साधनमात्मनोऽनन्यदेव; साधनत्वविरोधात्, अनुमानागमवत् साध्यस्यैव साधन- त्वोपपत्तेः, प्रकृतानुमानागमयोरिव स्वसवेदनप्रत्यक्षस्यापि साधन[त्व]स्याभावात् । ६२६ न च पुरुषाद्वैतं स्वतः सिद्धयति, विज्ञानाद्वैतवत् , स्वरूपस्य स्वतोगतेरभावात्, अन्यथा कस्यचित्तत्र विप्रतिपत्तेरयोगात्°, विज्ञानाद्वैतस्यापि प्रसिद्धेरिष्टहानिप्रसगाचे । ६ २७. न विज्ञानाद्वैत न स्वतोऽवसीयते, तस्यै क्षणिकस्यैकक्षणस्थायितया निरशस्यैक- परमाणुरूपतया सकृदप्यनुभवाभावादिति चेत् ; न, पुरुषाद्वैतस्यापि नित्यस्य सकलकालकलाकलाप- व्यापितया सर्वगतस्य च सकलदेशप्रतिष्ठिततया सकृदप्यनुभवाभावाऽविशेषात्' । 'स्वतःसिद्धं ब्रह्म' इत्युपगमे; द्वैतमपि स्वतःसकलसाधनाऽभावेऽपि किं न सिद्धयेत् ; तत्त्वोपप्लवमानं वा नैरात्म्यं वा स्वाभिलापमात्राविशेषात् ? सर्वस्य सर्वमनोरथसिद्धिरपि दुर्निवारा स्यात् । एव परब्रह्मसाधकस्य कस्यचिदपि प्रमाणस्याभावात् भेदग्राहिप्रत्यक्षस्य बाधकाभावो व्यवतिष्ठत एव, 11 एतदन्यस्यापि वाधकस्य अयोगात्। ६२८ स्यादाकूतम्--विवादापन्न प्रत्यक्षादि मिथ्यैव, भेदप्रतिभासत्वात् , स्वप्नप्रत्यक्षादि- वदिति; तदसत् ; प्रकृतानुमाने पक्ष-हेतु-दृष्टान्तभेदप्रतिभासस्याऽमिथ्यात्वे तेनैव हेतोर्व्यभिचारात् । तन्मिथ्यात्वे तस्मादनुमानात् साध्याऽप्रसिद्धेः । पराभ्युपगमात् पक्षादिभेदप्रतिभासस्याऽमिथ्यात्वेऽपि न दोप' इति चेत् ; न; स्वपराभ्युपगमभेदप्रतिभासेन व्यभिचारात् । तस्यापि पराभ्युपगमान्तराद- 1°मिथ्यात्वादोषाभावे स एव तद्भेदप्रतिभासेन व्यभिचारः14 इति न क्वचिद्व्यवतिष्ठेत् । $२६ कश्चिदाह-ब्रह्माद्वैतस्यामिथ्यासविन्मात्रस्य15 स्वत. सिद्धस्य क्रियाकारकभेद- प्रत्यक्षादीना 1 बाधकस्याभावात्तेषा भ्रान्तत्व ततो न तद्विरोधकत्वमिति; तदपि न साधीयः, तथा सति बाध्यबाधकयोर्भेदात् , द्वैतसिद्धिप्रसगात् । . १ यथा सर्वथाऽप्रसिद्धं सरविषाणादि न विधीयते । २ -तुलना-"तद्धि सवेदनाद्वैत न तावत्स्वत सिद्धयति पुरुषाद्वैतवत् , स्वरूपस्य स्वतोगतेरभावात् , अन्यथा कस्यचित्तत्र विप्रतिपत्तेरयोगात् , पुरुषाद्वै- तस्यापि प्रसिद्धरिष्टहानिप्रसङ्गाच।" -आप्तप० पृ० १८२।३ -तुलना-"ननु च पुरुषाद्वत न स्वतोऽवसीयते, तस्य नित्यस्य सकलकालकलापव्यापितया सर्वगतस्य च सकलदेशप्रतिष्ठिततया वाऽनुभवाभावादिति चेत्, न, सवेदनाद्वैतस्यापि क्षणिकस्यैकक्षणस्थायितया निरशस्यैकपरमाणुरूपतया सकृदप्यनुभवामावा- विशेषात् ।" -श्राप्तप० पृ० १८२ । ४. यथा हि विज्ञानाद्वैतवादिनोक्तम्-"स्वरूपस्य स्वतोगते [प्र० वा० ११५] इति नोपपद्यते तथैव । ५ कथं न सिद्धयेत् १ ६ क्रियाकारकादीनाम् । 1 -रोपो व्य-क०, ख० । 2 -माद् व्यवच्छेदक-110 1 3 -तद्वैत० स०। 4 क० प्रती इयं पक्तिर्नास्ति । 5 -रेव क०। 6 -तिरयो० क०, स० । '7 क० प्रती 'नच पुरुषद्वैतं • इत्यस्मात् पदादारभ्य "अविशेपात्' इति पर्यन्त पाठो नास्ति । 8 -मात्रविशे० ० क०, ख० । 9 “परमब्रह्म ख०, ग। 10 -प्रत्यक्ष स० । 11 तदन्यस्यापि ग०। 12 -त्वेनैव । 13. मिथ्याडो० क०, ख० । 14 तद्भेदेन व्यमि० स०। 15 द्वैतस्य सवि० ख० । 16 -कस्यभावात् स०।

७ - ३३] परब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षा $३०. न च परोपगममात्रात्तयोर्बाध्यबाधकभावः, परमार्थतस्तदभावापत्तेः । ततः सकल- वाधकाभावात् अभ्रान्तेन प्रत्यक्षेण प्रसिद्धोऽय भेदः कथमद्वैत न विरुन्ध्यात् । तयोः परस्पर- विरोधात् । तत एव भेदमद्वैतं विन्ध्यादिति चेत् ; न; अद्वैतस्याभ्युपगममात्रत्वात् , तत्साधक- प्रमाणाभावस्य प्रागेवोक्तत्वात् , मेदस्य च प्रमाणसिद्धत्वात् , तग्राहिप्रत्यक्षस्य बाधकाभावात् , अभ्रान्तत्वेन साधितत्वात् । नहि कस्यचिदभ्युपगममात्र प्रमाणसिद्ध क्रियाकारकभेद प्रतिरुणद्धि, क्षणिकाभ्युपगमवत् । तदेव *सकलबाधकवैधुर्यादभ्रान्तप्रत्यक्षप्रसिद्धक्रियाकारकभेदः, सोऽयमद्वैत- कान्तपक्षे विरुध्यत एवेति सिद्ध परमब्रह्माद्वैतशासनं प्रत्यक्षविरुद्धमिति । तदुक्तं श्रीस्वामिसमन्त- भद्राचायः "अद्वैतेकान्तपक्षेऽपि दृष्टो भेदो विरुद्धयते । कारकाणां क्रियायाश्च नैकं स्वस्मात् प्रजायते ॥" [ आप्तमी० श्लो० २४ ] इति $ ३१ एतेनैव इष्टविरुद्ध चाद्वैतशासनम्। उक्तं च अद्वैतसाधकानुमानागमाभ्या द्वैतस्य सिद्धेरुक्तत्वात् । अद्वैतशब्द "स्वाभिधेयप्रत्यनीकपरमार्थापेक्ष', नञ् पूर्वाऽखण्डपदत्वात् ; 'अहेत्व- भिधानवत्', इत्यनुमानविरोधाच्च । तदप्युक्तं भगवद्भिः स्वामिभि. "अद्वैतं न विनाद्वैतादहेतुरिव हेतुना । संशिनः प्रतिषेधो न प्रतिषेध्याहते क्वचित् ॥" [ आप्तमी० श्लो० २७ ] इति ६.३२ तथा ब्रह्मवादिना धर्मानुष्ठान न प्रतिष्ठामियर्ति, तेषा पुण्यपापसुखदुःखेहपरलोक- विद्येतरवन्धमोक्षासभवात् , तत्त्वोपप्लववादिवत् । तथैव स्वामिनः प्राहु:- "कर्मद्वैतं फलद्वैतं लोकद्वैतं च नो भवेत् । विद्याऽविद्याद्वयं न स्याद्वन्धमोक्षद्वयं तथा ॥" [ आप्तमी० श्लो० २५] इति ३३. एतेन यदुक्त वेदान्तवादिभिः 'एकमेव ब्रह्म नानात्मतया दृश्यते, ब्रह्मविवर्ताः पृथिव्यादयः, ब्रह्मप्राप्तिर्मोक्षः, श्रवणादिभिः ब्रह्मसाक्षात्कार' इत्यादि, तत्सर्व बन्ध्यास्तनन्धय- सौरूप्यव्यावर्णनैवदुपेक्षामर्हति, केनापि प्रमाणेन ब्रह्मसिद्धेरभावात् , अन्यथा प्रमाणप्रमेयद्वैत- प्रसंगात् । भ्रान्तेन प्रमाणेन तत्सिद्धौ स्वप्नोपलब्धधूमादिना परमार्थपावकादिसिद्धिप्रसंगात् । चन्द्र- मरीचिजालसन्निधिविशेषात् परिणमजल1 °पुद्गलविकारत्वात् परमार्थेनैव प्रतिविम्बेन चन्द्रप्रतिपत्तेः । भ्रान्तेन प्रमाणेन प्रमाणमन्तरेण वा ब्रह्माद्वैतसिद्धौ तथा द्वैत-नैरात्म्यादिसिद्धिरपि दुर्निवारा स्यात् । तथा11 द्वैताद्वैतयोधिकसाधकाभावाद्वेदान्तिना दृष्टहानिरदृष्टकल्पनेय केवलमुपहासाय जायते । -- १ भेदाभेदयो.। २ तुलना-अष्टम०, १६१ । ३ "एप बन्ध्यासुतो याति खपुष्पकृतशेखर । मृगतृष्णाम्मसि स्नात्वा शशशृङ्गधनुर्धर ॥” इत्यादि व्यावर्णनवत् । ४ रूपेण द्वैतप्रसङ्गात् । 1 परमार्थ ग०। 2 -द्वैत विरु० क०, ग० । 3 -वोक्तत्वात्तस्य च ग०। 4 के वैधुर्या० ख०, ग० ।। 5 ग० प्रती 'च' नास्ति। 6 -मानाभ्या क०, ख० । 7. साभिधेय ख०। 8. श्रवणादिना परमार्थमि. बझ० ग०। 9.-मेयप्रस० क०, ख० । 10. -मज्वलपु० ख०। 11. ततो ख०, ग० । - ८ सत्यशासन-परीक्षा [३४- , ३४. किं च, यद्येकमेव परत्रमास्ति तर्हि तदेव कुतो न प्रतीतिपथमवतरति, यदि वा प्रपञ्च खरविपाणवदभावरूप. कुतस्तहि स एव 'अहमहमिकतया प्रतीतिपथमापनियते। इति पृष्टः स्पृष्टमाचप्टा परः अविद्यया" तथेति चेत् , तदमत्; अविद्याया एवं परोपवर्णितम्बरूपाया व्यवस्थापयितुमशक्तेः, विकल्पानतिक्रमात् । अविद्याया असत्त्वे, गिल्याप्रतीतिहेतुत्वानुपपत्ते, सत एव अटेष्ट-दोष-संस्कार-यन्त्र-मन्त्र-तन्त्रादे स्वमेन्द्रजालादिमिल्याप्रतीतिहेतुत्वप्रतिपत्तेः । तम्या: सद्रूपत्वे द्वैतसिद्धिः' प्रसक्ते रिति । अविद्यायाः सनसत्त्वाभ्यामनिर्वाच्यत्वे कथम् 'अविद्या ससार- दशायामस्ति, ससारस्याऽविद्याविलासत्वात् ; मुक्तिदगाया तु नास्ति, मुक्त विद्यानिवृत्तिम्पत्वात इति शिष्य प्रति प्रतिपाद्येत । तदा तस्या सदसत्त्वाभ्या वाच्यत्वराभवात् । तथा चाप्रतिपादने विनेयाना कथ मोक्षाय प्रवृत्तिः, ससारमोक्षस्वरूपानवयोधात् । 'अनिर्वाच्याऽविद्या' इत्यविद्यास्वरूप- कथनमिद स्ववचनविरुद्धम्-- "यावज्जीवमहं मौनी ब्रह्मचारी च मत्पिता। माता मम भवेद्वन्या स्मराभोऽनुपमो भवान् ॥" [ इत्यादि वचनवत् । अनिर्वाच्यशब्देनाविद्यानभिधाने चानर्थकवचनतया निग्रहस्थानत्वापत्ते । $ ३५ ननु वस्तुन्येव प्रमाणप्रवृत्ति वस्तुनि । ततोऽम्माभिर्वस्तुवृत्तमपेक्ष्याविद्या व्यव- स्थाप्यते । तदुक्तम्--- "ब्रह्माविद्यावदिष्टं चेन्ननु दोपो महानयम् । निरवद्य1 च विद्याया आनर्थक्यं प्रसज्यते ।। नाविद्यास्येत्यविद्यायामेवासित्वा प्रकल्प्यते । 1 ब्रह्म[धारा त्वविद्येयं न कथञ्चन युज्यते ॥ यतोऽनुभवतोऽविद्या ब्रह्मास्मीत्यनुभूतिमत । अतो मानोत्थविज्ञान-ध्वस्तासाप्यन्यथात्मता1311 ब्रह्मण्यविदिते 4 वाधानाविद्येत्युपपद्यते । नितरां चापि विशाते 1 मृपा[घी स्त्यवाधिता ।। अविद्यावानविद्यां तां न निरूपयितुं क्षमः। वस्तुवृत्तमतोऽपेक्ष्य16 ना विद्येति निरूप्यते ।। वस्तुनोऽन्यत्र मानानां व्यापृत्तिर्नहि युज्यते । अविद्या च न वस्त्विष्टं मानाघातासहिष्णुतः ।। अविद्याया अविद्यात्वे इमेव च लक्षणम् । मानाघातासहिष्णुत्वमसाधारणमिप्यते ।।" [ सबन्धवा० श्लो० १७५-८१ ] - १. पुण्यपापरूपकर्म । २ थविद्याया । ३. मवान् स्मराम. कामतुल्यकान्ति. तथापि अनुपम. उपमारहित इति स्ववचनविरुद्धम् । 1 परमब्रह्मास्ति ख०, ग० । 2.-तिप्रथम क०, ख०। 3 -मापनीपद्यते क०। 4 -ति पृष्टमा- चष्टा क०, ग० । 5 अविद्याया क०। 6 -टोपयन्त्र क०, स० । 7 द्वैतप्रसिद्धि ग० । तथा ग० । 9 वस्तुनैव क०, ख०। 10 -मपेक्षावि० क०, स०। 11. निरविद्ये क०, ग० । 12. ब्रह्माद्वारास्व० क०, ख०, ग० । 13. -थात्मना ख० । 14. विधीते क० । 15. मृपादेर्नास्ति क० । मृपादिर्नास्ति ग० । 16 मस्तुवृत्तमतौपेक्ष ना० क० । 17 -रण इप्यते क०, ख० । - ९ . ४१] परब्रह्माद्वैतशासन-परीक्षा $ ३६ न चैवमप्रामाणिकायामविद्याया 1कल्प्यमानाया कश्चिद्दोषः, तस्याः ससारिणः स्वानुभवाश्रयत्वात् । द्वैतवादिन एव दृष्टादृष्टार्थप्रपञ्चम्य प्रमाणबाधितस्य कल्पनायामनेकविधाया बहुविधदोषानुषगात् । तदप्युक्तम्-- "त्वत्पक्षे बहुकल्प्यं स्यात् सर्व मानविरोधि च । कल्प्याऽविद्यैव मत्पक्षे सा चानुभवसंश्रया ॥" [ सबन्धवा० श्लो० १८२ ] इति $ ३७ इति कश्चित् , सोऽपि न प्रेक्षावान् , सर्वप्रमाणातीतम्बभावाया स्वयमविद्याया। स्वीकरणात् । नहि प्रेक्षावान् सकलप्रमाणातिक्रान्तरूपामविद्या विद्या वा4 स्वीकुरुते । ६३८ न च प्रमाणानामविद्याविषयत्वमयुक्तम् ; विद्यावदविद्याया अपि कथचिद् वस्तुत्वात् । तथा विद्यात्वप्रसग , इति चेत् , न किंचिदनिष्टम् “यथा यत्राविसंवादस्तथा तत्र प्रमाणता।" [ सिद्धिवि० १।१६ ] इत्यकलङ्कदेवैरप्युक्तत्वात् । बहि प्रमेयापेक्षया तु कस्यचित् सवेदनस्याविद्यात्वं वाधकप्रमाणावसेय कथमप्रमाणविषय , तद्बाधक पुनरर्थान्यथात्वसाधकमेव प्रमाणमनुभूयत इति वस्तुवृत्तमपेक्ष्यैवाविद्या निरूपणीया । $ ३९ न च कथचिद्विद्यावतोऽप्यात्मन प्रतिपत्तुरविद्यावत्त्व विरुध्यते यतोऽय महान् दोष : स्यात् । नाप्यविद्यागन्यत्वे कथचिद्विद्यानर्थक्य प्रसज्यते, तत्फलस्य सकलविद्यालक्षणस्य भावात् । $ ४०. न चाविद्यायामेव स्थित्वा 'अस्येयमविद्या' इति प्रकल्प्यते, सर्वस्य विद्यावस्थाया- मेव अविद्येतरविभागविनिश्चयात् ', स्वप्नाद्यविद्यादशाया तदभावात् । ततश्चात्माद्वारैवाविद्या अयुक्तिमती । यस्मादनुभवात् 'अविद्यावानहमस्मि' इत्यनुभववानात्मा तत् एव कथचित् प्रमाणोत्थ- विज्ञानावाधिनादविद्यापि सैवेत्यात्मताविरोधाभावात् । न चात्मनि कथचिद् 10विदितेऽप्यविद्येति नोपपद्यते, बाधाविरोधात् । कथचिद्विजातेऽपि वाऽविद्येति नितरा घटते । विदितात्मन एव तबाधकत्वविनिश्चिते कथचिद्बाधिताया बुद्धेम॒षात्वसिद्धेः । $ ४१ न च कथचिदविद्यावानेव नरम्तामविद्या निरूपयितु क्षम , सकलप्रेक्षावद् व्यवहार- विलोपात् । यदपि प्रमाणाघातासहिष्णुत्वममाधारण रक्षणमविद्याया , तदपि प्रमाणसामर्थ्यादेव निश्चेतव्यमिति11 न प्रमाणातिक्रान्ता काचिदविद्या नाम, यदभ्युपगमे ब्रह्माद्वैत न विरुद्धयते - [इति पुरुषाद्वैतगासनपरीक्षा] १ तुलना-अष्टसह० पृ०१६-१६३ । 1 कल्प० क० । कल्पनाम० क० । 3 मानुम० क० 14 -मविद्या वा ग०। 5 महादोषः ख० । 6 लक्षणभावात् ख० । 7 -गनिश्च० क०। 8 -बाना तत स०। १ सैरत्या. खः । 10 विधीयतेप्य. क.। 11 निश्चि० क० । 12 विरत ग०।

१० सत्यशासन-परीक्षा [१- [शब्दाढतशासनपरीक्षा] ६ ४२ तदेतेन गन्नाद्वैतमपि निरम्तम्, पुरुषाद्वैतवत्तम्यापि निगदितदोपविषयत्वसिद्धः । प्रक्रियामात्रभेदात्तद्रव्यवस्थानुपपत्ते, स्वपक्षेतरमाधकबाधकप्रमाणाभावाविशेपात , म्वतः मिद्धय- योगाद्गत्यन्तराभावाच्चेत्यलमतिप्रसंगिन्या कथया । सर्वथैवाद्वैतम्य दृप्टेष्टविरुद्धत्वेनामत्यन्वम्य व्यवस्थितत्वात् । ब्रामाविद्याप्रमापायात् सर्व वेदान्तिना वच । भवेत्प्रलापमात्रत्वान्नावधेय विपश्चिताम् ।। बामाद्वेतमत सत्यं न दृष्टेष्टविरोधतः । न च तेन प्रतिक्षेप स्याद्वादम्येति निश्चितम् ।। [इति शब्दाद्वैतशासनपरीक्षा ] 1 द्वैतत्तस्यापि खः ।

6 [विज्ञानाद्वैतशासन-परीक्षा ] तथा विज्ञानाद्वैतशासन दृष्टेष्टविरुद्धम्, [पूर्वपक्ष.] $ १. तथा हि-तावदिदं खलु विज्ञानाद्वैतिनामिष्टम्, अन्तरङ्गम्य स्वसविदितज्ञानस्यैव वस्तुता न तु बहिरङ्गस्यार्थस्य, जडस्य प्रतिभासायोगात्,1 वेद्यवेदकलक्षणस्य परपरिकल्पितस्य व्यभिचारित्वात् । ६२ [तत्र ] तावत्सौत्रान्तिकपरिकल्पिततज्जन्मताद्रूप्यतदध्यवसाया. न प्रत्येक वेद्य- वेदकलक्षणम् ; चक्षुषा' समानार्थसमनन्तरवेदनेन शुक्तिकाया रजताध्यवसायेन च व्यभिचारात् । सह वा समानार्थसमनन्तरज्ञानेन, कामलाग्रुपहतचक्षुष शुक्ले शो पीताकारज्ञानसमनन्तरज्ञानेन च व्यभिचारात् । ६ ३ योगाङ्गीकृतं "कार्यनिमित्तकारणत्वमपि न तल्लक्षणम् , चक्षुषानेकान्तात् । तथा अन्य- परिकल्पितकार्यकारणभावाख्यप्रभवयोग्यतादिकमपि न तल्लक्षणम् ; तेनैव व्यभिचारात् । ततः कस्यचि- दपि ग्राह्यग्राहकलक्षणस्यायोगात् सर्वं ग्राह्यग्राहकाकारज्ञान भ्रान्तमेव । तथा प्रयोग-~-यग्राह्यग्राहका- कारं तत्सर्व भ्रान्तम्, यथा स्वप्नेन्द्रजालादिज्ञानम्, तथा च प्रत्यक्षादिकमिति । न हि भ्रान्तप्रत्यक्षा- दिक बहिरर्थस्य व्यवस्थापकम् , स्वप्नप्रत्यक्षादेरपि - अर्थव्यवस्थापकत्वप्रसगात् । एवं युक्त्या अनुपपद्यमाना बहिरा दृष्टा अपि न श्रद्धेयाः, "युक्त्या यन्न घटामुपैति तदहं दृष्ट्वापि न श्रद्दधैं ।" ] इति वचनात् । $ ४. बहिरीनामेवमसभवात् सवित्तिरेव खण्डश प्रतिभासमाना सकलवेद्यवेदक व्यव- हाराय कल्प्यते । तदुक्तम्- "नावनिन सलिलं न पावको न मरुन्न गगनं न चापरम् । विश्वनाटकविलाससाक्षिणी संविदेव परितो विजृम्भते ॥" अन्यच्च, ] इति "एक संविदि विभाति भेदधी लपीतसुखदुःखरूपिणी । निम्ननाभिरियमुन्नतस्तनी स्त्रीति चित्रफलके समे यथा ॥" ] इति [ [ १. चक्षुपा घटज्ञान जायते न तु तत् चक्षुहिकम् । २ समानार्थे यत् पूर्वज्ञानादुत्पन्नम् अनन्तर- ज्ञान तत् पूर्वज्ञानादुत्पन्नम् अथ च पूर्वज्ञानाकार तथापि नोत्तर जान पूर्व जानाति, ज्ञान ज्ञानस्य न नियामकमिति सिद्धान्तात्। ३ शुक्तिकाया रजतमितिज्ञान रजताध्यवसायि, न च रजते प्रमाणम् । ४ शुक्ले शझे जायमान पीताकारज्ञान शहादुत्पन्न शङ्खलाकारमथ च शङ्खाध्यवसायि, न च प्रमाणम् । ५ का ज्ञान तन्निमित्तकारणं भवति वेद्यम् । ६ चक्षुरादिना । ७. उद्धृतमिदम्-अष्टश० अष्टसह० पृ०२३४ । मास योग० ख० । 2 क०, ग. प्रतौ 'तत्र' पढ नास्ति । 3. पिताकार. क. । 4 सकलवेदक० ग० 1 5. धी लपीतसु० स०, ग० । 6 समा 1 । क०॥

१२ सत्यशासन-परीक्षा [५- $ ५. तदेव बहिरास्यद्वितीयरहितत्वादद्वैतमनुभवसिद्धविज्ञानमात्रमेव व्यवतिष्ठत इति । [उत्तरपक्षः] ६ ६ तदेतत् विज्ञानाद्वेत प्रत्यक्षविरुद्धम्। विज्ञानरूप अन्तरर्थवद् बहिरथस्यापि नीलादे. परमार्थस्य प्रत्यक्षेणोपरक्षणात् । भ्रान्त तत्प्रत्यक्षमिति चेत् ; न, वाधकाभावात् । उक्त एव वंद्यवेदक- लक्षणाभावो वाधक इति चेत्, तावदेव बदता योगाचारेण विज्ञानाना क्षणिकत्वमनन्यवेद्यत्व नाना- संतानत्वमनुमानेनैव व्यवस्थापनीयम्, स्वसंवेदनात्तदसिद्धे; संविदा क्षणिकत्वेनाऽनन्यवेद्यत्वेन नानासतानत्वेन नित्यत्वेन च मर्ववेद्यत्वेनैकत्वेन परमब्रह्मणा ज्ञानवादिना इव स्वमवेदनाभावात् । अन्यथा ततो ब्रह्मसिद्धेपि दुर्निवारत्वात् । तत. क्षणिकत्वादिव्यवस्थापनमनुमानेनेवास्तु । तथा च क्षणिकत्वादौ कथचिद्वेद्यलक्षण यदि व्यवतिठेत् तदा प्रकृतसंविदा क्षणिकत्वाटिसाधन* लैनिक- जानेन कृत स्यान्नान्यथा । ६ ७ न चानुक्तदोपं वेद्यलक्षणमस्ति, विज्ञानवादिना तज्जन्मादेरनेकान्तिकत्यद्रोपवचनात् । सवितक्षणिकत्वादावनुमानवेदनस्य' तत्समवे नान्यत्र बहिरणं तदसमवोऽभिधेय. सर्वथा विशेपा- भावात् । $ ८ अत्राय प्रयोग -विमत्यधिकरणभावापन्न ज्ञान साक्षात्परम्परया चा म्वरूपव्यति- रिक्तार्थालम्बनम्; ग्राह्यग्राहकाकारत्वात् ; सतानान्तगद्यनुमानवत् । विप्लवनानग्रााग्राहका- कारित्वेन' व्यभिचार इति चेत् ; न ; सतानान्तरादिसाधनस्यापि व्यभिचारप्रसगात् । न हि व्यापार- व्याहारभे(द)नि सो' विप्लुनो नास्ति, येनाव्यभिचारिहेतुः स्यात् । यदि जाग्रद्दशाभाविसत्याभि- मतव्यापारादिहेतुरव्यभिचारी स्यात्1 0 तर्हि 11तथाविधग्राह्यग्राहकाकारकत्व हेतुरप्यव्यभिचारी भवेत् , तथैव विवक्षितत्वात् । $ ९ अथ सत्याभिमतज्ञानेन वासनाभेदो गम्यत' इति चेत् , तदन्यत्रापि समानम् । यथैव हि जाग्रद्दशाया बहिरर्थवासनाया दृढतमत्वात् तदाकाग्नानस्य मत्यत्वाभिमान ; स्वप्नादिदशाया तु तदवासनाया दृढत्वाभावात्तद्वेदनस्यासत्यत्वाभिमानो लोकस्य न परमार्थतो बहिर्थ. सिद्ध्यतीति वासनाभेदो गम्यते, तथानुपप्लवदशाया सतानान्तरज्ञानस्य वामनाया दृढतमत्वात् सत्यताभिमानो, अन्यत्र तददायादमत्यताव्यवहार इति वासनाभेटो गम्यताम्, न तु सतानान्तरम् । तदनभ्युपगमे स्वसंतानक्षणक्षयादिसिद्धिः कथमभ्युपगम्यते. ततः सुदूरमपि गत्वा किंचिद्वेदन स्त्रेष्टतत्त्वावलम्बन- मेषितव्यम्14 | तम्मादय मिथ्यादृष्टि परप्रत्यायनाय शास्त्र विदधान परमार्थत सविद्वानो वचन तत्त्वज्ञान च प्रतिरुणद्धि इति न किंचिदेतत् । तदेव वेद्यवेदकाकारत्वसाधन16 बहिरर्थवेदनस्य स्वरूपव्यतिरिक्तालम्बनत्व सावयतीति वाधकबाधनात् न वाधको वेद्यवेदकलक्षणाभाव । .. . १ बहिरर्थग्राहि । २ स्वसवेदनात् । ३ वेद्यवेदकमावसमवे । ४ सन्तानान्तराभ्युपगमे । 1 -नैकत्वेन क०। 2 -णा इव क०। 3 -कत्वव्य. क०। 4 -कत्वसा० क०। 5-दो कथचिद् वेदनस्य स०। 6 –सवोऽभि० ग० । -सवोऽभि० ग०। 7-कारस्बेन स०, कारकत्वेन ग018 -ग. प्रती 'न' पद नास्ति । 9-हारभेटो नि० क०, ख० । 10 व्यमिचारित्वात्तहि क०। 11 तथाविद् क० । 12 कारत्व० ख० । 13 वासना गम्यते क०। 14 तत्वालम्बन स०, ग०। 15 सविधानो वा वचन क० । 16 कारत्व क०। 17 -तीति वाधनात् सः । - .

१३-] विज्ञानाद्वैतशासन-परीक्षा १३ $ १० नन्वस्त्येव बहिरर्थप्रत्यक्षस्य बाधकम् , नीलतज्ज्ञानयोरभेदः सहोपलम्भ- नियमात्', द्विचन्द्रवत् , इत्यनुमानस्य तद्बाधकत्वादिति चेत् , न; हेतोविरुद्धत्वात् । यौगपद्यार्थे सहशब्दे तन्नियमस्याभेदविरुद्ध नाना(त्वे) भावात् । अभेदेऽपि चन्द्रद्वितये भाव इति चेत् ; न; तत्रापि यथा प्रतिभासं भेदभावात् । तथा तत्त्वमभेदोऽपि इति चेत् ; न, यथातत्त्व सहोपलम्भ- स्यापि अभावात् एवं दृष्टान्तोऽपि साध्यसाधनविकल. स्यात् । तन्मात्रस्य हेतुत्वे तस्य भेदमात्र एव भावाद्विरुद्ध एव हेतुः स्यात् । तथा-असिद्धश्चाय हेतु; यतो नर्तक्याघेकार्थसगतदृष्टय परचित्त- विदो' वा नावश्य तद्बुद्धिं तदर्थं वा सविदन्तीति हेतोरसिद्धि , नियमस्यासिद्धेः । नर्तकीरूप- स्यापि बहुत्वान्न तन्नियमासिद्धिरिति चेत् ; न; तपस्यैकत्वात् । तत्र सर्वेषा सभासमवायिना एक- वाक्यताप्रतिपत्तेः । व्यामोहादेव कुतश्चित्तत्र तेषामेकवाक्यत्व वस्तुतो नानैव तद्र्पमिति चेत् , कोशपानादेतत्प्रत्येतव्य न प्रमाणत कुतश्चिदपि तदभावात् । $ ११ अथ "सर्वे प्रत्ययाः निरालम्बनाः प्रत्ययत्वात्स्वप्नप्रत्ययवत्" [प्र० वार्तिकाल० पृ० ३५९ ] इत्यनुमानं प्रकृतबाधकमिति चेत् : न; प्रकृतमाध्यसाधनप्रत्यययोः स्वार्थालम्बनत्वा- भावेन हेतोर्विज्ञानमात्रसिद्धि , हेतुसाध्ययोरभावात् । अथार्थवत्त्वे, ताभ्यामेव हेतोयभिचारात् । तदुक्त भगवद्भि , स्वामिभि "अनर्थिका साधनसाध्यधीश्चेद्विज्ञानमात्रस्य न हेतुसिद्धिः । अथार्थवत्त्वं व्यभिचारदोपो न योगिगम्यं परवादिसिद्धम् ।।" [ युक्त्यनु० श्लो० १८] इति ६ १२. तदेव सकलबाधकवैधुर्यादभ्रान्तेन प्रत्यक्षेण बहिरर्थसिद्धेदृष्टविरुद्ध विज्ञानाद्वैत- शासनम् । $ १३ तथेष्टविरुद्ध च, अनुमानाबहिरर्थसिद्धे । तच्चेदमनुमानम् -'सन्ति बहिरा. साधनदूषणप्रयोगात्' इति कथ पुनरतो भावधर्मिणो बहिरर्थस्य साधनम् , कथ च न स्यात् , अस्य सद्भावधर्मत्वे तद्वदसिद्धत्वापत्ते; तदभावधर्मत्वे चातस्तदभावस्यैव सिद्धेविरुद्धत्वोपनिपातात् , तदुभयधर्मत्वे च व्यभिचारप्रसगात् इति चेत् ; न, प्रत्येकोभयधर्मविकल्पविकलस्यैवास्याभ्यनुज्ञानात् । कथमेव तस्य बहिरर्थभाव प्रत्येव लिङ्गत्व न तदभाव प्रत्यपीति चेत् ; न; तत्रैव तस्याविनाभाव- नियमात् । धर्मिधर्मस्यापि कृतकत्वादेरनित्यत्वादी' तत एव गमकत्वोपपत्ते. न धर्मिधर्मत्वमात्रेण, एकशाखाप्रभवत्वादावपि तदुपनिपातेनातिप्रसगापत्ते । - १ "सकृत्सवेद्यमानस्य नियमेन धिया सह । विषयस्य ततोऽन्यत्व केनाकारेण सिद्धयति ॥" प्र० वा० ३१३८८ २ एकत्वेऽपि । ३ सहोपलम्मनियममात्रस्य । ४ सभ्यानामित्यर्थ । ५ नर्तकीरूपम् । ६ कोशपान = सौगन्ध्यम् । ७ बहिरर्थसद्भाव एव । ८ अविनामावनियमादेव । ९ पक्वानि एतानि फलानि एकशाखा- प्रभवत्वात् उपयुक्तफलवदित्यन्न । 1.-त्यैव ग० । १ नीलदानयो ग० । 3 युग क०, न० । 4. नानात्वभावात् क०। 5 भेटव- भाषात् क० । भेद एव भावात् स० । 6 भेदेऽपि क०, स०। 7 विरोधावा० क०, ख०। 8 प्रत्येव ग० । १.-नित्यादौ ग० ।

सत्यशासन-परीक्षा [१६- $ १४ तत्रे साधन नीलादे. सवेदनत्वसमर्थनम् , दूपण बहिरर्थ त्वनिषेधन तयोः प्रयोगः प्रकाशनम् । 'नीलादिः सवेदनादव्यतिरिक्तः तद्वेद्यत्वात् ; तत्स्वरूपवत्' इत्यादिः 'न जडो नीलादिः प्रतिभास मानत्वात् सुखादिवत्' इत्यादिश्च । $ १५ कथ पुनरस्य बहिरर्थाभावेऽनुपपत्तिरिति चेत् ; अस्य बहिरर्थविशेषत्वादेव । नहि तदभावे तद्विशेषस्य सभव , वृक्षाभावे शिशपाभावस्यैव प्रतिपत्तेः । नासौ तद्विशेष आरोपितरूपत्वा- दिति चेत् ; न; तत. सर्वशक्तिविकलादनिष्टवदिष्टस्याप्यसिद्धेः । अनारोपितोऽप्येय बोध एव बहिरर्थ इति चेत् ; न, प्रतिपाद्यस्य तद्भावात् । प्रतिपादकस्येति चेत्, कथं ततः प्रतिपाद्यस्य प्रकृतार्थम्य प्रतिपत्तिः अन्यबोधादन्यस्य तदनुपपत्ते. । अन्यथा प्रत्यात्मं बुद्धिभेदकल्पनावैफल्योप- निपातात् । तस्मादर्थविशेष एवायमित्युपपन्नमेवातो बहिरर्थव्यवस्थानम् । तत साधूक्तम्- 'इष्टविरुद्ध विज्ञानाद्वैतम्' इति । [इति विज्ञानाद्वैतशासनपरीक्षा ] [चित्राद्वैतशासनपरीक्षा] ६ १६ एतेन चित्राद्वैतमपि प्रत्युक्तम् । तन्मतेऽपि बहिरापहवात् । प्रत्यक्षानुमानाभ्या बहिरर्थस्य च व्यवस्थापितत्वादित्यल प्रसगेन । सर्वथा अन्तरङ्गार्थकान्तशासनस्य दृष्टेष्टविरुद्धत्वा- दसत्यत्वसिद्धे.। प्रमाणाभावत. सर्वं विज्ञानाद्वैतिना वच । भवेत्प्रलापमात्रत्वान्नावधेय विपश्चिताम् ॥ ज्ञानाद्वैत न सत्य स्यादृष्टेष्टाभ्या विरोधत । न च तेन प्रतिक्षेप स्याद्वादस्येति निश्चितम् ।। [इति चित्राद्वैतशासनपरीक्षा] १ 'साधनदूषणप्रयोगात्' इत्यत्र । २ साधनदूषणप्रयोगादित्यस्य हेतो । ३ बहिरामावे । ४ बहिरर्थविशेप । ५ साधनदूपणप्रयोग । ६ प्रतिपादकबोधरूपात् । I -रर्थनि० ख० 12 माससमा० ग० । 3 त्यादेश्च ग० । 4 न तेन क० ।

: [चार्वाकशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्षः ] ६१. अथानेकार्थवादिशासनाना मध्ये तावच्चार्वाकमत दृष्टेष्टविरुद्धम् । इद हि तेषामभि- मतम्-इह तावन्न कश्चित्सर्वज्ञः सुगतादिपु संभवति । "सुगतो यदि सर्वज्ञः कपिलो नेति का प्रमा। तावुभौ यदि सर्वशो मतभेदः कथं तयोः॥" [ तत्त्वसं० श्लो० ३१४९] 'इति वचनात् । ६२. नाप्यागमस्तर्को वा प्रमाणभूतोऽस्ति परस्परविरोधादिदोषात्; ततः कथं धर्मो व्यवतिष्ठेत । तदुक्तम्- "तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्नाः, नासौ मुनिर्यस्य वचः प्रमाणम् । धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां, महाजनो येन गतः स पन्थाः॥" [ महाभारत ] इति ६ ३ इह आप्तस्तु कश्चिद्देवतारूपो गुरुर्वृहस्पतिरेव प्रत्यक्षप्रसिद्धपृथिव्यादितत्त्वोपदेशात् । तथाहि-पृथिव्यप्तेजोवायव इति चत्वार्येव तत्त्वानि । कायाकारपरिणतेभ्यस्तेभ्यः पिष्टोढकगुड- धातकीसंयोगान्मदशक्तिवान् स्नायुलाबूदण्डागुष्ठानुलिप्रयत्नाच्छ्रवणरमणीयक्वणितवच्च1 तदात्मक चैतन्यं जायते । तच्च गर्भादिमरणपर्यन्तं 'जीव आत्मा' इत्यादि व्यपदेशभाक् प्रवर्तते। गर्भात् पूर्वकाले मरणादुत्तरकाले च तदभाव । ६४ ततः परलोकिनोऽभावः। परलोकिनोऽभावात् परलोकस्याप्यभाव । परलोका- भावे तल्लोकसुखानुभवनार्थमैहिकसुखविमुखा डिम्भका इव दम्भप्रलम्भनाधीना. शरीरार्थव्यय- विधानेन बहुधा मुधावत् क्लेशमश्नुवते । तथैवोक्तम्- "यावज्जीवेत् सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः । भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमन कुतः ॥ अग्निहोत्रं त्रयो वेदाः त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् । वुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति वृहस्पतिः ॥ स्त्रीमुद्रां मकरध्वजस्य महतीं निर्वाणसंपत्करी, ये मोहादवधीरयन्ति कुधियो मिथ्यासुखान्वेषिणः। १ श्लोकोऽय पूर्वपक्षे विद्यते । २ पृथिव्यादिभ्यः । ३. ऋक्यजुसामारया । ४ उद्धृतमिदम्- सर्वदर्शनस०, चार्वा० पृ० २,५। 1 प्रयत्नाभ्रम० क० । 2 काले तद्० क०। 3 -दिना क०, ग०। 4. जीवक०, क० । - १६ सत्यशासन-परीक्षा [९- ते तेनैव निहत्य निर्दयतरं भस्मीकता लुण्ठिताः, केचित् पञ्चशिखीकृता हि जटिनः कापालिकाश्चापरे॥ [शृङ्गारगतक श्लो० ७९] अन्यच्च- “पयोधरभरालसाः स्मरविर्णिताक्षणाः, क्वचिन्मलयपञ्चमोच्चरितगीतमद्वारिणी 1 । विहाय रमणीरमूरपरमोक्षसौख्यार्थिना- महो जडिमडिण्डिमो विफलभण्डपाखण्डिनाम् ॥" ] इति [ उत्तरपक्ष. ] ६५ तदेतच्चार्वाकमत तावद् दृष्टविरुद्धम् , प्रत्यक्षेण पृथिव्यादीना परस्परमुपादानोपादेय-- भावदर्शनात् , तेषा सर्वथा तत्त्वान्तरत्वस्य पक्षस्य प्रत्यक्षविरोधसिद्धेः । तेषा परस्परमुपादानो- पादेयभावेऽपि तत्त्वान्तरत्वे बीजादेरमुरादेरपि तत्त्वान्तरत्वप्रसगात् । ६ ६ न च तेपा परस्परमुपादानोपादेयभावदर्शनमसिद्धम् , पृथिव्यात्मकचन्द्रकान्त- सूर्यकान्त-काष्ठविशेषेभ्यो जलानलयोरुत्पत्तेः । प्रदीपजलविशेषाभ्या पृथ्वीरूपाञ्जन-मुक्ताफलयोः, पृथ्वीविशेषतालवृन्तादेर्वायो साक्षाद्वीक्षणात् , अन्यथा दृष्टापलापप्रसगात् । ६७ तथा जीवो नास्तीत्यभिमतमपि दृष्टविरुद्धम् । सुखदुःखहर्षविषादाद्यनेकपरिणा- मात्मकस्यात्मतत्त्वम्य अस्वसवेदनप्रत्यक्षेण निर्बाधमनुभवात् हेतुभिर्विनैव अस्तित्वस्य सिद्धे । "तस्य हि हेतुर्वाच्यो यस्मिन्मोमुह्यते मतिर्नृणाम् । न हि दर्पण श्रादेयः करकङ्कणदर्शनाय बुधैः ।।" ] इति वचनात् $ ८ न च जीवस्य ज्ञानात्मन स्वसवेदनमसिद्धम् ; ज्ञानस्य स्वसविदितत्वे चाभावापत्ते- ग्राहकाभावात् । ज्ञानान्तरेण ग्रहणे, तस्यापि तदनन्तरेण ग्रहणकल्पनायामनवस्थोपनिपातात् । तदकल्पनाया तथा वक्तुमशक्ते । न चानुमानेन तद्ग्रहणम् , तदनुपगमात् प्रमाणसख्याव्याघा- ताच्च । तत स्वसवेदनमेपितव्यम् । तत्र च स्वसवेदनेन जीवस्य भोक्तृत्वासाधारणधर्मभृत. साक्षात्करणाद् दृष्टविरुद्धमिद बार्हस्पत्य मतम् । $ ६ नासिद्ध भोक्तृत्वस्यासाधारणत्वम्"; अचेतनस्य शरीरादेस्तदनुपपत्ते । न ह्यचेत- नस्य शरीरस्य भोक्तृत्वमुपपद्यते, शरीरस्य भोगाधिष्ठानत्वेन प्रसिद्धेः, अन्यथा मृतकस्यापि भोक्तृत्व- प्रसगात् । नापि करणग्रामस्यै, तस्य भोगोपभोगकरणत्वात् । न च शब्दादिविषयस्य; भोग्यत्वेन { १ उद्धृतमिदम्-यशस्तिलके उत्तरार्धे, पृ० २५२ । २. मणिभ्य । ३. स्वातिनक्षत्रे वृष्टस्य शुक्तिमध्ये पतितस्य । ४ अनुमानानभ्युपगमात् । ५ इन्द्रियसमूहस्य । 1 -झझारिण क०। 2 -त्वस्य परोक्षस्य प्रत्य० ख० । -स्वस्य परेष्टस्य प्रत्य०' ग०॥ 3. -य मवे० क० । 4 -मन्नो० क० । 5 -णमादेय क० 16 -पि साधा० क०, ख० ।

-१६] चार्वाकशासन-परीक्षा १७ तस्य प्रतीते । ततो भोक्तृत्वमात्मन्येवेति तदपलापिनो लोकायतिकम्य भोक्तृत्व क्वापि न व्यवस्था- मास्तिभुवीत । १० ननु पृथिव्यादिसमुद्रयगरीरकार्यान्वयिनि गर्भादिमरणपर्यन्ते चैतन्ये सर्वचेतना- विशेषव्यापिनि भोक्तृत्व सभवति, गरीरादिविलक्षणत्वात्तम्येति चेत् ; तदेवात्मद्रव्यमस्तु, जन्मन पूर्व मरणादूर्ध्वमपि तस्य सद्भावोपपत्ते. । विवादापन्न चैतन्यमनाद्यनन्त पृथिव्यादिसमुदयगरीरेन्द्रिय- विषयेभ्योऽत्यन्तवैलक्षण्यस्यान्यथानुपपत्ते । न हि तत्कार्य ततोऽत्यन्तविलक्षणमस्ति, रूपादिसमन्वयात् । चैतन्यस्यापि सत्त्वादिसमन्वयान्नात्यन्तविलक्षणत्वमिति चेत् ; न; तत्त्वभेदेऽपि तस्य भावात् पृथिव्या- दीनामभेदापत्ते । पृथिव्यादितत्त्वभेदानामेकविकारिसमन्वयाभावावेद एव केषाचित् प्रागभावादिभेद- वत् ; किमिदानी चैतन्यभूतयोरेकविकारिसमन्वयोऽस्ति येन तत्त्वान्तरत्वेन भेढो न स्यात्, तस्मादेक- विकारिसमन्वयासत्त्व लक्षण्यम्, तदेव च तत्त्वान्तरत्वमित्यनाद्यनन्तता चैतन्यस्य साधयतीत्यना- धनन्तत्वेन प्रसिद्धः सोऽयमात्मा हर्षविषादाद्यनेकाकारविवर्त प्रत्यात्मवेदनीय प्रतिशरीर भेदाभेदात्म- कोऽप्रत्याख्यानाहं प्रतिक्षिपन्तमात्मान प्रतिबोधयतीति कृत प्रयासेन । ततश्चार्वाकमतं दृष्टविरुद्ध- मिति सिद्धम् । $ ११ एतेन तदिष्टविरुद्ध च सिद्धम्, अनाद्यनन्तस्यात्मन साधितत्वात्, प्रतिषेधगौण- कल्पनादिभिस्तस्य साधयिष्यमाणत्वाच्च । तदुक्तम्- "प्रतिषेध-गौणकल्पन-शुद्धपदाने कसंमतिजिनोक्तः । निर्वाधलक्षणार्थैलिरैरपि भाव्यते भावः ॥" - $ १२ तद्यथा---'नास्ति जीव' इति प्रतिषेधवचनमेव जीवस्य मुख्यवृत्त्या अस्तित्वं सूच- यति, निरूपाख्येपुं विधिप्रतिषेधानुपपत्ते । यथा-'नास्तीह घट ' इति प्रतिषेधो देशान्तरे घटास्तित्वं प्रकाशयति तथा स्वरूपादिचतुष्टयेन सत एव जीवस्य पररूपादिचतुष्टयेन नास्तित्व घटते नान्यथा। $ १३. ननु खरविषाणा दीनामत्यन्ताभावरूपाणामपि निषेधविषय स्योपपत्तिरिति चेत् ; न, गवादिमस्तके सत एव विषाणस्य खरादिमम्तके प्रतिषेधदर्शनात् । तत सत प्रतीतौ' प्रतिषेध- सिद्धिरिति सुनिरूपितम् । $ १४ तथा चित्रपुरुषादौ 'इदं सजीवचित्रम्' इति गौणकल्पन मुख्यवृत्त्या जीवास्तित्व कथयति, यथा-'मिहो माणवक ' इति माणवके सिंहत्व विशिष्ट जात्यादिपरिणतसिंहास्तित्वमिति । तस्माद्गौणकल्पनात् मुत्यसिद्धिरिति निरवद्यम् । $ १५. तथा 'जीव' इति शुद्धपद मुख्यवृत्त्या, स्वार्थवत्, शुद्धपदत्वात् , प्रमाणपदवत् । ततः शुद्धपदाभिधेयत्वात् 'अस्ति जीव' इति च सिद्धम् । ६ १६ तथैवानेकविशिष्टजनसमतत्वात् , आप्तप्रणीतत्वाच्च 'अस्ति जीव' इति सुव्य- वस्थितम् । . १. सत्त्वादिसमन्वयस्य । २ नैयायिकानाम् । ३ प्रतिपेधश्च गौणकल्पन च शुद्धपदश्च अनेक- सम्मतिश्च जिनोक्तिश्च ते । ४ जीवः । ५ निरूपेषु तुच्छेषु । 1 -वित क०, ग०। 2. -नन्तरा चैत-क०, ख० । 3 -तदेष्ट क०॥ 4 -माणाचक०॥ 5. -दिना ख० । 6 -विषयत्वोप-ग017 प्रतीतो प्रति क०। 8 मजीव क०, स०। ३ । السما सत्यशासन-परीक्षा [१७- ६ १७ किं च भूतचैतन्ययोर्वहिरन्तर्मुखावभासयोः बाल्यादि-रागादि-विरुद्धधर्माध्यासि- तयोर्द्रव्यान्तरभावेन1 भिन्नप्रमाणग्राह्यत्वात् भेट एव । तयोगभेदेनादर्शनादभेदे शरीराकारपरि- णतावनिवन-पवनसख-पवनानामप्येकत्वासगात् । “उपादानकारणसदृशं हि कार्यं भवति ।" [] इति वचनाद् धारणेरणद्रवोप्णतारूपेण भृतसादृश्याभावात् , अमूर्तचैतन्यस्य मूर्तकार्यत्वायोगाच्च शरीरादिन्नमेव चैतन्यम् । $ १८ तस्य चाभिलापो हि प्रत्यभिज्ञाने सति प्रादुर्भवति, प्रत्यभिज्ञान च स्मरणे सति, स्मग्ण च पूर्वानुभव एव भवतीति पूर्वानुभव सिद्धः । अन्यथा तदहर्जातबालकस्य स्तनादावभिलापा- ऽभावप्रसगात् । 'मृताना केषाचिद्रक्षोयक्षादिकुलेषु स्वयमुत्पन्नत्वेन कथयतां दर्शनात् केषाचिद्भव- स्मृतरुपलम्भाच्च पग्लोकोऽप्यस्ति । तदुक्तम्- "तदहजस्तनेहातो रक्षो दृष्टर्भवस्मृतेः । भृतानन्वयनात सिद्धः प्रकृतिशः सनातनः ॥" ] इति ६ १९ जननादिकारणाविशेषेऽपि सुखदुःखादिवैचित्र्यदर्शनात् पुण्यपापादिकमप्यस्त्येव । एव प्रमाणप्रसिद्ध परलोके परलोकपुण्यपापप्रवेषि बृहस्पतिमत न सता मनो मनागपि प्रीणयति', किंतु उपालम्भमेवाहति । स चोक्त स्वामिभिः- 'मद्यागवद्भूतसमागमे शः शक्त्यन्तरव्यक्तिरदैवसृष्टिः । इत्यात्मशिश्नोदरपुष्टितुष्ट्रनिहीभयैर्हा मृदवः प्रलब्धाः॥ दृष्टेऽविशिष्टे जननादिहेतौ विशिष्टता का प्रतिसत्त्वमेषाम् । स्वभावत. किं न परस्य सिद्धिरतावकानामपि हा प्रपातः॥ स्वच्छन्दवृत्तेर्जगतः स्वभावाटुच्चैरनाचारपदेप्वदोषम् । निघुण्य दीक्षा सममुक्तिमानास्त्वदृष्टिवायाः वत विभ्रमन्ति' ॥ [ युक्त्यनु० श्लो० ३५-३७] इति ततो नाय बृहम्पतिराप्ततामात्मसात्करोति । $ २० यदुक्तम् --'सर्वज्ञो नास्ति' इत्यादि, तदपि प्रलापमात्रमेव; प्रत्यक्षतः सर्वज्ञस्य मुने , अनुमानम्यागमम्य च नास्तित्वव्यवस्थापनासभवात् , तस्य भावविषयताभ्युपगमात् । यदि किंचित् प्रत्यक्ष तत्राप्रवर्तमानत्वादेव तदभावं व्यवस्थापयेत् , तदा पुरुषान्तरादि-प्रत्यक्षान्तरा- णामप्यभाव तदेव गमयेत् , तद्विषयाणा च "क्ष्मादीनामित्यतिप्रसग स्वयमिष्टस्य बृहस्पत्यादि- प्रत्यक्षास्यापि सविषयस्याभ वसिद्धे । , - १ वाल्यादिभावो हि भौतिकशरीरगोचर । २ जलम् । ३. अग्निः । ४ धारण पृथिव्याः, ईरण वाय्बो, वो जलस्य, उष्णता चाग्ने । ५ जीवस्य । ६ तुलना-प्रमेयरन । ७ प्रत्यक्षस्य । 1 -तराभावेन क० । 2 -नुभूत एव क० । 3 -स्कृवे क०। 4 प्रसिद्ध पर-क०, ख० । ॐ प्रणयति क०, ख० । 6 दृष्टि क० । 7 इद पथ ख 'प्रतौ नास्ति'। 8. विषयत्वाभ्यु० ख० । 9 -दिना० ख०।

-२४] चार्वाकशासन-परीक्षा १९ ६२१. अथ प्रत्यक्षान्तर स्वयमात्मानं व्यवस्थापयति पृथिव्यादिस्वविषय च तत्र प्रवर्त- नादतो न तदभावप्रसग इति मतम्; तर्हि सर्वज्ञोऽपि स्वसवेदनादात्मानं स्वर्गापूर्वादिविषय च व्यवस्थापयति, इति कथ तदभावसिद्धि., प्रमाणान्तरस्य च तद्वचनस्य हेतुवादरूपस्याऽहेतुवाद- रूपस्य च स एव व्यवस्थापक स्यादिति कुतस्तदभावसिद्धि । सर्वज्ञ स्वपरव्यवस्थापकोऽस्तीत्यत्र किं प्रमाणमिति चेत्; स्वप्रत्यक्षकप्रमाणवादिन प्रत्यक्षान्तरं स्वपरविषयमस्तीत्यत्र किं प्रमाणम्, तथा प्रसिद्धिरन्यत्रापि, इति न प्रत्यक्षं तदभावावेदकम् , अतिप्रसगस्य दुःपरिहरत्वात् । $ २२ किं च, सर्वज्ञत्वाभाव प्रत्यक्षेण क्वचित् कदाचित् कम्यचिद् व्यवस्थाप्यते, सर्वत्र सर्वदा सर्वस्य वा १ तत्राद्यपक्षे परस्येष्टापादनम् । द्वितीयपक्षे सर्वत्र सर्वदा सर्वस्य सर्वजत्वाभाव प्रत्यक्षतः सविदन् स्वय सर्वज्ञः स्यात् । तथा सति व्याहतमेतत् सर्वज्ञाभाववचन चार्वाकस्य । $ २३. नाप्यनुमान तदभावसाधकम्, तदनभ्युपगमात् स्वयमनुमान निराकुर्वन्ननुमाना- देव सर्वज्ञाभाव साधयति इति कथमनुन्मत्तः । ६ २४. तदेवं बाधकाभावादस्ति सर्वज्ञ । स च स्याद्वाढी भगवनहन्नेवान्ययोगव्यवच्छेदेन निश्चीयते, तस्यैव युक्तिशास्त्राविरुद्धवाक्यत्वात् । अन्येषा न्यायागमविरुद्धभापित्वात् । तत- स्तदुक्तो धर्मो मोक्षश्च व्यवतिष्ठते । तन्निराकरणे चार्वाकाणा 'प्रमाणाभावस्य प्रतिणदितपायत्वात् । प्रलापमात्रस्य च प्रेक्षावतामनादरणीयत्वादिति स्थित दृष्टेष्टविरुद्धत्वात् चार्वाकमतमसत्यमिति । स्वपराविदिताध्यक्ष चार्वाकाणा वचोऽखिलम् । भवेत प्रलापमात्रत्वान्नावधेय विपश्चिताम् ।। न चावीकमत सत्यं दृष्टादृष्टेष्टबाधत । न च तेन प्रतिक्षेप: स्याद्वाद(स्ये)ति निश्चितम् ॥ [इति चार्वाकशासन-परीक्षा] 7 १. अनुमानरूपस्य । २. सर्वज्ञस्य प्रमाणान्तरस्य च । ३ 'अस्मिन् काले अत्र कश्चित्सर्वज्ञो नास्ति' इत्यत्र विवादाभावात् । ४. स्याद्वादितीर्थकरप्रणीत । 1 -दिविष- क०। 2 प्रवर्तमानात् क०, ख०। 3 तद्वचस्य ख०। 4 हितवाद ख० । 5 तदभ्युप-क०। 6-वाक्त्वात् ख०, ग० । 7-माणभाव-क०, ख०। 8 विधिताध्यक्षाणा चा- क०, ख०। 9 -दश्चति क०, खः ।

-1 कल्पना। [बौद्धशासन-परीक्षा] $ १. तथा ताथागतशासनमपि दृष्टेष्टविरुद्धम् । एव हि सर्वभावाना क्षणभङ्गसगममेवाङ्ग- शृङ्गारमगीकुर्वाणास्ताथागता. सगिरन्ते-रूपादिपञ्चस्कन्धा एव तत्त्वानि । रूपरसगन्धस्पर्शपरमाणवः सजातीयविजातीयव्यावृत्ताः परम्पराऽसबद्धा रूपस्कन्धा. । सुखदुःखादयो वेटनास्कन्धाः । सवि- 'कल्पकनिर्विकल्पकज्ञानानि विज्ञानस्कन्धा । "जाति-क्रिया-गुण-द्रव्यसज्ञा पञ्चैव अश्वो याति सितो घण्टिक तदास्येति यथाक्रमम् ॥ ] इति इत्येत कल्पनासहित सविकल्पकम् , तद्रहित निर्विकल्पकम् । तथा वृक्षादिनामानि संज्ञास्कन्धाः । ज्ञानपुण्यपापवासना. सस्कारस्कन्धा इति । रूपवेदनाविज्ञानसज्ञासस्कारा इति पञ्च स्कन्धा । $२ तेषु च पूर्व-पूर्वचित्तविशेषप्रभवा उत्तरोत्तरचित्तक्षणा उपादानोपादेयरूपेण सजात्युत्तर- क्षणं जनयन्त: परस्परासपृक्ता निरन्वयप्रतिक्षणविशरारवो निरशाश्च भ्रान्तिवशात् ग्राह्य-ग्राहक- सवेदनाकारत्रयाक्रान्ता "विजातीयाऽव्यवधानलघूत्पत्ति-सदृशापरापरोत्पत्तिविप्रलब्धबुद्धे. रूपेण वर्तमाना आत्माभिधान जनयन्ति । तत्रैकत्वप्रत्यभिज्ञानमपि लूनपुनर्जातनखकेशादौ पूर्वापरै- कत्वाभावेऽपि दर्शनान्नित्यत्वसमर्थनाय नालमिति त्रिकालानुयाय्ये' कत्वरहिता एव वर्तन्ते; किंतु जान-वैराग्यभावनातिशयवशाढविद्यातृष्णाविगमे निशक्तिकानामुत्तरोत्तरविज्ञानक्षणमजनयता निर- न्वयविनागेन सतानोच्छित्तिर्मोक्ष. | "प्रदीपनिर्वाणकल्पमात्मनिर्वाणम्' [ ] इति वचनात् । तदुक्तम्- "क्षणादूर्ध्व न तिष्ठन्ति शरीरेन्द्रियबुद्धयः । दीपार्चिरिव वर्तन्ते स्कन्धाः क्षणविलम्विताः1 ।।' ] इति । ६ ३ तम्य च मोक्षम्योपाय' काषायचीवरपरिधानगिरस्तुण्डमुण्डनब्रह्मचर्यधारणादय । तथैव दु खसमुद्रयनिरोधमार्गणा इति चन्वार पढाथाश्चतुरार्यसत्याभिधाना मुमुक्षुभिर्ज्ञातव्या $ ४ तत्र सहज-शारीर-मानमागन्तुकानि टु खानि । तत्र सहज क्षुत्तृप्णा-मनोभूभया- दिकम् । शारीर वात-पित्त-पीनसाना वैषम्यसभूतम् । मानस धिक्कारावजेच्छाविघातादिजनितम् । आगन्तुक शीतवातातपागनिपातादिजनितम् । एतद् खविशिष्टाश्चित्तक्षणा. ससारिणा दु खमित्यु- सतान- 9" १ घण्टावान् । २ तत्सज्ञक । ३ आशूत्पत्ति । ४. समुदेति अस्मादिति समुदय दु खकारण- मिति यावत् । ५ निर्वाणम् । ६ अष्टाङ्गिक सम्यग्दृष्ट्यादि । ७. कफ । 1 -सम्बन्धा क० । 2 मविकल्पनिर्विकरपकज्ञा-क०, सः। 3 पितो क०, स० । 4. -ख्यो यथा-क० । तालारयो- स० । । जनयत क०, स० । 6 -क्रान्तानि जातीया-क०, खन् । 7. यायै- कत्व-क०। 8 रहिताववर्तन्ते, क०, स० । 9 दूदुव, स० । 10 विलम्बिन ग० । - ८] वौद्धशासन-परीक्षा २१ च्यन्ते । तदु ख जननकर्मबन्धहेतुभूते अविद्यातृष्णे समुदयशब्देनोच्यते तत्र वस्तुयाथात्म्या- ऽप्रतिपत्तिरविद्या । इष्टानिष्टेन्द्रियविषयप्राप्तिपरिहारवाञ्छा तृप्णा । निरोधो नाम अविद्यातृप्णा- विनाशेन निरास्रवचित्तसंतानोत्पत्तिलक्षण सतानोच्छित्तिलक्षणो वा मोक्षः । तथा मोक्षहेतुभूता मार्गणा । . $ ५ सा च सम्यक्त्व-सज्ञा-सज्ञीवाक्कायकान्तायामाऽऽजीवस्थिति-समाधिलक्षणा- प्टाङ्गाः । तत्र सम्यक्त्व पदार्थाना याथात्म्यदर्शनम् । सज्ञा वाचक. शब्दः सजी वाच्योऽर्थः । वाक्कायकर्मणी वाक्कायव्यापारौ । अन्तर्व्यायामो वायुधारणा। आजीव स्थितिरायुरवसानपर्यन्त प्राणधारणा । समाधिर्नाम सर्व दु.खम्, सर्व क्षणिकम् , सर्वं निरात्मक सर्व शून्यमिति सत्यभावना । तस्या प्रकर्षादविद्यातृप्णाविगमे निरास्रवचित्तक्षणा. सकलपदार्थावभासका. समुत्पद्यन्ते । तद्योगि- प्रत्यक्षम् । स च योगी यावढायुस्तावत्कालमुपासकाना धर्ममुपदेश्य आयुरवसाने प्रदीपनिर्वाण- कल्पमात्मनिर्वाण प्राप्नोति उत्तरचित्तस्योत्पत्तेरभावादिति । तदप्युक्तम्- "दीपो यथा निर्वृत्तिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न कांचिद्विदिशं न कांचित् स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ।। जीवस्तथा' निर्वृतिमभ्युपेतो नैवानि गच्छति नान्तरिक्षम् । दिशं न कांचित् विदिशं न कांचित् मोहक्षयात् केवलमेति शान्तिम् ॥" [ सौन्दरनन्द० १६।२८,२९ ] इति [ उत्तरपक्ष ] ६६ तदेतत्सौगतमत तावत् दृष्टविरुद्धम् । सौगताभिमतस्य निरन्वयविनाशिपरमाणुमात्र- लक्षणस्वलक्षणस्य स्थूलस्थिरसाधारणाकारावभासिना प्रत्यक्षेण विरुद्धत्वात् । नहि प्रत्यक्षे सूक्ष्मक्षणिका- साधारणरूपाः परमाणव प्रतिभासन्ते, स्थूलस्थिरसाधारणाकारात्मनामेव घटादीना प्रतिभासनात् । ६ ७ ननु परमाणुष्वेवात्यासन्नाससृष्टेपु दृष्टौ प्रतिभासमानेपु कुतश्चिद्विभ्रमनिमित्तादात्मनि पात्र चासन्तमेव स्थूलाद्याकार दर्शयन्तो सवृति तान् सवृगोति केशादिभ्रान्तिवदिति चेत् ; नैवम् ; बहिरन्तश्च प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वापत्ते, तस्य अभ्रान्तत्वकल्पनापोढत्वाभावप्रसगात्, “प्रत्यक्षं कल्पना- पोढमभ्रान्तम्" [न्यायवि०१।४] इति लक्षणस्याऽसभवदोपानुषगात् । $ ८ ननु नैप दोष , परमाणुप्रत्यक्षस्य तल्लक्षणसभवादिति चेत्, न; परमाणूना जातुचिद- ध्यक्षबुद्धावप्रतिभासनात् । न हि कश्चिल्लौकिकः परीक्षको वा देशकालविप्रकृष्टार्थवत् परमाणून् साक्षात्मत्येति, अन्यथा प्रतीत्यपलापप्रसगात् । त इमे परमाणवः प्रत्यक्षबुद्धावात्मान न समर्पयन्ति प्रत्यक्षता च स्वीकर्तुमिच्छन्तीत्यमूल्यदानक्रयिण । . १ तन्मते हि-सम्यग्दृष्टि , सम्यक्सकल्प , सम्यग्वाक, सम्यग्व्यायाम , सम्यगाजीव , सम्यक प्रयत्न , सम्यकस्मृति , सम्यग्समाधिश्चेत्यष्टौ । २ भावनाया । ३ कल्पना । ४ मूल्य दात न प्रमवन्ति अथ च प्रत्यक्षतामिच्छति । 1 नोच्यते क० । 2 तदा क०, ख० । 3 अजीव क०, ख० । 4 -त्मक शून्यम् क० । 5 योगि क०, स०। 6 -रिष्टम् क०, ख । 7 जिनस्तथा क० । 8 -माने कुत-क०, ख० ।' - २२ सत्यशासन-परीक्षा [९- SE न च परमाणव प्रत्यक्षा भवितुमर्हन्ति, तत्साक्षात्करणे प्रमाणाभावात् । निर्विकल्पक प्रत्यक्षमस्तीति चेत् ; न; तस्याव्यवसायात्मकस्याप्रामाण्यात्, अविसवादवैकल्यात् । तथा हि- यदविसवादविफल न तत्प्रमाण, यथा अनस्य विषदर्शनम्, तद्विकल च सौगतपरिकल्पितं दर्शनम् । अविसवादो हीत्थ गेयमित्थ चित्रमित्यभिसन्धिकरणमेव । "अभिप्रायनिवेदनादविसंवादनम्" [प्र० वा० १।३] इति वचनात् । न च तन्निवेदनमव्यवसायस्य, अज्ञविपदर्शनस्यापि तत्प्रसंगात् । ६१० अव्यवसायस्यापि दर्शनस्य व्यवसायजननात्त न्निवेढनमिति चेत् ; न;व्यवसायस्यैवा- सभवात् , कुतश्चिदपि तत्स्वरूपस्याव्यवस्थिते. । विकल्पस्वरूपस्य स्वसवेदनेन व्यवस्थापनेऽपि तस्य विकल्पान्तरापेक्षत्वप्रसगात्, नीलादिस्वलक्षणदर्शनवत् । $ ११ यदि स्वसवेदन निश्चयस्वरूप निश् चयनिरपेक्षतया परिनिष्ठापयेत् तदा वस्तुदर्शनमपि स्वलक्षणम् , विशेषाभावात् , तथा च किं निश्चयापेक्षया ? वस्तुदर्शनस्य निश्चयापेक्षाया वा निश्चय- स्वरूपसवेदनस्यापि निश्चयान्तरापेक्षणादनवस्था स्यात् । विकल्पस्य विकल्पान्तरेण व्यवस्थापनेऽपि तस्यापि तदन्तरेण व्यवस्थेति तदवस्थैवानवस्था। ततो व्यवसाय एव न सभवति यतस्तजननात् प्रत्यक्ष प्रामाण्यमुपढौकेत। $ १२ यथा कथचिद् व्यवसायम्य सभवे वा न तज्जनन सभवति अव्यवसायाद् व्यव- सायस्य गर्दभादश्वस्येवानुत्पत्तेः । अभिलापशून्यादप्यध्यक्षाद् व्यवसायकल्पनाया स्वलक्षण किं नाध्यवसाय जनयेत् स्वयमभिलापशून्यमपि, प्रत्यक्षमध्यवसायस्य हेतुर्न पुन रूपादिरिति कथ सुनि- रूपिताभिधानम् । ६ १३ यदि पुनरविकल्पकादपि प्रत्यक्षाद्विकल्पात्मनोऽध्यवसायस्योत्पत्ति. प्रदीपादे कज- लादिवत्, विजातीयादपि कारणात् कार्यस्योत्पत्तिदर्शनादिति मतम्, तदा तादृशोऽर्थाद्विकल्पात्मन. प्रत्यक्षस्योत्पत्तिरस्तु तत एव । $ १४ 4 जातिद्रव्यगुणक्रियापरिभाषाकल्पनारहितादर्थात् कथं जात्यादिकल्पनात्मक प्रत्यक्ष स्यादिति चेत् ; प्रत्यक्षात्तद्रहिताद्विकल्प. कथ जात्यादिकल्पनात्मक स्यादिति समान पर्यनुयोग । विकल्पस्य जात्यादिविषयत्वाढढोप इति चेत्, न; प्रत्यक्षवत् तस्य॑ जात्यादिविषयत्व- विरोधात्; तत एव तस्य वस्तुनोऽप्युत्पत्तिप्रसक्तेश्चेति व्यवसायहेतुत्वमनुपपन्नमेव । $ १५. अथ व्यवसायवासनोन्मीलनेन अव्यवसायम्यापि व्यवसायहेतुत्व दर्शनस्येति चेत् न; तद्वदर्थस्यैव तद्धेतृत्वप्रसगेन अन्तर्गडुनो दर्शनस्याऽकल्पनापत्ते. । व्यवसायहेतुत्वेन चाविसवा- दित्वमौपचारिकमेव दर्शनस्य स्यात्, मुख्यत सनिपत्याऽभिप्रायनिवेदनेन व्यवसायस्यैव तदुपपत्ते । १ "प्रमाणमविसवादिज्ञानमर्थक्रियास्थिति । अविसवादन शाब्देऽप्यभिप्रायनिवेदनात् ॥" प्र. वा० १३ २ व्यवस्थापयेत् । ३ शब्दरहितात् । ४ निर्विकल्पस्य । ५ प्रत्यक्षात् । 1 -हितं ज्ञेय क० । 2.-नात्त निवेदमिति ख०, -जनमिति ग० । 3 इति पद 'ग' प्रती नास्ति ।। 4 एव तद्वजादव-क०, ख० । 5 पर्यानयोग क०, ख० ।

२१] बौद्धशासन-परीक्षा २३ न च ततस्तस्य प्रामाण्यम्; सन्निकर्षादावपि तत्प्रसगात् । ततो युक्तमविसंवादवकल्यात् दर्शनम- प्रमाणमिति । तदुक्तम्- "विषदर्शनवत्सर्वमज्ञस्याकल्पनात्मकम् । दर्शनं न प्रमाणं स्यादविसंवादहानितः॥" [सिद्धिविनि० ११२४ ] इति ६ १६ प्रामाण्याभावे च दूरतः प्रत्यक्षत्वम्, तस्य तद्विशेषत्वेन तदभावेऽनुपपत्ते । अतः प्रत्यक्षाभावान्न परमाणूना प्रतिभासने प्रत्यक्ष प्रभवति । ६ १७ नाप्यनुमानम् ; तस्य लिङ्गदर्शनपूर्वकस्य प्रत्यक्षा भावेऽनुपपत्तेः । नाप्यागमः वाचा वस्तुविषयत्वानिष्टे. । एवं सकलप्रमाणाभावात् कथमर्थप्रमिति स्यात्, तदभावे परोदितपञ्चस्कन्ध- रूपाशेष प्रमेयानुपपत्ति । तथा च सकल जगच्छ्न्यमेवेति स्याद्वादविद्वेषिना सौगताना महदनिष्ट- मुपनिपतति । तदुक्त स्वामिसमन्तभद्रपादै.- "प्रत्यक्षवुद्धिः क्रमते न यत्र तल्लिनिगम्यं न तदर्थलिङ्गम् । वाचो न वा तद्विषयेण योग. का तद्गतिः कष्टमश्रुण्वतां तें ॥" [ युक्त्यनु० श्लो० २२ ] इति $ १८ तत. प्राक्परमाणव' प्रतिभासन्त इति परेषा प्रतिज्ञा णेप्लूयते, तथा पश्चात् सवृत्या स्थूलाद्याकारा. प्रतीयन्ते इति प्रतिज्ञापि । प्रागपि प्रत्यक्षेण नीलादिवत् स्थूलाद्याकाराणा दर्शनात् नीलविकल्पवत् स्थूलादिविकल्पाना च प्रतीते । ६ १६ तस्मादिन्द्रियबुद्धयोऽपि स्वलक्षणविषया मा भूवन् केवल स्थूलाधाकारान् पश्येयुः, अदृष्टे विकल्पायोगात्, अलिप्रसगाच्च । ६२० यथैव हि नीले पीतादीनामदृष्टत्वान्न तद्विकल्पोत्प॑त्ति, नीलस्य दृष्टत्वान्नील-विकल्प- स्यैवोत्पत्ते , तथैव स्थूलादीनपश्यत तद्विकल्पोत्पत्तिर्मा भूत् ; म्वरक्षणदर्शनात् स्वलक्षणविकल्पो- त्पत्तिरेवास्तु । ६ २१ न चैवम्, स्थूलाद्याकारेप्वेव विकल्पोत्पत्ते. । यदि पुन स्थूलाद्याकाराणामदर्शनेऽपि तदनादिवासनावशादेव तद्विकल्पोत्पत्तिरुररीक्रियते तदा नीलादिरूपादर्शनेऽपि तद्वासनासाम- Oदेव नीलादिविकल्पोत्पत्ति । ततो नीलादिरूपव्यवस्था मा भूत् । तद्वत्सुखादिव्यवस्थितिरपि कुत. सभाव्येत् । स्वसंवेदनव्यवस्था च तन्निश्चयोत्पत्ते दुर्घटैव । तदनुत्पत्ते सुतरा तदव्यवस्था स्वर्गप्रापणशक्त्यादिवद् वेद्याकारविवेकवद्वा । “स्वरूपस्य स्वतो गतिः" [प्र० वा० ११५] १ प्रत्यक्षत्वस्य । २. प्रामाण्यामावे । ३ अर्हत इष्टमित्यध्याहार , तेन ते इप्टमश्रुण्वतामिति आ, टि० । ४ स्थूलादिविकल्पोत्पत्ति. । ५ स्थूलादि । ६ स्यादिति । ७ नीलादिविकल्पोत्प- त्यन्यथानुपपत्ते । 1 एष क०, ख० । 2 लिङ्गादर्श० क०। 3 प्रत्यक्षमावे क० । 4. अनुपपत्ति क०, खः । 5 -रूपा शेष-क० । 6 तत् क०, स० । 7 परमाणत क०, ख० । 8-योगादपि प्र-क०, ख० । १ दृष्टत्वान्नीलोत्पत्ति-क०, ख० । सम्वन्ध २४ 1 सत्यशासन-परीक्षा [२२- इत्यपि तथा निश्चयानुत्पत्तौ न सिद्ध्येत् , ब्रह्माद्वैतादिवदिति सर्व विप्लवते । $ २२ तत कुतश्चिन्निश्चयात् नीलादिस्वभावव्यवस्थाया स्थूलादिनिश्चयात् वस्तुनि परमार्थत स्थूलाद्याकारख्यवस्थितिरास्थेया। अन्यथा क्वचिदपि व्यवस्थानासिद्धेः । ६ २३ ततो न तेषा सावृतत्वम्, सवृते विकल्पात्मिकायाः प्रागेव प्रत्यादिष्टत्वाच्चेति प्रागुक्त शाक्यवाक्यमशेषत प्रतिज्ञारूप प्राजैरवज्ञायते । $ २४ ननु [ न ] परमार्था स्थूलाद्याकारा. वाधकसद्भावात् । तथा हि-स्थूलाकारो- ऽवयवी, साधारणाकार सामान्यम् । तत्र चैकस्यावयविनोऽनेकेप्ववयवेपु सामान्यस्यैकस्य अनेक- व्यक्तिपु वृत्ति परैरिष्टा, प्रत्याश्रय किमेकदेशेन, सर्वात्मना वा स्यात् प्रकारान्तगभावात् । समवायः प्रकारान्तरमिति चेत्, न; अयुतसिद्धेषु वर्तते समवैति इत्यनयोरर्थभेदाभावात् । तत्रैकमनेकत्र वर्तमान प्रत्यधिकरण न तावदेकदेशन, नि.प्रदेशत्वात् । नापि सर्वात्मना , अवयव्यादिवहुत्वप्रसगात् ; यावन्तोऽवयवादयस्तावन्तोऽवयव्यादय स्युः, तेपा प्रत्येक सर्वात्मना वृत्तत्वात् । ६२५ अथ प्रदेशवत्त्व मन्येत अवयव्यादीना तत्रापि वृत्तिविकल्पोऽनवस्था च । तथा वावयव्यादि सर्व तदेकमेव न स्यादिति वृत्तेर्दोषस्य बाधकस्य भावादिति चेत् ; तदसत् , भेदैकान्त- वादिनामेव प्रतिपादितदोषोपनिपातात् । स्याद्वादिभिरपि- "एकस्यानेकवृत्तिर्न भागाभावाद्वहनि वा । भागित्वाद्वास्य नैकत्वं दोषो वृत्तेरनाहते ॥" [ आप्तमी० श्लोक० ६२ ] इति तान् प्रति तद्दोषप्रतिपादनात् । $ २६ नन्वेव वृत्तेर्दोष स्थाद्वादिना च प्रसज्यत इति चेत् ; तर्हि नाय प्रसगोऽनेकान्ते कथचित्तादात्स्यात् वेद्यवेदकाकारज्ञानवत् । यथैव हि ज्ञानस्य वेद्यवेढकाकाराभ्या तादात्म्यम्, अशक्यविवेचनत्वात् 'किमेकटेशन सर्वात्मना वा' इति विकल्पयोर्न विज्ञानस्य सावयवत्वं बहुत्वं वा प्रसज्येत, अनवस्था वा, तथा अवयव्यादेरप्यवयवादिभ्यस्तादात्म्यमशक्यविवेचनत्वादेव नैकदेशन प्रत्येक सर्वात्मना' वा; यतस्ताथागत सर्वथा भेट इव अवयवावयव्यादीना कथचित्तादात्म्येऽपि वृत्तिं दूपयेत् । ६ २७ यदत्रान्यदप्युक्तम्-न परमार्थ. स्थूलाकार परमाणूना सबन्धासिद्धे तेषामेकदेशन सबन्धे दिग्भागभेदाढनुषटकेन युगपद्योगे पडशतापत्तेः; सर्वात्मना सबन्धे प्रचयस्यैकपरमाणुमात्र- १ प्रत्याख्यान निरसन प्रत्यादेशो निराकृति श्रा० टि० । २ नैयायिकान् प्रति वृत्तिविकल्प- दोपस्य । 1-रप्यासेया-क०। 2. ननु परमा- क०। 3 -वयेषु क० । 4 -वेदिना क०, ख० । 5 वेद्यवेदनाकार-1०। 6 प्रसज्यते ख०, ग01 7. प्रत्येक असर्वा-क० । - - २५ 18 [ ३०] बौद्धशासन-परीक्षा त्वापत्तेरिति, तदपि दूषण परमाणूनामनन्यथैः कान्तवादिना' स्यान्न पुनः स्याद्वादिनाम् । यथैव हि नैयायिकादय. 'परमाणवो विविक्तावस्थावत् प्रचयावस्थायामपि परमाणुत्व न त्यजन्ति' इति मन्यन्ते न तथा स्याद्वाढिनो येन तद्दोपस्तेषामनुषज्येत; तै परमाणना स्निग्धरूमाणामजघन्यगुणाना द्वयधि- कादिगुणाना विजातीयाना सजातीयाना च "सक्तुतोयवत् सतप्तजतुखण्डवत् कथंचित् स्कन्धाकार- परिणामात्मकस्य सबन्धस्याभ्युपगमात् । "लुक्खस्स लुक्खेण दुवाहिएण, णिद्धस्स णि ण दुवाहिएण। णिद्धस्स लुक्खेण हवेइ वन्धो, जहण्णवज्जे विसमे समे वा॥" ] इति वचनात् । ६२८ परैरप्येवमभ्युपगम. कर्तव्य , अन्यथा अर्थक्रियाविरोधात् , अणूनामन्योन्यम- सबन्धतो जलधारणाहरणाद्यर्थक्रियाकारित्वानुपपत्ते । रज्जुवशदण्डादीनामेकदेशापकर्षणे तदन्या- कर्षणे चामवन्धवादिनो न स्यात् । अस्ति चैतत् सर्वम् , विकल्पप्रतिभासिन प्रत्यक्षदृष्टत्वसिद्धे अदृष्टे विकल्पायोगात् , अन्यथातिप्रसगस्योक्तप्रायत्वात् । असबद्धपरमाणुमात्रग्राहिप्रत्यक्षादि- प्रमाणाभावम्य प्रतिपादितत्वाच्च । ततो जलाहरणाद्यर्थक्रियान्यथानुपपत्ते. सबन्धासिद्ध । ६ २९ किं च, एव वदत चित्रज्ञाननिर्भासलवविशेषाणामेकदेशेन सर्वात्मनापि सबन्धा- सिद्धे सकलनीलादिनिर्भासावयकव्याप्येकत्व तत्र' न सिद्ध्येत् । तदवयवपृथक्त्वकल्पनाया चित्रैकज्ञानव्यवहारो मा भृत् ; पृथग्वर्णान्तरविपयानेकसतानैकैकक्षणवत् । तत्र प्रत्यासत्तिविशेष कथचिदैक्यात्कोऽपर. स्यात् ; देशप्रत्यासत्ते गीतवातादिभि व्यभिचारात् ; व्यभिचारात् ; कालप्रत्यासत्तरेक- समयवर्तिभिरशेषार्थैरनेकान्तात भावप्रत्यासत्तेरेकार्थोदभूतानेकपुरुषज्ञानैरनैकान्तिकत्वात् , द्रव्यपत्या- सत्तिरेव पारिशेप्यात् सभाव्यते । सा चैकद्रव्यतादात्म्यलक्षणत्वात् प्रत्यासत्तिविशेष इति कथचिदै- क्यमेवैकत्वव्यवहारनिबन्धन चित्रज्ञानस्य । $ ३० तदेव प्रमाणप्रसिद्धचित्रज्ञानवत् सूक्ष्मस्थूलात्मनि जात्यन्तरे स्याद्वादीष्टवस्तुनि वृत्ति- दोषाद्यखिलदोषो नावकाग लभते । अत्रान्यत्र च सर्वत्र विरोधादिदूषण चित्रज्ञानमेवापहस्तयतीति किं नश्चिन्तया । तत स्याद्वादीना समत स्थूलाकार परमार्थ एव सिद्ध. । एतेन तदभिमत साधारणाकारोऽपि परमार्थतया सिद्ध स्याद्वादिसमतस्य सदृगपरिणामलक्षणस्य सामान्यस्याप्रति- क्षेपार्हत्वात् , अन्यथा शुक्तिकादे रजताद्यपेक्षया साधर्म्य दर्शनस्याभावात् , कथ तन्निबन्धनस्तत्र + १ परमाणव परमाणव एव न तु अन्यरूपा अवयविरूपा वा भवन्ति इत्येकान्तवादिनाम् । २ रुसस्य रुक्षेण द्वयाधिकेन, स्निग्यस्य स्निग्धेन हयाधिकेन । स्निग्धस्य रूक्षेण भवति बन्ध , जघन्यवज्य विपमे समे वा ॥ उद्धृतम्-सर्वा० पृ० ३०७ । ३ बौद्धैरपि । ४ कथचित् नित्यानित्यात्मनि । 1 -मनन्यतैकान्त-101 2 जघन्यगुणाना विजातीयाना च सत्तु क०, ख०। 3 लक्ख क०, ख० । 4 उवेइ क०, ख० ।। -पादित्वाच्च क०, ख०। 6 सबन्ध सिद्धः। 7 -वयव्याप्येतत्व तत्र क०, ख०। 8 वावकाश क०, ख०। 9 वादि स- ग० । 10 साधर्म-क०, खः । . .

૨૬ सत्यशासन-परीक्षा - [३१- - 3 रूप्या ध्यारोप , यत इद सूक्तं भवेत् । "शुक्तौ वा रजताकारो रूपसाधर्म्यदर्शनात् ॥" [प्र० वा० ११४५ ] इति ६ ३१ न च साधादपर सामान्यमम्ति, तस्य नित्यव्यापिस्वभावस्य क्वचिदप्यप्रतिवेद- नात् । तथा स्याद्वादिसमत 1 स्थिराकार " परमार्थ एव, चित्रज्ञानस्यैकस्य युगपदनेकाकारव्यापित्व- वत् क्रमेणाप्येकस्यात्मादेरनेकाकारव्यापित्वसिद्धे । तथैवोक्त भट्टाकलङ्कदेव "यथैकं भिन्नदेशार्थान् कुर्याद्वयाप्नोति वा सकृत् । तथैकं भिन्नकालार्थान् कुर्याद व्याप्नोति वा क्रमात ॥" [लघी० श्लो० ३७ ] इति पूर्वोत्तरक्षणाना सर्वथानिरन्वयत्वै अर्थक्रियाविरोधाच्च । न हि क्षणक्षयकान्तपक्षे अर्थक्रियोपपन्ना; बहिरन्तरर्थाना निरन्वयविनाश कार्यस्य निर्हेतुकत्वापत्तेर्जन्मविरोध सिधे । ६३२ ननु पूर्वक्षणादुत्तरक्षणस्य प्रादर्भावात् कुतो निष्कारणत्व कार्यस्येति चेत् ; न; कार्यकालमपाप्नुवत कारणत्वानुपपत्ते , चिरतरातीतवत् । ६३३. ननु कार्यकाल प्राप्नुवतोऽपि न कारणत्वम् , अन्यथा सर्वस्य समानक्षणवर्तिन- स्तत्कारणत्वप्रसगात् । ततो यदन्वयव्यतिरेकानुविधायि कार्य तदेव तस्य कारणम् "नाननुकृत्वान्वयव्यतिरेकं कारणम् ।” [ ] इति वचनात् इति चेत्, न; क्षणक्षयै- कान्ते अन्वयव्यतिरेकस्यैवाघटनात् । $ ३४ न खलु समर्थे कारणे सत्यभावत स्वयमेव पश्चादभवतस्तदन्वयव्यतिरेकानुविधान नाम नित्यवत् । 'स्वदेशवत् स्वकाले सति समर्थे कारणे कार्य जायते नासति' इत्येतावता क्षणिकपक्षे अन्वयव्यतिरेकानुविधाने नित्येऽपि तत् स्यात् ; स्वकालेऽनाद्यनन्ते सति समर्थे नित्ये स्वसमये कार्यस्योत्पत्तेरसत्यनुत्पत्तेश्च प्रतीयमानत्वात् । $ ३५ सर्वदा नित्ये समर्थे सति स्वकाल एव कार्य भवत् कथ तदन्वयव्यतिरेकानु- विधायीति चेत् ; तर्हि कारणक्षणात् पूर्व पञ्चाच्चानाद्यनन्ते तदभावेऽविशिष्टे क्वचिदेव तदभाव- समये भवत् कार्य कथ तदनुविधायीति समानम् । नित्यस्य प्रतिक्षणमनेककार्यकारित्वे क्रमशोऽनेक- स्वभावत्वसिद्धे. कथमेकत्व म्यादिति चेत् ; क्षणिकस्य कथमिति सम पर्यनुयोग । स हि क्षणस्थिति- रेकोऽपि भावोऽनेकम्वभावो विचित्र कार्यत्वात् नानार्थक्षणवत् । $ ३६. न हि कारणशक्तिभेदमन्तरेण कार्यनानात्व युक्त रूपादिज्ञानवत् । यथैव हि कर्कटिकादौ रूपादिजानानि रूपादि"स्वभावभेदनिवन्धनानि तथा क्षणस्थितेरेकस्मात् प्रदीपादि- क्षणात् वर्तिकाढाहतैलगोषादिविचित्रकार्याणि शक्तिभेदनिमित्तकानि व्यवतिष्ठन्ते, अन्यथा रूपादेरपि नानात्व न स्यात् । १ रूपयम्-रजतम् । एकद्रव्यान्वयाभावे । ३ तुलना-अष्टश० अष्टस० पृ० ८७ ॥ ४ अन्वयव्यतिरेकानुविधानम् । 1 स्याहादादि क०, स० । 2 स्थिराकारोऽपि ग० । 3 विधायि तदेवस्य- क०, ख० । 4. -मावत क०। 5. -णायात् क०, २० । 6, -मावे विशिष्टे क० । 7. रूपादे स्व-क०, ख० ।

२७ " ४३] वौद्धशासन-परीक्षा ६ ३७ ननु च शक्तिमतोऽर्थान्तरानान्तरपक्षयो 'शक्तीनामघटनात्तासा' परमार्थसत्त्वाभाव ; तर्हि रूपादीनामपि प्रतीतिसिद्धद्रव्यादर्थान्तरानान्तरविकल्पयोरसभवात् परमार्थसत्त्वाभावः स्यात् । स्याद्वादिभिश्चित्रज्ञानवत् जात्यन्तरस्य शक्तिमतोऽर्थस्योपगमाच्च नोक्तदोषानुषड्न । ६ ३८. अथ प्रत्यक्षबुद्धौ प्रतिभासमानत्वापादय परमार्थसन्तो न पुनस्तच्छक्तयस्ता- सामनुमानबुद्धौ प्रतिभासमानत्वात् ; इत्यप्ययुक्तम्; क्षणक्षयस्वर्गप्रापणशक्त्यादीनामपरमार्थसत्त्व- प्रसगात् । ततो यथा क्षणिकस्य युगपदनेककार्यकारित्वेऽप्येकत्वाविरोधस्तथा अक्षणिकस्य क्रमशो- ऽनेककार्यकारित्वेऽपीत्यनवद्य स्थिराकारोऽपि परमार्थ इति । $ ३९ तदेव सकलबाधकाभावादप्रतिक्षेपार्हाणामार्हताभिमताना स्थिरस्थूलसाधारणा- काराणा परमार्थत्वसिद्धे 3 अभ्रान्तेन तद्ग्राहिप्रत्यक्षेण स्वलक्षणलक्षणतत्त्वस्य विरुद्धत्व सिद्धयत्येव । ६४० ननु नैप दोष , सौगताभिमतस्वलक्षणतत्वस्य अवाच्यत्वादिति चेत् । तदसगतम् ; अवाच्यगन्देन स्वलक्षणतत्त्वस्य वाच्यत्वात् स्ववचनेनैव स्वप्रतिज्ञा हानेर्दर्शनात् । $ ४१ नन्ववाच्य शब्देनापि न स्वलक्षणस्वरूपमुच्यते 'तेनारोपितसामान्याकारस्यैवाभि- धानादिति चेत्, व्याहतमेतत् । सामान्याख्यपररूपवाचिना अवाच्यशब्देन स्वलक्षणस्वरूपाभि- धानस्य विरुद्धत्वात् नीलगब्देन पीताभिधानवत् । तदुक्त युक्त्यनुशासने स्वामिभि.- "अवाच्यमित्यत्र च वाच्यभावादवाच्यमेवेत्ययथाप्रतिज्ञम् । स्वरूपतश्चेत् पररूपवाचि स्वरूपवाचीति वचो विरुद्धम् । [ युक्त्यनु० ग्लो० २९ ] इति ६ ४२ ततो नावाच्यतैकान्तः श्रेयानिति कथमपि प्रत्यक्षविरोधो दु शक. परिहर्तुम् । तस्मात् सुव्यवस्थितेय प्रतिज्ञा दृष्टविरुद्ध शाक्यशासनमिति । $ १३. तथा ताथागतशासनमिष्टविरुद्वम् । तदभिमतक्षणक्षयकान्तविरुद्धस्य आत्मादीना कथचिन्नित्यत्वस्यानुमानेन साधनात् । तथा हि-यत् सत् तत्सर्व कथचिन्नित्यम् , सर्वथा क्षणिक क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रियाविरोधात् सत्त्वानुपपत्ते' इति । अत्र न तावद्धेतोरनैकान्ति- कत्वम् ; सर्वथा नित्यत्वे सत्त्वस्याभावात् , सर्वथा क्षणिकत्ववत् । तदभावश्च क्रमाक्रमानुपपत्तेः । तढनुपपत्तिश्च पूर्वाप स्वभावत्यागोपादानान्वितरूपाभावात्, सकृदनेकशक्त्यात्मकत्वाभावाच्च । न हि कूटस्थे पूर्वोत्तरस्वभावत्यागोपादाने स्त्र , क्षणिके चान्वित रूपमस्ति यत क्रम. 'कालकृतो देशकृतो वा स्यात् । नापि युगपढनेकस्वभावत्व यतो योगपद्यम्, कौटस्थ्यविरोधात्, सर्वथैक- रूपत्वात् कूटस्थस्य । “एकरूपतया तु यस्त्रिकालव्यापी स. कूटस्थः" । ] इत्य- भिधानात्, निरन्वयक्षणिकत्वव्याघाताच्च, तथा क्रमाक्रमानेकान्तात्मकस्यैव सिद्धे। सहकारि-' क्रमाक्रमापेक्षया तत्र क्रमयोगपद्यकल्पनापि न साधीयमी; स्वय तदपेक्षाक्रमेतरस्वभावत्वाभावे तदनुपपत्ते । १ भेदाभेदपक्षयो । २ शब्देन । ३ बौद्धन कुता यत शाक्यशासन दृष्टाविरुद्ध मिति । ४ नित्य । सहकार्यपेक्षा स्वय तत्स्वभावस्यैव समाव्यते । 3 सिदि क०, स०। 4 -नैव प्रतिज्ञा क०, स०। -मित्यस्य ग०। 8. --~तया तु य कालव्यापि सकूटस्थ क०, ख० । t 1 -टनात्ताना पर-क० । 2 -लपाचारणाकारणाक० । 5 नन्वाच्य- क०, ख० । 6 7 क्रम क०, ग० ।

२८ , ។ तथा सत्यशासन-परीक्षा [४४- $ ४४. तत्कार्याणा तदपेक्षा न पुनर्नित्यस्य क्षणिकस्य चेत्यपि न श्रेयः; तेषा तदकार्यत्व- प्रसगात् । $ ४५ तत्सहितेभ्य. सहकारिभ्य कार्याणा मुत्पत्ते., अन्यथाऽनुत्पत्तेस्तत्कार्यत्वनिर्णय. इति चेत् तर्हि येन स्वभावेनैकेन सहकारिणा सहभावः तेनैव सर्वसहकारिणा यदि तम्य स्यात् तदैक- कार्यकरणे सर्वकार्यकरणात् क्रमकार्यानुत्पत्ति । सहकार्यन्तराभावेऽपि च तत्सहभावात् सकृदेव सकलकार्योत्पत्ति. प्रसज्येत । स्वभावान्तरै. सहकार्यन्तरसहभावे तस्य क्रमाक्रमवृत्त्यनेकस्वभावत्व- सिद्धे कुतो नित्यमेकत्वस्वभाव क्षणिक वा वस्तु क्रमयोगपद्ययोापक स्यात्, कथचिन्नित्यस्यैव क्रमाक्रमानेकस्वभावस्य तद्व्यापकत्वप्रतीते. । ६ ४६ एतेन विपक्षे हेतो धकस्य व्यापकानुपलम्भस्य व्यतिरेकनिश्चयः कथचिन्नित्ये प्रत्यक्षप्रवृत्तेः प्रदर्शितः प्रत्येयः । तत सत्य कथचिन्नित्यमेव साधयतीति सिद्ध गौद्धोदनिशासन- मिष्टविरुद्धमिति । ६४७ च शुभाशुभानुष्ठान-पुण्य पाप-श्वभ्र-स्वर्गादि-परलोक--बन्ध-बन्धकारण- मोक्ष-मोक्षकारण-बन्धमोक्षफल-बद्ध -मुक्तादिपरोक्षतत्कारणस्वरूपप्रतिपादकोऽपि बौद्धागमो न प्रमा- णम् , दृष्टेष्टविरुद्धागमसमकर्तृकस्य तस्यातीन्द्रिये प्वतितरामप्रामाण्यापत्तेरिति न बौद्धाना धर्मानु- ठानं प्रतिष्ठामियति । कि बहुना, बौद्धैर्यदयदभिधीयते तत्सर्वमसदेव तदभिमतसर्वतत्त्वस्य शून्यत्वात् । $ ४८ तथा हि विकल्पोऽभिलापसबन्धार्थग्रहणरूप परैरिष्ट । स च नास्त्येव । न हि तावद्विषयस्यामिलापेन तद्गतेनैव सबन्ध , तत्र तदभावात् । स्मरणोपनीतेन 'सकेतकालप्रतिपन्ने- नेति चेत् ; न, स्मरणस्य निर्विकल्पकत्वे तद्विषयस्य स्वलक्षणत्वे न क्वचिदुपनयनानुपपत्ते । व्यव- सायरूपत्वे च तेनापि स्वविपयोऽभिलापसबन्ध एव स्मर्त्तव्य । तदभिलापोऽपि तथाविध एव तत्स्मरणेनेत्यनवस्थितिप्रसगात । स्मरणस्य तदनभिसबन्ध वस्तुवेदित्वेऽपि व्यवसायस्वभावत्वे प्रत्यक्षस्यापि तकि न स्यात्, 'स्वाभिधानविशेषापेक्षया एवार्था निश्चयैर्व्यवसीयन्ते' इत्येकान्त- त्यागात् । नाम्न स्वलक्षणस्यापि स्वाभिधानविशेषानपेक्षस्यैव व्यवसायवचनात् । ६४९ एवमनवस्थादिदोषोपनिपातान्नामस्मरणोभावेन क्वचिद्विकल्पा न 10सिद्धयेत् । स्मरणो- पनीतनामसबद्धार्थग्रहणस्यैव11 विकल्पत्वात्12 | विकल्पाभावेन न13 कचित्प्रत्यक्षम् । अकृतविक- ल्पेन प्रत्यक्षेण बहिरन्ती गृहीतस्याप्यगृहीतकल्पत्वात् क्षणक्षयादिसवेदनवत् । प्रत्यक्षाभावे न कचिदनुमानम् 1 प्रत्यक्षपूर्वकत्वात्तस्येति सकलप्रमाणाभाव । तदभावे सकल प्रमेयाभाव , प्रमाणापाये प्रमेयव्यवस्थानुपपत्तेरिति सौगताभिमत सर्व तत्त्व शून्यमेव स्यात् । - १. क्रमाक्रमयोापकयोरनुपलम्म । २ "विकल्पो नाम सश्रय" [प्र० वा० २११२३ ] इत्यमिधानात् । ३ प्रमाणाभावे । 1 -मेकस्व-, ग० । 2. मावा क०। 3 सत्त्वम् क०, ख० ।। -मोक्षबद्ध- स० । 5 -पति-क०, स०। 6 प्रामाण्योपपत्तेरि-क०, स०। 7 -नीते स स०। 8 सवद्ध- क०, स० । 9 साभि -क०, स०। 10 -कल्प सिद्धयेत् ग० । 11 सवन्धार्थ- ग० । 12 विकल्पात् क०, स० । 13 'न' स प्रतो नास्ति । 14 -मानप्रत्यक्षकत्वात् क०, ख० । । -

५० ]
बौद्धशासन-परीक्षा
२९
$ ५० तथा च सौगतो हेयोपादेयोपायरहितोऽयमहीक केवल विक्रोशतीत्युपेक्षाह एवेति
कृतमतिविस्तरेण, दृष्टेष्टविरुद्धत्वात्तन्मतस्यासत्यत्वसिद्धे ।
दृप्टेप्टेषु दृष्टेष्टविरोधात् सुगतोदित ।
परोक्षेषु तदेकत्वादागमो
प्रमाणताम् ॥
विकल्पाभावत. सर्वहानेबौद्धवचोऽखिलम् ।
भवेत्प्रलापमात्रत्वान्नावधेय विपश्चिताम् ॥
दृष्टेष्टाभ्या विरुद्धत्वान्न सत्य शाक्यगासनम् ।
न च तेन प्रतिक्षेप म्याद्वाढम्येति निश्चितम् ।।
[इति चौद्धशासनपरीक्षा]
1 -तुश्चेति-क० ख० ।

[सांख्यशासन-परीक्षा] [पूर्वपक्ष ] ७१ तथा साख्यशासनमपिदृप्टेप्टविरुद्धम् । एव हि तावदात्यान्ति साख्या सर्वमिद जगत्प्रधानमयम् प्रधान च सत्त्वरजस्तमसा साम्यावस्थास्वरूपम् । तथा च तद्- १ ग्रन्था- "सत्त्वं लघुप्रकाशकमिष्टमवष्टम्भकं चलं च रजः । गुरुवरणकमेव तम. साम्यावस्था भवेत्प्रकृतिः॥" [ साख्यका० १३] २ तत्र यदिष्ट प्रकाशक लघु तत्सत्त्वमित्युच्यते । सत्त्वोदयात् प्रशस्ता एव परिणामा जायन्ते । यच्च चल मवष्टम्भक दारक ग्राहक वा तद्रज इत्युच्यते । रजस उढयाद्रागपरिणामा एव जायन्ते । यद्गुरु आवरणकमज्ञानहेतुभूत तत्तम इति निरूप्यते । तमस उदयात् द्वेषादज्ञान- परिणामा एव जायन्ते । सत्त्वरजस्तमसा साम्यावस्था प्रकृति । "प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्च पोडशकः । तस्मादपि पोडशकात् पञ्चभ्य. पञ्चभूतानि ।।" [ साख्यका० २२] $३. जगदुत्पादिका प्रकृतिः, 'प्रधान बहुधानकम्' इति प्रकृतेरभिधानानि । तत प्रकृतेर्महा- नुत्पद्यते । आसर्गप्रलयस्थायिनी बुद्धिर्महान् । ततो महत सकाशादहकार उत्पद्यते । 'अह ज्ञाता, अह सुखी, अह दुःखी' इत्यादि प्रत्ययविषय । ततोऽहकाराद् गन्धरसरूपस्पर्शगब्दा पञ्चतन्मात्रा , स्पर्शन-रसन-प्राण-चक्षु-श्रोत्राणि पञ्चबुद्धीन्द्रियाणि, वाक-पाणि-पादपायूंपस्थानि पञ्चकर्मेन्द्रियाणि, मनश्चेति पोडशगणा. समुत्पद्यन्ते । तेपु षोडशगणपु पञ्चतन्मात्रेभ्य. पञ्च- भूतानि समुत्पद्यन्ते । $ ४ तद्यथा-गन्धरूपरसस्पर्शेभ्य पृथिवी, रसरूपस्पर्शेभ्यो जलम्, रूपस्पर्शाभ्या तेज , स्पद्विायु , शब्दादाकाश. समुत्पद्यत इति सृष्टिक्रमः । एतानि चतुर्विशतितत्त्वानि । पञ्चविशको जीव । षड्विशक परम इति निरीश्वरसाख्या । षड्विंशको महेश्वर , सप्तविगतिः परम इति सेश्वरसाख्या । तेषु तत्त्वेपु- "मूलप्रकृतिरविकृतिर्महादाद्याः प्रकृतिविकृतयः सप्त । पोडशकश्च विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥" [ साख्यका० ३] 4 २ मलविसर्जनद्वारम् । ३ मूत्रविसर्जनेन्द्रियम् । १ प्रधानमिति प्रकृतेर्नामान्तरम् । ४ मुक्त। 1 एव तावदा क०, ० । 4 स्पर्शनश- क०, स०। 5 गुणेषु क० । 2 जलम- क०, स० । 3 ज्ञावा कर, स० ।

११] सांख्यशासन-परीक्षा ६५. इत्येव प्रकृतिपुरुपयोर्भेदविज्ञानात् प्रकृतिनिवृत्तौ पुरुपस्य सुपुप्तपुरुषवदव्यक्त- चैतन्योपयोगेन म्वरूपमात्रावस्थानलक्षणो मोक्ष । तस्य चोपायः पञ्चविंशतितत्त्वपरिज्ञानमेव । "पञ्चविंशतितत्त्वज्ञो यत्र कुत्राश्रमे स्थितः। जटी मुण्डी शिखी केशी मुच्यते नात्र संशयः ॥" ] इति वचनात् [उत्तरपक्ष ] ६६. तदेतत्कपिलमत दृष्टविरुद्धम । तथा हि-तावत्पुरुषव्यतिरिक्तसर्वार्थाः प्रधानमया. कापिलैरिप्टा । तच्च प्रधान सर्वदा वर्तते नित्यत्वात् , सर्वत्र च वर्तते तस्य व्यापकत्वेनाभ्युपगमात्, सर्वत्र च सपूर्णतया वर्तते तस्य सर्वथानिरवयवत्वेनेष्टत्वात् । तथा च 'सर्व सर्वत्र वर्तते' इत्या- यातम् । 'सर्वमय प्रधान सर्वत्र साकल्येन वर्तते' इत्यभ्युपगमे 'सर्व सर्वत्र वर्तते इत्यस्यावश्यमभ्यु- पगन्तव्यत्वात् । ६ ७ नन्विष्टापादनमिद सर्व सर्वत्र चास्त इति कापिलैरुररीकरणादिति चेत् ; तदिद हि स्पष्ट दृष्टविरुद्धम् ; प्रत्यक्षेण प्रतिनियतदेशकालस्यैवार्थस्य दर्शनात् । न हि प्रत्यक्षेण सर्व सर्वत्र दृश्यते । अगुल्यग्रे हस्तियूथशतादेरपि दर्शनप्रसगात् । $ ८ ननु नैष दोपः सर्वस्य सर्वत्र सद्भावेऽपि यत्र यस्याविर्भाव स एव तत्र दृश्यते न पुनरन्यस्तिरोहित , इत्यर्थाना दर्शनयोग्यायोग्यत्वव्यवस्थितेरिति चेत्, कोऽयमाविर्भावो नाम- प्रागनुपलब्धम्य व्यञ्जकव्यापारादुपलम्भ इति चेत् ; स च नित्यो वाऽनित्यो वा; यद्यनित्यः, तदा स प्रागसन् कारणे क्रियेत, अन्यथा नित्यत्वप्रसगात्, तथा च घटादिरपि तद्वत् प्रागसन् कारण क्रियताम्, न चैव, सत्कार्यवादविरोधात् । आविर्भाव प्रागसन् कारणै क्रियेत न’ पुनर्घटादिरिति स्वरुचिवचनमात्र निरुपपत्तिकत्वात् । यदि नित्य , तदा तदेव सर्वत्र सर्वस्य दर्शन स्यात् , आवि- भर्भावस्य सदा सत्त्वात । ६९ अथाविर्भावस्य प्राक्तिरोहितम्य सत एव कारणैराविर्भावान्तरमिप्यते, तर्हि तस्या- प्यन्यत्तस्याप्यन्यदाविर्भावनमित्यनवस्थानान्न कदाचित् घटादेराविर्भाव 5 स्यात् । 8 १० अथाविर्भावस्योपलम्भरूपस्य तद्रूपाविर्भावान्तरानपेक्षत्वात् प्रकाशस्य प्रकाशान्त- रानपेक्षत्ववन्नानवस्थेति मतम् ; तर्हि तस्य कारणस्य कारणादात्मलाभोऽभ्युपगन्तव्य , उत्पत्ति- अभिव्यक्तिभ्यां प्रकारान्तराभावात् तत्र चोक्तदोष इति नाविर्भाव सिद्ध्येत् । ६११ यत्तेन तिरोभावेऽपि प्रत्यादिष्टप्राय " तस्य नित्यानित्यपक्षयोरुक्तदोषानुषङ्गात् । आविर्भावस्य निरस्तत्वेन तृतीयपक्षम्य चाऽसभवात् । एवमाविर्भावतिरोभावयोरसिद्धौ तद्वगात् कचित्कस्यचित् प्रतीतेग्नुपपत्ते सर्व सर्वत्र दृश्यताम् । न चैवम्, इति प्रत्यक्षविरोधस्तदवस्थ 10 एव . १ श्लोकोऽय सांख्यका० माठरवृत्तौ 'यदुक्तम्' इति कृत्वा उद्धत । 1 चैतस्योप- क०, चैतन्ययोगेन स०। 2 क्रियाम् क०, स०। 3 क्रिये न क० । 4 एवाकारणे स० । , कदाचिर्घ- क० ! 6 -तरापेक्ष- क० । 7. लामोऽप्युप- क० । 8 -भावोऽपि ग० । 9 धिप्ट क० । 10 -वस्थ वा क०, ग्व० ।

-- सत्यगासन-परीक्षा [१२- ६१२. तथा सत्युपलब्धियोग्यत्वे सत्यनुपलब्धे नास्ति प्रधानम् । तदभावे तन्निमित्तका मह- ढाढयोऽपि न सिद्ध्येयुरिति सर्वाभाव । तथापि यदि वैय्यात्यात्' महदादिसृष्टिप्रक्रियोच्यते, तदाय प्रप्टव्यः-किमिट महदादिकं प्रधानस्य कार्य वा परिणामो वेति, प्रथमपक्षे न तावत सत- स्तस्य कार्यत्वम् ; सर्वथा सत कारणवैय्यर्थात् पुरुषवत् । "यदि सत् सर्वथा कार्य पुंवन्नोत्पत्तुमर्हति ।" [ आप्तमी० श्लो० ३९ ] इति वचनात् । नाप्यसत; "असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् । शक्तस्य शक्यकरणात् कारणभावाच्च सत्कार्यम् ॥" [ सांख्यका० ९] इति स्वसिद्धान्तविरोधात । सर्वथाप्यसत उत्पत्तिविरोधाच्च । "यद्यसत्सर्वथा कार्य तन्माजनि खपुप्पवत् ।" [आप्तमी० श्लो० ४२ ] इति वचनात । ६ १३ द्वितीयपक्षे परिणामिनो बहुधानकस्य परिणामा महढाढयोऽत्यन्तं भिन्ना वा स्यु अभिन्ना वा, तत्र परिणामाना तदभिन्न ना क्रमशो वृत्तिर्मा भूत् परिणामिनोऽक्रमत्वात् । ततो भिन्नाना व्यपदेशो न स्यात् सबन्धासिद्धेरनुपकारकत्वात् । ६ १४ न तावत् प्रधान परिणामानामुपकारकम्; तत्कृतोपकारान्तरस्य कार्यत्वे सद- सत्पभोक्तठोपानुषगात् । परिणामत्वेतरभिन्नाना क्रमोत्पत्तिर्मा भूत् । भिन्नाना व्यपदेशो न स्यात् सबन्धासिद्धेरनुपकारात् । उपकारान्तरकल्पनायामनवस्थाप्रमगात् । परिणामै प्रधानस्योपकारे यावन्तो हि परिणामास्तावन्तस्तस्योपकारास्तस्कृतास्ततो यदि भिन्ना , तदा तस्येति व्यपदेशोऽपि मा भूत् सबन्धासिद्धेरनुपकारकत्वात् । तद्वतस्तैरुपकारान्तरेऽपि स एव पर्यनुयोग इत्यनवस्था । ततस्ते यद्यभिन्नास्तदा तावद्धा प्रधान भिद्येत । ते वा प्रधानकरूपता प्रतिपद्येरन्निति प्रधानस्योप- काराणा चावस्थानासम्भव । ६ १५ अथ न भिन्नो नाप्यभिन्न परिणाम केवलं महदादिरूपेण प्रधान परिणमते दण्डकुण्डलाद्याकारै सर्पवदिति चेत् , तदेतत् स्वेष्टनित्यैकान्तबाधकम् ; पूर्वोत्तराकारपरिहारावाप्ति- स्थितिलक्षणपरिणामाभ्युपगमे नित्यानित्यात्मकत्वस्यावश्यम्भावात् । ६ १६ तदेवमनेकवाधकोपनिपातात् प्रधानादिचतुर्वि गतितत्त्वानि न व्यवतिष्ठन्ते । तदव्यवस्थिती भोग्याभावे पुसो भोक्तृत्वाभावाढभाव स्यात्तस्य तल्लक्षणत्वात् । तत प्रकृतिपुरुषत- त्वयोरवस्थानाभावात् साख्याभिमत सर्व तत्त्व पुनरपि शून्यं जायत इति तत्कथं प्रत्यक्षसिद्ध स्यात् ; , । १ विपरीताग्रहात् । २ पुरपम्य । 1 करणवैक०, स्व० । 2 सर्वदा क० । 3. इति मिटान्त ग.! 4 परणामिनो क०, 5 क्रमती ग० । 6 तद्वतन्तैरकालरुप- ग० । 7. यात्वक क० । 8. -को निपातात क०, ख० । ख०1 १६] सांख्यशासन-परीक्षा ३३ स्यात् , उर्वीपर्वततर्वादिपदार्थाना ब्रह्ममयत्ववत् प्रधानमयत्वस्यापि प्रत्यक्षणानुपलक्षणात् सिद्ध साख्यशासनं दृष्टविरुद्धम् । ६ १७. तथा तदिष्टविरुद्धं च । कापिलाभिमतस्य कूटस्थनित्यपुरुषस्य कथंचित्तदनित्यत्व- साधकानुमानेन विरुद्धत्वात् । तच्चेदम्-विवादापन्न पुरुष स्यादनित्य , अनित्यभोगाभिन्न- त्वात् । यदित्य तदित्थ दृष्टम् ; यथा भोगस्वरूपमिति । नासिद्धं, भोगस्यानित्यत्वम् , 'अनित्यो भोग. उत्पत्तिमत्त्वात् , ज्ञानवत्' इत्यनुमानात्तत्सिद्धे 1 । $ १८ कथमुत्पत्तिमान् भोग इति चेत् , परापेक्षत्वात्तद्वदेव परापेक्षोऽसौ बुद्धयध्यवसायापेक्ष- त्वात् । “वुद्धयवसितमर्थ पुरुषश्चेतयते''[ ] इति वचनात् । भोगस्य बुद्धय- ध्यवसायानपेक्षत्वे पुसः सर्वत्र सर्वदा सर्वभोगप्रसगात् । भोग्यसनिधिसव्यपेक्षतया कादाचित्क- त्वाच्चानित्यः सिद्धो भोग । तस्य च पुरुषाद् भेदे तेन तस्य गगनादेरिव पुरुषान्तरस्यैव वा भोक्तृत्वानुपपत्ते । ततो भोगस्याभेदे तद्रूपतया पुरुषस्य कथचिदनित्यत्व सिद्धयतीति सम्यगिदं साधनमात्मानित्यत्वं साधयति । ततः सूक्तम्-साख्यमतमिष्टविरुद्धमिति । $ १९. तथा चतुर्विधवर्णाश्रमतत्तद्विधेयविविधाचारपुण्य-पाप-परलोक-बन्ध-मोक्ष-तत्का- रण-तत्फल-बद्ध-मुक्तादिस्वरूपप्रतिपादकः साख्यागमो न प्रमाण दृष्टेष्टविरुद्धागमाभिन्नस्य तस्य परोक्षतत्कारणेषु प्रामाण्यसभावनानुपपत्तेरिति न तेषा धर्मानुष्ठान प्रतिष्ठामियति । किमत्र बहुनोक्तेन यत् किंचित् सेश्वरनिरीश्वरसाख्यैरसख्यावद्भिराख्यायते तत्सर्व मृषैव, तदभिमतसकलतत्त्वानामा - विर्भावाद्यपाकरणद्वारेण शून्यत्वस्यापादितत्वादित्यल प्रसगेन, दृष्टेष्टविरुद्धत्वात् साख्यशासनस्या- सत्यत्वसिद्धेः। दृष्टेण्टेषु दृष्टेष्टविरोधात् साख्यसंमतः । परोक्षेषु तदेकत्वादागमो न प्रमाणताम् ॥ आविर्भावच्युतौ सर्वच्युतेः साख्यवचोऽखिलम् । भवेत् प्रलापमात्रत्वात् नावधेय विपश्चिताम् ॥ न साख्यशामनं सत्य दृष्टदृष्टेष्टबाधतः। न च तेन प्रतिक्षेप. स्याद्वादस्येति निश्चितम् ।। [इति सांख्यशासन-परीक्षा] १. पुरुषात् । 1, -मानासिद्धेः क०, ख० । 2 कदाचित्- क०, ख० । 3 तत्वामावि-क० । 4. दृष्टेग्विष्टेषु ख०, ग०। 5 प्रमाण्यताम् क०, ग० । 6 -दश्चेति क०, ख० ।

[ वैशेषिकशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्ष ] ६१ अथ वेगेपिकमतमपि दृष्टेष्टविरुद्धम् । तावदिदं हि तेषामाकृतम्- बुद्धिसुखदुग्वेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मसस्काराणा नवानामात्मविशेष गुणानामत्यन्तोच्छित्तावात्मन. स्वात्मन्यवस्थान मोक्ष , अन्यथा आत्मनोऽत्यन्तविशुद्धयभावादिति । "द्रव्यगुणकर्मसामान्य- विशेषसमवायानां पदार्थानां साधर्म्यवैधर्म्यतत्त्वज्ञान निःश्रेयसहेतुः।' [प्रश० भा० पृ० ६ ] शैवपाशुपतादिदीक्षाग्रहण-जटाधारण-त्रिकालभस्मोद्धूलनादितपोऽनुष्टानविशेषश्च । ६२ "तत्र द्रव्याणि पृथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशकालदिगात्ममनांसि सामान्यविशेप- सज्ञोक्तानि नवैव । तद्व्यतिरेकेण समान्तरानभिधानात ।” "गुणा. रूप-रस गन्ध-स्पर्श- सख्या-परिमाण-पृथक्त्व-संयोग-विभाग परत्व-अपरत्व-बुद्धि-सुख-दुःख-इच्छा-द्वेप प्रयत्नाश्च कण्ठोक्ताः सप्तदश, चशब्दसमुच्चिताश्च गुरुत्व-द्रवत्व स्नेह-संस्काराष्टशब्दा. सप्तवेत्येवं चतुर्विशतिगुणाः।" [ प्रश० भा. पृ० १०] "उत्क्षेपणापक्षेपणाकुचनप्रसारणगमनानीति पञ्चैव कर्माणि । गमनग्रहणाभ्रमणरेचनस्पन्दनोलचलनतिर्यपतन-मनोनमनायो गमन- विशेपा न जात्यन्तराणि ।" [प्रग० भा०, पृ० ११ ] "सामान्यं द्विविधम् , परमपरं चानु- वृत्तिप्रत्ययकारणम् । $३ "तत्र परं सत्ता महाविषयत्वात् , सा चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव । द्रव्यत्वाद्यपरम् अल्पविषयत्वात् । तच्च व्यावृत्तेरपि हेतुत्वात्सामान्यं सद्विशेपाख्यामपि लभते । नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेपाः। ते खल्वत्यन्तच्यावृत्तिबुद्धिहेतुत्वात विशेषा एव। अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः संवन्ध इह प्रत्ययहेतुः स समवायः । १. “एवं धर्मविना धर्मिणामुद्देश कृत.। पण्णामपि पदार्थानां साधर्म्यमस्तित्व- मभिधेयत्वं ज्ञेयत्वम् । श्राश्रितत्वं चान्यत्र नित्यद्रव्येभ्य । द्रव्यादीनां पञ्चानामपि समवा- यित्वमनेकत्वं च । 'गुणादीनां पञ्चानामपि निगुर्णत्व-निष्क्रियत्वे।" [प्रग० भा०, पृ० ११- १६] इत्याद्यनेकविध साधर्म्य वैधर्म्य चेति तत्त्वज्ञानं मोक्षहेतु । तद्यथा, "दु स्वजन्मप्रवृत्ति- दोपमिथ्यामानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तराभावादपवर्गः।" [ न्यायसू० १।१।२] $ ५ तत्र तत्त्वज्ञानान्मिथ्याज्ञान निवर्तते; मिथ्याजानानिवृत्तौ तज्जन्यरागद्वेषनिवृत्तिः; तद्दोषनिवृत्तौ तज्जन्यकायवाड मनोव्यापाररूपप्रवृत्तिनिवृत्ति तत्प्रवृत्तिनिवृत्ती तज्जन्यपुण्यपाप- १ 'नवानामात्मविशेषगुणानामत्यन्तोच्छितिर्मोक्ष ।'-प्रश० व्यो० पृ० ६३८ । २ 'धर्मविशेष- प्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायाना पदार्थाना साधर्म्यवेधाभ्या तत्त्वज्ञान्ति श्रेयस ।'- वैशे० सू० १।१४। ३. किं तु गमन एवान्तर्भूतानि । 2. नित्यद्रव्याणि न कार्यद्रव्यवत् स्वकारणा- श्रितानि भवन्ति । 1 नवानामात्मगुणविशेषाणाम् क०, ख० ।-2 -दोनामपि क०, ख० 13 * प्रवृत्तिनिवर्तते ख० । -तरपाये क०, ख० । -- ९] वैशेपिकशासन-परीक्षा ३५ बन्धलक्षणजन्मनिवृत्तिरित्यागामिकर्मबन्धनिवृत्तिस्तत्त्वज्ञानादेव भवति । प्रागुपाजिंताशेषकर्मपरिक्ष- यस्तु भोगादेव नान्यथा । तथा चोक्तम्- "नामुक्त क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि । अवश्यमनुभोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् ॥" ] इति ६ तत्रापि- "कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञः भोगात्कर्मपरिक्षयम् ।1 युगकोटिसहस्राणि कृत्वा तेन विमुच्यते ॥" [ hood इत्येकः पक्ष । "आत्मनो वै शरीराणि वहूनि मनुजेश्वरः । प्राप्य योगवलं कुर्यात् तैश्च सर्वा महीं वरेत् ॥ भुञ्जीत विषयान् कैश्चित् कैश्चिदुग्रं तपश्चरेत् । संहरेच्च पुनस्तानि सूर्यस्तेजोगणानिव ॥" ] इति एकस्मिन्नेव भवे बहुभि. शरीरैः प्रागुपार्जिताशेषफलभोग इत्यपर पक्ष । ततश्च भोगात् प्रागुपार्जिताशेषकर्मपरिक्षये एकविंशतिभेदभिन्नदु खनिवृत्तिरिति । ६७. तानि दु खानि कानीति चेत्, "संसर्गः सुखदु खे च तपा[थार्थेन्द्रियवुद्धयः । प्रत्येकं पड्विधाश्चेति दुःखसंख्यैकविंशतिः॥" ] इति सकलपुण्यपापपरिक्षयात् तत्पूर्वकबुद्धिसुखदु खेच्छाद्वेषप्रयत्नसस्काराणामपि परिक्षये आत्मन कैवल्य मोक्ष इति । [ उत्तरपक्ष ] $ ८ तदेतदौलूक्यगासन तावत 'दृष्टविरुद्धम् । तदभिमतस्यावयवावयविनोर्गुण- गुणिनो क्रियाक्रियावतोर्जातिव्यक्त्योभैदैकान्तस्य तदभेदग्राहिणा प्रत्यक्षेण "विरुद्धत्वात् । $ ९ न ह्यवयव्यादिरवयवादिभ्य सर्वथा भिन्न एव प्रत्यक्षे प्रतिभासते, अपि तु कथचिद- भिन्न एव । तन्तुभ्य तदातानवितानावस्थाविशेषरूपस्य पटस्य कर्पट्यादेश्चित्रज्ञाने नीलादिनिर्भा- सवत् , तत्रैकलोलीभावमुपगताना' रूपादीना गच्छत , पुरुषाद् बाल्यादिवत् , स्थित्यादिवद्वा तवस्था विशेषभूतक्रियाया सामान्यवतोऽर्थाद् वैसादृश्यवत्तद्धर्मभूतसादृश्यलक्षणसामान्यस्य अनर्थान्तरतया सकललोकसाक्षिकमध्यक्षेणादध्यवसायात् । [ . - 1 -परीक्षयम् क० । 2 इद पद्य क०, ख० प्रतौ नास्ति । 3. -कर्मपरिकर्मक्षये क०, ख० । 43 तानि चत् ग० । 5. -लुक्यशा क० । 6 न दृष्ट- ग0 1 7 प्रत्यक्षेणावि-ग०। 8 चित्रपच्यादौ इत्यर्थः । कर्कट्यादे क०, स । 9 लोविभा- ग० 1 10 -णाध्यवसायात् क०, स० । ।

[२० - . ... . ३६ सत्यशासन-परीक्षा १०. ननु समवायात्तेभ्योऽवय व्यादिरर्थान्तरमिव प्रतिभासत इति चेत् ; न, अवयव्या- ढिप्रत्यक्षस्य सर्वत्र प्रान्तत्वप्रसगात् , तिमिराशुभ्रमणनीयानसंशोभाद्याहितविभ्रमस्य 'घावध्यादि- दर्शनवदसदाकारविशिष्टार्थग्रहणात् । तथा चाव्यभिचारित्वं प्रत्यक्षरक्षणमसंभवि स्यात् । $ ११ न चैते अवयवादय , इमे अवयव्यादय , समवायश्च तेपामयमिति प्रत्यक्षबुद्धी विस्रसा भिन्ना सकृढपि प्रतीयन्ते प्रत्यक्षता च स्वीकर्तुमिच्छन्तीति तेऽमी अमूल्यदानयिण; प्रत्यक्षवुद्धावात्मानर्पणेन प्रत्यक्षतास्वीकरणात् । $ १२. न च परोपवर्णितस्वरूपः समवाय एव व्यवतिष्ठते । यतो भिन्नानाममेदप्रतिभास इप्यते । तथा हि नित्यव्यापकैकरूपतया परैरभिमत स समवायः समवाय्याश्रितोऽनाश्रितो वा, यदाश्रित तदा परमार्थत , उपचाराद्वा, तत्र न परमार्थत समवाय समवाय्याश्रितः तयो संबन्धा- भावात् । न हि तावत्तयो ममवाय सबन्ध ; समवायस्यैकत्वात् । समवायस्य समवायान्तरेण वृत्तौ तस्यापि तदन्तरेणैव वृत्तिरित्यनवस्थोपनिपातात् । नापि सयोगः, तस्यं गुणत्वेन द्रव्याश्रित- त्वात् , द्रव्यत्वाच्च समवायस्य । नापि विशेषणविशेप्यभाव.; सबन्धान्तराभिसबद्धार्थप्वेवास्य प्रवृत्ति- प्रतीते दण्डपुरुषादिवत् , अन्यथा सर्व सर्वस्य विशेषणं विगेप्यं च स्यात् । न च समवायममवा- यिना संवन्धान्तराभिसबद्ध त्वम् ; संयोगसमवाययोरनभ्युपगमात् विशेषणविशेष्यभावान्तरेण सबद्धत्वे तस्यापि तदन्तरेण संवद्धेष्वेव प्रवृत्तिरित्यनवस्थानात् । नाप्यदृष्टम् , पोढा संबन्धवादित्वव्या- घातात् । यदि चादृष्टेन ममवायः सबद्धयेत ; तर्हि गुणगुण्यादयोऽप्यत एव संबद्धा भविष्य- न्तीत्यल समवायादिकल्पनयेति न सबन्धान्तरेण समवायस्य सबन्ध सिद्ध्यति । $ १३ नन न समवायस्य सबन्धान्तरेण सबन्धोऽस्मामिरिष्ट येनानवस्थादिदोषा. स्यु , अपि तु अग्नेस्प्णतावत् स्वत एवास्य सबन्धो युक्त स्वत एव सवन्धरूपत्वात् , न संयोगादीना तदभावात् । न ह्येक्रस्य स्वभावोऽन्यस्यापि, अन्यथा स्वतोऽग्नेरप्णत्वदर्शनात् जलादीनापि तत्स्या- दिति चेत् ; तदपि प्रलापमात्रम् ; यत प्रत्यक्षप्रसिद्धे पढार्थस्वभावे स्वभावैरुत्तरं वक्तुं युक्तम् । "प्रत्यक्षेण प्रतीतेऽर्थे यदि पर्यनुयुज्यते । स्वभावैरुत्तर वाच्यं दृष्टे काऽनुपपन्नता ॥" ] इति वचनात् । अन्यथा तथोत्तरेण सर्वस्य स्वेष्टसिद्धिप्रसगात् । $ १४. न च समवायम्य स्वत संवन्धत्व सयोगादीना तु तस्मादित्यध्यक्षप्रसिद्धम्; तत्स्वरूपस्याध्यक्षागोचरत्वप्रतिपादनात् । “अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यक्षेपु वृत्त्यभा- वात् , स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च।' [प्रश० भा० पृ० ६९७] इति" प्रशस्तपाढभाप्येऽभिधानात् । १ गच्छवृक्षादिदर्शनवत् । २ 'इन्द्रियार्थसन्निकर्पोत्पन्नमव्यपदेश्यच्यमिचारि व्यवसायात्मकं प्रत्यक्षम्' -न्यायसू० ११११४ । ३. स्वमावेन । ४ समवाय-समवायिनो । ५ सयोगस्य । ६. विशेष- विठोप्यमावस्य। ७ सयोग , सयुतममवाय', सयुक्तसमवेतसमवायः, समवाय', समवेतसमवाय, विशेषण विशेप्यभावश्चेति । ८ अदृष्टादेव । ९ स्वत संवन्धरूपत्वाभावात् । १०. 'स्वभावात्' इत्युत्तरेण । ११ 'तस्मादिह बुद्धयनुमेय समवाय.' -प्रा० मा० । 1. एतदन्तर्गत पाठ क०, स० प्रतो नास्ति । 2 रोक्षव-क०, स०1 3 वृत्तिरित्यवस्थो- स० । 4 समवन्धत्वम क०। 5 गुणादयोऽपि ग०। 6 ननु सम-क०, स०। .. [ -- ३७ . - १९] वैशेपिकशासन-परीक्षा 'समवाय पदार्थान्तरेण सबद्ध्यमानो न स्वतः संबद्धयते संबद्धयमानत्वात् रूपादिवत्' इत्यनु- मानविरोधाच्च । $ १५ यदि चाग्नि-प्रदीपश्च मासादीनामुष्णप्रकाशाशुचित्ववत् समवाय स्वपरयो स- बन्धहेतुः, तर्हि तदृष्टान्तावष्टम्भेनैव ज्ञानं स्वपरयो प्रकाशहेतुः किं न स्यात् ; तथा च "शानं मानान्तरवेद्यं प्रमेयत्वात" [ ] इति विप्लवते। $ १६. किं च, यथा अर्थाना सदात्मकस्य भावस्य नान्यः सत्तायोगोऽस्ति एवं द्रव्या- दीना वृत्त्यात्मकस्य समवायस्य नान्या वृत्तिरस्ति, तस्मात् स्वात्मवृत्तिरिति मन्वानः पदार्थाना सवेदनात्मकस्य ज्ञानस्य नान्यत. सवेदनम् , तस्मात् स्वतसवेदनमिति किं न मन्येत्, भाववत्ता- दास्याविशेषात् । तदविशेषेऽपि सत्तादृष्टान्तेन समवायस्यैव स्वतो वृत्तिः स्यान्न पुनर्ज्ञानस्य स्व- सवेदनमिति स्वरुचिविरचितदर्शनप्रदर्शनमात्रम् । स्वतः सबन्ध इव स्वत सवेदनेऽपि स्वात्मनि क्रियाविरोधाभावात् , अन्यथा तत्रापि तत्प्रसंगात् । तस्यैकस्यैव संघटनीय-सघटकत्वभावात् । $ १७ यच्चोच्यते--समवायः संबन्धान्तरं नापेक्षते स्वतः संयन्धत्वात; येतु संबन्धान्तरमपेक्षन्ते न ते स्वत सबन्धा , यथा घटादय , न चायं न स्वतः सबन्धः, तस्मात्सबन्धान्तरं नापेक्षत इति; तदपि मनोरथमात्रम् ; सयोगेनानेकान्तात् । स हि स्वत सबन्ध. सबन्धान्तरं चापेक्षते। न हि स्वतोऽसबन्धस्वभावत्वे सयोगादे परतस्तद्युक्तम्; अतिप्रसगात् । 'समवायः पदार्थान्तरेण सश्लेषे सबन्धान्तरमपेक्षते, पदार्थान्तरत्वात् , यदित्थं [ तदित्थ ], यथा सयोगः, तथा चायम्, तस्मात्त- थैव, इत्यनुमानबाधितविषयत्वाच्च । ६१८ किं च, यथा समवायः स्वरूपापेक्षयाऽभेदात् तदव्यतिरिक्तघटनीय-घटकाकारापेक्षया भेदाभेदाभेदात्मक सिद्धयति, तथावयव्याद्यपेक्षयाऽभेदात्तदपृथग्भूतावयवापेक्षयाभेदात् सर्व वस्तु भेदाभेदात्मक' जात्यन्तर सिद्धयेत् , विरोधादिदूषणाना समवायदृष्टान्तेनापसारणात् इत्यहन्मत- सिद्धि तस्य तदिष्टत्वात् । "अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्वं तव ।” [युक्त्यनु० श्लो० ७ ] इति वचनात् । तन्मतसिद्धौ ‘पराभिमतभेदैकान्तरूप वस्तु खपुष्पवदसदेव स्यात् ।' "स्वतन्त्रान्यतरत् खपुष्पम्" [ युक्त्यनु० श्लो० ७ ] इति वचनात् । $ १६ तदेव स्वत परतश्च समवायस्य समवायिषु वृत्तिर्न स्यात्, अवृत्तिमत्त्वात् समवाय- वृत्तेन परमार्थत समवाय समवाय्याश्रित परैस्तस्य स्वातन्त्र्याभ्युपगमाच्च । नाप्युपचारात्, उपचारनिमित्ताभावात् । । १ "तस्मात् ज्ञानान्तरसवेद्य सवेदन वेद्यत्वात् । घटादिवत्"-प्रश० न्यो० पृ० ५२९ । २ सबन्धस्वभावत्वम् । ३ अन्येन सवन्धेन सबद्धत्वाभावात् । 1. यथा सदात्मक-क०, ख०। 2 एवं वृत्त्यात्मकस्य क०, ख०। 3 -मन्वान सवे-ख० । 4. -तु भेदात्मकं ग०।

૩૮ सत्यशासन-परीक्षा [२०- . $ २० ननु निमित्तमुपचारस्य समवायिपु सत्सु समवायनानम्, समवायिशून्यदेशे समवाय- ज्ञानासमवादिति चेत; तठसत्, ढिगादीनामप्येवमाश्रितत्वप्रमगात् , मूर्तद्रव्येषु सत्सु उपलब्धिलक्षण- प्राप्तेषु दिग्लिनस्य 'इदमत पूर्वेण' इत्यादि प्रत्ययस्य काललिङ्गस्य च परत्वापरत्वादिप्रत्ययस्य सभावात मूर्तद्रव्याश्रितत्वोपचारप्रयंगात्। तथा च "अन्यत्र नित्यद्रव्येभ्यः' [प्रश० भा०, पृ०१६] इति वचनव्याघात., नित्यद्रव्यस्यापि दिगादेरुपचारादाश्रित्त्व सिद्ध । ततो नोपचारा- दप्याश्रितत्व समवायस्य । २१ अथानाश्रित समवाय इति मतम्, तदा न संवन्ध. समवाय संबन्धिभ्यां भिन्न- स्योभयाश्रितस्यैव सयोगवत् सबन्धत्वव्यवस्थिते । तथा च प्रयोग -समवायो न संबन्ध सर्वथाऽ- नाश्रितत्वात् , यो यः सर्वथाऽनाश्रितः स स न संबन्ध , यथा दिगादि., सर्वथाऽनाश्रितश्च समवाय तस्मान्न संबन्ध इति । न चात्रासिद्धो हेतु , समवायस्य परमार्थत उपचाराच्चाश्रितत्वस्य निराकृतत्वात् । ६ २२ म्याढाकृतम्-समवायम्य धर्मिणोऽप्रतिपत्तौ हतोराश्रयासिद्धत्वम्, प्रतिपत्तौ धर्मि- ग्राहकप्रमाणवाधितः पक्षो हेतुश्च कालात्ययापदिष्ट प्रसज्यते । समवायो हि यतः प्रमाणात् प्रतिपन्न- स्तत एवायुतमिद्धसबन्धत्व प्रतिपन्नम् अयुतसिद्धानामेव संबन्धस्य समवायव्यपढेशसिद्धेरिति, तदपि न साधीय ; समवायग्राहिणा प्रमाणनाश्रितम्यैव समवायस्य अविप्वग्भावलक्षणस्य प्रतिपत्ते, तस्याना- श्रितत्वाभ्युपगमे च असंवन्धत्वस्य प्रसगेन साधनस्य साधनात् । साध्यसाधनयोाप्यव्यापकभाव- सिद्धौ परस्य व्याप्याभ्युपगमे तन्नान्तरीयकम्य व्यापकाभ्युपगमस्य प्रतिपादनात् । न ह्याश्रितत्व- मसंबन्धत्वेन व्याप्तं ढिगादिप्वसिद्धम् । नाप्यनैकान्तिकम् • अनाश्रितस्य कस्यचित् सवन्धत्वा- प्रसिद्ध विपक्षे वृत्त्यभावात् । तत एव न विरुद्ध नापि सत्प्रतिपक्षम् . तत्यानाश्रितस्यापि संव- न्धत्वव्यवस्थापकानुमानाभावादिति न परेपा समवायसबन्धोऽस्ति, यतस्तद्वशाढभिन्नानामप्यवयव्या- दीनाममेदेन प्रतिपत्ति रुपपद्येत । ततस्ते भेटेनैव प्रतियेरन्11 न चैवमत. प्रत्यक्षविरोधो दुःनक. परिहर्नु परेपाम् । ६ २३. किं च, प्रतिपादितप्रकारेण समवायस्यासमवे संयोगस्याप्यसंभवः तस्य कार्यस्य कारणसमवायाभावेऽनुपपत्ते । $ २४ एव सबन्धाभावे न किंचित् वस्तु भेदैकान्तवाढिमते व्यवतिष्ठते । तथा हि- तावत् परमाणूनां सयोगाभावे द्व्यणुकादिप्रक्रमेणावयविनोऽनुत्पत्ते:12 कार्यत्पभूतचतुष्टयाभाव., तदभावे तत्कारणचतुर्विधपरमाणवोऽपि न सभाव्यन्ते; कार्यलिङ्गत्वात् कारणस्य । "कार्यभ्रान्तेरणुभ्रान्तिः कार्यलिङ्गं हि कारणम् ।" [ आप्तमी० श्लो० ६८] %3 १ उत्तानुमान • नदविनामाविन । ३ कार्यमृतपृथिव्यादिकारण । 1-न्येक्दमत क०, स० । 2. वचनघात ० 1 3 -रावाश्रित-क० 1 4 -तस्यैक्स्यैवा- क०, ०। 5. प्रमाणाप्रतिपन्न क०, स० । 6 प्रतिपत्ति क०, २० । 7. अन्नबन्धस्य क०, स० । 8. प्रसंगेन माधनात् ग० । 9 - निल्लं क०, स०। 10 प्रतीति-उ० । 10 प्रतीति-उ०। 11 प्रतियतन क० । 12 -विनोत्पत्ते क०, स० !

१ 3 - २७] वैशेषिकशासन-परीक्षा ३९ इति वचनात् । तथा भूत चतुष्टयासत्त्वे 'परापरादिप्रत्ययापायात् । '1इदमत पूर्वेण' इत्यादि प्रत्ययापायाच्च [न ] कालो दिक्च व्यवतिष्ठ ते । तथा भेरीदण्डाद्याकाशसयोगाभावात् "सयोगजशब्दस्यानुत्पत्ति , सर्वत्रावयबसंयोगाभावे तद्विभागस्याप्ययोगाद् विभागजशब्दस्याप्य- नुत्पत्तिः; तयोरनुदये शब्दजशब्दस्यासम्भव ; इति सकलगब्दानुत्पत्तेराकाशव्यवस्थापकोपायादा- कागहानि । तथा आत्मान्त करणसयोगासिद्धे बुद्धयादिगुणानुत्पत्ति ; तदभावे चात्मव्यवस्थाप- कोपायासत्त्वादात्मतत्त्वहानि । तथा बुद्ध्यनुत्पत्तौ मनसोऽसिद्धि ; क्रमतो ज्ञानोत्पत्तेर्मनोलिङ्गत्वात्। "युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिगम्" [ न्यायसू० १।१।१६ ] इति वचनात् । $ २५ *एव सयोगाभावे सर्वद्रव्याभाव । अथवा समवायाभावे सत्तासमवायासंभ- वात् सर्वद्रव्य प्रच्युतः । सर्वद्रव्यहानौ तदाश्रितगुणकर्मसामान्यविशेषाणामसिद्धिः आश्रयाभावे सत्याश्रयिणा[म] भावात् , *तन्त्वभावे पटाभाववदिति । ससर्गहाने. सकलार्थहानिर्दुर्निवारा वैशेषिकाणामुपनिपतति । तदुक्त स्वामिसमन्तभद्रपादै - "अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्वं तव स्वतन्त्रान्यतरत्खपुष्पम् । अवृत्तिमत्त्वात् समवायवृत्तेः संसर्गहानेः सकलार्थहानिः॥" [युक्त्यनु० श्लो० ७ ] इति ६ २६ एव विचार्यमाणा सर्वथाभिन्नावयवावयव्यादय स्वयमेव न सन्ति यत प्रत्यक्षेण प्रतिभासेरन् । तत्प्रत्यनीकाश्च 'कथचिद्भिन्नास्ते प्रत्यक्षत प्रतिभासन्त इति स्थित दृष्टविरुद्ध वैशेपिकमतमिति । $ २७ तथा तदिप्टविरुद्धं च । तथा हि-विवादापन्न 'तनुकरणभुवनादिक बुद्धिमद्धेतुकं कार्यत्वात् घटादिवत्' इति जगतो महेश्वरकृतत्व योगे. व्यवस्थाप्यते, तच्चानुमानविरुद्धम् , तद्वा- धकानुमानसद्भावात् । तच्चेदम्-नेश्वरस्तन्वादीना कर्ता, अशरीरत्वात् , य एव स एवम् , यथात्मा, तथा चायम् , तस्मात्तथैवेति । न चात्रासिद्धो हेतुः, तस्य शरीरत्वायोगात् । तच्छरीरस्य सावयवस्य नित्यत्वानुपपत्ते. । 10नित्यस्यापि तच्छरीरस्य बुद्धिमत्कारणापूर्वकत्वे तेनैव कार्यत्वा- दिहेतूना व्यभिचारात्। तस्य बुद्धिमत्कारणसपूर्वत्वे वा परापरशरीरकल्पनायामनवस्थाप्रसगात् । पूर्वपूर्वस्य गरीरेणोत्तरोत्तरस्वशरीरोत्पत्तौ भवस्य निमित्तकारणत्वे सर्वससा। णा तथा प्रसिद्धेरीश्वर- कल्पनावैयर्थात् । स्वोपभोग्यभुवनाद्युत्पत्तावपि11 तेषामेव निमित्तकारणत्वोपपत्तेरिति; तत् कार्यत्वा- चेतनोपादानत्वसन्निवेशविशिष्टहेतवो गमका म्यु ।"भशरीरंवार वसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः।" [ छान्दो० ८।१२।१] इत्यागमविरोधाच्च । . १ देशापेक्षया अपरस्मिन् पर युगपच्चिर क्षिप्रमिति कार्यलिङ्गानि । २ इदमतो दक्षिणेनेत्यादि । ३ भेर्याकाशमयोगो निमित्तकारणम् । ४ अवयवविभागस्यापि । ५ सयोगजविभागजशब्दयोरभावे । ६ अवयव्यादय । ७-८ ईश्वरस्य । प्रत्ययादिदमत क०, ख०। १ सयोगशब्द- क०, स० । 3, -कोपायसत्त्व- ग० । 4 -यिणामावा- क०, ख० । 5 -एतदन्तर्गत पाठ ग० प्रतौ नास्ति । 6 प्रत्यक्षे प्रति क०, ख० । - कथचिदभिन्ना क०, ख० । 8 नानासिद्धो क०, ख० । 9 सावयस्य क०, ख० । 10 -तेरनित्य- स्यापि स० । 11 भुवनाद्युत्तावपि क०, स०। 12,-र नावसन्त क०, ख० । 1 - 1 ४० सत्यशासन-परीक्षा [२८- ६२८. एवमशरीरत्वे सिद्धे नेश्वरस्तस्य तन्वादीनां कर्ता स्यात् , वितनुकरणस्य तस्य तस्कृते- रयोगात् । तादृशोऽपि निमित्तमावे कर्मणामचेतनत्वेऽपि तन्निमित्तत्वमविप्रतिषिद्धम् , सर्वथा दृष्टान्तव्यतिक्रमात् । यथैव हि कुलालादिसतनुकरण. कुम्भाडे. प्रयोजको दृष्टान्त तनुकरणभुव- नादीनामशरीरेन्द्रियेश्वरप्रयोजकत्वकल्पनयान्यतिक्रम्यते तथा कर्मणामचेतनानामपि तन्निमित्तत्वं कल्पनया बुद्धिमानपि दृष्टान्तो व्यतिक्रम्यतां विशेषाभावात् । ६२९. स्यान्मतम्-सगरीरस्यापि बुद्धीच्छाप्रयत्नवत एक कुलालादे: "कारकप्रयोक्तृत्वं दृष्टम् , कुटादिकार्य कर्तुमबुद्ध्यमानस्य तददर्शनात् , बुद्धिमतोऽपीच्छापाये तदनुपलब्धे ; तदिच्छावतो- ऽपि प्रयत्नाभावे तदनुपलम्भात् ; तद्वद्वितनुकरणस्यापि बुद्धिमतः स्रष्टुमिच्छत. प्रयत्नवतः शश्वदी- श्वरम्य समस्तकारकप्रयोक्तृत्वोपपत्तेर्न दृष्टान्तव्यतिक्रमः, सशरीरत्वेतरयो: कारकप्रयुक्ति प्रत्यनङ्गत्वात् । न हि सर्वथा दृष्टान्तदान्तिकयो. साम्यमस्ति, तद्विशेषविरोधादिति; तदयुक्तम्, बुद्ध्यादीनामपि तस्यासमवात् । ईश्वरो ज्ञानचिकीप्रियलत्रयवान्न भवति; अशरीरत्वात् ; मुक्तात्मवदिति तदभाव- सिद्ध . । अगरीरत्वाविशेषेऽपि सादिमुक्तानामेव बुद्ध्यादिरहितत्व न त्वनादिमुक्तस्येश्वरस्येति चेत् ; न, अनादिमुक्तसिद्धे । 'ईश्वरस्यागरीरत्व सादि अशरीरत्वात् मुक्तात्माऽशरीरत्ववत्' इति तहाधकसद्भावात् । अत्राप्यगरीरत्वाविशेषेऽपि मुक्तात्मागरीरत्वमेव सादि न त्वीश्वरागरीरत्वमिति चेत् ; न, अनुपपत्तिकत्वात् ; जगत्कर्तृत्वसर्वज्ञत्वादीनामीश्वरविशेषणाना विवादगोचरत्ने न ततो वैलक्ष- ण्याभिधानानुपपत्ते । तथापि यदि तथेप्यते तर्हि कार्यत्वाविशेषेऽपि घट-पट-कट-कटक-शकट-मुकुटा- दीना बुद्धिमद्धेतुकत्वं न तु मही-महीघर-महीरुहादीनामिति अकृतसमयस्यापि कृतबुद्ध्युत्पादकेभ्यो घटादिभ्यः तदनुत्पादकमुवनाढीनां वैलक्षण्यस्यापि संभवात् । एवमगरीरत्वे वुद्धीच्छाप्रयत्नवत्त्वासिद्धे तदसिद्धौ सकलकारकप्रयोक्तृत्वानुपपत्ते. सूक्तमीश्वरस्तन्वादीनां न - 3 नेप्यते। कर्तेति । ३०. तथापि यदि वैय्यात्यादीश्वरः कर्तेत्यभिधीयते तदा प्राणिनां विचित्रघोरदुःखशता- नीश्वरः करोति वा, न वा, यदि न करोति तदा तै. कार्यत्वादिहेतूनां व्यभिचार. । अथ करोतीति मतम् , तदसंभाव्यम् ; इह हि कश्चिदसर्वनो प्रणष्टरागद्वेषो मुनिरन्यो वा साधु. परपीडा न करोति किल, स एव महर्षीणामप्याराध्य. सर्वज्ञो वीतरागद्वेषमोहो भगवान् महेश्वर प्राणिनाम- निमित्तमसह्यविविधोग्रदुःखपरम्परामुत्पाद्य जगत्त्रयं परिपीडयतीति कथमिदं प्रेक्षावद्भि. संभाव्यते । तत्करणे वा तस्य अत्युषापूर्वराक्षसत्वमेव, न तु महद्भिः स्तुत्यं महेश्वरत्वमिति तस्य तत्करणम- संभाव्यम् । ३१. ननु [न] प्राणिनामीश्वरो' दु खमुत्पादयतीति चेत् ; ना दुखहेतूनामपि पापकर्मणामीश्वरकृतत्वे तस्यैव दुःखहेतुत्वसिद्धेः, तत्पशोपक्षिप्तदोषानुषंगात् । तेषा तढकृतत्वे तनुकरणादेरपि तत्कृतत्वं मा मृत् ; विशेषाभावात् । कर्मभिरीश्वरसाधकहेतूनामनैकान्तिकत्वाच्च; १. तनुकरणरहिवस्य । कार्यकर्तृत्वाभावात् । ३. ईश्वरस्य । ४. अग्रहीतसकेतस्यापि । ५. कृतबुद्धयनु पादक । ६ ईश्वरस्यैव । ७. कर्मणाम् । 1 -प्रजक- क, ख० । कारकः प्रयो-क०, ख० 1 3 तस्य संमवात् क० 1 4 -नाटीश्वरो - ख०।

.. -३५] वैशेषिकशासन-परीक्षा ४१ कर्मणामबुद्धिमन्निमित्तत्वेऽपि कार्यत्वार्थक्रियाकारित्वस्थित्वा(त्या) प्रवर्तनाना संभवात् । यदि 1कल्पयित्वापीश्वरमवश्य कर्मानुमन्यते; तदा केवलं कर्मैव तनुकरणादिनिमित्तमिष्यताम् , किमनेनेश्वरेण प्रमाणबाधितेन, तथा च परेषा पारपर्यपरिश्रमपरिहारः स्यात् । $ ३२ ननु कथमचेतनाना कर्मणा विचित्रोपभोगयोग्यतनुकरणाद्युत्पादकत्वमिति चेत् ; कथमुन्मत्तमदिरामदनकोद्रवादीनामुन्मादादिविचित्रकार्योत्पादकत्वम् । कथ वा अयस्कान्तविशेषाणा लोहाकर्षणभ्रमणादि-कार्यकारित्वमित्यभिधीयताम् । तथादृष्टत्वादिति चेत् ; तत एव प्रकृतः स्वभाव- व्यालम्भोऽपि निवर्त्यताम् । तथा 'सुखदुःखलाभालाभादीनामदृष्ट कारणमस्ति, दृष्टकारणव्यभिचारा- न्यथानुपपत्ते.' इत्यनुमितत्वात् । न चैवमीश्वरस्याप्यनुमितत्वादुपालम्भप्रसगनिवृत्तिः स्यादिति शङ्कनीयम् , तदनुमानस्यानेकदोषदुष्टत्वात् । $ ३३ तथाहि-तनुकरणभुवनादे. कार्यत्वादिसाधन किमेकबुद्धिमत्कारणत्व साधयेत् , अनेकवुद्धिमत्कारण वा, प्रथमपक्षे प्रासादादिना अनेकसूत्रधारयजमानादिहेतुना तदनैकान्तिकम् । द्वितीयपक्षे सिद्धसाधनम् , नानाप्राणिनिमित्तत्वात्तदुपभोग्यतन्वादीनाम् , तेषा तददृष्टकृतत्वात् । ६ ३४ एतेन बुद्धिमत्कारणसामान्यसाधने सिद्धसाधनमुक्तम् ; तदभिमतविशेषस्याधिकरण- सिद्धान्तन्यायेनाप्यसिद्धे । सामान्यविशेषस्य साध्यत्वाददोष इति चेत्, न; दृष्टादृष्टविशेषाश्रय- सामान्यविकल्पद्वयानतिवृत्ते । दृष्टविशेषाश्रयस्य सामान्यस्य साध्यत्वे स्वेष्टविघातात् । अदृष्टविशेषा- श्रयस्य सामान्यस्य साध्यत्वे साध्यशून्यत्वप्रसगात् । निदर्शनाय दृष्टेतरविशेषाश्रयस्य सामान्यसाधनेऽपि स्वाभिमतविशेषसिद्धि. कुतः स्यात् । $ ३५ अधिकरणसिद्धान्तन्यायादिति चेत् , कोऽयमधिकरणसिद्धान्तो वन्यप्रकरणसिद्धिः सोऽधिकरणसिद्धान्तः” न्यासू० १११:३०] ततो दृष्टादृष्टविशेषाश्रयसामान्य- मात्रस्य बुद्धिमन्निमित्तस्य जगत्सु प्रसिद्धौ प्रकरणाज्जगन्निर्माणसमर्थ समस्तकारकाणा प्रयोक्ता सर्वदाऽविलुप्तशक्तिर्विभुरशरीरत्वादिविशेषाश्रय एव सिद्धयतीति चेत् , स्यादेवम् , यदि सकल- जगन्निर्माणसमर्थेनैकेन समस्तकारकाणा प्रयोक्त्रा सर्वज्ञत्वादिविशेषोऽपि तेनाविनाभाविदृष्टेतरविशे- पाधिकरणबुद्धिमत्कारणसामान्य कुतश्चित्सिद्धयेत् ; न च सिद्धयति; अनेकबुद्धिमत्कारणेनैव स्वोप- भोग्यतन्वादिनिमित्तकारणविशेषेण तस्य व्याप्तत्वसिद्धे समर्थनात् । तथा सर्वज्ञवीतरागकर्तृकत्वे साध्ये घटादिना अनैकान्तिक साधनम् । साध्यविकल च निदर्शनम् । सरागसर्वज्ञकर्तृकत्वे साध्ये अप- सिद्धान्त । सर्वथा कार्यत्व च साधन तन्वादावसिद्धम् , तस्य कथचित् कारणत्वात् । कथचित् कार्यत्व तु विरुद्धम् , सर्वथा बुद्धिमन्निमित्तत्वात् साध्याद्विपरीतस्य कथचिबुद्धिमन्निमित्तत्वस्य साधनात् । तथा पक्षोऽप्यनुमानबाधित स्यात् 'नेश्वरस्तन्वादीना कर्ता ज्ञानादिरहितत्वात् , मुक्तवत् ,' इति प्रागुक्तानुमानस्य तद्बाधकस्य भावादिति, जगतो बुद्धिमद्धेतुकत्व न सिद्धयति, साधकस्याभावाद् बाधकस्य संभवाद् । तत. सूक्तमिष्टविरुद्ध वैशेषिकमतमिति । [इति वैशेषिकशासन-परीक्षा] नाम, यत्सिद्धा- , १. व्युत्क्रमेण आ समन्तात् लम्म प्राप्ति । २ यस्मिन्द्वौ अन्यप्रकरणसिद्धि सोऽधिकरणसिद्धान्त । ३ तन्वादे । 1 -प इत्या क०, य० । 2 -विर्भू शरीर क०, खः । ६ - [नैयायिकशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्ष.] ६१. वैशेषिकसमसिद्धान्ता नैयायिकास्त्वेवमामनन्ति- "प्रमाण-प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-बाद-जल्प-वितण्डा- हेत्वाभास-उल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः। [न्यायसू० १११।१] ६२ किं च, भक्तियोग-क्रियायोग-ज्ञानयोगत्रयैर्यथासंख्यं सालोक्यं साल्प्य सामीप्यं सायुज्य मुक्तिर्भवति । ६३ तत्र महेश्वर. स्वामी स्वयं मृत्य इति तच्चित्तो मृत्वा यावज्जीवं तम्य परिचर्याकरणं भक्तियोग., तस्मात्सालोक्यमुक्तिर्भवति । ६१. तप स्वाध्यायानुष्ठानं क्रियायोगः । तत्रोन्मादकादिव्यपोहार्थमाध्यात्मिकादिद् खसहि- णुत्वं तप , प्रशान्तमन्त्रस्येश्वरवाचिनोऽभ्यास स्वाध्याय , तदुभयमपि क्लेगकर्मक्षयाय समाधिलाभाय चानुप्टेयम् । तस्मानियायोगात् सारूप्यं सामीप्यं वा मुक्तिर्भवति । विदितपदार्थस्येश्वरप्रणिधान ज्ञानयोगः । ६५. परमेश्वरतत्त्वस्य प्रवन्धेनानुचिन्तनं पालोचनमीश्वरप्रणिधानम् । तस्य योगस्य यम-नियम-आसन-प्राणायाम-प्रत्याहार-धारणा-ध्यान-समाधय अष्टाङ्गानि । तत्र देगकालावस्था- भिरनियता पुरुषस्य विशुद्धवृत्तिहेतवो यमा । अहिंसाब्रह्मचर्यास्तेयादयः देशकालावस्थापेक्षिणः पुण्यहेतब क्रियाविशेषा नियमाः देवार्चन-प्रदक्षिण-संध्योपासन-जपादय । योगकर्मविरोधि- क्लेगजपाद्यर्थश्च रणवन्धः आसनम् । पद्मकस्वस्तिकादे कोष्ठस्य वायोर्गतिच्छेठ प्राणायामः रेचकपूरककुम्भकप्रकार. शनै शनैरभ्यसनीय । समाधिप्रत्यनीकेभ्य समन्तात् स्वान्तस्य व्यावर्तनं प्रत्याहार. 1 चित्तस्य देशसंबन्धो धारणा । तत्रैकतानता घ्यानम् । ध्यानोत्कर्षान्निर्वाताचलप्रदी- पावस्थानमिवैकत्र चेतसावस्थानं समाधि । एतानि योगान्तानि मुमुक्षुणा महेश्वरे पग भक्तिमा- श्रित्यामियोगेन सेवितव्यानि । ततोऽचिरेण कालेन भवन्तमनौपम्यस्वभावं प्रत्यक्ष पश्यति; तं दृष्ट्वा निरतिगयं सायुज्य नि श्रेयसं प्राप्नोति । [उत्तरपक्ष. ] ६६. तदेतत्तार्किकमतं तृप्टेष्टविरुद्धम् । प्रागनन्तरं प्रतिपादितप्रकारेणैव प्रत्यक्षानुमान- विरोधयोरत्राप्युपपत्तः, अनो नात्र पृथक तद्विगेधसमर्थनमुपक्रम्यते । ६७. कि च, तदभ्युपगतपढार्थेषु इन्द्रियबुद्धिमनसाम् अर्थोपलब्धिमाधकत्वेन प्रमाणत्वात् प्रमेयेवन्तावानुपपत्त, अन्यथैकानेकात्मकत्वसिद्धे । मंगयादीना प्रमेयत्वे च व्यवस्थानानुपपत्ते. । विपर्ययानन्यवमाययो प्रमाणाढिपोडगपदार्थभ्योऽर्थान्तरभूतयो प्रतीतेश्च न पोडगपढार्थव्यवस्था । १ नमन। प्रमागाविषयवे 1. प्रणानं क.। 2 ममतान्, क० ।

-८] नैयायिकशासन-परीक्षा ४३ ६८. तथैव नैयायिकवैशेपिकसिद्धान्तस्य दृष्टेष्टविरुद्धत्वे सिद्धे चतुर्विधवर्णाश्रमवत् तदविधेयविविधाचारपुण्यपापपरलोकबन्धमोक्षतत्कारणतत्फळबद्धमुक्तादिस्वरूपप्रतिपादकोऽपि योगा- गमो न प्रमाणम् , दृष्टेष्टविरुद्धागमाभिन्नस्य तस्यातीन्द्रियेषु तत्कारणेपु च प्रामाण्यसभावनानुप- पत्तेरिति न तेषा धर्मानुष्ठान प्रतिष्ठामियति । किं वा बहुभिरालापै. औलूक्यैः तार्किकैश्च लौकिक वैदिक वा यत्किचिदुच्यते तत्सर्व मृषैव तदभिमतसर्वतत्त्वाना समर्गासभवेन' शून्यत्वस्यापादितत्वा- दित्यलमतिप्रपञ्चेन, दृष्टेटविरुद्धत्वान्नैयायिकवैशेषिकमतयोरसत्यत्वसिद्धत्वात् । दृष्टेष्विष्टेपु दृष्टेष्टविरोधाद्यौगसमत. । परोक्षेषु तदेकत्वादागमो न प्रमाणताम् ।। संसर्गहानेः सर्वार्थहानेर्योगवचोऽखिलम् । भवेत्प्रलापमात्रत्वान्नावधेय विपश्चिताम् ॥ दृष्टेष्टाभ्या विरुद्धत्वान्न सत्य योगशासनम् । न च तेन प्रतिक्षेप. स्याद्वादस्येति निश्चितम् ।। [ इति नैयायिकशासन-परीक्षा] १ समवायादिसम्बन्धाभावेन । 1 द्वाश्चेति क०, ख० ।

[ मीमांसक-भादृप्राभाकरशासन-परीक्षा] [ पूर्वपक्षः] ६१ अथ मीमामकमतमपि दृष्टेष्टविरुद्धम् । मीमासकेपु तावदेवं भाट्टा भणन्ति–'पृथिव्य- तेजोवायुदिक्कालाकागात्ममन शब्दतमासि' इत्येकादशैव पदार्थाः, तदाश्रितगुणकर्मसामान्यादीना तत्स्वभावत्वेन तादात्स्यसभवान्न पदार्थान्तरमित्येवं पदार्थयाथात्म्यज्ञानात् कर्मक्षयो भवतीति । ६२. प्रामाकरास्तु "द्रव्य गुणः क्रियाजातिसंख्यासाश्यरातयः | समवायः क्रमश्चेति नव स्युर्गुरुदर्शने ॥" ] सत्ता तत्र द्रव्या' [णि पृथिव्यादय., ] गुणा रूपादय क्रिया उल्लेपणादि । जाति द्रव्यत्वादि । सख्या एकत्वद्वित्वादि । सादृश्य गोप्रतियोगिकं गवयगतमन्यत् , गवयप्रतियोगिकं गोगत सादृश्यमन्यत् । शक्ति सामर्थ्यम् , सा अनुमेयैव । गुणगुण्यादीना सबन्ध. समवाय । एकम्य निष्पादनानन्तरमन्यस्य निष्पादन क्रम., प्रथमाहुत्यादिपूर्णाहुतिपर्यन्तम् । इत्येवं नवैव पदार्था । एतेपा याथात्म्यज्ञानान्नि.श्रेयससिद्धिरित्याचक्षते । $३ किं च, वेदमधीत्य तदर्थ ज्ञात्वा तदुक्तनित्यनैमित्तककाम्यनिषिद्धानुष्ठानक्रम निश्चित्य तत्र विहितानुष्ठाने य प्रवर्तते तस्य स्वर्गापवर्गसिद्धिर्भवति । त्रिकालसध्योपासनजपदेवर्षिपितृ- तर्पणादिक नित्यानुष्ठानम् । दर्शपौर्णमासग्रहणादिषु क्रियमाणनैमित्तकानुष्ठानम् । तद्वयमपि नियमेन कर्तव्यम् । कुत, "अकुर्वन् विहितं कर्म प्रत्यवायन लिप्यते ।" ] इति वचनात् । पुत्रकाम्येष्ट्याठिकमहिक काम्यानुष्ठानम् । ज्योतिष्टोमादिकमामुत्रिकं काम्यानुष्ठानम् । 'श्येना- भिचरन् यजेत् ,' इत्यादिक निषिद्धानुष्ठानम् । तत्क्रम निश्चित्य तेप्वनुष्ठानेषु विहितानुष्ठाने यः प्रवर्तते सम्वर्गापवर्गों प्राप्नोति । ६४, अपि च- "न्यायार्जितधनस्तत्त्वज्ञाननिष्टोऽतिथिप्रियः । श्राद्धकृत सत्यवादी च गृहस्थोऽपि विमुच्यते ॥" ] इति वचनात् । मुमुक्षणा प्रवज्यया भवितव्यमिति नियमो नास्ति । السا १ पापन ! • यंनयागेन । ३. गृहस्थी नाक्षमार्गस्थो इत्यादि । तुलना-रत्नर० इलो० 1 द्रव्यादि गुणस्पाटय क०, २० । 2 मानुमयव क०, १०। 3 निष्टातिथि क० ।

४५ - - -९] मीमांसक-भाट्टप्राभाकरशासन-परीक्षा ५. तत्रापि- "मोक्षार्थी न प्रवर्तेत तत्र काम्यनिषिद्धयोः । नित्यनैमित्तिके कुर्यात् प्रत्यवायजिहासया ॥" [ मी० श्लो० सवन्ध० श्लो० ११० ] इति भाट्टाः । प्रत्यवायपरिहारकामेन नित्यनैमित्तकानुष्ठानयोः प्रवर्तनात् । तयोरपि काम्यानुष्ठानकुक्षौ निक्षेपात् तत्करणमपि मोक्षकाक्षिणाऽनवधीयते इति प्राभाकरा. प्रत्यूचिरे । [उत्तरपक्ष. ] ६६ तटेतन्मीमासकमत तावद् दृष्टविरुद्धम्, मीमांसकात्यैर्भाटै प्राभाकरैश्च पृथिव्या- दयोऽर्थाः सत्तादिसामान्यतोऽनुव्यज्यन्ते। तच्च सत्तादिसामान्य सर्वथा नित्य निरवयवमेक व्यापकमिति तैरभिमतम् ; तत्तु प्रत्यक्षविरुद्धमेव, सदृशपरिणामलक्षणस्य सामान्यस्यानित्यस्या- सर्वगतस्य रूपादिवदनेकव्यक्तात्मतयाऽनेकरूपस्यैव प्रत्यक्षतः प्रतीतेः। न हि भिन्नदेशासु व्यक्तिषु सामान्यमेक प्रत्यक्षतः स्थूणादौ वंशादिवत् प्रतीयते; व्यक्तेरुत्पादविनाशेऽपि अनुत्पादम- विनाश वा यतस्तत्प्रत्यक्ष स्यात् । तदिद परोदितस्वरूपं सामान्य प्रत्यक्षवुद्धावात्मान न समर्थयति प्रत्यक्षता च स्वीकर्तुमिच्छतीत्यमूल्यदानक्रयित्वात् सतामुपहासास्पदमेव स्यात् । ६ ७ तथापि यदि याज्ञिका वैयात्यात् तथैवेति विवदन्ते, तर्हि तत्र ब्रूम; एकत्र व्यक्ती सर्वात्मना वर्तमानस्य अन्यत्र वृत्तिर्न स्यात् । तत्र हि वृत्ति तद्देशे गमनात् , पिण्डेन सहोत्पादात्, तद्देशे सद्भावात् अशवत्तया वा स्यात् , न तावद् गमनादन्यत्र पिण्डे तस्य वृत्तिः, निष्क्रियत्वोपगमात्। किं च पूर्वपिण्डपरित्यागेन तत्तत्र गच्छेत् , अपरित्यागेन वा, न तावत् परित्यागेन, प्राक्तन- पिण्डस्य गोत्वपरित्यक्तस्य अगोरूपताप्रसगात् , नाप्यपरित्यागेन, अपरित्यक्तपिण्डस्यास्यान- शरूपादेरिव गमनासभवात् । न ह्यपरित्यक्तपूर्वाधाराणा रूपादीनामाधारान्तरसक्रान्तिदृष्टा । नापि पिण्डे [ न ] सहोत्पादात् , तस्यानित्यतानुषगात् । नापि तद्देशे सत्त्वात् , पिण्डोत्पत्ते. प्राक् तत्र निराधारस्यास्याव्यवस्थानाभावात् , भावे वा स्वाश्रयमात्रवृत्तित्वविरोध. । नाप्यशवत्तया; निरशत्वप्रति- ज्ञानात् । ततो व्यक्त्यन्तरे सामान्यस्याभावानुपगः । ६८. परेषा प्रयोगः-ये यत्र नोत्पन्ना नापि प्रागवस्थायिनो नापि पश्चादन्यतो देशादागत- मन्त. ते तत्रासन्तो, यथा खरोत्तमाझे तद्विषाणम् , तथा च सामान्य तच्छून्यदेशोत्पादवति घटादिके वस्तुनीति । तदुक्तम्- "न याति न च तत्रासीदस्ति पश्चान्न चांशवत् । जहाति पूर्वमाधारमहो व्यसनसंततिः ॥" ] इति ६९. नन्वेष दोषो भेटवादिनामेव न तु मीमासकानाम् , तै सामान्यव्यक्त्योस्तादात्म्या- गीकरणात् । . १ सामान्यम्य इति शेप । २. सामान्यम् । 1 - प्रब- क० ख० । 2 मान स्यात स्यान्य-क०, स० । 3 पिण्डे सहो, क०, ख० ।

४६ सत्यशासन-परीक्षा [१०- - "तादात्म्यमस्य कस्माच्चेत् स्वभावादिति गम्यताम् ।' [ मी० श्लो० आकृति० श्लो० ४७ ] इत्यभिधानादिति चेत् , तेषा व्यक्तिवत्तस्यासाधारणमाधारण रूपत्वानुपंगात् । व्यक्त्युत्पाद- विनागयोश्चास्यापि तद्योगित्वप्रसंगात् । $ १० न सामान्यरूपता वा साधारणरूपत्वम् ; उत्पादविनागयोगित्वं चास्य नाभ्युपगम्यते, तर्हि विरुद्धधर्माध्यासतो व्यक्तिभ्योऽस्य भेद स्यात् । उक्तं च- "तादात्म्यं चेन्मतं जातेद्यक्तिजन्मन्यजातता। नाशोऽनाशश्च केनेष्टस्तहचानन्वयो न किम् ।। व्यक्तिजन्मन्यजाता चेदागता नाश्रयान्तरात । प्रागासीन च तदेशे सा तया संगता कथम् ।। व्यक्तिनाशे न चेन्नष्टा गताव्यक्त्यन्तरं न च । तच्छ्रन्येन स्थिता देशे सा जातिःक्वेति कथ्यताम् ।। व्यक्तर्जात्यादियोगेऽपि यदि जाते से नेप्यते । तादात्म्यं कथमिष्टं स्यादनुपप्लुतचेतसाम् ॥" [ हेतुवि० टी० पृ० ३२] इत्येवमनेकदोषदुष्टत्वात् याज्ञिकानुज्ञातसामान्य खरविपाणबदमदेव स्यात् । $ ११ यत्तु तत्सद्भावसाधनमुक्तं परै. "पिण्डभेदेपु गोवुहिरेकगोत्वनिवन्धना । गवाभास्येकरूपाभ्यामेकगोपिण्डवुद्धिवत ।।" [ मी० श्लो० वन० श्लो० ४४] “न शावलेयाद् गोवुद्धिस्ततोऽन्यालम्बनापि वा तदभावेऽपि सद्भावाद् घटे पार्थिवबुद्धिवत् ।।'' [ मी० श्लो० वन० श्लो० ४ ] इत्यादि; तत्सर्वं सिद्धसाधनम् ; अनुवृत्तप्रत्ययस्य सहशपरिणामलक्षणसामान्यालम्बनत्व- - सिद्धे. । $ १२ न हि वयं बौद्धवत् सामान्यस्यापह्नबोतार ; केवलं परपरिकल्पितसर्वथानित्य- स्वादिविशेषणविशिष्टमेव सामान्य न मृष्यामहे ! सर्वथा नित्यस्यैकस्यानष्टम्य सर्वगतस्य विचार्य- माणस्यासभवात् । $ १३ 'नित्यं सदादि सामान्य प्रत्यभिज्ञायमानत्वात् , गब्दवत्' इति चेत्, न; हेतो विरुद्ध- त्वात् । कथचिन्नित्यस्य इष्टविरुद्धस्य माधनात् । सर्वथा नित्यम्य प्रत्यभिज्ञानायोगात् । तदेवेदमिति- पूर्वोत्तरपर्यायव्यापिनकत्र प्रत्ययस्योपपत्तः, पौर्वापर्यरहितस्यै पूर्वापरप्रत्ययविषयत्वामभवात् । १ जात्यादियोग । २ नैयायिकादिपरिकल्पित । ३. कूटस्थनित्यस्य ! 1 -स्यासाधारणरूप-क० । 2 -दुध्यामतो क०, स०। 3 -जागता ख० 1 4 चावत् क० । 5. -स्यानस्तस्य क० । स्थानगत्य ख० ।

, , -१६ मीमासक-भादृप्राभाकरशासन-परीक्षा $ १४. धर्मावेव पूर्वापरभूतो न धर्मिसामान्यमिति चेत् , कथं तदेवेदमित्यभेदप्रतीतिः, पूर्वापरस्वरूपयोरतीतवर्तमानयो तदित्यतीतपरामर्शिना स्मरणेन इदमिति वर्तमानोल्लेखिना प्रत्यक्षेण च विषयीक्रियमाणयो परस्पर भेदात् । $ १५ सदादिसामान्यादेकस्मात्तयोः कथचिभेदाभेदप्रतिपत्तिरिति चेत् , सिद्धं तस्य कथंचिदनित्यत्वम् , अनित्यस्वधर्माव्यतिरेकात् । न ह्यनित्यादभिन्न नित्यमेव युक्तम् , अनित्य- स्वात्मवत् सर्वथानित्यस्य क्रमयोगपद्याभ्यामर्थक्रिया विरोधाच्च । तदनित्यं सामान्य विशेषादेशात् शब्दवत् । तत एवानेकं तद्वत् । सदित्यादिस्वप्रत्ययाविशेषादेक सत्तादिसामान्यमिति चेत् , न; सर्वथास्वप्रत्ययाविशेषस्या सिद्धत्वात् प्रतिपदादिव्यक्ति सदित्यादिप्रत्ययस्य विशेषात् । तद्व्यक्ति- विषयो विशेषप्रत्यय इति चेत् , तर्हि ता व्यक्तयः सामान्यात् सर्वथा यदि भिन्नाः प्रतिपद्यन्ते, तदा यौगमतप्रवेशो मीमासकस्य, स चायुक्त., तन्मते सबन्धस्य निरस्तत्वात् , तस्येति व्यप- देशानुपपत्ते. । १६ अथ कथंचिदभिन्नाः, तदा सिद्ध सामान्यस्य विशेषप्रत्ययविषयत्वम्, विशेष- प्रत्ययविषयेभ्यो विशेषेभ्य कथचिदभिन्नस्य सामान्यस्य विशेषप्रत्ययविषयतोपपत्ते विशेषस्वात्मवत् । ततो नैकमेव सत्तादिसामान्यम् । नाप्यनगम् ; कथचित् साशत्वप्रतीते ; साशंभ्यो विशेषेभ्योऽनर्था- न्तरभूतस्य सागत्वोपपत्ते तत्स्वात्मवत् । तथा सर्वगत तत् सामान्य व्यक्त्यन्तरालेऽनुपलभ्यमान- स्यात् । तत्राभिव्यक्तत्वात्तस्यानुपलम्भ इति चेत् ; तत एव व्यक्तिस्वात्मनोऽपि तत्रानुपलम्भोऽस्तु । तत्र तस्य सद्भावादेकप्रमाणाभावादसत्त्वादेवानुपलम्भ इति चेत् , सामान्यस्यापि विशेषभावा दसत्त्वा- देवानुपलम्भोऽस्तु, व्यक्त्यन्तराले तस्यापि सद्भावावेदकप्रमाणाभावात्, प्रत्यक्षतस्तथाननुभवात्, खरविषाणादिवत् । न हि भिन्नदेशासु व्यक्तिपु सामान्यमेकम्, यथा स्थूणादिपु वंशादिरिति प्रतीयते, यतो युगपदभिन्न देशस्वाधारवृत्तित्वे सत्येकत्व तस्य सिद्ध्येत् , स्वाधारान्तराले अस्तित्व साधयेदिति तदेवमनेकवाधकसद्भावात् भाषाभाकरैरिष्ट [ भद्र भूयात् ] 3 २ अनित्यस्वात्मवत। भेदात । ३ योगमते । ४ समवायस्य । ] वर्मादेव क., स०। 2 -मर्थविरोवाच क०, ख० । 3 -प स्यासिद्धस्यात् क० 4 विशेषाभाव-क०, १० । 5 युगपद् भिन्न ख० । 6. रन्तरालेऽपि क० ।

खण्डितुंमानिनां मानं मण्डितुं जिनधर्मिणाम् ।
विदुषां प्रीतये भूयाद् विद्यानन्दकृता कृतिः ॥

परिशिष्टानि

क्रम
*
१. सत्यशासन-परीक्षाकी मूल कारिकाओंको अनुक्रमणिका।
२ मूल अन्यमें उद्धत बाक्यॉकी अनुक्रमणिका ।
३ प्रभावना तथा मूलगत विशिष्ट शन्द ।

परिशिष्ट १ पृष्ठ २९ ४३ . २९ ३३ ४३ सत्यशासन-परीक्षाकी मूल कारिकाओकी अनुक्रमणिका कारिका प्राविर्भावच्युतौ सर्वच्युते दृष्टेष्टाभ्या विरुद्धत्वान्न सत्य शाक्यशासनम् दृष्टेष्टाभ्यां विरुद्धत्वान्न न सत्य योगशासनम् दृष्टेष्टेषु दृष्टेष्टविरोधात्सुगतोदित दृष्टेष्टेषु दृष्टेष्टविरोधात्साख्यसम्मत दृष्टेस्विष्टेपु दृष्टेष्टविरोधाद्योगसम्मत न चार्वाकमत सत्यम् न साख्यशासन सत्यम् प्रमाणामावतः सर्वम् ब्रह्माद्वैतमत सत्यम् ब्रह्मविद्याप्रमापायात विकरपामावत सर्वहान विद्यानन्दाधिप स्वामी स्वपराविदिताध्यक्षचार्वाकाणाम् ससर्गहाने सर्वार्थहानेर्योगवच ज्ञानाद्वैत न सत्य स्यात् ३३ १० २९ १ १९ ४३ ५४ परिशिष्ट २ पृष्ठ-संख्या ४४ - ३८ १३ ७ ] ३९ ३४ ३९ उद्धत वाक्य-सूची [अ] अकुर्वन्विहित कर्म अग्निहोत्र त्रयो वेदा अत एवातीन्द्रिय सत्तादीनामिव [प्रश० मा०, पृ० ६९७ ] अद्वैतैकान्तपक्षेऽपि [ आप्तमा० श्लो० २७ ] अर्हत न विनाद्वैतात् [प्राप्तमी० श्लो० २७ ] अन्यत्र नित्यद्रव्यम्य [प्रश० मा०, पृ० १६] अनथिका साधनसाध्यधीश्चेत् [ युक्त्यनु० श्लो० १८] अनिर्वाच्याऽविद्या [ मामती, श्लोक १] अभिप्रायनिवेदनादविसवादनम् [प्रमाण वा० १३] अभेदभेदात्मकमर्थतत्त्वम् [युक्त्यनु० श्लो० अयुतमिद्धानामाधार्याधेयभूताना [प्रश० भा०, पृ० १४] अवाच्यमित्यत्र च वाच्यमावात् [ युक्त्यनु० उलो० २९] अविद्याया अविद्यात्वे [सबन्धवा० श्लो० १८१] अविद्यावान विद्या तम् [सबन्धवा० श्लो० १७९ ] अशरीर वा वसन्त न [ छान्दो० ८1१२११ ] असदकरणादुपादानग्रहणात् [ मारयका. अस्ति हालोचनाज्ञानम् [ मी० श्लो०, प्रत्यक्ष श्लो० १२० [श्रा ] श्रात्मनो वै शरीराणि, श्रात्मा वार इष्टव्य वृहदा० २१४५ ] आधिनत्व चान्यत्र नित्याहव्यभ्य [प्रश० मा०, पृ० १६ ] आहुविधातृप्रत्यक्षम् [इ ] इन्द्रजालादिषु भ्रान्तम् [ न्यायविनि० ११५२ ] [3] उत्क्षेपणापक्षेपणाकुचन [प्रम० मा०, पृ० ११] उपाठानकारणमहश हि [3] ऊर्ध्वमृलमध शाखम् [ भगवद्गीता १५:१] [ए] एक एव तु भूतात्मा [अमृतवि० उप०, प० १२, पृ० १५ ] एकमेवाद्वितीय ब्रह्म [ छान्दो ६।११ ] एकरूपतया तु य ३ ३५ २ ३४ ar MY -- परिशिष्ट २ ५३ एकसविटि विमाति भेदधी एकस्यानेकवृत्तिर्न [क] कर्मद्वैत फलद्वैतम् कार्यभ्रान्तेरणुभ्रान्ति कुर्वन्नात्मस्वरूपन [ आप्तमी० श्लो० २५] [ आप्तमी० श्लो० ६८] ३८ MY ३४ २ २० [ मौन्दर० २१ ३४ १८ १६ ४६ ९ [ग] गुणा: रूपरसगन्धस्पर्श- [ प्रश० मा०, पृ० १०] गुणादीना पञ्चानामपि [ प्रश० भा०, पृ० १६] [ज ] जन्माद्यस्य ग्रन [ ब्रह्मसू० ११० ] जातिक्रियागुणद्रव्यसना जावस्तथा निर्वृतिमभ्युपेत १६॥२९ ] [त] तर्कोऽप्रतिष्ट श्रुतयो विमिन्ना. [ महाभारत ] तत्र व्याणि पृथिव्यप्तेजो [प्रगमा०, पृ० ८] तदहजस्तनेहातो तस्य हि हेतुर्वाच्यो तादात्म्यमस्य कस्माच्चेत् [ मी० श्लो०, आकृति० श्लो० ४७ ] तादात्म्य चेन्मत जाति [ हेतुवि० पृ० ३२ ] त्वत्पक्षे बहुकल्प्य स्यात [सवन्धवा०, उलो० १८२] [द] दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेत १६११८] दृष्टे विशिष्टे जननादिहेतो [ युक्त्यनु० श्लो० ३६] दु सजन्मप्रवृत्तिदोष- [ न्यायसू० ११०२ ] द्रव्यगुणकर्मसामान्य- [प्रश० भा०, पृ० ६] द्रव्यादीना पञ्चानामपि [प्रश० भा०, पृ. १६] द्रव्य गुण क्रियाजाति- [ न ] न याति न च नत्रामीत् न शावलेयाद्गोबुद्धि [ मी० श्लो०, वन० श्लो० ४] नाननुकृतान्वयव्यतिरक कारणम् नावनिन सलिल न पावको नाविद्यास्यत्यविद्यायाम् [ सवन्धवा०, उलो० १७६ ] नामुक्त क्षीयते कर्म नित्यगव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेपा निर्विशेप न सामान्यम् [मी० श्लो०, श्राकृति०, इलो० १० न्यायार्जितधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठो [ सौन्दर० २१ ३४ ३४ ४४ ४५ का ४ ५४ सत्यशासन-परीक्षा ३१ ६ ४६ - २३ ४२ [प] पञ्चविंशतितत्वज्ञो पयोवरभरालमा स्मरविघूर्णिता क्षणा पिण्डभेटेपु गोबुद्धि [ मी० श्लो०, वन०, श्लो० ४४ ] प्रकृतेमहास्ततोऽहकार [ सांख्यका० २२ ] प्रतिधगौणकल्पनशुद्धपदानेऊसमतिजिनाक्त प्रत्यक्ष करपनापोडमभ्रान्तम् [ न्यायवि० 910 ] प्रत्यक्षबुद्धि क्रमते न यत्र [ युक्त्यनु० श्लो० २ २] प्रत्यक्षेण प्रतीतेऽथें यदि पर्यनुयुज्यते- प्रदीपनिर्वाणकरपमात्मनिर्वाणम् प्रमाणप्रमेयमशयप्रयोजनदृष्टान्त- [ न्यायसू० 11१1१] [व] बुद्धयध्यवसितमर्थ पुरुषश्चेनयते ब्रह्मण्यविदिते बाधात [ मबन्धवा० इलो० ५७८ ] ब्रह्मविद्यावदिष्ट चेत [मबन्धवा० श्लो० १७५ ] [भ] भुनीत विपयान् कैश्चित् [ म] मद्याङ्गवद्भुनसमागमे ज्ञ [युक्त्यनु० श्लो० ३. मृलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्या [ सास्यका० ३ ] मोक्षाथी न प्रवर्तत [ मी० श्लोक०, सवन्ध०, श्लो० ११० [य] यतोऽनुभवतोऽविद्या [ सम्वन्धवा० इलो०६७७ ] यमिदान्वयप्रकरणसिद्धि [ न्यायसू० ११११३० ] यथा यत्राविसवाद [मिद्धिवि० श्लो० १११९] यथैक मिन्नदेशान् [लवी. उलो० ३७] यदि मत्सर्वथा कार्यम् [आप्तमी० श्लो० ३९] यद्यसत्सर्वथा कार्यम् [ आप्तमी. उलो. ४२] यस्मिन् रज्जुमुजङ्गवन्त्रिभुवनम् यावज्जीवेन्सुस जीवंत यावज्जीवमह मौनी युक्त्या ग्रन्न घटामुपमि युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिमनसो लिङ्गम् [ ल] लुक्सस्म लुक्खेन दुवाहिएण [व] वस्तुनाऽन्यत्र मानानाम् [ मवन्धवा० उलो० १८०] विपदर्शनयमबमजन्य सिद्धिवि० इलो० ११०४] ] १८ ४५ ४१ २ (U ३ २ २३ परिशिष्ट २ ५५ ४६ ४६ वा० २६ २ 0Y ३० व्यक्तर्जात्यादियोगेऽपि [ हेतुवि० टी०, पृ० ३२] व्यक्तिजन्मन्यजाता चेदागता [ हेतुबि० टी०, पृ० ३२] व्यक्तिनागेन चेन्नष्टा [ हेतुवि० टी०, पृ० ३२] [श] शुक्ती वा रजताकारो । प्र० १४. ] श्रोतव्य श्रुतिवाक्येभ्यो [प] पण्णामपि पदार्थाना साधम्र्य- [प्रशस्त-मा०, पृ० १६] [स] ससर्ग सुखदु खे च तथार्थेन्द्रियबुद्धय सत्त्व लघुप्रकाशकमिष्टम् [ साख्यका० १३ ] सर्वथैकरूपत्वात् कूटस्थस्य सर्व वै खल्विद ब्रह्म [ मैन्यु० ४।६] सर्वे प्रत्यया निरालम्बना प्रत्ययत्वात [ प्रमाणवार्तिकाल०, पृ० ३५९ ] सामान्य द्विविधम् [प्रश० भा०, पृ० ११ ] सुगतो यदि सर्वज्ञ कपिलो नेति [ तत्वस०, श्लो० ३१४] स्त्रीमुद्रा अपकतनस्य महती [शृङ्गार० श्लो० ७९] स्वच्छन्दवृत्तेर्जगत स्वभावात् [युक्त्यनु० श्लो० ० ३७ ] स्वरूपस्य स्वतो गति [ प्र० वा. ११५ स्वामिधानविशेषापेक्षया [ ह] हेतोरद्वैतसिन्तिश्चेत [ आप्तमी० श्लो० २६ ] [] क्षणादूध्वं न तिष्ठन्ति [] ज्ञान ज्ञानान्तरवेद्यम् १३ २३ ५ २० AY परिशिष्ट ३ प्रस्तावना तथा मृलग्रन्थगत विशिष्ट गन्द* प्रस्तावनागत विशिष्ट शब्द 1 [छ] जैमिनि २८१२९ १ [अ] कुमारिल २६.१०, २८१३०,३२, २९१३, १७ अकलक १६६३५, १७११२,१९।२८,३३, २०११ २०१८, ९, ३, ११, १२, १७, २२, २६, २८, २११९, [ग] २८१३१,०९।२, ४७११, १२,१४,१६, गृढपिच्छाचार्य २८०६ २१,२३, २९, ३०1३७, ३२।१६, १९, [च] पक्षपाद २८॥२९ चन्द्रनाथ ३११११ अर्चट २७११७ अध्यात्म परीक्षा ३१३३ अमृतविन्दु उपनिषद् २३१८. ९ छान्दोग्योपनिषद् ०२।१७, १८ अश्वघोष २५।१६ [ज] अष्टाती १७/१२ १३, ३०1१७ अष्टसती ३२।१७, १९ २२, [न] अष्टसहस्त्री ३२११५, १७, १८, १९, २०, २६, २०,३०, नत्वमग्रह २०१३, ४, तत्वार्थवृत्ति ११३६ [आ] तत्वार्थवार्तिक १६३३५ श्राप्तमीमामा १७१११, १२, १३ १४, १५,२१, तत्त्वार्थसूत्र १६:३०, ३३,३५,३६ १२६, २, १८1८,१६, २२, ३२११५, १७, २२, ૩રાર थारा २११० तत्त्वार्थरलोकवार्तिक १८ २०१५ ३२१३ ४, ७ मालम्बनपरीक्षा २००६ त्रिकालपरीक्षा ३६ [उ] [ द] उमास्वाति १६१३३, १७११, २८॥२६ २९।१,६, देवागमालङ्कार ३२११५ ३018 देवागमस्तोत्र ३०1१५ उद्योतकर २४॥३, ३०६, ३२ दरवारीलाल कोठिया ३०१५ [क] दिग्नाग २८१२७ कणाद २८२९,३०1११ कुन्दकुन्द २९४३ [ध] कुन्थुमागर ३१० धर्मकीति ३० १९०८ २६॥३४, २७१२९, ३०, कुमारिल ३२२३ ८, २८।२८, ३०३२, २०१३, १७,३०११५ कुम्मडवाड ३१११३ कुमारमेन ३११ * प्रथम अक पृष्ठ तथा दूमरा अक पक्तिका बोधक है। t वर्मकीति ३१४, ८ वर्मोत्तर ३०1१६ परिशिष्ट ३ ५७ . माणिकचन्द्र ३२११२ मीमासा-श्लोकवार्तिक २६।९, १०, १३, १६, २८१३१, ३२।३ मूडबिद्री १।२१, ३१ मैन्युपनिषद् २२।२४, २५ [य] यशस्तिलक २११११, १२, १८, २७, ३४, २२।१० यशोधर २१११२ यशोविजय ३२॥३१ युक्त्यनुशासन १८१२६, २७, २९, ३०, १९४१, ५, १३, २२ युक्त्यनुशासनालङ्कार १८॥२९, ३२।३२, ३३ [र] राचमल्ल ३१११६ । रामचन्द्र नाथारङ्ग ३२।११ . [न] न्यायकुमुदचन्द्र २०१३ न्यायवार्तिक २४१३१ न्यायवार्तिक ३०१५ न्यायविन्दु २७।९, १०, ११, २४१३१,३०४ न्यायविनिश्चय १९।२७, २८, २०११ न्यायविनिश्चयविवरण ५९।३०, ३०.२५ न्यायसूत्र २४१२९, ३०,३३,३०१४ नाथारङ्ग गान्धी ३१२८ नीतिशतक २५।३३ [प] प्रमाण-परीक्षा ३१२७,३० पत्र-परीक्षा ३३० पार्श्वनाथचरित ३०१२५ पूज्यपाद १६।३५ प्रज्ञाकरगुप्त २७।३०, ३१ प्रमाचन्द्र २०११३ प्रभाकर ३०1८,९ प्रमाणवातिक १९।२८, २६।३३, ३४, ३५, २७।३, ७, २८१३०, ३२१४ प्रमाणवार्तिकालकार २७।२८, २९ प्रशस्तपाद २५/२७, २८१२९ प्रशस्नपादमाग्य २५/२६, २७१२८, ३०, ३०३० प्रमाकरशासन ५९, १० [व] बादरायण २३१३२, ३३ ब्रह्मसूत्र २३।२९, ३०, ३१ बृहस्पति १०१९ ब्रह्ममिति २८११०, ११ [भ] भगवद्गीता २३१२३, २४ भर्तृहरि २२।९ [ म] मण्डनमिश्र २८।११,३०११७, २० महेन्द्रकुमार १९।३०, २०१२३, २११६, ३०३६ महामारत २३३१४, १५, २४ ८ [ल] लघीयस्त्रय २०11०, ११, १३, १५ लघुसमन्तभद्र ३२।३० [व] वाग्देवसूरि ३०१२५ वात्स्यायन २४।३१, २८।२९, ३०१४ वाचस्पति ३०३२, २३ वादिदेव ३०।२६ विजयादित्य ३१११६ वीरनाथ ३१२१ व्योमवती २५/२८ व्योमशिवाचार्य २५/२८, ३०।१२, १३ बृहदारण्यक २३११,२ वैराग्यशतक २५/३३ [] शृङ्गारशतक २२।९, २५/३२,३३,२६।१ श्रवणबेलगोला ३१.१० श्रीपुरुष ३११९, १४ श्रुतसागर सूरि १६३५ श्लोकवार्तिक ३०१७ शिवमार ३१1८, ९, १३, १६, १७ शकराचार्य ३०११९ सत्यशासन-परीक्षा [स] स्वोपन माप्य १०३५ सत्यशासन-परीक्षा ४१४, १९, २५, ५.१५, १८, २२,३४, ३५ सम्बन्ध-परीक्षा १२७ समन्तमद्र १७११२, १८२७, २८१२७, २९११, ६, ३०1१५,३२१२०, ३२ सर्वार्थ सिद्धि १६६३५ सम्बन्धवार्तिक २८1१३, १४ यांख्यकारिका २४१३, ४,६ सिदिविनिश्चय २०१२१, २२, २३, २५, २६, २१११ सिद्धसेन २८२७, ०६२, ६ सुरेश्वर मिश्र २८११४ सूरेश्वर ३०1१९, २०, २२ सोमदेव सूरि २१११२, १५, १६, २०११३, १४ सौन्दरनन्द २५/१५, १६, १८ [ह] हेतुविन्दु टीका २७११६, १७ -- मूलग्रन्थगत विशिष्ट शब्द अव्याप्ति १११७ अवनि १११०० [अ] अक्लंक देव ३११९, ९।११,२६१६ अग्निहोत्र १२५ अतिप्रसग ५/१०, २३११९, ३७११५ अतिव्याप्ति १३१७ अवयव ४४ श्रद्वय ५१ अवाच्य २७११०, ११, १२, १३ १५.१८ थविद्या २११०, ११,२०, २०, ८१३, ४, ६, ७, १३, १४, १८, २२, २४, २५, २७, ९/१,७, ७, ८, ९, ११, १३, १४, १५, १७, १८, १९, २०, २३, २४, २५, २०/१६, २१११, २, ९ अद्वैत ७।२, ३, ७, ९, ११, १२, १४, २७, १०1४, - असमव १११७ १०११ अद्वैतमिद्धि ३, ६, १८, ६२,३ अधिकरणसिद्धान्त न्याय ४१/१८, १९ यनल १६।१५ अन्तर्व्यायाम २०१५, ७ अनन्यवेद्यत्व १२१५, ६ अनिर्वाच्य ८९, १३ अनुमान १११६,४०६,६५, १२१६,८,१२,१५, १३।१०, १७, १८२६, १९६१०, २३1८, ३८१२०, ३९.१९, २०, ४११९ अनेकान्त १११२, १९, ५१1१०, २५/२०, ३७।१४ अनेकान्तशासन १११० अनेक सम्मति १७११६ अपह्नव १४१११ अम्युपगम २११११,३५।१०, ३२१२६, ३७१२६, ३८1१७ अभ्रान्न ७१२,५,६,२११२३,०४,२७१९ श्रयम्कान्त १५ श्रहंत ३७१२० शव्यक्त ३११ अश्वत्थ ५.२३ अहेतुवाट १९६३ [आ] श्रागम ४।१४, ५१९, २१, २६, ६२, ५, १५१८, १८।२६, २३३८, २८1१४,३३११४, २१, ३९॥ २७, ४३१३,८ आजीवस्थिति २११५, ७ आप्त १५1१७ आप्तप्रणीत १७१२९ थाम्नाय ६३ आहेत २७1८ [ई] ईश्वरप्रणिधान ४२११५ [3] उपादान १६१११,१२,१४,००1११ उपादेय १६१११,१०,१४,००1११,२९।१ पाय २९११ - परिशिष्ट ३ ५६ तर्क ४२१४ [ए] एकान्त 91१२,२०,६।३,७१९ [ औ] औलुक्य ३५।२४,४३५ [क] कपिल १५/५,३११७,८,१२ कर्म ३४१५ कापालिक १६२ कापिल ३३३३ क्रिया २२१२१,४४७ कूटस्थ २७१२७ कुम्भकार ३.१७ [ख] सरविपाण ८१२,४६।११,४७११९ [ग] ताथागत २४॥२३,२७१२० ताकिक ४२२६,४३१५ [द] द्रव्य २२।२१,३४१५,८,४४७,९ दृष्टान्त ६.१७,४२१४ दृष्टादृप्टार्थ प्रपञ्च ९२ द्वैताद्वैत १।११,१३ द्वैतप्रपञ्च ६२ द्वैतसिद्धि ५।२८,६।२३,७।११ [न] नर्तकी १६३,७ निर्णय ४२१४ निर्वाधलक्षण १७११७ निग्रह ४२१५ निविकल्पक २०१५,९,२८1१८ निरास्रव २९१९ निरीश्वर साख्य ३०२४,३२११६ निरीश्वरशासन १।१० नि श्रेयस ४२१५,४२१२४,४४।१३ नैयायिक ४२२३,४३.१,६,१३ नेयायिक-शासन १1१०,४२११ [प] प्रत्यवाय ४४।१८,४३,' प्रत्यक्ष १1१६ प्रतिपाद्य १४७ प्रतिपादक १४७ प्रतिमास १२,१३,१४,१६,१७,६।१७,१८,१११५, गगन १११२० M गन्ध २०१३ गौणकल्पन १७१६ गुण २२१२१,३४१५,४४१७ [च] चन्द्रकान्त १६९,१४,१५ चन्द्रमरीचिजाल ७।२५ चार्वाक १६:११,१७११०,१९।१४,१६,१८ चार्वाक-गासन १,१५११,३ चित्राद्वैत-शासन ११९,१४,१२,१३,२१ [छ] छल ४२१५ [ज] जल्प ४२१४ जल १६११५ जलयुद्गल विचार ७१२६ जाति २२१२१,०२,२३,४२।५,४४७ [ड] प्रतिषेध १७११६ प्रत्यभिज्ञान १८७ प्रमा १११५ प्रमाण ४२१४ डिण्डिम १६८ प्रमय ४२१४ प्रपञ्चाध्यवसाय २१९ प्रयोजन ४२।४ [त] तत्त्वापप्लव ७/१८,८१६ तत्त्वोपप्लव-शासन१।१० तत्वज्ञान ४२१५ प्रशस्तपाद ३६.२८ पजशिसी १६२ ६० सत्यशासन-परीक्षा पन्था १५/१३ परमाणु २५११,२,३ परमार्थ २७१४,९ परिमापा २२१२१ [ल] लोकायतिक १७७ [व] व्यवच्छेद्य हा व्यवच्छेदक ६२ पवन १८ वाद ४२।३ प्रामाकर ४४४६,४५१६,८,४७२१ पाखण्डी १६८ बायु ११६ पावक ११/२० पाशुपत ३४७ पुरुषाद्वैन १०२ पुरुषातशासन १।९, ५/१६, ४, ६, १० [व] ब्रह्माद्वैत ९२२५, २४१ ब्रह्मम्मिद्धि ४।१५,०७, ७०४, १२।८ वाटरायण १७ बार्हस्पत्य १६०६ बृहस्पति ११५,०६, १८1१",", २८ बोद २८1१४, १५, २९", ४६०६ बौदागम २८११३ बोढगासन १९ २०११ [भ] माट्ट ४१३, ४४, ४७१२१ माहगापन १1१०, ४४११ मावामाव १1११,१३ विजातीय २०१४,१३ वितण्डा ४३ विन्ध्य १६ विद्या ९५८, ९, १०, १३, १७ विगेप ३४१६ विज्ञानस्वन्ध २०१५ वेदनान्कन्ध २०१४ वैशेषिक ३१३,३९।११,१७,४१६३०,४२१३,४३११६ वैगेषिकगासन १.५०,३४१, ४११३१ [] दाढत ५०1१,२ शब्दानगासन ११९ शाक्यशामन २७।३९, २९१७ शुद्वपद ११६ शव ३७ शौद्धोदनिशासन २८1१० [स] भ्रान्तन्त्र २१३ ३३२ स्पर्श ००३ १ [म] मरत १५०० मीमासक ४४.१, ३, ४०८, ३०, ८७११० मुनाफल १६५१० [य] युक्त्यनुशासन २७११९ योग ०९:५९, ४३१७,९, २७।१० योगागन ४३ योगगासन ४२१११ [र] रम २०१३ स्याहाट १२०, ५९/१०, १९, २३११०,८1१४, १९ २०२८,३०,३१,३६,०७३, २९/८, ३३०७,४३१० सारय ३०३,३२१२९,३३११२, १८,३३१२०, २२ मारयगासन ५॥१०.३०३,३,३१२, १८, २४ मजातीय २018 सत्यगासन ११३, २, १५ सम्यक्त्व ", ६ समन्तभद्र ७१७,२३१११,३९।११ समवाय ३८६,३३-८,९,१०.१२,१८,१६, १७, १८,२६,३७११, ३, ७, ९, १०, २०, २७ ३८1१, ६, ७, ८,९,१०, १२, १३, १४, १",२०,२३, २४, ३९.८, ९, ५३, १४८ प २०१३ -

परिशिष्ट ३
६१
समाधि २१८
सविकल्पक २०१४, ९
मलिल १११२०
सह्य ५.५६
साधर्म्य ३४१६
सामान्य ३४१५
सामीप्य ४२१८, १३
सायुज्य ४२१९, २४
सारूप्य ४८, १३
सालोक्य ४२१८, १०
सिद्धान्त ४२१४
सुगत १५/४, ५, २९॥३
सूर्यकान्त १६।१५
सेश्वरसाख्य ३०१२५, ३२११६
सेश्वरशासन १९
सौगत २१११८, २३११०, २८१२७, २९।१
सस्कारस्कन्ध २०1१०
संशय ४२१४
[हा
हेत्वाभास ४२१५
हेतु ६।१७
हेतुवाद १९९३
हेय २९१

सहायक ग्रन्थ सूची आप्तमीमामा छान्दोग्योपनिषद् तत्त्वसग्रह न्यायबिन्दु न्यायविनिश्चय न्यायसूत्र प्रमाणवार्तिक प्रमाणवार्तिकलकार वोरसेवामन्दिर, मरमावा निर्णयमागर, बम्बई ओरियण्टल सीरीज बडोदा का० जायसवाल सीरीज, पटना भारतीय ज्ञानपीठ, काशी चौखम्बा सोरोज, कागो विहार उडीसा रिसर्च सो०, पटना का० जायसवाल इस्टीटय ट, पटना चौखम्बा मीरीज, काशी प्रशस्तपादमाप्य ब्रह्मसूत्र भगवद्गीता मीमासाश्लोकवातिक मैत्रायण्युपनिषद् यशस्तिलक उत्तरार्ध आनन्दाश्रम, पूना चौखम्बा मीरीज, काशी वम्बई निर्णय सागर, " युक्त्यनुगासन लघीयस्त्रय माणिकचन्द्र ग्रन्थमाला, बम्बई सिन्धी-जैन सीरीज, भारतीय विद्याभवन, बम्बई निर्णय मागर, बम्बई निर्णयसागर, वम्बई, बृहदारण्यक शृङ्गारशतक सम्बन्धवातिक मारयकारिका मिदिविनिश्चय सौन्दरनन्द महाकाव्य हेतुविन्दुर्टीका चौखम्बा सीरीज, कागी भारतीय ज्ञानपीठ, कागी रॉयल एशियाटिक मोमाइटी ऑव वेंगाल, कलकत्ता ओरियण्टल नीरीज, वडोदा .

BHARATIYA JÑĀNAPĪTHA MŪRTIDEVI JAINA GRANTHAMĀLĀ General Editors , Dr HL JAIN, Jabalpur Dr AN UPADHYE, Kolhapur. The Bhāratīya jñānapītba, is an Academy of Letters for the advancement of Indological Learning In pursuance of one of its objects to bring out the forgotten, rare unpublished works of knowledge, the following works are critically or authentically edited by learned scholars who have, in most of the cases, equipped them with learned Introductions etc and published by the Jñānapitha Mahābandha or the Mahādhavala : This is the 6th Khanda of the great Siddhānta work Şatichandāgama of Bhūtabalı : The subject matter of this work is of a highly technical nature which could be interesting only to those adepts in Jaina Philosophy who desire to probe into the minutest details of the Karma Siddhānta The entire work is published in 7 volumes The Prākrit Text which is based on a single Ms is edited along with the Hindi Translation Vol 1 is edited by Pt SC DIWAKAR and Vols 2 to 7 by Pt PHOOLACHANDRA Jñānapītha Mūrtidevī Jaina Granthamālā, Prākrit Grantha Nos 1, 4 to 9 Super Royal Vol I. pp 20+80 +350 ; Vol II PP 4+40+440; Vol III pp 10+496; Vol IV: pp 16+428 ; Vol V. pp 4+460, Vol VI. PP 22 +370, Vol VII pp 8+320 Bhāratīya Jñānapītha Kashi, 1947 to 1958. Price Rs 11/- for each vol Karalakkhana : This is a small Prākrit Grantha dealing with palmistry just in 61 gātbās The Text is edited along with a Sanskrit Chāyā and Hindi Translation by Prof PK MODI Jñānapītha Mūrtidevī Jaina Granthamālā, Prākrit Grantha No 2 Third edition, Crown PP 48 Bhāratīya Jnānapītha Kashi, 1964 Price 75 nP.

( 2 ) Madanaparājaya : An allegorical Sanskrit Campū by Nāgadeva (of the Samvat 14th century or so) depicting the subjugation of Cup.d Edited critically by Pt RAJKUMAR JAIN with Hindi Introduction, Translation etc, Jñānapītha Wūrtidevī Jaina Granthamalā, Sanskrit Grantha No 1 Second edition Super Royal pp 14 +58 +144 Bhāratīya Jñanapītha Kashi, 1964 Price Rs 81- Kannada Prāntiya Tādapatriya Grantha-sūcī: A descriptive catalogue of Palmleaf Mss in the Jaina Bbandāras of Moodbidri, Karhal, Aliyoor etc Edited with a Hindi Introduction etc by Pt K BAUJABALI SHASTRI Jñānapītbn Mürt,devī Jaida Granthamala, Sanskrit Grantha No 2 Super Royal pp 32 + 324 Bbāratīya Jñānapītha Kasbi, 1948 Price Rs 131- Tattvārtha-vrtti This is a critical edition of the evhaustive Sapskrit commentary of Śrutasāgnra (c. 16th century Vihrama Samsat) on the Tattvärthasūtra of Umāsvāti which is a systematic exposition in Sūtros of the fundamentals of Jainism The Sanskrit commentary is based on earlier commentaries and is quite elaborate and thorough Edited by Pis MAHENDRAKUMAR and UDAYACHANDRA JAIN Prof VAHEXDKA- KUMAR has added a learned Hindi Introduction on the exposition of the important topics of Jainism The edition contains a Hindi Translation and important Appendices of referential value Jñānapitha Mūrtidevī Jaina Granthomālā, Sanskrit Grantha No 4 Super Royal pp 108 + 548 Bhāratīya Jñānapītha Kashi, 1949, Price Rs 16/- Ratna-Manjūşā with Bhāşya : An anonymous treatise on Sanskrit prosody Edited with a critical Introduction and Notes by Prof HD VELANKAR Jñānapitha Mūrtijevi Jaina Granthamāla, Sapskrit Grantha No 5 Super Royal PP 8 +4+72 Bhāratīya Jñānapītha Kasbi, 1949 Price Rs 21- Nyāyaviniscaya-vivarana : The Nyāyayınıścaya of Ahalaika (about 8th century AD) with an elaborate Sanskrit commentary of Vādırāja (c 11th century A. D) is a repository of traditional knowledge of Indian Nyāya in general and of Jaina Nyāya in particular Edited with Appendices etc by Pt MAHENDRAKUMAR JAIN. Jūānapitha Mūrtides i Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha Nos 3 and 12. Super Royal Vol I. pp 68 +546, Vol II: pp 66+468 Bhāratiya Jñānapīțha Kasbi, 1949 and 1954, Price Rs. 15/- each ( 3 ) Kevalajñāna-praśna.cūdāmani : A treatise on astrology etc Edited with Hindi Translation, Introduction, Appendices, Comparative Notes etc by Pt NEMICHANDRA JAIN Jñānapitha Mūrtidevi Jajna Granthamālā, Sanskrit Grantha No 7 Super Royal pp 16+128 Bhāratiya Jñānapītha Kashi, 1950. Price Rs 41- Namamāla : This is an authentic edition of the Nāmamālā, a concise Sanskrit Lexicon of Dhanamjaya (c 8th century AD) with an unpublished Sanskrit commentary of Amarakīrtı (c 15th century A.D) The Editor has added almost a critical Sanskrit commentary in the form of his learned and intelligent foot-notes Edited by Pt SHAMBHUNATH TRIPATHI, with a Foreword by Dr PL VAIDYA and a Hindi Prastāvanā by Pt MAHENDRAKUMAR The Appendix gives Anekārtha nighantu and Elākşarī-kośa jñānapītha Mūrtidevī Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 6 Super Royal pp 16+140 Bhäratīya Jñānapitha Kashi, 1950 Price Rs 3.50 nP Samayasāra : An authoritative work of Kunda kunda on Jaina spiritualism Prākrit Text, Sanskrit Chāyā Edited with an Introduction, Translation and Commentary in English by Prof A CHAKRAVARTI The Introduction is a masterly dissertation and brings out the essential features of the Indian and Western thought on the all-important topic of the Self Jñānapītha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, English Grantha No 1 Super Royal PP 10 +162 +244 Bhāratiya Jñānapītha Kashi, 1950 Price Rs 81- . Jātakatthakathā This is the first Devanāgarī edition of the Pāli jātaka Tales which are & store-house of infoi mation on the cultural and social aspects of ancient India Edited by Bhikshu DHARMARAKSHITA Jñānapītha Mürtidevī Pāli Granthamālā No 1, Vol 1 Super Royal pp 16+384 Bhāiatīya Jñāyapitha Kashı, 1951 Price Rs 9/- 1 Kural or Thirukkural: An ancient Tamil Poem of Thevar It preaches the principles of Truth and Non-violence The Tamil Text and the commentary of Kavırājapandita Edited by Prof A CHAKRAVARTI with a learned Introduction in English Bhāratīya Jñānapitha Tamil Series No 1. Demy pp 8+36 + 440 Bhāratîya Jñānapītha Kashi, 1951 Price Rs 5- (4) Mahāpurāna :. It is an important Sanskrit work of Jinasena-Gunabhadra, full of encyclopædic information about the 63 great personalities of Jainism and about Jain lore in general and composed in a literary style. Jinasena (837 AD) is an outstanding scholar, poet and teacher ; and he occupies a unique place in Sanskrit Literature This work was completed by his pupil Gunabhadra Critically edited with Hindi Translation, Introduction, Verse Index etc by Pt PANNALAL JAIN Jñānapīțba Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha Nos 8,9 and 14 Super Royal Vol I Second edition, pp 8 +68+746 Varanası 1963; Vol II : Pp 8 +556, Vol III . pp 8+16+640; Bhāratīya Jñānapīķha Kashi, 1951 to 1954 Price Rs 10%. each Vasunandi Śrāvakācāra : A Prākrit Text of Vasunandı (c Samyat first bolf of 12th century) in 546 gātbās dealing with the duties of a householder, critically edited along with a Hindi Translation by Pt HIRALAL JAIN The Introduction deals with a number of important topics about the author and the pattern and the sources of the contents of this Srāvahācāra There is a table of contents There are some Appendices giving important explanations, extracts about Pratisthāvidbāna, Sallekhanã and Vratas There are 2 Indices giving the Präkrit roots and words with their Sanskrit equivalents and an Index of the gāthās as well Jñānapīțha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Prakrit Grantha No 3 Super Royal pp 230 Bhāratiya Jñānopītha Kashi, 1952. Price Rs 51-. Tattyārthavārtukam or Rājayārttıkam : This is an important commentary composed by the great logician Akalanka on the Tattvārthasūtra of Umāsvātı The text of the commentary is critically edited giving variant readings from different Mss by Prof. MAHENDRAKUMAR JAIN Jñānapītha Mūrtidevī Granthamālā, Sanskrit Grantha Nos. 10 and 20 Super Royal Vol I. pp 16+ 430, Vol II. PP 18+436 Bhāratiya Jñānapitha Kashı, 1953 and 1957 Price Rs 12|- for each Vol Jinasahasranāma : It has the Syopajña commentary of Pandita Aśādhara (V. S, 13th century) In this edition brought out by Pt HIRALAL & Dumber of texts of the type of Jinasahasranāma composed by Aśādhara, Jinasena, Sakalakirti and Hemacandra are given Āsādhara's text is accompanied by Hindi Translation Śrutasāgara's commentary of the same is also There is a Hindi Introduction giving information about Asadbara etc There are some useful Indices jñānapīțba Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantba No 11 Super Royal pp 288 Bharatiya Jñāpapītha Kashi, 1954 Price Rs 41- given here ( 5 ) Purānasāra-Samgraha : This is a Puiāna in Sanskrit by Damanandı giving in a nutshell the lives of Tartbaṁkaras and other great persons The Sanskrit test is edited with a Hindi Translation and a short Introduction by GC JAIN Jõānapitha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha Nos 15 and 16 Crown Part I pp 20+198 ; Part II. pp 16+206 Bhāratiya Jñānapītha Kashi, 1954, 1955 Price Rs 21- each Saryārtha-Siddhi; The Sarvārtha-Siddhi of Pūjya pāda is a lucid commentary on the Tattvārthasūtra of Umāsvātı called here by the name Gțdhrapiccha It is edited here by Pt PHOOLACHANDRA with a Hindi Translation, Introduction, a table of contents and three Appendices giving the Sūtras, quotations in the commentary and a list of technical terms Jñānapītha Mūrtidevi Jajna Granthamālā, Sanshrit Grantha No. 13. Double Crown pp 116 +506 Bhāratīya Jñānapītha Kashi, 1955 Price Rs 121- Jainendra Mahāvrtti: This is an exhaustive commentary of Abhayanandi on the Jainendra Vyakarana, a Sanskrit Grammar of Devanandi alias Pūjyapāda of circa 5th-6th century A. D Edited by Pts S N TRIPATHI and M CHATURVEDI There are a Bhūmikā by Dr Y S AGRAWALA, Devanandıkā Jaunendra Vyakarana by PREMI and Khilapātha by MIMĀNSAKA and some useful Indices at the end jñānapitha Mürtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 17 Super Royal pp. 56+506. Bhāratīya Jñānapītha Kashi, 1956 Price Rs 15/- Vratatithi Nirnaya : The Sanskrit Text of Sinhanandi edited with a Hindi Translation and detailed exposition and also an exhaustive Introduction dealing with various Vratas and rituals by Pt NEMICHANDRA SHASTRI Jñānapītha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 19 Crown pp 80+200 Bhāratīya Jñānapītha Kasbi, 1956 Price Rs 31- 1 1 Pauma-cariu : An Apabhramsa work of the great poet Svayambhū (677 A D) It deals with the story of Rāmi The Apabbramśa text up to 56th Sandhi with Hindi Translation and Introduction of Dr DEVENDRAKUMAR JAIN, is published in 3 Volumes Jñānapītha Mūrtidevi Jaina Granthamāla, Apabhramśa Grantha Nos 1, 2 & 3 Crown size, Vol I PP 28+333; Vol II pp 12 +377, Vol III PP 6 +253 Bhāratiya Jñānapītha Kashi, 1957, 1958 Price Rs 3/- for each Vol (6) is Jivamdhara-Campū : This an elaborate prose Romance by Ilaricandra written Kavya stylc clcaling with the story of Jivamdhari and his romantic adventures. It has both the features of a folk-tale and a religious romance and is intended to serve also ns a medum of preaching the doctrines of Jainism The Sunshrit Text is cdited by PL. PANNALAL JAIN along with his Sanskrit Commentary, Hindi Translation and Prastāvanā There is a Foreword by Prof K K HANDIQUI and detailed English Introduction covering important aspects of Jivamubara tale by Drs. A N UPADHYC and HL JAIN Jñānapitha Mūrtidesi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 18 Super Royal pp 4+24 +20+344. Bharatiya Jñānapītha Kashi, 1958 Price Rs 81-, Padma-purāna: This is an elaborate Purāna composed by Ravisena (V S. 734) in stylistic Sanskrit dealing with the Rāma tale It is edited by Pt PANNALAL JAIN with Hindi Translation, Table of contents, Index of verses and Introduction in Hindi dealing with the author and some aspects of this Purāņa Jñānapīțbe Mürtidevī Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha Nos 21, 24, 26 Super Royal Vol I. pp 44+548; Vol II: pp 16 + 460, Vol III. pp 16 +472 Bhāratiya Jñanapītha Kashi, 1958-59 Price Rs 10 - cach Siddhi-viniscaya : This work of Akalankadeva with Svopajñavrtti along with the commentary of Anantavīrya is edited by Dr. MAHENDRAKUMAR JAIN. This is & new find and has great importance in the history of Indian Nyāya literature It is a feat of editorial ingenuity and scholarship The edition is equipped with exhaustive, leamed Introductions both in English and in Hindi, and they shed abundant light on doctrinal and chronological problems connected with this work and its author There are some 12 useful Indices Jñānapitha Mürtidevī Jaina Granthamälā, Sanskrit Grantha Nos 22, 23 Super Royal Vol I. pp 16+174 +370, Vol. II: pp 8+808. Bhāratiya jñānapitha Kashi, 1959 Price Rs 18l- and Rs 121- Bhadrababu-Sambitā. A Sanskrit text by Bhadrabahu dealing with astrology, omens, portents elc Edited with a Hindi Trapslation and occasional Vivecana by Pt NEMICHANDRA SHASTRI There is an exhaustive Introduction in Hindi dealing with Jain Jyotisa and the contents, authorship and age of the present work Jññānapītha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 25 Super Royal Pp 72+416 Bhāratīja Jñānapīțha Kashi, 1959 Price Rs 81- (7) - Pañcasamgraha : This is a collective name of 5 Treatises in Prākrit dealing with the Karma doctrine the topics of discussion being quite alıke with those in the Gómmatasāra etc The Text is edited with a Sanskuit commentary, Prākrit Vștti by Pt HIRALAL who has added a Hindi Translation as well A Sanskrit Text of the same name by one Śrīpāla is-included in this,volume There are a Hindi Introduction discussing some aspects of this work, a Table of contents and some useful Indices Jñānapītha Mūrtidevī Jaina Granthamālā, Prākrit Grantha No 10 Super Royal pp 64+804 Bhāratiya Jñānapitha Kashi, 1960 Price Rs 15/- Mayana-parājaya-cariu : This Apabhramśa Text of Harideva is critically edited along with a Hindi Translation by Prof Dr HIRALAL JAIN It is an allegorical poem dealing with the defeat of the god of love by Jina. This edition is equipped with a learned Introduction both in English and Hindi The Appendices give important passages from Vedic, Pālı and Sanskrit Texts There are a few explanatory Notes, and there is an Index of difficult words Jñānapītha Mūrtulevi Jaina Granthamala, Apabhramśa Grantha No 5 Super Royal pp 88+90 Bhāratīya Jñānapītha Kashı, 1962 Price Rs 81- Harivamsa Purana : This is an elaborate Purāņa by Jinasena (Saka 705) in stylistic Sanskrit dealing with the Harivamśa in which are included the cycle of legends about Kțsna and Pāndayas The text is edited along with the Hindi Translation and Introduction giving information about the author and this work, a detailed Table of contents and Appendices giving the verse Inder and Index of significant words by Pt PANNALAL JAIN jñānapītur Mürtidevi Jaia Granthamālā, Sanskrit Grantha No 27 Super Royal pp 12+16 7. 812 +160 Bhāratiya Jñanapītha Kashi, 1962 Price Rs 16/- n 1 Karmaprakrti : A Prākrit text by Nemicandra dealing with Karma doctrine, its contents being allied with those of Gommatasāja Edited by Pt. HIRALAL JAIN with the Sanskrit commentary of Sumatıkırtı and Hindi Tīkā of Pandita Hemarāja, as well as translation into Hindi with Višesāıtha Jãānapītha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Prākrit Grantha No 11 Super Royal pp 32+160 Bhāratiya Jñānapītha Kashı, 1964 Price Rs 61- 1 (8) Upāsakādbyayana : It is a portion of the Yaśastılaka-campū of Somadeya Sūri. It deals with the duties of a housebolder Edited with Hindi Translation, Introduction and Appendiccs etc by Pt KAILASHCHANDRA SHASTRI Jūānapītha Mūrtidevī Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 28. Super Royal PP 116 + 539, Bbāratiya Jñanapītha, Kash, 1964. Price Rs 121 Bhojacaritra : A Sanskrit work presenting the traditional biography of the Paramāra Bhoja by Rājayallnbha (15th century AD) Critically edited by Dr B Ch. CHHABRA, Jt Director General of Archæology in India and S SANKARANARAYANA with a Historical Introduction and Explanatory Notes in English and Indices of Proper names jñānapitha Mūrtidevi Jaina Granthamālā, Sanskrit Grantha No 29 Super Royal PP 24 +192 Bhāratīya Jñānapītha Kashı, 1964. Price Rs 81- Satyasāsana-parīksā A Sanskrit text on Jain logic by Ācārya Vidyānandı, critically edited for the first time by GOKULCHANDRA JAIN. It is a critique of selected issues upheld by a number of philosophical schools of Indian Philosophy There is an English compendium of the text, by Dr NATHMAL TATIA Jñānapītha Mūrlıdevī Jain Granthamālā, Sanskrit Grantha No 30 Super Royal pp 56 +34+62 Bhāratīya Jñanapitha, Kashi, 1964 Price Rs 5- Karakanda-cariu An Apabhramśa text dealing with the life story of king Karakanda, famous as 'Pratyeha Buddhi' in Juna & Buddhist literature Critically edited with Hindi & English Translations, Introductions, Explanatory Notes and Appendices etc by Dr HIRALAL JAIN Jñānapītha Mūrtidevī Jaina Granthamālā, Apabhramsa Grantha No 4 Super Royal pp 64+278 Bbāratiya Jñānapītha Kashi, 1964 Price Rs 101 For Copies Please write to- BHARATIYA JNANPITH, 3620121 Netaji Subhas Marg, Dariyaganj, Delhi (India) or BHARATIYA JNANPITH, Durgakund road, Varanasi (India).

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Satyasasan Pariksa Of Acharya Vidyanandi

Author
Gokul Chandra Jain
Title
Satyasasan Pariksa Of Acharya Vidyanandi
File name
Satyasasan Pariksa Of Acharya Vidyanandi
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2010/08
Publisher
Varanasi, Bhartiya Gyanpith
Language
Sanskrit
Pages
162
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
327663
Barcode
99999990002303.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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