Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Pranayaam Arthart Swash Vigyan
Front matter
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प्राणायाम
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अर्थात्
श्वास-विज्ञान
सपादक
श्रीदुलारेलाल मार्गव
चुनी हुई पुस्तके कर्मयोग झान और कर्म २॥ कर्मयोग (विवेकानद) चह्मज्ञान-शास्त्र 0 फर्मयोग (अश्विनीकुमार दस) वैराय-शतक (सचित्र) ४,५ राजयोग (विवेकानद) योगदर्शन 9, भक्तियोग (अश्विनीकुमार दत) | मझानदमोक्षगीता ॥ ज्ञानयोग, दोभाग (विवेकानद)") योग-साधन की तैयारी U "ब्रह्मयोग-विधा नीता दर्शन २० श्रात्मदर्शन योगवाशिष्ठ D,१४) गीता रहस्य (क्मयोग शास्त्र) Y) विचारसागर (निरचलदास) BJ भक्ति (विवेकानद) विचारसागर (पीताबरदास) ६) श्रात्मसयम एकाग्रता और दिव्य शक्ति ध्यानयोगप्रकाश १७ २) धर्मपद (धुद्धगीता) ब्रह्मचर्य 30 विचार-चन्द्रोदय । ब्रह्मचर्य ही जीवन है गीता में ईश्वरवाद भक्ति रहस्य यासन हिंदी की सब तरह की पुस्तकें मिझने का एक मात्र पता- सचालक गंगा-पुस्तकमाला-कार्यालय २६-३०, अमीनाबाद-पार्क, लसनऊ .
गगा पुस्तकमाला का पैंसठवां पुष्प
प्राणायाम
अर्थात्
श्वास-विज्ञान
(योगी रामाचारक-लिग्वित 'साइंस
ऑफ बेथ' का हिंदी-रूपांतर)
मनुयादकर्ता
ठाकुर प्रसिद्धनारायणसिंह वी०ए०
प्रकाशक
गंगा-पुस्तफमाला कार्यालय
२९३०, अमीनायाद पार्क
लखनऊ
द्वितीयावृत्ति
सजिल्द 12]
स० १९८३
[सादी )
श्रीमान् माननीय राजा सर रामपालसिंहजू देव के० सी० आई० ई०, कुरीसुदौली नरेश समीपेषु
समर्पण
श्रीमान् माननीय राजा सर रामपालसिहज देव
के० सी० आई० ई०, कुर्रासुदौली-
नरेश समीपेप
राजन्,
श्रीमान् सर्वदा देश-हित की चिंता पोर चेष्टा
में रत रहते हैं। इसी में श्रीमान् ने अपने स्वास्थ्य
और स्वार्थ, दोनों को भुला दिया है। अतएव
अपने विश्वास के अनुसार, देश-दित के प्रधान
साधन इस 'प्राणायाम' को, श्रीमान् के उसी बत
के अनुकूल समभकर, सेवा में सादर समर्पित
फरता हूँ।
श्रीमान् का भत्त
प्रसिद्धनारायण
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भूमिका (द्वितीयात्ति) मुझे प्रान बड़े हर्ष के साथ यह प्रकट करने का अवसर मिला है कि इस प्रथ की प्रथमावृत्ति को सारी प्रतियाँ बहुत शीघ्र ही निकल गई। जिन लोगों ने इस पुस्तक का सार- धानी से अध्ययन पोर इसमें दी हुई कसरतों का कुछ भी अभ्यास किया, वे इसके प्रगलक बन गए । मुझे इस बात से बहुत ही संतोप हुश्रा फि इस पुस्तक के साधनों द्वारा हमारे बहुत-से देशभाइयों ने अपने खोए हुए स्वास्थ्य को पुनः प्राप्त करके, शरीर को पूर्णत बलिष्ठ बना लिया। कितने ही लोग तो इसके द्वारा वल, शक्ति और दृढ़ता प्राप्त कर, अपनी छाती पर भारी-भारी पत्थर रखकर तुड़- बाने लगे । इहीं कारणों से इस पुस्तक की मॉग यहुत ज्यादा हुई । इसलिये मुझे इस बात का बहुत बड़ा रोद रहा कि प्रथमावृत्ति की पुस्तकों के चुक जाने पर भी, चपों तक इसका दूसरा सम्करण न निकल सका । श्रव अनेक असु. विधाओं के रहते हुए भी, अपने देशवासियों की मॉग पूरी करने के लिये, इसका दूसरा मस्करण प्रकाशित कराया गया है । इस प्रावृत्ति में कुछ भी अधिक परिवर्तन नहीं है। हॉ, कहीं-कहीं भाषा का सुधार कर दिया गया है। श्राशा है, इस पुस्तक द्वारा लोग दिन पर-दिन अधिकाधिक लाभ उठावंगे।ॐ शाति.। बनारस, मसिद्धनारायणसिंह
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भूमिका
(मथमावृत्ति)
जय धीमान राजर्षि उदयप्रतापसिंजू देव सी० एस०
श्राइ०, भिनगा नरेश जीवित थे, मुझ पर बड़ी कृपा करते
थे। श्रीमान् ने मुझे अपना शिष्य बनाकर चपा अपने
धार्मिक, येदांतिक, सामाजिक और राजनीतिक सिद्धातों
का उपदेश किया । फिर मेरी परीक्षा भी ली गई।
तब उन्होंने क्षत्रिय-जाति के सुधार-संबंध में मुझसे काम
सेना प्रारंभ किया। जदों तक मुझसे बन पड़ा, मेने उनकी
श्राशा का पालन किया । जब कभी यह मुझ पर बहुत
प्रसन्न होते, तो कहा करने कि "तुम्हं ऐसी चीज़ दूंगा
कि तुम निहाल हो जानोगे, और जीवन पर्यंत समझोगे
कि किसी के द्वारा हमें यह निधि मिली है।" मुभको तो
उस समय उनकी संगति ही और उनके शिष्य होने का
सौभाग्य ही सब कुछ था । एक दिन मेरे भतीजे ठाकुर
महादेवसिंह के द्वारा, जो उनके यहाँ ड्योढी पर मुशी थे,
उन्होंने दो पुस्तकें मेरे पास भेज दी । दोनों ही योग विषयक
थी। इधरउधर उलट-पलटकर मैंने उन्हें रख छोड़ा। मन
में यह बात आई कि जय कभी सुनवसर मिलेगा, इनका
१२
प्राणायाम
जिस पुस्तक का मेंने अनुवाद किया है,और जिसे श्रापके
सम्मुख उपस्थित करता, वह योगी रामाचारक महोदय
की योग-विषयक शिक्षा है, जो अमेरिका-निवासी शिष्यों
के प्रति, अँगरेजी-भाषा में है। अमेरिकन पश्चिमी विद्वान्
किसी के कहने ही-मात्र से किसी बात को स्वीकार नहीं
कर लेते । जब कोई वान साइंस के रूप में उनके चित्त
पर विठलाओगे, तभी उस बात को घे मानेगे, नहीं तो
नहीं। योगी रामाचारक ने भी योग-शास्त्र का साइम ही
के रूप में वर्णन किया है, इसे साइंस सिद्ध कर दिया है।
उनकी पहली पुस्तक का नाम (जिसका यह अनुवाद है )
"योगी साइंस ऑफ वेथ" है।
हमारे देशवासियों के विचार भी पश्चिमी लोगों -
विचारों के ढरे पर चल पड़े है। इनके चित्त पर भी पूर्वी
ढंग से कही घाते नही पैठती। सांस्य, वेदांत, योग, न्याय
श्रादि दर्शन न तो इनकी समझ ही में श्राते है, और न उहं
अच्छे ही लगते हैं । वे ही शास्त्र पुराण हैं, जिनकी श्रार हम
कानी ऑख से भी नहीं ताकने, पर जव उन्हीं शास्त्र पुराणों
के सिद्धांतों को मिसेज एनी वीसेंट या और कोई विद्वान्
पश्चिमी ढंग से कहने लगता है, तो उन पर मुग्ध हो
जाते हैं।
यही बात इस योग-क्रिया और योगशास्त्र के संबंध में
भी कही जा सकती है। पातंजल योगसूत्र, शिर-सहिता,
-
---- -- . भूमिका घेरंड संहिता नादि कई प्रथों को मैने देसा, पर एक यात मी समझ में न श्राई। परंतु योगी रामाचारक के उपदेश, जो पश्चिमी शिष्यों के लिये पश्चिमी दंग पर है, हृदय में अंफित हो जाते है । म आशा करता कि जैसा इनका प्रभाव मुझ पर पड़ता है, चैमा ही हमारे देशवासी भाइयों पर भी पड़ेगा। मैंने इस पुस्तक का अनुवाद करने में भी कहीं पुराने ढग के वर्णन और पुरानी नामालियों से सहायता नहीं ली है, किंतु ध्यान केरल-मात्र अनुवाद ही पर रहा है। श्वासक्रिया और तालयुक्त श्वासक्रिया, यही नाम मैंने रक्खे है, प्राणा- याम नाम रसने का होसला मने नहीं किया । इसी प्रकार योग के श्रासन और मुद्रा को श्रासन ओर मुद्रा न लिखकर कसरत ओर अभ्यास ही नाम दिया है । पुरानी नामा- घलियाँ देने की चेष्टा ही नहीं की गई। हॉ, कहीं-कहीं कोष्ठकों में पुराने नाम, प्राचीन योग का स्मरण दिलाने के लिये, दे दिए गए है । इस पुस्तक में पुराने अभ्यासों को भी योगी रामाचारक ने ज्यों-का-त्यों नहीं, वरन् उन्हें देश- काल के अनुकूल सक्षिप्त कर दिया है। मेरा तो यह विश्वास है कि इस पुस्तक का अध्ययन करके, इसके अनुसार अभ्यास करने से, किसी को भी शारी. रिक और मानसिक त्रुटियों की शिकायत करने का अवसर
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प्राणायाम
अर्थात
श्वास-विज्ञान
पहला अध्याय
जय हो
अाजकल हमारे भारतवर्ष का साधारण जनसमुदाय
पोग से इतनी दूर हट गया है कि इसकी ओर लोगों के हृदय
में नाना प्रकार के कुभाव उत्पन्न हो गए है। योगी नाम
धारण करनेवाले नाना प्रकार के मनुष्य दिसलाई पड़ते है।
कहीं कोई गेरआ पहने, सारंगी लिए दुए, भरथरी, गोपीचद
शार महादेवजी के गीत गाता फिरता है, और अवसर पाकर
नाना प्रकार के दद्-फंद से लोगों को ठगता फिरता है,
कहीं कोई गेरुया वस्त्रधारी संन्यासी-ग्रेश में घूमता
है, और
मुंह से अथवा गले से शालग्राम की मूति निकाल.
कर अपनी सिद्धता दिखलाता और भोलेभाले मनुष्यों को
अपना शिकार बनाता है। एकाध जगह ऐसे भी मनुष्य
पाए जाते है, जो कॉटेको शैया पनाकर उस पर सोते है,
और अपने महत्व का रोन जमाते हैं, कहीं कोई पैर ऊपर
प्राणायाम
'
और सिर नीचे करके लटका हुआ दिखलाई पड़ता है, और
उसके साथी दर्शकों से पैसा मॉगा करते हैं, कहीं कोई
अर्ववाहु चना टुना है, और अपनी बॉह को वर्षों से ऊपर
उठाए-उठाए सुखा डाला है, जिसे देखकर दर्शकों को दया
श्राती है, और वे कुछ दे देते है । मेले ठेले में ऐसे श्रादमी भी
दिखलाई देते हैं, जो नाना प्रकार से अपने अगों को तोड़ते.
मरोड़ते और योग के चौरासी शासन सिद्ध करने का स्वॉग
दिखलाते है। ये और अनेक तरह के दूसरे लोग, योग के
नाम पर, लोगों से पैसा कमाते और योग को बदनाम
करते है। ऐसे भी लोग मिलते हैं, जिन्होंने अपनी अतही
श्रादि पर योग द्वारा कुछ थोड़ा अधिकार जमा लिया
है, और कभी-कभी उनकी उलटी गति दिखाकर लोगों
के हृदय में घृणा और योग से भय उत्पन्न कर देते हैं।
पर ये लोग योगी नहीं हैं, योग को बदनाम करनेवाले ठग
या कुछ योग का 'उलटा-पुलटा थोड़ा अभ्यास किए हुए
सनको श्रादमी हैं । जैसे भिखमगा नट पग्गड़ बाँधे और
उसमें एक भद्दा नश्तर खोंसे लोगों के फस्द और तवो
लगाता और कानों का मैल निकालता फिरता है, पर
चिल्ला-चिल्लाकर “वैद-चैद" कहता हुश्रा गॉवों की गलियों में
अपने को वैद्यराज जाहिर करता है, वैसे ही ये धूर्त
गेरुश्रा पहने और नाना प्रकार का ढोंग दिखाते हुए लोगों
को छलते फिरते हैं । यह हमारे देश का दुभाग्य है !
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३
जय हो
इन्हीं लोगों को देखकर ओर लोग योग से बहुत दूर हट गए
है। जो लोग पढ़े लिखे है, और सभ्य बनने का दाना करते
है, वे योग की तरफ आँख उठाकर देखते भी नहीं। यदि
किसी स योगी का कुछ समाचार भी वे सुन पाते हैं, तो
यही समझकर उसकी ओर से लापरवा हो जाते है कि
होगा कोई भूला हुश्रा, व्यर्थ स्वप्न देखने में अपना जीवन
पितानेवाला।
किंतु योग ऐसी घृणा की चीज नहीं है। हमारे
भारतवर्ष में और दूसरे पूर्वी देशो में भी प्राचीन काल
से ऐसे मनुष्य होते श्राए हैं, जिन्हाने अपने यहुमूल्य समय
और चित्त को मनुष्य की शारीरिक, मानसिक एवं श्राध्या
त्मिक उन्नति में लगाया है । पुरुषार्थी खोजियों के शताब्दियो
का अनुभव गुरु शिष्य परम्परा से एकत्रित होता चला
श्राया हे, भोर क्रमश एक निश्चित योगशास्त्र या योगदर्शन
चन गया है। इन्हीं सोजों को 'योग' नाम दिया गया है। यह
शब्द संस्कृत 'युज्' धातु से, जिसका अर्थ जुटना है,
बना है। इसका अर्थ भिन्न भिन्न महाशयों ने भिन्न भिन्न किया
है, पर मेरी समझ में तो यही अच्छा मालुम होता है कि
शारीरिक, मानसिक शोर श्राध्यात्मिक उन्नति के लिये
प्राकृतिक नियमों से जुट जाना ही योग है, अथवा शरीर
श्रोर मन को अपने सकल्प के अनुवर्ती बनाने के उद्योग में
जुट या लग जाना योग है। हमारे देश में प्राचीन काल से
.
प्राणायाम यह कहावत चली आती है कि इसके आदि प्राचार्य महादेवजी है। पतञ्जलि मुनि ने दर्शन या शास्त्र-रूप में इसका वर्णन किया है, जो शास्त्रों में से एक है। भारत- वर्ष की कौन-सी श्रुति, स्मृति, उपनिषद्, शास्त्र या पुराण है, जिसमें इसका महत्त्व न गाया गया हो। योग कई शाखाओं में विभक्त है। इसकी शिक्षा की दौड़ शरीर को अपने संकरप के अनुकूल बनाने से लेकर वहाँ तक है, जहाँ उच्चातिउच्च प्राध्यात्मिक उन्नति करके परमपद का ब्रह्मानंद प्राप्त हो जाता है । इल पुस्तक में हम योग के बहुत उच्च भावों की पोर न जायेंगे। हॉ, जहाँ कहीं श्वास विज्ञान से उच्च भावों का लगाव है, वहॉ विवश होकर कुछ थोड़ा बहुत कहना ही पड़ेगा । यह श्वास-विज्ञान बहुत जगहों पर योग में सम्मिलित है। यद्यपि इसका प्रधान उद्देश्य । शारीरिक उन्नति और शरीर को मन के अनुकूल बनाना है, तथापि इसका मानसिक पटल भी है, और यह प्राध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में भी प्रवेश कर जाता है। भारतवर्ष में योग के बड़े बड़े शिक्षा-स्थल है, जहाँ इस देश के सहलो प्रधान व्यक्ति इस कार्य में लगे हुए है । बहुत-से लोग तो इस योग ही को अपना जीवनसमझते है । उच्च और शुद्ध योग-शिक्षा तो बहुत थोडे श्रादमियों को प्रात होती है, साधारण जन इसके छिलके और उच्छिष्ट हीसे तृप्त हो जाते है । भारतवर्ष में ऊंची शिक्षानी को छिपाने का .
. जय हो घड़ा भारी रिवाज है। परतु श्रय पश्चिमी शिक्षा का प्रयल प्रभाव पड़ रहा है, और जो शिक्षा पहले इने गिने थोड़े-से मनुष्यों की दी जाती थी, वह अब खुले नाम सबको मिल सकती है, जो उसके ग्रहण करने के उत्सुक हों। पूर्व और पश्चिम, दोनों एक में जुटने जाते हैं, और इन जुटाव से दोनों का लाम हो रहा है, और एक दूसरे पर प्रभाव पड़ रहा है। हिन्दू योगियों ने श्वास-विज्ञान अर्थात् प्राणायाम पर बहुत ही अधिक ध्यान दिया है। क्यों ? यह इस पुस्तक के पढ़नेवालों को श्रागे चलकर माफ मालूम हो जायगा। पटुत-से पाश्चात्य लेसकों ने भी श्वास के विषय में पुस्तकें लिखी हैं। यहाँ भी योग पर प्राचीन पुस्तके है। परतु इन प्राचीन पुस्तकों में योग की बातें पुराने ही ढग से लिखी गई है, जो आजकल के शिक्षित भारतरासियों के चित्त पर बहुत ही कम प्रभाव डालती हैं । इसलिये यह पुस्तक इस ढग से सक्षेप में, और सरल भापा में, लिखी गई है कि योगियों के शान विज्ञान से अभिज्ञता दो जाय और साथ-ही-साध योगियों के प्रधान-प्रधान यास- सम्बन्धी अभ्यास करने की भी शिक्षा मिले । इसमें पूर्वी भोर पश्चिमी, दोनों विचार दिए गए हैं, और यह दिस- लाया गया है कि एक विचार का दूसरे से केसे ठीक-ठीक मेल खाना है। इसमें साधारण शब्दों का ही प्रयोग किया । ६ प्राणायाम गया है। योग के सदि-शब्द प्राय. छोड़ दिए गए है, जिससे समझने में सरलता हो। इस पुस्तक के पहले भाग में श्वास-विज्ञान का शारीरिक प्रयोग वर्णन किया गया है। उसके पश्चात् मानसिक विषयों पर उसके लगाय का विचार किया गया है, और अन्त में इसके प्राध्यामिक सम्बन्ध का दिग्दर्शन- मात्र करा दिया गया है। हम इस बात को प्रकट करने में आप लोगों से क्षमा- प्रार्थी है कि हमें इस बात का सतोप है कि इतने योगशात को हम केवल इन थोड़े-से पृष्ठों में भर देने में समर्थ हुए है, और यह भी ऐसे शब्दों और नामों के द्वारा, जो जिस किसी को भी समझ में आसानी से पा सकते ह। हमें यदि भय है, तो केवल इसी बात का कि इसकी सरलता और सादगी ही देखकर लोग इससे कहीं मुंह न फेर लें कि यह तो ध्यान देने-योग्य यात ही नहीं है, क्योंकि इसमें गम्भीर, गृह और अवोध्य कोई चीज है ही नहीं। किंतु भारतवर्ष के सुदिन श्रानेवाले हैं, इसलिये मैं श्राशा करता हूँ कि भारतवर्ष अवश्य इस ओर ध्यान देगा। हम अपने पाठकों का आन्तरिक आशीर्वाद द्वारा स्वागत करते हैं कि आपकी जय हो, और श्राप बैठकर सावधानी से योगी के मास-विज्ञान का पहला पाठ सौसिए । .
दूसरा अध्याय
श्वास ही जीवन है
जीवन पूर्णत श्वास क्रिया पर श्रनलम्बित है । शास
ही जीवन है। विचारों की सरणी और नामावलियों में चाहे
पूर्वी और पाश्चात्य विद्वान् कितना ही भिन्न हों, पर इन
मूल सिद्धान्तों में दोनों एकमत है ।
शास लेना ही जीना है, और विना श्वास के जीवन
नहीं है। केरल उब श्रेणी ही के जीव-जन्तु जीवन के लिये
श्गस पर श्रवलम्बित नहीं है, परन् नीची श्रेणी के जन्तुओं
को भी जीने के लिये अवश्य श्वास लेनी पड़ती है। पौदों
को भी वैसे ही, लगातार जीवन के लिये, हवा का
आश्रय लेना पड़ता है।
नवजात शिशु एक लम्बी, गहरी सॉस सींचता है,
उसको थोड़े अर्से तक, जीवनदायिनी शक्ति को खींचने के
लिये, गेफ रखता है, और तर एक लम्बी सॉस छोड़ता
हे । और, अहा ! उसका ससार का जीवन शुरू हो जाता
है । वृद्ध मनुष्य निर्वल सास छोड़ता है, सॉस लेना बन्द कर
देता है, और बस, उसके जीवन का अन्त है । नजात शिशु
की पहली धीमी वास से लेकर मरते हुए मनुष्य की
-
प्राणायाम श्वास लेने की आदत से-श्वास-विज्ञान के समझने और अभ्यास करने से शारीरिक लाभों के अतिरिक्त मनुष्य की मानसिक शक्तियॉ, सुख, अात्मसंयम, निर्मल दृष्टि, सदाचार धादि की प्राप्ति होती है, यहाँ तक कि उसकी अध्यात्मिक उन्नति भी होती जाती है। इसी विषय पर पूर्वी आचार्यों ने शास्त्र के शास्त्र रच डाले है । कहाँ तक कह। इसका अभ्यास करने से आश्चर्यजनक उन्नति देख पड़ेगी। इस पुस्तक में योगियों का श्वास-विज्ञान वतायाजायगा, जिसमें केवल पश्चिम की ही विद्या नहीं, किंतु इस विषय का आधिदैनिक पटल भी सन्निविष्ट है।यह केवल शारीरिक स्वास्थ्य काही मार्ग, पाश्चात्य श्राचार्यों के अनुसार लची सॉस श्रादि के द्वारा नहीं बतलाता, किंतु इस विषय के उन गूढ भावों में भी जाता है, जो पाश्चात्यों को कम शात हैं, और यह भी दिखलाता है कि कैसे हिंदू योगी अपनी मान- सिक शक्तियों को बढाकर अपने शरीर पर अधिकार जमाता ओर श्वास विज्ञान द्वारा अपने स्वभाव के आध्यात्मिक भाग को पुष्ट एवं उन्नत करता है। योगी ऐसे ऐसे अभ्यास करता है, जिनसे वह अपने शरीर पर अधिकार जमा लेता है,और अपने शरीर के किसी अंग या अवयव में अधिक जीवन या प्राण की धारा चहा देता है, जिससे यह अग या अवयव सुदृढ़ और बलवान हो जाता है। वह उन सब बातों को जानता है, जिन्हें उसका साल ही जीवन है ११ पश्चिमी विशानी ठीय-ठीक साँस लेने के शारीरिक प्रभाव के विषय में जानता है। परतु योगी यह भी जानता है कि हया में थॉक्सिजन, हाइड्रोजन और नाइट्रोजन के अताया और भी कुछ चीज अधिक है, जिसके द्वारा रुधिर में ऑक्सिजन पहुँचाने के अलाना कुछ और भी उत्तम कार्य साधा जाता है। योगी "प्राण" के विषय को भी जानता है, जिससे उसका पश्चिमी भाई बिलकुल अनभिज्ञ हे । वह शक्ति के उस महान् तन (माण) के व्यवहार की विधि और नियमों को भली भांति जानता है । यह अच्छी तरह जानता है कि इस प्राण का मनुप्य के शरीर और मन पर क्या प्रभाव पड़ता है। वह जानता है कि नियमित श्वास (प्राणायाम) द्वारा मनुष्य अपने को प्रति के राग में जोड़ सकता है, और इस प्रकार अपनी गुहा शहियों को जगा सकता है । वह जानता है कि नियमानुकूल वास द्वारा मैं केवल अपने और दूसरो के रोगों को ही नहीं दूर कर सकता, किंतु भय, चिड़चिड़ा- पन ओर नीच श्रादतों को भी निकालकर दूर फेंक सकता है। इन्हीं बातों का सिसाना इस पुस्तक का उद्देश्य हे । हम इसमें थोड़े ही अध्यायों में, सक्षिप्त विवरण और सकेत देंगे, जिनका विस्तार बढ़ी-चढ़ी पोथियों में हो सकता है। हम आशा करते है कि हमारे पाठकों का मन योगी-दवास- विज्ञान के महत्त्व की ओर प्रेरित होगा। .
१४
प्राणायाम
.
हवा कुछ गर्म हो जाती है, क्योंकि भीगे हुए पर्दै म
पुष्कल गर्म रक्त रहता है। फिर वहाँ से लेरिपस में
होती हुई वह घोंधे में जाती है । घोंघा नीचे जाकर कई
नलियों में विभक्त हो जाता है, जिन्हें नांकियल ट्यून्स
(Bronchial tubes ) कहते हैं। ये नलियाँ और भी
पतली-पतली नलियों में विभक्त हो-हो कर फेफड़ों की
नन्हीं-नन्हीं कोठरियों में प्रवेश कर जाती है । फेफड़ों में
ये नन्हीं-नन्हीं कोठरियाँ लाखों होती हैं। एक लेराक ने
लिखा है कि यदि फेफड़ों को इन छोटी-छोटी कोठरियों को
समतल स्थान पर फैला दें, तो ये चौदह सहन वर्गफोट
स्थान घेर लेंगी। इन्हीं छोटी छोटी कोटरियों में श्वास द्वारा
हवा प्राती जाती है।
फेफड़े में हवा डायाफ्राम ( Diaphiagm) की
क्रिया द्वारा खींची जाती है। यह डायाफ्राम एक बड़ी
सुदृढ, चिपटी, चादर के रूप की मांसपेशी है, जो
पेट और छाती के बीच में फैली हुई, पेट को छाती
की कोठरी से पृथक् करती है। इस डायाफाम
को किया उसी प्रकार श्राप से श्राप हुश्रा करती है,
जैसे हृदय के धड़कने की क्रिया, सकल्प के
प्रभाव से इसे अर्द्ध इच्छानुयायी भी बना सकते
जव ', यह फैलती है,
तो यह छाती और
फेफड़ों के विस्तार को बढ़ा देती है, और इस प्रकार
श्वास क्रिया पर स्थूल विचार फेफड़ों में जो पाली म्यान यनता है, उसे भरने के लिये पादर से हवा नाम द्वारा प्रदेश करती है । जय यह सिर- इती है, तो छाती और फेफड़े संकुचित हो जाते हैं, और हमा फेफड़े से बाहर फेक दी जाती है। फेफड़ों में हवा के साथ कौन-सी क्रिया होती है, इसके ऊपर विचार करने के पहले रुधिर के सचार के विषय में घोड़ा विचार कर लेना आवश्यक जान पडता है। श्राप जानते है, रूधिर को पहले हृदय संचालित करता है। यह धमनियों और फिर पारीक धमनिया म होता था शरीर के प्रत्येक भाग में पहुँच जाता है, शोर प्रत्येक भाग में जीनट, पोपण और शक्ति पहुंचा देता है । फिर यह दूसरे मार्ग से वारांक शिरात्रों में होता हुमा मोटी शिराओं में लौटना है, और यहाँ से फिर हृदय में वापस पाता है। फिर दृदय से निकलकर वह फेफड़ों में सिंच जाता है। जव पहले हदय से संचालित होकर रुधिर धमनियों और धमनियों द्वारा शरीर के प्रत्येक भाग के लिये प्रस्थानित हुना था, तब वह चमकदार, लाल रंग का और जीवनदायक गुणों और सामान से सयुक्त था। परंतु जय शिरानों के मार्ग से वापस श्राया, तव गुणहीन, नीला ओर फीका रग का होकर पाया, क्योंकि शरीर के अगप्रत्यंगों से निकाला हुभा रद्दी कूड़ा-करकट बटोरता हुश्रा पाया है। हद्रय सेप्रस्थान करते समय रधिर हिमालय पहाड़ से निकली
प्राणायाम
जाना चाहिए था, फिर शरीर के अंगों और प्रत्यंगों में
पापस जायगी, और विष उत्पन्न करके मृत्यु को न्योता देगी।
गंदी चाभी ऐसा ही असर डालती है, लेकिन जरा धीरे-
धीरे । यह भी देखने में बायेगा कि यदि कोई पूरे परिमाण
में श्वास न लेगा, तो रुधिर का काम भी उचित रीति से न
चल सकेगा, और तब शरीर का उचित पोपण उचित रीति
से न होगा, और वीमारी उत्पन्न हो जायगी, अथवा स्वास्थ्य
चिगट जायगा । जो मनुष्य अनुचित रीति से सॉस लेता है।
उसका रक्त नीला, कालापन लिए और निस्तेज होगा!
ऊपर से देखने में भी उस मनुष्य कारग बदरग दिखाई देगा।
ठीक-ठीक सॉस लेने से रुधिर-सचार अच्छा होता है, जिससे
मनुष्य का रंग स्वच्छ और चमकीला होता है। थोड़ा ध्यान
देने से दीक-ठीक श्वास लेने कीमहिमा प्रकट हो जायगी।
यदि फेफड़ों की साफ करनेवाली काररवाई से रुधिर साफ
न किया जायगा, तो यह दुर्दशा में नाड़ियों में पहुंचेगा। न
तो उसकी गदगी निकाली गई,न वह पूरा साफ किया गया।
यदि यही गदगी फिरशरीर में जायगी, तो यह निश्चय किसी-
न-किसी बीमारी के रूप में प्रकट होगी। या तो रुधिर-सबंधी
कोई रोग होगा, अथवा किसी इन्द्रिय या अवयव के निर्वल
होजाने से उस इंद्रिय या अवयव का काम रुक जायगा,
और
शरीर में रोग उत्पन्न हो जायगा, क्योंकि शरीर के अवयवों के
स्वामायिक कार्य के ही रकने से रोग उत्पन्न हुना करते है ।
. श्वास क्रिया पर धूल विचार जय फेफड़ों में रधिर को पूरे परिमाण म, हवा मिलती है, तब फेरल रधिर की सफाई ही नहीं होती, और कार- चोनिक एसिडगैस ही नहीं खारिज किया जाता, किंतु रधिर पुछ ऑक्सिजन भी अपने साथ ले लेता है, और उसे शरीर को अग-प्रत्यंगों में वहाँ पहुंचाता है, जहाँ उसकी बारश्यकता होती है, और जिसके द्वारा प्रकृति अपना कार्य उचित रीति से संपादन करती है। जय शॉक्सिजन का सपर्क धिर होता है, तो यह रुधिर के अणुओं में जुट जाता है, श्रीर शरीर के प्रत्येक कण, रेशे,मासपेशी और इद्रिय में पहुँचता है, (उसे शक्ति देता तथा दृढ और बलवान बनाता है, पुराने और निप्पल अणुत्रों की जगह नए बलवान् अणु स्थापित करता है। शुद्ध रुधिर में ०५ फो-सैकड़ा ऑक्सिजन रहती है। ऑक्सिजन द्वारा केवल प्रत्येक भाग बलवान ही नहीं बनाया जाता, किंतु पाचन-शक्ति भी अधिकाश में भोजन के प्रॉक्सिजन मिश्रित होने पर ही अवलवित है, और यह तमी हो सकता है, जब रुधिर में ऑक्सिजन अधिक रहें, और वह खाए हुए अन्न के संपर्क में श्राफर एक प्रकार की जलन उत्पन्न करे, जिसे जठराग्नि कह सकते है। इसलिये श्रावश्यक है कि फेफड़ों द्वारा ऑक्सिजन को काफी माना ग्रहण की जाय । यही कारण है कि निर्बल फेफड़ेवालों की पाचन शक्तिभी निर्यल होती है। इस कथन के पूरे महत्त्व को समझने के लिये यह स्मरण रखना चाहिए कि समन शरीर .
चौथा अध्याय
श्वास-क्रिया पर मूक्ष्म विचार
अन्य शिक्षाओं की भॉति श्वास-विज्ञान के विषय में भी
सूक्ष्म अर्थात् श्राभ्यंतरिक विचार उसी प्रकार है, जैसे
इसके बाद्य विचार है । शरीर-विद्या-संबंधी विचारों को
इसके स्थूल या वाद्य विचार कह सकते है, और जिस
पटल का श्रन हम वर्णन करेंगे, उसको सूक्ष्म अथवा श्राभ्य
तरिक विचार कह सकते है। सभी समयों और सभी देशों
के गुप्तवादियों ने गुप्त रीति से अपने कतिपय चुने हुए शिष्यों
को सिखलाया है कि वायु में एक प्रकार का पदार्थ या
शक्ति है, जिससे तमाम क्रियाएँ, जीपट और जीवन प्राप्त
किए जाते है। वे लोग इस शक्ति का नाम रखने और इस
विषय के विचार में भिन्न भिन्न मत रखते थे, परतु मुरय
सिद्धांत कुल गुप्त उपदेशों में पाया जाता है, और वह पूर्वी
योगियों के उपदेशों का शताब्दियों से एक अग रहा
इस महती शक्ति के विचार-भेदों से, जिसके कारण
इसके भिन्न-भिन्न नाम रक्खे गए है, पृथक रहने के अभिप्राय
से, हम इस पुस्तक में इस शक्ति को प्राण के नाम से उल्लेख
करेंगे। प्राण एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ 'सार शकि
my
शास-क्रिया पर सूक्ष्म विचार होता है। बहुत-से रहस्यवादी आचार्य सिखलाते है कि वह पदार्थ, जिसे हिंदू लोग प्राण कहते है, शक्ति या चल का सर्वव्यापक तत्य है, और इसी पदार्थ से समय शक्ति और बल निसृत होते हे, वरिक यों कहिए कि इसी पदार्थ से सय शक्तियों ओर चल भिन्न भिन्न रूप में प्रस्ट या उदय होते है। इन विचारों से हमें इस पुस्तक के विषय- संवत्र में कुछ प्रयोजन नहीं है, और इसलिये हम केवल इतनी ही समझ पर परिमित होते है कि यह प्राण शक्ति का मूल हे, जो सब जीवित वस्तुओं में प्रकाशित है, और जो निजॉन वस्तुओं से सजीव घस्तुओं को पृथक् करता है। हम लोग इसे जीवन का द्योतक या संजीवनी शक्ति कह सकते हैं। यह सब प्रकार के जीरों मे-छोटे-से-छोटे ऊप्मज से लेकर बड़े-से-बड़े मनुष्य में तथा छोटे-छोटे काई इत्यादि जीवों से लेकर बड़े से बडे जंतु-में पाया जाता है। प्राय सर्वव्यापक है, यह सर जीवधारियों में पाया जाता है। रहस्य-शास्त्र कहता है कि सभी वस्तुओं में जीय है सभी परमाणुओं में जीव है। फिर भी कुछ चीजों में निर्जीवता इस- लिये प्रतीत होती है कि उनमें न्यून मात्रा में प्राण का विकास हुना है, अतएर हम उनकी शिक्षा का यह अर्थ समझने सर्वन है, प्रत्येक वस्तु में है। प्राण को जीवात्मा ड़यड़ी न करना चाहिए, क्योंकि जीवात्मा तो * अंश है न्येक जीय में है जिसके .
चौथा अध्याय
श्वास-क्रिया पर माम विचार
अन्य शिक्षायों की भांति श्वास-विज्ञान के विषय में
सूक्ष्म अर्थात् श्राभ्यंतरिक विचार उसी प्रकार है,
इसके चाहा विचार है । शरीर-विद्या-संबंधी विचारों
इसके स्थूल या चाहा विचार कह सकते हैं, और कि
पटल का श्रर हम वर्णन करेंगे, उसको सूक्ष्म अथवा श्रा-
तरिक विचार कर सकते हैं। सभी समयों और सभी
के गुप्तवादियों ने गुप्त रोति से अपने कतिपय चुने हुए शि
को सिखलाया है कि वायु में एक प्रकार का पदार्थ
शक्ति है, जिससे तमाम क्रियाएँ, जीघट और जीवन
किए जाते है। वे लोग इस शक्ति का नाम रखने और
विषय के विचार में भिन्न भिन्न मत रखते थे, पातु मु
सिद्धांत कुल गुप्त उपदशों में पाया जाता है, और यह
योगियों के उपदेशों का शताब्दियों से यफ अग रहा है।
इस महती शक्ति के विचार-भेदों से, जिसके का
इसके भिन्न भिन्न नाम रक्खे गए है, पृथक रहने के अभिन्न
से, हम इस पुस्तक में इस शक्ति को प्राण के नाम से उल्ले
करेंगी। प्राण एक सस्कृत शब्द है, जिसका ATTE
-
-
- श्रास-क्रिया पर सूक्ष्म विचार २३ होता है। बहुत-से रहस्यवादी श्राचार्य सिखलाते है कि वह पदार्थ, जिसे हिंदू लोग प्राण कहते हे, शक्ति या चल का सर्वव्यापक तत्व हे, और इसी पदार्थ से समय शक्ति और वल नि सृत होते है, चरिक यों कहिए कि इसी पदार्थ से सर शक्तियाँ और बल भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट या उदय होते है। इन विचारों से हमें इस पुस्तक के विषय- संबंध में कुछ प्रयोजन नहीं है, और इसलिये हम केवल इतनी ही ममम पर परिमित होते है कि यह प्राण शक्ति का मूल है, जो सय जीवित वस्तुओं में प्रकाशित है, और जो निर्जीव वस्तुओं से सजीव वस्तुश्री को पृथक् करता है। हम लोग इसे जीवन का द्योतक या सजीवनी शक्ति कह सकते है । यह सब प्रकार के जीवों में छोटे-से-छोटे ऊप्मज से लेकर बड़े-से-बड़े मनुष्य में तथा छोटे-छोटे काई इत्यादि जीवों से लेकर बड़े से बडे जंतु-में पाया जाता है। प्राण सर्वव्यापक है, यह सब जीवधारियों में पाया जाता है। रहस्य-शास्त्र कहता है कि सभी वस्तुओं में जीव है सभी परमाणुओं में जीव है। फिर भी कुछ चीजों में निर्जीवता इस- लिये प्रतीत होती है कि उनमें न्यून मात्रा में प्राण का विकास हुश्रा है, श्रतएर हम उनकी शिक्षा का यह अर्थ समझते है कि प्राण सर्वत्र है, प्रत्येक वस्तु में है। प्राण को जीवात्मा से मिलाकर गड़बड़ी न करना चाहिए, क्योंकि जीवात्मा तो परमात्मा का वह अश है--और प्रत्येक जीव में है जिसके प्राणायाम 1 , - स्वच्छद रूप से पाया जाता है। यह वायुमडल की हवा जर ताज़ी रहती है, तब उसमें सूय प्राण रहता है। हम लोग प्राय को अन्य वस्तुओं की अपेक्षा इया से बड़ी सरलता से ले सकते है । साधारण श्वास लेने में हम लोग हवा से यों ही मामूली-सा प्राण लेकर अात्मसात् करते है, परंतु विधानयुक और नियमवद्ध लॉस लेने से, जिसे योगी की श्वास-क्रिया या प्राणायाम कहते है, हम लोग अधिक मात्रा में प्राण खींचने के योग्य हो जाते हैं, जो मस्तिष्क या अन्य ततु-केंद्रों में एकभित किया जाता है, और फिर आवश्यकतानुसार काम में आता है। हम उसी तरह से प्राण एकत्रित कर सकते हैं, जैसे स्टोरेज बैटरी में विद्युत्शक्ति एकत्रित की जाती है । अभ्यासी योगियों में जो अनेक शक्तियाँ पारोपित की जाती है, वे बहुधा इसी शान से प्राप्त हुई रहती और भरे हुए भंडार में से विचार-पूर्वक काम में लाई जाती हैं। 'योगी लोग जानते है कि कैसे सॉस लेने से अधिक मात्रा में प्राण प्राप्त हो सकता है, और अपने अभीष्ट कार्य के लिये वेउसी तरीके से उसे प्राप्त कर लेते है । इस भॉति वे अपने शरीर के सव भागों ही को शक्ति-संपन्न नहीं बना लेते, प्रत्युत इसी के द्वारा वे अपने मस्तिष्क में अधिक प्राण भेजकर गुप्त शक्तियों को प्रकट कर लेते ओर देवी तथा प्राध्यात्मिक शक्तियाँ प्राप्त कर लेने है। जो मनुष्य जान-बूझकर या अनजान में प्राण पकत्रित करने के विधानों पर चलना है, उसके शरीर .
श्वास मिया पर सूक्ष्म निचार
से जीवट और शक्ति का तेज निकला करता है, और जो लोग
उममे निकट जाते हैं, वे उसफे तेज का अनुभव करते हैं।
ऐमा मनुप्प दूसरों को भी शक्ति प्रदान कर सकता और
उन्हें जीवट और स्वास्थ्य दे सकता है। जिसको थाकर्ष
द्वारा रोग दूर करना कहते ह, यह इसी प्रकार किया जाता
है। बहुत-से 'प्राकर्षगा द्वारा रोग दूर करनेवाले यह जानते
भी नहीं कि उन्हें यह शक्ति केसे प्राप्त हुई।
पश्चिमी विद्वान् हवा में मिश्रित इस अद्भुत शक्ति से
यहुत ही कम श्रभिश है । परतु इसमें रासायनिक लक्षण न
पाकर या अपने थर्मामीटर, वैरामीटर की भॉति किसी
यत्र द्वारा गणना में लाने के योग्य इसे न पाकर, पूर्वी
लोगों के इस विचार को घृणा की दृष्टि से देखते है। इस
पदार्थ को ये समझ नहीं सके, इसलिये उन्होंने इसे अस्वीकार
कर दिया। ऐसा जान पड़ता है कि ये विशानी लोग अभी
तक इतना ही समझ पाए है कि अमुक स्थान की हवा में
"कोई बात" अधिक है, और डॉक्टर लोग अपने मरीजों को
उपदेश देते हैं कि खोए हुए स्वास्थ्य को पुन प्राप्त करने के
लिये वहाँ जानो।
हमा के ऑक्सिजन को रुधिर खींचता है, और रुधिर
संचार-विभाग उससे काम लेता है। हवा से प्राण को
नाही-सप्रदाय (Nervous system) खींचता है, और यही
विभाग उससे काम लेता है। जिस प्रकार रुधिर-संचार
प्राणायाम महानुभावी विभाग की शखा' भी निकल-निकलकर सारं शरीर में फैली हुई है। पहला विभाग शरीर के बाहर के पटाथों का ज्ञान प्राप्त करता तथा बाहरी जगत् में कार्य करता हुआ उसके साथ लगाव रखता है। जैसे देखना, सुनना, न्धर्शज्ञान, हाथ हिलाना, पैर हिलाना इत्यादि । दूसरा केवल शरीर के भीतर ही की क्रियानों से सवध रखता है। जैसे शरीर का वढाना, अन पचगना, रुधिर-संचार इत्यादि। पहले विभाग द्वारा देखना, सुनना, स्वाद लेना, सूंघना, स्पर्श-ज्ञान इत्यादि बातें होती है। यह गति का संचार करता है। इसके द्वारा जीवात्मा सोचती, विचारती और ज्ञान का अनुभव करनी है। यह वह भोजार है. जिसके द्वारा जीवात्मा बाह्य जगत् से संबध रखती है। यह विभाग टेलीफोन- विभाग की भाँति है, मस्तिष्क जिसका सदर दफ्तर है, मेरदड सदर तार और अन्य तंतुजाल टेलीफोन की शाखाएँ हैं। मस्तिष्क या भेजा गुद्दे की ढेरी है। इसके तीन भाग हैं। पहला मस्तिष्क खास है, जो खोपड़ी के ऊपरवाले, अगले, मध्य और पिटले भागों में रहता है । दूसरा है छोटा मस्तिष्क, जो खोपड़ी के नीचेवाले पिछले भाग में रहता है। तीसरा है मेहला ऑचलागेटा ( Medula Oblongata), जो मेरुदंड का श्रादि भाग है, और छोटे मस्तिष्क के सामने धागे से शुरू हो जाता है।
नाड़ी-संस्थान ३१ वास्तविक स्तिक अर्थात् पहला भाग मन के उस सड का औजार हे, जो घुद्धि-सबधी कार्य करता है। छोटा मस्तिक इच्छानुवर्तिनी मासपेशियों में गति का संचार करना है। मेटुला श्रॉवलागेटा मेरदंड का छोर है। इससे और पास्तविक मस्तिष्क से ज्ञान ततु निकल- कर, शाखा-प्रशासा में विभक्त होकर, सिर के प्रत्येक भाग में फैल जाते है, इधर प्रत्येक इन्द्रिय में फैलते हैं, पर छाती, पेट तथा सॉस लेनेवाले किसी-किसी श्रायन में भी पाते है। रोढ की हड़िया नीचे से ऊपर तक जो एक नली बनाती है, और जिसमें भी गुदी भरी रहती है, उसे मेरद्द कहते है। यह गुदी की लवी छडी-सी है। थोड़ी थोडी दूर पर इसमें से शाखाएँ फूटती हैं, और नाड़ी ततुजाल द्वारा शरीर के अग-प्रत्यग में फैल जाती है । मेरुदड टेलीफोन का सदर तार है, और ततुजाल उसको शासानों के तार । सहानुभागी विभाग में नाडीगुच्छक (Ganglia) को दो मुंग्वलाएँ मेरुदंड के दाहने-चा', दोनों ओर है, जिन्हें पिगला और ईडा-नाही कहते है । इस शृखला के अतिरिक्ष सिर, गले, छाती और पेट में भी नाडीगुच्छा है। नाड़ीगुच्छक को, जिसमें नाड़ीकण (Cells) भी सम्मिलित होते है, गुद्दी की ढेरी ( Gangha) कहते हैं। ये गुच्छक एक दूसरे से तंतु द्वारा नये हुए रहते +
प्राणायाम
है,
।
.
और प्रथम विभाग से, जिले मस्तिष्क-मेरु-विभाग कहने
है, शान-ततुओं और शति-ततुओं द्वारा नथे रहते है ।
इन्हीं ढेरों से अगणित तंतु निकलकर शरीर के
अवयवो और रुबिर की नलियों इत्यादि मैं जाल की
भॉति फैले रहते हैं। कई स्थानों पर ये तंतु एकत्रित होकर
मिल जाते हैं, जिन्हें नाड़ी प्रथि या चक्र (Plexuses) कहते
है। सहानुभाषी विभाग उन कार्यों का निरीक्षण करता
जो शरीर में हमारी इच्छा का प्राश्रय न करके भी होते
रहते है। जैसे रुधिर-संचार,
श्वास-क्रिया, पाचन
इत्यादि।
मस्तिष्क जिस बल का प्रयोग इन ततुओं द्वारा शरीर
के प्रत्येक अवयव पर करता है, उसे पश्चिमी वैज्ञानिक
तांतववल समझते है, यद्यपि योगी उसे एक प्रकार का प्राण
का विकास समझता है । सासियत और बेग में वह विद्युत्
बारा के समान होता है। यह देखने में आता है कि इस
तांतवबल के धिना हदय नहीं धड़क सकता, रुधिर का
संचार नहीं हो सकता, फेफड़े सॉस नहीं ले सकते, और कोई
अवयव अपना कार्य नहीं कर सकता ! सच बात तो यह
कि इसके विना शरीर-रूपी यंत्र रुक जाता है। इतना
ही नहीं, प्राण के विना मस्तिष्क भी नहीं सोच सकता।
जब ये बातें ध्यान में लाई जायँगी, तव प्राणसंचय का महत्व
लोगों के मन पर जमेगा, ओर तय श्वास-विज्ञान की महिमा
-
4 नाडी-संस्थान उस दर्जे से भी आगे बढ़ जायगी, जिस दर्जे तक आज पाश्चात्य वैज्ञानिक इसकी महिमा बताते है। मा इस ततुजाल के संबंध में भी योगियों को शिक्षा पश्चिमी विशान से आगे बढ़ जाती है। हमारा अभिप्राय उस चक्र 11 से है, जिसे पश्चिमी विज्ञान सौर्य तांतुकेंद्र (Solar है plexus) कहता है, और जिसको वह अनेक तंतुकेंद्रों में * से एक केंद्र मानता है, जहाँ बहुत-से सहानुभावी विभाग के १ तंतु श्राकर एकत्रित होते है। योग शास्त्र कहता है कि यह th सौर्य तातुकेंद्र ततु-विभाग का अत्यत प्रधान अंग (चक) कर है। यह भी एक प्रकार का मस्तिष्क है, और मनुष्य शरीर का मूल कार्य यही करता है । पश्चिमी विज्ञान भी कुछ इसकी महिमा समझने की ओर झुकता जाता है, परंतु पूर्वी योगियों को तो इसकी प्रभुता शताब्दियों से विदित है। कुछ भाधुनिक पश्चिमी विज्ञानियों ने इसे पेट का मस्तिष्क कहा है। यह सौर्य तांतुकेंद्र श्रामाशय के ऊपर, हृदय की धुकधुकी के ठीक पीछे, रीढ की हड्डी अर्थात् मेरदंड के दोनों ओर रहता है। यह वैसी ही सफेद और भूरी गुद्दी भ से बना है, जैसी मनुष्य शरीर को दूसरी गुदी होती है। १६ इसका अधिकार भीतरी सभी अपयतों पर है। साधार हा रीति से जितना कार्य इसके सिपुर्द समझा जाता है, यह । उससे कहीं अधिक कार्य करता है। हम इस सोर्य तातुकेंद्र- इस विषयक योग के विचारों का उल्लेख नहीं करेंगे। फेवत . नि य 1 का
प्राणायाम
इतना ही कह देने हैं कि माण का खज़ाना यहीं पर संचय
होता है । इस सौर्य तांतुकेंद्र पर चोट लगने से मनुष्य
तत्काल मरने हुए देखे गए हैं। पहलमान लोग भी इतना
शान रखते है कि अपने प्रतिद्वंदी के इमी मुकाम पर चोट
पहुँचाकर उसे बलहीन कर देते है ।
इस मस्तिष्क को जो सौर्य नाम पश्चिमी विज्ञानियों द्वारा
दिया गया है, वह बहुत ही सार्थक नाम है, क्योंकि यह
शरीर के प्रत्येक अवयव को चल और शक्ति देता है। प्राण
के लिये मस्तिष्क भी इसी का श्राश्रय लेता है । कभी-न
कभी पश्चिमी विज्ञान भी इस सौर्य तांतुकेंद्र के कर्तव्यों की
पूरे तौर से समझेगा, और इसे उस पदची से कहीं बढ़कर
ऊँची पदवी देगा, जो इस समय इसे उनके अंधों में दी
गई है।
-
.
छठा अध्याय
a
arl
IN
ब
होगा
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नाक और मुंह से श्वास लेना
योगी के श्वास विज्ञान के सर्वप्रथम पाठों में यह एक
प्रधान पाठ हे कि नाक से श्वास लेना चाहिए। यदि मुह
से शास लेने की बादत पड़ गई हो, तो उसे छोड़
देना चाहिए।
श्यास लेने को कल ऐसी बनी है कि मनुष्य को अधि.
फार है कि चाहे मुंह से श्वास ले, चाहे नाक से । परतु
दोनों प्रकार से श्वास लेने के लाभों में जमीन-भासमान
का अंतर है, क्योंकि नाक से श्वास लेने से चल और
स्वास्थ्य लाभ होता है, और मुंह श्वास लेने से बीमारी
और निर्बलता भोगनी पड़ती है।
अभ्यासियों को इस बात के सिखलाने की श्राश्यकता
तो नहीं है कि नाक में श्वास लेना होता है,
सभ्य समाज में इस छोटी सी बात की जानकारी
से भी आश्चर्यजनक अनभिज्ञता है । हम सब प्रकार के
मनुष्यों में बहुतों को ऐसा पाते हैं, जिनकी मुंह से ही
सॉस लेने की शादत पड़ गई है, और जो अपने बच्चों को भी
अपना भयकर और घृणित श्रादर्श दिखा जाते हैं।
पर
प्राणायाम
८
.
उसका मुंह उसे जलता हुआ और गला सूखा हुआ मालूम
होता है। यह कृति के नियम को तोड़ रहा है, और बीमारी
का वीज चो रहा है।
एक बार फिर याद कर लो कि मुंह में श्वसन-यत्रों की
रक्षा के लिये कोई प्रबंध नहीं है, और सर्द हवा, धूल-धकर
एवं कीटाणु बढ़ी आसानी से उस फाटक की राह फेफड़ों
में पहुंच जाते है । इसके विपरीत नासिका और उसके भीतरी
छिद्रों में प्रकृति के पूरे इंतजामाका सबूत मिलता है । नाक
के नथुने पहले तो बहुत ही संकीर्ण होते है, फिर भीतर जा
कर टेढ़े-मेढे घूमे हुए रहते है। शुरू ही में नाक के बाल ऐसी
सावधानी से सड़े रहते हैं कि छनने और चलनी का काम
देते है, देवा से धूल-धकइ, तृण आदि कूड़ा पहले ही
रोक लेते है, और जब साँस भीतर से बाहर आती है, तो
उसी के साथ बाहर फेक देते है। नासिमा केरल चलनी
और छनने ही का काम नहीं देती, किंतु श्वास में ली हुई
हवा को गर्म कर देने का भी बड़ा भारी काम कर देती है।
नासिका की लंबी, संकीर्ण, घूम धुमावाली नालियाँ गर्म
भाई परदे से घिरी रहती है। वह परदा संपर्क होते ही हवा
को गर्म कर देता है, जिससे सर्द हवा गले और फेफड़े
के नाजुक और सुकुमार श्रवयवों को क्षति न पहुंचा सके।
थापने किसी पशु या अन्य जीव को मुंह खोले सोते हुए
कभी न पाया होगा, और न वह मुंह से श्वास ही लेता है।
नाक और मुँह से श्वास लेना सच तो यह है कि केवल मनुष्य ही ऐसे है और मनुष्यों में भी सभ्य हो मनुष्य ऐसे है-जो प्रकृति के कार्य को उलट- पलट देते हैं, क्योंकि जंगली और असभ्य मनुष्य तो करीब- रीव सभी ठीक ठीक सॉस लेते है। यह संभव है कि सभ्य मनुष्यों को यह अस्वाभाविक शास लेने की श्रादत अस्था. भारिक रहन-चलन और मिथ्या आहार-विहार तथा निर्व- लकारी चिलास ओर अतिशय उष्णता के कारण पड़ गई हो। नासिका में जो साफ करनेवाले, छाननेवाले और चालने वाले औजार है, ये हवा को गला और फेफड़े-जैसे सुकुमार और कोमल अपयवों के योग्य बना देते है । जब तक हवा प्रकृति के साफ करनेवाले साधनों द्वारा साफ न हो जाय, तब तक यह उन अवयवों के योग्य नहीं होती। जिस मैल और कूड़ा-करकट को नाक की बालरूपी चलनी और भाई परदे ऊपर ही रोककर अपने पास रख लेते है, वह कूड़ा बाहर भानेवाली हवा के जरिए बाहर चला श्राता है। यदि यह किसी प्रकार से बचकर भीतर चला भी जाता है, तो प्रकृति हमारी रक्षा करती है, और छक उत्पन्न कर देती है, जिससे वह बडे जोर से बाहर फेक दिया जाता है। जब हवा फेफड़ों में प्रवेश करती है, तो बाहर की साधा. रण हया से उतनी ही मिन्न हो जाती है, जितना डिस्टिल किया हुश्रा पानी होज के पानी से भिन्न रहता है। नासिका के पेचीदे और स्वच्छ करनेवाले यत्र, जो हवा की गदी
प्राणायाम
,
को वाहर ही रोक रखते हैं, उतने ही कारगर और श्रावश्यक
है, जितना मुंह का कार्य भोजन करते समय गुठलियों,'
कॉटों और हड़ियों को ऊपर ही रोक लेने और भामाशय में
न जाने देने में कारगर और श्रावश्यक होता है। मनुष्य को
मुंह से उसी प्रकार श्वास न लेना चाहिए, जैसे उसे नाक
द्वारा भोजन न करना चाहिए।
मुंह से श्वास लेने का एक टोप यह भी है कि नाक
के
पूरों से कम काम लिए जाने के कारण ये पूरे या नधुने साफ
और निर्वाध नहीं रह सकते, और गंदगी जमा होने से रुद्ध
हो जाते अर्थात् जयद जाते या वन्द हो जाते, हैं, और
नासिका संबंधी रोगों के योग्य बन जाते हैं। जिस तरह उस
सड़क पर, जिस पर आवागमन नहीं होता, घास-पात
श्रटर-सटर भर जाता है, उसी तरह काम न लिए जाने के
कारण नाक भी मेली और गंदी चीजों से भर जाती है।
जो मनुष्य नाक ही से सॉस लेने की शादत डाल लेते
है, उनकी नाक शीघ्र मैल और गदगी से नहीं भरती,
जो मनुष्य थोड़ा बहुत मुंह द्वारा अम्वाभाधिक रीति से
साँस लेते हैं, और श्रव स्वाभाविक रीति से नाक द्वारा
श्वास लिया चाहते हैं, उनको अपनी मैली नाक साफ करने
के लिये दो-एक बातें घतला टेना प्रारश्यक होगा।
योगियों का तरीका यह है कि चे नाक की राह थोड़ा
पानी चढ़ा लेते हैं, और उस पानी को गले से लाकर,
॥
पातु
नाक और मुंह से पास लेना ४१
। मुंह से निकालकर फेक देते हैं। कोई-कोई हिंदू योगी किसी
पर्तन में पानी रखकर उसमें अपना चेहराडया देता है, और
जेने पिचकारी से पानी खींचा जाता है, वैसे ही वह अपनी
नाक से पानी खींचता है। परंतु इस दूसरे उपाय में बहुत बड़े
- अभ्यास की जरूरत है। पहला उपाय भी इतना ही कारगर
होता है, और उसके वर्तने में प्रासानी भी है।
एक और अच्छा तरीका यह है कि खिड़की खोल ले,
और वही चैठकर पूव सॉस ले। पहले एक नथुने को
उँगली या अँगूठे से बद करके दूसरे नथुने से सॉस ले, तब
दूसरे को बंद करे, और पहली से सॉस ले । इस तरह
अदल-बदलकर देर तक सॉस लेता रहे । इस प्रकार से भी
नाक का मैल और रुकावट दूर होती है।
अगर सर्दी या जुकाम की वजह से नाक बंद हुई हो, तो
घेसिलीन, कपूर या ऐसी ही किसी वस्तु का प्रयोग करना
चाहिए । नकड़िकनी या ऐसे ही और किसी पौदे का रस
नाक से सूंघने से भी छींक श्राकर नाक साफ होती है । यदि
श्राप थोड़ा-सा भी ध्यान देंगे, तो नाक का साफ हो जाना,
और फिर साफ बना रहना कोई कठिन यात नहीं है।
हमने इस नाक द्वारा श्वास लेने के विषय में कई पृष्ठ
लिस डाले, किंतु सिर्फ इसीलिये नहीं कि स्वास्थ्य के सबंध
में नाक द्वारा यास लेना एक श्रावश्यक यात हे, प्रत्युत
इस अभिप्राय से मीकि धागे चलकर इस किताब में जो
प्राणायाम
-
श्वास लेने की कसरतें बतलाई जायगी, वे सब इस नाकर
द्वारा सॉस लेने की कसरतें होगी, और अभ्यासी को नाम
द्वारा श्वास लेना अनिवार्य है। योगी की श्वास-क्रिया क
श्राधार नाक ही से साँस लेना है।
हमारे पाठकों को यदि नाक द्वारा सॉस लेने की श्रादर
न हो, तो पहले वे इसकी आदत डालें और इसको साधारण
चात समझकर छोड़ न दें।
-
सातवाँ अध्याय श्वास लेने के चार तरीके श्वास-क्रिया के विचार में पहले हमें यह देखना प्राव- श्यक है कि श्वास लेने के लिये कौन-सो कारीगरी के प्रवध प्रकृति द्वारा किए गए है, और कैसे श्वास की गति श्रमल में लाई जाती है। खास-क्रिया की कारीगरी पहले (१) फेफड़ों के सिकुड़ने और फैलनेवाली गति और (२) छाती के खोखले, जहाँ फेफड़े रहते हैं, बगलों और अधातल की क्रियाओं में प्रकट होती है । वक्ष स्थल या छाती मनुष्य शरीर के सोखले का वह भाग है, जो गले और पेट के बीच में है, और इसी में फेफडे और हृदय रहते है । यह सोखला एक श्रोर तो रीढ़ की हड़ी से, दूसरी ओर पसलियों और उनकी सहवर्तिनी मुलायम हड्डियों और छाती की हड़ियों से, और नीचे की ओर पेट औरछाती की वीववाली मास की चद्दर से घिरा हुआ है। इसको अक्सर यक्ष स्थल या छाती कहते हैं । इसकी उपमा एक विल्कुल बद कुब्वेदार बॉक्स से दी गई है, जिसका युवा तो ऊपर की ओर रहता है, पीछा रीढ की हड्डी से, सामना छानी की हड़ियों से और बगलें पसलियों से बनती है। FF
।
४४
प्राणायाम
पसलियाँ सख्या में २४ हैं, जो प्रत्येक पार्श्व में १२ होती
है । ये रीढ़ की ही के दोनों ओर से निकलती है । ऊपर
की सात जोडी पसलियाँ तो असली पसलिया है, जो छाती
को हही से श्राफर जुटजाती है। नीचे कीपाँच जोड़ी पस
लियॉ नकली पसलियों कही जाती है, क्योंकि ये छाती की
हट्टी-से नहीं जुटी होती। इनमें से भी ऊपर की दो तो कुरौं
(हदी-सी एक चीज) से, जो हड्डी से जरा मुलायम होती है,
ऊपरवाली पसलो से जुटी होती हैं, पर शेष जुटी भी नहीं
रहती । उनका सामनेवाला छोर बिल्कुल छुटा और खुला
एया स्वतंत्र होता है।
श्वसन-क्रिया में पसलियॉमांसपेशी की दो तोद्वारा, जिन्हें
छाती के भीतर की मांसपेशियों कहने हैं, संचालित
होती हैं।
श्वास को भीतर खींचते समय मासपेशियाँ फेफड़ों को
फैला देती हैं, जिससे फेफड़ों को कोठरियों में जाली जगह
पैदा होने के कारण, उसको भरने के लिये, पदार्थ विज्ञान के
विख्यात नियम के अनुसार, हवा भीतर जाती है । श्वास
लेने में जो मांसपेशियाँ पहले गति करतो हैं, उन्हीं पर सव
कुछ अपलस्थित है। इसलिये सुविधा के लिये इन्हें हम
श्वास लेनेवाली मासपेशियाँ भी कह सकते हैं। विना इन
मांसपेशियों की मदद के फेफड़े नहीं फैल सकते ।
इन्हीं मांसपेशियों के उचित प्रयोग करने और इन्हें
. श्वास लन क चार तरीके अपना वशवर्ती बनाने पर यह श्वास-विज्ञान अधिकांश अवलम्वित है। इनको उचित रीति से संचालित करने से फेफड़ा अपनी सीमा तक पूरा फैल जाता है, और अधिक- से अधिक मात्रा में हवा फेफड़ों में प्रवेश करती है। योगी लोग श्वास लेने की क्रिया चार प्रकार की बतलाते हैं- (१) ऊँची सॉस (२) मध्य-सॉस (३)नीची सॉस (४) योगी की पूरी सॉस पहले तीन प्रकार की सॉसों के विषय में केवल मोटी मोटी बाते कहकर उनका परिचय करा देंगे। हाँ' चौथे तरीके का निस्तार-पूर्वक वर्णन करेंगे, क्योंकि इसी पर योगी के श्वास-विज्ञान की नीव है। (१) ऊँची सॉस सॉस लेने के इस तरीके को पश्चिमी लोग फ्लैवीफ्युलर ( Clavicular ) अर्थात् हॅसली की हही तक की सॉस कहते हैं। इसमें साँस लेनेवाला पसलियों को ऊँचा कर देता है, और हँसी की हडी तथा केयी को ऊपर उठा देता हे । साथ-ही-साथ पेट को भीतर की ओर सींचता और अॅतड़ियो को पेट और छाती के बीचधाले परदे से मिटा देता है, परदा भी थोड़ा ऊपर उठ जाता है। 1
प्राणायाम
-
इस प्रकार सॉस लेने में छाती और फेफड़ों का केवल
ऊपरी भाग, जो बहुत ही छोटा होता है, काम में आता है।
परिणाम यह होता है कि फेफड़ों में बहुत ही कम
हवा प्रवेश पाती है। इसके अलावा छाती और पेट के बीच
का परदा तो ऊपर को उठ जाता है, लेकिन उसका फैलाव
किसी तरह नहीं हो सकता । छाती की बनावट के विवरण
का अव्ययन इस बात को आप ही सिद्ध कर देगा कि इस
प्रकार सॉस लेने में अधिक-से-अधिक प्रयत करना पड़ेगा,
और न्यून-से-न्यून लाभ होगा।
ऊँची सॉस सब सॉसों से निकृष्ट साँस है, इसमें अधिक
से-अधिक शक्ति कम-से-कम लाभ के लिये खर्च करनी
पड़ती है। यह ताक़त वर्वाद करनेवाला और कम फायदा
पहुँचाने वाला तरीका है । पश्चिमी लोगों में यह तरीका
बहुत प्रचलित है । बहुत-सी औरतें इसी प्रकार की सॉस लेने
की शादी है। किंतु गप, पादरी, वकील और अन्य लोग
भी, जिन्हें कुछ अच्छा ज्ञान होना चहिए था, मूर्खता से
इसी प्रकार की सॉस लेते हैं।
योलने और सॉस लेने के अवयवों के बहुत-से रोगों का
पता लगाया जाय, तो सावित हो जायगा कि इसी वाहियाद
तरीके से सॉस लेने के कारण चे रोग पैदा हुए हैं। ऐसी
सॉस लेने में जो कोमल नाजुक अवयवों पर जोर पड़ता
है, उसी से कड़ी और कश धावाज चारों ओर सुनने में
७
श्राती है। ऐसी सॉस लेनेवालों में बहुत से लोग मुंह से
सॉस लेने के आदी हो जाते है।
इस प्रकार को सॉस लेने के विषय में जो कुछ कहा गया
है, उसमें यदि किसी पाठक को कुछ संदेह हो, तो
उसे इसकी परीक्षा कर लेनी चाहिए। अपने फेफड़ों से
कुछ हवा निकाल डालो, दोनों हाथों को बालों में
लटकाते हुए खड़े हो जायो, कंधों पोर हॅसली की बड़ी को
ऊपर उठानो, और तय हवा को भीतर खींचो । तुम्ह मालूम
होजायगा कि जितनी हवा तुम सींच सके हो, वह साधारण
सॉस की हवा से बहुत ही कम है। अब कों और हसली
फी हही को गिरा दो, पोर पूरी सॉस खींची। तब तुम्हें
ऐसा प्रत्यक्ष प्रमाण मिल जायगा, जिसे तुम लिखे और
छपे हुए शब्दों की अपेक्षा बहुत दिन तक स्मरण रख
सकोगे।
(२) मध्य-सॉस
इस प्रकार की श्वास क्रिया को पश्चिमी लोग पसली की
सॉस कहते हैं। यद्यपि यह ऊँची सॉस की अपेक्षा कम
अापत्ति-जनक है, तथापि यह नीची सॉस और योगी की
पूरी सॉस की अपेक्षा निकृष्ट है । मध्य-सॉस में पेट और
छाती के बीच का परदा ऊपर को खिचता है, पेट भीतर
की ओर को दब जाता है, पसलियाँ कुछ-कुछ उठ पाती हैं
और छाती जरा-सा फैल जाती है। यह तरीका उन लोगों
-
ܕ
प्राणायाम
नीची सॉस लेने में फेफड़ों को, पहले वर्णन किए हुए
तरीकों की अपेक्षा और अधिक विस्तृत कार्य मिलता है,
और इसलिये अधिक हवा सॉस के साथ साँचीजाती है। इसी
यात से पश्चिमी लेपकों में अधिकांश यह कहने और
लिखने लगे कि यह नीची सॉस, जिसे 'पेट की सॉस' भी।
कहते हैं, विज्ञान केमत से सर्वोत्तम सॉस है । परतुपूर्वी योगी
इससे भी उत्कृष्ट तरीका बहुत दिनों से जानते हैं। कतिपय
पश्चिमी लेखकों ने भी श्रय इस बात की जान लिया है।
'योगी की पूर्ण सॉस' को छोड़कर अन्य सथ तरीकों में यह
श्रुटि है कि किसी तरीके में भी फेफड़े पूरी-पूरी हवा से नहीं
भर जाते, अधिक से अधिक केवल फेफड़े का एक भाग हवा
से भरता है। यही हाल नीची सॉस का भी है। ऊँची सॉस
से फेफड़ों का ऊपरी भाग भरता है,मध्य-सॉस से फेफड़ों का
मध्यभाग और कुछ ऊपरी भाग भरता है, और नीची सॉस
से केवल निचला और कुछ मध्य-भाग भरता है। यह बात
स्पष्ट है कि जिस तरीके से फेफड़ों के सव अंग हवा से भर
जायें, यही उन सब तरीकों से अच्छा है, जिनसे केवल
कुछ ही भाग भरते है । जिस तरीके से फेफड़ों की सय
जगह पूरी पूरी हवा से भर जाय, जिससे मनुष्य अधिक
से अधिक मात्रा में प्रॉक्सिजन जज्य कर सके, और अधिक
से अधिक मात्रा में प्राण का संचय कर सके, वही तरीका
मनुष्य के लिये अत्यंत मूल्यवान है। योगीलोना जानते है
an
श्वास लेने के चार तरीके
५१
कि पूर्ग सॉस हो का तरीका विज्ञान के जाने हुए तरीकों में
सबसे श्रच्छा
(४) योगी की पूरी सोस
योगी की पूरी सॉस में ऊँची, मध्य ओर नीची सॉम
को सब अच्छी श्रच्छी बातें श्रा जाती है, और केवल
वही चातें छूट जाती है, जो दृपित और श्रापत्ति-
जनक हैं। इस तरीके में श्वास लेने के पूरे यंत्रों से
पूरा काम लिया जाता है-फेफड़ों का प्रत्येक भाग, हवा
की प्रत्येक कोठरी और श्वास लेने की प्रत्येक मांसपेशी
पूरे-पूरे काम में लगाई जाती है। इस प्रकार श्वास लेने
में श्वास लेने की पूरी फल संचालित हो जाती है, और
थोड़ी शक्ति के व्यय से अधिक-से-अधिक लाभ होता है।
छाती का खोखला अपनी पूरी सीमा तक चारों ओर
बढ़ता है, और कल का प्रत्येक भाग अपनी पूरी क्रिया
और पूरा कर्तव्य करता है।
इस प्रकार के श्वास लेने में एक बहुन बड़ी खूबी यह है
कि श्वास लेने के पुट्ठों को पूग पूरा काम मिलता है, और
अन्य तरीकों में इन पुट्ठों काभाग मात्र काम करता है । पूरी
सॉस लेने में और पुट्ठों के साथ-साथ उन पुट्ठों को, जिनके
अधिकार में पसलियाँ हैं, कार्य में अधिक लगे रहना पड़ता
है, जिससे प्रकाश बढ़ता है, फेफड़े फैलते हैं, और
स्थावश्यकता पड़ने पर अवयवों को पूरा सहारा मिलता है।
.
प्राणायाम . - । . इस तरह प्रकृति को उसका वांछित प्रयोग मिल जाता है। कतिपय मांसपेशियों को निचली पलतियों को अपने-अपने स्थान पर स्थिर रखती है, और कतिपय उनको याहर को और मुकाती है। इस तरीके में पेट और छाती के बीच का परदा पूरे अधि कार में और अपना कार्य उचित रीति से संपादित करने के योग्य रहता है, जिससे अधिक सेवा हो सके। पसलियों की काररवाई में, जिसका ऊपर वर्णन किया गया है, निचली पसलियॉ पेट और छाती के बीचवाले परदे के अधिकार में रहती है। उन्हें वह थोड़ा नीचे खींचता है, अन्य पुढे उन्हें अपनी जगह पर थामे रहते हैं, छाती के भीतर के पुढे उन्हें बाहर की ओर दवाते हैं, एवं इस संयुक्त काररवाई से छाती के भीतर का खोखला अपनी हद- भर बढ़ जाता है। इन मांसपेशियों की काररवाई केअलावा छाती भीतर की पेशियों की प्रेरणा से ऊपरवाली पस- लियाँ भी बाहर की ओर दवाई जाती है, जिससे छाती। फा ऊपरी भाग भी अपनी पूर्ण विस्तार-शक्ति पर्यत फैल सकता है। यदि आप चारों सॉस लेने के तरीकों की सासियतों को समझ गए है, तो आप साफ-साफ देख सकते है कि पूरी सॉस के तरीके में शेप तीनों तरीकों की अच्छी-अच्छी बाते संयुक्त है, और उनके अतिरिक्त छाती के ऊपरी भाग, म
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। प्राणायाम इस तरह प्रकृति को उसका वांछित प्रयोग मिल जाता है। कतिपय मांसपेशियॉ तो निचली पसलियों को अपने-अपने स्थान पर स्थिर रसती हैं, और कतिपय उनकोबाहर की ओर मुकाती है। इस तरीके में पेट और छाती के बीच का परदा पूरे अधि- कार में और अपना कार्य उचित रीति से संपादित करने के योग्य रहता है, जिससे अधिक सेवा हो सके। पसलियों की काररवाई में, जिसका ऊपर वर्णन किया गया है, निचली पसलियॉ पेट और छाती के बीचवाले परदे के अधिकार में रहती हैं। उन्हें वह थोड़ा नीचे खींचता है, अन्य पुढे उन्हें अपनी जगह पर थामे रहते हैं, छाती के भीतर के पुढे उन्हें बाहर की ओर दवाते है, पवं इस संयुक्त काररवाई से छाती के भीतर का खोखला अपनी हद- भर बढ़ जाता है। इन मांसपेशियों की काररवाई के अलावा छाती के भीतर की पेशियों की प्रेरणा से ऊपरवाली पस- लियाँ भी बाहर की शोर दवाई जाती है, जिससे छाती फा ऊपरी भाग भी अपनी पूर्ण विस्तार-शक्ति-पर्यत फैल सकता है। यदि आप चारों सांस लेने के तरीकों की खासियतों को। समझ गए हैं, तो श्राप साफ-साफ देख सकते है कि पूरी सॉस के तरीके में शेष तीनो तरीकों की अच्छी-अच्छी बाते संयुक्त है,और उनके अतिरिक्त छाती के ऊपरी भाग, मध्य- ।
योगी की पूरी सॉस कैसे प्राप्त होती है ?
पर चलने के लिये कभी राजी न होगा, और अपने मित्रों
से यही कहेगा कि अपने परिश्रम करने का पूरा लाभ मेने
पा लिया। हम इन सब बातों को अभी से कह देते है कि
आप इस साँस की अावश्यकता और महिमा को पूर्ण रीति
से समझ ले, और इसे ज्या-त्यों करके छोड़कर इस किताब
में आगे दिए हुए चित्ताकर्षक अभ्यासों में न लग जायें।
हम फिर आपसे कहते है कि ठीक रीति से कार्य प्रारंभ
करो, तो ठीक नतीजा उठानोगे, और यदि प्रारभ की नींव
ही में असावधानी करोगे, तो शीन या देर में तुम्हारा भवन
गिर जायगा।
योगी की पूरी सॉस की शिक्षा देने
लिये उचित यह
होगा कि पहले सीधी सॉस ही के लिये सीधे-सादे उपदेश
दिए जायें, और तव पूरी सॉस के संबंध में साधारण बातें
यतलाई जायें। फिर ऐसे अभ्यास कराए जायें, जिनसे छाती,
पेशियों और फेफड़ों की पुष्टि हो । अधूरी सॉस लेने के
कारण ये छाती, फेफड़े और पेशियों अपुष्ट दशा में पड़ी
हुइ हे । ठीक इसी स्थान पर हम यह भी कह देना चाहते हैं
कि यह पूरी सॉस अस्वाभाविक-जबर्दस्ती को सॉस नहीं
किंतु इसके विपरीत असली सॉस लेने का तरीका
अनुकूल है । स्वस्थ जगली युवा और सभ्य
ये दोनों इसी तरीके से सॉस लेते
ने रहने, चलने और वस्त्र पहनने के
श्राठवा अध्याय
योगी की पूरी तॉस कैसे प्राप्न
योगी की पूरी सॉस ही योगी के :
का मूल आधार है। शिष्य को पहले।
पास कर लेना और पूरी तरह से
लेना चाहिए। तभी वह इस पु.
तरीकों से लाभ उठाने की श्राशा
इसे अधूरा ही सीखकर संतुष्ट न है
इसके अभ्यास में दिलोजान से
जिससे पूरी सॉस का लेना उसके
तरीका हो जाय। इसकी
ain, समय और धैर्य
में कभी कोई वस्तु प्राप्त
के जानने का दूसरा कोई
श्रतः शिष्य को इसका अभ्यास
ये कटिबद्ध हो जाना चाहिए, .
। बाल विज्ञान को अच्छी
बड़े-बड़े लाभ होते है। जिस मन
"
.
योगी की पूरी सॉस कैसे प्राप्त होती है ?
पर चलने के लिये कभी राजी न होगा, और अपने मित्रों
से यही कहेगा कि अपने परिश्रम करने का पूरा लाभ मेने
पा लिया। हम इन सब बातों को अभी से कह देते है कि
श्राप इस सॉस की आवश्यकता और महिमा को पूर्ण रीति
से समझ लें, और इसे ज्यों-त्यों करके छोड़कर इस किताब
में भागे दिए हुए चित्ताकर्षक अभ्यासों में न लग जायें ।
हम फिर आपसे कहते है कि ठीक रीति से कार्य प्रारम
करो, तो ठीक नतीजा उठानोगे, और यदि प्रारंभ की नींव
ही में असावधानी करोगे, तो शीघ्र या देर में तुम्हारा भवन
गिर जायगा।
योगी की पूरी सॉस को शिक्षा देने के लिये उचित यह
होगा कि पहले सीधी सॉस ही के लिये सीधे-सादे उपदेश
दिए जायें, और तब पूरी सॉस के सबंध में साधारण यातें
यतलाई जायें। फिर ऐसे अभ्यास कराए जायें, जिनसे छाती,
पेशियों और फेफड़ों की पुष्टि हो । अधूरी सॉस लेने के
कारण ये छाती, फेफड़े और पेशियाँ अपुष्ट दशा में पड़ी
हुई है । ठीक इसी स्थान पर हम यह भी कह देना चाहते है
कि यह पूरी सॉस अस्वाभाविक-जबर्दस्ती की सॉस नहीं
है, किंतु इसके विपरीत असली सॉस लेने का तरीका
प्रकृति के अनुकूल है । स्वस्थ जगली युवा और सभ्य
मनुष्य का स्वस्थ वचा, ये दोनों इसी तरीके से साँस लेते
हैं । परतु सभ्य मनुष्य ने रहने, चलने और वस्त्र पहनने के
W
.
प्राणायाम
अस्वाभाविक तरीके ग्रहण कर लिए, और इसलिये
वह अपने असली तरीकों से हाथ धो बैठा । हम यहाँ
अपने पाठकों को यह स्मरण करा देना चाहते हैं कि पूरी
सॉस में यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक श्वास में फेफडे
पूरी-पूरी हवा से भर दिए जार्य । पूरी सॉस द्वारा श्राप
रवा की औसत मात्रा भीतर खींच, और उसे फेफड़े के
सब भागों में वितरित कर दें, चाहे वा थोड़ी हो या बहुत।
परंतु दिन में कई बार तो अवश्य रंखलाबद्ध पूरी-पूरी सॉस ।
लेनी ही पड़ेगी । जव मौका मिल जाय, तभी इसका
अभ्यास कर लेना चाहिए । इससे शरीर अच्छी रीति से
और अच्छी दशा में रहना है।
नीचे लिखी हुई कसरत से श्राप समझ जायँगे कि पूरी
साँस क्या चीज है-
(१) सीवे अकड़कर खड़े हो, या बैठ जाओ । नाक
से धीरे-धीरे लगातार हवा पीचने लगो, पहले फेफड़ों के
निचले भाग को हवा से भरने जानो। यह ऐसे होगा,
कि पेट और छाती के वीचनाले परदे से काम लो, और
उसके द्वारा नीचे के पेट के पदों पर थोड़ा दवाव डालो,
जिससे पेट भागे को थोड़ा निकत श्रावेगा। फिर उसी
सिलसिले में, जिसमें तार न हटे, फेफड़ों के मध्य-भाग को
मरो, जिससे निचली पसलियॉ, छाती की हड्डी पोर छाती
चादर को फेल जाय । फिर उसी सॉस में फेफड़ों के ऊपरी
।
योगी की पूरी सॉस कैसे प्राप्त होती है ? भाग को भरो, जिससे छाती का ऊपरी भाग थोड़ा आगे निकल श्रावे, ओर छाती ऊपरी छ या सात जोडी पसलियों के साथ ऊपर उठ जाय । अतिम गति में पेट का निचला भाग कुछ थोड़ा सा भीतर दव जायगा, पर इस गति से फेफड़ों को सहारा मिल जायगा, और फेफड़ों का ऊँचा-से-ऊँचा भाग भी हवा से भर जायगा। पहले पढ़ते समय तो यह मालूम होगा कि इस सॉस में पृथक्-पृथक् तीन गतियाँ है, परंतु यह महज नयाल नहीं है। हवा का भीतर खींचना लगातार हो दुश्रा करता है, और छाती का समस्त सोसला, नीचे दवाए हुए परटे से लेकर छाती के उच्चतम शिखर तक, जो हॅसली की हड़ी के पास है, एक चाल में फैलता चला जाता है । हिचक हिचक- फर मत साँस लो, कोशिश करो कि लगातार धीरे-धीरे साँस भीतर प्रवेश करती रहे। अतसि को तीन चालों में चॉटने की दिक्षत अभ्यास द्वारा रफा हो जायगी, और लगातार एक सॉस सिद्ध हो जायगी। थोडा-सा श्रभ्यास फरने पर तुम दो सेकंड में पूरी सॉस भीतर सींच सकोगे। (२) कुछ सेंकड तक सॉस को भीतर ही रोक रक्खो। (३) छाती को स्थिर स्थिति में रखे हुए और पेट को धोड़ा-सा भीतर खींवकर बहुत धीरे धीरे सॉस को बाहर निकालो, और ज्यों-ज्यों हवा बाहर आती जाय, त्या त्या पेट प्राणायाम भीतर की ओर दबता जाय । जब कुल हवा बाहर आ जाय, तव छाती और पेट को ढीला कर दो । थोड़ा अभ्यास करने से इस कसरत का यह भाग श्रासान हो जायगा, और जर एकवार इसकी गति प्राप्त हो जायगी, तब फिर बाद को थोडी ही इच्छा करने से यह आसानी से होने लगेगी। यह बात देखने में श्रावेगी कि इस प्रकार सॉस लेने में श्वास-यंत्र के कुछ भागों को काम में लग जाना पड़ता है, और फेफड़ों के कुल भागों को, यहाँ तक कि दूर-से-दूर- वाली कोठरी को भी, काम करना पड़ता है । छाती का खोखला चारों तरफ फैलने लगता है। यह भी आप देखेंगे, कि यह पूरी सॉस एक ऐसी सॉस है, जिसमें ऊँची, मध्य और नीची, तीनों सॉसें सम्मिलित है, और तीनों एक दूसरे से बड़ी तेजी के साथ ऊपर लिखी हुई तरतीब से इस प्रकार जुट जाती है कि एक लगातार और पूरी साँस बन जाती है। अगर श्राप पक बड़े आइने के सामने बैठकर इस लॉल का अभ्यास करेंगे, तो श्रापको बड़ी मदद मिल जायगी। यदि अपने हाथों को हलका हलका पेट पर रक्खे रहेंगे, तो आपको सॉस के साथ-साथ पेट की गति भी मालूम होती रहेगी। लॉस खींचने के अत में कभी कंधों को थोड़ा ऊपर उठा देना अच्छा होगा। इससे हॅसली की हड्डी भी उठ जाती है, और दाहने फेफड़े के ऊपरपाली लोती तली भी हवा N योगी की पूरी सॉस कैसे प्राप्त होती है ? घुम जाती है । इमी छोटी ललरी में ही कभी-कभी ट्यूबर- फ्यूलोसिम (Tuberculosis)-नामक यीमारी फैलती है। गुरुशुम में आपको इन पूरी मॉम के प्रात करने में थोड़ी घटुन कठिनाइयाँ पढ़ेगी, परतु थोड़े अभ्यास से आप पो हो जायेंगे, और जर श्राप एकवार इस तरीके को ग्रहण कर लेंगे, तय कदापि इसे छोड़कर भहे तरीकों पर जाने को राजी न होंगे। .
-
।
नवा अध्याय
पुरी सॉस का शारीरिक प्रभाव
पूरी लॉस की महिमा जितनी ही कही जाय, थोड़ी है।
परंतु जिस शिप्य ने पहले कही हुई बातों का मनन कर
लिया है, उसको अब और महिमा बतलाने की आवश्यकता
भी नहीं है।
पूरी सॉस लेनेवाला-पुरुष हो या स्त्री-क्षय-रोग और
फेफड़ों के अन्य रोगों से तो बिलकुल ही निर्भय हो जाता
है, सर्दी-जुकाम होने की सभावना भी जाती रहती है । क्षय
रोग शरीर का जीवट कम होने से होना है, और जीवट
कम हया के अंदर जाने से कम होता है। जीरट ही कम होने
के कारण नाना प्रकार के रोगों के कीटाणु शरीर पर पाक
मण कर बैठने है । अधूरी मॉस लेने से फेफड़े का अधिक
भाग कार रहता है, और ऐसे ही भाग बीमारियों के
कीटाणुओं का श्राधादन करने है। ये कीटाणु रग्ण अंग में
डेरा जमाकर फिरतोतहलकाही मचा देते हैं। यदि फेफड़ों के
अवयव अच्छे सम्थ रहेंगे, तो वे कीटाणुनों को दवा बैठेंगे।
फेफड़ों के अंगों को अच्छा और स्वस्थ रखने का यही एक
उपाय है कि उनसे काम ले-लेकर उन्हें अब इद वताप रहे।
पूसात का शारशारक प्रभाव
-
सब क्षय-रोगवालों की छाती संकीर्ण हुश्रा करती है।
इसका क्या अर्थ है ? सीधा-सादा इसका यही अर्थ है कि
इन रोगियों ने कुरीति से साँस ली, जिससे इनकी छाती
उन्नत और विस्तृत न हो सकी । जो मनुष्य पूरी सॉस का
अभ्यास रसता है, उनकी छानी पूरी, चोड़ो होगी । यदि
सकीर्ण छातीवाला मनुष्य भी पूरी सॉस का अभ्यास
करेगा, तो उसकी छाती भी उन्नत और विस्तृत होकर उचित
विस्तार की हो जायगी। ऐसे मनुष्यों को तो, यदि उन्हें
जीवन से प्रेम है, अवश्य छाती की उन्नति करनी चाहिए।
जब कभी देखो कि सर्दी लग जाने का सयोग हो गया है,
तो
पूव जोर सं पूरी सॉस की कसरत कर डालो, फिर
श्राप सर्दी-जुकाम से बच जायगे । जव सर्दी लग जाय,
तय जोर से इस कसरत का करे, तो तमाम शरीर में उष्णता
श्रा जायगी । अगर जुकाम हो भी गया हो, तो एक दिन
निराहार रहो, और खूब इस कसरत को करो। जुकाम
अच्छा हो जायगा।
रुधिर की भलाई-घुराई फेफडो द्वारा काफी ऑक्सिजन
की पूर्ति पर अपलवित हे । यदि पून में कम प्रॉक्सिजन
पहुँचती रहेगी, तो वह शहिहीन हो जायगा, गदगी से
भर जायगा, शरीर में पुष्टि न पहुंचने से शरीर निर्वल
हो जायगा, बहुधा विपैला हो जायगा, क्योंकि उसकी
गंदगी दूर तो होगी नहीं, उलटे विकार उत्पन्न कर देगी।
प्राणायाम . चूंकि कुल शरीर और उसके प्रत्येक अंग और अवयव पु के लिये रुधिर ही पर निर्भर रहते हैं, इसलिये गदा रुचि फुल शरीर में विकार उत्पन्न कर देगा। इसकी सरल अं सादी दवा यही है कि पूरी सॉस का अभ्यास करो। अधूरी सॉस से भामाशय और दूसरे पोपणकारी श्रवन बहुन ही दूपित हो जाते हैं। श्रोक्सिजन की कमी के कार वे केवल निर्बल ही नहीं रहते, किंतु चूंकि रक्त में से । का ऑक्सिजन लेना परम श्रावश्यक है, और तभी वा हुला अन्न पचने और रस चनने के योग्य होता है, इसलि यह बात तुरंत समझ में आ जायगी कि अधूरी सॉस लेने कैसे पाचन-क्रिया और रस-निर्माण में बाधा पड़ती है। य रस निर्माण ही ठीक न हो, तो शरीर की पुष्टि दिन-पर-दि कम होती जाती और मंद होने लगती है, शारीरिक व क्षीण होने लगता है, शक्ति घट जाती ओर मनुष्य ६ स्वास्थ्य छीजने और गिरने लगता है। क्यों ? उचित साँ न लेने के कारण। अनुचित सॉस लेने से झान और शक्ति का ततुजाल में क्षीण हो जाता है, क्योंकि मस्तिफ, मेरुदंड, ततु-केंद्रावल और सारा तंतुजाल जब रुधिर से अधूरी पुष्टि पाते हैं, त- अपनी धाराओं को उत्पन्न करने, संचित करने और प्रवाहित करने में अक्षम हो जाते हैं। यदि काफी श्रॉक्सिजन फेफई द्वारा न ग्रहण की जायगी, तो वे अवश्य ही निल र ।
. पूरा माम फाशातरफनगाव जायेंगे। एक पान और भी है, जिसने न्ययं नंतुओं की शनि-धाराएँ, पल्लियों फदिए कि या शनि, जहाँ से ये धाराएं उत्पन्न होती, अधरी सांस लेने से पहन ही क्षीण हो गती है। परंतु यह मरा (प्राण फा) विषय है, और मा पर्णन अन्य अध्यायों में किया जायगा । याहाँ हमारा अभिप्राय गल इस यात के दिग्यलाने का है कि अनुचित मांस लेने से सारे तनु विभाग का यत्र दो शाति-धारा को यापन करने के अयोग्य हो जाता है। जननेन्द्रियाँ काममम्त शुगर मष्टल पर प्रभायरसना इतना प्रत्यक्ष है कि उसके विशेष धान की यहाँ श्रावश्यकता नहीं है। परंतु यहाँ भी हम इतना कह सकते है कि जननेन्द्रियों फा निर्मल पढ़ जाना अपनी प्रतिशिया द्वारा सारे शरीर पर बुरा असर डालता है। पूरी साँस एक ऐसा प्रवाह या नारसाम्य उत्पन्न कर देती है, जिससे शरीरस्यत्र का यह खंड भी अच्छी स्थिति में श्रा जाता है, और यही प्रकृति का पास उपाय इसको दुरुस्ती का है। पहले से ही यह यात देखी जा सकती है कि जय जननेन्द्रियाँ चलाती और शप्ति- चाली होती है, तो उन्हीं को प्रतिक्रिया से सारा शरीर भी तेजपात हो जाता है। इससे हमारा यह अभिप्राय नहीं कि इस श्वास क्रिया से नीच कामवृत्ति जागृत होती है। यह बात कदापि नहीं । योगी लोग ब्रह्मचर्य और पवित्रता के पक्ष- पानी होते है, और पाशविक कामवृत्ति को अपने पश प्राणायाम में रखना जानते हैं। परंतु कामवृत्ति को अधिकार में रखने का अर्थ नपुसकता नहीं है। योगशिक्षा यह बतलाती है कि जिस पुरुष या स्त्री की जननेन्द्रिय में कामशक्ति पूर्ण और स्वस्थ है, वह अपने को और भी प्रवल नियत्रण से अपने अधिकार में रख सकती है। योगियों का यह विश्वास है, कि अधिकांश कामातुरता पूरे स्वास्थ्य की कमी के कारण होती है, और यह व्यभिचार जननेन्द्रियों की रुग्णता का परिणाम है, न कि स्वास्थ्य का । इस प्रश्न पर तनिक सार धानी से विचार करेंगे, तो मालूम हो जायगा कि योगी का कथन सच है। यहाँ इस विषय का सविन्तर विवरण देने' के लिये स्थान नहीं। परंतु योगी लोग जानते है कि काम- शक्ति को सुरक्षित करके, उसे मनुष्य के चित्त और शरीर के पुष्ट करने में लगा सकते हैं, और इस शहि को व्यभिचार- पथ में लगाए जाने से, जैसा कि मूर्ख लोग लगाया करते है, रोक सकते है। लोगों ने जैसी इच्छा प्रकट की है, उसके अनुसार, इस पुस्तक में, हम योगियों का एक प्रिय अभ्यास देंगे। परंतु कोई शिष्य चाहे योगी को ब्रह्मचर्य और पवित्रता की शिक्षा को माने या न माने, उसे यह बात तो विदित ही हो जायगी कि इस पूरी सॉस के द्वारा शरीर के का समुचित स्वास्थ्य अन्य उपायों की अपेक्षा अधिक बढ़ता है । स्मरण रहे, हम समुचित स्वास्थ्य का पटना कहते है, न कि उसकी अनुचित वृद्धि । व्यभिचारी लोगों को तो समुचित इन अगों
पूरी सॉस का शारीरिक प्रभाव
का अर्थ इच्छा का घटना मालूम होगा, न कि पढ़ना।
परतु निर्वल इंद्रियवाले पुरुष या स्त्री को ऐसा ज्ञात होगा
कि उसकी उस निर्बलता से, जो आज तक उसे मनहूस
बनाए हुई थी, उसका छुटकारा हो रहा है, और उसके
शरीर पर तेज चढ़ रहा है। हमारे भाव को लोग बुरा न
समझे या धुरी जगह पर इसका उल्लेख न करें, यही
हमारी कामना है । योगी का यह उद्देश्य है कि संपूर्ण
शरीर बलवान् रहे, उसके सब अग बलिष्ठ रहे, यह
बलवान् शरीर अपनी प्रबल इच्छा के पूरे अधिकार
में रहे, और उच्च भावनाओं को संजीवनी शक्ति संचालित
होती रहे।
पूरी सॉस के अभ्यास में, सास को भीतर खींचते समय,
पेट और छाती के बीच कापरदा जरा सा नीचे वाया जाता
है, जिससे यह कलेजा, श्रामाशय और कुछ अन्य अवयवों
पर हलका दवाव डालता है, फेफड़ों की गति के साथ-साथ
इन अवयनों में हलका मर्दन उत्पन्न करता है, ये अपने कार्य
में उत्तेजित रहते हैं, और इनका कार्य उत्साहित हुआ करता
है । प्रत्येक श्वास के भीतर खींचने में यह कसरत हुश्रा
करती है, जो पोपण करनेवाले और मलत्याग करनेवाले
अवयवों में अनुकूल रुधिर सवार करती है। किंतु ऊँची या
मध्य सॉस की क्रियाओं में इस भीतरी मर्दन का अवसर
ही नहीं मिलता।
,
प्राणायाम
-
।
श्राजकल पश्चिमी दुनिया शारीरिक शिक्षा (व्यायाम )
की और बहुत ध्यान दे रही है । यह बड़ी अच्छी बात है।
पर अपने उत्साह में लोग यह न भूल जाये कि बाहरी
शरीर की कसरत ही सब कुछ नहीं है । भीतरी अवयवों को
भी व्यायाम की अावश्यकता है। यह स्वाभाविक व्यायाम
समुचित रीति से श्वास लेने से ही होता है। छाती और पेट
के बीच का परदा ही इस भीतरी व्यायाम का साधन है।
इसकी गति पोपण करनेवाले और मलत्याग करनेवाले श्रय
यवों को संचालित कर देती है, उनका मर्दन और मधन
प्रत्येक श्वास के जाने और पाने में करती रहती है, और
उनमें दवाव पहुँचाकर लहू भरती है, और फिर उसे निचोट
डालती और अवयवों को चौकन्ना रखती है। चाहे
कोई भी अवयव अथवा अंग हो, जिसकी कसरत न
होगी, वह निकम्मा हो जायगा, और उचित रीति से काम
न कर सकेगा । इसलिये यदि कथित परदे द्वारा भीतरी
अवयवों का व्यायाम न कराया जायगा, तो ये अवयवरुण
हो जायेंगे। पूरी सॉस लेने से परदे को उचित गति प्राप्त
होती है, और मध्य तथा ऊपरी छाती को भी कसरत
मिल जाती है। यह सॉस अपने कार्यों द्वारा "पूरी" है।
केवल पश्चिमी विज्ञान के विचार से यदि पूर्वी शास्त्रों
पर न भी ध्यान दिया जाय, तो भी-योगियों का यह पूरी
सॉस का तरीका प्रत्येक पुरुष, स्त्री और बालक के लिये,
,
.
पूरी सॉस का शारीरिक प्रभाव जिसने स्वास्थ्य प्राप्त किया और जो उसे सुरक्षित रखना चाहता हो बहुत ही आवश्यक है । सहनों मनुष्य तो इसको सरलताही के कारण इस पर ध्यान नहीं देते। चे भाडार- का भाडार धन पेचीदे और खचीले उपायों द्वारा स्वास्थ्य की तलाश में सर्च कर डालते है । लेकिन तदुरस्ती तो पास ही सही है, उसकी परवा ही नहीं करते । सच है, जो पत्थर यो.ही फेका जा रहा है, यही तंदुरुस्ती के मदिर के कोने का मुख्य पत्थर है। । +
दसवाँ अध्याय
योग-विद्या का कुछ अश
हम नीचे तीन प्रकार की सॉस बतलाते है, जिनका
योगियों में बहुत ही प्रचार है। पहली तो योगी की विण्यात
सफाईवाली सॉस है, जिसकी बदौलत योगियों के फेफड़े में
प्रवल दृढ़ता पाई जाती है । श्वास के प्रत्येक व्यायाम के
अंत में वे इस सॉस को काम में लाया करते है। इस पुस्तक
में भी हमने उन्हीं की पद्धति को कायम रक्खा है। हम
योगी के ज्ञान और शक्तितंतुओं का चल चढ़ानेवाले व्यायाम
का भी उल्लेख करते है । यह व्यायाम बहुत काल से
योगियों में प्रचलित चला पाता है। पश्चिमी शारीरिक
व्यायामवाले भी इसमें अपनी ओर से कुछ नहीं बढ़ा सके।
वटुतों ने तो योग के गुरुओं से इसी को सीखा है । फिर
हम योगी के वचनेंद्रियों को पुष्ट करनेवाले व्यायाम को देते
हैं, जिसके कारण ही उच्च योगियों के वचन ऐसे मधुर और
प्रिय स्वर में हुआ करते है। हम नो समझते है कि यदि
इस पुस्तक में इन तीन फसरतों के सिवा और कुछ भी न
होता, तो भी यह पुस्तक पश्चिमी शिप्यों के लिये अनमोल
होती। इन तीनों फसरतों को हमारी भेट-स्वरूप (अथवा
योग विधा का पुछ अंश प्रसाद न्यरूप) ग्रहण कीजिए, और इनसा अभ्यास कीजिए। योगी के फेफडों को साफ करनेवाली सॉस योगियों में एक प्रकार को घास किया प्रचलित है, जिसे घे उस समय फरते हे, जय उन्हें फेफड़ों में पवन प्रवाह या सफाई करने की आवश्यकता होती है । और कसरतों में प्रत्येक कसरत के अंत में भी ये लोग इसे किया करते है। दमने उन्हीं लोगों का अनुकरण इस पुस्तक में किया है। साँस की इस क्रिया से फेफड़ों में पवन प्रवाह किया जाता है, जिससे फेफड़ों की सफाई हो जाती है, फेफड़ों की कोठ- रियों उत्तेजित हो जाती है, और श्वान लेनेवाले अवयवों पर चोकनेपन की रंगत चढ़ जाती एवं उनके साधारण स्वा. मध्य की उन्नति हो जाती है । इसके अतिरिक्त यह सारे शरीर को ताजा बना देती है । चप्ता लोग और गवैए इस सास-क्रिया को बहुत सुसदायो पावेंगे, विशेपफर उस दशा में जव चोलते बोलते या गाते-गाते उनके शास लेनेवाले अवयव थक गए हों। (१) पूरी साँस लो। (२) हवा को कुछ सेकड तफ रोक रक्खो। (३) होठों को समेट लो, जैसे सीटी बजाने में समेटते हे, परतु गाल न फूलने पावें । तय होठों के बीच के छिद्र से थोड़ी ह्या बड़े जोर से फेको। फिर थोड़ा रुक जाओ, शेष ७० प्राणायाम हवा भीतर ही रुकी रहे। फिर थोड़ी हवा फेंको । जब तक कुल हवा न निकल जाय, तव तक इसी प्रकार करते जानो। याद रक्खो कि होठों के बीच के छिद्र से हवा निकालने में बहुत बड़ा जोर लगाना होगा। जव कोई मनुष्य थक गया हो, और उसकी शक्तियाँ खर्च हो गई हों, उस समय यह व्यायाम कर लेने से फिर वह मनुष्य ताजा हो जायगा। इस बात को करके श्राजमा लीजिए, तब आपको निश्चय हो जायगा । इस कसरत को करते-करते अभ्यास द्वारा अच्छी तरह ठीक कर लेना चाहिप, जब तक कि यह स्वाभाविक रीति और प्रासानी सेम होने लगे, पयोंकि इस पुस्तक में दी हुई अन्य बहुत-सी कसरतों के अंत में इसको करना होगा । इसलिये इसे वटुत अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। शक्ति और ज्ञान-तंतनों में शक्ति भरनेवाली योगी की श्वास-क्रिया यह वह कसरत है, जिसकी महिमा को योगी लोग भली भॉति जानते हैं। यह मनुष्य के ज्ञानतंतुओं और शक्ति- तंतुओं को उत्तेजित करनेवाली सर्वोत्तम कसरत है । उसका अभिप्राय तंतुजाल को उत्तेजित करना और तंतुओं की शक्तियों को बढ़ाना है। इस कसरत से प्रधान- प्रधान तांतर केंद्रों पर उत्तेजनशील दवाव पड़ता है, जिससे समन्त ततु-जाल उत्तेजित और शक्तिसंपन्न हो
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।
J
७२
प्राणायाम
को हवा से भरे रहने पर अवलंबित है। इस कसरत को
जब आप करेंगे, तब इसकी महिमा समझेगे । यह अद्वि-
तोय सुखदायिनी और शक्तिवर्द्धिनी है।
योगी की वचनेंद्रिय-श्वासक्रिया
योगी लोग अपनी आवाज को दुरुस्त करने के लिये
एक प्रकार की श्वास-क्रिया करते हैं । ये लोग अपनी'
श्राश्चर्यजनक नावाज़ के लिये विरयात होते हैं । उनकी
अावाज दृढ़, मधुर, साफ और तुरही के शब्द की भॉति ।
दूर तक पहुँचनेवाली होती है। वे इस भौति फी एक
श्वास क्रिया करते हैं, जो उनकी वाणी को मधुर, सुन्दर और
लोचदार बनाती है, और उसमें एक अकथनीय विचित्र
प्रवाह का गुण भर देती है। साथ-ही-साथ इसमें दृढ़ता
की भी वृद्धि कर देती है। नीचे लिखी हुई कलरत ऊपर
वर्णन किए हुए गुणों को कुछ समय में प्रदान करेगी,
सावधानी से इस कसरत को करना होगा। पह समझ
रखनाचाहिए कि यह कसरत कभी-कभी कर लीजाय, इसे
श्वास लेने का नियमित तरीका ही न बना लेना चाहिए।
(१) बहुत धीरे-धीरे पूरी सॉस नाक द्वारा भीतर खींचों।
पूरी सॉस खींचने में जहाँ तक अधिक समय लेते पने, लो।
(२) कुछ सेकंड तक रोक रक्खो।
(३) सूव मह फैलाकर एकदम से कुलं हवा को बड़े
जोर से बाहर निकाल दो।
योग-विद्या का कुछ अश
७३
(४) सफाईवाली श्वास किया द्वारा फेफड़ों को धाराम
दो। बोलने और गाने में कैसे शन्द उत्पन्न किया जाता है,
इस विषय पर जो योगियों के गंभीर विचार है, उनमें पूरा
प्रवेश न करके हम यहाँ पर इतना ही कह देते है कि
अभ्यास से वे जान गए है कि वाणी के स्वर, गुण और
शक्ति केवल गब्दोत्पादक गले के अवयनों ही पर अवलं-
वित नहीं, किंतु चेहरे की मांसपेशियों ( मांस के पुट्ठों)
का भी उस विषय से बहुत कुछ सवव है। कतिपय
चोदी छातीवाले मनुष्य बहुत निर्जीव वाणी बोलते हैं,
ओर दूसरे, जो उनको अपेक्षा छोटी छातीवले है, ऐसी
जोरदार और सुंदर आवाज पैदा करते हैं कि सुनार
श्राश्चर्य होता है। नीचे एक उदाहरण दिया जाता है,
जो परीक्षा करने के योग्य है। पक श्राइने के सामने सड़े
हो जाश्रो, फिर अपने होठों को समेटकर मीटी बजानो.
और अपने मुंह की शक्ल और चेहरे के प्राकार-विकार
को गौर से याद करते जानो। तब उसी प्रकार बोलो
या गाश्रो, जैसा तुम स्वामाविक रीति से करते हो, ओर
दोनों का अंतर देखो। भिर कुछ मिनट तक सीटी बजायो,
ओर तव चिना अपने होठों और चेहरे की स्थिति को बदले
थोड़ा फिर गानो। तब देखोगे कि कैसी लहरदार, सुरीली,
साफ और संदर आवाज पैदा हो गई।
-
॥
और
७२
प्राणायाम
को हवा से भरे रहने पर अवलंचित है। इस कसरत को
जव श्राप करेंगे, तब इसकी महिमा समझेगे। यह अद्वि
तोय सुखदायिनी और शक्तिवर्द्धिनी है।
योगी की वचनेंद्रिय-श्वासक्रिया
योगी लोग अपनी आवाज़ को दुरुस्त करने के लिये
एक प्रकार की श्वास-क्रिया करते हैं । ये लोग अपनी
श्राश्चर्यजनक आवाज़ के लिये विरवात होते है । उनकी
आवाज़ दृढ़, मधुर, साफ और तुरही के शब्द की भॉति
दूर तक पहुँचनेवाली होती है । वे इस भौति की एक
श्वास क्रिया करते हैं, जो उनकी वाणी को मधुर, सुन्दर
लोचदार बनाती है, और उसमें एक अकथनीय विचित्र
प्रवाह का गुण भर देती है। साथ ही साथ इसमें दृढ़ता
की भी वृद्धि कर देती है। नीचे लिखी हुई कजरत ऊपर
वर्णन किए हुए गुणों को कुछ समय में प्रदान करेगी,
सावधानी से इस कसरत को करना होगा। पह समझ
रखनाचाहिए कि यह कसरत कभी-कभी कर लीजाय, इसे
श्वास लेने का नियमित तरीका ही न बना लेना चाहिए।
(१) बहुत धीरे-धीरे पूरी सॉस नाक द्वारा भीतर खींचों।
पूरी सॉस खींचने में जहाँ तक अधिक समय लेते सने, लो।
(२) कुछ सेकंड तक रोक रक्सो।
(३) खूब मह फैलाकर एकदम से कुले हवाको वडे
ज़ोर से बाहर निकाल दो।
योग-विद्या का उछसंग
(१) सफाईवाली बामनियाहाग फेफड़ों को श्रागम
दो। बोलने और गाने में मेट उन्मान किया जाता है,
इस विषय पर जो योगियों के गंमीर विचार है, उनमें
पूरा
प्रवेश न करके दम यहाँ पर इतना ही कद देने ६ कि
अभ्यास से वे जान गप है किवाणी के म्बर, गुण श्रीर
शक्ति केवल गटोत्पादक गले के अश्या ही पर अपलं-
पिन नहीं, किंतु चहरे की मांसपेशियों ( मान के पुत्रो)
का भी उस विषय से बहुत पुर मंयंत्र । कतिपय
चौड़ी छातीवाले मनुष्य यहुन निय यागी योगत it;
और दूसरे, जो दनको अपेक्षा छोटी छातीघरोगी
जोरदार और सुंदर श्राराज पैदा करने है कि सुगकर
श्राश्चर्य होता है। नीचे एक उदाहरगा दिया जाता है
जो परीक्षा करने के योग्य है। एक आइने के सामने गई
हो जायो, फिर अपने होटों को समेटफर नीटी पगाशो.
और अपने मुंह की शह और चहरे के साकार fastr
को गौर से याद करने जायो। तय उसी प्रकार योता
या गायो, जैसा तुम म्यामायिक रीनि से करने को गोर
दोनों का अंतर देखो। भिरपुछ मिट तक गोरी पाने,
और
नर पिना अपने होठों और चहरे की स्थितियोमासे
थोड़ा फिर गायो। तय देगोगे कि मी रारदार, सुनो,
माप और सदर शायात पैदा हो गई।
.
ग्यारहवाँ अध्याय योगियों की प्रधान श्वास-क्रियाएँ नीचे लिखी हुई सात फसरतें योगियों को बहुत प्यार हैं। इनसे फेफड़े, पुढे, जोड़ और हवा की कोठरियाँ उन्न और पुष्ट होती हैं। ये बहुत ही सीधी-सादी पर आश्चर्य- सनक रीति से लाभ पर्दैवानेवाली कसरते हैं। इनकी सादगी की वजह से तुम इनसे उदासीन मत होना, क्योंकि ३ चोगियों के सावधान अभ्यास और अनुभवों से अत्यंत दायक सिद्ध हुई हैं, और ये अनेक पेचीदा और कठिन समितीफसरतों का सार-रूप हैं। इनमें से पेचीदा कसरता int warreयक भाग निकाल दिया गया है, और वित र भाग रख लिया गया है। (१) श्वास रोकना ' 'हत ही प्रधान व्यायाम है। इससे श्वास के अवयव द और पुष्ट होते है। इसके अधिक अभ्यास पानी सी चौड़ी होती है। योगियों को टन हो गया TET पर फेफड़ों को हवा से. तर दोघोड़ा रोक रखने से युग 1.33 पास ही लेनेनाले अव । -
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1 . ग्यारहवाँ अध्याय योगियों की प्रधान श्वास-क्रियाएँ नीचे लिखी हुई सात कसरतें योगियों को बहुत प्यारी हैं । इनसे फेफड़े, पुढे, जोड़ और हवा की कोठरियाँ उन्नत और पुष्ट होती हैं । ये बहुत ही सीधी-सादी पर आश्चर्य- जनक रीति से लाभ पहुंचानेवाली कसरते हैं । इनकी सादगी की वजह से तुम इनसे उदासीन मत होना, क्योंकि ये योगियों के सावधान अभ्यास और अनुभवों से अत्यत लाभदायक सिद्ध हुई है, और ये अनेक पेचीदा और कठिन टेढ़ी-मेढ़ी कसरतों का सार-रूप हैं। इनमें से पेचीदा कसरतों का अनावश्यक भाग निकाल दिया गया है, और केवत श्रावश्यक भाग रख लिया गया है। (१) श्वास रोकना यह बहुत ही प्रधान व्यायाम है। इससे श्वास के अवयव और फेफड़े सुदृढ़ और पुष्ट होते है । इसके अधिक अभ्यास करने से छाती भी चौड़ी होती है। योगियों को ज्ञात होगया है कि समय-समय पर फेफड़ों को हवा से खूब भर लेने पर, हवा को भीतर ही थोड़ा रोक रखने से बहुत ही लाभ होता है। और केवल श्वास ही लेनेवाले अवयवों को नहीं, प्रत्युत-
योगियों की प्रधान श्वास क्रियाएँ
और प्रायः मृतप्राय हो जाती है । जिस मनुस्य ने पहले
पटुत दिन अधरी साँस ली है, उसके लिये इन मृतप्राय
कोठरियों को एफवारगी काम में लगा देना आसान न
होगा। परतु इस अभ्यास के करते रहने से सर पाते
समय पाकर ठीक हो जायेंगी। यह अभ्यास करने दी
योग्य है।
(३) पसलियाँ फैलाना
क्षम ऊपर यतला श्राप हे कि पसलियाँ मुलायम हड़ियों-
जैसी एक चीज द्वारा सटी हुई है, इसलिये इनके फैलाव की
यदी सम्भावना है। ठीक ठीक साँस लेने में ये पसलियाँ
यड़ा काम करती है। इसलिये उचित है कि इन्हें भी विशेष
व्यायाम दे दिया जाय, जिससे उनका लनीलापन
टीक बना रहे । अस्वाभाविक रीति से पड़ा होने या बैठने
की आदत से ये पसलियाँ थोडी बहुत कड़ी और चीमड़
हो जाती है। इस कसरन से उनका यह दोष दूर हो
जायगा।
(१) सीधा खड़े हो।
(२) दोनों हाथों को दोनों बगलों पर श्राराम के साथ,
ऊँचे-से-ऊँचे करवटियों के पास रखो। अँगूठे तो पीठ की
ओर, दथेलियाँ यगलों पर और उँगलियाँ सामने की ओर,
छाती पर, हों।
(३) पूरी सांस भीतर खींचो ।
है।
J पहले तुम बहुत थोड़े ही असें तक सॉस को रोक सकोगे, परंतु थोड़ा अभ्यास बढ़ने से बहुत उन्नत देख पड़ेगी । यदि अपनी उन्नति देखना चाहो, तो-इच्छा हो तो-घड़ी रख- कर यह क्रिया किया करो। (२) फेफडो की कोठरियों को उत्तेजित करना यह कसरत इस अभिप्राय से की जाती है कि फेफड़ों की हयावाली कोठरियाँ उत्तेजित कर दी जायें । परंतु नए अभ्यासियों को इसमें अधिकता न करनी चाहिए, और बड़े जोर से तो इसे किसी तरह करना ही न चाहिए । बाज- पाज लोगों को पहले कुछ ही बार इसे करने में चक्कर थाने लगेगा। ऐसी दशा में कसरत छोड़ कर उन्हें उसी जगह थोड़ा टहल लेना चाहिए । (१) हाथों को बगल में लटकाकर सीधा खड़े हो जाओ। (२) बहुत धीरे-धीरे हवा को भीतर खींचों। (३) सॉस को भीतर खींचते समय हाथों को उँगलियों से छाती को धीरे-धीरे भिन्न-भिन्न स्थलों पर ठोकते जानो। (४) जय फेफड़े हवा से भर जाय, हवा को रोक रक्खो, और छाती को दथेलियों से धीरे-धीरे ठोकने लगी। (५) सफाई करनेवाली क्रिया कर डालो। यह फसरत सारे शरीर को उत्तेजित करनेवाली और सुसदायिनी है। यह योगियों की विख्यात श्वास किया है। शधरी सॉस लेने से फेफड़ों की प्रगणित कोठरियों बेकार
योगियों की प्रधान सास क्रियाएँ
और प्रायः मृतप्राय दी जाती है । जिस मनुष्य ने पहले
यटुत दिन अधुरी सांस ली है, उसके लिये इन मृतप्राय
फोठरियों को पकचारगी काम में लगा देना आसान न
होगा। परतु इस अभ्यास के करते रहने से सब बाते
समय पाकर ठीक हो जायेंगी। यह अभ्यास करने दी
योग्य हे।
(३) पसलिया फैलाना
इम ऊपर यतला श्राप है कि पसलियाँ मुलायम हड़ियों-
जैसी एक चीज द्वारा सटी हुई है, इसलिये इनके फैलाव की
यही सम्भाना है।ठीक ठीक सांस लेने में ये पसलियाँ
बड़ा काम करती है। इसलिये उचित हे कि इन्हें भी विशेष
व्यायाम दे दिया जाय, जिससे उनका लनीलापन
ठीक बना रहे। अम्वाभाधिक रीति से पडा होने या बैठने
को श्रादत से ये पसलियाँ थोडी बहुत कड़ी और चीमड़
हो जाती है। इस कसरत से उनका यह दोष दूर हो
जायगा।
(१) सीधा खड़े हो
(२) दोनों हाथों को दोनों बगलों पर श्राराम के साथ,
ऊँचे-से ऊँचे करवटियों के पास रखो। अँगूठे तो पीठ की
ओर, इथेलियों वालों पर और उँगलियाँ सामने की ओर,
छाती पर, हों।
(३) पूरी सांस भीतर खींचो।
स
प्राणायाम
--
(४) थोड़े असें तफ हवा को भीतर ही रोक लो।
(५) बगलों को क्रमशः हाथों से दवाओ, भोर धीरे-
धारे हवा निकालते जाओ।
(६) साफ करनेवाली सॉस ले लो।
यह कसरत थोड़ी ही-धोड़ी करो, अधिक नहीं।
(४) छाती फैलाना
काम करते समय मुके रहने के कारण लोग छाती को
सकुचित और संकीर्ण कर डालते हैं। यह कसरत छाती
को असली दशा पर पहुँचानेवाली और उसका विस्तार
बढ़ानेवाली है।
(१) सीधा खड़े हो।
(२) पूरी साँस भीतर खींचो।
(३) हवा को भीतर ही रोक रखो।
(४) दोनों चाटुनों को सामने लाफर कधों की उँचाई में
में सीधा तान दो।
(५) मुट्टियों को झटका देकर, भुजाओं को वगलों की
ओर, कंधों के सामने लाश्री।
(६) फिर नंबर की स्थिति में लाश्री, फिर नं०५ में
ले श्रायो। कई बार ऐसा ही करो।
(७) मुले मुंह से जोर से सॉस फेक दो।
(८) साफ करनेवाली लॉस ले लो।
इस कसरत को थोड़ा-ही-थोड़ा क्रो, अधिक नहीं।
--
योगियों की प्रधान श्वास-क्रियाएँ
(५) टहलने की कसरत
(१) सिर ऊँचा, लुढ़ी तनिक भीतर दवी और कधे
पीछे की ओर दये हॉ-यों नपे कदमों से टहलो ।
(क) पूरी सॉस भीतर खाँचो । (मन में) हर एक कदम
पर १, २, ३, ४,५,६,७,८-एक एक गिनती गिनते जाओ।
अाउ सस्या तक पहुँचते-पहुँचते सपूर्ण सॉस भीतर श्रा जाय।
(३) धीरे धीरे नाक की राह से सॉस बाहर निकालो।
पहले फी भॉति १, २, ३, ४, ५, ६, ७, ८ गिनते जाओ।
(१) श्वासों के बीच में ठहरे रहो, पर चलना और एक
से पाठ तक गिनती गिनना जारी रक्सो, प्रत्येक दम पर
एक गिनती।
(५) इसी तरह तव तक जारी रक्खो, जब तक थक न
जानो। थकने पर थोड़ा आराम कर लो, और अपनी इच्छा-
नुसार फिर जारी करो। दिन में कई बार ऐसा करो।
कोई-कोई योगी श्वास को १, २, ३, ४ की गिनती तक
भीतर ही रोके रहते है,
तव ८ तक की गिनती में बाहर
निकालते है । जो तरीका तुम्हें पसदाभावे, उसी के अनुसार
इस क्रिया को करो।
(६) मात कालीन श्वास-क्रिया
(१) जंगी स्थिति में खड़े हो, जिसमें सिर ऊँचा, ऑखें
सामने, कधे पीछे ये हुए, घुटने कड़े और भुजाएँ यगल में
लटकती हों।
८०
प्राणायाम
(२) शरीर को पैरों की उंगलियों पर धीरे-धीरे उठा
साथ ही धीरे-धीरे पूरी सॉस भीतर खींचते जानी।
(३) श्वास को भीतर ही कुछ सेकड तक रोक रक्स
स्थिति वही बनी रहे।
(४)धीरे-धीरे पहली स्थिति पर आयो, साथ-ही-सा
नाक की राह धीरे-धीरे सॉस को भी छोड़ते जाओ।
(५) फेफड़ों को साफ करनेवाली क्रिया कर लो।
(६) कई बार ऐसा ही करो। कभी अकेला दाहना
इस्तेमाल करो, कभी अकेला वायाँ।
(७) रुधिर-संचार को उत्तेजित करना
(१) सीधा खडे हो।
(२) पूरी सॉस भीतर खींचो, और उसे रोको।
(३) थोड़ा श्रागे भुको, किसी येत या छड़ी को दृढ़ता
पकड़ो, और क्रमश. उस बेत को जोर से दवाने में अपन
पूरा चल लगा दो।
(४) पकड़ को छोड़ दो, पहली स्थिति पर पात्रो, श्री
धीरे-धीरे श्वास को बाहर निकालो।
(५) कई बार ऐसा ही करो।
(६) फेफड़ा साफ करनेवाली क्रिया करके खत्म कर दो
इस कसरत को विना छड़ी या वेत के भी कर सकते हैं
वेत के स्थान पर करिपत वेत को पकड़ो, और यों ही चल
का प्रयोग करो। यह कसरत योगियों में बदत मालित है
-
योगियों की प्रधान श्वास-क्रियाएँ
इससे रगों का रुधिर छोरों की ओर दौड़ता है, और नसों
का रुधिर हृदय और फेफड़ों की ओर, ताकि वह उस
ऑक्सिजन को लेले, जो हवा के साथ साथ भीतर सॉस
द्वारा खींचा गया है। जहाँ रुधिर-सचार की बहुत कमी है,
वहाँ फेफड़ों में इतना रुधिर ही नहीं रहता कि श्वास द्वारा
अधिक सींची हुई ऑक्सिजन की मात्रा को ग्रहण कर
सके। इससे शरीर को इस सुधरी हुई श्वास का पूरा
फायदा नहीं पहुंचता। ऐसी दशा में पूरी सॉस के साथ इसे
भी समय-समय पर करना बहुत लाभदायक होगा।
- बारहवाँ अध्याय योगियों की सात छोटी कसरतें इस अध्याय में योगियों की सात छोटी श्वास-क्रियाएँ दी गई है। इनका कोई नाम नहीं है । ये एक दूसरी से बिल्कुल पृथक् हैं, और प्रत्येक का उद्देश्य भी भिन्न-भिन्न है । प्रत्येक शिष्य इन कसरतों में किसी-न-किसी को अपनी दशा की टीक यावश्यकता के अनुकूल पायेगा। यद्यपि ये कसरत छोटी कसरतों के नाम से कही गई हैं, फिर भी ये बहुत ही फायदे की हैं, नहीं तो इस किताब में दी हीन जातीं। ये संक्षेप में शारीरिक शिक्षा और फेफड़े की उन्नति करने का काम करती हैं । इन्हीं को पढ़ाकर एफ छोटी किताव लिखी जा सकती है। इनमें योगी की श्वास-क्रियाएँ भी सयुक्त हैं, इस- लिये इनका लाभ और भी बढ़ गया है। इनका नाम 'छोटी कसरतें रक्खा गया है, इसीलिये इन्हें छोड़ न जाओ । इनमें से कुछ-न-कुछ ऐसी कसरतें अवश्य होंगी, जिनकी तुमको सख्त जरूरत है। इनकी जॉच कर लो, और तुम्हीं अपना फैसला कर लो।। अभ्यास? (१) सीधा खड़े हो । वाह वगलों में नीचे लटकती रहें। .
योगियों की सात छोटी कसरतें (२)पूरी सॉस भीतर खींचो। (३) भुजात्रों को कड़ा किए हुए ऊपर उठायो, जव तक हाथ सिर के ऊपर जाकर एक दूसरे को छ न लें। (४) हाथों को ऊपर ही रक्पे हुए सॉस को भीतर कुछ सेकंड तक रोक रक्खो। (५) हाथों को धीरे-धीरे फिर वालों में ले श्रायो, साथ- हो-साथ धीरे-धीरे सॉस भी छोड़ते जानो। (६) सफाई की क्रिया कर डालो। अभ्यास २ (१) सीधा खड़े हो, और चाहों को सीधा अपने सामने लायो। (२) पूरी सॉस भीतर खींचो, और उसे रोक रक्खो। (३) झोंका देकर वाहों को पीछे फैको जहाँ तक ये जा सकें। फिर पहली स्थिति में लायो। ऐसा कई वार करो। तप तक श्वास को भीतर ही रोके रहो। (४) मुह की राह जोर से साँस को छोड़ दो। (५) साफ करनेवाली सॉस ले लो। अभ्यास (१) सीधासढ़े हो, चाहें सीधी और तुम्हारे सामने हों। (२) प्री साँस भीतर सीवो। (३) वाहों को वृत्त में झोंका देकर पहले कुछ यार पीछे से, तब फिर उलटकर कुछ वार भागे से घुमायो। तप तक - प्राणायाम (२) पूरी सॉस भीतर खींचो, परंतु लगातार एक धारा में खींचने के बजाय कई वार थोड़ा-थोड़ा करके जल्द-जल्द सॉससंड खींचो, मानों तुम नोसादर' और चूना सँघ रहे हो, और पूरी सॉस नही खींचना चाहते । इन साँस- खंडों को बाहर मत निकालो, पर एक में दूसरा मिलाते जानो, जव तक हवा से पूरा फेफड़ा न भर जाय । (३) चंद सेकंड सॉस को रोक रक्खो। (४)नाक की राह से श्राराम के सायलम्बी सॉस छोडी। (५) फेफड़ा साफ करने की क्रिया कर डालो।
. - परिवर्तन हो रहे है । थोड़े ही महीनों में शरीर बनानेवाले तेरहवाँ अध्याय कम्प और योगी की तालयुक्त श्वास-क्रिया सब कुछ कॉप रहा है। छोटे-से-छोटे परमाणु से लेकर बड़े-से-बड़े सूर्य तक, सब कांपने की दशा में हैं । प्रकृति में कोई भी धस्तु अत्यंत निश्चल स्थिति में नहीं है। यदि एक परमाणु भी कम्प-रहित हो जाय, तो सारे विश्व को नष्ट कर दे । लगातार कम्प में ही विश्व का कार्य हो रहा है। जा परमाणुओं पर शक्ति की लगातार प्रेरणा हो रही है, जिससे अगणित रूप और असंख्य भेद उत्पन्न हुश्रा करते है, वथापि ये रूप और भेद भी स्थायी नहीं है । ज्यों ही ये चन जाते है, परिवर्तन प्रारम्भ हो जाता है, और इनके अगणित रूप पैदा होते हैं, जो स्वयं परिवर्तित होकर नए- नए रूप सड़े कर देते है । और, यों ही अनंत काल तक टंखला चली जाती है । इस रूप की दुनिया में कुछ भी ' स्थायो नहीं है, तथापि महती सत्यता परिवर्तनहीन है । रूप केवल दिखावा-मात्र हैं । वे पाते हैं, जाते हैं, परतु सत्य अटल और परिवर्तन-रहित है मनुष्य शरीर के परमाणु भी श्रनवरत कम्प में है। श्रनत ॥
प्राणायाम
दृढ़ संकल्प से मेल मिला लेता है, जिससे फेफड़ों की
ताल-पूर्वक गति होती है, और जब वह ऐसे मेल में हो
जाता है, तो दृढ़ संकल्प की प्राशाओं का अनुसरण करने
लगता है। जव शरीर इस प्रकार ताल के अनुवर्तन-योग्य
हो जाता है, तब योगी को अपने संकल्प की आशा के
अनुसार शरीर के किसी भाग में अधिक रुधिर-संचालन
करने में कठिनाई नहीं होती, और इसी भाँति वह तंतु-बल
को किसी अंग या अपयव में, अधिक,मात्रा के साथ, भेज
सकता है, जिससे उस अग या अपयव को दृढता और
उत्तेजना मिलती है।
इसी प्रकार योगी ताल-युक्त श्वास द्वारा प्रकृति के
कम्पमान प्रवाह को पकड़ लेता है, और अति अधिक प्राण
को खींचने और अधिकृत करने में समर्थ हो जाता है, और
तव वह प्राण उसकी इच्छा के श्राधित रहता है। वह उस
प्राण को, अपने विचार दूसरों के पास भेजने में, साधन
की भॉति प्रयोग कर सकता और करता है, और जैसे ही
दूसरों के विचारों को, जो उसी कम्प में संयुक्त रहते हैं,
अपने पास आकर्षित करता है। दूरस्थ पदार्थों का अनुभव
करना, अपने विचार दूसरों के पास भेजना और दूसरों के
विचारों को अपने-श्राप जान लेना, मानसिक क्रियाद्वारा
रोग छुड़ाना, मिसमेरिज्म इत्यादि विषय, जो श्राज-कल
पश्चिमी ससार में इतनी रोचकता उत्पन्न कर रहे है, और
कम्प और योगी को तालयुक्त श्वास-क्रिया जिन्हें योगी लोग शताब्दियों से जानते हैं, और भी पुर और स्पष्ट हो सकते है, यदि प्रयोग करनेवाला ताल-युद्ध श्वास लेने के पश्चात् इन प्रयोगों को करे । तालयुक्त श्वास मानसिक प्रयोगों अथवा अाकर्षण द्वारा रोग चंगा करने में कई गुना अधिक लाभ पहुंचायेगी। इसी ताल-युक्त श्वास को प्राणायाम कहते हैं। इसमें निशेप यात जान लेने की यह है कि ताल का मानसिक परिज्ञान प्राप्त कर लिया जाय । उन लोगों को, जो संगीत में कुछ जानकारी रखते है, तुली हुई गिनती की अभिशता होती है। दूसरों के लिये जंगी सिपाहियों के कदम- 'वायाँ, दाहना' 'वायॉ, दाहना' 'चायॉ, दाहना', एक, दो, तीन, चार, एक, दो, तीन, चार-अच्छी तरह यह भावना उत्पन्न कर सकते है। योगी अपने ताल-युक्त श्वास अर्थात् प्राणायाम की मात्रा उतने ही काल को बनाता है, जो हृदय की धड़कन के बराबर होता है । भिन्न-भिन्न मनुष्यों में हृदय की धडकन का काल भिन्न भिन्न हुश्रा करता है, परंतु अपने हदय की चढ़कन के काल की मात्रा ही अपनी-अपनी ताल-युक्त साँस के लिये ठीक परिमाण है। अपने हृदय की धड़कन का काल अपनी नाडियों पर उँगली रखकर निश्चय कर लो, और तब गिनने लगी-१, २, ३, ४, ५, ६, १, २, ३, ४, ५, ६ इत्यादि। और, तव तक गिनते जाओ, प्राणायाम जब तक ताल खूब ठीक-ठीक हृदय पर जम न जाय य। थोडे अभ्यास से ताल वध जायगी, जिससे तुम श्रासानी से उस पर गिन सकोगे। नया मनुष्य प्रायः ६ मात्रा में श्वास खींचता है, परंतु अभ्यास से वह बहुत कुछ बढ़ा सकता है। योगियों के प्राणायाम का यह नियम है कि श्वास सींचने (पूरक प्राणायाम) और श्यास छोड़ने (रेचक प्राणा- याम) में बराबर मात्राएँ हो । श्वास भरने (कुम्भक) और श्वास जाली हो जाने पर रोक की मात्रा, भरने और खाली करने की मात्रा की श्राधी होनी चाहिए । ताल-युक्त श्वास का नीचे लिसा हुश्रा अभ्यास पुरी तरह समझकर कर लो, क्योंकि इसी के आधार पर अनेक अभ्यास है, जिनका श्रागे चलकर जिक्र किया जायगा। (१) सीधा अपने श्राराम के श्रासन से बैठो, पर अपनी छाती, गला और सिर को यथासाध्य एक सीध में रक्खो। फधे ज़रा पोडेको दये हों,और हाथ जॉघों पर सारामसे पढ़े हो । इस स्थिति में शरीर का अधिकांश बोझ पसलियों पर रहता है, और इस यामन में मनुष्य देर तक बैठ योगी को यह बात सिद्ध हो गई। लियुक्त सर्वोत्तम फल नहीं मिल स- कर और पेट निकालकर या M कम्प और योगी की तालयुक्त सात क्रिया (२) सास को धीरे-धीरे भीतर सींचते हुए हृदय की गति की मात्रा गिन जानो। (३) तीन माना तक गिनकर रोक रक्तो। (४) ६ मात्रा तक गिनने हुए श्वास को धीरे-धीरे बाहर निकालो। (५) श्वासों के बीच में ३ मात्रा तक गिना भात के रहो। (६) बार-बार ऐसा ही करने रहो, पर प्रारंभ ही में अपने को थका मत डाली। (७) जव अभ्यास को ममाप्त करना चाहो, तव सफाई करनेवाली सास क्रिया कर डालो। इससे तुम्हें पाराम मिल जायगा, और फेफड़े साफ हो जायेंगे। थोड़े दो अभ्यास के बाद श्वास खींचने ओर श्वास छोड़ने का समय १५ मात्रा तक बढ़ाया जा सकता है। किंतु मात्रा बढ़ाते हुए में स्मरण रहे कि सास को रोकने और पिना श्वास के रहने को मात्राएँ, श्वास खींचने और श्वास गहने की मात्राओं की श्राधी हुश्रा करती है । साल की मात्राओं के बढ़ाने के प्रयत्न में अति मत करो, ताल के प्राप्त करने म जहाँ तक हो सको, पूरा प्रयत्न पयोंकि श्वास की लवाई की अपेक्षा यह अधिक प्रधान । तब तक यत्त में लगे रहो, जब तक तुम्हें ताल- मिल जाय, श्रोर जब तक तुम्हें सारे शरीर में को ताल का अनुभव स्वयं न होने लगे।
१४
प्राणायाम
इसमें थोड़े अभ्यास और धैर्य की श्रावश्यकता होगी। परंतु
उन्नति करने में जो श्रानंद का अनुभव तुम्हें होगा, वह इस
कार्य को आसान बना देगा । योगी बहुत ही संतोषी और
धैर्यवान् मनुष्य होता है, और इन्हीं गुणों से बड़ी बड़ी बातें
प्राप्त कर लेता है।
-
चौदहवाँ अध्याय मन संयुक्त श्वास का रूप योगी के ताल-युक्त यास के अतिरिक्ष अर तक जितने अभ्यास दिए गए हैं, उनमें अधिकाश अभ्यास शारीरिक कमरत से ही सबंध रखनेवाले है। ये स्वय भी बहुत लामदायक है। परंतु योगो लोग इस विचार से और भी इनका थादर करते हैं कि ये फसरतें मानसिक और आध्यात्मिक अभ्यासों का भी धास्तविक प्राधार-रूप है। इन विषय के शारीरिक भाग को तुच्छ दृष्टि से देखकर निराहत मत करो, क्योंकि याद रखो, पुष्ट मन को धारण फरने लिये पुष्ट शरीर मी चाहिए। और, यह बात भी है कि शरीर हो जीवात्मा का मदिर है। यही वह लैम्प है, जिसमें श्रात्मा का प्रकाश दीप्त हो रहा है । सब पाते अपने स्थान पर अच्छी होती है, और सय वातों के लिये स्थान भी है। सम्पुष्ट मनुष्य ही पका मनुष्य है। यह शरीर,मन औरमात्मा, तीनों के महत्व को समझता और तीनों को उनका प्राण चुकाता है । किसी एक को भुला देना अपराध है। इस अप- राध का कमी-न-कभी प्रायश्चित करना पडेगा । पद एफ ऐसा ऋण है, जिसे व्याज के साथ चुफाना ही पगा।
प्राणायाम में दृढ़ श्रव हम योगी के श्वास-विज्ञान का मानसिक माग लेते हैं, इसका वर्णन हम अभ्यासों की श्रृंखला के रूप में करेंगे। प्रत्येक अभ्यास में उसकी व्याख्या भी होगी। तुम्हें यह बात देखने में श्रावेगी कि प्रत्येक अभ्यास में ताल-युक्त श्वास के साथ-साथ यह शिक्षा दी गई है कि अमुक अभीष्ट वस्तु का ध्यान धरो। इस मानसिक स्थिति से उस दृढ़ इच्छा के लिये साफ रास्ता मिल जाता है, जिस पर वह अपने बल का अभ्यास करे। मैं इस पुस्तक इच्छा के चल का वर्णन नहीं कर सकता, और यही मान लेता हूँ कि तुम लोग इस विषय में कुछ जानकारी रखते होगे। अगर तुम्हें इस विषय की जानकारी नहीं है, तो भी तुम्हें इन कसरतों का अभ्यास करने से उनका और भी स्पष्ट ज्ञान होगा, जो केवल बहुत से बचनों द्वारा भी न होता । एक पुरानी कहावत है कि एक रत्ती गुड़ खानेवाला गुड़ के स्वाद को हाथी के बोझ-भर गुड़ देखने- वाले से अधिक जानता है। १-योगी की मानसिक सॉस के लिये साधारण उपदेश योगी की कुल मानसिक श्वास-क्रिया का आधार ताल- युक्त श्वास है, जिसके विषय में हम पिछले अध्याय में शिक्षा दे आए हैं। अब नीचे के अभ्यासों में एकबार कही हुई बात को ही बार-बार दुहराने के बजाय हम केवल इतना ही कहेंगे कि ताल-युक्त श्वास लो। और, तय - मनासयुक्त श्वास का रूप मानसिक यल अर्थात् प्रेरित इच्छा शक्ति के अभ्यास की, जो ताल-युक्त श्वास के कम्प के सयोग से कार्य करती हे, शिक्षा दंगे। थोड़े अभ्यास के पश्चात् तुम्हें विदित हो जायगा कि पहली ताल-युक्त सॉस के बाद फिर तुम्हें गिनना न पड़ेगा, क्योंकि तुम्हारा मन ताल और उसके काल की अवधि को ग्रहण कर लेगा, और तुम खुशो से ताल-युक्त शास लेने रहोगे। तुम्हें मालूम होगा कि श्राप से श्राप क्रिया हो रही है। इससे मन को, इच्छा की प्रेरणा से, अपनी कम्पायमान धाराओं को यथेष्ट स्थान पर भेजने के लिये स्वतंत्रता मिल जायगी। नीचे लिखा हुश्रा पहला अभ्यास इच्छा की योग-विषयक शिक्षा के लिये दखिए- २-माण का वितरण पृथ्वी या चारपाई पर चित्त पड़कर, सर्गग को पूरे तौर से ढीला करके, हाथों को सौर्य-केंद्र (जहाँ भामाशय का गड्ढा है, और जहॉ से पसलियाँ पृथक होने लगती ह) पर रखकर ताल-युक्त श्वास लो । जय ताल की गति पूर्ण रीति से निर्धारित हो जाय, तव यह प्रेरणा करो कि प्रत्येक सॉस माण के विश्वभाडार से अधिक प्राण अर्थात् जीवनी शक्ति सोचे, जिसे ततु-जाल धारण करेगा, श्रोर सौर्य केंद्र सचित करेगा । प्रत्येक निश्वास (अर्थात् श्वास छोड़ने ) में यह क्रपना करो कि प्राण सारे शरीर में प्रत्येक अवयव और अग में, प्रत्येक मासपेशी, रेशे और देहाण में, प्रत्येक ततु,
नादी, रग और नम में, सिर की छोटी से ले
पं. नानक वितरित हो रहा है, जिससे प्रा
1. यल्यान श्रीर उत्तेजित हो रहा है, प्रत्येक
प्राण में भरा जा रहा है, और सारे शरीर
गण श्रीर एदना पितरित हो रही है। जय इन
m फरी, तर यह कल्पना करने । यत्न
प्रमोबाग माँ से प्रवेश कर रहा है,
मैं मन हो रहा है, और निश्वास के समय
माग में, हाथ और पैर को उँगलियों तक,
हो । क का प्रयोग पड़े प्रयत्न
गा भारयफ नहीं है, केवल उस बात की
मा, गो पापका अभीष्ट हो, और फिर उसके
STERTी पल्पना कर लेना, बस, इतना ही
। ति पूर्णफ आपा देना और मानसिक आ
मायाप पूर्षक इच्छा से पढ़कर है, क्योंकि
परम के माधयाय देने से चल की व्यर्थ हो
है । अपर लिखा एथा अभ्यास बहुत ही
पाता होता है, संतुओं को बहुत ताजा
पना देता थे, और सारे शरीर
कर देता है। यह उन दशा।
मन नंयुक्त वास का रूप B-पीड़ा दूर करना सीधे पड़कर अथवा सीधे बैठकर, यह खयाल करते हुए कि तुम माणसाच रहे हो, ताल-युग श्वास लो । तर जाय निःश्वास लो, प्रागा को पीदित स्थान पर रुधिर-सवार तथा तंतुधारा को ठीक करने के लिये भेजो। फिर पोड़ित दशा को दूर करने के लिये और प्राण खाँचो । तव यह ध्यान करते हुए कि तुम पीड़ा को दूर कर रहे हो, नि श्वास छोड़ो। दोनों मानसिक श्राशाएँ एक दूसरे के बाद दिया करो, जिससे एक निवास से तो पोहित भाग उत्तेजित हो, और दूसरे से पीड़ा दूर हो । सात श्वास तक यही क्रिया जारी रक्सो।नव साफ करनेवाली क्रिया करके थोडा विश्राम कर यो । जब तक पीड़ा दूर न हो जाय, तब तक यही प्रयोग फरते रहो । पीड़ा बहुत शीघ्र हट जायगी । बहुत-सी पीड़ाएँ तो पहलो सात सॉसों के खत्म होने के पहले ही दूर हो जाती हैं। यदि पीडित भाग पर हाथ भी रक्षे रहो, तो और भी शीन कार्यसिद्धि होगी। प्राण की धारा को मुजानों से होते हुए पीडित भाग में भेजो। ४-रूधिर-सचार को प्रेरित करना सोधे पड़कर या सीधे बैठकर ताल युक्त श्वास लो, और नि रास के साथ प्रमोष्ट स्थान पर, जहाँ अधूरे रुधिर- संचार के कारण कोई दुप उत्पन्न हो गया हो, रुधिर-सचार को प्रेरित करो। यह पैरों के सर्द हो जाने और सिर की
प्राणायाम
पीड़ा में बड़ा काम देता है। दोनों दशात्रों में रुधिर-संचार
नीचे की ओर प्रेरित किया जाता है। पहली दशा में तो पैर
गर्म हो जाते है, और दूसरी में मस्तिष्क के ऊपर का अधिक
दवाच हट जाता है। सिर दुखने में पहले पीड़ा हटाने की
क्रिया करो, तब रुधिर-संचार को नीचे प्रेरित करो । ज्यों
ज्योरुधिर-सचार नीचे की ओर होगा, त्यात्यों टॉगों में तुन्द
गरमी का अनुभव होने लगेगा । रुधिर-संचार तो अधिकांश
दृढ़ इच्छा की प्रेरणा पर निर्भर है, और ताल-युक्त श्वास इस
क्रिया को और भी सरल कर देती है।
-अपना रोग आप हर करना
दीले पड़कर ताल-युक्त श्वास लो, और यह प्राशा दो कि
प्रय अधिक प्राण श्वास द्वारा खींचा जाय । निःश्वास के
साथ इस प्राण को, कारण स्थान पर, उसे उत्तेजित करने के
लिये भेजी। कभी-कमी निःश्वास के साथ-साथ यह मानलिक
श्राज्ञा भी दो कि रुग्णावस्था हटाकर भगा दी जाय । इस
अभ्यास में हाथों का भी प्रयोग करो। सिर से लेकर रूप
भाग तक हाथ फेरो। अपना या दूसरों का रोग दूर करने के
लिये जब हाथ फेरा करो, तव सर्वदा यह कल्पना किया
करो कि माण तुम्हारी भुजाश्री में प्रवाह करता हुमा
उग
लियों के छोरों से शरीर में प्रवेश कर रहा और इस प्रकार
सा अग तक पहुँचकर उसे चंगा कर रहा है । इस पुस्तक
में हम केवल साधारण संकेत बतला सकते हैं। प्रत्येक रोग
मन संयुक्त श्वास का रूप १०१ फा उल्लेख इस छोटी-सी किताव में नहीं हो सकता । परंतु इसी अभ्यास को प्रत्येक रोग के अनुकूल बनाकर प्रयोग करना आश्चर्यजनक परिणाम उत्पन्न फरेगा। कोई-कोई योगी दोनों हाथ रुग्ण भाग पर रखते हैं, और तर ताल-युक्त श्वास लेते है। फिर वेयह कल्पना करते हैं कि हम रुग्ण अग या अश्या में पम्प की भॉति प्राण की धारा रहा रहे हैं, जिससे यह उत्तेजित हो जायगा, और इसका दुख दूर हो जायगा । इसकी करपना वैसी ही है, जैसे घड़े भर मैले पानी म अधिक साफ पानी पम्प द्वारा छोड़ा जाय, तो वह घडे के मैले पानी को वहाकर उसे साफ पानी से भर देगा । यह अंतिम ढंग बहुत ही कारगर है, यदि पम्प की कल्पना साफ-साफ मन में उपस्थित रहे कि सॉस लेना तो मानों पम्प फे मुठिया को ऊपर उठाना है, और निश्यास छोड़ना मानों पम्पहाराभरना। ६-~~-दूसरों को चगा करना हम प्राण के मानसिक प्रयोगों द्वारा रोग छुड़ाने का विषय किताव में नहीं ले सकते, क्योंकि यह विषय ही इस पुस्तक के विषय से मिन्न है। परतु हम सीधी-सादी बातें यहाँ यतला सकते हैं, और बतायेंगे भी, जिनके द्वारा तुम इसरों के दुख हटाने में समर्थ हो सकते हो। मुख्य वात स्मरण रखने की यह है कि तुम एकाप्रचित्त होकर ताल- युकशास द्वारा बहुत-सा प्राण प्राणभांडार से पाँच सकते १०४ प्राणायाम सकेत यद्यपि बहुत ही सीधा प्रतीत होता है, परंतु यदि ध्यानपूर्वक अध्ययन और प्रयोग किया जाय, तो उन सब कार्यों को सिद्ध कर देगा, जिन्हें "श्राकर्षण द्वारा रोग चंगा करनेवाले" अपने लंबे और पेचीदे प्रयोगों द्वारा सिद्ध कर सकते हैं। दरअसल प्राण ही का प्रयोग अमात रूप से करते हैं, पर उसे श्राकर्षण कहते और समझते है। यदि वे अपने आकर्षण के प्रयोग के साथ ताल युक्त श्वास को भी मिला दें, तो उनके प्रयोगों का प्रभाव दुगना हो जाय ।' ७-दूर से रोग चगा करना यदि प्राण के साथ प्राणप्रयोक्ता को प्रेरणा का रंग चढ़ा दिया जाय, तो यह प्राण दूर के रोगियों तक- ग्रहण करने की अकांक्षा बनाए रहे-भेजा जा सकता है, और इस प्रकार भी रोग दूर करने की क्रिया की जा सकती है। यही दूर से रोग चंगा करने को गुप्त भेद है, जिसकी पश्चिमी दुनिया में इतनी महिमा सुनी जाती है। प्रयोक्ता की रोग हटानेवाली दृढ़ श्राकांक्षा, प्रयोक्ता के प्राण को प्रेरणा करती और उस पर रंग चढा देती है, जिससे वह श्राकाश में विद्युत् की नाई दौडता हुअा रोगी के मानसिक संगठन में प्रवेश कर जाता है। वह अदृश्य रहद मारकोनी की चेतार को विद्युत् , च को पार करता हुया ठीक उस है, जो उसे ग्रहण करने की श्री यदि वे उसे - २०५ मनासंयुक्त सास का रूप दूर के मनुष्य पर प्रयोग करना हो, तो पहले उस मनुष्य के रुप की मानसिक कल्पना करो, तय उसके और तुम्हारे चोच में प्राण की धारा द्वारा लगाव हो जायगा। यह मान- निक प्रयोग है, और प्रयोक्ता की मानसिक कल्पना शहिं पर अपलरित है । जर तुम्हारे ओर उस मनुष्य के बीच में संबंध हो जायगा, तो तुम उसका अनुभव भी कर सकोगे, क्योंकि यह मनुष्य निकटस्थ प्रतीत होने लगेगा। यह यात बहुत ही सोबी है और इसके यदुत वर्णन की श्रावश्यकता नहीं है। यह थोड़े ही अभ्यास से सिद्ध हो जाती है। बाज- याज मनुष्य तो पहले ही प्रयत में सफल हो जाते है। जव लगाव स्थिर हो जाय, तो दूरस्थ रोगी से मन-ही-मन यो कहो कि "मैं तुम्हारे पास जीवनी शक्ति भेजता है, इससे तुम्हें बल मिलेगा, और यह तुम्हें चगा करेगी।" नव प्राण की कल्पना करो कि तुम्हारे तालयुक्त प्रवास के -येक नि श्वास के साथ वह प्राण तुममें से निकलकर, भल में रोगी के पास पहुँचकर उसे चगा कर रहा है। बारश्यक नहीं कि इस क्रिया के लिये तुम कोई समय तत कर लो। पर यदि तुम चाहो, तो ऐसा भी कर । रोगी को तुमसे संजीवनी पाने की अभिलाषा को-तुम्हारे मानसिक प्रयोग के प्रवेश के लिये अपनी धारा उसके पास तम कोई समय निश्चित मी तुम
१०६
प्राणायाम
कर लो, तो उस समय रोगी को अपने शरीर को बिलकुल
ढोला कर देना चाहिए, और धाराओं के ग्रहण करने की
उसे प्रवल श्राकांक्षा रखनी चाहिए। ऊपर लिखी हुई बात
ही पश्चिमी दुनिया के "दूरस्थ रोग-निवारण" का मूलतत्त्व
है। तुम थोड़े ही अभ्यास से इसको वैली ही खूबी से कर
सकते हो, जैलो सूची से सुप्रसिद्ध चंगा करनेवाले इसे
करते हैं।
पंद्रहवाँ अध्याय
योगी की मानसिक सॉस के अन्य प्रयोग
१--मन का संदेश भेजना
पिछले वर्णन किए हुए अभ्यास के अनुसार सदेश भी
दूसरे मनुष्यों के पास भेजा जा सकता है, और वे लोग इन
भेजे हुए सद्देशों का अनुभव कर सकते हैं । यह स्मरण रखना
चाहिए कि जिस मनुष्य के विचार अच्छे है, उसे दूसरों के
प्रेरित विचारों से कुछ भी हानि नहीं पहुँच सकती। अच्छे
पिचार सर्वदा बुरे विचारों के लिये अटल होते हैं, और बुरे
विचार सर्वदा अच्छे विचारों के सम्मुख विचलित हो जाते
है। एक मनुष्य इस प्रकार अपने विचारों को प्राण को धारा
के साथ दूसरों के मन तक पहुँचाकर उसके ध्यान और मन
को श्राकर्षित कर सकता है। यदि तुम किसी के प्रेम और
महानुभूति की इच्छा करते हो, जिसके साथ तुम स्वयं भी
प्रेम और सहानुभूति रखते हो, तो तुम उसके पास ऐसे
विचार भेज सकते हो, और तुम्हारा प्रयोग सफल भी हो
सकता है । परतु केवल उसी दशा म, अब तुम्हारा उद्देश्य
नविन और निफपट होगा । किसी को हानि पहुँचाने या
अपना स्वार्थ-साधन करने के लिये कभी दूसरे पर प्रभार
१०८ प्राणायाम - डालने की इच्छा मत करो, क्योंकि इस प्रकार के विचार जव दूसरों पर प्रयुक्त किए जाते हैं, नय दुगने वल से प्रयोक्ता ही पर आ पड़ते और उसकी हानि कर डालते हैं, और वह दूसरा मनुष्य निष्कंटक बच जाता है । यह मान- सिक प्रयोग जब उचित रीति से किया जाता है, तब तो ठीक है, परतु अनुचित प्रयोगों (अनुचित मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि) से सर्वदा खबरदार रहना; क्योंकि ऐसा करना अपने ही ऊपर आपत्ति को बुलाना है। कोई असहासनावाला मनुष्य कभी अधिक मानसिक शक्ति पा ही नहीं सकता, और पवित्र विचार और हृदयवाला मनुष्य इन दुर्वासनावाले प्रयोक्ताओं के लिये अभेद्य भी होता है । अत. अपने को पवित्र रक्खो, कोई तुम्हारा कुछ नहीं कर सकता। सास २-कवच रचना यदि कभी तुम नीच प्रवृत्तिवाले मनुष्यों की सगति में पड़ जाते हो, तव तुम्हें उनके विचारों का उद्वेगजनक प्रभार प्रतीत होने लगता है। ऐसी दशा में थोड़ो ताल-युक्त लो, जिससे तुम्हारे पास प्रा अधिक हो जाय । और, तर मानसिक कल्पना द्वारा अपने चारों ओर विचार का अंडा. कार घेरा डाल दो। यहो करच वन जायगा, और दूसरों के मलिन विचारों और नीच प्रभावों से तुम्हें सुरक्षित का मानसिक सास कअन्य प्रयाग २०६ ३-अपने मे आप ही प्राण भरना यदि तुम्हे मालूम हो कि तुम्हारी जीवनी शक्ति कुछ क्षीण हो गई है, और तुम्हें अधिक शक्ति की आवश्यकता है, तब इसका सर्वोत्तम उपाय यह है कि पैरों को परस्पर सटा दो, और दोनों हाथों की उंगलियों को एक मं, जैसा चाहो वैसा, संग्रथित कर दो । इसको मंटल वॉधना कहते है। इसके करने से तुम्हारे शरीर के छोरों से प्राण नि सृत नहीं हो सकता। अब ताल युक्त श्वास लो । कई बार श्वास लेने से तुम्हें जान पड़ेगा कि तुम्हारा शरीर प्राण से परिपूर्ण हो गया। ४-दूसरो मे प्राण भरना यदि तुम्हारे किसी मित्र की जीवनी शक्ति क्षीण हो गई हो, तो तुम उसको भी सहायता कर सकते हो । उसके सामने इस प्रकार बैठ जानो कि तुम्हारे चरणों की उँग- 'लियॉ उसके चरणों की उंगलियों को छूती रहे, और उसके हाथ तुम्हारे हाथों में हों। दोनों श्रादमी ताल-युक्त श्वास लो। तुम तो यह कल्पना करो कि उसके शरीर में प्राण भेज रहे हो, और वह यह कल्पना करे कि यह प्राण ग्रहण कर रहा है। निर्वल जीवट और निर्घल संक्रपवाले मनुष्य को इस विषय में सर्वदा साधान रहना चाहिए कि किसके साथ प्रयोग कर रहे हैं, क्योंकि दुष्ट विचारवाले मनुष्य के माण भी उसके विचारों के रंग में रंगे हुए होंगे, और नि- . 1 प्राणायाम - डालने की इच्छा मत करो, क्योंकि इस प्रकार के विचार जव दूसरों पर प्रयुक्त किए जाते हैं, नव दुगने चल से प्रयोक्ता हो पर ा पड़ते और उसकी हानि कर डालते हैं, और वह दूसरा मनुष्य निष्कंटक पच जाता है । यह मान- सिक प्रयोग जय उचित रीति से किया जाता है, तब तो ठीक है, परतु अनुचित प्रयोगों (अनुचित मोहन, उच्चाटन, वशीकरण आदि) से सर्वदा खवरदार रहना, क्योंकि पेसा करना अपने ही ऊपर आपत्ति को बुलाना है। कोई असशासनानाला मनुप्य कमी अधिक मानसिक शक्ति पा ही नहीं सकता, और पवित्र विचार और हृदयवाला मनुष्य इन दुर्वासनावाले प्रयोक्ताओं के लिये अभेद्य भी होता है। अत. अपने को पवित्र रक्खो, कोई तुम्हारा कुछ नहीं कर सकता। २--कवच रचना यदि कभी तुम नीच प्रवृत्तिवाले मनुप्यों की सगति में पड़ जाते हो, तव तुम्ह उनके विचारों का उद्वेगजनक प्रभाव प्रतीत होने लगता है। ऐसी दशा में थोड़ी ताल-युक्त सॉस लो, जिससे तुम्हारे पास प्राण अधिक हो जाय । और, तब मानसिक करपना द्वारा अपने चारों ओर विचार का अंडा- कार घेरा डाल दो। यही कवच बन जायगा, और दूसरों के मलिन विचारों और नीच प्रमानों से तुम्हें सुरक्षित रफ्प्रेगा।
१०६ भाग भी उसके विचारों के रंग में रंगे हुए होंगे, और निल योगी की मानसिक सॉस के अन्य प्रयोग ३-अपने मे आप ही प्राण भरना यदि तुम्हें मालूम हो कि तुम्हारी जीवनी-शक्ति कुछ क्षीण हो गई है, और तुम्हें अधिक शक्ति की आवश्यकता है, तब इसका सर्वोत्तम उपाय यह है कि पैरों को परस्पर सटा दो, और दोनों हाथों की उंगलियों को एक में, जैसा चाहो वैसा, संग्रथित कर दो । इसको मंटल बॉधना कहते है। इसके करने से तुम्हारे शरीर के छोरों से प्रामा निःसृत नहीं हो सकता। अब ताल युक्त श्वास लो। कई बार श्वास लेने से तुम्हें जान पड़ेगा कि तुम्हारा शरीर प्राण से परिपूर्ण हो गया। ४-दूसरो मे प्राण भरना यदि तुम्हारे किसी मित्र की जीवनी शक्ति क्षीण हो गई हो, तो तुम उसको भी सहायता कर सकते हो । उसके सामने इस प्रकार बैठ जायो कि तुम्हारे चरणों की उंग- लियाँ उसके चरणों की उंगलियों को छूती रहें, और उसके हाथ तुम्हारे हाथों में हों। दोनों श्रादमी ताल-युक्त श्वास लो। तुम तो यह कल्पना करो फि उसके शरीर में प्राण भेज रहे हो, और वह यह कल्पना करे फि यह प्राण ग्रहण कर रहा है। निर्यल जीवट और निर्मल संपरपवाले मनुष्य को इस विषय में सर्वदा सावधान रहना चाहिए कि किसके साथ प्रयोग कर रहे हैं, क्योंकि दुए विचारवाले मनुष्य के .
प्राणायाम इच्छा की प्रेरणा करो कि वह गुण पुष्ट होकर तुममें बना रहे । इस कल्पना को धारण किए हुए तालयुक्त श्वास लो। यथासाध्य उस मानसिक कल्पना को सदैव धारण किए रहो, और अब ऐसा बर्ताव प्रारभ करो, मानों तुम उस अभीष्ट गुण से युक्त हो। अपनी भावना के अनुसार तुम उस गुण में उन्नति करते हुए पाए जानोगे । श्वास' की ताल मन के नए सयोगों के जुटने में सहायता देती है । ७--शारीरिक गणो को माप्त करना ऊपर लिखी विधि से जैसे मानसिक गुण प्राप्त किए जाते है, वैसे शारीरिक गुण भी प्राप्त हो सकते है। मेरा यह मतलब नहीं कि नाटे मनुष्य लम्बे हो सकते है, कटे हुए अंग नए बन सकते हैं, या इसी प्रकार की कोई और करामात हो सकती है। अभिप्राय यह कि चेहरे का विकास बदल सकता है, शारीरिक दशा बहुत कुछ सुधर सकती और उन्नति कर सकती है। विधि वही है-तालयुक्त श्वास साथ-साथ दृढ़ इच्छा की प्रेरणा। मनुष्य जैसा विचार करता है, वैसा ही यह दिखाई पड़ता है, कार्य करता है, चलता है, बैठता है । इत्यादि। अपने विचारों को उन्नत कर लो, फिर उन्नत दिखाई दोगे, और उन्नत कार्य करने लगोगे। शरीर के किसी अंग को पुष्ट और उन्नत करना हो, तो ताल- युक्त श्वास लेते समय उसी अंग पर ध्यान जमानी। मान- सिक कल्पना करो कि उस अग में तुम अधिक प्राण या .
योगी की मानसिक सॉस के अन्य प्रयोग
ततुवल प्रवाहित कर रहे हो, और इस प्रकार उसके जीवट
को बढ़ा और पुष्ट कर रहे हो। यह तरीका शरीर के किसी
अग को भी पुष्ट करने के लिये ठीक होगा। बहुत-से पश्चिमी
पहलवान अपनी कसरत में इसी विधि के किसी रूपांतर को
सम्मिलित कर लेते है । साधारण विधि वही पूर्ववाली
( मानसिक गुण प्राप्त करनेवाली) विधि है । शारीरिक
पीड़ाओं के दूर करने का दिग्दर्शन पहले ही कराया जा
चुका है।
---मानसिक वृत्तियों पर अधिकार करना
अनिष्ट वृत्तियाँ-जैसे भय,शोक चिंता, घृणा, क्रोध, द्वेष,
ईर्ष्या इत्यादि-भी अपनी इच्छा के घश में लाई जा सकती
है, और इच्छा यदि ताल-युक्त वास के साथ प्रेरित की
जाय, तो उसका प्रभाव और भी अधिक और सरलता से
पड़ेगा। प्यों ही तुम निःश्वास छोड़ने लगो, त्यों ही मान
सिक आशा दो, और कल्पना करो कि नि श्वास के साथ
ही साथ अनिए घृत्तियाँ बाहर फेकी जा रही ह । सात वार
ऐसा करो, फिर सफाईवाली साँस लेकर समाप्त कर दो। तब
देखो कि तुम्हें फेसा अच्छा मालूम होता है। मानसिक श्राशा
दृढतापूर्वक देनी चाहिए । खेल से काम न चलेगा!
९-जनन-शक्ति को परवर्तित करना
योगी लोग स्त्री और पुरप, दोनों की फामशक्तियों के प्रयोग
ओर कुप्रयोग का बहुत बड़ा शान रखते है। इस पान का
।
प्राणायाम कुछ अंश उनके मंडल के बाहर प्रकाशित हो गया है, और इन्दी विषयों में पश्चिमी लेखकों ने उन्हें लित डाला है, जिससे बटुन लाभ हुना है। इस छोटी-सी किताब में हम दिग्दर्शन-मात्र करा देने के सिवा और कुछ नहीं कर सकते । केवल नामोल्लेख के अतिरिक्त और सय चातों को छोड़कर हम श्वास लेने का एक अभ्यास बतलायेंगे, जिसके द्वारा साधक अपने कामवेग को सारे शरीर के जीवट-रुप में परि- चर्तित कर सकता है। यह बहुत ही अच्छी बात है कि कामवेग को व्यर्थ स्वस्त्री और परस्त्री में न खोकर, उसे सारे शरीर के उपकारार्थ जीवट-रूप में बदल दिया जाय । काम- शक्ति जनन-शक्ति है। इसको सारा शरीर खींच सकता है, और यह जीवट और चल-रूप में परिवर्तित हो सकती है। इस प्रकार जनन के स्थान पर यह बल-सम्बर्द्धन कर सकती है। यदि नवयुवक-गण इस मूल मत्र को समझ जाते, तो भविष्य के बहुत-से कष्टों और सतापों से बच जाते, और मन, शरीर और धर्म में बहुत बलवान हो जाते । इस कामवेग के परिवर्तन करने से श्रभ्यासी को बड़ा जीवट प्राप्त हो जाता है। इससे अभ्यासी जीपट-पल से परिपूर्ण हो जाते हैं। यह तेज रूप में उनके शरीर पर धुति- मान हो जाता है। व्यक्तिगत तेज भी इसी को कहते हैं। इस प्रकार परिवर्तित शक्ति को दूसरे मागों में प्रवाहित करके, उससे बड़े-बड़े काम ले सकते हैं। प्रकृति ने बहुत-सी प्राण-'
1
योगी की मानसिक सॉम के अन्य प्रयोग
शक्ति को इस योड़े-से रज या वीर्य में एकत्रित कर दिया है,
क्योंकि इनका कार्य जनन अर्थात् उत्पादन करना है । शति
अधिक जीवट-वल बहुत थोड़े स्थान में एकत्रित रहता है।
जननेन्द्रियाँ जंतुओं के जीवन में प्राण की एक भाडार-रूप
ह । उनको शक्ति को हम ऊपर खींव सकते, उससे काम ले
सकते तथा जनन कर सकते है, अथवा अनर्थकारी भोगों
में उन्हें नष्ट कर सकते हैं। हमारे शिष्यों में अधिकाश इसके
पल-वर्द्धन को जानते होंगे ।ऊपर लिखी हुई वातों के कह देने
के सिवा और अधिक यहाँ हम कुछ नहीं कह सकते।
कामवेग को परिवर्तित करनेवाला योगियों का अभ्यास
बहुत ही सादा और सरल है। यह तालन्युक्त श्वास से
मिला है, और बहुत प्रासानी से किया जा सकता है।
इसका अभ्यास किसी भी समय कर सकते है, पर अत्यत
उपयुक्त समय यह हे, जय काम काग प्रबल हो । उस समय
जनन शक्ति प्रकट रहती है, और उसे पड़ी थासानी से बल.
वर्द्धन-शक्ति में बदल सकते है । अभ्यास नीचे लिखा
जाता है-
अपना ध्यान केरल उस शक्ति पर लगायो, काम कल्प
नाश्नों को छोड़कर केवल उस शक्ति पर खयाल जमायो ।
यदि काम-कल्पनाएँ भी अनायास भाजाय, तो कुछ चिंता
मत करो। यही समझ लो कि यह उस पल का विकास है,
जिसे हम शरीर गासन के पोषण में लगाना चाहते हैं।
--
प्राणायाम
शांत होकर लेट जाओ, या सीधे बैठ जाओ, और यह कल्पन
करो कि हम जनन शक्ति को नीचे से खींचकर ऊपर सौर्य
केंद्र में ला रहे है, जहाँ यह जनन-शक्ति से परिवर्तित होकर
प्राण-रूप में संचित रहेगी। अब यह कल्पना करते हुए ताल
युक्त श्वास लो कि प्रत्येक श्वास में तुम शक्ति को ऊपर सींच
रहे हो । प्रत्येक देवास में दृढ़ इच्छा को श्राज्ञा दो कि शक्ति
जननेन्द्रियों से खिंचकर सौर्यकेंद्र में चली बारे। यदि तात
खूब ठीक हो गया होगा, और कल्पना स्पष्ट हो गई होगी,
तो तुम्हें मालूम होता रहेगा कि यह शक्ति ऊपर उठी श्रा
रही है, और तुम उसको उत्तेजना के प्रभाव का भी अनुभव
करोगे। यदि तुम अपना मानसिक वल बढ़ाना चाहते हो,
तो इसे सौर्य-केंद्र में भेजने के स्थान पर मस्तिष्क में भेजो,
उसी के अनुकूल श्राज्ञा दो, और कल्पना करो।
जो पुरुष या स्त्री मानसिक अथवा शारीरिक रचना का
कार्य कर रहे हों, वे ऊपर के अभ्यास द्वारा इस शक्ति को
इस तरह अपने काम में लगा सकते है कि प्रत्येक श्वास में
तो शक्ति को ऊपर खींचे, और प्रत्येक निदवास में उसे नि:
स्थान पर भेजें। इस अंतिम दशा में केवल कार्य के
शक्ति तो कार्य में जायगी, शेप सौर्यकेंद्र में संचित
आप लोग तो अवश्य यह समझने होंगे कि
वीर्य न तो ऊपर को खींचा जाता और न ।
जाता है, किंतु उसकी प्राणशक्ति हीखींची
-
योगी की मानसिक सॉम के अन्य प्रयोग
वह धीर्य इतना प्रबल हो रहा था। इस परिवर्तन के अभ्यास
के समय सिर को थोड़ा आगे सरलता पूर्वक स्वाभाविक
रोति से मुका लेना अच्छा होगा।
१०--मस्तिष्क को उत्तेजित करना
योगी लोगों ने नीचे-लिखे श्रभ्यास को स्पष्ट सोचने विचा-
रने के अभिप्राय से मस्तिष्क की क्रियाओं को उत्तेजित
करने में बहुत ही लाभदायक पाया है। मस्तिष्क और ततु-
जाल को
शुद्ध
करने में इसका श्राश्चर्यजनक प्रमाव पड़ता
है। जिनको मानसिक प्रयत्न करना पड़ता है, उनके लिये
तो यह अभ्याल दोनों प्रकार से बहुत ही उपयोगी होगा-
एक तो उत्तम कार्य करने में, और दूसरे अधिक मानसिक
काम करने के उपरांत मन को फिर ताजा, चगा बनाने और
उसे साफ करने में।
सीधा बैठो । मेरुदड को भी सीमा रक्खो। ऑखें सामने
को श्रोर रहें । दोनों हाथ जॉघों के ऊपरी भागों पर पड़े
रह । तालयुक्त श्वास लो, परतु दोनों नासिका पुटों द्वारा
सॉस खींचने के स्थान पर, जैसा कि साधारण अभ्यासों में
करते श्राप हो, बाएँ नासिका पुट को वाएँ हाथ के अंगूठे
से बद करो, और केवल दाहने पुट से शास खींचो । तर
अॅगठा हटा लो, दाहने पुट को उँगली से बद करो, और
तब याएँ पुट से नि श्वास फेको । फिर निना उँगली बदले
पाएँ ही पुट से श्वास खींचो, और उँगली बदलकर टाटने
प्राणायाम
"
पुट से निश्वास को बाहर निकालो। तब दाहने पुट
श्वास खींचो, और वा पुट से निकातो। इसी प्रकार करते
जायो। ऊपर-लिपे अनुसार पुटों से वारी-बारी से काम लो,
और जिस पुट से काम लो, उसे अँगूठे या उँगली से धंद
रक्सो । यह योगियों के श्वास का एक बहुत प्राचीन तरीका
है, और बहुत ही उपयोगी और प्रधान है। यह सीखने
ही योग्य है । यह जानकर योगी लोग बहुत हॅसते है कि
पश्चिमी दुनिया पोवल इसी एक अभ्यास को योग का सारा
मूल मंत्र समझती है । बहुत-से पश्चिमी पाठक जब योगी
की श्वास क्रिया की कल्पना करते है तो उनके ध्यान में यही
श्राता है कि एक हिंदू सीधा बैठा है, और श्वास लेने में
कभी इस पुट को बंद करता है तो कभी उसे खोलता है,
और कभी उसे बंद करता है, तो इसे सोलता है। वे समझते
हैं कि बस, इतना ही है, और कुछ नहीं । हम आशा करते
है कि इस छोटी किताव से पश्चिमी दुनिया की ऑखें
पुल जायेंगी कि यह योग क्या-क्या कर सकता है, और
इसके कितने साधन है।
११-योगी की मानसिक महाश्वास,
योगियों को एक श्वास-क्रिया बड़ी
ये कभी-कभी अभ्यास करते हैं। उसी
योगी की मानसिक महाश्वास कहते हैं
में
है कि इसमें ताल-युक्त.
योगी की मानसिक सॉस के अन्य प्रयोग
कल्पना, दोनों की धावश्यकता पड़ती है, और हमारे शिष्य
श्रर श्राफर दोनों साथ-साथ करने के योग्य हुए हैं। इस
महाश्वास की महिमा इसी पुरानी कहावत से समझ लेनी
चाहिए कि "धन्य हे वह योगी, जो अपनी हड्डियों द्वारा
मास से सस्ता है।" इस अभ्यास से सारा शरीर प्राण से
परिपूर्ण हो जायगा, और साधक जय इस अभ्यास से
निकलेगा, तो उसकी प्रत्येक हही, पुट्ठा, ततु, परमाण, श्रव
यव और भाग,प्राण और ताल से शराबोर होंगे। यह शरीर
की सबसे बड़ी सफाइ है, और जो मनुष्य सावधानी से
इसका अभ्यास करता है, उसे ऐसा मालूम होगा कि उसका
शरीर फिर नया हो गया-सिर से लेकर पैर तक मानों
नया गढ़ गया । अभ्यास यों है-
(१) बिलकुल ढोले होकर पूरे श्राराम से लेट जाओ!
(२) तव तक ताल-युक्त साँस लो, जब तक ताल ठोक
न हो जाय।
(३) तय सॉस लेने और छोड़ने के समय यह कल्पना
करो कि सॉस टॉगों के मार्ग पा रही और उसी मार्ग से
जा रही है। फिर भुजाओं की हडियों के मार्ग से, फिर
सोपड़ी के सिरे से, फिर भामाशय से, फिर मानों मेरुदड
में नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे दौड़ रही है। फिर
मानों सॉम शरीर के चमडे के प्रत्येक छिद्र से श्रा और मा
रही है, मानों सारा शरीर माण और जीवन से भर गया है।
१२०
प्राणायाम
(४) तव (तालयुक्त सॉस लेते हुए) प्राण की वारा को
सातो मार्मिक स्थानों में बारी-बारी से भेजो, जैसा नीचे
दिया जाता है। परंतु ध्यान रहे, मानसिक करपना भी,
जैसा पहले कहा गया है, साथ-ही-साथ होती रहें-
(क) ललाट में
(ख) सिर के पिछले भाग में
(ग) मस्तिष्क के आधार में
(घ) सौर्यकेंद्र में
(3) मेरुदंड के निचले भाग में
(च)नाभी में
(छ)जननेन्द्रिय-स्थान में
सिर से पैर तक लगातार प्राण की धारा कई बार यहा-
कर समाप्त कर दो।
(५) अत में साफ करनेवाली किया कर डालो।
सोलहवा अध्याय
योगी की पाव्यात्मिक श्वास-क्रिया
योगी लोग अपनी दृढ़ इच्छा और तालयुक्त श्वास द्वारा
फेल अभीष्ट मानसिक गुणों ओर शक्तियों को ही नहीं
पढाते और पुष्ट करते, परन् उसी प्रकार वे श्राव्यात्मिक
शक्तियों को भी पुष्ट करते है, अर्थात् उनके जागृत रहने में
सहायता पहुंचाते हैं । पूर्वी शास्त्र यतलाते है कि मनुष्य में
बहुत-सी शक्तियाँ है, जो अभी अविकसित अवस्था में पड़ी
हे,
परतु जब ये जीव और उन्नति करेंगे, तब उनका विकास
होगा। यह भी बतलाते है कि मनुष्य अपनी दृढ इच्छा के
द्वारा यदि सुयोग श्रा जाय तो-अपनी आध्यात्मिक
शक्तियों के जगाने और उनके अतिशीघ्रता से पुष्ट होने में
सहायता पहुंचा सकता है। अभिप्राय यह कि विकास की
माधारण गति से जिस श्राध्यात्मिक दशा को मनुप्य-समु-
दाय बहुत दिनों में पहुंचेगा, उस दशा को, अपनी प्राध्या-
त्मिक शक्तियों को जगाकर, योगी यहुत शीघ्र प्राप्त हो सकता
है। इस अभिमाय से जितने अभ्यास है, उनमें तालयुक्त
श्वास क्रिया बहुत बड़ा काम करती है । केवल श्वास ही
लेने में ऐसा कोइ गूढ़ रहस्य नहीं, जो इस आश्चर्यजनक
-1
प्राणायाम - परिणाम को लाता है, किंतु वह ताल, जो योगी की ताल- युक्त श्वास-क्रिया से विकसित हो जाती है, ऐसी होती है कि सारे शरीर को, जिसके अंतर्गत मस्तिफ भी है, पूरे अधि- कार और प्रकृति के पूरे मेल में ले जाती है, और इस प्रकार गुप्त शक्तियों के जागृत करने का प्रकृति को खासा मौका मिल जाता है। इस पुस्तक में हम आध्यात्मिक उन्नति-विषयक पूर्वी शास्त्रों का गंभीर विचार न करेंगे, क्योंकि यह बड़ा गहन विषय है । इसके वर्णन में बड़े-बडे ग्रंथ लिखे जा सकते हैं, और यह इतना कठिन है कि साधारण पाठकों का जी भी न लगेगा । और भी दूसरे कारण है, जो योगियों को विदित हैं कि क्यों यह शान इस समय साधारण विद्याओं की भॉति फैल जाय । किंतु निश्चय रकालो कि जब तुम्हारे लिये ठीक समय आवेगा कि तुम्हारी आध्यात्मिक गति भागे बढ़े, तब तुम्हारे सामने मार्ग खुल जायगा । जप चेला तैयार होता है, तो गुरु भी प्रकट हो जाते हैं । इस अध्याय स्मिक शान के दो पटलों के विकसित होने के लिये हम अभ्यास देंगे-(१) अपने जीव के अस्तित्व का अनुभव और ( २ ) इस जीव के विश्वव्यापी जीव से सबंध का अनु- भव । नीचे दिए हुए दोनों अभ्यास बहुत सरल है, और उनमें मानसिक कल्पना तालयुक्त श्वास के साथ करनी होती है । शिष्य को प्रथम ही पड़ीचड़ी श्राशाए न करनी श्राध्या- योगी को श्राध्यात्मिक सास किया चाहिप, किंतु धीरे-धीरे गति तीन करनी चाहिए, और जिस प्रकार बीज से शनैः शनै पुष्प विकसित होता है, उसी प्रकार विकान पाने के लिये धैर्य रखना चाहिए । श्रात्मशान अमली यात्मा न तो मनुष्य का शरीर है, ओर न उसका मन । ये तो उस व्यक्ति के अंग है, और अधीनस्थ है। धमली श्रात्मा वह जीन है, जिसका विकास इस व्यक्ति में टुमा हे। यह असली श्रात्मा इस शरीर से, जिसे वह पहने हुए है, पर है। वह इस मन से भी, जिसको वह असली रूप में धारण किए हुए है, पर है। असली आत्मा उस परमात्म- महासमुद्र का एक विंदु है, और वह नित्य और थक्षय वह न तो मर सकता है, और न उसका नाश हो सकता है। शरीर की चाहे जो गति हो, पर प्रात्मा सर्वदा जीवित है। यह जीन है। तम जीव को अपने से भिन्न मत समझो, पयोंकि तुम्ही जीव हो, और यह शरीर तुम्हारा अनित्य और परिवर्तनशील अग है, जो नित्य अपने परमाणुओं को परिवर्तित किया करता है, और जिसे तुम एक दिन छोड़ दोगे । तुम उन शक्तियों को जगा और विकसित कर सकते हो, जिनके द्वारा तुम जीव की असलियत का अनुभव कर सकते और यह जान सकते हो कि यह शरीर से परे है इस विकास और जागृति के लिये योगियों का यह उपाय है कि असली जीव का ध्यान धरो, साथ ही साथ ।
प्राणायाम
तालयुक्त श्वास लो। नीचे लिखा हुश्रा अभ्यास बहुत
सरल है-
अभ्यास-अपने शरीर को ढीलीढाली गिरी हुई दशा में
रक्सो । तालयुक्त श्वास लो, और असली श्रात्मा का ध्यान
धरो। यह सोचो कि तुम शरीर से पृथक एक अस्तित्व हो,
यद्यपि तुम इसे पहने हुए होऔर इच्छा पूर्वक इसे उतार देने
में समर्थ भी हो। अपने को शरीर नहीं, किंतु पात्मा खयाल
करो, और शरीर को एक प्रावरण समझो, जो लाभदायक
और सुखदायक तो है, पर तुम्हारा खास कोई अंग नहीं है।
तुम अपने को एक स्वतंत्र सत्ता समझो, और शरीर को केवल
अपने काम के लिये उपयोग में ला रहे हो । ध्यान करते
समय शरीर को पूर्णत• भुला दो । तुम्हें मालूम होगा कि
कभी-कभी तुम शरीर से बिलकुल वेखबर हो गए हो, और
यह जान पड़ेगा कि तुम शरीर से बाहर हो, और अभ्यास
कर चुकने के बाद उसमें लौटोगे।
योगी की ध्यानवाली श्वास के अभ्यासों का यही सार
है, और यदि जी लगाकर अभ्यास किया जाय, तो जीन की
असलियत का अद्भुत् परिचय करा देगा,
और साधक को
उसे शरीर से परे दिखा देगा । इस बढे हुए अनुभव के
साथ-ही-साथ अमरत्व का भी ज्ञान हो जायगा, और उसे
आध्यात्मिक जागृति के लक्षण विदित होने लगेंगे । वे लक्षण
स्वयं उसे और दूसरों को भी दिखलाई देने लगेंगे । पस्तु
-
।
।
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प्राणायाम
तालयुक्त श्वास लो। नीचे लिखा हुश्रा अभ्यास बहुत
सरल है-
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अभ्यास-अपने शरीर को ढीलीढाली गिरी हुई दशा में
रक्खो । तालयुक्त श्वास लो, और असली श्रात्मा का ध्यान
धरो। यह सोचो कि तुम शरीर से पृथक एक अस्तित्व हो,
यद्यपि तुम इसे पहने हुए हो, और इच्छा पूर्वक इसे उतार देने
में समर्थ भी हो । अपने को शरीर नहीं, किंतु श्रात्मा खयाल
करो, और शरीर को एक प्रावरण समझो, जो
लाभदायक
और सुखदायक तो है, पर तुम्हारा खास कोई अंग नहीं है।
तुम अपने को एक स्वतंत्र सत्ता समझो और शरीर को केवल
अपने काम के लिये उपयोग में ला रहे हो । ध्यान करते
समय शरीर को पूर्णत: भुला दो। तुम्हे मालूम होगा कि
कभी-कभी तुम शरीर से बिलकुल खबर हो गए हो, और
यह जान पड़ेगा कि तुम शरीर से बाहर हो, ओर अभ्यास
कर चुकने के बाद उसमें लौटोगे।
योगी की ध्यानघाली श्वास के अभ्यासों का यही सार
है, और यदि जी लगाकर अभ्यास किया जाय, तो जीव की
असलियत का अद्भुत् परिचय करा देगा, और साधक को
उसे शरीर से परे दिखा देगा । इस वढे हुए अनुभव के
साथ ही साथ अमरत्व का भी ज्ञान हो जायगा, और उसे
आध्यात्मिक जागृति के लक्षण विदित होने लगेंगे । वे लक्षण
स्वयं उसे प्रो...
,
पर पहुँचने के पहले उसे बहुत कुछ करना है। परंतु उसे
योगी की आध्यात्मिक श्वास-क्रिया
साधक को इन ऊपरी लोकों में बहुत समय तक न रहना
चाहिए, और न शरीर से घृणा ही करनी चाहिए, क्योंकि वह
किसी अभिप्राय से यहाँ है, और उसे यहाँ की गढनेवाली
जीवन घटनाओं के सुअवसर के साथ लापरवाही न दिखानी
चाहिए। उसे शरीर का श्रादर करने में चूकना भी न
चाहिए । शरीर ही श्रात्मा का मदिर है।
परमात्मा का अनुभव
मनुष्य की आत्मा, जो उसके जीव का सोच विकास
, परमात्म समुद्र का एक विंदु है, जो पृथक् प्रतीत होता
है, पर दस्तुत वह समुद्र से ही नहीं, उसके प्रत्येक विंदु
से लगा हुआ है । व्यों ज्यों मनुष्य आत्मज्ञान को जगाता
है, त्यो त्यो वह परमात्मा से लगाव का अधिक श्रधिक ज्ञान
प्राप्त करता जाता है । कभी-कभी उसे ऐसा अनुभव होता
है कि वह परमात्मा के साथ एक है, और तय उस लगाय
और सबंध का भाव लुप्त हो जाता है। योगी लोग इस
दशा को ध्यान और तालयुक्त ध्वास द्वारा प्राप्त करता
चाहते है । और, बहुतों ने इसी प्रकार आध्यात्मिक उन्नति
के उस उच्च शिखर को प्राप्त भी कर लिया है, जो
मनुष्य के अस्तित्व की इस दशा के लिये सभव हो सकता
इस पुस्तक के पाठक को इस समय महात्मा बनने
की शिक्षा की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उस पदवी
--
१२८
प्राणायाम
,
ध्यानावस्था में मन को उन्हीं विचारों में लगायो, जो
अभ्यास में दिए गए हैं। यह क्रिया तब तक किए जाओ,
जब नक ध्यान स्पष्ट न हो जाय, और जब तक क्रमशः
इसका आंतरिक अनुभव न होने लगे । इन अभ्यासों में
श्रति मत करो, और जो श्रानद की दशा प्राप्त हो, उसके
कारण अपने मन में संसार से विरक्ति मत उत्पन्न होने दो,
क्योंकि सांसारिक कार्य भी तुम्हारे लिये लाभदायक और
आवश्यक है । तुम्हें अपनी शिक्षा (सांसारिक) से नही
भागना चाहिए, चाहे वह तुम्हें कितनी ही नापसद क्यों न
हो। जो श्रानंद तुम्हें श्रात्मविकास से प्राप्त हो, उसी से
सतुष्ट रहो, और जीवन की कठिनाइयों को सहने में
समर्थ बनो, न कि असंतुष्ट और घृणा करनेवाले हो जाओ।
इन अभ्यासों के साधन करनेवाले वहुत-से शिष्यों के मन
में और अधिक ज्ञान प्राप्त करने की आकांक्षा होगी।
निश्चय रक्खो कि जव समय आवेगा, तब तुम्हारी
श्राकांक्षा व्यर्थ न होगी। धैर्य और श्रद्धा के साथ चले चलो।
अपना मुख पूर्व की ओर किए रहो, जहाँ से कि उदीयमान
सूर्य निकल रहा है।
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