Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Menghar Namu
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A
AUGUR KAND BHAIRODAN
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श्री सीमंधरस्वामीने वीनति रुपे
कागळ हुंडी पेठ परपेठ
अने
लेझर नाखं.
ले मुनि ज्ञानसुंदर
प्रकाशक,
श्री रत्न प्रभाकर ज्ञान पुष्पमाला,
मु फलोधी, जि जोधपुर, मारवाड
भूमिका. शासनप्रमी अने वीरपुत्रो' आजे हु हार्दिक रहस्य आपनी सन्मुख जाहेर करु छु ने महाशयो ! सूर, वीर, धीर थई विचारशो. लगभग घणा समयथी आपणा पोताना घरमा हानि थवा माडी. घरना चोरज चोरी करवा लाग्या घरफाटे घर जाय, एवं नाटक थवा लाग्यु. तेनी साथेन बरोबर सावधान पुरुषो पण कटिबद्ध थई पोकार करता आन्या छे खूब जोर शोरयी आपणा समाजना सुधारको चेताव्या करे छे परतु घरना चोरो घरमाज गोंधाई रह्या छे एटले सर्वाशे निर्भय बनी शकातु नथी तो पण घणे मागे दीवो हाथमा लईने उभा रेवाथी घरना चोरनु जोर चाली शके नहि एटला माटेन आ साथे कागळ, हुडी, पेठ परपेठ अने मेजरनामु लखी दीवा जेवु अजवाणु करवाची धरमा लुट थती अटके छै अने श्री सीमधर स्वामी भगवान्ने आपणी खबर आपीने मनने शात करु छु आपणा घरमा मुनिम-गुमास्ताओप परस्पर लडी जगडा करी भनेक उपद्रव करी नाख्या छे, शासनने चारणीनी पेठे चाली नाख्यु छे, मूळ मार्गने घणी तरहथी हानि करी नवा नवा रीवाजो दाखल करी खरी बावतमा गुचवाडा उमा करी दीधा छ सत्यने भेळशेळ करी सामान्य प्रनामा कोलाहल मचावी दीघो छ, घणा समजु जीवोथी पण खुलासा न नीकळी - शके एवी प्रवृत्तिओ अने परपरा उभी करी छ, आ बधी भाजगढ सर्वाशे सुधारवी कठीन थई पीछे घणा भव्य जीवो आवा गोटाळाथी कटाळी गया छे अने हवे शु करवु केम तरी पार थशु एवा धर्म सकटमा मुझाया करे छे मारी पण एवी स्थिति थई छे अने तेथीन आ विनीत पक्ष स्वीकारी विनती रुपे मारा विचारो सीम- घर प्रभुनी सन्मुख उभा रही हाथ जोडी अत्यत नम्रभावे जाहेर रीते नणावी दीधा छे तेमा कोईनी साथे अभाव अप्रीतिनु कारण नथी. जे भला पुरुषो हशे ते सर्वे मारे माननीय जे अने जे भलाईथी वेगळा हशे ते सर्वनी साथे समभावे उपेक्षा राखु छ आ प्रथ साधत वाची विचारी अपक्षपात दृष्टिथी दरेक मला पुरुषोए निर्णय करी लेवा प्रार्थना छ -लेखक पुष्पांजली. हे प्रभो दीनोद्धारक 1 मारी शी 'दशा थई त्हारी पासे जन्म्यो नहि तेम चोधा आरामा त्हारो मार्ग मल्यो नहिं अरेरे ! हे स्वामिनाथ ! आवा पाचमा आरामा भयकर कलिकाळमा मारो जन्म तेमा कुगुरु समागम त्याथी भागी ल्हारा शुद्ध शासनमा दाम्बल थयो अने आगमशैली तपासी जोई तो जुदी जुदी समा- भारी अने गच्छागच्छ मतामत जोई, हे स्वामीनाथ ! क्या हारी लोकोत्तर मार्ग अने क्या आ लौकिक प्रवाह-गारीओ प्रवाह' 1. हे करणासागर ! क्या हारी वीतराग वाणी अने क्यां आ घर (४) अरनी वाणी ? हे भला भगवान् ! क्या. पुन्यानुबंधीनी जैन शैली अने क्या आने जनतामुत्रधीनी प्रवृत्तिओ ? हे कृपानीय ! दीन- अन्धो ! हु खरेखर खेद पाम्यो मने बीजो कोई उपाय न सूझयो हे जगतारक । में म्हारा आत्माने समजायवा माटे आपना पवित्र चरणकमळमा कागळ, हुडी, पेठ, परपेठ अने मेझरनामाथी प्रार्थना करी छे हे सर्वज्ञ मगवान् ! आप आप सर्व जाणो छो-देखो छो, तो पण हु एक अर्जदार तरीके अरजी करी म्हारा आखना आसुओ रेडी पुष्पाजलि आपना ; चरणकमळमा शरणे रही म्हारु परम कल्याण करवा चाहु छु. हे अनाथना नाथ ! दीनबन्धो। भक्तवत्सल भगवान् ! म्हारी · अरजी स्वीकारी मने पवित्र करो-निर्मय करो। शुद्ध श्रद्धा आपो ! सम्यकदृष्टि, सम्यक् ज्ञान-दर्शन-चारित्र आपो. हे श्री सामंधर भगवान् । अवमोद्धारक । जगत्तारक ! परम दयालो! हवे कृपा करो मुजने तारो पार उतारो, अरनी स्वीकारो जयदेव ! जयनाय ! जय वीतराग ! जय ! जय ! जय श्री सीमन्धर भगवान् । जयविहरमान भगवान् जय ! जय! त्वमेव सरणंटेव ! त्वमेव सरणं मम. त्वमेव सरणं नाथ ! त्वमेव सरणं प्रभो! --लेखक --
मारा विचारो.
अधमोद्धारक श्री सीमधर स्वामीने आ वीनतीरुपे कागळ:
हुडी-पेठ-परपेठ अने मेजरनामु बनावीने में मारा हृदयना विचारो
कर्या. अने तेमा (२०३) ठेकाणे आगम पाठना प्रमाण
दाखल करी मारी दलीलो मजबूत करी मे शासनसेना बनावी छे.
सत्य अने असत्य ए वे भेळशेळ न थई जाय, ए खास ख्यालमा
राखी आ प्रवृत्ति करी छे. आ एक बाबत मूलवा नेवी नयी के,
मस्ममहनी मीठी असरथी शासनमा बे हजार वर्ष पर्यंत पणी
हानि थई छे अने ते हानिमाथी घणा भाग्यशाली जैनाचार्यों बची
गयो छे छता पण केटलाक एवा पण शिथिलाचारी चैत्यवासी
गाचार्यो थया के जे शासनमा काटा खीला समान थया
जेनी प्रवृत्तिओ जैन समाजने धणी खटके छे ते दूर करता पण
पार आवतो नथी पेली काळी मीलाडीनी वार्ता अने " हारितताम्र
भाजनम्
" जेम घणी वीलाडीओ पेढी छे अने सत्य शोध
मुशकील थयु ले आ प्रकरणमा मात्र मुखनी वातो नथी पण
सिद्धातना पाठयी सत्य समजाववा कोशीश करी छे आराधक
घोडा अने विराधक जीवो घणा होय छे तेथी घणानी देसादेखीमा
बिचारा भोळा भद्रिक प्राणी घणी वखत फसाई जाय छे अने
खोळने गोळ सरखा मानी पाछळथी जरुर पस्ताय छे अने केटलाक
पासत्थाओ एम समझावे छे के आ दुढियामाथी अपेला छे तेने
।
उत्सर्ग, अपवाद, परपरा, गुरुगम क्यायी होय एम उपनमा पाना सुधीनी कुयक्तियो समळावी दे छे परिणाम शु आवे छे ते हवे फरीथी केवानु नथी. घणा कोलाहल करनारने जगत हवे बराबर पीछाणी शके छे हमेशां सत्यन बहार तरी आवे छे अने लोको बराबर मानी शके छे. लोको खाली वातोने अने कोरा पडितोने मानवाना नथी. ए तो हवे चारित्रने मान आपे छे कदाच एकाद प्रसगमा भूलथाप खाई जशे, परतु बीनी वार ठगाशे नहि अमारी पक्की श्रद्धा छे के शासननो पुनरुद्धार मुनि महारानो थीन थवानो छे अने तेवा मुनिराजो भारतममि उपर विचरे छे रत्न अने काचना टुकडा साथेन पड्या होय तो जोनारने सादी नजरे सरखा देखाय पण झीणी नजरे जेवाथी खरी वस्तुओ मळी शके छे-ओळखी शकाय छे. बाह्याडवरना मभकाथी काचना ककडा झवेरीओ सन्मुख हमेशां नापास थाय छे रंग, ढग, चाल, चलगत, चाळा, चेष्टा, टापटीप, वडे ढोगी, धर्मधुर्त जरुर जुदोन पड़ी जाय छे अने साचा सत पुरुषो खरी कसोटी उपर दीपी नकळे छे एक बात समजवा जेवी छे ते आ छे के, आगमोमा जे बाबतनु नामनीशान न होय अने पछीना ग्रथोंमा आग्रह-कदाग्रह रुपे तथा गच्छ व्यवहार रुपे घर घालीने बेठा . होय तेवा दाखलाओ मळी शके छे तीन थूई, चार यूई, पाच कल्याणिक, छ कल्याणिक- योमासामा अधिक मास ये पर्युशणा--लोकिक टीपणा मुभव अधु मानवु ने अधु न मानवु करेमीभते वणवार, एकवार, पेला के पछी ..(७) श्रावकोने मुहपति चरवलो, जुदा जुदा गच्छोनी जोगविधि-उपधान विधि तथा प्रतिष्टा विधि, अजनशलाका, देवन्य-सातक्षेत्र द्रव्य, मुपना पारणा, गोठी, पूजारी, देवकी दुकानो, तीर्थोनी पेढी, मुहुपति बाधवी तथा वखाण वखते काने चडाववी इत्यादि अनेक प्रवृत्तिओ दाखल थई छे के जे मन्य जीवोने खास विचारवा जेवीले मोक्षनी लुटालुट, अने दुकानदारी वधती जाय छे सावुओ एक बीनाने जुठा मानवा लाग्या एक बीजाना वापदादाने गालो भाडवा लाग्या "शकिए निस्संकति निस्संकिए सकंति " ज्या शका जेवू देखाय त्या नि शकपणे करवा लाग्या ज्या नि शक छे त्या अनेक शकाओ काढवा लाग्या परिणामे आ वावतोनो छेवटनो सरवाळो गुचाई गएला सूतरना कोकडा पेठे, काढवो उदरने खोदवो डुगर- व्यर्थ पाणी वलोवा जेवु निष्फळ देखाय छे श्रीमान् उपाध्यायनी यशोविजयजी महाराज तथा प सत्यविजयनी गणए घणो प्रयत्न को छ, अने तेथी परिणाम घणु सारु आन्यु उता पण पाछळथी मेळसेळ पेप्सती गई आ प्रसगे एक सूचना करवानी छे के एक क्रियाउद्धारक मुनि मडल स्थपाय, जैन महा सभा स्थपाय, जैन विश्वविद्यालय स्थपाय, जैन सुलेह कमीटी समा स्थपाय, जैन नाति मदद फड कायम थाय तो केवु सारु शासनदेवता सद्बुद्धि आपो. आ तमाम प्रकरणो आदियी अंत सूघी वाची विचारी मनन करो कई पण विरुद्ध विवेचन थयु होय तो मिच्छामि दुकड आपी लेखक . . 'क्षमा चाहुन - .
(८). प्रार्थना आ विनति लखवामा मारो हेतु ए नयी के हालमा भरत क्षेत्रमा कोइ साधु नथी. तेमज कोइने हलका पाडवानी कोशिष नथी. मारी मान्यता छ के शासननो आधार मुनिमडळी उपर छे, तथा समाजनी लाम हानिनी जोखमदारी पण मुनिमडळी उपर रहेली छे चालु समयमा मारत भूमिमा अनेक मुनिमतगजो विचरे ले तेओना पवित्र उपदेश द्वारा समयानुसार ' अनेक सुधारा थया छ, थाय छे अने थता रहेशे श्री वीर शासन; एक- वीश हजार वर्ष पर्यन्त अविच्छिन्न स्वरूपे चालशे ते महा मुनिमंडलना प्रनापेन. सखेद लखवु पडे छे के रत्न बहु कीमती छता पण काचना टुकडाओ साथे भेळसळ थवाथी प्रवेरी शिवाय कोइ कीमत करी शकता नथी बाकी साधारण जनसमुह तो वधाने काचनो देखाव दे ले एटला माटेज काच अने रत्नो जुदा पाडवानी जरुर छे. कधु छे, के-"गणिल्ठति पादाग्रे, काचः शिरसि धार्यते: क्रयविक्रय वेलायां, काचः काचो मणिर्मणिः । मतलब के रत्न पगे रोळांता होय अने काच माथे वाध्यो होय परतु परीक्षक पासे काच ते काचन बनवाना अने रत्न ते रत्न वस्तुज छे--एक अमूल्य चीज छे बन्ने ज्यासुवी अलग अलग वतावामां न आवे स्यामुधी भद्रिक माणसोनी रत्न तरफ आदरभावना--सत्कारबुद्धि
न थाय. केटलाएक बनावटी रत्नो पण लोकोमा जोवामा आवे है,
उपरथी सारी टापटीप करी मखमलना चळकदार कपडामा लपेटी
लोकोने रत्नना नग बताववामा आवे छे जे खरी रीते सात्रा रत्ननी
मश्करी करवा जेवु थाय छे--साचानी प्रतीत उठाडवा जेवु
बने छे रत्न अने काच बन्ने साथेन रहा होय तो समाजनुं भलु
करी शके नहि, जैन समाजमा परीक्षको गण्या गाठ्यान होय
छे काचना ककडाओ दृष्टिरागी अने लालचु लोकोने म तेम
समजावी पैसा एकठा करावे. कदाच एकाद दावपेचमा आवी
नाय, परंतु तेरलाख जैन जीवोनु कल्याण करावी न शके
समाजमा
अत करणनी धर्म लागणी-धर्म तत्वज्ञान विषय
कपायथी निवृत्ति—जिनाज्ञा आराधक ए तो घणा दूरज समनवा.
ज्यारे जिनाज्ञा तरफ दृष्टि करशु तो मले मोटा मोटा नामधारक
व्याख्यानमा-उपदेशमा कथनी कथता होय, परतु पोताना
ज मडळमा सुखसयम यात्रामा शुभ प्रवृत्ति न होय, तो पछी
समाननी सुधारणा कयाथी करी शकाय ! पोथीमाना रांगणा मेवु
धर्मोपदेशो जन रजनाय । बीजाने कहे खोटो संसार, पोते चाटे
वारवार आवा काचना टुकडाओधी समानने घणु सहन कर
पडे छे, अने तेवाओयी चेतीने चालवु हितकर छे
लेखक
-
न
भा
(८). प्रार्थना Ham- आ विनति लखवामा मारो हेतु ए नथी के हालमा भर क्षेत्रमा कोइ साधु नथी. तेमन कोइने हलका 'पाडवानी को नथी. मारी मान्यता छ के शासननो आधार मुनिमडळी उपर तथा समाजनी लाम हानिनी जोखमदारी पण मुनिमडळी उ रहेली ले चालु समयमा भारत भूमिमा अनेक मुनिमतगजो कि के तेओना पवित्र उपदेश द्वारा समयानुसार अनेक सुधः थया छे, थाय छे अने थता रहेशे. श्री वीर शासन ए वीश हजार वर्ष पर्यन्त अविच्छिन्न स्वरूपे चालशे ते । मुनिमडलना प्रनापेज. सखेद लखवु पडे छे के रत्न बहु कीमती छता पण का टुकडाओ साये मेळसेळ थवाथी प्रवेरी शिवाय कोइ कीमत शक्ता नथी बाकी साधारण जनसमुह तो बधाने काचनो दे दे ले एटला माटेज काच अने रत्नो जुदा पाडवानी जरुर काछे, के--गणिल्ठति पादाग्रे, काचः शिरसि धः क्रयविक्रय बेलायां, काचः काचो मणिर्मणिः । मतलब ये पगे रोळाता होय अने काच माथे बाध्यो होय परतु प पासे काच ते काचन बनवाना अने रत्न ते रत्न वस्तुन छे- अमूल्य चीज छे बन्ने ज्यासुघी अलग अलग वतावामां न त्यासुधी भद्रिक माणसोनी रत्न तरफ आदरभावना-सत्व - मेजरनामानी अनुक्रमणिका विषय गाथा. १० १२ दोहा गाया ७ २१ ३ १ श्री सीमधर स्वामीने विनती स्प कागळ २ श्री सीमधर स्वामीने विनती रुप हुडी ३ श्री सीमधर स्वामीने विनती रुप पेठ ४ श्री सीमंधर स्वामीने विनती रुप परपैठ ५ श्री सीमधर स्वामीने विनती रुप मेझर ढाळ १ ली सीमधर स्वामीनी स्तुति ढाळ २ जी सुविहीत-अधिकार दाळ ३ जी चैत्यवासी-अधिकार दाळ ४ थी आचार्यापाध्याय-अधिकार दाळ ५ मी गणी-अधिकार दाळ ६ठी योगोदहन-~-अधिकार दाळ ७ मी उपधान-अधिकार ढाळ ८ मी दीक्षा-अधिकार डाळ ९ मी आहारमहण-अधिकार बाळ १० मी रात्रिमोजन-अधिकार डाळ ११ मी वस्त्र पान -अधिकार २१ २ २९ १ २९ १ २ ३५ (१२) २९ १५ १ १ दाळ १२ मी सावन निर्वद्य अधिकार २ ढाळ १३ मी विहार-अधिकार दाळ १५ मी ज्ञानाम्यास-~-अधिकार २ टाळ १५ मी व्यारयान-अधिकार २ टाळ १६ मी तपस्या-अधिकार २ दाळ १७ मी स्त्रीसग निषेध-~-अधिकार दाळ १८ मी एकल विहारी-अधिकार दाळ १९ मी गच्उभेद-अधिकार २ दाळ २० मी निमित्त अधिकार ढाल २१ भी तार टपाल-अधिकार टाट २२ मी प्रतिकमण-~अधिकार १ दाळ २३ मी तीर्थयात्रा अधिकार २ ढाळ २४ मी मदिर उपाश्रय-अधिकार ३ दाळ २५ मी दुदर-अधिकार २ दाळ २६ मी तेरापन्या-अधिकार टाट २७ मी उसर्गापया अधिकार रार २८मी पासरगा--अधिकार टाढ०१.मी मायक-अधिकार सा ३० मी आराध विरामअधिकार २ टाळ३१ मी पूर्णा-अधिकार ३१ २१ १७ १ . Warna A . आ विनतिरुप कागळ, हुंडी, पैठ, परपैठ अने मेझरनामानी अंदर आगमोना प्रमाण नीचे प्रमाणे छे. . द्वाळ गाथा. ३ १ ४ ४ सख्या आगमना नाम १ श्री उववाइजी सूत्र २ श्री महानिशीथ सूत्र ३ श्री बृहत्कल्प सूत्र ४ श्री व्यवहार सूत्र ५ श्री आवश्यक सूत्र ६ श्री दशाश्रुत स्कंध सूत्र श्री व्यवहार सूत्र ८ श्री निशीथ सूत्र ९ श्री व्यवहार सूत्र १० श्री निशीथ सूत्र ११ श्री स्थानाग सूत्र १२ श्री व्यवहार सूत्र १३ श्री सूयगडाग मुत्र १४ श्री महानिशीथ १५ श्री अगलिया १६ श्री उत्तराप्ययन ४ ५ . " امور میں میں نو or •ramanar " २७ श्री भगवती । I..
(१२) २९ २ २ or १५ २ १२ M ढाळ १२ मी सावध निर्वद्य-अधिकार २ ढाळ १३ मी विहार-अधिकार १ दाळ १४ मी ज्ञानाभ्यास-अधिकार ढाळ १५ मी व्याख्यान-अधिकार दाळ १६ मी तपस्या--अधिकार ढाळ १७ मी स्त्रीसग निषेध-अधिकार ढाळ १८ मी एकल विहारी-अधिकार १ ढाळ १९ मी गच्छभेद-अधिकार टाळ २० मी निमित्त- अधिकार २ ढाळ २१ मी तार टपाल-अधिकार दाळ २० मी प्रतिक्रमण-अधिकार ढाळ २३ मी तीर्थयात्रा-अधिकार २ ढाळ २४ मी मदिर उपाश्रय-अधिकार ढाळ २५ मी दुढक-अधिकार ढाळ २६ मी तेरापन्थी-अधिकार ढाळ २७ मी उत्सर्गोपवाद-अधिकार ढाळ २८ मी पासत्या-अधिकार दाळ २९ मी श्रावक-अधिकार ढाळ ३० मी आराधक विराधक-अधिकार २ ढाळ ३१ मी पूर्णता-अधिकार २ ३ or २ २१ २ od १८ ७ ३५ २५ (१५) " " " " " श्री स्थानाङ्ग -v-rrr-2014 " ४२ श्री दशवकालिक श्री भगवती ४४ श्री भगवती श्री समवायाग ४६ श्री पिडनियुक्ति ४७ श्री सूयगडाङ्ग ४८ श्री निशीथ ४९ श्री स्थानाग ५१ श्री दशवैकालिक श्री उत्तराध्ययन ५३ श्री दशवेकालिक ५४ श्री कल्प ५५ श्री उत्तराध्ययन ५६ श्री आचाराग ५७ श्री भगवती ५८ श्री आवश्यक ५९ श्री दशकालिक ६० श्री दशवैकालिक ६१ श्री निशीथ ६२ श्री दशवैकालिक ६३ श्री बृहत्कल्प ६४ श्री निशीथ ६५ श्री दशवकालिक ९ ९ " २६ २८ " " " १० or १ १० १० १ " " " (१४) ३ श्री व्यवहार २ . ६ H MAM. ६ १२ ६ " " १८ श्री पनवणा १९ श्री नदि २० २१ श्री भगवती २२ श्री अणुत्तरोववाद २३ श्री अणुत्तरोववाइ २४ श्री व्यवहार २५ श्री भगवती २६ श्री समवायाग २७ श्री अन्तगढदशाग २८ श्री बृहत्कल्प २९ श्री व्यवहार ३० श्री व्यवहार ३१ श्री महानिशीथ ३२ श्री सूयगढाङ्ग ३३ श्री दशवैकालिक ३४ श्री महानिशीथ ३५ श्री स्थानाग ३६ श्री बृहत्कल्प ३७ श्री उत्तराध्ययन ३८ श्री स्थानाग ३९ श्री दशवकालिक २३ २४ २७ ८८ ७ . ७ " " ८ १ ८ ८ ८ श्री ज्ञाता १५ २४ ४१ श्री कर्मग्रंथ " (१७) १२ १२ १२ १२ १२ १२ १३ १७ २८ २८ १ ३ ९८ श्री " ७ " १३ १३ " श्री निशीथ ९१ श्री सूयगडाग ९२ श्री भगवती ९३ श्री उत्तराध्ययन ९४ श्री आचाराग ९५ श्री दशवैकालिक ९६ श्री आचाराग ९७ श्री आचाराग बृहत्कल्प ९९ श्री उत्तराध्ययन १०० श्री आचाराग १०१ श्री दशवैकालिक १०२ श्री समवायांग १०३ श्री निशीथ १०४ श्री ज्ञाता १०५ श्री स्थानाङ्ग १०६ श्री निशीथ १०७ श्री बृहत्कल्प १०८ श्री निशीथ १०९ श्री बृहत्कल्प ११० श्री व्यवहार १११ श्री व्यवहार ११२ श्री आवश्यक ११३ श्री प्रश्नव्याकरण १४ " १३ " १ ३ ४ " ५ ८ १४ १५ " (१६) १० " ६६ श्री निशीथ ६७ श्री दशवकालिक ५ ५ ७ श्री आवश्यक १० ११ १ ७० १ १ १ " श्री बृहत्कल्प " " " ४ ४ " ७८ ११ ६९ श्री कल्प श्री गच्छाचार पयन्ना श्री आचाराग श्री निशीथ ७३ ७४ श्री उत्तराध्ययन ७५ श्री दशवकालिक श्री निशीथ श्री पन्नवणा श्री निशीथ श्री प्रश्नव्याकरण श्री निशीथ श्री आचारांग ८२ श्री अनुयोगदार ८३ श्री निशीथ ८४ श्री ओधनियुक्ति श्री आचाराग ८६ श्री निशीथ श्री आचाराग श्री महानिशीथ श्री आचारांगा " " " " १० १२ ११ " १७ २४ २८ . ११ ३३ " " १२ १२ १२ (१७) १२ १२ १२ १२ १२ १२ १२ " १ १३ ३ " १३ १० १३ " श्री निशीथ ९१ श्री सृयगडाङ्ग ९२ श्री भगवती ९३ श्री उत्तराध्ययन श्री आचाराग ९५ श्री दशवकालिक ९६ श्री आचाराग ९७ श्री आचाराग ९८ श्री बृहत्कल्प ९९ श्री उत्तराध्ययन १०० श्री आचाराग १०१ श्री दशवकालिक १०२ श्री समवायाग १०३ श्री निशीथ १०४ श्री ज्ञाता १०५ श्री स्थानाङ्ग १०६ श्री निशीथ १०७ श्री बृहत्कल्प १०८ श्री निशीथ १०९ श्री बृहत्कल्प ११० श्री व्यवहार १११ श्री व्यवहार ११२ श्री आवश्यक ११३ श्री प्रभव्याकरण " १ १४ १४ १४ ४ १४ ५ " ।१४ ८ " १४ १५ २ "
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(२५) अर्थनी दिये देशना, ओलवे धर्मना ग्रन्थ रे; परम पुरुषना प्रगट चोर थी, किम वहे धर्मनो पंथ रे, कुगुरुनी वासना पासमा, हिरण परे जे पड्या लोकरे** ज्ञान दर्शन चरण गुण विना, जे करावे फुलाचार रे लूटे तेने जन देखता, किहां करे लोक पोकार रे. जे नवी भव तर्या निर्गुणी, तारसे कीण परे तेहरे; दोरुडे कुगुरु ते दाखवे, शुं थयु ए जग शूल रे ++ix विषय रसमा गृही माचीया, नाचीया, कुगुरु मदपूर धूम धामे धमा घम चळी, ज्ञान मारग रह्यो दूर रे॥ कलहकारी कदाग्रह भर्या, थापता आपणा चोल रे जिन वचन अन्यथा दाखवे, आज तो वाजते ढोलरे ।। अरे आ उपाध्यायजी एटलाथीज शान्त न थया हता, पण तेभोनी पोकार भने कोईए न सामळी त्यारे तेओश्रीने सादा त्रण सो गाथानी हुन्डी श्री सीमधर स्वामी उपर लखवी पडी हती, तथा सपासो गाथानु स्तवन लखवु पड्यु हतु भने एक स्वाध्याय तो वापानीए एवी लखी हती के ते वाचता रुवाटा उमा थई जाय, ते शु महात्मा पोईनी निन्दा करता हता एम कही सकाय ? नहीं नहीं शासननी पडती दशा तेओश्रीथी जोवाई नहीं भने तेओने ज्यारे घणान काटा टग्या हशे, त्यारेन एवा उद्गारो निकळ्या होय एम जणाय छे, अने आ उद्गारोथी दुराचारीओनो दुराचार दूर करी शास- नने लागतु कटक अटकावानोन तेमनो हेतु होवो जोईए । अरे महेरवान ! ,
(०६)
भने उदारता थी कहवा दो के परमात्मा वीरप्रभु पण दुराचारी-
भोना पक्का शत्रून हता, आ वात तेओ श्रीना सिद्धान्तथी झलकी
भावे छे. जुवो सुयगडाग आदि सूत्र.
सज्जनो ! दुराचारनु खडन करवू आ कोईनी निन्दा नथी,
पण सदाचारनु मंडनन छे, दुराचारनु खडन अने सदाचारनु
मडन आन काल थतु नथी, पण आ प्रवृत्ति पूर्व महाभाषि-
ओधीन चाली आवे छे, एटले नवीन नथी.
आत्मबधुओ! आपणे अत्यार सुधी एम मानता हता के-खरा हो
के खोटा पण आपणा गुरुदेव छे तेओना दुराचार जाहेरमा मुकवायी
आपणीन हासी थशे आ आपणा विचारो मोटा भूल मरेला हता
भने आवा खोटा विचारोथी आपणे आज सुधी केटला मोटा
नुकसानमा उतरी पड्या छाये.
आने लोको घरमा गाममा समाजमा के देशमा कचरोके सहो
होय ते बाहर फेंकी देवा सीखी गया छे अने एज तेओनो खरो
उन्नतिनो मार्ग छे, त्यारे जैनोए एवी गभीर भूल करी अग्निने
रुमा शामाटे संघरी राख्यो हशे।
केटलाक अज्ञान लोको पासत्थाओना लपेटामा आवेला अने
स्टीना गुलामो ननी एम कहे छ के आपणा गुरु देवोना दोषो गमे
सेटला नुकसानकारी होय तो पण प्रकाशमा नन लाववा जोईये,
अने जो ते दोषो प्रगट करशो तो शासननो उच्छेद थशे, धर्मनो
ध्वस थसे, अने तेथी गुरुना अमावे धर्मोपदेश कोई संभला
(७)
.
चशे नहि, ते शिवाय विचारी भोली नेनो उपधानादि क्रिया कोनी
पासे करश एटले भाई चुपचाप येसी रहो।
महानुभावो । आवा दुराचारी गुरुओधी नपी रहेतु शासन के
नथी रहेतो धर्म, अने आवा झघडाचारीओ के पोते रागद्वेषना
कीचडमा खुचेलाना उपदेशथी समाजनो सुधारो थवानो नथी अगर
खुल्ला दिलथी कहो तो जैन समाजने क्लेश, कदाग्रह, धर्मभेद, अने
पुरुषार्थहीन बनाववामा अग्रेसर कारण होय तो आ दुषित
गुरुओन छे बन्धुओ ! आने पोप, पादरी, मठधारी, महान्त के
भट्टारकोने दूर मुकवाधीन टोको उन्नति एवो शब्द काने
मामलवा सीख्या
कदाच आपणे आपणा गुरुओना छता दोपोने रत्ननी पेठे
तीजोरीमा मुकीये, पण ज्यारे अन्य समाजना लोको प्रसिद्ध पेपरामा
'एक जैनाचार्यनो अत्याचार एवा
लेखो लखे तेने हजारो नहि
पण लाखो विद्वानो वाचे त्यारे शु जैनोने सरमावा जेवु नी ?
'एक नहीं पण एवा गामो गाम हनारो दाखला तैयार छे, ज्यारे
जैन पत्र अने जैन धर्म प्रकासक नेवा महत्ववाला पेपरो वखतो
चखत पोकार कर्या करे छे के-आज काल साधुओने परिग्रहना
पोटला ववी पड्या छे, अने ग्रहस्थीओने त्या मुकवानो प्रचार
घणो वधी पङो छे इत्यादि, त्यार पछी एवा सडेला थामलामोने
मकानना आधारभूत कहेवा : नहिन कहेवा, माटे एवा यामला
ओने अज्ञान के दृष्टि रागी निर्मन्य कहेवा ते महा मोहनु कारण
(३०), गई तेवा अनाचारिओ थी हमार हाथ दूरन रहे, कल्याणकारी माने छे, तेमन जे महान पुरुषो पोतानु जीवन समाज हितार्थ अर्पण करेछे ते सदाचारीओने माटे विद्वानोनी श्रद्धा मजबूत थती जाय छे आ वात स्वमाविक छे के चोरोने चादणु गमतु नथी, तेमन दुराचारिओने सदाचारनु व्याख्यान केवी रीते गमे ? ज्यारे एमज छे त्यारे मेनरना, तो दुराचारीओने माटे एक मोटो कुहाडोन छे, तो पछी बिचारा पासत्थाओ कलकलता कालनाथी पोक पाडे तेमा नवाई शी अने पासत्याओना पक्षकार खोटा २ लेख लखी कोलाहल मचावीने पासत्यां- ओना उतरता आसुने लुछे अथवा दाजता हृदयने शान्त पाडे तो भले. हु छाती ठोकीने कहीश के ज्यासुधी अमारा मेजरनामामा आवेला ( २०३ ) आगमोना प्रमाण ते असत्य करी न बतावे त्या सुधी कोईपण विद्वान् मेझरनामाने असत्य न मानी शके ! पाठको ! जरा ध्यान राखशो के वस्तु गमे तेवी होय पण पोतानी मर्यादामा होय त्यासुधीज सारी कहेवाय छे, तेमन लेखक पण गमे तेवा होय तो पण पोतानी मर्यादामा रहीनेन लेख लखे त्यारेन दुनिया तेनी कीमत आकी शके छे, अत्रे अमे एटलुन कहीशु के मेजरनामु अने तेना प्रतिपक्षाओना लेखोने . पिन खरे खरु लखाण जणाई आवशे मेजरनामामा मुख्य ३ ॥
(३१) चालती धमालयी थतु शासनने नुकशान ने तेना कारण दर्शाव्याछे, तेनी साथेन अमे पण वारवार ख्याल राखता आव्या छीए के अमारा लेखपी पासत्थाओने पुष्टि न मले, तेमन छती क्रिया निषेध पण न थाय, एटलुज नहीं पण उत्सर्ग, अपवाद, अने समयानुसारना दाखला पण सार्थना सायेन आपता आन्या छोये आटलु, छता आ मेजरना, पासत्याओने वजपात नेवू शा माटे थई पडयु हशे, ते अमे समझी शक्ता नथी मेझरनामाना प्रतिपक्षमा पडदा पाछल रही त्रण निर्नामा लेख बाहर पड्या छे ( १ ) जैनपत्रना अकमा "मेझरनामा नामजूर" (२) श्री श्रेयस्कर मडल तरफथी हेन्डबील (३) एक ३२ पृष्टनी चोपडी तेना योजक केशवलाल डी शाह अमदावाद थी निकल्यु छे आत्रणे लेखोना लेखक गृहस्थ होय के कोई मेषधारी होय ते तपासवानी अमारे जरुरत नथी, परन्तु ते लेखना अन्दर जे गीत गाया छे तेज जोवाना छे आत्रणे लेखोमा वधारे महत्ववालो वीषय तो आ ले के तमे मेझरनामु लखवा वाहर पड्या छो परन्तु तमे ढूंढीयामा केना शिष्य हता: सवेगी मा क्यारे आन्या । दीक्षा कोनी पासे लीपी'तमारु नाम ज्ञान सुन्दर कोणे आप्यु' इत्यादि लेखक लखेछे के आ प्रश्नो नो पहेला उत्तर आपो अने पीन बीनाना उपर लेख लखनो, अर्थात् पछी मेझरनामु लखनो अहो ! आ के आश्चर्य ! विद्वानो विचार करी शके छ के - (३२) - होय अने - आ पुछेला प्रश्नोंने अने मेझरनामाने सबंध छे अगर एमन होय तो धारा समामा एक आवो कायदो पसार कराववो जोईये के अमुक दीयामाथी आवेलो होय, अमुक दिवसे आव्यो होय, अमुकनी पासे दीक्षा लीधी होय, अमुक व्यक्ती ए नाम आप्यु होय, अमुक रगर्मा होय, केटलो लावो पहोलो होय, साधु होय के गृहस्य अमुकनी रजा होय तोज सत्य वात लखी शके. याद राखशो के ज्या सुधी आवो कायदो नैनोमां प्रसार न थाय त्या सुधी आ स्वतत्र विचार वाला विद्वानो सत्य बात दुनीयानी सन्मुख जाहेर करवामा कदी पण पाछा हटशेज नहि. महाशयो । ध्यानमा राखसो हवे एवो जमानो नथी के एक बीजाना विचारोने कोई दवावी शके अथवा आडा अवला प्रश्नो करीने एक बीजा ने हलको पाडी शके ज्यारे अमारी उपर मोटा २ आचार्यो, पन्यासो अने साधुओना कागल मोटा मोटा विशेषणो वाला थोकबन्ध आव्या, ते वखते उक्त प्रश्नो केम नथी पूच्या,तेमन हुंज्यारे साथमा रहेतो हतोत्यारे पण मा प्रश्नो पुलवामा नथी आव्या, त्यारे आ ढोल जेटली पोल खोलवा वालु मेझरनामु वाचीनेन आ प्रश्नो पुछवामा आव्या छे । तेनो अर्थ विद्वानो पोतानी मेलेन समझी सकशे, परन्तु एटलु तो याद राखसो के हुं तमारा चोपडामा साधु तरीके नाम मडावा आवु त्योरेन तमारे सेवा प्रभा करवाना हक छे. ज्यारे हु एक शासन सेवक तरीके ओलखाववा धार छु महीना सुधी पेपरो द्वारा चर्चा चलावी छे, तथा आन सुधी ७५००० चोपडीयो देशोदेशमा शासन सेवा पनावी रही छे तपा म्हारी दीक्षा अने म्हारु नाम कई व्यक्तीपी छानु छे के तमने प्रश्न करवो पज्यो। दरेक लेखकने मूलवु न जोईये के आन गमे तेवा विचारो पन्ली- कमा कोई पण व्यक्ती मुकी शके छ पछी सत्यासत्यनो निर्णय करवो विद्वानांनी विचारश्रेणी परज छे, तो पछी एवा नबलाईना प्रश्नो करी पोते हासीना पात्र शा माटे बनो छो। हवे बीजा मडलना हॅन्डनिल तर्फ जोई श! तो मे महलनो नाम श्रेयस्कर राखवामा आन्यु तेमा केटली योग्यता छ भने तेना सायेन मडलनु हैन्डविल जोवामा आवे तो ते मंडलनी केटली कीमत मुंकाय ते अमे कही सक्ता नयी मंडले में प्रश्नो कर्या छे तेमा पण तेज गीत गाया रे के दीया माधी आवेल छे अने कोना पासे दीक्षा लीधी इत्यादि तेना उत्तरमा अमे उपर लखी आल्या छीये अने विस्तारथी जोवु होय तो मेझरनामानी दाल ३० मी जुवो. हु पूछु छु के आ हॅन्डबिल पहेला मेझरनामु बाहर पड़ी गयु हतु अने हन्डविलना तमाम प्रश्नोना उत्तर-सविस्तारथी तेमा आवेला होवा छना आ कागलीया शा माटे काला करवामा आल्या हो?
- - आ पुछेला प्रश्नोंने अने मेझरनामाने शु सबंध छ ? अगर एमज होय तो धारा सभामा एक आवो कायदो पसार कराववो जोईये के अमुक हूढीयामाथी आवेलो होय, अमुक दिवसे आन्यो होय, अमुकनी पास दीक्षा लीधी होय, अमुक व्यक्ती ए नाम आप्यु होय, अमुक रगमा होय, केटलो लानो पहोलो होय, साधु होय के गृहस्थ होय अने अमुकनी रजा होय तोज सत्य वात लखी शके. याद राखशो के ज्या सुधी आवो कायदो जैनोमा प्रसार न थाय या सुधी आ स्वतत्र विचार वाला विद्वानो सत्य बात दुनीयानी सन्मुख जाहेर करवामा कदी पण पाछा हटशेज नहि. महाशयो ! ध्यानमा राखसो हवे एवो जमानो नथी के एक नीजाना विचारोने कोई दवावी शके अथवा आहा अवला प्रश्नो करीने एक बीजा ने हलको पाडी शके ज्यारे अमारी उपर मोटा २ आचार्यो, पन्यासो अने साधु भोना कागल मोटा मोटा विशेषणो वाला थोकबन्ध आव्या, ते वसते उक्त प्रश्नो केम नधी पूच्या,तेमज हुँ ज्यारे साथमा रहेतो हतोत्यारे पण मा प्रश्नो पुवामा नथी आव्या, त्यारे आ टोल जेटली पोल खोलगा वालु मेझरनामु वाचीनेन आ प्रश्नो पुवामा भाव्या छे। तेने अर्थ विद्वानो पोतानी मेलेन समझी सफशे, परन्तु एटल तो याद रायसो के हु तमारा नोपडामा साधु तरीके नाम महावा भावु त्यारेन तमारे, या प्रश्न करवाना हक छे, ज्यारे हु एक शासन सेवक तरीके मोरवाया धारु - महीना सुधी पेपरो द्वारा चर्चा चलावी छे, तपा आन सुधी ७५००० चोपडीयो देशोदेशमा शासन सेवा मनावी रही छे. तथा म्हारी दीक्षा अने म्हारु नाम कई व्यवीथी छानु छे के -तमने प्रश्न करवो पड्यो। दरेक लेखकने भूलवु न जोईये के आज गमे तेवा विचारो पठची- कमा कोई पण व्यक्ती मुकी शके छे पछी सत्यासत्यनो निर्णय करवो विद्वानोनी विचारश्रेणी परज छे, तो पछी एवा नबलाईना प्रभो करी पोते हासीना पात्र शा माटे बनो छो। हवे बीना मडलना हन्डबिल तर्फ जोई शु! तो ने महलनो नाम श्रेयस्कर राखवामा आन्यु तेमा केटली योग्यता छ भने तेना सापेन मडलनु हैन्डविल नोवामा आवे तो ते मंडलनी केटली कीमत मुकाय ते अमे कही सक्ता नयी मंडले जे प्रश्नो कर्या छे तेमा पण तेज गीत गाया रे के ढूढीया माची भावेल अने कोना पासे दीक्षा लीधी इत्यादि तेना उत्तरमा अमे उपर लखी आन्या छीये अने विस्तारथी जोवु होय तो मेझरनामानी ढाल ३० मी ,जुवो हु पूछु तु के आ हॅन्डबिल पहेला मेझरनामु वाहर पडी गयु हत भने हॅन्डविलना तमाम प्रश्नोना उत्तर सविस्तारथी तेमा आवेला. होवा छता आ कागलीया शा माटे काला करवामा आन्या हशे । (४०) तपतेलादि कराली पैसा लेवा, उनमणाना माल लेवा, साधुओन उपाश्रयमा अठाई महोत्सव कराववा, रात्रे दीवा राखवा, आचार्यो मूर्तिओ जिन चैत्योमा स्थापवी, अने पोत पोताना जुदा २ उपाश्रयम पेटी पटारा अने पोतानो सिक्का इत्यादि राखनु ते आगमवादी प- महाव्रतधारी मुनि मतगजोनी किया नथी, परन्तु निगमवादी,चैत्यवाप्ती शिथिलाचारी, सुखशिलीयाओनीन क्रिया छे एने माटे अमे अत्रे वर्षों विवेचन नथी करता, कारण अमोए थोडा दिवसामान ए प्रपंच नामुं लखवानु धार्यु छे, अने जे मेझरनामानी अन्दर केटलीक वात मूलथी लखीज नथी, तेमज केटलीक सूचना मात्र ल्खी छे, तेओनी सारी टीका, टीपणी, नाम, गाम, साल, सम्मत सविस्तार लखवामा आवसे, तेथी आपनी जिज्ञासा पुरी थशे माटे अमे अमारा पाठकोने थोडा दिवसना माटे धैर्य राखवानु निवेदन करीये छीए, बनता सुधी कार्य शीघ्र करवामा आवसे. अमे त्रणे निर्नामा लेखोना लेखकोने सचोट सूचना छीए के हवे पडदा पाछळ रहेवानो जमानो नथी, मेदानमा आ. भने सत्यासत्यनो निर्णय करी स्व अने परर्नु कल्याण करो. इत्यलम्. लेखक, ज्ञानसुन्दर- - 4 -
श्रीवीतरागाय नम ।
श्री रत्नप्रभसूरीश्वर सद्गुरुभ्यो नमः ।
श्री सीमंधर परमात्माने वीनती रुपे कागल,
हुंडी, पैठ, परपैठ
अने
मेझर नामो.
प्रथम कागल
(संक्षेप मुद्दासर वातो)
सुणो चदाजी, ए देशी।
सुणो करुणानिधि, कागळ आ रखी भेज़ तेने वाचो,
ने प्रेम धरी, भरतक्षेत्रनी यातो, हृदये जाचो-ए देशी.
-
(२)
महा विदेह क्षेत्र अति भारी छे, पुष्कळावती विनया सारी छ,
पुंडरीगिणी नगरी थारी छ, धणी अमारो केवल धारी छे. सुणोः ।
भरतनी वदना लेजोजी, कागज पर चित्त देनोजी,
सुर भक्तिमा मत रीझोनी, उपकार गरीब पर कीजोजी. सुणो ।
चउ सघ गुणनी खाणो छे, पण भरतनी वातो जाणो छे,
शं लखं नहीं परिमाणो छे, थोडामा घणु ए पीछाणो छो. सुणो०३
दुकानं आपनी चाले छे, चोर चारे दिशि महाले छे
दिन दिन घाटो घाले छे, पण हजु काम काइ थाळे छे. सुणोः
पोलीस माले उठावे छे, वळी चोर चोर करी धावे छे,
वार्ड क्षेत्रने खावे छे, ए न्याय भरतमा पावे छ
मुनिमें गुमास्ता तेवा छे, ते पण चोरो नेवा छे,
छोडी दुकाननी सेवा छे, ते खाय माल नित्य मेवा छ सुणोः ।
घरमा पुरो तोटो छे, माथे खरचो अति मोटो छे,
पुरुषार्थतणी पण खोटो छे, तेथी पुण्य अहींथी छटो छे. सुणो०
श्वेतावर दिगबरना, झबडा गच्छ मतांतरना,
स्थानकवासी दुढकना, वळी भीखम तेरा पथीना. सुणो०
१ शासन २ कुदर्शनी, कुलिगी, पासस्था, मायाचारी ३ आचा
यादि उपदेशक अनेक क्लेश झपडा फेलाववाना उपदेश करे छे
४ क्षेत्र ते शासन अने वाड ते समाजना आगेबानो पदवीधर
आचार्य उपाध्याय पन्यास विगेरे ५ साधुसमाज,
वर्ग
६ रोज रोज नोनी सरया घटे छे
सुणो०५
~
श्रावक
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परपेठ, ल० का (पेटनो उत्तर न आववार्थी परपेठ लखाय छे. (दान कहे जग हुँ वडो, मुज सरखो न कोय ललना- देशी कागळ हुडी पेठने, केम न सीकारी नाथ ललना, हवे परपेठ सीकारजो, जो तमे जगना तात ललना कार कागळ हुडी पेंठमा, अहीआना हाल विचार, शेष लतु परऐंठमा, भरतना सहु समाचार. पहेली आडत बाधतां, करवो जोइए विचार; हवे अधवचा भरतने, किम छोडो निरधार मला माणस समारमा, करे न विश्वासपात; ल० तु साहेब त्रिभुवन घणी, भली कीधी आ वात. ल० का एवा कपटी अमे नहीं, नाणा राखी लखीए पेठ, ल० का समाचार दुकानना, तेहनी लखु परपेठ. साध्य रोगनी औषधि, होये जीव विशुद्ध, रोग मोटो असाध्यनो, दवाथी न थाये शुद्ध ल० का एक कनक अने कामिनी, वंश कयों सौ ससार, प्रवेश को शासन विपे, सुणीये ते समाचार ल० का अर्थ (दत्य ) नी दीये देशना, लेवे ज्ञानने नाम, उनमेणा उपधानमा, कादयु पेदाशनु काम ल० का महिला परिचय अति घणो, भविष्यमा वधशे रोग, वळी सुनो पन्यासनी, झूठा माटया जोग ल० का , . , -
ल.
पहाड रचना करायता, लटे जीवोना प्राण,
आरभथी शंके नहीं, उची धरी तुन आण. ल० का १०
कदी तमारा मनने विषे, एवो हशे विश्वास,
प्रायकवाड शासन तणी, वारण करशे तास. (तेनी)ल० का० ११
सुणो श्रावकनी पारता, देवन्य पोते खाय
गच्छ तणा झघडा करे, केटलु लल्यु हवे जाय ल. का० १२
बाध्या ते दृष्टि रागमा, न करे हृदये विचार,
ध्वजा पताका सारीखा, फरी जाय वायु लार
( पवाडे ) ल० का० १३
साधुने श्रावक तणो एकन जाणो ढग,
ल०
काण रही नहीं कोईनी, नहीं रह्यो शासन रग ल० का० १४
रोग वैरी अग्नि तणो, वळे शीतळ आचार,
वध्याथी व्याधी करे, जलदी करो उपचार ल० का० १६
'दुख नही आणा मुकता, केम आवे बीजाने देख,
बगला भक्त भेगा हुआ, केटला लखु हु लेख ल. का० १६
परऐंठ सिकारो नाथनी, मत करो देर लगार,
ज्ञान कहे बगड्या पडी, दुष्कर शुद्धाचार ल० का० १७
ल०
(८)
मेझर नामुं.
1
.
दोहरा.
श्री सीमधर साहेबा, महावेदेह क्षेत्र मोझार,
प्रातः उठी वदन करु, दिनमा वार हमार.
आनद घन देवचगनी, यशोविजय उवझाय, (उपाध्याय)
हुडी कागळ बहु लख्या, पेठ परपेठ पगय. ( मोकली)
उत्तर पाछो नहीं मळ्यो, ते पहोंच्या तुज स्थान,
कागळ हुडी वाचीआ, पेठ परपेठ सुणी कान,
ते न सिकारी नाथजी, शु कारण छे तेह;
के नाणुं जमे नथी, के नहीं पहोंची नेह
हुडी पेठ खोवाई गयी, परपेठ सीकारी न नाथ,
ते कारण मेंझर लखु, जलदी सीकारो तात
-
जिन स्तुति.
-
(ढाळ १ ली.)
चीर सुणो मारी विनती ए-देशी
सुणो सीमधर विनती, मेझर नामु हो लखी मेलु आन.
जलदी सिकारो नाथजी, जेम सुधरे हो सब जैन समान.
सुणो सीमधर.
स्वस्ति श्री पुष्कलावती, पुंडरीगिणी हो नगरी शुभ स्थान,
सर्व उपमाने योग्य छो केवळदर्शी हो जो रे केवळज्ञान सु. २
आठ प्रतिहार ज शोमता अतिशय हो मोटा चोत्रीश, (३४)
इद्रादिक नित्य पूनता नीत्या हो जे रागने रीस
तत्र श्री सीमघर प्रभु, करुणासागर हो मोटा कृपाळ,
अधम उद्धारण साहित्रो, जगबधव हो जग दीनदयाळ
सु०४
मरतक्षेत्रना सघनी, वदना होनो हो एक हमारने आठ,
तुम कृपा अत्र कुशळ छे, दर्शनथी हो होसे अधिको ठाठ सु. ५
कागळ हुडी पैठने, परपेठ हो लखी मेली अनेक,
तेनो उत्तर मळ्यो नहीं, केम कीधी हो ! प्रभु ढील विशेष सु०
ते कारण लखवु पडयु, मेझर नामु हो मने आ वार,
आगळ रीत नहीं लोकमा, देनो हो प्रभु एने सीकार
ढाळ १ लीनो तात्पर्य-वीतराग प्रभुने हमेशा वीनती
करवी अने वन्दना करवी.
दुहा
अनत कल्याणी सघ छे, सघथी वडो न कोय,
समोसरण बिराजता, नमस्कार करे तोय
हु पण सघने नमी करी, कहु मननी वात,
तोपण कोइ न सामळे, तु नाणे जगतात
ओछो कोठो तुच्छ मति, नहीं समावे नाथ,
कहु भरतनी वारता, सामळ कृपाळु नाथ
३
.
.
१
२
(१०)
सुविहित अधिकार.
(ढाळ २ जी)
उपरनी देशी चालु
केवळ कमळा जिन लहे, गणधर हो थापे 'तीर्थरूप;
चारे प्रकारे सपनो, तुं तो हो ! त्रीभुवननो भूप सु०
भरतक्षेत्रनी वारता, समय समय हो जाणो जगनाथ,
तो पण मारा मन तणी, अर्ज करू हो जोडी बन्ने हाथ. सु.
मुज मन भमरो वसी रह्यो, तुम चरणे हो मुन चित्त लोभ
विषम वाट पर्वत घणा, आ मवमा हो ! नहीं मुझथी अवाय सु०
वीर शासन अति उजळु, जाणु हो ! पूनमनो चद्र,
साधु सुधारे आतमा, गुण गावे हो ! मुरलोके इद्र.
अहो तपसी अहो सयमी, अहो ज्ञानी हो ! अहो ध्यानी तेह,
अहो क्षाति अहो मुत्ती, अहो त्यागी हो ! वैरागी जेह. सु०
मेरु जेम अडोल छे, सागर हो जेम होय गमीर,
दिनमणी जेवा दीपता, निर्मळ हो ! गगानु नीर.
अप्रतिवध वायु परे, निरालवन हो ! जाणो आकाश,
अप्रमत्त मारड परे, कोई करे हो कर्मनो नाश
क्रोधादि रिपुने दमे, पीवे हो ! मुनि उपशम रस,
शत्रु मित्रने सम गणे, न्याप्यो हो । भूमडळमा जश.
सु०
.
(११)
सु०९
-
इत्यादिक बहु गुणभर्या, माख्या हो प्रथम उपाग,
लब्धि अनेके ऊपजी, कोई मण्याहो ! पूर्वने अग.
एवा मुनिनीने नित्य प्रति, पूजे हो ! सुर इंद्र नरेंद्र
हु पण माथु नमावीने, नमु नमु हो । प्रमु तेह मुनींद्र, सु० १०
वीर पाट पर शोमता, पचम गणधर हो 1 श्रीसुधर्म स्वाम,
पचम आराना अतमा, दुपस्सह सूरि हो ! लेशे तेनु नाम सु० ११
परपरा श्री पासनी, बीजो गच्छ हो ऊपकेश (कमला) कहाय,
पोरवाळ श्रीमाळ ने, ओशवाळ हो कोई जैन बनाय
सु० १२
सुविहित आचार्य पाटमा, चाल्या आल्या हो ! रत्नोनी खाण,
उपलदे राजासप्रति, चद्रगुप्त हो ! पाळी 1 जिनवर चराण सु० १३
निन्हव नवा नवा नोकळी, वादळ जेम हो । गया विरलाय,
भरतक्षेत्रनी वारता, लखता हो जीवडो गमराय
सु० १४
दक्षिण भरत हुडा सर्पिणी, पचम आरो हो ! कृष्णपक्षी जोय,
असयति पूजा पाचमो, कारण मन्यु हो कमती नहीं कोय.
उदय उदय पूजा नहीं, भस्मग्रह हो ! बेठो वीरनी राश ( राशि )
प्रमाव पढ्यो तेहनो, पेहले कीघो हो । ते प्रेमनो नाश सु०१६
मान दूत कळिकाळनो, छडी रोपी हो ! शासनमा आय,
आराधे देवी देवता दिन दिन हो ! शिथिलता थाय
उसे नव वर्षों पछी, मोटो पड्यो हो ! शासनमा भेद,
दिगबर एकातने, पक्ष ताणो हो ! करे भेदमा भेद
बोलो केइ उत्यापीआ, केइ हो ! नव दीधा स्थाप,
तेनी रामायण छे घणी, केटली लखु हो ! तुम जाणो आप,
(१२)
'छसो चौराशी वर्षे हुआ, गध हस्ति हो प्रथम टीकाकार,
धीमे धीमे हवे साधुनो, शिथिल पड्यो हो ! तप तेज आचार सु०१०
काळ दुकाळ पड्या चणा, भारतमा हो
मचीओ हाहाकार,
केई मुनि भणसण करी पहोंच्या हो । परलोक मोझार. २१
ढाल २ जी नो तात्पर्य-जे मुनियोना गुण वखाण्या छ,
तेमा प्रवृत्ति करवी यथायोग्य प्रयत्न करवो अने प्रतिदिन
अनुमोदन करवु
चैत्यवासी अधिकार.
4
१
दुष्ट काळ अति आकरो, न मिले फासु आहार,
निर्बळ मन मुनि रामनी, लेोपे मर्यादा कार.
केई गया पर खडमा राखवा सयमसार,
ने पाछळ मुनिवर रह्या, सुणो तेना समाचार
(ढाल ३ जी)
देशी पूर्ववत
पासत्या पाछळ रह्या, जेणे कीघो हो ! जिन चैत्य (देश) मा वास;
-रसो व्यासी वर्षे, शासन हुओ हो ! जाणे भस्मी राम. ( राशि)
(१३)
,
G
C
तप सयम दूरे धर्यो, दूरे धर्यो हो ! साधुनो आधार,
वाडा वाध्या आपणा, तृष्णा हो लागी अपरपार
द्रव्यलिंगी द्रव्य राखवा,
माडी हो देवद्रव्य दुकान,
तेहीज द्रव्यने वापरे, अधा अध हो मच्यो अज्ञान
सु० ३.
वास कर्यो मुनि चैत्यमा, गृहस्थे हो छोडी सार समाळ,
द्रव्य करे मुनि एकछु, देवनामे हो, बीगावी जाळ
धर्मशाळाने उपाशरा नवा चैत्य हो बाध्या अनेक,
मालिकी राखी आपनी पोते हो करे जेनी देखरेख
सु० ५
कल्पित किया वनावीने, सावध हो करे उपदेश,
अजन शलाका प्रतिष्ठा विषे, सयम हो न राख्यो लेश सु० ६
कान्य बनाव्या पूजा तगा, सावध हो न आणे शक ( शका,)
माया ममतामा पड्या, हाथी हो जाणे पड्यो पक
मृदग ताल बजावता, कई खावा हो नित्य सारा माल,
गादी तकीआ बीडाववा, ओढवा हो शाल दुशाल.
रोशनी करावे रातमा, मदिरमा हो नचावे लोक,
निरकुश दया विना, धर्म नामे हो भोगवे मोग
पहाड तणी रचना करे, गाने हो आवे ने जाय,
धाम धूम घरे घणी, शासन हो दीघो लोपाय
संर साथे करे जातरा, साध्वीयो हो साथे चाले नार,
धर्म नामे अधर्मनु, पासत्या हो माडयो प्रचार.
तप तेलादि करावीने, उनमाणे हो, लेो रोकड दाम,
गौतम पडयो पुरावतो, शु ल्खु हो जाणो आतमराम
सु०१२
(१२)
छसो चोराशी वर्षे हुआ, गध हस्ति हो प्रथम टीकाकार,
धीमे धीमे हवे साधुनो, शिथिल पड्यो हो ! तप तेज आचार सु०२०
काळ दुकाळ पड्या घणा, भारतमा हो ! मचीओ हाहाकार,
केई मुनि अणसण करी पहोंच्या हो । परलोक मोझार.-
ढाल २ जी नो तात्पर्य जे मुनियोना गुण वखाण्या छ,
तेमा प्रवृत्ति करवी यथायोग्य प्रयत्न करवो अने प्रतिदिन
अनुमोदन करवु
चैत्यवासी अधिकार.
२
दुहा.
दुष्ट काळ अति आकरो, न मिले फासु आहार,
निर्बळ मन मुनि राजनी, लोपे मर्यादा कार.
केई गया पर खडमा राखवा सयमसार,
ने पाछळ मुनिवर रह्या, सुणो तेना समाचार.
(ढाल ३ जी)
देशी पूर्ववत्
“पासत्या पाछळ रडा, जेणे कीधो हो ! जिन चैत्य (देश) मा वास;
आठसो ब्यासी वर्षे, शासन हुओ हो ! जाणे मस्मी राम. ( राशि)
(१३)
,
.
तप सयम दूरे धर्यो, दूरे धर्यो हो ! साधुनो आचार,
वाडा वाध्या आपणा, तृष्णा हो लगी अपरपार
सु० २
द्रव्यलिंगी द्रव्य राखवा, माडी हो देवद्रव्य दुकान,
तेहीज द्वन्यने वापरे, अधा अध हो मच्यो अज्ञान
वास कर्यो मुनि चैत्यमा, गृहस्थे हो छोडी सार समाळ,
द्रव्य करे मुनि एकछु, देवनामे हो, बीवी जाळ
धर्मशाळाने उपाशरा नवा चैत्य हो बाध्या अनेक,
मालिकी राखी आपनी पोते हो करे जेनी देखरेख
कल्पित क्रिया वनावीने, सावद्य हो करे उपदेश,
अंजन शलाका प्रतिष्ठा विपे, सयम हो न राख्यो लेश
कान्य बनाव्या पूजा तणा, सावध हो न आणे शक ( शका,)
माया ममतामा पड्या, हाथी हो जाणे पड्यो पक
मृदग ताल बनावता, कई खावा हो नित्य सारा माल,
गादी तकीआ बीठाववा, ओढवा हो शाल दुशाल सु०८
रोशनी करावे रातमा, मदिरमा हो नचावे लोक,
निरकुश दया विना, धर्म नामे हो भोगवे भोग
पहाड तणी रचना करे, गाने हो आवे ने जाय,
धाम धूम करे घणी, शासन हो दीघो लोपाय
संघ साये करे जातरा, साध्वीयो हो साथे चाले नार,
धर्म नामे अधर्मन, पासस्था हो माटयो प्रचार.
तप तेलादि करावीने, उजमाणे हो, लेवे शेकड दाम,
गौतम पडधो पुरावतो, श लखु हो जाणो आतमराम
०
.
सु०१२
(१४)
उपधानना नामथी, नवी नवी हो क्रिया दीधी स्थाप,
रुपीआ लेवे रोकडा, शासनने हो लगायो पाप.
साधुना ऊपाशरे, स्थापे हो वीतरागी देव,
अठाई ओच्छव करावता, नाटकीया हो पाढी खोटी टे. सु. १४
इत्यादि सक्षेपथी, विस्तारे हो तु जाणे नाथ,
सो वर्ष सुधी चालीयो, मोटो हो चैत्यवासीनो साथ
देवगुप्त देवर्द्धि गणी, केई मुनि हो करी शासन सार,
हरिमद्रसूरि हुआ, केई मुनि हो कर्यो क्रियाउद्धार
अज्ञान तिमिर हठावीने, तप संयमे हो थया उजमाल,
पुस्तकारूद आगम कर्या, जेणे जाण्यो हो काई पडतो काळ.सु. १७
स्वल्प काळ क्रिया रही, चैत्यवासीनो हो वध्यो परिवार,
तेरसो वर्षों गया, प्रभु पछी, चोरासी गच्छना हो सुणीय समाचार.
सु०१६
.
,
सु० १८
सु० १९
गच्छ नाम जुदा पड्या, माहोमाहे हो घणो धर्म स्नेह,
पण कळियुगी जागता तेहना हो समाचार छ एह
समाचारी जुदी जुदी, जुदा जुदा हो सहुना ए नाण,
मदिर उपाशरा जुदा जुदा, जुदाजुदा हो श्रावक पीछाण सु. २०,
अथ रचना जुदी जुदी पाको बाधी हो पोतानी पाळ,
केई निंदक कदाग्रही, माडी वेठा हो ममतानी जाळ
सु० २१
सिद्धसूरि वल्लभमरि, जगचद्र हो चली हेमसूरींद्र,
पासत्याना मद चूरता, भूमडळ हो वीचरे मुनींद्र
२२.
-
(१५)
कुमारपाळ प्रतिबोधीने, जैन धर्म हो कीघो उद्योत,
देश अढारे दया पले रे, हीरसूरि हो अकबर प्रतिबोध. सु० २३
गच्छतणा अघडा घणा, पक्षा पक्षी हो माडी दुकान
लींगधारी शिथिल थया, पासत्या हो माच्या मस्तान.
सु० २४
विक्रम पदरसे आठमा, लुपक लोके हो कीधु तोफान,
पदरसे एकत्रीसमा, चाली हो लुपक दुकान.
सु० २१
प्रतिमा उत्थापी पापीए, आगम हो मान्या एकत्रीस,
बुक जेम वालक्रिया करे, दया दया हो पाडे मुख चीस. सु. २६
एक वाजु यति शिथिल थया, वीजी तरफ हो लुपकनो जोर,
सत्यविनय सत्य राखवा, लुपकना हो कील्ला दीघा तोड सु० २७ ।
वीर परपरा सत्यनी, सत्यविजयथी हो ! सवेगी नाम,
लुपकथी ढुढक थया, आगळ लखु हो । वन्नेना काम
सु० २८
सवत सत्तर आठमा, लवजी हो ! लुपकनो साध ( साधु ),
मोह पाधीने नीकल्या, लिंग पलटी हो ! कीघो उन्माद सु०,२९
सत्य मार्ग थोडो चालीयो वध्यो हो ! पासत्या प्रचार,
प्रवृत्ति लखु बन्ने तणी, थोडामा हो ! घणा समाचार
दाळ ३ जी नो तात्पर्य-जे चैत्यवासीयोनी प्रवृत्ति लखी
ठे तेमा काई आश्चर्य न पामवु जीव वधा कर्माधीन छे परतु
खास लक्षमा राखवु के ते प्रवृचि भमारामा न आवी जाय और
काई होय तो काढी मुस्वानो तुरत प्रयत्न करतो
-
,
A
-
(१४)
जाणे नाथ,
स. १५
उपधानना नामथी, नवी नवी हो क्रिया दीवी स्थाप,
रुपीआ लेवे रोकडा, शासनने हो लगाड्यो पाप,
साधुना उपाशरे, स्थापे हो वीतरागी देव;
अठाई ओच्छव करावता, नाटकीया हो पाटी खोटी टेव. सु. ११
इत्यादि सक्षेपथी, विस्तारे हो तु
सो वर्ष सुवी चालीयो, मोटो हो चैत्यवासीनो साथ.
देवगुप्त देवर्द्वि गणी, केई मुनि हो करी शासन सार,
हरिमद्रसूरि हुआ, केई मुनि हो को क्रियाउद्धार
सु०१६
अज्ञान तिमिर हठात्रीने, तप संयमे हो यया उजमाल,
पुस्तकारुढ आगम कर्या, जेणे जाण्यो हो काई पडतो काळ.सु. १५
स्वल्प काळ क्रिया रही, चैत्यवासीनो हो वध्यो परिवार,
तेरसो वर्षो गया, प्रभु पछी, चोरासी गच्छना हो सुणीय समाचार.
सु० १८
.
गच्छ नाम जुदा पड्या, माहोमाहे हो घणो धर्म स्नेह,
पण कळियुगी जागता तेहना हो समाचार छे एह.
समाचारी जुदी जुदी, जुदा जुदा हो सहुना ए नाण,
मदिर उपाशरा जुदा जुदा, जुदाजुदा हो श्रावक पीछाण सु. २०,
अथ रचना जुदी जुदी पाकी बाधी हो पोतानी पाळ,
केई निंदक कढाग्रही, माडी वेठा हो ममतानी जाळ सु० २१
सिद्धसूरि वल्लमसूरि, जगचद्र हो बेली हेमसूरींद्र,
पासत्थानो मद चूरता, भूमंडळ हो वीचरे मुनींद्र
सु० २२
(१७)
९०७
नहीं योग नहीं योग्यता, बनी वेठा हो आचार न पाट,
परि छत्रीश गुणे क्या रहा, क्या रही हो गणीसपदा आठ सु०६
माटीदार पटेलीया, कोई हो छीपा माळी जाट,
अगहीना केइ माजरा, नहीं शोभे हो श्रीवीरने पाट
ऊत्रो धर्यो आचारने, क्रिया हो गणे कप्ट समान,
आचारन थया अमरिया, नहीं किया हो नहीं रा ज्ञान
मोटी उपाधि धरावता, खीतायो हो राखे दो चार,
क्या कोरी क्या चीतरी (शीला), वंने डूबे हो भवनळ मोझार
.
परस्पर छापा छपावता, स्वश्लाघा हो परनिंदक तेह,
पैसा खरचे वाणीया, दृष्टिरागी हो नहीं धर्मस्नेह
सु० १०
निशीथ आचारंग मण्या विना, अथवा हो भणीने जाये भूल,
पदवी देवी क्ले नहीं, जुओ हो व्यवहारनो मूल
हाथी तणा बोजा लेइ, नाखे हो खर उपर मूल,
पदवी देवे अयोग्यने, नहीं जुए हो नातिने कुळ. सु० १२
पदवी देवी अयोग्यने, नहीं हो छोडावे सब,
दढ तणा भागी होवे, जुयो हो व्यवहारनो रग.
पोताना शिष्य माने नहीं, श करशे हो शासननु काम,
आचारज घर घर तणा, रह्यो हो निक्षेपो नाम
ज्ञानयोग उपधानना, नाम लेइ हो ! भेलु करे पाप,
लायो लावो करता फरे, भन क्लदार ! हो ! बेटा जपे जाप.
।
-
.
मर्या पछी पुस्तक नीकळे, चेला हो ! वहेंबीने खाय, (लेवे)
नहीं तो खाये वाणीया, अथवा हो! कोरटमा जाय
चरण स्थपावे तेहना, मुर्ति हो धरे मदिर वीच. (वचमा)
छवीओ चीतरावे बहुमूली स्वश्लाघा हो ! करे ते नीच, सु० १७
तप सयम आतम चळे, केई कीघा हो । जेणे जैन अनेक,
तेहनी खावे रोटीओ, लढाये हो ! माहो माही एक
अमिमानी झघडा करे, शु आशा हो ! नवा करे जैन !
मम लनीआ कह्या नायनी ! जुओ हो ! आगमना वेण सु० १९
उत्तम तो ऊंचा छोडे, नीचाने हो ! लेवे आपणी पास,
कडवी दवाई गुण करे, शासनप्रेमी हो ! करे अरजी खास सु० २०
राज्जा राखो पदवी तणी, शातवृति हो ! आपसमा प्रेम,
शासननी सेवा करो, पामो हो । जल्दी शिष जेम.
ढाळ ४ थी नो तात्पर्य
-ज्या सुधी आचार्यना गुणन
योग्यता न होय त्या सुधी आचार्य पद्वि नहिन आपवी अं
लेवावाळाने पण पुरो विचार करवो अगर पदवीने योग्यता हो
तो पदवी आपवी तथा लेवी अने सघने शान्त मार्ग प्रवृतावो.
"
सु० २१
गणी अधिकार
दोहा
गुण गारवा गणी करे, गच्छतणा शुम काम,
जिनागममा दीसे नहीं, पन्यासोना नाम
कहेवाय सवेगी नामना, नहीं सवेगनो रग,
पदवी तणा झगडा करे, लई लई गृहस्थी सग,
२
(ढाल ५ मी.)
देशी उपर प्रमाणे
समिति गुप्ति जाणे नहीं, सावद्य निर्वद्य हो ! नहि होये भान,
दोप जाणे नहीं आहारना, नहीं हो! भाषानु ज्ञान. सु. १
हृष्ट पुष्ट साधु बन्या, माल खाइ हो ! बनीया मस्तान,
जूठा
योग वहन करे, कळियुगी अहो ! माडयु तोफान सु० २
नवतत्त्व नहीं आवडे, नहीं हो । दशवकालिक ज्ञान,
योग वहे भगवती तणा, भरत माहे हो ! मचीउ अज्ञान सु. ३
सूत्र क्रमसर वाचना, उत्क्रम हो! कह्यो दह निशीथ;
पाप उदय पन्यासनु, तोडी हो ! जिनशासन रीत सु. ४
वाडा वाध्या पन्यासनी, चीना हो ! नहीं करावे योग,
माया जाल बेठा माडीने, शासने हो ! लगाव्या रोग सु०५
.
(२०)
व
-
आगमवाचना उची धरी, पासत्था हो ! क्रिया दीधी स्थाप,
पुस्तक धर्या भडारमा, कोण वाचे हो! पन्यासनो वाप सु०१
भेद करे गच्छ माहे ते, सपमा हो । करे सेंचाताण,
दुकान जमावे आपनी, पदवी पाम्या हो ! नहीं पाम्यो ज्ञान सु०
पुण्योदय साधु थया, आषाकर्मी हो ! खाई करे पुण्य नाश,
पाप पुरा उदय आवीया, साघु होवे हो ! पठी पन्यास सु० ।
शुखं मारा साहेबा, देखादेखी हो ! लागे चेपी रोग,
एक बीमाथी आगल पडे, नहीं देखे हो ! कोई योग्यायोग मु.
अदरनु रहस्य हवे सुणो, यइ पन्याप्त हो ! माडे उपधान,
मालपाणी नाणु मळे, महिला मळी हो ! करे सन्मान सु० १०
ठाणाङ्ग ठाणे आठमे, मत्र हो ! व्यवहारनो खोल,
कहेता गुण गणी तणा, केम चाले हो । जे पोलमपोल सु० ११
जो सत्र निर्णय नहीं करे, थासे हो श्री वीरना चोर,
मारी फर्नमें बजावी छे, जुठो हो ! मत करजो सोर सु० १२
ढाल ५ मी जेवी रीते आचार्य पद्वि ले के तेवीन ।
गणी पदवी समजवी.
योग वहन अधिकार.
दुद्दा
सूत्र वाचे तप करे, योगवहन तस नाम,
आगममाहे देखीलो, भाखे श्रीमुख श्याम (जिने धरदेव ) १
,
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जूठा योग वहन करे, आधाकर्मी हो ! खावे पदवी काम,
अगीतार्थ अभिमानीआ, पदवी लेता हो ! आवे नहीं लाज. सु०९
भगवती पहेला शतकमा आधाकर्मी हो ! साघु खावे जाण,
रूले अनत सप्तारमा केम काढे हो ! बीजाने ताण
जोगतणा आहारनी, लखता हो । चाले नहीं हाथ
हा! हा! मरतमा शु थयु, मळीयो हो ! स्वारथीयो साथ सु. ११
राम सनेही साधुना, भोजन बने हो ! घरघरमा तेम,
कमती नहीं योग वहनमा, वनडो ( वर ) वेठो हो ! वदोले
जेम सु० १९
वारा बाधी आवे श्राविका, काले हो ! शु आवशे तप !
पाप उदय पन्यासना, अमुक साधुने हो ! अमुक याशे खा.
सु०१
तैयारी करी आवे तेडवा, लाभ देनो हो! मारा स्वामीनाथ,
भाषाकर्मीथी शके नहीं ! टेवे लेवे हो ! डुबे बन्ने साथ सु० १५
पचक्खाण करे आबीलतणा, दहीतणा हो ! करवा खाई जाय,
मीठु मरन हींगने नीरू, दशवीस हो ! भोजन बनवाय. सु. १
नीधी तो जाणे नामनी कलाकद हो ! खीरने दूधपाक,
तल्यु गळ्यु खपे घणु, बदाम चिरंजी हो मेवोने दाख
पचक्खाण करे विगय तणा, विगय खावे हो! लागे मोटु
महा मोहनीय कर्म वाधतो समवायांगे हो ! भाख्यो श्री आप.
-
.
पाप
(२३)
"
काली आदि दश राणीओ, अंतगडा हो ! आनिल अधिकार
लेपादि विगय वरनीया, केवळ पामी हो ! गई मुक्ति मोझार.
सु०१८
उठ तप आबिल पारणे, नवमे अगे हो ! धन्नो अणगार,
लखो आहार वे द्रव्यनो, समाचारीमा हो ! चाल्यो अधि-
कार सु० १९
साधवीओ आवे एकली, लेवे हो ! योगवहन नाम,
काल विकाल गणे नहीं, कोण जाणे हो! पन्यासोना काम सु. २०
साधुना स्थानमा साधवी, वरजी हो ! बृहत्कल्प मोझार,
आलाप सलाप करवो नहीं, नागणपरे हो ! वतावी नार सु० २१
सत्र चतुर्विध माहने, सुणता हो ! आवे व्याख्यान,
प्रवर्तिनी पासे रहे, लेवे देवे हो ! आपसमा ज्ञान
नानी दीक्षा दिन सातनी, मध्यम हो ! राखे मास चार,
उत्कृष्टी छ मासनी, जुओ हो ! सूत्र व्यवहार
पिंडेपण अध्ययन मणवाता, हमणा हो ! छजीवणीया सार,
ते पण लुप्त करवा भणी, ज्ञानहीना हो केवळ क्रियाचार मु. २४
नानी दीक्षामा साधु रहे, वर्ष बे वर्ष हो रहे वर्ष चार,
आज्ञा नहीं वीतरागनी, पुन्य नाम हो! थावे आज्ञा बहार सु. २५
योग करावे नहीं अन्यने, करावता हो ! पहेला करे कोल (शरत),
एटला पुस्तक आदि तणा, रखावे हो । पहेली रोकड मोल सु० २६
सु० २२
सु० २३
,
,
"
(२४)
केटल लखु मारा वापजी ! लीला हो ! जेनी अपर पार;
बुद्धि सुधारो नाथजी, मारी अरनी हो ! यारवार सु. २७
ढाल ५ ठी-जिनागमोनी वाचना आपत्री सिद्धान्तो नु रहस्य
शिष्य मडळीने समजाववं, परन्तु जे योगने आधाकर्मादि आत्माने
अहितकारक खोटी प्रवृत्तियो छे तेने तिलानली आपत्री.
उपधान-अधिकार.
,
दोहरा.
गुरु तीर्थ पासे करे, उपधान तप सार,
जैन विधि अनुसारथी, ते पामे मवपार
धर्म अमूल्य जिनेंद्रनो वेचाय दुकाने मोल ( मूल्य )
धर्म नाम धाडा खुले, पन्यासोनी पोल
(ढाल ७ मी)
पूर्वनी देशी.
आपील प्रमुख तप करे, श्रावक हो भणे गुरुनी पाप्त,
श्राविका गुरुणी कने, हमणा हो ! जुवो पन्यास.
सु०
उपधान करावता पेहला, पेसा हो ! लेने ज्ञानने नाम,
पेढी जमावी ब्राह्मण परे, कोई काढी हो । पेदासनों काम. सु.
सधवा विधवा मळे घणी, भाग्ये पाई हो ! मळे दस बार,
क्रिया करावे पन्यासनी, महिला साथे हो । भाडे प्रचार सु
.
.
सु०४
।
ज्ञान नामे मेळु करे, पापोदय हो । पड़े चोरोमा मार म०१२
तृष्णा आर [ आकाश ] जेवडी, करावे हो । माटाम'
(२५)
नारीना परिचय यकी, यतिये हो । कोधो घरवास,
प्रत्यक्ष देखी केम करे, त्यागी हो ! महिला सहवास
आरम करावे नवा नवा, भोजन कारण हो 1 देवे आदेश !
माल उडाती करे मोझने, गागे मल्यो हो ! गुर्नरनो देश सु०५
भोजन जमे वाणीया, ओयो लेई हो ! जावे पन्यास,
अमुक सारु न केम कर्य ( त्यारे बोले ) शु खपे हो ! अने
श्रावकना दास मु०६
नाम लेवे नीवी तणो, आहार तणुं हो ! जाणो जगमाण,
बदाम तणो हलयो बने, धारी हो कलाकर पीडाण
लाडु पेंडा वरफी बने, दूधपाक हो ! नहीं रहे दूर,
दैथरा ने पुडला बने, जुदा जुदा शाक हो ! हाडा भरपूर मु०८
तृपणी मरे मरे पातरा, सासुनी हो ! उडावे माल,
धर्म नामे बूर्त नागीया, पन्यासे हो । त्रिगावी जाल.
केई गृहस्थी जैनना, नहीं मळे हो ! खावाने धान्य
उपधान नामे मुनिराजनी, माल उडाव हो ! मी मस्तान मु०१७
अमुक बाईए दश दीया, तु तो हो ! मोटा घरनी चेन ।
सो के बसो आपशो, धारे धीरे हो ! बोले मधुरा वेग.. ?
राडीराडो ठगवा मणी, भला जाग्या हो । धेळे दिन चो,
वादे वधारे वाणीया, मेळा करे हो ! लोपोडा दार
(२६)
.
"
सिद्ध साधक रहे वाणीया, धर्मादीया हो ! मळे दलाल,
कळियुगीया भेगा थया, केम रहे हो ! साहुनो माल
ओछा जीवित कारणे, सयम खोवे हो ! अज्ञानी बाळ,
जरा तो डरो परमवथ की, माथा उपर हो । भमे छे काळ. सु १५
वणिक भडकशे वाचीने, पन्यास हो । करशे कोई क्रोध,
भलामण करू तेहने, पक्ष छोडी हो! करो साची शोध सु०१६
साचामा समकात वसे, मायाथी हो । आवे मिथ्यात,
केवा चित्र हु चीतरु, तु जाणे हो । मारा त्रिभुवन तात सु. १
ढाळ ७ मी--गीतार्थाचार्य मुनिमहाराज श्रावकवर्गने योग्य
पूर्वक जैन धर्मना खास तत्व ज्ञान नित्य धर्म क्रियान ज्ञान आ
अने वळतो तप कराववो कितु जो धामधूम फोगट आडम्बर
द्रव्य खरचाववा के खावा पीवा तथा साना लोमे के स्त्रीयो स
ने प्रचारनी प्रवृत्ति छे ते योग्य नथी माटे लेने दूर करवी
दीक्षा अधिकार.
ज्ञान गर्षित वैराग्यथी, दीक्षा लेने जो कोय,
दीपाव जैन धर्मने, तरे ते तारण होय १
(ढाल ८ मी)
देशी पूर्व प्रमाणे
आणांग वृहत् कल्पमा, दीक्षा देवे हो जोइने योग्य,
एवी आज्ञा वीतरागनी, प्रवचने हो । वरमे अयोग्य सु. १
अधिकागुण होय आपथी अथवा हो ।' होवे सम तुल्य,
उत्तराध्ययन पात्रीसमा, जोवे हो ! मुनि जातिने कुल सु०
आज्ञा नहीं मानापनी, नहीं हो । निजमा वैराग्य,
नेवा तेवाने मुडता, पुस्तक वस्त्र हो, लेइ जाय माग सु० ३
एकनी पासेथी नीकल्यो, पुस्तक वेची हो । करे रोकड दाम,
अत्याचार सेवे तेहथी, वस्त्र पात्र हो ! की दे लीलाम सु. ४
बीना पासे ते जइ, दीक्षा हो लेतो बीनीवार,
गुरुनी निर्णय करे नहीं, चेलानो हो । लाग्यो लोभ अपार सु० ५
त्रीनीवार त्रीजा कने, एम ठगे हो । नहीं पूछे कोय '
मातापिताना पोषण करे, पुस्तक वस्त्र हो । दाम रोकड नोय सु०६
बनी चुक्या केई दाखला, तो पण हो! नहीं छोडे वलाय !
शासन निंदावा जनमीया, तेथी हो ! शुद्ध श्रद्धा नाय. सु० ७
आज्ञा विना दीक्षा दीये, बीना व्रतमा हो ! जलाजली होय !
प्रायश्चित आवे आठमु, ठाणांग हो । ठाणे त्रीने जोय. सु. ८
मूल्य तणा चेला करे, देवरावे हो ! ते रोकड दाम,
माल खाय मस्तानीआ, अनाचार हो । सेवे ठामो ठाम सु. ९
वरघोडा का विकाउ (परोडीया)मा, जैन नामे हो ! करे चोरीना काम,-
,
-
,
.
,
(२८)
छानामाना दीक्षा दीये, फोकट हो । खरचावे दाम सु० १०
मातापिता आवी करी, वेप खुची हो ! घर लइ जाय,
प्रतीति रही नहीं जैननी, लोमीडा हो । मारग निंदाय सु० ११
सयम लई समझया नहीं, समिति गुप्ति हो ! साधुनो आचार,
सयममा रमीया नहीं, व्याकरणनो हो ! माडे प्रचार सु० १२
पहेला तो मुके मोकळा, भणो मणो हो ! गणे दोप,
कल्प किया उची घरे, आज्ञा चिना हो! नहीं सतोप. सु० १३
च्याकरण भण गृहवासमा, दीक्षा लै हो । मणे जैनसिद्धात,
हाडे हाडे वैराग्यथी, तरे तारे हो ! करे भवनो अत सु० १४
सूत्रमा,
दीक्षा लै हो ! सीखे सधु आचार,
अगाटिक पाछे भणे, पेहेला रगीये हो । पाळे शुद्धाचार सु. १५
एक चक्र चाले नहीं, क्रिया साथ हो ! होवे सम्यग् ज्ञान,
प्रथम क्रिया व्यवहारमा, निश्चयमा हो ! होये ज्ञान प्रधान. सु० ११
कातो दुखी दरिद्रीओ, पेट भरवा हो । लेवे सयम भार,
कांतो पूनाववानी लालचे, मोहगी हो । देखादेखी प्रचार. सु० १५
गुरु पण तेदा मळ्या, वधारवा हो ! पोतानो परिवार,
जीवता भूत बनावी दे, मगावी हो । लेइ जावे लार. सु० १८
दीक्षाना केप कोरट चढ़े, जुओ हो ! जैनोनी रीत,
गादी बेठा जुओ वीरनी, केम रहे हो । सूरिनी प्रतीत सु० १९
गृहस्थीपणे एक घर तणो, मुशकेले हो । चलाने कारभार,
साधु थया घर हमारना, लावा रेखा हो नहीं आवे पार. सु० २०
ज्ञाता विगेरे
-
।
जेम म पोप गुरु वधे, तेम तेम हो । नबळी पडे समान,
गणी गाडरीयो शं करे ? सिंह हो ! करे एकलो राज सु० २१
वकील बेरीस्टर महेनत करी, मुश्केलथी हो । परीक्षा पास,
अधिकार मळे कोरट तणो दीर्घ दृष्टि हो ! विचारो खाप्त सु० २२
राना गादीपर बेसतो, पेटली हो । जोइए गुनास।
पूजनीक वने राजा तणा, जोइए हो । केटलो प्रकाश ! सु० २३
पदर ( १५) प्रकृति क्षय हुए, अथवा हो । होवे उपशात,
चडते वैराग दीक्षा लीए, करे हो ! मन इद्रिय दात (दमन )सु०२४
एकात पक्ष नहीं खेंचवो, रहे हो शुद्ध लोक व्यवहार,
ते जैन धर्म दीपावशे, तरे तारे हो! जाये मोक्ष मोझार सु० २५
मोटा घरनी स्त्री हुए, दक्षा लेवे हो ! साधवी पास,
पाच दश हमारना, जमे करावे हो! नामे ज्ञानने खास सु. २६
दीक्षा लेइ पछी साधवी, मालिकी हो ! राखे पोते आप,
लेणु देवु रावती, केम छुटे हो ! जो पाप सताप
साधु करता सापवी तणी, लीला हो । प्रभु अपरपार,
उद्धार करो आ भरतनो, थारी पलटणना हो । आले
समाचार सु० २८
दाक ८ मी-अयोग्यने दीसा न आपवी अने योग्यने पण
दीक्षा लेवाबाळानी पाउळ सगा समन्धीनी आना होय तोन आपबी.
सु० २७.
(१०)
आहार अधिकार.
.
२
समिति गुप्ति चित्त घरे, ले निर्दोपित आहार
१
ते गुरुतारे जगतने, वदु वारवार.
फासु निर्वद्य जे मळे, तेथी करे सतोप,
नहीं मळता तप आचरे, पण नहीं सेवे दोष
(ढाल ९ मी.)
देशी पूर्व प्रमाणे
आहार पाणी लेवे सूझतो, श्रावक हो ! देवे दातार,
बन्ने जाय मोक्षमा, दशवकालिक हो ! पाचमे अधिकार. सु.
छट्टे उद्देशे शतक आठमा, फासु हो ! देवे मुनिने आहार,
एकात होवे निरा, भगवती हो ! नहीं पाप लगार
फासुक आहारज भोगवे, भावे भावना हो ! धन्य तप करे तेह,
आप तरे पर तारता, मोक्ष जावे हो ! जिन गाखे एह
आधाकर्मी आहार भोगवे, आयु छोडी हो ! बाधे कर्म सात,
रुले अनत ससारमा पंचम अगे हो ! माखी आ वात
वडी नहीं छ कायने, वझी मामी हो ! ते जिनवर आण!
समवायांगे सबळो कयो पिंडनियुक्ति हो । गुणदोष पीछाण.
.
(३१)
-
पूतीकर्म जो भोगवे, सुपगडांगे हो ! सेवे ये पक्ष,
द्रव्य साधु भावे गृहस्थी, नहीं हो ! नेने आतम लक्ष
कृतगडे कल्पे नहीं, भूले लान्यो हो ! साधुने काज,
अणनाणे आवे तो परठवं, नहीं खावे हो। मोटा मुनिराज, सु० ७
सामे लाव्यो भोगवे, तेड्या जाये हो ! जेम चारण माट,
मुनि मत्तगम वेगळा, नहीं लागे हो । सोनाने काट
भक्तिवान श्रावक होवे, नहीं जाणे हो । मुनिनो आचार,
दोपसहित देतो बाधे, अल्प आयु हो ! ठाणांग मोझार
सु०९
त्रीजे स्थाने एम कयो, पध्यकारी हो ! देवे फासुक आहार,
शुभ दी आयु वाधतो, पंदर भवे हो । पामे भवपार.
दोषित आहार देता थका, आठ जणा हो ! भेला बाधे पाप,
सहाय देवे शीतल करे, कोण काढे हो ! ए पापनु माप सु० ११
ध्यान ध्यावे रातना, अमुक घेरे हो ! मळे अमुक माल,
पडिलेहणा पूरी कोण करे | लै तृपणी हो ! थावे उजमाल सु०१२
श्लोक गणे गौतम तणो, वाछिन हो! भरी लावु माल !
शुद्धाशुद्ध कोण गणे? कोण गणे हो ! ने काळ विकाळ सु० १३
गृहस्थी सुता होय खाटले, धमकविनय हो ! देवे धर्मलाम,
काटे गौतम पातलं, पूर्ण पात्र हो ! तृष्णा जाणो नाम,
दशवकालिक छटे कयो, एक बखत हो। भोजननु मान;
उत्तरा ययन छत्रीसमा, सुणो हो! समाचारीनु ज्ञान
पहेले पहोरे स्वाध्याय करे, बीने पहोरे हो ! विचारे ध्यान,
त्रीने पहोरे भीक्षा करे, चौथे पहोरे हो! मलो स्वाध्याय ज्ञान
-
पहेले पहोरे चा दूधनी, बीने पहोरे हो । उडावे माले,
त्रीनो पहोर निंद्रा तणो, चाथे पहोरे हो! वळी चोखाने टाल. सु०१७
दशवकालिक पाचमेरे, मुनि जाणे हो! क्षेत्रने काळ;
काले काले समाचरे, कल्पमा हो । भिक्षा एकज काळ (वखत)सु०१८
दूध दहीं घृत वापरे, तप करता हो । जो धुणे शीप,
उत्तराध्ययन सत्तरमा, पाप श्रमण हो ! कह्या जगदीश सु० १२
मोटु कारण मुनिने होवे रे, सयम जाये रो! के जावे प्राण,
दोष सहित देता यकारे, अल्प पाप हो ! बहु निर्जरा जाण सु०२०
सृष्ट पुष्ट साधु हेवे रे, सिंह जेम हो ! वाचे व्याख्यान,
विहार करे दश कोसनो, दोषित हो ! केम खाये जाण सु० २१
दोषित आहार लेता थका, आणा भागी हो । ने छे मुनिराज,
दातार भगो दुबशेरे, जेणे दोधा हो! चोरने सान (सहाय )सु०२६
विना मण्या जावे गोचरी रे, मण्या हो ! विराजे पाट,
शुद्धाशुद्ध जाणे नहीं, आयु साथे हो ! बावे कर्म आठ सु० २३
अतिशयवत जावे गोनरी, आचारांगे हो! नव बोलनो जाण,
उत्साह वघे ग्रहस्थी तणो, आठ कर्म हो । तोडे चतुर सुजाण सु०२१
शेठाणीओ बेसी रहे, काम करावे हो ! दासीओने पास,
एवी दशा साध्वी तणी रे, शु लखु हो ! जाणो स्वामी खास सु० २१
.
.
.
इद्रिय स्वादने छोडवा, घर छोडी हो । लोधो सयम भार,
स्वाद करे जुदा जुदा, भगवती हो ! करो दोप अपार सु० २६
जीमने स्वाद कारणे,-मोटी राखे हो । पातरानी जोड,.
जुदा जुदा गृहस्थो परे, पुद्गलानदी हो। नहीं सके छोड. सु० २७
पलग बीछाना छोडीया, छोडी हो ! सुख शय्या नार;
मोटा ओशीका वीछाववा, वरज्या हो । आवश्यक मोझार सु० २८
विशेष योगना आहारनी, आगळ लखी हो। आ मेझर माय,
आश्चर्य पामे नहीं केवळी, रही हो। नहीं कमती काय सु० २९
पाणी शेती वाणी रहे, अन्न जेवु हो । नित्य रहे मन,
निभाववा सयम यातरा, फासु मोनन हो । पोषण को तन सु० ३०
सुकोमलपणु छोडी दो, दशवैकालिक हो । श्री वीरनु ज्ञान,
मोक्ष किलो कायम करो, उठो जागो हो ! थाओ सावधान.सु. ३१
जे श्रद्धा घर छोडता, राखो हो ! जीवनपर्यत,
यथाशक्ति खप करो, तेथी हो ! थाय सतारनो अत. सु. ३२
ढाळ ९ मी-श्रावकवर्गने मोइये के मुनिने दोपिताहार
न आपवो अने मुनिने पण परिसह सहन करवा परन्तु दोपित
आहार नहीं लेवो निदोपित आहार लेयो ते पण छ कारणमाधी.
कोई कारण होय तो
"
३
(३४) रात्रि भोजन अधिकार- -- अशन आदि सचे नहीं, अनाणे रहे कोय, तल मात्र नहीं भोगवे, परठे स्थडील जोय ढाल १० मी. (देशी पहेलानी) रात्रिभोजन वरजीयो, भागे चार हो! निशीथ मोझार; दशवैकालिक देखीलो, वृहत्कल्प हो ! नही साधु आचार सु० वातु खाखने औषधि, चुरण हो ! मुख साफ कराय, गोळीओनी गणतरी नहीं, पारसल हो । केई वी पी मा आय.सु. ग्रीष्मरुतु गुलाबना, सीसा हो ! लावी दे वे चार; तेल रहे मर्दन कारणे, मर्दनी या हो ! नित्य रहे तैयार पहेला पहोरमा वहोरीउ, औपध पाणी हो! अथवा कोइ आहार, चोथे पहोरे कलपे नहीं, रात्रि मोनन हो ! कह्यो भ्रष्टाचार सु० राते दवाइ राखता, भ्रष्ट कह्या हो ! छठे अध्ययन, दंड को निशीथमा अनाचारी हो ! बीजे अध्ययन नीनी जगे मळे नहीं, मोटु कारण हो ! मुनिवरने होय, अणाहारी वस्तु रातनी, अपवादे हो ! राखे अवसर जोय अनिष्ट यस्तु अलखामणी, खाता हो ! अरुची थाय; आगम अक्षर देखीलो, ते वस्तु हो ! अगाहारी कहेवाय. सु. . . - .
(३५) चाध्या मळे हो पोटला, गाधीए हो ! जाणे माडी दुकान शु लखु मारा साहेबा, निर नायक हो ! मच्या मस्तान मायाचारी केई हुए, नहीं राखे हो ! ने पोते पास, गृहस्थी पासे रखावता, मायाथी हो ! पामे समकीत नाश सु० ९ दाळ १० मी-मुनिने रात्रि वाशी कशी पण वस्तु न राखवी जोइए जावाआववाना थोडाक प्रमादने लीधे औषधादि वस्तु राखी मोटा नुकशानमा उतरवु योग्य नथी वस्त्र पात्र अधिकार- +-- । नग्न मुद्रा ने रहे, जिन कल्पी मुनिराय, स्वल्प अल्प मूल्यना, स्थिविर कल्सी कहेवाय १ जीर्ण गच्छाचारमा, मानोपेत सफेत ( श्वेत ) दशवकालिक एम कह्यो, लज्जा राखण हेत २ ढाल ११ मी. ( देशी पूर्वनी) दूपण आचारांगे कह्या पाचमे, विस्तारे हो ! निशीथ पीछाण मु. १ वृहत् कल्प दीक्षा समे, पूर्ण हो ! वस्त्र ले तीन, टाळे आहारना, तेवा हो ! वस्त्रना जाण,
+
.
-
.
-
शीत परिसह सहन करे, सनममा हो ! मुनि रहे लीन सु. २
बहु मूल्य वस्त्र कावळी, पोटला हो! बाधी मुके भडार,
जोडीओ राखे पात्रातणी, परिग्रहधारी हो । दशवकालिक मोआर.सु. ३
मया कपाटने पेटीओ, पडिलहण हो । कोण करे देख,
पछी मळशे के नहीं मळे, मूळ घणी हो ! पनवणानो लेख सु०
गृहस्थीने परिग्रह तणी, होवे हो ! स्वल्प मर्याद,
५०
वस्त्र पात्र पुस्तक घणा, लावो लावो हो । करी रह्या मुनिराज सु
नाम लेवे पुस्तक तणो, ज्ञान नामे हो भरे भडार;
पुठीया चदरवा पाटी ठवणी तृष्णा हो ! लागी अपरपार सु०६
सोहनारथी धाने नहीं घावे नहीं, हो ! पाच पचीस:
एक बे चार लाखना पुस्तक हो । मरीया भडार सु० ७
आवेज रस्ते चालता, यतियो हो ! थया फजीत,
सत्यविजय वधु छोडीयु, तो पण हो । हवे आ चाली रीत. सु०
पोते आप वाचे नहीं, नहीं देवे हो । वाचणकाज,
कर्म जोगे चोरी होवे, रोवे वेठा हो ! जुवो काळने दाझ सु. ९
अधिकी उपाधि राखता, प्रायश्चित हो ! निशीथ मोझार,
चौद उपकरण माखीया, सूत्र हो । प्रश्नव्याकरण सार सु० १०
अधिकी उपाधि राखता, मजुरो हो । जोइए वे चार,
पारसल ने वी पी तणा क्या लगी हो । लखु समाचार. सु. ११
हुकम करे गृहस्थी उपरे, एने हो । देजो नीमाय ( जमाडी ),
८
आटलो रुपिया दो रोकडा टड चोमासी हो करो निशीथ माय.सु०१२
, - - 40 (३७) कपडा धोवे रगे नहीं, आचारांगे हो ! पाचमे अध्ययन, टीकाकार जिन कल्पीने, स्थिविरकल्पी हो! कारणमा लीन. सु०१३ जीव उत्पत्ति कारणे, अथवा हो ! असूची नाण, फासुक पाणीथी धोवतां, अपवादे हो ! रहे जिन आण सु० १४ कारणथी पीळा कर्या, कारण मटयु हो । केम राखे एह शेठ बिलाडी सबधथी, गाडरीया हो ! करे में में तेह सु. १५, साबु लेवो कल्पे नहीं, नहीं कल्पे हो । सोडा साजोखार, शासनथी श्रद्धा उतरे, दुर्लभबोधी हो ! अनत ससार. जीव अनता निगोदमा, कुण राखे हो! तेनी दरकार, भागळ साधु टाळता, सघहे हो ! नहीं लेता आहार घसी घसी साबु दीये, काई जाणे हो । जानमा नाये साथ, निषय वासना उपजे घछा मठा हो । अनुयोगमा वात सु. १८ उपदेश देवे गृहस्थी बनी, घृत नेम हो । वापरनो नीर ! पोते धोबी घाट माडता, केम पामे हो ! भवनल तीर. गृहस्थनु मोटु घर होये, तो सावु हो ! लावे सेर पाच मोटा सावु चोमासु करे । साबु हो ! लावे मण पाच, राखे राखोडी मायने, निक्षण फुलण हो ! उपजे निगोद, - गृहस्थीथी आगळ वध्या, पाटे वेठा हो ! करे प्रमोद कदाचित कारण पडे, अपवादे हो ! सेवे सानीखार, । सच्य करी नित्य वापरे, जावे हो ! जन्मारो हार टुढक वापरे मातरु, सवेगी हो । पड्या साबु लार (पछवाडे ) मापसमां निंदा करे । केनो केवो हो ! शुद्धाचार मु २२ सु २३
(३८)
,
विहार करे मुनिराजनी, साथे हो! घणा पातरा लोट,
आल्या वीरना पोठीया, नहीं उचके हो ! गृहस्थीने देवे पोठ सु.२४
दिगवरथी चर्चा करे, जीर्ण वस्त्र हो । ते नन्न समान !
स्वल्प वस्त्र राखश, ते बधु हो ! पोथीनु ज्ञान
झीणा कपडा मलमल तणा, रग्या हो ! केसरीये रंग,
आहे तरुणी साधवी, जेना दीसे हो । उघाडा अग.
मलाघरनी नारी होवे, राखे हो ! लोकोनी लान
मोक्ष कारण माथु मुडीयु, सुख शीलीया हो । बगाडे काज सु. २७
ओघनियुक्तिमा कयु, वन पात्रनु हो पूरु प्रमाण,
सघ परीक्षा जो लेवे, भला मुडा हो ! करे पीछाण
सोमा पाच टका नहीं, मळे हो ! जिनाज्ञा धार,
भाडबरी भेळा भल्या, आणाखडे हो ! कम पामे पार
आणा पाळवी दूर रही, थोडा हो । जाणे आगम वात,
उत्सूत्र बोले अज्ञानथी, तेथी हो ! लागे मिथ्यात्व.
सु. ३
जेवी वात छे वस्त्रनी तेवी हो ! पातरानी जाण,
केटलु लखु चापजी ! नहीं छानु हो ! तमने केवळ ज्ञान सु
परमाणु देवाडे पात्रा तणु, मूल्य हो ! करावे आप;
दडा उतरावे तरपणी, ज्ञानीये हो ! कह्यो वन पाप,
जीरण वस्त्र पातरा नाखी हो ! नवा लेने मोल;
वन क्रिया पहेला अंगमा टड कह्यो हो! निशीथ देखो बोल सु३
एक जोडीने वापरे वीजी हो ! राखे भडार;
तीभी नोडी देवे रंगवा, पेला पेली हो । कोण करे विचार सु. ३
-
सु. २०
a
(३९)
-
हवे हो हाथ थाकी गयो, नहीं हो ! कोई लीलानो पार;
मुनि मडळ उद्धारजो, खोटो खरो हो ! तमारो परिवार
ढाल ११ मी-मुनिने वस्त्र तथा पात्र दोषित न लेवा अने
निदोषित पण प्रमाणोपेत राखवा अने राखे ते उपर पण ममत्वभाव
न राखवो भने सचय पण न करवो, केवल सयमयात्रा निभावना
माटेज राखवा
सावध निर्वद्य अधिकार
an
दोहरा.
सावध योग तनी करी, लीघो सयममार,
जाव नीव नहीं आचरे, वीर वचन भणगार
सावध भाषा बोले नहीं, जेहथी लागे पाप,
अदेश उपदेश जाण्या विना, करवो नहिं आलाप २
ढाळ १२ मी
निर्वद्यमिया आचरे, करे हो । निर्वद्य उपदेश,
मुनि गणमारे शोमता, नहीं लागे हो ! जेने पापनो लेश मु. १
गृहस्प योग सापय काया, नही कसे हो ' आयो नाओ उठ,
भही मेसो अमुको करो, साय बोल्यो हो ! सत्यने को भु
-
(१०)
.
चोठी तार देई करी, बोलावे हो ! गृहस्थ राखे संग;
पाचक्रिया आगम कही, होवे हो ! सयमनो भग
बदोबस्त पगारनो, खाणु पीणु हो ! करे मुनि सार;
रोकडीयो रहे वाणीयो, देखादेखी हो । वध्यो प्रचार सु
रचना करावे पहाडनी, उमा हो ! रहे पोते आप,
अमुको लवो पहोळो करो अज्ञानी हो ! रहे सेवे बहु पाप. सु०५
वधावे उपासरा करावे हो । जीर्णोद्धार; -
गृहस्थ जेम उमा रहे, परमवनो हो ! नहीं डर लगार
पौषधशाळा उपासरा, निशक हो । दीये आदेश,
अहीं चोकी आलिउ करो! अही वाचशे हो! व्याख्यान हमेश.सु०७
अमुकी बारी मेडो करो, भडारीयु हो । करो पुस्तक कान;
ओडा जीवन कारणे, आज्ञा मुकी हो ! नहीं आवे लान
अणु मात्र पृथ्वीकाया, जळबिंदु ए हो ! कडा जीव असख्य,
उस यावर हणावता, लज्जा छोडी हो ।
हुवा
लीपे साधु कारणे, छवावे हो । छापरां केइ छाण;
आचारांगमा वरजीया, दड कयो हो ! निशीथ पिछण. सु. १०
मारा गच्छनो उपासरो, नहीं उतरे हो ! बीजो एनी माह;
घर छोडी मठ बाधीया, सूयगडांगे हो ! कह्या गृहस्थ
तेह. सु. ११
उपर लगावे पाटीउ, नेमा हो । पोतानु नाम;
एक देखी बीजो करे, एम वगडयु हो ! इण मरतनु काम सु० १२
।
नि.शक
।
(४१)
स्वायाय ध्यान वयु म्युटीए, उभा मणाने हो । पूजाना पाठ;
सावध निर्विध नहीं गणे, आणा लोपी हो । करी मननाठाठ.
"
+-
.
चैत्यवासी पेहला कोइ, नहीं भणाइ हो । कोई पूजा साध,
आगम पाठ दोसे नहीं, पासत्या ए हो ! मुकी मर्याद. सु० १४
साधु गावे रागथी, नेम नेम वागे हो । मृदग ताल;
न्य स्तव जेणे सेवीयो, द्रव्यलींगी हो । भावे कह्या बाल सु० १५
अमुको करो अमुको करो, लावो मुको हो ! वळी बोले एम;
चैत्यवासी बनी रया, स्वाहा ! हो ! साधु वोले केम
मुख आगळ राखी मुहपत्ति, यत्ना पूर्वक हो । वोले अणगार,
उघाडे मोटे बोलता, सावद्य लागे हो ! भगवती मोझार सु० १७
मोटु बाधी दुढके, कुलिंगी हो ! जाणे आयादक,
कमरमा राखे पीलीया, उधाडे मोढे हो ! वोले निशक
प्रतिष्ठा अविधि करे, अजन शलाका हो । करे आरम घोर,
कल्पित अथ बनावीने, साहु थोडा हो ! मळ्या बहु चोर सु० १९
उनीओ चीतरावे आपनी, फोटा पडावे हो ! देवे आदेश,
लूटे प्राण छकायना, गाडा गृहस्थी हो ! नहीं समने लेश सु० २०
आगळ कागळ मोकले, अमुक दिने हो ! अमुक घडीवार,
अमुक रस्ते आवशु, भेगो करजो हो । वरघोडो तैयार सु० २१
कदाचित प्रमादयी, कारण पामी हो ! नही आवे लोक,
(४२)
गाम बहार ये नोकळे ( अथवा ) बहार उतरे हो ! को घणी
शोक. सु० २३
गच्छ श्रावक बोलावीने, कोप करी हो ! बोले ऋपिराय,
गच्छनु सारू लागे नहीं, मडना नेम हो ! नहीं आवे
मुनिराय. सु० २३
शासननी उन्नति हुए, उलटो हो ! देवे उपदेश,
क्रोध करे दडे रमे (लडे), वर घोडामा हो! धुळ पडे विशेष सु०२४
देशकाळ देखे नही, आडबर हो । करे देखादेख,
गुणहीना गर्वे चडे, मोटा मोटा हो! लखावे लेख सु० २५
चरित्र छपावे आपणा, जमा हो! नहीं (लखे ) अवगुण एक,
सोमो को साचो होवे, पोलमा पोल हो । छपे अनेक. सु० २६
कदाचित आ भारतमा, आडबरी हो ! धुतीने खाय,
आपथी वात छानी नहीं, परमाधामी हो ! देशे समजाय (जावी)सु २७
उत्तराध्ययन पात्रीशमा, नहीं वाछे हो पूजा सत्कार
आदेश देवे कइ विधि, आचारांग हो । नहीं साधु आचार. सु०२८
दीवो रखावे उपाशरे, लेवे हो गृहस्थीनु नाम,
उज्जेइमा फरता फरे, मायाचारी हो । तु जाणे स्वाम सु० २९
घडीयाळ राखे टाइमनी, चावी देवे हो ! ते पोते आप:
परिग्रहने आरभ करे, नहीं डरे हो ! कोण गणे पाप सु० ३०
चप्पु राखे बहु मुला, मूई कातर हो । केइ ओजार;
कर्म विटवणा शु लखु, नोटो गिन्नीए हो ! सेवे अत्याचार सु० ३१
।
उद्धार करो मारा बापजी, बनी रहे हो जाए
डाळ १२ मी-मुनि हमेशा निर्वय -
वाथी वीतरागनी आज्ञानो भग थाय 32 RATE
राखको तथा पोताना नवदीक्षितोने पण देगा 2017,
विचरे देशो देशमा, तरे
जेवा साधु तेवी साधवी, वदे हो' बळी विकम:,
शामाटे घर छोडीउँ, आश्चर्य होवे हो! ते ब..
साधु समाननी आ दशा, साजीओनी हो शुन्
गुप्त
गोटाळा छे 'पणा, बहुलो हो ! अनानी ...
खोटी आचरणा देखीने, केइ नीव हो ! दुलम पर,
तेनु कारण साधु साधवी, तेथी हो ! समकिन राम,
श्रावकनी साधु उपरे श्रद्धा, मकि हो रहे नौ
हालनी 'आचरणा' देखीने, केवी श्रद्धा हो ! -
वात छानी नहीं आपथी, मारु लम्बबु हो
तथा प्रवृत्ति पण निर्वद्य राखे, सावद्य गेट
दुद्दा.
प्रति वध मुनिने नहीं, करे -
विहार अधिकार
(४४)
ढाळ १३ मी.
.
.
देशी पूर्वनी.
शीत उष्ण एक मातनो, चोमासे, हो ! रहे मास चार,
आचारांग बीमा क्षेत्रमा, वमणु तमणु हो ! रहे काळ बहार सु°
भोळा ग्रहस्थ समने नहीं, अधिकी विनती हो ! करे करजोड,
बने आज्ञा बहार ते, रहे राखे हो । जिन आज्ञा
२
तोड सु.
आचारागमा वरजीयु, बृहत् कल्प हो ! नहीं कसे एम,
दोष कह्यो निशीथमा, जबरदस्ती हो । कल्प उलघे केम. सु० ३
नाव बेसी नदी उतरे, नहीं रहे हो ! मुनि एकन ठाम,
अधिक रहे ममता वधे, मारो हो ! उपाश्रय गाम, सु० ४
मारा श्रावक मारी श्राविका, मारु हो ! पाठशाळे नाम,
मारो गच्छ क्रिया करो, एम बगडयु हो ! साधुनु काम सु० ५
पीयरमा नारी रहे, जमाइ हो ! करे सासरे वास,
एक स्थाने साधु रहे, होवे हो ! बहु मान नाश सु. ६
मारडपक्षी उपमा, विचरे हो मुनि देश विदेश,
पळे चारित्र निर्मळु, श्रावकने हो ! नवो मळे उपदेश सु. ७
अगोपाग हीणा थता अथवा हो ! रोग होवे तन,
स्थिविर भूमि पामीया, एक स्थाने हो | करे स्थिरमन
सु०
कारण व्हावो उपधानने, अठाईओच्छवे हो ! पूनामा रंग
-योग करवु शिप्यने, वीने स्थाने हो ! नहीं पडित सग
सु०
-
-
क
(४५)
वम आज्ञा वीतरागनी, आज्ञा लोपी हो करे गणी धर्म
आचारांग पहेला अगमा, नहीं जाण्यो हो ! तेणे धर्मनो मर्म सु० १०
मोटी ममता बाधता, स्त्रीओ साथे हो ! करे अधिक स्नेहा
संचय परिचय राखे धणो, सयम खोवे हो। नहीं तेमा सदेह
.
रस वृद्धि सुखशीलीआ, मठवासी हो! केम छोटे स्थान,
रडापो मोटा धरतणो श लखु हो । जाणो भगवान
ज्ञान भडार नामथी, माहे राखे हो । पात्रानी जोड;
गृहस्थीथी आगळ चडे, ममता लागी हो । नहीं शके छोड सु० १३
भ्रष्ट कल्या आचारथी दशवकालिक हो । उठे अध्ययन,
समवायांग सवळो कह्यो देड ते तो हो न देखे निशीथने
नयन 'सु० १४
चोमासानी विनति, तुर्त हो । वोले स्वामी एम,
आगेवान कहो कोण छ, वदोबस्त हो ! खरचनो केम
सु० १५
अमुक गामना श्रावको, कही गया हो ! वे चार हजार;
काईक अधिकु तमे करो, पीली पल्टणना हो ! आवा समाचार
.
पदवी टेया पन्यासनी, कराववा हो साधुने योग,
ल्हीया पढित चार छ, वे प्रण हो । मनुरीया लोक
कोईक पुस्तक
भंगारवा लखाववा हो ! सून वे चार,
ईटम पीटम आशरो, खरन हो ' थशे आठ दश हनार, सु० १८
(-४८)
योग्यने न दे वाचना, अयोग्यने हो । देवे सूत्र ज्ञान;
गुरुजी भागी होवे दडना, जुओ हो ! निशीथ दे ध्यान
साध्वीओ भणे ब्राह्मण कने, क्या रही हो ! जैनशासन रीत;
वृहदकल्प चिलमीली कहीं, अन्यतीथि हो केनी प्रतीत.
मु०
गणी उपाध्याय पन्यासजी, बेठा हो ! कचेरी माड;
अन्यतीर्थी पासे भणे, निशीथ हो ! कह्यो चोमासी दड
पोते प्रमादी यै रह्या, केम करे हो । शिष्यनी सार;
शिष्य अविनीत बनी गया, ब्राह्मण पासे हो ! नहीं विनय
विचार सु०१
ब्राह्मण पासे भणता थका, लघुता हो ! शासननी थाय,
द्रव्य खरचाये ज्ञाननु, गुरुभक्ति हो । टीधी उठाय सु० ७
एकथी बीजा गच्छमा, ज्ञान कारण हो ! जावे मुनिराय;
बृहत्कल्प व्यवहारमा, अन्य तीथ हो ! गुरु नहीं कराय मु. ८
देशकाळ देखीने, अपवादे हो ! करेलु काम,
ते हमेशा कर नहीं, पडित राखी हो ! व्यर्थ करे नाम
गुरुगमथी भणता थका, जाणे हो! आगमनो रहस्य;
गुण घणा लख केटला, शासन शोमा हो ! यधे विशेष सु० १०
एक साधु मण्यो होये, भणावें हो ! ते पाच पचीस;
पचास, मणाव पाचशो, पाचसो हो । होवे जग ईश
पण पुरुषार्थ कोण करे, पैसा देवा हो । श्रावक मजबूत;
पटेलाई पड्या करे, एम नगड्या हा ! साधुना सूत
"
.
.
-
(४९)
-
,
जैन शैली जाणे नहीं, नहीं जाणे हो! द्रव्यक्षेत्र काळ;
बीनाने केम तारशे, पोते हो। बनी बेठा बाल.
सु० १३
किया करे योगनी, पदवी हो ! मळी जाये राज,
पछी आगम कोण भणे, अज्ञाने हो ! एम रही समाज. सु० १४
मोटा मोटा पन्यासनी, वह्या हो । भगवती योग;
अर्थ नहीं माणे आवश्यके, थावे हो । केम पदवी योग्य सु. १५
पाना लीधा हाथमा, करावे हो ! मोटा उपधान;
आगे सुणनो नाथजी, ल्खु हो ! साधुना व्याख्यान.
ढाळ १४ मी-मुनिए आपणा शिप्यने विनय भक्तिमा प्रवृत्ति
करावयी जैनागमनो सारी पेठे ज्ञानाभ्यास कराववो परन्तु पोते प्रमादी
थई अन्यतीर्था पासे भणाची स्वच्छदी नहि बनाववो
.
--
व्याख्यान अधिकार.
दुहा.
गीतार्थ ने मुनिवरा, आगममा प्रवीण,
स्वाध्यायमा नित्य रमे, निम जळ माहे मीन
परपदा आवे पासमा, देवे मधुर उपदेश,
घर घरमा फरवु नहीं, जैन सिद्धातनु रहस्य,
an
२
४
(ढाल १५ मी.)
देशी पूर्वनी.
नय निक्षेप प्रमाणथी, स्याद्वाद हो ! जाणे सप्त मंग,
उत्सर्ग अपवादने ओळखे, चित्ते हो ! वैराग्यनो रग सु० १
वचन अपेक्षा ज्ञाता हुए, दश वोल हो ! सोळ बोलनो जाण,
उप्तातिकी बुद्धि होये, पाटे वेसी हो ! वाचे व्याख्यान. सु० २
गुरुकुळ वासो सेवे नहीं, नहीं लीधु हो ! गुरुगमथी ज्ञान,
एकान्त विद्या ब्राह्मणी, वध्यो हो ! बहुलो अज्ञान सु० ३
क्रिया प्रतिक्रमणु शुद्ध नहीं, नहीं हो ! नव तत्वनो जाण,
स्याद्वाद नहीं ओळखे, एवा गुरु हो । केम वाचे व्याख्यान सु० ४
वे चार चरित्रने, कल्प वाचे हो ! ब्राह्मणनी पास,
गुरुनी परवा कोण करे, सुठ गाठीये हो । वने गाधी खास सु०५
निशीथ आचारांग मण्या विना, नहीं कल्पे हो। वीचरे आगेवान,
हमणा पदवीधरनी वारता, जाणे हो ! महारो भगवान. सु. १
मोटा मोटा पदवीधरा, तेना हो ! सुणीए व्याख्यान,
उपदेश उजमणा तणा, अमुको अमुको हो । साधुने दान. सु० ७
पुस्तक लखावो साधुना, उपकरण हो ! देनो अनेक,
ज्ञानमडारमा आपा रुपिया, लावो लावो हो ! करे विशेष सु. ८
तप अठाइ पारणे, गुरु तेडी हो ! केइ देवे दान,
फळ वतावे पर्वत नेवो, तृष्णा हो ! लागी जुओ अज्ञान,
,
(५१)
ब्राह्मण वाचे पुराणने, सर्व डोडो हो । दो अमने दान,
सीधा जावं वैकुठमा, एम बगड्यु हो ! साधुनु मान सु० १०
मुनि तेड्या नावे नहीं, नहीं करपे हो ! कीघो मुनिने काज,
मूल्य देइ न लखावq, एम भाख्यु हो ! श्रीजिनराज सु० ११
आचारांग वाचे नहीं, दशवकालिक हो । वाचे केम,
प्रश्न व्याकरण वाचे नहीं, छेद सूत्रनो हो ! न लेवे नाम. सु. १२
कदी कोई वाचतो, जाणे हो । साधुनो आचार,
उत्सर्ग अपवाद लगावीने, वधारे हो ! अनत सप्तार सु. १३
गुरु नेवा चेला मळ्या, कोण काढे हो ! आ वातनो तोल,
साधु आचार बतावता, खुली जावे हो । पोतानी पोल सु. १४
महिला परिचय अति घणो, सधवा विधवा हो ! मळे मस्तान,
सेवा करो स्वामी तणी, स्वामी वेठा हो ! जाणे गोपीमा कान
(कृष्ण) सु० १५
साधुना स्थाने साधवी, वरजी हो । वृहत् कल्पमा नाय !
व्याख्यान अथवा वाचना, आवे हो ! सर चउविव साथ सु० १६
अगीतार्थ पासत्था होवे, केम वाचे हो ! साधुनो आचार,
आण रही नहीं कोइनी, अधोअध हो ! मचीयो भधकार मु. १७
साधु जाणे श्रावक जाणशे, तो करशे हो । वरी खेंचाताण,
श्रावक पण ढीला यया, अधा उदर हो ! थोथा धान सु. १८
हानि होवे छे ज्ञाननी, श्रावक हो ! नहीं पूछे सार,
1
(५२)
J
सु० २०
कान तणा रसीया थया, शु करवा हो! सुणे साधु आचार सु० १९
मोटा मोटा भाषण करे, कोरा हो ! पोते रहेवे आप,
पोधीना गण थया, केम पडे हो ! वीजापर छाप.
पाटे वेसी साधवी, पुरुष आगळ हो ! वाचे व्याख्यान,
दुराचार वध्यो 'पणो, कलियुगना हो! ए छे अनाण
शृगार हास्यादि घणा, व्याख्यान हो ! आवे नवनव रग,
स्वपर मति बहु जन मले, काम पड्या हो ! होवे शीलनो भग
सु० २१
सु० २२
जुओ आज्ञा वीतरागनी, दीर्य दृष्टि हो ! देइने ध्यान,
नाक अणी एडी पग तणी, नहीं दीसे हो! शुणवा व्याख्यान
सु० २३
,
.
सु० २५
आचारांगमा साध्वी, व्याख्यान सुणवा हो ! जावे त्रण सग,
चार हाथ पना तणी, चादर थी हो ! ढाके अग उपाग. सु० २४
दशाश्रुत स्कंधा ओपमा, नारीनों हो ! जोवो अधिकार,
घरनी झुपडी बाळीने, नीजानो हो ! केम ठंड निवार
निरयावलीका ज्ञातासूत्रा, बाईओने हो ! दीघो उपदेश,
एवी विधिए दे साधवी, जाणी हो ! सिद्धातनु रहस्य
श्रावक पण समने नहीं, जो हो । प्रत्यक्ष दृष्टात,
फूटी नाव अवो नाविक, केम पामे हो ! भवजलनो अंत सु० २७
उपदेश देवे द्रव्यनो, फड करे हो! टीप गामोगाम,
सस्था स्थापे नवी नवी, जेमा हो! पोतानु नाम
सु० २६
सु० २८
- एक सस्था सीने नहीं, तोडे हो! करे आपणु काम; 4 ऋपभ कुट चक्री देखीने, भुसाडी हो । करे आपन नाम सु. २९ कशव प्रतिकेशवा, कलियुगी हो ! जागीआ सेतान, एक वीजानु सडन करे, नोटीसो हो । देवे मस्तान एकने शिष्यनी लालसा, बीजाने हो ! हृदयमा मान, स्वार्ययी शुद्ध रहे नहीं, किम मळे हो ! समाजने ज्ञान सु० ३१ समय नहीं अपडा तणो, आपसमा हो ! राखो धर्म स्नेह, एक बोजाने मदद करो, मार्ग हो । सुधारानो एह शासन उपदेशकों उपरे, लाम हानिना हो ! थाशे जोखमदार, उठो सभाको समाजने, रात गई हो ! उग्यो दिनकार दाळ १५ मी-मुनि गुरुकुलवासो सेवन करी स्वप्तमय पर- समयना सारी पेठे जाणकार थाय, तर्क वितर्क अने समाधान करवाने सारो अभ्यास करे अने पोते अन्त करणथी वैराग्य दृष्टि, शुद्धाचरण राखे एवा मुनिए व्याख्यान आपी भव्यात्माओर्नु अवश्य कल्याण करवु जोइए परन्तु जेणे जैनसिद्धान्तो न वाच्या होय अने गुरुगमथी ज्ञान न मेळन्यु होय अने अदरमा स्वार्थनी लालसा बनी होय तो पछी तेवा व्याख्यान वाची दुनीयानो शु उद्धार करनार : तेओने तो मौन धारण करी गुरुसेवामा-गुरु आज्ञामान पोतानु संयम पाळवू जोइए
(५४)
-
तप अधिकार.
न
दोहा
1
आठमु लक्षण साधन, तप करी शोपे तन,
पूजा सत्कार वाछे नहीं, निर्मळ राखे मन
बागवाडी वनमा रहे, करे समाधि ध्यान,
लब्धि अनेके उपने, निर्मळ केवळ ज्ञान.
(ढाल १६ मी.)
देशी पूर्ववत्
जेम म तप मुनि आचरे, तेम तेम हो ! वधे अधिक तेज;
क्षात्यादिक गुण गण वधे, निकाचित हो ! कर्म तोडे सहेन. सु० १
रगी अभ्यतर आतमा, जाणो हो । जेने मुक्ति मोझार,
बाल क्रीडा आ भरतनी, एक पक्षी हो लखुं समाचार. सु०
मास खमण मुनिवर करे, त्रीश गामे हो ! मेले समाचार,
अमुक दिने होसे पारणु, छपावे हो' पोंमें जाहेर.
टेक्ष पडे गृहस्थी उपरे, मेळा थाएं हो! घणा गामना लोक,
महोत्सव वरघोडा काढता, करें हो । आडवर फोक (व्यर्थ) सु०४
घर घरमा तैयारी थती, मात पाणीनो । हो स्वामी देनो लाम,
भूखे मरी भेगी करी, कमाई हो ! उड जाये आम (आकाश)सु०९
क्दाचित गृहस्थ नहीं करे, कोप करी हो ! तपसी वोले एम,
२
.
,
(५५)
,
शु अमने जाणो नहीं, मन वधे हो ! तप खोवे तेम
५. तपसी नाम धरावीने, पीए हो ! अध वलोइ छास,
सुठादिक केई वापरे, दूध तणो हो । मीठु घोवण खास.
लावा लावा कागळ लखे, दुढकनी हो ! कीधा मास चार,
गुप्त वात खोले नहीं, अधिमानी हो ! सेवे माया चार.
धर्मीनु नाम धरावीने, लेवे हो । तपस्यानु नाम,
काम करे अधर्मना, शु लखु हो ! जाणो आतमराम
कोड वर्ष सुधी तप करे, करे हो ! कोई कोष लगार,
मान मायाने लोमथी, वधारे हो ! उलटो ससार
सु० १०
समवायोग बत्रीशमा, वाची हो ! करे आतम खप,
अज्ञात कुलनी गोचरी, अजाण्यो हो ! मुनि करे तप
ढाळ १६ मी-रागद्वेपनु शान्तपणु अने मात्र कर्मक्षय
निमित्ते घणु करी गुप्तपणेज तप कसु जोईए, किन्तु मानपूना-
सत्कार माटे न करे तेम तप करी क्रोध पण न करवो जोईए
स्त्री परिचय निषेध अधिकार.
दोहरा
नारी होय चित्रामनी, नहीं रहे मुनिराय,
दशकालिक आठमें, उदर बीलाडी न्याय
ढाल १७ मी
देशी पूर्ववत्
सर्व व्रतमा दुप्कर का, उत्तराभ्ययनमा हो । कही नव वाड;
दशमो कोट गणो जापतो, मुनि रहे हो ! वनवाडी के पहाड, सु०१
श्राविका तो दूर रही, साध्वीनो हो ! केटलो बदोबस्त;
साधु स्थाने साधवी, नहीं आवे हो ! निशीथनो मत. सु०
अठाई ओछव उपाशरे, ज्या रहे हो! श्रीवीरना साध;
मृदग ताल वीणा तणा, हारमोनीयम वाना हो! नवा नवा साद सु०३
गायन मडळी बोलावीने, नचावे हो ! करी नारीना रुप,
करे विषय उदीरणा, तु जाणे हो ! मारा त्रिभुवन भूप
गरवो गावे रातमा, ताली देवे हो ! नारी मळी साय,
भाक्त नामे लोक भोळवा, इद्रिय पोपे हो ! तुं जाणे नाथ. सु. ५
राते दीवो क्ल्पे नहीं, जिन मदिरे हो ! कह्यो वीतराग,
धर्म नाम अधर्म करे, शासने हो! लगान्यो दाग. सु०६
गौतम स्वामी आगळे, नाटक कर्यो हो । सूर्याभदेव,
वणिक समजावे कुहेतुथी, पासत्याए हो ! पाडी खोटी टेव. सु. ७
स्युलिभद्र वेश्या घरे, चित्र शाले हो! कीधु चोमास,
तो केम उतरो उपाशरे, वीरे वरज्यो हो ! वेश्यानो घास सु० ८
क्या गौतम क्या गीदडा(शियाळ), बाळ हृदय हो! शु जाणे अज्ञान;
क्या नवगनो सिंह केसरी, क्या खर हो ! कोण करे पीछाण. सु० ९
"
(५७) सु० १२ किया करावे केई मुनि, आलोचन हो ! देवे केई साध, प्रतिक्रमण करावता, नारी साथे हो । मेली मर्याद सु० १० नारीने सावु कागळ लखे, वधे परिचय हो । तु जाणे नाथ, अशुद्ध व्यवहार लोकमा, विहारमा हो रहे वाईओ साथ, सु०११ बाधी दृष्टिरागमा, करे हो! चोमासा साथ; आल पाणी मुनिने मळे, आधाकर्मी हो ! तु जाणे नाथ साधु गौतम सारखा, नारी हो! चटनबाळा जो होय, तो पण परिचय खोटो हुवे, प्रत्यक्ष दशा हो । यतिओनी जोय.सु०१३ अग्नि पासे घृत मुस्ता, लींबु नामे हो' व्यापे मुम्वे नौर, सूयगडांग चोथे कयो, नारी नागण हो ! मुके कामना तीर.सु. १४ नारी सग निवारसे, आतम हो । इद्रिय करे दम, नारदनी परे पामशे, रस हो ! आतम उपशम सु० १५ दाळ १७ मी-साध्वी के श्राविका गमे ते होय परन्तु ब्रह्म- चारी पुरुषोने नारी साथे बिलकुल परिचय नहिन करवो. एकलविहार अधिकार. - दोहा. कळिकाळमा एकलो, नहीं विचरे भणगार, गुरुकुळ वासो सेवता, तुरत तरे ससार. १
(५८)
--
(ढाल १८ मी.)
देशी पूर्व प्रमाणे.
निशीथ आचारांग भण्या नहीं, नहीं भण्या हो । ते जैन सिद्धात,
गुरु कुळवास छोडीने, अभिमानी हो ! विचरे एकात. सु. १
ढाळ चोपाइ कथा कहाणीयो, रीझावे हो ! अज्ञानी लोक,
मन मानी मोमो करे, अनाचारी हो । सेवे केइ दोप सु० २
स्वच्छढे अकुश विना, कोण रोके हो ! कहो केनी काण,
रेल विहारी मुनि केइ, मला भुडा हो! कोण करे पीछाण सु० ३
श्रावक पण भोळा घणा, नेठे मळ्या हो ! माने
गुरुराज,
बंने आज्ञा वारणे, जाणे दीधो हो। चोरोने सहाज, सु० ४
पासत्था कुशीलीया, प्रशसता हो ! चोमासी दंड,
स्वच्छदाना गुण कहे, निशीथे हो ! कह्या गुरु ( भारी ) दड.सु०५
अगीतार्थने एकलो, नहीं कल्पे हो ! वृहत्कल्पनो पाठ,
कहे किशु एक्नु, नहीं कल्पे हो ! जो भेला रहे साठ सु०६
केइ ध्यानी मुनि मणे, केइ हो ! तपस्या को पूर,
कठ कळा गायन करे, आज्ञा विना हो ! शासन रहे दूर. सु० ७
ठाणांगठाणे आठमे, आठ गुण हो । होवे जेने साथ,
सिंह जेम विचरे एकलो, आज्ञा दीधी हो ! जेने जगनाथ, सु० ८
उत्तराध्ययने ओगणतीसमें, गच्छ छोडे हो । जो होवे वीर,
तीने ठाणे भाने भावना, क्यारे विचरू हो ! एकाकी घरी धीर सु०६
।
(६३)
मलु होवे साधु सिद्ध थयो, नहींतर हो ! उठे प्रतीत,
तेथी श्रद्धा शिथील थई, हासी हो ! करे लोकनी रीत. सु. १०
पूर्व पाप वाणिये को, उदय आवे हो ! पहोंचे मुनि पास,
माला मत्र बतावी दो, जेम मळे हो ! घननी मोटी रास. सु० ११
झपडो जीतु राज्यमा; पुत्र हो । होवे एक बेन
पदवी देवरावु आपने, जगमा हो । जस मोटो छेन. सु० १२
गृहस्थी धनना लोभीया, साधुने हो ! पदवीन जाण,
बने आणा उची धरी, ए छे हो ! कलियुगना ए घाण सु० १३
ढाळ २० मी-छदमस्थ मुनियोने माटे आगममा कर्जा छे
के
भूत
भविष्य के वर्तमान काळना निमित्त न बोलवा, तेथी घणी
जातना नुकशान थाय छे माटे निनाज्ञा पालक मुनिने कदी पण
निमित्तादि सप्सार विधिना कार्यो नन करवा जोइये
,
तार टपाल अधिकार.
दोहरा
छोड्यो जगत म्नेह,
समाचार सुण एह
A
।
॥
(ढाळ २० मी.)
देशी पूर्वनी
मानपूजाने कारणे, वाछे हो ! आदर सत्कार,
पुद्गलानदी नीवडा, खाली खोवे हो । नरनो अवतार. सु. १
यत्र मत्र तंत्र करे, भाखे निमित्त हो ' करे भूति कर्म,
कामण टुमण दोरा करे, नहीं जाण्यो हो ! ते धर्मनो मर्म. सु. २
झाडा झपटा करे घणा, मादलीया हो ! मरे मजुर,
अक लीलाम बतावता, तेजी मदी हो । केई साधे सुर सु. ३
वासक्षप केइ करे, धरे हो ! केइ माथे हाथ,
केइ मूहुर्त वतावता, तु जाणे हो । मारा कृपानाथ, सु० ४
पुण्य विना सिद्धि नहीं, फोकट हो ! खोवे प्रतीत;
उत्तम तो झळके नहीं, जाणो हो । ए नीचनी रीत. सु. ५
भ्रष्ट कह्या आचारथी, दड कह्यो हो । निशीथ मोझार,
विरोधी आज्ञा तणा, भगवतीमा हो ! जुओ अधिकार. सु०६
सो वार साच पडे, एक वार हो! कदी पडे
प्रतीति रहे नहीं जननी, लोभी वणिक हो ! सयम लेवे लूट. सु० ७
आगम विहारी कारणे, सेवे हो! कोइ अपवाद,
ओठु लेवे तेहनु, नहीं शक्ति हो ! जुठो हठवाढ, सु० ८
पष्ट के रोग आवे थका, धन कारण हो ! वाछे कोई मान;
शाति स्नात्र भणावता, ओठी आरिल हो ! सिद्धचक्र ध्यान, सु०९
.
,
"
.
धर्म लामना नामयी, लखे हो ! कर्मनी वात;
। क्या सुधी लखु वापजी, पाखड माड्यु हो ! घोळे दिने रात.सु०१०
गरज नहीं ग्रहस्य तणी, स्वतत्र हो ! मत्यु जाणे राज,
शका रही.नहीं कोइनी, एम बगडयु हो ! भरतनु कान. सु. ११
पर्युषणनी क्षमापना, नहीं मळे हो ! भोजननो टाइम,
नहीं जोये नहीं देखता, क्षमापने हो ! लखे कुशळ क्षेम. सु. १२
मोटा मुनि चोमासु करे, सो पचाप्त हो । मोइए टपाल,
आचारज पन्यासनु, शं कहेवू हो ! ए तो मोतीनी माळ, सु० १३
टपालना पैसा तणु, थातो हशे हो ! केवो उपयोग,
विचार करे कोण तेहनो, सरखा सरखो हो ! मन्यो संयोग सु०१४
कमती नहीं कोइ ढुंढका, तेरा पंथीनी हो । वळी अधिकी वात,
गुप्त गोटाळा छे घणा, नहीं छाना हो ! तु जाणे वात सु. १५
पार नहीं केटलु लखु, नाणो हो ! तमे जगदाधार,
करुणानिधि कृपा करो, मरतनो हो ! करो जलदी उद्धार सु. १६
द्वाळ २१ मी--संजोगा विपमुकास्स, आ न्यास्याने हमेशा
स्मरणमा राखनु अने कागळ पर ना लिखवाथी गृहम्य साधे पणा
प्रकारनो परिचय यधी पडे छे ते पण रागद्वेपनु मूळ छे आर्तध्याननु
वृक्ष छे तेषी बने तेटेलु दूर रहेतु जोइये.
(६४)
(ढाल २१ मी)
.
देशी उपरनी
गच्छ नायक गोरुवा होवे, मोटु कारण हो । शासननु जाण;
समाचार लखावता, अपवादे हो । रही जिन आण. सु० १
छोटा होवे साधु साध्वी, पत्र लखे हो ! पोताने नाम,
आवे पोताना नामथी, कोण जाणे हो! शु करे काम. सु. २
दुकानदार गृहस्थी होवे, चिठी आवे हो । नित्य बेज चार;
एक घर छोडी नीकन्या, थया हो ! केइ घर हजार. सु. ३
मोटी आफीसमा सो पचास, नानीमा हो ! आवे दश वीस,
तार सुणी तुटी पडे, प्रतिक्रमणे हो! पाडे बेठा चीस. सु. ४
कवर कार्ड टीकीट घणा, नोटो हो । राखे मस्तान
पारसल वी. पी तणा, गणता हो । कोण राखे ज्ञान सु. ५
मोटा मोटा मुनिराजना, माडे हो ! दफतरमा नाम,
मन मानी मोजो करे, सोगणु हो । गृहस्थथी काम. सु०६
पारसलमा कपडा काबळी, दवा हो ! साबुने तेल,
हुक्म करे रुपिया तणो, शु लखु हो ! आ भरतना खेल सु०
गाडा गृहस्थी पूछे नहीं, देवे हो ! ते रोकड दाम;
मनीओरडर मोकलावता, वळी आवे हो ! श्रावकने नाम. सु० ८
सावु स्त्रीओने कागळ लखे, साध्वी लखे हो ! पुस्पने नाम,
अशुद्ध व्यवहार लोकमा, कोण जाणे हो ! अतरना काम सु०
.
--
.
धर्म लामना नामथी, लखे हो ! कर्मनी
वात
क्या सुधी लखु बापजी, पाखड माड्यु हो ! धोळे दिने रात.सु. १०
गरज नहीं ग्रहस्थ तणी, स्वतत्र हो ! मत्यु नाणे राज,
शका रही नहीं कोइनी, एम वगडयु हो ! भरतनु कान सु० ११
पर्युपणनी क्षमापना, नहीं मळे हो ! भोजननो टाइम,
नहीं जोये नहीं देखता, क्षमापने हो ! लखे कुशल क्षेम. सु. १२
मोटा मुनि चोमासु करे, सो पचाप्त हो ! जोइए टपाल,
आचारज पन्नासनु, शं कहेवू हो ! ए तो मोतीनी माळ. सु. १३
टपालना पैसा तणु, थातो हशे हो ! केवो उपयोग,
विचार करे कोण तेहनो, सरखा सरखो हो ! मन्यो संयोग सु०१४
कमती नहीं कोइ ढुढका, तेरा पंथीनी हो ! वळी अधिकी वात,
गुप्त गोटाळा छे घणा, नहीं छाना हो ! तु जाणे तात सु. १५
पार नहीं केटल लखु, जाणो हो ! तमे जगदाधार,
करुणानिधि कृपा करो, भरतनो हो ! करो जलदी उद्धार सु० १६
डाळ २१ मी--संजोगा विपमुक्करस, आ व्याख्याने हमेशां
स्मरणमा राखवु अने कागळ पत्र ना लिखवाथी गृहस्थ साथे घणा
प्रकारनो परिचय वधी पडे छे ते पण रागद्वेषनु मूळ छे आर्तध्याननु
वृक्ष छे तेथी बने तेटेलु दूर रहे जोइये.
,
(६६)
4
प्रतिक्रमण अधिकार.
--
दोहरा.
निरतिचार प्रत पाळता, कदाच लागे दोप,
उपयोग आलोचना, करता होय निषि. १
(ढाल २२ मी)
देशी उपरनी
छ आवश्यक उपयोगयी, करता हो ! जीव थाय विशुद्ध,
जेम जेम अधिकी क्रिया भरी, तेम तेम हो! उपयोग अशुद्ध सु०
छ आवश्यक सहना एक छे, अधिकी क्रिया हो । यता छेद भेद,
तीन चार युइ तणा, चैत्यवदन हो ! काउसगना भेद सु. १
भावार्थ जाणे नहीं, क्रिया करे हो! ते काळोकाळ,
द्रव्य आवश्यक अण उपयोगमा, ज्ञानी हो । कहे तेहने बाल. सुक
प्रतिक्रमणना अतमा, मोठे शब्दे, हो ! बोलावे शात,
गाडरी प्रवाह जीवडा, कोण जाणे हो! कहे तेहनो तत सु० ॥
मोटी शात मुनिवर कहे, पक्खी चोमासी हो ! को प्रतिबंध,
सतिकर शरु थयु, भविष्यमा हो! थाशे निबंध.
मोटा उपसर्ग कारणे, बनावी हो ! जाणी ते काळ,
- इमेशा उपसर्ग नहीं, देवी कोपे हो । समने नहीं बाळ सु०६
(६७)
.
-
निरत्ति निर्वाण पाठमा, देवी पासे हो ! मागे निर्वाण,
भरत क्षेत्रना लोकनी, दशा वगडी हो ! नहीं रह्यो ज्ञान सु. ७
देव वीतराग जैनना, नहीं पूने हो ! सरागी देव,
ते मार्ग लप्न करे, सरागी हो ! पूजे नित्य मेव सु. ८
कयवरी कम्मा पाठनो, कुलदेवी पूजी हो। कहे दुइक एम,
श्रावक सरागी पूजे नहीं, उत्तर आपे हो ! गीतार्थ तेम मु०९
सम्यग् दृष्टि जो सुर होवे, गुण कर्ता हो ! सुलम बोधि जाण,
अवगुण बोले उलटुं थता, पूजनीय हो । वीतराग पीठाण सु. १०
मोटे उपद्रव सधमा थता, स्मरण करे हो! सम्यग् दृष्टि देष,
प्रतिक्रमण करता थका, उपद्रव हो ! नहीं होवे सदैव सु. ११
कामदेव चुलणी पिता, अरण कहो । श्रावक पीगण,
उपसर्ग सह्या मोटका, सरागी हो ! पूज्या नहीं जाण. सु० १२
अप्ताहिज्जा, श्रावक थया, तुगीया तणो हो ! जुओ अधिकार,
मोक्ष कारण माथु मुडीयु, नहीं वाठे हो ! कोइ सहाय लगार सु०१३
नहीं कहे तो उपद्रव करे, यतिओ हो ! एम घाले मर्म,
नहीं कहेवा वाळा सत्रमा घणा, भ्रमे पड्या हो! समजो तमे
मर्म सु. १४
अजितशांतिना असमा, गाथा हो । मिलावी साथ,
उदेपुरमा लघुशांतिने, शरु करी हो ! नहीं छानु नाथ सु. १५
नानु प्रतिक्रमणु गुपचुप करे, मोटु हो ! करे परखदा वीच,
अमरुमा नहीं, मायाचारी हो । ज्ञानी कहे नीच. सु०१६
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(७१) - रात्री प्रयाण करे नहीं, नहीं जाये हो ! चोमाते बहार, खाण रत्ननी सघ होवे, हालना हो । सुणीए समाचार, उठावे दुढीया, पासत्था हो । करे अधिकुं थाप, ओछु अधिकुं बोलता, लागे हो ! मिथ्यात्वनो पाप सु०७ नहीं करता गुरु का, अविधि हो ! लघु प्रायश्चित जाण, विधि करता भवगल तरे, एवी हो! श्रीमिनवरनी आण मर्यादा मुनिवर तनी, सत्र तणी हो । करे कोशीश, उचो धर्यो आचारने, शु लखु हो ! जाणो जगदीश नाम लेवे यात्रा तणो, साये राखे हो! गाडीने माल, दाल वाटीने चूरमा, अहींथी हो ! लाग्यो मानो ताल साधवीओ साथे रहे, विधवा हो ! रहे दश वीस, माग्ये माई मळे कोई, श लखु हो ! जाणो नगर्दश, स्त्रीओ साये साधुने, वरने हो । आचारांगे एम; उत्तराध्ययने सोळमें, पाउ मागे हो ! शीयळनी नेम : मु. १२ साधु कारण तबु रहे, तबु कारण हो । गाडीने उट, जीव हणाय छ कायना, पूठेयी हो ! वळी बोछे जट. १०१३ आज्ञा चोरी वीतरागनी, महिला साये हो! मी मोन्टन बाह, ममता तो खुल्ली दीसे, पाचमु ऋ हो: नाड (नारा) मु. १६ उठे पाउली रातना, सर चाले हो परे गानो गाम, साधु-साध्वी राते चाइना, निंदा हो! हो टामो दाम- 1. "
,
-
उनु पाणी करे रातना, घडा मरी हो ! बाईयो रहे लार,
तेहन पाणी वापरे, यात्रा नामे हो ! सयम जावे हार. सु० १६
नीलण फूलण कोण गणे, कोण करे हो ! जीवोनी सार,
निरनुकपा अनुयोगमा, भक्ति नाम हो ! करे अत्याचार. सु० १७
सो नणा सघमा होवे, उनो पाणी हो । पीवे दश वीस.
आधाकर्मी ए आरोगता, साधु साध्वी हो! मेगा पचवीस. सु० १८
सो पचास के बसो रहे, माल मळे हो । सुणो तीर्थ नाथ;
मार्गमा मुक्ति नहीं, हाथ पकडी हो ! लै आवे साथ
देवसूरिजीने तेडीआ, कुमारपाळे हो । कढाव्यो सघ;
स्त्रीओ साथे कल्पे नहीं, उत्तर दीधो हो ! आगमनो रग सु० २०
गौतम करी जातरा, अष्टापद हो । एकला आप,
ते वखते संघ नहीं कह्यो, पासत्थाए हो! पाछळ दीधु स्थाप सु०२१
यात्रा कीधी पाडवे, जाली आदि हो ! घणा मुनिराज,
पांचमां आठमा अंगमां, मुक्ति गया हो! साधी
आतम काज
२२
चोमासे गामातरे, श्रावक हो ! जावे नहीं बीने गाम,
सघ कढावे, जावे वदवा, करे हो ! पोतानु काम.
केई तो धनना लोमीया, केई हो ! जुओ पुत्रने काज,
केई रोगादिक काढवा, यात्रा करवा हो ! मळे समान.
वणिक ठगे बधा जगतने, नहीं मूके हो । वीतराग देव,
तेने पण ठगवा भणी, नहीं छोडे हो ! अनादिनी टेव,
.
सु.
२३
"
:
सु० २५
(७३)
सु० २६
भाग घाले दुकानमा, मीलोमा हो! राखे कोइ भाग,
माग राखी सट्टा करे, उनवलने हो ! लगावे दाघ.
लोकोत्तर पक्ष क्रिया करे, वाळे हो ! लौकिकना सुख,
विष क्रिया मिथ्यात्वनी, एम मास्यो हो! आपे श्री मुग्व. सु० २७
धर्मशाळामा उतरे, पत्ते चोवट हो ! रमे कहेवा संघ,
राजा राणीने मारता, जुओ हो ! जातरानो रग
सु० २८
अनार्य भाषा बोलता, गाली गुप्ता हो ! करे कलेश,
केइ धर्मादु चोरता, गीदड हो । पहेरे वाघनो वेष
सु० २९
केइ तीर्य पण एवा थया, माडी बेटा हो ! दुकानोना काम,
मुनीम रोकडीया मळ्या, भेला करे हो । फरीने दाम सु०
'पछी एकठु नाणु थता, शेर लेवे हो ! मीलोनु पाप,
के जमा राखे बैंकमा, वणिक लीलानु हो । केम थाये माप सु. ३१
जीर्णोद्धार करावे नहीं, नहीं देवे हो! वीजे तीर्थे दाम,
ट्रस्टी जाणे मारा वापनु, मोटा मळ्या हो ! थोडु करे काम सु० ३२
जैन सघ कटावता, ढुढक हो ! जावे वढन काज,
तेरा पंथी नावे पूजकने, आडवरथी हो ! एम बगडी समाज सु०३३
धमाधमीमा धर्म नहीं, 'धर्म रह्यो ! निन आतम माह,
ते तो वीरला ओळखे, देखादेखी हो! वाजाबधे वनाह सु० ३४
यात्रा कारण जन मळे, नहीं हो ! जैन धर्मनो रग,
जो यात्रा तारक कही,-दूरे मुकयो हो । सगनो सग
+ -
(७४)
.
रामायण तो छ घणी, लीला हो। जेनी अपरपार,
मेझरनामु वाचीने, भरतनो हो 1 करो जलदी उद्धार. सु० ३६
ढाळ २३ मी-तीर्थयात्रा मोक्षनु कारण छे परन्तु धामधुम
मोक्षनो कारण नथी माटे पौद्गलीक इच्छा-छोडी यत्नपूर्वक जिनाज्ञा
सहित यात्रा करवी जोइये.
मंदिर उपाश्रय अधिकार.
दोहरा
मदिर श्री वीतरागना, करे जो तेहनी सार,,
जीर्णोद्धार करावता, पामे भवनो पार. १
कलिकाळमा मोटको, मविजनने आधार,
जिन प्रतिमा जिन सारिखी, कही ते सूत्र मोझार ३
श्रावक मळी पोसह करे, पौषध शाळा नाम,
चाहे कहो उपासरों, उपासकनो काम. ३
(ढाल २४ मी)..
देशी पूर्ववी.
अष्टापदनी उपरे, आदीश्वर हो ! पहोंच्या निर्वाण,
चैत्य बनाव्या तेहना, शकेंद्र हो ! रत्नोना जाण. सु. १.
.
+
(७५)
ए अधिकार आगम तणो, जंबुद्वीप हो ! पनति जाण,
ते परपरा आज छे, शुद्ध श्रद्धा हो ! राखे चतुर सुनाण. सु० २
राजा राणी शेठीया, भक्ति भावे हो! पणो धर्मनो राग,
चैत्य बनावे नवा नवा, विव थाप्या हो ! लीधो स्वर्गनो मार्ग सु० ३
देहरानो खरयो नहीं, पोते हो ! करता जीर्णोद्धार,
ताला कुची रहेता नहीं, नहीं हो । गोठी मजुर प्रचार. सु०४
श्रावक पोते पूजता, करता हो ! ते सार समाळ,
पडतो काल आरो पाचमो, पड्या हो ! केइ काळ दुकाळ सु० ६
चैत्यवास साधुए कयों, श्रावके हो ! जोडी समाळ,
जरूर पडी मोटा द्रव्यनी, श्रावके मळी हो कर्यो एकठो माळ. सु०६
तेनु नामन पाडीयु, देव द्रव्य हो ! प्रथे कर्या लेख:
भडार बनान्या जुनुआ, करे हो । एक वीजाने देख सु० ७
जेम नेम द्रव्य वधतो गयो, तेम तेम हो । ववे अधिक केश,
घरेणा दागीना प्रभुने वघ्या, तृष्णा हो ! वाधे हमेश
पडतो काळ थाये चोरीओ, लडे झगडे हो ! माया मस्तान,
ताळा कुची वीतरागने, चलावी हो ! वणिके दुकान “सु०९
मदीरने उपाशरा, मोक्ष कारण हो ! माख्या वीतराग,
ते कारण कयों अन्यथा, शासनने हो ! लगाव्यो दाग. सु० १.
एक मदिरनी आशातना, बीने मदिरे हो! द्रव्य रहे अनेक,
एक बीजाने आपे नहीं, कोई देवे हो। उपर लखावी लेख सं० ११
व्याज लेवे आक्रु, पाग हो! आप आटले काळ,
-
.
(७६)
-
मुदत उपर नहीं मळे, तेना हो ! प्रभु सुणो हेवाल.
ऋष्टीओ कौरट चटे, देव नामे हो ! माहे फरीयाद,
दिगवर श्वेताबरा, माहो माहे हो ! मुकी मर्याद,
झघडातो घरना होवे, नाखे हो ! मंदिरमा आप,
देव द्रव्यने वापरे, कोरटे चडे हो ! करे मोटु पाप
सु०
ममत्वना मदिर बन्या, अवदनीक हो ! कहे आगम आप,
अवदनीकने वादता, आज्ञा भागे हो ! लागे मोटु पाप.
देव द्रव्यनी वार्ता, सुणो हो ! प्रभु वणिकना काम,
शेर लेवे मीलो तणा, व्याजे धरे हो ! कोमा दाम
मोटा आरम मीलो तणा, श्रावकने हो । कयो कर्मादान
भाग घाले वीतरागनो, ए छे हो। कलियुगना नाण,
दुकान मकान वधावीने, माडे देवे हो! करे वेपार,
शु भगवान मुखे मरे, के पाळवो हो ! तेने परिवार;
जीर्णोद्धारनी टीपणी, मडावे हो ! फरे गामो गाम,
खरच आवक केटली थई, हीसाब हो ! जाणे आतम राम. सु. १०
रेक्स पडे गृहस्थ उपरे, धर्म छोडी हो । अन्य धर्मे जाय,
निर्धनता अज्ञानता, विना खर्च हो । धर्मे पेसी आय
पंढी चलावे देवनी, व्याज वटो हो ! राख्या मुनिम,
केई बेंको वाणीया, खाई गया हो। जेनी नही सीम.
जीर्णोद्धार करे नहीं, नवा मदिर हो ! करे पोताने नाम,
मोदा आरंम अन्याय, नही खपे हो ! देवद्रव्यमा दाम. सु० २२
.
"
सु० २८
-
(७७)
-
न द्रव्य वधारवा, ज्ञानोपकरण हो । स्वपरना सणो स्वाम,
क गौतमथी नहीं टळे, करी देवे हो ! वधान लीलाम. सु. २३
ळा पहेराये पैसा लुटवा, अधिक हो! एक एकनु मान,
व बापडा शु करे, नेवा गुरु हो ! तेवा जमान,
सु० २४
हेला पर्व आराधता, हमणा हो ! करे वेपार,
द्रन्यनु शु होवे, सुणनो हो । तेना समाचार,
तपडा तो आखा वर्षना, काहे हो ! पर्युपण काल;
सर्व व्याख्या क्या रही, माहो माहे हो ! आवे गालमगाल सु० २६
नाम कीर्ति अमिमानथी, वोली बोले हो ! बीजो लेवे तोड,
वाजा वागे रण तुरना, ईनत राखे हो । नहीं शके छोड सु० २७
ज्यारे पैसा देवा पडे, वावा कादे हो ! वळी अमुका एम,
कोरट चडे धरणा देवे, फजेती हो ! वळी करे तेम
सु० २८
देव ज्ञान द्रव्य तणा, पोतु राखे हो ! केई गृहस्थी पास,
पोते पैसा वापरे, काम काचो हो ! होवे देवद्रव्य नाश. सु० २९
प्रवृत्ति चैत्यवासी तणी, सत्यविनये हो ! बधी दीधी रोड,
यतिये मळी सरु करी, हनी सुधी हो । नहीं सके तोड सु० ३०.
निषेध नहीं विधि तणो, अविधिए हो ! लागे मोटु पाप;
केटलु लखु मारा वापनी, नहीं छानु हो ! वधू जाणो आप सु०३१
ढाळ २४ मी-मगवानना देरासर खरेखर मोसना दातार छ
अने तीर्थ के देरासरनो रक्षण करे छे ते शासनना रक्षण करवा नेवू.
-
1-
(७८)
..
छै, कटीकाळमा देरासरो कल्पवृक्ष तुल्य इच्छित सुखना देवावाळा
परन्तु ने मन्दिरोने नामे लडवु, जगहवु, के ममत्व मावी
अपणायत करवु, ए दुःखदाई थई पडे छे, माटे तेने त्याग करखु.
ढुंढक अधिकार.
१
40
दोहा
हवे दुढकनी वारता, लखता न चाले हाथ;
मुलन कापे
वृक्षनु, तु
जाणे जगनाथ,
जिन आगम मिन प्रतिमा, कलियुगमा आधार;
जे उत्थापी लुपके, सुण तेना समाचार.
२
ढाल २५ मी उपरनी.
अमदावाद गुजरातमा, लुपक लहियो हो! लखे जैन सिद्धात,
पापाचारी जाणी करी, काढी मुकयो हो ! सब मळी एकात सु. १
विरुद्ध उपदेश सुणावता, हिंसा हिंसा हो ! पूजा जातरा स्थान,
उदय कर्मना योगथी, वेत्रण हो ! मळीया अज्ञान,
बकरीने गया काढवा, घरमा पेठो हो । मोटो सिंहा
खडन तो हिंसा तणु, आगम हो । लोप्या अविध,
लिंग तो राख्यु जैननु, श्रद्धा हो ! थइ विपरीत,
लवनीथी दुढकायया, तोडी हो ! लुपानी रीत.
"
-
।
, । (७९) अधश्रद्धालु अज्ञानथी, गडबड हो । चाले लोटमलोट; जिन प्रतिमा मिन सारिखी, उत्पाप हो । सिद्धश्रीमा खोट सु. ५ वया पुत्र नेम यापडा, बाह्यक्रिया हो ! करे वक जेम बाळ; सूत्र सुयगडांगर्मा का, आज्ञा वहार हो । वधु आळ पपाळ .०६ आहार वस्त्र पात्र तणा, स्थानक तणा हो ! सेवे दोप अपार, कमती नहीं काई वातनी, उपर लख्या हो! बघा समाचार. सु. ७ प्रतिमा पुना कारण मोक्षनु, मारव्यु हो ! बीने उपांग, प्रत्यक्ष पाठ मरोडता, लाग्यो हो । कुगरुनो रग अनेक श्रावक श्रावीका, द्रव्य भावे हो । पूज्या मिनराज, खुल्ला पाठ आगम विपे, उत्यापे हो ! नहीं आवे लान सु० ९ सर्व आगम उत्थापीने, वत्रीस हो ! राख्या प्रमाण, ते पण माने मूळने, काम पडे हो ! तेमा खेंचाताण, सु० १० नंदी सूत्र बत्रीशमा, आगम हो ! तोतेर ( ७३ ) नाम; चौद हनार प्रकरण कह्या, मूळ पाठे हो! नहीं माने श्याम सु०११ पंचांगी कही मानवी, समवायांगे हो ! भगवती मोझार, भोळा पड्या ते भर्ममा, तेथी वधे हो । अनत समार. सु. १२ दिन पर मोढ बाधवं, कुलिंग हो ! लागे मिथ्यात्व, मक्षा भक्ष टाळे नहीं, नहीं टाळे हो ! कोइ कुळने जात सु. १३ बासी पाणी सचित होवे, लावे हो ! भरीमरी लोट; उपाधि राखे धणी, देवे हो! गृहस्य शोर पोट सु० १४ साधु नामे स्थानक बंधावता, ताळा 'फुची हो । करे सार समाळ, , . , -
(८०)
-
म
आहार पाणी साधवी तणा, भोगवे हो ! अज्ञानी बाळ. सु. १५
पडिकु ठकुल वरजीओ, दश बैंकालिक हो । पाचमे अध्ययन
दड क्यों निशीथमा, सर्व भक्षी हो! नहीं लेन अलेन सु. १६
सुवो सुतक गणे नहीं, नहीं गणे हो! नारी रुतु धर्म,
लोक विरुद्ध आचरण करे, केइक करे हो ! छाना कुकर्म. सु. १७
चेला लेवे मृत्यना, नानी उमरे हो ! पोते करे सभाळ,
टोळे टोळे निंदा करे, डे झुघडे हो । केइ विकराळ.- सु० १८
जीव अजीव पथीतणा, आठछ कोटी हो । केइ पथापथ,
केइ कपडा काळा करे, बुगला हो ! केइ वाजे संत सु० १९
क्रिया कल्प पुस्तक बाधीने, धर्या हो । मडार मोझार,
शील यु छे पेटीमा, ज्या त्या हो ! करे भ्रष्टाचार
देशीमाथी नीकळ्या, उत्कृष्ट हो! परदेशी नाम,
माया अधिकी केळवे, हु जाणु हो । सौ तेहना काम.
स्थानक छोडी नीकळ्या, भाडे हो ! लेवडावे मकान,
के ग्रहस्थी रहेवासन, खाली करे हो ! फोकट तोफान सु० २१
अथवा गृहस्थी भेगा उतरे, महिला परिचय हो ! रहे हरदम,
पुत्र तो लेवाने गइ, खोइ वेठी हो ! पोतानो खसम (पति) सु०२२
तपसी नाम धरावीने, पीवे हो ! अडधी वलोई छाश,
मोटा मोटा कागळ लखे, स्वामीए हो कीधा छे मास छमाप्त सु०२४
घोषण पीए धनु, घणी धोई हो ! साकर रहे साथ,
खाटु मीठु अथवा राखनु, शु लखु हो ! जाणे जगनाथ सु० २५
सु० २०
सु० २१
-
(८१)
,
.
बेले बेले एकातरे, पारणे हो। नहीं सतोष,
विगय माटे ममता फरे, लावू खावु हो ! असमाधि दोप सु० २६
खट पट घणी छानी करे, गृहस्थी हो ! रहे आधिन,
पुस्तक चेला लेवे मूल्यना, सिद्ध साधक हो । भल्या प्रवीण,सु. २७
मोटा दोष साधु सेवता, गुपचुप हो ! घरमा दे ढाक,
लेण देण समाचारनी, गृहस्थ नामे हो ! चलावे डाक.
सु० २८
पूज पुजने पग धरे, गाममाहे हो ! नीची राखे दृष्टि,
विहार करे दश कोशनो, मायाचारी हो । ज्ञानी कह्यो भ्रष्ट सु० २९
व्याकरण व्याधिकरण मानता, सस्कृतनो हो ! उलटो करे अर्य,
सूत्र उत्सूत्र जाणे नहीं, लोपे हो ! केई प्रथाग्रय
टोले टोले श्रद्धा जुदी, जुदा जुदा हो । सहुना ए घाण,
एक वीजाने उत्थापता, निंदा करे हो ! माडी खेंचाताण सु० ३१
म्लेच्छपणु राखे घणु, मलमूत्रनी हो ! नहीं राखे शुद्ध,
शासनने निंदावता, विपरीत हो ! आचरण बुद्ध
सु० ३२
केटलु लखु बापनी, लीला हो ! तेनी अपरंपार,
केटलेक अशे मुझने, एनो हो । मोटो उपकार
ते कारण लखवु पडयु, दुढ़कनो हो । प्रभु करो उद्धार,
निनागम जिन प्रतिमा, वादी पूजीने हो ! तरे ससार
सु० २४
ढाळ २५ मी-केस (बाल ) ने बदले माथे (शीर) कावु
ए केवल मूर्खाई जेवु छ अथवा अविधिथी हिंसा थाती जोईनेन
तेओ पोकार करता होय तो तेओने विधि पूर्वक प्रभुनी भक्ति करे
६
मळतो मीन चावता, वध्यो के हो ! अनत सतार;
(८२)
तो कोण रोके छे परतु आ समे राग द्वेष करवा के जिनागमोने
लोपवा एतो मोटु पाप बंधननु कारण छे माटे तेओने दीर्घ दृष्टि थी।
विचार जोइए
तेरापंथी अधिकार.
दोहरा.
प्रतिमा उत्थापी ढुंढके, माने दया और दान,
अढारे पदरोतरे, भीखम उदय अज्ञान.
प्रतिमाने पत्थर कहे, वीर प्रभु गया चुके,
पाप कहे दया दानमा, अज्ञानी बेवकुफ.
(ढाल २६ मी.)
देशी उपरनी.
तेरापथीनी वारता, लखता हो ! दुःख आवे अथाग;
शासन चद्र नेम उजळु, पथोडे हो ! लगाव्यो दाग
सुर
च्या दान जड जैननी, जेमा हो । बतावे पाप,
श्रावक वटको (टुकडो ) झेहरनो, आज्ञा बहार हो ! धर्म टीघो
जीवमार्या पाप एक छे, बचावता हो ! कहे लागे अद्वार
सु
थाप, सु
१
-
,
स० ७
(८३)
धर्मरुनी करुणा करी, बचायो हो ! पारो शातिनाथ,
नेमजी जीव बचावीया, नाग वचाव्यो हो ! श्रीपार्श्वनाथ सु. ४
पी साधुने फासी देवे, पथणीर्योथी हो ! सेवे अत्याचार,
बळती गायो ए वणने, वचावता हो ! कहे पाप अपार
सु०५
सर्व जीवोनी रक्षा कर वीजे अंगे हो| भास्यु भगवान
पहले शतक शतक आठमे, भगवती हो । देखीलो प्रमाण सु० :
पथी साधु छोडीने, कोई देवे हो ! बीजाने दान,
हुव्यों कहे ससारमा, जुभो हो । दुष्टोनु अज्ञान
वरपीदान मिनवर देवे, ते वखते हो। नहीं पी साथ
पकडयु पूछ गद्धा तणु, लातो खावे हो । करे हठवाद,
अभग द्वार गृहस्थी तणा श्रावक हो । होचे चित्त उदर;
विमुग्व कोई जाये नहीं स्थानांगे हो ! बाधे पुण्य अपार स. ९
वीजा दशमां अंगमा, निषेध हो ! कोई सावध दान,
चोरी ागे वीतरागनी, निन्हव हो । नहीं छोडेमान सु. १०
भगवती पाठ बतावता, उपासकनु हो ! लेने जुछ नाम,
तीर्थने जाणीने, देता हो ! लागे पापनु ठाम सु० ११
अबड श्रवक सो घरे, पारणु हो । करे वीरना वेण,
दान दइ श्रावक तरे, नहीं देखे हो । जेना फुग्या नेण सु० १२
प्रदेशी राजा थयो, केशी श्रमणे हो! दोघो प्रतियोध,
दानशाळा चोया भागनी, धर्म धारी हो । करे घणी शोध सु. १३
सतियो लावे गोचरी, जमाडे हो ! गृहस्थी पेरे साधु,
मक्षा भस गणे नहीं, पुदगलानदी हो ! पढ्या जीमने स्वाद. 1५
.
अन्य
पडदे बेठा पूजनी, साध्वीओ हो ! रहे पडदा बीच;
भोजन नव नवी जातना; अधारे हो करे आखो मीच सु. १५
शुलख कर्म विडबना, शं लख हो ! पंथणीओना काम
दुराचार वध्यो घणो, नहीं छानु हो । जाणे आतमराम मु. १६
पछे साधुने शु खाशो, दूध दही हो ! घी मीठाइ माल,
ग्रहस्थी आगळ कहे पूजजी, मारा साधु हो ! त्यागी उनमाल सु०१७
आधा कर्मीनी मावना, मरी लावे हो ! नेम पातरा पूर,
काचुं पाणी राखोडी तणु, माल खाइ हो भ्रष्ट होवे कूर सु० १८
खोटी करे प्ररुपणा, निन्हव कह्या हो । आगमवाद,
लिंग पण जुदो जैनथी, नहीं ग्रहस्थी हो ! नहीं होवे साधु सु० १९
तेरापंथी नाटक वाचनो, जेमा हो ! नहीं होय बाकी कोय;
मोला पड्या छे भ्रममा, पथी उपर हो । अनुकृपा जोय सु० २०
शीक्षा देदे पुत्रने, नहीं करे हो ! प्रकाशीत पाप,
लोकयुक्ति न्यायथी, एटलु लख हो ! आगळ जाणो आप. सु० २१
ढाळ २६ मी-अधुओ! तमारा माटे मने घणीज अनुकपा
आवे छे कारण तमे जैन नाम धरावो छो अने जिनाज्ञायी विरुद्धा-
चरण करो एटलुन नथी परतु अन्यं लोकोमा जननी दया अने
उदारतानी-मोटी छाप पडे छे छता तमे दया दाननो निषेध करो
छो ए केटली भुल भरेली छे परतु ज्यारे निर्णय बुद्धिथी विचार
करशो ते तमने सत्य मार्गनी प्राप्ती थासे माटे पक्ष छोडी न्यायनी
रस्तो लेवो जोइए.
(८५)
उत्सर्ग अपवाद अधिकार.
दोहरा.
उत्सर्ग मार्ग ओळले, जाणे द्रव्यादि काळ,
एकात खेंचे तेहने, ज्ञानी कहे छे वाळ १
त्रणे फोरका एम कहे, हमणा पाचमो काळ,
अपवाद मार्ग चालशु, उत्सर्ग शक न पाळ २
(ढाल २७ मी).
देशी उपरनी
उत्सर्ग मार्ग राखना, कारण पामी हो सेवे अपवाद,
ते कारण मट्या पछी, नहीं सेवे हो । श्री वीरना साधु सु. १
नाम लेवे अपवादनो, मद सघयण हो ! पचम आरो तेम,
ते कारण पळे नहीं, लेरख्यु हो ! आगममा जेम सु. २
इद्रिय पोषण कारणे, लेवे हो ! अपवादनु नाम,
छती शक्ति खप करेनहि, सुख शीलीया हो ! करे एशआराम सु०३
जैन कहे आरो पाचमो, अन्य लोकोने हो ! केम चोथो कहाय,
शीतोष्ण वनवासमा, नहीं वस्त्र हो मळे तो रहेवाय सु०४
रेह तो रग महेलमा, खावाने मीले हो चगा (पृष्ट ) माल,
गप्पा सुणका ग्रहस्थी मळे, वस्त्र हो ! मळे सुकुमाळ सु० ५
.
-
,
जगलमा लेता आतापना, तपस्या हो करता छ मास,
पडिमा अभिग्रह वारता, अपवादे है। ! करे उपवास. सु० ६
घर घणा गोचरी तणा, नित्य पिंड हो दोषिलो खाय,
नव कल्प विहार करे नहीं, उपाधि हो । मोटी पोठ बंधाय सु० ७
विहार करे वेला उठीने, पोटळीया हो । राखे मजुर,
पगचपी करावता, मर्यादा हो! जे मुकी दूर. सु. ८
शतक आठ उदेशो छठो, कारण विना हो ! सेवे अपवाद,
सहाय देवे कोई तेहने, बने चोर हो । मोटी पडे खाद, सु० ९
ग्रहस्थ करता तो भला एमे, बोले हो । पास त्या एम,
नाम साहुकार करे चोरीओ, अधिक हो चोरोथी तेम. सु. १०
पगे पहरे मोजा मोजडी, शक्त असक्त हो । नहीं विचार,
घडा उपाडे ग्रहस्थीओ, दश वैकालिके हो ' लागे अनाचार सु०११
ब्रहत्कल्पे दिक्षा समे, प्रश्न व्याकरण हो दसमे अध्ययन,
चौद उपकरण साधुने, वधता जावे हो ! दिनने रेन (रात ) सु०१२
जबरजस्ती दिक्षा नहीं, कोण देवे हो । जवरीयी आप;
जो पळे ते आदरो, नहीं तो पालो हो श्रावक व्रत जाण सु० १३
आराधक श्रावक होवे, पनर ( देशविरति 'लो) मवे हो पामे निर्वाण,
विराधक साधु होवे, केटला भव हो नहीं परिमाण. सु० १४
नाम लइ अपवादनु, वेप माहे ! सेवे अनाचार,
शासन कलक लगावता, दुर्लम बोधि हो । अनंत ससार सु० १५
उत्सर्गमा अपवादनी, कमल प्रभ हो ! सूरिए कीधी थाप,
महानिशीय पाचमे, अनत ससारी हो भाख्नो श्री आपसु० १६
(८७) , सयम पूरो न पळे, नहीं पळे हो श्रावक वृत बार, शासननी सेवा करो, पामे हो ते भवनो पार सु० १७ दाल २७ मी-मात्र पाचमो आरो मंद सहनन अने देश- कालनु नाम लइ छुटवानो नयी पण यथा शक्ति खप करी अमूल्य मनुष्य जन्मने सफळ करवानु पासत्था अधिकार -- दोहरो पास त्या कुदर्शनी, कुलिगी भ्रष्टाचार, गुरु नाणी वदन करे, रुले अनत ससार. १ (ढाल २८ मी) देशी उपरनी कर्म बाघे हो! कह्यो आगमसार, आहार पाणी साधु देवे, दड कह्यो हो ! निशीथ मोझार सु. १ पासत्थानी प्रशसा करे, परिचय करी हो ! देरे आदरमान, वस्त्र पान देवे वाचना, दड कह्यो हो । श्री वीरनु ज्ञान सु० २ पासत्याने कुशीलीया, उसन्ना हो ! नित्य पिंडिया होय, गामनगर पडोलीया, सप्तकता हो ! व्रत खडीया जोय सु० ३ पासत्याने वादता, AKH
(८८)
,
-
पासणीयाने कथा गा, ममईया हो ! निन्हव जोय,
आमोगीया किलवेषीया, बहु रुपीआ हो । निमीतिया होय. सु० ॥
कुतुहला काम कीडीया, चारण जेम हो। जस बोले कोय,
केइ दास ग्रहस्थी तणा, एटला हो ! अवदनीक होय. सु०५
सर्प अग्नि विप, सेवता, शस्त्रधी हो! मरे एकनवार,
कुगुरु तेथी अधिको कहा, ममाडे हो ! अनती वार. सु०६
पाच छ सात आठ नव, नवनवो हो । दुर्गति नावे अक,
आचारजने चौ सघना, महानिशीय हो! तुमे वाचो निःशक.सु०७
सजम पुरोनवी पळे, रुडो को हो । प्रमुए ग्रहस्थावास,
उमय भ्रष्ट महापापीआ, करे हो दुर्गतिमें वास सु. ८
यतिपरिग्रह धारी हुआ, तो पण हो ! रही करामात,
जोतिप वैदिक निमीतथी, शासन कार्य हो 1 केइ कीधा हाथ सु०९
साचा रह्या लगोटना, काम पडे हो ! बताव्या हाथ,
सूत्र सिद्धात लख्या घणा, हुआ हो राजा राणीना नाथ (पूजय)सु०१०
पासस्थानी प्रशसा नहीं, गुण लीधा हो जे जाणी सबध,
हमणाना सावुनी वारता, तेहनो हो ! प्रभु सुणो प्रवध
पेट दुखे पोता तणु, डाक्टर हो! आवे हकीम;
रुपिया देवे फी भरे, विद्वानोनी हो ! आवी छे सीम
दीक्षा देवी शिष्यने, ब्राह्मण हो ! बोलावे मुहुर्तकान,
लघुता लागे लोकमा एवा गुरुथी हो । केम सुधारे समाज. सु० ११
आगम लखव नाणे नहीं, जे नाणे हो ! ते करे प्रमाद:
रुपिया देवे वाणीया, कोण करे हो ! पुरुषार्थ साधु
सु० ११
सु० १२
,
यतिने पासत्था जाणीने नहि करी हो। सधे सार समाळ,
'एवी रोते हवे पासत्या तणी, करता हो केवायासे हाल
पुरुषार्थ रह्यो नहीं, नहीं रही हो ! कोई करामात,
रोटी मळवी मुश्केल थशे, नहीं छानु हो ! तुं जाणे तात. सु. १६
थोड लख्यं घणु नाणजो, मारा साहेब हो ! तमे चतुर सुनाण,
काप करशे मेझर वाचता, पासत्या हो ! ते लेनो पोगन. सु० १७
पक्ष करी पासत्या तणो, सुमतिनागीलनो हो ! जुओ अधिकार,
महानिशीथ चोथे कयो, रुस्या हो ! अनत ससार
सु. १८
पक्ष छोडी पासत्या तणो, पुरी हो ! करशे पीठान,
ते तुज चरणे आवशे, देजो हो । प्रभु केवळ ज्ञान
ढाळ २८ मी-पासत्याओनी प्रशसाके अलाप सलाप कर.
वानी प्रभुए ना पाडी छे तेनु कारण-जेमके सुशील बेहन जो कदी
गुणगान
करे के तेने साथे परिचय राखे तो लोकोमा ते
सुशीला पण निदानो पात्र थई पडे तेम गलाचार वाळा मुनिके
श्रावक वर्ग पासत्याओना परिचयथी पोते निंदाना पात्र याय छे
अने पासस्थाने बहु मान मलवाथी उचरिने पोषण थाय छे एटला
माटे पासत्या थावान न देवा जोईए कदाच कर्म योगे थाय तो
पछी सघ तेने आदर न करे तीन शासनने हितकारी थाय
सु. १९
वैश्यादिना
(९०)
1
श्रावक अधिकार.
1
दोहरा.
२
जिन शासन भूपण समा, दीपावे जैन धर्म;
जीवादिक नव तत्वना, साचो समने मर्म
ढयादान उदारता, हृदय स्फाटिक समान,
जिनवर पूने भावथी, श्रावक गुणनी खाण
रसीया जैन सिद्धातना, नवी नवी धारे वात;
एक तरफ साधु उपासका, एक तरफ जनकने मात
आलभिक तुगीया तणा, शख पोख्खली सार;
आनदादिक मोटका, एक लख गुण सठ हजार.
श्रीमुख वीरे वखाणीया, मडुकने कामदेव
दृढ श्रद्धा वीतरागनी, सदा करे गुरु सेव
मात पीता सरखा कह्या, ठाणांगे उजमाल,
भगवती शतक सोळमे, कह्या रत्नोनो माल.
साधु तेम श्रावको, शासन तुन जयवत,
वर्तमान वीतक लखु, सामळ महिमावत,
५
जेवा
-
,
(ढाळ २९ मी.)
देशी उपरनी
श्रद्धालु श्रावक घणा, राखे हो ! शासनथी प्रेम,
जाणी अभ्यतर आतमा, रुडा पाळे हो ! लीधा व्रतने नेम
सु० १
बहु रत्ना वसुधरा, नहीं करे हो! खाली डफाण,
हमणा श्रावफनी वारता, सुणोये हो । प्रभु दै ध्यान सु० २
नेवी दशा साधु तणी, तेवी हो ! श्रावकनी जाण,
मेला हृदय मायावणी, सघमा हो । माडी खेचा ताण,
श्रद्धा छोडी देवनी, सरागी हो ! पूने देवी देव,
मिच्छामि दुककड कुमारनु, पाखी चोमासी हो ! देवे नित्य
नित्य मेव स० ४०
देव द्रव्य गणे सुखडी, ज्ञान द्रव्य हो ! गाठे करी जाय,
हिसाब किताब जाणे रामनी लागी हो ! जळमाहे लाय
भक्षाभक्ष आरोगता, होटलमा हो ! पीवे चाहने दूध,
आचार डुब्यो जैननो, मोह क्या हो ! नहीं रहे शुद्ध सु० ६
स्वगच्छनो पासत्यो हुवे, वढे पूने हो ! करे वहुमान,
परगच्छनो गीतार्थ होवे, किया पात्रनो हो ! करे अपमान सु० ७
ध्वना पताका सम वनी, पवन नेम हो ! फरी जाये आप,
मोह देखी टीलु करे, जुठी साची हो! करे आपणी स्थाप सु० ८
पक्ष करे पासत्या तणो, देवे हो ! शीथिळने सहान,
अवगुण गुण जाणे नहीं, एम बगडी हो ! आ जैनसमाज मु०९
मु०६
"
-
,
धर्मी नाम धरावता, केइ हो ! करे अत्याचार
जैन निंदावाने जनमीया, मळ्यो हो ! महुलो परिवार. सु. १.
स्वामी वात्सल्य नामयी, माल पाणी हो । उडावे खब
स्नान करे भागो पीवे, चोथु व्रत हो ! भागे बेवकुफ. सु० ११
स्वामी वात्सल्य कयौँ पोखली, पोपध शाळाए हो ! करे धर्मने पुष्ट,
माल खाई धर्म नहीं करे, कृतघ्नी हो ! वळी कह्या दुष्ट सु० १२
लट्ठा कह्या, गुरुगमथी हो । जाणे आगम रहस्य;
प्रश्न पूछी निर्णय करे, जाण पणुं हो ! करे विशेष सु० १३
पोते पडित बनी रह्या, स्वच्छदे हो । वाचे ग्रंथाग्रंथ,
आज्ञा नहीं वीतरागनी, अर्थ तणो हो! करे अनर्थ सु. १४
पोते पड्या प्रमादमा, गोठी पासे हो ! पूजावे देव
भक्ति आशातना कोण गणे, पैसा खातर हो ! करे नित्य सेव सु० १५
प्रभु पूजा करे नहीं, करे तो हो । न जाणे विधि,
उपदेश सुणे नहीं कानमा, पोते हो! वनी बेठा सिद्ध सु० १६
स्नान करे मदिर माहे, वापरे हो ! अणगळ्यो नीर,
नीलण
फूलण
कोण गण, कोण गणे हो! श्रमजीवानी पीड सु०१७
पोते तन पोषण करे, लगावे हो ! साबु भेठ ने तेल,
कपडा धोव मोझो करे, शु लखु हो ! भरतना खेल सु. १८
दाढी मुछ जमावता, तिलक करता हो ! लागे घडी एक;
प्रभु पूजा करता थका, पाच मिनिट हो! लागे विशेष. सु. १९
दशत्रिक कोण सामवे, अभिगमनी हो | क्या रही वात;
चोराशी आशातना कोण गणे, काम, पडे हो! आवे बाथम बाय.
सु. २०
फेंटा टोपी सुथण पेहरीने, जुता छतरी हो । लकडी लेइ नाय,
कोध करे गाली देवे, पूजा करता हो ! रागद्वेष कराय सु० २१
रोशनी करे रातना, मंदिरमा हो ! लेवे भक्तिनु नाम,
अणगणता म जीवना, प्राण जाये हो ! जुओ वणिकना काम सु०२२
आणा नहीं आगम तणी, चैत्यवासी हो ! नचान्या नाच,
इद्रिय पोपण कारणे, नहीं करे हो ! गाडरीया नाच ( शोध ),
सु. २३
गाममा गुरु वदे नहीं, दृष्टिरागी हो ! जाये सो कोश
चोमासामा फरता फरे, आज्ञा मागे हो ! नहीं गणे दोष सु. २४
मोटा मोटा आरम करे, करे हो । विश्वासनो घात,
अधर्मना द्रव्य खर्चीने, निकाले हो । मोटा सपनो साथ सु० २५
अन्याय द्रव्य भोजन करे, पीवे खावे हो! चउविध सघ
हृदय न्याय रहे नहीं, श्रावक साधुनो हो ! जाणो एक ढग सु०२६
दयावत श्रावक रहेवे, चोमासे हो रहे एका ठाम,
नस कीर्तिना बानेथी, सघ काढी हो फरे गामोगाम सु० २७
वहेला उठे रातना, होवे हो उस जीवोनो नाश,
वीर आज्ञा उची घरी, दील माहे हो नहि दयानी वास सु० २८
साधु मरे करे टीपणी, नवकारशीए हो करे नवा नवा माल,
जाणे आव्या मसाणीआ, चेला चेली हो जमे बाळगोपाळ सु. २९
.
.
धर्मी नाम धरावता, केइ हो ! करे अत्याचार;
जैन निंदावाने जनमीया, मळ्यो हो ! बहुलो परिवार सु० १
स्वामी वात्सल्य नामथी, माल पाणी हो ! उडावे खुन,
स्नान करे भागो पीवे, चोथु व्रत हो ! भागे बेवकुफ. सु० ११
स्वामी वात्सल्य को पोखली, पोषध शाळाए हो ! करे धर्मने पुष्ट,
माल खाई धर्म नहीं करे, कृतघ्नी हो ! वळी कह्या दुष्ट सु० १२
लट्ठा कह्या, गुरुगमथी हो । जाणे आगम रहस्य
प्रश्न पूरी निर्णय करे, जाण पणुं हो ! करे विशेष. सु० १३
पोते पडित बनी रह्या, स्वच्छ हो! वाचे ग्रंथाग्रंथ,
आज्ञा नहीं वीतरागनी, अर्थ तणो हो ! करे अनर्थ सु० १४
पोते पड्या प्रमादमा, गोठी पासे हो ! पूनावे देव;
भक्ति आशातना कोण गणे, पैसा खातर हो ! करे नित्य सेव सु० १५
प्रभु पूजा करे नहीं, करे तो हो ! न जाणे विधि,
उपदेश सुणे नहीं कानमा, पोते हो । बनी बेठा सिद्ध सु० १६
स्नान करे मदिर माहे, वापरे हो! अणगळ्यो नीर,
नीलण फूलण कोण गणे, कोण गणे हो। त्रम जीवोनी पीड सु०१७
पोते तन पोषण करे, लगावे हो! साबु भेठ ने तेल,
कपडा धोव मोझो करे, शु लख हो ! भरतना खेल सु. १८
दाढी मुछ जमावता, तिलक करता हो ! लागे घडी एक
प्रभु पूजा करता थका, पाच मिनिट हो! लागे विशेष. सु० १९
दशत्रिक कोण सानवे, अभिगमनी हो ! क्या रही वात;
-
-
,
चोराशी आशातना कोण गणे, काम पडे हो ! आवे बाथम बाथ
सु.
फेंग टोपी सुषण पेहरीने, जुता छतरी हो । लकडी लेइ नाय,
जोर करे गाली देवे, पुना करता हो ! रागद्वेष कराय सु. २१
रोशनी करे रातना, मंदिरमा हो ! लेवे भक्तिनु नाम;
अगगणता त्रम जीवना, प्राण जाये हो । जुओ वणिकना काम सु०२९
आणा नहीं आगम तणी, चैत्यवासी हो ! नचान्या नाच,
इंद्रिय पोषण कारणे, नहीं करे हो ! गाडरीया जाच (शोध),
सु. २३
गाममा गुरु पदे नहीं, दृष्टिरागी हो ! जाये सो कोश,
चोमासामा फरता फरे, माज्ञा भागे हो ! नहीं गणे दोष सु. २४
मोटा मोटा आरम करे, करे हो । विश्वासनो घात,
आर्मना द्रन्य खचीने, निकाले हो । मोटा सपनो माय सु० २५
अन्याय द्रव्य मोनन करे, पीवे खावे हो! चउविध सत्र
हृदय न्याय रहे नहीं, श्रावक साधुनो हो । जाणो एक ढग सु०२६
दयावंत पापक रहेवे, चोमासे हो रहे एफन ठाम,
नम कीर्तिना बानेयी, सर काटी हो फरे गामोगाम. मु० २७
बरेटा ले रातना, होवे हो त्रस जीवोनो नाश,
वीर आज्ञा उची घरी, दीउ माहे हो नहि दयानी वाम मु.
सानु मरे को टोनी, नवचारशए हो को नतः या मन,
नाो आन्या मसानीआ, पेला नटी हा जमे azi
-
+
-
(९४)
-
.
1
अठाई महोत्सव मडावीने, पादुका हो ! स्थपावे किंव
रीत करे कल्याणनी, क्या अमृत हो। क्या रह्यो लीब
(लीबडो). सु. ३०
मदिरमा भगवाननी, मूर्तिओ हो ! मळे पाच साथ,
साधुतणी स्थापना, केटली मळे हो श लखु नाथ,
मार्गानुसारपणु किहा, किहा हो सम्यकत्व आचार,
क्या शासन प्रेमी पणु, दीर्घ दृष्टि हो क्या रह्यो विचार सु० ३२
रात्रि भोजन वरजीयु, आगममा हो ! का मोटु पाप;
सो माहे एसी टका, मळे तो हो । रात्रे खाय धाप (धापीने)सु० ३३
मीलो जीन चरचा तणा, मोटा आरंभे हो ! करे अत्याचार,
विश्वासघात कुडी साखमा, साचो लेवे हो ! नहीं शरम लगार. सु०३४
कन्या वेचे आपकी, दमडालोभी हो । देवे परणाय,
साठ वरसनो डोसलो, लाडी लावता हो ! नहीं शरमाय सु. ३५
वाडा बाध्या गच्छ तणा, तडा हो ! गामे गाम देखाय,
एक वीजाने जुठो कहे, काम पडे हो ! कोरटमा जाय. सु० ३६
वेश्या बोलावे लयमा, वरघोडा हो ! काढे वादावाद,
हारमोनीयम वाजातणा, सुणे हो! विषयना नाद सु०
पैसा जाये निजतणा, घणा जीवो हो । भाधे कर्म
माण्यो नहीं जिन धर्मने, भोळा हो। जीव पच्या मर्म. सु. ३८
एक दिनना नाममा, खर्चे हो दशवीस हजार,
स्वधर्मी भूखे जो मरे, कोण राखे हो ! तेनी दरकार
जान जमाहे आवे पाहुणा, राते राधे हो । पडे नीव आपल्य,
शु केवु ससारनु, स्वामीवात्सल्य हो! जमे नि शक
मु० ४०
बाल नाना परणावता, जाणे हो । ढींगलानो खेल,
बालविधवा सख्या घणी, वध्यो हो ! अनाचारनु मेल
वासी आहार राखे रातना, पीने दिन हो! उनो करी ग्वाय,
शुद्ध बुद्धि रहे केणी रीते, दुढकने हो ! केम आवे दाय सु. ४२
अकवार अरडाटा करे, भाषणे हो ! केई को पोकार,
नैन कोम कमती तणा, मोटा मोटा हो ! लखे समाचार मु० ४३
पाठशाळा गाम गाममा, स्कुलो हो । स्थापे अनेक,
केळवणी कुकवा करे, नहीं क्रम हो । करे देखादेख
सु० ४४
व्यवहारिक विद्यामणी, भणे हो । इग्लीशनु ज्ञान,
भूगोळ खगोळ मणावता, फेल्यु हो ! बहुल्लु अज्ञान सु. ४५
पाच कलाक अग्रेनीमा, धर्ममा हो ! मळे अर्को कलाक,
धर्म असर ते केम पडे, श्रद्धा हो । छेवट जावे थाक
स० ४६
मदिरने उपाशरा, आगम हो! गणे गप्पा समान,
गुरुने गणे रमतीओ, हम तुम हो । देव गुरु धर्म,
सु० ४७
मात पिताने नहीं गणे, नहीं गणे हो ! केर तोफान.
प्रत्यक्ष प्रमाणन मानता, नास्तिक हो । केई पड्या भ्रम सु० ४८
पूछता,
सोमा हो । नीकळे दशवीश,
एसी टका अलगा पड्या, नहीं छाना हो ! जाणे जगदीश सु. ४९
स्थिर सूर्य पृथ्वी चले, जीवानीव हो । पुण्य पापमा फेर,
पहेला असर खोटी जमे, बन्ने उद्धत हो नहीं लागे ढेर सु०५०
।
पास थयाने
सु० १
.
सु०५३
सु० ५१
(९६)
अन्य कोम वधती रहे, जैन कोम हो ! घटती रहे नाथ;
तेना
कारण
छे घणा, उपर रख्या हो ! आ मेझर साय. सु. ६
ज्ञान सिवाय उन्नति नहीं, होवु जोईए हो ! ते क्रमसर ज्ञान,
क्रमसर मणावता, शासनमा हो ! पामे बहुमान
पहेला अक्षर भणाववा, पडी हो! सख्यानुमान,
पछी धर्म भणावता, पामे हो ! ते सम्यग् ज्ञान
धर्म तणी क्रिया करे, जाणो हो ! ते पुण्यने पाप,
देव गुरुने ओळखे, काम वडे हो ! मडन करे आप.
द्रढ अक्षर नाम्मा पछी, भले मणे हो! इग्रेजी ज्ञान,
राजभाषा पण शीखवी, जेथी हो ! मळे धर्मने मान
पहेला श्रद्धा पाकी होवे, भले सीखे हो ! मिथ्यात्वी ज्ञान,
नदी सूत्रमा एम का, सम्यग्दृष्टि हो । होवे सम्यगज्ञान. सु. १६
एक उपाय उन्नति तणो, बीजो लख हो ! आ मेझर साथ,
साधु वर्ग सुधारवो, आ काम छे हो । श्रावकने हाथ
सु० ५८
मुनि वर्गनी उपरे, रह्यो हो ! शासननो भार;
ज्या सुधी ते सुधरे नहीं, त्या सुधी हो ! नहीं थाय उद्धार सु०५८
ममता छोडे गच्छनी, छोडे हो । स्थानक धर्मशाळ,
शिप्य तणी छोडे लोभता, चाहा दूध हो ! छोडे भातदाळ. सु० ५९
अधिक उपाधि पोटला, छोडे हो ! पुस्तक भडार,
विचरे देशो देशमा, क्रिया हो ! करे शास्त्रानुसार
गृहस्थनो परिचय तने, नहीं हो ! कोई राखे पक्षापक्ष,
सत्य मार्ग नि शकी, वैराग्य हो ! पोते आत्म लक्ष
सु०६३
.
-
सपनेता मळी एकठा सुविहित हो मळे सानु समान,
समयानुकुळ चालवु नहीं देवो पासत्याने माज.
सु०१२
मुनि उपदेश श्रावकने करे, श्रावक हो लावे मुनिने ठाम,
बगड्याने
सुधारता
बाधे हो तीर्थकर नाम
छती शक्ति खप करो, काई करो हो शासन उद्धार,
मनुष्य जन्म सफल करो, वारंवार हो नहीं अवतार
सात क्षेत्र आगममा कह्या, ज्ञान हो का सर्वनु मूल,
उत्तेजन दई तेहने मोक्ष जाये हो काढी कर्मशूल
धैर्य गुण धारण करो, मेमर वाची हो मनमा करी विचार,
ठीक लागे तो आचरो, दुस्खथी हो में कयों पोकार
ढाळ २९ मी-शासननी अठर श्रावक पण उच्च कोटीमा
गणाय छे कारण के छ क्षेत्रने पोपण करवा ते श्रावकथीज बनी
शके छ माटे श्रावक वर्गने पोतानो शील, ( आचार ) न्यायपणु,
सत्यता परोपकारता, सर्वजन मैत्रीक भावना अने आत्मदशामा
प्रयत्न करी शासन सेवा बनाक्वा तत्पर थव जोइए ने अज्ञानवश
कोइ स्थले कोइ व्यक्तिमा दुर्गुण जोवामा आवे तो मधुर वचनथी
हित शिक्षा आपी गुण वधारवा जोइए परतु अध श्रद्धाथी एक तारे
बीजाने डुवी मखु के कलेश कदाग्रह करवो ते वीर पुत्रोने छाजतो
नथी, माटे यथा नाम तथा गुण प्राप्त करवो
१
,
-
-
(९८)
आराधिक विराधिक अधिकार.
---
दोहरा.
जिन आणा विराधतां रुले अनत ससार,
आणा आराधी से हुआ, शिवरमणी भरतार.
काळ अनतो हु मम्यो, मवमडलना वीच ( वच्चे )
मुन सरखो पापी नहीं, नीच नीचथी नीच
(ढाल ३० मी)
देशी उपरनी
सूक्ष्म निगोदमा हु वस्यो, वादरमा हो पळी काळ अनत,
काळ असख्य सत्व घरे, वनस्पति हो नहीं भवनो अत.
विकलेंद्राने भमता थका, असज्ञी हो पचेंद्री मोझार;
संक्षी पचेंद्रीने घरे, भव कीधा हो गणतरी वहार.
नर्क तणा दुख में सह्या, आगमथी हो जाणीये वात,
तीर्यच पाच प्रकारना, योग नियोग हो जुदी जुदी जात
आर्य अनार्य मनुष्यमा बाल तपथी हो सुरनो अवतार,
व्यतर आसुरी कायमा, चउगति हो ! भन्यो वारवार
ने सबंधी मुम तणा, गया हो ! प्रमु मोक्ष मोझार,
हु अघन्य अभागीओ, तु जाणे हो ! भन्यामन्य विचार. सु०५
सु० १
सु०२
सु. ३
मनुष्य पणु हवे पामीओ, आर्यक्षेत्र हो । उत्तम कुल जात,
चाल अनादिनी मुझ तणी, लखु हो ! सक्षेपे वात
बाळपणु खोयु खेलीने, तरुणवये हो ! घणा विपय कपाय:
शुं लखु कर्म विटवना, जुठी हो ! कोइ नाळ रचाय
जीवहिंसा जुठु बोलवु, चोरीथी हो । लीधो परमाल,
रमणीरूपे मोहीयो, परिग्रहे हो । लेवा उजमाल
क्रोधादिक मिथ्यात्वना, सेन्या हो ! अदारे पाप,
कर्मादान न छोडीया बनी बेठो हु पापनो वाप.
सु०९
दुःख गर्भित वैराग्यथी, घर छोडयु हो ! नहीं छोड्यो काम,
स्थानकवासी दीक्षा लीधी, पूज्य हो । श्रीलालभी नाम सु० १०
दीक्षा लेई पूज्ययी, केइ वाच्या हो ! अगोपाग,
विरूद्ध रस्तो जाणीने, छोड्यो हो ! दुढक सग
कारण निमीत्त मलु थयु, मानु हो ! पूज्यनो उपकार,
कदाचित बुरो होवे, उपादान हो कारण विचार
नगर ओशीए भेटीया, वीर प्रभु हो ! गुरूरत्नना पाय,
समाचारी जुदी जुदी, वाचीने हो जीव अकळाय
काइक लीला सामळी काइक हो ! नजरे लीधी देख,
उत्पत्ति जोइ आपणी, वाच्या हो ! प्राचीन लेख
पार्श्वनाथ तेवीसमा, शुभदत्त हो गया तेती पार,
हरिदत्त आर्यसमुद्रनी, केशीश्रमण हो ! यया चोथे पाट सु. १५
स्वय प्रम पाट पाचमे, श्रीमाल कीया रो पोरवाळ जैन,
छठे पाठ रत्नमभरि उएस पटण हो आन्या पचसे लेन सु०१६
.
सु० १२
सु० १३
सु० १४
-
(१००)
सु०२०
उपलदे राज आदि करी, तीन लाख हो ! चौरासी हमार;
पवार राजाना वशमा, हू पण जन्म्यो हो ! आ वार सु०
ते उपकार जाणी करी, ते गच्छमा हो को क्रियाउद्धार,
जाणो छो मुज साहेवा आगळ हो | आराधक विचार
चोथे आरो वीर विराजता, तोपण हो ! नहीं पाम्यो धर्म,
भलो आरे मारे पाचमो, सक्षेपे हो ! जाण्यो धर्मनो मर्म, सु० १९
मुळ उत्तर गुण तणो, टेस सर्व ! विराधक होय,
दश प्रकारे आलोचना, लेता हो ! आराधक जोय
व्यवहारसूत्र एम कह्यो, साधुने हो ! केइ लागे दोप,
गीतार्थ अथवा चैत्यमा सिद्ध साखे हो ! होवे निर्दोष मु० २१
दर्शन आराधे चरणविराधना, चरण आराधे हो दर्शन विराधक होय,
त्रीजो बन्ने आराधतो, चोय भागो हो बन्ने विराधीक जोय सु० २२
शुद्ध प्ररूपक जे होये, शुद्ध चारित्र हो शके नहीं पाळ,
काढे दूपण निज तणा, पहेलो भागो हो नहीं मायाजाळ. सु० २३
चारित्र पाळे उजळो, न्यूनाधिक हो प्ररूपे जेह,
जमालि जेम जाणवो, वीजो भागो हो थाये जाणो एह
शुद्ध प्ररूपे
शुद्ध
गौतम हो भागे त्रीजो जाण,
हमणा मारा जेवा वाळमा, भागो हो ! चौथो पीछाण
न्युनाधिक कोई पद कहे, कहे हो कोई अक्षर एक,
चारित्रथी शीथिल होवे, चोथे भागे हो भव करे अनेक सु० २६
एक बीजाने जूठो कहे उत्सूत्र हो ! बोले करता वाद,
आगम उत्थापे अभिमानथी सत्यने हो ! कहे मिथ्यावाद सु० २७
-
आचरे, गुरू
सु० २६
(१०१)
सु० २९
.
मेरू जेटला ओघा पातरा, लीधा हो एम वृद्धना वेण,
आराधकपणु आन्यु नहीं, जेथी हो नहीं भवनी चैन
चोर करे जो चोरीयो, राजा पासे हो जो बोले साच,
साफ ने माफ मळे सदा, कसोटी हो ! लेवे सोनु जाच
एक मारी नहीं विनती, विनती हो, करे भरतनो सघ,
आराधक पद दे नाथनी लगावो हो ! प्रमु आफ्नो रग सु० ३०
रागद्वेष हारे नहीं, तेथी लख हो ! प्रभु वारवार,
अनतवार आगळ लखी, नहीं सगे हो ! प्रभु गरज लगार सु० ३१
सकीर्णता न करो साहवा, काइ करो हो ! प्रभु चित्त उदार,
खरच लागे नहीं आपने, मत मुको हो । मुजने निराधार. सु० ३२
हवे तो पुरो धापी गयो, कटाज्यु हो ! ससारथी मन,
मत तरसावो बापनी, नहीं मागु हो ! कोइ राज के धन सु० ३३
निर्गुणी तो पण आपनो, क्या जाउ हो ! नहीं बीनो नाथ,
अनेक भक्तोने तारीया, हमणा हो ! वारो आन्यो मुन तात
-
मेह आवो मेह आवो करे मोरीया, वर्षवु हो । ते तो ईंद्रने हाथ,
मारे तो जोर लखवा तणु देव लेवु हो ! जाणो जगनाथ सु. ३५
डाळ ३० मी-मारो जीव अनत काळथी ससारमें भ्रमण
करतो पण कोइ काले आराधीकपद नयी मिल्यो, आ यखते
पण सीमधर स्वामीथी प्रार्थना करी मे मीले ते सरू,
"
(१००)
-
-
पूर्णता.
.
दोहरा.
साधु नहीं सौ सारीखा, श्रावक नहीं सब तुल्य,
सामान्य विशेष क्रिया करे, पामी धर्म अमूल्य
जे कलम जेमा चले तेनु थाय व्याख्यान,
राग द्वेष करशो नहि, पामी निर्मळ ज्ञान
(ढाल २४ मी).
देशी उपरनी.
मुख्यतामा ए कह्या, गौणतामा हो ! घणा गुणवान,
तप सयम क्रिया करे, वदना होजो हो ! उगते ( माण ) सूर्य सु. १
तीर्थोद्धार केइ मुनि करे, केइ करे हो ! आगम उद्धार,
शासन प्रेमी केइ मुनि, केइ हो ! करे क्रिया उद्धार
सु०२
श्रद्धालु आवक धणा, शासन पर हो ! झामो प्रेम,
देव गुरू भक्ति करे, रुडा पाळे हो ! लीधा व्रतने नेम सु०
जेनामा समकीत वसे, स्वलिंगी हो ! अन्य लिंगी होय,
ते तो जाशे मोक्षमा, ढंगी हो ! रोलशे जगमाय
आणा पाळी शके नहीं, तो पण हो ! काढे निजना दोष,
ते दिन रुडो उगशे, पालु हो । सयम निर्दोष
समकीत शुद्ध का तेहनु, आयु वाधे हो ! उंची गति जाय
"
(१०३)
ते तुन चरणमा आवशे, मोक्ष देनो हो ! प्रभु महेर कराय सु० ६
पोते पूरु पाळे नहीं, बीजानी हो ! करे निंदा पूर,
भवामिनदी नीवडा जिन मार्ग हो । तेथी रहेशे दूर. सु० ७
जो तेने रुचशे नहीं, ते तो हो ! कुडा करशे तोफान,
ते मुजने परवा नहीं, मारे माथे हो ! मोटा भगवान
सूई तो जाये शोधवा, नीकळ जावे हो ! मोटा उटना उट,
काने सुणी जुठी होवे, ननरे देखी हो । नहीं होवे जुठ,
कदाचित पासत्या मळी, साचाने हो । करी देवे जूठ,
पण परमवे छुटे नहीं, परमाघामी हो ! करशे नही छुट सु. १०
मेझर पाचो बापजी, मत देनो हो ! गादी नीचे मेल,
अधारु फेल्यु भरतमा, नहीं हो ! दीवामा तेल
तारो हुकम माने घणा, इंद्रादिक हो ! रहे कोडो देव,
राजा राणा नित्य पूजता, करता हो ! तारा चरणनी सेव सु. १२
कातो मोकलो देवने, नहीं तो हो ! मोकलो समाचार,
मारू जोर लखवा तणं तु जाणे हो ! प्रभुतारो आचार
वेपारी लोकोने पूछीयु, मेझर आगे हो ! नहीं लोकमा रीत,
उत्तर लखमो कृपा करी, बनी रहे हो! तारे मारे प्रीत सु. १४
सिद्ध क्षेत्रनी यात्रा, कारणे हो आन्यो गुजरात,
सुणवाची अधिक देखी, आपथी हो नहीं छानी वात
सु० १५
मारो हेतु खोटी नहीं, नहीं हो परनिंदायी काम,
द्वेष बुद्धि मारी नहीं, नाणो हो ! श्री आतमराम
जेवो रस्तो कल्पनो, लख्या हो ! मेशरमा नोय,
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सु० २६
(१०४)
न्युनाधिक मति दोपथी, मुझने हो ! मिच्छामिदुक्कड होय, सु. १५
संघ रज मुज शीर चडो, हु छोटो हो । सघ चरणोनी रज,
अवगुण भयों मुज आतमा, मत जाणो हो! मुनमा कशु धन सु० १०
मारी मने खबर नहीं, मन्या भव्य हो ! जाणो जगनाथ,
तो पण घन जिम गाजशु, मारे माथे हो । प्रभु तारो हाथ. सु० २'
हजार दुर्जन ननला होवे, सबळो हो । होवे एकज नाथ,
कुण गने तारा दासने, तारे हो । हनार छे हाथ
ज्ञानसुदर गरीबडो, एकलडो हो ! पज्यो तुज पाय,
बीजु शरणु कइ नहीं, मारे तो हो ! तु बापने माय
ओगणीसे पचोतरमे, सुखे हो सुरत चोमास,
मेझरनाम शरु कर्यु, पूर्ण कीर्छ हो । सिद्धाचल खास
कळश.
सीमधर स्वामी अतर जामी, मोक्ष कामी जग जयो,
आगम सगे, मने चगे, मेझर रगे में लख्यो,
नित्य वाचो हृदय जाचो, श्रद्धो साचो सुखमयो,
रत्नपायो, ज्ञान गायो, सुख सवायो, शिवगयो.
ढाल ३१ मी-पूर्णतामे बघा साधु के सरखा नथी थात
तो पण ने अमूल्य रत्नोनी अदर काचना कटकाने तुरत जुदा
पाहवानी जरुरत छ पछे रत्न आप एथी प्रकाश करशे. मारी
मावना दर्शावी छे भुलनी क्षमा याचना प्रदान करशे इति,
सु० २०
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