Prakrit Bharati Academy, Jaipur

Tatvamrit

Muni, Jyoti Vijay · 2010/02

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Prawortungle
श्रीहंस विजयजी जैन फ्री लायब्रेरी ग्रंथमाला चतुर्थ पुष्प,
मुनिराज श्रीज्योतिर्विजयविरचित
तत्त्वाकृत।
भाषांतरसहित
jasat
विकानेरनिवासी शेठ, शीवचंदजी सुमेरमलजी सुराणानी आर्थिक सहायी
प्रसिद्ध कर्ता-श्रीहंसविजयजी जैन फ्री लायब्रेरी, वडोदरा.
आ
वीरसंवत् २४४६, विक्रम सं० १९७६, आत्मसंवत् २४.
सागरसूरि जानकारी व
द्वारा सप्रेम भट ख
किंमत ०-८-० आना.
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अर्पण पत्रिका श्रीमती साध्वीजीश्री प्रेमश्रीजी! आप साहेवे छेतालीश वर्ष जेटलो घणो लांबो अने अखंड दीक्षा पर्याय पाळी अमदावाद वड़ोदरा धांगधा, खंभात, कपडवंज, दरापरा धोलेरा तथा सिद्धक्षेत्र विगेरे स्थळे चतुर्मास करी अनेकभविक श्रावकश्राविकाने प्रति- बोध्या छे, आपे चोमासी, दोढमासी, मासिक, वीशस्थानकनी ओळी, मेरमंडळनी ओळी, कर्मचूरणनी ओळी विगेरे घणी उग्र तपस्याओ करी पोताना आत्मा हित साध्युं छे. आपे गिरनार, आबुजी, केसरीयाजी, शचुंजयजी विगेरे पवित्र तीर्थोनी यात्रा करी पोताना आत्माने निर्मळ बनान्यो छे. आप महाराजश्री हंस विजयजी महाराजना संसारी बहेन साध्वीजीश्री कंकुश्रीजीना गुरुणीजी छो. आवा आपना अनेक गुणोथी आकर्षाइ अमदावादवाळा श्राविका हीराकोरबाइनी प्रेरणाथी आ ग्रन्थ आपसाहेबने सविनय अर्पण करीए छीए, ते खीकारी कृतार्थ करशोजी. ली. सेवक. श्रीहंसविजयजी जैन फ्री लायब्रेरीना सेक्रेटरी, वडोदरा.

प्रस्तावना जैनधर्मना पवित्र सूत्रो अने सिद्धान्तोनो अभ्यास तेना अधिकारीवर्गने आवश्यक छे खरो, पण ते आगमोना सरल, सुंदर अने रसमय भाषांतरवाळा पुस्तकोना अभावे घणो खरो भाग अज्ञान छ; अने उपलक ज्ञानथी खरुं रहस्य समजी के समजावी शकता नथी. जैनधर्ममां तत्त्वोनो अभ्यास कठण छे, ते तत्त्वो विचारपूर्वक समजी तेनुं मनन कर्या पछीज ज्ञाननो काइक प्रकाश थाय छे. छे खरा धार्मिकनाननी बहुज जरुर छे, इंग्रेजी भणता हाइस्कुल अने कोलेजना विद्यार्थीओ के साधारणज्ञानवाळा सर्वेने धार्मिकजान अवश्य होQज जोइए. धार्मिकज्ञानना अभावे समाजमां ज्ञाननो प्रकाश झांखो छे, अने ते माटे सरल, रसमय तत्त्वना ग्रन्थो, ट्रेक्टसो, हिंदी गुजराती इंग्रेजी भाषांतरोनी पूर्ण जरुर आत्मानुं ज्ञान एज खरुं ज्ञान छे, अने मनुष्य जेवी उत्तमोत्तम गतिमां जन्म लीधा पछी आत्मज्ञानना विमुखपणाथी जींदगीनुं शुं सार्थक थशे ? जीवननो पवित्रमा पवित्र आदर्श आत्मज्ञान छे, अने तेनी चालु जमानामां संपूर्ण जरुर छे. तेटलाज माटे तत्त्वना कठण विषयने समाजना उपयोगने माटे सरल, सादो अने आकर्षक बनावी आ मूळग्रन्थ

।
तत्त्वामृत
प्रस्तावना.
॥१॥
पूज्यपाद महाराज श्रीपद्मविजयजीना शिष्य पूज्यपाद महाराज श्रीज्योतिर्विजयजीए विक्रम संवत् १८४५ मां बनान्यो छे.
"तत्त्वामृत" नाम सुंदर अने गुणभाव प्रमाणेज योज्युं छे. कर्ताए एवा सादा अने मोहक श्लोकोमा तत्त्वज्ञान मूक्यु
छे के, खरेखर ते प्रेमथी अभ्यास करनार अभ्यासीने अमृतरसतुंज पान करावे.
उक्त पुस्तकमा टुंका पण सहेलथी समजाय तेवा विधविध विषयोथी वांचनारने आ एकज पुस्तकथी तत्त्वचें सारं ज्ञान
थइ जाय तेवू छे.
आ क्षणभंगुर संसार उपर अनेक जीवात्माओ आधि, व्याधि अने उपाधिना विधविध दुःख-संतापोथी संसारसागरना
तोफानी तरंगोमां मुश्केली अने विपत्तिओथी अथडाय छे, पण संतोप एज परमसुख छे, अने मनुष्यने आनंदतुं कारण छे.
कपाय वडे पामर प्राणी संसारसागरमा डुबकी मार्या करे छे, त्यारे ज्ञान, दर्शन अने उत्तम चारित्रयुक्त जीवन मनुष्यने
मोक्षसुख आपी शके छे, कपायनो विजय एज मनुष्यनी रुडी फत्तेह छे.
तेज आत्मा मोक्षमार्गनो अधिकारी थइ शके छे जे क्रोध उपरज क्रोध करेछे, जे माननुं अभिमान राखेछे,
संगनो त्याग करेछे.
कामदेव मनुष्यने नरकद्वारमा प्रवेश कराववामां सहाय करे छे, पण इंद्रियनिग्रह तेज मनुष्यने कल्पवृक्षनी माफक मनो-
वांछित आपनार छे.
॥१॥

ज्ञान, संयम अने शीळ मनुष्यने सत्यमार्ग दर्शक छे, अने तेमांज आत्मानी उन्नति छे. उपरना अनेक तत्त्वज्ञानना विषयोथी ग्रन्थने सुंदर बनान्यो छे, तत्त्वज्ञानना अभिलाषीने आ ग्रन्थ घणोज रसभर्यो अने सुगम लागशे, जेथी अनेक आत्माओनो उद्धार थशे, अने कर्तानो महान् प्रयत्न सफळ थशे. आ ग्रन्थ छपाववामां बिकानेर निवासी श्रीयुत धर्मात्मा शेठ सुमेरमलजी सुराणाए द्रव्यसहाय करी छे, के जेओ अनेक प्रकारनां आवां धार्मिक कृत्यो करी पोतानी लक्ष्मीनो सद्व्यय करे छे. तेओं पोते चतुर्थव्रतधारी छे, अने देव गुरु धर्म उप- रनी तेमनी श्रद्धा प्रशंसनीय छे. तेमनुं जीवन बीजाओने दृष्टांतरूप नीवडे एम अमो इच्छीए छीए. उपर प्रमाणे सहायता मळवाथी जे लायब्रेरी तरफथी आ ग्रन्थ वहार पड्यो छे तेना दरेक वर्गना लाइफ मेम्बरोने तथा आ ग्रन्थना खपी पूज्य साधु साध्वीओने, अने जाहेर संस्थाओने भेट आपवानुं नक्की ठराव्युं छे. साधारण वर्ग पण पुस्तकनो लाभ लइ शके तेवा हेतुथी तेनी जुज किमत मात्र आठ आना राखवामां आवीछे. जाणीने आनंद थायछे के, आ ग्रन्थने छपावनार श्रीहंसविजयजी जैन फ्री लायब्रेरी (वडोदरा) छे, के जेना तरफथी थोडा वखत अगाउ द्वितीय पुष्प तरीके 'श्रीसवेगद्रुमकंदली' जेवो वैराग्यमय उत्तम ग्रन्थ बहार पडयो छे. आवा छपाइने वहार नही आवेला ग्रन्थोनुं गुजराती भाषामा भाषांतर करी छपाववानी पद्धति खरेखर स्तुत्य छे, अने जो आ प्रमाणे पूर्ण उत्साहथी लायब्रेरी पोतानुं कार्य शरु राखशे तो जैनसाहित्य अने समाजनी घणी सारी सेवा करी शकशे. विशेषमां आवी समाजने माटे सेवा करती धार्मिक संस्थाने दरेक ज्ञानरसिक बंधु मदद करशे एवी अमारी नम्र विनंति छे, के जेथी संस्कृतभाषाथी अने तत्त्वज्ञानथी अजाण व्यक्ति सहेलाइथी वांचननो लाभ थोडा खर्चे लइ शके.

तत्वामृत ग्रन्थनी मूळ नकल भावनगर जैनधर्मप्रसारकसभाना तंत्री श्रीयुत कुंवरजीभाइए आपेल हती, तो तेमनो लायब्रेरी तरफथी उपकार मानवामां आवछे. प्रस्तावना. ॥२॥ काळजी पूर्वक तपास्या छतां ग्रन्थमां भूल रही गइ होय तो वांचकोने सुधारी वांची लेवा विनंति करवामां आवे छे. दरेक व्यक्ति आ ग्रन्थनो लाभ लइ पोतानुं कल्याण करो एवी इच्छा राखवामां आवेछे. अंतमां आवा आवा उपयोगी ग्रन्थो प्रसिद्ध करवा बाबत सूचना करवा माटे परमपूज्य मुनिमहाराज श्रीहंसविजयजी महाराजश्रीनो उपकार मानी विरमीए छीए. ली. फुलचन्द हरिचन्द दोशी सुप्रिन्टेन्डन्ट श्रीयशोविजयजी जैन गुरुकुल, पालीताणा. ता. १. १२. १९१९ ॥२॥ Cin पण्डितश्रीपद्मविजयशिष्य-ज्योतिर्विजयविरचितम्- गुर्जरभाषानुवादसमलङ्कृतम्- तत्त्वामृतम् । इष्टदेवने नमस्काररूप मङ्गलाचरण, तथा ग्रन्थ बनाक्वानुं प्रयोजन विगेरे देवदेवं जिनं नत्वा भवोद्भवविनाशकम् । वक्ष्येऽहं देशनां काञ्चिद् मतिहीनोऽपि भक्तितः॥१॥ संसारे पर्यटन जन्तुबहुयोनिसमाकुले । शारीरं भानसं दुःखं प्राप्नोति बत दारुणम् ॥२॥ आर्तध्यानरतो मूढो न करोत्यात्मनो हितम् । तेनाऽसौ सुमहालेशं परत्रेह च गच्छति ॥ ३॥ देवना पण देव, अने संसारने विषे जन्मादिनो नाश करनार श्रीजिनेश्वरने नमस्कार करीने, हुं बुद्धिहीन छतां पण भक्तिने लीधे कांइक हितोपदेश कहुं हुं ॥१॥ चोराशी लाख जीवायोनिए करीने व्याप्त आ संसारमा भट- कतो प्राणी, शारीरिक अने मानसिक भयंकर दुःखने पामेछे ॥ २ ॥ मूढ पुरुप आर्तध्यानमा रक्त थवाथी आत्मा हित करी शकतो नथी, तेथी ते आ भव अने परभवमा अत्यंत क्लेशने पामेछे ॥३॥ तत्वामृ. १

तच्चामृत
भापान्तर-
सहित.
॥१॥
आत्माने आ लोक अने परलोकमां सुखप्राप्तिना उपायो
ज्ञानभावनया जीवो लभते हितमात्मनः । विनयाचारसम्पन्नो विषयेषु पराङ्मुखः ॥४॥
आत्मानं भावयेन्नित्यं ज्ञानेन विनयेन च। मा पुनर्पियमाणस्य पश्चात्तापो भविष्यति ॥५॥
तथा हि सत्तपः कार्य ज्ञानसद्भावभावितैः । यथा विमलतां याति चेतोरत्नं सुदुर्लभम् ॥ ६॥
नृजन्मनः फलं सारं यदेतज्ज्ञानसेवनम् । अनिहितवीर्यस्य संयमस्य च धारणम् ॥ ७॥
ज्ञान-ध्यानो-पवासैश्च परीषहजयैस्तथा । शील-संयमयोगैश्च खात्मानं भावयेत् सदा ॥८॥
ज्ञानाभ्यासः सदा कार्यों ध्यानेना-ऽध्ययनेन च । तपसो रक्षणं चैव यदीच्छेद्धितमात्मनः॥९॥
विनयाचारे करीने युक्त अने विषयोथी पराङ्मुख थयेलो प्राणी ज्ञाननी भावना वडे आत्माना हितने मेळवे
छे ॥ ४॥ ज्ञान अने विनय बडे करीने निरंतर आत्मचिन्तन करवू जोइए, तेम करवाथी मृत्यु वखते पश्चात्ताप
थतो नथी ॥५॥ ज्ञाननी सद्भावनाथी युक्त थयेला जीवोए अवश्य तेवा प्रकारचें श्रेष्ठ तप करवं जोइए, के
जेथी अत्यंत दुर्लभ चित्तरूपी रत्न निर्मळताने पामे ॥ ६ ॥ मनुष्य जन्मनु श्रेष्ठ फल एज छ के-ज्ञान- सेवन
करवू, अने मन वचन तथा कायानुं वीर्य गोपव्या चिना संयमने धारण करवो ॥७॥ ज्ञान ध्यान अने
उपचास बडे, तथा परीषहना जय वडे-सहन करवा चडे, तेमज शील अने संयमना योगो वडे निरन्तर पोताना
आत्माने भावित-वासित करवो ॥ ८॥ जो मनुष्य पोताना आत्मानुं हित इच्छतो होय तो तेणे निरन्तर शुभ-
ध्यान अने अध्ययन बडे ज्ञाननो अभ्यास करवो, अने तपनुं पण आचरण करवू ॥९॥

ज्ञानादिर्यस्य सूर्यः स्याद् नित्यमुद्द्योतकारकः । तस्य निर्मलतां याति पञ्चेन्द्रियदिगाननम् ॥१०॥ एतद्ध्यानफलं नाम यच्चारित्रोद्यमः सदा। क्रियते पापनिमुक्तैः साधुसेवापरायणैः ॥ ११॥ सर्व द्वन्द्वं परित्यज्य निभृतेनान्तरात्मना । ज्ञानामृतं सदा पेयं चित्तालादनमुत्तमम् ॥ १२॥ ज्ञानं नाम महारत्नं यन्न प्राप्तं कदाचन । संसारे भ्रमता भीमे नानादुःखविधायिनि ॥ १३ ॥ अधुना तत् त्वया प्राप्तं सम्यग्दर्शनसंयुतम् । प्रमादं मा पुनः कार्षीर्विषयावादलालसः॥१४॥ आत्मानं सततं रक्षेद् ज्ञान-ध्यान-तपोवलैः । प्रमा दिनोऽस्य जीवस्य शीलरत्नं विलुप्यते ॥१५॥ जे पुरुषना अन्तःकरणमां निरंतर प्रकाश करनार, ज्ञानादि रूपी सूर्य ऊग्यो छे, तेना पांच इन्द्रियो रूपी दिशा- ओनां मुख निर्मळताने पामेछे ॥ १०॥ ध्यानचें फळ एज छे, के जेथी पाप रहित अने साधुनी सेवामां तत्पर थयेला पुरुषो हमेशां चारित्रनो उद्यम करे ॥ ११ ॥ सर्वे राग-द्वेषादि द्वन्द्वनो त्याग करीने, निश्चल अन्तरात्मा वडे निरन्तर चित्तने आह्लाद करनार, श्रेष्ठ ज्ञानामृतनुं पान करवू ॥ १२ ॥ ज्ञान ए महारत छ, के जे विविध दुःख उत्पन्न करनार आ भयंकर संसारमा भ्रमण करता जीवे कदापि प्राप्त कयु नथी ॥१३॥ हे जीव! ते ज्ञान हमणां तें सम्यग्दर्शन (समकित) सहित प्राप्त कयुं छे, तो हवे फरीथी विपयोना आस्वादमां लंपट थइने, प्रमाद करीश नहीं ॥ १४ ॥ ज्ञान ध्यान अने तपना वल वडे आत्मानुं निरन्तर रक्षण करवानी जरुर छ, केमके आ जीव जो तेमां प्रमाद करेछे तो, तेनुं शीलरूपी रत्न नाश पामे छे ॥१५॥ १

तत्त्वामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥ २॥
शीलरत्नं हृतं यस्य मोहध्वान्तमुपेयुषः । नानादुःखशताकीर्णे नरके पतनं ध्रुवम् ॥ १६ ॥
यावत्स्वास्थ्यं शरीरस्य यावचेन्द्रियसम्पदः । तावद् युक्तं तपः कर्तु वार्धक्ये केवलं श्रमः ॥१७॥
शुद्धे तपसि सदीयं ज्ञानं कर्मपरिक्षये। उपयोगं धनं पात्रे यस्य याति स पण्डितः ॥१८॥
गुरुशुश्रूषया जन्म चित्तं सद्ध्यानचिन्तया । श्रुतं यम-शमे याति विनियोगं स पुण्यभाक् ॥१९॥
छित्त्वा स्नेहमयान् पाशान् भित्त्वा मोहमहार्गलम् । सच्चारित्रसमायुक्ताः शूरा मोक्षपथे स्थिताः २०
मोह रूपी अन्धकारमा फसेला जे पुरुपर्नु शील रूपी रत्न गयुं छे, तेनुं अवश्य विविध प्रकारना सेंकडो दुःखोथी
व्याप्त एवा, नरकमां पतन थायछे ॥ १६ ॥ ज्यां सुधी शरीरनी स्वस्थता छे, अने ज्यां सुधी इन्द्रियोनी सम्पत्ति
(परिपूर्ण प्राप्ति) यथार्थ छे, त्यां सुधी तप करवो योग्य छ, केमके वृद्धावस्थामां तो केवल श्रम ज छे, एटले के-
ते वखते तप थइ शकतो नथी ॥ १७ ॥ जे पुरुषतुं सद्वीर्य शुद्ध तपने विषे उपयोगी थायछे, ज्ञान कर्मनो क्षय
करवामां उपयोगी थायछे, अने जेनुं धन सत्पात्रने विषे उपयोगी थायछे तेज पुरुष पंडित छे एम जाणवू ॥१८॥
जेनो जन्म गुरुनी सेवामा उपयोगी थायछे, जेनुं चित्त उत्तम ध्यानना चितवनमा उपयोगी थायछे, अने जेनुं श्रुत-
ज्ञान नियम अने शमतामां उपयोगी थायछे ते पुरुषने पुण्यशाळी जाणवो ॥ १९॥ शूरवीर पुरुषो स्नेहमय पाशने
अने मोहरूपी मोटी अर्गला (सांकळ) ने भेदीने, उत्तम चारित्र बडे युक्त थइ मोक्षमार्गमा ज प्रवतेला छे ॥२०॥
॥२॥

मोहनीय कर्मनुं प्रावल्य
कर्मणा मोहनीयेन मोहितं सकलं जगत् । धन्या मोहं समुत्सार्य तपस्यन्ति महाधियः ॥२१॥
अहो ! मोहस्य माहात्म्यं विद्वांसो येऽपि मानवाः । मुह्यन्ति तेऽपि संसारे कामा-ऽर्थरतितत्पराः॥
आत्माने संसारमा भ्रमण करावनार अंतरंग शत्रुओ
कामः क्रोधस्तथा लोभो रागो द्वेषश्च मत्सरः। मदो माया तथा मोहः कन्दो दर्प एव च ॥२३॥
एते हि रिपबो घोरा धर्मसर्वस्वधा(हा) रिणः । एतैर्बम्नम्यते जीवः संसारे बहुदुःखदे॥२४॥युग्मम् ।
राग-द्वेषमयो जीवः काम-क्रोधवशं गतः । लोभ-मोह-भदाविष्टः संसारे संसरत्यसौ ॥ २५ ॥
मोहनीय कर्मना उदयथी समग्र जगत् मोह पामेलुं छे, तेमां जे महा बुद्धिमान् पुरुपो मोहनो त्याग करीने तपस्या
करेछे-चारित्र ग्रहण करेछे, तेओ ज धन्य छे ॥ २१ ॥ अहो ! मोहर्नु माहात्म्य, तेनो प्रभाव तो जुओ, के जेथी
विद्वान् मनुष्यो पण आ संसारमा काम अने अर्थनी प्रीति (प्राप्ति) मां तत्पर थइने मोह पामेछे-पडेछे.
॥ २२ ॥ काम (इच्छा), क्रोध, लोभ, राग, द्वेष, मत्सर, मद, माया, मोह, कामदेव, अने अहंकार, आ अग्यार
धर्म रूपी सर्वस्वनुं हरण करनारा भयंकर शत्रुओ छ; अने तेओने वश थइने ज आ जीव, अत्यंत दुःखने आप-
नारा आ संसारमा परिभ्रमण कर्या करेछे ॥ २३-२४ ॥ राग-द्वेपमय थयेलो, काम-क्रोधने वश थयेलो, तथा
लोभ मोह अने मदथी व्याप्त थयेलो आ जीव संसारमा भ्रमण करेछे ॥ २५ ॥

तत्वामृत
भापान्तर-
सहित.
॥३॥
सम्यक्त्वज्ञानसंपन्नो जैनभक्तो जितेन्द्रियः । लोभ-मोह-मदैस्त्यक्तो मोक्षभागी न संशयः ॥२६॥
कामः क्रोधस्तथा मोहस्त्रयोऽप्येते महाद्विषः। एते न निर्जिता यावत्तावत्सौख्यं कुतो नृणाम् ? २७
नास्ति कामसमो व्याधिर्नास्ति मोहसमो रिपुः । नास्ति क्रोधसमो वहिर्नास्ति ज्ञानसमं सुखम् २८
कपायविपयातानां देहिनां नास्ति निवृतिः । तेषां च विरमे सौख्यं जायते परमाद्भुतम् ॥ २९॥
कपाय-विपयै रोगैरात्मानं पीडितं सदा । चिकित्सतां प्रयत्नेन जिनवाक्सारभेषजैः ॥३०॥
विषयोरगदष्टस्य कषायविषमोहिनः । संयमो हि महामन्त्रस्त्राता सर्वत्र देहिनः ॥ ३१ ॥
जे प्राणी सम्यक् प्रकारना ज्ञाने करीने सहित होय, जिनदेवनी भक्तिमां तत्पर होय, इन्द्रियोनो जय करनार होय,
तथा लोभ मोह अने मद वडे रहित होय ते मोक्षने भजनार-पामनार थाय छे, तेमां कांइ पण संशय नथी ॥२६॥
काम क्रोध अने मोह, ए त्रणे आ प्राणीना मोटा शत्रुओ छे. ज्यां सुधी ए शत्रुओ जीताया नथी त्यां सुधी
मनुष्यने सुख क्याथी मळे ? ॥ २७ ॥ काम समान बीजो कोइ व्याधि नथी, मोह समान बीजो कोइ शत्रु
नथी, क्रोध समान बीजो कोइ अग्नि नथी, अने ज्ञान समान बीजं कांइ सुख नथी ॥ २८ ।। कषाय अने विष-
यथी पीडाता प्राणीओने जरा पण सुख नथी, पण जो ते कषायनी विरति (अभाव) थाय तो अत्यंत अद्भुत
सुख प्राप्त थाय ॥ २९ ॥ कपाय अने विषय रूपी रोगो वडे पीडाता आत्मानी निरन्तर यत्नपूर्वक जिनेश्वरनी
वाणीरूप उत्तम औषध वडे चिकित्सा करवी जोइए ॥ ३० ॥ विषय रूपी सर्पथी डसाएला अने कषायरूपी
विषथी मूर्छा पामेला प्राणीनुं संयमरूपी महामन्त्र ज सर्वत्र रक्षण करेछे ॥ ३१॥

कषायकलुपो जीवो रागरजितमानसः । चतुर्गतिभवाम्भोधौ भिन्ननौरिव सीदति ॥ ३२॥
कपायवशगो जीवः कर्म बध्नाति दारुणम् । तेनासौ क्लेशमामोति भवकोटिषु दुस्तरम् ॥३३॥
कपाय-विषयश्चित्तं मिथ्यात्वेन च संयुतम् । संसारवीजतां याति न याति मोक्षबीजताम् ॥ ३४॥
कषायविजये सौख्यमिन्द्रियाणां च निग्रहे । जायते परमोत्कृष्टमात्मनो भवभेदि यत् ॥ ३५॥
कषायान् शत्रुवत् पश्येद् विषयान् विषवत्तथा । मोहं च परमं व्याधिमेवमूचुर्विचक्षणाः ॥३६॥
कषाय-विषयैश्चौरैर्धर्मरत्नं विलुप्यते । वैराग्यखगधाराभिः शूराः कुर्वन्ति रक्षणम् ॥ ३७॥
जे जीव कपायो बडे मलीन थयेलो होय अने जेनुं मन राग बडे रंगायेलं होय ते जीव, जेनुं वहाण
भांगी गयुं होय एवा पुरुपनी जेम, आ चार गतिवाळा संसाररूपी समुद्रने विपे सीदाय छे ॥ ३२॥ कपायने
वश थयेलो जीव भयंकर कर्मने बांधे छे, अने तेथी ते करोडो जन्मने विषे अपार क्लेशने पामे छे ॥३३॥
कपाय विषय अने मिथ्याल बडे संयुक्त थयेलं चित्त संसारनुं कारण बनेछे, पण मोक्षनुं कारण कदि थतुं नथी
॥ ३४ ॥ कपायनो विजय करवाथी अने इन्द्रियोनो निग्रह करवाथी जीवने संसारनो नाश करनारं अत्यंत उत्कृष्ट
सुख प्राप्त थायछे ।। ३५ ॥ पंडितो कहेछे के-कपायोने शत्रुनी जेवा जाणवा, विषयोने विष जेवा जाणवा,
अने मोहने महाव्याधि जेवो जाणवो ॥ ३६ ।। कपाय अने विषयो रूपी चोरो धर्मरूपी रत्नने लूटी ले छे, तेनुं शूर-
वीरो वैराग्यरूपी खड्गानी धारा वडे रक्षण करेछे ॥ ३७॥

तत्त्वामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥४॥
समकितनी श्रेष्ठिता, अने तेने सेववानो उपदेश
कपायकर्षणं कृत्वा विषयाणामसेवनम् । एतद्धि मानवाः! पथ्यं सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ॥ ३८॥
कपायातपतप्तानां विषयामयमोहिनाम् । संयोगाऽयोगखिन्नानां सम्यक्त्वं परमं हितम् ॥ ३९ ॥
वरं नरकवासोऽपि सम्यक्त्वेन समायुतः। न तु सम्यक्त्वहीनस्य निवासो दिवि राजते ॥ ४०॥
सम्यक्त्वेन हि युक्तस्य ध्रुवं निर्वाणसङ्गमः । मिथ्यादृशोऽस्य जीवस्य संसारे भ्रमणं सदा ॥ ४१॥
सम्यक्त्वं परमं रत्नं शङ्कादिमलवर्जितम् । संसारदुःखदारियं नाशयेत् सुविनिश्चितम् ॥ ४२ ॥
पण्डितोऽसौ विनीतोऽसौ धर्मज्ञः प्रियदर्शनः। यः सदाचारसम्पन्नः सम्यक्त्वदृढमानसः ॥४३॥
हे मनुष्यो ! कपायोनुं कर्पण एटले नाश अने विषयोनो त्याग करीने खरेखरा पथ्यरूप उत्तम सम्यग्दर्शनुं तमे
पालन करो॥३८॥ कपाय रूपी ताप वडे तपेला, विषयो रूपी रोगो वडे पीडायेला, तथा संयोग अने वियोग वडे
पामेला जीवोने एक सम्यक्स (रूप पथ्य) ज उत्कृष्ट हितकारक छे ॥३९॥ सम्यक्ल सहित नरकमां पण वसवू सारुं छे,
परंतु सम्यक्त्व रहित वर्गमा वसवू शोभतुं नथी-सारं नथी ।॥ ४० ॥ जे जीव सम्यक्स सहित होयछे ते जीवने
अवश्य मोक्षनी प्राप्ति थायछे, परंतु जे जीव मिथ्यादृष्टि होयछे तेने तो निरंतर संसारमा भ्रमण करवानुं ज छे
॥४१॥ जेनी पासे शंकादि मेल रहित श्रेष्ठ समकितरूपी रत्न होय छे, ते अवश्य संसारनां दुःखरूपी दारियनो
नाश करी शकेछे ॥ ४२ ॥ जे सदाचार बड़े युक्त छे, अने जेनुं मन समकितमां दृढ छे, ते ज पंडित छे, ते ज
विनयवंत छे, तेज धर्मनो जाणकार छ, अने तेनुं ज दर्शन लोकोने प्रिय होय छे ॥४३॥
॥४॥

जरा-मरणरोगाणां सम्यक्त्व-ज्ञानभेषजैः। शमनं कुरुते यस्तु स वै वैद्योऽभिधीयते ॥४४॥
जन्मान्तरार्जितं कर्म सम्यक्त्व-ज्ञान-संयमैः । निराकर्तु सदा युक्तमपूर्वस्य निरोधनम् ॥ ४५ ॥
सम्यक्त्वं भावयेत् क्षिप्रं सज्ञानं चरणं तथा । कृच्छ्रात् सुचरितं प्राप्तं नृत्वं याति निरर्थकम् ॥४६॥
अतीतेनापि कालेन यन्न प्राप्तं कदाचन । तदिदानीं त्वया प्राप्तं सम्यग्दर्शनमुत्तमम् ॥४७॥
उत्तमे जन्मनि प्राप्ते चारित्रं कुरु यत्नतः । सद्धर्मे च परां भक्तिं शमे च परमां रतिम् ॥४८॥
अनादिकालं जीवेन प्राप्तं दुःखं पुनः पुनः । मिथ्यामोहपरीतेन कषायवशवर्तिना ॥४९॥
जे सम्यक्ख अने ज्ञानरूपी औषध वडे जन्म जरा अने मरणादि रोगोनी शांति करेछे, तेज साचो वैद्य कहेवाय
छे ॥४४॥ सम्यक्ष ज्ञान अने संयमे करीने जन्मांतरमा उपार्जन करेला कर्मनो नाश करवो योग्य छे, अने नवां बंधातां
कर्मनो निरोध करवो योग्य छे ॥ ४५ ॥ आत्माने विपे शीघ्रपणे सम्यक्खनी भावना करवी, तथा
ज्ञान सहित चारित्रनी भावना करवी, कारण के-महाकष्टथी प्राप्त थयेलो आ मनुष्य जन्म ते त्रण विना
निरर्थक चाल्यो जायछे. तेथी मनुष्यपणाने समकितादि विना निष्फळ जवा देवू नहीं ॥ ४६॥ हे जीव ! अनंता
अतीत (गयेला) काळे करीने पण ते जे कदापि प्राप्त कर्यु नथी ते उत्तम समकित तने आज प्राप्त थयुं छे ॥४७॥
तुं उत्तम कुळमां जन्म पाम्यो छे, तो यत्नथी चारित्र अंगीकार कर, उत्तम धर्ममां अत्यंत भक्ति धारण कर, अने
उपशमने विषे उत्कृष्ट नीति धारण कर ॥४८॥ मिथ्या मोहथी वीटायेला अने कपायने वश थयेला आ जीवे
अनादि काळथी वारंवार दुःख ज प्राप्त कयु छे ॥ ४९॥

तच्चामृत
भापान्तर-
सहित.
॥५॥
सम्यक्त्वादित्यसंभिन्नं कर्मध्वान्तं विनश्यति । आसन्नभव्यसत्त्वानां काललब्ध्यादिसन्निधौ ॥५०॥
सम्यक्त्वभावशुद्धेन विषयोसङ्गवर्जिना । कषायविरतेनैव
भवदुःखं विहन्यते ॥ ५१ ॥
संसारध्वंसनं प्राप्य सम्पनुष्य ताशयन्ति ये । वमन्ति तेऽमृतं पीत्वा सर्वव्याधिहरं पुनः ।। ५२॥
पथ्यात्वनी दुष्टता, तेने त्यागवानो उपदेश
मिथ्यात्वं परमं बीजं संसारस्य दुरात्मनः । तस्मात्तदेव मोक्तव्यं मोक्षसौख्यं जिघृक्षुणा ॥ ५३॥
आत्मतत्त्वं न जानन्ति मिथ्यामोहेन मोहिताः । मनुजा येन मानस्था विप्रलब्धाः कुशासनैः॥५४॥
उदयकाळनी प्राप्ति बिगेरे सामग्री नजीक आवेछे त्यारे, आसन्नभवी जीवोनु, समकितरूपी सूर्ये भेदेलं कर्म रूपी
अंधारु नाश पामेछे ॥५०॥जे जीच समकितना सद्भावथी शुद्ध थयो होय, विपयोने विपे आसक्ति रहित थयो होय,
तथा कपायोनो जेणे नाश कर्यो होय, तेज आ संसारनां दुःखो हणी शकेछे ॥५१॥जेओ संसारनो नाश करनारुं समकित
पामीने पाछो तेनो (समकितनी) नाश करेछे-तेथी भ्रष्ट थायछे, ते मूढ पुरुषो सर्व व्याधिने नाश करनार अमृतनुं
पान करीने पाछु तेने वमी नांखेछ एम जाणवू ॥ ५२ ॥ दुष्टस्वरूपवाळा संसारनुं मूळ बीज मिथ्याखज छे, तेथी
मोक्ष सुख प्राप्त करवाने इच्छनार पुरुपे ते मिथ्यालनोज त्याग करवो जोइए ॥ ५३ ॥ खोटा मोहे करीने मोह
पामेला अने तेथी करीने ज अभिमानने पामेला मनुष्यो आत्मतत्त्व जाणी शकता नथी, कारण के-तेओ कुशास्त्रने
माननारा मिथ्यादृष्टिओ बडे ठगाया छे ॥ ५४॥
॥५॥

दुःखाच भीरवोऽप्येते सुधर्म नहि कुर्वते । कर्मणा मोहनीयेन मोहिता बहवो जनाः ॥ ५५॥
कथं न रमते चित्तं धर्मेऽनेकसुखप्रदे । जीवानां दुःखभीरूणां प्रायो मिथ्यादृशो यतः ॥ ५६ ॥
दुःखं न शक्यते सोढुं पूर्वकर्मार्जितं नरैः। तस्मात् कुरुत सद्धर्म येन तत्कर्म नश्यति ॥१७॥
धर्म करवानो उपदेश
सुकृतं तु भवेद् यस्य तेन यान्ति परिक्षयम् । दुःखोत्पादनभूतानि दुष्कर्माणि समन्ततः ॥ ५८ ॥
धर्म एव सदा कार्यो मुक्त्वा व्यापारमन्यतः । यः करोति परं सौख्यं यावन्निर्वाणसङ्गमम् ॥१९॥
क्षणे हि समतिक्रान्ते सद्धर्मपरिवर्जिते । आत्मानं मुषितं मन्ये कषायेन्द्रियतस्करैः ॥ ६०॥
दुःखथी भय पाम्या छतां आषणा लोको मोहनीय कर्म वडे मोह पामेला होवाथी सद्धर्म करीशकता नथी।।५५||
दुःखथी वीकण होवा छतां पण घणा जीवोनुं चित्त, अनेक सुख आपनार धर्ममां कोइ पण प्रकारे आनंद पामतुं
नथी, कारण के तेओ प्राये मिथ्यादृष्टि होयछे।।५६।।पूर्वना कर्मोथी उपार्जन करेलं दुःख मनुष्यो सहन करी शकता
नथी, तेथी हे भव्यो । तमे सद्धर्मर्नु सेवन करो, के जेथी ते दुःखदायी कोनो नाश थाय॥५॥जे पुरुषे सुकृत कयु
होय, ते पुरुषने ते सुकृत वडे दुःखने उत्पन्न करनार दुष्कर्मो चोतरफथी क्षय पामेछे ॥५८॥ अन्य व्यापारने छोडीने
निरंतर धर्म ज करवो जोइए, के जे धर्म यावद् मोक्ष पदवी प्राप्ति स्वरूप उत्कृष्ट सुख करे छे ॥ ५९॥ जो एक क्षण
पण सद्धमें कयाँ विना व्यतीत थाय, तो कपाय अने इन्द्रियो रूपी चोरोए आत्माने लूट्यो छे एम हुं मानुंछु ॥६०॥

तच्चामृत
भाषान्तर-
सहित.
धर्मकार्य मतिस्तावदु यावदायुदृढं तव । आयुःकर्मणि संक्षीणे पश्चात्त्वं किं करिष्यसि ? ॥ ६१ ॥
धर्ममाचर यत्नेन मा भव त्वं मृतोपमः । सद्धर्मचेतसां पुंसां जीवितं सफलं भवेत् ॥ ६२॥
मृता नैव मृतास्तेऽत्र ये नरा धर्मकारिणः । जीवन्तोऽपि मृतास्ते वै ये नराः पापकारिणः ॥६॥
धर्मामृतं सदा पेयं दुःखातङ्कविनाशनम् । यस्मिन् पीते परं सौख्यं जीवानां जायते सदा ॥ ६४॥
स धर्मो यो दयायुक्तः सर्वप्राणिहितप्रदः । स एवोत्तारणे शक्तो भवाम्भोधेः सुदुस्तरात् ॥६५॥
यदा कण्ठगतप्राणो जीवोऽसौ परिवर्तते । नाऽन्यः कश्चित्तदा त्राता मुक्त्वा धर्म जिनोदितम् ६६
हे जीव ! ज्यां सुधी तारुं आयुष्य दृढ छे, त्यां सुधी तने धर्मकार्यमां मति थइ शकशे; परंतु ज्यारे आयुष्यकर्मनो
क्षय थशे सारे तुं शुं करीश ? कांइ पण करी शकीश नहीं, माटे प्रथमथी ज धर्ममां मति राख ॥ ६१ ॥
हे चेतन ! तुं यत्न वडे धर्मर्नु आचरण कर, मरेला जेवो न था; कारण के-जेनुं चित्त सद्धर्ममां तत्पर होय,
तेज पुरुषोनुं जीवित सफल छे ।। ६२ ॥ जे पुरुषो धर्म करेछे-सेवेछे तेओ आ जगत्मा मरेला होय तो पण तेमने
मरेला न जाणवा-जीवता ज जाणवा. अने जे मनुष्यो पापकर्मने करनारा छे ते जीवता छतां मरेला जेवा छे ॥६३।।
दुःख अने व्याधिनो नाश करनार धर्मरूपी अमृतनुं निरंतर पान करवू जोइए. तेनुं पान करवाथी जीवोने निरंतर
उत्कृष्ट सुख प्राप्त थायछे ॥६४॥ जे धर्म दया वडे युक्त होय, तथा जे सर्वप्राणीओने हितकर होय ते ज धर्म कहेवाय
छे, अने तेज धर्म दुस्तर संसार समुद्रथी तारवा शक्तिमान छ । ६५ ॥ ज्यारे आ जीवना प्राणो कंठमां आवेछे-
मरवानी तैयारीमां होय छे, त्यारे एक जिनेश्वरे कहेला धर्म विना वीजुं कोइ तेनुं रक्षण करी शकतुं नथी ॥६६॥

अल्पायुषा नरेणेह धर्मकर्माऽविजानता । न ज्ञायते कदा मृत्युभविष्यति न संशयः ॥१७॥ आयुष्यनी अनित्यता आयुर्यस्यापि दैवज्ञैः परिज्ञाते हि जातके । तस्यापि.क्षीयते सद्यो निमित्तान्तरसङ्गतः ॥ ६८॥ जिनेन्द्र प्ररूपित धर्मथी सुखनी प्राप्ति, अने दुःखनो विनाश जिनैर्निगदितं धर्म सर्वसौख्यमहानिधि । ये न तत्प्रतिपद्यन्ते तेषां जन्म निरर्थकम् ॥ ६९॥ हितं कर्म परित्यज्य पापकर्मसु रज्यते । तेन वै दह्यते चेतः शोचनीयो भविष्यति ॥७०॥ अल्प आयुष्यवाळो अने धर्मकमैने नहीं जाणनार मनुष्य पोतार्नु मरण क्यारे आवशे ? ए जाणी शकतो नथी, तेमां कांइ पण संशय नथी ॥६७ ॥ जन्म मरण जणावनारा ज्योतिष ग्रन्थने अनुसारे कदाच दैवज्ञोए कोइनुं आयुष्य जाण्यु होय, तथापि तेनुं आयुष्य पण अन्य निमित्तना योगथी तत्काळ क्षीण थायछे ॥६८॥ जिनेश्वरोए सर्व सुखना मोटा निधिसमान धर्म कहेलो छ, ते धर्मने जेओ अंगीकार करता नथी, तेमनो जन्म निरर्थक छे ॥६९॥ जे प्राणी हितकारक धर्मकर्मनो त्याग करी पापकार्यमां आसक्त थायछे, तेनुं चित्त ते पापकार्य वडे बळेछे, अने तेथी ते शोक करवा लायक थायछे ॥ ७० ॥ १ धर्मशब्दो नपुंसकेऽप्यस्ति ।

तत्चामृत
भापान्तर-
सहित.
॥ ७॥
यदि नामाऽप्रियं दुःखं सुखं च यदि वा प्रियम् । ततः कुरुत सद्धर्म जिनानां जितजन्मनाम् ॥७॥
विशुद्धादेव सङ्कल्पाद् धर्मः सद्भिपाय॑ते । खल्पेनैव प्रयासेन चित्रमेतदहो! परम् ॥७२॥
धर्म एव सदा त्राता जीवानां दुःखसङ्कटात् । तस्मात् कुरुत भो यत्नं तत्राऽनन्तसुखप्रदे ॥७३ ॥
यत्त्वया न कृतो धर्मः सदा मोक्षसुखावहः । प्रसन्नमनसा येन तेन दुःखी भवानिह ॥७४ ॥
यत्त्वया क्रियते कर्म विषयान्धेन दारुणम् । उदये तस्य संप्राप्ते कस्ते त्राता भविष्यति ? ॥७५ ॥
भोगथी अतृप्ति, तेने त्याग करवानो उपदेश
भुक्त्वाऽप्यनन्तशो भोगान् देवलोके यथेप्सितान् । यो हि तृप्तिं न संप्राप्तःसकिं प्राप्स्यति सांप्रतम्॥
जो तमने दुःख अप्रिय लागतुं होय, अने सुख प्रिय लागतुं होय, तो जन्म-जराने जीतनारा जिनेश्वरना सद्धर्मने
आदरो ॥ ७१ ॥ अहो! आ मोडं आश्चर्य छे के-सत्पुरुषो अल्प प्रयास बडेज विशुद्ध भावनाथी धर्म उपार्जन
करे छे ॥ ७२ ॥ जीवोने निरंतर दुःखना संकटथी रक्षण करनार एक धर्म ज छे, तेथी हे भव्यप्राणीओ! अनंत
सुख आपनारा ते धर्मने विपेज यत्न करो ॥७३॥ हे जीव ! तें प्रथम निरंतर मोक्षना सुखने वहन करनार धर्म
प्रसन्न चित्ते को नहीं तेथी ज तुं आ जन्ममा दुःखी छे ॥ ७४ ॥ विषयमा अंध थयेलो तुं जे दारुण (भयंकर)
कर्म करेछे, तेनो उदय आवशे त्यारे तारो रक्षण करनार कोण थशे ॥७५॥ स्वर्गमा इच्छा प्रमाणे अनंतवार भोगो
भोगव्या छतां पण जे जीव तृप्ति पाम्यो नहीं, ते जीव आ तुच्छ मनुष्यभवमां शी रीते तृप्ति पामशे? ॥ ७६ ॥
॥७॥

1
बरं हालाहलं भुक्तं विषं तद्भवनाशनम् । न तु भोगविषं भुक्तमनन्तभवदुःखदम् ॥ ७७ ॥
इन्द्रियोने काबुमा राखवानो उपदेश
इन्द्रियप्रभवं सौख्यं सुखाभासं न तत्सुखम् । तच कर्मविवन्धाय दुःखदानकपण्डितम् ॥७८॥
अक्षाश्वान् निश्चलान् धत्व विषयोत्पथगामिनः । वैराग्यप्रग्रहाकृष्टान् सन्मार्गे विनियोजय ॥७९॥
अक्षाण्येव स्वकीयानि शत्रवो दुःखहेतवः । विषयेषु प्रवृत्तानि कषायवशवर्तिनः ॥ ८० ॥
इन्द्रियाणां यदा छन्दे वर्तते मोहसङ्गतः। तदात्मैव भवेच्छत्रुरात्मनो दुःखबन्धकः ॥ ८१॥
ते एकज भवनो नाश करनारं हालाहल विप खावू सारुं छे, परंतु अनंत भवने विपे दुःख आपनार भोग रूपी
विप खावं सारं नथी ॥ ७७॥ इंद्रियोथी उत्पन्न थतुं सुख ए सुखना आभास रूप ज छे, पण तात्विक सुख नथी.
वळी ते सुख कर्मना बंधनने माटे छे, अने दुःख देवामां ते महाकुशळ छे ।। ७८ ॥ हे जीव ! विपयरूपी उन्मार्गे
जनारा इंद्रियो रूपी अश्वोने वैराग्यरूपी लगाम वडे खेंचीने निश्चल कर, अने सन्मार्गे प्रवर्ताव ॥ ७९ ॥ कपायने वश
थयेला प्राणीने विषयोमा प्रवर्तेली पोतानी इन्द्रियो ज दुःखदायी शत्रुओ छे ॥ ८० ॥ ज्यारे आ जीव मोह पामीने
इन्द्रियोनी इच्छा प्रमाणे वर्ते छे-इन्द्रियोने छूटी मूके छे, त्यारे आत्मा पोते ज पोताना दुःख बंधन करनार शत्रुरूप
थायछे ॥ ८१॥

तत्त्वामृत भाषान्तर- सहित. ॥८॥ इन्द्रियाणि प्रवर्तन्ते विषयेषु निरन्तरम् । सज्ज्ञानभावनासक्ता वारयन्ति हि ते रताः ॥ ८२॥ इन्द्रियेच्छारुजामज्ञः कुरुते यो धपक्रमम् । तमेव मन्यते सौख्यं किं नु कष्टमतः परम् ॥ ८३ ॥ आत्माभिलाषरागाणां यः श्रमः क्रियते बुधैः । तदेव परमं तत्त्वमित्यूचुर्ब्रह्मवेदिनः ॥ ८४ ॥ इन्द्रियाणां शमेनाऽलं राग-द्वेषजयेन च । आत्मानं योजयेत् सम्यक संमृतिच्छेदकारणम् ॥ ८५॥ इन्द्रियाणि वशे यस्य यस्य दुष्टं न मानसम् । आत्मा धर्मरतो यस्य सफलं तस्य जीवितम् ॥८६॥ इन्द्रियो निरंतर विपयोमा प्रवर्तली ज होयछे, परंतु जेओ आत्मानुं हित करवामां तत्पर होय छे, तेओ ज सत्यज्ञाननी भावनामां आसक्त थइ ते इन्द्रियोने विषयो थकी निवर्तन करेछे ॥ ८२ ॥ जे मूर्ख माणस इन्द्रियोनी इच्छा रूपी रोगमां अजीर्णनी वृद्धि करेछे, अने तेने ज सुख माने छे, तेथी बीजं कष्ट शुं कहेवाय ? ॥८३ ॥ पंडितो आत्मानी (आत्मज्ञाननी) अभिलाषाना रागने विषे जे काइ श्रम करेछे ते ज उत्कृष्ट तत्त्व छ, एम ब्रह्मज्ञानीओ कहेछे ॥ ८४ ॥ इन्द्रियोनो अत्यंत उपशम करीने तथा राग द्वेपनो जय करीने, आत्माने संसारनो नाश करवामां कारणरूप एवा ज्ञानादिक प्रत्ये सारी रीते जोडवो जोइए ॥ ८५ ॥ जेने इन्द्रियो वश छे, जेनुं मन दुष्ट- दोपवाळु नथी, अने जेनो आत्मा धर्ममां तत्पर-मन छे, तेनुं जीवित सफळ छ । ८६ ॥ ॥८॥ १ श्रमद्वारा आत्मज्ञान मेळवे छे तेज परमतत्त्व छ ।

जगत्मां सत्पुरुषो कोण ? परनिन्दासु ये मूका निजश्लाघापराङ्मुखाः । ईदृशैर्ये गुणैर्युक्ताः पूज्याः सर्वत्र विष्टपे ॥ ८७ ॥ प्राणनाशेऽपि संप्राप्ते वर्जनीयानि साधुना । परलोकविरुद्धानि येनात्मा सुखमश्रुते ।। ८८॥ संमानयति भूतानि यः सदा विनयान्वितः। स प्रियः सर्वलोकेऽस्मिन् नापमानं समश्नते ॥ ८९॥ विपयोना त्यागनो उपदेश किम्पाकस्य फलं भक्ष्यं कदाचिदपि धीमता । विषयास्तु न भोक्तव्या यद्यपि स्युःसुपेशलाः॥१०॥ जेओ परनी निंदा करवामां मूंगा छ, अने पोतानी प्रशंसा करचाथी विमुख छ, जेओ आवा (उपर कहेला) गुणोथी युक्त छे तेओ जण जगतमा पूजनीय छे ॥ ८७ ॥ सत्पुरुपे प्राणनो नाश प्राप्त थाय तो पण परलोक- विरुद्ध कार्यों अवश्य वर्जवां जोइए, के जेथी आत्मा सुख पामे ॥ ८८ ॥ जे पुरुष सर्वदा विनयवडे युक्त थइने सर्वप्राणीओ सन्मान-पालन करेछे ते सर्वलोकने प्रिय थायछे, अने कदापि अपमान पामतो नथी ।। ८९ ॥ बुद्धिमान् पुरुष कदाच किंपाकचें फळ खावु पडे तो खा, परंतु विषयो जो के मनोहर-सुंदर लागता होय तो पण कदापि सेववा नहीं ॥ ९०॥ - १ किंपाक फळथी एक ज मरण थाय छे, त्यारे विपयोथी अनेक थाय छे ।

तच्चामृत
स्त्रीणां सम्पर्क सौख्यं वर्णयन्त्यबुधा जनाः । विचार्यमाणमेतद्वि दुःखानां बीजमुत्तमम् ॥९१॥
भाषान्तर-
सहित.
कामनी विडम्बना
॥९॥
स्मराग्निना प्रदग्धानि शरीराणि शरीरिभिः। शमाम्भसा घसिक्तानि निर्वृत्तिं नैव भेजिरे ॥१२॥
अग्निना तु प्रदग्धानां शमोऽस्तीति यतोऽत्र वै । स्मरवहिपदग्धानां शमोनास्ति भवेष्वपि ॥ ९३ ॥
मदनोऽस्ति महाव्याधिदुश्चिकित्स्यः सदा बुधैः। संसारवर्धनोऽत्यर्थ दुःखोत्पादनतत्परः ॥ ९४ ॥
यावद्यस्य हि कामाग्निर्हदये प्रज्वलत्यलम् । आश्रयन्ति हि कर्माणि तावत्तस्य निरन्तरम् ॥ ९५॥
अज्ञानी माणसो 'स्त्रीओना स्पर्शथी सुख थाय छ' एम वर्णवे छे, परंतु तेनो बरावर विचार को होय तो
निश्चय थाय के-ए सुख सर्व दुःखोर्नु उत्तम-अद्वितीय कारण छे ॥ ९१ ॥ जो मनुष्यो कामाग्निथी वळेलां पोतानां
शरीरोने शमता रूप जळ बडे सिंचन नहीं करे, तो तेओ कदापि निवृति-सुख पामवाना नथी ॥ ९२ ॥ आ
जगत्मां अग्निथी बळेला घर विगेरेनुं शमन थइ शके छे, परंतु कामरूपी अग्निथी बळेला जीवोनुं शमन अनेक जन्मो
सुधी थइ शकतुं नथी ॥९३ ॥ संसारने अत्यंत वृद्धि पमाडनार अने दुःख आपवामां ज तत्पर एवो काम ज
महाव्याधि छे के, जेनी पंडितो पण चिकित्सा करी शकता नथी ॥ ९४ ॥ ज्यां सुधी जेना हृदयमां कामरूपी
अग्नि अत्यंत प्रज्वलित छे, त्यां सुधी निरंतर कर्मों तेनो आश्रय करे छे-कमनो बंध थया करेछे ॥ ९५॥
॥९॥

कामाहिदृढदष्टस्य तीव्रा भवति वेदना । यया सुमोहितो जन्तुः संसारे परिवतते ॥ ९६ ।।
दुःखानामाकरो यस्तु संसारस्य च वर्धनः । स एष मदनो नाम नराणां स्मृतिसूदनः ॥ ९७ ॥
सङ्कल्पाण्डात् समुद्भूतः कामसोऽतिदारुणः। राग-द्वेषद्विजिह्वोऽसौ वशीकर्तुं न शक्यते ॥१८॥
दुष्टा चेयमनङ्गेच्छा सेयं संसारबर्द्धनी । दुःखस्योत्पादने शक्ता शक्ता वित्तस्य नाशने ॥ ९९ ॥
अहो! ते धिषणाहीना ये स्मरस्य वशं गताः । कृत्वा कल्मषमात्मानं पातयन्ति भवार्णवे ॥१०॥
स्मरेणाऽतीवरौद्रेण नरकावर्तपातिना। अहो! खलीकृतो लोको धर्मामृतपराङ्मुखः ॥ १०१॥
कामरूपी सर्प बडे दृढ रीते डसाएला जीवने एटली वधी तीव्र वेदना थायछे के, जे वेदनाथी अत्यंत मूर्छा पामेलो
ते जीव वारंवार संसारमा परिभ्रमण कर्यां करे छे ॥ ९६ ॥ जे सर्वदुःखोनी खाण रूप छे, अने जे संसारनी वृद्धि
करनार छे, ते मनुष्योनी स्मृतिनो नाश करनार आ कामदेव ज छे, वीजी कोइ नथी॥९७॥ मनना संकल्प-विकल्प
रूपी इंडामांथी उत्पन्न थयेला, राग अने द्वेष रूपी वे जिह्वाबाळा अतिभयंकर कामरूपी सर्पने वश करवो अशक्य छे
॥९८॥ आ कामदेवनी इच्छा अति दुष्ट छे, ते संसारने बधारनारी छे, दुःख उत्पन्न करवामां शक्तिमान् छे, अने
धननो नाश करवाने समर्थ छे ।। ९९ ।। अहो ! जेओ कामदेवने आधीन थयेला छे तेओ बुद्धि रहित ज छे-मूर्ख ज
छे, केमके तेओ पापकर्म करीने पोताना आत्माने संसारसमुद्रमा नाखे छ । १०० ॥ अहो! नरकरूपी खाडामा
नाखनारा अतिक्रूर कामदेवे धर्मरूपी अमृतथी पराङ्मुख थयेला लोकने तुच्छ-हलको करी नाख्यो छे ॥१०१॥

तत्त्वामृत
भापान्तर-
सहित.
॥१०॥
स्मरेण स्मरणादेव वैरं दैवनियोगतः । हृदये निहितं शल्यं प्राणिनां तापकारकम् ॥ १०२ ॥
तस्मात् कुरुत सद्वृत्तं जिनमार्गरताः सदा । येन शतखण्डशो याति स्मरशल्यं सुदुर्धरम् ॥१०३ ॥
चित्तसंदूषणः कामस्तथा सद्गतिनाशनः । सद्त्तध्वंसनश्चासौ कामोऽनर्थपरम्परा ॥ १०४॥
दोपाणामाकरः कामो गुणानां च विनाशकृत् । पापस्य च निजो बन्धुरापदां चैव सङ्गमः ॥१०५॥
पिशाचेनैव कामेन च्छलितं सकलं जगत् । बम्भ्रमीति परायत्तं भवाब्धौ तन्निरन्तरम् ॥ १०६ ॥
वैराग्यभावनामन्त्रस्तं निवार्य महाबलम् । खच्छन्दवृत्तयो धीराः सिद्धिसौख्यं प्रपेदिरे ॥१०७ ॥
दैवना नियोगथी कामदेवे मात्र सरण करवाथी ज प्राणीओना हृदयमां संताप करनारुं वैररूपी शल्य स्थापन
कयुछे ॥ १०२ ॥ तेथी हे भव्यो! तमे निरंतर जिनमार्गमा आसक्त थइने सदाचारनुं सेवन करो, के जेथी दुःखे
करीने दूर करी शकाय एवं ते कामरूपी शल्य सेंकडो ककडा थइ नाश पामे ॥ १०३॥ काम चित्तने दूषित करेछे,
सद्गतिनो नाश करेछे, सदाचारनो नाश करे छे, तथा अनर्थनी परंपरा रूप छे ॥ १०४ ॥ काम सर्वदोपोनी
खाण छे, गुणोनो विनाश करनार छे, पापनो बंधु छे, अने आपत्तिओनो मित्र छे ॥१०५॥ कामदेवरूपी पिशाचे
ज आ समग्र जगत् छळ्युं छे, तेथी आ जगत् पराधीनपणे निरंतर संसारसमुद्रमा भ्रमण को करेछे ॥ १०६ ॥
ते महा वळवान् कामरूपी पिशाचनो वैराग्यनी भावना रूप मंत्र वडे विनाश करीने स्वतंत्र वृत्तिवाळा धीर
पुरुषो सिद्धिसुखने पाम्या छे ॥ १०७ ॥
॥१०॥

कामी त्यजति सद्वृत्तं गुरोर्वाणी हियं तथा । गुणानां समुदायं च चेतःस्वास्थ्यं तथैव च ॥ १०८ ॥
तस्मात् कामः सदा हेयो मोक्षसौख्यं जिघृक्षुभिः। संसारं च परित्यक्तुं वाञ्छद्भिर्यतिसत्तमैः १०९
कामाथी वैरिणौ नित्यं विशुध्यानरोधिनी । संत्यजतां महाक्रूरौ सुखं संजायते नृणाम् ॥११० ॥
कामदाहो वरं सोढुं न तु शीलस्य खण्डनम् । शीलखण्डनशीलानां नरके पतनं ध्रुवम् ॥ १११॥
कामभोगः सदा नैव स्वल्पकामेन शाम्यति । सेवनाच महत्पापं नरकावर्तपातनम् ॥११२ ॥
सुतीवेणापि कामेन स्वल्पकालं तु वेदनाः। खण्डनेन तु शीलस्य भवकोटिषु वेदनाः ॥११३ ॥
कामी पुरुष सदाचारने, गुरुना उपदेशने, लज्जाने, गुणना समूहने, अने चित्तनी स्वस्थताने त्यजी दे छे
॥ १०८ ॥ तेथी मोक्षना सुखने प्राप्त करवा इच्छनार अने संसारनो त्याग करवाने इच्छनार श्रेष्ठ मुनिओए
निरंतर कामनो त्याग करवो ॥१०९॥ काम अने अर्थ रूपी महा क्रूर शत्रुओ निरंतर विशुद्ध ध्यानने रंधनारा छे,
तेने त्याग करनार मनुष्योने सुख प्राप्त थायछे ॥ ११०॥ कामरूपी ज्वरनो दाह सहन करवो सारो छे, परंतु
शीळनुं खंडन करवू सारं नथी; कारण के शीळनुं खंडन करनार प्राणीओ अवश्य नरकमां पडेछे ॥ १११ ॥ स्वल्प
कामभोगनी सेवाथी कामज्वरनो दाह शांत थतो ज नथी, उलटुं तेने सेववाथी नरकमां पाडनारुं महापाप प्राप्त
थायछे ।। ११२ ॥ कामनी पीडा तीव्र होय तो पण तेनी वेदना अल्प काळ सुधीज रहेछे, परंतु शीळy खंडन
करवाथी तो करोडो भव पर्यंत वेदनाओ भोगववी पडेछे ॥ ११३ ॥

भापान्तर-
सहित.
तत्त्वामृत
॥११॥
कामने शांत करवाना उपायो
नियतं प्रशमं याति कामदाहः सुदारुणः । ज्ञानोपयोगसामर्थ्याद् विषं मन्त्रपदैर्यथा ॥ ११४ ॥
असेवनमनङ्गस्य शमाय परमं स्मृतम् । सेवनाच परा वृद्धिः शमस्तु न कदाचन ॥ ११५ ॥
उपवासोऽवमौदर्य रसानां त्यजनं तथा । स्नानस्याऽसेवनं चैव ताम्बूलस्य च वर्जनम् ॥११६ ॥
असेवेच्छानिरोधस्तु ज्ञानस्य स्मरणं तथा । एते हि निर्जरोपाया मदनस्य महारिपोः॥११७॥ युग्मम्।
काममिच्छानिरोधेन क्रोधं च क्षमया भृशम् । जयेन्मानं मृदुत्वेन मोहं सज्ज्ञानसेवया ॥ ११८॥
तस्मिन्नुपशमं प्राप्ते युक्तं सद्वृत्तधारणम् । तृष्णां सुदूरतस्त्यक्त्वा विषाक्तमिव भोजनम् ॥ ११९ ॥
जेम मंत्रना अक्षरोथी विपनो नाश थायछे, तेम ज्ञानना उपयोगना प्रभावथी अत्यंत भयंकर पण कामज्वरनो
दाह अवश्य शांत थायछे ॥ ११४ ॥ कामर्नु सेवन न करवू एज तेनुं उत्कृष्ट शमन कहेलुं छे, केमके तेनुं सेवन
करवाथी उलटी तेनी अत्यंत वृद्धि थायछे, पण कदापि शान्ति थती नथी ॥११५॥ उपवास, उणोदरी, घी विगेरे
रसनो त्याग, स्नाननो त्याग, तांबूलनुं अभक्षण, कामसेवननो अभाव, इच्छानो निरोध, अने ज्ञान- सरण, आटला
कामरूपी महाशत्रुने क्षय करवाना उपायो छे ॥११६-११७॥ इच्छानो निरोध करी काम जीतवो, क्षमा वडे क्रोधनो
जय करवो, मृदुपणा वडे मानने जीतवो, अने सम्यग् ज्ञाने करीने मोहने जीतवो जोइए ॥११८॥ ते काम उपशांत
थाय त्यारे विषमिश्रित भोजननी जेम तृष्णानो दूरथी त्याग करीने सदाचार-चारित्र ग्रहण करवू योग्य छे॥११९॥
॥११॥

कर्मणां शोधनं श्रेष्टं ब्रह्मचर्य सुरक्षितम् । सारभूतं चरित्रस्य देवैरपि सुपूजितम् ॥ १२० ॥ स्त्रीओनी असारता या चैषा प्रमदा भाति लावण्यजलवाहिनी । सैपा वैतरणी घोरा दुःखोर्मिशतसङ्कुला ॥ १२१ ॥ संसारस्य च बीजानि दुःखानां राशयः पराः । पापस्य च निधानानि निर्मिताः केन योषितः ? ॥ इयं सा मदनज्वाला बढेरेव समुद्भवा । नराणां यत्र ड्यन्ते यौवनानि धनानि च ॥ १२३ ॥ नरकावर्तपातिन्यः स्वर्गमार्गदृढार्गलाः । अनर्थानां विधायिन्यो योषितः केन निर्मिताः ? ॥१२४॥ कर्मोने शुद्ध करनार, चारित्रनुं सारभूत, अने देवोने पण पूजवा योग्य सारी रीते रक्षण करेलुं ब्रह्मचर्य श्रेष्ठ छे ॥ १२० ॥ जे आ स्त्री लावण्य रूपी जलनी नदी समान भासेछे, ते वास्तविक रीते दुःखरूपी सेंकडो तरंगोथी व्याप्त एवी महाघोर वैतरणी नदी रूप ज छ ॥ १२१ ॥ संसारना बीज रूप, दुःखोना मोटा समूह रूप, अने पापना निधानरूप स्त्रीओने कोणे नीपजावी हो ? ॥ १२२ ॥ आ स्त्रीरूपी कामज्वाला खरेखर अग्निथी ज उत्पन्न थयेली छे के, जेमा पुरुपोनी युवावस्था अने द्रव्य होमाय छे-भस्मीभूत थाय छे ॥ १२३ ॥ नरकरूपी आवर्तमां पाडनारी, स्वर्गना मार्गने रुधवा माटे मजबूत भोगळ समान, अने अनर्थने उत्पन्न करनारी स्त्रीओ कोणे नीपजावी हशे? ॥ १२४ ।।

भा
तच्चामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥१२॥
कृमिजालशताकीर्णं दुर्गन्धमलपूरिते । त्वमानसंवृते स्त्रीणां काये का रमणीयता ? ॥ १२५ ॥
अहो! ते सुखितां प्रासा ये काममलवर्जिताः । सद्वृत्तं विधिनाऽऽपाल्य यास्यन्ति पदमुत्तमम् ॥
भोगार्थी यः करोत्यज्ञो निदानं मोहसङ्गतः । चूर्णीकरोत्यसौ रत्नमनऱ्या सूत्रहेतुना ॥ १२७ ।।
वैराग्य भावनाथी कर्मशत्रुनो नाश
भवभोगशरीरेषु भावनीयः सदा बुधैः । निर्वेदः परया बुद्ध्या कारातिजिगीपुभिः ॥ १२८॥
यावन्न मृत्युवज्रेण देहशैलो निपात्यते । नियुज्यतां मनस्तावत् कारातिपरिक्षये ॥ १२९ ॥
त्यज कामार्थयोः सङ्गं धर्मध्यानं सदा भज । छिन्धि लेहमयान् पाशान् मानुष्यं प्राप्य दुर्लभम् ॥
सेंकडो कृमिना समूथी व्याप्त, दुर्गन्ध अने मळ बड़े परिपूर्ण, अने मात्र खचाथी-चामडाथी मढेला स्त्रीओना
शरीरने विषे शुं सौंदर्य छे ? ॥ १२५ ॥ अहो! जे पुरुषो काम रूपी मळे करीने रहित छे तेओज सुखने पाम्या
छ; अने तेओज विधिपूर्वक उत्तम चारित्र पाळीने मोक्षपद पामशे ॥ १२६ ॥ मोहने पामेलो जे मूढ प्राणी भोगने
माटे निया| करेछे, ते सूतरना तांतणा माटे अमूल्य रत्नने चूर्ण करेछे-अमूल्य रत्ननी माळाने तोडे छे ॥१२७॥
कर्मरूपी शत्रुने जीतवानी इच्छावाळा पंडितोए निरंतर तीक्ष्णबुद्धि बड़े संसार, विपयो, अने शरीरने विपे वैराग्यनी
भावना भाववी ॥१२८॥ ज्यां सुधी मृत्युरूपी वजे आ शरीररूपी पूर्वत पाडी नाख्यो नथी, त्यां सुधीमा कर्मरूपी
शत्रुनो क्षय करवा मननी योजना करवी ॥ १२९ ॥ आ दुर्लभ मनुष्यजन्म पाम्यो छे, तेथी काम अने
अर्थनो संग छोडी दे, निरंतर धर्मध्यान- सेवन कर, अने स्नेहमय पासलाओने छेदी नाख ॥ १३०॥
॥ १२ ॥

सदाचारथी भ्रष्ट थयेला अने विपयोमां लंपट बनेला प्राणीओ आ लोक अने परलोकमां दुःखी थाय छ कथं ते भ्रष्टसदृत्ता विषयानुपसेवते (न्ते)। पञ्चतान्तरिता येषां नरके तीव्रवेदना ॥१३१॥ सद्वृत्ताद् भ्रष्टचित्तानां विषयासङ्गसङ्गिनाम् । तेषामिहैव दुःखानि भवन्ति नरकेषु च ॥ १३२ ॥ विषयावादलुब्धेन रागद्वेषवशात्मना । आत्मा सुवञ्चितस्तेन यः शमं नापि सेवते ॥ १३३ ॥ कर्मनां आश्रवद्वारोने रंधवानो अने इंद्रियोने वश करवानो उपदेश आत्मना यत्कृतं कर्म भोक्तव्यं तदनेकधा । तस्मात् कम स्वेन्द्रियाणि वशं नय ॥१३४॥ इन्द्रियप्रसरं रुद्धा खात्मानं वशमानय । येन निर्वाणसौख्यस्य भाजनत्वं प्रपत्स्यसे ॥ १३५ ॥ कर्माश्रवं रुद्ध्वा ते पुरुपो सदाचारथी अथवा चारित्रथी भ्रष्ट थइने शा माटे विपयोने सेवेछे ? के जेओने जन्मान्तरित एटले मरण पछी जन्मान्तरे नरकमा तीव्रवेदना भोगववानी छे ॥ १३१॥ जेमनुं चित्त सदाचारथी भ्रष्ट थयुं छे, एवा विपयनी आसक्तिवाळा ते मनुष्योने आ भवमा ज दुःखो भोगववां पडेछे, अने परभवमां पण तेओ नरकने विपे दुःखो भोगवे छे ॥१३२ ॥ विषयना आस्वादमां लुब्ध थयेला अने राग-द्वेपोने वश थयेला ते पुरुपे पोताना आत्माने ज ठग्यो छे के, जेणे शमतानुं लेश पण सेवन कर्यु नथी ॥१३३ ॥ आत्माए पोते जे कर्म कर्यु हशे तेनुं फळ अनेक प्रकारे भोगवईं पडशे, एम जाणीने हे आत्मा ! तुं कर्मनां आश्रव द्वारोने रूंधीने पोतानी इंद्रियोने वश कर ॥१३४॥ हे चेतन! तुं इंद्रियोनाप्रचारने रंधीने पोताना आत्माने वश कर, के जेथी तुं मोक्षसुखना स्थानने प्राप्त करी शके।।१३५॥ .

तत्वामृत
भाषान्तर.
सहित.
॥ १३॥
भोगनी लालसा त्यागवानो उपदेश
सम्पन्नेष्वपि भोगेषु महतां नास्ति गृध्नुता । अन्येषां गृद्धिरेवाऽस्ति शमस्तु न कदाचन ॥ १३६ ॥
पट्खण्डाधिपतिश्चक्री परित्यज्य वसुन्धराम् । तृणवत् सर्वभोगांश्च दीक्षां भागवती श्रितः॥१३७॥
कृमितुल्यैः किमस्माभिभक्तब्यं वस्तु सुन्दरम् । येनात्र गृहपङ्केषु सीदामः किमनर्थकम् ? ॥१३८॥
येन ते जनितं दुःखं भवाम्भोधौ सुदुस्तरम् । तं कर्मारातिमत्युग्रं विजेतुं किं न वाञ्छसि ?॥१३९॥
अब्रह्मचारिणो नित्यं मांसभक्षणतत्पराः । शुचित्वं तेऽपि मन्यन्ते किं नु चित्रमतः परम् ? ॥१४०॥
भोगो प्राप्त थवा छतां पण महान् पुरुषोने तेमां आसक्ति होती नथी, अने बीजा मनुष्योने भोगो नहीं मळवा
छता पण तेओमां निरंतर आसक्ति ज रहेछे, पण कदापि उपशमभाव प्राप्त थतो नथी ॥१३६ ॥ छ खंड पृथ्वीनो
खामी चक्रवर्ती पण पृथ्वीने तथा भोगोने तृणनी जेम त्यजी दइने जिनेश्वर संबंधी दीक्षाने अंगीकार करेछे
॥१३७॥ तो घररूपी पंकमां कृमियानी जेम रहेला आपणे कइ सुंदर वस्तु भोगववानी छे के जेथी ते पंकमां आपणे
निरर्थक सीदाइये छीए ? ॥१३८ ॥ हे जीव! जे कर्मरूपी शत्रुए तने आ संसाररूपी समुद्रमा अत्यंत
दुस्तर दुःख उत्पन्न कर्यु छे, ते उग्न कर्मरूपी शत्रुने जीतवा माटे तुं केम इच्छा करतो नथी ? ॥ १३९ ।।
जेओ मैथुनने सेवनारा छे, अने जेओ निरंतर मांसभक्षण करवामां तत्पर रहेछे, तेओ पण पोताने पवित्र-शुद्ध-
मानेछ !, अहो ! आथी बीजं आश्चर्य शुं होय ॥ १४० ॥
॥१३॥

येन संक्षीयते कर्म संचयश्च न जायते । तदेवात्मविदा कार्य मोक्षसौख्याभिलाषिणा ॥ १४१॥
चार गतिरूप संसारमा अनेक प्रकारनां सुख दुःख भोगव्या छतां वैराग्य नहीं पामवाथी जीवने उपालंभ
अनेकशस्त्वया प्राप्ता विविधा भोगसम्पदः । अप्सरोगणसङ्कीर्णे दिवि देवविराजिते ॥ १४२॥
पुनश्च नरके रौद्रे रौरवेऽत्यन्तभीतिदे । नानाप्रकारदुःखौघे संस्थितोऽसि विधेर्वशात् ॥ १४३ ॥
तप्ततैलकभल्लीषु पच्यमानेन यत्त्वया । संप्राप्तं परमं दुःखं तद्वक्तुं नैव पार्यते ॥ १४४ ॥
नानायन्त्रेषु रौद्रेषु पीड्यमानेन वह्निना । दुःसहा वेदना प्राप्ता पूर्वकर्मनियोगतः॥ १४५ ॥
मोक्षना सुखनी अभिलाषा राखनार आत्मज्ञानीए तेवू ज कार्य करवू जोइए के, जे करवाथी करेला कर्मनो
क्षय थाय, अने नवानो संचय-प्राप्ति न थाय ॥ १४१ ॥ हे जीव ! अप्सराओना समूहथी भरपूर अने देवो बडे
सुशोभित एवा स्वर्गने विपे ते अनेकवार विविध प्रकारना भोगोनी संपत्ति प्राप्त करी छे ॥ १४२ ॥ तेमज कर्मना
वशथी उग्र रसवाला, अत्यंत भय आपनारा, अने विविध दुःखना समूहवाला एवा रौरव नामना नरकमां पण तुं
चिरकाळ रह्यो छे-त्यांनां दुःखो पण ते भोगव्यां छे ॥ १४३ ॥ ते नरकमा तपावेला तेलनी कडाहीमां पका-
वाता तें जे असाधारण दुःख अनुभव्युं छे, ते कहेवाने पण समर्थ थवाय नहीं ॥ १४४ ॥ त्यां पूर्वकर्मना नियो-
गथी-वशथी भयंकर विविधयंत्रोमां अग्निवडे पकावाता ते दुःसह बेदना अनुभवी छे ॥ १४५॥

तच्चामृत
भापान्तर-
सहित.
॥ १४ ॥
विण्मूत्रपूरिते भीमे पूति-श्लेष्म-वसाकुले । भूयो गर्भगृहे मातुर्दैवाद्यातोऽसि संस्थितिम् ॥१४६॥
तिर्यग्गतौ च यदुःखं प्राप्तं छेदन-भेदनैः । न शक्तस्तत्पुमान् वक्तुं जिह्वाकोटिशतैरपि ॥ १४७ ॥
संमृतौ नास्ति तत्सौख्यं यन्न प्राप्तमनेकधा । देव-मानव-तिर्यक्षु भ्रमता जन्तुनानिशम् ॥ १४८॥
चतुर्गतिनिबन्धेऽस्मिन् संसारेऽत्यन्तभीतिदे। सुख-दुःखान्यवाप्तानि भ्रमता विधियोगतः ॥१४९॥
एवं चिरमिदं कष्टं ज्ञात्वाऽत्यन्तविनश्वरम् । कथं न यासि वैराग्यं ? धिगस्तु तव जीवितम् ॥१५०॥
वळी हे जीव ! विष्ठा अने मूत्रथी भरेला, भयंकर, अशुचि श्लेष्म अने चरवीथी व्याप्त एवा माताना गर्भरूपी
घरने विपे तुं फरीथी कर्मने योगे स्थिति पाम्यो छे ॥१४६ ॥ तेमज तिर्यचनी गतिमां पण छेदन अने भेदनथी
उत्पन्न थयेला जे दुःखने जीव पाम्यो छे ते दुःख कहेवाने मनुष्य कोटिजिहाए करीने पण शक्तिमान् नथी
॥१४७॥ आ संसारमा एवं कांइ पण सुख नथी, के जे देव, मनुष्य, अने तिर्यचगतिमां निरंतर भ्रमण करता
जीवे अनेक प्रकारे प्राप्त कयु न होय ॥१४८ ॥ अत्यंत भय आपनार आ चारगतिरूप संसारमा भ्रमण करता
जीवे कर्मना योगथी सर्व प्रकारनां सुख-दुःख प्राप्त कर्यां छे ॥१४९ ॥ हे जीव ! आ प्रमाणे चिरकाळ
सुधी आत्मानो अत्यंत नाश करनार दुःखने जाण्या छतां पण तुं केम वैराग्य पामतो नथी ?, तारा जीवितने
धिकार छ । १५० ॥
॥१४॥

जगत्मां सर्ववस्तु अनित्य होवाथी ममत्व राखी राग नहीं करवानो उपदेश जीवितं विद्युता तुल्यं संयोगाः स्वप्नसन्निभाः। सन्ध्यारागसमः लेहः शरीरं तृणबिन्दुवत् ॥१५१॥ इन्द्रचापसमा भोगाः सम्पदो जलदोपमाः । यौवनं जलरेखेव सर्वमेतदशाश्वतम् ॥ १५२ ॥ समानवयसो दृष्ट्वा मृत्युना खवशीकृतान् । कथं चैतत्समो नास्ति मनागपि हितात्मनः ॥ १५३ ॥ सर्वाऽशुचिमये काये नश्वरे व्याधिपीडिते । को हि विद्वान् रतिं गच्छेदू यस्याऽस्ति श्रुतसङ्गमः ॥ हे चेतन ! आ जीवित वीजळीना जेवू चपळ छे, स्त्री-पुत्रादिना संयोगो खमना जेवा असत्य छ, स्नेह संध्यासमयना रंग जेवो अल्पकाळ रहेनारो छे, अने शरीर तृणना अग्रभाग उपर रहेला जळना बिंदुना जेवू अस्थिर छे ॥१५१ ॥ काम-भोगो इन्द्रधनुषनी जेवाछे, संपत्तिओवादळां जेवी छे, अने युवावस्था जळनी रेखा समान छे आ सर्वे अनित्य पदार्थों छे ॥ १५२ ॥ पोतानी समान वयवाळाओने मृत्युए वश करेला जोइने पण आत्महित करे एवा थोडा पण जोवामां आवता नथी-जगतमा आत्महित करनारा वीरला ज छे ॥ १५३ ॥ जे पुरुषने श्रुतज्ञाननो समागम होय तेवो कयो विद्वान् पुरुष सर्वे अशुचिर्नु स्थानरूप, नाशवंत, अने व्याधिवडे पीडायेला आ शरीर उपर रति पामे -ममता करे? ॥१५४॥ १ उत्तरार्द्धमा काइक फेरफार थयो होय एवं जणाय छ ।

भापान्तर-
सहित.
तत्त्वामृत
॥१५॥
चिरं सुपोषितः कायो भोजनाच्छादनादिभिः । विकृति याति सोऽप्यन्ते काऽऽस्था बाह्येषु वस्तुषु ?
नायातो बन्धुभिः सार्ध न गतो बन्धुभिः समम् । वृथैव खजनैः लेहो जनानां मूढचेतसाम् १५६
जातेनाऽवश्यमर्तव्यं प्राणिना प्राणधारिणा । अतः कुरुत मा शोकं मृते बन्धुजने वुधाः!॥ १५७ ॥
जे स्वस्वभाव छोडी परभावमां लीन रहेछे ते पोताना हितथी चूके छे
आत्मकार्य परित्यज्य परकार्येषु यो रतः। ममत्वरतचेताः स खहिता भ्रंशमेष्यति ॥ १५८ ॥
आत्मानुं स्वहित शुं?
स्वहितं तु भवेज्ज्ञानं चारित्रं दर्शनं तथा । तपःसंरक्षणं चैव सर्वविद्भिस्तदुच्यते ॥ १५९॥
आ शरीर के जेनुं भोजन वस्त्र विगेरे वडे चिरकाळ सुधी पोषण करवामां आवेछे, ते पण छेवटे-वृद्धावस्थामां
विकारने पामेछे, तो पछी आवी पौद्गलिक वाह्य वस्तुओ उपर शी श्रद्धा ?-शो विश्वास राखवो ? ॥ १५५॥ आ जीव
बंधुओनी साथे परभवमाथी अहीं आव्यो नथी, अने ते बंधुओनी साथे जवानो नथी, तो मूढ चित्तवाळा पुरुषोने
स्वजनोनी साथे जे स्नेह छे ते वृथा ज छे ॥ १५६ ॥ हे पंडितो! प्राणोने धारण करनार जे प्राणी उत्पन्न थयोछे
ते अवश्य मरवानो ज छ, तेथी करीने कोइ बंधुजन मृत्यु पामे तो तेमां तमे कांइ पण शोक करो नहीं ॥ १५७ ॥
जे पुरुष आत्मानुं कार्य-ज्ञानादिने छोडीने अन्य शरीरादि पौद्गलिक कार्यमा आसक्त थायछे, तेनुं चित्त स्त्री-
पुत्रादिने विषे ममता करवामां आसक्त होयछे; तेथी ते आत्माना हितथी भ्रष्ट थायछे-चूकेछे ॥ १५८ ॥ सर्वज्ञ
भगवान् कहेछे के-ज्ञान, दर्शन, चारित्र अने तपर्नु आचरण ए सर्व आत्मानुं हित कहेवाय छे ॥१५९ ॥

सांसारिक सुखमां लंपट वनेला मनने उपालंभ
वियोगान् विविधान् दृष्ट्वा द्रव्याणां च परिक्षयम् । तथापि निघणं चेतः सुखास्वादनलम्पटम्१६०
सुखसंभोगसंमूढा विषयाखादलम्पटाः । स्वहिताद् भ्रंशमागत्य गृहवासं सिविरे ॥ १६१ ॥
ज्ञानी पुरुपे केवु कार्य करवू ?
यथा च जायते सम्यक् चेतःशुद्धिः सुनिर्मला । तथा ज्ञानविदा कार्य प्रयत्नेनापि भूरिणा ॥१६२॥
विशुद्धं मानसं यस्य रागादिमलवर्जितम् । संसारायं फलं तस्य सकलं समुपस्थितम् ॥१६३||
संसारध्वंसने हृष्टिं धृतिमिन्द्रियनिग्रहे । कषायविजये यत्नं नाऽभव्यो लब्धुमर्हति ॥१६४॥
स्त्री पुत्र मित्र विगेरेना विविध प्रकारना वियोगने तथा द्रव्यना नाशने जोवा छतां पण हे जीव! तारु
निर्लज्ज चित्त सुखना आस्वादमा लुब्ध ज रहेछे, ए आश्चर्य छे ॥ १६० ॥ सुख भोगववामां मोह पामेला
अने विपयना आस्वादमा लंपट थयेला प्राणीओ आत्महितथी (चारित्रथी) भ्रष्ट थइने गृहवास सेवेछे ॥१६१॥
जे प्रकारे सारी रीते अत्यंतनिर्मळ चित्तशुद्धि थाय, ते प्रकारे ज्ञानी पुरुषे घणा प्रयत्नथी पण कार्य करवू
॥ १६२ ॥ जे पुरुपर्नु चित्त रागादिक मळे करीने रहित अने विशुद्ध होय, ते पुरुपने समग्र संसारनुं (मोक्षरूप)
मुख्य फळ प्राप्त थयुं छे एम जाणवू ॥ १६३ ॥ अभव्य प्राणी संसारनो नाश करवामां हर्ष पामी शकतो नथी,
इन्द्रियोनो निग्रह करवामां धृति-संतोपने धारण करी शकतो नथी, अने कपायनो विजय करवामां यत्न करी
शकतो नथी, तेवा प्रकारनी इच्छा पण तेने थती नथी ॥ १६४ ॥

भापान्तर
सहित.
तत्वामृत
॥ १६॥
परब्रह्म एटले शु?
एतदेव परं ब्रह्म न विदन्तीह मोहिनः । यदेतचित्तनैर्मल्यं राग-द्वेषादिवर्जितम् ॥१६५॥
आपत्तिमां पण मनने विकृत नहीं करवानो उपदेश
तथाऽनुष्ठेयमेतद्धि पण्डितेन हितैषिणा । यथा न विक्रियां याति मनोऽत्यर्थ विपत्वपि ॥१६६॥
धन्यास्ते मानवा लोके ये प्राप्याऽप्यापदान्तरम् । विकृतिं नैव गच्छन्ति यतस्ते साधुमानसाः १६७
संक्लेशो न हि कर्तव्यः संक्लेशो बन्धकारणम् । संक्लेशपरिणामेन जीवो दुःखस्य भाजनम् ॥१६८॥
संक्लेशपरिणामेन जीवः प्राप्नोति भूरिशः । सुमहाकर्मसम्बन्धं भवकोटिसुदुःखदम् ॥ १६९॥
जे आ राग-द्वेषादिक रहित चित्तनुं निर्मळ पणुं तेज परब्रह्म-मोक्ष कहेवाय छे, ते वात मोहवाळा प्राणीओ
जाणता ज नथी ॥१६५॥ जे प्रकारे मोटी आपत्तिमा पण मन विकार न पामे, ते प्रकारे आत्महितने इच्छनार
पंडित पुरुषे कार्य करवू जोइए ॥१६६॥जगत्मां ते पुरुषो ज धन्य छे के, जेओबीजी बीजी आपत्तिओ पामवा छतां
पण विकारने पामता नथी, कारण के तेओर्नु चित्त विशुद्ध होयछे ॥१६७॥ हे प्राणी ! आपत्तिमां पण क्लेश करवो
नहीं, कारण के क्लेश ए कर्मबंधननुं कारण छे, क्लेशना परिणाम-अध्यवसायथी ज जीव दुःखनुं भाजन-स्थान थायछे
॥१६८॥क्लेशना परिणामथी जीव अनेक प्रकारे कोटी भवोमां दुःसह दुःख आपनारा अति मोटा कर्मबंधने करेछे ॥१६९॥
॥१६॥

चित्तरत्नमसंक्लिष्टं महतामुत्तमं धनम् । येन संप्राप्यते स्थानं जरा-मरणवर्जितम् ॥१७॥
महापुरुष कोने कहेवा?
सम्पत्तौ विस्मिता नैव विपत्तो नैव दुःखिताः। महतां लक्षणं ह्येतद् न तु द्रव्यसमागमात् ॥१७॥
आपत्सु संपतन्तीषु पूर्वकर्मनियोगतः । धैर्यमेव परं त्राणं न युक्तमनुशोचनम् ॥१७२॥
निर्मल मनथी शान्ति रहेछे, अने क्लिष्ट मनथी भवांतरमां पण अशान्ति ज रहे छे
विशुद्धपरिणामेन शान्तिर्भवति सर्वतः। संक्लिष्टेन तु चित्तेन नास्ति शान्तिर्भवेष्वपि ॥१७॥
संक्लिष्टचेतसां पुंसां संसारो याति वृद्धिताम् । विशुद्धा चेतसो वृत्तिः सम्पत्ति-वृत्तिदायिनी ॥
क्लेश रहित चित्त थर्बु ए रन समान छे, तेज महापुरुषोनु उत्तम धन छे, अने ते धन वडेज तेओ जरा अने मरणरहित
उत्तम स्थान (मोक्ष) ने पामेछे ॥१७०॥संपत्तिमां हर्षे (गर्व) करवो नहीं, अने विपत्तिमां दु:खित (दीन) थq नहीं,
एज महापुरुषोनुं लक्षण छे, परंतु द्रव्यनी प्राप्ति थवाथी कांइ महापुरुष थइ शकातुं नथी ॥१७१।। पूर्वकमना संबंधने लीधे
आपत्तिओ आवी पडे त्यारे प्राणीओने रक्षण करनार एक धैर्य ज छे, परंतु ते वखते शोक करवो योग्य नथी ॥१७२॥
चित्तना शुद्ध परिणामथी ज जीवने सर्वत्र शान्ति प्राप्त थाय छे, परंतु चित्तमां क्लेशनो अध्यवसाय होय तो अने-
क भवोने विषे पण शांति थती नथी ॥१७३ ॥ पुरुषोना चित्तमा संक्लेशनो परिणाम वर्ततो होय तो तेमनो संसार
वृद्धि पामेछे, अने चित्तनी शुद्धता वर्तती होय तो ते संपत्ति तथा आजीविकाने आपनार थायछे ॥ १७४॥

तत्त्वामृत
भापान्तर-
सहित.
॥१७॥
यदा चित्तविशुद्धिः स्यादापदः सम्पदस्तदा । समास्तत्वविदांपुंसां सर्वं हि महतां महत् ॥१७॥
उन्मार्गे जता मनने रोकवानो उपदेश
परोऽप्युत्पथमापन्नो निषेद्धं युक्त एव सः । किं पुनः खमनोऽत्यर्थ विषयोत्पथयायि यत् ॥१७॥
अज्ञानाद् यदि वा मोहाद् यत्कृतं कर्म कुत्सितम् । व्यावर्तयेन्मनस्तस्मात् पुनस्तन्न समाचरेत् ॥
पोते करेलां कर्मनां फळ पोताने ज भोगवां पडेछे
अचिरेणैव कालेन फलं प्राप्स्यसि दुर्मते !। विपाकेऽतीवतिक्तस्य कर्मणो यत्त्वया कृतम् ॥ १७८ ॥
खल्पेनैव हि कालेन फलं प्राप्स्यसि यत्कृतम् । शशवदात्मकर्णाभ्यां गोपयन् स्वं मनागपि ॥१७॥
ज्यारे तत्त्वज्ञानी पुरुषोनुं चित्त विशुद्ध होय, त्यारे तेमनी सर्व आपत्तिओ पण संपत्तिरूप जथायछे, केमके महा-
पुरुषोने सर्व महान ज होयछे ॥ १७५ ॥ अन्य प्राणी पण उन्मार्गे जतो होय तो तेने तेथी अटकाववो योग्य छे,
तो पछी विषयरूपी उन्मार्गमा जनारा पोताना मनने अत्यंत अटकावq जोइए तेमां शुं कहेवू ? ॥१७६॥ अज्ञानथी
अथवा मोहथी जो कांइ कुत्सित कार्य करायुं होय, तो ते अकार्यथी मनने पार्छ वाळवू जोइए; अने फरीथी तेवा
कार्यमा प्रवर्तवा देवु जोइए नहीं ॥ १७७ ॥ हे दुष्टबुद्धिवाळा जीव ! तें पूर्वजन्ममा जे अशुभ कार्य कर्यु हशे, ते
अतिकटुकर्मना उदयकाळे तेनुं तेवू ज फळ तुं थोडा काळमां ज पामीश ॥ १७८ ॥ ससलो जेम पोताना वे कान
वडे पोताना शरीरने गोपवीने 'मने कोइ देखतुं नथीं' एम मानेछे, परंतु तरत ज ते वध-बंधनादिकने पामेछे; तेमज
हे जीव! तुं पोते करेला कर्मने जराक गोपववाजायछे, परंतु थोडा काळमांज तेनुं फळ तने भोगवq पडशे ॥१७९॥
॥१७॥

वर्धमानाऽहितं कर्म अज्ञानाद्यो न शोधयेत् । प्रभूतदुःखसंग्रस्तः स पश्चात् परितप्यते ॥ १८०॥ सुखभावकृता मूढाः किं न कुर्वन्ति मानवाः । येन संतापमायान्ति जन्मकोटिशतेष्वपि॥ १८१॥ परने ठगनारो प्राणी पोतानाज आत्माने ठगेछ परं च वञ्चयामीति ये हि मायां प्रयुञ्जते । इहाऽन्यत्र च लोके वै तैरात्मा वञ्चितः सदा ॥ १८२॥ मनुष्यपणुं प्राप्त थवा छतां जे पुण्योपार्जन करतो नथी, तथा कर्म खपावतो नथी तेनो जन्म निष्फळ छे पञ्चताऽऽसन्नतां प्राप्ता न कृतं सुकृतार्जनम् । सुमानुष्ये हि संप्रासे हा ! गतं जन्म निष्फलम् १८३ कर्मपाशविमोक्षाय यत्नो यस्य न देहिनः । स संसारमहागुप्तौ बद्धः संतिष्ठते सदा ॥ १८४ ॥ जे पुरुष अज्ञानताने लीधे वृद्धि पामता अशुभ कर्मनी शुद्धि-प्रायश्चित्त करतो नथी, ते पाछळथी, मोटा दुःखने प्राप्त थइ अत्यंत पश्चात्ताप पामेछे ॥ १८० ॥ सुखनी प्राप्तिमां लालचु थयेला मूढ मनुष्यो शुं शुं अकार्य करता नथी?–सर्व अकार्य करेछे, अने तेथी करीने सेंकडो कोटी जन्म पर्यन्त तेओ संतापने पामेछे ॥ १८१ ॥ 'हुँ बीजाने ठगुं छु' एम धारीने जेओ माया-कपट करेछे, तेओ आ लोक तथा परलोकमां पोताना ज आत्माने ठगे छे एम जाणवू ॥१८२॥ हे चेतन! उत्तम मनुष्यपणुं प्राप्त थया छतां पण ते काइ सुकृत कयु नहीं, अने मरण तो समीपे आव्यु, खेदनी बात छे के तारो समग्र जन्म निष्फळ गयो॥१८३॥ जे प्राणी कर्मरूपी पाशमांथी मुक्त थवा माटे काइ पण यत्न करतो नथी, ते संसाररूपी केदखानामां निरंतर बंधायेलो ज रहेछे ॥ १८४ ।।

भाषान्तर-
सहित.
तच्चामृत
॥ १८ ॥
गृहचारकवासेऽस्मिन् विषयामिषलोभिनः । सीदन्ति नरशार्दूला बद्धा बान्धवबन्धनैः ॥ १८५॥
गर्भवासेऽपि यदुःखं प्राप्तमत्रैव जन्मनि । अधुना विस्मृतं किं ते येनात्मानं न वुध्यसे? ॥ १८६॥
चतुरशीतिलक्षेषु योनीनां भ्रमता त्वया । प्राप्तानि दुःखशल्यानि नानाकाराणि मोहिना ॥ १८७॥
कथं नोद्विजसे मूद ! दुःखात् संसृतिसंभवात् । येन त्वं विषयासक्तो लोभेनाऽसि वशीकृतः १८८
यत्त्वयोपार्जितं कर्म भवकोटिषु पुष्कलम् । तच्छेत्तुं नैव शक्नोषि गतं ते जन्म निष्फलम् ॥ १८९ ॥
अज्ञानी प्राणी जे कर्म करोडो भवमां न खपावी शके ते कर्म ज्ञानी अन्तर्मुहूर्तमां खपावेछे
अज्ञानी क्षपयेत् कर्म यज्जन्मशतकोटिभिः । तज्ज्ञानी तु त्रिगुप्तात्मा निहन्त्यन्तर्मुहूर्तके ॥ १९ ॥
विपयरूपी मांसमां लुब्ध थयेला मनुष्यरूपी सिंहो बांधवरूपी बंधनथी बंधाइने आ घररूपी केदखानामां पड्या पड्या
सीदाय छे॥१८५॥हे आत्मा! आ जन्ममां ज गर्भवासनुं जे दुःख तुं पाम्यो हतो, ते पण हमणां शुं तुं भूली गयो? के
जेथी तारा आत्माने पण तुं जाणतो नथी ॥ १८६॥ चोराशी लाख योनिओने विषे भ्रमण करता तें मोहने लीधे
नाना प्रकारनां दुःखरूपी शल्यो प्राप्त कर्याछे-अनुभव्यां छे ॥१८७॥ तो हे मूढ ! आ संसारथी उत्पन्न (प्राप्त) थयेला
दुःखथी तुं केम उद्वेग-वैराग्य पामतो नथी? के जेथी तुं विषयोने विषे आसक्त थइ लोभने वश पड्यो छे ?॥१८८॥
हे जीव ! जे ते पूर्वे कोटी जन्मोने विषे पुष्कळ कर्म उपार्जन कर्यु छे, तेने छेवा माटे तुं लेश पण शक्तिमान्
न थयो, तेथी तारो जन्म केवळ निष्फळ गयो ॥ १८९ ।। अज्ञानी जीव जे कर्मने सेंकडो कोटी जन्मो वडे खपावे
छे-क्षीण करेछे, ते कर्मने त्रण गुप्तिने धारण करनार ज्ञानी पुरुष एक अन्तर्मुहूर्तमां खपावी शकेछ ॥ १९ ॥
॥ १८॥

जन्मनु फल फल शुं? जीवितेनापि किं तेन कृता यत्र न निर्जरा । कर्मणां संबरोवाऽपि संसाराऽसारकारिणाम् ॥ १९१ ॥ स जातो येन जातेनाऽपक्कानां पाचनं कृतम् । कर्मणां पाकघोराणां विवुधेन महात्मना ॥ १९२ ॥ रोप अने मान कोना उपर करवा ?, तथा संग कोनो त्यजवो ते कहेछे रोपे रोषं परं कृत्वा माने मानं विधाय च । सङ्गे सङ्गं परित्यज्य खात्माधीनं सुखं कुरु ॥ १९३ ॥ द्वेष कोना उपर करवो? तथा प्रीति यत्न अने चित्तनी एकाग्रता कोना उपर राखवी? परिग्रहे महाद्वेषो मुक्तौ च रतिरुत्तमा । सद्ध्याने चित्तमेकाग्रं रौद्रात नैव संस्थितम् ॥ १९४ ॥ एवी जींदगीथी शुं फळ ? के जे जींदगीमां संसारने (जन्मने) निष्फळ करनारां कर्मोनी निर्जरा के संवर कांड पण करी शकायो नहीं? ॥ १९१ ॥ आ जगत्मां तेज प्राणी जन्मेलो कहेवाय के जेणे जन्म धरीने विपाक काळे भयंकर फळ आपनारां कर्मों के जेनो उदय थयेलो न होय तेमने उदयमां लावी खपात्री दे. आवो पुरुप ज महात्मा अने पंडित कहेवाय छ । १९२ ॥ हे आत्मा! क्रोध उपरज क्रोध करवो, माननी साथे ज मान-अभिमान राखवू, अने संगनाज संगनो त्याग करवो, आ प्रमाणे करीने तुं वर्ग-मोक्षना सुख स्वाधीन कर-खाधीन करी शकीश ॥१९३॥ परिग्रह उपर ज महाद्वैप करवो, मुक्ति उपर ज उत्तम प्रीति राखवी, शुभध्यानमां ज चित्तनी एकाग्रता राखवी, पण आत-रौद्रध्यानमा चित्त जवा देवू नहीं ॥ १९४ ॥ तत्त्वामृ.४ तत्वामृत भापान्तर- सहित. ॥१९॥ धर्मस्य संचये यत्नं कर्मणां च परिक्षये । साधूनां चेष्टिते चित्तं सर्वदा पापनाशने ॥ १९५ ॥ महात्माओर्नु कर्तव्य मानस्तम्भं दृढं भक्त्वा लोभाद्रिं प्रविदार्यच । मायावल्लीं समुत्पाट्य क्रोधशत्रु निहत्य च ॥१९६॥ यथाख्यातं हितं प्राप्य चारित्रं ध्यानतत्पराः। कर्मणां प्रक्षयं कृत्वा प्रपन्नाः परमं पदम् ॥ १९७ ॥ धीर कोने कहेवा सङ्गादिरहिता धीरा रागादिमलवर्जिताः । शान्ता दान्तास्तपोभूषा मुक्तिकाङ्क्षणतत्पराः ॥ १९८॥ धर्मनुं उपार्जन करवामां अने कर्मनो क्षय करवामां यत्न करवो, तथा पापनो नाश करनारा साधुपुरुषोना आचरणमां ज सदा चित्तने स्थापन करवू ॥१९५।। शुभध्यानमां लीन थयेला घणा महात्माओ मानरूपी दृढ स्तंभने भांगी, लोभरूपी पर्वतर्नु विदारण करी, मायारूपी लतार्नु निर्मूलन करी, क्रोधरूपी शत्रुनो नाश करी, आत्माने हितकर एवा यथाख्यातचारित्रनो स्वीकार करी अने छेवटे समग्र कर्मनो क्षय करी मोक्षपदने पाम्या छे ।। १९६- १९७॥ जेओ सर्वसंगादि रहित होय, रागादि मळथी दूर रहेला होय, शांत दांत अने तपरूपी अलंकारथी भूषित होय, तथा मोक्षनी अभिलाषावाळा होय तेओ ज धीर कहेवाय छे ॥ १९८ ॥ ॥१९॥ ..

सुपात्र कोण?
मनोवाक्काययोगेषु प्रणिधानपरायणाः । वृत्ताड्या ज्ञानसम्पन्नास्ते पात्रं करुणापराः ॥ १९९ ॥
धृतिभावनया युक्ताः सत्त्वभावनयाऽन्विताः।तत्त्वार्थाहितचेतस्कास्ते पात्रं दातुरुत्तमाः ॥ २०० ॥
धृतिभावन
नया दुःखं सत्त्वभावनया भवम् । ज्ञानभावनया कर्म नाशयन्ति न संशयः ॥ २०१॥
आग्रहो हि शले येषां विग्रहः कर्मशत्रुभिः । विषयेषु निराशंसा ते पात्रं यतिसत्तमाः ॥ २०२॥
निःसङ्गा अपि वृत्ताड्या निःस्नेहाः सुश्रुतिप्रियाः। अभूषाश्च तपोभूषास्ते पात्रं योगिनः सदा॥२०३॥
जेओ मन वचन अने कायना योगने विषे उत्तम ध्यान करवामां तत्पर होय, सदाचारर्नु आचरण करनारा
होय, ज्ञाननी संपदा वडे युक्त होय, तथा सर्वप्राणी उपर करुणाघाळा होय तेओ सुपात्र कहेवायछे ॥ १९९॥
वळी जेओ धैर्यभावना वडे युक्त होय, सत्त्व (पराक्रम)नी भावना सहित होय, तथा तत्त्वज्ञानमा ज चित्तने स्थापन
करनारा होय, ते ज उत्तम पुरुषो दातारने सुपात्ररूप छे ॥२००॥ आ सुपात्ररूप महापुरुषो धैर्यभावना बडे दुःखनो
नाश करे छे, सत्त्वभावना वडे संसारनो नाश करेछे, अने ज्ञानभावना वडे कर्मनो नाश करे छे, तेमां संशय
नथी । २०१॥ जेओ शमताने विषे ज आग्रही छे, कर्मरूपी शत्रुओनी साथे ज जेओ युद्ध करे छे, अने जेओ
विषयोनी इच्छा पण राखता नथी, ते ज उत्तम मुनिओ सुपात्र छे ॥ २०२ ॥ जेओ सर्वसंग रहित छतां पण
सदाचारना संगवाळा छे, जेओ सर्ववस्तु उपर स्नेह रहित छतां पण सुशास्त्र उपर स्नेहवाळा छे, अने जेओ आभूषण
रहित छतां पण तपरूपी आभूषणथी भूषित छे, एवा योगीजनो ज सदा सुपात्र छे ॥ २०३ ॥

तत्त्वामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥ २०॥
यैर्ममत्वं सदा त्यक्तं खकायेऽपि मनीषिभिः । ते पात्रं संयतात्मानः सर्वसत्त्वहिते रताः ॥ २०४॥
सुमुनिओ उपर ईर्ष्या राखनारनी धर्मक्रियाओ पण निष्फळ थाय छे
परीषहजये शक्तं शक्तं कर्मपरिक्षये । ज्ञान-ध्यान-तपोभूषं शुद्धाचारपरायणम् ॥ २०५॥
प्रशान्तमानसं सौम्यं प्रशान्तकरणं शुभम् । प्रशान्तारिमहामोहं काम-क्रोधनिपूदनम् ॥ २०६ ॥
निन्दा-स्तुतिसमं धीरं शरीरेऽपि च निःस्पृहम् । जितेन्द्रियं जितक्रोधं जितलोभमहाभयम् ॥२०७॥
राग-द्वेषविनिर्मुक्तं सिद्धिसङ्गमनोत्सुकम् । ज्ञानाभ्यासरतं नित्यं नित्यं च प्रशमे स्थितम् ॥ २०८॥
जे उदार चित्तवाळाओए हमेशां पोताना शरीर उपरथी पण ममतानो त्याग कर्योछे, ते ज सर्वप्राणीओर्नु हित
करवामां रक्त संयमी(मुनि)ओज सुपात्र छ । २०४ ॥ जेओ परीपहो जीतवामां (सहन करवामां) समर्थ होयछे,
कर्मनो क्षय करवाने शक्तिमान् होयछे, ज्ञान ध्यान अने तपरूपी अलंकारथी अलंकृत छ, शुद्ध आचारमा तत्पर
होयछे, जेमनुं चित्त शांत होयछे, जेमनी दृष्टि सौम्य-सर्व प्राणीओ पर समान होयछे, जेमनी इंद्रियो शांत होयछे,
जेओ सर्वजगतना प्राणीओ प्रति कल्याणरूप छे, जेमनो मोहरूपी महाशत्रु शांत थयेलो होयछे, जेओए काम अने
क्रोधनो सर्वथा नाश करेलो होयछे, जेओनी कोइ निन्दा करे के कोइ प्रशंसा करे पण ते बन्ने उपर जेओ समद्द-
प्टिवाळा होयछे, जेओ मेरु पर्वतनी जेवा धीर होयछे, जेओ पोताना शरीर उपर पण स्पृहा रहित होयछे, जेओए
इंद्रियो क्रोध लोभ अने महा भयरूपी शत्रुओनो पराभव करेलो होयछे, जेओ राग-द्वेपथी सदा रहित होयछे, जेओ
॥२०॥

एवं विधं हि यो दृष्ट्वा खगृहाङ्गणमागतम् । मात्सर्य कुरुते मोहात् क्रिया तस्य न विद्यते ॥ २०९॥
मायानिरसनं कृत्वा तृष्णां च परित्यज्य ते ।राग-द्वेषौ समुत्सार्य प्रयाताः पदमक्षयम् ॥ २१० ॥
वास्तविक धीर मुनिओ ज छे
धीराणां यतयो धीरा ये निराकुलचेतसः। कर्मशत्रुमहासैन्यं निर्जयन्ति तपोवलात् ॥ २११ ।।
शूरवीर कोण?
परीषहजये शूराः शूराश्चेन्द्रियनिग्रहे । कषायविजये शूरास्ते शूरा गदिता वुधैः ॥ २१२ ॥
सिद्धिरूपी स्त्रीना संगमनी ज लालसावाळा होयछे, जेओ निरंतर ज्ञाननो अभ्यास करवामां ज तत्पर होयछे,
अने जेओ निरंतर प्रशमरसमा ज मग्न थयेला होयछे, आवा मुनिजनने पोताने घेर आवेला जोइने जे पुरुष
अज्ञानताने लीधे तेमना पर मात्सर्य-ईया करेछे तेनी सर्व धर्मक्रियाओ निष्फळ थायछे ॥२०५ थी २०९ ॥
तेवा मुनिओ मायानो नाश करी, तृष्णानो त्याग करी, तथा राग-द्वेपर्नु उन्मूलन करीने अक्षय एवा मोक्ष-
पदने पाम्याछे ॥ २१० ॥ सर्व धीरपुरुषोनी मध्ये मुनिओज वास्तविक धीर छ कारण के तेओर्नु चित्त कदापि
आकुळ व्याकुळ थतुं नथी, अने तेओ पोताना ज तपोवळथी कर्मरूपी शत्रुना मोटा सैन्यनो पराजय करेछे ॥२११॥
जेओ परीसहोने जीतवामां शूरवीर होय, इन्द्रियोनो निग्रह करवामां शूरवीर होय, अने कषायोनो विजय करवामां
शूरवीर होय, तेओ ज वास्तविक शूरा छे एम पंडितो कहेछे ॥२१२ ॥

तत्वामृत
भापान्तर-
सहित.
॥ २१॥
नादत्तेऽभिनवं कर्म सच्चारित्रनिविष्टधीः । पुराणं निर्जयेद् बाढं विशुद्धध्यानसङ्गतः ॥ २१३ ॥
पंडित कोण कहेवाय?
संसारावासनिवृत्ताः शिवसौख्यसमुत्सुकाः। सद्भिस्ते गदिताः प्राज्ञाः शेषास्त्वर्थस्य वञ्चकाः॥
समतां सर्वभूतेषु यः करोति सुमानसः । ममत्वभावनिर्मुक्तो यात्यसौ पदमव्ययम् ॥ २१५ ॥
वास्तविक शूरवीर कोण ?
इन्द्रियाणां जये शूरः कर्मबन्धे च कातरः। तत्त्वार्थाहितचेतस्कः खशरीरेऽपि नि:स्पृहः ॥ २१६ ॥
परीपहमहारातिबलनिर्दलनक्षमः । कषायविजये शूरः स शूर इति कथ्यते ॥ २१७ ॥ युग्मम् ॥
उत्तम चारित्रनुं पालन करवामां ज चित्तने स्थापन करनार होवाथी मुनि नवा कर्मने बांधता नथी, अने
विशुद्ध ध्यानमा ज तत्पर होवाथी बांधेला कर्मनी अत्यंत निर्जरा करेछे ॥ २१३ ॥ जेओ संसारना वासथी विरक्त
होयछे, अने मोक्षतुं सुख मेळववामांज उत्सुक होयछे, तेओने ज सत्पुरुषोए वास्तविक प्राज्ञ (पंडित) कह्या छे, ते
सिवायना पंडितनामधारीओ तो मात्र पंडितशब्दना अर्थने ठगनारा ज छे ॥ २१४ ॥ शुभ मनवाळो जे पुरुष
सर्व प्राणीओ उपर समानदृष्टि राखेछे, अने जेणे सर्व प्रकारे ममतानो त्याग करेलो छे, ते ज मोक्षपुरीमां जायछे
॥ २१५ ॥ जे पुरुष इंद्रियोनो जय करवामां शूरवीर होय, अने कर्मनो बंध करवामां कायर होय, जेणे तत्त्वार्थनी
विचारणामां मनने स्थापन कर्यु होय, जे पोताना शरीर उपर पण निःस्पृह होय, जे परीसहरूपी महाशत्रुना
॥ २१ ॥

संसारध्वंसिनी चर्यां ये कुर्वन्ति सदा नराः।राग-द्वेषहतिं कृत्वा ते यान्ति परमं पदम् ॥ २१८ ॥ मलैस्तु रहिता धीरा मलदिग्धाङ्गयष्टयः। ते ब्रह्मचारिणो नित्यं ज्ञानाभ्यासं सिषेविरे ॥ २१९ ॥ ज्ञानभावनया शक्ता निभृतेनान्तरात्मना । अप्रमत्तं गुणं प्राप्य लभन्ते हितमात्मनः ॥ २२० ॥ प्रशंसापात्र जीवित कोर्नु ? संसारावास भीरूणां त्यक्तान्तर्बाह्यसङ्गिनाम् । विषयेभ्यो निवृत्तानां श्लाघ्यं तेषां हि जीवितम् २२१ जे सुश्रमणने गुरु तरीके मानतो नथी ते पामेलो अमूल्य मनुष्यजन्म हारी जायछे समं शत्रौ च मित्रे च समं मानापमानयोः। लाभालाभे समं नित्यं लोष्ठ-काञ्चनयोस्तथा ॥२२२॥ सैन्यनुं दलन करवामां समर्थ होय, तथा जे कषायोनो विजय करवामां शूर होय, ते ज वास्तविक शूर कहेवायछे ॥ २१६-२१७ ॥ जेओ संसारनो नाश करनार चारित्रनुं सदा पालन करेछे, ते पुरुषो राग-द्वेपनो क्षय करीने मोक्षपदने पामेछे ॥ २१८ ॥ जेओ शरीर उपर परसेवाना मळथी व्याप्त छतां मिथ्यालादिक आभ्यंतर मळ रहित होय, अने निरंतर ब्रह्मचर्य- पालन करवामां तत्पर होय ते धीर पुरुषो ज्ञानना अभ्यासनी सेवा करेछे ॥२१९॥ ज्ञाननी भावनाथी शक्तिमान् थयेला धीर पुरुषो निश्चळ आत्मा बडे अप्रमत्त नामना गुणस्थानने पामीने आत्मानुं हित साधेछे ॥ २२० ॥ जेओ संसारना वासथी भीरु होयछे, जेओए बाह्य अने आभ्यन्तर संगनो त्याग करेलो होयछे, अने जेओ विषयोथी निवृत्ति पाम्या होयछे, तेओर्नु ज जीवित प्रशंसापात्र छे ॥ २२१ ॥ शत्रु अने मित्र उपर, मान अने अपमानने विषे, लाभ अने अलाभने विषे, तथा माटीना ढेफा अने सुवर्णने विषे जेनी समान TAN

भापान्तर-
सहित.
तत्वामृत
॥ २२ ॥
सम्यक्त्वभावनाशुद्धं ज्ञानसेवापरायणम् । चारित्रचरणासक्तमक्षीणसुखकाङ्किणम् ॥ २२३ ॥
ईदृशं श्रमणं दृष्ट्वा यो न मन्येत दुष्टधीः । नृजन्मनः फलं सारं स हारयति सर्वथा ॥ २२४ ॥
त्रिभिर्विशेषकम् ।
रागादिवर्जकाः सङ्गं परित्यज्य दृढव्रताः । धीरा निर्मलचेतस्कास्तपस्यन्ति महाधियः॥ २२५ ॥
संसारोद्विग्नचित्तानां निःश्रेयससुखैषिणाम् । सर्वसङ्गनिवृत्तानां धन्यं तेषां हि जीवितम् ॥ २२६ ॥
जीवित सफळ कोर्नु?
सप्तभीस्थानमुक्तानां यत्रास्तमितशायिनाम् । त्रिकालयोगयुक्तानां जीवितं सफलं भवेत् ॥ २२७ ॥
दृष्टि होयछे सम्यक्खनी भावना वडे जेना शुद्ध परिणाम होयछे, जे ज्ञाननी सेवामां ज निरंतर तत्पर होयछे, जे
चारित्रनुं आचरण करवामां आसक्त होयछे, अने जेनी अभिलाषा मात्र एक मोक्षना अक्षय सुखमांज छे, एवा मुनिने
जोइने जे दुष्टबुद्धिवाळो पुरुष तेने महात्मा गुरु तरीके मानतो नथी, ते पुरुष पोताना मनुष्यजन्मना उत्तम
फळने सर्वप्रकारे हारी जायछे ॥ २२२ थी २२४ ॥ रागादिथी रहित, दृढ व्रतवाळा, निर्मळ चित्तवाळा अने
श्रेष्ठबुद्धिवाळा धीरपुरुषो सर्वसंगनो त्याग करी तपस्या करेछे ॥ २२५ ॥ जेओनुं चित्त संसारथी उद्वेग पाम्युं
होय, जेओ मोक्षना ज सुखनी इच्छा राखता होय, अने जेओ सर्वसंगथी निवृत्त थया होय तेओनुं जीवित
धन्य-प्रशस्य छे ॥ २२६ ॥ सात भयस्थानथी मुक्त, निद्रारूपी प्रमादमां नही पडेला, अने सर्वकालमां संयमयुक्त
पुरुषोनुं जीवितव्य सफळ छे ॥ २२७ ॥
॥ २२॥

आर्त-रौद्रपरित्यागाद् धर्म-शुक्लसमाश्रयात् । जीवः प्राप्नोति निर्वाणमनन्तसुखमच्युतम् ॥ २२८ ॥ आत्मानं विनियम्याशु विषयेषु पराङ्मुखः। साधयेत् स्वहितं प्राज्ञो ज्ञानाभ्यासरतो यतिः २२९ सर्वसंगनो त्याग करवाथी छेवटे मोक्षपद मळेछे यथा सङ्गपरित्यागस्तथा कर्मविमोचनम् । यथा च कर्मणां छेदस्तथाऽऽसन्नं परं पदम् ॥ २३०॥ विद्वाने शरीरनी पण मूर्छानो त्याग करवो जोइए यत् परित्यज्य गन्तव्यं तत् खकीयं कथं भवेत् ? । इत्यालोच्य शरीरेऽपि विद्वानाशां परित्यजेत् ॥ जीव आर्त अने रौद्रध्याननो त्याग करवाथी, तथा धर्म अने शुक्लथ्याननो आश्रय करवाथी अनंत सुखने आप- नार अक्षय मोक्षने पामेछे ॥ २२८ ॥ बुद्धिमान् मुनि आत्माने नियममा राखी-निश्चळ राखी, विषयोमा परा- मुख थइ, अने ज्ञानना अभ्यासमां तत्पर थइ शीघ्रपणे आत्महित-मोक्ष साधेछे ॥ २२९ ।। महापुरुषो जेम जेम संगनो त्याग करता जायछे तेम तेम तेओनां कर्म क्षीण थता जायछे, अने जेम जेम कर्मनी क्षीणता थती जायछे तेम तेम मोक्षपद तेमनी समीपे आवतुं जायछे ॥ २३० ॥ जे आ शरीर धन स्त्री पुत्रादिक अहीं त्यजीने ज परलोकमां जवानुं छे ते पोतार्नु केम कही शकाय?, आ प्रमाणे विचारीने विद्वान् पुरुष शरीरनी पण मूर्छानो त्याग करे ।। २३१॥

नूनं नात्मा प्रियस्तेषां ये रताः सङ्गसंग्रहे । प्रियश्चेदपकृत्तुच्छं खीकर्तु नैव शक्यते ॥ २३२ ॥
शरीरमात्रसङ्गेन भवेदारम्भवर्तनम् । तदशाश्वतमत्राणं तस्मिन् विद्वान् रतिं त्यजेत् ॥ २३३ ॥
भापान्तर-
सहित.
तत्वामृत
॥२३॥
संगति अने ममत्वथीज संसारनी वृद्धि अने दुःखनी परंपरा थायछे
सङ्गात् संजायते गृद्धिगुद्धो वाञ्छति सञ्चयम्। सञ्चयाद् वर्धते लोभो लोभात्संमृतिवर्धनम्॥२३४॥
ममत्वाजायते लोभो लोभाद् रागश्च जायते । रागाच जायते द्वेषो द्वैपाहुःखपरम्परा ॥ २३५ ॥
जेओ संग (परिग्रह) नो संचय करवामां आसक्त थयेला छे, तेओने खरेखर पोतानो आत्मा ज प्रिय-वहालो
नथी. केमके जो आत्मा प्रिय होय तो आत्मानो ज अपकार करनार तुच्छ वस्तुनो स्वीकार नज करी शके ॥२३२॥
केवळ शरीरना संगथी पण आरंभनी प्रवृत्ति थायछे, ते शरीर ज अनित्य छे, तथा आत्मानुं रक्षण करवा शक्तिमान्
नथी, तेथी विद्वान् माणसे तेना पर प्रीति न राखवी जोइए ॥ २३३॥ संगथी विषयो परनी लोलुपता उत्पन्न
थायछे, विषयनी लोलुपताथी धनादिकनो संचय करवानी इच्छा थायछे, धनना संचयथी लोभ वधे छे, अने लोभ
वधवाथी संसारनी वृद्धि थायछे ॥ २३४ ॥ ममताथी लोभ उत्पन्न थायछे, लोभथी राग उत्पन्न थायछे, रागथी
द्वेप उत्पन्न थायछे, अने द्वेप उत्पन्न थवाथी दुःखनी परंपरा प्राप्त थायछे ॥ २३५ ॥
॥ २३ ॥

द्रव्यना दोपो निर्ममता ज सर्वसुखनुं कारण निर्ममत्वं परं तत्त्वं निर्ममत्वं परं सुखम् । निर्ममत्वं परं बीजं मोक्षस्य कथितं बुधैः ॥ २३६ ॥ निर्ममत्वे सदा सौख्यं संसारस्थितिच्छेदनम् । जायते परमोत्कृष्टं आत्मनि संस्थिते सति॥ २३७ ॥ अर्थो मूलमनर्थानामों निवृतिनाशनः । कषायोत्पादकश्चार्थों दुःखानां च विधायकः ॥ २३८ ॥ आप्तोज्झितानि वित्तानि त्वया सर्वाणि संसृतौ।पुनस्तेषु रतिः कष्टा भुक्तवान्त इवौदने ॥ २३९॥ को वा वित्तं समादाय परलोकं गतः पुमान् ? । येन तृष्णाग्निसंतप्तः कर्म बध्नाति दारुणम् ॥२४०॥ तेथी निर्ममता ज उत्कृष्ट तत्त्व छे, निर्ममता ज उत्कृष्ट सुख छे, अने निर्ममताने ज पंडितोए मोक्षनुं उत्कृष्ट कारण कयुं छे ॥ २३६ ॥ निरंतर आत्माने विषे निर्ममतानी निश्चळ स्थिति थइ होय तो संसारनी स्थितिने नाश करनारं परम उत्कृष्टसुख प्राप्त थायछे ॥ २३७ ॥ द्रव्य अनर्थोनुं मूळ छे, द्रव्य मोक्षसुखनो नाश करनार छ, द्रव्य कषायोने उत्पन्न करनार छे, अने द्रव्य ज दुःखोने प्राप्त करावनार छ । २३८ ॥ हे प्राणी ! ते आ संसारमा भ्रमण करतां अनेकवार द्रव्यो प्राप्त करीने त्यजेला छे, तो फरीथी तेओना उपर प्रीति करवी ए भोजन करेला अन्नने वमन करी तेने ग्रहण करवानी जेम अत्यंत कष्टकारक छे॥२३९॥ आ जगतमा कयो पुरुष धनने साथे लइने परलोकमां गयो छे ? कोइ ज नहीं, त्यारे शा माटे तृष्णारूपी अग्निथी ताप पामेलो प्राणी दारुण कर्मने बांधे छे? ॥ २४० ॥ १ ममता रहितपणुं।

भापान्तर-
सहित.
तच्चामृत
॥ २४॥
जगतमां जे संतोपी तेज सुखी होयछे
तृष्णान्धा नैव पश्यन्ति हितं वा यदि वाऽहितम् । सन्तोपाञ्जनमासाद्य पश्यन्ति सुधियो जनाः॥
सन्तोपसारसदनं समादाय विचक्षणाः । भवन्ति सुखिनो नित्यं मोक्षसन्मार्गवर्तिनः ॥ २४२॥
तृष्णानलप्रदीप्तानां सुसौख्यं नु कुतो नृणाम् ? । दुःखमेव सदा तेषां ये रता धनसञ्चये ॥ २४३ ॥
सन्तुष्टाः सुखिनो नित्यमसन्तुष्टाः सुदुःखिताः। उभयोरन्तरं ज्ञात्वा सन्तोषे क्रियतां रतिः २४४
द्रव्याशां दूरतस्त्यक्त्वा सन्तोपं कुरु सन्मते! । मा पुनर्दीर्घसंसारे पर्यटिष्यसि निश्चितम् ॥२४॥
तृष्णा वडे अंध थयेला मनुष्यो हित के अहित जोइ शकता नथी, परंतु बुद्धिमान् मनुष्यो संतोषरूपी अंजनने
पामीने-आंजीने स्पष्ट रीते जोइ शके छे ॥ २४१॥ विचक्षण पुरुषो संतोषरूपी श्रेष्ठ रन पामीने मोक्षरूपी सन्मा-
गेमां चाली सुखी थायछे ॥ २४२ ॥ तृष्णारूपी अग्निथी तपी रहेला मनुष्योने सुख क्याथी होय ?. जेओ धननो
संचय करवामां आसक्त होयछे तेओने सदा दुःख ज प्राप्त थायछे ॥ २४३॥ संतोषी मनुष्यो ज सदा सुखी
छे, अने असंतोषी जनो सदा अतिदुःखी छे, आ प्रमाणे ते बन्नेनुं अंतर-तफावत जाणीने संतोषमा ज प्रीति
करवी योग्य छे ॥ २४४ ॥ हे सद्बुद्धिमान् ! द्रव्यनी आशाने दूरथी त्यजीने तुं संतोप ज राख. तेम करवाथी तारे
फरी आ दीर्घसंसारमा भ्रमण करवानुं रहेशे ज नहीं ॥ २४५॥
॥ २४ ॥

संतोषी ज परमसुखी होयछे
ईश्वरो नाम सन्तोषी यो न प्रार्थयतेऽपरम् । प्रार्थना महतामत्र परं दारिन्यकारणम् ॥ २४६ ॥
हृदयं दह्यतेऽत्यर्थ तृष्णाग्निपरितापितम् । न शक्यं शमनं कर्तु विना सन्तोषवारिणा ॥ २४७ ॥
यैः सन्तोषोदकं पीतं निर्ममत्वेन वासितम् । त्यक्तं तैर्मानसं दुःखं दुर्जनेनेव सौहृदम् ॥ २४८ ॥
यैः सन्तोषामृतं पीतं तृष्णातृङपनाशनम् । तैः सुनिर्वाणसौख्यस्य कारणं समुपार्जितम् ॥ २४९ ॥
सन्तोष लोभनाशाय धृतिं चाऽसुखशान्तये । ज्ञानं च तपसोवृद्ध्यै धारयन्ति सुनीश्वराः ॥ २५० ॥
संतोषी मनुष्य ज वास्तविक धनाढ्य छे, कारण के ते वीजानी पासे याचना करतो नथी. महापुरुषोने वीजानी
पासे प्रार्थना करवी ए उत्कृष्ट दारिद्यतुं कारण छे ॥ २४६ ॥ तृष्णा रूपी अग्निथी तप्त थयेलं हृदय अत्यंत बळेछे,
तेने शांत करवा माटे संतोषरूपी जळ विना बीजुं कोइ समर्थ नथी ॥ २४७॥ जेओए निर्ममता बडे वासित
थयेला संतोषरूपी जळजें पान कर्यु होय तेओ, जेम दुर्जन माणस मैत्रीनो त्याग करेछे तेम मानसिक दुःखनो
त्याग करेछे ॥ २४८॥ जेओए तृष्णा-लोभ रूपी तृषाने नाश करनार संतोषरूपी अमृतनुं पान कर्यु होय,
तेओए मोक्षना सुखनुं कारण उपार्जन कर्यु छ एम जाणवू ॥ २४९ ॥ मुनीश्वरो लोभनो नाश करवा
संतोषने धारण करेछे, दुःखनी शांतिने माटे धृति-धैर्यने धारण करेछे, अने तपनी वृद्धिने माटे ज्ञानने
धारण करेछे ॥२५०॥

भाषान्तर-
सहित.
तच्चामृत
॥ २५॥
ज्ञान-दर्शनयुक्त आत्मा ज शाश्वत छे
ज्ञान-दर्शनसम्पन्नआत्मा चैको ध्रुवो मम । शेषा भावाश्च मे बाह्याः सर्वे संयोगलक्षणाः ॥ २५१ ॥
संयोगमूला जीवेन प्राप्ता दुःखपरम्परा । तस्मात् संयोगसम्बन्धं त्रिविधेन परित्यजेत् ॥ २५२ ॥
जिनेश्वरभाषित भावो उपर श्रद्धा राखवी
ये हि जीवादयो भावाः सर्वज्ञैर्भाषिताः पुरा । अन्यथा च क्रिया तेषामिति चिन्ता निरर्थका ॥
यथा च कुरुते जन्तुर्ममत्वं विपरीतधीः । तथा हि बन्धमायाति तस्य कर्म समन्ततः ॥ २५४ ॥
ज्ञान अने दर्शनथी युक्त एक मारो आत्मा ज ध्रुव-शाश्वत छे, अने संयोगलक्षणवाळा बीजा सर्वे पदार्थों
बाह्य एटले अनित्य-क्षणविनाशी छे ॥ २५१॥ आ जीव संयोगना कारणथी ज दुःखनी परंपराने पाम्यो छे,
तेथी संयोगना संबंधने त्रिविधे-मन वचन अने कायाए करी त्याग करवो जोइए ॥ २५२ ॥ 'पूर्वे जिनेश्वरोए जे
जीवादिक पदार्थो कहेला छे, तेओनी क्रिया अन्यथा छे, एटले के ते पदार्थों तेवा प्रकारना नथी' एम जे
चिंतवतुं ते निरर्थक-निष्फल छे ॥ २५३ ॥ विपरीत बुद्धिवाळो जंतु जेम जेम ममता करेछे, तेम तेम तेने चो-
तरफथी कर्मनो बंध प्राप्त थायछे ॥ २५४ ॥
॥ २५॥

अज्ञान अने परिग्रहथी आत्मा कर्म बांधेछे अने दुःखी थायछे
अज्ञानावृतचित्तानां राग-द्वेषवशात्मनाम् । आरम्भेषु प्रवृत्तानां हितं तेषां न भीतवत् ॥ २५५ ॥
परिग्रहपरिष्वङ्गाद् रागो द्वेषश्च जायते । राग-द्वेषौ महाबन्धकारणं बत कर्मणाम् ॥ २५६ ॥
खरो यज्ञ कयो?
सर्वसङ्गान् पशून् कृत्वा ध्यानाग्नावाहुतिं क्षिपेत्। कर्माणि समिधश्चैव यागोऽयं सुमहाफलः ॥२५७ ॥
राजसूयसहस्राणि अश्वमेधशतानि च । अनन्तभागतुल्यानि न स्युस्तस्य कदाचन ॥ २५८ ॥
जेमनां चित्त अज्ञानथी आच्छादित थयां होय, जेमनो आत्मा राग-द्वेषने वश थयेलो होय, अने जेओ आरं-
भमां प्रवर्तता होय, तेओने भय पामेलानी जेम हितनी प्राप्ति थती नथी ॥ २५५ ॥ परिग्रहना संबंधथी जीवने
राग द्वेष उत्पन्न थायछे, अने ते राग द्वेष ज कर्मना घाटा बंधनुं कारण छे ॥२५६ ॥ सर्वसंगोने पशुरूप करी,
तथा कर्मोंने समिध (काष्ठ) रूप करी, ध्यानरूपी अग्निमां आहुति आपवी-होम करयो; ए भावयज्ञ महाफळने
(मोक्षने) आपनारो छे ॥२५७ ॥ हजारो राजसूय यज्ञो अने सेंकडो अश्वमेध यज्ञो कर्या होय, पण ते आ भावय-
ज्ञना अनंतमा भागनी तुल्य पण कदापि थता नथी॥ २५८॥

तत्त्वामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥ २६॥
शुभवुद्धि दया अने मैत्री आ लोक अने परलोकमां हितकर छे
सा प्रज्ञा या शमे याति विनियोगपरा हिता। शेषा हि निर्दया प्रज्ञा कर्मोपार्जनकारिणी ।। २५९ ॥
प्रज्ञाङ्गना सदा सेव्या पुरुषेण सुखावहा । हेयोपादेयतत्त्वज्ञा या रता सर्वकर्मणि ॥ २६०॥
दयाङ्गना सदा सेव्या सर्वकामफलप्रदा । सेविताऽसौ करोत्याशु मानसं करुणामयम् ॥ २६१॥
मैत्र्यगना सदोपास्या हृदयानन्दकारिणी। या विधत्ते कृतोपास्तिश्चित्तं विद्वेषवर्जितम् ॥ २६२ ॥
सर्वसत्त्वे दयामैत्री यः करोति सुमानसः।जयत्यसावरीन् सर्वान् बाह्याभ्यन्तरसंस्थितान् ॥२६३ ॥
.
ते ज प्रज्ञा (बुद्धि) कहेवाय के जे आत्माने हितकारक अने शुभकार्यना आरंभमां तत्पर थइ शमरसने पामे,
ते सिवायनी अन्य प्रज्ञा होय तो ते निर्दय अने कर्मने उपार्जन करनारी ज छ ॥ २५९ ॥ जे प्रज्ञारूपी स्त्री सर्व.
शुभकार्यमां प्रीतिवाळी होय, जे हेय अने उपादेय तत्वने जाणे, अने जे निरंतर सुख आपनारी होय, ते प्रज्ञारूपी
स्त्रीने ज पुरुषे सेववी जोइए ॥ २६० ॥ सर्व मनवांछित फळने आपनारी दया रूपी अंगनाने निरंतर सेववी, के
जेने सेववाथी ते तत्काळ मनने करुणामय करी दे छे ॥२६१॥ हृदयने आनंद आपनारी मैत्रीरूपी अंगनानुं निरंतर
सेवन करवू जोइए, के जेनी सेवा चित्तने द्वेष रहित करेछे ॥२६२ ॥ जे उदार चित्तवाळो पुरुष सर्व प्राणीओ उपर
दया अने मैत्रीभाव राखेछे, ते पुरुष बाह्य अने आभ्यंतर सर्व शत्रुओनो पराभव करेछे ॥ २६३॥
॥ २६॥

कर्मनी निर्जरा कोण करे छे ? शमं नयति भूतानि यः शक्तो देशनाविधौ। द्रव्यादिलब्धियुक्तो यः प्रत्यहं तस्य निर्जरा ॥ २६४ ॥ क्षमाथी कर्म खपेछे, अने चित्त निर्मळ थाय छे शमो हि न भवेद् येषां ते नराः पशुसन्निभाः । समृद्धा अपि सच्छास्त्रे कामार्थरतिसङ्गिनः॥ कर्मणां ध्वंसने चित्तं रागं मोहारिनाशने । द्वेषं कषायवर्गे च नाऽयोग्यो लब्धुमर्हति ॥ २६६ ॥ चित्ते नरक-तिर्यक्षु भ्रमतोऽपि निरन्तरम् । जन्तो! ते विद्यते नैव शमो दुरितबन्धनः ॥ २६७ ॥ मनस्याह्नादिनी सेव्या सर्वकालं सुखप्रदा । उपनेया त्वया भद्र! क्षमा नाम कुलाङ्गना ॥ २६८ ॥ जे प्राणीओने उपशम पमाडेछ, तथा जे द्रव्य क्षेत्र काळ अने भावने आश्रीने लब्धि युक्त होयछे एवा धर्मदेशना करवामां शक्तिवाळा पुरुषने हमेशां कर्मनी निर्जरा थायछे ॥२६४ ॥ जेओने शमता रस प्राप्त थयो न होय, ते पुरुषो पशुतुल्य ज छ कारण के तेओ श्रेष्ठ शास्त्रना ज्ञानरूपी समृद्धिवाळा होय तो पण काम अने अर्थमा ज मग्न थयेला होयछे ॥२६५ ॥ जे पुरुष शमादिक गुणहीन होवाने लीधे अयोग्य होय, ते कर्मने नाश करवामां तत्पर एवा चित्तने प्राप्त करी शकतो नथी, मोहरूपी शत्रुनो नाश करवामां राग (प्रीति) करी शकतो नथी, अने कपायना समूह उपर द्वेष धारण करी शकतो नथी ॥२६६ ॥रे प्राणी ! नरक अने तिर्यच गतिमां निरंतर भ्रमण करवा छतां पण तारा चित्तमां पापने नाश करनार शमरसनो लेश पण प्राप्त थयो नहीं ॥२६७॥ हे भद्र ! चित्तमां आनंद आपनारी अने निरंतर सुख करनारी क्षमा नामनी कुलीन स्त्री तारे परणवी अने सेववी योग्य छे ।। २६८ ॥

भापान्त
सहित.
तत्त्वामृत
॥ २७॥
क्षमया क्षीयते कर्म दुःखदं पूर्वसञ्चितम् । चित्तं च जायते शुद्धं विद्वेष-भयवर्जितम् ॥ २६९ ॥
प्रज्ञा सूया च मैत्रीच समता करुणाक्षमा।सम्यक्त्वसहिताः सेव्याः सिद्धिसौधसुखप्रदाः॥२७०॥
भयं याहि भवाद् भीमात् प्रीतिं च जिनशासने । शोकं पूर्वकृते पापे यदीच्छेहितमात्मनः॥२७१॥
कुसंगनो त्याग करी सत्संग करवो जोइए
कुसंसर्गः सदा त्याज्यो दोषाणां प्रविधायकः। सगुणोऽपि जनस्तेन लघुतां याति तत्क्षणात्॥२७२॥
सत्संयोगो बुधैः कार्यः सर्वकालसुखप्रदः । तेनैव गुरुतां याति गुणहीनोऽपि मानवः॥२७३॥
पूर्वे संचय करेलु दुःखदायक कर्म क्षमा वडे ज क्षीणताने पामेछे, अने चित्त द्वेष तथा भयथी रहित थइ शुद्धताने
पामेछे ॥ २६९ ॥ सिद्धि रूपी महेलने विषे निवाससुख आपनार प्रज्ञा, ईर्ष्यारहितपणुं, मैत्री, समता, करुणा,
अने क्षमानुं निरंतर सम्यक्षसहित सेवन करवू ॥ २७० ॥ हे प्राणी ! जो तुं पोताना आत्मानुं हित इच्छतो होय
तो आ भयंकर संसारथी भय पाम, जिनधर्म उपर प्रीति कर, अने पूर्वे करेला पापकर्मनो शोक कर ॥२७१ ॥
हे जीव ! सर्व दोषोने उत्पन्न करनार कुसंगनो सर्वदा त्याग करवो, कारण के ते कुसंगथी गुणी जन पण तत्काळ
लघुताने पामेछे ॥ २७२ ॥ बुद्धिमान पुरुषे निरंतर सुख आपनार सत्संग करवो योग्य छे, कारण के गुणहीन
मनुष्य पण ते सत्संगथी ज गुरुताने पामेछे ॥ २७३ ॥
॥ २७॥

साधूनां खलसङ्गेन चेष्टितं मलिनं भवेत् । सैहिकेयसमासक्त्या भाखद्भानोरपि क्षयः ॥ २७४ ॥
संसाँ न हि कर्तव्यः कदाचिदसतां सताम् । शुण्डिनीहस्तपयसा वारुणी च विधीयते ॥२७॥
रागादयो महादोपाः खलास्ते गदिता बुधैः । तेषां समाश्रयस्त्याज्यस्तत्त्व विद्भिः सदा नरैः ॥२७६॥
जगतमां गुणो ज पूजाय छे
गुणाः सुपूजिता लोके गुणाः कल्याणकारकाः । गुणहीना हि लोकेऽस्मिन् महान्तोऽपि मलीमसाः
सद्गुणैगुरुतां याति कुलहीनोऽपि मानवः । निर्गुणः सुकुलाढ्योऽपि लघुतां याति तत्क्षणात् ॥२७८॥
दुर्जनना संगथी सज्जनोनुं चरित्र पण मलीन थायछे, केमके राहुना संगथी देदीप्यमान सूर्यना किरणो पण क्षय
पामेछे ॥ २७४ ॥ सत्पुरुषे कदापि दुर्जननो संग करवो नहीं, कारण के कलालनी स्त्रीना हाथमा रहेला पाणी
अथवा दूध बडे मदिरानो भ्रम थायछे, अथवा हाथणीनी सूंढना संबंधथी जल पण मदिरा स्वरूप थइ जायछे
॥ २७५ ॥ पंडितोए रागादिक महादोषोने दुर्जनरूप कह्याछे, तेथी तत्त्वज्ञानी जनोए सर्वदा तेमनो संग त्यजयो
जोइए ॥२७६ ॥ लोको गुणोनी ज पूजा करेछे, अने गुणो ज आत्मानुं कल्याण करनार छे; महापुरुषो पण गुण-
रहित होय तो ते मलिन थायछे ॥ २७७ ॥ कुलहीन मनुष्य पण सद्गुणे करीने गौरव पामेछ, अने उत्तम कुलमां
उत्पन्न थयेलो पुरुप पण गुण रहित होय तो ते तत्काळ लघुताने पामेछे ॥ २७८ ॥

तत्त्वामृत भापान्तर- सहित. ॥ २८ ॥ शुद्ध चारित्र पाळनार महात्मानी इंद्रादि पण सेवा करेछे सद्वृत्तः पूज्यते देवैराखण्डलपुरस्सरैः । असद्वृत्तस्तु लोकेऽस्मिन् निन्द्यतेऽसौ सुतैरपि ॥२७१॥ चारित्रं तु समादाय ये पुनर्भङ्गमागताः । ते साम्राज्यं परित्यज्य दास्यभावं प्रपेदिरे ॥२८०॥ शीळनुं माहात्म्य शीलसंधारिणां पुसां मनुष्येषु सुरेषु च । आत्मा गौरवमायाति परत्रेह च सन्ततम् ॥ २८१ ॥ आपदो हि महाघोरास्तत्त्वसन्धानसङ्गतैः । निस्तीर्यन्ते महोत्साहैः शीलरक्षणतत्परैः ॥ २८२ ॥ वरं तत्क्षणतो मृत्युः शीलसंयमधारिणाम् ।न तु सच्छीलहीनानां कल्पान्तमपि जीवितम् ॥ २८३ ॥ सदाचारवाळा पुरुषने इंद्र सहित सर्व देवो पूजेछे, अने दुराचारी मनुष्य आ लोकमां पुत्रो बडे पण निंदायछे ॥ २७९ ॥ जेओ चारित्र ग्रहण करीने तेनो त्याग करेछे, तेओए चक्रवर्तीपणानो त्याग करी दासपणुं स्वीकार्य छे, एम जाणवू ॥ २८० ॥ निरंतर शीळने धारण करनारा पुरुषोनो आत्मा आ लोकमां तथा परलोकमां मनुष्योने विषे अने देवोने विषे गौरव पामेछे ।। २८१ ॥ तत्त्व साधवामां तैयार थयेला, शीळनुं रक्षण करवामां तत्पर, उद्यमने धारण करनार पुरुषो महाघोर आपत्तिओने तरी जायछे ॥ २८२ ॥ शीळव्रतने धारण करनारा मनुष्योनुं तत्काळ मृत्यु थाय ते सारं छे, परंतु शीळरहित पुरुषो कल्पांतकाळ-प्रलयकाळ पर्यंत जीवे ते सारं नथी ॥२८३॥ १ अने महा ॥ २८॥ ६ m

चरं परगृहे भिक्षा याचिता शीलधारिणा । न तु सच्छील भङ्गेन साम्राज्यमपि जीवितम् ॥ २८४ ॥
धनहीनोऽपि शीलाढ्यः पूज्यः सर्वत्र विष्टपे। शीलहीनो धनाढ्योऽपिन पूज्या खजनेष्वपि ॥ २८५ ।।
चरं सदैव दारिद्यं शीलैश्वर्यसमन्वितम् । न तु शीलविहीनानां विभवश्चक्रवर्तिनः ॥ २८६ ॥
धनहीनोऽपि सद्वृत्तो याति निर्वाणनाथताम् । चक्रवर्त्यप्यसद्वृत्तो याति दुःखपरम्पराम् ॥२८७॥
सुखा रात्रिभवेत्तेपां येपां शीलं सुनिर्मलम् । न तु सच्छीलहीनानां दिवसोऽपि सुखावहः ॥२८॥
शीळने धारण करी परयरने विपे भिक्षा मागची सारीछे-भीक्षा मागी जीववं सारं छे, पण शीळनो भंग करी
साम्राज्य सहित जीवg सारुं नथी ॥ २८४ ॥ शीळव्रतधारी पुरुष धनहीन होय तो पण सर्व जगतमा पूजनीय छे,
परंतु शीळरहित धनाढ्य होय छतां ते खजनोमां पण पूजवा योग्य नथी ।। २८५ ॥ शीळरूपी ऐश्वर्यथी युक्त एवं
दारिय पण श्रेष्ठ छे, परंतु शीळ विना चक्रवर्तीनो वैभव पण सारो नथी ॥ २८६ ॥ सदाचारी (शीळवंत) पुरुष
धनरहित होय तो पण ते मुक्तिनगरीनो खामी थायछे, अने सदाचार रहित चक्रवर्ती होय तो पण ते दुःखनी
परंपराने पामेछे ।। २८७॥ जेओ निर्मळ शीळने धारण करेछे तेमने रात्रि पण सुखकारक थायछे, परंतु शीळरहित
पुरुपोने दिवस पण सुखकारक थतो नथी ॥ २८८ ॥

तत्त्वामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥ २९॥
क्रोधथी कर्मनी अने दुःखनी वृद्धि तथा सुखनो विनाश थायछे
देहं दहति कोपाग्निस्तत्क्षणं समुदीरितः । वर्धमानः शमं सर्व चिरकालसमर्जितम् ॥२८९॥
क्रोधेन वर्धते कर्म दारुणं भववर्धनम् । शिक्षा च क्षीयते सद्यस्तपश्च समुपार्जितम् ॥२९०॥
सुदुष्टमनसा पूर्व यत्कर्म समुपार्जितम् । तद्विपाके भवेदुग्रं कोऽन्येषां क्रोधमुद्हेत् ? ॥२९१॥
शोध्यमाने तु कर्मणे सत्सुखं किं न जायते । खहितं यः परित्यज्य तापनात्पापमाहरेत् ? ॥२९२॥
छिद्यमाने ऋणे यद्वचेतसो जायते धृतिः। शोध्यमाने तु कर्मणे किं विमुक्तिन जायते? ॥२९३ ॥
प्रदीप्त थयेलो कोपानि ते ज समये प्रथम तो देहने ज बाळेछे, अने पछी वृद्धि पामे तो चिरकाळथी उपार्जन करेला
सर्व शमने (चारित्रने) भससात् करेछे, ॥२८९॥ क्रोधथी संसारने वधारनारुं दारुण कर्म वृद्धि पामे छे, क्रोधथी
गुरुनी आपेली शिक्षा नाश पामेछे, अने क्रोधथी चिरकाळथी संचेलो तप पण तत्काळ नाश पामेछे ॥२९० ॥
दुष्ट मन वडे करीने (क्रोध वडे करीने ) जे कर्म पूर्व उपार्जन कयु होय, तेना उदय वखते तेनुं फळ महा उग्र प्राप्त
थायछे, तेथी कोण पंडित बीजा उपर क्रोध करे ? ॥ २९१॥ जे पुरुष पोताना सुखनो-वैषयिकसुखनो त्याग करी
आतापनादि कष्ट वडे पापनो नाश करेछे, तेने कर्मरूपी ऋणनी शुद्धि थवाथी केम श्रेष्ठ सुख प्राप्त न थाय ?
॥ २९२ ॥ जेम द्रव्यर्नु ऋण दूर करवाथी चित्तनी स्वस्थता थायछे, तेम कर्मऋण दूर करवाथी मुक्ति केम प्राप्त
न थाय? ॥ २९३ ॥
॥ २९॥

शत्रुभावस्थितान् यस्तु करोति वशवर्तिनः प्रज्ञाप्रयोगसामर्थ्यात् स शूरः स च पण्डितः ॥ २९४ ॥
नीच मनुष्योनी साथे विवाद न करवो
विवादो हि मनुष्याणां धर्मकामार्थनाशकृत् । वैराग्यान्धजनेनापि नित्यं चाहितकर्मणा ॥ २९५ ॥
धन्यास्ते मानवा नित्यं ये सदा क्षमया युताः । वञ्यमानाः शहॅलन्धैर्विवादं नैव कुर्वते ॥ २९६ ॥
वादेन बहवो नष्टा येऽपि द्रव्यमदोत्कटाः । वरमर्थपरित्यागो न विवादः खलैः सह ॥ २९७ ॥
सुखनी इच्छावाळा पुरुषे निरभिमानी थर्बु
अहङ्कारो हि लोकानां नाशाय न तु वृद्धये । यथा विनाशकाले स्यात् प्रदीपस्य शिखोज्ज्वला ॥
जे पुरुष शत्रुपणाने पामेला कषायादिने बुद्धिप्रयोगना सामर्थ्यथी वश करेछे, ते ज शूरो अने ते ज पंडित कहे-
वायछे ॥ २९४ ॥ वैराग्यनो डोळ करनार अने अहित कर्म करनार पुरुषनी साथे मनुष्योनो विवाद धर्म अर्थ
अने कामनो नाश करनार छे ॥ २९५ ॥ जेओ निरंतर क्षमा वडे युक्त होयछे ते मनुष्यो ज धन्य छ। केमके तेओ
शठ अने लोभी पुरुषोथी ठगाय, तो पण तेमनी साथे विवाद कलह करता नथी ॥ २९६ ॥ जेओ द्रव्यना मदथी
उत्कट हता तेवा पण घणा पुरुषो वादथी नष्ट थायछे-थयाछे तेथी द्रव्यनो त्याग करवो सारो, पण लुच्चा पुरुषोनी
साथे वाद करवो सारो नथी ।।२९७।। अहंकार ए लोकोना नाशने माटे छे, पण वृद्धिने माटे नथी, केमके बुझावाने
वखते दीवानी शिखा पण उज्वळ-वधारे तेजस्वी थायछे, परंतु पछी तत्काळ ते दीवो बुझाइ जायछे ॥ २९८ ॥

तत्त्वामृत
भाषान्तर-
सहित.
॥३०॥
हीनयोनिषु बम्भ्रम्य चिरकालमनेकधा । उच्चर
चगोत्रं सकृत्प्राप्तः कस्ततो मानमुद्हेत् ? ॥ २९९ ॥
राग-द्वेषौ महाशत्रू मोक्षमार्गमलिम्लुचौ । ज्ञान-ध्यान-तपोरत्नं हरतः सुचिरार्जितम् ॥ ३०० ॥
बोधिने प्राप्त करी प्रमाद न करवो
चिरं गतस्य संसारे बहुयोनिसमाकुले । प्राप्ता सुदुर्लभा बोधिः शासने जिनभाषिते ॥ ३०१॥
अधुनातां समासाद्य संसारच्छेदकारिणीम् । प्रमादो नोचितः कर्तु निमेषमपि धीमता ॥ ३०२॥
प्रमादं ये तु कुर्वन्ति मूढा विषयलालसाः। नरकेषु च तिर्यक्षु ते भवन्ति चिरं नराः ॥ ३०३ ॥
आ जीव चिरकाळ सुधी अनेक प्रकारनी नीचयोनिओने विषे वारंवार भ्रमण करीने एकाद वखत उच्च गोत्रने
कदाच पाम्यो, तो तेथी करीने कोण बुद्धिमान अहंकार धारण करे? ॥ २९९ ॥ राग द्वेष रूपी महाशत्रुओ छे,
तेओ मोक्षमार्गमां चोर तरीके रहेला छे, तेथी तेओ घणा काळे कष्टथी उपार्जन करेला ज्ञान ध्यान अने तप रूपी
रत्नने लूंटी ले छे ॥ ३०० ॥ हे भव्य प्राणी ! अनेक योनिओथी व्याप्त एवा आ संसारमा तुं चिरकाळ रह्यो त्यारे
तने आ जिनधर्मनी बोधि के जे अत्यंत दुर्लभ छे ते प्राप्त थइ छे ॥ ३०१॥ संसारनो उच्छेद करनारी ते बोधिने
पामीने हवे बुद्धिमान पुरुषे एक निमेषमात्र पण प्रमाद करवो योग्य नथी ॥ ३०२ ॥ जे मूढ पुरुषो विषयमा
लालचु थइने प्रमाद करेछे, तेओ चिरकाळ सुधी नरक अने तिर्यचनी गतिमां वारंवार उत्पन्न थायछे ॥ ३०३ ॥
॥३०॥

जेणे आत्माने वश कर्यो तेणे जगत वश कर्यु
आत्मा यस्य वशे नास्ति कुतस्तस्य परो जनः । आत्माधीनस्य शान्तस्य त्रैलोक्यं वशवर्ति
आत्मिक सुख तेज तात्त्विक सुख छे
आत्माधीनं तु यत्सौख्यं तत्सौख्यं वर्णितं बुधैः । पराधीनं तु यत्सौख्यं दुःखमेव न तत्सुखम् ।।
पराधीनं सुखं कष्टं राज्ञामपि महौजसाम् । तस्मादेतत्समालोच्य आत्मायत्तं सुखं कुरु ॥ ३०६॥
आत्मायत्तं सुखं लोके परायत्तं न तत्सुखम् । एतत् सम्यग्विजानन्तो मुह्यन्ति मानुषाः कथम् ?
जे मनुष्यने पोतानो आत्माज वशवर्ती न होय, ते पुरुपने बीजो प्राणी शी रीते वश थाय ?, जेने पोतानो
आत्मा वश होय, एवा शांत पुरुषने त्रणलोकना जीव वशवर्ती थायछे ॥ ३०४ ॥ जे सुख आत्माने आधीन
छे ते ज तत्त्वथी सुख छे. परंतु जे सुख स्त्री धन विगेरे अन्यपदार्थने आधीन होय, ते सुख नथी पण दुःखज
छे, एम पंडितो कहेछे ॥ ३०५॥ हे प्राणी! मोटा तेजस्वी राजाओने पण अन्यवस्तुने आधीन जे सुख छे ते
कष्ट ज छ, एम विचारीने तुं आत्माने आधीन जे सुख छे तेनो स्वीकार कर ॥ ३०६॥ आ लोकमां जे आत्माने
आधीन छे तेज सुख छ, अने जे परने आधीन छे ते सुखज कहेवाय नहीं, आ प्रमाणे सारी रीते जाणनारा
मनुष्यो केम मोह पामे ? न ज पामे ॥ ३०७ ॥

भापान्तर-
सहित.
तत्वामृत
॥३१॥
निःसङ्गपणुं सुखनुं साधन छे
निस्सङ्गाजायते सौख्यं मोक्षसाधनमुत्तमम् । सङ्गाच जायते दुःखं संसारस्य निबन्धनम् ॥३०८॥
पूर्वकर्मविपाकेन बाधायां यच्च शोधनम् । तदिदं श्वदष्टस्य रजखेड्या हि ताडनम् ॥३०९॥
अज्ञानीने मानसिक दुःख पीडे छे, ज्ञानीने नही
अझं हि वाधते दुःखं मानसं न विचक्षणम् । पवनीयते तूलं मेरोः शृङ्गं न जातुचित् ॥३१०॥
ज्ञान- फळ चारित्र अने वैराग्य छे, धन नही
परं ज्ञानफलं वृत्तं विभूतिर्न गरीयसी । तया हि वर्धते कर्म सद्वृत्तेन विमुच्यते ॥३११॥
निःसंगपणाथी मोक्षने सिद्ध करनारं उत्तम सुख प्राप्त थायछे, अने वाह्यपदार्थना संगथी संसारनी
वृद्धि करनारुं दुःख प्राप्त थायछे ॥३०८ ॥ पूर्वकर्मना विपाकथी बाधा थये छते, जे बाह्य पापोपचार
वडे तेने दूर करवाने शोधन करवू ते कुतराथी करडायेलाने रजखेडीथी ताडन करवा जेवु छे, तेथी
भव्यपाणीए विपाकनी निर्जराना उपाय लेवा जोइए ॥ ३०९ ॥ खरेखर मानसिक दुःख अज्ञानीने
पीडेछे, पण विचक्षण पुरुपने पीडतुं नथी, पवन बडे आकडानुं तूल उडेछे, पण कदाचित् मेरुनु शिखर
उडी जतुं नथी ॥३१० ॥ ज्ञान प्राप्त थयानुं मुख्य फळ एज छे के श्रेष्ठ चारित्रनी प्राप्ति थाय; परंतु मोटी समृद्धि
प्राप्त थाय ए कांइ ज्ञान- फळ नथी, कारण के समृद्धि प्राप्त थवाथी कर्मनी वृद्धि थायछे, अने सुचारित्र प्राप्त थवाथी
कर्मनो क्षय थायछे ॥ ३११ ॥
॥३१॥

संबेगः परमं कार्यं श्रुतस्य गदितं बुधैः । तस्माद् ये धनमिच्छन्ति ते विच्छन्त्यमृताद् विपम् ३१२ श्रुतं वृत्तं यमो येषां धनं परमदुर्लभम् । ते नरा धनिनः प्रोक्ताः शेषा निर्धनिनः सदा ॥३१३॥ को हि तृप्तिं समायातो भोगैदुरितवन्धनैः । देवो वा देवराजो बा चक्राको वा नराधिपः॥३१४॥ दुष्ट आंतरिक चित्त तीर्थस्नानथी शुद्ध थतुं नथी दुष्टमन्तर्गतं चित्तं तीर्थलानान्न शुध्यति । शतशोऽपि जलैधौंतं मद्यभाण्डमिवाऽशुचि ॥३१५॥ खरं तीर्थ कयु? आत्मा चै सुमहत्तीर्थ यदाऽसौ प्रशमे स्थितः । यदाऽसौ प्रशमे नास्ति ततस्तीर्थ निरर्थकम् ॥३१६॥ पंडितोए श्रुतज्ञाननुं मुख्य कार्य-फळ संवेगज कह्यो छे, तेथी करीने जेओ ते ज्ञानथी धननी प्राप्तिने इच्छे छे तेओ अमृतमांथी विपने इच्छे छे, एम जाणवू ॥३१२ ॥ अत्यंत दुर्लभ एवं श्रुतज्ञान, चारित्र, अने यसरूप धन जेओनी पासे होय ते पुरुषोने ज धनाढ्य कहेला छे, ते सिवायना बीजाओ निरंतर निर्धन ज छे ॥ ३१३ ॥ अशुभ कर्मनो बंध करनारा भोग वडे करीने कयो देव, इन्द्र, चक्रवर्ती, के राजा तृप्ति पाम्यो छे ? कोइ पण भोगथी तृप्त थतुं नथी ॥ ३१४ ॥ शरीरनी अंदर रहेलं दुष्ट चित्त तीर्थमां स्नान करवाथी शुद्ध थतुं नथी, अशुचि मदिरानुं पात्र सेंकडो वखत जळथी धोइए तो पण ते पवित्र थतुं नथी ॥ ३१५ ॥ जो आत्मा प्रशमरसमां लीन थयेलो होय तो ते आत्माज महातीर्थ छे, अने जो ते आत्मा प्रशमरसमा रहेलो न होय तो वाह्य तीर्थो निष्फळ छे ॥३१६ ॥ S

तत्त्वामृत
शीलव्रते जले स्नात्वा शुद्धिरस्य शरीरिणः । न तु स्नातस्य तीर्थेषु सर्वेष्वपि महीतले ॥३१७॥
भाषान्तर-
सहित.
॥ ३२ ॥
खरं स्नान कयु
रागादिवर्जनं स्नानं ये कुर्वन्ति दयापराः। तेषां सुनिर्मलो योगो न तु लातस्य वारिणा ॥३१॥
आत्मानं स्नापयन्नित्यं ज्ञाननीरेण चारुणा । येन निर्मलतां याति जीवो जन्मान्तरेष्वपि ॥३१९॥
सर्वाशुचिमये काये शुक्र-शोणितसम्भवे । शुचित्वं येऽभिवाञ्छन्ति नष्टास्ते जडचेतसः ॥३२०॥
औदारिके शरीरेऽस्मिन् सप्तधातुमयेऽशुचौ । शुचित्वं येऽभिमन्यन्ते पशवस्ते न मानवाः ॥३२१॥
शीळवतरूपीज जळमां स्नान करवाथी आ जीवनी शुद्धि थायछे, परंतु पृथ्वी परना सर्वतीर्थोमा स्नान करवाथी
जीवनी शुद्धि थती नथी ॥३१७ ॥ जेओ दयाधर्मनुं पालन करवामां तत्पर थइने रागादिकना त्यागरूपी स्नानने
करेछे, तेओने मन वचन अने कायानो योग अत्यंत निर्मळ थायछे, परंतु जळना स्नानथी निर्मळ थतो नथी ॥३१८॥
सुंदर ज्ञानरूपी जळ बडे ज निरंतर आत्माने स्नान करावयु जोइए, के जेथी आ जीव बीजा जन्ममां पण निर्मळताने
पामे ॥ ३१९॥ पिताना वीर्य अने माताना रुधिरथी उत्पन्न थयेली आ काया सर्वप्रकारे अशुचि ज छे, तेनी शुद्धिने
जेओइच्छे छे ते जडचित्तवाळा पुरुषो नाश पामेछे-अधोगति पामेछे ॥३२०॥ आ औदारिक शरीर सात धातु बनेलं
होवाथी केवळ अशुचिज छे; तेने विषे जेओ शुचिपणानी मान्यता करेछे तेओ मनुष्य नथी, परंतु पशुओ ज छे ॥३२१॥
॥३२॥

मन वचन अने कायानी शुद्धि शाथी थाय ?
सत्येन शुध्यते वाणी मनो ज्ञानेन शुध्यति । गुरुशुश्रूषया कायः शुद्धिरेषा सनातनी ॥३२२॥
वर्ग-मोक्षोचितं नृत्वं मूढविषयलालसैः । कृतं खल्पसुखस्यार्थे तिर्यङ्-नरकभाजनम् ॥३२३॥
सामग्री प्राप्य सम्पूर्णा यो विजेतुं निरुद्यमः । विषयारिमहासैन्यं तस्य जन्म निरर्थकम् ॥३२४॥
वाक्य केवु वोलवू?
निरवद्यं वदे वाक्यं मधुरं हितमर्थवत् । प्राणिनां चेतआह्लादि मिथ्यावादबहिष्कृतम् ॥३२५॥
प्रियवाक्यप्रदानेन सर्वे तुष्यन्ति जन्तवः । तस्मात्तदेव कर्तव्यं किं वाक्येऽपि दरिद्रता? ॥३२६।।
सत्यभाषा बोलवाथी वाणी शुद्ध थायछे, ज्ञान वडे मन शुद्ध थायछे, अने गुरुनी सेवा वडे काया शुद्ध थायछे,
आ प्रकारनी शुद्धि शाश्वती छे ॥ ३२२ ॥ आ मनुष्यभव स्वर्ग अने मोक्ष मेळववानी योग्यता धरावेछे, तेने विषयमा
लंपट थयेला मूढ प्राणीओए अल्प सुखने माटे तिर्यच अने नरकगतिनुं पात्र कयुछे ॥ ३२३ ॥ जे प्राणी मनुष्यभव
विगेरे सर्वसामग्री पाम्या छतां पण विषयोरूपी शत्रुना मोटा सैन्यने जीतवानो उद्यम करतो नथी, तेनो जन्म
निरर्थक छे ॥ ३२४ ॥ मनुष्ये दोष रहित, मधुर, हितकारक, सार्थक, प्राणीओना चित्तने आह्लाद करनालं, अने
असत्य रहित एव॒ वचन बोलवू जोइए ॥३२५।। ज्यारे प्रियवचनना दानथी सर्वे जंतुओ प्रसन्न थायछे तो तेनुं ज दान
करवू योग्य छे, शा माटे वचनमां पण दरिद्रता राखवी जोइए । ॥ ३२६॥

तत्वामृत
भापान्तर-
सहित.
॥ ३३॥
व्रतं शीलं तपो दानं संयमोऽहत्मपूजनम् । दुःखविच्छित्तये सर्व प्रोक्तमेतन्न संशयः ॥३२७॥
मोक्ष मेळववाने योग्य कोण?
तृणतुल्यं परद्रव्यं परं च स्वशरीरवत् । पररामां समां मातुः पश्यन् याति परं पदम् ॥३२८॥
कर्मनी निर्जराना उपाय
सम्यक्त्वात् समतायोगानिःसङ्गात् सहनात्तथा। कषायविषयाऽसङ्गात् कर्मणां निर्जरा परा ॥३२९॥
ध्यान कोर्नु धरQ
आर्हन्त्यं महिमोपेतं सर्वज्ञं परमेश्वरम् । ध्यायेद् देवेन्द्रचन्द्रार्कसभान्तःस्थं खयम्भुवम् ॥ ३३० ॥
बत, शीळ, तप, दान, संयम अने जिनपूजा ए सर्व अवश्य दुःखने छेदनारां छे, तेमां कांइ संशय नथी ॥३२७॥
परद्रव्यने तृणसमान गणतो, परजीवना शरीरने पोताना शरीर समान गणतो, अने परस्त्रीने माता समान गणतो पुरुष
मोक्षपदने पामेछे ॥ ३२८ ॥ समकित, सर्व प्राणीओ उपर समान दृष्टिपणुं, निःसंगपणुं, क्षमा, अने कपाय तथा
विपयनो त्याग, आ सर्व कर्मनी उत्कृष्ट निर्जरा करनारा छे ॥ ३२९ ॥ अष्ट महापातिहार्यादिक संपत्ति वडे युक्त,
अद्भुत महिमावाळा, देवेन्द्रो अने चंद्र सूर्यादिक जेनी पर्पदामा स्थिर थइने बेठा होयछे, अने जेने पोतानी मेळे
ज ज्ञान प्राप्त थयुंछे, एवा सर्वज्ञ परमेश्वरना स्वरूपनुं ध्यान करवू ॥३३० ॥
॥३३॥

1 पार्श्वजिनेन्द्रने नमस्कार सर्वातिशयसम्पूर्ण दिव्यलक्षणलक्षितम् । सर्वभूतहितं देवं शीलशैलेन्द्रशेखरम् ॥ ३३१ ॥ घातिकर्मविनिर्मुक्तं मोक्षलक्ष्मीकटाक्षितम् । अनन्तमहिमायुक्तं त्रयोदशगुणस्थितम् ॥ ३३२॥ अनन्तचरितं चारुचारित्रसमुपासितम् । विचित्रनयनिर्णीतं विश्वं विश्वैकवत्सलम् ॥ ३३३ ॥ निरुद्धकरणग्रामं निपिद्धविषयद्विपम् । ध्वस्तरागादिसन्तानं भवज्वलनवामुचम् ॥ ३३४ ॥ दिव्यरूपधरं धीरं विशुद्धज्ञानलोचनम् । अपि त्रिदश-योगीन्द्रकल्पनातीतवैभवम् ॥ ३३५ ॥ जे पार्श्वनाथ प्रभु सर्व अतिशयो वडे संपूर्ण छ, एकहजार ने आठ शुभलक्षणोथी युक्त छे, सर्व प्राणीओना हितकर छे, शीळरूपी मेरुपर्वतना शिखर पर रहेला छे, चार घातिकमथी रहित छे, जेना उपर मोक्षलक्ष्मीए प्रेमना कटाक्ष नांखेला छे, जे अनंत महिमावाला छे, जे तेरमा गुणस्थानके रहेला छे, जेनुं चरित्र अचिन्त्य छे, जे मनोहर चारित्रवडे सेवायेला छे, सर्वप्रकारना नयो जेनो निर्णय करेछे-सत्यदेव तरीके प्रतिपादन करेछे, जे ज्ञान स्वरूपे सर्वव्यापक छे, जे सर्व जगतना जीवोने वत्सल छे, जेणे इंद्रियोना समूहने रुंध्यो छे, जेणे विषयरूपी शत्रुनो तिरस्कार कयों छे, जेणे रागादिकनी परंपरानो नाश कोछे, जे संसाररूपी दावानळने बुझववामां मेघ समान छ, जेनुं रूप अनुत्तर विमानना देव करतो पण अनंतगुण मनोहर छे, जे मेरुपर्वतनी जेवा धीर छे, जेने केवळज्ञान अने केवळदर्शनरूपी निर्मळ लोचन छे, जेनो वैभव देवेंद्रो अने योगींद्रोनी कल्पनामां पण आवी शकतो नथी, जेणे स्थाद्वादरूपी

तत्वामृत
भापान्तर.
सहित,
॥ ३४॥
स्याद्वादपविनिर्घातभिन्नान्यमतभूधरम् । ज्ञानामृतपयःपूरैः पवित्रितजगत्रयम् ॥ ३३६ ॥
इत्यादिगणनातीतगुणरत्नमहार्णवम् । देवदेवं जिनं पार्श्व वन्दे सर्वार्थसिद्धिदम् ॥ ३३७ ॥
ग्रन्थकार प्रशस्ति
एकषष्टितमे पट्टे विजयसिंहसूरिराट् । तपगच्छाधिपो जज्ञे सज्ज्ञानामृतशेवधिः ॥ ३३८॥
तस्य ज्ञान-क्रियानिष्ठः सचारित्रपवित्रितः। संविग्ननभोमार्तण्डः श्रीसत्यविजयोऽन्तिषत् ॥३३९॥
कर्पूरोज्वलसत्कीर्तिः कर्पूरविजयाभिधः। तेषां शिष्योऽभवद् भूरिकीर्तिकरिताम्बरः ॥३४०॥
श्रीक्षमाविजयो नाम वाचंयमशिरोमणिः । तेषां पट्टे पवित्रात्मा बभूव भुवि विश्रुतः ॥ ३४१ ॥
वज्रना घा वडे अन्यमतरूपी पर्वतोने भेदी नाख्या छे, जेणे ज्ञानामृत रूपी जळना प्रवाह वडे त्रण जगतने पवित्र
कर्या छे, जे देवोना पण देव छ, अने जे सर्व अर्थनी सिद्धिओने आपनार छे, इत्यादिक असंख्य गुणोरूपी
रत्नोना महासागररूप पार्श्वनाथ जिनेश्वरने हुँ वंदन करुंछु ॥ ३३१ थी ३३७ ॥ एकसठमी पाटे श्रीतप-
गच्छना अधिपति, ज्ञानरूपी अमृतना निधि समान श्रीविजयसिंह नामना सूरीश्वर थया ॥ ३३८ ॥ तेमना
शिष्य ज्ञान अने क्रियामां तत्पर, सुंदर चारित्र वडे पवित्र, अने संविग्नपक्षरूपी आकाशमा सूर्यसमान श्रीसत्यविजय
नामना थया॥३३९॥ तेमना शिष्य कपूरना जेवी उज्वळ कीर्तिवाळा, अने घणी कीर्ति वडे आकाशने विचित्र वर्णवाळू
करनार श्रीकपूरविजय नामे थया ॥३४०॥ तेमनी पाटे सर्वमुनिओमां शिरोमणिरूप, पवित्र आत्मावाळा, अने
पृथ्वीपर विख्यात एवा श्रीक्षमाविजय नामे थया. ॥ ३४१ ॥
॥३४॥

सज्जनानां शिरोत्तंसः श्रीजिनाद्विजयाभिधः। तदन्तिषत् पण्डितानां मण्डनो भुवि विश्रुतः॥३४२॥ तदन्तिषत् पवित्राङ्ग: श्रीमदुत्तमनामभृत् । जैनसिद्धान्तपाथोधिमन्थनकसुराचलः ॥ ३४३ ॥ तत्पपूर्व दिग्नाथः श्रीपद्मविजयाभिधः । वर्तते भव्यसत्त्वानां बोधयन् भुवि विश्रुतः ॥ ३४४ ॥ ज्योतिर्विजयशिष्येण गुरूणामुपदेशतः। आद्याभ्यासे कृतो ग्रन्थः श्रीतत्त्वामृतनामकः ॥ ३४५ ॥ वाणवेदाप्टचन्द्रे च वत्सरे विक्रमार्कतः । माघे श्वेताप्टमीघने कृतोऽणहिल्लपत्तने ॥ ३४६ ।। तेमना शिष्य सज्जनोना मुगटसमान पंडितोना आभूषणरूप अने पृथ्वीपर प्रख्यात श्रीजिनविजय नामे थया ॥३४२ ॥ तेमना शिष्य पवित्र शरीरवाळा श्रीउत्तमविजय नामना थया, तेओ जैनसिद्धान्तरूपी समुद्रनुं मथन करवामां मंदराचळ पर्वत समान हता ॥ ३४३ ॥ तेमनी पाटरूपी उदयाचळ पर्वत उपर सूर्यसमान श्रीपद्मवि- जय नामे थया, तेओ भव्यप्राणीओने बोध पमाडता पृथ्वीपर प्रसिद्ध थया छे ॥ ३४४ ॥ तेमना शिष्य ज्योतिर्विजये गुरुमहाराजना उपदेशथी आ श्रीतत्त्वामृत नामनो ग्रन्थ अभ्यासनी शरुआतमां रच्यो छे॥३४५॥ विक्रम संवत् १८४५ महाशुदी आठमने दिवसे अणहिल्लपुरपाटणमां आ ग्रन्थ समाप्त कर्यो ॥३४६॥ པའོ། །། ॥ गुर्जरभाषान्तरोपेतं श्रीतत्त्वामृतं समाप्तम् ॥ R-52-53-2-12-HS-38-SAT-SR-12-5

है
-
NIRL
TRISTMASTER
AST
Printed by Ramchandra Yesu Shedge ab the Nirnaya-sagar Press, 23, Kolbhab Lane. Bombay.
SAL
इति श्रीज्योतिर्विजयविरचितम्-तत्त्वामृतम् ।
Published by Lalbhai Motilal, Hon. Secietary Shri Hansavijayaji Jain free library Baroda.
More
S

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Tatvamrit

Author
Muni, Jyoti Vijay
Title
Tatvamrit
File name
Tatvamrit
Text
OCR done
Citation
1919
Published
2010/02
Publisher
Shri Hansvijay Ji Jain Library, Barodara
Language
Sanskrit
Pages
80
Library
Prakrit Bharati Academy, Jaipur
DLI number
322192
Barcode
99999990245031.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
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c3OUSzZKuDs
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