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Striprabhodhini

Subhadradevi · 2009/10

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R समर्पण। . ३ पार्थिवसम्पत्तिके सहित अपार्थिव ऐश्वर्यके सम्मिलनमें जिनका हृदय देवमंदि- रके समान पवित्र और उज्ज्वलहै; दानमें, दयामें, संदर्नुष्ठानमें, और देशहितैपितामें जिन्होंने सम्पूर्ण मनुष्योंकी श्रद्धा और भगवान् श्रीवकटेश्वरजीके आशीर्वादको आकर्षित कियाहै। बम्बई महानगरीमें निन्होंने "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यंत्रालय को स्थापित पार लुप्तमाय जीर्णशीर्ण वेदवेदाङ्गादि ऋषि मुनि मोक्त सम्पूर्ण शास्त्रोंके ग्रयोंको छाप उनका उद्धार करके अतुल यश और अक्षय पुण्यका संचय किया है. जिनके प्रकाशित सचित्र साप्ताहिक "श्रीवेङ्कटेश्वरसमाचार" को सम्पूर्ण देशदेशा- न्तरके राना, महाराना, सेठ, साहूकार, धनी, निर्धनी, योगी, यती आदि हिन्दीमात्रके नाननेवाले गौरवकी दृष्टि से अवलो- फन करते और मातृभाषाका सर्वोत्तम पत्र मानकर मुक्तकंठसे प्रशंसा करते हैं:- जिनका भगवदत्यनुराग, साहित्यानुराग और शिष्टाचार अनिर्वचनीय है; जिन्होंने सम्वत् १९५६ के माड़वाड़देशीय कालमें शतशः पितृ मातृहीन सुकुमार अनाथ बालकोंका भरण पोषण करके उनके जीवनकी रक्षा कीहै । उन्हीं परोपकारी, सज्जनहितकारी, विद्याप्रचारोत्साही, वैश्यकुलदिवाकर, आश्रित वत्सल, उदारचरित, न्यायपरायण, भ्रातृवर्य, श्रीमान् सेठजी खेमराज श्रीकृष्णदासजीके करकमलों में सहर्ष कृतज्ञहृदयसे भगिनी-सुभद्रादेवीकी यह पुष्पांजलिरूपी "स्त्रीप्रबोधिनी" समर्पित FARRAR HTTE man

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tuntyoti भूमिका। पाठिकागण ! इस समय भारतवर्ष में एक विवाद उठरहाहै, और उसमें दो दल हो रहेहैं, एक दल तो यह कहताहै कि, स्त्रियोंको लिखाना पढ़ाना और और शिक्षा करना उचित नहीं, इससे स्त्रिये हमारे वश न रहेंगी और उनके चरित्रमें अन्तर पडेगा; इस दलमें मायः प्राचीन शैलीके अनपढ़ लोग और कुछ पुरातन ढंगकी शिक्षा पाये संस्कृत सीखे हुए पंडितभी हैं [पुरातन शब्दसे हमारा संकेत यहाँ उस पद्धतिसे है जो महाभारतके पीछे विदेशियोंके आक्रमणसे नष्ट भ्रष्ट होकर खिचडीके रूपमें परिणत हुई है. ] दूसरा दल हमारे नव शिक्षितोंका है वे यह चाहतेहैं कि, हमारी ललनायें पश्चिमी रीति नीतिक अनुसार 'एम ए' 'वीए' होकर हमारे साथ वन उपवनके विहारमें निरत रहैं,और परदा वा पीजरके समान घरोंमें बन्द रहना यह एक बहुतही घृणित कार्य है, स्त्रियोंका पुरुषोंके समान सत्व है इस कारण खान पानं निमंत्रण आदिमें पुरुपोंके समानही स्त्रियोंका सम्मिलन होना चाहिये इसके अतिरिक्त औरभी बहुतसी बातें हैं जिनका मैं इस छोटीसी भूमिकाम उल्लेख करना नहीं चाहती यथा वकालत वरिष्टरी करना दफ्तर जाना इत्यादि । मेरी सम्मतिमें धर्मशास्त्र के अनुसार तथा देशकालके अनुसार यह दोनोंही रीति ठीक नहीं हैं, नतो मैं पढे लिखे सभ्य पुरुषके साथ अशिक्षित स्त्रीका जोडाही सुखदायक मान सकती हूं और न मैं उनको ऐसी उच्चकक्षाकी बनानेमें ही कल्याण देखतीहूं कि, वह अपने स्वामीको बूटका प्रसाद जबतक प्रदान. किया कर, और मोधूराम वैठे २ सहा करें, हे बहनो ! मैं स्त्रीशिक्षाकी विरोधी भी नहीं हूं, उनको निपट मूर्ख रखना मेरा अभीष्ट नहीं है। मैं उनके मुखसे अश्लील गाली सुननेकी पक्षपातिनी नहीं हूं, मैं अनेक देवी देवताके होते हुए उनसे भूत, प्रेत, मियाँ, मदार, ताजिया, पुजवाना नहीं चाहती, और न गंडे तावीजाके लिय बाबाजीके पास भेजना चाहतीहूं; और न वशीकरनके लिये मुलापर भेजनेकी पक्षपातनी हूं और मेरी यह इच्छा भी नहीं है कि, स्त्रिये अपने स्वामीके घरमें पातेही गहने कपडेका रोना ले बै, न मैं यह चाहतीहूं कि, खडी, मलाई, मिठाई, चटनीसे वह अपने स्वामी और श्वशुरका संचित धन चटनी करजाय, पर मैं यह भी नहीं चाहती कि, बूट, स्त्रीप्रबोधिनी। कमीज, कुरता, साया पहनकर पुरुषोंके समान जहाँ तहाँ डोलतीहुई, अपने सास श्वशुरको मूर्खराजकी पदवी प्रदान करती हुई सनातन सत्य रीतिको एक साथ तिलांजलि देती हुईं, लजीले नेत्रकी लाजको कोसों दूर फेंकती हुईं, स्या. मीके प्रत्यक्ष वा परोक्षमें अन्य पुरुषोंस प्रेमालापकरती हुई, बंधु बांधव कुटम्बि- योको झिजकारती हुई,बिनाकुरसीके नवैठती हुई, देवी देवताका तिरस्कार कर- ती सोडावाटरकी बोतल गटकती हुई, धम कर्मको खोती हुई, हमारे देशकी कुलवधू इस प्रकारकी सभ्य बनें। मेरी यही इच्छाहै कि, वे सदृहस्थिनी वने, सास श्वशुरकी मर्यादा सेवाकरना सीर, अपने कुटुम्बियोंसे प्रेमपूर्वक यथायोग्य वीव रक्खें, देवरानी, जिठानी में वैर विवाद न होने दें, देवर जेठके बालकोंको अपने बालकोंके समान जाने, जितना ईश्वरने दियाहै उसीमें संतोष रक्खें, पतिको ही परम पूजनीय परम उपास्य सर्वस्व परमगुरु परम देवताः मानें, पतिकी आज्ञासही धर्म कर्म करें बड़े बूढ़ोंकी उत्तमरीतिको अपने हाथो न खोई, व्रत, दान, दयाका सदा सेवन करें, घरका खर्च हिसाब किताब अपने माप करसकें, जितनी चादर देखें उतने पैर फैलावें, अपने बालकोंका पालन, पोषण, शिक्षा, और साधारण रोग होनेपर उनकी चिकित्सा करसके, विविध प्रकारके भोजन बनानेकी दक्षता सब प्रकारका कसीदा काढ़ना, सीना, गृहकार्यकी कुशलता, कुटम्बी जनाका संतो- प संपादन, स्वामी के मन प्रसन्नताके निमित्त अपरिमितगान, और वाद्यकी दक्ष- ता, बूढ़ोंका सन्मान, समानोंसे आलाप, छोटोंको अशीश, पतिव्रतधर्मकी पराकाष्ठा धर्मको आगे करके समस्तकार्योका कर्तव्य, परमेश्वरका विश्वास, कुल मर्यादाका पालन, कुरीति निवारणमें दृढ़ता, बाहर जानेमें अवगुंठनसहित गमन, माभूषणोंका अति शब्द न करना, बहुत ऊँचे स्वरसे न हँसना, स्वामीके दोष देखकरभी सहलेना, मीठीरीतिसे उन दोषोंके दूर करनेका उपाय करना, उद्धतता न करना, केश न ठगन्ना, पतिव्रता स्त्रियोंके चरित्र जानना, तदनुकूल आचरण करना, दोनोंकुलकी प्रतिष्ठा रखना, आनतानकी बात न करना, द्याके गुण जानना, मूर्खताके दोष देखना, स्वामी वा भाई बंधुके साथही तीर्थ यात्रा करना, गृहका स्वच्छ रखना, मीठे वचनोंसे विरत न होना, पड़ोसियोंसे प्रेमवृत्तिसे वर्तना, विपत्तिकालमें साथी होना,स्वामीके दुःखमें सौगुना नेह करना इत्यादि सगुणसम्पन्ना हिन्दू नारीही हिन्दू रमणीयोंको बनाना चाहतीहूं, ऐसी स्त्रियोंक विषयमें भगवान् मनुजी लिखगये हैं कि- भूमिका। (७) " " यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः । यौतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तवाफलाः क्रियाः ॥" जहां स्त्रियोंके आँसू गिरते हैं वह कुल शीघ्र नष्ट होजाता है, और जहा स्त्री प्रसन्न रहती हैं उस घरमें देवता रमते हैं, इस कारण यथाथ स्त्रीशिक्षा वहीहै जिससे गृहस्थ धर्म, कुलधर्म, सनातनधम, पतिव्रतधर्म, इनकी यथार्थ शिक्षा हृदयंगम होजाय; मैं भारतकी हिन्दू स्त्रियोंको ऐसी शिक्षा और ऐसीही विद्या दिना चाहती हूं जिससे पतिके मुखसे मुख आर पति दुःखमें दुःख मानें जैसा भगवती जानकीजीने रामचंद्रसे वन जानेके समय कहा था कि- "प्राणनाथ करुणा यतन, सन्दर-सुखद सुजान । तुम विन रघुकुल कुमुद विधु, सुरपुर नरक समान ॥ खग मृग परिजन नगरवन,वलकल विमल दुकूल नाथ साथ सुरसदनसम, पर्णशाल सुखमूल, जिस दिन ऐसा समय फिर आजाय कि, स्त्रिये अपने स्वामीका: स्वामित्व और उसका सन्मान करना यथोचित जान जायँ फिर इससे अधिक और शिक्षा की क्या आवश्यकता रहेगी, सब कुछ जानने परभी अनुसूया महारानी जानकी जीको क्या सिखा गई हैं। मात पिता भ्राता हितकारी । मितसुखप्रद सुनुराज कुमारी ॥ अमित दान मा वैदेही । अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥ वृद्ध रोगवश जड धनहीना । अंधधिर क्रोधी अतिदीना ॥ ऐसह पतिकर किये अपमानाः । नारि पार यमपुर दुखनाना ॥ एक धर्म एक व्रतनेमा .काय वचन मनपति पदप्रेमा । जिस, शिक्षासे यह धर्म आवै वही शिक्षाहै, जिस विद्यासे उपरोक्त धर्म कर्मका ज्ञान हो वही विद्याहै, और स्त्रियेकि लिये यही उचितहै इन्हीं धर्मकर्मको शिक्षा वा ' ज्ञानकें प्रचारके निमित्त और भारतवर्षीय. नारियों और बालिकाओंक सुधारके निमित्त मैंने यह पुस्तक लिखीहै कि, जिसको पढ़कर और उसके अनुसार वर्ताव कर स्त्रिये सची.भारतमाहला न जाय, सास, ननद, देवरानी जिठानियोंके साथ अच्छा बर्ताव करना सीखें, गृहस्थियोंके केश मिटें, कारण कि, भाई बंधु कुटुम्बी जनोंके वैमनस्यका कारण विशेषकर स्त्रियाँही होतीहैं और कही २ तौ पुरुष उनके खेलनेका मृग छौनाही बन जाते हैं और इस कहावतको चरितार्थ करतेहैं कि- (८) स्त्रीप्रबोधिनी। * नारि विवश नर सकल गुसाई । नाचहिं नट मर्कटकी नाई, ऐसे कुसंस्कार मिट जॉय, वालकोंके संस्कार यथासमयमें होनेलग[ कहीं स्त्रियोंकी हठसेही गुड़िया गुडेके समान वालकाका विवाह होताहै ] और कुरीति मिटकर देशभरमें आनंद छाजाय,कारण कि,जव स्त्रिये ठीक होजायगीतो उत्पत्ति भी ठीक होगी, वालकोंका सुधार विशेषकर स्त्रियोंपरही निर्भरहे, इसीकारण मैंने इस पुस्तकमें प्रायः उपयोगी सभी वार्ताको ऐसी सरलताके साथ लिखा कि, जिससे सहजमेंही नारी जन समझसकें, मुझे आशा तो बहुतहै पर यदि कुछभी इससे हमारी सहपाठकाओंको लाभ होगा तो मैं अपने परिश्रमको सफल मानूंगी, ऐसी परम उदार, न्याय परायण, गुणग्राहक, शर बकरीको एक घाट पानी पिलाने वाली तथा विद्या प्रचारमें लक्षारुपये खर्च करनेवाली गवर्नमेंटके सुराज- में स्त्रिय विद्या और सुशिक्षा ग्रहण न करेंगी तो फिर किस दिन अपनेको सभालेगी कारण कि, अब वह कुराज्य और कुदिन नहीं है कि, जहाँ स्त्रिय घरसे बाहर हुईं कि, हाथ धरागया, अब वह सुराज्य है कि, " वातोपि नावंसयदंशुकान कोलम्वयेदाहरणाय इस्तम्" पवनभी अंचल नहीं उडासकती हाथसे तो कौन सकताहै ऐसे पवित्र गवर्नमेंटको जितना धन्यवाद दिया जाय थोड़ाहै । वहनी उठो ! और अपनेको सम्हालो। इस.प्रकार सब प्रकारके सत्वसहित यह पुस्तक परम उदार गुणीजन मंडलीमंडन विद्याप्रचार निरव "श्रीवेङ्कटेश्वर" (स्टीम् ) यंत्रालयाध्यक्ष सेटजी श्रीयुत खेमराज श्रीकृष्णदासजीको समर्पण कर दी है कि, जो इस समय विद्याके प्रचारमें निरत होकर भारतवर्ष, वडा उपकारको कार्य कर रहेहैं। पाठिकाोंसे मेरी यह प्रार्थना है कि, इस पुस्तकमें जहाँ कहीं अशुद्धि रह गईंहों उसे क्षमाकर मुझे सूचित करदें जिससे कि, दूसरी बार छपनेपर अशु- द्वियोंका मुधार हो जायगा। आपकी धर्मभगिनी, सुभद्रादेवी, मुरादाबाद.

..॥ श्रीः॥ स्त्रीप्रबोधिनीकी- अनुक्रमणिका। - ... वेसनकी कढ़ी .... ... ... . "" " ... " विषय.. पृष्ठांक. विषय. पृष्टांक. १ सोपान वालिका विद्या व्यय आदिका प्रबंध शिक्षा १. २ सोपान। किशोरी अवस्था खरलरीतिसे शिक्षाका देना भोजन संस्कार ७९ पढना उडदकी दाल बनाने की विधि...८० लिखना १२ उडदकीधोवा दाल बनानेकी विधि" सामान्य शिक्षा इंसराजके चावल सिझानेकी रीति ८१ शिल्पकार्य (अर्थात् सीना, पिरोना, सुनखरचेके चावल सिझानेकी रीति" कसीदा आदि) टोपी कुरता सीना तथा छांटना ३० मूंगकी कढ़ी दुकलियां और चौसइयाटोपीसी आटेकी रोटी ८३ ना तथा छांटना ३१ पूरी अंगरखेका कतर बाँत तथा सीना: ३३ खस्तापूरी ... ... कोटका कतर बौत ..... बनारसी पूरी कचौड़ी वासकट, अचकनका कतर बात खस्ता कचौड़ी कमीजका कतर बाँत तथा चित्र ३७-१० पायजामेका कतरवाँत तथा चित्र ३७-४० कुरतीका कतर बोत तथा चित्र ३८-६५ करका ८६ कच्ची पक्की बेल बूटियोंका कादना जिमीकंद ८७ तथा उनके चित्र .मखानोंकी खीर जालीका काढना रामतुरईकी खीर ... ...८८ कमालका काढना... चावलकी खीर कामदानीका काटना सलमे सितारेकी चेल बनानेकी ८९ गुझिया क्रिया तथा चित्र:, .......... ४९ निरे सलमेकी घेर गुलूवंद बनानेकी क्रिया भुनीहुई खिचड़ी चित्रकारी रायता... गृहकार्य तथा चित्र ... " तरकारी आलू भिन्डी सावत... .... " ... " 1 कूटकी खीर " इल्लुआ मोहनभोग, -- टिकोने... ... " मगदके लड्डू (१०) অঙ্গবিন্দা। विषय. मंगके लड्डू ... ... " " " ... ... ९५ ... ... ... पतिकी शुश्रूषा ... ... . " पृष्ठांक विषय, पृष्टांक. ९१ पेट फूलना या बदहजमीका यल १११ गलेकी पीडाका यत्न आमका अचार नोंद न आनेका यत्न आमका मुरब्बा फुडिया फुन्सीका यत्न ... नींबूका अचार ९२ आँख तथा डाढ पीडाका यत्न ... ११२ चटनी... दाँतोम कीडा लगनेका यत्न अदरखकी चटनी पेटकी आँवका यल शरीरपालन ९३ मदररोगका यत्न ... स्वास्थ्यरक्षा खट्टीडकार आनेका यत्न ... ११३ गरमी छातीमें दर्द होनेका यत्न... शरदी ९६ पीनेका जल ३ सोपान । गृहिणी-विवाह निद्रा और पातिव्रत धर्म ११४ भोजन.. गृहिणी कर्तव्य १२० व्यायाम १२५ वस्त्रादिपहरना ४ सोपान । अमोदिनी स्नान गृहनिवास सदानन्दमयी १२९ १०० रसिकता रोगीचा हास्य... १३४ सेवाकरनेवालीका कर्तव्य... १०३ क्रीडा कौतुक १३८ विछौना तकिया चद्दर आदि १०६ १४० शय्यांछत १४१ पथ्य विपदा विपत् चिकित्सा बोसरका खेल.. अग्निले जलनेकी मौषधि १५५ चाकू कतरनीआदिके घाव भरनेकी रजोदर्शन महौषधि.. ऋतुका समय १५७ ततैया या शहदकी मक्खीकाटने- १५९ की महौषधि ऋतुरक्षा १५० विच्छूके काटनेकी महौषधि मातुमें आचार कनखजूराके काटनेका यल ..." रजस्वलाशो कर्तव्य कर्म... १५२ कांताके छुटानेका यत्न ... सहवास चूहेके काटेका यत्न सहवासका सुख दुःख ... सहवासका समय ... कुत्ता, बावला कुत्ता, मकरी, सर्प, १५३ कुटकी आदिके काटनेका यत्न ... ११० ५ सोपान । गर्मिणी १५६ शिरपीडाका यत्न १११ । गर्भमें बालककी अवस्था " ... ... तालका खेल १०७ गुलाम चोरका खेल १०८ | तुरपका खेल ... १०९ / शतरंजका खेल यौवनके लक्षण " " अनुक्रमणिका। (११). विषय. १६५ | ज्वर... ... " .... " ... १६७ हुचकी पृष्टांक. विषय. पृष्टांक गर्भ अवस्या और गर्भ रक्षा १५९ मुंहआजाना गर्भ परीक्षा पुत्रकी परीक्षा संग्रहणी कन्याकी परीक्षा १६६ - काँचका निकल आना .... गर्भमै नपुंसककी पहचान.. गर्भमें दो बालककी पहचान चिनग गर्भचिकित्सा (बारहों मदिनेकी)" दाँतोंके निकलनेका इलाज प्रसूतिके पूर्व आयोजन १७१ छालांकी दवा सूतिका गृह... २७४ अधिक लार गिरे उसका इलाज प्रसवका नियत समय ( शीन बालकका पेशाय बंद होना प्रसूताखोके लक्षण). ...१७६ गुदा पकनेका इलाज सोपान । जननी-धात्रीशिक्षा ढरनेका इलाज सोतेमें दाँत पीसनेका इलाज ... १९४ " " ... " और प्रसव १७९ अधिक शर्दी .. " गर्भस्थलोसे स्राव .. " ... ... -2 .. " ... प्रसूविकी पीडा और चिकित्सा ... १८४ पसली पेशाबका बंद होना... ... १८५ शीतला शिशुपालन.. १९६ दुग्धोत्पत्तिजनितज्वर शिशुस्वास्थ्यरक्षा १९९ जननीका कर्तव्य १८६ स्नान... २०० बालचिकित्सा १८७ वस्त्र सांसकी पहचान ... १८८ आहार आंखोकी पहचान वायु २०१ नांदका नभाना निद्रा ... बालकके रोनेकी पहचान... दाँत २०२ बालकका खांसना १८९ टीका माताकी पहचान माताकी स्वास्थ्यरक्षा ." ढूँडीका पक जाना... शिश शिक्षा २०३ खालंका लगजाना... कहानी... २०५ दूध डाटना... १९० अभ्यास और संग २०६ अन्यान्य शिक्षा २१० इसलीका जाना ७सोपानाकर्ती-धर्मोपदेश २१२ भाखका दुखना १९२ रीति और नीति २१५ खाँसी... त्योहार २१९ रक्तातिसार ... १९२ दिवाली वा दीपमालिका आँधका अतिसार वसन्तपंचमी भाँधखूनके दस्त ... मकरकी संक्रान्ति ... दूध न पीना . ... पेट म्बलना ... . ... .. ग - (१२) अनुक्रमणिका। विषय, . . ... ... , " " ... ... नाग पंचमी १ ... गुरुजन अतिथि सेवा ... ... ... दास दासी ... .... ... " मथुरा तीर्थ विषय.. पृष्ठांक. पृष्टांक. होली .. २२१ रामनौमी ... २४८ ज्येष्ठ सुदी १० कारसुदीमें देवीजीकी पूजा (नव भाषाढी पूनो दुर्ग) तीजै. भादोंमें शुक्लपक्षकी पंचमी २४९ सलूनो... संक्रांति व्रत... २२२ । कार्तिक शुक्लपक्षकी एकादशी जन्माष्टमी (देवोठान ) ३५० श्रावणके सोमवार... संतान संतति ३२४ । कात्तिक सुदी दोयज ३५१ आत्मीय स्वजन १२५ | तीर्थ सेवा ( तीर्थ यात्रा और ३२६ उसका फल). दरिद्र और भिखारी... २२७ काशी तीर्थ २५२ सद्व्यवहार.. २२८ वैद्यनाथ तीर्थ २५३ ८ सोपान । पुण्यवती २३२ हरिद्वार तीर्थ- ૨ धर्माचरण २३७ प्रयागराज ... नित्य कर्म २३८ अयोध्या तीर्थ प्रभाती... २५६ आरती... श्रीवृन्दावन तीर्थ व्रत २४१ कामाख्या तीर्थ २५८ श्रावण सुदी तीज २५९ भादों सुदी तीज २४२ (पुष्कर तीर्थ कार्तिक वदी चौथ... ... २४३ चन्द्रनाथ तीर्थ २६० ज्येष्ठमासकी मावस वदरिकाश्रम तीर्थ चैत्रमासके शुक्लपक्षकी तीज २४४ | सेतुनंध रामेश्वर तीर्थ २६१ पुत्रके लिये व्रत चन्द्रशेखर तीर्थ माघ सुदी चौथ श्रीक्षेत्र तीर्थ ३६२ श्रावण मालकी शुक्ल चतुर्थी ९ सोपान । श्रोता २६४ मोक्षके लिये व्रत सीता फागुन सुदी तेरस संती २७३ भादों सुदी चौदख २४६ शैव्या २७५ भादोपदी अष्टमी सावित्री... वैशाख मालके शुक्लपक्षकी तीज २४७ | दमयन्ती २७७ ललिता सात २७८ पद्मिनी.. २८७ दूर्वाष्टमी व्रत लीलावती इत्यनुक्रमणिका। VE० २४० " ब्रह्मपुत्र तीर्थ. ... ... ... " ... " .. ... २४५ " ... .. ... ... . ..

स्त्रीप्रबोधिनीका
उपोद्घात ।
ran
WHAURYA
tum
दिल्लीशहरमें आज लाला पुरुषोत्तमदासजीके यहाँ बड़ी
धूमधाम होरही है, लालाके घर आज समध मिलावा होगा
अजमेरसे समधनें मिलाप करनेके लिये आई हैं; घरमें नाया
ने लुगाइयोंको बुलावा देनेके लिये जारही हैं, सारे मुहल्लोंकी
लुगाइये आज लालाके घरको जानेके लिये तैयार होरही हैं,
क्या व्याही क्या क्वाँरी क्या बालक क्या बूढी सभीने ला-
लाके घरकी सुरत ली, लुगाइयोंके इकट्ठी होज़ानेपर समधौरा
हुआ दोनों ओरकी लुगाइयें ढोलकी ले लेकर गालियें गानेके
लिये बैठी, समधनोंमें मिलाप हुआ लालाकी बहूने समधनके
गलेमें हार डालकर मिलाप किया। इसके पीछे दोनों ओरकी
लुगाइयोंने खूब गालिये गाई जिनको सुनकर सारी लुगाइयें
हँसते २.लोट पोट होगई, लालाकी घरवालीने समधनोंको
खिला पिला कर बहुतसी तीयलें और रूपये देकर उनको
विदा किया, समधौरा होजानेके पीछे सब लुगाइयें अपने र
घरोंको चली गई, समधौरा देखने के लिये एक घरकी तीन लु-
गाइयें गई थीं, इनमें एक तो नंद थी और दो भावजै थीं लड़-
कीकीअवस्था आठ नौ वर्षकी होगी इस लड़कीकी एक बहन
और थी वह समधौरा देखने नहीं गई घरहीं पर रही थी, यह
तीनों जनी आकर समधौराकी बड़ाई करने लगीं, भावजने
कहा जीजी।हमैं बडा पछतावा रहा कि तुम यह तमाशा देखने

(१४).. श्रीप्रबोधिनीका- नहीं गई बडा सुन्दर समधौरा हुआ जो नहीं गया वही पछता- या ऐसा दिल्ली में कोई घर न रहा कि,जिस घरकी लुगाइये इस समधोरमें न गई हों तुम तौ रातदिन कागज किताव लिये इनके कीड़े मकोड़ोंको देखती रहती हो जाने इनमें क्या धरा है, इसी अवसरमें उसकी छोटी वहनने कहा कि, जीजी। समधौरमें लुगाइयोंने बड़ी २ सुन्दर गालिये गाई थीं जिनको सुन २ कर सभी लुगाइयें ठढे मार २ हँसती थीं समधौरेमें बड़ी धूम रही. यह सुनकर उसकी बड़ी वहन जिसका नाम विद्यावती था वह अपनी छोटी वहन प्रकाशवतीसे वोली, कि, वहन देखो ! मुझे लुगाइयोंकी ऐसी दशा सुन २ कर बड़ा दुःख होता है,जो मैं विचार कर देखती हूं तो पहले सम- यकी स्त्रियोंसे आज कलकी स्त्रियें दिनपर दिन सूर्खही होती जाती हैं। उसका कारण यही है कि, स्त्रियें अनपढ़ी हैं, आज- कल स्त्रियोंकी जैसी अवस्था होरही है उसको देखकर मन काँप उठता है, हे परमेश्वर ! इस देशकी स्त्रियोंका क्या कभी सुधार होगा ? क्या इस देशकी स्त्रिये सदैव जड़ता युक्त रहेंगी। क्या पहलेकी बुद्धिवाली स्त्रियोंके समान इस देशकी स्त्रिये फिरभी कभी होंगी? क्या अब फिर इनके भले दिनोंका उदय न होगा ? क्या यह अपना इसी अवस्थामें पड़े रहकर जीवन विताबैंगी। चाहे इन्हें अपनी दासी बनाकर रक्खो चाहै घरकी टहलनी बनाकर रक्खो, परन्तु इन्हें अपनीअव- स्थापर कुछभी ध्यान नहीं होगा,हे जगदीश्वर ! हे भक्तवत्सल प्रभू । तेरा नाम दयामय है, फिर इन विचारी अवलाओंके । "o- उपोदात। (१५) उपर क्यों नहीं अपनी कृपा करता इनको हीन दशामें रख- नेसेही तू प्रसन्न क्यों है ? क्या इनकी सृष्टि तेरे द्वारा नहीं हुई ? जो इनके ऊपर ऐसा रूठा हुआ है, हे दयालु ! अव तो अपनी कृपाकटाक्षसे इनकी अवस्थाको सुधार और इनको विद्यारू- पी अमृतका पान कराय पुनार जीवदान दे । इस प्रकारसे पश्चात्ताप करती हुई अपनी छोटी बहन प्रकाशवतीसे वोली कि, देखो वहन ! तुमने जो वातें कहीं हैं इनसे कुछ लाभ नहीं है तुम जो जहाँ तहाँ जाकर ढोलकी वजानेके लिये ले वैठती हो और बुरे २ गीत गाया करती हो इन सब बातोंको छोड़ दो, अब मैं तुम्हें इतिहासादिककी कथा सुनाती हूँ जो तुम्हारे बहुत काम आवंगी और इन गालियोंके गाने वजाने तुम्हें कुछ लाभ नहीं होगा,इस समय तुम्हारी अवस्था घर २ फिरनेकी नहीं है अभी तुम वालकहो, मेरी समझमें यह आता है कि, सबसे पहले तुम्हें लिखना पढ़ाना सिखाना चा- हिये, जिसके द्वारा फिर तुम सभी कामोंमें चतुर हो जाओगी, मैं तुम्हें ऐसी २ उपयोगी वातें सिखलाऊंगी कि, जो तुम्हारे जन्म भर काम आवंगी और सारे संसारमें तुम्हारी वड़ाई हो- गी, और ऐसीही वातै लड़कियोंको सुनानी योग्य है, जिनके द्वारा वह.सव अपने घरके कामकाजको भली भाँतिले निर्वाह कर सके,आज तो मैं तुम्हें "स्त्रियोंकी भूत और वर्तमान दशा" सुनाती हूँ।इसके पीछे जो शिक्षा लड़कियोंको होनी चाहिये वह सभी सुनाऊंगी कारण कि, इस समय दिन थोड़ा रहगया है, कल प्रातःकालहोतेही तुझे सम्पूर्ण शिक्षाकी बातें सुनाऊंगी;

बीप्रबोधिनीका- - हे बहन ! पहले समयमें इस देशकी स्त्रियाँ कैसी २ पढ़ी लिखी और चतुर होती थीं प्राचीनकालमें इस देशकी स्त्रियोंका ऐसानि यमथा कि, स्त्रिये दो श्रेणीमें विभक्त होतीथी एकतो ब्रह्मवादिनी दूसरी सद्योवधू-जो स्त्रियें विवाह नकरके परब्रह्ममें आत्मस- मर्पण करती थीं वह.ब्रह्मवादिनी कहाती थीं, और जो विवाह करके गृहस्थाश्रममें वास करती थीं वह सद्योवधूके नामसे पुका- री जाती थीं, स्त्रिये धर्मशास्त्र, नीतिशास्त्र,साहित्य गणित दर्श- न और विज्ञानादि सभी शास्त्रोंको पढ़ती थीं, वह चित्रविद्या, शिल्पविद्या और नृत्यगीतादिकी विद्याओंको पढ़ती थीं,परन्तु पतिकी सेवा और तत्त्वज्ञानको प्राप्त करना यह उनकी सम्पूर्ण विद्याओंका शिरोभूषण था. भास्कराचार्यकी कन्या लीलावती ने पाटीगणित और लीलावती नामक दो ग्रंथ वनाये थे, मंडन मिश्रकी स्त्रीने रसोई वनाते २ शंकराचार्यके साथ घोर दार्श- निक विवाद किया था. चित्तौरकी रानी मीराबाई कवि थी, पृथ्वीराजकी स्त्री पद्मावती अनेक कला कौशलसे युक्त थी। महाभारतमें लिखा है कि, दुपदराजाने आलेख्यरचना और शिल्पकादि सब विषयोंमें कन्याको अति यत्नके साथ शि- शादी थी, कन्याने द्रोणाचार्यले विद्याकी शिक्षा पाई, विराद राजाके घरमें नृत्यशाला थी उस स्थानपर अर्जुनने उत्तरा को नृत्य गीतादिकी शिक्षा दी थी. हे बहन ! ऊँची शिक्षाके साथही साथ उनको गार्हस्थ शिक्षा भी दी जाती थी। आय व्यय रन्धन शिल्प आदि गृहकार्यों में वह अत्यन्त निपुण थीं उनकी शिक्षाका प्रधान गुण यही था, वह उनका विना आसरा

उपोडात।
लिये एक पगंभी नहीं चलसंकती थीं, आज कलके समान
भक्ति और प्रेम रहित शिक्षा स्त्रियोंके हृदयको भयभीत और
कम्पायमान कर देती है. परन्तु उस समयकी शिक्षाका यह
केन्द्र था उनके अन्तरिक्षमें ईश्वर और सन्मुखमें स्वामी थे
उनका हृदय इन दोनों केन्द्रोंको छोड़कर और किसी ओरको
भी चलायमान नहीं होता था।
देखो प्रकाशवती ! रामचंद्रके वनवासके समयमें महारानी
सीताजीने कहा था। “प्राणनाथ तुम विन जग माहीं । मो.
कहँ सुखद कतहुँ कोउ नाहीं। पतिही स्त्रियोंका देवताहै जो
स्त्री छायाके समान अपने पतिकी अनुगामिनी होतीहै उसीका
जीवन धन्य है वह इस लोक और परलोकमें स्वामीके साथ।
सुखपूर्वक समयको विताती है. स्त्रीको उचित है कि, वह मन
वचन कर्मसे एकाग्र वृत्ति हो अपने पतिकी सेवा करै, किसी
समयमी अपने पतिके वाश्यका उलंघन न करै; मैंने विवाहके
समयमें स्वामीके करकमलमें अपने जीवनको समर्पण कर
दिया है यह विचार कर जिस कामके करनेसे उनका हित
हो उनके निमित्त उस कार्यों मैं अपने प्राणोंकोभी समर्पण
कर सकतीहूं।
फिर और भी सुनो महारानी शकुन्तलाने राजा दुष्यन्तसे
कहा था कि, हे राजन् ! स्नीका निरादर मत करों, कारण कि,
स्त्री धर्मकार्यमें पिताके समान दुःखमें माताके समान और
पथिकको विश्राम स्थानके समान है, हे महाराज तनक ध्यान
धर देखो कि, एक सत्यही परमधर्म है, फिर सत्यप्रतिज्ञाका
पालन करनाही श्रेष्ठधर्महे तुम सत्यको मत छोड़ो।

(१८)
छीप्रबोधिनीका-
फिर हे बहन ! औरभी देख राजा दशरथजीने अपनी
रानी कौशल्याजीका इसप्रकार वर्णन कियाथा ॥ प्रियवोलने
वाली कौशल्याजी हमारी सेवाके समयमें दासीके समान,
रहस्यालापमें सखीके समान, धर्मके आचरणमें स्त्रीके समान,
उत्तम सम्मति देनेके समयमें बहनकी समान और भोजनके
समयमें माताके समान व्यवहार करती है।
और २ लिखी पढ़ी स्त्रियोंकी बात तो दूर जानेदों, राजा-
की रानीभी घरके काम काजसे घृणा नहीं करतीथी, राजरा-
नी द्रौपदीजी अपने पतिके घरमें अतिथि और दास दासि-
योंका भोजन और कपड़ोंके पहरनेके सम्बन्धमें स्वयं विचार
करतीथी, घरको भली भाँतिसे स्वच्छ करती और रसोईको
स्वयं अपने हाथसे बनातीथी।
हे बहन ! स्त्रियें पहले गुरुजीके आश्रममें जाकर विद्याको
पढ़तीथीं वा अपने पतिसे पढ़तीर्थी, परन्तु उनकी
शिक्षाका उदेश्य इससमयकी स्त्रीशिक्षासे स्वतंत्रथा, इससमय
स्त्रीशिक्षाका जैसा प्रचार हुआहै उससे स्त्रियें बंधनसहित
घरमें रहते हुएभी पुरुषोंके समानं स्वभावको प्राप्त होजातीहैं,
उससमयकी स्त्रीशिक्षासे स्त्रिये स्त्रियें रहतीथीं अब तो पुरुषसे
भी बढकर बननेकी इच्छा करती हैं।
हे बहन जभी तोउससमयकी स्त्रियोंका सन्मान होताथा।
माता, पिता, माता तथा कुटुम्बके सभी कुटुम्बी उनका आदर

उपोद्घात। (१९) सन्मान करतेथे और मधुर वचनोंसे उनके साथ बातचीत करते थेवोभी माता, पिता, सासाश्वशुरकी सेवामें तत्पर रहतीं थीं। पहली स्त्रियोंका यह पहरावाथा कि, वह वर्तमान राजपूतों की स्त्रियोंके समान घाँघरा और चोली पहरा करतीथीं तथा उसके ऊपर चादरको ओढ़तीथीं; आजकलके समान प्रच- लित केवल एकमात्र साड़ी कुरतीकाही पहरावा नहीं था केवल साड़ीही पहरनेसे स्त्रिये आधी नंगी रहती हैं परन्तु उन्हैं तो साड़ीही रुचतीहै, लैंहगे, दुपट्टे चोली आदिका पहरावा तो एक साथही लोप होता चला जाताहै, इसीसे उनकी लज्जा और शीलताकी हानि होतीजातीहै उस समय स्त्रियें बाहर जातीथीं मनुस्मृति और रामायणमें लिखाहै स्त्रियें अपनी शुद्धतासेही रक्षित रहती हैं वंधनसे उनकी रक्षा नहीं होती उनको बंधनकी कुछ आवश्यकता नहींहै स्त्रिये उत्सवमें,यज्ञमें, सभामें, भोजनआदि सब स्थानों में जाती थीं वह स्थपर और घोड़े परभी चढ़ती थीं और अपने देशकी रक्षाकरनेके लिये रणभू- मिमें स्वयं युद्ध करती थीं, परन्तु यह वीर नारियों की बात है। हे वहन ! यूरोपकी स्त्रियोंका वाहर जाना और उस समय की हिन्दू स्त्रियोंका वाहर जाना यह दोनों स्वतंत्रहैं, विलायत की स्त्रियें अपनी इच्छानुसार अकेली जिस तिसके साथमें इधर उधर चली जाती हैं, वह घरमें रहकर पोशाक और वस्त्रोंके प्रति उदासीनता रखती हैं परन्तु जिस समय बाहर जाती हैं उसी समय बढ़िया नेत्रोंको तृप्ति देनेवाली पोशाक (२०) स्त्रीप्रबोधिनीका- पहरती हैं। भांति २ के सुंदर २ गहने पहर कर परमसुगंधित लेवेंडरको लगाकर सज धज कर पुरुषोंका मन आनंदित करना ही उनका उद्देश्य है, उनका जीवन केवल बाहिरी चमक दमक और गर्वसे परिपूर्ण है, किन्तु हिन्दू घरानेकी स्त्रिये किस प्रकारसे बाहर जाती थीं उसको वतादेना भी तुम्हें अत्यन्त आवश्यक है वह अपने पिताके साथ स्वामीके साथ अथवा पुत्रके साथ बाहर जाती थीं,वह वीर नारी होकरभी धर्म और आत्मरक्षाके सम्बन्धमें अपनेको यथार्थ क्षमता शील नहीं जानतीथीं, वह स्त्रियें अपनी अमूल्य निधिकी रक्षा करनेकेलिये पिता स्वामी और पुत्रको नियुक्त करती थीं, वह स्वामीका चित्त प्रसन्न करने के लिये घरमें रहकर सुन्दर २ वस्त्र और आभूषण पहरती थीं, स्वामीके परदेश जानेपर वह घरसे बाहर नहीं जाती थीं और न अपना.शृंगा- र ही करती थीं उस समय वह एकाग्रचित्त होकर सावधानी के साथ नियमसहित ब्रतोंको किया करती थीं। हे बहन ! वह स्त्रिये विद्याभ्यास करती थीं परन्तु ईश्वर परायणता और पतिके बीचमें भक्ति यह उनकी शिक्षाका प्रधान उद्देश्य था इस समय सभ्य जातिकी स्त्रियोंकी शि- शाका उद्देश्य केवल बाहिरी शोभा तथा पार्थिव सुख और पुरुषोंकी बराबरी करना है, वह प्रयोजन होनेके समय पिताके साथ स्वामीके साथ अथवा पुत्र के साथ बाहर जाती थीं, वर्त मान समयकी स्त्रियें केवल अपने कटाक्षरूपी वाणकी सहा-

उपोद्धात।
(२१).
यतासे मनुष्यों के चित्तको उन्मत्त करनेके लिये वाजारकी शेर
करनेको वाहर जाती हैं, पूर्वकालकी स्त्रियें पतिसेवामें रत
रहती तथा गृहकार्य और आमदनीके अनुसार खर्च करतीथीं
और आज कलकी स्त्रियें पतिसे अपनी सेवा कराती, नौकर
के. समान उस पर अपना हुक्म करती, अतिथिसे अपनी
सेवा कराती गृहकार्यको नीच जातिका कार्य कहकर
उससे घृणा करती और स्वामीकी आमदनीसे चौगुना
खर्च करती हैं चाहे स्वामी किसी अवस्थामें क्यों न हो परन्तु
उनको उसकी अवस्थापर कुछभी ध्यान नहीं. रात दिन उन्हें
तौ गहनोंकी हाय हाय रहती है. वह अपने पतिसे केश किये
विना संतुष्ट नहीं, रहतीं, पूर्वकालकी स्त्रियोंका तो धर्मही
जीवन था और आजकलकी स्त्रियोंका जीवन बाहिरी शोभा
हमारे देशकी स्त्रियोंकी वर्तमान अवस्थाको सभी जानते
पूर्वकालकी स्त्रियोंकी अवस्थाको वर्तमान समयकी स्त्रियों-
की अवस्थासे मिलानेमें विस्मित होना पड़ता है, आधुनिक
स्त्रियोंकी नाड़ियोंमें पूर्वकालकी स्त्रियोंका रक्त प्रवाहित होता
या नहीं,उनके धर्मके साथ इनके धर्मकी एकता है वा नहीं,
यहांतक कि, वह पहले भारतवासिनी थी या नहीं इन सब
विषयोंमें इतिहासके न जाननेवाले मनुष्योंके मनमें बड़ा
संदेह उत्पन्न हो सकताहै, जिस हिन्दूजातिकी स्त्रिये एक समय
उन्नतिके ऊँचे शिखर पर विराजमान हो गई थी, एक समय
सभ्यजातिकी स्त्रियोंका आदर्श स्वरूप थीं, उस हिन्दूजाँति-

(२२) श्रीप्रबोधिनीका- की स्त्रियोंकी किस कारण आज शोचनीय अवस्था हो रही है, यदि अज्ञानही उनके घोर अज्ञानका कारण है तो वर्ण ज्ञान रहित आजकलकी हिन्दू जातिकी स्त्रियें जिस हीन दशा पर पहुंच गई हैं इसमें कुछ भी संदेह नहीं। हे वहन । हम अंग्रेजी रीतिके अनुसार चलना नहीं चाहती। और न उनकी बरावरी करनेसे उन्नतिको पासकती हैं। हमैं स्त्रीजातिकी अवस्थाकी उन्नति करनी होगी. इस देशकी पहली सभ्यताकी ओर देखना कर्तव्य नहीं, जो लोग चाहते हैं कि, स्त्रियोंको सर्वथा स्वच्छन्दता दीजाय चाहे जहाँ विचरै उनको यह भी विचारना चाहिये कि, नरनारियोंका शरीर रक्त मांससे संगठित है, और उसमें काम क्रोधादि छः शत्रु नि- रन्तर रक्तस्त्रोतके बीच वायुरूपसे वहन करते हैं इनका आक- पण और विकर्षण स्वभावसे सिद्ध है; व्यास, पराशर, विश्वा- मित्र आदि कठोर तपस्वीभी इनकी अवरोध गतिको नहीं रोक सके हैं, औरोंकी तौ फिर वात ही क्या है, नेत्र उठाकर संसारकी ओरको देखो तो ऐसा बोध होता है कि, यहां सत्य- की अपेक्षा झूठका अधिक प्रचार है, मंगलकी अपेक्षा अमंग- लकी अधिकता है, पवित्रताकी अपेक्षा अपवित्रताके राज्यका विस्तार है देवभावकी अपेक्षा असुर भावका साम्राज्य है, ज्ञान है और धर्मकी अपेक्षा शत्रुकी जय है, और दुर्वलके ऊपर वल- वानोंका अत्याचार प्रकाशमान हो रहा है, दुर्वलको वलवानोंके हाथसे और निस्सहायको अत्याचारीके उपोद्वात। (२३). हाथसें रक्षा करना जिस प्रकार समाजनीतिका कर्तव्य है, उसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि शत्रुओंसे सामर्थ्य के अनुसार स्त्रीपुरुषकी आन्तरिक रक्षा करना समाजनीति और धर्मनीति दोनोंका कर्तव्य है, वास्त- वमें मनुष्यके पशुभावकी अपेक्षा देवभावका आकर्षण दुर्व- ल है मनुष्यके स्वभावसे ही वीराचारी और सात्विकता प्राप्त होनेमें बहुतसे समयकी आवश्यकता हो इस कारण हे बह- न स्त्री पुरुषोंके इच्छानुसार मिलापमें समाजका मंगल नहीं होसकता, अंग्रेजी रीति नीति भारतवर्षका उद्धार नहीं कर सकती, उससे नम्रता शील लांज स्त्री पुरुषोंका प्रेम और गार्हस्थ्य धर्म लोप होताहै।पुरातन रीतिवाली सावित्रीके समा- न पतिपरायणा । जानकीके समान पतिव्रता स्त्री इस वातको दिखागई हैं कि, संसारमें इस प्रकारसे पतिव्रता स्त्रीयोंको क्या करना चाहिये यदि हम अंग्रेजी स्त्रियोंकी चाल ढाल पर चलेंगी तो हिन्दू जातिकी और हिन्दू स्वभावकी जड़ उखड़ जायगी। हे वहन ! मैं सर्वथा अंतःपुरके पांजरेकी भी पक्षपातिनी नहीं हूं, स्त्रीपुरुषके स्वेच्छाचारमिलापको भी उन्नतिकी परा- काष्ठा मत जानता, यह तो मैं पहलेही कह आई हूं कि, पूर्व- काल में हिन्दूजातिकी स्त्रिये घरके बाहर होकर अपनी इच्छा- नुसार जाती. आती थीं, किन्तु वह स्वाधीन नहीं रहती थीं, वह स्वामी, पिता, भाई, इत्यादि अपने कुटुम्बियोंसे (२४) स्त्रीप्रबोधिनीका- रक्षित होकर अपनी इच्छानुसार जाती आती थीं। इस प्रकारकी रीतिकोही प्राचीनरीति कहा है बहुत वर्षों से हिन्दू जातिकी स्त्रिये मूर्खताके घोर अंधकारसे ढकी हैं, उनकी उन्नतिका मार्ग रोकनेवाला अज्ञानरूपी कांटा है, इस अज्ञानके विना दूर हुये स्त्रियोंकी उन्नति नहीं होसकती फिर यह अज्ञान विद्या के विना पढ़े हुए दूर नहीं होसकता है.यों तो कुछ थोड़ीर बुद्धि तौ विधाताने सभी- को दी है परन्तु विना विधाके पढ़े बुद्धि पैनी नहीं हो सकती। स्त्रीको पराये आदमीके साथ बैठना उचित नहीं है, न कि- सीके घरमें जाकर किसीकी बात चीत सुनना उचित है, पिता भ्राता और कुटम्बियोंके साथ वात चीत करनाही उचित है। हे वहन ! पहले समयमें पुरुप स्त्रियोंका अधिक सन्मान करतेथे आज कल स्त्रियोंका सन्मान पहलेकी अपेक्षा आधाभी नहीं होता इसविषयमें मनुजीका उपदेश सदायाद रखनाचाहिये मनुका वचनहै कि,"जिस कुलमें स्त्रिये वस्त्र और आभूषर्णादिसे पूजित होती हैं। वहां सभी देवता प्रसन्न रहतेहैं, और जिस कुल में स्त्रियोंका अनादर होता है, उस कुलके सम्पूर्ण कर्म नि- फल होजाते हैं। जिस कुलमें वहन और कुटम्बकी स्त्री पत्नी कन्या और पुत्रवधू इत्यादि स्त्रिये भूषण वस्त्र और भोजनके आभावसे दुःखी रहतीहैं वह कुल शीघ्रही निर्धन होजाताहै राजा इत्यादिसे सताया जाता है,सदा देवता उस कुलके ऊपरं रुष्ट रहते हैं, और जिस कुलमें स्त्रिये भोजन वस्त्र आभूषणा- *** ** . ********* 74 उपोद्वातः। (२५.). दिसे संतुष्ट रहती हैं उस कुलकी सदा बढ़ती होती है। भगिनी, स्त्री, पुत्र वधू इत्यादि स्त्रिये भोजन वस्त्र और आभूषणादिके न मिलनेसे जिस कुलको शाप देती हैं वह कुल सव प्रकारसे नष्ट होजाता है, इस कारण हे वहन ! जो लोग सम्पत्तिकी इच्छा करनेवाले हैं वह स्त्रियोंको सदा भोजन वस्त्र आभूषण आदिसे संतुष्ट रखते हैं। बहुत वर्षों से इस देशमें स्त्रीशिक्षा लोप हो गई है. अधिक क्या भले मनुष्य और पंडितोंकी सभामें भी बहुतसे मनुष्य प्राचीन कालकी स्त्री शिक्षाको घृणाकी दृष्टिसे देखते हैं, वह यह विचारते हैं कि, जो स्त्रियोंको लिखाया पढ़ाया जायगा तो यह विधवा होजायगी, हे बहन ! कहीं पढ़ाने लिखानेसेभी स्त्रियें विधवा होती सुनी हैं। इसी कारणसे आजकलकी स्त्री- शिक्षाके प्रचारमें वह लोग अनेक प्रकारके विघ्न करते थे, परं- तु वह भय इस समय बहुतोंका दूर हो गया है, इस समय भार- तवर्षके प्रायः सभी स्थानों में लड़कियोंके पढ़नेके लिये पाठ- शालायें वनती जाती हैं, और घर २ में स्त्रियोंको पढ़ानेके लिये ईसायनी भेजी जाती हैं स्त्रियोंकों भी पढ़नेका अधिक चाव होता जाता है, परन्तु जिस प्रकारसे हिन्दूजातिकी स्त्रियों- को यथार्थ शिक्षा देनी चाहिये वह उपाय अभी प्रकाशित नहीं हुआ।

दोष
स्त्रींप्रबोधिनीका-
author
प्रकाशवती ! मेरे कहनेका मतलब यह है कि जिस भांतिसे
तुमने देखा देखी ढोलकी वजानी सीखली है और जिस भांति
से तुमने बड़ी जल्दी उन लुगाइयोंकी गालिये सीखली इसी
भांति यदि तुम मन लगाकर पढ़ना लिखना सीखोगी तौ
तुम्हारे बड़ा काम आवेगा और इसके द्वारा तुम सब कामोंमें
चतुर हो जाओगी, यह ढोलकी वजाना और नालियोंका गाना
कुछ काम नहीं आवैगा पढ़ने लिखनेमें एक और भी बड़ा
भारी गुण है कि, जब अपना प्यारा परदेशको चला जाय तो
विना दूसरेके कहेहुए अपने मनकी वात घर बैठे ही कह दिया
करेगी और जो स्त्रिये लिखना पढ़ना नहीं जानतीं वह अपने
मनकी छिपीहुई वात दूसरेसे कहकर अँड़वा खोल देती हैं,
स्त्रीको बहुतसी बातें ऐसी हैं कि जिनको वह सिवाय अपने
पतिक दूसरेसे नहीं कह सकती। हे वहन ! किसीकी वरावरी
करना उचित नहीं, शुण दूसरेके भी लेले और अवशुण अपने
भी तज दे, आज तो मैंने फेवल त्रियोंकी भूत और वर्तमान
अवस्थाही सुनाई है कारण कि, अव मैं भोजन बनानेकी
तैयारी करूंगी और तभी बैठे २ थक गई होगी, अब कलसे
मैं तुझे सब वातैवताऊंगी कि, किस भांतिसे विद्या पढ़ी जाती
और स्त्रीको वालकपनमें कौन २ सी बातें सीखनी चाहिये,
तुझे क्रमानुसार यह २ बातें सिखाऊंगी।

उपोद्वात् । (२७) कन्यावस्था-विद्याकी शिक्षा, सरल रीतिसे शिक्षाका देना, पढ़ना, लिखना, चिट्ठी पत्री, सामान्य शिक्षा, शिल्पका- य, (सीना पिरोना कसीदा आदि) चित्रकारी, गृहकार्य और व्यय आदिका प्रवन्ध । " किशोरी-भोजन संस्कार, शरीर पालन, स्वास्थ रक्षा, रोगीचर्या, विपदाविपदचिकित्सा। गृहणी-विवाह और पातिव्रत धर्म, गृहणी कर्तव्य, (पति और सास श्वसुरकी सेवा तथा पुरजनियोंके प्रति व्यवहार )। आमोदिनी-रसिकता, हास्य, क्रीड़ा कौतुक, रजोदर्श- न, ऋतुरक्षा और सहवास। गर्भिणी-गर्भावस्था और गर्भरक्षा गर्भपरीक्षा, गर्भचि- कित्सा,प्रमतिके पूर्व आयोजन, प्रसूतिका गृह, प्रसवका नियत समय और शीघ्रप्रसूता स्त्रीके लक्षण। जननी-धात्रीशिक्षा और प्रसव, प्रसूतिकी पीड़ा और चिकित्सा, जननीका कर्तव्य, बाल चिकित्सा, शिशुपालन, शिशुस्वास्थ्यरक्षा,माताकी स्वास्थ्य रक्षा,शिशुशिक्षा अभ्यास और संग.अन्यान्य शिक्षा।

(२८)
स्त्रीप्रबोधिनीका-उपोद्घात।
कर्ती-धर्मोपदेश, रीति, भांति और त्योहार, गुरुजन
और अतिथिकी सेवा,संतान, संतति, आत्मीय स्वजन, दास,
दासी, दरिद्र और भिखारी, सद्व्यवहार ।
पुण्यवती-धर्म, धर्माचरण, नित्यकर्म, व्रत, तीर्थसेवा
तीर्थयात्रा और उसका फल)।
श्रोता-सीता, सावित्री, सती, शैब्या, दमयन्ती पद्मिनी,
और लीलावती इन सात स्त्रियोंका जीवन वृत्तान्त ।
इति ।
श्रीवेङ्कटेश्वर " (स्टीम् ) यन्त्रालय-वम्बई.

श्रीलक्ष्मीकान्ताय नमः।
स्त्रीप्रबोधिनी।
१-प्रथम सोपान।
0
(वालिका.)
विद्या शिक्षा।
हे वहन प्रकाशवती ! आओ आजका दिन विद्या
पढ़ानेके लिये वहुत उत्तम है. इस कारण आजहीसे तुम्हें
विद्या पढ़ाना प्रारंभ करूं; प्रकाशवतीने कहा कि, जीजी !
अभीतो मुझे वर्णज्ञानका वोध नहीं है, इस कारण सबसे
प्रथम तुम मुझे अक्षर पहँचानने बताओ; पीछे कुछ और
पढ़ाना विद्यावतीने हँसकर कहा कि, हाँ बहन प्रथमतो तुम्हें
वर्णज्ञानकाही वोध कराया जायगा कहीं पहलेसेही मैं
तुम्हें पुस्तक पढ़ानेको थोड़ेही वैठ जाऊंगी? देखो वहन !
इस संसारमें नेत्रहीन (अंधे) मनुष्यको देखकर उसके लिये
सभी दुःख प्रकाश करते हैं; कारण कि, वह अंधा कुछ भी
नहीं देख सकता । संसारमें जितनी सुन्दरता है, वृक्षोंके उपर
भाँति २ रंगके पक्षी वैठे हैं. उसपर मनोहर सुगन्धित फूल
नाकावन्सारका

है (२) खीप्रबोधिनी। teetett खिले हुए हैं, और रात्रिमें जो चंद्रमाकी सुन्दर चांदनी खिल रही है, इन सवको वह कुछभी नहीं देख सकता । वह अपने कुटुम्बी और वधु वांधव, तथा अपने प्राणोंसे भी अधिक प्यारी संतानका मुख भी नहीं देख सकता, यही विचार करके मनुष्य उसके लिये कितने दुःखी होते हैं। परन्तु हम अपने विचारसे वास्तवमें अंधे मनुष्यको जितनादुःखी विचारते वह उतना दुःखी नहीं है । कारण कि, संसारमें उसने कुछ भी नहीं देखा है, वह सब वस्तुयें देखनेमें अच्छी हैं या बुरी इन सव बातोंको वह कुछभी नहीं जानता इसी कारणसे उसके देखने के लिये वह व्याकुल नहीं होता। नेत्रहीन मनुष्य तो केवल इसी कारणसे नहीं देखसक- ता है कि, उसके नेत्र नहीं हैं अर्थात् वह अंधा है, और उस- को देखनेकी सामर्थ्य नहीं है, सैकड़ों उपाय करने परभी वह कुछ नहीं देख सकता। परन्तु संसारमें ऐसे सैकड़ों और ह- जारों मनुष्य हैं जो नेत्रोंके होते हुए भी कुछ नहीं देख सकते, वह नेत्रोंके होते हुए भी नेत्रहीन हैं । वृक्षोंपर नाना प्रकारके फूल खिल रहे हैं, फूलोंकी सुहावनी सुगंध हृदय और मनको आनंददायनी है। इसका विना विचार किये हुए यह कुछ नहीं जाना जासकता । देखो आकाशमें वादल बड़ी जोरसे गर्ज रहा है, उस भयसे भयभीत होते हैं, परन्तु किस प्रकारसे यह भयंकर शब्द आकाशमें गुजार रहा है, इसको वह कुछ भी नहीं समझ सकते, इसका कारण यही है कि, वह ज्ञान रहित हैं; जब कि, उनको इतना ज्ञानही नहीं है, तब वह कुछभी नहीं देख सकते, हे वहन ! संसारकी सम्पूर्ण सुन्दरता बहस बालिका विद्याशिक्षा। M यह उनके निकट वस्त्रसे ढकी हुई वस्तुके समान रहती संसारके सभी सुखोंसे वह वंचित रहते हैं। फिर नेत्रहीन और नेत्रवाले इन दोनों मनुष्योंकी अवस्थामें भेदही क्या है ? हे बहन ! विद्याका पढ़नाही ज्ञान रूपी नेत्रोंकी प्राप्तिका एक मात्र उपाय है। परन्तुः विद्या शिक्षा क्या है ? और फिर उसके द्वारा किस प्रकारसे संसारके सम्पूर्ण रहस्य विदिता होसकते हैं; तव फिर क्या संसारके साथही साथ विद्या भी पृथ्वीमें उत्पन्न हुई थी। जो पृथ्वीमें चिन्ताशील हैं, संसारके सम्पूर्ण आश्चर्य- दायक व्यापारोंको देख कर उसके कारणको निर्देश करनेकी जिन्होंने चेष्टा की है। जिन्होंने पृथ्वीमें स्थित सम्पूर्ण प्रका- रकी सौन्दर्यताके यथार्थ गुणको जान कर मनुष्योंको उसके। समझानेके लिये,और उन सव सौन्दयोंके भोगका भागी कर- नेकी चेष्टा की है। वही विद्याके जन्म देनेवाले हैं, उनका चिन्ता पूर्ण हृदय प्रसूत भाव युक्त सम्पूर्ण पुस्तकोंमें है। उनका वह भाव और कहीं नहीं है । उन सब पुस्तकोंको पढ़ना, और उन सब बातोंका विचार अपने हृदयमें करने- काही नाम विद्या शिक्षा है। और यह नहीं कि, तोतेके समान रटलगाकर पढ़ लिया और उसके अर्थको कुछभी नहीं समझा, इससे कुछ भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता; विशेप करके वालकपनमें मनुष्यका मन जितना चंचल होता है। और समयमें उतना नहीं रहता इस कारण हे वहन! तुम इस अवस्थामें बहुत शीघ्र पढ़ना लिखना सीखजाओगी अधिक क्या इस समय तुम्हें जो बातें सिखाई जायँगी उनको तुम

(४)
स्त्रीप्रबोधिनी।
httute
बहुत शीघ्रतासे सीखलोगी और उन्हींके द्वारा तुम गृहस्थंके
सम्पूर्ण कार्योंको भली भाँतिसे निर्वाह करसकोगी, सबसे
प्रथमतो मनका स्थिर करना है तुम अपने मनको एकाग्र कर
मेरे पास बैठ कर जो जो बातें मैं तुम्हें बताऊं सभीको ध्यान
देकर सुनतीजाना और मैं विद्या तो तुम्हें इस सरलतासे पढ़ा-
ऊंगी कि, बहुत जलदीसे लिखना पढ़ना आजाय ?
सरंलरीतिसे शिक्षाका देना।
बहुतोंका, विशेष करके स्त्रियोंका यह विश्वास है कि विद्या
शिक्षाके समान कठोर और कठिन कार्य इस संसारमें और
कुछ भी नहीं है, और बहुतोंका यह विश्वास है कि, विद्या
शिक्षा में कुछ भी रस नहीं वह निरसतायुक्त बड़ी ही कठिन है
यह उनकी बड़ी भारी भूल है; हे वहन ! अब देखो विद्या शिक्षा
जैसी सरल है. और जैसा इस शिक्षामें आनंद है, वह सब
बातें मैं तुम्हें बताऊंगी इस संसारमें विद्याशिक्षा में जितना
सुख है, उतना सुख और कहीं नहीं और कहीं हो भी नहीं
सकता।
संसारमें सुख क्या है ? मानसिक मत्तताका नामही सुख
है। इससे मन प्रफुल्लित हो जाता है, हृदयमें अपूर्व आनं-
दकी तरंगें उठती हैं। इस संसारमें वही यथार्थ सुखी है जिसने
विद्या शिक्षा पाई है। मनुष्य सुखके लिये उन्मत्त होकर
घूमते हैं। परन्तु सुख कहां है, इसका कुछ पता नहीं मिला,
कौन सुखी है, और कहाँ सुख पायाजाता है, इसका विचार
कोई भी नहीं कर सकता, 'सुखके लिये मनुष्य कहां जाय
और कहां न जाय इसको वह कुछ भी स्थिर नहीं कर सकता,

बालिका-विद्याशिक्षा।
Yant
unit
परन्तु विचार कर देखाजाय तो सुख सभीके सन्मुख खड़ा
रहता है. मनुष्य इच्छा करते हो सुख प्राप्त कर सकता है;
विद्याका पढ़नाही यथार्थ सुखप्राप्तिका एक मात्र उपाय है ।
हे वहन ! पहले पहल तो विद्या पढ़नेमें बड़ी कठिनता
जानपड़ती है इस बातको मैं भी भली भांतिसे जानती हूँ
कारण कि, विद्याके पड़नेसे क्या फल है इसको पहले पहल
कोई भी नहीं जानसकता, इसी कारण सवसे प्रथम विद्या
पढ़ना कठिन मालूम होता है।
विद्या पढ़ना कुछ कठिन नहीं है। केवल उसकी भाषाही
कठिनहै। इसविषयमें विनाभापाकी शिक्षापाये पंडितोंने क्यार
कहा है, उसका विचार करना असंभव है; केवल मातृभाषाकी
शिक्षाके लिये वार २ परिश्रम करना निरर्थक बोध होता
है; परन्तु एक वार भाषाका ज्ञान उत्पन्न होतेही एक बार
विद्याकेस्वादमें सामर्थ्य होते ही, फिर इससे अधिक सरल
और दूसरा नहीं विदित होगा।
हे वहन ! किसी वागमें जाकर देखो कि, गुलाब, चमेली,
मोतिया जिधर तिधर खिलरहा है, परन्तु उस बागमें विना
जाये हुए उन फलोंका अनुभव कभी नहीं हो सकता और
घरमें बैठे हुए क्या उन फूलोंके देखनेके लिये मन
व्याकुल होसकता है कभी नहीं इसी प्रकार विना विद्या पढ़े
हुए मनुष्य विद्याके स्वादको कभी नहीं जान सकते, सूर्य
भगवानके अस्ताचल जानेपर उनकी किरणोंकी नीले समु-
में कैसी शोभा होती है। प्रातः कालके सूर्यकी कोमल किरणें
वरफके पर्वतके शिखरपर अपनी कैसी शोभाका विस्तार
करती हैं; वस्त्राभूषणोंसे सुसज्जित पृथ्वीकी चांदनीकी रात्रिमें
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(६) स्त्रीप्रबोधिनी। कैसी अपूर्व शोभा होती है। विना देखे हुए कोई भी उसका अनुभव नहीं कर सकता उफनते हुए समुद्रकी तरं- गोंको देखकर हृदय भयभीत होता है। हिमालयके देखनेसे केवल कुरूप पत्थरोंके समूहके अतिरिक्त और कुछ विचार नहीं होता इसमें फिर केवल यही कहना होगा कि, समुद्र और पर्वतोंकी कुछ शोभा नहीं है। हे बहन । विद्याका भी सम्बन्ध ठीक उसी प्रकारका है, विद्याका विना विचार किये हुए इसके अपार सुखको कोई भी नहीं समझ सकता, विद्या शिक्षामें प्रथम कठोरताको देख- कर भयमान विद्या पढ़ना न छोड़ना चाहिये विद्या पढ़कर जितना उसमें विचार कियाजायगा, उतनाही अधिक सुख प्राप्त होगा। पढ़ना। हे बहन ! स्त्रियें इसी कारणसे तो विद्याको नहीं पढ़ती कि उनको विद्याकी शिक्षा उत्तम प्रकारसे नहीं मिलती इसीसे वह झटसे दो चार अक्षर पढ़ कर कहने लगती हैं कि, हमैं कुछ कचेहरी थोड़ेही करनी है, मास्टर बन कर मदरसोंमें थोड़ेही जाना है। अपने इसी विचारसे वह मूर्ख रहजाती हैं, और इसी कारणसे उनकी संतान मूर्ख होती है। वह यह नहीं जानतीं कि, विद्यामें क्या २ गुण हैं। किसीने कहा है- दोहा-कौड़ी कौड़ी जोरिके, धनी होत धनवान । अक्षर अक्षरके पढ़े, मूरख होत सुजान ।। हे बहन विद्याकी भी ठीक यही अवस्था है। प्रथम हैं ;

वालिका-विद्याशिक्षा। (७) एक २ अक्षरके पढ़नेसे स्वरज्ञान होता है; और फिर एक २ अक्षरके पढ़नेसे वर्णज्ञान होता है। फिर वारह खड़ी पढ़ीजाती हैं, इसी प्रकारसे क्रमानुसार सम्पूर्ण पुस्तकोंको पढ़ कर मनुष्य विद्वान् और पंडित हो सकता है अब देखो। वहन । मैं तुम्हें एक अक्षर पढ़ाकर पंडिता बनाये देती हूं। जिस समय मैं मथुराजीको गई थी उस समय तुम्हारे पढ़ा- नेके लिये पं० गोवर्धनदासजीके यहांसे खिलौना लाई थी बहुत दिनोंसे मेरे पास धरा है। सो आज तुम्हारे काम आजा- यगा,उसकी एक २ तख्तीके ऊपर स्वर व्यंजन इत्यादि उन- चास अक्षर बड़े २ मोटे अक्षरों में लिखेहुए हैं उनके द्वारा तुम्हें बड़ी जल्दी वर्णज्ञानका बोध होजायगा; और तुम्हें कठिनाई भी कुछ न पड़ेगी, प्रकाशवतीसे यह कह कर विद्या- वतीने अपनी तगड़ीमेंसे तालियोंका गुच्छा खोल प्रका- शवतीको दिया, और कहा कि, छतके ऊपर मेरे कमरेमें एक बड़ा संदूक धरा है उसको खोल कर उसमें जो एक संदूकची धरी है उसे यहां ले आओ जीजीकी यह बात सुन कर प्रका- शवती अतिशीघ्रतासे तालियोंका गुच्छाले छतके ऊपरको गई; और चावके .मारे बड़ी शीघ्रतासे संदूक खोल कर उसमेंसे संदूकची निकाल कर बहनके सम्मुख ला धरी और इसके भीतर क्या है यह देखनेके लिये वह अत्यन्तही उत्कंठिता हुई; और अपनी बड़ी बहनसे कहने लगी कि, मैं आजही सव अक्षर पढ़लूंगी तुम इसे जल्दीसे खोल कर मुझे दिखाओ। यह सुन कर विद्यावतीने कहा, हे वहन ! तुम घवड़ाती क्यों हो धीरज धारण करो मैं इसे खोलती हूँ यह कह कर विद्यावतीने संदूकंचीको खोला और लक (८) खीप्रबोधिनी। उसमेंसे सवअक्षरोंको निकाल कर मेजके ऊपर वरावर २ चुन दिये जिससे उस मेजकी अत्यन्तही शोभा होगई. प्रकाश- वती इस चित्रको देख कर अत्यन्तही आश्चर्यमें हुई और कहने लगी कि, पीले रंगका अक्षर तो जीजीतुम मुझेखेल- नेके लिये देदो यह सुन कर विद्यावतीने कहा कि, हे बहन ! तुम घवड़ाओ मत, यह अक्षर सभी तुम्हारे लिये हैं। एक अक्षर नहीं बरन सभी रंगोंके अक्षर मैं तुम्हें दूंगी। यह कह कर विद्यावतीने प्रथम चार अक्षर प्रकाशवतीको दिये कि, जिनके ऊपर अ. आ. इ. ई. इन चार अक्षरोंका स्वरूप लिखाहुआ था और यह अक्षर चारही रंगके थे। और फिर उनमें अकार का अक्षर लेकर उसको दिखाया कहा कि, लो वहन ! मैं इस अक्षरको इन चारोंके वीचमें मिलाये देतीहं तुम इसको ढूंढ कर यही अक्षर मुझे पकड़ा देना एक दो बार तो प्रकाशवतीने औरकाऔर अक्षर उठाकर दिया और फिर आपसे आप वही अकारका अक्षर वार२ निकाल २ कर बहनके हाथमें देने लगी जब उसने छोटे अकारका स्वरूप भली भाँतिसे पहँचानलिया तब फिर इसी भाँतिसे अव बड़ाआ. इ.ई.उ.ऊ. इत्यादि क्रमानुसार १६ स्वर और उनचास व्यं- जनोंको पांच छैः दिनमें प्रकाशवतीने बड़ी सरलतासे पहचा- न लिया, तब विद्याने कहा कि, प्रकाशवतीने अक्षर तो बड़ी ही शीघ्रतासे पहचान लिये अब इसको केवल मात्राका ज्ञान और होजाना चाहिये. वस फिरतो यह आपसे आप भाषा पढ़ने लगेगी. यह विचार कर सेठ खेमराज श्रीकृष्णदासके यहांकी छपी पंडित नाथूरामजीकी बनाई हुई पहली दूसरी P बालिका-विद्याशिक्षा। to तीसरी और चौथी पुस्तकको मँगाया और उसमेंसे पहली गुस्तक प्रकाशवतीको देकर वोली कि, हे बहन देखो मैंने तुम्हें एकता संदूकची दी है जिसमें भाँतिरके रंगबिरंगेअक्षर हैं। जिनके देखनेसे मन एकवारहीमोहित होजाता है और देखो आज मैने तुम्हें यह कैसी सुन्दर पुस्तक दी है जोतुम इसको मन लगाकर पढ़ोगी तो यह बहुत जल्दी समाप्त होनायगी; तभी मैं तुम्हें दूसरी पुस्तक दूंगी इसीप्रकारसेक्रमानुसार तुम जितनी जल्दी जल्दी पुस्तक समाप्त करोगी उतनीही जल्दी नई पुस्तकें तुम्हें मिलेंगीः प्रकाशवती प्रथमपुस्तकको देखकर बहुतही संतुष्ट हुई, और यह विचारने लगी कि, किसी तरहसे हो यह चारों पुस्तकें मेरे पास आजाँय तो अच्छा है; यह विचार कर अपनी बहनसे बोली कि, जीजी! अक्षर तो मैं सभी पहचान गई हूँ अव मुझे इसमें क्या पढ़ना होगा सो कहो. विद्यावतीने कहाकि, हेवहन! अव मैं तुम्हें लघुमात्रा बताती हूंइनको तुम मन लगाकर और ध्यान देकर सीखो प्रकाशवतीने कहा अच्छावनाओ। विद्यावतीने कहाअच्छा बहन! लो सीखो, और यह ध्यान रक्खो कि, मैं जिस अक्षरपर जैसी मात्रा वताऊँगी उसको तुम इस प्रकार याद करना कि, मैं चाहैं जौनसी पुस्तकमें उस अक्षरको पूछळू प्रकाशवतीने कहा अच्छा जीजी ऐसाहीकरूँगी। तव विद्यावतीने एक कागजके ऊपर बड़े २ मोटे अक्षरों में स्वर और व्यंजन लिखे, और कहा कि, देखो बहन ! यह सोलह स्वरही इन उनचास अक्षरोंमें काम आँवगे। इनकी विना सहायताके व्यंजन कुछ भी नहीं करसकतेः प्रथम बड़े आ. की मात्राको ककारमें लगाकर बताया और कहा इसके लगनेसे यह बड़ा का होगया फिर छोटीइ की मात्राको ककार में लगा- পূr.

(१०) स्त्रीप्रबोधिनी। या और कहा कि, देखो वहन ! इसकी मात्राके लगनेसे ककार कि की आवाज देने लगा। इसी प्रकारसे उ की मात्रा वताई और कहा कि, क्रमानुसार उनचास व्यंजनोंमें इन सोलह स्वरोंमेंसे जिस किसीकी मात्रा लगाओगी वह उसीअक्षरसे पुकारा जायगा जैसे कि, तुमने बड़े ऊ को खकारमें लगाया तो यह बड़े खू की आवाज देगा; और ओ को तुमने गकार अक्षर पर लगाया तो यह गो होजायगा। इसी प्रकारसे तुम इन सोलह अक्षरोंकी मात्राओंको उनचास व्यंजनों पर लगाकर; इनके स्वरूप और इनकी आवाजको सीखलो तो वस तुम बहुत जल्दी भाषा पढ़ने लगोगी; और यह अक्षर तुम्हारी पुस्तकमें भी लिखे हुए हैं, मैंने केवल तुम्हारे पहचाननेके लियेही इस कागज पर लिखकर बताये थे। अव तुम इन अक्षरोंको अपनी पुस्तक- मेंही याद करना, प्रकाशवतीने उन सब अक्षरोंको अपनी वहनके कथनानुसार अतिशीघ्र पहचान लिया फिर चाहे जिस पुस्तकमें मात्रासहित किसीभी अक्षरको पूछनेपर प्रकाश- वती अतिशीघ्रतासे उसे वतादेती; तव तो विद्यावतीने विचारा कि, अब बस सब काम बन गया बारह खड़ीके सीखतेही मानो समस्त पुस्तक पढ़ली: इसके पीछे छोटे पद पढाने प्रारंभ किये इनको भी प्रकाशोने बहुत शीघ्र आठ दश दिनमें समाप्त कर दिया। इसी प्रकारसे दशवीस दिनमें ही पहली किताव समाप्त करडाली; और अपनी बहनसे कहने लगी कि, जीजी अव तुम मुझे पढ़ने के लिये रामायण मँगादो; यह सुन विद्यावतीने

"
बालिका-विद्याशिक्षा।
Mitate
कहा कि, हे बहन ! अभी तुम रामायण पढ़ने योग्य नहीं हुई।
अव तुम हिन्दीकी दूसरी पुस्तक पढ़ो प्रकाशोने बहनकी
आज्ञानुसार ऐसाही किया, और जो लड़कियें प्रकाशोके निकट
खेलनेके लिये आया करती थीं उनसे भी प्रकाशवती बोलीं कि,
बहनी ! अव मैंने गुड़ियें खेलनी छोड़ दीहैं मैं तो अव पढ़ा
करती हूँ, लड़कियोंने कहा वतातो तैंने क्या पढ़ा है हम भी
तो देखें प्रकाशवती उनके यह वचन सुनकर झटसे "खिलौना"
ले आई; और उस संदूकचीमेंसे अक्षर निकाल २ कर दिखाने
लगी कि,मैंने इन्हीं अक्षरोंमेंसे विद्या पढ़नी सीखी है, लड़-
किये, उन अक्षरोंको देखकर कोई तो कहने लगी कि, यह
हाथी है, कोई वोली कि, इसमें देवी जीकी जो तस्वीर यह
मुझे देदे, किसीने कहा इसमें वरात जा रही है। इत्यादि
अनेक प्रकारकी वा” कहने लगी; तब प्रकाशवतीने कहा
बहन! यह हाथी घोड़े नहीं हैं, न यह बरातही
है, यह तो केवल स्वर और. व्यंजन हैं इन्हींके
द्वारा में विद्या पढ़ी हूँ मेरी जीजी जब मथुराको गई थी तो
यह खिलौना मेरे लिये लाई थी इस कारण मैं इनमेंसे एक
अक्षर भी अपना नहीं दूंगी लड़कियोंने कहा कि हम भी
मैंगावेंगी तुम हमें पढ़ा देना, प्रकाशवतीने कहा अच्छा;
यह कहकर वह लड़किये तो अपने २ घरोंको चलीगई और
प्रकाशवती अपनी पुस्तक को खोलकर पढ़ने लगी तब
विद्यावतीने कहा कि हे वहन ! अव तुम एक काम करो कि,
एक वखत तो पढ़ा करो एक वखत लिखना सीखा करो,
प्रकाशवतीने कहा वहन लिखना तो बड़ा कठिन है भला
নুরুক্ষ কারু

(१२) स्त्रीप्रबोधिनी। tattituttitutituttitpottostta satta वह मुझे किस प्रकार आवेगा, विद्यावतीने उत्तर दिया कि, तुम मत घबड़ाओ जिस सरल रीतिसे मैंने तुम्हें पढ़ना सिखा- या है उसीरीतिसे मैं लिखना भी सिखा दूंगी. तुम किसी वातकी चिन्ता मत करो, लिखने में जिस २ बातको ध्यान रखनेकी आवश्यकता है और जिसके द्वारा लिखना बहुत सुगम और सरलतासे आजाता है वह सभीवातें इससमय मैं तुमसे कहती हूँ लिखना. हे बहन! केवल एक मात्र पढ़लेनेसही सम्पूर्ण कार्य नहीं आसतो लिखना भी पढ्नेका एक प्रधान अंग है। जिसको लिखना नहीं आता उसका पढ़ना निरर्थक है; हे वहन !'उस- के पढ़नेसे कुछ उपकार नहीं होता। उसके विना वह शिक्षा भी सम्पूर्ण नहीं होतीकेवल वह मनुष्य वीचधारमें पड़ा रह- ता है इसी कारण तुम्हैं, लिखना सिखाना मुझे अत्यावश्यक है। स्वच्छ और सुन्दर अक्षरोंको सभी मनुष्य सरलतासे पढ़ सकते हैं। और जिनके अक्षर टेढ़े वेढ़े होते हैं। उनको सर्व साधारण मनुष्य नहीं पढ़सकते; उनके अक्षरोंके पढ़नेमें मन उलझताहै; और जो किसीने बहुत दिमागको जोर देकर पढ़ भी लिया तो कुछ का कुछ पढ़कर सुनादिया। इसमें लिखने- वालकी बड़ी हानियें होती हैं, यह खूब ध्यान रक्खो कि, अक्षर जहाँतक होसके सीधा और गोल वनाओ; अक्षरोंके सुधारनेमेंही यत्न करो जिस कागज़पर लिखो उसको मैला मत करो, और जहाँतक होसकै सबसे पहले टांटल- की कलमसे लिखना योग्य है होलडर और लोहेके कलमसे बालिका-विद्याशिक्षा। (१३) tattituttsatttituits लिखना उचित नहीं; दूसरे जिस कागजपर लिखो उसपर लाइन बैंचलो विना लाइनके कागजपर मत लिखो जिससे कि लाइन सीधी और सुन्दर लगे; यों चीतमकोड़े तो सभी करलेते हैं परन्तु जिसका नाम लिखना है वह हरेकसे नहीं आता हेवहन ! यद्यपि लिखना बहुत पित्तमारेका होताहै लिख- नेका भी एक प्रधान गुणहै । लिखते समय इस वातका भी ध्यान रखना आवश्यक है कि, जिससे कागज काला न पड़े इसप्रकार दवातमेंसे डोवाले; और जो यदि कहीं रोश- नाईका छींटा पड़ गया तो हाथसे उसे कभी न पोंछना, ऐसा करनेसे समस्त कागज मैला और कुचैला होजायगा तव तुम्हारे लिखने की प्रशंसा न होगी: स्याहीके छीटोंके पड़नेसे तुम उसे ब्लाटिंगसे सुखाना, ऐसा करनेसेही तुम्हारे लिख- नमें सफाई आवेगी और यह भी ध्यान रखखो कि, नागरीके अक्षर जितने ड्योढ़ी कलमके लिखे हुए सुन्दर और सुहावने होते हैं उतने सीधीकलमके नहीं होते; इस कारण जहांतक संभव होसके वहांतक तुम ड्योढीही कलमसे लिखा करना; यदि कोई वात लिखते २ भूल जाओअर्थात् कुछका कुछ लिख जाओ तो उस शब्दको हाथसे न मिटाना उस शब्दके ऊपर कलम फेर देना; अर्थात् लकीर खींच देना। स्त्रियोंके लिखने में प्रायः बहुतसी अशुद्धियां होती हैं। एक तो उन्हें विभक्तियोंका ज्ञान नहीं होता, और दूसरे वह लिखते समयमें मात्राओंका ध्यान नहीं रखतीं इसी कारणसे उनके लिखने में बहुतसी अशुद्धियां रहती हैं और वह सब अक्षरोंके उपरकी लाइनको भी नहीं लगाती, इस कारण सबसे प्रथम কুনুনু নুনু নুনু स्त्रीप्रबोधिनी। tatutitutitutitute tut (१४) अक्षरोंकेशिरके ऊपरकी मात्राका लगानाहीं कर्त्तव्य है। जिससे सम्पूर्ण अक्षर पूर्ण विदित हों। यह मैं निश्चयही कहती है कि, इन सव नियमोंके अनुसार लिखनेवालेका लिखना फिर किसी प्रकारसे खराब नहीं होगा, यदि जो स्त्री पुरुष मेरे इन नियमोंके अनुसार लिखेंगे, तो पढ़- नेवालोंको कुछ भी कष्ट नहीं होगा। हे बहन ! पहली पहल, तुम्हें जिस कागजपर लिखना हो उस कागजकी मजबूतीको भली भाँतिसे देखलो और कागज मोटा चिकना हो मोटा कागज लिखने के लिये फुलिस्केपही उपयोगी है। परन्तु उसपर पेन्सलसे लाइन अवश्यही खींच- लेनी चाहिये पहली पहल लिखनेमें जैसा अभ्यास होजायगा फिर सर्वदाके लिये वैसाही लिखा जायगा; और फिर जब तुम पहली पहलही लिखनेमें सावधान न होगी तब फिर जन्मभरतक तुम्हारा लिखना नहीं सुधरैगा; इस कारण आज मैं तुम्हें लिखनेके लिये एक कापी देती हूं जिस प्रका- रसे उस कापीके ऊपर मोटे २ अक्षर पेन्सलसे लिखे हुए हैं उसके ऊपर क्रमानुसार तुम मोटी टाँटल की कलमसे लिखती जाना, यह कहकर विद्यावतीने लिखने के लिये अपनी संदूकमें से वह कापी निकालकर प्रकाशवतीके हाथमें दी: प्रकाशवतीने बड़ी शीघ्रतासे उस कापीको लेलिया; तव विद्यावतीने एक बहुत मोटी टाँटलकी ड्योढी कलम बनाकर दी और कहा कि, ला पहले मैं तुझे एक अक्षर लिख कर बताएं। नजन्य क बालिका-विद्याशिक्षा। अ-इस प्रकारके सम्पूर्ण स्वर और व्यंजन उस कापीमें लिखे हुए थे विद्यावतीने अकारको लिखकर बताया, और कहा कि, हे वहन! तुम इसी प्रकारसे क्रमानुसार समस्त अक्ष- रोंको लिखकर दिखाओ तव प्रकाशवतीने ऐसाही किया, जिस प्रकारसे विद्यावतीने छोटे अको लिखकर बताया था प्रकाशवतीने भी उसी प्रकारसे बड़े आको लिखकर वहनको दिखाया और कहा कि, हे जीजी ! देखो ! यह अक्षर तुम्हारी है समान बना या नहीं, विद्यावतीने कहा हाँ बहुत ठीक वना, और अपनी बहनसे कहा कि, तुम इसी प्रकार सब कापीको लिखकर दिखाओ प्रकाशवतीने ऐसाही किया, आठ दिनमें समस्त कापी लिखकर दिखादी तव तो विद्यावती अत्यन्तही संतुष्ट हुई, और अपने मनही मनमें कहने लगी कि, प्रकाश- वतीकी बुद्धि बड़ी तीक्ष्ण है, यह विचार कर विद्यावतीने दूसरी कॉपी प्रकाशवतीको दी और कहा कि, लो इसमें सब मिले हुए अक्षर हैं। इनको भी इसी प्रकारसे लिखना; इस कॉपीमें तीन २ चार २ अक्षरोंके मिले हुए शब्द भी हैं। वस इन्हीं मिलावटी अक्षरोंके लिखनसे फिर तुम्हें नाम लिखने बहुत जल्दी आजायगे प्रकाशवतीने कॉपीको लेकर लिखना प्रारंभ किया और प्रथमकी रीतिके अनुसार इस कॉपीकोभी आठ दशदिनमें समाप्त कर दिया, और एक दूसरे कागजपर छोटे २शब्द लिखकर आपसे आप दिखाने लगी, फिर इसी प्रकारसे उसने अपना नाम लिखकर विद्यावतीको दिखाया और कहा कि, जीजी ! अब तुम हमैं नाम डाल दोतो हम नाम लिखने सीखा करें, और जब हमसे नाम लिखने आ- 1 -- श्रीप्रबोधिनी। (१६) Istitutet ettisteet tuto tutikta " , " जाँयगे तो तुम हमैं चिट्ठी लिखनी वतादेना. विद्यावती प्रकाश- वतीकी यह बात सुनकर बहुत ही संतुष्ट हुई, और अपने मन ही मनमें कहने लगी कि, अब प्रकाशवतीका मन पढ़ने लिखने में बहुत ही लगगया तव तो यह बहुत जल्दी चिट्ठी पत्री लिखना सीखलेगी, यह विचार कर विद्यावतीने प्रकाश- वतीसे कहा कि, लाओ बहन दवात कलम मैं तुम्हें नाम डाल दूं, जब यह नाम जो मैं लिखे देती हूँ तुम विना देखे लिखकर मुझे दिखा दोगी, तभी मैं तुम्हें चिट्ठी पत्री लिखनेकी रीति बताऊंगी, प्रकाशवतीने अति शीघ्रतासे कागज कलम दवात वहनके हाथमें दी विद्यावतीने “गोपालकृष्ण, भगवतप्रसाद, ब्रजवासीलाल, प्रकाशचंद, ब्रजनंदनलाल, मुरलीमनोहर” इत्यादि नाम लिखकर प्रकाश वतीको दिये और कहा कि, प्रथम तुम इनको देख २ कर लिखना और जब तुम्हारी दृष्टिमें यह भली भांतिसे रमजाय तब तुम इनको बिना देखे लिखना, बस नाम लिखने में इतना अवश्यही ध्यान रखो कि, कौन २ सा अक्षर किस किस मात्रा युक्त है, बस जहां तुमने यह अच्छी तरहसे समझ लिया फिर तुम सब नामोंको आपसे आप लिखा करोगी, प्रकाशवतीने कहा अच्छा ऐसाही करूंगी, यह कहकर प्रथम तो दो चार बार देख २ कर उन नामोंको लिखा और जव उनका स्वरूप भली मांतिसे स्मरण होगया, तब उसने सब अपने कुटुम्बके नाम बिना डलवायेही लिखकर विद्यावतीको दिखाये और कहा कि, आज तो हमने यह नाम विनाही देखे लिखे हैं; अवतो चिट्ठी लिखनेकी रीति बतादो, प्रकाशवतीके यह वचन सुन- . " बालिका-विद्याशिक्षा। (१७) intite LI कर विद्यावतीने कहा कि, अच्छा बहन ! आज मैं तुम्हें चिट्ठी पत्री लिखने की रीति बताती हूँ तुम सावधान होकर मेरे पास वैठ जाओ और जो मैं कहूँ उसको समझती जाना। हे वहन ! पत्र लिखनेकी दो रीति हैं, एक तो अंग्रेजी और दूसरी हिन्दुस्तानी, सो मैं तुझे दोनों बताती हूँ। पुरानीरीतिके अनुसारवडोंको “सिद्धिश्री" और छोटोंको "स्वस्तिश्री" लिखनेके पीछे वड़ों में विद्या वृद्धको "श्रद्धास्पद' "मान्यवर महाशय" आदि और धर्मवृद्धको “धर्मधुरन्धर-ध- मावतार "महोदय" वरावर-वालेको "प्रियतम, मित्रवर" "प्रियवर" "प्रियवत्स" "वघुवर" आदि लिखना चाहिये छोटोंको "चिरंजीव" "प्रियवत्स" लिखना उचितहै "स्त्रीको "प्रिय" "प्राणप्रिय" प्राणवल्लभे आदि पतिको "आर्यपुत्र" "नाथ" "प्राणनाथ" "प्राणवल्लभ" आदि शिष्टाचारके शब्द लिख कर बड़ोंको प्रणाम और छोटोंको आशीर्वाद लि- रखकर पत्रको प्रारंभ करें। ब्राह्मणोंमें वड़ेको प्रणाम वरावर वालेको नमस्कार और अपनेसे छोटेको वा दूसरे वर्णसे छोटेको आशीर्वाद लिखे । क्षत्री-वैश्य, शुद्ध यह ब्राह्मणोंको प्रणाम लिखें । और आप- समें राम र सीताराम जय श्रीकृष्णकी लिखें। हे वहन ! जिसके नाम पत्र लिखा जाय उसके पहले श्री- शब्द अवश्य रहना चाहिये। "श्री"लिखनेका नियम यह कि, गुरु, पिता, और माता आदिको छः श्री। स्वामीको पांच शत्रुको चार मित्रको तीन सेवकको दो और शिष्य पुत्र तथा स्त्रीको एक श्री लिखते हैं।

(१८) स्त्रीप्रबोधिनी। totke tutstitutitute दोहा-"श्रीलिखिये षट गुरुनको, पाँच स्वामि रिपु चारि । तीन मित्र द्वै भृत्यको, एक शिष्य सुत नारि"॥ हे बहन! पत्रकी समाप्तिमें "इति" "इति शम" "कृपाव- नाये रखियेगा" और "काम काज लिखियेगा" अवश्य लिखे। अपने पति तथा सास श्वसुर आदिका नाम चिट्ठीमें लिखना ठीक नहीं केवल लिफाफे परही लिखा जाता है। चिट्ठीपिताको पुत्रीकी ओरसे-सिद्धि श्री वृंदावन शुभस्थान अनेक उपमा योग्यपरम श्रद्धास्पद पूज्यवर श्रीयुतपिताजीको योग्य लिखीपुष्करजीसे लक्ष्मीदेवीका प्रणाम वाँचना।आपकी कृपासे यहां सबकुशल है आपका कुशल मंगल सदा गोपाल- अजीसे चाहती हूं आगे दश पंद्रह दिनमें मैं सब घर वालोंके साथ आपकी सेवामें उपस्थित हूंगी कुछ चिन्ता न करिये इति शुभम । मिती फागुनवदी ८ रविवार-संवत् १९५९ चिट्ठीमाताको पुत्रीकी ओरसे-सिद्धिश्री काशीजी शुभस्थान श्री-६दयामयी माताजीको योग्य लिखी दिल्लीसे रामप्यारीका प्रणाम बाँचना आगे आपके आशीर्वादसे मैं सब प्रकार सुख पूर्वक हूँ और सर्वदा आपकी कुशल चाहती हूँ आपने लिखा था कि, तेरा बड़ा भाई तुझे लिवानेके लिये आवैगा सो त चली आना माताजी मैं पराधीन हूँ जो वह भेज देंगे तो अवश्य चली आऊँगी, दोनों वहनोंको प्यार कहना भौजा- इयोंसे मेरा आशीर्वाद कहना । कृपा बनाये रखना मिती चैत्र सुदी ७ मंगलवार संवत् १९६० चिट्ठी बड़ेभाईको बहनकी ओरसे । सिद्धि श्री अजमेर शुभस्थाने मान्यवर भाई श्री ३ बलदेव प्रसादजीको चंद्रवतीका काम , E वालिका-विद्याशिक्षा। (१९) प्रणाम पहुँचै यहां मैं कुशल पूर्वक हूँ और आपकी कुशल सर्वदा चाहती रहती हूँ आपने जो लिखा कि, सास इवसुर आदिकी सेवा भली भाँतिसे करना । सो मैं ऐसाही करती हूँ तुम्हारे देखनेको बहुत मनकरता है, एक वार मेरे पास हो जाओ चिरंजीव रामरत्नको प्यार करना अधिक क्या लिखू- अमिती माघ वदी पंचमी संवत् १९५९ चिट्ठी स्त्रीकी ओरसे पतिको । सिद्धिश्री अमृतसर शुभस्थान अनेक उपमा योग्य प्राणनाथ श्री श्रीमदायं पुत्रजी योग्य लि- वी दिल्लीसे विद्यावतीका प्रणाम आगेमैं सर्वदा आपके कुशलक्षे म को सुननेकी अभिलाषिणी रहती हूँ, परन्तु चिरकालसे आप- का कोई पत्र नहीं आया कि, जिससे मेरी अभिलापा पूरी होती, इस लिये दिन रात चिन्ता रहती है अव निवेदन है कि, मुझ अवलाकी दीनतापर ध्यान देकर अपने हृदयकी कठोरताको छोडिये और अपने कुशल मंगलका समाचार लिखकर मेरी चिन्ताको दूर कीजिये । और यह भी लिखिये कि, आपका दर्शन कवतक होगा! इतिशम्। मिती अगहन वदी५बृहस्पत वार संवत् १९६० हे वहन ! यह तो मैंने तुझे हिन्दुस्तानी रीति चिट्ठी लिख- नेकी वताई और अव अंग्रेजी रीति भी बताती हूँ कारण कि, आज कल इस की ही वहुत चाल है। आजकल पत्र लिखनेकी यह रीति है कि, पत्रके ऊपरी भाग पर अपने स्थानकानाम और तारीख दाहिनी ओर लिखै, फिर नीचे उस मनुष्य और उसके स्थानका नाम कि, जिसको पत्र लिखा जाता है लिखे इसके पीछे पहली पंक्तिमें वाई ओर बड़ों . PPPTEMPETE POST . (२०) स्त्रीप्रबोधिनी। dain tu " में विद्यावृद्धको पूज्यपाद, विद्यावृद्ध, पूज्यवर, महाशयआदि धर्मवृद्धको धर्म धुरन्धर, महोदय आदि मित्रआदि बराबरवा- लोंको, प्रियतम, मित्रवर प्रियवर, सुत्दृत्तम, प्रियवंधु, बंधुवर, आदि तथा छोटोंको चिरंजीव, प्रियवत्स आदि स्त्रीको प्रिय- प्राणप्रिय, प्राणवल्लभे लिखना उचित है। पतिको आर्यपुत्र, प्राणनाथ, प्राणवल्लभ आदि लिखना चाहिये। फिर हे बहन ! दूसरी पंक्तिसे आधी पंक्ति छोड़कर पत्र लिखना उचित है; जव पत्र समाप्त होजाय तो नीचे, यदि वह पत्र छोटेकी ओरसे बड़ेको हो तो "आपका आज्ञाकारी' आपका सेवक वा “आपका प्रेमपात्र" इत्यादि यदि वड़ेकी ओरसे छोटेको हो तौ. "तुम्हारा शुभेच्छु” "तुम्हारा हित- काँक्षी'" वा "तुम्हारा शुभचिन्तक" इत्यादि और वरावर वालेको होतो "आपका प्रिय मित्र" इत्यादि शब्द लिखकर नीचे पृथक् पंक्तिमें अपना नाम लिखना चाहिये । चिट्ठी पिताको पुत्रीकी ओरसे- जैपुर ता० २५ अप्रेल, सन् १८९७ ई. महामान्यवर! इसके पहले मैंने एक पत्र आपकी सेवामें भेजा उसका उत्तर अभी तक नहीं आया क्या कारण है कृपाकर लिखियेगा. अब मेरी छोटी बहनका गौना कव होगा. बड़ी बहन सुसरालसे आगई या नहीं यदि आगई हों तो उनसे भी पत्र भिजवाना। आजकल मेरी सासुजी मथुराजीको गई हैं,मैं घरमें अकेली

वालिका-विद्याशिक्षा। (२१)
ही रहती हूँभाईकी छुट्टी होगई हो तौउनको मेरे पास भेज देना
पत्रका जशव जल्दी देना।
आपकी आज्ञाकारिणी-
प्रकाशवती..
चिट्टी माताको पुत्रीकी ओरसे ।-
आगरा.
ता० २१ जून-सन् १९००,
महामान्य माताजी!
प्रणाम ! आपसे विदाहों में भली भाँति आनंद पूर्वक काशी
जी पहुँच गई अब मैंने लल्लाकी वहको बुलानेके लिये पत्र डाला
जो इसी महीनेमें विदा ठहर गई तो दोनों बहनोंको भेज
देना आजकल मेरा मन यहाँ विलकुल नहीं लगता तुम्हारी
याद बहुत आती रहती है. विदा ठहर जाने पर आपको
पत्र लिखूगी।
आपकी पत्री
भाग्यवती.
चिट्टी वड़ेभाईको वहनकी ओरसे-
मुरादाबाद
ता० २५ जून-सन् १९०१ ई०
पूज्यवर भाई साहव!
आपका २५ तारीखका पत्र मेरे पास आया; अब आप
वहूको विदाकराकर शीघ्र चले आइये घर पर अम्माकी
तवियत खराव हो रहीहै; और फिर दो एक दिनमें
शुक्र डूबनेवाला है जहाँ तक हो सके शीघ्र आओ क्यों कि,
{
१

(२२) स्त्रीप्रबोधिनी फिर बहूके घर में लेनेका मुहूर्त टल जायगा; आप बड़े बेफि- क्र होकर बैठ रहे हो। देखतेही पत्रके चले आइए। आपकी भगिनी कमलावती, . चिट्ठी पतिको स्त्रीकी ओरसे- नैनीताल ता० ५ मार्च सन् १९०१ ई० प्राणनाथ! 'आज कई महीनोंके पीछे मैंने आपका प्रेमपत्र पाया बाँच कर नेत्र सफल हुए कई बार पढ़ा परन्तु तृप्ति न हुई, अपने चित्तकी दशा आपको कैसे दिखाऊँ, मेरा मन सदा आपकीओर लगा रहताहै, परन्तु आप बड़े कठोर हो चल- ते २ मुझसे कह गये थे कि, मैं रोज एक पत्र भेजूंगा पर आज महनिमें एक पत्र मिला: कलावती रातदिन चाचा २ करती रहती है। कृपाकर कुशल पत्र जल्दी २ भेजा कारए; जिससे चित्तको धीरज तो बँधा रहै। आपकीदासी श्यामकांता हे बहन ! इस रीतिसे जो तू चिट्ठी लिखा करैगी तो बहुत जल्दी चिट्ठी लिखनी आ जायगी और सबमें अब्बल रहै गी; अब चिट्ठीके बाद लिफाफे पर जिस रीतिसे पता लिखा जाता है वहभी मैं तुझे बताती हूँ इसी रीतिसे लिखा करना। का

बालिका-विद्याशिक्षा।
(२३)
हेवहन ! आजकल तो लिफाफा इसीरीतिसे लिखा जाता
यह नई रीति है।
टिकट लगादिया.
श्रीवाबू गोपीनाथजी गुप्त
हेड मास्टर हाईस्कूल
प्रयाग
1
यह लिफाफा लिखनेकी पुरानी रीति है, पहले इसीरी-
तिसे लिखा जाता था जो रीति तुझे अच्छी लगै उसी
रीतिसे लिखा करना।
७४॥ चिट्ठी पहुँचैवमुकाम दिल्ली मुहल्ला
मुरगोंकी गलीमें पहुँचकर
वनवारी लालको मिले.
சசச
1
4
सामान्य शिक्षा
हे बहन ! मैंने तुझे लिखना पढना तौ सिखाया परन्तु
इस समय कुछ शिक्षाकी बात भी बताती हूँ, जिस समय
तुम स्यानी हो जाओ और तुम्हें कुछ ज्ञान होजाय तो अपने
मैकेमें इस प्रकारके व्यवहारसे रहो जो तुम्हारे ससुराल चले
जानेपर तुम्हारे घरवाले सब तुम्हें याद किया करें बहुत
सी लड़कियें ऐसी होती हैं कि, वह बात २ पर अपनी

statitut
(२४).
स्त्रीप्रबोधिनी।
Y
मासे लड़ती हैं. भाई भौजाइयोंको गालियाँ देती हैं, घरका
कुछ काम काज नहीं करती. दिनरात पच गुट्टे हाथमें लेकर
घर २ खेलती फिरती हैं, उनका कहीं आदर नहीं होता
ससुराल चले जाने पर कोई उनके बुलानेका नाम भी नहीं
लेता, ससुरालमें भी उनका निवहना कठिन होजाता है। यदि
कभी ठिक टेहलेपर आभी गई तो उनकी पूछ कोई नहीं
करता, लड़कियोंको ऐसा काम कभी नहीं करना चाहिये.
माता पिता जिस किसी कामको कहैं उनका काम उसी समय
करना चाहिये, अपने माता पिताका जहाँ तक होसकै काम
वटाना चाहिये हलके २ काम कर लिये भाई बहनने पीनेको
पानी.माँगा तो झट उठकर दे दिया; अम्माको तमाखू बनाकर
आई,घर आंगनमें बुहारी दे डाली,कभी मन हुआ तौ चौका
भी फेरलिया, तरकारी बनाली,दाल बैठ कर बीनली, तुम्हारा
इतनाही सहारा बहुत होगा अम्मा रोटी करनेको चौकेंमें गई
तो हलदी मिर्च मसाला पीसकर रखदिया इसमें तुम्हारे दो
काम वनेंगे. एक तो काम करना आजायगा और दूसरे तुम्हारे
माता पिता खुश होंगे; अपने भाई वहनसे कभी मत लड़ा
करो प्यारके साथ हिल मिल कर खेला करो, जब कोई वस्तु
ही तुम्हारे पास हो तो अपने भाई वहनं आदि सबको
हेले कभी मत खाओ; भौजाइयोंसे कड़वा
वोल वोलनो नहीं सदा मीठा वोलो, हलकेसे चलो
धमक कर मत चलो, कोई ऐसी वैसी बात मा वापके सामने
मुँहसे मत निकालो, जब तुम्हारी सहेली तुम्हारे पास आ तौ
उनको आदर भावके साथ बैठालो और अच्छी २ वात करो
,

बालिका-विद्याशिक्षा। (२५.) किसी सहेलीसे किसी सहेलीकी बुराई भलाई मतकरोजो लड़- कियें इधरकी उधर और उधरकी इधर लगाया वुझाया करती हैं उनकी वात का कोई विश्वास नहीं करता, फिर उनसे कोई अपने मनकी वात नहीं कहता; और सब उसे लगा लूतरी कहते हैं, जो तुम्हारी मा तुम्हें घर पर बैठालकर कहीं को जाय तो घरको इकला छोड़कर कभी कहीं नजाना इकला घर छोड़नेमें बड़ी हानि होती है, चौकेमें कोई चीज रक्खो तो दूरसे रक्खो जिससे कि, चौका छू न जाय, कोई चीज खाओ तो हाथ मुँह धो डालो; जूंठन न लगी रहै,जल्दीरशिर अवधवा लिया. जिससे कि, शिर साफ रहै, यही वातें लड़कि- योंको सीखनी उचित हैं.यदि कभी ननसालमें जाना होगया तो वहां जाकर बड़े शील स्वभावसे रहना चाहिये नानी माँईसे कभी तू तडाकसे बोलना उचित नहीं वह जिसकाम- को कहैं उनका वह काम तत्काल कर दिया. हे वहन मह मैंने तुझे शिक्षाकी वातै वताई, अब मैं तुझे सीने पिरोने तथा कसीदे आदिका काम भी बताऊँगी । अर्थात् सीना पिरोना कसीदाआदि) हे वहन ! अब तुम एक काम और करो लिम्बुनामा । आही गया. अब मैं तुम्हें कुछ मील पारन आर काढूना इत्यादि भी सिखाऊँगी इस कारण तुम एक वेला तो पढ़ा लि. खा करो.और एक वेला सीना सीखा करो, क्योंकि, यह भी एक स्त्रियोंका प्रधान गुण है, जिन स्त्रियोंको सीना पिरोना आता है उनको किसी प्रकारका दुःख नहीं होता; और वह मन F (२६.) स्त्रीप्रबोधिनी। माना कपड़ा सीकर पहर सकती हैं और अपने लड़की लड़- कोंको पहरा सकती हैं. उनका पैसाभी वृथा नहीं जाता है। बहु- धा ऐसा होता है कि, जिन्हें सीना पिरोना नहीं आता। उन विचारियोंके लड़की लड़कोंका कपड़ा दरजीके यहाँ सिलने- को जाता है; और त्योहारके दिन बहुधा दरजी कपड़ा नहीं देते इससे उनके बालक वर्ष दिनके वर्षदिन नंगे और मैलेकुचै- ले कपड़े पहिने रहते हैं इसी कारणसे उन स्त्रियोंको अत्यन्त दुःख होता है और जिन स्त्रियोंको सीना पिरोना आता है वही स्त्रिय धन्य हैं कारण कि, वह त्योहारसे आठ दशदिन पहलेही अपने तथा अपने वालवच्चोंके कपड़े सीरखती हैं; और त्यो- हारके दिन सबसे पहले अपने वालकोंको पहिना देती हैं, उन- को दरजीके यहाँ की वाट देखनी नहीं पड़ती और न मन मार कर बैठना पड़ता है। इसी कारण से मैं तुम्हें सीना पिरोना भी भली भाँतिसे सिखा दूंगी: जिस समय तुम कुछ भी कपड़ा सी- ओ या कादो तो इस बातका भीजरूर ध्यान रक्खो कि, सुई किस प्रकारसे पोही जायगी. उसकी रीति यह है कि, सुईके न- कुयेको अपन बाये हाथके अंगूठेसे थामलो और जिस डोरे या रिशमकौउसमें पिरोओ तो उसके पासही की अंगलीसे वट कर उसे सीधा करलो डोरेमें कोई सलवट या झोल तथा पूँसड़ान रहै. साफ करके डोमेको सुईमें पिरोओ ऐसा करनेसे फिर तुम्हें. सीनेमें. कुछ कष्ट नहीं पड़ेगा. पहली पहल पुराने कपड़ोंको सीकर उन परसे सीना सीखो फिर जब तुम्हारे सीनेमें सफाई आजायगी तभी तुम नये कपड़ोंको सिया करना प्रकाशवती अपनी बहनकी यह बात सुन कर उसी बटन क रु tos बालिका-विद्याशिक्षा। (२७) untutianton समय घरमेंसे एक पुरानी धोती ले आई और कहा कि, लो इसके कपड़े वोतकर तुम मुझे सीना सिखाओ। प्रकाशव- तीका ऐसा उत्साह देख विद्यावती प्रसन्न हुई और अपनी जुलदानीमेंसे सुई, गुल्ली, गज, कैंची आदि निकालकर धोतीको अपने हाथमें लिया और प्रकाशवतीसे कहा कि, तुम मेरे निकट बैठ जाओ। जिस प्रकारसे मैं इस कपड़ेको छा, तुम भी उसी प्रकारसे छाँटना, यह कह कर प्रकाशवती को अपने पास बैठाल लिया- सीनेके समय इस वातका ध्यान भी रखना अत्यन्तही आ- वश्यकहै. कि, हाथ, पैर यह सभी साफहों, मैले कुचले नहीं, और जो मेले कुचले हाथोंसे सिओगी तौ कपड़ेमें सफाई नहीं आवैगी, और देखनमेंभी वह कपड़ासुन्दर नहीं लगेगा, इससे तुम्हारा सवपरिश्रम वृथा जायगाः सीनेके समयमें सावधानी रखनेकी अत्यन्त आवश्यकताहै और सफाईकाभी अत्यन्तही प्रयोजन है.। २-सीनेके समयमें सुई ही समस्त कार्य करती है, पसूजनेके समयमें तो कुछ एक गद्दर अर्थात् न वहुत मोटी और न मही- न ऐसी सुई होनी चाहिये, और वखियाके लिये बहुत बारीक मुई होनी योग्यहै, इससे सिलाई वहुतही सुन्दर आती है। और हे वहन ! इसमें डोरेकाभी भेद है. पसजके लिये मोटा डोराहो. और तुरपके लिये बहुत वारीक हो और वखिया करनेके लिये मझोला डोरा होना चाहिये । हे वहन ! यह भी ध्यान रखो कि, जिसरंगका-कपड़ा सियो उसी रंगका उसमें डोरा लगा- ओ तो वह सिलाई नहीं चमकेगी, वहन ! यह सीना पिरोना पढ़नेसे भी अति कठिनहे; कारण कि, लिखनेकी भूलको

(२८)
स्त्रीप्रबोधिनी।
andit
तो शुद्ध कर लिया जाताहै. परन्तु सीनेकी भूलका सुधारना
कुछ सरल नहीं है। जब कहीं तुम्हारे सीनेमें भूलपड़जायगी
तब उस कपड़ेको विना उधेड़े हुए उसका सुधार नहीं होसक
ता-इससे तुम्हारा प्रथमका सभी परिश्रम नष्ट होजायगा। इस
कारण इस बातका विशेष ध्यान रंक्खो कि, किसस्थानपर
कौनसा भाग जुड़ेगा। और फिर जिस समय तुम्हारा मन
नहो उस समय सीना उचित नहीं, उस समय सीनेमें सिलाई
कभी सुन्दर नहीं होती. ऐसे सीनेसे तो न सीनाही अच्छा
है। कारण कि, सीनेका यही अर्थ है कि, वह देखनेमें सुन्दर
और सुहावनाहो, जिसको देखकर मन एक साथही
प्रफुल्लित होजाय, वार २ देखनेको जिसके लिये इच्छा वनी
रहै उसीका नाम यथार्थ सीनाहै; और जब कि, तुम्हारी
सिलाई ऐसी सुन्दर और मनको हरण करनेवाली न हुई तव
फिर उस सीनेका प्रयोजनही क्याहै।
जो तुम इन नियमोंके अनुसार सिया करोगी तो कभीभी
तुम्हारा सीना खराब और बदसूरत नहीं होगा, ऐसा कार्य
करनेसे.सब जगह तुम्हारा आदर और सन्मान होगा।
हे बहन ! मैंने तुम्हें जो जो बातें बताई यह सभी तुम्हारे
उपयोगीहैं १ कैंची १ गज २ महीन मोटी दो प्रकारकी गुल्ली
और महीन मोटी दोनों प्रकारकी सुई प्रत्येक सीनेवालीको
अपने पास रखनी उचितहैं अब मैं तुम्हें एक चादर सीनेके
लिये देतीहूँ तुम इसके बीचमें पसूज डालना-पसूजकरतेमें
इतना और ध्यान रखना कि, पसूज टेढ़ी वेढ़ी न हो; जहां-
तकहो सिलाई सीधी आवै यह कहकर विद्यावतीने जरासा
ल
हसन

बालिका विद्याशिक्षा। (२९) . चादरका कोना सीकर बतादिया, प्रकाशवतीने अपनी चतु- राईसे उसीप्रकारकी सिलाईसे चादर सीली और बहनसे कहा कि. जीजी पसूज तो मैं जानगई अब केवल मुझे वखिया और तुरपकरनी और बतादो प्रकाशवतीकी यह बात सुन- कर विद्यावतीने कहा कि, हे वहन ! वखियाके लगानेमें इत- नी बात होनी चाहिये कि, जहांतकहो वखियाका, टांका निकट २ लगाना और इसीप्रकारसे तुरपकरनाः तुरपभी महीन होनी चाहिये, और पसूजनेके समय तुरपका भाग छो- दियाकरो जिससे तुरपने में टांका नछीजाय और तुरपकी दरज चौंड़ी रहे बखिया जहांकरो सीधी और दाने दार करो टांका वरावर निकालो कमती बढ़ती नहो. तब तुम्हारी वखिया बहुत साफ़ आवेगी लाओ अब मैं इसी चादरके एक सिरेपर तुम्हें पलीतेदार गोट बखियाकी सिलाईकी अवताऊँ, यह कहकर विद्यावतीने एक गिरेके चौथाई हिस्सेकी वरावर गिलासके खासेकी सुदेव गोट लेकर चादरके एक सिरेको पसृज दिया और गोटकी लंबाईकी किनारपर लाल डोरा बटा हुआ मोटे २ टोवोंसे सीदिया और उसके. एक कोनेमें जरासी बखिया लगाकर वतादी और कहा इसी प्रकारसे सीना प्रकाशवतीने बहनकी आज्ञानुसार चादरके सिरेपर पलीतेदार गोटपर दानेदार वंखिया लगाकर सीडाली जिसको देखकर वहनको अत्यन्तही आश्चर्य हुआ और प्र- काशवतीसे कहा कि, हे वहन | अब तुमपर पसूज और ब- खिया करनी तौ आईही गई; अब मैं तुम्हें टोपी कुरता सीना तथा उसका छांटनाभी बतातीहूँ, तुम इसे सीकर दिखाओ- করুক্ষলক্ষ শুনুন্য th ttttt htott kit titt " * (३०) वीप्रबोधिनी। गी तभी म तुम्हें बहुत उमदा और बहुत बढ़िया कमीज कलकत्तेकी तरजका सीना और कतरना बताऊंगी; जो कि. स्त्रियोंसे उसका सीना विलकुलभी नहीं आताहै। प्रकाशवती बड़ी प्रसन्न हुई और बोली कि, इसी धोतीमेंसे कुरता टोपी छाँटदो भाग्यवतीने कहा कि, लो.... वहन ! मैं तुम्हें कुरता छांटना और सीना बतातीहूं, प्रथम तो तुम यह याद रखना कि सबसे बड़े कुरतेमें गज भरके अर्जका कपड़ा सवादोगज लगताहै और चार वर्षके बालकके कुरतमें सवागज लगताहे कुरते में चार कली पड़तीहैं बड़े आ- दमीका कुरता गजभर नीचा होताहै, और बालकका दश गिरह, बड़े, आदमीकी आस्तीन बारह गिरह नीची और बालककी छः गिरह नीची होतीहै; अब यह विचार लेना होगा कि, बड़े कुरतेमें हमें कितना घेर करनाहै। जिससे उतनीही चौंड़ी कलिये काटी जायँ गजभर कपड़ेका तो आगा पीछा फाडले, और गज- भरमें चार कलियोंकी इस प्रकारसे तराश ले जिससे कि, कपड़ा खराब न जाय; कपड़ेकी वरावर घरावर दो तह मोड़कर फिर उसे बीचमें चुनकर कैंचीसे तराशले और डेढ़ गिरहकी लम्बी और डेढ़गिरहकी चौंड़ी बगल फाइले फिर सुदेवकी ओर दोनों- कलियोंके कमचौड़े शिरपर जोडदे फिर उसको बांहोंमें जोड़े इस प्रकारसे तुम भली. भाँतिसे कुरता सी सकोगी और ओरेवी (३१) बालिका-विद्याशिक्षा। Print ओर की कलियोंको आगे पीछेमें पसूज देना. फिर सिलाईमें जो कुछ कलियें बढ़ जायँ उन्हें दामन तुरपते समयमें कैंचीसे काट डालना और जव कुरता सी चुको तो मुझसे इसका गला वनाना सीख लेना प्रकाशवतीने ऐसाही किया; उसने वहनकी बताई हुई रीतिके अनुसार कुरता सीकर खड़ा कर दिया और दामन तुरप कर वहनसे कहा जीजी अव तुम मुझे इसका गला बनाना बतादोः विद्यावती कुरतेको देख कर अत्यन्तही संतुष्ट हुई और कहने लगी कि, ला वहन अव मैं इसका गला लगाना भी बता दूँ; यह कह कर उसने गलेको कैंचीसे तराश कर उसमें सफेद खासेकी पट्टी लगा कर उस पर वखिया कर दी और उसकी नोंक मोड़ कर उस पर भी भली भाँतिसे बखिया कर दी, फिर प्रकाश- वतीसे कहा कि, तेरी समझमें आगया अब इसको देख कर तू दूसरे कुरतेका गला इसी प्रकार वनाना प्रकाशवतीने ऐसाही किया; और दूसरे कुरतेको साग सुन्दर सीकर वह- नको दिखा दिया विद्यावतीने कहा कि, हे बहन ! यह दुक- लिया और चौसइया टोपी छाँटनी बताये देती हूँ चौसइया टोपीकी चार कली इस रीतिसे छाँटना जिस रीतिसे मैं तुम्हें बताती हूँ, देखो जैसी कली यह मैंने छाँटी है इसी प्रका- रकी चार कली छाँटना फिर इन चारोंको वराबर २ जोड़ लेना तव गुव्वारेकी तरजकी बहुत सुन्दर और सुहा- वनी गोल टोपी वन जायगी, दुकलियाके दो पल्ले होते हैं दोनोंको मिलाकर वरावर कर औरेवकी। ओरसे पसूज लेना उचित है। फिर उसमें दो जो की वरावर चौंड़ी गोट लगावै गोट सीधी अच्छी लगती है; और जो

(३२)
स्त्रीप्रबोधिनी।
Guru
मुदेवः
गोटके दोनों सिलाइयों पर लाल या काले रंगका पलीता
लगाओगी तो टोपीकी देखनेमें अत्यन्तही सुन्दरता होगी;
दो प्रकारकीही गोट लगाई जाती है एक तो औरेव एक सुदेव
सुदेव गोट तो सीधे कपड़मेंसे फाड़ली जाती है औरेव
गोटकी थैली करनी होती है सुदेव गोटके लगाने में जोड़
बहुत आते हैं और आड़ी गोटमें जोड़ कम आते हैं; आड़ी
गोटका तराशनाभी मैं तुम्हें बताती हूँ गज भर या बारह
गिरहके कपड़ेको तीनों तरफसे वखियाकी सिलाईसे सी
लेना और चौथा सिरा खुला रखना; और उसको आड़ा
करके चुन लेना फिर उसीकी सीध पर कैंचीसे काटना
जितनी चौंड़ी गोट लगानी हो उतनीही चौंड़ी पट्टी तरा-
शना. रेशमीन सूती सब तरहकी गोट
इसीरीतिसे काटी जाती है फिर यह अपनी
इच्छा रही कि, चाहे जितनी चौंड़ी काट
लो गोट बस दोही प्रकारकी प्रत्येक कपड़ेमें लग सकती है,
हाँ केवल इसके लगानेकीरीति भिन्न रहैं। एक तो संजाफदार
गोट होतीहै जो कि, पहले गोटको मोड़कर कपड़ेमें पलीता
धरकर लगाई जातीहै यह गोट एक जोकी, बराबर आगेको
निकली रहतीहै और आधगिरह चौड़ी तुरपीजातीहै;एक डेढ़
गोट होतीहै, जो डेढ़ हिस्सा मोड़कर लगाईजातीहै और एक
हिस्सा तुरपनेके लिये छोड़ी जातीहै इसका भी पलीता
कपड़ेमेंही डाला जाताहै; और एक डोरीकी गोट लगाई
जातीहै; आध गिरह चौड़ी. गोटकी किनारपरही पलीता
डालकर उसको कपड़ेपर रखकर उसपर बखिया की जाती है

वालिका-विद्याशिक्षा। (३३) और फिर उसकी नीचेको तुरपाई होती है। और एक डवलगोट होतीहै; आजकल इसी डवलगोटका हमारे भारत- वर्षमें अधिक प्रचार होरहाहै; यह गोट गिरहका तिहाई हिस्सा चौंड़ी होतीहै इसके दोनों ओर पलीता रक्खा जाता है और इसे कपड़ेके ऊपर रखकर फिर दोनों ओर इसके वखिया की जातीहै, तब यह गोट देखनेमें अत्यन्तही सुन्दर और मनको हरण करनेवाली प्रतीत होतीहै। वस आजकल इसी गोटका अधिक प्रचार होरहाहै; इसीकारणसे मैंने तुम्हें यहभी गोट वतादी अव इन गोटोंमेंसे चाहै जौनसी गोट चाहै जिस कपड़ेपर लगाओ। लैंहगा, डुपट्टा, कुरती, अंगा, कुरता, टोपी सभी कपड़ोंमें यही गोट लगाई जातीहै; तुम इन सभीको सीखलेना प्रकाशवतीने ऐसाही किया, उन्हीं पुराने कुरतोंपर सब प्रकारकी गोटें लगा २ कर सीखली, विद्यावतीने कहा कि, हे वहन ! आजकल अंग्रेजी कोट हैद रावादी अचकन, कमीज, अंग्रेजी वासकट ( वैस्टकोट ) इनकाही पहरावा चल पड़ाहै इसकारण इनका सीना और छाँटनाभी मैं तुम्हें बताऊँगी, तुम क्रम २ से सब कपड़े तैयार कर २ रखती जाना जब तुमसे यह कपड़े सीने आजायेंगे तो अतुम्हारा संसारमें बहुत आदर और सन्मान होगा । अव हेवहन प्रकाशवती! अंगरखेकाभी कतर वात इसी प्रकारका होताहै पूरे आदमीके अंगरखेमें गजभरके अरजका तीन गज कपड़ा लगताहे उन्नीस गिरह नीचा और आठ गिरह चौंड़ा अंगरखेका पीछा फाइले और आठ गिरहके दो परदे कतरले अंगरखेमें कली छः पड़तीहैं, परदा, चाक, ३ (३४) .. खीमबोधिनी। , बाँह, चौवगले, गृहवान, गलेके पिछाड़ी एक पट्टीसी लगाई जाती है कमर पट्टी यह इस प्रकार वौंतीजाती है कि, जितनी चौड़ी कमर हो उतनाही कपड़ा अर्जसे नापकर उसीमें परदेके लिये दो या ढाई गिरह बढ़ाकर कपड़ा फाडले, चौड़ाई से परदेका कपड़ा छोड़कर वाकी कपड़ेके दो वरावर टुकड़े करलेने उचित हैं, और जिस कपड़ेमें पर्दा छोड़ाहै। उसमेंसे आधेके पर्दैको छोड़कर दो टुकड़े करले यही दोनों आगे होजायगे और वह एक पीछा, आगेमें पर्दा रहजायगा जिसके कतरनेकी रीति इसप्रकार है उसपर सुनकर कतरले तो दो टुकड़े अलग २ होजायँगे तो हे वहन ! पर्दा तुम्हारा ठीक वनजायगा और वायें हाथका आगा होजायगा, जितनी नीची चोली रखनी चाहो उत- नाही नीचा कतरलो, वायें हाथके आगेमेंसे ऊपरका भाग थोड़ासा कतरलेना, जितनी चोली नीची रक्खै उतनीही अँगरखेकी निचाई से घटाकर कलियोंको वोतले कलियें तराशनेकी रीति तो मैं पहलेहीसे तुम्हें वता- आईहूँ; और इसीप्रकारसेभी इसके सीनेकी रीतिहै, पहली पहल दो कली अलग २ पसूजले फिर इन दोनोंको "पिछा- डीके भाग" में एकओर जोड़दे फिर एक कली और जोड़े और पीछे पर्दैको जोड़े परदेमेंसे थोड़ासा द्वितीयाके चंद्रमाकी भांति गला कतरले; वीचकी दोर कलियोंके ऊपर चौवग- लोंको जोड़दे, फिर वगलको बाँहमें जोड़दे और आस्ती- नकी मौरी छांटले जिस ओर वगल आस्तीनमें जुड़ती है उसओर आस्तीनकी चौड़ाई साढ़ेपांच गिरह होती है, और "

बालिका-विद्याशिक्षा।
मोरीको छाँटकर चार गिरहकी रखनीचाहिये, और फिर
इन आस्तीनोंको मुद्देमें जोड़दे फिर इसके चारोंओर उमदा
दाने दार वखिया करके गोट लगावो इस रीतिसे सीने
के अनुसार तुम दरजीसे भी अव्वल अंगा तैयार कर सकोगी;
हे वहन ! कहो तो सही अंगरखेका कतरना और सीना
तुम्हारी समझमें आगया या नहीं? प्रकाशवतीने कहा कि हे जी-
जी! मैं अपनी बुद्धिके अनुसार अंगरखा छांटकर सीकर तुम्हें
दिखातीहूँ जो अँगरखा तुम्हारी कहीहुई रीतिके अनुसार
सीकर वतला, तब तुम मुझे कलकत्तेकी तरज़का
कमीज़ सीकर बतादेनाः विद्यावतीने कहा अच्छा
नं.१ कोटकोपीठ,
कोटकासामना.
वाह.
बाहै
.

स्लीमबोधिनीं।
नं०२ वासकटकासामना.
वासकटकीपीठ,
-
नं०३ अचकनकीपेस.
अचकनकीपेस.
बाहै.
बाहैं.
कालर.
0

(३७)
वालिका-विद्याशिक्षा..
that
अचकनकी पीठ.
पायजामा.
नं०४
नं.५ कमीजका सामना.
कमीजकी पीठ.
-
१
बाहैं
.
कफ.
पाहै.
कफ

(३८)
ब्रीप्रबोधिनीं।
बगल.
बगल.
चौबगले.
चौबगले.
..
नं०६. कुरतीकी पीठ.
कुरतीका सामना.
बाहैं.
बाहै.
.

बालिका-विद्याशिक्षा। (३९) नं०१-हे वहन ! अठारह उन्नीस गिरह नीचे कोटमें गज़- भरके अर्जका कपड़ा साढ़े तीन गज लगताहै, कोटको इस भाँति छाँटना चाहिये कि, पहले कपड़ेको दुहरां कर, एक शिरमेंसे तो अगाड़ीकी पेश काटले और एक शिरमेंसे पीठ तराशले तराशनेसे पहले पिंडोल मट्टी या कोयलेसे इस नकशेके अनुसार निशान काढले, फिर दोनों पाटोंमेंसे जो कपड़ा वचैगा उसकी वाह जेबें और कालर वनाले, इस भाँतिसे कोटको छाँटकर फिर उसकी पीठमें दोनों साम- नोंको जोडै; और दोनों चाकोंकी धारीपर वरावर सिलाई करके फिर उसमें वाहैं सीकर जोड़दे, इसके पीछे कालर लगावै फिर चारोंतरफ दुहरी बखिया कर तीनों जैबैं तराश- कर लगादे कोटमें चाक नहीं खुले रहते सवाविलस्त पीठ में सुलारहताहै! नं०२-अंग्रेजी वासकट (वेष्टकोट) काभी सीधा हिसाव वासकटमें गजभरके अरजका कपड़ा गजहीभर लगता पूरे आदमीकी वासकट दश गिरह नीची होतीहै। दो पाट कर कोयलेसे चिह्न लगाकर नकशेके अनुसार तराशले एक पाटमें दोनों पेशें करले; और एकमें पीठ करले फिर पीठमें दोनों पेशोंको जोड़कर सिलाई करजाय इसके पीछे चारोंओर वखिया कर तीन जेव लगावै बसवड़ी सुन्दर वा- सकट तैयार हो जायगी और जहां एक २ वार तुमने एकर कपड़ा सीडाला फिर तो ढव पड़जायगा। नं०३-वीस गिरह इक्कीसगिरह नीची अचकनमें बारह गिरहके अरजका कपड़ा साडेचार गज लगताहै, इसकोभी दो (४०) स्त्रीप्रबोधिनी। पाटकर निशान लगाकर नकशेके अनुसार तराशले एक पान्में दो पैश छोटे और एक पाटमें पीठ, बाकी जो कप- ड़ा बचै उसमें वाहैं जै कालर आदि छांटले। इसके पीछे पीठमें दोनों सामनोंको जोड़दे फिर चाकका हक छोड़कर सिलाई करजाय, मुड्डेपर बाहोंको जोड़दे, फिर चारोंओर बखिया करके जेब और कालर लगादे, इसके पीछे काज- करके वटन लगावै। नं०४-पैजामेंमें गजभरके अरजका कपड़ा सवादोगजल- अंगताहै पैजामा वीस गिरह नीचा होताहे घेर सवा दोगजका रहता है औरेवी पैजामेका थैला सीकर तीन गिरह ढीले पांयचे.तरा शले और सूधे पैजामका थैला नहीं सियाजाता उसके पांयचे आठ गिरहके ढीले रहतेहैं, फिर बीचमें आसन जोड़कर सिलाई करडालै, इसके पीछे नेफा तुरपकर मौरी बनाले। नं०५-गजभरके अरजका कपड़ा कमीजमें तीन गज लग ताहै, कमीज अठारह गिरह नीचा रहताहै इसके दो गज कपड़े कोदो पाट करके अगाड़ी पिछाड़ी नकशेके अनुसार तराशले और गज भर कपड़ेमें वाहैं और डबल सामना छांटे, और पांच गिरहके लम्बे ढाई गिरहके चौड़े कफ लगावै । कालर साढे छः गिरहका तरांशै काज पट्टीकी लम्बाई सात गिरह नीची रक्खे, सवाबालिस्तके चाक सीते समय छोड़कर बाकी सिलाई करजाय फिर उसमें बाँहैं जोड़दे इसके पीछे बाहौंमें घूम भरकर कफ लगावै, और दामनपर बखिया करजाय फिर काज बटन करले कालर लगावै-इसरीतिसे सीने कतरने से कमीज बहुत सुन्दर तैयार हो जायगा,

बालिका-विद्याशिक्षा।
नं०६-लुगाइयोंके पहरनेकी कुरतीमें गजभरके अरजका
कपड़ा डेढ़ गंज लगताहै पूरी लुगाईकी कुरती दश गिरह
नीची रहतीहै चार गिरहके चौवगले, ग्यारह गिरह ढीली
और बारह गिरह लम्बी अस्तीने छांटले, इसके पीछे आगा
पीछा तराशले फिर आगे पीछेको जोड़कर उसमें चौवगले
जोड़दे, वाहोंमें वगले जोड़कर मुट्ठोंपर वाहोंको जोड़दे फिर
तुरपकर गोट लगावै इसी भांति चाहै छोटी लड़कीकी चाहै
वड़ी लुगाईकी कुरती सीलो।
हे वहनाकहो इनका छांटना सीना तुम्हारी समझमें आया
प्रकाशवतीने कहा हाँ वहन ! अव मैं इसी रीतिसे छोटकर
सियाकरूंगी. इसका हिसाब तो बहुत सीधाहै, अब मुझे तुम
कसीदेका काढ़नाभी वताओ।
प्रकाशवतीने कहा हे वहन ! अब मैं तुझे कच्ची पक्की वेल
बूटियोंका काढ़ना भी बतातीहूं इनको तुम भली भातिसे
समझ लेना जो कढ़ावट मैं इस चादर पर सिखलातीहूं इसी
कढ़ावटसे अंगरखा कुरता रूमाल चादर दुपट्टा सभी कुछ
काढ़सकोगी आज तो मैं तुम्हें चादरके चारोंओर वेल
उसके बीचमें बूटियें डालेदेतीहूं,पहली पहल तुम इन
कढ़ावटसे काढ़ना।
,
र

(४२)
ब्रीप्रबोधिनी।
Saat
क
ग
ख
10
ड
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Mara
च
छ
ज
झ
*
.
है
वहन ! यह जो चादरके चारोंओर बेल डालीहै. इसमें
क) अक्षरखाली वेलको तुम इस प्रकारसे काढनाः प्रथम
खूव मोटा दो आने गजका खासा मँगाकर उसके ताने वानेको
उधेड़कर उन डोरोंको निकालना और चार २ तारके डोरे
202

बालिंका-विद्याशिक्षा (४३) निकालकर उनकी गुल्ली करलेना, फिर वेलकी पत्तीके चारों ओर बहुत बारीक २ सिलाईको पसूज देना; जब एक बार किनारे २ पर पत्तीके वरावरमें पसूज देआओ तब उसमें जो वीच खाली रहा है उसको फिर दुवारा उस पसूजके वरावर- मेंही महीन २ पसूजदेना; तव इस वेलकी पत्तीमें चार सिलाई होजायगी इसी कढ़ावटको चौसइया कढ़ावट कहतेहैं और इस विलमें जहांर गोलर विदीयैसी आई हैं इनको तुम इस भांतिसे काढ़नाः सुईमें तागा पिरोकर उलटी ओरसे सीधी ओरको निकालना ऐसा करनेसे एक रोजन होजायगा उसी रोजनको सुईसे जरा एक बढ़करके उसके चारों ओर एकर टांके की सिलाई करती जाना वस बहुत सुन्दर और गोल सितारा वनजायगा तव इस वेलकी सुन्दरताई इस प्रकारकी होजा- यगी कि मानो सोनेमें सुगंध मिलगयाहो, और इसके नीचेकी जो दुहरी लकीरहै उसमें मैं तुम्हें जाली डालना वतातीहूं : प्रथम इस चादरमें वेलकी लकीरके भीतरके चार पांच तारं निकाल लेना और सुईमें डोरो पिरोकर चार तार · सुईमें उठाकर फिर उस सुईको चादरकी किनारमें निकालना वरावर२ इसी प्रकारसे चार तार लेकर टांका लगाती जाना; वस बड़ी सुन्दर सितारेदार जाली पड़जायगी। (ख) प्रकाशवती और सुनो यह जो मैंने तुम्हें कढ़ावट वताई यह कच्ची कढ़ावट है। और अब मैं तुम्हें चादरके दूसरे पल्लेवाली वेलको पत्तीकी कढ़ावटसे वतातीहूं यह कढ़ावट आजकल किसीसेभी नहीं आती उस चौसइया कढ़ावटको तालतल

७
(४४)
श्रीप्रबोधिनी।
तो. सर्वसाधारण स्त्रिय काढ़सकतीहैं, परन्तु अभीतक इस
कढ़ावटका प्रचार इधरकी स्त्रियोंमें नहीं हुआ इस कढ़ावटमें
डबलकी चारवाली पेचकका डोरा लगेंगा, हे बहन ! इस
वेलको जिस ओर छपीहै इसी ओरसे काढ़ना इसका सीधा-
पन नीचेकी ओर रहेगा। इसमें सुईका टांका आड़ा निकलेगा
एक टांका पत्तीके इस ओर और एक टांका उस ओर
निकालना तो बहुत सुन्दर जालसा पड़जायगा उसके दूसरे
ओर सिलाई पड़जायगी और बहुत सुन्दर पत्तीकी वेल
तैयार करलोगी; इसी प्रकारसे इस पत्तीकी कढ़ाईके वेल
बूटे हरेक कपड़ेपर तुम काढ़सकोगी।
(ग) हे बहन! दो तरहकी कढ़ावट तो मैंने तुम्हें वताई
अब इस चादर में जो बूंटियें छपरही हैं उनमेंसे प्रथम (ग)
अक्षरकी बूटीका काढ़ना बतातीहूँ यह बूंटीभी कच्चे डोरोंसे
कढ़ती है, इस बूंटीकी कलियोंके इधर उधर वरावर २ पसूज
डालना इस बूंटीमें चार पसूज नहीं पड़ेंगी केवल दोही सिलाई
पड़ेंगी, वह दोनों सिलाई परस्परंमें मिलीहुई होंगी, तब यह
बूटी बहुत साफ कढ़जायगी, इसीको दुसइया कढ़ावटं कहतेहैं।
(घ) अब मैं दूसरी (घ अक्षरकी बूंटीका काढ़ना
बतातीहूं इस बूटीको प्रथम कहीहुई रीतिके अनुसार चौसइया
कढ़ाईसें भी काढसकोगी और गुल्लीके डोरोंसे मोइयेकी कढ़ा,
वटसे कालोगी, जिस समय तुम्हें इस बूटीको मोइयेकी
कढ़ावटमें काढूनाहो तो इस प्रकारसे काढनाः कि, पैसेकी
चारवाली गुल्लीके डोरेको महीन सुईमें पिरोना और कपड़े

बालिका विद्याशिक्षा! (४५) की बूटीकी जड़में टांका निकालना पत्तीके ऊपरके वरावर आड़े टांकोंकी पंक्तिकी सिलाईके टांके लगातीजाना, तो यह मोइये कढ़ावटकी बूंटी कढजायगी; यह कड़ावटभी आ- जकल किसीसे नहीं आती है यह बूंटी धुलकर बहुतही सुन्दर लगतीहै परन्तुइसके काढ़ नेमें इतना ध्यान अवश्य रखना कि छापेको हदमेंही टांकारहै उसके बाहर नहोजाय, कमती बढ़ती टांका लगनेसे बूंटीकी सुन्दरता जातीरहेगी। (ङ) अक्षरकी बूटीभी मोइयेकी कढ़ाईसे कढ़तीहैं,इसकी नोकपर जो तीन गोल २ बूंदै लगरहीहैं इनको पीले रेशमके डोरेसे सितारेकी कढ़ावटसे काढ़ना, और फूलके बीच में पके पीले रेशमसे वरावर वरावर दानेदार बखिया लंगाना तो यह बूटी-अत्यन्त ही सुन्दर विदित होवेगी। , (च)हे बहन ! इस बूटीका काढ़ना बहुतही कठिन है, इसमें तीन प्रकारका डोरा लगता, एक तो चार तारका कुच्चाऔर पैसेवाली गुल्लीका और एक पीला रेशमः तवं यह बूंटी काढ़ीजातीहै, प्रथम इस बूंटीको क, डोरेसे काढ़ना चाहिये, इस बूटीकी उपरकी पत्तियोंको. इसप्रका रसे काढ़ना कि, प्रथम सुईमें कुच्चा डोरा पिरोकर पत्तियों को काढ़ना पत्तीकी बरावरीमें सुईका टांका निकाल फिर उसके ऊपर उसी तागेको घुमाकर सुईको निकालना तो जालसा पड़जायगा। इसी प्रकारसे एक २ पत्तीमें पांच र वार सईको निकालना फिर जो इस बूंटीमें यह गोल २ बूदेसी वनरही हैं इनकी कढ़ावट इसप्रकार है कि, इस एक बूंदके ऊपर सुई का एक टांका-निकाल उसके ऊपर वरावर पांच टांके लगा-

४
(४६)
स्त्रीप्रवोधिनी।
*
ना, तव यह गोल घुन्डीसी वनजायगी फिर इसके चारों
ओर सुईको फिराकर डोरेको बैंचलेना, इससे इन घुन्डियों
की मजबूती होजायगी और इस बूंटीकी नीचेकी जड़की
लकीरोंपर पक्की गुल्लीके डोरेसे चिकनकी कढ़ाईसे कादना
और बीचमें पीले पक्के रेशमकी वरावर २ वखिया करती-
जाना तब यह बूटीं अव्वल नंवरकी कढ़कर तैयार होजायगी-
और इन कढ़ावटोंके काढ़नेसे हे वहन् ! संसार में तुम्हारी
अधिक बड़ाई और सन्मान होगा।
(छ) इस वूटेको लाल पीले हरे तीन रंगके रेशमसे
काढ़ना इसकी कढ़ावट प्रथम कहीहुई रीतिके अनुसार
पसूजसेही काढ़ना, एक २ कलीको एक २ रेशमके रंगके
रेशमसे काढ़ना तो यह बूंटी अत्यन्तही मनोहर होजायगी
और देखनेमें इस भांतिकां वोध होगा मानों कलका कढ़ा
हुआ ग्रान्डीलहै।
(ज) इस.बूटीको हे वहन ! पकी चिकनकी कढावटसे
काढ़ना इसके काढ़नेकी रीति इसप्रकारहै कि, पक्की मोटी
गुल्लीका डोरा सुईमें पिरोकर कपड़ेमें टांका निकाल डोरेको
सुईके चारोंओर लगाकर टोकेको वरावर वरावर इसीप्रकार
से निकालती जाना, तो यह पक्की चिकनकी बूटी तैयार
होजायगी, और बाजारसे भी अव्वल चिकनके दुपट्टे कुत्ते
तुम अपने हाथसे तैयार कर सकोगी और इस बूंटीकी
नोंकपर प्रथम कही हुई रीतिके अनुसार पालेरेशमके डोरे
से सितारेवनाना प्रकाशवतीने कहाअच्छा मैं ऐसाही करूंगी
.
"

वालिका-विद्याशिक्षा। (४७) (झ) इस बूटीको सात रंगके कच्चे रेशमसें पसूजकी तरह काढ़ना, एक २ पत्तीमें एक २ रंगका रेशम लगाना, फिर इसके सितारे पीले रेशमसे भरना तो यह बहुतही सुन्दर बूटी बन जायगी। अव हे बहन | मैं तुम्हें जालीका भी. काढ़नाः बताती इसका काढ़ना है तो बहुतही कठिन परन्तुं इसमें खाने गिन कर काढ़ना होता है, जिस प्रकार मैंने चादर पर तुम्हें बेल बूटे छाप दिये हैं, इसमें इस प्रकारकी वेल बूटी नहीं छापी जाँयगी इसमें केवल अपनी बुद्धिसे ही काइना होताहै आज मैं तुमको एक जालीका रूमाल देतीहूँ और जिस प्रकार मैं इसमें विलबूंटी काढ़कर बताऊँ उसी प्रकारसे तुम भी काढना हे प्रका- शवती ! इसमें भी खासेके चार तारका कच्चा डोरा लगाया जाता है। (अ) सुईमें डोरेको पिरोकर प्रथम इसके चारोंओर वेल काढ़ना जालीका एक टांका सुईमें उठाकर और एकको उसके नीचे दवाकर सुईको निकालना, सुईसे इस रूमालके चारोंओर काढंनाः चार जालीके खाने दाँई ओरके और चार खाने वाँई ओरके लेकर- चौसइया कढ़ावटसे काढ़ना वस यह रूमाल भली भांतिसे कढ कर सर्वाङ्ग सुन्दर होजायगा और इस कढ़ावसे तुम दुपट्टा कुरता इत्यादि भी काढ़ सकोगी.वसजालीकी कढ़ावट में केवल इतनाही ध्यान रखना है कि, जिस बूंटीको कादो उसके खाने (४८) स्त्रीप्रभोधिनी गिन लिया करो जिस बूंटीमें प्रथम चार खाने लेकर पत्ती बनाई है फिर सब पत्तियें उस बूंटीकी चार २ खानेकी बनाना जिससे पत्ती कम बढ़ नहोजाय. ऐसा करनेसे ही तुम जालीके सभी कपड़े भली भांतिसे काढ़ सकोगी। (ट) हे बहन ! अब मैं तुम्हें कामदानीका भी काढ़ना बताती हूँ- यह कामदानी इस प्रकारसे काढ़ी जाती है। बहुधा स्त्रियोंसे इसका काढ़ना नहीं आता, जहाँ उन्होंने इसके सीखनेका उत्साह किया. और काढ़नेके लिये सुईमें तार पिरोकर एक आधबार टाँका सुईका निकाला और जहाँ वह तार उलझा कि, झटसे. तोड़ मरोड़ कर रख दिया. उसमें केवल इतनीही सावधानी रखनेकी अत्यन्त आवश्यकता है कि, प्रथम सुईका तार निकाल कर सीधाही निकालना इस प्रकारसे उसी टाँके पर पाँच टाँके निकाले तब वह गोल बुंदकी चनेकी दालकी तरज़की बन जायगी. तारमें सलवट न पड़ने दे मैं तुम्हें अपने हाथका काम- दानीका कढ़ाहुआ रूमाल दिखा- ती हूं. इसको देख २ कर तुम इस रूमालमें दालें काढ़ना इसकी T कढ़ावटमें तारही दीखताहै कपड़ा *-**K नहीं दीखता. उलटी ओरको बहुत तार नहीं रहता है बस इस- का टांका निकालतेसमय इतना अवश्य ध्यान रक्खो कि,तारमें सलवट न पड़ें जिस ओरको तारकी सिधाई हो उसीओरसेसु- बालिका-विद्याशिक्षा। (४९) ईको निकालना.ऐसा करनेसे फिर तुम्हें काढ़नेमें उलझना नहीं पड़ेगा. जिस ओर तारकी महीन नोंक हो उसी ओरको सुई पिरोना, फिर इन्हीं बूटियोंसे चादर कुरता अंगरखा रू- माल टोपी इत्यादि सभी कुछ तुम काढसकोगी। हेवहन ! अब मैं तुम्हें कुछ थोड़ासा सलमे सितारे और कलाबत्तूका काम भी सिखातीहूं सो तुम इसे भी ध्यान देकर अपनी अटकलमें रखना। (ठ)हे वहन ! कलावत्तू और सलमे सितारेकी प्रथम वेल बनानीवतातीहूं इसमें पांच चीजोंकी आवश्यकता होतीहै प्रथम तो आधागिरह चोड़ी मखमल या साटन होनी चाहिये उस साटनको उतनीही चौड़ी तूलके ऊपर मोटे २ टांकोंसे सीदेना, फिर उसकी सीधपर कुड़ २का तार दुहरा टांक- जाना. इसकी सिलाई तकके डोरोंसे होतीहै पेचकका डो- रा काम नहीं आता, फिर कलावत्तूको दुहरा करके भन- मावट लेना फिर तारके उस वेलके वीच सिंघाड़ेकी तरजके लहरिये दार खाने वनाना उन्हीं खानोंके वीचमें कलावत्तू टांक २ कर सितारोंकी माफिक गोल पांच कोठे वनाना उन कोठोंपर सितारे टोकना उन सितारोंपर सलमा कतरकर टांकना, इस प्रकारकी वेल मेरे दामनमें लगीहुईहै इसको देखकरही तुम वेल बनाना, जब तुम केल बनाचुको तो इसके ऊपर कलावलूके केंगूरे इसीप्रकारके बनाना उनके वीचमें सितारेको प्रथम एक टांकेसे टांककर फिर सुईमें सलमां पिरो उस टांकेको सितारेकेरोजनमें डालकर नीचेकोनिकालना OPA (५०) स्त्रीप्रबोधिनी। tuisit इस रीतिसे तुम भांतिरकी सलमे सितारेकी बेलें वनासकोगी। (ड) प्रकाशवती! अब मैं तुम्हें निरे सलमेकी वेल वतातीहूं जिसमें कि, सितारोंके स्थानपर सलमाही भराजाता जिस समय तुम कलावत्तूसे काढ़कर खाने वनालो तव फिर मोटी सुईमें पोले चीरूका कच्चा मोटा डोरा पिरोकर सितारोंके स्थानपर सितारेहीकी माफिक गोल बूंदै वनाना फिर छोटे २ सलमेंके टुकड़े काट २ कर रखलेना, सुईमें सलमेके एक टुकड़ेको लेकर उस दालके ऊपर धरकर जहां सलमेकी समाप्ति हो उसी स्थानपर सुईका टांका लगाना. इसी रीतिसे बरावर सलमेके टुकड़े टांकना; जब वह पीला डोरा सलमेसे ढकजाय तव सुईको तोड़लेना; यह वेल देख- नेमें अत्यन्तही सुन्दर और बहुत भारी बनतीहे. हेवहन! यह अपनी इच्छारही कि चाहै जितनी चौड़ी बेल वनालो. चाहै कँगूरे लगाओ चाहै न लगाओ। इसी प्रकारसे सलमें सितारेकी बूटियें भी बनती हैं। प्रथम साटन या मखमलपर गेरूके रंगसे बूटीको छापलेना और उसकी वरावर लकीरपर कलाबत्तूको टांकती जाना उसके वीचमें सितारे टांककर उसमें सलमेकी धुन्डी टांकना, बस इसरीतिसे काढनेसे सलमे सितारेका कामभी तुमपर वहुत शीघ्र आजायगा। (ढ) अव हेवहन ! मैंने तुम्हें यह कसीदेका काम तो वतादिया यह तो तुमने समझही लिया परन्तु इससमय की

बालिका-विद्याशिक्षा।
(५१)
तुम्हें कुछ थोड़ासा उनका कामभी बतातीहूं गृहस्थीमें जो
काम अपने आपसे आताहो वही अच्छाई, आजकल शुलूवं-
दका शौकभी सभीकोहै. इसमें भांति २ के रंगकी उनैं लगती
हे प्रथम लोहेकी सवाविलस्त लांबी दो संलाका ले फिर एक
सरकफन्दी बनाकर. एक सुईमें डाले फिर उस सरकफुन्दीके
वीचमें दहिने हाथकी सुईको डाल उसपर उनका डोरा लपेटे
फिर उसी.सुईको उसी फंदेके बीचमेको निकाल ले फिर जो वह
फंदा सुईपर आवै उसे वायेहाथकी सुईमें पिरोदे इसभाँतिसे
तीन २ फंदोंका एक २ फंदा गिन कर सुईमें ऐसे पंद्रह फंदे
डालै तव इस भाँतिले गुलूवंदका ओड़ पड़जायगा और फिर
दहिने हाथकी सुईमें वांये हाथकी सुईका एक फंदा ले
और वाये हाथकी सुईके दो फंदोंके वीचमें दहिने हाथकी
सुईको डालकर उस पर उनका डोरा घुमावै और फिर उसके
वीचमेंको निकाल ले, फिर उन दोनों फंदोंको तो सुईसे नीचे
उतार दे और उनके डोरेको सुईके वीचमें करले, इसी भाँति
से बुनता जाय और जव दो गिरहकी एक पट्टी बुनजाय तो
दूसरे रंगकी उन जोड़ दे, इस प्रकारसे जब दो या डेढ़
गजका गुलूवंद तैयार होजाय तो उसका मुँह इस प्रकार
मूंददे कि, प्रथमके एक फंदेके वीचमें सुईको डाल कर उस
पर उनका डोरा घुमा सुईको उसी फंदेके वीचमें निकालै
और उस फंदेको बांये हाथकी सुईपरही पिरोदे फिर तीन
फंदोंके वीचमें सुईको डाले फिर उन फिरा कर सुईको
निकाल ले और उन तीनों फंदोंको सुईके नीचे उतार दे
इस प्रकार करनेसे सभी फंदे सुईसे नीचे उतर जाँयगे और

खोप्रबोधिनी।
तुम्हारा गुलूबंद अत्यन्तही सुन्दर होजायगा फिर उनके दोनों
सिरों पर तुम झालर वाँध देना. पंचरंगी उन मिलाकर
सवा विलस्त लाँबी उनके टुकड़े २ तीस जगह कर लेना
और एक २ टुकड़ेको एक २ लकीरकी वरावरीमें पिरोकर
गाँठ लगा देना इसरीतिसे तेरह फंदों पर तेरहही डसिौं बाँध
ना, फिर एकडसी वाँई ओरकी लकीरकी और एक दहिनी
ओरकी लकीरकी लेकर दोनोंको मिलाना उन्हीं डसियोमेसे
एक डस लेकर उससे गाँठ दे देना बस इसी रीतिसे गाँठ पर
गाँठ लगाती जाना तो यह गुलूवंद बहुत सुहावना प्रतीत
होगा और ऐसा करनेसे घर २ में तुम्हारा आदर
और सन्मान होगा यह गुलूवंद आदमियोंके
गलेकी अत्यन्तही शोभा बढ़ाता है, हे भगिनी !
प्रथम मैंने तुम्हें जो जो काम वताये इन सभी
को तुम सीख कर एक २ अदत तैयार कर मुझे
दिखाना, उसमें जो कुछ कोर कसर होगी उस
को मैं तुम्हें बतादूँगी, प्रकाशवतीने ऐसाही कि-
या, वह घंटा दो घंटा तो पढ़ा करती और
सारे दिन सीना पिरोनाही लिये बैठी रहतीथी,
किसी समय भी अपने समयको वृथा नजानेदेती.
हे बहन ! अव मैं तुम्हें कुछ चित्रकारी भी बताती हूं जो
कि, सालभरके प्रत्येक त्योहारको पूजनेके लिये घरकी
दीवारों पर बनाई जातीहैं।
चित्रकारी।
चित्रोंके खींचनेका भी लड़कियोंको अत्यन्तही प्रयोजन
"

बालिका विद्याशिक्षा।
(५३)
रहता है, और इसकी शिक्षाकी भी अत्यन्तही आवश्यकताहै
इस चित्रकारीको देख कर छोटे २ वालकोंका मन आनंदित
होता है, और तस्वीरें देखनेके लिये मन व्याकुल होजाता
है, जिनको यह अच्छी लगती हैं उनका मन इनके वनानेके
लिये भी अत्यन्तही उत्कंठित रहता है, इसी कारणसे मैंने
बहुतसी लड़कियोंको दीवारों पर मूत्तिये वनाते देखा है। यद्यपि
हमारे देशमें दीवारों पर तस्वीरें काढनेका कुछ अधिक प्रचार
नहीं है, मानो चित्रविद्याका तो लोपही होगया है।
इसका सीखना भी सीने पिरानेकीही समान है, पुस्तक
पढ़नेकी समान नहीं है। इसकारण चित्रोंके सम्बन्धमें जिन २
वस्तुओंका होना आवश्यक है उनको भी मैं तुझे वतातीहूं।
(ण) हेभगिनी ! करवाचौथ दिवाली, भइयादोयज इत्या-
दि त्योहारोंके आने पर स्त्रियोंको दीवारोंपर करवाचौथ इत्या-
दि रखनी होती हैं सो जिन स्त्रियों पर चित्रकारी करनी आती
है वह तो त्योहारसे एक दो दिन पहले भांति २ केरंग भर कर
अपने घरकी दीवारें सजा रखती हैं और जिन पर नहीं आती
वह अपने चीतमकोड़े कर लेती हैं इससे उनके घरकी शोभा:
नहीं होती और उनका मन दूसरे घरकी चित्रकारीको देख
कर सर्वदाउत्कंठित रहताहै कि, किसी रीतिसे हो ऐसा बनाना
हम परभी आजाय।
हे वहन ! मैं तुम्हें दिवाली अघोई करवाचौथ इत्यादिकी
तस्वीरें भी काढनी बताती हूं परन्तु वह अपने २ देशकी
रीतिसे कुल मर्यादाके अनुसार भिन्न २ देशमें भिन्न २
रीतिकी रक्खी जाती हैं इसी कारणसे मैं यहां उनके नकशे
-

(५५).
खींप्रबोधिनी
नहीं बताती हूँ. जिस रीतिसे तुम इन सव तस्वी
रोंको काढ़ सको उनके जो नियम हैं वह मैं सभी तुम्हें बता-
(त) । तस्वीरें बैंचने के लिये प्रथम मोटे डबल का:
गजके ऊपरपिन्सलसे तस्वीर खींचनेकी चेष्टा करना चाहिए.
२। सबसे प्रथम कागजके ऊपर पिन्सलसे सीधी और गोला-
कार लकीरोंको खींचे।
। इसके उपरान्त वृक्षकी डाली, पत्ते, फूल फल इत्यादिको
देख कर उसीके अनुसार कागज पर पिन्सलसे बनावै ।
शेर, रीछ, बंदर, हाथी, घोड़े, गरुड़ इत्यादि प्राणियोंकी
तस्वीरें देख २ कर तस्वीरें खींचनेकी चेष्टा करना उचित
है। ऐसा करनेसे बड़ी सरलतासे तस्वीरें खींचनी आ
जायगी।
५। इसके उपरान्त फिर मनुष्योंकी तस्वीरें देख कर उसी
प्रकारकी तस्वीरें खींचे।
६। फिर जब पिन्सलसे खींचते २ तुम्हें अभ्यास हो जाय तव
कोई स्थान देख कर (जैसे कि नदीकी धार- एक घर,
एक बगीचेमें बँगला) उस स्थानमें बैठे हुए उसी प्रकार
देख २ कर तस्वीरोंको काढ़ना।
जब पिन्सलसे अत्यन्त सुन्दर तस्वीर खिंचकर तैयार हो-
जाय तो उसमें रंग भरना उचितहै; और जो इसके पहलेही
रंग भराजायगा तो तुम्हारी तस्वीर कभी ठीक नहीं बनेगी।
रंगकी तस्वीरोंका खींचना दो प्रकारसे होताहै, उन दोनों
नाम यह हैं. प्रथम नाम "जलरंग" और दूसरानाम

.
वालिका-विद्याशिक्षा।
(५५)
"तैलरंग" इस विषयके सम्बन्धमें निम्नलिखित नियमोंका
पालन करना उचितहै।
प्रथम तो रंगको पसंद करना उचितहै। किस स्थानपर
किस प्रकारका रंग भराजायगा और किस रंगके देनेसे
तस्वीर सर्वाङ्गसुन्दर वनजायगी, इसका स्थिर करना
अत्यन्तही आवश्यक है । एक रंगमें पांच सात प्रकारका
रंग होताहे, रंगको कुछ एक पतला करे और फिर उसे
देखले कि, यह कागजपर वहता तो नहीं है इस वातका
भी ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यकहै ।
रंगसे ठीकतस्वीर नहीं खिंच सकती केवल तस्वीरके भीतर
रंग भरा जाताहे कारण कि, तस्वीर तो प्रथम पिन्सलसेही
खींच ली जाती है, इस कारण रंगभरनेके समय इस बात
का भी ध्यान रखना अत्यन्त आवश्यक है कि, कहीं
तस्वीर पर रंगके छींटे इधर उधर न पड़ जाय। हेभगनी
मैं यहाँपर एक उदाहरण देती हूँ।
इटाली देशमें चित्र विद्याका प्रचार अधिकहै इटालीमें जैसे २
तस्वीरें खींचनेवाले उत्पन्न हुएहैं संसारमें उनके समान और
कहींभी नहीं हुए।इटाली देशकी खिंची हुईजैसीरसुन्दर तस्वी-
हैं वैसी और कहींकी नहींहैं इसीइटालीदेशमें एक चित्रकार
मनुष्य अपनी छत्तपर बैगहुआ तस्वीर खींचरहाथा । इसके
पीछे तस्वीर किस प्रकारकी बनी है इसको देखनेके लिये
(उठा, और दूर जाकर तस्वीरको देखनेलगा, फिर और
पीछेको हटकर तस्वीरको देखनेलगा, इससे उसका पैर
छत्तकी कानसपर जापहुँचा, जो जराएक और पीछेको हटता

खीप्रबोधिनी। तो झटसे नीचे गिरजाता। उसका प्यारा नौकर स्वामीकी यह अवस्था देखकर भयभीत हो कुछ भी स्थिर नहीं कर सका; यदि वह उसे पकड़नेके लिये जाता तो अवश्यही नीचे गिर- जाता, तब उसने विना शोच विचारकिये रंगका भराहुआ कटोरा उस तस्वीरके ऊपर फेंककर मारा। चित्रकार अपने चित्रमें इतना मग्न होगया था कि, वह इस भयंकर विपत्तिका किंचित् मात्र भी ध्यान न कर सका, इस समय प्राणप्यारी तस्वीरको विगड़ता हुआ देखकर बोल उठा कि "हाय ! क्या किया?" इसके उपरान्त झपट कर तस्वीरकी ओरको जा पहुँचा । उसके प्राणोंकी रक्षा हुई। परन्तु तस्वीरके विगड़ जानेकी अपेक्षा अपने प्राणोंकी रक्षा होनेसे वह संतुष्ट नहीं हुआ। मेरे इसं उदाहरणके कहनेका अभिप्राय यह है कि, जो तुम्हैं चित्र बनाना हो तो विख्यात चित्रकारके समान तस्वीर खींचनेमें मन लगाना कर्तव्य है। प्रथम (जलरंग) की तस्वीरके बनाने पर पीछे (तैल- रंग)की तस्वीर बनानेकी चेष्टा करना चाहिए । अयेल (तैलरंगकी ) तस्वीरका बनाना अत्यन्त कठिन है और इसमें विशेष यत्नकी आवश्यकता है, यह तस्वीर वहुत समय तक रहती है बिगड़ती नहीं, अधिक क्या पांच चार वर्ष तक भी यह ज्योंकी त्यों बनी रहती है। हे बहन ! यह मैंने तुम्हें तस्वीर बैंचनेकी रीति वताई- इसीके द्वारा तुम सव त्योहारोंको अपनी दीवारों पर सुन्दर चित्र काढ सकोगी और फिर तुम्हें किसीको बुलाकर चित्र कढ़वानेकी भी आवश्यकता नहीं रहेगी।

बालिका-विद्याशिक्षा।
(५७)
गृहकार्य।
हे वहन! अव मैं तुम्हें घरके काम धन्धे बतातीहूँ, इसके
अनुसार काम करनेसे संसारमें तुम्हारी बड़ाई होगी और
घरके तथा वाहरके सभी तुम्हारा आदर सन्मान करेंगे।
स्त्रियोंको प्रातःकालसे प्रथमही उठना कर्त्तव्य है. फिर
घरके सभी दरवाजोंको खोलदेना चाहिए जिससे उनमें ताजी
हवा प्रवेश कर जाय और जो घरमें नौकर चाकर हो तो
उनसे सभी स्थानोंमें सूर्यका उदय विना हुए बुहारी झाड़ी
करवानी चाहिये, सभी घरोंको साफ रखना उचित है, जिनके
घरके कोने विचालोंमें कूड़ा पड़ा रहता है वहाँ दरिद्रका
अनिवास होता है. लक्ष्मी उस स्थान पर कभी निवास नहीं कर
सकती घरकी दीवारों पर जो जाले होगये हों तो बुहारीसे
नित्य झाडे हे बहन ! इस वातका भी विचार कर लेना अवश्य
कर्तव्य है कि, कौन सा काम किस समय किया जायगा, ऐसा
करनेसे सारा काम होजायगा और उसमें कुछ गड़बड़ न
पड़ेगी, घरके भीतर मटके आदिकोंमें जो गेंहू चावल इत्यादि
अनाज भरा हुआ है वह सील न गयाहो इस कारण उसको
धूपमें सुखा लेना उचित है, जिस समय गेहूँ पिसनेके लिये
दो तो एक दिन पहले छाँट फटक कर रख लो जिससे
उसमें किसी प्रकारकी मिट्टी कंकड़ न रह जाय, साफ करके
पिसनेके लिये तोलकर देने उचित हैं और जिस तराजूमें तोलो
प्रथम देखलो कि, इसमें पासंग तो नहीं है और जो पासंग हो.
तो उसकी डंडी पर गुट्टी कपड़ेमें बाँधदेओ, फिर आप स्वयं
शौच इत्यादिसे निश्चिन्त हो स्नान कर, तदनंतर घरके सभी

(५८) स्त्रीप्रबोधिनी। १ वर्त्तनोंको बहुत साफ मॅजवा धुला कर रक्खै, फिर थोड़ी देर कुछ धर्म सम्बन्धी पुस्तकको पढे; अपने घरमें सभी वस्तुओं का होना आवश्यकहै, जो २ वस्तु गृहस्थीमें होनी उचित हैं सभीको संग्रह कर रक्खे शाक इत्यादि तरकारी इतनी मँगानी उचित है कि, जो दूसरे दिनके लिये भी काम आ जाय, कदा- चित् तुम्हारे घर कोई रात्रिमें पाहुना आ जाय तो उसके लिये उस समय तरकारी कहाँ ढूँढती फिरोगी और जो किसीके घर माँगनेको भेजोगी तो तुम्हारे घरकी बदनामी होगी और जो तुम्हारे घरमें धरी होगी तो उस समय निकाल कर कर तो लोगी, आये हुए पाहुनेकी सेवा भली भाँतिसे करना; जब उसे भोजन खिलानेके लिये वैठालो तो परोसते समयमें संकोच न करना, उसके खानको इतना परोसना जिससे उसकी थालीमें कुछ रहजाय बहुधा स्त्रिय पाहुनोंका निरादर करके उनको बड़ी कृपणता से भोजन कराती हैं, इसी कारणसे वह पाहुने घर घरमें उनकी निन्दा करते फिरते हैं, एक महीनेके लिये अन्न, घी, मीठा, नोन, तेल, मसाला इत्यादि सभी सामग्री मँगानी उचित है और नौकरोंकोजो काम करना योग्यहै, एक बार सभी सम- झा देना चाहिये, जिससे वारउनसे कहनान पड़े, और नौक- रोंके प्रति ऐसा व्यवहार करना जिससे वह संतुष्ट हैं जिस स- मय वह घरका कुछ काम विगाड़ दें तो उन पर क्रोध करना चाहिये, परन्तु हर समय क्रोध करना उचित नहीं नौकर जहाँ तक हो पुरानाही ठीक है. नये २ नौकर घरमें आकर बहुत इसी गड़बड़ करते हैं घरमें जितने बरतन हैं, "यह गिनती- J बालिका-विद्याशिक्षा। (५९). में कितने हैं" इस बातका भी ध्यान रखना; यदि जो कोई वर्त्तन पड़ोसनका अपने यहाँ आगया हो तो उसके विना माँगे ही दिलवा भेजना, भोजनके समयमें आटा,दाल, घी, मिष्टान्न, मुरव्वा इत्यादि जो जो सामग्री काममें आती हैं. उनकी सावधानीसे रक्षा करना, जिससे कि,विल्ली कुत्ता मुँह न डाल जाय,और पानीके भरे हुए सभी वर्तनोंको ढककर रक्खोजिससे कउये मुँह न डालें घर की सव जे ढकी रक्खो, जिससे कि, चूहे इत्यादि नाज न खाजायँ, जिस घरमें जिन्स धरीहो उस- की ताली अपने पास रक्खो, स्त्रियोंको हर समय अपने पास रुपये पसेका रखना उचित है जिससे कि, कोई काम आनेपर किसीसे उधार लेना न पड़े, किसी समय अपने पतिकोही कुछ रुपयोंकी आवश्यकता हो तो उस समय अपने पाससे निकालकर दे दे, व्याजू रुपया कभी न ले, जो व्याजू रुपया लेते हैं उनको दूना रुपया देना पड़ता है. और जो तुम किसीको उधार रुपया दो तो प्रथम यह देखलो कि,यह घराना कैसा है जो अच्छाहो और समझ लो कि इससे रुपया पटजायगा तभी देना नहीं तो नहीं जब कोई स्त्री तुम्हारे घर आवै तो उसका आदर सन्मान भली भांतिसे करना, उसको ऊँचेपर बैठालकर आप नीचे पर बैठना,जिस वातको पूंछे उस वातका उत्तरदेना, बहुत न बोलना, खानेके लिये पान तमाखू देना,और ऐसा कभीन करना कि, आप तो एक पान खालिया और आई हुई स्त्री को आधा दिया. ऐसा करनेसे घर में तुम्हारी बड़ी निन्दा होगी प्रथम उसको पान देकर पीछे आपखाना, और जो कोई उसस्त्री के संग वालक आयाहो उसकोखानेके लिये कुछ मिठाईदेना.च- REPARA (६०) खीप्रबोधिनी। लतेससय दरवाजे तक पहुँचाआना, माता पिताकी आज्ञामें चलनाकोईवरतन घरकाटूट फूट गयाहोतो उसको वदलवाकर नया मँगा लेना और एककापी इस प्रकारकीवनाना कि,जिसमें सवसामग्री लिखी रहैं, तुम्हारे घरमें जितनी दरी, कालीन,घर- की पलंग,संदूक इत्यादि वस्तुएं हैं उन सभीको अपनी कापीपरं लिख रक्खो फिर जब कोई वस्तु तुम्हारे घरसे माँगकर ले जाय तो उसी समय कापीपर लिख लो ऐसा करनेसे कोई वस्तु नहीं खोई जायगी गहने और रुपये पैसेकी संदूकको हर किसीके सामने मत खोलो, जिससमय सब घरके कामोंसे निवटकर सोनेके लिये जाओ तो प्रथम दीवा लेकर घरके आँगन, जीना इत्यादि सभी स्थानोंको देखलो कि, कहीं चोर इत्यादि तो नहीं दुवक रहा; फिर जिस स्थानपर ताला लगता हो वहां ताला लगा दो और जहां कुन्डी लगती हो वहां कुन्डी लगादो, ग्यारह बजेसे प्रथमही सो जाओ कारण प्रातः- कालके पांचवजेही उठना पड़ताहै। फसलपर जो वस्तु सस्ती हो उसको खरीद लेना; और फसल निकल जानेपर नहीं लेना, फसल बीतनेपर जो तुम लोगी तो तुम्हारे दाम अधिक जायेंगे; आमका अचार, नीबूका अचार, अदरखका अचार इनको फसलमेंही डाल लेना उचित है, सुंगोरी, वरी, पापड़ यह सब अपने घरमें रहने चाहिये, घरमें कोई गऊ या भैंस हो तो उसकी देखा भाली आप करनी नौकरों पर ही नहीं बैठे रहना घर जहां कहीं टूटफूट गयाहो तो तुरन्तही उसकी मरम्मत करा देना; जिस कामको करो पूरा करके छोड़ो अधभरमें मतछोड़ो वर्षाऋतुमें दो तीन वार कपड़ोंको धूपमें सुखा दे- बालिका-विद्याशिक्षा। ना उचित है, जिससमय गोटे किनारीके कपड़े सुखाओ तो एक सफेद चादर महीनसी उन कपड़ोंके ऊपर डाल दो तो उन कपड़ोंका और गोटेका रंग नहीं उड़ेगा वर्षातमें ऊनी- कपड़े दुसाले इत्यादिकोंको खूटीपर डालदो जिससे उनको हवा लगती रहै; उनीकपड़ोंको संदूकमें नहीं रखना चाहिये जो संदूकमें रखतेहैं, उनके कपड़ोंको कीड़ा काट डालता है इससे उनकी बड़ी हानि होतीहै. जिससमय गोटे किनारीके कपड़ोंको सुखाकर संदूकमें रक्खो तो प्रथम उन्हें ठंढाकर लो तव रक्खोजो कपड़े पसीनेमें भीज गयेहों उनकी तह मतकरो धोबीकोजो कपड़ाधुलनेके लिये दो, प्रथम कापीपर लिखलो और गिनलो पीछे धुलनेको गिनकर दो जिस दिन दो उसकी तारीख लिख रक्खो जहांतक हो अपनी माको काम मत कर- ने दो जिसकाममें परिश्रम पहै उसे आपही करो, ऐसा व्यव- हार करनेसे. जब तुम ससुरालको चली जाओगी तो तुम्हारी माता हर कामपर हर समय तुम्हारी याद करेंगी और जल्दी २ तुम्हारे बुलानेको भेजेंगी, इससे तुम्हारा आदर ससुरालमें भी वनारहेगा और माताके यहांभी अधिक सन्मान रहेगा, अपने घरकी गुप्तवात किसीसे न कहना, जब तुम्हारे निकट तुम्हारी सहेली आवे तो उनको एकान्तमें लेकर न बैठना जो ऐसा करोगी तो घरके सभीलोग तुमपर संदेह करेंगे, उनसे जो कुछ वार्तालाप करो प्रथम यह देखलो कि, इससे किसीको बुरा तो न लगेगा किसीकी बुराई मतकरो, जो हँसी दिल्लगी करो तो यहां तक करो कि, जिससे कोई बुरा न मान जाय और घरके कामकाजसे निवटकर जितना

(६२)
खीमबोधिनी।
समय शेष रहै उसमें अपना सीना पिरोना करना, जो काम
नौकरोंके करनेका हो उसे आप न करना।
यह हमने बहुधा देखा है कि, स्त्रिये अपने घरमें समर्थ
होकर भी नोकरको नहीं रखतीं सारे दिन घरके कामकाजमें
स्वयंलगी रहतीहैं, गाय भैंसको सानी करना, कुट्टीकाटना,
चौका वरतन करना, इत्यादि ऐसे २ कामोंकोभी वह स्वयं
आपसे करती हैं.यह उनकी बड़ी भूल है वह यह नहीं विचारती
कि, जितने समयमें हम यह काम करेंगी यदि जो उतने समय
में घरवैठकर कपड़े इत्यादिकोंको सियेंगी तो हमें कितना
लाभ होगा, नौकरके न रखनेसे गाँवके मनुष्य उस स्त्रीको
कृपण कहते हैं। घरके जितने उज्ज्वलं काम हैं वह सभी स्त्रि-
योंको स्वयं करने उचित हैं और शेष काम सब नौकरोंसे लेने
चाहिये। यदि जो तुम किसी लड़की लड़केको पढ़ाओ, तो
प्रथमका पढ़ाहुआ उससे पूछलो तब पीछे आगेको पढ़ाओ।
कदाचित् जो वह कहीं भूलजाय तो उसको मारना नहीं वरन्
पुचकार कर प्यारके साथ समझादो; जिससे वह डरकर
एकसाथही पढ़ना न छोड़ बैठे. अपने घरको आठवें दिन
गोवरंसे लिपाती रहो; त्योहारके आनेपर उस त्योहारमें
जिस २ वस्तुकी आवश्यकता हो,एकदिन पहले मँगा रक्खो;
और एकदिन पहलेसेही घरका लीपना पोतना करवा रक्खो
यदि कोई पड़ोसन तुमसे तरकारी आदिक माँगनेको आवे
तो अवश्यही उसे दे दो बिना दिये कभी मतखाओ। अपनी
वहन भानजी भतीजी आदिसे नेह रक्खो हे वहन ! जो
तुम मेरे कहे हुएके अनुसार आचरण करोगी तो तुम्हें कभी

बालिका-विद्याशिक्षा
(६३)
...
atti
"
पछताना नहीं पड़ेगा और न तुम्हारा समयही वृथा जायगा
यह वातें सर्वसाधारणस्त्रियोंको सीखनी योग्य हैं ऐसा करनेसे
घर २ में उनकी वड़ाई होगी।
व्ययआदिका प्रबन्ध।
" कौडी २ जोड़के रंक होत धनवान
हे वहन ! घरमें खर्च किसरीतिसे उठानेमें वचत हो सकती
है, वह भी मैं तुम्हें समझाकर कहतीहूं जो स्त्रियें नियमसहित
खर्चको उठाती हैं वह कभी कंगाल नहीं रहती और न उनका
कोई कामही बंद रहताहै कौड़ी २ नियम सहित जोड़ी जायगी
तो ऐसा हो जायेगा और पैसा पैसा रोज नियमसे जोड़ा जा-
यगा तो रुपये हो जायँगे, फिर तुम धनवान हो जाओगी, इस
कारण जितनी आमदनी हो उसका तीसरा हिस्सा जोड़कर
अवश्य रखना कर्तव्य है कोई २ स्त्रि कहने लगती हैं कि, हे
वहन! हम कहांसे रखें हमारेतोइतनी आमदनीमें गृहस्थीका
कामभी पूरा नहीं होता। उनकी यह कहावत सच है, वह खर्च
विपरवाहीसे उठाती हैं प्रथम तो सम्पूर्ण गृहस्थोंको सालभर में
जितने रुपयेका नाज उठे वह ले लेना चाहिये, फिर एक मही-
नेमें कितने का घी,तेल, सांभर, मिर्च,मसाला इत्यादि सामग्री
उठती है वह सब इकट्ठी ले लेनी योग्य है और जो रोजकी
रोज पैसे २ की मँगाओगी तो उसमें वड़ी कसर रहेगी: इकट्ठी
मँगाने में बहुत फायदा है। महीनेमें कितनेका कपड़ा आवेगा
उतनेही दाम जमाकरके रखदिये, और वालबच्चोंके विवाहके
लिये एक खाता अलग करदिया जो कुछ रुपया बचै सो सव
उसीमें डाल दियाकरो न जाने किस समय क्या जरूरत पड़

(६४) स्त्रीप्रबोधिनी। जाय समय पड़ेपर रुपया नहीं मिलता यह खूब ध्यान रक्खो कि, रुपया अपने पासकाही काम आताहै, चाहै तुम्हारे घरके कितनेही धनी क्यों नहों परन्तु समय पर कोई किसीको नहीं देता जो तुम्हारे पास धरा होगा तो उस समय काम तो आजा- यगा और तुम्हारे घरका बनाव बनारहैगा जो गृहस्थ ऐसा नहीं करतेहैं। वह सदा कर्जदार रहते हैं और वह रातदिन की हाय हायमें अपनी जिन्दगीसे आरी होजातेहैं तथा बहुतसे आ- त्मघात करके मरभीजाते हैं इससे उनके दोनों लोक विगड़ते हैं बहुतोंका यह हालहै कि, प्रथम तो उधार ले २ कर खा गये और जब उधार वालेका तगाजा आया तो मुंह छिपाकर बैठ गये और जो कहीं ब्योहर बाजारमें आते जाते मिलगया तो लगे कस्मैं खाने और कहने कि, आज देंगे कल देंगे,जब वाय; दे परभी नहीं देते तो उसका नौकर आकर दो चार भली- बुरी कह जाताहै। लाचार होकर उनको सुननी पड़ती है, फिर उनकी बाजारसे साख जाती रहती है। कोई उन्हें उधार नहीं देता, सारे मोहल्लेमें उनकी हँसी होती है, सब आदमियोंकी आंखोंमें वह हकीर होजाताहै, इस कारण प्रत्येक गृहस्थीकोअपने घरका व्यय इस रीतिसे करना चाहिये कि, जिससे कभी उधार लेना न पड़े, विवाह इत्यादि बड़े २ कामोंके आने परभी सब काम अपने घरसेही चल- जाय, दूसरेका मुंह देखना न पड़े देखो गृहस्थीमें बहुत खर्च उठनेके तो अनेक अवसर आते हैं और ऐसा अवसर कोई नहीं आता जिसमें कम उठताहो; फिर जब कि, तुम अलग खाता बनालोगी तो बहुत खर्चकभी नहीं उठेगा और तुम्हें है "

बालिका-विद्या शिक्षा।
(६५)
वचतभी रहैगी, छोटे २ खचोंके रोकनेसे कभी वचत नहीं हो
सकती परन्तु नियम सहित खर्च उठानेसे वचत हो सकती
है, जब तुम शोच विचार कर खर्च उठाओगी तो अवश्यही
तुम्हें वचत रहेगी, किसीकी कहन है कि " बूंद २ करके
घड़ा भरजाता है" इसी प्रकारसे घरका खर्च है; कि, एक २
पैसेको जो तुम छ वस्तुओंमेंसे बचाओगी तो डेढ़आने रोजकी
अवचत होगी इस प्रकार महीनमें तीनरुपये हो जायँगे पैसा २
तो कुछ मालूम नहीं देता; परंतु प्रत्येक वस्तुमें थोड़ी २ भी
बचत करोगी तो प्रत्येक महीने में दश १५ रुपये वड़ी सरलता
से वचजायँगे फिर जव भंगन, पनिहारी, मालन, धोबी,
इनका महीना हो जाय तो प्रथम कापीमें चढाकर उनको
हिसावसे महीने भरकी तनख्वाह देदेनी चाहिये और जब देखो
कि, हमैं किसी लड़के लड़कीका विवाह करना है तो अपनी
सामर्थ्य के अनुसार खर्च करो जो तुमने अधिक धूमधामके
साथ कर्ज लेकर विवाह करदिया तो व्याज देते २ पिच मरोगी,
गृहस्थीको ऐसा काम भूलकर न करना चाहिये उधार उस
समय ले कि जिस समय देखले कि, अब हमारा काम बिना
उधार लिये चलताही नहीं क्योंकि उधार तौं बड़े २ धनवान
अवसर पड़ने पर ले लेतेहैं, परन्तु जबतक वह उस ऋणसे
मुक्त नहीं होते तबतक उन्हें रात्रिमें नींद नहीं आती यह
नहीं कि, उधार तौ ले लिया और देनेका कुछ विचारही नहीं
जो उधार लेकर वे फिकर होजाते हैं वह व्याज देते २ मरजाते
हैं फिर वह कभी नहीं उभरते उधारका रुपया रोजकी रोज
रखता जाय तो मनुष्यको बहुत सुभीता होजाता है और महीने
*

(६६) खीप्रबोधिनी। भरमें बड़ी सरलतासे रकम वन जाती है जोउधार लेकर नहीं देते हैं उनकी साख जातीरहती है,व्याजूरुपया कभी लेना योग्य नहीं, हेवहन! व्याजके लोभमें आकर विना लिखत पढ़त किसी- कोरुपया उधार मतदेना इस प्रकारसे व्याजके लालचमें आकर बहुतसी स्त्रिये ठगीगई हैं। एक स्त्री जिसका नाम रुक्मिणी था वह व्याजके लोभमें आकर इस प्रकारसे ठगीगईथी कि, उस- की पड़ोसन गंगादेई नामकी स्त्री रोज़ नियमसे इसके यहांआ- यां करतीथी, एकदिन मुँह सुजाकर बैठीरही कुछ बोली नहीं रुक्मिणी सीधी साधी स्त्री थी वह बोली बहनी आज तुम उदास. क्यों हो? गंगादेईने यह सुनकर कहा कि मैं अपने उदास होने- का कारण कुछ नहीं कहसकती, फिर कहेसे क्या होताहै, क- ही तुम हमारी पूरी थोड़ेही करदोंगी,यह सुनकर रुक्मिणीने कहा कि हे वहन ! यदि जो मेरे पूरी करनेकी होगी तो मैं उ- पूरा करदूंगी, यह सुनकर गंगादेई कहनेलगी कि आज कुछ घरमें चकर मकर हुईथी इसीकारणसे सामूजीने मुझे घरसे जुदा करदिया खानेपीनेको हमारे पास इससमय कुछ नहींहै दोनों प्राणियोंको आज सारेदिन फांका हुआहै यदि इससमय तुम मुझे दश रुपये उधार देदो तो बड़ाही काम चले महीनेपर उनकी तनख्वाह आतेही मैं एक आने रुपयेके व्याजके हिसाव करके तुम्हारा रुपया देजाऊंगी, तब तो उसकी मीठी २ बातोंपर रुक्मिणीका मन पसीज गया और झट संदूकची से दश रुपये निकालकर गंगादेईको देदिये और कहा कि लो अपना कामकरोजब तुम्हारे पास हों त- भी मेरे पास देजाना, यह सुन गंगा रुपयोंको ले अशीशे देती

बालिका-विद्याशिक्षा।
(६७)
हुई चंपतहुई और अपने मनही मनमें विचार करने लगी कि.
यह दश रुपये तो नहीं मारनेकी अव इसको मेरा विश्वास तो
होगयाहे कोई भारी रकम पर हाथ मारूंगी; यह विचार कर
दश पंद्रह दिनमें उन रुपयोंको व्याजसहित रुक्मिणीके घर
लेआई, और लेकर बोली कि लो बहन! मैं तुम्हारे दशं रुपये
औरदशआने व्याजकेले आईहूं, तुमने मेरावडा काम निका-
ला, यह सुनकर रुक्मिणीने कहा कि ऐसीजल्दीक्या पडीथी
जैसे तुम्हारे पासथेवैसेही मेरे पासथे इतनी जलदी तुम क्यों ले
आईगंगादेईने कहा कि हे वहन उधारका यही हिसाव है कि,
जिस समय हुआ उसी समय चुकादिया, यह कह कर चली
गई और एक महीनेके बीतनेपर फिर आकर कहने लगी कि,
यदि आज तुम हमारा काम निकालदोगी तो विरादरी में
मेरी नाक रहजायगी, मेरी नंदकी लड़कीका विवाह है वहां-
को मैं भात लेकर जाउंगी. इसकारणं पचास रुपये मुझे
उधार उसी एकआने रुपयेके हिसाबसे देदों, और थोड़ासा
अपना गहनाभी देंदो, कारणं कि हमारे घरकी चोरानी जिं-
ठानी तो सब पहरे ओढ़े जायगी, और मैं नंगी बूची जाऊंगी
इसमें मुझे वडी लज्जा आवैगी यदि तुम मुझे अपना सब
गहना दे दोगी तो मेरी बात बन जायगी; यह सुनकर रुक्मि-
णीने उसीसमय पचास रुपये और अपना सारा सुनहरी और
रुपैली जेवर गंगादेयीके हाथमें दिया और कहा किलो सँभा-
लकर रखना, जिससमय भात देकर चली. आओ तो गहना
तो मेरस उसीसमय देजाना और रुपये चाहे जब देना; यह
सुनकर गंगादेईने कहा कि, हाँ वहन। मैं उसीसमय दे जाऊंगी

(६८)
स्त्रीप्रबोधिनी।
आज परमेश्वरने मेरी बड़ी लाज रक्खीतुमने मेरावड़ा काम
निकाला, यह कहकर चलीगई, जब महीना एकवीत गया और
गंगादेईने सूरतभी न दिखाई तो रुक्मिणीके मनमें बड़ा संदेह
हुआ, कहने लगी कि, क्या कारण हुआ जो गंगादेई हमारे घर
नहीं आई। विवाहको हुये तो बहुत दिन हो गये, अव तो वह
भात देकर चली आई होगी, यह विचारकर कहने लगी कि,
आज मैं स्वयंही जाऊंगी, दूसरे दिन उसके घर गई, उसकी
सूरत देखतही गंगादेईने गाल फुलालिये रुक्मिणी बोली कि,
हे वहन ! भात देकर आगई, गंगादेईने कहा कि, कैसा भात,
रुक्मिणी बोली कि, हे बहन ! तू क्या बातें करती है भातके
देनेके लियेही तो तू मुझसे सारा गहना माँगकर ले आई है
सो वहन ! गहना तो मुझे देदे और रुपये मेरे जव हों तब दे
देना, गंगादेई ने कहा कि, मैं तो कभी किसीके घर नहीं जाती
मेरे घर नारायणने सबकुछ दियाहै, मैं क्या घर २ फिरती
फिलहूं मैं तुम्हारे घर काहेको जाती, तुम मेरे घरसे जल्दी
चली जाओ जो कोई हमारे घरका मर्द इस चकचकको सुन
लेगा तो तुम्हें पीटैगा, इस कारण सीधी तरहसे चली जाओ
यह सुनकर रुक्मिणी बड़ी लज्जित हुई और कहने लगी कि,
हाय ? मैंने अपने पैरमें अपने हाथसे ही कुल्हाड़ी मारी,
परमेश्वर करे मेरी आत्माका दुःख इसके ऊपर पड़े जैसे इस
ने मेरा गला मसोसाहै, तसेही नारायण करै इसकाभी कोई
गला मसासे; यह कह कर विचारी पश्चात्ताप करती हुई चली
गई इसी कारण हे बहन ! व्याज भी मूलको ले डूबताहै
स्त्रीको चाहिये कि, लेन देन विना लिखत पढ़त किये कभी न

बालिका-विद्याशिक्षा। ६९) करै, ऐसे करनेसे स्त्रियोंको बड़ी हानिउठानी पड़तीहै बहुतसी स्त्रियें ऐसी ठगनी होतीहैं जो घर २ की बहू वेटियोंको ठगती फिरतीहैं जिस समय उन्होंने देखा कि, इससमय उसकी सास- ननँद घरमें नहींहै तभी जाकर उसकी बहू वेटीसे चुपड़ी बातें कहीं और कहा कि, फलाना साधु बड़ा अच्छा आयाहे वह ऐसा तावीज करेहै, जिसके पहरतेही उसका पति उसके वशमें हो जाताहै तिसपरभी वह लेता कुछ नहीं है केवल वह पूजनके लिये सवारुपया लेताहै, और एक तावीज देताहै, स्त्रियें तो इस बातपर मरतीहैं कि, किसी- प्रकारसे हो पति हमारे वशमें होजाय, झटसे सवारुपया निका- लकर देदिया फिर उस लेनेवालीने जाकर सूरततक न दिखाई जिस स्त्रीको देखा कि इसके संतान नहीं होती है उससे जाकर कहा कि तेरे पुत्र होगा एक स्याना ऐसा अच्छा आया है कि जो स्त्री उसकी करी हुई डोरीको पहरती है उसके अतिशीघ्र संतान होतीहै, मैंने वहुतसी स्त्रियोंको डोरी करा कर पहरते देखाहै, और उनके संतान हुई है, सारेदिन स्त्रियोंकी भीड़ उसके घर लगी रहतीहै, यह सुनकर वह स्त्री बड़ी प्रसन्न हुई और जो कुछ सास ननँदसे चुरा छिपाकर जोड़ा जंगोडा था सभी निकालकर उसे दे दिया और कहा कि, जो वह स्याना ऐसाहै तो मैं पुत्र होनेपर औरभी दस बीस रुपये दूंगी इसी प्रकारसे बहुतसी सीधी साधी भोली भाली स्त्रिये इन धूर्त स्त्रियोंके द्वारा ठगी गई हैं हे वहन ! जो स्त्रिये चतुर हैं वह ऐसी ठगाईमें नहीं आतीं, जहां कहीं रुपये पैसेके लेन देनका अवसरं आता है चतुरस्त्रिये उसी समय कह देती।

(७० स्त्रीप्रबोधिनी। हैं कि हमारे घरके आदमियोंसे रुपया लेना, हम स्त्रीहैं इस बारेमें कुछ नहीं जानतीं, हे बहन ! एक स्त्री झाड़ा फूंकीके जालमें फंसकर जिसप्रकारसे धोखेमें आगई थी उसकाभी वृत्तान्त मैं तुमसे कहतीहूं कि एक नगरमें एक स्यानेने आकर अपनी बड़ी धूमधाम मचाई सारे नगरमें शोर पड़ गया, बड़े २ घरानेकी स्त्रियें उसके पास आने जाने लगी, कोई आकर कहती कि कोई ऐसा गंडा करदो जिससे मेरा पति वशमें होजाय, कोई कहती कि, ऐसी डोरी करो कि, जिससे मेरा भाई जो घरसे निकल गयाहै वह चला आवे कोई कहती कि, मेरे लड़के पसलीके रोगसे मरजाते हैं इस कारण कोई ऐसा यंत्र लिखदो कि कोई तो मेरी गोदमें खेले और किसी वातका मुझे दुःख नहीं है, केवल संतानकी ओर- सेही आठों पहर चौसठ घड़ी जलती रहती हूं, इत्यादिऐसीर अनेक प्रकारकी बातें स्त्रियें आ२ कर कहती; तब वह स्याना किसीको तो भोजपत्र पर तावीज लिखकर देता और कहता कि, लो बीवी इसे तुम सवेरेही उठकर धोकर पी लिया,करना वस पति तुम्हारे वशमें हो जायगे और जो तुम चाहोगी वही करेंगे: किसीसे कहता कि लो यह डोरी मैंदेताहूं इसको तुम अपनी कमरमें बांधना, ईश्वर करेगा तो तुम्हारे बालक जी जायगे: किसीसे कहता कि, लो यह मेरा तावीज अपनी चोटीमें बांधना तुम्हें भूत चुडैल नहीं सतावैगे: कि- सीसे कहता कि लो मैं ये जानवरके दांत देताहूं इसको अपनी भुजामें बांधनाः यदि ईश्वरने चाहा तो तुम्हारे संतान होजायगी, इस प्रकारसे घरमें स्त्रियोंकी जबानपर वह बालिका-विद्याशिक्षा। (७१) स्यानाही चढ़ा रहता एक दिन एक अच्छे घरानकी एक स्त्री गई और जाकर उस स्यानेसे वोली कि, जो तुम मेरा काम पूरा करदोगे तो मैं तुम्हें बहुतसाधन दूंगी: स्यानेने कहा मइया कुछ नहीं लेताहूं काम अपना कहो अपनी सामर्थ्य के अनु- सार मैं उसे पूरा करदूंगा स्त्रीने कहा कि, मेरे पतिने बहुत दि- नोंसे एक और स्त्रीको अपने घरमें रखलियाहै जिस दिनसे वह स्त्री आई है; न वह मुझसे बोलें न वह घरहीमें रहैं सारे दिन उसीके ध्यानमें मग्न रहते हैं, और तो मुझे किसी वातका दुःख नहीं है परन्तु न जाने विधाताने यह प्रवल दुःख मुझे क्यों दिया महाराज ! जो तुम मेरा यह काम पूरा करदोगे तो मैं तुम्हें निहाल करदूंगी, स्याना यह बात सुनकर मनमें अत्य- न्त प्रसन्न हुआ और मन ही मनमें कहने लगा कि, आज तौ अच्छी चिड़िया हाथ लगी, यह विचारकर प्रगटमें कहने लगा कि, अच्छा तुम दुपहरको आना इसकी फिकर की जायगी स्यानेकी आज्ञानुसार वह स्त्री ठीक दुपहरीमें आई, तव स्यानेने कहा कि, इसका अनुष्ठान रात्रिके समय श्मशानपर सिद्ध होगा,तुम अपना साराशृंगारकर अच्छे वस्त्र गहने पह- रकर आना, उस स्त्रीने ऐसाही कियाः तव वह उस स्त्रीको अपने साथ लेकर नदीके किनारे श्मशानपर गया और अप- नी झोलीमेंसे तावेकी थालीके ऊपर एक चक्र लिखाहुवा उसे निकालकर दिखाया और कहा कि,प्रथम तो तुम इसे देखकर तारागणकी ओरको हाथ जोड़ो, स्त्रीने ऐसाही किया फिर स्यानेने चार पांच लकड़ी निकालकर सुलगाई और उस स्त्रीसे कहा कि अब तुम अपना सारा शंगार उतार कर केवल (७२) श्रीप्रबोधिनी। यह एक मेरे पास, जो धोती है (झोलीमेंसे निकालकर पीली धोतीदी ) इसे पहरकर इस नदीमें स्नान करो फिर आकर अपने कपड़े और सारे गहने पहरलो, स्त्रीने सारे गहने कपड़े उतारकर रखदिये और वही एक- मात्र धोती पहरली, और वह नदीमें स्नान करनेके लिये गई उसने जैसेही जाकर नदीमें गोता मारा कि, वैसेही स्याना सव गहने कपड़ेको लेकर चंपतहुआ वह स्त्री स्नान करके नदीके किनारे पर आई और आकर देखा किं न स्याना है और न गहने कपड़े हैं तव तो वह हाहाकार करने लगी और बोली कि हाय मैं तो आज चौपटेमें मारी गई, आज मेरा सर्व नाश होगया, दोनों दीनसे गई, तत्ता दूध न उगलनेका न पीने का वह विचारी बड़ी कठिनतासे अपने घर आई और कहने लगी कि, स्त्रियोंको कभी स्याने दिवानेके फैदमें न पड़ना चाहिये इस प्रकारसे बहुतसी स्त्रिये धोखेमें आकर अपना सर्व नाश कर बैठती हैं हेवहन ! जव ईश्वर करदेताहै तव सभी उसके आधीन होतेहैं और जभी उसके संतान होती है विना ईश्वरकी इच्छाके कुछ नहीं होता, इसकारण स्त्रि- इयोंको उचित है कि, स्याने और धूर्त स्त्रियें चाहे कैसी २ चुपड़ी २ बातें क्यों न बनावै परन्तु उनके फंदेमें कदापि आना चाहिये । उनको अपना एक पैसा मंतदो,जो स्त्री तुमसे रुपया उधार मांगे तो साफ कहदो कि, इस वातमें हमारे घरके आदमियोंसे पूछलो, और ऐसेही रसायन बनाने वालों- केभी फंदेमें मतपडो। रसायनबाले यह कहते हैं कि, ला माई हम तेरे चांदीके गहनेको सुवर्णका करदें मूर्खस्त्रिये सुवर्णके । वालिका-विद्याशिक्षा। (७३) लालचमें आकर चांदीके गहनोंकोभी खो बैठती हैं। यह खूब ध्यान रक्खो जो वह रसायन बनानेवाले चांदीको सुवर्ण करसकते तो घर बैठेही न पुजते, घर २ भीख मांगते क्यों फिरते ? जिससमय नौकर भंगन पनिहारीका महीना हो जाय उसी समय इनकी तनख्वाह देदो, यहभी एक अपने ऊपर कर्जही समझो जो ऐसा करोगी तो नौकरोंके पास पैसा हर- समय रहेगा. उनको चोरीकी आदत नहीं पड़ेगी चाहे नोक- रोंको मोटाही नाज खिलाओ परन्तु पेट भरकर खानेको दो भूखा मतरक्खो, और जो भूखा रक्खोगी तो उनको चोरीकी आदत पड़ेगी. दूसरा महीना कभी मत चढ़नेदो, और कभीर अवसरपर एक दो पैसा देदिया करो फटा पुराना कपड़ाभी देदिया जिससे नौकर प्रसन्न रहैं, त्योहारके आनेपर एक दो आना इनामके बतौर दे दिया-जिसके घर नौकर चोरी कर- ताहै उस घरमें वरक्कत नहीं होती। जो स्त्री चटोरी होती है उसके घरमें लक्ष्मी नहीं ठहर सकती इसमें अधिक व्ययभी होताहै, जो गृहस्थीस्त्रियें चटोरी होतीहैं वह जन्मभरतक दुःख, भोगती और सर्वदा नंगीबूची रहती हैं। जहां चटोरपनेका अधिक राज्यहै वहां घरमें कछ नहीं रहता वह घर नाश हो जाताहै बहुतसे गृहस्थी तो कुछ हाट हवेली सभी कुछ बेंच- डालतेहैं और जवानकी राह खाजातेहैं फिर उन स्त्रियोंके न तो तनपर सावित कपड़ाहै और न कांसेका छल्लाहै वरन उन्हें पे- टभरके खानेको रोटीभी नहीं मिलती,बुरे.घरकी बंदोरसी घरमें वैठी रहती हैं, न कहीं आनेकी और न कहीं जानेकी: इसकारण स्त्रीको हरसमय अपने पास तीस चालीस रुपयेकातौ छील- (७४) खीप्रबोधिनी। पत्तर रखना उचितहै। जिससे अपनी इज्जत तौवनीरहै और कपड़ाभी साफ और सावित हो, जिससे कोई दरिद्री न कहे इज्जतके साथ दश लुगाइयोंमें बैठे, जो स्त्रियें चटोरी होती हैं, वह सर्वदा दरिद्रनसी बनी बैठी रहती हैं उनका कोई स- न्मान नहीं करता किसीने कहा है कि जीभहाथी, घोडे, रथ बहल, महल, दुमहले,वाग इत्यादि सभीको खा जाती है, इस- के अगाडी कुछ नहीं रहता. हां तीज त्योहारके आनेपर अच्छे २ पदार्थ बनाकर भगवत्को भोग लगाय खानेमें चटो- रपना नहीं कहाताचटोरपनेका नाम दौलतकी चाट है अर्थात समस्त दौलतको चाटजा; जो स्त्रियें चटोरी होतीहैं वह सर्वदा निर्धन और कंगाल रहतीहैं निर्धनकी कोई वात नहीं पूछता, धनवानका सभी आदर सत्कार करते हैं, धन- वान्की सभी जगह पूछ होतीहै, निर्धनकी कोई वाततकभी नहीं पूछता, धनवानसे सब दवते हैं,निर्धनके ऊपर सव अपना बल प्रकाश करतेहैं, जिसपर वीतती है वही जानता है दूसरा उसके दुःखका किंचित्भी अनुभव नहीं करसकता क्योंकि किसीने सच कहा है। "जाके पैर न फटी विवाई । सो कहा जानै पीर पराई"। हे बहन ! जब तुम्हारे पास धन होगा तो तुम्हारी इज्जत बनी रहेगी और घरके लोग भी तुम्हारे संगी होंगे परन्तु विपत्तिमें कोई किसीका साथी नहीं, जब खोटे दिन आते हैं तो कह कर नहीं आते. यह संसारचक्र है सर्वदा घूमता रहता है, सुखके उपरान्त दुःख और दुःखके पीछे सुख हो- ता है, अपनी एक मात्र आशासे निराश न होना चाहिये, है

बालिका-विद्याशिक्षा।
(७५)
आज तुम्हारे खोटे दिन हैं ईमानदारी और नेक नियतसे
चलोगी तो फिर भी तुम्हारे भले दिन आजाँयगे।
प्रकाशवती इस बातका भी अवश्य ध्यान रक्खो कि,
जब तुम कोई वस्तु बाजारसे मँगाओ तो प्रथम दो, चार
दूकानों पर उसका भाव पुछवालो और घर आने पर तोल
लो कारण कि, ऐसा बहुधा होते देखाहै कि, उसमें से नौकर
चाकर चुरा लेते हैं जब वह कम निकले तो उसी समय उस
दूकानदारसे मँगालो और कभी किसीसे उधार सौदा लेकर
मत खाओ, इसमें ओछापन कहलाता है, जब मँगाओ तब
नकद दाम देकर प्रत्येक वस्तुको बड़ी संभालसे रक्खो
जैसे कि, बहुतसी स्त्रियें नाजकी छाँटन फटकनको इधर
उधर पड़ा रहने देती हैं, इस कारण उसे चूहे खाजाते हैं, जिस
समय चूल्हेमें जलते२ लकड़ियोंके कोयले झड़जाँय तो एक
घड़में भर कर ढक कर रख दे, वह जाड़ोंमें तापनेके लिये
काम आयेंगे, फिर तुम्हें पैसा नहीं डालना पड़ेगा, दाल,
धोवाकरो तो उसके छुकले इकडे करकै रखती जाओ
निकट पड़ोस में किसीकी गायको खिलानेके लिए भेजदो
तो उसके मुंह पड़जायँगे और जब चाहो तब उसके यहाँसे
गोवरमँगासकोगी, वैसे देनेमें स्त्रिये मुंह सकोड़ती हैं और
जब तुम चुन्नी भुस्सी छुकले आदि उसकी गाय भैसके
खानेको दिलवाभेजोगी तो तुम्हारा उस पर जोर रहैगा, और
अवसर पड़ने पर वह तुम्हें दूध मट्टाभी दे दिया करेगी, जिसमें
समय खरबूजा तरबूज मँगाओ तो उसके बीज एक थल्लेमें
डालती जाओ फिर बहुतसे होजाय तो चलनीमें डालकर

(७६) स्त्रीप्रबोधिनी । tet मलकर धो रक्खो फिर सुखाकर छीलकर उनकी मांग निकालकर बूरेमें पागलो खानेके काम आजायगी और हरसमय घरमें मीठा भरा रहेगा जो स्त्रियें चतुर होतीहैं वह इनको इसीप्रकार संभालकर रखतीहैं, घरमें सभी वस्तुएँ काम आजाती हैं, घरकी खाट टूटजाय तव उसे नई बुन- वालो और पुराने बानोंको उधेडकर उसकी विन्डी बनाकर रखलो बहुतसी कंजार छींके वेचने आया करतीहैं वान देकर उनसे छींके मोल लेलियाकरो और कुछ तुम्हारे वर्तन माज- नेके जूने बनानेके काम आजायँगे जो कोई वगवानी या कूजडी तरकारी अथवा फल फलैरी बेचनेको आवे उससे नाज देकर मोल कभी मतलो, नाजकी वस्तु मोल लेनेसे दोपैसेका नाज होगा तो वह तुम्, धेलेकी चीज देगी, इसकारण स्त्रियों- का नाज आदि घरकी वस्तु देकर मोल लेना उचित नहीं जब देखोंकि अवके सालमें लिहाफ रजाई नई वनगई तो उनके रुअ- को उधेड़कर कातनेवालीको घर बुलवाकर कतवालो और जो तुम उसके घर कातनेको दोगी तो वह रुअड़ बदल लेगी जब कत कर तैयार होजाय तो उसकी दरी बुनवालो, दरी बुनकर आजाय तो उसके सिरे बटलो. जितनी तुम्हारी यह घरकी दरी चलेगी उतनी बाजारूदरी नहीं चलेगी, जो तुम किसीसे वहने- लाकरो तौऐसा मतकरो जिसमें कि थुक्का फजीती होतीरहै जैसे तुम्हारी चारः पांच मिलनेवाली हैं तो उन चारोंके साथ एकसा व्यवहार करो, मैं तुम्हें वह रीति बताये देती हूं कि, "हरी लगन फटकरी" डबल खर्च न हो और तुम्हारे घरका बनउआ बनजाय जो बहनेली प्रथम तुम्हारे यहाँ थाली भेजे पालिका-विद्याशिक्षा। (७७) . tott तो तुम उसे आप मत खालो अपनी दूसरी वहनेली के यहां वही थाली भेजदो, फिर दूसरे त्यौहारके आनेपर वह तुम्हारे यहां भेजेगी फिर तुम दूसरीके यहां भेजदेना इसी रीतिसे तुम्हारा लेन देन वढजायगा, मेरी बहनने ऐसाही किया था, घरमें जरामीठा नहीं उठाती इधरका उधर और उधरका इधर करती, उसकी इसी चतुरताको देखकर तो मैं अत्यन्तही प्रस- हुई इसीरीतिसे वहनेला करना सर्वसाधारणको उचित है,जो स्त्रिये इसप्रकार चतुरतासे गृहस्थीका लालन पालन करती हैं। वह धनवान् होजातीहैं और धनसे धर्म करती हैं इससे उनका इस लोकमें नाम और परलोक सुधरता है, संसारमें वह भारी भरकम गिनी जातीहैं। हे वहन ! इसकारण तुम घरके सभी कामोंको ध्यान देकर सीखो जिससे तुम्हें किसीकी बात न सहनी पडै कहा- वत है कि, "वातकी मारी न मरी तौ लातकी मारी क्या मरगी। " इसकारण बातही तो नहीं सही जाती, इससे ऐसा काम क्यों करो जिसमें किसी की वात सहनी पड़े हे वहन | जिससमय कोई भिक्षुक भिक्षा मांगनेके लिये आवे तो उसे सौकाम छोड़कर भिक्षा देआओ क्योंकि जो अ- पने हाथसे निकल जाय वही अच्छाहै और कदाचित् किसी समय भिक्षा न दो तो उससे यह मत कहो कि, फिर लेजइयो ऐसा कहनेसे वाक्यदान होजाताहै इससे बड़ा भारी पातक लगताहै, फिर घरमें नटनी इत्यादिका नाच न कराओ जो स्त्रियें घरमें नाच करातीहैं उनको घरके वरतनोंसेभी हाथ धोने पड़तेहैं हे वहन ! एक नटनी का मैं यहां दृष्टान्त देतीहूं कि,

(०८)
स्त्रीप्रबोधिनी।
एक स्त्रीने ज्येष्ठ मासकी ठीक दुपहरीमें नटनीका नाच कराया
घरकी सब स्त्रियें तोनाचदेखनमें लगगई और उन्हीमेंकी एक
स्त्री उस घरके सब बरतन भाड़ें उठाकर चम्पत हुई,नव नटनी
नाचकर चलीगई तब वह स्त्री घरमें घुसी तो घरमें सुनसान दे
खा और मनही मन शोचने लगी कि, मुझे क्या कुछ प्रम
होगया घरमें तो एक वरतनभी नहीं सूझता, फिर और स्त्रियों
से बोली कि, घरके सव वरतन कहां गये, दूसरीने कहा कि
हाय ! आज तो बड़ा धोखा हुआ, हम सब तो नाच देखने
में लगी रहीं. कोई सब घरमेंके बरतन उठाकर लेगया।
हे बहन ! स्त्रियोंको ऐसे काम कभी नहीं करने चाहिये जो
स्त्रियें शोच समझकर इस हमारे लिखेहुएके अनुसार काम
करेंगी उनको इन आपत्तियोंमें नहीं पड़ना होगा।
हेवहन गृहस्थीमें किस रीतिसे चलना चाहिये वह मैंने सभी
तुम्हें बताया मेरी सीख कुछ खोटी नहीं है, यह सभी तुम्हारे
काम आवेगी।
इति प्रथमसोपान समान।

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। (७९) द्वितीयसोपान। (किशोरीअवस्था) भोजनसंस्कार। हे वहन ! अव मैं तुम्हें सबप्रकारके भोजन बनानेकी री- तिभी बतातीहूं, कारण कि जिन्हें भोजन बनाना नहीं आता उनकी घर २ निन्दा होती है, और जो स्त्रिये स्वादिष्ट भोजन बनाना जानती हैं अवसर आनेपर उनकी सभी प्रशंसा करतेहैं भोजन बनानेका कार्य स्त्रियोंकेही ऊपर छोड़ागया है, कारण कि, वह घरमें रहतीहैं, और कोईर मनुष्य तो इसी अभिप्रायसे अपना विवाह करते हैं कि, हम नौकरीपरसे हारे थके आगे तो हमें घरमें बनीवनाई रोटी तो तैयार मिलैगी, परन्तु कोई २ स्त्रियें ऐसी मूर्ख होतीहैं कि, उनसे तवेपर चँदियातकभी डालनी नहीं आती वह ससुरालमें जाकर बड़े नाम सुनती हैं, उठते बैठते सासु ननँद ताना मारतीहैं,किवह रोटी बनाना क्यों सीखैगी. बड़े वापकी वेटीहै पैसे दिये और बाजारसे कचौड़ी मँगाकर खाली । इत्यादि बातें उन्हें सहन करनी पड़ती हैं। इस कारण हे वहन ! जिस प्रकारसे मैं तुम्हें भोजन वनानेकी रीति सिखाऊं उसको ध्यान देकर सुनती जाओ। भोजन बनानेमें सबसे प्रथा रसोईघर बहुत साफ और पवित्र होना योग्यहे, जहां बैठकर तुम रसोई बनाया करो उसकी दीवारों परभी दोनों समय झाडू मार लियाकुरो, कारण कि, दीवारोंपर जो जाले होते हैं वही भोजन बनाने के समय तरकारी दालमें गिरतेहैं, फिर रसोईघरमें जो वस्तु रक्खो, उसे

(८०)
नीप्रबोधिनी।
ढककर रक्खो भोजन दो प्रकारके होतेहैं (१)कच्चा, और
दूसरा पक्का,सो हे वहन ! प्रथम मैं तुम्हें कच्चा भोजन बनानेकी
रीति बताती हूं. जो कि यह बारहों महीने आता है.
जब कि तुम्हें उड़दकी काली दाल करनीहो तो इस प्रका-
रसे करना कि प्रथम ओखलीमें डालकर उसे सूसलसे छड़लो
जिससे कि, उसके छुकले निकल जाय. फिर सेरभर पानीमें
एक गांठ हलदीकी पिसी हुई डालकर उसे चूल्हेपर रखदो.
और आंच वालतीजाओ, जब वह पानी गरम होजाय तौपाव
भर दालको दो तीन बार धोकर उसमें छोड़दो और छटां-
कका चौथा हिस्सा उसमें सामर डालदो, फिर जब देखो कि,
दाल गलगईहै तो उसे उतारकर अंगारों पर रखदो, फिर
चमचा लाल होनेको आगमें रखदो, घी, मिरच, हाँग चमचे
में डालदो जव देखो कि मिरचैं काली पड़गई तो दालको
छौंकदो।
उड़द की धोवादालको इस रीतिसे करना. प्रथम
दालको पानीमें भिगोदो जब वह दाल फूलजाय तो
घोडालो छुलका न रहने पावें, फिर कपडेसे पोंछ
लो; जब फरैरी होजाय तो जरा घी कढ़ाईमें डालकर अकोर
लो फिर निकाललो, पतीलीमें सेरभर पानी गरम करलो,वह
पानी निकाल कर कसैरीको फिर चूल्हेपर धरदो उसमें जरासा
घी डालो, पिसीहुई सुखी हलदी डालो, जरासा जीरा डालो
फिर उसमें दालको डालकर भूनो, जव खूब सुनजाय तो जो
पावभर दालहो तो तीन पाव पानी डालो, दो तीन उफान
आकर दाल गल जायगी, फिर चूल्हेपरसे उतारलो, नीचे

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार । (८१) अंगारे रक्खो, ऊपर कोयले रक्सो, आधघंटेवाद चमचा लाल कर घी मिरच धनियाँ हींग डालकर छोकदो, यह दाल खाने में अत्यन्तही स्वादिष्ट होगी; हे वहन ! इसी रीतिसे मूंगकी धोवादालभी वनालेना अब मैं तुम्हें भात वनानेकी रीति वता- तीहूं; भात दोप्रकारके चावलों का वनताहै एक तो पुराने हैं- सराजके चावलोंका और दूसरा नये सुनखरचेके चावलोंका, बहुधा स्त्रियोंसे भात विगड़ जाताहै, उनको करने की रीति नहीं आती। (१)-प्रथम हंसराजके पुराने चावलोंको तीन वार धोकर पानीमें आध घंटेतक भीगनेदे, और दो सेर पानी कसेरीमें उभरकर गरम करनेको रखदे जब वह पानी सनसनाने लगे तो चावलों को छोड़दे, फिर चमचे से चलादे दो तीन बार उफान आजाय तो चावल निकालकर देखे गले या नहीं, जब चाव- अलमें एक कन रह जाय तो उतारलो और छन्ना बांधकर माड़ अपसालो. जव देखलो कि, पानी इसमें विलकुल नहीं रहा तो उसमें आधी छटांक घी डालकर हिलादो जरा देर उघड़ा रख कर फिर ढक दो वस इस रीतिसे करनेसे तुम्हारा भात कभी नहीं हलुआसा होगा। (२)-सुनखरचेके चावलोंको इस रीतिसे करो प्रथम पानी भरकर कसैरीमें रखदो जब वह पानी सनसनाने लगे तो चावल धोकर उसमें डालदो दो कन गल जाँय एक शेषरहै। तो उतारलो, फिर कपड़ा बांधकर मांड पसालो, फिर हिलादो ढककर रखदो तो यह भात कभी गलकर हलुआसा नहीं होगा वरन विखरमा होगा।

(८२)
स्त्रीप्रबोधिनी।
"
(३) बेसनकी कढ़ी-इस रीतिसे वनती है कि, प्रथम
वेसनमें जरासी हींग घिसकर बेसनको पानीमें घोलकर खुव
फेंटो, जब वह खूब फिटजाय तो पहले पानीमें एक फुलोरी
डालकर देखलो, जो वह फुलोरी पानीमें ऊपरको उतरा
आवै, तो पीसकर जरासा नमक डालदो कढ़ाईमें घी
छोड़ो जब घी बोलकर चुप होजाय तो उसमें फुलोरी
तोड़ो वह अच्छी खरी सेंककर निकाललो, फिर कढ़ाई में
हलदी, अजवायन, मेथी, मिर्च,हींग आदि सब मसाला
डालदो, और वेसन घोलकर उसमें मट्ठाडाल दूधकी तरह उसे
पतला करलो.जव देखो कि, कढ़ाईका मसाला होगया तो उस
धुले हुए वेसनको कढाईमें छोड दो; फिर धीरे २ चलाती रहो.
सामर डालदो, जबतक कढ़ी चुरने न लगे तबतक वरावर
चलाती रहो, दस वारह उफान कढीको आजाय तो उसे
फलोरी डालकर उतारलो, बस ऐसा करनेसे बडी सोंधी कढी
होजायगी तीन घंटेमें यह तैयारहोती है।
(४)- गकी कढी-प्रथम मूंगकी दालको धोकर उसकी
पिही वहुत महीन पीसलो, फिर उसको थालीमें रखकर खूब
फेंटती जाओ कढाई में घी डालकर चढाओ जव घी वोलकर
चुप होजाय तो उसमें पिट्टीकी फुलौरी तोडो, दोनों तरफसे
सेंक कर उतारलो; फिर उस शेष पिट्ठीकों मढे घोलंकर
कढाईमें छोड दो अपनी अन्दाजसे उसमें नमक डाल दो,
हलदी, मिरच, अजवायन, यह कढाईमें मटेके छोडनेसे प्रथम
भूनलो, जब पांच सात उफान आजाँय तो फुलौरी डालकर
उतारलो, बस यह कढी अत्यन्तही सुन्दर बनजायगी।
"
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किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। (८३) antetak (५)-आटेकी रोटी-को इसप्रकार बनाना कि, हे वहन । प्रथम तौ आटेको कड़ा करकै माड़ना, फिर जरा २ सा पानी देकर दोनों हाथोंसे सुक्की देकर माइती रहना, जव खूव नरम होजाय और उसमें छाला पड़ने लगे तो पर्थन लगा कर छोटी २ लोइयें बनालेना फिर दो लोइयोंके वीचमें पर्थन रख लोइयोंको चुनियाले और हथेलीसे रोटीको वढावै यह अव- श्य ध्यान रखो कि, रोटी टेढ़ी वेदी न हो, पतले किनारे और गोल रोटी रहे जव तवा होजाय तो तवे पर उस पोई हुई रोटीको डाल दो जव रोटीमें झाइयेसी पड़ने लगे तो लौट दो, जव चित्ती पडजाय तो उतार कर घईमें सेंको धुएँ रोटीको कभी न सेंको, जल न जाय इस वातका भी ध्यान रक्खो, जब दोनों ओरसे सिकजाय तो किसी ऐसे वर- तनमें रखती जाओ जिस्से हवा न लगे, हे बहन ! यह रोटी खानेमें अत्यन्त ही हाजिम होती हैं, चकले वेलनकी रोटी तो सभी करलेतीहैं परन्तु हाथकी रोटी वहुधा स्त्रियोंसे नहीं आती जिस समय तुम्हें चकले वेलनकी रोटी करनी हो तो उसका आटा कडा रक्सो, लोई बनाकर चकले पर वेल २ कर रोटी वनालो; यह रोटी हजम देरमें होती हैं, हे वहन ! अब मैं तुम्हें पूरी, कचौडी, तरकारी, खीर, रायता इत्यादि वनानेकी रीति भी बताती हूँ, कारण कि, इनका गृहस्थीमें नित्य प्रति काम रहता है, और सब प्रकारकी मिठाई बनाना भी बता देती परन्तु अभी इतना बताया हुआ सीखलो, जब यह सव बनानेमें चतुर होजाओगी और अधिक सीखनेकी इच्छा होगी तो सेठ खेमराजजीके यहांकी छपीहुई व्यंजनप्रकाश मँगा -- (४) स्त्रीप्रबोधिनी । : दूंगी उसमें भाँतिर के भोजन बनानेकी रीति लिखी है, वह पुस्तक प्रत्येक स्त्रीके उपयोगी है, उसके पढ़नेसे भी तुम्हें बहुत प्रकारके भोजन बनाने आजॉयगे, यह कच्ची रसोई तो मैंने तुम्हें बताई, अब पक्कीभी बताती हूं। (६)-पूरी-प्रथम आटेको खूब कड़ा मा., फिर मल्हार कर भली भांतिसे चिकना करले और उसकी छोटी २ लोइयें बनाकर पूरियें बेल कढ़ाईमें छोड़ताजाय, जव पूरी फूलैं तभी लौटदे दोनों ओरसे सेककर उतारले पूरियोंको एक बरतनमें रखता जाय बस बहुत मुलायम पूरी होजायगी। (७)-खस्तापूरी-इसमें सादी पूरीसे दूना घी लगेगा:सेर भर मैदामें माइते समय छटांकभर घी, तोला भर नमक, ज- रासी अजवायन डालदे, फिर छोटी २ लोइयां बनाकर चक- लेपर पतली र पूरी वेल दोनों तरफसे सेंक कर उतारले खानेमें यह पूरी बहुत खस्ताहोंगी। (८)-बनारसीपूरी-इसमें खस्तासे भी अधिक घी लगेगा, इसकी मैदा रोटीके आटेके समान माडै; फिर पिट्टी पिसी हुईको लोई के वीचमें रखकर लोईका मुँह सूंददे पर्थन लगाकर पूरीको चकले पर फोके २ बेलै, घी होजाय तो कढाईमें छोडदे, दोनों ओरसे सेंक कर उतारले, यह पूरी खानेमें बडी स्वादिष्ट होगी। (९)-कचौड़ी-मैदाको नमक डालकर मुक्कीददैकर खूब माडे और पिट्टीमें सब मसाला लाल मिर्च, धनिया, जीरा, हींग, इलायची डालकर महीन पीसे, फिर उसी पिट्टीको लो- " . किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। (८५) इयोंके भीतर भरै, हाथोंमें पानी चुपड़ ले हाथसेही कचौड़ी ठेक २ कर कढाईमें छोड़े दोनों ओरसे सेंककर खूब लाल करके उतार ले, बहुत सुन्दर कचौड़ी होजायेंगी। (१०)-खस्ता कचौड़ी-प्रथम पिट्टीमें सव मसाले डाल कर उसे धीमें अच्छी तरह सेंके, फिर उसको सिलवाटपर खूब महीन पीसले, उस पिट्ठीको लोईमें भरै, पर्थन लगाकर बहुत धोरे रवेलै, घीहोनेपर कढाईमें छोडता जाय फिर दोनों ओरसे सेंक कर उतारले; इन कचौडियोंमें आटा बहुत थोड़ा लगाना, इसका आटाभी नमक डालकर रोटीके समान नरम माडना। (११)-तरकारी आलू-सेरभर आलुओंमें पाव भर घी लगता है, उसकी रीतिभी मैं बतातीहूं, सबसे प्रथम आलुओंको छीलै, और उनको चाकूसे गौदै, फिर कढ़ा- उईमें घी छोड़कर आलू धोकर उसमें छोड़दे, फिर आंच पालता जाय, भुनते २ गलजायँ तो निकालले, फिर चूल्हे पर पतीली चढ़ावै, घी, तथा पिसी हुई धनियां, हींग, जीरा, म गादिको उस पतीलीमें छोड़दे जव मसाला सुनजायत ही देदेकर खूब भूनता रहै अन्दाजसे नमक डालंदा पानी हाल- कर ढक दे नीचे धीमी २ आंच बोलता जाता कि पानी नहीं रहा तो गरम मसाला डालकर उतार लें। यह आलू खानेमें रसभरीके समान होंगे, सावत रहेंगे टूटेंगे नहीं। (१२)-भिन्डीसावत-प्रथम भिन्डीको धोकर भीजे हुए कपड़ेसे पोंछले, जिससे कि उनमें काटे न रहैं, फिर पन्न

(८६)
स्वीप्रबोधिनी।
हलदी, धनियाँ, जीरा, मिर्च, हींग, अमचूर इत्यादि मसालेको
खूब महीन पीसकर करेलोंके समाने तराशकर उनके बीच में
थोड़ा २ मसाला भरदे फिर कदाईमें घी डालकर भिन्डी
छोड़दे, खूब भूनतारहै, नमक पिसाहुआ डालकर ढकदे, तो
यह भिन्डी सावत खिलमा वहुत सुन्दर होजायगी, और इस
रीतिसे करनेसे लुआवभी नहीं उठेंगे । इसी रीतिसे सावत बैं-
गनभी बनते हैं।
(१३) करेला-इसके बनानेकी कई रीतिहैं, यहां दो
एक बताती हूं, इसके बनानेमें चतुराई तो इस वातकीहै
कि कड़वापन न रहजाय, उसकी रीति इसप्रकार है, प्रथम
सावत करेलेके ऊपरके कांटोंको छीलकर धोले, और चाकूसे
चीरकर उसके भीतरके बीज निकाल डाले,फिर नमक लगा-
कर धूपमें रखदे । जव उसका पानी निकल जाय, तो धो-
डाले, फिर धनियां, लालमिर्च, सौंफ, हलदी, अमचूर,नमक
इन सबको पीसकर करेलोंमें भरकर डोरेसे उनको बांधता
जाय, फिर थोड़ासा पानी पतीलीमें भरकर पूल्हेपर चढ़ादे,
फिर जब वह गलजाँय तो कढ़ाई में घी डालकर तलले,जरार
सा दहीका छींटाभी देताजाय, बस यह करेले बहुतही सुन्दर
होंगे, कड़वे जरा नहीं होंगे।
और इनकी दूसरी रीति यह है कि इनके चंदे वना २ कर
धोले, फिर कढ़ाईमें घीछोड़कर उसमें हलदी, मिर्च, धनियाँ,
सौंफ पीसकर भूने, फिर करेले छोड़दे, गलनेलायक पानी
डालदे, जव गलजाँय तो दही देकर भून-फिर गरम मसाला
डालकर उतारले, यहभी खानेमें अच्छे होते हैं।

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार । (८७) - (१४)-जिमीकंद-इसका बनाना बहुधा स्त्रियोंसे नहीं आता, इसके बनानेमें बड़े खटरंगे करने पड़तेहैं, तव भी इसकी पपड़ाहट दूर नहीं होती, इसकारण मैं तुम्हें इसके वनानेकी सरलरीति बतातीहुं प्रथम जिमीकंदके टुकड़े काट- कर पतीलीमें भरकर उसमें पानी डाल उवालनेके लिये रखदे और पतीलीमें इमली के पत्तेभी भरदे, जब दो घंटे चूल्हेपर धरे होजाय तो उतारले और गोलेके तेलमें तलले, फिर हलदी, मिर्च, दालचीनी, तेजपात, धनियां, लौंग, इत्यादि मसाले पीसकर धीमें भूने और फिर जिमीकंदको डालकर दही देकर भून, रसीला करना हो तो पानी जियादे डालै, नहीं तो पानीका छींटा दे पिसीहुई साँभर डालदे, फिर गरम मसाला डालकर उतारले, यह इसरीतिसे वनानेमें कभी नहीं पपड़ावैगा। हे वहन ! धियातुरई, रामतुरई, काशीफल, मूली, सोया, पालक, लाहीगोभी इत्यादि तरकारी वनानेकी तौ साधारण रीतिहै, इन्हैं तो तुम विलावतायेही वनासकोगी इनके बनाने में कुछ भेद नहींहै। (१५)-मखानोंकी खीर-प्रथम मखानों को भी घीमें तललो, जवं वह शुनजाय उतारलो, पीछे कढ़ाईमें दूध औटाओ, जब दूध खूब औटजाय तो मखाने छोड़दो, तीन चार उफान आनेके पीछे उसमें गोला, पिस्ता, बदाम, छुहारा, किसमिस इत्यादि मेवा डालदो, दश मिनट के बाद उतारलो, पीछे बूरा डालदो बस यह खीरभी बहुतही सुन्दर होगी। (१६)-रामतुरइकी खीर-इसे छीलकर कडूकसमें (८८) खीप्रबोधिनी। कसलो, सेरभर दूधको पतीलीमें औटालो, कसेहुए कदूको धोकर पतीलीमें उवालने के लिये रखदो,जब वह गलजाय तो उतार कर खूब निचोड़लो, फिर उस औटते हुए दूधमें तीन छटांक कद छोड़दो, पीछेसे गोला, किसमिस, छोटी इलायची डालदो जब तीनचार बार उफान आजाँय तो उतारलो, पीछे- से बूरा डालदो। (१७)-कूटूकी खीर-प्रथम कूटूको भाड़में भुनाले जब उसकी खीलैं होजाय तो बीनले, काला छुलका न रहने पावै, दूध औटाकर उसमें खीलैं छोड़दे दो एक उफान आने पर गोला, किसमिस इलायची, डालकर उतारले. नीचे उतार कर बूरा डालदे। (१८)-चावलकी खीर-चार सेर दूधको कढ़ाईमें खूब औटावै, औटते २ जब वह आधा रहजाय तो पावभर हंसराजके पुराने चावलोंको धोकर उसमें छोड़दे, कर्छलीसे बरावर चलाता रहै, जब चावल गलकर मिलजाय तो गोला किसमिस, पिस्ता, बादाम तोला २ भर सब चीजें डालकर उतारले और पूरा डालकर जरासा केवड़ा डालै फिर थालीमें परसकर चांदीका वरक लगाकर खाय तो इसके खानेमें अत्य- न्तही स्वाद आवेगा। (१९)-हलुआमोहन भोग-हे वहन ! हलुए वनते तो कई चीजोंकेहैं. परन्तु इस समय मैं एकही हलुआ वताती हूं यही हलुआ सवसे बढ़करहै पाव भर सूजीको पाव भर घीमें भूनै जब भुनते २ सुगंधिआनेलगे तो उतारले आधसेर बूराको डेढ़सेर पानीमें घोलकर गरम करनेके लिये रखदे;

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। . फिर कढ़ाईमें सूजी डालकर छान कर सरवतको छोड़दे, वरावर कर्छलीसे चलातारहै, इसके पीछे, गोला, किसमिस, इलायची, सौंफ डालकर उतारले, यह हलुआ बहुतही वढ़ि- याहोगा। (२०)-गुझिया-गुझियोंके बनानेकी रीति इसप्रकार है कि, प्रथम सेंरभर मैदाको तीन छटांक घी डालकर मारे नरम न माई करौं माड़ा और सेरभर मैदामें पावभर घी डालकर भूनले जव वह खूब भुनजाय तो उसमें जरासा कपूर डालै गोला, किसमिस, इलायची तीन पाव वूरा डालै; मैदाकी छोटीर लोई करके वेले फिर उसमें कसार भरकर किनारों पर पानी लगा मोड़दे फिर गूंदकर कड़ाईमें छोड़दे दोनों ओरसे सेककर उतारले खाने में अत्यन्तही स्वादिष्ठ और खस्ता होंगी अकसर होलीके आनेपर स्त्रियां इन्हें वनाया करतीहैं। (२१)-टिकोने-इनको इस प्रकार बनाना कि प्रथम पावभर मैदाको जरासा नमक डाल, छटांक भर घी देकर माड़ना, आलुओंको छील कर उनके नन्हे २ टुकड़ेकर घी में भूनना जब वह गलजाँय तो साँभर चूक और भुने हुए चनेके वखतोंको पीसकर उसमें मिलालेना; जरासा दही डालना, फिर छोटी २ लोई बनाकर पूरी वेलना, चाकूसे वीचमेंसे काटकर दो करना फिर दोनों सिरोंको मिलाकर पानीसे जोड़ना, इसके उपरान्त उसमें कूर भरकर गूदन दे देना, यह भी खानेमें बड़े खस्ता होंगे। (२२)-भुनीहुई खिचड़ी-भुनेहुए आधसेर हंस- (९०) स्त्रीप्रबोधिनी। राजके पुराने चावल आधसेर गूंगकी धोई दाल चार आलूके टुकड़े इन सबको मिला कर धोडालें, फिर हलदी, लौंग, कालीमिर्च, जीरा इनको घीमें भूने फिर उस घीमें खिचड़ीको छोड़दे खूब भूनतारहै, सामर डालकर पानी डालदे पानी खिचड़ीके ऊपर दो अंगुल रहै फिर जव गलजाय और उसमें पानी न रहै तो नीचे उतारलो खानेमें यह खिचड़ी बहुत सों- धीहोगी। (२३)-रायता-रायते तो कई किस्मक वनते हैं इन- में केवल जीरा हींगका छौंकही तेज होनाचाहिये, काशीफल रामतुरईका भी रायता बनता है इनके बनानेकी साधारण रीतिहैं मैं तुम्हें केवल चिनौरियोंका रायता बनाना बता- तीहूं। प्रथम जरासी हांगको पानी में घोलकर छटांकभर वेसनको घोले जरासा नमक डालदे, वेसन गाढ़ा न रहै, फिर पावभर घी कढ़ाईमें चढाकर पौने में थोड़ा २ बेसन डालकर कढाईमें पौनेको ठोकता जाय तोछोटी नुक्ती गिरेंगी उन्हें दूसरी पो- नियांसे चलाकर जव सिकजायँ तो उतारले फिर एकथालीमें जरासा नमक डालकर उसमें उन्हें डालताजाय, जब वह फूलजाय तो मढे वा छनेहुए दहीमें उन्हें डालदे, सांभर, मिर्च पिसीहुई डाले, जीरे, हींगका शृंगार देकर ढकदे जरासा गरम मसाला डालदे। (२४)-मगदके लड्डू-सृजीके वरावर घी कढाईमें चढ़ाकर मंदी २ आंच वालकर भूनतारहै जब भुनते २ उस में सुगंध आने लगे तो उतारकर उससे सवाया पूरा उसमें का किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। (९१), डालकर मिलावै, फिर सब मेवा डालदे, जब ठंढा होजाय तो घीका हाथ लगा २ कर लड्डु बांधले। (२५)-मूंगका लड्डू-मोटी २ मूंगको भाड़में भुनाले फिर दलकर उसे फटकले जव छुकले निकलजाय तो चक्कीसे उसका आटा पीसले सेरभर आटेमें आधसेर घी डालकर भूने इसे अधिक न भूने फिर ढाईपाव बूरा मिलाले मेवा डाल कर घी लगाकर लड्डु बांधताजाय । (२६)-अचार आमका-आमको छीलकर उसमें नमक पिसाहुआ मिलाकर धूपमें सुखादे, फिर हलदी, मिर्च कलौंजी, सौंफ, हींग इन मसालोंको तेलमें भूनकर पीसले फिर तेलका मोवा देकर सब मसालेको मिलादे. इसके उपरान्त अचारीमें भरकर उपरसे तेल छोड दे तेल अचारके ऊपर तक रहै ॥ कभी २ धूपमें भी रखदिया करै तेल सर- सोंका हो। (२७)-आमका मुरब्बा-हे वहन ! सुरब्बे तो कई ची- जोंके होते हैं परन्तु तुम्हें इस समय आमकाही मुरब्बा बताती- हूं, दो सेर आमोंको छीलकर दो टुकड़ेकरकै गुठली निकालडाले फिर काँटेसे गोदकर पानी भरकर मट्टीके वरतनमें जोस देले जब कुछ एक गलजांय तौ उतारले फिर सेरभर सफेद दूरा डालकर कुछ एक जोस देकर उतारले, फिर सेरभर बरेकी दूसरी चासनी तैयार कर रक्खे, इसके उपरान्त निकाल- कर दूसरी चासनीमें छोड़दे और ठंढाकरके अमृतवानमें रखदे। न (९२) स्त्रीप्रबोधिनी (२८) नीबूका अचार-प्रथम नीबूको चाकूसे तरा- शकर दो टुकड़े करले, फिर पत्थरके बरतनमें उनका कुछएक अर्क निचोड़ कर लौंगचूरा, कालीमिर्च, जीरा, इलायची, नमक इन सबको कूटकर नीबूकी फांकोंमें भरै, और दो कटो- रियोंको वरावर जोड़कर कच्चे तागेसे वांध २ कर शीशेकी अचारीमें भरदे, फिर उस अर्कको छानकर मट्टीके वर्तनमें रखकर गरम करले इसके उपरान्त अचारीमें छोड़दे,अर्कनी- बूके ऊपरतक भरारहै, नित्यप्रति धूपमें रखदिया करै । (२९) चटनी-तोलाभर पोदीना,आध तोला अमचूर, नमक, कालीमिर्च, जीरास्याह. डालकर सिलवटपर खूब पीसे और जरासी हींग डालदे। (३०) अदरखकी चटनी-अदरखको छीलकर उ- सको तराशले फिर धोकर पत्थरकी प्यालीमें रखकर उसमें नीबू निचोड़दे-जीरा, इलायची,नमक यह अपनी अट- कलका डाले। हे बहन! यह ३० रीतियें भोजन बनानेकी मैंने सभी तुम्हें बताई, गृहस्थीमें इन सभीका काम पड़ताहै, पेड़ा, वी, जलेबी,खुरमे,इमरतीइत्यादि बनानेकी रीति भी बताती परन्तु यह सब वस्तुएँ तो बाजारमें भी मिलतीहैं इसीकारणसे इनको नहीं बताया। विद्यावतीके यह कहनेपर प्रकाशवतीने कहा कि, हे बहन तुमने प्रथम कहाथा कि, तुम व्यंजनप्रकाश मँगालेना. उसमें सभी प्रकारकी मिठाई और भोजन बनानेकी भी रीति लिखी हुईहैं, सो तुम्हारे पास हो तो मुझे देदेना। , किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार । तब विद्यावतीने अपनी आलमारीमेंसे सेठ खेमराज श्री- कृष्णदासजीके यहांका छपाहुआ व्यंजनप्रकाश दिया और कहा कि, इसको पढ़ाकरना, इसमें सभी मिठाई इत्यादिके बनानेकी भी रीति लिखीहुई हैं। शरीरपालन। हे वहन ! शरीरका पालन करनाभी एक मुख्य कार्यहै सो मैं तुझे इसे भी बतातीहूँ जो शरीरको यत्न सहित रक्खाजाय तो इसकी रक्षा भली भांतिसे होतीहै, सरलतासे शरीर पर कोई भी रोग अपना अधिकार नहीं जमासकता, यौवन बहुत समय तक स्थिर रहताहै, तनदुरुस्ती नहीं विगड़ती, थोड़ी अवस्थामें ही बुढ़ापा नहीं आजाता, अकालमें मृत्यु नहीं होती इस वातको कितनेही आदमी जानती, हे बहन ! हम तो अपने भाग्यपर ही विश्वास करे रहती हैं कि जो कुछ होता, है हमारे भाग्यसे ही होताहै; इसी वातको जानकर सभी मनुष्य अपने मनही मनमें, विश्वास करलेतेहैं, इसकारण पीड़ा, अकाल, बुढ़ापा और अकाल मृत्यु यह सभी प्रारब्ध- के अनुसार होतीहैं, इसी वातको सव आदमी निश्चयकर जा- नतेहैं । इसीसेही हमारे देशमें इतने दुर्वल और क्षीण मनुष्य दिखाई देते हैं, इसीसेही इस देशमें मनुष्याको थोडी अवस्था में ही बुढ़ापा आजाताहै और इसीकारणसेही इस देशके मनुष्योंकी अकाल मृत्यु होतीहै । प्रारब्धके उपरही विश्वास रखकर आजकलके लोग “शरीर पालन" जो एक विद्याह उसको भूलगयेहैं,परन्तु हे वहन!प्राचीनकालमें हिन्दू संतानके वीचमें इस विद्याका वड़ा आदरथा ऋषियोंने स्वास्थ्यरक्षाको - (९४) स्त्रीप्रबोधिनी। धर्मशास्त्रके अंशीभूत मानाहै, वह लोग जानतेथे कि, शरी- रका पालन न होनेसे किसी धर्म कर्मका साधन नहीं हो सकता, इसीलिये प्रातःकर्मसे लेकर रात्रिमें निद्राके समय तक सम्पूर्ण विषयोंको नियमकी श्रेणीपर चलागयेहैं, और इन सब नियमोंको धर्मरीतिके अनुसार करनेपर स्वास्थ्यरक्षा स्वयंही भली भांतिसे होसकतीहै, स्वास्थ्यरक्षामें शरीरका पा- लन करनाही प्रथम उद्देश्यहै, इसी कारणसेही उस समयके मनुष्य आजकलके मनुष्योंकी भांति रोगी नहीं होतेथे न थो- ड़ी उमर में ही उनको बुढ़ापा आताथा और उनकी अकाल मृत्यु भी नहीं होतीथी. सो हेवहन ! मैं देखतीहूं कि सब कोई विशेष करके स्त्रिये तो अपने शरीरपर कुछ भी ध्यान नहीं देती इसी कारणसे २५ ॥३० वर्षकी अवस्थामेंही उनको बुढ़ापा आजाताहै, शरीरके पालन करनेसेही स्वास्थ्यरक्षा होती है, सो उसेभी मैं तुझे वतातीहूं यह भी तेरे काम आवेगी इसको ध्यान देकर सुन! स्वास्थ्यरक्षा। हे बहन ! स्वास्थ्यरक्षा करने में प्रथम इन दो नियमोंपर सावधान रहना उचित है। ३ गरमी। २शरदी। इन दोनों विषयोंकी ओर दृष्टि रखकर पीछे कईएक विष- योंपर ध्यान देना योग्य है। १ पानेका ज़ल। २ निद्रा। ३ भोजनकी सामग्री ४ व्यायाम । ५ वस्त्रपहरना। स्नान । ७ गृहनिवास स्वच्छ वायुका सेवन। ८ मन । 44 किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार (९५) Cony गरमी-हे वहन ! शरीरमें अधिक गरमी लगनेसेही अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होतेहैं अधिकतापके लगनेसेही मूर्छा दुर्वलता इत्यादि नानाप्रकारके रोग उत्पन्न होजाते हैं, और फिर बहुत दिनोंतक वही तापशरीरमें प्रवेशकर रुधिर चल- निकी क्रियाको दुर्वलकर शरीरको क्षीण करदेता है, इसकारण जहांतक होसकै शरीरको अधिकं गरमी लगने देना उचित नहीं यदि कोई बहुतही जरूरी काम हो और बाहर जानाहो तो इसरीतिसे जाना कि जिससे शिरको धूप न लगै, और शरीरनंगा नरहै; विना कपड़ा पहरेनंगे वदन घरसे बाहर जाना उचित नहीं. अधिक धूप लगनेसे कितने ही ऐसे रोग शरीरमें उत्पन्न होते हैं जिन्हें बहुतसे मनुष्य नहीं जानते, जिस रीतिसे अधिक गरमी लगनेसे जिस प्रकार बहुतसे रोग उत्पन्न होते हैं उसी प्रकार शरदी लगनेसे भी रोग उत्पन्न होते हैं। - शरदी-शरदीके अर्थसे हिम, शिशिर, शीतल जल; इत्यादि सभीको समझना। शरदीके लगनेसे ज्वर, वात,शरी- रमें दर्द, पेटमें पीड़ा इत्यादि रोग उत्पन्न होतेहैं विशेष करके वालकोंको तौ शरदी बहुत जलदी सताती है गरमदेशके रह- नेवाले मनुष्यों को अधिक शरदी लगतीहै उसका कारण यह है कि गरमीसे वहलोग अधीर होकर शरीरको असमय में ठंढ लगादेते हैं जैसे कि १ अधिक परिश्रम करके आना और झटसे कपड़े उतार डालना। २ परिश्रम तो अधिक करना और विना विश्राम कियेही झटसे पानी पीलेना।

. (९६). स्त्रीप्रबोधिनी। ३ रात्रिमें सोते समय ओसमें सोना, अधिक हवाका लगना. ४ वर्षाकालमें शरीरको हवा लगाना, वस्त्रोंका न पहरना वस हे बहन ! इन्हीं कारणोंसे मनुष्योंको गरमी शरदी सतातीहै और फिर उनको अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होतेहैं, इन सब विषयों पर मनुष्योंको सावधान रहना उचित है। पीनेका जल-जल जीव धारण करनेके पक्षमें एक प्रधान उद्देश्य है पानीसेही अनेक प्रकारके रोग उत्पन्न होतेहैं जलके दोषसे ही तिल्ली आदि रोग हो जातेहैं, नदी और कुएका जल शुद्धहै, जलको जब पियो तब छानकर पियो जल जिन पात्रों में भराहो उनको कभी खुले मत रक्खो ढक- कर रखो दिशासे आकर पानी मत पियोः प्रत्येक कुएका पानी मत पियो भोजन करते समय एक या दो बार पानी पियो, हे वहन ! खड़े होकर पानी कभी न पीना,रात्रिमें वारह वजेके पीछे पानी कभीन पीना, निराहारभी पानी पीना बुरा- हे वहन ! जो इस रीतिसे जल पीनेमें ध्यान रक्खा जायगा तो कोई रोग नहीं सतावैगा। निद्रा-सारेदिनके परिश्रमके उपरान्त विश्रामका नामही निद्राहै भली भांतिसे नींद न आनेसे शरीरमें पीड़ा रहती है, जो रात्रिमें जागरण करतेहैं उनका दूसरे दिन शरीर अक- जड़ने लगताहै, अंगड़ाई आती हैं, देह टूटतीहै, आलस्य छाया रहताहै, काम करनेको दिल नहीं करता, इसकारण रात्रिमें कभी न जागे, जमीन पर कभी न सोवै,वर्षावस्तुमें जव सोवै तो इस वातका जरूर ध्यान रखै कि, कोई कीडा मकोड़ा कान नाकमें न घुसजाय, इस कारण कानमें रुईके फोये लगाले किशोरीअवस्था-भौजनसंस्कार । (९७) गलेतक चादरकोओदै,जमीनके सोनमें नसें दव जातीहैं रुधिर बहना बंदहोजाता है, शरीर तख्तासा होजाताहे, सोते समय मुँह खुला रक्खे ओसमें कभी न सोचे, सोनेसे पहले नित्य- प्रति नेत्रोंमें अंजन लगावे और हाथ पैर धोकर सोवे तो नींद खूब आती है। स्वप्न नहीं दीखते. प्रातःकालही उठना उचित हे सर्य निकलनेसे प्रथम उठकर दंतौन करनी चाहिये ऐसा कर निसे शरीमें फुर्ती रहती है, चेहरा प्रफुल्ल रहता है, कोई रोग नहीं सताता। भोजन-भोजनसेही मनुष्योंका जीवनहै. इसकारण ह वहन ! इसपर विशेष सावधानी रखनी उचितहे. नीचे लिखे- हुए नियमोंको अवश्य पालन करना चाहिये। १-भोजनका स्थान साफ हो । भोजनकी सामग्रीको कभी उघड़ा मत रक्खो। २-भोजन करनेके पीछे सान कभी मत करो; भोजन पचानेके लिये कुछ काम ऐसा भी करो जिससे शरीरको कुछ कष्ट हो, परिश्रम करनेसे भोजन अतिशीघ्र पचताहै, खाली वैठे रहनेसे भोजन नहीं पचता, भोजनका पचनाही शरीरको बलिष्ट करनेवालाहै, भलीभांति पचनेसे दस्त खुलकर आता- है, नहीं तो खुलकर नहीं आता, और इसके न आनेसे मन विगड़ा रहताहै, भूख नहीं लगती, भोजनमें अरुचि रहतीहै इसकारण थोड़ासा परिश्रम अवश्य करनाचाहिये, गरमियोंकी दुपहरियोंमें घंटा दो घंटा मनुष्य सोरहै। जिस घरमें रहै उसको नित्य बुहारडाले कच्चा भोजन कभी न खाय. बासी तिवासी भी न खायः यह पेटमें जाकर आंतोंमें चुभताहै,

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(९८)
स्त्रीप्रबोधिनी।
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और इसीसे शूलका दर्द पैदा होजाताहै. भोजन सर्वदा स्नान
करके खाय. उसको भली भांतिसे चवा २ कर खानायोग्य
है; ऐसाभोजन बहुत जलदी पचताहे; भोजनके समय अधिक
पानी न पिये भोजनके पहले भी न पिये और न अंतमें,
भोजन करके आध घंटेको लेटरहे, फिर पीछे थोड़ासा
पानी पिये। ऐसा करनेसे भोजन अतिशीघ्र पचताहै, भोजन
करके अधिक परिश्रम न करै, और मार्गभी न चलै ऐसा
करनेसे दर्द होजाताहै. भोजन तभी करै जव खूब कड़ाकेकी
भूख लगीहो, अरुचि वा अजीर्णमें भोजन न करै, जिसके
सन्मुख भोजन करनेमें लज्जा आतीहो उसके सामने भोजन
न करै, जिसके देखनेसे घृणा, आतीहो उसके सन्मुख भी
भोजन न करै, भोजनके पीछे भोजन न करना चाहिये ऐसा
भोजन पचता नहीं है; भोजन करते समय अपने पुत्र पुत्री
या अपने प्योरको अपने पास बैठालले, तो भोजन अच्छा
कियाजाताहै भोजनके आदि और अंतमें थोड़ासा मीठा
भोजन करे, जिन भोजनोंका परस्परमें विरोधहै उनको कभी
न करै, जैसे दूधके संग गुड़, खीरके संग मट्ठा इत्यादि हे
वहन! मेरी कहीहुई रीतिके अनुसार भोजन करनेसे तुम्हें
कष्ट उठाना कभी नहीं पड़ेगा।
व्यायाम । अंग प्रत्यंगको विना चलायेहुए शरीर फुर
तीला नहीं होता। और विना फुरतीके आयेहुएशरीरमें नवीन
रुधिरका प्रवेश नहीं होता, इसकारण भोजनमें भी इच्छा नहीं
होती देखते,२शरीर दुर्बल होजाताहै, स्त्रियें पुरुषोंकी भांति तो
कसरत करतीही नहीं उनको घरके काम धंधेही कसरतहैं मैंने
सम्म

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार । (९९) यह अपने नेत्रोंसे देखा है कि, वड़े २ घरानोंकी स्त्रिये कामकाज तोअलग रहा वरनखाटपरसे उतरकर नीचे पैरतकभी नहीं धरती इसीकारणसे वह सर्वदा रोगी रहती हैं उसका यही का- हरण है कि, वह परिश्रम नहीं करतीं, ऐसा करनेसे उनको अपने जीवनसे हाथ धोवैठना पड़ताहै, इसकारण हे बहन! घरके काम धंधे अवश्य करने चाहिये ऐसा करनेसे भोजन भली भांतिसे पचताहै, शरीर फुरतीला रहताहै. आरोग्यता अपना प्रचंड अधिकार जमाये रहती है। वस्त्रादि पहरना-जिन वस्त्रोंके पहरनेसे शरीर स्वस्थ रहताहै और जो वस्त्र अत्यन्तही प्रयोजनीयहैं. मैं केवल उन्हीं वनोंको तुझे वतातीहूं मेरे कहनेका मतलब यह है, कि कपड़ा जब पहरो तव मोटा पहरो.शरीरको उघड़ाकभी मत र- क्खोजिससे शरीरमें ठंढ नलगैअपने ओढ़ने विछौनेके कपड़ों को दूसरे तीसरे दिन सुखालिया करो जो कपड़े पहरो वह साफ पहरो,मैले कुचैले कपड़े कभी मत पहरो, जो कपड़ा फटगया हो उसे सीलो ऐसा करनेसे तुमसे कोई घृणा नहीं करेगा और तुम्हारा मनभी स्वस्थ रहेगा। स्नान-स्नानकरनाभी शरीरकी रक्षाका एक प्रधान उपायहे, जो नित्य प्रति नियमसे स्नान नहीं करते। उनके शरीरके रोमकूप बंद होजातेहैं और इसीसे अनेक रोग उत्पन्न होतेहैं, इसकारण रोमोंका वंदपडना कदापि उचित नहीं रनान करनेसे रुधिरके चलनेकी शक्ति बढ़तीहै। प्रातःकालही उठ दिशा इत्यादिसे निश्चितहो स्नान करना चाहिये जो गरमी हो तो ठंढे जलसे स्नान करै और जो शरदी हो तो गरम सापक (१००) स्त्रीप्रबोधिनी। जलसे स्नान करना चाहिये स्नान करनेसे प्रथम जाडोंके दिनोंमें शरीरपर सरसोंका तेल मलले फिर स्नान कर गीले अंगोछेसे शरीरको पोंछडाले । हे वहन ! इसरीतिसे नित्य प्रति स्नान करना योग्यहै। गृहनिवास-जिस घरमें रहो उसको झाड़ बुहार कर साफ रक्खो आठवें दिन गोवरसे लिपवादिया करोः कूड़ा करकट कोने विचालोंमें कहीं न रहने पावै, कूड़ा होनेसे घरमें दुर्गन्ध आने लगतीहै जीवजन्तु पैदाहोतेहैं, उनके काटनका डर रहताहै। नित्य घरमें अगर, गूगल आदिकीधूनी देतीरहो, इससे घरकी दुर्गंध जाती रहतीहै; और वायुभी शुद्ध होजाती है, कोई रोग नहीं होता, घरके दरवाजोंको प्रातःकाल खोल देवो जिससे उनमें ताजी हवा प्रवेश कर जाय, घरमें दो चार गमले सुन्दर वृक्षोंके लगाये रक्खो एक तुलसीका भी वृक्ष अवश्य होना योग्यहै। इसके रहनेसे घरमें सब प्रकारसे शांति रहती है। इसके दो चार पत्ते रोज खानेचाहिये यह बड़ा गुण करतेहैं, पाखाने साफ रखने चाहिये, एक घड़े पानीसे इनको सर्वदा धुलवा डालना चाहिये ऐसा करनेसे दुर्गंध न आवेगी और घरकी हवा भी शुद्ध रहेगी। घरमें अंधेरा और शील न होशीलका घर बहुत दुःखदाई होताहै,घरकी दीवारोंकोनित्य- प्रति झाड़ डालो जिससे जाले न होने पावै घरमें छिपकली और उनके अंडों को न होने देओजहांतक होसकै हेवहन ! अपने रहनेके घरको लिपा पुता साफ रक्खो ऐसा करनेसे कोई रोग उत्पन्न नहीं होगा। मन-मनके साथ जो शरीरका एक विशेष सम्बन्धहे

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार।
उसको सभी मनुष्य मन लगाकर अपने मन और शरीरके
कार्योंको भली भांति देखनेसे जान सकतेहैं । जिस रीतिसे
भोजन आदिके विषयमें भी नियमानुसार कार्य करना उचित
है, ठीक उसीके अनुसार मनके सम्बन्धमें भी मनको सर्वदा
अपने स्वाधीन रखना कर्त्तव्यहे, हे वहन ! कभी किसीकी
अच्छी चीजको देखकर उस परमनन डुलाओ जो परमेश्वरने
तुम्हें जैसा कुछ दियाहै सर्वदा उसीपर संतोप रक्खो।
रोगीचर्या ।
हे वहन । अव मैं तुझे यहभी वतातीहं कि रोगीके प्रति कैसा
व्यवहार करना होताहै यह भी तेरे उपयोगी वातहै वहुधा रोगी
की सेवा स्त्रियोंसेही भली भांति हो सकतीहै; कारण कि स्त्रियें
दिन रात घरमें रहतीहैं। इसकारण उनको रोगीकी ओर विशेष
ध्यान देना चाहिये हे वहन ! रोगीको ठीक समय पर दवा
देनी चाहिये, विलायतमें रोगीकी सेवा सुश्रूपा करनेवाली
खियें तनख्वाहपर मिलती हैं। हमारे देशमें यह रीति नहींहै;
लड़केको वीमार होनेसे उसकी सेवा माता करेंगी, पतिके
रुग्ण होनेसे उसकी सेवा उसकी स्त्री करेगी, स्त्री और माता
आदि जैसे मन लगाकर अपने पति और पुत्रकी सेवा
करसकतीहैं। ऐसी प्रीति और मन लगाकर नौकरनि सेवा
सुश्रूपा कदापि नहीं करनेकी, उनसे ऐसी आशा करना बड़ी
भारी भूल है।
गृहस्थी मनुष्यको सुख दुःख सभी भोगना पड़ताहै; वहु-
तेरे रोगीकी हालतको देखकर दुःखीहो शिथिल होजातेहैं और
बहुतेरे रोगीकी सेवाके तरीकोंको न जानकर उसकी सेवा

(१०२).. स्त्रीप्रबोधिनी। नहीं करते । आजकल स्त्रियोंके पढ़नेका अधिक प्रचार होग- याहै; और बराबर होताचलाजाताहै, वह यदि हमारे बताए। हुए नियमोंके अनुसार रोगीकी सेवा टहल करेंगी तो रोगीको किसी वातकीभी तकलीफ न होगी; और जो स्त्रियें पढ़ना लिखना नहीं जानती हैं। उनको हमारे नियम सुनानेसे भी बहुत कुछ उपकार होसकताहै। (१)रोगीके घरवालोंको इस वातकाभी ध्यान रखना आवश्यकहै कि, रोगीकी सेवा चिकित्साका एक प्रधान अंगहै, किस समय, कितनी खुराक दुवा रोगीको खिलानी होगी, किस समय रोगीको उठाना वेठाना होगा और रोगीको कैसा पथ्य दियाजायगा जो स्त्रिये इस वातको नहीं जानतीहैंउनको अपने रोगीकी सेवामें बहुत सी हानियें उठानी पड़ती हैं. इससे रोगीको आराम न होकर वरन रोग दूना बढ़ता जाताहै। (२)हे वहन ! मैंने बहुधा देखाहै, कि, रोगीको बहुत तेज बुखार चढ़ रहाहै, उसकी खुशकीसे व्या- कुल होकर रोगी हाथ पैर पटकताहै और प्यासके मारे पीनेके लिये ठंढापानी मांगताहै, उस समय घरके लोग विना शोच विचार किये उस विचारेको ठंढा पानी पीनेको दे देतेहैं रोगीका तो जायका विगड़ही जाताहै वह भांति २ की खानेकी चीजें मांगताहै घरवाले उसपर दयाकर झटसे बड़े लाड़ प्यारसे उसको खानेके लिये देदेतेहैं, वह यह नहीं जानते कि, इस खिलानेका कैसा भयानक फल फलैगा, यही विचारकर मैं तुझे रोगीकी सेवाके नियम संक्षेपसे बतातीहूं। मैं जो यह नियम बतातीहूं, यह सभी स्त्रियोंको याद रखने किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। (१०३) उचितहैं। इसके अतिरिक्त वैद्य और डाक्टर जो कुछ कहैं वही करना योग्यहै। सेवाकरनेवालीका कर्तव्य। रोगीको किसी समयभी अकेला न छोड़े उसके पास एक न एक आदमी हर समय बैठारहै, सेवाकरनेका भार स्त्रीकोही देना उचितहै; जो स्त्री रोगीकी सेवामें नियुक्तहो वह निरोगी और वलिष्ट तथा धैर्यवान्हो वालक और छोटे २ वच्चोंके लिये तो स्त्रीही सेवाकरनेवाली चाहिये रोगी चाहै कैसाही घवडावे और चिल्लावै परन्तु वह स्त्री विना घवडायेहुए स्थिर भावसे स्थित रहकर रोगीको धीरज वैधाती रहै । वैद्य जिस रीतिसे पथ्यपालनकरनेको कहगये हों उसपर विशेष ध्यान रखना उचितहै। दवाइयोंमें किसके वाद कौनसी दवा देनी होगी इसका ध्यानभी रखना उचितहै । नित्य रोगीके शारी- रक लक्षणोंका परिवर्तन और रोगी के सम्बन्धमें जो कुछ नई वातहो उसका स्मरण रखनाचाहिए और वह सब बातें वैद्यसे अवश्य कहदेव । रोगीके दस्त पिशावका रंग और आकार परिमाण स्मरण रखकर वैद्यसे कहदेवे और फिर जिस रीतिसे वैद्य कहै उसीके अनुसार कार्य करें। सेवाकरने वाली स्त्री प्रौढा और स्थिर बुद्धिवाली होनी उचितहै यदि रोगी सहसा संज्ञाहीन होजाया या वाईमें भर- कर वकवादकर अथवा विछौनेसे उठ २ कर भागने लगे तो स्त्रीको उचितहै कि, वह निडर होकर अपना कर्तव्य पालन- करतीरहे और सर्वदा प्रसन्न मनसे रोगीके मन बहलानेके लिये कहानी आदि सुनाती रहै, जिससे उसका मन प्रफुल्लरहै

'(१०४)
खीप्रबोधिनीं।
चाहै रोगीको कितनीही कठिन वीमारी क्यों न हो परन्तु
रोगीसे यह कभी न कहै कि, तेरी बीमारी बड़ी कठिन है
ऐसा करनेसे रोगीको अपना प्रवल रोग अल्प विदित होगा
रोगके सम्बन्धमें चिन्ता हीनता और प्रफुल्लताही रोगीको
निरोगकरनेका प्रधान उपायहै, यह बात सभी स्त्रियोंको स्मरण
रखनी उचितहै।
रोगीके घरमें धीरे २ वात चीत करे, अधिक चिल्लाकर
वार्तालाप न करै।रोगीसे रोगके सम्वन्धमें कुछभी वातचीत
न करै यदि रोगी अपने रोगके विपयमें कुछ प्रश्न करें तो
उसको उत्तर ऐसा देना चाहिये कि, जिससे रोगीको धीरज
और भरोसा बनारहै।
रोगीके घरमें धीरे २ बातचीत करै, तथा कोई कठिनशब्द
न बोले रोगीके सो जानेपर धीरे २ चलना उचित है, रोगीके
पास रहनेवाली स्त्रीको पैरोंमें वाजे इत्यादिका पहरना ठीक
नहीं रोगी नीचके घरमें रहता हो तो उस घरकी छतपर किसी-
को चलने फिरने नदेवे रोगीके सन्मुख दो जनोंमें चुपके २
वार्तालाप नहींकरने देवे, ऐसा करनेसे रोगीको अपने रोग
पर संदेह होताहै।
जब रोगीका रोग कठिनहो, तो उसे विस्तरपरसे उठने न
देवे,करवटलेने,ठसकं देकर बैठाने, हिलाने, डुलाने, या दस्त,
पेशावकरनेमें सेवाकरनेवाली स्त्री रोगीको सहारा देतीरहै ।
यदि रोगीको उठनेकी जरूरतपड़े, तो अपने गलेमें रोगीके
दोनों हाथ डालकर अपने हाथसे उसकी कमरको पकड़ धीरे २
उठाकर बैठावे, इसीप्रकार और २ कामोंमें सहायताकरनी

COM किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। (१०५) 1 उचितहै, तकियेपर शिर उठातीसमय रोगीके दोनों नेत्रोंको वंदकरदेना उचितहै, नहीं तो रोगीको घूमनीआजाती है, फिर रोगी सूच्छित होजाताहै।जो रोगी बहुत दुर्वल होगयाहो और उसका शिर तकियेसे अलग होगयाहो खाटके वान उसके शिरमें चुभनेके कारण वह छटपटाताहो तो जानलो कि, यह इससमय वेचैनहै, इसकारण ऐसे समयमें उसकी अवस्था देखकर या उससे विनापूछे तुरन्तही उसके सुभीतेका उपाय करदेना उचितहै। हे वहन ! प्रातःकालही रोगीको पेशाव पाखानेसे निश्चिन्त करादेना चाहिये, एक बड़ा और गहरा वरतन खाटके नीचे रखकर उसमें कुल्लाकराना, गरमपानीसे मुँह हाथ धुलाकर साफ कपड़ेसे पोंछकर थोड़ीदेर तकियेके सहारेसे रोगीको वैठानाचाहिये। कठिनरोगोंमें रोगी सवेरे बहुतही सुस्त होजाताहै, इसके पीछे मुँह धुलानेके उपरान्तही वैद्यकी व्यवस्थाके अनुसार पथ्य और उत्तेजक द्रव्य देना चाहिये। इससमय सेवाकरने- वालीको रोगीपर विशेष ध्यानरखना कर्तव्यहै, अर्थात् सब- काम छोड़ उसको रोगीकी सेवाही करनी उचितहै। रोगीका घर-जिस घरमें रोगी हो वह सबसे बड़ा, सुन्दर, हवादार और धूप आने योग्य हो । रोगीके शरीरमें ठंढी हवा न लगनेपावै एकओरकी ऐसी खिड़की खोलदेवे जिससे घरमें धूपआवे और रोगीको अधिक नुकसान न पहुंचे ऐसे घरमें रहनेसे रोगीको कुछ हानि नहीं होती वरन लाभ होताहै कारण कि, रोगी उजालेमें रहना अच्छा मानताहै।

(१०६) खीप्रबोधिनी। घरकी सब वस्तु साफ और एकजगह रखनीचाहिये सब दवा एकओर धरीरहैं, पथ्यादि एकओर रक्खे रहैं, मेरे कहनेका आशय यह है कि, सब वस्तु इस रीतिसे रखनी चाहिये कि आवश्यकता होनेपर तुरन्तही हाथ बढ़ाते मिलजाय, नहीं तो बहुधा ऐसा होताहै कि, समयपर साधारण वस्तुकी आवश्य- कता होनेपर १०। १५ मिनट तो उसकी खोज ही लगजाते हैं, इतनेमें रोगी विचारा कष्टके मारे व्याकुल हो जाता है। रोगीके पेशाव और पाखानेका स्थान घरके एककोनमें हो, वह हरसमय साफ रहनाचाहिये किसी २ समय घरमें वदबूको दूरकरनेकेलिये अगरकी वत्ती जलाकर दीवार में लगा देनी, या धूपकी धूनी घरमें देदेनीचाहिये। रोगीका घर साफ करनेकेलिये झाडू ऐसी नहीं लगानी चाहिये जिससे कि, धूल उड़कर रोगीके शरीरपर गिरैः पानी छिड़ककर धीरे २ झाडू देना उचित है। बिछौनातकियाचदर आदि-विछौना, तकिया, अथ वा तकियेकी खोल चादर.आदि तीसरे दिन बदल देने उचि- तहैं और रोज विस्तरेको धूपमें सुखालेना कर्त्तव्यहै, रोगीका विस्तर बहुत मुलायमहो, विछौना नीचा ऊँचा रहनेसे रोगी को तकलीफ होती है और नीचे ऊँचे विछौनेपर सोनेसे "शय्या क्षत" (Bedsore ) रोग पैदा होजाताहै। रोगीको जो वस्त्र पहरायाजाय वह गरम और नरमहो; मुंह ढककर न सोनेदे, इसका कारण यह है कि, श्वास प्रश्वासमें दूपित हवा रोगी लेताहै, कम्बलआदिसे मुँह ढककर सोना उचित है,कारण कि শুনুনু किशोरीझवस्था-भोजनसंस्कार। (१०७) कम्वलमें बहुतसे ऐसे छेद होतेहैं जिनमेंसे खराव. हवा निक- लती रहतीहै। दिनभरमें दोदफे विस्तरको झाड़ना उचितहै । शय्याक्षत-शरीरका कोई अंग लगकर एकओर पड़े रहनेसे शरीरके उस अंगकी कार्यकारिता वंदहोकर उस अंगमें घाव हो जाते हैं, इसीको "वेडसोर" या शय्याक्षत कहतेहै. यह घाव बहुधा मेरुदंडके नीचे पीठमें होताहै । एक तो रोग की पीड़ा और दूसरे घावकी तकलीफ नई उत्पन्न होजाती है, इससे शरीर बहुत दुर्वल होजाताहै। जिससे शय्याक्षत रोग न हो ऐसी रीतिभी मैं तुझे वतातीहूं। (१) विछौना साफ, नरमहो और उसमें सलवट नहो। (२) रोगीको करवट फिराते रहो,एक करवटसे नसोनेदो। (३) यदि रोगीकी इच्छा करवटलेनेकी नभी हो परन्तु तो भी उसे करवट लिवाते रहो और इस वातकाभी ध्यान अव- श्य रक्खो कि, रोगीका कोई अंग दवता तो नहीं है । या खाटके एक ओरतो नहीं पड़ाहै । (४) वीच २ में वैद्यकी सम्मतिके अनुसार गरमपानीमें थोडासा अक्कोहल मिलाकर स्पञ्चसे रोगीकी पीठमें मालि- शकरो, फिर सूखी फलालैनसे पोंछो। (५)हवेकी गद्दी (एआर क्रूशन) पर यदि रोगी सोवै तो बहुत उत्तमहै । गरीवोंके लिये यह वात, कठिनहे, इसकारण विछोना अवश्य नरम होना चाहिये। (६)रोगीकी पीठमें जो लालरंगका चकद्दा, दाग पड़- जाय तो तुरतही वैद्यको दिखादे, यही दाग शय्याक्षतका पूर्वलक्षण है।

(१०८)
खीमबोधिनी।
पथ्यदेना-रोगीको मांसका जूस, साबूदाना, अरारोट,
दलिया, जौका मंड आदि पतले पदार्थोंका पथ्य नीचे लिखी-
हुई रीतिके अनुसार देना उचितहै; मांसजूस आदि मुखरोचक
और स्वादिष्ट बनानाः जिससे रोगी रुचिसे भोजन करले
जिसके खानेमें रोगीकी अनिच्छाहो उसके खिलानेको रोगीसे
हठ न करनीचाहिये धीरे र रोगीको उठाकर गलेके नीचे और
छातीके ऊपर एक अंगोछा रखना उचितहै, जिससे मुखभ्रष्ट
बूंद उस अंगोछेपरही गिर ऐसा करनेसे विस्तर खराव नहीं
होगा, रोगीको स्वच्छताके साथ पथ्यवनाकर खानेको देना-
चाहिए, यह खालो,वह खालो, यह कहकर रोगीको विरक्त नहीं
करना, उसको अपनी इच्छानुसार खाने देना उचितहै। रोगीके
विछौनेपर दूसरा कोई न सोवै। रोगीके घरमें पथ्य नहीं
बनाना चाहिये, वैद्यके कहनेके अनुसार रोगीको जगाकर
पथ्य या औषधी देनी उचितहै । हे बहन ! मेरी कही हुई
रीतिके अनुसार रोगीकी सेवा सुश्रूषा करनेसे सरलतासे रोगी
आरोग्यता प्राप्त कर सकताहै, मेरी इन सब बातोंको तू भली
भांतिसे स्मरण रखना भूलना नहीं।
विपदाविपचिकित्सा।
हे वहन ! संसारमें मनुष्यको न जाने किससमय क्या विपत्ति
आजाय इसका समय कुछ ठीक नहीं है, आगमें जलजाय,
शस्त्रसे हाथ पैर आदि कट जाय आदि एकही मुहूर्तमें अनेक
प्रकारकी विपत्ति आजातीहैं, इसमें क्या करना उचित है
वहभी मैं तुझे वतातीहूं।
ATI

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार। १-यदिआगमें हाथपैरआदि कोई स्थान जलजाय तोउसी समय चूना या काली रोशनाई लगादी जाय तो जलन थम- जाती है अथवा उसी समय आलू कुचलकर जलेहुए स्थानपर लगावै तौछाला नहीं पड़ता और तत्काल ठंढक होजाती है। २-किसीस्थानमें चाकू छुरीसे चोट आई हो और वह स्थान कटगयाहो तो उसमें दूर्वाधासको कुचलकर भरदो घाव भर जायगा। ३-ततैया या शहतकी मक्खी काटखाय तो सरसोंका तेल या मिट्टीका तेल या भीजीहुई मट्टी मलदे तौ शीघ्र आराम होजाय। ४-विच्छूके काटनेपर मूलेके पत्तेकारस लगावै अथवा का- शीफलके ऊपरका डंठल घिसकर लगादे, या जमालगोटा पानीमें घिसकर पिलादे, अथवा दीवासलाई घिसकर लगादे या शिरसके वीज, गोमेद, दाडिमकी जड़, आकका दूध, इनकी धूप दे तो विच्छूका विष दूर होजावेगा। हींग और जलका लेप भी विच्छूके विषको दूर करताहै। ५-यदि कानखजूरेने काटा हो तो दीवेका वचाहुआ तेल उस स्थानपर लगावे तो उसीसमय विष दूर होजावे या गूग- लकी धूपदे और पीछे आकके पत्ते लपेटकर बांधदे तो विष " दूर होजावे। ६-यदि कांतर चिपटगईहो तो कड़वा तेल डालदे टुकड़े २ होकर मरजायगी । या मूलीके पत्तेका रस निचोड़दे तो वह उसी समय छूटजायगी। ७-चूहेने काटाहो तो मैनशिल, हरताल, कूट इनको निर्मू- (११०) स्त्रीप्रबोधिनी। utid डीके रसमें भावितकरके. पीवै तो मूसेका विप उतरजाय, या सरसों कुंकुम, मट्ठा इन तीनों चीजोंको वरावर लेकर घीके साथ पिये तो चूहेका विष दूर होजावे। ८-कुत्तेने काटाहो तोशिरसके वीज थूहरके दूधमें पीसकर काटे हुए स्थानमें लगादे तो कुत्तेका विष दूर होजाताहै अथवा चिरचिटेकी जड़ पीसकर एककर्षशहतके साथ चटावे तो भी विष दूरहोताहै। ९-यदि बावले कुत्तेने काटा हो तो घीवारका पत्ता सैंधा- नोन कुछ गरमकर तीनदिनतक वांधै तो विष दूर होताहै वा कुचला पीसकर लगा दे तो भी विष दूर होता है। १०-मकरी फलजाय तो हलदी, देवदारु, मजीठ, नाग- केशर इनकालेप करै तो मकरीका विष दूर होताहै । या अमचूर पीसकर लगावै तौ भी विप दूर होताहै। ११-यदि सर्पने काटाहो तो सफेद विष्णुकांताकी जड़,देव- दाली (वड़ीतोरई) की जड़ जलमें पीसकर सुँघावै तौ सांपका विष दूर होताहै.या दही,शहत,मक्खन,पीपल,अदरख, काली- मिर्च यह बरावरले इनसे आठवां हिस्सा सैंधानमक ले, इन सबको कूट पीसकर सेवन करे तो साक्षात् तक्षक और वासु- किका काटा भी क्षणभरमें यमराजके यहांसे लौटआताहै। अथवा कुटकी और तालमूशलीकी जड़ जलके साथ पी- नेसे विष दूर होताहै। १२-जीयापोतेके फलकी मांग शीतल जलके साथ पीस कर लेप करै याआंखोंमें अंजन लगावै वा एकनिष्कमात्र पीवै तो व्याघ-चूहा-सर्प-बिच्छू आदिका विष दूर हो जाता है।

किशोरी अवस्था-भोजनसंस्कार।
(१११)
१३-यदि शिरमें अधिक दर्दहोताहो तो कच्ची हलदी वा
मक्खनको मिलाकर लगावै तो शिरका दर्द दूर होताहै, या
गुलवनफसा पीसकर माथेपर लगावै तो आराम होताहै।
१४-पेट अफर गया हो तो महीन २ सामर पीसकर
पेटमें मले तोआराम होताहै यासात आठ कालीमिर्च मिश्रीके
सरवतमें खावे तोभी आराम होताहै।
१५-चदहजमी होगई हो तो अजवायन और काला-
नमक मिलाकर खानेसे हाजमा दुरुस्त होताहै।
१६-गलेमें दर्द होताहो तो वहांपर चूनेका पानी गरम
करके लगावै तो तत्काल आराम होताहै।
१७-रातमें नींद न आवै तो मेथीके शाकका रस पीवे
झट नींद आजायगी।
१८-जो शरीरमें कहीं फुड़ियाहो तो उस स्थानमें जरासा
चूना लगा दे तत्काल आराम होजायगा।
१९-फोडाहो तो गरम चीजें बैंगुन-या गंठी, तथा कबूतर
की वीट लगादेनेसे फोड़ाशीघ्रही पकजाताहै उसके पकजाने
पर अलसीकी खलकी पुलटिस वांधदे तो फोड़ा तत्काल
फूटजायगा।
२०-राल एक पैसेभर-सुरदाशंख एक पैसेभर इन दोनों
चीजोंको महीन पीसकर रक्खे, पहले गौका घी छः पैसेभर
लेकर गरम करै उसमें दो पैसेभर मोम डालै नव मोम पि-
घलजाय तो उन दोनों दवाइयोंको मिलावे फिर कांसीकी
थाली में डाल कर एक सौ आठ वार इसे धोवे धोकर किसी
वरतनमें रखले यह मल्हम जिस फाड़े फंसीपरलगाया जायगा
तत्काल आराम होजायगा।
--

(११२) स्त्रीप्रबोधिनी। २१-सफेदेमोम, मस्तगी गोंद,नीला थोथा, सुहागा सज्जी, सिंदूर, कवीला, मुरदाशंख, गूगल, कालीमिर्च, गेरू, इला यची वेर, सफेदा, सिंगरफ, सुधी गंधक इन सब दवाइयोंको वरावर लेके मोमको छोड़कर बाकी सब दवाइयाको अलग २ पीसले, फिर घीको गरम कर उसमें मम पिघलावे (गायका घी सब दवाइयोंसे चौगुना हो) फिर सव औषधियोंको मिलाय खरलमें डाल खूब घोटे जब घुटते २ घी और दवा एक होजाय तो उसे एक डिवियामें रखले और घावोंपर लगावै यह मल्हम चोटके घाव-शस्त्रकेघाव,फोड़े फुसी आदिके घावोंपर लगानेसे उन्हें आराम करताहै। २२-आँख दुखतीहों तो वस रसौतही लगावै उपर भी लेप करे और भीतरभी सलाईसे लगावै तत्काल आराम होता है। २३-डाढ़में दर्दहोतोतोमड़के वीज दावले आराम होजा- यगा या वकूलके पत्ते चावै तो दांतोंकी कमजोरी दूर होकर दांत मजबूत होजातेहैं। दांतोंमें कीड़ा लगग़याहो तोहींगको कुछ गरम करके ल- गावे तत्काल आराम होजायगा। या चिकनी सुपारीकी राख, सरसोंके तेलके साथ दांतों- की जड़में लगानेसे दांतोंकी जड़ मजबूत होजातीहै; और दां- तोंमेंसे खून निकलनाभी बंद होजाताहै। २४-पेटमें आंव होगईहो तो बेलको भरड़में भूनकर खाय तो आराम होजाताहै। २५-गूलरके रसकों शहतके साथ पीनेसे प्रदररोग दूर

किशोरीअवस्था-भोजनसंस्कार।
(११३)
होजाताहै, पावभर दूध, अशोककी छाल दो तोले, एक सेर
जलमें पकावे जब जल जलजाय और दूध रहजाय तो उसे
छान कर मिश्री डालकर पी ले तो अधिक रजका निकलना
और प्रवल प्रदररोगभी दूर होजाताहै ।
२६-यदि खट्टी डकारें आतीहों तो कालानिमक अदरखं
खानेसे आराम होताहै।
२७-खांसीसे या और किसीकारणसे छातीमें दर्द होगया
होय तो पुराने घीका मालिशकरे आराम होजाताहै।
इति द्वितीयसोपानसमाप्त ।

(११५) स्त्रीप्रबोधिनी। trator तृतीयसोपान । (गृहिणी) विवाह और पातिव्रतधर्म । हे वहन ! विवाहभी स्त्रियोंके जीवनमें एक प्रधान यज्ञहे, वरन इसको सभी यज्ञ कहतेहैं। इस यज्ञमें स्त्रियोंका देह, मन, प्राण पुरुषके अर्पण होजाताहै। उनका आशा, भरासो, सुख, दुःख सभी एक मनुष्यपर निर्भर होजाताहै; उनका जीवन प्राणपतिके जीवन के साथ, हृदय हृदयके साथ, मांस मांसके साथ, इन्द्रिय इन्द्रियोंके साथ - मिलजातीहैं । स्वभावकी कैसी सुन्दर और मनोहर विधिहै, जैसे विजलीक नरकेन्द्रके साथ स्त्रीकेन्द्रका मिलन न होनेसे विजलीकी क्रिया पूरी नहीं होती वैसेही स्त्रीपुरुष (शिवशक्ति) के संयोगविना संसारयंत्र एक पलकोभी नहीं चलसकता। विवाहका प्रधान उद्देश्य आत्मरक्षाहै, स्त्री पुरुष सभीकी यह इच्छा रहतीहै कि, हमारी आत्मा संसारमें वनीरहै मनु- जीने कहाहै, कि स्वामी स्वयं स्त्रीके गर्भ में जाकर संतान- रूपसे जन्म लेताहै, इस आत्मरक्षाकोही वंशरक्षाभी कहतेहैं, विवाह इसीलिये किया जाताहे कि, हमारा आगेको वैश बढ़े यही विवाहका आदि कारणहै, उसकारण विना स्त्रीपुरुषाका सम्बन्ध हुए किसी प्रकारभी वंशरक्षा नहीं होसकती, आज- कल मैं बहुधा देखतीहूं कि, विवाह होजानेके पीछे स्त्री पुरुषोंमें मेल नहीं होता, परस्परमें दोनोंजने एकरको शत्रुकी दृष्टिसे गृहिणी-विवाह और पतिव्रतधर्म । (११५) देखते रहतेहैं, वर्षों बातचीत करे विना बीत जातेहैं, इसी कारणसे स्त्रियें व्यभिचारिणी होजातीहैं, हे वहन ! स्त्रियोंको जो करना कर्तव्य है; और जिसके करनेसे इस लोक और परलोकमें उनका धर्म वनारहै, और पतिकी वह अत्यन्त प्यारी हैं सो मैं वही तुझे पातिव्रत धर्म वतातीहूँ, तू मन लगाकर सुन कारण कि, विवाह होजानेके उपरान्त तुझेभी इस धर्मको पालन करना होगा। यह श्रेष्ठ जाति जिस प्रकार अनेक सद्गुणों और सुन्दर धर्मोंसे पूर्ण है इसी प्रकार इस जातिमें स्त्रियोंको पातिव्रतधर्म का पालन करना भी सर्वोत्तम धर्म है,पतिपरायण,पतिकी सेवामें दक्ष, पतिकी इच्छानुसार कार्य करनेवाली,धर्मनिष्ठ सती लक्ष्मी महिलाओंकी कीर्तिसे आजतक भारत वर्षकी प्रजा सम्पूर्ण देशोंमें जगमगारहीहै; पातिव्रत धर्मका पालन करना वह धर्म है कि, इसके अतिरिक्त दूसरा कार्य कर्त्तव्यही नहीं, देवता, ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, जो कुछभीहैं स्त्रियोंके लिये सब पति- हीह, पतिकी सेवाही देवताओंकी पूजा है, हे बहन ! जिस स्त्रीपर स्वामी प्रसन्नहे, मानो उसपर सभी देवता प्रसन्न होगये, तपस्विनी अरुन्धती पातिव्रत धर्मके कारणही सप्तऋषि मंडलमें महर्षि वसिष्टजीके समीप विराजमान हैं, अवतक विवाह के समयमें उन श्रेष्ठ 'अरुन्धतीका दर्शन करायाजाताहै, पतिव्रतास्त्रीका अलौकिक प्रभाव होताहै, चंद्र, सूर्य क्या वरन सम्पूर्ण ब्रह्मांडके धारणमें पतिव्रता समर्थ होतीहै, महाभारतमें लिखाहै कि, एक महर्षि तप कररहेथे उनके ऊपर चिड़ियाने वीट करदी, जैसेही उन्होंने क्रोधकर उसकी ओरको देखा कि 1 (११६) स्त्रीप्रबोधिनी। वैसेही वह जलकर भस्म होगई, तब यह अपने मनमें विचा- रने लगे कि हम सिद्ध होगये, ऐसा विचार तपसे विरत हो विचरते हुए एक नगरमें आये और किसी गृहस्थीसे कुछ याचना करी,ज्योंही वह स्त्री भिक्षा लेकर आई कि, वैसेही उसके स्वामीने उसको पुकारा, जिससे वह वीचमेंसेही लौटगई और स्वामीके कार्यसे निवृत्त होकर पीछे वहां आई तब यह उससे पूछने लगे कि, हे अवले ! तू किस कारणसे लौटगई ? उसने कहा कि, महाराज स्वामीका कार्य करने चलीगईथी। तब वह ऋषि क्रोधकर बोले कि तैने अतिथिका इतना निरादर किया तब वह इनकी क्रोधभरीदृष्टिको देखकर बोली कि महाराज | मैं वनकी चिड़िया नहीं हूं जो दर्शनमात्रसेही भयभीत होजाऊं, महर्षि बड़े आश्चर्यमें हुए और पूछने लगे कि,तुमको यह ज्ञान कहांसे प्राप्त हुआ ? इससे वह स्त्री कहनेलगी कि यह सब पतिके चरणकमलसेवनकाही प्रतापहै, मैं स्वामीकी सेवाही परमधर्म जानतीहूं, इस प्रकार कहकर उस स्त्रीने उस ब्राह्मणकोबहुतसा धर्म सिखाया पातिव्रत धर्मके पालनसेहीस्त्री सर्वोत्तम गुणोंको प्राप्त होतीहै, अधिक क्या भूत भविष्य वर्त्त- मानका ज्ञान, पतिरक्षा, कल्याण, कुटुंब सन्तानादिकी प्राप्ति यह सव एकही धर्मसे होतीहैं ; अनुशासनपर्वके १३२ अध्या- यमें कथा आतीहै कि, सुमनय नामक केकयराजकी कन्याने सर्वज्ञा शाण्डिलीसे पूछाथा कि तुम किस चरित्र और आचरणसे इस लोकमें आईहो और किस पुण्यके प्रभावसे तुमने यह अतुल ऐश्वर्य पायाहै इसपर शाण्डिलीने कहाथा कि, मैं गेरुआ वस्त्र पहरनेवाली नहीं हूं, मैंने शिर मुंडाने गृहिणी-विवाह और पातिव्रतधर्म। वा जटा धारणकरनेसे स्वर्ग लोक नहीं पायाहै, परन्तु मैंने सावधान रहकर कभी भी अपने पतिसे कठोर वचन नहीं कहाहै, देवता, पितर, ब्राह्मणोंकी पूजामें रहकर अप्रमत्त चित्तसे सास श्वशुरकी सेवा कीथी, कभी किसीकी चुगली नहीं की, घरसे बाहर कभी निवास नहीं किया, न बहुत समयतक किसीके साथ बातचीतही; की किसी असंवकार्य अथवा हास्यकार्यसे अहित गुप्त किसीकी वात जाननेमेंभी मैं व्यय नहीं हुई, कार्यको बाहर गएहुए हमारे स्वामी जव घरआते तव उन्हें बैठाय उनकी पूजा करती तथा उनके चरणोंको धोकर चर- गुणामृत लेतीथी जो भोजन उन्नै रुचता वही मैं वनाती, कुटुः म्वके निमित्त जो वस्तुलाई जातीथी तथा जो कुछ घरका काम काज होता सभीको करलेती, तथा दूसरेसे करालेतीथी; यदि मेरे पति परदेश चले जातेथे तब मैं उससमय मंगलसूत्र धारणकर व्रतसे रहतीथी न चोटी गूंधती, न भूषण पहरती, न महावर लगाती, न उवटन करती, अर्थात् पतिके विदेश- जानेपर मैं कोई शृंगार नहीं करतीथी जिस समय पति शयन- करते उस समय मैं सब कामोंको छोड़छाड़ पतिके निकटही रहाकरती; उनको देखकरही मेरा मन प्रसन्न रहताथा; घरके कामकाजकेलिये स्वामीको केश नहीं देतीथी; छिपाने योग्य यातोंको सर्वदा छिपाकर प्रसन्नरहतीथी, हे वहन ! जो स्त्री सर्वदा सावधानहोकर इस रीतिसे पातिव्रत, धर्मका पालन करतीहै, वह स्त्रियोंमें अरुंधतीके समान सर्वदा स्वर्गमें निवासकरतीहै। हे वहन! पुरातन धर्म पातिव्रतके पालन करनेसेही यह स्त्रियाँ (११८) खीप्रबोधिनी। पतिलोकमें गमन करतीहैं, पतिव्रताओंकी महिमासे आजतक भारतका शिर ऊँचा होरहाहै। पूर्वसमयकाही एक इतिहास सु- नातीहूं, कि एक स्त्री अपने पतिकी सेवामें तत्पर थी पति उस- की जंघापर शिर धरकर सोगयेथे, उससमय उसका छोटा ल- का खेलता२ अग्निहोत्रके प्रज्वलितकुंडमें जापड़ा स्त्रीने वि- चारा कि, जो मैं इसे उठानेकेलिये जातीहूं तो इनकी नींदमें बाधाहोगी, इसकारण वह उठानेकेलिये न गई, परन्तु अग्निमें क्या सामर्थ्यथी कि,जोपतिव्रताके पुत्रको भस्म करती, उसी समय चंदनके समान शीतलहोगई, हेवहन ! इससे भलीभाँति विदितहोताहै कि, पातिव्रतधर्मका कैसा प्रभावथाः स्त्रियोंके नि- मित्त इससे अधिक और क्या होसकताहै, एकवार परम तप- स्विनी अनुसूयाजीने जानकीजीसे इसप्रकार पातिव्रतधर्मका उपदेश किया था कि, हेजानकी! जो गति जप, तपसेभी किसीको सिद्ध नहीं होसकती वह गति केवल पतिके चरणार- विदोंकी कृपासे स्त्रियोंको सरलतासे प्राप्तहोसकतीहै । चौपाई। मातपिताभ्राताहितकारी । मितसुखप्रद सुन राजकुमारी ॥ अमितदानभर्ता वैदेही । अधमनारिजो सेव न तेही ॥ वृद्ध रोगवशजड़ धनहीना । अन्धवधिर क्रोधी अतिदीना॥ ऐसेहु पतिकर किये अपमाना। नारिपाव यमपुर दुखनाना॥ एकै धर्म एक व्रत नेमा । कायवचनमल पतिपदप्रेमा। जगपतिव्रता चार विधि अहहीं। वेद पुराण सन्त सेवकहहीं।। अर्थात् माता पिता भ्राता यह सव परिमित सुख देनेवाले हैं, परन्तु हे जानकी! स्वामी अपरिमित सुख देता है। वह स्त्री - गृहिणी-विवाह और पातिव्रतधर्म । अधम है जो स्वामीकी सेवा नहीं करतीस्वामी चाहै बूढ़ा, रोगी, मूर्ख, धनहीन, अंधा, वहरा, क्रोधी, दीन, दुःखी केसाभी क्यों नहो, ऐसे पतिका जो स्त्री निरादर करतीहै वह यमलोकको जातीहै एकही धर्म और एकही नियम और एकही व्रत स्त्रियोंकेलिये कहागयाहै, कि स्त्री मन वचन कर्म- से पतिके चरणों में प्रेमकरे, संसारमें उत्तम, मध्यम, नीच, ल- घु यह चार प्रकारकी पतिव्रता स्त्री वेद और पुराणों में कहींहैं । चौपाई। उत्तमके अस वस मनमाहीं। सपनेहु आन पुरुष जगनाहीं । मध्यम परपति देखहि कैसे। भ्राता पिता पुत्र निज जैसे ॥ विनु अवसर भयते रह जोई। जानहु अधम नारि जग सोई॥ पतिवंचक परपतिरतिकरहीं। रौरवनरक कल्पशत परहीं॥ क्षणसुखलागिजन्मशतकोटी। दुखनसमझतेहिसमको खोटी ॥ विनश्रमनारि परमगतिलहई । पतिव्रतधर्म छांडिछलगहई । पतिप्रतिकूल जन्म जहँ जाई। विधवा होय पाय तरुणाई ॥ हेवहन ! जो उत्तम पतिव्रताहै वह यह जानतीहै कि,मेरे प- तिके अतिरिक्त दूसरा कोई पुरुप संसारमें नहींहै, और मध्य- मपतिव्रता दूसरे मनुष्योंकी वड़ाई छोटाइके अनुसार भ्राता पिता पुत्रके समान देखतीहै, जिनका चित्त चलजाताहै; पर- न्तु वह अपने कुल और धमको विचारकर स्थितरहतीहैं, वे स्त्रियें निकृष्टहैं जो विनाअवसरही भयसे चकित रहतीहैं,औ रजो अपने पतिको वैचितकर परपतिसे रति करतीहैं वह स्त्री अधम, वह रोरव नरकमें जातीहैं, जो क्षणकालीन सुखके निमित्त अनेक जन्मोंका सुख नष्टकरदेती हैं उनके समान (१२०) स्त्रीप्रबोधिनी। 1 खोटा और कौनहै? यदि निष्कपटहोकर स्त्री अपने पतिकी सेवाकरै तौ विनाही आश्रयके उसकी परमगति होतीहै और जो स्त्री पतिसे प्रतिकूल होकर जहांभी कहीं जन्मलेगी वह तरुण अवस्था में ही विधवा होजायगी, कैसी भी अपवित्र स्त्री क्यों नहो पतिके चरणों में पूजनकरनेसे परमगतिको प्राप्तहोतीहै। हेवहन ! महारानी जानकीने पतिव्रतधर्मकी शिक्षा मानो सर्व साधारणको करदीहै उन्होंने अंतिमपरीक्षाके समय कहाथा। वामनःकर्मभिः पत्यौ व्यभिचारो यथा न मे ।। तथा मे माधवी देवी विवरं दातुमर्हसि ॥ वा. रामायणे ॥ यदि मेरा मन वचन कर्मसे पतिमें व्यभिचार नहींहै तो यह पृथ्वी फटजाय और मैं उसमें समाजाऊं कैसी धर्मकी महि- माहै, कि महारानीका प्रेम ऐसे वनवासमें अलग रहकरभी उनसे पृथक् नहींथा, वह कहउठी थी कि यदि मेरा जन्म फिर कभी हो तो रघुनाथ रामचंद्रही मेरे पति हों! इसकारण हेवहन! स्त्रियोंकेलिये पातिव्रतधर्मही अत्यन्त श्रेष्टहै सो मैने तुझसे कहा। गृहिणीकर्तव्य। हे बहन!अब मैं तुझे गृहणीकर्तव्य बताती है, क्योंकि जब- तक कन्याका विवाह नहीं होता तबतक वह अपने माता पिताके आधीन रहती है, और विवाह होनेपर ससुरालमें जाना होता है, फिर वहां जाकर कैसे व्यवहार करनेसे उसकी बड़ाई होगी वहभी मैं तुझे बताती हूं। बुद्धिमान स्त्री वही है जो अपनी चतुरतासे सव कुटुम्बको कार का गृहिणी-विवाह और पातिव्रतधर्म । (१२१) . अपने वशमें करले लड़कीको ससुरालमें जाकर पिता की जगह श्वशुरको, माताकी जगह सासको, भगिनीकी, जगह नंदको, भ्राताकी जगह देवरको समझना योग्यहै भली भांतिसे पतिकी सेवा करनी चाहिये सहेलियोंके स्थानपर देवरानी जिठानीको समझना । सबसे प्यारसे बोलना उनके कहनेको न टालना, वहूका यह मुख्य कर्तव्य है, हे भगिनी! विचारो वचपनसेही लड़केके माता पिता बहुके आनेकी खुशी मनाते रहते हैं कि हमारे घर बहू आवैगी तो सव काम काजका भार उठालेगी; तुम्हारे पतिकी उन्होंने कितनी टहलकी है यदि इस वातको तुम समझकर अपने सासश्वशुरकी सेवा करोगी और आदरसत्कारकर उनका चित्त प्रसन्न रक्खोगीतो उनके आशीर्वादके प्रभावसे तुम्हेंभी सुख मिलेगा और तुम्हारी जो बहुएँ आवेगी वहभी तुम्हारे आच- रण देखकर तुम्हारी टहल भली भांतिसे करेंगी, सबके साथ प्रीति रखना, कभी किसीकी चुगली न करना; बहुत न वोलना, न बहुत चुपके रहना प्रत्येक गृहिणीको उचित है. किसीने कहाहै। "अतिका भला न बोलना। अतिकी भली न चुप्प ।” अवसर पाकर बहुओंको वोलना शोभा देताहै; बूंघट काढ़े रहना, सबके सामने मुँह न खोलना,जो अपने पतिसे वड़ाहो उससे कभी न बोलना न उसके आगे मुँह खोलना प्रत्येकत्रीको उचितहै कि,सास नंदसे छिपाकर कोई काम कभी न करना चाहिए अपने घरकी कोई वस्तु अपने घरवालोंसे छिपाकर कभी किसीको न देना और न अपने घरकी कोई (१२२) स्खीप्रबोधिनी। वस्तु छिपाकर बेचना उचितहै ऐसाअवसर अनसमझ कच्ची मतिकी थोड़े दिनोंकी आई हुई बहुएँ कर बैठतीहैं, कि सास से तो कहदिया कि हमारा फलाना गहना खोगया, और किसीके हाथ विकवा मँगाया, या अपने लहँगे डुपट्टेका गोटा किनारीही बेचनेके लिये भेज दिया, इससे आधे दाम तो जभी रहगये कि,जव वह विकनेको गया और फिर जिसने बेचा है उसनेभी अपनी दस्तूरी खाई, इससे तुम्हारे पल्ले कुछभी न पड़ा, और जब तुम नया मँगाओगी तो पूरे दाम देने पड़ेंगे, फिर जो सासवशुरने सुन लिया तो उनके मनसे उतर जाओगी, और जब वह तुम्हें बुरा कहेंगे तो पतिभी तुम्हारा आदर नहीं करेंगे, इसकारण ऐसा काम कभी न करना, और अपने घरका भेद कभी किसीसे मत कहना, अकसर ऐसी स्त्रिये बहू बेटियोंको वहकानेके लिये घर २ फिरा करती हैं कि प्रथम तो सासश्वशुरकी कु- राईकर वहूक पेटमें घुसकर उसके मनका भाव लेती हैं, फिर मीठी २ बातेंकर कहने लगती हैं कि,लो तेरा जो कुछ काम हो उसे मैं कर लाऊंगी इसीरीतिसे यह ठगईका जाल फैलाया करती हैं। इनके कहनमें कभी न आना, यह बड़ी दुष्टा होती अपने घरमें जो कुछ रूखासूखा मिला उसीको खाकर सं- तोष करलेना; जब कोई अतिथि तुम्हारे घर आवैगा तो उ- सके सन्मुख कोई ऐसी बात मत कहना जो वह तुम्हें मूर्ख समझे,भोजन करतीसमय अन्नपूर्णाको प्रणामकर भोजन कं- रके उठना और परोसी थाली छोड़कर कभी न उठना चा- हिए, भोजन बनानेकी रीति नीति और घरके कामकाज तो.

गृहिणी-विवाह और पातिव्रतधर्म । (१२३) मैं प्रथम तुझे वताही चुकीहूं यहां केवल सास श्वशुर और प- तिकी शुश्रूषाही बतातीहूं। किसीकी अच्छी वस्तुको देखकर उसके लिये हठ न करना; यहां मैं तुझे एक दृष्टान्त सुनातीहूं; कारण कि आजकलकी स्त्रियां शील और गुणको तो सीखती नहीं परन्तु गहनेके मारे मरी जाती हैं गहना तो केवल शोभाके लिये पहना जाताहै, न कि बोझालादनेके लिये स्त्रिये बूढ़ी तो हो जाती हैं परन्तु उनको गहनेका चाव नहीं जाता; Qहमें दांत नहीं शरीर में केवल अस्थिमात्र रह गई हैं परन्तु गहने पहननेमें जवानसेभी अधिक मन चलताहै, गहने पहरनेका स्त्रियोंको इतना चाव होता है कि, और गैरोंकाभी मांगकर पहर लेती हैं, वरन पीतल और गिलटीकाभी पहरलेतीहैं और कुछ न हुआ तो वीजोंके गजरेही बनाकर पहिनती हैं। एकदिन ऐसा हुआ कि, एक स्त्रीके पतिने कहा कि, वह पंसेरी जो रक्खी है जरा उसे उठाला; उसने कहा भला मुझसे यह इतनी भारी काहेको उठेगी तुम्हीं उठालो,यह वात उसके पतिने अपने मनमें रखली और भुलवा देकर एक दिन उसी पंसेरीके चार टुकड़ेकर सोने मढ़वा एकहारमें पुहालाया, और अपनी सीको देकर कहा कि, लो आज मैं तुम्हारे लिये सबसे भारी गहना बनवालाया, ऐसा किसी स्त्रीपरभी नहीं निक- लैगा, तुम वार २ मुझसे कहा करतीथी फलानागहना फलानी पर बड़ा भारीहै, सो लो तुम्हारे समान भारी अब किसी पर न निकलेगा; यह सुनकर उस स्त्रीने बड़ेही चावसे पहरलिया और कई दिनतक दिखानेके मारे बरावर पहने रही। तब एक (१२४) ... स्त्रीप्रबोधिनी। दिन उसके पतिने कहा कि, जरा तोलकर देखो तो सही यह हार तुम्हारा कितनामारीहै, उसने तोला तो छः सेरका निकला तब उसके पतिने हँसकर कहाकि वह पंसेरीतोतुमसे उठीनहींथी यह इतना भारी छः सेरका हार कईदिनसे अपने गलेमें डाले हो । यह सुनकर वह स्त्री बहुतही लजित हुई । इसकारण हे वइन ! ऐसी हठ कभीन करना कि, हमें गहने भारी वनवाओ। ऐसे गहने पहरनेसे शोभा नहीं होती सदा अपनी जिठानी देवरानी और नंदके साथ मिलकर रहना, और घरका काम- काज मिल झुलकर करलिया करना इसप्रकारसे काम तो किसीको मालूम नहीं देगा, और घरका सारा काम हो जाय- गा, तथा घरकी शोभा और वड़ाई भी निकलेगी, एक काम किसीने करलिया, और कोई काम किसीने करलिया, कभी किसीकी बुराई भलाई न करनी चाहिये। हे वहन ! सास, नंद तथा देवर जेठमें परस्पर जो कुछ वार्तालापहो,और जिस- के सुननेसे तुम्हारे पतिका माता पिताकी ओरसे मन फटजाय तो ऐसा कभी न करना कि वह बात अपने पतिसे कहदो ऐसा मैंने बहुधा देखाहै कि, वाजी २ बहुएँ ऐसी आती हैं जो कि, अपने स्वामीके कान भरकर मातापितासे पतिका मन अलग करा झटसे जुदी हो जाती हैं, फिर पीछे उनको कितनी तक- लीफ उठानी पड़ती है, इस बातको वही जानती हैं वह इस- को पहले नहीं जानती, अवसर पाकर उनका पतिभी वात २ पर ताने दिया करता है, कि तैनेही मेरे मातापितासे मुझे अ- लग कराया है, अब मैं भी तुझे तेरे मातापिताके यहां नहीं भे- जूंगा, इत्यादि अनेक प्रकारके मर्मभेदी वचन उसको सुनने गृहिणी-विवाह और पातिव्रतधर्म। (१२५) पड़ते हैं, और फिर सारे गृहस्थीका भार अपने उपर आजा- ता है, औरभी वहुतसी ऐसी बातें हैं कि, उन्हें मैं अ- वसर पाकर फिर कभी कहूँगी इसकारण हे वहन ! जो काम तुम्हारा उनके साथमें रहनसे चलेगा वह अलग रहनेसे कभी नहीं चलेगा। हमारे देशमें सासेंभी स्त्रियोंको वड़ा कष्ट देतीहैं। यह दुष्ट व्यवहार अत्यंतहीं निन्दनीय है । अपनी कुलवधू जो कि आ- दरकी सामग्री है, इसके सुखदुःखके ऊपर अपने बेटेकाभी सु- खदुःख निर्भर है। इस वातको वह नहीं जानतीं, वहूको दुःख देनाही उनका स्वभाव है, वह यह नहीं समझतीं कि,जो हम वहूसे प्रेम करेंगी तो वेटाभी हमारी सेवा करैगा, परन्तु वह इस वातको ध्यानमेंभी नहीं लाती इसींकारणसे बहुएँ जुदी हो जाती हैं, सो हे बहन ! तुम अपनी बहुओंके प्रति कभी ऐसा व्यवहार न करना, ऐसा करनेसेही तुम्हारी भलाई होगी। कपड़ा जिससमय पहरो ओढ़ो तो ध्यानरक्खो कि तुम्हारा कोई अंग उघड़ा. न दीखता रहै, घरके दरवाजेकी ओर मुहँ करके कभी न बैठो, झरोखोंमें न झांको, बरात आदिके आनेपर दरवाजेपर न जाओ, पराये घरमें न रहो, पराये घरमें सोनाभी ठीक नहीं,सास नंद देवरानी जेठानीका जो काम हो उसे प्रसन्नचित्तसे करदेना, घरमें जो कोई रोगी हो उसकी सेवा भली भांतिसे करो और सवसे एकसाव्यवहार रक्खो। पतिकी शुश्रूषा-हे वहन ! पतिव्रता स्त्रीको अपने पतिसे पहले उठना चाहिये वह सवेरेही उठकर पति और सासश्वशुरको प्रणाम कर घरके कामकाज सुधारे, रसोईके बरतन मांज धोकर रसोई घरमें रक्खे और जो टहलनी (१२६) स्त्रीप्रबोधिनी। हो तो यह काम उससे करालिया करै, रसोई जब वना- वे तो प्रथम भगवत्को भोग लगायं पीछे लड़के और नई व्याही हुई लड़कियोंको और उससे पीछे वृद्धोंको, फिर गर्भ- वती स्त्री तथा रोगीको खिलाये और पीछे सास, श्वशुर, देवर, जेठ, घोरानी, जिठानी, अतिथि, इत्यादिको भोजन कराय और अपने पतिको भोजन कराकर सबसे पीछे आप भोजन करे पतिक मनको अपने मीठे २ वचनोंसे प्रसन्न रखना, पतिकी आज्ञाका कभी उलंघन न करना,पतिव्रता स्त्रीका मुख्यधर्महै। पतिसे जो बात कहनेकी इच्छा हो तो बहुत आधीनीके साथ कहना चाहिए स्त्रीको उचित है कि रातकोभी उसी भांतिसे भोजनकर पतिकी शय्याभली भांतिसे बिछावे, पतिके सोनेसे पहले कभी न सोवे, और पतिके परदेश जानेके पीछे गंजीझा चौसर इत्यादिका खेल न करै, केवल उससमयमें उसे एक निर्दोष शिल्पविद्यासेही निर्वाह करना चाहिये । विवाह हो जानेपर, किसी मंत्रका संस्कार न करावे, और किसी पुरु- षको गुरुभी न करै स्त्री कभी स्वतंत्र नहीं है। चौपाई। नारिस्वभाव सत्य कविकहहीं। अवगुणआठसदा उररहहीं॥ साहस अनृत चपलता माया । भयअविवेक अशौच अदाया।। हे वहन ! स्त्रीको अपने पतिका नाम कभी न लेना चाहिये। और अपने ससुरालवालोंकाभी नाम नहीं लेना चाहिये जो अपनेसे और अपने पतिसे छोटे हों उनका नाम लेना योग्य है। हे वहन । स्त्री पुरुषका आधा अंग होतीहै, इसकारण

गृहिणी-विवाह और पातिव्रतधर्म ।
(१२७)
जहांतक हो स्त्रीको अपने चरित्रोंके सुधारनेकी ओर ध्यान
देना कर्तव्य है, स्त्रियोंमें जो आठ अवगुण बताये हैं वह यह हैं
उतावली, झूठ बोलना, चंचलता, माया रचना,भयभीत होना,
अविचार, अपवित्रता और निर्दयता, स्त्रीको उचित है कि
जहांतक होइन आठोंको त्यागदे।
इति तृतीयसोपान समाप्त.

(१२८). खीमबोधिनी। चतुर्थसोपान । आमोदिनी। " सदानंदमयी। हे बहन ! इस संसारचक्रमें दिनरात मनुष्य घूमता थकित होकर विश्राम करनेके लिये स्थान ढूंढ़ताहै। क्या दरिद्र क्या धनी कोईभी संसारकी पीड़ासे छुटकारा नहीं पा सकता सभीको दिनरात परिश्रम करना पड़ताहै; सभीका मन अ- नेकप्रकारकी चिंतासे व्याकुल रहता है, उससमय मनुष्य सं- सारी तापोंसे व्याकुल होकर सुसाफिरके समान व्याकुल हो वृक्षकी छायाको ढूंढता है। कहां शांति है, कहां सुख है, कहाँ विश्राम मिलेगा इन्हींको ढूंढता हुआ फिरता है। सभी मनुष्य शान्तिकी आशासे अपने घरपर आते हैं, इस वातको सभी कहतेहैं, कि अपने घर जाकरही आराम मिलैगा घरमें आते ही संसारी सव दुःख दूर हो जातेहैं, और शान्ति तथा सुख मिलता है फिर कोई कष्ट नहीं रहता। परन्तु हे बहन ! घर क्याहै, और वह कैसे सुख और शा। न्ति दे सकता है घर तो केवल एक जड़ पदार्थ है। उसमें सुख और शान्ति देनेकी सामर्थ्य कहां है ? यह तो कभी सम्भव नहीं हो सकता। जिस घरमें गृहिणी नहीं है। वह घर कभी किसीको सुख और शान्ति नहीं दे सकता। घर कुछ नहीं है,घरकी गृहिणीही सब कुछहै स्त्रीसेही घरकी शोभाहै इसकारण संसारमें स्त्रियेही मनुष्योंको सुख और शान्ति दे सकतीहैं, स्त्रियोंके अतिरिक्त आमोदिनी-सदानन्दमयी (१२९.) और कोईभी मनुष्योंको सुख नहीं दे सकताः जिससमय पुरुष सूर्यके कठिन तापसे व्याकुल हो जाते हैं, उससमय स्त्रियेही पंखा लेकर हवा करती २ उनके शरीरको शीतल करती हैं, परन्तु वड़े दुःखका विषय है कि, स्त्रिये इस बातको जानकर भी अनजानकी भांति व्यवहार करती हैं । इसीकारणसे बहुधा घर २ में केश और दुःख रहताहै। हे वहन ! यह तो मैं तुमसे पहलेही कह आईहूं कि, मनुष्य जिससमय घरपर आतेहैं तो सुखकी आशासे आते हैं. ऐसी अवस्थामें घरपर आकर यदि अपनी स्त्रीको आनंदमयी नहीं देखते, तो उनका शरीर दुगना व्याकुल होताहै। उसस- मय उनको घरके समान दुःखदायी और कोई स्थान नहीं दिखाई देता। जिसके पास आनंद पानेकी इच्छासे गये, यदि वहांही आनंद न मिला तो फिर और कहां मिलेगा। इसी कारणसे मैं कहतीहूं कि, स्त्रियोंको सर्वदा प्रसन्न मनसे रहना उचितहै, चाहै उन्हें किसी प्रकारका केशभीहो परन्तु पतिके सामने प्रफुल्लवदनसेही रहना ठीक है, कारण कि, अनेक भौतिके केशोंको सहनकर मनुष्य घरपर सुखकीही आशासे आता है घरपर दुःखकी आशा नहीं करता इस वातको भी मैं भली भाँति से जानतीहूं कि, बहुतेरी स्त्रियोंका ऐसा स्वभाव होताहै कि, स्वामीके आनेपर वह मान- करनेके मिस गाल फुलाकर बैठ जातीहैं, वह इसीमें आनंद मानती हैं कि स्वामी हमारी विनती करै और हमैं मनावे परन्तु मनुष्यको उस समय यह बातें अच्छी नहीं लगती, उसको उस समय अभिमान अच्छा नहीं लगता जिस समय

(१३०)
श्रीप्रबोधिनी।
मनुष्य घरमें रहताहै तब तो उसे मान अभिमानकी बातें
अच्छी लगतीहैं परन्तु वाहर जाकर अनेक प्रकारकी चि-
न्तायें आ २ कर उसे घेर लेतीहैं, उस समय वह स्त्रीके निकट
शान्तिकीही आशासे जाताहै। उसको उस समय मान आदि-
क कुछभी अच्छा नहीं लगता। उस समय यदि मनुष्य
घरपर आकर स्त्रीको प्रसन्न नहीं देखता तो उसका शरीर
जल उठताहै, तब वह घरसे भागनेका उपाय करताहै, फिर
कहां जाकर सुख मिलेगा। यदि उस समय वह स्त्रीसे वाद
विवाद करे तो वह घर भयंकर मूर्ति धारण करले । स्त्रियों-
की इस अज्ञानताकें पीछे उनको कितना दुःख उठाना पड़-
ताहै इसबातको वह नहीं जानती। इसी कारणसे उनके पति
उनसे विरक्तहो वेश्या इत्यादिकोंसे जाकर प्रेम करते हैं, फिर
वह त्रिये रातदिन पड़ी रोती रहती हैं, कोईभी उनकी वात
नहीं पूछता, अंतमें उनकी बुरीदशा होजाती है, यदि जो
उन्हैं तुम प्रसन्न चित्तसे आदर सत्कार कर उनके मनको
प्रसन्न रक्खो तो वह घरको छोड़कर काहेको वेश्याओंसे
प्रेम करे, धेश्यायें उनको बड़े आदर मानके साथ प्रसन्न रखती
हैं, यदि जो स्त्रियेही उनको ऐसा प्रसन्न करसकें तो उनके पति
कभीभी घरको छोड़कर बाहर नहीं जासकते।
हे बहन! सभी समयमें "आनंद मयी" रहो, वरन् जिस
समय स्वामी घरपर आवें उससमय प्रसन्न मनसे उसको
प्रसन्न रक्खो यह सभी स्त्रियोंसे मेरी प्रार्थनाहै; और जो
स्त्रिये इस मेरे कहे हुएके अनुसार व्यवहार करेंगी वह कभी
दुःख नहीं पावेंगी। आमोदिनी होनेसे प्रथम आनंदमयी, और

आमोदिनी-सदानन्दमयी। हास्यवदना होनाभी प्रथम कर्त्तव्यहै, इसका होना संसारमें बड़ा कठिनहै; संसारमें इसकी अपेक्षा और सुख क्या होसक- ताहै! स्वयं सुखीन होनेपर कभी आनंदमयी नहीं होसकती, परन्तु संसारमें सभी तो सुखी नहीं हैं, इसीकारण मैं अनुरोध करतीहूं, कि अपने स्वामीके सन्मुख सर्वदा दुःखको छिपाकर प्रसन्न मनसे रहो जव ऐसा व्यवहार कर स्वामीको प्रसन्न कर- लोगी; जव स्वामी तुम्हारे साथमें रहकर स्वर्गके मुखको प्राप्त करेंगे, तव देखना कि, तुम्हारे दुःखोंका किस प्रकारसे नाश होजायगा, और कितना आनंद मिलेगा। रसिकता हे वहन ! आनंद प्रगट किस प्रकारसे होताहै वहभी तुम्हें बतातीहूं, उसके दो उपायहैं; हास्यरस और रसिकता; हास्यरसका सम्बन्ध तो मैं अगाड़ी कहूंगी, परन्तु पहले मैं इस समय रसिकताके सम्बन्धमें दो एक बातें कहतीहूं। जिस वार्तालापसे औरोंके भी मनमें हास्यरसका उदयहो; और हृदयमें हास्यरसका आनंद अनुभव होनेलगे उसीका नाम रसिकता है। परन्तु दुर्भाग्यसे विना अश्लील शब्दोंके निकले हुए रसिकता नहीं हो सकती अश्लीलतानीच प्रकृति- की अनुचर है। इससे जिससे आनंद उदय होय वह भी नीच हो जाता है; और इससे जिस हास्यरसका उदय होताहै, वह यथार्थ रूपसे हृदयमें हास्यरस नहीं पहुंचा सकता । यथार्थ रसिकताभी एक विद्या है, यथार्थ रसिक मनुष्य सबके निकट आदर और सन्मान प्राप्त करताहै; जहां वह जाताहै, वही स्थान आनंदसे पूर्ण हो जाताहै। हजारों आदमियोंके जम- (१३२) स्त्रीप्रबोधिनी। घटमें जानेसेभी इस मनुष्यके समागमसे सभीको सुख मिल- ताहै इसकारण रसिकता एक सामान्य विद्या नहीं है। और इसीकारण सरलतासे सबजने रसिक नहीं होसकते । बहुतसे. विश्वासी रसिकताकी शिक्षाको प्राप्त नहीं कर सकते। जो रसिक होते हैं, वह आपही हो जाते हैं, रसिकता एक स्वभाविक सामर्थ्य है. मैं इसका विश्वास कभी नहीं करस- कती कि चेष्टाकरने पर रसिकता प्राप्त होसकती हो तव बड़ी भारी सामर्थ्य होनेपरभी सब जने काम चलानेके लिये एक न एक उपयुक्त रसिकताकी शिक्षाकर सकते हैं। इसकी चेष्टा भी शिक्षाके समान है। किसी को यह एक महीनेमें प्राप्त होती है और कोई एक वर्ष तक भी उपाय करने पर इस शिक्षाको प्राप्त नहीं कर सकता। बात चीतकरनेका प्रधान अंगही रसिकता है; जो रसिक इस बातको नहीं जानते हैं। उनकी वार्तालापसे कोई कार्य सिद्ध नहीं होता; रसिकताके विना हुए वार्तालाप निरस हो जाता है। मनुष्य विरक्त होकर उस स्थानको भी छोड़ देते हैं। हे वहन ! रसिकता क्या हे ! इस बातकोभी मुझे समझा देना होगा किसी वातका उपयुक्त हास्यदायी उत्तर देने काही नाम रसिकता है)जो हास्ययुक्त 'उत्तर देनमें समर्थ हैं उन्हींका नाम रसिक है। परन्तु ऐसा उत्तर क्या सभी मनुष्य दे सकते हैं, कदापि नहीं। एक दृष्टान्त मैं तुझे सुनातीहूं। एक समय एक पाठशालामें एक अच्छे रंग ढंगका मनुष्य गया, वह काना था, उसने जाकर पढ़नेवाले लड़कोंसे बहु-

आमोदिनी-सदानन्दमयी।
(१३३)
तसी पूछापाछी करी यहांतक हुआ कि, सभी वालक बताते २
थक गये, फिर उसने अंतमें एक और लड़केसे जाकर
पूछा कि, बताओ "प्रश्नका चिह्न कैसाहै ?" बालकने उसी :
समय खड़े होकर कहा कि "प्रश्नका चिह्न ऐसा होताहै,
कि एक काना आदमी हमारे सामने खड़ाहुआ पूछरहाहै।"
फिर उसने किसीसे कुछ न पूछा और जलदीसे पाठशालासे
चलागया।
वीरवलका वेटा संस्कृतमें बड़ा योग्य पंडितथा; जब
वीरवल मरगया तब वादशाहने उसके बेटेको बुलाकर पूछा-
कि वीरवलके साथ कितनी स्त्रिये सतीहुई, लड़केने कहा
वहादुरी, उदारता और बुद्धि, यह तीन स्त्रिये तो वीरवलके
साथही सती होगई, अब केवल उसकी एक कीर्ति, यहांपर
रहगई है। यह उत्तर सुनकर बादशाह बड़े खुशहुए । एकदिन
वादशाहने वीरवलसे कहा कि वीरवल बैलके भी लड़का पैदा
होताहै वीरवलने कहा नहीं तव बादशाहने कहा इसवातको
सावित करकै दिखाओ महीने भरकी मुहलतहै नहीं तो जानसे
मारेजाओगे: वीरवल घर आकर पड़रहे कोई युक्ति नहीं मिली,
जवमहीना होनेको आया तो वीरवलकी लड़कीने पूछा कि,
पिता किसशोचसागरमें पड़े हो तव वीरवलने कहा कि, बादशा-
हने मुझसे कहाहै कि,वैलके लड़का होता है इसवातको साबित
करकै दिखाओ नहीं तो एक महीने बाद मारे जाओगे बेटीने
कहा यह कितनी बड़ी बात है लो मैं आजही साबित करती हूं
यह कहकर आधीरातके समयमें बहुतसे कपड़े लेजाकर
बड़े जोरसे छीहो छीहो!शब्द करके धोने लगी, वादशाह सो-
म

(१३४) स्त्रीप्रबोधिनी। तेसे जागगये और उसे पकड़मँगाया पूछा कि तू क्यों रातमें कपड़े धोरही है उसने कहा मेरे पिताके लड़का हुआ है पोत- रोंके लिये कपड़ोंकी जरूरत हैवादशाहने कहा हैं ! कहीं इन्सा- नके भी लड़का पैदा होताहै, लड़कीने कहा हैं ! कहीं वैलके भी लड़का पैदा होता है । यह सुनकर बादशाह बहुत खुश हुए। हे वहन ! सर्वदा हास्यमयी और आमोदिनी होनेसे ही रसिकता अपने आपही उत्पन्न होजातीहै, इसके पीछे मनुष्य किस प्रकारका उत्तर देताहै उसके ऊपर भी ध्यान रखना कर्त्त- व्यहै,किसवातका कैसा उत्तर देनेसे मन प्रसन्न होजायगा,इसका जानना भी प्रथम आवश्यक है, विनाकारण जाने हुए तुम रसिक नहीं होसकोगी। जिस मनुष्यके सन्मुख तुम्हें रसिकता करनी हो, उसकी मनकी अवस्था, समय, स्थान इन सबको प्रथमही देखलेना होगा । बहुतसे मनुष्योंको जो एकसाथही हँसी आजाय उसीका नाम रसिकताहै, कौनसा समय रसिकता करनेका है। ऊपर लिखे हुए सव विषयोंपर दृष्टि अवश्य रखनी चाहिये, चाहै तुमपर हँसीकी सैकड़ोंही वातैं क्यों न आती हों, परन्तु जो हँसीको उत्तेजनकरनेवाला यथार्थ उत्तर देसकतेहैं हे वहन ! वही रसिकहैं, मैं यहाँपर कई एक हँसीकी भी बातें बताती हूं हास्य। हे बहन ! अव मैं तुझे दो चार दृष्टान्त हास्यरसके भी सुनातीहूँ, स्त्रियोंके यहभी उपयोगी हैं। एक दिन इजलासमें बैठे २ मुन्सिफ साहवने एक वकील साहवसे कहा कि, ओह तुम बड़े गधेहो, वकीलने इस बातका आमोदिनी-सदानन्दमयी। उत्तर बड़ी सरलता से दिया । हुजूर! आपने ठीक कहा हे वकीलोंमें जितने गधे थे वह तो सब मुन्सिफ हो गये हैं, के- वल एक मैं ही वाकी रहाहूँ। मुन्सिफ साहव मुसकाकर चुप हो गये। एक अफीमची अफीमकी पीनकमें बैठे हुए थे, उस समय मक्खी उनकी नाकपर बार बैठ जाती थी, कई बार उड़ाया परन्तु मक्खी न मानी अंतमें उन्होंने जेवमेंसे चाकू निकाल- कर अपनी नाकको उड़ा दिया, और वोलेले सुसरी अव काहे पर बैठेगी मैंने तेरे बैठने के स्थानको ही काट डाला। आपको मक्खीके उड़ानेकी बड़ी खुशी हुई अपनी नाक कटनेका कुछ भी रंज नहीं हुआ। किसी गाँवमें एक आदमीने एक मसखरेसे पूछा भाई इस गाँवका ठेकेदार कौन है मसखरेने, उत्तर दिया कि आप किसका ठेका पूछते हो, कोई भाँगका ठेका, कोई गांजेका ठेका कोई चरसका ठेका,कोई अफीमका ठेका लियेहैं तब उसने म्हा कि मैं यह नहीं पूछता; इस गाँवका ठाकुर कौन है,मसखरेने कहा किसरको वताऊं, किसीके यहाँ शालिग्राम, किसीके यहां श्रीकृष्ण किसीके यहां बालमुकुन्द, किसीके यहां गोपीनाथ, किसीके यहां महादेव, सबके यहाँ ठाकुरही ठाकुर हैं, आप किसको पूछते हैं, उसने कहा कि, भाई इन ठाकुरोंको नहीं पूछता, इस गाँवका राजाकौन है; फिर मसखरेने कहा, यहां एक चमार मर गया था उसकी स्त्री यह कह कर रोती थी "मेरे राजा२” इससे यह मैं जानता है कि अपने २ घरके सभी रा- जा हैं तब वह विचारा इसको मसखरा समझ चलागया। " (१३६) वीप्रबोधिनी। पिता-बेटा पढ़ो २" मातृवत्परदारेषु पुत्र-इसका अर्थ क्या हुआ? पिता-दूसरेकी स्त्रीको माके समान जानना चाहिये. पुत्र-तब तो मेरी लुगाई भी आपकी अम्मा होगी? पिता-चप पाजी, राम २ ऐसा नहीं ? पढो- "परद्रव्येषु लोटवत्" पुत्र-इसका क्या अर्थ है? पिता-पराई चीज वस्तुको लोष्टवत् जानना योग्यहै । पुत्र-लोष्टवत किसे कहते हैं? पिता-मट्टीके ढेलेके समान । पुत्र-तो अब बदमाश हलवाइयोंको मैं मिठाईके दाम नहीं दूंगा, क्योंकि पेड़े आदि मट्टीके ढेलेके समान वस्तुके दामही क्या? पिता-अवे मूर्ख ! गधा है, जरा अकलको जोर देकर पढ़ आगे भावार्थमें साफ खुल जायगा। आगेको पढ़ (आत्मव- सर्वभूतेषु यः पश्यति स पंडितः)। पुत्र-इसका अर्थ क्या हुआ? पिता-जो अपने समान सबको देखता है सो पंडित है। पुत्र-तब तो बड़ी खुशी की बात हुई पराई वस्तुको अपनी- ही समान समझेंगे, तो पराई वस्तु और पराई स्त्री भी अपने ही समझनी चाहिये। पिता-अवे जा मूर्खके मुर्ख इसी अकल पर कहता था कि, मुझे धर्मशास्त्र पढ़ा दो, इससे जो खोमचा करना सीखलेता तो घरका पालन पोषण तो होजाता, हट मूर्ख, आमोदिनी-सदानन्दमयी (१३७) जा यहांसे (यह कह कर पिताने एक थप्पड़ बड़ी जोरसे उसके गाल पर मारा पुत्र लड़कोंमें खेलनेके लिये चला गया)। एक जवान स्त्री गंगाजीपरसे घड़ा लेकर जल भरनेके लिये जा रही थी इसी अवसरमें वह धर्मशास्त्रशिक्षित वालक आया और उससे वोला कि, अम्मा ! अरीअम्मा ! स्त्री-क्यों वेटा ! आ।(मनही मनमें इस लड़केकी कैसी प्यारी वोली है) वालक-क्योरी,अम्मा? मुझे चीज खानेके लिये एक पैसा देदे। स्त्री-बेटा! मैं तो गरीव हूं पैसा तो मेरे पास नहीं है वालक-रंडा ! पेसा क्यों नहीं देती दे पैसा नहीं तो अभी पीटता हूं। स्त्री-यह कैसा वालक है ? जो गालियें देता है। वालक-नहीं देती चुडैल (यह कहकर एक लात मारी और घड़ा फोड़ डाला ) इतने ही गंगास्नानसे लौटकर उस लड़केका पिता यह चरित्र देखकर वोलाक्यारे वदान्या ? यह क्या बदजाती है। वेटा--होता क्या यह मेरी'मा' है जो (मा,के साथ किया कर- ताहूं सोई इसके साथ करता हूं, आपने मुझे सवेरे पढ़ायाही था मातृवत्परदारेषु" स्त्रीकी ओर देखकर) क्यों री अम्मा! वापको देख कर चूंघट क्यों नहीं काढ़ती। तू मेरीमा है तो मेरे वापकी मा है ? हे वहन ! इसी प्रकारकी हँसी दिल्लगी की अनेक वाते हैं; सो मैं तुझे वीरवलविनोद देती हूँ इसमें बहुतसी बातें हँसीकी लिखरही हैं इसे पढ़ना। LL (१३८) स्त्रीप्रबोधिनी । " क्रीड़ाकौतुक । हे वहन ! रसिकता और हँसी दिल्लगीकी वातोंसे यद्यपि स- मय तो आनंदपूर्वक व्यतीत होजाता है; परन्तु सब समयमें रसिकता अच्छी नहीं लगती, समय व्यतीत करनेके लिये और स्वामीको सुखी करनेकेलिये और भी बहुतसे उपाय हैं संगीत और वाजे इत्यादिकी विद्या भी आनंद और सुख- का यथार्थ उपाय है संगीत और वाजेमें भी बहुत मन लगता है। आज कल संगीत विद्याको भी स्त्रिये भली भांति सीखती जाती हैं, हे वहन ! तू गाना बजाना तो जानतीही है। मैं जानती हूँ कि, स्त्रियें आज कल अनेक भांतिके खेलोंको जानती हैं परन्तु अच्छी रीतिसे नहीं जानती। स्त्रिये स्त्रियोंके साथ खेलती हैं, इस कारण खेलकी चपलताके अतिरिक्त र गंभीरता नहीं होती,स्त्रियें खेलकी रीतिको नहीं जानतीं। उनके पति उनके साथ खेल कर सुख नहीं पासकते, परस्पर समान भावके उदय न होने पर, दोनोंमें खेलनेका उत्साह नहीं बढ़े गा। खेलनेमें हार जीतके समयमें हर्ष विषाद उत्पन्न नहो तव तक खेलही क्या; इसकारण पुरुष तो. खेलके जाननेवाले होते हैं, और स्त्रिये अज्ञान रहती हैं, हे वहन ! इसी कारणसे आपसमें क्रीडाका आनंद कभी नहीं उत्पन्न होता; तभी कहतीहूँ कि, प्रत्येक स्त्रीको खेलोंमें भी पारदर्शी होनेकी चेष्टा करनी चाहिए। बहुतोंका यह कहन है कि स्त्रियोंको खेल खेलना उचित नहीं। बहुतेरे यह विचारते हैं कि, स्त्रियें जव खेलने बैठ जायँगी तो

आमोदिनी-सदानन्दमयी।
घरके काम काज कौन करेगा, यह उनकी बड़ी भूल है,
परन्तु स्त्रियोंको खेलकी शिक्षा पुरुपके लिये है, जिस समय
घरके काम काजसे निश्चिन्त हो स्वामीके पास बैठें तो अपने
पतिके सुखके लिये खेला करें इसमें कुछ हानि नहीं है, यह
शिक्षा स्त्रीके लिये नहीं हुई वरन् पुरुषहीके लिये हुई, यह वात
किस प्रकारसे कही जा सकती है ? तो आदमी जिस.२
खेलको खेलते हैं और जो खेल खेलना उन्हें उचित है। ठीकर
वही २ खेल स्त्रियोंको भी खेलना उचित है पुरुषको जो खेल
अच्छा लगे, स्त्रियोंको भी वही खेल सीखना उचित है हे
वहन ! इसी लिये मैं तुझे तासका खेल, शतरंजका खेल और
चोसर आदिका खेल भी बताती हूँ। इनको तू सीखलेना;
और अवसर मिलनेपर अपने पतिके साथ खेला करना।
अधिक अवस्था होने पर पहले के समान तासका खे-
ल अच्छा नहीं लगता तव चौसर और शतरंज खेलनेके
लिये मनुष्यका मन करता है, इसी कारणसे बहुतसे मनुष्य
घरसे बाहर जाकर अपने दूसरे साथीको ढूंढ़ कर उसके सा-
थ खेल कर समय विताते हैं, फिर यह खेल दो जनोंसे होता
है; यह खेल केवल स्त्री पुरुपके खेलनेकेही लिये है, परन्तु
हमारे इस भारत वर्पकी स्त्रियें इस खेलको विलकुल नहीं
जानती, इसी लिये उनके स्वामी घरसे वाहर जाकर अपने
साथीको ढूढ़ते हैं, और फिर उन्हें यह संगतिही विगाड़ देती
है; हे वहन । जो स्त्रियों को यह खेल खेलने आते होते, तो
उनके पति क्यों कुमार्गगामी होजाते,. स्त्रियोंको यह खेल
अवश्य सीखने चाहिये, इसी लिये मैं तुझे तास चोसर
शतरंज आदिके खेलनेकी रीति सरलतासे बताती हूँ।
"

(१४०)
स्खीप्रबोधिनी।
tetet
"
जो स्त्रिये इन बातोंको जानती होती कि, हमारी तनक
सी भूलसे कितना दुःख होता है तो वह कभी अज्ञानकी भाँति
नहीं बैठी रहतीं।
खल तासका।
तासके खेलको तो स्त्रियें थोड़ा बहुत जानती भी हैं।
परन्तु भली भाँतिसे नहीं जानती उनको सिखाने के लिये मैं
तास खेलनेकी रीति बताती हूँ।
१ तासके खेलको तीन जने खेलैं यह खेल बहुत सीधा
हरेक रंगके तेरह २ पत्ते होते हैं चारों रंगके कुल मिलाकर
बावन पत्ते होते हैं जिसमें से ईंटकी दुग्गी निकाल कर फिर
तासको खेल जव तुम तीन जनी तास खेलनेको बैठो तो
उनमेंसे एक जनी तासोंको फांट करतीनों जनियोंको १७
सत्तरहपत्ते वाँटदे, इसखेलमें सबसे पहले हुकमका इक्का
अर्थात् आफताब खेला जाता है, पीछे यह अपनी इच्छा
रही कि, चाहै जौनसा रंगखेलो, चारों रंगोंका सबसे बड़ा
इका है उससे छोटा वादशाह, वादशाहसे छोटी वेगम, वेगमसे
छोटा गुलाम, गुलामसे छोटा देहला, दैहलेसे छोटा नैहला
नहलेसे छोटा अहा, अडेसे छोटा सत्ता, सत्तेसे छोटी छग्गी
छग्गीसे छोटी पंजी,पंजीसे छोटी चौग्गी,चौग्गीसे छोटी तिग्गी
तिग्गीसे छोटी दुग्गी होती है, इसी रीतिसे बड़ा पत्ता छोटेको
जीत लेता है, और जिसने खेलमें बदरंग पत्ता डाला है
वह पत्ता चाहै इका बादशाह भी क्यों न हो उसे रंगवाला
पत्ता काट लेगा, इसी भांति खेलते २ जिस पर तीन पत्ते रह
जाँय या एक भी न रहै उसीकी हार होती है, और जो तीन

आमोदिनी-सदानन्दमयी। (१४१) पत्तेवाला खेलना चाहै तो उसको तीन पत्ते देकर दूसरेको पूरी वाजी देनीचाहिये जिसको अधिक जीत हो बाकी पत्ते उसको देनेचाहियें, फिर अच्छे २ पत्ते छांटकर उस तीन पत्ते वालेको वाकी पत्ते देकर उसके सत्तरह पत्ते पूरे कर देने उचित हैं यह खेल तीन जनोंसे होताहै। गुलाम चोर खेल-हे वहन ! यह तो मैंने सीधा खेल व ताया और अब गुलाम चोर खेलके खेलने की भी रीति व- तातीहूँ; पहली पहल सब तासों से चारों गुलामोंको एक जगह मिला उनमें से एक गुलामको छिपा कर रखले, इसके पीछे उन तीनों गुलामोंको । विना देखे तासमें मिलाकर खुव फाँटले, जव खूब फाँट चुको तौचार पांचजनीं आपसमें बाँटलो और इसके पीछे काले रंगका काले रंगके साथ और लाल रंगका लालरंगके साथ जोड़ा मिला २ कर नीचे तासोंको डालती जाओ; अर्थात वेगमके साथ वेगम, बादशाहके साथ बादशाह, दैलेके साथ दैला इत्यादि।अब जितनेतास वचैं, जिस- ने तासोंको वांटा हो, उसके दहिने हाथवाली वांटनेवालेसे विना देखे एक तास बँचे, अगर जोड़ा मिलजाय तो जमीन पर डालदे और नहीं तो वह भी अपने दहिने हाथवालेसे खिचावै-चाहै जोड़ा मिलै चाहै न मिलै जहां तक होसके गुलामके निकालनेकी कोशिश करे, अंतमें जिसके पास गुलाम रह जायगा वही चोर कह लायगी। इसी खेलको गुलाम चोर खेल कहते हैं। तुरपका खेल-इसे चारजनी खेलती हैं,इसमें जो रंग कटने में आता है वही रंग माना जाता है, चाहे ईटहो, या चिड़ी हो

(१४२).
स्त्रीप्रबोधिनी।
वा पान हो या हुकम हो और वही रंग सबसे बड़ा माना
जाता है,जैसे चिड़ीकी दुग्गी काटी गई और वही रंगमाना गया
तो वह हुक्मके आफ़तोवको भी काट सकती है, जैसे पानका
खेल होरहा है और चारोंमेंसे एकके पास पानका रंग नहीं है
तो उस अवसरमें खेलनेवाली तुरप लगासकती है। सर्वोपरि
रंगको तुरप कहते हैं, इस खेलमें दो दो जनी एक २ तरफ
होकर खेलती हैं। दो २ जनीका खेल एक साथ होता है। अपने
सामने बैठी हुईको वह अपनी वाजी दिखा सकती है और
वह उसकी देख सकती है, इसी भांति खेलते २ जिसको
कम पत्ते हों उसको काटकर पत्ते दिये जाते हैं। इसी भांति
जिसकी हार होती है उसीको खिलाल होजाता है।
तासोंका खेलतो अनेक प्रकारका है परन्तु तेरे लिये यह
तीन प्रकारका खेलही उपयोगी होगा अब मैं तुझे चौसरका
खेलभी बताती हूँ।
चौसरका खेल-हे बहन ! चौसर दोरीतिसे खेली जाती
है एक तो पासोंसे दूसरी कौडियोंसे परन्तु मैं तुझे कौड़ियों के
खेलनेकी चौसरका खेल बतातीहूँ यह तेरीवहुत जलदीसमझमें
आजायगा,यह आठ कौड़ियोंकाखेल है इस चौसरको दो जने
खेलतेहैं पहले कागज पर या कपड़े तथा जमीन पर चौसरका
नक्शा इस भांति खेचले।

आमोदिनी-सदानन्दमयी।
(१४३)
stuttitute
राजा
राणी
EXAXERG
TExera
ANI
चाररंगकी सोलह नरर्दै बनवाले-रंग-हरालाल, पीला
काला होना चाहिये आठ २ नर दो दो रंगकी दोनों जनें ले
लैं; अव खेलनेकी रीति तुझे बताती हूं; दो जनोंमेंसे पहले
एक जन आठों कौडियोंको हाथमें लेकर जमीनपर डाले इसके
पीछे यह देखें कि, सात कौड़ी खिल्ल पड़ी हैं और एकपट्ट है तो
तीसका दोव होता है, और छः खिल्ल पड़ें और दो पट्ट पड़ें तो
पच्चीसका दांव होता है, और पाँचखिल्ल पड़ें तो पांचका दाँव
हुआ; चार खिल्ल पड़ें तो चारका दाँव तीन खिल्ल पड़े तो
तीनका दाँव दो खिल्ल पड़ें तो दोका दाँव होता है और जो
एक खिल्ल पड़े तो दशका दाँव होता है, और आठों कौडिय
खिल्ल पड़े तो बारहका दाँव होता है और जो सब कौड़िय

(१४४)
स्त्रीप्रबोधिनी।
पट्ट पड़े तो छका कहाताहै-विना पौआये दोनों से किसीकी
नर, नहीं चल सकतीं तीस पच्चीस और दशके, दाँवकों
ही पौ कहते हैं छः और बारहके पड़नेसे खेलनेवाला दो
वार कौड़ियें डालैगा और पौ के आने परभी दो बार कौड़िये
डालैगा अगर किसीकी एक साथही तीन पौयें आ जाय
तो वह दाँव गल जाते हैं अर्थात् उनका दाँव नहीं लिया
जाता है, फिर चौथी वारके डालनेसे जोदाँव आता है वहीं
लिया जाता है,इसकी हार जीत इस भाँति होती है कि जिसकी
आठों नरर्दै चारों ओरको घूमकर अपने दाँव पर आकर रंग
होजॉय उसीकी जीत होती है, इस खेलमें नीचे लिखे नियम
अवश्य याद रखने चाहिये।
१ जिस समय ३० १२५ या १० की पौह आवै तो पहले
देख ले कि, कौन सी नरद के चलने से दूसरेकी नरद पि-
टती है।
२ चिडों पर बैठी हुई नरद नहीं पिटती, चिड़ौं-
के अतिरिक्त दूसरे घरोंमें यदि दो नर एक रंगकी बैठी हाँ
वह भी नहीं पिटती यदि चिड़ों को छोड कर दूसरे घरों में
दो रंगकी दो नर बैठी हों तो वह दोनोंही पिटजाती
जिस समय दूसरेकी, सब नर रंग होती हों तौ पौहके पड़
जानेसे खेलनेवाला अपनी रंग हुई नरदसे उस नरदको
पीटलेगा, जो नरद अपने घरमें रंग होनेको नहीं आईहो तो
वह दूसरेकी पोहसे पिट जाती है या जो नरद पौहके आनेसे
रंग होने वाली हो तो वह भी दूसरे की पौह आनेसे पिटजा-
तीहै । इसीभांति चौसर खेलीजातीहै।
ल

आमोदिनी-सदानन्दमयी। (१४५) का खेलशतरंजका-हे वहन ! सबसे प्रथम शतरंजका न- क्शाभी कपड़े या कागज पर काढले. इसके पीछे लाल और हरे रंगके मोहरे वनवावै इस खेलकोभी दो जने खेलते हैं दो। राजा, दो मंत्री, चार हाथी, चार घोड़े, चार ऊँट और सोलह पैदल इस भांति बत्तीस मोहरे वनवावै फिर सोलह २ मोहरे एक २ जन वाँट ले, इसके पीछे दोनों जने अपने २ खानोंमें मोहरे इस भांति वैठा कि चारों कोनोंमें चार हाथी हाथियोंके पास घोडे, घोडोंके पास ऊंट, ऊंटोंके पास मंत्री, मंत्रीके पास राजाको वैठाले और उनके आगेके आठों घरोंमें आठों पैदलों- को वैठगले अब मैं तुझे प्रत्येक मोहरेकी चाल बताती हूँ, इस खेलमें सबसे पहले पैदलको चलाते हैं पैदल सीधा चलता है और अपने सामनेके दोनों कोनोंकी ओर बैठे हुए निर्बल मोह- रेको मारता है, घोड़ा ढाई घर चलता है, और उसी ढाई घरकी चालमें निर्वल मोहरेको मारता है ऊंट तिरछा चलता है और निर्वल मोहरेको मारता है, हाथी सीधा अपनी दोनों पट्टियों पर चलता है और सीधाही निर्वल मोहरेको मारता है, मंत्री हाथीकी चाल ऊंटकी चाल और पैदलकी चाल चलता है और " (१४६) खीप्रबोधिनी। निर्बल मोहरेको मारता है, राजा सीधा तिरछा अपनी इ- च्छानुसार एक घर चलता है। और सबसे पहले एक बार ढाई घर चलता है, इसकी हार जीत इस भाँति होती है कि पैदल घोड़े ऊँट मंत्री हाथी आदि यह सभी मोहरे मारे जाते परन्तु राजा नहीं मारा जाता, सभी मौहरे अपनी २ चा- लसे राजाको किस्त देते हैं। और जिस समय राजाके चलने- का मार्ग बंद होजाता है; उस समय जिसके राजाका मार्ग बंद होजाय उसीकी हार हुई अर्थात् उसी पर मात हुआ। हे बहन ! एक ओर का पैदल चलते २ दूसरेके दलमें जाकर मंत्री ऊंट हाथी घोड़ा इन चारोंके घर पर जा पहुंचे और अपने दलका वह मोहरा मारा गया हो तो वह मोहरा जीवित होजाता है। रजोदर्शन। ऋतु किसको कहतेहैं ।-हे वहन ! अब मैं तुझे यह भी वताती हूँ कि, यह किस समय और किस प्रकारसे होतीहै, स्त्रियोंके लिये इसका जानना भी अवश्यकर्त्तव्य है। ऋतु कुछ नहीं है केवल गर्भ धारण करनेके समय दिखा- निका चिह्नमात्र है, जिस समय स्त्रिये पूर्ण यौवनवती होती जिस समय उनके सब अंग प्रत्यंग पूर्णताको प्राप्त हो जातेहैं, तो उनको स्वभावसेही नूतन मनुष्यको जन्म देनेकी सामर्थ्य होजातीहै ? संसारका नियमही इस प्रकार है ईश्वरके * स्त्रियोंके उदर में महीने २ पर एक डिम्बकोश रहताहै, डिम्बकोशस्थ चर्म- स्थलीके रक्तसे प्रतिमासमें अंडेके समान छोटा पदार्थ उत्पन्न होता है । क्रमानुसार एकमास पूर्ण होनेपर यह अंडा फट जाताहै । तिससमय रक्त निकलता है; और क्रमसे- आमोदिनी-सदानन्दमयी। (१४७) PORA # राज्यकी प्रथाही यहहै तुम यत्न करो अथवा न करो,पेड़ होगा, फूल होगा फल होगा फिर सूख जायगा।इसीप्रकार तुम संतानकी चाहना करो यान करो तुम्हारे संतान होनेकी सामर्थ्य आपही होगी, अन्य २ प्राणियोंमें संतान उत्पन्न करनेका एक नियत समय है इस समय उनकी कामेच्छा अत्यन्त प्रवल हो जाती है। मनुष्योंका यह नियम नहीं है, महीनेरपर ही स्त्रिये संतान उत्पन्न करनेको उपयुक्त होती हैं, इसीको ऋतु होना अर्थात न्हानी होना, या कपड़ोंसे होना, या रजस्वला होना भी कहते इससमय सहवास करनेसे संतानका होना अति संभव है। अस्तुका समय-कोई निर्दिष्ट नहींहै। जिस समय यौवन पूर्ण होताहै उसी समय ऋतु आरंभ होतीहै; परन्तु किसी २ स्त्रीको आगे पीछेभी होतीहै, यह स्वाभाविक नहीं है । जो स्त्रियें नगरमें रहतीहैं, जो सदा नाटक उपन्यासोंको पढ़ा करती: हैं, जो थोडी अवस्थामें संगदोपवशसे इन्द्रियोंको उत्तेजित करना सीखतीहैं उनको ऋतु आगेही आरंभ हो जातीहै। फिर हे वहन ! सभी देशोंमें स्त्रियें एक अवस्था पर रज- स्वला नहीं होती जिस देश में अधिक सरदी पड़ती है, वहां अधिक अवस्थामें होती हैं, और जिस देशमें अधिक गरमी पड़ती है वहां थोडी अवस्थामें रजस्वला होती हैं "लैपलैन्ड" और नारवे आदि देशोंमें अत्यन्त शरदीके कारण कन्यायें। -ही यह छोटे अंडे गर्भस्थलीके पार्श्वमें नाभिसे जा मिलते , रक्तादिमूत्रमार्गद्वारा बाहर निकल आताहै,इसप्रकार किसीके दो तीन दिन और किसीके पांच सात दिनतक निकलताहै । इसकोही लोग ऋतु कहतेहैं । प्रायः अंडा गर्भस्थलीके बगलमें जाकर रहता है फिर इसके संग पुरुषका वीर्य मिलनेसे मनुष्यका जन्म होता है ।

(१५८) खीप्रबोधिनी। १९ वर्षकी अवस्था में मासिक धर्मसे होतीहैं। और इंग्लै- ण्डमें इसकी अपेक्षा कम शीतहै इस लिये वहां १९१६वर्षकी अवस्थामें ऋतुमती होतीहैं। अमरीकामें १४, १५ वर्षकी अ- अवस्थामें ही कन्यायें मासिक धर्मसे होने लगतीहैं; और ह- मारे भारत वर्ष में अधिक गरमीके कारण साधारण १२ वर्ष- की अवस्थामें ही कन्यायें मासिकधर्मसे होने लगतीहैं, त- थापि किसी २ स्थानोंमें १०,११ वर्षकी अवस्थामेंभी ऋतु- मती होजाती हैं। हे वहन ! कोई २ ऐसाभी कहते हैं, जवसे ऋतु प्रारंभ हो- तीहै उससमयसे लेकर ३० वर्ष तक ऋतु रहती है। और कोई ऐसाभी कहते हैं कि, पचास वर्पतक रहती है जिन स्त्रियोंको ऋतु एक साथ बंद हो जातीहै वह बहुत दुःख भोगती हैं ऐसी अवस्थामें स्त्रियोंके कलेजेपर ज्वाला प- इतीहै नेत्रोंसे धुंधलदिखाई देता है, चित्त चंचल रहताहै, कि- सी काममें उनका मन नहीं लगता विचारी बहुतसे कष्ट पा- ती रहती हैं, और अपना रोग लाजके मारे किसीसे नहीं कहतीं उन स्त्रियोंको उचित है कि, उस समयमें वह किसी सुयोग्य वैद्यका इलाज करावे लाज करके अपने स्वास्थ्यको न विगाड़ बैठे इस रोगके छिपानेसे स्त्रियोंको बहुतसी हानि उठानी पड़ती हैं। जव यौवन प्रारंभ होता है उससमय ऋतुका होना स्वाभा- विक है; और जो स्त्रिये इससे पहले ऋतुमती होती हैं तो उनका स्वास्थ्य ठीक नहीं हे वहन! ऐसी अवस्थामें ऋतु होनेसे उनका स्वास्थ्य भंग हो जाता है। ऐसी स्त्रीमें जो संतान उत्पन्न होती आमोदिनी-सदानन्दमयी। (१४९) है वह दुर्बल और रोगी रहती है और उसकी उमरभी कम होतीहै, स्त्रियोंको नगरमें रहना; उत्तम भोजन खाना, मांसा- दिका अधिक भोजन करना, सुराआदिका पान, सर्वदा मधुर संभाषण, उपन्यास नाटकादिका पढ़ना, संगदोषके वशसे थोड़ी अवस्थामेंही इन्द्रियोंको उत्तेजित करना, इत्यादि अनेक दोपोंसे असमयमें वे रजस्वला हो जाती हैं * यौवनके लक्षण-जिस समय स्त्रियोंके तलपटकी अंत्री सव पूर्ण हो जाती हैं चोली विस्तारित, दोनों स्तन ऊंचे और गोल हो जातेहें उस समय गर्भस्थलीभी योनिके साथ मिल- जाती है, छाती, गला, हाथ यह सभी पूर्णताको प्राप्त हो जाते हैं, सम्पूर्ण शरीर गोल और सुडौल हो जाताहै, केशः अधिकतासे उत्पन्न होतेहैं, स्वर मीठा और गंभीर होताहै, मन सर्वदा प्रफुल्ल रहता है; चाल चलनेमें मंद हो जातीहै, और प्रत्येक विषयमें संकोच, तथा लज्जाशीलता दिखाई देती है । जो स्त्री पूर्ण यौवनवती हुई है उसमें यह सव लक्षण दृष्टि आवेंगे। इसकारण हे वहन ! जिससे विना समयमें स्त्रियें रजस्वला न हो इसविपयमें सभी स्त्रियोंको सावधान होना उचित है। यह तो ठीकही नहीं कि, स्त्रिये पूरे महीनेपरही ऋतुमती होती हों,कारण कि कोई २ स्त्री पंद्रह दिनके भीतरही न्हान्ही हो जाती हैं, और कोई एक महीने के भीतर होतीहैं, और * कोई २ ऐसाभी कहते हैं, कि जिन स्त्रियोंका छोटी अवस्था में विवाह हो जाता है उनकोभी कम अवस्थामें ऋतु होने लगतीहै ।

स्त्रीप्रबोधिनी। कोई २ दो महीनेपर ऋतुमती होती हैं जो स्त्रिये ठीक २८।२९दिनमें कपड़ोंसे होती हैं। वह निरोग . रहती हैं वही समय ऋतुकालका ठीक समय है ऋतुरक्षा-हे बहन ! जब स्त्रिये न्हानी हों तो पहले दिन उनको बड़ी सावधानीसे रहना चाहिये, इस बात- काभी अवश्य ध्यान रखना चाहिये कि, हमारे कपड़ोंमें कहीं रुधिरका दाग न लगजाय, इस कारण उससमय हरेक स्त्रीको कौपीन बांधनी चाहिये, कौपीनके बीचमें पांच सात तह लगा- कर थोड़ासा कपड़ाभी रखना उचित है। इस कपड़ेको दो तीन बार बदलना चाहिये उससमय एक जगह साफस्थानमें बैठी रहै। पुष्टिकारक भोजन करै, मूली, गाजर, दही, दूध और मांसादि पदार्थोंको न खावे, कारण कि, मांसादिक खानेसे कामेच्छा बलवती होती है, तो उससमय अधिक रुधिर निकलता है, इसके अतिरिक्त फिर नलोंमें दर्द हो जाता है, ठंढ़े जलका अधिक सेवन न करै ठंढी हवा शरीरको न लगने दे, और वर्षाकी हवा भी शरीरको न लगने दे और आंधी आजानेपरभी उस हवामें स्त्रियोंको बैठना उचित नहीं। सदा शरीरपर कपड़ा पहरे रहै । दिनमें न सोवे,रातको न जागै, धूपमें या शरदीमें न फिरै, कुछ परिश्रम न करे, तेल न लगावै और उस समय स्नान करनाभी उचित नहीं, बहुधा स्त्रिये पहले दिनही स्नान करलेती हैं, और कहतीहैं कि, हम शुद्ध हो गई। सो उन्हें ऐसा कभी नहीं करना चाहिये । जिससे बुखार या शरदी न हो जाय,इसविषयमें स्त्रियोंको सर्वदा सावधान रहना चाहिये कारण कि इन दिनों में स्त्रियोंको आमोदिनी-सदानन्दमयी। कोई रोग हो जाय तो वह रोग दूर होना पड़ा कठिन हो जाताहै। स्त्री चौथेदिन स्नान करें और साफ कपड़ोंको पहर एकमनसे प्रथम परमेश्वरकी आराधना करे फिर हे वहन! इसके पीछे अपने पतिका दर्शनकर उसकी सेवा करै, और रात्रि में [जो पूर्णमासी, मावस, संक्रान्ति-यह न हों तो] उत्तम भोजन करनेके उपरान्त सोनेके समय पवित्र और प्रफुल्ल- मनसे पतिके साथ संसर्ग करै, यदि जवतक स्त्रीको रुधिर निकलना बंद न हुआहो तो उसदिन तक पतिसंसर्ग न करे, कारण कि, पतिका वीर्य रुधिरके साथ निकल जायगा, फिर गर्भ रहने की संभावना न होगी। हे वहन ! स्त्रियोंको इसीलिये अपने ऋतुकालमें बहुत सावधान रहना उचित है। ऋतुमें आचार-हे वहन । स्त्रीको उचित है कि कपड़ोंसे होनेपर तीन दिन ब्रह्मचर्य व्रतसे रहै, जो स्त्री दिनमें सोती है उसका वालक निद्रालु और आलसी होता है, जो स्त्री इन दिनोंमें आँखोंमें काजल लगाती है, उसका वालक अंधा होता है, जोरोती है, उसका वालक विकार युक्त दृष्टिवाला होता जो स्नान करती है और जो चंदनादि लगाती है, उसका वालक दुःखी होता है, और जो उवटनलगाती औरतेल मलती है उसका वालक कोढ़ी होता है, और जो नख काटती है उसका वालक नखरोगी होता है, जो बहुत दौड़ती है उसका वालक चंचल होता है, और जो स्त्री बहुत हँसती है उसके वालकके काले दांत होते हैं। और मोटे होठ तथा बहुत वक- वादी होता है, और जो स्त्री भयंकर शब्दोंको सुनती " , है

(१५२)
स्त्रीप्रबोधिनी।
उसका बालक बहरा होता है। जो स्त्री बहुत हवा सेवन
करती है उसका वालक उन्मत्त होता है। हे बहन ! इसलिये
स्त्रियोंको उचित है कि वे इन तीन दिनोंमें इन कामोंको न करें।
रजस्वलाको कर्तव्यकर्म-हे वहन ! स्त्रीको उचित है।
कि जिस दिन कपड़ोंसे हो तो उस समयसे तीन दिनतक हो
सकैतो कुशकी शय्यापर शयन कर और नहीं तो चटाई
परही शयन करे, फूलके या पीतलके बरतनमें भोजन न करे,
पत्तलपर भोजन करै, घृत शाल्योदन अकवा खीरको खाय,
और किसीको स्पर्शभी न करे, तीन दिनतक पतिका दर्शनभी
न करे, चौथेदिन स्नान करनेके पीछे शुद्धहो सुन्दर २ वस्त्रों
को पहन कर पतिका दर्शन करै उसका कारण यह है कि, जब
स्त्री ऋतुस्नान करचुकै तो चौथेदिन स्त्री जैसे पुरुषको देखती
है, उसकी वैसीही संतान उत्पन्न होती है। इससे उचित है कि
स्त्री प्रथम पतिकाही दर्शन करै।
सहवास।
हे वहन ! अब मैं तुझे सहवास करनेकी रीति बताती हूं कि,
किस तरहसे सहवास करना चाहिये, कारण कि सहवासही एक
सृष्टिका मुख्य उद्देश्य है, ईश्वरकी सृष्टिही इस सहवासके द्वारा
चलती है।
सहवासका सुखदुःख-मनुष्यके जीवनका सुखदुःख
सभी सहवासके ऊपर निर्भर है; कुसमयमें सहवास करनेसेही
संतान गूंगी-कानी-लँगड़ी-रोगी-दरिद्री-मूर्ख-क्रोधी-उन्मत्त
होती है। सहवासके ठीक समयमें सहवास करनेसे संतानमें
उपरोक्त दोष नहीं होते, और संतान उत्तम होतीहै ।

आमोदिनी-सदानन्दमयी। (१५३) Foad सहवासका समय-रात्रिकालही सहवासका ठीक स- मय है। रात्रिमें समस्त वायुमंडलीसे एकप्रकारकी भाफनिक- लती है, सहवासके लिये जिस वलकी आवश्यकता होतीहै, यह माफ उसी वलकी देनेवाली होती है। दिनमें यह माफ नहीं निकलती; इस कारण दिनमें सह- वास कभी नहीं करना चाहिये कारण कि, दिनमें सहवास करनेसे बलका नाश होजाता है और वलकी हानि होतेही अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं। सहवासके समय इस वातका भी अवश्य ध्यान रक्खै कि, स्त्रीका रज और पुरुपका वीर्य शुद्ध हो जव स्त्रीपुरुपका वीर्यही दूपित होगा तो संतान उत्पन्न करनेकी आशाही वृथाहै। गठीला दुर्गन्धयुक्त पीपकी तरह क्षीण और मलमूत्रके गंध समानदुर्गंधीवाला पुरुषकावीर्य अशुद्ध समझना चाहिये। जो स्त्रीका रक्त दूपित हो तो वहभी पुरुपके वीर्यकी तरह वात, पित्त और कफादि दोपोंके योगसे उन २ दोपोंके रंग तथा गंधवाला होजाता है। स्फटिककी तरह सफेद लसलसा, मधुर और सहतके गंधके समान पुरुपका वीर्य शुद्ध तथा खरगोशके खूनके और लाखके रंगके समान स्त्रीका रज शुद्ध समझना चाहिये, अति संयोगके कारण पुरुषका वीर्य और इसी तरह स्त्रीका रज गिरने लगताहै, यह एक प्रकारका रोग यदि जो पुरुपत्रीका वीर्य रज दूषित हो तोउस समय किसी सुयोग्य वैद्यका इलाज करना चाहिये। इसके पीछे शुद्ध वीर्य होने पर सहवास करै। रात्रिके समय भोजनके दो तीन घंटे पीछे शरीर जिस प्रकार विश्राममें और स्वस्थ अवस्थामें रहता

(१५४)
स्त्रीप्रबोधिनी।
है, ऐसा और किसी अवस्थामें नहीं रहता, इस लिये सहवास
करनेके लिये यही समय ठीक है, सहवासके दोपसे ही संतान
रोगी कुरूपा होती है, इसी कारण सहवास करनेके समय
विशेष सावधानी रखनी उचित है।
हे बहन ! रजोदर्शनके उपरान्त चौथेदिन शुद्ध स्नान करके
सफेद फूलोंकी माला और उत्तम २ वस्त्रोंको धारण करे हुए
पवित्र हो पतिके समान पुत्रकी इच्छा करनेवाली प्रथम
अपने पतिको देखें । हे वहन ! बारह रात्रियोंतक ऋतुकाल
रहता है, इसके पीछे योनि संकुचित होजाती है और वह वीर्य
को ग्रहण नहीं करती, इस लिये उन बारह रात्रियोंमें ऋतुकाल
कहा है, उनमें पहली दूसरी तीसरी यह तीन रात्रि निंदित हैं,
और ग्यारहवीं रात भी निंदित है, और युग्म अर्थात् पूरी
रात्रियों में गर्भ स्थित रहनेसे पुत्र उत्पन्न होताहै, और अयुग्म
रात्रियोंमें गर्भ रहनेसे कन्या होती है। स्त्री पुरुषका संयोग
निष्फल नहीं होता, पुत्र तथा कन्या अवश्य ही उत्पन्न होती है।
हे वहन ! बड़े २ ऋषि मुनियोंने भी सहवास करनेको
एकांतमें कहा है ज्योतिषशास्त्रके अनुसार उत्तम तिथिमें पुरुष
और स्त्री हलुआ पूरी खीरआदि इनका भोजनकरैः और फिर
परमेश्वरको स्मरण कर संतानकी इच्छासे मनुष्य अपना पहले
दहिना पैर शय्या पर रक्खै और फिर स्त्रीभी अपना वाया
पैर शय्यापर रखकर शय्यापर विराजमान हो।
परन्तु स्त्री पुरुषकी दाहिनी ओरसे होकर चढ़े, इसके
पीछे नीचे लिखे हुए मंत्रको पढ़े।
अहिरसि आयुरसि सर्वतः प्रतिष्ठासि धाता त्वाम् ।।

आमोदिनी-सदानन्दमयी।
.
(१५५)
दधातु विधाता त्वां दधातु ब्रह्मवर्चसा भवेति ॥
ब्रह्मा वृहस्पतिर्विष्णुः सोमः सूर्यस्तथाश्विनौ ॥
भगोऽथ मित्रावरुणो वीरं ददतु मे सुतम् ॥
शेपभी तुम्ही हो, आयुभी तुम्ही हो, सव ओरसे प्रतिष्ठा भी
तुम्ही हो,धाता तुम्हें धारण करै,विधाता तुम्हें धारण कर आप
ब्रह्मके तेजसे संयुक्त हो, ब्रह्मा, बृहस्पति, विष्णु, चंद्रमा, सूर्य,
अश्विनीकुमार, भग, मित्र, वरुण यह सब मुझे वीर्यरूप
पुत्रको दें।
इसके उपरान्त प्रिय वचन आदिका परस्पर आदिमें संभाषण
कर आनंदसहित सहवास करैः उस स्थानपर सीधी शयन
करनेवाली मनको लगानेवाली वह नारी सुन्दर स्थित हुए
अंगोंकरके स्थित रहै । और जिस प्रकार अपने २ स्थानोंमें
स्थित कुए दोपों करके वह स्त्री वीर्यको ग्रहण करती है वैसेही
स्थितरहै , और जव योनिमें वीर्यका संग्रह होता है तव
तत्काल गर्भ रह जाता है। उस समय स्त्रीके लक्षण तुरन्त
पलट जाते हैं वह भी मैं तुझे अगाड़ी बताती हूँ
Ent

(१५६) खीप्रबोधिनी। पंचमसोपान। गर्भिणी। - हे वहन ! सहवास तो मैं तुझे वताचुकी अव मैं तुझे गर्भ- वतीके लक्षणभी बताती हूं, गर्भवती स्त्रीकी यह पहचान है- कि, जिसदिन सहवास करनेसे गर्भरहा हो उसीदिनसे उसको ग्लानि, तृषा, होठोंपर खुशकी, पेडूमें दर्द और प्रसवस्थानमें फुर्ती हो जातीहै । ऋतु होना उसी दिनसे बंद हो जाताहै; जी मिचलाता रहता है, वमन होती है, गर्भ रहनेके दशपंद्रह दिन पीछे स्त्रीके स्तनोंका अग्रभाग काला हो जाताहै, आंखों के पलक चिपकने लगते हैं, शरीर पर रुयें खड़े हो जातेहैं, मुँहसे पानी बहता रहता है। शरीर पर आलस्य छाया रहताहै तरह २ की वस्तुओंके खानेको मन चलता है, खट्टे मीठेको बहुत मन करताहै, भोजन करतेही वमन हो जाती है, सोतेसे उठतेही निराहार मुंह वमन होती है सुगंधित पदार्थों में एक प्रका- रकी दुर्गन्ध आने लगती है, सारे शरीरपर. आलस्य रहता है, दो एक दिनके लिये ज्वरभी आजाताहै। यही गर्भवतीके लक्षण हैं। हे वहन ! माताके गर्भ में वालक किस रीतिसे वनकर कैसे बढ़ताहै, और उसको वहां भोजन किस प्रकारसे मिलता है वह मैं तुझे बताती हूं, तू मेरी इन बातोंको गांठ बांध लेना, यह तेरे बड़े काम आवेगी। स्त्रीके गर्भस्थलीके बीचमें एक थैली है; यह मैं पहलेही गाभणी। (१५७). . तुझे रजोदर्शनमें पीछे वता आईहूं कि, जिस रीतिसे जीवका जन्म होता है। गर्भ में बालककी अवस्था हे वहन ! दैवप्रेरित अप- ने पूर्वजन्मोंके प्रभावसे देहप्राप्तिके निमित्त यह जीव पुरुषके वीर्यकणके आश्रय होकर स्त्रीके उदरमें प्रवेश करता है। एक रातमें तो शुक्रशोणित मिलता है,पांचरातमें बुबुदासा होता है, दशदिनमें वेरके समान हो जाताहै फिर मांसके पिंडके समान हो जाताहै, एकमहीनेमें वालकका शिरबनता है दूसरे महीनेमें वाहु, चरण आदि अंगके आकार वनजाते हैं, तीसरे महीने में अनख, रोम, हाड, चाम सव इन्द्रियोंके छिद्र बन जाते हैं, चौथे महीनेमें सातौ धातु प्रगट होती हैं, पांचवें महीनेमें श्रृंख प्यास उत्पन्न होती है, छठे महीनेमें जेरमें लिपटाहुआ माताकी दाहिनी कोखमें घूमा करताहै, माता जो भोजन करती है उसी अन्नादिकसे इसकी.धातु वढ़ती हैं और वह जीव जीवोंकी खानि ऐसे २ विष्टा और मूत्रके गर्तसे गड्ढेमें दिनरात पड़ा रहता है, मार्कंडेयपुराणामें लिखाहै कि "स्त्रीकी नाभिमें एक वालककी वृद्धि करनेवाली आप्यायनी नाड़ी बंधी है, उसीके द्वारा स्त्रियोंके खाये पिये पदार्थके रसका अंश उसगर्भ स्थित वालकको पहुँचता है और उसको वह वालक पीपीकर दिन २ वढ़ता है" सुकुमारतासे गर्भके कीड़े जोः क्षणमें उसे काटते हैं, उस कठिन पीड़ासे वह जीव अत्यन्त व्याकुल हो मूच्छित होजाता है,वह कीड़े भूखसे व्याकुल होकर जीवको सताते हैं, और कीड़ोंके काटे हुए घावोंपर जो माताके खाये कटु, तीक्ष्ण, उष्ण, (गरम ) लवण रूखा, अम्लादि अनेक (१५८) स्त्रीप्रबोधिनी। भाँतिकी वस्तुओंके लगनेसे उस जीवके शरीरमें अत्यन्त पीड़ा होती है, उदरके भीतर जरायुसे बँधा और बाहर माताकी आँतोंसे बंधा; नीचे योनिकी ओरको शिर किये। धनुषके समान टेढ़ी पीठ झुकाये मलमूत्रमें पड़ा रहता है। हाथ पैर तकभी नहीं चला सकता। यह माताका उदर नहीं है; वरन् जेलखाना है, अपने तनुकी चेष्टा करनेमें इस वाल- ककी कुछ सामर्थ नहीं रहती। जैसे पीजरमें पक्षी अपना मनोर्थ सिद्ध नहीं कर सकता, उसी प्रकार यह प्राणी फँसा रहता है वहाँ इस प्राणीको पिछले सौ जन्मके कौकी याद आती है; उस समय दीर्घ श्वास लेकर पश्चात्ताप करता है और इस बालककोवहाँ सुख तौ नाम मात्रको भी नहीं मिलता। गर्भके समान दुःख कहीं नहीं है हे वहन ! सातवें महीने में इसे अधिक वाधा होती है, यह एक जगह स्थिर नहीं रह सकता, प्रसूतिकी वायुसे सदा काँपता रहता है। और विष्ठेके कीड़ोंको अपना सम्बन्धी समझता है । उस समय दुःखी होवह जीव वारम्बार परम उदास हो गर्भवासकी त्रास देख सात धातु- से बँधाहुआ हाथ जोड़ व्याकुल वाणीसे उस परमात्माकी स्तुति करताहे कि, जिसने इसको इस बंदीगृहमें डाला है। स्तुति गीतका छंद। तेहि कृष्णके चरणारविन्दहि मैं शरण अव होत हूं। जो दास हित बहुरूप धारत मैं परो दुःख सोतहूं ॥ माया विवश में कर्म बंधन बँधो गर्भहिमें परो। अविकार शुद्ध अंखडवोध सुरारि मेरा दुख हरो॥ मैं हौं असंगहिये वृथाही बँधो भूतहि पंचमें।

rasi
गर्भिणी।
(१५९)
కు ముందుకు వీలు కుదురుకు కుకు
इन्द्रिय विपय आसक्त हौं मैं बढ़ो मायामंचमें।
दुख रूप यह संसारमें जेहि विवश जीव सिधावतो।
नहिं कटत जाकी कृपा विन तेहि नाथको गुहरावतो॥
यह ज्ञान दायक नाथ सोइ जो सकल जग व्यापत रहै
सम तिनहि ज्ञान विनाश हित अव नाथ सोइ दाया गहै ।।
मल मूत्र शोणित कूपमें जननी जठर वड़वानलै ।
तनुदशन मासन को गनत उद्धार करि हौ कव भलै ।
दशमास वालक मोहिं जो यह ज्ञानदिय सुखगाथ है।
जो करत निरहेतुक कृपा सो सत्य दीनानाथहै ।
प्रभुको न निरखत पशुखगादिक निज सुखे दुःख भोगते
मैं तो लखौं तुमको सकल थल आप ज्ञान सँयोगते॥
पै मैं न इतते कढन चाहत यदपि कठिन कलेश है।
निकसे असे तुव प्रवल माया यह विशेष अशेप है।
यह गर्भहीमें भक्ति कर संसार सागर तरहुँगे।
तुव कृपासे वैकुंठ वश नहिं विश्व व्यालहि डरहुँगे ॥
हे वहन ! इस रीतिसे माताके गर्भमें आया हुआ बालक नौ
महीने गिन २ कर व्यतीत करता है, । अब मैं तुझे गर्भकी
अवस्था और गर्भकी रक्षा भी बताती हूँ।
गर्भावस्था और गर्भरक्षा।
जिस समय स्त्री गर्भवती होती है हे वहन ! उस समय उसकी
सुन्दरता बढ़ती जाती है, और कोई २ स्त्री अत्यन्त दुर्वल
होकर वृद्धके समान होजाती हैं, नेत्रोंमें झाई पड़ जाती हैं।
नेत्र नीले वर्णके होजाते हैं, उस समय कोई स्त्री तो अधिक

(१६०) स्त्रीप्रबोधिनी। चपलता धारण करती है, और कोई २ धीर और गंभीरता को ग्रहण करती है। गर्भवती स्त्रीको उचित है कि, वह अपने भोजन और व्यव- हारके सम्बन्धमें बड़ी सावधान रहै । इस समय उनकी रक्षाके ऊपर और एक जीवकी रक्षाका भार है। जो स्त्रियें ऐसी अव- स्थामें असावधान हो अपना यत्न सहित पालन नहीं करती उनके गर्भ मेंका वालक, रोगी, अंगहीन, बुद्धिहीन, होते हैं और फिर वह गर्भमेंही मरजाते हैं। गर्भगिरनेकी संख्या कुछ कम नहीं है। गर्भवती स्त्रीकी असावधानीसेही गर्भपात होता है। हे बहन! यदि सुगठित-बलवान् और बुद्धिमान सन्तानको उत्पन्न करनेकी इच्छाहो, तो तुम्हारे गर्भमेंका वालक जिसप्र- कारसे भलीभाँति निर्विघ्नतासे वलप्राप्त कर सके, वही काम करना उचित है; गर्भवती स्त्रीकाशरीर एक साथही बदल जाता है, इस कारण पहले नियम भी साथही साथ बदल जाते हैं, उस समय समयके अनुसार उचित कामके विना किये उनकी संतान दुर्बल, अंगहीन, बुद्धिहीन, गूंगी,वहरी, अंधी होजाती है, यह माताही का दोष है, गर्भवतीस्त्रियोंको गर्भावस्थामें सावधानी से रहनाचाहिये गर्भवती स्त्रीको कम भोजन करना उचित नहीं, वरन् खूब पेट भरकै खाना चाहिये। वह वासी तिवासी, सड़ी बुसी चीज कभी न खाय और पुष्टिकारक भोजन करना कर्तव्य है; दिनरातमें जै वार भोजन करनेका अभ्यास हो, उससे अधिक वार भी खालो तो कुछ हर्ज नहीं है। और जिस पदार्थके खानेमें रुचि न हो उसे कभी खाना उचित

गर्भिणी।
(१६१)
नहीं जो रुचै उसीको खाना चाहिये, परन्तु इतना अवश्य
ध्यान रहै कि, जो वस्तु इस समय दुःखदायी हो उसे न खावे
पके हुए फलके खानेमें कुछ दोष नहीं है। अधिक खटाई भी न
खायः छै महीनेके पीछे भोजनकी मात्राको कुछ बढ़ादे,
उस समय दूध, मोहनभोग इत्यादि हलके पदार्थोंका भोजन
करै, धोती या लेंहगा कस कर न बाँधै जिससे पेटको पीड़ा
नहो, शरदीके दिनों में गरम कपड़ा पहरे रहै और नंगे पैरोंसे
शरदीमें न फिरै । ऐसी अवस्था में स्त्रियोंको काया कष्ट अवश्य
करना चाहिये । इस समय योंही चारपाई पर बैठी हुई
नौकर चाकरोंसे काम न लेती रहै, सर्वदा अपने घरके काम
काजको आप करती रहै, तो वह बड़ी जल्दी और सुखसहित
संतान उत्पन्न कर सकेंगी, परन्तु ऐसा काम न करै जिससे
अधिक परिश्रम पड़े और शरीरको केश हो । जो घरके काम
काज न करै तौ हे वहन ! इतना तो वह अवश्य करै कि, दो
तीन घंटे घरमें टहल लिया करै, गर्भावस्थामें भारी बोझ न
उठावे, जैसे बहुतसी स्त्रिये भारी २ पलंग तथा नाजके भरे
हुए मटके, पानीके भरे घड़े आदि उठा लेती हैं, इससे उनकी
गर्भकी संतानको अपना जीवन दे देना होता है। गर्भवती स्त्री
को गाड़ी पालकी घोडागाड़ी इत्यादि सवारीमें वैठना उचि-
त नहीं, और दो तीन महीने तक बाहर जानेसे गर्भके गिर
जानेका भय है, गर्भवती स्त्रीको घरसे बाहर जाना उचित नहीं
इन नियमोंकी गर्भवती स्त्रीको अवश्य पालना उचित है।
जिस घरमें हवा भलीभाँतिसे जा सकै ऐसे घरमें स्वच्छ
शय्या पर शयन करनाउचित है ८-९ घंटे तकबरावर शयन

(१६२) श्रीप्रबोधिनी। करे इससमय सुखसहित नींदआनेकी अत्यन्त आवश्यकताहै। वहुधा आठमास पूर्ण होने पर गर्भवती स्त्रीको नींद नहीं आती, दिनमें भी दो तीन घंटेको सो रहना चाहिये ।अति गर्म या अत्यन्त ठंढी शय्यापर भी शयन न करे। शारीरिक स्वस्थताकी अपेक्षा मानसिक शांतिका अधिक प्रयोजन है प्रथमही गर्भवती स्त्रीके मनमें वड़ा भय होताहै । और वह अपनी अवस्थाको देखकर व्याकुल होजातीहै; यह गर्भिणी स्त्रीको सन्तानके लिये अत्यन्त अनिष्टदायकहै । इस कारण भय कभी न करे, गर्भकी पीड़ा नहीं है, यह सभी खियोंको होतीहै, ऐसीअवस्थामें जो स्त्रिये भय करतीहैं उनका गर्भ गिरजाताहै। ऐसी अवस्थामें अधिक मानसिक परिश्रमभी करना उचित नहीं, जिससे मन सर्वदा संतुष्ट रहै शांत रहै ऐसी उत्तम और श्रेष्ठ चिन्ता करना कर्तव्यहै; स्त्रीकी वह मानसिक चिन्ता गर्भके बच्चेपर अपना असर करती है। बुद्धिमान् अथवा निर्वोध, क्रूर अथवा सरल; धार्मिक या नास्तिक संतानका उत्पन्न करना माताकेही ऊपरनिर्भरहै । गर्भवती स्त्रीका खाया हुआ भोजन जिस रीतिसे वालकको पुष्ट करताहै, उसी रीतिसे उसकी चिन्ताआदि करनेसे वालकपर असर पड़ताहै; इस कारण मनको सर्वदा ऊंचा रखना चाहिये। धर्मकी चिन्ता करै, सभी मनुष्योंके साथ नम्रता और सरलतासे व्यवहार करे, दीन दरिद्रीके दुःखसे दुःखिनी होकर उसके दुःखको दूर करे, तो धार्मिक और बुद्धिमान संतान होगी वडे २ वीरोंके जीवन चरित्रको गर्भवती स्त्री पढे, उनकी वीरता, धीरता और गर्भिणी। (१६३) kath साहसको पढ़कर हृदयमें भक्ति उत्पन्न होगी, तो तुम्हारेभी श्रेष्ठ संतान होगी-हे वहन ! कुंतीने अपने पुत्रोंसे इस प्रकार कहला भेजाथा कि "हे केशव ! तुम भीम और अर्जुनसे जाकर कहना कि, क्षत्रीकन्याने जिसलिये गर्भ धारण किया है, उसका समय अब आगया-इसकारण जो तुम युद्ध नहीं करोगे. तौ यह कार्य वडा घृणित होगा।" सिंहनीका पुत्र सिंहही होता है । इस समय उपन्यासादिको कभी न पढे और कोई बुरी चिन्ता मनमें न करै । जिसके देखनेसे या जिसका विचार करनेसे मनमें भय, घृणा, क्रोध, ग्लानि, शोक इत्यादि उदयहों उसको कभी न देखें और न उसका विचारही करे। माताके मानसिक भावके ऊपरही संतानकी सुन्दरताका भी भार निर्भरहै वह तो मैं तुझे पीछे बताआई है, गर्भवती स्त्रीको भयानक पदार्थभी देखना उचित नहीं, और गर्भाव- स्थामें मुरदेको भी न देखे कोई दुर्गन्धियुक्त पदार्थकी गंध नले और अधिक सुगंधित चीजोंको भी न सूंघे जिससे शरीर स्वस्थ रहै तथा जिससे मन प्रफुल्ल रहैं वही काम करना ठीकहै। संसारमें सुख दुःख निर्विघ्नतासे नहीं भोगे जा सकते। संसारमें सुख दुःख सभी भोगने पडतेहैं। जिसमें अधिक सुख मिलताहै,उसके लिये बड़ा दुःख उठाना पडताहै।संसारी सुखोंके बीचमें संतानका होना एक प्रधान सुखहै । और यह सभी जातियों में देखाजाताहै। परन्तु इसमें प्रारंभसे अबतक कितना केश और कष्ट उठाना पडताहै उस वातको हे वहनाजननीही जानती होंगी, मैंने गर्भ गिरजानेके बहुतसे कारण तुझे वताये (१६४) स्त्रीप्रबोधिनी। tatut हैं,और उसके निवारण करनेके उपायभी वतायेहैं,परन्तु अधूरा जाना उन सबकी अपेक्षा भारीहै।गर्भके गिरजानेसे गर्भवती स्त्री को बड़ा कष्ट उठाना पड़ताहै वरन प्राणोंके जानेमेंभी संदेह नहीं रहता, परन्तु इसमें सबसे बुरी बात यह है कि, जिस स्त्रीको एकवार कच्चा गर्भ जाता रहा फिर उसे टेव पड़जातीहै वर्ष दिन दसियों जीव उदर में आकर अपने जीवनकी यात्राको शेष कर जातेहैं, पूरा वालक होना वड़ा कठिन पड़ जाताहे गर्भ तीसरेमहीने अधिकतर गिरजाताहै, और छठे मासमें भी बहुधा गिर जाता है। जिस स्त्रीका गर्भ जिस महीने में गिरा है उसका दूसरीवार भी ठीक उसी समयमें गिर जायगा। बा- लक और वृद्ध स्त्रियोंके गर्भ गिरजानेकी अधिक शंका रहती है। स्त्रियोंकी पूर्ण युवावस्था होजानेपर यह विपत्ति बहुत कम पड़तीहै । गर्भवती स्त्रीको जुलाब आदि कोई औपधी नहीं देनी चाहिये, गर्भवती स्त्री दौड़ कर न चलै,चौपटेमें न सोवे । गर्भावस्थामें अपने गोदीके बालकको स्त्रियें दूध न पिला जो ऐसी अवस्थामें वालकको दूध पिलाती रहती हैं उनका गर्भ भी गिरजाताहै। इसके अतिरिक्त, परिश्रम अधिक क्वांति भारी बोझाका उठाना, क्रोध, दौड़कर चलना, अधिक आनंद, भय,गाड़ीआदिमें दूर जाना,जुलाव देकर आधिक दस्त कराना, तथा अधिक दुर्वलता इत्यादि गर्भ गिरजानेके कारण हैं। गर्भवती स्त्रीको इन सब बातोंपर ध्यान रखना अवश्य कर्तव्यहै गर्भवती स्त्रीको स्वामीके साथ सहवास करना उचित नहीं है, पहली पहल गर्भवती स्त्रीको बड़ी सावधानीसे रहना चाहिये कि, उसको बहुत डर रहता है नवीन गर्भवती स्त्रीको किसी गाभणी। (१६५) प्रकार भी चौथे महीनेसे अधिक सहवास न करने दे। इससे भी गर्भ गिर जाता है हे बहन! गर्भगिरनेसे प्रथमही पेडूमें दर्द होने लगता है और रुधिर निकलने लगता है, इस कारण इन लक्षणों के होते ही गर्भवती स्त्रीकी किसी योग्य वैद्यसे चिकित्सा करानी चाहिये। गर्भका गिरजाना यह अस्वाभाविक है। इसी लिये स्त्रीको अधिक पीड़ा होतीहै। जिन स्त्रियोंके गर्भ जाता रहा हो, उनको एक महीनेतक विश्राम करना उचित है। विना दो तीनमासि- कधर्मोंके हुए गर्भाधान करना उचित नहीं । जिन स्त्रियोंके छै महीनेमेंही वालक होजाता है वह किसी भाँति नहीं वचसकता, पृथ्वीपर आतही मर जाता है, और यदि जो किसी प्रकार जीवित रहभी जाय तो बड़ी सावधानी और यत्नसे उसे रखना चाहिये। कारण कि मैंने डाक्टरोंके मुखसे सुना है, कि ऐसे २ दोचारवालक वचभी जाते हैं । अ- ठमासा वालक भी नहीं बचता, परन्तु हे बहन ! सतमासे वा- लक बहुत वच जाते हैं स्त्रियोंको उचित है कि, गर्भावस्थामें बड़ी सावधानीसे रहैं । यही मेरा कहना है । गर्भपरीक्षा। हे वहन! अव मैं तुझे गर्भकी परीक्षा भी बताती हूं कि,जिस से गर्भवती स्त्रीको देखते ही पहचान लिया जाय कि, इसको पुत्र होगा वा कन्या,या नपुंसक संतान होगी या दोवालक होंगे। पुत्रकी परीक्षा। १-जिस स्त्रीके पहले दाहिने स्तनमें दूध हो तो जानलो कि, इसके पुत्र होगा।

(१६६)
स्त्रीप्रबोधिनी।
२-जो स्त्री चलते समय अपना दहिना पैर आगे धरै तौ
इसके भी पुत्र होगा।
३-जिस स्त्रीके मुखकी कांति हीन होजाय और चेहरा
रूखा रहे तो इसके भी पुत्र होगा।
४-जो स्त्री दहिनी पसली करके अपनी इच्छासे सोती हो
तो उसके भी पुत्र होगा।
५-जिस गर्भवती स्त्रीको पुरुपके नामोंमें अधिक प्रीति हो
जाय वा पुरुष नामवाले प्रश्नमें रतहुई स्त्री भी पुत्रको जनती है।
६-जो स्त्री गर्भके समय पुरुष नामवाले पदार्थों के देखनेकी
अधिक इच्छा करती हो, तो जानलो कि, इसके भी लड़का
होगा।
७-जिस स्त्रीकी दाहिनी कोख ऊँची हो, तो इसके भी पुत्र
होगा।
कन्याकी परीक्षा।
१-जिस गर्भवती स्त्रीके गर्भ समयमें पुत्रके लक्षण न हों
तो उसके कन्या होती है।
२-जिसको गर्भ समयमें पुरुषके साथ सहवास करनेकी
इच्छा अधिक होजाय उसके भी कन्या होतीहै।
३-जिस स्त्रीको गर्भ समयमें नृत्य अच्छा लगता हो,
वाजा अच्छा लगता हो, गांधर्वविद्या (गाना) अच्छा लगता
हो सुगंधि तथा फूलोंकी माला अच्छी लगती हो, उस स्त्रीके
कन्या होती है।
४-जिस स्त्रीके कुच काले हों उसके भी कन्या होती है।

गर्भिणी। (१६७) s ५-जो स्त्री आलस्यमें भरी रहै दिनभर लेटी रहै, किसी कामकी भी इच्छा न करै तो उसके भी कन्या होती है। गर्भ में नपुंसककी पहचान। जिस स्त्रीको गर्भावस्थामें पुत्र और कन्याकी जनने- वाली इन दोनों गर्भवतियोंके लक्षण न मिलैं, और कोखमें मध्य भाग ऊँचाहो उसकें नपुंसक संतान होती है। गभम दो बालकोंकी पहँचान। १-जिस स्त्रीके गर्भ समयमें दोनों ओरके पाइौंके ऊँचे पनेसे और द्रोणीकी तरह कोख स्थित हो तो उस नारीके दो वालक होते हैं। २-जिस स्त्रीके गर्भ समयमें उदर अधिक बढजाय, वा ग- भिणी स्त्रीको यह मालूम पडै कि, एकही समय दो वालक पेटमें घूमरहेहैं तो उस स्त्रीके दो वालक पैदा होते हैं। हे वहन ! यह मैंने तुझे गर्भवती स्त्रियोंकी परीक्षा बताई यह भी समय पर तेरे काम आवेगी, अब मैं तुझे गर्भकी चिकित्सा भी बताती हूँ। इसे तू सावधान होकर सुन । गर्भ चिकित्सा। १-हे वहन ! पहले महीनेमें-यदि अकस्मात् गर्भमें वेदना होजाय तो उस समय गोंके दूधमें पद्माख, खस, लाल चंदन एकपलमात्र तीन दिन पान करनेसे गर्भ स्थित होजाता या मुलेठी, देवदारु, शाकवृक्षके वीज और क्षीरकाकोली इनको पीसकर गौके दूधके साथपिय तौभी गर्भ ठहर जाता है। २-दूसरे महीनेमें नीलकमलकी जड़,मुलेठी,काकड़ा- --

(१६८)
खीप्रबोधिनी।
सींगी, इनको बराबर ले जो स्त्री गायके दूधके साथ पिये तो
दूसरे महीनेकी वेदना शान्त होजाती है अथवा पीपलकी छाल,
काले तिल, शतावरी, मंजीठ, इनको वरावर ले पीसकर चौ-
गुने दूधके साथ पिये तो भी दूसरे महीने की वेदनाशांत हो
जाती है।
१.
३-तीसरे महीनेमें-चंदन, तगर, कूट, मृणाल (कमल
की जड़) कमलकेशर यह ठढे जलके साथ पियै तो तीसरे
महीनेकी पीड़ा शान्त होती है। अथवा क्षीर काकोली और
सुगंध वालाको जलके साथ पियै तो भी गर्भकी पीड़ा दूर
होती है।
४-चौथे महीनेमें-नीलोत्पलकमलकी जड़, गोखरू,
कसेरू पीस कर गोके दूध के साथ पीनेसे चौथे महीने की वेदना
शान्त होजाती है । अथवा मुलेठी,रास्ना, श्यामक ब्राह्मण यष्टि,
अनन्त मूल इनको पीस कर गोके दूधके साथ सेवन करै तौ
चतुर्थ मासकी वेदना शान्त हो जाती है।
५-पांचवें महीने में-पुनर्नवा,काकोली,तगर,नीलोत्पल
यह सब गौके दूधके साथ पिये तो पाँचवें महीनेकी पीड़ा दूर
हो जाती है, अथवा दोनों कटेरी, ब्राह्मण यष्टिका कमल नाल,
गौके घी और दूधके साथ पंचम मासमें सेवन करै, तो पांचवें
महीनेकी पीड़ा दूर होती है।
६-छठे महीनेमें-मिश्री,कैथका गूदा, ठंढे जलके साथ
पीने वा गायके दूधके साथ पीनेसेभी वेदना शान्त होती है
अथवा गोखरू सहजना मुलेठी, पृष्टीपर्णी, खरैटी इनको
-

गर्भिणी। (१६९) पीसकर गायके दूधके साथ पिये, तो छठे महीनेकी पीड़ा जाती रहती है। ७-सातवें महीनेमें-कसेरू, पुष्कर मूल, सिंघाड़ा, नी- लोफर पीसकर दूधके साथ पियै तौ सातवें मासकी वेदना शान्त होजाती है। अथवा मुलेठी,दाख,सिंघाड़ा,कसेरू,कम- बुलकी जड़, मिश्रीके साथ दूध में मिलाकर पियै तोभी सातवें महीनेकी पीड़ा दूर होती है। ८--आठवें महीने में-मुलेठी,पद्माख,मोथा,नागकेशर, गजपीपल, नीलोत्पल यह गौके दूधमें पिये तो आठवें मही- नेकी वेदना शान्त होजाती है। अथवा वेलकी जड़,कैथ,दोनों कटेरी अर्थात् छोटी वड़ी, गन्नेका रस, पटोलकी जड़ यह दूधमें सिद्ध करैः इस दूधको जलके साथ पीनेसे आठवें मही- नेकी गर्भ पीड़ा शान्त होजाती है। ९-नौमें महीनेमें-इन्द्रायनके बीज क्षीरकाकोली शीतलचीनी) सहतके साथ पीनेसे नौमें महीनेकी व्यथा शान्त होजाती है । अथवा मुल्हेठी,गुडूची,अनन्तमूल, प्रियंगु इनसे सिद्ध कर नौमें महीनेमें दूध पिये तो वेदना शान्त होजाती है। १०-दशमें महीनेमें-मिश्री,सुनका,शहद, नीलकमल इन सबको गायके दूध के साथ पियै तो दशमें महीनेकी वेदना शान्त होती है अथवा सोंठसे सिद्ध कर गौका दूध दशमें महीने में पान करै या मुल्हैठी, देवदारु, सोंठ, गौके दूधसे पिये तो भी दशमें महीने की पीड़ा शान्त होजाती है। -

(१७०)
स्त्रीप्रबोधिनी।
हे वहन ! जो स्त्री सामान्यतासे लोध (वा आमला) सौ
वीरांजन, मुलेठी इन सबको सावधान होकर सात दिन तक
पीती है तो उसका गर्भ स्तंभित होता है फिर चलायमान
नहीं होताया धनियाँ,रसौत,लोध, मुलेठी पिये तो भी गर्भ
ठहर जाता है।
शहत,अडूसा,चंदन,सैंधा,इद्रयव,घृत यह जलके साथ पीस
कर देनेसे गिरता हुआ गर्भ शीघ्र थम जाता है, यह योग
मौलि देवने कहा है।
कुम्हारके चाकपर बरतन बनाते समय जो पतली मिट्टी हाथ
में लगती है उसकोले वकरीके दूधमें डालकर शहतके साथ पिये
तो शलयुक्तगर्भके गिरनेको निवारण करताहै और स्थापित
करता है।
कसेरू, सिंघाड़ा, जीरा,नागरमोथा, एरण्ड,शतावरी इनसे
सिद्ध किया जल मिश्रीडालकर पिये तो शूलको निवारणकर
ताहै, और गर्भको गिरनेसे रोकता है।
कुमुदका कंदशहत,घी, दूधको मिलाकर पिये अर्थात् इसमें
मिश्री डालकर ठंढा कर पिये तो गर्भस्राव, अरोचक, वातरोग
सूजन, त्रिदोष,चमचमाहट यह सभी नियम सहित सेवन करने
से नष्ट हो जाते हैं
हीबेर, अतीस, मोथा, मोचरस, कुटज,जो इनका काथकर
गिरते हुए गर्भमें देवे तो गर्भ स्तंभित होजाता है प्रदर कोख
रोगमें देनेसे शूलादि नष्ट हो जाते हैं।
कमलका कंद,काले तिल,शहता मिश्रीयुक्त, दूधके साथ
पीवे तो यह गुरुदोषसे गिरतेहुए गर्भको भी शीघ्र स्तंभनकर

गर्भिणी। (१७१) ताहै। नील कमलकी नाल,मुलेठी, मिश्री,वड़ी कटेरी यह भी पीसकर पानीके साथ खानेसे गर्भको स्तंभन करती है। शर्कराके साथ गौका दूध सेवनकरनेसे शुष्कगर्भकी शांति होतीहै,अथवा गंभारीके फलकाचूर्ण वा सुलेठी शहतके साथ पान करैः अथवा गर्भिणी स्त्री जिसका गर्भ सूखता हो तो वह गायका दूध सेवन करे, तो उसके गर्भकोभी शान्ति होतीहै। हे वहन ! यह मैंने तुझे गर्भकी चिकित्सा वताई जो स्त्रियें: इसके अनुसार व्यवहार करेंगी उनको गर्भकी पीड़ा नहीं सतावैगी। प्रसूतिके पूर्व आयोजन। हे वहन ! स्त्रियोंके जीवन में प्रसवके समान कठिन पीड़ा और कुछ नहीं है, इस बातको सभी मनुष्य कहते हैं कि, इसमें स्त्रीका नया जन्म होता है। इस कठिन कार्यमें किन २ चीजोंका प्रयोजन होता है वहभी मैं तुझे वताती हूँ कारण कि, जो स्त्रियें प्रसवकालकी आवश्यकीय वस्तुओंको पहलेसे संग्रह नहीं कररखती हैं उनको उस समयमें वड़ा कष्ट उठाना पड़ता है। १-सवसे प्रथम तो गर्भवती स्त्रीके लिये एक सुतिका गृह अर्थात् सौड़का घर स्थिर करना चाहिये। सूतिकागृह कै- सा होना चाहिये उसे मैं आगे बताऊँगी। २-प्रथमसेही घड़ी मंगालेनी चाहिये कारण कि, इससे वालकका जन्मपत्र ठीक वनेगा- • ३-चालक वार २पाखाना पेशाव करता है, चालकके लिये चार पांच विछौने पहलेसे ही सिला रक्खै । यह पुराने कप- डोंके हों; कारण कि, नया कपड़ा कड़ा होता है, वह (१७२) नीप्रबोधिनी। . वालकके कोमल शरीरमें छिदता है और पुराना कपड़ा मुला- यम होता है, वह बालकको कुछ क्लेश नहीं देता इसलिये पुराना कपड़ाही श्रेष्ठ है ४-तीन वालिस्तके लंबे चौडे पोतरेभी बालकके लिये पहलेसेही बना रक्खै दश पंद्रह हों। ५-माता और संतानके लिये उस समय ताप" की भी आवश्यकता पड़ती है इसलिये सूतिकागृहमें पहलेसेही कोयलोंकी अँगीठी भरी हुई रखनी उचित है । ६-प्रसूति स्त्रीके लिये भोजनके उपयुक्त द्रव्यभी पहलेसेही संग्रहकर रक्खैकारण कि, न जानें किस समय वालक पैदाहो और जो यह वस्तु उस समय न मिलै अथवा देरसे मिले तो वड़ा कष्ट होता है, पहलेसे ही एक होशियार दायी स्थिर कर रखनी चाहिये कि, जो समाचार पातेही तुरन्त चली आवै। ७-यदि घरमें अमीरी हो तो एक धायभी पहलेसेही बालकके लालन पालन करनेके लिये ठीक है। ८-प्रसूतिको वालक होनेके पीछे बहुतसे कपड़ोंकी आव- श्यकता रहती है। इस कारण पहलेसेही पुराने २ कपड़े जितने मिल सके सभीको संग्रह कर रक्खै । ९-सूतिकाघर झाड़ बुहार कर साफ कर लेना उचित है, उसके भीतर कूड़ा कर्कट कुछ न रहे। ३०-सूतिकाघरमें एक चारपाई और एक साधारण विछौना भी रखना चाहिये। ११-नालकाटने के लिये एक तेजसा चाकू भी रखना चाहिये।

गर्भिणी।
(१७३)
१२-खरयायी दवानेको खुरपेकी आवश्यकता पड़ती
उसे मँगा रखना उचित है।
१३-नाल वांधनके लिये एक कलावेका कुछ एक मोटा
वटा हुआ डोराभी रख छोड़े।
१४-मीगतेल और कुछ थोड़ासा आटाभी पहलेसे रख
छोड़ें।
१५-मट्टीका कूड़ा या करियल वालकके स्नान करानेके
लिये भी पहलेसेही रक्खे।
१६-जल गरम करनेके लिये अंगीठीमें आग रहनी
उचित है।
१७-पुराने कपड़े और वालककी विछौनी आदिको एक
जगह रक्खे।
१८-पहलेसेही जलं और दूध मँगा रखना उचित है।
१९-घरमें थोड़ीसी अजवायन और मिठाईभी रहनी
चाहिये।
हे वहन । जो स्त्रिये इन कामोंके करनेमें असावधानी करती
हैं, उनको प्रसव कालमें वड़ा कष्ट उठाना पड़ता है। प्रसव
समयमें प्रसूतीकी असहनीय पीड़ाको देखकर घरकी सभी
खियोंकी बुद्धि स्थिर नहीं रहती वरन् वह व्याकुल होकर इधर
उधरको ढूँढती फिरती हैं उनको जिस वस्तुकी आवश्यकता
पड़ती है वह कठिनतासे मिलती हैं। वह पागलकी भाँति
इधरसे उधर और उधरसे इधर दौडती फिरती हैं। और उस
समय जो ऐसा होता है तो प्रसूति और संतानका जीना
कठिन-पड़जाता है। इसी कारण हे वहन। प्रसवके समयमें
पर

(१७४) खीमबोधिनी। जिन २ वस्तुओंकी आवश्यकता हो स्त्रियोंको वह पहलेसेही ठीक करनी उचित हैं। सूतिकागृह। हे बहन ! हमारे देशमें स्त्रियें सूतिका घरको बड़ा खराव और बहुत छोटा तथा घरके बाहर आंगनमें बना देती हैं। और बहुतेरी छतपरही बना देती हैं। वह इस बातको नहीं जानती कि, इससे हमारी कितनी हानी होती है । बहुतेरे सोबड़के घरोंमें शील होती है, चारों ओरसे ठंढी. २ हवा जाती है, ऐसे २ घरोंमें प्रसूतिको रक्खाजाता है। इन घरोंमें रहनेसे सैकड़ोंबालक सूतिका घरमेंही मरजाते हैं। इसमें आश्च- र्य क्या है। जिस घरमें पैर धरनेसे सर्वसाधारणको फुरैरियें आती हैं भला उस गृहमें रहनेसे प्रसूतिकी क्या अवस्था होगी। और बहु सुकुमार वालक उस पीडाको कैसे सहन कर सकता है, वह तो एक दो दिन जीवित रहकर आपही शरदीके मारे ऐंठ जायगा, जिस घरमें रहनेसे हमैं कुछ पीडा नहीं होती, प्रसूतिको उस घरमें रहनेसे भी पीड़ा होती है। इस कारण हे वहन ! सभी स्त्रियोंको सूतिकागृहकी ओर भी विशेष ध्यान रखना उचित है, स्त्रियोंको कैसा सूतिकागृह बनाना चाहिये इसको वह नहीं जानती हैं तभी तो वह ऐसा घृणित सूतिका- गृह बनाती हैं, सूतिकागृह बहुत उत्तम बनाना चाहिये, जिससे बालक और उसकी माताको कुछ कष्ट न पहुंचे कितनीही सन्तान और उनकी माता मरंजाती हैं उसका कारण यही सूतिकागृह है जो वह इस बातको जानतीं तो ऐसा घर कभी नहीं बनाती।

गर्भिणी। (१७५) हे वहन ! सूतिकागृह कैसा होना उचित है, वह तुझे बताती हूं। १-घरोंमें जो सबसे उत्तम घर हो वही सूतिकागृहके लिये ठीक है। २-घरमें शील आदि न हो और सूतिका गृहमें जो कुछ शील हो तो दो तीन दिन पहले अग्नि जलाले। ३-उत्तर या दक्षिणकी दिशामें सौहड़का घर होना ठीक है। सूतिकाघर जो बनाया जाय उस घरके आगेभी कोई घ- हो जिससे प्रसूत इकली नरहे और उसे बोलचालकी सुनार आती रहै। ४-उस घरमें खिड़की आदि अवश्य हों जिससे कि उजाला भली भांतिसे रहै। ५-सूतिकाघरमें पानी निकलनेका भी रास्ता होना चाहिये कारण कि, पानीका काम बहुत पड़ता है। ६-घरमें किसी प्रकारकी दुर्गन्ध न आती हो, दुर्गंध समानअधिक पीड़ा आर कुछ नहीं है । हे वहन! देखा जाता है कि, जिन घरोंमें दुर्गधि आती है उन घरोंमें कोई न कोई रोगी रहताही है। इसलिये वरमें गंधककी धूनी देनी उचित है। ७-अनेक प्रकारके कारणोंसे सूतिकाघर मैला कुचैला रहता है, इसी कारण मिट्टीसे पुतवालिपवाकर साफ रखना चाहिये जो घर साफ नहीं होता उसमें बालक और उसकी माताका स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता विना यत्न कियेहुए सूति- काघर भी साफ सुथरा नहीं बन सकता।

( १७६) स्त्रीप्रबोधिनी। who हे बहन ! मैंने जो कुछ कहा है यह इसके सम्बन्धमें ठीक स्त्रियोंको इस पर विशेष ध्यान देना चाहिये। अब मैं तुझे यहभी बताती हूं कि, वालक कितने दिनोंमें उत्पन्न होता है और वह लक्षणभी बताती है कि, जिनके द्वारा स्त्रियें भली भांतिस जानलेगी कि, अब इस स्त्रीके वालकहोने में दो एक दिन की ही देरहै। प्रसवका नियतसमय- शीघ्रप्रसूतास्त्रीके लक्षण। हे वहन 1 गर्भ रहने पर नवें या दशमें महीनेमें वालक होता है किसी २ स्त्रीके नौ महीने पंद्रह दिनमें भी होता है, यह साधारण नियम है, परन्तु ठीक किस दिन वालकका जन्म होगा यहभी गणित शास्त्रसे जानने लायक बात है, इस दिनके स्थिर करने के लिये रजोदर्शन बंद होनेका पिछला दिन छोड़ कर उसके आगेके तीन या पहले महीन गिनने और जो दिन आवे उसमें सातदिन जोड़ने, इस हिसावसे आया दिन प्रसवकाही दिन है । अथवा रजोदर्शन बंद होनेका अखीर दिन छोड़कर दोसौ अस्सी दिन गिनना, और इस हिसावसे आनेवाला दिन प्रसूतिका समझना चाहिये। इसी प्रकार गणितसे निकालेहुए दिनको या कभी उस दिनके एक दो दिन आगे पीछे बहुत करके स्त्री प्रसव होती है। परन्तु स्त्री पुरुषको उमर जिस प्रकारसे जादे बढ़ती जाती है वैसेही प्रसव समयको नियमितदिनसे अधिक दिन लगते हैं। ऐसा अनुभव है।

गर्भिणी। (१७७) bk तौ ३० Rottatut तौ ३१ तौ ३० हे वहन ! विलायतके डॉक्टरोंने प्रसव होना इस प्रकारसे निर्णय किया है पहली जनवरीमें ऋतु बंद होवै तौ ३० सित- म्बरके दिन प्रसव होता है। १ फर्वरीमें .. तौ ३१ ...... अक्तूबर १ मार्चमें नवम्बर. १ अप्रेलमें तौ ३१ ...... दिसम्बर. १ मईमें ... तौ ३१...... जनवरी. १ जूनमें... तौ २८...... फरवरी. १ जुलाईमें तौ ३१...... मार्च. १ अगस्तमें अप्रेल. १ सितम्बरमें मई. १ अक्टूवरमें जून. १ नवम्बरमें जुलाई. १ दिसम्बरमें तौ ३१ ...... अगस्तके दिन प्रसव होता है इसी हिसाबसे हे वहन ! अन्य २ तारी- खोंमें ऋतुवंद होतोप्रसवके और २ भी दिन जानेजा सकते हैं। प्रसव होनेके कुछ दिन पहले गर्भिणी स्त्रीको पुष्यनक्षत्रमें सूतिकाघरमें प्रवेश करना चाहिये, वहां वह स्त्री बालकके होनेके समयको देखती रहै, प्रसूत होनेके आठ दशदिन अपहले कुछ आराम मालूम होने लगता है तथा उसको अपना शरीर कुछ हलकामी मालूम पड़ने लगता है, श्वास लेने में भी कुछ तकलीफ नहीं पड़ती, शरीर फुर्तीला होजाता है; और उस स्त्रीका चलने फिरनेको भी मन करता है। इसका कारण यह है कि वालक नीचे कटि प्रदेशमें उतरता है (१७८) छीप्रबोधिनी प्रसूतिकाल पास आगया, इसके जाननेके लिये दूसरें भी बहुत से उपाय हैं.गर्भिणी का पेंट जिस समय ढीला होता है, उससमय उसकी जांघों में दर्द होने लगता है गर्भवती स्त्रीको जल्दी रपेशा व पाखाना होता है तथा कुछेक जलन भी होती है, उसी स- मय समझना चाहिये कि, प्रसवकाल निकट आगया है। वार२ पेशाव पाखाने होनेका यही कारण है कि, इस समय मूत्रा- शयपर अधिक बोझ पड़ता है. कभीर ऐसाभी होता है कि गुदास्थानपर विशेष बोझ पड़नेके कारण दस्त बंद हो जाता है। ऐसी अवस्थामें जो दस्त बंद हो जाय तो पेडूपरसेक करै। प्रसवकाल जाने पर कमर और पीठकी पसलियोंमें दर्द होने लगता है, और पेशावके समय प्रसवस्थानके झुंहपर कफ आकर दर्द करता है. योनिमें दुःख होने का कारण यह है कि इस समय बालकके गर्भाशयसे बाहर गिरनेकी विधि चलती रहती है, इसीकारणसे वह कभी विकास या कभी संकोच पाती है, ऊपर कहीहुई अवस्था जव स्त्रीकी होने लगे, तब समझ लेना चाहिये कि वालक सांझ सवेरेहीमें होगा। ले प्रकाशवती यह तो मैंने तुझे प्रसूतीके लक्षण वताये और अवधात्री शिक्षा वताती हूं इसका जानना भी अवश्य कर्तव्य है। इति पञ्चमसोपान समाप्त.

(१७९)
धननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव ।
zurati
षष्ठसोपान।
जननी।
धात्रीशिक्षा और प्रसव
MATHURAIYA
"
हे वहन ! अब मैं तुझे जापेका काम बताती हूं यदि किसी
समय दाई न मिले तो फिर क्या करना उचित है गर्भवती स्त्रीको
किसीप्रकार जनाले यह काम ऐसाहै कि, बहुतसी स्त्रियां
इसको नहीं जानती हैं,परन्तु उनको इसकाजानना अवश्य है
क्योंकि इससे स्त्रीको सर्वदा काम पड़ता रहताहै, जो इसको
जानती होगी तो उन दुःखोंसे बची रहेगी. जो कि, मूर्ख दाई
वा सौढ़में असावधानीसे हो जाते हैं, इसमें स्त्रीका दूसरा
जन्म होता है कि, वह जापेसे भली भाँति कुशल पूर्वक हाथ
पैरोंसे छुटे, जिस समय वह लक्षण दृष्टि आनेलगैं और गर्भि-
मिस्त्रीके वेदना होनेलगै तो किसी चतुर दाईको बुलाले और
उसके हाथोंके नख कटवादेव।
प्रसव होना एक स्वाभाविक वातहै इसलिये इसको
स्वाभाविक रीतिसेही होने देना चाहिये, उस काममें विना
कारणही हस्तक्षेप करना कोई बुद्धिमानीका काम नहींहै।
फिर जव देखे कि वेदना होते २ वहुत देर होगई और वालक
होनेका अभी कुछ चिह्न दिखाई नहीं देता, तो दाईको यह
देखना उचित है कि,बालकपेटमै किस प्रकार है, शिर नीचेको
वा पैर नीचेको है याआजाहै, सभी बालकोंका शिर नीचेको
होताहै और शिरके वल बालक पैदा होता है। इससे जच्चाको
कुछ अधिक कष्ट नहीं पड़ता. इसकी पहचान यह है कि,

स्त्रीप्रबोधिनी। जब वालक दाई ओरसे बांई ओर घूमें और बाई ओर ही स्त्री को भारी रहै तो यह पालक मस्तकके वल होता है और जो दाई ओर भारी रहै और दाई ओरसे बांई ओर घूमा करे तो पांवके बल होता है और जो दोनों ओर भारी रहे और पेटमें नहीं घूमै तौ जानलो कि वह आड़ा पडाहै और हाथके बल पैदा होताहै, इससे स्त्री बहुधा मरंजाती है, जो वालक अपने आपही घूम २ कर पांव मस्तकके वल आगया तो जानो भलाहै या जो दाईने अपने चतुराईसे वालकके हाथ भीतरको सरकादिये; तो भी वालकहो जायगा और स्त्री वच जायगी। दाईको प्रसूत होनेवाली स्त्रीके गर्भस्थानके मुखको हाथसे मलनाचाहिये, और फिर जब गर्भके बंद तथा और सब नाड़ियोंके बंद ढीले होने लगे और कमरके पिछले भागमें पीठ पसली वस्ती इत्यादि स्थानोंमें और मस्तकमें पीडा होने लगे तव धीरे २ मलना चाहिये। जिस समय गर्भमार्गमें आने लगे तब अधिक मलना उचित है, यह क्रिया गर्भ बाहर आने तक करना चाहिये। बालकका शिर जननेन्द्रियके मुखमें आतेही स्त्रीको सावधा- नीसे बांयें करवटसे लिटाना चाहिये । दाईको उचित है स्त्रीको शय्यापर लिटाकर ही संतान उत्पन्न करावै। जभी वालकका शिर वाहरको निकले तो उसे दाई अपने हाथ पर ले ले। परन्तु जोरसे न दवावै, जिस २ तरहसे कंधा वाह शरीरके और और भाग बाहर आने लगैं, वैसेही स्त्रीके पेट- को अपने हाथसे नीचेको दवाना और जो यदि बालकका खाली सस्तकहीं दिखाई दे तो उसकी कोखमें आहिस्तेसे व है जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (१८१) उंगली डालकर बड़ी सावधानीसे बालकको बाहर निकालना यदि इसमें जराभी असावधानी हुई तो वालकके गले घुट जानेका डर है, इसकारण इसकामको बड़ी होशियार और जानकार दाईसे कराना चाहिये । वालक बाहर निकल आवै तो एक स्त्री तौ जच्चाकी संभाल करे, और दाई वाल- कको तुरंत गरम पानीसे नहला कर उसके गलेका चिकना पदार्थ उंगलीसे निकाल-डाले बहुधा ऐसभी वालक होते हैं कि, जो खालकी पतली झिल्लीमें बंद होते हैं उस समय दाई को उचित है कि, वह छुरी या चाकूसे उस झिल्लीको फाड़ कर वालकको निकालले, परन्तु इतना अवश्य ध्यान रक्खै अकि, वालक पर सदमा न पहुँचे, जो इसके फाड़नेमें देर होती है या यह नहीं फटै तौ वालक इसके भीतरही मरजाता है। वालक पैदा होतेही श्वास प्रश्वास लेने लगता है । और उसी समय रोताभी है, उसका श्वासोच्छास उचित रीतिसे होता हो तो उसका नाल नाभिसे चार अंगुल अरसे पर या छैः तैह डोरेसे कसकर बांधना, और फिर औरभी चार अंगुलीके फाँसलेपर दूसरा बंद वांधना । फिर इन दोनों बंदोंके वीचमें कैंचीसे काटना इस रीतिसे नाल काटने में अधिक रुधिर नहीं गिरेगा,लाल काटतीसमय दूसरी स्त्रीको हुनालका भाग बड़ी मजबूतीसे पकड़वा देना उचित है जो ऐसा न होगा तो नालका भाग फिर भीतर चला जायगा। हे वहन ! जो वालक जन्मतेही न रोवै तो उसे चिकोटी (नोचना) भर कर रुलावै। कारण कि, बालकके रोनेसे उसकी श्वासोच्छासकी क्रिया भलीभाँतिसे होती है, चिकोटी (१८२). श्रीप्रबोधिनी। F भरने परभी यदि वह न रोवै, और मृतककी समान मालूम पड़े, तो उसकी पीठको थपकोरना या चूतरोंको थपकोरना चाहिये, और जवभी वालक न रोवै तो कुछ एक गुन गुने पानी में डुबोकर निकाल लेना उचित है, इससे बालक चौंक कर रो उठेगा, यह क्रिया नाल काटनेके बाद करनी चाहिये। नाल साफ नरम कपड़े की पट्टीमें लपेटकर उसके पेटपर पट्टी बांधना कपड़ेका जो भाग नालमें लगेगा वहां मीठातेल लगाना । ऐसा करनेसे दो तीन दिनमें अपने आपही नाल सूखजायगा। यदि नाल कच्चाही छूटजाय और वा- लककी नाभिसे खून गिरने लगे तो दीवेका तेल सुहाता गुन- गुना रातको रोज लगा देना चाहिये । या रुई जलाकर उसकी छाई लगानी उचित है। जन्म होनेपर वालकको दो तीन दिन तक जन्म घुट्टीही पिलानी उचित है, माताका दूध पिलाना ठीक नहीं। उसका स्तन नहीं पिलाना चाहिये। गर्भिणी स्त्रीको बालक होजाने के दो तीन दिन पीछे दूध उत्पन्न होता है और उस दूधमें रेचक गुण रहनके कारण बालकको मलशुद्धि होती है, जिस समय वालक पैदा होजाय तो स्त्रीको औंधी सुलाकर उसके पेटका भाग जोरसे दवावै । जब खरआई बाहर निकल आवै तब फिर पेट दवानेकी कुछ जरूरत नहीं है। बहुत करके प्रसृतके होनेके १०५ मिनटके बीचमें ही खरआई बाहर गिर जाती है । इतने समयके भीतर भी जो वह न गिरे तो धीरे २ पेटपर हाथ फेरते रहना तो वह बाहर, ক্ষক w सरकारका जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (१८३) . गिर जायगी। गर्भाशयसे खरआई निकली है या नहीं, इसे जाननेके लिये जननेन्द्रियका नालखंचना चाहिये । तब वह जो छुटी होगी तो उसी समय वाहर आजायगी। परन्तु ना- लको बैंचकर खरआईका निकालना बड़ा धोखेका काम है। हे वहन ! जव खरआई निकल आवे तव इन्द्रियके आस पासका बिगड़ा हुआ भांग गरमपानीसे पोंछ डालना चाहिये, त्रीको गरम कपड़े उढ़ाकर चित्त लिटा देना चाहिये ऐसी अवस्था में स्त्रीको पैर न सकोड़ने देना, और थोड़ी देर चुपचाप सोने देने चाहिये, और उसके निकट कोयलोंकी दहकती हुई अँगीठी रखनी चाहिये चाहँ अँगीठीको खाटके नीचे रखकर सेंकदो, परन्तु उस समय इतना अवश्य ध्यान रखना कि, खाटके वान अँगीठी आदिमें न लग जाँय। उस समय स्त्रीको हलका और जो जल्दी पच जाय ऐसा भोजन खिलाना चाहिये,जच्चाको नाज खाने कोन दे और कच्चा पानी भी पीनेको न दे वत्तीसे पानी औटाकर देना चाहिये, उस औटे पानीकोही ठंडा करके पीनेको दे, पानीको दो वार बदलना उचित है; सवेरे का औटाहुआ पानी दोपहर तक पीने को दे और दोपहरका औटाहुआ पानी शामतक पिलाना चाहिये । जच्चाको चार दिन तक वरावर विछो- नसे न उठनेदे, तथा पांचवें छठे दिन उस स्त्रीको केवल पेशाव पाखानेके लिये जाने दें। हे वहन ! प्रसूतिको विना प्रयोजन दवादेनेकीकुछ आव- श्यकता नहीं है। प्रसूतिके समय विस्तृत हुआ भाग नियमित. कालसे

(१८४)
स्त्रीप्रबोधिनी।
23
अपने आप संकुचित होजाता है इसके लिये दवादेनेकी कुछ
आवश्यकता नहीं है।
प्रसूतिको ज्वर खाँसी इत्यादि विकारोंके लिये देशी
वैद्य लोग दशमूलका काढ़ा देते हैं, यह काढ़ा स्त्रियोंको
अवश्य देना चाहिये, प्रसूतिके विकारोंमें वास्तविक यह बड़ा
चमत्कारिक गुण करता है।
प्रसूतिकी पीड़ा और चिकित्सा।
हे वहन ! वालक होजानेके पीछे अक्सर जच्चाको जो रोग
होजाते हैं वहभी मैं तुझे बताती है. कारण कि, जो उन्हें तू
जानती होगी तो जच्चाकी सँभाल भलीमाँति करलेगी,
रोगोंके साथही साथ उनकी दवाइयां भी बताती हूं।
जिन स्त्रियोंके वालक होनेके पीछे रुधिर अधिक वहता
रहता है, उनकी सँभाल कठिन पड़ जाती है और जिनके
नहीं वहता वा कुछ कम वहता है वह दश दिनमेंही चंगी हो उठा
बैठती हैं।
दिनभरमें कई बार गरमपानीमें कपड़ा भिगो २ कर
स्त्रीके जननेंद्रियमें रखना चाहिये, जब ठंडा हो जाय
तभी गरम करके फिर रखदे, और गरम पानी में गरम दूध
मिलाकर धो भी डालना चाहिये, इससे वहां मैल नहीं रहेगा.
कारण कि, थोड़ार लोहू कई दिन तक बहता रहता है, और
चार पांच दिन पीछे वीस पचीस दिन तक लोहूका पानीसा
निकलता है, किसी २ स्त्रीके सवामहीनेतक निकलता
रहता है। इसके धोने और सेकनेसे चैन पड़ता है और वेदना
भी कम होती है।

जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसवं ।
(१८५)
प्रसव के उपरान्त गर्भस्थली पहली अवस्थामें प्राप्तहोनेके
लिये चेष्टा करतीहै; और इसीकारण स्त्रीको अत्यन्त पीड़ा
होती है। यदि उचित रीतिसे उस स्थानको सेका जायगा तो
वह वेदना होने परभी प्रवल नहीं हो सकेगी।
पेशाबका बंद होना-प्रसवके उपरान्त स्त्रियोंको दो
तीन दिन तक पेशाव नहीं उतरता है. उससमय किसी अच्छे
वैद्यकी औषधी करानी चाहिये।
गर्भस्थलीसे नाव-प्रसवके- उपरान्त गर्भस्थलीसे
जलीय स्त्राव होता रहता है, यह माताके शरीरके लिये विशेष
उपकार और प्रयोजनीय है, यदि यह सहसा बंद होजाय तो
विपतिकी आशंका होती है। इससे बहुत जल्दी अच्छे वैद्यसे
इसकी चिकित्सा करावै।
दुग्धोत्पत्तिजनितज्वर-प्रसबके उपरान्त वालकके
आहार के लिये माताके स्तनोमें दुग्ध होता है। पहली पहल
तो एक प्रकारका घना पदार्थ स्त्रीके स्तनोंसे निकलता है।
यह बालकके पक्षमें विरेचकका कार्य करता है, तीसरे दिन
वास्तविक दूध स्तनोंमें आता है, तब स्तन बढ़ने लगते हैं यहां
तक बढ़ते हैं कि, इधर उधरको हाथ झुकाते भी पीड़ा होती
है। उससमय तृष्णा और शीत बोध होता है शिरमें दर्द होने
लगता है, इसके पीछे अधिक पसीना आता है, और दो
तीन दिन तक ज्वर भी आता है, जब वालक दूध पी-
ने लगता है तब यह वेदना कुछ कम होती
इसलिये स्त्रीका दूध निचड़वा डालना उचित है, तव पीड़ा
जाती रहेगी। कभी २ स्त्रियोंको दूध उतरताभी नहीं; यदि

( १८६.) :
खींप्रबोधिनी।
ऐसा हो तो स्त्रीको दूध अधिक पीनेके लिये देना चाहिये और
बूरामें सफेद जीरेको पागकर इसकी कतलिये खानेके लिये
दे इससे दूध उतर आवेगा।
जब तक वालक माता का दूध पीवे तबतक बालकका जी-
वन माताके ऊपरही निर्भर है, माता जो कुछ द्रव्य खाती है,
स्तनोंका दूध उसके अनुरूपही होता है, इस समयमें संतानको
पीड़ा माताके कारण होती है। इसकारण माताकी स्वास्थ्य
रक्षा करने पर बालकको और किसी प्रकारकी पीड़ा नहीं होती
माताको औषधी सेवन करनेसे वालककीपीड़ा दूरहोजाती है। हे
वहन!अवमैं तुझे जननीको क्या करना कर्तव्य है वह बताती हूं।
जननीका कर्तव्य।
हे वहन ! जननी सभी स्त्रियें होती हैं, जिनके पुत्र नहीं होता
वह अपने को चिरदुःखिनी मानकर दिन रात कुढ़ती रहती
हैं, पुत्रके तोतले वचनोंको सुन उनका मन अत्यन्तही प्रसन्न
होता है. पुत्रकी मंद मुसकानको. देखकर माताके प्राण पुल
कायमान हो जाते हैं, पुत्रकी मंद २ चालको देखकर माता
के आनंदकी सीमा नहीं रहती; इससे बढ़कर आनंद इस संसा-
रमें दूसरा नहीं है। इस कारण सभी स्त्रिये सुखकी लालसासे
पुत्रकी कामना करती हैं। अपने असीम कष्टको भी पुत्रप्राप्ति
पर सुख मानती हैं, पुत्रका सुधारना और विगाड़ना यह माताही
के अधीन है।
बालक इस संसारमें क्या लेकर आयाहै. जिस समय वह
पैदा हुआ तब उस पर क्या था। यह क्या संभव था कि, इस
जरासे बालककी मानसिक वृत्ति इतनी पुष्ट हो जायगी। यह
२

जननी,धात्रीशिक्षा और प्रसव ।
( १८७)
वालक अपने साथ कुछ नहीं लायाहै, यह केवल बीज लेकर
आया, उसी वीजसे वृक्ष उत्पन्न करना जननीका कर्तव्य है।
यदि वह इच्छा करेगी तो इस वृक्षको बचालेगी, और नहीं
इच्छा करेंगी तो यह वृक्ष नष्ट होजायगा।
"इस संसारमें बालककी रक्षा करने वान करनेका भार स्त्रियों
केही हाथ है यदि संतान वालकपनसेही कुशिक्षित होजाय तो
फिर वह बड़े होनेपर कभी नहीं सुधर सकता; जो वालक
बचपनसेही लोभी क्रोधी होगा तो फिर बड़े होने पर कभी नहीं
सुधरेंगा, परन्तु वह कहीं लोभी और क्रोधीथोड़े ही उत्पन्न हुआ
है उसको तो इसकी शिक्षा मिली है।
बहुतसी माताओंको यह कहते देखा है कि, ऐसे कुकर्मी
पुत्रसे तो मेरी कोख बंदही रहती तो अच्छाथा, "फिर क्या
करूं मेरे भाग्यमेंही ऐसी संतान लिखीथी" यह उनकी बड़ी-
भारी मूलहै, संतानका बुरा भला होना किंचित् मात्रभी
भाग्यके ऊपर निर्भर न रक्खें यह सभीजननीके उपरनिर्भर है।
संसारमें पुत्रं उत्पन्न होना कोई कठिन कार्य नहीं है। वरन
संतानका लालन पालन करना बड़ा कठिन कार्य है। जिस
रीतिसे वालकका लालन पालन किया जाता है और जिस
रीतिसे वालकके स्वास्थ्यकी रक्षा माताको करनी चाहिये,वह
मैं तुझे वताती हूं; प्रथम कुछ थोड़ीसी वालचिकित्सा वता-
कर फिर शिशुपालन वताउंगी।
बालचिकित्सा।
हे बहन ! वालकको पीड़ा सदा होती रहती है, वालकके
मनका भाव देखने में केश होनेके कारण बालकको पीडाकी
-

(१८८) स्वीप्रबोधिनी। चिकित्सामें इतना केश बोध होता है, माता जिसप्रकार अपनी संतानके मनका भाव समझ सकती है, उसप्रकार और कोई भी नहीं जान सकता; नीचे संक्षेपसे वालकोंकी पीड़ा और उनके रोगकी पहचान तथा उन रोगोंकी औपधी भी बताती हूं। साँसकी पहचान-हे वहन ! जिस समय इवास लेते समय बालकके नाकसे सुर जल्दी २ चलते हों और फैल जायँ तो जानलो कि, वालककी छातीमें दर्द है; इस रोगमें वालककी आंखें पथराने लगती हैं। वालकको श्वासलेनेमें अधिक पीड़ा होती है। पेट फूलजाता है, होंठ नीले पड़ जाते हैं वालककी आंखें घूमती रहती हैं। मुंह लाल और सफेद पड़ जाता है ऐसी अवस्था में वालकका इलाज बड़ीसावधानीसे करना चाहिये। आँखोंकी पहँचान-सुखमें तो वालककी आँखें साफ रहती हैं, और जब बच्चेको कोई रोग होता है, तब उसकी आँखोंकी त्योरी बदल जाती है ले मैली रहती हैं, उस समय जानना चाहिये कि, बच्चेके शिरमें वीमारी होनेवालीहै। नींदका नआना-जिस समय वालक रोजकी भाँति न सोवै और माताकी गोदी में ही रहना चाहै, चौंक पड़े तो जानलो कि, वालकका स्वास्थ्य ठीक नहीं है। बालकके रोनेकी पहँचान-जिस समय वालक वार २ रोवै तौ माताको देखना उचित है कि, बालक और दिन- कीही तरह रोता है या उससे आज अधिक रोता है, जो नारन

जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव ।
(१८९)
1
किसी भाँति न चुपै तौ जानलो कि वालकको कोई रोग होने
वाला है, इस अवस्थामें माताको बड़ी सावधानीसे बालककी
चिकित्सा करनी चाहिये।
बालकका खाँसना-जव वालकको शरदी होजाय
और वह वार २ खाँसने लगे; आवाज पड जाय तो जानलो
कि यह खांसी शरदीसे हुई है कभी कभी २ इसरोगमें वालक
की पसली भी चल निकलतीहै, इस खाँसीका इलाज भी
वहुत जल्दी करना चाहिये।
माताकी पहचान-हे वहन ! प्रथम तो बालकको टीका
लगवा देना ही ठीक है वाजे २ वालकोंके टीका लगनेपरभी
माता निकल आती हैं, उनकी भी पहँचान बताती हूं।
इसमें प्रथम बुखार आता है वच्चेके दिलपर बहुत घबडाहट
और वेहोशी रहती है, फिर तीसरे दिन वालकका सारा शरीर
लाल पड़ जाता है, और माथेपर खसखसकी वरावर छोटे २
दाने दिखाई पड़तेहैं। इस समय वालकको वड़ी होशियारीसे
रखना चाहिये इसमें वालकको कुछ औषधी न दे।
टूंडीका पकजाना इसमें पहले तो दीवेका तेलही
मुफीद है, और दूसरा इलाज यह है, हलदी लोध परनींगके
फूल इन सवको वारीक पीसकर शहतमें मिलाकर टुंडी
पर लेप करें।
खालका लगजाना-अक्सर वालककी खाल लगजाती
है.जांधें लग जातीहैं.इसका इलाज यह है कि,बालककेतेलकी
लोई करके फिर पीछे गरमपानीसे न्हिला डाले।

(१९०) स्त्रीप्रबोधिनी। दूध डालना-जो वालंक थोड़ा २ दूध डालता हो तो कुछ हर्पकी बात नहीं है इससे बालक की छाती हलकी रहती है; और जो अधिक दूध डालता हो तो उसका उपाय यह काकड़ासीगी; मोथा, पीपल इनको पीसकर शहतमें मिलाकर चटावे। दूध न पीना-इसका लक्षण पहलेही देखले कि, किस पीड़ासे वह दूध नहीं पीता है, जिस जगह वालकका र २ हाथ पड़े वहां जाने कि, इसके इसी स्थानपर दर्द है, या इसको इन रोगोंमेंसे कोईसा है; या गर्भिणीके दूध पीनेसे उसके मंदाग्नि होगई है तो जैसा देखे वैसा उपाय करै, नीमके पत्ते, पटोलके पत्ते, कटेलीके पत्ते, गिलोयके पत्ते इन पत्तोंको औटाकर उसके पानीसे स्नान करावे। हसलीका जाना-जो बालक रोताहो दूध न पीवे तौ उसे दाईको दिखोकर मलवाना चाहिये और नींबूके पत्तोंकी धूनी दे, गुंजाकी माला पहरावै । कागका लटक आना वाल- कका काग गरमीसे लटक जाता है, वालक दूध नहीं पीता, और दूध पीकर उसी समय डाल देता है, रोया नहीं जाता इसको बड़ी चतुराईके साथ चूल्हेकी राख और काली मिर्च पीसकर उंगलीमें लगा ऊपरको काग उठादे। आँखका दुखना-हे बहन! बालककी आंखें दुखनेके कई कारण होते हैं कभी गरमीसे होजातेहैं और कभी शरदीसे तथा दांतनिकलनेमें भी दुखती हैं, छोटे बालकके कानों में कडुआ तेल डालना उचित है, और जो बालक माताला दूध पीताहो तो उसकी माताको बड़े परहेजसे रहना चाहिये जननी,धात्रीशिक्षा और प्रसव । (१९१) " नोन, मिर्च, खटाई, गरमवस्तु वादीकीचीजें इनमेंसे कुछ भी न खाय,और रसौत को घिसकर उसके पानीका लेप वालक की आंखों पर करै. और भीतरभी एक बूंद डालदे, पीली मिट्टीकी टिकियें बनाकर घड़ोंपर रखदे और रातको सोते समय वालककी आँखोंसे बांधदे-और गेरूके फायेभीवांधने चाहिये-जो आंखें दांतों की होती हैं उनका आराम होना जरा कठिन होजाता है. जब तक दांत नहीं निकलआते तव तक आंखें दुखती ही रहती हैं। पेट चलना-जव वालकका पेट चलै तो वेल, कत्था, धायके फूल, लोध, वड़ी पीपल इनको पीसकर शहतमें मिलाकर चटावे वड़ी हड़, काला नोंन, हींग यह पानीमें घिसकर पिलादे । कुड़ेके वीज,हलदी, बड़ी हड़,काकड़ासींगी पानी में भिगोकर वह पानी वालकको पिलाव या इन्द्रजौ, नेत्र- वाला, नागरमोथा अतीस, सोंठ इनका काढा पिलावै । खांसी-जव वालकको खांसी हो जाय तो पीपल अतीस मूल, काकड़ासींगी इन सबको पीसकर शहतमें चटावे या बहेड़ा, कालानोंन, भुटेकी छूछ इनकी जला छाई कर वालकके माके दूधमें घोल कर पिलावै ।अथवा वंशलोचनको शहतमें मिलाकर चटावैवा विलायती अनारका छिलका जला- कर उसकी छाईकर उसे तीन चार वार चयावै. तथा बहेड़ेको भूभलमें भूनकर उसं राखको वालकको चटावै । और जो खांसी वा अतीसार संगहो तो अतीस पीपल.मोथा सहतके साथ चटावै । ज्वर अतीसार । अतीस, पीपल, काकडालींगी,नागर मोथा इनको पीस कर वालकको चटावै इससे खांसी और दूध गिरना भी बंद होजाता है।

(१९२)
स्त्रीप्रबोधिनी।
रक्तातिसार-जब बालकके दस्तके साथ खून आवै तौ
पाषाण भेद और साठा पानीमें घिसकर पिलावै ।
आंवकाअतिसार-जिस बालकके दस्तोंमें आंव आती-
हो तौ वायविडंग, पीपल, अजमोद, कुड़, कुड़ेके वीज, सपेद,
जीरा इनको एकसाथ पीसकर मिश्री डाल पीनेकेलिये दे।
आंवखूनके दस्त-यह वालकको होते हों तो कच्ची
पक्की सौंफको पीसकर उसमें कच्ची खांड़ मिला चूरनकी
भांति वालकको चटावै या सोंठका मुरब्बा, खानेको दे, या
मरोड़फली सैंधे नमकके साथ घिसकर दे।
मुँह आजाना-शीतलचीनी और पपरिया कत्था पीस
कर शहतमें चटावै । और जो सफेद मुँह आगया हो तो जिस
कपड़ेसे पोता फेरा जाता है उसकी दो तीन बूंदै उसके मुंहमें
निचौड़दे इससे जाता रहेगा।
ज्वर-जब वह वालकको आने लगे तो इसमें दो एक
दस्त करादेने उचित हैं. इस कारण दो तीन चमचे अंडीका
तेल पिलादे।
संग्रहणी-छटांक भर चूना परातमें रखकर ढाई सेर
पानीसे धीरे २ पतली धारसे तर्त्ता दे, इससे वह घुलजायगा,
उस पानीको निखारले और दूधमें थोडा सा मिलाकर दिनमें
चार पांच वार चटावै।
काँचका निकलआना-बालकके मूत्रसेही उसे आव
दस्त करादे, पुरानीचलनीका चमड़ा जलाकर उसके पानीको

जननी,धात्रीशिक्षा और प्रसव ।
(१९३)
उस पर छिड़क, तेल लगाकर ल्हसोढ़ा लगावै, या आम
और जामनकी छाल और पत्ती इनको औटाय उस पानीसे
आवदस्त करावे।
हुचकी-गीला कपड़ा तालुयेपर रक्खै, नारियल पीस
कर शकर मिलाकर चटावै । रीठेको डोरेमें पिरोकर नारमें
पहरा दे।
चिनग-जिस समय वालक पेशाब करती समय रोवै
और अपनी पेशावकी इन्द्रियको बँचे तो जानलो कि इसे
चिनगकी बीमारी है उसकी औषधी यह है कि, चार पांच
डेली ववूलके गोंदकी कपड़ेमें बांध पानीमें भिगोदे, फिर उस
पानी में मिसरी मिला तीन चार बार दिन भरमें पिलावै ।
दांतोंके निकलनेका इलाज-जरासा चूनेका पानी
शहतमें मिलाकर वालकके मसूढोपर लगादे, दांत भली
भांति निकल आवैगे। धायके फूल और पीपलको आंवले
के रसमें रगड़ कर बच्चे के मसूढोंमें लगावै तो दांत अच्छे
निकलेंगे।
छालोंकी दवा-बालकके मुँहमें छाले पड़गये हों तो
पीपलकी छाल और उसके पत्ते इनको वारीक पीस कर
शहतमें मिलाकर चटावै हे वहन! इससे वालकके मुंहके छाले
अच्छे हो जातेहैं।
अधिक लार गिरै उसका इलाज-जो वालकके
मुखसे वहुत लार गिरती हो तो सफेद सरसों लोध,तिल इनका
काढ़ा कर शहद डाल कर बच्चेको पिलावे. जो थोड़ी लार
वहती हो तो उसका रोकना उचित नहीं है।

(१९४)
स्त्रीप्रबोधिनी।
बालकका पेशाब बंद होना-यदि बालकका पेशाब
बंद हो गया हो तो टेसूके फूलोंको पीसकर बालकके पेडू
पर लेप करदे पेशाब अच्छीतरह से आवेगा।
गुदा पकनेका इलाज-रसोतको पानीमें घिस कर
लगावै या शंख और मुलहटी को बारीक पीसकर लगावै ।
डरनेका इलाज-जो वालक डरताहो, या सोतमें चौंक
पड़ता हो तो मुगै की पूछके परको दोनों ओर घी लगाकर
आगपर रख कर धूनी दे तो बालकका डर जाता रहता है ।
और फटकरीकी धूनी दे।
सोतेमें दांत पीसनेका इलाज-जो बालक सोतेम
दांत पीसै तो भुरजीके भाड़का रेता उसके मुँहमें डालदे ।
नीलकंठके परको ताबीजमें मढ़कर गलेमें पहरादे ।
अधिक शर्दी-जो बालकको केवल शरदीही होगई हो
और बार २ छींकें लेता हो तो जरासी केसर दूधमें घोलकर
बालकको पिलादे और जाड़ोंमें तो दूसरे तीसरे दिन देता रहै।
पसली-यह रोग बालकोंके प्राणोंकाही लेनेवाला होता
है। बहुधा यह रोग अपवित्रतासे ही होता है इसमें बालककी
पसली चलने लगतीहै ज्वर आजाताहै कफ जम जाताहै.श्वास
जलदी २ चलता है, दस्त होतेहैं और नहीं भी होते, वालक
अचेत रहता है नाकके दोनों सुरोंमें गड्डे पड़ते हैं, पेटमें तीन
गड्डे पड़ते हैं-एक तौ बीचमें दो पसलियोंमें इसमें सुईके तरह
कांटा वालकके छिदता रहता है,ज्यादेतर यह रोग वालकको
शीसे होता है। इसकी औषधी यह है कि, मुर्गीके अंडेको
"

जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (१९५) फोड़कर उसके पानीको रुईकी फुरैरीसे तीनों गड्ढोंमें लगावै- एक बूंद कुछएक मुँहमें चुआदे-और गोरोचनभी जरासा खानेके लिये दे दूधमें घिस कर गोरोचन पिलाना चाहिये इस रोगमें दस्त भी करादेने चाहिये । और ऐलुआको पीस गरम कर वालककी पसलियों पर लेप करदे । वरांडीभी पसलीपर मलनी चाहिये। दोचार जगह स्यानोंसे झड़वाना फुकवाना भी चाहिये। हे वहन ! यह रोग बड़ा दुष्टहै. मैं तो इसे भुगते बैठीहूं वीसियों बालक इसी रोगमें चट पट मरजाते हैं, इसकी दौड़ बड़ी जलदी करनी चाहिये, इसीको मशान रोगभी कहते हैं शीतला-इसमें वालकको पहले दो तीन दिन तक बुखार आता है इसके पीछे नन्हे २ दाने निकलते हैं, उस समय तर कारी छौंकनी उचित नहीं घरमें किसीको स्नान नहीं करने देना चाहिये, जिस घरमें बालक रहे उसके द्वारपर आगकी अंगीठी भरी धरी रहे, शीतलाष्टकका पाठ कराना उचित है, ऐसे समयमें कुछ औषधी न दे; चौराहेमें दोनों वक्त मश्के छुड़वाव किसीको घरमें न आनेदे-घरके भीतर जो कोई भी जाय पहले अग्निपर पैर सेक कर पीछे भीतर जाय- वालकको खानेके लिये दूध आदि कोई वस्तु न दे, केवल भुने हुए आलू और रोटीका छुलका खानेको दे-नमक विल- कुल न दे; फिर जब वालककी माता ढालालेजॉय तौबालक का मुँह हाथ धुला कर उसको वाजार भेजना चाहिये-इसमें शीतलाका पूजन-और शीतलाका पाठ अवश्यही कराना चाहिये।

Ratot १९६) स्त्रीप्रबोधिनी। शिशुपालन। हे वहन! अब मैं तुझे यह बतातीहूं कि बालकका लालन पालन माताको किस रीतिसे करना चाहिये वालचिकित्सा जिस प्रकार तेरे उपयोगी है, उसी प्रकारसे बालकके लालन पालनकी रीतिभी तेरे काम आवैगी। १-माताको बालकके पालन करनेके विषयमें प्रथम धीरजकी अवश्यकता है। जो स्त्रियें संतानके तनक रोग होने परही अपने धीरज छोड़ देती हैं उनके लिये वालकका पालन करना बड़ा असंभव है। जननीको यही उचित है कि, यदि बालकको कुछ कष्ट हुआहो तो सावधान होकर उसकी चिकित्सा करै और उस समय वालकको कुछ वद- परहेजी न होने दे माताको उचित है कि, सोते समय वालकको अपना दूध कभी न पिलावै बहुतेरी स्त्रियें जिस समय वालक रोता है उसी समय जागकर वालकको गोदमें ले उठकर दूध पिलाती हैं लेटे २ दूध पिलानेसे वालकका कान बहनेलगता है, वह स्त्रियां इस वातको नहीं जानतीं कि, जरासे हमारे कष्टमें इस सुकुमार बालकको कितना कष्ट उठाना पडता है, यदिजो वह ऐसा जानती होती तो यह काम कभी नहीं करती २-इस कारण हे बहन ! माताको सर्वदाही सावधान रहना चाहिये, माताके समान लालन पालन करनेवालीका अभाव होने पर बालकभी जीवित नहीं रह सकता । यदि वह सुकुमार बालक अपने नेत्रोंसे एक मिनट भी अपनी माको न देखे तो वह कितना व्याकुल होता है, सभी समयमें वालक अपनी माताकी ही गोदीमें रहनेसे सुख मानता है । जब साव- जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (१९७) धानी करने परभी अनेक वालक मरजाते हैं तवं विना साव- धानी कियेकी तौ कौन कहै । वहुतसी स्त्रियें दास दासी या अपने कुटुम्बकी स्त्रियोंको वालक देकर निश्चिन्त हो जाती हैं परन्तु टहलनी हो या कुटुम्वकी स्त्रीहो माताके समान स्नेह और यत्नसे दूसरा कोई नहीं रख सकता । हे वहन ! विधाताकी कैसी अद्भुत लीला है कि, माताको जितनी संता- नकी ममता होती है उतनी और किसीकी नहीं होती । यह ममता केवल संतान पालन के लियेही है, इस ममताके होते हुए भी नव माता संतानका यत्न सहित पालन नहीं करती हैं तव इस प्रकारकी ममताके बिना हुए संतानका लालन पालन नहीं हो सकता। हे वहन ! किन र नियमोंसे वालकोंके स्वास्थ्यकी रक्षा करनी होती है उसे तो मैं तुझे आगेवताऊंगी । यह वात नहीं है कि, वालककी स्वास्थ्यरक्षासे ही वालकका लालन पालन नहीं हो सकता,वालकके पालनकरनेके विषयमें बहुतसीवातों पर ध्यान रखना स्त्रियोंको अवश्यकर्त्तव्यहै; वह सभी वार्तं तुझे वताती हूं। वालकको यल सहित रखनेकाही नाम वालकका लालन पालन है, वालकको किस समय क्या करना चाहिये, इस वातको स्त्रिये भली भांतिसे नहीं जानतीं, इसीलिये वह निय- मभी मैं तुझे बतातीहूं। १-दिनमें जितनी बार वालकको दूध पिलायाजाय उतनी- ही वार पिलाना चाहिये उससे अधिक न पिलावै ।

(१९८) खीप्रबोधिनी। २-जिस समय वालक सोताहो उस समय उसे सोने देना चाहिये, उसकी नींद भंग करनी उचित नहीं । ३-कच्ची नींदमें वालकको कभीनजगावै,कच्ची नींदमें जाग- कर वालक सारे दिन रोता है और उसे बड़ा कष्ट होता है। ४-भीगे कपड़ोंमें बालकको कभी न सुवावै करण कि, इससे बालकको बड़ी ठंढ लगजाती है । वालकके नीचेका पोतराबार २ वदलना उचित है जो स्त्रियें वालकको सारीरात भीजेमें रखती हैं इससे कितनी हानि होती है वह इस वातको नहीं जानतीं । बालकके पेशाव पाखाने फिरनेके समयमें वह आलस्यके मारे उसे खाट परही करने देती हैं, अपनी कायाको कष्ट नहीं देतीं इसी कारण विचारा वालक सारीरात भीजेमें पड़ा रहता है और माता सन सन सोती रहती है। फिर वालक रोगी होजाय तो इसमें आश्चर्यही क्या है वालक शरदी लगने- के करण अनेक कष्ट पाता है, और इसी शरदीकी पीड़ासे वे अकाल मृत्युको प्राप्त होजाते हैं। माताको उचित है कि, बालकको पाखाने पेशाव करानेका अभ्यास डालें, यह तो उनकेही आधीन है, जो स्त्रियें वालक को बार २ पाखाना पेशाव नहीं कराती हैं, उनके वालकको कोई डरके मारे गोदमें भी नहीं ले सकता इस कारण इस वात परभी माताको अवश्य ध्यान देना उचित है। ५-बहुतसी स्त्रिये बालकको ठंढेपानीसे ही निहलाती हैं और आपभी दिनमें कई बार स्नान करती हैं, उनको इस " जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (१९९) वातका ध्यान नहीं रहता कि, हमारे नहानसे बालकको ठंढ होजायगी, यदि वह स्त्री स्वयं स्नान करे तो शरीर पर प्रथम तेल मलकर पानीको औचकर उससे स्नान करै और बाल- ककोभी दूसरे तीसरे दिन तेल मलकर स्नान करावे । ६-यह तो मैं तुझे प्रथमही वताआई हूं और अवभी बताती कि, वालकका पालन करनेके लिये माताको भी अपना शरीर और स्वास्थ्य ठीकरखना उचितहै। नहीं तो किसी प्रकार वालकका पालन नहीं होसकता यदि माताको कुछ रोग होगा तोवालकको भी अवश्य वही रोग होजायगा। यदि माता सदा रोगी रहती हो, दूसरेकी निन्दा करनेवाली हो, कलेश करने वाली हो, चोरी करनेवाली हो, सदा झूठ बोलती हो, तव संतान भी उसी प्रकारकी होजायगी। हे वहन | वालकोंका पालन करना कोई सहज बात नहीं बालकके पालन करनेमें माता अपने तनकी सुधिभी भूल जातीहै, और उसका वालककी ओर ही ध्यान रहताहै। इसी कारणसे सभी स्त्रियोंको उचितहै कि, बालकके ऊपर विशेष ध्यान रक्सैं । संतानका सुख दुःख माताहीके ऊपर निर्भरहै । शिशुस्वास्थ्य रक्षा। हे वहन ! अव मैं तुझे वालकके स्वास्थ्यकी रक्षा बताती जिस प्रकारसे वालककी स्वास्थ्य रक्षा होकर शरीर दिन २ पुष्ट होता है। ताप-सोहढके घरमें तापका रखना भी अत्यन्त प्रयोज- नीयहै सर्वदा कोयलोंसे भरी दहकतीहुई अंगीठी प्रसूतीके घरमें धरी रहै, इससे बालकका शरीर क्रमसे तेजवान और

' (२००)
बीप्रबोधिनी।
पुष्ट होजाताहै, शरीरमें रुधिरके आने जानेकी क्रिया तीक्ष्ण
होजातीहै श्वासप्रश्वासभी भलीभांति चलतारहताहै उस अँगीठी
में हाथ सेंकरकर बालकके शरीरको सेकना उचितहै।फिरतेल
गरमकर सुहातार तेल वालकके शरीर पर मलना कर्तव्य है।
ऐसा जो करा जायगा तौ वालकको शर्दी होना तो दूर रहा
वरन् कोई रोग नहीं होगा।
स्नान-बालकको दूसरे तीसरे दिन स्नान कराने में कुछ
हानि नहींहै, भली भांतिसे वालकके शरीरपर सरसोंका तेल
मलकर शरदीमें गरम पानीसे और गरमीमें धूपके धरे पानीसे
स्नान करावै, परन्तु वालकको बहुत देरतक जलमें भिगोना
उचित नहीं उसीसमय उसका सव शरीर पोंछ डालना
चाहिये।
वस्त्र-वालंकका शरीर सदा ढकारखना चाहिये, आंगनमें
उघड़ा कभी न सुलावै जव सुलावै तब ढककर सुलावे, उघड़े
रहनेसे बालकको बड़ी शरदी होजातीहै तथा दृष्टि लगजातीहै
इसकारण गरमियोंमें तो पतले और साफ कपड़ेसे वालकको
ढककर रक्खै और जाड़ोंमें गरम कपड़ोंसे ढककर रखना
उचितहै।
आहार-वालकका प्रधान आहार स्तनका दूधहै, यह मैं
तुझे पहलेही वताआईहूं, स्तनोंमें दूध न होनेसे वालकके जी-
वित रहनेमेंभी संदेह है। परन्तु अत्यन्त स्तन पिलानेसे मा-
ताका स्वास्थ्य भंग होसकताहै, यही नहीं वरन्, बहुतसी
उन्मत्त होजातीहैं, स्तनमें किसीप्रकारकी पीड़ा होजानेपर
बालकको स्तन नहीं पिलाना चाहिये. स्तन पिलानेका समय

जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (२०१) वांधलेना चाहिये, इससे देखोगे कि, वालक ठीक उसी समय जागताहै,इसकारण वालक और माता दोनोंके विश्राममें विघ्नन होगा वालकके रोतेही उसको स्तन पिलाना कदापि उचित नहीं इससे वालकको एक प्रकारका कुअभ्यास हो जायगा और दूध न पचते पचते दूधके पीनेसे पेटमें जलन पड़ने लगेगी।रात्रि के समय निद्रावस्थामें दूध कभी नहीं पिलाना चाहिये। इस प्रकारकी अवस्था में स्तन पीकर बहुतसे बालक मरगये हैं स्तनोंको उघाड़े रखना किसी समयभी ठीक नहीं, इससे स्त- नोंमें फोड़े होजानेका डर है। हे वहन ! जव वालक चार पांच महीनेका होजाय तो उसे गायका दूध आधा पानी मिलाकर पिलाना चाहिये परन्तु इतना अवश्य ध्यान रहै कि, वालकको ठंढ़ा दूध किसीसमय पीनको न देवै और न वासी देवै वालकको दूधके अतिरिक्त और कुछ खिलाना न चाहिये। वायु-जिससे बालक साफ और शीतल हवाको सेवन कर सकै इसके उपाय करनेका भी प्रयोजन है,वालक अच्छी हवाके लगनेसे हाथ पैर हिलाकर खूब खेलेगा, इससे उसके परि- श्रममें उसका भोजनशीघ्रही पचजायगा।और वालककाशरी- रभी दिन २ पुष्ट होता रहेगा, पवन ही मनुष्यके जीवन धारण का मूलाधार है। पवनके खराव होनेसे सभीको पीड़ा उत्पन्न हो तीहै। तब फिर वालकको यदि रोग होजाय तो इसमें आश्चर्य क्या है ? निद्रा-हे वहन ! ऐसा देखाजाताहै कि, बालक उत्पन्न होनेके पीछे ५-६ सप्ताहतक सोता ही रहताहै,केवल भूखके स- (२०२) खीमबोधिनी। मय जागताहै, और दूध पीकर फिर सोजाताहै यह स्वाभाविक बात है। गर्ममें रहनके अभ्यासको वालक सरलतासे नहीं मूलसकता। इस प्रकार जब बालक जागै उससमय किसीको वालकके सन्मुख जाना उचित नहीं इससे वालकका मन सह- सा उत्तेजित होजाताहै,और उसे बड़ा कष्ट होता है वहुधा स्त्रि- ये बालकको थपकोर २कर सुलाया करती हैं,ऐसा कभी नहीं करना चाहिये, यह वडा अन्यायहै, इससे बालकके मस्तक पर आघात लगताहै इससे मस्तक निस्तेज और शरीर दुर्वल हो जाताहै, इसके अतिरिक्त यह बुरीवान पड़तीहै। जहां एकवार वालकको इस प्रकारसे सुवाया फिर विना थपकोरे हुए वालक सोता नहीं। दांत-वालकोंको दांत निकलनेके समय अनेक भांतिके कष्ट भोगने पड़तेहैं, अधिकतर इसमें पेटकाही रोग होताहै। इस समय माताको बड़े पथ्यसे रहना चाहिये। टीका-जव बालक चार पांच महीनेका होजाय तब उस के टीका लगवा देना उचित है, इसमें केवल दो तीन दिन बु- खार आता है बालककी वाहोंको बड़ी सावधानीसे रखना चा- हिये जिससे फफोले फूटने न पावै ऐसा यत्न करना उचितहै माताकीस्वास्थ्यरक्षा-विनामाताकी स्वास्थ्य रक्षा हुए सन्तानका स्वास्थ्य कभी ठीक नहीं रहसकता, बहुतसी स्त्रियें अपना परहेज कुछ नहीं करती इसी कारणसे उनका बालक रोगी रहताहै, तब वह यह कहतीहैं कि, इतनी सावधानीसे तो बालकको रखतीहूं, फिर नहीं कहसकती कि, इसको रोग कहां से दौड़आताहै। उसका कारण यहीहै कि, वह अपना परहेज़ जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (२०३) नहीं रखती इसमें अधिकतर तौमाताकोही बड़े परहेजसे रहना चाहिये, हे बहन ! किसीकी कहावतहै कि "तीन वरस घालै तो एक बालक पाले" तीन वर्पतक वालककी माको परहेजसे रहना चाहिये । वालककी स्वास्थ्यरक्षाके साथही साथ माता केभी स्वास्थ्यकी रक्षा होजायगीअधिकतर माताके भोजनपर वालकका स्वास्थ्य ठीक रहताहै, इसी कारण माताको ऐसी वैसी कोई चीज नहीं खानी चाहिये, बहुतसी स्त्रियें अपने खानेपर कुछ ध्यान नहीं रखती स्वादके मारे अलाय वलाय सभी कुछ भखजाती हैं, वह स्त्रिये वडी मूर्ख हैं जिनको अपनी संतानका ध्यान नहीं रहता इसी कारणसे उनकी बहुतसी संतान अकालमेंही मरजातीहैं उनको घोर पाप लगताहे ऐसी कौनसी माताहै जो संतानको पालन करनेमें कसर करेगी, परन्तु वह अपने भोजनमें ध्यान नहीं देती इसीसे बहुतसे वालक अकालमेंही मृतक होजातेहैं। शिशुशिक्षा। हे वहन ! वालकके पालन करनेके साथही साथ वालकको वालशिक्षा देनेकी आवश्यकताहै, जिनवालकोंकोवालकपनसे उचित शिक्षा मिलेगी फिर वह बड़े होनेपर कभी कुमार्गगामी नहीं होंगे इसीकारण माताको चाहिये कि, जव वालक कुछ होशियार होजाय तभीसे उससे वर्णमालाके अक्षर बुलवा जब वह इनको बोलनेलगैं तो खाने पीनेकी वस्तुओंके नाम बुलवा जैसे 'पानी-रोटी' इत्यादि जो दो दो अक्षरके हों और जिनसे रोज काम पड़ताहो जैसे कि "चाचा, दादी, लाला, अम्मा, चाची, बुवा, नानी, मामा इनकोभी खूब बुल- (२०४) स्त्रीप्रबोधिनी। वावै, फिर जब इतना होजाय और बालक कुछ समझनेलगै तो ५२ प्रकारके बहुतसे खांड़के अक्षर वनवावै जैसे कि, दिवा- लीमें खांडके हाथी घोड़े आदि बनाकरतेहैं, और वालकको जो खानेके लिये मीठा दियाजाताहै उस स्थानमें इसी मीठेको दे और उनको पहँचान करकै जैसे कि क, ख, ऐसा होताहै, दो तीन दिनतक "क" अक्षरही खानेको दे और कहती जाय कि आज तैंने "क" खाया फिर इसी भांति "ख" दे फिर धोखा देकर जब बालक "ख" मांगै तो उसे 'क' देदे जो वह लेले तो उसे सावधान करै कि, देख कौनसा अक्षर है जो वह बतादे कि यह “ख” नहीं है "क" है तब उसे एकके पलटेमें दो देदे, इसी भांतिसे अक्षरों की पहचान करावै । एक काम और भी करै कि, उनके कपड़ों पर भी रेशमके डोरेसे अक्षर काढदे, जिससे वह पहँचान जाय कि,यह उस अक्षरका कपड़ा है। या उस खिलौनेको जो मैंने तुझे दिया उससे पढ़ाना सिखा- वे उस्सेभी बालक बहुत जल्दी पढ़सकताहै, उसके पढ़ाने की रीति मैं तुझे पहले वताआईहूं उसीके अनुसार वालकको प्रथम पुस्तक पढ़ा देनी उचित है जिस रीतिसे मैंने तुझे पढ़ायाथा, उसी रीतिसे पढ़ाना सभीके उपयोगी होगा। बालकपनही बालकोंकी शिक्षाका समयहै, इस समयमें वा- लक जितनी जल्दी सीखताहै बड़े होनेपर उतनी जल्दी नहीं सीख सकता, जिस प्रकारसे दिन २ वालक बढ़ताजाताहै उसी प्रकारसे बालशिक्षाभी अवस्थाके अनुसार वालककी मान- सिक वृत्तिको ऊँचा करतीहै। यदि माता बालककी शिक्षाके विषयमें ध्यान नहीं देती जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (२०५) तो वालक जिस रीतिसे चारों ओर को देखताहै वही वातैं सीख- ताहै । जिस दिन वालक आँखें मलकर चारों ओरको देखताहे उसी दिनसे मानों उसकी मानसिक शिक्षाका नाश होगया। उसी दिनसे वह अपने मनमानी घरजानी वातें सीखनेलगा। यदि माताको उसने क्रोध करते हुए देखा, तब वहभी गुस्सा करना सीखजायगा। और जो माता उसे हटकेगी तब तो उ- सका गुस्सा दिन २ वदजायगा। यहां पर हे वहन! मैं तुझे अएक कहानी सुनाती हूं माताके विना सुधारेहुए बालक कभी ठीक नहीं होसकता। बालकपनमें वालक माताके पाससे जो कुछ सीखताहै, वह कभी नहीं भूल सकता, वालकपनमें माताकी शिक्षा उसके हृदयमें जमजातीहै बड़े होनेपर सैकड़ों उपाय करनेपर भी वह वालक उस भांति नहीं सीखसकता, इस वातको सभी जानती हैं कि, वालक अपनी मातासे ही पूछा करते हैं कि 'अम्मा ! यह क्या है यह क्या है ' माता यदि उस वस्तुको कुछका कुछ वतादे तो वालक उसको वही जानेगा, पीछे सैकड़ों वातोंके जानने परभी वालक उस चीजको नहीं भूलैगा। कहानी-हे वहन ! आमेरिकाके युद्ध समयमें जिस मनु- प्यने जो वीरता और सहायता प्रकाश की थी, वह मनुष्य वालकपनमें रोया करता तो माता उसे घरके कुछ दूर जाकर कह देती कि,यह जो पेड़ है इसके भीतर भूत बैठहै,और जो तू अवकी वार रोया तो तुझे मैं इसे देदूंगी जब वह बालक बड़ा होगया, और अनेक भांतिकी पुस्तकोंको पढ़गया, तब वह -

(२०६)
स्त्रीप्रबोधिनी।
भूतका यकीन नहीं करता, वह यह कहता कि जमीनपर भूत
कभी नहीं रहसकता; भूत तौ क्या वह किसी भयदायक वस्तु-
से भी नहीं डरता था।
हे बहन ! जब युद्ध समाप्त होगया और वह आदमी
अपने घरको लौटा रात्रि अँधेरी घोड़ेपर चलाजारहाथा
चलते २ उसी माताके बतायेहुए पेड़के नीचे पहुँचा तो
उसी समय माताकी वह बात याद आगई यह बात सच्चं थी
कि, वह उस समय कुछ भय नहीं करताथा, परन्तु उस समय
उसको आपसे आपही भय लगा, तब उसने देखा कि, वह
बिकटाकार भूत अपनी भयंकर मूर्तिको निकालेहुए मुझे
पकड़नेके लिये दौड़रहाहै। उसने डरके मारे आंखें मीचली;
फिर मूच्छित होकर जमीनपर गिरपड़ा।
इतने ही घोड़ेके पैरोंका शब्द सुनकर उसकी मा और
उसके भाई द्वारपर देखनेके लिये आये; जाकर देखा कि, वह
वीर पुरुष जमीनपर अचेत पड़ाहै,घोड़ा इधर उधर फिर रहाहै
तब उनकोबड़ा आश्चर्य हुआ और उसके निकट गये जाकर
देखा कि, उस समय वह मनुष्य मृतक होगयाहै।
हे वहन ! मेरे इस कहानी कहनेका यह अभिप्राय है कि,
माता जिस प्रकारसे बालकको शिक्षा देगी, बालक वैसीही
सीख सीबंगा । बालककी शिक्षासम्बन्धमें माताको क्या
करना चाहिये वह मैं तुझे आगे बतातीहूं।
अभ्यास और संग।
अभ्यास-अभ्यास शिक्षाका-प्रधान अंगहै; एक प्रका,
रसे अभ्यासको मनुष्यका दूसरा स्वभावभी कहाजासकता है,

जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव ।
(२०७).
कारण कि, यह साधारणमें देखा जाताहै कि, संसारमें मनु-
ष्यके स्वभावके अतिरिक्त और कुछ नहीं है, जैसे कि, विना
भोजन मिलेहुए जीना असंभव है, उसी प्रकारसे अभ्यासहै
सभी मनुष्य पृथ्वीमें अभ्यासपर निर्भर करतेहैं । उसीप्रकार
वालककी अवस्था अभ्यासपरहै, जैसी आदत डालोगी वैसी
आदत पड़ेगी इसमें अधिकतर माताकोही सावधान रहना
चाहिये।
हे वहन ! जिससमय वालक जन्म लेताहै उस समय वह
कुछ नहीं जानता जव माता उसे पीनेको दूध देतीहै तभी वह
पीताहै,उस अवस्थामें माताजैसी आदत वालककी डालैगीवा-
लकवैसाही होगामांअच्छीआदत डालैगी वालक अच्छा होगा
और बुरी आदत डालैगी तो दुष्ट प्रकृति होगा। बालक जिस
समय भोजन करनेको वैठे माताको उचितहै कि, उससमय
उसको चुप चाप खानेदें भोजन करतेसमय वालकको चलने
फिरने दें, मैले कपड़े पहरनेकी आदत न डालें, भोजन खा-
नेके उपरान्त हाथ मुँह भली भांतिसे धोनेकी वान डालें।
वालकके पेशाव आदि फिरनेपर हाथ पैर धोनेको कहैं,चौके में
न घुसने दें, किसीकी चीजको देखकर जो वालक मचलजाय
और कहै कि, मैं यही लूंगा तो उस समय उसकी इस हठको
पूरा न करें, जो यदि वह उसी समय वही वस्तु मँगादेगी तो
आगे को उसको वही वान पड़ेगी प्रभातकाल होनेपर वालक
को परमेश्वरके नाम लिवाने सिखावें, इससे भगवान्में भक्ति
उत्पन्न होगी। गाली देनेकी वान कभी न डालें, बहुधा स्त्रियें
वालकको छोटेपनेपर गाली देना सिखातीहैं, उस समय तो
"

(२०८) स्त्रींप्रबोधिनी। उसके तोतले २ वचनोंसे वह गालिये सभीको अच्छी लगती- हैं, परन्तु बड़ेहुए पर सभीको बुरी लगती हैं फिर वह सैकड़ों उपाय करतीहैं परन्तु बालक अपनी आदतको नहीं छोड़ता। हे वहन ! संतानके प्रति माताका ध्यान न देने में आगेको वालकके लिये बड़ी खरावी होतीहै । माताके दोषसे ही संतान विगड़तीहै और वह माता रात दिन संतानको देख कर जला करतीहै। स्त्रियोंको उचितहै कि, अपनी संतानके. प्रत्येक कामोंकी ओर अवश्य ध्यान रखें। संगति-यह भी काम माताका ही है कि, वह अपने वा- लकोंको जैसी संगतिमें बैठालेगी वैसाही गुण आवेगा किसी- ने कहाहै कि। दोहा-संगतिही गुण ऊपजे, संगतिही गुण जात । संगति बैठे नीचकी, आठों पहर उपात ॥ जो वालक वालकपनमेंही जुआरीके निकट बैठेगातो धीरेर जुआरी होजायगा, चोरके निकट बैठेगा चोर होगा, ठगके निकट बैठेगा ठग होगा, नीचके निकट वैठेगा नीच जातिकी बातें पसंद आवेंगी, बदमाशके निकट बैठेगा, बदमाशीसीखे- गा। पढ़े लिखेके निकट बैठेगा, पढ़ना लिखना सीखंगा, मूर्खके निकट बैठेगा मूर्ख होगा, गुणीके निकट बैठेगा गुण- वान होजायगा, पंडितके निकट बैठेगा पंडित होगा। परन्तु हे बहन ! माता इन बातोंको न जानकर अपने वालकोंको घरसे बाहर लंड़कोंमें खेलनेके लिये भेजदेतीहैं, फिर उनके वह बालक उनके हाथोंसे बाहर निकलजातेहैं, जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (२०९) tetitute फिर उनका सँभालना कठिन होजाताहै तव उस समय माता चैतन्य होती हैं, फिर संतानको मारना पीटना करती हैं, पर- न्तु वालक क्या कभी सुधर सकता है, कभी नहीं, वरन् इससे वालकको क्रोधही वढ़ता जाता है, फिर वह संतान अपने माता पिताका सामना करने लगती है। आखिरको उनकी संतान मूर्ख होजाती है। फिर वह चोरी करनेमें कमर बांधती है। परन्तु यह कसूर तो उन्हींका है। जब वह अपनी संतानको बुरी संगतिसे वचावेंगी कभी उनका सामना नहीं करेंगी, मेरे कहनेका यह मतलब नहीं है कि, तुम अपने वालकको घरसे वाहर न जाने दो । जिस समय वालक अपनी संगतिको ढूंढनके लिये बड़े व्याकुल होते हैं उस समय उनको श्रेष्ठ जातिके वालकोंके निकट खेलना चाहिये । इससे उनकी शारीरिक और मानसिक वृत्ति बढ़जाती है । परन्तु जिन लड़कोंके निकट तुम्हारे पालक खेलनेको जाते हैं उनका स्वभाव कैसा हैं, इस वातको भी देखना उचित है । विना स्वभाव जानेहुए उनके निकट खेलनेको न जाने दे। यदि किसीभांति वालकोंको बुरी संगति मिलजाय; उस समय उनको मारना नहीं चाहिये, कारण कि, मारनेसेवालक और भी खराब हो जाता है उसको उस समय समझा बुझा- कर लजित करना उचित है । जव बालक अपने गुणोंपर आपही लज्जित होजायगा, तौः अपने आप उस मार्गसे हट जयगा।

(२१०)
धीप्रबोधिनी।
हे बहन ! बालकके छोटे परही माताको अभ्यास और
संगति इन दोनों विषयमें ध्यान रखना उचित है । जो बालक
वालकपनमें ही पढ़ेलिंखोंके निकट बैठेगा तो वहभी पढ़ने
लिखनेको सीख कर धीरे २ पंडित होजायगा। और जिसके
चरित्र ठीक नहींहैं वह कभी नहीं पढ़ सकता चाहै वह सैंकड़ों
मदरसों में क्यों न पढ़ें।
अन्यान्यशिक्षा।
हे वहन ! पहले जो कुछ बताया यह तो बालकपनकी
शिक्षाथी जबतक वालक पढ़नेके लिये न जाय माताको
इन बातोंपर तभीतक ध्यान रखना कर्तव्य है। फिर जव
बालक पढ़नेके लिये जाने लगे उस समय माताको क्या
करना चाहिये वहभी मैं तुझे बताती हूं।
१-प्रथम तो जिस पाठशालामें पढ़ाई अच्छी होती हो
और जहां पंडित अच्छा गुणवान हो उस पाठशालामें लड़-
केको पढ़ने के लिये भेजे।
२-फिर पाठशालामें भेजकरही निश्चिन्त न होजाय, वह
पढ़नेके लिये जाता तो है परन्तु कुछ पढ़ताभी है या नहीं इस
परभी माताको अवश्य ध्यान देना उचित है। बिना इसके
देखे भले संतानका पढ़ना ठीक नहीं होता।
३-जिससे बालकका लिखने पढ़नेमें मन लगै और
उत्साह बढ़े वही यत्न करना उचित है उसके पढ़ने लिखनेको

जननी, धात्रीशिक्षा और प्रसव । (२११) सुनकर अच्छे २ प्रयोजनीय कपड़े बनाना और जूते आदि पहराना चाहिये । इसीसे वालकोंको पढ़नेमें उत्साह बढ़ताहै ४-स्वास्थ्य भी पढ़नेलिखनेका एक मूल कारणहै, जव वालकका स्वास्थ्यही ठीक नहींहै तो पढ़ना लिखना किसी प्रकार नहीं होता, और जो ऐसी हालतमें वह पढ़ेलिखे गया तो उसका स्वास्थ्य नष्ट होजायगा, इसकारण पढ़ानेके साथही साथ वालकके स्वास्थ्यकीभी रक्षा करनी माताको उचित है नियत समय में स्नान, भोजन, नियमसे सोना ऐसा करनेसे वालकका स्वास्थ्य कभी नहीं विगइसकता। फिर जव देखे कि, अब यह वालक पढ़ लिखकर हुशियार होगयाहै और इसकी अवस्थाभी युवा होनेको आईहै तो उससमय उसका विवाह करदेना उचितहै। कारण कि, आज- कल जिन लड़कोंका अवस्था आनेपर विवाह नहीं होता है वह वहुधा कुगार्गगामी होजातेहैं। इति पठसोपान समाप्त.

(२१२) वीप्रबोधिनी। सप्तमसोपान। की। धर्मोपदेश। हे वहन ! अवतक तो मैंने तुझे घरके कामकाज वताये परन्तु अब कुछ थोड़ा धर्म उपदेशभी बतातीहं । संसारमें सभी सनुष्योंको गृहस्थीमें रहना होताहै इस कारण जिस प्रकारसे संसारी सुख दुःख बीतते जातेहैं उसी- प्रकारसे मनुष्यका जीवनभी सुख दुःखोंको भोगकर समाप्त होताजाताहै। जिस स्थानमें मनुष्य रहताहै उसीको गृह (घर) कहतेहैं, परन्तु संसार एक विस्तारित विषयहै, गृह (घर) वागके बीचमेंका एक वृक्षरूपहै, और यह संसारही वागस्वरूपहै, घरके ओरे धोरेके घरोंमें और भी बहुतसे मनुष्य रहतेहैं। परन्तु उन सभी मनुष्योंके साथ मिलकर एक जगह रहनेका ही नाम संसारहै एक साथ रहनेपर किसी दूसरे मनुष्यके सम्बन्धमें कोई भी मनुष्य अज्ञानताका परिचय नहीं देस- कता। जिस प्रकार संन्यासियोंका घर नहीं होता. तव संन्या- सीही संसारसे अलग रहसकतेहैं, दूसरा कोई भी संसारसे अलग नहीं रहसकता । वरावरवालेके साथ सम्बन्ध, कुटुः म्बियोंके साथ सम्बन्ध, स्वजनोंके साथ सम्बन्ध, दुकानदा- रोंके साथ सम्बन्ध दास दासी इत्यादि सभी मनुष्योंके साथमें एक संसारी सम्बन्धहै। हे वहन ! इस संसारमें रहकर कोई मनुष्य इन सम्बन्धोंको नहीं भूलसकता। इन सर्व कारणोंसे की-धर्मोपदेश। (२१३) - संसारके स्थानविपयमें वा अवस्थाके सम्बन्धमें संसारका नाम नहीं है। संसारमें सभी मनुष्योंके साथ सम्बन्धके वशसे जो मनुष्यको करना उचित है उस कर्तव्यकेही अनुसार कार्य करके वास करनेकाही नाम संसारहै । इसी कारणसे सभी मनुष्य संसारीहैं। क्या असभ्य, क्या सभ्य, क्या अंग्रेज, क्यों जर्मन, क्या भारतवासी, क्या चीनी सभी संसारमें वास करतेहैं । हम हिन्दूहैं हम भी संसारमें वास करतेहैं; और २ जातियोंकी वनिस्वत हमारा संसारमें अधिक सम्बन्धहै हम संसारमें यात्रा कर एक धर्मकोही उस यात्राका अंग मानतेहैं हे वहन ! बड़े २ ऋपि मुनिभी प्राचीन शास्त्रोंमें यही लिख- गयेहैं । हम केवल एक अनके खानेवालेहैं। हम सबके साथ मिलकर रहना ठीक मानतेहैं । अंग्रेजलोग स्त्रीकोही साथ लेकर रहना पसंद करतेहैं, अधिक क्या वह विवाह होजाने- पर कन्याके माता पितासे कुछ सम्बन्ध नहीं रखते परन्तु हमारे यहां यह रीति नहींहै, हमैं तो सभीके साथ मिलकर रहना होताहै इन सबमें 'स्वामिनी' जिस समय स्त्री होतीहै उस समय मनुष्योंके सुख दुःखका भार उसी कीपर जाताहै। और २ देशोंकी अपेक्षा हमारे भारतवर्षकी स्त्रियोंके ऊपर गृहस्थका अधिक भार पड़ता है; भारतवर्पकी स्त्रियोंके ऊपर प्रथम तौ स्वामीकी सेवाका भार है, इसके अतिरिक्त फिर सा- सु,श्वसुर, देवर, नंद इत्यादिकी भी सेवा करनी पड़तीहै।अधिक क्या उनके ऊपर दरिद्र और भिखारियोंकी भी सेवाका भार है, स्त्रियें ऐसा कोई दिन नही होता जो अपने घर आयेहुए भिखारीको अन्न न देती हों।

. (२१४) स्त्रीप्रबोधिनी। राजा जिस भांतिसे धर्मसहित प्रजाका पालन करता है, धनी हो या दरिद्र हो परन्तु उसकी दृष्टिमें सभी समान जिस भांति वह सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्यसे लेकर की- ट पर्यन्त सभीकी समान रक्षा करता है उसी प्रकार जव स्त्री स्वामिनी हो जाती है उस समय बड़ेसे लेकर छोटे तक अथ- वा नौकर चाकरसे लेकर भिखारी तक सभीके लिये विचार करना होताहै; जो स्त्रियां ऐसा करती हैं उनका घर ऋद्धि सिद्धिसे भर जाता है और जो ऐसा नहीं करती उनके घरमें रात दिन क्लेश रहता है। हे वहन ! कर्ती होनेका काम कोई सहजवात नहीं है, क- ीं तो सभी होती हैं परन्तु जो कर्जीका कर्तव्य कार्य निवाहे वही यथार्थ कंत्री है; की होकर जो स्त्रियें घरके मनुष्यों पर अपना अधिकार जमाया चाहती हैं, उनका फल उलटा हो जाता है । विना नम्रता और प्रेम तथा दयासहित व्यवहार कियेहुए घरवालों पर अपना अधिकार किसी भांति नहीं जम सकता और घरवाले भी विना भाक्ति दया आदिके उत्प- न हुए किसी भांतिसे उसका मान नहीं करसकते; उसके कह- नेमें कोई नहीं चलता, उसकी वात कोई नहीं मानता यदि कोई घरवाला गृहणीको की नहीं माने, तौ घरमें कभी शान्ति नहीं हो सकती, और जिस घरमें अंशान्ति विराजमान रहती है वहां सुख कभी नहीं मिल सकता । मनुष्य भक्ति किसकी करते हैं । जव गुण होगा तो मनुष्य स्वयंही तुम्हारी भक्ति करने लगेंगे, जिनमें गुण होता है उन- की प्रशंसा सभी मनुष्य करते हैं जिस स्त्रीका अधिकार घर

की-धर्मोपदेश।
(२१५).
पर रहता है, उसका रोव जमजाता है, और घर २ में उसकी
प्रशंसा होती है, उसके विना पूछे कोई कुछ काम नहीं कर
सकता इसी कारण सभी स्त्रियोंको उचित है कि, जिस समय
वह की होजाय उस समय सबके प्रति एकसा व्यवहार करें
और दया तथा भक्ति सबके ऊपर जमाकर सवको अपनी
मुट्ठीमें करलें, फिर हे बहन ! घरमें कभी लेश अशांति लड़ाई
झगड़ा कुछ नहीं होगा।
हे वहन ! विना रीतिनीतिके जानेहुए कर्ती ठीक नहीं हो
सकती सो मैं तुझे आगे रीति नीति भी बताती हूं।
रीति और नीति ।
हे वहन ! अब मैं तुझे रीति नीतिकी रीति भी बताती हूँ
१-रीतिनीति कुछ विपय नहीं है, रीति एक बाहिरी
कार्य है, और नीति मानसिक भावकी उन्नति है । पहले
नीति हैं उसके पीछे रीतिहै, कारण कि, जवतक स्त्रियोंका
मनही ठीक नहीं होगा तबतक उनपर रीति नहीं आसकती।
२-चित्तकी मानसिक वृत्तिकाही नाम नीति हैं, इस वृत्ति
की उन्नति करतेही मन अपने आपही ऊँचा होजाता है।
और उसी समय मनकी नीचता दूर होजाती है।
३-हे बहन ! स्त्रियोंको सच्च वोलनाही एक प्रधान नैतिक
व्यवस्था है, जो स्त्रिये झूठ बोलती हैं उनको ऐसा बहुधा देखा
जाता है कि, अच्छेकी जगह बुरा होगया है, झूठ बोलना महा
पाप है।
४-सबके ऊपर दया करनाही स्त्रियों का प्रधान कार्य है, जो
स्त्रियें श्रेष्ट व्यवहार करतीहैं फिर उनको कष्ट उठाना नहीं पड़ता

(२१६). वीप्रबोधिनी। ६-सबसे मीठा बोलना यही उनका प्रधान गुण है। जो स्त्रियें कर्कश स्वभावकी होती हैं उनसे कोई बात चीत करना नहीं चाहता उनके समीप कोई स्त्री नहीं आती घर २ में उनकी निन्दा रहती है, और जो मीठा बोलती हैं, तो सभी उनसे संतुष्ट रहते हैं घर २ में उनकी बड़ाई होती है, बहुतसी स्त्रिये उनके पास आया जाया करती हैं। सहस्त्रों और हजारों रुपये पानेसे भी इतना मनुष्य संतुष्ट नहीं होता जितना तुम्हारे मीठे बोलनसे संतुष्ट होताहै, यदि मनुष्यको तुम विना कुछ दिये हुए विदाकर दोपरन्तु मधुर वचनोंसे विदाकरीतो वह सहस्र गुण संतुष्ट होताहै, हे बहन! इस संसारमें मधुर वचन बोलनेके समान वस्तु दूसरी नहीं है। मधुर बोलना कुछ शक्तिका काम नहीं है यह स्त्रियोंका एक आभूषण है। स्त्रियों के लिये मधुर बोलने और लज्जा करनेका भी प्रयो- जन है । जिन स्त्रियोंको लज्जा नहीं है, जो स्त्रिय निर्लज्ज हैं, वह चाहैं रूपवती क्यों न हों परन्तु उनका रूप किसी अर्थका नहीं। स्त्रियोंको स्वभावसेही लजा होती है, अधिक जोर करने पर लज्जाको विना नष्ट कियेहुए स्त्रियोंकी लज्जा कभी नष्ट नहीं होती। परन्तु आज कलकी नए फेशनको पसंद करनेवाली स्त्रिये लज्जाको नष्ट करती जातीहैं; जो स्त्रिय स्वाधीन बनना चाहती हैं, उनसे मानो लज्जाका वैर होगया है, और दिन दिन लज्जाका राज्य उठताही जाता है। हे बहन ! स्त्रिये स्वभावसेही सौन्दर्यप्रिय हैं, और अपनी २ सुन्दरताको बढ़ानेके लिये कितने उपाय करती की-धर्मोपदेश। (२१७) . हैं। फिर मैं नहीं जानती कि, वह लज्जाको किस लिये छोड़ती चली जाती हैं। ऐसा जाना जाता है कि वह इस वातको नहीं जानतीं कि, लज्जासे भी स्त्रियोंकी सुन्दरता है,लज्जासे स्त्री कि- तनी सुन्दर लगती है इस वातको वह जानती होती तो ऐसा काम कभी नहीं करती। १-हे वहन दयाभी स्त्रियोंके लिये एक आवश्यकीय वृत्ति है, इस संसारमें सबकी अवस्था समान नहीं है, कोई दरिद्र है, कोई धनी है, यदि संसारमें दया न होती तो यह संसार कठोर और भयंकर हो जाता यदि कोई किसी के ऊपर दयान करता यदि सभी सबके दुःखको देखकर सुखी होते, तो यह संसार जंगलके समान दिखाई देता। केवल हृदयमें दया होनेसे ही ऐसा नहीं हुआ,संसारमें रह- नेसे मायाका भी प्रयोजन है। मायाही स्त्रीपुरुषोंको बांधनेके लिये रस्सी स्वरूप है। परन्तु माया तो सबके हृदयमें है, जो संसारमें जन्मा है वहीं मायासे वधाहुआ है। माया, अच्छी वोल चालके सिवाय और कुछ नहीं है। संसारमें जैसे २ हृदयमें माया बढ़ती जाती है, वैसे २ ही अच्छी वोल चाल भी बढती जाती है, इसी कारणसे संसार सुखका स्थान होगया है, अच्छी बोल चालके समान मधुर द्रव्य और कुछ नहीं है। पुण्यकी ओरकोमन जाना इस संसारमें सुख प्राप्तिका उपाय है; जिस स्त्रीका मन पापकी ओर है, वह सुखी होनेकी आशान करै, आजकल पापकी अधिक वृद्धि हो रही है इस कारण सभी स्त्रियोंका मन पापकी ओरकोजाता है जिस प्रकारसे स्त्रियोंका मन पापकी ओरको न जाय वही करना कर्तव्य है ।

(२१८)
खींप्रबोधिनी।
यह सभी स्त्रियोंको जानना उचित है कि, पुण्यही एक मात्र
सुख और शान्तिका उपाय है। जो स्त्रिये पुण्यको छोड़कर
पापकी ओरको जाती हैं उनके समान मूर्ख दूसरी नहीं है।
पहली पहल पापका मार्ग अच्छा लगताहै इसीसे स्त्रिये इसकी
ओर जाती हैं, परन्तु वह इस बातको नहीं जानतीं कि, इस
पापका फल केसा भयंकर फलैगा।
यदि संसारमें सुखी होना चाहो तो सर्वदा पुण्यके मार्गपर
चलकर नीतिकी उन्नतिका उपाय करो, सदा अपने कुटम्बि-
योंको संतुष्ट रखनेकी चेष्टा करो, सदा सबसे मीठा बोलो, सब
के प्रति श्रेष्ठ व्यवहार करने के लिये उपाय करनाही स्त्रियोंका
मूल धर्म है।
नीति-उपर लिखीहुई नीति सबके हृदयमें उन्नति प्राप्त
करती है और वह उन्नतिस्वभावसे ही रीतिका उदय करके
सबको प्यारा बनालेती है।
रीति-रीतिके विषयमें कोई नियमवताना सहजवात नहींहै
१-आदर सहित संभाषण(वात चीत)करना एक श्रेष्ठ रीति
है, परन्तु बहुतसी स्त्रिये आदर सहित बात- करना नहीं जा-
नती। इसीसे स्त्रिय उनके पास आकर भी वात चीत नहीं करती
इस कारण सभी स्त्रियोंको आदर सहित वात चीत करनी चा-
अहिये । हे बहन ! जो कोई तुम्हारे घर आवे उसको तुम आदर
सहित बैठालो अपने बड़ोंका मान करो इसीका नाम. सत
रीति है, परन्तु इस समय स्त्रियें अभिमानके मारे आदरभाव
करनेकी रीतिको भूलतीही जाती हैं जो स्त्रियें अपने बड़ोंका
आदर सन्मान नहीं करतीं, उनकी उचित सेवा नहीं करती

की-धर्मोपदेश। (२१९) 1 सासनंदको साधारण स्त्रियोंके समान जानती हैं, उनको कटु वचन कहती हैं उन दुष्टा स्त्रियोंको घोर नरक प्राप्त होता है। हे वहन! अपने कुटम्बियोंसे भी श्रेष्ठ और अच्छा व्यवहार करना उचितहै परन्तु दुष्टा स्त्रियें श्रेष्ठ व्यवहारतो दूर रहा वरन् दिनरात उनके साथमें कलेश करती रहती हैं। जितना अन्याय और अत्याचार होना चाहिये वह अपने कुटुम्बियोंकेही ऊपर करतीहैं जो अपने कुटुम्बी हैं उनके ऊपर ऐसे अत्याचारका करना कैसे अन्यायका कामहै। रीतिका दूसरा नाम सभ्यताहै परन्तु स्त्रिये इसवातको नहीं जानतीं कि, सभ्यता किसको कहते हैं। सभ्यता कोई किसीको नहीं सिखासकता यह स्वयं उत्पन्न होतीहै; जो स्त्री रीतिनी- तिको अच्छी रीतिसे जानतीहैं वही संसारमें आदरकी सामग्री होतीहैं-सभीजगह उसका मान होताहै, सभी उसका आदर करतेहैं, सभी उसके साथ बातचीत करनेकी इच्छा करते हैं हे वहन ! मैंने तुझसे रीति नीतिक विषयमें जो कछु कहाँ यहसभी तेरे उपयोगी है, रीतिनीतिके विना जानेहुए कभी कोई स्त्री सुखी नहीं रह सकती। त्योहार। हे बहन ! अब मैं तुझे वर्षदिनके त्योहारभी बतातीहूं कि, यह किसलिये होते हैं। कार सुदी दशमी-इसे विजयादशमी तथा दशहरा भी कहतेहैं, इस त्योहारमें नगरों नगरों में बड़ी धूमधाम होती है, आजकेही दिन महाराज श्रीरामचंद्रजीने रावणको मार लंका (२२०) स्त्रीप्रबोधिनीं। को जीताथा और विभीषणको राज्यदे श्रीसीताजीको पायाथा व्यापार देशयात्राकेलिये यह तिथि वहुत उत्तम है,आजके दिन ब्राह्मण, क्षत्री, वैश्य सभी अपने २ यहां पूजन करतेहैं। दिवाली वा दीपमालिका-यह त्योहार कात्तिकके कृष्णपक्षकी त्रयोदशीसे प्रारंभ होताहै, त्रयोदशीके दिन जिस समय भगवान सूर्य छिपजाते हैं, उससमय सभी स्त्रियें यमरा- अजके नामका एक दीपक जलाया करतीहैं, और चतुर्दशी और मावसके सवेरेही तारोंकी छांह उठकर तेल और उवटना मलके सभी स्त्री पुरुष स्नान करते हैं, इसके पीछे सुन्दर वस्त्र पहर २ कर अपने २ घरोंको सजाते हैं, दिवारोंपर भांति २ के रंगकी बेलबूटी बना२ कर आनंद मनातीहै। सूर्यके अस्त होजानेपर घर २ में श्रीलक्ष्मीजीका पूजन होता है, फिर पूजनकर घर २१ में रोशनी होतीहै. सारीरात जागरण होताहै; और रात- भर लक्ष्मीसूक्तका पाठ आदि कर वह रात्रि व्यतीत होती है। वसंतपंचमी-सव ऋतुओंमें वसंतऋतुही सबमें प्रधान नहै, माघसुदी पंचमीको यह वसंतपंचमी होतीहै, आजके दिन घर २मालिन वसंत देने जातीहैं, सभी स्त्री पुरुष अपने २ कपड़े वसंती रंगकर पहरतेहैं और आजहाँके दिनसे होलि- कोत्सव प्रारंभ होताहै। मकरकी संक्रान्ति-यह संक्रान्ति सव संक्रांतिओमवड़ी है संक्रान्तिओंके हिसावसे जो संवत् होताहै उस सम्बत्का आरंभ इसी संक्रान्तिसे होताहै, आजके दिन तिल खानेका तथा तिलदान करनेका बड़ा माहात्म्य है।

की-धर्मोपदेश। (.२२१) होली-फागुनसुदी पूर्णमासीके दिन होलीका त्योहार होताहै हे वहन ! ऐसा सुननेमें आयाहै कि इस दिन वह सम्वत् समाप्त होजाताहै जो कि, पूर्णमासीके हिसाबसे गिनाजाताहै। आठ दिन पहलेसे विवाह आदि शुभकार्य नहीं होते, आजके दिन आग्निहोत्र कियाजाताहै आजकल वैदिकरीतिको छोड़कर सीधी रीतिसे आग्नि जलालेतेहैं छोटे २ लड़के उपले लड़की काठ आदि इकट्ठा कर उसमें अनि लगातेहैं सभी स्त्री पुरुष होलिका देवीका पूजन करतेहैं। ज्येष्टसुदी १०-इसको दशहराभी कहतेहैं, यह तिथि सभी शुभकार्योंमें श्रेष्ठहै, इसी दशमीको राजा भगीरथजी- श्रीगंगाजीको लायेथे इसीलिये इसको गंगाजीके जन्मका दिन कहतेहैं। गंगाजीके आनसे सारे भारतवर्षका उपकार हुआ दशों इन्द्रियोंसे कियेहुए पाप भगीरथजीके नष्ट हुए इसीलिये इसको दशहरा कहतेहैं । असाढीपूनो-आजके दिन सभी स्त्रिये देवीजीका पूजन करतीहैं। तीजै-श्रावणसुदी तीज-यह भी स्त्रियोंको बड़ाभारी त्योहार है घर २ में सभी स्त्रियें सुन्दर २ वस्त्र और आभूषण पहरकर अपनी संग सहेलियोंके साथ मिलकर हिंडोलोंमें झूला डालकर झूलतीहैं और भांति २ की मल्हारै गातीहैं। सलूनो-त्रेतायुगमें रामचंद्रजी महाराजने अवतार लेकर जिससमय लंकापर चढ़ाई की थी और समुद्रका पुल बांधाथा तो उस समय अपनी सहायताके लिये शिवजी महाराजका पूजन किया और रेतेका लिंग बनाकर महादेवजीकी स्थाप- NE (२२२) स्लीमनोधिनी। ना करी, वही स्थान सेतुबंध रामेश्वर नामसे विरव्यातहै,पूर्ण- मासीको पूजन पूरा हुआ, और शिवजी महाराज प्रसन्नहुये, तब शिवजीमहाराजने प्रसन्न होकर महाराज रामचंद्रजीके हाथमें राखी बाँधी नाह्मण सभी सावनके महीनेमें शिवजीका पूजन करतेहैं और पूर्णमासीको नवीन यज्ञोपवीत पहनतेहैं उसी दिन सबके हाथों में राखी बाँधी जातीहै । नागपंचमी-आजके दिन सभी स्त्रिये नागोंका पूजन कियाकरतीहैं घर लीप पोतकर आजके दिन घरके चारों को- नोंमें एक गोवरकी लकीर खींचकर नागोंको कच्चा दूध पिलाती हैं। जन्माष्टमी-मादोंवदी आको श्रीकृष्ण महाराजका जन्म हुआथा सो आजके दिन उनका जन्मोत्सव मनायाजाताहै, आजके दिन सभी स्त्रिये वधाई गती हैं। गुरुजन-अतिथि सेवा। हे वहन । कर्नीको सबसे पहले गुरु जनोंकी सेवा करनी चा- हिये जिससे उनकी सेवामें कुछ हानि न हो नियतके समयपर उनको भोजनादि मिलजाय रात्रि होनेसे पहलेही जो अपने बड़ोंकी चारपाई आदि विछादेतीहैं,कोई रोग होजाने पर जो स्त्रियें उनकी भलीभांतिसे सेवा शुश्रूषा करतीहैं, उस समय उनकी सेवा करनेसे जो स्त्रिये घृणा नहीं करतीहैं वही स्त्रियें धन्यहैं। संसारमें मातापिता तथा सासश्वसुरके समान गुरु दूसरा स्त्रियों के लिये नहींहै देखो माताने कितना, कष्ट उठाकर .. कर्वी-धर्मोपदेश। (२२३) कितने यत्ल और कितने परिश्रमकरके अपनी सतानको मनुष्य कियाहै, उनकी संतान जैसी कर्जदारहै संसारमें उतनी कर्जदार और किसीकी नहीं, संतान इस ऋणका बदला इस- जन्समें नहीं देसकती इसकारण सभी स्त्रियोंको उचितहै कि, जहांतक हो उनकी सेवामें कसर न करें, ऐसा नहीं करती वह पशुहैं। सासं श्वशुरभी माताकी ही समानहैं.स्वामी स्त्रीमें कुछ भेद नहींहै, जिसप्रकार लड़का अपने मा वापका वेटाहै उसीप्रकार वेटेके समान उनकी वहहै वह और वेटेमें कुछ अंतर नहीं है। इसकारण पतिके पितामाता स्त्रीकेभी पितामाता हुए।इसनिमित्त स्त्रीको सासश्वसुरकी भी सेवा करनी सवप्रकारसे उचितहै, अपने मातापिताके स्थानपर सासश्वसुरको समझना चाहिये, जो स्त्रिये सासश्वसुरका कहा न मानकर उनका निरादर कर- तीहैं वह कुलकलंकहैं। जिससमय पति कमानलगै उससमय स्त्रीको कर्तीका पद मिला उससमय उस पदवीको पाकर गृह- स्थमें निर्लिप्तहो धर्मचर्चासे समयको वितावै. उसी समय स्त्री नये कर्जी घरके राज्यसिंहासनपर विराजमान हुईहै । उसी समय सारे घरका भार उसके ऊपर पड़ा तब उसे सबसे पहले सासश्वसुरकी सेवामें तन मन लगाना चाहिये। हे वहन ! बूढे आदमियोंकास्वभावही टर्रा होजाताहै,बोली अख्खड़ होजातीहै।इससमय उनको संतुष्ट रखना बड़ा कठिन होजाताहै । वह जरा वातपर रुष्ट होजातेहैं, उससमय स्त्रीको धीरजकी आवश्यकताहै उनका इसवातपर ध्यान न देकर सा- सश्वसुरको संतुष्टकरनेके लिये परिश्रम करना अत्यन्त उचि- सजन . (२२४.) स्त्रीप्रबोधिनी। बहै, जिस रीतिसे तुम अपने सासश्वसुरको संतुष्ट रूखोगी तुम्हारी बहुयेंभी उसी प्रकार तुम्हें संतुष्ट रक्खेंगी। हे बहन जिससमय तुम्हारे घर कोई पाहुना आवै तो उस- काभी आदर सत्कार.भलीभांतिसे करो प्रथम उसे भोजनक- राकर पीछे आप करो, उसके सोनेका बंदोवस्त भलीभांतिसे करदो पाहुनकी सेवा करनेका वडा फलहै जो स्त्रिये पाहुनोंका निरादर करतीहैं उनकामी आदर नहीं होता । इसकारण अतिथिकी सेवा करनाही स्त्रियोंका कर्तव्यहै। संतानसंतति। हे बहन ! अब मैं तुझे वतातीहूं कि, संतान संततिके सम्बन्ध में स्त्रीको क्या करना उचितहै। १-बेटे, पोते, पोती, वेटी आदि जिससे सदा सुखी रहसकै माताको वही करना चाहिये। २-फिर वालवच्चोंके खेलनेकी चीजोंकाभी बंदोबस्त कर- देना उचितहै, जो वस्तु उन्हें रुचै उनके लिये वही मँगादेनी चाहिये। जिससे बालक आपसमें खेलते २लड़ाई झगड़ान करें तथा मार पीट न करें ऐसा उपायभी स्त्रियोंको करना उचितहै, जि- ससमय वह खेलते २ लड़नेलगैं तो उन सबको बुलाकर उनका झगड़ा मिटादेना उचितहै । कारण इसकी असावधानीमें वा- लकोंका केश नहीं मिटता, बालकपनमें जब वालकोंके मनमें वैरभाव उदय होजायगातौ वड़े होनेपरभी उनको वही आदत रहेगी।

की-धर्मोपदेश। (२२६) फिर यह भी देखनाचाहिये कि, वालकोंने समयपर खाने- को खाया है या नहीं, यदि नहीं खायाहो तो उसी समय उन- को खाने पीनेका बंदोबस्त करनाचाहिये, जहाँपर बालक खेलनेको जाय, तो उनको ठीकसमयपर आनेका भी प्रवंध- करना चाहिये, जो समय पढ़नेलिखनेका हो उसमें उन्हें पढ़ावै। रातको सुलावै, प्रभातकोही जगादे। इन सब बातोंपर स्त्रीको अवश्य ध्यान देना चाहिये जो स्त्रिये अपने बालबच्चोंपर इस- भांति ध्यान नहीं रखती हैं उनको बड़ा कष्ट उठानापड़ता है इसविषयको तुझे अधिक क्या बताऊं जिससमय तू घरवाली वनेगी उससमय सभीवातें तुझे आपसे आप आजायगी। आत्मीयस्वजन। हेवहन ! स्त्रीको अपने कुटुम्बके प्रति कैसा व्यवहार करना चाहिये वह भी मैं तुझे बतातीहूं, स्त्रीको बहुधा कुटुम्बमें ही रहनापड़ताहै, और कुटुम्वमें रहने सेही उसकी शोभाहै, परन्तु आजकलकी स्त्रिये कुटुम्बमें रहना नहींचाहतीं वह केवल अपने स्वामीके ही साथमें रहना पसंद करती हैं उनका यह कहनाहै कि "मैं और मेरा मुन्श तीसरेका मुँह भुल्स" परन्तु यह उनकी बड़ी भूलहै, जो स्त्रियें ऐसाकरती हैं अंतमें उन्हें पछता- ना पड़ताहे जो स्त्रियें अपने कुटुम्बियोंसे मिलकर नहीं चलती यदि उनके घर कोई व्याह शादी हो तो वह लोग उससमय उनके शरीक नहीं होते, और उनके व्याह शादीमें भी रौनक नहीं आती, रातदिन अपने कुटुम्बियोंके साथ झगड़ा करती रहतीहैं, नहीं ऐसा कभी नहीं करना चाहिये, उनसे मिलझुल- कर चलना चाहिये इसीमें तुम्हारी शोभाहै; जो ऐसा नहीं क- १५ (२२६). श्रीप्रबोधिनी। रती उनका घर दुःखमय होजाताहै; जिसघरमें कुटुम्बके लोग दुःख पातेहैं वहां कौकी भक्ति नहीं रहती उसका आदर कोई नहीं करता, जिसघरमें रातदिन क्लेश होता रहताहै वहां सुख और सुशांति कभी नहीं रहसकती जिस घरमें सर्वदा क्लेशका राज्य रहताहै, जहां सभी अपना स्वार्थ ढूढ़ते रहतेहैं वहां सभी सुखका एक वारही लोप होजाताहै। यहां मैं तुझे एक दृष्टा- न्त सुनाती हूं। पांच छै जने एकही घरमें रहतेथे, कोई सौरुपये महीना पैदा करताथा,कोई दशरुपये पाताथा। सभीके लड़के लड़की थे; यह सब वालक एकही साथ खेलाकरते थे, जिसका वाप सौरुपये पाताथा उसकी माताने आकर अपने वेटेको भोजनका पदार्थ दिया, और उन वालकोंको बुलायातकभी नहीं। इसके साथी बालक उसके खानेकी चीजको देखतेरहे, उसका यह व्यवहार बड़ाही नीच और तुच्छ हुआ स्त्रियोंको ऐसा क- भी नहीं करना चाहिये जितने वालक खेलतेहों जराजरासी चीज सभीको देनीचाहिये, स्त्रियोंकी बड़ाई इसीमें होतीहै, उनका जरासी चीजमें कुछ पेट थोड़ेही भरजाताहै। दासदासी। हे बहन ! आजकल सभी अपने घर में नौकर चाकर तथा टहलनी रखलेतीहैं परन्तु करुणामय परमेश्वरने जिनको नौ- कर चाकर या टहलनी रखनेकी सामर्थ्य दीहै, वह यदि नौकरों- के ऊपर अत्याचार करें तो इसमें बड़ी लजाकी वातहै, बहुत- सी स्त्रिये अपनी टहलनियोंको पशुके समान जानकर निर्द- यहो उनके साथ वर्ताव करतीहैं, वात २ पर गाली देकर की-धर्मोपदेश। (२२७) बुलातीहैं, उनको तेलीका बैल जानकर उनके ऊपर कामकी मारामार करती हैं, जरा देरभी नहीं बैठनेदेती बात २ पर चिल्लाकर वोलतीहैं, घरकी यदि कोई वस्तु जातीरही तो नौ- करकोही धमकानेलगी यहांतक कि,उसको मारने पीटनेमें भी कसर नहीं करती, खानेके लिये पेटभर भोजन नहीं देती, यदि दियाभी तो कहा “ अरे तेरी खूराक बड़ी है, इतना तो हमारे घरमें कोई नहीं खाता" अव वताओ भला उस नौकरको कहांतक बुरी न लगेगी, उनके ऐसे व्यवहारसे दुःखीहो नौकर नौकरी छोड़कर भागजाताहै, महीनेसे अधिक कोई नौकर उनके यहां नहीं ठहरसकता, इसकारण नौकर चाकरोंके साथ ऐसा व्यवहार कभी नहीं करना चाहिये, मीठे वोलकर उनसे काम लेना उचित है, यदि कोई घरकी वस्तु जातीरहै तो उन- से इसभांति पूछना चाहिये कि, जिससे उन्हें बुरी नलगै, ऐसा करनेसे वह तुम्हारा घर छोड़कर कहीं नहीं जायेंगे और सबमें तुम्हारी वड़ाई करेंगे, फिर तुम्हें भी नौकरोंके विना कुछ कष्ट उठाना नहीं पड़ेगा। दरिद्र और भिखारी। हे वहन । दरिद्र और भिखारीको भी अपने अंशका भागी समझना चाहिये तुम्हारे घरमें इनकामी कुछ हिस्साहै, ऐसा कोई दिन नहीं होता कि, जिसदिन तुम्हारे दरवाजेपर कोई भिखारी न आता हो, परन्तु आजकल भिखारियोंको भीख देना तो अलगरहा, उनको स्त्रिये गालियां देती हैं और कहतीहैं कि " आगया सवेरेसेही टरटरकरनेके लिये" वाजी२ स्त्रियें झंझलमें भरकर आटेके बदले उनकी झोली में खाक डाल-

(२२८)
खीप्रबोधिनी।
आतीहैं, इससे उन फकीरोंका सारा आटा विगड़जाताहै और
वह दुरशीशैं देतेहुये चले जातेहैं, नहीं ऐसा कभी नहीं करना-
चाहिये किसीने कहा कि "क्या फकीरका टालना और क्या
वालकका बहलाना" फकीरको जरासा आटा देदिया, वह तुम्हें
सैकड़ों आशीर्वाद देताहुआ चलागया; जो कुछ वसाया नित
फकीरोंके लिये निकालधरा; इससे तुम्हारा परलोक सुधरैगा
और तुम्हारा धन कुछ कम न होगा वरन् दूना बढ़ेगा।
दोहा-तुलसी पक्षिनके पिये, घटैन सरितानीर।
धर्मकिये धन ना घटे, जो सहाय रघुवीर ॥
रामनामके कारने, सव धन डाला खोय ।
मूरख जा गिर पड़ा, दिन र दूना होय ॥
हे वहन ! स्त्रियोंको उचितहै कि अपने द्वारपरसे भिखारीको
खाली न जानेदें; जो स्त्रि ऐसा व्यवहार करती हैं उनका यश
और कीर्ति बढ़तीहै।
सद्यवहार।
हे बहन ! स्त्रियोंको सबमें अपना विश्वास जमाना चाहिये,
सबके साथ मिलजुलकर काम करना उचित है; जो किसीसे
किसीसमय तुमने रुपया पैसा कुछ उधार लियाहो, तो जव
तुम्हारे पास आजाय पहले उसका देदो पीछे और कुछ काम
करो इस कारण तुम्हारी साख बनीरहेगी, और अवसर पड़ने-
पर तुम्हारा बड़ा काम निकलैगा, जिसके साथ तुम्हारा लेन
देन हो उससे हिसाब किताव साफकर रक्खो जिससे तुम्हारा
विश्वास बनारहै, सबसे बातचीतकरनेमें नम्रतारक्खो, कभी

की-धर्मोपदेश।
(२६)
अभिमान मत करो, जो स्त्रियां अभिमान करतीहैं उनकी
बड़ाई नहीं होती उन्हें सभी स्त्रियां कहा करतीहैं कि, “ अरी
वह तो मारे गरूरके किसीसे वाततकभी नहीं करती उसके
पास हम जाकर क्या करेंगी।"।
हे वहन ! इस कारण अभिमानकरना स्त्रियोंको कदापि
उचित नहीं तुम्हारे घर फिर कोई स्त्री नहीं आवैगी घर २ में
तुम्हारी निन्दा होगी धनचाहै तुम्हारे कितनाही क्यों
न होजाय लड़के लड़की कितनेही क्यों न होजांयाइनके होने-
पर कभी अभिमान नहीं करना चाहिये,धन तोआताही जाता
रहताहै।
राग कालिंगड़ा-मूरख छोड़ि वृथा अभिमान ।
औसर वीत चल्योहै तेरो दोदिनको महिमान ।
भूप अनेक भये पृथ्वीपर रूप तेज बलवान ।
कौन वचो या कालव्यालते मिटगयेनामनिशान ।
धवल धाम धन गज रथ सेना नारी चंद्रसमान।
अंतसमय सवहीको तजकर जाय वसे श्मशान ।
तज सतसंग भ्रमत विषयनमें जाविधि मर्कटश्वान।
छिनभर वैठिन सुमिरण कीनोजासोंहोय कल्यान ।
रे मन मूढ़ अंत जिन भटकै मेरों कयो अवमान ।
नारायण ब्रजराज कुँवरसों वेगहिकर पहचान ।
हे वहन ! इसलिये इस धनसम्पत्तिका अभिमानही क्या
आजहै कल नहीं।जो स्त्री तुम्हारे घर कोई वस्तु मांगनेआवै,
जहांतक होसकै उसे वह देदो उसका काम निकलजायगा,
फिर मुहल्लेकी स्त्रियोंके यहांसे जैसा चालचलन हो उनके

(२३०)
खीमबोधिनी।
साथभी तुम्हें वैसाही करना चाहिये। जितनी मिठाई उनके
यहांसे आवै उतनीही तुम उनके यहां भेजो जो कमती भेजोगी
तो तुम्हारी निन्दा होगी यहां मैं तुझे एक दृष्टान्त सुनाती हूं,
हमारे मुहल्ले में दुर्गाप्रसादकी वेटीका विवाह हुआ, इनके यहां
सबके यहांसे व्याह शादीमें आदपाका ही गिंदोड़ा आता था
दुर्गाप्रसादने कहा हमभी आदपाकाही गिंदोड़ा बनवावैगे,
इसपर उनकी स्त्रीने उत्तर दिया।
कवित्त।
पटुका मँगवाय मुँह बांधो हलवाइनके,
चासनी न चाटजायं जौलो सिंहरायगी।
मृत्तिका मँगाइके कुटाइ डारो भाठनको,
चूहे और चूही कहु केसे नियरायगी।
चारहू दिशानते वयारिनको बंद कीजै,
उड़ने न पावै जौ लौं तौलौं ठहरायँगी।
माछिनको मारिडारो चीटिन अवार फारो,
चींटी दई मारी क्या हमारी खांड खायेंगी।
वीसई पुस्ति हम बाटेहैं गिंदोरे मुनि,
बड़े २ वैरिनकी छाती फटजायगी।
नायन औ वारिन परोसिन पुरोहतानी,
छोटे पाय खोटी खरी हमसों कहिजायेंगी।
सुनरे हलवाई चाल आईहै हमारे यही,
डेढटांकखांड़ चहै औरहु लगि जायगी।
फिरकीसे छोटे दिमरकीसे जोटे जरा,
कागज से मोटेवनें बात रह जायगी।
म

की-धर्मोपदेश।
(३३१)
.
पतिने कहा चल मूर्ख ! मैं तेरी बात कभी न मानूंगा, हे।
वहन ! ऐसा स्त्रीको कभी करना उचित नहीं और फिर उनका
कोई कहा नहीं चलता, घरमें सब निरादर करतेहैं, अपने
यहाँसे चाहैं जरासी वस्तु ज्यादे चली. जाय परन्तु कमती
कभी नहीं देना हे वहन ! यह मैंने तुझे कर्ती होनेपर जो काम
करने चाहिये वह बताये, अब कुछ थोड़ासा पुण्यधर्मभी वता-
तीहूं।
इति सप्तमसोपान समाप्त.
• •

(२३२)
खीप्रबोधिनी।
अष्टमसोपान।
पुण्यवती।
PARAN
सवैया-
वेदपुरानविहाय सुपंथ कुमारग कोटिकुचाल चलीहै ।
काल कराल नृपाल कृपालन राजसमाजवड़ोहिछलीहै
वर्णविभाग न आश्रमधर्म दुनीदुखदोषदरिद्रवलीहै ।
स्वारथको परमारथको कलिरामको नामप्रताप वलीहै।
धर्म-हे वहन ! सभी मनुष्योंके साथ धर्म जाताहै; परन्तु
बहुतसी स्त्रियें इसको जानतींतकभी नहीं, संसारका नियम
यहीहै कि, जिससमय तुम्हारे लड़के बड़ेहोगये, घरमें वेटेकी
बहू आगई, बेटोंने सव कारवार. संभालकर धन पैदाकरना
शुरू करदियाः इस ओर बेटेकी बहूने भी सव घरका काम
काज सीखलिया उससमय स्त्रियोंको उचितहै कि, घरका सव
भार बहूको सौंपकर आप गृहस्थीकी सब चिन्ता छोड़ धर्मा-
चरण करैं परन्तु बहुधा स्त्रियें गृहस्थीमें ऐसी लिप्तरहतीहैं,
कि, मरने तक उन्हें गृहस्थीसे छुटकारा नहीं मिलता, उनको
अपने जीवन में एकबारभी धर्मकी चिन्ता करनेका समय नहीं
मिलता उनका परलोक नहीं सुधरताः स्त्रियें इसीसे धर्माचरण
और धर्मकी चिन्ता नहीं करतीं कि उन्हें यह ज्ञान नहींहै कि,
धर्मकरनेसे कितना सुख और कितना आनंद मिलताहै,इसीसे
वह इस मिथ्यागृहस्थीमें फंसीरहतीहैं और जिन्होंने एकबारभी
धर्मकी चिन्ताकीहै, उनको यह संसार दुःखरूप दिखाई देताहै.
उन्हें इस संसारमें सुख किंचित्भी नहीं दिखाई देता.हे बहन।
शाला

पुण्यवती। (२३३) " फिर देखो राजामोरध्वजकी धर्मके लिये क्यागति हुईथी। वहभी मैं तुझे सुनातीहूं। राजा मोरध्वज बड़ा धर्मात्मा राजा था। उसका यह नियम था कि, उसके यहांसे कोई साधु विमुख नहीं जाता। जो कोई जो मांगताथा राजा उसे वही दे देतेथे, इसकी कीर्ति देशदेशोंमें फैलरही थी सभी कोई मोरध्वजराजाकी बड़ाई करतेथे. एकदिन ऐसा हुआ कि, नारदजीने श्रीकृष्ण भग- वान्से जाकर कहा कि, महाराज मृत्युलोकमें राजा मोरध्वज बड़ा धर्म कर रहाहै, उसके धर्मकी परीक्षा करनी चाहिये यह विचारकर श्रीकृष्ण भगवान्ने बहुतसे साधुओंकी मंड- ली अपने साथ ली, और आपनेभी साधुका रूप धारण कि- या और एक मोटा ताजा शेरभी अपने साथमें लिया सबजने मिलकर राजा मोरध्वजकी नगरीमेंगये और जाकर राजाकेद्वार पर खड़ेहुए; द्वारपालने राजाको जाकर समाचार सुना- या कि, महाराज ! बहुतसे साधु आपके द्वारपर खड़े हैं। और आपके दर्शनकी इच्छा करते हैं; राजाने कहा शीघ्र लिवालाओ द्वारपाल जल्दीसे जाकर साधुओंको बुलालाया, राजाने प्रणामकर पूछा आपका आना कहांसे हुआ,साधुओंने आशीर्वाद देकर कहा राजन्! हम तोरमतेरामहैं राजाने चरण धोकर चरणोदक ले पूछा कि, आपने किसकार्यके लिये मेरा भवन पवित्र किया जो इच्छा हो सो कहिये । संतोंने कहा हे राजन!आप दीनदयालु और बड़े धर्मात्मा देशदेशोंमें आपकी कीर्ति छारहीहै, इसे सुनकर हम कुछ धन लेनेको आपके पास आतेथे रास्तेमें एक शेर मिलगया उसने हमारे -

स्त्रीप्रबोधिनी।
पुत्रको पकड़लिया तब हमने उसकी बहुत विनती करी और
कहा कि, इसे छोड़दो तब सिंहने बहुत कहने सुननेपर उत्तर,
दिया कि मोरध्वज राजाके पुत्रके दाहिने अंगका मांस लाओ
तो मैं तुम्हारे पुत्रको छोडूंगा नहीं तो किसीप्रकार नहीं
मोरध्वजने प्रसन्नहोकर कहा कि, वहुत अच्छी वातहै , मेरे
बड़ेभाग्यहैं जो मेरे द्वारा आपका पुत्र बचै । तुम सिंहको
बुलालाओ और मैं अपने वेटेको लाताहूं, साधुओंने सिंहको
बुलालिया, शेरने राजासे कहा कि, मैं आपके पुत्रका मांस
इस प्रतिज्ञापर खाऊंगा कि,एकओर रानी और एक आर आप
खड़े होकर बीचमें पुत्रको वैठाल आरेसे चीरै तौ मैं उसके
दाहिने अंगका मांस खाऊंगा और तीनों से किसीके भी
नेत्रोंसे आंसु न निकलै-राजाने कहा ऐसाही होगा मैं रानीको
बुलालाऊं, यह कह रानीको वुलालाये चौकी विछाकर
बीचमें पुत्रको बैठाल दोनों जने आरेसे पुत्रके शरीरको वीचमें
से प्रसन्नहो चीरनेलगे, किसीके मुखपर मलीनता नहीं
दिखाई दी (उससमय आकाशवाणी हुई)।
रागकाफी।
सुतके चीरनहेत मोरध्वज ठाढे रानिसमेत ।
चौकीपर सुतको पधरायो महाकठिन आरामँगवायो।
निकट केहरीको वैठायो बँचत धर्म निकेत ॥ १ ॥
माया मोह कपट निद्रा तज सब शरीरसे मल हरिपदरज।
हरि हरि हरिहरि जपत ताम्रध्वज सब दुःख हरि हरलेत॥२॥
'ज्यों २ चलत शीशपर आरा त्यों २ बहै रुधिरकी धारा।
ऐसा रक्षक कृष्ण हमारा रहा सकलमलरेत ॥ ३ ॥

पुण्यवती। (२३५) भये बहुत दानी विज्ञानी जिनकी अबलों कहत कहानी। परन्तु मोरध्वजसा दानी कोउ न दिखाई देत ॥ ४ ॥ हरि हरि हरि हरि भजहु रैनदिन,कोऊकार्यसरतनहिहरि विन । कबहुं न हरिको नामलियो जिन होत भूत और प्रेत ॥ ५ ॥ धनधन मोरध्वजकुमारको उदित भयो, नाहर अहारको श्यामगिनो नहिंश्वेत । दानी ऐसो भयो न होगो सुतनु चीररहे मिलदोनों। वृथाजन्म अकारथ खोनो मूरख अव तो चेत । रानीने चीरते २ राजासे कहा कि, देखो पुत्रके शिरपर आरा चल रहाहै परन्तु पुत्रको कुछभी कष्ट नहीं विदितहोता; रुधि- रकी धारा वहरहीहै। वास्तवमें इसकी रक्षा श्रीकृष्णही करतेहैं; देखो मनुष्यके एक कांटाभी लगजाताहै. तो वह उसके लग नेसे कितना व्याकुल होताहै, और इसके शिरपर तो आरा चलरहाहै परन्तु इसको कुछभी सुधि नहीं कि, किसका शिर चिररहाहै परमेश्वरकी कैसी अद्भुत महिमाहै । दोहा-कोमल जव तनुको करत,शिरसकुसुम लजि आय। वही समयके फेरसों, वज्रसदृश लैजाय ॥ जो पुष्पोंकी सेजपर, धरत सकुचसों पाय । तिनके शिर आरा चलत, करत न मुखसों हाय ॥ लालनको पालनकियो, कुचको दूधपियाय । ताको शिर चीरत खड़ी, सुनी. न ऐसी माय ।। रानीके यह वचन सुन राजाने कहा कि, तुम्हें नहीं मालूमहै कि हिरणाकुशने प्रह्लादको कैसे २ कष्ट दियेथे, अग्निमें "

(२३६) .
श्रीप्रबोधिनी।
"
जलाया, पर्वतसे गिराया,गयन्दसे चिरवाया, तप्तखंभसे वधवा
यो अनेकप्रकारके दुःख दिखाये परन्तु परमेश्वरकी कृपासे
उसका बाल बांका भी नहीं हुआ,रानीने कहा कहीं कुछ विघ्न
न होजाय ताम्रध्वजके वांये नेत्रसे आंसुओंकी धारा बहरहीहै।
उसी समय संतोंने कहा मत चीरो अव हमारा सिंह यह मांस
नहीं खायगा; यह कहकर संत अंतर्ध्यान होगये । तव सव
हाहाकर करनेलगे, पुत्रने प्राण छोड़दिये ताम्रध्वजकी स्त्री भी
विलाप करतीहुई आई और उसने भी अपने प्राण छोड़दिये
तब राजारानीने कहा कि, अब हम जीकर क्याकरेंगे जब वह
दोनों मरनेके लिये तैयारहुए उसीसमय भगवान् श्रीकृष्णने
आकर उनका हाथ पकड़लिया और उसीसमय उनके पुत्र
ताम्रध्वजके शिरपर हाथ धरा वह जीवित होंगया तव श्रीकृष्ण
मुरलीवजाकर गानेलगे।
भक्त हैं मेरे जीवन प्रान।
जव जब भीर परत भक्तनपर धरत हमारो ध्यान ।
उसीसमय सुधिलेत गरुड़ चढ़ त्याग खान अरु पान ।।
भक्त हेत अवतार लेतहूं भूमंडलमें आन ॥
मैं भक्तनको भक्त हमारे करत सदा सनमान ॥
जो कोउ मेरी शरण लेतहै मुझको अपनो जान ॥
मेरे हिये वसत सो निशिदिन सज्जन चतुर सुजान।
१-परन्तु प्रह्लादने सब दुःख सहकर भी अपनी प्रतिज्ञाको न छोडाऔर कहा-
गले तोक पहिरावो पांव बेरीले भरावो गाढे बंधन बंधावो औ खिचाओ काची खालसों॥
विषले पिलावो तापै- मूठभी चलावो मांझी धारमें वहावो बांध पत्थर कमालसों ॥
विच्छूलै बिछावो तापै मोहिं ले सुलावो फेर आगभी लगावो वाँधकापर दुसालसों ।
गिरिसे गिरावो कालेनागसे डसावो हा हा प्रीति न छुटायो गिरिधारी नंदलालसों ॥

पुण्यवती। (२३७) मैं अपने पूरण भक्तोंको देत हृदय अस्थान ।। "शालग्राम" नामसे बढ़कर और कौनसोदान॥ हे वहन ! फिर तीनों जने भगवानकी स्तुति करने लगे अंव देखो कि, धर्मका कैसा प्रताप है. कि, आजतक उनकी वड़ाई देशदेशांतरोंमें छा रहीहै, इसकारण हे वहन ! सभी स्त्रियोंको धर्माचरण करना उचित है। धर्माचरण-सवैया। काहू सों न रोप तोप काहूं सों न राग दोष काहू सोनवैरभाव काहू सों न घातहै ॥ काहू सों न वाकवाद काहू सों न है विपाद काह सों न संग नातो काऊ पक्षपात है ॥ काहू सों न दुष्ट वेन काहू सों न लेन देन ब्रह्मको विचार कछु और न सुहात है। सुन्दरकहतसोईईशनकोमहाईशसोईगुरुदेवजाकेदूसरीनवातहै हे वहन ! अव मैं तुझे धर्माचरणकी रीति बताती हूं कि, जिस रीतिसे धर्माचरण किया जाताहै। सबसे प्रथम प्रातःका- ल होनेसे प्रथमही शय्यासे उठना उचितहै फिर शौचादिकसे निश्चितहो, स्नानकर पूजापाठ करै, जो स्त्रियें घरपर आ उन्हेंभी धर्मका उपदेश दे, वालकोंको अपने समीप बैठाकर उनको भगवतकी भक्तिका उपदेश दे, सव ओरसे मन हटा- कर केवल एक ईश्वरमेंही लगावै, पूजापाठ नियमसहित करै स्नान करके विना पूजा पाठ किये हुए किसीको न छुये ।। पूजाका स्थान एकांत होना चाहिये, फिर जव पूजापाठसे नि- श्चित होजाय तो दुपहरसे प्रथम भोजन करे और उससमय जिस स्त्रीसे भी बात करै उससे धर्मशास्त्रहीकी करै। संध्याके समय धूपदीप देकर नारायणकी आरती करे, तुलसीका दीप-

.
(२३८)
स्त्रीप्रबोधिनी।
क बाले, फिर रात्रि होनेपर धर्मशास्त्रकी पुस्तकोंको पढ़ाकर
जबतक नींद न आवै तबतक पढ़े, ऐसा करनेसे स्त्रियोंको पर-
म गति प्राप्त होतीहै, और मरते समय उन्हें यमराजके दूत
आनकर नहीं ले जाते पुण्यात्माओंमें उसकी गणना होतीहै
मरनेमें कुछ कष्ट नहीं होता।
हे बहन ! मैंने तुझे अबतक जो कुछभी बतायाहै वह सभी
तेरे उपयोगी है और जो तू मेरे कहे अनुसार व्यवहार करेगी
तो तेरी बड़ाई होगी घरके आदमी तेरा आदर सत्कार करेंगे
नित्यकर्म।
हे बहन ! स्त्रियोंको नित्यकर्म अवश्य करना चाहिये, कार-
ण नित्यकर्मसे ही शरीर स्वस्थ रहताहै प्रभात कालही उठकर
परमेश्वरका भजन करै, पीछे स्नानकर पूजापाठ करैः प्रभात
कालके गानेयोग्य दोएक प्रभाती बतातीहूं-
प्रभाती-१.
प्रातसमय रघुवीर जगा कौशल्या महतारी ।
उठो लालजी भोर भयो है सुरनरमुनि हितकारी ॥
ब्रह्मादिक इंद्रादिक नारद सनकादिक ऋषि चारी ।
वाणी वेद विमल यश गावत रघुकुल यश विस्तारी ॥
बंदीजन गंधर्व गुण गावें नाचत दे दे तारी ।
उमासहित शिव द्वारे ठाढ़े होत कुलाहल भारी ॥
कर अस्नान दान प्रभु कीनो गो गज कंचन झारी ।
जयजयकार करत जन माधो तनमनधनबलिहारी॥१॥

पुण्यवती। (२३९) प्रभाती-२. जागिये कृपानिधान जानराय रामचंद्र जननी कहै वारर भोर भयोप्यारे।राजिवलोचन विशाल पीत वापिका मराल ललित कमलवदन ऊपर मदनकोटि वारे॥ अरुणउदित विगत शर्वरी शशांक किरन हीन दीन दीपज्योति मलिन द्युतिसमूह तारे। म. नो ज्ञान घनप्रकाश बीते सवभवविलास आसत्रास तिमिरतोष तरनितेज जारे॥वोलत खगनिकर मुखर मधुकर प्रतीत सुनो श्रवण प्राण जीवन धन मेरे तुम वारे । मनोवेद बंदी मुनिबंद सूतमागधादि विरद वदत जयजयजयजयति केटभारेविकसत कमलावली चले प्रपुंजचंचरीक गुंजत कलकोमल धुनि त्या- गकंज न्यारे। मनोविराग पाय सकल शोककूपगृहविहाय भृत्य प्रेममत्त फिरत गुणत गुण तिहारे। सुनत वचन प्रिय रसाल जागे अतिशय दयाल भागे जंजाल विपुल दुखकदंव टारे। तुलसिदास अतिअनंद देखके मुखारविंद छूटे भ्रमफंद परम मंदद्वन्द्वभारे ॥२॥ हे वहन ! इसभांति भगवत्को जगाकर पीछे स्नानकर विष्णुसहस्रनामादि अच्छे २ स्तोत्रोंका पाठ करै, तिसके पीछे तुलसीका पूजन करै सूर्यनारायणको अध्यदेव । १-तुलसीपत्र इस मंत्रको पढ़कर तोडै-" तुलस्यमृतनामासि सदात्वं केशव- प्रिया । केशवाथै चिनोमि त्वां वरदा भव शोभने ।" तुलसीको स्नान करानेका मंत्र- गोविन्दवल्लभा देवी भक्तचैतन्यकारिणीम् । स्नापयामि जगद्धात्री विष्णुभक्ति प्रदायिनीम् ॥ " इस मंत्रको पढ़कर तुलसीको प्रणाम करै-" वृन्दायै तुलसीदेव्यै प्रियायै केशवस्य च । विष्णुभक्तिमदे देवि संत्यवत्यै नमो नमः ॥ २-इस मंत्रको पढ़कर मूर्यको अर्घ्य देवै-"जगत्सवित्रे शुचये सवित्र कर्मदायिने ॥ नमो विवस्वत ब्रह्मन् भास्वत विष्णुतेनसे (एषोऽर्थः भगवते श्रीसूर्याय नमः)" " (२४०) खींप्रबोधिनी। पीछे सूर्यनारायणको नमस्कार कर उनकी परिक्रमा करें। इसके पीछे ठाकुरजीका चरणामृतले यही स्त्रियोंके नित्यक- महैं इसीकेद्वारा मुक्ति प्राप्तहोतीहै, जो स्त्रिय ऐसा करतीहैं उनका फिर जन्मनहीं होता जिससमय रसोई तैयार होजाय तो भगवानका भोगलगाय पीछे आप भोजनकरै, भगवानके विना भोगलगाये कोई वस्तु नखाय, हे वहन ! दोपहर होनेपर अच्छी २ पुस्तकोंके भजन पढ़ाकरें, जैसे कि, सुरसाग र व्रजविहार, रागरत्नाकर इत्यादि पुस्तकें हैं, इनमें बड़ेर उत्तम भजनहैं, संध्याहोनेपर तुलसीका दीपक वाले और ठाकुरजीकी आरतीकरै। आरती १. आरति युगलकिशोरकिकीजे । तन मन प्राणनिछावरकीज।। गौर श्याम मुखनिरखन कीजै। हरिको रूप नयनभर पीजे॥ १-इस मंत्रसे सूर्यको नमस्कार करै-" जपाकुसुमसंज्ञाशं काश्यपेयं महाद्युतिम् । ध्वान्तारिं सर्वपापनं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम् ॥ २-" एक चंडयां रवी सप्त त्रीणि दद्यात् विनायके ॥ चत्वारि केशवें चार्ध शम्भवे च परिक्रमम्" देवीके पूजनमें एक परिक्रमा करै. सूर्य नारायणकै पूजनमें साँत परि- क्रमा कर. गणेशजीके पूजनमें तीन परिक्रमा करै. और केशवकें पूजनमें चार परि- क्रमा करै-और महादेवनीके पूजनमें आधी परिक्रमा करै अर्थात् जलेरीको न लाँधै ३-हे बहन ! ताबेके पात्रमें विष्णुका चरणामृत लेकर पान करै पीछे मस्तकपर धारण करे, चरणामृत पीनेसे पहले इस मंत्रको पहै। कृष्ण कृष्ण महावाहो भक्तानामातिनाशन । सर्वपापप्रशमनं पादोदकं प्रयच्छ मे॥१॥ अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।विष्णोःपादोदकं पीत्वा शिरसा धारयाम्यहम्॥२॥ ४-प्रत्येक देवताकी आरती अलग २ हैं. वह सब आरतीसंग्रह नामक पुस्तकमें लिखी हैं।

पुण्यवती।
(२४१)
रविशशिकोटि वदनको शोभा । ताहि देखिमेरो मनलोभा ॥
फुलनकि सेज फुलन गलमाला।रत्नसिंहासन वैठे दलाला॥
मोर मुकुट कर मुरली सोहै। नटवरवेष निरखि मनमोहै ॥
ओढ़े नीलपीतपटसारी । कुंजन ललना लालविहारी॥
श्रीपुरुपोत्तम गिरिवरधारी। आरति करत सकल वजनारी॥
नंदनँदनवृपभानुकिशोरी । हरमानंदस्वामीअविचलजोरी ॥
आरती २.
आरतिकीजै श्यामसुन्दरकी । नंदकुमार राधिका वरकी ॥
भक्तिकरदीप प्रेमकरवाती । साधुसंगतिकर अनुदिन राती ॥
आति ब्रजयुवतिन मन भावै।श्याम लीलाहित हरियशगावै ॥
बता
हे वहन ! अब मैं तुझे व्रत बताती हूं जो स्त्रियें करती हैं,
व्रत तौ अनेक हैं उन्हें बतानेमें समय अधिक लगेगा, परन्तु
मुख्य २ व्रत इस समय मैं तुझे वताती हूं, व्रत चार प्रकार के
हैं, एक तो, सौभाग्यके लिये, दूसरे पुत्र के लिये, तीसरे भाईके
लये और चौथे मोक्षके लिये है। इन्हींको स्त्रियें अधिक तर
किया करती हैं। अब मैं पहले सुहागके व्रत बतातीहूं।
श्रावणसुदी तीज-जिसे कजली तीज भी कहते हैं, इस
दिन जिन लड़कियोंका विवाह हो गया है छोटीसे लेकर बड़ी
तक सभी इस व्रतको रहती हैं, प्रातः कालही उठ स्नान कर
नवीन वस्त्र और अच्छे २ गहनोंको पहन मिट्टीकी गौरि वना
कर सव स्त्रिये उसकी पूजा करती हैं, गौरि को सुन्दर वस्त्र
पहरा रोली चावल फूल और मिष्टान्नसे उसकी पूजा कर हाथ
जोड़ कर प्रार्थना करती हैं कि हे देवी ! जिस भाँतिसे तुम्हारा
१६

(२४२) खीमबोधिनी। सुहाग अचल है उसी भाँति हमारा भी सुहाग अचल रहै, इ- सके पीछे विविध प्रकारके पदार्थ गौरीके आगे रख उनका भो- ग लगाती हैं, फिर तीसरे पहरके समय अपने कुटम्बियोंको भोजन करा आप भोजन करती हैं, सभी सौभाग्यवती स्त्रियें इस व्रतको करती हैं। भादों सुदीतीज-जिसे हरतालिका तीज कहते हैं, इसे भी सब स्त्रियां करती हैं हे बहन ! यह व्रत इस भांति किया जाता है, प्रातःकाल होतेही स्नान कर इस व्रतको धारण करें, फिर तीसरा पहर होने पर शिव और गौरी की मूर्ति बना उस- काभली भांतिसे श्रृंगार करे, इसके उपरान्त आप सुन्दर २ वस्त्र तथा आभूषण पहर विन्दीमहावर आदि लगाकर शिव पार्वती को स्नान कराकर उनको वस्त्र पहरावै, फिर शेली चंदन अक्षत फूल धूप दीप नैवैद्य चढ़ा कर वेलपत्र चढ़ावै फिर दक्षिणा चढ़ाकर शिव गौरीको प्रणाम करै, और हाथ जोड़ कर प्रार्थ- ना करे कि, हे गौरी ! तुम्हारे समान मेरा भी सुहाग अचल रहै, फिर विविध भांतिके पदार्थ शिव गौरीकी प्रीतिके निमि त उनके सन्मुख धरै, पीछे वायनामंसकर सास नंद आदिको दे, इसके पीछे कथा सुनै-उस रात्रिको जागरण करे फिर प्रभातकाल होने पर गौरिको सिलावे फिर स्नान कर आप भो- जन करे, हे बहन ! महादेवजीने पार्वतीजीसे कहाथा कि, जो स्त्री इस प्रकार हमारा तुम्हारा पूजन कर इस व्रतको करती हैं, उनके सब पाप धुक्त होजाते हैं, और सदा उनका सुहाग अचल रहताहै, और जो स्त्री आजके दिन भोजन करती हैं वे जन्म जन्मान्तरों तक विधवा दरिद्रिणी तथा पुत्रशोकको प्राप्त पुण्यवती। (२४३) हो दुःख भोगती रहती हैं। इस कारण यह व्रत सभी स्त्रियोंको करना उचित है। कार्तिक वदी चौथ४-इसे करवा चौथभी कहते हैं इस दिनभी सभी स्त्रियें व्रत धारण करती हैं। प्रथम स्त्रियें स्नान कर इस व्रतकोधारण करें और भली भांतिसे अपना शृंगारकर सारे दिन उपवास करें,पीछे दीवारपरवड़कापेड़ काढ़कर उसके नीचे गणेशजीकी मृत्तिवना उसे स्नान करा चंदन पुष्प धूप दीप नैवेद्य आदिसे उनकी पूजा करै, इसके पीछे दक्षिणा चढ़ाकर प्रणाम करै फिर चंद्रमाके उदय होने पर अध्यदे अक्षत फूल चढ़ा कर हाथजोड़ चंद्रमाको प्रणाम कर उनकी परिक्रमा करें। पीछे आप भोजन करैः इस व्रतमें चंद्रमाका दर्शन कर भोजन किया जाता है करुवामँसे । जेष्ठमासकीमावस-इसेही वर मावस तथा वरसात कहते हैं, हे बहन ! यह व्रत इस भांति किया जाता है कि, स्त्री प्रभातकाल होते ही स्नान कर इसके पीछे अपना सब श्रृंगार कर वड़के वृक्षकी पूना करै बहुतसी अपने घरही वड़के वृक्षकी डाली मँगा कर उसकी पूजा करती हैं प्रथम वृक्षके नीचे लीप कर मिट्टीका कलश भराहुआ रखकर लेपन अक्षतसे उसकी पूजा करै। इसके पीछे उत्तम २ फल चढ़ाकर विविध भांतिके भोजन उस कलशके ऊपर रखकर उसे मंसदे पीछे हाथ जोड़ कर प्रणाम कर-हे बहन ! इसी व्रतके प्रभावसे सावित्रीने अपने पति सत्यवानकी आयु ४०० वर्ष की करलीथी। जो स्त्रिये इस व्रतको करती हैं वह सावित्री के समान सुख भोगकर अंतमें वैकुंठको जातीहैं।

(२४४)" खीप्रबोधिनी। .. चैत्रमासके शुक्लपक्षकी तीज-हे वहन ! आजके दिनभी सभी स्त्रियें इस व्रतको करती हैं। इस व्रतमें वसिष्ठजी के साथ देवी अरुन्धतीकी पूजा की जाती है, मिट्टीकी मूर्ति बनाकर पृथ्वी पर स्थापित कर, इसके पीछे स्नान करा रोली अक्षत फूल पान मिष्टान्न चढ़ावैः पीछे सुन्दर पदार्थोंका भोग लगाय देवी अरुन्धतीको प्रणाम करै पीछे चंद्रमाको अर्घ्य दे आप भोजन कर, स्कंदजीने कहाथा कि, जो स्त्री इस व्रतको कर देवी अरुन्धतीकी पूजा करती है वह हजार वर्षतकभी विधवा नहीं होती और पति पुत्र पौत्र सहित इसलोकमें सौ वर्ष तक जीकर अंतमें वैकुंठ धामको जाती है। पुत्र के लिये व्रत। हे वहन ! जो व्रत पुत्रके लिये स्त्रिये किया करती हैं, वह मैं तुझे बताती हूं। माघसुदी चौथ-इसे गणेश चौथ भी कहते हैं इस दिन स्त्रिये पुत्रके लिये व्रत धारण करती हैं इस दिन स्नान कर शुद्धहो सभी स्त्रियें गणेशजीकी पूजा करतीहैं मिट्टीसे गणेश जीकी मूर्ति बनाकर उन्हें स्नान कराय चंदन पुष्प धूप दीप नैवेद्यसे उनकी पूजा कर तिलकुटका भोग लगाय हाथ जोड़ यह प्रार्थना करती हैं कि, हे गणेशजी! आपके प्रसादसे हमारे पुत्रहो वर्षवें दिन यह व्रत करती हैं अधितर मायके महीने में यह व्रत किया जाता है, यह व्रत श्री पार्वतीजीने कियाथा इस व्रतके करनेसे स्त्रिये सब संक- C पुण्यवती। (२४५) टोंसे छूट जाती हैं और गणेशजीकी कृपासें उनके पुत्र होते हैं प्रत्येक महीनेकी चतुर्थीको भी गणेशजीका व्रत रहना उचित है। श्रावणमासकी शुक्ल चतुर्थी के दिन दूर्वा गणेशजीका व्रत करै, सुवर्ण या चांदीकी गणेशजीकी प्रतिमा बना कर सुवर्णकी दूर्वा बिछाकर सुवर्णकी पीठपर स्थित लाल वस्त्र- से युक्त कलशके ऊपर रख कर, स्नान कराय चंदन, पुष्प पान नैवेद्य आदिसे गणेशजीकी पूजा करै, पीछे दक्षिणा चढाय वह मूत्ति और कलश अपने पुरोहितको देदे, जो कोई स्त्री इस व्रतको तीन वर्ष तक करती है, उसके सब मनोरथ पूर्ण होजाते हैं, और पुत्र पौत्रादिकी प्राप्ति होती है । मोक्षके लिये व्रत। हे बहन ! मोक्ष पानेके लिये स्त्रिये व्रत किया करती उनमेंके मुख्य २ व्रत मैं तुझे वताती हूँ। फागुनसुदी तेरस-इसे शिवरात्रि व्रत कहतेहैं इस व्रतके करनेमें वालक वृद्ध कन्या स्त्री पुरुष सभीका अधिकार है, प्रातःकालही उठस्नानकर पवित्र हो शिवजीका ध्यानकर वत धारण करे पीछे बेलपत्र फल फूल मिष्टान्न, धूप आदिसे शिवजीकी पूजा करै,इसके उपरान्त दक्षिणा चढाय दीपक वा- लकर शिवजीकी आरती करे, सारीरात जागरण कर प्रभातको दूसरे दिन व्रत करनेवाले ब्राह्मणको भोजन कराकर पीछे आप पारण करै, इस भांति इस व्रतके करनेसे धर्म अर्थ काम मोक्ष चारों वर्ण प्राप्त हो जाते हैं, इसके समान व्रत पृथ्वीमें दूसरा नहीं है शिवरात्रिका व्रत सर्वोत्तम व्रत है। her (२४६) स्त्रीप्रबोधिनी। भादों सुदी चौदस-जिसे अनन्त चौदस कहते हैं, इस व्रतकोभी स्त्री पुरुष रहते हैं, प्रथम प्रातःकालही स्नान कर अनन्त देवका व्रत धारण करें, इसके पीछे शिव आदि पांच देवताओंकी पूजा करै इसके पीछे थालीमें गौका कच्चा दूध भर कर समुद्रके आशयसे उसकी पूजा करें, फिर अनन्त, वासुकी, तक्षक इनका ध्यान कर इनकी भी पूजा करै पीछे कारी कन्याके कते हुए सूतका अनन्त वनाय चौदह तारोंमें चौदह ग्रंथी लगाय उस दूधसे अनन्त देवको स्नान करावे पीछे स्त्री अपनी वाई भुजामें धारण कर अनन्तदेवकी कथा सुनै, इसके उपरान्त ब्राह्मणको भोजन कराय आप भोजन करे, इस व्रतमें नमक या सैंधा नमक नहीं खाया जाता, हे वहन ! श्रीकृष्णने युधिष्ठिरजीसे कहा था कि, मनुष्य इस व्रतके अनुष्ठान मात्रसे सब पापोंसे छूटकर मुक्त हो जाता । चौदह वर्ष तक यह व्रत किया जाताहै । इस व्रतके प्रसाद- से स्त्री पुरुष सभी पापोंसे छूटकर वैकुंठ धामको जाते हैं। भादो वदी अष्टमी-जिसे जन्माष्टमी कहते हैं इस व्रतको स्त्री पुरुष दोनोंही करते हैं। स्त्रियोंको यह व्रत अवश्यही कर्तव्य है, प्रातःकाल ही स्नान कर इस ब्रतको धारण करैः इसके पीछे आधीरात होने पर श्रीकृष्ण भगवानका ध्यान कर उनकी पूजा करै, इसके पीछे यथाशक्ति वसुदेव, यशोदा, नंद, रोहिणी, देवकी, गर्ग, आदिकी पूजा करै,फिर श्रीकृष्णके जन्मोत्सवकी कथासुन,चंद्रमाके उदय होनेपर अध्यदेहाथजोड़ कर परिक्रमा करै । पीछे भगवान्को भोग लगाय आप भोजन करी हे बहन ! इस प्रकार जन्माष्टमीके व्रत करनेसे स्त्री पुरुष सब पापोंसे छूट कर श्रीकृष्णके लोक को जाते हैं।

पुण्यवती।
(२४७)
वैशाखमासके शुक्लपक्षकी तीज-इसे अकतीज क
हते हैं, अकतीजके दिनही बद्रीनारायणके पट खुलतेहैं इसी
दिन यात्रियोंको दर्शन होता है, इस तिथिमें स्नान, दान, जप,
होम और विष्णुकी पूजा करनेसे अक्षय फल प्राप्त होता है;
इस तीजके दिन विष्णु भगवानकी पूजा कर जलसे भरा कलश
चूरा और सत्तू ब्राह्मणको दे पीछे सत्तुओंका भोग भगवान्को
लगावे और लक्ष्मीजीके सहित विष्णुभगवान्का ध्यान कर
उनको प्रणाम करै, जो स्त्री इस प्रकारसे इस व्रतको करती हैं
वह इन्द्रलोकको प्राप्त होकर विष्णुलोकको जाती हैं।
ललितासातै-यह व्रत भादोंके महीनेमें शुक्लपक्षकी
सातैके दिन किया जाता है। इस दिन स्नान कर, गणेशजी,
शिवजी तथा दुर्गाजीकी पूजा करें, उसके पीछे धूप दीप
चंदन अक्षत फूल आदिसे शिव आदिकी पूजा करै, उसके
पीछे कथा सुनै तत्पश्चात् भगवानको भोग लगाकर आप
पारण करे, सात वर्ष तक यह व्रत किया जाताहै, इस व्रतके
प्रभावसे स्त्रिये पुत्र पौत्रादिका सुख भोगकर अंतमें वैकुंठ धाम
कोजाती हैं।
दूर्वाष्टमीव्रत-इसीको महालक्ष्मी व्रत कहते हैं, इसे भी
सभी स्त्रियें रहती हैं, इस दिन लक्ष्मीनारायणकी पूजा होती
है, इस दिन कच्चे तारोंको आठ तार कर उसमें आठ, गाठे
लगाय उसकी पूजाकर स्त्री वाँये हाथमें धारण करैः इसके पीछे
कथा सुनकर ब्राह्मणको भोजन कराय आप भोजन करे जो
स्त्रिये इस व्रतको धारण करतीहैं वह इस लोकमें अनेक प्रका-
रके सुखोंको भोग कर अंतमें वैकुंठ धामको जाती हैं।
"

(२४८) श्रीप्रबोधिनी। चैत्रमासके शुक्लपक्षकी नौमी। इसे रामनौमी कहतेहैं, यह रामनौमीका व्रत स्त्री पुरुष दोनों कोही करनेका अधिकार है, जो स्त्री इस व्रतको धारणकरै तो इस भांति आचारसे रहे प्रथम प्रातःकालही उठ स्नान कर भक्ति सहित सीता और रामचंद्रजीकी मूर्तिका पूजन करें, इसके पीछे रामचंद्रजीकी माता श्रीकौशल्याजीको फूल चढ़ावै, इसके उपरान्त सीतापति रामचंद्रजीकी चिन्ता कर शंख घड़ियाल इत्यादि बाजे वजावे, फिर फल पुष्प और तुलसी पत्र लेकर श्रीरामचंद्रजीको चढ़ावैः इसके पीछे रामगीताका पाठ करें। सारीरात जागरण कर प्रभातको ब्राह्म- णको जिमाय पीछे आप भोजन करे, हे वहन! जो इस प्रकार से इस रामनौमीका व्रत करती हैं उनकी सव मनोकामना पूर्ण होजाती हैं और सर्वदा श्रीरामचंद्रजी उनकी रक्षा करते रहते हैं फिर उन्हें कुछ भय नहीं रहता। कारसुदीमें देवीजीकी पूजा। इन्हें नवदुग भी कहते हैं इसमें नौदिन तक ब्रत किया जाता है, प्रतिपदासे लेकर नौमीतक बरावर व्रत कर नित्य श्री दुर्गादेवीजीकी पूजा कर इसके उपरान्त घीका दीपक वालकर दुर्गादेवीकी अतिभक्तिकर दुर्गापाठ करै नौमीके दिन कन्या वरुओंको हलुआ पूरी जिमाकर उन्हें दक्षिणा दे पीछे चरण छूकर देवीकी प्रार्थना करे,पीछे आप भोजन करे नौदि- न तक बराबर फलाहारही खाकर व्रत धारण करै, जो स्त्रियें इस प्रकारसे नौ दिन तक श्रीदुर्गादेवीजीका व्रत धारण कर THAN + पुण्यवती। (२४९) ती हैं उनको संसारमें कुछ दुर्लभ नहीं रहता देवी प्रसन्न होकर उनको मन वांछित फल देती हैं। भादौमें शुक्लपक्षकी पंचमी। इसे ऋषिपंचमी कहते हैं, इस व्रतको सभी स्त्री करती पंचमीके दिन नदीमें मान कर व्रत धारण करे, इसके पीछे अरुन्धती सहित सप्तऋषिकी पूजा करै, और चंदन हार पान फूल नैवेद्य आदि चढ़ाकर प्रणाम करै, पीछे भगवान्का चरणोदक लेकर शाककाही भोजन करै, जो स्त्री इस व्रतको करती है उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट होजाते हैं, स्त्रियें जो रज- स्वला होनके समयमें घरके वरतन आदि छूलेती हैं, उनको इसका वड़ा पाप लगता है उनका वह पापभी इस व्रतके कर- नसे दूर होजाता है । यह व्रत स्त्रियोंको सम्पूर्ण सम्पति तथा धन, पुत्र और यशका देने वाला है जो कोई स्त्री ऋषिपंचमी- का व्रत धारण कर ऋषि पंचमीकी कथाको सुनती है उसके सम्पूर्ण पाप नष्ट होजाते हैं। संक्रान्तिव्रत-हे वहन ! महीनेकी महीने स्त्रियोंको सं- क्रान्तिका व्रत रहना चाहिये, संक्रान्तिके दिन स्त्री स्नान कर पवित्र हो व्रत धारण करै, इसके पीछे भक्तिसहित लक्ष्मीपति विष्णु भगवानकी पूजा करै; फिर भगवान्को मिष्टान्नका भोगं लगाकर जलसे भराहुआ कलश ब्राह्मणको दे तदनन्तर आप भोजन करें-जो स्त्रियें वर्षदिनकी वारह संक्रान्तिको व्रत धारण करती हैं वह सब पापोंसे छूटकर अंतमें विष्णुधामको जाती हैं।

(२५०) स्वीप्रबोधिनी। कार्तिकके शुक्लपक्षकी एकादशी-इसे देवोठान एकादशी कहते हैं इस दिन स्त्री व्रत धारण कर भक्ति सहित विष्णु भगवानकी पूजा करै आजकेही दिन सम्पूर्ण देवता सो- तेसेजागते हैं, प्रत्येक महीने के पक्ष २ की एकादशी रहनी उचित है; पीछे विष्णुभगवानको स्नान कराय वस्त्र पहराकर हार, चंदन, फूल, सुन्दर २ फल यह चढ़ावे इसके पीछे एकादशीकी कथा सुनै पीछे फलाहार भोजन कर रात्रिको जागरण करै, हे वहन ! जो स्त्री इस प्रकारसे एकादशीका व्रत नित्य प्रति करती हैं उन पर विष्णु भगवान् प्रसन्न होजाते हैं फिर उनको संसारमें आना नहीं होता है । श्रावणके सोमवार-श्रावणमासके सव सोमवारोंको व्रत रहना उचित है, सोमवारके दिन प्रभातकाल ही स्नान कर व्रत धारण करै पीछे शिवजीको स्नान करावै, इसके उपरान्त चंदन फूल पान मिष्टान्न सुन्दर २ फल चढ़ाकर बेलपत्र चढ़ावै फिर दक्षिणा चढाय शिवजीकी आरती करे, शिवतांडव आदिस्तोत्रोंका पाठ करे, इसके पीछे परिक्रमा कर शिवजी- को प्रणाम करै । संध्यासे कुछ पहले ब्राह्मणको भोजन कराय दक्षिणा दे पीछे आप भोजन करै । जो स्त्रियें इस प्रकार साव- उनके सोमवारों में व्रत धारण करती हैं उन पर शिवजी प्रसन्न होजाते हैं, इस लोकमें वह सव सुखोंको भोगकर अंतमें शि- वलोकको जाती हैं। हे बहन ! यह मैंने तुझे चारों प्रकारके व्रत सुनाये, और फिर अपने २ देशकी रीतिके अनुसार भी वत होते हैं। म पुण्यवतीं। (२५१) कार्तिकसुदी दायज-इसेही भैयादोयज कहतेहैं आज के दिन भाईके लिये व्रत किया जाताहै, सभी स्त्रियें तथा लड़- किये इस व्रतको धारण करती हैं, भाई बहनके यहां भोजनकर नेके लिये जाते हैं, सभी बहनें उत्तम २ भोजन बनाकर भाई को अपने हाथसे परोस कर खिलाती हैं, आजके दिन वेरीके वृक्षकी पूजा करदिवालीके दीवलोंमें खीले वताशे दाल चावल चने आदि भरकर उनको मूसलसे कूटती हैं, और कहती जाती हैं कि, यह हमारे भाईके वैरी दुश्मन कूटे गये, और जिनके सगी वहन या सगा भाई नहीं होता वह अपने नाते रिश्तेके भाईको जिमाती हैं, इसके पीछे भाई भोजनकर उ- नको दक्षिणा देते हैं, हे वहन ! आजके दिन स्वयं यमराजभी अपनी वहन यमुनाजीके यहां भोजन करनेके लिये गयेथे; इसका यहफल है कि, जो भाई आजके दिन अभिमान कर अपनी वहनसे टीका नहीं कराता उसका माथा उस जन्ममें पत्थरका होता है और जो बहन अभिमान करके अपने भा- ईका टीका नहीं करती उस जन्ममें उसका अंगूठा पत्थरका होता है। अव मैं व्रतोंको यहांही समाप्त करके तुझे तीर्थों का मा- हात्म्य वताउंगी कि, किसतीर्थमें जानेसे क्या फल मिलताहै। तीर्थसेवा । तीर्थयात्रा और उसका फल । हे वहना हिन्दूजातिमें तीर्थका दर्शनही प्रधान धर्म है, तीर्थ को चले गये और वहाँकै सम्पूर्ण देवताओंके दर्शन कर लिये, वस इसीसे तीर्थका फल मिल गया इस प्रकारसे तीर्थसेवाका फल कभी नहीं मिलसकता, जिस रीतिसे तीर्थकी सेवा करने - (२५२) स्त्रीप्रबोधिनी। से फल प्राप्त होता है। हे बहन ! बह रीतिभी मैं तुझे बतातीहूं. जो मनुष्य धार्मिक जितेन्द्रिय अहंकाररहित होकर तीर्थका दर्शन करते हैं। वही तीर्थं फलके यथार्थ अधिकारी हैं,अर्थात् उ- न्हींको तीर्थका फल मिलता है, और जो नास्तिक और नि- दक हैं उनको कभी तीर्थका फलं नहीं मिलता, जिनको ती- थोंमें विश्वास नहीं है, जो मूर्ख हैं, उनका तीर्थमें जाना न जाना बराबरहै, तीर्थमें जानेसे अज्ञानको दूर करना उचित है, और जव अज्ञान दूर होगया तब ज्ञानका उदय होगा, और ज्ञानका उदय होतेही अज्ञानसे कियेहुए सम्पूर्ण पाप नष्ट होजायगे, और तीर्थके दर्शन करनेसेही सब पाप छूटजां- यगे, और जो पाप तीर्थके ऊपर किया जाता है, उसका नाशभी नहीं होता, इस कारण तीर्थ जानेसे प्रथम मनकी शुद्धि करलेनी उचित है। तीर्थको पैदल जानेमें जितना फल होता है उतना गाड़ी- पर चढ़कर जानेसे नहीं होता, फिर तीर्थपर जाकर दूसरे तीर्थकी प्रशंसा कभी न करे, तेल कभी न मलै, तीर्थके पुरो- हितकी कभी निन्दा न करै, जबतक इच्छा हो तबतक तीर्थमें रहै परन्तु तीन दिन तक रहनसे फल प्राप्त होता है, इसकारण तीन दिन तक तो अवश्यही रहै। काशीतीर्थ-हे वहन ! काशीजीमें जाकर पुष्करणी और मणिकर्णिका घाटपर स्नान कर ब्राह्मणों को भोजन करावै, इसके पीछे उत्तरवाहिनी गंगाजीपर स्नान कर गंगाजीकी पूजा करें। इसके उपरान्त आदित्य, विष्णु, दंडपाणि, महे- इवर और द्रौपदीको नमस्कार कर गणेशजीकी मूर्ति के समीप " पुण्यवती। (२५३) जाकर भली भांतिसे उनकी पूजा कर फिर ज्ञानवापीके ज- लको छुकर तारकेश्वर नंदिकेश्वर, और महाकालीका दर्शन कर उनकी पूजा करै । इसके पीछे संसार बंधनसे छूटनेके लिये विश्वेश्वरकी पूजा कर उनका ध्यान करै. फिर अन्नपूर्णा का दर्शन कर उनकीभी पूजा करै । इस रीतिसे सब देवी देवतोंकी पूजा दर्शन और ध्यान कर कुमारीकी पूजा करै,फिर अपनी शक्तिके अनुसार दान पुण्य करै। जिस दिन काशीमें अपहुँचै उस दिन उपवास करै; उसके दूसरे दिन स्नान कर नि- त्य क्रियाको समाप्त कर ब्राह्मणोंको संतुष्ट करे, इससे गोत्र- मादि यज्ञके करनेका फल मिलता है। फल-हे वहन ! महेश्वर कभी काशीधामको छोड़ कर नहीं जाते,इस कारण जोस्त्री पुरुप अपने पापोंको दूर करनेकी इच्छासे काशी में जाते हैं उन सबके पाप दूर हो जाते हैं। और अंतमें उनको मोक्षप्राप्ति होती है, वह मनुष्य आवागमन से छूट जाता है। वैद्यनाथतीर्थ । हे वहन ! वैद्यनाथ तीर्थमें जाकर प्रथम शिवगंगामें स्नान करे, इसके पीछे नित्यक्रिया समाप्तकर वैद्यनाथको हाथसे स्पर्श कर यथाशक्ति पूजा कर उसस्थानमें स्थित जयदुर्गा आरोग्यदेवी तथा अन्यान्य देवी देवताओंकी पूजा करें ऐसा विख्यात है कि, भगवतीका हृदय पतित होकर जयदुर्गा रूपसे विराजमान हैं। -वैद्यनाथतीर्थ के दर्शन और उनकी पूजा करनेसे सहस्त्र अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है और सब पापोंका -

(२५४)
स्त्रीप्रबोधिनी।
नाश होकरं असीम पुण्य प्राप्त होता है, इसतीर्थका दर्शन
बड़ी सरलतासे हो जाता है, इसमें अधिक खर्च नहीं पड़ता
और यह स्थानभी अति मनोहर है।
हरिद्वारतीर्थ-हरिद्वारतीर्थ गंगाका द्वार ऐसा प्रसिद्धहै कि,
श्रीगंगाजी महादेवजीकी जटासे निकल कर बिष्णुभगवान्के
चरणोंको धोतीहुई इस स्थानके बीचमें होकर मृत्युलोकमें आई
हैं। इसी लिये हरिद्वारके समान दूसरा तीर्थ नहीं है। हरिद्वारमें
जाकर स्नानादिकर तीर्थ पद्धतिक सम्पूर्ण कर्म करै। पीछे
उस स्थानमें गंगाधर, वेणीमाधव और अन्यान्य देवी देवता-
ओंके दर्शन कर पीछे उनकी पूजा करै, और जितने दिन
इच्छा हो उतने दिन रहै।
फल-हरिद्वारतीर्थका दर्शन करनेसे करोड़ तीर्थों के
जानेका फल मिलता है यह स्थान गंगाद्वार स्वर्गद्वारके समान
है, इस स्थानमें स्नान करनेसे तीन कुलोंका उद्धार होता है
हरिद्वारगंगा मोक्षदेने हारी हैं, यदि भाग्यसे कोई मनुष्य
वहां शरीर छोड़दे तो उसको मोक्ष हो जाता है, यहां एक रात
रहनेसे सहस्त्र गोदानका फल प्राप्त होता है।
प्रयागराज--इसतीर्थका नाम इलाहाबादभी है । यहाँ
मुक्तवेणी गंगा यमुना और सरस्वतीका संगम हुआ है; हे
बहन ! इस प्रयागतीर्थमें जाकर स्नानादि कर अपनेको पवित्र
करै, इसके पीछे गंगा यमुना और सरस्वती के संगमस्थानमें
स्नान करै, पीछे वेणीमाधव इत्यादि देवताओंकी पूजा कर
मनुष्य अपना शिर मुंडावे उन वालोंको गंगाजीमें डालदे
इसके पीछे मनुष्य ऋणमोचन तीर्थमें स्नान करै, पीछे

- पुण्यवती। (२५५) यमुनाके किनारेके सभी देवता तथा महादेवजीकी पूजा करै फिर भोगवतीमें स्नान समुद्रकूपमें तीन रात्रि तक रह कर हंसप्रपतनकुम्भमें स्नान करे। फल-प्रयागराजमें जानेसे स्वर्गकी प्राप्ति और ब्रह्मलोककी प्राप्ति होती है और ऋणसे मुक्त होकर अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होताहै। इस स्थानमें जानेसे सब कुल पवित्र होजातेहैं, पूर्णमासीके निकटके तीन दिनों में गंगा यनुनाके संगममें स्नान करनेसे सूर्यग्रहणकालके समान स्नानका फल प्राप्त होता है और ज्ञानका उदय होकर सब पापोंका नाश होजाता है। अयोध्यातीर्थ-अयोध्याजीमें जाकर पहले सरयूमें स्नान करै, फिर ग्रामके वीचमें हनूमानजीकी पूजा करै, पीछे श्रीरामकी पूजा उनकी प्रार्थना तथा उन्हें नमस्कार करें; पीछे कौशल्या, दशरथ और सीताजीका एकाग्रमनसे दर्शन कर उनकी पूजा करे, इसके पीछे कृत्तिवास शिवजीकी पूजा कर जनकमहर्पिकूपमें स्नान और तर्पण करै.'जब तक इच्छा हो तव तक रहै। फल-यहां आकर कृत्तिवास शिवकी पूजा करनेसे अश्वमेघ यज्ञका फल प्राप्त होता है, जो मनुष्य या स्त्री जनक- पुरमें स्नान करता है उसका फिर जन्म नहीं होता और जो इस स्थानपर शरीर छोड़ता है उसकाभी पुनर्जन्म नहीं होता; उसे एकवारही मोक्ष प्राप्त होजाती है। श्रीरामचंद्र- जीके आशय से जो कुछ कार्य कियाजाता है उसका असीम फल होता है, यहां रामनौमीके दिन उपवास रह कर जो मनुष्य पितृपुरुषों के लिये तर्पण करता है उसको ब्रह्मकी . 1 (२५६) खीप्रबोधिनी। प्राप्ति होती है जो कोई कामभी रामनौमीके दिन इस स्थान पर किया जाता है उसका काम तत्काल सिद्ध होजाता है। मथुरातीर्थ-मथुराजी श्रीकृष्ण भगवान्की लीला करनेकी भूमिहै।इसके बीचमें यमुनाजीके विश्रामके तीर्थ अन्यर हैं यहां स्नान और तर्पण आदि कार्य कियाजाता है। पीछे गतश्रम नामक देवताका मंदिर है सब यात्री उन्हीं देवताकी विधिपूर्वक पूजा करतेहैं, उसके पीछे ध्रुव तीर्थ है यहां भी स्नान और तर्पण किया जाता है। इसके उपरान्त मथुरानाथके निकट जाकर उनकी और श्रीराधिकाजीकी भलीभांति- से पूजा करे, श्रीमथुराजी सबसे पवित्र और शुद्ध तीर्थ है यहां जाकर, केशव, भूतेश्वर, कंसनाथ, महाविद्या इत्यादि सभी तीर्थोंमें स्नान और पित्रोंके लिये तर्पण करै. कंसका मंदिर वसुदेव और देवकीका कारागार, श्रीकृष्णका जन्म- स्थान इनका दर्शन करनेसे मन प्रफुल्लित होजाता है। फल-श्रीयमुनाजीमें स्नान कर श्रीमथुरानाथकी पूजा करनेसे अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त होता है, और श्रीकृष्णका दर्शन करनेसे मनुष्यको परमगति प्राप्त होती है, जो मनुष्य मथुराजीमें रहते हैं उन सभीको मोक्षकी प्राप्ति होती है, मथुरा- जीमें नियम सहित स्नान कर तर्पण करनेसे सव पितर तृप्त होजाते हैं, जो भगवत् भक्त श्रीयमुनाजीपर शरीर छोड़ते हैं उनको फिर जन्म लेना नहीं होता. उनको विष्णुलोक प्राप्त होजाता है इस तीर्थमें स्नान करदान करनेका अक्षय फल हो ता है। इतना फल यज्ञ तपस्या करनेसे भी नहीं होता जितना फल यहां दान और स्नान करनेसे होता है, यहां कंसराजके पुण्यवती। (२५७) घर बने हुए हैं, यहाँपर श्रीकृष्णने कंसको मारकर देवता- ओंका भय दूर किया था। श्रीवृन्दावनतीर्थ। दोहा-वृन्दावन जे वास कर, शाक पात नित खात । तिनके भोगनको निरखि, ब्रह्मादिक ललचात ॥ हम न भये ब्रजमें प्रगट, यही रही मन आस । नित प्रति निरखत युगलछवि, कर वृन्दावन वास ॥ हे वहन ! वृन्दावन अति उत्तम तीर्थ है जो यात्री वृन्दावन जाते हैं वह मथुरा होकर जाते हैं, यहां जाकर प्रथम मनुष्य केसीघाटमें स्नान कर तर्पण कर पीछे गोविन्द, भ्रमर, चिड़ इत्यादि २४ घाट हैं वहां क्रमसे स्नान करै, यहांभी प्रयागरा- जके समान मस्तक मुंडाना होताहै। वृन्दावनमें भी श्रीकृष्ण ने अनेक स्थानोंमें लीला कीहै, वह स्थान वनेहुए हैं। श्रीकृ- ष्णने इस वृन्दावनमें वाल्यावस्था, किशोर अवस्था और यौवन अवस्थाका कुछ एक अंश व्यतीत कियाथा, इसीलिये वृन्दावन श्रीमथुराजीसे बडातीर्थ हैं। गोपीनाथ गोकुलानंद, राधारमण, मदनमोहन, दामोदर, राधा, श्यामसुन्दर, गोविन्द और राधिका इत्यादि बहुतसी देवताओंकी मूर्तियोंकी यहां पूजा कीजाती है। केशव, महादेव, गोकर्णेश्वर, वृन्दादेवी, गोपेश्वर, नन्द, उपनंद, यशोदा, रोहिणी, कृष्ण, बलराम, श्रीराधिका इत्यादि अनेक देवता हैं, इन सबकी भली भांतिसे पूजा और प्रणाम कर प्रार्थना करै, इस वृन्दावन में बहुतसे कुण्ड हैं, इनमें मोनगंगा, कृष्णसरोवर, राधाकुंड, श्यामकुंड इत्यादि विख्यात हैं, इन सभी कुंडोंमें स्नान किया जाता है, इन सब

.
(२५८)
खीमबोधिनी।
कामोंको समाप्त कर पीछे महालक्ष्मीका दर्शन करै फिर उनकी
विधिपूर्वक पूजा करै।
फल- इस स्थानपर आकर जो मनुष्य इन कुंडोंमें
स्नान करता है उसको सातकरोड़ वार गंगास्नानसे जो फल
प्राप्त होता है वह मिलता है, सावनके महीनेमें तीजसे लेकर
पूर्णमासी तक बड़ा मेला होता है, झूलोंकी अनुपम शोभा
होती है। वृन्दावनकी अनुपम शोभाको देखकर यात्रियोंका
मन वहांसे आनेको नहीं करता।
कामाख्यातीर्थ-इस तीर्थको यात्रीलोग आषाढ़के
महीनेमें जाते हैं इस स्थानमें जाकर प्रथम नीलाचलकी
पूजा करे, पीछे गोरीशिखरपर जाय, इसके उपरान्त सौभा-
ग्यनामक कुंडमें स्नान और तर्पण करे हे वहन ! फिर विष्णु-
का दर्शन कर उनकी पूजा कर; इस स्थानमें दशकुंड
हैं सभीकुंडोंमें स्नान कियाजाता है। इसके पीछे गुफाके
बीचमें कामाख्या देवीकी पूजा कर नमस्कार करे, पीछे
प्रार्थना करे, यहां और भी बहुतसे देवता हैं, इनमें टाकवेश्वरी,
दीर्घेश्वरी, प्रचंडिका और चंडघद, प्रधान हैं, इन सबका
दर्शन और पूजा कर पीछे प्रार्थना करै। इसके उपरान्त धर्म
शरमें जाकर, निर्गमन, स्वर्गद्वारका दर्शन कर पीछे वैर
मुहामेंकी सिद्धगंगामें स्नान करै।
फल-हे बहन ! कामाख्यादेवीकी पूजा करनेसे मनुष्य
के जन्मजन्मान्तरोंके किये हुये पाप नष्ट होजाते हैं साष्टांग
दंडवत करै तो उसके संव मनोरथ सिद्ध होजाते हैं, फिर उसका
पुनर्जन्म नहीं होता।

पुण्यवती। (२५९) ब्रह्मपुत्रतीर्थ-यह ब्रह्मपुत्रनद हिमालयसे निकल भारतको उत्तरओरमें छोड़कर अर्थात् तिब्बतनामक देशके मध्यमें भारतके पूर्व उत्तरद्वारमें प्रवेश कर उस स्थानसे दक्षिण और पश्चिमकी ओर होकर गंगाजीके साथ मिलाहै इसी कारणसे यह ब्रह्मपुत्रनद ठीक उत्तरमें है, भारतके मध्यमें स्थित जहां इच्छाहो इस नदमें वहीं स्नान करैः उसे ब्रह्मपुत्र तीर्थका फल मिलताहै, जो मनुष्य चैत्र मासके शुक्लपक्षकी अष्टमीमें स्नान करता है, उसको सव तीर्थों के फलकी प्राप्ति होती है, जो मनुष्य ब्रह्मपुत्रकी पूजा करता है वह सब पापोंसे छूट जाता है। फल-हे वहन ! जो मनुष्य ब्रह्मपुत्रके किनारे जाकर उसका दर्शन करता है उसका फिर जन्म नहीं होता, और तीन जन्मोंके कियेहुए पाप नष्ट होजाते हैं । ब्रह्मपुत्रका जल- स्पर्श करते ही, मनुष्य संसारी बंधनोंसे छूट जाता है और ब्रह्महत्याका पापभी छूट जाता है । जो मनुष्य उसके जलमें कुछ द्रव्य डालता है वह जीवन्मुक्त होजाता है, ब्रह्म- पुत्रकी कथा सुननेसे शरीर निष्पाप होजाता है, और दर्शन करनेसे मनुष्यका फिर जन्म नहीं होता, इसके जलस्पर्शसेही मुक्ति प्राप्त होती है, और जलके पान करनेसे इस लोकमें यश और लक्ष्मीकी वृद्धि होती है जो मनुष्य इस तीर्थ पर वास करता है, उसको गंगासागर, प्रयाग, पुष्कर, काशी आदि तीर्थोके रहनेके समान फल मिलता है। पुष्करतीर्थ-इस स्थानमें बारह वर्ष पीछे मेला होता है, उसीको कुंभ कहते हैं । यह तीर्थ राजपूतानेमें स्थित है। इस (२६०) स्त्रीप्रबोधिनी स्थानपर पितरोंका श्राद्ध किया जाता है। यह बड़ा भारी तीर्थ है, पुष्कर एक हदका नामहै। भागीरथीजी जिस प्रका- रसे पूजनीयहैं, पुष्करभी उसी प्रकारसे पूजनीय तीर्थ है। फल-यहां स्नान और तर्पण करनेसे पित्रोंको स्वर्गकी प्राप्ति होतीहै। चन्द्रनाथतीर्थ-हे बहन । चंद्रनाथतीर्थको कलकत्ते होकर जाना होता है रास्तेमें ग्वालंदा पड़ताहै, वहांसे नाराय- णगंज होकर मेधना नदीके पार पहुंचना होताहै, पीछे वहाँसे गोशकुंडमें जाय । इसके पीछे यहाँसे वालुकाकुंडमें जाकर यात्री लोग पित्रों के लिये पिंड देतेहैं, चंद्रनाथतीर्थ त्रिपुराराजके अन्तर्गत एक छोटेसे पर्वतके वीचमें विराजमान है। यहां देवदेव महादेवजी चंद्रनाथ नाम धारणकर प्रतिष्ठित हैं, शि- वरात्रि के समय यहां बड़ा मेला होताहै, भारतवर्ष के सभी स्थानोंसे यहां यात्रीलोग आते हैं। फल-जो मनुष्य चंद्रनाथकी पूजा कर उनका ध्यान कर- ताहै, वह इस लोकमें जबतक जीताहै तबतक आनंद सहित जीवन व्यतीत करताहै उसको कोई कष्ट नहीं होता। और अंतमें विष्णुलोकमें जाकर परमात्मा लीन हो जाता है। बदरिकाश्रमतीर्थ--हे बहन! जो यात्री बदरिकाश्रमको जाते हैं वे हरिद्वार होकर जाते हैं। पीछे वहांसे वराबर पंद्रह दिनतक हिमालय पर्वतपर चढ़कर बदरिकाश्रममें पहुँचतेहैं। सब समयमें ही बदरिकाश्रमको जाना नहीं होता, यहांपर बड़ी शरदी पड़तीहै और बरफ पड़ताहै इसकारण चैत्र वैशाख इन महीनोंमें यात्रीलोग जातेहैं । यहां विष्णुभगवान्की मूर्ति

पुण्यवती।
(२६१)
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चतुर्भुज हरि प्रधान देवताहैं, सब यात्री उनका दर्शनकर पूजा
करते हैं, और पीछे ब्राह्मण, संन्यासी और भिखारियोंको
संतुष्टकर भोजन करा पीछे आप भोजन करते हैं।
फल-हे वहन ! वदरिकाश्रमतीर्थमें जाकर जो मनुष्य
हरिकी पूजा करताहै उसको फिर माताके उदरकी पीड़ा
भोगनी नहीं होती, अर्थात् उसका फिर जन्म नहीं होता।
सेतुबंधरामेश्वरतीर्थ-वम्बई होकर सेतुर्वधरामेश्वर
जाना होताहै यहां एक लिंगमय शिवजीकी मूर्ति प्रतिष्ठित है,
यात्री लोग यहां जाकर विधिपूर्वक उस मूर्तिकी पूजाकर
यथाशक्ति दान करते हैं, हे वहन ! यह शिवजीकी मूर्ति
श्रीरामचंद्रजीने स्थापित कीथी । इस स्थानमें रामचंद्रजीने
सीताजीके उद्धारके निमित्त रावणके राज्यमें जानेके लिये
समुद्रका पुल बांधाथा । यद्यपि लंकासे लौटते समय रामचंद्रने
उस पुलको तोड़दिया था, परन्तु तोभी इसका कुछ एक अंश
तीर्थरूपसे विख्यात है।
फल-जो रामेश्वर दर्शन करिहैं।
सो तनु तजि ममधाम सिधारहैं।
सेतुबंधरामेश्वरमें स्नान पूजा और तर्पण आदि करनेसे
परलोकमें पितृपुरुषोंको तृप्ति प्राप्त होतीहै, और मनुष्योंके
असव मनोरथ पूर्ण हो जातेहैं, मनुष्यको इस जीवनमें परम सुख
मिलताहै।
चन्द्रशेखरतीर्थ-हे वहन ! इस तीर्थमें जाकर मनुष्य
पहले व्यासकुंडमें स्नान करै इसके पीछे शिवतीर्थमें स्नान और

(२६२)
बीप्रबोधिनी।
fotutte
तर्पणादि कर पर्वतके ऊपर नन्दीश्वर, मतिदक्ष इत्यादि
देवताओंकी पूजा करै यहां पर कोई २ यात्री शिरभी मुंड़ाते हैं।
यहां नानाप्रकारकी शिवजीकी मूर्ति अनेक स्थानों में
प्रतिष्ठित हैं।
फल-हे बहन ! जो मनुष्य यहां स्नान और तर्पण
करताहै उसको अक्षयफल मिलता है। उसके सात जन्मौके
कियेहुए पाप नष्ट होजातेहैं । यहांपर विराजमान केश
शालग्राम नामक सहस्रमुखयुक्त मूर्तिका दर्शन करनेसे।
मनुष्यका पुनर्जन्म नहीं होता। शम्भुनाथका दर्शन स्पर्श
और उनकी पूजा करनेसे मनुष्यको दशाश्वमेधयज्ञका फल
प्राप्त होताहै । जो मनुष्य चंद्रनाथका दर्शन, स्पर्श, पूजा और
प्रणाम करताहै, और जो उनका चरणोदक पान करता है।
उसको मुक्ति प्राप्त होतीहै।
श्रीक्षेत्रतीर्थ--उड़ीसाके अन्तर्गत जिला कटकके वीचमें
पुरी नामक स्थानमें जगन्नाथ देवका एक विख्यात मंदिर है,
इसके बीचमें जगन्नाथ देवही पुरीके प्रधान देवताहैं । इसीको
श्रीक्षेत्र कहते हैं, और फिर जगन्नाथके अतिरिक्त यहां विरजा
देवी हैं, पुरुषोत्तम, शंभु, हरि, भुवनेश्वर, साक्षी गोपाल,
माकैडेश्वर, शिव, इत्यादि देवताओंकी पूजा की जातीहै और
फिर वैतरणी में स्नान; नाभिगयामें श्राद्ध, तथा अक्षय वटकी
प्रदक्षिणा, दर्शन और उनकी पूजा की जातीहै, इसके पीछे
पूजा और नमस्कार करनेसे विशेष फल प्राप्त होताहै।

पुण्यवती। (२६३) फल-हे वहन ! जो मनुष्य जगन्नाथका दर्शन और उनकी प्रदक्षिणा करताहै उसको सहस्र अश्वमेध यज्ञका फल मिलताहै तथा सात तीर्थोके स्नान दानका फल मिलताहै, वलरामकी पूजा करनेसे मोक्ष प्राप्त होताहै । जो मनुष्यं सुभद्राका दर्शन- कर उनको नमस्कार करता है, उसको परम गति प्राप्त होतीहै और अंतसमयमें विष्णुपुरमें जाकर आनंदसे समय व्यतीत करताहै, वैतरणीमें तर्पण और दान करनेसे अन्तसमयमें वैतर- णीके पार होने में कष्ट नहीं होता, विरजादेवीका दर्शन करनेसे सातकुल पवित्र होतेहैं और ब्रह्मलोककी प्राप्ति होतीहै, अक्षय- वटका दर्शन करनेसे राजसूय यज्ञका फल मिलताहै, हे वहन! वहां जाकर जो मनुष्य पुरुषोत्तमकी पूजा कर अपने पित्रोंका श्राद्ध करताहै उसके सात कुल उद्धार होजाते हैं। हे वहन । तीर्थ तो हजारों हैं उनको कहांतक बताऊंगी इस समय मैंने मुख्य २ तीर्थोंका माहात्म्य तुझे सुनादिया, क्योंकि आगे औरभी बहुतसी बातें समझानी हैं। एडया (२६४) खीप्रबोधिनी नवम सोपान। श्रोता। हे वहन! अव मैं तुझे स्त्रियोंकी कथा सुनाती हूं कि जिनकी वड़ाई आज तक भारत वर्षमें छारही है। सीता-महारानी सीताजी मिथिलाधिपति राजा जनक की पुत्रीथीं। जिस समय राजाने पानीवरसने की इच्छासे पृथ्वीको मुखनन कियाथा उस समय यह कन्या इनको मिली इन्होंने इसका नाम सीता रक्खा, यह कन्या परम रूपवती और गुणवान् थी, जब यह विवाहयोग्य हुई, तौ राजाने अपनी यह आज्ञा प्रचार की कि, जो कोई मेरे यहां शिवधनुषको तोड़ेगा वही इस कन्याको पावैगा देशदेशांतरोंके राजा आन २ कर धनुषसे जूझे परन्तु कुछ भी न हुआ हार २ कर घरको लौट गये; अंतको महाराज अयोध्याके राजा दशरथ- जीके बड़े पुत्र महाराज रामचंद्रनेही उस धनुषको तोड़कर सीताजीको पाया। जिस समय राजा दशरथजी वृद्ध होगये और राजकार्य भारमें उनकी सामर्थ्य नरही तव राजाने अपने बड़े पुत्र राम चंद्रको ही राजतिलक देनेका विचार किया राजाके तीन पुत्र और थे, कैकेयीसे भरत सुमित्रासे लक्ष्मण, शत्रुघ्न और, कौशिल्या से राम उत्पन्न हुएथे यही सबसे बड़े थे राजाने अपनी यह आज्ञा प्रचार की कि, मैं रामकोही राज्य दूंगा,इस बातको सुन कर कैकेयी बड़ी दुःखित हुई। उसने विचारा कि हायाराजाने मेरे पुत्रको राज्य न दिया जव रात्रि होनेपर राजा

श्रोता।
(२६५)
उसके महलमें गये, उस समय कैकेयी मलीन भावसे चुपचाप
पड़ी रही राजासे कुछ न बोली। राजाने न बोलनका कारण
पूछा तब उसने कहा कि, जिस समय आपसे देवासुर संग्राम
हुआथा उससमय युद्ध में मैंने आपकी बहुत सहायता की थी।
तव आपने प्रसन्न होकर मुझे दो वरदान दियेथे परन्तु मैंने
उनको उस समय धरोहरकी भांति आपहीके पास रखदिये, अब
मैं अपने वही वरदान लेना चाहती है। पहले से तो भरतको
राज्य दो और दूसरेसे रामचंद्रको वर्षके लिये वनको भेजो।
यह सुनतेही राजाको सूज आगई और उसी अवस्थामें सारी
रात वीतगई जब राजा प्रभातको राजदरवारमें न गये
तो सुमन्त्रको बड़ी चिन्ता हुई और वह इस बातको
जाननेकेलिये रनवासमें गये जाकर देखा कि, राजा
पृथ्वी पर अचेत पड़े हैं। पीछे राजाको सावधान कर
राजासे कहा कि, आज रामचंद्रको राज्य दिया जायगा
इसकारण शीघ्र सभामें चलिये कारण नौतेहुये राजालोग
आपकी वाट देख रहेहैं। राजाने कहा सुमंत्र । सर्वनाश हो-
गया। दुष्टा कैकेयीने बड़ा विघ्न किया है। यदि इस समय
एक बार रामको मेरे निकट लेआवो तो अच्छा हो, सुमंत्र
रामचंद्रको तुरंत लिवा लाये, आकर देखा कि, पिता पृथ्वी
पर अचेत पड़े हैं, सौतेली माता कैकेयीसे राजाके अचेत
होनेका कारण पूछा तव कैकेयीने कहा कि, राजाने मुझे दो
वर दिये हैं, तुम इसी समय वनको चले जाओ भरतके आने
की वाट मत देखो। रामचंद्र उसी समय पिताको प्रणाम कर
सीताजीको कौशल्याजीके पास रखनेको गये, और जा-

(२६६)
स्त्रीप्रबोधिनी।
कर बोले कि, माता! मैं आज वनको जाऊंगा इसलिये सीता
को अपने पास रखना, यह सुनतेही सीतादेवीने कहा स्वामिन
मैं पतिके विना एक पल भी जीवती नहीं रह सकूँगी आप
जहां जायँगे पीछे २ मैं आपके चरणोंकी सेवा करती हुई
चलूंगी। फिर रामचंद्रने लक्ष्मणसे कहा भाई ! लक्ष्मण तुम
घरपर रहकर माता पिताकी सेवा करना। इस पर लक्ष्मण
ने कहा भाई जिस समय आप सीताजीको अपने साथ लिये
जाते हो तब मुझे भी लेजाओ, नहीं तो स्त्रीको साथ में ले
जानसे आपको बड़ा कष्ट होगा, तब रामचंद्रजीने उन्हें भी
संग लिया जब तीनों जने जानेको तैयार हुये तब राजाने
सुमंत्रको बुलाकर रथ लानेके लिये कहा, सुमंत्र रथ लाकर
तीनों जनेको बैठाल वनको चले।
रामचंद्रके वन जानेसे सभी अयोध्यावासी दुःखित हो
कर रामचंद्रके रथके पीछे २ चलने लगे। राजा दशरथभी
वाहर आये, पिताको अधिक कष्ट होता हुआ देखकर
रामचंद्रने सुमंत्रको शीघ्र रथ चलानेकी आज्ञा दी, रथ
तमसा नदी पर पहुँचा, वहां सबने स्नान कर फलाहार
किया । फिर दूसरे दिन गोमती नदीके पार हो गंगाके
किनारे कौशल राज्यमें पहुँचे वहां शृङ्गवेर नगरमें गुह्यकके
यहां पहुँच कर सुमंत्रको विदादी दूसरे दिन गंगा पार होकर
भरद्वाज मुनिके आश्रममें पहुँचे । भरद्वाजने अपनेही आश्रम
में रहने के लिये बहुत हठ करी, रामचंद्रने विचारा कि, यह
स्थान अयोध्यासे बहुत निकट है कदाचित् भरतजी मुझे लेने
के लिये न आजांय इस कारण चित्रकूट पर्वतपर जाकर
एक कुटी बना वहीं रहने लगे।
.

श्रोता। (२६७) इस ओर सुमंत्र शृंगवेरपुरमें रामचंद्रको छोड़कर अयो- ध्यामें पहुँचे राजा दशरथने सारा समाचार सुमंतके मुखसे सुन अत्यन्त व्याकुल होकर कहा कि, एक समय मैं शिकार खेलनेको सरयूके किनारे गयाथा वहां जिस समय अंधक मुनिके पुत्रने अपने कमंडलुमें नदीसे जल भरा तव मैंने मृग जानकर उसके वाण मारा, तव उसने राम २ कह कर. प्राण छोड़ दिये, तव मैं उसके मातापिताको पुत्रके मृतक शरीरके निकट लाया उस समय उन्होंने पुत्रशोकसे कातरहो मुझे शाप दिया कि, जिस भाँति हम पुत्रशोकसे व्याकुलहो प्राण छोड़ते हैं उसी भाँति तुमभी पुत्रशोकसे कातर हो प्राण छोड़ोगे; यह कहते २ राजानेभी प्राण छोड़ दिये । मंत्रियोंने विचारा कि, राजाकी क्रिया कौन कर चार वेटों से यहां एक बेटा भी नहीं है। तव कुलगुरु वसिष्टजीने राजाके शरीरको तेलमें रक्खा, और केकय राजाके यहांसे भरत शत्रुघ्नको बुलाकर राजाकी अंतिम क्रिया करवाई, हाथी घोड़े गाय अन्न वहुतसा दानकिया। इसके उपरान्त सभीने भरतजीको राज्यसिंहा- सन पर बैठनेके लिये कहा, परन्तु भरतजी राजी न हुए, और रामचंद्रको खोजते २ चित्रकूट पर्वतपर पहुँचे, वसि- टजीके मुखसे राजाके मरनेका समाचार सुनकर सभी दुः- खित हुए, मुनिकी आज्ञानुसार तीन दिन तक अशौच ग्रह- ण कर रामचंद्रने पिताका. श्राद्ध किया, फिर भरतजीने अ- योध्याको चलनेके लिये रामचंद्रसे बहुतसी विनती करी, तव रामचंद्रने उनकी वात न मान कर उन्हें राज्यपर बैठ (२६८) खीप्रबोधिनी। नके लिये कहा, भरतने कहा जो आप नहीं चलतेहैं तो आप अपनी खड़ाऊं देदीजिये उन्हेंही सिंहासनपर बैठाकर राजकार्य चलाऊंगा तब रामचंद्रने उन्हें खड़ाऊं देकर विदा किया। इस ओर राम लक्ष्मण सीता चित्रकूटको छोड़ कर अ- गस्त्य पर्वत पर पहुंचे, वहां कुछ दिन रहकर पंचवटी वनमें कुटी बनाकर रहने लगे, इस समय लंकामें राजा रावणथा। रावणने अपने भुजावलसे पंचवटीतक अपना अधिकार किया रावणकी वहन शूर्पणखा घूमती २ रामलक्ष्मणके पास गई और उनसे विवाहका प्रस्ताव किया, रामने न माना, तब उसका बहुत हठ देखकर लक्ष्मणने उसके नाक कान दोनों काट लिये, तब वह अपने भाई खर दूषणको लेकर आई रामने उनको मार डाला, तब उसने रावणसे जाकर कहा, रावणने मारीचसे जाकर कहा कि, मारीच । सीता हरनेमें तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी मारीचने मना किया समझाया परन्तु वह एक न माना अन्तमें मारीच सुव- र्णका मृग बनकर इधर उधर घूमने लगा. इसे देख कर सीताजीने रामचंद्रसे कहा कि, इस मृगको मारकर इसका चर्म ले आओ रामचंद्र उस मृगको मारनेके लिये गये, लक्ष्मणको सीताके निकट छोड़ गये मृग रामचंद्रजीको बड़ी दूर लेगया वहां जाकर रामचंद्रने उसे तीक्ष्ण वाणसे मारा तव वह माया- वी राक्षस " भइया लक्ष्मण ! मरा" यह कहकर चिल्लाने लगा सीताजीने लक्ष्मणसे कहा कि, देवर अपने भइयेकी सहायताके लिये जाओ, तव लक्ष्मण चारों ओर धनुषसे रेखा बैंच कर सीताजीसे वोले कि, इस लकीरसे वाहर मत श्रीता। (२६९) arathi निकलना, यह कहकर चले गये। इस अवसरको पाकर रावण दंडीका रूप धारण कर भिक्षा लेनेके लिये सीताके समीप गया सीताने भीतरसे हो भिक्षा दी परन्तु रावणने कहा मैं बँधी भिक्षा नहीं लेता वाहर आकर दो, जैसेही भिक्षा देनेके लिये सीताजी वाहर आई वैसेही रावण रथके ऊपर चढ़ाकर लंकाकी ओरको चला; लंकामें लेजाकर अशोकवनमें रक्खा सीताको रानी वनानके लिये बहुत हठ किया जब उन्होंने न माना तो छोड़कर चलागया हे वहन । सीताकी रक्षा करनेके लिये बहुतसी राक्ष- सियोंको रक्खा इस ओर राजा रामचंद्रने सुग्रीवके मुखसे सुना कि, सीताको रावण चुराकर लेगयाहै। अतएव उन्होंने सुग्रीवकी सहायता कर वालिको मार . सुग्रीवको राज्य दिया, फिर हनूमान्जीको सीताकी खोजके लिये भेजा हनूमान्ने लंकामें जाकर देखा कि, रावणके रनवासमें रावण मंदोदरीको लिये हुए सो रहा है। फिर वृक्षके ऊपर चढ़कर देखा कि, सीता देवी अत्यन्त दुःखित हो मलीन भावसे बैठी रामनाम जप रही हैं। तव किसीको न देख कर सीताजीके समीप जा रामचंद्रकी अंगूठी दे रामलक्ष्मणकी कुशल सुनाई हे वहन ! जब यह सीताका समाचार ले रामचंद्रके पासको लौटे तो रावणके वागके फल खाने और पेडोंको उखाड़ने लगे तब रावणके वेटेने आनकर युद्ध किया उसेभी मार डाला अंतमें मेघनाद बांधकर लेगया और इनकी पूछों आग लगादी यह लंकाको फूंककर रामचंद्र के पास आये रामचंद्र सीताकासमा चार पायं समुद्रका पुल बांधलंकापुरीको गये,यहआजतक सेतु- (२७०) स्त्रीप्रबोधिनी। बंध नामसे विख्यातहै रामने सामनेसेही रावणके मुकुटको चूर्ण कर डाला। फिर बड़ा भयंकर युद्ध होता रहा बहुतसे राक्षस मारे गये रावणके पुत्र इन्द्रजित्ने लक्ष्मणको नागपाशमें बांध लिया परन्तु उससे छूटकर उन्होंने रावणके पुत्रोंसे युद्ध कर सारी सेना मार डाली। रावणने इन्द्रजित्को फिर सेना देकर युद्ध करनेके लिये भेजा इस युद्ध में रामचंद्रकीबहुतसी सेना मारी गई,फिर जब कुंभकर्ण इन्द्रजीत आदि बलवान् २ योद्धा मारे गये तो अंतमें रावणके साथ युद्ध प्रारंभ हुआ रावणने अत्यन्त क्रोधित होकर लक्ष्म- णके वक्षस्थलपर भयंकर आघात किया उस समय रामचंद्रने क्रोधित होकर रावणको मारडाला और विभीषणको राज सीताके पास हनूमानके हाथ समाचार कहला भेजा फिर सीताके लेनेके लिये विभीषणको भेजा, सीताके आनेपर राम- चंद्रने कहा कि, तुम बहुतदिनोंसे रावणके यहां रहीहो जो हम तुम्हें घर रखलेंगे तो हमारी निन्दा होगी इसकारण तुम सुग्रीव या भरत तथा शत्रुघ्नके यहां रहो, तव सीताने बहुत रुदन किया सीताने अग्निमें परीक्षा देकर रामचंद्रको अपनी सत्यताकी परीक्षा दी तब रामचंद्रने ग्रहण किया, पीछे चौदह वर्ष होजाने पर रामचंद्र अयोध्याको आय: चारों भाई मिले फिर सबने मिलकर रामचंद्रको राज्य दिया। इस ओर सीताजी गर्भवती हुई। रामचंद्रने सीताजीसे पूछा कि, तुम्हारी क्या खानेको इच्छा करतीहै, सीताने कहा नाथ ! खानेको तौ कुछ इच्छा नहीं करती परन्तु वन देखने की इच्छा करती हूँ, रामने कहा अच्छा कल भेजदूंगा, " काला माहाकार क श्रीता। (२७१) यह कहकर रामचंद्रने सभामें आकर सभासदोंसे पूछा कि, हमारे राज्यमें प्रजा कैसे रहतीहै, किसीने कुछ उत्तर न दिया, इनने ही किसी भले आदमीने कहा कि, आपने रावणके घरमें रहीहुई सीताको जो घरमें रख लियाहै इससेही लोग उंगली उठाते हैं और सब बातमें आपकी कीर्ति है। यह सुन- कर रामचंदने दुःखित हो दूतको बुलाकर उससे पूछा कि, कहो हमारे विपयमें लोग क्या कहतेहैं दूतने कहा कि, महाराज कल एक नदीके किनारे धोवी कपड़ा धोते २ लड़ते जातेथे उनमें एकतौ श्वसुर था और एक जमाई था श्वसुरने जमाईसे कहा देखो मैंने तुम्हें योग्यपात्र विचारकर कन्या दी थी, परन्तु तुमने उसे ऐसा माराहै कि, वह तुम्हारे घरसे भागकर मेरे घर गई परन्तु जवान लड़कीको मैं अपने घर रखना पसंद नहीं करता, यह बात शास्त्रकेभी विरुद्ध है, इसपर जमाईने कहा कि, तुम्हारी लड़की पतिके निकट रहना नहीं चाहती वह केवल मावापके यहां रहना अच्छा मानतीहै; अब मैं उसे घर नहीं रक्तूंगा, देखो महाराज रामचंद्रकी स्त्री सीताजीको रावण हरकर ले गयाथा, और रामचंद्रने उसे फिर अपने घरमें रखलियाफिर वह तौ राजाहैं,उन्हें सब सामर्थ्यहै और मैं नीच जातिहूं जो ऐसा करलूं तो बिरादरीके लोग मुझे जातसे बाहर कर देंगे यह बात सुनकर रामचंद्र दुःखी हुए । उसीदिन सीताकी चोटी बांधते २ किसी सहेलीने पूछा तुमने बहुत दिनोंतक रावणको देखाथा, उसके दशशिर वीसनेत्र वीस भुजा थीं क्या यह वात सत्य है। सो तुम पृथ्वीपर बैंचकर उसकी आकृति दिखाओ, सीताने पृथ्वीपर रावणकी मूर्ति - (२७२) वीप्रबोधिनी। बनाकर दिखाई, इतने ही देवात् रामचंद्रभी आन पहुंचे, तब देखा कि, रावणका चित्र ठीक बना है। तब विचारने लगे. कि, सीताजी यदि भली भाँतिसे रावणको न देखती तो यह उसकी मूर्ति किस भाँति बैंचती। इससे राम औरभी दुःखित हुए और क्रोधित होकर लक्ष्मणसे कहा कि, कलही सीता- जीको तुम वाल्मीकिके आश्रमके निकट छोड़ आओ सीताको वनवास दिया । लक्ष्मणने वही किया, और सारा- हाल सीताजीसे कहदिया। सीता अत्यन्त दुःखी हुई. फिर वाल्मीकिने मुनियोंकी स्त्रियोंके निकट सीताको रखदिया। रामचंद्र महादुःखित हो एकसुवर्णकी सीता बनाकर समय वितानेलगे हे वहन ! इस ओर सीताजीके दो पुत्र हुए, सुनिने इन दोनों पुत्रोंको लव और कुशसे ढककर रक्खा । फिर एकका नाम लव और दूसरेका नाम कुश रखदिया। फिर धीरे २ यह दोनों बालक संगीतविद्यामें पंडित होगये । इस- समय रामचंद्रने अश्वमेध यज्ञप्रारंभ किया यज्ञका घोड़ा मुनिके तपोवनमें गया तब शत्रुघ्न उसे लेनेके लिये गये। तव लव कुश के साथ शत्रुघ्नका युद्ध हुआ। शत्रुघ्न हारे फिर भरत और लक्ष्मण भी हारे अधिक क्याउस युद्ध में स्वयं रामचंद्रभी गयोरामचंद्रकी सैना दोनों बालकोंको देखकर कहनेलगी किं,जिससमय महा- राजने सीताको वनवास दियाथा उससमय सीताजी गर्भवती थीं, कदाचित् यह उन्हींके पुत्र हों तब रामचंद्रजीने उन दोनों बालकोंका परिचय पूछा लव और कुशने कहा परिचय तो पीछे पूछना, प्रथम युद्ध करके अपने घोड़ेको ले जाओपिता- पुत्रमें युद्ध हुआ रामचंद्रकी बहुतसी सेना मारीगई, फिर राम- .

श्रोता। (२७३) चंद्रने उनसे पूछा कि, तुम कौन हो और किसके पुत्र हो तव लवने कहा कि, हम वाल्मीकि मुनिके शिष्य हैं। पीछे लव- कुश वाल्मीकिके साथ रामचंद्रके यज्ञमें गये और जाकर अपनी संगीतविद्याका परिचय दिया। इससे सारी सभा मोहित होगई। रामचंद्रने संतुष्ट होकर बहुतसा धन देना चाहा, लव- कुशने कुछ नहीं लिया, रामचंद्रने पूछा यह कविता किसकी है; वालकोंने कहा कि, वाल्मीकिकी वनाईहै रामचंद्रने कहा अमाताका नाम क्या है तब लवकुशने कहा कि, हम सीताके सुपुत्र हैं यह सुनतेही रामचंद्रने उन्हें गोदीमें उठालिया । और नेत्रोंमें जलभरकर कहा कि, हे मुनिश्रेष्ठ ! सब सभास- दोंके सन्मुख सीताकी परीक्षा दो तो मैं उन्हें अपने घरमें रख लूं। फिर सीताजीके आनेपर सीताने कहा कि, एकवार तो मैं परीक्षासे उत्तीर्ण होगईहूं फिर अव क्यों दूं यह कह लज्जासे मुख नीचाकर पृथ्वीकी ओर देखकर कहा। हे माता वसुन्धरे! मुझे स्थान दो, यह कहतेही पृथ्वी फटगई और सीताजीको गोदमें बैठालकर पृथ्वी देवी रसातलको ले गई। इसके पीछे रामचंद्रनेभी शोकसे अधीर हो प्राण छोड़ दिये। पीछे लव और कुश राज्य करने लगे। हे वहन ! इससे यह भलीभांति विदित होताहै कि, सीता- जी कैसी पतिव्रता स्त्री थीं। उनके सतीत्वमें कोई भी संदेह नहीं करसकता सतीमें जो गुण होने चाहिये सीता देवीमें वह सभी गुण विद्यमान थे। सती। हे वहन ! सतीका प्रेम जैसा स्वामीसे देखा जाताहे, संसार (२७४) बीप्रबोधिनी। में ऐसा और किसीका दिखाई नहीं देता। कन्या सती दक्ष राजाकी बड़ी प्यारी कन्या थी, रूपमें सुवर्णकी मूर्ति गुणमें सर्वलोकोंको मोहनेवाली, अंतमें शिवजीकी स्त्री हुई वह कुटीमें रहकरही आनंद मानतीथी भिक्षाके अन्नसेही उन्हें संतोषथा मुंडोंकी मालासे शोभायमान् शिवका वक्षस्थल, अंगमें भस्म लगीहुई, लाल २ नेत्र, ऐसे शिवकी सेवा करना ही उनके जीवनका एक व्रत था, कैलासपर्वतके सुख और शान्तिको वर्णन करते २ भारतके प्रधान २ कविभी हारमान गयेथे । जिससमय राजा दक्षने अपने यहां यज्ञ किया; तो उस यज्ञमें दक्षने शिवजी और सतीको न्योता नहीं दिया इसी अवसरमें गौतमकी कन्या जया सतीके देखनेकी इच्छासे कैलास पर्वतपर गई. सती उसे इकला आयाहुआ देखकर बोली कि, विजया,जयन्ती और अपराजिता यह किसकारणसे नहीं आई। जयाने कहा कि, वह सभी अपने नानाके यहां यज्ञ में गईहैं; मैं वहींको जारही हूं आप और क्या शिवजीमहा- राज उनके यज्ञमें नहीं जायँगे। क्या पिताने आपको निम- त्रण नहीं दिया,सम्पूर्ण लोकोंमें जो स्थावर और जंगम दिखाई देते हैं यह सभी उनके यज्ञमें निमंत्रित हुये हैं तब क्या आप को निमंत्रण नहीं किया । हे वहन ! जयाके सुखसे इन वज्रके समान कठोर वचनोंको सुनकर उन्होंने अत्यन्त क्रोधित हो उसीसमय अपने प्राणोंको त्याग दिया । जया सतीकी यह अवस्था देखकर शोकसे व्याकुल हो ऊँचे स्वरसे विलाप करने लगी, उसके रोनेके शब्दको सुनकर शिवजी जयाके धोरे गये जाकर देखा कि, सती मृतक पड़ी है. शिवजीने पूछा श्रोता। २७५) यह क्या हुआ तव जयाने कहा कि, यज्ञमें पिताने इनको निमंत्रण न देकर इनका निरादर कियाहै. इनकी सब बहिनें अपने २ पतियों के साथ गई हैं। यह सुनकर इन्होंने अपने प्राण छोडदिये, यह सुनकर शिवजी अत्यन्त क्रोधित होकर दक्षके यज्ञमें गये और जाकर दक्षका यज्ञ विध्वंस करदिया- हे वहन । सतीने मृतक होकरभी शिवजीको न छोड़ा, उन्हों ने गिरिराजके घरमें मैनाके गर्भसे जन्म लिया उनका विवाह फिर शिवजीकेही साथ हुआ। देखो। सती कैसी पतिव्रता स्त्री थी जिसने पतिका निरादर हुआ सुनकरही प्राण छोड़दिये इसीसे आजतक भारतवर्ष में उनकी कीर्ति प्रकाशमान हो रहीहै। शैव्या। हे वहन ! महाराज हरिश्चंद्र ससागरा पृथ्वीके राजाथे परन्तु प्रारब्धके वशसे उनकोभी अनेक कष्ट उठाने पड़े उन्होंने प्रथम सारा राज्य विश्वामित्रको स्वप्नमें दियाथा. मह- पिने प्रत्यक्षमें आकर अपनाराज्यलेलिया परन्तु विश्वामित्रके कोधकी तवभी शान्ति नहीं हुई तौभी राजा ऋपिके कर्जदारही रहे फिर ऋपिके ऋणसे मुक्त होनेके लिये घरसे निकल चले, स्त्रीभी उनके साथ चली । जब किसी भाँति कर्जसे छूटनेका उपाय न देखा तव रानी शैब्याको एक ब्राह्मणके हाथ वेचा; परन्तु इससे भी उनके दुःखका अंत न हुआ तब चंडालके यहां आप बिके तव ऋषिके ऋणसे छुटकारा हुआ चांडालके यहां मुरदोंपरसे वस्त्र लेनेका रुजगार होता था मरघटपर राजा नियत हुए।

(२७६) बीमबोधिनी। इस ओर रानी शैब्या अपने पुत्रको ले ब्राह्मणकी सेवा शुश्रूषा करने लगी एकदिन अचानक उसके पुत्रको सांपने काटखाया,उसके काटतेही पुत्र मरगया, रानी शेव्या पुत्रशो- कसे कातर हो सारी रात रोती रही। परन्तु कौन दासीके पुत्रका संस्कार करेगा इस कारण अपने आपही पुत्रके मृत- क शरीरको उठाकर रात्रि में इकली रोते २ मरघटकी ओर- को चली। उसके रोनेके शब्दको सुनकर वृक्षलता आदि सभी कांपने लगेः श्मशानमें राजा हरिश्चंद्र मोटा लट्ट कंधे- पर धरेहुए घूमरहेथे अंधकारमें दोनोंमेंसे किसीने किसीको न पहँचाना। हाय ! राजा रानीको इससे अधिक दुःख और क्या हो सकताहै। हरिश्चंद्रने कहा पुत्रकी क्रिया जव करियो पहले हमैं आधा कप्फन दे दो राजाके बोलको रानीने पहँचानकर कहा, लो आज अपने गोद खिलाये पुत्रकी दशा देखलो, राजाने बहुत दुःख माना अंतमें कहा जो होनाथा सो होगयाअव हमें आधा कप्फन दे दो, रानीने कहा स्वामी मेरे पास तो कपड़ा नहींथा मैं अपने दुपट्टेमें लपेटकर लाई हूं परन्तु तुम्हारी आज्ञा माननी उचितहै, यह कहकर आंचल फाड़ने लगी, हे वहन ! उसी समय भगवान् रानी शैब्याके सतीत्व और राजाकी सत्यता देखकर आ उपस्थित हुए और उनके पुत्रको जीवदान देकर राजा हरिश्चंद्रको फिर राज्य दिया। हे बहन ! रानी शैब्याका पतिधर्म सराहने योग्य हैं स्त्रियों को ऐसाही करना उचित है।

श्रोता।
(२७७)
सावित्री।
हे वहन ! सावित्री के पिता बहुत दिनोंसे राज्यको छोड़कर
वनमें रहते थे इन्होंने वानप्रस्थका अवलम्बनकर कन्याकोभी
अपनेही साथ रक्खाथा वृक्षके फूलके समान उस वनमें
सावित्री दिन २ बढ़ने लगी । इसवनके एक ओर एक
अंधा राजा रहता था। उसके भाईने राज्य छीन लियाथा. वह
अपने पुत्र सत्यवान्को लेकर रहताथा; सत्यवान् और
सावित्री दोनों जने अपने २ पिताके लिये जंगलमें लकड़िये
वीनने जाया करते दोनों में अधिक प्रेम बढ़गया, परस्परमें
दोनोंने विवाह करनेका संकल्प किया दोनोंके पिता माताभी
राजी होगये, परन्तु किसी ऋषिने सावित्री के पितासे गणना
करके कहा कि, जब सावित्रीके विवाहको एक वर्ष हो जायगा
उसी दिन सत्यवानकी मृत्यु होगी, यह सुनकर ऐसा कौनसा
पिताहै जो सत्यवान के साथ विवाह करनेमें राजी हो, परन्तु
सावित्रीने किसी की न मानी। यदि विवाह न हुआ तो भी
वह नहीं बचेगा, तव उसके इसकाममें किसीने कुछ रोक टोक
न करी, सावित्री और सत्यवान्का विवाह हो गया।
धीरे २ एकवर्ष पूर्ण होगया। सावित्री दिन गिनतीजातीथी।
जिसदिन उसके विवाहका पूर्ण दिन हुआ उसकोभी वह नहीं
भूलीथी । तब प्रभातकोही सत्यवान् घरसे बाहर चले तो
सावित्रीभी उनके पीछे २ चली, सत्यवान्ने बहुत मना किया
परन्तु सावित्रीने एक न माना, संध्यातक तो वह दिन
निर्विघ्नतासे बीतगया सावित्री अपने मनही मनमें विचारने
लगी कि, ऋषिके वचन झूठे हुए, आज सारादिन बीतगया;

(२७८) स्त्रींप्रबोधिनीं। ठीक उसीसमय सत्यवानने कहा “ सावित्री । " मेरे शिरमें बड़ा दर्द हो रहाहै; यह कहते २ वह वहीं लेट रहा सावित्री स्वामीके मस्तकको गोदीमें धरकर बैठगई । हे वहन ! कुछ काल पीछे रात्रि होगई, सारे वनमें अंधकार छागया, इसस- मयमें सत्यवान्की मृत्यु होगई तव भयंकर जीवजंतुओंके वनमें स्वामीके मृतक शरीरको गोदीमें लियेहुए सावित्री उसी वनमें बैठी रही। यमके दूत सत्यवान्को लेने के लिये आये, परन्तु सतीकी देह छुनेसे उसके उठानेमें असमर्थ हो लौट गये और जाकर यमराजसे कहा-यमराज स्वयं आये, परन्तु वहभी सत्यवान्का शरीर उठानेको समर्थन हुए अनेक उपाय करे परन्तु न उठासके तब सावित्रीने यमराजसे कहा कि, तुम सत्यवान्के मातापिता- के नेत्र खोल दो तो मैं इस देहको छोड्दै यमराजने कहा ऐसाही होगा उनके नेत्र खुलजायगे; सावित्रीने सत्यवानकी देह छोड़दी परन्तु यमराजको पकड़लिया, वह उनके साथ र चलने लगी तब उन्होंने सावित्रीको और भी वरदान दिये परन्तु सावित्रीने उनका पीछा जबभी नहीं छोड़ा, तव यमरा- ज घवड़ाकर सावित्रीसे कहने लगे कि, " सत्यवान्के और- ससे तुम्हारे सौपुत्र होंगे" सावित्रीने कहा “देव ! सत्यवान को तो आप ले चले फिर किसप्रकारसे सत्यवान्के औरससे हमारे सौ पुत्र होंगे?" तव यमराजको ज्ञान उत्पन्न हुआ उससमय उन्होंने सावित्रीकी पतिभक्तिसे विशेष संतुष्ट हो सत्यवान्को जीवित करदिया, तव सावित्री लौटकर अपने पतिके निकट आय सत्यवानका मस्तक गोदीमें रखकर बैठ- प्रोता। (२७९) गई। सत्यवान् उसीसमय उठ बैठा, और उठकर बोला कि, यह क्या रात होगई अवतक हम इस वनमेंही पड़े हैं, यह कह- कर दोनोंजने घरको चले गये। धीरे २ यह सब बात सारेमें फैलगई उसीदिनसे आजतक सारी स्त्रिये ज्येष्ठमासकी मावसको सावित्रीका व्रतपालन करती हैं कि, हमभी सदा सुहागन हैं। हे वहन ! सावित्री कैसी सती थी जिसने सासश्वशुरके नेत्र खुलवाकर पीछे अपने पतिको जीवित कराया धन्य है सावित्रीके सतीत्वको कि, जिसका यश आजतक फैल रहाहै। दमयन्ती। हे वहन ! विदर्भ नगरमें भीमसेन नामके एक राजाथे, उनके कोई संतान नहीं थी इसकारण वह सर्वदा दुःखी रहतेथे, एकदिन दमनक नामके ऋषि राजाकी सभामें गये राजाने अपना दुःख कहा ऋषिने कहा कि शीघही तुम्हारे एक सौभाग्यवती कन्या जन्म लेगी । ऋषि यह कहकर चले गये, थोडे दिनोंके वाद राजाके एक कन्या हुई राजाने ऋषिके नामके अनुसार उस कन्याका नाम दमयन्तीखखा दमयन्ती के रूप और गुणकी बड़ाई सुनकर निषधदेशके राजा वीरसेन- का पुत्र नल उसके साथ विवाह करनेकी इच्छा करने लगा। दमयन्तीके रूप और गुणकी परीक्षा करने के लिये एक दूत भेजा, नेपधकाव्यमें इसको हंसरूपी कहाहै अरु कहा है कि, एक दिन राजा नल अपने हमजोलीके लड़कों के साथ वागमें फिर रहेथे उससमय उस वागके सरोवरमें सुवर्णके पंखवाले एक हंस- को देखकर उसे पकड़ने लगे, तब उस हंसने कहा कि तुम जो (२८.) खीप्रबोधिनी। दमयन्तीके पानेकी अधिक इच्छा करतेहो मैंने उसकामको ठीक कर लियाहै, और हंसने दमयन्तीक रूप गुणकी वड़ाई भली भाँतिसे सुनाई तव राजाने उसे अपना दूत बनाया। हंस फिर विदर्भनगरमें गया और रनवासके भीतरखाले सरोवरमें विचरण करने लगा उस समय दमयन्तीकी दृष्टि उस हंस पर पड़ी और उसको पकड़ने लगी, हंसने कहा मुझे न पकडना मैं तुम्हारा अधिक रूपवान् और गुणवान् राजा नलके साथ विवाह करादूंगा। इसको सुनकर दमयन्ती अत्यन्तही प्रसन्न हुई और उस हंससे इस कामको पूरा करनेके लिये कहा इसके चलेजानेपर रानी उसके आनेकी वाट देखती रही जब हंस न आया तो बड़ी चिन्ता करने लगी सखियोंने यह समाचार दमयन्तीकी मातासे जाकर कहा, तब राजाकोभी खबर हुई, राजाने एक सभा करी देशदेशान्त- रोंके राजा आये नैषधकान्यके वनानेवालेने लिखा है कि, इन्द्र, अग्नि, यम, वरुण इत्यादि देवताभी दमयन्तीके पानेकी इच्छासे इस सभामें आयेथे। जिससे नलराजा दमयन्तीके साथ विवाह न करसकैं, इस इच्छासेही नलके द्वारा दम- अयन्तीपर अपना समाचार भेजा कि, हम तुम्हारे साथ विवाह करनेकी इच्छा करते हैं दमयन्तीने कहा कि, उन देव- देवके चरणों में मेरा कोटि २ प्रणाम कहना, मैंने मनही मनमें जिसके साथ विवाह किया है, उसके विपरीत नहीं होगा, राजा नलने यह बात उन देवताओंसे जाकर कहदी, देवताओंने बहुतसे उपाय किये कि, जिससे राजा नलका विवाह दमयन्तीके साथ न हो परन्तु कुछ भी न हुआ "

श्रीता।
"
(२८१)
अंतमें दमयन्तीने सबके सामने राजा नलके गलेमें
जयमाला डाली, नलराजा दमयन्तीको लेकर अपने देशको
चले गये, और रनवासमें रहकर आनंदसहित समय विताने
लगे, इसप्रकारसे जब वारह वर्ष वीतगये तो दमयन्तीके
एक लड़का और एक लड़की उत्पन्न हुई लड़केका नाम
इन्द्रसेन और लड़कीका नाम इन्द्रसेना रक्खा ।
पुष्कर नाम नलराजाका छोटाभाई अक्षक्रीड़ामें वड़ा
पंडित था। राजा नलभी पाशा खेलना जानतेथे, बुद्धिके
फेरसे दोनों भाई खेलनेको वैठे धीरे २ राजानल राज, पाट,
धन, दौलत, दास, दासी सभी हारगये, इसके उपरान्त यह
समाचार दमयन्तीने सुना, वह विधाताकी गति जान विधिको
मनाने लगी, परन्तु उसका मनोरथ सफल न हुआ तव महा-
विपत्ति जानकर सुशील नामवाले सारथीको बुलानेके लिये
अपनी प्यारी दासीसे कहा उस सारथीके आजानेपर दमयन्ती
ने इन्द्रसेन और इन्द्रसेनाको ननसालमें पहुँचानेकी आज्ञा दी
आज्ञापातेही सारथी उनको विदर्भरानमें लेगया।
धीरे २ राजा अपने कपड़े तकभी हारगये । केवल जो
कपड़े पहर रहेथे वही रहे तव पुष्करने कहा कि, अब अपनी
स्त्रीको दाँवपर लगाओ यह सुनकर राजा नल अत्यन्त क्रोधित
हुए,फिर रानीके गहने उतारकर लगाए जब यहभी हारगये तो
राजानल निकल चले, दमयन्तीभी स्वामीके पीछे २ चली पु-
कर सव राज्यके अधीश्वर हुए,और अपने राज्यमें यह ढंडोरा
पिटवादिया कि, राजा नलको जो कोई अपने घर रक्खेगा
वह जानसे मार दिया जायगा। राजानलको कहीं ठिकाना

(२८२) श्रीप्रबोधिनीं। न मिला इन्हें तीन दिनतक विना जलपान किये वीतगये चौथेदिन नदीके किनारे जाकर अंजलीसे जल पिया; और उस रात्रिको वहीं व्यतीत किया। प्रातःकाल किसी वनमें जा- कर फल मूल भक्षणकर जीवनकी रक्षा करने लगे इसभांति- कई दिन वीतगयेएकदिन राजानलने सुवर्णके पंखवाला एक पक्षी देखा,जैसे ही इन्होंने उसके पकड़नेके लिये अपनाडुपट्टा उसके ऊपर डाला कि, वैसेही वह आकाशको उड़गया, तब राजानलने कहा कि,देख दमयन्ती! जव भाग्य मंद होताहै तब ऐसाही हुआ करताहै, देखो हमने तो यह विचारकर कपड़ा डालाथा कि, इसपक्षीके पंखमें जो सुवर्णहै इसे वेंचकर जीवि- का निर्वाह करेंगे और इस पक्षीके मांसको खांयगे, सो विधा. ताकी गतिसे फेंकाहुआ डुपट्टाभी गया । दमयन्तीने राजा नलसे अपने बापके यहां चलनेको बहुत बार कहा परन्तु राजा- ने यही कहा कि, पहले तो मैं राजा होकर ससुरालमें गयाथा, अब क्या मुँह लेकर ससुराल में जाऊँ तुम्हें कष्ट होताहै तुम स्त्री जातिहो तुम चली जाओ, इससे दमयन्तीने कहा मुझे चाहे जितना कष्ट हो मुझे पिताके घर रहनेमें कुछ सुख नहीं है पर- न्तु मैं आपको किसी भांति नहीं छोड़ सकती,यह कह कर दम- यन्तीने अपने पहरेहुए वस्त्रमेंसे आधा वस्त्र राजाको पहराया, जिससे कि, मुझे छोड़कर स्वामी कहींको न चलेजाय । इस ओर राजानल झूख प्याससे व्याकुलहो दमयन्तीको सोती छोड़कर चलदिये आगेको चलते जॉय और पीछे फिर २ कर देखते जॉय कि, दमयन्ती क्या कररही है. परन्तु अव- तक दमयन्ती सोतीही रही, पीछे जब जागी तो राजाको न , श्रीता। - (२८३) देखकर रोनेलगी हा नाथ ! मुझे कहां छोड़गये, यह कह २ कर विलाप करने लगी। इसी समयमें एक अजगरसर्प दम- यन्तीको दिखाई दिया और वह सर्प दमयन्तीके निकटको आनेलगा-दमयन्ती वरावर रोतीरही, रोनेके शब्दको एक व्याधेने सुना उसने आकर उसे मारडाला, व्याधा दमयन्ती की सुन्दरताको देखकर मोहित हो उसे अपने घर ले गया। और अपनी स्त्री वनानेकी इच्छा की दमयन्वीने शाप दिया कि, मैं यथार्थही पतिव्रताई तो यह पाखंडी शीघ्रही भस्म हो-: (जाय । यह सुनकर अत्यन्तही क्रोधित हुआ और दमयन्तीके मारनेके लिये धनुपपर वाण चढाया परमेश्वरकी कृपासे जैसे- ही उस व्याधेने धनुपको बैंचा. वैसेही वह वाण उस व्याधे- केही छातीमें जाकर लगा, उसके लगतेही व्याधा मर गया हे वहन ! इसी समयमें दमयन्ती उसके घरसे बाहर हो स्वामीकी खोज करने लगी, कहीं भी कुछ समाचार न मिला फिर एक बड़े ऊंचे पर्वतपर चढ़ी और जाकर एक ऋषिकी कुटीमें देखने लगी, जब वहाँभी न मिले तो आगे चली वहाँ जाकर रास्तेमें एक बनियेसे पूछा, तुमने क्या हमारे पति राजानलको देखा है, तब उसने कहा माता हमने तो नहीं देखा, मैं इस समय वाणिज्य करनेके लिये सुबाहुनगरीको जाताहूं, यदि इच्छा हो तो चलो मेरे साथ वहाँ जाकर ढूंढ- लेना जब वह वनिया वहाँ पहुँचगया तो वह तो अपने काम धन्धेमें लगा और दमयन्ती पागलकी भांति राजा नलको ढूंढती हुई फिरने लगी। इसी अवसरमें छत्तपरसे सुबाहु राजाकी रानीने उसे देखा, तो उसी समय अपनी सखीको (२८४) श्रीप्रबोधिनी। भेजकर बुलाया उसका सारा हाल पूछकर सुनन्दा नामकी एक कन्याको उसके निकट रखदिया। इस ओर राजा नलने बहुत दूरसे देखा कि, एक काला सर्प भयंकर दावानलमें जलनेके कारण चिल्ला रहा है उसको दावानलसे छुटाया, फिर उस अधजले सर्पको चलनेमें अशक्त देखकर राजाने उसे अपनी गोदीमें ले लिया परन्तु वह कुटिल सर्प काटनेको हुवा तो राजाने उसे छोडदिया फिर अयोध्यामें ऋतुपर्ण राजाके निकट जाकर कहा कि मैं राजानलका सारथी हूँ, मेरा नाम वाहुक है मैं घोडे चलाने भली भांतिसे जानता ह" तब राजाने इनको अपने यहां रख लिया, इस प्रकारसे नल और दमयन्ती दोनों जने दो स्थानों में रहने लगे इस समयमें राजा भीमसेनने कन्या और जमाईको खोजनेको वहुतसे नौकर चाकर भेजे परन्तु किसीने इनका पता न पाया, अंतमें सुदेव नामका ब्राह्मण बहुतसे धनकी इच्छासे सुबाहु राजाके राज्यमें गया उसने सुना कि, दासीके वेषमें एक रानी राजाके रन- वासमें रहती है, उसने उसकी पहचानकर राजा सुबाहुसे कहा कि हाँ यही राजा भीमसेनकी कन्याहै। दमयन्ती उस ब्राह्मण- के मुखसे माता पिताका समाचार सुनकर संतुष्ट हुई, सुवाहु राजाने उसका पूरा २ हाल जानकर जाना कि, यह वास्तवमें रानीही है, दमयन्तीने अपनी माताके यहाँक ब्राह्मणको प्रणाम किया यह समाचार पाकर रानीभी पहलेसेभी अधिक प्यारके साथ रखने लगी। इसके उपरान्त सुदेव दमयन्तीको पिताके घर ले आये दमयन्तीके आनेपर उसके माता पिता अत्यन्तही श्रोता। (२८५) हर्षित हुए परन्तु दमयन्तीको स्वामीके लिये दुखित देखकर राजाने फिर सुदेव ब्राह्मणको जमाईकी खोज करनेके लिये भेजा, सुदेवने बड़े यत्नसे उनका पता चलाया कि, राजा नल ऋतुपर्णराजाका सारथी वनाहै, दमयन्तीने ऋतुपर्णरा- जाको एकपत्र लिखकर सुदेव ब्राह्मणके हाथ अयोध्याको भिजा और सुदेवसे कहा कि, तुम राजासे जाकर कहना कि, दमयन्तीको उसके स्वामी राजानलने छोड़ दियाहै अव उस- का स्वयंवर फिर होगा, इसकारण आप शीघ्र स्थपर चढ़कर विदर्भ नगरको चलें, इससे ऋतुपर्ण राजा अवश्यही आवैगे, और जो उसके सारथी यदि राजानल होंगे तो वहभी आवैगे तव पहँचान लिया जायगा कि, यह राजाहै या नहीं। समाचार पातेही राजा ऋतुपर्ण और सारथी एकवारही विदर्भनगरमें पहुँच गये, राजाने आकर जब स्वयंवरका कुछ सामान न देखा तौ मनही मनमें संदेह किया।वाहुक घोड़ोंको खोलकर घुड़शालामें बांधकर आपभी वहीं बैठा । दम- यन्तीने रनवासमें ऋतुपर्णराजाके आनेका समाचार पा केशिनी नामकी दासीको अश्वशालामें भेजा बाहुक केशिनी- के मुखसे दमयन्तीकी अवस्था सुन रोनेलगा। यह सुनकर दमयन्ती समझ गई कि, यही राजा नलहैं । वाहुकने अपने लिए जो भोजन बनायाथा। उसका कुछ अंश दमयन्तीने देखने के लिये दासीसे मँगवा भेजा, दमयन्तीने खाकर देखा तो जाना कि इन भोजनोंको नलराजाके अतिरिक्त और कोई नहीं वनासकता, इसके उपरान्त दमयन्तीने दासीके साथ लड़के लड़कीको भेजा। सारथीने बड़े प्यारसे उन दोनों (२८६) श्रीप्रबोधिनी। बालकोंको गोदी में बैठालकर बड़ा प्यार किया और फिर मह- लोंमें भेजदिया। यह देखकर दमयन्ती स्वयं वालकोंको ले- कर स्वामीके साथ मिलनेके लिये गई और जाकर सारा हाल कहा, आपसमें दोनोंजने वार्तालाप करतेहुए मग्न होगये राजा भीमसेनने सुना कि, राजानल अवतक ऋतुपर्णराजाके यहां छिपकर सारथी बने नौकरी करते रहे। अव उनके आनेसे अत्यन्त संतुष्ट हुए, ऋतुपर्णराजाभी दमयन्तीकी आ- शासे निराश हो दमयन्तीका राजा नलके साथ मिलन होनेसे अत्यन्त प्रसन्न हुए,और लज्जित होकर कहा कि,मैंने विनाजाने हुए आपको सारथीके कार्यमें नियुक्त कियाथा, यदि जो कुछ भूलसे कहाहो आप सुझको क्षमा कीजिये राजानलने कहा मैं आपका जन्मभरतक उपकार मानूंगा कारण कि, आपने उस समय मुझे अपने स्थानमें रखकर जीवदान दिया उस समय ऋतुपर्ण राजा अपने देशको चले गये। हे वहन ! राजानलने कुछ दिनतक सुसराल में रहकर फिर अपने राज्यमें जानेकी इच्छा की, इनके श्वसुरने बहुत भांति समझाया और कहा कि, हमारे पुत्र नहीं है तुम्हीं हमारे राज्य पर रहो; परन्तु राजानल राजी न हुये और बहुत विनय कर अपने देशको जानेकी आज्ञा मांगी। राजा नल एक स्थ सोलह हाथी, पांचसौ घोड़े और छै सो पैदल साथ लेकर निषध राज्यको चले दमयन्ती पिताके घरही रहीं इसके पीछे राजा नलने निषधराज्यमें जाकर पुष्करसे एकवार फिर खेल नेको कहा, और कहा कि, पहिली पहल खेलकर हम अपना सर्वस्व हार गये और अबकी बार देखो क्या होय जो नहीं खेलोगे तो युद्ध करनेके लिये तैय्यारी करो।

1
श्रोता।
(२८७)
पुष्करने हँसकर कहा कि, दमयन्तीको नहीं हाराथा सो
उसीपर कूदते दीखोहो; यह कहकर दोनों जने चौसर खेलने
लगे, अवकी वार राजा नल जीते तव पुष्कर थर २ कांपने
लगा; नल राजाने कहा कि, भाई ! मैं तुम्हारे समान दुष्ट
नहींहूं, तुम कुछ चिन्ता मत करो वृथा क्यों कांप रहे हो, तुम
जिस तरह पहले रहतेथे उसी तरह रहौ मैं तुम्हारे ऊपर कुछ
अत्याचार नहीं करूंगा। पुष्कर राजा नलके पैरों में गिरपड़ा
प्रजाने राजा नलकोही राजा मानकर प्रणाम किया नलराजाके
राजा होने पर प्रजा आनंद सागरमें मग्न होगई राजा नलने
अपने पुत्र कन्याकोभी ननसालसे बुलालिया और आनंद
सहित राज्य करने लगे।
हे वहन ! देखो दमयन्तीने कैसे २ कष्ट सहे और शाप
देकर व्याधेको भस्म किया वह कैसी सती स्त्री थी।
पद्मिनी।
हे बहन ! चित्तौरमें भीमसिंह नामवाले एक बड़े पराक्रमी
राजाथे पद्मिनी उसकी स्त्री थी। जिस समय मुसल्मानोंने
भारतवर्ष पर आक्रमणकर अपना अधिकार कियाथा, और
आर्यावर्त के प्रायः सभी देशोंमें अपना दखल किया उससमय
भीमसिंह अपने वाहवलसे चित्तौरका राज्य कररहेथे उस
समय अलाउद्दीन दिल्लीका वादशाह था।
आर्यावर्तके प्रायः सभी अंशोंको जीतकर अलाउद्दीनने
दक्षिणापथ और चित्तौरपर आक्रमण किया. यद्यपि चित्तौर
पर आक्रमण तो किया परन्तु उसकी इच्छा पूरी न हुई।

(२८८) ब्रीप्रबोधिनी। भीमसेनकी स्त्री चित्तौरकी महारानी पद्मिनी बड़ी रूपवती थी जिसप्रकार ग्रीकके इतिहासमें कि उपेटरकी सुन्दरताने वि- लायतके सातसौ राजाओंका भस्म कियाथा वैसेही सुल्तान अलाउद्दीनभी पद्मिनी के रूप ज्योतिके भीतरही जलाथा. सुस- ल्मान बादशाह बड़े पाखंडी होतेथे, वह बहुतसी वेगम होने- परभी यदि किसी हिन्दू स्त्रीकी सुन्दरताको सुनते तो उसके पानमें ऐसा बुरा व्यवहार करतेथे कि, जिसका ठीक नहीं,एक तो यह भारतवर्षके सभी अंशोंके अधिकारी थे,फिर उनकीजो इच्छा होती वही करसकतेथे, बहुतसे नौकर चाकर गुप्तभावसे बादशाहके कहने अनुसार काम करतेथे, वह नौकर चाकर अनेक देशोंमें जाकर यह देखतेथे कि किस जगह कौनसी स्त्री रूपवती है और जिस स्थानपर जिस स्त्रीको देखा उसीसमय आनकर कहतेथे और बादशाहसे बहुत धन पातेथे। अलाउद्दीनने सुना कि, पद्मिनी रानी अत्यन्तही रूपवतीहै जिसदिनसे पद्मिनी रानीके रूपकी कथा सुनी, अलाउद्दीन उसी दिनसे भोजन पान निद्राको छोड़कर पद्मिनीके पानेकी कोशिश करने लगा, किसी उपायसे क्यों न हो परन्तु पद्म- नीको अवश्य प्राप्त करूंगा, चित्तौरके राजा भीमसिंहसे कह- लाभेजा कि, मैं चित्तौर देखनेकी इच्छा करताहूं। भीमसिंह सभी बातोंको जानते थे परन्तु राजपूत अतिथि सेवासे विमु- ख नहीं होते, अतिथिकी सेवा नहीं करेंगे तो महापाप लगेगा, इस शंकासे अलाउद्दीनको चित्तौरसे पत्र लिखकर निमंत्रण किया।

श्रीता। (२८९) यद्यपि अलाउद्दीन अपनी बड़ी भारी सेना लेकर गयाथा परन्तु दोचार आदमियोंकोही अपने साथ लेकर भीमसिंहसे साक्षात् किया: भीमसिंहने बड़े यत्नके साथ अलाउद्दीनकी शुश्रूपा की, अलाउद्दीनने वातों २ में पामिनीके रूपका जिक- भी छेड़ा,भीमसिंह उसके मतलवको समझ गये, वह यह उपा- यशोचने लगे कि, किसप्रकारसे इसको टालूं, परन्तु अलाउ- द्दीन ऐसा भूलनेवाला आदमी नहींथा। भीमसिंहने अतिथि- का अपमान करना नहीं चाहा । अलाउद्दीन पद्मिनीके साथ वार्तालाप करनेके लिये महल में गया। अंतमें यह ठहरी कि, अलाउद्दीनके सन्मुखही एक अग्निका कुंड बनाकर उसमें पद्मिनीका प्रतिविम्व दिखाया जाय, भीमसिंहने विचारा कि, मुसल्मान राजाके सन्मुख खड़ी होकर हिन्दूराजाकी रानी अवश्यही प्राण छोड़ देगी, भीम- सिंहने यह समाचार अलाउद्दीनसे कहला भेजा; अलाउ- हीन इसवातपर राजी हो गया,तव एक अग्निका कुंड बनाया गया रानी पद्मिनी एकवारही उस ओरको होकर निकली, अलाउद्दीन उसके रूपकी परछांही को देखतेही मोहित हो गया जिसके यहां हजारों रानियाँ थीं वह चित्तौरकी रानीको देखकर जो मोहित हो गया तो इसमें आश्चर्यही क्याहे हे वहन ! पद्मिनीका रूप इतिहासोंमें विख्यात है। जब अलाउद्दीनको ज्ञान हुआ तो विदा होकर अपने स्थानको चला गया फिर कुछ दिनोंके पीछे दूतके द्वारा यह पत्र लिखकर भेजा कि, यदि भीमसिंह सीधी तरहसे पद्मिनीको मायाला

ग्रीनबोधिनी।
मुझे नहीं देंगे, तो मैं चित्तौर पर चढाईकर अपना अधिकार
करलूंगा। इस पत्रको देखतेही भीमसिंहका तन बदन जल
उठा, भीमसिंहने वह पत्र पढ़कर अपनी रानीको सुनाया पद्मि-
नीने हँसकर स्वामीको उसपत्रका यथोचित् उत्तर देनेके लिये
कहा, भीमसिंहने अलाउद्दीनका निरादरकर विपरीत पत्र
लिखा: अलाउद्दीन क्रोधमें भरगया और उसीसमय चित्तौरपर
चढ़ाई की, चित्तौरकी बड़ीमारी सेनाने अलाउद्दीनके साथ
घोर युद्ध किया, परन्तु अंतमें भीमसिंहही हारे, अलाउद्दीन
जय प्राप्तकर महलमें पद्मिनीको ढूंढ़नेके लिये गया, परन्तु
महलमें कहींभी रानीका पता न लगा तो बड़ी चिन्ता करने
लगा, उसने देखा कि, एक भयंकर चिता धू धू करके जलरही
है, कोलेमें छिपकी हुई एक ओर पद्मिनी खड़ी अपना वस्त्र
संभाल रहीहै जैसेही अलाउद्दीनने उसके पकड़नेको हाथ
बढ़ाया कि, वैसेही पद्मिनी उस अग्निकी जलतीहुई चितामें
कूद पड़ी। इस चरित्रको देखकर अलाउद्दीन बहुत दुःखी
हुआ, और हताश हो अपने घरको चलागया।
हे वहन ! पद्मिनीके पतिव्रतधर्मको धन्य है कि जिसने
मुसल्मानके हाथसे इसप्रकार अपने सतीत्वकी रक्षा की।
लीलावती।
लीलावती भास्कराचार्यकी कन्या, गणित और ज्योति-
पशास्त्रके जाननेमें पंडिता थी, फैजी नामक एक सभासदने
दिल्लीके बादशाह अकवरके संतोषके अर्थ एकब्राह्मणसे अपनेको
ब्राह्मण वता संस्कृतभाषाको सीखकर इस भाषाके उत्तमरग्रंथों
सम

श्रोता। (२९१) 24. Um को पढ़ फारसीमें उनका अनुवाद किया।इनमें भास्कराचार्यकी लीलावती नामक कन्याने जिस ग्रंथका अनुवाद कियाथाउसमें लिखाहै कि, भास्कराचार्य वदर शहर निवासी हैं, यह लीलाव- तीही उनकी एकमात्र कन्या है । जन्मलग्न और नक्षत्रादिकी गणना करनेसे जाना जाताहै कि,वह पति पुत्र करके हीन होगी इससे उसके पिता सदा चिन्ता करते रहते कि, वैधव्य निवारणका कोई उपाय है या नहीं। कन्याका विवाह समय आ पहुँचा । उन्होंने स्वयं ज्योतिष शास्त्र विचारकर ऐसी लय स्थिर करी कि, जिससे कन्या विवाह होने पर सधवा रहै और पुत्रवती हो । विवाहकी रात्रि में बहुतसे ब्राह्मण और पंडितोंके सामने कन्या और जमाई को एक जगह बैठालकर लग्नका समय निश्चय करनेके लिये जल भरेहुये एक पात्रके ऊपर छोटे छोटे छेदोंकी एक तोबी रखकर कहा इस तोंवीके छेदोंमेंसे जल आकर भरपूर हो जभी जलमें डूब जायगी तभी मैं कन्याको दान करूंगा, तो मेरी कन्या विधवा नहीं होगी परन्तु कैसी आश्चर्यकी वातहै। जब लीलावती उसे देख रहीथी, उस समय अचानक उसके सुकुट मेंसे एक मोती टूटकर उस तोंवीमें गिरगया उसके गिरतेही तोवीका छेद बंद होगया, उसीसमय लग्न टलगई। कन्याके पिता अत्यन्त विस्मित हुये और लग्नकी आशाको निष्फल देिख कन्याका विवाह करदिया अंतमें लीलावती विधवा होगई इस प्रकारसे विधवा होकर वह समय विताने लगी। परंतु पंडितने प्रण किया कि, मैं उस कन्याको ज्योतिष विद्या में ऐसा पंडित करूंगा कि, जिससे उसका नाम सर्वदा विद्यमान रहे।

(२९२)
खीप्रबोधिनी।
यह विचार कर उन्होंने कन्याको नानाभांतिके अंक और
ज्योतिषशास्त्रकी शिक्षा दी और संस्कृतभाषामें एक अंकोंकी
पुस्तक बनाकर उसके नामसे प्रचारित की, इस पुस्तकमें
सर्व प्रकारके अंक सूत्र और उदाहरण भी हैं।
लीलावती शुद्ध थी, इसीसे उसके पिता पुस्तके द्वारा
ही उसका नाम विख्यात कर गये हैं, कुछ यही बात
नहीं है, वरन् लीलावती भी स्वयं ज्योतिष शास्त्रकी जानने
वालीथी,लीलावतीने एकवृक्षकी जड़के नीचे बैठकर ज्योतिष
शास्त्रकी विद्याके बलसे थोड़ेही समयमेंही उस वृक्षकी शाखा
और पत्तोंतककी गिनती करदी थी।
हे बहन लीलावतीका नाम भारतवर्षमें आजतक विख्यात
है, उसने पतिधर्म पालन करनेके लिये लिखनेमेही अपना
जीवन व्यतीत कियाथा।
हे वहन ! अब मेरी परमेश्वरसे यही प्रार्थना है कि
इसके सुननेका. ईश्वर तुझे फल दे यदि तू मेरे कहे अनुसार
चलैगी तो तेरी बड़ी बड़ाई होगी।
AM
इति श्रीप्रबोधिनी समाप्ता.
तक मिलनेका पता-खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेङ्कटेश्वर" स्टीम् प्रेस-मुंबई.

Striprabhodhini

Author
Subhadradevi
Title
Striprabhodhini
File name
Striprabhodhini
Text
OCR done
Citation
1904
Published
2009/10
Publisher
Bombay, Venkateshvar Steam Press
Language
Sanskrit
Pages
319
Library
Sanmati Library
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345694
Barcode
99999990234026.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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Copyright permitted
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