Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Narad Purana Khand-i
Front matter
भूमिका यथा भूमि समाथित्य सर्वे जीवन्ति जन्तवः । तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥ 'नारद पुराण' का यह श्लोक उसके सिद्धान्त और विशेषताओं पर अच्छी तरह प्रकाश डालता है । वह विष्णु भक्ति प्रधान रचना है। उसमे आदि से अन्त ता विविध कथाओ द्वारा यही प्रतिपादित पिया है कि मसार में सबसे अधिक महिमा भक्ति यी है और उसका अब- लम्बन करने वाला सदैव लोक और परलोक मे कल्याण का भागी होता है । भक्ति-मार्ग की श्रेष्ठता मे तो कोई सन्देह नहीं । मान-मार्ग और... कर्म-मार्ग पर तो अध्ययन और मननशील विद्वान्, बुद्धिमान व्यक्ति ही भली प्रकार चल सक्ते हैं । सामान्य स्तर का जो जन समुदाय अधिक सख्या में पाया जाता है, वह न तो उन सिद्धान्तो के वास्तविक मर्म को समझ सकता है और न व्यावहारिक रूप मे उनका पालन कर सकता है । परमात्मा के अशरीरी क्रियाकलाप उसकी समझ मे नही आ सकते । वह यह कल्पना कर राक्ने मे भी असमर्थ रहता है कि निराकार परमेश्वर विस प्रकार करोडो पदार्थों और जीव जन्तुओ मे भरे इम मसार की रचना कर देता है ? इसका कारण यही कि उसकी मोटी बुद्धि स्थम पदार्थो का रहस्य समझने में असमर्थ रहती है । भात्म शक्ति, सकल्प-शक्ति, विचारो की शक्ति जैसे अति सूक्ष्म विषयो को समझने की बात तो दूर, वह विद्युत-शति और एटमशक्ति ती प्रत्यक्ष प्राकृतिक सूक्ष्म शक्तिमो की समझाना कि कार्य-प्रणाली के रहस्य को भी नहीं जान पाता। ऐसे व्यक्तियो को यह यह समस्त ससार भगवान का ही स्वरूप है और इसमे जो करोडो पदार्थ और कार्य दिखाई पड़ते हैं वे सब "माया" अथवा हमारी बुद्धि और नेत्रो के भ्रम है, एक असम्भव सी बात है। इसलिए उनको परमात्मा, उसकी सृष्टि और मनुष्य के वर्तव्य-कर्म के सम्बन्ध में जो कुछ बताया जा सकता है, उसका आधार स्थूल ही होना आवश्यक है। इसीलिये हमारे देश के प्राचीन मनोपियो ने भगवान की मूर्ति बनाकर उसके माध्यम से ध्यान और उपासना का विधान बनाया। जब तक मूर्तियो की कल्पना और निर्माण नहीं हुआ तब तक नेत्रो से दिखाई पड़ने वाली यज्ञाग्नि को ही उपासना और पूजा का माध्यम माना जाता था। कारण यही था कि ऐसे किसी प्रत्यक्ष उपकरण को सामने देखकर ही सामान्य बुद्धि का व्यक्ति उसके प्रति अपनी मानसिक भावना को प्रेरित कर सकता है और उसकी श्रेष्ठता को स्वीकार करके उसे अपना भक्तिभाजन बना सकता है। भक्ति का स्वरूप और उसको महिमा- यही कारण है कि जहा शेव-पुराणों में विशेष रूप से योग तथा तत्र साधना यो विशेष महत्व दिया गया है, वहां वैष्णव पुराणो-जैसे भागवत, विष्णु, नारद आदि मे भक्ति को ही सर्वोच्च तथा सवश्रेष्ठ कहा गया है। इसके मुख्य अङ्ग पूजा, उपासना, नाम-स्मरण, भजन, कीर्तन आदि माने गय हैं । निम्न स्तर के सकाम भावना वाले व्यक्तियो को आकर्षित करन के लिय सामान्य व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा, मन्दिर निर्माण या जीणोद्धार आदि बातो का महत्व बहुत बढा-चढ़ा कर बताया गया है । ऐसी बातो पर याजक्ल के नवशिक्षित व्यक्ति विश्वास करने को तैयार नहीं हाग । हम भी उनको अक्षरश मान लन का आग्रह नही करत । पर जिस प्रकार वालों को मुनाई जाने वाली वाल्पनिक और भव कहानियों से भी लाभकारी शिक्षाये प्राप्त हो सकती हैं, उसी प्रकार पौराणिक कथाओ मे मनुष्यो को अनेक सत्कर्मों की 'रणा मिलती है। पुराणकारी ने भी यह नहीं कहा है कि मनुष्य भक्ति करने के साथ दुष्ट फर्म भी करता रहे, फिर भी उसका कल्याण ही होगा। उन्होने प्रायः यहाँ उपदेश दिया है कि भगवान की भक्ति करने से दुष्ट प्रवृत्तियाँ स्वयमेव छूट जायेंगी और मनुष्य में माधुना के गुग उत्पन्न हो जायेंगे । "नारद पुराण" के आरम्भ मे हो कह दिया गया है कि "भगवान की प्रसन्नता के लिए वेद शास्त्रो द्वारा बतलाये मद्-अनुष्ठानो को करना आवश्यक है। मनुष्य निष्काम हो या सकाम उसे विधिपूर्वक कर्म अवश्य करने चाहिये । सदाचार परायण ब्राह्मण अपने ब्रह्म तेज के साथ वृद्धि को प्राप्त होता है । यदि वह भगवान के चरणो मे भक्ति रखता है तो उस पर विष्णु भगवान बहुत प्रसन्न होते हैं ।" इससे आगे चल कर भक्ति को जो महिमा और प्रणाली बतलाई है उरासे यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है- “हरिभक्तिः परानृणा कामधेनूपमा स्मृता । तस्या सत्या पिवन्तजाः ससार गरल हो।। "भगवान की भक्ति मनुष्यो के लिये कामधेनु के समान कल्याण- कारी मानी गई है। पर कितने आश्चर्य की बात है कि अज्ञानी जन उसे त्याग कर मासारिक मोहरूपी विप को ग्रहण करते हैं ।" मनुष्य को सत्कर्मों का अनुष्ठान रादेव श्रद्धा और भक्ति की भावना मे ही करना चाहिये जैसे मूर्य का प्राश ममस्त जीवो को कमरत करने मे कारण रूप होता है, उसी प्रकार समस्त सिद्धियो का आधार भक्ति ही होती है। जैसे जन ममूर्ग लोकों का जीवन कहा गया है वैसे समस्त महान लाम भक्ति के द्वारा ही प्राप्त होत है। जैसे सब जीव-जन्तु पृथ्वी वा आश्रय लेकर जीवन धारण करते हैं, उसी प्रकार भक्ति का सहारा लेकर मदायों का साधन करना चाहिये । श्रद्धालु पुरुष को धर्म का लाभ होता है, श्रद्धालु ही धन पाता है, श्रद्धा से ही कामनाओं की सिद्धि होती है, तथा श्रद्धालु पुरष ही मोक्ष का अधिकारी बन सकता है । दान, तपस्या अथवा बहुत दक्षिणा वाले यज्ञ भी यदि भक्ति से रहित हो, तो उनके द्वारा भगवान सतुष्ट नहीं होते। मेरु पर्वत के बरावर सुवर्ण की रोडो सहन राशियों का दान भी यदि विना श्रद्धा-भक्ति के किया तो वह निष्फल होता है। बिना भक्ति के जो तपस्या की जाती है, वह केवल शरीर को सुखाना मात्र है। विना भवित जो हविष्य हवन किया जाता है, वह राख में डाली हुई आहुति के समान है। श्रद्धाभवित के साथ मनुष्य जो चुछ थोडा सा भी मत्कर्म करता है, वह उसे अनन्त माल तक अक्षय मुख देने वाला होता है।" इस प्रकार पुराणो ने भक्ति को जो महत्व दिया है वह दिखा- वटी पूजा-उपासना अथवा दान-पुण्य के आधार पर प्राप्त नहीं हो सकता। उसका मारतत्त्व हार्दिक श्रद्धा और निष्काम परोपकार की भावना ही हाला है। पौराणिक उपाध्यानो और रामायण आदि मे बडे-बडे पापियो के अन्त समय राम कह लेने से मुक्ति प्राप्त होने की बात लिखी है। पर साथ ही यह भी लिखा है- जनम-जनम मुनि जतन कराही। अन्त राम कहि आवत नाही।। इसका आशय यही है कि उन "पापी" कहे जाने वाले व्यक्तियो वो तभी सद्गति प्राप्त होती है जब अन्त समय मे विसी घटनावश उनकी जीवनधारा बदल जाती है और उनके भीतर छिपा भक्ति का धरना फूट उठना है। कुछ भी हो इममें सन्देह नहीं कि भक्ति मार्ग लोक और परलोक के माधनों के लिय सम्म सरल और प्रभावशाली है। विशेष रूप में जो लोग जान मार्ग के गहन तथ्य को समझ सकते में असमर्थ है और कमाण्डो के लिये जिनो पास पर्याप्त साधन नहीं हैं, उनका सर्वश्रेष्ठ ( ७ ) सम्बलभक्ति ही है । यह वास्तव में ऐसी कामधेनु है जिसमे मनुष्य अल्प- साधनो और अल्प प्रयत्न द्वारा ही बहुत बडी सिद्धियाँ पा सकता है। पर इसके लिये हृदय की सचाई और शुद्धता अनिवार्य है। जैसे छोटा शिशु माता पर पूर्ण रूप से भरोसा रखता है और उसके लिये किसी प्रकार का अविश्वास का भाव कभी उसके हृदय में आ ही नहीं सकता, इसी प्रकार जो लोग अन्त करण में भगवान को अपना सच्चा सहायक और रक्षक समझ लेते हैं और उसके आदेशानुसार सदाचार के मार्ग पर चलते हैं, वे ही सच्चे भक्त माने जा सकते है और भगवर-शक्ति उन्ही की भव सकटो मे रक्षा करती है । पर यह मार्ग उनके लिये नही है जो इसे केवल दलीलो तर्को रो जानना और प्राप्त करना चाहते हैं । उनके लिये ऋपियो ने ज्ञान-मार्ग बतल दिया है, जिसकी पहुँच आधुनिक विज्ञान से भी ऊँची है। रह गये आधुनिक शिक्षा का गुमान रखने वाले आलोचक उनके लिये तो प्राचीन काल की सभी बातें और सिद्धात "निकम्मे ' जान पडते है और सभी "मार्गो" मे दोप ही दोप दिखलाई पडते है । ऐसे सज्जन महात्मा गाँधी के कथनानुसार उस "गटर-इन्सपेक्टर" के समान है जिनका कार्य सर्वत्र गन्दगी दढना ही है । हम कभी इस बात से इनकार नहीं करते कि पुराणी मे "कथा-व्यासनो" ने मैकड़ो भले बुरे कथानक, उपाख्यान समय-समय पर जोड दिये है,जिनमे से कुछ वास्तव मे 'भ्रष्ट' भी कहे जा सकते हैं । पर साथ ही पुराणो मे संकडो उपयोगी, यथार्थ लाभकारी बातें भी हैं, उनकी ओर से आँखें बन्द कर लेना कोई बुद्धिमानी अथवा प्रशसा की बात नहीं । हम अपनी 'पुराण-सीरीज" का सम्पादन इसी दृष्टि कोण मे कर रह हैं और सन्तोष का विषय है कि पाठको ने इसे पूरी तरह अपनाया है। समन्वय को प्रवृत्ति-- पर भक्ति-मार्ग का अनुयायी होने पर भी "भारदपुराण" की नीति समन्वयवादी है और इसमे अध्यात्म-योग तथा ज्ञान-योग की भी महिमा भली प्रकार बतलाई गई है। मुक्ति प्राप्त करने के 1 सम्पन्ध मे कहा है। "योग मे स्थित होने पर साधक ब्रह्म में लीन होकर फिर अपने स्वरूप से च्युत नही होता। मन ही मनुष्यो के बन्धन और मोक्ष का कारण है। विषयो मे आसका होने पर वह बन्धन का कारण होता है और विपयो से दूर हट कर वही मोक्ष का द्वार बन जाता है। इसलिये ज्ञानी वही कहा जायगा जो मन को विषयो से हटा कर परमेश्वर का चिन्तन करे। जैसे चुम्बक अपनी शक्ति से लोहे को खींचकर अपने मे सयुक्त कर लेता है, उसी प्रकार ब्रह्म चिन्तन करन वाले साधक के चित्त को परमात्मा अपने स्वरूप में लीन कर लेता है । आत्मज्ञान के उपायभूत जो यम-नियम आदि साधन है, उनकी अपेक्षा रखने वाली मन की विशिष्ट गति को ही 'योग' कहा जाता है। जिसका योग इस प्रकार की विशेषता वाले धर्म से युक्त होता है वह योगी " मुमुक्ष कहलाता है। पहले पहल योग का अभ्यास करने वाला योगी युञ्जा' कहलाता है । जव उसे परमात्मा की प्राप्ति हो जाती है तब वह विनिष्पन्न-समाधि' (युक्त) कहा जाता है। ऐसा "विनिष्पन्न स्माधि" योगी अपनी योगाग्नि से समस्त कम राशियो को भस्म कर डालता है। योगी को चित्त से ब्रह्मचर्य, अहिंसा, सत्य, अस्तय सथा अपरिग्रह का निष्काम भाव से सेवन करना चाहिये । इनके साथ ही शौच, सन्तोप, तप, स्वाध्याय तथा परमात्मा मे सलग्नता या पालन करे। इनका पूर्ण रूप से सेवन करने से हो मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है । इसी प्रकार जडभरत द्वारा मोवीर नरेश को ज्ञान योग का उपदेश कराते हुए कहा है-"राजन् । सिर और हाय-पर आदि लक्षणो वाला यह शरीर आत्मा से पृथक ही है, इसलिये 'अह' (में) शब्द का प्रयोग इसके लिय स किया जा सकता है ? यदि मुझसे भिन्न , कोई और भी सजातीय आत्मा हो तोभी 'यह मैं हूँ और यह अन्य है,- ऐसा कहना उचित हो सकता था। पर जब सब शरीरो में एक ही आत्मा विराजमान है तब 'आप कौन है और मैं कौन हूँ' इत्यादि प्रश्न- वाक्य व्यर्थ ही है । महाराज । 'तम राजा हो, यह पालकी है, ये सामने पालकी ढोने वाले खडे हैं और यह समस्त देश आपके अधिकार गे है- ऐसा जो कहा जाता है, वह वास्तव में यथार्थ नहीं है । वृक्ष से लकडी उत्पन्न हुई और उससे यह पालकी बनी, जिम पर तुम बैठते हो। यदि इसे 'पालकी' ही कहा जाय तो इसका 'वृक्ष' नाम अथवा 'लकडी' नाम कहा चला गया ? यह तुम्हारे मेवकगण एसा नही कहत वि महाराज पेड पर चढे हैं अथवा 'लकडी' पर सवार है, सब कोई पालकी में बैठा हुआ ही कहते हैं। किन्तु पालकी क्या है-लकडियो का समुदाय । बगर इसमे से लव डियो के समुदाय को अलग करदें तो फिर खोजो तुम्हारी पालवी कहाँ है ? यही न्याय (सिद्धान्त) तुम्हारे और मेरे ऊपर भी लागू होता है । पुरुष, स्त्री, गाय, वकरी, घोडा हाथी, पक्षी और वृक्ष आदि लोकिक नाम कर्मजनित विभिन्न शरीरो के लिये ही रखे गये हैं । पर यह आत्मा न देवता है, न मनुष्य है, न पशु है और न वृक्ष ही है। ये सब काल्प- निक है । जो वस्तु परिणाम आदि के कारण होने वाली किसी नई सज्ञा को कालान्तर मे भी प्राप्त नहीं होती, वही वस्तु पारमार्थिक है। विचार करो यह क्या है ? तुम सबके लिए राजा हा, अपने पिता के लिय पुत्र हो, शत्रु के लिय शत्रु हा, पत्नी के लिए पति और पुत्र के लिये पिता हो। अब मैं तुम्हे क्या समझ्। इस प्रकार आत्म-तत्त्व सब से पृथक होकर ही स्थित है और उसे 'अह" इस नाम से नहीं बताया जा सकता। इसी प्रकार आगे चल कर यऔर परमार्थ की व्याख्या करते हुए बतलाया गया है कि "जो मनुष्य देवता की आराधना करके धन- ।
। १०) जब मनुष्य सम्पति चाहता है, पुत्र अथवा राज्य की अभिलाषा करता है, उसके लिये ये सब वस्तु 'श्रेय' हैं, इन्हे परमार्थ नही कहा जायगा । स्वर्ग- लोक रूप फल देने वाला जो यज्ञ आदि कर्म किया जाता है, वह भी श्रेय है । इन सबसे बढ कर श्रेय योग साधन द्वारा परमात्मा से सयोग प्राप्त करना है। इस प्रकार के श्रेय-कर्म अनेको है, पर इनमे से किसी को परमार्थ नही कहा जा सकता । उदाहरणार्थ यदि धन परमार्थ होता तो धर्म के लिये उसका त्याग क्यो किया जाता? यज्ञो मे जिस समिधा, घृत, कुशा का प्रयोग किया जाता है वे सब विनाशशील है, इसलिये उनके द्वारा जो क्रिया की गई वह भी कभी अविनाशी नहीं हो सकती। इमलिये परमार्थ केवल उस आत्म-ज्ञान को ही कहा जा सकता है को यह निश्चय हो जाता है कि आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे है, उसमे जन्म और वृद्धि आदि विकार नहीं है, वह सर्वत्र व्यापक तथा परम ज्ञानमय है, वह अपने और दूसरे शरीरो मे विद्यमान रहते हुए भी एक ही है, तभी उसे परमार्थ-ज्ञानी कहा जा सकता है, जो इस अद्वैत तत्व को जान लेता है और वैसा ही आचरण करता है वही परमार्थी है ।" इस प्रकार "नारद-पुराण" में भक्ति को सर्वसाधारण के लिये श्रेष्ठ और सुलभ बतलाते हुए भी योग और अद्वैत-ज्ञान जैसे साधनो की उपेक्षा नहीं की है। उमको मान्यता यही है कि ऐमा अद्वैत ज्ञान सर्वोच्च है पर उस त करोडो मे से कोई एफ विरले ही पहुंच सकते हैं। मसार के समस्त सम्बन्धी तथा भले-बुरे, छोटे-बडे के भेदो को भूल कर जोवन-यापन कर सकना सर्व साधारण के लिये कभी गभव नहीं, पर धर्म की, श्रेय को आवश्यक्ता उनको भी है। इसलिये पुराण- कार ने "भक्ति" को सर्वोत्तम मार्ग समझा है जिसमे मनुष्य मब सासा. रिक वार्यो यो यथाशक्ति करता हुआ उन्हे भगवदार्पण करता रहता है, इससे उसकी म्वार्थ यदि दवी रहती है और यह सब यो एप ही - ( ११ ) भगवान की सन्तान समझकर सेश और परोपकार के मार्ग पर चलने का प्रयत्न करता रहता है । इस मार्ग मे जब उराको अधिक वृद्धि हो जाती है, तब वह भी उमी लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है जिसे योगी और ज्ञानी अपना अभिप्रेत मानते हैं । इस प्रकार पुराणकार ने जिस समन्वय की भावना का प्रतिपादन किया है, वह निस्सन्देह प्रशसनीय है। शैवागम का परिचय- "नारद पुराण" पूर्ण रूप से वैष्णव पुराण है, फिर भी उसमे "शवागम" का परिचय और भगवान शिव की महिमा का वर्णन इसी समन्वयात्मक प्रवृत्ति का परिच यक है । हमने कितने ही पुराणो मे ऐसे भी वर्णन देखे हैं जिनमे अपने इष्ट देव के अतिरिक्त अन्य देवो को हीन सिद्ध करने की चेष्टा की गई है । ऐसी ही मनोवृत्ति के कारण लोगो मे प्रतिस्पर्धा और अन्त मे द्वप बुद्धि उत्पन्न होती है, जिसका परिणाम धार्मिक क्षेत्र मे आक्षेप और निन्दा, कुत्सा की गन्दगी फैलने के सिवाय और कुछ नहीं निकलता । पर " नारदपुराण" मे ऐसी भावना का चिन्ह भी नहीं है। जिस प्रकार गोस्वामी तुलसीदास ने श्रीरामचन्द्रजी को अपना प्रमुख इष्टदेव मानते हुये भी शिवजी के प्रति आन्तरिक भक्तिभाव प्रकट किया है और रामचन्द्रजी के मुख से ही यह कहलाया है कि "जो शिवजी से विरोध रखता है और मेरे प्रति भक्ति रखता है ऐसा मनुष्य गुझे स्वप्न मे भी स्वीकार नहीं हो सकता।' उसी प्रकार "नारदपुराण" में भी काशी-क्षेत्र तथा शिव पूजा का वर्णन करते हुए कहा है- ''काशीपुरी तीर्थों में उत्तम तीर्थ और क्षेत्रो मे उत्तम क्षेत्र है। समस्त देवता उसका सेवन करते है । काशी के गुणो के विषय मे यहाँ बहुत कहने से क्या लाभ, जो काशी का नाम भी लेते हैं, उनसे धर्म, अर्थ काम और मोक्ष-ये चारो पुरुषार्थ दूर नही रहते । शिवलिङ्ग ( १०) सम्पति चाहता है, पुन अथवा राज्य की अभिलापा करता उसके लिये ये सब वस्तु 'श्रेय' हैं, इन्हे परमार्थ नही कहा जायगा। स्वर्ग- लोक रूप फल देने वाला जो यज्ञ आदि कर्म किया जाता है, वह भी श्रेय है । इन सबसे बढ कर श्रेय योग साधन द्वारा परमात्मा से सयोग प्राप्त करना है। इस प्रकार के श्रेय-कर्म अनेको हैं, पर इनमे से किसी को परमार्थ नही कहा जा सकता । उदाहरणार्थ यदि धन परमार्थ होता तो धर्म के लिये उसका त्याग क्यो किया जाता? यज्ञो में जिस समिधा, धृत, कुशा का प्रयोग किया जाता है वे सब विनाशशील है, इसलिये उनके द्वारा जो क्रिया की गई वह भी कभी अविनाशी नहीं हो सकती । इसलिये परमार्थ केवल उस आत्म ज्ञान को ही कहा जा सकता है जव मनुष्य को यह निश्चय हो जाता है कि आत्मा एक, व्यापक, सम, शुद्ध, निर्गुण और प्रकृति से परे है, उसमे जन्म और वृद्धि आदि विकार नही है, वह सर्वत्र व्यापक तथा परम ज्ञानमय है, वह अपने और दूसरे शरीरो मे विद्यमान रहते हुए भी एक ही है, तभी उसे परमाथ-ज्ञानी कहा जा सकता है, जो इस अद्वैत तत्व को जान लेता है और वैसा ही आचरण करता है वही परमार्थी है ।" इस प्रकार "नारद-पुराण" मे भक्ति को सर्वसाधारण के लिये श्रेष्ठ और सुलभ बतलाते हुए भी योग और अद्वैत-ज्ञान जैसे साधनो को उपेक्षा नहीं की है। उमकी मान्यता यही है कि ऐसा अद्वैत ज्ञान सर्वोच्च है पर उस ता वरोडो मे से कोई एक विरले ही पहुँच सकते हैं। समार के समस्त सम्बन्धो तथा भले बुरे, छोटे-बडे के भेदो यो भूल कर जीवन-यापन कर सकना सर्व साधारण के लिये कभी मभव नहीं, पर धर्म की, श्रेय की आवश्यक्ता उनका भी है । इमलिये पुराण- पारने "भक्ति" का सर्वोत्तम मार्ग समझा है जिमम मनुप्य मब सासा- रिव पार्यों को यथाशक्ति करता हुआ उन्ह भगवदापण करता रहता है, इससे उसकी स्वार्थ बुद्धि दवी रहती है और वह मय को एक ही ( १३ ) यद्यपि सम्कृत भापा के पुराणों में भी अनेक स्थलो पर ऐमे वर्णन पाये जाते हैं, पर इस सम्बन्ध में हम सब से अधिक श्रेय गो० तुलसी- दाम जी का ही मानते हैं जिन्होने रामायण में आदि से अन्त तक भगवान शिव को परमोच्च पदवी प्रदान की है और भगवान विष्णु का सर्वाधिक प्रिय उन्ही को माना है। हमे यह कहने मे भी कुछ सकोच नहीं कि इस विषय मे वैष्णव पुराणो न अधिक उदारता दिखलाई है। शव पुराणो में "स्कन्द पुराण" इस क्षेत्र में अग्रगण्य है जिसने अपने विशाल क्लेवर मे एक स्वतन्त्र "वैष्णव खण्ड" का समावेश किया है और जगन्नाथ, अयोध्या, मथुरा बादि वणव क्षेत्रो का सविस्तार वर्णन दिया है। "कूर्म पुराण" को भी शंब माना जाता है, पर उसम कही विष्णु के प्रति उपक्षा अवज्ञा का भाव प्रकट नहीं किया गया है। इस प्रकार की साम्प्रदायिक सहिष्णुता का परिणाम हमेशा हिनवारी ही होता है और उससे धर्म की वृद्धि तथा समाज का कल्याण निश्चित रूप से होता है। गगा और गायत्री क प्रति भी पुराणकार ने आन्तरिक श्रद्धा और भक्ति प्रक्ट की है । गगा की महिमा विश्वव्यापी है और गायत्री को भी मभी ज्ञानी जनो ने मनराज स्वीकार किया है । इसी लिये गगा, गायनी, गीता और गौ को हिन्दू धर्म तथा सस्कृति की आधार शिला कहा गया है। गगा की महिमा कहते-कहत ता पुराणकार थक्ते ही नहीं। अन्त में यह कह दिया है- नास्ति गगा सम तीर्थ नास्ति मातृसमो गुरु । नास्ति विष्णु सम देवम् नास्ति तत्त्व गुरो परम्।। गगा स वढार कोई तीर्थ नहीं है, क्योकि वह लोगो को परलोक 4 मुधारन का ही विश्वास नहीं दिलाती वरन् इम लोक म भी मान- सिक शान्ति और शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करत बितना ही का कटो ( १२ ) . साक्षात् श्री हरि रूप है और श्री हरि साक्षात् शिवलिङ्ग रूप है । इन दोनो मे थोडा भी अन्तर नहीं है । जो यह भेद करता है उसकी बुद्धि खोटी है । अज्ञान के समुद्र मे डबे हुए पापी मनुष्य ही भगवान विष्णु और शिव मे भेद करते हैं । जो सम्पूर्ण जगत के स्वामी और कारणो के भी कारण, वे भगवान् विष्णु ही प्रलय-काल मे रुद्र रूप धारण कर लेते हैं । इसी प्रकार भगवान रुद्र ही विष्णु रूप से सम्पूर्ण जगत का पालन करते है। वे ही ब्रह्माजी के रूप में ससार की सृष्टि करते हैं, तथा अन्त मे हर रूप से वे ही तीनो लोको का सहार करते हैं । जो मनुष्य भगवान विष्णु, शिव तथा ब्रह्माजी मे भेद बुद्धि करता है वह अत्यन्त भयकर नरक मे जाता है।" यद्यपि वर्तमान समय मे हमको इन बातो मे कोई विशेष महत्व प्रतीत नहीं होता, पर अबसे हजार-डेढ हजार वर्ष पूर्व देश की धर्मनीति ही नही वरन् समाजनीति और राजनीति का निर्णय भी इन्ही भावनाओ पर आधारित था। शैव और वैष्णव अपने-अपने सम्प्रदायो के नाम पर एक दूसरे पर शाब्दिक आक्षेप--गाली-गलौज हो नहीं करते थे, वरन् वे प्राय आपस में भिड भी जाते थे, जिसमे सैक्डो व्यक्तियो को प्राणहानि होती थी ओर अनेक निदोंप व्यक्ति भी कष्ट पाते थे। यह सघपं इससे भी प्राचीन समय में उपस्थित हो गया था जिसकी स्मृति दक्ष प्रजापति और शिवजी के पुले युद्ध के रूप के वर्णन में मौजूद है। बाद मे यह मनोवृत्ति कुम्भ मे धार्मिक मेलो में प्रकट होने लगी जिनमे शवो और वैरागियो के संनिय संगठन आपस मे लड जाते थे। इस प्रकार यह साम्प्रदायिक वैमनस्य की भावना मेकडो-हजारो वर्षों से हिन्दू-ममाज को छिन-मिान और बमजोर करती चली आती थी । अन्त मे जब अनुभव होने पर विद्वानो ने इस त्रुटि को समझा तो उन्होंने विष्णु और शिव में सामज य स्थापित करने का प्रयत्न किया।
( १३ ) यद्यपि संस्कृत भाषा के पुराणो मे भी अनेक स्थलो पर ऐसे वर्णन पाये जाते हैं, पर इस सम्बन्ध मे हम सब से अधिक श्रेय गो० तुलसी- दास जी का ही मानते हैं जिन्होने रामायण मे आदि से अन्त तक भगवान शिव को परमोच्च पदवी प्रदान की है और भगवान विष्णु का सर्वाधिक प्रिय उन्ही को माना है। हमे यह कहने में भी कुछ सकोच नहीं कि इस विषय में वैष्णव पुराणो ने अधिक उदारता दिखलाई है। शैव-पुराणो मे "स्कन्द पुराण" इस क्षेत्र मे अग्रगण्य है जिसने अपने विशाल क्लेवर में एक स्वतन्त्र "वैष्णव खण्ड" का समावेश किया है और जगन्नाथ, अयोध्या, मथुरा आदि वैष्णव क्षेत्रो का सविस्तार वर्णन किया है । "कूर्म पुराण" को भी शैव माना जाता है, पर उसमे कही विष्णु के प्रति उपेक्षा अवज्ञा का भाव प्रकट नही किया गया है। इस प्रकार की साम्प्रदायिक सहिष्णुता का परिणाम हमेशा हितकारी ही होता है और उससे धर्म की वृद्धि तथा समाज का कल्याण निश्चित रूप मे होता है । गगा और गायत्री के प्रति भी पुराणकार ने आन्तरिक श्रद्धा और भक्ति प्रकट की है । गगा की महिमा विश्वव्यापी है और गायत्री को भी सभी ज्ञानी जनो ने मनराज स्वीकार किया है। इसी लिये गगा, गायत्री, गीता और गो को हिन्दू धर्म तथा सस्कृति को आधार शिला कहा गया है। गगा की महिमा कहते-कहते तो पुराणकार थकते ही नहीं । अन्त मे यह कह दिया है-- नास्ति गगा सम तीर्थ नास्ति मातृसमो गुरु. । नास्ति विष्णु सम देवम् नास्ति तत्त्व गुरो परम्।। गगा से वढार कोई तीर्थ नहीं है, क्योकि वह लोगो को परलोक के सुधारने का ही विश्वास नहीं दिलाती वरन् इस लोक म भी मान- सिक शान्ति और शारीरिक स्वास्थ्य प्रदान करके क्तिनो ही का कष्टो - ( १४ ) से उद्धार करती है। गायत्री वेदमाता है, जिसकी साधना करने से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारो फल प्राप्त होते हैं । विद्वानो के मत्तानुमार गायत्री की उपासना करने वाले भी 'वैष्णव" ही कहे जा सकते हैं क्योकि चारो वेदो का लक्ष्य भी विष्णु स्वरूप परब्रह्म ही होता है। मामान्य धर्म का पालन-- . पर इस प्रकार की देवोपासना और साम्प्रदायिक किया-कर्म से बढ़ कर वे कर्तव्य और व्यवहार हैं जो मनुष्य को प्रतिदिन अन्य व्यक्तियो के सम्पर्क में आकर करने पड़ते हैं । यदि कोई व्यक्ति मन्दिर में बैठकर घटा-आध घटा पूजा पाठ करता है, पर लोगो के सज्जनता के कार्यों मे महयोग नहीं देता, विपत्तिग्रस्त भाइयो की सेवा सहायता को तैयार नहीं होता तो उसकी उपासना-पूजा व्यर्थ ही समझनी चाहिये । भगवान की पूजा और आराधना का वास्तविक उद्देश्य यही है कि मनुष्य के हृदय मे श्रेष्ठ और सज्जनता के भाव उत्पन्न हो और वह अपने दैनिक व्यवहारो मे इस बात का ध्यान रखे कि उससे अन्य लोगो को प्रसन्नता हो। इस बात को 'नारदपुराण' मे बहुत स्पष्ट रूप से कहा गया है- सर्वलोक हितैपित्व मगल प्रियवादिता। अनायासो मनोहर्षस्तितक्षा नातिमानिता। सामान्य सर्व वर्णाणा मुनिभि. परिकोर्तितम् ॥ "सब लोगों का हित चाहना, मवर' मङ्गल माधन वरना, प्रिय वचन बोलना, विमी को पष्ट न पहुँचाना, मन का प्रसन्न रखना, गहन- शील होना, व्यर्थ वा घमण्ट न यग्ना-यही ऋषियों ने मव मनुष्यो या मामान्य धर्म वतनाया है।" इनाा पालन पर प्रत्येक व्यक्ति, चाहे वह किमी वर्ण का हो मुनियों के समान माननीय हो जाता है।
( १५ ) इसके विपरीत आचरण करने वाला नागरिक्ता के भी अयोग्य माना जाना चाहिए । प्राचीन समय मे गमाज का मगठन वणं-धर्म के आधार पर किया गया था और प्रत्येक व्यक्ति को समाज के प्रति अपने कर्तव्यो का पालन करना पड़ता था। जो इसमें ढील करता था अथवा ऐसा व्यवहार करता था जिससे अन्य लोगो का अकल्याण हो, समाज की शान्ति भग हो, उसमे विशृखलता उत्पन्न हो, तो ऐसे व्यक्ति को दडित किया जाता था, या उसे समाज से बाहर समझा जाना था । प्राचीन समय मे गांवो और कस्बो तक का नागरिक जीवन ऐसा सगठिन और अनुशासन युक्त था कि उसमे रहकर कोई व्यक्ति मनमाने ढग से कार्य नहीं कर सकता था। इसमे उसको समाज हितकारी मार्ग पर ही चलना पडता था। वर्तमान समय को यद्यपि हम उन्नतिशील मानते हैं और उद्योग घ-धो की वृद्धि तथा वैज्ञानिक उपकरणो वे व्यवहार के आधार पर यह कहने लगत हैं कि अव मनुष्यो का जीवन पहले की अपेक्षा बहुन मुख- सुविधापूर्ण हो गया है, पर वास्तव मे बात ऐसी नहीं है। इस समय समाज की व्यवस्था नियम तथा कर्तव्य पालन के बजाय धन तथा सम्पत्ति पर आधारित हो गयी है। जो जितना ही अधिक धन सम्पन्न होगा वह उतना ही समाज की परवाह किये बिना स्वेच्छापूर्वक रह सकेगा । सर्व साधारण म ऐसी कहावतें प्रसिद्ध हो गयी हैं कि 'पैसा हो तो शेग्नी का दूध भी मिल सकता है" अथवा "सर्वगुण कचन दे गुण सुवर्ण द्वारा ही प्राप्त क्येि जा सकते हैं। हम नही समझत कि जा सदाचार और विद्या के बजाय धन को मनुष्य वी उत्कृष्टता की कसौटी बना दिया गया तो मानव सभ्यता और सस्कृति की उन्नति मे मानी जा सकती है। धन तो मनुष्य भले कम भी उपाया म प्राप्त कर सकता है अथवा वह उसे जुआ, लाटरी कही पडा हुआ आदि के रूप म भी मिल सकता है। पर इसमे उसम माश्रयन्ति" (सद प्रकार ( १६ ) सद्गुणो की वृद्धि कैसे होगी? हम तो प्राय: यही देखते हैं कि इस प्रकार अनायास धन पाजाने वाले प्रायः तरह-तरह के दुव्यंसनों में फंस जाते हैं और अनेक प्रकार के कुकर्म करने लगते हैं । इसलिये प्राचीन ज्ञानी जनो ने "धर्म" अथवा मानव कर्तव्य के जितने भी लक्षण बतलाये हैं उनमे धन की अधिकता को कही स्थान नहीं दिया गया है। "श्रीमद्- भागवत्" मे धर्म के निम्न तीस लक्षण लिखे हैं- सत्य दया तप शौच तितिक्षेक्षा शमो दमः । अहिंसा ब्रह्मचर्य च त्यागा स्वाध्याय आर्जवम् ।। सतोष समदृक् सेवा ग्राम्येहो परम. शनैः । नृणा विपर्यये हेक्षा मौनमात्म विमर्शनम् ॥ अन्नाद्यदि सविभागो भूतेभ्यश्च यथार्हतः । तेप्वात्म देवता वुद्धि. मुतरा नृषु पाडव ॥ श्रवण कीर्तन चास्य स्मरण महताम् गतेः । सेवेज्यावनतिर्दास्यं सख्यमात्मसमर्पणम् ।। नृणामय परो धर्मः सर्वेषा समृदाहतः । त्रिशल्लक्षणवान् राजन् सर्वात्मा ये न तुष्यति ।। "सत्य, दया, तपस्या, शौच, तितिक्षा, उचित अनुभव का विचार, मन का सयम, इन्द्रियो का सयम, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, त्याग, स्वाध्याय, सरलता, सन्तोप, समदर्शी महात्माओ की सेवा, धीरे-धीरे सासारिक भोगो की चेष्टा से निवृत्ति, मनुष्य के अभिमान, पूर्ण प्रयत्नो का फल उलटा ही होता है-ऐमा विचार, मौन, आत्मचिन्तन, प्राणियो को अन्न आदि का यथायोग्य विभाजन, सब जीवो मे आत्मा तथा अपने इष्टदेव का भाव, भगवान का श्रवण, कीर्तन, मेवा, पूजा, नमस्कार, दास्यभाव, सख्य-भाव और आत्म समर्पण । ये मभी मनुष्यो के परम धर्म हैं। इनके पालन से सर्वात्मा भगवान प्रसन्न होते है।" पाठक देखेंगे कि इन तीस लक्षणो मे कही भी धन का उरलेख ( १७ ) नही है और भगवान की भक्ति का नाम भी अन्त में आया है। वास्तव मे जिसने आरभ ही मे एक सज्जन व्यक्ति के सामान्य गुणो-सत्य, दया, क्षमा, सहनशीलता सयम, सन्तोप, परोपकार आदि का बभ्यास नहीं विया वह भगवान की भक्ति क्या करेगा ? और भगवान भो ऐसे मनुप्प को क्या अपनायेंये ? फिर जो व्यक्ति उपयुक्त सब धर्मों का यथोचित रोति से पालन करेगा उसे जीवन निर्वाह के लायक साधन स्वयम् ही मिल जायेंगे । अगर वम भी मिलें तो वह यह देखकर सतोप रखेगा कि ससार मे करोडो व्यक्ति ऐसे भी मौजूद हैं जिनको इतना भी प्राप्त नही है। "भगवद् गीता" मे भी समस्त वणों के धर्मों का वर्णन इसी से मिलता जुलता किया गया है- 'शमो दमस्तपः शौच क्षान्तिरार्जवमेव च । ज्ञान विज्ञानमास्तिक्य ब्रह्म कर्म स्वभावजम् ।। शौर्य तेजो धृतिक्ष्यि युद्ध चाप्यपलायनम् । दानमीश्वररभावश्च क्षाग कर्म स्वभावजम् ।। कृषि गौरक्ष्य वाणिज्य वैश्य कर्म स्वभावजम् । "शम, दम, शौच, क्षमा, सरल, स्वभाव, ज्ञान-विज्ञान ब्राह्मणी के स्वभाविक धर्म हैं । शोर्य, तेज, धेयं, चतुरता, युद्ध से परामुख न होना, दान, सुशासन क्षनियो के धर्म नहीं हैं । सेती, गौपालन, वाणिज्य आदि वैश्यो के धर्म है।" J गीता मे तो पूजा पाठ का नाम भी नहीं लिया है। इसका आशय यही है कि जो मनुष्य मचाई के साथ अपने उत्तरदायित्त्व का पालन कर देता है, वही वास्तविक भगवान की पूजा और उपासना है। उसके पूरा करने के बाद अगर समय मिले और रुचि हा तो मन्दिरो के दर्शन, भगवान की स्तुति और भजन भी किये जा सकते हैं । पर अपने पारिवारिक, समाजिक राष्ट्रीय और मानवीय कर्तव्यो को त्याग कर ( १८ ) केवल पूजापाठ मे लग रहना और उसी आधार पर अपने को धार्मिक या भगवद्-भक्त समझ लेना एक बहुत बड़ी गलती या आत्म वचना है । इस तथ्य का निरूपण करते हुए लोकमान्य तिलक ने 'गीता रहस्य' में कहा है। "कुछ लोगो की ऐसी समझ हो गयी है कि सच्चा भगवद् भक्त वही है, जो सासारिक कर्मों को छोड कर विरक्त हो, केवल भक्ति मे ही निमग्न हो जावे। इस सम्बन्ध में हम यह बतलाना चाहते है कि भक्तिमार्ग वालो का 'ब्रह्म' सगुण भगवान माना गया है । जब वह सारे ससार का सचालन कर्ता है और समय-समय पर अवतार लेवर साधु- जनो की रक्षा और दुष्टो को दण्ड देने का कार्य किया करता है, तो उसके भक्तो को उसका अनुकरण करके कर्म करते रहना आवश्यक है या नही ? हनुमानजी श्रीराम के बडे भक्त थे, पर क्या उन्होने रावण आदि दुष्टो को नष्ट करने का कर्तव्य-कर्म त्याग दिया था। इसी प्रकार भीष्म पितामह को गणना परम भगवद्-भक्तो मे की जाती है, पर क्या वे आजन्म राज्य-रक्षा का कार्य नहीं करते रहे ? यह सच है कि जब भक्ति द्वारा परमेश्वर का ज्ञान हो जाता है, तब भक्त मे स्वय अपने हित के लिये कोई कामना या वासना शेष नही रह जाती । परन्तु इससे दया,करुणा वर्तव्यनिष्ठा आदि श्रेष्ठ मनोवृत्तियो का नाश नहीं होसकता, वल्कि वे और भी अधिक शुद्ध हो जाती है । ऐमी दशा मे यह प्रश्न तो उठता ही नहीं कि वर्म करे या नही। वरन् भगवान का यथार्थ भक्त तो वही है जिसके मन मे ऐमा अभेद भाव उत्पन्न हो जाय- "जिसका कोई न हो हृदय से उमे लगावे, प्राणिमात्र के लिये प्रेम की ज्योति जगावे । सवमे विभु पो व्याप्त जान गवको अपनावे, हे वम ऐसा वही भक्त की पदवी पावे॥' .
( १६ ) सच्चे दान का स्वरूप- दान की प्रणसा पुराणो मे बहुत अधिक पाई जाती है । पर्यो, व्रतो और सस्कार आदि के अवसरों पर तो दान देना आवश्यक माना ही जाता है, पर अन्य समय भी जब कोई याचा सामने आजाय तो उमको विमुख लौटाना बड़ा हीनता का कार्य समझा जाता है। पुराणो मे अपनी हडियो का दान करने वाले दधीचि, सम्पूर्ण गज्य का दान करन वाले कर्ण और पुत्र को सिंह के भक्षणाथ दे डानने वाले मारध्वज का अत्यन्त भावपूर्ण शैली में वर्णन किया गया । यहाँ दान की महिमा इतनी अधिक बतलाई गई है कि उसके फल से लोप-परलोप की सब विभूतिया अनायाम प्राप्त हो जाती हैं । पर साथ ही यह भी शतं है कि सत्पात्र को दिया गया दान ही उत्कृष्ट परिणाम उत्प न करता है, कुपान और अपात्र को दिया गया दान निरर्थक हा जाता है । कभी तो दान का ऐमा दुरुपयोग होता है कि उसके कारण दाता को और भी अधोगति का भागीदार बनना पडता है। 'नारद पुराण' मे बनु- चित दान के सम्बन्ध म चेतावनी देते हुये लिखा है- "सदानारी ब्राह्मण दान का थेठ पात्र है। पर जो ब्राह्मण क्राधी, दम्भाचार परायण, तथा अपने कर्म का त्याग करने वाला हो, उसको दिया हुआ दान निष्फल होता है । जो परायी स्त्री मे आसक्त, पराये धन का लोभी तथा ज्योतिष का धन्धा करने वाला हो वह भी दान का पात्र नहीं होता । जिसके मन म दूसरो के दोष देखने का दुर्गुण भरा है, जा हिमर, दुष्ट योर रम का विक्रय करने वाला है, उसको दिया दान व्यर्थ हा है । जा गीत गार जीविका चलाता है, जिमी स्त्री व्यभिचारिणी है, जा दूसरा पो कष्ट दन वाला है, जा स्याही से निर्वाह करता है. जो दव पूजा की नौकरी करता है, समूचे गाव पा पुरोहित है, पावन (हरवारा) या बाग करता है रसोइये । काम करता है, कविता द्वारा लोगो की झ्ठो प्रशसा करता है, चिकित्सा का पेशा करता है, अभक्ष भक्षण करता है उसको दिया दान व्यर्थ होता है। जो भगवान के नाम-जप को बेचता है, सध्या-कर्म को त्यागने वाला है, दूषित दान ग्रहण करता है, दिन में मैथुन करता है, जो अत्यन्त दुष्ट है, शराबी, मासखोर, स्त्री लम्पट, अत्यन्त लोभी, चोर और चुगली खाने वाला है, उसको दिया हुमा दान निष्फल होता है । जो कोई भी पाप परायण हो, सज्जन पुरुपो द्वारा सदा निन्दित हो, उनसे न तो दान लेना चाहिये और न उन्हे देना ही चाहिये ।" यदि इन नियमो का मिलान वर्तमान स्थिति से किया जाय तो सब वाते उल्टी ही दिखाई पड़ती है । आजकल जो साधु-सन्यासी, पडा पुगरी, ब्राह्मण और पडित दान ले रहे हैं वे प्राय सुलफा, गाजा, तम्बाकू, भाग आदि का नशा करने वाले ही होते हैं। उनमे क्रोधी, कामी लोभी, दम्भी व्यक्तियो की हो सख्या अधिक होती है । कपट, ठगी, झूठ, चुगलखोरी आदि के दुर्गुण भी उनमे कम नहीं होते। फिर ऐसे लोगो को दान देने से दाता का क्या भला हो सकता है ? इसलिये दान वही कल्याणकारी कहा जा सकता है जो सत्पात्र को, सत्कर्म के लिये, सद्भावना से दिया जाय। दान लेने वाला यदि सत्पान भी मिल जाय, पर दान दाना को मनोभावना शुद्ध न हो तब भी उसकी गणना उत्तम दान मे नही हो सकती। इस सम्बन्ध में पुराणकार ने पहा है- "जो वाहाण सवर्म में लगा हो उसे स्वयम् प्रयत्न करके दान देना चाहिए। जो दान श्रद्धापूर्वक तथा भगवान को समर्पण पूर्वक दिया गया हा एवम् जो उत्तम पात्र के याचना करने पर दिया गया वह सर्वोत्तम है। इहलोक तथा परलोक के लाभ का उद्देश्य रखकर जो दान सुपात्र को दिया जाता है वह मध्यम माना गया है। जो दम्भ से, दूसरो की हिमा के नियेअविधिपूर्वक, क्रोध स, अश्रद्धा से " और सपान को दिया जाता है, वह दान यधम माना गया है "भगवद् गीता" मैं भी दान के विषय में ऐसी ही मान्यता प्रकट की गई है- यज्ञ दान तप कर्म न त्याज्य कायमेव तत । यज्ञो दान तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ।। एतान्यपि तु कर्माणि सङ्ग त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चित मतमुत्तमम् ।। अश्रद्धया हुत दत्त तपस्तप्त कृत च यत । अगदित्यु च्यते पार्थ न च तत्प्रेस नो इह ।। यर्थात्- "यज्ञ, दान, तप और वर्ष का त्याग न करना चाहिए योकि ये सब बातें श्रेष्ठ पुरुषों के लिये भी कल्याणकारी है । पर इन कर्मों को भी बिना आसक्ति रखे, फलाशा का त्याग करने, बत्तव्य भावना म करते रहना चाहिये । साथ ही यह भी ममझ लेना चाहिये मि जो यज्ञ, दान अथवा तप अश्रद्धापूर्वक किया जाता है, वह 'असद है और लोक पवा परलोक प कही भी मल्याणकारी नहीं होता।" दान, सत्कर्म अवश्य है, और उसमे समाज पा हित होता है, पर उसी दशा में जव उमे जरूरतमन्द वा विना किसी स्वार्थ या साम की भावना के दिया जाता है। हम इसको देवत्र आत्म-वल्याण का हेतु ही नहीं मानते वरन् अप्रत्यक्ष रूप म इसके द्वारा समाज म सम्पत्ति फा गरन भी बना रहता है। धन का केन्द्रीकरण हाना गमाज के लिय कमी हितार नही माना जा सकता, क्यानि इममे बहुमख्यक लोगो म कष्ट और मन्तोष पो वृद्धि हानी है और उसग बन्न म समाज की गति मा हानी है। इसलिय किस प्रकार बाजपत पानून द्वारा अधिस गम्मति वाला पर तरह-तरह के टैवम नगा कर उनकी सात को मार्वजनिा हित के कामों में पय किया जाता है, उमी प्रकार प्राचीन समाच विमान ५ जाताने दाम ( २२ ) को प्रेरणा ही थी, जिससे धन एक जगह एकत्रित न होकर समाज में वितरित होता रहे । हम हिन्दू और बौद्ध शास्त्रो मे ऐसे सैकडी धनी व्यक्तियों का वर्णन पढते हैं जिन्होंने अपनी लाखों अथवा करोडो की सम्पत्ति लोक कल्याण अथवा धर्म-कर्म के लिये दे दी । यहाँ हपं जैसे राजा भी हो चुके हैं जो अपनी आय मे मे बचें धन को प्रति वर्ष दान के रूप मे अभावग्रस्त लोगो में बांट देते थे। वर्तमान समय में जब कि लोगो को कानून द्वारा अपना धन देने को बाध्य किया जाता है तब वे तरह-तरह की चालाकियां करके कम से कम देने का प्रयत्न करते हैं। पर प्राचीन समय में जब उनको दान की प्रेरणा दी जाती थी तब के स्वेच्छा से अपना धन देते थे जिससे सर्व साधारण मे भी बेईमानी और धूर्तता के बजाय उदारता और त्याग की भावना बढ़ती थी । इस दृष्टि से उचित रीति से किये दान को आत्मा को शुद्ध बनाने के अतिरिक्त समाज मे सामञ्जस्य और मतुलन का साधन भी माना जा सकता है। गृहस्थ धर्म के विशेष नियम यद्यपि देश-काल में परिवर्तन हो जाने से अब गृहस्थ जनो के रहन-सहन और व्यवहार में बहुत अन्तर पड गया है, तो भी 'नारद पुराण' मे इस सम्बन्ध में जो नियम बतलाये है उनमे से कितने ही अब भी उपयोगी है। उदाहरण के लिये उन्होने ब्रह्मचर्य आश्रम की अवधि पूर्ण करके गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होने वाले व्यक्ति के लिये "उत्तम कुल में उत्पन्न, रूप, लावष्य से युक्त, सद्गुणवती, सुशीला तथा धर्म परायण कन्या' के साथ विवाह करने को, सम्मति दी है जो उचित ही है । साथ ही उन्होन विवाह-सम्बन्ध करने के लिये अयोग्य कन्याओं के जो कितने ही लक्षण बतलाये है वे विशेष रूप से ध्यान देने योग्य हैं- 'जो कन्या रोगिणी ही अयवा किसी विशेष रोग से युक्त कुल मे उत्पन्न हुई हो, जिसके केश बहुत अधिक हो या बहुत कम हो, जो ( २३ ) सर्वथा देश रहित हो, जो बहुत बोलने वाली हो, उससे विद्वान् पुरुष विवाह न करे। जो बहुत क्रोध करने वाली, बहुत नाटो या बहु। घटे शरीर काली, अनि कुरूपा, किसी अङ्ग से हीन या अधिक अङ्ग बाली, उन्मादिनी और चुगली करने वाली हो अभवा मो कुबडी हो, उससे भी विवाह न करे । जो सदा दूसरो के घर में रहती हो. झग- डालू हो, मति-भ्रान्त हो, निष्ठुर स्वभाव वाली हा, बहुत खाने वाली हो, जिप्त के दांत और ओठ मोटे हो, जिसकी नाक से घुराहट की आवाज आती हो और ओ धूत हो, विद्वान् पुरुप उससे भी विवाह न करे। जो न कपट करने वाली हो, जो बहुत घमडी और बगुला- चत्ति वाली ( ऊपर से साधु और भीतर से दुष्ट ) हो उससे भी विवाह करना उचित नहीं है।' पुराणकार ने जिस प्रकार की लडकियो की विवाह के लिये अनुपयुक्त बतलाया है अब भी जानबूझ कर और सुविधा रहने पर उनसे विवाह करने को कोई तैयार नहीं होता । पर एक अन्तर अवश्य है कि जहाँ 'नारद पुराण में स्वभावगत दोपो पर ज्यादा जोर दिया है वहाँ आजकल बाहरी रूप रड्ग और बनाव चुनाव की दृष्टि से हो अधिक छानबीन की जाती है । इस समय क्या पुरुपा में और चया स्त्रियो मे परित्र की शुद्धता, पवित्रता, नैतिकता भादि की बजाय फैशन, सजावट बातूनोपन और शान शौकत को ही अधिक महत्व दिया जाने लगा है । इसस गृहस्यी के मुख और स्थिरता म हो कमी नहीं आई है वरन् सामाजिक सुव्यवस्था, सहयाग और सङ्गठन में भी कमी पडती जाती है । क्योकि पर लिखी प्रवृत्तिया मनुष्य में व्यक्तिगत लाम और आराम की मनोवृत्ति का बढावा देती हैं और जब अधिक जनसंख्या इन बातो को अपना लती है ता उनम हानि. पारप प्रतिस्पर्धा और अनैतिक साधनो से अपने लक्ष्य को पूरा फरने की भावना जह पकड़ लेती है । ऐमा समाज जिसरे सदस्य अपने- ( २४ ) अपने स्वार्थ को समष्टि की सुख-सुविधा की अपेक्षा प्रधानता हैं उन्नत और सुखी नहीं बन सकता । आगे चलकर सामान्य नागरिको के लिये खाने, पीने, पहिनने और शिष्टाचार के जो नियम बतलाये हैं, उनमे से बहुत सी बातें अब भी अशिक्षित वर्ग के बहुसख्यक लोगो में पाई जाती हैं, पर नवीन शिक्षा प्राप्त लोगो को वे अजीब ही लगेंगी। कहा गया है कि 'गृहत्थ व्यक्ति दो यज्ञोपवीत, दुपट्टा ( बडा अंगोछा ), सोने के कुण्डल और धोती जोडा रखे। उवटना, चन्दन, तेल लगाता रहे । केश, नाखून आदि कटाता हुआ पवित्र रहे और छडी लाठी तथा जल-पात्र रखे। स्वच्छ पगडी, छाता और जूता पहिने, पुष्पमाला धारण करे, सुगन्धित वस्तु का व्यवहार करे । ऐसा वेश रखे जो सबको भला जान पडे । सदा स्वाध्याय करता रहे, अपने धर्म के अनुसार आचरण करता रहे, दूसरो का अन्न खाने और दूसरो को निन्दा करने से बचे। पैर पर पैर न रखे, झूठे पदार्थों को न लाधे, दोनो हाथो से शिर को न पुजावे । द्विज और देवालय के बायीं ओर होकर चले । देव पूजन, आचमन, स्नान, व्रत, याद्ध आदि में घुले केश अथवा चोटी न रखे। एक ही वस्त्र न पहिने रहे, गधा आदि पराय सवारी पर न चढे और निरर्थक वाद-विवाद न करे । व्यभिचार और चुगली से बचे और गौ, पीपल, अग्नि और पर्वत इनका बांयी ओर लेता चले। 'अमूया, मतारता और दिन का सोना त्याग दे । दूसरे के पापों का वर्णन न परे अपने पुण्य को किसी में न रहे । अपने नाम, नक्षत्र तथा धन बल आदि का जिक्र किमी के सामने न परे। दुष्टो के साथ निवास न करे,'मास्त्र के विरुद्ध चर्चा न मुने तथा मद्य, जुआ और गाने-बनाने में आसक्ति न रये। गीली हड्डी, जूठी पस्तु, पाता, मुर्दा और कुत्ते को धूर वस्त्र सहित स्नान परे । पि, चिता को नररी, यप ( पशुओ को मारने का स्तम्भ ) ( २५ ) चाडाल का स्पर्श कर लेने पर वस्त्र महित स्नान करे । दीपक, खाट और शरीर को छापा, वेश, वस्त्र और चटाई का जल, तथा बकरी, विन्नी तया झाडू की धूल, इन सबसे वचे क्योकि ये मव प्रारब्ध का हरण करते है । सूप को हवा, शव-दाह का धुआं, शूद्रा स्त्री के पति से दूर रहे तथा नाखून तथा बाल वा दोनो से चबाना, नगाहोकर मोना त्याग दे। सिर में लगाने से बचे तेल को शरीर मे न लगावे, अप- वित्र ( बाजार से लाये ) पान को न खाय, दायें हाथ अथवा केवल मुख स जल न पिए । गुरु की छाया पर पैर न रखे, उनकी आज्ञा भी कभी न टाले, योगी, यनी, ज्ञानी पुस्पो की कभी निन्दा न करे । साय, प्रात उपासना, हदन यादि अवश्य करे।" प्राचीन समय के लोग दैनिक जीवन में जिन बातो को अनु- चित, हानिकारक अथवा मामान्य शिष्टाचार के विपरीत समझते थे उनका यह काफी विस्तृत विवरण है। स्मृतियो मे और भी बहुत सी वाते त्याज्य बनलाई है। वर्तमान समय में रहन सहन की परिस्थितियो में अस्तर पर जाने से इनम से आने वातों का अनावश्यक अथवा बहम समझा जाता है। इस समय क शिक्षित व्यक्ति छुआछून की बातों का एवं ढोसला मानने ला है और अस्पृश्यता पो हदान के लिये कानून द्वारा भी प्रयत्न दिया जाताहै । पर इसम विचारणीय विषय यह है कि जन्म से विमी को शूद्र, अस्पृश्य या चाण्ड ल आदि मान सेना तो प्रत्यक्षा मे अनुचित है. पर जो व्यक्ति दिसी गन्द पो का करन क वारण प्राय गन्दी हालत में रहते हैं, उनम दूर रहने के नियम को बुरा नहीं वहा जा गश्ता । उदाहरण के लिये जो वधिन या दमाई पशुआ वा काटन यऔर उनका माम वचन का कार्य करत है,अयया जा मृन पशुये दान और उनमा चमडा मादि निकालने का काय करत है, उना बम्पो तथा हाथ, पैर आदि में इन पदायास दुध अश सगा ही रहता है। उनस पृथर रहना स्वच्छता की दृष्टि से आवश्यष मानना चाहिये । इसमें ( २६ ) नोच ऊँच का प्रश्न उठाना ठीक नही । इसी प्रकार गीली हड्डी, पशु वध स्तम्भ, मुर्दा जैसी जैसी वस्तुओ के स्पर्श से मन मे घृणा उत्पन्न होती है । उस अवसर पर स्नान करके ग्लानि को मिटा देना अनुचित नहीं कहा जा सकता। कुछ बाते बहम की तरह लगनी है पर विचार करन से उनके पालन में कोई दोप नहीं जान पडना । दीपक, खाट और शरीर की छाया अपने ऊपर न पडने देना, केश, वस्त्र और चटाई से टपकते जल को अशुद्ध मानना, बकरी, बिल्ली तथा झाडू को धूल से बचना चाहे सौभाग्य या दुर्भाग्य का कारण न हो पर स्वास्थ्य और स्वच्छता की निगाह से इनका पालन अनुचित नहीं कहा जा सकता । हाँ इसमे जो 'कुत्ते को छूार स्नान करने की बात लिखी है, वह स्तिने ही आधुनिक 'वावुओ' और "मिस्टरो" को अनुचित लग सकती है । क्योकि वे छोटे कुत्तो को प्राय गोदमे लेते रहते हैं । पर हमको समझ लेना चाहिये कि पुराणकार का आशय ऐसे विशेष कुत्ता से नहीं है, वरन् रास्ते में धूमने वाले 'गन्दे कुत्तो से है। यह भी आवश्यक नहीं कि हम इस प्रकार के समस्त नियमो का पालन अवश्यमव करे । देशकाल की परिस्थितियां बदल जाने से बहुत से नियम हमको कोई दूसरा उपाय न होने से त्यागने ही पड़ते हैं । उदाहरणार्थ पहने पैदल अथवा बैलगाडी आदि पर यात्रा करनका चलन पा। उस समय लोग दोरहर या सायवाण को किसी पडार पर टटर पर अपना भोजन आप वनात थे । उसके लिये स्वयम् कुएं से पानी यौच कर भूमि को मार तया जल सिर पर शुद्धतापूर्वर भाजन की व्यवस्था की जाती थी। ऐमा भोजन शास्त्रीय विधि के अनुमार मुख तथा स्वास्थ्यदायय हो सरता था । पर आजपम यात्रा का प्रधान साधा रेल या मोटर बमें बन गई है । इन सवारिया में बैठने लाया स्थान पाने के लिए भी रापर्ण वरना पड़ता है, तब उनमे से उतर पर r भोजन बनाना और खाना सम्भव कसे हो सकता है ? रेलवे स्टेशन पर तो हमपो आँखो से यह देखते हुये कि वहाँ के खाद्य पदार्थ नीचे दर्जे के लोगो द्वारा बनाए और स्वच्छता की दृष्टि से असन्तापजना है, साचार होकर उन्ही को उचित से ज्यादा मूल्य देकर खरीदना और काम में. लाना पडता है। शहरी में भी परिस्थितिवश हाटलो और भोजन की दुकानो का प्रचार निरन्तर बढ़ता जाता है और उनम सभी जानियो और धणियो के लोग काम करते हैं। उनमे भोजन करने वाला के लिये छुआछूत के प्राचीन नियमो का पालन करना किसी प्रकार सम्भव नहीं होना । बिस्कुट, उबलरोटी, टास्ट आदि जैसी नई खाद्य बरतुओ को तो गशीनो द्वारा बडे-बडे कारखानो में बनाया जाता है जहां सैकड़ा व्यक्ति बिना जाति या धर्म के भेदभाव के नौकर रख लिये जाते हैं । इस लिये अब भोजन करते समय हमेशा खाद्य पदार्थों के भले या बुरे स्रोत अथवा कार्यकर्ताओ के श्रेष्ठ अपवा जघन्य चरित्र का पता चला सकना प्राय असम्भव है । इस अवस्था मे एक मात्र माग यही रह जाता है कि हम स्वयम् तन, मन, धन की दृष्टि से शुद्ध रहे और किसी प्रकार का बुरा काम न करें । आप भला तो जग भला वाली कहावत यहा भी चरितार्थ हो सकती है। ज्योतिष और मंत्र विद्या- ज्योतिष और मत्र-शास्त्र का विवेचन "नारदपुराण" की एक प्रसिद्ध विशेषता है । इसमे गणित (सिद्धान्त , जातक [होरा] और सहिता तोनो शाखाओ का विस्तार पूर्वक वणन किया गया है। गणित- ज्यातिप तो सर्वमान्य है और पश्चिमीय वैज्ञानिक भी उसी के द्वारा मूर्य, चन्द्र, मंगल, शुक आदि ग्रहो की गति का ठीक ठीक हिसाब लगा- कर उन तक अपने अन्तरिक्ष-याना को पहुँचान म सफल हो सके हैं। चन्द्रग्रहण, सूयग्रहण, सूर्योदय और सूर्यास्त का समय आदि का निर्णय भी गणित ज्योतिप द्वारा किया जाता है जो विल्कुल ठीक निकलता है।
( २८ ) "जातक-शाखा" का सम्बन्ध व्यक्तियो की भान्स गणना और उनके जीवन में घटित होने वाले भावी परिवर्तनो तथा विशेष घटनाओ से माना गया है। सर्व साधारण को ज्योतिष को इसी शाखा का विशेष परिचय है और बाजार में बैठ कर लोगो का राशिफल और भाग्य-फल बतलाने वाले 'ज्योतिषो" इसी के आधार पर हिसाव लगाया करते है। हमारे देश मे इसको "फलित ज्योतिष" भी कहते है । तीसरी शाखा "सहिता" में देशव्यापी घटनाओ, वर्षफल, तिथि, दिन, नक्षत्र, योग, करण, मुहूर्त आदि के सम्बन्ध मे विचार किया जाता है । पचागो की रचना इमी के आधार पर की जाती है और भारतीय-समाज मे प्रचलित पोडश-सस्कारों के समय का निर्णय इसी के द्वारा किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र एक बहुत प्राचीन विद्या है । वैदिक काल मे यज्ञो के कालनिर्णय मे उसका प्रयोग किया जाता था और राज्य तथा राष्ट्र सम्बन्धी सभी कार्य उसी के द्वारा उत्तम मुहूर्त वा निश्चय करके किये जाते थे। इस कार्य के लिये केवल भारतीय राजा ही ज्योतिपियो को अपने दारो मे नही रखते थे, वरन मिश्र , रोम जैसे पश्चिमीय देशो के वादशाह और राष्ट्रपति भी इस विद्या पर पूरा विश्वास रखते थे और युद्ध , विग्रह, मधि, मैन्य-भचालन का काल निर्णय ज्योतिषियो के मतानुमार ही किया जाता था। 'बाइबिल' मे अनेक स्थानो पर भविष्य वक्ताओ या जिक्र भाता है। पाठको यो यह जान कर आश्चर्य होगा कि इम विज्ञान युग मे भी, जो दूसरा विश्व मन् १६३६ से १६४५ तक वायुयानो और एटम यमो मे सहा गया, गंम्प-गचालन में ज्योतिषियो की मलाह ली जाती थी। जर्मनी के मुमय पा-प्रतां हिदार को, जो सयोगो की बदौलत पारी मे अधि. नायक (विटेटर) बन गया था, ज्योतिष पर विश्वास था । यह युद्ध- रांचालन सम्बन्धी अपने सभी निर्षय ज्योनिपविभागका सलाह से करता यूनान और ( २६ ) था। इस विभाग में पाप ज्योतिपो काम करते थे जिनका प्रधान विलि- यम क्राफ्ट था जो हिटलर का वडा विश्वासपात्र था । जब अपने गुप्तचरी द्वारा इस रहस्य का पता इङ्गलैण्ड के अधिका- रियो को लगा तो वहां के प्रधान मन्त्री मिचिल ने सोचादि चाहे यह एक नई चान है और शायद मजाक ही हो पर इसमें फायदा क्यो न उठाया जाय । बस इ गलण्ड के सेना विभाग ने भी अपने देश में लुई डी० व्होल नामय ज्योतिषी को खोज निकालो जो वास्तव मे हगरी का निव सी था, पर अब कई वर्ष से लन्दन मे आकर रहने लग गया था । उसने कुछ समय तक जर्मनी में रह कर हिटलर के ज्योतिपी विलियम क्राफ्ट के साथ काम किया था और वह उसकी ज्योतिष विधियो को अच्छी तरह जानता था। डीव्होल को अगरेजी सेना विभाग मे भर्ती करके कप्तान का पद दे दिया गया और उसने लगातार कई वर्ष तक हिटलर के युद्ध सम्बन्धी निर्णयो का भेद अगरेज सेनापतियो का बतलाकर जर्मनी को पराजय मे पर्याप्त सहयोग दिया ।। ज्योतिष विद्या मे कहाँ तक सचाई है और ज्योतिषी लोग जो भाग्यफल या भविष्यफल बताया करते हैं वे किलने अशो मे सत्य अथवा असत्य सिद्ध होते हैं, इस विषय में अधिक विवेचना करना यहाँ अप्रा- सङ्गिक होगा । हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि हमारे देश में ही नहीं विदेशो मे भी अभी बहुसख्यक लोगो का ज्योतिष विद्या पर विश्वास है और अच्छे समझदार और शिक्षित व्यक्ति भी किसी ज्यो- तिपी या हम्लरेखाज्ञाता को सामने देखकर अपना भविष्य फल पूछने का लोभ सम्बरण नहीं कर पाते। इस दृष्टि से 'नारद पुराण" का यह "निस्कन्ध ज्योतिप वर्णन" वाला प्रकरण विशेष महत्वपूर्ण है । इसमे गणित ज्योतिष के वर्णन मे विभिन्न प्रकार के अकगणित, रेखा-गणित, क्षेत्र गणित आदि वा जो सूक्ष्म रहस्य बतलाया गया है उसने लेखक को विद्वता प्रमाणित होती है । जातक और महिता विभाग मे वतलाई गई विधिया भी स्पष्ट और सरल हैं जिनमे सभी श्रेणी ५ कम या अधिव पनि शस्त लाभ उठा सकते हैं।
मन-शास्त्र का तो हमारे देश में अब भी बहुत अधिक प्रचार है और बडे-बडे विद्वान् भी उसकी सचाई मे विश्वास करते हैं । यहाँ हजारो ऐसे व्यक्ति मिल सकते हैं जिनकी सफलता का मुख्य भाधार किसी मन्त्र का जप करना बतलाया जाता है। विद्या-प्राप्ति, धन लाभ, विवाह और सन्तान प्राप्ति, मुकदमा आदि मे विजय इत्यादि सब कार्यों के लिये मन्त्री का प्रयोग वतलाया गयाहै और लोग उसे बडी श्रद्धा और उत्साह से करते भी हैं, "नारदपुराण" मे "मन्त्र" शब्द के 'म' का अर्थ मनन अयवा सर्वज्ञता तथा '' का नाण [रक्षा] बतलाया गया है । तदनुसार मत्र वह शति है जिससे मनुष्य विनिध प्रकार की सासारिक सफलतायें प्राप्त कर सकता है और अपनी रक्षा में भी समर्थ हो सकता है । वैसे वर्तमान समय में प्रचलित अधिकाश मन्त्र शाक्त और तांत्रिक मत के देखने मे आते हैं, पर 'नारदपुराण" वैष्णव आम्नाय का है, इमतिये इसक सभी मन विष्णु, राम-सीता, कृष्ण, हनुमान से सम्बन्धित हैं। ये मन्त्र सकाम है, जिनका अनुष्ठान किसी भौतिक लाभ की इच्छा में किया जाता है । सभव है कि जो व्यक्ति दृढ श्रद्धा और एकाग्रनिष्ठा से इनका विधिवत् अनुष्ठान करत हैं उनमो वैमा लाभ होता हो, फिर भी आध्यात्मिक विषयों में निपाम भावना रसना ही मवोत्तम है। इस सम्बन्ध में एक विद्वान का निम्न पयन विचारणीय है-- किमी वस्तु को प्राप्त करन की इच्छा से भगवान को भजता है, उसका ध्येय वह वस्तु है, भगवान नहीं है । वह वस्तु साध्य है, और भगवान तथा उनकी भक्ति साधन है । यदि किसी कारणवश उसरे अभीष्ट की प्राप्ति देर होगी तो वह भगवान की भक्ति छाड सरता है। अतएव समाम भार स की हुई उपासना एक प्रकार म वाम्य वस्तु मी ही उपामना है, भगवान की नहीं। दम वात ना समम पर भगवान की उपासना निप्पाम प्रेम भवस, पयस भगवान की प्रसन्नता व निय हो परनी चाहिए। गो अतिरिका यह यात भी है कि मयाग ठान पा पल "जा पुरेप ( ३१ ) प्रतिबन्धक की प्रबलता अथवा सरलता के अनुसार विलम्व से या शीघ्र होता है । एक आदमी को किसी विशेष वस्तु या स्थिति की आवश्यकता है। वह उसके लिये सकाम उपासना करता है। यदि उस वस्तु या स्थिति को प्राप्ति मे वाधक पूर्व जन्म का कम बहुत अधिक प्रबल होता है, तो एक ही अनुष्ठान से अभीष्ट फल नहीं मिलता, बार-बार अनुष्ठान करने पड़ते हैं । आजकल के सकामी पुरषा मे इतना धैर्य हो सकता, अतएव वे देवता मे ही अविश्वास कर बैटते है, तथा उसकी अवज्ञा करने लगते हैं, जिससे लाभ के बदले उलटी हा न हो जाती है।" वास्तव में भक्ति के सम्बन्ध में कुछ मम्प्रदाय वालो ने बहुत प्राति उत्पन्न करदो है । वे लोगो को यही बतलाते है कि भगवान का दर्शन करने, तीयों मे स्नान करने और एकादशी आदि के व्रत करने से सद्गति मिलना अवश्यम्भावी है। चाहे अपन में भी पाप क्यो न किये हो इम में पुराणकारो का दोष भी कम नहीं है। उन्होने अपनी कक्षाओ का प्रभाव जमाने के लिये जगह-जगह लिखा है कि अमुक व्यक्ति जन्म भर पाप करता रहा, पर अन्त समय किसी प्रकार त या तीर्थ स्नान कर लेने से ही उसे उत्कृष्ट गति प्राप्त हो गई । "वाराह पुराण" में कुब्जा- म्रक तथा कोकामुख आदि तोथ क्षेत्रो में मग्ने से ही सर्पिणी, यौला, गृद्ध, शृगाल आदि जीवो को राजा और धनवानो की यानि में सद्गति प्राप्ति होने की बात बतलाई गई है। इसी तरह वे अतिशयोक्तिपूण कयनी के कारण अनेक लोगो को पुराणो पर शका और अश्रद्धा हा जाती है। पर जैसा हम बराबर कहते आये है वे पुराणों को उपदेशात्मक धर्म क्थाओं अथदा उपाण्यानो ये रूप में पड़ तो ऐसी कोई ममस्या उत्पन होने की आशका नहीं रहती। हमने पुराणा म स ऐम वर्णना को कम करने की यथाशक्ति चेष्टा की है, जिससे उनकी उपयोगिता वढी है और प्रचार भी होने लगा है। यदि पाठा ऐमा बुद्धिमङ्गत भाव रखकर पुराणो को पड ग ता उनस बहुत से पल्याणकारी उपदश मिल सकेंगे। ~श्रीराम शर्मा, आचार्य विषय-सूची भूमिका ३ ... ४६ ... ... ११२ १२६ १४१ ... ... १६४- ... २०५ २४२ १ सूत-ऋपि सवाद वर्णन २ सनक-नारद सवाद और विष्णु स्तुति ३ भूगोल वर्णन और भारतवर्ष की श्रेष्ठता ४ मृकण्डु मुनि को भगवान का वर देना ५ मारकण्डेय की कथा और वर प्राप्ति ६. प्रयाग और गङ्गाजी माहात्म्य वर्णन ७ राजा वाहु का चरित्र ८ भगीरथ द्वारा गङ्गाजी का लाया जाना ६ मौदास चरित्र १०. दैत्यो का अग्नि प्रकट कर भस्म होना ११ वामनावतार धरित्र १२ इष्टापूर्त फल एव वीरभद्र नृप चरिन १३ नाना प्रकार दान-निरूपण १४ द्विज धर्म निरपण १५ पापियो को नरक दण्ड वर्णन १६. भागीरथ द्वारा गङ्गाजी का लाना ... १७ शुक्ला द्वादशी व्रत का उद्यापन १८ पूर्णिमा व्रत वा उद्यापन १६ ध्वजारोपण व्रत २० मुमति-विभाण्ड सम्बाद २१. हरि पञ्चरात्र व्रत २२ मागोमास ग्रन २३. एकादशी व्रत-भद्रशील उपाख्यान २४ चारो वर्ण तथा स्त्रियो वे सदाचार वा वर्णन २५ म्मात-धर्म वर्णन २६ वेदाध्ययनादि वर्णन २७ गृहस्थ वानप्रस्थ और गन्यामी ये धर्म २८ था-न्य विवरण ... ... २९६ ३०५ ३३५ ३५७ ३७६ ... ४१० ४१५ ४२० ४४७ ..
नारद पुराण वार सपी नन्त अशुई मो में मुक्त म पुयात सापक पदा ॥ सूत-ऋषि संवाद वर्णन ॥ ॐ नारायण नमस्कृत्य नर चैव नरोत्तमम् । देवी सरस्वती चैव ततो जयमुदीरयेत् ।। वन्दे वृन्दावनासीनमिन्दिरानन्दमन्दिरम् । उपेन्द्र साद्रकारुण्य परानन्द परात्परम् ।।१ ब्रह्मविष्णुमहेशाय्य यस्याशा लोकसाधका । तमादिदेव चिद्रूप विशुद्ध परम भजे ॥२ शौनकाद्या महात्मान ऋषयो ब्रह्मवादिन । नैमिपाख्ये महारण्ये तपरतेतुर्मुमुक्षव ॥३ जितेन्द्रिया जिताहारा सन्त सत्यपराकमा । यजन्त परया भक्तया विष्णुमाय सनातनम् ।।४ अनोा सर्वधर्मज्ञा लोकानुग्रहतत्परा । निर्ममा निरहकारा परस्मिनतमानसा ॥५ न्यस्तकामा विवृजिना शमादिगुणसयुता । कृष्णाजिनोत्तरीयास्ते जटिला ब्रह्मचारिण ॥६ गृणन्त परम ब्रह्म जगच्चक्षु समोनस । धर्मशास्त्रार्थतत्त्वज्ञास्तेपुर्नैमिषकानने ॥७ ग्रन्थ के आरम्भ म सब प्रथम विघ्न विनाशनार्थ मङ्गलाचरण किया जाता है। भगवान् श्री नारायण-नरो म परम श्रेष्ठ नर- वाणी की देवी सरस्वती को प्रणाम करके फिर जाशद वा उच्चारण ३४ [ नारद पुराण . करना चाहिए। भगवान् वेद व्यास देव के लिये प्रणाम है। अपने ललित केलि के स्थल वृन्दावन में विराजमान, श्री लक्ष्मीदेवी को आनन्द प्रदान करने के मन्दिर स्वरूप, इन्द्रदेव के अनुज ( उपेन्द्र नाम वाले ) वामन अवतार धारण करने वाले, अत्यधिक करुणा के केन्द्र, परमा- धिक आनन्द के स्वरूप एव पर से भी पर सर्वोत्तम एव सर्व शिरोमणि भगवान् विष्णु को वन्दना करते हैं ।।१।। जिस परम ब्रह्म की प्रभा का सृजन करने के ही कारण से 'ब्रह्मा' यह नाम हो गया है, प्रजा का का पूर्ण परिपालन करने के कारण मे 'विष्णु' यह नाम पड गया है तथा सृष्टि का सहार करने के कारण से 'शिव' यह नाम हो गया है । इस सम्पूर्ण लोक के साधन करने के वास्ते जिसके अश से इन्द्र वरुण आदि प्रतिष्ठित हुए है उन्ही आदिदेव परम विशुद्ध चित्स्वरूप भगवान् का मैं भजन करता हूँ ॥२॥ ब्रह्म के विषय मे वाद करने वाले शौनक आदि महान आत्मा वाले ऋपि वृन्द मुक्ति प्राप्त करने की इच्छा से नैमिष अरण्य मे तपश्चर्या किया करते थे ॥३॥ वे लोग अपनी इन्द्रियो को विपयो की ओर न जाने देकर भोजन पर भी विजय प्राप्त कर सत्यस्वरूप पराक्रम से सुसम्पन्न होकर अत्यधिक भक्ति की भावना से आदि देव श्री सनातन विष्णु भगवान् की अर्चना कर रहे थे ॥४॥ ये लोग परम गनम्बी थे और चिसो से डाह नही किया करते थे। धर्म के • दश प्रकार के धृति, क्षमा आदि समस्त धर्मों को अच्छी तरह से जानते थे। ससार मे जो भी अधिकारी योग्य प्राणी थे उन पर सर्वदा अनु- ग्रह करने के लिये तत्पर रहा करते थे। उनकी ममता किसी भी वस्तु पर नही थी और न वे ममत्व को जताते ही थे। उनके हृदय कार तो नाम मात्र को भी नहीं था और सदा उनका हृदय परब्रह्म में ही रमण किया करता था ॥५॥ सभी प्रकार के सङ्कल्पो का उन्होन परित्याग कर दिया था। वे लोग पूर्णतया पापो से रहित और शम. दम आदि सद्गुणो से भूपित थे। उनके मस्तक पर जटाऐ थी और वे ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाले कृष्ण मृग के चर्म को धारण किया मे अह
नारद पुराण ]
करते थे ॥६॥ मम्पूर्ण लोक के चक्षु मूर्य के समान तेजस्वी निरन्तर
वेदा का स्वाध्याय करते हुए धर्मशास्त्र के तत्व का मर्म जानने वाले
वे मुनिगण उस नमिपारण्य मे तपस्या कर रहे थे।।७।।
ययज्ञपति वेचिज्ज्ञानज्ञानात्मक परे ।
केचिच्च परया भक्तथा नारायणमपूजयन् ।।
एकदा ते महात्मान समाज चन रुत्तमा ।
धर्मार्थकाममोक्षाणामुपायाज्ञातुमिच्छव ॥६'
पििड्वंशतिसहस्राणि मुनीनामूलरतसाम् ।
तेपा शिष्यप्रशिप्याणा सख्या वक्तुन शकयते ॥१०
मुनयो भावितात्मानो मिलितास्ते महीजस ।
लोकानुग्रहर्तारो वीतरागा विमत्सरा ॥११
कानि क्षेत्राणि पुण्यानि कानि तीर्थानि भूतले ।
कथ वा प्राप्यते मुक्तिनु णा तापार्तचेतसाम् ।।१२
कथ हरी मनुष्याणा भक्तिरव्यभिचारिणी।
केन सिद्धयत च फल कर्मणास्विविधात्मन ।।१३
इत्येव प्रष्टुमात्मानमुद्यतान् प्रेक्ष्य शौनक ।
प्राञ्जलिर्वाक्चमाहेद विनयावनत सुधी ।।१४
कतिपय मुनिगण यज्ञा वे यजन वरने के द्वारा यज्ञा के स्वामी
भगवान् श्रीविष्णु का पूजन किया करते थे उनम कुछ ऐसे थे जो ज्ञान
शास्त्र की चर्चा के ज्ञान स्वरूप वाले ईश्वर की उणसना किया करत
थे और मुदृढ भक्ति की भावना से श्री नारायणदेव की पूजा किया
करत थे ।।८।। एक बार उन सब महानुभावा ने मिलकर एक परमोत्तम
सम्मलन किया था। उम सम्मलन म धम अर्थ वाम और मोक्ष चारा
पुस्पार्थों की प्राप्ति के लिए उपायो पाना की इच्छा रखने वाल
छब्बीस सहस उर्वरता मुनिगण सम्मिनित हुए थे। उस सम्मेलन म
इन मुनिया के शिष्य प्रशिप्य भी सव आय ५ जिनकी सस्या गणित
[ नारद पुराय
थी। ।। ससार के प्राणियो परु अनुकम्पा करने की इच्छा वाले--
राग द्वीप और मात्सर्य जैसे सब अवगुणो से रहिन पवित्र हृदय वाले,
अत्यन्त ओजस्वी सम्मेलन में सम्मिलित हुए गुनिवृ-दो को इस भूतल
मे कौन कौन क्षेत्र एव तीर्थ पवित्र है तथा आधिभौतिक, आध्यात्मिक
और आधिदैविक तापो के कारण होने वाले सन्तापो से सन्तप्त चित्त
वाले प्राणियो को मुक्ति किस रीति से प्राप्त हो सकती है एव मनुष्यो
की श्री विष्णु भगवान् के चरणो मे अनन्य भक्ति क्सि विधि से हो
सकती है तथा नित्य और नैमित्तिक काम्य कर्मों का फल कैसे प्राप्त
हो सकता है-इत्यादि अनेक प्रश्नो को पूछकर अपनी जिज्ञासा शान्त
करने के लिए समुद्यत देखकर परम विनयशील और महान बुद्धिमान
श्री शौनकजी हाथ जोड कर कहने लगे थे ।।११-१४॥
आस्ते सिद्धाश्रमे पुण्ये सूत पौराणिकोत्तम ।
यजन्मखैबहुविधैविश्वरूप जनार्दनम् ।।१५
स एतदखिल वेत्ति व्यासशिष्यो महामुनि ।
पुराणसहितावक्ता शान्तो वै रोमहर्षणि ॥१६
युगे युगेऽल्पकान धर्मात् निरीक्ष्य मधुसूदन ।
वेदव्यासस्वरूपेण वेदभाग करोति हि ॥१७
वेदव्यासमुनि साक्षान्नारायण इति द्विजा ।
गुथ म सर्वशास्त्रेषु मूतस्तु व्यासशासित ॥१८
तेन सशासित सूतो वेदव्यासेन धीमता ।
पुराणानि स वेत्त्येव नान्यो लोके तत पर ||१६
स पुराणार्थविल्लोके स सर्वज्ञ स बुद्धिमान् ।
स शान्तो मोक्षधर्मज्ञ कर्मभक्तिकलापवित् ।।२०
वेदवेदाङ्गशास्त्राणा सारभूत मुनीश्वरा ।
जगद्धितार्थ तत्सर्व पुराणेपूक्तवान मुनि ॥२१
ज्ञानार्णवो व सूतस्तत्सर्वत्त्वार्थकोविद ।
तस्मात्तमेव पृच्छाम इत्यूचे शोनको मुनीन् ॥२२
नारद पुराण ] महा महर्षि प्रवर श्री शौनकजी ने कहा-पुराणो के प्रवक्ताओ मे परम श्रेष्ठ श्री मूतजी सिद्धाश्रम मे रहते हैं। वहां पर वे ससार में व्यापक भगवान जनार्दन का विविध भांति के यज्ञो के द्वारा यजन किया करते हैं ।।१५।। समस्त पुराणा के प्रवक्ता महपि लोमहर्पण के आत्मज अत्यधिक शान्ति से सम्पन्न श्री कृष्ण द्वैपायन वेदव्यास जी के प्रिय शिष्य महामुनि वे इन सभी बातो को भली भाति पूर्णतया जानते हैं ।।१६।। स्वय श्री विष्णु भगवान ही युग २ मे धार्मिक तत्वों का अधिक हास देखकर वेदव्यासजी के स्वरूप में आकर वेदो को सहिताओ फा विभाग किया करते हैं ॥१७॥ हे द्विजगणो । समस्त शाम्बी मे हमन यही श्रवण किया है नि श्री वेदव्यास मुनि साक्षात् भगवान नारायण के ही अवतार है । " द्विवाहुरपरो हरि अर्थात यह दो भुजाओ वाले दूसरे हरि भगवान् ही है और मूतजी उन्ही व्यासदेव जी के प्रमुख नि है ॥१८॥ इमलिये अपने गुरु थी व्यासदेवजी से शिक्षा प्राप्त करते हुए मूतजी जिस प्रकार का उत्तम जान पुराणो का रखते हैं वैमा या उनसे अधिव पुराणा का महान् जाता इस ससार में अन्य कोई भी नहीं हो सकता है ॥१६॥ ये सूनजी इस ममार में इस समय पुराणो के यथार्थ अभिप्राय पो समझते हैं और वे पुराणो की समस्त बातो के ममंश मनीपी हैं तथा परम बुद्धिमान, अत्यधिक शान्त, मोक्ष- धर्म के समुचित जानकार एव कर्मकाण्ड और भक्ति मार्ग को पूर्णत पा जानने वाले भी है ॥२०॥ हे मुनिगण । मन्त्र माग और प्राह्मण भाग स्वरूर वेद, ज्यातिप, मीमांमा, न्याय आदि वेद के यङ्गो का सम्पूर्ण सार मसार के हित को सिद्ध करने के लिये महामहर्षि श्री व्यासदेव जी ने पुराणों में ही सब कुछ यह पर बना दिया है। शान में जलनिधि श्री उन समस्त तत्वो के अर्थ एव अभिप्राय यो समान में यहत हो चुगल है । इमलिए अब उन मूनजी म यही मय याते पूछना उचित है। इस प्रकार में शौनरजी ने उन समुपस्थित समस्त मुनियो से यही महापा ॥२१॥२२।।
[ नारद पुराण ततस्तै मुनय सर्वे शौनक वाग्विदा वरम् । समाश्लिष्य सुसम्प्रीता साधु साध्विति चाब्रुवन् ॥२३ अथ ते मुनयो जग्मु पुण्य सिद्धाश्रम वने । मृगव्रजसमाकीणं मुनिभि परिशोभितम् ॥२४ मनोजभूरुहलताफलपुष्पविभूपितम् । युक्त सरोभिरच्छोदरतिथ्यातिथ्यसकुलम् ॥२५ ते तु नारायण देवमनन्तमपराजितम् । यजन्तमग्निष्टोमेन ददृशू रोमहर्पणिम् ।।२६ यथार्हमचितास्तेन सूनेन प्रथितौजस । तस्यावभृयमीक्षन्तस्तत्र तस्थुर्मखालये ॥२७ अधरावभृथस्नात सूत पौराणिकोत्तमम् । पप्रच्छुस्ते सुखासीन नैमिषारण्यवासिन ॥२८ उम समय समस्त मुनिगण परम प्रसन्न होगये थे और वक्ताओं मे थेष्ठ शिरोमणि थी शौनकजी से आतिङ्गन कर कहने लगे साधु- साधु' ।२६।। इसके पश्चात् वे सब मुनिवृन्द वन मे स्थित पविन सिद्धो के आश्रम की योर चल दिये थे। वह सिद्धो का आश्रम हिरनो के समूहो से गछा हुआ था। उसम मुनिगण के विराजमान होने से परम शोभा हो रही थी । अति सुन्दर लता और वृक्ष, फल और पुष्प आदि से वह परम शोभा से सम्पन्न दिखाई देता था। वहाँ स्वच्छ एव परिपूर्ण सरोवर विद्यमान थे और वहां की दुटियो ने अतिथियो का स्वागत मसार मदा होता रहा करता था ।।२४ २५।। वहां पर मुनि- गण ने श्री सूतजी का दशन प्राप्त किया था ना अग्निष्टोम यज्ञ के यजन के द्वारा अनत, अपराजित भगवान् नारायण की अर्चना म ध्यान हा रहे थे ।।२६॥ श्री मूनजी न उन समागत नाजस्वी मुनियो या समुचित स्वागत-सत्कार किया था। वे सय मुनिगण यज्ञ में अब- भृप अर्यात यशान्तर स्नान को प्रतीक्षा करते हुए यहा विराजमान
नारद पुराण
हो गये थे ॥२७॥ ने अवध स्नान करने के पश्चात् पौरा-
णिको में परम धेठ श्री सूतजी से मुख पूर्वक उपविष्ट होजाने पर उन
मुनियो से वार्तालाप का बारम्भ पिया या ॥२८॥
वय त्वतिथय प्राप्ता आतिथेयास्तु सुव्रत ।
ज्ञानदानोपचारेण पूजयास्मान् यथाविधि ॥२६
दिवौकसो हि जीवन्ति पीत्वा चन्द्रकलामृतम् ।
ज्ञानामृत भूसुरास्तु मुने त्वन्मुखनि मृतम् ॥३०
येनेदमखिल जात यदाधार यदात्मकम् ।
यस्मिन्प्रतिष्ठित तात यस्मिन् वा लयमेप्यति ॥३१
केन विष्णु प्रसन्न स्यात् स क्थ पूज्यते नरै ।
पथ वर्णाश्रमाचारश्चातिथे पूजन क्थम् ॥३२
सफल रयाद्यथा की मोक्षोपाय कथ नृणाम् ।
भक्तया कि प्राप्यते पुभिस्तथा भक्तिश्च कीदृशी ॥३३
वद सूत मुनिर्थ सर्वमेतदमशयम् ।
कस्य नो जायते श्रद्धा श्रोतु त्वद्वचनामृतम् ॥३४
शृणुध्यमृपय सर्वे यदिष्ट वो वदामि तत् ।
गीत सनक मुस्यस्तु नारदाय महात्मने ॥३५
पुराण नारदोपाध्यमेतद्वे दार्थसम्मितम् ।
सर्वपापप्रशमन दुष्टग्रहनिवारणम् ॥३६
थपियो ने कहा-हे मुक्त। हम लोग अतिथि सत्कार सो
प्राप्त करने के पात्र अतिषि यापकी मवा में उपस्थित हुए हैं। अब
बाप हम लोगो का यातिथ्य जान में प्रदान स्वरूप भेट पे द्वारा ही
पामर परिए ॥२६॥ देवगण ता चन्द्र की नलाआ में शरण परते
हुए अमृत का पान वर सदा जीवित रहा परत है। ह मुनिपर ।
हम तो बाह्मण है मा मापने मुप से टकराने वाली मान पीयप का ही
पान पसे जीवित रहो की आशा मेर यहाँ प्राप्त हुए है॥३०॥
[ नारद पुराण आप यह बताइये कि जिनसे यह ससार उत्पन्न हुआ है, जिनका अव- लम्ब ग्रहण कर यह सम्पूर्ण ससार टिका है, जो इसमे आत्मा रूप से व्याप्त है और यह सम्पूर्ण विश्व जिनमें प्रतिष्ठित है। है तात ! यह सब विश्व अन्त में जिसमें आकर लोन हुआ करता है वह भगवान् विष्णु किस रीति से प्रसन्न हुआ करते हैं और मनुष्यो का उनका सम- र्चन किस विधि से करना चाहिए ? वर्गों और आश्रमों का वास्तविक स्वरूप कैसा हाता है तथा स्वनिवास भूमि पर समागत अतिथियो का स्वागत-सत्कार किस प्रकार से करना चाहिए ॥२१॥३२॥ मानवो द्वारा किया हुआ कार्भ कैसे सफल हुआ करता है और मानवो को मोक्ष की प्राप्ति करने का उपाय किस तरह से करना चाहिए। भगवान् की भक्ति से क्या प्राप्त हुआ करता है ? उस भक्ति का स्वरूप कैसा होता है ॥३३॥ हे मुनिश्रेष्ठ सूतजी । आपसे यही प्रार्थना है कि इन हमारे द्वारा किये गये प्रश्नो का उत्तर इस रीति से समझाते हुए प्रदान कीजिए कि फिर हमारे हृदय मे कोई भी सन्देह शेप न रहे। ऐसा कौन सा जीवात्मा होगा जो आपके वचनामृत वा पान करने में श्रद्धालु न होवे ? अर्थात् ऐसा कोई भी नहीं है ॥३४।। श्री सूतजी ने उत्तर दिया-हे समस्त पिगण । आपके मन में जो भी कुछ बाते है उनको मैं बतलाऊँगा उसका आप लोग श्रवण करे। एक बार सनकादि महा- पुरुषो ने श्री देवपि नारद जी से वेद सम्मत नारदोपाख्यान नाम वाले पुराण को कहा था। यह पुराण सभी प्रकार के पापो का विनाश करने वाला और दुष्ट ग्रहो के कुफलो को दूर भगा देने वाला है ॥३५-३६।। दु स्वप्ननाशन धर्म्य भुक्तिमुक्तिफलप्रदम् । नारायणक्योपेत सर्वकल्याणकारणम् ॥३७ धर्मार्थकाममोक्षाणा हेतुभूत महाफलम् । अपूर्वपुण्यफलद शृणुध्व सुसमाहिता. ॥३८ नारद पुराण ] ४१ . महापातकयुक्तो वा युक्तो वाप्युपपातक.। श्रुत्वैतदार्घ्य दिव्य च पुराण शुद्धिमाप्नुयात् ॥३६ यस्यकाध्यायपठनाद वाजिमेधफल लभेद । अध्यायद्वयपाठेन राजसूयफल तथा ॥४० ज्येष्ठमासे पूर्णिमाया मूलः प्रयतो नर । स्नात्वा च यमुनातोये मथुरायामुपोषितः १४१ अभ्यर्च्य विधिवत् कृष्ण यत्फल लभते द्विजाः । तत्फल समवाप्नोति अध्यायरयपाटत. ॥४२ इरा पुराण की महिमा कहा तक वतलाई जावे। यह दुम्बन को दूर कर देने वाला है। यह धर्म प्रदायक और मोक्ष रूपो फल का प्रदाता है एव भावान नारायण की कथा से पूर्ण यह सभी प्रकार के कल्याणो का देने वाला है ॥३७॥ यह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इस पुरुषार्थ चतुप्रय के हेतु रूप है । परमोत्तम फल के देने वाला और पुण्य का अपूर्व फल प्रदायक है। अब आप सब लोग इसका ही परम समाहित होकर श्रवण वरिए ॥३८॥ जो पुरुप ब्रह्म हत्या, मदिरापान, गुरुतलागमन आदि महान् पातको से दुपित है तथा लहमन का भक्षण और शराब पीने वाली स्त्री से समागम आदि अनेक उप पातको से भ्रष्ट हो गया है वह भी इस ऋषि प्रणीत पुराण का श्रवण कर परम पवित्र एद शुद्ध हो जाया करता है ॥३६॥ इस प्रमुख पुराण की मेवन एक अध्याय का पाठ करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त हुआ करता है तथा दो अध्यायो के पाठ से राजसूय यज्ञ का फल मिला करता है । अभिप्राय यही है कि इस ग्रन्थ में बहे हुए धर्मों का समाचरण करने से समस्त पातको-महापातको और उपपातको से शुद्धि के साथ माप अश्वमेघ और राजसूप यज्ञो वे यजन करने के बराबर फल को प्राप्त हो जाता है ॥४०॥ जो पुरप मूल नक्षत्र में समन्वित ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन परम सावधानी से पाप ४२ [ नारद पुराण मथुरा में श्री यमुना में स्नान करके तथा व्रत करपे सविधि श्रीकृष्ण का अर्चन करने पर जो फल प्राप्त करता है । हे द्विजगण ! वही फल इस पुराण के तीन अध्यायो के पठन या श्रवण से प्राप्त हो जाया करता है ॥४११४२॥ तत्प्रवक्ष्यामि व सम्यक् शृणुध्व गदतो मम । जन्मायुताजित पापमुक्त कोटिकुलान्वित ॥४३ ब्रह्मण पदमासाद्य तत्रैव प्रतितिष्ठति । थु त्वास्य तु दशाध्यायान् भक्तिभावेन मानव ॥४४ निर्वाणमुक्ति लभते नात्र कार्या विचारणा । श्रेयसा परम श्रेय पवित्राणामनुत्तमम् ॥४५ दुस्वप्ननाशन पुण्य श्रोतव्य यत्नतो द्विजा । श्रद्धया सहितो मर्त्य श्लोक श्लोकार्धमेव वा ॥४६ पठित्वा मुच्यते सद्यो महापातरराशिभि । सतामेव प्रवक्तव्य गुह्याद् गुह्यतर यत ॥४७ हे द्विजश्रेठा 1 मैं अब इसी परम पावन पुराण का वर्णन आप लोगो के समक्ष मे परता हूँ आप लोग सावधान होकर भली भांति मुझ से श्रवण करे। भक्ति भावना से इस पुराण वे दश अध्यायो ये पाठ से दश सहयो जन्मो मे किये हुए पापों मे मुक्ति पावर अपने वोटिश कुलो के साथ मुक्त होकर ब्रह्माजी के लोक मे सीधा चला जाया करता है और वह वहीं पर निवास लिया करता है ।।४३.४४१६ इस पुराण ये श्रवण करने वाली को निर्वाण मुक्ति प्राप्त हाती है। इसमें घुछ भी विचार या मशप की बात नहीं है। यह परम श्रेयस्कर, अत्यधिक पवित्र तया दुस्वप्नी का निवाश करने वाला पुराण है । ह दिगण ! इस पुराण दो यहुन यत्न ये साथ मुनना चाहिए। जो कोई मनुष्य पहावे साथ यदि इमरे एप या आधे घोर पा भी पाठ पर लता है तो वह इसमे वर्णन किय जाने याले सब धमों का पालन पर पता नारद पुराण ] ५३ है और सुवर्ण आदि की चोरी प्रभृति महा पातकों के समुदाय विमुक्त होजाया करता है । यह पुराण परम गोपनीय वस्तु है । अत- एवं इसका श्रवण भी सज्जन पुरुपो को ही करना चाहिए ॥४५॥ ॥४६॥४७॥ वाचयेत् पुरतो विष्णो पुण्यक्षेत्रे द्विजान्तिके । ब्रह्मद्रोहपराणा च दम्भाचारयुतात्नमाम् ॥४८ जनाना वकवृत्तीना ने बयादिदमुत्तमम् । त्यक्तकामादिदोपाणा विष्णुभक्तिरतात्मनाम् ॥४६ सदाचारपराणा च वक्तव्य मोक्षसाधनम् । सर्वदेवमयो विष्णु स्मरतामातिनाशन. ॥५० सद्भक्तिवत्सलो विप्रा भक्तचा तुप्यति नान्यथा । अथद्धयापि यन्नाम्नि कीर्तितेऽथ स्मृतेऽपि वा ।।५१ विमुक्त पातकर्मयों लभते पदमव्ययम् । ससारपोरकान्तारदावाग्निमंधुसूदन ॥५२ स्मरता सर्वपापानि नाशयत्याशु सत्तमा.। तदर्थद्योतकमिद पुराणा याव्यमुत्तमम् ।।५३ थवणात् पठनाद्वापि सर्वपापविनाशकृत् । यस्यास्य श्रवगे बुद्धिर्जायते भक्तिसयुता ॥५४ स एव कृतकृत्यस्तु सर्वशास्त्रार्थ कोविद । यजित तप पुण्य तन्मन्ये सफल द्विज ॥५५ यदस्य श्रवगे भक्तिरन्यथा न हि जायते। सत्कथासु अवर्तन्ते सज्जना ये जगदिता ॥५६ दिसो भगवान् विष्णु में मंदिर में, पवित्र तीर्थ स्थल में किसी विद्वान सुबत्ता ग्राहग से इससी क्या वहावानी पाहिए । जो ग्राह्मणों से द्रोह करने वाले हो, वे देशम प्रदशन पर ढोग दिखाने के लिये ही धर्मपा वापरण करें, बगुला भगत हो अदि ऊपर एक और [ नारद पुराण और मन मे कुछ अन्य ही विचार रखने वाले धूर्त हो उनके सामने ऐसे उत्तम पुराण का वर्णन कभी नहीं करना चाहिए। यह तो मोक्ष का साधन पुराण है । इसे तो जो सदाचारी और कायादि दोपो से रहित विष्णु भक्त पुरुप ही उन्ही को इसका श्रवण कराना चाहिये । भगवान् विष्णु तो सदा भक्ति करने ही से प्रसन्न हुआ करते है । वे सद्भक्ति पर स्नेह करने वाले है इसलिये अन्य किन्ही वातो या साधनो से ऐसे परम प्रसन्न नहीं होते है मनुष्य के हृदय में भले ही श्रद्धा न भी हो तो भी भगवान विष्णु के नामो का कीर्तन या उनके गुण एव लीलाओ का स्मरण करने मात्र से समस्त पातको से बच कर वह अव्यय पद का प्राप्त कर लिया करता है। मधु नामक दैत्य का वध करने वाले प्रभु इस ससार रूपी ( पाप पूर्ण ) भयङ्कर जङ्गल के लिये दावाग्नि के ही तुल्य हैं ॥४८-५२॥ हे परम श्रेष्ठ पुरुषा । ये भगवान् रमरण करने वाले मनुष्यो के समस्त पापो का नाश कर दिया करते है। उन भगवान् श्री विष्णु को अनुकम्पा का लाभ जिस प्रकार से हो उन्ही उपायो को यह नारद पुराण बताता है । इसीलिये यह परमोत्तम पुराण है और सब वे श्रवण करने तथा कराने के योग्य है ॥५३|| इस श्रेष्ठ पुराण अध्ययन करने तथा इसको पढाने एय मुनने-सुनाने से सभी पापो का विनाश हो जाया करता है । जिसकी बुद्धि में भक्ति की भावना से इसके श्रवण करने की बात बैठ जाती है वह सभी शास्त्री का तात्पर्यायं समझने में चतुर पुरप कृतकृत्य ही होजाता है। है द्विज- गण । उमने जो कुछ भी तपश्चर्या और पुण्य किया है उनमो में सफल हुभा ही समझता हूँ ॥५४-५५॥ पारण यही है कि इस पुराण भी मुनन यो असा भक्ति घरो कभी भी हो ही नहीं सकती है। जो मनुष्य दम गगार में हिम सम्पादन करने की इच्छा परते हैं। ऐगे सरजन मनुष्यो मी ही गसधाबी पी आर प्रवृत्ति हुआ करती है । निन्दाया सलहे वापि ह्यमन्त पापतत्परा । पुरागेप्ययवादत्व ये वदन्ति नराधमा. ॥५७
नारद पुराण ]
तैरजितानि पुण्यानि क्षय यान्ति द्विजोतमाः ।
समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः ॥५८
पुराणान्यर्थवादेन ववन्नरकमश्नुते ।
अन्यानि साधयन्त्येव कार्याणि विधिना नरः ॥५६
पुराणानि द्विजश्रेष्ठाः साधयन्ति न मोहिताः।
अनायासेन य. पुण्यानीच्छतीह द्विजोत्तमाः ॥६०
श्रोतव्यानि पुराणानि तेन वै भक्तिभावतः।
पुराणश्रवणे बुद्धिर्यस्य पुस. प्रजायते ॥६१
पुराजितानि पापानि तस्य नश्यत्यसंशयम् ।
परागे वर्तमानेऽपि पापपाशेन यन्त्रितः आदरेणा-
न्यगाथासु सक्तबुद्धि पतत्यधाः ॥६२
जो महापापो एव सजनता के सद्गुणो से रहित हुआ करते
हैं वे सदा निन्दा और कलह में ही फंसे रहा करते । ऐसे जो नराधम
है कि वे सर्वदा पुराणो मे अर्थवाद को ही भरा हुआ बताया करते
हैं । तात्रय यह है कि पुराणो को कल्पित कहानियो का मण्डार यह
फर मिथ्या पहते हैं । हे द्विजोत्तमो । उन नोगे के जो भी
पुण्य है वै सय नष्ट हो जाया करते हैं। जो पुराण समस्त पा को
निमूल कर मोक्ष जमे परम पुस्पार्थ के साधन हैं उन पुराणो को जो
मिथ्या कहते हैं वे नरकगामी हुआ करते हैं। मनुष्य धन्य कमो को तो
विधि के साथ सिद्ध करने में लगे रहा करते है किन्तु मोह मे ग्रस्त बने
रहने के कारण हे द्विजगण ! जो कर्म पुराणो मे वर्णन किये गये है
उनको कभी परना ही नहीं चाहते हैं। हे द्विजगण ! शिना किसी
गट के पुथ्यो को प्राप्त करने की इच्छा रखता हो उसे चाहिए कि
भक्ति भाव ये माप पुराणों का यषण करे। जो मनुष्य पुराणो के
प्रवण परने का निश्चय क्यिा पता है उसके पूर्व के पति सम्पूर्ण
पाप नष्ट हो जाते हैं। पुराणों के विद्यमान रहते हुए भी जो मनुष्य
कुछ राचित
[ नारद पुराण और मन मे कुछ अन्य ही विचार रखने वाले धूर्त हो उनके सामने ऐसे उत्तम पुराण का वर्णन कभी नहीं करना चाहिए। यह तो मोक्ष पा साधन पुराण है । इसे तो जो सदाचारी और कायादि दोषो से रहित विष्णु भक्त पुरुष हो उन्ही को इसका श्रषण कराना चाहिपे । भगवान् विष्णु तो सदा भक्ति करने ही से प्रसन्न हुआ करते हैं । सद्भक्ति पर स्नेह करने वाले हैं इसलिये अन्य किन्ही बातो या साधनो से ऐसे परम प्रसन्न नहीं होते है मनुष्य के हृदय मे भले ही श्रद्धा न भी हो तो भी भगवान विष्णु के नामो का कीर्तन या उनके गुण एव लीलाओ का स्मरण करने मात्र से समस्त पातको से बच कर वह अव्यय पद को प्राप्त कर लिया करता है। मधु नामक दैत्य का वध करने वाले प्रमु इस संसार रूपी ( पाप पूर्ण) भयङ्कर जङ्गल के लिये दावाग्नि के ही तुल्य हैं ॥४८-~५२॥ हे परम श्रेष्ठ पुरुषो । वे भगवान् स्मरण करने वाले मनुष्यो के समस्त पापो का नाश कर दिया भरते है । उन भगवान् श्री विष्णु की अनुकम्पा का लाभ जिस प्रकार से हो उन्ही उपायो को यह नारद पुराण बताता है । इसीलिये यह परमोत्तम पुराण है और सब के थवण करने तथा वराने के योग्य है ॥५३।। इस श्रेष्ठ पुराण के अध्ययन करने तथा इसको पढाने एव सुनने-सुनाने से सभी पापो का विनाश हो जाया करता है। जिसकी बुद्धि मे भक्ति की भावना से इसके श्रवण करने की बात बैठ जाती है वह सभी शास्त्रो का तात्पर्यार्थ समझने मे चतुर पुरुष वृतकृत्य ही होजाता है । हे द्विज- गण । उसने जो कुछ भी तपश्चर्या और पुण्य किया है उसको मैं सफल हुआ ही समझता हूँ ॥५४-५५।। पारण यही है कि इस पुराण की सुनने की प्रसा-मक्ति वसे कभी भी हो ही नहीं सकती है। जो मनुष्य इस सगार वे हित के सम्पादन करने की इच्छा करते हैं। ऐसे सम्जन मनुष्यो पो ही सतपालो की ओर प्रवृत्ति हुआ करती है। निन्दामा कलहे वापि बसन्त. पापतत्परा । पुरागेप्वर्थवादत्व ये वदन्ति नराधमा. ॥५७ -
रद पुराण ]
४५
तेजितानि पुण्यानि क्षय यान्ति द्विजोतमाः ।
समस्तकर्मनिर्मूलसाधनानि नराधमः ॥५८
पुराणान्यर्थवादेन व वन्नरकमश्नुते ।
अन्यानि साधयन्त्येव कार्याणि विधिना नरः ॥५६
पुराणानि द्विजश्रेष्ठाः साधयन्ति न मोहिताः ।
अनायासेन यः पुण्यानीच्छतीह द्विजोत्तमाः ॥६०
थोतव्यानि पुराणानि तेन वै भक्तिभावतः ।
पुराणश्रवगे चुद्धिर्यस्य पुसः प्रजायते ॥६१
पुराजितानि पापानि तस्य नश्यत्यसशयम् ।
परागे वर्तमानेऽपि पापपाशेन यन्त्रितः आदरेणा-
न्यगाथामु सक्तबुद्धिः पतत्यधाः ॥६२
जो महापापी एव मज्जनता के सद्गुणो से रहित हुआ करते
है ये सदा निन्दा और कलह में ही फंसे रहा करते हैं । ऐसे जो नराधम
है कि वे सयंदा पुराणों में अर्थवाद को हो भरा हुआ बताया करते
है । तात्पर्य यह है fr पुराणो को कल्पिन कहानियो का भण्डार वह
पर मिथ्या पहले है । हे द्विजोत्तमो ! उन लोगो के जो भी कुछ सचित
पुष्प है वे मर नष्ट हो जाया करते हैं। जो पुराण समस्त कमों को
निस पर मोक्ष जमे परम पुरुषार्ग के साधन है उन पुराणों को जो
मिप्या पहले है वे नरवगामी हुमा करते हैं। मनुप्य अन्य कर्मों को तो
विधिक माप गिल परने में लगे रहा करते है किन्तु मोह में ग्रस्त बने
रहने के कारण हे निजाग ! जो कर्म पुराणों में वर्णन किये गये है
उनी भी बरना ही नहीं चाहते हैं। हे दिजमण ! बिना किसी
र पुस्यों को प्राप्त करने की इच्छा रगुता हो उमे चाहिए कि
भक्ति भार में माप पुगोवा यवन परे। जो मनुष्य पुराणों के
घवापरने का निारय नियाता है उसके पूर्व के. मश्चिन सम्पूर्ण
पाप नष्ट हो जाए। पुरानो रे विद्यमान रहते हुए भी जो मनुष्य
[ नारद पुराण पापो के जाल मे बंधे रहा करते हैं और व्यर्थ की अन्य बातो मे बुद्धि लगाये रहते हैं उनका निश्चय ही अध पतन हुआ करता है ॥५७-६२।। सत्सङ्गदेवार्चनसत्कथासु हितोपदेशे निरतो मनुष्य । प्रयातिविष्णो परम पद यदेहावसानेऽच्युततुल्यतेजा ॥६३ तस्मादिद नारदनामधेय पुण्य पुराण शृणुत द्विजेन्द्रा । यस्मिञ्छु ते जन्मजरादिहीनो नरो भवेदच्युतनिष्ठचेता।.६४ वर वरेण्य वरद पुराण निजप्रभाभावितसर्वलोकम् । सकल्पितार्थप्रदमादिदेव स्मृत्वा बजेन्मुक्तिपद मनुष्य ॥६५ ब्रह्मेशविष्ण्वादिशरीरभेदैविश्व सृज्यत्ति च पाति विप्रा । तमादिदेव परम परेशमाधाय चेतस्युपयाति मुक्तिम् ।।६६ यो नाम जास्यादिविकल्पहीन पर पराणा परम परस्माद् । वेदान्तवेद्य स्वजनप्रकाश समीडयते सर्वपुराणवेदै ॥६७ तम्मात्तमीश जगता विमुक्तिमुपासनायालमज मुरारिम् । पर रहस्य पुरुषायहेतु स्मृत्ला नरो याति भवाब्धिपारम्।।६८ जो लोग सायुओ की सङ्गति, दवो वा यजन और परम श्रेष्ठ क्या तथा हितकारी उपदेश देने में सलग्न रहता है वह मनुष्य इस पाथिव शरीर ये पात हो जाने पर अच्युत भगवान के मदृश तेज सम्पन होकर सीधा श्री विष्णु भगवान् के परम पद को प्राप्त किया परता है ।।६३॥ इसलिये हे द्विजवरो ! आप सब लोग परम पावन इस नारद पुराण वा श्रयण परिए । इम मुनन का ऐगा प्रभाव है पि इसमा याता भगवान अच्युत में अपना चित्त लगा दिया करता है और फिर इस वित्त पो भगवचरण म गलना में पारण से जन्म- मरण और यार्धक्य रे बारम्बार यानि हान में सम्पूर्ण पाट ग मुन हाजाता है ।।६।। यह परम छ पुराण है और यह वरण सरने में याप साक्षात परदान देन याना है। हम पुराण पी प्रदीप्त प्रमग नारद पुराण ] मोक्ष सम्पूर्ण ताक भावित रहा करते हैं। मनोवाछित (धर्म, काम, आदि ) प्रयोजनो को पूर्ण कर देने वाले आदिदेव विष्णु भगवान का भजन करने से मनुष्य छुटकारा पा जाता है और उसको मुक्ति होजाया करती है ॥६५॥ हे विप्रवरो। जो मर्व शक्तिमान् भगवान् ब्रह्मा, विष्णु, शिव आदि के स्वरूपो में भिन्न २ शरीरो से इस समस्त विश्व का उद्भव, पालन और सहार दिया करते हैं। उस परमेश्वर आदि देवेश्वर को अपने हृदय म स्थापित कर लेने से निश्चय ही मनुष्य की मुक्ति हो जाती है ॥६६॥ जो भगवान् नाम, जाति, रूप आदि के विक्ल्प से रहित है, जो सूक्ष्मातिसूक्ष्म एव परमाधिक सूक्ष्म है जो थेष्ठ शिरोमणियो से भी परम ठनम है, जिनका ज्ञान वेदान्त के ग्रन्या के परिशीलन से प्राप्त होता है जो परम प्रिय भक्तो के हित- सम्पादन के लिए पारम्बार प्रकट हुआ करते हैं और जिनका समस्त वेद और पुराण पूजन किया करता है ।।६७। उन जन्म से रहित भग- वान् मुरारि जगदीश्वर की ही सदुपासना मुक्ति के लिये पर्याप्त साधन है । इन धर्मादि पुरुषार्थ चतुष्टय के हतुभूत, परम रहम्प एव अत्य- धिक गाप्य भगवान् का स्मरण करने से प्राणी इस महान् घोर ससार रूपी सागर से पार हो जाया करता है ॥६८|| वक्तव्य धार्मिकेभ्यस्तु श्रद्धवानेभ्य एव च । मुमुक्षुभ्यो वतिभ्यश्च वीतरागेम्य एव च ॥६६ वक्तव्य पुण्यदेशे च सभाया देवताहे । पुण्यक्षेने पुण्यतीय देवग्राह्मणसन्निधौ ॥७० उच्छिष्टदेशे वक्तार आख्यानमिदमुत्तमम् । पच्यन्तै नरके घोरे यावदाभूतसप्लवम ॥७१ मृपा शृणाति यो मूडो दम्भी भक्तिविजित । सोपि तद्वन्महाघोरे नरके पच्यतेऽक्षये ॥७२ नरो य सत्वथामध्ये सम्मापा युरतेऽन्यत । स याति नरव घोर तदेवाग्रमना भवेत् ।।७३ [ नारद पुराण श्राता वक्ता च विन्द्रा एष धर्म. सनातन । असमाहितचित्तस्तु न जानाति सि किञ्चन ॥७४ तत एकमना भूत्वा पिवेद्धरिकथामृतम् । कय सभ्रान्तचित्तस्य कथास्वाद. प्रजायते ।।७५ इस गोपनीय पुराण के सुनने के अधिकारी भी परम धार्मिक- श्रद्धालु-मुमुक्षु-सन्यासी और रागादि रहित पुरुष ही होते हैं। अतएव ऐसी योग्यता के पात्र उनको ही यह पुराण सुनना चाहिए अर्थात इनके अतिरिक्त इनके सुनने के अधिकारी नहीं हैं। इस पुराण की क्या ऐसे ही किसी परमोत्तम स्थल मे कहनी चाहिये जो या तो देवालय हो, या सभामण्डप या पवित्र क्षेत्र एव तीर्थ हो। इसकी क्या देवो और ब्राह्मणो के समक्ष मे कहना चाहिए ॥६६॥७०॥ जो कोई कथा वाचक मनुष्य इस परम श्रेष्ठ पुराण की कथा किमी अप- विन स्थान में पहते हैं वे वहाँ प्रलय काल ता घोर नरक में कर गोगा परते हैं ।। ७१।। जो दाम मे भर कर महामूढ भक्ति के भाव से शून्य हो और विना भाव ये व्ययं ही इस पुराण को गुनता है यह भी अक्षय महान् घोर नरक में निवास पर पीडित होता है 11७२|| जो कोई श्रोता क्या के बीच में अन्य चाय पिया परते हैं वे भी घोर नरम मे गिरते हैं, अतएव पयामा श्रवण चित्त की एकाग्रता से ही करना चाहिए ॥७२॥ है विप्र शिरोमणियो । यह धर्म सनातन है पाहे कोई योता है या प्रवक्ता हो यदि उनका हृदय समाहित नहीं होता है तो उसका कुछ भी शान नहीं बना है और श्रवण जो अगायधानी में दिया । पनशून्य हो होजाता है ॥३॥ अतएय सदा सपो मन का एशराम पर हो हरि मी पपारपी पीयप या पान एना चाहिए। शिारा पित परियर और घमापमान है उगो सपा मुग्गा कुछ भी प्यार नहीं पाता। 131
नारद पुराण ]
कि सुखं प्राप्यते लोके पुसा सम्भ्रातचेतसा।
तस्मात् सर्वं परित्यज्य कामं दुखस्य साधनम् ॥७६
समाहित मना भूत्वा कुर्यादच्युतचिन्तनम् ।
येन केनाप्युपायेन स्मृतो नारायणोव्ययः ।।७७
अपि पातकयुक्तस्य प्रसन्नः स्यान्न संशयः ।
यस्य नारायणे भक्तिविभौ विश्वेश्वरेऽव्यये ।
तस्य स्यात्सफल जन्म मुक्तिश्चैव करे स्थिता ॥७८
धर्मार्थकाममोक्षास्यपुरुपा द्विजोत्तमाः ।
हरिभक्तिपराणा वै सम्पद्यन्ते न सशयः ॥७६
क्या सर्वदा अस्थिर चित्त वाले पुरुप को कभी कोई सुख प्राप्त
होता है ? अर्थात् कभी भी नहीं मिलता है इसीलिये सब प्रकार की
इच्छाओ को और सकल्पो को त्यागकर इस दुखदाता चित्त को ही
भगवच्चरणो मे यलपूर्वक लगा देना चाहिये ॥७६॥ परम सावधान
हृदय भगवान् विष्णुदेव का ध्यान करे । चाहे किसी भी प्रकार से
उस अविनाशी नारातण की आराधना की जावे वे ऐसे दयालु हैं कि
पातकी पुरुष पर प्रसन्न ही होते हैं ॥७७|| जिस पुरुष की उस
अविनाशी व्यापक विश्वेश्वर भगवान् विष्णुदेव मे सुदृढ भक्ति होती है
उसका जन्म धारण करना ही सफल हो जाया करता है और मुक्ति
तो फिर अपने ही मुट्ठी में आ जाती है ।।७।। हे श्रेष्ठतम विप्रो !
श्री हरि की भक्ति में तत्पर पुरुषो को धर्मार्थकाम मोक्ष पुरुषार्थ चतु-
टयप्राप्त हो ही जाता है ।।७६।।
से
॥ सनक-नारद संवाद और विष्णु स्तुति ॥
वथ सनत्कुमारस्तु नारदाय महात्मने ।
प्रोस्तवान् सकलान् धर्मान् कथ तो मिलितावुभौ ॥१
[ नारद पुराण कस्मिन् स्थाने स्थितौ सूत तावुभौ ब्रह्मवादिनौ । हरिगीतसमुद्गाने चक्रतुस्तद्वदस्व न ॥२ सनकाद्या महात्मानो ब्रह्मणो मानसा सुता । निर्ममा निरहद्वारा सर्वे ते ह्यूध्वरेतस ॥३ तेपा नामानि वक्ष्यामि सनकश्च सनन्दन । सनत्कुमारश्च विभु सनातन इति स्मृत ॥४ विष्णुभक्ता महात्मानो ब्रह्मध्यानपरायणा । सहस्रसूर्यसंकाशा सत्यसन्धा मुमुक्षव ॥५ एकदा मेरुशृङ्ग ते प्रस्थिता ब्रह्मण सभाम् । इष्ट मार्गेऽथ ददृशु गगा विष्णुपदी द्विजा ॥६ Vता निरीक्ष्य समुद्य क्ता स्नातु सीताजलेऽभवन् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र देवपिनारदो मुनि ॥७ आजगाम द्विजश्रेष्ठा दृष्ट वा भ्रातृन् स्वकाग्रजान् । तान् दृष्टवा स्नातुम युक्तान् नमस्कृत्य कृताञ्जलि ॥ ऋषिगणा न कहा-सनत्युमारजी ने महात्मा देवर्षि थी नारद जी मे इन सब धर्मों व वणन किस तरह से किया था और इन दोनो का सम्मिलन वहा पिस कारण से हुआ था '१॥ हे सूत जी । आप यह भी बतनाइय कि इन दोना ब्रह्मवादियो ने जो भगवत् चर्चा की थो यह विष्णुदेव के गुणा का गान किस स्थान पर विराजमान होकर पिया था ? ||२॥ श्री सूतजी न यहा-श्री सनकादि महापुरष श्री ब्रह्माजी ५ मानस पुत्र हैं । उाम न तो किसी प्रकार का ममत्व है और 7 अह बुद्धि ही है । ये सब ऊ वरता मराभाय है ॥३॥ अब हम दामारोप परग पुग नामा यो भी वापरा बननात है- ' सान दा --रान कुमार और विभु सनातन य चारा के पार गहै। पारा ही भगदान व परम भरा महान भारमाना वासे ५ तथा मयदा म मे घ्याा म पिरत रहा परत य नारद पुराण ] - थे ये सहस्रो सूर्य के सह शभज्ञानान्धकार के नाशक, सत्य प्रतिज्ञ और मुमुक्ष हैं ॥ ५॥ हे द्विजगण । एक ममम यो घटना है वे ब्रह्माजी की सभा मे गमन करने के वास्ते अपने इन्ति मेरु शृङ्ग की और चल दिये थे। मार्ग मे उन्होंने श्री विष्णुदेव चरण कमल से प्रकट हुई भागीरथी गङ्गा का दर्शन परके उस पाट पर इनकी पद्धति के तुल्य वहन करने वाली गङ्गा में यवगाहन के लिये प्रस्तुत हुय थे। है द्विजपरो। उसी समय में वहां पर देवपि नारदजी आगये थे उन्होने अपने ज्येष्ठ माइयो को स्नान करने को उद्यत हुए देखा तो उनको हाथ जोड कर प्रशाम किया था ॥७॥८।। गृणन् नामानि सप्रेमभक्तियुक्तो मधुद्विष । नारायणच्युतानन्त वासुदेव जनार्दन ॥६ यज्ञेश यज्ञपुरुष कृष्ण विष्णो नमोऽस्तु ते । पद्माक्ष कमलाकान्त गङ्गाजनक केशव । क्षारोदशायिन् देवेश दामोदर नमोऽस्तु ते॥१० श्रीराम विष्णो नरसिंह वामन प्रद्युम्न सकर्षण वासुदेव । अजानिरुद्धामलरुड म रारे त्व पाहि न सर्वभयादजस्रम् ।।११ इत्युच्चरन् हरेन म नत्वा तान् स्वाग्रजाम् मुनीन् । उपासोनन त साध सस्नो प्रीतिसमन्वित ॥१२ ते चापि तु सीताया जले लोकमलापहे । स्नात्वा सन्तप्यं देवपिपितृन विगतकल्मपा ॥१३ उत्तीर्य सन्ध्योपास्त्यादि कृत्वाचार स्वक द्विजा । क्था प्रचा विविधा नारायणगुणाथिता ॥१४ इगये अन नर बहुत ही भक्तिभाव के साथ मधुदैत्य के वध करने वाले उमवे शत्रु भगवान् वे निम्नलिखित नामो का उच्चारण घरने लगे। उन्हाते दहा-हे नारायण । हे अच्युत । है अनन्त । हे वासुदेव । आपो (हमारा) प्रणाम है। हे या पुष्प । हे यशश !
[ नारद पुराण हे कृष्ण । हे विष्णो | आपको ( हम सबका ) प्रणाम है ॥६॥१०॥ हे कमल पत्राक्ष । हे लक्ष्मीकान्त । हे गङ्गाजनक । हे केशव । हे क्षीरोदि शायिन् । हे देवेश । हे दामोदर ! आपकी सेवा में हमारा सवका प्रणाम समर्पित है । हे श्रीराम । हे प्रद्युम्न । हे सङ्कर्षण । हे वासुदेव । विष्णो । नरसिंह । वामन । अज । अनिरुद्ध । निर्मल कानि सम्पन्न । आप ही विश्व के पदार्थ जगत म व्याप्त है ऐमे आप हमारी सभी तरह के भयो स रक्षा करे ॥११।। इस रीति से देवर्षि नारदजी नेथी हरि भगवान् के नामो काउच्चारण करके अपन ज्येष्ठ भाई मुनियो को प्रणाम किया था और फिर उन्ही के साथ अवगाहन करके वही पर बैठ गये थे ॥१२॥ हे द्विजगणो । सनकादि भी सासारिक मल को धो डालने वाले भागीरथी वे जल मस्नान करके देवपि पितृगण का तर्पण करने लग और फिर जल से वाहिर आकर उम पापरहित मुनिगण ने अपना सन्ध्योपासनादि नित्यकर्म सम्पा- दित परवे नारायण के गुणो से पूरित अनेक कथायें बना आरम्भ पर दिया था ॥१३॥१४॥ कृतक्रियेपु म निपु गङ्गातीरे मनोरमे। चकार नारद प्रश्न नानाज्यानवयान्तरे ॥१५ सर्वज्ञा स्य मुनिश्रेष्ठा भगवतितत्परा । यूय सर्वे जगन्नाथा भगवन्त सनातना ॥१६ लाकोदारपरान् युष्मान् दीनेषु वृतसौहृदान । पृच्छे ततो वदत म भगवल्लक्षण बुधा ॥१७ यादमचिल जात जगत् स्यारजङ्गमम् । गजा पायोदा यम्य स क्य ज्ञायते हरि ॥१८ पथ च त्रिविध सपल जायते नृणाम । मानस्य लक्षण त तपसश्चापि मानद ॥१६ अतिथे पूजन वाप येन विष्णु प्रसादपि ।
. नारद पुराण ] एवमादीनि गुह्यानि हरितुष्टिकराणि च । अनुगृह्य च मा नाथा तत्त्वतो वक्तुमर्हथ ॥२० नम पराय देवाय परस्मात् परमाय च । परावरनिवासाय सगुणायागुणाय च ॥२१ इसी समय में जब कि वे लोग नित्य कर्म की पूर्ण परके विविध श्री हरि कथाओ का प्रवचन कर रह थे श्री नारद ने प्रश्न किया था ॥१५॥ दवपि न पूछा था है परम श्रेष्ठ मुनिजनो। यह तो परम निश्चित है कि आप सभी सर्वज्ञ हैं और सर्वदा भगवद्भक्ति में सलग्न रहा करते है । सम्पूर्ण ऐश्वर्य-वीरयं-यश-श्री-ज्ञान- वैराग्य इन छ ( पडैश्वर्य अर्थात् भग ) से सम्पन्न है और भगवान हैं। पडेश्वर्य स्वरूप भग से युक्त है । आप सनातन और जगन्नाथ हैं ॥१६॥ हे विद्वज्जनो। आप तो सर्वदा सासारिक प्राणियो के उद्धार मे लगे रहने वाले हैं ! आप सदा दीना पर मुहृद् भाव रक्खा करते हैं। आप ऐसे एक परम महान् विशिष्ट महापुरपहै आप मेरे प्रश्नका समाधान करते हुये भगवान् के लक्षण का वर्णन कारये ।।१७। जिनसे यह चराचर सम्पूर्ण विश्व समुत्पन्न हुआ है। गङ्गा जिनके पावन चरणो का जल है वे श्री हरि का ध्यान किस प्रकार से होता है ॥१॥ इस समार मे मनुष्यो के जो नित्य, वैयक्तिक और काम्य इन तीनो प्रकार के कर्म किस विधि से सफल हुआ करते हैं । हे मानद । आप कृपया मुझको ज्ञान और तप का वास्तविक स्वरूप समझाइये R६ अतिथि के अर्चन का क्या विधान होता है ? यह बतलाइये क्योकि इसके करने स श्रीहरि बहुत प्रसन्न हो जाते हैं । इसी प्रकार श्री हरि के प्रसन्न कर देने वाली परम गुप्त बातें मुझ पर अनुग्रह करके ठीक ठीक समझाइये ॥२०॥ इस पर श्री शौनकजी ने कहा- प्रकृति से परे, श्रेठो से भी परम श्रेष्ठ देव उत्कृष्ट एव निकृष्ट [ नारद पुराण साधको मे आत्मा रूप से निवास करने वाले सगुण एव निर्गुण भग- वान् के लिये प्रणाम है ।।२१।। अमायाथात्मसज्ञाय मायिने विश्वरूपिणे । योगीश्वराय योगाय योगगम्याय विष्णवे ॥२२ ज्ञानाय ज्ञानगम्याय सर्वज्ञानैकहेतवे । ज्ञानेश्वराय ज्ञेयाय ज्ञाने विज्ञानसम्पदे ॥२३ ध्यानाय ध्यानगम्याय ध्यातृपापहराय च । ध्यानेश्वराय सुधिये ध्येयध्यातृस्वरूपिणे ॥२४ आदित्यचन्द्राग्निविधातृदेवा. सिद्धाश्च यक्षासुरनागसधा। यच्छक्तियुक्तास्तमज पुराण सत्य स्तुतीश सतत नतोऽमि॥२५ यो ब्रह्मरूपी जगता विधाता स एव पाता द्विजविष्णुरूपी । कल्पान्तरुद्राख्यतनुः स देवः शेतेऽड घ्रपानस्तमज भजामि ।२६ यन्नामसङ्कीर्तनतो गजेन्द्रो ग्राहोग्रवन्धान्मुमुचे स देव । विराजमान. स्वपदे पराज्ये त विष्णुमाद्य शरण प्रपद्ये ॥२५ शिवस्वरूपी शिवभक्तिभाजा यो विष्णुरूपी हरिभावितानाम् ।' सङ्कल्पपूर्वात्मकदेहहेतुस्तमेव नित्य शरण प्रपद्ये ॥२८ माया के प्रलेप रहित ( ब्रह्म. ) आत्मा नाम वाले मायोपा- घिधारी ईश्वर विश्व के स्वरूप में वर्तमान-योगीश्वर-योगात्मक और योग के द्वारा ही प्राप्त होने वाले भगवान् विष्णु के लिये प्रणाम है ॥२२॥ स्वय ज्ञान के स्वरूप वाले, ज्ञान के द्वारा ही प्राप्त होने वाले, सम्पूर्ण ज्ञान के अनन्य कारपस्वरूप, जानने के योग्य, ज्ञाता, विज्ञान के सम्पत्ति स्वरूप भगवान के लिए प्रणाम है ॥२३॥ ध्याना. स्मक, ध्याता, ध्यान से प्राप्त होने वाले ध्यानी के पापको दूर भगा देने वाले, ध्यान के ईश्वर, सद्धि ध्येय सर्व ग्रह्ममय जगद भगवान के लिए प्रणाम है ॥२४॥ चन्द्र, सूर्य, अग्नि और विधाता, मिद्ध, असुर, यस तया नागो के समुदाय जितरी मक्ति से सम्पन्न होने के नारद पुराण ] उन कारण ही अपना कार्य पूर्ण कर सक्त है । उन जन्म रहित पुराण पुष्प, सत्य स्वरूप, स्तुतियो के स्वामी, सनातन भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ ॥२५॥ जो ब्रह्मस्वरूप में इस समार ये विधाता है प ही द्विन विष्णु के रूप से इस ससार का पालन किया करते है और वे ही कल्प के अन्त म रुद्र का स्वरूप बनाकर इमका महार करते हैं । चरणामुष्ठ का पपाल कर शयन करते हुए पान वरन वाले उत्पत्ति से रहित भगगन का में भजन करता हूँ ॥२६॥ गजराज जिना पवित्र नाम का कीर्तन करन स प्राह क परम भयकर व धन से मुक्त हो गया था उन परम पद पर विराजमान आदि देव भगवान् विष्णु की शरण मैं ग्रहण करता है ॥२७॥ जो शिव के स्वरूप को भक्ति करने वाना के लिए शिव स्वरूप म विद्यामान है और हरि का ध्यान करने वाने पुरपा क लिए विष्णु के स्वरूप म वतमान हैं । अपन भत्ता की भावना क तुल्य सकल्प कारण स ही जा इस प्रकार व शरीर धारण किया करते हैं न नित्य परमात्मा की मैं शरण ग्रहण परता हूँ ॥२८॥ य देशिहन्ता नरवान्तकश्च वालो धुजाण दधार गोयम् । देव च भूभारविनोदशील त वासुदेव सतत नतोऽम्मि ॥२६ लेभेनतीर्योग्रनृसिंहस्पी यो दैत्यवक्ष कठिन शिलावत् । विदार्य सरक्षितवान् स्वभक्त प्रलादमीश तमज नमामि।।३० व्योमादिभि पितमात्मसन निरन्जन नित्यमययतत्वम् । जगद्विधातारमकमक च पर पुराण पुरण नतोऽम्मि ॥३१ ग्रह्मन्दरदानितनायुमत्यगन्धर्वयशामुरदेवाय । स्वमूर्तिभेद स्थित एक ईशस्त-मादिमात्मानमह भजामि ॥३२ यातो भिन्नमिद सर्व समुद्भूत स्थित य वै । यस्मिन्नेप्पति पश्चाच्च तमम्मि शरण गत ॥३३ य स्थितो विश्वम्पण सगीवाय प्रतीयत ।
[ नारद पुराण असङ्गी परिपूर्णश्च तमस्मि शरणं गतः ॥३४ हृदि स्थितोऽपि यो देवो मायया मोहितात्मनाम् । न ज्ञायेत परः शुद्धस्तमस्मि शरणं गत. ॥३५ जो केशी नामक दैत्य का बध करने वाले हैं जो महान अत्याचारी नरकासुर का सहार करने वाले हैं,और भक्तो की रक्षा हेतु जिनने बचपन में ही अपने हाथ की छोटी-सी अगुली पर ही गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था और जो भूमडल के भार को हटाने के लिए विनोदपूर्ण स्वभाव वाले हैं, उन्ही 'वसुदेवजी और देवकी के पुत्र भगवान की मैं शरण लेता हूँ ॥२६।। जिन प्रभु ने परम भयकर नृसिंह रूप में प्रकट होकर पाषाण के तुल्य छोर हिरण्यकश्यपु दैत्य का हृदय अपने नखो मे विदीर्ण करके अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा की थी उन उत्पत्ति से रहित भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ ॥३०॥ आकाश आदि की अनेक उपमाओ से विभूषित आत्मा की सजा वाले, नित्य निरजन, अप्रमेय तत्व से युक्त, जगत् के विधाता, कर्मों के फलादि शून्य-परम प्राचीत पुरुष भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ ॥३१॥ ब्रह्मा, रुद्र, इन्द्र, अग्नि वायु, मनुष्य, गधर्ष, आसुर, देव- वृन्द आदि अपनी ही मूत्ति के भेदो से जो एक आदि आत्मा ईश्वर विराजमान है उनका मैं सेवन करता हूँ॥३२॥ यह सम्पूर्ण विश्व की रचना का प्रयत्न जिनसे पृपद् है और समस्त प्रपच जिनसे ही प्रकट हुआ है--जिनमे स्थित है और पीछे जिनमे ही सीन हो जाया परता है उन्ही भगवान की मैं गरण ग्रहण करता हूँ ।।३३।। जो इस विशाल विश्व के स्वरूप में विराजमान होने के कारण से लिप्त से प्रतीत होते हैं पिन्तु वास्तविकता से वह सदा निलंप और परि- पूर्ण हैं उन्ही परम प्रभु भगवान् को मैं गरण ग्रहण परता हूँ ll जो परम विगुल परमारमा समस्त प्राणीमात्रो के अन्त करण में वर्तमान रहते हैं तथापि चित्त को माया से मोहित होने के कारण से बन्धन
[ नारद पुराण
उस अजित
ही लिये पत्थर के तुल्य परम कठोर हिरण्यकशिपु के वक्ष स्थल को
विदीर्ण कर दिया था उन नृसिंह भगवान् को मैं प्रणाम करता हूँ १३६।
जिनने अपने दो ही पदो से इस समस्त भूमण्डल को नापकर
विरोचन के पुन महाबली दैत्यराज बलि से छीन कर ब्रह्मलोक
का सम्पूर्ण राज्य देवगण को दे दिया था ।
बामन भगवान की मैं शरण लेता हूँ ॥ ४० ॥ जिन्होने हैहय
वश वाले कार्तवीर्य अर्जुन के अपराध करने पर इक्कीस बार
क्षत्रियो का सहार किया था. उन जमदग्नि ऋपि वे पुत्र परशुराम
को मैं प्रणाम करता हूँ ॥४१॥ जिन्होने श्रेता मे राम, लक्ष्मण, भरत,
शत्रुध्न इन चार स्वरूपो मे प्रकट होकर वानरो की सेना बना कर
राक्षसो की सेना का सहार किया था उन श्री राघवेन्द्र प्रभु को मैं
प्रणाम करता हूँ ॥४२।।
भूतिद्वय समाश्रित्य भूभारमपहृत्य च ।
सजहार कुल स्व यस्त श्रीकृष्णमह भजे ॥४३
भूम्यादिलोकपितय सतृप्तात्मानमात्मनि ।
पश्यन्ति निर्मल तमीशान भजाम्यहम् ॥४४
युगान्ते पापिनोऽशुद्धान् भित्त्वा तीक्ष्णसुधारया ।
स्थापयामास यो धर्म कृतादौ त नमाम्यहम् ॥४५
एवमादीन्य कानि यस्य रूपाणि भूसुरा ।
न शक्यं परिसख्यातु कोटयव्दरपि त भजे ॥४६
महिमान तु यन्नान्न पर गन्तु मुनीश्वर ।
देवासुराश्च मनव कथ त क्षुल्लको भजे ॥४७
यन्ना श्रवणेनापि महापातक्निो नरा ।
पवित्रता प्रपद्यन्ते त पथ स्तौमि चाल्पधी ॥४८
यथाक्थञ्चिद्यन्नाम्नि कीर्तिते वा श्रुतेऽपि वा।
पापिनस्तु विशुद्धा स्यु शुद्धा मोक्षमवाप्नुयु ॥४६
नारद पुराण ] जिन प्रभु ने कृष्ण और बलराम दो स्वरूपो को धारण करके पृथ्वी का भार उतारा था और अन्त में आपने यादव कुलका भी सहार करा दिया था उन भगवान् श्री कृष्ण की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥४३॥ जिनको भूलोक आदि तीनो भुवत निर्मल विशुद्ध अपने स्वरूप में तृप्त देखा करते हैं उन प्रभु का ही में भजन करता हूँ ॥४४॥ जो इस घोरतम कलियुग के अन्त म दुष्ट पापियो का तीक्ष्ण धार वाली तलवार से सहार करके सत्ययुग के आरम्भ काल मे धर्म की स्थापना किया करते है उन्ही भगवान की सेवा मे मैं अपना प्रणाम समर्पित करता हूँ ।।४।। हे विप्रो भगवान के इस तरह में अनेको ही स्वरूप है जिनकी गणना करोडो वर्षों में भी नहीं की जा सकती है ऐसे भग- वान् का मै भजन किया करता हूँ 11४६।। बड़े से बड़े देवगण और महर्षि मनु भी जिनके नाम की महिमा का पार नही पा सकते हैं उनका मुझ जैस क्षुद्र जीव क्या भजन स्मरण कर सकता है ॥४७॥ जिनके शुभ परम पावन नाम का श्रवण मात्र करने ही से महा पातकी मनुष्य भी अशुचिता का त्याग कर पवित्र हो जाया करते है उन प्रभु की मैं अल्प बुद्धि वाला क्या स्तुति कर सकता हूँ ॥४८जिन भगवान के नाम का जैसे-तैसे भी कीर्तन करके या श्रवण करो महान् पापी एक दम विशुद्ध हो जाया करते हैं और शुद्ध होकर वे मोक्ष पद को प्राप्त कर लिया करते हैं ॥४॥ आत्मन्यात्मानमाधाय योगिनो गतकल्मपा । पश्यन्ति य ज्ञानरूप तमस्मि शरण गत ॥५० साख्या सर्वेषु पश्यन्ति परिपूर्णात्मक हरिम् । तमादिदेवमजर ज्ञानरूप भजाम्यहम् ॥५१ सर्वसत्त्वमय शान्त सर्वद्रष्टारमीश्वरम् । सहस्रशीर्षक देव वन्दे भावात्मक हरिम् ॥५२ यद्भूत यच्च वै भाष्य स्थावर जङ्गम जगत् ।
६० [ नारद पुराण /दशागुल योऽत्यतिष्ठत्तमीशमजर भजे ॥५३ अणोरणीयासमज महतश्च महत्तरम् । गुह्याद्गुह्यतम देव प्रणमामि पुन पुन ॥५४ ध्यात स्मृत पूजितो वा श्रत प्रणभितोऽपि वा । स्वपद यो ददातीशस्त वन्दे पुरुषोत्तमम् ॥५५ इति स्तुवन्त परम परेश हम्बुिसरुद्धविलोचनास्ते । मुनीश्वरा नारदसयुतास्तु सनन्दनाद्या प्रमुद प्रजग्मु ॥५६ य इद प्रातरुत्थाय पठेद्वे पौरुप स्तवम् । सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोक स गच्छति ॥५७ निष्पाप योगीजन अपने चित्त को आत्मा मे सतग्न करके जिस ज्ञानस्वरूप ईश्वर का साक्षात्कार किया करते है उमी ईश्वर की मैं शरण को ग्रहण करता है ॥५०॥ सारूपवादी लोग हरि को सबमे परिपूर्ण देखा करते हैं उन्ही आदि देव, अजर, अमर और शानस्वरूप ईश्वर की शरण में ग्रहण करता हूँ ॥५१॥ सर्व मत्त्वमय, शान्त- स्वरूप, सबवे दृष्टा, सहस्रो शिर वाले भावात्मय श्रीहरि की मैं वन्दना करता हूँ ॥५२॥ जो भूत और भविष्यत् काल के स्वरूप वाले है, जो स्थावर ( अचर ) और जङ्गम (चर ) मम्पूण जगत् मे दश अगुल प्रमाण मूत्ति में विद्यमान रहा करत है उन जरा रहित भगवान् विष्णु का मैं भजन करता हूँ ॥५३॥ जो सवत्र व्यापक होने के कारण से अणु से भी अणु हैं तथा मूदम से भी मूक्ष्म हैं और महान से भी महान हैं तथा गुह्य से भी परम गुह्य है। उन देव को मैं बारम्बार सादर प्रणाम समर्पित करता हूँ ॥५४॥ गो दयालु भगवान् केवल ध्यान धरने पर, स्मरण करने पर, थद्धा म यजन घरने पर, सुनने और प्रणाम मात्र परने पर अपने लोक का निवास प्रदान कर दिया करते है उन्ही परम पारपिय पुरुषोत्तम भगवान पी में वन्दना करता हूँ॥५५॥ हे मुनीशरो । देवपि श्री नारद जो इस रीति रा परश परमात्मा का [ नारद पुराण आदि की सृष्टि आदि काल में जिस प्रकार की थी उस सृष्टि की रचना का वर्णन आप मेरे समक्ष मे कीजिए ॥१॥ श्री महा महपि सनकजी ने कहा- भगवान् नारायण अनन्त, अक्षर, निरञ्जन और सर्वव्यापी हैं । यह सम्पूर्ण स्थावर और जगम जगत उनसे ही व्याप्त है ॥२॥ स्वकीय तेज से ही प्रकाशित होने वाले जगन्मय महाविष्णु देव ने इस सृष्टि के आदि काल मे गुणगान के भेद होने के अनुसार तीन मूर्तियो की रचना की थी ।।३।। हे मुनिवर ! उस देवेश्वर ने अपने दक्षिण अङ्ग से प्रजापति ब्रह्मा जी को प्रकट किया था तथा अपने मध्याग से इस विश्व का सहार करने वाले ईशान रुद्रदेव को प्रकट किया था ॥४।। इस सम्पूर्ण विश्व का पालन एव संरक्षण करने के लिए अपने ही वांये अङ्ग से अविनाशी विष्णु को समुत्पन्न किया था। उन अजर अमर आदिदेव को ही कोई शिव नाम से पुकारते हैं। कोई महाविष्णु और कोई मदा मत्य ( विष्णु ) ब्रह्म कहा करते हैं। इन्ही भगवान् विष्णु देव की सवंथेष्ठ शक्ति का ही प्रभाव है कि इस जगत् का उसी से मव वार्य चलता रहता है वही भाव और अभावात्मक विद्या इस नाम से कही जाती है ॥६॥ जिस समय में यह विश्व विष्णु भगवान् से भिन्न प्रतीत होता है उस समय में वह शक्ति अविद्या के रूप में सिद्ध होकर दुख का कारण हो जाया करती है ।।७।। ज्ञातृजेवाछुपाधिस्ते यदा नश्यति नारत । सर्वकभावना बुद्धिः सा विद्य त्यभिधीयते ।। -एव माया महाविष्णोभिन्ना ससारदायिनी। अभेदयुद्ध या दृष्टा चेत् ससारक्षयकारिणी॥६ विष्णुशक्तिसमुद्भूतमेतत् सर्व चरानरम् । यस्माभिन्नमिद सर्व यच्चेङ्गद्यच्च नेगति ।।१० उपाधिभियंथाकाशी भिन्नत्वेन प्रतीयते । अविद्योपाधियोगेन तथेदमपित जगत् ।।११ नारद पुराण ] यथा हरिर्जगद्व्यापी तस्य शक्तिस्तथा मुने । दाहशक्तिर्यथाङ्गारे स्वाश्रय व्याप्य तिष्ठति ।।१२ उमेति केचिदाहुस्ता शक्ति सक्ष्मी तथा परे । भारतीत्यपरे चैना गिरिजेत्यम्विकेति च ॥१३ दुर्गेप्ति भद्रकालीति चण्डी माहेश्वरीत्यपि । कौमारो वैष्णवी चेति वाराह्येन्द्री च शाम्भवी ॥१४ हे नारद | जिस समय मै ज्ञाता और ज्ञेय की उपाधि विनष्ट हो जाती है और फिर सब को एक विचारने की बुद्धि उत्पन्न होजाया वरती है वही अभेदमयी अवस्था विद्या कही जाती है ।।८।। इस तरह मे माया को विष्णु मे भिन्न देखा जाये तो वह इस ससार मे डालने वाली होती है और उसी वो अभेद बुद्धि, ब्रह्म वुद्धि देया जावे तो वह ममार का क्षय करसे वाली हुआ करती है ॥६॥ यह सम्पूर्ण चराघरा- स्मक जगत् भगवान् विष्णु की शक्ति से ही प्रपट हुआ है और यह मम्पूर्ण जड जगम जगत जो भी कुछ है यह गव विष्णु से भिन्न नहीं है ।।१०॥ घर, भवन, मठ बादि बन उपाधियो से यह यायाश भी मावाश प्रभृति भिन्न २ दिखाई देता है ऐसे ही विद्या रूपी उपाधि के योग से यह सम्पूर्ण जगत् भिन्न दीय पहना है किन्तु वास्तव में यह यह ममी कुछ विष्णुमय है ।।११॥ हे मुनिवर । जिस प्रकार से श्रीहरि जगत् मे व्यापक है उमी भांति उनकी शक्तियां भी जगद व्यापिनी होती है । देखने में आता है मि अग्नि की दाह शक्ति के स्वरूप को काई सक्ष्मी तो पोई उमा एव मरम्बती कहा करते हैं। कोई ० इसी को गिरिजा अगवा जगदम्बा भी कहते है ।।१३॥ इमी शक्ति को कोई २ दुर्गा, मदानी, माहसरी, चण्डी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, वागही और माम्मदी कहा ४ रते हैं ॥१४॥ ग्रामीति विद्याविद्यति मायेति च तथा परे । प्रतिश्च परा ति वदन्ति परमपंय ॥१५
६४
[ नारद पुराण
शेपक्ति परा विष्णोर्जगत्सर्गादिकारिणी।
व्यक्ताव्यक्तस्वरूपेण जगद्वयाप्य व्यवस्थिता ।।१६
प्रकृतिश्च पुमाश्चैव कालश्चेति विधिस्थितिः ।
सृष्टिस्थितिविनाशानामेक कारणता गतः ॥१७
येतमखिल जात ब्रह्मरूपधरेण वै ।
तस्मात् परतरो देवो नित्य इत्यभिधीयते ।।१८
रक्षा करोति यो देवो नित्य इत्यभिधीयते ||१६
रक्षा करोति यो देवो जगता परतः पुमान् ।
तस्मात् परतर पत्तदव्यय परम पदम् ॥२०
अक्षरो निर्गुणः शुद्ध परिपूर्णः सनातनः ।
यः परः कालरूपाख्यो योगिध्येय. परात्पर ।।२१
परमात्मा परानन्दः सर्वोपाधिविजित.।
ज्ञानेकवेद्य परम. सच्चिदानन्दविग्रहः ॥२२
कतिपय लोग इसी शक्ति को ब्राही विद्या और अविद्या माया
कहते है । कुछ धेष्ठ ऋपिगण इस को परा तथा प्राति कहा करते हैं
।।१५।। यह भगवान् विष्ण को परम धेट परा शक्ति ही इस विश्व
थी रचना आदि का कार्य किया करती है और यह प्रक्ट एव अव्यक्त
रूप से इस जगत् में व्याप्त होकर स्थित रहा परती है ॥१६॥ एक
भगवान् विष्ण ही सविधि जगत में स्थित होकर प्रति-पुरुष और
बात के रूप से जगत् की सष्टि, रियति और महार के कारण हुआ
करते है ।।१७।। कारण यह है कि ब्रह्म के स्वरूप को धारण करने वाले
परमात्मा ही से यह सम्पूर्ण विश्व प्रादुर्भूत हुआ है। अतएव यह परम
घा शिरोमणि देव निरम कहे जाया करते हैं ॥१८॥ यही देय रक्षा
क्यिा करते है अतएव नित्य कहे जाया करते हैं ॥१६॥ जो देव पर
भेद पुदि से जगत् की रक्षा क्यिा करते हैं इसी कारण में ये परम
मेहनम अव्यय परम पर होते हैं ॥२०॥ जो निगुंग, अक्षर शुद्ध परि-
नारद पुराण ]
६५
पूर्ण और सनातन हैं योगीजन काल के स्वरूप से जिस परम श्रेष्ठ का
ध्यान क्यिा करते हैं वह परमानन्द स्वरूप परमात्मा समस्त उपाधियो
से रहित है और वे एकमात्र ज्ञान के द्वारा ही जाने जाया करवे हैं
और वे सच्चिदानन्द विग्रह वाले हैं ।।२१।।२२।।
योऽसौ शुद्धोऽपि परमोह्यहड्कारेण सयुत ।
देहीति प्रोच्यते मूढ रहोजानविडम्वनम् ॥२३
स देव परम शुद्ध सत्त्वादिगुणभेदत.।
मूर्तियय समापन्न सृष्टिस्थित्यन्तकारणम् ॥२४
योऽसौ ब्रह्मा जगत्कर्ता यन्नाभिकमलोद्भव ।
स एवानन्दरूपात्मा तस्मान्नास्त्यपरो मुने ।।२५
अन्तर्यामी जगद्ववापी सर्वसाक्षी निरज्जन ।
भिन्नाभिन्नस्वस्पेण स्थितो वे परमेश्वर ॥२६
यस्य शक्तिमहामाया जगद्विसम्भधारिणी ।
विश्वोत्पत्तनिदानत्वात्प्रकृति प्रोच्यते बुध, ॥२७
आदिसर्गे महाविष्णोर्लोकान्कत्तं समुद्यत ।
प्रकृति पुरुपश्चेति कालश्चेति निधा भवेत् ॥२८
परमात्मा का स्वरूप परम शुद्ध है तथापि अहवार से सयुक्त
होने के कारण मूढ पुरुष उसको देहधारी समझा करत है। यह केवल
अज्ञान की ही एक विडम्बना मात्र है ॥२३॥ वे परम् शुद्ध भगवान
विष्णुदेव ही सश्यादि तीनो गुणो के द्वारा, ब्रह्मा, विष्णु, महेश इन
तीन स्तरूपा की मूर्तियां धारण करपे इस जगत की दृष्टि, स्थिति
और गहार का कारण हुमा बरत हैं ॥२४॥ हे मुनिवर । इस जगत
फा मजा वरने वाले ब्रह्माजी जिन भगवान् की नाभि वमल मे समु.
पन्न हुए हैं वही परमानन्द स्वरूप विष्णु ही है क्या कि उन से श्रेष्ठ
अन्य पोई हो ही नहीं सकता है ।।२५॥ वे भगवान परम ईश्वर, सर्वा-
नर्यामी, जगत व्यापी, सर्व साक्षी तथा निरञ्जन है। वे उपाधिया में
.
[ नारद पुराण
भेद होने के कारण सब से भिन्न और निरुपाधि स्वरूप से अभिन्न
स्वरूप मे स्थित रहते हैं ॥२६॥ उन की महामाया शक्ति से इस
जगत् में विश्वास हुआ करता है और इस विश्व की उत्पत्ति का वही
मूल कारण है अतएव विद्वान् लोग उसको 'प्रकृति'- इस नाम से कहा
करते है ॥२७॥ जिस समय में सृष्टि का आदि काल था और महा-
विष्णुदेव इस विश्व की रचना करने के लिए उद्यत हुए थे। उस समय
मे वे ही प्रकृति और पुरुष कारण के स्वरूप से तीन स्वरूप वाले भागो
मे बँट गये थे।।२८
पश्यन्ति भावितात्मानो य ब्रह्मत्यभिसज्ञितम् ।
शुद्ध यत्परम धाम तद्विष्णो परम पदम् ॥२६
एव शुद्धोऽक्षरोऽनन्त कालरूपी महेश्वर
गुणरूपी गुणाधारो जगतामादिकृद्विभु ॥३०
प्रकृति क्षोभमापन्ना पुरुपाख्ये जगद्गुरौ ।
महान्प्रादुरभूवुद्धिस्ततोऽह समवर्तत ॥३१
अहङ्काराच्च सूक्ष्माणि तन्मात्राणीन्द्रियाणि च ।
तन्मात्रेभ्यो हि जातानि भूतानि जगत, कृते।।३२
आकाशवाय्वग्निजलभूमयोजभवात्मज ।
यथाम कारणतामेकैकस्योपयान्ति च ॥३३
ततो ब्रह्मा जगद्धाता तामसानसृजत्प्रभु ।
तिर्यग्योनिगताञ्जन्तून्पशुपक्षिमृगादिकान् ॥३४
तमप्यसाधक मत्वा देवसर्ग सनात्नात् ।
ततो वै मानुप सगं कल्पयामास पद्मज ॥३५
जिनका अन्त वरण परम पवित्र है, वे लोग जिसका ब्रह्म के
स्वरूप मे देगा करते हैं, जो परम विशुद्ध धाम है वही भगवान विष्ण,
देव मा परम पद होता है । इग रीति रा यह समा लेना चाहिये कि
विमु. शुद्ध, अक्षर, अनन पाल रूपधारी महेश ही गुणो के रूप वाली
नारद पुराण ] १७ एव गुणो का आश्रय होकर आदि काल में इस जगत् का सृजन किया वरते हैं ।।२६-३०।। जगत् गुरु पुरुष नामधारी में क्षोभ होने पर ही प्रकृति उत्पन्न या प्रादुर्भूत हुआ करती है। उम प्रकृति से महत उत्पन्न होता है, महत से बुद्धि और बुद्धि मे अहम्झार की उत्पत्ति हुआ करती है ॥३१॥ इस अहवार से सूटम तण्मानाये समुत्पन्न हुया करती हैं, इन्द्रियां होती है और जगत् के लिये उन तम्मायाओ से ही भूतो की उत्पत्ति हुआ करती है ।।३२॥ हे ब्रह्मपुत्र । इन भूतो में भी आकाश, वायु, अग्नि, जल ये सभी क्रमश एक-एक के कारण अर्यात उत्पादक हुआ परते हैं और उसी क्रम में ये लीन भी हो जाया करते है ॥३३॥ इन आकागादि पांच महाभूतो की रचना करने के पीछे इस जगत् के धाता ब्रह्माजी ने तिर्यक योनियो मे रहने वाले पशु पक्षी आदि तमोगुण प्रधान प्राणियो की सृष्टि की थी ॥३४॥ किन्तु जर ब्रह्माजी ने देखा कि इनकी सृष्टि से सरन के कार्य का साधन सम्पन्न सम्पन्न नहीं हो सकता है तव पिर उन्होंने देवभागो की रचना की थी और सनातन पुरुष से ही मिलने वाली मनुष्यों को सूष्टि पी थी ॥३५ ततो दशादियापुत्रान्मृष्टिसाधनतत्परान् । एमि पुर्वरिद व्याप्त सदेवानुरमानुपम् ।।३६ भूर्भुवश्च तथा म्वश्च महश्चंव जनस्तया। तपश्च गत्यमित्येव लोm सत्योपरि स्थिता ॥३२ अतरा वितल चंच मुतल च तलातलम् । मरानन च विप्रेन्द्र ततोऽधश्च रमातलम् ।।३८ पाताल चेति गप्नव पातानानि मादध । एप मर्येषु नौलोपनायाश्च गृटपाद ॥३६ पुमानतान्नदोश्चागौ तत्ततौरनिवामिनाम् । यर्शनातीनि गयांनि यथायोग्यगात् ।।. भूतो मध्यगो र सर्वदेग्ममाषय, ।
[नारद पुराण फिर अतल, लोकालोकश्च भूम्यन्ते तन्मध्ये सप्त सागराः ॥४१ द्वीपाश्च सप्त विप्रेन्द्र द्वीपे द्वीपे कुलाचला. । वाह्या नद्यश्च विख्याता जनाश्चामरसन्निभा.॥४२ इसके अनन्तर दक्ष आदि मानस पुत्रो की सृष्टि की थी जो उनकी रचना के कार्य मे साधन होकर तत्पर होगये थे। उन्ही पुत्रो के द्वारा सन्तान-प्रसन्तान के स्वरूप से समस्त देव, असुर और मनुष्यो का समुदाय से यह भगवान व्याप्त हो रहा है ॥६६॥ इसके पश्चात् फिर ब्रह्माजी ने भू , भुवः, स्वः, मह , जन, तप और सत्य इन सात लोको की रचना की थी, जो कि सत्य पर प्रतिष्ठित हैं ॥३७॥ है विन्द्र । वितल, सुतल, महातत और इसके भी अधोभाग मे रसातल तथा उसके भी नीचे पाताल लोक की रचना की थी। ये सभी कम से एक के नीचे एक हैं और नीचे होने के कारण सात पाताल कहे जाते हैं। इसके उपरान्त विधाता ने इन सब लोको के स्वामियो की रचना की थी॥२७-३६॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा ने कुलाचल नदी तथा प्रत्येक लोक के लायक वर्तन, व्यापार और जीविका आदि की जैसी जहाँ होनी चाहिये उसी के अनुमार रचना की थी।॥४०॥ इस भूमण्डल के मध्य में मेरू पर्वत है इसी पर्वत पर समस्त देवगणो का निवास रहता है इम भूलोक के अन्त मे लोकालोक पवंत है और इस भूलोक में सात रामुद्र है ॥४१॥ हे विप्रवर ! इस लोक में सात द्वीप है और प्रत्येक द्वीप मे वुल पर्वत स्थित है। इनके वाहिर के भाग में परम प्रसिद्ध नदियां भी हैं और यहाँ पर निवास करने वाले मनुष्य देवो के ही सदश हुआ यरते हैं ॥४२ जम्यूप्लक्षाभिधानी च शाल्मलश्च वुशस्तथा । कोचशायो पुष्करश्च ते सर्वे देवभूमय. ।।४३ एते द्वोपा ममुद्रग्तु सप्तसप्तभिगवृता । सवर्णक्षुगुरागपिदधिक्षीरजलं. ममम् ॥४४ नारद पुराण ] एते द्वीपा समुद्राश्च पूर्वस्मादुत्तरोतरा. । ज्ञेया द्विगुणविस्तारा लोकालोकाच्च पर्वतात् ।।४५ क्षारोदधेरुतर यद्धिमाद्रेश्चैव दक्षिणाम् । जेय तद्भारतवर्ष मर्वकर्मफलप्रदम् ।।४६ अय कर्माणि कुर्वन्ति विविधानि तु नारद । तत्कल भुज्यते चैव भोगभूमिधनक्रमात् ।।४७ 'भारते तु कृत कर्म गुम वाशुभमेव च । तत्फल क्षयि विप्रन्द्र भुज्यतेऽअन्यत्र जन्तुभि. ॥४८ अद्यापि देवा इच्छन्ति जन्म भारतभूतले । सञ्चित सुमहत्पुण्यमक्षय्यमल गुभम् ॥४६ - उन सात द्वीपो के नाम जम्बूद्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मल, कुश, क्रोध, शाक और पुष्कर द्वीप हैं । ये सभी द्वीप देवभूमि कहे जाते हैं 11४३।। ये सातो द्वीप सात समुद्रो से घिरे स्थित हैं । इन सातो समुद्री के नाम भी क्षार ( लवण ) सागर, इक्षु, सुरा, घृत, दधि और क्षीर (दूध ) तथा जल के नाम से प्रसिद्ध हैं और इनमें सुरा आदि ही पृथक् पृथक् भरा हुआ है । ये सब द्वीप और सागर क्रमश एक दूसरे के आगे २ ही स्थित रहते । इसका विस्तार भी एक दूसरे का क्रम से दुगुना रहा करता है। यह लोकालोक पर्वत तक स्थित हैं ॥४४. १५॥ लवण समुद्र के उत्तर दिमाग मे तथा हिमाचल पर्वत के दक्षिण दिग्भाग में भारतवर्ष है । यह भारतवर्ष सब प्रकार के कृत कर्मों का फलदाता वर्ष है ॥४६॥ हे नारद । इस भारतवर्ष मे मनुष्य नित्य- नैमित्तिर और काम्य ( कामना से युक्त ) इन तीनो प्रकार के कर्मों को किया करते हैं क्योकि यही कर्मक्षेत्र या वमों के करने की भूमि है । वे सभी भोग भूमि तथा धन के स्वरूप मे उन कर्मों का फलो का भी उपभोग किया करते हैं ॥४७॥ हे विप्र शिरोमणे । इस भारतवर्ष की भूमि में जो भी शुभाशुभ म सम्पन्न किया जाया करता है उसका
[ नारद पुराण
पान ही होता है और प्राणी उनको स्वर्ग एव नरक आदि
दूसरे लाको मे जाकर भोगा करते हैं ॥४८॥ इसी कारण से देवगण
आज तक भी इस भारत देश की भूमि म जन्म ग्रहण करने के लिये
परम इच्छुक रहा करते हैं। कारण यही है कि इस भारत में बहुत
बडे अक्षय निमल एव परम शुभ पुण्य एव फल का सषय किया जा
सकता है ॥४६
"कदा लभामहे जन्म वर्षभारतभूमिषु ।
कदा पुण्येन महता यास्याम परम पदम् ॥५०
दाने विविधैर्यजैस्तपोभिर्वाथवा हरिम् ।
जगदीश समेप्यामो नित्यानन्दमनामयम् ॥५१
यो भारतभुव प्राप्य विष्णुपूजापरो भवेत् ।
न तस्य सदृशोऽन्योऽस्ति पुि लोकेषु नारद ५२
हरिकीतनशीलो वा तद्भक्ताना प्रियोऽपि वा।
शुश्रूपुर्वापि महत स वेद्यो दिग्विजैरपि॥५३
हरिपूजारतो नित्य भक्त पूजारतोऽपि वा।
भक्तोच्छिष्टान्नसेवी च याति विष्णो पर पदम् ॥५४
नारायणेति कृष्णेति वासुदेवेति यो वदेत् ।
अहिंसादिपर शान्त सोऽपि वन्द्य सुरोत्तम ।।५५
शिवेति नीलकण्ठेति शङ्करेतिच य स्मरेत ।
सर्वभूतहितो नित्य सोऽभ्या दिविज स्मृत ॥५६
इमी कारण से देवगण यही सोच परते हैं कि कौन सा ऐमा
मुसमय होगा कि हम लाग भारत म जम ग्रहण परेंग और वही पर
परम पुण्यमय कर्मों का करखे परम पद प्राप्ति का लाभ लेंगे ॥५011
दवाणा या सदा यही चिन्तन बना रहा करता है कि पद हम अब
प्रबार रे दान, यन और तपश्चर्या भारत म पर फिर नित्यानाद
स्वरूप-सनामय जगत् व ईयर भगवान् विष्णु को प्राप्त करेंगे ।
नारद पुराण'] ७१ क्यो कि स्वर्गादि लोक तो केवल भोग भूमि मात्र हैं । कर्मभूमि तो यह भारत देश ही है ।।५१॥ हे नारद ! जो प्राणी इस परम पवित्र भारत की धरातल मे जन्म ग्रहण कर भगवान विष्णु के अर्चन मे तत्पर रहता है उसकी समानता रखने वाला वैलोक्य मे अन्य कोई भी नहीं हो सकता है ।।५२॥ जो श्री हरि के कीर्तन करने के स्वभाव वाला होता है और जो विष्णु के भक्तो का प्यारा होता है एव अपने बडो की सेवा करने की इच्छा रखता है उस मनुष्य की देवगण भी वन्दना किया करते हैं ॥५३।। भगवान् विष्णुदेव की अर्चना मे परायण होकर विष्णु- भक्त होता हुआ पूजा मे तत्पर और भक्त के उच्छिष्ट अन्न अर्थात् शेष का जो सेवन करता है वह विष्णु के पद को प्राप्त करता है ।।५४॥ जो अहिंसा आदि धर्म के गुणो मे सदा तत्पर रहकर शम प्रभृति का पूर्ण- तया परिपालन किया करता है और नारायण, कृष्ण, वासुदेव आदि भगवान के परम पुनीत नामो का कीर्तन करता है उस को भी देवगण पूजा किया करते है ।।५६ गुरुभक्त. शिवध्यानी स्वाश्रमाचारतत्परः । अनसूयु. शुचिर्दक्षो यः सोऽप्यर्च्य. सुरेश्वरैः ॥५७ ब्राह्मणाना हितकरः श्रद्धावान्वर्णधर्मयो. । वेदवादरतो नित्य स ज्ञेय. पक्तिपावन. ॥५८ अभेददर्शी देवेशे नारायणशिवात्मके। सर्व यो ब्रह्मणा नित्यमस्मदादिपु का कथा ॥५६ गोपु क्षान्तो ब्रह्मचारी पर निन्दाविजितः । अपरिग्रहशीलश्च देवपूज्यः स नारद ॥६० स्तेयादिदोपविमुखः कृतज्ञः सत्यनाक् शुचिः । परोपकारनिरतः पूजनीयः सुरासुरैः ॥६१ वेदार्थश्रवगे बुद्धिः पुराणश्रवणे तथा। सत्सगेऽपि च यस्यास्ति सोऽपि वन्द्य सुरोत्तमैः ।।६२ [ नारद पुराण एतमादीन्यनेकानि कर्माणि श्रद्धयान्वित । करोति भारते व सम्वन्धीऽस्माभिरेव च ॥६३ जो मनुष्य अपने बडो का परम भक्त होता है, शिवदेव का ध्यान किया करता है जो वर्णाश्रम धर्मों का पूर्ण नया परिपालन करने वाला है, जो किसी भी प्राणी से डाह नहीं किया करता है, पवित्र एवं चतुर होता है उस पी देवराज इन्द्रदेव पूजा किया करते हैं ।।५७॥ जा मनुष्य ब्राह्मणी का सदा हित सम्पादन किया करता है जो वर्णा- श्रम के धर्मों में श्रद्धा रखता है जो सर्वदा वैदिक सिद्धान्तों का विचार रखता है उसको पक्ति पावन समझना चाहिये ।।५८॥ जिसको देवे- श्वर नारायण और देवों में महान् श्री शिव मे अभेद दृष्टि हुआ करती है, जो सब मे ब्रह्म को सम्पन्नता को देखा करता है उस मनुष्य को गणना हम लोगो मे क्या हो सकती है वह तो हम सब से भी परम श्रेष्ठ होता है ।।५६।। हे नारद । गोलो पर सर्वदा दया की भावना रखने वाला, ब्रह्मचर्य का पालक, दूसरो को निन्दा से रहित, दान ग्रहण न करने वाला पुरुष होता है वह देवगणो का भी परम पूज्य होजाया ररता है ।।६०॥ चोरी आदि के महान दोपो से रहित, कृतज्ञ, सत्य भापण करने वाला, परम पवित्र और सर्वदा परोपकार करने मे तत्पर रहने वाला व्यक्ति देवताओ के द्वारा भी पूजनीय हुआ करता है तथा इमकी देवगण ही नहीं अमुर भी अर्चना किया करते हैं ॥६१।। जो वैदिव सिद्धान्तो के श्रवण करने में और उनको समझने के लिए उत्सु. पता रखता है और पुराणो दे श्रवण में भी उसाठा रखता है तथा सत्पुरुषों की सङ्गति म जिरा पी लगा लगी रहती है उस पुरुप बडे २ देवाण मी यन्दना पिया करते हैं ।।२।। इस रीति से इस भारत भूमि म मनुष्य श्रद्धा के साथ विविध भांति के सत्यम पर सस्ता है और सत्तमो ये पारण से हो सका हम देयो से भी मदा सम्बन्ध बना रहा करता है ॥६३
नारद पुराण ]
एतेप्वन्यतमो विप्र नात्मान तारयेत्तु य ।
स एव दुष्कृतिमूढो नाम्न्यन्योऽस्मादचेतन ॥६४
सप्राप्य भारते जन्म सत्कर्मसु पराड मुख ।
पीयूप कलश मुक्त वा विपभाण्डमुपाश्रित ॥६५
श्रुतिस्मृत्युदित मैत्मिान पावयेत्त य ।
स एवात्मविघाती स्यात्पापिनामग्रणीमुने ।।६६
कभूमि समासाद्य या न धर्म समाचरेत् ।
स च सर्वाधम प्रोक्तो वेदविद्भिर्मुनीश्वर ॥६७
शुभ कर्म समुत्सृज्य दुष्कर्माणि करोति य ।
कामधेनु परित्यज्य अकंक्षोर स मार्गति ॥६८
एव भारतभूभाग प्रशसन्ति दिवौकस ।
ब्रह्माद्या अपि विप्रेन्द्र स्वभोगक्षयभीरव ॥६६
तस्मात्पुण्यतम ज्ञेय भारत वर्षमुत्तमम् ।
देवाना दुर्लभ वापि सर्वकर्मफलप्रदम् ॥१७०
हे विप्रवर । जो यहां पर जन्म पाकर भी किसी भी एक कर्म
का सम्पादन न कर अपनी आत्मा को मासारिक बन्धन के भय से
विमुक्त नहीं करता है वह महान् दुष्कर्मी एव अत्यन्त ही मूढ है ।
उसके समान अन्य कौन जड हो सकता है जिसे यहां जन्म पाकर भी
आत्म-कल्याण करने का सुयोग न बन सके ।।६४।। जो इस महा
महिमामयी भारत की धरा म जन्म ग्रहण करके भी मकर्मों
से परागमुखता रहा करता है वह पीयूष से पूर्ण कलश
कर विपपात्र को ही अपने मुख मे डालना चाहता
है ॥६५ ॥ जो वेद और स्मृतियो मे बताये हुए धर्म
कर्मों से अपनी आत्मा को निर्मल, निष्पाप और पवित्र नहीं करता है
वह हे मुनिवर । बारमा का ही घात करन वाला और महा पापिया
का सरदार समझना चाहिए ॥६६॥ हे मुनीश्वर ! जो मनुष्य इस
ना त्याग
[ नारद पुराण आक के कर्म भूमि भारतवर्ष मे जन्म ग्रह्ण करके भी वेदविहीन धर्मों का समाचरण नहीं करता है वेद के ज्ञाता मनीपियो ने उसको सबसे निक एतम एव अधम बताया है ॥६७॥ जो मनुष्य परम शुभ कर्मों का त्याग करके दुष्कर्मों के करने मे ही अपनी प्रवृत्ति रखता है उस ऐसा ही समझ लेना चाहिये जैसे कोई प्राप्त हुई कामधेनु को छोड कर द्ध की खोज कर रहा हो ।।६८॥ हे मुनीन्द्र | अपने कृत यमों के भोग के क्षय होने से भयभीत हाने वाले ब्रह्मा प्रभृत्ति देवगण भी इस तरह से इस भारतवप की प्रशसा किया करते है ।।६६। इस लिय इस भारतभूमि को अवश्य ही परम पुण्य पूर्ण समझना चाहिए । यह देवो को भी परम दुलभ एव सभी कर्मों का प्रदान करने वाली भूमि है। अन्य लोक तो केवल भोग करने के ही दोष होने के कारण कुछ भी फल देन मे असमथ हुआ करते हैं ॥७०॥ अस्मिन्पुण्ये च भूभागे यस्तु सत्कर्मसूद्यत । न तस्य सदृश कश्चिलिपु लोकेषु विद्यते ॥७१ अस्मिजातो नरो यस्तु स्ववर्मक्षपणोद्यत । नरस्पपरिच्छन्न स हरिनि सशय ॥७२ पर लोकफल प्रेप्सु कुर्यात्कर्माण्यतन्द्रित । निवेद्य हरये भक्तथा तत्फल ह्मक्षय स्मृतम्।।७३ विरागी चेत्वमंफोप्वपि विचिन्न कारयेत् । अर्पयत्सुकृत धर्म प्रीयतामिति मै हरि ॥७४ भाब्रह्मभुवनालोतरा पुनरुत्पतिदायवा । फनागृध्नु पर्मणा तप्राप्नोति परम पदम्।।७५ वेदादितानि पर्माणि पुर्यादीश्वरतुष्टये। यथाश्रम त्यत्त काम प्राप्नोति पदमव्ययम् ॥७६ निधामो वा मयामो वा कुर्यात्वमं पथाविधि । स्याश्रमाचारशून्यश्च पतित प्राच्यते युधै ॥७७ नारद पुराण ] ७५ जो मनुष्य इस महान् पुण्यमय भूमण्डल में आकर सदा सत्कर्म करने के लिये समुद्यत रहा करते हैं उसकी समता रखने वाला त्रैलोक्य में भी अन्य कोई भी नहीं होता है ।। ७१ ॥ जो मनुष्य इस पुण्यमयी भारतवर्ष की भूमि में अपना जन्म पाकर अपने कृतवर्मों को क्षीण करने के लिये उरत रहना है उसको मनुष्य के स्वरूप में रहने वाला समावृत साक्षात् थी हरि ही समझना चाहिये ।। ७२ ॥ तन्द्रा और आलस्य से रहित होकर जो परलोक के फल की कामना करते हुये कर्म करता है वह भक्तिभाव से भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिये कार्य करें तो उसका फल अक्षय हुआ करता है ॥७३।। जो कर्मों के फल पाने में राग से रहित हो और कर्मों के पल प्राप्त करने की कुछ भी इच्छा न करे और यही भावना रक्खे कि मेरे इस कर्म से भगवान् प्रसन्न होवें ऐसा कहकर अपने कर्मको भगवान के ही चरणो मे रामपित कर देवे ॥७४॥ ब्रह्म लोक पर्यन्त सभी लोक कमों के फल को प्रदान करने वाले एव पुनर्जन्म देने वाले होते हैं । किन्तु जो मनुष्य अपने कृतकर्मों का फल प्राप्त करना ही नहीं चाहता है उसी को पुनरावर्तन शीलता से रहित परम प्रतिष्ठित पद प्राप्त हुआ करता है ।।७५॥ भगवान् को परम प्रसन्न करने के लिये कर्मों का सम्पादन करना चाहिये । जो फलाभिलापा को पूर्णतया परित्याग करके अपने आश्रम के अनुकूल कर्म किया करता है ॥७६।। चाहे कोई भी कर्म कामना मे रहित हो या सकाम हो उनका सम्पादन मदा शास्त्रोक्त विधान के अनुसार ही करना चाहिए। जो अपने आश्रम के नियत आचार का परिपालन पूर्ण रूप से नही करता है विद्वान् लोग उसको पतित कहा करते हैं ॥७७॥ सदाचारपरो विप्रो वर्तते ब्रह्मतेजसा । तस्य विष्णुश्च तुष्ट. स्याद्भक्तियुक्तस्य नारद । भारते जन्म सप्राप्य नात्मान तारयेत्त य. । पच्यते निरये घोरे स त्वाचन्द्राकंतारकम् ।।७६, [ नारद पुराण वासुदेवपरो धर्मो वासुदेवपर तपः । वासुदेवपर ज्ञान वासुदेवपरा गतिः ।।८० वासुदेवात्मक सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । आब्रह्मस्तम्बपर्यन्त तस्मादन्यन्न विद्यते ॥५१ स एव धाता निपुरान्तकश्च स एव देवासुरयज्ञरूप । स एव ब्रह्माडमिद ततोऽन्यन्न किंचिदस्ति व्यतिरिक्तरूपम् ८२ यस्मात्पर नापरमस्ति किंचिद्यस्मादणोयान्न तथा महीयान् । व्याप्त हि तेनेदमिद विचिन त देव-देव प्रणमेत्समीडयम्॥८३ हे नारद । जो ब्राह्मण सद् आचरण करने वाला है उसका ब्रह्मतेज सर्वदा बढता ही रहा करता है और ऐसे भक्तिमान् पुरुष पर भगवान श्री विष्णु परम प्रसन्न रहा करते हैं और उनकी प्रसन्नता का होना ही मानव जीवन की परम सार्थकता है ।।७।। जो मनुष्य इस देव दुर्लभ परम पावन भारत को भूमि में जन्म ग्रहण करके भी अपनी आत्मा का उद्धार नही किया करता है वह इस भूमण्डल में चन्द्र, मूर्य विराजमान रहा करते है उस सुदीर्घकाल तक अत्यन्त घोर दुख प्राप्त करता रहा करता है ॥७६॥ जो धर्म तथा तप-ज्ञान और सङ्गति है इन सबका भगवान् विष्णु से ही सम्बन्ध होता है ॥८॥ यहाँ पर ब्रह्मा जी से आरम्भ करके एक जड, ठूट तक सबका स्वरूप चाहे कोई स्थावर हो या जगम हो भगवान् का ही स्वरूप समझना चाहिये क्योकि उन प्रभु के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं है ।। ८१ ॥ जितने भी ब्रह्मा-शिव आदि देवगण हैं तथा यक्ष और असुर वृन्द हैं और यह समस्त ब्रह्माण्ड जो भी कुछ है उन्ही का विभिन्न स्वरूप में दिखाई देने वाला रूम होता है क्योकि उनसे भिन्न तो अन्य कही भी कुछ होता ही नहीं है ।।८।। जिस भगवान से न कोई -न अपर ही है। न जिन प्रभु से कोई छोटा है और न वडा ---यह अनेक प्रकार का सम्पूर्ण जगत् उनके ही विभिन्न स्वरूपो से ७७ नारद पुराण 1 व्याप्त है उन्ही परम पूजा करने के योग्य देव को प्रणाम करना चाहिये ।।३।। मृकण्डु मुनि को भगवान् का वर देना श्रद्धापूर्वा सर्वधर्मा मनोरथफलप्रदा । श्रद्धया साध्यते सर्व श्रद्धया तुप्यते हरि ॥१ भक्तिभक्तयैव कर्तव्या तथा कर्माणि भक्तित । कर्मश्रद्धाविहीनानि न सिध्यन्ति द्विजोत्तमा ॥२ यथाऽऽलोको हि जन्तूना चेप्टाकारणता गत । तयव सवसिद्धीना भक्ति परमकारणम् ।।३ “यथा समस्तलोकाना जोवन सलिल स्मृतम् । तथा समस्तसिद्धीना जीवन भक्तिरिप्यते ॥४ यथा भूमि समाथित्य सर्वे जीवन्ति जन्तव । तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वकार्याणि साधयेत् ॥५ श्रद्धावल्लभते धर्म श्रद्धावानर्थमाप्नुयात् । श्रद्धया साध्यते काम श्रद्धावान्मोक्षमाप्नुयात् ॥६ न दानैर्न तपोभिर्वा यज्ञैर्वा वहुदक्षिण । भक्तिहीनमुनिश्रेष्ठ तुप्यते भगवान्हरि ॥७ । महा महपि श्री सनवाचार्य ने कहा-यदि सम्पूण धर्म- कृत्य यदि परम श्रद्धा के सहित किये जाते है तो वे सब मनोरथो का अवश्य ही सफल क्यिा करते हैं । श्रद्धा ही मे सब कुछ सिद्ध हुआ करता है। विना श्रद्धा के चाहे सभी कुछ किया जावे निप्पल है । श्रद्धा ही ऐमी है जिसके रहने से भगवान् मी प्रसन्न हो जाया करते है । ॥१॥ भगवान् की भक्ति के सभी कार्य श्रद्धा पूर्व करे क्योकि जा कर्म श्रद्धा से रहित हाते हैं उनके करने से दुछ भी मिडि नही हुआ करती है ।।स। जिस प्रकार में समस्त प्राणियो की चेष्टा का कारण प्रमाश हाता है ठीक उसी भांति भक्ति भी समस्त कर्मों की सिद्धि प्राप्ति करने का परम कारण है । जमे प्रकाश होने पर सर कर्म [ नारद पुराण कर्म किये जा सकते हैं वैसे ही भक्तिपूर्वक ही सम्पूर्ण कर्म सिद्धिप्रद होते हैं ।।३।। जिस तरह से जल सभी लोको का जीवन है उसी तरह से भक्ति भी समस्त शक्तियो का जीवन होती है इसके बिना सभी कर्म निष्प्राण होते हैं।।४।। जिस प्रकार से इस पृथ्वी का समाश्रय ग्रहण करके ही समस्त प्राणिवृद जीवित रहा करते है उसी प्रकार से भक्ति का आश्रय ग्रहण करने पर ही सब कमों की सिद्धियां प्राप्त हुआ करती है । अत भक्ति का आश्रय अवश्य ही ग्रहण करना चाहिये || भक्ति और श्रद्धा की महान महिमा है। श्रद्धा रखने वाला मनुष्य ही धर्म की प्राप्ति किया करता है—श्रद्धा से सब कामनायें सिद्ध होती हैं और जो परम श्रद्धालु होता है उसी को मोक्ष जैसे परम पद की प्राप्ति होती है ॥ ६ ।। मुनीन्द्र । दाग-तपश्चर्या और अनेक प्रकार की अत्यधिक दक्षिणा से समन्वित यज्ञ आदि यदि भक्ति की भावना मे रहित होकर किये जाते हैं तो उनसे चाहे वे कितने ही उच्चस्तर पर क्यो न किये जावे भगवान् विष्णु कभी भी प्रसन्न नहीं हुआ करते हैं ॥७॥ मेरुमा सुवर्णाना कोटिकोटिसहस्रश । दत्ता चाप्पथनाशाय यतो भक्तिविजित ॥ अभक्तया यत्तपस्तप्त केवल कायशोपणम् । अभक्तया यद्ध त हव्य भस्मनि न्यस्तहव्यवत् ॥६, यत्किञ्चित्कुरुते कर्म श्रद्धयाऽप्यणुमारकम् । तन्नाम जायते पुसा शाश्वत प्रोति दायकम् ।।१० अश्वमेधसहस्र वा कर्म वेदोदित कृतम् । तत्सर्व निष्फल ब्रह्मन्यदि भक्तिविवर्जितम् ॥११ हरिभक्ति परा नृणा कामधेनूपमा स्मृता । तस्या सत्या पिवन्त्यज्ञा ससारगरलाहो ॥१२ असारभते ससारे सारमेतदजात्मज । भगवद्भक्तसङ्गश्च हरिभक्तिस्तितिक्षुता॥१३ नारद पुराण ] असूयोपैतमनसा भक्तिदानादिकर्म यत् । अवेहि निष्फल ब्रह्म स्तेपा दूरतरो हरि ॥१४ कोई भी दानशील पुरुष वरोडो और सहयो सुमेरु पर्वत के बरावर भी मुवर्ण का दान करे और उस दान के प्रदान करने में श्रद्धा का भाव न हो तो वह सब इतना विशाल दान देना भी निरर्थक एव पल से शून्य ही हुआ करता है ||८|| भक्ति भाव से रहित होकर जो तपस्या की जाती है उससे केवल अपने शरीर का कष्ट देना मान ही होता है किन्तु उसको पल सिद्धि कुछ भी नही होती है इसी प्रकार से भक्ति शून्य होकर अग्नि में हवि डाली जाती है और होम किया जाता है वह केवल भस्म मे हवि के डाल देने के ही समान है ।।६।। श्रद्धा के साथ थोडा-सा भी कोई कम किया जाता है तो उससे मनुष्यो को मदा प्रसन्नता हुआ करती है ॥१०॥ हे ब्रह्मन् । वेदाक्त सहस्रो यज्ञ एव अश्वमध भी किया जावे और उनके करने में श्रद्धा का अभाव हो तो वे समस्त कर्म निष्पल ही हुआ करत है ॥११॥ इस मसार मे मनुष्यों के कल्याण करने के लिये और सभी मनोवाछित फल प्रदान करने के वास्ते श्री हरि भगवान की भक्ति को कामधेनु के तुल्य बतलाया गया है। उसके रहत हुग अनजान प्राणी इस ससार- रूपी विप का पान किया करते हैं ॥१२॥ हे ब्रह्मपुत्र नारद । इस सार शून्य ससार म भगवान् के भक्ता की सङ्गति-भगवान की भक्ति और सहनशीलता य ही सार पदाथ हैं ॥१३।। जिसके मन मे बुढन होती है और रात दिन दूसरा को देख कर जलते रहते हैं उनके दान और भक्ति आदि समस्त कर्म निप्पल ही समझने चाहिये । है ब्रह्मन् । यह निश्चय ही सम्यो धि व अन्तर्यामी भगवान् ऐसे प्रागियास बहुन ही दूर रहा करत हैं ॥१४॥ परश्रियाभितप्ताना दम्भाचाररतात्मनाम् । मुषा तु कुर्वता कर्म तेषा दूरतरो हरि ॥१५ [ नारद पुराण ५० पृच्छता च महाधन्विदता वै मृपा च तान् । धर्मेष्वभक्तिमनसा तेपा दूरतरो हरि ॥१६ वेदप्रणिहितो धर्मो वेदो नारायण पर. । तनाश्रद्धापरा ये तु तेपा दूरतरो हरि ॥१७ यस्य धर्मविहीनानि दिनान्यायान्ति यान्ति ल। स लोहकारभस्त्रेव श्वसन्नपि न जीवति ॥१८ धर्मार्थकाममोक्षाख्या पुरुषार्था सनातना. । श्रद्धावता हि सिध्यन्ति नान्यथा ब्रह्मनन्दन ॥१६ स्वाचारमनतिक्रम्य हरिभक्तिपरो हि य । स याति विष्णुभवन यद्वै पश्यन्ति सूरय. ॥२० कुर्वन्वेदोदितान्धर्मान्मुनीन्द्र स्वाश्रमोचितान् । हरिध्यानपरो यस्तु स याति परम पदम् ॥२१ दूसरो की लक्ष्मी के वैभव से अपने हृदय में सन्ताप करने वाले, केवल दम्भ के लिये सदाचार का प्रदर्शन करने वाले मिथ्या. चारियो से भगवान् बहुत दूर ही रहा करते हैं ॥१५।। जिनके अन्त करण मे तो धर्म करने की भक्ति विल्कुल ही नही होती है और केवल दिखावे के लिये ही धर्म की चर्चा क्यिा करते है और जिज्ञासा किया करते है और मिथ्या ही धर्म का करते हैं ऐसे पाखडियो के समीप मे भगवान् बभी भी फटक्ते नहीं है क्योकि वे तो उनके असली रूप को स्वय जानते हैं ॥ १६ ॥ धर्म का प्रसार वेदो से ही होता है क्योकि वेद के द्वारा धर्म । स्वरूप जाना जाता है या यो समझिये कि वेद ही साक्षात् नारायण है । ऐगे वेदो पर जो श्रद्धा नही रखते हैं उनसे भी भगवान बहुत दूर रहा परते हैं ॥१७॥ जो धर्म में रहित रहार ही यहां जन्म लेता है और इम मसार से पल बमता है उसका जीवन निरर्थक ही रहता है और उसका श्वास लेना भी सुहार को धोनी थे ही समान होता है यादी वर्णन किया नारद पुराण ] ८१ -काम वह जीवित रहता हुमा भी मुर्दे के ही समान होता है ॥१८॥हे ब्रह्म नन्दन । जो श्रद्धा वाले मनुष्य होत हैं उन्ही को धर्म-अर्थ- और मोक्ष ये चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं। श्रद्धा के अभाव में इनकी मिद्धि कभी नहीं हो सकती है ॥१६॥ जो मनुष्य धर्म का उल्लघन न परवे सदा श्री हरि भक्ति मे ही मग्न रहा करता है वह सीधा विष्णु लोक को चला जाया करता है । ज्ञानी पुरुप हो उस लोक में जाते हैं ॥२०॥ हे मनीन्द्र । जो अपने आश्रम के अनुसार विहित वेदोक्त कर्मों को सम्पन्न करके विष्णु भगवान की भक्ति म परायण रहता है वही परम पद की प्राप्ति क्यिा करता है ।।२१।। आचारप्रभवो धर्म धर्मस्य प्रभुरच्युत । आश्रमाचारयुक्तेन पूजित सर्वदा हरि ॥२२॥ य स्वाचारपरिभ्रष्ट साङ्गवेदान्तगोऽपि वा। स एव पतितो ज्ञेयो यत कर्मवहिप्कृत ॥२३ हरिभक्तिपरो वाऽपि हरिध्यानपरोऽपि वा। भ्रष्टो य स्वाथमाचारात्पतित सोऽभिधीयते ॥२४ वेदो वा हरिभक्तिवा भक्तिर्वापि महेश्वरे । आचारात्पतित मूढ न पुनाति द्विजोत्तम ॥२५ पुण्यक्षेत्राभिगमन पुण्यतीर्थनिपेवणम् । यज्ञो या विविधो ब्रह्म स्त्यक्ताचार न रक्षति ॥२६ आचारात्प्राप्यते स्वर्ग आचारात्प्राप्यते मुखम् । आचारात् प्राप्यने मोक्ष आचारालि न लभ्यते ॥२७ आवागणा तु सर्चपा योगाना चंय सत्तम । हरिभर रपि तथा निदान भक्तिरिप्यते ॥ २८ सदाचार मे ही धर्म प्रवट पा पाता है और धर्म के स्वामी मापात भगवान यान ही है । जापान आश्रम में अनुकर धर्म वा. पूर्ण परिणानन पिया परला है वह माना गदा ही भावात या अन रिया पर सजा प्रष्टापरण वाना होता है वर मी ही ८२ [ नारद पुराण साग वेदो और वेदान्त ग्रन्थों को पढ़ा हुआ होता है तो भी उसको कमों से बहिष्कृत और महान पतित ही समझना चाहिये ॥२३॥ आश्रम के धर्म का भी बड़ा महत्व है जो आश्रम धर्म से भ्रष्ट हो भले ही विष्णु की भक्ति मे सलग्न रहता हो और विष्णु के ध्यान मे निमग्न हो किन्तु पतित ही कहलाता है ॥२४॥ हे द्विजोत्तम ! वेदो का ज्ञान या परायण, श्री हरि भगवान् की भक्ति अथवा शिव की भक्ति आचार से भ्रष्ट पुरुष को कभी पवित्र नही बना सकती है ॥२५॥ जो आचार से भूष्ट मनुष्य होता है उसकी रक्षा पवित्र तीर्थस्थल, पवित्र तीर्थों का सेवन और विविध प्रकार के यज्ञो का यजन भी नही कर सकते हैं ।।२६।। आचार की बहुत बडी महिमा है इससे स्वर्ग का निवास प्राप्त होता है । आचार से परम सुख की प्राप्ति भी हुआ करती है । आचार से ही मोक्ष प्राप्त होजाता है । ऐसी कौन सी बात है जो इस सदाचार से प्राप्त नहीं हो सकती है अर्थात् सभी कुछ मिल जाता है ॥२७॥ सम्पूर्ण सदाचारो का तथा योग की समस्त क्रियाओ का एव भगवान् की भक्ति की आदि कारण भक्ति ही होती है ॥२८ भक्त्यैव पूज्यते विष्णुर्वाञ्छितार्थफलप्रदः । तस्मात्समस्तलोकाना भक्तिर्मातेति गीयते ॥२६ जीवन्ति जन्तव सर्वे यथा मातरमाश्रिता. । तथा भक्ति समाश्रित्य सर्वे जीवन्ति धार्टिमकाः ॥३० स्वाथमाचारयुक्तस्य हरिभक्तिर्यदा भवेत् । न तस्य त्रिपु लोकेषु सदृशोऽस्त्यजनन्दन ॥३१ भक्त्या सिध्यन्ति कर्माणि कर्माभिस्तस्यते हरिः । तस्मिस्तुप्टे भवेज्ज्ञान ज्ञानान्मोक्षमवाप्यते ॥३२ भक्तिस्तु भगवद्भक्तसगेन खलु जायते । तत्सङ्ग प्राप्यते पुम्भि- सुकृते पूर्वसचितैः ॥३३ वर्णाश्रमाचाररता भगवद्भपितलातसाः । कामादिदोपनिमुक्तास्ते सन्ता लोकशिक्षकाः ॥३४ नारद पुराण ] सत्सङ्ग परमो ब्रह्मन्न लभ्येताकृतात्मनाम् । यदि लभ्येत विज्ञेय पुण्य जन्मान्तराजितम् ॥३५ मनोवाछित पुरुषार्थ के फल प्रदान करने वाले भगवान् थी विष्णु की भक्ति भाव के सहित पूजा की जाया.करती है। इसलिये भगवद्भक्ति सब लोको वी जननी कही जाती है ।२६। जिस प्रकार से अपनी माता का आश्रय पाकर सभी प्राणी जीवित रहा करते हैं और अपना जीवन सुत्र पूर्वक व्यतीत क्यिा करते हैं ठीक उसी भाति भक्ति वा समाश्रय ग्रहण करने पर सब प्राणियों को भी सुख मिलता है ॥३०।। जो वो और आश्रमो का पालन करने वाले मनुष्य है उनमे यदि भगवान की भक्ति भी हो जाय तो फिर हे ब्रह्म पुत्र । उनकी समता रखने वाला लोक्य में भी कोई नहीं हो सकता है ॥३१॥ भक्ति में करने से समस्त कर्मों की सिद्धि हुआ करती है और उन कर्मों के द्वाग भगवान् की जव प्रसन्नता का लाभ हो जाया करता है और शान मुलभ हो जाता है क्योरि शान के विना मुक्ति नहीं हुआ करती है ॥३२॥ भगवान की भक्ति की प्राप्ति भगवद्भक्तो के सङ्ग स होती है। यह भगवद्भक्तो की सङ्गति पूर्व जन्म मे सश्चित विय हुए कर्मों की छता ही प्राप्त होती है ।।३३।। वर्णाभ्रम धर्म का पालन बरन वाले सपा भगवान की भक्ति की प्राप्ति की लालसा वाल तथा वाम क्रोधादि दोपो से रहित समस्त लोका के शिक्षा यति धर्म ये उपदशक हो सकते है ॥३४॥ है ब्रह्मन् । मत्पुरपो वा सङ्ग परम श्रेष्ठ होता है। यह पद हदय वालो को ही मिनना है जिनमा अन्त करण पवित्र नही है उनको यह पमी भी प्राप्त ही नहीं हो सकता है। जिनको यह सत्पुरो की गति का नाम हो जाये तो इमे पूर्व जन्म के पुण्यों या ही पल मममना चाहिए ॥३५॥ पूर्वाजितानि पापानि नाशनायान्ति यस्य वै । सत्मभिधगम्य नान्यथा घटते हि गा ॥३६
८४
[ नारद पुराण
रविहि रश्मिजालेन दिवा हन्ति वहिस्तम ।
सन्त सूक्तिमरीच्योधैश्चान्तवन्ति हि सर्वदा ॥३७
दुर्लभा पुरुपा लोके भगवद्भक्तिलालसा ।
तेपा सङ्गो भवेद्यस्य तस्य शान्तिर्हि शाश्वती ॥३८
किलक्षणा भागवतएते च किं कर्म कुर्वते ।
तेपा लोको भोत्कीदृक्तत्सर्व ब्रूहि तत्त्वत ॥३६
त्व हि भक्तो रमेशस्य देवदेवस्य चक्रिण ।
एतन्निगदितु शक्तरत्वत्तो नास्त्यधिकोऽपर ॥४०
शृणु ब्रह्मत्पर गुह्य मार्कण्डेयस्य धीमत ।
यमुवाच जगन्नाथो योगनिद्राविमोचित ॥४१
योऽसौ विष्णु पर ज्योतिर्देवदेव सनातन ।
जगद्रूपी जगत्कर्ता शिवब्रह्मास्वरूपवान् ।।४२
जिस व्यक्ति के पूर्व जन्म के पाप नष्ट हो जाया करते हैं उसी
सो सत्सङ्ग की प्राप्ति हुआ करती है इसका पाना पूर्व जन्म के पुण्यो
का ही फल समझना चाहिए अन्यथा सत्पुरुषा की सङ्गति कभी भी
प्राप्त नहीं हुआ करती है ॥३६॥ सूर्यदेव तो अपनी किरणो के प्राश
ये द्वारा दिन के समय म केवल वाहिर पले हुए अन्धकार या ही
विनाश किया करते हैं किन्तु सन्त पुरुष तो अपने सद्वचना के द्वारा
हृदय के भी अन्धकार को दूर कर दिया करते हैं। सन्तो के वचनरूपी
किरणो वे प्रकाश का प्रभाव हृदय म व्याप्त अज्ञानाधिकार पूर्ण रूप से
नष्ट हुआ करता है ।।३७।। इस ससार में भगवान की भक्ति की लालसा
रखने वाले पुरुषा का प्राप्त होना अत्यन्त दुर्लभ है। ऐसे भगवान् के
भक्ता मा सङ्ग सौभाग्य स जिस को भी प्राप्त हो जाता है उसको
यदा कनिये शानि प्राप्त हो जाया करती है ॥३८॥ देयपि श्री
नारदतो न कहा- भगवान् । कृपया यह वतनाइय fr भगवान
भाारा क्या नभण हाता है ? ये भगवझरा क्या काम किया परत
नारद पुराण ]
है ? उनको किन लोगो की प्राप्ति हुआ करती है । ये सभी बातें आप
स्पष्ट रूप से समझाने की कृपा करे ।।३।। आप तो देवो के भी देव
सुदर्शन चक्र के धारण करन वाले रमा के स्वामी भगवान के परम
भक्त हैं इसलिये आपसे अधिक इस का ज्ञाता अन्य कोई भी नहीं है
और न इन बातो का वर्णन ही और कोई करने को क्षमता ही रखता
है ॥४०॥ नारदजी के इन वचनो को सुनकर श्री सनकदेव ने कहा-
हे ब्रह्मन् । परम बुद्धिमान श्री मार्कण्डेय ऋषि का एक अत्यन्त गोपनीय
वृत्तान्त का यवण करो जो भगवान् ने अपनी योगनिद्रा में जागने पर
पहा पा ।।४१॥ यह जो विष्णुदेव हैं यह परम ज्याति सनातन देवो के
देव हैं । यह समस्त जगत् इनरा ही एप स्वरूप है। ये इस जगत् के
पर्ता है, शिव और ब्रह्मा के रूपो मैं यही हैं ॥४२
युगान्ते रौद्रस्पैण ब्रह्माण्डग्रासवृहित ।
जगत्येकार्णवीभूते नप्टे स्थावरजङ्गमे ॥४३
भगवानेच शेपात्मा शेते वटदले हरि ।
अराख्याताजजन्माधराभूपिततनूरुह ॥४४
पादागुटाग्रनिर्यातगङ्गाशीताम्बुपावन ।
सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरो देवो ब्रह्माण्डग्रासवृहित ॥४५
वटच्छदे शयानोऽभूत्सर्वशक्तिसमन्वित ।
तस्मिन्स्थाने महाभागो नारायणपरायण ।
मार्कण्डेय स्थितस्तस्य लीला पश्यन्महेशितु ॥४६
तस्मिन्काले महाधोरे नप्टे स्थावरजङ्गमे ।
हरिरेप स्थित इति मुने पूर्व हि शुथुम ॥४७
जगत्येकागंवीभूते नप्टे स्थावरजङ्गमे ।
सर्वग्रस्तेन हरिणा किमर्थं सोऽवशोपित ॥४८
पर मौतूहल पन पत्तंतेतीद सूत न ।
हरियोनिमुधापाने वस्यालस्य प्रजायते ॥४६
[ नारद पुराण यह प्रलय होने के अवसर पर रुद्र रूप से इस समस्त ब्राण्ड का ग्रास करके वढ जाया करते है और वही भगवान् जिस समय में स्थावर जङ्गम यह सम्पूर्ण जगत नाश को प्राप्त होकर एक सागर के रूप वाला रह जाया करता है उस समय मे भगवान विष्णु के स्वरूप में एक वट के पन पर शयन किया करते हैं । इन भगवान के रोम कूपो मे अगणित ब्रह्माड सुशोभित रहा करते हैं और इनके चरण के अङ्ग, से गङ्गा की धारा निकला करती है । वही उस ब्रह्माड का ग्रास करके वृद्धि को प्राप्त हुए देव सूक्ष्माति सूक्ष्म होकर समस्त शक्तियो से सुस- म्पन्न होकर वट पत्र पपशयन किया करते है उसी स्थल पर नारायण में परायण महान भाग वाले मार्कण्डेय जी उन महेश्वर देव की लीला को देखते हुए विराजमान थे ॥४३-४६॥ ऋषिगणो ने कहा-हे मुनिवर ! हमने ऐसा ही श्रवण किया है कि उस प्रलयकालीन महान घोर अवसर मे जब कि यह चराचर जगत् विनष्ट हो जाता है। एक मात्र श्री हरि ही शेष रहा करते है 1४७। जिस समय में यह जगत् एक सागर के स्वरूप मे बदल कर बन गया था और स्थावर-जगम स्वरूप सम्पूर्ण विश्व विनष्ट हो गया था उस समय में भगवान ने सभी का ग्रास कर लिया था तो उन्ही भगवान ने इन मार्कण्डेयजी को रिस कारण से छोड दिया था जो कि वहाँ पर यह विराजमान थे ॥४८॥ हे सूतजी ! इस विषय मे हमारे हृदय मे बडा भारी वुतूहल उत्पन्न हो गया है। भगवान विष्णुदेव के कथामृत का पान करने के लिये पिस को आसस्य हो सकता है ? अतएव इस पया का सविस्तार वर्णन करने की कृपा कीजिए ।।४६ आसीन्मुनि भागो 'डुरिति विथतः। शालग्रामे महातीर्थे सोऽतप्यत महातपा. ॥५० युगानामयुत ग्रह्मन्गणब्रह्म सनातनम् । निराहारः क्षमायुक्तः सत्यसन्धो जितेन्द्रियः ॥५१ नारद पुराण ] आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्विषयनि स्पृहः । सर्वभूतहितो दान्तस्तताप सुमहत्तप. ॥५२ तत्तप.शङ्किता सर्वे देवा इन्द्रादयस्तदा। परेश शरण जग्मुनारायणमनामयम् ॥५३ क्षीराब्धेरुत्तर तीर सप्राप्य निदिवौकस । तुष्टुवुर्देवदेवेश पद्मनान जगद्गुरुम् ॥५४ नारायणाक्षरानन्त शरणागतपालक । मृकण्डनपसा प्रस्तान्पाहि न शरणागतान् ॥५५ जय देवाधिदेवेश जय शखगदाधर । जयो लोकस्वरूपाय जयो ब्रह्माण्ड हेतवे ॥५६ श्री मूतजी ने कहा- मृण्ड नामधारी एक परम प्रसिद्ध मुनि हुए थे । वे महा भगवान ये और उन महा तपस्वी ने शालग्राम नामक तीर्थ में तप किया था ॥५०॥ हे ब्रह्मन् । उन्होंने दश सहस पुगो तक निराहार रह कर ही क्षमा धारण कर, सत्य प्रतिन वाले होकर अपनी समस्त इन्द्रियो को वश में करके सनातन ब्रह्म भगवान विष्णु का बोतंन किया था ।५१। उस महाप ने सासारिक विषयों से बिल्कुल ही स्पृहा रहित होकर, समस्त प्राणियों में अपने ही समान देखते हुए और सब जीवधारियो की भलाई मे सदा तत्पर रक्षर अपनी इन्द्रियों का दमन घरते हए बहुत ही घोर तपश्चर्या की थी ॥५२॥ उनकी इस प्रकार की अत्युग्र तपस्या से गड़ा हृदय में कर के देवराज इन्द्रादि सय देवगण अनामर भगवान श्री नारायण की शरण में प्राप्त हुए थे ॥५३॥ वे देवगण क्षीरसागर के उत्तर नीर पर स्थित होकर पदमनाम जगत के गुरु देव देवेश्वर श्री नारायण का स्तवन करने लगे पे ॥५।। देवगण ने प्रार्थना की पो हे नारायण देव । हे यशर । हे बनन्त । है शरः पागतो वे पालन करने वाले। हम सब लोग इम महर्षि मुष्ट तपश्चर्या से बहुत ही भयभीत हो रहे हैं। अब हम राब आपरे ।
। गारद पुराण चरणो की शरण में आकर प्राप्त होगये हैं। आप ही इस समय में हमारी रक्षा करें ।। हे देवाधिदेवेश्वर ! आपकी सदा जय हो ! हे शरा, चक्र और गदा को धारण करने वारो प्रभो ! आप की जय हो। यह सम्पूर्ण ससार जिनका ही एक स्वरूप है उन परात्पर प्रभु की जय हो, जो इस समस्त ब्रहाड का कारण है उन भगवान की जय हो ।।५६ नमस्ते देवदेगेश नमस्ते लोकपावन । नमस्ते लोकनाथाय नमस्ते लोकसाक्षिणे ॥५७ नमस्ते ध्यानगम्याय नमस्ते ध्यानहेतवे । नमस्ते ध्यानरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिगे ॥५८ केशिहन्त्रे नमस्तुभ्य मधुहन्त्रे परात्मने। नमो भूम्यादिरूपाय नमएचैतन्यरूपिणे ।।५६ नमो ज्येष्ठाय शुद्धाय निर्गुणाय गुणात्मने । अरूपाय स्वरूपाय वहुरूपाय ते नमः ॥६० नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च । जगद्विताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥६१ नमो हिरण्यगर्भाय नमो ब्रह्मादिरूपिणे । नम सूर्यादिरूपाय हव्यकव्यभुजे नम ॥६२ नमो नित्याय वन्दाय सदानन्दैकरूपिणे । नम स्मृतातिनाशाय भूयो भूयो नमो नम ॥३६3 ॥ हे देवो के भी देवेश्वर । आपकी सेवा में हम सबका प्रणाम है। हे लोको को पावन करने वाले ! आपके लिये प्रणाम है। । लोको के स्वामी भगवान विष्णु के लिये हमारा प्रणाम है-लोको के साक्षी स्वरूप प्रभु की सेवा में हमारा प्रणाम समर्पित है ॥ ५७ ।। ध्यान के द्वारा ही प्राप्त होने वाले भगवान के लिये प्रणाम' है । जिनके कारण से ही ध्यान किया जाता है उन श्री भगवान की सेवा में हमारा प्रणाम है-जो ध्यानात्मया हैं और ध्यान के साक्षी है नारद पुराण ] 5६ उन प्रभु के लिये प्रणाम है ॥५८।। है भगवन् ! आपने मधु और केशी नाम वाले दैत्यो का वध कर जगत् का कल्याण किया है ऐसे आपके लिये प्रणाम है-चंतन्य रूप वाले श्री भगवान् के लिये वार- भ्वार प्रणाम है ॥५६॥ ज्येष्ठ-शुद्ध-निर्गुण - गुणात्मा-नीरूप स्वरूप और अनेक रूपो से समन्यित आप थी भगवान की सेवा मे हमारा प्रणाम है ।।६०॥ ब्रह्मण्य देव । गौ और ब्राह्मणो का सर्वदा हित करने वाले भगवान के लिये प्रणाम है इस सम्पूर्ण जगत के हित का सम्भादन करने वाले प्रभु के लिये प्रणाम है-परब्रह्म श्रीकृष्ण गोविन्द की सेवा मे हम सबका बारम्बार प्रणाम है ॥६१॥ हिरण्य- गर्भ ब्रह्मा आदि के स्वरूप को धारण करने वाले–सूर्यादि के रूप में सस्थित-हव्य-कव्य के भोग करने वाले अग्नि में व्याप्त श्री परमात्मा प्रभु के लिये प्रणाम है ॥ १२॥ नित्य ही वन्दना करने के योग्य सर्वदा आनन्दमय स्वरूप वाले-स्मरण करने पर सबके महा दु.खो का विनाश करने वाले भगवान् के लिये हमारा अनेक बार प्रणाम है ।। ६३ ॥ एव देवस्तुति श्रुत्वा भगवान्कमलापतिः । प्रत्यक्षतामगात्तेपा शयचक्रगदाधरः ।।६४ विकचाम्बुजफ्याक्ष सूर्यकोटिसमप्रभम् । सर्वालङ्कारसयुक्त श्रीवत्सावितवक्षसम् ॥६५ पीताम्बरधर सौम्य स्वर्णयज्ञोपवीतिनम् । स्तूयमानं मुनिवर पार्पदप्रवरावृतम् ॥६६ त दृष्ट्वा देवसघास्ते तत्तेजोहततेजसः । नमश्च मुदायुक्ता अष्टागैरवनि गतः ॥६७ ततःप्रसन्नो भगवान्मेघगंभीरनिस्वनः । उवाच प्रीणयन्दैवान्नतानिन्द्रपुरोगमान् ॥६८ जाने को मानसं दुःखं मृकण्टुतपसोदशतम् ।
है. [ नारद पुराण युष्मान्न वाधते देवा स ऋपि सज्जनाग्रणी॥६६ सपभि सयुता वापि विपद्भिश्चापि सज्जना । सर्वथान्य न वाधन्ते स्वप्नेऽपि सुरसत्तमा ७० इस प्रकार की देवगण द्वारा की हुई स्तुति का श्रवण कर कमला के स्व मी भगवान विष्णुदेव शख चक्र और गदादि अपने अमोध आयुधो को धारण करके उन देवो के समक्ष मे प्रत्यक्ष होकर प्रकट होगये ध ॥६॥ भगवान् के युले हुये नेत्र कमल दल के समान सुन्दर थे और उनको प्रभा करोडो सूर्यों के समान थी वे समस्त लाभरणो श विभूपित थे और उनके वक्षस्थल पर श्रीवास का चिन्ह था ॥६५॥ वे पीताम्बर को धारण करने वाले थे और परम सौम्य सुवण का यज्ञोपवीत धारण किये हुये थे । उन प्रभु की परम थेष्ठ शिरोमणि मुनिगण स्तुति कर रहे थे तथा पापदो मे परम प्रधान उनके चारो ओर स्थित थ ।। ६६।। उन दयामय प्रभु का दशन करक उस समय मे समस्त देवगणो के समुदाय का तज फीका पड़ गया था। सब देवो ने भूमि पर गिर कर भगवान् को साष्टांग प्रणाम किया था ।।६७॥ उसी समय में भगवान् प्रसन्न होकर इद्रादि सब देवताओ को प्रसन्न करते हुये मेघ के समान अतीव गम्भीर वाणी से कहने लगे थे ॥६८॥ हे देवगणो । आप लोगो के मन मे इन मृकुण्डु महषि की तपस्या के कारण से जो सन्ताप हो रहा उसको मैं भली भाति समय रहा हूँ । हे देवताओ । यह ऋपि आपको किसी भी प्रकार भी पीटा नही देगे। ये तो बहुत ही अधिव' सम्पन हैं ।। ६६॥ हे छ देवगणो ! यह नियम है कि जो महानुभाव परम सज्जन हुआ करते हैं वे अपने समीप मे सम्पत्ति हा या विपत्ति हा स्वप्न में भी वे कभी दूसरा को पीडा नहीं दिया करते हैं ॥७॥ सतत वाध्यमानोपि विषयाख्यररातिभि । अविद्यायात्मनो रक्षामन्यान्वेष्टि यय सुधी ॥७१ तापमयामिधानेन वाध्यमानो हि मानव ।
नारद पुराण ]
अन्य पीडयितु शक्त कथ भवति सत्तम ॥७२
कमणा मनसा वाचा बाधते य सदा परान् ।
नित्य कामादिभियुक्तो मूढधी प्रोच्यते तु स १७३
यो लोकहितकृन्मयो गतासूया विमत्सर ।
नि शङ्क प्रोच्यते सद्भिरिहामुत्र च सत्तमा ७४
सशङ्क, सवदा दुखी नि शङ्क सुखमाप्नुयात् ।
गच्छध्व स्वालय स्वस्था पीडयिप्यति वो न स ।।७५
भवता रक्षकश्चाह विहरध्व यथासुखम् ।
इति दत्वा वर तेषामतसीकुसुमप्रम ॥७६
पश्यतामेव देवाना तवान्तरधीयत ।
तुष्टात्मान सुरगणा ययुनाप यथागतम्।।७७
विपयरूपी शशुओ म पीडित होता हुआ बुद्धिमान् पुरप अपनी
रक्षा न कर दूसरा का कष्ट दे सकता है ? 11७11 आध्यात्मिक आधि
दैविक और आधिभौतिर इन तीन प्रकार ये तापा से स्वय पीडा को
प्राप्त करने वाला सज्जन मनुष्य क्या दूमरा के साथ पीडा पहुँचा पर
पिलवाड कर सकेगा ऐमा कभी भी सम्भव ही नहीं है ।। ७२ ॥ जा
मन-वाणी और कम के द्वारा सदा दूसरा को पीडित पिया परता है
और सर्वदा कामादि म सा रहा करता है वह मूद युद्धि वाला कर
लापा करता है 101 जा मनुष्य सदा इस मसारमा हित किया
करता है और असूया एव मसरता स रहित होता है उसको सन्जन
सोम और परला म निशद्ध यहा परते है ॥४॥ जो पुरप शना
से युक्त होता है वह सवदा दुपित रहा करता है । व ऋप आप
सागा को कोई भी पीडा नहीं पहुँचायेगे। अतएव आप साग अपन २
निवास स्थाना को परे जाइये ॥७।। मैं तो सयदा याप सागोरी
गुरक्षा परन को तत्पर रहा ही परता हूँ। अनाव आप माग स्वच्या
या गुप म साप विहार भले रहिये। इस रोनि से उन देवा का पर
६२
[ नारद पुराण
दान देकर अलसी के पुष्प के समान नीलकान्ति वाले भगवान् वही पर
देवगणो के दखते ही अन्तहित होगये थे। उस समय मे समस्त देव
गण परम सतुष्ट होकर अपने स्वगलोक को वापिस लौट कर चले
गये थे ।।७६७७
मृकण्डोरपि तुष्टात्मा हरि प्रत्यक्षतामगात् ।
अरूप परम ब्रह्म स्वप्रकाश निरञ्जनम् ॥७८
अतसीपुप्पसकाश पीतवाससमच्युतम् ।
दिव्यायुधधर दृष्ट्वा मृकण्डुर्विस्मितोऽभवत् ।।७६
ध्यानादुन्मील्य नयने अपश्यद्धरिमग्रत ।
प्रसन्नवदन शान्त धातार विश्वतेजसम् ॥८०
रोमाञ्चितशरीरोऽसावानन्दाश्रु विलोचन ।
ननाम दण्डवझूमौ देवदेव सनातनम् ।।८१
अश्रु भि क्षालयस्तस्य चरणौ हपसभवै ।
शिरस्यञ्जलिमाधाय स्तोतु समुपचक्मे ॥६२
नम परेशाय परात्मरूपिणे परात्परस्मात पत पराय ।
अपारपाराय परानुकों नम परेभ्य परपारणाय ॥८३
यो नामजात्यादिविकल्पहीन प्रब्दादिदोपव्यतिरेकरूप ।
बहुस्वरूपोऽपि निरजनो यस्तमीशमीडय परम भजामि।।८४
इसके उपरात भगवान् विष्णु देव तपश्चर्या करने वाले
मृण्ड पर भी अपने चित्त म परम प्रस न होकर उनके समक्ष में भी
उपस्थित होकर प्रकट होगये थे। रूप से रहित-निरजन-स्वप्रकाश
परब्रह्म को अलमी ये पुष के तुल्य वण बाले-पीताम्बरधारी दिव्य
आयुधा से समवित अच्युत प्रभु को विष्णु के दिव्य स्वरूप म अव
स्थित देवकर मृण्ड महर्षि को अत्यधिक विस्मय हुआ पा ॥७८७६||
उम समय म मृाण्ड महपि न ध्यान से अपने दोनो नेत्रा को साता तो
प्रगान मुख पाते परम शा तस्वरूप वारे-धाता विश्व तमा भगवा
नारद पुराण ] विष्णु को अपने समक्ष मे स्थित देखा था 1८०॥ उस समयमे भगवान् के दर्शन प्राप्त कर मृकन्डु ऋषि को हर्षातिरेक के कारण रोमाच हो गया था और अमन्दानन्द से उनके दोनो नेत्रो मे अथ, भर आये थे । ऐसी ही दशा में रहते हुये मृकडु ने भूमि मे झुक करके भगवान् विष्णु के लिये दन्डवत् प्रणाम किया था ॥१॥ हतिरेक से बहते हुए आँखो के आसुओ से भगवान के चरणो को प्रक्षालित कर दिया था। इसके पश्चात् वे अपना मस्तक नीचे की ओर नवाकर हाथो को जोड कर भगवान् के स्तवन करने की अपने मन मे इच्छा की थी ।। २ ।। मृक्न्डु ने कहा-हे परेश्वर । परात्मरूपी सूक्ष्म से भी सूक्ष्म-श्रेष्ठो से भी परम श्रेष्ठ- जिनका पार नहीं पाया जा सकता है-सर्वदा दूसरो पर अपनी अनुकम्पा करते रहने वाले, भक्तो को शत्रुओ से बचाकर दूसरी पार लगा देने वाले भगवान् आपकी सेवा मे मेरा शतश प्रणाम है ।।३।। जो नाम जाति आदि के विकल्प से रहित है, जो शब्दादि के दोपो से व्यतिरेक स्वरूप हैं, जो अनेक रूप होने पर भी सदा निर- जन है उन्ही परम पूजनीय भगवान का मैं भजन किया करता हूँ ||४|| वेदान्तवेद्य पुरुष पुराण हिरण्यगर्भादिजगत्स्वरूपम् । अनूपमक्त भजनानुम्पिण भजामि सर्वेश्वरमादिमीडयम् ॥८५ पश्यन्ति य वीतसमस्तदोपा ध्यानकनिष्टा विगतस्पृहाश्च । निवृत्तमोहा परम पवित्र नतोऽस्मि ससारनिवर्तक तम् ॥८६ स्मृतातिनाशन विष्णु शरणागतपालकम् । जगत्सेव्य जगद्धाम परेश करुणाकरम् ।।८७ एव स्तुत स भगवान्विष्णुस्तेन महर्षिणा। अयाप परमा तुष्टि शपचन गदाधार ॥८८ अथालिङ्गय मुनि दवश्चतुभिर्दीर्घाहुभि । उवाच परम प्रीत्या वर वरय मुरत ||८६ ६४ [ नारद पुराण प्रीतोऽस्मि तपसानेन स्तोत्रेण च तवानघ । मनसा यदभिप्रेत वर वरय सुव्रत ।।६० देवदेव जगन्नाथ कृतार्थोऽस्मि न सशय । त्वदर्शनमपुण्याना दुर्लभ च यत. स्मृतम् ॥६१ वेदान्त शास्त्र के द्वारा जानने में आने वाले हिरण्यगर्भ, पुराण-पुरुष आदि जगत् के स्वरूप मे स्थित-अनुपम-अपने भक्तो पर महती कृपा करने वाले सब के स्वामी परम पूजनीय उन बापका ही मैं गजन करता हूँ ॥८॥ जिनवा सभी दोपो से रहित, एक मात्र ध्यान मे ही परायण, स्पृहा से रहित और महा मोह से शून्य पुरुप ही दर्शन प्राप्त कर सकते हैं उन परम पवित्र ससार निवृत्ति कर देने वाले भगवान की सेवा मे मेरा बारम्बार प्रणाम समर्पित है।।८६|| स्मरण करने पर पीडा वो तुरन्त ही विनष्ट कर देने वाले, शरण मे समागत प्राणियो का परिपालन करने वाले, सम्पूर्ण जगत् जिनकी सेवा में निरत रहा करता है, जगत् के तेज स्वरूप करुणा के निधान उन परमेश्वर भगवान विष्णुदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।। ८७ ॥ जिस समय में उन मृान्डु महर्षि ने इस रीति से स्तवन किया था उस समय मे शख-चक्र-गदा के धारण करने वाले भगवान विष्णु परम प्रसन्न होगये थे ॥८६॥ उस समय मे अपनी लम्बी चारो भुजाओको फैला वर उन्होने मृाण्डु मुनि का समालिङ्गन विया था और अत्य- धिक प्रेम के साथ करने लगे-हे सुमन । मैं प्रसन्न हूँ तुम वर की पाचना बरोदा भगवान् ने कहा- हे निष्पाप। मैं आपके इस उ पटनपस्या में और इग स्तुति से बहुत ही अधिक तुम पर प्रसन होगया है इसलिये हे गुबत । अब जो भी आपके मनमे अभीष्ट हो वही वरदान मुनमे प्राप्त कर लो ॥६६॥ इन प्रकार मेगवान् के पल पर ग्रान्टु ने कहा-हे जगत में नाप । है देवो वे भी देये. भर I तो जागे व दुग दर्शा प्राप्त हो गया हो
नारद पुराण ]
गया । क्योकि जो पुण्यहीन होते हैं उनको आपका यह साक्षात् दर्शन
प्राप्त करना ही बहुत दुर्लभ होता है ।।६१॥
ब्रह्माद्या य न पश्यन्ति योगिनः संशितव्रताः।
मिष्ठा दीक्षिताश्चापि वीतरागा विमत्सराः ॥६२
तं पश्यामि पर धाम किमतोऽन्यं वरं वृगे।
एतेनैव कृतार्थोऽस्मि जनार्दन जगद्गुरो ॥६३
यन्नामस्मृतिमात्रेण महापातकिनोऽपि ये ।
तत्पद परम यान्ति तं दृष्ट्वा किमुताच्युत ॥६४
सत्यमुक्त त्वया ब्रह्मन्प्रीतोऽस्मि तव पण्डित ।
मद्दर्शन हि विफल न कदा चिद्भविष्यति ।।६५
विष्णुभक्तकुटुम्योति वदन्ति विबुधाः सदा ।
तदेव पालयिष्यामि मज्जनो नानृत वदेत् ॥६६
तस्मात्त्वत्तपसा तुष्टो यास्यामि तव पुताम् ।
समस्तगुणसयुक्तो दीर्घजीवी स्वरूपवान् ।।६७
मम जन्म कुले यस्य तत्कुल मोक्षगामि वै ।
मयि तुष्टे मुनिश्रेष्ठ किमसाध्य जगत्त्रये ॥६८
इत्युक्त्वा देवदेवेशो मुनेस्तस्य समीक्षत ।
अन्तर्दधे मृकण्डुश्च तपस सन्यवर्तत ॥६६
जिस भगवान् का दर्शन ब्रह्मा यादि देवगण, योगी, प्रशसनीय
प्रत धारण करने वाले परम धामिर, दीक्षित, रागद्वेष में मृत्य और
मात्रा में रहित जन भी नहीं प्राप्त कर गाते हैं या बहुत ही पटिनता
से प्राप्त कर पाते हैं ॥१२॥ उन परम पाम भगवान का दर्शन में
इम समय में प्राप्त पर रहा है। इसमें अधिक मैं पौन सा वरदान
आप में गां। इन जारा के गुरदय ! हे जनादन प्रभो ! मैं सो
इतने मे ही परम प्राय हो गया | इस नगर में महान पाती
भी जिनोमामा मरण माये, परग परमो प्राप्त किया जाने
[ नारद पुराण है, तो हे अच्युत देव । उनको साक्षात् प्राप्त कर लेने पर अन्य क्या शेष रह जाता है जिसे मैं माँगू ॥६४|| उस समय मे भगवान ने कहा-- हे ब्रह्मन् । आप ने इस समय मे जो भी कुछ कहा है वह बिल्कुल सत्य है । हे महापण्डित । मै तुम पर बहुत ही प्रसन्न हूँ किन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि मेरा यह दर्शन कभी निष्फल नहीं हुआ करता है ॥६५।। अन्य देवगण कहा करते हैं कि विष्णु भगवान भक्तो के सदा कुटुम्ब वाले होते है । मैं भी उसी के अनुसार पालन करूंगा क्यो कि मेरे भक्तगण कभी मिथ्या भापण नही किया करते हैं ॥६६॥ इसीलिये मैं आपके इस तप से सन्तुष्ट होकर परम स्वरूपवान, दीर्घजीवी, सर्व- गुण सम्पन्न आपका पुन बनूगा ॥६७॥ यह समझ लो कि जिस कुल मे मेरा जन्म होता है वह पूर्ण कुल मोक्ष प्राप्त कर लिया करता है । हे मुनि श्रेछ । मेरी सन्तुष्टता हो जाने पर इस त्रिलोकी कोई भी वस्तु असम्भव नही रहा करती है ।।६८।। इस प्रकार से उन देवेश्वर भग- वान के कहने पर ब्रह्म देवेश्वर उन महपि के समक्ष से अन्तर्धान हो गये थे और फिर मृकण्डु महर्षि भी अपनी तपश्चर्या से निवृत हो गये थे ॥६६॥ ॥ मार्कण्डेय की कथा और वर प्राप्ति । ब्रह्मन्क्य स भगवान्मृकण्डो पुत्रता गत । किं चकार च तद् ब्रूहि हरिर्भार्गववशज ॥१ श्रूयते च पुराणेषु मार्कण्डेयो महामुनि । अपश्यद्वष्णवी माया चिरजीव्यम्य सप्लवे ॥२ शृणु नारद यक्ष्यामि यथामेता सनातनीम् । विष्णुमक्तिसमायुक्ता मार्कण्डेयमुनि प्रति ॥३ तपमान्ते माण्डुम्तु भार्यामृहाह्य सत्तम ।
नारद पुराण ] ३७ गार्हस्थ्यमकरोदष्ट शान्तो दान्त कृतार्थक ॥४ तस्य भार्या शुदिक्षा नित्य पतिपरायणा । मनसा वचसा चापि देहेन च पतिव्रता ॥५ काले दधार सा गर्भ हरितेजोशसभवम् । सुपुवे दशमासान्ते पुन तेजस्विन परम् ॥६ स ऋपि परमप्रीतो दृष्ट्वा पुत्र सुलक्षणम् । जातक कारयामास मङ्गल विधिपूर्वकम् ॥७ देवपि श्री नारदजी ने कहा-हे ब्रह्मन् । भगवान् मृकण्डु महपि के पुत्र किस प्रकार से वन गये थे ? और विष्णुदेव ने भृगु के वश मे जन्म ग्रहण करके क्या-क्या चरित करके दिखाये थे? आप उन सबका वर्णन इस समय में हमारे सामने करने की कृपा कीजिए ॥१॥ पुराणो मे ऐसी कथायें हैं और उनम सुना जाता है कि माकण्डेय महामुनि चिरजीवी हैं और उन्होने महाप्रलय मे भी भगवान की इस वैष्णवी माया के साक्षात् दर्शन किये थे ।।२।। सनकजी ने कहा है नाथ । मैं विष्णु की भक्ति से परिपूर्ण मान्डेयजी को इस परम प्राचीन क्या को आपको बतलाता हूँ ||३|| तपस्या के पश्चात् परम श्रेष्ठ - शान्त - दान्त मृकडु मुनि ने अतिशय कृतार्थ होकर अपनी पत्नी से विवाह किया था और परम प्रसन्नता से गाहस्थ्य धर्म को चलाने लगे थे ।। ।। मृकण्डु महर्षि की भार्या परम पवित्र और चतुर थी। वह सदा पति सेवा में तत्पर रहा करती थी और मन वाणी तथा देह से पूर्णतया पतिव्रता पनी थो ॥५॥ समय के सम्प्राप्त होने पर उस भार्या ने श्री हरि के तेज के अश से समन्वित गर्भ को धारण किया था । फिर दश मासो के ममाप्त होने पर परम पूर्ण तेज से युक्त पुत्र का प्रराव किया था ॥६॥ उस महपि ने परम सुलक्षणो से युक्त उस अपने पुत्र को देखकर अधिक प्रसन्नता प्राप्त की थी और शास्त्रोक्त विधि के साथ उसका जातकम सरकार कराया था !
| नारद पुराण
स चालो ववृधे तत्र शुक्लपक्ष इवोडुपः ।
ततस्तु पञ्चमे व उपनीय मुदान्वितः १६
शिक्षा चकार विप्रेन्द्र वैदिकी धर्मसहिताम् ।
नमस्कार्या द्विजा. पुत्र सदा दृष्ट्वा विधानतः ॥६
निकाल सूर्यमभ्यर्च्य सलिलाञ्जलिदानतः ।
वैदिक कर्म कर्तव्य वेदाध्ययनपूर्वकम् ।।१०
ब्रह्मचर्येण तपसा पूजनीयो हरिः सदा ।
निपिद्ध वर्जनीय स्याद् एमभापणादिकम् ॥११
साधुभिः सह वस्तव्य विष्णुभक्तिपरः सदा ।
नपः कस्यचित्कार्यः सर्वेपा सितमाचरेत् ।।१२
इज्याध्ययनदानानि सदा कार्याणि ते सुत ।
एव पित्रा समादिष्टो मार्कण्डेयो मुनीश्वरः ।।१३
चचार धर्म सतत सदा सचिन्तयन्हरिम् ।
मार्कण्डेया महाभागो दयावान्धर्मवत्सलः ॥१४
वह होनहार बालक शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा के समान ही वृद्धि
प्राप्त करने लगा था। फिर जब पांचवें वर्ष में प्रवेश करने लगा तो
मृरण्डु महर्षि ने उस बालक वा उपनयन सस्कार करा दिया था !
हे यिप्रेन्द्र ! उपवीत होजाने पर उसको वैदिक कर्म सहिता की
शिक्षा का आरम्भ कर दिया था । ऋपि ने अपने उस पुत्र से कहा-हे
पुत्र ! ब्राह्मणो को जब भी देवो उसी समय मे उनको समादर पूर्वक
प्रणाम अवश्य ही करनी चाहिये ।।६। तीनो कालो मे भी सूर्य को अर्थ
वेदो के अध्ययन आदि के मैदिक वर्मों को करना चाहिये 10 ब्रह्मचर्य
प्रत को धारण कर तपश्चर्या के द्वारा सर्गदा विष्णु का पूजन करना
परमावश्यक है । दृष्ट पुरुपो के साथ सम्भापण करने आदि निपिद्ध
कमों का परित्यार देना चाहिये ॥११॥ भगवान् विष्णदेव के जो
नारद पुराण] भक्त सायुज न हो मदा उनके ही साथ मे रहार सत्मा मरे-विमी से भी द्वेष भाव न रवये और सदा सब जानियों के हित या सम्पादन करना चाहिये ॥१२॥ मृकण्टु ऋषि ने कहा-हे पुत्र । सद, नेदों का पाट-यतो का यजन और दान करत रहना चाहिये । वपने पूज्य पिताजी को इस प्रकार मे आशा प्राप्त करके मुनीश्वर माण्डेयजी ने मर्नदा भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुये धर्म का पूर्ण लाचरण करना थारम्भ कर दिया था । वह मारंन्डेय महा भाग्यवान् और दयावान तथा धर्म वत्सल हुये थे ॥१३॥१४|| आत्मवान्मत्यसन्धश्च मार्तण्डसदृशप्रम । वशी शान्तो महानानी सर्वतत्त्वार्यकोविद ॥१५ तपश्चचार परममच्युतप्रीतिकारणम् । आराधितो जगन्नायो मार्कण्डेयेन धीमता ।।१६ पुराणहिता का दत्तवान्वरमच्युत । मार्कण्टेयो मुनिस्तम्मान्नागयण इति स्मृत ।।१७ चिरजीवी महाभक्तो देवदेवस्य चक्रिण । जगत्येकार्णवीभूते स्वप्रमाव जनाईन ।।१८ तस्य दर्शयितु विप्रास्त न महृतवान्हरि। मृकण्डतनयो धीमान्विष्णुभक्तिसमन्वित ॥१६ तस्मिन्जले महाघोरे स्थितवान्छीर्णपणवत् । मापंण्डेय स्थितस्तारद्यावच्छेते हरि स्वयम् ॥२० तम्य प्रमाण वक्ष्यामि कालस्य वदत शृणु । दशभि पञ्चभिश्चय निमप परिकीर्तिता ॥२१ काठा तत्यिशतो या क्ला पद्मजनन्दन । ततिशतो क्षणो ज्ञेयस्तै पभिघंटिया स्मृता ॥२२ वह मायन्ठेय मुनि वह ही आत्मनानी सत्यप्रतिज्ञा करने वाल मूर्य के तुरय वालिम सम्पन्न वशी और इन्द्रियों को जीतने वाल- महान् जानी और समस्त तत्त्वा को समझ लेने में परम चतुर हुये थे १०० [ नारद पुराण ॥१५॥ इसके पश्चात् परम मेधावी उस महा मुनि मार्कण्डेयजी ने अगवान् अच्युत देव को प्रसन्न करने के लिये तपश्चर्या करके जगत् के स्वामी भगवान विष्णु को समाराधना प्रारम्भ करदी थी ॥१६॥ उस समय में भगवान ने उनको प्रसन्न होकर एक पुराण की सहिता की रचना करने का वरदान प्रदान किया था। इसी कारण से यह महा- मुनि माकंडेय नारायण नाम से कहे जाते हैं ॥१७॥ यह चिरञ्जीवी हैं और देवो के भी देव भगवान विष्णुदेव के परम भक्त हैं । हे विप्रो। इस समस्त विश्व के महा प्रलय के काल में सागरस्वरूप मे केवल जलाकार हो जाने पर भी जनार्दन श्री हरि भगवान ने उनको अपना प्रभाव दिखा देने की इच्छा से सधृत नहीं किया या अर्थात् अन्य सबके समान अपने में लीन नहीं किया था। बुद्धि सम्मन्न विष्णु के भक्त मृकडु के पुत्र उस महा पोर जत मे एक टूटे हुये पत्र के ही समान रहे थे। जिस समय तक भगवान् श्री हरि वहा पर शेप शय्या पर शयन करते रहे थे तभी पर्यन्त महामुनि मार्कण्डेय भी वहा पर स्थित होकर विद्यमान रहे थे ।।१८।१६॥२०॥ उस काल का परि- माण मैं आपको बतलाता है । पन्द्रह वार निमिष अर्थात् पलक भारने के समय की एक रात होती है। हे नारद । तीस पाठाओ की एक कना हुआ करती है और तीम कला का एक क्षण होता है और छ क्षणो को एक घडी (घटिवा) हुआ करती है ॥२१॥२२॥ तदद्वयेन मुहूर्त स्याद्दिन तस्विशत भवेत् । निशदिनभवेन्मास पक्षद्वितयसयुत ॥२३ ऋतुर्मासद्वयेन स्यात्तलयेणायन स्मृतम् । तवयेन भवेदब्द स देवाना दिन भवेत् ।।२४ उत्तर दिवस पाहू रानिय दक्षिणायनम् । मानुपेणच मासेन पितृणा दिनमुच्यते ॥२५ तस्मात्सूर्येन्दुसयोगे ज्ञातव्य पल्पमुत्तमम् । दिव्यपसहन्न दशभिर्देवत युगम् ॥२६ नारद पुराण ] देवे युगसहस्र द्वे ब्राह्म. कल्पो तु तो नृणाम् एकसप्ततिसय्यातदिव्यमन्वन्तर युगे. ॥२७ चतुई शभिरेतैश्च ब्रह्मणो दिवस मुने । यावत्प्रमाण दिवस तावद्रावि प्रकीर्तिता ।।२८ दो घडियो के समय को एक मुहूर्त काल कहा जाता है और तीस मुहूर्तों का एक दिन होता है तथा तीस दिन का एक मास होता है जिस मास में १५-१५ दिन के कृष्ण और शुक्ल दो पक्ष हुआ करते हैं ।।२३।। दो मास की एक ऋतु हुआ करती है ।नीन ऋतुओं का एक अयन होता है तथा दो अयनी का जिसका नाम उत्तरायण और दक्षिणायन है एक वर्ष हुआ करता है । यही वर्ष देवताओ का एक दिन हुआ करता है जिसको दिव्य दिन के नाम से कहा जाता है ।।२४।। उत्तरग्यण को देवताओ का दिन कहा जाता है और दक्षिणा- यन को रात्रि कहा करते हैं । जो मनुष्यो का एक मास होता है वह पितृगण का एक दिन होता है ॥२५|| इससे उत्तम कल्प वही वहा जाता है जिससे चन्द्र और सूर्य का सयोग अमावस्या को होता है । इस अमावस्या के दिन मे श्राद्धतया पिंडो का दान उत्कृष्ट माना जाता है । बारह सहस्र देव वर्षों का एक दैव युग माना जाया करता है ॥२६।। दो सहस्र देव युगो का मनुष्यो वा ब्राह्म कल्प हुवा करता है । जिस समय मे इस्हत्तर दिव्य युग ( मनुष्यो की चतुर्युगो ) न्यनीत होजाया करती है तो उस समय मे एक मन्वन्तर हुआ करता है ॥२७॥ हे मुनिवर । ऐमे जब चौदह मन्वन्तर समाप्त होजाते हैं तव ब्रह्माजी का एक दिन होता है और जितना वडा दिन होता है उतनी रात्रि भी हुआ करती है ॥२८॥ नाशमायाति विप्रेन्द्र तस्मिन्काले जगत्ययम् । मानुपेण सहलेण यत्प्रमाण भवेच्छणु ॥२६ चतुर्युगसहस्राणि ब्रह्मणो दिवस मुने ।
१०२ [ नारद पुराण तद्वन्मासो वत्सरश्न ज्ञेयस्तस्यापि वैधस ॥३० पराद्ध द्वयकालस्तु तन्मतेन भवेद्विजा । विष्णोरहस्तु विज्ञेय तावदानि प्रकीर्तिता ॥३१ मृकण्डुतनयस्तावस्थित सजीर्णपणवत् । तस्मिन्धोरे जलमये विष्णुशक्तय पढ़ हित । आत्मान परम ध्यायन्स्थितवान्हरिसन्निधौ ॥३२ अथ काले समायाते योगनिद्राविमोचित । सृष्टवान्ब्रह्मरूपेण जगदेतच्चराचरम् ॥३३ सहृत तु जल वीक्ष्य सृष्ट विश्व मृकण्डुन । विस्मित परमप्रीतो ववन्दे चरणो हरे ॥३४ सिरस्जञ्जलिमाधाय मार्कण्डेयो महामुनि । तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभि सदानन्दकविग्रहम् ॥३५ हे विप्रेन्द्र । उसी समय मे यह त्रिभुवन विनष्ट हो जाया करता है । अब मनुष्यों के सहन के प्रमाण से पूरा वृत्तान्त श्रवण करो ॥२॥ है मुनिवर ! जिस प्रकार से एव सहस्र चतुर्थियो का ब्रह्माजी का एक दिन होता है वैसे ही ब्रह्माजी का मास और वर्ष भी समझ लेना चाहिये ॥३०॥ हे द्विजगणो । ऐमे दो पराधं (५०) को ब्रह्माजी की आयु हुआ परतो है । विष्णु भगवान का यह एक दिन होता है । इतनी बडी विष्णु देव की रात्रि कही जाती है ॥३१॥ मुण्ड महर्षि वे पुत्र मार्कण्डेयजी भगवान् विष्णु की शक्ति से बलशाली होकर एक जीणं पात्र वै तुल्य इतन समय तक उस परम घोर जलमय स्थान म रहे थे और घराचर परमात्मा का ध्यान परते हुये भगवान् विष्णु के ही समीप म मामन विराजमान रहे ये ॥३२॥ फिर जब भगवान् विष्णुदव गमय में समाप्त होने पर अपनी उम योग निद्रा से समुत्थित हो तो उग समय में उन ही ब्रह्मा का स्वरूप धारण किया और इस परापर संसार की रचापी पी ॥३३॥ उस समय में उस महान नारद पुराण ] १०३ विस्तृत जल को सहत हुआ और इस सम्पूर्ण विश्व को रचा हुमा देख कर मृकण्डु महर्षि के पुत्र मार्कण्डेय ऋषि ने देखा तो इनको बहुत विस्मय उत्पन्न हो गया था और प्रसन्न होकर इनने श्री हरि के चरणो की वन्दना की थी ॥३४।। मुनि श्रेष्ठ मार्कण्डेयजी ने अपना मस्तक झुकाकर और हाथ जोडकर उस सच्चिदानन्द भगवान् विष्णुदेव का परम अभीए वचनो के द्वारा स्तवन करने लगे थे ॥३॥ सहस्रशिरसं देव नारायणमनामयम् । वासुदेवमनाधारं प्रणतोऽस्मिजनार्दनम् ॥३६ अमेयमजर नित्य सदानन्दकविग्रहम् । अप्रतर्यमनिर्देश्य प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ।।३७ अक्षर परम नित्य विश्वाक्ष विश्वसम्भवम् । सर्वतत्त्वमय शान्त प्रणतोऽस्मि जनार्दनन् ॥३८ पुराण पुरुष सिद्ध सर्वज्ञानकभाजनम् । परात्परतर रूप प्रणतोस्मि जनार्दनम् ॥३६ पर ज्योति पर धाम पवित्र परम पदम् । सकरूपं परम प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ।।४० त सदान्दनचिन्मात्र पराणा परम पदम् । सर्व सनातन्ध श्रेष्ठ प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ४१ सगुण निर्गुण शान्त मयाऽतीत सुमायिनम् । अरूप बहुरूपंत प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ॥४२ यन तद्भगवान्विश्व सृजत्यवति हन्ति च । तमादिदेवमीशान प्रणतोऽस्मि जनार्दनम् ।।४३ महामुनि मार्कण्डेयजी ने कहा-मैं समस्त ससार मे व्यापक होने के कारण सहस्रो शिर वाले वनामय स्वरूप अपने ही आधार पर स्थित भगवान जनार्दन देव को सादर प्रणाम करता हूँ ॥३६॥ जो भगवान् जनार्दन बजर-अप्रमेय-नित्य-सर्वदा आनन्द से परिपूर्ण- १०४ [ नारद पुराण तर्क के अविषय और निर्देश करने के अयोग्य है उनकी सेवा मे मेरा प्रण' म अर्पित है ॥३७।। जो भगवान् अच्युत परम नित्य और इस विस्तृत विश्व के आधार है और यह सम्पूर्ण विश्व जिससे समुत्पन्न हुआ है उन सर्वतत्वो से परिपूर्ण परम शान्तिमय भगवान् जनार्दन को मैं प्रणाम करता है ।।३८|| परम पुराण पुरुष-समस्त ज्ञान के एक मात्र आधार-सिद्धि-उत्कृष्ट से भी परमोत्कृष्ट स्वरूप वाले भगवान् को मैं नमस्कार करता हूँ ॥३६॥ परम श्रेष्ठ ज्योतिर्मय स्वरूप वाले, परम धाम वाले, परमोत्कृष्ट पद से समन्वित-सर्वशस्वरूप जनादंग भगवान की सेवा मे मैं प्रणाम करता हूँ ।।१०।। सच्चिदानन्द भगवान, बडे से भी बडे, रक्षा करने वाले, सर्वस्वरूप, सनातन श्रेष्ठ भगवान् को मैं सादर प्रणाम करता हूँ ॥४१॥ ब्रह्मा, विष्णु और शिव के स्वरूप मे स्थित सगुण ब्रह्म के स्वरूप में निपुण पायातीत, भाम शान्त और मायावान् और रूप रहित तथा अनेक स्वरूपो से युक्त भगवान जना- दंन को मैं प्रणाम कपरा हूँ ॥१३॥ परेश परमानन्द शरणागदवत्सल । प्राहि मा करुणासिन्धो मनोतीत नमोऽस्तु ते 11४४ एव स्तुवन्त विप्रेन्द्र मार्कण्डेय जगदगुरुम् । उवाच परया प्रीत्या शखचक्रगधारः ॥४५ लोके भागवता ये च भगवद्भक्तमानसाः । तेपा तुष्टो न सन्देही रक्षाम्येताश्च सर्वदा ॥४६ यहमेव द्विजश्रय नित्य प्रच्छन्नविग्रहः । भगवद्भक्तरूपेण लोकानक्षामि सर्वका 180 मिलक्षणा भागवता जायन्ते केन कम्मणा। एतदिच्छाम्पह श्रोतु कौतूहलपरी यत 11४५ लक्षण भागवाताना शृणुप्त मुनिसत्तम। वक्त तेपा प्रभाव हि शक्यते नान्दोटिभः ॥४६ नारद पुराण ] १०५ जो महान् शक्ति सम्पन्न इस सम्पूर्ण विश्व की रचना किया करते हैं, इसका परिवर्तन एव रक्षण करते हैं और अन्त मे इसका विनाश भी किया करते हैं उन आदि देव सर्वोपरि विराजमान भगवान् विष्णु को प्रणाम करता हूँ ॥५३॥ हे परमात्मन् ! हे परमानन्दमय परमेश्वर ! हे शरण मे समागतो पर प्यार करने वाले ! आप मन वाणी के अगोचर है । हे करणा के सागर ! आप मेरी रक्षा गरिए- मैं आपकी सेवा मे अपना सादर प्रणाम् अपित करता हूँ ॥४४॥ जिस समय मै इस रीति से जगत् के गुरु विप्रेन्द्र मार्कण्डेय जी ने स्तवन किया था उस ममय में शख चक्र गदा आयुधो के धारण करने वाले भगवान उन से अत्यधिक प्रसन्न होगर कहने लगे थे ।।४५॥ श्रीभगवान ने कहा-हे द्विजथेठ ! इस जगतीतल में भगवान के चरणो की सेवा मे अपना मन रमाते हैं उन पर मैं विशेष प्रसन्न रहा करता हूँ और सर्वदा उनकी रक्षा करने की मुझे चिन्ता रहती है। मैं स्वय अपने स्वरूप को छिपाकर एक भगवान के भक्त के रूप में होकर सदा मनुष्यो की सुरक्षा किया करता हूँ ॥४६-४७॥ श्री मार्कण्डेयजी ने भगवान से पूछा था कि भगवान के भक्तो का कैसा स्वरूप होता है और विन २ कर्मों के द्वारा उनकी पहिचान हुआ करती है ? मुझे हृदय मे इस बात का वडा भारी कुतूहल है । आप ही के मुखारविन्द से मैं इस विषय की जिज्ञासा को श्रवण कर के शान्त करना चाहता हूँ ।।१८।। श्री भग- वान ने कहा-हे मुनि सत्तम । आपको ऐसी ही अभिलापा है तो अब आप मुझ से भगवद्भक्तो के लक्षणो को सुनिये । वैसे भगवान् के भक्तो का प्रभाव ऐसा है जो करोडो वर्षों में भी वर्णन नहीं किया जा सकता है ॥४६॥ ये हिता. सर्वजन्तूना गतासूया अमत्सरा. । वशिनो निस्पृहाः शान्तारते वै भागवतोत्तमा, ।।५० कर्मणा मनसा वाचा परपीडा न कुर्वते ।
१०६ [ नारद पुराण अपरिग्रहशीलाश्च ते वै भागवता स्मृता ॥५१ सत्कथाश्रवणे येपा वर्तते सात्त्विकी मतिः । तद्भक्तविष्णुभक्ताश्च ते वै भागवतोतमा ॥५२ मातापित्रोश्च शुश्रूषा कुर्वन्ति ये नरोत्तमा । गङ्गाविश्वेश्वरधिया ते वे भागवतोत्तमा ॥५३ ये तु देवार्चनरता ये तु तत्साधका स्मृता । पूजाहृष्ट्वा नुमोदन्ते ते वै भागवतोत्तमा ॥५४ व्रतिना च यतीना च परिचर्यापराश्च ये। वियुक्तपरनिन्दाश्च ते वै भागवतोत्तम ॥५५ सर्वेपा हितवाक्यानि ये वदन्ति नपोतमा ये गुणग्राहिणो लोके ते नै भागवता स्मृता जो भगवद्भक्त होते हैं वे सर्वदा समस्त प्राणियों के हित वा कायं विया करते हैं । उनमे कभी भी असूया और मात्सर्य दोष नाम मान को भी नहीं होता है, उनका चित्त सदा उनके वश में रहा करता है। भगवान के भक्त कभी भी कोई इच्छा नही रक्षा करते है और शम परायण हुआ करते हैं। ऐसे ही लोगो की भगवद्भक्तो में परम घेछ समझ लेना चाहिए ।।५०॥ जो अपने मन से, वचना से और कर्मों के द्वारा कभी भी दूसरो को पीडा नही दिया करते हैं और जो रिसी के द्वारा हुए दान को ग्रहण नहीं किया बरते हैं वे सच्चे और उत्तम भगवान के भक्त होते हैं ।।५१।। जिन लोगा में सत्वगुण वाली बुद्धि होती है और वह सदा परम थेछ भगवान की कथा का श्रवण करने में ही लगी रहा करती है ये विष्णु के चरणो मे ही भक्ति किया बरते हैं तथा भक्तो वा महान् समादर उनरे हृदय मे सदा रहा करता है ऐसे लोग उत्तम भगवान से भक्त कहे जाया करते हैं ॥५२॥ जो लोग अपनी माता यो गला की बुद्धि से और पिता की मदाशिव की बुद्धि से निर- न्तर सेवा दिया मरते है वे परम भगवान ये भक्त होते हैं ।।५३।।
नारद पुराण ]
१०७
जो लोग सदा देव-यजन करने में सलग्न रहा करते हैं और देवार्चन
करने की साधना रखते हैं और पूजा का सर्वदा अनुमोदन क्यिा परत
हैं उनकी गणना भी परम श्रेष्ठ भक्तो में होती है ॥५४॥ जिनका समय
सदा प्रतधारियो एव सन्यासियो की सेवा में व्यतीत हुआ करता है
और भूल कर भी दूसरो को निन्दा नही दिया करते हैं उनको परम
श्रेष्ठ भगवान के भक्तो म समझना चाहिए ॥५५॥ जो सदा सव मे
हित की ही चर्चा क्यिा करत हैं तथा जो प्राणियो का आदर सत्कार
करने वाले होकर गुणो का ग्रहण किया करते हैं वे लोग भगवद्भक्त
कहे जाया करने है ।।५६।।
आत्मवत्सर्वभूतानि ये पश्यन्ति नरोत्तमा ।
तुल्या शपु मिपुते व मागवतोत्तमा ॥५७
धम्मशास्त्रप्रवक्तार सत्यवाक्यरताश्च ये ।
सता शुश्रू पयो ये च ते वै भागवतोत्तमा ॥५८
व्याकुर्वते पुराणानि तानि श्रृण्वन्ति ये तथा ।
तद्वक्तरि च भक्ता ये ते वै भागवतोत्तमा ।।५६
ये गोग्राह्मणशुश्रू पा कुर्वते सतत नरा ।
तीर्थयात्रापरा ये च ते वै भागवतोतमा ॥६०
अन्येपामुदय दृष्टवा येऽभिनन्दन्ति मानवा ।
हरिनामपरा ये च ते वै भागवतोत्तमा ॥६१
आरामारोपणरतास्तडागपरिरक्षका ।
कासारफूपकारस्ते वै भागवतोत्तमा ॥६२
ये वै तडागकर्तारो देवसद्मानि कुर्वते।
गायत्रीनिरता ये च ते वै भागवतात्तमा ॥६३
जो मनुष्य प्राणीमात्र को अपने ही समान समझ कर वैसा ही
व्यवहार किया करते हैं तथा शत्रु मित्र भाव उनरे हृदय में नहीं होता
उनकी दृष्टि म शत्रु हो चाहे मित्र हो एक समान होते हैं और कभी भी
१०८ [ नारद पुराण किसी से राग-द्वेप का भाव नहीं रखते है उनको परम श्रेष्ठ भक्त सम- झना चाहिए ।।५७।। जो लोग धर्मशास्त्रो की व्याख्या किया करते हैं, सदा सत्य-भापण करने वाले और सत्पुरुषों की सेवा में तत्पर रहा करते हैं वे मेरे श्रेष्ठ भक्त कहे जाया करते हैं ॥५८11 पुराणो की व्याख्या जो स्वय किया करते है तथा श्रवण किया करते है तथा पुराणो की कथा का प्रवचन करने वाले मे परम श्रद्धा का भाव रखते है वे तोग श्रेष्ठ भक्त होते हैं ॥५६॥ जो मनुष्य सर्वदा गो और विप्रो की सेवा किया करते है और तीर्थो की यात्रा किया करते है उनको श्रेष्ठ भग- वद्भक्त जानना चाहिए ॥६०। जो सदा श्री हरि नाम का कीर्तन करने में सलग्न रहते हैं तथा जिनका मन दूसरो की अभिवृद्धि देखबर परम प्रसन्न हुआ करता है वह परम श्री भगवान् का भक्त होता है ॥६१॥ जो उद्यान तगाया करते हैं तालाव और बावडी दवा कर उनका निर्माण कराया करते हैं वे श्रेष्ठ भक्त होते हैं ।।६२६॥ जो सरो- बरी का निर्माण कराते हैं तथा देवालयो का निर्माण वराते हैं तथा देवालयो का कराते हैं एव जो गायनी देवी की एवं उपासना में परायण रहते हैं वे मेरे परम थे। भक्त हुआ करते हैं ॥६॥ येऽभिनन्दन्ति नामानि हरेः श्रुत्वाऽतिहपिता.। रोमान्चितशरीराश्च ते वै भागवतोत्तमाः ॥६४ तुलसीकानन दृष्टवा ये नमस्कुर्वते नरा.। तत्काधाद्वितकण्ठा येते व भागवतोत्तमाः ॥६५ तुलसीगन्धमाघ्रायसन्तोप कुर्वते तु ये । तन्मूलमृतिका ये च ते वै भागवतोत्तमा ॥६६ आयमाचारनिरतास्तथैवातिथिपूजका । ये च वेदार्थवक्तारस्ते वै भागवतोत्तमा ॥६७ शिवप्रिया. शिवासत्ता. शिवपादाने रताः। जाप नारद पुराण ] जड वी विपुण्ड्रधारिणो ये च ते नै भागवतोत्तमा ॥६८ व्याहरन्ति च नामानि हरे शम्भोर्महात्मन । रुद्राक्षालकृता ये च ते नै भागवतोत्तमा ॥६६ ये यजन्ति महादेव तुतुभिर्वहुदक्षिन । हरिं वा परया भक्तया ते ने भागवतोत्तमा ७० जिनका मन भगव नामो का कीर्तन श्रवण करके उसका अभि- नन्दन किया करते हैं और भगवान के नामोचारण करने में तथा नाम श्रवण करने मे रोमाञ्च हो जाया करते हैं व भगवान के भावुक भक्त कहे जाते है ॥६४।। जिनके कण्ठ में सदा तुलसी की कण्ठी या माला रहती है और जो तुलसी के वन को देखकर परम प्रसन्नता का अनु- भव करते हुए प्रणाम करते हैं उनका श्रष्ठ भगवद्भक्त समझना चाहिये ॥६५।। जो तुलसी की मुगन्ध को तथा तुलसी पौधा की मृत्तिका को गन्ध को सूधकर परम सन्तोष का लाभ प्राप्त किया करते वे मेरे परम श्रेष्ठ भक्त होते हैं ॥६६।। जो सदा अपने आश्रम के नियमो का पूर्णतया परिपालन किया करते है जिस भी आश्रम में हो समागत अतिथिया का आतिथ्य एव अर्चन परम प्रसन्न मन मे किया करत है तथा वदार्थ का कथन किया करते हैं वे श्रेष्ठ भक्त होते हैं ॥६॥ जो भगवान शिव की भक्ति करते हुए उनके परम प्रिय होत है तथा शिव के चरणो की पूजा मे आसक्त और सदा सलग्न रहते हैं और जो त्रिपुण्ड धारण किया करते हैं वे मेरे परम भक्त कहे जात है क्यो कि शिव की कृपा के विना भक्ति नहीं हुमा करती है अत शिवभाा मेरे सच्चे स क होते हैं ।।६८जो विष्णु या शिव नामो का कीर्तन किया करते है और रद्राक्ष माला धारण किया करते है वे मरे श्रेष्ठ भक्त होते हैं ॥६॥। जो विविध भांति की विपुल दक्षिणा वाले यज्ञा वा यजन कर श्री शकर भगवान का अथवा विष्णु का भक्ति भाव से पूजन किया करते हैं वे मेरे श्रेष्ठ भक्त होत हैं ॥७० ११० [ नारद पुराण विदितानी च शास्त्राणि परार्थ प्रवदन्ति ये। सर्वत्र गुणभाचो ये ते वै भागवताः स्मृताः ॥७१ शिवे च परमेशे च विष्णौ च परमात्मनि । समबुद्धघा प्रवर्त्तन्ते ते वै भागवताः स्मृताः ॥७२ शिवाग्निकार्यनिरताः पञ्चाक्षरजपे रता। शिवध्यानरता ये च ते वै भागवतोत्तमा. ॥७३ पानीयदाननिरता येऽन्नदानरतास्तथा । एकादशीव्रतरता ते वै भागवतोत्तमाः ॥७४ गोदाननिरता ये च कन्यादानरताश्च ये। मदयं कम्मकारस्ते वै भागवतोत्तमाः ।।७५ एते भागवता विप्र केचिदन प्रकीर्तिताः। मयाऽपि गदितु शक्या नाब्दकोटिशतरपि ॥७६ तस्मात्वपि विवेन्द्र सुशीलो भव सर्वदा। सर्वभूताश्रयो दान्तो मैत्रो धर्मपरायणः ।।७७ जो समस्त शास्त्रो के तत्वो को जान कर अन्य लोगो को सम- माया करते हैं और सर्वत्र गुणो का भेवन करने वाले हैं वे परम भाग- कहे जाया परते है ॥७१॥ जो परमेश शिव और परमात्मा विष्णु इन दोनो मे कोई भेद बुद्धि न रखकर अभेद भावना से इन दोनो की उपा- मना किया धरते हैं वे मेरे सच्चे भक्त होते हैं ॥७२॥ जो "नमः शिवाय" पञ्चाक्षरी मन्त्र के जाप के द्वारा शिव की तुष्टि के लिये हवन पिया धरते हैं तया पश्चाक्षरी उपयुक्त मन्त्र का जाप किया परते है और भगवान शिव के ध्यान में मग्न एव सदा सलग्न रहा परते है ये प्ठ भक्त होते है ।।७३।। जो सदा अन्न और जल का दान दिया परते हैं तथा एकादशी तिपिका प्रतापवाम विना करते है ये मेरे परम येष्ट मत होते हैं ॥७॥ जो गौमो का दान और पन्याओ के दान मिया परते है राधा ऐ हो अनेर गुम पमं घेवस् भगवान की नारद पुराण ] १११ प्रीति के लिये ही किया करते हैं वे भगवान के परम श्रेष्ठ भक्त कहै जाया करते ।। ७५ ॥ हे विप्र । यहाँ पर हमने सक्षेप में कुछ भग- वद्भक्तो के लक्षणों का वणन पर दिया है किन्तु वैसे तो भक्तो के लक्षण इतने अधिक है कि करोडो वर्षों में भी उनका वर्णन नही किया जा सकता है ।।७६।। हे विप्रथेष्ठ । इसलिये मैं तुमको यही उपदेश देता हूँ कि तुम को भी सदा सुशील रहना चाहिए। समस्त प्राणियो का आश्रय दान करो। अपनी इन्द्रियो को कुमार्ग मे गमन करने से उनका दमन करते रहो । सब के साथ मंत्री का भाव एव व्यवहार रक्खो तथा सर्वदा धर्म मे तत्पर रहना चाहिये ।।७।। पुनयुगान्तपर्यन्त धर्म सर्व समाचरन् । मन्मूर्तिध्याननिरत पर निर्वाणमाप्स्यसि ॥७८ एम मृकण्डपुत्रस्य स्वभक्तस्य कृपानिधि । दत्त्वा वर स देवेशस्तवातरधीयत ७६ मार्कण्डेयो महाभागो हरिभक्तिरत सदा। चचार परम धर्ममोजे च विधिवन्मख ८० शालग्रामे महाक्षेत्रे तताप परम तप । ध्यानक्षपतिकर्मा तु पर निर्वाणमाप्तवान् ॥८१ तस्माज्जन्तुपु सर्वेषु हितकृद्धरिपूजक । ईप्सित मनसा यद्यत्तत्तदाप्नोत्यसशयम् ॥८२ एतत्सर्ग निगदित त्वया पृष्ट द्विजोत्तम । भगवद्भक्तिमाहात्म्य किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ।।८३ मुम्हारा कर्तव्य है कि इस महा प्रलय होने के समय तक सभी पर्म धर्म के अनुकूल करके मेरे ध्यान म मग्न रहा करो। तुम्हारा मोक्ष निश्चित रूप से हो जायगा । इसमे तनिक भी सशय नहीं है ॥७८।। इस रीति से देवेश्वर भगवान मृषण्डु महर्षि के पुत्र माकडेय को सदु- पदेश प्रदान करके उसी समय में वही पर अ तर्हित हा गय घे ॥७६|| ११२ उसी समय से महान भाग्य वाले मार्कण्डेय ऋपि भी सर्वदा श्रीहरि की भक्ति में लीन होकर परम धर्म कर्म का पालन करते हुए अनेक प्रकार के यज्ञो के द्वारा भगवान का यजन करते रहा करते है ॥५०॥ मार्क- ण्डेय मुनि ने शालग्राम नामक महान तीर्थ मे जाकर अत्यन्त उग्र तप. श्चर्या की थी और निरन्तर भगवान के ध्यान मे मग्न रहते हुए अपने समस्त कमों को क्षीण करके वे परम शान्ति तथा मोक्ष की प्राप्ति करेंगे 11८११॥ इम कथा से यह सिद्ध हा जाता है कि जो कोई भी भगवान का भक्त भगवान की पूजा किया करता है और समस्त प्राणियो का हित चाहता है वह अपने हृदय में जो भी कुछ मनोरथ करता है उसके वे सभी मनोरथ सिद्ध होजाया करते है ॥२॥ श्री नकदेव जी ने कहा- हे द्विजोत्तम । आपके प्रश्न करने पर हमने यह म्पूर्ण भगवान का माहात्म्य वर्णन कर दिया है । अव और आप मुझ । क्या पूछने की इच्छा रखते हैं ॥८॥ प्रयाग और गंगाजी माहात्म्य वर्णन। भगवदभक्तिमाहात्म्य श्रुत्वा प्रीतस्तु नारद । पुन पप्रच्छ सनक ज्ञानविज्ञानपारगम् ॥१ क्षेत्राणामुत्तम क्षेग तीर्थाना च तथोत्तमम् । पराया दयया तथ्य यूहि शास्त्रार्यपारग ॥२ शृणु ब्रह्मन्पर गुह्य सर्वसपत्कर परम् । दुस्वप्ननाशन पुण्य धयं पापहर शुभम् ॥३ श्रोतव्य मुनिभिनित्य दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वरोगप्रशमनमायुनंदनवारणम् ॥४ क्षेत्राणामुत्तम क्षेश तीर्थाना च तयोत्तमम् । गद्गायमुनयोर्योग वदन्ति परमपंय ॥५
नारद पुराण ]
११३
सितासितोदक तीथं ब्रह्माद्या सनदेयता. ।
मुनयोमनवश्चैव सेवन्ते पुण्यकाक्षिण ॥६
गङ्गा पुण्यनदी जेया यतो विष्णुपदोदभवा ।
रविजा यमुना ब्रह्म स्तयोर्योग शुभावह ॥७
श्री सूतजी ने कहा-भगवान की भक्ति के इस माहात्म्य का
श्रवण पर नारदजी को अत्यधिक प्रसन्नता हुई और फिर ज्ञान तथा
विज्ञान के महान् पारगामी विद्वान सनकजी मे उन्होंने पुन प्रश्न किया
था । श्री नारदजी ने कहा---हे शास्त्रो के तत्वार्थों में पारङ्गत मुनि-
वर । अब आप मुझ पर परमानुग्रह व रके यह वताइये कि क्षेत्रो में
सर्वोत्तम क्षेत्र कौन सा है ।।१.२॥ थी सनक जी ने कहा-
है ब्रह्मन ।
अव मैं आपके सामने यही बतलाता हूँ गो क्षेत्रो मे और तीर्थों मे
सर्वोत्तम है । यह परम गुह्य, सभी प्रकार की सम्पत्तियो का प्रदान
करने वाला, दु स्वप्नो का विनाशक, परम पुण्य पूर्ण, धर्म से युक्त,
पापों का अपहरण करने वाला, अत्यधिक शुभ, दुष्टग्रहो को दूर भगा
देने वाला, मुनियो के श्रवण करने के योग्य समस्त व्याधियो को शात
करने वाला, आयु की वृद्धि करने वाला जो परमोत्तम तीथ एव क्षेत्र,
है उसका सुनिये । परमोत्तम पिगण उसको गङ्गा यमुना का सङ्गम
प्रयाग कहा करते हैं ॥३-५।। यह ऐसा महान तीर्थ है जहाँ पर गङ्गा
का जल तो सफेद है और यमुना का जल आधित स्प वाला है। पुण्य
की अभिलापा रखने वाले ब्रह्मा आदि समस्त देववृन्द, मुनिगण और
मनुजो का समुदाय सभी लोग सदा इसी क्षेत्र एव सर्वोत्तम महान्
तीर्थ का सेवन किया करते हैं ।।६।। भागीरथी गङ्गाजी को परम
पुण्यमयो सरिता समझनी चाहिए क्यो कि साक्षात् गावान् विष्णु के
परम पावन चरणो से प्रकट हुई है। यमुना श्री सूर्यदव की पुत्री हैं।
इसीलिये इन दोनो नदियो या यहाँ पर सङ्गम जो है वह परम कल्याण
घरने वाला है ॥७॥
११४
[ नारद पुराण
स्मृतातिनाशिनी गङ्गा नदीना प्रवरा मुने ।
सर्वपापक्षयकरी सर्वोपद्रवनाशिनी ।।
यानि क्षेत्राणि पुण्यानि समुद्रान्ते महातले।
तेषा पुण्यतम ज्ञेय प्रयागाख्य महामुने १६
इयाज वेधा यज्ञन यत्र देव रमापतिम् ।
तथैव मुनय सर्ने चक्र श्च विविधान्मखान् ॥१०
सर्वतीर्थाभिषेकाणि यानि पुणयानि तानि ।
गङ्गाविन्द्वभिपेकस्य कला नार्हन्ति पोडशीम् ॥११
गङ्गा गङ्गति यो याद्योजनाना शते स्थित
सोऽपि मुच्येत पापेभ्य किमु गङ्गाभिषेकवान् ।।१२
विष्णुपादोद्भवा देवी विश्वेश्वरशिर स्थिता।
ससेन्या मुनिभिदेंगे कि पुन पामरैर्जन ॥१३
यसकत ललाटे तु ध्रियते मनुजोत्तमै ।
तव नेत्र विज्ञेय विध्वर्भाध समुज्वलत् ।।१४
हे मुनिवर 1 गङ्गा की ऐमी महिमा है कि यह स्मरण मात्र
भरने ही से सम्पूर्ण पीडा को शान्त कर दिया करती है। यह समस्त
नदियो मे परम श्रेष्ठ नदी है और सभी प्रकार के महापातको को
क्षीण कर दिया करती है तथा सव उपद्रवा को दूर भगा देने वाली
है ॥८॥ हे महामुने । समुद्र पर्यन्त पृथ्वी पर जो भी पुण्य क्षेत्र हैं उन
सब में प्रयाग परम पुण्यमय एव सर्वश्रेष्ठ क्षेत्र है ।।६। यह वह पवित्र
तीर्थ स्थल है जहा पर ब्रह्माजी ने स्पय यज्ञो वे यजन के द्वारा भग.
वान् विष्णुदेव या अर्चन किया है और गौर अन्य सय मुनिगण ने भी
इस स्थल में भनेर प्रगर वे बहुत-मे यज्ञादि या अनुष्ठान किया है
॥१०॥ अन्य जितने भी पवित्र तीयों के अभिषेक हैं वे गद्गा ये
हिन्दुओं के अधिपा पो मालहवी पता को भी प्राप्त नहीं हो राक्त हैं
॥११॥ पार मो वोग ने दूरी पर भी कोई बैठा हुआ 'गङ्गा-गङ्गा'
1
नारद पुराण ] ११५ यह उच्चारण कर इसका स्मरण मात्र कर लेता है वह भी अपने कृत सब पापो से छुटकारा पा जाया करता है फिर यदि वहा पर पहुँच कर गङ्गा मे अवगाहन करले तो उसकी महिमा का कहना ही क्या है ॥१२।। यह गङ्गा प्रथम तो भगवान विष्णु के चरणो से उत्पन्न हुई है फिर अखिल विश्व के स्वामी शङ्कर के मस्तक पर जाकर स्थित हुई थी उमगङ्गा का वडे देवगण और मुनिवृन्द भी मेवन कम करने की उत्कट अभिलाषा रक्खा करते है फिर पामर मनुष्यो की तो बात ही क्या है ।१३।। मनुजो मे श्रेष्ठ ललाट पर जहां गङ्गा की रज को लगाया करते वहाँ पर ही अर्ध चन्द्र के नीचे भगवान शिव के मत्युज्वल तीसरे नेत्र को समझना चाहिए ॥१४॥ यन्मज्जन महापुण्य दुर्लभं त्रिदिवौकसाम् । सारूप्यदायक विष्णोः किमस्मात्कथ्यते परम् ॥१५ यत्र स्नाताः पापिनोऽपि सर्वपापविजिताः। महद्विमानम रूढाः प्रयान्ति परम पदम् ।।१६ यत्र स्नाता महात्मानः पितृमातृकुलानि वै । सहस्राणि समुदत्य विष्णुलोक ब्रजन्ति वै ॥१७ स स्नात सर्वतीर्येषु यो गङ्गा स्मरति द्विज। पुणयक्षेत्रेषु सर्वेषु स्थितवान्नान संशयः ।।१८ यत्र स्नात नर दृष्ट्वा पापोऽपि स्वर्गभूमिभाक् । यदगस्पर्शमानेण देवानामधिपो भवेत् ॥१६ तुलसीमूलसमूता द्विजपादोद्भवा तथा। गगोद्भवा तु मृल्लोकान्नयभ्यचुतरुपताम् ।।२० गगा च तुलसी चव हरिभक्तिरचञ्चला। अत्यन्तदुर्लभा नृणा भक्तिर्द्ध मंप्रवक्तरि ॥२१ भागीरथी गङ्गाजी के जल में स्नान करना परम पुण्य का प्रदान करने वापा होता है। यह गङ्गाजल मे स्नान करना देवगण को ११६ [ नारद पुराण भी परम दुर्लभ हुआ करता है । गङ्गाजल का स्नान, पान, स्पर्शन और दर्शन साक्षात् भगवान् विष्णु के स्वरूप का प्रदान करने वाला होता है- इससे अधिक इस गङ्गा की महिमा क्या वर्णन की जा सकती है ।।१५।। इम भागीरथी गङ्गा के जल मे स्नान करने का ऐसा अदभुत प्रभाव होता है कि महा पापात्मा प्राणी भी समस्त पापो की वासनाओ से छुटकारा प्राप्त करके बड़े भारी विव्य विमान पर समारूढ होकर पर- मोत्तम पद की प्राप्ति करा लिया करता है ॥१६॥ महान आत्माओ वाले पुरुप गङ्गा के जल मे अवगाहन करके सहस्रा माता-पिताओ के वुलो पा उद्धार करके विष्णु लोक को प्राप्त हो जाया करते हैं ॥१७॥ हे द्विजवर | जो गङ्गाजी का स्मरण भी यदि कर लेता है उसने समस्त परम पुण्यमय तीर्यों में स्नान कर लिया है ऐसा समझ लेना चाहिए । वह पुरुष सभी पुण्य क्षेत्रो के गमन करने का फल प्राप्त करलिया करता है। ऐसा पल ममस्त पापो की वासनाओ को देने वाले शुद्ध हृदय त्याग वाले पुरुषको ही प्राप्त हुआ करता है ।।१८॥ यहां पर स्नान करने वाले पुरषो का दर्शन मात्र कर लेने पर भी लोग स्वर्ग को प्राप्त कर लिया करते हैं । गङ्गा के जल का स्पर्श करने का ही ऐसा महत्त्व है कि वह मनुष्य देवताओ या भी स्वामी वन ज या परता है ॥१६॥ तुलसी के जहरी मृत्तिरा-विप्रा वे चरणो से स्पर्श की हुई धूलि कण और गङ्गा मृत्तिवा मनुष्य को साक्षात् विष्णु भगवान् का स्वरूप प्रदान कर दिया परत है अर्थात् स्वरूप मुक्ति दे दिया करते हैं ॥२०॥ बहुत बड़े पुण्य से ही गङ्गातुलसी और श्री हरि की अनन्य भक्ति प्राप्त हुआ करते है घम वे प्रवचन करन वाल मे भक्ति यी भावना भी अत्यन्त दुर्लभ होती है। य सब को भी प्राप्त नही हा सपत है ।।२१ समंवक्त पदसभवा मृद गगोमवा चव तथा तुलस्या । मूलोया भातयुतो मनुष्यो वृत्या शिरस्येति पद च विष्णो २२ पदा यास्याम्यह गङ्गा ददा पश्यामि तामहम् ।
नारद पुराण ] ११७ वाच्छन्यपि च गे ह्य वं सोऽपि विष्णुपद प्रजेत् ॥२३ गङ्गाया महिमा ब्रह्मन्वक्त वर्षशतैरपि। न शक्यते विष्णुनापि किमन्वैवंहुभाषिते ॥२४ अहो माया जगत्सर्व मोह्यत्येतदद्भुतम् । यतो वै नरक यान्ति गङ्गानाम्नि स्थितेऽपि हि ॥२५ ससारदुखविच्छेदि गङ्गानाम प्रकीर्तितम् । तथा तुलस्या भक्तिश्च हरिकीर्तिप्रवक्तरि ॥२६ सकृदप्युच्चरेद्यस्तु गङ्गत्येवाक्षरद्वयम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोक स गति ॥२७ योजननितय यस्तु गङ्गायामधिगच्छति । सर्वपापविनिर्मुक्त सूर्यलोके समेति हि ।।२८ सद धर्म के प्रवचन करने वाले के चरणो से स्पर्श की हुई रज. गङ्गाजी की मृत्तिका और तुनसी के मूत की मिट्टी मस्तक पर चढाने को ऐसी महान् महिमा है कि वह मनुष्य मीघा विष्णु भगवान् के लोक को प्राप्त हो जाता है । ॥२२॥ जो मनुप्य अपने हृदय मे--मैं किस समय मे गङ्गाजी पर पहुँचकर रनानादि करूंगा मैं वव गङ्गादेवी के दशन करूंगा। ऐसे विचार उठा करते हैं वह भी अपने इन परम पविन विचार धारा के ही परम पुण्य से विष्णु लोक की प्राप्ति कर लिया करता है ॥२३।। हे ब्रह्मन । अधिक क्या वणन दिया जावे गङ्गाजी की महिमा इतनी विशाल है कि भगवान् विष्णु भी यदि स्वय कहना चाहें तो उसे सेकडो वर्षों में भी नहीं कह सकते हैं। साधारण मनुष्य थी तो शक्ति ही क्या हा सपती है ॥२४॥ यह भगवान् की माया ऐसी है जो सम्पूर्ण ससार का मोह मे डाल दिया करती है क्योकि गङ्गा जैसी परम पावन नदी में विद्यमान रहते हुए भी उस ओर मायामग्नता के कारण ध्यान न देने से मनुष्य नरवा की यातनाएं सहन किया करते हैं क्योकि पाप करने का स्वभाव होता ही है जिनका कुफल नख प्राप्ति
११८
[ नारद पुराण
हुआ करती है। गङ्गा का नाम स्मरण, तुलसी की भक्ति और धर्म
प्रवक्ता म श्रद्धाभाव ये ससार के जन्म-मरण के दुख को काट देने
वाले हुआ करते हैं ॥२५॥ ॥२६॥ जो एक बार भी अपने जीवन
पापो को वासना को निर्मूल करने के लिये "गङ्गा" ये दो अक्षरो का
उच्चारण करना है वह सभी पापो से छूट कर भगवान् विष्णु के परम
पद को प्राप्त कर लेता है ॥२७॥ जो गङ्गा के क्षेत्र से वारह कोस तक
विचरण किया करता है वह भी समस्त प्रकार के पापो से छूट कर
सूर्य लोक को प्राप्त किया करता है । १२ कोस की दूरी पर भी गङ्गा
का ऐसा प्रभाव होता है ॥२८
सेय गङ्गा महापुण्या नदी भक्तया निपेविता।
मेपतौलिमृगार्केपु पावयत्यखिल जगत् ॥२६
गोदावरी भीमरथी कृष्णा रेवा सरस्वती।
तुगभद्रा च कावेरी कालिन्दी वाहुदा तया ॥३०
वेत्रवती ताम्रपर्णी सरयूश्च द्विजोत्तम ।
एवमादिषु तीर्थेषु गङ्गा मुख्यतमा स्मृता ॥३१
यथा सर्वगतो विष्णुर्जगद्वयाप्य प्रतिष्ठित ।
तथेय व्यापिनी गङ्गा सर्वपापप्रणाशिनी ॥३२
अहो गङ्गा जगद्धात्री स्नानपानादिभिर्जगत् ।
पुनाति पावनीत्येषा न कथ सेव्यते नृभि ॥३३
तीर्थानामुत्तम तीर्थ क्षेत्राणा क्षेत्रमुत्तमम् ।
वाराणसीति विख्यात सर्वदेवनिपेवितम् ॥३४
ते एव थवगे धन्ये सविदाते वहुथु तम् ।
इह थ तिमता पु सा काशी याभ्या थ ताऽसत् ॥३५
यदि महा पुण्यमयी गङ्गाजी के जल का सेवन मैप, तुला और
मरर वे कपर जब मूर्य सक्रमण किया करते है उस समय में किया
जाये तो यह समस्त जगत् को परम पविव बना दिया करता है ॥२६॥
मारद पुराण ] ११६ गोदावरी, भीमरथी, कृष्णा, रेवा, सरस्वती, तुङ्गभद्रा, कावेरी, फालिन्दी, वाहुदा, वेत्रवती, ताम्रवर्णी और सरयू इन समस्त तीर्थों मे हे द्विजवर ! गङ्गा परम पुण्यमयी बताई गई है ॥३०-३१॥ जिस प्रकार से भगवान विष्णु समस्त लोको को व्याप्त करके विराजमान रहा करते है वैसे ही व्यापिनी यह गङ्गा भी सब महापापो का नाश कर देने वाली है ॥३२।। इस ससार में जगत् को पुष्टि प्रदान करने वाली यह गङ्गा नदी स्नान, पान, दर्शन और स्पर्शन आदि के द्वारा जगत को परम पवित्र बना देते वाली स्थित है तो भी मनुष्य इसका रोवर क्यो नहीं किया करते हैं-कैसी आश्चर्य की बात है ॥३३॥ वाराणसी मे सभी देवगण विराजमान रहा करते है। यह भी परमो- त्तम तीर्थ और श्री क्षेत्र है ॥३४।। जिन कर्णो से बहुत से शास्त्री का श्रवण करके उन पुण्य क्षेत्रो का धर्म ज्ञात किया है वे ही कान परम धन्य हैं जिन कानो ने वारम्बार काशी के माहात्म्य का श्रवण किया है ॥३५॥ ये य स्मरन्ति सस्थानमविमुक्त द्विजोत्तमा । निधू तसर्वपापास्ते शिवलोक वन्ति वै ॥३६ योजनाना शतस्थोऽपि अविमुक्त स्मरेद्यदि । बहुपातकपूर्णोऽपि पद गच्छत्यनामयम् ।।३७ प्राणप्रयाणसमये योऽविमुक्त स्मरेद् द्विज । सोऽपि पापविनिर्मुक्त शैव पदमवाप्नुयात् ॥३८ काशीस्मरणज पुण्य भुक्त वा स्वर्ग तदन्तत । पृथिव्यामेकराड् भूत्वा वाशी प्राप्य च मुक्तिभाक् ॥६६ बहुनान किमुक्त न वाराणस्या गुणान्प्रति । नामापि गृह्णता काश्याश्चतुर्वर्गोन दरत ॥४० गङ्गायमुनयोयोगोऽधिक काश्या अपि द्विज। यस्य दर्शनमात्रेण नरा यान्ति परा गतिम् ॥४१ १२० [ नारद पुराण अपना मन लगाने के मकरस्थे रवी गङ्गा यत्र कुत्रावगाहिता। पुनाति स्नानपानाद्यनयन्तीन्द्रपुरं जगत् ॥४२ हे द्विजोत्तम ! जो पुरुष अविमुक्त क्षेत्र इस काशी का स्मरण किया करते हैं वे अपने सब कृत पापो को झाडकर सीधे शिवजी के लोक को चले जाया करते हैं ॥३६॥ कोई मनुष्य चारसो कोस दूर बैठा हुआ भी इस अविमुक्त क्षेत्र काशी का स्मरण भी कर लेता है वह चाहे अनेक प्रकार के पापो से पूर्ण भी क्यो न हो काशी कारण से पापो के पुञ्ज से छूट कर अनामय पद की प्राप्ति कर लिया करता है । काशी मे अपने चित्त की वृत्ति लगा देने मात्र का ही इतना प्रबल प्रभाव होता है ॥३७॥ अपने प्राणो का परित्याग करने के समय में काशीपुरी का स्मरण कर लेता भले ही वह कही पर भी क्यो न हो, हे द्विजोत्तम ! वह भी सब पापो से विमुक्त होकर शिवलोक की प्राप्ति करने का अधिकारी हो जाता है ॥३८॥ इस काशीपुरी के स्मरण करने से स्वर्ग मे सुख भोग कर के अन्त मे इस भूमण्डल मे आकर राजघर मे जन्म ग्रहण किया करता है और फिर काशी निवास पाकर मुक्त हो जाया करता है ॥३६॥ वाराणसी के गुणो की अधिकता का वर्णन करने से क्या लाभ है ? जो काशी का ज्ञान प्रकाश नाम भी लेता है उससे चारो पुरुषार्थ दूर नहीं रहा करते है ॥४०॥ हे द्विज- वर । गगा यमुना का सङ्गम जहाँ पर है वह प्रयाग काशी से भी अधिक है जिसके केवल दर्शन करने ही से परम श्रेष्ठ गति प्राप्त होजाती है ।।४१॥ मकर राशि पर जब सूर्य स्थित हो तब चाहे जिस किसी घाट पर स्नान किया जावे वह स्नान-पान आदि से जगत् को पवित्र करके इन्द्रलोक में भेज दिया करती है ॥४२॥ यो गङ्गा भजते नित्य शङ्करो लोकशङ्करः । तिङ्गरूपी कथ तस्या महिमा परित्कीर्यते ॥४३ Jहरिरूपधर लिङ्ग लिङ्गरूपधरो हरिः ।
नारद पुराण ] १२१ ईपदप्यन्तर नास्ति भेदकृच्चानयो कुधी ॥४४ अनादिनिधने देवे हरिशङ्करसजिते । अज्ञानसागरे मग्ना भेद कुर्वन्ति पापिन ॥४५॥ यो देवो जगतामीश कारणाना च कारणम् । युगान्ते निगलत्येतद्रुद्ररूपधरो हरि ॥४६ . रुद्रो वै विष्णुरूपेण पालयत्यखिल जगत् । ब्रह्मरूपेण सृजति प्रान्ते ह्येतत्नय हर ॥४७ हरिशकरयोमध्ये ब्रह्मणश्चापि यो नर । भेद करोति सोऽभ्येति नरक भृशदारुणम् ॥४८ हर हरि विधातार य पश्यत्येकरूपिणम् । स याति परमानन्द शास्त्राणामेप निश्चय ॥४६ समस्त जगत के कल्याण करने वाले भगवान लिङ्ग रूपधारी शङ्कर भी सर्वदा गङ्गा का सेवन किया करते हैं ता ऐसी भगवती गङ्गा की महिमा किस तरह से वणन की जा सकती है अर्थात् गङ्गा का महत्व वणनातीत है ।।४३।। लिङ्ग स्वरूपधारी शिव भी हरि के रूप धारण करने वाले हैं और विष्णु चतुर्भुजधारी शिव स्प हैं । दोनो में तनिक भी कुछ भेद नहीं है । जो मूढ मनुष्य इन में भेद राम झता है उसकी बुद्धि वास्तव में ही कुत्सित हो गई है-यह मान लेना चाहिए ।। ४४॥ जन्म मरण से रहित भगवान् शम्भु तथा विष्णु मे भेद अज्ञान सागर मे निमग्न महापापी ही समझा करते हैं या समझते हैं १४५।। जो भगवान विष्णु इस जगत् के स्वामी है। कारणों के कारण स्वरूप हैं वे ही स्वय प्रक्षयकाल म भीषण रुद्र पा इस ससार को लीन कर लिया करते हैं ॥४६॥ रुद्रदेव ही विष्णुदेव के स्वरूप से समस्त विश्व के चराचर का पालन पोषण किया करते हैं और वे ही ब्रह्मा के स्वरूप म अवस्थित होकर विश्व का सृजन किया करते है। अत म ये तीनो हर ही हैं ।।४७।। अतएव ब्रह्मा, रूप धारण कर १२२ [नारद पुराण विष्णु और महेश-इनमे जो भेद बुद्धि रखता है वह महान दारुणतम नरक में जाकर परम घोर यातनाऐ सहता है ॥४८॥ जो प्राणी हरि- हर और ब्रह्मा इन तीनो को एक रूप देखता है बह परमानन्द की प्राप्ति किया करता है- ऐसा पास्त्रो का निश्चित सिद्धान्त है ॥१६॥ योसावनादि सर्वज्ञो जगतामादिकृद्विभु । नित्य सन्निहितस्तस्त्र लिंगरूपी जनार्दन ॥५० काशीविश्वेश्वर लिंग ज्योतिङ्गि तदुच्यते । त दृष्ट्वा परम ज्योतिराप्नोति मनुजोत्तम ॥५१ काशीप्रदक्षिणा येन कृमा गेलोक्यपावनी । सप्तद्वीपा साधिशैला भू परिक्रमिमामुना ॥५२ धातुमृद्दारुपापाणलेख्याद्या मूर्तयो मला । शिवस्य वाच्युतस्यापि तासु सनिहितो हरि ॥५३ तुलसीकानन या तत्र पद्मवन द्विज । पुराणपठन या तग सन्निहितो हरि ॥५४ पुराणसहितावक्ता हरिरित्यभधीयते । तद्भक्ति पुर्वता नृणा गङ्गास्नान दिने दिने ॥५५ पुराणश्रवणे भक्तिगङ्गास्नानसमा द्विज । तद्वक्तरि च या भक्ति सा प्रयागापमा स्मृता ॥५६ जो अनादि सर्वज्ञ इस विश्व वा प्रारम्भ करने वाले भगवान विष्णु हैं वही स्वय साक्षात् पाशी वाराणसी या विश्वेश्वर लिग ज्यो तिनिङ्ग पहलाता है । इना दर्शन प्राप्त करके मनुष्य परम ज्योतिर्मय लोय यो प्राप्त हो जाया परता ॥५१॥ सम्पूर्ण तीनो भुवनी को परम पावन बना देने वाली वाराणमी पुरी की परिक्रमा जिस मनुष्य ने की है उसको इतना पुण्य होता है जो गात सागर गिरिधानन सम- यित एव सातो दीपयती प्रदक्षिणा से हा परता है ॥५२॥ किमी नारद पुराण ] १२३ भी शुद्ध धातु, मृत्तिा, काष्ठ, पापाण और लेख ( चिनरूपी ) इत्यादि से निर्मित शिव और विष्णु की प्रतिमा निर्मल होती है और उनम भगवान् सन्निहित रहा करत है ।।५३॥ हे द्विजवर । जिस स्थान मे तुलसी का वन होता है या पद्मो का वन हाता है जहा पुराण का पाठ होता है वहा पर श्री हरि सदा विद्यमान रहा करते है ।।५४।। पुराणो की सहिता का प्रवचन करने वाला (व्यास) श्री हरि का ही प्रतिनिधि स्वरूप हुआ करता है । इन वक्ताओं की भक्ति करने वाला को प्रतिदिन के स्नान का फर मिला है ॥५५॥ हे द्विजगज । पुराणो के श्रमण करने म भक्ति की भावना का उत्पन्न होना गङ्गा के स्नान के ही समान है। पुराणो के वक्ता व्यास म जो भक्ति होती है उनकी उपमा प्रयाग की दी जाया करती है ॥५६॥ पुराणधर्मकथनैर्य समुद्धरते जगत् । ससारसागरे मग स हरि परिकीर्तित ।।५७ नास्ति गङ्गासम तीर्थं नास्ति मातृसमो गुरु । नास्ति विष्णुमम देव नास्ति तत्व गुरो परम् ॥४८ वांना ब्राह्मण श्रेष्ठस्तारकरणा यथा शशी। यथा पयोधिध सिन्धूना तथा गङ्गा परा स्मृता ॥५६ नास्ति शान्ति समो वन्धुर्नास्ति सत्यापर तप । नास्ति मोक्षात्परो लाभो नास्ति गङ्गासमा नदी ॥६० गङ्गाया परम नाम पापारण्यदवानल । भवव्याधिहरा गगा तस्मात्सेव्या प्रयत्नत ॥६१ गायत्री जाह्नवी चोभे सर्वपापहरे स्मृते । एतयोक्तिहीनो यस्त विद्यापतित द्विज ॥६२ गायगी छन्दसा माता माता लोक्स्प जाह्नवी। उभे ते सर्वपापाना नाशवारणता गते ॥६३ पुराणा में वर्णित तथा पुराणो द्वारा प्रतिपादित धर्मों का वर्णन करके जो समार सागर में डूबते हुए प्राणियो का उद्धार करता है वह १२४ [ नारद पुराण ये व्यास हरि कहा जाता है ॥५४॥ गङ्गाजी के समान तीर्थ नहीं है, माता के तुल्य कोई अन्य गुरु नही है, भगवान् विष्णु के सदृश्य अन्य देवता नहीं है और गुरु के समान कोई तत्व नहीं है ।।५८।। जिस प्रकार नक्षत्रो और तारों में चन्द्र सर्वश्रेष्ठ होता है और चारो वर्णो मे ब्राह्मण परम श्रेष्ठ होता है सातो सागरों में क्षीर सागर सर्वोत्तम है उसी प्रकार से समस्त नदियो मे गङ्गा सर्वश्रेष्ठ नदी है ॥५६।। जैसे शान्ति के 'तुल्य कोई बन्धु नही है--सत्य के समान अन्य कोई भी तप नहीं है-मोक्ष के वरावर अन्य लाभ नहीं है उसी भाति श्रीगङ्गाजी के समान अन्य कोई नदी नही है ॥६०॥ पापारण्य दावानल अर्थात पापा के बनो को भस्म करन वाला दावाग्नि यह गङ्गाजी का एक श्रेष्ठ अन्य नाम है । गङ्गा समस्त सासारिक व्याधियो का हरण करने वानी परमोत्कृष्ट नदी है । अतएव मनुष्यो वा चाहिये गङ्गा का सेवन परम प्रयाना के माथ अवश्य ही परे ।।६१॥ गायत्री और गङ्गा दोनो मम्पूर्ण पापो का हरण कर मुक्त करा देने वाली हैं । जो देहधारी इन दोना की भक्ति एवं सेवा से शून्य होता है यह महान् पतित प्राणी है ।।६२॥ गायत्री समस्त छन्दो की जननी है और गङ्गा लोको की माता है। ये दाना समस्त पापो के नाम करन का कारण हैं ॥६३ ॥ यस्य प्रसन्ना गायत्री तस्य गगा प्रसीदति । विष्णुशक्तियुते ते द्वे समकामप्रसिद्धदे ॥६४ धर्मार्थकामरूपाणा फलस्पे निरञ्जने । सर्वलोगानुग्रहार्य प्रवर्तते महोतमे ॥६५ अतीव दुर्लभा नृणा गायत्री जाह्नवी तथा । तथैव तुलसी भक्तिहरिक्तिश्न सात्विको ॥६६ अहो गगा महाभागा स्मृता पाप प्रणाशिनी । हरिलोरप्रदा दृष्टा पीता सास्प्यदायिनी । यग नाता नरा विष्णो पदमनुत्तमम् ॥६७
नारद पुराण ]
१२५
नारायणो जगदाता वासुदेव सनातन ।
गगास्नानपुराणा तु वाञ्छितार्थफलप्रद ६८
गङ्गाजलकगेनापि य सिक्तो मनुजोत्तम ।
सर्वपापविनिर्मुस प्रयाति परमा पदम् ॥६६
यद्विन्दुसेवनादेव सगरान्वय सम्भव ।
विसृज्य राक्षस भाव सप्राप्त परम पदम् ।।७०
जिस प्राणी पर गायत्री देवी परम प्रसन्न होती है उस पर
गङ्गा भी प्रसन्न हो जाती है। इन दोनो मे भगवान विष्णु को भक्ति
भरी हुई है इसीलिए ये दोनो सब कामनाओ को सिद्ध करने मे एक सी
ही है ।।६४।। ये दोनो ही धर्म अर्थ और काम की सिद्धि स्वरूप वाली
हैं निरञ्जन-महोत्तम और सब प्राणियो पर अपना अनुग्रह करने
में सतत सलग्न रहती हैं ॥६५॥ इस ससार में मानवो को गायत्री-
गङ्गा और तुलसी की भक्ति तथा परम सात्विकी भगवान् विष्णु की
भक्ति का प्राप्त होना परम दुलभ होता है ॥६६॥ यह गङ्गा पापों
का विनाश कर देने वाली महाभागा बतलाई गयी है जो केवल दर्शन
करने मात्र से ही वैकुण्ठ लोक का निवाम प्रदान किया करती है और
इसके जल का पान करने पर भगवान का सारूप्य प्रदान किया करती
है ॥६७।।इस जगत् के धाता सनातन नारायण भगवान् वासुदेव प्रभु
गङ्गा के स्नान करने वाले मानवो के समस्त मनोरथ पूण किया
करते हैं ॥६८।। वह परम श्री पुरुष है जिसके देह पर गङ्गा जी के
जत का एक कण भी गिर जाता । इसी से ही वह मनुष्य सब
प्रकार के महा पातको से
मुक्त होकर परम पद को प्राप्त कर लिया
करता है ॥६६॥ इस गङ्गा देवी के जल की विन्दु पड जाने से सगर
के वश म समुत्पन्न सौदास राक्षस भाव को त्याग कर परमोत्तम पद
दो प्राप्त हो गया था ॥७॥
१२६ [ नारद पुराण ॥ राजा बाहु का चरित्र ॥ कोऽसौ राक्षसभावाद्धि मोचित सगरान्वये। सगर को मुनिश्रेष्ठ तन्ममाख्यातुमर्हसि ॥१ शृणुष्वमुनिशार्दूत गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् । यज्जलस्पर्शमात्रेण पावित सागर कुलम् । गत विष्णुपद विप्र सर्वलोत्तमोत्तमम् ।।२ आसोद्रविकुले जातो वाहुर्नाम वृकात्मज । बुभुजे पृथिवी सर्वा धर्मती धर्मतत्पर ॥३ ब्राह्मणा क्षत्तिया वैश्या शूद्राश्चान्ये च जन्तव । स्थापिता स्वस्वधर्मेपु तेन वाहुविशापति ॥४ अश्वमेधैरियाजासौ सप्तद्वीपेपु सप्तभि । अतर्प यद्भूमिदेवान् गोभूस्वर्णाशुकादिभि ॥५ अपासन्नीतिशास्त्रेण यथेष्ट परिपन्थिन । मेने कृतार्थमात्मानमन्यातनिवारणम्॥६ चन्दनानि मनोज्ञानि वलि यत्सर्वदा जना । भूषिता भूपर्णाप्रव्यस्तद्राष्ट्र सुखिनो मुने । थी नारदजी ने कहा-हे मुनिश्रेष्ठ । सगर के भश मे राक्षस भाव को प्राप्त होने वाला कोन था जो गङ्गा के प्रभाव से मुक्त हो यह मगर पौन था? इसका वर्णन कृपा पर मेरे सामने आप पहिय ।।१।। श्री सनकदेव ने नारदजी को उत्तर दिया था-है मुनियो में शार्दूल । अव आपरी ऐमी ही अभिनापा है. तो गङ्गाजी के उत्तम माहात्म्य वा विशेष रूप से श्रवण परिये। हे विप्र- वर । गङ्गाने जल या स्पर्श होने ही मगर राजा का श परम पवित्र होपर सब लोबो में परमोत्तम भगवान विष्णु के लोग पो वह प्राप्त गया पा ॥२॥ मूर्यगरा में एक वृय नाम बारे राजा ये पुल बाहु गया था २ नारद पुराच } १२७ नाम बाले राजा हुये थे । वे परम धर्म परायण थे और उन्होने इस सम्पूर्ण पृथिवी का उपभोग क्यिा था ||३|| राजा वाहु अपने शासन काल मे ब्राह्मण, क्षत्रिय, मेश्य और शूद्र इन चारो वर्णों के प्राणियो को अपने अपने धर्मो कर्मों मे सस्थापित दिया था। इसी- लिये बाहु प्रजापति कहलाया था ॥४॥ वह ऐसा धर्म परायण राजा हुआ था कि सातो द्वीपो मे सात अश्वमेध यज्ञ आपने दिए थे। समस्त ब्राह्मणो को उस राजा ने दक्षिणा के रूप मे गौ भूमि, सुवर्ण और वारीक उत्तम वस्त्र बादि देकर पूर्णतया तृप्त किया था ॥२॥ नोति शास्त्र के अनुसार समस्त लुटेरों को समुचित दण्ड देकर किसी अन्य राजा को उस समय में छत्रधारी न देखकर वह अपने आपको परम कृतार्थ मानने लगा था ॥६।। सुन्दर, सुगन्धित चन्दन लगाकर तथा दिव्याभूपण धारण करके मनुष्यों के शरीर मे झुरियां पड जाया करती थी। हे मुने । इस तरह से उसके राज्य मे सभी लोग परम सुख से सुसम्पन्न और प्रसन्न रहा करते थे ॥७॥ अकृष्टपच्या पृथिवी फलपुप्पसमन्विता ।।८ ववर्य भूमौ देवेन्द्र काले काले मुनीश्वर ।। अधर्मनिरतापाये प्रजा धर्मेण रक्षिता ॥ एकदा तस्यभूपस्य सर्वसपद्विनाशकृत् । अहकारो महाजज्ञे सासूयो लोपहेतुक ॥१० अह राजा समस्तान लोकाना पालको वली। कर्ता महाक्तूना च मत्त पूज्योऽस्ति कोऽपर ॥११ मह विचक्षण श्रीमाजिता सर्वे ममारय । वेदवेदाङ्गतत्वज्ञो नीतिशास्त्रविशारद ॥१२ अजेयोऽव्याहतैश्वर्यो मत्त कोऽन्योऽधिको भुवि । अहकारपरस्यैव जातासूया परेप्वपि ॥१३ असूयातोऽभवत्कामस्तस्य राज्ञो मुनीश्वर ।
१२८ [ नारद पुराण एपु स्थितेषु तु नरो विमाश यात्यसशयम् ।।१४ हे मुनिवर । वह ऐसा धर्मपाल राजा हुआ था कि उसके राज्य मे यह पृथ्वी विना ही जोते हुये ही पूर्ण रूप से पक जाया करती थी और खूब फल पुष्पादि दिया करती थी ॥८॥ हे मुनीश्वर उचित समय पर मेघ आकर वर्षा किया करते थे और भूमि को जल से तृप्त कर देते थे। उस राजा ने प्रजा मे जो अधर्म की प्रवृत्ति थी उसका समूल विनष्ट करके उनको धर्म मे पूर्णतया प्रवृत्त कर दिया था तया धर्म को अच्छी तरह से रक्षा की थी ।।६।। एक समय ऐसा आ गया था कि उस राजा की सम्पूर्ण सम्पत्तियो को विनष्ट करने वाला और सब सद्गुणो मे दोप लगाने वाला यह विनाश का कारण बडा भारी अहवार हो गया था ॥१०॥ उसके मनमे ऐसा धर्म दूपित भाव पैदा हो गया था कि मैं तो सभी लोको का पालन करने वाला हूँ और महान बलवान राजा हूँ। मैंने बडे २ विशाल यज्ञो का यजन किया है। इस समय मे विश्व मे मुझसे अधिक पूजनीय अन्य कोई भी नहीं है ।।११।। मैं तो श्री सम्पन्न और विचक्षण राजा है मेरे सभी शत्र, परास्त हो गय हैं । मैं तो वेदो और वेदातो ये तत्वो को भली भाति जानने वाला हूँ तथा नीति शास्त्र के ज्ञान में भी बहुत कुशल हूँ।१२।। में इस समय समार मे अजेय हूँ और मेरा यह ऐश्वर्य भी अव्याहत है। मुझसे अधिक इस भूमडल मे कोई नही है । इस तरह के हृदय मे उठने वाले बहसार से भरकर वह राजा दूसरो के गुणो मे भी दोषो पा आरोपण करने लग गया था ॥१३॥ हे मुनीश्वर । अमूया के भाव में उस राजा ये हृदय मे घाम वासना की उत्पत्ति होगयी थी। जिसमे होजाने मे प्राय मनुष्य का विनाश हाजाया करता है ॥१४।। यौवन धननपति प्रमुत्यमविवेपिना। समप्यनय पिमु या चतुष्टयम् ॥१५० स्यामूयानुमती जाना लोपिरोधिनी।
नारद पुराण ]
१२५
स्वदेहनाशिनी विप्र सर्वसपद्विनाशिनी ।।१६
असूयाविष्टमनसि यदि सपत्प्रवर्त्तते।
तुपाग्नि वायुमयोगमिव जानीहि सुव्रत ११७
असूयोपेतमनसा दम्भाचारवता तथा।
परपोक्तिरताना च सुख नेह परत्र च ।।१८
असूयाविष्टचित्ताना सदा निष्टुरभाषिणाम् ।
प्रिया वा तनया वापि वान्धवा अप्यरातय ||१६
मनोभिलाप कुरुते य समीक्ष्य परश्रियम् ।
स स्वसपद्विनाशाय कुठारो नात्र संशय ॥२०
य स्वश्रेयोविनाशाय कुर्याद्यत्न नरो मुने ।
सर्वपा श्रेयस दृष्ट्वा स कुन्मित्सर कुधी ॥२१
यौवन-धन सम्पत्ति प्रभुता और अविवेक्ता इन चारो वस्तुओं
मे यदि एस भी किसी को होजाये सो वह महान् यनर्थ करने वाली
होजाया करती है-ऐमा शास्त्र सम्मत सिद्धान्त है और फिर दुर्भाग्य
से यदि ये चारो ही एकत्रित हो जाये तो फिर उस व्यक्ति के विनाश
मे कुछ भी सन्देह ही नही रहता है ।।१५।। है विप्रवर । यह अमूया
की भावना हो एक ऐमो भयानक होती है जो समस्त सम्पत्तियो का
विनाश कर दिया करती है और शरीर को विनष्ट ही कर देती है ।
ममार में विरोध की वृद्धि कर देने वाली वही असूय। उनके हृदय में
बहुत ही अधिक मात्रा मै समुत्पन्न हो गयी थी ॥१६|| हे सुव्रत ।
जिस प्राणी के हृदय मे ईया और अमूया की भावना सवृद्ध होकर
भर जावे उसके पास जितनी अधिक सम्पत्ति क्यों न हो वह वायु के
सयाग वो पाकर उस मे पात पग्नि के समान अनि शीघ्र ही विनष्ट
हा जान पाली ममन लेना चाहिए ॥१७॥ जिसन मनम अगूया की
भावना भरी रहा करती है और जो वेवल प्रदर्शन मात्र सीलिय
सदाचार का दोग किया परता है तथा अपने मुनु स बहार बातें
१३० [ नारद पुराण निकाला करते है उनको न तो इस लोक मे सुख शान्ति प्राप्त होती है और न परलोक मे ही शान्ति मिला करती है ॥१८॥ जो असूया से युक्त रहा करते हैं और परम निकृष्ट भाषण किया करते हैं उनको अपनी स्त्री बन्धु जन भी शत्रु के समान दिखाई दिया करते हैं ।।१६॥ जो दूसरे के वैभव को देखकर उसे अपहरण करने का विफल मनोरथ अपने चित्त में किया करते है उसे समझना चाहिये कि वह अपनी प्राप्त सम्पत्ति को काटने के लिए कुठार ही चलाया करता है ॥२०॥ हे मुनिवर ! जो अपने श्रेय का नाश करने के लिए यत्न करता है वही दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य अन्योके थेय को देख कर मनमे डाह किया करता है । जब दूसरो के श्रेय से डाह करने लगे तो समझ लेना चाहिये कि इसके श्रेय का निश्चित ही अब विनाश होगे वाला है ॥२१ मिवापत्यगृहक्षेत्रधनधान्यपशुप्वपि । हानिमिच्छन्नर. कुर्यादसूया सततं द्विज ॥२२ अथ तत्या विनीतस्य ह्यसूयाविष्टचेतस. । हैहयास्तालजधाश्च वलिनोरातयोऽभवन् ।॥२३ यस्यानुकूलो वक्ष्मीश. सौभाग्यं तस्य वर्द्धते । स एव विमुखो यस्य सौभाग्यं तस्य हीयते ।।२४ तावत्पुयाश्च पौत्राश्च धनधान्य गृहादयः । यावदीक्षेत लक्ष्मी. कृपापाङ्गन नारद ॥२५ अपि मून्धिवधिरजडाः शूरा विवेकिन । श्लाघ्या भवन्ति विप्रेन्द्र प्रेक्षिता माधवेन ये ॥२६ सौभाग्य तस्य होयेत यस्यासूयादिलाञ्छनम् । जायते नात्र सदेहो जन्तुद्वेपो विशेषतः ॥२७ सतत यस्य कम्यापि यो देय पुरते नरः । तस्य सर्वाणि नश्यन्ति प्रेयासि मुनिसत्तम ।।२८ नारद पुराण ] १३१ है द्विजवर ! जिमको मित्र सन्तान-घर, रोत, धन-धान्य और पशु आदि का विनाश निरट में ही होने वाला होता है वही मनुप्प अमूपा का भाव मनगे परने लगता है ।।२२।। इस प्रकार मे उम राजा के हृदय मे नग्नता मे रहित यमूया की भावना पड गई तो उस समय में हैहर और तास वश के ना उगो सा यन गये थे ॥२३॥ यह तो मादिक निश्चित नियम है नि भगवान जिसके अनु- फूल रहा पर है उसी पा मौमाग्म इस जगत में बड़ा करता है और निगरे दुरापारण में भगवान विष्णु अप्रसन्न एव विमुग हो जाते है उसका गोमाग्य पाहे मिनमा भो यो न हो गर विनष्ट होजाया करता है। इसीलिये भगयान मी मन्तुष्ट रवाने के लिये और अपने अनुरून बनाने के वास्ते सदाचरण एव गत्यो मा महान्य होता है ॥२॥ नारद ! जिग समय मगवान मापूर्ण अपनी रष्टि प्रापी पर रखते है तभी तक उसके पुत्र , पौत्र, धन-धान्य यादि का भय बना रहा परता है ॥२५) हे प्रियर । मगयान की पुष्टि की परी अधि महिमा है। भगवान् की मुहिहोजाने पर महान मूग-अन्धे-जर और यधिर भी बटेगर और वियोगीन एव प्रगगा रे पात्र होत्राया भग्ने १॥२६॥ जिमी में अगमा सादि सशिन गग जाया परने हैं, उगमा गम्पूर्ण गौभाग्य सीप होने सगा है पर फिर गमन मानियों गंगाप रणने मगा। पिर धीरे धीरे उमरे मन गुग पाँ मा दिनान होने गगना है पाहे पनि गरिने होगम र को नहो ॥२॥ अगूया यदंते यम्य राम्य पिप्नु पराग । धन धापं मती गपिारी मोघ यम् L यियेक हमारा जोगिताम् । आ गभरमार वंशान।।. समागे भयेचार गम्य नागोरगर ।
[ नारद पुराण
१३२
असूयाविष्टमनसस्तस्य राज्ञ परै सह ।।३१
आयोधनमद् घोर मासमेक निरन्तरम् ।
हैहयैस्तालजड धैश्च रिपुभि स पराजित ॥३२
बन गतस्ततो वाहुरन्तर्वल्या स्वभार्यया ।
अवाप परमा तुष्टिं तन दृष्ट्वा महत्सर ॥३३
असूयोपेतमनसस्तस्य भाव निरीत्र्य च ।
सरोगतविहङ्गास्ते लीनाश्चिमित महत् ॥३४
अहो कष्टमहो रूप घोरमन समागतम् ।
विशन्तस्त्वरया वासमित्यूचुस्ते विहङ्गमा ॥३५
जिस मनुष्य के चित्त मे असूया का भाव बढने लगता है उससे
भगवान् विष्णु परागमुख होजाया करते है और जब भगवान् की
विमुखता होने लगती है तो उसकी पृथ्वी धन, धान्य आदि की समस्त
सम्पत्ति का विनाश अवश्य होजाया करता है ॥२६॥ यह निश्चित
नियम है कि चित्त में जब अहकार आजाता है तो उसका विवेक
विल्कुन ही नष्ट होजाता है। जव अविवेक' और अविचार मन में
आ जाते है तो उस प्राणी को चारो ओर से अविचार और आपत्तियाँ
घेर लिया करती है । इसलिये अहसार बहुत बुरी वस्नु है इसका त्याग
ही पर देना चाहिय। यह सर्वनाश का मूत होता है ॥३०॥ जिसके
हृदय में अहङ्कार हो जाता है उसका विनाश बहुत ही वेग से होने
लगता है । इस प्रकार अगूया म युक्त उस राजा बाहु वा युद्ध निरन्तर
एक मास तय होता रहा था और अन्त म हैहय वश और तालजय
राजाओ न उसको पराजित कर दिया पा॥३१॥३२॥ वह पिर सब
वैभव यावर अपनी गभवती स्त्री को लबर वन म चला गया था ।
वाम एस परम विशाल मरावर पा देवर उसा अधिक प्रमन्नता
हुयी थी ।३३१ वहा पर य अत्य न पाश्चय की यात यह हुई कि
उग राजा क ईप्या भाव यो भापकर उस सरोवर पर रहन पाल
नारद पुराण ] १३३ सब पक्षी अपने २ घासलो म प्रविष्ट होगये ये ॥३४॥ जिस समय म उड २ कर जाने लगे थे तब यह कहते जा रहे थे कि-अरे । यह बहुत ही अधिक दुख की बात है कि बहुत ही घोर कर्मों के करने वाला यह प्राणी यहा पर आगया है। ऐसा ये सब पक्षी आपस में चातचीत करते हुये अपने २ घोसनो म जाकर छिप गये थे कि उसका मुख न दिखाई पडे ॥३॥ सोऽवगाह्मसरोभूप पत्नीभ्या सहितो मुदा । पीत्वा जल च सुखद वृक्षमूलमुपाश्रित ॥३६ तस्मिन्वाही वन याते तेनैव परिरक्षिता । दुर्गुणान्विगणय्यास्य धिग्धिगित्यव व प्रजा ॥३७ । यो वा को वा गुणी मयं सर्वश्लाघ्यतरो द्विज । सबसपत्समायुक्तोऽप्य पुणो निन्दितो जने ॥३८ आपकोर्तिसमो मृत्युलोकेप्वन्यो न विद्यते । यदा वाहुर्वन यातस्तदा तद्राज्यगा जना । सतुष्टि परमा याता दवथी विगते यथा ॥३६ निन्दितो वहुशो वाहुमुंतवत्कानने स्थित । निहत्य कम च यशो लोके द्विजवरोत्तम ॥४० (नास्त्योतिसमो मृत्युर्नास्ति सोधसमो रिपु । नास्ति निदासम पाप नास्ति मोहसमासव ॥४१ नास्त्यमूयासमाकोतिर्नास्ति कामसमोऽनल । नास्ति रागसम पाशा नास्ति सङ्गसम विषम् ॥४२ उस समय म उस विभव विहीन राजा ने अपनी पत्नियो फे साथ में उस सरोवर म स्नान दरवे जनपान दिया था और सानन्द सुध पूर्वर उसी वृक्ष के मूल म आवर बैठ गया था ॥३६॥ उस राजा बाहु के वन म जाने पर उसकी समस्त रक्षित प्रजा उस महान दुगुणा पर विचार सरस उसको धिमार देन लगी १३४ [ नारद पुराण . थी ॥३७ । हे द्विजवर | चाहे कोई भी कैसा ही मनुष्य हो यदि वह गुणो से सुसम्पन्न होता है तो सभी उसकी प्रशसा किया करते हैं , भले उसके पास कुछ भी न हो और जो गुणहीन एव दुर्गुणो से युक्त होता है तो भले ही वह कैसा भी शक्तिशाली क्यो न हा उसकी सभी मनुष्य निन्दा किया करते है ॥३८।। इस ससार में अपकीर्ति का होना मृत्यु भी अधिक कष्टदायक होता है। वह बाहु राजा अपना सभी कुछ विनष्ट करके जब वन मे चला गया था तब सभी उसके राज्य में निवास करने वाले ग्रीष्म के ताप के व्यतीत होजाने के ही समान परम सन्तोष का अनुभव करने लग गये थ ॥३६॥ हे द्विजवर 1 इस भांति वह वहुत प्रकार को निन्दा का पात्र होता हुआ अपने सुयश और सत्कर्मों का विनाश करके एक मृत प्राणी के ही तुल्य उस वन मे रहने लगा था ।।४।। अकीत्ति मृत्यु के ही समान होती है। क्रोध के तुल्य अन्य कोई भी शत्रु नहीं होता है । मनुष्य को क्रोध एक महान् शत्रु के ही ममान हुआ करता है । मोह के बराबर मादक वस्तु इस ससार मे अन्य कुछ भी नहीं है ॥४१॥ असूया ही सबसे बडी अर्कोत्ति करने वाली होती है। काम के समान अन्य कोई भी अग्नि नहीं है । राग के तुल्य अन्य कोई वन्धन नहीं होता है । कुसगति के यरावर अन्य कोई वस्तु नहीं है जो विष वा सा प्रभाव रखती है ॥४२॥ एव विलप्य वहुधा वाहुरत्यन्तदु खित । जीर्णाङ्गो मनसस्तापाद् वृद्धभावादभूदसौ ।।४३ गते बहुतिथे काले औश्रिमसमीपत. । सवाहुर्माधिना ग्रस्तो ममार मुनिसत्तम् ॥४४ तस्य भार्या च दुखार्ता निष्ठा गभिणी तदा। चिर विलप्य बहुधा सह गन्तु मनो दधे ॥४५ समानीय च मैधासि चिता कृत्वातिदुःखिता।
नारद पुराण ]
१३५
समारोप्य तमारूढ स्वय समुपचक्रमे ।।४६
एतस्मिन्नन्तरे धोमानौवस्तेजोनिधिमुनि ।
एतद्विज्ञातवा-सर्व परमेण समाधिना ॥४७
भूत भव्य वर्तमान त्रिकालज्ञा मुनीश्वरा ।
गतामूया महात्मान पश्यन्ति ज्ञानचक्षुपा ॥४८
तपोभिस्तेजसा राशिरोर्व पुण्यसमो मुनि ।
सप्राप्तस्तम साध्वी च यन वाहुप्रिया स्थिता ॥४६
उस अपकीति के कारण ही यह बहुत विलाप करता हुआ बहुत
अधिक दुखित हुआ था। इस तरह से वढे हुए मन का सन्ताप और
वृद्धता के भाव के कारण उस बाहु राजा के सभी अङ्ग बहुत जीणं
होगये थे ।।४३।। इस प्रकार रा वह बाहु राजा और्व प्रपि के आश्रम
के समीप म बहुत सा समय व्यतीत करके हे मुनिवर । यह व्याधिया
से ग्रस्ता हाकर वही पर मर गया था ॥१४॥ उसय मृत्युगत हा जाने
पर उसकी जो छोटो पत्नी थी वह बहुत ही दुखित हुई थी क्योकि
वह गभवती थी। उसने बहुत अधिक विलाप किया था ॥४५॥ उस
रानी ने ईधन एकदित पर दिना बनाई और अत्यात शोक्ग्रस्त
दुखिनी ने उस पर राजा के शव को रखकर उमी के साथ स्वय भी
चार दाह करने का विचार किया था ॥४६॥ उस ममय म परमा-
धिक तेजस्वी और्व मुनि ने समाधि के द्वारा इस वृत्तान्त मा ज्ञान
प्राप्त पर यहीं पर प्राप्त होगपे थे ॥४७॥ मुनीश्वर तो तोना माना
पी वात यो पसी प्रकार से जानते ही है। ये महात्मा अमूपा ये भाव
से रहित होने के कारण शान कीष्टि से सभी कुछ पा ज्ञान प्राप्त
पर लिया परत है ॥४|| सपश्चर्या के कारण महान तज वाले
मृतिमान पुष्प ये समान वे और मुनि भी जहाँ पर यहाँ चिता बनाई
गयी थी और वाह को साध्वी पत्नी गती हा चाहती थी यहाँ
उपस्थित हा
गये थे ॥४६
[नारद पुराण चितामारोढुमुद्युक्तातादृष्ट वा मुनिसत्तम । प्रोवाच धर्ममूलानि वाक्योनि मुनिसत्तम ॥५० राजवर्यप्रिये साध्वि मा कुरुष्वातिसाहसम् । तवोदरे चरवर्ती शत्रुहन्ता हि तिष्ठति ।।५१ वालापत्याश्च गभिण्यो यदृष्ट मन्तवस्तथा । रजस्वला राजसुते नायेहति चिता शुभे ।।५२ ब्रह्महत्यादिपापाना प्रोक्ता निष्कृतिरुत्तमै । दम्भिनो निदकस्यापि भ्रूणघ्नस्य न निष्कृति । नास्तिकस्य कृतघ्नस्य धर्मोपेक्षाकरस्य च ।। विश्वासघातकस्यापि निष्कृतिनास्ति सुव्रते (१५४ तस्मादेतन्मह पाप कत्तु नाहसि शोभने । यदेतदु खमुत्पन्न तत्सर्वं शातिमेष्यति ॥५५ इत्युक्ता मुनिना साध्वी विश्वस्य तदनुग्रहम् । विललापातिदु खार्ता रागुह्य धवपलजी ॥५६ हे मुनिवर । जिस समय मे और्ग मुनि ने रानी को चिता पर चहार दाह करने को प्रस्तुत देखा था तो उस समय में ये धर्म मे परिपूर्ण वचन रहने तग थे ॥५०॥ और मुनि ने अपने भापण मे कहा- हे साध्वि । तुम इस श्रेष्ठ राजा की प्रिया हो किन्तु तुम्हारे उदर मे समस्त शत्रुओ का विनाश कर देने वाला चक्र- पत्तों पुत्र विद्यमान है अतएव यह जो परम साहस से पूर्ण सती होने का तुम्हारा विचार है इमको मत करो ॥५१॥ हे गुणे । शासन का यह सुनिश्चित सिद्धान्त है कि जिनको सन्तति बालक एप असमर्थ हाती है-जा गर्भवती हाती है जिनका रजादशन नहीं हुआ है- जा रजापता हैं । है राजपुनि । हे शुभे ये चितारोहण मरखे सती नही हुआ र रती है । उनको धमशास्त्र के अनुसार सती होने का अधिकार प्राप्त नहीं है ।।२२।। श्रेष्ठ महानुभावो ने ब्रह्महत्या प्रति
नारद पुराच
१३७
महापाप करन वाले की-दम्भ करने वाले की तथा निदक
को तो सबकी निष्कृति बतलाई है किन्तु जो गर्भवती होती है उसकी
निष्पति या उद्धार का कहीं पर कोई भी नहीं कहा है ॥५३।।
अतएव ह साध्धि । ह सुव्रत । नास्तिव, कृतघ्न और धर्म की उपेक्षा
परने वाल तथा विश्वास यातक पुरुप का इतना महान पाप समझा
जाता है इसके करन वाल का काई प्रायश्चित ही नहीं बताया गया
है ॥५४॥ इसलिये आपको इस समय में यह महान पाप का करना
उचित नहीं है । हे शाभन । तुम्हारे ऊपर जा इस समय म यह बहुत
भारी कट आया है वह सभी कुछ समय मे दूर होजायगा ।५५।
और्व मुनि के इस भाति स कथन परन पर यह साध्वी मुनिवर वे
अनुग्रह पर विश्वाम पसे अति दुखित भाव में अपने पतिदेव के
चरणा को पड वर विलाप करने लगी थी ।।५६
और्वोऽपि ता पुन प्राह सर्वशास्त्राथकोविद ।
मा रोदी राजतनये श्रियमग्रया गमप्यसि ॥५७
मा मुचान महाभागे प्रेतो दाह्योऽद्य सज्जन, ।
तस्माच्छोय परित्यज्य कुरु कालोचिता क्रियाम् ॥५८
पडिते वापि मूर्ये वा दरिद्रे वा श्रियान्विते ।
दुत्ते वा सुवृत्ते वा मृत्यो सर्वत्र तुल्यता ॥५६
नगरे वा तयारण्ये देवमात्रातिरिच्यते ॥६०
यद्यत्पुरातन वर्म तत्तदेवेह युज्यते ।
कारण देवमेवाय मत्ये सोपाधिका जना ॥६१
गर्ने वा वाल्यभावे या यौवने वापि वाद्ध के।
मृत्योवंग प्रयातव्य जन्तुभि कमलानने ॥६२
हन्ति पाति च गोविन्दो जन्तून्यमवशे स्थितान् ।
प्रवाद रोपपन्त्यमा हतुमाशेषु जन्तुपु ॥६३
उम समय म सर्वशास्त्राने महा मनीपा ग्रीवं मुनि ने उसस
१३८ [ गारद पुराण फिर कही-हे राजपुनि । तुम विलाप मत परो । तुमको भविष्य में परम श्रेष्ठ लक्ष्मी की प्राप्ति होगी ॥५७॥ है महाभागे ! तुम अब अधिक अश्रुपात मत करो। आज के दिन विद्वान लोगो ने प्रेत की दाह क्रिया करने की आज्ञा दी है अतएव शोक छा त्याग करके सम. योचित दाह की निया को सस्पन्न करो ॥५८॥ यह मृत्यु तो सभी को एक दिन आया ही करती है चाहे कोई पडित मूखं, दरिद्र, लक्ष्मी. मान्, दुराचारी या सदाचारी क्यो न हो। यह तो सभी को समान भाव से समय पर आती है ॥५६॥ नगर हो या वन हो कही पर भी मौत का जव समय प्राप्त हो जाता है तव आ ही जाया करती है, इमका कोई भी प्रतिकार नही होता है प्रारब्ध के अनुसार ही मृत्यु सर्वत्र सबको आया करती है ॥६०॥ पूर्व जन्मो के जो सचित कर्म होते है उनका योग बुरा या भला जैसा भी हो उसको इस ससार मे हर एक को भोगना ही पड़ता है । मैं तो इस प्रकार से भोग करने में प्रारब्ध को ही मुख्य कारण मानना हूँ - किसी न किसी उपाधि के वश होकर पूर्व जन्म मे किये हुए कर्म के कारण ही गनुष्य इस जगत में फल भोगा करते हैं ॥६१।। हे कमल के समान मुख वाली । भोगो के अनुसार ही प्राणी गर्भ मे, शैशवावस्था मे यौवन मे अथवा वार्धक्य मे अवश्य ही मृत्यु के पजे मे फंसते ही हैं ॥६२॥ भगवान प्रभु कर्मों के वश में पडे हुए प्राणियों को उनके कर्मों के अनुसार पालन किया करते हैं और मारते है । मूढ पुरुप तो जो निमित्त मात्र बने हुये प्राणी है उन पर दोषारोपण किया करते है ॥३॥ तस्मादु ख परित्यज्य सुखिनी भव सुव्रते। कुरु पत्युश्च कर्माणि विवेकेन स्थिरा भव ॥६४ एतच्छरीर दुखाना व्याधीनामयुतैर्वृतम् । सुखाभास वहुक्लेश कर्मपाशेन यन्त्रितम् ॥६५ इत्याश्वास्य महाबुद्धिस्तया कार्याण्यकारयत् ।
नारद पुराण ] १३६ त्यक्तशोका च सा तन्वी नता प्राह मुनीश्वरम् ॥६६ किमन चिा यत्सन्त. परार्थफलकाक्षिण । नहि द्रुमाश्च भोगार्थ फलन्ति जगतीतले ॥६७ योऽन्यदु खानि विज्ञाय साधुवाक्य. प्रबोधयेत् । स एव विष्णुस्सत्त्वस्थो यत परहिते स्थित ॥६८ अन्यदु खेन यो दुखी योऽन्य हर्षेण हर्षित । स एव जगतामीशो नररूपधरो हरि ॥६६ राभि श्रुतानि शास्त्राणि परदु खविमुक्तये । सर्वपा दु खनाशाय इति सन्तो वदन्ति हि ||७० अतएव हे सुव्रते । अव तुम इस पति-वियोग के दुख पा त्याग करके सुपी बनो और विवेक द्वारा अपनी बुद्धि को स्थिर करो । अब तुमको यही चाहिये कि अपने पति का औदर्य दैहिक को यथा विधि करो। यह शरीर तो अयुतो ( दश हजारो ) व्याधियो से घिरा हुआ रहा परता है । इसमे सुख का तो देवल आभास माय ही होता है अन्यथा इसम नाना प्रकार के क्लेश ही क्लेश भरे हुये हैं सुख तो वास्तव में है ही नही। यह शरीर कर्मों के पास में बद्ध है ॥६४।६५ ॥ महान मेधावी उम औवं मुनि ने इस रीति से उसया समाधान करके धीरज प्रदान किया और कर्म कराने की चाह की थी। उस स्त्री ने भी शोर का त्याग कर मुनि को प्रणाम किया और उसने यहा इसमे कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है सज्जन पुरुप सदा परोपकाररूपी पल की हो इच्छा विया वरते है । पृथ्वी पर वृक्ष अपने लिये कभी पल नही दिया करते हैं और वे परोपकार करने के लिये ही फलते-फूलते हैं ॥६६।६७॥ जो पुरुष दूसरे को दुख में पतित देख कर और उसके दुख का ज्ञान प्राप्त करते सदुपदेशों के वचनो द्वारा शान्ति प्रदान किया करते हैं उनको सत्त्व गुण मे ही विराजमान मम- मना पाहिये नयोकि वे मयंदा दूसरों के हित में परायण रा करते
नारद पुराण ]
१४१
ही उस चिता के मध्य से देवराज इन्द्र के समान चमकता हुमा उठा
और मुनिराज मौर्य को प्रणाम करके एव परम श्रेष्ठ विमान में विरा-
जमान होकर परम धाम को चला गया था ॥७३॥ चाहे कोई पापी
हो या महापातको से घिरा हुआ हा महापुष्पा की जिस पर कृपा की
दृष्टि हो जाती है तो वह निश्चय ही सबसे मुक्त होकर परमधाम को
प्राप्त हाजाया करता है ॥७४॥ है सत्तम पुण्यात्मा महापुरप की
दृष्टि किसी के शरीर-भस्म, अथवा घूम पर भी पड जाया करती है
तो
वह सभी पापो से छुटकारा पाकर परमोत्तम गति को प्राप्त हो
जाया करता है ॥७॥ हे नारद । वह रानी अपने पति की क्रिया
करख मुनि के ही आश्रम म भक्ति भाव से उनकी सेवा करने में तत्पर
हो गयी थी उसकी सपत्नी भी उसी के साथ रहने लगी थी ७६।।
॥ भगीरथ द्वारा गंगाजी का लाया जाना ।।
एवमौर्वाश्रमे ते द्वे वाहुभायें मुनीश्यर ।
चक्राते भक्तिभावेन शुश्रूषा प्रतिवासरम् ।।१
गते वाद्धं व काले ज्येष्ठा राज्ञो तु या द्विज ।
तस्या पाप मतिर्जाता सपल्या सम्पद प्रति र
ततस्तया गरो दत्त पनिष्ठाय तु पापया ।
न म्पप्रभाव चक्रे वैगरो मुनिनिपेवया ॥३
भूपनादिभि सम्यग्यत सानुदिन मुने ।
चगर सेवा तेनासी जीर्णपुण्येन वर्मणा ॥४
ततो मासत्रयेऽतोते गरेण महित सुतम् ।
गुपान सुशुगे काले शुभपानष्टरित्वपा ॥५
अहो सत्सहातिलोव विपाप न विनाशयेत् ।
न तदातिमुख पि वा नराणा पुण्यर मणाम् ॥६
१४०
[ नारद पुराण
हैं ॥६८।। जो सर्वदा दूसरो के दु खो मे स्वय दुखित होता है और
दूमरो के हर्ष मे स्वय प्रसन्नता का अनुभव किया करता है उस पुरुष
को इस जगत् का स्वामी नररूपधारी साक्षात् विष्णुदेव ही समझना
चाहिए ॥६६॥ सज्जन पुरुष दूसरो का दुख निवारण करने के लिये
शास्त्रो का गह्न अध्ययन किया करते हैं और जब दूसरो को दुख मे
मग्न देखते है तो अवसर प्राप्त करके उस दुख का निराकरण करने के
लिये शास्त्र का सार उन्हें-सुनाया करते हैं ।।७।।
यत्र सन्त प्रवत्तते तत्र दुख न वाधते ।
वर्तते यत्र मार्तण्ड कथ तन तमो भवेत् ॥७१
इत्येव वादिनी सा तु स्वपत्युश्चापरा किया. ।
चकार तत्सरस्तीरे मुनिप्रोक्तविधानत. ॥७२
स्थिते तत्र मुनी राजा देवराडिव सज्वलन् ।
चितामध्वाद्विनिष्क्रम्यविमानवरमास्थित ॥७३
प्रपेदे परम धाम नत्वा चौवं मुनीश्वरम् ।
महापकयुक्ता वा युक्ता वा चोपपातकं.।
पर पद प्रयान्त्येव महद्भिरवलोकितः ।।७४
कलेवर वा तद्भस्म तद्ध म वापि सत्तम् ।
यदि पश्यति पुण्यात्मा स प्रयाति परा गतिम् ।।७५
पत्युः कृतक्रिया सा तु गत्वाश्रमपद मुने. ।
चकार तस्य मुथपा सपत्न्या सह नारद ॥७६
जिस म्पल पर सजन पुरुषो वा प्रवेश होता है वहां पर दुप
विशेष जोर नहीं करता है क्योकि मान के मूर्य के सामने अज्ञान से
समुत्पन्न दुध वा अन्धकार रहने नहीं पाता
७१।। उसने इस
प्रकार से पहर मुनि ये दणित विधान के अनुसार ही अपने पति देव
की उमो मरोयर के तौर पर अपर पाल की दहिय दिया
रागन पी पी ॥७२॥ उम समय मे वर वाटराजा मुनि के समक्ष में
नारद पुराण ]
१४१
ही उस चिता के मध्य से देवराज इन्द्र के समान चमक्ता हुमा उठा
और मुनिराज और्व को प्रणाम करके एक परम श्रेष्ठ विमान मे विरा-
जमान होकर परम धाम को चला गया था [७३।। चाहे कोई पापी
हो या महापातकों से घिरा हुआ हो महापुरुपो की जिस पर कृपा को
दृष्टि हो जाती है तो वह निश्चय ही सवसे मुक्त होकर परमधाम को
प्राप्त होजाया करता है ॥७४॥ हे सत्तम । पुण्यात्मा महापुरप की
दृष्टि किसी के शरीर-भस्म, अथवा धूम पर भी पड जाया करती है
तो
वह सभी पापो से छुटकारा पाकर परमोत्तम गति को प्राप्त हो
जाया करता है ॥७५॥ हे नारद । वह रानी अपने पति की मिया
करते मुनि के ही आश्रम में भक्ति भाव से उनकी सेवा करने में तत्पर
हा गयी थी उसकी सपत्नी भी उसी चे माथ रहने लगी थी ।७६॥
॥ भगीरथ द्वारा गंगाजी का लाया जाना ।।
एवमौर्वाश्रमे ते द्वे वाहुभायें मुनीश्वर ।
चक्राते भक्तिभावेन शुश्रूषा प्रतिवासरम् ।।१
गने वाद्ध के काले ज्येष्ठा राजी तु या द्विज ।
तस्या पाप मतिर्जाता सपन्या सम्पद प्रति ॥२
ततस्तया गरी दत्त यनिष्ठाय तु पापया।
नम्पप्रभाव पके वैगरी मुनिनिपेवया ॥३
भूतेपनादिभि सम्यग्यत सानुदिन मुने ।
चार मेवा तेनासी जीर्णपुण्येन कर्मणा ॥४
ततो मामत्रयेजीते गरेण महिन सुतम् ।
गुपार मुशुभे काले शुभपानष्टारिवपा ॥५
अहो सत्रातिलों कि पाप न विनाशयेत् ।
न तदानिमुय कि वा नराणा पुण्यय मंणाम् ॥६
१४२ [ नारद पुराण भक्ति ज्ञानाज्ञानकृतं पाप यच्चान्यत्कारित परैः । तत्सर्व नाशयत्याशु परिचर्या महात्मनाम् ॥७ श्री मनकजी ने कहा-हे मुनीश्वर ! इस प्रकार से वे दोनो विधवा रानियां और्म मुनिके पाश्रम मे रहती हुई मुनि की शुश्रूषा की भावना से किया करती थी ।।१।। हे द्विज | अब छ मास व्यतीत हो गये तो बडी रानी को अपनी सपत्नी की पुत्र की सम्पत्ति पर पापमय बुद्धि उत्पन्न हो गई थी ॥२॥ उस महा पापिनी ने छोटी रानी को विप दे दिया था। किन्तु महा मुनि की सेवा करने के कारण से उस दिये हुये विष का कुछ भी बुरा प्रभाव नहीं हुअ था ।। ३ ।। वह छोटी बाहु की रानी नित्य हो उस आश्रम की भूमि को लीपने आदि की महा मुनि की सेवा किया करती थी। इसलिये जीर्णोद्धार के परम पुण्यमय सत्कर्म के करने के ही कारण से ही उसको सौत के दिये हुए विष का प्रभाव कुछ भी नहीं हुआ था ॥४॥ फिर मुनि की भक्ति पूर्णक सेवा करने से जिसका सब पाप नष्ट हो गया था उस रानी ने तीन मास व्यतीत होजाने पर उस विप के सहित पुन रन का प्रसव किया था ||शा ओहो । इम ससार मे सत्पुरुषो को मङ्गति का कैसा अद्भुत प्रभाव है कि इससे सभी पाप नष्ट हो जाया करते हैं । पुण्य- शील पुरुषो के लिये इस सत्सङ्गति के समान और कौन-सा सुख हो सक्ता है ।।६।। जो जान बूझकर या अनजाने पाप कर्म बन जाया करता है यया दूसरो के द्वारा कराया जाता है उस मवको महान् पुरुषो की सेवा नुरन्त ही नष्ट कर दिया करती है ॥७॥ जडोपि याति पूज्यत्व सत्सङ्गाज्जगतीतले । कलामानोऽपि शोताशुः शम्भुना स्त्रोकृतो यथा ॥ सत्सङ्गति परामृद्धि ददाति हि नृणा सदा । इहामुन च विप्रेन्द्र सन्त. पूज्यतमास्ततः ॥६ अहो महद्गुणान्वक्नुक: समर्थों मुनीरवर । 1 नारद पुराण ] १४३ गर्भ प्राप्तो गरो जीर्णो मासयमहोऽद्भुतम् ।।१० गरेण सहित पुन दृष्ट्वा तेजोनिधिमुनि । जातकर्म चकारासौ तन्नाम सगरेति च ॥११ पुपोप सगर वाल तन्माता प्रीतिपूर्वकम् । चौलोपवीतकर्माणि तथा च मुनीश्वर ॥१२ शास्त्राण्यध्यापयामास राजयोग्यानि मन्त्रवित् । समर्थ सगर दृष्ट्वा किंचिदुद्भिन्नशैशवम् ॥१३॥ मन्त्रवत्सर्वशास्त्रास्त्र दत्तवान्स मुनीश्वर । सगर शिक्षितस्तेन सम्यगोवर्षिणा मुने ।।१४ वभूव बलवान्धर्मी कृतज्ञो गुणवान्सुधी । धमज्ञ सोऽपि सगरो मुनेरमिततेजस । समित्कुशाम्बुपुप्पादि प्रत्यह समुपानयत् ॥१५ इस जगत् जड मनुष्य भी सत्पुरपो की सगति करने से पूज्य हो जाया करता है । जिस तरह से एक क्लामात्र बचे हुये चन्द्रमा को ही जिवजी ने अङ्गीकार कर लिया था। इसलिये भगवान को सङ्गति के कारण ही उसकी सब पूजा किया करते हैं ॥२।। यह अटल सिद्धान्त है कि सत्सङ्गति मनुष्या को सदा समृद्धि दिया करती है। हे विप्र । यही कारण है कि सज्जन लोग यहां भू लोक मे और पहा परलोक मे परमाधिन पूजनीय है 11 हे मुनिवर । चरित्र ऐसे विशाल है कि उनका वर्णन किसके द्वारा किया जा सकता हे ? देखिये, कमा प्रभाव है गर्भ में प्राप्त होने वाला विष तीन मास में जीण हो गया। यह मन्त शुश्रूषा एक अद्भुत पत के सिवाय क्या हो सकता है ॥१०॥ तेज वे निधान महामुनि भो ने बालय को विप के साथ उत्पन्न हुआ देय पर उमरा नामकरण ही 'म गर' इसगे कर दिया गया था पिर जात कर्मादि साम्प्राक्त सस्कार करा दिये थे ॥११॥ उसके पश्चात उमरी माता उस वालव ( सगर) या महापुरषा के
१४४
[ नारद पुराण
स
बडी ही प्रीति के साथ पालन पोषण करने लग गई थी, मुनिवर और्म ने
यथा समय म ण्डन और उपचीत आदि सस्तार भी परा दिये थे ।१२।
उस वालक सगर ने अपनी शैशवावस्था में पदार्पण किया उसी समय
मन्त्रो के ज्ञाता मुनि । उनको राजाओ के पढने योग्य शास्त्रो को
पढाया था ।।१३॥ मुनीश्वर ने केवल अध्ययन ही नहीं कुछ मन्त्री के
सहित अस्त्र शस्त्र भी प्रदान किय थे। इस प्रकार से और्ण महाप ने
सगर को अच्छी तरह स शिक्षित बनाकर होशियार एवं कुशल बना
दिया था । हे मुनिश्रेष्ठ । उसी समय से बलवान,धमिध, कृतज्ञ, गुणी,
दुद्धिमान् सगर भी उन मुनि और्ग के लिये समिधा-जल दर्भ और पुष्प
आदि लाकर देने की सेवा में नित्य ही निरत रहने लगा था ।।१४।१५
वद्गुणनिधि प्रणिपत्य स्वमातरम् ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा सगरो विनयान्वित १६
मातर्गत पिता कुब किनामा कस्य वशज ।
तत्सर्व मे समाचक्ष्व श्रोतु कौतूहल मम ॥१७
पिना विहीना ये लोके जीवतोऽपि मृतोपमा १८
दरिद्रोऽपि पिता यस्य ह्यास्ते स धनदोपम ।
यस्य माता पिता नास्ति मूख तस्य न विद्यते ॥१६
धर्महीनो यथा मर्ख परोह च निन्दित ।
मातापितृविहीनस्य अज्ञस्याप्यविवेक्नि ।
अपुषस्य वृथा जन्म ऋणग्रस्तस्य चैव हि ॥२०
(चन्द्रहीना यथा रानि पद्महीन यथा सर ।
पतिहीना यथा नारी पितृहीनस्तथा शिशु २१
एक दिन ऐसा अवसर प्राप्त हुआ कि वह गुणसागर अपनो
माता से बहुत विनम्र होकर प्रणाम पूवर पूछने लगा ।।१६।। सगर ने
कहा--हे माताजी हमारे पिताजी कहा पर है ? मैने कभी उनके दशन
तक नहीं किये हैं । पिताजी का शुभ नाम क्या है व रिस वश में
नारद पुराण]
१४५
उत्पन्न हुए थे। आप इन सब बातो का सुस्पष्ट उत्तर यभी
दे दीजिये-इन सब बातो का जान पाने के लिए भरे हृदय में बडा
कुतूहल हो रहा है ।।१७। हे माताजी । इस गराार में जो पितृहीन है
वे जीवित रहते हुए भी मृत के समान ही हैं ।।१८॥ जिसका पिता
अत्यन्त दरिद्र भी है तो भी उसको कुबेर के ही ममान समझना
चाहिए। जिसके माता और पिता दोनो ही न हो उसको संसार में
सभी सुख नहीं मिल सकता है ।।१६सह पुरुष धर्म विहीन एक
मूर्ख के ममान इस लोस योर परलोक दोनो जगहो मे निन्दा ही पाया
करता है। इस जगत मे माता पिता से हीन का--अज्ञानी का, यदि-
वेको का, अपुत्र और ऋण शून्य का जन्म ही व्यर्थ है ॥२०॥ विना
चन्द्रोदय के राषि-कमलो के विकास से रहित सरोवर, पतिहीन नारी
और पिता से हीन वालक =ये सब एव से ही होते हैं ।।२१
धर्महीनो यथा जतु कर्महीनो यथा गृही।
पगुहीनो यथा वैश्यस्तथा पिया विनार्भक ॥२२
सत्यहीन यया वाक्य साधुहीना यथा सभा।
तपो यथा दयाहीन तया पिया विनार्भक ॥२३
वृक्षहीन ययारण्य जलहीना यथा नदी।
वेगहीनो यथा वाजी तथा पिया विनार्भक ॥२४
यथा लघुनरो लोके मातर्याच्जापरो नर ।
तथा पित्रा विहीनस्तु बहुदु खान्वित सुत ॥२५
इनीरित सुतेनेपा श्रुत्वा निश्वस्य दुखिता।
सपृष्ठ तपथावृत्त सर्व तस्मै न्यवेदयत् ॥२६
तच्छ वा सगर द वोपसरक्तनोचन ।
हनिप्यामोत्यरातीन्स प्रतिमामवरोतदा ॥२७
प्रदक्षिणीकृत्य मुनि जननी च प्रणम्य स ।
प्रम्यापित प्रतस्थे च तेनैन मुनिना तदा ॥२८
।
१४६ [ नारद पुराण जिस प्रकार से धर्म से हीन प्राणी, कर्म से हीन प्राणी, कर्म होन गृहस्थ और पशु हीन वैश्य हो उसी प्रकार से पितृहीन बाउक होता है ॥२२॥ जिस रीति से सत्यता से रहित वचन, सत साधुओ से हीन सभा या परिपद्- दया से विहीन तपश्चर्या व्यर्थ है जैसे ही जनकहीन बालक होता है ॥२३।। जैसे वृक्ष लतादि से शून्य वन, सलिल शून्य नदी, वेग विहीन अश्व केवल नाम मात्र से ही हुआ वरते है उसी भाति पिता से रहित बालक हुआ करता है ॥२४॥ जैसे याचना करने वाला मनुप्प इस जगत मे बहुत ही तुच्छ एव ओछा माना जाया करता है उसी तरह से पिता से रहित अनाथ बालक भी बहुत ही तुच्छ समझा जाया करता है और अनेक प्रकार के कष्ट ही भोगा करता है ॥२५॥ पुत्र के इस भाति से क्थन करने पर उसकी माता न दुखित होकर एक लम्बी उष्ण श्वास लेकर आह भरी और अपने पुत्र के पूछने पर सम्पूर्ण सत्य घटित घटना का वृत्तान्त उसको वहार सुना दिया था । इस दुर्वृत्तान्त का श्रवण करके सगर को बहुत भारी क्रोध उत्पन्न होगया था। क्रोधावेश मे उसके नेत्र लाल हो गये थे और उसी क्षण मे दृढ प्रतिज्ञा की थी कि मैं अपने सर्वस्व का अपहरण करने वाले समस्त शत्रुओ का सहार कर दूंगा ।। २७ ।। इसके उपरात उस सगर ने उन महा मुनि के चरणो में और अपनी जननी के पद पङ्कजा म अपना मस्तक झुकाया था और उस महा मुनि के समादेश से प्रस्थान करा देन पर वह वहा से चल दिया था ।।२८ औथिमाद्विनितान्त सगर सत्यवाक् शुचि । वशिष्ठ स्वकुलाचार्य प्राप्त प्रीतिसमन्वित ॥२६ प्रणम्य गुरवे तस्मै वशिष्ठाय महात्मने। सर्व विज्ञापयामास ज्ञानदृष्टया विजानते ॥३० ऐन्द्राम्य वारण ग्राह्ममागेय सगरो नृप । तेनेय मुनिना-वाप पङ्ग वज्रोपम धनु ॥६१ नारद पुराण १४७ ततस्नेनाभ्यनुनातः सगरः सौमनस्यवान् । अशोभिरनितः सद्यः प्रतस्थे प्रणिपत्य तम् ॥३२ एपोनेव तु चापेन स शूरः परिपन्धिनः । सपुश्पोमान्सगणानकरोत्स्वर्गवासिनः ॥३३ तच्चापमुक्तयाणाग्निमंतप्तास्तदरातयः । केचिद्विनष्टा ममम्तास्तथा चान्ये प्रदुद्रुवुः ।।३४ केचिद्विशीर्णकेशाश्च वल्मीकोपरि मस्थिता.। तृणान्यभक्षयन्केचिन्नग्नाच विविशुर्जलम् ।।३५ परम सत्य मापण करने वाला और अधिक पुनीत यह बालक सगर औवं मुनि के बाथम से चल कर परम प्राप्ति के साथ अपने बुल के गुरदेव श्री वशिष्ठ मुनि के समीप में प्राप्त हुआ था ॥२६॥ यगिष्ठ जी ज्ञान की दृष्टि से सभी कुछ जानते थे । उस समय मे सगर ने वहा पर पहुँच कर श्री मिष्ठजी को प्रणाम करके सभी वृत्तान्त सुनाई दिया या ॥३०॥ उसी समय मे पुलगुरु वशिष्ठजी ने उस रागर पो ऐन्द्रास्त्र, ब्रह्मास्त्र, वरुणास्त्र, अग्निमास्त्र बच के समान बङ्ग और धनुष आदि का प्रदान किया था ॥३१॥ इसके उपरान्त वसिहजी के भादेश और अमोघ याशीर्वाद को प्राप्त करके परम प्रसन्न मन से मुक्त करके यहाँ से तुरन्त ही प्रस्थान कर दिय। या ॥३२॥ उस सगर ने अपने शत्र स्वरूप परिपन्थियो से युद्ध आरम्भ कर दिया था। उस महावीर नर सगर ने एक ही धनुप से उन सबको अपने पुत्र-पौत्रादि के गणो के सहित महार फरके स्वर्गवासी बना दिया था ॥३३।। राजा धनुप से निकले शरो के प्रहारो से सन्तप्त एव उसके व अन्यन्त भयभीत होवर रण में मारे गये थे और रहे-राहे भाग गये थे ॥३४॥ कुछ के बाल बिखर गये और कुछ खोहो म जाकर छिप गये थे कुछ दांतो तले तिनके दबाकर रह गये और शेप नग्न होकर डूब मरे थे ॥३॥ सगर के १४८ [ नारद पुराण शकाश्च यवनाश्चैव तथा चान्ये महीभृतः । सत्त्वर शरणं जग्मृर्वशिष्ठ प्राणलोलुपाः ।।३६ जितक्षितिहुपुत्रो रिपून्गुरुसमीपगान् । चारविज्ञातवान्सद्य. प्राप्तश्चाचार्यसन्निधिम् ॥३७ तमागत वाहुसुतं निशम्य मुनिवशिष्ठ शरणागतांस्तान् । त्रातु च शिष्याभिहित च क विचारसामास तदा क्षगेन ॥३८ चकार मुण्डाशवरान्यवनांल्लम्वमूर्द्ध जान् । अन्धाश्चश्मथुलान्सन्मुिण्डान्वेदवहिप्कृतान् ॥३६ वसिष्ठमुनिना तेन हतप्रायान्निरीक्ष्य सः । प्रहसन्ताह सगर स्वगुरु तपसो निधिम् ॥४० भो भो गुरो दुराचारातानुक्षसि तान्वृथा। सर्वयाह हनिष्यामि भरिपतुर्देशहारकान् ॥४१ उपेक्षेत समर्थ. सन्धर्मस्य परिपन्थिनः । स एव सर्वनाशाय हेतुभूतो न सशयः ॥४२ वह ऐसा भीषण समय उपस्थित हो वया था कि अपने प्राणी के परित्याग की इच्छा से शक और यवन आदि सब राजा लोग शोध ही वशिष्ठ की शरण में जाकर पहुँच गये थे ॥३६॥ स्वर्गीय बाहु के परम बलवान् प्रतापी सगर ने सम्पूर्ण पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर ली सगर वो दूतो के द्वारा ज्ञात हो गया था कि शत्रु समुदाय अपने गुर- देव की शरण में पहुंच गए है । उसी समय वह वमिएजी के समीप मे आ गया था ॥३७॥ राहु के पुत्र सगर को अपने पास में धाता हमा गुनर र वसिष्ठजी ने उन शरण में रामागत होने वालो की रक्षा और अपने परम प्रिय शिष्य के हित मी चिन्ता में एक क्षण के लिए निमान होगए ॥३८॥ इमरे पश्चात् उन सम्धे-सम्ये मे शो बाले शगर और यानो कमाथे गुइया पर वेद परिपा पास्नरूपी नेत्रों से अन्धे उनसरी गछ भी मया दी थी। राजा मगर ने शिष्ट मुनि के द्वारा
नारद पुराण ]
१४६
उनको मरा हुआ सा देखा था। उस समय में तपोनिधि अपने गुरु
पशिष्ठजी से हंसकर कहा था ॥४०॥ सगर ने अपने भाषण में कहा-
हे गुरुदेव । आप इन दुष्ट, दुराचरण करने वालो को रक्षा व्यर्थ ही
करना चाहते हैं। ये वे ही महा दुष्ट दापी हैं जिन्होंने मेरे पिताजी का
देश और वैभवपूर्ण राज्य छीन लिया था । मेरी तो यही इच्छा है कि
इन सभी को मार ही डालना चाहिए ॥४१॥ इस धर्म के नाशक
लुटेरो की शक्ति होत हुये भी रक्षा का करना और अपेक्षा करके इनको
जीवित बने रहने देना भविष्य मे सर्वनाश का हेतु हो सकता है ॥४२
वाधन्ते प्रथम मत्वा दुर्जना सकल जगत् ।
त एव बलहीनाश्चेद्भजन्तेऽत्यन्तसाधुताम् ॥४३
अहो मायाकृत कर्म खला कश्मलचेतस ।
ताव.कुर्वन्ति कार्याणि यावत्स्यात्प्रवल वलम् ॥४४
दासभाव च शत्रूणा वारस्त्रीणा च सौहृदम् ।
साधुभाव च साणा श्रेयस्कामो न विश्वसेत् ॥४५
प्रहास कुर्वते नित्य यान्दन्तान्दर्शयन्खला ।
तानेव दर्शयन्त्याशु स्वसामर्थ्यविपर्यये ॥४६
पिशुना जिह्वया पूर्व परुप प्रवदन्ति च ।
अतीव करण वाक्य वदन्त्येव तथावला ॥४७
थे यस्कामो भवेद्यस्तु नीतिशास्त्रार्यकोविद ।
साधुत्व समभाव च पलान नैव विश्वसेत् ।।४८
दुर्जन प्रणति यान्त मित्र कंतवशीलिनम् ।
दुष्टा भार्या च विश्वस्तो मृत एव न सशय ॥४६
मदमत्त य दुष्ट लोग पहिले समस्त जगत् के लोगो को भरसक
प्रपीडित किया करते हैं और जब इनकी शक्ति क्षीण हो जाती है तो
ये
साधुता
दिखलाया परते हैं ।।१३।। ये महापापी दुष्ट चित्तवृत्ति वाले
साग जयता अपना दल प्रवल नहीं होता है तभी तक माया रचबर
[नारद पुराण वडी साधुता एव सज्जनता का प्रदर्शन किया करते है और अच्छे कर्म दिखलाते है जैसे ही इनमे थोडी सी भी सबलता प्राप्त हुई कि ये शत्रु बन जाया करते है ॥१॥ जो मनुष्य अपना वास्तविक कल्याण की कामना रहता है उसे भूलकर भी कभी शत्रुओ के दास भाव का, वेश्याओ की मित्रता का और विषधर सर्पो की साधुवृत्ति का विश्वास नही करना चाहिये ॥४५॥ दुष्ट लोग अपनी शक्ति की सम्पन्नता की दशा मे जिन दातों को हंसकर दिखाया करते है वे ही शक्ति के क्षीण हो जाने पर उन्ही दाँतो को दिखावर हीनता का भाव प्रकट किया करते है ।।४६।। चुगली करने वाले लोग जिम अपनी जिह्वा से परम कठोर वचन बोला करते है वे क्षीण व निर्वल हो जाते हैं तो उसी जीभ से अत्यन्त वरुणा से परिपूर्ण वचन बहा करते हैं ॥४७॥ नीति शास्त्र का सिद्धान्त है कि चतुर मनुष्य यदि अपना कल्याण चाहता है तो उसे दुए पुरुषो के माधु भाव और समता के भाष का भी विचार नहीं करना चाहिये ॥४८॥ नग्रता दिखाने वाले दुर्जन पुरुप का, जुआरी मित्र का और दुष्टा भायां का विश्वास करने वाला व्यक्ति मरे हुए के ही समान हुआ करता है 18E मा रक्ष तस्मादेतान्य गोरूपव्याघ्रामिण । हत्वैतानखिलान् दुष्टास्त्वत्प्रसादान्मही भजे ॥५० वशिष्ठस्तद्वच श्रुत्वा सुप्रीतो मुनिसत्तम । पराभ्या सगरस्याङ्ग स्पृशन्निदमुवान ह ॥५१ साधु साधु महाभाग सत्य वदसि सुव्रत । तथापि मच श्रुत्वा परा शान्ति लमिप्यसि ।।५२ मयने निहिता पूर्व त्वाप्रतिताविरोधित । हताना हनने योनि का समुत्पद्यते वद ॥५३ भूमोश जन्तव मा धर्मपाशेन यन्त्रिता. तथापि पानिहता किमयं हसि तान्पुन. १४५ . नारद पुराण ] ૧૧ देहस्तु पापजनितः पूर्वमेवेनसाः हतः । आत्मा ह्यभेद्यः पूर्णत्वाच्छास्त्राणामेप निश्चयः ॥५५ स्वकर्मफलभोगानां हेतुमात्रा हि जन्तवः । कर्माणि देवमूलानि दैवाधीनमिदं जगत् ॥५६ अतएव मेरी तो यही प्रार्थना है कि इन व्याघ्र के समान कर्म करने वाले गोरूपधारी दुष्टों का विश्वास न करें। मैं तो इन समस्त दुष्टो का समूल संहार करके ही इस भूमि पर राज्य करने का इच्छुक हूँ॥५०॥ उस समय में मुनि शिरोमणि वसिष्ठजी ने सगर के मोतिपूर्ण ववनों का श्रवण करके परम प्रीति के साथ उस सगर के शरीर पर अपना हाथ फिराते हुये उससे कहा-वसिष्ठजी ने कहा था--हे महाभाग ! बहुत ही ठीक है और साधु है ( आप जो भी कुछ कह चुके हैं वह अक्षरशः परम सत्य है तथापि मेरे वचन मुन कर आपका शान्ति प्राप्त होगी ॥५१॥५२॥ जमे नुमने प्रतिज्ञा की थी उसका विरोध करने वाली मैंने अपनी शरण इनको दी है। ये तो पारण मांगकर स्वय ही मर चुके है फिर मह बतलाओ कि इन मृतों के मारने से आपको क्या कोनि प्राप्त होगी? ॥५२॥ हे भूमीश्वर ! इस जगद में समस्त प्राणी अपने कर्मों के पाश में जकड़े हुये रहा करते हैं। ये अपने पापकों से स्वय ही मरे हुपे रहा करते हैं । जो अपने पापकर्मों से स्वप ही मरे हुये हैं फिर बाप उनको क्यो मारने की इच्छा करते है इन मवका पापो से समुत्पन्न देह पहिले ही पाप से हो नाश वाला होरहा है । रही आत्मा के सम्बन्ध की बात सो तो सदा ही अमोघ है क्योंकि वह पूर्ण और नित्य है। ऐसा सत् शास्त्रों का सत्य सिद्धान्त है ।।५।। यह प्राणी अपने कर्मों के फलो को भोगने का हेतु मात्र होता है जो कर्म प्रारब्ध के अधीन होता है। इस प्रकार ने यह जगद प्रारब्ध के ही अधीन रहा करता है ॥५६ यस्माई व हि साधूना रक्षिता दुष्ट शिक्षिता ।
१५२ [ नारद पुराण ततो नरैरस्वतन्न कि कार्य साध्यते वद ॥५७ शरीर पापसभूत पापेनैव प्रवर्तते। पापमूलमिद ज्ञात्वा कथ हन्तु समुद्यत ॥५८ आत्मा शुद्धोऽपि देहस्थो देहीति प्रोच्यते बुधं । तस्मादिद वपुभूप पापमूल न सशय ॥५६ पापमूलवपुर्हन्तु का कीर्तिस्तव वाहुज । भविष्यतीति निश्चित्य नैतान्हिसास्तत सुत ॥६० इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्य विरराम स कोपत । स्पृशन्करेण नगर नन्दन मनुयस्तदा ॥६१ अथाथर्वनिधिस्तस्य सगरस्य महात्मन । राज्याभिषेक कृतवान्मुनिभि सह सुव्रतै ॥६२ भार्याद्वय च तस्यासीत्केशिनी सुमतिस्तथा। काश्यपस्य विदर्भस्य तनये मुनिसत्तम ॥६३ अतएव यही सिद्धान्त सुदृढ है कि देव ही साधु पुरुषों की सुरक्षा करने वाला तथा दुष्टो को दण्ड देने वाला होता है। इसलिये यह वताओ कि जो पराधीन हैं उनसे क्या काम सिद्ध हा सकता है ॥५॥ यह शरीर पापो से उत्पन्न हुआ है और पापों से ही चला करता है। इस शरीर का पाप मूल जान कर भी तुम क्यो मारने के लिए प्रस्तुत हुए हो ॥५६॥ आत्मा ता परम शुद्ध होता है किन्तु यह आत्मा देह मे स्थित रहा करता है इसीलिए विद्वान् लोग इसको देही कहा करते है भतएव हे भूमिपाल । यह गरीर निश्चय ही पाए मूल होता है। ऐसे इस पाप मूल शरीर का विनाश करने से आपको क्या यश प्राप्त होगा? इसलिय हे पुर । ऐमा विचार कर अव तुम इनको मत मारो ॥५६---- ६॥ अपन गुरुचरण वे इन वचनो का यवण वरखे सगर का वह वढा हुना काध शान्त हो गया था। उस ममय म समस्त मुनिवृन्द ने आनन्द प्रद सगर के शरीर पर प्रेमपूण हाथ फिरा घर स्पर्श दिया पा ॥६१॥ इसके आतर अथर्व वेद के निधि वसिएजी न मथा अत्य नारद पुराण ] १५३ प्रतधारी मुनिगण ने राजा सगर का राज्याभियक किया था ॥६२॥ है मुनिश्रेष्ठ । फिर विदभ देश के राजा काश्यप की केशिनी और सुमति नामा वाली दो राजकुमारियों के साथ सगर राजा का विवाह हुआ था ॥६॥ राज्ये प्रतिष्ठित दृष्ट्वा मुनिरौर्दस्तपोनिधि । वनादागत्य राजान सभाप्य स्वाथम ययौ ॥६४ कदाचित्तस्य भूपस्य माया प्रार्थितो मुनि । वर ददावपत्याथ मौर्यो भागवमन्त्रवित् ॥६५ क्षण ध्यानस्थिता भूत्वा निकालज्ञो मुनिश्वर । केशिनी मुमतिं चैव इदमाह प्रहपयन् ॥६६ एका वशधर चैकमन्या पडयुतानि च । अपत्यार्थ महाभाग वृणुता च यथेपितम् ॥६७ अथ श्रुत्वा वचस्तस्य मुनरोवंस्य नारद । केशिन्येक सुत वय वशसन्तानकारणम् ॥६८ तथा पष्टिसहस्राणि सुमत्या ह्यभवन्सुता । नाम्नासमजा केशियास्तनयो मुनिसत्तम ॥६६ असमजास्तु कमाणि चारोन्मत्तचेष्टित । त हप्टवासागरा सर्वे ह्यासन्दुर्वृ त्तचेतस ॥७० तपोनिधि महामी योव राज्यासन पर प्रतिष्टित सगर को देखने के लिये वहाँ पर उपस्थित हुए थे और राजा सगर से वार्तालाप परये वापिस वन पो गोबर चल गये थे ॥६४॥ एक समय में सगर को दोनोनिया ने भृगु पत्र के माता औव मुनि से सतान होने के लिए प्रायना की थी। उस समय और्ण महामुनि ने उनको बर- दान दिया था ॥६५।। त्रिकाल पो बातें जानन वान मुनि ने सण भर के लिये ध्यान परर फेमिनी और मुमति को प्राता प्रदान करते हुए यह बहा या वि आप दानो महान् भाग्या वाली है। तुम म स एष तो राजा १५४ [ नारद पुराण के केशघर पुत्र को प्राप्त कर सकती है और दूसरी रानी साठ सहल पुत्रो की प्राप्ति कर सकती है । अतएव तुम दोनो जैसी भी इच्छा हो उसी अनुसार वरदान माँग लो ॥६७।। है नारद ! और्व मुनि के इन वचनो का श्रवण करके केशिनी नाम वाली रानी ने एक ही वश चलाने वाले पुन को प्राप्त करने का वरदान मांगा था और दूसरी सुमति के साठ हजार पुत्र उत्पन्न हुए थे । हे मुनि सत्तम ! केशिनी के असमज्जा नाम वाला एक ही पुत्र हुआ था ॥६५-६६।। असमज्जा एक उम्मत के समान चेष्टा वाला होकर जैसे ही कर्मों का करने वाला था। उसको देखकर सभी सगर पुत्रों का चित्त बिगडने लगा था ॥७० तद्वालभाव सदुष्ट ज्ञात्वा वाहुसुतो नृपः । चिन्तयामास विधिवत्सुनकर्म विहितम् ।।७१ अहो कष्टतरा लोके दुर्जनाना हि सगतिः । कारकस्ताडयते वह्निरय. सयोगमात्रतः।।७२ अशुमान्नाम तनयो वभूव ह्यसमजतः । शास्त्रज्ञो गुणवान्धर्मी पितामहहिते रतः ॥७३ दुर्वृत्ता. सागराः सर्वे लोकोपद्रवकारिणः । अनुष्ठानवता नित्यमन्तराया भवन्ति ते ॥७४ हुतानी यानि यज्ञेषु हवीघि विधिवद् द्विजै. । बुभुगिरे हि सर्वाणि निराकृत्य दिवौकस ॥७५ स्वर्गादाहृत्य सतत रम्भाद्या देवयोपितः । भजन्ति सागरास्ता वै कचग्रहबलात्कृताः ।।०६ पारिजातादिवृक्षाणा पुष्पाण्याहृत्य ते खलाः । भूपयन्ति स्वदेहानि मद्यपानपरायणा. १७७ राजा सगर ने उसके बालकपन के दूपित कर्मों को देख कर पुष के इन परम निन्दित कर्मों पर गहन विचार किया था ।।७१॥ दुष्टो मी सङ्गति मे इरा मसार मे कष्ट ही मिला करता है। लोहे के सयोग
नारद पुराण 1
१५५
होन से लुहार लोग अग्नि को भी पीटने लगा करते हैं ।।७२।। उस
असमज्जा का अशुमान् नाम वाला पुत्र समुत्पन्न हुआ था। पर शास्त्री
का ज्ञाता एव परम गुणी था, बहुत अधिक धर्मात्मा था और सदा ही
अपने पितामह सगर के हितप्रद कार्यो म सलग्न रहा करता था ।।७३।।
अन्य सभी सगर के पुत्र दुराचारी थे तथा ससार मे कुछ न कुछ उपद्रव
मचात रहा करते थे और जो काई अनुष्ठान किया करते थे उस के कम
म विघ्न डाला वरते थे ॥७४॥ द्विजगण यज्ञो मे सविधि जो हवि वा
होम किया करते थे वे सागर के देवो को हटाकर उस दव योग्य
हवि को स्वय ही खा जाया करत थ ॥७५।। स्वग लोक से रम्भा आदि
दवाङ्गनाओ को लाकर उनकी घाटी पकड कर उन साथ बलात्कार
किया करते थे ।।७६॥ ये एमे दुष्ट थे कि पारिजात आदि देव वृक्षो
पुष ग्रहण कर अपन शरीरा पा सज्जित किया करत थे और मदिरा
का पान किया करते थे ।।७७॥
साधुवृत्ती समाजह्नु सदाचाराननाशयन् ।
मित्रैश्च योद्ध मारब्धा चलिनोऽत्यन्तपापिन ॥७८
एतद् दृष्ट्वातिदु खार्ता देवा इन्द्रपुरोगमा ।
विचार परम चा रेतेपा नाशहतवे ।।७६
निश्चित्य विबुधा सर्वे पातालान्तरगोचरम् ।
पपिल देवदेवेश ययु प्रच्छन्नरूपिण 150
ध्यायन्तमात्मनात्मान परानदकविग्रहम् ।
प्रणम्य दण्डवद् भूमी तुष्टुभुस्थिदशास्तत ॥६१
नमस्ते योगिने तुभ्य माखययोगरताय च ।
नरस्पप्रतिच्छन्नविष्णवे जिष्णवे नम ॥२
नम परेशभक्ताय लावानुग्रहहेतवे ।
ससारारण्यदायाम्ने धमपालनसतच ॥८३
महते वीतरागाय तुभ्य भूया नमो नम ।
नारद पुराण ]
१५७
त हात देवमेवाशु नाग कार्या विचारणा ।।८७
अल्परहोभिरेवते नाशमेष्यन्ति सागरा ।
इत्युक्त मुनिना तेन कपिलेन महात्मना ।
प्रणम्य त यथान्याय गता नाक दिवौकम. १८८
अत्रान्तरे तु सगरो वसिष्ठाद्यैर्महपिभि ।
मारेभे हयमेधाख्य यज्ञ कर्त्त मनुत्तमम् ॥६
तद्यज्ञे योजित सप्तिमपहत्य सुरेश्वर ।
पाताले स्थापयामास कपिलो यर तिष्ठति ॥६०
गूढविग्रहानपण हृतमश्व तु सागरा ।
अन्वेष्टु वभ्रमुर्लोकान् भूरादीश्च सुविस्मिता १६१
देवगण पी इम विनती को सुनकर श्री कपिल मुनि ने कहा-
है श्रेष्ठ देवताओ । जो अपराध रहित मनुष्यो को पीडा पहुंचाने की
इच्छा दिया करता है उसको सभी लोको मे पापो का कुफल भोगन के
लिये उन्मुख समझ लेना चाहिए ॥८६॥ जो अपने कर्मों से ही नहीं
मन और वनो के द्वारा भी सर्वदा दूसरे प्राणियो को प्रपीडित किया
परता है उमो देव बहुत ही शीघ्र समाप्त कर दिया करता है।
इसमे विचारते की कुछ भी बात नहीं है ॥२७१। इसलिये इस
प्रातिर नियमानुसार के महान उत्पीडर राजा सगर के पुत्र शीघ्र
ही विनष्ट होजायगे। समस्त देवगण ने श्री कपिल मुनि के ऐसे
सान्त्वनामद वचती का श्रवण करके उनरे चरमो मे गिरकर दण्डवत
प्रगाम पिया और फिर ये वापिम अपने स्वर्ग साक को चले गये ये
पइसी अनन्नर में रागा सगर ने श्री यसिहजी आदि महा
महपियो को महायता प्राप्त पर परम ये अवमेघ यग पर यमन
मरने या आरम्म पर दिया या man देवराज इन्द्र का उग
अपरमेध या पार पाडा गया था उमा महाप पर पानान
तोर म पहुँचा दिया था जहां पर श्रीवपिन मनि तपाचर्मा पर रह
१५८
[ नारद पुराण
थे । वहां उसको बांध दिया था ॥६६॥ इन्द्रदेव ने अपने शरीर को
छिपा कर ही इस अश्व का अपहरण किया था । उस समय मे राजा
सगर के ये साठ हजार पुत्र बहुत ही विस्मित हो गए थे और भू आदि
समस्त लोको मे उम अश्द की खोज करने लगे थे ॥६१
यदृष्टसप्तयस्ते च पाताल गन्तुमुद्यता ।
चरनुमहीतल सर्वमेकको योजन पृथक् ॥६२
मृत्तिका खनिता ते चोदधितीरे समाकिरन् ।
तद्द्वारेण गता सर्वे पाताल सगरात्मजा ॥६३
विचिन्वन्ति ह्य तर मदोन्मत्ता विचेतस ॥६४
तत्रापश्यन्महात्मान कोटिसूर्यसमप्रभम् ।
कपिल ध्याननिरत वाजिन च तदन्निके ॥६५
तत सर्वे तु सरधा मुनि दृष्ट्वाऽतिवेगत ।
हन्तुमुद्युक्तमनसो विद्रवन्त समासदन ॥६६
हन्यता हन्यतामेप वध्यता वध्यतामयम् ।
गृह्यता गृह्यतामाशु इत्यूचुस्ते परस्परम् ।।६७
हताश्व साधुभावेन वकवद्धचानतत्परम् ।
सन्ति चाहो खला लोके दुर्वन्त्याइम्बर महत् ।।६८
अश्वमेध यज्ञ विना इस अश्व की प्राप्ति के अधूरा ही रह
गया था। जब अन्यत्र यही पर भी वह अब नहीं मिला तो वे सब
पाताल लो में गमन करने को उद्यन हुये और एक-एक योजन का
एक वृत्त वना का इस पृथ्वी के खनन करने का कार्य आरम्भ कर
दिया था और खुदी हुई मिट्टी को समुद्र के किनारे पर डालकर उस
बुदी हुई मृतिका के द्वार स इन्होने पाताल लोक में प्रवेषा प्राप्त कर
लिया था ।।६।६३ व सगर के पुत्र बहुत ही उदास होकर वहा पर
भी उस अश्व की खोज करने में प्रवृत्त होगये थे। इन मदोन्मत्त सगर
पुत्रान वहा पर करोड़ो मूर्यों के समान कान्ति वाले महात्मा कपिल
नारद पुराण ] १५६ मार डालो- मुनि को ध्यान में निमग्न इन्होंने देखा था और यह भी देखा था कि वह घोडा उन्हीं के समीप बंधा हुना है ॥६४३॥ मुनि को देखकर इनको बहुत अधिक क्रोध हुआ था और वे सब उनको मार देने का मनमे विचार कर अत्यन्त वा से उनकी ओर झपटने लगे थे ॥६६॥ उम समय मे वे परस्पर में ऐसे वचन कह रहे थे-अरे । इम दुष्ट को 1-मार डालो और शीघ्र ही इसे पक्ड लो ॥१७॥ यह यज्ञ वे अश्व को चुराकर यहां ले बाया है और अब कमा वगुले के हो ममान ध्यान लगा कर बहुन वडा साधु बनकर बैठा हुआ है । ऐमे दृष्ट लाग इस मसार में कैसा बाडम्बर दिखाया करते है ।।६८ इत्युच्चरन्तो जहमु कपिल ते मुनीश्वरम् । समस्तेंद्रियमदोह नियम्यात्मानमात्मनि ॥६E आस्थित कपिलस्तपा तत्कर्म ज्ञात वान्न हि ॥१०० आमन्नमृत्यवस्ते तु विनष्टमतयो मुनिम् । पभि मताडयामासुहू च जाहु परे ।।१०१ ततस्त्यक्तसमाधिस्तु स मुनिर्विस्मितस्तदा। उवाच भावगम्भीर लोकोपद्रवकारिण ॥१०१ ऐश्वर्यमदमत्ताना क्षुधिताना च कामिनाम् । अहवारविमूटाना दिवेको नैव जायते ।।१०३ निधेराधारमानेण मही ज्वलति सर्वदा। तदेव मानवा भुक्त वा ज्वलतीति क्मिद्भुतम् ॥१०४ किमत्र चित्र सुजन वाधन्ते यदि दुर्जना । महीरहाश्चानुतटे पातयन्ति नदीरया ॥१०५ महा मुनीश्वर वपिन देव के विषय में इस तरह से बहने हय हिंग पनि घर वपिन मुनि ने अपनी ममम्न इन्द्रियों वो वश मेंबर परमात्मा ध्यान में अपना मन सगा पर रमा था। इमी- लिय उना मगर ये पुत्री के इम वर्म पादुछ भी पता नही सगा
१६०
[ नारद पुराण
था 1881१००11 किन्तु उन लोगो की मौत निकट आ पहुंची थी।
आएव उनकी बुद्धि एकदम भ्रष्ट हो गई थी। इसीलिये वे तप मे
समवस्थित मुनि मे ठोकरें मारने लगे थे और कुछ ने उनकी भुजायें
पकड ली थी ॥१०१॥ उस समय में इस अत्यधिक उत्पार होने के
कारण उनकी समाधि पुल गयी थी। उस समय मे परम विस्मित
होकर उन समस्त ससार में महान् उपद्रव मचा देने वालो से बड़े ही
गम्भीर भाव से पूर्ण यह वचन कहा था-ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त,
मूर्ख और कामियो को तथा अहवार के वश मे पडे हुये महा मूढो को
पिये नही रहा करता ॥१०२।१०३।। सम्पूर्ण निधि का आधार होने
से यह पृथ्वी सदा चलती रहा करती है उसी निधि को उपभोग करने
वाले मनुप्य भी जलने लगें तो कुछ आश्चर्य की बात नहीं है।१०४
दुष्ट लोग सज्जनो को वह देते हैं तो कोई आश्चर्य की बात नही है
क्योकि दुष्टो का तो स्वभाव ही पीडा पहुंचाना है जैसे नदी का वेग
तटस्थ वृक्षों को गिरा ही दिया करता है ।।१०५
या श्रीयौवन वापि शरदा वापि तिष्ठति ।
तभश्री द्धता नित्य मूर्खत्व चापि जायते ॥१०६
अहो कनकमाहात्म्यमाख्यातु केन शक्यते ।
नामसाम्याद हो चिा धत्त रोऽपि मदप्रद. ॥१०७
भवेद्यदि खलस्य श्रीः सैव लोकविनाशिनी ।
यथा सखाग्ने पवन. पन्नगस्य यथा विपम् ॥१०८
अहो धनमदान्धस्तु पश्यन्नपि न पश्यति ।
यदि पश्यत्यात्महित स पश्यति न संशयः ।।१०६
इत्युक्त वा कपिलः ॐ द्वो नेवाभ्या ससृजेऽनलम् ।
स बहि सागरान्सन्भिस्मसादकरीक्षणात् ।।११०
यन्लेग्रजानल दृष्ट्वा पातालतलवासिन.।
अकालप्रलय मरवा च शु शोकलालसा ॥१११
नारद पुराण ] तदग्नि तापिता सर्वे दन्दशूकाश्च राक्षसा । सागर विविशु. शीघ्र सता कोपो हि दु सह ।।११२ जहाँ लक्ष्मी,यौवन और सरस्वती वर्तमान में रहा करती है वहाँ पर इनके साथ ही साथ अलक्ष्मी-वृद्धता वोर मूर्खता भी अपनी जडे जमा लिया करती है ।।१०६।। कनक ( सुवर्ण ) का माहात्म्य किसी से भी कहा नहीं जा सकता है । समान नाम होने के कारण कनक (धतूरा) भी महान मदकारी होता है ( क्नक सुवर्ण और धतूरा इन दोनो का नाम होता है ) 11१०७ यदि किसी दुष्ट पुरुप के पास पूर्व पुण्यों के प्रताप से सम्पत्ति हो जाया करती है तो वह उससे संसार के समस्त प्राणियो को कष्ट दिया करता है जिस तरह अग्नि का मित्र वायु वहाँ जाता है तो वह अत्यन्त प्रचण्ड होकर सर्वनाश ही कर दिया करता है और सर्प का विप बढ़ जाता है तो वह जीवो का दशन करके मार दिया करता है ॥१०॥ अहो । धन का मद कितना प्रवल होता है कि मांखो से देखता हुमा भी अन्धा हो जाया करता है और उसे भी सत्-असत् दिखलाई नही पडता है। यदि अपने-हित की बात देख लेने तो मुख प्राप्त करे किन्तु उसे तो हित-अहित का धन के मद में ज्ञान ही नहीं रहा करता है ॥१०॥ इस प्रकार से वह कर पपिल मुनि ने कद होकर अपने नेत्रो से यग्नि या प्रक्षेप क्यिा था और उससे एक ही क्षण में वे सगर के पुत्र खार की टेरियां बन गये थे ॥११०॥ उस समय में उनके नेत्रो की उस अग्नि को देख पर सब पाताल लोक के निवासी महाप्रलय को बालाग्नि समसकर शोक से चीखने लग गये पे ॥१११॥ उरा महान् प्रदीप्त अग्नि ये ताप रो सन्तप्त होकर मर्प और राक्षम समुद्र में कर गये थे। क्योकि सरजनो का कोप परम दुःसह हुआ करता है ॥११२ अथ तस्य महीपग्य समागम्याध्वर तदा । देवदूत उवावेद सर्व वृत्त हि यक्षते ॥११३
१६२
[ नारद पुराण
एतत्समावण्यं वच सगर सर्ववित्प्रभु ।
देवेन शिक्षता दुष्टा इत्युवावातिहुपित ॥११४
माता वा जमको वापि भ्राता वा तनयोऽपि वा।
अधर्म कुरुते यस्तु स एव शिपुरिष्यते ॥११५
यस्त्वधर्मपु निरत सर्वलोक विरोधकृत् ।
न रिपु परम विद्याच्छास्त्राणामेप निर्णत ॥११६
सगर पुन नाशेऽपि व शुशोच मुनीश्वर ।
दुर्वृत्तनिधन यस्मात्सतागुत्साहकरणम् ।।११७
यज्ञेष्वनधिकारत्वादपुगाणामिति स्मृते ।
पौग तमगुमन्त हि पुनत्वे कृतवान्प्रभु ॥११८
असमञ्जस्सुत त तु सुधिय वाग्विदा वरम् ।
युयोज सारविद् भूयो ह्यश्वानयनकर्मणि ।।११६
इसके अनन्तर एक दूत ने वहा उपस्थित होकर समस्त समा
चार राजा सगर को सुना दिया था जहा पर वे यज्ञ कर रहे थे
॥११३॥ इस वृत्तान्त का श्रवण कर सर्व ज्ञानी राजा सगर ने यही
कहा था कि देव ने ही दुष्टो को दण्ड दिया है-~~यह कह कर वह
प्रसन्न हुआ था ॥११४।। राजा सगर ने कहा कि चाहे माता हो
या पिता हो, भ्राता हो या पुत्र हो, जो भी कोई हो जो अधर्म और
अन्याय क्यिा करता है उसको शत्र, ही समझ लेना चाहिये।।११५॥
जो अधर्म परायण हो और सदा सब लोगो का विरोध ही किया
करता हो उसको अपना परम घोर शत्रु हा समझना चाहिये---यही
ममस्त शास्त्रो का सिद्धान्त है ।।११६।। हे मुनीश्वर | इसा शास्त्रो के
सिद्धान्त के अनुसार राजा सगर ने अपने पुत्रों का विनाश होने पर भी
किंचि मात्र भी शोक नहीं किया था क्योकि दुराचरण करने वालो का
विनाश मापुरुपो के हप का ही बढाया करता है 11 ११७ ।। इसके
पश्चात् राजा सगर ने पुत्रहीन को यज्ञ करने का कोई अधिकार नहीं
नारद पुराण ]
१६३
होता है। शास्त्र के सिद्धान्त का स्मरण करके अपने पौत्र अशुमान
को ही पुन मान लिया था ।।११८|| फिर उस परम बुद्धिमान एव
वक्ताओं में परम श्रेष्ठ असमञ्जस के पुन अशुमान को ही सारवेत्ता
सगर ने अश्व के लाने के कार्य में नियुक्त किया था ॥११६
स गतस्तद्विलद्वारे दृष्ट्वा त मुनिपुङ्गवम् ।
कपिल तेजसा राशि साष्टाङ्ग प्रणनाम ह ॥१२०
कृताञ्जलिपुटो भूत्वा विनयेनाग्रत स्थित. ।
शान्तमनस देवदेव सनातनम् ॥१२१
दो शील्य यत्कृत ब्रह्मान्मत्पितृव्यै क्षमस्व तत् ।
परोकारनिरता क्षमासारा हि साधव ॥१२२
'दुर्जनेष्वपि सत्त्वेषु दया कुर्वन्ति साधव ।
नहि सहरते ज्योत्स्ना चन्द्रश्चाण्डालवेश्मन ॥२३
वाध्यमानोऽपि सुजन सर्वपा सुखकृद्भवेत् ।
ददाति परमा तुष्टि भक्ष्यमाणोऽमर शशी ॥१३४
दारितश्छिन्न एवापि ह्यामोदेनेव चन्दन ।
सौरभ कुरुते सर्व तथैव सुजनो जन ॥१२५
क्षान्त्या च तपसाचारस्तद्गुणज्ञा मुनीश्वरा ।
सजात शासितु लोकास्त्वा विदु पुरुपोत्तम ॥१३
फिर वह अशुमान उसी पूर्व निमित विल के द्वार स पहा
पहुँच गया था जहा पर परम तेजस्वी मुनिपुगर श्री कपिल देव के
दर्शन करके उनके चरणो में साशङ्ग दण्डवत प्रणाम किया था
१.१२०॥ फिर यह म गुमान नम्रता के साथ दोनो शप जोड बर
उनने मगन में स्थित हो गया था और परम शाम हृदय वाले
मनातन श्री कपिल मुनि स यह निवेदन परन लगा पा ११२१॥
अ गुमान ने कहा-हे असन् । मेरे पापाओ ने जो दुशोसता का
व्यवहार किया था, उस अपराध को थाप क्षमा पर दीलिए योरि
१६४
[ नारद पुराण
साधु पुस्प सर्वदा परोपकार करने में परायण हो रहा करते है और
क्षमा भाव ही उनका सार हुआ करता है ॥१२२॥ साधु पुरुष
दुर्जन प्राणियो पर भी उनके पत्याण करने के लिए हो दया किया
करते हैं। चन्द्रमा पाण्डाल के घर से भी अपनी चांदनी का प्रकाश
हटाता नहीं है और सब पर उसकी चांदनी का प्रकाश समान स्वरूप
से ही फैला रहा करता है ॥१२३॥ साधु पुरुषो को भले ही कोई
अपनी दुष्ट वृत्ति से पोडा भी देखें तो भी वे सबको सदा सुख ही दिया
करते हैं । देवता चन्द्र को साये जाते हैं फिर भी वह सबको सन्तुष्ट ही
रखा करता है ॥१२४॥ फाडकर और चीरकर प्राप्त किया गया भी
चन्दन अपनी सुन्दर सुगन्ध को ही सवंन्न फैलाया करता है वैसी ही
दशा साधु पुरुषो को हुआ करती हैं ॥१२५॥ हे पुरषोत्तम ! आपकी
क्षमा और तप के आचरणो से गुणज्ञ भूनीश्वर यह समझ लिया करते हैं
कि आप मनुष्यो पर शासन करने के लिये ही समुत्पन्न हुये हैं ॥१२६
नमो ब्रह्मन्मुने तुभ्य नमस्ते ब्रह्ममूर्तये ।
नमो ब्रह्मण्यशोलाय ब्रह्मध्यानपराय च ॥१२७
इति स्तुतो मुनिस्तेन प्रसन्नवदनस्तदा।
वर वरय चेत्याह प्रसानोऽस्मि तवानघ ।।१२८
एवमुक्त तु मुनिना ह्य शुमान्प्रणिपत्यतम् ।
प्रापयास्मत्पितृन्तन्द्राह्म लोकमित्यभ्यभापत ॥१२६
ततस्तस्यातिसतुष्टो प्रोवाच मुनिः सादरम् ।
गङ्गामानीय पौत्रस्ते नयष्यिति पितृ.न्दिवम् ॥१३०
त्वत्पोोण समानीता गङ्गा पुण्यजला नदी ।
कृत्वैतान्धूतपापान्वै नयष्यिति पर पदम् ॥१३१
प्रापयन हय वत्स यत स्यात्पूर्णमध्वरम् ।
पितामहान्तिक प्राप्य साश्य वृत्त न्यवेदयत् ।।१३२
सगरस्तेन पशुना त यज्ञ ब्राह्मणः सह ।
नारद पुराण ] विधाय तपसा विष्णुमाराध्याप पदं हरेः ।।१३३ हे ब्रह्मन् ! हे मुनिवर ! आपको मेरा सादर प्रणाम समर्पित है । सदा ब्रह्म के ध्यान मे लीन रहने वाले आपको में सर्वप्रथम प्रणाम करता हूँ ॥१२७। इस प्रकार से मुनि का सस्तवन करने पर कपिल मुनि ने परम प्रसन्न मुख से कहा-हे निष्पाप ! मैं तेरे ऊपर अत्य- धिक प्रसन्न हूँ, तुझे जो भी कुछ इच्छा हो उसका वरदान मुझसे माग से ॥१२८।। उन महा मुनि के इस तरह से कहने पर मशुमान ने उनको फिर एक बार मविनय प्रणाम करके निवेदन किया था-हे ब्रह्मन् ! मेरे मृत पितरो को थाप ब्रह्मलाक भेज देने की कृपा कीजिये ।।१२। उस समय मे उन पर परम प्रसन्न होकर महा मुनि कपिल- देव ने आदरपूर्वक कहा-तेरा पोर स्वर्गलोक से गङ्गाजी को यहा लाकर इन सबका उद्धार कर स्वर्गलोक में पहुँचायेगा ॥१३०॥ तेरे पौत्र के द्वारा लाई गई परम पवित्र जल वाली गङ्गा इनको निप्पाप करके परम पद को प्राप्त करा देगी ॥१३१॥ है वत्स ! अब तू इम पज के अश्व को लेजा जिससे तेरे पितामह का यज्ञ पूर्ण हो जाये । इसके पश्चात् अश्व को लेकर अ शुमान ने वहा आकर अपने पितामह राजा सगर से समस्त वृत्तान्त मुना दिया था ॥१३२।। फिर राजा सगर ने ग्राह्मणों के साथ बैठकर अपने यज्ञ अश्वमेघ का पजन पर उसे पूर्ण किया पा । तपश्चर्या से भगवान् विष्णु को समाराधना करके श्री हरि के परमपद को प्राप्त हो गया था ॥१३३॥ गजें पशुमतः पुत्रो दिलीप इति विद्युत । तस्माद्भगीरथो जातो यो गङ्गामानद्दिवः ।।१३४ भगोरयस्य तपमा सुष्टो ब्रह्मा ददौ मुने। गङ्गा भगीरयायाय चितयामाम धारणे ।।१३५ ततच शिवमाराध्य तद्वारा स्वर्णदी मुवम् । आनीय तग्गलः स्पृष्ट्या पूतान्लिन्ये दिव पिन न ॥१३६ १६६ [ नारद पुराण था जिससे भगीरथान्वये जात सुदासो नाम भूपतिः । तस्य पुत्री मिनसह सर्वलोकेपु विश्रुत. ॥१३७ वसिष्ठशापात्प्राप्त ससौदासो राक्षसी तनुम् । गगाविन्दुनिपेकेण पुनर्मुक्तो नृपो ऽभवत् ।।१३८ फिर उस ध शुमान का दिलीप नाम याला परम प्रसिद्ध पुत्र उत्पन्न हुआ था। उस दिलीप के भागीरथ नामक पुत्र हुआ था और उसने ही स्वर्ग लोक से यहां पर गङ्गाजी को लाकर विराजमान किया था ॥१३४।। हे मुने । भगीरथ ने अति उग्र तप किया परम प्रसन्न एव सन्तुष्ट होकर ब्रह्माजी ने भगीरथ को गङ्गाजी दे दी थी। उस समय भगीरथ ने अपने मनमें विचार दिया था कि इन गङ्गाजी को यहां से जाने पर धारण कौन करेगा ॥१३५॥ गङ्गादेवी के प्रपात करने के लिये फिर राजा भगीरथ ने परम दयालु भगवान् शङ्कर की आराधना की थी और उनके ही द्वारा स्वर्ग से गङ्गाजी को इस भूमण्डल मे लेकर भगीरथ नृपति स्वय पवित्र हुये और पितरो को भी जल का स्पर्श करा वर स्वर्ग लोक मे पहुँचा दिया था भगीरथ राजा के वश मे एक सुदास नाम वाला राजा हुआ था। उसका पुत्र समस्त लोको में मिन सह नाम से प्रसिद्ध हुआ था ॥१३६ वसिष्ठ मुनि के शाप से उस सौदास को राक्षस का शरीर प्राप्त हो गया था वह राजा भी गङ्गाजल के छोटे पडने ही से राक्षसी भाव से मुक्त होकर मनुष्य होगया था ॥१३८ ॥१३७॥ ॥ सौदास चरित्र ॥ शप्त कथ वसिष्ठन सौदासो नृपसत्तम । गगाविन्द्वभिषेकेण पुन शुद्धोऽभवत्कथम् ॥१ सवमेतदशेपेण भ्रातर्मे वक्त मर्हसि ।
नारद पुराण ]
१६७
श्रृण्वता वदता चैव गङ्गारयान शुभावहम् ॥२
सौदास. सर्वधर्मज्ञ सर्वज्ञो गुणवाछुचि ।
बुभुजे पृथिवी सर्वा पितृवद्रजयन्प्रजा ॥३
सगरण यथा पूर्व महीय सप्तसागरा।
रक्षिता तद्वदमुना सर्वधर्माविरोधिना ॥४
पुत्रपौनसमायुक्त सर्वेश्वर्यसमन्वित ।
विशदष्टसहस्राणि वुभुजे पृथवी युवा ।।५
सौदासस्त्वेकदा राजा मृगयाभिरतिवनम् ।
विवेश सवल सम्यक् शोधित ह्याप्तमन्त्रिमि ॥६
निपाद सहितस्तन यिनिघ्नन्मृगसञ्चयम् ।
आससाद नदी रेवा धर्मज्ञ स पिपासित ॥७
देवपि श्री नारदजी न पूछा था यि वसिष्ठजी ने राजामो में
परम श्रेष्ठ सौदास को क्यो शाप दिया था और यह गङ्गाजलसे कैसे
हुआ ? ।।१।। हे घात । बाप इन सब बातो का वर्णन मेरे सामने
विस्तृत रूप से करने की पुपा पीजिये क्योकि यह गङ्गा देवी अपनी
पथा के वक्ता और श्रोता दोनों को ही पवित्र पर दिया करती है
॥२१॥ श्री सनवजी ने नारदजी के प्रश्न का उत्तर देते हुये कहा था
गि मुदाग का पुत्र मित्रमह सभी धर्मों को जानने वाला था। सभी
पस्तुआ और गुणो का ज्ञाता तथा परम पवित्र या । वह पिता के ही
रामान अपनी प्रजा या मनोरजन करते हुये पृथ्वी के मुगा पा भोग
शिया रता पा ॥३॥ पहिले राजा सगर ने जिस तरह मे सातो
गागर यात्री पृथ्वी का पाचन पिया था उसी प्रकार म राजा मित्रमह
भी धर्म परिमी भी भाग म विरोध न करता हुआ इम भूमण्डल पी
रक्षा करता था ४ाउग रामा ने युवावस्था हो म पुत्र-पौत्र और सभी
तरह के ऐश्वयं से परिपूर्ण रहार बहतीम हजार थप तब इस पृथ्वी
का गुप भोगा पा ॥शा एर समय म राजा मिगह मन्त्रि या ये
१६८
नारद पुराण
द्वारा सुरक्षित वन मे शिर करने के शौक से अपनी सेना के साप
प्रविष्ट हुआ था ।।६।। वहा पर उसी के साथ मे निपाद लोग भी
अपनी टोली बना कर मृगो की टोलियो वो मार रहे थे। वह धर्मश
राजा प्यास लगने पर रेवा नदी के तट पर पहुंच गया था ७
सुदासतनयस्तय स्नात्वा कृत्वाह्निक मुने ।
भुक्त्वा च मन्त्रिभि. साता निशा तर चावस.त् ।।
तत प्रात समुत्थाय कृत्वा पोर्वाहिङ्गको नियाम् ।
बभ्राम मन्त्रिसहितो नर्मदातीरजे वने ॥६
बनानान्तर गच्छन्नेक एव महीपतिः ।
आकर्णकृष्टवाण. सत् कृष्णसार समन्वगात् ॥१०
दूरसैन्योऽश्वमारूढ स राजानुव्रजन्मृगम् ।
व्याघ्रद्वय गुहासस्थमपश्यत्सुरते रतम् ।।११
मृगपृष्ठ परित्यज्य व्याघ्रयो. समुख ययौ ।
धनु सहितवागेन तेनासौ शरशास्त्रवित् ॥१२
ता व्याघ्री पातयामास तीणाग्रनतपर्वणा।
पतमाना तु सा व्याघ्री पनिशद्योजनायता ॥१३
तडित्वद्वोरनिर्पोपा राक्षसी विकृताभवत् ।
पतिता स्वप्रिया वीक्ष्य द्विपन्स व्याघ्रराक्षस ॥१४
प्रतिक्यिा करिष्यामीत्युक्त्वा चातर्दधे तदा।
राजा तु भयसविग्नो वने सैन्य समेत्य च ॥१५
हे मुनिवर । वहाँ पर राजा भित्रसह ने स्नान तथा आह्निक
कृत्य समाप्त करके अपने मन्त्रि यो के साथ भोजन किया था और
उस रात मे वही पर ठहर गया था 11८11 इसके उपरान्त दूसरे
दिन मे प्रान काल होने पर उठकर पूर्वान्ह की क्रिया की थी और
फिर अपने मन्त्रियो को साथ में लेकर नर्मदा नदी के तौर पर भ्रमण
करने लग गया था ॥६॥ एक वन से दूसरे वन में जाने के समय
मारद पुराण ] १६६ गया देखा था मे राजा अकेला ही रह गया था और एव कृष्ण सार हिरन के पीछे कान तक वाण खीचकर दौडने लग था ॥ १० ॥ उस समय मै राजा के सैनिक बहुत दूर पीछे ही रह गये थे । उस अवसर पर घोडे पर सवार रहते हुये ही राजा ने एक गुफा के अन्दर व्याघ्र दम्पत्ति को मैथुन करते हुए ॥ ११॥ इनको देखकर उस राजा ने हिरण पा पीछा करना तो छोड दिया और अपने धनुप पर शर चढा कर उस व्याघ्र दम्पत्ति के जोडे की ओर बढ़ गया था ॥१२॥ उस राजा गे अत्यन्त तीक्ष्ण अग्र भाग वाले तथा जमी हुई गांठ से युक्त वाण से उस जोडे में मे वाघनीनो मार कर गिरा दिया था। उस व्याघ्री ने जब मौत के मुह मे गमन कर रही थी। विद्युत से युक्त मेघ के समान बडी भारी गर्जना की थी और एकसौ चौआलीस कोस लम्बी वेडोल भयावह राक्षसी का स्वरूप धारण करके मर गयी थी। उस समय मे अपनी प्रिया को मरी हुई देखकर वह व्याघ्र रूपी राक्षस बडा भारी द्वैप करके राजा से कहने लगा था-मैं तेरे इस अत्याचार का बदला लेकर छोडूगा । इतना कहकर वह अन्तर्धान होगया था। इसके ऐसा कहने पर राजा को बड़ा भय हुआ और अत्यन्त उद्विग्न होकर वह अपने सैनिको से मिला था ।।१३।१४:१५ तद्वृत्त कथयन्सर्वान्स्वा पुरी स न्यवर्तत । शङ्कमानस्तुतद्रक्ष कृत्याद्राजा सुदासज ॥१६ परितत्याज मृगया तत प्रभृति नारद । गते वहुतिथे काले हयमेध मख नृप । समारेभे प्रसन्नारमा वशिष्ठाद्यमुनीश्वर। 1१७ तत्र ब्रह्मादिदेवेभ्यो हविदत्त्वा यथाविधि । समाप्य यज्ञनिजातो वशिष्ठ स्नातकोऽपि च ॥१८ १७० [ नारद पुराण अनान्तरे राक्षसोऽसौ नृपहिसितभार्यकः । कर्तुं प्रतिक्रिया राज्ञे समायातो रुपान्वितः ॥१६ स राक्षसस्तस्य गुरो प्रयाते वशिष्ठवेप तु तदेव धृत्वा । राजानमभ्येत्य जगाद भोक्ष्ये मास समिच्छाम्यहमित्युवाच ।।२० भूय समास्थाय स सूदवेप पक्वामिप मानुपमस्य प्रादात् । स्थितश्च राजापि हिरण्यपात्रे धृत्वा गुरोरागमन प्रतीक्षन् ।।२१ तन्मास हेमपात्रस्थ सौदासो विनयान्वित.। पमागताय गुरवे ददौ तस्मै स सादरम् ॥२२ राजा ने अपने सैनिको को वह सव वृत्तान्त सुना दिया और वापिस अपनी नगरी को लौट पड़ा सुदास का पुत्र राजा मित्रसह उम राक्षस के कृन्य से सदा शङ्कित रहा करता था। इसलिये उसने उस दिन से मृगया का करना ही एक दम बन्द कर दिया । हे नारद ! बहुत सा समय व्यतीत हो जाने पर उस राजा ने चित्त मे प्रसन्नता करके वशिष्ठ आदि ऋषीश्वरो के साथ मिलकर अश्वमेध यज्ञ के यजन करने का आरम्भ किया था ।।१६।१७॥ उसमे ब्रह्मा आदि देव वृन्द को हवि देकर और यज्ञ को सविधि समाप्त करके वह राजा और वशिष्ठ महर्षि उस यज्ञ गण्डप से बाहर चले गये थे ॥१८॥ इसी अन्तर मे जिसकी भार्या को राजा ने वन मे मार पर गिरा दिया था वह राक्षस महान क्रोध से भरकर बदला लेने के लिये राजा के समीप पहुँच गया था ॥१६॥ वह वशिष्ठ मुनि के चले जाने पर वशिष्ठ मुनि का स्वरूप धारण कर राजा के पास पहुंचा और उससे कहने लगा था-'मैं मास खाऊगा, राक्षस ने पाचक का रूप धारण किया था और राजा को मनुष्य का मास पकाकर दे दिया था। राजा भो उसको एक सुवर्ण के पात्र मे रखकर उस मांस को आदर के साथ गुरुजी को अर्पित करने लगा था ॥२०१२११२२ त दृष्ट्वा चिन्तयामास गुरु किमिति विस्मित । फिर उस
नारद पुराण ]
१७१
अपश्यन्मानुप मास परमेण समाधिना ।।२३
अहोऽस्य राज्ञो दो शील्यमभक्ष्य दत्तवान्मम ।
इति विस्मयमापन्न प्रमापुरभवन्मुनि ॥३४
अभोज्य मद्विघाताय दत्त हि पृथिवीपते ।
तस्मात्तवापि भवतु ह्य भदेव हि भोजनम् ॥२५
नृमास रक्षसामेव भोज्य दत्त मम त्वया।
तद्याहि रक्षसत्व (व तदाहारोचित नृप ॥२६
इति शाप दमयस्मिन्सौदासो भय विह्वल ।
आज्ञप्नो भवतेवेति सकपोऽरमै व्यजिज्ञपत् ।।२७
भूयश्च चिन्तयामास वशिष्ठस्तेन नोदित ।
रक्षसा वचित भूत ज्ञातवान् दिव्यापा।।२८
इसको देखकर योगी गुरुजी ने परम विस्मित होकर विचार
किया था कि-यह क्या है और जब बहुत ध्यान से देखा तो उनको
वह मनुष्य का मास ज्ञात हो गया था ॥२३॥ इससे परम विस्मित
हुये मुनि को महान क्रोध हो गया था। उन्होने विचार किया ओहो ।
इस राजा ने पंसा दुष्टता का कार्य किया है इससे मुये सर्वथा
अभक्ष्य नर मास भक्षण करने को दिया है ॥२४॥ वजिष्ठजी ने कहा-
हे राजन् । तूने मेरी सम्पूर्ण तपश्चर्या का नाश करने के लिय आज यह
पभोज्य पदार्थ मेरे अर्पण किया है । अतएव जा, यह तेरा ही
भोजन होगा।।२५॥ अरे दुष्ट राजा, तूने यह राक्षसो का भाजन
मुझे दिया है अतएव इसके खाने का उचित पात्र तू माज से राक्षस
हाजा ॥२६॥ राजा मित्रसह श्री वसिजी के इस प्रकार से शाप देन
पर भय से वचन होगया था और परम पम्पित गात्रो वाला होकर
कहने लगा कि बापने ही मुथै आज्ञा प्रदान की थी, मेरा इसम क्या
दोष है ॥२७॥ राजा की इस बात का सुनकर वसिष्ठनी को कुछ
प्रेरणा मिली थी और उन्होंने पुन याग माग के द्वारा विचार किया
१७२
[नारद पुराण
तो दिव्य चक्षु से उन्होंने देखा था कि राक्षस ने ही राजा वो वचित
किया है ॥२८
राजापि जलमादाय वशिष्ठ शप्तुमुद्यत ॥२६
समुद्यत गुरु शप्त दृष्ट्वा भूयो रुपान्वितम् ।
मदयती प्रिया तस्य प्रत्युवाचाथ मुव्रता ॥३०
भो भो क्षनियदायाद कोप सहतुमर्हसि ।
त्वया यत्कर्म भोक्तव्य तत्त्प्राप्त नात्र सशय ॥३१
गुरु तु कृत्य हु कृत्य यो वदेन्मूढधीनर ।
अरण्ये निजले देशे स भवेद् ब्रह्मराक्षस ॥३२
जितेन्द्रिया जितकोधा गुरुशुश्रूपणे रता ।
प्रयान्ति ब्रह्मसदनमिति शास्नैपु निश्चय ॥३३
तयोक्तो भूपति कोप त्यक्त्वा भार्या ननन्द च ।
जल कुत्र क्षिपामीति चिन्तयामास चात्मना ॥३४
तज्जल यन ससिक्त तद्भवेद्भस्म निश्चितम् ।
इति मत्वा जल तत्तु पादयोन्यक्षिपत्स्वयम् ॥३५
उस समय मे राजा भी हाथ मे जल ग्रहण करके वशिष्ठ मुनि
को शाप देने के लिये प्रस्तुत हो गया था ॥२६॥ उस अवसर पर
वसिष्ठजी ने देखा था कि राजा परम क्रुद्ध हो गया है और मुझे शाप
देने के लिये तैयार हो गया है तो उसकी रानी जो परम सुन्दर व्रत
वाली थी और जिसका मदयन्ती नाम था राजा से निवेदन करने
थी।३०।। मदयन्ती ने उस समय में कहा था-हे क्षत्रिय पुत्र ।
अपने इस क्रोधावेश को राकिये । जो कम आपको भोगना था वह
आपको अव प्राप्त हो गया है ॥३१॥ महान् मूढ पुरुष जो होता है
वही अपने गुरु से तू या हूँ ऐसा कहकर बोला करता है वह निश्चय
ही निजन वियावान वन मे ब्रह्म राक्षास हुआ करता है ।।३२॥ शास्त्री
का यह परम निश्चित सिद्धान्त है कि जो अपनी सब इद्रियो को
नारद पुराण ]
१७३
और क्रोध को वश में रखते हुये गुरु को सेवा सुश्रूषा मे निरन्तर
निरत रहा करते हैं वे ब्रह्म लो मे गमन किया करते हैं ।। ३३ ।।
अपनी पत्नी के ऐसे समझाने पर राजा ने अपने आपको शान्त किया
था और अपनी भार्या को आनन्दित करके स्वयही अपने मनमे विचार
किया था कि अब शाप देने के लिये ग्रहण किये हुये जल को यहाँ
छोडा जावे ॥३४३ वह जल तो शाप देने के विचार से ही ग्रहण
किया था अतएव वह जल जिस पर भी गिरेगा वह निश्चय ही भस्मी-
भूत हो जायगा । गहराई से यह विचार र वह जल अपने ही चरणो
मे डाल दिया था ॥३५
तज्जलस्पर्शमानेण पादौ कल्मापता गती।
कल्माषपाद इत्येव तत प्रभृति विस्तृत ॥३६
कल्मापपादो मतिमान् प्रिययाश्वासितस्तदा।
मानसा सोऽतिभीतस्तु ववन्दे चरण गुरो ॥३७
उवाच च प्रपन्नरत प्राञ्जलिर्नयकोविद ।
क्षमस्व भगवन्सर्वं योपराध कृतो मया ॥३८
तच्छुत्वोवचा भूपाल मुनिनि श्वस्य दुखित ।
आत्मान गर्हयामास ह्यविवेकपरायणम् ॥३६
अविवेको हि सर्वेपामापदा परम पदम् ।
विवेकरहितो तोके पशुरेव न संशय ॥४०
राज्ञा त्वजानता नूनमेतत्कर्मोचित कृतम् ।
विवेकरहितोऽज्ञोऽह यत पाप समाचरम् ॥४१
विवेव नियतो याति यो वा को वापि निर्वृतिम् ।
विवेकहीनमाप्नोति को वा यो वाप्यनिर्वृतिम् ॥४२
उस जल का स्पर्श होते ही उस राजा के पैर चितकबरे से हो
गये थे और उस दिन में वह फिर करमपपाद नाम से लोक में प्रसिद्ध
हो गया था ॥३६॥ कल्मषपाद बहुत ही बुद्धिमान था, अपनी प्रिया
१७४ [ नारद पुराण पत्नी के समाश्वासन देने पर अपने मन में बहुत अधिक डरते २ फिर उसने भृगुजी के चरणो में प्रणाम किया था ॥३७॥ इसके अनन्तर नीतिशास्त्र में परम चतुर उस राजा ने हाथ जोड कर अपने गुरुजी के चरणो की शरण में जाकर रहने लग गया था और उसने उनसे विनम्र होकर प्रार्थना की थी। हे भगवन् । मुझ से जो यह महान अपराध इस समय मे बन गया है उसे अव आप क्षमा कर दीजिए ॥३८॥ इस बात का श्रवण कर मुनिवर वसिष्ठ जो बहुत ही दु खित हुए और उन्होने एक दु.ख भरी श्वास लेकर उस राजा से कहा-मैं बहुत ही विवेकहीन है, मुझे धिक्कार है। यह कार्य और अकार्य का विचार न रहना ही अविवेक है और यही समस्त आपदाओ का मूल होता है । जो विवेक से हीन रहा करता है वह मनुष्य पशु के ही तुल्य हो जाया करता है ।।३६-४०॥ हे राजन् । तुम को इसका ज्ञान ही नही था अतएव आप भी मुझे शाप दे देते तो बहुत ही उचित होता क्यो कि मूढ और विवेक से रहित था। इसी कारण से मुझ से यह पाप बन गया था ॥४१॥ जो प्राणी विवेक बुद्धि के द्वारा अपने मन को वश मे रखता है वह भले ही कोई भी हो सदा मुख प्राप्त किया करता है तथा जो विवेक को त्याग देता है उसे हर तरह का दुख आवर दबा दिया परता है ।।४२॥ इत्युक्त्वा चात्मनात्मान प्रत्युवाच मुनि पम् । नात्यन्तिक भवेदेतद् द्वादशाब्द भविष्यति ।।४३ गगाविन्द्वभिषिक्तस्तु त्यक्त्वा वै राक्षसी तनुम् । पूर्वरूप त्वमापन्ना भोदयमे मेदिनीमिमाम् ॥४४ तद्विदुगेवमभूतज्ञानेन गताल्मप । हरिमेवापगे भूत्व परा शान्ति गमिप्यसि ॥४५ इन्युक्त्वाथवविद्भप वशिष्ठ स्वाश्रम ययो। राजापि दु ग्रसपन्नो राक्षसी तनुमाश्रित, ॥४६ 'नारद पुराण १७५ क्षुत्पिपासाविशेपातों नित्यं क्रोधपरायणः । कृष्णक्षपाद्युतिर्भीमो वभ्राम विजने वने ॥४७ मृगाश्च विविधांस्तत्र मानुपांश्च सरीसृपान् । विहङ्गमान्प्लवङ्गाश्च प्रशस्तास्तानभक्षयत् ॥४८ अस्थिभिबहुभिर्भूय. पीतरक्तकलेवरः । रक्तान्तप्रेतकेशश्च चित्रासीद् भूभर्यकरी ॥४६ हग तरह से स्वय थाप ही अपनी कुराई का काम न कर फिर मुनि उस राजा से कहने लगे थे-यह मेरा शाप चिरकाल तक नहीं रहेगा । बारह वर्ष के बाद यह छूट जायेगा ।।१३।। जब तुम्हारे शरीर पर भागीरथी गङ्गाजी के जल से अभिषेक होगा तो इस राक्षस शरीर से तुम्हारी मुक्ति हो जावेगी और पुन. तुम प्रथम स्वरूप को प्राप्त कर इस पृथ्वी का सुख भोगोगे ॥४४॥ गङ्गाजी के जल से अभिषक्त होने पर तुमको ज्ञान की प्राप्ति होगी और समस्त तुम्हारे पाप नष्ट हो जायेंगे। फिर तुम भी हरि की सतत सेवा करके परम शान्ति का लाभ करोगे ॥४५ । अथर्व वेद के पूर्ण ज्ञाता महा मुनि वशिष्ठजी उस राजा को इस प्रकार से सान्त्वना देकर सपने आथम मे वापिस लौटकर चले गये थे और वह राजा राक्षस का शरीर प्राप्त कर महान् पट में पड़ गया था ॥४६॥ राक्षस शरीर को प्राप्त कर वह भूख प्याम से परम व्याकुल रहने लग गया था । सर्वदा ही वह क्रोध से भरा रहता था । कृष्ण पक्ष की रात्रि के समान ही महान भीषण कान्ति वाला होकर निर्जन वनो में भ्रमण करने लग गया था ॥४७॥ वन मे विभिन्न प्रकार के मृग-मनुष्य, पक्षी, सर्प और अंध वानरो का भक्षण किया करता था ||८|| वहां की भूमि बहुत सी अस्थियो से तथा रक्त पान कर चूसी हुई लाशो से और रधिर से लिप्त हुए मृत मनुष्यो के केशो से चितववरी और बरसन्त भयावह हो गई थी।
१७६ [नारद पुराण . ऋतुनये स पृथिवी शतयोजनविस्तृताम् । कृत्वातिदु खिता पश्चाद्वनान्तरमुपागतम् ॥५० तनापि कृत वान्नित्य नरमासाशन सदा । जगाम नर्मदातीर मुनिसिद्धनिपेवितम् ।।५१ विचरन्नर्मदातीरे सर्वलोकभयकर । अपश्यत्कचन मुनि रमन्त प्रियया सह ।।५२ क्षुधानलेन सतप्तस्त मुनि समुपाद्रवत् । जग्राह चातिवेगेन व्याधो मृग शिशु यथा ॥५३ ब्राह्मणी स्वपति वीक्ष्य निशाचरकरस्थितम् । शिरस्यञ्जलिमाधाय प्रोवाच भयविह्वला ॥५४ भो भो नृपतिशार्दूल नाहि मा भवविह्वलाम् । प्राणप्रियप्रदानेन कुरु पूर्ण मनोरथम् ॥५५ नाम्ना मित्रसहस्त्य हि सूर्यवंशसमुद्भव । न राक्षसस्ततोऽनाथा पाहि मा विजने वने ॥५६ वह राक्षस शरीर में रहने वाला राजा छ मास पर्यन्त चार सौ कोस यी भूमि को प्राणी विहीन एव दु'यमयी वनावर फिर वहा दूसरे वन में चला गया था ॥५०॥ वहाँ पर भी नर मांस का भक्षण फरता हुआ मुनि और परम मिद्धो द्वारा रोवित नर्मदा नदी के तट पर भटक्ता हुमा पहुँच गया था 11 ५१ ।। सभी प्राणियो को भयभीत परने वाले उस राक्षम ने उम नर्मदा नदी के विचरण करते हुये एक मुनि को अपनी प्रिया पत्नी के साथ रमण परत हुये देखा था ॥५२॥ भूत की उग्र अग्नि से झुलसता हुआ वह राक्षम मुनि के ऊपर झपटा था और जिस तरह से ध्यान एक मृग के बच्चे को पकड लिया करता है उसी भांति इस राक्षस ने भी उम विप्र को दबोच लिया था ॥५३॥ वह मुनि पत्नी ब्राह्मणी ने अपने स्वामी को राशम पे हाथा में पैसा हुआ देखा तो वह भय से अरपन्न विह्वल होरर हाथ जोहपर पहन लगी थी ॥५४॥ उग मनि पानी न यहा- राजशा । आप मुपे गय से पिवस राती तट पर
रद पुराण ]
१७७
( रक्षा करिये। मेरे प्राण प्यारे पति को छोड दीजिए और मेरा
रय पूर्ण करिए ॥५५॥ साप वास्तव में राक्षस नहीं हैं । आप तो
रम पवित्र एव प्रख्यात सूर्य वश मे पैदा हुएहैं। अतएव इम निर्जन वन
मुझ अनाथ की इम समय मे आप रक्षा करिए ॥५६
या ना भ रहिता जीवत्यपि मृतोपमा ।
तथापि वालवैधव्य कि वक्ष्याम्यरिमर्दन ।।५७
न मातापितरौ जाने नापि वधु च कचन ।
पतिरेव परो वधु परम जीवन मम ॥५८
भवान्वेत्यासिलान्धर्मान्योपिता वर्त्तन यथा।
प्रायस्व वन्धुरहिता वालापत्या जनेश्वर ॥५६
कथ जीवामि पत्यास्मिन्हीना हि विजने वने ।
दुहिताह भगवतस्त्राहि मा पतिदानत ॥६०
प्राणदानात्पर दान न भूत न भविष्यति ।
वदन्तीति महाप्राज्ञा प्राणदान कुरुष्व मे ॥६१
इत्युक्त्वा सा पपातास्य राक्षसम्य पदाग्रत ।
एक सप्राय॑मानोऽपि ब्राह्मण्या राक्षसो द्विजम् ।
अभक्षयत् कृष्णसार शिशु व्याघ्रो यया बलात् ॥६२
सतो विलप्य बहुधा तस्य पत्नी पतिव्रता।
पूर्णशापहत भूपमशपत्क्रोधिता पुन ॥६३
जिस नारी का पति नहीं रहा परता है वह नो जीवित रहते
हुई भो मृन ही ममान हो जाया परती है। है अरिमर्दन । फिर
भी जा वाल विधया हाती है उगवे दुध का तो मैं वर्णन ही क्या
करू ॥४७॥ मैं न तो अपनी माता यो जानती हूँ और न अपने पिना
या हो जाननी जान रिसी भी वधु का ज्ञान मुग नहीं है ।
मेरे नो पर पतिदव ही परम वायु है मौर यही मरे जीवन सर्वस्त्र है
॥५॥ आप तो सभी धर्मोग भली मानि मार रहा है और स्त्रिया
१७८ [ नारद पुराण के व्यवहार वर्ताव को भी अच्छी तरह से जानते हैं। हे नभेश्वर । इस समय में मुझ वन्धु विहीन वालक सन्तति वाली अवला की आप सुरक्षा कीजिये ॥५६॥ मैं अपने स्वामी के विना इस निर्जन वन मे कैसे जीवित रह सगो। मैं आपकी पुत्री हूँ । आप इसस मय में मुझे मेर पतिदेव का दान देकर मेरी रक्षा करिये ॥६०॥ परम बुद्धि मानो का क्थन है कि प्राणी या दान परम श्रेष्ठ होता है इसकी समता अन्य कोई भी दान नहीं रखता है । ऐसा दान अव तक कोई नहीं हुआ है और न होगा, अत मेरी रक्षा करिये । मुझे प्राण- दान ही कीजिये ।।६१॥ इस तरह से विनती करके वह मुनि पत्नी उस राक्षस के चरणो म गिर पड़ी थी। उस ब्राह्मणी की इस प्रार्थना वे करने पर भी वह राक्षस जैसे व्याघ्र कृष्ण मृग के बच्चे को पलाव खा जाया करता है । उसी भांति उस ब्राह्मण को खा गया था ॥६२ उस समय उसी पतिव्रता पत्नी ने बहुत भारी दिलाप किया था और प्रथम ही शाप से नष्ट राक्षस को ऋद्ध होकर फिर शाप दे दिया था ।।६३ पति मे सुरतासक्त यस्माद्धिसितावान्वलात् । तस्मात्स्त्रीसङ्गम प्राप्तस्त्वमपि प्राप्स्यसे मृतिम् ॥६४ शाप्त्वव ब्राह्मणी न दा पुन शापान्तर ददौ । राक्षमत्व ध्रुव तेऽस्तु मत्पतिर्भक्षितो यत ॥६५ सोऽपि शापद्वयं श्रुत्वा तया दारा निशाचार । प्रमन्यु प्राह विमृजन्योपादङ्गारसचयम् ॥६६ दुष्टं यस्मा प्रदत्त मे वृथा शापद्वय त्वया। एपरयवापराधम्य शापस्त्वेको ममोचित ॥६७ यस्मारितापसि दुष्टाग्रघं मयि शापान्तर तत । पिशाचयोनिमार यारि पुषसमन्विता ।।६८ तनव ग्राह्मणा गता पिशाचर तदा गता।
नारद पुराण ] १७६ क्षुधार्ता सुस्वरं भीमा रुरोदापत्यसंयुता ॥६६ राक्षसश्च पिशाची च क्रोशन्तो निर्जने वने । जग्मतुर्नर्मदातीरो वटं राक्षससेवितम् ।।७० अरे दुष्ट ! तूने मेरी रति मे आसक्त प्रिय पति को बलपूर्वक मार डाला है। इसलिये तू भी जब भी स्त्री का सङ्ग करेगा मृत होजायगा ॥६४।। इस प्रकार से शाप देकर क्रोध मे भरी हुई ब्राह्मणी ने पुनः शाप दिया था कि अरे दुष्ट तूने मेरे पति का भक्षण कर लिया है अतएव तेरा यह राक्षसत्व बहुत समय तक अटल हो जावेगा ॥६५।। उस समय मे वह राक्षस उस मुनि पत्नी के दिये हुए इन दो शापो को मुनकर क्रोध से धधकने लग गया था और क्रोध के अङ्गारे से उगलते हुए उससे बोला-अरी दुष्टे । एक अपराध के लिए तुझे एक ही शाप देना उचित था। तूने व्यर्थ ही मुझे दो शाप दिये हैं ऐसा क्यो किया है ? ॥६७॥ अरी दुप्टे । तूने एक ही अपराध पर दूसरा भी शाप दिया है इसलिये मैं भी तुझे शाप देता हूँ कि तू भी अपने पुत्र के सहित राक्षसी होना ॥६॥ उस राक्षस के द्वारा इस प्रकार से शाप देते ही वह ब्राह्मणी अपने पुत्र के सहित राक्षसी हो गई थी और अपने वाला के सहित भूखे होकर परम भयकर चीखे मारने लगी थी ॥६६॥ इस तरह से उस वियावान वन में चीखते व चिरलाते हुये थे राक्षस और पिशाचिनी उम नर्मदा के तट पर एक राक्षस के निवास स्थान में वट पर जाकर पहुँच गये थे ॥७० औदासान्य गुरो कृत्वा राक्षसी तनुमाश्रित.। तयास्ते दुखसतात. कश्चिल्लोकविरोधकृन् १७१ राक्षम च पिशाची च दृष्ट्वा स्ववटमागती। उवाच मोधवहलो वटस्थो ब्रह्मराक्षस ।।७२ किमर्थमागती भीमो युवा मत्स्थानमीसितम् । ईदगो केन, पापेज. जालो मे यूवता ध्रुवम् ॥७३ १८० [ नारद पुराण सौदासस्तद्वच श्रुत्वा तया यच्चारमना कृतम् । सर्व निगेदयित्वास्मै पश्चादेतदुवाच ह ॥७४ कस्त्व वद महाभाग त्वया नै किं कृत पुरा । सख्युर्ममातिस्नेहेन तत्सर्वं वक्त मर्हसि ॥७५ करोति वञ्चन मित्रे यो वा को वापि दुष्टधी । स हि पापफल भुक्त यातनास्तु युगायुतम् ॥७६ जन्तूना सर्वदुःखानि क्षयन्ते मित्रदर्शनात् । तस्मान्मिोपु मतिमान्न कुर्याद्वचन कदा ॥७७ उस स्थल में भी एक लोको के विरोध करने वाला तथा अपने मे उदासीनता दिखाने वाला होने के कारण से ही राक्षस शरीर पाकर दु ख से अत्यन्त सन्तप्त होकर निवास किया करता था ॥७१।। वह ब्रह्मराक्षस था और उसने जब यह देखा कि एक राक्षस और एक पिशाचिनी भी उसके बड के नीचे आ पहुँचे है तो वह क्रोध मे भरकर कहने लगा ।।७२॥ उसने कहा-अरे महान् भयङ्कर प्राणियो । तुम मेरे परम प्रिय इस स्थान पर क्यो आये हो ? और यह भी बताओ कि किस पाप के वरो क कारण तुम्हारी यह गति हुई है? 11७३।।इस यात का श्रवण वर राजा मुदाम के पुप मित्रसह ने और उस ब्राह्मणी ने स्वय ही अपने माप जो कम किया था वह सब कह कर सुना दिया था। इसके पश्चात् उस सौदास ने पूछा था-उसने कहा-हे महा- भाग । आपभी अपना पूर्ण परिचय दो कि आप कौन हैं ? और पहिले कौनसा कुत्सित कम किया था जिसके कारण आप इस दशा मे प्राप्त हुए है। मुगे तो आप अपना ही एर मिश्र ही समान लीजिए तथा बडे ही स्नेह के साथ अपना सम्पूण वृत्तान्त सुना, दीजिये ॥५ तो अपने मित्र के साथ धोखा दिया करता है वह बहुत ही दुष्ट बुद्धि वास होता है और वह चाहे कोई भी क्यो न हा दरा हजार युगाता पाप व फल की यातना ही भागा वरना है ॥७६॥ गित्र के दशहान -
मारर Ton]
14
पर प्राणी के समान दुग पर वाया परने हैं। गति परम यु
पान मनुष्य का पम्प है कि यह अपने मित्रों से कभी भी
दिलायन करे ।
पल्मापारयुको यटम्पा यमगधगः।
उयार प्रीनिमापन्नो धर्मयारयानि नारद ||
आमार्ग पुराणिो मागधी येदपारगः।
मोमास पनि ग्यानी नाम्ना धर्मपरायणः ।
प्रमनोरमभाग विषया परगा धनः ।
औशानीय गुर्ग भूला मातानीदनी गतिम् ।।८०
मनोर मुगनिनिनिताniro
मया गु भक्षिता fran गोम गागमः ॥८१
शरिणागारो नियमनग्नान पनि ।
जगायागारोनिग्य मागागनारायण ॥२
যানমালা মার্ণিা।
मयानुप्रामादित: भोपाल पापांग ।।
मारद पुराण J
आपको वर्णन करके बतलाता हूँ। हे सखे । अव आप अपने मन
पो एकान करके उसका श्रवण करिये ॥६५॥ वेदो का अध्यापन कराने
वाला-वेदार्ग वी ऋतियो को बताने वाला-शास्त्रो को विशद व्याख्या
परने वाला-धर्म का उपदेश देने
वाला,
नीति शास्त्र को बताने
वाला, मन्नोपदेश करने वाला तथा मन्त्रो के अर्थ समझाने वाला, वेदो
में समुचित सन्देही को दूर करने वाला, बो का उपदेश प्रदान
परने वाला, भय से बचाने वाला, बन्नदान देने वाला, श्वसुर, मामा,
पडा माई, पिता, उपनयन मस्कार कराने वाला, वह जिसने गर्भा-
धानादि ममस्त सस्वार रराय हो, ये सब गुरु ही माने जाते हैं। इन
सभी या सादर पूजन एव वन्दना करनी चाहिये ।।८६।७।८८८
सल्माप पाद ने इस पर उस ब्रह्म राक्षस से कहा-आपने तो बहुत
प्रकार वे गुरओ का वर्णन कर दिया है। इन सब मे परम येष्ठ गुरु
पौन होता है अयवा ये सभी समान ही हुआ करते है । हे मित्र !
यह अय बाप ठीक-ठीक यतलाइय 180
साधु साधु महाप्राज्ञ यत्पृप्ट तद्वदामि ते ।
गुरमाहात्म्यवथन श्रवण चानुमोदनम् 11६१
सर्वेपा श्रय आधले तम्मादक्ष्यामि साप्रतम् ।
एते समानपूजाहाँ सर्वदा नार मशय ॥६२
तथापि ऋणु वक्ष्यामि शाम्याणा मारनिश्चयम् ।
अध्यापकाश्च वेदाना मन्त्रव्याख्यातस्तया ॥६३
पिता च धर्मवक्ता च विशेषगुरव स्मृता ।
एतेपामपि भूपाल श्रृणुप्व प्रवर गुरम् ।।६४
सर्वमानवार्यतत्वमापिन प्रवदामि ते।
य पुराणानि यति धर्मयुक्तानि पण्डित १६५
मसारपाशविच्छेदकरपानि स उत्तम ।
देयपूजाहंपर्माणि देवतापूजने फलम् ॥६६
१८४ [ नारद पुराण ज्ञायते च पुरागेभ्यस्तस्मात्तानीह देवता. । सर्ववेदार्थसाराणि पुराणानीति भूपते ॥६७ वदन्ति मुनयश्चैव तद्वक्ता परमो गुरु । यः ससारार्णवं तत्त मुद्योग कुरुते नर ॥६८ शृणुयात्स पुराणानि इति शास्त्रविभागकृत् । प्रोक्तवान्सर्वधर्माश्च पुराणेषु महीपते ॥६६ उस ब्रह्म राक्षस ने कहा-हे महा प्राज्ञ ! बहुत अच्छा प्रश्न है। यह तुम्हारा पूछना बहुत ही अच्छा एव उचित है । वह भी अभी आपको बतलाता हूँ। क्योकि गुरु के विषय में उनकी महिमा का वर्णन, श्रवण अथवा गुरु के माहात्म्य का अनुमोदन करना सबको कल्याण करने वाला हुआ करता है। इसीलिए मैं अभी इसका वर्णन फरता हूँ। यद्यपि वैमे उपर्युक्त गुरुजन जिनके नाम मैंने अभी आपको बतलाये हैं ये सभी समान ही पूजन के पात्र हुजा करते हैं ॥६१।६।। तथापि जो शास्त्रो का निश्चित सिद्धान्त है वही में आपको बतलाये देता हूँ । जो वेदो की शिक्षा दिया करते हैं जो मन्त्रोपदेश एव मन्त्री की व्याख्या किया करते हैं जो गर्भ धारण कराने वाले पिता है और जो धर्म के ज्ञाता है। ये विशेष पूजा के पात्र गुरु कहे जाया करते हैं । हे भूपाल | इनमे भी जो परम श्रेष्ठ तम गुरु हैं उनको भी अब आप सुनिये ॥६३६४॥ सर्व धर्म के जानने वालो का जो मन्तव्य है उसी का मैं वर्णन कर रहा हूँ। जो इस ससार के आवा- गमन के पाश का छेदन कर धर्मपूर्ण पुराणो का वर्णन किया करता है वही सर्वोतम गुरु है । देवो को पूजा का फर्म और देवो की अर्चना वा फल पुराणो के द्वारा ही ज्ञात हुआ करता है । अतएव हे राजन् ! पुराण सब वेदो के तत्वार्थ के सार स्वरूप हुआ करते हैं इस कारण से थे देवता ही होते हैं IMEN६६७11 मुनिगण यही कहते है कि उन पुराणो का वर्णन करने वाला परम येष्ठ गुरु होता है । जो प्राणी
नारद पुराण ]
इस ससार रूपी गहन सागर को पार करने का उद्या
उसको पुराणो वा श्रवण अवश्य ही करना चाहिये । हे राजन् । कृष्ण
द्वैपायन व्यासदेव ने सब शास्त्रो का विभाजन कर पुराणो मे सभी
(समस्त) धर्मों का विशद एव सरल वर्णन किया है |IEELL
तर्कस्तु वादहेतु स्यान्नीतिस्त्यहिकसाधनम् ।
पुराणानि महायुद्ध इहामुन सुखाय हि ॥१००
य शृणोति पुराणानि सतत भक्तिसयुक्त ।
तस्य स्यान्निमला बुद्धिभू यो धर्मपरायण १०१
पुराणश्रवणाभक्तिर्जायते श्रीपती शुभा ।
विष्णुभक्तनृणा भूप धर्म बुद्धि प्रवर्त्तते ॥१०२
धर्मात्पापानि नश्यन्ति ज्ञान शुद्ध च जायते ।
धर्मार्थकाममोक्षाणा ये फलान्यभिलिप्सव १०३
शृणुयुस्ते पुराणानि प्राहुरित्थ पुराविद ।
अह तु गौतममुने सर्वज्ञाद् ब्रह्मवादिन ।।१०४
श्रुतवान्सर्वधर्मार्थ गङ्गातीरे मनोरमे ।
कदाचित्परमेशस्य पूजा कर्तुं मह गत ॥१०५
हे महान बुद्धिशाली सौदास I तर्क करना तो एक विवाद का
कारण होजाया करता है और नीति के अनुसरण करते ही इस लोक
के सब कार्य सिद्ध हुआ करते हैं । ये पुराण इस लोक और परलोक
दोनो ही जगहो पर सुख प्रदान किया करते हैं ॥१००। इन पुराणो का
श्रवण करने से श्रीपति भगवान की परम शुभ भक्ति समुत्पन्न हुआ
करती है और हे राजन् । जो मनुष्य भगवान् विष्णु के भक्त होते हैं
उनकी बुद्धि सदा धर्म कर्मों मे लगा करती है । जो भक्त भाव के
सहित सदा श्रवण किया करता है उसकी बुद्धि निर्मल हो जाया करती
है और वह फिर अधिकाधिक धर्मों का समाचरण किया करता है
॥१०११०२।। धर्म का आचरण करने से समस्त पाप नष्ट हो जाया
१८६ [ नारद पुराण 1 ज्ञानवान् लोग करते हैं और मन मे निर्मलता आया करती है। प्राचीन कहा करते हैं कि 'जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, इन चारो पुरुषार्थों को यशावत् प्राप्त करने की अभिलाषा रखते हो और इनका श्रेप्ठतम... फल प्राप्त करना चाहते हो उनको सब कुछ त्याग कर पुराणो का ही श्रवण करना चाहिये । मैंने तो परम रमणीय श्री गङ्गा नदी के तीर पर सर्व ज्ञाता महान ब्रह्मवादी श्री गौतम मुनि के मुख से सम्पूर्ण धर्मों के तात्पर्य का श्रवण किया था। एक समय की घटना है कि मैं भगवान शकरजी का अर्चन करने मे सलग्न था ।।१०३।१०४११०५ उपस्थितायापि तस्मै प्रणाम न ह्यकारिपम् । स तु शान्तो महाबुद्धिगौतमस्तेजसा निधि ।।१०६ मन्तोदितानि कर्माणि करोतीति ययौ। यस्त्वक्तिो मया देव. शिवः सर्वजगद्गुरु. ॥१०७ गुर्ववज्ञा कृता येन राक्षसत्वे नियुक्तवान् । ज्ञानतोऽज्ञानतो वापि योऽवज्ञा कुरुते गुरोः ॥१०८ तस्यैवाशु प्रणश्यन्ति धीविद्यार्थात्मजक्रियाः। शुश्रूपा कुरुते यस्तु गुरूणा सादर नरः १०६ तस्य सपद्भवेद्भप इति प्राहुर्विपश्छितः । तेन शापेन दग्धोऽहमन्तश्चैव क्षुधाग्निना ॥११० मोक्ष कदा प्रयास्यामि न जाने नृपसत्तम । एव वदति विप्रेन्द्र वटस्थेऽस्मिन्निशाचरे ॥१११ धर्मशास्त्रप्रसगेन तयोः पाप क्षय गतम् । एतस्मिन्नन्तरे प्राप्त. कश्चिद्विप्रोऽतिधार्मिकः ।।११२ इसी बीच में मेरे गुस्वर नदी पर समागत हो गये थे । मैं पूजन में लगा रहने के कारण से उनके चरणों में उपस्थित होकर उन्हे प्रणाम न कर सका था परन्तु गौतम मुनि महान मेधावी महा पुरुष थे और उत्तम तेज वे निधि ये इसीलिये वै शान्त रहे थे ॥१०६॥ वे मह नारद पुराण ] १८७ हमारा शिष्य मन्त्रशास्त्र मे वहे हुये कमों का विधान कर रहा है-यह समझ कर ये बहुत प्रसन्न हुये थे परन्तु उन भगवान् शकर ने ही --जिनके यजनार्चन मे लगा हुआ था, गुरु की मात्रा करने के अपराध के कारण ही मुझे राक्षस बना दिया था। जो भी कोई ज्ञानपूर्वक या अज्ञान स गुरुदेव का अपमान किया करता है उसकी, विद्या, बुद्धि, सम्पत्ति, सन्तति और सत्वर्मानुष्ठान ये सभी अत्यन्त शीन ही नष्ट हो जाया करते हैं । जो अपने गुरुदेव की समादर के सहित सेवा, सत्कार किया करते हैं ॥१०७।१०८।१०६।११०।। हे राजन् । उसको अतुल सम्पदा प्रदान हुआ करती है। ऐसा विद्वजन कहा करते हैं । मैं उन ही भगवान के शाप से परम दुखित होकर झुलस रहा हूँ । अन्दर भूख को अग्नि मुझे जला रही है ।।१११॥ मैं नहीं मानता कि इस महान कष्ट से मेरा छुटकारा कब तक होगा । हे विप्रेन्द्र । वह उस वट वृक्ष पर निवास करने वाला ब्रह्म राक्षस इस प्रकार से कह ही रहा था कि धर्म चर्चा के करने से उसका सम्पूर्ण पाप क्षीण हो गया था। उसी समय मे एक परम धार्मिक ब्राह्मण वहां पर आ पहुँचा था ॥११२ कलिङ्गदेशसभूतो नाम्ना गर्ग इति स्मृत । वहन्गङ्गाजल स्कधे स्तुवन् विश्वेश्वर प्रभुम् ॥११३ गायन्नामानि तस्यैव मुदा हृष्टतनूरुह । तमागत मुनि दृष्ट्वा पिशाची राक्षसी च ती ॥११४ प्राप्ता न पारगेत्युक्त्वा प्राद्रवन्नूळवाहव । तेन कीर्तितनामानि श्रुत्वा दूरे व्यवस्थिता । अशक्तास्त घर्पयितुमिदमूचुश्च राक्षस ॥११५ अहो विप्र महाभाग नमस्तुभ्य महात्मने। नामकीर्तनमाहात्म्याद्राक्षसा दूरगा वयम् ॥११६ अस्माभिर्भक्षिता पूर्व विप्रा कोटि सहस्रश । 'नामप्रावरण विप्न रक्षति त्वा महाभयात् ।।११७ १८८ [ नारद पुराण नामश्रवणमात्रेण राक्षसा अपि भो वयम् । परा शान्ति समापन्ना महिम्ना ह्यच्युतस्य वै ।।११८ सर्वथा त्व महाभाग रागादिरहितो ह्यसि । गङ्गाजलाभिषेकेण पाह्यस्मात्पानुकोञ्चयात् ॥११६ वह ब्राह्मण कलिंग देश मे समुत्पन्न हुआ था और उसका नाम: गर्ग था । वह अपने कन्धे पर गङ्गाजल लिये हुये विश्वेश्वर प्रभु वा स्तवन कर रहा था ॥११३॥ भगवान् के परम शुभ नामो का कीर्तन. कर रहा था। प्रसन्नता के कारण से उसका शरीर पुलकायमान हो रहा था । उस श्रेष्ठ मुनि को समागत हुये देखकर ये राक्षस और पिशाचिनी मनमे विचार करने लगे कि हमारा भोजन प्राप्त हो गया है। ये दोनो अपनी भुजायें उठाकर उसे पकड़ने के लिये दौडे थे । पिन्तु उसके मुख से उच्चरित भगवान् के शुभ गाम कीर्तन को सुन कर कुछ एक गये थे। उस समय मे उस विप्र को धर दबोचने में असमर्थ होकर वे राक्षस इस तरह से बहने लगे थे ॥११४११५ उन्होने विनम्रता के साथ उससे कहा-हे महाभाग ( ब्राह्मण ) हम महान आत्मा वाले आपको सादर प्रणाम करते हैं। ओहो । भगवान विष्णु के नाम कीत्तंन का कैसा अद्भुत प्रभाव है कि इस नाम ये माहात्म्य के कारण से हम सरीधे राक्षस आपके समीप मे फटक भी नहीं सकते हैं । ऐसे महाप्रभु श्री विष्णु भगवान की सेवा मे भी हमारा प्रणाम समर्पित है ।।११६। इससे पूर्व हमने सहस्रो ब्राह्मणो का भक्षण पर डाला था परन्तु यह नामोच्चारणरूपी दुर्ग आपकी रक्षा महान भय से कर रहा है ।।११७॥ हम लोग महान दुष्ट राक्षस है तो भी भगवान के परम पावन एव शुभ नामो के कीर्तन का श्रवण परने पर इस समय हमको परम शान्ति प्राप्त हो रही है । अहो ! भगवान अच्युत पी वही भारी महिमा होती है ।।११।। हे महाभाग ! आप तो रागादि दोपा से रहित है। ये लाग मुमे खाने को प्रस्तुत हागये
नारद पुराण ]
१८६
थे रात इनका उद्धार मैं क्या करूं । इस भावना का परित्याग करके
आपके पास जो यह परम पावनी पतितोद्धारणी गङ्गा का जल है इससे
अभिपिच्चन करके हमको राक्षस योनि के बडे भारी पाप से उद्धार
कीजिये ॥११०
हरिसेवापरो भूत्वा यश्चात्मान तु तारयेत् ।
स तारयेज्जगत्सर्वमिति शसन्ति सूरय ॥१२०
अपहाय हरेर्नाम घोररसारभेपजम् ।
केनोपायेन लभ्येत मुक्ति सर्वत्र दुर्लभा ।।१२१
लोहोडुपेन प्रतरन्निमज्जत्युदके यथा।
तथवाकृतपुण्यास्तु तारयन्ति क्थ परान् ॥१२२
अहो चरिन नहता सर्वलोक्सुखावहम् ।
यथा हि सर्वलाकानामानन्दाय कलानिधि ॥१२३
पृथिव्या यानि तीर्थानि पवित्राणि द्विजोत्तम ।
तानि सर्वाणि गङ्गाया कणस्यापि समानि न ॥१२४
तुलसीदलसमिश्रमपि सर्पपमानकम् ।
गङ्गाजल पुनात्येव कुलानामेकविंशतिम् ।।१२५
तस्माद्विप्र महाभाग सर्वशास्त्रार्थ कोविद ।
गङ्गाजलप्रदानेन पाह्यस्मान्पापकमिण ॥१२६
विद्वान् पुरुप कहा करते हैं कि जो निरन्तर भगवान् श्री हरि
की सेवा मे सलग्न रह कर अपने आपका उद्धार किया करता है वह
सम्पूर्ण जगत् का भी उद्धार कर सकता है ॥१२०॥ भगवान् श्री हरि
का नाम इम मसाररूपी महा व्याधि की महीपध है । मुक्ति बहुत ही
दुर्लभ वस्तु है । आप यह वताइये कि इस श्री हरि के नामोच्चारण के
अतिरिक्त विमो अन्य साधना के द्वारा भी वह प्राप्त हो सकती है
।।१२१॥ तौह की नौका से पानी मे तरने वाला भी डूब जाया करता
है । दमी प्रकार से जिसने कभी दोई पुण्य वर्म नहीं दिया है वह
[ नारद पुराण
दूसरो को कैसे तार सकता है ।।१२२॥ जिस तरह से चन्द्रमा सबको
आनन्द प्रदान किया करता है वैसे ही बडे आदमियो का चरित्र भी
सब लोगो को सुख प्रदान किया करता है ।।१२३॥ हे द्विजोत्तम 1 इस
भूमण्डल मे जितने भी परम पावत्र तीर्थ है वे सभी गङ्गा के किनके की
बरावर नही है ।।१२३॥ तुलसी दलो से युक्त सरसो के दाने के समान
भी गङ्गाजल मनुष्य की इक्कीस पीढियो का उद्धार कर दिया करता
है ।।१२४।। अतएव हे समस्त शास्त्रो के महान पण्डित महाभाग ब्राह्मण
देव । इस समय मे गङ्गाजी का जल प्रदान करके हम सब पापियो की
आप रक्षा कीजिये ।।१२५
इत्याख्यात राक्षस्तैस्तैर्गङ्गामाहात्म्य मुत्तमम् ।
निशम्य विस्मयाविष्टो बभूव द्विजसत्तम ।।१२७
एपामपीदृशी भक्तिर्गङ्गाया लोकमातरि ।
किमु ज्ञातप्रभावाणा नहता पुण्यशालिनाम् ॥१२०
अथासी मनसा धर्म विनिश्चित्य द्विजोत्तम ।
सर्वभूतहितो भक्त प्राप्नोतीति पर पदम् ।।१२६
ततो विप्र कृपाविष्टो गङ्गाजतमनुत्तमम् ।
तुलसीदलसमिथ तेषु रक्ष स्वसेचयत् ॥१३०
राक्षसास्तेन सिक्ताफ्तु सर्पपोतमविदुना ।
विसृज्य राक्षस भावमभवन्देवतोपमा ।।१३१
ब्राह्मणी पुनसयुक्ता सोमदत्तस्तयव च ।
कोटिसूर्यप्रतीकाशा बभूवुर्विबुधर्पभा ॥१३२
शखचक्रगदाचिह्ना हरिसारूप्य मागता ।
स्तुवन्तो ब्राह्मण सम्यले जा
रमन्दिरम् ॥१३३:
उन राक्षसो ने जिस समय में गङ्गाजल का इस प्रकार से
माहात्म्य का यर्णन किया तो उसका श्रवण करके वह परम श्रेष्ठ ब्राह्मण
अत्यधिक प्रसन्न हुआ था ।।१२७॥ उसे प्रसन्नता इसी बात से हुई
नारद पुराण ] १६१ . थी कि लोक जननी गङ्गा में जव इन महा पतित राक्षसो को ऐसी प्रगाढ भक्ति है जो जन गङ्गाजी की महिमा का भली भांति ज्ञान रखते हैं उन महान पुण्यात्मा लोगो की श्रद्धा-भक्ति के विषय मे क्या कहा वे ॥१२८। इसके अनन्तर उस परम श्रेष्ठ शिरोमणि द्विज ने पिने मन में विचार किया कि जो प्राणी जगत् में समस्त प्राणियों का हत-सम्पादित किया करता है वह परम दयालु और परोपकारी भक्त अवश्य ही परम पद की प्राप्ति किया करता है। अतएव इन विचारे दुर्गति दशापन्न जीवों का भी उद्धार करना महान धर्म का कार्य है- इम वात का अपन हृदय में विचार करके उसके अन्त करण मे दया की भावना जाग उठी थी ।।१२६।। मन मे करुणा के आ जाने से उस ब्राह्मण ने तुलसी दल से मिश्रित परम पावन गगाजल के छोटे उन राक्षसो पर दिये थे ।।१३०।। उस ब्राह्मण के द्वारा सरसो के बराबर ही गङ्गाजल की छीटें देते ही वे राक्षस राक्षसी स्वभाव का त्याग करके दवो वे तुल्य अति शीघ्रता से होगये ये ॥१३१।। अपने पुन के सहित वह ग्राह्मणी और सोमदत्त करोडो सूर्य के समान दमकत हुए परम श्रेष्ठ वन गमे थे ।।१३२।। उस समय में उना स्वरूप शख, चक्र, गदा धारी भगवान् विष्णु के समान ही होगया था और फिर वे सब उस ब्राह्मण देवता का सस्तवन करते हुए विष्णु लोक को चले गये थ ।।१३३ राजा पल्लपपादस्तु निजरूप समास्थित । जगाम महती चिन्ता दृष्ट्वा तान्मुक्तिगानघान् ।।१३४ तस्मिन् राज्ञि सुदु खाते गूढम्पा सरस्वती । धर्ममूलमहावाक्य वभापेगाघया गिरा ।।१३५ भो भो राजन्महाभाग न दुख गन्तुमर्हसि । गजमावापि भागान्ते महच्छ्यो भविष्यति ।।१३६ सलमतपापा ये हरिभक्ति परायणा ।
१६२ [नारद पुराण प्रयान्ति नात्र सन्देहस्तद्विष्णो परम पदम् ॥१३७ सर्वभूतदयायुक्ता धर्ममार्गप्रवर्तिनः । प्रयान्ति परम स्थान गुरुपूजापरायणा ।।१३८ इतीरित समाकर्ण्य भारत्या नृपसत्तमः । मनसा निर्वृति प्राप्यसन्मार च गुरोर्गच. ११३६ स्तुवन्गुरु च तं विप्र हरिं चैवातिहर्पितः । पूर्णवृत्त च विप्राय सर्ग तस्मै न्यवेदयत् ॥१४० किन्तु राजा कल्मापपाद अपने राक्षसी रूप मे ही वहां पर खडा रहा था और उसने उन अन्य पापियो की मुक्ति को आँखो से देखा तो उमको बडी चिन्ता हुई थी ।।१३४॥ इस प्रकार से जब अत्यधिक खिन्न हो गया था तो उस समय मे सरस्वती देवी ने गुप्त रूप से परम गम्भीर वाणी में कहा था ॥१३५।। हे महाभाग्यवान् ! हे राजन् | तुम अपने हृदय मे दुःखित मत होओ, जब कर्मों के भोग की समाप्ति हो जायगी तव तुम्हारा भी महान कल्याण अवश्य ही होगा ॥१३६।। सत्कर्मों से जिनके पाप पङ्क का प्रक्षालन हो जाया करता करता है ऐसे श्री हरि के भक्त मनुष्य भगवान विष्णु के परम पद की प्राप्ति अवश्य ही किया करते हैं इसमे तनिक भी सन्देह का अवसर नहीं है ।।१३७॥ जो समस्त प्राणियो से दयाभाव वा परताव किया करते हैं, धर्म के मार्ग पर चलते हैं और अन्यो को चलाया करते हैं, अहर्निश श्री हरि की भक्ति मे निमग्न रहा करते हैं, सर्वदा अपने से बडो की सेवा दिया करते हैं वे निश्चय ही परम पद को प्राप्त किया करते हैं ॥१३८।। इस नभोवाणी का श्रवण करके उम राजा के मनमे मुख हुआ और उसे फिर श्री गुरुदेव वसि जी के वचनो का स्मरण हो आया ।।१३६॥ तय वह अत्यधिन प्रसन्नता मग्न होकर अपने गुरु देय की, उस ग्राह्मण को और भगवान् श्री हरि यी स्तुति करने में प्रवृत्त हो गया था। उसने फिर अपना पूर्व घटित अपना गमम्त वृत्तात गण देवता को गुना दिया था ॥१४०
नारद पुराण ]
१६३
ततो नृपस्तु कालिग प्रणम्य विधिवन्मुने ।
नामानि ब्याहरन्विष्णो सद्यो वाराणसी ययौ ।।१४१
पण्मास तर गङ्गाया स्नात्वा दृष्ट्वा सदाशिवम् ।
ब्राह्मणीदत्तश पात्तु मुक्तो मित्रसहोऽभवत् ॥१४२
ततस्तु स्वपुरी प्राप्तो वशिष्ठेन महात्मना।
अभिपित्तो मुनियेष्ठ स्वक राज्यमपालयत् ।।१४३
पालयित्वा मही कृत्स्ना भुक्त्वा भोगास्त्रिय विना ।
वसिष्ठात्प्राय सन्तान गतो मोक्ष नृपोतम ॥१४४
नैतच्चिन द्विज्येष्ठ विष्णोवाराणसीगुणान् ।
गृणन्छ्वण्वन्स्मरन्गङ्गा पीत्वा मुक्तो भवेन्नर ॥१४५
तस्मान्महिम्नो विप्रेन्द्र गङ्गाया शक्यते नहि ।
पार गन्तु सुराधीशब्रह्मविष्णुशिवरपि ।।१४६
यन्नामस्मरणादेव महापातव कोटिभि ।
विमुक्तो ब्रह्मसदन नरो याति न सशय ॥१४७
गङ्गा गङ्गति यन्नाम सकृदप्युच्यते यदा ।
तदेव पाप निर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयके ॥१४८
हे मुनिवर । उसके पश्चात् उस राजा ने उन करिङ्ग देशवासी
ब्राह्मण को प्रणाम किया था। फिर सविधि भगवान् विष्णु के शुभ
नामो का कीतन ररता हुआ वह शीघ्र ही भगवान विश्वनाथ की
पुरी वाराणसी को रवाना हो गया या ॥१४१॥ काशीपुरी में उस
कल्माषपाद ने छ मास तक निवास कर गङ्गा म स्नान किया था
और सदाशिव प्रभु के नित्य दशन विमे थे। उस समय मे राजा मित्र
मह का उम ब्राह्मणी वे दिय हुय गाय से मुक्ति हुई थी।। १८२ ।।
राक्षसी शरीर स छुकारा पारबह मिपा राना अपनी नगरी म
पहुँच गया था। यहां पर महामुनि वशिहजी न उमगा अभिपव
किया था। हे श्रष्ठ । इस प्रकार स अपनी पाप यानि म छूटकर अपने
१६४ [नारद पुराण राज्य का यथावत् परिपालन करने में प्रवृत्त हो गया था ।।१४६।। उसने राज्य की प्रजा का पालन करते हुए सम्पूर्ण भूमि को भोगा फिर महपि वसिजी की कृपा एव आशीर्वाद से सन्तान की प्राप्ति करके वह श्रेष्ठ राजा अवसान में मोक्ष पद को प्राप्त होगया था1१४४ हे द्विज श्रे| इसमे कुछ भी आश्चर्य की बात नहीं है । भगवान विष्णुदेव और विश्वनाथपुरी वाराणसी की ऐसी ही अद्भुत महिमा है। इनमे इसी प्रकार के गुण विद्यमान हैं । जो मनुष्य गङ्गाजी की कथा का प्रवचन किया करता है, श्रवण करता है, अथवा गङ्गाजल का पान किया करता है वह निश्चय ही मुक्त हो जाया करता है ।।१४।। अतएव हे चिप्रेन्द्र । देवो के स्वामी, ब्रह्मा, विष्णु, महेश भी गङ्गाजी को महिमा का पार नही पा सकते हैं अन्य लोगो की तो बात ही क्या है ॥१४६।। भगवनी, पतित मावनी गङ्गाजी के नामोच्चारण करने ही से मनुष्य करोडो महा पातको मे छुटकारा पाकर अन्त में ब्रह्मलोक की प्राप्ति किया करता है। इसमे कुछ भी सन्देह नहीं है ॥१४७॥ जो 'गङ्गा-गङ्गा' यह भगवती का नाम एक बार भी अपने मुख से जच्चा- रण किया करता है उसी समय में मनुष्य अपने कृतकों से अर्थात पापो से छूट जाया करता है और उसी समग से ब्रह्म लोक से उसकी प्रशसा होना आरम्भ हो जाया करता है ।।१४।। दैत्यों का अग्नि प्रकट कर भस्म होना । विष्णुपादाप्रमभूता या गङ्गत्यभिधीयते । तदुत्पत्ति वद भ्रातरनुग्राह्योऽस्मि ते यदि ॥ शृणु नारद वक्ष्यामि गङ्गोत्पत्ति तवानघ । वदता शृण्वता चैव पुण्यदा पापनाशिनीम् ॥२ आसीदिद्रादिदेवाना जनक. कश्यपो मुनिः !
नारद पुराण ] दक्षात्मजे तस्य भार्ये दितिश्चादितिरेव च ॥३ अदितिर्देवमातारित देत्याना जननी दिति । ते तयोरात्मजा विप्र परस्परजयपिण ॥४ सदा सपूर्वदेवास्तु यतो देत्या प्रकीर्तिता । आदिदैत्यो दिते पुत्रो हिरण्यकशिपुर्वली ॥५ प्रह्लादस्तस्य पुत्रोऽभूत्सुमहान्दैत्यसत्तम । विरोचनस्तस्य सुतो वभूव द्विजभक्तिमान ॥६ तस्य पुनोऽतितेजस्वी वलिरासीत्प्रतापवान् । स एव वाहिनीपालो दैत्यानामभवन्मुने ॥७ श्री देवपि नारदजी ने कहा-हे भाई । गङ्गा देवी की उत्पत्ति भगवान विष्णु के चरण कमलो के अग्रभाग में बतायी जाया करती है। इस भगवती गङ्गा उत्पत्ति का वर्णन कृपया आप यदि करना चाहें तो करे ॥१॥ नारदजी के ऐमा कहने पर श्री सनक मुनि ने कहा-हे निष्पाप नारद ! मैं अब आपकी इच्छा के अनुसार गङ्गा देवी को उत्पत्ति की कथा का वर्णन करता है। यह सपा तो ऐसी महिमामयी है कि यह वक्ता और थोता दोनो के पाप का नाश कर उनको महान् पुण्य फल प्रदान किया करती है ॥२॥ कश्यप मुनि इन्द्रादि देवा के पिता थे। दक्ष प्रजापति की २पुत्रियां थी जिनके नाम दिति तथा अदित ५ ये दोनो कश्यप ऋषि की पत्निया थी ।।३।। इन दोना म अदिति देवा की माता थी और दिति दैत्या की माता थी। हे विप्रवर । इन दोनो के पुत्र परस्पर मे एक दल दूसरे दल पर मवदा विजय प्राप्त करने की अभिलाषा रक्खा करते थे और नम बराबर युद्ध कलह हुआ ही बरता या ॥४॥दिति का पुरा आदि दैत्य हिरण्यकशिपु वडा भारी वसगालो हुआ था ॥५॥ हिरण्यकशिपु क पुत्र का नाम प्रहलाद था जो बहुत थे दंत्य हुआ था । प्रहलाद थे पुत्र का नाम विरोचन हुआ था। इस विरोचन पो ब्राह्मणा में परम १६६ [ नारद पुराण भक्ति रहा करती थी ॥६॥ इस विरोचन का पुत्र बलि दैत्यराज हुआ था। यह वलि अत्यधिक तेजस्वी और महान प्रतापी राजा या । हे मुनिवर । यह बलि ही दैत्यो की सेना मे सेनापति बना था 11७ वलेन महता युक्तो वुभुजे मेदिनीमिमाम् । विजित्य वसुधा सर्वा स्वर्ग जेतु मनो दधे ॥८ गजाश्च यस्यायुतकोटिलक्षास्तावन्त एवाश्वरथा मुनीद्र । गजे गजे पञ्चशती पदाते किं वपते त्तस्प चमूवरिष्ठा १६ अमात्यकोटयग्रसरावमात्यो कुम्भाण्डनामाप्यथ कूपवर्ण । पिना सम शौर्यपराक्माभ्या वाणो बले पुत्रशताग्रजोऽभूत् ।।१० वलि सुराजेतुमना प्रवृत्त सैन्येन युक्तो महता प्रतस्थे । ध्वजातपत्वर्गगनाचुराशेस्तरङ्गविद्यु स्मरण प्रकुर्वन् ॥११ अवाप्य धृवारिपुर सुरारी रुरोध दैत्यद्गराजगाढ । सुराश्च युद्धाय पुरात्तथैव विनिर्ययुर्वनकरादयश्च ।।१२ तत प्रववृते युद्ध घोर गीर्वाणदैत्ययो । कल्पातमेघनिर्घोष डिडिंमध्वनिसभ्रमम् ॥१३ मुमुचु शरजालानि दत्या सुमनसा वले । देवाश्च दैत्यसेनासु मग्रामेऽत्यन्तदारगे ॥१४ इस दैत्यराज बलि के पास बहुत ही विशाल सेना थी । उस बलि ने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर अपने ही अधीन कर लिया था और उसको भोगता था। इसके पश्चात इस राजा बलि ने स्वर्गलोक को भी जीतने का विचार किया था। इसवे पास दश पद्म तो हाथी थे और हे मुनीन्द्र | इतने ही इस बलि के पास अश्वो के रथ थे। प्रत्येक हाथी के साथ पांच सौ २ पदाति (पंदल) सैनिक थे । इराकी इतनी बढी हुइ महान विशाल सेना थी कि इसका वर्णन कहा नक किया जा सकता है ।।८।६।। इस राजा बलि के मन्त्रियो की संख्या कराडा मे थी। इन सब मा यो मे कु भाण्ड और कूपवर्ण नाम के दो महा नारद पुराण ] मन्त्री थे। राजा बलि के सौ पुत्र हुए थे। वाणासुर इन सबमे : था और यह भी वीरता एव वल पराक्रम मे अपने ही पिता के स या ॥१०॥ राजा बलि ने देवगणो को जीतने का विचार अपन म स्थिर करके अपनी वही भारी सेना को साय लेकर यह वहाँ से दिया था। इस अपनी सेना के ध्वज और छत्रो को देखकर उस समुद्र की लहररूपी विलियो का स्मरण हो गया था ॥११॥ देवो महान शत्र दैत्य राज बलि ने वृत्रासुर के परम शत्रु देवराज इन्द्र स्वर्गपुरी पर आक्रमण कर दिया था। मृगराज से यति गहरी मित्र मी रखने वाले दैत्यों के द्वारा इद्र की स्वर्गपुरी को घेर लिया य उस दैत्यो के आक्रमण को देखकर देवगण भी हाथ मे वजन हथियार ग्रहण कर दैत्यों के साथ युद्ध करने के लिये सुसज्जित हो निरल बाये थे ।।१२। उस समय मे देवो और दैत्यो में महान् भोर युद्ध होना प्रारम्भ हो गया था। उस युद्ध में प्रलय काल मे होने व महान मेघो के समान गडगडाहट हो रही थी तथा नगादो की चोट ऐमी घोर ध्वनि हो रही थी कि उससे समस्त प्राणियो को चक साने लग गये थे ॥१३॥ दैत्यो ने देवो की सेना पर वाणो की । वर्षा करना आरम्भ कर दिया था। उस महान दारुद्ध युद्ध मे दे गण भी दैत्यों पर वाणा की वर्षा करने लग गये थे ।।१४ जहि दारय भिधीति ििध मारय ताडय। इन्येव मुमहान्योपो वदता सेनयोरभूत् ॥१५ शरदुन्दुभिनिध्वनि सिंहनाद सुरद्विपाम् । भावार. स्यन्दनाना च वाणवारनि. स्वने ॥१६ यश्वाना हपितश्च व गजाना वृहितैस्तथा। टद्वारर्धनुषा चैत्र लोक. शब्दमयोऽभवत् ॥१७ सुरासुरविनिर्मुक्तत्राणनिप्पेपजानले। अकालप्रलय मेने निरीक्ष्य सकल जगत् ॥१८ ទី៤ [ नारद पुराण वभौ देवद्विपा सेना स्फुरच्छस्त्रौषधारिणि चलविद्युन्निभा रानिश्छादिता जलदैरिव ।।१६ तस्मिन्युद्धे महाघोरगिरीन् क्षिप्ताव सुरारिभि । नाराचैश्च र्णयामासुदेवास्ते लघुविक्रमा.॥२० केचित्सताडयामासु गानथान्थे । अश्वरश्वाश्च केचित्तु गदादण्डैरथाई यन् ॥२१ उस महान् भीषण युद्ध में सैनिको के द्वारा मार दो, चीर डालो, फाड दो छेदन कर डालो इस तरह के उत्साह वर्धक शब्दो की ध्वनियां कहते, करते हुये एक दूसरे पर बराबर हमला कर रहे थे यौर महान द्वन्द्व होने लग गया था ॥१५॥ उन देव और दैत्यो वी भीषणता ऐसी वढ गई कि देवो की गूजों मे-असुरो की दहाडों से, रथो की झनझनाहट से, वाणो के छूटनेसे कणं कठोर ध्वनियो से अश्वो की हिनहिनाहट से, हाथियो की चिंघाडो से, धनुषो को टकारो से सम्पूर्ण ससार एक दम गूज उठा था ॥१६॥१७॥ उस युद्ध के समय मे देवो और दैत्यो के बाण जब परस्पर मे टकराव कर रहे थे तो उस टक्कर से जो अग्नि उत्पन्न हुई थी उसको देखकर सम्पूर्ण जगत के प्राणी उसे अकाल प्रलय हुआ ही समझने लग गये थे ॥१८॥ दैत्यो की सेना लपलपाते हुये शस्त्रो को धारण किये हुये थी और वह मेघावृत चमकने वाली बिजली से युक्त रात सी दिखाई दे रही थी ॥ १६ ॥ देवताओ के गण भी बडी फुर्ती से वीरता का प्रदर्शन कर रहे थे । उस दैत्य जिन पापाणो को फंक कर देवो पर प्रहार करते थे देवता उनको अपने परम भय कर वाणो से चूर्ण कर दिया परते थे ॥२०॥ उस समय उस महान भयङ्कर युद्ध में कोई हाथियो के द्वारा हाथियो को टक्कर दे रहे थे। कोई अश्व सवार अश्वो पर धावा बोल रहे थे और कुछ हाथो मे गदा दण्डो को ग्रहण करके ही सहार करने मे व्यस्त हो रहे थे ॥२१ युद्ध में नारद पुराण 1 परिपस्ताडिता केचित्पेतु शोणितकर्द मे । समुत्वलातासव केचिद्विमानानि समाथिता ॥२२ ये दैत्या निहता देवप्रसह्य सङ्गरे तदा। ते देवभावमापन्ना दैतेया-समुपाद्रवन् ॥२३ अथ दैत्यगणा अद्धास्तरडरमाना सुरभृशम् । शस्त्रैर्बहुविधवा निजघ्नुरतिदारुणा १२४ हपििभदिपालश्च खड्ग परशुतोमरै । परिधेपछुरिकाभिश्च चुन्तैश्च श्च शकुभि ॥२५ युमलरकुरीश्चैव लाङ्गले पदृिस्तिथा । शक्तयोपले गतघ्नीमि पाशश्च बलमुष्टिभि ॥२६ शूलैनालीकनाराचे क्षेपणोयत्ममुद्गरे । रथाश्वनागपदगै सङ्कलो ववृधे रण ॥२७ देवापच विविधास्वाणि दतेयेभ्य समाक्षि पन् । एव वपंसहस्राणि युद्धमासीत्सुदारुणम् ॥२८ उस समय मे कोई सैनिक परिधो के प्रहारो से प्रपीडित होकर बीच मे पड़ गये थे और कुछ प्राणो वा परित्याग कर विमानो पर चढे जा रहे थे ॥२२॥ उस युद्ध में देवो ने जिन दैत्यो को मार गिराया था वे फिर देव रूप धारण करके उल्टे दैत्यो पर झपट रहे थे॥२३॥ मे देवो ने दैत्यो की खूब दिल खोलकर पिटाई की थी और दत्यो ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। वे भी अनेक बार के शस्त्रो के द्वारा देवो को मार रहे थे ॥ २५ ॥ उस समय में युद्ध मे भिन्दिपाल, बङ्ग, कुठार, नोमा परिघ छुरिका, बुन्त (माले) पक्र, श कु ममल, अकुश, लकड़ी, पटे, गोपन, तोप, फासे, हथेली, मुक्के, शूल, बन्दूक, न राच, क्षेपणीय, मुद्गर, रथ, अश्व हाथी और पैदलो से वह रणभूमि सचाखच भरी हुई थी और महान दारुण सयाम हो रहा था ॥२४॥२॥२६॥२७॥ इस तरह मे यह देव दानवो उस युद्ध
२००
[ नारद पुराण
का युद्ध एक हजार वर्ष तक वरावर होता रहा था। इसमे देवी ने
भी विभिन प्रकार के अस्तो का प्रयोग दैत्यो की सेना पर किया था
॥२४
अथ दैत्यवले वृद्ध पराभूता दिवोकस ।
सुरलोक परित्यज्य सर्वे भीता प्रदुद्र २६
नररूपपरिच्छन्ना विचेरुरवनीतले ।
नैरोचनिस्त्रिभुवन नारायण परायण ॥३०
वुभुजेऽव्याहतश्वयं प्रवृद्धश्रोममहानल ।
इयाज चाश्वमेध स विष्णुप्रीणनतत्पर. ॥३१
इन्द्रत्व चाकरोत्स्वर्ग दिवपालत्व तथैव च ।
देवानाप्रीणनार्थाय मै क्रियन्ते द्विगैर्मखा ॥३२
तेषु यज्ञेयु सर्नेषु हविभुक्ते स दैत्यराट् ।
अदिति स्वात्मजान्वीक्ष्य देवमातातिदु खिता। ।३३
वृथान निवसामीति मत्वागाद्धिमवभरिम् ।
शक्रस्यैश्वर्यमिच्छन्ती दैत्याना च पराजयम् ॥३४
हरिध्यानपरा भूत्वा तपस्तेपेति दुप्परम् ।
मिचित्काल समासोना तिष्ठन्ती च तत परम् ॥३५
दत्यो वा बल बराबर बढना ही चला जा रहा था उम युद्ध
में अततोगत्या देवगण दैत्यों से हार गये थे और भयभीत होकर सब
देवता देवलार को छाडार इधर उधर भाग गये थे । फिर
देवता लाग दैत्यों से इतने डर गये थे जिवे मनुष्यो वे स्वरूप मे पृथ्वी
पर विचरण वरने लग गय थे। फिर विराचन का पुत्र दैत्यराज बलि
भगवान नारायण की भक्ति करता हुआ निमुवन के राज्य सुध
पा उपभोग करन राग गया था।॥३०॥ इस दैत्यराज का ऐश्वर्य इतता
बा-चहा पानि कोई भी इमम कुछ बाधा नहीं डास सपता था ।
उसी राज्य लक्ष्मी दिल दूनी बढ़ रही थी। उस समय में उस महान
नारद पुराण ]
२०१
तन
बलवान दैत्यो के राजा बलि न भगवान विष्णु को प्रसन्न करने
लिये अश्वमेध यज्ञा का यजन किया था ।।३१। इस वलि का व
पराक्रम इतना बढ़ गया या कि यह स्वर्गलोक में जाकर इन्द्रदेव व
कार्य स्वय ही रिया करता था। यज्ञ मण्डप में ब्राह्मण लोग जो दे
को तृप्ति दने के लिये जो भी हवि दिया करते थे उसे सभी यशो
वह दैत्यराज ही उस हवि को ग्रहण किया करता था क्योकि देवग
तो डरकर सब भाग ही गय थे । इस समय म अपने पुन देवा की ऐ
दुदशा देखकर माता अदिति को बड़ा भारी दुख हुआ था ॥२२॥२
उस अदिति ने वहाँ पर रहना व्यथ समझकर फिर हिमाचल प
प्रस्थान कर दिया था। वहा पर जाकर भी पुन देवो के ऐश्वर्य क
इच्छा मन मे रखती थी और दैत्यो की पराजय होने की भावना उस
हृदय में थी ॥३४॥ यह अदिति वहा पर्वत पर श्री हरि के ध्यान
मग्न होकर परम दुष्कर तप करने लग गयी थी। कुछ समय
तो उसने बैठकर ही तपश्चर्या की थी फिर वह खडी होपर तपस्य
करने लगी थी ॥३५
पादेनैकेन सुचिर तत पादाग्रमानत ।
कचित्काल फलाहारा तत शीर्णदलाशना १३६
ततो जलाशना वायुभोजनाहारवर्जिता।
सच्चिदानन्दसन्दोह ध्याय यात्मानमात्मना ।।३७
दिव्याब्दाना सहस्र सा तपोऽतप्यत नारद ।
दुरन्त तत्तप श्रुत्वा देतेया मायिनोऽदितिम्।।३८
देवतास्पमास्थाय सप्रोचुर्व लिनो दिवा ।
किमर्थ तप्यते नात शरीरपरिशोपणम् ॥३६
यदि जानन्ति द नेया महदुख ततो भवेत् ।
त्यजेद दुखवहुल कायशोपणकारणम् ॥४०
प्रयाससाध्य सुकृत न प्रशसन्ति पण्डिता ।
२०२ [ नारद पुराण शरीरयत्नतो रक्ष्यं धर्मसाधनतत्परः ।।४१ ये शरीरमुपेक्षते ते स्युरात्मविघातिनः । सुख त्व तिष्ठ सुभगे पुत्रानस्मान्न खेदय ॥४२ बहुत समय तक एक ही पर से खडी रहार और फिर केवल अपने चरण के अंगूठे के बल पर हो पडी होकर उसने तपस्या की थी। कुछ समय तक तो उसने फलो का ही आहार किया था ॥३६॥ इसके उपरान्त जल का आहार और अन्त मे केवल वायु को खाकर ही घोर तप अदिति ने किया था। हे नारद ! उम देव माता अदिति ने इस रीति से परम सच्चिदानन्द सन्दोह श्री भगवान का चित्त मे ध्यान स्मरण करते हुये एक हजार दिव्य वर्षों तक तपस्या की थी। उस देव माता अदिति की इस परम दुष्कर तपश्चर्या करने का वृत्तान्त सुनकर दैत्यो ने राजा बलि की प्रेरणा प्राप्त बार अपनी माया से देव रूप धारण किया था और उस तप मे सलग्न अदिति के समीप मे पहुँच कर उससे कहने लगे थे। इस समय मे आप हे माता जी ! अपने शरीर को शोपण करने वाला ऐसा उग्र तप किस निये कर रही हो ॥३७. ३६॥ आपकी इम तपस्या का ज्ञान यदि दैत्यो को लग जायगा तो फिर आपको बहुत अधिक कष्ट उठाना होगा। अतएव हम लोग यही प्रार्थना करते है कि इस अवस्था मे आप शरीर को सुखा देने वाले सप को छोड दो क्योकि इससे आपको इम समय में बहुत ज्यादा कष्ट उठाना पड़ रहा है ।।४०॥ अत्यधिक श्रम उठाने पर जो भी कुछ पुण्य का फल प्राप्त हुआ करता है उस फल के प्राप्त करने की महान पण्डित लोग प्रशसा नहीं किया करते हैं। इसलिये जो कोई धर्म की साधना में सलग्न रहना चाहता है उसे अपने शरीर के सरक्षण का भली भाति ध्यान रखवा परम आवश्यक होता है ॥४१॥ जो अपने शरीर की पुण्य साधन के कार्यो मे उपेक्षा किया करते है वे तो पुण्यात्मा न होकर आत्मघाती ही कहे जाया करते हैं । अतएव हे
नारद पुराण ]
१०
मौभाग्यवति । आप मुख से ही अपना जीवन वितायें । ऐमा
दुपर तप करके हम पुत्रो के चित्त मे खिन्नता उत्पन्न न करे ।
मात्रा हीना जना मातमृतप्राया न समय ।
गावो वा पशवो वापि यत्र गावो महील्हा ॥४३
न लभन्ते सुख किंचिन्माना हीना मृतोपम ।
दरिद्रो वापि रोगी वा देशान्तरगतोऽपि वा ॥४४
मातुर्दशनमागेण लभते परमा मुदम् ।
अन्ने वा सलिले वापि धनादी वा प्रियासु च ॥४५
कदाचिद्विमुखो या त जनो मातरि कोऽपि न ।
यस्य माता हे नास्ति यत्र धर्मपरायणा ।
साध्वी च स्त्री पतिप्राणा गन्तव्य तेन नै वनम् ।।४६
धर्मश्च नारायणभक्तिहीनो धन च सद्भोगविवर्जित हि
गृह च भायांतनगेविहीन यथा तथा मातृविहीनमयं. ।।
तस्मादेवि परित्राहि दुपार्तानात्मजास्तव ।
इत्युक्ताप्यदितिर्दोन वचाल समाधित. ॥४८
एवमुक्त्वारा सर्वे हरिध्यानपरायणाम् ।
निरीक्ष्य सोधसयुक्ता हन्तुचक्र मनोरयम् ।।४६
फिर देवरूपधारी उन दैत्यों ने अदिति में वहा-हे माता:
जो पुत्र अग्नी माता मे हीन हो जाया करते हैं व तो मृत पे ही स
होने है । भले ही पाम में गौ, पशु, वृक्ष सभी कुछ ही परग्नु पदि म
मही है तो ये सय उम मातृ-मुरा को रिमी भी प्रकार म प्राण
परागरते हैं । जो अपनी मा में रहित हो जाया परते है वे तो
मरे हुये मे ही रहा करते हैं। चाहे कोई बत दरिद्र हो,राग युक्त
परदेन में रहता हो परन्तु माता पभो भी बिमा गरी होती
जिमर पर में माना न हो और पतिप्राणा, धर्म परायणा, परम मा
पानी भी म हो उगेसा वर उच पर का पार पर वन में ही
२०४ [ नारद पुराण जाना चाहिये क्योकि ऐसे शून्य घर मे कुछ भी आनन्द नही रहा करता है ।१४३-४६।। भगवान नारायण की भक्ति से शून्य, धर्म, सद्भोग से रहित धन का वैभव, भार्या और पुत्रो से रिक्त घर जिस तरह से आनन्द से सूना होता है वैसे ही माता से रहिन मनुष्य का जीवन भी निरानन्दामय हुआ करता है ॥४७॥ अतः हे देवि ! आप अपने परम खिन्न एव दुःखित पुनो की रक्षा करो। इस प्रकार से दैत्यो के द्वारा माया कथन के करने पर भी अदिति ने अपनी समाधि का त्याग नहीं किया था ।।४८।। असुरो के इस तरह से बहुत कुछ कहने पर भी जव अदिति टस से मस तक नहीं हुई और उसको सर्वदा भगवान विष्णु के ध्यान मे ही सलग्न पाया तो वे असुर क्रोध मे भरकर उसे मार डालने का विचार करने लगे थे ।।४६ कल्पान्तमेघनिर्घोपा क्रोधसंरक्तलोचनाः । दष्ट्राग्रे रसृजन्वह्नि सोऽदहत्कानन क्षणात् ।।५० शतयोजनविस्तीर्ण नानाजीवसमाकुलम् । तेनेव दग्धा दंतेया ये प्रधर्षयितुंगता ॥५१ सेवावशिष्टा जननी सुराणामव्दाच्छतादच्युतसक्तचित्ता। सरक्षिता विष्णुसुदर्शनेन दैत्यान्तकेन स्वजनानुकम्पिना।।५२ उन दैत्यो ने माता अदिति को भयभीत करने के उद्देश्य से प्रलय काल के मेघो के समान अपनी माया रचित मेघो की गडगढाहट की थी और अत्यन्त उन क्रोध से अपने नेत्रो को लाल कर लिया था। अपनी दाढो से अग्नि उत्पन्न कर चारो ओर फैलादी थी जो कि एक ही क्षण में सम्पूर्ण वन को भस्मसात् करने मे लग गयी थी। चारसौ कोस पर्यन्त फैला हुआ वह वन जिसमे अनेक जीव निवास किया करते थे धाय २ कर एक दम जलने लग गया था। उस अग्नि ने अपना प्रभाव प्रकट करने के लिये जो भी दैत्य वहाँ पर समागत हुए थे उनको भी जता दिया था ॥५०॥५१॥ नारो ओर उन दैत्यो जन्तु २०६ [ नारद पुराण रूप से आप वर्णन करने की कृपा कीजिये क्योकि जो भी मुनीश्वर होते हैं वे दूसरो को उपदेश प्रदान करके अपनी सज्जनता को प्रकट किया करते है ॥२॥ श्री सनाजी ने कहा है नारद । जो श्री हरि के चरणो मे ध्यान लगा कर मग्न रहा करते हैं उन साधु पुरुषो को कौन बाधा पहुँचा सकता है ।।३॥ जिस स्थान पर श्री हरि की भक्ति मे परायण प्राणी निवास किया करता है उसकी रक्षा करने के लिये सदा ब्रह्मा, विष्णु महेश, देवता सिद्धगण और परम श्रेष्ठ मुनीश्वर सभी खडे रहा करते हैं ॥४॥ हे महाभाग ! जो अपने चित्त मे परम शान्त रहा करते हैं । उनके चित्त मे शान्ति प्रिय भगवान स्वय ही प्रकट होजाया करते हैं । जो सदा हरिनाम के उच्चारण मे तत्पर रहते हैं और श्री हरि के ध्यान मे अपने मन को लगाये हुये हैं उनकी क्या प्रशसा की जावे ॥५॥ जिस स्थल मे भगवान शङ्कर अथवा भग- वान् विष्णु की पूजा में मग्न मनुष्य निवास किया करता है वहा पर महालक्ष्मी और अन्य सभी देवता पूर्ण कृपा किया करते हैं ।।६।। जिस स्थान पर श्री विष्णु की अर्चना करने मे मग्न प्राणी रहता है वहां न अग्नि कोई दुख दे सकता है और न वहा पर चोर तथा व्याधियो का ही कुछ प्रभाव हो सकता है ॥७ प्रेता पिशाचा कुष्माण्डग्रहा वालग्रहास्तथा । डाकिन्यो राक्षसाश्चैव न वाधन्तेऽच्युतार्चकम् ॥ परपीडारता ये तु भूतवेतालकादय । नश्यन्ति यत्र सद्भक्तो हरिलक्ष्म्यर्चनेरत ॥ जितेन्द्रिय सर्वहितो धर्मकर्मपरायण । यन तष्ठति तनैव सर्वतीर्थानि देवता ॥१० निमिप निमिपाद्धं वा यत्र तिष्ठन्ति योगिन । तव सर्वश्रेयासि तत्तीर्थ तत्तपोवनम् ।।११ यन्नामोच्चारणादेव सर्वे नश्यन्त्युपद्रव ।
२०८ [ नारद पुराण स्पृशन्करेण पुण्येन प्राह कश्यपवल्लभाम् ।।१५ देवमात प्रसन्नोऽस्मि तपसाराधितस्त्वया । चिरश्रान्तासि भद्र ते भविष्यति न संशय ॥१६ वर वरय दास्यामि यत्ते मनसि रोचते । मा भर्भद्रे महाभागे ध्रुव थेयो भविष्यति ॥१७ इत्युक्ता देवमाता सा देवदेवेन चक्रिणा। तुष्टाव प्रणिपत्यैन सर्वलोकसुखावहम् ॥१८ नमस्ते देवदेवेश सर्वव्यापिञ्जनार्दन । सत्त्वादिगुणभेदेन लोकव्यापारकारण ॥१६ नमस्ते वहुरूपायारूपाय च महात्मने । सर्वेकरूपरूपाय निर्गुणाय गुणात्मने ।।२० नमस्ते लोकनाथाय परमज्ञानरूपिणे । सद्भक्तजनदात्सल्यशालिने मङ्गलात्मने ॥२१ म द मुस्कराहट के कारण कुछ प्रक्ट होते हुए दन्तो के प्रकाश के कारण से सभी दिशाओ मे परमोज्वल प्रयाश फैलाने वाले भगवान ने अपने क्मलोपम परम कोमल करो से देवमाता अदिति के शरीर का स्पर्श करते हुए कहा था--हे देवमाता | आरने अत्यधिक समय तक तपश्चर्या करके भक्तिभाव से मेरा समाराधन किया है और आपने बहुत ही अधिक श्रम उठाया है । मैं अब आप पर बहुत प्रसन्न हूँ। तुम्हारा पूर्ण रूप से कत्याण ही होगा-इसम कुछ भी सन्देह नही है ॥१६॥ अब आपके मन म जो भी अच्छा लगता हो वही वरदान मुझ से प्राप्त पर लो। हे भने । अव माप बिल्कुल भी डरिय नही । अत्र आपला पूर्ण रूप से कल्याण होगा ।।१७। जिम समय मै च धारी भगवान विष्णुदेव ने देवमाता अदिति म इस तरह मैं वहा तो वह समस्त लोको का सुप प्रदान करन वाले भगवान का प्रणाम करये उनकी स्तुति परन लग गय ५ ॥१८॥ अदिति न कहा-हे देवा में भी देवेश्वर । हे गर्वन यापर रहा वाल । हे जनाश। गारी मेवा में मेरा ।
नारद पुराण ] २०६ प्रणाम समर्पित है । सत्वादि गुणो के प्रभेद से इस समस्त ससार के व्यापार के कारण स्वरूप आपको मेरा प्रणाम है ॥१६॥ आप तो सर्व- व्यापक हैं अतएव आपके अनेक स्वरूप है। अपने २ रूप में प्रतिष्ठित अवस्था में रूप रहिन ब्रह्म, उदार चित्त वाले सभी रूपो के एक रूप (विराट रूप धारण करने वाले ) निर्गुण और सगुण परमात्मा के लिये मेरा प्रणाम है ॥२०॥ सम्पूर्ण ससार के स्वामी, परम शान स्वरूप, सज्जन अपने भक्तो पर कृपा करने वाले मङ्गलमय भगवान की सेवा मे सादर प्रणाम है ॥२१॥ यस्यावताररूपाणि ह्ययन्ति मुनीश्वरा । तमादिपुरुषं देवं नामामि ह्यर्थसिद्धये ॥२२ श्रुतयो य न जानन्ति न जानन्ति सूरयः । त नमामि जगतु समाय चाप्यमायिनम् ॥२३ यस्यावलोकन चित्र मायोपद्रवकारणम् । जगदूप जगद्धत वन्दे सर्ववन्दितम् ॥२४ यत्पादाम्बुजकिजल्कसेवारक्षितमस्तका । अवापुः परमा सिद्धि वन्दे कमलाधवम् ॥२५ यस्प ब्रह्मादयो देवा महिमान न व विदु. । अत्यासन्न च भक्ताना तं वन्दे भक्तसगिनम् ॥२६ यो देवस्त्यक्तसङ्गाना शान्ताना करुणार्णव. । करोति ह्यात्मनः सङ्ग त देव सङ्गजितम् ॥२७ यज्ञेश्वर यज्ञकर्म यज्ञकर्मसुनिष्ठितम् । नमामि यत्रफलद यज्ञकर्मप्रवोधकम् ।।२८ महा मुनीश्वर जिन भगवान के स्वरूपो वा अर्चन दिया करते हैं उन परम पुराण आदि पुस्प देव वो मैं अपनी मनोवाञ्छित कामना की गिति के लिए प्रणाम करती हूँ ॥२२॥ जिन भगवान ये यानिधिक स्व. सपा पूर्ण रूप में वर्णन यूनिया नही कर सकता है और बरे २ २१० [ नारद पुराण विद्वान भी भगवान के स्वरूप को यथार्थ रूप से नही बखान सकते हैं उन इस सम्पूर्ण विश्व के कारण स्वरूप, माया से विशिष्ट और माया से रहित परमेश्वर को मैं सादर प्रणाम करती हूँ ॥२३॥ जिन भगवान का वेवल दर्शन ही मोक्ष रूपी अद्भुत फल को प्रदान करने वाला हैं और जो इस माया स्वरूप उपद्रव का हेतुभूत है अर्थात् यह माया जिनसे प्रकट हुआ करती है उन्ही जगन्मय विश्व के कारण, सर्व बन्दित भगवान् विष्णुदेव के चरणो मे मेरा प्रणाम है ॥२४॥ जिनके चरण वमल के केसर से अपने मस्तव को सुरक्षित करके प्राणी परम सुसिद्धि को प्राप्त किया वरते हैं उन्ही कमलाकान्त भगवान की मैं वन्दना करती हूँ ।।२५।। ब्रह्मादि बटे २ देव भी जिन भगवान की महिमा का पार नही पा सकते है और जो अपने भक्तो के लिये प्रकट हुआ करते हैं। उन्ही भत्तो के सङ्ग करने वाले माधव की मैं वन्दना करती हूँ ॥२६॥ जो इग ससार को त्याग कर परम शान्त भक्तजनो के लिए परुणा के गागर के समान हैं और उनके साथ रहा करते हैं उन सर्व मन से रहिम देवदेव की सेवा मे मेग सादर प्रणाम है ।।२७।। साक्षी, यशवम, यशकों में निष्ठित, यज्ञो का फल प्रदान करने वाले और यज्ञरमो के पल का बोध करने वाले वेदस्वरूप भगवान विष्णु को मेरा प्रणाम अपित है ॥२८॥ अजामिनोऽपि पापात्मा यन्नामोच्चारणादनु । प्राप्तवात्परम धाम त वन्दे लोनसाक्षिणम् ॥२६ हरिरूपी महादेव शिवरूपी जनार्दन । इति लोकस्य नेता यस्त नमामि जगद्गुरम् ॥३० ग्रह्माद्या अपि देवेश यन्मायापाशयन्त्रिता । न जानन्ति पर भाव त वन्दे सर्वनायकम् ॥३१ हत्पमस्योऽप्ययोग्याना दूरस्य इव भासते। प्रमाणातीतसदभावस्त वन्दे मानसाक्षिणम् ॥३२ यज्ञ कमों के २११ नारद पुराण ] यन्मुखाद् ब्राह्मणो जातो वाहुभ्या क्षत्रियोऽजनि । ऊर्वोदेश्यः समुत्पन्न पद्भया शुद्रोऽभ्यजायत ॥३३ मनसश्चन्द्रमा जातो जात. सूर्यश्च चक्षुप. । मुखादग्निस्तयेन्द्रश्च प्राणाद्वायुरजायत ॥३४ ऋग्यजु सामरूपाय साम्वरगतात्मने । पडगरूपिगे तुभ्य भूयोभूयो नमो नम ॥३५ महापापी अजामिल भी जिनके एक ही बार अन्त समय मे "नारायण"-इस शुभ नाम के उच्चारण करने मात्र से ही परम पद को प्राप्त हो गया था उन्ही इम सम्पूर्ण लोर के दृष्टा भगवान् विष्णु को मैं बारम्बार प्रणाम करती हूँ ॥२६॥ महादेव विष्णु के रूप वाले हैं और जनार्दन भगवान शिव स्वरूप हैं । इस रीति से सब लोको को उपदेश प्रदान करने वाले जगत् के गुरुदेव भगवान् विष्णु की सेवा में मैं अपना प्रणाम करती हूँ ॥३०॥ ब्रह्मादिर देवगण भी जिनकी महा- माया के पाश मे बद्ध होकर उस परम तत्व को वास्तविक स्प में नही जान पाते हैं उन्ही जगत् के नायक भगवान विष्णु की सेवा मे मेरा प्रणाम समर्पित है ॥३१॥ सर्वान्तरयामी और सब के हृदय कमल मे विराजमान रहने वाले भगवान विष्णु जो योग्य नहीं है उन लोगो को दूर ही लगा करते हैं, किसी भी प्रत्यक्षानुपानादि प्रमाणो से जिनके असली भाव का निरूपण नही किया जा सकता है उन्ही ज्ञान के साक्षी भगवान विष्णुदेव को मैं प्रणाम करती हूँ ॥३२॥ जिन प्रभु के मुखार- विन्द से ब्राह्मणो की उत्पत्ति हुई है, भुजाओ से क्षत्रिय प्रकट हुए हैं। जाघो से मैश्यो का उद्भव हुआ है और चरणो से शूद्रो या जन्म हुआ है। उन्ही चारो वर्णो को ममुत्पन्न करने वाले भगवान का मैं प्रणाम करती हूँ ॥३३॥ जिन भगवान के मन स चन्द्रदव प्रक्ट हुए हैं, जिनके नेत्रो से मूर्यदेव, मुख से इन्द्र और अग्नि का प्रादुर्भाव हुया है तथा से वायु ने अपना रुप प्रकट किया है उन भगवन् को मैं प्रणाम प्राण २१२ [ नारद पुराण करती हूँ ॥३४॥ नसक्, यजु और सामवेद स्वरूप सातो स्वरो में व्याप्त आत्मा वाले पडङ्ग रूपी आप के लिये मैं वारम्वार प्रणाम करती हूँ ॥३५॥ त्वमिन्द्र पवन सोमस्त्वमीशानस्त्वमन्तक । त्वमग्निनिऋतिश्चैव वरुणस्त्व दिवाकर ॥३६ देवाश्च स्थावराश्चैव पिशाचाश्चैव राक्षसा । गिरय सिद्धगधर्वा नद्यो भूमिश्च सागरा ॥३७ त्वमेव जगतामीशी यनासि त्व परात्पर । त्वद्रूपमखिल देव तस्मान्नित्य नमोऽस्तु ते ॥३८ अनाथनाथ सर्वज्ञ भूतदेवेन्द्रविग्रह । दैतेयैर्वाधितान्पुतान्मम पाहि जनार्दन ॥३६ इति स्तुत्वा देवमाता देव नत्वा पुन पुन । उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा हर्षावुक्षालितस्तनो।।४० अनुग्राह्यास्मि देवेश त्वया सर्वादिकारण । अकण्टका श्रिय देहि मत्सुताना दिवौकसाम् ॥४१ अन्तर्यामिजगद्रूप सर्वज्ञ परमेश्वर । अज्ञात किं तव श्राश कि मामीहयसि प्रभो ॥४२ आप ही इन्द्र, पवन, सोम, ईशान, अन्तक, आग्न, निऋति, घरण और दिवाकर के रूप में काम किया करते हैं ||३६॥ विश्व मे देव, स्थावर, पिशाच, राक्षस, सिद्ध, पर्वत, गन्चव, नदी, भूमि और समुद्र सब मे आप ही का प्रकाश दिखाई दिया करता है ॥३७॥ हे भगवन् । आप ही इस समस्त जगत् के स्वामी हैं और आप जहाँ पर भी है परम श्रेष्ठ है । हे देवेश्वर । यह सम्पूर्ण जगत थाप का ही रूप है अतएव आपकी मेवा मे मरा सवंदा प्रणाम अपिन है ॥३॥ है आया ये स्वामिा। ह सर्वन। हसमत प्राणियो और देवेन्द्र में व्याप्त । है जनादन । मरे सब पुत्र इस समय म इन दुष्ट दैत्यो रो पीडा मारद पुराण ] २१३ प्राप्त कर रहे हैं आप उनको रक्षा कीजिए ॥३६॥ इस प्रकार से स्तवन करके देवमाता अदिति ने भगवान की सेवा में अनेक वार प्रणाम किया था । हातिरेक होने के कारण वहने वाले भयो से उसके स्तन भीग गये थे। उस समय में वह अपने दोनो हाथो को जोड कर भग- वान से प्रार्थना करने लग गई पी ॥४०॥ अदिति ने पहा-है सब के आदि मारण देवेश्वर ! यदि आप मुझ पर अपनी अनुकम्पा करने की इच्छा करते है तो मैं यही आपकी सेवा मे विनम्र निवेदन करती है कि मेरे पुत्रो को ( देवगणो को ) निवन्टक लक्ष्मी प्रदान कीजिएगा ॥४॥ हे जगद्रप अन्तर्यामिन् ! हे सर्वज्ञ परमात्मन् ! आप से तो कुछ भी छिपा हुआ नही है तथापि हे लक्ष्मीपति देव ! बाप मुझ से अपनी मनोव्यथा को कहने के क्पो प्रेरित कर रहे हैं ।।१२ तथापि तव वक्ष्यामि यन्मे मनसि रोचते । वृयापुयास्मि देवेश देतेय परिपीडिता ॥४३ तान्न हिसितुमिच्छामि यतस्तेऽपि सुता मम । तानहत्वा श्रिय देहि मत्सुतेभ्य सुरेश्वर ॥४४ इत्युक्तो देवदेवेश. पुन. प्रीतिमुपागतः । उवाच हर्पयन्विप्र देवमातरमादरात् ॥४५ प्रोतोऽस्मि देवि भद्र ते भविष्यामि सुतो ह्यहम् । यतः सपत्निपुत्रेषु वात्सल्य देवि दुर्लभम् ॥४६ त्वया तु यत्कृत स्तोन तत्पन्ति नरास्तु ये । तेपां सपद्वरा पुत्रा न हीयन्ते कदाचन ॥४७ स्वात्मजे वान्यपुगे वा य: समत्वेन वर्तते । न तस्य पुत्रशोक स्यादेप धर्म सनातनः ।।४८ नाह वोढु क्षमा देव त्वामद्य पुरुष परम् । असख्याताण्डरोमाण सर्वेश सर्वकारणम् ॥४६ फिर भी मेरे मन को जो भी अच्छा मालूम होता है उसी को २१४ [ नारद पुराण मैं आपकी सेवा में निवेदित करती हूँ। हे देवेश्वर । मेरी सपत्नी दिति के पुत्र दैत्यो से मैं इस समय मे अत्यधिक सताई हुई हूँ और मेरे सभी पुत्र विचारे मारे २ व्यर्थ ही इधर उधर डोल रहे हैं ॥४३॥ हे भग- वन । मैं उन दैत्यो को मारना तो नही चाहती हूँ क्यो कि आखिरकार वे भी मेरे ही पुत्र है । हे भगवन् । आप सहार किये ही बिना मेरे पुत्रो से अपहृत की हुई सम्पत्ति उनको दिला दीजिए ॥४४॥ हे विप्न । इस रीति से अदिति के द्वारा प्रार्थना करने पर भगवान और भी अधिक उस पर प्रसन्न हो गये थे और फिर आदर के साथ देवमाता को प्रसन्न करते हुए बोले ।।४।। श्री भगवान् ने कहा-हे देवि | आपका कल्याण हो । मैं तुम पर अधिक प्रसन्न हूँ। हे देवि । अपनी सपत्नी के पुत्रो पर वत्सलता का भ व दिखाना बहुत ही कठिन है। मत मैं आपका पुत्र बनकर ही समुत्पन्न होऊँगा ।।४६।। आप के कहे हुए इस स्तोत्र का जो मनुष्य पाठ करेंगे उनके पुत्र और धन का कभी विनाश नहीं होगा ॥४७॥ अपने और दूसरे के पुत्र मे जो कोई समता का बर. ताव रखता है उसको कभी भी अपने पुत्र का शोक नहीं हुआ करता है यही सनातन धर्म है ॥४८॥ अदिति ने कहा-हे देव । आप तो परम पुरुष हैं । अखण्ड एव अस ख्य ब्रह्माण्ड आपके रोमो में भरे हुए है । आप सब के स्वामी है और सब के आप कारण है। अतएव मैं आपको धारण करने में असमर्थ हूँ ॥४६ यत्प्रभाव न जानन्ति श्रुतय सर्वदेवता तमह देवदेवेश धारयामि कय प्रभो ॥५० अणोरणीयासमज पगत्परतर प्रभुम् । घारयामि वथ देव त्वामह पुरुषोत्तमम् ।।११ महापातायुक्तोऽपि यन्नामस्मृतिमारत । मुच्यते स क्य देवो ग्राम्येपु जरिमहंति ॥५२ यथा शूकरमत्स्याद्या अवतारास्तव प्रभो।
नारद पुगण ] २१५ तयायमपि को वेद तव विश्वेश चेष्टितम् ॥५३ त्वत्पादपद्मप्रणता त्वन्नामस्मृतितत्परा। त्वामेव चितये देव यथेच्छसि तथा कुरु ॥५४ तयोक्त वचन श्रुत्वा देवदेवो जनादन । दत्वाभय देवमातुरिद वचनमब्रवीत् ॥५५ सत्यमुक्त महाभागे न्वया रास्त्यत्र सशय । तथापि शृणु वक्ष्यामि गुह्याद्रातर शुभे ॥५६ है प्रभो। जिनके प्रभाव और महिमा का पार श्रुति और समस्त देववृन्द भी नहीं कर सकत हैं। उन देव देवश्वर वो मैं 'अपने उदर म करा धारण कर सगी ? ३५०॥ हे देव । भाप तो सूक्ष्म से भी परम मूक्ष्म है-आप उत्पत्ति से रहित हैं और पर से भी पर प्रभु हैं । पुरुपात्तम आपको मैं कसे धारण करूंगी ? ॥५१॥ ब्रह्माहत्या आदि महापातक करने वाला मनुष्य भी जिनके नाम का स्मरण मात्र करने से ही मुक्त हो जाया करता है वह देवेश्वर मुझ जैसी ग्रामीण के यहाँ जन्म धारण करे -यह कैसे उचित होगा ॥५२॥ बच्छा जिस तरह से आपके शूकर मौर मत्स्य आदि अवतार हुए हैं वैसे ही यह मी थापना अवतार हो जायगा क्यो दिह विग्नेश । आपकी चेष्टा को कौन समझ सकता है ॥५३।। जैमी आपको इच्छा हो वही आप करिए। मैं तो सर्वदा बापके चरण कमला म प्रणाम करती हूँ ॥५४॥ श्रीसनक- देवदेव जनार्दन न देवमाता अदिति को अपना दान दिया और यह फहन लगे थे ॥५५॥ 1 भगवान ने कहा-हे महामाो । तुमन सर्वथा सत्य ही कहा है-इम आप क्थन म कुछ भी सन्दह नहीं है। है शुभे । हे मैं एक परम गुप्त वास माप स कहता हूँ उसमरा थाप श्रवण परे ॥५६ रागद्वेषविहीना ये यद्भक्ता मत्परायणा । वति सतत ते मा मतासूया अदाम्भिय। ॥५७ २१६ [ नारद पुराण परोपतापविमुखा शिवभक्तिपरायणा । मत्कथाबवणासक्ता विहन्ति सतत हि माम् ॥५८ पतिव्रता पतिप्राणा पतिभक्तिपरायणा । वहन्ति सतत देवि स्त्रियोऽपि त्यक्तमत्सरा ॥५६ मातापित्रोश्च शुश्रूपुणुरुभक्तोऽतिथिप्रिय । हितकृबाह्मणाना य स मा वहति सर्वदा ॥६० पुण्यतीर्थरता नित्य सत्सङ्गनिरतास्तथा । लोकानुग्रहशोलाश्च सतत ते वहन्ति माम् ॥६१ परोपकारनिरता परद्रव्यपराड मुखा । नपुसका परस्तीपु ते वहन्ति च मा सदा ॥६२ तुलस्युपासनरता सदा नामपरायणा । गोरक्षणपरा ये च सतत मा वहन्ति ते ॥६३ जो पुरुष राग द्वेप से रहित हैं और मेरे भक्तजन हैं, जो अह- निश मेरे ही चरणो मे सलग्न रहा करते हैं, जो असूया और दम्भ से रहित है वे तो सदा ही मुझे धारण करने में समर्थ होते हैं ॥ ५७ ।। जो सदा दूसरों को सन्ताप दने से बचते हैं और भगवान शिव की भक्ति मे लीन रहा करते हैं तथा सदा मेरी कथा के श्रवण करने की जिनको तालसा रहा करती है वे मुझे सर्वदा धारण कर सकते हैं ॥५८।। हे देवि । जो स्त्रियाँ पतिव्रता होती हैं और अपने पति को प्राण के समान ही समझा करती हैं तथा अहर्निश पति को भक्ति मे ही सलग्न रहा करती है। जो स्त्रियां मात्सर्य से रहित होती हैं वे मुझे सदा धारण करने मे समथ होती हैं ।।५६ जो अपने माता पिता की सदा सेवा भक्ति भाव से किया 'रता है-जो गुरु या परम भक्त है सथा ममागत अतिथि को प्रिय समझता है और विप्रो का हित विया परता है वह मुझे धारण करने का पात्र क्यो नहीं है ? ॥ ३० ॥ जो परम पुण्यमय तीर्थों में भ्रमण किया करते हैं, सदा सत्पुरुषो की गति
नारद पुराण )
२१७
किया यरत हैं, जिनका स्वभाव समरत प्राणियों पर अनुग्रह करने
का होता है व मुझे सदा धारण कर सकते हैं ।। ६१।। जो परापकार में
तत्पर, दूसरे के द्रष्य से विमुस रहा करते है तथा पराई स्त्रियो के
विषय मे ना सक्त्व रक्खा करत हैं वे मुझे सदा धारण कर सकते हैं
॥६२॥ जो सदा तुलसी की उपासना लिया वरते हैं, जो सदा मेरे
नामो का स्मरण किया बरत हैं और नाम स्मरण म मग्न रहा करत
हैं । जो सर्वदा गौ रक्षा में सलग्न रहते हैं, उनके समीप में तो मैं
सर्वदा ही रहा करता हूँ ॥६३
प्रतिग्रह निवृत्ता ये परान्नविमुखास्तथा ।
अन्नोदकप्रदातापो वहन्ति सतत हि माम् ॥६४
त्व तु देविपतिप्राणा साध्वी भूतहिते रता।
सप्राप्य पुप्रभाव ते साधयिष्ये मनोरयम् ।।६५
इत्युक्त्वा देवदेवशो ह्यदिति देवमातरम् ।
दत्वा कण्ठगता मालामभय च तिरोदधे ॥६६
सा तु सहृष्टमनसा देवसूर्दशनन्दिनी ।
प्रणम्य कमलाकान्त पुन स्वस्थानमावजत् ॥६७
ततोदितिर्महाभागा सुप्रोता लोकवन्दिता।
असूत समये पुन सर्वलोक्नमस्कृतम् ॥६८
शखचक्रधर शान्त चन्द्रमण्डलमध्यगम् ।
सुधाक्लशदध्यन्नकर वामनसज्ञित्तम् ॥६६
सहस्रादित्यसकाश व्याकोशकमलेक्षणम् ।
सर्वाभरणसयुक्त पीताम्बरधर हरिम् ।।७०
स्तुत्य मुनिगणयुक्त सर्वलोकनायकम् ।
आविर्भूत हरि ज्ञात्वा कश्यपो हर्षविह्वल ।
प्रणम्य प्राञ्जलिभूत्वा स्तोतु समुपचक्रमे ॥७१
जो दान लेने के कार्य से दूर रहते है, जो दूसरों के अन्न से
बचते रहा करते हैं तथा जो स्वय अन्न और जल का दान दिया करते
२१८ [ नारद पुराण हैं वे मुझे पाने के सर्वदा अधिकारी पात्र हुआ करते हैं ।।६४॥ हे देवि ! आप तो समस्त प्राणियो के हित करने में परायण रहा करती है और पतिप्राणा एव परम साध्वी है अतएव मैं आपका पुत्र वन कर भापका मनोरथ पूर्ण कर दूंगा ||६५॥ उन देवेश्वर भगवान ने देवो की माता अदिति को इस रीति से समझा बुझाकर उसको अमय का दान प्रदान करके अन्त में अपने कण्ठ की माला देकर वही पर अन्त- र्धान हो गये थे ॥६६॥ उस समय मे वह दक्ष प्रजापति की पुत्री देव माता अदिति अपने मनमे अत्यन्त प्रसन्न होकर लक्ष्मीनारायण भगवान को प्रीति पूर्वक प्रणाम करती हुई अपने स्थान पर वापिस लौट कर आ गयी थी ॥६४॥ इसके उपरान्त समस्त संसार की वन्दनीया अदिति ने परम प्रस-नता मे भरी रहती हुई समय समाप्त होने पर परम वन्दनीया पुन का प्रसव किया था ॥६॥ कश्यप मुनि ने भी शख, चक्र, गदाधारी, परम शान्त चन्द्र मण्डल के मध्य मे विरा- जमान, हाय मे अमृत का पात्र, दधि और अन्न ग्रहण किये हुए बामन नाम को धारण करने वाले, सहस्रो सूर्यो के समान तेजस्वी, कमल के सदृश सुन्दर नेत्रो से युक्त, सभी आभरणो से विभूपित, समुचित पात्र, मुनियो से घिरे हुये और सब लोको में अद्वितीय एव अनुपम नायक को देखकर उन्होने साक्षात् श्री हरि को प्रकट हुआ समझ लिया था और परम हर्ष से गद्गद् होकर हाथ जोड़ कर प्रणाम करते हुये स्तवन करने के लिये समुद्यत हो गये थे ॥६६-७१।। नमो नमस्तेऽखिलकारणाय नमो नमस्तेऽखिलपालकाय । नमो नमस्तेऽमरनायकाय नमो नमो दैत्यविनाशनाय ।। ७२ नमो नमो भक्तजनप्रियाय नमो नम सज्जनरजिताय । नमो नमो दुर्जननाशनाय नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय ।।७३ नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । सीङ्गवकासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ॥७४ स्तुति के .
नारद पुराण ] २१६ नम पयोराशिनिवासनाय नमोऽस्तु सद कमलस्थिताय । नमोऽस्तु सुर्याद्यमिदप्रभाय नमो नम पुण्यकथागताय ॥७५ नमोनमोऽन्दुविलोचनाय नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय । नमोऽस्तु यज्ञाङ्गविराजिताय नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाया।७६ नमो जगत्कारणकारणाय नमोऽस्तु शब्दादिविजिताय । नमोऽस्तु ते दिव्यसुखप्रदाय नमो नमो भक्तमनोगताय ॥७७ कश्यप मुनि रहा-हे भगवन् । सबके कारण स्वरूप आप की सेवा मे मेरा प्रणाम है । गवके परिपालन करने वाले आपको सेया मे मेरा प्रणाम अपित है और पुन प्रणाम है । देवो के नायक आपको मेर' बारम्बार प्रणाम है । दैत्यो के विनाश करने वाले आपकी सेवा में मेरा पुन पुन प्रणाम है ॥७२॥भक्तो के परम प्रिय भगवान को वारम्बार नमस्कार है। सज्जनो को प्रसन्न करने वाले भगवान की सेवा मे मेरा बारम्बार प्रणाम है। दुर्जनो का नाश करने वाले भग- वान को मेरा बारम्बार नमस्कार है । जो इम सम्पूर्ण जगत के स्वामी हैं उन भगवान के लिये मेरा प्रणाम है ॥७३॥ विशेष कारण के वशीभूत होकर वामन स्वरूप का अवतार धारण करने वाले तथा अमित विक्रम वाले भगवान को मेरा बारम्बार प्रणाम है । शाहू- धनुप, सुदर्शन चक्र, नन्दक खान और कौमोदकी गदा को धारण करने वाले परम पुरुपोत्तम भगवान की सेवा में मेग प्रणाम है ।।७५ क्षीर सागर में निवास करने वाले विश्वम्भर भगवान को नमस्कार है । सत्पुरुषो के हृदय कमल में सस्थित अन्तर्यामी ईश्वर के लिये मेरा प्रणाम है । सूर्यादि के तुल्य अपरिमित प्रभा से ममन्वित आपकी सेवा मे प्रणाम है तथा परम पवित्र स्थाओ मे वर्णन किये गमे आपको नमस्कार है ॥७॥ मूर्य-चन्द्ररूपी नेवा वारे भगवान को सेवा में बारम्बार नमसार है। यज्ञो के पुण्य फल को प्रदान करने वाले तथा यमाङ्गो में विराजमान प्रभु के लिये नमस्कार है । हे सत्पुरुषों को २२० [ नारद पुराण प्रिय समझने वाले ! आपको मैं अपना प्रणाम अपित करता हूँ ॥७६।। इस सम्पूर्ण जगनके कारण स्वरूप ईश्वर के लिये नमसार है। शन्दादि से रहित भगवान के लिये नमवार है तथा दिव्य मुरा प्रदान करने वाले भगवान को प्रणाम है और भगवद्भक्तो के मनमे सदा निवास करने वाले भगवान को प्रणाम है ।।७।। नमोऽतु ते ध्वान्तविनाशकाय नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय । नमोस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने नमो हिरण्याक्षविदारकाय ७८ नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे नमोऽस्तु ते क्षत्लकुलान्तकाय । नमोस्तु ते रावणमर्दनाय नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय ॥७६ नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने । स्मृतातिनाशिने तुभ्य भूयो भूयो नमो नमः १८० यज्ञेश यशविन्यास यज्ञविघ्नविनाशन । यशरूप यजद्रूप यज्ञाग त्वां यजाम्यहम् ॥८१ इति स्तुत: स देवेसो वामनो लोकपावनः । उवाच प्रहसन्हर्प वर्द्ध यन्कश्पपस्य सः ॥२ तात तुष्टोऽस्मि भद्र ते भविष्यति सुराचित । अचिरात्साधयिष्यामि निखिल त्वन्मनोरथम् ॥८३ अह जन्मद्वयोस्त्वेय युवयो. पुनता गतः । अस्मिजन्मन्यपि तथा साधयाम्युत्तम सुखम् ॥८४ अज्ञानान्धकार विनाश करने वाले, मन्दराचलधारी, यज्ञवराह, हिरण्याक्ष के विदारण करने वाले भगवान की सेवा मे बारम्बार प्रणाम सरित है । वामन का स्वरूप ( वौना ) धारण करने वाले आपके लिये मेरा प्रणाम है। क्षत्रियो के वश का विश्वस करने वाले परशुराम के अवतार वाले आपको नमस्कार है । लकेश्वर रावण का वध करने वाले रामरूप आपको नमस्कार है । बलराम के छोटे भाई नन्द सुत श्रीकृष्ण का अवतार धारण करने वाले आपको मेरा प्रणाम
नारस पुराण ]
२२१
है ।।७८०७६॥ हे मलाकान्त । सुख प्रदान करने वाले आपको प्रणाम
फरता हूँ। स्मरण करने मात्र से पीडा को दूर भगा देने वाले आपको
बारम्बार प्रणाम है । हे यश । हे यज्ञ विन्यास । हे यज्ञो के विघ्नो
को विनष्ट करने वाले । हे यज्ञ स्वरूप । हे यज्ञान ! मैं बापका पूजन
करता हूँ ।।८०८१।। इस प्रकार से कश्यप मुनि के द्वारा स्तुति क्येि
जाने पर लोकपावन, देश भावन भगवान वामनजी हँसकर कश्यप मुनि
का हर्ष वर्धन करते हुये बोले ॥८२ 1 श्री भगवान ने कहा-हे पिता
जी मैं प्रसन्न हूँ । हे देवो ये वन्दनीय । आपका कल्याण होगा ।।८।।
मैं वृधिनगर्भ और योवृष्ण इन दोनो नामोम से आपका पुत्र बना करता
हूँ अतएव इस वामन जन्म मे भी आपको सुख दूंगा ।।८४
अन
वलिदैत्यो दीर्घसन महामखम् ।
आरेभे गुरुणा युक्त काव्येन च मुनीश्वर ॥८५
तस्मिन्मये समाहूतो विष्णुलस्मीसमन्वित ।
हवि स्वीकरणार्याय ऋपिभिर्ब्रह्मवादिभि ॥८६
प्रवृद्ध श्वर्यदैत्यस्य वर्तमाने महाक्तो।
आमन्य मातापितरौ स वटुर्वामानो ययौ ॥८७
स्मितेन मोहयल्लोक वामनो भक्तवत्सल ।
हविर्भोक्त मिवायातो वले प्रत्यक्षतो हरि !!८८
दुर्वृत्तो वा जडा वाय हितोऽपि वा।
यो भक्तियुक्तस्तस्यान्त सदा सनिहितो हरि ॥८६
आयान्त वामन दृष्ट्वा ऋषयो ज्ञानचक्षुप ।
ज्ञात्वा नारायण देवमुद्ययु सभ्यसयुता ॥६०
एतज्ज्ञात्वा दैत्यगुरुरेकाते बलिमब्रवीत् ।
स्त्रसारमविचार्येव खला कार्याणि कुर्वते ॥६१
इस ओर दंत्यराज बलि ने अपन गुस्वर शुक्राचार्य और अन्य
मुनीश्वरो को अपन साथ में लेकर बहुत लम्ब समय तक चलने वाले
२२२ [ नारद पुराण एक बडे भारो यज्ञ के वरने वा आरम्भ कर दिया था ।। ६५ ।। उस यज्ञ म ग्रह्मवादी महामहर्पियो ने लक्ष्मीनारायण भगवान का हवि स्वीकार करने के लिए आवाहन किया था ।।६॥ उस समय मे वटुक वामन अपने माता पिता से आज्ञा प्राप्त करके बढे हुये ऐश्वयं से सम्पन दैत्यराज वे विय जाने वाले महा यज्ञो के देखने को चल दिये थे ॥८॥ भक्तवत्सल वामन देव अपनी मन्द मुस्कराहट स सम्पूर्ण रासार यो मुग्ध करते हुये बलि राजा वे सामन प्रकट होकर विष्णु भगवान के हरि का भोग लगाने के समान आगे को बढ़ चले ॥८६॥ जो अन्न करण मे भक्ति का भाव रखता है वह दुराचारी हो या सदाचारी, जड हा या प्राज्ञ, जो लोगो के हित का काम करने वाला है श्री हरि उसके ममोप मे रहा करते हैं । वहाँ पर वामन देव को आते हुये देखकर ऋपिगणो ने अपनी ज्ञान दृष्टि से देख लिया था कि यह तो भगवान नारायण ही आ ररहे हैं अत वे सभ्या के साथ गानोलान देने के लिए सब खडे हो गये थे ॥६०॥ दुष्ट लोग अपनी शक्ति का विचार न कर काम करने के लिए उद्यत हो जाया करते हैं अतएव दैत्य गुरु शुक्राचाय इस बात को जाँच गये थे और फिर राजा बलि से एकान्त मे जाकर कहन लगे ये॥६१ भो भो देत्यपते सौम्य ह्मपहर्ता तव थियम् । विष्णुर्वामनरूपेण ह्यदिते पुत्रता गत ॥६२ सवाध्वर स आयाति त्वया तस्यासुरेश्वर । न किंचिदपि दातव्य मन्मत शृणु पण्डित ।।६३ आत्मबुद्धि सुखकरी गुरुबुद्धिर्विशेषन । परबुद्धिविनाशाय स्त्री बुद्धि प्रलयकरी १६४ शत्रूणा हितकृतद्यस्तु स हन्तव्यो विशेषत ॥६५ गुरो न क्तवव्य धममार्गविगेधत । यदादत्ते स्वय विष्णु किमस्मादधिक वरम् ॥६६ नारद पुराण २२३ कुर्वन्ति विदुषो यज्ञान्विष्णुप्रीणनकारणात् । स चेत्साक्षाद्धविर्भोगी मत्त कोऽभ्यधिको भुवि १६७ दरिद्रेणापि यत्किचिद्दीयते विष्णवे गुरो। तदेव परम दान दत्त भवन्ति चाक्षयम् ।।६८ श्री शुक्राचार्यजी ने कहा-हे दैत्यराज | आप तो बहुत ही सीधे साधे और भोले हैं । मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि आपकी लक्ष्मी का अपहरण करने के लिये और इसी विचार से यह विष्णु भगवान ही अदिति के पुत्र बन कर यहाँ आय है ।।१२। हे असुरेश्वर । वही आपके इस यज्ञ - मण्डप मे आरहे हैं। अब हे पण्डित । आप मेरी बात का श्रवण कर भली भांति समझ लो आप उसको कुछ भी मत देना ।।६३ अपने अन्दर यदि बुद्धि हो तो वह हमेशा मुख देने वाली हुआ करती ह परन्तु अपने गुरुदेव की बुद्धि परम सुख दिया करती है और शय अथवा दूसरे की बुद्धि नाश कारिणी होती है । यह कहा भी गया है कि मुखं सदा दूसरे की वृद्धि ग्रहण किया करता है । स्त्री की बुद्धि प्रलयकारिणी हुआ करती है ॥६४॥ जो पुरुष अपने शत्रुगण का हित किया करता है वह तो भली भाति नष्ट विनष्ट होकर ही रहा करता है ॥६५॥ राजा बलि ने इस गुरुदेव के वचन का उत्तर दिया था। उसने कहा-हे गुरुदेव । घम मार्ग के विपरीत आपको ऐसी बात कभी भी नहीं करनी चाहिये । यदि स्वय विष्णु ही दान लेना चाहते तो इससे भली दूसरी मेरे लिये और क्या बात हो सकती है ॥६६॥ विद्वान् लोग भगवान विष्णुदेव को प्रसन्न करने के लिये तो यज्ञ कर्म नादि विया करते हैं । जब वे स्वय ही हरि का भोग लगाना चाहत हैं तो इस भूमण्डन पर मुझसे अधिक महान भाग्य- शालीप कौन हागा ? ॥६७।। हे गुरुवर । एक महान दरिद्र पुरुष भी जो कुछ यथा शत्ति विष्णूदेव को प्राति के लिये दान दिया वरता है वह दान परम था और अक्षय हुआ करता है ।।६८
२२४
[ नारद पुराण
स्मृतोऽपि परया भक्तया पुनाति पुरुषोत्तमः ।
येन केनाप्यर्चितश्च ददाति परमा गतिम् ।।६६
हरिहरति पापानि दुष्ठचित्तैरपि स्मृतः ।
अनिच्छ्यापि सस्पृष्टो दहत्येव हि पातकः ॥१००
जिह्वाग्रे वसते यस्य हरिरित्यक्ष रद्वयम् ।
स विष्णुलोकमाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१०१
गोविदेति सदा ध्यायेद्यस्तु रागादिवजित ।
स याति विष्णुभवनमिति प्राहुर्मनीषिण ॥१०२
अग्नी व ब्राह्मगे वापि हूयते यद्धविगु रो।
हरिभक्तया महाभाग तेन विष्णु प्रसीदति ॥१०३
अह तु हरितुष्टयर्य करोम्यध्वरमुत्तमम् ।
स्वयंमायाति चेद्विष्णुः कृतार्थोऽस्मि न संशयः ।।१०४
एव वदति दैत्येन्द्रे विष्णुमिनरूपधृक् ।
प्रविवेशाध्वरस्थान हुतवह्निमनोरमम् ।।१०५
पुरुषोत्तम प्रभु तो अत्युत्कट भक्तिभाव से स्मरण करने पर ही ,
उस अपने उपासक भक्त को परम पवित्र कर दिया करते हैं चाहे जो
कोई भी हो जव उनका वह पूजन करता है तो वे उसको परमोत्तम
गति दिया करते है | दोपयुक्त चित्त वाले पुरुष भी यदि श्री
हरि भगवान का स्मरण किया करते हैं तो भी ये उनके सम्पूर्ण पाप को
हरण कर लिया करते हैं । अग्नि को बिना इच्छा के भी कोई स्पर्श करे
तो अवश्य ही जला दिया करता है । इसी प्रकार से भगवान श्री हरि
तो पापो के समुदाय का विनाश कर दिया करते हैं ॥१००॥ जिन
पुरुषों की जिवा के अग्र भाग पर श्री हरि इन दो अक्षरो का निवाम
रहा करना है वह तो उस परमोत्तम विष्णु लोक की प्राप्ति किया
करता है जिम पद मे फिर वापिस लौटना परम दुर्लभ हुआ करता है
१०१॥ बुद्धिमान पुरुप यहा परते हैं जो रामादि दोपों से रहित
-
नारद पुराण ]
२२५
होकर के सर्वदा श्री गोविन्द भगवान वा ध्यान क्यिा करते हैं वे
निश्चय ही भगवान विष्णु के लोक की प्राप्ति क्यिा करते हैं ॥१०२।।
हे महाभाग ! श्री हरि पी भक्ति के साय जो हवि अग्नि या ब्राह्मण
मे होमी जाया करती है उससे भगवान श्री विष्णु परम प्रसन्न हुया
करते हैं ॥१०३॥ मैं भी तो इस समय भगवान् श्री विष्णुदेव को प्रसन्न
करने के ही लिये इरा महान यज्ञ या यजन कर रहा हूँ। अब पदि
भगवान विष्णु स्वय ही कृपा करके यहां पदार्पण करते हैं तो मैं तो
निश्चित ही परम कृतकृत्य हो जाऊंगा ।।१०४।। वह दैत्यराज वलि
इस प्रकार से अपने गुरुदेव से कह ही रहा था वि अग्नि मे होम करने
से उस परम मनोहर स्थल मे जहा कि यज्ञ का यजन किया जारहा था
वामन स्वरूप को धारण करने वाले श्री विष्णुदेव ने प्रवेश किया
था १०५
त दृष्ट्वा कोटिसूर्याभं योग्यावयवसुन्दरम् ।
वामन सहसोत्थाय प्रत्यगृह्णात्कृताञ्जलि. ॥१०६
दत्त्वासन च प्रक्षाल्य पादो वामनरूपिणम् ।
सकुटुवो वहन्मूर्ना परमा मुदमातवान् ।।१०७
विष्णवेऽस्म जगद्धाम्ने दत्त्वाध्यं विधिवद्वलि ।
रोमाञ्चितततुभूत्वा हर्षाश्रुनयनो-ब्रवीत् ॥१०८
अद्य मे सफल जन्म अद्य मे सफलो मख. ।
जोवित सफल मेऽद्य कृतार्थोऽस्मि न संशय. ॥१०६
अमोघामृतवृष्टिमें समायातातिदुर्लभा ।
त्वदागमनमात्रेण ह्यनायासो महोत्सव ॥११०
एते च ऋपय सर्वे कृतार्था नान राशय ।
यः पूर्व हि तपस्तप्त तदद्य सफल प्रभो ।।१११
कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि न सशय ।
तस्मात्त भ्य नमस्तुभ्य नमस्तुभ्य नमोनम ॥११२
२२६ [ नारद पुराण करोडो सूर्यों के समान कान्ति वाले और ठीक २ अवयवो से युक्त श्री वामनदेव के दर्शन करके राजा बलि एक साथ अपने आरान से उठकर खड़ा हो गया था और उसने अपने दोनो हाथो को जोडते हुए उनका स्वागत किया था ॥१०६॥ फिर एक आसन समर्पित कर उन वामन रूपधारी विप्र वटु के राजा ने चरणो का प्रक्षालन किया था तथा उसके चरणामृत को अपने मस्तक पर एव अपने समस्त परि- वार के मस्तको पर छिडक दिया था और उस समय में उसके मन मे अत्यधिक प्रसन्नता हुई थी ॥१०॥ इसके उपरान्त राजा वलि ने समस्त जगत् के परमाश्रय स्थान भगवान विष्णुदेव को विधिपूर्वक अर्य दिया था। उस समय मे पुलकायमान होकर परम हर्ष से अपने नेत्रो में आंसू भरकर दैत्यराज वलि ने कहा था ।।१०८॥ दैत्यराज ने निवे दन किया था-आज मेरा जन्म परम सफल होगया है और आज मेरा यह गज्ञ भी सफल हो गया है एव आज मेरा जीवन ही सफल होगया है, अधिर क्या निवेदन करू मैं तो आज निश्चय ही कृतार्थ होगया हूँ॥१०६॥ मरे घर मे तो मैं समझता हूँ कि आज अति दुर्लभ और अमोप अमृत की वर्षा हो रही है। हे भगवान् आपने यहां पदार्पण परने से ही अनायास मेरे गृह में एव प्रकार या उत्सव सा मच गया है ॥११०॥ इस समय म यहाँ पर विराजमान होने वाले ये सब ऋपि- गण भी वृतार्थ हो गये हैं। है प्रभो । इनने जो भी अब तक तपश्चर्या की थी वह आज इनवी रापस हो गई है ॥१११। मैं तो अवश्य ही पृतार्थ होगया । पृतार्य हो गया और परम पृतार्थ हो गया हूँ इसी कारण से मैं आपकी सेवा में अपना प्रणाम समर्पित करता है और पारम्बार प्रणाम करता है ।। ११२ स्वदाजया त्वन्नियोग माधयामीति मन्मन । अत्युत्माममायुक्त समाजापय मा प्रभो ॥११३ एवमुक्तो दीक्षितन प्रहसन्नामनोमनीत् ।
नारद पुराण ] २२७ देहि मे दपसि स्थातु भूमि त्रिपद समिताम् ।।११४ एतच्छु त्वा वलि प्राह राज्य याचितवान्न हि । ग्राम वा नगर चापि धन वा किं कृत त्वया ।।११५ तन्निशम्य वलि प्राह विष्णु सर्वशरीरभृत् । आसन्नभ्रष्टराज्यस्य वैराग्य जनयन्निव ॥११६ शृणु दैत्येन्द्र वक्ष्यामि गुह्याद्गृह्यतम परम् । सर्वसंग विहीनाना किमर्थं साध्यते वद ।।११७ अह तु सर्वभूतानामन्तर्यामीति भावय । मयि सर्वमिद दैत्य किमन्य साध्यते वद।।११८ रागद्वेपविहोनाना शान्ताना त्यक्तमायिनाम् । नित्यानदस्वरूपाणा किमन्य साध्यते धन ॥११६ अव जो भी आपकी आज्ञा होगी मैं आपके उसी कार्य को पूर्ण सिद्ध करू गा। मेरा मन इम समय में बहुत ही अधिक उत्साह से भरा हुआ है । अतएव हे प्रभो । अर आप मुझे अपनी सेवा के लिये आदेश प्रदान कीजिये ॥११३॥ उस यज्ञ मे दीक्षा का ग्रहण किये हुये राजा वलि के द्वारा इस प्रकार से कहने पर श्री वामनदेव ने हँसकर कहा था कि मुथे तपस्या करने के लिये केवल तीन पग भूमि का दान करो ।।११४।। यह मुनकर राजा बलि ने कहा था-हे भग- वन् । आपने यह क्या मांगा है ? आपने न तो कोई राज्य ही मांगा न ग्राम की ही याचना की है न काई नगर मांगा और न धन हो मांगा है ॥११५|| इस बात का श्रवण पर सब प्राणियो के शरीर को पुष्ट करन वाल वामन स्पधारी भगवान विष्णुदेव शीघ्र ही जिसका राज्य भ्रष्ट हान वाला है उस राजा बलि का वैराग्य दिखात हुए घाले थे ॥११६॥ भगवान न रहा है दैत्येन्द्र । मैं आप गुप्त वात करना है उसको साप मुनिए-हम लोग तो सभी प्रकार ये रा एक २२६ [ नारद पुराण सङ्गो मे रहित है तो फिर आप ही बताइये, हमको धन सम्पत्ति से क्या प्रयोजन है ? ||११७॥ हमको तो आप सब प्राणिमो का अन्त- मी ही समझ लेना चाहिए । यह सम्पूण जगत् हममे ही तो है फिर अन्य धनो से सबको क्या करना शेष रहता है ? ॥११॥ जो सभी प्रकार के राग द्वेप से रहित है, जो ज्ञान से सुसम्पन्न हैं जो माया को छोड देने वासे हैं और जो नित्य ही मानन्द स्वरूप हैं वे धन को ग्रहण करके भी बया वाव सिद्ध करेंगे ? ॥११६ आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यता शान्तचेतसाम् । अभिन्नमात्मन सर्व को दाता दीयते च विम् ।।१२० पृथ्वीय क्षत्रियवशा इति शास्मेषु निश्चितम् । तदाज्ञाया स्थिता सर्वे लभन्ते परम सुखम् ॥१२१ दातव्यो मुनिभिश्चापि पष्ठाशो भूभुजे वले । महीय ब्राह्मणाना तु दातव्या सवयत्नत ॥१२२ भूमिदानस्य माहात्म्य न भूत न भविष्यति। पर निर्वाणमाप्नोति भूमिदो नान सशय ॥१२३ स्वल्पामपि मही दत्त्वा श्रोनियायाहिताग्नये । ब्रह्मलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥१२४ भूमिद सर्वद प्रोक्तो भूमिदो मोक्षभाग्भवेत् । अतिदान तु तज्ज्ञेच सर्वपापप्रणाशनम् ।।१२५ महापातक्युक्तो वा युक्तो वा सर्वपातक । दशहस्ता हो दत्त्वा सर्वपापं. प्रमुच्यते ॥१२६ सभी प्राणिया का अपने ही समान देखन वाले और परम मान्त चित्त वाले के लिय तो अपने से सभी अभिन्न है तोपिर पौन देने वाला होता है और दिया भी क्या जा सकता है ॥१२०॥ यह भूमि तो भनियो के वश म हो रहा परती है। ऐमा शास्त्रा का मिद्धान्त है। अतष्य शास्त्रो की आशानुसार ही चलन वाला या प म सुख प्राप्त हुआ करता है ।।१२१॥ ६ बलिराजा । मुनियो का मारद पुराण ] २२६ भी अपने तप मे से छटवां भाग राजा को देना पड़ता है। अतएव इस भूमि का दान ब्राह्मणो को पल पूर्वक परना चाहिये ॥ १२२॥ हे पले ! इस भूमि के दान का माहात्म्य भूत और भविष्यत काल में भी अपनी समता नही रखता है । इस भूमि के दान देने वाले को परम मुख की प्राप्ति हुआ करती है - इसमे तनिक मो सन्देह नहीं है ॥१२३ किमी अग्निहोत्र करने वाले श्रोत्रिय ब्राह्मण को बहुत थोड़ी-सी भूमि का दान देने से भी उस व्यक्ति को उरा ब्रह्मलोक को प्राप्ति हुआ करती है जहा पर पहुँच कर फिर वापिस लौटना कदिन है ॥१२४॥ जो भूमि का दान करने वाला है यह सभी प्रकार की वस्तुओ का दाता माना जाया करता है । भूमि के दान देने वाले की मुक्ति होजाया फरती है । भूमि दान को मब पापो का नाशक एक महा दान ममाना चाहिए ॥१२॥ महा पातकी और ममी प्रकार के पापो से पलवित मनुष्य केवल दश हाथ भूमि का दान देने से सभी पापों से छुटकारा पा जाया करता है ॥१२६ सत्पात्र भूमिदाता य मदानफल लभेत् । भूमिदानसम नान्यत्त्रिषु लोकेषु विद्यते ॥१२७ द्विजाय वृत्तिहीनाय यः प्रदद्यान्मही चले। तस्य पुण्यफल वक्त न क्षमोऽब्दशतरहम् ॥१२८ राक्ताय देव पूजागु वृत्तिहीनाय दंत्यप । स्वल्पामपि मही दद्याद्यः स विष्णुनं सशय. ॥१२६ इक्षुगोधूमतुवरीपूगनृक्षादिमयुता। पृथ्वी प्रदीयते येन स विष्णु न सशय ॥१३० वृत्तिहीनाय विप्राय दरिद्राय कुटुम्बिने। स्वल्पामपि मही दत्त्वा विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।।१३१ मक्ताय देवपूजामु विप्रायादकिका महीम् । दत्वा लभेत गङ्गाया त्रिरात्रस्नानज फलम् ।।१३२ २३० [ नारद पुराण विप्राय वृत्तिहीनाय सदाचाररताय च । द्रोणिका पृथिवी दत्त्वा यत्फल लभते शृणु ॥१३३ जो मनुष्य किसी सत्पात्र को भूमि का दान किया करता है उसको अनेक प्रकार के दानो का फल प्राप्त हुआ करता है । इस भूमि के दान के समान इस लोक्य मे अन्य काई भी दान नहीं होता है ।।१२७।। हे वले । जो आजीविका से रहित किसी ब्राह्मण को पृथ्वी का दान देता है उसका जो पुण्यफल होता है उसका वर्णन मुझसे यदि लगातार कहता ही रहूँ तो भी सौ वर्ष के लम्बे समय में भी नहीं किया जा सकता है ।।१२८॥ है दैत्यराज । अहर्निश देवो के यजन में सलग्न रहने वाले ब्राह्मण को, जिसकी कोई भी वृत्ति नहीं होती है, थोडी सी भी पृथ्वी का दान दिया जाता है वह उस प्रति- गृहीता के लिये साक्षात् विष्णु ही है ॥१२६॥ ईख, गहूँ, अरहर, सुपारी आदि पेड पौधा से भरी-पूरी भूमि का जो दान किया करता है वह प्रतिगृहीता और समस्त संसार की दृष्टि मे विष्णु ही होता है 1१३०॥ आजीविका से रहित कुटुम्ब वाले दरिद्री ब्राह्मण को यदि कोई बहुत थोडी सी भी पृथ्वी का दान देता है उसे विष्णु भगवान की सायुज्यता प्राप्त हुआ करती है ।। १३१ ।। देवों की अर्चना मे निमग्न ब्राह्मण को एक आढक अर्थात् जिसमे एक घडा भर अन्न उत्पन्न हो जाता हो उतनी ही पृथ्वी का दान देने से तीन दिन तक गङ्गा स्नान का पुण्य फल मिला करता है ॥१३२।। वृत्ति विहीन सदाचरण से रहने वाले ब्राह्मण के लिये द्रोणा मात्र अर्थात बीस सेर अन्न उप- जाने वाली पृथ्वी के दान से जो फल प्राप्त होता है उसका करो ॥१३॥ गङ्गातीर्थाश्वमेधाना शतानि विधिवन्नर । कृत्वा यत्फ समाप्नोति तदाप्नोति सपुष्फलम् ॥१३४ ददाति सारिखा भूमि दरिद्राय द्विजाय य 1 ध्रवण
२३२
[ नारद पुराण
अभवस्तस्य षट् पल्य. श्रुति. सिन्धुर्यशोवती।
कामिनी मालिनी चव शामा चेति प्रकोर्तिता ।।१४१
आसु पत्नीपु तस्यसश्चत्वारिंशच्छतद्वयम् ।
पुयाणामसुरश्रेष्ठ सर्वे नित्य बुभुक्षिता. ॥१४२
अकिञ्चनो भद्रमतिः क्षुधार्तानात्मजान्प्रिया.।
पश्यन्स्वय क्षुधार्तश्च विललापालेन्द्रिय. ॥१४३
घिग्जन्म भाग्यरहित धिग्जन्म धनवर्जितम् ।
धिग्जन्म धर्मरहित धिग्जन्म ख्यातिवजितम् ॥१४४
नरस्य वह्वपत्यस्य धिग्जन्मेश्वर्यवर्जितम् ।
अहो गुणा सौभ्यता च विद्वत्ता जन्म सत्कुले ॥१४५
दारिद्रयाम्बुधिमग्नस्य सर्वमेतन्न शोभते ।
प्रिया. पुत्राश्च पौत्राश्च वान्धवा भ्रातरस्तथा ॥१४६
शिष्याश्च सर्वमनुजास्त्यजन्त्यैश्वर्यवर्जितम् ।
चाण्डातो वा द्विजो वापि भाग्यवानेव पूज्यते ॥१४७
उसकी श्रुति-सिन्धु-यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोमा
इन नामो वाती पत्नियां थी ॥१४१॥ हे असुर श्रेष्ठ ! इसके इन
पत्नियो के गर्भ मे दो सौ चालीस पुत्र उत्पन्न हुए थे। ये सभी भूखे
रहा करते थे ।।१४२॥ वह महान दरिद्र भद्रपति अपने सब बच्चो को
और पत्नियो को भूसा क्षधात देखकर और स्वय भी क्ष धातुर होने
के कारण से इन्द्रियो के व्याकुल होने पर विलाप करने लग गया था
॥१४३।। वह कहता था-अहो । इस संसार मे भाग्यहीन मनुष्य का
जीवन व्यर्थ ही है- एसे धन विहीन जीवन को धिक्कार है और
प्रसिद्धि से रहित जीवन को धिक्कार है ॥ १४४ ॥ जिसके बहुत
सी
सलतियों हो परन्तु धन न हो उस मनुष्य के जीवन को भी धिक्कार
है । बडे से बड़े अच्छे गुणगण, सौम्यता, विद्वता और सत्कुलीनता ये
सब बातें दरिद्रता के सागर मे डुबकियां लगाने वाले मनुष्य को शोभा
नारद पुराण ] २३३ नहीं दिया करती है ।।१४५॥ जिसके पास ऐश्वर्य का अभाव होता है उसको प्रिय पुन,पौत्र, वाधव, भाई तथा शिप्य सभी मनुष्य त्याग दिया करते हैं । चाहे काई चाण्डाल हो अथवा द्विज हो ससार धनेश्वयं से सम्पन्न भाग्यशाली का ही सत्कार हुआ करता है ॥११६११४७॥ दरिद्र पुरुपो लोके शववल्लोकनिन्दित । अहो सपन्समायुक्तो निष्ठुरो वाप्यनिष्ठुर ॥१४८ गुणहीनोऽपि गुणवान्मूर्यो वाप्यय पण्डित । ऐश्वर्यगुणयुक्तश्चेत्पूज्य एव न सशय ॥१५६ अहो दरिद्रता दुख तत्राप्याशातिदु खदा। आशाभिभूता पुरुपादु समश्नुवतेक्षयम् ॥१५० आशाया दासा ये दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येपा तेपा दासायते लोक ॥१५१ मानो हि महता लोके धनमक्षय्यमुच्यये । तस्मिन्नाशाख्यरिपुणा माने नष्टे दरिद्रता ॥१५२ सर्वशास्थार्थवेत्तापि दरिद्रो भाति मूर्खवत् । नणिञ्चन्यमहाग्राहग्रस्ताना को विमोचकः ॥१५३ अहो दुखमहो दु रामहो दु ख दरिद्रता । तनापि पुत्रभार्याणा वाहुल्यमतिदु सदम् ॥१५४ जो मनुष्य दरिद्र होता है वह तो इस संसार में एक शव के समाज ही परम निन्दित माना जाया करता है। परे । सम्पत्तिशाली पुरुष परम निष्ठुर हा तव भी उरा दयालु रामपा जाया परता है ।१४८ यह भले ही गुणा से ही हीन हो तो भी उसका गुणी पहा जाया करता है। मप पनी या पण्डित ग्यानी पार पुधारा जाता है । जिसमें ऐवयं माप गुग भी हो ना फिर उस पया कहना है वह सो पूज्य ही हो जाता है ॥१४॥ अहो ! यह दरिद्रता का होना ही
२३४
[ नारद पुराण
महान दुख है पिर उसमे भी आशा का होना तो बहुत ही दुरा देने
वाली हुआ करती है । आशा ने पाश फंसे हुये मनुष्य अक्षय दु खो
का भोग पिया घरते हैं ॥१५०।। जो आशा के दास हैं वे तो मानो
सभी लोगो के दास हो जाते हैं और यह आशा जिन महा पुरया की
दामी होती है उनका यह सम्पूर्ण ससार ही दास बन जाया करता है
॥१५१11 वडे पुरुषो का तो मान-सम्मान ही धन कहा जाया करता
है और एष विचारे दरिद्री के मान का तो यह आशा रूपी
शत्रु नष्ट ही कर दिया करता है । अतएव वह तो मान के विनष्ट हो
जाने से दरिद ही रहा करता है ॥१५२॥ दरिद्र पुरुप भले ही समस्त
शास्त्रो का ज्ञाता हो वह सदा सवको दृष्टि में एक मूर्ख ही जंचा
करता है। अरे । जिनको यह दरिद्रतारूपी नाका परड लिया वरता है
उसको कोन छुडा सकता है ।।१५३।। यह दरिद्रता महान दुख है-
विशाल वेदना है और अनुपम यातना है । ऐसी दरिद्रता मे बहुत सी
स्त्रिया और बहुत सी सन्तान हो जाय तो बहुत ही दुख दिया करते है
1१५४
एवसुक्त्वा भद्रमति सर्वशास्त्रार्थ पारग ।
अन्यमयवद धर्म मनसाऽचिन्तयत्तदा।१५५१
भूमिदान विनिश्नत्य सर्वदानोत्तमोत्तमम् ।
दानेन योऽनुमताति स एव कृतवान्पुरा ॥१५६
प्रापक परम धर्म सर्वकामफलप्रदम् ।
दानामुत्तम दानभूदान परिकीर्तितम् ।।१५७
यद्दत्वा समवाप्नोति यद्यदिष्टतम नर ।
इति निश्चित्य मतिमान्धीरो भद्रमतिर्बले ॥१५८
कौशाम्बी नाम नगरी कलत्रापत्ययुग्ययौ ।
सुघोषो नाम विप्रेन्द्र सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ।१५६
गत्वा याचितवान्भूमिं पञ्चहस्तायता वले ।
. २३६ [ नारद पुराण विष्णु बुद्धया समभ्यर्य तावतों पृथिवी ददौ । सोऽपि भद्रमतिविप्रो धीमता याचिता भुवम् ॥१६५ दत्तवान्हरिभक्ताय श्रोत्रियाय कुटुम्बिने । सुघोपो भूमिदानेन कोटिवशसमन्वितः ॥१६६ प्रपेदे विष्णुभवन यय गत्वा न शोचति । वले भद्रमतिश्चापि यतः प्रार्थितवाञ्छितम् ।।१६७ स्थितवान्विष्णुभवने सकुटुम्वो युगायुतम् । तथैव ब्रह्मसदने स्थित्वा कोटियुगायुतम् ॥१६८ ऐन्द्र पद समासाद्य स्थितवान्कल्पपञ्चकम् । ततो भुव समासाद्य सर्वैश्वर्यसमन्वितः ॥१६६ हे द्विजवर ! आपके अनुग्रह से मेरा यह वुल पवित्र होगया है । इस रीति से कहकर सुधोप ने उम विप्र का सत्कार दिया था ।।१६२।। फिर उस महान मतिमान् सुघोष ने इस विप्र को पाच हाथ प्रमाण वाली भूमि के दान का वचन दे दिया था । मैं इस विष्णु से पालित विष्णु की पविन पृथ्वी को देता हूँ ॥१६३॥ इस भूमि दान से जनार्दन भगवान् मुझ पर प्रसन्न होवे । हे देत्येन्द्र ! उस सुघोष ने यह उपर्युक्त मन्त्र पडकर उस द्विज श्रेष्ठ को विष्णु बुद्धि से पहिले तो अर्चन किया और फिर उतनी भूमि का दान कर दिया था। इसके उपरान्त उस भद्रमति ब्राह्मण ने एक कुटुम्बी श्रोत्रिय हरिभक्त को वह याचना की हुई भूमि देदी थी। भूमिदान के प्रभाव से वह सुघोप अपनो करोडो पीढियों के सहित विष्णु लोक मे चला गया था जहां कि किसी को भी कोई शोक नहीं करना पडता है । हे वले ! वह भद्रमति भी सम्पत्ति को चाह किया करता था ॥१६४-१६७॥ अतएव वह सकुटुम्ब वहा पर विष्णु लोक मे दस हजार युग तक रहा था। इसके पश्चात् दस सहल युग पर्यन्त उसने ब्रह्म लोक मे निवाम किया था। इसके अनन्तर इन्द्र के पदचर पांच कल्प पर्यन्त उस भद्रगति ने इन्द्रासन पर विराजमान होकर स्वर्ग लोक का राज्योपभोग किया था। इसके उपरान्त पुन. इस भूमण्डल
नारदपुराण ]
२३७
में उत्पन्त होकर सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्राप्त किये थे ।।१६८1१६६
जातिस्मयो महाभागो बुभुजे भोगमुत्तमम् ।
ततो भद्रमतिर्दैत्य निष्कामो विष्णुतत्पर ॥१७०
पृथिवी वृत्तिहीनेभ्यो ब्राह्मगेभ्य प्रदत्तवान् ।
तस्य विष्णु प्रसन्नात्मा दत्त्वैश्वर्यमनुत्तमम् ॥१७१
कोटिवशसमेतस्य ददौ मोक्षमनुत्तमम् ।
तस्माद्दे त्यपते मह्य सर्वधर्मपरायण ।।१७२
तपश्चरिष्ये मोक्षाय देहि मे त्रिपदा महीम् ।
वैरोचनिस्ततो हृष्ट कलश जलपूरितम् ॥१७३
आददे पृथिवी दातु वणिने वामनाय ।
विष्णु सर्वगतो ज्ञात्वा जलधारावरोधिनम् ॥१७४
काव्य हस्तस्थदर्भाग्र तच्छरे सन्यवेशयत् ।
दर्भाग्रेऽभून्महाशस्त्र कोटिसूर्यसमप्रभम् ।।१७५
वह जातिस्मर हो गया था। इस रीति से उस महा भाग ने
अनेक उत्तमोत्तम भोगो का भूमि दान की महिमा से उपभोग किया
था। हे दैत्यराज । इसके अनन्तर उस भद्रमति विप्र ने निष्काम भाव
में भगवान विष्णु की सेवा मे निरन्तर निमग्न होकर वृत्ति विहीन ब्राह्मणो
को भूमि का दान दिया था। इससे विष्णु भगवान् ने अपने चित्त मे परम
प्रसन्न होकर उसको परम श्रेष्ठ ऐश्वर्य प्रदान किया था ॥१७० १७१।।
उसके पश्चात् उसके कोटिश वशो के सहित श्रेष्ठ मुक्ति प्रदान की थी।
अतएव परम धर्म परायण दैत्यराज I मुझको केवल तीन पद पृथ्वी
दीजिये ॥१७२।। उस भूमि पर स्थित होकर मैं अपनी मुक्ति प्राप्त करने
के लिए तपस्या करूंगा। तब उसी समय में विरोचन के पुत्र राजा
बलि ने उन ब्रह्मचारी वामन देव का पृथ्वी का दान प्रदान करने के
लिये जल स परिपूर्ण कलश या करुआ उठाया था। इधर सर्व व्यापक
भगवान ने समझ लिया था कि दैत्य गुरु शुक्राचार्य इस पाए की जल
२३८
[ नारद पुराण
की धारा को रोकने के लिए उसमे प्रविष्ट होकर मध्य में स्थित हो गये
है । अतएव भगवान ने अपने हाथ के अग्रभाग को उस करए की टोटी
मे प्रविष्ट कर दिया था। यहां पर जो कुशा वा अग्रभाग या वह सूर्य
की कान्ति के समान महाशस्त्र बनाया था ।।१७३-१७५।।
अमोघ ब्राह्ममत्युग्र काव्याक्षिग्रासलोलुपम् ।
आयाय भार्गव सुरानसुरानेक चक्षुपा ।।१७६
पश्येति वादिदेशे च दर्भाग्न शस्त्रसन्निभम् ।
वलिर्ददौ महाविष्णोर्मही विपदसमिताम् ॥१७७
ववृधे सोऽपि विश्वात्मा आब्रह्मभुवन तदा।
अमिमीत महीद्वाभ्या पद्भया विश्वतनुहरि ॥१७८
स आब्रह्मकटाहातपदान्येतानि सप्रभ ।
पादागुष्ठाग्रनिभिन्न ब्रह्माण्ड विभिदे द्विधा ।।१७६
तद्द्वारा वाह्यसलिल बहुधार समागतम् ।
धौतविष्णुपद तोय निर्मल लोकपावनम् ॥१८०
आजाण्डवाह्यनिलय धारारूपमवर्त्तत।
तज्जल पावन श्रेष्ठ ब्रह्मादोन्पावयत्सुरान् ॥१८१
सप्तपिसेवित चैव न्यपतन्मेरुमूर्द्धनि ॥१८२
उस समय मे शुक्राचार्य के नेत्र को फोडने के लिये उत्साही
अमोघ अस्त्र का काम किया था और शुक्राचाय के नेत्र से काने हो गये
थे और सव असुरो के समक्ष वे कहने लगे थे--अरे । इस कुशा के अग्र
भाग को देखो जिसने शस्त्र के समान कर्म किया है। इधर राजा
वनि व मन देव को तीन पैर पृथ्व। का दान करने मे तत्पर हो गया
था ।।१७६ १७७॥ उसी ममय म विश्वात्मा भगवान् हरि जिनका यह
सम्पूण विश्व ही शरीर है बढने लग गये थे और भूमि वो नापने के
लिए उद्यत होकर दा पग से समस्त पृथ्वी को नाप डाला था ॥१७८।।
फिर उनका उठाया हुना तीसरा वदम जव बढा तो वह ब्रह्माण्ड व टाह
नारद पुराण ] अग्रभाग की पर्यन पहुंच गया था। उस समय मे उनके चरणागुष्ट के ठोकर से कटकर उस ब्रह्माण्ड के दो टुकडे हो गय थे ॥१७६।। उसी छिद्र से भगवान् विष्णु के चरण के धुलने से परम निर्मल लोको को पावन अनेक धाराओ वाला जल बाहिर की ओर निकलने लगा था ॥१८०। यह पवित्र कर देने वाला परम श्रेष्ठ जल ब्रह्मादिक सब देव- गणो को पवित्र कर ब्रह्माण्ड से वाहिर की आर निकल आया था और सप्तपियो के द्वारा सेवित होकर मेरू पर्वत वे शिखर पर पहुँच गया धा॥१८१-१८२॥ एतद् दृष्ट्वाद्भुत कर्म ब्रह्माद्या देवतागण । ऋपयो मनवश्चैव वस्तुवन्हर्पविह्वला ॥१८३ नम परेशाय परात्मरूपिगे परात्परायापररुपधारिणे । ब्रह्मात्मने ब्रह्मरतात्मबुद्धये नमोऽस्तुतेऽन्याहतकर्मशीलिन।१८४ परेश परमानन्द परमात्मन्परात्पर । सर्वात्मने जगन्मूर्ते प्रमाणातीत ते नम ॥१८५ विश्वतश्चक्षुपे तुभ्य विश्वतो वाहवे नम । विश्वता शिरसे चैव विश्वतो गतये नम ॥१८६ एव स्तुतो महाविष्णुबहाद्यं स्वद्दिवौकसाम् । दत्वामय च मुमुदे दवदेव सनातन ।।१८७ विरोचनात्मज दैत्य पदैवार्य ववन्ध ह । तत प्रपन्न तु बलि ज्ञात्वा चास्मै रसातलम् । ददौ तद् द्वारपालश्च भक्तपश्यो वभूव ह ॥१८८ रसातले महाविष्णुविरोचनमुतस्य वै । गि भोज्य पल्पयामास घारे सर्पभयाकुले ॥१८६ दम परमादा कार्य को देखकर ब्रह्मा आदिव देवना पापियो की समुदाय और मनु बादि गव बहुत ही पं ये गाय आपन विय हेर वामनदेव भगवान की राति बसाये ||१३|| देवगण न २४० [ नारद पुराण कहा-हे परमेश्वर परमात्मन् ! आप तो पर से भी पर हैं । आप समय पर सगुण स्वरूप धारण करने वाले हैं । आप ग्रहात्मय ब्रह्म में परा- यण आत्म बुद्धि के रूप है तथा अव्याहत वर्मों के करने वाले हैं। आप के चरणो मे हम सबका सादर प्रणाम समपिन है ॥१८॥ हे परमेश्वर परमानद स्वरूप परापर परमात्मन् । समस्त प्रमाणो से अतीत ! हे जग-मूर्ति । थाप सर्वात्मक हैं आपके लिए हमारा प्रणाम है ॥१८॥ सबके नेयो म आप व्यापक हैं और सर्वन आपकी ही भुजाऐ है -सब आपके ही शिष्य हैं और आपकी सर्वत्र गति है ऐसे आपकी सेवा मे मेरा सादर प्रणाम अपित है ॥१८६।। जिस समय में ब्रह्मादिक देवो ने इस प्रकार से भगवान् का सस्तवन किया तो उन परम सनातन देवो के भी देवेश्वर ने देवताओ को स्वर्ग प्रदान करके सबको भय से रहित कर दिया था और उस समय मे उनको परम प्रसन्नता हुई थी ॥१७॥ और एष पग पृथ्वी के लिये उस बलि को बांध दिया था किन्तु पीछ बलि को शरण मे समागत हुआ समझकर उसको रसातल का राज्य प्रदान कर दिया था और स्वय उसके द्वारपाल बन कर रहने लो थे । भगवान अपने भक्त के वश मे होकर इस तरह से निवास करने लगे थे ॥१८८|| श्री नारद जी ने कहा था कि सर्पो के महान् भय से घबड़ा देने वाले उस परम भीषण रसातल मे भगवान् विष्णु ने वलि के भोजन के लिए क्या नियत किया था ॥१८६। अमन्त्रित हविर्यत्तु हूयते जातवेदसि । अपात्रे दीयते यच्च तद्घोर भोगसाधनम् ।।१६० हुत हविरशुचिना दित्त सत्कम यत्कृतम् । तत्सर्व तत्र भोगाहमध पातफलप्रदम् ।।१६१ एव रसातल विष्णुबलये सासुराय तु । दत्त्वामय च सर्वेषा सुराणा विदिव ददौ ॥१६२ पूज्यमानोऽमरगणे स्तूयमानो महर्षिभि ।
२४१ नारद पुराण गन्धर्वर्गीयमानश्च पुनर्वामनतां गतः ॥१६३ एतद् दृष्ट्वा महत्कर्म मुनयो ब्रह्मवादिन. । परस्पर स्मितमुखा. प्रणेमुः पुरुषोत्तमम् ।।१६४ सर्वभूतात्मको विष्णुर्वामनत्वमुपागतः । मोहियन्निखिल लोक प्रपेदे तपसे वनम् ॥१६५ एव प्रभावा सा देवी गङ्गा विष्णुपदोद्भवा । यस्या. स्मरणमात्रेण मुच्यये सर्वपातकैः ।।१६६ इद तु गङ्गामाहात्म्य य: पठेच्छणुयादपि । 'देवालये नदीतीरे सोऽश्वमेधफल लभेत् ॥१६७ श्री सनक महामुनि ने कहा-जो बिना ही मन्त्र के उच्चारण किये अग्नि में हवि का होम किया जाता है और जो दान किसी अपात्र को दिया जाता है वह अत्यन्त घोर अन्न वलि का भोग हुआ करता है ॥१६०॥ जिस हवि का अपवित्र दशा मे रहते हुए श्वसन किया जाया करता है तथा दान दिया जाता है या केई भी सत्कर्म किया जाता है वह नीचे गिर कर देवी को प्राप्त न होकर वलि असुर को ही प्राप्त हुआ करता है ।।१६१॥ इस भांति समस्त अगुर गणो के सहित वलि को रसातल प्रदान किया था और सब देवो को अभय का दान प्रदान कर उनको स्वर्ग का राज्य एव सव वैभव प्रदान किया था ॥१६२॥ उस समय मे सभी देवगण भगवान् विष्णु देव का यजन करने लग गये थे। महर्षि गण स्तवन करने में परायण हो गये तथा गन्धर्व गान करने लगे थे। इसके पश्चात् भगवान् विष्णु अपना वह विशाल वपु समेट कर पुन वामन रूप हो गये थे ।।१६३।। इस बहुत ही भारी कार्य को देख कर ब्रह्मवादी मुनिगणो ने परम्पर में मुम्करावर पुरपोत्तम भगवान वामन देव को सादर प्रणाम दिया था ||१६४॥ इस रीति से सर्वात्मक विष्णु भगवान ने रूप धारण कर सब ससार वो मुग्ध करके भारा मे तपस्या परने के लिये वे वन में चले गये 4 m६॥ भगवान् विष्णु २४२ [ नारद पुराण के चरण कमल से प्रादुर्भूत हुई गगा देवी का ऐसा प्रभाव है कि इसका स्मरण करने मात्र मे ही प्राणी यहा पर मभी प्रकार के महान् पापो से छूट जाया करता है ।।१६६॥ इस गङ्गा भागीरथी देवी का माहात्म्य जो पुरुप किसी देवालय में अथवा पवित्र नदी के तौर पर बैठकर पढता है उसको अश्वमेघ यज्ञ करने का पुण्यफल प्राप्त हुआ करता है ॥१६७॥ तहान ॥ इष्टापूर्त फल एवं वीरभद्र नृप चरित्र । श्रुतं तु गङ्गामाहात्म्य वाञ्छितं पापनाशनम् । अधुना लक्षण ब्रूहि भ्रातमें दानपानये ॥१ सर्वेपामेव वर्णाना ब्राह्मण, परमो गुरुः । तस्मै दानानि देयानि दत्तस्यानन्त्यमिच्छता ॥२ ब्राह्मण. प्रतिगृह्णीयात्सर्वतो भयवजितः । न कदापि क्ष त्यविशो गृह्णीयाता प्रतिग्रहम् ।।३ चण्डस्य पुयहीनस्य दम्भाचाररतस्य च । स्वकर्मत्या गिनश्चापि दत्त भवति निष्फलम् ।।४ परदारातस्यापि परद्रव्याभिलापिणः। नक्षत्रसूचकस्यापि दत्त भवति निष्फलम् ॥५ असूयाविष्टमनस कृतघ्नस्य च मायिन. । अयाज्ययाजकस्यापि दत्त० ॥६ नित्य याच्चापरस्यापि हिंसकस्य खलस्य च । रसविऋयिणश्चैव दत्त ०७ देवापि श्री नारदजी ने कहा कि मैं स्वय पापो के विनाश करने वाले गङ्गाजी के माहात्म्य का श्रवण करना ही चाहता था जो अब मैंने आपके अनुग्रह से श्रवण कर लिया है। है भाई ! अब मेरा यह नारद पुराण ] २४३ मे सदा ही असूया निवेदन है कि आप कृपा करके दान का तथा दान देने के लिए समुचित सत्पान वा लक्षण बताइये ॥११॥ तव महा मुनि श्री सनकजी ने कहा- ब्राह्मण सब वर्षों में श्रेष्ठ और सबका बडा गुरु होता है। अतएव जो मनुष्य दान मे दी हुई वस्तु को अनन्त और अक्षय स्प मे प्राप्त करते का अमिलापी है उसे चाहिये ब्राह्मण वो ही दान देवे ।।२॥ कर्मिष्ठ ब्राह्मण भय से रहित होकर सभी वर्गों से दान ग्रहण कर सकता है परन्तु क्षत्रिय और वैश्य को कभी भी दान का ग्रहण नहीं करना चाहिए ॥३॥ यदि दान का ग्रहण करने वाला ब्राह्मण क्रोधी पुत्र होन-दम्य परने वाला अपने उचित कर्तव्य कर्मों वो गाग देने वाला हो तो ऐसे ब्राह्मण को दिया हुआ दान निष्फल ही हुआ करता है ॥॥ जो पराई स्त्री के साथ गमन करने वाला हो तथा दूसरो के द्रव्य को झपट कर ग्रहण करने की इच्छा रखता हो एव नक्षत्र सूचक ज्योतिषी हो उसको दान देना निष्फल हुआ करता है 111 जिसके भरी रहा करती है-जो दिये हुये उपकार को न मानने वाला कृतघ्न होता है जो मायावी एव अपात्र को यज्ञो का यजन कराया करता है ऐमे ब्राह्मण को दान देना भी सर्वथा निप्पल हुआ करता है ॥६॥ जो सर्वदा ही याचना किया करता हो, हिंसावृत्ति वाला हो, अत्यन्त खल कर्म करने वाला हो उसका दिया हुआ दान कभी भी कुछ पल नहीं दिया करता है ॥७॥ वेदविक्रयिणश्चापि स्मृतिविनायिणस्तथा। धर्मविक्रयिणो विप्र दत्त० ॥८ गानेन जीविका यस्य यस्य भार्या च पुश्चली। परोपतापिनश्चापि दत्त भवति निष्फलम् ।।६ असिजीवी मपीजीवी देवलो ग्रामयाजक । धावको वा भवेत्तेपा दत्त भवति निप्पलम् ।।१० पाक्कतु परस्यायें कवये गदहारिणे।
२४४ [ नारद पुराण अभक्ष्यभक्षकस्यापि दत्त ॥११ शूद्रान्नभोजिनश्चैव शूद्राणा शवदाहिनः । पोश्चलान्नभुजश्चापि दत्त भवति० ॥१२ नामविक्रयिणो विष्णो. सध्याकम्मोज्ज्ञितस्य च । दुप्प्रतिग्रहदग्धस्य दत्त ।।१३ दिवाशयनशीलस्य तथा मैथुनकारिणः । सध्याभोजिन एवापि दत्त भवति० ॥१४ जो वेद-म्मृति और अपने धर्म का विक्रय किया करता है उस ब्राह्मण को भी कभी दान नहीं देना चाहिए क्योंकि वह दान निष्फल ही होता है ॥८॥ जो विद्या के बल से ही अपनी आजीविका चलाया करता है, जिसकी स्त्री व्यभिचार करने वाली होती है, जो दूसरो को सदा सन्ताप दिया करता है उस ब्राह्मण को भी दान देना सर्वथा व्यर्थ ही होता है ॥६॥ जो नलवार से तथा स्याही से अपनी जीविका का परिचालन किया करता है, जो वेतन ग्रहण करके देवो का यजन किया करता है, जो ग्राम याजक एव हरकारे का कर्म करता है ॥१०॥ जो भगवान के निमित्त रसोई न बनाकर दूसरो के लिए रसोई मे पाचन कर्म किया करता है अर्थात भगवान् का भोग नही लगाता है, जो दान ग्रहण करने के लिए चतुराई प्रकट किया करता है, जो दया से रहित होता है, जो वैद्य वृत्ति क्रिया करता है और जो अभक्ष्य पदार्थो को भोजन किया करता है उस ब्राह्मण को भी वभी दान नहीं देना चाहिए क्योकि उसका कोई भी फल नही हुआ करता है ।।११।। जा शूद्रो का अन्न खाया करता है। उमको दिया हुआ दान कुछ भी प्रभाव नही रखता है, जो शूद्रो के मुर्दो को जलाता है, जो पुश्चती स्त्री के पति का अन्न खाता है उसको दिया हुआ दान भी व्यर्थ ही होता है ॥१२॥ जो स्वय भक्ति-श्रता के भाव से न कर धन की प्राप्न के लिए ही भगवान विष्णु का पूजन किया करता है, जो साध्या वादन नहीं करता है और नारद पुराण ] २४५ जो दुष्प्रतिग्रह से दान ले चुका है ऐसे ब्राह्मण को दिया दान कुछ भी अपना प्रभाव नहीं रखा करता है ।।१३।। जो ग्रीष्म ऋतु के अतिरिक्त अन्य ऋतु में भी दिन मे मोता है, जो दिन के समय में मथुन किया करता है, जो सन्ध्या के समय मे भोजन करता है ऐसे ब्राह्मण को दिया हुआ दान कभी भी सफल नही हुआ करता है ॥१४॥ महापातकयुक्तस्य त्यक्तस्य ज्ञातिवान्धव.। कुण्डस्य चापि गोलस्य दत्त भवति ॥१५ परिवित शठस्यापि परिवेत : प्रमादिन. । स्त्रोजितस्यातिदुष्टस्य दत्त भवति० ॥१६ मद्यमासाशिनचापि स्त्रीविटस्यातिलोभिनः । चौरस्य पिशुनस्यापि दत्त ० ।।१७ ये मोरित्यापारिरता लिन्दिता सुनने सदा । न तेभ्य प्रतिगृह्णीयान्न च दद्याद् द्विजोत्तम । सत्कर्मनिरतायापि देय यत्नेन नारद ।।१८ यद्दान श्रद्धया दत्त तथा विष्णुसमर्पणम् । याचित्त वापि पारेण भवेत्तदानमुत्तमम् ॥१६ परलोक समुद्दिश्य देहिक वापि नारद । यहान दीयते पाये तत्काम्य मध्यम स्मृतम् ॥२० दम्भेन चापि हिंसायं परस्याविधिनापि च । कद्धनाश्रद्धयापारे तद्दान मध्यम स्मृतम् ॥२१ जो गुरु पन्नी गमन मे महापापा मे दूपिन रहा करता है, जो जाति और याधुगण के द्वारा स्याम्प पिया हुआ है, जो पनि ये जीवित रहते हुए रिमी गार के वीर्य से समुत्पन्न हुना हा अर्या। मुण्ड हो, जो पोनर मनापाना हो उग प्राह्मण या दिरा हुमा दाा मी पर वाला नहीं हुआ करता है ॥१५॥ यो वहिन का किराह न होने पर छोटी महिला के साथ विवाह पर सपनी पत्नी पना सेन वाला, हे माईया [ नारद मोह विवाह न होने पर पहिने अपना विवाह कर लेने वाला, शठता रखने वाला, प्रमादशील और जो दुष्ट प्रकृति का तथा स्त्रीजित जो ग्राह्मण होता है उसयो भी कभी दान नहीं देना चाहिए क्योकि ऐसे विप्र को दिया हुआ सब दान निप्पल ही हो जाया करता है ॥१६॥ मदिरा पान बरने वाले, मास वा अशन करने वाले और स्त्री के द्वारा की गयी कमाई को खग्ने वाले, अत्यन्त लालची, चोर वृत्ति वाले एव चुगली खाने के स्वभान वाने विप्र को दिया हुआ दान भी विपल हुआ करता है अत ऐसे ब्राह्मणों को सूब परखकर ही दान देना चाहिए ।।१७।। जिन पापो म डूबे रहने वाले लोगो की सज्जन पुरुप नि दा किया करते हो । हे द्विजवर । ऐसे विप्रो को भी सभी दान न देवे और ऐस विनों से दान लेना भी नहीं चाहिए। हे नारद । जो सदा सत्वर्मों के अनु- प्ठान में ही प्रवृत्ति रखा करते हैं उन्ही को प्रबत प्रयत्न करके दान देना चाहिए ।।१८। जो दान के पात्र के द्वारा याचना करने पर भगवदर्पण की भावना से परम श्रद्धा से साथ दान दिया जाया करता है वह ही परमोत्तम दान कहा जाता है और उसी का पुण्य फल भी ययावत् प्राप्त होता है । वैसे ही कुछ किसी को दे देने का नाम दान नही हुआ करता है ॥१६॥ हे नारद । ऐडतोकिक और पारलौकिक किसी भी सुख- सौभाग्य के प्राप्त करने की इच्छा से जो दान उचित पात्र को दिया जाता है वह मध्यम श्रेणी का दान कहा जाता है क्योकि इसमे अपनी कामना पहिले ही से लिये हुए होती है ।।२०।। जो दान दम्भपूर्वक शत्रु की हिंसा के उद्देश्य से विधि विहीन रीति से क्रोधावेश मे भरकर अश्रद्धापूर्वक किसी अपात्र को दान किया जाया करता है वह निकृष्ट श्रेणी का दान होता है ।।२१।। अधम वलितोपाय मध्यम स्वार्थसिद्धये । उत्तम हरिप्रीत्यर्थ प्राहुर्वेदविदा वरा ।।२२ दानभोगविनाशाश्च राय स्युर्गतयस्त्रिधा।
नारद पुराण ]
२१७
यो ददाति च नो भुक्ते तद्धन नाशकारणम् ॥२३
धन धर्मफल विप्न धर्मो माधवतुष्टिकृत् ॥२४
तरव किं न जीवन्ति तेपिलोने परार्थका ।
या मूलफलवृक्षा परकार्य प्रकुर्वते ।।२५
मनुप्या यदि निप्राथ न परास्तिदा मृता ।
परमार्य न ये मां पायेनापि धनेन वा ॥२६
मनमा वचसा वापि ते जेश पापतमा ।
अप्रैनिहाम वक्ष्यामि शृणु नारद तत्वत ॥२७
या दानादियाना तु लक्षण परिकीर्तितम् ।
गङ्गामाहात्म्यसहित मर्वपापप्रणाशनम् ॥२८
परम मे वो राना माग पहा बरत हैं अधम दान
चति मन्तुष्ट होत है, स्वार्थ को मिदिर लिए जा भी भुछ दान दिया
जाता है वह मध्यम है तथा उत्तम दान में भगवान प्रसन्न हुआ परन
है ॥२२॥ गगार म जिस धन क प्राप्त परन की बहुधा गभी का
सालगा रहा पानी है उग धन को दान, भाग और विनाग तीन
हो गनिया हुआ करती है । जो सर्वोत्तम गति धन का दान होग
उगदान भी नहीं पता है और न स्वप ही उमा उपभाग
रिया परसा है उम धन की प्रतिमा पनि विनाम हो होनी है। पाह
पार पुरा मये १ ह मिमी ऐनमा म यह पट जार ना मला युग
तरगदुराग एप अपभ्यय परक मीमही पिनर दिया परता
है ॥२॥हवित्र धना वानपिन पर धम करना हीराना है
और थम यही है समान भाराम व यशनमी प्रसन्नता प्राप्त
THAगिजामाता है। इन जागा जीवन भी
गगार मदारे मिरा भी निरा है। जय
पमहाना भी पून, र धारा और पाछ
के द्वारा पET fruar1 और गाना हो कि
२४९ [ नारद पुराण उत्पन्न होकर जीवन व्यतीत क्यिा करते हैं ॥२४॥२५॥ तो हे विप्र- श्रेष्ठ । ये मनुष्य जो सब कुछ ज्ञान रखने वाले होते हुए भी दूसरो के काम मे कुछ भी नहीं आया करते हैं और दूसरो का कार्य कभी सिद्ध नहीं करते हैं तो उनके जीवन रहते हुए भी वे मृत के ही समान होते हैं । जो मनुष्य तन, मन, वचन, धन किसी के द्वारा भी दूमरो की भलाई नहीं किया करते हैं उन को इस ससार में महान घोर पापी ही समझना चाहिए । हे नारद । इस विषय की पुष्टि के लिये आपको मैं एक ऐतिहासिक घटना को चर्चा करता हूँ। आप इसको परम समा- हित होकर श्रवण करिए ॥२६-२७।। इस वर्णन मे दानो के विविध भेदो का वर्णन है और समस्त प्रकार के महापातको को विनष्ट कर देने वाला श्री गङ्गा की महिमा का भी वर्णन है ।।२८ भागीरथस्य धर्मस्य सवाद पुण्यकारणम् । आसीद्भगीरथो राजा सगरान्वयसभवः ॥२६ शशास पृथिवीमेता सप्तद्वीपा ससागराम् । सर्वधर्मरतो नित्यं सत्यसंध. प्रतापवान् ॥३ कन्दर्पसदृशो रूपे याय को विचक्षण। प्रालेयाद्रिसमो धैर्य धर्म धर्मसमो नृपः ॥३१ सर्वलक्षणसंपन्नः सर्वशास्त्रार्थपारगः । सर्वसपत्समायुक्त सर्वानन्दकरो मुने ।।३२ आतिथ्यप्रयतो नित्यं वासुदेवार्चने रतः । पराक्रमी गुणनिधिमंत्रः कारुणिक: सुधीः ।।३३ एतादृश त राजान ज्ञात्वा हृष्टो भगीरथम् । धर्मराजो द्विजश्रेष्ठ कदाचिद् द्रप्टुमागतः ॥३४ समागत धर्मराजमहंयामास भूपतिः । शास्त्रदृष्टन विधिना धर्म. प्रीत उवाच तम् ॥३५ इस चर्चा में धर्मराज राजा भागीरय का भी परम पुण्यप्रद सम्वाद भी माता है । यह राजा भगीरय महाराज सगर में वश नारद पुराण ] २४६ मे ही समुत्पन्न हुए थे ॥२६॥ राजा भगीरय ने सातो द्वीप और सातो समुद्र तक की भूमि पर अपना शासन क्यिा था । वे धर्म के सभी अङ्गो का पूर्णतया परिपालन करने वाले और सर्वदा सत्य प्रतिज्ञा करने वाले तथा महान प्रतापी हुए थे ।।३०सुन्दरता में वे कामदेव के समान परम सुन्दर रूपवान हुये थे। वे विलक्षण यज्ञो का यजन बारम्बार किया करते थे। राजा भगीरथ धैर्य में हिमालय के सदृश और धर्म कर्मो में साक्षात् धर्मराज के ही तुल्य घे ॥३१॥ हे मुनिवर । वह राजा भगीरथ सभी सु-दर लक्षणो से शोभा सम्पन्न समस्त शास्त्रो के तात्पर्य को भलीभांति समझने वाले सभी तरह की सम्पत्ति के वैभव से भरे पूरे और सबको सर्वदा आनन्दानन्द प्रदान करने वाले हुए थे ॥३२॥ वे सदा समागत हुए अतिथियों का स्वागत सत्कार करने वाले तथा भगवान वासुदेव के अचंन मे सदा परायण रहने वाले थे । वे परम पराक्रमशील, सपल सद्गुणो के निधान, अतिशय करणा करने वाले तथा मंत्री करने के योग्य और सद्बुद्धि से सुसम्पन्न थे ॥३३॥ हे द्विज श्रेष्ठ । जव राजा की इस प्रकार की प्रशस' का श्रवण किया तो धर्मराज अधिक प्रसन्न हुये और एक बार वे स्वय ही इनका दर्शन करने के लिये वहां पर चले आये थे ॥३४॥ श्रीमान धर्मराज के वहां पर पदाणि करने पर राजा भगीरथ ने उनका शास्त्रोक्त विधि विधान से स्वागत एव अतिथि सत्कार किया था। उस समय मे परम प्रसन्न होकर उनसे कहा था ॥३५ राजधर्मविदा श्रेष्ठ प्रसिद्धोऽसि जगत्तये । धर्मराजोऽथ कीर्ति ते थ त्वा त्वा द्रष्टुमागत ॥३६ सन्मार्गनिरत सत्य सर्वभूतहिते रतम् । द्रष्टुमिच्छन्ति विबुधास्तवोत्कृष्टगुणप्रिया.॥३७ कीर्तिनीतिश्च सपत्तिर्वर्तते यत्र भूपते ! वसन्ति तत्र नियत गुणास्सन्तश्च देवता, ॥३८ २५० [ नारद पुराण अहो राजन्महाभाग शोभन चरितं तव । सर्वभूतहितत्वादि मादृशामपि दुर्लभम् ॥३६ इत्युक्तवन्त धर्म प्रणिपत्य भगीरथ :। प्रोवाच विनयाविष्टः सहृष्ट. श्लाक्ष्णया गिरा ॥४० भगवन्सर्वधर्मज्ञ समदर्शिन् सुरेश्वर । कृपया परयाविष्टो यत्पृच्छामि वदस्व तत् ॥४१ धर्मा कीदृग्विधाः प्रोक्ताः के लोका धर्मशालिनाम् । कियत्यो यातना. प्रोक्ताः केपा ता. परिकीर्तिता. ॥४२ धर्मराज ने उनसे कहा- हे धर्म के ज्ञान रखने वालो मे परम श्रेष्ठ राजन । आपका सुयश लोक्य मे प्रथिन है अतएव मुझको भी आपकी विशद कीत्ति को सुन समझकर मनमे प्रबल इच्छा उत्पन्न हुई थी कि मैं आपके एक वार स्वय चल कर दर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य लू और आपके परम श्रेष्ठ गुणो से समाकृष्ट होकर ही मैं आपके समीप मे पाया हूँ। आपके सद्गुण ही ऐसे है कि सभी देव- गण आपके दर्शन करने को उत्सुक्ता रखा करते है क्योकि आप सन्मार्ग परायण, सदा सत्य भापण करने वाले और समस्त प्राणियो के हित में संलग्न रहने वाले महानुभाव हैं ।।३६-३७॥ हे राजन! यह सर्वाधिक नियम ही होता है कि जहा पर नोति, कोत्ति और सम्पत्ति हुआ करती है वहा पर सभी सद्गुण, सज्जन पुरुष और देव वृन्द भी स्वय ही पिचे चले आया करते हैं ।।३८॥ हे महाभाग ! आपका चरित्र परम शोभन है । आपके हृदय में जो प्राणीमात्र के हितो या सम्पादन करने आदि के जो अद्भुत गुण विद्यमान हैं वे हम लोगो में भी पटिनाई से होते हैं ॥३६॥ जब धर्मराज ने इस तरह में प्रशसा की थी तो राजा भगीरप ने उनको प्रणाम दिया और अत्यधिक प्रसन्न होकर विनय के साप मपुर वाणी से निवेदन किया था 11४०॥ राजा भगीरथ ने कहा-हे सवं धमों के माता । याप तो ममदर्शी है
नारद पुराण ]
२५१
और सुरेश्वर हैं। मैं इस समय मैं जो पूछना चाहता हूँ उसके विषय
मे आप कुछ वर्णन करने की कृपा कौजिये । आपका मुझ पर परम
अनुग्रह होगा ॥४१॥ धर्मों का स्वरूप क्या-क्या है ? धर्म कर्मों के
करने वाले पुरुषो को कौन-कौन से लोको का निवास प्राप्त हुआ
करता है ? नरको की यातनाये कितनी हैं ? वे नारकीय यातनाये
किनको भोगनी पड़ती हैं ? ।।४२
त्वया संमाननीया ये शासनीयाश्च ये यथा ।
तत्सर्व मे महाभाग विस्तराद्वक्त महमि ।।४३
साधु साधु महायुद्ध मतिस्ते विमलोजिता।
धर्माधर्मात्प्रवक्ष्यामि तत्त्वत शृणु भक्तितः ॥४४
धर्मा वहुविधा प्रोक्ता पुण्यलोकप्रदायकाः ।
तथैव यातना प्रोक्ता असख्या धोरदर्शनाः ।।४५
विस्तराद्गदितु नालमपि वर्पशतायुतं ।
तस्मात्समासतो वक्ष्ये धर्माधर्मनिदर्शनम् ॥४६
वृत्तिदान द्विजाना वै महापुण्य प्रकीतितम् ।
तथैवाध्यात्मविदुपो दत्त भवति चाक्षयम् ॥४७
कुटुम्विन वा शास्त्रज्ञ श्रोत्रिय वा गुणान्वितम् ।
यो दत्त्वा स्थापयेद्वृत्ति तस्य पुण्यफल शृणु ॥४८
मातृत पितृतश्चैव द्विजः कोटिकुलान्वितः ।
निर्विश्य विष्णुभवन कल्प तत्रैव मोदते ॥४६
हे महाभाग । थाप विन प्राणियो का सत्कार किया करते है
और कौन से लोगो को दण्ड दिया करते हैं ? अब आप कृपा करके
इन सब बातो का मेरे समक्ष मे विस्तृत वर्णन कीजिये ।। ४३ ।।
इस प्रकार से राजा भगीरथ के द्वारा जिज्ञासा करने पर धर्मराज ने
कहा-हे महान वुद्धि वाले राजन बहुत ही अच्छे २ मापने प्रश्न
किये हैं। आपको बुद्धि बहुत ही विमल एवं उदार है। मैं आपके
२५२ [ नारद पुराण प्रश्नो का समुचित उत्तर निवेदित करता हुआ इस समय मे सभी धर्मों और अधर्मों के विषय मे वर्णन करता हूँ आप भक्ति पूर्वक उन परम तात्विक बातो का श्रवण कीजिये ॥४४॥ शास्त्रो में पुण्य लोको को प्रदान कराने वाले बहुत से कर्मों का वर्णन किया गया है और उसी भांति महान भीपण दिखाने वाली विविध नरयो की यातनाओ का भी वर्णन किया गया है ।।४५।। यदि इन सवका शास्त्रो के अनु- सार विस्तृत वर्णन किया जावे तो दश लाख वर्षों में भी नहीं किया जा सकता है अतएव आपके प्रश्नो के अनुसार मे यहाँ पर आपके सामने परम मक्षेप से धर्माधर्म का दिग्दर्शन कराता हूँ ।।४६।। ब्राह्मणो के लिए वृत्ति का वाधना परम पुण्यप्रद कार्य है और जो किसी अध्यात्मवादी को दान दिया जाता है वह अक्षय हुआ करता है ॥४७॥ किसी कुटुम्न परिवार वाले पुरुप की,, शास्त्रो के ज्ञाता, गुणगण सम्पन्न श्रोत्रिय की जो वृत्ति बांधता है उसका जो पुण्य-पल होता है उसका थवण आप करिये ॥४८।। वह ब्राह्मण अपने पितृकुल और मातृकुल की करोडो पीढियो को विष्णु लोक में प्रविष्ट कराकर वहाँ पर एक कल्प पर्यन्त आनन्द का लाभ लिया करता है ।।४६ गण्यन्ते पासवो भूमेर्गण्यते वृष्टिविन्दव । न गण्यन्ते विधातापि ब्रह्मवृत्तिफलानि वै ॥५० ससस्तदेवतारूपो ब्राह्मण परिकीर्तित । जीवन ददतस्तस्य क पुण्य गदितु क्षम ॥५१ यो विप्रहिनवृन्नित्य स सर्वाकृतवान्मखान् । स स्नात सर्वतीर्थेपु तप्त तेनाखिल तप ॥५२ यो ददस्वेति विप्राणा जीवन प्रेरयेत्परम् । सोऽपि तत्फतमाप्नोति किमन्यबहुभापितं ॥५३ तडाग कारयेद्यस्तु स्वयमेवापरेण वा । वक्त तत्पुण्यसख्यान नालह वर्षशतायुपा।। ५४ नारद पुराण ] २५३ एकश्चेदध्वगो राजस्तडागस्य जल पिवेत् । तत्कतुं सर्वपापानि नैश्यन्त्येव न सशय ॥५५ एकाहमपि यत्कुर्याद्भू मिस्थमुदक नर । स मुक्त सर्वपापेभ्य शतवपं वसेदिवि ॥५६ धूल के कण और वर्षा की वूद भी किसी प्रकार से गिनी जा सकती है जिनकी गणना करना निता त असम्भव होता है अय की तो बात ही क्या है यदि विधाता भी चाहे तो उस ब्रह्मावृत्ति प्रदान करन वाला के पुण्य फ्लो की गणना नहीं कर सकत हैं ॥५॥ ब्राह्मण सभी देवो का स्वरूप होता है। उसकी जो जीविका बांध देता है उसके महान पुण्य फल के विषय में किसकी शक्ति है जो उनका वणन कर सके ॥५१॥ निरन्तर विप्रो के लिय हितप्रद काय किया करता है उसको तो यो समयना चाहिये कि उसने समरत यज्ञो का यजन कर लिया है समस्त तीयों में उसने अवगाहन कर लिया है और सभी प्रकार की तपश्चर्या भी बह पूण कर चुका है ।। ५२ ।। जो पाणी दूसरे लोगो को ब्राह्मणो की आजीविका बांधने के लिये प्रेरित किया करता है उसको भी यही पुण्य फल प्रदान किया जा सकता है ।।५३।। जो स्वय किसी तालाब आदि जलाशय का निर्माण कराता है या करता है उसका इतना अधिक पुण्य होता है कि उसकी गणना मो वष की पूरी लम्बी आयु मे भी नहीं की जा सकती है ॥५४॥ है राजन् । यदि कोई एक पथिक भी उस तालाब मे स जलपान कर लेता है तो उस तालाव के निर्माण करने वाले के सभी पापो का विनाश हो जाया करना है ॥५५॥ जा बोइ मनुष्य एक दिन के नायक भी जल उस तालाब में कर दिया करता है यह सम्पूण पापो स छुटकारा पाकर सौ वष तक स्वग मे निवास किया करता है ॥५६ जन्तु तडाग यो मत्य साह्यक शक्तितो भवत् । पान करने ५५४ [ नारद पुराण सोऽपि तत्फलमाप्नोति तुष्ट प्रेरक एव च ॥५७ मृद सिद्धार्थमात्रा वा तडागाद्यो वहि क्षिपेत् । तिष्ठत्यब्दशत स्वर्ग विमुक्त पापकोटिभि. ॥५८ देवता यस्य तुप्पन्ति गुरवो वा नृपोतम । तडागपुण्यभाक्स स्यादित्येपा शाश्वती श्रुति ॥५६ इतिहास प्रवक्ष्यामि तवान नृपसत्तम । य श्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशय ॥६० गौडदेशेऽतिविख्यातो राजासीद्वीरभद्रक । महाप्रतापो विद्यावान्सदा विप्रपूजक ॥६१ वेदशास्त्रकुलाचारयुक्तो मित्रविवर्धन । तस्य राज्ञी महाभागा नाम्ना चम्पकमञ्जरी ॥६२ तस्य राज्ञो महामामात्या कृत्याकृत्यविचारणा । धर्माणा धर्मशास्तैस्तु सदा कुर्वन्ति निश्चयम् ॥६३ जो मनुष्य तालाब के निर्माण कराने में अपनी शक्ति के अनुरूप सहायता दिया करता है उसको तथा तालाव के निर्माण के लिये चन्दा आदि करने वाले तथा प्रेरणा देने वाले को भी यही फल प्राप्त हुआ करता है ॥५७॥ जो मनुष्य तालाब के निर्माण होने के समय मे तालाव को मिट्टी को निकाल कर बाहर की ओर फेकता है उसको भी ऐसा पुण्य मिलता है कि वह भी करोडो पापो से मुक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त स्वर्ग मे वारा किया करता है ॥५८॥ हे नृप- श्रेष्ठ । ऐसी एक परम प्राचीन काल से चली आने वाली श्रुति है कि जिस मनुष्य पर गुरु और देवगण परम प्रसन्न हुआ करते हैं उसी को तालाब बनवाने का महान पुण्य प्राप्त हुआ करता है ।।५६॥ हे राजन्। इस विषय में मैं आपको एक ऐतिहासिक घटना का वर्णन करता हूँ उसका श्रवण करने वाला पुरुष भी सम्पूर्ण पापो से मुक्त होजाया करता है ||३०|| गोड देश म वीरभद्र नाम द्वारा ए राजा था जो नारद पुराण ] २५५ महान् प्रतापी, विद्यावान और ब्राह्मणो की पूजा करने वाला परम प्रमिद्ध था ॥६१।। वह राजा वेद शास्य और कुल के उपचारो का पूर्णतया पालन किया करता था तथा अपने मित्रो की वृद्धि करता था। उस राजा की परम भाग्यशालिनी रानी का नाम चम्पक- मजरी था ॥६२॥ उस राजा के जो प्रधान मन्त्री थे वे भी वृत्य. अकृत्य का भली भाति से विचार करने वाले थे। उनका वत्तव्य यही गा कि धर्मशास्त्री के द्वारा ही पूर्णतया निर्णय पिया परते थे ।।६३ प्रायश्चित चिकित्सा च ज्योतिते धर्मनिर्णयम् । विना शास्त्रेण यो यातमाहुब्रह्मघातकम् ॥६४ इति निश्चित्य मनसा मन्वादीरितधर्मकान् । आचार्यभ्य सदा भूप शृणोयि विधिपूर्वकम् ॥६५ न कोऽप्यन्यायवर्ती च तस्य राज्येऽवरोऽपि च । धर्मेण पाल्यमानस्य तस्य देशस्य भूपते ॥६६ जात समत्व स्वर्गस्य सौराज्यम्य शुभावहम् । स चैकदा तु नृपतिमूंगयाया महावने ॥६७ मन्यादिभि परिवृतो वभ्राम मध्यभास्करम् । देवादाग्रेटशून्यस्य ह्यतिथान्तस्य तत्र वं ॥६८ नृपरीतस्य सजात सरमो दर्शन नृप। तत गुप्का तु सरसी दृष्ट वा तत्र व्यचिन्तयत् ॥६६ किमय सरसी शृगे भुव पेन विनिभिता । क्य जल भवेदन येन जीवेदय नृप ॥७० पापीया प्रायश्चित, रागो को चिरित्मा, ज्योतिप और पमं ये विषय में जो बिना मात्र का विचार किये ही सहसा कुछ बोल देना है यह प्रत्य पार ये गमान ही महा पापी होता है ।। ६४ ।। अपने घदय मे इन सभी थानों का भली भौति विचार से ही यह मयंक्षा मनु मादि महपियो द्वारा पित धमों में विषम में रादाही विज्ञान २५६ [नारद पुराण आचार्यों से थषण दिया परता था ॥६॥। उच्च वर्गों की तो बात ही क्या है उसके राज्य में कोई शूद्र भी अधर्म का कार्य नहीं किया करता था। धर्म के साथ परिपालन करते हुए उस राजा के देश में जो स्वराज्य था उसमे और स्वर्ग मे सभी समान ही कल्याणकारी वाते दिखलाई दिया करती थी । एक समय की बात है कि वह वीर- भद्र राजा मृगया के लिये वन मे गया था ॥६६।६७॥ वह मध्यान्ह के समय मे पूरा दिन वन मे अपने मन्त्रियो के साथ मे इधर-उधर भ्रमण करता रहा विन्तु उसे दैवात् उस दिन कोई भी शिकार नही मिली थी। राजा घूमते हुए बहुत ही अधिक थक गया था। इसी बीच मे उसको उस महान् घोर वन मे एक बावडी दिखलाई दी थी। उस वावडी को मनुष्य चारो ओर से घेर कर खड़े हो गये थे। उस समय मे बुद्धिसागर नामक मन्त्री ने उस बावडी को शुष्क देख कर अपने मन मे विचार किया था ॥६८६६॥ यह पर्वत की चोटी पर किमने मिट्टी से एक वावडी का निर्माण कर दिया है । इसमे अब जल किस प्रकार से होवे जिससे इस परम परिधान्त राजा मे जीवन कैसे आवे ॥७० ततो बुद्धि समभवत्खाते तस्या नृपोत्तम । हस्तमात्र ततो गत खात्वा तोयमवाप्तवान् ॥७१ तेन तोयेन पीतेन राज्ञस्तृप्तिरजायत । मन्त्रिणश्चापि भूमोश बुद्धिसागरसज्ञिन ॥७२ स बुद्धिसागरो भूप प्राह थर्मार्थकोविद । राजन्निय पुष्करिणी वर्षाजलवती पुरा ।।७३ अथैना वद्धवप्रा च कर्ता जाता मतिर्मम । तद्भवान्मोदता देव दत्तादाज्ञा च मेजय ।। इति श्रुत्वा वचस्तस्य मन्त्रिणो नृपसत्तम गुमुदेतितरा भूप स्वय मर्तु समुद्यत १७५ नारद पुराण ] तमेव मन्त्रिण तर युयोज शुभकर्मणि । ततो राजाज्ञया सोऽपि बुद्धिसागरको मुदा ॥७६ सरसी सागर कत्तु मुद्यत पुण्यकृत्तम । धनुषा चैव पञ्चाशत्सर्वतो विस्तृतायताम् ।।७७ सरसी वद्धसुशिला चकारागाधश-वराम् । ता विनिर्माय सरसी राज्ञे सर्वं न्यवेदयत् ।।७८ उस समय मैं उसने दवान का मन में विचार किया था और एक हाथ का गड्ढा खोद दिया तो उसमे जल प्राप्त हो गया था ॥७१ हे राजन् । उस जल के पान करने से राजा को तृप्ति हुई थी और बुद्धिसागर नाम वाला मन्त्री भी जल पीकर तृप्त हो गया था ।।७२ उस समय में धार्मिक कार्यो के वरने म परम कुशल उस म जी ने राजा से प्राथना की थी कि हे राजन् । पहिले यह वावडी वपा के ही जल से भरी हुई थी ।७३।। अब इसकी ठीक रचना कराकर सु दर स्वरूप इसका वनवाने का मेरा विचार है। ह देव । यदि मरे इस प्रस्ताव का अनुमोदन करे तो हे निष्पाप । मुझे इस कार्य के सम्पादन करा देने की आज्ञा प्रदान करें ।।७४।। अपन महान् मेधावी मन्त्री की इस वान का श्रवण कर वह श्रेष्ठ शिरोमणि राजा बहुत ही प्रसन हुआ था तथा बावडी की ठीक रचना कराने के कार्य के लिये स्वण भी समुद्यत हो गया था ॥७॥ राजा ने इस परम शुभ काम का सम्पन्न कराने के लिये उसी बुद्धिसागर मत्री को नियुक्ति कर दी थी। इस पुण्य कर्म क करन के लिय परमेच्छुक वुद्धिसागर राजा की आज्ञा पा कर परम प्रसन्न होकर उस बावडी को एक उत्तम सरोवर बावाने के लिय तैयार होगया या । उस मत्री ने फिर वहाँ पर चारो बोर स पचास धनुष की फैली हुई चोडी पापाण की भित्तिवाला परम मनोहर सरोवर बनवा दिया था। फिर तो उमम अगाध जल हागया था। इस रीति मे जब वह सरोवर पूर्णतया तयार हो गया तामनी ने राजा को खबर दी थी ।७६७८॥
२५८ [ नारद पुराण तस्या तत प्रभृति वै सर्वेऽपि वनचारिणः । पान्था पिपासिता भूप लभन्ते स्म जल शुभम् ।।७६ कदाचित्स्वायुपश्चान्ते रा मन्नी बुद्धिसागरः । प्रमृतो गतवाल्लोक लोकशास्तुर्मम प्रभो ॥८० तदर्थ तु मया पृष्टो धर्मो धर्मलिपिकर. । चित्रगुप्तस्तु तत्कर्म मह्य सर्व न्यवेदयात् ॥८१ उपदेष्टा स्वय चासौ धर्मकार्यस्य भूपते. । तस्मद्धर्मविमान तु समारोढुमिहार्हति ॥८२ इत्युवते चित्रगुप्तेन समाज्ञप्तो मया नृप । विमान धर्मसज्ञ तु आरोदु बुद्धिसागर. १८३ अथ कालान्तरे राजन्स राजा वीरभद्रक.। मृतो गतो मम स्थान नमश्चक्र मुदान्वितः ।।८४ मन्त्री ने राजा के समीप में यह सम्वाद भिजवाया था कि उस सरोवर के निर्माण होने के पश्चात् सुन्दर निर्मल जल हो गया है और अब उसी दिन से उस सरोवर में वनवासी और यात्री लोग सभी इसके पवित्र जल का पान करने लग गये हैं । ७६।। हे राजन् । एक समय आ गया कि आयु के पूर्ण होआने पर वह बुद्धिसागर मन्त्री मर गया था । मुझे तो इस समार को शिक्षा देनी ही पड़ती है। एव जव वह मेरे लोक मे समागत हुआ तो मैंने धर्म को लिपिवद्ध करने वाले चित्रगुप्त से कहा और उम बुद्धि सागर मन्त्री के धर्म के विपय मे प्रश्न किया था। उस समय चित्रगुप्त ने इसका किभा हुआ सभी कर्म मुझे बतलाया था ।।८०८१॥ उसने कहा था कि इम मन्त्री ने इस धर्म के कार्य का राजा को स्वय ही उपदेश दिया था। अतएव यह धर्म-विमान पर चढने का पात्र है ।।२।। हे राजन् ! चित्रगुप्त के द्वारा इस बात के कहने पर मैंने उस बुद्धिसागर राजा के मन्त्री का धर्म नाम वाले विमान पर समारोहण करने का माज्ञापत्र अत-
नारदपुराण ]
दे दिया था ।। २३॥
इस के उपरान्त कुछ समय के व्यतीत हो
जाने पर वह राजा वीरभद्रभी आयु के समाप्त हो जाने पर मृत्यु
प्राप्त करके मेरे दरबार में उपस्थित होगया था। उस राजा ने बहुत
ही प्रसन्नता के साथ वहां आकर मुझे प्रणाम किया था ।।८४
मया तु तत्र तस्यापि पृष्ट कर्माखिलं नृप ।
कथित चित्रगुप्तेन धर्म सरसिसभवम् १८५
तदा सम्यङ्गया राजा वोधितोऽभूद्यथा शृणु ।
अधित्यकाया भूपाल सैकतस्य गिरेः पुरा ॥९६
लावकेनामुना चच्वा खात द्वय ग लमम्युनि ।
तत कालान्तरे तेन वाराहेण नृपोत्तम ।।८७
खनित हस्तमात्र तु जल तुण्डेन चात्मनः ।
ततोऽन्यदाऽमुया काल्या हस्तयुग्ममित. कृतः ।।८८
खातो जले महाराज तोय मासद्वय स्थितम् ।
पीत क्षुदैर्वनचरैः सत्त्वस्तृष्णासमाकुलं. १६६
ततो वपत्रयान्ते तु गजेनानेन सुव्रत ।
हस्तत्रयामित खात कृतस्तत्राधिक जलम् ॥६०
मासत्रये स्थित तच्च पयो जीवैर्वनेचरः।
भवास्तत्र समायातो त्तलशोपादनन्तरम् ॥६१
हे राजन् । मैंने फिर चित्रगुप्त से उस राजा के धर्म के विपय
मे
'দ্য
तो उसने उस राजा के धर्म के सम्बन्ध में सरोवर के निर्माण
मे मिले हुए उसकै धर्म का वर्णन किया था | उस समय मै मैंने
उस राजा को विस्तार के साथ बतलाया था। जब आप उसका श्रवण
परिए । मैंन कहा था-हे राजन् । पहिले इस वाज ने इस पहाड को
तलहटी की रज में अपनी चोंच सदा अगुल पा गत बनाकर जल
निकाला या ! हे नृप श्रेष्ठ । इसके पश्चात् किमी ममय मे एव शूर
ने अपनी थूथडे में एक हाथ का उसी जगह पर एक गड्ढा बना दिया
२६०
[ नारद पुराण
था ॥८६१८७१८८। हे राजन् उस गर्त मे दो मास तक जल बना
रहा था और प्यास से घबडाये हुए छोटे वन के जीव जन्तुओ ने उसके
जल का पान कर अपनी पिपासा को शान्त किया था ।। ६६॥ हे
सुव्रत । फिर जब तीन वर्ष व्यतीत होगये थे तो इस हाथी ने उसी
जगह पर एक तीन हाथ का गर्त खोदकर बना दिया था और उसमे
कुछ अधिक जल रहने लगा था । वह जगली जीवो के लिये तीन मास
तक बराबर बना रहा था। इसके उपरान्त जब उसका जल सूख
गया तो आप वहां पर पहुँच गये थे ॥६१
मासे तत्र तु सप्राप्त हस्त खात्वा जल नृप।
ततस्तस्योपदेशेन मन्त्रिगे नृपते त्वया ॥६२
पञ्चाशद्धनुरुत्खात जात तन महाजलम् ।
पुन शिलाभिः सुदृढ वद्ध जात महत्सर ।
वृक्षान रोपितास्तत्र सर्वलोकोपकारिणः ॥६३
तेन स्वस्वेन पुण्येन पञ्चैते जगतीपते।
विमान धर्नामारूढास्त्वमप्येन समारुह ।।६४
इति वाक्यं समाकर्ण्य मम राजा स भूमिप ।
आरुरोह विमान तत्पष्ठो राजा समाशभाक् ॥६५
इति ते सर्वमाख्यात तडागजनित फलम् ।
श्रुत्वैयन्मुच्यते पापादाजन्ममरणान्तिकात् ॥६६
यो नर श्रद्धया युक्तो व्याख्यात शृणुयात्पठेत् ।
सोऽप्याप्नोत्यखिल पुण्य सरोनिर्माणसभवम् ॥६७
हे राजन् । फिर वही पर एन हाथ मा गतं खोदने पर ही
आपको उसमे जल की प्राप्ति होगई थी फिर आपने अपने मन्त्री के
उपदेश से पचाम धनुष का मंदान दया का उममें बहुत अधिक जल
पर दिया था और पापाणो के द्वारा एक परम मुन्दर पाा घाट
यनवा पर बहुत ही अच्छा एक सरोवर का निमांग परा दिया था
नारद पुराण ]
२६१
और उसके आस-पास सबके उपकार करने वाले अनेक वृक्षो का भी
आरोपण करा दिया था HEN६३|| हे राजन् । उसी दिये हुये अपने
अपने पुण्य के प्रभाव से ये पांचो धर्म के नाम वाले विमान पर चढ
चुके हैं अब आप भी उस पर समारूढ होइये ॥६४॥ हे राजन् । मेरे
इस कथन को सुनकर वह छटा राजा भी जो उस जलाशय के निर्माण
से उत्पन्न धर्म वा समभायी था उस विमान पर चढ गया था ।।६।।
तालाब के निर्माण करन का जो महान पुण्य होता है उसका वर्णन
मैंन आपको कहकर मुना दिया है। इसका श्रवण कर तथा इसको
करके मनुष्य जन्म से लेकर जा भी पाप होते हैं उनसे मुक्त हो जाया
करता है ।।६६॥ जो कोई मनुष्य श्रद्धा की भावना से इम अद्भुत
माख्यान को सुनता या पढ़ता है उमको भी कभी ऐसी शक्ति होने पर
यह सब फल प्राप्त हुआ करता है ।।६७
॥ नाना प्रकार के दानों का निरूपण ।।
देवतायतन यस्तु कुरुथे कारयत्यपि ।
शिवस्यापि हरेर्वापि तस्य पुण्यफल शृणु ॥१
मातृत पितृतश्चैव लक्षकोटिकुलान्वित ।
कल्पनय विष्णुपदे तिष्ठत्येव न सशय ॥२
मृदेव कुरुते यस्तु देवतायतन नर ।
यावत्पुण्य भवेत्तस्य तन्मे निगदत शृणु ॥३
दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थित ।
कल्पनय विष्णुपदे तिष्ठत्येव न सशय ॥४
मृदेव कुरुते यस्तु देवतायतन नर ।
यावत्पुण्य भवेत्तस्य तन्मे निगदत शृणु ॥५
दिव्यदेहधरो भूत्वा विमानवरमास्थित ।
२६२ [ नारद पुराण कल्पनय विष्णुपदे स्थित्वा ब्रह्मपुर व्रजेत् ॥६ कल्पद्वय स्थितस्तन पुन कल्प वसेद्दिवि। ततस्तु योगिनामेव कुले जातो दयान्वित ॥७ धर्मराज ने कहा--जो मनुष्य भगवान् शङ्कर या भगवान् विष्णु इन देवी का स्थान अर्थात् मन्दिर का निर्माण कराता है अथवा निर्माण कराने की प्रेरणा प्रदान किया करता है इसका जो पुण्यफ्ल होता है उसे भी आप अब सुनिए-ऐसे देवालय का निर्माण करने या कराने वाला मनुष्य अपने माता पिता दोनो के कुलो की दश खरब पीडियो के साथ तीन कल्प पर्यन्त विष्णु लोक मे निवास किया करता है ।।१-२।। इस समय म केवल मिट्टी से ही जो किसी देव मन्दिर का निर्माण कराता है उस मनुष्य को जो पुण्यफल प्राप्त होता है वह भी मुझ से आप सुन लीजिये ॥३॥ उस व्यक्ति का भी शरीर परम दिव्य होजाया करता है। और वह भी एक परम श्रेष्ठ विमान में बैठकर तीन कल्प तक श्री विष्णु भगवान के लोक मे निवास किया करता है ॥४॥ जो पक्की मिट्टी आदि से देव मन्दिर की रचना करवाया करता है उसका पुण्यफल भी मैं आप को बतलाता हूँ उसका भी आप श्रवण करिए।।शा वह मनुष्य रूपी परम दिव्य देह को धारण करके उत्तम विमान मे समारूढ हुआ करता है और तीन कल्प तक विष्णुलाक मे निवास किया करता है। फिर वह वहाँ से ब्रह्मलोक को चला जाता है 11६।। यहां पर दो कल्प तक निवास करके फिर एक कल्प तक स्वर्ग- लोक वे निदास का सुख भोगता है। इसके अनन्तर वह प्राणी क्सिी योगिराज के कुल म समुत्पन्न होता है और अपने जीवन म वह परम दयालु रहा करता है ॥७ वैष्णव योगमास्थाय मुक्ति व्रजति शाश्वतीम् । दारुभि पुरते यस्तु तस्य स्याद् द्विगुण पलम् ।।८ त्रिगुण चेष्टवाभिस्तु शिलाभिस्तच्चतुर्गुणम् ।
नारद पुराण ] कर्तुः स्फाटिकाभिः शिलाभिस्तु ज्ञेयं दशगुणोत्तरम् ।। ताम्रोभिस्तच्छतगुणं हेम्ना कोटिगुणं भवेत् । देवालयं तडागं वा ग्राम वा पालयेत यः ॥१० : शतगुण तस्य पुण्य भवति भूपते । देवालयस्य शुश्रूषा लेपसेचनमडने ।।११ कुर्याद्यत्सतत भक्तचातस्य पुण्यमनन्तकम् । वेतनाद्विष्टितो वापि युण्यकर्मप्रवत्तिता. ॥१२ ते गच्छति धराधारा शाश्वत वैष्णव पदम् । तडागार्द्ध फल राजन्कासारे परिकीर्तितम् ।।१३ कूपे पादफल ज्ञेय वाप्या पद्माकरोन्मितम् । वापीशतगुण प्रोक्त कुल्याया भूपते. फलम् ।।१४ इसके उपरान्त योगाभ्यास के द्वारा मगवान विष्णु का ध्यान करके परम शाश्वत मोक्ष की प्राप्ति किया करता है। जो काg के द्वारा किसी देयालय का निर्माण कराया करता है उसको इससे भी द्विगुणित पुण्य का फन प्राप्त हुआ करता है ॥८॥ ई टों के द्वारा देव मन्दिर के वनवाने वाले को चौगुना पुण्य प्राप्त हुआ करता है। जो स्फटिक मणि के पापाणो के द्वारा देवालय की रचना कराता है उसको उपयुक्त पुण्य फल से दशगुना पुण्य मिला करता है ॥६ताम्रधातु से देव मन्दिर की रचना कराने वाले को सौगुना और मुवर्ण के द्वारा देव मन्दिर के निर्माण कराने वाले को करोड गुना फल प्राप्त हुआ करता है। जो किसी भी देव मन्दिर का, तालाव का और ग्राम का परिपालन एव सरक्षण किया करता है उस पुरुप को निर्माण कराने वाले से भी सौगुना पुण्य मिला करता है जो लेपन-अभिपिञ्चन और पुताई आदि के द्वारा इनका रक्षण एव उद्धार किया करता है तथा परम भक्ति भाव से सब प्रकार से सेवा किया करता है उसको अनन्त पुण्य मिला करता है। हे राजन् ! जो धनिक अथवा राजा महाराजा [ नारद पुराण वेतन देकर या विना ही वेतन के ऐसे पुण्य कर्म को प्रवृत्त किया करते है। उनको विष्णुनोंक सर्वदा के लिए ही प्राप्ति हो जाता है। ह राजन् । तालाब से आधा पुष्प जाड के निर्माण कराने का हुआ करता है ।। १०-१३॥ कूप के निर्माण कराने पर चौथाई फल मिला करता है। बावडी बनवाने वाले पुरुष को दश खवं गुना फल प्राप्त हुआ करता है । बावडी से भी सौ गुना पुण्य नहर बनवाने वाले राजा को प्राप्त हुआ करता है ॥१४॥ दृपभिस्तु धनी कुर्या-मृदा निष्किञ्चनो जन । तयो फल समान स्यादित्याह कमलोद्भव ॥१५ दद्यादाढयस्तु नगर हस्तमानकिंचन । भुव तयो समफल प्राहुर्वेदविदो जना ॥१६ धनाढय कुरुते यस्तु तडाग फलसाधनम् । दरिद्र कुरुते कूप सम पुण्य प्रकीर्तितम् ॥१७ आराम कारयेद्यस्तु वहुजन्तूपकारकम् । स याति ब्रह्मभुवन कुलमयसमन्वित १८ धेनुर्वा ब्राह्मणो वापि यो वा को वापि भूपते । क्षणाद्धं तस्य छायाया तिष्ठन्स्वगं नयत्यमुम् ॥१६ आरामकारका राजन्देवतागृहकारिण । तडागग्रामपत्र पूज्यन्ते हरिणा सह ॥२० सर्वलोकोपकारार्थ पुष्पाराम जनेश्वर। वुर्वते देवतार्थ वा तेषा पुण्यफल शृणु ॥२१ ग्रह्माजी ने कहा-यदि कोई धनिय पुरुप पाषाणो से देवालय तालाब आदि का निर्माण कराव और साधारण आर्थिक स्थिति का मनुष्य मृत्तिवास ही निर्माण करावे तो दोनो का एक सा ही फल प्राप्त करता है ॥१५।। कोई समृद्धिशाली पुरुप एक विशाल नगर को दान मे प्रदान कर दे दे और सामान्य आर्थिक स्थिति का मनुष्य अवल एक ही हाप भर प्रमाण वाली भूमि का दान करे उन दोनो को भी [ नारद पुराण समकोटिकुलैयुक्तो मातृत पितृतस्तथा । वसेत्कल्पशत साग्र नारायणपदे नृप ॥२५ ऊर्ध्वपुण्ड्रधरो यस्तु तुलसीमूलमृत्स्तया। गोपिकाचन्दनेनापि चित्रकूटमृदापि वा । गङ्गामृत्तिकया चैव तस्य पुण्यफल शृणु ॥२६ विमानवरमारूढो गन्धर्वाप्सरसा गण । सङ्गीयमानचरितो मोदते विष्णुमन्दिरे ॥२७ पत्राणि तुलसीमूलाद्यावन्ति पतितानि वै । तावन्ति ब्रह्महत्यादिपातकानि हतानि च ।।२८ उस उद्यान मे जितने भी फूल और पन होते हैं उसने ही वर्षों तक वह मनुष्य जिसने वृक्षो का आरोपण किया है अपनी करोडो पीढियो के महित स्वर्ग लोक मे आनन्द का उपभोग किया करता है ॥२२।। जो लोग उस उद्यान की सुरक्षा के लिए परदे की दीवार बनवाते हैं या काटो की बाड लगाया करत हैं वे एक मन्वन्तर के समय पर्यन्त ब्रह्म- लोक मे निवास किया करते हैं ॥२३।। हे राजन् । जो तुलसी के पौधे का आरोपण किया करते हैं उनके पुण्य फल को आप मेरे द्वारा कहे जाने पर हो जान सकते हैं ॥२४॥ हे राजन् । जो तुलसी का पौधा लगाने वाला व्यक्ति अपने माता पिता को सात करोड पीढियो के सहित सो कल्प के समय तक नारायण लोक में निवास प्राप्त किया करते हैं ॥२५१ जो तुलमी के मूल के समीप की मृत्तिका से, गोपी चन्दन मे, चित्रकूट की मृत्तिका से अथवा गङ्गाजी के तट की मृत्तिका से अर्व पुण्डू धारण किया करता है उसको महान पुण्य फल प्राप्त होता है। उसको भी मैं अब आपको ज्ञान प्राप्त कराने के लिए बतलाता हूँ। इसे लोग एक साधारण सी बात ही समझा करते हैं और इसकी वास्तविक महिमा का ज्ञान नहीं होता है । वह पुरप विष्णुलोक मे पहूँचकर परमश्रेष्ठ विमान मे बैठा घरता है और गन्धवं गण तथा अप्सराओ का दल - नारद पुराण ] २६७ उसके यश का गान किया करते है ॥२६-२७॥ तुलमी के मूल मे जितने भी पत्ते स्वय झडकर गिर जाया करते हैं उस पौधे के बारोपित करने वाले पुरुष के उतने ही ब्रह्म हत्या आदिक महापातको को दूर करा दिया करते है ॥२८॥ तुलस्या सेचयेद्यस्तु जलं चुलुकमारकम् । क्षीरोदवासिना साद्ध वसेदाचन्द्रतारकम् ।।२६ ददाति ब्राह्मणाना य कोमल तुलसीदलम् । स याति ब्रह्मसदने कुलनितयसयुतः ॥३० शालग्रामेऽपयेद्यस्तु तुलस्यास्तु दलानि च । स वसेद्विष्णुभवने यावदाभूतसप्लवम् ॥३१ कण्टकावरण यस्तु प्राकार वापि कारयेत् । सोऽप्येकविंशशिकुल मोदते विष्णुमन्दिरे ॥३२ योऽयेद्धरिपादाब्ज तुलस्या कोमलैदलै. । न तस्य पुनरावृत्तिविष्णुलोकान्नरेश्वर ॥३३ द्वादश्या पोर्णमास्या य क्षीरेण स्नापयेतरिम् । कुलायुतयुत सोऽपि मोदते वैष्णवे पदे ॥३४ प्रस्थमागेण पयसा य. स्नापयति केशवम् । कुलायुतायुतयुत सोऽपि विष्णुपुरे वसेत् ॥३५ जो कोई एक चुल्लू भर जल से भी तुलसी के पौधे को सीच दिया करता वह क्षीर सागर में निवास करने वाले भगवान के साथ जब तक सूर्य और चन्द्र इस विश्व में स्थित रहा करते है तब तक निवास किया करता है ॥२६॥ जो ब्राह्मणो को लाकर परम शोमल तुलसी के दल अर्पित किया करता है वह अपने तीनो बुलो के सहित ब्रह्मलोक मे गमन किया घरता है ॥३०॥ जो पुण्यात्मा पुरुप श्रीशाल- ग्राम भगवान पर नित्य मुलमी के दलो को चढाया करता है वह प्रलय- पाल तब विष्णुलोक में निवास किया करता है ॥३१॥ जो मुरक्षा
[ नारद पुराण
के लिए तुलसी के पौधो की कांटो की बाढ लगाता है अथवा तुलसी
का धमला बना देता है वह भी अपनी इक्कीस पुरतो तक स्वर्ग लोक
आनन्द का अनुभव किया करता है ॥३२॥ जो भगवान विष्णु के
चरण कमलो की तुलसी के कोमल दलो से पूजा किया करता है वह
विष्णुलोक को प्राप्त कर वहां से फिर वापिस नहीं लौटा करता है
॥३३॥ जो कोई मनुष्य द्वादसी तिथि अथवा पूर्णिमा के दिन दुग्ध
से विष्णु भगवान का स्नान कराया करता है वह अपनी दश करोड
पुश्नो के सहित विष्णु भगवान के लोक में रहा करता है ॥३४॥ जो
एक प्रस्थ भर प्रमाण वाले अर्थात् ६४ तोले दूध से भगवान केशव
को म्नान करता है ॥३५
पृतप्रस्थेन यो विष्णु द्वादश्या स्नापयेन्नर ।
कुलकोटियुतो राजन्सायुज्य लभते हरे ॥३६
पञ्चामृतन य स्नानमेकादश्या तु कारयेत् ।
विष्णो सायुज्यक तस्य भवेत्तुलशतायुत ॥३७
एकादश्या पौर्णमास्या द्वादश्या वा नृपोत्तम ।
नालिकेरोदकविष्णु स्नापयेत्तत्फला शृणु ॥३८
दशजन्मानित. पापविमुक्तो नृपसत्तम ।
शतद्वयकुलयुक्तो मोदते विष्णुना सह ॥३६
इक्षुतोयेन देवेश य स्नापयति भूपते ।
केशन लक्षपितृभि साद्धं विष्णुपद ब्रजेत् ॥४०
पुप्पोदकेन गोविन्द तथा गन्धोदकेन च।
स्नापयित्वा हरि भक्तमा वैष्णव पदमाप्नुयात् ॥४१
जलेन वस्त्रपूतेन य स्नापयति माधवम् ।
सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुना सह मोदते ॥४२
जो एक प्रस्थ भर घृत मे द्वादशी तिथि के दिन भगवान विष्णु
को स्नान पराया परता है। हे राजन् । यह अपन परोडा धुनों में
नारद पुराण } २६६ सहिन भगवान को सायुज्यता को प्राप्त किया करता है ।।३६।। जो एकादशी के दिन या पूर्णिमा ति मे नारियल के जल से भगवान विष्णु की प्रतिमा का स्नपन कराता है उसके पुण्य फा का भी साप मुझ से श्रषण कीजिए १३७ ३८॥ हे नृपते । वह दश जन्मो मे बने हुए पातको से छुटकारा पाकर अपने दो सौ वश्वज पीढियो के सहित विष्णु भगवान के समकक्ष पहुंच कर निवास किया करता है ॥३६॥ हे राजन् । जो कोई भक्त गन्ने के रस से भक्तिभाव से भगवान केशव का स्नान कराया करता है वह मनुष्य अपने एखो पितृगणो के सहित विष्णुलोक मे प्रवेश प्राप्त किया करता है ॥४०॥ जो पुग्यो के रस अथवा परम सुगन्धित पुष्पो के अर्क से या इन से गोविन्द का स्नान कराता है वह भी विष्णुलोक वा निवास प्राप्न करता है ॥४१॥ जो भक्त वस्त्र से छान कर जल से भगवान माधव प्रभ का स्नान कराता है वह सभी प्रकार के घोगतिघोर पाप से मुक्ति प्राप्त करके भगवान विष्णु के मन्निधि म ही मानन्दायरस किया करता है ॥४२॥ क्षीराद्यै स्नापयेद्यस्तु रविसरमण हरिम् । स सेद्विष्णुसदने निसत्पुरुष सह ॥४३ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्या पूर्णिमादिने १४४ एकादश्या भानुवारे द्वादश्या पचमीतियो। सोमसूर्योपरागे च मन्वादिपु युगादिषु ॥४५ अझैदये च सूर्यस्य पुष्यार्के रोहिणीवुधे । तथव शनिरोहिण्या भौमाशिवल्याँ तथैव चा४६ शन्या भृगुमृगे चैव भृगुरेवतिसङ्गमे । तथा बुधानुराधाया श्रवणार्के तथैव च ॥४७ तया च सोमश्रवगे हस्तयुक्ते वृहस्पती । बुधाष्टम्या वुधापाढे पुण्ये चान्ये दिने तथा ॥४८ स्नापयेत्पयसाविष्णु शान्तिमा वाग्यत शुचि । घृतेन मधुना वापि दना वा ताफा शृण ॥४६ १७० [ नारद पुराण चन्द्र से जो भक्त सूर्य सक्रमण के ( सक्रान्ति ) समय मे दुग्ध आदि गव्यो से भगवान की प्रतिमा का स्नान भक्ति पूर्वक कराया करता है वह अपने इक्कीस पूर्वजो को साथ मे लेकर विष्णु लोक मे निवास किया करता है ।।४३॥ जो कोई भक्त शुक्लपक्ष की चतुर्दशी, अष्टमी, पूर्णिमा अथवा एकादशी रविवार के दिन पञ्चमी, सूर्य अथवा के ग्रहण, मन्वन्तरादि तथा युगादि की तिथियो मे ग्रस्तोदय सूर्य- ग्रहण, अर्थोदित सूर्य, पुष्य नक्षत्र युक्त सूर्य, रोहिणी युक्त बुध, शनि संयुक्त रोहिणी, अश्विनी नक्षत्रयुत भौमवार तथा शनिवार, मृगशिरा 'युक्त भृगुवार, रेवती से समन्वित शुक्रवार, अनुराधा से युक्त बुधवार, श्रवण समन्विन सोमवार, हस्त नक्षत्र वाते गुरुवार, बुधवार वाली अष्टमी उत्तराषाढा से युक्त वुधवार तथा अन्य किसी परम पुण्यमय दिवस में भगवान विष्णु को हृदय मे शान्त रहकर तथा वाणी को नियम नियन्त्रित रखते हुए परम पवित्रता के साथ घृत, दधि और मधु से भगवान को स्नान कराया करता है उसके पुण्यफल का श्रवण करिये ॥४४४६॥ सर्वयज्ञफल प्राप्य सर्वपापविजित । वसेद्विष्णुपुरे साद्धं निसप्तपुरुप ॥५० तोव ज्ञानमासाद्य योगिनामपि दुर्लभम् । मोक्षमाप्नोति नृपते पुनरावृत्तिदुलभम् ॥५१ कृष्णपक्षे चतुर्दश्या सोमवारे च भूपते । शिव सस्नाप्य दुग्धेन शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥५२ नलियेरोदकेनापि शिग सस्नाप्य भक्तित । अष्टम्यामिन्दुवारे वा शिवसायुज्यमश्नुते ॥५३ शुक्लपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्या वापि भूपते। घृतेन मधुना स्नाप्य शिव तत्साम्यता व्रजेत् ॥५४ तिलौन मस्नाप्य विष्णु वा शिवमेव च।
नारद पुराण ] २७१ स याति तत्तत्सारूप्ठां पितृभिः सह सप्तभिः ॥५५ शिवमिक्षुरसेनापि यः स्नापयति भक्तितः । शिवलोके वसेत्कल्प स सप्तपुरुषः सह ॥५६ हे राजन् ! वह उपर्युक्त द्रव्यो से भगवान का स्नपन कराने वाला भक्त सब पापो मे रहित होकर समस्त प्रकार के यज्ञो के पुण्य को प्राप्त किया करता है । और अन्न मे २१ पुश्तो के सहित विष्णु- लोक मे वास करता है।।५०॥हे राजन् ! वहाँ पर हो योगियो को भी दुर्लभ ज्ञान को प्राप्त करके जिसके प्राप्त करने से फिर थावृत्ति दुर्लभ होती है ऐमें मोक्ष पद को प्राप्त कर लिया करता है । ५१॥ हे नरपति देव । जो मास के कृष्णपक्ष को सोमवार से युक्त चतुर्दशी तिथि के दिन भगवान शिव को दुग्ध ये स्नान करा कर अर्चन क्यिा करता है वह शिव की सायुज्यता वा लाभ लिया करता है और शिवलोक को गमन किया करता है ॥५२॥ सोमवार के दिन जब अष्टमी तिथि हो उस दिन नारियल के अन्दर रहने वाले जल से भक्ति की भावना ते गयुत होकर भगवान श्री शङ्कर को प्रतिमा का स्नान कराया करता है वह भी शिव के लोक को गमन विया करता है ॥५३॥ है भूपते ! मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी अथवा अष्टमी तिथि के दिन घृत और शहद में शिवजी का स्नान पराता है भगवान का यह सराय भाव प्राप्त पर सेना है ॥५४॥ जो तिल के तेल में भगवान विष्णु या शिव रास्नान कराना है वह अपने सात पितरो के साथ एप शिव के लोय में निवाग विया वरना है ।।५।। जो शिव को मूर्ति का स्नान मन भाय युक्त होकर ईध के रस से बराया करता है वह भी अपनी सात पुमा रे महिन बरामर ता शिव के मोड में निवाम प्राप्त विया करता घृतेन म्नापन्निनमुत्याने दाद दिने । धोरण वा महाभाग तरफा मृणु मदिगरा ॥५७ 11१६॥
२७२ [ नारद पुराण जन्मायुताजितै पापविमुक्तो मनुजो नृप । कोटिसख्य समुदत्य स्वकुल शिवता व्रजेत् ॥५८ सम्पूज्य गन्धकुसुमैर्विष्णु विष्णुतिथौ नृप । जन्मायुताजित पापैर्मुक्तो व्रजति तत्पदम् ॥५६ पद्मपुष्पेण यो विष्णु शिव वा पूजयेन्नर । स याति विष्णु भवन कुलकोटिसमन्वित ॥६० हरिं च केतकीपुष्पै शिन धत्तू रजैनिशि । सपूज्य पापनिर्मुक्तो वसेद्विष्णु पुरे युगम् ॥६१ हरिं तु चाम्पकै पुप्पैरकपुष्पैश्च शङ्करम्। समभ्यर्च्य महाराज तत्तत्सालोक्यमाप्नुयात् ॥६२ शङ्करस्याथवा विष्णोघृतयुक्त च गुग्गुलुम् । दत्त्वा धूपे नरो भक्तया सर्वपापै प्रमुच्यते ॥६३ हे महाभाग ! जो सूर्य के उदयकालीन द्वादशी तिथि के दिन भगवान् शङ्कर वी लिंगमयी प्रतिमा का क्षीर से स्नान कराया करता है उसको जो पुण्य होता है उसका मै आपके सामने बतलाता हूँ ।।५७॥ है राजन् । वह मनुष्य अपने दश सहस्र जन्मो मे किये हुए समस्त महा पापो मे छूटकर अपने कुल के करोडो पुरुषो का उद्धार करके अपने सम्पूर्ण कुल को भगवान् शिव मे ही लोन कर दिया करता है ॥५८।। हे राजन् । भगवान् विष्णु की देवोत्थापिनी द्वादशी तिथि के दिन भग- वान् विष्णु को सुगन्धित पुप्पो से पूजा करने वाला अपने दश सहस्र जन्मो मे किये हुए पापो से मुक्त होकर अन्त मे विष्णु लोक को प्राप्त हो जाता है ।।५६॥ जो कमल के पुष्पो से भगवान् विष्णु या शिव का समर्थन किया करता है वह करोडो ही कुलो के महित वैकुण्ठ लोक मे निवास किया करता है ॥६०॥ जो भक्त विष्णु भगवान का केतकी ये पुप्पो म और भगवान शिव का धतूरे के पुप्पा म यजन किया करता है वह सभी पागे से मुक्त होकर एर युग तव विष्णु के लोक म रहा करता है ।।६१॥ हे राजन् । जो भा भगवान विष्णु को चम्पा में पुप्पो से
नारद पुराण ]
२७३
-
तथा भगवान् शिवको आक के पुप्पो से पूजता, है वह मनुष्य इन
दोनो ही देवो के लोगो की प्राप्ति किया करता है ।।६। जो मनुष्य
भक्ति गाव के साथ भगवान् शङ्कर अथवा विष्णु को घृतमिश्रित गूगल की
धूप दिया करता है उसके समस्त पाप दूर भाग जाया करते है ।।६३॥
तिलतैलान्वित दीप विष्णोर्वा शकरस्य वा।
दत्त्वा नर सर्वकामान्सप्राप्नोति नृपोत्तम ॥६४
घृतेन दोप यो दद्याच्छकरायाथ विष्णवे ।
स मुक्त. सर्वपापेभ्यो गङ्गास्नानफले सभेत् ॥६५
ग्राम्येन वापि तैलेन राजन्नन्येन वा पुन ।
दीप दत्त्वा महाविष्णोः शिवस्यापि फल शृणु ॥६६
सर्वपापविनिमुक्त सर्वेश्वर्यसमन्वित.
तत्तत्सालोफयमाप्नोति निमापुरुषान्वित. ॥६७
यद्यदिष्टतम भोज्य तत्तदीशाय विष्णवे ।
दत्वा तत्तत्पद याति चत्वारिंशत्कुलान्वित. ॥६८
यद्यदिष्टतम वस्तु तत्तद्विप्राय दापयेत् ।
स याति विष्णुभवन पुनरावृत्तिदुर्लभम् ।।६६
भ्रूणहा स्वणदानेन शुद्धो भवति भूगने ।
अन्नतोयसम दान न भूत न भविष्यति ॥७०
जो भक्त भगवान विष्णु यथवा शिव के लिये तिल के तेल का
दोपप प्रज्वलित क्यिा करता है उसकी सव मनोकामनायें पूर्ण होजाया
करती है ।।६।। जो मक्ति के महिन भगवान् शङ्कर अथवा विष्णु के
निये घृत का दीपा जलाता है वह मभी पापों में घटकारा पाजाता है
और गला में स्नान करने में पुत्र पत्र की प्राप्ति किया करता है
॥६५॥ जो ग्राम म सिदि ये तल में अथवा परी विष्णु भगवान
सदोष प्रचलिन रिया एता है उसका पुष्य पन गुमाना हूँ ॥६६
पद मनुष्य मभी पापो से हट जाया करता है और सर यार में
१७४
[ नारद पुराण
ऐश्वर्य प्राप्त कर अपने इक्कीस पुरुखाओ के साथ शिव या विष्णुलोक
मे निवास किया करता है ॥६७। भोजन के पदार्थो मे जो जा पदार्थ
आपको अधिक प्रिय हो उसे भगवान विष्णु या शिव की सेवा मे
के
समर्पित करने से वह अपने २ इष्टदेव के लोको मे अपने चालीस कुल
पुरुपो को लेजाया करता है ॥ ६८ ॥ जो वस्तु स्वय अपने आपको
अत्यधिक प्रिय लगती हो उसका दान ब्राह्मण को देने से ऐम विष्णु
लोक की प्राप्ति किया करता है जहाँ से लौटकर फिर पुनर्जन्म नही
मिला करता है ।।६६। हे राजन् । जो भ्रूण हत्या करने वाला पुरुप
है वह मुवर्ण के दान देने से इस पाप से शुद्ध हो जाता है । अन्न
का दान और जल का दान जैसा दान तो न आज तक कोई दान हुआ
है और न भविष्य मे होगा ॥७०
अन्नद प्राणद प्रोक्त प्राणदश्चापि सर्वद ।
सर्वदानफल यस्मादन्नदस्य नृपोत्तम ॥७१
अन्नदो ब्रह्मसदन याति वशायुतान्वित ।
न तस्य पुनरावृत्तिरिति शास्त्रेषु निश्चितम् ॥७२
सद्यस्तुप्टिक्य ज्ञेय जलदान यतोऽधिकम् ।
अन्नदानान्नृपश्रेष्ठ निर्दिष्ट ब्रह्मवादिभि ॥७३
महापातकयुक्तो या युक्तो वाप्युपपातक ।
जलदो मुच्यते तेभ्य इत्याह कमलोद्भव ॥७४
शरीरमन्नज प्राहु प्राणानप्यन्नजान्विदु ।
तस्मादन्नप्रदो ज्ञेय प्राणद पृथ्वीपते ॥७५
यद्यत्तुप्टिकर दान सर्वकामफलप्रदम् ।
तस्मादन्नसम दान नास्ति भूपाल भूतले ॥७६
अन्नदस्य कुले जाता आसहस्र नृपोत्तम ।
नरपत न पश्यन्ति तस्मादन्नपदा वर ॥७७
जा अन्न का दान देता है उसका प्राण दाना वहा जाता
नारद पुराण ] २७५ है । प्राणो का दाता तो सर्व दाता कहा जाया करता है। हे नृप. श्रेष्ठ । अत अन्न के दान करने वाले मनुष्य को सभी के दान का पुण्य पत्र प्राप्त होजाया करता है । अन्न के दान को बडी भारी महिमा है क्योकि इससे प्राणों की रक्षा हुआ करती है ॥७१॥ अन्न का दान देने वाले मनुष्य अपने दश सहस्र कुल के पुरुषा को साथ लेकर ब्रह्म लोप में गमन करता है और फिर उसका पुनर्जन्म नहीं हुआ करता है ऐमा सभी शास्त्री वा निश्चय है ॥७२॥ जल के दान वा भी वडा भारी महत्व है क्योकि इससे तुरन्त ही तुष्टि होजाया करती है अतएव इसकी महिमा अन्न के दान से भी अधिक होती है । हे उत्तम राजन् । ऐसा ग्रह्मवादियों ने निश्चय किया है ।।७३॥ ब्रह्माजी ने कहा है- महापाता और उपपातको मे दूपित पुरप जल का दान करने से शुद्ध हाजाया करता है ।।७४ । शरीर और प्राण दोना को अन्न से पुष्ट होन वाला यहत है बतएव हे भूमिपते । अन्न पे दाता यो प्राणो का हो दान देने वाला समझ लेना चाहिय ७५।। जितन भी सन्तुष्ट करने वाल दान है व सभी मन की समस्त वामनाओ को पूर्ण कर देने वाले होते हैं किन्तु है राजन् । इग भूमडल में अन्न के धान को समता परने वाला अन्य पाई भी दान नहीं है ॥७६॥ हे नृपोत्तम । अन्न- में पाहे सहसा ही प्राणी समुत्पन हय हा प सभी नरम या दशन कभी भी नहीं किया परत है अतएव यह सिद्ध होता है कि अन्न वा दान परन वाला पुष्प श्रेष्ठ होता है ।।७७॥ पादाभ्यग भत्तियुक्तो योऽतिये पुरते नर । स स्नात सयंतीयपु गाम्नानपुर मरम् ॥७८ तैनाम्यग महाराज ग्राह्मणाना पगीय । मम्नातोप्टशत माग गङ्गाया नात्र मगय ||७६ रोगितान्याह्मणान्यातु प्रेम्मा क्षति रक्षा । म गोटिगुलमयुत्तो यमद मापुरे युगम् ।।८० यो रोमियोपाल गया रोगिण नरम् । दाता २७६ [ नारद पुराण . तस्य विष्णु प्रसन्नात्मा सर्वान्कामान्प्रयच्छति ।।८१ मनसा कमणा वाचा यो रक्षेदामयान्वितम् । सर्वान्कामानवाप्नोति सर्वपापविवर्जित ॥२ यो ददाति महीपाल निवास ब्राह्मणाय वै । तस्य प्रसन्नो देवेश. स्वलोक सप्रयच्छति ।।८३ ब्राह्मणाय ब्रह्मविदे यो दद्याद्ना पयस्विनीम् । स याति ब्रह्मसदनमन्येपामतिदुर्लभम् ॥८४ जो मनुष्य समागत अतिथि के चरणो को दवाता है वह मनुष्य गङ्गा स्नान के सहित सभी पुण्य तीर्थों के अवगाहन करने का पुण्य फल प्राप्त कर लेता है ।।७८।। हे राजन् । जो ब्राह्मणो को तेल मनता है उसको एक्सौ आठ वार गङ्गा के जल मे स्नान करने का पुण्य-फल मिला करता है । जो रोग से अवस्थित ब्राह्मण की प्रेम के साथ रक्षा किया करता है वह अपने एक करोड कुलो के साथ युग भर पर्यन्त ब्रह्म लोक मे निवारा किया करता है ॥७६८०॥ हे पृथिवीपाल । जो विसी गरीब अथवा रुग्ण की रक्षा करता है उस पर भगवान विष्णु- देव का चित्त अधिक प्रसन्न होजाया करता है । फिर वे देवेश्वर उसकी सम्पूर्ण मनोकामनायें पूर्ण कर दिया करते हैं ॥१॥ जो मन, वाणी और कर्म से रोगी पुरुष की रक्षा करता है वह सभी पापो से पृथक् होकर विशुद्ध होजाया करता है और उसकी सब कामनाये सिद्ध होती हैं ।।२।। हे महीपाल । जो कोई भी पुरुष ब्राह्मण को निवास करने का स्थान देता है भगवान उस पर परम प्रसन्न होकर अपने लोप का निवास प्रदान कर दिया करते हैं ॥८३ जो ब्रह्म ये ज्ञाता प्राह्मण पा दूध देने वाली गाय का दान दिया करता है उसको वह लोर परलारमामी होन पर मिला करता है जो अन्यो को बहुत ही पटिनाई स प्राप्त हुआ परता है ।।८४ अन्यन्य प्रतिगृह्यापि यो दद्याद्गापयस्विनीम् ।
नारद पुराण }
२.७७
तस्य पुण्यफल वक्त नाहं शक्तोऽस्मि पण्डित ॥८५
कपिला वेदविदुपे यो ददाति पयस्विनीम् ।
स एव रद्रो भूपाल सर्वपापविजित. ॥८६ -
विप्राय वेदविदुपे दद्यादुभयतोमुखीम् ।
यस्तस्य पुण्य सम्यातु न शक्तोदशतैरपि ॥८७
तस्य पुण्यफल राजशृणु वक्ष्यामि तत्वत ।
एक्त मतव. सवें समग्रवरदक्षिणा. ८८
एवतो भयभीतस्य प्राणिन प्राणरक्षणम् ।
मरक्षति महीपाल यो विप्रभयविह्वलम् ॥६
स स्नात. सर्वतीर्येषु सर्वयज्ञेषु दीक्षित ।
वस्त्रदो रद्रभवन कन्यादो ब्रह्मण पदम् ॥६०
जो स्वय दूमरे म गो का दान ग्रहण कर दूध देने वाली गौ
पा दान कर दिया करता है उसके पुण्य फल का तो वर्णन परने यी
मुझमें सामर्थ्य ही नही है इतना महान उसे पुण्य-पल हुआ करता है
1१५॥ जो माई मनुष्य दुग्धवती कपिला गाय या दान चिगी वेदो के
भान रखने वाले प्राह्मण का देता है वह सभी पापो ये दोपो से छूट
जाया करता है ।८६। जो मनुष्य वेदो के पडित ग्राह्मण को उभयतो-
मुखी ( दोनो तरफ मुन वाली अर्याद अघश्याई हुई ) गो या दान
देता है उसकी इतना पुण्य प्राप्त होता है जिसका वर्णन सौ वर्षों तक
परापर पहले रहने पर भी वर्णन नहीं करने में याता है ॥८
राजन् ! चा मनुष्य frसी भय से विवर याहमण की रक्षा पिया
परता है उसा। पुण्य-गर ऐमा होता है कि ए तरफ तो मय दक्षिणा
पाने योगा पुण्य होता है और उनना ही पुग्प दूमरी और भयभीत
प्राणी को रक्षा का पुण्य
करता है | उग भीत को वाण
परने यारो पुरष का तो ऐमा पुष्प दृमा मरता है जंमा ममरत प्रकार
में यमो यो दोदा ग्रहण परो वाले । तथा समस्त महान तीर्थों में
२७८
[ नारद पुरान
स्नान करने वाले को हुआ करता है, जो वस्त्रों का दान करता है
उसको रुद्रलोक मिलता है और जो किसी कन्या का दान किया करता
है उसको ब्रह्मलोक की प्राप्ति हुआ करती है ॥६०
हेमदो विष्णुभवन प्रयाति स्वकुलान्वित ।
यस्तु कन्यामलकृत्व ददात्यध्यात्मवेदिने १६१
शतवशसमायुक्त स व्रजेद ब्रह्मण पदम् ।
कार्तिक्या पौर्णमास्या वा आषाढया वापि भूपते ।।६२
वृषभ शिवतुष्ट्यर्थमुत्सृजेत्तत्फल शृणु।
सप्तजन्माजित पापैविमुक्तो रुद्ररूपभाक् ॥६३
कुलसप्ततिसयुक्तो रुद्रेण सह मोदते।
शिवलिङ्गाकित कृत्वा महिप य समुत्सृजेत् ॥६४
न तस्य यातनालोको भवेन्नृपतिसत्तम ।
ताम्बूलदान य कुर्याच्छक्तितो नृपसत्तम ॥६५
तस्य विष्णु प्रसन्नात्मा ददात्यायुर्यश श्रियम् ।
क्षीरोदो घृतदश्चैव मधुदो दधितस्तथा ॥६६
दिव्याब्दायुतपर्यंत स्वर्गलोके महीयते ।
प्रयाति ब्रह्मसदनमिक्षुदाता नृपोत्तम ॥६७
सुवण का दान देने वाला अपने कुल के सहित विष्णु लोक को
गमन किया करता है तथा जो किसी की क्या को वस्त्राभरणो से
विभूपित करके किसी आत्मज्ञानी पुरुप को दान दिया करता है वह
अपनी सौ पुस्तो को भी अपने साथ ब्रह्मलोव को ले जाया करता है।
जो वोई मनुष्य मापाढ अथवा बात्तिक मास की पूर्णिमा के दिन में
भगवान शिव का प्रसन्न करन वे लिये वृषभ का उत्सर्ग विमा करता
है अगांव बिजार छोडा करता है उसको इतना भारी पुण्य हाता है
fr उसक प्रभाव स वह सब जन्मो के दिये हुये पुरवले पापो से मुक्त
होकर भगवान रुद्र के ही स्वरूप को प्राप्त कर लेता है 1६१/६२।।
नारद पुराण ] वह अपनी सत्तर पीढियो के सहित रुद्रलोक में भगवान रुद्र- देव के साथ निवास किया करता है। जो मनुष्य अकित करके अर्शन शिवलिंग का चिन्ह करके किसी भैसे को बिजार बनाकर छोड दिया करता है उसको कभी भी नरक यातना पाने के स्थानों को नहीं देखना पड़ता है । हे नृपोत्तम! जो अपनी शक्ति के अनुकूल ही जाम्बूलो का दान किया करता है। भगवान् विष्णु उस पर अपने हृदय मे बहुत प्रसन्न हुआ करते हैं और उसे आयु, लक्ष्मी, यश प्रदान किया करते हैं । जो भीर, घृत, मधु और दधि का दान किया करते हैं वे दश सहस्र दिव्य वर्षों तक स्वर्ग में सुखी रहा करते हैं। हे नृपवर ! ईख का दान देने से स्वर्ग लोक का सुख प्राप्त होता है ।।६३-६७ गन्धद. पुण्यफलद प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । गुडे रसदश्चैव प्रयादि क्षीरसागरम् ।।६८ भटाना जलदो याति सूर्यलोकमनुत्तमम् । विद्यादानेन सायुज्य माधवस्य व्रजेन्नर.॥६६ विद्यादान महीदान गोदान चोत्तमोत्तमम् । नरकादुद्धरन्त्येव जपवाहनदोहनात् ॥१०० सर्वपामपि दानाना विद्यादान विशिष्यते। विद्यादानेन सायुज्य विष्णोर्याति नृपोत्तम ॥१०१ नरस्त्विन्धनदानेन मुच्यते ह्य पपातकः । शालग्रामशिलादान महादान प्रकनैतितम् ॥१०२ यद्दत्वा मोक्षमाप्नोति लिंगदान तथा स्मृतम् । ब्रह्माण्डकोटिदागेन यत्फल लभते नरः ॥१०३ तत्फल समवाप्नोति लिङ्गदान संशयः । शालग्रामशिलादाने ततोऽपि द्विगुण फलम् ।।१०४ गन्ध और पवित्र फलों का दान देने पर भी ब्रह्म लोक मिला परता है। गुड और इंव का रस दान देने वाले मनुष्य को सीरगागर २५० [ नारद पुराण प्राप्त हुआ करता है ।। ६८ ।। योधा पुरुषो को जल का दान करने वाला मनुष्य परम श्रेष्ठ सूर्य लोक की प्राप्ति किया करता है और विद्या के दान से गनुष्य को भगवान विष्णुदेव की सायुज्य प्राप्ति होती है ।।६६॥ विद्या का दान, गोदान, पृथ्वी दान ये सब दाम एक से एक उत्तम दान होते है । जाप, अन्न प्राप्ति और दोहन के द्वारा ये तीना दान नरको से उद्धार किया करते है ।।१००॥ तथापि विद्या का दान सभी दानो मे उत्तम दान होता है क्योकि इस विद्या के दान से भग- वान विष्णु की सायुज्यता का लाभ प्राप्त होता है ॥१०१॥ ई धन के दान से मनुष्य सभी उपपातका से मुक्त हो जाया करता है। शाल- ग्राम शिला या दान महादान कहा गया है ॥ १०२॥ शिवलिंग के दान को महादान बताया गया है । इसको देने से मोक्ष की प्राप्ति हुआ करती है। करोडो ब्रह्माडो के दान से जो फल होता है वही पुण्य का फल शिव की लिगमयी प्रतिमा के दान से प्राप्त हो जाता है तथा शालग्राम शिला के दान देने से उससे भी दुगुना पुण्य फल हुआ करता है ।।१०३।१०४ शालग्रामशिलारूपी विष्णुरेवेति विथु त । यो ददाति नरो दोप गृहेषु महत्ता प्रभो ॥१०५ गङ्गास्नानफल तस्य निश्चित नृप जायते । रत्नान्वितसुवर्णस्य प्रदानेन नृपोत्तम ॥१०६ भुक्तिमुक्तिमवाप्नोति महादान यतः स्मृतम् । नरो माणिक्यदानेन पर मोक्षमवाप्नुयात् ।।१०७ ध्रुवलोकमवाप्नोति वज्रदानेन मानव । स्वर्ग विद्र मदानेन रुद्रलोक मवाप्नुयात् ॥१०८ प्रयाति यानदानेन मुक्तादानेन चैन्दवम् । वैडूर्यदो रुद्रलोक पुष्परागप्रदस्तथा ॥१०६ नारद पुराण ] २८१ पुष्परागप्रदानेन सर्वत्र सुखमश्नुते । अश्वदो ह्यस्वसानिध्य चिर ब्रजति भूमिप ११० गजदानेन महता सर्वान्कामानवाप्नुयात् । प्रयाति यानदानेन स्वर्ग स्वर्यानमास्थित ॥१११ महिपीदो जयत्येव ह्यपमृत्यु न सशय । गवा तृणप्रदानेन रुद्रलोकमवाप्नुयात् ।।११२ भगवान् विष्णु शालग्राम की शिला के रूप वाले हैं ऐसा परम प्रसिद्ध है । जो मनुष्य किसी भी देवालय मे दीपक जलाया करता है हे नृप । उसका गन्ना के स्नान करने का पुण्य होता है। रत्नो से जटित स्वण क-दान से भोग और मोक्ष दाना मिला करते है । पहिले परमोत्तम भोगो का सुख का उपभोग करके अन्त म मुक्ति होजाया करती है। यह महादान कहा जाता है । माणिक के दान देने से भी मोक्ष की प्राप्ति हुआ करती है ॥१०५।१०७ हीरा ये दान देने से अटल लोक की प्राप्ति हुआ करती है, मूगा के दान से रुद्र लोक मिला करता है ॥१०॥ किसी सवारी और मुन्ना के दान से चन्द्र- लोर गिला मरता है। वेडूर्य मणि का दाता और पुण राग का दाता म दोनों रुद्रलोक को पाया परते हैं ॥१०६ पुष्पराग रत्न के दान देने से सब जगह मुख की प्राप्ति हुआ करती है। हे राजन् । जो अश्व का दान देता है उस प्राणी को बहुत अधिक समय तक अश्विनीकुमारो ये लोग की प्राप्ति हुआ करता है ॥१०॥ गज में दान को यडा महत्व होता है उस दान में होता यो सभी कामनाये पूर्ण होजाया करती है । गाडी के दान देने से स्वण पो गाही म समारूढ होपर स्वर्ग लोक या गमन दिया परता है ।।१११॥ जा मनुष्य भैम का दान देता है यह मनुप्प अपमृत्यु पर विजय पा लेना है। गौत्रा को पास दिलाने में रुतोर मिना परता है ।।११२ वारण लोकमायोति महीश लवणप्रद ।
२८२
[ नारद पुराण
स्वाश्रमाचारनिरता सर्वभूतहिते रता ॥११३
अदाम्भिका गतासूया प्रयान्ति ब्रह्मण पदम् ।
परोपदेशनिरता वीतरागा विमत्सरा ॥११४
हरिपादार्चनरता प्रयान्ति सदन हरे ।
सत्सङ्गालादनिरता सत्कमसु सदोद्यता ॥११५
परापवादविमुखा प्रयान्ति हरिमन्दिरम् ।
नित्य हितकरा ये तु ब्राह्मणेषु च गोषु च ॥११६
परस्त्रीसङ्गविमुखा न पश्यन्ति यमालयम् ।
जितेन्द्रिया जिताहारा गोपु क्षान्ता सुशीलिन ।।११७
हे राजन् । नमक के दान से वरुण लोक मिला करता है ।
जो अपने आश्रम के समाचरण मे परम तत्पर, समस्त प्राणियो के
मङ्गल म मग्न, पाखण्ड और असूया से जो रहित है वे लोग सीधे
ब्रह्मलोक को गमन किया करते हैं । जो राग और मत्सरता से रहित
होकर भगवान विष्णु के चरणो की शुश्रूषा मे रत रहा करते हैं और
अन्य जनो को भी ऐसा ही उपदेश दिया करते हैं वे सीधे श्री हरि
भगवान के भवन को जाया करते हैं । जो सत्सङ्ग आनन्द मे मग्न हो
जाया करते है तथा सदा सत्कर्मों के करने में ही परायण रहा करते
है नया दूसरो की निन्दा से दूर हो रहा करते हैं वे लोग भी विष्णु
लोक को गमन किया करते हैं । जो गो और ब्राह्मणो का सर्वदा हित
क्यिा करते हैं तथा पराई स्त्री के सङ्ग से मुक्त रहा करते हैं क्या
जो सदा सयम से रहा करते हैं उनको कभी भी यमलोक के
दशन करने का अवसर नही मिला करता है । जो अपनी इन्द्रियो को
नियन्त्रण म रक्खा करते हैं और माहार के लोलुप नहीं हुआ परत है।
गौ और ब्राह्मणा पर समा क्यिा करत हैं ये सदाचरण स रहने बाल
मानव भी हरि के भवन का जाया करते हैं ।।११३-११७
ब्राह्मगेषु क्षमाशीला प्रयाति भवन हरे ।
नारद पुराण ] २६३ अग्निशुश्रू पवश्चैव गुरुशुश्रूपकास्तथा ॥११८ पतिशुधपणरता न वै ससृतिभागिन । सदा देवार्चनरता हरिनामपरायणा ११६ प्रतिग्रहनिवृताश्च प्रयान्ति परम पदम् । अनाथ विप्रकुणप ये दहेयुनु पोत्तम ॥१२० अश्वमेधसहस्राणा फलमश्नुवते सदा । पत्र पुप्पै फ्लैर्वापि जलेर्वा मनुजेश्वर ।।१२१ पूजया रहित लिगमचर्यत्तत्फल शृणु। अप्सरोगणगन्धर्व स्नूमानो विमानग ॥१२२ प्रयाति शिवसान्निध्यमित्याह कमलोद्भव । चुलुकोदकमानेण लिङ्ग सस्नाप्यभूमिप ।।१२३ लक्षाश्वमेधज पुण्य सप्रा नोति न संशय. । पूजया रहित लिङ्ग कुसुमर्योऽयेत्सुधी ॥१२॥ अश्वमेधायुतफल भवेत्तस्य जनेश्वर। भक्ष्यभॊज्य फलेवापि शून्य लिङ्ग प्रपूज्य च । शिवसायुज्यमाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥१२५ जो पुरुष अग्नि होम करने वाले और अपने गुरु की सेवा में रति रखने वाले हुआ करत हैं और जो स्त्रिया अपन पति को सेवा में मदा परायण रहा करती हैं वे मसार के चक्र स छुटकारा पा लिया परती हैं । जो सर्वदा देवी की पूजा विया वरत है, जो सदा श्री हरि के उच्चारण करने में ही सनग्न रहा करते हैं, जो दूसरो के दिये प्रतिमह स दूर रहा बरत है वे मब परम पद को प्राप्त हो जाया करत है । जो मनुष्य किसी भी भनाथ शव का दाह पर दिपा परत है हे नृपवर । उनको एक महन्न अश्वमध यशा करने का पुण्य मिला परता है । जिमको काई न पूजे ऐम शिवलिङ्ग को जा पर-पुष्पादि से अचन करता है उमा पुण्यपन का प्रवण परो । ब्रह्माजीन कहा है- f २८४ [ नारद पुराण अप्सरा, गन्धर्व उस पूजा करने वाले भक्त की स्तुति किया करते है और विमान मे बैठकर सीधा शिव के समीप मे पहुँच जाया करता है ११८॥१२२ ॥ हे राजन् ! जो एक चुल्लू भर पानी से भगवान् शिव के लिंग को स्नान कराता है उसे एक लाख अश्वमेधो का फल मिला करता है । जो सुन्दर वुद्धि वाला पुरुप पूजा से रहित शिव के लिंग की पुप्पो से पूजा करता है हे जनेश्वर । उसको दश सहस्र अश्वमेध यज्ञो के करने का पुण्य-फल मिला करता है। जो परम शून्य स्थल मे विराजमान शिवलिंग का भक्ष्य-भोज्य और फलो के द्वारा यजन करता है वह शिव के सायुज्य को प्राप्त करता है जहाँ से फिर पुनरागमन नही हुआ करता है ॥१२३।१२५ पूजया रहित विष्णु योर्चयेदवंशज । जलेनापि स सालोक्य विष्णोर्याति नरोत्तम ॥१२६: देवतायतने यस्तु कुर्यात्समार्जनं सुधीः । यावत्पासु युगावास वैष्णवे मन्दिरे सभेत् ॥१२७ शीर्ण स्फटिकलिग तु य संदध्यान्नृपोत्तम । शतजन्माजितैः पापमुच्यते स तु मानवः ।।१२८ यस्तु देवालये राजन्नपि गोचर्ममात्रकम् । जलेन सिञ्चेद् भूभागं सोऽपि स्वर्ग लभेन्नरः ।।१२६ गन्धोदकेन यः सिञ्चेद्देवतायतने भुवम् । यावत्कणानुकल्प तु तिष्ठेत देवसन्निधौ ॥१३० मृदा धातुविकारर्वा यो लिम्पेद्देवतागृहम् । स कोटिकुलमुद्धृत्य याति साम्य मधुद्विपः ॥१३१ शिलाचूर्णेन यो मयों देवागार तु लेपयेत् । स्वस्तिकादीनि वाकुर्यात्तस्य पुण्यमनन्तकम् ॥१३२ यः कुर्याद्दीपरचना देवतायतने नृप । तस्य पुण्य प्रसम्यातु नोत्सदेन्दशतरपि ॥१३३ .
नारद पुराण । २८५ हे सूर्यवश मे समुत्पन्न भागीरथ । जो पूजा से रहित भगवान विष्णु की पूजा वैवल जल के द्वारा भी किया करता है हे नरोत्तम । उसको भी भगवान विष्णुलोक प्रदान करा दिया करते हैं । जो मनुष्य किसी भी देवालय मे बुहारी लगाकर मार्जन किया करता है तो वह जितने भी धूलि ने कणो यो वुहारा करता है उतने ही युगो । तक वह भगवान विष्णु के मन्दिर मे निवास प्राप्त किया करता है ॥१२६।१२७॥ जो किमी जीर्ण-शीर्ण स्फटिक से निर्मित लिंग को ठीक कर दिया करता है हे नृपवर । वह मनुष्य अपने सौकडो जन्मो के पापो से मुक्त होकर सद्गति पा लिया करता है ।।१२८।। हे राजन् । जो किमी भी देवालय में गोचर्य मात्र भूमि पर जल से छिडकाव कर दिया करता है वह जितने भी धूलि के कणो पर छिडकाव किया करता है वह उतने ही कल्लो तक देव के समीप मे निवास किया करता है ॥१२६१३०॥ जो पुरुष किसी भी देव मन्दिर को मिट्टी से अथवा पीतल तावे के पत्तो आदि से मजाता है वह अपने करोडो कुलो का उद्धार कर मधु के वध करने वाले भगवान विष्णु के सायुज्य को पा लिया करता है ।।१३१॥ जो मनुष्य किसी देव मन्दिर को चूने ( सफेदी) से पुनवा देता है तथा स्वस्तिक आदि की रचना कराता हैं ॥१३२।। हे नृपोत्तम । जो मनुष्य किसी भी देव के मन्दिर से दीप रचना किया करता है उसका फल तो मैं सौ वर्षों में माननी कर सकता हूँ ।।१३३ अखण्डदीप य कुर्याद्विष्णोर्वा शकरस्य । क्ष क्षगेश्वमेधस्य फल तस्य न दुर्लभम् ।।१३४ अचित शकर दृष्ट्वा विष्णु वापि नमेत्तय । स विष्णुभवन प्राप्य मोदत च युगायुतम् ॥१३५ देव्या प्रदक्षिणामेका सप्त सूर्यस्यभूमिप । तिस्रो विनायास्यापि चतस्रो विष्णु मन्दिरें ॥१३६ हल्ला हताह प्राप्य सोदो गुगलम १२४७ JA A २८६ [ नारद पुराण यो विष्णोभक्तिभावेन तथव गोद्विजस्य च । प्रदक्षिणा चरेत्तस्य ह्यश्वमेध: पदे पदे ।।१३८ काश्यां माहेश्वरं लिंग संपूज्य प्रणमेत्तु यः । न तस्य विद्यते कृत्यं ससृति व जायते ।।१३६ शिवं प्रदक्षिण कृत्वा सव्ये नव विधानतः । नरो न च्यवते स्वच्छिंकरस्य प्रसादतः ॥१४० जो विष्णु या शिव के मन्दिर में अखण्ड दीपक जलाया करता है उसके लिये प्रत्येक क्षण मे अश्वमेध के यज्ञ का फल प्राप्त करना कोई भी दुर्लभ कर्म नही होता है ॥१३४॥ जो मनुष्य समचित शिव अथवा विष्णु को प्रणाम करता है यह विष्णु के भवन में प्रास होकर दश सहन युगों तक आनन्द प्राप्त किया करता है ॥१३५।। हे राजन् देवों को प्रदक्षिणा करने का क्रम यह है कि सूर्य को सात परिक्रमा पारे । गणेश को तीन प्रदक्षिणा करनी चाहिए। विष्णु की धार और देवी को केवल एक परिक्रमा करे। इस परिग्रमा का ऐसा फल होता है कि प्रदक्षिणा करने वाला मनुष्य उन-उन ही देवो के भुवनी में एक एमा नाय युगो सफ निवारा कर गुष प्राप्त किया करता है ॥१३॥ जो मनुष्य पक्तिमाय के सहिन गो और ब्राह्मण को परिक्रमा क्रिया फरता है उसको एषः २ पद में अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है ॥१३७.१३८॥जो मनुष्य काशी में माहेर लिङ्ग की पूजा उनको प्रणाम करता है फिर उग मनुष्य को हम भूतम में कोई भी पाय करना गेप नही रहा करता है और न वह फिर इस गंगार में ही पोट पर आया करता है ॥१३६।। जो मनुष्य विधि पूर्वक सम्य সংণি দিবা না ? কি মান সী যুবা । এম भी स्वां गेम नही हुमा करता है ॥१४. ग्तुत्या स्तोत्रंजगन्नायं नारायणगनामयम् । गन्नामानवाप्नोति मनगा पदिति ।।१५१ करके नारद पुराण ] २८७ देवतायतने यस्तु भक्तियुक्त प्रनृत्यति । गायते वा स भूपाल रुद्रलोके च मुक्तिभाक् ॥१४२ ये तु वाद्य प्रकुर्वन्ति देवतायतने नराः । ते हसयानमारूढा ब्रजन्ति ब्रह्मण. पदम् ।।१४३ करताल प्रकुर्वन्ति देवतायतने तु ये । ते सर्वपापनिर्मुक्ता विमानस्था युगायुतम् ।।१४४ देवतायतने ये तु घण्टानाद प्रकुर्वते । तेपा पुण्य निगदितु न समर्य. शिव. स्वयम् ॥१४५ भेरीमृदङ्गपटहमुरजश्च सडिण्डिमै । सप्रीणयन्ति देवेश तेपा पुण्यफल शृणु ॥१४६ देवस्त्रीगणसयुक्ता सर्वकाम समचिंता । स्वर्गलाकमनुप्राप्य मोदन्ते कल्पपञ्चकम् ।।१४७ इस सम्पूर्ण विश्व के स्वामी अनामय भगवान नारायण की स्तवो के द्वारा जो स्तवन विया करता है उसमें सभी मनोवाछित मनोरथ पूर्णतया सफल होजाया करते हैं ।।१४१॥ है भूपाल | जो विसी भी देव वे मन्दिर मे भक्तिभाव के सहित नृत्य किया करता है अथवा भगवद् भजन वा गान परता है वह रुद्रलोर में प्राप्त होवर मुक्ति का नाम लिया परता है ॥१४२॥ जो मनुष्य देवालय में कोई भी वाद्य बजाया करते हैं वे हमयुक्त विमान में बैठकर ब्रहालोक में गमन रिया परते है ॥१४३॥ जो मनुष्य देवालय मे वाली वजावर भग- वजन दिया करते हैं ये मय पापो से शुद्ध होकर दश सहन युग पर्यन्त विमानो में बंटा करते हैं ।।१४४॥ जो मनुष्य देव मन्दिरी में घन्टा नाद पिया करते हैं उनके पल या वर्णन करने में साक्षात भग. वान गियी थर जाया करते हैं ॥१४॥ जो मनुप्य भगवान को नगाडे, पयायन, दोष तथा सिंगी नाद यादि चाजे वजापर सिमा परते है उनो पुण्य पन का आप अयण परिण ॥१६॥ घे मनुष्य २६० [ नारद पुराण . धर्मराज ने कहा- हे नृपो मे परमश्रेष्ठ । अब मैं वेदो तथा स्मृतियो मे वर्णन किये गये समस्त वणो के धर्म का वर्णन करता हू और क्रमश पुलाशा बतलाता हूँ। आप समादित होकर श्रवण कीजिए ॥१॥ जो कोई पुरुप भोजन करने के समय मे क्रोधावेश मे या अज्ञान के वशीभूत होकर किसी अशुचि पुरुप अथवा पतित एव चाण्डाल का स्पर्श कर लेता है तो उसके दोप का निवारण करने के लिए क्या प्रायश्चित होता है, यहो बतलाया जाता है ॥२॥ ऐसे स्पर्श दोष से युक्त ब्राह्मण का कर्तव्य है कि वह तीन अथवा छ दिन तक तीनो समयो मे स्नान करके पचगव्य का प्राशन करे तो वह पवित्र हो जाया करता है और स्पश दोष छूट जाता है ॥३।। यदि भोजन करने के समय मे किसी ब्राह्मण का मल बाहिर निकल आवे तो उससे होने वाली अप- विनता का प्रायश्चित मैं बतलाता है। उस विप्र का कर्तव्य है कि सर्व प्रथम वह शौच कर्म पर जल का आचमन कर और फिर दिन रात का उपवास करे और पञ्चगव्य मे गो की ही पांच वस्तुएं होती हैं-गौ दुग्ध, गो दधि गोमय, गो घृत, गोमूत्र । ऐमा करने से शुद्धि हुआ करती है ।।४-५॥ यदि भोजन करने के समय में पेशाब ( प्रश्राव ) बाहिर निकल आवे तो दिनरात का उपवास करके अग्नि में धृत की आहुतियाँ देनी चाहिए ॥६॥ यदि भोजन के समय मे ब्राह्मण अशुचि हाथ मे हुए ग्रास को भूमि में रख देना चाहिए और फिर उठकर स्नान करने से शुद्ध हो जाया करता है ।।७।। भक्षयित्वा तु तद् ग्रासमुपवासेन शुद्धयति । अशित्वा चैव तत्सर्व निरानमशुचिर्भवेत् ।।८ अश्नतश्चेद्वमि स्याद्वै ह्यस्वस्थास्त्रशत जपेत् । स्वस्थस्थीणि सहस्राणि गाय-या शोधन परम् ॥६ चाण्डाले श्वपच स्पृष्टो विषमूने च कृत द्विज ॥११ विराम तु प्रकुर्वीत भक्तोच्छिष्ट पडाचरेत् । हो जाव तो ग्रहण किये नारद पुराण २६१ उदक्या सूतिका वापि सस्पृशेदन्त्यजो यदि ।।११ निरानेण विशुद्धि स्यादिति शातातपोऽब्रवीत् । रजस्वला त सस्पृष्टा श्वभिर्मातङ्गवायस ॥१२ निराहारा गुचिस्तिप्ठेत्काले स्नानेन गुढयति । रजस्वल यदा नायावन्योन्य स्पृशत क्वचित् ।।१३ शुध्येते ब्रह्मर्चेन ब्रह्मकूर्चन चोपरि । उच्छिष्टेन च सस्पृष्टो यो न स्नान समाचरेत् ॥१४ यदि जो प्रथम य स मुख में डालकर खा चुका हो तो फिर शुद्धि के लिये उपपास का करना निता त आवश्यक होता है और यदि खूब डट कर पूरा भोजन कर चुका हो ता तीन दिन पय त अशुद्धि रहा करती है ॥८॥ यदि भोजन करते हुए को दमन हो जाये तो यदि अस्वस्थता होवे तो शुद्धि के लिये तीन सौ गायनो मन का जाप करे और स्वस्थ हो तो उसको तीन सहस्र गायत्री म प्र का जाप करना चाहिए। तभी परम पवित्रता होती है ॥ यदि मन मत्र के त्याग करने के समय में द्विज का किसी चाडाल अयवा श्वपच से स्पश हो जावे तो तीन रात्रि पय त उपवास करना चाहिए। यदि भोजन करने के पश्चात् अथवा उच्छिष्ट दशा म स्पश हो जावे तो छ राति पय त उपवास करना चाहिए । यदि किसी रजम्बला अथवा मूतिका स्त्री को व त्यज स्पश कर लेवे तो वह फिर तीन रानिये वाद शचि हुआ करती है । ऐमा शास्नो के ज्ञाता मुनियो का मत है। यदि ररस्वता का श्वान कौआ और किरात से स्पथ हो जाये तो उस निराहार रहना चाहिए ॥१० १२।। और आहार का त्याग कर फिर उसे समय आने पर स्नान करना चाहिए तभी उसकी शुद्धि हुआ करती है। यदि रजम्वना स्त्रिया परस्पर म स्पश कर नव तो ब्रह्मकूच व्रत के करने शुद्धि हुआ करती है जिसका वणन पराशर स्मृति में किया गया है । से जो उचित पुरुष स र स्नान न कर सके तो ब्रह्मकच व्रत करना चाहिए ।।१३ १४॥
२८९ [ नारद पुराण दिव्य अङ्गनाओ के साथ समम्त कामनाओ को प्राप्त पर पांच कम तर स्वर्ग लोक म निवास किया करते हैं ॥१४७॥ देवतामन्दिरे कुर्वन्नर शयरव नृप। सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुनां सह मोदते ॥१४८ तालकास्यादिनिनद कुर्वन् विष्णुगृहे नर । सर्वपापविनिर्मुक्तो विष्णुलोरमवाप्नुयात् ॥१४६ यो देव सर्वदृग्विष्णुर्ज्ञानरूपी निरञ्जन, सर्वधर्मफल पूर्ण सतुष्ट प्रददादि च ।।१५० यस्य स्मरणमात्रेण देवदेवस्य चक्रिण.। सललानि भवन्त्येव सर्वकर्माणि भूपते ॥१५१ परमात्मा जगन्नाथ सर्वकर्मफफप्रद ।, सत्कर्मकर्तृभिनित्य स्मृत सर्वातिनाशन । तमुद्दिश्य कृन यच्च तदानन्त्याय कल्पते ।।१५२ धर्माणिविष्णुश्च फलानि विष्णु कर्माणिविष्णुश्च फलानिभोक्ता कार्यचविष्णु करणानिविष्णुरस्मान्नकिंचिद्वयतिरिक्तमस्ति ॥१५३ हे राजन् । जो मनुष्य किसी भी देव मन्दिर मे शख की ध्वनि किया करता है वह सभी पापो से छुटकारा प्राप्त करके सदा भगवान विष्णु की सनिधि मे आन द को प्राप्त किया बरता है ॥ १४८ ॥ मनुष्य विष्णु मन्दिर मे कांसे को झांझनादि बजा कर देवेश्वर को रिझा है वे सर्व पाप विमुक्त होकर विष्णु लोर की प्राप्ति किया करते हैं ।१४६ भगवान् विष्णु देव ज्ञान रूपी निरजन और सब दृष्टा हैं उनके पूर्ण सन्तुष्ट एव प्रसन्न हो जाने पर वे सभी धमों का पूण फल प्रदान कर दिय करते हैं ।। १५० ।। ह राजन् । उन शख चक्रादि आयुधो के धारण करने वाले देवेश्वर के स्मरण मात्र सही समस्त कर्म सफल हो जाया करते हैं और फिर कुछ भी शेष नहीं रहा करता है ||१५१॥
नारद पुराण ]
२८६
परमात्मा इस सम्पूर्ण जगत् के स्वामी हैं, सभी कर्मों के फल दाता हैं ।
जो सदा मत्कर्मों का अनुष्ठान करने वाले यदि उनका स्मरण किया
करते हैं तो वे सभी पीडाओ से मुक्त होकर परम मुखी रहा करते हैं
क्योकि भगवान् उनको कोई भी व्यथा रहने ही नहीं दिया करते हैं ।
भगवान् के निमित्त से जो भी कुछ भक्ति पूर्वक किया जाता है वह अनन्त
और अक्षय फल का देने वाला हुआ करता है ॥१५२।। यह परम सिद्धात
मम्पन्न बात है कि धर्म धर्म फल, कर्म और कर्मो का फल, भोक्ता, कार्य
और कारण सब मे भगवान् विष्णु व्याप्त होते हैं तथा भगवान् विष्णु
से भिन्न इस ससार मे अन्य कुछ भी नहीं है ।।१५३।।
॥ द्विज-धर्म निरूपण ॥
श्रुतिस्मृत्युदित धर्म वर्णानामनुपूर्वश ।
प्रब्रवीमि नृपश्रेष्ठ त गृणुष्व समाहित ॥१
यो भुजानोऽशुचिर्वापि चाण्डाल पतित स्पृशेत् ।
क्रोधादज्ञानतो वापि तस्य वक्ष्यामि निष्कृतिम् ॥२
विरान वाथ पडान यथासख्य समाचरेत् ।
स्नान त्रिपवण विप्र पचगव्येन शुध्यति ॥३
भुजानस्य तु विप्रस्य कदाचित्स्रवते गुदम् ।
उच्छिष्टत्वेऽशुचित्वे च तस्य गुद्धि वदामि ते ॥४
पूर्व कृत्वा द्विज शौच पश्चादप उपस्पृशेत् ।
अहोरात्रोपितो भूत्वा पचगव्येन गुध्यति ॥५
निगिरन्यदि मेरेत भुव-वा वा मेहन कृते ।
अहोरानापितो भूत्वा जुडुयात्मपिपाऽनलम् ॥६
यदा भोजनकाले स्वादशुचिह्मिण क्वचित् ।
भूनौ निधाय त ग्रास स्नात्वा शुद्धिमवाप्नुयात् ।।७
२६२
[ नारद पुराण
ऋतौ तु गर्भा शङ्गित्वा स्नान मैथुनिन स्मृतम् ।
अन्तौ तु स्यय गत्वा शौच मूत्रपुरोषवत् ॥१५
उभावप्यमुची स्याता दम्पती याभसगतौ ।
शयनादुत्थिता नारी शुचि स्यादशुचि पुमान् ॥१६
भत्त शरीरशुश्रू पा दौरात्म्यादप्रकुर्वती।
दण्डया द्वादशक नारी वर्ष त्याज्या धन विना ।।१७
त्यजन्तो पतितान्वन्धून्दण्डयानुत्तमसाहसम् ।
पिता हि पतित चाम न तु माता कदाचन ॥१८
आत्मान घातयेद्यस्तु रज्ज्वादिभिरुप मै ।
मृते मेध्येन लेप्तव्यो जीवतो द्विशत दम ॥१६
दण्डयास्तत्पुनमिनाणि प्रत्येक पाणिक दमम् ।
प्रायश्चित्त तत कुर्यु यथाशास्त्र प्रचोदितम् ॥२०
जलाग्न्युद्वन्धनभ्रष्टा प्रव्रज्यानाशकच्युता ।
विपप्रपत नध्वस्ता शस्त्र घातहताश्च ये ॥२१
न ते प्रत्यवसिता सर्वलोकवहिष्कृता ।
चान्द्रायणन शुद्धयन्ति तप्तकृच्छूद्वयेन वा ॥२२
ऋतु काल में यदि कोई गभ की आशङ्का होवे तो मैथुन करने
वाले को स्नान करने का विधान बतलाया गया है । ऋतु में स्त्री के
समीप जान पर मून पुरीष के समान ही पवित्रता करनी चाहिए ॥१५
मैथुन करने के समय मे स्त्री पुरुष दोनो ही अपवित्र हो जाया करत
हैं । नारी तो शय्या को छोडकर उठ जाने पर ही पवित्र होजाया
करती है परन्तु पुरुष अपवित्र ही रहता है ।।१६।। जो स्त्री दुष्ट स्वभाव
के कारण अपन स्वामी की सेवा न करे तो उस प्रकार की स्त्री को
बारह वर्ष तक त्याग देने का दण्ड देना चाहिये । स्त्री का उसके साथ
सम्पप न करन का ही दण्ड होता है। धन का दण्ड उसको नहीं दवे
॥१७॥ पतित और दण्ड के पान बन्धुओ को त्यागकर उत्तम साहस का
गारद पुराण ] प्रदर्शन करना चाहिए । पतित पुत्र को पिता भले ही त्याग देवे किन्तु माता को उसका त्याग नहीं करना चाहिए ॥१८॥ जो रस्सी आदि थे द्वारा आत्मघात करना चाहे -। उसपे मृत हा जाने पर पवित्र वस्तुओ से उसके शरीर का लेपन करना चाहिए और वह जीवित रह जाये तो उसे दो सौ पण दण्ड करना चाहिए ॥१६।। उसके जो पुत्र एव मित्र हो उन पर एक एक पण का दण्ड करना चाहिय । इसके उपरान्त उन्हें शास्त्र मे वणित विधान अनुसार प्राश्चित करना चाहिए तव शुद्धि हुआ करती है क्यो कि आत्मघात करने का बडा अपराध पास्त्र में बताया गया है ।।२०। जो जल, अग्नि और व.धन से मरने की इच्छा करके भ्रष्ट हो गये हा- सन्यासी का व्रत भङ्ग करने से पतित होगय होवें-विषपान वर या यूद कर मरने के पाप से दूपित होगये होवे --जो शस्त्र का प्रहार कर आत्म हत्या करने में दोप से दूपित होगये होवे वे मनुप्य फिर व्यवहार के पात्र नहीं रहा करते हैं। सब को चाहिए इनका बहिष्कार कर देवे ऐस. मरने की चेष्टा करने वाले लोगो की शुद्धि पराशर स्मृति म यणित चान्द्रायण व्रत अथवा दो तप्त कृच्छ व्रतो के करने पर ही विशुद्धि हुआ करती है ॥२१-२२॥ उभयावसित पापश्यामच्छवलकाच्च्युतः । चान्द्रायणाभ्या शुद्धचेत दत्त्वा धेनु तथा वृपम् ।।२० श्वशृगालप्लवङ्गद्य मानुषैश्च रति विना। स्पृष्टा स्नात्वा शुचि सद्यो दिवा सध्यासु रात्रिषु ॥ अज्ञानाद्वा तु यो भुक्त्वा चाडालान्न कथचन । गोमूत्रयावकाहारो मासाद्धन विशुद्धयति ॥२५ गोब्राह्मण राह दग्ध्वा मृत चोद्वन्धनादिना। पाश छित्वा तथा तस्य कृच्छ्मेक चरेद् द्विज ॥२६ चाडालपुल्क्साना च भुक्त्वा हत्वा च योपितम् ।
[ नारद पुराण कृच्छार्द्ध माचरेज्ज्ञानाज्ञानादैन्दवद्वयम् ॥२७ जो पुरुप महा पातक और उप पातक दोनों प्रकार से भ्रता प्राप्त कर चुके होवे अथवा अन्य कनेक प्रकार के पापों के समाचरण करने से भ्रष्ट हो गये होवे उनको शुद्ध होने के लिये दो चान्द्रायण व्रत बोर धेनु या वृष के दान करने पर ही शुद्धता प्राप्त हुआ है ॥२३॥ रति के अतिरिक्त दिन, रात अथवा सन्ध्या के समय में कुत्ता, मोदड, बन्दर और पतित पुरुष से स्पर्श हो जाये तो स्नान वर पर तत्काल मे ही पवित्र हो जाया करते हैं ।।२४।। यदि अज्ञानता वश मे आकर किसी चाण्डाल का अन्न खा लेवे तो पन्द्रह दिन तब गो मूव मे बने जो के भोजन करने से पवित्र हो जाया करता है। गो अथवा किसी ब्राह्मण के घर को प्रज्वलित करने पर अपवा पाश में द्वारा बाधने से मरने की चेष्टा करते हो तो इनके पाश को काटकर द्विज को एक कृच्छ व्रत करना चाहिए ॥२॥२६॥ यदि अज्ञान होने में पारण किसी पुलस या चाण्डाल के अन्त मा भक्षण कर लेथे और इनकी स्थियो को मारे तो शुद्धि के लिये अर्ध कृच्छ प्रत करने का प्राय- श्चित करना चाहिए। यदि ज्ञान पूर्वक भोजन करे तो दो चान्द्रायण व्रतो को करना चाहिए ॥२७॥ कोपालिकान्नभोक्त णा तन्नारोगामिन तथा । अगम्यागमने विप्रो मद्यगोमासभक्षणे ॥२८ सप्तकृच्छपरिक्षिप्तो मौ/होमेन शुद्धयति । महापातककश्चित्वारोऽथ विशेषत. ॥२६ अग्नि प्रविश्य शुद्धयन्ति स्थित्वा वा महति व्रतो। रहस्यकरणोऽप्येव मासमभ्यस्य पूरुषः । अघमपणसूक्त वा शुद्धय दन्तर्जले जपम् ।।३० रजकश्चमंकारश्च नटो बुरुड एप च । कंवर्त मेदभिल्लाश्च सप्तते हास्यजा. स्मृताः॥३१ २६१ नारद पुराण ] मा नाम है । भुक्त्वा चेपा स्त्रियो गत्वा पीत्वा य. प्रतिगृह्यते ॥३२ कृच्छाद माचरेज्ज्ञानादज्ञानाद्वंन्दवद्वयम् ॥३३ अमूपु पितृगोगासु मातृगोरगतामु च ॥३४ परदारेषु मर्वेषु कृच्छाद्ध तपने चरेत् ॥३५ योपालिका अर्थात् एक अन्त्यजो की विशेष जाति इसका अन्न खाने पर, उनकी म्नी के साथ गमन करने पर, जो स्त्री गमन करने के योग्य नहीं होती है उसके माथ गमन करने पर, मदिरा तथा गो मांस का मेवन करने पर ब्राह्मण पी शुद्धि तप्त कृच्छ बन के करने पर और तेल के तातो से होम करने पर शुद्धि हुआ करती है। जो चार प्रकार के महा पातको होते हैं उनकी शुद्धि तो अग्नि मे प्रवेश करने पर अथवा महा ऋतु में प्रवेश पारने पर ही शुद्धि हुआ करती है। यदि एकान्त में कोई भी पाप बन जावे तो एका मास पर्यन्त जलके अन्दर "ऋत च सत्यम्" इत्यादि अद्यामकर्षण मन्त्र का जाप करें तो शुद्धि हुआ करती है ।। २८-३० ॥ धोबी, चमार, नट, पुरुड, कैवतं, मेद और भिल्ल (भील) इन सात को अन्त्यज कहा जाता है ।। ३१ ॥ इन उन उपर्युक्त सात जातियो फा अज्ञान वश अन्न वा भक्षण कर लेवे अथवा इनकी स्त्रियो के साथ संगम कर लेये या इनके घर के जल का पन कर लेवे या इन जातियो का दान ग्रहण कर लेवे तो पराशर स्मृति मे बताया हुआ अर्ध कृच्छ व्रत परे और जान बूझ कर ऐसा करे तो शुद्धि के लिये दो चान्द्रायण व्रत करने चाहिए इस पाप का यही प्रायश्चित है ॥३४॥ माता पिता के गोत्र की पराई दारापो से गमन करने पर भी शुद्धि के लिये अधं वृच्छ यत रना चाहिए ॥३२-३५॥ वेश्याभिगमने पाप व्यपोहन्ति द्विजास्तथा ॥३६ पीत्वा सकृत्सुतप्त च पञ्चरान कुशोदकम् । गुरुतल्पगतो कुर्याद् ब्राह्मणो विधिवद् व्रतम् ॥३७ [ नारद पुराण गोध्नस्य केचिदिच्छन्ति केचिच्चवावकीणिनः । दण्डादूर्ध्व प्रहारेण यस्तु गा विनिपातयेत् ॥३८ द्विगुण गोव्रत तस्य प्रायश्ति विशोधयेत् । अङ्ग मानस्थूलस्तु वाहुमात्रप्रमाणक ॥३६ साकस्सपलाशश्च गोदण्ड परिकीत्तित. । गवा निपातने चैव गर्भोऽपि सभवेद्यदि ॥४० एकैकशश्चरेत्कृच्छ्र एपा गोघ्नस्य निष्कृति. । वन्धने रोधने चैव पोपणे वा गवा रुजाम् ॥४१ द्विजो के वेश्या गमन का पाप भी इस भाति दूर हो सकता है ॥३६॥! गुरु पत्नी गामी ब्राह्मण एक बार तो अत्यधिक गरम जल और पांच रात तक कुशोदक का पान कर विधि पूर्वक व्रत करना चाहिए ॥३७॥ कोई-कोई आचार्य गौ का वध करने वाले और अवकीर्णी (धर्म से भ्रष्ट) वो भी इसी प्रायश्चित को कहा करते हैं। जो कोई गाय के ऊपर दण्ड से चोट मारे और वह प्रहार से भूमि पर गिर पड़े तो उसकी शुद्धि दुगुणित प्रायश्चित्त से हुआ करती है । एक अगुछ यरावर स्थूल और मुजा के समान प्रमाण याला गीला ढाक मा दण्ड ही गोदण्ड कहा जाया करता है । यदि गाय को इतना या ऐसा पीटा जावे कि उमका गर्भ गिर जाये तो उसकी शुद्धि के लिए एक कृच्छ व्रत करना आवश्यक है । यह तो केवल कष्ट देने मात्र को ही प्रायश्चित्त होता है। बांधने से, रोपने से, पोपण करने मे अथवा पीटा देने से गाय पा प्राणान्त हो जावे तो एक-एक पाद पृच्छू ग्रत परे ॥४०.४१॥ सपद्यते चेन्मरण निमित्त नव लिप्यते । मूच्छिन पतितो वापि दण्डेनाभिहतस्ततः ॥४२ उत्याय पट्पद गच्छेत्रात पञ्चदशापि वा। ग्रास वा यदि गृह्णीयात्तीय वापि पिवेद्यदि ॥४३ सर्वव्याधिग्रनष्टाना प्रायश्चित्त न विद्यते। - के नारद पुराण ] २६७ काष्ठलोप्टाश्मभिर्गा शस्त्रैर्वा निहता यदि ॥४४ प्रायश्चित स्मृत तनशस्त्रे शस्ने निगद्यते । काप्ठे सान्तमन प्रोक्त प्राजापत्य तु लोप्टके ॥४५ तप्तकृच्छ्र तु पापागे शस्त्र चाप्यतिकृच्छकम् । औपधा स्नेहमाहार दद्याद्नोब्राह्मणषु च ॥४६ दीयमाने विपत्ति स्यात्प्रायश्चित्त तदा नहि । तैलभेषजपाने च भेषजाना च भक्षो ॥४७ निशल्यकरणे चैव प्रायश्चित्त न विद्यते । वत्साना कण्ठवन्धेन नियया भेषजेन तु ॥४८ साय सगोपनार्थ च त्वदोपो रोपवन्धयो । पादे चैवास्य रोमाणि द्विपादे श्मश्रु केवलम् ॥४६ यदि दण्ड से पिटने पर मूछित होकर गिरने पर फिर उठकर दश पांच कदम तक चल लेवे और घास खाकर जल पान कर लेवे तो इस तरह से उमके पिटने की व्याधि दूर हो गई है अत फिर कोई भी प्रायश्चित परने की जरूरत नही रहती है । यदि काष्ठ पापाण डला या शस्त्र से गाय की मृत्यु हो जावे तो शास्त्र मे उनके भिन्न भिन प्रायश्चित कहे गये हैं । यथा काप्ठ से मौत हाने पर सा तमन व्रत दण्ड से मरने पर प्राजापत्य व्रत करना चाहिए ॥४२-४५।। पाषाण के द्वारा मृत्यु होने पर तप्त वृच्छ और शस्त्र द्वारा मर जाने पर अति कृच्छ व्रत करना चाहिए। गौ तथा ब्राह्मणो के निमित्त औषध घृत तैलादि स्नेह एव बाहार का वितरण परे ।। ४६ ॥ यदि तल या किसी औपध के खाने पीने से ऐसी विपत आ जावे तो उस देने वाले को किसी प्रायश्चित करने की आवश्यकता नहीं होती है । यदि बछडी के गले म बाधकर कोई दवा पिलाई जावे अथवा सायङ्काल म रक्षा के लिए कण्ठ म रस्सी वाधी जावे तो उमदे राप अथवा बधन से भी कोई दोष नहीं हाना है। एक पाद जो प्रायश्चित होता है उमम लामो का मुण्डन कराव । द्विपाद प्रायश्चित म मूछ मुडावे ।।४७-४६।।
२६८ [ नारद पुराण त्रिपादे तु शिखावर्त मूले सर्व समाचरेत् । सर्वान्केशान्समुद्धत्य छेदयेदगुलद्वयम् ॥५० एवमेव तुं नारीणा मुण्डन शिरस स्मृतम् । न स्त्रिया वपन कार्य न च वीरासन स्मृतम् ॥५१ न च गोष्ठे निवासोऽस्ति न गच्छन्तीमनृन्नजेत् । राजा वा राजपुत्रो वा ब्राह्मणो वा वहुथ त ॥५२ अकृत्वा वपन तेपा प्रायश्चित विनिद्दिशेत् । केशाना रक्षणार्थ च द्विगुण व्रतमादिशेत् ॥५३ द्विगुणे तु व्रते चीणे द्विगुणा व्रतदक्षिणा ॥५४ पाप न क्षीयते हन्तुर्दाता च नरक व्रजेत् । अश्रौतस्मात विहित प्रायश्चित्त वदन्ति ये ॥५५ विपाद मे शिखा का मुण्डन करावे । पूर्ण प्रायश्चित मे पूरा मुण्डन कराना चाहिए। स्त्रियो के सब केशो को पकडकर दो अगुल काट देना चाहिए । नारियो का यही शिरोमण्डन शास्त्र विधान में बताया गया है । इसके अतिरिक्त स्त्रियो के लिए मुण्डन और वीरासन करना शास्त्र मे निपिद्ध होते है ॥५०-५४॥ स्त्री गोट मे न रहे और गाय के पीछे-पीछे घूमे । यदि राजा या राज-पुन अथवा बहुश्रुत ब्राह्मण को पाप दुर्भाग्य से लग जाये तो उनका प्रायश्चित मुण्डन रहित कराना चाहिए और वेशो की रक्षा के बदले में दुगुना न करना चाहिए ॥५५-५६।। दुगुने यत प्रायश्चित में जब किये जाते हैं तो उन व्रतो को दक्षिणा भी दुगुनी होनी चाहिए ॥५७।। अगर श्रुति, स्मृतियो मे जो नहीं बताया गया है ऐगा प्रायश्चित बताया जाता है तो अपराधी के पाप वा कभी भी क्षय नही हुआ परता है और यह प्रायश्चिती का उपदेश देने वाला स्वय नरस गामी हो जाया करता है ॥५५॥ तान्धर्मविघ्नकर्तृश्च राजा दण्डेन पीडयेत् । न चतान्पीडयेद्राजा वयचित्याममोहित ॥५६
नारद पुराण ]
२६६
तत्पाप शतधा भूत्वा तमेव परिसर्पति ।
प्रायश्चित्ते ततश्चोणे कुर्याद् ब्राह्मणभोजनम् ॥५७
विशतिर्गा वृप चैक दद्यात्तेषा च दक्षिणाम् ।
किमिभिस्तृणसभूतैर्मक्षिकादिनिपातित ॥५८
कृच्छूद्ध स प्रकुर्वोत शक्तया दद्याच्च दक्षिणाम् ।
प्रायश्चित्त च कृत्वा वै भोजयित्वा द्विजोत्तमान् ॥५६
सुवर्णमानिक दद्यात्तत शुद्धिविधीयते ।
चाण्डालश्वपचे स्पृष्ट निशि स्नान विधीयते ॥६०
न वसेत्तर रानौ तु सद्य स्नानेन शुद्धयति ।
वसेदथ यदा रात्रावज्ञानादविचक्षण ।
तदा तस्य तु तत्पाप शतधा परिवर्तते ।।६१
उद्नच्छन्ति च नक्षत्राण्युपरिष्टाच्च ये ग्रहा ।
सस्पृष्टे रश्मभिस्तेपामुदकस्नानमाचरेत् ॥६२
याश्चान्तर्जलवल्मीकमूपिकोपरवर्मसु श्मशाने ।
शौचशेषे च न ग्राह्या सप्त मृत्तिका ॥६३
इस तरह के अशास्त्रोक्त प्रायश्चितो को बनाकर धर्म के कार्य
मे जो विघ्न डाला करते हैं उनको तत्कालीन राजा को दण्ड अवश्य ही
देना चाहिए। यदि मोह के कारण इन लोगो को दण्ड नही देता है तो
वही पाप सैक्डो भागो मे बँट जाता है और राजा पर भी जाकर चढ
बैठा करता है । प्रायश्चित पूर्ण कर लेने के पश्चात् ब्राह्मणों को भोजन
करावे तथा उनको समुचित दक्षिणा भी देनी चाहिए ॥५६-६०॥ एक
वृप और वीस गायो को दक्षिणा देवे । यदि गौ के शरीर पर प्रहार
करने से कोई क्षत हो गया हो और उस घाव में घास से कोडे पड
जायें और उसमे भक्खी पड जावे तो अर्धकृच्छ व्रत का प्रायश्चित करना
चाहिए यथा शक्ति दक्षिणा देकर ब्राह्मणो को भाजन करावे तथा घोडा
सुवर्ण भी देवे तभी शुद्धि होती है । यदि किसी चाण्डाल अथवा श्वपच
[ नारद पुराण से रात्रि के समय मे स्पर्श हो जावे तो प्रात काल मै स्नान करने से शुद्धि होती है ॥६१-६३।। यदि उनके स्पर्श होन पर रात्रि मे न रहे तो तत्काल ही में स्नान करके शुद्ध हो जाया करता है। यदि चातुर्य हीन पुरुष अज्ञान होने के कारण रात्रि मे चाण्डालो के पास में रहता है तो उनका पाप शत गुना होकर लिपट जाया करता है 11६१॥ मनुष्यो के ऊपर जो भी ग्रह तथा नक्षत्र निकले उनकी किरणो का स्पश हो जाने पर फिर जल से स्नान करे ॥६२।। जल वे अन्दर रहने वाली, सप के वमई को चूहे के बिल की, करलड भूमि की मार्ग, की श्मशान भूमि की और शौच शेष की इन सात स्थलो को मिट्टो कभी ग्रहण नहीं करनी चाहिए ॥६३ इष्टापूर्त तु कर्त्तव्या ब्राह्मणेन प्रयत्नत । इप्टेन लभते स्वर्ग मोक्ष पूर्तेन चाप्नुयात, ॥६४ वित्तक्षेपो भवेदिष्ट तडाग पूर्तमुच्यते । आरामश्च विशेषेण देवद्रोण्यस्तयैव च ॥६५ वापीकूपतडागानि देवतायतनानि च । पतितान्युद्धरेद्यस्तु स पूर्तफलमश्नुते ॥६६ शुक्लाया आहरेन्मून कृष्णाया गो शकृत्तथा। ताम्रायाश्च पयो ग्राह्य श्वेतायाश्च दधि स्मृतम् ॥६७ कपिलाया घृत ग्राह्य महापातकनाशनम् ॥६८ शस्तीर्थनदीतोय सर्वद्रव्य पृथक्-पृथक् । आहृत्य प्रणवेनैव उत्थाप्य प्रणवेन च ॥६६ प्रणवेन समालोड्य प्रणवेनैव सपिवेत् ॥७० ग्राहाण का वर्त्तव्य है कि उस इष्ट और पूर्त वर्मों को प्रबल प्रयत्नी के साथ करना चाहिए। इष्ट कम ये परन स स्वग वास बा लाभ हुआ करता है तथा पूर्त कार्यों के करने गे मोक्ष मिना परता है ।।६।। धन का दान दना इस कहा जाता है तथा तासाय, उद्यान नारद पुगण ] ३०१ तथा देवार्पण की हुई गावडी पूर्त कर्म कहा जाया करता है ॥६५॥ जो कोई तालाब, बावडी और कूप तया देवालय जीर्ण-शीर्ण दशा मे होकर नष्ट हो रहे हो उनका जो उद्धार कराता है यह भी पूर्त कर्म कहा जाया करता है । इस का वही पल भी मिलता है ॥६६।। शुक्ल वर्ण वाली गौ का मून और कृष्ण वर्ण की गौ का गोवर ग्रहण करना चाहिए। ताम्र के समान जिस का वर्ण हो उम गौ का दूध और सफेद रङ्ग वाली गो का दही लना चाहिए । जो कपिला गौ हो उसका सदा धृत लेवे । ये सब महा पातका के नाश करने वाले हात हैं । पञ्चगव्य जो बनाया जाये तो ऐमा ही बनाना चाहिए वहीं पञ्चगव्य परमोत्तम हुआ करता है ।।६७-७८॥ कुश, नदी और तीर्थ जल इनसे सभी द्रव्यो का पृथक २ लना चाहिए । जब भी इन वस्तुआ को उठावे तो उम समय म प्रणव का उच्चारण करना चाहिए और प्रणव (ॐकार के) जप करत हुए ही आलोडन परे तथा प्रणव का उच्चारण कर के पान भी करना चाहिए ।।६६ ७०।। पालाशे मध्यमे पर्णे भाण्डे ताम्रमये शुभे । पिवेत्पुपरपणे वा मृन्मये वा कुशोदकम् ॥७१ सूतके तु समुत्पन्ने द्वितीये समुपस्थिते । द्वितीये नास्ति दोपस्तु प्रथमेनैव शुध्यनि ॥७२ जातेन शुध्यते जात मृतेन मृतक तथा । गर्मसम्रग मासे योण्यहानि विनिर्दिशेत् ॥७३ रातिभिर्मासतुत्याभिर्गमस्रावेविशुद्धयति । रजस्युपरतेमाध्वी लानेन स्त्री रजस्वला ॥७४ स्वगोत्राद् भ्रश्यते नारी विवाहात्सप्तमे पद । स्वामिगोत्रण क्तव्यास्तस्या पिण्डोदर क्रिया ॥७५ उद्देश्य पिण्डदान स्यात्पिण्डे पिण्डे द्विनामत । पण्णा देशास्त्रय पिण्डा एव दाता न मुह्यति ॥७६ ३०२ [ नारद पुराण स्वेन भर्ना सहस्राब्द माता भुक्ता सुदैवतम् । पितामह्यपि स्वेनैव स्वेनैव प्रपितामही ।।७७ वर्षे वर्षे तु कुर्वीत मातापित्रोस्तु सत्कृतिम् । अदैव भोजयेच्छाद्ध पिण्डमेक तु निर्वपेत् ।।७८ इस पञ्चगव्य को पलाश (ढाक) के पत्ते में जो एक दोना के रूप में होता है लेवे अथवा ताम्र के परम शुभ पात्र मे, मृत्तिका के पान मे कुशोदक का पान करना चाहिये ।।७१।। किसी एक आशौच ( सूतक ) में यदि कोई दूसरा भी सूतक आजावे तो फिर दूसरे का दोष नही लगा करता है ।।७२॥ जना शौच के साथ ही जनना शौच उतर जाया करता है तथा इमो भांति मृता शौच के साथ मृता शौच दूर हो जाया करता है। गर्भ का स्राव होजावे तो तीन दिन के लिये सूतक लगा करता है ॥७३॥ जितने मास के गर्भ क स्राव होता है उतने ही दिन का सूतक भी होता है फिर उतनी ही रानियो के पश्चात् शुद्धि हो जाया करती है ॥७४।। सप्तपद में नारी अपने पिता के गोत्र मे पृयक होजाया करती है। इसके पश्चात् उमका पिण्डदान और जलदान उसे अपने स्वामी के गोत्र से ही करना चाहिए ।।७।। प्रयेव पिण्ड पर दो दो नाम बोलना चाहिए। माता-पिता को, पिता- मह पितामही को और प्रपितामह प्रपितामहो वो तीन पिंड देवे । इस रीति से दाता कभी मोह मे नही पडा करता है ॥७६ ॥ माता अपने स्वामी अर्यात पिना के साथ महतो वप ता पिंड का उपभोग किया करती है । इमी रीति से पितामही अपने स्वामी ( पितामह ) के माथ म और प्रपितामही अपन स्यामी (प्रपितामह) के साय मे पिंड का उप. भोग दिया करती है ॥७॥ प्रत्या वष में माता-पिता मरण के दिन दिन श्राद्ध मसार करना चाहिए। विमाया हित श्राद्ध में जिमाव तथा एपिंड दान देरे ॥७८ नित्य नमितिा म्य नृदियाउगथाम् । .
नारद पुराण ]
३०३
पार्वण चेति विज्ञेय श्राद्ध पचविध बुधै ॥७६
ग्रहोपरागे सक्रान्तौ पर्वोत्सवमहालये।
निर्वपेत् त्रीन्नर पिण्डानेकमेव मृतेऽहनि ।।८०
अनूढा न पृथक्कन्या पिण्डे गोगे च सूतके ।
पाणिग्रहणमन्त्राभ्या स्वगोगाद्मश्यते तत ॥८१
येन येन तु वर्णन या कन्या परिणीयते ।
तत्सम सूतक याति तथा पिण्डोदवेऽपि च ।।८२
विवाहे चैव सवृत्ते चतुर्थेऽहनि रानिपु ।
एकत्व सा व्रजे तु पिण्डे गोरे च सूतके ॥८३
प्रथमेऽह्नि द्वितीये वा तृतीये वा चतुर्यके ।
अस्थिसचयन कार्य वन्बुभिहितबुद्धिभि ॥८४
विद्वान पुरुपो का पाच नरह से थ द्ध ससझ लेना चाहिए ।
वे पाँच ये होते हैं-नित्य, नैमित्तिक काम्य, वृद्धि श्राद्ध और पार्वण
थाद्ध ।।७६।। ग्रहण सकाति, महालय पर्वोत्सव (कनागत) म मनुष्य वो
तीन पिण्ड देने चाहिए ।।८०॥ जिस कन्या का विवाह नहीं हुआ हो
वह पिण्ड, गोत्र और सूतक म पृथक नही होती है और जिस समय
म उस कन्या का पाणिग्रहण होजाया करता है तो वह फिर अपने
गोत्र स पृथक् हो जाया करती है और अपने स्वामी के गात्र म जाकर
मिल जाया करती हैं ॥१॥ जिस जिस वण की कन्या विवाही जाया
करती हैं उन २ वर्गों के अनुसार ही सूतक, पिण्ड तथा उदव क्रियाऐ
हुआ करती है ॥२॥ विवाह के सम्पन्न हाने पर चौथे दिन म रानि
के समय में कन्या पिण्ड, गोन और सूतक म अपने पति से मिल जाया
करती है ॥८६॥ मरण हान पर हिनचिन्तक य.धुना का प्रथम, द्वितीय,
तृतीय अथवा चतुथ दिन मे अस्थि सचय करना चाहिए ।।८४
चतुर्थे पञ्चम चव सतमे नवमे तथा ।
अस्थिसचयन प्रोक्त वर्णानामनुपूवश ॥८५
३०४
[ नारद पुरान
एकादशाहे प्रेतस्य यस्य चोत्सृज्यते वृष ।
मुच्यते प्रेतलोकात्स स्वर्गलोके महीयते ॥६६
नाभिमाने जले स्थित्वा हृदयेन तु चिन्तयेत् ।
आगच्छन्तु मे पितरो गृह्णन्त्वेताजलाजलीन् ॥५७
हस्तौ कृत्वा तु मयुक्तौ पूरयित्वा जलेन च ।
गोशृङ्गमानमुद्धृत्य जलमध्ये विनि क्षिपेत् ।।८०
आकाशे च क्षिपेद्वारि वारिस्थो दक्षिणामुख ।
पितृणा स्थानमाकाश दक्षिणादिक् तथैव च ॥८६
आपो देवगणा प्रोक्ता आप पितृगणास्तथा ।
तस्मादस्य जल देव पितृणा हितमिच्छता ॥६०
दिवासूर्याशुसतत रात्रौ नक्षनमारुते ।
मध्ययोरप्युभाभ्या च पविन सर्वदा जलम् ॥६
चतुर्थ, पचम और सप्ताह तथा नवम दिन मे भी वर्गों के क्रम
से अस्थियो का मचया बताया गया है ।।८। जिस प्रेत के एकादशाह
में वृप या उत्सग किया जाता है वह प्रेत लोक से मुक्त होपर स्वर्ग
निवास का आनन्द भोगा करता है ।।८६॥ नामि पर्यन्त जल में खडे
होकर हृदय मे विचार करे कि मेरे पितरगण आयें और मेरे द्वारा
प्रदत्त जलाजलियो को ग्रहण करे ॥७॥ अपन दोना हाथी को मिला
पर जल से भरे और गो की मीग की ऊँचाई तक उछाल कर
जस में ही उस जत का छोड देवे ।।८।। दक्षिण दिशा को और मुग्न
करये आयाम म जन को प्रक्षिप्त पर दा वाहिए क्यो विराण
दिशा म ही आपाश में पिता का म्यान है ॥८६जग हो देवता
और जल को ही पितरगण कहा गया है अनाय जो अपन पितृगण की
भनाई माहता है उस जन मा दा रना चाहिए। जलान ग पितर
तृप्त हा जाग परत हैं ॥३०॥ नन दिउ म गयं३३ को रिणी +
तापन ARPIT रहा करता है ना राममा EITTो
३०५
मारद पुराण ]
की वायु से वह विशुद्ध होता है एव दानो सन्ध्याओ मे भी दोनो के
योग होने से उसकी शुद्धि होती है अतएव सदा परम पवित्र रहता
है ।।६१
स्वभावयुक्तमव्यक्तममध्येन सदा शुचि ।
भाडस्थ धरणीस्थ वा पवित्र सर्वदा जलम् ॥६२
देवताना पितृणा च जल दद्याज्जलाजलीन् ।
असस्कृतप्रमीताना स्थले दद्याद्विचक्षण ॥६३.
श्राद्ध हवनकाले च दद्यादेकेन पाणिना।
उभाभ्या तर्पणे दद्यादेप धर्मो व्यवस्थित ॥६४
किमी भी अशुचि वस्तु जिससे जल का स्पश न हुआ हा और
वह अपने ही स्वभाव में स्थित हो, चाहे वह किमी भी पात्र मे रहे
या भूमि में रहे वह सर्वदा परम पवित्र होता है। चतुर पुरुष का
कर्तव्य है कि वह देवगण एव पितृगण को जलाजलि अर्पित करे ।
जो बिना ही मस्वार हुए मृत हो गये हो उनको स्थल में जल की
अजलि देनी चाहिये ॥६२-६३॥ श्राद्ध और हवन मे एक हाथ से
जल देना चाहिये और जब केवल तर्पण करना हो तो दोनो ही हाथों
से जल दान करना चाहिए, यह इसी प्रकार से धर्म की व्यवस्था
है ।।
॥ पापियों को नरक दण्ड वर्णन ॥
पाप भेदान्प्रवक्ष्यामि यथा स्थूलाश्च यातना ।
शृणुस्व धैर्यमास्थाय रौद्रा ये नरका यत ॥१
पापिनो य दुरात्मानो नरकाग्निषु सन्ततम् ।
पच्यन्ते येपु तान्वक्ष्ये भयकरफलप्रदान् ॥२
३०६
[ नारद पुराण
तपनो वालुकाकुम्भौ महारौवरौरवौ ।
कुम्भीपाको निरुच्छ्वासः कालसूत्रः प्रमर्दनः ॥३
असिपनवनं घोर लालाभक्षो हिमोत्कटः ।
मूढावस्था वसाकूपस्तथा वैतरणी नदी ॥४
भक्ष्यन्ते मूत्रपान च पुरीपह्नद एव च ।
तप्तशूल तप्तशिला शाल्मलीद्रुम एव च ॥५
तथा शोणितकूपश्च घोर. शोणितभोजन. ।
स्वमासभोजन चैव वह्निज्वालानिवेशनम् ।।६
शिलावृष्टि शस्त्रवृष्टिवहिनवृष्टिस्तथैव च ।
क्षारोदक चोष्णतोय तप्रायः पिण्डभक्षणम् ॥७
अथ शिरः शोपण च मरुत्प्रपतन तथा ।
तथा पापाणवर्णच कृमिभोजनमेव च ।।८
धर्मराज ने कहा- अब मैं ममस्त पापो के भेद-प्रभेद तथा
महान् भीषण यातनाओ मे पूर्ण नरको के विषय में वर्णन करता हूँ।
आप बहुत ही धीरज के साथ उनका श्रवण करिये क्योकि नरको का
वर्णन बहुत ही भयानक सा प्रतीत हुआ करता है और उसे सुनकर दिल
काप उठता है ॥ १ ॥ दुष्ट पापात्मा नर नग्य की भीषण अग्नि मे
निरन्तर जला करते हैं उन्ही महान भयावह नरको का वर्णन अब दिया
जाता है ।१२। उन नरसो का सर्व प्रथम नामो को श्रवण कराया जाता
है, तपन, वालुका, कुम्भ, रौरव, महारोरव, कुम्भीपाक, निम्च्छ्वास,
कालसूत्र और प्रमदन ये नरको के नाम है ।।३।। असिपवन, हिमोत्कट
मूढावस्थ, वसाप, वैतरणी सरिता जहाँ पर मूत्र वा पान परना पड़ता
है. पुरीप नद, ततशून, तहशिला और शारमनी तुम ये गभी नामो
वाते बटे भीषण नरक हैं ॥र-शा शोणित कूप, घार शोणित भोजन,
स्वमाम भोजन, वाहिन ज्याला निवेशन, शिलावृष्टि, शस्पष्टि, वहिन
वृष्टि, शारोदय, उणादयः, तसाय पिy: मक्षण ये सभी नया पे नाम
नारद पुराण ]
३०७
हैं ॥ ६-७ ।। शिरशोपण, मरुत्प्रयतन, पाषाण वर्ष और कृमि भोजन
ये सभी नामो वाले महान् घोर नरक होते हैं ।।८।।
क्षारो दपान भ्रमण तथा ककवदारणम् ।
पुरीपलेपन चैव पुरीपस्य च भोजनम् ॥६
रेत पान महाघोर सर्वसन्धिपु दाहनम् ।
धूमपान पाशवन्ध नानाशूलानुलेपनम् ।।१०
अङ्गारशयन चैव तथा मुसलमर्दनम् ।
वहूनि काष्ठयन्याणि कर्पण छेदन तया ॥११
पतनोत्पन चैव गदादण्डादिपीडनम् ।
गजदन्तप्रहरण नानासश्च दशनम् ॥१२
शीताम्बुसेचा चैव नासाया च मुये तथा ।
घोरक्षाराम्बुपान च तथा लवणभक्षणम् ।।१३
स्नायुच्छेद स्नायुबन्धमस्थिच्छेद तथैव च ।
क्षाराम्बुपूर्णनन्ध्राणा प्रवेश मामभोजनम् ।।१४
पित्तपान महाघोर तथव श्लेप्मभोजनम् ।
वृक्षापात्पातन चव जलान्तर्मज्जन तथा ॥१५
क्षारोदव पान, ध्रमण, करच विदारण पुरीप लेपन, पुरीपा हार,
रेतःपान, महाघोर सर्व मन्धि विदाहन, धूमपान, पाशवन्ध गाना शूलानु
लेपन ये सभी नरव होते हैं 18-१०॥ अगार शयन मुमलमदन, जिसमें
अधिर पाठ पे यन्त्र बने हुए हैं जो छीनकर काटने वाला नरव है
पननोत्पतन जिममे गतं मे गिराया जाया करता है, कार का गार ग
पुमार दिया जाता है। जिग नग्न म गदा नया दण्डे म नाटिस
दिया जाता है ऐगा गदा हारिपीटानाम वा नगर है।
रिक रोग भी नरक है जहां पर दाग प्रारा जनम तरह
विपशामों इमाया जाया परना है ॥११-१॥ मुग सपा नाम
में अधिक शीतल जा घुमेह दिया .ता। अयाा मागे उस परवश
३०८ [ नारद पुराण पिलाया जाता है तथा केवल नमक ही खिलाया जाता है ऐसे भी नरक यमलोक मे होते हैं ||१३|| नरको मे बडी-बडी भयानक यातनाये दी जाया करती है, वहाँ पर शरीर की नस काटी जाती है, नसें बाधी जाया करती हैं, हड्डियाँ तोडी जाती है, अत्यन्त खारी जल मे डुबा दिया जाता है, मास, पित्त, कफ खिलाया जाता है तथा वृक्ष पर चढाकर गिराया जाता है और जल मे डुबा दिया जाता है ॥१४-१५।। पापाणधाण चैव शयनं कण्ठकोपरि। पिपीलिकादशन च वृश्चिकैश्चापि पीडनम् ।।१६ व्याघ्रपीडा शिवापीडा तथा महिपपीडनम् । कर्दमे शयन चैव दुर्गन्धपरिपूरणम् ॥१७ वहुशश्चार्धशयन महातिक्तनिषेवणम् । अत्युष्णतैलपान च महाकटुनिपेवथम् ।।१८ कपायोदकपान च तप्तपापाणतक्षणम् । अत्युष्णशीतस्नान च तथा दशनशोर्णनम् ।।१६ तप्ताय शयन चैव ह्ययोभारस्य वन्धनम् । एवमाद्या महाभाग यातना. कोटिकोटिश. ॥२० अपि वर्पसहस्रण नाह निगदितु क्षमः । एतेषु यस्य यत्प्राप्त पापिनः क्षितिरक्षक ॥२१ ऐसे भी नरक होते हैं जहाँ पर शिर पर भारी पत्थर की शिलाऐ रस दी जाती हैं, काटो पर मुलाया जाता है, चीटियो से कटाया जाता है औरभयानप बिच्छुओ से दशन गया जाता है ॥१६॥ ध्याघ्र- गीदड और भैसो से मुटभेट पराई जाती है वीच मे लिटा दिया जाता है और घोर दुर्गन्ध ऊपर न छाइ दी जाती है ॥१७॥ जब तप नीद नहीं भरती है उठाएर विटा दिया जाता है, ऐसे भी नरम है जहाँ पर अत्यन्त बमस्य तीक्ष्ण पदाधं गिलाग जात हैं, नौगता हुआ तप्स तल पिलाया जाना है नया महान् परी वा गिलाई जाया करती है
नारद पुराण ]
॥१८॥ नारकीय यातनाओ म कसैला जल पिलाया जाता है, जलते
हुए पत्थर तुडवाये जाते हैं, अत्यन्त ठण्डे और अधिक खोलते हुए पानी
म स्नान कराया जाता है ॥ १६॥ य यन्त तप्त लोह की चादर पर
लिटाया जाता है, लोहे का भार मस्तक पर रख दिया जाता है । हे
महाभाग । नरको मे ऐसी करोडा प्रकार की यातनायें दी जाती हैं
जिनको मैं स्वय भी हजारो वर्षों मे भी पूरा वर्णन नहीं कर सकता
हूँ ।।२०-२१।।
तत्सर्व सप्रवक्ष्यामि तन्मे निगदत शृणु ।
ब्रह्महा च सुगपी च स्तेयी च गुरुतल्पग ॥२२
महापातकिनस्त्वेते तत्ससर्गी च पञ्चम ।
पवितभेदी वृथापाको नित्य व्राह्मणदूपक ।
आदेशी वेदविक्रेता पचते ब्रह्मघातका ॥२३
ब्राह्मण य समाहूय दास्यामोति धनादिकम् ।
पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्तमाहुं ब्रह्मघातिनम् ।।२४
स्नानार्थ पूजनार्थी वा गच्छनो ब्राह्मणस्य य ।
समायात्यन्तरायत्व तमाहुब्रह्मघातिनम् ।।२५
परनिन्दासु निरतश्चात्मात्वपरतश्च य ।
असत्यनिरतश्चैव ब्रह्महा परिकोर्तित ॥२६
अधर्मस्यानुमन्ता च ब्रह्महा परिकीर्तित ।
अन्याद्वेगरतश्चैव अन्येपा दोपसूचक ॥२७
दम्भाचाररतश्चैप ब्रह्महेत्यभिधीयते ।
नित्य प्रतिग्रहरतस्तया प्राणिवधे रत ॥२८
हे भूमिपाल | अब मैं आपका यह मक्षप में बतलाता है कि
पिन किन पापिया का वहाँ पर क्या-क्या नरख को याननाऐ भोगनी
पड़ती हैं । जो ब्राह्मण वा हत्या परने धान, मदिरापान परने वाला,
पार और गुरु पनी दे माप गमन करने वाला ये मारा और पाच
३११
नारद पुराण ]
मुरापानसमं पापं लभते स नराधमः ।
एव वहुविधं पापं सुरापानसमं स्मृतम् ॥३४
अब मैं सुरापान के तुल्य होने वाले पापो का अति मक्षेप में
वर्णन करता हूँ गणिकाओं के अन्न का भोजन तथा गणिकाओ का सेवन
फरना, पतितो के अन्न का भोजन करना भी सुरापान के ही समान
होता है। उपासना करने का त्याग, देवलो का भोजन, शराब पीने
वाली नो के साय गमन करना भी मुरापान के समान ही पाप होता
है। जो विप्र शूद्र के यहां पर बुलाया जाने पर उसके यहाँ भोजन कर
लेता है उसको भी शरावी ही समझना चाहिए और ऐमे ब्राह्मण को
कभी भी किसी धार्मिक कृत्य करने का अधिकार नहीं देना चाहिए।
जो श्द्रो की आज्ञा मे पुण्य कर्म करता है उस नराधम को भी सुरापान
के ही ममान पाप लगता है। ऐसे अनेक तरह के पाप भी सुरापान के
ही तुल्य ही होते हैं ॥२६-३४॥
हेमस्तेयसम पापं प्रवक्ष्यामि निशामय ।
कन्दमूलफलाना च कस्तूरीपटवाससाम् ॥३५
सदा स्तेय च रत्नाना स्वर्णस्तेयसम स्मृतम् ।
ताम्रायस्त्रपुकास्यानामाज्यस्य मधुनस्तथा ॥३६
स्तेय सुगन्धद्रव्याणा स्वर्णस्तेयमम स्मृतम् ।
क्रमुकस्यापि हरणमम्भसा चन्दनस्य च ॥३७
पर्णरसापहरण स्वर्गस्तेयसम स्मृतम् ।
पितृयज्ञपरित्यागो धर्मकार्यविलोपनम् ॥३८
यताना निन्दन चैव स्वर्णस्तेयसम स्मृतम् ॥३६
भक्ष्याणा चापहरण धान्याना हरण तथा ॥४०
रुद्राक्षहरण चैव स्वर्णस्तेयसम स्मृतम् ।।४१
अव हम सुवर्ण की चोरी के तुल्य होने वाले पापो के विषय में
वतलाते हैं, कन्द, मूल, फलो की चोरी करना, कस्तूरी, वस्त्र और रत्नो
३१२ [ नारद पुराण की चोरी करना भी सदा सुवर्ण की चोरी के ही समान होती है । तान्न लोहा, शीशा, कासा, घृत, शहद, सुपारी तथा चन्दन से मिश्रित जल की चोरी भी सुवर्ण की चोरी के ही समान पाप होता है ॥ ३५-३७॥ शरबत को चोरी, पितृ यज्ञ का त्याग कर देना और पिसी भी धर्म के कार्य का लोप कर देना भी सुपणं को पोरी के समकक्ष ही पाप होता है ॥३८॥ सन्यामियो को निन्दा, भक्ष्य पदार्थों का अपहरण और धान्यो का अपहरण करना भी सुवर्ण चोरी के ही समान है ।। ४०-४११ धर्मलोप: शास्त्रनिन्दा गुरुतल्पसमं स्मृतम् ॥४२ इत्येवमादयो राजन्महापातकसज्ञिताः ॥४३ एतेप्वेकतमेनापि सङ्गकृत्तत्समो भवेत ॥४४ यथाकथचित्पापानामेतेपा परमपिभिः ॥४५ शान्तैस्तु निष्कृति या प्रायश्चित्तादिकल्पनैः । प्रायश्चित्तविहीनानि पापानि शृणु भूपते ॥४६ समस्तपापतुल्यानि महानरकदानि च। ब्रह्महत्यादिपापाना कथचिन्निष्कृतिर्भवेत् ॥४७ ब्राह्मण द्वेष्टि यस्तस्य निष्कृतिर्नास्ति कुत्रचित् । विश्वस्तधातिना चैव कृतघ्नाना नरेश्वर ॥४८ शूदस्त्रीसङ्गिना चैव निष्कृति स्नि कुत्रचित् । शूद्रान्नपुष्टदेहाना वेदनिन्दारतात्मनाम् ।।४६ धर्म का लोप और शस्त्रो की निन्दा ये समस्त पाप गुरु तल्प गमन के हो रामान होते हैं । हे राजन् ! इन उपयुक्त महान् पापियो का माथ देने वाला भी उसी के समान पानकी हो जाया करता है। शमादि गुमो से विभूषित महषियो ने प्रायश्चित आदि के द्वारा इन सब पापो से विद्ध होने का मार्ग बतलाया है किन्तु हे भूपते ! कुछ ऐसे भी महान् पाप होते हैं जिनका कि कोई भी प्रायश्चित हो ही नहीं सकता है । मै अब आपके सामने उन पापो का वर्णन करता हूँ, आप ३१३ नारद पुराण ] श्रवण करिये ।।४२-४६॥ ऊपर मे बतलाये हुए सभी पाप महान् घोर नरको को देने वाले होते हैं किन्तु ब्रह्म हत्या आदि के महान पापो से भी किसी प्रकार से छुटकाग हो भी जाया करता क्योकि ये जसे महान पाप हैं वैसे ही इसके परम उग्र प्रायश्चित भी बतलाये गये है ।।१७।। किन्तु जो मनुष्य ब्राह्मणो से द्वेप करता है उसके पाप से छुट- कारा किसी भी प्रकार से नही हो सकता है । हे नरेश्वर । विश्वास- घातियो की, किये हुए उपकार को न मानने वालो की, शुद्र की स्त्री से गमन करने वालो की, शूद्रान्न से पुष्ट शरीर वालो की और देवो की निन्दा करन वालो की निष्कृति (उद्धार होने की गति) तो कही पर है ही नही ।।४८-४६॥ सत्कथानिन्दकाना च नेहामुन च निष्कृति ॥५० वौद्धालय विशेद्यस्तु महपाद्यपि वै द्विज । न तस्य निष्कृतिष्टा प्रायश्चित्तशतैरपि ॥५१ वौद्धा पापण्डिन प्रोक्ता यतो वेदविनिन्दका । तस्माद् द्विजस्तान्नेक्षेत यो धर्मवहिप्कृता ॥५२ ज्ञानतोज्ञानतो वापि द्विजो वौद्धालय विशेत् । ज्ञात्वा चेन्निप्कृतिर्गस्ति शास्त्राणामिति निश्चय. ॥५३ एतेपा पापवाहुल्यान्नरफ योटिकल्पकम् । प्रायश्चित्तविहीनानि प्रोतान्यन्यानि च प्रभो ॥५४ पापानि तेपा नरकान्गदतो मे निशामय ॥५५ महापातक्निस्ते प्रत्येक युगवासिन । तदन्ते पृथिवीमेत्य सप्तजन्ममु गर्दभा ॥५६ जो सत्वया की निन्दा करन वाले लोग है उनी निपति तो इस लोक में तया परलोक में कही भी नहीं है ॥५०॥ महान भापक्ष में प्रस्त हो जाने पर भी जो द्विज योदाम मन्दिर में प्रवेश करता है उमरी शतश प्रायश्चितो सभी शुद्धि नहीं हो सकती है ॥५१॥ इस कारण ३१४ [ नारद पुराण यही है कि बौद्ध लोग वेदो के महान् निन्दव होते हैं, वे पापण्डी हैं और धर्म से बहिष्कृत होते हैं, अनएव द्विज यो तो उनकी ओर अपनी टिभी नही डालनी चाहिए ॥५२।। इन्ही वातो के कारण से डिज यदि जान- बूझकर ऐसा करता है तो फिर उसका छुटकारा कभी भी नही होता है, ऐमा धर्म शास्त्रो का सत्य सिद्धात है ॥५३॥ इन ऐमे बहुत मे पापो का फल भी वरोडी करपो तब नरयो मे यातनाएँ सहन करना ही होता है । हे प्रभो । जिन महा पापो का कुछ भी कही प्रायश्चित नहीं है ऐसे भी बहुत से पापो का वर्णन किया गया है । अव उन महा पापो से प्राप्त होने वाले नरको के विषय मे आप मुझसे श्रवण कीजिए । मैं उन्हे अब बतलाता हूँ ॥५४-५५१। जो पातकी होते हैं वे प्रत्येक नरक मे एक-एक युग पर्यन्त रहा करते हैं । फिर इराके अनन्तर इस पृथ्वी मे आकर उनको सात बार गधो की योनि में जन्म ग्रहण करना पडता है ॥५६॥ ततः स्वानो विद्धदेहा भवेयुर्दशजन्मसु । आशताब्द विट्कृमयः सर्पा द्वादशजन्मसु ॥५७ ततः सहस्रजन्मानि मृगाद्या. पशवो नृप । शताब्द स्थावराश्चैव ततो गोधाशरीरिण: ॥५८ ततस्तु सप्तजन्मानि चण्डाला पापकारिणः । ततः पोडश जन्मानि शूद्राद्या हीनजातयः ।।५६ ततस्तु जन्मद्वितये दरिद्रा व्याधिपीडिताः । प्रतिग्रहपरा नित्य ततो निरयगा. पुन. ॥६० असूयाविष्टमनसो रौवे नरके स्मृतम् । तर कल्पद्वय स्थित्वा चाण्डाला शतजन्मसु ।।६१ मा ददस्वेति यो ब्रूयान्दवाग्निद्राह्मणेषु च । शुना यो योनिशत गत्वा चाण्डालेपूपजायते ॥६२ ततो विष्ठाकृमिश्चैव ततो व्याघ्रस्त्रिजन्मसु ।
३१५ नारद पुराण ] तदते नरक याति युगानामेकविंशतिम् ॥६३ इसके उपरान्त दश जन्मो तक के फटे हुए शरीर वाले कुत्ते की योनि मे जन्म धारण किया करते हैं । फिर एक्सौ वर्ष तक विष्ठा के कीडे होते हैं ! इसके पश्चात् बारह जन्मो तक समं हुआ करते हैं ।।१७।। इसके अनन्तर एक हजार जन्म मृग आदि पशुओ मे लिया करते हैं। इसके पश्चात् सौ वर्ष तक उनको स्थावर योनि प्राप्त हुआ करती हैं । फिर गोह का शरीर प्राप्त होता है ।।५८।। इसमे भी सात जन्म तक पापकारी चाण्डालोके यहाँ उत्पन्न हुआ करता है। इसके पश्चात हीन जातियो मे सोलह बार जन्म लिया करता है ।।५६। इसके पीछे वे दूसरे जन्मो मे रोग ग्रस्त एव दरिद्र होते हुये जन्म ग्रहण किया करते हैं और मवंदा प्रतिग्रह ग्रहण किया करते हैं । उस समय मे भी अमूया होने के कारण से रौरव नरक में जाकर यातनाय भोगा करते हैं । वहां दो कल्पों तक निवास करके फिर एक मौ जम चाडाल के पर मे ग्रहण किया करते हैं ॥६०।६१।। जो कोई गौ, अग्नि और ब्राह्मणों के लिये यह कहता है कि इनको कुछ भी मन दो, इनको देने मे क्या होता है वह एव सौ जन्मो तक युत्ते की योनि को भोगा परता है और फिर चाण्डाल होता है ॥६२॥ इसके पश्चात विष्ठा या कोहा होता है तथा इसके पश्चात् तीन जन्मो तक वाघ या शरीर धारण किया करता है और इसके बाद में इक्कीम युगो तक नरक पास विया करता है ।।६३ परनिन्दापरा ये च ये च निष्ठुरभापिण । दानाना विघ्नकारस्तेपा पपफल शृणु ॥६४ मुगलोलूखलान्या तु चूयन्ते तस्करा भृगम् । तदन्ते तापापाणग्रहण वत्मग्णयम् ॥६५ ततन कालमूग भिद्यन्ते सप्त वत्मरान् । शोचन्त. स्वानि कर्माणि परद्रव्यापहारका ॥६६ ३१६ [ नारद पुराण कर्मणा तर पच्यन्ते नरकाग्निपु सन्ततम् ॥६७ परस्वसूचकाना च नरक शृणु दारुणम् । यावागसहस्र तु तप्ताय पिण्डभक्षणम् ॥६८ सपीउयते च रसना सदशैभृशदारुणे । निरुच्छ्वास महाघोरे कल्पाद्धं निवसन्ति ते ॥६६ परस्त्रीलोलुपाना च नरक कथयामि ते । तप्तताम्रस्त्रियस्तेन सुरूपाभरणैर्युता ॥७० यादृशीस्ताहशीस्ताश्च रमन्ते प्रसभ वहु । विद्रवन्त भयेनासा गृह्णन्ति प्रसभ च तम् ॥७१ जो मनुष्य दूमरो की निन्दा किया करते है, कठोर वचन मुख से बोला करते हैं, दान देने में विघ्न वाधाये उपस्थित किया करते हैं उनको जो इस बात का फल प्राप्त हुआ करता है उसका फल श्रवण कर लो ।।६४॥ वे चोर होते है और उनको नरको मे लोहे के मूसल तथा काठ के मूसलो से पीटा जाया करता है फिर इसके पश्चात् तीन वर्ष तक तपे हुये पत्थर को पकडा करते है। इसके उपरान्त वे काल सूत्र से सात वर्ष तक विधा करते हैं । उस समय मे दूसरो का द्रव्य हरण करने वाले प्राणी अपने किये हुये कर्मों के विषय में सोचते हुए नरक की अग्नि मे पका करते है ॥६६।६७।। अव मैं उनके पापो के विषय में बतलाता हूँ जो चोरो को दूसरो के धन का पता ठिकाना बता कर माल का अपरहण कराया करते हैं उनको भी महा दारण नरको की यातनाये भोगनी पडती हैं । ऐसे पापी एक सहस्र वर्षो तक तप्त लोहे के पिण्डो को खाया करते है ॥६८।। इन लोगो की जीभ को यमदूत चीमटो से खीचा करते है क्योकि जीभ से ही कहकर उन्होने दूसरो के धन का पता बताया था । ये लोग आधे कल्प तक उच्छ्वास रहित दशा मे पडे रहा करते हैं ॥६६॥ अब हम पराई स्त्री से सङ्गम करते वे लालचियो को प्राप्त होने वाले नरको का वर्णन परते है ।
नारद पुराण ]
३१७
ये लोग जिस प्रकार की स्त्रियो के साथ भोग करने की कामना किया
करत थे उसी प्रकार की तपे हुये ताम्र की आभूषणो से भूपित हुयी
स्त्रियां उनके साथ बल पूर्वक रमण किया करती हैं ॥७०।७१
कथयन्तश्च तत्कर्म नयन्ते नरकाक्रमातू ।
अन्य भजन्ते भूपाल पतिं त्यक्त्वा च या स्त्रिय ॥७२
तप्ताय पुरपास्तास्तु तप्ताय शयने वलात् ।
पातयित्वा रमन्ते च वहुकाल बलान्विता ॥७३
ततस्तैयोपितो मुक्ता हुताशनसमोज्ज्वलम् ।
अय स्तम्भ समाश्लिप्य तिष्ठन्त्यब्दसहस्रकम् ॥७४
तत क्षारोदकस्नान क्षारोदकनिषेवणम् ।
तदन्ते नरकान् सर्वान् भुञ्जतेऽब्दशत शतम् ।।७५
यो हन्ति ब्राह्मण गा च क्षत्रिय च नृपोत्तमम् ।
स चापि यातना सर्वा भुक्त कल्पेषु पञ्चसु ॥७६
वे ताम्र की तप्त स्त्रियाँ इनके किये हुये कुकर्मोंगरा वखान करके
पुन नरको मे ढकेल लाया करती हैं । हे भूपाल । जो स्त्रियाँ
अपने पति का त्याग करके दूसरे जार पुरुषो का सेवन किया करती
हैं । उनको भी लोहके जलते हुए शरीर वाले पुरुष लोहेके तप्त पलङ्गो
पर लिटा कर बलपूर्वक उनके माथ रमण क्रिया बहुत समय तक करा
करते है ।।७२।७३।। इनसे पिंड छूट जाने पर अग्नि के समान लाल
धधकते हुय लाहे के खम्भो से एक हजार वर्ष तक चिपटा दी जाया
करती हैं ॥७४॥ इसके उपरान्त उनको अत्यन्त खारी जल से स्नान
कराया जाता है खारी पानी ही पिलाया जाता है फिर एकसौ वर्षों
तक वे सभी नरको वी यातनाय भोगा करती है ॥७॥ जो पुरुष
गो ब्राह्मण तया परम श्रेष्ठ क्षत्रिय राजा का वध किया करते है वह
पान कल ता नरक की मममम धोर याननाशो को भोगा करते है
य शृणोति महन्निन्दा सादर तत्फल शृणु।
॥७६॥
[ नारद पुराण तेपा कर्णेषु दाप्यन्ते तप्ताय कोलसचया ॥७७ ततश्च तेषु द्वेिषु तैलमत्युष्णमुल्वणम् । पूर्यते च ततश्चापि कुम्भीपाक प्रपद्यते ॥७८ नास्तिकाना प्रवक्ष्यामि विमुखाना हरे हरौ। अब्दाना वोटिपर्यन्त लवण भुज्जते हि ते॥७६ ततश्च कल्पपर्यन्त रोरवे तत्तमकते। भज्यते पापकर्माणोऽन्येप्वप्येव नराधिप ॥८० ब्राह्मणान्ये निरीक्षन्ते कोपदृष्ट्या नराधमा । तप्तसूचीसहस्रण चक्षुस्तेपा प्रसूर्यते ॥८१ तत क्षाराम्भुधाराभि सेच्यन्ते नृपसत्तम । ततश्च कोरभिद्यन्ते पापवर्मण ॥८२ विश्वासघातिना चैव मर्यादाभेदिना ताथ । परान्नलोलुपाना च नरक शृणु दारुणम् ॥८३ जो अपने से वडो की बुराई किया करते हैं या बडो की निन्दा को सादर श्रवण किया करते हैं उनके कानो मे गर्म लोहे की कोलो को यमपुर मे ठोका जाया करता है ।।७७॥ जब कानो मे घाव होजाते हैं तो उन पर गर्म तेल डाला जाया करता है। इसके पश्चात् उम पापी को कुम्भीपाक नामक नरक मे डाल दिया जाता है ॥७॥ अब उन पापियो की गति का वर्णन किया जाता है जो नास्तिक भग- वान शिव तया भगवान विष्णु से विमुखता रक्खा करते है उनको एक करोड वर्ष तक नमक का आहार करना पडता है ।।७६॥ ह राजन् । इसके अनन्नर उन पापियो को ए7 कल्प तक जलती हुई रेत वाले रौरव नरक में पड कर भुनना होता है ॥८०|| जो अधम मनुष्य ब्राह्मणो को क्रोध में पूर्ण दृष्टि से देखा करते हैं उनो आँखे तपी हुई एन महस सुझ्यो से फाडी जाती हैं ।।८१॥ हे थेष्ठ नृप । इसके बाद उसके अपर खारी जल छिडका जाया करता है और उनमें शरीर को
नारद पुराण ]
३१६
कुडियो मे गूव गोदा जाता है ॥२॥ अय हम विश्वास या धात
परने वाले पराये अन्न के लालची तथा मर्यादा का भङ्ग करने वाले
मोगो को जो महा दारण नरक यातना भोगनी पडती है उनका वर्णन
परत हैं । पाप गावधान होकर श्रवण परिये ॥८३
स्वमाममोजिनो नित्य भक्षमाण मिस्नुते ।
नरपेषु ममस्तेषु प्रत्येक ह्यन्दनागिन ॥८४
प्रतिग्रहरना ये च ये वै नापामा ।
ये च देवलसान्नाना भोजिनम्तागृणुष्व मे ॥८५
राजन्नार पपयन्त यातनाम्बामु दु पिता ।
पच्यन्ते सतत पापाविष्टा भोगरता मा ॥८६
तनम्न न पर्यने मूत्रप्रपोटिना ।
तत क्षारोदाम्नान मूयिष्टानिषेपणम् ।।
सदले भुवमागाद्य भान्ति म्च्छनातय ।
अन्यौटेगरता ये तु यानि येतरणी नदीम् ।।८८
त्यत्तपञ्चमहायमा लाभक्ष ग्रन्ति ।
उपागनाररित्यागी रौरव नप JINEE
विप्रणामागान युवायु परे।
यानापागपचन्ने गावदासदारयम् ॥६०
३२०
[ नारद पुराण
इसके पश्चात्
-
से आक्रान्त होकर एक कल्प पर्यन्त परम दुखित होकर घोर नरको मे
पडे रहा करते हैं 11८६) इसके अनन्तर उनको तेल के कुण्डो मे जला
दिया जाता है और फिर काल सूत्र से उत्पीडिन किया जाता है।
वे लोग खारी जल से स्नान करके विष्ठा तथा मूत्र का
सेवन किया करते ॥८७॥ जब नरको की यातनायें समाप्त होजाती
हैं तो यहाँ पृथ्वी पर ये लोग शेप पापो को भोगने के लिये म्लेच्छ
जाति मे जन्म ग्रहण किया करते हैं। जो दूसरो को घडबडाया करते
है वे वैतरणी नदी मे जाकर पडा करते हैं ॥१८॥ जो मनुष्य सन्ध्या,
तर्पण आदि पाँच महा यज्ञो मे से कोई सा एक यज्ञ भी नहीं किया
करते है वे नर लालाभक्ष नरक मे जाया करते हैं और वहा पर गोते
खाया करते हैं । जो मनुष्य देवोपामना या त्याग कर देता है वह
रौरव नरक मे गिरा करता है । ८६ ॥ हे राजन् । जो भूमिपति
ब्राह्मणो के परिवार से बहुत कड़ाई के साथ वमूलयाबी किया करता
है उसको यह गति होती है कि वह जब तक सूर्य-चन्द्र स्थित रहा करते
है तब तक नरको में पड़ा रहा करता है ॥६०
ग्रामेषु भूपालवरो य कुर्यादधिक करम् ।
स सहस्रकुलो भुड क्त नरक क्ल्पपञ्चसु ॥६१
विषग्रामकरादाने योऽनुमन्ता तु पापकृत् ।
स एव कृतवान् राजन्ग्रह्महत्यासहस्रकम ॥६२
कालसूत्रे महाघोरे स वसेद् द्विचतुर्युगम् ।
अयोनी च वियोनी चपगुयोनौ च यो नर ॥८३
त्यजेन्द्रेतो महापापी स रेतोभोजन लभेत् ।
वसाकूप तत प्राप्य स्थित्वा दिव्याव्दसप्तकम् ॥६४
रेतोभो जी भवेन्मत्यं सवलोकेषु निन्दित ।
उपवासदिने राजन्दन्तधावनमुन्नर ॥८५
स घोर नरक याति त्र्याघ्रपक्ष चतुयुगम् ।
नारद पुराण
३२१
य. स्वकर्मपरित्यागी पापण्डीत्युच्यते वुध ॥६६
तत्सगकृतमोघ स्यातावुभावतिपापिनो।
कल्पकोटिसहस्रपु प्राप्नुतो नरका क्रमान् ।।६७
देवद्रव्यापहारो गुरुद्रव्यापहारका ।
ब्रह्महत्याव्रतसम दुप्कृत भुजते नृप ।।६८
जो राजा अपनी प्रजा से अधिक कर खीच लिया करता है वह
अपनी एक हजार पुश्त तक पाँच क्ल्प पर्यन्त नगर को यातनायें भागा
करता है ।६१जो ब्राह्मणो के ग्राम पर अधिक कर लगाने को या कर
में वृद्धि करन की सम्मति एन अनुमति दिया करता है उसको ऐसा
ही समझ लेना चाहिए कि हजारो ही ब्रह्महत्या कर चुका है ।।६।।
इस महा पाप का यह परिणाम होता है कि वह महान घोर काल मूत्र
नरक मे चतुयुगा की दो कडियो तक पहा रहता है । जो गमन के
अयोग्य पुत्र वधू आदि नारियो की योनि-अयोनि म अथवा अन्य वर्ण
की योनि-वियोनि में या किसी पशु वी योनि मे अपना वीर्यपात किया
करता है व महा पापी नरव म दीर्ग का साया करता है। इसके
पश्चात् चर्ची के गर्त म सात दिव्य वर्षों तक पड़ा हुआ वीर्य भक्षण
किया करता है और इसकी लोक मे भी सब निन्दा किया करते हैं ।
हे राजन् । जो जो मनुष्य उपवास के दिन दन्त धावन ( दातुन )
किया करता है वह व्याघ्र पक्ष चौयुगो तक परम घोर नरव मे जाकर
गिग करता है जो अपन वर्तव्य कर्म का परित्याग कर दिया करता
है विद्वज्जन उसको पाखण्डी वहा करत हैं ॥६६६॥ जो पाखण्डी
पुम्प की मगति विया करता है वह लच्छ कहा जाया करता है और
दाना हो अनि पापी हैं जा कि दण व कल्या ना क्रमा ममी नग्मा
म वास करत हुप यातनायें भोगा करत हैं ।।६७ ॥ ह नृप
मनुप्य दवद्रव्य या गुन्द्रम्प का अपहरण किया वरत है ये ग्रह्म हत्यार
में ही ममान पाप वे मागी होते हैं ॥३८॥
३२२
[ नारद पुराण
अनाथधनहारो ह्यनाथ ये द्विपन्ति च ।
कल्पकोटिसहस्राणि नरके ते वसन्ति च ॥६६
स्त्रोशूद्राणा समीपे तु ये वेदाध्ययने रता ।
तेपा पापफल वक्ष्ये शृणुप्व सुसमाहित ॥१००
अध शीर्पोर्ध्वपादाश्च कीलिता स्तम्भकद्वये ।
धूम्रपानरता नित्य तिष्ठन्त्याब्रह्मवत्सरम् ॥१०१
जले देवालये वापि यस्त्यजेद्द हज मलम् ।
भ्रूणहत्यासम पाप सप्राप्नोत्यतिदारुणम् ॥१०२
दन्तास्थिकेशनखरान्ये त्यजन्त्यमरालये।
जले वा भुक्तशेप च तेपा पापफल शृणु ॥१०३
प्रासप्रोता हलैमिन्ना आर्तरावविराविण ।
अत्युष्णतैलपाकेतितप्यन्ते भृशदारुगे ।।१०४
जो पुरुप किसी अनाय का द्रव्य अपहृत किया करता है और
अनाथ से द्वेप किया करते है वे करोडो हजागे कल्पो तक नरका मे
सदा करते है ॥६६॥ जो पुरुष स्त्रिया अथवा शूद्रो के निकट वेदो वे
अध्ययन में परायण रहा करत हैं उनको जो फल प्राप्त होता है उमे
आप सावधानता के माथ श्रवण करिय ॥१००।। वे लोग ब्रह्मा के एर
दिव्य वप पयन्त नीचे की ओर मस्तक और ऊपर की और टांगे वरपे
दो सम्मा के बीच में टांग दिय जाया करते है और कीलें ठोक दी
जाया करती है । उस समय म नीचे वा धुआ उनो वरवश पीना
पडता है ।।१०१।। जो मनुष्य दवालय म या पिसी जलाशय में अपने
मल का त्याग किया करता है उसको भ्रूण हत्या का महान् घार एव
परम दारुण पाप हुआ करता ॥१०२॥ जो मनुष्य किसी भी दवता
में आए म अगवा तिमी जनामय म दास, हड्डी, पेश, नापून अपया
भाजन म यच हए उछिट यान का टाल दिया यन्त है उनका जा
पाप या पन हाता है उसका भी आप मुनमे श्रवण परिए ॥ १०३ ।।
नारद पुराण J
३२३
इन पापियो को भालो से छेदे जाते हैं, हलो से भेदित किया जाता है
और अत्यन्त घोर उप्ण खोलते हुए तेल में डाल दिया जाता है
जिसकी वेदना से वे चीखा करते हैं ।।१०४॥
कुर्वन्ति दुखसतप्तास्ततोऽन्येषु व्रजन्ति च ।
ब्रह्म सहरते यस्ते गन्धकाप्ठ तथैव च ॥१०५
स याति नरक घोर यावदाचन्द्रतारकम् ।
ब्रह्मस्वहरण राजग्निहामुन च दुखदम् ॥१०६
इह सपद्विनाशाय परत नरकाय च ।
कूटसाक्ष्य वदेद्यस्तु तस्य पापफल गृणु ॥१०७
स याति यातना सर्वा यावदिन्द्राश्चतुर्दश ।
इह पुत्राश्च पौगाश्च विनश्यन्ति परग च ॥१०८
रोग्व नरक भुड क्त ततोऽन्यानपि च क्रमात् ।
ये चातिकामिनो मा ये च मिथ्याप्रवादिन ॥१०६
तेपा मुखे जलोकास्तु पूय॑न्ते पन्नगोपमा ।
एव पष्टिमहस्राब्दे तत क्षाराम्भुसेचनम् ॥११०
ये वृथामासनिरतास्ते यान्ति क्षारकर्दमम् ।
ततो गर्जेनिपात्यन्ते मरत्यपतन यया ॥१११
इमी माति परम दुख से मतप्त होते हुए फिर दूसरे नरको में
जाकर पहा करते हैं । जो शब्द ब्रह्म ( वेद ) और मुगन्धित काष्ठ
(चन्दनादि ) की चोरी करता है वह महा पापी पुरप जब तक चन्द्र,
मूर्य गमार में स्थित रहते हैं तब ना नरकों में पड़ा रहा परता है।
है राजन् । ब्राह्मण वे धन का हरण वग्ने मे इम नोर योर पग्लोर
दोनों में हो दुख पाया करता है ॥१०॥१०॥ इसका नारायं यह
है कि इस माम में उमत्री मति नष्ट होती है और परमार म उगे
नरस प्राप्त हुआ करता है । जो सूठी गवाही दिया परना है उगरे
पार का पत पही होता है कि उगरीब बल ग.7 गभी गरमी में
३२४
[नारद पुराण
जाकर यातना भोगनी पड़ती हैं । इस लोक में उसके पुन पौत्रादि सब
नष्ट होजाया करते है और परलोक मे रौरव आदि नरको का कष्ट
क्रमश भोगना पडता है ॥१०७ १०६॥ जो अधिक कामी और झूठे
होते हैं इनके मुख मे साप के सदृश जोक डाल दी जाती है । इस रीति
से साठ हजार वर्षों के पश्चात खारी जल उन पर छिडकवाया जाता
है ।।११०।। वृथा मास खाने वाले लोग क्षारक दम नाम वाले नरको
मे डाले जाया करते है । वहाँ उनका बडे २ हाथी पछाड लगाते हैं
और वायु पक्का दिया करता है ॥१११
तदन्ते भवमासाद्य हीनाङ्गा प्रभवन्ति च ।
यस्त्वृतौ नाभिगच्छेत स्वस्थिय मनुजेश्वर ।।११२
स याति रौरव घोर ब्रह्महत्या च विन्दति ।
अत्याचाररत दृष्ट्वा य शक्तो न निवारयेत् ।।११३
तत्पाप समवाप्नोति नरक तावुभावपि ।
पापिना पापगणना कृत्वान्येभ्यो दिशान्त च ११४
अस्तित्वे तुल्यपापास्ते मिथ्यात्वे द्विगुणा नृप ।
अपापे पातक यस्तु समारोप्य विनिन्दति ॥११५
स याति नरक घोर यावच्चद्रावतारकम् ।
पापिना निन्द्यमानाना पापा क्षयमेति च ॥११६
यस्तु प्रतानि सह्य असमाप्य परित्यज्येत् ।
साऽसिपाऽनुभूयाति हीनाङ्गो जायते भुवि ॥११७
अन्य साह्यमाणाना व्रताना विघ्नकृन्नर ।
अतीव दुखद रौद्र स याति श्लेप्मभोजनम्॥११८
न्याये च धमशिक्षाया पक्षपात वरोति य ।
न तस्य निप्कृतिर्भूय प्रायश्चित्तायुतैरपि ।।११६
इम पश्चात दम गमार महीन जग वान हार ही जम
निया परत है । हे मनुजसर । ना पुग्प तुपात म भी अपनी स्त्री
नारद पुराण:] भी पाप से सङ्गम नही किया करता है वह रौरव नरक मे पडता है और उमको ब्रह्महत्या का भी पाप लगता है। जो सामर्थ्य रखने पर भी अत्या चार करन वाले को दखकर नही रोरा करता है उसका लगा करता है और वे दाना ही नरक में गमन किया करते हैं । जो पापिया के पापो की गणना करके दूसरा को बताने जाते है वे पाप हान पर तो उनके ही वरावर पाप क्यिा करते हैं और जो हे राजा । मिथ्या हो दोप लगाया करते हैं उनको दुगुना पाप लगा करता है । जो विना पाप दाले का पाप लगाकर उसकी बुराई किया करता है वह जबतक चन्द्र-स्य लोक म स्थित रहतह तवता नरका का हो सवन किया करता है । पापा का जो कीत्तन किया जाता है उससे पापिया का आधा पाप नष्ट हो जाया करता है ॥ ११२-११६ ।। जो काई भी मनुष्य किसी व्रत को प्रथम तो ग्रहण कर लेता है और पीछ उसको बिना पूर्ण हुए ही छोड दिया करता है वह मनुष्य अमिपत्र वन नामक नरक म निवास क्यिा करता है । वहा पर बहुत नरक की यातनाग भोगकर फिर इस मसार म विक्लाङ्ग होकर जन्म ग्रहण किया करता है ।।११७॥ जो कोई व्रत को ग्रहण करन वाल दूमरे क व्रत म विघ्न डाल दिया करते हैं वह अघिव दुख दन वाले महान् भयङ्कर श्लम भोजन नाम वाले नरक म गमन क्यिा करते हैं ।११। जा न्याय तथा धर्म की शिक्षा म पक्षपात किया करता है उसका एक- दो क्या दश हजार भी प्रायश्चित करे तो भी उद्धार नहीं हुआ करता यभोज्यभोजी सप्राप्य विड्भोज्य तु समायुतम् । ततश्चाण्डालयानौ तु गोमासाशी सदा भवेत् ।१२० अवमान्य द्विजान्वाग्भिब्रह्महत्या च विन्दति । सर्वाश्च यातना भुक्त्वा चाण्डालो दशजन्मसु ।।१२१ विप्राय दीयमाने तु यस्तु विघ्न समाचरेत् । ब्रह्महत्यामम तेन क्र्तव्य व्रतमेव च ॥१२२ है ॥११६ 1 [ नारद पुराण अपहृत्य परस्पार्थ यः परेभ्यः प्रयच्छति। अपहर्ता तु निरयी यस्यार्थस्तस्य तत्फलम् ॥१२३ प्रतिश्रुत्याप्रदानेन लालाभक्ष ब्रजेन्नरः। यतिनिन्दापारो राजन् शिलामात्रे प्रयाति हि ।१२४ आरामच्छेदिनो यान्ति युगानामेकविंशतिम् । श्वभोजनं ततः सर्वा भुञ्जते यातनाः क्रमात् ॥१२५ देवतागृहभेत्तारस्तडागाना च भूपते । पुष्पारामभिदश्चैव या गति यान्ति तच्छणु ॥१२६ जो अभक्ष्य पदार्थों को खाया करता है वह दश सहस्र वर्षों तक विष्ठा खाया करता है और इस नरक यातना भोगने के पीछे भी गाय के माँस का भक्षण करने वाले चाडाल के घर मे जन्म लिया करता है ॥१२०॥ विप्रो का अपमान करने से ब्रह्महत्या लग जाती है और इस अपराध से वह समस्त नरको को भोगने के बाद चाडालो मे ही दश बार जन्म लिया करता है ॥१२१॥ ब्राह्मणो के दिये जाने वाले दान मे जो विध्न उपस्थित किया करता है उसको भी एक ब्रह्महत्या करने वाले के तुल्य ही व्रत प्रायश्चित के लिये करने चाहिए ॥१२२॥ जो दूसरो का धन छीन कर दूसरो को दान देता है वह अपहरण करने वाला नरकगामी हुआ करता है और जिसका वारतव मे धन होता है उसको उस दान का पुण्य-फल प्राप्त हुआ करता है ।। १२३ ।। जो पहिले देने की प्रतिज्ञा करले और पीछे नहीं दे वाले नरक मे गमन करता है और सन्यासियो को निन्दा करने वाला प्राणी पापाण हो जाया करता है ।।१२४॥ अव हे राजन् ! जो देव मन्दिर, जलाशय और पुप्पित उद्यानो को नट्ट-भ्रष्ट किया परते है उनकी जो गति हुआ करती है उसके विषय मे भी मुझ से आप थवण परे ।।१२।। उद्यान को उजाडने वाले पापी को इक्कीस युग पर्यन्त पुत्ते पाया करते हैं। फिर जो महापातकी होते है वे प्रत्येक वह लालाभक्ष नाम
नारद पुराण ]
१२७
नरक म एक-एक युग पर्यन्त रहा करते हैं । फिर वह क्रमश सभी
नरका म भाग भोगा करते है ॥१२६।।
यातनास्वासु सुर्वासु पच्यन्ते वै पृथक् पृथक् ।
ततश्च विष्ठाकृमय कल्पानामेकविंशतिम् ॥१२७
ततश्चाण्डालयोनौ तु शतजन्मानि भूपते ।
ग्रामविध्वसकाना तु दाहकाना च लुम्पताम् ॥१२८
महत्पाप तदादेप्टु न क्षमोह निजायुपा।
चच्छिष्टभोजिनो ये च मिनद्रोहपराश्च ये ॥१२६
एतेपा यातनास्तीद्रा भवन्त्याचन्द्रतारम् ।
उच्छिन्नापितृदेवेज्यावेदमार्गवहि स्थिता ॥१३०
पापण्डा इति विख्यातास्तेपा वै सर्वयातना ।
एव बहुविधा भूप यातना पापकारिणाम् ।।१३१
तेषा तासा च सख्यान कत्तुं नालमह प्रभो।
पापाना यातनाना च धर्माणाचापि भूपते ।।१३२
मख्या निगदितु लोके व क्षमो विष्णुना विना ।
एतेपा सर्वपापाना धर्मशास्त्रविधानत ॥१३३
इन सभी नरवो म वे पृपा-गृथा दुरा भागा करते हैं और
पोछ इसीस पला तर विहाय कोडे हुया परत है ॥१२॥ है
राजा। इमर भी पीछ उ सो वार जन्म पाण्डान योनि म हमा
फरत है। जो ग्रामो - विम्यमा हान है या प्रामा म आग मगा पर
नट-नट पर दिया करते है उन पापावी मन्या इतनी अधिरहाती
है Eि में अपनी पूरी आयु भी मगाना भी उस पापो को गणना
नही पर ममता है। जो मक्ष टि माउन परन बार है और
यान मित्रा महोदाह रिया परत है उनरा जर सर गृम मनि पी
पनि रहा परती है तभी सागर भागन पाए है। जा
३२८
[ नारद पुराण
देव-यजन और पितृ तर्पण नहीं किया करते है तथा वेदोक्त मार्ग के
विपरीत चला करते हैं वे महान् पाखण्डी कहे जाया करते है और
उनको सभी तरह के नरको के कष्ट भोगने पडते है । है राजन् । इस
प्रकार के पाप करने वालो को अनेक प्रकार की यातनाये भोगनी
पड़ा करती हैं ॥१३०।१३१।। हे प्रभो। उन ऐसे पापियो और
नरको की गणना मुझसे नहीं की जा सकती है। हे भूप । पापियो
की, धर्मो की और नरको की गणना भगवान् विष्णु ही करने की शक्ति
रखते है उनके बिना अन्य कौन कर सकता है ? धर्म शासन के
विधानानुसार प्रायश्चित करने पर पाप राशि नष्ट होजाया करती है
॥१३२।१३३॥
यश्चित्तेषु चीर्णेषु पापराशि प्रणश्यति ।
प्रायश्चित्तानि कार्या ण समीपे कमलापते ॥१३४
न्यूनातिरिक्तकृत्याना सपूर्तिकरणाय च ।
गङ्गा च तुलसी चैव सत्सङ्गो हरिकीर्तनम् ॥१३५
अनसूया पहिसा च सर्वेप्येते हि पापहा ।
विष्ण्वपितानि कर्माणि सफलानि भवन्ति हि ॥१३६
अनप्पितानि कर्माणि भस्मविन्यस्तहव्यवत् ।
नित्य नैमित्तिक काम्य यच्चान्यन्मोक्षसाधनम् ।।१३७
विष्णो समर्पित सर्वं सात्त्विक सफल भवेत् ।
हरि भक्ति परा नृ णा सर्वपापापप्रणाशिनी ॥१३८
सा भक्तिर्दशधा ज्ञेया पापारण्यदवोपमा।
तामस राजसैश्चय सात्त्विकैश्च नृपोत्तम ॥१३६
यच्चान्यस्य विनाशार्थ भजन श्रीपतेप।
सातामस्यधमा भक्ति खलभावधारा यत ॥१४०
पर्मों की यूनाधिषता सागोपागता सम्पादन करने के लिये
ये सभी प्रायश्विन भगवान् विष्णु की प्रतिमा के समीप में ही परने
३२६ नारद पुराण ] चाहिय । गङ्गा, तुलसी, सत्मगति, अनसूया, अहिंसा और श्री हरि भगवान् के नाम गुण और लीला-धामो की महिमा का कीर्तन ये सभी पापा का विनाश करने वाले होते हैं । जो कर्म सभी पापो का विनाश करने को किये जाते हैं, जो कर्म श्रीभगदर्पण करने की बुद्धि से किये जात हैं व ही साग सफल हुआ करत है और उनका फल भी पूर्ण होता है ।।१३४-१३६।। जो मं भगवान की सेवा में समर्पित किये जाते हैं वे सभी कृत कर्म राख मे हवि के होम के ही समान निप्पल हुआ करते हैं । नित्य कर्म, नैमित्तक कर्म, काम्य अनुष्ठान तथा अन्य मोक्ष के वन्धन म्वरूप सभी कार्य-क्लाप श्री भगवान की सेवा में ही सादर समर्पित कर देने पर परम मात्विक एव सफल हुआ करते हैं । श्री हरि की भक्ति मनुष्य के सम्पूर्ण पापा को भगा दिया करती है ॥१३७- १३८॥ हे राजन् । दूसरे प्राणिया का विनाश करन के लिय श्री भग- वान का भजन करना अत्यन्त तामसी भक्ति कही जाती है क्योकि इसमें हृदय के अन्दर दुष्टता का भाव निहित रहा करता है। हे भूपाल । पापरूपी वन के लिये भगवान् की भक्ति दावानल की तरह ही हुआ करती है । यही हरि भक्ति सात्विक, राजस और तामस भेद से दश प्रकार की हुआ करती है ।।१३६१४०॥ योञ्चयत्तवधिमा स्वैरिणी स्वपति यथा । नारायण जगन्नाय तामसी मध्यमा तु सा ।।१४१ देवपूजापरान्दृष्ट्वा मात्सर्याद्योऽचयेद्धरिम् । सा भक्ति पृथिवीपाल तामसी चोतमा स्मृता ।१४२ धनधान्यादिक यस्तु प्रार्थयन्नर्चयेद्धरिम् । श्रद्धया परया युक्त सा राजस्यधमा स्मृता ।।१४३ य सर्वलोकविख्यातकीर्तिमुद्दिश्य माधवम् । अर्चयेत्परया भक्त्या सा मध्या राजसी मता ॥१४४ सालोक्यादि पद यस्तु समुद्दिश्यार्चयेदरिम् । सा राजस्युत्तमा भक्ति कीर्तिता पृथिवीपते ॥१४५ [नारद पुराण यस्तु स्वकृतपापाना क्षयार्थ प्रार्चयेद्धरिम् । श्रद्धया परयोयेपेत. सा सात्त्विक्यधमा स्मृता ।।१४६ हरेरिद प्रियमिति शुश्रूपा कुरुते तु य । श्रद्धयासयुतौ भूय सात्त्विकी मध्यमा तु सा ॥१४७ जो धूर्तता के साथ व्यभिचारिणी स्त्री अपने ही पति के समान जगत् के स्वामी श्री भगवान नारायण की अर्चना क्यिा करता है वह मध्यम श्रेणी की तामसी भक्ति हुमा करती है ॥१४१॥ जो दूसरे लोगो को देव-यजन करते हुए देखकर मत्सरता के वशीभूत हो कर स्वय भी थी भगवान का पूजन किया करते हैं वह भक्ति भी तामसी अवश्य है क्योकि मा सर्य ही उसका महान दाप हुआ करता है किन्तु वह उत्तम श्रेणी की तामसी कही जाया करती है ॥१४२॥ धन-धान्यादि के लाभ की कामना रखकर परम श्रद्धा के साथ श्री हरि वे चरणो की उपासना करना अत्यधम राजसी भक्ति कही जाया करती है ॥१४३॥ जो मनुष्य अपने हृदय में ऐसी भावना रखता है कि मेरी कीति सर्वत्र विस्तृत होकर फैल जावे और इसी उद्देश्य को लेकर भगवान की भक्ति भाव से पूजा किया करता है वह मध्यम श्रेणी घी राजसी भक्ति हुआ करती है ॥१४॥ हे पृथिवीपते । जो सालोक्य मुक्ति आदि को उपलब्धिकी इच्छा से श्री हरि की पूजा- अर्चा किया करता है वह उत्तम-कोटि की राजसी भक्ति कही जाया वरनी है ॥१४॥ जो मनुष्य अपने इस जन्म के तथा पूर्व उन्मोजित समस्त मचित पापो से क्षय कराने के लिये परम अक्षा की भावना रो श्री हरि या यजन किया करता है वह स्याथं की भावना हृदय में भरी होने से वारण से अधम मात्विकी भक्ति होती है क्योकि भगवान् से कुछ अपना मनाय पूर्ण करता है ॥१४६॥ भक्ति हरि पो परम प्रिय सगा परना है यही रामापर उनणे प्रीति का सम्पादन पर पापात्र यनरे की भावना गे अक्षा पूर्वव उनकी संया करना श्री
३३१
नारद पुराण ]
किया करता है वह मध्यम श्रेणी की सात्विक भक्ति कही जाया करती
है ।।१४७॥
विधिवुद्धघाचयेद्यस्तु दासवच्छीपति नृप ।
भक्तीना प्रवरा सा तु उत्तमा सात्विकी स्मृता॥१४८
महिमान हरेर्यस्तु किंचित्कृत्वा प्रियो नर ।
तन्मयत्वेन सनुष्ट सा भक्ति रुत्तमोत्तमा ॥१४६
अहमेव परो विष्णुर्मति सर्वमिद जगत् ।
इति य सतत पश्येत्त विद्यादुत्तमोत्तमम् ।।१५०
एव दशधविा भक्ति ससारच्छेदकारिणी ।
तत्रापि सात्विको भक्ति सर्वकामफनप्रदा ॥१५१
तस्माच्छणुष्व भूपाल ससारविजिगीपुणा ।
स्वकर्मणोऽविरोधेन भक्ति कार्या जनार्दने ।।१५२
य स्वधर्म परित्यज्य भक्तिमात्रेण जीवति ।
न नस्य तुप्यते विष्णुराचारेणेव तुप्यते ।१५३
सर्वागमानामाचार प्रथम परिकल्पते ।
आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युत ॥५४
हे नृप ।
शास्त्र सम्मत विधान को समझ कर अपने
क्तव्य का परिपालन करने के लिये दास का भाव लेकर उसी के
समान श्रीपति की समाराधना किया करता है वह समस्त प्रकार की
परमोत्तम सात्विकी भक्ति कही जाती है ।। १४८ ।। जो नर नारायण
को महान् महिमा को हृदय म धारण करके उनका परम प्रिय दास
बनकर तन्मय होता हुआ सदा सन्तुष्ट रहा करता है वही उत्तमोत्तम
परम श्रेष्ठ भक्ति हुआ करती है ।।१४६॥ जो मैं स्वय ही परम विष्णु
का स्वरूप हूँ जो कि मनुज के चोले मे रहकर ससार मे भ्रमण किया
करता हूँ और यह सम्पूर्ण जगत मुझम ही व्याप्त है। इस रीति से
जो सदा विचार किया करता है उसको परमोत्तम भक्ति समझना
३३२ [ नारद पुराण चाहिए क्योकि उसे सर्वदा ही विष्णु के स्वरूप का ध्यान बना रहा करता है और उसका दृष्टिकोण परम निश्चल होता है ।। १५० ॥ ये दशो प्रकार की भक्ति चाहे तामस ही क्यो न हो इस संसार का समुच्छेद कर देने वाली हुआ करती है क्योकि भगवान की भक्ति तो होती ही है । इनमे जो मात्विको भक्ति होती है वह सम्पूर्ण कर्मों के स्वत: ही पुण्य फली को प्रदान करने वाली हुआ करती है ॥१५१।। अतएव हे राजन् ! आप समाहित होकर मिद्धान्त की बात का श्रवण करिए । जो इस मसार यात्रा मे आकर अपनी पूर्ण विजय चाहता है उसका परम कर्तव्य है कि अपने वर्णाश्रम धर्म का पूर्ण पालन करते हुए उसे इस प्रकार से भगवान की भक्ति करनी चाहिए ॥१५२।। जो अपने वर्णाश्रम का परित्याग करके केवल भगवान की भक्ति का करना अपना कर्तव्य समझा करता है उस पर भगवान् पूर्णतया प्रसन्न नहीं हुआ करते हैं क्योकि उसकी प्रसन्नता तो सर्वदा सदाचार से ही हुआ करती है ।।१५३।। इसका एक मात्र कारण यही है कि सभी शास्त्रो का सिद्धान्त यही है कि सर्व प्रथम धर्म आचार ही है । धर्म आचार से ही हुआ करता है और उस धर्म के स्वामी भगवान श्री विष्णु देव ही है ॥१५॥ तस्मात्कार्या हरेभक्त. स्वधर्मस्याविरोधिनी। सदाचारविहीनाना धर्मा अप्यसुखप्रदा: १५५ स्वधर्महीना भक्तिश्चाप्यकृतव प्रकीर्तिता। यत्त पृष्ट स्वया भूयस्तत्सर्व मदित मया ॥१५६ तस्माद्धर्मपरोभूत्वा पूजयस्व जनार्दनम् । नारायमणीयास सुखमेप्यसि शाश्वतम् ।१५७ शिव एव हरिः साक्षाढरिरेव शिवः स्वयम् द्वयोरन्तर हायाति नरकाकोटिश. पल. ॥१५८ तस्माद्विष्णु शिव वापि मम बुद्ध्वा ममर्चय ।
[ नारद पुराण भेदकृद् दु.खमाप्नोति इह लोके परन च ॥१५६ तदर्थमहमायातस्त्वत्समीप जनाधिप। तत्ते वक्ष्यागि सुमते सावधानं निशामय ॥१६० आत्मघातकपाप्मानोदग्धाः कपिलकोपतः । वसन्ति नरके ते तु राजंस्तव पितामहाः ॥१६१ अतएव भगवद्भक्त मानव का परम कर्तब्ध यही है कि अपने वर्णाश्रम प्रयुक्त धर्म का किसी प्रकार से भी भूल कर भी विरोध न करे। ऐनी ही स्वधर्म विरद्ध श्री हरि भगवान की भक्ति करनी चाहिये क्योकि जो सदाचार से विहीन पुरुष होते है वे यदि धर्म भी करते हैं तो वह दु खप्रद ही हुआ करता है ॥१५५।। अपने धर्म का त्याग करके जो भगवान की भक्ति की जाया करती है उमका वरना भी व्यर्थ ही माना जाता है। हे राजन् । आपने मुझ से जो भी कुछ प्रश्न किये थे उन मवका समाधान मैंने भली भानि कर दिया है ॥१५६॥ यतएव आप परम धर्म परायण रहते हुए अत्यन्त सूक्ष्म स्वरूप भगवान श्री नारायण जनार्दन वा यजन करें तो आप निश्चय ही परम मुख को प्राप्त कर लेंग॥१५७।। भगवान् शिव साक्षात् श्री हरि का ही एक स्वरूप होता है और उमी भांति श्री हरि माक्षात् भगवान् का हो म्वरूप हुआ करता है। वस्तुन. इन दोनो स्वरुप मे तात्विक रूप मे कोई भी भेद नही होता है। वैसे इनये स्पो में ही भेद है जो दर. असल भेद नही होता है। इन दोनो के रूपों में जो भी मूड मानव भेद ममझा परना है उस दुष्ट पुष्प को करोडो नरको की भीपण यातनाएँ महन करनी पड़ती है ॥१५७॥ अतएव आपरा परम कर्तव्य यही है पि शिव तया विष्णु का ममान ही ममतार पूजित पिया परो। जो इन दोनो के चम्पा में भगनाव ममाता है उगरी दम मोर तथा परनाल में यही भी गम प्राप्त न होकर येवल दुग ही उठाना पटना है ।।१५।। है राजन् ! म ममय में मैं जिमका के पियार
३३४
[ नारद पुराण
समीप मे उपस्थित हुआ हूँ उसको आप परम समाहित होकर श्रवण
कीजिए ॥१६०1। हे राजन् | आपके साठ हजार पितामह भगवान्
कपिल देव के कोपभाजन बनकर भस्म हो गये थे एव अपने आत्मघात
के पाप को भोगते हुए नरको मे पडे हुए हैं ।।१६१॥
तानुद्ध र महाभाग गङ्गानयनकर्मणा ।
गङ्गा सर्वाणि पापानि नाशयत्येव भूपते ॥१६२
केशास्थिनखदन्ताश्च भस्मापि नृपसत्तम ।
नयति विष्णुमदन स्पृष्टा गागेन वारिणा ॥१६३
यस्यास्थि भस्म वा राजन् गङ्गाया क्षिप्यते नर ।
स सर्वपापानिमुक्त प्रयाति भवन हरे ॥१६४
यानि कानि च पापानि प्रोक्तानि तब भूपते ।
तानि सर्वाणि नश्यन्ति गङ्गाविन्द्वभिषेचनात् ॥१६५
इत्युक्त्वा मुनिशार्दूल महाराज भगीरथम् ।
धर्मात्मा धर्मराज सद्यश्चान्तर्दधे तदा ॥१६६
स तु राजा महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रार्थपारग ।
निक्षिप्य पृथिवी सर्वा सचिवेषु ययौ वनम् ।।१६७
तुहिनादौ ततो गत्वा नरनारायणश्रमात् ।
पश्चिमे तुहिनाकान्ते शृङ्ग पाडशयोजने ॥१६८
तपस्तप्त्वानयामास गङ्गा लोक्पपायनीम् ॥१६६
हे महाभाग । अव आप त्रिपयगा था गङ्गा देव नदी को यहां
भूमण्डल में लाने के वर्म म प्रवृत्त हो जाइये और उन सब का उद्धार
करिये । है र जन् । गङ्गा का जल सभी पापा का आमून मूल विनाश
कर दिया करता है ॥१६२॥ हे परम श्रेष्ठ भूपन । यदि गङ्गा जल से
मनुप्पो व वेश ओम्य नायन दात या भस्म पा थाडा सा भी स्पण
हो जावे तो गङ्गा म यह मामथ्य है कि उनको विष्णु मोर म पहुँचा
दिया करती है ।।१६३॥ जो वाघिव अपन मृत मनुष्य की अस्थियो
या मम्म को गङ्गा प्रवा- म पशित पर दिया यग्न
। वे पुस्प
३३५
नारद पुराण ]
समस्त पापो के समुदाय से मुक्ति पाकर सीधे विष्णुलोक मे चले जाया
करते हैं ॥१६४।। हे राजन् । मैंने आप के समक्ष में जितने भी पापो
का वर्णन किया है वे सभी पाप एक ही गङ्गाजल की वूद के पड जाने
पर नष्ट भ्रष्ट होजाया करते हैं ॥१६॥ श्री सौनक्जी ने कहा-हे
मुनि शार्दूल नारद । धर्मराज ने परम धाम्मिक राजा भगीरथ से ये
वातें समाप्त करके तुरन्त ही वही पर अन्तर्धान होगये थे ।।१६६।। उस
समस्त शास्त्रो के अर्थों के ज्ञाता और पारगामी वह महान् बुद्धिमान
राजा भगीरथ भूमण्डल के सम्पूर्ण शासन के भार को मन्त्रियो के लिय
सौप कर तपश्चर्या करने के लिये वन को चला गया था ॥१६७।। वहाँ
पर भगव न नरनारायण के आश्रम में पश्चिम दिशा की ओर हिम से
ममाच्छादित ६४ कोस के परिमाण वाले शिखर पर तपस्या करके
त्रैलोक्य म व्याप्त रहने वाली पतित पावना गङ्गाजी को लेकर माया
था ।।१६८१६६।।
गाममेomrn.
॥ भगीरथ द्वारा गंगाजी का लाना ।
हिमवनिरिमाद्य निचवार महीपति ।
क्थमानी नवान्गङ्गामेतन्मे वक्तुमर्हसि ॥१
भगीरथो महाराजो जटाचीरघरो मुने ।
गच्छन्हिमाद्रि तपसे प्राप्तो गोदावरीतटम् ॥२
तत्रापश्यन्महारण्ये भृगोरायममुत्तमम् ।
कृष्णमाग्ममाकीर्ण मान गगणमेरितम् ॥३
भ्रमद्भमरसयुष्ट पूजद्विहगमबुतम् ।
वजद्वराहनिार चमरीपुच्छनीजिनम् ॥४
नृत्यन्नयूरनिर मारङ्गादिनिपवितम् ।
IPIAN मनियन्याभिरादगा ॥५
[ नारद पुराण शालतालतमालाढ्य नूनहिन्तालमण्डितम् । . वेदशास्त्रमहाघोपमाश्रम प्राविशद् भृगो ॥७ गृणन्त परम प्रह्म वृत शिष्यगणैर्मु निम् । तेजसा सूर्यसदृश भृगु तत्र ददर्श स ८ देवपि श्री नारद जी ने कहा- राजा भगीरथ ने हिमालय पर्वत पर पहुँच कर क्या किया था और वह किस रीति से गङ्गाजी को लाये थे -इसका स्पष्ट वर्णन मुझे करके कृपा कर मुनाइये ।।१।। श्री सनक जी ने कहा--हे मुनिवर । जटाचीर धारी राजा भगीरथ हिमालय पर्वत पर तपस्या करने के लिए विचरण करये हुए, गोदावरी के तट पर पहुँच गये थे ।।२।। उस महावन मे भगीरथ नृप ने भृगु जी के परम श्रेष्ठ आश्रम का निरीक्षण किया था जहाँ पर कि कृष्णसार मृग और वाय हाथी भ्रमण कर रहे थे ॥३॥ चारो आर मँडराते हुए भ्रमर गुजार कर रहे थे-पक्षियो की चहचहाहट मानो को परम प्रिय पुनीत हो रही थी-इधर-उधर मूकरा झुण्ड के थे और चमरी गाये अपनी श्वेत पूछो को हिला रही थी ॥३-४॥ मयूरो का वहाँ पर नृत्य हो रहा था )सारङ्ग (पहीहा) बोल रहे थे और वहाँ पर मुनि कन्याओ के द्वारा सीचे गये पौधे जो बटे प्रेम से समारोपित किये गये थे बड़े होकर परम शोभायमान दिखाई दे रहे थे ॥५॥ वह परम शुम आश्रम माखू, ताइ तथा तमाखू के पेड़ पौधो से समन्वित था एव शहतूत, हिताल (बाड वृक्ष का ही एक भिन्न स्प) वे वृक्षो वी उसम बहुत अधिक शोभा हो रही थी। जही, कन्नेर, चमेली, चम्पा और अश्वत्य के वृक्ष एव ननामो से वह आयम परम विभूपित हो रहा था॥ ६ ॥ वहा पर चारों आर विवमित पुप्पो की अद्भुन छटा पंजी हुई थी। इधर-उधर ऋपियो या समुदाय नियाग झुण्ड घुम रहे नारद पुराण ] किया करता था। सब ओर वेदो वे मन्यो के उच्चारण का बड़ा भारी घोष सुनाई दे रहा था । उस आश्रम मे राजा भगीरथ ने भृगु मुनि का दर्शन किया था जो परम ब्रह्म का विस्तृत वर्णन करते हुए चारो ओर मे शिष्यो से घिरे हुए थे और तेज में सूर्य के समान दिखलायी दे रहे थे ॥७॥ प्रणनामाय विप्रेन्द्र पादसग्रहणादिना । आतिथ्य भृगुरप्यस्य चक्रे सन्मानपूर्वकम् ॥६ कृतातिथ्यनियो राजा भृगुणा परमर्पिणा। उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा विनयान्मुनिपुङ्गवम ॥१० भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रविशारद पृच्छामि भवभीतोऽह नृणामुद्धारकारणम् ॥११ भगवास्तुष्यते येन कर्मणा मुनिसत्तम । तन्ममाख्याहि सर्वज्ञ अनुग्राह्यो स्मि ते यदि ॥१२ राजस्तवेप्सित ज्ञात व हि पुण्यवता वर । अन्यथा स्वकुल सर्वं कथमुद्धर्तु महखि ॥१३ यो वा को वापि भूपाल स्वकुलशुभकर्मणा। उद्धर्तुकामस्त विद्यान्नररूपधर हरिम् ॥१४ राजा भगीरथ ने उस मह महर्षि प्रवर के चरणो का स्पश करके सादर प्रणाम किया था । भृगु मुनि ने भी बहुत ही सम्मान के साथ राजा का अतिथि सत्कार एव आदर किया था ॥६॥ महामुनि भृगु से आतिथ्य ग्रहण करके राजा भगीरथ को मुनिवर से सविनय एव साजलि प्राथना की थी ॥१०॥ राजा भगीरथजी ने कहा- हे समस्त शास्त्रो के महान पण्डित भगवन | इस महान भयङ्कर से भयभीत मैं कुछ मानवो के उद्धार का उपाय पाप से पूछन की इच्छा रखता हूँ ॥११॥ हे सवज्ञ | आप तो मुनियो मे परम श्रेष्ठ है। यदि मुझ से रकपर अपना अनुग्रह करना चाहत हैं तो जिस कर्म के करने ३३८ [ नारद पुराण पर भगवान को प्रसन्नता होवे उस कलाप का वर्णन मेरे समक्ष मे करने की कृपा कीजिए ।॥ १२ ॥ श्री भृगु मुनि ने उत्तर दिया--हे राजन् । आपका हादिक मनोरथ मैं समझ गया हूँ। आप तो पुण्या- त्मक पुरुपो में परम श्रेष्ठ पुरुष हैं अन्यथा अपने सम्पूर्ण कुल के उद्धार करने का विचार ही कैसे करते ? ।।१३।। हे भूमिपते । जो आपके शुभ कर्म के द्वारा अपने कुल के उद्धार करने की इच्छा करे वह भले ही कोई भी क्यो न हो, उसको मनुष्य के स्वरूप का धारण करने वाला साक्षात् श्री हरि ही समझ लेना चाहिए ॥१४॥ कर्मणा येन देवेशो नृणामिष्टफलप्रद । तत्प्रवक्ष्यामि राजेन्द्र शृणुष्व सुसमाहित ॥१५ भव सत्यपरो राजन्नहिंसानिरतस्तथा । सर्वभूतहितो नित्य मानत वद वै क्कचित् ॥१६ त्यज ढुजनससर्ग भज साधुसमागमम् । कुरु पुण्यमहोरान स्मर विष्णु सनातनम् ॥१५ कृरु पूजा महाविष्णोर्याहि शान्तिमनुत्तमाम । द्वादशाष्टाक्षर मन्त्र जप थे यो भविष्यति ॥१८ सत्य तु कीदृश प्रोक्त सर्वभूतहित मुने। अनृत कीदृश प्रोक्त दुर्जनाश्चापि कीदृशा ॥१६ साधव कीदृशा प्रोक्तास्तथा पुण्य च कीदृशम स्मर्तव्यश्च क्थ विष्णुस्तस्य पूजा च कीदृशी ।।२० शान्तिश्च कीदृशी प्राक्ता की मन्त्रोऽष्टाक्षरो मुने । को वा द्वादशवर्णश्च मुने तत्वाथ कोविद ॥२१ हे राजन्द्र प्रवर । देवश्वर भगवान विष्णु जिस कम से मानवो को अपीट फल प्रदान दिया परत है उसकोही में अब आपका बतलाता हूँ आप परम गमाहत हारर उमा थपण वरिये ।।१५। हे राजन् । आवरत है उहै मैं आपका वत- नारद पुराण ] भगीरथ ने कहा- ? लाता हूँ --आप सदा सत्य भापण करो, पूर्णत अहिंमा व्रत का परिपा- सन करो, सर्वदा समस्त प्राणियो के हित का सम्पादन करो और भूल कर भी किसी भी दशा मे झूठ मत बोलो ।।१६॥ दुष्ट दुर्जन पुरुषो की सङ्गति कभी मत करो और सदा सत्पुरपो का सङ्ग करते रहा करो और यहनिश परम पुण्यमय सत्कर्मों को करते हुए मत्य एव सनातन विष्णु भगवान का भजन करते रहना चाहिए ॥१७॥ महा विष्णु भगवान का अर्चन करने से परमोत्तम शान्ति का लाभ होगा तथा द्वादशाक्षर (मो नमो भगवते वासुदेवाय) एव अष्टाक्षर (श्री कृष्ण शरणं मम) मत्र का जाप किया करो। इसमें आपका परम कल्याण होगा ॥१८॥ राजा -हे मुनिवर । सत्य का क्या लक्षण होता है ? समस्त भूनो (प्राणियो) का हित क्सिको कहा जाता है ? मिथ्या सिमा नाम है और दुर्जनो का स्वरूप कैसा होता है । ॥ १६ ॥ साधु तथा पुण्य किसको कहा जाया करता है ? पुण्य का वास्तविक स्वरूप क्या हुआ करता है ? भगवान विष्णु का स्मरण किस रीति से किया जाता है ? तथा उन भगवान का अचन किस विधान में किया जाता है ॥ २०॥ शान्ति का सच्चा स्वरूप क्या बतलाया गया है ? अष्टाक्षर मन्त्र कौन- सा है ? हे फ्ला के अर्थों के जानन वाले महा पण्डित । ह मुनिवर । बाप यह भी बतलाइये कि वह द्वादशाक्षर मन्त्र कौन-मा है ॥२१॥ कृपा कृत्वा मयि परा सर्व व्याख्यातुमहसि । साधु साधु महाप्राज्ञ तव बुद्धिरनुत्तमा ॥२२ यत्पृष्टोऽह त्वया भूप तत्सर्व प्रवदामि ते । यथार्थकथन यत्तत्सत्यमाहुर्विपश्चित ॥२३ धर्माविरोधतो वाच्य तद्धि धर्मपरायण । देशकालादि विज्ञाय स्वयमम्याविराधत ॥२४ यद्वच प्रोच्यते सभिस्तसत्यमभिधीयते । सर्वेषामेव जतूनामक्लेशजनन हि तत् ॥२५ ३४० [ नारद पुराण 1 । अहिंसा सा नृप प्रोक्ता सर्वकामप्रदायिनी। कर्मकार्यसहायत्वमकार्यपरिपन्थिता ॥२६ सर्वलोकहितत्व वै प्रोच्यते धर्मकोविदै । इच्छानुवृत्तकथन धर्माधर्माविवेकिन ॥२७ अनृत तद्धि विज्ञय सर्वश्रेयोविरोधि तत् । ये लोके द्वोपिणो मूर्खा कुमार्गरतबुद्धय ॥२८ हे महामुने । इन सभी मेरे प्रश्नो की आप कृपा पर विशद् व्याख्या कीजिए । ओ भृगुमुनि ने कहा हे महान् बुद्धि वाले राजन् वहुत ही अच्छी बातें आपने जनहित करने वाली पूछी है क्योकि आप आपकी बुद्धि तो बहुत ही श्रेष्ठ है ।। २२ ।। हे राजन् । आपने इस समय जो भी कुछ पूछा है । उसका मैं यथातक वर्णन करता हूँ-विद्वान पुरुष जो यथार्थ कहा जाता है उसको ही स य कहा करते हैं। सत्य वही है जिसका प्रवणकर मनुष्य सही बात को ठीक समझ जावे ।२३। उस सत्य को ऐसी रीति से धर्म मे तत्पर पुरुष को वहना चाहिए कि धमं मे कोई भी विरोध न आवे। देश और काल को भी भली भांति समझकर जिममे कोई विरोध न होवे ऐसा जो वचन कहा जाता है उसी को सत्पुरुष सत्य वचन कहा करत हैं। जिसमें किसी प्राणी को पाई कष्ट नहीं पहुंचता है ।२४-२५॥ हे नृपोत्तम ! अहिंसा उसी का नाम है जिममे समस्त वामनाएं पूर्ण हो जाया करती हैं। सभी सत्कर्मों मे सहायता देना और कुत्सिन फर्मों से दूर रहना ही धर्म म चतुर पुरपी वे द्वारा मर्द लोगो या हित कहा करते हैं। धर्म और अधर्म का पुछ भी विचार न कर विवेक रहित होकर स्वेच्छा पूवर वार्य बरना ही मूठ है ॥२६-२७।। इस झूठ गे सभी कल्याणो वा दरयामा बन्द हो जाया करता है। जो इस जगत म ढेप करने वाले लोग है तथा मूगं है इनकी मति मयंदा बुरे मार्गों पी और ही गाया प्रती । है॥२E1
नारद पुराण ]
ते राजन्दुजना ज्ञेया सर्वधर्मव हष्कृता ।
धर्माधर्मविवेकेन वेदमार्गानुसारिण ॥२६
सर्वलोकहितासक्ता साधव परिकीर्तिता ।
हरिभक्तिकर यत्तत्सद्भिश्च परिरञ्जितम् ॥३०
आत्मन प्रीतिजनक तत्पुण्य परिकार्तितम् ।
सर्व जगदिद विष्णुविष्णु सर्वस्य कारणम् ॥३१
अह च विष्णुर्यज्ज्ञान तद्विष्णुस्मरण विदु ।
सर्वदेवमयो विष्णुविधिना पूजयामि तम् ।।३२
इति या भवति श्रद्धा सा तद्भक्ति प्रकीर्तिता।
सर्वभूतभयो विष्णु परिपूर्ण सनातन ॥३३
इत्यभेदेन या बुद्धि समता सा प्रकीत्तिता।
समता शन मने पु वशित्व च तथा नृप ॥३४
यदृच्छालाभसतुष्टि सा शान्ति परिवोतिता।
एते सर्वे समाख्यातास्तय सिद्धिप्रदा नृणाम् ।।३५
हे राजन् | उन्ही पुरपा को दुष्ट एव दुर्जन सगयना चाहिए
और ऐमे लोग समस्त धर्म कृत्यो से वहिप्पत रहा परते हैं। जो पुरुष
सदा धर्म एव अधर्म का विचार गहराई के साथ रखे ही वेद प्रतिपा-
दित मार्गों पर गमन रिया करत हैं । सर्वदा सब प्राणियो वा हित
मम्पादन करने में परायण रहा करते थे ही साधु पुरप कहे जाया करते
हैं, जिससे श्री हरि भगवान के चरणा की प्रीति बढती है और सज्जन
जिससे परम प्रसन्नता प्राप्त करें और अपने हृदय में भी जिमवे करने
मे प्रसन्नता उत्पन्न होती है उसी को पुण्य पहा जाया करता है। यह
सम्पूर्ण विश्व भगवान विष्णु का ही एक व्यापर स्वरूप है और इम राब
ये भगवान विष्णु ही परम कारण है ।।२६-३१।। मैं भी विष्णु का हो
एव स्वरूप हूँ, ऐगा शान वा होना ही विष्णु पा स्मरण कहा जाया
परता है। भगवान विष्णु तो रावं देवमय है, मैं उनकी सविधि अपना
[ नारद पुराण
करू, इस प्रकार की श्रद्धा-भावना का समुत्पन्न होना ही भक्ति कही
जाती है। परिपूर्ण सनातन भगवान विष्णु सर्वभूतमय होते हैं ॥३२--
३३॥ इसी प्रकार की जो ये दया से शून्य बुद्धि है वही समता पही
जाती है। हे राजन् शत्रु-मित्र मे समता का व्यवहार रखना, इन्द्रियो
को अपने वश मे रखना, जो कुछ मी यदृच्छया प्राप्त हो जावे उसी मे
सन्तुष्ट रहना शान्ति कही जाया करती है। ये सभी बाते, सिद्धान्त पूर्ण
हैं और मनुष्यो को ये तपस्या की सिद्धि प्रदान करने वाली हुआ करती
हैं जिनको मैंने अभी आपको बतलाया है ।।३४ ३५।।
समस्तपापराशीनां तरसा नाशहेतव.।
अष्टाक्षर महामन्त्र सर्वपापप्रणाशनम् ॥३६
वृक्ष्यामि तव राजेन्द्र पुरुषार्थैकसाधनम् ।
विष्णोः प्रियकर चैव सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥३७
नमो नारायणायेति जपेत्प्रणवपूर्वकम् ।
नमो भगवते प्रोच्य वासुदेवाय तत्परम् ॥३८
प्रणवाद्य महाराज द्वादशार्णमुदाहृतम् ।
द्वयो. सम फलं राजन्नष्टद्वादशवर्णयो॥३६
"प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च साम्यमुद्दिष्टमेतयोः ।
शंखचक्रधर शान्त नारायणमनयमयम् : ४०
लक्ष्मीमश्रितवामाई तथाभयङ्कर प्रभुम् ।
किराटकुण्डलधर नानामण्डनशोभितम् ॥४१
भ्राजत्कोस्तुभमालाढ्य श्रीवत्साहितवक्षसम् ।
पीताम्बरधर देव सुरासुरनमस्कृतम् ॥४२
घ्यायेदनादिनिधन सर्वकामफलप्रदम् ।
अन्तर्यामी ज्ञानरपी परिपूर्णः सनातनः ॥४३
इन सब का परिपालन करने से शोष ही राव पापो के समुदाय
३४३ नारद पुराण ] । का विनाश हो जाया करता है । अष्टाक्षर महामन्त्र सभी पापो का नाश कर देने वाला होता है ॥३६॥ हे राजन् । यह महामन्त्र सभी पुरुषार्थों की प्राप्ति का एकमात्र साधन है और यह भगवान विष्णु को प्रिय वना देने नाला है तथा समो मिद्धियों को प्रदान करने वाला है । उसे अब मैं आपको बतलाता हूँ ॥३७॥ "ॐ नमो नारायणाय", यह अष्टा- क्षर मन्त्र है। इसका जाप करना चाहिए। "ॐ नमो भगवते वासु- देवाय", यह द्वादशाक्षर मन्त्र है । आठ और बारह अक्षरो से युक्त इन दोनो ही मन्त्रो का फल सम्मन ही हुआ करता है ॥३८-३६॥ प्रवृत्ति और निवृत्ति मे इन उपयुक्त दोनो मन्त्रो को समता बतलाई गयी है। सासारिक कर्मों से अनुराग सहित सम्पादन करने को प्रवृत्ति कहा जाता है और सभी लौकिक कार्यों से निर्वेद प्राप्त कर उनसे दूर हटने को निवृत्ति कहा करते हैं । अव भगवान के ध्यान करने के लिए उनके स्वरूप का वर्णन किया जाता है-शख-चक्र' धारण करने वाले, परम शान्त स्वरूप, अनामय अर्थात् परमानन्दमय, अपने वाये भाग मे सर्वदा लक्ष्मी देवी को साथ रखने वाले, किरीट और कुण्डली को धारण करने वाले, सदा अभय का प्रदान करने वाले, विविध बहु मूल्य भूपणो से विभूषित, दमकने वाली कौस्तुभ मणियो की माला को धारण करने व ले, श्री वत्स के चिह्न से युक्त वक्षस्थल वाले, पीताम्बर को पहिने हुए, सब देवासुरो के द्वारा वन्धमान, अनादि निधन और सब कामनाओ को परिपूर्ण करने वाले भगवान विष्णु है-ऐसा ही उनका ध्यान करना चाहिए। ये भगवान विष्णु अन्तर्यामी हैं, ज्ञान स्वरूप हैं, परिपूर्ण एवं सनातन है ।।४०-४३॥ एतत्सर्व समाख्यात तत्तु पृष्ट त्वया नृप । स्वस्ति तेऽस्तु तप.सिद्धि गच्छ लब्धु यथासुखम् ॥४४ एवमुक्तो महीपालो भृगुणा परमपिणा। परमा प्रीतिमापन्नः प्रपेदे तपसे वनम् ॥४५ [ नारद पुराण आप १५३। देवो ने प्रार्थना की थी-हे भगवान आप तो अपने स्मरण करने वालो को सभी पीडाओ को दूर कर दिया करते है । सर्वोपरि विराजमान परमात्मा हैं । आप अपने स्वभाव से परम विशुद्ध है और सब प्रकार से परिपूर्ण हैं । इम जगत के एक मात्र आप ही स्वामी हैं। ऐसे भगवान श्री विष्णु की सेवा मे हम सबका सादर एवं सविनय प्रणाम समर्पित है। आपके स्वरूप का ज्ञान करने वाले मनीपी आपको ज्ञानात्मक ही कहा करते हैं ॥५४॥ योगी लोग जिस महान आत्मा वाले का हमेशा ध्यान किया करते है और जो स्वेच्छा से ही शरीर धारण करके देवगणो का काय सफल किया करते है यह सम्पूण ससार जिनका ही रवरूप है तथा इस समस्त विश्व के जो आदि स्वामी हैं उन महा पुरुप की सेवा मे हम सब नमस्कार करते है ॥५५॥ जिनके परम पावन नामो का सकीर्तन करने से दुष्टो के मव पापो का नाश होजाया करता है उन्ही परम पूजनीय महान पुराण पुरुष भगवान विष्णु को हम लोग अपने अर्थ की सुसिद्धि प्राप्त करने के लिये प्रणाम करते हैं ।।५६ यत्तेजसा भान्ति दिवाकराद्या नातिक्रमत्यस्य कदापि शिक्षा । कालात्मक त विदशाधिनाथ नमामहे वै पुरुषार्थरूपम् ॥५७ जगत्करोऽप्यन्जभवोऽत्ति रुद्र पुनाति लोकान् श्रुतिभिश्च विप्रा। तमादिदेव गुणसन्निधान सर्वोपदेष्टारमिता शरण्यम् ॥५८ वर वरेण्य मधुकैटभारि सुरासुराभ्यचितपादपीठम् । सद्भक्तसकल्पितसिद्धिहेतु ज्ञानेकवेद्य प्रणता स्म देवम् ।।५६ अनादिमृध्यान्तमज परेशमनाद्यविद्य ख्यतमोविनाशम् । सच्चित्परानन्दघनस्वरूप रूपादिहीन प्रणता स्म देवम्॥६० नारायण विष्णुमनन्तमीश पीताम्वर पद्मभवादिसेव्यम् । यज्ञप्रिय यज्ञकर विशुद्ध नता स्म सर्वोत्तममव्यय तम् ॥६१ नारद पुराण ] इति स्तुतो महाविष्णुर्देवैरिन्द्रादिभिस्तदा। चरित तस्य राजदेवाना सन्यवेदयत् ॥६२ ततो देवान्नमाश्वास्य दत्त्वाभयमनजन. । जगाम यन राजपिस्तपस्तपति नारद ।।६३ मूर्य आदि समस्त ग्रह जिनके तेज के द्वारा ही प्रकाश प्रदान किया करते हैं और आज्ञा एव शिक्षा का कभी उल्लघन नहीं किया करते हैं उन्ही क्लारूप देवो के प्रभु परम पुरुषार्थ स्वरूप भगवान विष्णु की सेवा में हमारा प्रणाम सादर निवेदित किया जाता है ॥५७।। जो ब्रह्म का स्वरूप धारण कर इस विश्व की रचना किया करते हैं 1 श्री रुद्रदेव के स्वरूप मे अवस्थित होकर इस जगत का सहार किया करते हैं और विप्र के स्वरूप में आकर सब लोगो को युतियो के द्वारा पवित्र करते हैं उन्ही आदि देव गुणो के सन्निधान, सबको उपदेश देने वाले और शरण करने के योग्य भगवान् विष्णु की हम शरणागति लेते हैं ।।५८।। परम श्रेष्ठ शिरोमणि, मधु और कैटभ दैत्यो के विनाश करने वाले, देवासुरो के द्वारा पूजित चरण, अपने भक्तो के मनोरथो की सिद्धि के कारण स्वरूप और केवल ज्ञान के द्वारा ही जानने योग्य भगवान विष्णु देव को हम सब प्रणाम करते हैं ॥५६॥ जो आदि मध्यान्त से रहित है, जिनका जन्म कभी नहीं होता है, जो परम परेश आदि पुरुष और जो अविद्या के अन्धकार का नाश करने वाले तथा स्वरूप विहीन, सच्चिदानन्द है उन भगवान विष्णु देव की सेवा मे हम सब लोगो का प्रणाम है ॥६०।। जो साक्षात् नारा- यण, ईश, अनन्त विष्णु, पीताम्बर धारण करने वाले वाले,ब्रह्मादि सब देवो के वन्दनीय, यज्ञप्रिय, यज्ञकर, परम विशुद्ध स्वरूप, सर्व शिरो- मणि और अविनाशी हैं उन देवेश्वर को मेवा में हम सबका प्रणाम है ॥६१॥ इस भाति इन्द्रादि मब देवताओ ने भगवान का स्तवन करके फिर प्रार्थना की थी तो उन्होने राजर्षि भगीरथ के परम चरित्र का
३४८
[ नारद पुराण
वर्णन किया था और हे नारद । उस समय में भगवान विष्णु ने समस्त
देवो को समास्वासन दिया था । जहाँ पर राजपि भगीरथ तपश्चर्या
कर रहे थे वहा भगवान स्वय पहुँच गये थे ॥६२।६३
शखचक्रधरो देव सच्चिदानन्दविग्रह ।
प्रत्यक्षतामगात्तस्य राज्ञ सर्वजगद्गुरु ॥६४
त दृष्ट्वा पुण्डरीकाक्ष भाभासितदिगन्तरम् ।
अतसीपुप्पसकाश स्फुरत्कुण्डलमडितम् ॥६५
स्निग्धकुन्तलवक्त्राब्ज विभ्राजन्मुकुटोज्ज्वलम् ।
श्रीवत्सकौस्तुभधर वनमालाविभूषितम् ॥६६
दीर्घबाहुमुदाराग लोकेशाजितपकजम् ।
नमामि दण्डवद् भूमौ भूपतिनम्रकधर ॥६७
अत्यन्तहर्षसपूर्ण सरोमाञ्च सगद्गद ।
कृष्ण कृष्णेति कृष्णेति श्रीकृष्णेति समुच्चरन् ।।६८
तस्य विष्णु प्रसन्नात्मा ह्यन्तर्यामी जगद्गुरु ।
उवाच कृपयाविष्टो भगवान्भूतभावन ॥६६
भगीरथ महाभाग तवाभीष्ट भविष्यति ।
आगमिष्यन्ति मल्लोक तव पूर्वपितामहा ॥७०
इम सम्पूर्ण जगत् के गुरु सच्चिदानन्द भगवान् विष्णु राजा
भगीरथ के समक्ष म शख-चक्र आदि को धारण कर प्रकट होगये थे
वह राजपि भगीरथ ने अपनी दिव्य प्रभा से दिशाओ को प्रकाशित
करते हुये जिस समय मे भगवान के अलसी के पुष्प के समान कान्ति
वाले हिलत हुए कुण्डलो से विभूपित परम स्निग्ध और घुघराले केशो
से शोभायमान मुख कमल वाले, ददोप्यमान समुज्वल मुकुट को मस्तक
पर धारण करने वाले, वक्षस्थल पर कौस्तुभ मणि और श्रीवत्स को
धारण किये हुए, धनमालाधारी, परम विशाल भुजा युक,
लोक
से
नारद पुराण }
३४६
पालो द्वारा वन्द्यमान, उदार अङ्गो से शोभित पुण्डरीकाक्ष भगवान का
दर्शन किया तो वे अपना शिर झुका कर भगवान के चरणो मे दण्डवत्
प्रणाम करने लगे थे ॥६५-६७।। उस समय में भगवान का दर्शन
प्राप्त करके राजा भगीरथ के मन में अत्यधिक आह्लाद हो रहा था।
उनका प्रत्यैर रोम हर्षोल्लास के कारण खडा हो गया था, उनकी वाणी
गद्गद् हो गई थी वे केवल मुख से श्रीकृष्ण ही श्रीकृष्ण उच्चारण करने
लग गये थे ॥६८।। भगवान विष्णु के हृदय मे भक्त को भाव विह्वल
दशा को देखकर बहुत ही प्रसन्नता हुई और उस समय मे अन्तर्यामी
सव प्राणियो पर कृपा करने वाले जगद्गुरु राजा भगीरथ से बहने
लगे थे ।।६। भगवान ने कहा-हे महाभाग ) भगीरथ । तेरा
हादिक मनोरथ पूर्ण होगा और तेरे पूर्वजो का उद्धार होकर ये सब
मेरे लोक को प्राप्त होजायेंगे॥७०
मम मूय॑न्तर शम्भु राजन्स्तोत्रं स्वशक्तित ।
स्तुहि ते सकल काम स वै सद्य परिप्यति ॥७१
यस्तु जग्राह शशिन शरण समुपागतम् ।
तस्मादाराधयेशान स्तोत्रं स्तुत्य सुखप्रदम् ॥७२
अनादि निधनो देव सर्वकाम फलप्रद ।
त्वया सपूजितो राजन्सद्य श्रेयो विधास्यति ॥७३
इत्युव वा देवदेवेपो जगता पतिरच्युत ।
अन्तर्दधे मुनिथेय उत्तस्थौ सोऽपि भूपति ७४
किमिद स्वप्न आहोस्वित्सत्य साक्षाद् द्विजोत्तम ।
भूपतिविस्मय प्राप्त कि करोमीति विस्मित ७५
अथान्तरिक्ष वागच्च प्राह त भ्रान्तचेतसम् ।
सत्यमेतदिति व्यक्त न चिन्ता कर्तुमर्हसि ॥७६
तन्निशम्पावनोपाल ईशान सर्वकारणम् ।
समस्तदेवताराजमस्तीपीद्भक्ति तत्पर ।।७७
३५० [ नारद पुराण भगवान ने कहा-हे राजन् ! यह शम्भु मेरी ही दूसरी मूत्ति हैं । अब तुमको चाहिए कि उन शम्भु भगवान का स्तवन अपनी शक्ति के अनुसार करो । वे तुम्हारे सभी मनोरथो को पूर्ण अवश्य ही कर देगे क्योकि शम्भु बहुत ही दयालु हैं ॥७१॥ भगवान् शम्भु ने शरण मे समागत चन्द्र को ग्रहण किया है। अब उन्ही स्तुत्य भगवान परम सुहृदायक ईश्वर की स्तोत्रो के द्वारा स्तुति करो ॥२॥ जन्म-मरण से रहित सब मनोरथो को पूर्ण करने वाले भगवान शङ्कर की हे राजा । यदि तुम अर्चना करोगे तो वे भोलेनाथ परम कृपालु प्रभु अति शीघ्र आपका कल्याण कर देंगे ॥७३॥ हे मुनि शिरोमणि ! देवो के भी देव भगवान जगत के स्वामी अच्युत राजा भगीरथ से यह कहकर वही पर अन्तहित हो गये थे। तव राजा भगीरथ उठकर खडा हो गया था ॥७४।। उस ममय में राजा ने मन में विचार किया था कि क्या यह मेरा स्वप्न था अथवा मर्वथा सत्य घटना घटित हुई है । मैं इस समय में क्या करू। राजा भगीरथ को उस समय में ऐमा विस्मय-सा हो रहा था ।।७५॥ उमी समय में इस भ्रान्ति से पूर्ण राजा को आकाशवाणी सुनाई दी थी कि यह सब स्पष्टतया सत्य है, तुमको अब कुछ भी मनमे चिन्ता नही करनी चाहिये ॥७६।। इस प्रकार से उम नभोवाणी के द्वारा श्रवण करके राजा भगीरथ ने सब के कारण स्वस्प और सव देवो मे महान भगवान शङ्कर की स्तुति करने में भक्ति भाव में सलग्त हो गये थे प्रणमामि जगन्नाथ प्रणतार्तिप्रणाशनम् । प्रमाणागोचर देवमीशान प्रणवात्मकम् ॥७८ जगद् पमज नित्य सर्गस्थित्यतकारणम् । विश्वम्प विरुपाक्षं प्रणतोऽम्म्युप्ररेतसम् ।।७६ यम ।
नारद पुराण ]
३५१
समामनन्ति योगीन्द्रास्त वन्दे पुष्टिवर्धनम् ॥८०
नमो लोकाधिनाथाय वञ्चते परिवञ्चते ।
नमोऽस्तु नीलग्रीवाय पशूना पतये नमः ॥८१
नमचैतन्यरूपाय पुष्टाना पतये नम ।
नमोऽकल्पप्रकल्पाय भूताना पतये नम ॥८२
नम. पिनाकहस्ताय शूलहस्ताय ते नमः ।
नम. कपालहम्ताय पाशमुद्गरधारिणे ॥८३
नमस्ते सर्वभूताय घण्टाहस्ताय ते नमः ।
नमः पञ्चास्यदेवाय क्षेत्राणा पतये नम ॥८४
नमः समस्त भूतानामादिभूताय भूभृते ।
अनेकरूपरूपाय निर्गुणाय परात्मने ||८५
राजपि भगीरथ ने प्रार्थना की थी-मैं इस समस्त जगत् के
परम प्रभु प्रगतिशील पुरुषो के दुखो के विनाशक, प्रमाणो के द्वारा
अगोचर और प्रणयस्वरूप भगवान शम्भु की सेवा मे अपना प्रणाम
अर्पित करता हूँ ॥७॥ यह सम्पूर्ण जगत ही जिनका स्वरूप है, जो
अजन्मा और नित्य हैं । उत्पति, स्थिति और प्रलय में जो मूल
कारण है उन विरूपाक्ष, विश्वरूप एव उग्र वीर्य वाले भगवान शिव
के चरणो मे मेरा प्रणाम है ॥७६। वडे २ योगी जन जिन को
आदि मध्यान्त न रहित, अनन्त, अज और अव्यय बतलाया करते है
उन्ही पुष्टि के बढाने वाले भगवान शङ्कर को मैं प्रणाम करता है ।८०
आप सभी लोको के स्वामी हैं अपनी अद्भुत अचिन्त्य माया के द्वारा
सवको मोह जात मे डाले हुए है उन्ही नीलकण्ठ, यज्ञ जीवो को ज्ञान
प्रदान करने वाले भगवान शहर के चरण कमलो में मेरा
प्रणाम है ।।८१।। जो स्वय चतन्य स्वरूप से युक्त हैं। परिपुष्टो को
मुमार्ग में लगाने वाले भगवान शम्भु की सेवा मे मेरा प्रणाम प्रस्तुन
है। असम्भव को भी सम्भव कर देने वाले, पांच भूतो पर प्रभुता रखने
वाले भगवान शङ्कर वो मरा प्रणाम है ।।२।।
प्रभु
३५२
[ नारद पुराण
कपाल को धारण करने वाले तया पाश और मृदङ्ग को ग्रहण करने
वाले भगवान शङ्कर को मेरा प्रणाम है ।।३।। सर्वभूत, हाथ मे घण्टा
धारण करने वाले, पांच मुखो से युक्त, क्षेत्र रक्षक भगवान शम्भु की
सेवा मे समादर सहित मेरा प्रणाम है ॥८४॥ सब भूतो मे आदि भूत,
भूभृत, अनेक स्वरूपो वाले, निर्गुण निरजन भगवान शम्भु को मेरा
प्रणाम है ।।८५
नमो गणाधिदेवाय गणाना पतये नम ।
नमो हिरण्यगर्भाय हिरण्यपतये नम ॥८६
हिरण्यरेतसे तुभ्य नमो हिरण्यवाहवे।
नमो ध्यानस्वरूपाय नमस्ते ध्यानसाक्षिगे ॥७
नमस्ते ध्यानसस्थाय ध्यानगम्याय ते नम ।
येनेद विश्वमखिल चराचरविराजितम् 11८८
वर्षवाभ्रण जनित प्रधानपुरुषात्मना ॥८६
स्वप्रकाश महात्मान पर ज्योति सनातनम् ।
यमामनन्ति तत्त्वज्ञा सवितार नृचक्षुपाम् ॥६०
उमाकान्तन्नन्दिवेश नीलकण्ठ सदाशिवम् ।
मृत्युञ्जय महादेव परात्परतर विभुम् ॥६१
पर शब्दब्रह्मरूप त वन्देऽखिलवारणम् ।
कपद्दिने नमस्तुभ्य सद्योजाताय वै नम ॥६२
समस्त गणो के आदि देव, सर गणो के अधिदेव तथा गणों के
पति आपको मेरा प्रणाम है। हिरण्यगर्भ और हिरण्य पति को मेरा
प्रणाम है ॥८६॥ जिया यह सुवर्ण वीय है उन हिरण्ययाहु भगवान
निव का मेरा प्रणाम है । ध्यान दे म्वरप म ममस्थित तथा ध्यान वे
साक्षी के लिए मरा प्रणाम है ॥७॥ सदा ध्यान म मग्न रहने वाले
तथा परम ध्यान द्वारा ही प्राप्त होने वाले भगवान शम्भु को मेरा
प्रणाम ममापत है। पिग्म प्रधान पुरष स यह मपूर्ण स्थावर,
नारद पुराण ]
३५३
जङ्गम विश्व मेघ वर्षा के ममान ही प्रकट हुआ है और जिनको तत्त्व-
वेत्ताजन मनुष्य दृष्टि का सूर्य कहते हैं उन स्वप्रकाश, महान् आत्मा
वाले, परम ज्योति रूप भगवान शिव को मैं प्रणाम करता हूँ ॥८८-
६०॥ जगदम्बा उमा देवी के पति, नन्दिकेश, नील कण्ठ, मृत्युञ्जय
सदाशिव, महान देव, परम श्रेष्ठत्तम, विभु, शब्द ब्रह्म स्वरूप और
सबके कारण स्वरूप भगवान शिव को मरा प्रणाम है। मस्तक पर
जटा जूट धारण करने वाले, अपने भक्तजनो की रक्षा करने के लिए
तुरन्त प्रकट होने वाले सद्योजात भगवान शङ्कर को मेरा प्रणाम
है ।।६१-६२।।
भवोद्भवाय शुद्धाय ज्येष्ठाय च कनीयसे ।
मन्यवे त इपे तय्या पतये यजतन्तवे ॥६३
ऊर्जे दिशा च पतये कालायाघोररूपिणे ।
कृशानुरेतसे तुभ्य नमोऽस्तु सुमहात्मने ।।६४
यत ससुद्रा सरितोऽद्रयश्च गन्धर्वयक्षात्युरसिद्धसपा ।
स्थाणुश्चरिष्णुमहदल्पक च असच्च सज्जीवमजीवमास १६५
नतोऽस्मि त योगिनताघ्रिपद्म सर्वान्तरात्मानमरूपमीशम् ।
स्वतन्त्रमेक गुणिना गुण च नमामि भूय प्रणमामि भूय ६६
इत्य स्तुतो महा देव शङ्करो लोकशङ्कर ।
आविर्वभूव भूपस्य सतप्तस्तपसोग्रत ॥६७
इस समस्त जगत् के उत्पत्ति स्थान, मर्वव्यापक, महान् और परम
मूक्ष्म स्वरूप वाले, यज्ञ स्वरूप, वेदनयी (ऋक्, यजु और साम) की रक्षा
करने वाले, यज्ञ तन्तु, महाबलवान्, दिशाओ के स्वामी कालरूप, अघोर
स्पी और कृशानुरेता, महान् आत्मा भगवान् शिव को प्रणाम है ।।६३
-६४ा जिन भगवान् से य ममुद्र, नदियाँ, पवत, यक्ष, गन्धवं, असुर,
सिद्ध समुदाय, स्थावर जङ्गम,
छोटे-बडे सत् यसत् और चेतन एवं
अचेतन समुत्पन्न हुए हैं उन प्रभु शिव को मैं प्रणाम करता हूँ ॥६५॥
३५४
[ नारद पुराण
योगीजन जिनके चरणो की सदा वन्दना किया करते है उन शिव को
मेरा प्रणाम है। जो सबके अन्तरात्मा है, रूप रहित ईश, एक, स्वतन्त्र
और गुणीजनो के गुण हैं, उन भगवान शङ्कर की मैं वन्दना करता हूँ
1६६॥ जिस समय में समस्त ससार का कल्याण करने वाले भगवान
शिव की इस भाँति स्तुति की गई तो वे उस भगीरथ के अत्युग्र तप से
सन्तप्त होकर वही पर प्रकट हो गये थे ।।६७॥
पञ्चवक्त दशभुज चन्द्रार्द्धकृतशेखग्म् ।
विलोचनमुदाराङ्ग नागयज्ञोपवीतिनम् ।।६८
विशालवक्षस देव तुहिनाद्रिसमप्रभम् ।
गजचर्माम्बरधर सुराचितपदाम्बुजम् ॥६६
दृष्ट वा पपात पादाने दण्डवद्भुवि नारद ।
तत उत्थाय सहसा शिवाग्ने विहिताञ्जलि ॥१००
प्रणनाम महादेव कीर्तयशङ्कगह्वयम् ।
विज्ञाय भक्ति भूपस्य शङ्कर शशिशेखर ॥१०१
उवाच राज्ञे तुष्टोऽस्मि वर वरय वाछितम् ।
तोपितोस्मि त्वया सन्यक् स्तोत्रण तपमा तथा ।।१०२
एवमुक्त स देवेन राजा सतुष्टमानम ।
उवाच प्राञ्जलिर्भूत्वा जगतामीश्वरेश्वरम् ।।१०३
अनुग्राह्योस्मि यदि ते वरदानान्महेश्वर ।
तदा गङ्गा प्रयच्छास्मपितृ णा मुक्तिहेतवे ।।१०४
दत्ता गङ्गा मया तुभ्य पितृणा ते गति परा।
तुभ्य मोक्ष परश्चेति तमुक्-वान्तर्दधे शिव ॥१०५
हे नारद । राजपि भगीरथ ने अपन समक्ष में जय भगवान
शहर व स्वरूप का दर्शन दिया था तो उम ममय म उनका स्वरूप
परम मुन्दर था। शिव के पांच मुष थे दश भुजाये थी, माथे पर अर्ध
पन्द्र शामित पा, तीन नेत्र धे, विशाल अजपा गिम पर नागो या
यश.पवीत धारण पिया दृा था। विशाल वक्षस्थल या, हिमालय में
नारद पुराण ] सदृश कानि सम्पन्न थे । गज के चर्म को धारण करने वाले, देवो द्वारा वन्दित चरण वाले भगवान शहर को साक्षात् सामने उपस्थिति देखत ही भगीरथ प्रेम विभोर होकर उनके चरणो म लोट गया था। दण्डवत् लेटकर उन चरणो का स्पर्श किया और फिर उठकर दोनो हाथ जोड कर शिव के शुभ श्रेयस्कर नामो का कीर्तन करन लग गया था। भगवान शकर उम राजा की भक्ति को भली-भांति समझ गये थे 118 -१०१।। भगवान शकर राजा भगीरथ से कहने लगे-मैं तुझ पर बहुत ही प्रसन्न हूँ अब तरी जो भी इच्छा हो वही वरदान मुझसे मांग ले। तुम्हारे इम स्तोत्र से और तपश्चर्या क्षर्या से मैं बहु, ही अधिक सन्तुष्ट एव प्रसन्न हो गया हूँ ॥१०२॥ भगवान शिव के इस कथन से भगीरथ के मन को बहुत कुछ सन्तोष हो गया था और फिर वह हाथ जोडकर जगदीश्वरो के भी ईश्वर से प्राथना करने लगा था ॥१०३॥ राजपि भगीरथ न कहा-ह महेश्वर । यदि आप वरदान प्रदान करके मुझ मेवर पर पूर्ण अनुग्रह करना चाहत है तो मेरे भस्मीभूत पितरो के उद्धार करने के लिए गङ्गाजी को दीजिए ।।१०।। भगीरय की इस प्रार्थना पर भगवान शिव न उत्तर दिया था कि मैं तुमको गङ्गा देता है। इसमे तेरे पितरो की तो परम श्रेष्ठ गति होगी ही और तेरी भी मुक्ति हो जायगी, इतना ही कहकर शकर का वही पर अन्तर्धान हो गया था ॥१०५॥ कपर्दिनो जटामस्ता गङ्गा लोक स्पाविनी। पावयन्ती जगत्सर्वमन्वगच्छभगीरथम् ।।१०६ तत प्रभृति सा देवी निर्मला मलहारिणी। भागीरथोति विख्याता त्रिषु लोकेप्वभून्मुने ॥१०७ मगरम्यात्मजा पूर्व या दग्या म्वपाप्मना । त देश प्लावयामाम गङ्गा मवसरिद्वरा ॥१०८ यदा सप्नापित भस्म सागराणा तु गङ्गया। तदेव नसे मग्ना उद ताश्च गर्ननस । १० [ नारद पुराण पुरासन श्यमानेन ये यमेनातिपीडिता । तदेव नरके मग्ना उद्घ ताश्च गतैनस ॥११० गतपापान्स विज्ञाय यम सगरसभवान् । प्रणम्याभ्यच्य विधिवत्प्राह तान्प्रीतमानस ॥१११ इधर भगवान को जटागो की लट से नटखट गङ्गा जो सम्पूण ससार को पविन करने वाली है इस संसार को पवित करती हुई राजा भगीरथ के पीछे पीछ चल रही थी ।।१०६ उमी दिन से यह गङ्गा हे मुनिवर । मल को दूर करने वाली परम निमल तीनो लोको म भागीरथी के नाम से प्रसिद्ध हो गई थी ।।१०७।। सव प्रथम सगर के पुन अपने पाप के कारण भस्मीभूत हो गये थ उसी स्थान पर पहुँचकर गङ्गा नदी ने पवित्र एव प्लवित किया था ॥१०॥ गङ्गाजी न सगर के साठ हजार पुत्रो की भस्म को प्रक्षालित किया था कि नरको म पडे हुए मगर मुत निष्पाप होकर परम शुद्ध हो गये थे और उनका उद्धार हो गया था ॥१०६। इसके पूर्व यमराज ने बहुत ही डाट उपट कर घोर दण्ड जिनको दिया था उही को गङ्गा जल से स्नाT से स्नान करने पर बहुत आदर के साथ पूजा की थी ।।११०॥ यमराज ने जब सगर के पुत्रो का निष्पाप हुआ जान लिया तब उनको प्रणाम और सत्तार करके परम प्रमानता से कहने लगा था ॥१११॥ भो भो राजसुता यूय नरवाद भृशदारुणात् । मुक्ता विमानमारुह्य गच्छध्व विष्णुमन्दिरम् ॥११२ इत्युक्तास्ते महात्मानो यमेन गतकल्मपा । दिव्यदधरा भूत्वा विष्णुलोक प्रदिरे ॥११३ एवप्रमावा सा गङ्गा विष्णुपादानसभवा । सदलारपु विख्याता महापातकनाशिनी ॥११४ य इद्र पुण्यमाख्यान महापातानाशनम् । पठच्च शृणुयाद्वापि गङ्गास्नानफा लमत् ॥११५ यस्त्वतत्पुण्यमास्यान वयवद्वाह्मणायत ।
३५७
नारद पुराण ]
स याति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ॥११६
यमराज ने कहा-हे राज पुनो । अब आप इस परम भयानक
नरक से मुक्त हो गये हैं । अव तो श्री गङ्गाजी की कृपा से आप लोग
दिव्य विमानो का पर समारूढ होकर सीधे विष्णु लोक को गमन करिए
॥११२।। यमराज के द्वारा इस तरह के कहने पर उन समस्त सगर के
पुत्रो ने दिव्य देह धारण करके निष्प्राण होते हुए विष्णु भगवान के
लोक मे गमन किया था ॥११३।। भगवान विष्णु के चरणो के नखो से
प्रकट हुई गङ्गा का ऐसा अद्भुत प्रभाव है । फिर वह गङ्गा समस्त
लोको म महान् से भी महान् पापो का विनाश करने वाली पतितपावनी
प्रसिद्ध हो गई थी ॥११४॥ जो मनुष्य पाप नाशक परम पवित्र आख्यान
का श्रवण किया करता अयवा इसको पढता है उसको गगाजी के
स्नान करने के तुल्य ही पुण्य फल प्राप्त हुआ करता है ।।११।। जो इस
परम पवित्र म्यान का वित्रो की सभा में वर्णन किया करता है वह
भी पुनर्जन्म से छुटकर विष्णु लोक को गमन पिया करता है ।।११६॥
॥ शुक्ला द्वादशी वृत का उद्यापन ॥
साधु सूत महाभाग त्वयातिकरुणात्मना।
थावित सर्वपापघ्न गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् ॥१
श्रुत्वा तु गङ्गामाहात्म्य नारदो देवदर्शन.।
कि पप्रच्छ पुन मूत सनक मुनिसत्तमम् ॥२
शृणुध्वमृपय. सर्वे नारदेन मुरपिणा ।
पृष्ट पुनर्यथा प्राह प्रवक्ष्यामि तथैव तत् ॥३
नानाख्यानेतिहासाढय गङ्गामाहात्म्यमुत्तमम् ।
थु त्वा ब्रह्मसुतो भूय. पृष्टवानिदमादगत् ॥४
[ नारद पुराण अहोऽतिधन्य सुकृतकसार श्रुत मया पुण्यमसवृतार्थम् । गाङ्ग यमाहात्म्यमघप्रणाशि त्वत्तो मुने कारुणिकादभीष्टम् ॥५ ये साधव साधु भजन्ति विष्णु स्वार्थ परार्थ च यतन्त एव । नानोपदेशै सुविमुग्धचित्त प्रवोधयन्नि प्रसभ प्रसन्नम् ॥६ तत समाख्याहि हरेव॑तानि कृतैश्च यै प्रीतिमुपैति विष्णु । ददाति भक्ति भजता दयालुमुक्तिस्तु तस्या विदिता हि दासी १७ शौनकादि महपियो ने श्री सूतजी से कहा---हे महाभाग आपने समस्त महान् भीषण पापो के विनाश करने वाली गङ्गाजी के माहात्म्य का श्रवण करा कर हम लोगो पर अत्यधिक कुपा का प्रदर्शन किया है। अब आप हम को यह बताइये कि देवर्षि नारद जी ने गङ्गा जी के इस माहात्म्य का श्रवण कर इसके पीछे मुनि श्रेष्ठ श्री सनकजी से क्या जिज्ञासा की थी ॥१२॥ इस पर सूतजी ने कहा-हे ऋषि- गणों । देवपि श्री नारद जी के पूछने पर महर्षि सनक देव कहा था उस मबको मैं बिलकुल उसी भांति आप लोगो को सुनाता हूँ ॥३॥ ब्रह्मा क पुत्र नारदजी विविध कथानको तथा इतिहास से परिपूर्ण गङ्गाजी के इस उत्तमोत्तम आख्यान को सुनकर फिर सनवजी से बडे ही समादर के साथ पूछने लगे थे ।।४।। श्री नारद जी ने कहा था- है मुनिवर | आपके मुखारविन्द से परम पुण्यो का सार और परम पुण्य स्वरूप एव महा पाप विनाशक गङ्गा माहात्म्य सुना है ? आप तो स्वय ही वहुत दयालु हैं आपको धन्यवाद है ॥५॥ साधु पुरुषो का ऐसा स्वभाव ही हाता है कि वे सर्वदा भगवान् विष्णु का भजन किया करते हैं और वे अपने तथा दूमरो के उद्धार की सदा चेटा किया करते हैं। जिनका मन महान् घोर मोह म पड़ा रहता है उनको अनेक प्रकार का सदुपदेश प्रदान कर उन्हें वह यश प्रसन्नता दिया करते हैं ॥६॥ अतएव जिन व्रतो वे करने से भगवान विष्णु की प्रसन्नता हुआ करती है उन ग्रतो का अवश्य वर्णा कीजिए। भगवान तो स्वय ही बहुत दयालु हैं । जो उनसे
नारद पुराण ]
जो लोग उनका भजन किया करते हैं । उनको भक्ति दे दिया करते हैं
और मुक्ति तो उनकी परम प्रसिद्ध दामी है ।।७।।
ददाति मुक्ति भजता मुकुन्दा व्रताचंनध्यानपरायणानाम् ।
भक्तानुमेवामु महाप्रयास विमृश्य कस्यापि न भक्तियोगम् ।।८
प्रवृत्त च निवृत्त च यत्कर्म परितोपणम् ।
तदाख्याहि मुनिश्रेष्ठ विष्णुभक्तोऽसि मानद ।।६
साधु साधु मुनिश्रेष्ठ भक्तस्त्व पुरुषोत्तमे ।
भूयो भूयो यत पृच्छेश्वरि शाङ्गधन्वन. ॥१०
व्रतानि ते प्रवक्ष्यामि लोकोपकृतिमन्ति च ।
प्रमोदति हरियैस्तु प्रयच्छत्यभय तथा ॥११
यस्य प्रसन्नो भगवान्यज्ञलिङ्गो जनार्दनः ।
इहामुत्र सुख तस्य तपोवृद्धिश्च जायते ।।१२
येन केनाप्युपायेन हरिपूजापरायणाः ।
प्रयान्ति परम स्थानमिति प्राहुर्महर्पय ॥१३
मार्गशी सितेपक्षे द्वादश्या जलशायिनम् ।
उपोपितोऽयेत्सम्यड नर श्रद्धाममन्वित ॥१४
जो लोग भगवान का प्रत-पूजन और ध्यान दिया करते है
उनको भगवान मुक्ति दे दिया करते है किन्तु भत्तो को मेवा करने में
यहुत झाट भोगना पडता है-ऐसा समन पर किसी को भी भति-
योग देना नहीं चाहते हैं ॥८॥ हे मानद । भले ही प्रवृत्ति मार्ग वा हो
या पाहे निवृत्ति मार्ग का हो, ना मत्यम भगवान श्री हरि को प्रसन्नता
समुत्पन्न कराने वाला हो उसी वा अव थाप मेरे सामने वर्णन परिए।
आप तो म्नय भगवान विष्णु के परम शिरोमणि भत्त है और भाप
ममी शुछ जानते हैं ॥६॥ श्री मनाजी ने कहा--हे परम श्रेष्ठ मुने ।
यहत अन्ठा प्रश्न रिया है, यह भस्पधिप अच्छी यात है। बार भी तो
भगवान पुरषोत्तम के परम भन है यया मा धनुपरे पास मरने
३६० [ नारद पुराण वाले भगवान के चरित्र को बारम्बार पूछते ही चले जा रहे है। बिना भक्ति के ऐसी वात अन्य कौन पूछ सकता है ? ॥१०॥ मै अब आपके प्रश्न के अनुसार ही अपने समक्ष मे गसार का परम उपकार करने वाले व्रतो का विशद वर्णन करता हूँ जिन व्रतो के करने पर भगवान विष्णु परम प्रसन्न हुआ करते है और अभय का दान दिया करते है ।।११।। यज्ञ स्वरूप भगवान की जिस जीव पर प्रसन्नता होती है उस जीवात्मा को दोनो लोको मे सर्वदा सुख की प्राप्ति हुआ करती है और उसकी तपस्या की वृद्धि हुआ करती है ।।१२।। महपियो का ऐगा कहना है कि हरि का पूजन करने वाले चाहे जिस प्रकार स उनका अर्चन करने वाले चाहे जिस प्रकार से उनका पर्चन करने वाले हो उनको अवश्य ही परम पद की प्राप्ति हो जाया करती है ।।१३।। जो परम श्रद्धा से सयुन होते है वे मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन को व्रत धारण कर जलशायी भगवान का भली-भाति पूजन किया करते हैं ॥१४॥ स्नात्वा शुक्लाम्बरधरो दन्तधावनापूर्वकम् । गन्धपुष्पाक्षतैबूंपैर्दीपेनैवेद्यपूर्वकै ॥१५ वाग्यतो भक्तिभावेन मुनिश्रेष्ठार्चयेदरिम् । केशवाय नमस्तुभ्यमिति विष्णु च पूजयेत् ॥१६ अष्टोतरशत हुत्वा वह्नो घृततिलाहुतीः । रायी जागरण कुर्याच्छालग्रामसमीपतः ॥१७ स्नापयेत्प्रस्थपयसा नारायणमनामयम् । गीतैर्वाद्य श्च नैवेद्यमेश्य ज्यश्च केशवम् ॥१८ यिकाल पूजयेद्भक्तमा महालदम्या समन्वितम् । पुन कल्ये समुत्थाय कृत्वा कर्म यथोचितम पूर्ववत्पूजये देव वाग्यतो नियत. शुचिः । पायस घृतसमिश्र नालिकेरफलान्वितम् ॥२० ॥१६
३६२
[ नारद पुराण
नारायणपरो भूत्वा स्वय भुजोत वाग्यत ।
इति य कुरुते भक्तया केशवार्चनमुत्तमम् ॥२३
स पौडरीकयज्ञस्य फलमष्टगुण लभेत् ।
पौषमास सिते पक्षे द्वादश्या समुपापित ॥२४
नमो नारायणायेति पूजये प्रयतो हरिम् ।
पयसा स्नाप्य नैवेद्य पायस च समर्पयेत् ॥२५
रानौ जागरण कुर्यात्रिकालार्चनतत्पर ।
धूपर्दोपैश्च नैवेद्यर्गन्धै पुप्पैमनोरमै ॥२६
तृणेश्च गीतवाद्यायै स्तोत्रैश्चाप्यर्चयेद्धरिम् ।
कृशरान्न च विप्राय दद्यात्सघृतदक्षिणम् ॥२७
सर्वात्मा सर्वलोकेश सवव्यापी सनातन ।
नारायण प्रसन्न स्यात्कृशरान्नप्रदानत ॥२८
मीणानेन विप्राय दत्त्वा वै दानमुत्तमम् ।
द्विजाश्च भोजेच्छक्तया स्वयमद्यात्सवान्धव ॥२६
इसके अनन्तर अपनी वाणी को नियम नियन्त्रित रखते हुए
नारायण का ध्यान रखकर स्वय प्रसाद ग्रहण करना चाहिये । इस
विधान के अनुसार जो भी कोई भक्तिभाव पूर्वक भगवान केशव का
पूजन क्यिा करता है ।।२३।। वह मनुष्य पौण्डरीक यज्ञ का अठगुना
पुण्य-फल प्राप्त किया करता है। फिर पौष शुक्ला द्वादशी के दिन भी
बन रक्से तथा अपनी इन्द्रियों को वश में रख पर 'नमो नारायण'
इम मन्त्र का उच्चारण कर श्री हरि का पूजन करना चाहिये । दूध
से भगवान् का स्नान वरावर फिर नैवेद्य और क्षीर वा भाग लगाना
चाहिये ॥२४॥२५॥ रात्रि के समय म जागरण करे तथा तीनो कालो
मे भगवान का सविधि अचन करना चाहिये । धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प,
गन्ध, खसादि तृण, गान वाद्य और स्तान आदि से श्री हरि का पूजन
घर । 'सर्वात्मा, सव लावेश सर्वव्यापी सनातन । नारायण
प्रसन्न
[ नारद पुराण
स्यात्कृशरान्न प्रदानतः' अर्थात् सर्वव्यापी, समस्त लोको के स्वामी,
सव में अन्तर्यामी रूप से निवास करने वाले सनातन भगवान नारायण
इम खिचडी के दान में प्रसन्नता प्राप्त करें, इस मन्त्र के द्वारा घृत
तथा दक्षिणा द्रव्य रखकर ब्राह्मण को दान देवे। इस विधि से ब्राह्मण
को श्रेष्ठ दान देकर फिर अपनी शक्ति के अनुसार विप्रो को भोजन
करावे और अपने वन्यु वान्यवो के सहित स्वय भी भोजन करे
॥२६-२६॥
एव सपूजयेद्भक्तया देव नारायण प्रभुम् ।
अग्निष्टोमाष्टकफल स सपूर्णमवाप्नुयात् ॥३०
माघस्य शुक्लद्वादश्या पूर्ववत्समुपोपितः ।
नमस्ते माधवायेति हुत्वाशी च धृताहुतीः ।।३१
पूर्वमानेन पयसा स्नापयेन्माधव तदा ।
पुप्पगन्धाक्षतरचेंत्मावघानेन चेतसा ॥३२
रात्री जागरण कुर्यात्पूर्ववद्भक्तिसयुत ।
कल्यकर्म च निर्वत्य माधव पुनरचयेत् ॥३३
प्रस्थ तिलाना विप्राय दद्यादै मन्मपूर्वकम् ।
सदक्षिण स वस्य च सर्वपापविमुक्तये ॥३४
माधव सर्वभूतात्मा सर्वकर्मफलप्रद ।
तिलदानेन महता मन्किामान्प्रयच्छतु ।।३५
इस विधि से भगवान् नारायण का मनिपूर्वक धनन करने
मे आठ अग्निष्टोम यशो का पुष्प-पल मिला परता है। भगवान इसमें
परम प्रसन्न होते है। इमी भांनि माघ माम यो द्वादशी निषि में
दिन भी वन रगना चाहिये । दम दिन 'नमम्म
मा उम्चारण पर एतमी आट आनियां अग्नि में देनी चाहिए।
एर प्रस्य दुग्ध मे प्रगान माधव की प्रतिमा यो म्नान पगना माहिये
और परम ममाहित रित मे गधामा पुपादियारा भगवान् ।
माधवाय ग मात्र
[ नारद पुरण पूजन करना चाहिये ॥३०-३२॥ पूर्ववत् भक्तिभाव पूर्वक रात्रि मे जागरण करे और प्रात काल का सर्व कर्म करके भगवान माधव का पुन, पूजन करना चाहिए ।।३३।। इसके उपरान्त मन्त्र पढ कर एक प्रस्थ तिल तथा दक्षिणा एका वस्त्र रख कर ब्राह्मण को दान देना चाहिये। ऐसा करने से ममस्त पापो का विनाश होजाया करता है 11३४1। इसका मन्त्र यह है--'माधव सर्वभूतात्मा सर्व कर्म फल- प्रद । तिल दानेन महता सर्वान् कामान् प्रयच्छतु --अर्थात् समस्त प्राणियो की आत्मा, मव कर्मो का फल प्रदान करने वाले भगवान माधव इन तिलो के दान से समस्त मनोरथी को पूर्ण करें ।। ३५ मन्द्रोणानेन विप्राय दत्त्वा भक्तिसमन्वित । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्तया सस्मरन्माधव प्रभुम्॥३६ एव य कुरुते भक्तया तिलदाने व्रत मुने । वाजपेयशतस्यासौ सपूर्ण फलमाप्नुयात् ।।३७ फाल्गुनस्य सिते पक्षे द्वादश्या तमुपोपित. । गोविन्दाय नमस्तुभ्यमिति सपूजयेद् व्रती ।।३८ अष्टोत्तरशत हुत्वा घृतमिथतिलाहुती । पूर्वमानेन पयसा गोविन्द स्नापयेच्छु चि. ॥३६ रात्री जागरण कुर्यालिकाल पूजयेत्तथा । प्रात कृत्य समाप्याथ गोविन्द पूजयेत्पुनः ॥१० ग्रीह्याढक च विप्राय दद्याद्वस्न सदक्षिणम् । नमो गोविन्द सर्वेश गोपिकाजनवल्लभ ॥४१ अनेन धान्यदानेन प्रोतो भव जगद्गुरो। एन कृत्वा व्रत सम्यक् सर्वपापविजित. ॥४२ गोमेघमखज पुण्य सम्पूर्ण लभते नरः । चैत्रमासेमिते पक्षे द्वादश्या समुपोपित ॥४३ इम मन्त्र से ब्राह्मण को भक्तिभाव के साथ दान देवर भगवान नारद पुराण ] माधव का हृदय मे स्मरण करता हुआ अन्य ब्राह्मण को अपनी शक्ति के अनुसार भोजन कराना चाहिये ।।३६।। हे मुनिवर । इस विधि से भक्ति की भावना से दिलो को दान प्रदान किया करता है उसको एक सो वाजपेय यज्ञो के करने का फल मिना करता है ॥३७॥ व्रत करने वाले पुरुष को फाल्गुन मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन पूर्व की ही भांति व्रत रखकर 'गोविन्दाय नमस्तुभ्यम्' इस मात्र का उच्चारण करके भगवान का पूजन करना चाहिये तथा घृत मिथित तिलो से एक्सो याठ आहुतिया देकर एक प्रस्थ दुग्ध से पवित्रता के साथ श्री गोविन्द को स्नान करावे ॥३८॥३६।। व्रत के दिन में रात्रि मे जागरण करे, तीनो कालो मे भगवान का पूजन करे और प्रात.. कालीन सम्पूर्ण कृत्य ममाप्त करके फिर श्री गोविन्द भगवान का यजन करना चाहिये ॥४०॥ 'नमो गोविन्द सर्वेश गोपिका जन वल्लभ । अनेन धान्य दानेन प्रीतो भव जगद्गुरो ।' अर्थात् हे गोपीजनो के परम प्रिय गोविन्द । आप सबके ईश है। आपकी सेवा में मेरा प्रणाम समर्पित है । इस धन्य के दान से आप मुझ पर प्रसन्न होइये । इस रीति से प्रार्थना करने पर चार सेर ( एक नाटक ) धान, वस्त्र और दक्षिणा ब्राह्मणो को दान देवे। इस विधि से व्रत कराने पर मनुष्प सब पापो से मुक्त होकर गोमेध यज्ञ के पूरे फल को प्राप्त किया करता है ॥४१ -४३।। नमोऽस्तु विष्णवे तुभ्यमिति पूर्ववदर्चयेत् । क्षीरेण स्नापयेद्विष्णु पूर्णमानेन शक्तित ॥४४ तथव स्नापयेद्विप्रघृतप्राथेन सादरम् । कृत्वा जागरण रानी पूजयेत्पूर्ववद्वती ॥४५ तत कल्ये समुत्थाय प्रात कृत्य समाप्य च । अष्टोत्तरशत हुत्वा मध्वाज्यतिलमिश्रितम् ।।४६ सदक्षिण च विप्राय दद्याद्वै तण्डुलाढकम् ।
[ नारद पुरा प्राणरूपी महाविष्णु प्राणद सर्नवल्लभ ॥४७ तण्डुलाढकदानेन प्रीयता मे जनार्दन । एव कृत्वा नरो भक्तया सर्वपापविजित. ॥४८ अत्यग्निष्टोमयज्ञस्य फलमष्टगुण लभेत् । वैशाखशुक्लद्वादश्यामुपोप्य मधुसूदनम् ॥४६ द्रोणक्षीरेण देवेश स्नापयेद्भक्ति सयुत । जागर तन कर्तव्य निकालाचनसयुतम् ॥५० इसी रीति से चैत्र शुक्ला द्वादशी के दिन व्रत करना चाहिये । इस दिन पे 'नमोऽस्तुऽविष्णवे'-इस मन्त्र से पूर्व के समान ही भग- धान का प्जार्चन करे तथा एक मेर दुग्ध से भगवान विष्णु का स्नान करावे ।।१४। इसके अनन्तर एक सेर घृत से स्नान कराना चाहिये । व्रती पुरुप को पूर्व की भांति ही रात्रि जागरण करके पुन पूजन करना चाहिय ।।५५।। प्रात काल मे उठ कर सम्पूर्ण कृत्यो से निवृत्त होकर मधु, घृत और विला से निमित शाकत्य से एक्सौ आठ अग्नि में आहुतिया देनी चाहिये ।।४६॥ प्राण रूपी महा विष्णु प्राणद मर्व वरलभ । तण्डुलाढक दानन प्रीयता मे जनार्दन' अर्थात जो भगवान् विष्णु प्राणो के स्वरूप वाले हैं, प्राणो का बल का प्रदान करने वाले हैं और सभी के परम प्रिय हैं वे भगवान जनार्दन मेरे इस चार सेर चावलो के दान से प्रसन्न होगे,भक्तिभाव से समन्वित होकर ऐमी विधि करन पर मनुष्य समस्त पापो से मुक्त होकर परम विशुद्ध होजाया करता है।।४७॥४८॥वह मनुष्य अग्निष्टोम या अटगुन पुण्य-पल को प्राप्त करने का अधिकारी हो जाया करता है। इमी भाति मैशाख माम ये प्रवल पक्षीद्वादशी के दिन भी व्रत रम और परम गक्ति की भावना मे मधुसूदन भगवान की प्रतिमा का एप द्रोण (३२ गेर) दूध मे अभिपेर करावे तया तीना समय में सविधि पूजन पर और गांव में जागरण भी पंव गगना पाहिय ।।४३५० नारद पुराण ] नमस्ते मधुहतो च जुहुयाच्छक्तितो घृतम् । अष्टोत्तरशत प्रार्यविधिवन्मधुसूदनम् ।।५१ विपापो ह्यश्वमेधानामष्टाना फलमाप्नुयात् । ज्येष्ठमासे सिते पक्षे द्वादश्यापुपवासकृत् ।।५२ क्षीरेणाढकमानेन स्नापयेद्यस्त्रिविक्रमम् । नमस्त्रिविक्रमायेति पूजयेद्भक्तिसयुत ॥५३ जुहुपात्पायसेनेव ह्यष्टोत्तरशताहुती । कृत्वा जागरण रानौ पुन पूजा प्रकल्पयेत् ॥५४ अपूपविशतिं दत्त्वा ब्राह्मणाय सदक्षिणम् । देवदेव जगन्नाथ प्रसीद परमेश्वर ॥५५ उपायन च सगृह्य ममाभीष्टप्रदो भव । ब्राह्मणान्भौजयेच्छक्तया स्वय भुञ्जीत वाग्यत ॥५६ नमस्ते मधुह ने इस मन्त्र का उच्चारण करके घी की अष्टोत्तर शत आहुतियां अग्नि मे अर्पित करे। इस तरह अपनी शक्ति अनुसार शास्त्रो में वर्णित विधि विधान से भगवान का अर्चन करने से सब पापो से छुटकारा प्राप्त कर व्रती मनुष्य आठ अश्वमेध यज्ञो के समाचरण का पुण्य फल प्राप्त कर लिया करता है ।। ५११५२ ।। इसी प्रकार से ज्येष्ठ शुक्ला द्वादशी के दिन मे उपवास करने वाला पुरुप चार मेर दूब मे निविक्रम प्रभु का स्नान करावे और 'नभ- स्त्रि विक्रमाय' - इस मन्त्र के द्वारा भक्ति भाव पूर्वक भगवान त्रिवि- क्रम का पूजन करे ॥५३॥ गोदुग्ध मे पायस बना कर उसकी एक्सो आठ आहुतियां देवे । रात्रि जागरण और पूजन करना चाहिये ॥५४॥ इसके अनन्तर वीस गुलगुले और दक्षिणा 'देव देव जग- ग्नाथ प्रसीद परमश्वर । उपायन च मगृह्य ममाभीष्ट प्रदोभव' अर्थात् हे देवो के भी देव इस जगत् के स्वामी ! आप मुझ पर प्रसन्न होइए। हे परमात्मन् ! आप मेरी इस तुच्छ भेट को स्वीकार करके [ नारद पुराण मेरी मनोवाछित वस्तु का दान मुझको कृपा कर प्रदान कीजिये । इसका उच्चारण करे और ब्राह्मण को दान देवे | फिर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मणो को भोजन कराकर स्वय भी मौन रहकर भोजन करे ॥५५॥५६॥ एव यः कुरुते विप्र व्रत गैविक्रम परम् । सोऽष्टाना नरमेधाना विपाप फलमाप्नुयात् ॥५७ आपाढशुक्लद्वादश्यामुपवासी जितेन्द्रिय. । वामन पूर्वमानेन स्नापयेत्पयसा व्रती ।।५८ नमस्ते वामनायेति दूर्वाज्याप्टोत्तर शतम् । हुत्वा च जागर कुर्याद्वामत चार्चयेत्पुनः ।।५६ सदक्षिण च दध्यन्न नालिकेरफलान्वितम् । भक्तया प्रदद्याद्विप्राय वामनाचं नशीलिने ॥६० वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यस्थ वामन. सदा । वामनस्तारकोऽस्माच्च वामनाय नमो नमः ॥६१ अनेन दत्वा दध्यन्न शक्तितो भोजयेद् द्विजान् । कृत्वैवमग्निष्टोमाना शतस्य फनमाप्नुयात् ॥६२ श्रावणस्य सिते पक्षो द्वादश्यामुपवासकृत् । क्षीरेण मधुमिश्रण स्नापयेच्छीधर व्रती ॥६३ हे विप्र । जो कोई भी मनुष्य इम विधि-विधान में इम परम बेष्ठ निविक्रम प्रत को विया करता है उस मानव के समस्त पाप नष्ट हो जाया करते है और वह फिर आठ नरमेध यज्ञी के द्वारा होने वाले पुण्यो को प्राप्त कर लिया करता है ॥५७।। इसी रीति से आपाढ मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी का भी प्रतोपवास का विधान है जो इस दिन उपवास किया करता है उगयो जितेन्द्रिय रहकर प्रथमोत तोल के ममान ही दुग्ध में वामन देव प्रभु का अभिषेचन परावे ॥५८॥ फिर दूध और घी की-नमस्ते वामनाय' इगगन मे नारद पुराण ] अष्टोत्तर शत माहुतियाँ अग्नि मे देनी चाहिये । रात्रि मे जागरण तथा वामनदेव का यजन करे और इसके पश्चात उस उपवास एव पूजन करने वाले मनुष्य को चाहिये कि वह किसी सुयोग्य ब्राह्मण को 'वामनो बुद्धिदो होता द्रव्यम्थो वामनो सदा वामनस्तारकोऽस्मांच वामनाय नमोनम.' इसका अर्थ यह है कि वामन भगवान बुद्धिदाता हैं और इन सब द्रव्यो मे वामन देव विराजमान हैं। वामन देव के द्वारा बुद्धि देने से ही मैं इस समय मे हवन कर रहा हूँ। इस जगत मे वामन देव ही उद्धार करने वाले हैं। ऐसे वामन देव भगवान की सेवा में मेरा प्रणाम अपित है । इस मन्त्र से दधि, अन्न और नारियल तया दक्षिणा का दान करे ॥६०६१। इसी मन्त्र के द्वारा अपनी शक्ति के अनुसार ही ब्राह्मणो को दधि और अन्न से भोजन कराना चाहिय । ऐसी रीति इस व्रत दान और पूजन से एक सौ अग्निष्टोम यज्ञो के यजन करने का फल प्राप्त हुआ करता है ॥६२।। इस प्रकार से थावण शुक्ला द्वादशी के दिन का भी उपवास होता है । इस दिन व्रती व्यक्तियो को चाहिये कि दूध और मधु से भगवन श्रीधर प्रभु को स्नान करावे ।।६३ नमोऽतु श्रीधायेनि गन्धाद्य पूजयेत्क्रमात् । जुहुयात्पदाज्येन शतमप्टोत्तर मुने ॥६४ कृत्वा च जागर रात्री पुन पूजा प्रकल्पयेत् । दातव्य चैव विप्राय क्षीराढकमनुत्तमम् ॥६५ दक्षिणा च सवस्त्रा वै प्रदद्याद्ध मकुण्डले । मन्त्रणानेन विरेन्द्र सर्वकामार्थसिद्धये ॥६६ क्षीराब्धिशायिन्देवेश रमाकान्त जगत्पते। क्षीरदानेन सुप्रीतो भव सर्वसुखप्रद ।।६७ सुखप्रदत्वाद्विप्राश्च भोजयेच्छक्तितो प्रती। एवं कृत्वाश्वमेधाना सहस्रम्य फल लभेत् ॥६८ ३७० [ नारद पुराण मासि भाद्रपदे शुक्ल द्वादश्या समुपोपितः। स्नापयेद् द्रोणपयसा हृषीकेश जगद्गुरुम् ॥६६ हृपीकेश नमस्तुभ्यमिति सपूज्येन्नर । चरुणा मधुयुक्तेन शतमष्टोत्तर हुनेत् ॥७० 'नमोऽस्तु श्रीधराय'- '- इस मन्त्र का मुख से उच्चारण करते हुये गन्धाक्षत पुष्पादि पूजन के औपचारिक द्रव्यो से भगवान का पूजन करना चाहिये । फिर हे मुनिवर | फिर पृपदाज्य दधि घृत मिश्रित हव्य मे एकसौ आठ आहुतियाँ अग्नि मे देवे ॥६४॥ रात्रि में यथा विधि जागरण करके पुन भगवान् का अर्चन करे और इस मन्त्र को पढता हुआ हे विप्र । फिर चार सेर उत्तम दुग्ध, वस्त्र, सुवण के कुण्डल तथा दक्षिणा किसी मुयाग्य सत्पात्र ब्राह्मण को दान मे देना चाहिए । इससे मनुष्यो की सम्पूर्ण मनोकामनाये सिद्ध हो जाया करती है ॥६५॥६६॥ क्षीराधि शायिन् देवेश रमाकान्त जगत्पते । क्षीर दानेन सप्रीतो भव सर्वत्सखप्रद' । अर्थात हे क्षीर सागर में सुख शयन करने वाले, भगवती लक्ष्मी के पति तथा देवो के ईश जगत्पते । आप मेरे द्वारा प्रदत्त इस क्षीर के दान से परम प्रसन्न होकर मुझे सभी प्रकार के सुखो को प्रदान कीजिए। इस उपरान्त व्रती को ब्रह्मभोज बराना चाहिय क्योवि विप्रो को भोजन कराना परम मुखो का देने वाला हुआ करता है। ऐसी विधि से इस व्रत को साङ्ग सम्पादित घरने पर एक सहस्र अश्वमेधो का फल मिला करता है ।। ६७१६५ ।। इमी भांति भाद्रपद मास की शुक्ल पम को द्वादशी के व्रत का भी विधान है । इस दिन उपवाम वर ३२ सेर दूध से भगवान जगत् के गुरु हृषीकेश का स्नान कराना चाहिए ॥६EIL हृषीकेश नमस्तृभ्यम्' इम मन्य का पहार भगवान का अर्चन परे तथा मधु मिश्रित पर भी अष्टात्तर गत माहुनियो दनी चाहिय ॥ ३० जागरादीनि नित्यं दद्यादात्मविदे तत ।
नारद पुराण ]
३७१
सार्धाढकं च गोधूमान्दक्षिणां हेम शक्तितः ॥७१
हृपीकेश नम तुभ्य सर्वलोकैकहेतवे ।
मह्य सर्वसुख देहि गोधूमस्य प्रदानतः ॥७२
भोजयेद्ब्राह्मणाशक्तया स्वय चाश्नीत वाग्यत. ।
सर्वपापविनिमुक्ती ब्रह्ममेधफल लभेत् ॥७३
आश्विने मासि शुक्लाया द्वादश्या समुपोपितः ।
पद्मनाभ च पयसा स्यापयेद्भक्तितः शुचि. ॥७४
नमस्ते पद्मनाभाय होम कुर्यात्स्वशक्ति ।
तिलव्रीहिवाज्यश्च पूजयेच्च विधानतः ॥७५
जागर निशि निवर्त्य पुन पूजा समाचरेत् ।
दद्याद्विप्राय कुडव मधुनस्तु सदक्षिणम् ॥७६
पद्मनाभ नमस्तुभ्य सर्गलोकपितामह ।
मधुदानेन सुपीतो भव सन सुखप्रद. ॥७७
इसके अनन्तर पूर्ववत् जागरण कर पुन पूजन करे । इम समस्त
कृत्य के अवसान मे किसी आत्मवेत्ता ब्राह्मण वो ६ सेर गेहूँ तथा
शक्ति के
अनुरूप द्रव्य दक्षिणा अर्पित करे। दान करने के समय मे-
'हृषीकेश नमस्तुभ्या सर्वलोकक हेतवे । मह्य सर्व सुख देहि गोधूमस्य
प्रदानत ॥ जय हे हृषीकेश | आपकी सेवा मे सादर प्रणाम है ।
आप ही समस्त लोको के एक मात्र कारण हैं । यब इन गेहुंओ के दान
मे मुझे सभी प्रकार के सुखो को प्रदान कीजिए ॥७१।७२। इसके
उपरान्त अथाशक्ति ब्रह्मभोज करावे और स्वय भी मौन रहकर भोजन
करे। ऐसा विधान करने से मनुष्य समस्त वृत महा पापो से मुक्त
होकर ब्रह्ममेध यज्ञ के पुण्य फल को प्राप्त किया करता है ।। ७३ ॥
इसी रीति से आश्विन मास की शुक्ला द्वादशी के दिन उपवाम रख
कर परम पवित्र होता हुआ भक्ति के सहित दूध के द्वारा यज्ञनाभ
भगवान का स्नान कराना चाहिए ।।७४|| "नमो पद्मनाभाय' इम
३७२
[ नारद पुरान
मन्त्र का उच्चारण करके तिल, धान जौ और घृत की अपनी
शक्ति के अनुसार अग्नि मे आहुतिया देवे और शास्त्र वर्णित
विधि से ही पूजन करना चाहिए ॥ ७५ ।। रात्रि में भी
सविधि जागरण करके पुन रात्रि में भी पूजन करना चाहिए
तथा एक कुडव ( एक पाव ) शहद और द्रव्य दक्षिणा किसी
सत्पात्र विप्र को-पद्मनाभ नमुस्तभ्य सव लोक पितामह । मधु
दानेन सुप्रीतो भव सव सुखप्रद' अर्थात हे समस्त लोको की रचना
करने वाले पितामह ! आपकी सेवा मे मेरा प्रणाम है । आप इस
मधु के दान
परम सन्तुष्ट होकर मुझे सव सुखो को दीजिए। इसक)
उच्चारण कर दान देना चाहिये ।।७७
एव य कुरुते भक्तया पदमानभव्रत सुधी ।
ब्रह्ममेधसहस्रस्य फलमाप्नोति निश्चितम् १९७८
द्वादश्या कार्तिके शुक्ले उपवासी जितेन्द्रिय ।
क्षीरेणाक्ढकमानेन दना वाज्येन तावता ॥७६
नमो दामोदरायेति स्नापयेभक्तिभावन ।
अष्टोत्तरशत हुत्वा मध्वाज्याक्ततिलाहुता ॥८०
जागर नियत कुर्यात्तिकालार्चनतत्पर ।
प्रात सपूजयद्द व पद्मपुप्पैमनोरम 11८१
पुनरष्टोत्तरशत जुहुयात्सतस्तिले ।
पञ्चभक्ष्ययुत चान्न दद्याद्विप्राय भक्तित ॥५२
दामादर जगन्नाथ सवकारणवारण ।
त्राहि मा कृपया देव शरणागतपालव ।।८३
अनेन दत्त्वा दान च श्रोग्रियाय युटुम्बिन ।
दक्षिणा च यथा शक्तया ग्राह्मणाश्चापि माजयेत् ।।८४
जा बुद्धिमान पुरप इस रीति म भक्ति भाव पूवर इस पदम
नाम भगवान व दावा रिया करता है उसका एक महर अश्य.
नारद पुराण ] मेध यज्ञो के यजन करने का पुण्य-फल मिला करता है ॥७८। इसी रीति से कात्तिक मास मे शुक्ल पक्ष की द्वादशी का फल हाता है । इस दिन अपनी सव इन्द्रियो को पूर्ण नियन्त्रण में रख कर उपवास करना चाहिये । व्रत में चार सेर दूध, दही अथवा घृत से 'नमो दामोदराय' इस मन्त्र के द्वारा भक्ति भाव से समन्वित होकर भगवान का म्नान कराना चाहिये तथा पुनः घृत, मधु मिश्रित निलो के सकल्य से अप्ठोत्तर शत आहुतियां अग्नि मे डाल कर होम करे। प्रातः मध्यान्ह और सायङ्काल इन तीनो कालो मे भगवान का अर्चन करे । रात्रि मे जागरण करे । प्रातः काल मे कमल के परम सुन्दर पुषो से भगवान का पूजन करना चाहिए और फिर घृत मिथित तिलो की एक सौ आठ आहुतियाँ देवे । “दामोदर जगन्नाथ सर्व कारण । माहिमा कृपया देव शरणागत पालक अर्थात हे दामोदर । हे जगत् के नाथ । आप सब कारणो के कारण हैं । हे देव । कृपा करके मेरी रक्षा कीजिए । आप भक्तोका पालन करने वाले हैं । इस मन्त्र से ब्राह्मणो को भक्ति भाव के साथ पांच प्रकार के व्यजनो का दान करे 11७६-८३॥ इस मन्त्र के द्वारा किसी कुटुम्ब वाले श्रोनिय ब्राह्मण को दान एव द्रव्य दक्षिणा देकर यथा शक्ति ब्रह्मभोज करावे ॥५४ एव कृत्वा व्रत सम्यगश्नीयाद्वन्धुभिः सह । अश्वमेधसहस्राणा द्विगुण फलमश्नुते ॥८५ एव कुर्याद्वती यस्तु द्वादशीव्रतमुत्तमम् । सवत्सर मुनिश्रेष्ठ स याति परम पदम् ॥८६ एकमासे द्विमासे वा य कुर्याद्भक्तितत्परः । तत्तत्फलमवाप्नोति प्राप्नोति च हरेः पदम् ।।८७ पूर्ण सवत्सर कृत्वा कुर्यादुद्यापन व्रती। मार्गशीर्वासिते पक्षे द्वादश्या च मुनीश्वर ।।८८ स्नात्वा प्रातर्यथाचार दन्तधावनपूर्वकम् ।
[ नारद पुराण इस विधि शुक्लमाल्याम्बरधर. शुक्लगन्धानुलेपन.।।८६ मण्डप कारयेद्दिव्य चतुरस्र सुशोभनम् । घण्टाचामरसयुक्त किङ्किणीरवशोभितम् ॥६० अलकृत पुष्पमाल्यैर्वितानध्वजराजितम् । छादित शुक्लवस्त्रेण दीपमालाविभूपितम् ॥६१ व्रत पूर्ण करके फिर अपने बान्धवो के साथ मे बैठ कर स्वय भी भोजन करना चाहिए। इस उपवास को करके दो सहस्र अश्वमेध यज्ञो के यजन का पुण्य फल प्राप्त हुआ करता है है मुनिवर ! जो कोई भी मनुष्य इस विधान से वर्ष भर के उप- वास किया करता है उस द्वादशी के व्रती को अन्त मे परमपद की प्राप्ति होती है ।।१६।। जो कोई मनुष्य भक्ति भाव पूर्वक एक या दो मास भी इस व्रत का अनुष्ठान करता है उसको उन मासो का पुण्य फल प्राप्त होजाया करता है और अन्त मे विष्णु लोक की प्राप्ति हुआ करती है ॥७॥ यदि पूरे वर्ष तक सभी मासो में यह व्रत पूर्ण करे तो उस उपवास करने वाले पुरुष का इस प्रत का उद्यापन भी अवश्य ही करना चाहिये । उद्यापन का विधान यह है कि मार्गशीर्ष मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि के दिन प्रात समय में दातुन करके स्नानादि नित्य कृत्य समाप्त करे इसके पश्चात् श्वेत एव सुगन्धित पुष्पो की माला बनवा कर उसे धारण परे और श्वेत चन्दन का लेपन करे । एक चौकोर परम दिव्य मण्डप की रचना कर उसमे सब ओर घण्टे, चमर और घुघरू लटकाने चाहिए ॥८८--६०। इस सुन्दर मण्डप को भली भांति पुष्पो की मालायें लटका कर विभूपित करे। बीच में चंदोवा, और चारो ओर शुक्ल वस्त्र को मुन्दर झालर लटकानी चाहिये तथा दीपमालाओ से उने दीप्ति युक्त करे ॥६१ तन्मध्ये सर्वतोभद्र कुर्यात्सम्यगलकृतम् । काल के उस पर ध्वजा
नारद पुराण
तम्यापरि न्यमेतुम्मान्द्वादगाप्रपूरितान् ॥६२
एपेन गुपनवोण सम्यक्गशोधितेन च ।
मानाच्छादयेत्युम्भा पञ्चरत्नममन्वितान् ॥६३
लक्ष्मीनारायण देव कारयेदभक्तिमान्त्रती।
हेम्ना वा रजतेनापि तया ताम्रण वा द्विज ॥४
स्थापयेत्प्रतिमा ता च दुम्मापरि मुगयमी।
तन्मूल्य वा द्विजथः काञ्चन च स्वशक्तित ॥६५
मवंग्रतेपु मतिमान्वित्तशाठय विवर्जयेत् ।
यदि पुर्यात्क्षय यान्ति तस्यायुद्ध'नसपद. ॥६६
अनन्तशायिन देव नारायणमनामयम् ।
पञ्चामृतेन प्रथम स्नापयेद्भक्तिसयुत ॥६७
नामभि केशवायरन ह्य पचारान्प्रकल्पयेत् ।
रात्री जागरण कुर्यात्पुराणश्रवणादिभि ॥६८
उम मण्डित मजुल मण्डप के मध्य म मुन्दर मर्वतोभद्र
मण्डप की रचना करवावे । उसके ऊपर जल स भरे हुए बारह घट
रक्ये ॥३२॥ भली भांति स्वच्छ शुक्ल वस्त्र से पन्चरत्न जिनमे पडे
हुए हैं उन घटी को ढांक देना चाहिए ॥६३।। हे द्विजवर्य । भक्त व्रत
घारी
पुरुप
को चाहिए कि सुवर्ण, चांदी अथवा ताम्र की श्री लक्ष्मी
नारायण भगवान की प्रतिमा बनपावे ॥६४॥ उस मयमशील उपवास
परने वाले पुरुष के द्वारा उस सुन्दर भगवान् को प्रतिमा की स्थापना
पट के ऊपर करनी चाहिए। यदि विमी विशेष कारणवश
वो मूत्ति वा निर्माण न कराया जा सके तो उतने ही मूल्य वा अथवा
वित्तशान्य से रहित होकर अपनी शक्ति क अनुसार वहां पर सुवर्ण
रख देना चाहिए ॥६५॥ बुद्धिमान पुरुष को अत्यन्त उदारता मे
भक्ति पूर्वक इस कर्म का समाचरण करना चाहिए । इन भगवान
के प्रीति के लिये किए हुए व्रतो में कमी कमी न करे। यदि कृपणता
भगवान
[ नारद पुराण
से काम करता है तो भगवान असन्तुष्ट हो जाया करते हैं ।। ६६ ॥
सर्व प्रथम अनन्तशायो लक्ष्मीनारायण प्रभु ना भक्ति के सहित पचा-
मृत से स्नान अर्थात् अभिषेक कराना चाहिए ॥१७॥ फिर केशय
आदि भगवान के परम पावन एव शुभ नामो से भगवान को सेवा
करते हुए तथा पवित्र पुराणादि की कथा का श्रवण करते हुये रात्रि
में जागरण करना चाहिये ।।६।।
जितनिद्रो भवेत्सम्यक्सोपवासो जितेन्द्रियः ।
यिकालमर्चये देव यथाविमवविस्तरम् ॥६६
तत. प्रातः ससुत्थाय प्रायः कृत्य समाप्य च ।
तिलहोमान्च्याहृतिभि. सहस्र कारयेद्विजैः ॥१००
ततः संपूजयेदेव गन्धपुष्पादिभिः क्रमात ।
देवस्य पुरत. कुर्यात्पुराणथवण ततः ।।१०१
दद्याद् द्वादविप्रेभ्यो दध्यन्न पायसं तथा।
अपूपर्दशभिर्युक्त सघृतं च सदक्षिणम् ॥१०२
देवदेव जगन्नाथ भक्तानुग्रहविग्रह ।
गृहाणोपायन कृष्ण सर्वाभीष्टप्रदो भव ।।१०३
अनेनोपायनं दत्त्वा प्रार्थयेत्प्राञ्जलि: स्थितः ।
आधाय जानुनी भूमो विनयावनतो वती।।१०४
नमो नमस्ते सुरराजराज नमोऽस्तु ते देव जन्निवास ।
कुरुष्व सपूर्णफल ममाय नमोऽस्तु तुभ्य पुरुषोत्तमाय ॥१०५
निद्रा न कर उसको जीत लेवे। उपवास करते हुए अपनी
समरत इन्द्रियो को विषयो की ओर न जाने देकर अपने वश में ही
रक्छे । अपो वैभव के अनुरूप ही तीनो समयो में भगवान का अर्चन
करना चाहिए। इसके अनन्तर जागरण समाप्त कर प्रात: काल मे सब
कृत्य करके ब्राह्मणो के द्वारा व्याहृतियो से अग्नि में एक सहस्र आहु-
तिया डलवानी व हिए। वे व्याहृतियां ये हैं--ॐ भूः,
भारद पुराण ] महः, जनः, ॐ तपः, ॐ सत्यम् ||६-१००1। इसके अन- न्तर सुगन्धित पुष और गन्धातादि के द्वारा भगवान का धर्चन पारे । इसके उपरान्त भगवान ने समीप मे ही स्थित होकर पुराणो का श्रवण करे ।।१०१। इसके पश्चात् दश विप्रो को दधि, अन्न, क्षीर, दश-दश गुनगुले, घन और दव्य दक्षिणा देकर "देवदेव जगन्नाथ भक्ता- नुग्रह निग्रह । गृहाणो पाया कृष्ण सर्वाभीष्ट प्रदोमव ।" अर्थात् हे देवो के देव ! अपने भक्तजनो पर अनुकम्पा करने के ही लिये शरीर धारण करने वाले अर्थात अवतार लेने वाले । जगत् के स्वामिन् हे कृष्ण ! मेरे द्वारा समर्पित इस भेंट को अङ्गीकार करने मुझे मेरी सभी मनो- पाछित वस्तुएँ प्रदान कीजिए। इस मन्त्र वो पढना चाहिए ।।१०२- १०३ ।। इस विधि से उपयुक्त मन्त्र का पाठ करते हुए भेट समर्पित करे और पीछे प्रतधारी पुरुष का कर्तव्य है कि वह अपने दोनो घुटने भूमि पर टेक कर हाथ जोडते हुए सविनय श्री भगवान से प्रार्थना करे ॥ १०४॥ प्रार्थना इस भांति है-"नमोनमरते सुरराज राजनमोस्तुते देव जगन्निवास । कुरुष्व सम्पूर्ण फल ममाय नमोऽस्तु तुभ्यं पुरुषोतमाय" अर्थात हे देवो के देव के भी राजा ! आपकी सेवा मे मेरा बारम्बार प्रणाम निवेदित है । हे जगत् के निवास ! हे देव थापको मेरा अनेकशः प्रणाम है। आप अब मुझे सम्पूर्ण फल प्रदान कीजिये ॥ १० ॥ इति सप्रार्थयेद्विप्रान्देव च पुरुषोत्तमम् । दद्यादयं च देवाय महालक्ष्मीयुताय वै ।।१०६ लक्ष्मीपते नमस्तुभ्य क्षीरार्णवनिवासिने। अध्यं गृहाण देवेश लक्ष्म्या च पहित. प्रमो॥१०७ यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यून सपूर्णता यति सद्यो वन्दे तमच्युतम् ।।१०८ इति विज्ञाप्य देवेश तत्सर्व सयमी व्रते। प्रतिमा दक्षिणायुक्तामाचार्याय निवेदयेत् ॥१०६ [ नारद पुराण ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाच्छक्त्या दद्याच्च दक्षिणाम् । भुजीत वाग्यतः पश्चात्स्वय वधुजनैर्वृतः ।।११० आसायं शृणुयाद्विष्णोः कथां विद्वज्जनः सह । इत्येव कुरुते यस्तु मनुजो द्वादशीव्रतम् ।।१११ सर्वान्कामान्स आप्नोति परत्रेह च नारद । मिसप्तकुलसयुक्तः सर्वपापविजितः । प्रयाति विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति ।।११२ य इद शृणुयाद्विप्र द्वादशीव्रतमुत्तमम् । वाचयेद्वापि स नरो वाजपेयफल लभेत् ॥११३ इस रीति से श्री भगवान से तथा तत्कालीन समुपस्थित ब्राह्मणो से प्रार्थना करनी चाहिए। फिर देवी महालक्ष्मी और भगवान् श्री नारायण की सेवा मे-" लक्ष्मीपते नमस्तुभ्य क्षीरार्णवनिवासिने । अध्य गृहाण देवेश लक्ष्म्या च सहितः प्रभो ।" अर्थात् हे क्षीरसागर मे निवास करने वाले हे प्रभो ! हे लक्ष्मीदेवी के स्वामिन् । आपको मेरा प्रणाम है। हे प्रभो । आप अपनी प्रियतमा लक्ष्मी माता के सहित मेरे द्वारा प्रदत्त इस अर्घ्य को ग्रहण कीजिये। इस मन्त्र उच्चारण करता हुआ भगवान् को अर्घ्य अर्पित करना चाहिए ॥१०६, १०७ ।। इसके पश्चात् सयमशील व्रतधारी पुरुष को देवेश्वर की सेवा में प्रार्थना कानी चाहिए। "यस्य स्मृत्या न नामोतजा तपोयज्ञ क्रियादिषु । न्यून सम्पूर्णता याति सद्यो वन्दे तमच्युतम्" अर्थात् जिस भगवान् का स्मरण करने से अथवा जिनके नाम लेने से समस्त तप-यज्ञ तथा सत्कर्मो की न्यूनता भी पूर्ण हो जाया करती है उन्ही अध्युत भगवान् की सेवा में मैं अपना समादर सहित प्रणाम अर्पित करता हूँ। इसके अनन्तर वह सम्पूर्ण सामग्री और प्रतिमा तथा दक्षिणा आचार्य की सेवा में भेट कर देनी चाहिये ।। १०८, १०६। इसके पश्चात् ब्रह्मभोज कराना चाहिए और अपनी शक्ति अनुरूप उन विप्रो को दक्षिणा देनी चाहिए । तथा नारद पुराण ] ३७६ पीछे मौन व्रत में रहकर वान्धवो के साथ बैठकर स्वयं भी आहार का ग्रहण करना चाहिए ।। ११०॥ इसके उपरान्त सुयोग्य विद्वानो की परिपद् में स्थित होकर सायकाल पर्यन्त भगवान् विष्णु की कथाओ का श्रवण करना चाहिए। इस प्रकार से द्वादशी व्रत का विधान है ॥१११॥ जो भक्त इस व्रत को इसी विधान से साङ्गोपाङ्ग किया करता है । हे नारद । उसको इस लोक मे सभी कामनाये पूर्ण हुआ करती है और परलोक म सब पापो से छूटकर अपनी इक्कीस पुश्तो के पूर्व पुरुपो के साथ विष्णुलोक का निवास प्राप्त किया करता है जहाँ पर उसको किसी भी शोक का मुकाबला नही करना पडता है ।। ११२॥ हे विप्रवर | जो भक्त इम परमोत्तम द्वादशी व्रत के विधान का श्रवण किया करता है अथवा इसको पढता है उस मनुष्य को भी वाजपेय यज्ञ का पुण्य-फल प्राप्त हो जाता है ।।११३!! ॥ पूर्णिमा वृत का उद्यापन ॥ अन्यव्रतवर वक्ष्ये शृणुष्व मुनिसत्तम । सर्वपापहर पुण्य सर्वदु खनिवर्हणम् ॥१ ब्राह्मणक्षत्रियविशा शूद्राणा योपिता तथा । समस्तकामफलट सर्वव्रतफलप्रदम् ॥२ दु स्वप्ननाशन धयं दुष्टग्रहनिवारणम् । सर्वलोकेषु विख्यात पूर्णिमाव्रतमुत्तमम् । येन चोणेन पापाना राशिकोटि प्रशाम्यति ॥३ मार्गशो सिते पक्षे पूर्णाया नियत शुचि । स्नान कुर्याद्यथाचार दन्तधावनपूर्वकम् ॥४ शुल्काम्बरधर शुद्धो गृहमागत्य वाग्यत । प्रक्षाल्य पादावाचम्य स्मरन्नारायण प्रभुम् ॥५ ३८० [ नारद पुराण नित्य देवार्चन कृत्वा पश्चात्संकल्पपूर्वकम् । लक्ष्मीनारायण देवमर्चयेद्भक्तिभावतः ॥६ आवाहनासनाद्यैश्च गन्धपुष्पादिभिर्वती। नमो नारायणायेति पूजयेद्भक्तितत्परः ॥७ श्री सनक जी ने कहा-हे परम श्रेष्ठ मुने ! अब में आपके समक्ष मे समस्त पापो एव दुःखो को दूर भगाने वाले एक अन्य परम पवित्र व्रत का वर्णन करता हूँ। यह ऐसा व्रत है जो चारो ही वर्णो के पुरुपो की तथा स्त्रियो की भी सम्पूर्ण कामनाएं पूरी कर दिया करता है और सभी व्रतो के करने का पूरा पुण्य-फल प्रदान किया करता है ॥१ । २॥ यह कहे जाने वाला व्रत बुरे स्वप्नो के फल को नष्ट किया करता है तथा दुष्ट ग्रहो के फल को भी दूर भगा दिया करता है । यह परमोत्तम व्रत सभी लोको मे "पूर्णिमा व्रत" के नाम से प्रसिद्ध है । इस व्रत का अनुष्ठान करने से करोडो पापो का समुदाय नष्ट हो जाया करता है ॥ ३ ॥ मार्गशीर्ष मास की पूर्णिमा के दिन इस व्रत की साधना करने वाले को परम पवित्रता और सयम-नियम के साथ दांतुन कर विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए ।। ४ ।। इसके उपरान्त श्वेत वस्त्र धारण करके घर मे बैठकर मौन व्रत मे समास्थित होकर अपने चरणो को धोकर भगवान् नारायण का सस्मरण करते हुए आचमन करना चाहिए ॥ ५॥ इसके पश्चात् नैत्यिक देव-पूजन करके सङ्कल्प पढे और फिर परम भक्तिभाव के साथ थी लक्ष्मीनारायण देवेश्वर की अर्चना करनी चाहिए ।। ६ ।। जो इस व्रत को करे उसे भक्ति भाव के साथ "नमोनारायण"- इसका उच्चारण करके भगवान का गन्ध पुष्पादि से अर्चन करना चाहिए। प्रथम उनका आवाहन करे और फिर आसनादि को अर्पित करे ।।७।। गीर्वाद्यैश्च नृत्यश्च पुराणपठनादिभिः । स्तोनराधयेदेव व्रतकृत्सुसमाहित ।।८
नारद पुराण ]
३८१
देवस्य पुरत कृत्वा स्थण्डिल चतुरस्रकम् ।
अरनिमात्र तत्राग्नि स्थापयेद् गृह्यमार्गत ।
आज्यभागान्तर्पयन्त कृत्वा पुरुषसूक्तत ।
चरुणा च तिलंश्वापि घृतेन जुहुयात्तथा ॥६
एकवार द्विवार वा निवार वापि शक्तित ।
होम कुर्यात्प्रयनेन सर्वपापनिवृत्तये ॥१०
प्रायश्चित्तादिक सर्व स्वगृह्योक्तविधानत ।
समाप्य होम विधिवच्छान्तिसूक्त जपेद्तुध ।।११
पश्चादेव समागत्य पुन पूजा प्रकल्पयेत् ।
तथोपवास देवाय ह्यपयेद्भक्तिसयुत ॥१२
पौर्णमास्या निराहार स्थित्वा देव तनाज्ञया ।
भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽह्नि शरण भव ॥१३
इति विज्ञाप्य देवाय ह्यध्य दद्यात्तथेन्दवे ।
जानुभ्यामवनी गत्वा शुक्लपुप्पाक्षतान्वित ॥१४
क्षीरोदार्णवसभूत अत्रिगोत्रसमुद्भव ।
गृहाणार्घ्य मया दत्त रोहिणीनायक प्रभो ॥१५
(जो भी इस व्रत को करे उसे बहुत ही सावधानी के सहित
गायन-वादन-नृत्य-पुराण-पठन और स्तोत्र पाठादि के द्वारा
भगवान् की समाराधना करनी चाहिए ॥ ८11) भगवान् के समक्ष मे
एक चौकार वेदी की रचना करावे उस वेदी मे गृह्य मूत्र के कथना-
नुसार पाँच भूसस्कार करे। उममे फिर अरनि प्रमाण ( कनिष्ठ अंगुति
स रहिन मुटठी के बराबर ) अग्नि की स्थापना करनी चाहिए। फिर
पुरुष सूक्त स आज्य भाग तक कर घृतमिश्रित तिलो की आहुतियां
अग्नि में डाल कर होम करना चाहिए ॥६॥ मम्पूण पापा को
भगाने के लिये अपनी शक्ति के अनुरूप एक-दो अथवा तीन वार हाम
करने या प्रयत्न करना चाहिए ॥ १० ॥ वुद्धमान् मनुष्य को चाहिए
।
३८२ [ नारद पुराण करे और अन्त कि अपने गृह्य सून के अनुसार प्रायश्चित प्रभृति करके होम समाप्त शान्ति सूक्त का पाठ भी करना चाहिए ।। ११ ॥ पुन श्री भगवान् के निकट उपस्थित होकर फिर उनका यजन करे तथा भक्ति सहित भगवान् को उपहारो का समर्पण करे ॥१२ ।। इसके अनन्त र भगवान् से निम्न मन्त्र पढकर प्रार्थना करनी चाहिए-"पौर्ण- मास्या निराहार स्थितादेव नवाज्ञया । भोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष परेऽहित शरणभव -अर्थ इसका यह है कि हे पुण्डरीक के तुल्य नेत्रो वाले देव । मैं पूर्णिमा तिथि में आहार न करते हुए उपोपित होकर आपको आज्ञा मे कल भोजन करूंगा। आप मेरे रक्षक हो जाइए। इसके उप- रान्त शुक्ल एव सुगन्धित पुष्प और चावल हाथ में लेकर भूमि पर अपने घुटनो को टेकते हुए चन्द्रमा को अर्घ समर्पित करके यह प्रार्थना करे-"क्षीरोक्षर्णव सम्भूत अग्रिगोन समुद्भव । गृहाणाऱ्या भया दत्त रोहिणी नायक प्रभो।" अर्थात् हे क्षीर सागर के नाथ प्रभो । आप मेरे द्वारा अर्पित किये गये इस अर्घ को अङ्गीकार करिए । . ।। १४-१५॥ एवमर्थ्य प्रदापेन्दो प्राथयेत्प्राञ्ज लस्तत । तिष्ठ-पूर्वमुखो भूत्वा पश्यन्निन्दु च नारद ।।१६ नम शुक्लाशवे तुभ्य द्विजराजाय ते नम । रोहिणीपतये तुभ्य लक्ष्मीभ्राने नमोऽस्तु ते ॥१७ ततश्च जागर कुर्यात्पुराणश्रवणादिभि । जितेन्द्रियश्च सशुद्ध पापण्डालोकवर्जित ॥१८ तत प्रात प्रकुर्वीत स्वाचार च यथाविधि । पुन सपूजयेदेव यथाविभवविस्तरम् ॥१६ ब्राह्मणभोजयेच्छक्तमा ततश्च प्रयतो नर।। वन्धुभृत्यादिभि साध स्वय भुजोत वाग्यत ॥२० एव पौपादिमाने पूर्णमास्यामुमोपित ।
नारद पुराण ]
अद्भक्तिसयुक्तो नारायणमनामयम् ॥२१
हे नारद । इस विधि से चन्द्रदेव को अर्घ देकर अपना मुष
पूर्व दिशा मे करके हाथ जोडकर पुन प्रार्थना करनी चाहिए ।। १६ ।।
"नम शुक्लाशवे तुभ्य द्विजराजायते नमः । रोहिणी पतये तुभ्य लक्ष्मी
प्राथै नमोऽस्तुते ।" अर्थात्-परम शुभ्र किरणो वाले द्विजराज आपकी
सेवा मे मेरा प्रणाम है । हे रोहिणी के स्वामिन् । हे लक्ष्मी देवी के
भाई । मेरा आपसे सादर प्रणाम है ॥१७॥ इमके अनन्तर सब
पाखण्डियो से दूर रहत हुए परम शुद्धता और जितेन्द्रियतापूर्वक पुराणो
का श्रवण करत हुए रात्रि मे जागरण करना चाहिए ।।१८।। प्रात काल
मे शास्त्रोक्त विधि के अनुसार अपने नत्यिक आचार को करके अपने
ऐश्वर्य के ही अनुरूप भगवान् विष्णु का अर्चन करना चाहिए ।। १६ ।।
इसके पश्चात् यथाशक्ति ब्रह्मभोज करा कर स्वय सवान्धव भोजन करे
॥२०॥ इसी विधि से पौष आदि मासो की पूर्णिमा तिथियो मे व्रत
करके भक्तिभाव से अनामय भगवान् श्री नारायण का अर्चन करना
चाहिए ।। २१ ।।
एक सवत्सर कृत्या कातिवचा पूर्णिमादिने ।
उद्यापन प्रकुर्वीत तद्विधान वदामि ते ॥२२
मण्डप कारयेदिव्य चतुरस्र सुमङ्गलम् ।
शोभित पुष्पमालाभिवितानध्वजराजितम् ।।२३
वहुदीपसमाकीणं किङ्किणीजालशोभितम् ।
दर्पणैश्चामरैश्चैव कलशंश्च समावृतम् ॥२४
तन्मध्ये सर्वतोभद्र पञ्चवर्णविराजितम् ।
जलपूर्ण तत कुम्भ न्यसेत्तस्योपरि द्विज ॥२५
पिधाय कुम्भ वोग सुमूक्ष्मेणातिशोभितम् ।
हेम्ना वा रजतेनापि तथा ताम्रण वा द्विज ।
लक्ष्मीनारायण देव कृत्वा तम्योपरि न्यसेत् ॥२६
[ नारद पुराण मण्डप मे पञ्चामृतेन सस्नाप्याभ्यर्य गन्धागिभिः क्रमात् । भक्ष्य ज्यादिनैवेद्यक्तितः सयतेन्द्रियः ।।२७ जागर च तथा कुर्यात्सम्यक्तासमन्वितः । परेऽह्नि प्राविधिवत्पूर्ववद्विष्णुमचंयेत् ।।२८ इसी विधि से पूरे वर्ष की पूर्णिमाओ का उपवास करे और फिर कार्तिक मास की पूर्णिमा मे इस परम पावन व्रत का उद्यापन साल भर पूरे होने पर करना चाहिए। उस उद्यापन का विधान भी अब मैं आपको बतलाता हूँ ॥ २२ ॥ चार कोणो वाला एक परम दिव्य और माङ्गलिक मण्डप की रचना करवावे उस मण्डप को भली भाति विभपित करे और उसमे सब ओर फूलो की सुन्दर मालाएं- चॅदोवा और ध्वजा-पताकाएं लटकानी चाहिए ।। २३ ।। बहुत-से दीपक जलावे और घुघरू, दर्पण-~चमर और कलश आदि पदार्थों से भली भांति मण्डप को सुशोभित करना चाहिए ।। २४ ।। इसकी पूरी सजावट करके हे द्विजवर । उस मण्डप के बीच मे पाँच वों का सर्वतोभद्र मण्डल की रचना करवावे। उसके ऊपर 'जल से भरे हुए कलशो की स्थापना करे ।। २५ ॥ उस वलश को बारीक श्वेत वस्न से समाच्छादित करे और फिर उसके ऊपर शक्ति के अनुसार सुवर्ण - रजत या ताम्र की श्री भगवान् लक्ष्मी नारायण की मूत्ति की स्थापना करे ॥ २६ ॥ उस देव मूर्ति का स्नान पञ्चामृत से कराकर गन्ध पुष्प-धूप-दीप-रजत या ताम्र की श्री भगवान् लक्ष्मीनारा- यण की पूर्ति का स्नान पञ्चामृत से कराकर गन्ध पुष्प-धूप - दीप-- नैवेद्य आदि पूजन के समस्त उपचागे के द्वारा अर्चन भक्तिभाव के सहित करना चाहिए ।। २७ ।। फिर श्रद्धा के सहित रात्रि जागरण कर पुन प्रात काल मे विधि के सहित देव-यजन करना चाहिए 1 २८ ।। आचार्याय प्रदातव्या प्रतिमा दक्षिणान्विता।
३८६ [ नारद पुराण हेमभारसहस्र तु यो ददाति कुटुम्बिने । तत्फल तुल्यमात्र स्याद्ध्वजारोपणकर्मणः ॥३ ध्वजारोपणतुल्य स्याद्गङ्गास्नानमनुत्तमम् । अथवा तुलसारोबा शिवलिङ्गप्रपूजनम् ॥४ अहोऽपूर्वमहो पूर्वमहोपूर्वमिद द्विज । सर्वपापहर कर्म ध्वजारोपणसज्ञितम् ॥५ सन्ति वै यानि कार्याणि ध्वजारोपणकर्मणि । तानि सर्वाणि वक्ष्यामि शृणुप्प गदतो मम ॥६ कार्तिकस्य सिते पक्षे दशभ्या प्रयतो नरः । स्नान कुर्यात्प्रयत्नेन दन्तधावनपूर्वकम् ॥७ श्री सनवानार्य ने कहा---अब मैं एक अन्य ध्वजारोपण नाम वाले व्रत के विषय मे सुनाता हूँ। यह परमोत्तम व्रत भी भगवान् विष्णु को प्रसन्नता करने वाला है। तथा इस व्रत से समस्त सञ्चित पाप दूर भाग जाया करते हैं और परम पुण्य का लाभ इसके करने वाले को हुआ करता है ॥१॥ यह व्रत भगवान् श्री विष्णु के मन्दिर मे उत्तम ध्वजा के समारोपण करने वाला है । जो भी कोई मनुष्य भग- वान् विष्णु के मन्दिर मे उत्तम ध्वजा लगाता है उसका इतना अधिक पुण्य प्रभाव होता है कि ब्रह्मादिक देव भी उस भक्त की पूजा किया करते हैं - इससे अधिक इस व्रत की महिमा को क्या वर्णन किया जा सकता है ॥२॥ एक कुटुम्बी पुरुष को एक सहस्र भार सुवर्ण का दान करने से जो पुण्य-फल प्राप्त होता है उतना हो पुण्य का फल ध्वजा के समारोपण करने वाले भक्त को प्राप्त हुआ करता है ॥३॥ इस विष्णु मन्दिर मे ध्वजारोपण व्रत की समानता रखने वाला पुण्य थेठ गङ्गा नान-तुलमी मेवन और शिव लिङ्ग के पूजन का हो सकता है ११४॥ हे द्विजवर ! यह ध्वजारोपण नामक व्रत एक परम अद्भुत एव अपूर्व होता है इसका अपरिमित महत्व होने से यह अपूर्व ही है । इस वजा ३८७ नारद पुराण ] रापण व्रत के परने मे जो लाभ हुआ करते हैं उन सबका वर्णन मैं आपके मामने करता हूँ। आप परम समाहित होकर सुनिए ॥५॥६॥ इस व्रत के करन वाले मनुष्य को वार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि के दिन प्रात काल में दातुन आदि कृत्यो से निवृत्त हाकर स्नान करना चाहिए ।।७।। एकाशी ब्रह्मचारी च स्वपेन्नारायण स्मरन् । धौताम्वरधर शुद्धो विप्रो नारायणाग्रत ॥ तत प्रात समुत्थाय स्नात्वाचम्य यथाविधि । नित्यकर्माणि निर्वत्य पश्चाद् विष्णु समर्चयेत् ॥६ चतुभि ह्मणे साद्धं कृत्वा च स्वस्तिवाचनम् । नान्दीश्राद्ध प्रकुर्वीत ध्वजारोपणकर्मणि ॥१० ध्वजस्तम्भौ च गाय-या प्रोक्षयेद् वस्त्रसयुतौ । सूर्य च वैनतेय च हिमाशु तत्परोऽर्चयेत् ।।११ धातार च विधातार पूजयेद्ध्वजदण्डके । हरिद्राक्षतगन्धाय शुक्लपुष्पैविशेपत ॥१२ ततो गोचर्ममान तु स्थण्डिल चोपलिप्य वै । आधायाग्नि स्वगृह्योक्तया ह्याज्यभागादिक मात् ॥१३ जुहुया पायस चैव साज्यमष्टोत्तर शतम् । प्रथम पीरुष सूक्त विष्णोर्नु मिरावतीम् ।।१४ उस दिन एक बार भोजन करे-ब्रह्मचय व्रत का पूर्णतया परिपालन करे-धुले हुए परम विशुद्ध वस्त्र धारण कर भगवान् श्री नारायण का ही मन मे स्मरण एव ध्यान करके उन्ही के सामने रात्रि मे भूमि पर शयन करना चाहिए ॥८प्रात काल मे उठकर यथा विधि नित्य कृत्यो से निवृत्त हाकर स्नानाचमन करे नथा भगवान् विष्णु का सविधि अचन करना चाहिए ॥६॥ चार अन्य सुयोग्य विप्रो को अपने माथ गे लेकर सव प्रथम स्वस्ति वाचा वरके ध्वजारोपण ३८८ [ नारद पुराण विधि कर्म मे पहिले नान्दीमुख श्राद्ध करना चाहिए ॥२०॥ फिर गायत्री महा मन्त्र के द्वारा एक वस्त्र से लिपटे हुए ध्वजा तथा स्तम्भ दोनो का सविधि प्रोक्षण करना चाहिए। इसके पश्चात सूर्यदेव, गरुड और चन्द्रदेव का पूजन करे ।।११।। उस ध्वजा के दण्ड मे हल्दी, गन्ध, अक्षत और विशेष रूप से श्वेत, सुगन्धित पुप्पो के द्वारा धाता-विधाता का यजन करना चाहिए ॥१२॥ इसके पश्चात गौ चर्म मात्र अर्थान सौ गौयें और साँड जिनकी भूमि मे बैठ सके उतनी भूमि पर गोमय को लीप कर वहा पर फिर अपने गृह्य सूत्र के अनुसार पूर्वक अग्नि को स्थापना करनी चाहिए और उसमे क्रम से घृत और पायस का अष्टोत्तर शत आहुतियां देकर होम करना चाहिये । पहिले पुरुष सूक्त का पाठ कर 'विष्णोतु कम्' मन्त्र से और 'इरावतीम्' इस मन्त्र से आहुति देनी चाहिये ॥१३।१४ ततश्च वैनतेयाय स्वाहेत्यष्टाहुतीस्तथा । मोमो धेनुमुदुत्य च जुहुयाच्च ततो द्विज ॥१५ सौरमन्नाजपेत्तत्र शान्तिमूक्तानि शक्तित । रानी जागरण कुर्यादुपवण्ठ हरे शुचि ॥१६ तत प्रात समुत्थाय नित्यकर्म समाप्य च । गन्धपुष्पादिभिर्देवमर्चयेत्पूववत्क्रमात् ॥१७ ततो मगलवाद्यश्च सूक्तपाठश्च शोभनम् । नृत्यैश्च स्तोत्रपठनं यद्विप्ण्वालये ध्वजम् ।।१८ देवस्य द्वारदेशे वा शिखरे वा मुदान्वित । सुस्थिर स्थापयेद्विप्र ध्वज सुस्तम्भसयुतम् ॥१६ गन्धपुप्पाक्षतर्देव धूपदीपमनोहरे । मध्यभाग्यादिमयुपतन वेद्यश्च हरि यजेत् ॥२० एव देवालय म्याप्य शोभन ध्वनुत्तमम् । प्रदक्षिणमनुव्रज्य म्तासमेतदुदीरयेत् ॥२१ १८६ नारद पुराण ] करना नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । नमस्तेऽस्तु पोपेश महापुरुष पूर्वज ॥२२ इसके अनन्तर नितेयाय स्वाहा' इसका समुच्चारण करके आठ माहुतिया देवे। दूसरे उपरान्त 'सोमो धेनुम्' और 'उहुत्यम्' इनसे आहुतियां देनी चाहिए। इसके अनन्तर यथा शक्ति ऐमे अन्य मन्त्रो का जिनका देवता मूय है तथा शान्ति सक्त का जाप करे पौर उम दिन भी श्री हरि के सामने पेठ कर रात्रि जागरण चाहिये ॥१५-१६।। इसके पश्चात प्रात काल उठ कर नित्य कर्म को पूर्ण करक पूर्ण कर्मानुसार ही गन्ध पुष्पादि के द्वारा देव पूजन करे 11१७। यह सब पूर्ण करने के पश्चात परम मागलिक वाद्य, मून पाठ, म्तान पाठ और नृत्य करता हुआ उम ध्वजा को श्री विष्णु क मन्दिर म ले जाना चाहिए ॥१८॥ वहा विष्णु मन्दिर के द्वार देश में अथवा शिखर भाग म परम प्रसन्नता के साथ उस दण्ड सहित ध्वजा का समारोपण करे ।।१६। वहा पर भी ध्वजा की स्थापना करन के पश्चात् पुन गन्ध पुष्पादि के द्वारा भगवान विष्णु का अर्चन करना चाहिए ॥२०॥ इस विधि से देव मन्दिर म उस उत्तम ध्वजा को स्थापित करके उसकी प्रदक्षिणा करे और उस ममय म 'नमस्ते पुण्ड- रीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन । इम पक्ष से (२२०मूल म लिखित लोक से ) आरम्भ करके ३८ ने मूलोक्त श्लोक पर्यन्त स्तोत्र का पाठ करे । अर्थात् हे पुण्डरीकाक्ष । हे सम्पूर्ण विश्व पर कृपा करने वाले । आपकी मवा में प्रणाम है। हे महान पुरुप पूर्वज । हे हपीवेशा यापको मरा प्रणाम है ॥२१॥२२ येनेदमखिल जात यत्न सर्व प्रतिष्ठितम् । लयमेष्यति यौव त प्रपन्नोऽस्मि केशवम् ॥२३ न जानन्ति पर भाव यस्य ब्रह्मादय सुरा । योगिनो य न पश्यन्ति त वन्दे ज्ञानरूपिणम् ।।२४ [ नारद पुराण अन्तरिक्ष तु यन्नाभिद्योमूर्दा यस्य चैव हि । पादोऽभूद्यस्य पृथिवी त वन्दे विश्वरूपिणम् ।।२५ यस्य श्रोत्रे दिश सर्वा यच्चक्षुर्दिनकृच्छशी । क्सामयजुपी वाग्वै त वन्दे ब्रह्मरूपिणम् ॥२६ यन्मुखाद् ब्राह्मण जाता यद्वाहीरभवन्नृपा । वैश्या यस्योरुतो जाता पद्भया शूद्रो व्याजमत १२७ यह सम्पूर्ण जगत् जिन आपसे प्रादुर्भूत हुआ है और जिस थापके हो स्वरूप में यह समस्त जगत प्रतिष्ठित है और अन्त में यह सम्पूर्ण विश्व लय को प्राप्त हुआ करता है उन्ही भगवान केशव की मैं शरण ग्रहण करता हूँ ॥२३॥ जिन भगवान के परमोत्तम भाव का ज्ञान ब्रह्मा आदि महान देवता भी नहीं रख सकते है और योगी- जन अपने योग माग के द्वारा जिनका दर्शन नहीं कर पाते हैं उन्ही ज्ञान स्वरूप वाले भगवान को मे सादर प्रणाम समर्पित करता हूँ ॥२४॥ यह व्यापक अन्तरिक्ष जिन भगवान की नाभि है, दिव लोक जिनका मस्तक है, पृथ्वी जिनके चरण हैं उन्ही विश्वरूपी भगवान को सेवा मे मैं प्रणाम निवेदित करता हूँ ॥२४॥ ये समस्त दिशायें जिन प्रभु के श्रोत्र है--सूय और चन्द्र य दोनो प्रभु के नेत्र है। वेद रूपी (ऋक्, यजु और शामवेद) जिन प्रभु की वाणी हैं ऐसे ब्रह्मा- स्वरूप वाले भगवान को मैं प्रणाम करता हूँ ॥२६॥ जिनके मुख रमल स ब्राह्मणो की उत्पत्ति हुई है, भुजाओ से क्षत्रिय वर्ण की उत्पत्ति हुई है । जिनके उरुमो मे वैश्य जाति का आविर्भाव हुआ है और चरणा से शूदो वा समुद्भव हुआ है ॥२७ मायासङ्गममाण वदन्ति पुरुप त्वजम् । स्वभावविमल शुद्ध निर्विकार निरन्जनम् ॥२८ क्षीराब्धिशायिन देवमनन्तमपराजितम् । सद्भक्तवत्सत विष्णु भक्तिगम्य नमाम्यहम् ॥२६ [ नारद पुराण ही सर्वत्र प्राप्त होने वाले है वही भगवान विष्णु पर मुझ प्रसन होये ॥३४॥ चतुभिश्च चतुर्भिश्च द्वाभ्या पञ्चभिरेव च । हूयते च पुनद्वाभ्या स मे विष्णु प्रसीदतु ॥३५ ज्ञानिना कर्मिणा चैव तथा भक्तिमता नृणाम गतिदाता विश्वमृग्य स मे विष्णु प्रसीदतु ॥३६ जगद्धितार्थ ये देहा ध्रियन्ते लीलया हरे । तानचयन्ति विबुधा स मे विष्णु प्रसीदतु ॥३७ यमामनन्ति वै सन्त सच्चिदानन्दविग्रहम् । निर्गुण च गुणाधार स मे विष्णु प्रसीदतु ॥३८ इति स्तुत्वा नमेद्विष्णु ब्राह्मणाश्च प्रपूजयेत् । आचार्य पूजयेत्पश्चादक्षिणाच्छादनादिभि ३६ प्राह्मणा-भाजयेच्छक्तया भक्तिभावसमन्वित । पुत्रमित्वकलवाये स्वय च सह वन्धुभि ॥४० कुर्वीत पारण विप्र नारायणपरायण । यस्त्वेतकर्मकुर्वीत ध्वजारोपणमुत्तमम् । तस्य पुण्यफल वक्ष्ये शृणुष्व सुसमाहित ॥४१ पटो ध्वजस्य विप्रेन्द्र यावच्चलति वायुना। तावन्ति पापजालानि नश्यन्त्येव न संशय ॥४२ जो चारो वर्षों से-चारो बाथम वालो के द्वारा-दिन तथा रात्रि मे और पाचा प्रकार के मनुष्यो से जिनकी पूजा की जाया करती हैं वही भावान विष्णुदव मुझ पर प्रसन्न होवे ।। ३५ । ३६ । ३७ ।। साधुपुरुष जिन भगवान् म सच्चिदानन्द--निगुण और सगुण भी कहा यह भगवान् विष्णु मुझ पर प्रसन्न हावें ॥ ३८॥ इस प्रकार से भगवान का स्तयन पर विष्णु था तथा ब्राह्मणों का अपन बरे और दक्षिणा द्रव्य तया यस्त्रादि समपित कर आचाम का सरकार करना परत
नारद पुराण ]
२६३
चाहिए ॥ ३६॥ फिर भक्ति भाव से महित अपनी शक्ति के अनुनार
ब्राह्मगा को भोजन करावे । इसके बनन्तर पुत्र-मित्र-स्त्री और समस्त
चन्यु-बान्धवों के माय स्वय भी भोजन करे ॥ ४०॥ हे विप्रवर । इस
प्रकार ने भगवान् नारायण-परायग होकर पारणा करनी चाहिए।
जो पुरप दम ध्वजारोपण कर्म को मदिति क्यिा करते हैं उनरे
पुण्य--
फ्ल का में नव वर्णन करता हूँ। बाप सावधान होकर श्रवण परिए ।
॥४१॥ है विप्रेन्द्र । इम ममारोपित वजा झण्डा शत्रु में जब तक
चना करता है उतन ही पापो का समुदाय भस्म हो जाया करता
है ।। ४२ ॥
महापातक्युक्तो वा युक्तो वा सर्वपातक ।
ध्वज विष्णुगृहे कृत्वा मुच्यते मर्वपातकं ॥४३
यावदिदनानि तिष्ठेत ध्वजो विष्णुगृहै द्विज ।
तावद्युगसहस्राणि हरिमान्प्यमश्नुते ॥४४
आरोपित ध्वज दृष्ट्वा येभिनन्दन्ति धार्मिका.।
तेऽपि सर्व प्रमुच्यन्ते महापातककोटिभि ॥४५
आरोपितो ध्वजो विष्णुरहे धुन्वन्पट स्वकम् ।
क्र्नु मर्वाणि पापानि धुनोति निमिपात ॥४६
यस्त्वारोप्य गृह विष्णोध्वज नित्यमुपाचरेन् ।
स देवयानेन दिव यातीव मुमतिर्नुप ॥४७
जो काई मनुष्य महापातका में बवा बन्य सभी प्रकार के
महान् पापो म दूपिन हागया हो वह भगवान् विष्णु के मन्दिर पे घना
चढाकर समम्न पारा ने विमुक होजाया करता है ।।१३।।ह द्विववर ।
वह ध्वना जितन दिना तर विष्णु मन्दिर म रहा करती है उतन ही
मा युगो तर वह श्री हरि की मनिधि में निवाम किया करता है।
॥१॥ जो कोई भी धामि पुरष उन चढ़ी हुई वजा को दर
उगरी वन्दना पिया करत हैं द भी रिय हुए अपन कराहा पातरी से
३६४ [नारद पुराण छूटकर विशुद्ध हो जाया करते है ।। ४५ ।। भगवान् विष्णु के मन्दिर मे चढाई हुई ध्वजा अपने झण्डे को फहराती हुई उस ध्वजारोपण करन वाले व्यक्ति के सभी पापो को आधे निमेष में ही कम्पित कर दिया करती है ।। ४६ ।। जो पुरुष श्री विष्णु के मन्दिर मे ध्वजा को चढाकर सवदा उसकी वन्दना किया करता है । वह राजा सुमति के समान ही देव यान म बैठ कर सीधा स्वग लोक को चला जाया वरता है ॥४७॥ ॥ सुमति विभाण्डक संवाद ॥ भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रार्यपारग। सर्वकर्मवरिष्ठ च त्वयोक्त ध्वजधारणम् ।।१ यस्तु वै सुमति म ध्वजारोपपरो मुने । त्वयोक्तस्तस्य चरित विस्तरेण ममादिश ॥२ शृणुष्वकामना पुण्यमितिहास पुरातनम् । ब्रह्मणा कथित मह्य सर्वपापप्रणाशनम् ॥३ आसीत्पुरा कृतयुगे मुमतिनाग भूपति । सोमवशोद्भव थीमान्सप्तद्वीपकनायक ॥४ धर्मात्मा सत्यसपन्न शुचियश्योऽतिथिप्रिय । सर्वलक्षणमपन्न समपद्विभूपित ॥५ सदा हरिक्थासेवी हरिपूजापरायण । हन्भिक्तिपराणा च शुश्रू पुनिरहकृति ॥६ पूज्यपूजारतो नित्य समदर्शी गुणान्वित । सर्वभूतहित शान्त वृतज्ञ कीनिमास्तथा ।।७ देवति श्री नारद जी ने कहा-ह भगवन् । आप तो समस्त शास्त्रो के वास्तविक प्रयोजनों के ज्ञाता है और सभी धर्मों के तत्व यो .
नारद पुराण ] पविन वश भी मती भांति जानते है । आपने परम श्रेष्ठ वजागेपण कमंका वर्णन किया है । हे मुने । आपने इमी प्रमङ्ग मे राजा मुमति की जो चर्चा की है जिसने ध्वजारोपण किया था अब आप महती कृपा करके उस गजा मुमति का चरित्र विस्तृत रूप मे मुये श्रवण कराइये ॥ १॥२॥ इस तरह मे नारदजी के पूछने पर सनक मुनि ने कहा-यह परम प्राचीन ऐतिहामिर घटना है। इसको आप मन लगाकर बव परम पवित्र एव प्राचीन इतिहास को एवारता मे श्रवण करिए । ब्रह्माजी ने मुझमे इस समस्त पापों को दूर करने वाले इतिहास का वर्णन किया था।॥ ३॥ बहुत पहिले सत्ययुग में एक सुमति नामधारी राजा हुए थे। वह राजा सोमवश मे समुत्पन्न हुया था तथा मातो द्वीपो का एक छन राजा हुआ था ।। ४ । यह राजा बहुत ही धामिक, मत्यभापी समुद्भूत, समागत, अतिथियो म अत्यधिक प्रेम किया करते थे। यह सभी मुन्दर लक्षणों से युक्त और सभी नरह की सम्प- दाओ मे समन्वित एव भूपित थे ॥ ५॥ राजा मुमति नित्य ही श्री हरि भगवान को क्या का श्रवण क्यिा करत ये बऔर अर्निश भगवान विष्णु के पूजन करने म मग्न रहा करते थे और अभिमान मे रहित होकर सर्वदा भगवान विष्णु के भक्तो की सेवा में तत्पर रहा करते थे ॥ ६ ॥ जो भी पूजा के करन के योग्य सत्पात्र होते थे उनकी पूजा किया करते थे। यह सबको समान दृष्टि से देखने वाले–गुण गणो से युक्त-ममस्त प्राणियों के हितपी-शम का परिपालन करने वाले एव परम कृतज्ञ थे । इसीलिये उस राजा की कीति का चारो तरफ विस्तार हो रहा था ॥ ७ ॥ तस्य भार्या महाभागा सर्वलक्षणसयुता। पतिव्रता पतिप्राणा नाम्ना सत्यमतिमुने ।। तावुभौ दम्पती नित्य हरिपूजापरायणा । जातिस्मरौ महाभागौ सत्यज्ञो सत्परायणौ ॥६
[ नारद पुराण
अन्नदानरतौ नित्य जलदानपरायणौ ।
तडागारामवप्रादीनसख्यातान्वितेनतु ॥१०
सा तु सत्यमतिनित्य शचिविष्णुगृहे सती।
नृत्यत्यन्तसन्तुष्टा मनोज्ञा मजुवादिनी ॥११
सोऽपि राजा महाभागो द्वादशीद्वादशोदिने ।
ध्वजमारोपयत्येव मनोज्ञ वहुविस्तरम् ।।१२
एव हरिपर नित्य राजान धर्मकोविदम् ।
प्रिया सत्यमति चास्य देवा अपि सदास्तुवन् ॥१३
त्रिलोके विश्रुती ज्ञात्वा दम्पती धर्मकोविदौ ।
आययौ वहुभि शिष्यै टु कामोविभाण्डक ॥१४
हे मुनिवर । उस राजा की पत्नी का नाम सत्यमती था। वह
भी महान् भाग्य वाली, समस्त शुभ लक्षणों से समुत्पन, अपने पति को
प्राण के समान समझने वाली परम पतिव्रता थी ।। ८॥ ये दोनो ही
पति-पत्नी सर्वदा थी हरि के अर्चन में सलग्न रहा करते थे। इन
दोनो को अपने प्रथम जन्म का भी स्मरण था। ये दानो ही सत्य
प्रतिज्ञा रखने वाले और सत्परायण रहा करते थे ।।६।। ये सदा अन्न
और जल का दान दिया करते थे। इन्होने माणित उद्यान-तालाब
आदि स्थापित एव निर्मित किये थे ।। १०॥(वह रानी सती सत्यमती
विष्णु भगवान के मन्दिर में जाकर सर्वदा परम पवित्रता पूर्वक नृत्य
पिया परती थी तथा सन्तोप के साथ अतीव मनोहर वाद्यो या वादन
पर भगवान को रियाया करती थी ॥ ११॥) इसी प्रकार से परम
महाभाग वह राजा भी द्वादशी निधि दिन जो वि प्रत्येक मारा
आती मो भगवान् के मन्दिर म मुन्दर ध्वजा का ममारोहण किया
परता था ॥ १२ ॥ इन प्रकार के अत्यन्त धर्म-तत्पर परम धामिय
राजा और राती सत्यमति रानी या देवगण भी प्रशसा लिया
परते थे ।। १३ । लाक्य म परम प्रसिद्ध धामिप दम्पनी ये विषय
-
मै
३६७ नारद पुराण ] म श्रवण करके विभाण्डक मुनि अपने समस्त शिष्य वर्ग के साथ उस दम्पत्ति का दर्शन करन के लिये एक बार वहाँ पर समागत हुए थे ।। १४ ॥ तमायात मुनि श्रुत्वा स तु राजा विभाण्डकम् । प्रत्युद्ययौ सपत्नीक पूजाभिर्वहुविस्तरम् ।।१५ कृतातिथ्यनिय शान्त कृतासनपरिग्रहम् । नीचासनस्थितो भूप प्राञ्जलिमुनिमब्रवीत् ॥१६ भगवन्कृतकृत्योऽस्मि त्वदभ्यागमनेन वै। सतामागमन सन्त प्रगसन्ति सुखावहम् ॥१७ या स्यान्महता प्रम तत्र स्यु सवसम्पद । तेज कीतिर्धन पुत्रा इति प्राहुर्विपाश्वत ॥१८ तन वृद्धिमुयायान्ति श्रेयास्यनुदिन मुने । यर सन्त प्रकुर्वन्ति महती करुणा प्रभो ।।१६ यो मूनि धारयेद् ब्रह्मन्महत्पादजल रज । स स्नात सर्वतीर्थेषु पुण्यात्मा नात्र संशय ॥२० मम पुत्राश्च दाराश्च सपत्त्वयि समर्पिता । मामाज्ञापय विप्रन्द्र वि प्रिय करवाणि ते ॥२१ राजा न जब मुना वि विभाण्ड मुनि वहाँ पर पधार रह है तो उपन पनी पत्नी का साथ म सबर उनी अगवानी करन व लिय यामन से उठ कर बाहर आगमन पिया या । जब व आगय नो उनका बहुत ही अच्छी तरह म आतिथ्य ॥ व सत्कार प्रिया था। जब मुनिवर गपिन उच्चामन पर विराजमान हा ग्य तो तय राजा नीच एक आमन पर बैठ गया था और हाय जाउ र मुनिया म प्राया परन लगा था ॥१५॥१९॥ गजा यहा--है भगवन् वाज नाम शुभागमन म मैं परम नाय हा गया है बोधि मरजना य आगमा गयो भारी मुग की प्रालि हा करती है-यर एमागपुस्पा - न [ नारद पुराण से के दर्शन की महिमा ही होती है ॥२७॥ विद्वान् लोग कहा करते हैं कि जहा पर उदार सत्पुरुष प्रेम किया करते हैं वहाँ पर निश्चित रूप से कीति-सम्पदा और पुत्रादि की प्राप्ति होने लगा करती है ।।१८॥ है मुनिवर । है प्रभो । सत्पुरुष जहाँ पर अपनी बडी कृपा किया करते हैं वहा पर प्रतिदिन मङ्गल ही मङ्गल हुआ करते हैं ॥१६॥ हे ब्रह्मन् । जो मनुष्य अपने पूज्य तम बडो के चरणोदक तथा चरण स्पर्श की गई धूलि को अपने मस्तक पर धारण किया करते हैं उन परम पुण्यात्गा पुरपी ने सभी पवित्र तीर्थों मे रतान कर लिया है-इसमे लेशमान भी सशय नही है ॥२०॥ मैं अपने पुत्र-स्त्री और सम्पूर्ण वैभव को आपकी सेवा में समर्पित करता हूँ। हे विप्रवर । आप मुझे अपनी आज्ञा प्रदान कीजिए मैं इस समय में आप का परम प्रिय कार्य क्या करू ? ॥२१॥ विनयावनत भूप स निरोक्ष्य मुनीश्वर । स्पृशन्करेण त प्रीत्या प्रत्युवाचातिहर्पित ॥२२ राजन्यदुक्त भवता तत्सर्व त्वत्कुलोचितम् । विनयावनत सर्वो वहुणे यो लभेदिह ॥२३ धर्मश्चार्यश्च कामश्च मोक्षश्च नपसत्तम । विनयाल्लभते मर्यो दुर्लभ कि महात्मनाम् ॥२४ प्रीतोऽस्मि तव भूपाल सन्मार्गपरिवत्तिन । स्वस्ति ते सतत भूयाद्यत्पृच्छामि तदुच्यताम् ॥२५ पूजा बहुविधा सन्ति हरितुष्टिविधायिया । तासु नित्य ध्वजारोपे वर्तसे त्व सदोद्यत ॥२६ भार्यागितव पाध्वीय नित्य नृत्यपरायणा । विमर्थ मेतद् वृत्तान्त यथावद्वत्तमहमि ॥२७ मृणुप्प भगवन्सर्व यस वदामि तन् । आश्चर्पभून लोकानामाग्योश्चारित चिह ८ नारद पुराण ] वह महा मुनि उस गजा की ऐसी नम्रता देखकर बहुत ही प्रसन्न हुए और बडे ही प्रेम के साथ उस पर हाथ फेरते हुए कहने लगे-॥२२॥ श्री ऋषिवर ने कहा-हे राजन् । आपने जो कुछ भी मुझ से प्रार्थना की है वह सब आपके इम परमोच्च एव पवित्र कुलके योग्य ही है। ऐमा निश्चित नियम है कि जो विनम्र होता है उसे बनेक तरह के कल्याणो की स्वत ही प्राप्ति हो जाया करती है ॥२३॥ हे नृप श्रेष्ठ । यह विनय ऐमा उत्तम गुण है कि इसके द्वारा धर्म-अर्थ काम और मोक्ष मभी कुछ प्राप्त हो जाया करते हैं । महान् आत्मा वालो को इस ससार में कोई भी पदार्थ दुलंभ नही रहा दरता है ।२४। हे राजन् । आप तो परम श्रेष्ठ मार्ग पर चल रहे हो-मैं आपसे बहुत ही प्रसन्न हो गया हूँ । मैं आशीर्वाद देता हूँ कि आपका सदा कल्याण होवे । अब मैं आपस जो कुछ भी पूछना हूँ उमगा उतर आप मुझे दीजिए ॥२५॥ ऋपि ने कहा- भगवान विष्णु का प्रसन्न करने वाली अनेक प्रकार की अर्चन-पद्धतिया है उन मबमे से आप केवल ध्वजारोपण नाम वाली पूजा ही क्यो क्यिा ररते हैं ? ॥२६॥( यह आपकी परम साधी पत्नी भी विष्णु मन्दिर मे सदा नृत्य ही दिया करती है-यह मय क्या बात है आप दानो ऐमा ही क्यों दिया परते हैं जब नि अन्य अनेक भगवान् के प्रसन्न करने में उत्तमोत्तम साधन विद्यमान है ? इसका मत्य-मत्य उत्तर मुझे दीजिए ॥१७॥ राजा ने कहा है भगवन् । आपने जो कुछ भी मुझ में इस समय म पूछा है उगो में बतलाना है, आप मुनिए । हम दोना के चरित्र में मोग आशयं म पड़े रहा परते है ॥२८॥ अहमाम पुरा शूद्रो मालिनि म मत्तम । गुमानिम्तो निन्य मवंलोवाहिते रत ॥२६ पिगनो धर्मविद्वे पी देवद्रव्यापहार । गोनश्च ब्रह्महा नोर गर्वप्राणधे ग्त ॥३०
[ नारद पुराण
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नित्य निष्ठुरवक्ता च पापी वेश्यापरायणः ।
एव स्थित कियत्कालमनादृत्य महतच. ॥३१
सर्ववन्धुपरित्यक्तो दुखी वनमुपागतः ।
मृगमासाशनो नित्य तथा पान्थविलुम्पक ॥३२
एकाकी दु खवहुलो न्यवसन्निर्जने वने।
एकदा क्षुत्परिश्रान्तो निदाघात पिपासितः ॥३३
जीर्ण देवालय विष्णोरपश्य विजने बने ।
हसकारण्डवाकीर्ण तत्समीपे महत्सर ॥३१
पर्यन्तवनपुप्पौघच्छादित तन्मुनीश्वर ।
अपिव तत्र पानीय ततीरे विगतश्रम. ॥३५
फलानि जग्ध्वा शीर्णानि स्वय क्षुच्च निवारिता।
तस्मिञ्जीर्णालये विष्णोनिवास कृतवानहम् ।।३६
हे मुनिवर । मैं पहिले जन्म मे मलिनि नाम वाला शूद्र था ।
मैं बहुत ही अधिक वुमार्गगामी था और सदा दूसरो के अहित के ही
कार्य करने में लगा रहा करता था ।।२।। मैं बड़ा नुगलखोर-धर्म
से द्वेष रखने वाला-देवद्रव्य का चोर और गो ब्राह्मणो को मारने वाला
था और सभी प्राणियो की हिंसा किया करता था ॥३०॥ मैं सदा
वडवी बातें कहा करता था और पाप कर्म ही किया करता था । मैं
वेश्यागामी था और अपने बडो की बातें नहीं मानता था। इसी प्रकार
में बहुत मा ममय व्यतीत हो गया था ॥३१॥ ऐसी दशा मेरी देखकर
मेरे ममी वान्धवो ने मुझे त्याग दिया था । नब मैं परम दुषित होकर
जगल में चला गया था और वहा पर मैं मगो रे मांग वा आहार पर
लग गया पा तथा में राहों में जाने जाने वाले मारिगे
का काम पर लग गया था ।।३२॥ ग प्रकार में मैं बहन गेदु
मागे
सलन हार वन म रहन लगा था। ए ममय में भूगम पाडा पर
गोग पीडिभर प्यांमा पम रहा था। उम गमय में मैं
सूटो
नारद पुराण } ४०१ उस निर्जन वियावान जङ्गल मे भगवान विष्णु के जीर्ण-शीर्ण एक मन्दिर को देखा था। उस मन्दिर के समीप मे ही एक सरोवर भी था जो हस और कारण्डवो से घिरा रहता था। वह सरोवर हे मुनि- वर । जल पर्यन्त पुप्पो वाली लताओ से सुशोभित था । उसने तट पर मैंने पहुंच पर जल पान क्यिा था । उमसे मेरी थकान दूर होगई थी। उस समय पर मैंने देखा कि भूमि पर कुछ फ्ल वृक्षो पर से टूट वर गिर गये हैं। मैंने उनको उठा कर अपनी क्षुधा को भी शान्त किया था। इसके उपरान्त मैं उसी जीर्ण मन्दिर में रहने लग गया था।॥३५॥३६॥ जीर्णस्फुटितसधान तस्य नित्यमकारिपम् । पर्गस्तृणश्च काष्ठौघगृह सम्यक् प्रकल्पितम् ॥३७ स्वसुखार्थ तु तद्भूमिर्मया लिप्ता मुनीश्वर । तबाह व्याघवृत्तिस्थो हत्वा बहुविधान्मृगान् ॥३८ आजीव वर्ततन्नित्य वाणा विशति स्थित । अथेयमागता माध्वा विन्ध्यदेशसमुद्भवा ।।३६ निपादकुलजता विप्र नाम्ना ख्याताऽवकोकिला। बन्युवर्गपरित्यक्ता दुखिता जीर्णविग्रहा ।।४० क्षत्त धर्मपरिश्रान्ता शोचन्ती स्वकृतघम् । देवयोगात्ममायाता भ्रमन्ती विजने वने ॥४१ ग्रोप्मतापादिता वाह्य स्वान्ते चाधिनिपीडिता। इमा दुखादिता दृष्ट्वा जाता मे निपुना दया ॥४२ जो उम मन्दिर के भाग हर पट?" उनको धीरे-धीरे मृण और वाठाग टोक करता रहा था। हम तरह गे पृष्ठ ममय में बहुत अच्छा निवाम यह मा बना लियाना है नीय गर्न शो वहाँ को ना भूमि भी उसको भी मैंने अपनी गुग मे दृष्टिकोण मे सीप पर टीम बना लिया था। उम पान पर ही एम
४०२
[ नारद पुरान
मेरे पास
बहेलिया का कम करता हुआ मैं नित्य ही बहुत-से मृगो को मार कर
वीस वर्ष तक रहा था। हे विप्रवर ! इसके अनन्तर विध्यदेश के
एक निपाद्र कुल मे उत्पन्न अवकोकिला नाम वाली परम साध्वी स्त्री
वहा पर भागयों थी। जिसको उसके बन्धु-वान्धवी ने त्याग कर
निकाल दिया था। इसका शरीर बहुत जीणं हो गया था और वह
भूख प्यास धूप से बहुत घबडाई हुई बस निजन वन मे इधर उधर धूम
रही थी। वह अपने किय हुए पापो का पश्चाताप कर रही थी। इस
तरह से वह दैवयोग से
आ निकली थी ॥३८-
४१।। वह विचारी बाहिर तो धूप की गरमी से झुलस रही थी और
अपने मनके अन्दर इन प्राप्त हुए क्लेशो के कारण बहुत ही सन्ताप
धाली थी। उस समय में उम अत्यन्त दुखिनी को देख कर मरे हृदय
मे अत्यन्त करुणा उत्पन्न हो गई थी॥४२
दत्त मया जल चास्यै मास वन्यफलानि च ।
गतश्रमा त्विय ब्रह्मन्मया पृष्टा यथा तथम् ।।४३
अवेदयत्स्ववृत्तान्त तच्छृणुष्व महामुने।
नाम्नावकोकिला चाह निपादकुलसम्भया ॥४४
दावस्य सुता चाह बिन्ध्यपक्तवासिनी।
परस्वहारिणी नित्य सदा पैशुन्यवादिनी ॥४५
पुश्चलात्येवमुक्त्वा तु बन्धुवर्ग समुज्झिता।
क्यित्काल तत पत्या भृताह लोकनिन्दिता ॥४६
देवात्सोऽपि गतो लोक यमस्याय विहाय माम् ।
कान्तारे विजने चैका भ्रमन्ती दुखपीडिता ॥४७
देवात्त्वत्सविध प्राता जीविताह त्वयाधुना ।
इत्येव स्वकृत वम मह्य सवं न्यवेदयत् ।।४८
ततो देवालय तस्मिन्दम्पतीभावमाधितौ ।
स्थिती वर्षाणि दश च आचा मारापनाशिनौ 11४६
४०३ नारद पुराण ] एकदा मद्यपानेन प्रमत्तौ निर्भर मुने। तत्र देवालये रानौ मुदितो मासभोजनान् ॥५० अतएव मैंने उसको उल और मांस तथा जङ्गली फल दे दिये थे अव । वह अपनी थकान दूरकर शान्त होगई थी तब मैंने उसका सब कारण पूछा था ।।४३॥ हे महामुने | उसने अपना सारा हाल सुनाया था उसे मैं आपक मामने कहता हूँ आप श्रवण कीजिये । उसने कहा था-मैं निपाद कुल मे समुत्पन्न हुई हूँ और मेरा नाम अब काक्लिा है ।।४४॥ मेरे पिता का नाम दारुक है, मैं विन्ध्याचल पर्वत पर रहती थी, मैं सदा दूसरो का धन चुराया करती थी और सर्वदा दूसरो की चुगली खाया करती थी ॥४५॥ मरे कुल वालो ने 'यह छिनाल है' यह कह कर घर स निकाल दिया था किन्तु मुझे लोक म निन्दित होने पर भी मेरे पति ने कुछ समय तक मेरा पोपण किया था ॥४६॥ मेरे दुर्भाग्य से वह भी मुझे असहाय छोडकर परलोक- गामी हो गया है । अव मैं इम निर्जन वन में अत्यन्त पीडित होकर बरेली घूम रही थी ॥४७।। भाग्यवश मैं तेरे समीप मे आ निकली हूँ। तूने मुझको मौत से उवार लिया है। ऐसे उसने मुझको अपना मव ममाचार मुना दिया था ।। १८॥ इसके अनन्तर हम दोनो गृहस्थी वनकर उमी मन्दिर में माम यावर तथा मदिरा पान करके मत्त होत हुये प्रमन्न हो रहे थे ।।४६३५० तनुवस्यापरिज्ञानौ नृत्य चकृव मोहितो। प्रारब्धकर्म भोगान्तभावा युगपदागतौ ॥५१ यमदूतास्तदायाता पाणहम्ता भयवरा । नेतुमावा नृत्यरतो मुघोरा यमयातनाम् ॥५२ तत प्रसन्नो भगवावमंगा मम मानद । देवावमयमस्वारमनितेन कृतेन न ॥५३ स्वदूतान्प्रेषयामास स्वभक्तायनतत्पर ।
४०४ [ नारद पुराण ते दूता देवदेवस्य शखचागदाधरा ॥५४ सहस्रसूयसकाशा सर्वे चारुचतुर्भुजा। किरीटकुण्डलधरा हारिणो वनमालिन ॥५५ दिशो वितिमिरा विप्र कुवन्त स्वेन तेजसा । भयकरापाशहस्तान्दष्ट्रिणो यमकिङ्करान् ॥५६ आवयोर्ग्रहण यत्तानूचु कृष्णपरायणा ॥५७ ( उस समय म अपन शरीर की सब मुधि खोकर हम मोह मे नृत्य करने लगे थे ।)हमको अपने शरीर और वस्त्रो का भी कुछ होश हवास नही रहा था । उस समय मे हम दोनो का ही प्रारब्ध भोग का अ न आ गया था ॥५१॥(हम दोनो नृत्य मे मम्त हो रहे थे कि महान भयकर यमदूत हाथ म फांसी के पाश लिये हुये वहाँ नरको मे ले जान थे निये आ पहुंचे थे ॥५१॥)हे मानद । उमी समय म भगवान विष्णु ने भी अपने देवानय की स्वच्छता रखने के कारण परम प्रसन होकर अपन दूनो को भेज दिया था ॥५३॥ भगवान सदा अपने भक्तो की सुरक्षा का ध्यान रखत हुये तत्पर रहा करत है। देवेश्वर के दूत शख चक्र और गदा धारण करन वाले थे ।।५४।। वे सहस्रो मूर्यों का समान प्रकाश स युक्त थे सबके चार भुजाय थी किरीट कुएइल और वन- माला धारण क्यि हुये थ ॥५५।। हे परमपद । नमी परम दिव्य कातिरा निशाआ से समस्त अधिकार दूर हो गया था । इस प्रकार से श्रीकृष्ण भगवान के पार्षद ने हम दाना की घात म प्रस्तुत उन महान भयपर यमदूना म जो वड़ो २ दाढा वाल पागधारी वहाँ पर थे उनस यहा पा ॥५६॥५७ भा भी । रा दुराचारा पिवयपरिवजिता । मुन्चध्वमतो निप्पापो दम्पती हरिष लभा ॥५८ विवामित्र लागु मपदामादिधारणम् । अपापपापधीयग्नु । विद्यात्यु पाधगम् ॥५६ भारद पुराण ] पाप त्वपापधीर्यस्तु तं विद्यादधमाधमम् ॥६० युप्माभि सत्यमेवोक्त कि त्वेतीपापिसत्तमौ । यमेन पापिनो दण्डवास्तन्नेप्यामो वयं त्विमौ ॥६१ श्रुतिप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्यय. । धर्माधर्मविवेकोऽय तन्नेध्यामो यमान्तिकम् ॥६२ एतच्छु त्वातिकुपिता विष्णुदूता महीजस. । प्रत्यूचूस्तान्यमभटानधर्म धर्ममानिन. ॥६३ श्री विष्णुदूतो ने कहा-अरे क्रूर पुरुषा । तुम बहुत ही विवेक- होन और दुराचारी हो । तुम इन हरि के निष्पाप दम्पतियो को छोड ५८|| लोक्य मे विवेक ही समस्त सम्पदाओं का आदि कारण माना जाया करता है । जो पाप रहित प्राणी में पाप बुद्धि रखता है सपा पापो का पाप रहित समझता है उमका महान अधम पुरप ही समझना चाहिए ।।५६६०॥ यमराज के दूतो ने उत्तर दिया----हे पापंदो । यापन जो कुछ भी कहा वह अक्षरशः सत्य है किन्तु ये दोनों तो छटे हुए बदमाश हैं । यमराज ऐमे महा पापियो को ही दण्ड दिया करते हैं । इसीलिए हम इनका पक्ड कर लिए जाते हैं ॥६१।। वेद जिस कर्म का प्रतिपादन किया करता है वही धर्म होता है और वेद जिस कर्म का निपध किया करता है वही अधर्म है । यही धर्माधर्म का विचार हम जानते हैं । इसीलिए हम इनको यमराज के सामने लिये जाते हैं ।।६२॥ इस उनके उत्तर को सुनकर महा पराक्रमी विष्णु के पार्षदो को वडा क्रोध हो गया और अधर्म वा धर्म समझने वाले इन यमराज के दूतो म उन्होन कहा--॥६३ अहो कष्ट धर्मदृशामधर्म स्पृशते सभाम् । सम्यग्विवेकशून्याना निदान ह्यापदा महत् ॥६४ तर्कणाद्यविशेषेण नरकाध्यक्षता गता । यूय किमर्थमद्यापि कर्ता पापानि सोद्यमा ॥६५ [ नारद पुराण स्वकर्मक्षयपर्यन्तं महापातकिनोऽपि च । तिष्ठन्ति नरके घोरे यावच्चन्द्रार्कतारकम् ॥६६ पूर्वसचितपापानामदृष्ट्वा निष्कृति वृथा। किमर्थं पापकर्माणि करिष्येऽथ पुनः पुनः ॥६७ श्रुतिप्रणिहितो धर्मः सत्य सत्य न संशयः । किन्त्वाभ्या चरितान्धर्मान्प्रवक्ष्यामो यथातथम् ॥६८ एतो पापविनिर्मुक्ती हरिशुश्रू पणे रतौ । हरिणा त्रायमाणौ च मुञ्चध्वमविलम्वितम् ।।६६ एपा च नर्तन चक्रे तथैप ध्वजरोपणम् । अन्तकाले विष्णुगृहे तेन निष्पापता गतौ ॥७० विष्णु दूतों ने कहा-अहो ! अत्यन्त ही दुःख की बात है कि धर्म के द्रष्टाओ की सभा को अधर्म स्पर्श करने की इच्छा कर रहा है । यह अधर्म जिसका ठीक २ विचार ही नही कर सकते हैं उनको बहुत अधिक आपत्ति मे डाल दिया करता है ।।६४॥ अरे ! तुम तो वहुत ही विवेक शून्य हो । तुमको ऐसा होने पर भी क्सिने भरको का जेलर बना दिया है । अरे ! तुम अभी भी पाप करने के लिये हो कमर कसे खडे हुए हो ? ॥६५॥ अरे ! जिस समय तक पाप कर्मों का क्षय नही हुआ करता है तब तक घोर महापातको भोपण नरको मे रहा करते हैं और प्रलय काल तक भी वहीं पर पोर यातनायें सहन किया करते है ॥६६॥ अरे ! तुम लोगो का अभी तक पहिले किये हुए सञ्चित पापो से तो छुटकारा नहीं हुआ है और फिर भी तुम लोग पाप कर्मों के ही करने पर उतारू क्यो हो रहे हो? ॥ ६ ॥ तुमने जो यह कहा था कि घेद मे जिसका विधान है वही धर्म है । यह मवंधा सत्य है । अब हम इन दोनो प्राणियो के दिए हुए धर्मों को बतलाते हैं ॥६८।। ये दोनो ही भगवान विष्णु की पूजा करने से विशुन पाप रहित हो गये है । अब भगवान विष्णु इनकी रक्षा करना
४०७
नारद पुराण ]
चाहते हैं अब आप लोग इन दोनो को तुरन्त ही छोड दो ॥ ६६ ।।
(इनने इस अन्तिम समय में इस भगवान् विष्णु के मन्दिर मे ध्वजा
सगाई है और नृत्य किया है। इसीलिये बिल्कुल निप्प होकर विशुद्ध
भक्त हो गये हैं ॥७०।।)
अन्तकाले तु यन्नाम श्रुत्वोक्त्वापि च वै सकृत् ।
लभते परम स्थान किमु शुश्रूपये रत्ता ॥७१
महापातक्युक्तो वा युक्तो वाप्युपपातक ।
कृष्णसेवी नरोऽन्तेऽपि लभते परमागतिम् ।।७२
यतीना विष्णुभक्ताना परिचर्यापरायणा ।
ते
दूता सहसा यान्ति पापिनोऽपि परा गतिम् ॥७३
मुहूर्त वा मुहूर्ताद्धं यस्तिप्ठेद्धरिमन्दिरे ।
सोऽपि याति पर स्थान किनु द्वात्रिंशवत्सरान् ॥७४
उपलेपनकर्तारौ समार्जनपरायणौ ।
एती हरिगृहे नित्य जीर्णशीर्णाधिरोपको ॥७५
जलसेचनकारी दीपदी हरिमन्दिरे।
कथमेतौ महाभागौ यातनाभोगमहंथ ॥७६
इत्युक्त्वा विष्णुदूतास्ते च्छित्वा पाशास्तदैव हि ।
आरोप्यावा विमानानच ययुर्विष्णो पर पदम् ।।७७
जो प्राणी अपने जीवन के अन्त काल में एक वार भी भगवान्
के परम पावन नाम का उच्चारण कर लेता है अथवा भगवन्नाम का
श्रवण कर लेता है तो उसको परम पद की प्राप्ति हुआ करती है फिर
जो स्वय ही भगवान् की सवा म लग्न हो उमको परम पद प्राप्त होता
है तो क्या आश्चर्य की वात है ॥७१॥ चाहे कोई पापी हो या महा
पातकी हो श्रीकृष्ण की सेवा करने वाले को अन्त मे परम गति प्राप्त
हुआ करती है ॥७२॥ अरे हे यमदूतो । देखो, जो संन्यासियो और
विष्णु भक्तों के सेवा शुश्रूषा म निरत रहा करते हैं वे वैसे भी पापी हा
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। नारद पुराण
तो भी परम गति के पाने के अधिकारी होते हैं ॥७३॥ अरे महामूढो !
जो एक बार भी या आधे मुहर्त भी हरि मन्दिर मे निवाम किया
करता है वह भी परम पद प्राप्त कर लेता है फिर ये दोनो प्राणी
तो बत्तीस वर्ष तक इस विष्णु मन्दिर मे रहे हैं ॥५४॥ ये दोनो इस
विष्णु भगवान के मन्दिर को लीपते रहा करते थे इसमे बुहारी लगा
कर स्वच्छ रखते थे तथा जहाँ-तहाँ इसकी मरम्मत किया करते रहते
थे जोकि इसका अत्यन्त जीर्ण-शीर्ण भाग था ॥७॥ ये इस मन्दिर में
जल का छिडकाव किया करते थे और दीपक जलाया करते थे। इतनी
सेवा करने पर ये महाभागो नरक मे जाने के पात्र कैसे बने रह गये
हैं ? ॥७६।। विष्णु दूतो ने यह कहते हुए यमदूतो के पाशो का छेदन
कर दिया था और हम दोनो को एक दिव्य विमान मे बिठाकर में
विष्णु लोक को लेकर चल दिए थे ।।७७
तन्त्र सामीप्यमापन्नौ देवदेवस्य चक्रिणः ।
दिव्यान्भोगान्भुक्तवन्तौ तावत्काल मुनीश्वर ।।७८
दिव्यान्भोगास्तु तत्रापि भुक्त्वा यातौ महीमिमाम् ।
अत्रापि सपदतुला हरिसेवाप्रसादतः ।।७६
अनिच्छ्या कृतेनापि सेवनेन हरेमुने ।
प्राप्तमीदृक् फलं विप्र देवानामपि दुर्लभम् ॥८०
इच्छ्याराध्य विश्वेशं भक्तिमावेन माधवम् ।
प्राप्स्याव परम श्रेय इति हेतुनिरूपितः ।।८१
अवशेनापि यत्कर्म कृत स्यात्सुमहत्फलम् ।
जायते भूमिदेवेन्द्र कि पुन श्रद्धया कृतम् ॥२
एतदुक्त निशम्यासो स मुनीन्द्रो विभाण्डक. ! .
प्रशम्य दम्पतो तो तु प्रययो स्वतपोवनम् ।।८३
तस्माज्जानीहि देव देवदेवस्य चक्रिण.।
परिचर्या तु सर्वेषा कामधेनूपमा स्मृता ।।८४
४०६ नारद पुराण ] हरिपूजापराणा तु हरिरैव सनातन । ददाति परम श्रेय सर्वकामफलप्रद ॥८५ य इद पुण्यमाख्यान सवपापप्रणाशनम् । पठेच्च शृणुयाद्वापि सोऽपि याति परा गतिम् ॥८६ ह मुनीश्वर | वहां पर भगवान् चक्रधारी विष्णु के समीप मे पहुँच कर हमने दिव्य भागा का सुखोपभोग किया था 11७८।। इस तरह से वहां पर चिरकात तक दिव्य भाग प्राप्त कर अव पुन इम भूमण्डल मे उत्पन्न हुए हैं तो यहां पर भी भगवान् विष्णु के प्रसाद से अतुल सुख-मम्पत्ति मिली है ।।७६।। हे विप्र । हे मुनिवर । इस रीति से इच्छा न होने पर भी बनी हुइ विष्णु की सेवा से ही ऐमा देव दुलभ फल मिला है ।1८०॥ हमारा अब सेवा करने का यही कारण है कि अब हम इच्छापूर्वक भक्ति-भाव से माधव की सेवा-आराधना करके परमोत्तम श्रेय की प्राप्ति करें ।।१।। हे भूदेवेश्वर । अवशता के होते हुए भी किया हुआ कम जब ऐसा महान् फल देता है तो फिर परम श्रद्धा के साथ किए हुए श्री हरि भजन का क्या कहना है ॥२॥ इस क्यन का श्रवण कर विभाण्डक मुनि ने उन दोनो दम्पत्ति की बहुत प्रशमा की और फिर वे अपने तपोवन को वापिस चले गये थे ।।३।। अत हे देव । आप समझ लीजिए चक्रधारी भगवान की सेवा का फल सवको कामधेनु के ही समान हुआ करता है ॥४॥ श्री हरि भगवान की पूजा मे निमग्न रहन वाले जनो को समस्त कामनायें पूर्ण करन वाले श्री हरि ही परम श्रेय प्रदान किया करते हैं ।। ८५ ।। जो कोई भी प्राणी समस्त पापो के विनाश करने वाले इस परम पावन आख्यान का श्रवण या वाचन करता है वह भो परम गति को प्राप्त हो जाया करता है ॥८६ ४१० [ नारद पुराण ॥ हरिपञ्चरात्र व्रत ॥ अन्यद्वृत प्रवक्ष्यामि शृणु नारद तत्त्वत । दुर्लभ सर्वलोकेषु विख्यात हरिपञ्चकम् ॥१ नारीणा च नराणा च सर्वदु खनिवारणम् । धर्मकामार्थमोक्षाणा निदान मुनिसत्तम ॥२ सर्वाभीष्टप्रद चैव सर्ववतफलप्रदम् । मार्गशीर्ष सिते पक्षे दशम्या नियतेन्द्रिय. ॥३ कुर्यात्स्नानादिक कर्म दन्तधावनपूर्वकम् । कृत्वा देवार्चन सम्यक्तथा पञ्च महाध्वरान् ॥४ एकाशी च भवेत्तस्मिन् दिने नियममास्थित । तत प्रात. समुत्थाय ह्य कादश्या मुनीश्वर ॥५ स्नान कृत्वा यथाचार हरिं चैवार्चयेद् गृहे । स्नापयेदेवदेवेश पञ्चामृतविधानत ॥६ अर्चये परया भक्तया गन्धयुप्पादिभि क्रमात् । धूपैर्दोपैश्च नैवेद्यस्ताम्बूलश्च प्रदक्षिण ॥७ श्री रानवाचार्यजी ने कहा-हे नारद । भय में आपके सामने एक अन्य वन का तत्व बतलाता हूँ--एक हरिपञ्चव' नाम वाला प्रत इस लोय में परम प्रसिद्ध है और यह परम दुर्लभ है ॥१॥ प्रत पेपरने से मनुष्या के और नारियो के सभी दुख दूर हो जाया परते हैं। हे मुनिश्रेष्ठ । इस व्रत से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारो पुरपार्यों को प्राप्ति हो जाया करती है ।। २।। इससे मानवी की सभी मनापामनाऐ सफ्न हुआ करती हैं और अन्य सभी व्रतो या पल इगरे करने में प्राप्त हो जाया करता है यह ऐगा ही है। मार्गशीर्ष माग मे पक्ष की दशमी के दिन अपनी गमम्त इन्द्रियोमो यश म पर दातुन एप स्नान आदि नित्य एव पायरय पोकोपर
४११
नारद पुराण ]
भली भांति से देव पूजन और पञ्च यज्ञ करे तथा उस दिन के नियमो
का परिपालन करने के लिये एक समय में आहार ग्रहण करना चाहिए।
एकादशी तिथि के दिन पात काल में सर शारीरिक कृत्यो से निपट
कर श्री हरि का अर्चन करे और पञ्चामृत से भगवान् श्री हरि का
म्नान कराना चाहिए ।। ३-६ ।। भगवान का अर्चन कि भावना के
सहित सभी आवश्यक गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल एव
प्रदक्षिणा आदि से करना चाहिए ।। ७ ॥
सपूज्य देवेदेवेश मिम मन्त्रमुदीरयेत् ।
नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानदाय नमोऽस्तु ते ।।८
नमस्ते सर्वरूपाय सवसिद्धिप्रदायिने ।
एव प्रणम्य देवेश वासुदेव जनार्दनम् ॥६
वक्ष्यमागेन मन्त्रेण ह्य पवास समर्पयेत् ।
पञ्चरात्र निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव ॥१०
त्वदाज्ञया जगत्स्वामिन्ममाभीष्टप्रदो भव ।
एव समर्प्य देवस्य उपवास जितेन्द्रिय ॥११
रात्रौजागरुण कुर्यादेकादश्यामथो द्विज ।
द्वादश्या च त्रयोदश्या चतुर्दश्या जितेन्द्रिय ॥१२
पौर्णमास्या च कर्त्तव्यमेव विष्ण्वर्चन मुने ।
एकादश्या पौर्णमास्या कर्तव्य जागर तथा ॥१३
पञ्चामृतादिपूजा तु सामान्या दिनपञ्चसु ।
क्षीरेण स्नापयेद्विष्णु पौर्णमास्या तु शक्तित ।
तिलहोमश्च कर्तव्यत्तिलद न तथैव च ॥१४
पूजा
करके फिर उनके समक्ष मे निम्न मन्त्र का
उच्चारण करके प्रार्थना करनी चाहिए। 'नमस्ते ज्ञानरूपाय ज्ञानदाय
नमोऽस्तुते । नमस्त सर्वरूपाय सर्वसिद्धि प्रदायिने ।' अर्थात् हे भगवन्
आप ज्ञान के स्वरूप वाले हैं आपको मेरा प्रणाम है । आप ज्ञान के
भगवान् की
४१२ [ नारद पुराण दिन रात्रि प्रदान करने वाले है आपकी सेवा मेरा प्रणाम है । आप समस्त सिद्धियो के प्रदान करन वाल है आपको मेरा नमस्कार है । आप सर्म रूप के लिये मेरा प्रणाम है। इस विधि से भगवान देवेश्वर वासुदेव का अर्चन करना चाहिए ।।८।६॥ इस अन तर जो उपवास भगवत्प्रीत्यर्थ किया है उसे भगवान् की सेवा मे समर्पित कर देवे । उसका मन्न यह है पञ्चरात्र निराहारा ह्यद्य प्रभृति केशव । स्वदाज्ञया जगत्स्वामिन् । ममाभीष्टप्रदोभव' अर्थात ह केशव । मैं आपकी ही आज्ञा प्राप्त कर पांच रात्रि तक निराहार रहकर उपवास करन का इच्छुक हूँ। अतएव हे इस सम्पूर्ण जगत् के स्वामिन् । आप मेरे सभी मनोरथ पूर्ण परिये । इस रीति से भगवान की सेवा में उप- वास का अर्पण करे । हे द्विजवर । फिर उस एकादशी म जागरण करना चाहिए । हे मुनिवर । फिर द्वादशी-प्रयोदशी- चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को भी इसी विधान से भगवत्पूजन करे । सिर्फ एकादशी और पूर्णिमा को रात्रियो में जागरण करे ।। १०-१३ ।। साधारणतया पाचो दिन पञ्चामृत आदिसे पूजन करे । पूर्णिमा के दिन भगवान् को दूध से स्नान करावे और यथा शक्ति तिला का दान तथा तिलो से होम करना चाहिए ॥१४।। तत पष्ठे दिने प्राप्ते निर्वत्य स्वाश्रमक्रियाम् । सप्राश्य पञ्चगव्य च पूजयेद्विधिवद्धरिम् ॥१५ ब्राह्मणान्भोजयेत्पश्चाद्विभवे सत्यवारितम् । तत स्ववन्धुभि साद स्वय भुजीत वाग्यत ॥१६ एव पौपादिमामेषु कात्तिवान्तेषु नारद । शुल्लपक्षे प्रत कुर्यात्पूर्वोक्तविधिना नर ॥१७ एव सवार कार्य व्रत पापप्रणाशनम् । गुन प्राप्ते मार्गशो कुर्यादुद्यापन व्रती ।।१८ एकादश्या निराहारो भवेत्यूर्वमिर द्विज ।
नारद पुराण ] ४१३ द्वादश्या पञ्चगव्य च प्राशयेत्सुसमाहित ॥१६ गन्धपुष्पादिभि सम्यग्देवदेव जनार्दनम् । अभ्यर्योपायन दद्याद् ब्राह्मणाय ।जतेन्द्रिय ॥२० पायस मधुसमिथ घृतयुक्त फलान्वितम् । मुगन्धजलसयुक्त पूर्णकुम्भ सदक्षिणम् ॥२१ इसके उपरान्त छटवें दिन अपने आश्रम के नित्य कृत्यो से निवृत होकर पञ्च गव्य का प्राशन करे तथा विधि पूर्वक भगवान् का यजन करना चाहिए ।। १५ ।। यदि पास मे कुछ वैभव हो तो ब्राह्मणो को भोजन करावे और इसके पश्चात् वान्धवो के सहित एकन बठकर स्वय भी प्रमाद ग्रहण करना चाहिए ।।१६।। हे नारद । इसी रीति से पोप आदि मासोम भी आगे आने वाले कार्तिक माम पर्यन्त प्रतिमाम इस व्रत का समाचरण करना चाहिए। मभी मासो वे वनो मे विधान यही पूर्व में कहा हुआ है ।।१७। इस तरह से पूरे वर्ष म किया हुआ यह व्रत समस्त पापो का नाश कर दिया करता है। व्रतधारी पुरुप को पुन मार्गशीर्ष मास के आने पर ही इस महाव्रत का उद्यापन करना चाहिए ॥१८॥ हे द्विजवर । एकादशी तिथि के दिन पूर्व की भाति ही निराहार रहे नथा द्वादशी के दिन सावधानता के साथ पञ्चगव्य का प्राशन करना चाहिए ॥१६॥ देवेश्वर जनार्दन भगवान् का गन्ध पुष्पादि के द्वारा पूजन करे-जितन्द्रिय रहे और ब्राह्मण का भेट देव । ॥२०॥ उम दान में मधु और घृत मिश्रित पायस-फल-सुगन्धित जल से पूर्ण कलश और द्रव्य दक्षिणा होने चाहिए ॥२१॥ वस्त्रेणाच्छादित कुम्भ पञ्चरत्नममन्वितम् । दद्यादध्यात्मविदुर ब्राह्मणाय मुनीश्वर ॥२२ सर्वात्मन् सवभूतश सर्वव्यापिन्सनातन । पग्मान्नप्रदानेन सुप्रीतो भव माधव ॥२३ अनन पायस दत्त्वा ब्राह्मणा-भाजयत्तत ।
४१४ [ मारद पुराण शक्तितो वन्धुभि सार्द्ध वय भुजीत वाग्यतः ॥२४ व्रतमेतत्त य कुर्याद्वरिपञ्चकर्सज्ञितम् । न तस्य पुनरावृत्तिब्रह्मलोकात्कदाचन ॥२५ व्रतमेतत्प्रकर्त्तव्यमिच्छद्भिर्मोक्षमुत्तमम् । समस्तपापकान्तारदावनलसम द्विज ॥२६ गवाकोटिसहसाणि दत्त्वा यत्फलमाप्नुयात् । तत्फल लभ्यते पुम्भिरेतस्मादुपवासत ॥२७ यस्त्वेतच्छणुयाद्भक्तया नारायणपरायण । स मुच्यते महाघोरै पातकाना च कोटिभि ॥२८ जो कलश दिया जावे वह पञ्चरन्नो से युक्त और वस्त्र से समावृत होना चाहिए। इस दान को किसी अध्यात्मवेत्ता विद्वान ग्राह्मण को ही देना चाहिए ॥ २२ ॥ फिर निम्न मन्त्र का उच्चारण पर प्रार्थना करे-- 'सर्वात्मन् सर्वभूतेश सर्वभूतेश सर्वव्यापिन् सनातन । परमान प्रदानेन सुप्रीनो भवमाधव ।" अर्थात्-हे भगवन् । आप सब आत्म स्वरूप वाले हैं और आप सभी भूतो के प्रभु हैं । हे सर्वव्यापक । आप सनातन ( सर्वदा से चले आने वाले ) माधव है। इस परम श्रेष्ठ अन्न वे प्रदान मे आप मुझ पर प्रसन्न होइये । इमी मन्त्र को पढत हुए ग्राह्मण को धीर अर्पित करे। फिर यथा शक्ति ब्रह्मभोज करवावे और सबके पश्चात म्बय भी अपने पांवो के साथ बैठार भोजन करे ।२३॥ २४ ।। जो मनुष्य इस हरिपञ्चा नाम वाले व्रत को किया परता है वह ग्रहालाव पुन यहां पर कभी भी वापिस नहीं आया करता है ।। २५॥ हे द्विजवर । जो मनुष्य परम थे मोक्ष की प्राप्ति की अभि. मापा रगते हा उनको सब पापो के वन के दावानल परुप इस चन को अवश्य ही करना चाहिए ॥ २६ ॥ दग अरब गौओ के दान में जो पुण्य-पर प्राप्त होता है यही पुण्य-पर इम उपयास ये बग्न म प्राप्त हमारता है ।२७ जा कोई भगवद्भक्त इस उपम परन विधान -
४१५
नारद पुराण ]
को
सुनता है और भक्तिभाव स इसका श्रवण किया करता है वह कोटिश
महापापो स विमुक्त हो जाता है ।।२।।
॥ मासोपमास व्रत ॥
अन्यद् व्रतवर वक्ष्ये तच्छृणुष्व समाहित ।
सर्वपापहर पुण्य सर्वलोकोपकारकम ॥१
आपाढे श्रावो वापि तथा भाद्रपदेऽपि च ।
तथैवाश्विनके मासे कुर्यादेतद् द्विज ॥२
एतेप्वन्यतमे मासे शुल्कपक्षे जितेन्द्रिय ।
पाशयेत्पञ्चगव्य च स्वपेद्विष्णुसमीपत ॥३
तत प्रात समुत्थाय नित्यकम समाप्य च ।
थद्वया पूजयेद्विपशु वशी क्रोधविवर्जित ॥४
विद्वद्भि सहितो विष्णुमचयित्वा यथोचितम् ।
सकल्प तु तत कुर्यात्स्वस्तिवाचनपूवकम् ॥५
मासमेक निराहारो ह्यद्यप्रभृति केशव ।
मासान्तपारण कुर्वे देवदेव तवाज्ञया ॥६
तपारूप नमस्तुभ्य तपसा फलदायक ।
ममाभोष्टप्रद देहि सवविघ्नान्निवारय ॥७
श्री सनकाचाय ने कह --हे नारद । मैं इस समय में एक अ य
उत्तम व्रत के दिग्य में वणन करके आपका सुनाता हूँ आप उसको
समाहित होकर मुनिय । यह व्रत समस्त महान् से भी महान् पापो का
विनाशक है और माल लोको का अत्यधिक उपचार किया करता है
इम व्रत के करने का ममय आपाढ थावण भाद्रपद और
आश्विन मास होता है ।॥ २ ॥
इन उक्त मामा म स क्मिी भी एक
मास म स्वच्छया एव सुविधा के अनुसार शुक्लपक्ष म पनी समस्त
1॥१॥
४१६ [ नारद पुराण इन्द्रियो पर नियन्त्रण करके पञ्चगव्य का प्राशन कर भगवान् विष्णु के समीप मे ही शयन करना चाहिए ।। ३ ।। प्रात काल में उठकर अपन नित्य कृत्य से निपट कर बहुत ही श्रद्धा के साथ भगवान् विष्णु का अर्चन करे और इस व्रत के अनुष्ठान के समाचरण के ममय में अपनी सब इन्द्रियो पर पूर्ण नियन्त्रण रखते हुए क्रोध बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए ॥४॥ विद्वानो को साथ मे रखकर विष्णु का पूजन कर स्वस्ति- वाचन करे तथा सङ्कल्प करना चाहिए। इसके पश्चात् निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करे--"मासमेक निराहारो ह्यद्य प्रभृति केशव । मासान्त पारणकुर्ने देवदेव तवाज्ञया ।" अर्थात् -हे देवो के देव । हे केशव । मैं आपसे आज्ञा प्राप्त करके एक मास पर्यन्त निराहार व्रत करने की अभिलाषा रखता हूँ और मास के अवसान मे मै धारणा करूंगा ।। ६ ।। "तपोस्प नमस्तुभ्य तपसा फलदायक । ममभीष्ट पद देहि म; विघ्नान्निवाग्य ।" अर्थात हे तप के ही नाम और स्वरूप वाले प्रभो । मैं आपको प्रणाम अपित करता हूँ। आप ही सब तपश्चर्याओ के फल का प्रदान करने वाले मुगे इस व्रत को पूर्ण करने की शक्ति प्रदान कीजिये और मेरे इस व्रत मे आने वाले वि-नो को दूर करिये ॥७॥ एव समर्प्य देवस्यविष्णोर्मासवत शुभम् । तत प्रभृति मासान्त निवसेद्धरिमन्दिरे ॥८ प्रत्यह स्नापयेदेव पञ्चामृतविधानत । दीप निरन्तर कुर्यात्तस्मिन्मासे हरेगृहे | प्रत्यह खादषेत्काष्ठ ह्यपामार्गममुद्भवम् । तत स्नायोत विधिन्नारायणपरायण ॥१० तत सस्नापर्यद्विष्णु पूर्ववत्प्रयताऽचयेत् । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्तया भक्तियुक्न गदक्षिणाम् ।।११ स्वय च वन्धुभि साद मुजीत प्रयतेन्द्रियः ।
नारद पुराण ] ४१७ एव मासोपवासांश्च व्रती कुर्यालयोदश ॥१२ वर्षान्ते वेदविदुपे गा प्रदद्यात् सदक्षिणाम् । भोजयेद्ब्रह्मणांस्तत्र द्वादशव विधानतः । शक्तया च दक्षिणा दद्याद्ब्रह्मण्याभारणानि च ॥१३ मासोपवासत्रितय यः कुर्यात्सयतेन्द्रियः । आप्तोर्यामस्य यज्ञस्य द्विगुण फलमश्नुते ॥१४ इस प्रकार से भगवान् विष्णुदेव की सेवा मे परम शुभ मास व्रत का समर्पण करके उसी दिन से एक मास पर्यन्त भगवान् विष्णु के मन्दिर मे ही निवास करे ।। ८ । प्रति दिन भगवान् को पञ्चामृत से स्नान कराना चाहिए और उस पूरे मास मे देवालय में अखण्ड दीपक को प्रज्वलित रखना चाहिये ॥ ६ ॥ प्रतिदिन चिरचिटा की दातुन करे और भगवान् नारायण की भक्ति में मग्न रहता हुआ स्नान करे ।१०॥ इसके अनन्तर भगवान् को स्नान करावे और पूर्नवत् परम समाहित होकर विष्णु देव का अर्चन करना चाहिये । जब इस रीति से व्रत करते हुए मास का अन्त होवे तब उस अवसान काल जितनी अपनी थाथिक शक्ति हो उसी के अनुसार ब्राह्मणो को भोजन श्रद्धापूर्वक कराना चाहिए । तथा उचित दक्षिणा देवे । ब्रह्मभोज और दक्षिणा के बिना कोई भी अनुष्ठान सफल नही हुआ करता है । पुष्षत दक्षिणा देने मे कृपणता करना महान मूर्खता है ।११। अपनी समस्त इन्द्रियो को वश में रखकर फिर स्वय भी बान्धवगण के साथ भोजन करना चाहिये । व्रतधारी पुरुष को तेरह मासोपवाम ( मास भर के व्रत ) करने चाहिए ॥ १२॥ जब वर्ष पूर्ण हो जावे तो किसी वेदो के ज्ञाता विद्वान् ब्राह्मण को दक्षिणा के सहिन गो का दान देना चाहिये । इम समय में सविधि वारह ब्राह्मणों को भोजन करावे तथा यथा शक्ति दक्षिणा तथा भूपण ब्राह्मणो को देवे ।। १३ ॥ जो पुरुष तीन मास या प्रतोपवास करता है और इन्द्रियो पर पूर्ण विजय प्राप्त कर लेता
नारद पुराण ]
४१६
व्रती को नरमध यज्ञ का पांच गुना पुण्य फल प्राप्त हुआ करता है
॥१६॥ जो पुरुप नौ बार इस व्रत को कर लेता है उस पुरुष को
गोमेध यज्ञ का निगुणित फल प्राप्त हुआ करना है ।२०। हे महान् श्रेष्ठ
मुनिवर । इस पराक द्रत का जो मनुष्य दस वार कर लिया करता है
उम व्रतधारी पुरुप को ब्रह्ममेध यज्ञ का तिगुना पुण्य फ्ल मिला करता
है ।२१॥
एकादश पराकाश्च य कुर्यात्सयतेन्द्रिय ।
स याति हरिसारूप्य सर्वभोगसमन्वितम् ।।२२
प्रयोदश पराकाश्च य कृर्यात्प्रयतो नर ।
स याति परमानन्द यन गत्वा न शोचति ॥२३
मासोपवासनिरता गङ्गास्नानपरायणा ।
धर्ममार्गप्रवक्तारो मुक्ता एव न सशय ।।२४
अवीराभिश्च नारीभिर्यतिभिह्मचारिभि
मासोपवास कर्तव्यो वनस्थश्च विशेषत ॥२५
नारी वा पुरुपो वापि व्रतमेतत्सुदुलभम् ।
कृत्वा मोक्षमवाप्नोति योगिनामपि दुलभम् ॥२६
गृहस्थो वानप्रस्थो वा व्रती वा भिक्षुरेव वा।
मूखों वा पण्डितो वापि श्रुत्वतन्मोक्षभाग्भवेत् ॥२७
इद पुण्य व्रतारयान नारायणपरायण ।
शृणुयाद्वाचयेद्वापि सर्वपापै प्रमुच्यते ॥२८
जो कोई सुदृढ मनुष्य इद्रिय जित होकर ग्यारह पराक व्रत
वर लेता है वह मक्त सुखोपभोगा से परिपूण थी हरि के सारूप्य को
प्राप्त कर लिया करता है ।२२।
जा काई मनुष्य प्रयत्न पूर्वर तरह
पराक बता का सागापाङ्ग र लता है। इसकी प्राप्ति पर फिर
उमगो कभी भी शोब करन का अवसर ही नही प्राप्त हुआ करता है
॥ २३ ॥ जा मासोपवास करते हैं गङ्गा स्नान में जो परायण रहत है
४२० [ नारद पुराण और धर्म का प्रचार करते हैं वे युक्त ही होते है ।२१। पति-पुनादि से रहित नारी, सन्यासी, वानप्रस्थ और ब्रह्मचारी को यह व्रत ध्यानपूर्वक करना चाहिए ।२५। कोई स्त्री हो या पुरुष हो जो इस महान् दुर्लभ एवा कठिन व्रत को कर लेता है उसको वडे-बडे योगाभ्यासियो को भी अति दुर्लभ मोक्ष प्राप्त हो जाया करता है ॥२६॥ जो कोई गार्हस्थ्या- श्रमी हो चाहे वानप्रस्थ हो अथवा भिक्षु ( सन्यासी ) हो या ब्रह्मचारी हो, मूर्ख हो अथवा विद्वान् हो इस व्रत के इस विधान एक आख्यान को श्रवण करके ही मोक्ष की प्राप्ति कर लिया करता है ॥ २७ ।। जो भगवान् की भक्ति मे परायण पुरुष इस परम पविन व्रत के आख्यान का श्रवण करता है अथवा इसका पटग किया परता है वह समस्त प्रकार के महापापो से भी मुक्त होजाया करता है तथा उसको अन्त मे सद्गति हो जाती है ॥२८॥ गलवार ॥ एकादशी व्रत-भद्रशील उपाख्यान । इदमन्यत्प्रवक्ष्यामि व्रत त्रैलोक्यविथ तम् । सवपापप्रशमन सर्वकामफलप्रदम् ॥१ ब्राह्मणक्षत्रियविशा शूद्राणा चैव योपिताम् । मोक्षद कुर्वता मक्तया विष्णो प्रियतर द्विज ॥२ एकादशीयत नाम सर्वाभीष्टप्रद नृणाम् । पर्त्तव्य मर्वथा विप्र विष्णुप्रीतिर यत ॥३ एकादश्या न भुजीत पक्षयाएभयारपि । यो भुक्त सो-न पापीयान्परत नरक नेत् ॥४ उपयागपत लिप्णुजाचारमुतिगाण्यम् । पूर्वापरदिने रात्रावहींगम तु मध्यम ॥५ नारद पुराण ] ४२१ एकादशीदिने यस्तु भोक्त मिच्छति मानव । स भोक्तु सर्वपापानि स्पृहयालुन सशय ॥६ भवेदशम्यामेकाशी द्वादश्या च मुनीश्वर । एकादश्या निराहारो यदि मुक्तिमभीप्सति ॥७ थी सनकाचाय महर्षि ने कहा-हे नारद अब मैं आपके समश मे सम्पूर्ण पापो को शा त रा वाले और सभी मनोकामनाओ को पूर्ण एव सफल करने वाले तथा त्रिनोको मे परम प्रसिद्ध एक अन्य महा व्रत का वणन करता हूँ ॥१५॥ यह महा व्रत भगवान् विष्णु को परम प्रिय है । स्त्री हो या पुरुष ब्राह्मण हो या क्षत्रिय वैश्य और शूद भी इस व्रत का बडी भारी निष्ठा एव भक्ति के साथ दिया करता है उसको यह व्रत मोक्ष दे दिया करता है ॥२।। यह व्रत मानवा की मन की कामनाओ को पूण कर दिया करता है। इस व्रत का नाम एकादशी व्रत है । इस व्रत को सब प्रकार स प्रयत्न पूवर अवश्य ही करना चाहिये क्योकि यह व्रत भगवान विष्णु को अधिय प्रसन्न करने वाला बताया गया है ॥३॥ मास में दो पक्षा म एकादशी तिथि आया करती है । इस दिन भोजन बिल्कुल नहीं करना चाहिए। जो एकादशी के दिन भाजन किया करता है वह महा पापी कहा जाया परता है। परतोक म उसे घोर नरक की यातना सहनी पड़ती है।४। इस उपवास के पूण फल की इच्छा रखने वाले व्यक्ति का चार समय से भोजन का त्याग करना पडता है । दशमी तिथि को रात्रि का भोजन, एकादशी म दोनो ममया या भोजन और द्वादशी तिथि को रात्रि के समय का भोजन त्याग देना चाहिए ।।५॥ जो मनुष्य एका दशी तिथि र दिन भोजन करने की इच्छा किया परना है उसको माना मी पापा ये युफ्ला यो भागने का पाव है ॥६॥ हे मुनिवर । यदि मुक्ति प्राप्त करने की इच्छा हा तो दशमी और द्वादशी पो ४२२ [ नारद पुराण एक २ बार ही भोजन करे और एकादशी को निराहार रहना चाहिये ॥७॥ यानि कानि च पापानि ब्रह्महत्यादिकानि च । अन्नमाश्रित्य तिष्ठन्ति तानि विप्र हरेदिने 15 ब्रह्महत्यादिपापाना कथचिन्लिष्कृतिर्भवेत् । एकादश्या तु यो भुक्त तस्य नवास्ति निष्कृति ॥६ महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकै । एकादश्या निराहार स्थित्वा याति परा गतिम् ॥१० एकादशी महापुण्या विष्णो प्रियतमा तिथि । ससेव्या सर्वथा विप्रै ससारच्छेदलिप्सुभि ।।११ दशम्या प्रातरुत्थाय दन्तधावनपूर्वकम् । स्नापयेद्विधिवद्विष्णु पूजयेत्प्रयतेन्द्रिय ॥१२ एकादश्या निराहारो निगृहीतेन्द्रियो भवेत् । शयीत सन्निधौ विष्णोर्नारायणपरायण ॥१३ एकादश्या तथा स्नात्वा सम्पूज्य च जनार्दनम् । गन्धपुष्पादिभि सम्यक् ततस्त्वेवमुदारयत् ॥१४ हे विप्रवर | श्री हरि के दिन मे ग्रह्म हत्या प्रति सम्पूर्ण पाप अन्न का समाश्रय लेपर रहा करत हैं 10॥ ब्रह्महत्या आदि महापातको स तो उपाय करने पर किसी प्रकार से छुटकारा प्राप्त हो भी सकताई किन्तु एकादशी के दिन अन्न का भोजन करने वाले को पापा से छुटकारा पाने का बाई भी प्रायश्चित्त नहीं होता है। चाहे कोई तिन हो महा पातर करन वाला हो उसमें सभी पातय एकादशी का निराहार प्रत करन से नए हाजाया करत है और यह प्रत कर परमगति को प्राप्त होजाया करता ॥१०॥ यह एकादशी भगवान की परम रिय महा पुण्पमयो तिथि है मत जो सांसारिक बन्धन पाटना चाहत है उनमो इस तिथि के दिन अवश्य हो या 4 ४२३ नारद पुराण ] पूजन कर फिर करना चाहिए ॥११॥ दशमी के दिन प्रात काल उठकर दातुन करे और सब इन्द्रियो को अपने वश में करके भगवान् विष्णु को स्नान फरवावे तथा स्वय प्रथम स्नान करके फिर भगवान् का पोडशोपचार विधि मे पूजन करना चाहिए ।।१२।। एकादशी के दिन निराहार रह कर इन्द्रियजित रहे और भगवान के चरणो में दृढ भक्ति रखता हुआ नारायण की प्रतिमा के समीप मे ही शयन करना चाहिए ।। १३ ॥ एकादशी तिथि के दिन स्वय स्नान कर परम शुचि होकर जनार्दन भगवान का गन्ध पुष्पादि से भक्ति की भावना भगवान् से निम्न रीति से प्रार्थना करनी चाहिए ।।१४।। एकादश्या निगहार स्थित्वाद्याह परेऽहनि । मोक्ष्यामि पुण्डरीकाक्ष शरण मे भवाच्युत ॥१५ इम मन्त्र समुच्चार्य देवदेवस्य चक्रिण । भक्तिभावेन तुष्टात्मा उपवास समर्पयेत् ॥१६ देवस्य पुरत कुर्याज्जागर नियतो व्रती। गीतेर्वाद्यश्च नृत्यैश्च पुराणश्रवणादिभि ॥१४ तत प्रात समुत्त्याय द्वादशीदिवसे व्रती। स्नात्वा च विधिवद्विष्णु पूजयेत्प्रयतेन्द्रिय ॥१८ पञ्चामृतेन सस्नाप्य एकादश्या जनार्दनम् । द्वादश्या पयसा विप्र हरिसारूप्यमश्नुते ॥१६ अज्ञानतिमिरान्धस्य व्रतेनानेन केशव । प्रसीद सुमुखो भूत्वा ज्ञानदृष्टिप्रदो भव ॥२० एव विज्ञाप्य विजेन्द्र माधव सुसमाहित । ब्राह्मणान्भोजयेच्छक्तया दद्याद्वै दक्षिणा तथा ॥२१ "एकादश्या निराहार स्थित्वाद्याह परहनि । मोक्ष्यामि पुण्ड- रोकाक्ष शरण मे भवाच्युत' अर्थात् हे पुण्डरीकाक्ष ! मैं एकादशी के दिन निराहार रह कर फिर दूसरे दिन भोजन करू गा । हे अच्युत ! .
[ नारद पुराण दुग्ध से स्नान आप मुझे अपनी शरण में लीजिये अर्थात् आप मुझे इस व्रत को पूर्ण करने की शक्ति प्रदान कीजिये ॥१५॥ इस मन्त्र का उच्चारण कर अपने हृदय मे प्रसन्न होता हुआ चक्रधारी भगवान देवदेवेश्वर की सेवा मे भक्ति के साथ अपने उपवास को समर्पित कर देवे ॥१६॥(बत- धारी पुरुष का कर्तव्य है कि अपनी इन्द्रियो को वश मे रख कर भगवान के समक्ष मे गायन,वाद्य और नृत्य करते हुए पुराण श्रवण करके रात्रि में जागरण करना चाहिये ।।१७।०वती पुरुप को द्वादशी के दिन प्रातःकाल मे उठ कर स्नान करे और इन्द्रियों पर नियन्त्रण करते विधि पूर्वक विष्णु का पूजन करे ।।१८।। एकादशी में जनार्दन भगवान् को पञ्चामृत से स्नान करावे और द्वादशी में करावे। इस तरह करने से मनुष्य को सारूप्या मुक्ति प्राप्त हुआ धरती है ॥ १६ ॥ इसके अनन्तर भगवान से प्रार्थना करें-"अज्ञान तिमिरान्धस्य व्रतेन नेन केशव । प्रमीद सुमुखो भूत्वा ज्ञान दृष्टि प्रदो- भव" अर्थात हे केशव ! मैं अज्ञान के अन्धकार होने के कारण अन्धा हो रहा हूँ। मेरे इस व्रत के समाचरण से आप प्रसन्न मुख होकर कृपया मुझको ज्ञान की दृष्टि प्रदान कीजिए ॥२०॥ हे विप्रप्रवर ! इस रीति से बहुत ही सावधानता के साथ माधव भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए । इसके अनन्तर अपनी श्रद्धा एव शक्ति के अनुसार ब्राह्मणो को भोजन करावे और पुष्कल दक्षिणा समर्पित करे ॥२१ ततः स्ववन्धुभि. साई नारायणपरायणः । कृतपञ्चमहायज्ञ. स्वय भुञ्जीत वाग्यतः ।।२२ एवं यः प्रयत. कुर्यात्पुण्यमेकादशीव्रतम् । म याति विष्णुभवन पुनरावृत्तिदुर्लभम् ॥२३ उपवासव्रतपरो धर्मकार्यपरायणः । चाण्डालान्पतिताश्चंव नेक्षेदपि कदाचन ॥२४ नास्तिकान्भिन्नमर्यादान्निन्दकान्पिशुनारतथा।
४२५ नारद पुराण ] उपवासव्रतपरो नालपेच्च कदाचन ॥२५ वृपलीसूतिपोष्टार वृपलीपतिमेव च । अयाज्ययाजक चैव नालपेत्सर्वदा व्रती ॥२६ कुण्डाशिनं गायक च तथा देवलकाशिनम् । भिपज काव्यकार देवद्विजविरोधिनम् ॥२७ परान्नलोलुप चैव परस्त्रीनिरत तथा । व्रतोपवासनिरतो वाङ्गात्रेणापि नार्चयेत् ॥२८ इसके उपरान्त भगवान नारायण के ध्यान में तत्परता रख कर पञ्च यज्ञ करे तथा इसके पश्चात अपने वन्धु-बांधवो के साथ वंठ कर स्वय भी भोजन करना चाहिए ॥२२।। इस विधि से जो लोग सावधानी के साथ इस परम पवित्र एकादशी के महा व्रत को किया करते हैं वे सीधे विष्णु लोक को गमन किया करते हैं जहाँ से पुन. लौट कर वापिस भूलोक मे नही आते हैं ।।२३॥ इस उपवास के परम धार्मिक कृत्य मे सलग्न रहने वाले व्रतधारी पुरुष को चाहिए कि उसे चाडालो तथा पतितो को भी देखना नहीं चाहिए ॥ २४ ॥ उपवास करने वाले पुरुप को नास्तिको से, मर्यादा के भङ्ग करने वालो से, धर्म की निन्दा करने वालो से और जो चुगली किया करते हैं उन लोगो से कभी बात भी नहीं करनी चाहिए ॥२५॥ व्रती पुरप को शूद्रा दाई के पति और वृपली पति यज्ञ न कराने के योग्य पात्र को यज्ञ कराने वाले पुरुप से भी बाते नहीं करनी चाहिये ॥२६।। जो पति के जीवित रहने पर भी अन्य जार से समुत्पन्न पुत्र के घर मे भोजन किया करता है । गायन करने वाले भार, जो केवल द्रव्य के लिये ही देव पूजा करता है उसके जो अन्न का सेवन करने वाला है, दया भाव से न करके केवल धन की कमाई के लिए वैद्य वृत्ति करता है, जो भाटो की वृत्ति दिया करना है और जो देव और वित्रो से विरोध किया करता है, जिसका पराया अन्न पाने के लिये
४२६
[ नारद पुराण
लार टपका करती है और जो दूसरे की स्त्री से व्यभिचार करता है,
इन सबके स थ उपवास करने वाले ब्रधारी पुरुष को वाणी मात्र से
भी सत्कार नहीं करना चाहिए ।।२७।२८।।
इत्येवमादिभि शुद्धो वशी सर्व हिते रत ।
उपवासपरो भूत्वा प ा सिद्धिमवाप्नुयात् ॥२६
नास्ति गङ्गासम तीर्थ नास्ति मातृसमो गुरु ।
नास्ति विष्णुसम दैव तपो नानशनात्परम् ॥३०
नास्ति क्षमासमा माता नास्ति कीर्तिसम धनम् ।
नास्ति ज्ञानसमो लाभो न च धर्भसम पिता ॥३१
न विवेकसमो वन्धु कादश्या पर व्रतम् ।
आआत्युदाहरतीममितिहास पुरातनम् ॥३२
सवाद भद्रशीलस्य तरिपतुर्गालवस्य च ।
(पुरा हि गालवो नाम मुनि सत्यपरायण ॥३३
उवास नर्मदातीरे शान्तो दान्तस्तपोनिधि ।
वहुवृक्षसमाकीर्णे गजभल्लुनिपेविते ॥३४
सिद्धचारणगन्धर्वयक्षविद्याधरान्विते ।
कन्दमूलफलै पूर्णे मुनिवृन्दनिषेविते ॥३५
गालवो नाम विप्रेन्द्रो निवासनकरोच्चिरम् ।
तस्याभवद्भद्रशील इति ख्यात सुतो वशी ॥३६
इस विधि से परम शुद्ध होकर तथा इन्द्रियो को अपने वश में
रखकर सब प्राणियो के हित मे तत्पर रहने वाला पुरुष एकादशी का
उपवास करके परमोतम सिद्धि का भोग क्रिया करता है ।। २६ ॥
गङ्गा के समान तीथ, माता के समान गुम, विष्णु भगवान के समान
देवता और अनशन अर्यात उपवास के ममान तप कोई भी नहीं
हाता है ॥३०॥ माता व समान क्षमाशील अन्य पाई भी क्षमा करन
वाला नही होता है, कीत्ति के तुल्य इस जगत म अन्य कोई भी धन
४२८ [ नारद पुराण सर्वेपा जगतां स्वस्ति भूयादित्यव्रया दिदम् ॥४१ कीडाकाले मुहूर्त वा मुहूर्तार्द्ध मथापि वा। एकादशीति सकल्य व्रतं यच्छति केशवे ॥४२ इस भद्रशील पुत्र को अपने पूर्व जन्म का हाल सब स्मरण था और महान भाग्य वाला वालक अहर्निश भगवान नारायण के ध्यान में ही तत्पर रहा करता था । महान मनि वाला भद्रशील वालक अपनी शशवावस्था मे ही बालोचित बीटा के समय में भी मिट्टी की विष्णु की प्रतिमा का निर्माण कर उसका पूजन किया करता था और अपने समस्त साथियो से भी यही कहा करता था कि मानवो को भगवान् विष्णु देवेश्वर की पूजा सर्वदा और अवश्य ही करनी चाहिये ।३७।३८। हे मुनिवर ! यह एकादशी का महान व्रत पण्डितो को भी अवश्य करना चाहिए । इस प्रकार से महत्व समझा २ कर छोटे २ बच्चो में भी ज्ञान का प्रमार कर दिया था ॥३६॥ इसका प्रभाव यह हुआ कि वे बालक भी विष्णु-भक्ति मे मग्न होकर पृथक् २ करके या सब मिलकर मिट्टी की प्रतिमा बना कर सानन्द उसका अर्चन करने लगे थे ॥४०॥ भद्रमति सर्वत्र व्यापक भगवान विष्णु का स्तवन करके कहा करता था । सर्व जगत का कल्याण हो ॥४१।। वह बालक अपने खेल के समय में ही एक या आधे मुहर्त के लिए एकादशी व्रत का सकल्प करके फिर भगवान के अर्पण करने का कर्म भी किया करता था ॥४२॥ एव सुचरित दृष्ट्वा तनय गालवो मुनिः । अपृच्छद्विरययाविष्ट समालिंग्य तपोनिधि. ॥४३ भद्रशील महाभाग भद्रशीलोऽसि सुव्रत । चरित मगल यत्ते योगिनामपि दुर्लभम् ।।४४ हरिपूजापरो नित्य सर्वभूतहिते रत । एकादशीव्रतपरो निषिद्धाचारवजित.।
४२६ नारद पुराण ] निर्द्वन्द्वो निर्मम शातो हरिध्यानपरायण ॥४५ एवमेतादृशी बुद्धि कथ जाताकस्य ते । विनापि महता सेवा हरिभक्तिहि दुर्लभा ॥४६ स्वभावतो जनस्यास्यह्यविद्यावामकर्मसु । प्रवर्तते मतिर्वत्स कथ तेऽलौकिकी कृति ॥४७ सत्सङ्गोऽपि मनुष्याणा पूर्वपुण्यातिरेकत । जायते भगवद्भक्तिस्तदह विस्मय गत ॥४८ पृच्छामि प्रीतिमापन्नस्तद्भवा-वक्त मर्हति । भद्रशीलो मुनिश्रेष्ठ पिनैव सुविकल्पिते ॥४६ जातिस्मर सुकृतात्मा हृष्टप्रहसितानन । स्वानुभूत यथावृत्त सर्व पिने न्यवेदयत् ॥५० तपोमूत्ति महपि गालव भी अपने छाटे से पुन के इस तरह के सुन्दर एव सत् चरित्र को देख कर परम विस्मित होकर उसका प्रेमा- लिङ्गन कर उससे पूछने लगे थे ।।४३।। श्री गालब महर्षि ने कहा-- हे सुव्रत महाभाग भद्रशील । तुझ जैसा अतिशय माङ्गलिक चरित्र योगिराजो मे भी प्राप्त होना अति कठिन है।।४४॥ हम देखते हैं कि तू सर्वदा समस्त प्राणियो के हित मे सलग्न रहकर भगवान् विष्णु की पूजा करता है और एकादशी का व्रत क्यिा करता है तथा कभी भी कोई निपिद्ध आचरण नही करता है । सासारिक ममता तथा द्वन्द्वा के वन्धन से अलग रहता हुआ परम शान्त भाव से भगवान का ध्यान किया करता है ॥४५॥ छाटे बालक की अवस्था म हो तुझे ऐसी पारमार्थिक वृद्धि कहा स कैस उत्पन्न हो गई है ? बडा की सेवा विना श्री हरि की भक्ति अत्यन्त दुलभ हुआ करती है ॥४६॥ साधारणतया ससार प मनुष्या की बुद्धि तो स्वाभाविक रूप से अविद्या के कर्मों मे लगी रहा करती है विन्तु हम देखते हैं कि तेरी बुद्धि सदा सन्माग की ओर ही जाया करती है-वह एक बहुत ही बडी अलौकिक वात [ नारद पुराण ही है ॥४७॥ सत्पुरपो का सग होने पर भी देखा जाता है कि पूर्व पुण्यो की अधिकता होने पर ही मानवो वे हृदय में भगवद्भक्ति आ कर निवास किया करती है अतएव मुझे आश्चर्य होरहा है 11४11 में अधिक प्रसन्न होकर ही तुझसे सय भेद की वात जानना चाहता हूँ । वेटा, तू मुझको यह सम्पूर्ण रहस्य खोलकर स्पष्ट बतला दे। मुनिश्रेय भद्रशील को तो अपने पूर्व जन्म का स्मरण बना ही था। अत अपने पिता की ये बाते सुन कर मुस्कराते हुये वह पुण्यात्मा अपना अनुभव किया हुआ सम्पूर्ण वृत्त कहने लगा था ॥४६॥५०॥ शृणु तात मुनिश्रेष्ठ ह्यनुभूत मया पुरा। जातिस्मरत्वाज्जानामि यमेन परिभाषितम् ॥५१ एतच्छ्रुत्वा महाभागो गालको विस्मयान्वित । उवाच प्रीतिमापन्नो भद्रशील महामतिम् ॥५२ करत्व पूर्व महाभाग किमुक्त च यमेन ते कस्य वा केन वा हेतोस्तत्सर्व वक्त मर्हसि ॥५३ अहमास पुरा तात राजा सोमकुलोद्भव । धर्मकीतिरिति ख्यातो दत्तादयेणशासित ॥५४ नववर्षसहस्राणि मही कृत्स्नामपालयम् । अधर्माश्च तथा धर्मा मया तु वहब कृना ॥५५ तत श्रिया प्रमत्तोऽह वह्वधर्ममकारिषम् । पापण्ड जनससर्गात्पापण्डचरितोऽभवम् ॥५६ भद्रशील ने कहा-हे पिताजी, हे मुनिश्रेष्ठ । मैंने जो भी कुछ अनुभव किया है वह मेरे पूर्व जन्म म यमराज के दिये हुये भाषण का ज्ञान पहिले जन्म की स्मृति बने रहने के कारण खुव अच्छी तरह याद है आप सुनिए ।५१। महाभाग महर्षि गालव यह बात सुनकर अत्य धिक विस्मित हो गये थे। परम प्रसन्न होकर महामति भद्रशील से कहने लगे थ ॥५२॥ थ गालव मुनि ने कहा-हे महाभ ग | तू पहिले ।
नारद पुराण ] जन्म मे कौन था ? यमराज ने तुझसे क्या कहा था और किस कारण से कहा था ? तू पहिले किसका शिष्य था—ये सभी हमको सुनाओ ॥५३॥ भद्रशील ने उत्तर दिया कि हे तात | मैं अपने पूर्व जन्म मे धर्मकीति नामक सोमवश मे समुत्पन एक राजा था और महा महर्षि श्री दत्तात्रेयजी मुझे उस जन्म मे उपदेश दिया करते थे ॥५४।। उस जन्म में मैंने इस सम्पूर्ण भूमण्डल का परिपालन नौ सहस्र वर्ष तक क्यिा था। उस इतने लम्बे समय मे मुझसे बहुत से धर्म अधर्म वन गये थे ॥५५॥ मैं उस समय मैं अपने अतुल ऐश्वर्य के मद में मत्त होकर नाना प्रकार के अधर्म कर्म करने पर उत रू हो गया था । बहुत से पाखण्डी मनुष्यो के सङ्ग-समर्क से मेरा चरित्र भी महान् पाखण्ड पूर्ण हो गया था ॥५६॥ पुराजितानि पुण्यानि मया तु सुवहून्यपि । पापण्डैर्वाधितोऽह तु वेदमार्ग समत्यजम् ॥५७ मखाश्च सर्वे विध्वस्ता कूटयुक्तिविदा मया। अधर्मनिरत मा तु दृष्ट्वा मद्देशजा प्रजा ।।५८ सदैव दुष्कृत चक्र पटाशस्तत्र मेऽभवत् । एव पापसमाचारो व्यसनाभिरत सदा ॥५६ मृगयाभिरतो भूत्वा ह्य कदा प्राविश वनम् । ससन्योऽह वने तत्र हत्वा वहुविधान्मृगान् ॥६० क्षुत्तट्परिवृत श्रातो रेवातीरमुपागमम् । रवितीक्ष्णातपक्लातो रेवाया स्नानमाचरम् ॥६१ अदृष्टसैन्य एकाकी पीडवमान क्षुधा भृशम् ॥६२ समेतास्तत्र ये केचिदेवानीरनिवासिन । एकादशीव्रतपरा मया दृष्टा निशामुखे ॥६३ इपके पूर्व पहिले मैन बहुत सा पुण्य का सञ्चय किया था किन्तु फिर मैंने पाखडी पुरुषो की सङ्गति म पडकर उनके द्वारा ४३२ [ नारद पुराण वाधायें उपस्थित करने के कारण वेद मार्ग का सर्वथा परित्याग ही कर दिया था ॥५७॥ मैं बहुत सी कूटयुक्तियो का ज्ञाता था अतएव सभी प्रकार के यज्ञादि उत्तम कमों मा त्याग कर दिया था। मेरी प्रजा ने जब मुझे अधर्म परायण देखा था तो वह भी सर्वदा अधर्म मे ही निरत हो गयो थी और उसका छटवो भाग मुा पर भी शास्त्र कथन के अनुसार पडने लग गया था । इस रीति से पाप कर्मों में डूबा हुआ मैं बहुत से दुष्कर्मों म रति रखने लग गया था । एक समय में मैं अपन सैनिको के साथ मृगया करता हुआ एक परम गहन वन मे प्रविष्ट हो गया था और बहुत से मृगो की शिकार की थी ॥५८-६०॥ इसके पश्चात महान बुभुक्षित एव तृसित होकर मैं थका हुआ रेवा नदी के तीर पर पहुँच गया था। उस समय में सूर्य के परम तीक्ष्ण आतप के ताप मे सतप्त हुए मैंने रेगा नदी म अवगाहन किया था ।।६१।। उस समय मैं बिल्कुल एकाकी ही था। मरी सेना भी मुझे कही दिखाई नहीं दे रही थी। मैं क्षुधा से अत्यधिक वेचैन होकर तडफडा रहा था ।। ६२ । मन्ध्या के समय में मैंने वहाँ एकादशी का व्रत करने वाले, रेवा नदी के तीर पर निवास करने वाले लोगो को एक नित हुए देखा था ।।६३॥ निराहारश्च तत्राहगेकाकी तज्जन सह । जागर कृतवाश्चापि सेनया रहितो निशि ॥६४ अध्वश्रमपरिश्रात क्षुत्पिपासाप्रपीडित । तत्रैव जागरान्तेऽह तात पचत्वमागत ॥६५ ततो यमभटबंद्धो महादष्ट्राभयकरै । दष्ट्राकरालवदनमपश्य समवर्तिनम् ॥६६ अथ कालश्चित्रगुप्तमाहूयेदमभापत । अस्य शिक्षाविधान च यथावद्वद पण्डित ॥६७ एवमुक्तश्चित्रगुप्तो धर्मराजेन सत्तम ।
नारद पुराण ] चिर विचारयामास पुनश्चेदमभापत ॥६८ अनी पापरतः सत्यं तथापि शृणु धर्मप । एकादश्या निराहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥६६ एप रेवातटे रम्ये निराहारो हरेदिने । जागरं चोपवासं च कृत्वा निप्पापता गतः ।।७० उस समय में मेरे समीप में सैनिक लोग तो थे ही नही अत- एव मैंने भी उन लोगो के साथ वहां पर अकेला रह जाने के कारण विवश होकर रात्रि जागरण क्यिा था ॥६४।। मैं उस समय मे दिन भर इधर उधर वन में भटकते रहने के कारण अधिक थान्त हो गया था और भूख-प्यास से भी अधिक पीडित था । अतएव हे तात । मैं उस रात्रि जागरण के समाप्त होते ही वहीं पर मर गया था ।।६।। उस समय में महान भीपण लम्बी २ दाढो वाले यमराज के दूतो ने आकर मुझे पाशो में बद्ध कर लिया था और अत्यन्त पीडा देने वाले मार्ग मे होकर मुझे ले गये थे और यमराज के समीप मे पहुंचा दिया था। वहाँ पर मैंने भयङ्कर मुखाकृति वाले परम विकराल यमराज को देखा था ।।६६।। उस समय मे उस काल पुरुष ने तुरन्त चित्रगुप्त को उससे पूछा था-हे पण्डित । वतलाओ, इस दुष्ट को क्या शिक्षा देनी चाहिए ॥६७।। हे तात । धर्मराज के इस तरह से पूछने पर वह चित्रगुप्त बहुत समय तक विचारो मे निमग्न होकर उनसे कहने लगे थे ।।६८॥ हे धर्मराज । निस्सन्देह यद्यपि यह प्राणी पहले बहुत ही अधिक पापो मे निरत रहता था नो भी यह घटना हुई कि जो भी कोई कसा भी क्यों न हो एकादशी के दिन निराहार रहता है वह सभी पापो से छूट जाया करता है ॥६६। यह भी उस हरि के दिन में परम रमणीय एव महान पावन रेवा के तट पर निराहार व्रत और रात्रि जागरण करके अव तो विल्कुल निप्पाप होगया है ॥७० यानि कानि च पापानि कृतानि सुबहूनि च । चुलाकर
४३४
[नारद पुराण
तानि सर्वाणि मष्टानि ह्य पवासप्रभावतः ॥७१
एवमुक्तो धर्मराजपिचत्रगुप्तेन धीमता ।
ननाम दडवभूमौ ममाग्रे सोऽनुकपित. ।।७२
पूजयामास मा तत्र भक्तिभावेन धर्मराट् ।
ततश्च स्वभटान्सर्वानाहूयेदमुवाच ह ॥७३
शृणुध्व मदचो दूता हित वक्ष्याम्यनुत्तमम् ।
धर्ममागरत्तान्मान्मानयध्व ममान्तिकम् ।।७४
ये विष्णुपूजनरताः प्रयत।
कृतज्ञापचैकादशीव्रतपरा।
नारायणाच्युत हरे शरणभवेति
शातावदन्ति सतत तरसात्यजध्वम् ।।७५
नारायणाच्युत्त जनार्दन कृष्ण विष्णो
पद्मश. पद्मपित. शिव शकरेति ।
नित्य वदत्यखिललोकहिताः प्रशान्ता
दूराद्भटास्त्यजत तान्तु ममैप शिक्षा ॥७६
नारायणापितकृतान्हरिभक्तिभाज.
स्वाचारमार्गनिरतान् गुरुसेवकाश्च ।
सत्पात्रदाननिरताश्च सुदीनपाला-
न्दूतास्त्यजध्वमनिश हरिनामसक्तान् ।।७७
इसने अपने पूरे जीवन काल मे जो भी महान घोरतम पाप
किये थे वे सभी एक साथ एकादशी के प्रवल प्रभाव से नष्ट होगये हैं
और यह अब पूर्णतया विशुद्धारमा हो गया है ॥७१।। महान मति-
मान चित्रगुप्त के द्वारा ऐसा क्थन किय जाने पर धर्मराज ने परम
अनुकम्पित होकर भूमि में मेरे ममक्ष पात करके गुझे दण्डवत्प्रणाम
किया था ।।७२।। दमरे पश्चात् बहुत ही अधिक भक्ति की भावना से
धर्मराज ने मेरा सत्कार किया था और फिर उसने अपने दूतो को
४३५ नारद पुराण ] 1 बुलाकर यह आदेश दिया था कि हे दूतो 1 अब तुम लोग अपने कान खोल कर भली भांति मेरे हितप्रद वचनो का श्रवण कर लो। जो प्राणी किसी भी धर्म के मार्ग में चल रहे हो उनको कभी भूल कर भी मेरे पास मत लाया करो ॥७३॥७४।। जो भगवान् विष्णु दवेश्वर की अर्चना में निरत रहा करते हो-जो सयम का पूर्ण पालन करते हो- जो किये हुए उपकार को मानते हो-जो एकादशी का व्रत किया करते हो-जो इन्द्रियो को अपने वश में रखते हो-जो परम शान्त भाव से अपने मुख से ऐसा कहा करते हा-“हे नारायण 1 हे हरे । हे अच्युत मुझे शरण प्रदान कीजिए" तुम्हारा यह उस ममय पर आवश्यक कर्तव्य होना चाहिए कि एसे प्राणियो को तुरन्त ही छोड दो॥७५॥ अरे दूतो । मैं तुमको तुम्हारे ही कल्याण के लिये यह शिक्षा देता हूँ कि जो भी कोई प्राणो सबका हित चाहते हुए परम शान्त भाव स एवान होकर हे नारायण । हे जनार्दन । हे अच्युत । हे विष्णो । हे पद्मा के ईश । हे ब्रह्मा के जनक ! हे शिव । हे शङ्कर । इस तरह मे नित्य ही अपने मुख से उच्चारण क्यिा करत हो उनस तुमको बहुत दूर से बचकर रहना चाहिये ।। ७६ ॥ अरे दूतो 1 आप अच्छी तरह समझ लो जिन प्राणियो ने अपने आपको भगवान् नारायण के चरणो मे समर्पित कर दिया हो, जो विष्णु भक्ति में रत हा, जा सदा सदाचरण का पालन क्यिा करते हो, जो अपन पूजनीय वडा का मवा सत्कार किया करत हो, जो सत्पान पुरुपो को सर्वदा दान दिया करत हो, जो दीन दुखियो का परिपालन किया करते हो अथवा श्रीहरि नाम में ही परायण किया करत हो उनका तुम लोग सदा ही छोड दिया करो ।।७॥ पापडमगरहितान्द्विजभक्तिनिष्ठान्म- स्मगलोलुपरताश्च तथातिथेयान् । रामो हरौ च समबुद्धिमतस्तथैव दूतास्त्य- जध्वमुपवारपराजनानाम् ।।
[ नारद पुराण
ये वर्जिता हरिकथामृतसेवनैश्च
नारायाणस्मृतिपरायणमानसश्च ।
विद्रपादजलसेचनतोऽप्रहृष्टास्ता-
न्पापिनो मम भटा गृहमानयध्वम् ॥७६
ये मातृतातपरिभर्सनशीलिनच
लोकद्विषो हितजनाहितकर्मणश्च ।
देवस्वलोभनिरताजनाशर्तृ नतानयध्वमपराधपराश्च दूता ॥६०
एकादशीव्रतपराड मुखग्रशील लोकापवादनिरत परनिंदक च ।
ग्रामस्यना शकरमुत्तमवरयुक्त
दूता समानयत विप्रधनेषु लुब्धम् ।।८१
ये विष्शुभक्तिविमुखा प्रणमन्ति नैव
नारायण हि शरणागतपालक च ।
विष्ण्वालय च नहि याति नरा सुमूर्खा-
स्तानानयध्वमतिपापरतान्नसह्य ॥२
एव श्रु त यदा तर यमेन परिभाषितम् ।
मयानुतापदग्धेन स्मृत तत्वम निदितम् ॥८३
असत्वानुतापेन सद्धर्मथवगेन च ।
तनैव सर्वपापानि निशेषाणि गतानि मे ॥४
मनुष्य पाखण्डियो वी सङ्गति से दूर रहा करते हो, जो
विप्रो के परम भक्त हो, जो सत्मङ्ग के लिए पद लोलुप रहने वालो मे
हादिक प्रेम करते हो, जो सदा अतिथियों का सत्कार किया करते हो,
जो भगवान विष्णु और शिव मे अभेद्य बुद्धि रखते हो अथवा जो
सवदा मानवा वे उपकार करन में उद्यत रहत हो एम जीवो स तुमया
बहुत दूर बधार ही रहना चाहिए ॥७८।। यमराज ने पिर यह कहा-
है दत्तो । जो कभी भी श्री हरि की पथा रूपा अमृत का पान न किया
करते हो, जो भगवान नारायण की स्मृति में अपने पित्त को गगान
नारद पुराण ] वालो से मदा दूर तथा बचकर रहा करते हो, ब्राह्मणो मे अपने चरण धुलवाकर प्रसन्न हुआ करते हो तथा विप्रो के चरणो को धोने से जिनको अप्रसन्नता होती हो, उन महा पापात्मा लागो को ही तुम पकड कर मेरी सभा में उपस्थित किया करो ॥७६ जिनका स्वभाव ही ऐसा बन गया हो जो सदा अपने माता-पिता का तिरस्कार ही किया करें, जो हितैपी लोगो का अहित कर्म किया करते हो, जो देव धन मे भी लोम रखते हो, जो दुरी २ बाते बताकर भोले-भाले लोगो को विगाडते रहा करते हो, ऐसे महान् अपराध करने वालो को तुम लोग वग्वण बद्ध करके मेरे सामने उपस्थित किया करो ।। ८० ॥ जो मनुष्य एकादशो के व्रत मे हटता हो, जो सदा ही मनुष्यो की निन्दा किया करते हो, जो बुरे कर्मों में ही सदा रति रखते हो, जो ग्राम को उजाडता हो, जो सबके साथ कठोर व्यवहार किया करते हो, जो सज्जनो से दुश्मनी रखा करते हो, ब्राह्मणो के धन पर लालच क्यिा करते हो उन महापापियो को तुम्हारा कर्तव्य है कि हठात् घसीट कर मेरे पास लाया करो ।।८१॥ जो विष्णु भक्ति से विमुख हो, जो सदा शरणागतो के पालय नारायण प्रभु को प्रणाम न किया करते हो और कभी भी विष्णु मन्दिर में न झाँक्त हो,ऐसे पाप परायण पुरुपो को जबर्दस्ती पकड कर मेरी सभा मे ले आया करो ॥२॥ उस समय में जब मैंने यमराज का इस प्रकार का विस्तृत भाषण सुना तो मैंने अपने महान निन्दित दून कर्मों का स्मरण किया और बडा भारी मुझको पश्चाताप हुआ था ।।८३॥ अपने किये हुय पाप कर्मों IT पश्चाताप करने से और सद्धर्मों का श्रवण करने से मेरे समस्त राप यही पर विनष्ट हो गये थे ।।८४|| पापशेषाद्विनिमुक्त हरिसारूप्यता गतम् । सहस्रमूर्यसकाम प्रणनाम यमश्च तम् ॥८५ एव दृष्ट्वा विस्मितास्ते यमदूता भयोत्कटाः । विश्वास परम चक्र यमेन परिभाषिते ॥८६
[ नारद पुराण
तत सपूज्य मा काली विमानशतस कुलम् ।
सद्य सप्रेषयामास तद्विष्णो परम पदम् ॥८७
विमानकोटिभि सार्द्ध सर्वभोगसमन्वितै ।
कर्मणा तेन विप्र विष्णुलोके मयोपितम् ॥८८
कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ।
स्थित्वा विष्णुपद पश्वादिंद्रलोकमुपागमम् ।।
तत्रापि सर्वभागाडच सर्वदेवनमस्कृत।
ताव-काल दिवि स्थित्वा ततो भूमिमुपागत ॥६०
अत्रापि विष्णुभक्ताना जातोऽह भवता कुले।
जातिस्मरत्वाज्जानामि सर्वमेतन्मुनीश्वर ।।६१
उप्ती समय में समस्त पापो से विमुक्त हुए श्री हरि के समान
स्वरूप पाले और सहस्र सूर्यो के समान तेजस्वी मुझको यमराज ने
स्वध प्रणाम किया था ||८५) उस समय में यमदूतो ने भी विस्मय
ओर भय के साथ यमराज के भापण पर विश्वास किया था ।। ६६ ।।
उसी समय में यमराज ने मेरा सत्कार करके सैकडो विमानो से
भरे हुये भगवान विष्णु के परम पद मे मुझको भेज दिया था ।। ८७ ।।
हे तात । वहाँ पर सभी प्रकार के भोगा से परिपूर्ण करोडो किमानी के
मध्य मे में विष्णु लोक मै रहा था। यह सब कुछ उसी कर्म का
प्रभाव पा ||८|| मैं पारह अरव क्ल्पो तक निवास कर फिर इन्द्र
लोक में गया था । वहां पर भी समस्त देवगणों के द्वारा वन्नमाम हो
कर सभी तरह के मुखोपभोग का आनन्द पावर उत्तने ही वाल पर्यन्त
मैंने निवास किया था । अब मैं इस भू लार मे आवर समुत्पन्न वा
हूँ MEENE यहा पर भी हे भागवन् । अय आप मे परम पवित्र
विष्णु के भत्तो ये वग मे उदभूत हुआ हूँ। ह मुनीश्वर । इन समस्त
रहस्यमयी स्था को मैं अपने पूर्व जन्मो के स्मरण बने रहने के कारण
ही जानता हूँ ॥६॥
रद पुराण
तस्माद्विष्ण्वनोद्योगं करोमि सह वालकै,।
एकादशीव्रतमिदमिति न ज्ञातवान्पुरा ॥६२
जातिस्मृतिप्रभावेण तज्ज्ञात साप्रत मया ।
अत्र स्वेनापि यत्कर्म कृत तस्य फल त्विदम् ॥६३
एकादशीव्रत भक्तया कुवंता किमत प्रभो ।
तस्माच्चरिष्ये विरेंद्र शुममेकादशीव्रतम् ।।६४
विष्णुपूजा चाहरह परमस्थानकाक्षया ।
एकादशीव्रत यत्तु कुर्वति श्रद्धया नराः ॥६५
तेपा तु विष्णुभवन परमानददायकम् ।
एव पुनवच श्रुत्वा सतुष्टो गालवो मुनि ॥६६
अवाप परमा तुष्टि मनसा चातिहर्पित ।
मज्जन्म सफल जात मदश पावनीकृत. ॥६७
यतस्त्व मगृहे जातो विष्णुभक्तिपरायणः ।
इति सतुष्टचित्तस्तु तस्य पुत्रस्य कर्मणा ॥६८
हरिपूजाविधान च यथावत्समवोधयत्
इत्येतत्ते मुनिष्ठ यथावत्कथित मया।
सकोचविस्तराम्या च किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ।।६६
यही कारण है कि मैं बालकों को अपने माथ मे लेकर भगवान्
विष्णु की पूजा का उद्योग किया करता है क्योरि मुहको विष्णु पूजा
पी महिमा का पूर्ण ज्ञान यमराज यो वरनृता मे हो गया था। पूर्व
जन्म मे मुझको इसके महत्व का ज्ञान ही नही हुआ था कि यही
एकादशी का व्रत होता है ॥२॥ यय पूर्व जन्मो का स्मरण होने मे
हो मेरी भली मोति ममा म आ गया है कि सम्मान विवशता मे बन
जाने वाले एकादशी के ग्रन वे वमं का इतना अदभुत प्रभाव एव मुफ्त
हुआ है तो फिर मान पूर्वक इसके परने मे हिनना महान पन होना
होगा है प्रभो! जो भनि भाय माय इम एकादशी के महा
४४० [ नारद पुरान व्रत को किया करते हैं । उनको प्राप्त हुए फल के विषय का क्या वर्णन किया जा सकता है । अत. हे विप्रेन्द्र ! मैं परम शुभ एव पावन इस एकादशी के व्रत को अवश्य ही करता रहूँगा ।।६४॥ परम पद को प्राप्त करने की अभिलाषा से मैं प्रति दिन भगवान विष्णु की पूजा भी किया करूंगा । जो मनुष्य परम श्रद्धा के साथ एकादशी का व्रत किया करते है वे परम पद को प्राप्त होते हैं ।।६५॥ एकादशी के व्रत धारी पुरुष को विष्णु भवन परमानन्द दायक अवश्य ही मिना करता है इसमे तनिक भी सशय नही है । पुत्र के मुख से इस पूर्व जन्म के अद्भुत आख्यान का श्रवण कर गालव मुनि को परम प्रसन्नता हुई थी ॥६६॥ गालव महर्षि परमाधिक मन मे सन्तुष्ट होकर विचार करने लगे कि मेरा जन्म आज सफल हो गया है । इस पुत्र ने मेरे घर मे जन्म धारण कर मेरा कुल ही पवित्र कर दिया है ॥६७।। ऐसा वचपन में ही परभ विष्णुभक्त परम धर्मनिष्ठ पुत्र मुझको प्राप्त हुआ है । पुत्र के परम सत्वर्म से इस तरह से सन्तुष्ट होकर उन्होने भगवान विष्णु के पूजन की यथार्थ विधि बतलाई थी। हे मुनीश्वर ! इस रीति से मैंने विस्तृत एव सक्षिप्त रूप से यह सव वर्णन करके बतला दिया है । अब आगे आप क्या मुझसे श्रवण करना चाहते हैं ? II६८६६॥ चारों वर्ग तथा स्त्रियों के सदाचार का वर्णन एतन्निशम्य सनकोदितमप्रमेयं पुण्य हरेदिनभयं निखिलोत्तमं च । पापीघशान्तिकरण व्रतमारमेव ब्रह्मात्मज. पुनरभापत हर्षयुक्त ॥१ कथित भवता सर्व मुने तत्वायकोविद । प्रतास्यान महापुण्यं यथावरिभक्तिदम् ।।२ ४४१ नारद पुराण ] इदानो श्रोतुमिच्छामि वर्णाचारविधि मुने । तथा सश्रिमाचार प्रायश्चितविधि तथा ॥३ एतत्सर्वं महाभाग सर्वतत्वार्थकोविद । कृपया परया मह्य यथावद्वक्तुमर्हसि ॥४ शृणुष्व मुनिशार्दूल यथा भक्तप्रियकर । वर्णाश्रमाचारपर पूज्यते हरिरव्यय ॥५ मन्मायं रुदित यच्च वर्णाश्रमनिवन्धनम् । तत्ते वक्ष्यामि विधिवद्भक्तोऽ म त्वमधोक्षजे ॥६ ब्राह्मणा क्षत्रिया वंश्या शूदाश्चत्वार एवते । वर्णा इति समाख्याता एतेयु ब्राह्मणोऽधिक ॥७ ब्राह्मणा क्षत्रिया वैश्या द्विजा प्रोक्तास्त्रयस्तथा । मातृतश्वोपनयनाद् द्विजत्व प्राप्यते प्रिभि ॥८ महामहर्षि प्रवर श्री सूतजी ने कहा-समस्त पापो की शान्ति करने वाले व्रतोपवामो के सारभूत और परमोत्तम श्री हरि दिन से समुत्पन होने वाले और सनकाचार्य के द्वारा बताये हुए अपरिमित ग्रत या वृत्तान्त श्रवण कर ब्रह्मा के आत्मज देवपि श्री नारदजी हपोल्लास में भरकर फिर कहने लगे थे ॥१॥ श्री नारदजी ने पहा-हे मुने । थाप तो तात्त्विक अर्थों के परम विद्वान हैं। आपन हरिभक्ति देने वाले महान पुण्यमय इस एकादशी वे महाग्रत वा यथार्थ वर्णन किया है ।। हे महामुने । अब कृपा पर आप वर्गों की सदाचार पति या प्रवण तथा समस्त आयमो के सदाचरण एवं प्रायश्चित पद्धति या श्रवण करने की उत्तट अभिलाषा रखता है ॥ ३ ॥ हे सभी तत्वों के समान में परम युगल महाभाग ! इन मक्का यथा वर्णन परव मुनादय दगो निय यापमा परम अनुग्रह मुा पर हागा ॥ ४॥ धी मनाचार्य ने कहा-हे नारद ! हे मुनिगाडूंस । अब आप वर्माधम धमाका पपाथं पालर भत्ती परम प्रिय एवं अभीष्ट करने वाले विष्णु भगवान् ।
४४२ [नारद पुराण का जिस रीति से पूजन किया करते हैं उसको सुनिए ॥ ५॥ आप तो भगवान् अधोक्षज के परम भक्त हो । अतएव भगवान् मनु आदि महपियो ने वर्णों और आश्रमो के धर्म बतलाये हैं उनका सविधि वर्णन करता हूँ। आप सावधानता से उनको अब सुनिये ॥ ६ ॥ ब्राह्मण, क्षत्रिय, पैश्य और शूद्र-ये ही चार वर्ण धर्मशास्त्रो मे बताये गये है। इनमें प्रथम तीनो का एर जन्म तो अपनी माता के उदर से हुआ करता है और दसरा जन्म उपनयन सस्कार के द्वारा हुआ करता है। इसीलिये इनको द्विज या द्विजाति कहा जाता है । एतैर्वर्णं सर्वधर्मा कार्या वर्णानुस्पत । स्ववर्णधर्मत्यागेन पापड प्रोच्यते बुधै ॥६ स्वगृह्यचोदित कर्म द्विज. कुर्वन्कृती भवेत् । अन्यथा पतितो भूयात्सर्वधर्मवहित्कृतः ।।१० युगधर्म. परिग्राह्यो वर्णरेतैर्यथोचितम् । देशाचारास्तथा ग्राह्या स्मृतिधर्माविरोधत. ॥११ कर्मणा मनमा वाचा यत्नाद्धम्म समाचरेत् । अस्वयं लोकविद्विष्ट धर्म्यमप्याचरेन्न तु ॥१२ समुद्रयानास्वीकार. कमण्डलुविधारणम् । द्विजानामसवर्णासु कन्यासूपयमस्तथा ॥१३ देवराच्च सुतोत्पत्तिर्मधुपर्के पशोर्वध । मासादन तथा श्राद्ध वानप्रस्थाश्रमस्तथा ॥१४ दत्ताक्षताया कन्याया. पुनर्दान वराय च । नैष्ठिक ब्रह्मचर्य च नरमेधाश्वमेधको ॥१५ महाप्रस्थानगमन गोमेधश्च तथा मस । एतान्धन्विलियुगे यानाहुर्मनीषिण ॥१६ इन सभी वर्गों को समस्त धर्म-यमं अपने यर्ण के अनुमार ही ४४३ नारद पुराण ] करने चाहिए। जो अपने वर्णाश्रमो के ममुचित धर्म-कर्मों का त्याग कर दिया करता है उससे विद्वान् पुरुष पाखण्डी कहा करते हैं ।। ६ ।। द्विज अपने गृह्य सूत्र म कथित कमों के करने मे ही कृतार्थ हो जाया करता है । इसके विपरीत अन्यथा आचरण मे वह पतित हो जाया करता है फिर उमको विमी भी कम के करने का अधिकार नहीं रहा करता है ।।१०। इन सभी वर्गों के व्यक्तियो को अपने यथार्थ वर्ण- धर्म का ही पालन करना परमावश्यक होता है। जो स्मृति धर्म के अविरोधी देशाचार होत है उनका भी ग्रहण करना आवश्यक होता है ॥ ११॥ मन--कर्म और वचन से प्रयत्न पूर्णक धर्म का आचरण करना चाहिए। जो ऐसा कर्म है जिससे ( धर्म कार्य से ) स्वर्ग की प्राप्ति न होवे और जिमकी लोक में निन्दा होती हा उसको कभी भी नही करना चाहिय ।। १२ ।। समुद्र यात्रा को स्वीकृति-कमण्डलुका धारण ( सन्यास ग्रहण)-द्विजो का असवर्ण कन्याओ क साथ विवाह, देवर से सन्तान की उत्पत्ति, मधुपर्क म पशुवध, श्राद्ध मे मास भक्षण, वानप्रस्थाश्रम, वाणी मात्र से दी हुई अक्षता कन्या का वर को पुनर्दान नैष्ठिक ब्रह्मचर्य, नरमेध, अश्वमेघ, महाप्रस्थान, गोमेध इन शास्त्रोक्त घों को भी विद्वान् पुरुपो ने इस कलियुग म वजित बताया गया है ॥१३-१६॥ देशाचारा परिग्राह्यास्ततद्देशगतैर्नरै । अन्यथा पतितो ज्ञेय सर्वधर्मवहिप्कृप्त ॥१७ ब्राह्मणक्षत्रियविशा शूद्राणा च द्विजोत्तम । प्रिया सामान्यतो वक्ष्ये ताच्छृणुप्व समहित ॥१८ दान दद्याद् ब्राह्यगेभ्यस्तथा यज्ञर्यजेत्सुरान् । वृत्त्यर्थ याजनेच्चव अन्यानध्य पयेत्तथा ।।१६ याजयेद्यजने योग्यान्विप्रो नित्योदकी भवेत् । कुर्याच्च वेदग्रहण तथाग्नेश्च परिगटम 100 ४४४ [ नारद पुराण ग्राह्य द्रव्ये च पारक्ये समबुद्धिर्भवेत्तथा। सवलोकहित कुर्यान्मृदुवाक्यमुदीरयेत् ॥२१ पुरुष जिस देश में समुत्पन्न हुआ हो उसको उस देश के सदाचार का पालन अवश्य ही करना चाहिए अन्यथा करने से वह पुरुष सब धर्मो से बहिष्कृत एन पतित हो जाया करता है ।। १७ ॥ हे द्विज श्रेष्ठ ! अब मैं चारो वर्णों के साधारण कम्मों के विषय मे वर्णन करता हूँ। उनको आप परम समाहित होकर श्रवण करिए ।। १८ ।। ब्राह्मण का सामान्य कर्म है कि वह ब्राह्मणो को दान देवे -यज्ञो के यजन के द्वारा देवो का अर्चन करे और अपनी जीविका के लिये यज्ञ करावे तथा दूसरो को अध्ययन करावे ॥ १६ ।। जो पुरुष यजन और पूजन के पात्र हो उनके द्वारा ही यज्ञो का यजन कराना चाहिए । विप्र को चाहिए कि वह नित्योदकी रहे, वेदो का अध्ययन करे और प्रति दिनं अग्निहोत्र करे ।। २० ।। अपने ग्रहण करने के योग्य जो द्रव्य हो अथवा दूसरे के द्वारा ग्रहण करने के योग्य हो -इन दोनो मे समान बुद्धि ही रखनी चाहिए। समस्त प्राणियो के हितप्रद कार्य करने चाहिए । विप्र का कर्तव्य है कि वह सर्वदा अपने मुख से कोमल वचनो का ही उच्चारण किया करे और कभी भी कठोर वनन नहीं पहना चाहिये ॥२१॥ ऋतावभिगमः पन्या शस्यते ब्राह्मणस्य वै । न कस्याप्यहित व याद्विष्णुपूजापरो भवेत् ॥२२ दद्यादानानि विप्रेभ्यः क्षत्रियोऽपि द्विजोत्तम । कुर्याच्च वेदग्रहण यज्ञद्देवान्यजेत्तथा ॥२३ शस्त्रजीवी भवेच्चव पालयेदर्मतो महीम् । दुष्टाना शासन कुर्याच्छिष्टाना पालन तथा ॥२४ पाशुपाल्य च वाणिज्य कृषिश्च द्विजसत्तम । वेदस्पाध्ययन चैव वैश्यस्यापि प्रकोतितम् ॥२५ नारद पुराण ] कुर्याच्च दारग्रहण धर्माश्चैव समाचरेत् । क्रयवियर्वापि धनै कारुवियोद्भदै ॥२६ दद्यादानानि शूद्रोऽपि पाकयज्ञैर्यजेन्न च । ब्राह्मणक्षत्रियविशा शुश्रू पानिरतो भवेत् ॥२७ ऋतुकालाभिगामी च स्वदारेषु भवेत्तथा। सर्वलोकहितपित्व मङ्गल प्रियवादिता ॥२८ अनायासो मनोहर्यस्तितिक्षा नातिमानिता । सामान्य सर्ववर्णाना मुनिभि परिकीर्तितम् ।।२६ ब्राह्मण को चाहिए कि वह केवल ऋतु के समय में ही अपनी पत्नी के साथ गमन करे- ऐमा करना ही प्रशसित होता है। जिस वात के कयन से किसी का भी अहित होवे ऐमी वात कभी भी विन को नही कहनी चाहिये । ब्राह्मण का निरन्तर भगवान् विष्णु की पूजा मे निरत रहना चाहिए ।। २२ ।। हे उत्तम हिज । अब क्षत्रिय वर्ण का साधारण धर्म बतलाता हूँ-क्षत्रिय को ब्राह्मणा को दान देना चाहिए, वेदो का अध्ययन करे तथा यज्ञा के यजन के द्वारा देवी का अचन बरे ॥२३ ।। शस्यो की वृत्ति से अपनी जीविका का अजन करे-धर्म के साय पृथ्वी का परिपालन करे-दुष्टो को दण्ड देवे और साधु पुरपो का सवताभाव से पालन एवं रक्षण करना चाहिए ॥२४॥ अश्य का सामान्य धर्म पशुओ का पालन, व्यापार, कृषिकर्म, वेदा का अध्ययन य वैश्य वर्ण के व्यक्तियो के धम्म हुआ करत हैं ।। २५ ।। अव शूद्र वर्ण वे सामान्य धर्म बतलाय जाते हैं, शूद्र को भी विवाह करना चाहिए- मभी धर्मों का पालन करे-शिल्प के द्वारा प्रस्तुन वस्तुओं के विक्रय एव कय म जो धन प्राप्त हा उसरा दान दव विन्तु शूद्र यो पाक यज्ञ करन का अधिकार शाम्या में नहीं बताया गया है। शुद का पत्तं व्य है कि ग्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य इन तीनो वर्णों वी सवा म सनग्न रहना चाहिए ।। २६ ।। २७ ।। ऋतुकात म स्त्रो गमन, सपके हित को नारद पुराण ] क्षत्रिय और वैश्य इन तीनों के लिये ही चार आश्रमो का विधान किया गया है और पाचवा आश्रम नही होता है। उन चारो आश्रमो के नाम ये होते हैं-ब्रह्मचय्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और चौथा आश्रम सन्यास होता है ॥३२॥३३॥ इन्ही चारा आश्रमो के द्वारा उत्तम धर्म की सिद्धि हुआ करती है। ह विप्रवर । जो सदा कर्मयोग म तत्परता रखता है-परम नि स्पृह होने के कारण जिसके मनमे पूण शान्ति विराजमान रहा करती है--जो नित्य ही अपन समुचित धर्म कर्मो मे सलग्नता रखता है उसीसे भगवान् विष्णु परम प्रसन्न रहा करते हैं और वह मर्यादा के पूर्ण रूप से परिपालन करने के कारण ऐसे उत्तम स्थान को अन्त समय में प्राप्ति किया करता है जहा से फिर वापिस लौटकर यहा ससार मे नहीं आना होता है ॥३४॥३२॥ ॥ स्मार्त धर्म वर्णन । वर्णाथमाचारविधि प्रवक्ष्यामि विशेषत । शृणुष्व तन्मुनिष्ठ सावधानेन चेतसा ।।१ Vय स्वधर्म परित्यज्य परधर्म समाचरेत् । पापड स हि विज्ञेय सर्वधम वहिप्कृत ॥२ गर्भाधानादिसस्वारा कार्या मन्त्रविधानत । स्त्रीणाममन्त्रत कार्या यथाराल यथाविधि ॥३ सीमतवमं प्रथम चतुर्थ मासि शस्यते । पप्ठे वा सप्तमे वापि अष्टमे वापि कारयेत् ।।४ जाते पुरे पिता स्नात्वा सचैल जातकर्म च । दुय्याच्च नादीश्राद्ध च स्वस्तिवाचनपूर्वकम् ॥५ हम्ना वा रजतेनापि वृद्धिश्राद्ध प्राल्पयत् । अन्नेन कारयेद्यस्तु स चटालसमा भवेत् ॥६ [ नारद पुराण कृत्वाभ्युदयिक श्राद्ध पिता पुत्रस्य वाग्यतः । कुर्वीत नामनिर्देश सूतकाते यथाविधि ॥७ अस्पष्टमर्थहीन च ह्यात गुर्वक्षरान्वितम् । न दद्यान्नाम विद्र तथा च विषमाक्षरम् ।। श्री सनाचार्य मह पि ने कहा-हे मुनिश्रेष्ठ । अब मैं सब वर्णो और आश्रमो के सदाचार की विधि का विशेष रूप से वर्णन करके समझाता हूँ। हे मुनिवर! आप उसको विशेष सावधानी के साथ श्रवण करिये।१। जो मनुष्य अपने उचित धर्म का परित्याग करके दूसरो के धर्म का समाश्रय ग्रहण किया करता है उसको पाखण्डी ही समझना चाहिए चाहे वह कोई भी क्यो न हो। फिर उसका धर्माधिकार ही नष्ट होजाया वरता है और किसी भी धर्म के करने का अधिकार नहीं रहा करता है ॥२।। समुचित समय पर विधि के अनुसार गर्भाधान आदि सस्कार मन्त्रो का उच्चारण करके ही करने चाहिए। स्त्रियो के रास्कारो मे मन्यो का पाठ नहीं करना चाहिए ॥३॥ सीमन्तोन्नयन सस्कार सर्व प्रथम गर्भाधान के चतुर्थ मास मे परमश्रेष्ठ माना जाता है। यदि चौथे मास मे किमी कारण वश इसको न कर सके तो फिर इस मम्कार को छटवें-सातवें या आठवें मास मे अवश्य ही करना चाहिए ।। ४ ॥ पुत्र की उत्पत्ति होने पर उसरे पिता या वस्त्री के महित स्नान करना चाहिए। फिर स्वस्ति वाचन के सहित नान्दीमुख श्राद्ध और जातपर्म मस्कार करे ।। ५।। इम वृद्धि सूचक थान को चांदी या सुवण के साथ ही करे । जो वेवल अन्न के द्वारा ही इस वृद्धि श्राद्ध को पिया करत हैं उममें और चाण्डाल में फिर कौन सा भेद रह जाया करता है ? ॥ ६ ॥ इमो अनन्तर पिता को अपनी पाणी या नियमन करते हुर पुत्र का आभ्युदयिर पमं करना चाहिए। जातकाशीच ५ गमाप्त हो जाने पर अन्न मे विधि-विधान के अनुमार बालक या नामकरण बरे। ह विदा नाम ऐमा हो हा पाहिय जो परम स्पष्ट हो -- नारद पुराण सार्थक यौर स्पाक्षरो चाला हो। इसके विपरीत नाम नहीं रखना चाहिये ।।७।। तृतीयव चौल च पचमे पटसम्मिते । सप्तमे चाष्टमे वापि कुर्याद् गृह्योक्तमार्गतः ॥ दैवयोगादविकाते गर्भाधानादिमणि । कर्तव्य पादकृच्छो वै चौले त्वर्द्ध प्रकल्पयेत् ॥१० गर्भाष्टमेऽष्टमे वाब्दे वटुकस्योपनायनम् । आषोडशाब्दपपर्यंत गौण कालमुशति च ।।११ गर्भकादप्तमेब्दे तु राजन्यस्योपनायनम् । आद्वाविंशाब्दर्यत कालमाहुर्विपश्चित ॥१२ वैश्योपनयन प्रोक्त गर्भात द्वादशे तथा । चतुविशाब्दपर्यंत गौणमाहुमनोपिण ॥१३ एतत्कालावधेयस्य द्विजस्यातिकमो भवेत् । सावित्रीपतित विद्यात तु नेवालपेरुदा ॥१४ गृह्यमूत्र धर्मप्रन्य के अनुसार फिर बालष वा चोल वमं होगरे पांचवें, छो, मातवें तथा आठवें वर्ष में परे अर्थात् मुण्डन मस्कार करना चाहिए ॥६॥ यदि देववशात् समुचित समय पर गर्भाधान यादि मस्वार न हो सके तो चतुर्थ भाग यच्छ व्रत का प्रायश्चित रूप में करना चाहिये और पूडारमं गम्भार समुचित समय पर नहीं किया जा मये तो आधा भाग वृच्छ व पारना चाहिए तभी शुद्धि होती है ।।१०। गर्भाधान के समय मे आठ वर्ष म बासरा पशो- पवीत गमार राना चाहिए। यदि इम उचित गमय पर यह मार नही क्यिा जाना हैता सिमानह वर्ग ना ग उपनयन गप्यार का गोग माम माना गया है।॥ ११॥ गगन म मारहाण वष मचिय पा पोपवीन मम्मर राना चाहिये । विद्वान पुरष क्षत्रिय गोगमा बाग वतमहा है। गभग यारम पम र राजप-
४५०
[ नारद पुरान
नयन कराना चाहिए । विद्वान् पुरुप चौबीस वर्ष तक पैश्य के इस
सस्कार का गौण काल कहा करते है ।। १२ । १३ ।। जिस द्विज का
मुख्य और गौण दोनो ही काल व्यतीत हो जाये तो वह फिर सावित्री
पतित माना जाया करता है और फिर उससे बात भी किसी को नहीं
करनी चाहिए ।।१४॥
द्विजोपनयने विप्र मुख्यकालव्यतिकमे ।
द्वादशान्ट चरेत्कृच्छ्र पश्चाच्चाद्रायण तथा ।
सातपनद्वय चैव कृत्वा कर्म समाचरेत् ॥१५
अन्यथा पतित विद्यात्कापि ब्रह्महा भवेत् ।
मौजी विप्रस्य विज्ञेया धनुा क्षत्रियस्य तु ॥१६
- आवी वैश्यस्य विज्ञेया थू यतामजिन तथा ।
विप्रस्य चोक्तमैणय रौरव क्षत्रियस्य तु ११७
आज वैश्यस्य विज्ञेय दडान्वक्ष्ये यथाक्रमम् ।
/पालाश ब्राह्मणस्योक्त नृपस्यौदुम्वर तथा ॥१८
वैल्व वैश्यस्य विज्ञेय तत्प्रमाण शृणुष्व में।
विप्रस्य केशमान स्यादाललाट नृपस्य च ॥१६
नासाग्रसमित दण्ड वैश्यस्याहुविपश्चित ।
तथा वासासि वक्ष्यामि विप्रादीना यथाक्रमम् ॥२०
कपाय चैव माजिष्ठ हारिद्र च प्रकीर्तितम् ।
उपनीतो द्विजो विप्र परिचर्यापरो गुरो ॥२१
हे विप्रवर | द्विज के उपनयन संस्कार का मुख्य काल व्यतीत
होजावे तो फिर उसको वारह वप तक कुछ व्रत प्रायश्चित के लिये
करना चाहिए । इसके बाद दो चान्द्रायण व्रत और इसके पीछे दा
सन्तापन व्रत करके ही कम करे ॥१५॥ ऐमा न करने पर यह सर्वथा
मतत समझा जाता है और उस दशा में वह कर्म करके भी ब्रह्म
हत्यारा ही कहा जाया करता है। उपनयन संस्कार मे ब्राह्मण की
४५१ नारद पुराण ] मेखला मूज को होनी चाहिये । क्षत्रिय को मेखला धनुष की डोरी की, वैश्य की मेखला भेड के ऊन की होनी चाहिए । अब उनके चर्म धारण के विषय मे भी श्रवण करिये। ब्राह्मण के लिये ऐण मृग का चर्म होना चाहिये । क्षनिय के लिये रुद्र मृग की होवे और वैश्य के लिये बकरे वा चर्म होना चाहिये । इसी प्रकार से भिन्न • २ वर्गों के दण्ड भी भिन्न होते है । ब्राह्मण वटु के लिये ढाक का दण्ड होना चाहिए और क्षत्रिय वर्ण के वटु के लिये उपनयन संस्कार के समय में धारण करने के लिये गूलर वृक्ष का दण्ड होना चाहिये ॥ १७॥ १८ ॥ वैश्य वर्ण के लिये विल्व वृक्ष का दण्ड होना चाहिये । इन दण्डो को ऊँचाई भी भिन्न २ होती है । ब्राह्मण का दण्ड केशो तक ऊंचा होवे, क्षत्रिय का दण्ड ललाट तक ऊँचा होवे और विद्वान् पुस्प वैश्य का दण्ड नासिका तक ऊँचा कहा करते हैं। इसके अनन्तर ब्राह्मणादि के वस्त्रो का वर्णन किया जाता है ।।१६॥२०॥ ब्राह्मण वर्ण के बालक के वस्त्रो का रङ्ग गेरुआ होना चाहिये, क्षत्रिय का मंजीठ का रङ्ग और वैश्य के बालक का रङ्ग पीला होना चाहिए । हे विप्रेन्द्र | उपवीत हुए द्विज को गुरु की सेवा करते हुए वेदो को ग्रहण करने के समय पर्यन्त गुरु के ही यहां रहना चाहिए ॥२१॥ वेदग्रहणपर्यंत निवसेद्गुरुवेश्मनि । प्रात स्नायी भवेद्वर्णी समित्कुशफलादिकान् ।।२२ गुर्वर्थमाहरेन्नित्य कल्ये कल्ये मुनीश्वर । यज्ञोपवीतमजिन दड च मुनिसत्तम ॥२३ नष्टे भ्रष्ट नव मत्राद् धृत्वा भ्रष्ट जले क्षिपत् । वणिनो वर्त्तन प्राहुभिक्षान्नेनैव केवलम् ॥२४ भिक्षा च श्रोत्रियागारादाहरेत्प्रयतेद्रिय । भवत्पूर्व ब्राह्मणस्य भवन्मध्य नृपस्य च ॥२५ भवदत्य विश प्रोक्त भिक्षाहरणक वच !
[ नारद पुराण सायप्रातर्वह्निकार्य यथाचार जितेद्रिय ॥२६ कुर्यात्प्रतिदिन वर्णी ब्रह्मयज्ञ च तर्पणम् । अग्निकार्यपरित्यागी पतित प्रोच्यते बुध ॥२७ ब्रह्मयज्ञविहीनश्च ब्रह्महा परिकीर्तित । देवताभ्यर्चन कुर्याच्छुश्रूषानुपद गुरो ॥२८ गुरु के घर में ही निवास करने वाले ब्रह्मवादी को प्रात काल में स्नान करना चाहिए। हे मुनीश्वर। प्रात काल म गुरुवदेव के लिए नित्य पुष्प, समिधा, फल आदि आवश्यक वस्तुये लाना चाहिये। यदि ब्रह्मचारी के चर्म, यज्ञापवीत, दण्ड आदि नष्ट या भ्रष्ट होजावे तो मन्त्रो का वाचन कर पुन नवीन धारण करे । जो भ्रष्ट हो जावे तो उसको किसी पवित्र जलाशय मे छोड देना चाहिये । ब्रह्मचर्य की अवस्था में रहने वाले ब्रह्मचारी की जीविका केवल भिक्षा अन्न से ही होनी चाहिये ॥२२-२४१ इन्द्रियो पर पूर्ण सम रखते हुये केवल वेद पाटी ब्राह्मण के यहां से ही भिक्षान प्राप्त करे जब भिक्षा याचना करे तो ग्राह्मण द्विज को भवत् शब्द का पूर्व में प्रयोग करना चाहिए । यथा---'भवति । भिक्षा देहिमात' अर्थात आप हे माता भिक्षा दो । क्षत्रिय यदि भिक्षा की याचना करे तो उसका भवत् शब्द का प्रयोग मध्य मे करना चाहिए । यथा-'भिक्षा भवति । देहिमात' । यदि पश्य विजाति भिावी याचना बरे तो उमे अन्न में भवत् शब्द का प्रयोग करना चाहिए। पया-'भिक्षा दहि भवति मात' को प्रति दिन प्रात और मायवाल दाना क्त अग्निहोत्र करना भाव- श्यर हाना है और आचार के अनुसार ब्रह्म यश तथा तपंण भी परना चाहिए । विद्वान पुरप अग्निहोम प त्याग करने वाले पुरुष या पनित बताया करत है ॥२१-२७॥ जो ब्रह्म यज्ञ नही किया करता है उसको ब्रह्म हत्या करने वाला बताया गया है । ब्रह्मचारी या वर्तव्य है कि अपन ताच य गुरुदेव की सवा परत हर दव पूजा भी प्रति दिन करना पाहिए ॥२८॥ 1 ब्रह्मचारी ४२३ ना निशानभाजीनियमानी गाना। সানিবিন্না মিয়া বিঘি. i नियंत गुगनीगायतकामगा। मम्चीमागाननादून दाधारनम् ॥३० अष्टिमात्रा दियाम्गाप च यत् । पादुग्गधारन तथा मापानुलेपनम् ॥३१ जरीन पगोतमारतु परिवजयेन् । पग्यिाद गोरताप विप्रताप नयाजनम् ॥३२ पापण्ट जनमयोग गूरमग न यर्जयेत् । अभिवादनगीर म्पार वृद्धच ययात्रमम् ॥३॥ 'शानदारापोरमा योगदानि प्रय । आध्यात्मिादिदु यानि निवारयति यो गुम् ॥३४ वेदनाम्यापदमन त पूर्वमभिवादयेत् । अमावमिति यूयाद द्विजों व भिवादने ।।३५ ब्रह्मराग या निम्प भिक्षा रा साया हुआ ही अन्म पाना पाहिए और एक ही अन्न निन्य नही ग्राना पाहिय । ब्रह्मचारी मा नन्दियत्रित होना परमावश्यर है । उगमा अनिन्दित ब्राह्मणों ये यहाँ मे ही मिना मानी पाहिए और उन नापर गर्व प्रथम गुर या मम- पित करना चाहिए । गुरक्षा बादेश प्राप्त पर ही मौन हावा भाजन करना चाहिय । ब्रह्मचारी का मधु, स्त्री, मांस, लवण, पान, दातुन, उच्छिष्ट भोजन और दिन में शयन का परित्याग कर दना चाहिए (ब्रह्मचारी को छाता, घडाऊ, गन्ध माल्य, अनुलेपन, जल- विहार, नृत्य-गान, वाद्य, निन्दा, उपनाप, वरवाद और अञ्जन या भी त्याग पर दना चाहिए ॥२६॥३०)ब्रह्मचारी का पापण्ड परन वाले तथा शूदी का मन कभी नहीं करना चाहिए। जो भी अपन मे वृद्ध हा उनको क्रमश प्रणाम करना चाहिए । वृद्ध भी तीन तरह के
[ नारद पुराण
बताये गये है--ज्ञानवृद्ध वयोवृद्ध और तपोवृद्ध ये तीन भेद वृद्धो
के होते है । जो वेद और शास्त्र का उपदेश देकर आध्यात्मिक और
आधिभौतिक आदि दुखा का निवारण करने वाले है उनको सव प्रथम
प्रणाम करना चाहिये । वृद्धा को अभिवादन करने के समय में द्विज को
इस विधि से कहकर प्रणाम करना चाहिए कि प्रणाम ग्रहण करन वाले
को उसका परिचय भी प्राप्त हो सके । मैं अमुक गोत्र मे ममुत्पन्न
अमुक नाम वाला आपको प्रणाम करना चाहता हूँ ॥३१-३॥
नाभिवाद्याश्च विप्रण क्षत्रियाद्या कथचन ।
नास्तिक भिन्नमर्याद कृतघ्न ग्रामयाजकम् ॥३६
स्तेन च क्तिव चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
पापण्ड पतित व्रात्य तथा नक्षनजीविनम् ।।३७
तथा पातकिन चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
उन्मत्त च शठ धूर्त धावन्तमशुचिं तथा ॥३८
अभ्यक्तशिरस चैव जपन्त नाभिवादयेत् ।
विवादशीलिन चड वमत जलमध्यगम् ॥३६
भिक्षान्नधारिण चैव शयान नाभिवादयेत् ।
भर्तृघ्नी पुप्पिणी जारा सूतिका गर्भपातिनीम् ॥४०
कृतघ्नी च तथा चाण्डी कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
सभाया यज्ञशाताया देवतायतनेष्वपि ॥४१
प्रत्येव तु नमस्यारो हति पुण्य पुराकृतम् ।
श्राद्ध व्रत तथा दान देवताभ्यर्जन तथा ॥४२
यज्ञ च तपण चैव पुरंत नाभिवादयेत् ।
एनेभिवादरे यस्तु न पुथा प्रतिवादनम् ।।४३
एक उम उपत्ति का जो ग्राह्मण, क्षत्रिय आदि किसी को भी
प्रणाम न सरे ईश्वर से मना का जान मानता हो, जो बंधी हुई
मर को सोर दव, जापिसी भी उपरार से भी 7 मा चार,
नारद पुराण ] जुआरी, ग्रामयाजक, पतित, पाखण्ड करने वाला, व्रात्य और जो नक्षत. जीवी हो, इनवो भी प्रणाम ब्रह्मचारी को नही करना चाहिये ॥३६॥ ३७॥ महापातकी, उन्मत्त, शठ, धूर्त और जो भाग रहा हो अथवा अपविन हो उसको भी प्रणाम नहीं करना चाहिए ॥३८॥ जो शिर मलकर प्रक्षालन कर रहा हो, जो मन्त्र का जाप कर रहा हो । जो झगडा और कलह करने के स्वभाव से युक्त हो, क्रोधशील, जो वमन करने वाला हो और जो जल के मध्य मे हो उसको कभी प्रणाम नहीं करना चाहिये ।।३६। जिसके पास में भिक्षा से प्राप्त अन्न हो और जो शय्या पर लोट लगा रहा हो उसको भी कभी भून कर भी प्रणाम नही करना चाहिए । जो नारी अपने ही पति की ताडना किया करती अथवा जो स्त्री ऋतुमती हो, सूतिका, गर्भ- पान कर देन वाली, कृतघ्नी और क्रोध करने के स्वभाव वाली हो, उस नारी को भी अभिवादन करन का निपध होता है । सभा, यज्ञ- शाला अथवा देवालय मे उपस्थित प्रत्येक का अभिवादन करना भी उचित नहीं होता है क्योकि ऐसा करने से पूर्ववृत समस्त पुण्य का विनाश करने वाला हुआ करता है । जो काई पुरुष चाहे वह नमन करने के योग्य क्यो न हो यदि वह श्राद्ध, व्रत, दान, देवार्चन यज्ञो का यजन और तर्पण करने मे मनग्न हो तो उसको अभिवादन नहीं करना चाहिए और उसको कभी प्रणाम न करे और जो प्रणाम करने पर कुछ भी आशीर्वाद न देने के स्वभाव वाला हो ॥४०-४३।। नाभिवाद्याश्च स विज्ञेयो यथा शूद्रस्तथैव स । प्रक्षाल्य पादावाचम्य गुरोरभिमुख सदा ॥४४ तस्य पादौ च सगृह्य अधीयीत विचक्षण । अष्टकासु चतुदश्या प्रतिपपर्वणोस्तथा ॥४५ महाभरण्या विप्रेद्र श्रवणद्वादशीदिने। भाद्रपदापरपक्षे द्वितीयाया तथैव च ॥४६ -
! नारद पुराण
चाहिये
माघस्य शुक्लसरम्य नवम्यामाश्विनस्य च ।
परिवेप गते सूर्ये श्रोत्रिये गृहमागते ॥४७
वधिते ब्राह्मणे चैव प्रवृद्धकलहे तथा ।
सध्याया गजिते मेवे ह्यकाले परिवर्पगे ॥४८
उल्काशनिप्रपाते च तथा विप्रेवमानिते।
मन्वादिषु च देवर्षे युगादिपु चतुर्वपि ॥४६
नाधोयीत द्विजः कश्चित्सर्वकर्मफलोत्सुक.।
तृतीया माधवे शुक्ला भाद्रे कृष्णा त्रयोदशी ।।५०
कात्तिके नवमी शुद्धा माचे पञ्चदशी तिथि ।
एता युगाद्या. कथिता दत्तस्याक्षयकारिकाः ॥५१
ऐसे पुरुषों को अभिवादन करने का पात्र नहीं समझना,
वोंकि जैसा शूद्र होता है वैसे ही ऐसे पुरुष भी हुआ करते है। चतुर
ब्रह्मचारी का कर्तव्य है कि अपने परो का प्रक्षालन कर आचमन करे.
और इसके पीछे अपने गुरुदेव के समक्ष मे जाकर उनके चरणों का
स्पर्श करे और फिर अध्ययन किया करे। कुछ दिन वेद शास्त्रो के
अनध्याय दिवस माने जाते हैं उन दिनो मे कभी पढ़ना नही चाहिये ।
जैसे-अष्टमी, चतुर्दशी, प्रतिषत्, पर्व तिथि, महा भरणी मक्षभ
नक्षत्र से समुत द्वादशो, भाद्रपद मास स्थित शुक्ल पक्ष की द्वितीया
तिथि, माघ शुक्ला सप्तमी, आश्विन मास की नवमी, सूर्य ग्रहण या
दिन अथवा वह दिन जिस दिन कोई श्रोत्रिय का घर मे समागमन हो।
ये भनध्याय दिन बताये गये हैं ॥४४-४७॥ हे द्विजवर ! जो दिन
सब कमो के पुण्य फल प्राप्त करने की उन्मुक्ता रखता है उसको
अधोलिखित दिवमो में भी मध्ययन नहीं करना चाहिए-विमी
ग्राह्मण के कारावास होने वाले दिन, क्लह की वृद्धि वाले दिन,
सन्ध्या समय मेघ गर्जन, असमायिक वर्ग वाले दिन, मन्वादि की
तथा युगादि की तिथियों में अध्ययन का निषेध बताया गया है।
श्रवण
४५७
..रद पुराण ]
वंशाख मास की शक्ल पक्ष की तृतीया ( अक्षय तृतीया )-भाद्रपद
कृष्णा त्रयोदशी, कार्तिक शुक्ला नवमी ( अक्षय नवमी ), माघ मास
की पूर्णिमा मे युग के आरम्भ होन वाली तिथियां है । इन तिथियो
में दिया हुआ दान अक्षय हुआ करता है ।।४८-५१॥
मन्वादीश्च प्रवक्ष्यामि शृणुष्व मुसमाहित ।
अश्वियुक्छुक्लनवमी कातिके द्वादशी ।सता ॥५२
तृतीया चनमासस्य तथा भाद्रपदस्य च ।
आपाढशुक्लदशमी सिता माघस्य सप्तमी ॥५३
श्रावणस्याष्टमी कृष्णा तथापाढी च पूर्णिमा।
फाल्गुनस्य त्वमावास्या पौपस्यैकादशो सिता ॥५४
कार्तिकी फाल्गुनी चैत्री ज्येष्ठो पञ्चदशी सिता।
मन्वादय समाख्याता दत्तस्याक्षयकारिका ॥५५
द्विज श्राद्ध च कर्त्तव्य मन्वादिषु युगादिषु ।
श्राद्ध निमन्त्रितेचैव ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो ॥५६
अब मन्वादि तिथियो को बतलाया जाता है अब आप परम
समाहित होकर सुनिये-आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की नवमी,
कार्तिक शुक्ला द्वादशी, चैत्र मास की तृतीया, भाद्रपद की तृतीया,
नापाढ शुक्ला दशमी, माघ शुक्ला सप्तमी, थावण कृष्णा अष्टमी,
आपाढ माग की पूर्णिमा, फाल्गुन की अमावस्या,पौष शुक्ला एकादशी।
कार्तिक, फाल्गुन, चैत्र और ज्येष्ठ-इन मासो की पूर्णिमा तिथि-ये
मब मनुओ के आरम्भ होने वाली आदि तिथियां कही जाती है। इन
तिथियो को महा पुण्यमयी माना जाता है और इनम दिय हुये दान
का अक्षय पुण्य हुआ करता है ।।५२-५५॥ द्विज का कर्तव्य है कि
मन्वादि और युगादि तिथियो मे श्राद्ध कर्म करे। श्राद्ध के निमन्त्रण
वाले दिन म और चन्द्र एव सूर्य के ग्रहण वाले दिना में अध्ययन नहीं
करना चाहिए ।।५६
४५८
[ नारद पुराण
अयनद्वितये चैव तथा भूकंपने मुने ।
गलग्रहे दुद्दिने च नाधीयीत कदाचन ॥५७
एवमादिषु सर्वेषु अनध्यायेषु नारद ।
अधीयता सुमूढाना प्रजा प्रज्ञा यशः श्रियम् ॥५८
आयुष्य वलमारोग्य निकृन्तति यमः स्वयम् ।
अनध्याये तु योऽधीते त विद्याद् ब्रह्मघातकम् ॥५६
न त सभापयेद्विप्र न तेन सह सवसेत् ।
कु डगोलकयो. केचिज्जडादीना च नारद ॥६०
वदति चोपनयन तत्पुत्रादिषु केचन ।
अनधीत्य तु यो वेदमन्यत्र कुरुते श्रमम् ॥६१
शूद्रतुल्य. न विज्ञेयो नरकस्य प्रियोऽतिथि ।
अनधीतच तिविप्र आचार प्रतिपद्यते ॥६२
नाचारफलमाप्नोति यथा शूद्रस्तथैव सः ।
नित्यं नैमित्तिकं काम्यं यच्चान्यत्कर्म वैदिकम् ॥६३
अनधीतस्य विप्रस्य सर्व भवति निष्फलम् ।
शब्दब्रह्ममयो विष्णुर्वेद. साक्षाद्धरि. स्मृतः ।।६४
वेदाध्यायी ततो विप्रः सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥६५
जिस दिन में उत्तरायण या दक्षिणायन आरम्भ हो उसमे-
भूकम्प वाले दिन में आठ ( गर्गोत ) गलग्रह दिनो मे तथा मेया च्छन्न
दुदिन मे अध्ययन करना वजित होता है अत. वह नही करना चाहिये
॥५७॥ हे नारद ! जो महामूढ इन दिनो मे अर्थात् शास्त्रोक्त अना-
घ्यायो के दिनो में भी अध्ययन किया करता है उमवे आयु, वन और
आरोग्य का छेदन स्वय यमराज कर दिया करते हैं। जो उपर्युक्त
अनाध्याय दिवमो पे भी पढ़ता है उसको ब्रह्म हत्यारा ही समझना
चाहिए ।।५८॥५६॥ हे विप्रवर ! ऐसे पुरुष के माय भाषण और सङ्ग
भी नहीं करना चाहिये । सोई २ विद्वान् घुण्ड और गोलापा भी
नारद पुराण ] उपनयन सस्कार या ऐसो के पुत्रो वा सस्कार भी निन्दित बताया करते हैं यह अनुचित ही है । जो बिना वेदो के पढे ही स्वय ही पुस्तकें लेकर पहने मे श्रम करता है वह शूद्रवत् ही होता है ॥६०।६१॥ ऐसे पुरुप को चाहे द्विज ही क्यो न हो शूद्र ही समझना चाहिये । ऐसा पुरप तो नरको का परम प्रिय अतिथि हुआ करता है । हे विप्र ! बिना वेदो के अध्ययन के सदाचार का पालन भी निष्फल ही होता है ॥६२॥ इस प्रकार के सदाचरण का कोई भी फल नहीं प्राप्त हुआ करता है क्योकि वह पुरुष विल्कुल शूद्र के ही समान माना जाया करता है । जो ब्राह्मण अनधीत है अर्थात् जिमने वेदो वा अध्ययन नहीं किया है उसके नेत्यिक, नमित्तिक और काम्य सभी प्रकार के वर्म तथा अन्य वैदिक कर्म सभी निष्कल हुआ करते हैं । विष्णु शब्द बृह्ममय है। वेद साक्षात् विष्णु भगवान ही है ॥६३।६४।। अतएव वेदो के अध्ययन करने वाले के सभी मनोरथ परिपूर्ण हुआ करते है ॥६५॥ ब्राह्मण ।। वेदध्ययनादि धर्म वर्णन ॥ वेदग्रहणपर्यंत शुश्रूपानियतो गुरोः । अनुज्ञातस्ततस्तेन कुर्यादग्निपरिग्रहम् ॥१ वेदाच धर्मशास्त्राणि वेदाङ्गान्यपि च द्विज । अधीत्य गुरुवे दत्त्वा दक्षिणा सविशेद् गृहम् ॥२ रूपलावण्यसपन्ना सगुणा सुकुलोद्भवाम् । द्विज समुद्हेत्कन्या सुशीला धर्मचारिणीम् ॥३ मातृत पञ्चमी धीमान्पितृत सप्तमी तथा । द्विज समुद्हेत्कन्यामन्यया गुरुतल्पग ॥४ रोगिणी चव वृत्ताक्षा सरोगकुलसभवाम् । अतिकेशामकेशा च वाचाला नोद्वहेह बुध. ॥५ ४६० [ नारद पुराण कोपना वामना चैव दीघदेहा विरूपिणीम् । न्यूनाधिकाङ्गीमुन्मत्ता पिशुना नोद्वहेद बुध ॥६ स्फूलगुल्फा दीर्घजघा तथैत पुरुषाकृतिम् । श्मश्रु व्यजनसयुक्ता कुब्जा जैवोदहेन्न च ॥७ श्री सनकदेवाचार्य ने कहा-ब्रह्मचारी व्यक्ति का कत्र्तव्य है कि अपने गुरु की सेवा करते हुये वेदो के अध्ययन को साङ्गोपाङ्ग समाप्त करके ही फिर अग्नि को धारण करे ॥१॥ ब्रह्मचारी का कत्तव्य है कि वेद धर्मशास्त्र और वेदो के अङ्ग शास्त्रा को पढ़कर ही गुरुदेव को दक्षिणा अर्पित करके फिर गार्ह म्थ्य मे प्रवेश करे अर्थात् ब्रह्मचर्य से गृहस्थ बन जावे ॥२॥ उस गृहस्थाश्रमी होने की इच्छा वाले द्विज को ऐसी ही कन्या से विवाह करना चाहिय जो रूप लावण्य से युक्त, गुणवती, सत्कुल समुत्पन्न, शीलवती और धर्म का आचरण करने वाली हो, विद्वान् द्विज को, अपन मातृ कुल मे पांचवी पीढी की और पितृ कुल म सातवी पीढी की कन्या से विवाह करना चाहिए अर्थात् मौसी, मामी, भूआ आदि की कन्या से नहीं करे अन्यथा गुरुतल्पगामी महा पापी होता है ॥४॥ रोगिणी, गोल नेत्रो वाली, रोगी के कुल म समुत्पन्न, अधिन धन केशो वाली, गजी, अधिक बोलने वाली वन्या से विद्वान् को कभी विवाह नहीं करना चाहिए ॥५॥ विद्वान् को क्रोध बरन के स्वभाव वानी, बहुत लम्बी, बौनी, विरूपा, अधिक अङ्गो वालो, विक्लाङ्गी ( कानो या छड्गी) कन्या के साथ कभी भी विवाह नही करना चाहिय । जो अन्युमत्त अथवा चुगली करने के स्वभाव वाली कन्या हो उमस भी विवाह म परे ।। मोटे टखनो गे युक्त शरीर वाली, लम्बी जोपो वाली, पुरपके समान आकृति वालो, दाढ़ी मृछ। पाली हा और जा यही हो ऐसी धन्या मे भी विवाह नहीं करना चाहिय ॥७॥ वृथाहास्यमुपी चैव मदान्यगृहवामिनीम् ।
पारद पुराण ]
विवादशीलां भ्रमिता निष्ठुरां नोदहेद् वुधः ॥
वह्वशिनी स्थूलदता स्थूलोष्ठी धुषुरस्वनाम् ।
अतिकृष्णा रक्तवर्णां धूर्ता नैवोद्वहेद बुध ॥६
सदा रोदनशीला च पाण्डुराभा च कुत्सिताम् ।
कासश्वासादिसयुक्ता निद्राशीला च नोहहेत् ॥१०
अनर्थभाषिणी चैव लोकद्वेपपरायणाम् ।
परापवादनिरता तस्करा नोद्वहेद् वुध ॥११
दीर्घनासा च कितवा तनूरुहविभूपिताम् ।
गविता वकवृत्तिं च सर्वथा नोद्वहेद् बुध ॥१२
वालभानादविज्ञातस्वभावामुद्वहेद्यदि ।
प्रगल्भा वागुणा ज्ञात्वा सर्वथा ता परित्यजेत् ।।१३
भत्तु पुनेपु या नारी सर्वदा निष्ठुरा भवेत् ।
परानुकुलिनी या च सर्वथा ता परित्यजेत् ।।१४
विना ही किसी कारण के व्यर्थ ही मे हंसने वाली, दूसरो के
घर में निवास करने की इच्छा या रुचि रखने वाली, झगडा करने के
स्वभाव से सयुत भ्रम मे युक्त और अति निष्ठुर स्वभाव की कन्या से
भी विवाह नहीं करना चाहिये 11८। विद्वान् पुस्प को चाहिये कि वह
अधिन खाने वाली, बडे दांतो वाली, धुपुर ध्वनि करने वाली,
अत्यधिक काले वर्ण वाली, रक्त वर्ण से युक्त और जो धूर्ती हो ऐसी
कन्या के साथ विवाह न करे ॥६॥ जो सदा ही रोते रहने के स्वभाव
वाली हो,पाण्डुर वर्ण की आभा से युक्त कास और श्वास रोग वाली,
कुत्मित, सदा शयन ही करन वाली कन्या के साथ भी विवाह नहीं
करना चाहिये ॥१०॥ अनर्थक एव अमम्बन्धित बातें करने वाली,
सभी से द्वेष भाव रखने वाली, दूसरो की निन्दा मे निरत रहने वाली,
चारी करने वाली कन्या से भी विवाह नहीं करना चाहिये ॥११॥ जो
लम्बी नामिका से युक्त हो, चूत क्रीडा करने वाली हो, मर्वाङ्ग में
४६२ [ नारद पुराण लम्बे के शो वाली, अभिमान से भरी हुई, देखने में सीधी मगर मन से चालाक कन्या में भी विवाह नही करना चाहिए। यदि बालभाव वश अथवा स्वभाव का ठीव जान न होने पर ऐसी कन्या से विवाह भी हो जावे तो उसको अति प्रगल्भ और गुणहीन मानकर उसका त्याग वर देना चाहिए ।।१३।। जा नारी सदा ही अपने स्वामी और पुत्रो से निष्टुरता का व्यवहार किया करती हो अन्यो के अनुकूल रहा करती हो उसका सर्वथा त्याग कर देना चाहिए ॥१४॥ विवाहाश्चाष्टधा ज्ञेया ब्रह्माद्या मुनिसत्तम । पूर्व पूर्वो वरो ज्ञेय पूर्वाभावे पर पर ॥१५ ब्राह्मो देवस्तथैवापं प्राजापत्यस्तथासुर । गाधर्वोराक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमो मत ॥१६ ब्राह्मण च विवाहेन वैवाह्यो वै द्विजोत्तम । देवेनाप्यथवा विप्र केचिदाप प्रचक्षते ॥१७ प्राजापत्यादयो विप्र विवाहा पच गहिता । अभावेषु तु पूर्वपा कुर्यादेव परान्बुध ॥१८ यज्ञोपवीतद्वितय सोत्तरीय च धारयेत् । सुवर्णकुण्डले चैव धौतवस्त्रद्वय तथा ॥१६ अनुलोपनलिप्ताग कृत्तकेशनख शुचि । धारयेद्वैणव दड सोमक च कमडलुम् ॥२० उप्णीपममल छत्र पादुके चाप्युपानहौ । धारये पुष्पमाल्ये च सुगध प्रियदर्शन ॥२१ हे परमश्रेष्ठ मने । विवाह भी ब्राह्मणादि आठ प्रकार के होते हैं । इन आठो मे प्रथम विवाह ही घोट विवाह माना गया है यदि प्रथम न बन मके तो इसके अभाव मे दूसरा विवाह करे । इसी क्रम से एक दूसरे में निम्न श्रेणी के विवाह हैं जो अभाव मे ही करने चाहिए अन्यथा न्यूनतम विवाह कभी न करे ॥१५॥ आठ तरह के विवाहो के
४६३
नारद पुराण ]
नाम ये हैं ब्राह्म, देव, आर्ष, प्रजापात्य, आसुर,गान्धर्व, राक्षस और
पैशाच । ये आठ विवाह के भेद हुआ करते हैं ।।१६।। श्रेष्ठ ब्राह्मण को
ब्राह्म विवाह ही करना चाहिये । हे विप्रवर । कोई २ आचार्य देव
और आप विवाह करने की भी आज्ञा दिया करते हैं ॥१७॥ प्राजा-
पत्य से लेकर अन्य जो पांच प्रकार के विवाह होत हैं वे इन तीनो की
समानता रखने वाले नहीं माने जाया करते हैं। यदि प्रथम श्रेष्ठ
विवाह नहीं हो सके तो अगले दो विवाहो में जो भी बन सके विवाह
विद्वान पुरुष को करना अवश्य ही चाहिए ।।१८।। ब्रह्मचर्य को त्याग
कर गृहस्थ होन पर द्विज को दो यज्ञोपवीत, दो अङ्गो का, सुवर्ण के
दो कुण्डल और धोती जोडा अवश्य ही अपने समीप मे रखना चाहिए
॥१६॥ उसको फिर उवटना, तेल और चन्दनादि का प्रयोग भी
अवश्य करना चाहिए । अपने देश और नखो को कटवा कर परम
पवित्र रहे तथा सदा अपने पास एक बांस की यष्टि और जलसे परिपूर्ण
कमण्डलु रखना चाहिए ।।२०।। मस्तक पर स्वच्छ शिरोवेष्टन ( पगडी
आदि ) छाता, खडाऊ या पादत्राण (जूत) आदि पहिनना चाहिए।
परम सुन्दर वस्तुओ को धारण किया करे । इस विधि से गृहस्था-
श्रमी को परम प्रिय दर्शन होकर ही रहना चाहिये ॥२१
नित्य स्वाध्यायशील स्याद्यथाचार समाचरेत् ।
परान्न नैव भुजीत परवाद च वजेत् ॥२२
पादेन नाक्रमेत्पादमुच्छिष्ट नैव लघयेत् ।
न सहताभ्या हस्तान्ता कडयेदात्मन शिर ॥२३
पूज्य देवालय चैव नापसव्य व्रजेद द्विज ।
देवार्चाचमनस्नानव्रतश्राद्धक्रियादिषु ।।२४
न भवेन्मुक्तकेशश्च नक्वस्त्रधरस्तथा ।
नारोहेद दुष्टयान च शुष्क्वाद च वर्जयेत् ॥२५
अन्यस्त्रिय न गच्छेच्च पैशुन्य परिवर्जयेत् ।
[ नारद पुराण
नापसव्य ब्रजेद्विप्र गोश्वत्थानलपर्वतान् ॥२६
चतुप्पथ चैत्यवृक्ष देवखात नृप तथा।
असूया मत्सरवं च दिवास्वाप च वर्जयेत् ॥२७
न वदे परपापानि स्वपुण्य न प्रकाशयेत् ।
स्वक नाम स्वनक्षत्र मान चैवातिगोपयेत् ॥२८
गृहस्थी को भो सदा स्वाध्याय करते रहना चाहिए और अपने
वर्णाश्रम धर्म के ही अनुसार आचरण करे, भरसक दूसरो के अन्न का
सेवन कग्न से वचता रहे और कभी भी अन्य लोगो को निन्दा न
करे चाहे कोई बुरे से भी बुरा क्यो न हो ॥२२॥ अपने पैर से पैर
को कभी नहीं दबाना चाहिए। उच्छिष्ट पदार्थ का उल्लघन न करे,
दोनो हाथो को एक साथ मिलाकर अपना शिर कभी नहीं खुजलाना
चाहिए। ये सब बुरे लक्षण घातक हुआ करते हैं ॥२३॥ द्विज को
चाहिए हमेशा पूज्य देवालय को दाई ओर करके ही गमन किया करे।
देवाचन, स्नान, आच मन, व्रत और श्राद्धकर्मादि के करने के समय
मे अपनी शिखा और केशो को खुला हुआ नही रक्खे या एक ही
वस्त्र भी पहिन कर नही रहना चाहिए । कभी भी बुरी सवारी पर
आराहण न करे तथा व्यर्थ प्रयोजनशून्य विवाद भी न करे ॥२४॥२५॥
व्यभिचार, चुगली कभी भी नही करे। हमेशा इसका ध्यान रखे कि
गमन के समय मे यदि गौ, पीपल का वृक्ष, अग्नि और पवत पडे तो
इनको अपने वाम भाग मे करवे गमन नही करना चाहिए ॥२६॥
इमी विधि अनुसार चौराह ( चतुष्पय ) चैत्यवृक्ष और देव स्थान
को सदा अपने दक्षिण भाग मे लेता हुआ ही गमन करना चाहिए।
गृहस्थी को असया, मत्मरता, दिवा शयन का सर्वथा त्याग कर देना
चाहिए ॥२७॥ भूल कर भी दूसरे के द्वारा क्यि हुए पाप कर्मों का
अपने मुख स वणन नही करे और अपन द्वारा इन पुण्य वर्मों का भी
अपन मुह में प्रकट नहीं करना चाहिए । मवंदा अपना नाम, नक्षत्र
तथा धन बल का मान गुप्त रखना चाहिए ॥२८॥
४६५ रद पुराण ] न दुर्जनै सह वसेन्नाशास्त्र शृणुयात्तथा । आसवा तगीतेपु द्विजस्तु न रति चरेत् ॥२६ आर्द्रास्थि च तथोच्छिष्ट शूद्र च पतित तथा । सर्प च भपण स्पृष्ट्वा सचैल स्नानमाचरेत् ॥३० चितिं च चितिकाष्ठ च यूप चाडालमेव च । स्पृष्ट्वा देवलक चैव सवासा जलमाविशेत् ॥३१ दीपखट्वातनुच्छाया केशवस्त्रकटोदकम् । अजामानिमार्जारेणुर्दैव शुभ हरेत् ॥३२ शूर्पवात प्रेतधूम तथा शूद्रान्नभोजनम् । वृपलीपतिसङ्ग च दूरत परिवर्जयेत् ॥३३ असच्छास्त्रार्थमनन खादन नखकेशयो । तथैव नग्नशयन मर्मदा परिवर्जयेत् ॥३४ शिरोम्यगावशिष्टन तैलेनाङ्ग न लेपयेत् । ताम्बूलमगुचिं नाद्यात्तथा मुप्त न बोधयेत् ॥३५ दुष्ट लोगो के पडोम मे कभी निवाम न करे। अशास्त्रीय वाने हो उन पर अपना पान प्रवण करने के लिय नहीं लगावे तथा द्विज को आमव, चूत, मादक पदार्थ और गोतो में प्रेम कभी न यरे ॥२६॥ आई अस्थि, उच्छिष्ट, शूद्र, पतित, गपं, स्वान इनम यदि स्पर्श होजाये तो यत्रो के गहिन म्नान करना चाहिए ॥३०॥ चिता और चिता यी माटी, यूप, चाण्डाल और देवनर का म्पनं होने पर भी भवानी म्नान करना चाहिए।३१।दीपा योर पर की छाया,वैशवस्त्र करावा यवर्ग,युटारी, विलाय ये नीचे की धलि ये गभी पदार्थ प्रारBY यसमा माम मरण वाले हुआ परते।। गाया, प्रेत पा UिTI धूम, शूटान्न । माहार, मृदा स्त्री व पति पागनका स्याग दूर नीगं पर देना चाहिए।॥३२॥३३॥ पुरिमा पन्या । मनन, नयाँ मौर रंगों को दोनों मेरादना, नम होरर पन करना आदि मुल- [ नारद पुराण क्षणो का भी अवश्य ही परित्याग कर देना चाहिए। इनके करने में धर्म नाश के साथ युरा प्रभाव भी हुआ करता है ॥३४॥ शिर में डालन स अवशिष्ट तैल को शरीर पर भी नही मलना चाहिए । अपवित्र ताम्बूल का चरण भी कभी न करे और कोई भी शयन का रहा हो तो बिना किसी कारण वे उस न जगावे ॥३५) नाशुद्धोऽग्नि पग्चिरेत्पूजयेन्द्गुरुदेवता । न वामहस्ते येन पिवेद्वकोण वा जलम् ॥३६ न चाक्मेद गुरोश्छाया तदाज्ञा च मुनीश्वर । न निदेद्योगिनो विप्रान्वतिनोऽपि यतीस्तथा ॥३७ परस्परस्य मर्माणि न कदापि वदेद् द्विज । दर्श च पौर्णमास्या च याग कुर्याद्यथाविधि ॥३८ उपासन च होतव्य साय प्रातद्विजातिभि । उपासनपरित्यागो सुरापीत्युच्यते बुधै ॥३६ अयने विषुवे सैव युगादिपु चतुर्वपि । दर्श च प्रेतपक्षे च श्राद्धं कुर्याद् गृही द्विज ॥४० मन्वादिषु मृताहे च अष्टकासु च नारद । नवधान्ये समायाते गृही श्राद्ध समाचरेत् ॥४१ श्रोत्रिये गृहमायाते ग्रहणे चन्द्रसूर्ययो । पुण्यक्षेशेषु तीर्थेपु गृही श्राद्ध समाचरेत् ॥४२ अपविन अथवा अशुद्ध अवस्था मे रहकर भी अग्नि सेवा गुरु और देवो का यजन नहीं करना चाहिए । अकेले अपने वाम कर से पशु के समान पात्र म मुख डाल कर मुख से जल का पान नही करना चाहिए ॥३६।। हे मुनिवर | अपने गुरुदेव की उनकी का कभी भी उल्लघन नहीं करना चाहिए ॥३७॥ द्विज को चाहिए कि आपस के मों का उद्घाटन न करे । अमावस्या और पूर्णिमा तिथियो मे शास्त्रोक्त विधान से यज्ञ करे ।३८॥ द्विजातिया को चाहिए कि नित्य ही नियम पूर्वक प्रात व साय दानो जया और आज्ञा ४६७ नारद पुराण ] कालो मे देवोपासना तथा हवन करना चाहिए । जो द्विज अपनी उचित उपासना का त्याग कर दिया करता है विद्वान लोग उसको सुरापी के समान ही समझा करते हैं ॥३६॥ गार्हस्थ्य आश्रम में रहने वाले द्विज को चाहिये कि वह दक्षिणायन और उत्तरायण के आरम्भ मे विपुव काल मे तुला तथा मेप की सक्राति के अवसर पर चारो युगो की तिथियो जिनका उल्लेख ऊपर किया जा चुका है-अमावस्या और पितृ पक्ष मे श्राद्ध करे ॥४०॥ हे नारद । गृहस्थी द्विज को मन्वादिको तिथियो मे, मृताह मे, अष्टका तथा नूतन धान्य के आने पर श्राद्ध अवश्य ही करना चाहिये ॥४१॥ किसी श्रोत्रिय ब्राह्मण के घर मे समागत होने पर चन्द्र-सूर्य को ग्रहण वेला मे पवित्रतम क्षत्रो तथा धामो और तीर्थ स्थलो मे गृहस्थी को अवश्य ही श्राद्ध करना चाहिए ॥४२॥ यज्ञो दान तपो होम स्वाध्याय पितृतर्पणम् । वृथा भवति तत्सर्वमूर्ध्वपुण्ड विना कृतम् ।।४३ उर्ध्वपुण्ड च तुलसी श्राद्ध नेच्छन्ति केचन । पराचार परित्याज्यस्तस्माच्छ्रे योऽथिभिद्विज ॥४४ इत्येवमादयो धर्मा स्मृतिमार्गप्रचादिता । कार्या द्विजातिभि सम्यक्सर्वकर्मफलप्रदा ॥४५ सदाचारपरा ये तु तेपा विष्णु प्रसीदति । विष्णो प्रसन्नता याते विमसाध्य द्विजोत्तम ॥४६ द्विज या मस्तक कभी भी शून्य नहीं रहना चाहिए । तिलक करने की बहुत बड़ी महिमा है। वैष्णवो व मनानुसार गिना अवं. पुण्ड के यन, दान, तप, होम, म्वाध्याय और पितृ तर्पण सब व्ययं ही जाया परता है ॥४३॥ शैव, शाक्त आदि लोग ऊव पुण्द्र थोर सुलगी को थार म बाई आवश्यकता नहीं समझा करत है य साग अपणो २ गम्प्रदाय व अनुमार त्रिपुण्ड धारण किया बरत है । अत- ४६८ [ नारद पुराण एव परमाधिक श्रेय के अभिलापो द्विज को दूसरो के आधार को त्याग कर अपने ही कुल क्रमागत आचार का पालन करना चाहिए ॥४५॥ स्मृति ग्रन्थो मे वणित इस सदाचरण के नियमो का पालन द्विजो को करना ही चाहिए । ये सदाचरण मभी कमों का फल दिया करते है ॥४५॥ जो द्विजगण सदा सदाचरणो का पालन किया करते हैं उन पर भगवान विष्णु की अधिक प्रसन्नता हुआ करती है । जब भगवान विष्णु प्रसन्न होजाया करते हैं तब फिर कोई भी कम असाध्य नहीं रहा करता है ।।४६ ++++ ।।गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी के धर्म।। गृहस्थस्य सदाचार वक्ष्यामि मुनिसत्तम । यद्वता सर्वपापानि नश्यत्येव न संशयः॥१ ब्राहा मुहूर्ते चोत्थाय पुरुषार्थाविरोधिनीम् । वृत्ति सचितयेद्विध कृतकेशप्रसाधन. ॥२ दिवासध्यासु कर्णस्थब्रह्मसूत्र उदड, मुखः । कुर्यान्मूत्रपुरीचे तु रात्रौदक्षिणामुख. ॥३ शिर प्रावृत्य वीण ह्य तर्तीय तृणे महीम् । वहकाष्ठं करेणक तावन्मौनी भवेद् द्विज. ॥४ पथि गौष्ठे नदीतीरे तडागगृहसन्निधौ । तथा वृक्षस्य च्छायाया कातारे वलिसन्निधौ ।।५ देवालये तथोद्याने कृष्टभूमौ चतुप्पथे । ब्राह्मणाना समीपे च तथा गोपुरायोपिताम् ॥६ तुपागारकपालेय जलमध्ये तथैव च । एवमादिषु देशपु मलमून न कारयेत्त ।।७ नारद पुराण ] के थी सनक महपि ने कहा-हे मुनिश्रेष्ठ ! अब मैं गृहस्थ सदाचरणो का विस्तृत वर्णन करता हूँ-इन सदाचारो का पालन करने वालो के समस्त पाप नष्ट हो जाया करत हैं ॥ १॥ हे विप्रवर ! गृहम्यो द्विज व्यक्ति को ब्राह्म मुहतॊ म ही शय्या से उठकर धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में बाधा पहुंचान वाली आजीविका के विषय मे विचार करना चाहिए। उसी समय म अपन केशो को भी सम्हाल लेवे ।।२।। दोनो समयो मे मूत्र-पुरीपोत्सर्ग करने के समय में यज्ञोपवीत को कान पर चढाकर उत्तर की ओर मुख करके ही करना चाहिए । रात्रि के समय म दक्षिग दिशा की ओर मुख करके ही मल मूत्र का त्याग करना चाहिए ।। ३ ।। मल मूत्र के त्याग करने के ममय म शिर को ममावृत रखे और भूमि पर तृण विछाकर जिससे भूमि का साक्षात मल का स्पर्श न हावे एक हाय स दण्ड को ग्रहण क्यि हुए ही मौत होकर मल का उत्सर्ग करना चाहिए ।। ४ ॥ निम्नलिखित स्थलो पर मल का त्याग कभी नहीं करे---मार्ग, गोठ, नदी तट, तालाव का तीर, वृक्षो की छाया, उपवन, अग्नि की मनिधि दवालय, जुती हुई भूमि, चतुप्पथ, ब्राह्मण, गौ, गुर और स्त्रिया के समीप में भुम, बङ्गार, ( ठीकरी का ढेर, जल का मध्य ये सभी स्थल मल त्याग के लिये वजित हैं ॥५-७॥ शोचे यत्ल सदा कार्य शौचमूलो द्विज, स्मृत । शौचाचारविहीनस्य समस्त कर्म निष्फलम् ।।८ शौच तु द्विविध प्रोक्त वाह्यमाभ्यतर तथा। मृज्जलाभ्या वहि शुद्धिर्भावशुद्धिस्तथातरम् ॥ गृहीतशिश्नश्चो याय शोचार्य मृदमाहरेत् । न मूपकादिखनिता फालोन्कृष्टा तथैव च ।।१० वापीकूपतडागेभ्यो नाहरेदपि मृत्तिकाम् । शौच कुर्यात्प्रयत्लेन समादाय शुभा मृदम् ॥११ लिंगे मृदेका दातव्या तिस्रो वा हस्तयोर्द्वया ।
४७० [ नारद पुराण एतन्मूत्रसमुत्सर्गे शौचमाहुर्मनीपिणः ॥१२ एका लिंगे गुदे पंच दश वामे तथोभयोः । सप्त तिम्रः प्रदातव्या. पादयोमृत्तिकाः पृथक् ॥१३ एतच्छौचं विडुत्सर्ग गन्धलेपापनुत्तये । एतच्छौच गृहस्थस्य द्विगुणं ब्रह्मचारिणाम् ॥१४ निगुण तु वनस्थाना यतीना तच्चतुर्गुणम् । स्वस्थाने पूर्णशौच स्यात्पथ्यद्ध मुनिसत्तम ॥१५ हाश्रमी को सदा परम पवित्र रहने का उद्योग एव प्रबल प्रयत्न करना चाहिये क्योकि द्विजत्व का मूल पवित्रता ही होती है । जो पवित्रता और सदाचरणो से शून्य रहता है उसके द्वारा विहित सभी कम्मं निष्फल हो जाया करते हैं ।। ८ ।। यह पवित्रता बाह्य और आभ्यन्तर के भेदो से दो प्रकार की हुआ करती है। मिट्टी और जल से बाहिरी शुद्धता हुआ करती है तथा मानसिक भावो की शुद्धि से आन्तरिक पवित्रता हुआ करती है ॥ ६॥ फिर निङ्ग को हाथ मे थामे हुए उठकर शौच के लिये मिट्टी लेवे । जहाँ से मृत्तिका का ग्रहण करे उस स्थान को भी पहिले विचार कर देख लेना चाहिए-चूहो तथा अन्य प्राणियो के द्वारा खोदी हुई मिट्टी न लेवे- हलकी नोक से उख ही हुई मिट्टी, बावडी, कूप और तालाब को मिट्टी का भी इस कर्म के लिये कभी ग्रहण नहीं करना चाहिए। अच्छी और शुद्ध मिट्टी लेकर ही प्रयत्नपूर्वक स्वच्छता का सम्पादन करे अर्थात् पवित्र होना चाहिये ।।१०।११॥ उपम्य मे एक वार—दोनो हाथो में दो बार मृत्तिका लगाकर ही मुत्र के उत्सर्ग करने पर विद्वान पुरुष शुद्धता बतलाया करत है ।।१२।। मलोत्सर्ग करने पर दुर्गन्ध का निवारण करने के लिये एक वार लिङ्ग पर-पाच वार गुदा मे-दश वार वाम र मे-दोनो हाथो में सप्त वार परो मे तीन वार मृत्तिका लगानी चाहिये । यह शुचिता गृहस्थो की कही है । ब्रह्मचारी की शुचित्त इससे दुगुनी मृत्तिका 1 ४७१ रिद पुराण ] लगाने से होती है-वानस्थियो की तिगुनी क्रिया करने से ही शुद्धि हुआ करती है। हे मुनिवर । अपन स्थान पर पूर्ण शुचिता जैमी कि शास्त्र म बताई गयी है करनी चाहिए तथा मार्ग में इससे आधी करे ॥१३-१५॥ आतुरे नियमो नास्ति महापदि तथैव च । गन्धलेपक्षपकर शौच कुर्याद्विचक्षण ||१६ स्त्रीणामनुपनीताना गन्धने पक्षयावधि । व्रतस्थाना तु सर्वेपा यतिवच्छोचभिप्यते ॥१७ विधवाना च विरेंद्र एतदेव निगद्यते । एव शोच तु निर्व य पश्चाद्वै सुसमाहित ॥१८ प्रागास्य उदगास्यो वाप्याचामेत्प्रयनेंद्रिय । त्रिश्चनुर्धा पिवेदापो गन्धकेनादिवजित ॥१६ द्विजियेत्कपोल च तलेनोष्ठौ च सत्तम । तर्जन्यगुष्ठयोगेन नासारध्रद्वय स्पृशत् ।।२० अगुष्ठानामिकाध्या च चक्षु श्रोगे यथाक्रमम् । कनिष्टागुष्ठयोगेन नाभिदेशे स्पृशेद् द्विज ॥२१ रग्णावस्था म और परम घोर आपति के समय मे शुचिता जितनी भी वन पडे करे वहा पर कोई भी नियम नहीं बताया गया है । चतुर पुरुष को दुर्गन्ध के निवारण करने तक शुद्धि अवश्य ही करनी चाहिये ।।१६।। स्त्रियो वा और ऐसे वालका का जिनका उपवीत नहीं हुआ हो इतनी ही शुचिता पर्याप्त है जिससे गन्ध का निवारण हो जावे। जगे व्रत करे उनका सन्यामिया के तुल्य ही शुद्धि करनी चाहिए ॥ १७॥ हे विप्रवर । विधवा स्त्रिया की शुचिता के लिये यही नियम होते है। इस रीति से शुचिता करके परम समाहित होकर उत्तर अथवा पूर्व की ओर मुख करके गन्ध-जन आदि से रहित विशुद्ध निमन जल वो तीन चार वार पोकर आचमन करे ।। १८, १६॥ह मुनि सत्तम । इसके उपगन्त दो बार जल से पालो को धोव तथा दो बार ही अपने होटो का प्रक्षालन करे । पीछे तजनी अंगुलि और अंगूठे से नासिका के छिद्रा को साफ करे ॥२०॥ अंगुष्ठ और अनामिका अगुलि की सहायता ४७२ [ नारद पुराण से क्रम में नेत्रों और पानी का स्पर्श पर शुद्ध करें। इसके पश्चात का कर्तव्य है कि कनिष्ठिका अंगुली और अँगूठे से नाभि देश का स्पर्श करना चाहिय ।।२१।। तलेनोर स्थल चैव अगुल्प शिर स्पृशेत् । तलेन चाड गुलावा स्पृशेदसो विचक्षण ॥२२ एक्माचम्य विपद्र शुद्धिमाप्नोत्यमुत्तमाम् । दतकाष्ठ तत खादेत्सत्वच शस्तवृक्षजम् ॥२३ विल्यासनापामार्गाणा निम्बाम्राौदिशाखिनाम् । प्रक्षाल्य वापिणा चैव मीणाप्यभिमत्रितम् ॥२४ आयुर्वल यशो वर्ष प्रजा पशुवसूनि च । ब्रह्म प्रज्ञा च मेधा च त्वन्नो धेहि वनस्पते ।।२५ कनिष्ठाग्रसम स्थोल्ये विप्र खादेदशागुलम् । नवागुल क्षनियश्च वैश्यपचाष्टाह गुलोन्मितम् ॥२६ शूद्रो वेदाड गुलमित वनिता च मुनीश्वर । अलाभे दन्तकाष्ठाना गडूपैर्भानुसमित १२७ मुखशुद्धिविधीयेत्त तृणपत्रसमन्विते । करेणादाय वामेन संचर्वेद्वातदष्ट्रया ।।२८ हाथ की हथेली स द्विज को अपने वक्ष स्थल का स्पर्श करना चाहिये--अंगुलियो के अग्रभाग से अपने शिर का स्पश करे फिर चतुर पुरुप को अपनी अंगुलियो के अग्रभाग से दोनो कन्धो का स्पश करना चाहिए ।२२। हे विप्रवर । इस विधि से सम्पूण अङ्गो का स्पर्धा करके तथा आचमन करके श्रेष्ठ शुचिता हुआ करती है । इसके उपरान्त किसी श्रेष्ठ वृक्ष की छालदार दातुन करे । दन्त धावन करने के लिए खेल, विजयसार, चिरविटा, नीम आम्र और मदार की टहनी को पहिरो प्रसालित करे और फिर निम्न मन्त्र पढ़कर अभिमन्त्रित करे-- 'आयुवल यशो दर्व प्रजा पशु सूनिच । ब्रह्म प्रमा म मेधा च स्वनो देहि वनस्पते । अर्थात् हे वनस्पते । तुम मुझको मायु, वल, यज्ञ, तेज सन्तति पशु धन, वेद ज्ञान, बुद्धि और मघा दो। इस से पढ़ करके अभिमन्त्रण करके फिर दातुन का ग्रहण करना चाहिए ॥२३-२५॥ प्राह्मण को कनिष्ठिका के तुल्य स्यूल दश अगुल ४७५ [ नारद पुराण - प्रणाम करे। फिर रविमण्डल से भगवान् वा आवाहन परके गन्धादि से मण्डल की रचना करता हुआ जनार्दन भगवान् का सस्मरण करके गङ्गा आदि तीर्थों के पावन शुभ नामो या ममुच्चारण करते हुए स्नान करे ||३१--३२॥ तीर्थों के स्मरण करने के मन्त्री का निम्न रोति से ही पाठ करते हुए स्नान करने का विधान है । मन्त्र ये हैं... 'गङ्ग च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जले ऽस्मिामाग्निध कुरु । पुष्कराद्यानि तीर्याणि गङ्गायाः सरितस्तथा । आगच्छन्तु महाभागा स्नान काले सदा मम । अयोध्या मथुरा माया काशी-काञ्ची अवन्तिका । पुरी द्वारावती ज्ञयाः सप्तता मोक्ष दायिका ।' अर्थात् हे गङ्गा, यमुना, गोदाबरी, नर्मदा, सिन्धु और कावेरी । आप सब इस जल मे सन्निधान करिये और अपना पुण्य प्रभाव इसमे डालिये । मेरे इस स्नान-काल मे गङ्गा प्रभृति समस्त पावन नदियाँ तथा पुष्कर आदि महाभाग समस्त तीर्थ सर्वदा यहाँ पदार्पण करे । अयोध्या, मथुरा, माया ( हरिद्वार ), काशी, काञ्ची, अवन्तिका ( उज्जैन ) और द्वारका इन सातो पुरियो को मोक्ष देने वाली कहा गया है ॥३३-३५॥ ततोऽघमर्पण जप्त्वा यतासुर्वारिसप्लुत । स्नानाग तर्पण कृत्वाचम्याऱ्या भानवेऽर्पयेत् ।।३६ ततो ध्यात्वा विवस्वत जलान्निर्गत्य नारद । परिधायाहत धौत द्वितीय परिवार्य च ॥३७ कुशासने समाविश्य सध्याकर्म समारभेत् । ईशानाभिमुखो विप्र गायत्र्याचम्य वै द्विज ॥३८ ऋतमित्यभिमन्याथ पुनरेवाचमेद् बुधः । ततस्तु वारिणात्मान वेष्टयित्वा समुध्य च ॥३६ सकल्प्य प्रणवान्ते तु ऋपिच्छन्द सुरान्स्मरन् । भूरादिभिहृितिभि. सप्तभि प्रोक्ष्य मस्तकम् ॥४० नारद पुराण ] न्यास समाचरे-मन्त्री पुथगेव करागयो । विन्यस्य हृदये तार भू शिरस्यथ विन्यसेत् ।।४१ भुव शिखाया स्वश्चैव कवचे भूर्भुवोऽक्षिपु। भूर्भुव स्वस्तक्षापास्त दिक्षु तालत्रय न्यसेत् ॥४२ इसके अनन्तर अघमपण मन्त्र का जप करे--प्राणायाम करे और जल से आर्द्र रहते हुये ही स्नानाङ्ग तर्पण करे । इसके उप- रान्त आचमन करके सूर्य देव को अर्घ्य देव ।।३६।। हे नारद 1 जल से निकलकर सूय देव का ध्यान करके शाटी धारण करे और दूसरा वस्त्र भी समीप रखकर दर्भासन पर स्थित होकर मध्या फर्म करे । हे द्विजवय । ईशान कोण विदिशा की ओर मुह करके आचमन न करे ॥३७-३८।। 'ऋत च सत्यम्' इत्यादि मन्त्रो का उच्चारण करके वद्वान् पुरुप को पुन आचमन करना चाहिए । इसके पश्चात् अपन वारो ओर जत से घेरा देवर ममुक्षण करे ॥ ३६ । इसके पश्चात सकल्प करे। प्रणव के अन्त मे ऋषि छन्द और देवता का स्मरण करना हुआ भू-भुव -स्व-मह जन -तप-सत्यम्-इन सात महाव्याहृतियो से अपने शिर पर प्रोक्षण करना चाहिए ॥ ४० ॥ इसके उपरान्त मन्त्रो क साय वरन्यास और अङ्गन्यास करे । जोर के साथ-ॐ भू-ऐसा उच्चारण करता हुआ हृदय का हृदयाय नम कहार स्पश करे। ॐ भुव' यह बोलता हुआ 'शिर स स्वाहा कहकर शिर पर न्यास करे । 'ॐ स्व'-देवाय वषट् कहार शिखा या स्पर्श करे।' 'ॐ भूमुंद स्व' इसका उच्चारण करते हुए दाना भुजाओ का स्पर्श करना चाहिए । इमी रीति से ॐ भू मुव स्व कहार दोना नत्रा का स्पश करे और अन्त म '2. अम्पाय पद' पह वह वर दिशाओ मनीन तालियां बजाव ॥४१६४२।। । तत आवाहयेत्सध्या प्रात योक्नदस्थिताम् । आगच्छ वरदे देवि भ्यक्षरे ब्रह्मवादिनि ॥४३ . .
[ नारद पुरान
गायत्रि च्छन्दसा मातब्रह्मयोने नमोऽस्तु ते ।
मध्याह्नेवृपभारूढा शुक्लाम्बरसमावृताम् ॥४४
सावित्री रुद्रयोनि चावाहयेद्रुद्रवादिनीम् ।
साय तु गरुडारूढा पीताम्वरसमावृताम् ॥४५
सरस्वती विष्णुयोनिमाहवयेद्विष्णुवादिनीम् ।
तारं च व्याहृतोः सप्तत्रिपदा च समुच्चरन् ॥४६
शिर शिखा च सपूर्य कु भयित्वा विरेचयेत् ।
वाममध्यात्परैर्वायु क्रमेण प्राणसयमे ॥४७
द्विराचामेत्तत पश्चात्प्रातः सूर्यश्चमेति च ।
आप पुनन्तु मध्याह्ने साथमग्निश्चमेति च ॥४८
आपो हिष्ठति तिसृधिर्मार्जन च ततश्चरेत् ।
सुमित्रिया न इत्युक्त्वा नासास्पृष्टजलेन च ।।४६
द्विपद्वर्ग समुत्सार्य द्रुपदा शिरसि क्षिपेत् ।
ऋत च सत्यमेतेन कृत्वा चैवाघमर्षणम् ॥५०
इसके अनन्तर प्रात.काल की सन्ध्या के अवसर पर रक्त
वर्ण के कमल पर विराजमान श्री गायत्री माता का आवाहन निम्न
लियित मन्त्र को पढते हुए परना चाहिये ।
'आगच्छ वरदे देवि ।
त्यक्षरे ब्रह्मवादिनि । गायति छन्दसा मातम योते नमोऽस्तुते'
अर्थात हे गायत्री माता ! आपका समुत्पत्ति स्थान वेद है, आप
समस्त छन्दो की जननी हैं तथा तीन अक्षरो वाली है और ग्रहह्म आदि
यो भी वरदान प्रदान करने वाली है । ऐसो गायत्री देवी यहाँ पधारिये
आपरी मेवा मे मेरा प्रणाम अस्ति है। तीनो कालो मे तीन पो था
कृषक ध्यान होता है । मध्याह्न के मध्य में वृषभ पर चढ़ी हुई-शुक्ल
वस्त्रो को धारण करने वाली-स्पोनि-दाहिनी तया मावित्री के रूप
वाली देसी या आवाहन परना चाहिए, मायद्वकाल के समय में गाड पर
ममारूद-पीताम्बर धारण करने वासी-विष्य योनि एय दिएणु यास्निी
४७७ नारद पुराण ] स्पर्श कर शन्नु सरस्वती के स्वरूप वाली देवी को आवाहन करे। इसके उपरान्त उच्च स्वर मे सात महाव्याहृतियो वाली त्रिपदा गायत्री का उच्चारण करते हुए शिर और शिखा पर्यन्त प्राणवायु को चढाकर विरेचन करे । प्राणायाम मे वायु का पूरण-कुम्भन और विरेचन करना चाहिए । प्रात काल मे 'मूर्यश्च या' इत्यादि मन्त्र को उच्चरित करते हुए आचमन करना चाहिए । मध्यान्ह वला मे 'आप. पुनन्तु' इत्यादि मन्त्र से दो वार आचमन करे तथा माय मन्ध्योपासना के अवसर पर आश्च श्चया' इत्यादि मन्त्र से आचमन करे ।।४३-४८।। इसके पश्चात् 'आपोहिहा इत्यादि नीन ऋचाओ मे माजन करे और पीछे 'सुमत्रिया न आप' इत्यदि मन्त्र को पढ़ कर नाक वर्ग का समुत्मारण करे। पीछे 'दुपदादिव' इत्यादि मन्त्र को पढ़ कर शिर पर जल के छोटे देवे । फिर 'ऋत च मत्यम्' इत्यादि मन्त्र से अघमर्पण करे ॥४६॥५०॥ अन्तश्चरसि मोण सकृदेव पिबेदप । तत सूर्यायविधिवदगध पुप्प जलाजलिम् ॥५१ क्षिप्त्वोपतिप्ठेदेव भास्कर स्वस्तिकाजलि । ऊर्ध्ववाहुरधोवाहु क्रमात्कल्यादिके मिके ॥५२ उदुत्य चित्र तच्चक्षुरित्येतत्त्रितय जपेन् । तेजोऽसि गायत्र्यसीति प्राथयेत्सवितुमह । ततोऽङ्गानि गिरावत्यं ध्यायच्छक्तीस्तदात्मिका ॥५४ ब्रह्माणी चतुराननाक्षवलया कुम्भ कर. स्रक्सवी विभ्राणा त्वरणे दुफातिवदना मारूपिणी वालिया। हसारोहणोलिसण्यण्मविवाचिता भूपिता गायत्री परिभाविता भवतु न मपत्समृदय सदा ॥५५ रद्राणी गवयोयना प्रिनयना वयाघ्रचर्माम्बरा पटवागनिशियाक्षमूत्र दलयाभीतिश्रियं चास्तु न.।
४७८ [ मारद पुरण विद्य द्दामजटाकलापविलसद्वालेंदुमौलिमुदा सावित्री वृषवाहना सिततनुषंया यजुरूपिणी ।।५६ इसके अनन्तर 'अन्तश्चारसि'-इत्यादि मन्त्र को पढ करके आचमन करे और फिर विधि पूर्वक गन्ध-पुष्प से समन्वित जलाजलि सूर्य देव को देनी चाहिए। हे देवर्षे ! स्वस्तिकाजलि करके सूर्य का उपस्थान करना चाहिए । मध्यान्ह के समय में ऊर्ववाहु रहे और सायकाल के समय मे अधोवाहु रहे ।।५१।५२।। 'उहुत्यम्'-'चित्रम्'--- 'तच्चा०' इत्यादि तीन ऋचाओ को जपता हुआ हे नारद । उस समय मे सूर्य, शिव और विष्णु सम्प्रदायो के अन्य मन्त्रो का भी उच्चारण करना चाहिए ।।५३।। फिर 'तेजोऽसि गायथ्यसीति' इस मन्त्र को पढ कर सूर्य भगवान के अपरिमित तेज का ध्यान करे । इसके पश्चात् ब्रह्म के अङ्गो का तीन नामोच्चारण करे और उसकी शक्तियो का ध्यान करना चाहिए ॥५४॥ ध्यान के मन्त्र ये है- 'ब्रह्माणी चतुराननाक्ष वलया कुम्भ कर बक्य वो विभ्राणा त्वर- णेन्दु कान्तिवदना ऋन पिणी बालिका । हसारोहण केलि खण्खण्मणे. विवाचिता भूपिता : गायत्री परिभाविता भवतु न.सम्पत्समृद्धयं सदा'- अर्थात् चौमुखी रुद्राक्षो की माला वो हाथ में धारण करने वाली, दोनो करो मे यव और सवा और कुम्भ को धारण करने वाली, अरुण चन्द्र के समान मुख यान्तिमती, ब्रह्मा के तुल्य यालिवा-न पिणी, हम पर गमारद, पनखनाहट करती हुई मणियो के प्रतिविम्ब से अचित ऐमी परम विभूपित गायत्री देवी ध्यान परने पर हमारी सम्पत्ति की गमृद्धि करें ॥५५॥ व मध्यानबालीन ध्यान बताया जाता है-'रद्राणी नवयोयना त्रिनयना ययाघ्रनर्मा- मरा यट्वाङ्गनिशियाममूवनयाभीतिथिमे वास्तु नः । विथ दा. मजटा कलाप दिल मदालेन्दुमोलिमुंदा मावित्रीयपवाहना मिततनुर्गेया यज रूपिणी ।।' अर्पा र पे सहग स्थान में गमन्यिा, नूतन यौवन रूप वाली नारद पुराण ] ४७६ से भूपित, तीन नेत्र धारण करने वाली, व्याघ्र चर्म ( बाघम्बर ) यो ओढे हुए, खाट का एक पाया, त्रिशन यक्ष मून अर्थात् स्द्राक्ष माला तथा बड्डण धारण करने वाली, विझत के समान कान्ति- मती, अपनी जटाजूट में वाल चन्द्र को मस्तर पर सानन्द धारण करने वाली, वृपम के वाहन वानी, गौर वर्ण से युक्त, यजुर्वेद मे वर्णित रूप वाली, ऐमी सावित्री देवी ध्यान मे लाने पर हमारी सम्पत्ति को वढाने और अभौति हमकी प्रदान करे ॥५६}] ध्येया सा च सरस्वती भगवती पीतावरालकृता श्यामा श्यामतनुरोपरिलसद् गानाचिता वैष्णवी। ताक्ष्यस्थामणिनूपुरागदलसद्ग वेयभूपोज्ज्वला हस्तालवृतभखचा मुगदा पदमा धियं चास्तु न ।।५७ एष ध्यात्वा जपेत्तिष्ठन्प्रातमध्याह्नके तथा। सायकाले समासीनो भक्तया तद्गतमानस. ॥५८ सहस्रपरमा देवी रतमध्या दशावराम् । निपदा प्रणवोपेता भूर्भुव स्वरुपामाम् ॥५६ पट्तार सपुटो वापि प्रतिनश्च यतेजप । ग्रहम्यस्य सतार म्याज्जप्य एव विधी मुने ॥६० ततो जप्त्वा यथाशक्ति मवि विनिवेद्य च। गायत्र्यं च सविन च प्रक्षिपेदजलिद्वयम् ॥६१ ततो विमृज्य ता विप्र उतरे इति मयत । ब्रह्मगंशन हरिणानुनाता गच्छ सादरम् ॥६२ दिभ्यो दिग्देवताभ्यश्च नमस्कृत्य नाजति । प्रातरादे पर कर्म पुर्यादपि विधानत ॥६३ अब गारदालीन ध्यान या वन पिया जाता है । मयान में गमय में गायत्री का ध्यान करना चाहिए। 'ध्येया गा गरम्यमी भगमी पीताम्बराहता, यसमा श्याम ननुजम मात्रामा ४८० [ नारद पुराण गैष्णवी। तार्यस्थामणिन् पुराङ्गदलसद्गवेयभूपोज्ज्वल, हस्तालकृत शख चक्र सुगदा पद्मा धिमै चास्तुन.' । अर्थात् सन्ध्या समय भगवती गायनी देवी के स्वरूप का ध्यान विष्णु के समान रूपवती सरस्वती के तुल्य जैसा ध्यान करना चाहिए। भगवती गायत्री देवी पीत वर्ण के वस्त्रो को धारण करने वाली हैं । आप श्यामा हैं और श्याम ही आपका स्वरूप है अर्थात् शरीर है, वृद्धता की आभा से गरड पर समारूढ हैं । मणि यो से निर्मित नूपुर और बाजूबन्दो से देदीप्यमान तथा हार के भूषण से समुज्वल, हाथो मे शख, चक्र, गदा और पद्म धारण करने वाली ऐसी जगन्माता देवी हमारी सम्पत्ति के वर्धन के लिये पधारे ।।५७।। तीनो कालो मे भिन्न रूपो का ध्यान करके गायत्री मे भक्ति युक्त होकर मन को लगा कर अपने आसन पर शान्त भाव से बैठ कर जाप करना चाहिये ॥५८।। हे मुनिवर । गायत्री मन्त्र का एक महस्र जाप उत्तम कहा जाता है। एक माला का जाप मध्यम कोटि का जाप कहा जाया करता है तथा दश वार का जाप साधारण होता है । इस नीन पदो वाली गायत्री को प्रण व (ॐ) 'ओ३म् भू- भुव स्व' पहिले जोड कर जाप करना चाहिये । जो ब्रह्मचारी या सन्यासी हो उनको आदि अन्त दोनो ओर उक्त प्रणव सहित व्याह- तिया छोड कर जाप करना चाहिये । गृहस्थी द्विज उक्त रीति से सम्पुटित न करके भी जाप कर सकता है ॥५६-६०॥ यथा शक्ति जप करके भगवान् सूर्य देव की सेवा में समर्पित कर देवे । इसके अनन्तर गायनी देवी और सूर्य भगवान को दा अञ्जलि देनी चाहिए ॥६१।। इसके पश्चात् 'उत्तरे शिखरे' इत्यादि मन्त्र के द्वारा गायत्री का विसर्जन करे। उस समय में यह प्रार्थना करे कि अव तो आप पधारें किन्तु त्रिदेव (ब्रह्मा-विष्णु)मे हमारे कर्म वर्णन कर उनसे अनुमत होकर पुन पगरियेगा ॥६२॥ फिर इसके अगत्तर दिशा विदिशाओ के लिए हाथ जोड र अर्थात् दिदेवो को साजति प्रणाम करना नारद पुराण । ४५१ चाहिए । इसके बार मे प्रात काल मे होने वाले अन्य कृत्यो का सम्पा- दन करना चाहिए ॥६॥ प्रातमध्यदिने चंच गृहस्थ स्लानमाचरेत् । वानप्रस्थश्च देवर्षे स्नायास्तिपवण यति ॥६४ आतुराणा तु रोगाचे पाथाना च सकृन्मतम् । ब्रह्मयज्ञ तत कुर्यादर्भपाणिर्मुनीश्वर ॥६५ दिवोदितानि कर्माणि प्रमादादकृतानि चेत् । शर्वर्या प्रथमे यामे तानि कुर्याद्यथा-मम् ॥६६ नोपास्ते यो द्विज सध्या धूर्तवुद्धिरनापदि । पापड स हि विजय सर्वधर्मवहिप्कृत ॥६७ यस्तु सध्यादिवर्माणि कूटयुक्तिविशारद. । परित्यजति त विद्यान्महापातपिना वरम् ।।६८ ये द्विजा अभिभाषन्ते त्यक्तसध्यादिकमण । ते याति नरकान्धोरान्यावच्चन्द्रार्कतारकम् ।।६६ देवार्चन तत कुर्याद्वैश्वदेव यथाविधि । तत्यमतिथि सम्यगन्नाद्यश्च प्रपूजयेत् ॥७० हे देव । रहस्थी और वानप्रस्थो का प्रात मध्य न दो बार नित्य स्नान करना चाहिए किन्तु मन्यामी को तीनो उपासना के योग्य पानी में अवश्य हो नित्य स्नान करना चाहिए ॥६४।। जो रागादि म पीडित हा और यात्रा में हो तो उनका एक ही बार स्नान करन वा मिदान्त है । हे मुनिवर । इसके उपरान्त हाय में दर्भ ग्रहण वरपे ग्रह्म या मरा चाहिए ॥६५॥ यदि बाद वन ऐमा है जिसरा दिन यही समय म पूर्ण करना लावरम है और विसी कारण उस दिन में पूरा नही विगा जा सकाहाना त्यामन पर रात्रि हो प्रथम माम में घर मा पाहिए ॥६६॥ बिना किसी विश्य भाषा में गमामा हा पूर्णता में अपना प्रमाद र शोभनाकर नाई
४५२
[ भारद पुरण
सन्ध्यापासना नहीं किया करता है तो उस व्यक्ति को महान पाखडी
और धर्म के क्मों का मनाधिकारी ही जान लेना चाहिए ॥६७॥ जो
अपने मनम अनेक कूटयुतियो वा विचार कर साध्यादि परमावश्यक
नित्य के कर्तव्यो का त्याग कर दिया करता है उसको महान् घोर
पापात्मा पुरुप ही समझ लेना चाहिए ॥६६॥ जो ऐसे धूतं लोगा से
जिनका कि सन्ध्यावन्दन जैसे अवश्यकरणीय कर्मों का भी त्याग कर
दिया करते हैं, भाषण भी करते हैं तो वे भी सूर्य चन्द्र के रह्ने तक
घोर नरको मे निवास किया करते हैं ॥६६॥ इम सन्ध्योपासना कम
के करने के पश्चात् देवार्चन और वैश्वदेव करे। उसी समय में कोई
अतिथि का समागमन हो जावे तो उसका भी अन्नादि समर्पण के
द्वारा स्वागत-सत्कार सविधि करना चाहिय ।।७।।
वक्तव्या मधुरा वाणी तेष्वप्यभ्यागतेषु तु ।
जलान्नकन्दमूलैर्वा गृहदानेन चाचयेत् ।।७१
अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहा.प्रतिनिवर्तते ।
स तस्मै दुष्कृत दत्त्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥७२
अशातगोतनामानमत्यग्रामादुपागतम् ।
विपश्चितोऽतिथिं प्राहुर्विष्णुवत्त प्रपूजयेत् ॥७३
स्वग्रामवासिन त्वेक श्रोत्रिय विष्णुतत्परम् ।
अन्नाद्ये प्रत्यह विप्र पितृ नुद्दिश्य तर्पयेत् ॥७४
पचयज्ञपरित्यागी ब्रह्मत्युच्यते बुधै ।
कुर्यादहरहस्तस्मात्पचयज्ञान्प्रयत्नत ॥७५
दवयज्ञो भूतयज्ञ पितृयरूस्तथैव च ।
नृयज्ञो ब्रह्मयज्ञश्च पचयज्ञान्यचक्षते । ७६
भृत्यमिनादिसयुक्त स्वय भुञ्जीत वाग्यत ।
द्विजानाभोज्यमश्नीयात्पात्र नैव परित्यजेत् ।।७७
जो महा पुग्प अभ्यागत स्वरूप म समागत हुये हा उनस
नारद पुराग ] अत्यधिक मधुर और विनयान्वित वाणी से भाषण करना चाहिए और समय पर अनुपस्थित अन्न, जल, बन्द फलादि के द्वारा शक्ति के अनुमार उनका सवार करके व्हरने के लिये स्थानादि की व्यवस्था कर देनी चाहिये ॥१॥ जिम गृहस्थी के घर पर से कोई भी आशा रहित होकर योही निराश वापिस चला जाया करता है तो वह अपना सम्पूर्ण उमे देकर उसके सम्पूर्ण सञ्चित पुण्य को लेकर चला जाया करता है ।।७२।। भारतीय मस्कृति में आतिथ्य सत्कार को विशेष महिमा गाई गई है। जो किसी अन्य ग्राम पा नगर से आया हो और जिसके गोत्र तथा नाम का भी ज्ञान न हो उसको ही विद्वज्जन अतिथि पहा करते हैं । अतिथि का सत्कार एव समचंन भगवान साक्षात् विष्णु तुल्य करना चाह्येि ॥७३॥ हे विप्र ! अपने हो में निवास करने वाले किसी एक भगवान के परम भक्त थोत्रिय का पितरो की तृप्ति के निमित्त में प्रतिदिन अन्नादि के दान द्वारा मत्कार करना चाहिये ॥७४॥ विद्वान लोग पञ्च यज्ञो का त्याग कर देने वाले ब्राह्मण को शब्द ब्रह्म की हत्या करने वाला कहा करते है। अतएव प्रयत्न पूर्वक पञ्च यन्त्र अवश्य ही करने चाहिए ॥१५॥ देव यज्ञ, भूत यज्ञ, पितृ यन, ब्रह्म यज्ञ और नृपश-इनको ही यज्ञायज्ञो के नाम से वहा जाया करता है ।।७६॥ इन समस्त कर्मों के करने के पश्चात् मौन होकर मित्र एव भृत्य आदि सबको साथ लेकर स्वय आहार को ग्रहण करे । किसी भी भोजन के पात्र का त्याग न करे उसको अवश्य ही भोजन देना चाहिये ।।७७ सस्थाप्य स्वासने पादौ वस्त्राद्धं पग्धिाय च । मुखेन वमित भुक्त्वा सुरापीत्युच्यते बुधै ॥७८ खादिताद्ध पुन सादेन्मोदकाश्च फला न च प्रत्यक्ष लवण चैव गोमासाशीति गद्यते ॥ अपाशाने वाचमने अद्यद्रव्येषु च द्विज ।
४८४ [ नारद पुराण शब्द न कारयेद्विग्नस्त कुर्वन्नारकी भवेत् ।।८० पथ्यमन्न प्रभुजीत वाग्यतोऽन्नमकुत्सयन् । अमृतोपस्तरणमसि अपोशान भुजे पुर ॥८१ अमृतापिधानमसि भोज्यान्तेऽप्र सकृत्पिबेत् । प्राणाद्या आहुतीदत्त्वाचम्य भोजनमाचरेत् ॥२ ततश्चाचम्य विरेंद्र शास्त्रचिंतापरो भवेत् । रात्रावपि यथाशक्ति शयनासनभोजन ।।८३ एव गृही सदाचार कुर्यात्प्रतिदिन मुने । यदाऽऽचारपरित्यागी प्रायश्चित्ती तदा भवेत् ।।८४ भोजन करने के समय मे जो आसन पर परी को फैला कर वैठता है और आधा वस्त्र धारण करके भोजन करता है तथा मुख से उगले हुये को खाता है उसको विद्वान् लोग मद्यपी कहा करते है १७८।। जो एक बार आधा खाकर छोडे हुए मोदक एव फल को तथा लवण को पुन खाया करता है उसको गोमास भक्षी ही कहा जाया करता है ।।७६॥ द्विज को चुल्लू भर के आचमन करने मे सपा भक्ष्य पदार्थों के खाने मे शब्द नही करना चाहिए । ऐसा करने से वह नरक- गामी हुआ करता है ।।८०॥ भोजन करने के समय में मौन रह कर ही अन्नादि का माहार करना चाहिए । ऐसा शास्त्र का सिद्धान्त है । भोजन मे जो भी अन्न प्राप्त हो उसको निन्दा न करने हुये सदा पथ्यान्न का ही सेवन करे । भोजन करनेके पूर्ग 'अमृतोपस्तरणमसि - यह कहकर एक चुल्लू भर जल छिडके ।। ८१॥ भोजन की समाप्ति होन पर नी 'अमृतापिधानमसि'-यह उच्चारण कर एक बार जल का पान करना चाहिए । प्राणाय स्वाहा' आदि याहुतियां देव र आचमन करन क पश्चात भोजन का समारम्भ करना चाहिए । रान के समय में भी इसी भाँति शयन, भोजन एव आसन आदि के द्वारा अतिथि वा समादर सत्कार करे ।।८३।। हे मुनिवर । इसी रीति स गृह-
नारद पुराण }
प्याथमो को पुरुष को प्रतिदिन सदाचरण
का प्रतिपादन करना
चाहिए। गृहम्यी यदि इस तरह के सदाचरण का त्याग कर देता है
तो उसको प्रायश्चित करना बहुत ही आवश्यक हो जाया करता है
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दूषितां स्वतनु दृष्ट्वा पलिनाद्यैश्च सत्तम ।
पुत्रेषु भार्या नि.क्षिप्य वन गच्छेत्सहेव वा ।।८५
भवेत्त्रिपवणस्नायी नखश्मथ जटाधरः ।
अध शायी ब्रह्मचारी पञ्चयज्ञपरायणः ॥६६
फलमूलाशनो नित्य स्वाध्यायनिरतस्तथा ।
दयग्वान्सर्वभूतेषु नारायणपरायणः ।।०७
वजयेद् ग्रामजातानि पुष्पाणि च फलानि च ।
अष्टौ ग्रासाश्च भुञ्जीत न कुद्रिात्रिभोजनम् ।।
अत्यन्त वर्जगत्तैल वानप्रस्थसमाश्रमी ।
व्यवाय वर्जयेच्चव निद्रालम्ये तव च ।।८६
शखचक्रगदापाणि नित्य नारायण स्मरेत् ।
वानप्रस्थ प्रकुर्वीत तपश्चाद्रायणादिकम् ।।६०
सहेत शीततापादिवहिन परिचरेत्सदा ।
यदा मनसि वैराग्य जात सर्वेषु वस्तुपु १६१
तदैव सन्यसेद्विप्रपतितस्त्वन्यथा भवेत् ।
चेदाताभ्यासनिरत शातो दातो जितेद्रिय. ॥६२
निद्वंद्वी निरहकारी निर्मम. सर्वदा भवेत् ।
शमादिगुणसयुक्त: कामक्रोधविजित. ॥६३
हे मम्जन महानुमाव! अब गृहस्थी पुरुष अपने शरीरमे झुरियां
आदि चिह्नो को देखे तो उसका कर्तव्य है कि वह अपनी भार्या को
पुत्रो के मुपुर्द करके या अपने ही साथ में लेकर वन पे चला जावे
मर्थात वानप्रस्थ आश्रम को ग्रहण कर लेना चाहिये ॥८॥ वन में
[ नारद पुराण तीनो कालो में स्नान करें तथा दाढी, नख और जटायें धारण करके नियम से रहे । भूमि शयन, ब्रह्मचर्य पालन करके यज्ञ महायज्ञो को वहाँ पर भी अवश्य किया करे ॥८६॥ सदा फल-मूलो का आहार करे तथा निरन्तर स्वाध्याय मे परायण रहना चाहिये । सब प्राणियो पर परिपूर्ण दया का भाव बनाये रख कर भगवद्भक्ति में ही तत्पर रहना चाहिए ।।८७॥ उम अवस्था मे ग्राम के अन्दर निपजे हुए पल पुष्पो का उपयोग नहीं करना चाहिए । केवल वन्य फल-पुप्पो को काम मे लावे । वेवल आठ ग्रास भोजन करे और वह भी रात्रि के समय मे नहीं करना चाहिए ॥८॥ जो वानप्रस्थ आश्रम में रहे उसको तेल का अधिक उपयोग नही करना चाहिये । उम दिशा में निन्दा, गैगुन, और आलस्य नहीं करना चाहिये ॥७६॥ वानप्रस्थ आश्रम मे जाकर तो सदा शख, चक्र धारण करने वाले भगवान् नारायण का ही नित्य स्मरण करना चाहिये तथा चान्द्रायण महाव्रत आदि की तपश्चर्या अवश्य ही करनी चाहिये ॥१०॥ शीतोष्णादि द्वन्द्वो को सहन करने का अभ्यास करता रहे। अग्नि को सेवा निरन्तर करता रहे । जिस समय मे सभी पदार्थों के सेवन में निर्वेद की भावना जाग्रत होने लगे तो उसी समय मे सन्यास ग्रहण कर लेना चाहिये अन्यथा सन्यास ग्रहण न करने पर वह पनित हो जाया करता है। सन्यास होने पर परम शान्त, दयनशील और जितेन्द्रिय रहकर वेदान्त शास्त्र के अभ्यास में निरन्तर परायण रहना चाहिये ॥१२॥ सन्याश्रम में प्रवेश परके सर्वदा द्वन्द्व, अहवार और ममता से रहित होकर ही शमादि गुणो से मयुत होकर काम, क्रोध आदि का पूर्णतया स्याग कर देना चाहिए नग्नो वा जीर्णकोपीनो गोन्मुण्टो यतिद्विजः । सम यो च मिये च तथा मानापमानयो. ॥१४ एकरान वसेर ग्रामे विरान नगरे तथा।
नारद पुराण ] ४८७ भक्षेण वर्त येन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्यति.n६५ अनिदितद्विजगृहे व्यगारे भुक्तिवजिते । विवादरहिते चैव भिक्षार्थ पर्यटेद्यति ॥६६ भवेत्रिपवणस्नायी नारायणपरायणः । जपेच्च प्रणव नित्य जितात्मा विजितेंद्रिय ६७ जो द्विज सन्यासी होजाये उसको नग्न रहना चाहिये था पटे, पुराने वस्त्र की एक लंगोटी लगा कर रहे । सन्यासो पा शिर मुण्डित रहना चाहिये । मन्यासी को सदा पान, मिव और मानापमान मे सदा समान भावना रखनी चाहिये १६४॥ सन्यासी के लिये भास्याका नियम है कि उमे किमी ग्राम में एक राषि तथा नगर में तीन रात निवास करना चाहिये । सदा भिक्षा में निर्वाह चलावे । सन्यासी को सर्वदा एक में अन्न का सेवन नहीं करना चाहिये १६५। मन्यासियो के लिये मिक्षा करने के भी नियम हैं । ऐसें जो द्विज निन्दिन न हो उन्ही के घर से भिक्षा लेनी चाहिये । जिस समय में अग्नि बुझ गई हो और भोजन का समय व्यतीत हो तभी विवाद रहित समय में मन्यासी को भिक्षा के लिये भ्रमण करना चाहिय ।। ६६ ।। सन्यासी तीनो कालो म स्नान किया करे। सदा भगवान नारायण के ध्यान में निमग्न रहे । चित्त एव सव इन्द्रियो को वश में रखकर प्रणव (ॐ) का जाप निरनर ही सन्यासी को करते रहना चाहिये ॥६७॥ जो सन्यास धारण करके भी लम्पट रहार पिसी एक ही गृहस्थी के अन्न का सेवन किया करता है वह अपने आश्रम के नियमो को भङ्ग किया करता है उसकी शुद्धि दम महत प्रायश्चितो के करने पर भी कभी नहीं हो सकती है ।।६७॥ एकान्नादी भवेद्यस्तु कदाचिल्लपटो यति । न तस्य निष्कृतिहटाप्रायश्चित्तायुतैरपि ।।६८ लोभाद्यदि यतिषिप्र तनुपोषपरो भवेत् । स चडालसमो ज्ञेयो वर्णाश्रमविहित ६६
४८८
[ नारद पुराण
आत्मानं चिंतयेदेवं नारायणमनामयम् ।
निद्व निमम शात मायातीतममत्सम् ॥१००
अव्यय परिपूर्ण च सदानन्दैकविग्रहम् ।
ज्ञानस्वरूपममल परं ज्योति. सनातनम् ॥१०१
अधिकारमनाद्यन्त जगच्चैतन्यकारणम् ।
निर्गुण परम ध्यायेदात्मान परतः परम् ॥१०२
पडेदुपनिपद्वाक्य वेदाताश्च चितयेत् ।
सहस्रशीप देव च सदा ध्यायेज्जितेद्रिय. ॥१०३
एव ध्यानपरो यस्तु यतिविगतमत्सरः।
स याति परमानन्द पर ज्योतिः सनातनम् ॥१०४
इत्येवमाश्रमाचारान्य करोति द्विजः क्रमात् ।
स याति परम स्थान यन गत्वा न शोचति ॥१०५
वर्णाश्रमाचाररताः सर्वपापविवर्जिताः ।
नारायणपरा याति तद्विष्णो. परम पदम् ॥१०६
है विप्र ! यदि कोई भी सन्यासी होकर लोभ के वशीभूत हो
कर अपने इस विनाशशील अनित्य शरीर के पोषण में लग जाया करता
है तो वह वर्णाश्रम से महान निन्दित होकर एक-चाण्डाल के ही
समान हो जाया करता है ॥६६॥ सन्यासी का कर्तव्य है
कि आत्मा का अनामय नारायण देव, निन्द, निम, मायातीत,
गान्त, अवय, अमत्सर, सच्चिदानन्द स्वरूप, परिपूर्ण, निर्मल, ज्ञानरूप
परम ज्योति, रानातन विकार तथा शान्त से रहित, जगत् के चैतन्य
पारण, निर्गुण परम ब्रह्म के ध्यान में मग्न रहे ॥१..-१.२॥
सन्यामी को सदा उपनिषद के वायण का पाठ करना चाहिए। उसे
मवंदा वेदान के वर्षों का गहन विचार करना चाहिये । अपनी
इन्द्रियों को निर्वाचन रपते हुए गत्य पतों से युक्त गेप भगवान का
पान करना चाहिए।१०३॥ जो यति मारमयं दोष से रहित होकर
नारद पुराण ] इस विधि से भगवान का ध्यान किया करता है वह परम ज्योतिस्वरूप, परमानन्दमय, सनातन ब्रह्म म लीन हो जाया करता है ।।१०।। जो द्वित इस उपयुक्त विधि र क्रम से आश्रमा रे धर्मों का परिपालन क्यिा करता है वह ऐस परम पद को प्राप्त करता है जहां पर पहुंच पर कोई भी शोक नही करना पहना है ।।१०। जो व्यक्ति वश्रिम के धर्मों का ययावत् पालन किया बरत हैं व समस्त पापो से मुक्त हो कर नारायण भगवान के परम पद की प्राप्ति किया करते हैं जहां पर सदैव भगव न क चरणा मे ही मग्न रहते हैं ॥१०६॥ ॥ श्राद्ध कृत्य विवरण । शृणुष्व मुनिशार्दूल श्रावस्य विधिमुत्तमम् । यच्छु त्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नाम सशय ॥१ क्षयाहपूर्वदिवसे स्नात्वा चंकाशनो भवेत् । अध शापी ब्रह्मचारी निशि विप्रान्निमत्रयेत ॥२ दलधावनताम्बूने लाभ्यग तथैव च । रत्योपधिपरान्नानि श्राद्धकर्ता विवजयेत् ॥३ अध्वान वयह क्रोध व्यवाय च धुर तथा। थादयत्ता च भोक्ता च दिवाम्बाप च वजयेत् ॥४ श्राद्ध निमपिनो यस्तु व्यवाय कुम्ने यदि । ग्राहत्यामवाप्नोति नरक चापि गच्छति ॥५ श्रद नियोजयेपि धात्रिय विष्णुतत्परम् । यथाम्बाचारनिरत प्रशान्त मन्युाद्भवम् ।।६ रागदपविहीन च पुराणार्यविनारदम् । त्रिमधुनिमुपर्णा मवंभूतदयापरम् 119 ४६० { नारद पुराण श्री सनकाचार्यजी ने कहा है मुनि शार्दूल । अब आप श्राद्ध करने की परम श्रेष्ठ विधि का श्रवण कीजिए । इसके सुनने वाला सभी पापो से मुक्त हो जाया करता है । फिर इसमे कोई भी पाप का निवास नही रहता है ।।१11 जिस दिन पितृ गण का श्राद्ध करना है उसके पूर्व दिन मे स्नानादि करके केवल एक ही बार भोजन करना चाहिए । भूमि शयन और ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए रहना चाहिए । प्रथम दिन में ही ब्राह्मण को श्राद्ध के लिए निमन्त्रित कर देवे ॥२॥ श्राद्ध के करने वाले पुरुष को दांतुन, तैल मर्दन, ताम्बूल, तर्पण ,रति, औषध और पराये अन्न से बचाव रखना परम आवश्यक है ।। ३ ।। श्राद्ध के करने वाले और श्राद्ध मे भोजन करने वाले दोनो के लिए नियमो का पालन करना अत्यावश्यक है । इनको कलह, क्रोध, मैथुन और बोझ का त्याग कर देना चाहिए ।। ४ ।। जो ब्राह्मण श्राद्ध का निमन्त्रण स्वीकार करके भी रति क्रिया करता है वह भी ब्रह्महत्या के पाप में लिप्त होकर नरकगामी हुआ करता है । ।५।। श्राद्ध मे भोजन करने वाले ब्राह्मण मे विशेष गुणो का होना अत्यावश्यक है। वह विष्णु का भक्त, श्रोत्रिय, स्वधर्म पालक, सम युक्त, राग द्वेष विहीन, सत्कुल समुत्पन्न, पुराणार्थ ज्ञाता, त्रिमधु और त्रिमुपणं के जानने वाला और समस्त प्राणियो पर दयालु होना चाहिए ॥६॥७॥ देवपूजारत चैव स्मृतितत्त्वविशारदम् । वेदान्ततत्त्वसम्पन्न सर्वलोकहितेरतम् ॥८ कृतज्ञ गुणसम्पन्न गुरुशुथ पणे रतम् । परोपदेशनिरत सच्छास्त्रकथनैस्तथा ॥६ एते नियोजितव्या वै श्राद्ध विप्रा मुनीश्वर । श्राद्ध वान्प्रवक्ष्यामि शृणु तान्सुसमाहित. ।।१० न्यूनागश्चाधिकागश्चकदर्यो रागितस्तथा । कुष्टी च कुनखी चैव लवकर्ण क्षतव्रतः ॥११ ४६१ नारद पुराण ] क्षत्रपाठजीवी च तथा च शवदाहक । कुवादी परिवेत्ता च तथा देवलक खल ॥१२ निंदकोऽमपणो धूर्तस्तथैव ग्रामवाजक । असच्छास्त्राभिनिरत पगन्ननिरतस्तथा ।।१३ वृपलीसूतिपोष्टा च नृपलीपतिरेव च । कुण्डश्च गोलकश्चैव ह्ययाज्याना च याजक ॥१४ थाद्ध भोजी ब्राह्मण मे देवार्चन की तत्परता, स्मृतियो वे गूढार्थ का ज्ञान, वेदान्न तात्विर ज्ञान में युक्त, मबके हित साधन में परायण, कृतोपकार का ज्ञाता, गुगगण समन्वित, गुरु सेवा निरत और सद्शाम्नो का दूसरे वा सदुपदश प्रदान, ये गुण अवश्य हान चाहिये । ऐसे ही ब्राह्मण को खाज कर श्राद्ध मे निन्त्रित करना चाहिए 11 हे मुनिवर । जिस प्रकार के ग्राह्मण को श्राद्ध म निमन्त्रण दिया जावे यह बतलाने के पश्चात् अब यह बतलाता हूँ कि दिन २ ब्राह्मण को थाद्ध मे निमन्त्रित नहीं करना चाहिये । आप परम समाहित होरर मुनिय । श्राद्ध के योन्य ब्राह्मण विरले ही मिला परते हैं । केवल ग्राह्मण वर्ण से इम कर्म में कार्य नहीं चला करता है ॥१०॥ जिसका अङ्ग विसर हो अर्थात् अधिव या म्यून हा वह श्राद्ध के योग्य नहीं होता है । वायर, रोगी, काढी, बुरे नयो वाला, लम्बे कानो वाला, प्रष्टवती, नक्षत्र पाठ जीवो, दव्य ग्रहण पर शय दाह करने वाला, कुत्सित वचनो का वक्ता, परिवेत्ता दवनर, निन्दक, पल, असहिष्णु धून, ग्राम याजक, अगत् शास्त्र पहन वाला परान्न भोजी, वृषली एव मूनिका ये अन्न स पुष्ट शूद्रा स्त्री का पति, दुष्ट, गोलर और यज्ञो यजन करन व अपाग्य व्यक्तियों का यजन परने वाले ब्राह्मण को कभी भूल पर भी याद में निमन्त्रित नो परना चाहिए प्रपोरि ऐप ग्राह्मण थाइ म भान परन व पान नहीं हा परत है ॥११-१४॥
[ नारद पुराण
दभाचारो वृथामुण्डी ह्यन्यस्त्रीधनतत्पर ।
विष्णुभक्ति विहीनश्च शिवभक्तिपराड मुख ॥१५
वेदविऋयिणश्चैव व्रतवियिणस्तथा ।
स्मृतिवियिणश्चैव मत्रविक्र यिणस्तथा ॥१६
गायका काव्यकारो भिपक्छास्त्रोपजीविन ।
वेदनिंदापरश्चैव ग्रामारण्यप्रदाहक ॥१७
तथातिकामुकश्चैव रसविक्रयकारक ।
कूटयुक्तिरतश्चैव श्राद्ध वा प्रयत्नत ॥१८
निमयीत पूर्वेध स्तस्मिन्नेव दिनेऽथवा ।
निमन्त्रितो भवेद्विप्रो ब्रह्मचारी जितेद्रिय ॥१६
श्राद्ध क्षणस्तु कर्तव्य प्रसादश्चेति सत्तम ।
निमन्त्रयेद् द्विज प्राज्ञ दर्भपाणिजितेद्रिय ॥२०
तत प्रात समुत्थाय प्रात कृत्य समाप्य च ।
श्राद्ध समाचरेद्विद्वान्काले कुतपसज्ञिते ॥२१
जो सवदा दम्भाचरण करने वाला हो वह भी अयोग्य होता
है। निष्प्रयोजन शिर को मुण्डित कराने वाला, पराई स्त्री और धन
को तकने वाला, विष्णु और शिव की भक्ति मे रहित, वेद, स्मृति और
प्रन का विक्रय करने वाला, भांड और भाट जैसी तृत्ति रखने वाला,
चीर फाड के कर्म को करने वाला, वेद का निन्दक, ग्राम मे अग्नि
लगाने वाला अत्यधिक वाम वामना वाला, रयो को बेचने का कर्म
करने वाला तथा कूटयुक्तिया के करने वाले ब्राह्मण को कभी भी
आमन्त्रित नहीं करना चाहिये क्योकि ये परम निषिद्ध बताये गए
हैं ॥१५-१८॥ श्राद्ध के पूर्व दिन म अथरा प्राय उमी दिन
ब्राह्मण को निमन्त्रण देना चाहिए । निमनित विन भी जितेन्द्रिय
और ब्रह्मचर्य पालक होकर रहे ।।१६॥ हे श्रेष्ठ मुनिवर । श्राद्ध म
विशेष उत्साह और पूर्ण प्रसन्नता के साथ ही रहकर इसको परे ।
नारद पुराण ]
४६३
आरम्भ
श्राद्धकर्ता इद्रियो को वश में रखकर हाथ मे डाभ लेवर ब्राह्मण को
निमन्त्रण देने के लिए उसो घर पर जावे ॥२०॥ श्राद्ध के दिन
प्रात काल में उठकर प्रात काल के समस्त देनिन त्यो से छुटकारा
पाकर विद्वान् पुरुष को श्रद्धा के सविन सनर ने उमका
परना चाहिये ॥२१
दिवसस्याष्टमे काले यदा मदायते रवि ।
स काल सुनपस्तम पितृगा दत्तमक्षयम् ।।२२
अपराह्म पितृ णा तु दत्त काल स्वयभुवा ।
तत्काल एव दातव्य कव्य तस्माद् द्विजोत्तम ॥२३
यतब्ध दीयते द्रव्यैरकाले नुनिसत्तम ।
राक्षस तद्धि विशेष पितृ णा नीपतिष्ठति ॥२४
कन्य प्रत्त तु सायाहन राक्षस तदभवेदपि ।
दाता नरकमा नोति भोक्ता च नरक व्रजेत् ।।२५
क्षयाहस्य तियेविप्र यदि दडमिति भवेन् ।
विद्वापराहिण कार्या तु श्राद्ध कार्य ग्जिानता ॥२६
क्षयास्य तिथियां तु ह्यपराह्णद्वय पदि ।
पूर्वा क्षरे तु पतंध्या वृद्वी वार्या तयात्तरा ॥२७
मुहूर्तद्वितय पूर्वदिने स्यादपरे नि ।
तिथि सायास्नगा यत्र परा र यम्य विथता ॥२८
दिपम ये आय भाग में अर्या। चार, वजन पाना जिग
४६४ [ नारद पुराण मिलकर राक्षसो को ही प्राप्त हुआ करता है ॥२४॥ जो कम्य साय- ड्काल के समय मे दिया जाता है वह भी राक्षसो का ही भाग हो जाया करता है ! इससे दाता और भोक्ता दोनो नरको में जाया करते हैं ।।२।। हे विष ! यदि श्राद्ध की तिथि एक ही दण्ड • भर हो तो श्राद्ध के कर्ता को अपराह्नविद्धा तिथि का ही ग्रहण करना चाहिए ॥२६॥ यदि क्षय दिन की तिथि दोनो ही अपराह्नो मे हो तो पहिली को क्षय कर्म मे प्रयुक्त करे और दूसरी को वृद्धि कर्म मे प्रयुक्त करना चाहिए ।।२७।। यदि वह तिथि प्रथम दिन ४ घडी होवे और शेष दूसरे दिन में होवे तो सायाह्न व्यापिनी अगली तिथि को ही क्व्य के लिए काम में लेनी चाहिए ऐसा ही प्रसिद्ध विधान है ॥२८ किंचित्पूर्व दिने प्राहुर्मुमूर्त्तद्वितये सति । तन्मल हि सर्वेपर झपदाने मुनीश्वर ॥२६ निमन्त्रितेपु विप्रेष मिलितेषु द्विजोत्तम । प्रायश्चित्तविशुद्धात्मा तेभ्योऽनुज्ञा समाहरेत् ॥३० श्राद्धार्थ समनुज्ञातो विप्रान् भूयो मिमन्त्रीत् । उभौ च विश्वेदेवार्थ पियर्थ श्रीन यथाविधि ।।३१ देवतार्थ च पिण्यर्थमंकेकं वा निमन्त्रयेत् । श्राद्धार्थ समनुज्ञात. कारयेन्मण्डलद्वयम् ॥३१ चतुग्न ब्राह्मणस्य त्रिकोण क्षत्रियस्य वै वैश्यस्य वर्तुल ज्ञेय शूद्रस्याभ्युक्षण भवेत् ॥३३ ब्राह्मणानामभावे तु भ्रातर पुत्रमेव च । आत्मान वा नियुजीत न विप्र वेदवजितम् ।।३४ प्रक्षाल्य विप्रपादाश्च ह्याचान्तानुपवेश्य च । यथावदचंन कुर्यात् म्मरन्नारायण प्रभुम् ।।३५ पुछ विद्वानों का मत है कि यदि प्रथम दिन मापान में पार घडी तिथि हो तो प्रथम दिन ही याद में प्ररण गरना चाहिए कि नारद पुराण ] ४६५ यह मत सर्व सम्मत नही है ॥२६हे द्विजोत्तम । निमन्त्रित किए जाने के योग्य ब्राह्मणो के मिल जाने पर प्रायश्चितो के द्वारा शुद्ध आत्मा वाले यजमान के सर्व प्रथम उन विप्रो से श्राद्ध कम को करने की आज्ञा प्राप्त कर लेनी चाहिए ॥३०॥ जब वे आज्ञा दे दवें सभी उन विप्रो को सविधि निमन्त्रण देना चाहिए । विधि यही है कि विश्वेदेवाओ के लिए दो ब्राह्मणो को निमन्त्रण देवे और नीन विप्रो को पितरो के निमित्त मे निन्त्रित करना चाहिए ॥३१॥ अथवा देवो और पितरो के लिए एक २ को हो निमन्त्रित करे । श्राद्ध करने की आज्ञा प्राप्त हो जाने पर दो मण्डल बनान चाहिय ॥ ३२ ॥ ब्राह्मण के मण्डल चौकोर, क्षत्रिय वा त्रिकोण, वैश्य को गोल मण्डप वनावे । शूद्र का मण्डल जल के छिडक देने मात्र स ही मान लिया जाता है ।।३३।। यदि पूर्व मे बतलाये हुये युक्त ब्राह्मण थाद्ध के लिए ने प्राप्त होवे तो भाई, पुत्र अपन ही लोगो को श्राद्ध के योग्य ब्राह्मण समझ लेना चाहिये किन्नु वेद विहीन ब्राह्मण को भूल कर भी कभी निमन्नित नहीं करना चाहिये । इससे विधि का विनाश होता है । सर्व प्रथम ब्राह्मण के चरणों का प्रक्षालन करे और जिम ममय म व आमनो पर समुपस्थित होजावें और आचमन कर लेवें तब भगवान का म्मरण करते हुए उनका समुचित सत्कार चाहिए ॥३५ ब्राह्मणाना तु मध्ये च द्वारदेशे तथैव च । अपहता इत्यचा वै कर्ता तु विकितिलान् ॥३६ यवैदर्भश्च विश्वेपा देवानामिदमासकम् । दत्वेति भूयो दद्याच्च देवे क्षणप्रतीक्षणम् ॥३७ अक्षय्यामनयो पष्ठी द्वितीयावाने स्मृता । अन्नदाने नतुर्थी म्याच्छेपा मयुद्धय स्मृता ॥३८ आमाद्य पायद्वितय दर्भशाखासमन्वितम् । करना नारायण ४६६ [ नारद पुराण तत्पाने सेचयेत्तोय शन्नो देवीत्यचा तत ॥३६ यवोऽसीति यवान् क्षिप्त्वा गन्धपुष्पे च वाग्यत । आवाहयेत्ततो देवान् विश्वे देवा स इत्यचा ॥४० या दिव्या इति मन्त्रणा दद्यादर्घ्य समाहित । गन्धैश्च पत्रपुप्पैश्च धूपदीपैर्यजेत्तत ॥४१ देवैश्च समनुज्ञातो यजेत् पितृगणास्तथा । तिलसयुक्तदःश्च दद्यातेपा मदासनम् ॥४२ श्राद्ध करने वाले पुरुप का कर्तव्य है कि वह ब्राह्मणो को अपने मध्य म तथा द्वार का देहली पर 'अपहना' इत्यादि ऋना का पाठ करते हुए तिलो को बखेर देवे ।।३६।। यवो और कुशा को विश्व देवाओ को सम्मुख रखकर उनसे प्रार्थना करे कि यह आपके लिए आमन है। आसन समर्पित करने के पश्चात् यवो का अर्पण कर इन विश्वेदेवाभा समागगन पे लिए क्षण भर प्रतीक्षा करे ।। ३७ ।। 'शिवा आप सन्तु इत्यादि पढे तथा अक्षय और आसन के सङ्कल्प मे पछी विभक्ति वा 'अमुक गोत्रस्य अमुव नाम्न 'प्रयोग करना चाहिए तथा आवाहन मे द्वितीया विभक्ति का ही प्रयोग अमुक गोत्रमुख नामानम्' पारना चाहिए तथा भन्न दान ये ममर म चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग 'अमुक गोत्रायाममुक नाम करना चाहिए । शप सर्वत्र सम्वृद्धि का प्रयोग परें । जैग-अमुक गात्र, अमुव नाम आदि ।।३।। इमो अनन्नर दो पात्रो को रखकर उनम डाम प्रक्षिप्त कर शन्नो देगी.' इत्यादि मन्त्र के द्वारा उन पात्री म जन भर दे ।।३६॥ पिर 'ययामि' इत्यादि मन्त्र को उच्चारण करत हा जो टापर मौन होत हुए गन्ध थोर पुष्प चढाव । इगा पश्चात् 'विश्य दवा इत्यादि प्रामा स विश्व देवामा या बापान करना चाहिए ।।४०॥ या दिग्पा दरवादि मन्त र गाय मास्थानी ये गाय अध्यं दना चाहिए पिर 'या विम्या' इम म.प म मावधानी ग अर्घ, गाय, पुष्प, धूप, दी सादिन विश्व -
नारद पुराण
४६७
देवाओ का अर्चन करना चाहिए ॥४१॥ इसके पश्चात् विश्वेदेवाओ से
सम्मति प्राप्त करके अपने पितृगणो का पूजन करे। पितरो को सर्वदा
तिल और कुशा का आसन ही समर्पित करना चाहिए ।।४२॥
पागाण्यासादयेत् त्रीणि ह्यर्थिपूर्ववद् द्विजः ।
शन्नो देव्या जल क्षिप्त्वा तिलोमीतिक्षिपेतलता ॥४३
उशन्त इत्यचावाह्य पितृन् विप्र. समाहितः ।
या दिव्या इति मन्येण दद्यादयं च पूर्ववत् ॥४४
गन्धश्च पनपुप्पश्च धूपीपश्च सत्तम ।
वासोभिभू पणश्चैव यथाविभवमर्चयेत् ॥४५
ततोऽन्नाग्र समादाय घृतयुक्त विचक्षण ।
अग्नौ परिष्य इत्युक्त्वा तेभ्योऽनुज्ञा समाहरेत् ।।४६
करवं करवाणोति चापृष्टा ब्राह्मणा मुने।
कुरुष्व क्रियता वेति कुविति युरेव च ॥४७
उपासनाग्निमाधाय स्वगृह्योक्तविधानत ।
सोमाय च पितृमते स्वधा नम इतीरयेत् ॥४८
अग्नये कव्यवाहनाय स्वधा नम इतोह या ।
स्वाहान्तेनापि वा प्राज्ञो जुहुयात् पितृयज्ञवत् ॥४६
इसके अनन्तर ब्राह्मणो को पूर्व में ही गमान बघ के लिए
तीन पात्र रणने चाहिये और 'शन्नो देवी' इत्यादि मात्र का उच्चारण
पर पात्रोम जल भर देवे और तिलोजसीति' इत्यादि मात्र मे तिसी का
प्रक्षेप बरे ॥४३॥ इमवे अनन्तर वहन ही मावधानता मे 'उगन्त'
इत्यादिवाना गे अपने पितगणो का यावान पाना पानि तथा
'या दिव्या' इत्यादि मान्यों में पूर्ववत् अर्घ का ममपण परे ।।४४ ॥ है
गरजा । दमये उपगन्न अपने धन विभव की प्रति अगार की माध,
धूप, दीप, यम, भषण और दृष्य में निवाणी पाही भानि अन
परमा पाहिए inगा अनन्तर युगप पुकात गे अरे
४६८
[ नारद पुराण
ग्रास को ग्रहण कर इसकी मैं अग्नि में आहुति दूंगा 'अग्नी करिष्ये'
इत्यादि मन्त्र से आज्ञा प्राप्त करे । ब्राह्मणो को इसके उत्तर में कहना
चाहिए कि हां, परिये अर्थात् अग्नि मे आहुति दीजिए ॥४७॥ फिर
अपने गृह्य सूत्र के विधान के अनुसार उपासना कर अग्नि की स्थापना
करके 'सोमाय पितृमते स्वधानम' इसका उच्चारण करके ' इस पितृयज्ञ
की दो समान आहुतियां देनी चाहिए अथवा विद्वान् व्यक्ति को अन्त
में 'स्वाहा' यह कहकर ही आहुति देनी चाहिए ॥४८-४६।।
आभ्यामेवाहुतिभ्या तु पित्हणा तृप्तिरक्षया।
अग्न्यभावे तु विप्रस्य पाणौ होमो विधीयते ॥५०
यथाचार प्रकुर्वोत पाणावग्नौ च वा द्विज ।
न ह्यग्निर्दू रंग कार्य पार्वगे समुपस्थिते ।।५१
सधायाग्नि तत कार्य कृत्वा त विसृजेत् ।
कृती यद्यग्निर्दू रगो विप्र पार्वगे समुपस्थिते ।।५२
भ्रातृभि कारयेच्छ्राद्ध साग्निविधिवद् द्विजै ।
क्षयाहे चैव सप्राप्ते स्वस्याग्निर्दू रगो यदि ॥५३
तथैव भ्रातरस्तव लौकिकाग्नावपि स्थिता ।
उपासनाग्नौ दूरम्थे समापे भ्रातरि स्थिते ॥५४
यद्यग्नौजुहुयाद्वापि पाणौ वा स हि पातकी ।
उपामनाग्नी दूरस्थे केचिदिच्छन्ति वै द्विजा ॥५५
तच्छेप विप्रपापु विक्रेित् सस्मरन् हरिम् ।
भक्ष्यभॊज्यश्च लेह्य श्च स्वाविप्रान्प्रपूजयेत् ॥५६
इन आहुतियो के देने में पितृगण को अक्षय तृप्ति हुआ करती
है । यदि यजमान अग्नि होय करन वाला न होवे और वहां पर उम
समय म अग्नि या अभाव हो तो उग ममय ग्राह्मण के हाथ में ही
अपण परना रूपी हो होम वरना पर्याप्त होता है । हे दिन । आचार
के अनुरूप ही मर गा अग्नि में आहुतियां देनी पाहिये । पार्यण पाट
ये ममय में अग्नि को दूर नही रणा पाहिए ॥५१॥ पार्वण ने गमय
'मारद पुराण!] में यदि अग्नि दूर हो ' अर्थात् पत्नी अपनी माता के यहाँ (मायके मे ) चली गयी हो तो कुशल पुरुप को नूतन अग्नि की स्थापना करनी पाहिये और उप्तमे ही आहुतियां देवे । श्राद्ध के समाप्त होने पर उस 'नवीन सस्यापित अग्नि को विसजित कर देना चाहिये ॥५२॥ यदि थाद के समय की तिथि उपस्थित होजावे और अग्नि दूर हो तो अग्निहोत्र करने वाले अपने जो दूसरे भाई हो उनमे श्राद्ध करवाना चाहिए ॥५३॥ यदि अपनी अग्नि जो उपासना करने की हुआ येरती है कही दूर देश में हो और समीप मे ही कोई लौकिक अग्नि वाले भाई विद्यमान हो तो उस दिशा में नवीन अग्नि की स्थापना करना या ब्राह्मण के कर मे ही बाहुनि का समर्पण करना बहुत ही अनुचित है क्योकि ऐसा करने पर यह पानी होजाया घरता है ।। ५४३५५ ।। इन विधि में आहुति 'यण कर जो शेष अन्न बच जाये उमको भगवान् पा स्मरण करता हुआ ब्राह्मणो के रक्खे हुये पात्रों में परिवेषण पर देवे। इसके पश्चात परम स्वादिष्ट भक्ष्य-भोग्य, सेय आदि पदार्थों मे ग्राह्मणों को भोजन करावे ॥५६॥ अन्नत्याग ततः कुर्यादुभयत्र ममाहित । आगच्छन्तु महाभागा विश्वे देवा महावलाः ॥५७ ये या विहिता. थाढे मावधाना भवन्तु ते । इति सप्रार्थयेदेवान्ये देवास चा नुवै ॥५८ ' तथा मप्रार्थयेद्विप्रान्ये च हेति चा पितृन् । अमूर्तीना च मूर्ताना पितृ.णा दीप्ततेजमाम् ॥५६ नमस्यामि सदा तेपा ध्यानिना योगनापाम् । एव पितृ.न्नमगृत्य नारायणपरायण ॥६० दत्त हविश्च तरुमं विष्णये विनिरेदयेत् । ततने ग्राह्यगा मयें भुजीरवाग्यता द्विजाः ।। हमने वाले को पि राक्षम तदभवेदयि. । ययागार प्रदेय च मधुमामादिक तया ॥६२ पारादिन प्रजमेरन् वाम्यता धनमाजना.।
- - ५०० [ नारद पुरान यदि पात्रं त्यजेत्कोऽपि ब्राह्मण: श्राद्धयोजितः ॥६३ श्राद्धहता स विज्ञेयो नरकायोपपद्यते । भुजानेगु च विप्रेषु ह्यन्णेन्यं सस्पृशेद्यदि ॥६४ । इसके अनन्तर दोनो स्थानो पर अर्थात् विश्वेदेवा और पितृ- गण के स्थानो पर अन्न के स्वादिष्ट पदार्थो का परिवेक्षण कर साव। धान हो प्रार्थना करे । हे महाबलवान् हे महाभाग विश्वेदेवाओ ! इस श्राद्ध मे जिनका, आवाहन किया गया है वे आप अब सावधान होजावे । 'येदेवास:०' इत्यादि ऋचा से विश्वेदेवानो की, प्रार्थना करे तथा 'मया चेह' ऋचा से पितरो और तत्स्थानीय ब्राह्मणो की प्रार्थना करे और यह कहे कि-जो इस समय मे यहाँ पर गुप्त अथवा प्रकट रूप से प्रकाशवान तेजस्वी पितर विद्यमान हैं उन योग दृष्टि वाले ध्यान में स्थित पितृगणो की सेवा मे मैं प्रणाम करता है। इस विधि से पितरो का अभिवादन कर भगवान नारायण के ध्यान में तत्पर होजाना चाहिए ।।५७-६०। इस अपित हवि, कर्म को विष्णु भगवान् की सेवा में ममपित कर देना चाहिए। इसके पश्चात वे सभी ब्राह्मण मौन होकर भोजन करें ॥६१। उस समय किसी को भी हंसी और वातचीत नहीं करनी चाहिए । यदि ऐसा उस समय में किया जाता है तो वे सभी हवि राक्षस हो जाया करते हैं। फिर देशाचार के अनुकूल मधु मास का परिवेषण करे । पत्तलो पर बैठे हुये ब्राह्मणो को एक दम मौन रहना चाहिये और पाक आदि की प्रशसा नही करनी चाहिये । यदि बार में समागत ग्राह्मण पत्तल मा त्याग पर उठ जाता है तो उसको थार का हनन करने वाला ही सम. सना चाहिए वह निश्चय ही नरगामी होता है। भोजन करते हुए प्राह्मण परस्पर में एक दूसरे का स्पर्श नही करे ॥६२-६१।। तदन्नमत्यजन्भुव वा गाय यष्टशत जपेत् । भुज्यमानेषु विप्रेषु वर्ता श्रद्धापरायणः ॥६५ स्मरेन्नारायण देवमनन्तमपराजितम् । रक्षोघ्नान्यप्णवाश्चय पैतृकाश्च विशेषतः ॥६६ नारद पुराण ] -५०१ जपेच्च पौरुष सूक्त नाचिकेतश्रयं तथा । निमधु त्रिसुपर्ण च पावमान यजू पि च ॥६७ सामान्यपि तथोक्तानि वदेत्पुण्यप्रदास्तथा । इतिहामपुराणानि धर्मशास्त्राणि चैव हि ॥६८ भजीरन्द्राह्मणा यावत्तायदेताजपेद् द्विज । ब्राह्मणेषु च मुक्तेषु विकिर विक्षिपेत्तथा ॥६६ शेषमन्न वदेच्चव मधुसूक्त च ये जपेत् । स्वयं च पादौ प्रक्षाल्य मम्यगावम्य नारद ७० उस अन्न कोन छोडे तो दनको पाठमो गायत्री मन्त्र या जाप करना चाहिए। तभी उनसे वि दि हुआ करती है । जिम समय मे याहमण भोजन कर रह हो उस समय में परम श्रद्धालु श्राद्धवर्ता या क्त्तव्य है कि वह अनल, अपगजिन श्री नारायण देव वा गस्मरण करे और उस समय में गक्ष मो के नाशक मन्त्री वा, विष्णु से स्तोवो पा और पिन सम्बन्धी मन्मो का पाठ करना चाहिए ॥६४-६६॥ इसके माघ २ पुग्प मूक्त और यजुर्वेद के मन्त्री या जाप करना चाहिप ॥६७। पुण्य प्रदान करने वाले माम वेद के भयो पा तथा इनिहाग, पुराण और धर्म शास्त्र या भी पाठ करे ॥६८॥ जिस समय तर माह्मण भोजन करते रहें सभी तर इन उपर्युक्त मन्त्रादि यो निरन्तर पढ़ते रहना चाहिए । जर ब्राह्मण भोजन ममाप्त पर नु तब दुशो पृपा करने शेप अन्न गाने का विप्रो में बनुरोध परे 'मधुवाता एनायते मधु मूक्त का जाप करना चाहिये । इगरे अनन्तर अपने भाप रोंको घोषा भनी मानि पानमन करना चाहिये ६६.७०॥ आचाते च थिपेषु पिण्ड निपिपतन । स्वस्तिवाचनक पुर्यादाग्योदामेव ग 11७१ दत्या गमाहित पुर्यातया विवाभिवादनम् । अमालयित्वा पात्र तु स्पम्नि गुनिय दिना ॥७२ 'यमर पितरम्नेषा भग्त्युनिष्टभोगिन । दातारो नोभियनागित्याय स्मृतिमापिनं. 11७३ थानीयंनो ममेरोम्यो नमामार चतन. ।
1 ५०२
नारद पुराण
दद्याच्च दक्षिणा शक्तया तावूल गन्धसयुतम् ।।७४
न्युब्जपानमथानीय स्वधाकारमुदीयेत् ।
वाजेवाजे इति ऋचा पितृ न्देवान्विसजरयेत् ॥७५
भोक्ता च श्राद्धकृत्तस्या रजन्या मैथुन त्यजेत् ।
तथा स्वाध्यायमध्वान प्रयत्नेन परित्यजेत् ॥७६
अध्वगश्चातुरश्चंव विहीनश्च धनैस्तथा ।
आमश्राद्ध प्रकुर्वीत हेम्ना वास्पृश्पभार्यक १७७
ब्राह्मणो के द्वारा आचमन किये जाने पर पिण्ड दान करे ।
स्वस्तिवाचन बोने और अटूट जल धारा ( अक्षय्योदक ) करे। इस
विधि से बहुत ही सावधानी के साथ श्राद्ध समर्पित करके ब्राह्मणों का
अभिवादन करना चाहिए। जो विप्र पानी का परिचालन किये ही
विना तात्पर्य यह है कि पात्रो को सीधान करके ही स्वस्ति करते हैं
उनके एक वप तक उच्छिष्ट भोजी रहा करते है। इसके पश्चात्
'दातारो नाऽभिवधतान् इत्यादि स्मृति के वचनो के द्वारा आशीर्वाद
ग्रहण करे । पुन ब्राह्मणो को प्रणाम करके दक्षिणा देवे और सुगन्धित
ताम्बूल अर्पित करना चाहिए ॥७१-७४॥ इसके पश्चात् औधे पात्र
लाकर स्वधा कहे और वाजे वाज' इत्यादि के द्वारा पितृजनो का विस
र्जन कर देवे ॥७५।। थाद्ध कर्ता और श्राद्ध भोक्ता को कभी भी मैथुन
नहीं करना नाहिए तथा उस दिन भर्ता से गमन और स्वाध्याय भी
नहीं वरे ।।७।। जा पोई यात्रा म हो, राग युक्त हो, धनहीन हो वह
कच्चा सांधा देकर ही श्राद्ध कर देवे जिसकी पत्नी रजस्वला हो गई
हो उसे सुवर्ण के द्वारा श्राद्ध कर देना चाहिए ।।७७
द्रव्याभावे द्विजाभावे ह्यन्नमान च पाचयेत् ।
पतृपेन तु सूक्तेन होम कुर्याद्विवक्षण ७८
अत्यन्तद्रव्यशून्यश्चेत्यशक्तया तु नृग गवाम् ।
स्नात्वा च विधिवद्विप्र कुर्याद्वा तिलतपणम् ॥७.
अथवा रोदन वुदित्युच्नेविज ने वने ।
दरिद्रोह महापापो वदमिति विवक्षण ||८०
नारद पुराण परेधु श्रादकृन्मयो यो न तर्पयते पितृन् । तत्कुल नाशमायाति ब्रह्महत्या च विदति ॥१ श्राद्ध कुर्वति ये माः श्रद्धावन्तो मुनीश्वर । न तेपा सततिच्छेद सम्पनास्ते भवन्ति च ।।८२ पितृ न्यजति ये श्राद्धे तैस्तु विष्णु प्रपूजित । तस्मिस्तुष्टे जगगन्नाथे सर्वास्तुप्यति देवता ॥६३ पितरो देवताश्चव-गन्धर्वाप्सस्तथा। यक्षाश्च सिद्धा मनुजा हरिरेव सनातन ॥८४ यदि द्रव्य ना अभाव हो अथवा थााचित द्विजो का अभाव हो तो श्राद्ध करने वाले मो वैचल अन्न का दान करपे पैतृक सूक्त से पितृ. गण की दृष्टि के उद्देश्य से अग्नि में होम करना चाहिए ॥६८॥ हे विप्रवर । यदि बहुत ही अधिक द्रव्य का अभाव हो तो अपनी शक्ति के अनुसार गायो को घास डलगा देनी चाहिए अथवा स्नान पर विधि पूर्वक तर्पण कर देवे ॥७६॥ कुशल पुरुष को चाहिये कि निर्जन वन में जाकर उच्च स्वर से, मैं महाम् यापात्मा हूँ और बहुत ही दरिद्र हूँ यह वहार उच्च स्वर से गे देना चाहिए 11८७॥ यदि श्राद्ध करने वाला अगल दिन म पितृ तर्पण नहीं किया करता है ता उमे ब्रह्म हत्या का पाप लगता है और अन्त में उसका पुल ही नष्ट हो जाया करता है 11८१॥ हे मुनियर । जो परम श्रद्धा स समन्वित होपर याद पिया पररा है ।।२॥ जो बाद म अपन पिन्गणा का अर्चन पिया करत है वे मानो साक्षात थगवान् विष्णु का पूजन कर लिया करते है और भगवान जगत् के स्वामी विष्णु के परम मन्तुष्ट होन पर सभी देवता गन्तुष्ट होजाया करते हैं ॥३॥ पितृगण, देववृन्द, गन्धर्वगण, ममूह, अगरा वृन्द गिद्ध और मनुष्य इन सबमे सनातन प्रभु श्री हरि हरि भगवान ही व्याप्त रहा धरते हैं | येनदमाखन जात जगत्म्यावरजगमम् । तम्मादाता च भोक्ता च सर्व विष्णु गनानत ॥८५ पदस्ति विप्र यन्नान्ति दृश्य चादृश्यमेव च । गर्व विष्णुमय ज्ञेय सम्मादम्पन्न विद्यते ॥८६ यक्ष- [ नारद पुराण आधारभूतो विश्वस्य सर्वभूतात्मकोऽव्यय । अनौपम्यस्वभावश्च भगवान्हव्यकव्यभुक् ।।८७ परब्रह्माभिधेयो य एक एव जनार्दन । कर्ता कारयिता चैव सर्व विष्णु सनातन 1८८ इत्येव ते मुनिश्रेष्ठ श्राद्धस्य विधिरुत्तम । कथित कुवतामेव पाप सद्यो विलीयते ॥८६ य इद पठते भक्तया श्राद्धकाले द्विजोत्तम । पितरस्तस्य तुष्यति सततिश्चैव वर्धते ।।६० उही भगवान् विष्णु से यह सब स्थावर और जङ्गम जगत् प्रकट हुआ है अत दाता और भोक्ता सबमे वही सनातन विष्णु विरा जमान रहा करते हैं ॥५॥ हे विप्रवर | इस विश्व मे जो कुछ भी दिखलाई दे रहा है तथा जो नहीं दिखाई देता है अर्थात् स्थूल सूक्ष्म सत् असत् जड चेतन सबको विष्णुमय ही समझना चाहिये क्योकि विष्णु से परे कुछ भी नही होता है ।। ८६ ।। भगवान् विष्णु ही इस सम्पूर्ण विश्व के आधार स्वरूप हैं सब प्राणी उनके ही रूप हुआ करते है और यह भगवान् अपने कर्तत्व रूप से कभी भी वे च्युत नही हुआ करत हैं भगवान का स्वभाव ऐसा अद्भुत है कि उसकी किसी से भी उपमा नहीं दी जा सकती है और वे ही ह-य-व्य सबवे भोत्ता हुआ परते हैं ।।८७॥ जिनका परम ब्रह्म नाम है वही एक जनादन है । वे ही वर्ता और कराने वाले हैं। यह प्रपञ्च विष्णु वा ही म्यरूप है ॥८॥ हे मुनि श्रg | इस रीति से आपके समक्ष म यह थाद का पूरा विधान वणित कर दिया है जोकि अत्युत्तम है । जो इस श्राद्ध को विया करते हैं उनके समस्त पापा का समूह तुरत ही नष्ट हा गाया करता है 1८६१ ह द्विजात्तम । जो मनुष्य याद करन 4 गमय म इम थार विधान के अध्याय या भक्तिमहित पाट दिया करता है उमर पितृगण परम स तुष्ट होजाया करत और उगती सम्पत्ति यो वृद्धि हुआ करती है ॥६०|| ॥ नारद पुराण ( प्रथम खड ) समाप्त ।।