Adarsh Library, Jaipur

Tesra Admi

Kamlishwar · 2011/03

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सुमंत का दूसरा खत आते ही मैं और बाबूजी चल पड़े थे। वहां दोनों ही काम हो गए थे । लड़का भी तय हो गया था और मेरे तबादले की वात भी पक्की हो गई थी। बाबूजी ने काफी आनाकानी के बाद मेरा दिल्ली जाना मंजूर कर लिया था, इस शर्त के साथ कि अभी चित्रा उन लोगों के पास वहीं इलाहाबाद में रहेगी, ताकि वह घर में रस- वस जाए। लेकिन मैं जानता था कि यह होगा नहीं। चिना वहां अकेले रहना पसंद नहीं करेगी। पांचवां महीना समाप्त होते-होते सरला की शादी हुई। सरला के पति की नौकरी अहमदावाद में लग गई थी और शादी होते ही वह अपने पति के पास रहने चली गई थी। सरला की शादी के बाद घर की हालत बहुत नाजुक हो गई थी। रिटायर हो चुकने के बावजूद वावूजी को मजबूरन कोई नौकरी खोजनी पड़ी थी, और इसमें मदद मिली थी सुमंत के बड़े भाई जयंत से। उन्होंने भोपाल में किसी ठेकेदार के पास ढाई सौ रुपये माहवार पर उन्हें लगवा दिया था और इस तरह हमारा आधा घर उखड़कर इलाहाबाद से भोपाल चला गया था। और कोई चारा भी नहीं था। मुझे कुल दो सौ मिलते थे, उसमें पूरे घर का गुजारा नहीं हो पाता था। उसके बाद मैंने फिर दौड़-भाग करके अपना तबादला दिल्ली करा ही लिया था। इलाहाबाद छूट गया था। शुरू-शुरू में आकर मैं सुमंत के पास ही ठहरा था। और कोई ठिकाना नहीं था। सुमंत कुतुव रोड पर आराम नगर के एक निहायत गंदे कमरे में रहता था। सीलन-भरा वह कमरा पसीजता रहता था। उन दिनों वह किसी प्रेस से निकलनेवाली एक निहायत सस्ती-सी पत्रिका में काम करता था और जैसे-तैसे अपना खर्चा चलाता था। २४/ तीसरा आदमी पहली बार जब चिना आई तो उसी एक कमरे में हम तीनों की टिकना पड़ा । साना वगैरह बनाने की जगह नहीं पी, पर विद्यापी बगर से अब होटलों या ढाये में साना मुमकिन नहीं था, इसलिए रोश पिपड़ी या पराठों का भोजन होने लगा। पहले दिन जब में पिता को साया था तो कमरा और जगह देखकर यह यहुत उदास हो गई थी। उसका मुंह ही उतर गया था। फिर धीरे-धीरे उसने कमरे की सफाई वगैरह कर हाली थी। जब भी मैं ड्यूटी में लौटता तो देखता कि गुमत और पिता गाप- माथ किसी काम में लगे हुए हैं। अगर यह गाना पका रही है तो गुमरा बैठा मलाद ही बना रहा है । या गुमन दीवार को नीम गाहा है तो चित्रा उसकास्ट्रल पद पट्टी है। खिड़कियों और दवाई के लिए, मुमंत प का कपडा भी ले आया था और.वित्रा गामने पानी बनि मे मिषवाकर, उन्हें गुतली में पिरोकर, टांग भी लिया था। धीरे-धीरे मित्रा की दवागी उनी गई थी और यह उग गर्दकमी. में ही काफी मग नजर आने लगी थी। गुवह गवर्ग परले चियामा यो, दसके बाद मुमंत बोर के बाद मैं । मो. हा धोनों एक वार चार बनाकर पी पर होते और दिन मर के काम की गिनी बना चुके होते है। चित्रा डिन दिनों पाई थी, टन दिनों बाद ही पीना। दही पनघोर दारिश की और हमारे बनी भी दीगो नम ही गई थी। मोट बाद-जगह में समा गया था, रिगी बरगर्म में पानी छटा था। नई धर पर श्री हर form मलाने सदा सापडोकीवर या परगने घटाया और टोकिदर अंटार्सम दरों में बटों नरोधी दरकारमा दिक दोहराती रही देता.

- देर में शरीर चिपचिपाने लगता था । बड़ी बुरी हालत थी। गली में लेटना मुमकिन नहीं था, इसलिए हम तीनों ही नीचे जमीन पर जैसे-तैसे गुजारा कर लेते थे.. । धीरे-धीरे उस कमरे और माहौल में मेरा दम घुटने लगा और हम तीनों ही अजनवियों की तरह पेश आने लगे। मेरे पास ऐसा कोई वक्त ही नहीं था, जिसमें मैं चित्रा से बात कर पाता । एकांत मिलना तो दुर्लभ हो ही गया था। शाम को कमी कमरे से बाहर निकलते तो ज्यादातर सुमंत साथ होता। वह न भी होता तो हम भीड़ के बीच होते-दूर एकांत में जा सकने की न हममें ताब होती और न जेव में इतने पैसे। । AR- आखिर एक दिन घबराकर हम निकल ही पड़े थे। शाम रात में इल रही थी और हम कनाट प्लेस से बस पकड़कर सेंट्रल सेक्रेटेरियट पर उत्तर पड़े थे। राजपथ पर पहुंचकर हमने जैसे मुक्ति की सांस ली थी। राजपथ के ऊपर आसमान की निरन्तर नीली पड़ती कोरसरकती आ रही थी और फांक की तरह कटा हुआ चमकता आसमान मुंदता जा रहा था। बिजली की वन्दनवार दूर इण्डिया गेट तक चली गई थी। हवा में ताजगी थी- महीनों बाद ऐसी मुक्ति का एहसास हुआ था। हम दोनों के जैसे पंख लग गए थे। मैंने चिता की कमर में हाथ डाल दिया था और चलते-चलते गुदगुदी घास पर पहुंच गए थे। घास पर हम दोनों ही लेट गए थे और मैंने उसकी बांह पर हाथ रख लिया था। नम घास हमें धीरे-धीरे असह्य लगने लगी थी और मैं उसकी कमर के गिर्द वाहें डालकर अघलेटा-सा हो गया था । चिन्ना ने भरी-भरी आंखों से मुझे देखा था। उनकी आंखों में बल्बों के अक्स चिनगारियों की तरह फूट रहे थे । उसका शरीर हमेशा की तरह पसीज आया था और घास की भीगी महक के साथ उसके तन की । २६/तीसरा आदमी

..."
महक चारों ओर भर गई थी। उसके ओंठो से जैसे रम फूटने लगा था
और ओठो तथा कानो की किनारियो से लो-सी निकल रही थी। मैंने
उसी मदहोशी में उसके ओठो पर अपने ओंठ रख दिए थे कि किसी आहट
ने हमे चौंका दिया था। चित्रा ने हडबड़ाकर अपनी साडी ठीक की थी
और सिर पर खडे पुलिसमैन को देखते ही वह अचकचाकर उठी थी और
चुपचाप नहर के किनारे पर जाकर सही हो गई थी। यह उसके लिए
एक नितान्त अपरिचित अनुभव या "मुझे लगा था कि वह बेतरह काप
रही होगी, तभी उस पुलिसमैन ने आकर बड़े बेहूदे ढग से कहा था,
"किघर से आया है आप लोग?"
"अपने घर से ।" मैंने हकलाते हुए कहा था।
"ये लड़की कौन होता है तुम्हारा?"
"मेरी बीवी है और कौन है'
वह पुलिममन छोटी-सी व्यंग्यात्मक हंसी हसा था और बोला था,
"उधर थाने में आइए, जरा..."
"क्यों ?"
"उधर ही पता लगेगा--वो आपकी बीवी है ना?"
उसकी यह बात सुनकर में तिलमिला उठा था ।
"आपका मतलब क्या है ?" मैंने जरा सस्ती से पूछा था।
"उघर सब पता लग जाएगा-चलिए..." वह पुलिसमैन कह ही
रहा था कि एक चनेवाला भाकर खड़ा हो गया था और अपने-आप ही
मेरी पैरवी करने लगा था, "जवान लोग हैं हवलदार साहब''जाने भी
दीजिए।"
"उधर दरोगा छोड़ देगा । वहा तक तो चलना ही पड़ेगा।"
तभी उस चनेवाले ने मुझे इशारा किया था कि मैं उसे कुछ दू । यह
मुझे निहायत अपमानजनक लग रहा और मैं भीतर ही भीतर जला जा
रहा था। लेकिन कोई बस नहीं था। चित्रा शर्म की मारी रहलती-
तीसरा आदमी / २७

टहलती नहर-किनारे दूर तक निकल गई थी। मैंने जेब से एक रुपया निकालकर उस पुलिसमैन की तरफ बढ़ा दिया था, पर उसने बड़ी हिकारत से उस रुपये को देखा था और फिर गुर्राया था-"आपको थाना चलना पड़ेगा।" कुछ दूर पर खड़े लोग हमारी तरफ कुछ-कुछ मुखातिब हो रहे थे कि मैंने जान बचाने के लिए दो रुपये और उसकी हथेली पर रख दिए थे और तव वह यह कहता हुआ चला गया था, "उधर टहलो"नहर के उस पार" और चनेवाले ने चलते-चलते कहा था-"मौज करो प्यारे !" मैं भीतर ही भीतर तिलमिलाकर रह गया था। यह वेकार का दंड पड़ गया था। मुझे चित्रा पर भी गुस्सा आया था कि वह एकदम ऐसे उठकर चल दी थी कि जैसे उसका और मेरा कोई सम्बन्ध ही न हो" जैसे वह मेरी पत्नी न होकर जान-पहचान की लड़की हो, जो सिर्फ इस शाम-भर के लिए मेरे साथ आई हो। उसके पास पहुंचते ही मैं वरस पड़ा था, "यह तुमने कैसी हरकत की! खामख्वाह पुलिसवाले को शक हो गया।" "तो मैं वहां कैसे...?" चित्रा ने रुआसे स्वर में कहा था । "कैसे का क्या मतलव है ?" मैं और भी विगड़ उठा था और चिना वेहद अनमनी और उदास हो गई थी। काफी देर तक हम विना वोले-चाले रोशनी के किनारे-किनारे टहलते रहे थे। भीतर का कुछ मूल्यवान मर गया था और हम एक-दूसरे को आमने-सामने देख सकने में अपने-आपक असमर्थ पा रहे थे। उस एक घंटे के दौरान चिन्ना ने मेरी ओर नहीं देखा था और मेरा ही जी उसे देखने को किया था। मेरे खयाल में वह अपमान ब तीन रुपये उलझे हुए थे, जो मुझे निरंतर साल रहे थे। आखिर हम वस में आकर बैठ गए--विलकुल अपरिचित-से। इतने अपरिचित-से कि लगभग खाली बस में हमें एक ही सीट पर २८ /तीसरा आदमी देखकर शेप चार-पांच लोग मेरी बदतमीजी पर आंखें तरेर-सी रहे थे। कंडक्टर ने भी हमें समय से देखा था। चिना खिड़की से चिपकी हुई बरावर बाहर ताक रही थी। मैंने दो टिकट लिए तब कही जाकर कडक्टर का संशय दूर हुआ था। मैंने एक बार फिर उन्हीं मदहोश नजरों से चित्रा को देखा था, पर उसका बदन जैसे विलकुल मूखा हुआ था । उसका रस कहीं भीतर समा गमा था और यह बिलकुल अलग-थलग कटी-सी बैठी थी । स्पर्श भी अब उसे महसूस नहीं हो रहा था। बस में बैठे-बैठे उस दिन मुझे पहली बार चिना से नफरत-सी हुई थी। मैंने कई बार गौर से उसे देखा था और तब मुझे एकरएक उसके शरीर का अनुपात और नकश बहुत भोंडे-से लगे थे। पता नहीं, उसमें से क्या खो गया था. बस से उतरकर कमरे की ओर चलते हुए मैं मांस बचाकर उसे ताकता रहा था और एकाएक मुझे लगा कि मैं उसे नहीं चाहता। कमरे में पहुचे थे, तो मुमंत मौजुद मा । हमें गुमसुम देखकर उसने इतना ही कहा था-"का बहुत या गए ?" "नही तो.." चिना ने जवाब दे दिया था और वही खड़े होकर साड़ी वदलने लगी थी। मेरे तन मे आग-सी लग गई थी। सुमंत ने मेरो आंखों में धधकती आग को देखा था और वह कमरे से निकलकर नीचे गली में चला गया था। मैंने अपने को बहुत मुश्किल से साधा था। स्टूल पर बैठे-बैठे एकाएक मेरा मन भर आया था-~-यही सोचकर कि जैसा कुछ भी है, ठीक ही है"आखिर चित्रा इतनी कठिनाइयों में मेरे साथ गुजारा कर रही है । उसने आज तक मुझसे किसी चीज के लिए जिद नहीं की अपनी किसी इच्छा को पूरा करने के लिए मजबूर नही किया और न अपना मन बिगाड़ा |"उसके प्रति मन कुछ-कुछ बदल ही रहा था कि उसने धीरे से कहा था: तीसरा आदमी/२६ - । "यहां रहना हो नहीं पाएगा "क्यों ?" "मेरा मन यहां नहीं लगता।" "तो कहां जाना चाहती हो?" "जाने के लिए और जगह कहां है." उसने जैसे अपने से ही कहा था और सीढ़ी उतरकर आंगन के गुसलखाने में चली गई थी। मैं चुप- चाप अपनी जगह पर बैठा रहा था। अपने में घुटता हुआ । लगा था कि चित्रा के भीतर घुमड़ता हुआ धुआं अब निकला है।

। जब भी मैं अकेला होता, हमेशा यही सोचता रहता कि जिन्दगी की यह गाडी इतने अनमनेपन से कैसे चलेगी? इतने अलगाव और अजनवीपन से जिन्दगी का यह सारा वक्त कैसे कटेगा? बार-बार मैं अपने को टटोलता और फिर विना की तरफ से अपने बारे में सोचता। लगता था कि जैसे इतने योई से दिनो मे ही हमारे बीच एक अजीब सा ठंडापन भर गया है। हम दोनों जैसे एक-दूसरे के साथ यह विवाहित जीवन जीने के लिए कुछ-कुछ-से मजबूर थे और कुछ मजबूरी थी हमारे जवान होने की। जैसे हमें एक-दूसरे की ज़रूरत कुछ क्षणो के लिए थी और वे क्षण भी अजीव उफान के होते थे, उसके बाद सूनापन बांधने लगता था। "शाम होते ही हमारी गली में उदासी भरने लगती थी। एक-एक कमरे में रहनेवाली गृहस्थिया बाहर गली में निकल आती थी। गली भर में पत्थर के कोयलों की अगीठियां सुलगने लगती थी। नाली के पास गली की जमीन साफ करके पानी छिड़क लिया जाता था और सार्ट विद्या ली जाती थी। उनपर बैठी-बैठी औरतें सब्जिया काटती रहती या कोई और काम करती रहती । सामने की दीवारो पर लगे हुए नालियों के पाइप बड़ी-बड़ी छिपकलियों की तरह चिपके लगते थे, और मेरा मन गिजगिजाहट से भर उठता । इन कुछ ही दिनों में हमारे सारे कपड़ो का रंग और वू एक खास किस्म की हो गई थी। तोलियों में अजीब-सी महक समा गई थी और विस्तर सड़े हुए अनाज की तरह महकने लगे थे। शाम गहरी होती तो गली में रहनेवाले दूकानदार आदमी अपना धंधा करके लौट आते थे, और वेल-बूटेदार मैले-चीकट तकिये लगाकर सरहरी खाटों पर लेटे रहते-क्रोशिए से बनी हुई बनियाइने पहने तथा तीसरा मादमी/३१ जांघों तक तहमद उठाए। मैं खिड़की से यह सब देखता और मन घुटने लगता । रात होते- होते मन इतना छटपटाता था कि दीवारें तोड़ कर कमरे को कुछ और खुला करने के लिए अकुलाने लगता था। चिना जैसे-तैसे वहीं कमरे के एक कोने में स्टोव पर खाना पका लेती, और खाना खाते वक्त भी लगता कि रोटी की अपनी महक नहीं रह गई है। लगता था कि जैसे रोटियां पकाकर किसी वोरे में बंद कर दी गई हों, और अब उसमें से निकाल-निकालकर परोसी जा रही हों। गिलासों में सड़ते अचार-सी बू आती और जव रात को इस सबके बाद कभी चित्रा बालों में तेल लगाकर पास लेट जाती, तो सांसें रुकने लगती। सीली हुई दीवारों की महक में मैले कपड़ों की मिली हुई बू" कोने में रखे राशन की गर्म महक और बिस्तरों से आती सड़े हुए अनाज की वू और चित्रा के बालों का महका हुमा तेल"वगलों में भरे हुए पसीने की तेज़ भभक"दिल होता था कि कमरे से निकलकर भाग जाऊं. और इस सबके बीच भी जैसे कभी-कभार ज़िन्दगी लौटती थी। वे क्षण ही जैसे सारे जीवन को सार्थकता दे जाते थे। जब भी सुमंत यह कहकर चला जाता कि वह सेकिण्ड शो सिनेमा देखकर लौटेगा, तो कमरे की सारी बूएं जैसे मदहोश करने लगती थीं। हम दोनों ही जैसे उस सवकी अनहोनी अनुभूति से भर जाते थे-जो होने वाला होता था। चिना बहुत फुर्ती से खाना बनाती थी और तब तक जाकर, मैं मन्दिर के पास से उसके लिए वेणी खरीद लाता था । हम बहुत जल्दी खाना खाते थे और चिना झटपट गुसलखाने में जाकर हाथ-मुंह धो आती थी, तेल डाल- कर वाल काढ़ती थी, जूड़े में वेणी बांधती थी और साड़ी बदलकर तैयार हो जाती थी। हम नई दिल्ली स्टेशन होते हुए कनाट प्लेस की तरफ पैदल घूमते हुए निकल जाते थे-~मन में यह सोचते हुए कि हमें ३२ / तीसरा आदमी ती-२

जल्दी ही सोना है और पासो fat"
हम सोरकर भाते। जमीन पर
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हुए एक-दूसरे से कतराते । परमी मात Hit
इरादो को एक-दूसरे पर जाहिर | Niti WITH
पर रहती और सर जरो गोई भी tamil Maili Tht
माखो में नहीं होती परणो भी मानता. innti nition
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जांघों पर जैसे कोमल कांटे उभर आते और फिर सव महके घुल- मिलकर ज़िन्दगी की एक अजीव महक में समा जातीं । चारों ओर जैसे सितारे फूटने लगते "शरीर चटखने लगते । सांसें गुंथ जाती और हाथों से पके हुए चावल की गंध फूटने लगती। शरीर उस गंध में नहा जाता और हम पसीने से लथपथ अपने बंधनों को ढीला करने लगते । कमरे में गर्मी और बढ़ जाती। दोनों जल्दी-जल्दी विस्तर की सलवटें साफ करते। मैं तव तक कमरे का दरवाजा खोलकर गली की आहट लेता"हवा की हल्की-सी लहर आती, तो तन ताज़ा-सा होता और मैं वहीं चौखट पर खड़े-खड़े कहता, "बड़ी गर्मी हो रही है, चिता।" चित्रा एक क्षण शरारत से मुस्कराकर मुझे देखती । उसकी आंखों में वेहद मासूमियत होती और चेहरे पर ताज़गी। तभी मुझे लगता कि सचमुच मैंने चित्रा को यहां लाकर एक पिंजड़े में बन्द कर दिया है" मेरा मन भीतर से उमड़ आता और मैं उसे बांह पकड़कर खींच लाता। "चलो, जरा बाहर टहल भाएं..."और दरवाजे की ओट में एक बार फिर उसे धीरे से प्यार कर लेता। हम दोनों ताला लगाकर नीचे गली में उतर आते और बड़ी मस्ती से कुतुव रोड की ओर निकल जाते। उस वक्त गली में चलते हुए मुझे हमेशा यह एहसास होता कि लोग हमसे ईर्ष्या कर रहे हैं और हमारी मस्ती से भरी ज़िन्दगी देखकर कुढ़ रहे हैं। मैं उन क्षणों में अपने व्यक्तित्व को पूरा होते हुए देखता। अपने पर विश्वास होता और ज़िन्दगी की सार्थकता कुछ-कुछ दिखाई देने लगती। चित्रा उन क्षणों में बेहदं सुन्दर लगती। मैं उसके शरीर के एक एक खम को सकारता और कभी-कभी एक कदम ठिठककर उसे देखता -कितना सुडौल था उसका बदन ! मेरा मन जैसे पूर्णता प्राप्त करता और गली से बाहर आते-आते चित्रा कुछ गुनगुनाने लगती थी" हमें तब नींद नहीं आती थी। कुतुब रोड पर हम घूमते "सड़क के । ३४ | तीसरा आदमी किनारे खडी दीवार के उस पार पड़ा हुआ दिल्ली-भर का कूड़ा वदवू देता, पर तब हमे वह वदवू बस्ति हो जाती थी। हम सड़क के किनारे-किनारे टहलते रहते और दीवार के उस पार कूडे की रेलगाडिया भर-भरकर छूटती रहती । डिब्बों में कूड़ा भरते हुए जमादारों की टोलियों की भनभनाहट, लडते हुए कुत्तों का शोर और वेलचों, तसतो, पल्लो और फावड़ी की आवाजें बाती रहती । संकडों टन कूड़े की बदबू भी उस वक्त चिना के जूडे में महकते वेला के फूलो मे दव जाती और हम चुहल करते हुए उसी सड़क पर चहलकदमी करते रहते। नई दिल्ली स्टेशन से इजनों को सीटिया सुनाई पड़ती और कुछ- कुछ देर बाद अड्डे की तरफ लौटते हुए तांगो की आहट भाती। भाधी रात में कूदे के ट्रक आते, और शोर मचाते हुए और 'डम्प प्लेट- फार्म' की ओर चले जाते। हम तब तक टहलते रहते, जब तक सिनेमा के लोग लोटने न लगते और कभी-कभी हम सुमन्त को वही सड़क या गली के मुहाने पर ही मिल जाते । वह हमें आश्चर्य से देखता, "अभी सोए . नहीं?" "नोंद नहीं आई.."विना कह देती। फिर हम लौटकर उसी कमरे में पहुंचते । सुमन्त की दरी और चादर विधी होती। मैं पसरकर लेटु जाता विना सुमन्त को साना खिलाती और मैं भरा-भरा-सा उसे देवता रहता। उन दिनों का यह दृश्य आज भी हल्के से मुझे सहला जाता है। उन क्षणों में जैसे हमारे पास सब कुछ होता था। सुमन्त खाता जाता और देखे हुए सिनेमा का किस्सा सुनाता जाता। विवा बड़े मन से किस्सा सुनती, फिर गानो के बारे में पूछती और गाने अगर उसे अच्छे लगते, तो वह मुझसे किसी दिन प्रोग्राम बनाने का आग्रह करती। हम तीनों लेट जाते । बीच में मैं, दाहिनी ओर कुछ दूर . तीसरा आदमी/३५ मोर वाई और पास ही सटी हुई चिना । बहुत रात गए तक हम चुप- चाप एक-दूसरे को छेड़ते रहते "पर ऐसे कि सुमन्त को भी एहसास न हो। और तब मांख में नींद उतर आती। सुबह चित्रा अपना जूड़ा संभालती तो सूखी हुई वेणी उतारकर खिड़की में विछे कागज़ पर रख देती। और जब उसी खिड़की पर शेय के लिए मैं पानी का इन्तजार करता होता तो उस सूखी हुई वेणी को सूंघता"उसमें तव भी महक होती। और मैं एकाएक न जाने क्यों सुमंत से फहता, "अगले महीने कोई अच्छी-सी जगह देखी जाए-क्यों सुमंत ? जो दस-बीस ज्यादा पड़ेगा, दे लेंगे.." चिता की आंखों में रोशनी-सी लहर जाती । दाल धोते-धोते वोलती, "फिर हम घर से अपना सामान वगैरह भी ले आएंगे." "अगले इतवार मकान खोजने जाएंगे, यही प्रोग्राम रहेगा। क्यों भाभी, ठीक है न !" कहता हुआ सुमंत तोलिया लिए गुसलखाने की और बढ़ जाता । वहां कोई और नहाता होता तो लोटकर कमरे में आता और पूछता, "क्यों, भइया, तुम्हें सरकारी क्याटर नहीं मिल सकता ?" "मिलेगा तो, पर कव तक, यह पता नहीं।" मैं पाहता तो चित्रा के पंख लग जाते, "एक दफा घर ठिकाने का हो जाए तो मैं भी काहीं छोटी- मोटी नौकरी कर लूं."सारा दिन अयोले यहां मन भी तो नहीं लगता।" "तो तुम कुछ मेरा काम कर दिया करो भाभी।" सुमंत बोला था ! "हो तो बताओ न"मैं तो खाली ही बैठी रहती हूं।" "प्रेस के प्रूफ पढ़ दिया करो"कुछ पैसा भी मा हो जाएगा।" ३६/तीसरा आदमी सुमत ने कहा था तो चिना बोली थी, "पर प्रूफ पढ़ना मुझे आता नहीं "मैं बता दूंगा। घटे भर में सीस जाओगी । अगर सीख लो तो चार-छ' फर्मे मैं रोज ला सकता हूं." कहते हुए सुमन्त ने गुसलखाना खाली होने की आवाज सुनी थी और वह झपटकर घुस गया था। उस दिन के बाद ही वह कुछ प्रूफ ले आया था। चित्रा को उसने प्रूफ पढ़ना भी सिखा दिया था। जब भी सुमन्त को कुछ काम मिलता तो वह उठा लाता । दूसरे दिन चिना उसे पूरा कर देती और तीसरे दिन सुबह वह लेता जाता । कुछ आमदनी भी हो ही जाती थी। चित्रा को यह आमदनी थी तो बहुत थोड़ी, पर फिर भी एक सहारा-सी बनती जा रही थी। कभी-कभी मैं लौटता तो देखता कि चिना प्रूफ पढ़ने में लगी हुई है। मेरे आते ही वह उठती, पर उसका ध्यान उस काम में ही रहता। मैं हाथ-मुंह धोने जाता तो वह एक पैराग्राफ और पढ़ लेती और तुमत के आते ही उससे उलझ जाती। "जरा यह शब्द देखना, मुमन्त ।" वह कहती और पूरी लाइन पढ़ कर सुनाती । सुमन्त बड़े गौर से सुनता और सही करता जाता। वीच में वह उठकर जाती । इधर-उधर की बातें करते हुए चाय बनाती, मुझसे दफ्तर के हाल पूछती और चाय के प्याले रखते ही जैसे हम दो हिस्सों में वट जाते । मैं चुपचाप चाय पीता रहता और चित्रा सुमन्त के पास अपना प्याला सिसकाकर, लाल स्याही का फाउण्टेनपेन हाथ में लिए फिर उन कागजो से कुछ पढ़ने लगती। और पढ़ते-पढते कभी वह उस लेखक का मजाक बनाती, "कितने गधे होते हैं तुम्हारे ये लेखक ! इन्हें इतनी भी तमीज नही कि क्या लिख तीसरा आदमी/ ३७ सुमन्त कुछ कह देता । चित्रा झगड़ पड़ती। और उनमें बहस छिड़ जाती । तब सुमन्त बड़े इत्मीनान से बैठकर उसे समझाता । और एक दिन ठीक ऐसा ही हुआ था । प्रूफ पढ़ते-पढ़ते चित्रा ने किसी लेखक का मजाक उड़ाया था। चाय का एक दौर चल • चुका था। मैं अपना प्याला खाली करके चुपचाप वैठा सिगरेट पी रहा था कि उन दोनों में घमासान बहस होने लगी थी। चिना कह रही थी, "तुम्हारे ये लेखक नारी को समझते-वमझते कुछ नहीं, सिर्फ दिल की भड़ास निका- लते हैं।" "तुमने अभी दुनिया नहीं देखी है, भाभी।" सुमन्त बोला था, "कैसी-कैसी औरतें पड़ी हुई हैं, तुम क्या जानो । तुम लोगों के दिमागों में वही सती साध्वी पत्नी का रूप बैठा हुआ है "पर दुनिया बहुत बदल गई है। संबंध बहुत बदल गए हैं." सुनते हुए चित्रा झुंझला उठी थी। बोली थी, "होता होगा कहीं और, अपने हिन्दुओं में ऐसा नहीं होता"." और वहस का दौर लगभग झगड़े पर खत्म हुआ था। सुमन्त सख्ती से बोला था, "छोड़ो इस वहस को । समझ में नहीं आता कि तुमने पढ़ा-लिखा क्या है ?" यह बात चित्रा को चाट गई थी । सारी बातों के बावजूद वह इसे वरित नहीं कर पाई थी। सुमन्त भन्नाया हुआ उठ गया था। चित्रा गुसलखाने में जाकर रोई थी और मुंह धोकर लौटी थी। उसकी सुर्ख आंखें देखकर मुझे पता चल गया था कि वह रोकर आई है। तब मैंने उसके पास बैठते हुए समझाया था, "तुम्हें बुरा नहीं मानना चाहिए"यह तो बात की बात थी। इसमें झगड़ने का सवाल ही क्या था ! फिर तुम्हें क्या लेना-देना इस बात से कि कौन क्या लिखता है और । - ३८/तीसरा आदमी क्यों लिखता है। तुम अपने प्रूफ पढो और थमा दो उसे । वह जाने, उसका काम जाने"." चिन्ना की आखें फिर डबइवा आई थी। उसे कोई और ही वात सार जा रही थी। दोली घी, "मुना नहीं तुमने-सुमन्त मेरे पढ़ने- लिसने पर" "अरे छोड़ो भी इस जरा-सी बात को." मैंने उसे समझाया था। कुछ देर बाद वह ठीक हो गई थी और खाना पकाने लगी थी। । पर उस दिन के बाद मैंने महसूस किया था कि चित्रा रिश्ते के जिस वड़प्पन से सुमन्त से बात करती थी, वह बड़प्पन कही खो गया था। उस कमरे में एकाएक वह सबसे छोटी हो गई थी" उस दिन से पहले तक अगर सुमन्त को प्यास लगती थी तो वह खुद उठकर पानी पी लेता था, पर अब चिन्ना कमी-कभी उसे दे देती थी। अपने घोए हुए कपड़े वह शाम को आकर खुद उठाता था, पर उस दिन के बाद मैंने देखा था कि चित्रा उसका तौलिया और बनियान भी बाहर से लाकर कील पर टांग देती थी। शाम को वे फिर प्रूफ ठीक करने बैठते, तो चिना धीरे से उठकर दुवारा चाय का पानी चढ़ा देती थी। उस दिन भी कुछ ऐमा ही हुआ था। चाय का पहला दौर चल चुका था। मैं अपना प्याला खत्म कर सुबह का असवार पलट रहा था कि चित्रा ने फिर चाय तैयार की थी और वेखबर-सी सुमन्त का और अपना प्याला भरकर फिर पूछताछ में उलझ गई थी। उसी दिन शायद पहली बार मैंने अपमानित महसूस किया था । कुछ देर बाद उसे एकाएक याद आई थी तो बहुत खिसियाते हुए वह बोली थी, तीसरा आदमी /३६ 'अरे, मैं तो आपको चाय देना ही भूल गई:"टण्डी हो गई है, अभी गरम कर देती हैं।" मैं बहुत पीड़ित था उस वक्त, फिर भी अपने को संयत रखते हुए मैंने कहा था, "नहीं, मुझे और जरूरत नहीं"तुम अपना काम करो..." "मैं बिलकुल भूल ही गई..." कहते हुए उसने स्टोव पर केतली रख दी थी। उस क्षण उसकी इस बेचारगी पर मुझे बड़ा तरस आया था। उसका हाथ स्टोव में हवा भरते हुए बार-बार विछल रहा था। कनपटियों पर पसीना छलछला आया था। उस वक्त जितनी जल्दी से वह चाय गरम करके मुझे दे देना चाहती थी, वह मुझे बहुत बेहूदी-सी लग रही थी। उसका बैठना, बार-बार बांह से माथे पर आया हुआ पसीना पोंछना और पैरों की अंगुलियों का कसकर ज़मीन पकड़ना-सब कुछ बहुत अजीब-सा लग रहा था । लगता था, जैसे कुछ ही मिनटों में हमारे वीच मीलों की दूरी पैदा हो गई है और उस दूरी के एक सिरे पर बैठी चिता चाय बना रही है और दूसरे सिरे पर बैठा मैं अब और भी ज्यादा अपमानित महसूस कर रहा हूं। कि अब यह चाय मुझ तक कभी नहीं आएगी-आएगी भी तो उसका कोई मतलब नहीं होगा। उसने मेरा प्याला धोकर चाय ढाल दी थी और चुपचाप उठकर नल से पानी लेने चली गई थी। सुमन्त कुछ पढ़ने में गुम था । चाय मेरे सामने पड़ी थी और चित्रा अपराधी-सी दरवाजे की चौखट के पार चिपकी खड़ी थी। ऐसा ही उस दिन भी हुआ था, जब इण्डिया गेट से हम दोनों अपमानित-से लोट थे। रास्ते-भर चित्रा ने मुझसे बात नहीं की थै मैं तैयार होकर रेडियो चला गया था। सुमन्त अपने काम पर । को जब हम तीनों फिर इकट्ठे हुए तो कहीं पर कुछ खोया हुआ या कुछ और जुड़ गया था, जिसे हम कोई नाम नहीं दे सकते जो कुछ जुड़ा था, वह शायद अतिरिक्त था "कुछ ऐसा जो हम ४०/तीसरा आदमी को ही अकेला कर रहा था। शाम को मुमन्त ने चाय भी नहीं पी। वह जल्दी में था। शायद चित्रा उसके सामने पड़ना भी नहीं चाहती थी। वह गुसलखाने में घुस गई थी। जब तक वह गुगलखाने से लौटकर आई थी, तब तक सुमन किसी काम से चला गया था। मुझसे कह गया था कि वह देर से लौटेगा, यही कोई डेढ-दो बजे रात को। "मुमन्त डेढ़-दो बजे आएगा । उसका खाना रख दो, आकर सा. लेगा।" रात का खाना खत्म हुआ तो मैंने अनमनेपन से कह दिया था। आम भी वक्त था-अकेले होने का--पर मन में कुछ ऐसा भरा हुआ था कि दोनों ही अपने वहां होने का कोई वसीला नहीं खोज पा रहे थे। लग रहा था कि हम दोनो ही साथ रहने को मजबूर हैं। अभी चिन्ना विस्तर बिछाएगी और हम अनजान-से लेटकर सो जाएगे। यही हुआ भी। मुझे नहीं मालूम कि चिन्ना कब सोई, सुमन्त कर पाया और सुबह वह कब उठ गई। जब मेरी आख खुली तो चिना नहा रही थी और सुमन्त पड़ा सो रहा था । उसके सिरहाने, वही जमीन पर एक गिलास पानी तश्तरी से ढका हुआ रखा था। वह गिलास देखकर मैं तिलमिला उठा था । अपने सिरहाने मैंने देखा-पानी का गिलास नही था। सिर्फ एक तश्तरी पड़ी हुई थी। उन दिनों जिन्दगी कुछ अजब रसतार से चल रही थी। काम में भी मन नहीं लगता था। नौकरी का तीन साल का काट्रेक्ट था, जो अब समाप्त होने को आ रहा था । नौकरी से अलग किए जाने की उम्मीद तो न थी, पर भविष्य के लिए कुछ होता भी नहीं दिखाई पड़ रहा था- उम्मीद थी कि यही कोई बीस-तीस रुपये का इन्क्रीमेंट मिल जायेगा --जिससे कुछ होता-जाता नहीं था। इमसे ज्यादा कुछ पाने की आशा बिलकुल नहीं थी। मन में कही यह डर भी समाया हुआ था कि स्टेशन डायरेक्टर ने यदि सिफारिश न की या रिपोर्ट में कुछ अंट-शट लिख दिया तो जो होने वाला है, वह भी नहीं होगा। तीसरा भादमी/४१ - दिल्ली में आकर तो मैं और भी गरीव हो गया था। मन में कहीं यह बात भी टीसती रहती थी कि दिल्ली आकर मैंने अपनी खुदी को और भी खो दिया है । इलाहाबाद में तो फिर भी कुछ होने' का एहसास होता था, लगता था कि कुछ लोग मुझे जानते हैं और मेरे काम को ईप्या की दृष्टि से देखते हैं--दूसरों की आंखों से झांकती हुई वह ईयां मेरे अहं को तुष्ट करती थी। यूनिवर्सिटी और कालिजों के बड़े दों के लड़के मुझे कभी-कभी हसरत से देखा करते थे और मुझसे बात करने के लिए उतावले-से रहते थे। कभी कॉफी-हाउस चला जाता तो जान-पहचान कराते हुए कोई थोड़े फख से ही कहता--"ये रेडियो में एनाउंसर हैं।" तव एक क्षण के लिए मुझे अपने पर गर्व होता था। पर दिल्ली आकर मेरी जिन्दगी की यह बहुत छोटी-सी सार्थकता भी मर गई थी। और धीरे-धीरे मेरे भीतर का इन्सान खण्डित होता जा रहा था । छोटी-छोटी बातें उस वक्त बहुत चुमती, जब चिन्ना साथ होती। मुझे लगता था कि मेरे भीतर ही मेरी एक कद्दे-आदम मूर्ति थी-उस की शक्ल मुझसे कुछ ज्यादा खूबसूरत थी। उसके माथे पर मेरी तरह शिकनें नहीं थी। उस मूर्ति में दम-खम था । दर्प और अहं भी था। तन कर खड़े होने की ताकत भी थी। वह मूर्ति एक काबिल इन्सान, पूर्ण पति यौर सफल व्यक्ति की थी। उसकी आंखों में सपने थे, दिमाग में योजनाएं थीं और मन में इच्छाएं भी थीं। अव भी चिता मेरे साथ होती तो वह मूर्ति मेरे भीतर से निकलकर ऊपर छा जाती और मेरा असली चोला भीतर समा जाता पर दिल्ली में आकर यह मूर्ति लगातार टूटती गई, छोटी-छोटी वातों से। वे बातें अह्म नहीं थी, पर जिस रूप में वे घटित हुई, उनसे कुछ न कुछ चटकता गया। चिना के रिश्ते का कोई भाई दो दिन के लिए आया था। वह रेडियो स्टेशन देखना चाहता था। चित्रा ने अपने सहज दर्प में कुछ - ४२ / तीसरा नादमी समतरानिया हांक दी थी."ऐसे बढ़-चढ़कर कुछ बातें कह दी थी, जो उस क्षण मुझे भी बहुत भली लगी भीं-"अरे, रेडियो स्टेशन का क्या है ? इन्हें कौन नहीं जानता--अगर मैं ही इनका नाम लेकर चली जाऊं तो किसकी मजाल कि टोक दे..." चित्रा अपनी रो में उस भाई से कहती जा रही थी, "छन्चीस जनवरी को ये पास ले आए थे, हम बडे आराम से रिपब्लिक डे देख आए, नहीं तो यहां पास मितना आसान धात नहीं है । बड़े-बड़े लोग हाथ-पैर मारकर रह जाते है। इतना रोब तो है तुम्हारे जीजाजी का। कव देखोगे रेडियो स्टेशन ?" "आज या कल, यही दो दिन हैं । कल रात को मैं वापस भी जाना चाहता हूं-हो सकेगा?" चिता के भाई ने पूछा। "हो क्यों नहीं सकेगा? इसमें कौन-सी दिक्कत है !" चिन्ना ने अपनी उसी री में कहा था, "वैसे रेडियो स्टेशन देखने के लिए सिर्फ शुक्रवार को ही पास मिलते हैं. पर जाएगा"क्यो?" उसने मुझसे पूछा था। मैं अजीव धर्मसंकट में था । दफ्तर में जो मेरी औकात थी, उसे मैं खूब जान रहा था, पर उस क्षण के दर्द में मैं इनकार भी नहीं कर सकता था। इसीलिए वोला था, "हो क्यों नहीं जाएगा । एक नहीं, दस पास बन जाएगे" "तो फिर ठीक है दीदी, हम लोग कल चलेंगे." और जब चिता अपने भाई को साय लिए हुए रेडियो-स्टेशन आई थी तो मैं दवसट में फसा हुआ था । कोशिश के बावजूद पास नहीं बन पाए थे । स्टेशन डायरेक्टर तक पहुंचने की अपनी विसात नहीं थी, आसिर चुपचाप ड्यूटी आफीसर से जाकर मिला था। उसने झट रे तरकीब बताई थी, "स्टूडियो में कोई रिहर्मल हो रहा हो तो दोनो का आटिस्टी का पास वनवा लो और चले जाओ..." बात मुझे जंची थी। पर बदकिस्मती कि उस दिन किसी नाटक तीसरा आदमी/४३ स्टूडियो-रिहर्सल नहीं हो रहा था । आखिर में हिम्मत करके उन नों को ले चला था, यही सोचकर कि स्टूडिओज़ वाले बड़े दरवाजे पर बड़ा होने वाला चौकीदार मुझे पहचानता है । वह टोकेगा नहीं। आखिर दिन में वीस पार आते-जाते देखता है, पहचानता तो है ही। उस वक्त जव कि मैं अपनी उस छोटी-सी जान-पहचान के आसरे उन दोनों को लेकर दरवाजे तक पहुंचा था, तो उसने टोक दिया था, "साब, पास!" "अरे भई, पहचानते नहीं !" मैंने चौकीदार से जान-पहचान जताई थी, पर मन ही मन मैं तिलमिला भी उठा था। मैं जान रहा था कि अव यह वदमाश चौकीदार मेरी वेइज्जती करके ही रहेगा । पर न जाने उसे क्या सूझा कि मुस्कराता हुआ एक ओर हट गया। एकाएक मेरी स्थिति सुधर गई थी और मैंने जीत के अंदाज में चिना और उसके भाई को देखा था। अभी एक क्षण पहले जो स्थिति थी, उससे मैं उबर आया था। पर चित्रा की आंखों में अपमानित होने जैसा भाव उतर या था। उसकी चाल और हाव-भाव में अब वह उत्साह नहीं रह गया था जो कि तब था, जब वह अपने भाई को लेकर रेडियो स्टेशन आई थी। रेडियो स्टेशन में ऐसा कुछ देखने को होता भी नहीं। मैं उन दोनों को एक खाली स्टूडियो से दूसरे खाली स्टूडियो में घुमाता रहा और बताता रहा कि यहां से खबरें प्रसारित होती हैं। यह बूथ हम एनाउन्सरों का होता है यह कण्ट्रोल है"यह ड्रामा स्टूडियो है"यहां से हम लोग किस-किस तरह और किन तरकीवों से साउण्ड इफेक्ट देते हैं." यह सव उन्हें समझाते हुए मैं जरा ज्यादा ही उत्तेजित था। मे चित्रा के भाई की ओर उतना ध्यान नहीं था, जितना कि स्वयं उस ओर। ज़िन्दगी में बहुत बार ऐसे क्षण आए, जब मैंने गर्व से भरकर की आंखों में अपनी सार्थकता खोजनी चाही, पर ऐसे क्षणों में मैंने ४४ / तीसरा आदमी । बहुत सयत पाया । आज लगता है कि शायद हर पुरप अपनी प्रेमिका या पत्नी की आंखों में अपनी भावनाओं की अतिरजित तस्वीर देगने की कामना रखता है। परिवार इतने छोटे-छोटे टुकडो में घट गए हैं कि आदमी की खुशियों या दु सो का विस्तार सिमट आया है-अप शुस में दस या दुख में बीस जन सवेदना प्रकट करने पाले नहीं रहे हैं। और इसीलिए अब सुखी और दुखो की सह-अनुभूति के लिए दस या धोरा गुनी गहराई चाहिए. एहसास की गहराइयां। कितनी गहरी हो गई है ये गहराइयां । टूटे हुए परिवारों में, जहा पति-पत्नी का ही घटक रह गया है. यह गहराई एक अनिवार्यता बन गई है, और मेरे साथ मुस्किल यही थी कि हम दोनों एक दूसरे के पूरक बनने के लिए, पहयानने के लिए कुछ योर ववत गंवाने को मजबूर थे । शादी के पहले मैंने चित्रा को जाना नहीं था और न उसने मुझे। हो, उस हिन्दू वैवाहिक कर्मकाण्ड के दौरान इतना भर जहर मह- सूस हुआ था कि अब में कहीं और भी प्रतिश्रुत हो गया हूं। उन पर्न. काण्डों के बीच धीरे-धीरे एक जुड़ने की भावना पैदा हुई थी और लगा पा कि उन दो दिनों में मिल-जुनकर हर जगह साथ-साप मध्ये देते या हवन करते हममे कुछ सन्निकटता आई थी। और उस जरा-सी जान-पहचान के सहारे हम एक बहुत लम्बी जिन्दगी के छोर से वध गए थे। उस सलिकटता में यह जोग, गरमी और रस नहीं या "स्वयं कुछ करके पाने का एहसास नहीं था। जब हमारा घर टूटा था तो मैंने यही सोचा था कि अब मैं चित्रा के साथ शायद गहरी आरमीय निकटता महमूम कर गगा। हम बोले होते हुए अपनी भावनात्मक दुनिया में एक-दूसरे पर इतने निर्मर हो जाएंगे कि हमारा एक-दूसरे के बगैर रहना मुश्किल हो जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हमारी निर्भरता में बाहरी दुनिया की बातें तौमरा यादमी / ही अधिक रह गई और ऐसे एकांतिक आत्मीय क्षण बहुत कम आए जव हम एक-दूसरे को आंतरिक गहराई से महसूस करते । कुछ ऐसा था जो हमारे बीच पैदा ही नहीं हो पाता था "कभी वहुत अपनत्व के क्षण आते, तो भी कुछ था जो वाकी रह जाता था । यह कुछ शायद मह- सूस ही किया जा सकता है, यह बहुत कम ऊपरी भावों में उभरता है- कभी उभरता है तो वहुत सुन्दर बनकर-तब व्यक्ति के चेहरे से एक प्यार-भरा तेज़ फूटता है"आंखों में एक आभा उतर आती है और चारों ओर सव कुछ संतुलित और सुन्दर दिखाई देने लगता है । वेकार चीजों में भी अर्थ भर जाते हैं घटनाएं तो बहुत-सी हैं हर दिन कई-कई घटनाओं का दिन होता था। हर पल मुझे एक संशय खाए रहता था-दिन-ब-दिन अपने असं- तुलित होते हुए संबंध और हमारे बीच में निरन्तर भरती हुई खामोशी। धीरे-धीरे उस एक कमरे में छोटी-मोटी चीजें भरती जा रही थीं। और हम एक-दूसरे पर उन चीजों के लिए निर्भर भी करते थे--पर वे सभी ऐसी चीजें और वा थीं, जो पति-पत्नी की एकांतिक दुनिया से संबंधित नहीं थीं। हमारे निर्भर होने की बातें कपड़े टांगने के लिए खूटी गाड़ने, नई सुराही लाने और बक्से का टूटा हुआ ताला बनवाने तक ही सीमित थीं। हमारे बीच ऐसी कोई भावनात्मक पूंजी पैदा नहीं हो पा रही थी, जिसे सहेजकर रखने के लिए हम उत्सुक होते । हमारे वीच एक भी ऐस. बीता हुआ क्षण या वाक्य नहीं था, जिसे हम वक्त-वेवक्त याद करके हंस लेते या जिसकी स्मृति से हमारी आंखों में सहज प्यार-भरी शैत, नी ही उभर आती। “४६ / तीसरा आदमी आज वे सब सशय उभर-उभरकर आते हैं। मुझे लगता है कि जिन बातों को मैं अपने मन की क्षुद्रताएं समझकर मुह पर ताला लगा लेता था वह गलत था। सशय भीतर से काटते हैं और धीरे-धीरे शंकाओं में बदल जाते हैं। उन्हीं दिनो जब मुझे चार-पाच दिनो के लिए एक ओ०बी० के सिल- सिले में बाहर जाना पड़ा था, तो मेरा मन बहुत ज्यादा संशयग्रस्त था । हमे पहाड़ी जीवन के कुछ लोकगीत रिकार्ड करके लाने थे और रेडियो के लिए 'गगातट का जीवन पर एक डाक्यूमेंटरी तैयार करनी थी । उस डाक्यूमेंटरी में कुछ आखों देखा वर्णन भी जाना था, उसके लिए मुझे ही भेजा जा रहा था। मैं भी दिल्ली के कोलाहल से कुछ दिनी के लिए बाहर निकल जाना चाहता था। और कहीं यह बात भी थी कि बाहर का दौरा करने से तनख्वाह के अलावा कुछ टी० ए०, डी० ए० भी और बन जाएगा । इसीलिए मैंने शुरू-शुरू में मुद दौड-भाग करके ही ओ०बी० पार्टी में अपना नाम शामिल करवाया था, पर तब यह सोचा ही नहीं था कि मैं जिन परिस्थितियों में रह रहा हूं, उनमें मेरा बाहर रहना मुझे ही काटता रहेगा। ओ०बी० पर जाने से पहले ही मेरे दिमाग में कई बातें आ-जा रही थी। रह-रहकर लगता था कि चिन्ना इस तरह अकेली कैसे रहेगी? रहने को तो रह ले, पर सुमत के साथ एक उठना-चंठना और सोना "में कुछ सोच ही नहीं पाता था। यह कैसे होगा ? चिना को साथ ले जाना सम्भव ही नहीं था, और कहीं भीतर मन मे उसे ले जाने का उछाह भी नहीं था। अजीव डबडबाई-सी तवियत थी। जब मैंने उसे यह बताया तो एकाएक उसने कहा था, "तुम जाओ, काम है तो करना ही पड़ेगा, पर इस तरह मेरा यहा रहना "वैसे कोई बात नहीं"मुझे कोई डर नहीं है । और फिर पांच-छः दिनों में तो तुम तीसरा भादमी / ४७ कमरे में रहना, पस आ ही जाओगे..." उसकी बात में कई पहलू थे। और स्थिति के वे पहलू ही मुझे तर रहे थे। धीरे से मैंने कहा था, "खैर डर की तो कोई बात नहीं !" में इस 'डर' को स्वयं ही दूसरी तरफ मोड़ देना चाहता था। इस शब्द की कई नोकें थीं। और मन के मुख्य डर को हम दोनों ही स्पष्ट नहीं करना चाहते थे। "यह जगह वैसे वहुत सेफ है । गली में हर वक्त कोई न कोई माता- जाता रहता है। रात में भी लोग वाहर लेटते हैं-डर तो मुझे बिलकुल नहीं लगेगा।" चित्रा ने कहा था और हमारे 'डरों' का रुख बदल गया था। दोनों ही इस सम्बन्ध में सुमंत का नाम लेने से कतरा रहे थे। चित्रा भी यह नहीं कह पा रही थी कि सुमंत का यहां साथ होना ही मुख्य डर का कारण है जो मुझे सता रहा था, और न मैं ही खुलकर कह पा रहा था कि मुझे भी यही वात काट रही थी। हमने अपने 'डरों' को नई परिभाषा दे दी थी, ऐसी परिभापा जिससे हम दोनों ही विलकुल डरे नहीं थे। "तुम निश्चिन्त होकर जाओ।" चित्रा ने वहुत संभालकर जैसे मेरे य को समाप्त कर देना चाहा था। "हां, ऐसी तो कोई बात नहीं "मैं कुछ रुपये भी तुम्हें देता जाऊंगा "दिक्कत नहीं होगी।" "तुम्हें जरूरत पड़ेगी"वाहर जा रहे हो। हमारा क्या है, यह चल ही जाएगा।" वह बोली थी। "फिर भी "जरा-जरा-सी चीज़ के लिए कहते अच्छा भी न लगता।" और मैंने उस दिन वहुत गहराई से यह अनुभव किया था कि स मुच एक तीसरा आदमी हमारे बीच कहीं उपस्थित है-हर वात ४८ / तीसरा नादमी पर ढलती है। हर सशय वही इशारा करता है, और हमारे बीच हर वार वही एक छाया आकर खड़ी हो जाती है, जिसे हम खुली आंखों देखते हैं पर कुछ कह नहीं पाते। उस छाया को देखते हुए भी कुछ न कहना मैं सशय की बात सम- झता था। मुझे लगता था कि उस तीसरे आदमी के बारे में बात करते ही मैं कही बहुत छोटा हो जाऊगा | और यह क्षुद्रता मुझे फिर कभी भी चित्रा की आंखों में ऊपर नही उठने देगी। लेकिन आज मैं इस नतीजे पर पहुंच चुका हूं कि पति-पत्नी के सम्बन्धों मे यह संयम जहर घोल देता है । जो बात समाज के मदर्भ में सभ्य और शातीन है, वही वात पति-पत्नी के सदर्भ में गलत और अवास्तविक हो सकती है। पति-पत्नी के सम्बन्धों का आधार ही दूमरा है-इस सम्बन्ध में एक नैसगिक कोमल पशुता है। यह सम्बन्ध बुद्धि से उतना मंतुलित नहीं होता जितना कि हृदय से, और इसीलिए तक की उतनी गुंजाइश इसमें नहीं है। इस सम्बन्ध के बारे में तक हो ही नहीं सकता। किसी भी तर्क के सहारे इसे चलाया ही नहीं जा सकता" तीसरा आदमी/४६ ? घर से आफिस जाते हुए जब मैं तांगे पर बैठा तो मन में आया कि जव चित्रा के प्रति मैं कहीं उतना लगाव अनुभव ही नहीं करता तो वह वात मुझे क्यों काट रही थी? उसका सुमंत के साथ अकेले रह जाना मुझे क्यों बर्दाश्त नहीं हो रहा था आखिर वह कौन-सी चीज़ थी जो मुझे काट रही थी, मेरे दिमाग को कुतर रही थी। लगा था कि मैं अपनी पत्नी से जो सहज अपेक्षा कर सकता था, उसीके कारण यह भावना दिल-दिमाग में आई थी। .."कमजोर क्षणों को कोई नहीं जानता । पता नहीं कब, कहां और किसके लिए किसीके मन में कमजोरी पैदा हो जाए ! दुनिया को किसी चीज़ पर मेरा एकात्म अधिकार नहीं था "मेरे वश में कुछ भी नहीं था और मेरा निज का तो शायद कुछ था भी नहीं। चित्रा पर भी एक एकात्म अधिकार नहीं था। उसकी बांहों और आंखों पर भी नहीं था... उसके मन पर तो कतई नहीं था। अगर था भी तो एक बनावटी और झूठा अधिकार, जिसकी घोषणा हर पत्नी करती रहती है और अपने पुरुष को सताती रहती है। यों यह बात आज भी सोचते या कहते मुझे बहुत छोटा बनाती है और शायद कोई यह भी कह दे कि मैं निहायत असभ्य आदमी हूं, पर विना कहे नहीं रहा जाता कि मैं अधिकारपूर्वक केवल एक ही बात कह सकता था । और वह यह कि चित्रा किसी दूसरे पुरुप से शारीरिक सम्बन्ध नहीं रख सकती। इस अधिकार के पीछे नैतिक और परम्परागत दोनों ही शक्तियां थीं और अपने इस अधिकार की रक्षा के लिए मैं किस भी हद तक जा सकता था। हर पुरुष के पास यही एकमात्र है जिसे वह किसी भी सीमा तक जाकर मनवा सकता है । इस अधिका अधिकार ५० / तीसरा आदमी की रक्षा के लिए वह जघन्य से जघन्य अत्याचार कर सकता है""इसी लिए मुझे लगता था कि चित्रा पर मेरा बस यही वश है कि मेरे होते हुए वह किसी अन्य से इस तरह के सम्बन्ध नहीं रख सकती। और इसीलिए मैं अपने उस एकमान अधिकार की बात को बातों, ही बातों में ध्वनित करा देना चाहता या । लेकिन वह हुआ नहीं था। शाम को वापस आया तो सुमत कमरे में ही था-वह एक ओर कोने में बैठा हुआ कोई पत्रिका पढ़ रहा था और चित्रा कमरे में नहीं थी। यह स्थिति मुझे अच्छी सगी थी। अच्छी तरह यह जानते हुए भी कि यह मान एक क्षण की स्थिति है-आखिर कमरा एक है और उसमे चिता आएगी ही और सुमत भी बैठेगा ही। मेरे घुसते ही सुमंत ने पूछा था, "सुना, तुम कल बाहर जा रहे हो?" "हां"दफ्तर का काम है।" "कब तक लौट आओगे?" "यही दो-तीन दिनों में।" यह जानते हुए भी कि मैं एक सप्ताह से पहले नहीं लोगा, मेरे मुह से ऐसे ही 'दो-तीन दिन' निकल गया था। शायद इसलिए कि सुमंत मेरी अनुपस्थिति की निश्चितता महसूस न करे । मैंने उसके चेहरे को गौर से देखा था। उसपर एक बनावटी संतुष्टि यो। जैसे कि कह रहा हो-ब तो कोई बात नहीं । और उसने मुझे और अधिक आश्वस्त करने के लिए ही कहा था, "मुझे भी शायद परसों दो-एक दिन के लिए बाहर जाना पड़े--प्रेस का काम है. असल में मुझे पत्रिका के लिए आगरा में एक विज्ञापन वाले से मिलना है । मालिक चाहते हैं कि मैं ही जाऊं।" उसको इस बात से मुझे बड़ी राहत मिली थी। पर एक क्षण बाद ही जव चित्रा कमरे में आई तो मुझे लगा कि सुमत की यह वात वना- वटी है। स्थिति का जो टेढ़ापन था, शायद उसीके कारण सुमंत ने यह तीसरा मी/५१ जना वना ली थी और उसे जाना-जवाना कहीं नहीं था। हम तीनों ही जैसे अपने संशयों में डूब-उतरा रहे थे । चिना को कुछ कहना ही नहीं था । उसके चेहरे पर ऐसी तसल्ली व्याप रही थी जैसे कि अब सब ठीक हो गया-कम से कम वह निश्चित हो गई है। "तुम्हारा जाना ज़रूरी है ?" मैंने अपने मन के चोर को दवाते हुए ऊपर से कहा था, "मैं भी जा रहा हूं."चिना अकेली रह जाएगी।" यह सुनकर चित्रा पूरी तरह उवर आई थी और उसने बड़े मुक्त भाव से कहा था, "चाय के साथ कुछ और बना दूं." सुमंत ने सिर हिला दिया था, "कुछ बना दो तो अच्छा है भाभी, भूख तो लग रही है।" और तब उस क्षण का उखड़ा-उखड़ा वातावरण एकदम ठीक हो गया था। हम तीनों ही अपनी-अपनी कीलियों पर जम गए थे और लगा था कि एक बार फिर हमारे रिश्ते सही जगह पर आ गए हैं। अब कोई ऐसी-वैसी बात नहीं है। अच्छा ही होगा कि सुमंत भी बाहर चला जाए, न भी जाए तो अब कोई ऐसी खास बात नहीं है। "ठीक है "तुम्हें भी जाना ही है तो होते आओ':." मैंने कहा था, फिर चित्रा से पूछा था, "तुम्हें अकेला रहना पड़ेगा, कुछ दिनों।" "तो क्या हुआ ! अब तो ऊपरवालों से भी जान-पहचान हो गई है। सभी जगहें जान-बूझ गई हूं। क्या फरक पड़ता है ! और वैसे भी तुम दोनों कीन दिन-भर घर में बैठे रहते हो !" चित्रा के कहने में खुलापन था । उसने यह कहते हुए सुमंत की ओर देखा भी नहीं था। जैसे उस कुछ खास लेना-देना न हो। ५२/तीसरा आदमी दूसरे दिन मैं दौरे पर गया था। चलते समय सुमंत ने कहा था, "अभी तो मैं दपतर जा रहा हूं और आज शाम को मैं आगरा चला जाऊंगा।" यह उसने बहुत निश्चित शब्दो में कहा था। मैं चला आया । हम रेडियो की जीप से ही जा रहे थे। पहला पड़ाव होना था हरिद्वार और उसके बाद जाना था उत्तरकाशी तक। 'गगातट का जीवन' डाक्यूमेटरी के लिए जगह-जगह से सामग्री इकट्ठी करते हुए और साउड इफेक्ट रिकार्ड करते हुए। बहुत अच्छी यात्रा थी। वेहद खुशनुमा । चार आदमी और भी ये साय में । बड़ा ताम-झाम था । सब निश्चिन्त थे । कोई भी अपने घर के लिए चितित नहीं दीखता था । लगता था कि बाकी सब पिण्ड छुडा- कर भागे थे। साथियों की राय थी कि इस दौरे को जैसे-तैसे बढ़ाकर पन्द्रह दिन का कर लिया जाए और हम लोग उत्तरकाशी से गंगोत्री और तिब्बत सीमा तक घूम आएं। मन मेरा भी था। पर यह होना सम्भव नहीं था । आफिम को जीप हमे ऋषिकेश पर ही छोड़ देनी पड़ी थी। वहां से कपर जाने के लिए ड्राइवर को पहाड़ पर गाड़ी चला सकने का सर्टीफिकेट चाहिए या और अपनी निपुणता की परीक्षा भी देना जरूरी था। ड्राइबर यह निपुणता प्रदर्शित कर सर्टीफिकेट लेने को तैयार था, लेकिन फिर भी उस भयानक पहाड़ी प्रदेश में गाड़ी चलाने को उत्सुक नहीं था। वह खतरा मोल नहीं लेना चाहता था। अततः हम गाड़ी ऋषिकेश में छोड़कर वहां की बस से आगे चल दिए। सभी को शुरू से ही इच्छा थी कि यह दौरा कुछ और दिनों के लिए बढ़ जाए और इसका तरीका एक ही था कि कुदरत हमारी मदद करे। कही रास्ते में 'लैण्ड स्लाइड' हो जाए या कोई पुल वगैरह ही टट तीसरा आदमी/ ५३ - । जाए"तब हम बहुत आसानी से अपनी अटक जाने की बात बना सकते थे। रास्ते की खूबसूरती और ताजगी हमें सचमुच बांध रही थी। पर जैसे-जैसे शाम घिरती आ रही थी, मेरी आंखों के सामने वह कमरा नाच रहा था."कुछ पलों के लिए मैं प्रकृति की सुन्दरता में या साथियों की मज़ाकों में खो जाता, पर रह-रहकर दिमाग वहीं अटक जाता था। साथियों की निश्चितता देखकर मुझे ईर्ष्या हो रही थी और अपने ऊपर तरस आ रहा था। मुझे लगा कि दुनिया में शायद मैं सबसे अधिक शक्की आदमी हूं--आखिर इतने लोग हैं और सवों की बीवियां हैं इन्हें ये दुश्चिताएं क्यों नहीं सताती ? क्या यह सब केवल मेरी ज़िन्दगी में ही है ? क्या मैं ही इस सताई हुई जिन्दगी का एकमात्र व्यक्ति हूं? और मेरा मन घुटने लगता। मुझे अपने पर शक होने लगता । शायद मैं नार्मल नहीं था""शायद मुझे कुछ हो गया था। रात को हम एक धर्मशाला में ठहरे थे । नीचे पुआल विछा हुआ था, उसीपर हमने विस्तर लगा लिए थे। सर्दी बहुत थी और आसमान में बादल थे। कोल ने अपने वैग से वोतल निकालकर सामने रख दी थी और हम लोगों के साथ जशन मनाया था। तब कौल ने बताया था "यह मेरी शादी की सातवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है। आज मेरी शादी की वर्ष- गांठ है।" "और तु यहां चला आया ? बीवी मायके गई होगी।" शिवराम ने कहा था, "इसीलिए वच्चू यह रम से मनाई जा रही है।" "यह वात नहीं है, दोस्त ।" कौल ने कहा था, "वीवी सौ फीसदी घर पर है, पर दोस्त, इधर घूमने-घामने का मौका कहां हाथ आता " कुछ ही देर बाद चारों साथी कुछ थकन और कुछ नशे में पड़कर सो गए थे। मुझे भी एक झपकी आई थी। पर कुछ देर बाद ही मांख ५४/तीसरा आदमी खुल गई। मेरी सारी चेतना दिल्ली के उस कमरे में अटकी हुई थी। जैसे मैं उस पहाड़ी धर्मशाला में नहीं""उस कमरे के बाहर गली में चुपचाप सांस साधे हुए खड़ा था। मेरे कान कमरे की आहटें ले रहे थे । कथ देर मुझे कुछ सुनाई नहीं दिया था-मैं जैसे निश्चिन्त होकर लोटने लगा कि तभी कुछ माहट हुई। विना ने उसी तरह सास ली थी; जब सोते में उसपर मैं कभी हाथ रख लेता था और फिर वही कुनमुनाहट, और उसके बाद वही सधी हुई खामोशी । एक कमरे में तीन व्यक्तियों के होने का अहसास"और चोरों की तरह शरीर के ताले तोड़ते हुए दो व्यक्ति । मेरी सास रुकने लगी थी। मैंने घबराकर उन सोते हुए चारों सायियों की ओर देखा था । वे निश्चिन्त सो रहे थे। मैं और भी कस- मसा उठा था। मन इतना छटपटा रहा था कि मैं एक पल में ही दिल्ली के आरामनगर के उस कमरे में पहुच जाना चाहता था और सबकुछ तोड़-मरोड़कर फेंक देना चाहता था। कुछ देर बाद मैं प्रकृतिस्थ हुआ था और मन ने तरह-तरह के तर्क किए थे। हर तरह से सोच लेने के बावजूद मेरा मन मान नहीं रहा था । लगता पा कि मेरा वह एकातिक अधिकार भी अब नहीं रह गया है"अब मेरे पास कुछ भी बाकी नही बचा है। उस रात धर्मशाला में मैंने बार-बार सोने की कोशिश की, पर नीद नहीं आई थी और संशय के सर्प-दंशों में मैं नीला पड़ गया था। उस रात के बाद मेरा मन नहीं लगा और जैसे-तैसे काम पूरा होते ही में भागा था । सातवें दिन जब मैं घर वापस पहुंचा था तो सुमत नहीं था। बिना कपड़ो पर इस्त्री कर रही थी। मुझे देखते ही वह खिल उठी थी. और मुझे लगा था कि उसने एक घुली हुई कमीज बहुत चतुराई से अपनी एक साड़ी के नीचे छिपा दी थी। मैं कुछ देर तक उसे याना का हाल सुनाता रहा, पर मेरा ध्यान उसो छुपाई हुई कमौज मे मटका था। तीसरा आदमी/५५ मैं चाह रहा था, किसी तरह चित्रा बाहर जाए और मैं उसे देख लूं." पर चिन्ना कमरे से टल नहीं रही थी, बल्कि वह मुझे ही कुछ देर के लिए वहां से हटा देना चाहती थी। मेरी बातें सुनते-सुनते वह एकाएक बोल पड़ी थी, "तुम हाथ-मुंह धो लो तब आराम से सुनाना' "यहीं ला दो पानी..." मैंने कहा था ! "यहां, कमरे में कहां घोओगे"इतना आलस नहीं करते, जाओ धो लो। तबियत कुछ हलकी हो जाएगी। तब तक मैं चाय बना दूंगी।" हम दोनों ही जैसे अपने-अपने में सचेत थे। "अव आयरन वाद में करूंगी।" कहते हुए उसने कपड़े समेटे थे तो उस साड़ी को गुड़ीमुड़ी ही उठा लिया था और सारे कपड़ों को कोने घाले ट्रंक के ऊपर रख दिया था। इस्त्री किए हुए तीन-चार कपड़ों को उसने ट्रंक के भीतर डाल दिया था। अब वह कुछ निश्चिन्त-सी हो गई थी। माखिर वह चाय बनाने के लिए स्टोव जलाने लगी और मैं वैसा ही बैठा रहा। जब वह पानी लेने गई तो मैंने लपककर साड़ी के नीचे छिपी हुई कमीज़ को पहचानना चाहा था। पर उसके वापस आने तक मैं ठीक से देख नहीं पाया था । फुर्ती से मैं अपनी जगह आकर फिर बैठ गया था। हमारे सारे काम कमरे में ही होते थे, अत: उसके बार-बार बाहर जाने का सवाल नहीं उठता था । "सुमंत बाहर जाने वाला था"हो आया?" न चाहते हुए भी यह प्रश्न मेरे मुंह से निकल ही गया था। "उनका प्रोग्राम नहीं बना ।" चित्रा ने इस बात की भीतरी मरोड़ को समझते हुए बहुत ही अचकचाकर जवाब दिया था। जैसे उस बात के लिए वही दोषी हो मैंने बहुत खामोशी से एक पल के लिए उसे ताया था, तो उसके माथे पर पसीना छलछला आया था। कुछ देर बेहद अर्थभरी खामोशी छाई रही थी। हम दोनों अपनी ५६./तीसरा आदमी अपनी जगह बैठे हुए बड़ी वेढंगी स्थिति में कैद थे। फिर वह कुछ युद- वुदाई थी। उस मनहूस खामोशी को तोड देने के लिए मैं भी घटपटा रहा था। धीरे से पूछा, "तुमने कुछ कहा ?" "चीजें बहुत मंहगी हो गई हैं। समझ में नहीं आता कि कैसे चलेगा ? वहां खाने-पीने को ठीक से मिल जाता था ?" उसके दोनों पाक्यों की कोई सगति नहीं थी। "रास्ता बेहद खूबसूरत था पर आदमी बहुत गरीव हैं वहां के।" मैं बोला था। "अरे हा, अभी याद आ गया"मकान-मालिक पानी का पंसा माग रहा था। सात-आठ महीने से उसे पैसा नहीं मिला है, हमी दे देंगे तो तुम्हारा काम तो सव पूरा हो गया ?" "इस कमरे में तो अब दम घुटता है।" "पहाड़ों पर घूमकर आए हो न, इसलिए.." "यावूजी का कोई खत आया ?" "नहीं..." "तुमने भी नहीं लिखा होगा "बहुत दिन हो गए, कोई हालचाल नही मिला।" "इतने दिन तो मेरे लिए बनवास हो गया था"को ईकाम करने में मन ही नहीं लगता था"अकेले पडे-पड़े भी जी ऊब जाता था।" "उधर ऊनी चादरें बहुत सस्ती मिल रही थी, पर इतने पैसे ही पास नही थे जो लेता आता..." "चाय और लोगे ? है।" "तुम ले लो।" "बाहर जाना तो जरा चाय की पत्ती की याद रखना, छोटा पैकेट लेते आना..." तीसरा आदमी/ ५७ "खत्म हो गई..." "हां"तुम्हारे पीछे एक रात यहां कमरे में बिल्ली घुस आई। पता नहीं कैसे दरवाजा खुला रह गया यह भीतर वाला-मैं तो इतना डर गई कि फिर तीन-चार घंटे नींद ही नहीं आई"सोचा बाहरवाला दरवाजा खोलकर निकाल दूं, चिटकनी खोली तो बाहर से वन्द।"वड़ी मुश्किल हुई वह कह रही थी तो मैंने पूछ लिया था-"क्यों ?" "वह वाहर लेटता था न." चित्रा ने कहा था और उसके मन का बोझ जैसे उतर गया था । शायद इस एक वात की सूचना के लिए ही हम निरर्थक और संगतिहीन बातें करते रहे थे । इतनी देर तक वह घुमा- -फिराकर इसी वात तक पहुंचना चाहती थी। यह सूचना वह मुझे हर हालत में दे देना चाहती थी कि सुमंत बाहर गली में सोता रहा है। और मुझे लगा था कि बिल्ली ने कितना बड़ा सहारा चित्रा को दिया था ! अगर वह कमरे में न आई होती तो शायद चाहते हुए भी इतनी चतुराई से वह मुझे इस बात की खवर न दे पाती। "सुमंत को तो वड़ी तकलीफ हुई होगी । वह गली में लेटने का आदी नहीं है..." फिर अपनी ही बात को मैंने मोड़ दिया था, "हम लोगों के कारण उसे बहुत तकलीफ हो रही है।' "मैं खुद तुमसे यही कहना चाहती थी."पर कहते इसलिए डरती थी कि कहीं तुम कुछ और न समझो । आखिर तुम्हारा भाई है।" चित्रा ने बड़ी चतुराई से अपने को सारी स्थिति के जाल से काट लिया था। मैं कुछ देर चुप ही बैठा रहा था। "कहीं और कोई एक कमरा नहीं मिल सकता?" उसने अब साहस से मेरी ओर देखते हुए पूछा था । और मैंने उसको मांखों में सच और की भाषा पढ़नी चाही थी। "मिल तो सकता है, पर तलाश करने का वक्त भी तो हो।" "किसी इतवार को यही काम कर डालो..". ५८ / तीसरा आदमी योर इन अपनत्व-भरी बातों के बीच चित्रा मुक्त हो गई थी। उसके मन का बोझ जैसे सरक गया था और वह प्याले धोने के लिए गुसलखाने में चली गई थी। मैंने घोती के नीचे छिपी कमीज़ को निकाला या-वह मेरी ही उस वक्त मुझे अपने पर बेहद ग्लानि हुई थी। अपनी इस क्षुदता पर बहुत पीड़ा हुई थी और चिना एकाएक बहुत पवित्र-सी लगने लगी थी। कुछ देर पहले उसकी बातों में मुझे जो चतुराई दिखाई दी थी, वह भोलेपन में बदलती लगी थी। मैंने अपने से ही प्रश्न किया था कि आखिर यह संदेह क्यों मेरे मन में पेटता गया है ? और उस दिन मुझे लगा था कि इस शक का कोई आधार नहीं है। वह प्याले धोकर लौटी तो मैंने बहाने से उठकर उसे पकड़ा था और वांही में लेकर प्यार कर लिया या। वह जैसे विभोर हो गई थी। यह उसके लिए लगभग एक अनहोनी ही बात थी। शायद इस तरह प्यार के उफान को उसने तब तक उठते नहीं देखा था और न वह इस बात की आदी ही थी कि मैं उसे जव-तब इस तरह प्यार कर लू । "आज तुम्हे पया हो गया है ?" उसने प्याले रखकर बहुत प्यार से देखते हुए कहा था। "सुमंत कब आएगा?" मैंने पूछा था । अव सुमत का नाम लेकर यात करने में मुझे कोई हिचक या कठिनाई नहीं थी। "क्यों?" "ऐसे ही, पूछ रहा हूं।" . तीसरा आदमी /५६

"क्या पता !"
"कुछ कहकर नहीं गया है ?"
"नहीं।"
"तो फिर...॥
"मेरे खयाल से जल्दी ही लौटेगा।"
"तो फिर आज भी उसे बाहर ही सुलाया जाए।"
"नहीं। आज वह ज़रूर यहीं सोएगा, कहेगा भी तो मैं जबरदस्ती
यहीं सुलाऊंगी।" कहते हुए उसने शरारत से मुझे घूरा था ।
"वह समझदार है।"
और तुम ।"
गई
"मेरी-उसकी ज़रूरतों में फर्क है।"
"शर्म नहीं आती तुम्हें..." कहकर वह खुद जैसे शर्स से गड़
थी।
और आज""जव मैं उस क्षण को याद करता हूं तो लगता है कि
वह क्षण फिर बार-बार नहीं आया। इतनी आत्मीयता का क्षण फिर नहीं
लौटा। हालांकि ऐसा क्षण बहुत अधिक अर्थ नहीं रखता, फिर भी उस
कुछ ऐसा था, जो आज भी हलके-से कुरेदता है। लगता है कि वह क्ष
या तो बहुत ही वास्तविक था या फिर एकदम झूठा । वीच की स्थि
नहीं थी। और यह जानना एकदम नामुमकिन है कि वह कैसा थ
आज तो कुछ भी नहीं कहा जा सकता।
और अब उसका अर्थ भी क्या रह गया है ! यदि वह क्षण वास्त
भी था तो भी उसका प्राप्य ? कुछ भी नहीं। ऐसे क्षणों की
को जोड़कर रखू तो भी कुछ नहीं होता और आज तो इस
६० / तीसरा आदमी

मतलब भी नहीं रह गया है। शायद इसका मतलब तब होता जव 'विवाह' का भी कोई अर्थ होता । जिन्दगी के सन्दर्भ में जव इस सामा- जिक संस्था का ही कोई अयं नहीं रह गया है, तो उन क्षणों को आत्मी. यता ही बेमानी है। प्रवंचना है । छल के सिवा अब इस रिश्ते में बाकी क्या वचा है ? यही कि व्यक्ति स्वयं को छत्रता रहे और दूसरे द्वारा छला जाता रहे। मेरे खयाल से अब मक्कारों के विवाह ही सफलतम सिद्ध हो सकते हैं। या फिर बुद्धओं के । नही तो वह अव एक सतत अत्याचार और अनाचार के रूप में सिमटकर रह गया है । वैवाहिक अपेक्षाओं की पूर्ति में सलग्न व्यक्ति कितना भद्दा और बेहूदा लगता है ! शायद इसलिए और भी ज्यादा कि विवाह का वह परम्परागत स्वरूप अब नष्ट हो चुका है"उसको सामाजिक अपेक्षाए बदल गई हैं। यह सब सोचता हूं, पर किसी अन्त तक नहीं पहुचता । शायद सोचने से जिन्दगी के संतुलन खोजे भी नहीं जा सकते-उन्हें जीकर प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए मैंने जीना स्वीकार किया- ताकि जिन्दगी खुद अपने नतीजो तक पहुंचे। और जो नतीजा अब धीरे-धीरे निकल रहा है, वही सत्य है"संतु- लन है आज के इन संबंधों का । रात को जल्दी ही सुमन्त लौट आया था। आते ही उसने कहा, "अरे भैया, तुम आ गए । मैं इसीलिए जल्दी लोटा कि भाभी अकेली होंगी." "यह तो बहुत पहले ही मा गए थे।" चित्रा ने बताया तो उसने मजाक करते हुए कहा, "एक रोज बड़ा मजा हुआ"रात को कही कमरे में बिल्ली घुस आई."उधर भीतर वाला दरवाजा शायद सुला रह गया था"फिर अंधेरे में बिल्ली की भाभी से जो मिड़त हुई वह बहुत ही तीसरा आदमी / ६१ 1 मजेदार थी । असल में बाहर से मैंने कुण्डी बन्द कर दी थी"गली में लेटा था न"सो, बिल्ली भीतर वाले दरवाजे से भागने को तैयार ही नहीं थी और भाभी का दम खुश्क हो रहा था" सुमंत कुछ ज्यादा ही रस लेकर उस नीरस घटना को बता रहा था कि चित्रा ने उसपर सचाई की परत चढ़ाते हुए जोड़ दिया, "दम खुश्क होने की बात ही थी, ज़रा से में पंजा ही मार देती"और जब मैंने भीतर से चिटकनी लगा ली थी तो तुम्हें बाहर से बंद करने की क्या जरूरत थी?" दुबारा उसी बात को सुनकर मैं ऊब उठा था। दरवाजे के भीतर और बाहर से बन्द होने पर दोनों ही बड़ी सहजता से ज़ोर दे रहे थे. जैसे बार-बार मुझे यह जता रहे हों कि सबसे महत्त्वपूर्ण बात यही थी और दोनों ही इस सम्बन्ध में वहुत सतर्क थे। तभी मुझे उसमें झूठ की गंध लगने लगी थी। यह कोई इतना बड़ा हादसा नहीं था, जिसे दस बार मेरे सामने दोहराया जाए। "अपने को वहुत सहजता से दोनों ने प्रकट किया था। और उन पिछले सात दिनों में अपने अलग-अलग रहने की स्थितियों को ही दोहराया था। .."यही कि जव मकान-मालिक आया तो मैं नहा रहा था। इन पिछले सात दिनों में काम इतना ज्यादा था कि कमरे में आधा घंटे से अधिक रुकने का मौका ही नहीं हुआ । कि चार रातों को तो वह बाहर से ही खाकर लौटा ताकि चित्रा को जगाना न पड़े"बल्कि एक रोज़ तो पैंट पहने-पहने ही सोना पड़ा क्योंकि रात बहुत हो गई थी और उस वक्त दरवाजा भड़भड़ा कर चिना को जगाना बहुत अजीव लगता। अनजाने ही दोनों की बातों से उन सात दिनों का कुछ ऐसा खाका उभरा था कि जैसे वे एक-दूसरे से बात तक न कर पाए हों। मेरे रहते तो कुछ वात हो भी जाती थी, पर मेरी अनुपस्थिति में तो सब गड़बड़ा गया - ६२/ तीसरा भादमी था। वे एक प्याला चाय भी साथ पीने का मौका नहीं निकाल पाए थे। ये बातें इतनी बार और इतनी तरह से मेरे सामने आती रही कि मन झुझला-झुंझला उटता था । धोरे-धीरे वह कुण्डा की माठ कस-कसकर छोटी होती गई और अपने कहे हुए के मुताबिक वे दोनों मेरे सामने भी कुछ दिनों तक अपने- अपने में उसी तरह व्यस्त रहे जैसे मुझे यह दर्शाना चाहते हो कि उन सात दिनो में भी कुछ ऐसी ही स्थिति रही थी। लेकिन उनकी आखो में कुछ बदला हुआ था और वे मुझे अहसास करा-कराके सहजतापूर्ण कठिनाई से कतराते थे। एक ही कमरे में चलते फिरते हुए भी वे दोनों अब पहले से ज्यादा दूरी रखकर गुजरते या बैठते थे । उनके संबंध में हल्की-सी दिखावटी औपचारिकता की बू आने लगी थी। प्लेट पकड़ाते वक्त या रोटी देते वक्त चिता इस बात का ख्याल रखती दिखाई देती यो कि कही उसका हाथ सुमन्त के हाथ से छू न जाए । कभी जल्दी की धुन में सुमन्त पहले चिन्ना को हटाकर अपने बक्से से कपड़े निकाल लेता था, पर अब वह ध्यान देकर इतजार करता था। और इस बात का अहसास अब चित्रा को ज्यादा होने लगा था कि सुमन्त क्या चाह रहा है। पहले यह निविघ्न अपना काम करती रहती थी, पर अब उसमें एक सजगता वा गई थी कि सुमन्त को जव कपड़े निकालने होगे तो यह बिना देखे ही वहां से हट जाएगी। लगता था कि जैसे विना का शरीर और उसकी सारी इन्द्रिया किसी गहरे अहसास से चालित होने लगी है, कि उसकी पीठ भी अब किसी की जरूरत को देसने लगी है। सतह पर एक दूसरे तरह की दूरी थी और सतह के नीचे एक प्रगाढ़ निकटता भी। अब वे बहुत खुलकर बात भी नहीं करते थे। हा, इतना जरूर होता कि जब सुमंत नहाता होता तभी चित्रा को सहसा प्याते घो लाने का ख्याल आता और वह हाथ का काम छोड़कर भी उन्हे धोने । तीसरा आदमी/६३ लिए उठ जाती। "और एक दिन जब वह प्याले धोकर लौटी थी तो उसकी कनपटी र सावुन का झाग लगा हुआ था । उसे शायद उसने पोंछा भी था पर अनजाने ही थोड़ा-सा पुछने से रह गया था। उसने तब यह भी खयाल किया था कि मैं आंख चुरा-चुराकर उसके चेहरे की तरफ देख रहा हूं और वह चम्मत्र ढूंढती हुई खिड़की में रखे- शीशे के पास बहाने से आई थी, अपना चेहरा देखकर फिर चम्मच ढूंढना भूल गई थी और सब्ज़ी काटने लगी थी। मैंने कनस्तर के पास पड़ा चम्मच उठाकर उसे पकड़ा दिया था तो वह सब्जी काटना छोड़कर चम्मच से कटोरी में घी निकालने लगी थी वह एकाएक बहुत ही अस्त-व्यस्त हो उठी थी। कनपटी पर लगा झाग उसने पोंछ लिया था और कनखी से मेरी ओर देखा था। मुझसे आंख मिलते ही उसने ज़रूरत खोज ली थी, "जरा वह तश्तरी पकड़ा देना।' मैंने तिपाई पर रखी तश्तरी पकड़ा दी थी, तो उसमें उसने प्याज निकालकर रख लिया था। और इन सब कामों की फिर कोई संगति नहीं थी। वह भीतर ही भीतर वेहद घबराई हुई थी। उसका शरीर कुछ वैसे ही पसीज रहा था, और अंगों में कुछ वैसा ही कम्पन था, जैसा कि पहली-पहली बार मैंने अपने अजनवी हाथों से उसे छूते वक्त महसूस किया था। उस दिन तो मैंने उसे छुआ नहीं था पर शायद मेरी नजरों उतने ही अजनवीपन से उसे नंगा किया था, जितने कि पहले दिन हार ने किया होगा। वेहद बेवसी में आवद्ध थी चित्रा । और मेरे दिल में गुवार उठ ये। दिमाग मेरा फटा जा रहा था। मन में आया था कि कमीज़ कर चल दूं और फिर कभी वापस न आऊं। किसीसे कुछ भी न कहूं ६४ तीसरा आदमी स्पिति को स्वीकार कर लू और अपनी अफेली राह पर चला जाऊं। उसी । हालत में रेडियो स्टेशन पहुंचा पा। ड्यूटी रूप में बैठकर क्यू. शीट देखने लगा, तो भनक पड़ी कान मे-श्रीमती शिवदसानी मे किलो की। ड्यूटी आफीसर शर्मा बता रहा था कि-कल रेडियो के अहाते में ही बड़ा गुलगपाड़ा मचा । (शिवदसानी एकादरला विरोध में एनाउन्सर थी)। रात की मात है । अभी ट्रान्समिशन साग नहीं हमापा कि मिस्टर शिवदसानी टैक्सी मे माए और उससे बोले भी मेरे साथ पर चली। इसी वक्त ।' मिसेज शिवदानी पयरा गई थी, बोली, "मह नहीं हो सकता। रेडियो की प्रेमिसेश में अगर तुम गलत तरीके से पेश धामोगे और यूटी पर होते हुए मेरे साथ बदतमीजी करोगे तो मैं अभी गाईस को घुमाकर तुम्हें अरेस्ट करा दूंगी। घरी जाओ यहा री !" मिस्टर शिवदसानी ने पिस्तोल निकाल पीपी! "मलती है गरे साय या नहीं ?" उसपर सून सवार पा। यह वकता जा रहा पा, "ff जानता हूं तू कहाँ जाएगी यहां गे।" और मौका पाते ही मिगेर गिवदगानी नै टुहियो में घुगकर जान बचाई थी। यासिर जैसे-जैसे मामन को वहीं दवाया गया और मिस्टर शिवदमानी को रेडियो स्टेगन मे बाहर निकाला गया। वह द्वाग्ममिशन खत्म होने तक बाहर गेट के पाग रहसता हसार में कि पह निकलकर पाएगी। मिगेर गिवदगानी की गाड़ी पड़ी हुई थी। मिमें गिवदमानी ने उमाधान मान रग कर्नरस को फोन किया और वह पिछले गेट गे पाकर दमे से गया। मुटी भी उसने पूरी नहीं की। यातिर एनाउन्समेंट पद ट्यूटी सारीमर ने दिया। फिर पता नही शिष. दमानी कर धमा गया। मुबह मिनिट्री का एक यादमी वाया था और मिड निवदमानी की मादी मे गया था। अब पहा नहीं गांगमयाया? याबद्दल दीमय ग्रामी/६५ - पास ही रहेगी। कर्नल उसे छोड़ेगा नहीं, बड़े पुराने सम्बन्ध हैं । शायदे सका रेजिगनेशन आ जाए। उसे अब ज़रूरत भी क्या है नौकरी करने हो... ड्यूटी आफीसर जव यह सब बता रहा था तो मैं फिलर निकाल रहा था । असिस्टेंट प्रोड्यूसर एनाउन्समेंट लिखकर रख गया था। गनी- मत यही थी कि मुझे नहीं लिखना था, नहीं तो उस रोज़ बड़ी गलतियां होतीं। ड्यूटी आफीसर की बात में वहां बैठे सभी रस ले रहे थे और मेरा सिर बुरी तरह भन्ना रहा था। तभी चावला ने मज़ा लेते हुए जोड़ा था, "यार पहले से तो उसे संभालकर रखा नहीं। वह तो कर्नल के साथ वरसों से घूमती है। दसियों वार वह कर्नल उसे यहां ड्यूटी पर छोड़ने आया है और लेने आया है । अव जव मामला इस हद तक पक गया तो पिस्तौल लेकर आया ? बुज़दिल था शिवदसानी..." पता नहीं क्यों मुझे यह सव सुनना बर्दाश्त नहीं हुआ था और मैं - अपने कागज-पत्तर और रिकार्ड वगैरह उठाकर सीधा स्टूडियो में चला गया था। फेडर आन किया था तो प्रोग्राम आने लगा था""मीरावाई पर वार्ता आ रही थी, जिसमें बीच-बीच में भजन टंके हुए थे"सब कुछ वेजान-सा लग रहा था । लगा था कि मैं एक मुर्दा दुनिया के बीच घिरा हुआ हूं"एक ऐसी दुनिया में जिसका कोई सम्बन्ध मेरी या मुझ जैसों की ज़िन्दगी से नहीं है । दिन-भर यहां से यही सव ऊटपटांग प्राडकास्ट होता रहता है, जिसे न कोई सुनता है, न समझता है । आवाज़ों की दुनिया । सेण्ट्रल कंट्रोल रूम में सैकड़ों आवाजें भरी हुई थीं। इंजीनियर व्यस्त थे। आवाजें एक-दूसरे को काटती ऊर्च उठती जा रही थीं."कुछ आवाजें डूबती जा रही थीं। किसी ड्रामे के "सिसकियां, कराहें और चीखना और किसी भापण की तेज आवाज और उघरं अंग्रेजी में न्यूज़रील के इफेक्ट्स। चलती मशीनों का शो ६६/ तीसरा आदमी चीखते हुए इन्सान और उनके बीच उभरती हुई सिसकियां । आवाजें"आवाजें.."सिर्फ आवाजें। और उतनी ही आवाजें मेरे भीतर थो जिनका कोई अर्य नहीं था। एक बेमानी शोर भरा हुआ था। ऐमा शोर जिसमें कोई वात साफ नहीं सुनाई पड़ती थी। घुमड़ते हुए स्वर और एक दूसरे को काटती ध्वनिया। जैसे-तैसे मैं काम करता रहा । मुझे नहीं मालूम कि मैंने कर क्या एनाउन्स किया-हर वार बोल चुकने के बाद मेरी आंखें 'पोरहोल' पर टिक जाती थी कि अभी मुझे ड्यूटी अफसर का चेहरा वहा दिखाई पड़ेगा, वह घबराया हुआ भीतर आएगा और कहेगा कि यह सब क्या हो रहा है, नरेश ? होश में हो या नहीं ? लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। क्योकि एनाउन्समेंट करने में दिमाग लगाने की मादत छूट चुकी थी--यह एक बना-बनाया ढर्रा हो गया था, जो अपने-आप आदतन चलता चला जाता था। दो घटे बाद ही मेरा मन उचट गया था। मैंने बहुत सस्त पेटदर्द का बहाना बनाया था-इत्तफाक से ग्रामीण प्रोग्राम का एनाउन्सर वहा मौजूद था और वह मेरी जगह एनाउन्समेंट कर देने के लिए तैयार हो गया था। पंक्स ने भी मेरी बात सुन ली थी। और मैं रिलीव हो गया था। कमरे पर जाने को मन नहीं था, पर उसके सिवा कहीं और जाने का सवाल भी नहीं उठता था। मीधा वहां पहुंचा तो देखा, ताला बंद था। कुछ अचरज हुआ । चित्रा कही नाती-जाती नहीं थी। अगर भीतर मकान में किसी परिवार के पास गई होती तो इधर गली से ताला बद करने की कोई उरूरत नहीं थो, भीतर से चिटखनी चढ़ाकर जा सकती थी। . सामनेवाले पंजाबी परिवार ने मुझे गौर से देखा तो लगा कि शायद वे लोग मुझे कुछ बताना चाहते हैं । एक पल मैं ठिा, पर चूकि तीसरा आदमी/६७ उनसे मेल-मिलाप और बोलचाल का सिलसिला नहीं था, अतः वे भी चुप रहे । मैं गंदी गली में होता हुआ धीरे-धीरे लौट आया । कहां जाऊं, समझ में नहीं आ रहा था। चित्रा कहां जा सकती है, यह भी समझ में नहीं आ रहा था। वक्त गुजारने के लिए मैं नई दिल्ली स्टेशन की ओर चल दिया। सोचा, वहां रेस्टोरेंट में एक प्याला काफी पी लूंगा और लौटकर चिना से सब बातें खुलकर करूंगा। मैं नई दिल्ली स्टेशन की सीढ़ियों के पास पहुंचने ही वाला था कि ऊपर से सुमंत और चित्रा मुझे माते दिखाई दिए। मेरी सांस जहां की तहां अटकी रह गई । बदहवासी में कुछ सोच भी नहीं पाया "यह भी नहीं हुआ कि सीढ़ियों पर चढ़कर उनके सामने पहुंच जाऊं। एकाएक टेलीफोन बूथ में घुसकर मैंने उसका दरवाजा बंद कर लिया था। उनकी निगाह उधर नहीं गई थी। टेलीफोन के बूथ थे थे भी कोने में । वे दोनों उतरकर हाल की ओर बढ़ गए । मैं शीशे के पार से जितना देख पाया था, उतना ही मेरे लिए काफी था। सुमंत चित्रा के कंधे पर हाथ रखे हुए बड़े मुक्त भाव से धीरे-धीरे चल रहा था और चिना हंसती हुई उससे कुछ कह रही थी। उसके बाद दीवार का कोना आ गया था और वे मेरे दृष्टिपथ के परे हो गए थे। मेरे सामने सब वातें स्पष्ट हो गई थीं । अव वाकी कुछ भी नहीं रह गया था। बूथ से निकलकर मैं प्लेटफार्म पर चला गया था लेकिन नजर के सामने कुछ भी साफ नहीं था। वहां भी वही शोर और आपाधापी थी। पर उस शोर में जैसे बड़ी राहत. थी। उस वातावरण में मैं अपने को कहीं किसी अनजान स्टेशन पर छूटा हुआ महसूस कर रहा था। .६८/तीसरा आदमी चाय पीते-पीते दो ही बातें समझ में आती थों-या तो हिंस्र पशु की तरह मैं चिना के साथ पेश आऊं"उसकी चमड़ी उधेड़ दू या फिर चुपचाप उसकी जिन्दगी से निकल जाऊं । तीसरा रास्ता तो कोई घा नहीं। यही दो अधिकार हैं पति के पास या तो वह गंवारो की तरह पेश आए और जानवर की तरह सव कुछ स्वीकार ले और इस टूटी हुई जिन्दगी की हर तकतीफ मेले "या आदमी की तरह अपनी हार मानकर चुपचाप रास्ते से हट जाए। मुझे अंदाज था कि चिद्रा गर्भवती भी है। बहुत देर बाद मैं थके कदमों से वापस कमरे में आया था । चिना ने दरवाजा खोला तो मुझे देखकर उसने कोई आश्चर्य प्रकट नहीं किया या। बस इतना ही पूछा, "क्यों, क्या बात है ? इस धक्त "ड्यूटी खत्म हो गई ?" "कुछ नहीं"ऐसे ही।" "कोई बात तो होगी!" "नही।" "आराम कर लो"" "यही सोच रहा हूं।" "चाय तो नहीं पीओगे।" "नहीं।" उसे देखकर मेरे मन का गुबार खुद-ब-सुद निकल गया था। लगा या कि अब बात करने के लिए क्या रह गया है ? ऐसा क्या है जो पूछने से खुद ही मैं अपने को छोटा करता । और पूछने का वास्तविक अधिकार तो शायद तभी होता जबकि चित्रा ने कभी कहा होता कि वह मुझे ही प्यार करती है। शादी तो इस बात की गारंटी नहीं है कि पुरुष और नारी प्यार भी करेंगे ही। यह रिश्ता तो सिर्फ रहम का रह गया है। इसके अलावा और क्या तीसरा आदमी/६९

है इसमें ? नारी पुरुष पर रहम करके उसकी वासना की तृप्ति के लिए
अपना शरीर दे देती है और पुरुष उसपर रहम करके उसे सुरक्षा प्रदान
कर देता है । अंततः यह रहम ही उन दोनों को जोड़े रहता है जहाँ
यह रहम नहीं रह जाता, वहां सब कुछ टूट जाता है।
यही तो था हमारे बीच।
मैंने कुछ भी कहा नहीं था।
मन में एक बार आया था कि पिताजी की सारी बातें बता देना
उचित होगा, लेकिन उससे भी क्या हासिल होना था ! उन्हें इस बुढ़ापे
में यह सब वर्दाश्त नहीं हो पाता। उनके संस्कार ही अलग थे"शायद
वे तो इस झटके से दम ही तोड़ देते।
काफी देर लेटे रहने के बाद मैंने चिता से कहा था, "मैं यहां से
ट्रान्सफर करा रहा हूं।"
"क्यों ?"
"यहां की ज़िन्दगी मेरे वश की नहीं।"
"क्या हुआ ?"
"तुम्हीं सोच लो।"
यह सुनकर वह मुझे ताकती रह गई थी। उसने कोई उत्तर नहीं
दिया था। और मेरा गुस्सा भड़क उठा था। अपने को मैं रोक नहीं पाया
था। बहुत गम्भीर मावाज में मैंने इतना ही कहा था, "अब हमारे-तुम्हारे
सम्बन्धों का कोई अर्थ नहीं रह गया है।"
"यह तो तुम्हीं सोच सकते हो।" उसने कहा था ।
"मेरे सोचने की इसमें क्या बात है ?"
"तो और कौन सोचेगा"
और बात करते-करते मुझे लग रहा था कि मुझसे चिता नहीं,
सुमंत वात कर रहा है । मैं झुंझला उता था। मैंने सिर्फ इतना ही कहा
था, "मैं ट्रान्सफर करा लूंगा और अकेला ही चला जाऊंगा। इसमें तो
-
७०./तीसरा आदमी

तुम दोनों को आपत्ति नहीं होगी।" "तुम्हारी बातें मेरी समझ में नहीं आ रही हैं। पता नहीं क्या अंट- शंट सोच लेते हो "सैर ठीक है।" कहकर वह रोने लगी थी। मैं खामोश लेटा रहा था । इन यातों के बाद घर में सन्नाटा छा गया था। हर काम होता था पर से तीनो में से कोई भी एक-दूसरे को नही पहचानता था। सुमंत बहुत घुट-घुटा रहने लगा था। उसने उस दिन के बाद मुझसे आप नही मिलाई और न कोई बात ही की । मैं सोचता था कि कम से कम वह कभी बात करेगा, और, मूठ ही सही, इन सब बातो को मेरा शक बता. एगा और मुझे तमाम वास्ते देगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। चित्रा का तो जैसे हम दोनो मे से किसी से सम्बन्ध नही रह गया था। वह किसीसे बात नहीं करती थी। खाना बनकर वक्त से सामने आ जाता था, जिसे जितना साना होता था, खाकर प्लेटें दरवाजे के पीछे सरका देता था और चला जाता था। ऐसी हालत में रह सकना मेरे लिए सम्भव नहीं था। आखिर एक दिन पन्द्रह दिन की छुट्टी लेकर मैं भोपाल चलने लगा था तो चित्रा ने यह भी नहीं पूछा था कि कब लौटकर आओगे । इतना ही बोली थी, "वहा मेरा सबसे प्रणाम कह देना।" वरित करने की अद्भुत क्षमता थी चित्रा में। वह कुछ भी कहने या मानने में विश्वास नहीं करती थी। अजीव था उसका अहम् । तीसरा आदमी/७१ . भोपाल में पूछताछ हुई थी कि चिना पयों नहीं आई तो मैंने उसकी हालत फा वास्ता देकर सबको शांत कर दिया था । इस खवर से कि वह मां बननेवाली है--सबों के चेहरों पर खुशी झलफ आई थी। वहीं से मैंने उसे पत्र लिखा था : "अब मैं दिल्ली नहीं लौटना चाहता। नौकरी करने का चाव भी मन में अव बाकी नहीं रह गया है । नोकरी ही क्या, अव कुछ भी करने लायक मैं नहीं रह गया हूं। मेरा मन टूट गया है। दिल्ली में तो अब मैं एक दिन भी रहना बर्दाश्त नहीं कर सकता। मुझसे सहा नहीं जाएगा । मैं जानता हूं कि अव तुम किसी भी हालत में दिल्ली नहीं छोड़ना चाहोगी। पर मेरे लिए यह सम्भव नहीं है कि मैं सिर्फ तुम्हारी खातिर वहां रह सकूँ और अपने को वह सब सहने के लिए मजबूर करूं जो कि मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता । मुझे पता है कि तुम्हारे लिए कोई भी निश्चित निर्णय ले सकना सम्भव नहीं है। तुम अभी निर्णय और अनिर्णय की स्थिति में रहोगी। पर मैंने यह तय कर लिया है । मैं यहां से अपना त्यागपत्र भेज दूंगा और फिर जो कुछ सामने माएगा, उसे झेलूंगा। यह मेरा निश्चय है, इसमें कोई रद्दोबदल नहीं होगा । मैं निर्णय बदलने का आदी नहीं हूं! नहीं जानता कि तुम यहां आना चाहोगी या नहीं. फिर भी मैं यह तुम्हारी मर्जी पर छोड़ता हूं कि तुम स्वयं सोचकर निर्णय लो। मेरे वारे में ज्यादा सोचने की ज़रूरत नहीं है। अपने वारे में सोचो और जो ठीफ लगे, वही करो। अपने निर्णय की सूचना दोगी, यह सहज अपेक्षा है। "ऐसी स्थिति में जवकि तुम मां बनने वाली हो-मैं नहीं चाहता कि मैं तुम्हें किसी तरह का मानसिक कष्ट पहुंचाऊं, फिर भी जो स्थिति है उसमें कुछ सहज निर्णय लेना ही श्रेयस्कर है, क्योंकि आगे बातें और भी . ७२ / तीसरा आदमी उलझ जाएंगी और तव कुछ भी कर सकना और अधिक दुःखद हो जाएगा । अच्छा है कि नवजात के आने से पहले ही यह सब कम हो जाए, ताकि यह शिशु हमारी बबर मजदूरी का शिकार न भने । अच्छा हो कि वह एक उचित वातावरण मे आखें खोले। "सब सोचकर मुझे लिखना।" सात दिन बाद पिता का जवाब आया था कि वह मेरी बातों को समझ ही नहीं पा रही थी। आखिर ऐसा क्या पा जिसमे निर्णय लेने का सवाल उठ आया था । उसने यह भी लिखा था कि बेहतर यही है कि मैं दिल्ली लौट आऊ और वहीं सब बातें करू। ये बातें सतो में नहीं होती। पर दिल्ली लौटकर जाते मुझे दहशत होती थी । लगता था कि किसी पराये घर में खलनायक की तरह घुसने की कोशिश करूगा । उन दोनों को सहज चलती जिन्दगी में एक अवरोध वनकर मैं वहां पहुचूगा । अपने भीतर भी में बुरी तरह अपमानित महसूस कर रहा था। ऐसा लगता था कि सब गलती मेरी थी और मैं भागा-भागा वहा जाकर उनका निर्णय सुनने के लिए मजबूर या। बातें तो बहुत हैं और उनके पहलू भी बहुत हैं। सबको आज माद करना सम्भव भी नहीं रहा है। पर हुआ यह था कि मैंने बीमारी का सर्टीफिकेट भेजकर एक महीने की छुट्टी और बढवा ली थी और चिन्ता को लिख दिया था कि मैं दिल्ली नहीं आ रहा हूं। बहुत सोचने के बाद मैं इसी नतीजे पर पहुंचा था कि नौकरी छोडना मेरे लिए घातक था। घर को जो स्थिति थी और मेरी जो हालत थी, उसमें नौकरी छोड़कर मैं भूखा मर जाता । भावुकता मे यदि तीसरा आदमी/७३ - ऐसा कोई निर्णय ले लेता तो भीख या उधार मांग-मांगकर जीने का रास्ता रह जाता-वह भी कितने दिन? वहरहाल "मैं छुट्टी वढ़ाता रहा और जब आफिस से यह नोटिस आया कि मुझे हर हालत में अब एक सप्ताह के अंदर लौट आना चाहिए, तो मैं भागकर दिल्ली पहुंचा। घर में इतने दिन चिना को छोड़कर छुट्टी पर पड़े रहने से तरह-तरह की बातें हुई थीं। सभी को इस बात का अहसास हो गया था कि दाल में कुछ काला है। जब मुझे और कोई जवाव नहीं सूझा था तो मैंने कह दिया था कि प्रसव का खर्चा उठाना मेरे वश में नहीं था, इसलिए मैंने उसे उसके मायके भेज दिया था। घर में इस बात से किसीको तसल्ली नहीं हुई थी, बल्कि शक और बढ़ गया था। मेरे लिए भोपाल में भी टिकना मुश्किल हो गया था। दिल्ली पहुंचकर मैं एक मित्र के यहां ठहर गया था। उसके पास एक कमरा था, जिसका पूरा किराया दे सकना उसके लिए भारी पड़ रहा था। पहुंचने के दूसरे ही दिन चिना का हाल जानने के लिए मैंने सुमन्त को उसके प्रेस में फोन किया था। उसने चित्रा को इस बार भाभी न कहकर उसका सीधे-सीधे नाम लिया था । और इस एक ही बात ने सारी स्थिति स्पष्ट कर दी थी। यह भी मालूम हो गया था कि सम्बन्धों के किस स्तर पर वे पहुंच गए हैं। सुमन्त ने यह भी जानने की कोशिश नहीं की थी कि मैं कहां ठहरा था । सुमन्त का यह व्यवहार मुझे चाट गया था। वह भादमी, जिसने मेरी बनती दुनिया में आग लगा दी थी, एक तरह से मुझे ही दोषियों के कठघरे में खड़ा कर रहा था। उसने कुछ बताया ही नहीं था"सिर्फ मुझपर दोप लगाता रहा था कि यह कोई तरीका है आखिर झुंझलाकर मैंने ही फोन बंद कर दिया था। बात अधूरी रह गई थी। चित्रा का कोई हाल भी मैं नहीं जान पाया था। फोन पटक देने के बाद मैं मन ही मन पराजित महसूस करता रहा। ७४/ तीसरा आदमी कही भीतर बहुत दुरी तरह से टूट भी गया था । लगता था कि शायद चिन्ता अपने मायके चली गई होगी, क्योंकि वहां दिल्ली में प्रमद का इंतजाम कर सकना, सुमन्त के वश की बात नहीं थी। और फिर सामाजिक कठिनाइया भी थी ही। गली के सभी लोग जानते थे कि चित्रा मेरी पत्नी है और इस तरह मेरा छोड़कर चले जाना उन्हें आराम से नहीं रहने देता। वहां रह सकना उनके लिए मुश्किल होता गया होगा। लेकिन वित्रा ने भी मुझे अपने बारे में कोई सूचना नहीं दी थी। करीब चार महीने बाद रेडियो स्टेशन के पते पर मेरे सेक्शन में मेरे नाम एक पत्र आया था। वह पन्न चित्रा के पिताजी का या, जिसमें पुत्र- जन्म की सूचना थी। बस, मान इतना ही। इसके आगे कुछ भी नहीं उन्होंने मेरा हालचाल और कुशल-सेम भी नहीं पूछा था। सरकारी सत की तरह भापा थी उसकी। पुत्र प्राप्ति । कसी? और किसलिए? मेरे लिए वह अर्थहीन था। मन मैं घृणा-सी उपजती यो चिना के लिए । मैं अपने को पिता मान ही नहीं पाया था । लगता था कि यह मानना-भर भी उस अबोध के प्रति अपराध होगा । पर मन में कहीं उसे एक नजर देखने की ललक होती थी । यह मैं जानता था कि वह पुत्र मेरा ही है लेकिन इसके बावजूद कुछ धनता नहीं दिखाई देता था। कि एकाएक एक दिन आफिस पहुंचने पर किसी सायी ने सूचना दी कि किन्ही मिस्टर मुमन्त का फोन आमा या, उन्होने कहा है कि मैं जय आऊं, उन्हें फोन कर लूं । मैंने उसी वक्त उसे फोन किया था तो उसने मुझे मिलने के लिए बुलाया था। मैं कनाट प्लेस पहुंच तीसरा आदमी/७५ कॉफी हाउस के बाहर ही वह मुझसे मिला था और हम बात करने के लिए जंतर-मंतर के मैदान में आ बैठे थे। "माप अव क्या सोच रहे हैं ?" उसने मुझसे सीधा सवाल किया था, कुछ इस तरह कि चित्रा के साथ मैं ज्यादती कर रहा होऊ और वह उसकी ओर से मुझसे लड़ने आया हो । "किस सम्बन्ध में ?" "चिना के बारे में।" "मुझे क्या करना है ?" "तो और कौन करेगा?" "यह वह बेहतर जानती होगी। या फिर तुम जानते होगे"मुझे तो अव कुछ मालूम नहीं, और मैं मालूम भी नहीं करना चाहता । जैसा तुम लोग ठीक समझो, करो । मुझे अब क्या लेना-देना है ?" "यह आप जैसा ज़िम्मेदार आदमी ही सोच सकता है !" उसने व्यंग्य किया था। तब मैं अपने को रोक नहीं पाया था, और बरस पड़ा था, "देखो सुमंत, मुझे नसीहत देने की कोशिश मत करो, और फिर तुम ! तुम किस मुंह से यह सब कह रहे हो? शरम आनी चाहिए तुम्हें । मुझे उस हद तक मत ले जाओ, जहां मैं फट पड़"नहीं तो अच्छा नहीं होगा।" "अच्छा और बुरा होने की मैं चिंता नहीं करता । मैं किसी ऊंच-नीच ! से नहीं डरता..." - "तुम्हें शरम आनी चाहिए थी यह सब करते हुए.." मैं उसकी बात बीच में काटकर उबल पड़ा था, "तुम मेरे भाई थे."अगर चिना में कोई कमज़ोरी पैदा हो ही गई थी तो तुम्हें उसका नाजायज फायदा नहीं उठाना चाहिए था । तुमने मेरा विश्वास तोड़ा है "मैंने कभी यह नहीं सोचा था कि तुम मेरे लिए आस्तीन के सांप सावित होगे।" "मैंने यह सब बकवास करने के लिए आपको यहां नहीं बुलाया है। ७६/तीसरा आदमी

चिना दिल्ली आना चाहती है. और मैं चाहता हूं कि उसके आने से पहते
बातें साफ हो जाएं । मैं नहीं चाहता कि किसीके मन में कोई फांस
रहे।"
यह सब सुनकर मैं तिलमिला उठा था। पर अपने पर संयम रखते
हुए मैंने कहा पा, "यह तो वही तय करेगी।"
"पर आपका रवैया क्या होगा?"
"मेरा रक्या क्या होना है-जो है, यह देत ही है हो"मुझे
उससे अब कुछ लेना-देना नहीं है । हो, इतना जरूर है कि मैं एक बार
उससे मिलूगा और उसी से बातें करूगा । उसमें किसीका दखल मुझे
मंजूर नहीं होगा।"
"और अगर वह इसे मंजूर न करे !"
"तो तुम कौन हो कहने वाले !" मैंने बहुत गुस्से में कहा था, तो
सुमंत सहम गया था। काफी देर तक हम दोनो के बीच मनहूस सामोशी
छाई रही थी।
"तो यही बेहतर है कि आप चित्रा से मिल आइए।"
"मुझे जो करना होगा, वह मैं करूगा । तुम्हारी राय से मुझे कुछ
नहीं करना है, समझे!"
"तो ठीक है।" उसने कहा था और उठकर पल दिया था। उम
धक्त मुझे चिता पर गुस्सा आया था। यह सिर्फ उसीके कारण पाकि
सुमंत मुझे यों अपमानित करके चला गया था।
तीसरा आदमी/७७

अपमान की धधकती हुई आग में मैं बहुत दिनों तक झुलसता रहा। रात-दिन सिवा जलने के और था ही क्या मेरे पास ? हारा और पिटा हुआ मैं अपने घावों को ही चाट रहा था और कोई रास्ता सुझाई नहीं पड़ रहा था। एक दिन वेहद कमजोर क्षणों में मैंने चिन्ना को लिखा था: "जो कुछ भी हुआ है, उसे भूल जाओ और बच्चे को लेकर यहां चली आओ । मेरे दिल में आज कुछ भी नहीं है । अपमान और दारुण दुःख की जिस आग में मैं जलता रहा हूं, उसने अब कुछ भी शेप नहीं छोड़ा है। अब न मेरे मन में घृणा है और न प्रतिशोध । कुछ भी नहीं हैं, चिना। "शायद हम फिर से अपनी ज़िन्दगी शुरू कर सकें। नही जानता, इस बीच तुमने क्या-क्या सोचा है । पर मैं बहुत साफ मन से इतना ही कह सकता हूं कि तुम्हारे चले आने से सब ठीक हो जाएगा। मेरे मन में अब कहीं भी किसी तरह की कुण्ठा नहीं है । शायद इसलिए भी कि मैं उस अवोध को सिवा प्यार के और कुछ नहीं कर सकता । तुम्हारे पन्न की प्रतीक्षा में निरन्तर करूंगा।" यह पत्र पोस्ट कर देने के बाद कुछ पश्चात्ताप भी हुआ, यही सोच कर कि जव चिना ने बच्चे के जन्म पर बुलाना भी उचित नहीं समझा और उसके घर वालों ने भी सिवा सूचना देने के और कुछ नहीं लिखा, तो मैं ही इतना कमज़ोर क्यों हो गया ? फिर लगा कि कमजोरी ही सही, अगर यह विगड़ी हुई जिन्दगी सुधर जाए तो बुरा क्या है ? पर मन कुछ इतना चुप हो गया था कि चित्रा के पत्न की प्रतीक्षा भी सचमुच नहीं रही थी। ७८/ तीसरा आदमी - कुछ दिनों बाद उसका तार मिला कि वह आ रही है। मैं स्टेशन पर उसे लेने गया, शक था कि शायद सुमन भी पहुंचा हो, पर ऐसा कुछ भी नहीं था । यह मुझे बहुत अच्छा लगा था । चित्रा ने समझदारी का काम किया था और इससे उसके इरादों का भी पता चल गया था। बच्चे को जब मैंने देखा तो सारा मलाल धुल गया। बहुत ही सुन्दर था-बहुत प्यारा । चिना ने उसे बहुत सवार कर रखा था। "देख लो अपनी अमानत ।" उसने बच्चे की तरफ इशारा करते हुए कहा था, "फिर मत कहना कि मैंने अपना फर्ज पूरा नहीं किया."" सचमुच बच्चा खूब तन्दुरुस्त और हंसमुख था। पहली नजर में चिना भी खुद, बहुत निलुप लगी थी । उसका शरीर पहले से कुछ निसरा और दुर्बल या "कुछ अजीब तरह का निखार था उसमें~बच्चे के जन्म के बाद उसमें वह उद्दाम पिचाव नहीं रह गया था, उसकी जगह अद्भुत- सा मौन्दयं फूटा था उसमें, शांत, मासूम और पावन-सा । उसके अगों मे नए घुमाव मा गए थे-नए सौन्दर्य-कोण फट आए थे। अजीब-सी गरिमा व्याप्त थी पूरे व्यक्तित्व में। उस गरिमा ने मुझे अभिभूत कर लिया था। उसे लेकर में अपने दोस्त के कमरे पर हो आया था, जहा चाय और अण्डा बना सकने के अलावा दूध उबाल लेने भर का इन्तजाम था। कोई और घरेलू सामान नहीं था। मेरे मित्र ने भी चिता का खुले दिल से स्वागत किया था और बच्चे को देखकर वह भी बहुत खुश हुआ था। कमरे पर पहुंचते ही चित्रा ने वाय बनाई थी। चाय पोकर मेरा दोस्त चला गया था, हमें बातचीत करने की सुविधा देने के सयाल से । मैं उस वका पत्चात्ताप से भरा बैठा था कि धीरे से चिना ने ही कहा था, "तुम तो नाराज होकर भोपाल जा बैठे, यह भी नहीं सोचा कि मैरा क्या होगा ?."क्यों?"घर पर क्या- 'या नहीं सुनना पड़ा मुझे लेकिन इस गुड्डू की खातिर सब बरदात तीसरा आदमी !७६ -- - कर लिया । अगर यह पेट में न होता तो मैं सचमुच कुछ कर लेती अपने लिए..." कहते हुए वह शून्य की ओर देख रही थी। मेरी सारी ममता उमड़ आई थी। अपने को संयत रखते हुए मैं बोला था, "चित्रा, उन वातों को मत दोहराओ। जो कुछ हुआ, वह हो गया"दोनों ने ही बचपना किया..." :"अब तुम्हारे मन में तो कोई बात नहीं है ?" "नहीं।" "सचमुच ।" "हां" "फिर इस तरह मत सोचना कभी।" हम ये बातें कर रहे थे और उधर चटाई पर पड़ा गुड्डू मुस्करा रहा था--अपने में मस्त । उसने गद्दी गंदी कर ली थी। चित्रा उसके कपड़े बदलने के लिए मुड़ी थी तो एकाएक न जाने कैसी झलक उसमें से फूटी थी... वह झलक'"और मेरा मन खिन्न हो गया था। वह कपड़े बदल रही थी और मैं बहुत गौर से उसे देख्न रहा था । रह-रहकर उसमें से कुछ आकार उभरते थे, जो अजीव-सा भ्रम पैदा करते थे। मुझे लगा कि चित्रा को अच्छी तरह पहचानने के लिए फिर एक बार वहुत निश्चितता से देखना होगा"उसके अग-प्रत्यंग को अपनी स्मृति में वसाने के लिए मुझे एक बार फिर पहचान करनी होगी"वही आत्मीय पह- चान "जिसकी मुझे हमेशा तलाश थी। और यह खोज बराबर जारी रही। मैंने उसे दुवारा पहचानने की कोशिश की-तन से, मन से । इस बार मैं उसे सम्पूर्णता में जान लेना . ८०/तीसरा आदमी ती-५ चाहता था। पर क्या कहीं" यह पहचान मुझे और भी सता रही थी। मैंने उसके शरीर के एक एक भाग को फिर उसी सम्मोहन से देखा था, उसकी आवाज़ में कभी भुनी हुई अपनत्व की झनक को अनुभव करना चाहा था और मुझे लगा था कि वह छाया हमारे वीच से गई नहीं है। उस छाया ने चिना के पूरे शरीर और व्यक्त्त्वि को एक संस्कार दे दिया है । मुझे याद है-एक वार वही कमरे पर बैठे-बैठे मैंने चिता से कहा था, "चिना"यह जो तुम्हारे वायें गाल के कार तिल है"यह बहुत चमकता है।" सुमन्त के बैठे होने के कारण मैं यह नहीं कह पाया था कि वह तिल मुझे बहुत अच्छा लगता है"या मुझे प्यार करने के लिए विवश करता है । चिन्ना मेरी बात का अर्थ समझकर लजा-सी गई थी। तभी सुमन्त ने कहा था, "यह जरा-मा और नीचे होता तो...' कहते. कहते वह सकुचा गया था और मैं मन मे कुण्ठित हो गया था। और इतने अरसे बाद जब उसी तिल को मैंने फिर देखा ण, तो लगा था कि वह सचमुच नीचे खिसक आया है । वहा, जहां वह मुमन्त को अच्छा लगता। चित्रा के लहजे में भी कुछ बदलाव था"अव यह बोलती थी तो जैसे कभी-कभी उसकी आवाज़ में प्रूफ के लिए शुद्ध किए जाते शब्दों की शकार होती, जो उस छाया को मावाज से मिली-जुली लगती थी। उस के हंसने में एक तीसरी ध्वनि फूटती थी। और वह तीसरा आदमी दिन-ब-दिन हमारी जिन्दगी मे घमता चला आ रहा था। अपनी अनुपस्थिति से शायद और भी ज्यादा । काम करते- करते एकाएक चिना बीच में जैसे बात कर उठती थी, वह भी उसी छाया जैमा था। यहां तक कि मुझे उसके चेहरे में भी उस छाया का हल्ला-सा रूपा- तीसरा आदमी/८१ .

4 भास दिखाई देता था। पहले चिना के नक्श बिल्कुल अपने थे, पर अव उनमें अंतर मा गया था। ओंठों के आसपास और नाकवाला हिस्सा विलकुल उस छाया के सांचे में ढला हुआ लगता था। .''गहन और प्रगाढ़ शारीरिक सम्बन्धों की अनवरत क्रिया के फल- स्वरूप आत्मिक और शारीरिक रूप से लिप्त दोनों व्यक्तियों के रूपा- कारों में शायद यह साम्य उभरने लगता है बहुत धीरे-धीरे "यह शायद एक प्रक्रिया है जो अपने-आप घटित होती है" शायद इसीलिए कुछ बरसों के बाद कुछ जोड़े अपनी शक्लों में पति- पत्नी से अधिक भाई-बहन से लगने लगते हैं । चित्रा के पूरे व्यक्तित्व से हमेशा कुछ-कुछ वैसे ही छायामास-से फूटते नजर आते थे और मैं गुमसुम हो जाता था। मेरा सारा उत्साह उछाहं ठण्डा पड़ जाता था और मेरे भीतर सर्द हवाएं सिसकारियां भरने लगती थीं। वेहद दुःखद स्थिति थी यह। यह न बर्दाश्त होती थी, न अस्वीकार की जा सकती थी। लगता था, जैसे चिना के माध्यम से कोई और वरावर एक आक्रामक की तरह मुझपर हावी रहता है"हर वक्त वह मुझे ललकारता है"खिजाता और परेशान करता है । और उस छाया के इस मौन, पर वेहद भयंकर आक्रमण को मैं झेलता था"उससे लड़ता था, क्षत-विक्षत होता था"हजारों घाव सहता था और अंततः उसे अपनी उद्दाम शक्तियों से जीतकर कुछ क्षणों वाद फिर पराजित-सा लेट जाता था। यह एक अनवरत युद्ध था जो मैं लड़ रहा था। चौवीस घंटों के बीच कई बार वह छाया मुझे ललकारती थी और मैं हमेशा उससे मुंथ जाता था । रातों में"जब मैं चिता को अपनी बाहों में लेता तो एक अजनवी गंध फूटती थी। वह छाया मंडराती हुई कहीं से आती थी और मुझसे पहले उसकी बांहों को पकड़ लेती थी 'जव मैं उसकी वांहों पर हाथ ६२/तीसरा आदमी - रखता तो वहां दो हाय पहले से मौजूद होते थे। वह पाया मुझे चिता के पास पहुंचने से रोकती थी"चिना की आंखों में जब मैं झांकता था तो वहा चार आखें झांकती होती थीं."चार वाहें उसे कस रही होती थी, चार ओंठ उसे प्यार कर रहे होते थे... जब भी मैं आफिस से घर आता, दरवाजे के पास स्कता और दस्तक देता तो लगता कि वह छाया मुझसे पहले पहुंच चुकी है, और हमने दो दस्तकें दी हैं" वह छाया आगे-आगे चलती थी और मैं सिर्फ उसका पीछा करता था। जो कुछ वह छाया करती है, वही मैं करता जाता था-जैसे युद्ध में होता है." वह मुझसे पहले घर मे दासिल होती थी"मुझसे पहले वह निवासे वानों कर लेती थी। उसकी चितवनों, मुस्कराहटो का अधूनापन सोख लेती थी "जो कुछ में करना चाहता उसे वह छाया पहले ही कर लेती थी। इस दारुण स्थिति में"इस अनवरत युद्ध की स्थिति में मेरा व्यक्तित्व सिमटता जा रहा या "मुझमें एक मौन ठण्डापन भरता जा रहा था। कभी-कभी तो यह भ्रम भी होने लगता था कि वह छाया मुझपर ही हावी हो गई है और मैं खुद उसके अलावा और कुछ नही रह गया हूं"। कभी जब चित्रा अपनी आखो में प्यार भरकर मुझे देखती तो लगता कि वह मुझे नहीं, उस छाया को देस रही है जो मुझपर हावी हो गई है और उसे ही प्यार कर रही है, माझगड़ रही है, या माहार कर रही है। ऐसे क्षणों में मैं पगला उठता या । तव एक ही सहारा रह जाता था-गुड्डू । उसके पास पहुंचते ही वह सब मिट जाता था , लगता था उसे चाहने से किसीको ईर्ष्या नहीं होती यो । मेरे और गुड्डू के बीच कोई नही था । उसकी आखों मे मैं एकांतिक रूप से शाक सकता था। तीसरा आदमी/८३ की पनाह में चला वह छाया जैसे गुड्डू से घबराती थी । गुड्डू एक स्थाई शह था और जव-जव वह छाया मुझपर आक्रमण करती मैं गुड्डू जाता या उसे हथियार बना लेता और अपना युद्ध जीत लेता था। लेकिन यह युद्ध इतना एकांगी नहीं था । यह घृणा, ईर्ष्या, विद्वेप, और हिकारत का युद्ध भी था, जिसके लिए हर क्षण तैयार रहना पड़ता था। कभी चित्रा हाथ-मुंह धोकर आती और अपना जूड़ा खोलकर फिर बांधती तो वह छाया उससे लगकर खड़ी हो जाती ! चित्रा अनमनी-सी बैठी होती तो आकर उसे गुदगुदा देती 'जो कुछ मैं सोचता, वही वह मुझसे पहले कर देती। और इस तरह मैं एक नितांत द्वितीय के रूप में रह गया था । . उन दिनों चित्रा में ज्वार उठा करते थे-वह हंसती तो खूब हंसती । और मुझे लगता कि इस हंसने में भी उसका हिस्सा है । वह नहाती तो लगता कि बड़ी-बड़ी देर तक नहाती है, जैसे हम दोनों के लिए साथ-साथ देर तक नहाती है। कभी जब वह अपनत्व की वात करती तो लगता कि उसमें वह क्वांरापन नहीं है जो सहज ही वांध लेता है-वह वात शायद पहले कही जा चुकी है और उसका सत्य निचुड़ चुका है, अव वह मात्र दोहराई जा रही है । लगता था कि एक पुराने मकान में मैं वसा दिया गया हूं और उसमें मृत्युपर्यन्त जीना ही मेरी नियति है । यह मानसिक स्थिति मेरे लिए असह्य होती जा रही थी। हर वक्त में सतर्क रहता था, हर वक्त मैं अपने से लड़ता रहता था, फिर भी मैंने चित्रा को इन बातों का अहसास नहीं होने दिया। शायद यह मेरा ख्याल । भर है, क्योंकि थोड़े दिनों वाद चित्रा भी कुछ घुटी-घुटी-सी रहने लगी थी। जिन्दगी के नये अर्थों तक पहुंचे विना ही हम अपनी ज़िन्दगी की मौजूदा विभीषिका में लिपट गए थे। - ८४/ तीसरा आदमी बहुत दिनो वाद सुमत का फोन आया था और उसने कहा था, कि मैं अपना सामान वगैरह ले जाऊ तो अच्छा है, कोकि वह कमरा वदल रहा था । इससे पहले भी मैंने चिन्ना से एक बार सामान उठा लाने के लिए पूछा था, तो उसने इतना ही कहा था, "अब वहा जाने की कोई जरूरत नहीं । सामान ही कितना है !" जाना तो मैं भी नहीं चाहता था, पर दोस्त के यहा रोज वर्तनी की तकलीफ होती थी और इतना पैसा किसी महीने नहीं बचता था कि कुछ वर्तन वगैरह ले आऊ। सुमत के कहने के बावजूद मैं अपना सामान लेने नहीं गया था तो कुछ दिनों बाद वह खुद ही एक स्कूटर मे दो वण्डल रखे हुए हमारे यहा आया था। कुछ ऐसे, जैसे कि पहले कुछ हुआ ही न हो। बहुत प्रकृतिस्थ होकर वह बातें करता रहा था और जब बहुत स्नेह से गुड्डू की तरफ बढ़ा था तो मैं भीतर ही भीतर सहम-सा गया था। अब क्या होगा?" सुमत बडे प्यार से गुड्डू को खिलाता रहा था। उसके लिए वह खिलौने भी लाया था। वह शायद हम लोगों से फिर अपने सामान्य सम्बन्ध स्थापित कर लेना चाहता था। शायद वह अपनी ग्लानि की आग को सह नहीं पाया था। मेरा मन भी कुछ-कुछ उमड आया था। एक क्षण के लिए गुजरा हुआ सब मुझे अपनी सामखयालो-सा लगने लगा था । हम फिर बैठे थे और कही कुछ भी नहीं था । कोई सराश तक नहीं थी। चिन्ना ने चाय बनाई थी और हम सबने कुछ कुछ सहमे हुए एक बार फिर चाय पी थी। न जाने क्यों, चाय के वक्त ऐसा हुआ था कि बातों का दौर थम गया था। चाय के प्याले में हम सभी अपनी बीती हुई सूरतें देखने लगे थे और चुप हो गए थे। तीसरा आदमी /८५ उस दिन जरा-सी देर की टेढ़ी खामोशी से बावजूद हम तीनों ही शायद एक-दूसरे को माफ कर रहे थे-मन ही मन, और जैसे तीनों ही अपनी-अपनी जगह यह सोच रहे थे कि हमने अलग-अलग कितना तूल दे दिया था वातों को । अगर हम पहले ही साथ बैठ गए होते तो यह सब क्यों होता! दरारें क्यों पड़ती ? दिल इतने क्यों फटते ? कोई भी एक दूसरे को जिम्मेदार ठहराने के मूड में नहीं था, हर एक स्वयं को ही दोपी पा रहा था। दोपी होने का यह भाव हम तीनों के चेहरों पर लिखा हुआ था। हरएक स्वयं मैं दोपी होने की भावना से दूसरे को कनखियों से देख रहा था और धीरे-धीरे धुंध और धुएं से छाया हुआ आसमान साफ हो रहा था। वह क्षण बहुत बड़े सन्तोष का क्षण था। हम कट-फट गए थे, जुड़ रहे थे । हमारे टूटे-फूटे व्यक्तित्व जैसे फिर आकार ग्रहण कर रहे थे । और इतना हुआ कि हमारे बीच का मलाल धुल-सा गया। आना- जाना, मिलना-जुलना तो शुरू नहीं हुआ पर बीच में गहरी फासें नहीं रह गई। ८६/ तीसरा आदमी पर जिन्दगी का वही ढर्रा था। वही मार थी वक्त की। दिन-ब-दिन जोना दूभर होता जा रहा था। जरा-जरा-सी चीज की किल्लत थी। मेरे दोस्त का तबादला हो गया था, इसलिए कमरे का किराया भी पूरा पड़ने लगा था और गुड्डू के पर्चे भी बढ़ने जा रहे थे । आमदनी वही थी, बहती हुई महगाई के कारण लगता था कि हर महीने तनख्वाह कम होती जा रही है । बड़ी खीच-तान रहती। पारिवारिक ज़िन्दगी में भी एक ढर्रा बन गया था उस एकरसता मैं कभी-कभी मन बहुत भटकता था और बीते हुए की कसक होने लगती थी। बिलकुल तो कुछ भी नहीं बीतता । सब जीवित रहता है-भूत और भविष्य । केवल वर्तमान ही ऐसा है जिसका कोई मसरफ नहीं दिखाई देता । वह शायद होता भी नहीं । हर व्यक्ति शायद अपने बीते तथा बीतते हुए मैं कल के लिए जीवित रहता है । रेडियो में काम करते करते मैं कुछ ऐसा बन गया था कि कहीं और फिट ही नहीं हो सकता था। अगर मैं रेडियो की नौकरी छोडकर निकलता भी तो मेरे लिए कही कुछ भी नहीं था। मुझे कोई एक कोडी को नहीं पूछता । यह नौकरी ही ऐसी है, जो आदमी को बेकार कर देती है । वह किसी लायक नहीं रह जाता । और जगहों का अनुभव जिन्दगी में बहुत काम देता है, पर यहा का अनुमव और कामो के लिए बेकार कर देता है। यह कुछ-कुछ गलत राजनीतिक सस्था जैसी ही संस्था है, जिसमें नीचे अटके रह जाने का मतलब होता है--अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को तोड़-फोड़ लेना, और अपने को व्यर्थ महसूस करते हुए भी वही चिपके रहना; क्योकि और कोई गति नहीं है । व्यक्ति की गरिमा, उसके रवना- त्मक अह और प्रयत्नशीलता को जैसे गलत राजनीतिक पार्टियों को तीसरा आदमी/८७ प्रतिक्रियावादी नीति कुचलती है, वैसे ही यहां भी आदमी कुचला जाता है। धीरे-धीरे वह एक चाबी-भरा ववुआ रह जाता है, जिसमें अपना दिमाग और दिल नहीं होता सिर्फ होती है आवाज । आवाज़! सिर्फ आवाज़ ! रेडियो के किसी आदमी को सामने खड़ा कर लीजिए, वह सिर्फ वजने लगेगा। और मैं भी लगातार वजता जा रहा था। चित्रा ने कहा भी था कि वह कहीं छोटा-मोटा काम कर ले, पर वह सम्भव नहीं हुआ था । अभावों के बीच वेकारी झेलना और भी दुःखदाई होता है-चित्रा भी भीतर ही भीतर जैसे मरती जा रही थी। काफी दिनों तक उसने अपने भीतर की प्राणशक्ति को चलाया और उसके बल पर मुझे तथा स्वयं को अधिक से अधिक जीवित रख सकने की कोशिश की, पर अब वह भी टूट रही थी। उसकी आंखों की वची हुई चमक वुझती जा रही थी."अंगों की आभा मिटती जा रही थी। लगता था, कोई घुन उसे भीतर ही भीतर खा रहा था और मेरे पास ऐसा कोई करिश्मा नहीं था, जिससे मैं उसकी क्षय होती हुई ज़िन्दगी को वचा लूं । वही कमरा "दीवारें"अलमारियां'वर्तन" और वक्त । सड़क का वही मोड़"तार के खंभे, दूध वाले की आवाज़ और थकन । जाते हुए,लौटते हुए कदमों की वही वर्षों से चली आती आहट, वही बूथ, वही माइक, वही घोषणायें, वही आवाज""और कुछ नहीं"कुछ भी नहीं। - - गुड्डू कुछ बीमार पड़ा था। पर वह बीमारी भी आदत बन गई थी। हम अभ्यस्त हो चुके थे । चिना फिर गर्भवती थी-पहले से और भी ज्यादा श्लथ और थकी हुई। दोपहर में गुड्डू की हालत ज्यादा विगड़ी थी तो वह डाक्टर के पास ईग थी और डाक्टर ने बताया था, "यह सिर्फ सर्दी या जुकाम नहीं ८८/ तीसरा आदमी .

लगता- -इसकी आवाज कती जा रही है। मुझे डिप्थीरिया का शक है –बेहतर हो कि इसे आप फौरन 'इन्फेक्स डिजीजेज हास्पिटार' में ले जाएं।" आसपास घरों के बावू लोग भी नहीं थे। उसने मुझे फोन किया था. पर मैं मिला नहीं था, तो बेबसी मे उसने सुमन्त को फौरन घुलाया या और वह गुड्डू को लेकर किसवे कैम्प गया था। यही जब डाक्टरों ने उसे देखकर भर्ती कर देने के लिए कहा था तो उसने मुझे फोन किया था । डिप्थीरिया का केस पा । मेरे तो होश ही उड़ गए थे । गिरता. पड़ता वहा पहुंचा था। गुड्डू को अस्पताल में भरती कराना पड़ा था और देखभाल के लिए चित्रा का रुकना जरूरी था । गुड्डू की हालत में कोई सुधार नही हुआ था "चित्रा की आसो में बराबर धुन-सी उड़ती दिखाई देती थी। जिन्दगी और मौत की जद्दोजहद के बीच हम तीनों ही हाप पर हाथ धरे बैठे थे । हम मान दर्शक थे। बहुत नाजुक वक्त पा । चिना चुपचाप बैठी-चंठी हा पोगो को देखती तो लगता कि मौत की परछाइयां उराकी आंखों में सब और गहरी हो जाती थी जब वह मेरी ओर देखती थी और जब यह गुमन्त को देगती थी, तो जैसे उसे सहारामा मिलता था । जिन्दगी की कुछ आरा वती थी। मिनट मिनट पर दौड़ार सुमन्त ही डाक्टरों की राप जानकर आता था और बताता था । डाक्टर तो यहा कुछ बोलते ही नहीं थे। मुमन्त ही हरकारा बना हुआ था और विश्वास यथा रहा था, "हार ने कहा है कोई खतरे की बात अब नहीं रह गई"फिर भी..." और मैं जड़वत सब सनता रहा। चिता छटपटाती तो मुमन्त के पास ही जाती पोकि मेरी आगो में अनिश्चय के अलावा और कुछ था ही नहीं। दो दिन याद जय गुइष्ट की हालत मुधरी यी तो तगा पा कि यह राय फेयल गुमन्त मे मारण ही तीसरा आदमी/08 हुआ है। वह न होता तो कुछ भी नहीं हो पाता, सिर्फ अनिष्ट हो जाता। आठवें दिन गुड्डू घर आ गया था। सुमन्त उसके बाद भी आता रहा था, उसका हालचाल जानने के लिए । अव मेरे पास कोई सवाल भी नहीं था कि वह क्यों आता है। गुड्डू भी उससे बहुत हिल गया था और देखते ही बांहें फैलाने लगता था । सुमन्त में ऐसा कुछ ज़रूर था जो अपनी तरफ वेतरह खींचता था। और कहीं भीतर दफन वह छाया फिर उभरने लगी थी। क्या अव गुड्डू भी मेरा रक्षक नहीं रहा ? शायद जहां सपने नहीं रह जाते, वहीं यह तीसरी छाया उभरने लगती है "यह एक अनिवार्यता बन गई ६०/ तीसरा अादमी दूसरे भागत बच्चे को लेकर चित्रा से मैग कुछ मनमुटाव पन रहा था। मेरी इच्छा थी कि उसे दुनिया में न लाया जाए । मेरी हालत ऐसी नहीं थी कि मैं एक और को पाल सकू। यह वस्तुस्थिति थी। चित्रा कुछ भय के कारण और कुछ सस्कारों के कारण मेरी यात को स्वीकार करने में असमर्थ थो। मैं नियति पर विश्वास करके नहीं बैठना चाहता था। इतनी ताब ही मुझमें शेष नहीं रह गई थी। दूसरे बच्चे को लेकर हमारे सम्बन्धों में भीषण तनाय चल रहा था और एक दिन अतीत का भोंड़ा मुंह उभर आया । जब चित्रा के पास कोई तक नहीं रह गया तो उसने कहा था, "मैं जानती हूं कि मुझे पहले जैसी हालत में छोडकर फिर भाग जाओगे"तुम यही करोगे, तुम्हारे पास और कोई रास्ता नही है..." "शायद तुम्हारे पास कोई होगा।" "हो या न हो, पर मैं इतनी वेचारी नहीं है, जितना तुम रामा रहे "चित्रा । इस तरह के सयाल रखते हुए कैसे साथ चला जा सस्ता है !""बच्चे का मोह किसे नहीं होता, पर कुछ सोचना चाहिए"" "हर बच्चा दो हाथ लेकर आता है, और वे दो हाय दस को सहारा दे सकते हैं "मेरे लिए कोई भी बच्चा कभी भी अनचाहा नहीं होगा।" चिन्ना ने यह कहा था तो मेरा पारा चढ़ गया था। यह दो हायो पाला वही तर्क था, जो एक दिन सुमन्त ने दिया था"मैं बौखला उठा था। विफरकर बोला था, "अगर जिन्दगी मेरे साथ जिभोगी तो जिन्दगी का दर्शन भी मेरे साथ ही बनाना पड़ेगा." "तुम्हारे साथ कुछ बन सस्ता है ?" उसने तसल्ली से कहा था। तीसरा आदमी/६१ "नहीं बन सकता तो मुक्त होकर बना लो ।' "और क्या करूंगी।" कहते हुए वह फूट-फूटकर रो पड़ी थी। वहां से उठकर वाहर चली गई थी। इस झगड़े के बाद हमारे दिलों में पड़ी दरार और भी चौड़ी हो गई थी। यही अहसास हुआ था कि इतने दिन हम मात्र अपनी सुवि- धाओं और मजबूरियों के कारण ही फिर साथ-साथ जी लिए थे। सुमन्त की दौड़-भाग और कोशिशों से चित्रा को एक छोटी-सी नौकरी मिल गई थी। वह एक हायर सेकेण्डरी स्कूल में किसी लीव वैकेन्सी में पढ़ाने लगी थी। इसके बारे में उसने मुझसे पूछा भी नहीं था, केवल सूचना भर दी थी। मैंने भी विरोध नहीं किया था। करता भी तो किस विरते पर! मेरे सामने और कोई रास्ता नहीं था, सिवा इसके कि मैं अपना तबादला कराके किसी छोटे स्टेशन पर चला जाऊं । आर्थिक और मान- सिक-दोनों रूपों में तभी कुछ शान्ति मिल सकती थी, क्योंकि अब तो सुमन्त और चित्रा-दोनों मिलकर मुझपर अहसान चढ़ा रहे थे । तवा- दला कराने की अपनी इच्छा मैंने चित्रा के सामने प्रकट कर दी थी, इस- पर वह खामोश रही थी। जब मैंने खोदकर पूछा था तो उसने कहा था, "ठीक है । जो उचित समझो सो करो।" "तुम अपने स्कूल में अभी से कह देना।" मैंने कहा था तो वह बात को टाल गई थी--"देखा जाएगा। ६२/ तीसरा आदमी आखिर मेरा तबादला मंजूर हो गया और ज्वाइनिंग सीव भी मिल गई थी। जब यह सब हो गया तो मैंने उसी रात चित्रा को बताया था, "मैंने पटना ट्रान्सफर करा लिया है-यही सोचकर कि दिल्ली को बनि- स्वत वह छोटी जगह है, वहां कुछ सांस ले सकूँगा। मुझे वीरा को यहां ज्वाइन करना है।" "तो जाओ।" "मेरा मतलब है कि तुम सब ठीक-ठाक कर लो "ऐसे चलना कैसे हो पाएगा-पसा हाथ में नही, सभी के बिल देने हैं। तुम्हें तो किसी से मतलब नहीं, बक्सा उठाकर चल दोगे । मेरा जाना इस तरह नहीं हो पाएगा।" "तुम तो ऐसे कह रही हो, जैसे तुम्हें ही सब कुछ नुकाना है ! पचास-साठ देना होगा राशन वाले का, दूध वाले का लेकिन दोस्तों का जितना कर्धा मुझे धुकाना है वह तो मैं ही जानता हूं।" "तो तुम ऐसे जा सकते हो-मैं नहीं जा सकती। नौकरी भी मैं छोडना नही चाहूंगी..." "वह है ही कितने दिनों की ? एक-डेढ महीना और रह गया होगा। उन्हे जवाद देने में कोई हर्जा नहीं है।" "मुझे वह जगह मिल गई है, अब नौकरी छूटने का सवाल नहीं है। जो टीचर छुट्टी पर गई थी, उसका त्यागपन्न आ गया है । फिर प्रिंसिपल का कहना है कि डिपार्टमेंट से वे मुझे एप्रूव करा लेंगी।" मैं जान रहा था कि यह सब पोच बहाने थे। चित्रा मेरे साथ पटना चलने को राजी नहीं थी और वह दिल्ली में ही रुकना चाहती थी। यही हुआ भी । मैं अट्ठारह तारीख को वहां से चल दिया। गुड्डू को छोड़ते हुए बहुत तकलीफ हुई । रास्ते-भर उराको अयोध आंखें मेरा पीछा करती रही"पर मैं भी लाचार था। दिल्ली के पजं. दारो से मैं परेशान आ गया था। वह हालत भी बर्दाश्त के बाहर हो । । तीसरा यादमी/६३ रही थी और मैं किसी तरह थोड़ा-बहुत पेट काटकर कर्जा चुका देना चाहता था। दिल्ली छोड़ने से पहले मैं कितनों के सामने कितना बेइज्जत हुआ हूं यह मेरी मात्मा ही जानती है। कितने अपमान सहे आदमी ? किस किस तरह के ? पटना आकर मुझे कुछ राहत मिली थी। ऐसी राहत जो मुझे सुल- गाए रहती थी। तरह-तरह के वोझ थे दिलो-दिमाग पर । दिल्ली से कोई सूचना नहीं मिली थी। मेरे एकाध पत्न का उत्तर आया था, फिर कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था। चूंकि अकेली औरत का किसी जगह रहना एकदम नामुमकिन होता है, इसलिए चित्रा किसी होस्टल की खोज में थी, यह उसने मुझे लिखा था। प्रसव के इन्तज़ाम के सम्बन्ध में मैंने लिखा था कि मैं उसे पटना ले आऊंगा तो उसने उत्तर दिया था कि वह मायके जाना ही पसन्द करेगी। जब जाएगी तो लिखेगी। सम्बन्ध सब विखर चुके थे । और वह तीसरा आदमी मुझपर फिर हावी रहने लगा था। तीन महीने बाद चित्रा का खत आया था कि उसने भाई को बुलाया है और वह मायके जा रही है । वहां से लौटकर फिर दिल्ली ही आएगी। वह चाहती थी कि मैं दिल्ली ही फिर तबादला करवा लूं । मैंने उसे पटना वुलाया था । न मैं दिल्ली जाने को तैयार था, न वह पटना आने को तैयार थी। और वही हुआ जो होना था। प्रसव के लिए भी वह मायके नहीं गई । यह शक मुझे पहले भी हुआ था कि वह नहीं जाएगी। होस्टल में उसे कमरा भी नहीं मिला। ६४/तीसरा आदमी यह भी मुझे मालूम था कि नहीं मिलेगा। सुमत ने एक तीसरी जगह कमरा से लिया था और वे दोनों वही साथ-साथ रहने लगे थे । प्रसव का सारा इन्तजाम सुमंत ने किया था। मैं पूरी तरह से टूट चुका था। . और एक बार फिर घबराया हुआ में दिल्ली वापस आया था- छुट्टी पर । पहले जाकर प्रेम में मुमत से मिला था। उसने मिलने में कोई उत्साह नहीं दिखाया था। पता लेकर मैं उसके घर पहुवा था तो चिना बाहर ही बैठी हुई मिल गई थी। मुझे देखते ही उसने सिर पर पल्ला कर लिया या-जैसे मैं एकाएक उसके लिए कोई पूज्य व्यक्ति हो गया होऊ । वच्ची वही खाट पर लेटी थी। और एक बार फिर मुझे चित्रा बड़ी ही निकलुप-सी दिखाई दी थी। उसका शरीर कुछ और निखरा हुआ था-कुछ सौन्दर्य और फूट आया था । अगो के घुमाव कुछ और बढ़ गए थे और वह पहले से अधिक आश्वस्त लग रही थी। ऊपर का हालचाल पूछने के बाद मैं अपने में कुठित हो गया था और कुछ लोगों से मिलने का बहाना करके उठ के चला आया था। रात को लौटा तो चित्रा ने बताग कि सुमत किसी काम से तीन दिनों के लिए वाहर चला गया है । "मेरे कारण?" मैंने पूछा था। "हो सकता है।" और तव मेरे भीतर का हिस पशु जागा था। प्रतिशोध की भावना उफनने लगी थी और मैंने चिता को पकड़ लिया था । मन में मान इतना ही था कि अब सिर्फ एक बार उसे अपनी पत्नी बनाकर टकराऊं और हमेशा के लिए चला जाऊ । शायद इससे मेरा आहत अहं तृप्त होता था। तीसरा आदमी/६५

मेरे भीतर आग धधक रही थी, फिर भी मैं नाटक करता हुआ बहुत
धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा था। और जब मैंने उसका मुंह दोनों हाथों में
भरकर ऊपर उठाया था तो वह छिटककर खड़ी हो गई थी।
"यह नहीं होगा..."
"क्यों?"
"वस "नहीं होगा।" उसकी आंखों से चिनगारियां फूट रही थीं।
"और जो मेरे साथ हुआ है ?"
"उसके लिए तुम खुद ज़िम्मेदार हो।"
"इसीलिए वह भाग गया है !"
"भागते तो तुम रहे हो। उन्हें विश्वास न होता तो इस तरह न
चले जाते।" चित्रा की आंखों में हिकारत थी।
तभी बच्ची जाग गई थी और वह उसे उठाकर रसोई में चली गई
थी। एक बार वह फिर आई थी और चटाई का टुकड़ा व गुड्डू को
उठा ले गई थी और रसोई की चिटखनी बन्द करके भीतर कैद हो गई
थी।
"मैं जा रहा हूं।" इतना कहकर मैं हताश-सा चला आया था।
माकर वेटिंगरूम में पड़ रहा था और सुबह ही पटना के लिए चल दिया
था।
सव समाप्त हो चुका था।
मेरे और किसी के बीच एक छाया थी"मेरे और हर इंसान के
वीच छाया थी। मैं पटना वापस आ गया था।
.......
..
मुझे तो बहुत बाद में पता चला कि फिर सुमंत लौटकर नहीं आया
था। चित्रा ने कोई खबर नहीं दी। उसने कोई खत भी नहीं लिखा।
६६ / तीसरा आदमी
ती-६

यह भी नहीं लिखा कि यह भीषण दुर्घटना कैमे और क्यों हुई। किमी होटल के कमरे में जाकर गुमा ने आत्महत्या कर ली थी। मापद किसी तीसरे आदमी के कारण"शायद वह मैं" पुलिस ने चित्रा को कितना परेशान किया होगा, कुछ पता नहीं; क्योकि मुझे जब यह खबर मिली थी तो दो-ढाई महीने गुजर चुके थे। .."एक बार तो लगा था कि शायद अब चित्रा मुझे याद करे। शायद उसके दिल में वही पुरानी भावनाए फिर उभरें और वह हारी हुई आकर मेरे पास खही हो जाए। "लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। और शायद अब कुछ होना भी नहीं है । हो भी क्या सकता है ? अब वासी हो क्या बचा है ? बच्चे । मैं जानता हूं चित्रा उन्हें नहीं देगी। और अब मैं चित्रा के साथ उस तरह रह भी नहीं सकता। यह मेरी मजबूरी है । मुझे उस छाया ने मजबूर कर रखा है। अब मेरी दुनिया मे मैं हूं और एक वह छाया है जो मुझे अब भी चैन से नहीं बैठने देती। "हर वक्त एक तीमरी छाया महराती रहती है "ऐसा लगता है कि हर 'मुझ' और हर 'चिना' के बीच वह छाया खड़ी है"जब भी, कोई भी, किमी भी चित्रा की आंखो में झांकने की कोशिश करता है तो लगता है कि जैसे दो नही, चार आंखें झाक रही है-चार बाहे उस चित्रा को कम रही है-चार होठ उसे प्यार कर रहे है।

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यह भी नहीं लिखा कि यह भीषण दुर्घटना में और क्यों हुई । किसी होटल के कमरे में जाकर गुमत ने आत्महत्या कर ली थी। शायद किसी तीसरे आदमी के कारण "शायद वह मैं" पुलिस ने चिन्ना को कितना परेशान किया होगा, कुछ पता नहीं; क्योंकि मुझे जव यह खबर मिली थी तो दो-ढाई महीने गुजर चुके थे। "क बार नो लगा था कि शायद अब चिवा मुझे याद करें। शायद उसके दिल में वही पुरानी भावनाए फिर उभरें और वह हारी हुई आकर मेरे पास खड़ी हो जाए। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। और शायद अब कुछ होना भी नहीं है । हो भी क्या सकता है ? अब बाकी ही क्या बचा है ? बच्चे । मैं जानता हू चिना उन्हें नहीं देगी। और अब मैं चित्रा के माथ उस तरह रह भी नहीं सकता। यह मेरी मजबूरी है । मुझे उम छाया ने मजबूर कर रखा है। अव मेरी दुनिया में मैं हूं और एक वह छाया है जो मुझे अब भी चैन से नहीं बैठने देती। "हर वक्त एक तोमरी छाया मडराती रहती है"ऐसा लगता है कि हर 'मुझ' और हर चित्रा' के बीच वह घामा खड़ी है"जब भी, कोई भी, किसी भी चिना की आंखो मे झाकने की कोशिश करता है तो लगता है कि जैसे दो नही, चार आँखें झाक रही हैं-चार वाहे उस चित्रा को कस रही हैं-चार होठ उसे प्यार कर रहे हैं।

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तीसरा आदमी

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'बात बिगड़ती ही चली गई। ऐसा मैंने कभी सोचा नहीं था। सपने में भी यह ख्याल नहीं आया था कि चित्रा मेरे साथ ऐसा करेगी । जो कुछ उसने किया, उसे, चाहते हुए भी मैं भुला नहीं पाया। और आज, जबकि बातें फिर बदल गई हैं."मैं कुछ इतना मजबूर है कि कुछ भी नहीं कर सकता। एक बार तो मन मे आया था कि लोट जाऊं और चित्रा को ले आऊं, पर ऐसा मैं कर नही पाया । हर वक्त एक तीसरी छाया मंडराती रहती है। ऐसा लगता है कि वह मेरे और चिना के बीच खड़ी है "वह छाया मुझे चित्रा के पास तक पहुंचने से रोकती है। जब मैं अपने खयालो मे ही मिना की आंखो में शांकने की कोशिश करता हूं, तो लगता है जैसे दो नहीं, चार आखें उसकी आंखों में झांक रही हैं, चार बाहेंउ से कस रही हैं, चार ओंठ उसे प्यार कर रहे है। मेरे आगे-आगे एक छाया हर समय चलती है । और लगता है कि मैं उस छाया का सिर्फ पीछा करता हूं। जो वह कहती है, वही मैं करता जाता हूं। मुझसे पहले वह घर में दाखिल होती है । मुझसे पहले वह चिता को देखती है-जो कुछ में करना चाहता हूं, उससे पहले वह छाया वही सब कर लेती है। शायद इसीलिए अब मैं कुछ नहीं कर पाऊगा । चाहते हुए भी नहीं करे पाऊगा। क्योकि उस छाया से मुक्ति नहीं है, उससे कोई बवाव नहीं है। तीसरा आदमी/ ५ । । - चित्रा ने कोई खत भी नहीं लिखा। यह भी नहीं लिखा कि वह भीषण दुर्घटना क्यों और कैसे हुई । एक बार तो लगा था कि शायद अब चित्रा मुझे याद करे । शायद उसके दिल में वही पुरानी भावनाएं फिर उमड़ें और वह हारी हुई मेरे पास आकर खड़ी हो जाए। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। और शायद कुछ होना भी नहीं है। भी क्या सकता है ? अव बाकी ही क्या बचा है ? बच्चे ! मैं जानता हूं कि चिन्ना उन्हें नहीं देगी। तभी नहीं दिए, तो अव क्या देगी? वच्चों की ममता जरूर मुझे खींचती है, पर उस ममता का जो जरिया है, जब वही भावनाहीन हो गया है, तो अब इस इच्छा में भी कोई अर्थ नहीं दिखाई पड़ता। और अब मैं चिना के साथ उस तरह रह भी नहीं सकता । यह मेरी मजबूरी है । मुझे उस छाया ने ही मजबूर कर रखा है । अव मेरी दुनिया में मैं हूं, और वह एक छाया है, जो मुझे चैन से नहीं बैठने देती। मैंने कभी यह सोचा भी नहीं था। जिन्दगियां यों मोड़ ले जाएंगी और किनारे इस तरह छूट जाएंगे, यह खयाल तक दिमाग में नहीं आया था। और अब तो रास्ते बहुत बदल गए हैं--कोई एक-दूसरे को नहीं काटता-पहले यही सोचता था कि शायद वह दिन फिर आए, जव चित्रा आकर फिर मेरे रास्ते में खड़ी हो जाए लेकिन अब यह सब होगा नहीं। की मुलाकात पहली बार ट्रेन में हुई थी उस समय, जब मैं विवाह करके लौट रहा था। रिश्ते में वह मेरा छोटा भाई भी होता था और वारात में जितने लड़के थे, उनमें वही सबसे बड़ा और' समझदार था । मुझसे सिर्फ दो साल छोटा था सुमंत । उस वक्त मुझे कुछ भी नहीं लगा था । कुछ खयाल करने का सवाल भी नहीं था । वल्कि मैं उलटा यही चाहता था कि पानी वगैरह के लिए पूछने-पाछने सुमंत ही जाए। चित्रा तो अकेली बैठी थी फर्स्ट क्लास चित्रा और सुमन्त ६ / तीसरा आदमी 1 - । डिब्बे मे । बैठना मुझे भी साथ ही पा, पर कुछ दोस्तो को फतियो के कारण और कुछ बुजुगों के खयाल से मैं सबके साथ आकर पई क्लास के डिब्बे में ही बैठ गया था। दिन का वक्त या, और यह अच्छा भी नहीं लग रहा था कि मैं अपनी बीवी के पास ही बैठा रहूं। मन में भावनाए तो बहुत उमड रही थी, पर अजीव-सा लिहाज नाए जा रहा था। हमारे घरो की स्थिति भी कुछ ऐसी ही थी। काफी दि-लिख लेने के बावजूद अभी आख की शर्म बाकी थी, और इतना लहाज करना जरूरी भी था। लखनऊ स्टेशन पर चित्रा के घरवाले और सहेलिया-सभी विदाई ने आए थे और तब उस भीड़-भबड़ में मैं फस्र्ट क्लास में ही घुस गया ग। तभी बड़े चाचा को फबती मुनाई दी थो, 'आज-कल के लड़के तो अंग्रेज हैं अंग्रेज । यही गनीमत नहीं है का, कि हाय मिलाकर शादी नहीं र लाए"यह सुनकर मेरा मन सराव-सा होने लगा था। डिब्बे में चित्रा अपनी बहनो और सहेलियों से घिरी हुई पी । घर छोड़ते समय का अवसाद और थकन उसके चेहरे पर थी। उसने एक जर मुझे कही से देखा था-और मैं उसे देखता रह गया था । भरे हुए सदूर की लाली उसके माथे पर झलक रही थी और वालो की कुछ शोख नटें बाहर निकल आई थीं। माया पसीने से भीगा हुआ था और चेहरा भी पसीजा हुआ था। मैं अपने में डूबा सड़ा था। चित्रा के घर वाले मेरे आसपास खड़े थे और वेकार की पूछताछ कर रहे थे--"शाम तक आप घर पहुंच जाएंगे?" "जी हां।" मैंने जवाब दे दिया था। गाड़ी काफी देर से अटकी हुई थी। कुछ लेट भी हो रही थी। नहुंचाने आने वालों का उत्साह टण्डा पड चुका था। गाड़ी को नौ बजे यूट जाना चाहिए था, पर उस वक्त सवा नौ हो रहा था और लोगों की भावना की गरम चुक गई थी। तीसरा आदमी/७ "अब तो गाड़ी काफी लेट हो रही है।" किसीने थकान-भरे स्वर में कहा था। प्लेटफार्म की रौनक विखरती जा रही थी । मैं निगाह बचा-बचाकर चित्रा को ताक रहा था और मन में कहीं यह लग रहा था कि इस तरह यहीं खड़े रहना ठीक नहीं। तभी देखा था-सुमंत दनदनाता हुआ डिब्बे में घुस गया था-"भाभी को हवा लगने दीजिए"हटिए"." उसे यह भी ख्याल नहीं था कि चित्रा की सहेलियां या बहनें इस तरह के व्यवहार से तुरा भी मान सकती हैं। तभी सुमंत ने थर्मस खोलकर पानी निकाला था और गिलास चित्रा के सामने कर दिया था, "भाभी, लीजिए पानी पीजिए।" सुमंत की यह चुस्ती मुझे अच्छी लगी थी। मेरे घर में कोई सलीके का था भी नहीं, जो चित्रा का इतना खयाल करता । सुमंत देखने-भालने में भी अच्छा था, और मैंने देखा था कि कुछ लड़कियों की निगाहें वार- बार उसकी ओर उठ जाती थीं। जैसे कुछ मिनटों के लिए चित्रा केन्द्र- विन्दु नहीं रह गई थी-सुमंत ही केन्द्रविन्दु बन गया था। तभी किसी लड़की ने कुछ मज़ाक की थी और शायद सुमंत ने अपनी तेजी के मुता- विक उसका जवाब दिया था। वह छोटा-सा डिब्बा टूटे कांच की खन- खनाती-सी हंसी से भर गया था। सुमंत किसी लड़की को पानी पेश कर रहा था और साथ ही सव लड़कियां मज़ाक कर रही थीं। आखिर गाड़ी चली-और सब चढ़ गए। उस भीड़-भाड़ में मैं चिन्ना के डिब्बे में घुस गया। यों मेरे लिए भी वहीं रिजर्वेशन था, पर जव बड़े चाचा की फबती सुनी थी, तो मन संकोच से भर गया था। परं चित्रा का आकर्षण इतना ज्यादा था कि उस लिहाज की बात को भूल ही . गया। और जब गाड़ी कुछ दूर निकल आई, तो मैंने चित्रा की तरफ ८ / तीसरा आदमी । निश्चित होकर देखा था। वह सीट पर पर रखे, घुटनों पर ठोड़ी टिकाए मुझे देख रही थी । इतने पास से उसकी नजर का वह पहला मम्मोहन मैं सह नहीं पाया था। आज भी अगर कुछ याद आता है तो सिर्फ दो आखें । कुछ क्षणों के लिए मैं चित्रा के पूरे शारीरिक अस्तित्व को जैसे भूल गया था। आखों के सिवा कुछ और दिखाई ही नहीं दिया था। उन आंखो में सागर जैसी गहराई थी। फिर उसने पलकें झुका ली थी और तब मैंने उसे एक बार अच्छी तरह देखा था-उसके महावर लगे पैरों को, पोली-पीली गुदाज हथेलियों को, और माथे पर पसीने से चिपके रोओ को। "आराम से बैठ जाओ-मेरे सिवा और तो कोई नही है यहां." मैंने कहा था। चिना ने एक बार फिर भर-आख मुझे निहारा था और हलकी-सी मुस्कराहट उसके ओठो पर फैल गई थी लेकिन एक क्षण वाद ही उसके माथे पर और पसीना छलछला आया था। कनपटी पर चिपके रेशमी रोओ पर एक वूद और ढरक आई थी। ओठ के नीचे पसीने के छोटे- छोटे मोती उभर आए थे। मैंने बहुत प्यार मे घुटनों पर कसी उसकी बाहो पर हाथ रखा था, तो जैसे जल उठा था--हथेली पसीज गई थी, जैसे भाप लग गई हो । भोर चिता के हाथ कांपने लगे थे। गाड़ी तेज़ रपतार से भागी जा रही थी। चित्रा की बांहों मे से सनसनाहट-सी हो रही थी-तार के सम्भे जैसी। मैंने हाथ हटा लिया था। मुखते गले से मैंने पूछा था, "मुझसे डर तो नहीं लगता न !" उसने अपनी उन्ही वडी-बडी आंखों से मुझे आश्वस्त किया था। मैंने उठकर पानी लिया था, पर सद पीने से पहले उसकी ओर बढाया था। "आप पी लीजिए।" वह बोली थी। तीसरा आदमी / - - - तभी गाड़ी की चाल धीमी पड़ने लगी थी और मैंने खिड़ ढ़ानी शुरू कर दी थीं । स्टेशन आया। गाड़ी रुकी तो देखा सुमंत के साथ रघुवीर था-मेरा दोस्त । आते ही बड़ी बेतकल्लुफी से रघुवीर बोला, "भाभी जी ! आज-भर यह हम लोगों का है, फिर तो जिन्दगी- भर के लिए आपका हो जाएगा-हम लोग तो अब हट ही जाएंगे- इसलिए सिर्फ दो स्टेशनों तक की मोहलत इसे दे दीजिए-तीसरे स्टेशन पर हम वाहिफाज़त इसे आपके सुपुर्द कर जाएंगे ?" सुनकर चित्रा कुछ बोली नहीं। और मेरा हाथ खींचते हुए रघुवीर मुझे घसीट ले गया, “यार, बस, चार बाजियां । खेल जम ही नहीं रहा है, आ. और मैं उसके साथ थर्ड क्लास वाले डिब्बे में पहुंच गया, जहां दोस्तों की महफिल जमी हुई थी। आखिर न चाहते हुए भी मुझे उनके साथ बैठना पड़ा। ताश शुरू हुए । तभी बावूजी की नज़र मुझपर पड़ी, एकदम बोले, "क्यों नरेश, तुम यहां हो-वहां बहू के पास कौन है ?" "अभी तो शायद कोई नहीं है..." मैंने अचकचाकर कहा था । वावू जी को दोस्तों के साथ इस तरह बैठकर मेरा ताश खेलना पसंद नहीं आया था, इसीलिए वे बात को चलाते हुए बोले थे, "वहां डिब्बे में वहू अकेली है-चार जेवर भी पहने-ओढ़े है-ज़रा से में कुछ हो जाए तो सव तमाशा धरा रह जाएगा-तुम्हें यहां बैठना ही है तो किसी और को भेजो वहां, उसके पास ।" "सुमंत को भेज दीजिए।" मैंने जल्दबाजी में यों ही कह दिया है यह वात वावूजी को भी जंच गई और उन्होंने तुरंत सुमंत को पकड "जा बेटा, अपनी भाभी के पास बैठ जाकर'.."उन्होंने बड़े संतोप कहा, फिर मुझसे बोले, "इसे अपना टिकट दे दो ताकि फर्स्ट कर में कोई तंग न करे..." मैंने टिकट सुमंत को दे दिया । और तब वाबूजी ने एक गर्ने १०/तीसरा आदमी मुस्कराहट सब वारातियों की ओर फेंकी। कुछ यह जाहिर करने के लिए कि इस जमाने में भी मेरे जैसा लायक लड़का हो सकता है !- इतना ही नहीं, उन्होंने बहाने से सब लोगों के सामने यह बात किसी न किसी तरह प्रकट भी कर दी कि मैं अपनी पत्नी के पास न वैठकर, उन लोगो के माय वंठा हुआ हूं। लेकिन मेरा मन नहीं लग रहा था। हर वार वाजी हारता जा रहा रहा था। चित्रा की आखें मेरे अदर सुची हुई थी। मैंने इतनी अच्छी पत्नी की कल्पना नहीं की थी—यह लगा ही नही था कि घरवाले इतनी सुन्दर लडकी चुन लेंगे। वावूनी और मां के खयालात मैं जानता था- और चूकि मेरी वहने बहुत सुन्दर नही थी, इसलिए वे कभी ज्यादा रूप- वती बहू की बात भी नहीं करते थे। उनके दिमागों पर हर समय यह बात हावी रहती थी कि उन्हें अपनी लडकियो की शादी भी करती है, इसतिए मेरी शादी की बात भी कहीं चलती तो मा धोरे से यही कहती, "देखिए शादी तो नरेश की बिरादरी में ही करनी है । और हमें औसत लड़की चाहिए-लगड़ी-लूली, कानी-बहरी न हो, बस"चेहरा-मोहरा अच्छा हो, देखने में "रग उन्नीस भी हो तो कोई बात नहीं"हमें तो ऐसी लड़की चाहिए जो हमारे घर मे निभजाए और लड़के वालों की तरह हमारे यहां नखरे नहीं है कि हमें इन्दर की परी चाहिए"""जब भी मा यह कहती थी तो मेरा दिल बैठ जाता था कि पता नहीं किस जगह गठबंधन हो जाए-- परिवार भी मेरा ऐसा था कि उसमें रहते हुए मैंने कभी अपने अलग पर की कल्पना नहीं की थी, इसलिए अपनी अलग पसंद की बात भी दिल में नहीं आई थी। तब तक घर में जो कुछ होता रहा था, वह सबको तीसरा आदमी/११ द से ही होता था-कोई भी चीज़ आती थी तो 'घर' के लिए की थी, किसी एक के नाम लिखकर नहीं । वावूजी ने जिस वक्त इकिल खरीदी थी, तो वह भी सिर्फ उनके लिए या उनके नाम लिख र नहीं आई थी, वह 'घर' के लिए आई थी। उसपर जो 'कैरियर' गाया गया था, वह घर का सामान वगैरह लाने के लिए ही लगाया गया था और आगे डंडे पर छोटी सीट भी सबसे छोटे भाई के बैठने के लिए फिट कराई गई थी। कोई बक्सा भी खरीदा जाता, तो उसके कइ काम पहले से तय हो जाते । बाबूजी जब एक बक्सा खरीदकर लाए थे तो बोले थे, "नरेश की मां, यह बक्सा फिलहाल तुम्हारे काम आ जाएगा-सव बच्चों के कपड़े और तुम्हारे भी इसमें आ जाएंगे, और जब तुम शादी से लौटोगी तो नरेश को इम्तहान देने वाहर जाना है, तब इसमें उसके कपड़े और कितावें भी आ जाएंगी और जब तक वह इम्तहान देकर वापस आएगा, तब तक सर्दियां खत्म हो जाएंगी, तो घर-भर के ऊनी कपड़े रखने के काम आ जाएगा यह बक्सा।" और सबने उस बहुधंधी वक्से को बहुत पसन्द किया था। उस बक्से में वाई ओर एक छोटा-सा खाना भी बना था, जिसमें छोटा-सा ताला भी लग सकता था। उसे दिखाते हुए बाबूजी ने कैफियत वयान की थी, "इस खाने में तुम्हारे जेवर वगैरह बंद किए जा सकते हैं और जब नरेश ले जाएगा तो उसकी कलमें, घड़ी वगैरह"छोटी- मोटी चीजों के काम आ जाएगा।" घर में जूते तो सबके अलग-अलग आते थे, पर चप्पलें कुछ इस तरह खरीदी जाती थीं कि जिनसे एक-दूसरे का काम भी निकल जाए वावूजी की चप्पल मेरे काम आ जाती थी और बहनों की चप्पलें ज़रूर के वक्त मां की इज्जत रख लेती थीं। बहनों के पास साड़ियां भी ऐन ही थीं जो बदल-बदलकर एक-दूसरे के काम आती रहती थीं। जो कुछ भी हमारे यहां था, वह घर का था, इसीलिए जब भी १२/ तीसरा आदमी शादी की बात चलती तो घर में बहू लाने की बात ही होती, नरेश की बीवी नहीं"नरेश की शादी तो जैसे 'घर में बहू लाने' का एक माध्यम भर थी। यही या मेरे घर का रवैया और तौर-तरीका--सबके अपने व्यक्तित्व थे, पर वे सभी व्यक्तित्व एक 'घर' के लिए समर्पित थे। मुझे कही अच्छी नौकरी मिलने की बात उठती, तो उसे भी इसी रूप में लिया जाता कि घर सुधर जाएगा, या घर का नाम होगा" और यह सब मेरे लिए सचमुच बड़े संतोष का विषय था । हम सब मिलकर एक 'घर' बनाए हुए थे, या एक घर था जो हम सबको बड़ी गहराई से वाधे हुए था । जो कुछ होता था, वह इसी घर के लिए। और इतने अच्छे घर में हम सभी ने अपनी-अपनी रुचियो और व्यक्ति- गत सुविधाओं को कुछ न कुछ खो डाला था। ऐसे मे अपनी पत्नी को खोज करना या उस खोज में जरूरत से ज्यादा टाग अड़ाना घर के अदृश्य नतिक नियमों के खिलाफ ही था। ...और रेल के डिब्बे मे जो गर्व बाबू जी के चेहरे पर उभरा था वह भी ऐसा ही था-वह मेरी पत्नी तो थी ही, पर उससे ज्यादा वह एक घर की बहू थी, जो जा रही थी रास्ते-भर मेरा मन चिन्ना के लिए भटकता रहा। स्टेशनो पर उतर- कर मैं किसी न किसी बहाने से उसे देख आता । सुमंत जिस तत्परता से उसकी देखभाल कर रहा था और जितना खुल गया था, वह अच्छा ही था। मेरे सामने तो चित्रा दवी-सकुची-सी बैठी रही थी, पर अब वह आराम से बैठी हुई थी। उसकी आखो का हल्का-सा अजनवीपन जैसे दूर हो गया था और अपने घर की यादो से जैसे वह धीरे-धीरे कट रही थी। तीसरा आदमी/१३ द उसने कुछ नाश्ता भी कर लिया था। एक प्लेट और पानी के दो लास नीचे रखे हुए थे । मैं खुद ही उसे नाश्ता कराना चाहता था, पर भी रघुवीर मुझे पकड़ ले गया था । सुमंत ने खयाल करके उसे नाश्ता रा दिया था, यह मुझे बहुत भला-सा लगा था, क्योंकि घर पहुंचते ही जस भीड़-भाड़ में चित्रा घिर जाने वाली थी, उसमें शायद उसे पानी मांगते भी संकोच होता। चित्रा की आंखों ने एक बार फिर मुझे उसी तरह देखा था और मैं भीतर ही भीतर छटपटा उठा था। गाड़ी पांच-सात मिनट के लिए ही किसी स्टेशन पर रुकी थी। मैंने सिर्फ उससे इतना ही पूछा था, "कोई तकलीफ तो नहीं।" उसने सिर्फ सिर हिलाकर जवाब दे दिया था और तव मैंने मजाक में सुमंत से पूछा था, "अरे, ये तुमसे भी बात करती हैं या नहीं ?" "अपने से तो सारी बातें हो रही हैं ।" सुमंत बोला था, "मैं तो भाभी से यह टिप्पस भिड़ा रहा हूं कि इनकी जैसी कोई और लड़की इनके यहां हो तो मैं भी शादी-वादी कर डालूं-" सुमंत ने यह कहा था तो चित्रा का चेहरा शर्म से लाल हो उठा था। वह पहले की तरह ही धीरे से मुस्कराई थी। "अरे भई, कोई हो तो बताओ।" मैंने उसी री में चित्रा से कहा था, "अपने घर की सव लड़कियों की फेहरिस्त दाखिल करो, मेरे बहुत से भाई हैं-सब लड़कियों का उद्धार हो जाएगा 1" इस पर सुमंत ज़ोर से हंसा था, पर चित्रा खामोश ही रही थी सुमंत के होने से चिता पर अच्छा प्रभाव पड़ रहा था, मेरे घर-परिवा के सम्बन्ध में उसके विचार अच्छे ही बने होंगे, यह मुझे लगा था। १४ | तीसरा आदमी घर पर चित्रा का खूब स्वागत हुआ। सभी ने उसे पसन्द किया और उसके रूप को सराहा था । बहनों ने अपनी भाभी को बेहद पसन्द किया था। मुझे तो जैसे सब कुछ मिल गया था । एक ही बात मन में चुभती थी कि दो-तीन दिनो की उस अत्यन्त अपनत्व-भरी जिन्दगी के बावजूद चित्रा मुझसे खुल नहीं पाई थी। मैंने सोचा था कि यह उसका सहज संकोच ही होगा। वैसे उसने अपने घर-द्वार की तमाम बातें की थीं, पर जब भी मैं उसके निकट आफर कधे पर या कहीं और हाथ रख कर बात शुरू करता, तो वह सकुचाने लगती। मेरा स्पर्श पाते ही जैसे उसका शरीर पसीजने लगता था और बड़ी मोहक-सी गप उसके बदन से उठती थी। बहुत-बहुत देर तक मैं उसके अग-प्रत्यग को देखता रहता। उसके पैरों के नाखूनों को देखता-हयेलिया हाथ में लेकर अंगुलियों को निहारता और जब उसकी आंखों में झांकता तो वे आखें एक क्षण वाद ही झपकः जाती। कभी उसका पल्ला कधे से नीचे सरकने लगता, तो वह सावधानी से उसे रोक लेती और साडी की किनारी आधी खुली वाहों और परो तक खीचकर ठीक कर लेती। उसका यह सकोच मुझे कुछ-कुछ भाता था, पर किसी क्षण बहुत अजीब-सा लगने लगता। आखिर मुझसे शरम क्या थी? और कंसी शरम? जब मैं उसके पास न होता, तो सुमत और बहनों से वह घिरी रहती । उनके बीच जितने खुलेपन से वह पेश आती, उससे मुझे थोड़ी राहत भी मिलती, पर साथ ही तकलीफ भी होती। इतने दिनो के बीच कई बार ऐसा हुआ कि मैं भीतर कमरे में पहुंचा तो वह बाल बाढ़ रही थी। मेरे पहुंचते ही वह वाल लपेट लेती और साड़ी ठीक करके खड़ी रहती या बैठ जाती। उसके लम्बे भूरे बालों को छूने को मेरा मन तीसरा आदमी/१५ "भैया, ता, पर उसका वह दुराव मुझे अपने में ही सीमित कर देता- ता कि मैंने वाल छुए तो चित्रा घंटों कांपती रहेगी। लेकिन एक दिन पहुंचा तो देखा कि वह बाल काढ़ते-काढ़ते सुमंत से बात कर रही है और सुमंत पलंग की पाटी पर बैठा पैर हिला रहा है। मेरे घुसते ही चित्रा ने हमेशा की तरह अपने बिन-कढ़े बाल लपेट लिए और कंधे में उलझे वालों को लपेटती हुई खिड़की के पास फेंकने के लिए चली गई । उस वक्त मुझे बहुत वुरा-सा लगा था और सुमंत का वहां होना मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया था। सुमंत के चेहरे पर कोई अचकचाहट नहीं थी। उसने बड़ी सरलता से पूछा था, आप तार दे आए?" "हां।" मैंने अपने में घुटते हुए कहा था, क्योंकि उस क्षण में चित्रा को खबर देने ही आया था कि उसकी विदा के लिए मैंने बाबूजी की आज्ञानुसार तार दे दिया है और कल तक उसका भाई विदा कराने के लिए आ जाएगा। यह बात कहकर मैं चित्रा से सचमुच कुछ ऐसा सुनना चाहता था कि जो एक बार मेरे मन को प्यार से भर दे। मैं उसे वांहों में भरकर यह सूचना देते हुए पूछना चाहता था कि क्या सचमुच उसका जाने को मन है ? और उससे सिर्फ एक 'नहीं' सुनना चाहता था-और फिर तमाम अन्य बातें। पर सुमंत ने जिस सहजता से तार वाली बात पूछी थी, उससे मेरा सारा उत्साह ही ठंडा पड़ गया था और यह बात मैं वर्दाश्त नहीं कर पाया था कि उसने मुझसे पहले ही पहुंचकर यह सूचना चित्रा व दे दी है और मुझसे वह बेहद प्यार-भरा और संवेदनशील क्षण छ लिया है, जिसकी तलाश में मैं उस वक्त पहुंचा था। वह क्षण खो चुका था-उस क्षण की संवेदना समाप्त हो थी और अब मेरा कहना कोई मतलव नहीं रखता था। उस अपनत्व-भरे क्षण को खोकर मुझे बहुत पीड़ा हुई थी। और तभी । १६ / तीसरा आदमी वार मुझे सुमत से ईर्ष्या हुई थी कुछ-कुछ नफरत भी। कुछ देर बाद सुमत चाय लाने की बात कहकर चला गया था और मैंने चित्रा से कहना चाहा था कि यह सब मुझे बहुत अच्छा नही लगता, पर अपने छोटेपन के उपर जाने के खयाल से मैं चुप ही रहा था। "तुम्हारे भाई साहब शायद कल शाम या परसों सुबह तक आ जाएं। परसो हो तुम्हारी विदा की तिथि निकली है.." बहुत परे हुए लहजे में मैंने यह सूचना चित्रा को दे दी थी। फिर भी उम्मीद थी कि चित्रा अपनी तरफ से कुछ कहेगी-उलहना-भरी नजरो से मुझे ताकेगी या शायद यही पूछ बैठे कि मैं क्यो उसे इतनी जल्दी भेज देने को तैयार हो गया हूं, पर उसने यह सब नहीं कहा । धीरे से बोली, "भाई साहब तो शायद नहीं आ पाएगे, वे तो अब तक जयपुर लौट गए होगे । ज्यादा छुट्टी नहीं थी उनकी। शायद मामा जी और छोटा भैया आए..." "तो चली जाओगी?" जो बात मैं उससे सुनना चाहता था, वही मैं खुद बोल गया था। "यह तो आप पर है।" चित्रा ने कहा था, "तार तो वे ही भाए पता नहीं क्यों, उस पल मुझे यह भी लगा कि वे सब सवाल जी मैं चिन्ना से पूछने वाला था और उनका जो जवाब मे सुनना चाहता था, वह सब पहले ही चुक गया है और तार देकर मैंने कुछ प्यादती की है--विना और सुमंत के प्रति । और पहली बार उस दिन मुझे अपने और चिना के बीच एक हलकी-सी छाया मंडराती दिखाई दी थी । उसे में सह नहीं पाया था। तब शाम यो। चिता मेरे साथ अकेली थी और तब अपने को बहुत संभालते हुए, मैंने घूम-घुमाकर चिता से यह सवाल पूछा था, "चिता । किमी और को प्यार किया है कभी?" तीसरा आदमी/१७ "आपने किया होगा." वह वैसे ही बोली थी, जिसमें कहीं भी ईर्ष्या, जानने की उत्सुकता और प्रश्न पूछने या उत्तर पाने का वाव नहीं था। मैंने एक बार वहुत गहराई से उसे ताका था तो उसने जैसे हलके मज़ाक में बात दोहराई थी, "बताइए।" तब इस एक शब्द ने मुझे जैसे डूबते से बचा लिया था और मैंने बहुत अपनेपन से कहा था, "तुम्हें तो बहुतों ने चाहा होगा-मेरी वात छोड़ो..." तभी सुमंत आ गया था चाय लेकर । आते ही बोला, "लो भइया, चाय पी लो, बड़ी मुश्किल से तीन प्याले झटककर लाया चित्रा ने चाय बनाकर पहला प्याला मेरी ओर बढ़ा दिया था, तो मुझे अच्छा-सा लगा था। हम तीनों बैठे चाय पीते रहे थे, और तब सुमंत को इतने निकट से देखते हुए मुझे कुछ देर पहले के अपने ओछेपन पर बड़ी ग्लानि हुई थी। चाय पीते हुए सुमंत ने चित्रा से कहा था, "तो भाभी, आप तो परसों चली जाएंगी"उसके दो दिन बाद मैं भी दिल्ली वापस लौट फिर पता नहीं कब मिलना हो..." सुनकर कुछ बोली नहीं थी तो सुमंत ने आगे कहा था, "भैया, आप भाभी को लेकर दिल्ली आइए न । कुछ दिनों का सैर-सपाटा रहेगा-लालकिला, कुतुब तो देखा होगा, भाभी?" चिन्ना ने सिर हिलाकर न कर दिया था । "तब तो आपको ज़रूर आना चाहिए।" वह मुझसे बोला था । मैंने 'हां' कर दी थी, जिसका कोई मतलव नहीं था। . सुनकर चिन्ता तीसरे दिन चित्रा की विदाई हो गई थी और उसके बाद बचे हुए • मेहमान भी चले गए थे। सुमंत भी चला गया था। मामा के घराने में 'अकेला सुमंत ही ऐसा था, जो इधर-उधर रिश्तेदारियों में आता-जाता . - १८/तीसरा आदमी - था, नहीं तो उनके यहा से किसी का आना-जाना नहीं हो पाता । मामा को लकवा मार चुका है और सुमत के बड़े भाई जयत उधर भोपाल में कोई बड़े अफसर हैं, इसलिए उनका आना-अवाना होता नही, और वे प्यादा मिलनसार भी नहीं। लखनऊ से चिता के बड़े प्यार-भरे खत आते रहे । एकाध में यह मूचना भी रहती कि बनारस से बड़ी दीदी या दिल्ली से मुमंत का पत्र भी मिला था."बाकी अपनी बातें रहती। कभी कुछ अजीब-सा भी लगता कि सुमत ने मुझे पन क्यों नहीं लिखा, लेकिन फिर यही सोचकर रह जाता कि दीदी ने भी तो नही लिखा-इसमे ऐसी क्या बात है। घर मे सन्नाटा छाया रहता। कभी-कमार शाम को बाबूजी साट पर लेटे-लेटे मा को उन खतों का मजमून सुनाते, जो उन्होंने सरला की शादी के लिए भेजे होते । जब कोई जवाब आ जाता तो घण्टों उसपर बहस होती। दूर-दूर की रिश्तेदारिया निकाली जाती और घर-घराने की चर्चा होती रहती। बाबूजी ने इसी आसरे पर मेरी शादी की थी कि जो कुछ थोड़ा- बहुत आएगा, उससे सरला की शादी में मदद मिलेगी। शादी में जो सामान वगैरह आया था; मां ने उसे बहुत सहेज कर रख दिया था। खास तौर से ऐसा सामान जो सरला की शादी में काम आ सकता था। चित्रा के आने से घर में एक रौनक-सी आ गई थी। माजो भी काम अधूरा छोड़ती, वह चिना के ऊपर छोड़ दिया जाता कि वह आकर कर लेगी, या वही इसकी देखभाल करेगी। कभी-कभी वायूजी कह भी देते, "नरेश को मा, चित्रा इतनी पढ़ी- लिखी है, उसका मन तुम्हारे इन कामों में नहीं लगेगा." "वो ऐसी लड़की नहीं है। पढ़ी-लिखी चाहे जितनी हो, पर घर के तीसरा आदमी/१६ - . म सब लड़कियां करती हैं "समझे !" मां कहतीं। उन्हीं दिनों सुमंत का एक खत आया था, वावूजी के नाम । उसने रला के लिए कोई खाता-कमाता लड़का सुझाया था। यह भी लिखा था कि अगर चाहें तो आकर देख जाएं, और लड़का पसन्द आए तो तय भी कर लें। दिल्ली जाने की बात पक्की हो गई थी और मैं भी तैयार हो गया था, क्योंकि अपनी तरक्की के मामले में मैं कई बार डायरेक्टरेट को लिख चुका था, पर कोई सुनवाई नहीं हुई थी। शादी के बाद से इलाहाबाद मुझे छोटा शहर लगने लगा था। कभी सोचता कि चित्रा को लेकर कहां जाऊंगा? कोई जगह ही नजर नहीं आती थी। ले-दे के सिविल लाइंस थी, वहां भी कोई ऐसी जगह नहीं थी, जहां निश्चित होकर घूमा जा सके "या अगर घूमें तो किसीकी नजर न पड़े । लेकिन वहां तो नज़रें ही नज़रें थीं और उनसे बच निकलने का कोई रास्ता नहीं था। वहां बीवियों को लेकर घूमने का रिवाज भी नहीं था। वह उस शहर के मिज़ाज के खिलाफ बात थी। उन्हीं दिनों चित्रा का एक पन आया था, तो मैंने उसे कई बार पढ़ा था । उसने पहली बार अपने घर में उकताहट महसूस की थी और लिखा था-"यहां अब दिल बिलकुल नहीं लगता। पढ़ाई भी अब खत्म होने को आ रही है। मार्च में परीक्षाएं हो जाएंगी। उसके बाद लम्बे-लम्बे दिन होंगे-उदासी से भरे हुए । तब क्या करूंगी ! घर वाले अभी भेजने को भी तैयार नहीं हैं । कोई ऐसा रास्ता नहीं हो सकता कि आ किसी तरह अगस्त से पहले मुझे बुलवा लें ? सच मानिए, अब दिल न लगता । रेडियो पर जब आपकी आवाज़ सुनती हूं तो मन और भी म लाने लगता है। कभी आपने सोचा है कि कोई एक आपकी आव सुनने के लिए कितना व्याकुल रहता है ? रेडियो पर तो आपकी आ 'और भी अच्छी हो जाती है। कितनी गहराई आ जाती है उस - आपको तो कभी मेरी याद भी नहीं आती होगी। वहा साय में इतनी लड़किया जो है"मला क्यों याद आएगी मेरी ?"आपका तबादला यहां लखनऊ भी तो हो सकता है । देखिए, कुछ और मत समशिएगा, यह तो मैंने यो हो लिख दिया है। मुमत का खत आया था। वे दिल्ली को रौनक से घबराए हुए हैं |-आप बीबीजी के सिलसिले में कव दिल्ली जा रहे हैं ? क्या यह सम्भव नहीं कि मैं दो-चार दिनों के लिए आपके साथ दिल्ली जा सकू ? आपके साथ होने का सौभाग्य न जाने कब मिलेगा." खत को कई बार पढ़ा था और मन में आया था कि लखनऊ से चिन्ना को लेता हुआ दिल्ली निकल जाऊं। लेकिन सम्भव नहीं था। बाबूजी से मैं यह कह नहीं सकता था, और फिर खर्चे की बात भी थी। विना को साथ ले जाने का मतलब था-सौ रुपया और । फिर ठहरने-ठहराने की दिक्कत भी उठती । हम लोगों का क्या था । सुमत के पास भी ठहर सकते थे और स्टेशन पर रिटायरिंग रूम में भी। चिना को ले जाना मुमकिन नहीं था, इसलिए बहुत संभालकर मैंने उसे पत्र लिख दिया था और यह भी कि वह मन लगाकर पहले परीक्षाएं दे ले, उसके बाद कोई लम्बा-सा घूमने का प्रोग्राम बनाया जाएगा। और अपनी रो मे, बिना किसी सिर-पर के मैंने यह लिख दिया था कि बहुत मुमकिन है, मेरा तबादला दिल्ली ही हो जाए, क्योकि यहां इलाहाबाद मे प्रमोशन का कोई मौका नही है । मुझे प्रमोशन मिलने वाला है और तब मेरा तबादला भी कहीं न वाही होगा । अफवाह यही है कि मुझे दिल्ली भेजा जाएगा। अच्छे एना- उंसर को फौरन दिल्ली बुला लिया जाता है-वहां तो मैं जल्दी ही न्यूज़ रीडर भी बन सकता हूं। यहां भी तो कभी-कभी प्रादेशिक समाचार पढने पड़ जाते हैं । जब-जब मैंने प्रादेशिक समाचार पढे हैं, ड्यूटी आफी- सर ने 'ए' दिया है। अगले दिन की मीटिंग में भी हमेशा तारीफ हुई है। सभी साथी यही कहते हैं कि मुझे दिल्ली जरूर जाना चाहिए। अगर तबादला न भी हो, तो भी मुझे कोशिश करके दिल्ली पहुंचना चाहिए।

पहुंचने पर और तमाम रास्ते खुल जाएंगे। अगर न्यूज़ रीडर वाले लेक्शन में किसी वक्त आ गया तो देवकीनन्दन पाण्डे जैसी शोहरत ते देर नहीं लगेगी." और सचमुच मैं उन दिनों इसी तरह के सपने देखा करता था। लगता था कि बेहतर दुनिया के दरवाजे मेरा इंतज़ार कर रहे हैं जिन्हें मुझे खोलना है और वे दरवाजे दिल्ली में ही हैं। इलाहाबाद में अव कुछ और होता दिखाई नहीं पड़ता था। वहां की एकरसता भी खलने लगी थी। वही छोटा-सा रेडियो स्टेशन और लम्बी-दूर तक जाती हुई थानहिल रोड... रेडियो स्टेशन के बाहर शीशम के पेड़ों तले बनी हुई एकाध दुकानें, जहां से कभी-कभार एकाध सिगरेट ले ली या गर्मी के कारण किसी खुले हुए पंक्चर को फिर बनवा लिया। या फिर लकड़ी की वेंचों पर बैठकर किसी दोस्त के साथ चाय पी ली। शादी के बाद से तो मैं और भी अकेला महसूस करने लगा था। लगता था जैसे दुनिया ही बदल गई है। दोस्तों का रवैया वदल गया था। उन्हें लगता था कि मैं उनके साथ-लायक नहीं रह गया हूं। पता नहीं क्यों, वरावर यही लगता था कि अब चित्रा को लेकर इलाहाबाद में रहना नहीं हो पाएगा। अगर हुआ भी तो हम वहां घुट-घुटकर ही रहेंगे और आठ-दस बच्चों के बाप बनकर एक दिन श्मशान चले जाएंगे। रेडियो स्टेशन पर भी मन नहीं लगता था। रेडियो एक सुहावना ढोल था, जिसे दूर से सुनकर सव खुश होते थे, पर उसके भीतर जो पोलें थीं, वे हम लोग ही जानते थे। मेरी नौकरी ऊपर से चाहे जैसी लगत हो, पर मैं वहां एक दिन के लिए भी सुरक्षित महसूस नहीं करता था हम स्टाफ आर्टिस्टों की बड़ी पतली हालत रहती है । हर बेइज्ज हमें सहनी पड़ती थी और ज़रा-जरा-सी बातों पर नीचा देखना पर २२/तीसरा आदमी था । इसके बावजूद नौकरी का कोई ठिकाना नही था." चित्रा और उसके घरवाले बडे गर्व का अनुभव करते थे कि मैं रेडियो में हूं, पर भीतरी हालत में ही जानता था । रेडियो ने समी को इतना निकम्मा कर दिया था कि कोई भी कही और काम लायक नहीं रहा था । वहां रहते-रहते मेरे भीतर का इनसान भी मरता जा रहा था और उसके साय-साय मैं चुकता जा रहा था । तनख्वाह भी कोई अच्छी नहीं थी। पर इलाहाबाद से सस्ते शहर में उतनी तनख्वाह से गुजारे की बात सोची जा सकती थी। दिल्ली जाते मुझे यही डर लगता था कि इतने कम पैसो में वहा गुजारा कैसे होगा? फिर भी एक सपना या आखों में-शायद वह पूरा हो जाए और मेरी किस्मत का सितारा चमक जाये । और कुछ न भी हुआ तो कम से कम वहा चित्रा तो कुछ काम कर ही सकती थी। उसने इतना जो पढ़ा-लिखा था, उसका कुछ फायदा तो उठाया ही जा सकता था।

सुमंत का दूसरा खत आते ही मैं और बाबूजी चल पड़े थे। वहां दोनों ही काम हो गए थे । लड़का भी तय हो गया था और मेरे तबादले की वात भी पक्की हो गई थी। बावूजी ने काफी आनाकानी के बाद मेरा दिल्ली जाना मंजूर कर लिया था, इस शर्त के साथ कि अभी चित्रा उन लोगों के पास वहीं इलाहाबाद में रहेगो, ताकि वह घर में रस- बस जाए। लेकिन मैं जानता था कि यह होगा नहीं। चित्रा वहां अकेले रहना पसंद नहीं करेगी। पांचवां महीना समाप्त होते-होते सरला की शादी हुई। सरला के पति की नौकरी अहमदाबाद में लग गई थी और शादी होते ही वह अपने पति के पास रहने चली गई थी। सरला की शादी के बाद घर की हालत बहुत नाजुक हो गई थी। रिटायर हो चुकने के बावजूद वावूजी को मजबूरन नौकरी खोजनी पड़ी थी, और इसमें मदद मिली थी सुमंत के बड़े ई जयंत से। उन्होंने भोपाल में किसी ठेकेदार के पास ढाई सौ रुपये हवार पर उन्हें लगवा दिया था और इस तरह हमारा आधा घर खड़कर इलाहावाद से भोपाल चला गया था। और कोई चारा भी नहीं मुझे कुल दो सौ मिलते थे, उसमें पूरे घर का गुजारा नहीं हो पाता था। उसके बाद मैंने फिर दौड़-भाग करके अपना तबादला दिल्ली करा ही लिया था। इलाहावाद छूट गया था। शुरू-शुरू में आकर मैं सुमंत के पास ही ठहरा था। और के ठिकाना नहीं था। सुमंत कुतुब रोड पर आराम नगर के एक निहार गंदे कमरे में रहता था। सीलन-भरा वह कमरा पसीजता रहता उन दिनों वह किसी प्रेस से निकलनेवाली एक निहायत सस्ती पत्रिका में काम करता था और जैसे-तैसे अपना खर्चा चलाता था २४ / तीसरा आदमी

Tesra Admi

Author
Kamlishwar
Title
Tesra Admi
File name
Tesra Admi
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Art
DLI number
552165
Barcode
4990010032885.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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