Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Swetamber-digamber Bhag I,ii
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नं०
श्रीचारित्रस्मार
मिलाया जाना
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बरसंदिगम्वर।
((स
११-२०
(स.मात्रय
कर्ता-
मुनि दर्शनविजय.
प्रकाशक:--
शा...मफतलाल .माणेकचंद.
1
८
घी० सं० २४६९.
मूल्यं
.
क०चा० सं० २५
यी० सं० १९४३..
वि० सं०.२०००
HOM
मुद्रक :-
A: भाग १ ला
राजमलजी लोढा
भारत प्रीन्टींग प्रेस. अजमेर
प्राप्ति-स्थान.
१ शा. मफतलाल माणेकचंद,
पत्ता-बोरडी वजार,
मु० वीरमगाम. (गुजरात)
२ पं. कांतिलाल दीपचंद देशाई.
पत्ता-पटेलका माढ, मादलपुरा
पो. एलीसनीज,
मु. अमदावाद. (गुजरात)
B भाग २ रा
हीरालाल देवचंद शाह.
शारदा मुद्रणालय, सेन्ट्रल टॉकीझ
के पांस, पानकोर नाका-अमदावाद.
punit..
.....
इस ग्रन्थके पूर्व ग्राहक
नाम
स्थान
प्रति
१००) श्रीमती पोपटवहिन मारफत श्रीमान्
शाह सदुभाई तलकचंद.
२५) सेठ हमीरमलजी गोलेच्छा द्वारा, जैन संघ, जयपुर ।
१३) श्रीमती सेठाणी सकरुलाई द्वारा, श्राविकासंघ, जयपुर ।
अहमदावाद।
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....
प्राक् कथन विक्रम सं. १९९५ के वैशाख-ज्येष्ठ महिनेमें हम देहली में अवस्थित थे। उस समय एक रोज एक बन्द लिफाफा मेरे पर आया। उसमें एक पत्र था, जिसे स्थानकमार्गी सम्प्रदायके माननीय प्र०व० पं० चौथमलजीस्वामी के साथवाले मुनि सुखमुनिजीने भेजवाया था। वह पत्र निम्न प्रकार है- "बडौत (मेरठ) ता. ३-६-३८ इ. "श्रीमान् दर्शनविजयजी महाराज ! "सादर वन्दन । "निवेदन है कि ++ ++ + उस 'कल्पित कथा समीक्षा' नामक पुस्तक में जैनागमों के विरुद्ध जो जो बातें लिखी गई हैं उनका प्रत्युत्तर क्या आपने दिया है ! यदि नहीं तो क्यों ? क्या उन बातों का प्रत्युत्तर देनेका साहस नहीं है ? यदि है, तो कमर कस कर तैयार हो जाइयेगा। और आगमविरुद्ध तथा श्वेताम्बर समाज के विरुद्ध जो जो बातें उन्होंने लिखीं हैं उनका मुंहतोड उत्तर अवश्य दीजिएगा। तभी पंडिताई सार्थक होगी। ऐसा महाराज श्री सुखमुनिजीने फरमाया है। पत्रोत्तर नीचे के पते पर दीजिएगा। "लाला न्यायतसिंहजी मोतीराम जैन. मंडी आनंदगंज बडौत (मेरठ) + + ++ + भवदीय, दीपचन्द सुराना" उन मुनिओंकी इच्छा थी कि मैं कुछ लिखें । अतः मैनें, कुछ लिखु उसके पहिले, दिगम्बरीय शास्त्रोंका विशेष अध्ययन किया। और इस विशेष अध्ययनके फल स्वरुप, खण्डनमण्डन के रूपमें नहीं किन्तु पारस्प- , tarikar aer : AN * . काय FarweANtri iry tiny it .. की १५. ftonly aff 2. सुधार air trit statin tink पर अनुचित निम्बा माया ian vum directititi| fi.i), ५.", .., .
५९ ५९ श्वेताम्बर-दिगम्बर भाग पहिला की अनुक्रमणिका नाम अधिकार मुनि-आचार विश्वव्यापि धर्म १ स्कंदक सत्कार आजीवक से उत्पत्ति ૨ गणधर-घोडा कुछकुछ प्रमाण गोचरी-भ्रमण मुनि-उपधि अजैन से आहार परिग्रहण लक्षण (भ० शीतलनाथ) नग्नता शूद्रसे गौचरी (वैवल-निपीटक शूद्रका पानी निर्गन्ध खडे खडे थाहार अचेल परिपह (पकासन-आदि) जिनकल्प १७ प्रत्याख्यान आव० उपधि त्याग एक दफे आहार मोरपीच्छ यादि ૨૨ (तप-परिभाषा) पांच जातिके वस्त्र २३ मांस (अष्ट मूल गुण) सीर्फ नग्नता ही... यादव-मांस जितेन्द्रियता (मयपीच्छ-चर्चा) आचेलक्य-कल्प रात का पानी सामायिक में वस्त्र काम भोग (अतिथि संविभाग) गुणस्थानमें पत्र ३३ कृत्रिम जिनवाणी केवलशान वस्त्र' (विष्णुकुमार मुनि) उपधिके दि० पाठ (धर्मद्वेपी को दंड) ऊन-पोछे ४४. धर्मलाभ-धर्मवृद्धि मोक्ष-योग्य (रात्रिभोजन आदि) गृहस्थ (मरतचक्रवती-पाठ) उपधि-उपाधि (भावलिंग-प्रधानता) उपधि से लाम आभूषण द्रव्यलिंगके खिलाफ (पाण्डव-साभरण) ६० ६२ उत्सर्ग अपवाद -" C. ७३, पात्र ४४ ७४ ७९ ९० वेदोंका गुणस्थान १०४ शूद्र स्त्रीके संहनन १०६ गोत्र-व्यवस्था स्त्री की आगति १०७ गोत्र परिवर्तन ८२ स्त्रीको अप्राप्य ૧૦૮ गोत्रके दि० पाठ ८३ स्त्री आचार्य, अवला ११० (जाति कल्पना) स्त्रीकी उत्कृष्ट गति १११ शुद्र-जिन पूजा (गति-आगति) शूद्र दीक्षा-मुक्ति प्रमाण (अध्यवसाय वैचित्र्य) फिर मना क्यों! ९६ स्त्री विज्ञान ११६ बाहुवली-अनार्य ९७ स्त्री-जिनपूजा आर्य भूमि में म्लेच्छ ९७ स्त्री मुनिंदीक्षा स्त्री मुक्ति ९८ स्त्री दीक्षा योग्यता १२१ स्त्री की त्रुटियां ९८ (४ अनुयोग-पाठ) '९९ (अनुसंधान-पाठ) (प्रस्ता०१२) अभेदता १०० फिर मना क्यों! १३५ '. द्रव्य-वेद (नो कर्म) १०० जैन-विशालता १३५ वेदों का परावर्तन १०२ नपुंसक-मुक्ति १३६ समाप्त. स्त्री के दूपण प्रश्नका उत्थान श्वेताम्बर-दिगम्बर भाग दूसरे की अनुक्रमणिका केवली अधिकार नो कर्म-आहार (छै आहार) ११ कवलाहार १२ उदय प्रकृति १२२. ज्ञानावरणीय-भूख १२ केवली कर्मप्रकृति ३ १३. (कर्म शक्ति) (असंक्रमण) मोहनीय -भूख वेदनीय कर्म प्रमाद-भूख १३ (ग्यारह परिषह) आहारक अठारह दूषण (निरीह भाव-प्रवृत्ति) पसीना- ૨ दर्शनावरणीय-भूख अंतराय-भूख वेदनीय-भूख ४६ द्रव्यमन प्रमाण उपचार-ताकात सिद्ध अवगाहना सताना फिर मना क्यों। संक्रमण अतिशय आहार-कारण जन्म से १० चार आहार (निद्दार, दाढी मुछ) (४० योगधारण) केवल से १० (उपवासमें पानी) (जिन-केवली, मेद) आहार के दि० प्रमाण १८ भूमि विद्दार रोग, निहार २४ बैठना औदारिक-शरीर गगन गमन सात धातुएं-पाठ २६ (कमल संख्या) (धननयमनाराच) भूविहार दि० प्रमाण अग्निसंस्कार कवलाहार-प्रमाण तीर्थ-दादाएं ३० देवकृत १४ (बाठ प्रातिदाय) विनय (विषमता-पत्यय) (प्रदक्षिणा, आहारदान, गमन, चोतील अतिशय सर्पनिवेदन, बहन, नृत्य) (वैवल-प्रमाण) नाच (कपील०) ३२ अनासक्ति (कूर्मापुत्र) तीर्थकर मूद्रा-आसन ३३ नाभिराजा-रानी निष-रंग आदि) (युगलिक व्यवस्था) ३५ ऋषभदेव-पत्नी भूमि-विहार (१०० पुत्र २ पुत्री) (स्पर्प-वन) भरतसुन्दरी चाणी-उपदेश मातापिता निहार (निरक्षरी, गणधर, मागधदेव, स्वप्न अतिशय, दशम द्वार, प्रश्नो.. (जिनेन्द्र यागति) तर, अपौरुषेय, साग) (नीन फल्याणक) साक्षरीवाणीममाण (स्वप्न फल) उपसर्ग वध केचली बस ६० ४० ऋपमदेव पुत्र ८ वार्षिक दान १०७ दीवाली-तिथि २०-स्थानक कल्याणक-३, २ (२७० तीर्थकर) आश्चर्य - ६९ ७१ ي पभदेव-वैराग्य ऋपभदेव-भोजन देवदप्य- ऋषभदेव लोच अनार्य विहार नग्नता मारदेया-मुक्ति ६७ (धनुप, गजासन) कुमार-तिथंकर ६५ (पुराणो का मतभेद) व्याह के दि० पाठ स्त्री तीर्थकरी मुनि सुबत-गणघर ७ (मल्लीनाथ-वर्ण) (नेमि दीक्षाकाल) वीर-२७ भव. ग़पिहार ७६ वीर-अभिग्रह ઉદ मेरु-कंपन. वीर लेखशाला चीर-विवाह (जमाली-निन्हव) देवंदुष्य-दान ७९ वीर छींक ७२ वीर-उपसर्ग ८० (आगमशली, प्राणीवाचक वन- स्पति, प्राणीजैसेनाम,वीरथहिला रेवती परिचय, रोग स्वरूप,मूल पाठ; कपोत-मज्जार-कुक्कुड- मंसए के अर्थ) वीर निर्वाण वर्ष ट १ ओर स्थानम जन्म २. पुत्री की प्राप्ति ३. अवधि प्रकाशन १२० ४. जिन-उपसर्ग ५ ओर स्थान में मोक्ष ६ चकी-मानभंग २१२ ७ वासुदेव-मृत्यु ८ शलाका ५९ ९.नारद रुद्र १०: कल्कि-उपकल्कि विच्छेद (मा० कुंदकुंद) ब्राह्मण कुल वडी-आयू (भद्र० चंद्र) (या०धरसेन) १ अट्ठसयसिद्ध २ असंयत पूजा १२२ ३ हरिवंश ४ स्त्री तीर्थ १२८ ५ सपरकंकागमन १२८ ६ गर्भापहार (गर्भ विज्ञान) १२८ ७ चमरोत्पात २३४ ८ अभाविता पदिपद् ९ उपसर्ग : १३७ १० सूर्य-चंद्रावतरण १३७ ::: (मृगावती) . ७८ १२० १०७ लोक प्रकाश " सार ... आधार-ग्रन्थ जैन ग्रंथ कर्मग्रन्थ चर्चा सागर भाचारांग प्रयंघ चिंतामणि चर्चा० समीक्षा सकतांग छेदपीडम् ठाणांग तपगच्छ पट्टावली.. छेदशास्त्र भगवतीसूत्र हीमवंत स्थवीरावली जैनसिद्धांत संग्रह उपासकदाग काल सबंधी विचारणां जैनधर्मको उदारता उवयाई सत्र सम्राट खारवेल-लेख जैनाचार्योके शासनमेद जीवामिगम अखबार जंवचरित्रं पनवणा तत्वार्थाधिगम अनुयोगद्वार जैन धर्म प्रकाश सर्वार्थसिद्धि पयन्नय जैन सत्य प्रकाश " राजवातिक मावश्यक नियुक्ति , लोकवार्तिक विशेषावश्यक भाष्य दिगम्बर-ग्रन्थ उत्तराध्ययन अंगपन्नत्ति धुतसागरी दशवकालिक अनगार धर्मामृत " भापा-टीका पृहद् कल्प भाप्य आदिपुराण : तिलोयपन्नति आराधना (मूल) तिलोय सार- भाय-टीका विजयोदया त्रिवर्णाचार-३ " मापा- उत्तरपुराण दर्शन सार- ललित विस्तरा कथाकोप दशभक्त्यादि गृहद कथाकोष दि० पहावली पृहक्षेत्रसमास पुण्याश्रय कथाकोप देवशास्त्र गुरुपूजा याराधना कथाकोप द्रव्यसंग्रह फल्याण मन्दिर कल्याण आराधना धर्म परीक्षा मकामर फार्तिकेयानुपेक्षा नंदीश्वर भक्ति प्रययन सारोद्धार निपष्ठी चरित्र कुंदकुंद चरित्र नंदीध्यर० पूजा निर्वाण कांड परिशिए-प फेलिमुक्ति प्रकरण निर्वाण भक्ति नीतिसार गौतम चरित्र नीति घाफ्यामृत " राजेन्द्र चारित्रमार तत्वार्थ सूत्र. पड्दर्शन समु० पंच पस्तु: पुंदकुंद गुटका योग शान अमिधान चिंतामणि गोम्मट सार प्रवचन सार १० सिद्धांतसार प्रदीप सुअखंधो सुदर्शन चरित्र सूर्य प्रकाश सोमा रानी चरित्र स्त्री मुक्ति प्रकरण स्त्रीमुक्ति (हींदी) स्वामी समन्तभद्र पद्म चरित्र स्वयंभू स्तोत्र प्रवचन चरणानुयोग विरंचीपुर सं० -चूलिका श्रवणवेलगोल संक प्रवचन सारोद्धार श्रावकाचार पंचास्तिकाय रत्नकरंड परमात्म प्रकाश धर्मसंग्रह प्रश्नोत्तर पद्मपुराण समीक्षा आशाधरीय पार्श्वपुराण मेधाविकृत पुरुपार्थ सिद्धि सकलकीतिक प्रायश्चित चूलिका अमृतचंद्र संग्रह श्रुतसागरी टीकाएं. वनारसो विलास धुतावतार बाईश परिपह शुद्र मुक्ति ब्राह्मणोकी उत्पत्ति पट खंडागम धवला भ्रम निवारण जयघवला भाव संग्रह महाधवल मनोमतिः खंडन पट् प्राभूत महापुराण दर्शन महावीर और वुद्ध चारित्र मुनिवंशाभ्युदय लींग योध प्रकाशक मोक्ष भद्रबाहु संहिता हरिवंश पुराण हरिवंश घत्ताबंध हरिवंश वनिका ज्ञानार्णव दि० अखबार अनेकान्त खंडेलवाल हितेच्छु जीनविजय (कनडी) जैन गजट जैन जगत् सेन दर्शन जैन मित्र जैनसिद्धांत भास्कर वीर बौद्ध-ग्रंथ भाव सूत्र समयसार (प्राभृत) समयसार प्रस्तावना सत्यसमीक्षा सम्यक्त्व कौमुदी समाधि तंत्र भक्ति धर्मामृत अवदान कल्प लता दिव्यादान ममिम निकाय महा सञ्चक महा सीहनाद महा सुकुलदायी
शब्द चिंतामणि
हादसागर
शव्द सिन्धु
सरकार
बिमीन-प पैयक शन्दसिंधु मत्स्य पुराण .
येवल
মিশন মা
जीव-विज्ञान
समान नियष्ट
कल्पित कधासमीक्षा
मोडनरीब्यु
दस्तोम महानिधि पपिप्राफिका इन्डिका
पर निगंट
कामोशद फोर
शालिग्राम निघंटु
पन् साईपलोपीडिया
निदरनार
पापिनीय
ओफ रीलीजियन
भागयत
HTER निट्ट .
पन्ड एधिक्स वो०
गीताजी
१ पृ०२५९
१० सिद्धांतसार प्रदीप सुअखंधो सुदर्शन चरित्र पद्म चरित्र सूर्य प्रकाश सोमा रानी चरित्र स्त्री मुक्ति प्रकरण स्त्रीमुक्ति (हींदी) स्वामी समन्तभद्र स्वयंभू स्तोत्र हरिवंश पुराण शुद्र मुक्ति पट् खंडागम प्रवचन चरणानुयोग बिरंचीपुर सं० -चूलिका श्रवणवेलगोल सं० प्रवचन सारोद्धार श्रावकाचार पंचास्तिकाय रत्नकांड परमात्म प्रकाश धर्मसंग्रह प्रश्नोत्तर पद्मपुराण समीक्षा आशाघरीय पाइपुराण मेधाविकृत पुरुषार्थ सिद्धि सकलकीर्ति प्रायश्चित चूलिका अमृतचंद्र संग्रह श्रुतसागरी टीकाएं बनारसी विलाल श्रुतावतार वाईश परियह ब्राह्मणोकी उत्पत्ति भद्रबाहु संहिता धवला, भ्रम निवारण जयघचला भाव संग्रह महाधवल मनोमति खंडन पट् प्रामृत महा पुराण दर्शन महावीर और बुद्ध चारित्र मुनिवंशाभ्युदय लींग मूलाचार योध मोक्षमार्ग प्रकाशक. मोक्ष यशस्तिलक भाव रत्नमाला सूत्र राजावली समयसार (प्राभृत) समयसार प्रस्तावना लाटी संहिता सत्यसमीक्षा वरांग चरित्र सम्यक्त्व कौमुदी समाधि तंत्र विद्वद् जन चोधक समाधि भक्ति शिलालेख संग्रह सागार धर्मामृत हरिवंश घत्ताबंध हरिवंशवचनिको झानार्णव दि० अखबार अनेकान्त खंडेलवाल हितेच्छु जीनविजय (कनडी) . जैन गजट जैन जगत् जैन दर्शन जैन मित्र जैनसिद्धांत भास्कर वीर बौद्ध-ग्रंथ .. लब्धि सार वर्षमान पुराण अवदान. कल्प. लता दिन्यादान मस्मिम निकाय महा सञ्चक महा सीहनाद महा सुकुलदायी
१
यामि
मरम्प पुगत
शिमीम-प्रय
समिधान र
भविमान नियन्द्र
এ মিলি
राष्ट्र मिशु
वापर मिमंद
जोग-विमान
पाशिम कपासमोसा
मोटनगन्य
मनोम महानिधि पवित्राफिक निता
शानिप्रामनिट्र
पन् माईफलीपीरिया
पापिनीय
मार
* যা যা
गीगासी
जामोद दोष
मानिदि
१२ भाग १ पृष्ट १३४ के अनुसन्धानमें स्त्रीदीक्षा-मुक्ति के पाठ. पमत्तस्स उकरसंतरं उच्चदे ।+++तिण्णिअंतो मुहुत्तम्भहिय अवस्से शृण अदालीस ४८ पुचकोडिओ पमत्तुक्कस्स अंतर होदि । (पृ० ५२) अपमत्तस्स उकारसंतरं उच्चदे । तीहिअंतो मुहुत्तेहिं अभहिय अष्टवस्सेहिं उणाओ अदालीस पुत्र कोडिओ उक्कस्स अंतरं । पनत्त मणुसिणीसु एवं चेव । णवरि पज्जत्तेसु चउवीस पुञ्चकोडिओ, मणुसिणीमु अट्ट पुञ्चकोडिओत्ति वत्तव्वं (पृ० ५३) इत्थी वेदेसु पमत्तस्स उच्चदे । अवस्सेहिं तीहिं अंतो मुहुत्तेहिं ऊणिया त्थीवेदष्ठिदी लदमुक्कस्संतरं । . एवमपमत्तस्स वि उकस्संतरं भाणिदव्वं, विसेसा भावा (पृ०. ९६) (छक्खंडागने जीवाणं-अंतराणुगगे अंतरपरुवणं पु० ५वा ) वेदाणुवादेण इस्थि वेदएसु दोमु वि अद्धासु (अपूञ्च-अणिवट्टिकरणेसु) उवसमा पवेसेण तुल्ला थोवा (१० हॉनेसे) ।। सूत्र-१४४॥ (पृ० ३००) खवा संखेजगुणा (२० होनेसे) सूत्र-१४५।। अप्पमत्त संजदा अक्खवा अणुवसमा संखेजगुणा ॥१४६|| पमत्तसजदा संखेजगुणा ॥१४७|| संजदा संजदा असंखेजगुणा ।।१४८॥ . पमत्त अपमत्त संजदट्ठाणे सवथोवा खइय सम्मादिछी ॥१५६॥ (पृ०३०३) उवसम सम्मादिछी संखेजगुणा ।। १५७ ॥ वेदग सम्मादिट्ठी संखेजगुणा ॥ १५८ ॥ एवं दोसु अद्धासु ॥ १५९।। इसीप्रकार अपूर्व करण और अनिवृत्तिकरण, इन दोनों गुणस्थानोमें स्त्री-वेदिओं का अल्प बहुत्व है ॥ १५९ ॥ (पृ० ३०३) सव्व थोवा उवसमा ॥१६०॥ (प्रवेशसे नहीं, संचयसे)(पृ० ३०४) खवा संखेजगुणा ॥१६॥ (षड खंडागम-जीवस्थान-अल्पवहुत्वानुगम-स्त्रीवेदी अल्पवहुत्व प्ररूपणा- धवला टीका मुद्रित पुस्तक पांचवा)
ॐ अहं॥
श्वेताम्बर दिगम्बर
.
धृत्वा सन्मतिं चारित्रं, स्याद्वादं हृदि सादरं ।
श्वेताम्बर दिगम्बर-समन्वयो निगद्यते ।।...
नाम अधिकार ...........
जैन यह त्रिकालाबाधित सत्य है कि-जिसमें सन्मति सद्
रूप और सत् तत्व के प्रणेता भगवान् सन्मति वगैरह देव हैं सम्यक
दर्शन सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चारित्र युक्त पूज्य श्री चारित्र
विजयजी वगैरह गुरुवर है तथा नय निक्षेप सप्तभंगी और प्रमाणों
से सापेक्ष स्याद्वाद झान आगम है, वही धर्म विश्वव्यापी होने के
।
लायक है।
दिगम्बर--ऐसा तो सिर्फ दिगम्बर जैन धर्म ही है। -
जैन-महानुर्भाव ? जैन धर्म तो इन लक्षण से युक्त हैं ही !
फिन्तु मापने दिगम्बर का विशेषण लगाकर उसको एकान्तवाद.
में जकड़ लिया है एवं येकार बना दिया है । वास्तव में भिन्न मित्र
नयो की अपेक्षा से भिन्न २ दर्शन बने हैं। वैसे एकान्त मताग्रह,
से दिग़म्बर वगैरह संप्रदाय बने हैं। एकान्तिक संप्रदाय कतई
विश्वव्यापी धर्म नहीं हो सकता है
दिगम्बर:-जैन धर्म में श्वेताम्यर और दिगम्बर ये दो प्रधान
शाखायें हैं। मानता हूं कि श्वेताम्बरधर्म भूठा है दिगम्बर सच्चा है।
।
.
1.
[२] श्रतएव दिगम्बर विश्वव्यापी होने के लायक है। जैन कसोटी के कस विना मनमानी गति से किसी को सच्चा या झूठा कहदेना यह केवल शान की अराजकता है। श्वे. ताम्बर और दिगम्बर के वास्तविक सत्यों का एकीकरण करने से ही शुद्ध जैन धर्म का स्वरूप मालम होता है। और ऐसी अंनकान्त दृष्टि वाला जैनधर्म ही विश्वव्यापी चनन के योग्य है। दिगम्बर--क्या दिगम्बर मान्यतायें है, वे कल्पना मात्र ही है ? श्राप स प्रमाण खुलासा करें। जैन- "महानुभाव ? क्रमशः प्रश्न करो! पूज्य गुरुदेव की कृपा से मैं उत्तर देता.१ श्रापको स्वयं निर्णय हो जायगा कि जो जो मान्यताएं प्रचलित है वे एकान्तिक है ? जिनवाणी से विरुद्ध है ? तर्क शुन्य है ? पराश्रित है ? अपने २ शास्त्र से भी विरुद्ध है ? कि ठीक है? दिगम्बर-यदि ऐसा है तो श्वेताम्बर दिगम्बर को एक बनाने की जो कोशिश होरही है उसमें बड़ी सफलता मिलेगी। अस्तु । पहले तो यह तय हो जाना चाहिये कि श्वेताम्बर और दिगम्बर ये वास्तव में एक है कि भिन्न है! : जैन- दोनों सम्प्रदायों की जड तो एक ही है । परन्तु दोनों में शुरू से ही साक्षेप.भेद हैं । जो इस प्रकार है। भगवान महावीर के श्रंमणसंघ में और दो मुनि संघ श्राकर सम्मिलित हुए थे। १. भगवान पार्श्वनाथ का मुनि संघ, जो चातुर्याम याने चार महावत वाला था। विविध रंग वाले वस्त्रों का धारक था। इस संघ के प्राचार्य केशीकुमार थे जिन्होंने गणधर इन्द्रभूति गौतम- स्वामीसे परामर्श करके भगवान महावीर स्वामी के सघं में प्रवेश ? - -किया। श्री उत्तराध्यान सूत्र में इस मुनि संघ का विचारभेद पाया है। और बौद्ध त्रिपटकों में भी इस सघं का 'चाउजामो धम्मो इत्यादि शब्दों से उल्लेख मिलता है। इस संघ की मुनि परम्परा. श्राज भी उपकेश गच्छ कवलागच्छ इत्यादि नामों में प्रख्यात है। २. मंखलीपुत्र गौशाल. का मुनि संघ, यह भगवान महावीर के छदमस्थ अवस्था के एक शिष्य का संघ है जो प्रधानतया नग्न ही रहा करता था, इसका प्राचार्य लोहार्य या अन्य कोई था जिन्होंने अपने गुरु की अन्तिम श्राक्षा को शिरोधार्य बनाकर अपने गुरुके भी गुरु भगवान महावीर स्वामी के संघ में प्रवेश किया। : श्री सूत्र कृतांग और भगवती सूत्र में इस मुनि संघ का विस्तृत वर्णन मिलता है। दिन्यादान (४२, १४३) भवदान कल्वलता (पल्लष 1७110) मझिम निकाय के चूलसागरोपम सुत्त ।।३।१० सन्दक'२।। (पृष्ट ३०१,३०४) महासुकुलदायी सुतंत २।३।1महासचक 1101 (ट.१४४ १ महासीहनाद १२।३।३ ( पत्र.४८) गैरह बोद शास्त्रो में भी इस मत के विभिन्न उल्लेख है। पनसाइकलों पीडिया' गोफ लिजियन एन्ड एथिक्स वॉल्यूग १ पृ० २५में बड़े लेन द्वारा इस मुनि संघ पर 'अच्छा प्रकाश डाला गया है उसके लेखक ए० एफ० पार होअर्नल साहय बड़ी छान चीन के बाद बताते हैं कि उसके मत में १ शीतोदक, २ चीजकाय ३ प्राधाकर्म और ४ स्त्री सेवन की मना नहीं है (सूत्र कृतांग) ये अचेलक है मुक्ता चार है हस्तापलेपन ( कर पात्र हैं। एकागारीक ( एक घर से प्राधाकर्मी भिक्षा लेने वाले ) हैं (मज्झिमनिकाय पृ ०४४ व ) यह मत पुरुषार्थ, पराक्रम का निषेध करता है और नीयति को ही प्रधान. मानता है .
( मजिसमनिकाय पृ. ३.11३०५ पासादांग ) गैरहवास
कहने की थावश्यकता नहीं है कि इस मुनि संघ ने उपरोक्त
वातों में सुधार कर और भ० महावीर स्वामीकी श्रानाको अपना
कर उनके संघ में प्रवेश कीया था परन्तु यह संघ अनेकांत दृष्टि
स अंचलक रहने में भी स्वतंत्र था।
इस संघ की मुनि परम्परा आज भी भाजीचक, राशिक और
दिगम्बर. इत्यादि नाम से विख्यात है
--
(लायुधकृत अभिधान रत्नमाला, विरंचीपुर का शिलालेख, तामिल शाद
कोष, सूत्रकृतांगटीका)
इस प्रकार ये दोनों संघ श्रमण संघ में सम्मिलित हो गये ।
उस समय वह श्रमण संघ अविभक्त था । उसमें न वस्त्र का
एकांत आग्रह था ? न नग्नता काटन पुल्प जाति से पनपात था!
न स्त्री जाति से ! इसी प्रकार ६०० चर्प तक अविभक्तता जारी
रही । बाद में किसी एक मुहर्तकाल में दिगम्वरत्व को प्रधानता
देकर, श्राजीवक संघ का कोई दल अलग होगया, और उसने
प्राजीवक मत की शीतोदक ग्रहण वगैरह जो मान्यताएँ थीं उनमें
से कई को पुनः स्वीकार कर लिया। उस समय उसके नायक थे
प्रा० शिव भूति याने भूतवली और श्रा० कुंद कुंद वगैरह
दिगम्बर- उपलब्ध दिगम्बर शास्त्रों में भी शीतोदक ग्रहण
प्रादि के प्रमाण मिलते हैं ?
जैन-हाँ? आपकी जानकारी के लिये थोड़े से प्रमाण देता हूँ
पाषाण स्फोटितं तोयं, घटी यंत्रेण ताडितं ।
सद्यः संतप्त वापीना, प्रासुकं जल मुच्यते ॥
। -1 म '.. देवर्पिणां प्रशौचाय, स्नानाय · गृहमेधिनां ।। (मा. शिव कोटि कृत रनमाला लोक ६३, ६४ ) (जैन दर्शन घ० ४ २ पृ० 11-121५५-५८) २ मुहूर्त गालित तोय, प्रासुकं प्रहर द्वयम् । उष्णोदक महोरात्र-मतः संम्मूर्छितं भवेत् ।। (रत्न.माला, जैन दर्शन वर्ष ४ ० ३ पृ.१६) ३ वृक्षपर्णोपरि पतित्वा यज्जलं यत्युपरि पतति तस्य प्रामुक त्वा द्विराधनाप्कायिकानां जीवानां न भवति . (आ० कुन्द कुन्द कृत भाव प्रामृत गा० १.१ की टीका पृ० २६.) ४ विलोडितं यत्र तत्र विक्षिप्तं वस्त्रादि गालित जलं । पानी के विलोड़ित इत्यादि चार भेद हैं । विलोडित छना हुआ. पानी अचित्त है । पापाण स्कोटितं इत्यादि पानी भी विलोड़ित मान जाते हैं। (दि. आ· श्रुतं सागर कृत तरवार्थ सूत्र टीका) ५ प्रत्यक्तात्मीय मसद्वर्ण-संस्पर्शादिक मंजसा। अप्रासुकमथा तप्तं, नीरं त्याज्यं व्रतान्वितैः॥ (नोत्तरं धावाधार, संधी २२, श्लो. ६ नभस्वंता हतं ग्राव-घटी यन्त्रादि ताडितम् तप्त सूर्या शुभिर्व्याप्यां मुनयः प्रासुकं विदुः ॥ ५३॥ स्नानादि ॥ ५४॥ (पं. मेधावि पं० कुल तिलक कृत धर्मसंग्रह प्रावकाचार) ७ दिगम्बर मत में आकाश धारण सिद्धि प्राप्त मुनि देवर्षि माने जाते हैं। (चारित्र सार पृ० २२, प्रवचनसार पृ० ३४३ जैन दर्शन व० ४ ० ३३१) । अथवा एक विहारी या माधोपवासादिक धारक महामुनि देवर्षि है। (मैन दर्शन, ५० ४.१ १५९.)...":. - i 1. ~- , मल १४ हैं जिनमें कन्द, मूल, बीज, फल, करण और कुण्ड (भीतर से अपक्व चावल ) ये भी सव मल हैं किन्तु ये अपामुक नहीं हैं याने इनके सद्भाव में सचित्त निक्षिप्त, सचित्त पिहित या सचित मिश्र का दोप नहीं है। (पं० आशाधर कृत अनगार धर्मामृत अ०५६लो० ३९ ) २. कन्दादिपटकंत्यागार्ह, इत्यन्नाद्विभजेन्मुनिः न शक्यते विभक्तुं चेत्, त्यज्यतां तर्हि भोजनम् । टीका-कन्दादिपदकं मुनि पृथक् कुर्यात् मान ये सचित्त नहीं है अतः इनको दूर करके दिगम्बर मुनि श्राहार करें। (पं० भाशावर कृत अनगार धर्मामृत अ० ५ श्लो०४१) ३ मूलाचार पिण्ड विशुद्धि अधिकार गा० ३५ की टीका में भी उपरोक्त विधान पाया विशेष जानकारी करनी हो तो ता० १६८ | १९३६ इस्वी० के खंडेलवाल हितेच्छु अंक २१ में प्रकाशित व्यावर निवासी दि० ७० महेन्द्रसिंह न्यायतीर्थ का "वनस्पति श्रादि पर जैन सिद्धान्त" शार्पक लेख पढना चाहिये। उपर के ऐतिहासिक प्रमाणों से सिद्ध है कि-दिगम्बर श्वेता. इन दोनों का उद्-गम एक ही स्थान से है से ही सापेक्ष भेद है. जो भेद आज अनेक शाखा प्रशाखाओं से अति विस्तृत हो उठा है। परन्तु दोनों में शुरु । tho दिगम्बर-यह भेद श्राचार्य भद्रवाहु स्वामी के बाद हुआ दिगम्बर विद्वानों ने इस भेदका समय वि० सं० १३६ लीखा है। आ० देवसेन कृत दर्शनसार, और भाव संग्रह. गा० १३७. पं० नेमिचन्द्रजी कृत सूर्यप्रकाश. श्लो०-१४७, पृ०- १७९, भट्टारक इन्द्रनन्दि कृत नीतिसार गुलों० ९ ५० गजाधरलालजी सम्पादित "समयसार प्राभृत' प्रस्तावना) . [७] जैन-ठीक है। दिगम्बर के दूसरे भद्रबाहु स्वामी याने श्वेताम्बर मतानुसार वज्रस्वामी के बाद यह भेद पड़ा है। जिसका समय वि० सं० १३६ है। विचार भेद होना,जोड़ने का प्रयत्न करना और आखिर में अलग रहो जाना, इसमें तीन वर्ष व्यतीत हो जाय यह स्वाभाविक है । इस विषय के लिये दोनों में खास मत भेद नहीं है। दिगम्बर-इस मत भेद की जह क्या है ? जैन मत भेद की उत्पति के लिये तो प्रसंग भान पर बताया जायगा । समुचित यह मानना होगा कि वस्त्र के निमित्त यह मत भेद खड़ा हुआ है यानी जैन मुनि वस्त्र पहिने किं न पहिने ? इस वस्त्र के ही झगड़े में :जैनधर्म" यह. नाम लुप्त हो गया और वस्न के कारण ही दिगम्बर और श्वेताम्बर ये दो नाम प्रसिद्ध हुए। अम्बर के निपेध में इतना भाग्रह था कि उसके लिय जैन नाम को हटा कर दिगम्बर नाम ही अपना लिया और उसको अच्छा माना। वस्त्र के निषेधकार को अपनी मान्यता की पुष्टि के लिये स्त्री मोतं, केयंली भुक्ति; द्रव्य शरीर वचन और मन के प्रयोग, औदारिक शरीर, परिपह, साक्षरी वाणी इत्यादि अनेक पातों का निषेध करना पड़ा। मगर प्रधान दिगम्बर आचार्य इन सब निधों को स प्रमाण मानते नहीं हैं । जो कि आपके प्रश्नों के उत्तर में क्रमशः बताया जायगा। :
[८] मुनि उपधि-अधिकार दिगम्बर-पांच महाव्रत वाले साधु परिग्रह के त्यागी होते । अतः उन्हें परिग्रह नहीं रखना चाहिये वस्त्र.पान वगैरह का त्याग करना चाहिये। जैन-- श्राप परिग्रह का लक्षण क्या मानते हैं। . E- दिगम्बर- दिगम्बर शास्त्र में परिग्रह का स्वरूप इस प्रकार है! १ मूर्छा परिग्रहः (मा० श्री उमास्वाति कृत तत्वार्थ सूत्र अध्याय ७ सूत्र १७) २. ममात्तं परिवज्जामि, णिम्मम त्ति मुवादिट्ठों । ( भा० कुन्द कुन्द कृत भावप्रामृतं गाथा ५०) मूच्छादि जणण रहिदं, गेराहदु समणोयदिवि अप्प (आ० कुन्द कुन्द प्रवचन सार, चरणानु योग चूलिकागाथा २२) ४. पाखंडियलिंगेसु व, गिहलिंगेसु व बहुप्पयारेसु । कुव्वंति जे ममात्ति, तेहिं ण णादं समयसारं ॥४४३॥ टीकाश-निर्गन्थ रूप 'पाखंडि द्रव्य लिंगेषु कौपीन चिन्हादि गृहस्थलीगेषु बहु प्रकारेषु ये ममतां कुर्वन्ति । याने जो किसी भी लिंग ऊपर ममत्व रखता है वह परमार्थ को जानता नहीं हैं। 1 - ( आ० कुन्द कुन्द कृत समय प्राभूत गा० -४४३ ) ५ या मूर्छानामेयं विज्ञातव्यः परिग्रहो ह्येषः । मोहोदयादुदीर्णो, - मूर्छा तु ममत्व परिणामः।। १११ ।
-- " [ मूर्छा लक्षण करणात्, सुघटा व्याप्तिः परिग्रहत्वस्य सग्रन्थो मूर्जावान् विनापि शेपसंगेभ्यः ।। ११२ ।। हिंसा पर्यायत्वात् सिद्धा हिंसान्तरंग संगेषु । पहिरंगेषु तु नियतं, प्रयातु हिंसैव मूीत्वं ॥ ११६ ॥ (भा. अमृतचन्द्र सूरि कृत पुरुषार्थ सिद्धि उपाय वि० सं०६६२) इन सव प्रमाणों से स्पष्ट है कि मूर्छा यानी ममत्व ही परिग्रह है। किसी वस्तु पर ममता होने से परिग्रह विरमण, बत-में दूपण लगता है, ममता नहीं है वहाँ परिग्रह नहीं है श्रममत्व के कारण ही समोसरन अादि से युक्त तीर्थंकर भगवान अपरिग्रही है । ... दिगम्बर आचार्य जिनन्द्र की विभूतियाँ बताते हैं । १ इत्थं यथा तय विभूतिरंभूजिनेन्द्र ? "धर्मोपदेशन विधौ न तथा परस्य ।।:::..in (भक्तामर जोनको अशोक वृक्ष सिंहासन, चम्मर छत्र, पन ये सय तीर्थंकर की निकट ची विभूति है। २ माणिक्य हैम रजत प्रविनिर्मितेन । .:, साल त्रयेण भगवन्नभितो विभासि ॥.२६ ॥ (कल्याण मन्दिर स्तोत्र) ३...अनीहितु स्तीर्थ कृतोपि विभूतयः जयन्ति ।। 11 (भा. पंपाद कृत समाधितन्त्रम्):: जलद जलद ननु मुकुट सपतफणं' ::: :::.पं० बनारसीदास कृत) -१५ भागालाल कृत धर्घा सागर पर्षा २२८४१३५). साँप की फण भी भगवान की निकट यौषिभूति दिन . . . ४ 1 [१०] विभूतियों के होने पर भी अममत्व के कारण वे अपरिग्रही हैं परिग्रह से मुक्त है। सारांश यह यह है कि दिगम्बराचार्य मूच्छा को ही परिग्रह मानते हैं। जैन तब तो जैन साधु वस्त्रादि उपधि को रखते हैं. उसमें भी अममत्व होने से परिग्रह दोष नहीं है दिगम्बर तीर्थंकर भगवान तो नग्न ही होते हैं मगर अतिशय से अनग्न से दीख पड़ते हैं। जैन तीर्थकर भगवान के ३४ अतिशयों में ऐसा कोई भी प्रति- शय नहीं है जो नग्नता को छियावे, वास्तव में तीर्थकर भगवान सवस्त्र ही होते हैं बाद में किसी का वस्त्र गिर जाय तो अनग्न भी होते है । इस प्रकार तीर्थकरो में नग्नता या अनग्नता का कोई एकान्त नियम नहीं है। नाबौद्ध धर्म के निपीटक शास्त्रों में भ० पार्श्वनाथ के अनुयायीयों को चातुर्याम धर्मचाले और सर्वत्र माने है यानी भगवान पार्श्व- नाथ और उनकी सन्तान सबस्त्र थी नग्न नहीं थी। मथुरा के कं- काली टीला से प्राप्त दो हजार वर्ष की पुराणी जिनेन्द्र प्रतिमाएं श्रनग्न है, दिगम्बर चिन्ह से रहित हैं। जिनके ऊपर श्वेताम्बर श्राचार्य के नाम खुदे हुए हैं । वहाँ करीव ६०० वर्ष पुरानी दिगम्व- रीय प्रतिमाएं भी हैं जो खुल्लम खुल्ला दिगम्बर ही है इससे भी स्पष्ट है कि दो हजार वर्ष पहिले "तीर्थकर भगवान नग्न ही होते हैं" ऐसी मान्यता नहीं थी। - मका शफते. वाव आयात ४ में तख्त नशीन सफेद वस्त्रवाले और सोने के ताज वाले २४ वुजुर्ग का वर्णन हैं संभवतः वह २४ तीर्थकरों का वर्णन है।
[११] विद्वानों का मत है कि-इसा मसीह ने कई वर्ष पर्यन्त हिन्द में रह कर जैन बौद्ध या शैव धर्म का परिशीलन किया और बाद में यूरोप में जाकर इसाई धर्म की स्थापना की। यहां के २४ श्रव- तारों को उन्होंने उन शब्दों द्वारा ईश्वरी स्थान दिया है। मगर चौद्ध धर्म में इस प्रचार २४ वौद्ध नहीं हैं और शैव धर्म में २४. अवतार . मनुष्य रूप से नहीं है........सिर्फ... जैन धर्म में ही २४ तीर्थकर है और वे मनुष्य ही है, अतः श्रायात में २४ बुजुर्ग के रूप में इनका ही सूचन है । इसके अलावा इसाई धर्म में पापों की क्षमा मांगने की विधि. भी जैन प्रतिक मण का ही कुछ अनुकरण है । इससे तये पाया जाता है कि इसा मसीह में यहां जैन धर्म का परिशीलन किया है। यदि यह बात सच्ची है तो उस समय में २४ तीर्थकर पापा में माने जाते थे। यह भी स्वीकृत करना पड़ेगा। दिगम्बर-भगवान महावीर स्वामी के युग के जैन मुनि S - जन- -- यह बात निम्नलिखित प्रमाणों से गलत है। १-चौद्ध शास्त्रों में सूचित "चाउजामो धम्मो" वाले जैन साधु सवस्त्र.ही थे! २-चौद्ध आगमों में श्राजीयक मत की.चर्चा है कि नाजीवक मत में समस्त जीवों के वर्गीकरण से छै अभिजातियाँ (छ.लश्या के समान विकास पायरी) मानी गई हैं जो इस प्रकार हैं। १-कृष्णाभिजाति, क्रूर मनुष्य : . -नीलामिजाति-भिक्षु, चौद्ध भिक्षु :: लोहित्याभि जाति-निर्गन्थ साधु जो-नियत तया....चोल पट्टा फो पहिनते है माने जो वस्त्रधारी दी है। ::
[१२]
४- हरिद्वाभिजाति-सर्व वस्त्र त्यागी-श्राजीयक गृहस्य (पलक
वगैरह-गृहस्थ )
५---शुक्लाभिजाति-श्राजीवक श्रमग, श्रमगी
६-- परम शुक्लाभिजाति-माजीवक धर्माचार्य नंदयन्स किस
सकिय और माली गौशाला वगैरह ।
इन अभिजातियों का परमार्थ यह है कि अधिक वस्त्र बाल
मनुष्य प्रथम पायरी पर खड़ा है अल्प बन्न बाला बीच में सड़ा
है और बिलकुल नग्न छटी पायरी पर जा पहुचाँ है। .
इस हिसाब से बौद्ध श्रमण दूसरी कक्षा में जैन निग्रन्थ तीसरी
और श्राजीवक श्रमण पाँचवीं कक्षा में उपस्थित है । साफ बात है
कि उस काल में निग्रन्थ श्रमण वस्त्रधारी थे और श्राजीवक भ्रमण
नंगे रहते थे।
(एन साई फ्लो पीढिया फि रीलिजियन एण्ड मिक्स वॉ० । पृ०
२५६ का भाजीवक लेख)-
• -
३-लोहित्या भिजाति नाम"निग्ग था-एक साटिक"ति वदन्ति ।
लोहिता भि जांति माने वस्त्रवाले जैन निगन्य ।
दि० वांचू, कामता प्रसादजी कृत "महावीर और बौद)
यह पाठ भी ऊपर के पाठ का ही उद्धृत ग्रंश है । इसमें जैन
साधुत्रों को सवस्त्र माना है।
४--पाणीनीय व्याकरण में "कुमारश्रमणादिभिः"सूत्र से गणधर
श्री केशिकुमार का उल्लेख है ये श्राचार्यभी वस्त्र धारी थे. इन्होंने
गणधर श्री गौतम स्वामी से प्राचार पर्यालोचना की थी।
.. ( उतराध्ययन सूत्र अ०)
५- कलिंगाधिपति सम्राट खारवेल ने जैन मुनित्रओं को वस्त्र दान
किया था ऐसा उसके उत्कीर्ण शिला लेख में लिखा गया है।
,
[ १३ ] ६--द्वादशांगी जिनवाणी क्रा:श्रादिम अंग "श्री शायरंग उत्त" में जैन निर्गन्यों को पाँच जाति के वस्त्रों की प्राज्ञा है.विक्रमी दूसरी शताब्दी पर्यन्त के किसा,भी ग्रन्थ में इसका विरोध नहीं किया गया। पहले पहल आचार्य कुन्द कुन्द ने "पद् प्राभूत"ग्रन्थ में इसका विरोध किया। इसी से स्पष्ट है कि उस समय पर्यन्त जैन श्रमण वस्त्र धारी थे और पाँच जाति के वस्त्र पहिनते थे किसी को नग्नता का श्राग्रह नहीं था। यकायक श्रा० फुन्दकन्द ने पाँच जाति के वस्त्र का निषेध लिखा और वाद के वेताम्बर श्राचार्यों ने भी एकान्त नग्नता तथा इस कृत्रिम नग्नता का विरोध किया। भूलना नहीं चाहिये कि वीर निर्वाण के ६०० वर्ष तक के किसी जैन श्रागम में दिगम्बर का विरोध नहीं है किन्तु बाद में ही ज्वेताम्बर शास्त्रों में दिगम्बर विरोध लिखा गया है। जब दिगम्बर के प्राचीन या अर्वाचीन सव शास्त्रों में श्वेताम्बर का विरोध जोर शोर से किया गया है। इसीसे कौन साहित्य प्राचीन है और कौन अर्वाचीन है, यह निर्विवाद हो जाता है, और जिसका विरोध किया जाता है उसकी प्राचीनता भी स्वयं सिद्ध हो जाती है। " सारांश यह है कि-विक्रम की दूसरी शताब्दी तक जैन शास्त्रों में वस्त्र का निषेध नहीं था। जैन मुनि वस्त्रधारी थे वस्त्र के एकांत विरोधी नहीं थे। . दिगम्बर- जैन मुनि का असली नाम निर्गन्य है निर्गन्थ का अर्थ यही होता है कि दिगम्बर । जैन--दिगम्बर सम्मत शास्त्र पांच प्रकार के निर्गन्य मानते है और ये सब पत्रधारी थे ऐसा साफ २ बताते हैं । देखिये- । १-पुलाक बकुश कुशील निर्गत मात- - . [ १४ ] संयमश्रुतप्रतिसेवनातीर्थ लिंग लेश्योपपातस्थान विकल्पतः साध्या:। (चा० मास्वति कृत तत्वा० १८ सू ४६ ४७ ) अविविक्त परिग्रहाः परिपूर्णोर्भयाः कथंचिदुत्तर गुण विरा- धिनः प्रति सेवना कुशीलाः । निर्गन्य वस्त्र पात्र और उपकरण बाले नो होते ही हैं परन्तु उसमें ममता नहीं रखते हैं यदि उनमें "प्रत्यक्त परिग्रह, 'यानी मूर्छ करते हैं। तो भी वे तीसरी कोटि के निर्गन्ध ही है। प्रति सेवना कुशीलाः द्वयोः संयमयोः दश पूर्व धराः। 3 वे निर्गन्थ दो चारित्र वाले और दश पूर्व के ज्ञान वाले भी होते हैं। .. तत्र उपकरणाभिष्वक्त चित्तो, विविधविचित्रः परिग्रह युक्तः, बहु विशेपयुक्तोपकरणकांक्षी, तत्संस्कार प्रतिकार सेवी, भिक्षुः॥ ... निर्गन्थ के पास वस्त्र पात्रादि उपकरण होते.. ही हैं । परन्तु वह उनमें प्रासक्त चित्त रहे, विविध और विचित्र वस्त्रादि को धारण करें या तीर्थकर की आज्ञा से अतिरिक्त विशेष उपकरणों की चाहना करे तो वह पाँच में से दूसरी कक्षा का निर्गन्थ है। लिंग द्विविघं, द्रव्यलिंगं भावलिंगच । भावलिंग प्रतीत्य सर्वेपि निर्गन्थाः लिंगिनो भवन्ति । द्रव्यलिग प्रतीत्य भाज्या:। श्रमण लिंग दो प्रकार के हैं. ! १-द्रव्यलिंग-साधु, वेप और २-भावलिंग--चारित्र । चारित्र के जरिये पाँचो निर्गन्थ "लिंगी' हैं । व्यर्लिंग के जरिये उनके अनेक भेद होते हैं। ..
•
[१५]
::दिगम्बर के विद्वज्जन बोधक पृष्ठ १७ में भी लिखा है कि
व्यलिंग में प्रतीतिकरि तिसे विचारिये तो पांचों ही भेद भाज्य
है भेद करने योग्य है। : :
इस पाठ से स्पष्ट है कि पाँचों निगन्य के भिन्न २ साधु वेश
होने के कारण अनेक भेद होते हैं। यदि निर्गन्य का द्रव्यलिंग सिर्फ
नग्नता ही होती तो भावलिंग के समान द्रव्यलिंग का भी एक ही
भेद होता, किंतु यहाँ अनेक भेद माने हैं, अतः स्पष्ट है कि-निर्गन्धों
का द्रव्यालिंग नग्नता नहीं किन्तु साधुवेश यानी साधु के उपकरण
ही है, और ये उपकरणं अनेक प्रकार के हैं।..
(सस्वार्य सून म०सू०४६, ४७ की सर्वार्थ सिद्धि और राजवार्तिक
टीका पृ० ३५८, ३५६)
संनिरस्त कमाणातमुहूर्त केवल ज्ञान दर्शन प्रापिणो
निर्गन्धाः ।
चौथा "निगन्य" नामक निर्गन्थ यही है जो कि चाहा और
अभ्यंतर ग्रन्थी से रहित है, और जिसको अन्त मुहूर्त में केवल ज्ञान
चं केवल दर्शन होता है। इससे भी स्पष्ट है कि नंगे को निर्गन्ध
मानना, सरासर भ्रम ही है।
प्रकृष्टा प्रकष्ट मध्यमानां निर्गन्थाभावः ।..."न या......
संग्रह व्यवहारा पेक्षत्वात् ।।
तरतमता के होने पर भी पाँचों निर्गन्ध निगन्य ही है। नयाँ
की अपेक्षा से यह भेद मी उचित है।
(सरपार्य मून टीका)
तयो रुपकरणा सक्ति संभवात् आर्त ध्यानं कदाचित
संभवति, पार्तध्यानेन कृष्णलेश्यादि त्रयं भवति ।
1
-
-
उक्त
वकुश और प्रति संवना कुशील की है लेश्या होती है निर्गन्य
वस्त्रादि उपकरण वाले हैं अतः उन्हें कभी उपकरणों में ग्रासक्ति
होना भी सम्भावित है। जव निर्गन्थ को प्रासाक्ति होती है तब
आर्तध्यान होता है कृष्णादि तीन लेश्यायें होती है
(चारित्र सार, व विज्ञान पृ० १७९)
शारांश-जैन मुनि का असली नाम "निर्गन्ध" है । जो
दिगम्बर ग्रन्थों के अनुसार वस्त्रादि युक्त, किन्तु उनमें मूळ रहित
ही होता है, अतः वह निर्गन्य माना जाता है।
श्वेताम्बर जैन मुनियों का सर्व प्रथम संत्र.. "निर्गन्थ गच्छ:
है और दिगम्बर का सर्व प्रथम संघ "मूल संघ" है । इससे भी
स्पष्ट है कि निर्गन्थ यह संकेत शुरु से आज तक वस्त्र धारी श्रमणों
के लिये उपयुक्त है।
भूलना नहीं चाहिये कि जिनागम जैन तीर्थ और निर्गन्ध
गच्छ की संपत्ति (वारसा) श्वेताम्बर संघ को ही प्राप्त हुई है।
दिगम्चर संघ इन लाभों से बंचित रहा
-
दिगम्बर-श्री उमास्वाती महाराज भी नग्नता माने अचेल
परिषह मानते हैं इससे ही दिगम्बरत्व साध्य है।
जैन यह परिषह तो वस्त्र के ही पक्ष में है नुधा और
पिपासा के सद्भाव में आहार और पानी की आवश्यकता होने
पर भी अप्रासुकता आदि के कारण आहार पानी न मिले या
अल्प प्रमाण में मोले, तो भी काम चला लेवे दुःख न माने और
संतुष्ट रहे इस परिस्थीति में वहाँ लुत, पिपासा परिपह माने जाते
हैं, जो संवर रूप है । और आहार पानी को छोड़कर बैठ जाना,
वह तपस्या मानी जाती है, जो निर्जरा का कारण रूप है। वैसे
ही वस्त्र की आवश्यकता होने पर भी निपि न मिलने के कारण
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श्रलोचन से चलानी पड़ें या-विना वस्त्र रहना पडे उस हालत में अचेल परिपह माना जाता है जो संवररूप है और चनाको छोडे कर बैठ जाना वह "काया क्लेश" रूप तपस्या हैं। भूलना नहीं चाहिये कि मुनि धर्म में संवर. अनिवार्य है और तपस्या यथेच्छ है.. इस हिसाब से स्पष्ट है कि मुनियों को आहार पानी अनिवार्य है.वैसे ही वस्त्र धारण करना भी अनिवार्य है। यदि ये शुद्ध मिले तो साधु इनको लेते हैं। मगर वैसे न मिले तो जुत, पिपासा और अचेल परिपह को सहते है इस प्रकार क्षुत् परिपह से मुनियों के आहार का समर्थन होता है। और अचेल परिपह से मुनियों के वस्त्र को ही समर्थन होता है। (दिंगम्बर-श्वेताम्बर आगम में जिनकल्पी का वर्णन है वह असली मुनि लिंग है।' • • ... । जैन जैन दर्शन स्याद्वादी है अतः एक मार्ग का आग्रह नहीं रखता है । में चौद्ध प्रमाणों से बतला चुका है कि भगवान महावीर खामी के साधु वस्त्र धारक थे। उनमें से कोई मुनिजी चिशेप तपस्या करना चाहते 'याने अधिक कायक्लेश "सहने को उद्युक्त होता तो घेशानी को पूछकर जिनकल्पी भी बनते थे। जो वस्त्र युक्त रहते थे. या वस्त्र रहित भी बन जाते थे। भूलना नहीं चाहिये कि जिनकल्पी बनने वाले को कम से .कम || अंग और १३ वे अंग के दशवे पूर्व की तीसरी वस्तु तक को शान और प्रथम संहनन होना चाहिये। इसके विना जिनकल्पी बनना, जिन- कल्पी बनने का मजाक उड़ाने के सिवाय और कुछ नहीं है। जिन. कल्पी को क्षपक श्रेणी नहीं होती है। १० पूर्व से अधिक झीन पाले को जिनकल्पी रूप कायक्लेश तपस्या करने की आवश्यकता नहीं है। (तकरुपमाष्य गा० १३८५ से १४.४, पंचषस्तु गा० १५९८) सारांश--जिनकल्पी व नग्नता असली मुनिलिंग नहीं है किन्तु विशिष्ट प्रवृत्ति ही है। असली मुनि मार्ग यानी सर्व सामान्य मुनि जीवन स्थविर कल्प ही है। दिगम्बर- स्थविर कल्प और जिनकल्पी के लिये पूर्व शान की अनिवार्यता है, इत्यादि ये सच श्वेताम्बर की कल्पना ही है। जैन- दिनाम्बर शास्त्र में भी जिनकल्पी और स्थविरकल्पी की व्यवस्था बताई है इतना ही नहीं किन्तु जिनकल्पी के लिये विशिष्ट ज्ञान और विशिष्ट सहनन की अनिवार्यता भी स्वीकारी है। देखिये प्रमाण १-मुनियों के जिन कल्पी और स्थवीर कल्पी ये दो भेद हैं। आ जीनसेन कृत आदि पुराण सर्ग-1 श्लोक ३) मूलुत्तर गुण धारी, पमादसहिदो पमाद रहिदो य । ऐकेक्को वि थिरा-थिर भेदण होइ दुवियप्पो ॥ २१ ॥ थिर अथिरा ज्जाणं पमाद दप्पेहिं एगबहुवारं ॥ समाचारदिचारें, पायच्छित्तं इमं भणिय ॥ २६१ ।। * याने जैन साधु के प्रमत्त और अप्रमत्त तथा.. स्थविर कल्पी और अस्थविर कल्पी ये दो २.विकल्प है आर्या के भी ये ही दो दो भेद है। (दि० आ० इन्द्रनन्दि कृत छेदपिरम् ३-दुविहो जिणेहिं कहियो जिणकप्पो तहय थविरकप्पो य ।। सो जिण कप्पो उत्तो उत्तम संहणण धारिस्स ॥ ११ ॥ एगारसंगधारी ॥ १२२ ॥ याते-जिन कल्प और स्थविर कल्प ये दो कल्प है जिन कल्प उत्तम संहन वाले और ग्यारह अंग वेदी के योग्य है.। (प्रा०. देव सेनः कृतःभाव संग्रह) - ' । स प्रकार दिगम्बर शास्त्रों में भी दो कल्प बताये है, और जिन कल्प यह किसी ज्ञानी की 'सास विशिष्ट यथेच्छ प्रवृति है ऐसा स्पष्ट कर दिया है। येप्रमाण भी बताता है कि स्थविर कप ही प्रधान श्रमणमार्ग है जय जिन कला सिर्फ व्यक्तिगत विशिष्ट प्रवृति है। इस हालत में जिन कल्प असली यानी प्रधान मुनि लिंग नहीं हो सकता है दिगम्बर-श्रा० कुन्द कुन्द तो सय द्रव्य के त्याग से ही अपरिग्रहता मानते हैं। वे लिखते हैं कि- • बालग्गः कोडिमिन, परिग्गह ग़हणं ण होई. साहणं । भुजेड पाणि पत्ते, दिएणंएणं इक्क ठाणम्मि ॥१७॥ (आ० कुन्द कुद कृत-सूत्र माभून!) किध तम्हि नास्थि मूच्छा ! प्रारम्भो, वा असंजमो तस्स । तध परदव्वम्मि, रदो, कथ मप्पाणं पसाधयदि. ॥ २० ॥ टीका -उपधि सद्भावे हि ममत्व परिणाम लक्षणायाः मुंछायाः, तद्विपय कर्म प्रक्रम परिणाम - लक्षणस्यारंभस्य, शुद्धात्म रूप रूप हिंसन परिणाम लक्षणस्याऽसंयमस्य चावश्यं भावित्वात् । यान-उपधि में भूच्छा, प्रारम्भ और असंयम होता है, में रत मनुष्य प्रारमा को साध सफता नहीं है। 10 कुन्द पुर करा प्रबधन सार परमानुयोग लिस) जन--महानुभाय ! यह कथन सिर्फ ममता सग परिप्रद पानी मां के खिलाफ है यास्तव में योलाग्न ही नहीं फिन्तु यालों फा समूह-पाठी, उपधि, शरीर याणी और मनगरह पर द्रव्य है। जो धर्म साधन थे हेतु होने के कारण उपकरण ही है किंतु मृदा होने " (मा० - [२०] पर, वे सब अधिकरण बन जाते हैं, इस प्राशय को स्पष्ट करने के लिये ऊपर की गाथाएँ पर्याप्त है। . यदि ऐसा न होता तो वे श्राचार्य उपधि की आशा कतई नहीं देते । किन्तु प्रत्यक्ष है कि वे ही वाद की गाथाओं में उपधि स्वी. कार की श्राक्षा देते है । देखिये- छेदो जेण न विज्जदि, गहणविसग्गेसु सेवमाणम्स समणो तोणिह बट्टदु, कालं खेत्तं वियाणित्ता ।। २१ ॥ टीका-यः किल अशुद्धोपयोगाऽविनाभावी स छेदः । अयं उपधिस्तु श्रावण्यपर्याय सहकारकारि कारण शरीर धृति हेतुभूताऽऽहार निहारादि ग्रहण विसर्जन विषय छेद प्रति षेधार्थमुपादीयमानः सर्वथा शुद्धोपयोगाऽविना भूतत्वात् प्रतिषेध एव स्यात् ।। २१ ॥ । अथाऽप्रतिपेद्धोपधिस्वरूप मुपदिशति । ii अप्पडिकुटुं उपधि अपत्थणिज्जं असंजद जणेहिं । १. मूच्छादिजणण रहिदं, गेह्णदु समणो यदि त्रि अप्प।।२२।। टीका-यः किलोपधिः बंधाऽसाधकत्वाद प्रति कुष्ठः संय- मादन्यत्रानुचितत्वाद संयतजनाऽग्रार्थनीयो, रागादि परिणाम मंतरेण धार्य माणत्वा"न्मूर्छादिजनन रहित श्च"भवति स खलु "अप्रतिषिध्धः । अतो यथोदितस्वरूप एवोपधिरुपादेयो, न पुनरल्पोपि यथोदित विपर्पस्त स्वरूपः ॥ २२ ॥ बालो वा बुड्डो वा, समाभिहतो वा पुणो गिलाणो वा । चरिय चरउ सजोग्गां, मूलच्छेदं जधाण हवदि ।। २६ ।। आहारे व विहारे देशं कालं समं खमां उवधि। जाणिताते समणो, बट्टदि जदि. अप्प लेवी सो ॥ ३० ॥ ट्रीकांश-१ अल्प लेपो भवत्येव तद्वर मुत्सर्गः ।
L २- अल्प एव लेपो भवति, तद्वरमपवादः॥ उपधि निषेध ३-देशकालज्ञस्यापि बाल वृद्ध श्रान्त ग्लान त्वानुरोपेना ऽऽहार विहारयो रल्पलेपभयेनाऽप्रयतं मानस्याऽतिकर्कशाऽऽ चरणीभूय क्रमेण शरीरं पातयित्वा सुरलोकं प्राप्योद्वांत समस्त संयमाऽमृतभारस्य तपसोऽनवकाशतयाऽशक्य ,प्रतिकारो महानु लेपो भवति, तन्न श्रेया नपवादनिरपेक्षः उत्सर्गः । ४-असंयत जन समानी भूतस्यं...""महान् लेपो भवति, तनश्रेयानुत्सर्ग निरपेक्षोऽपवादःसर्वथानु . गम्यस्य. परस्पर सापेक्षोत्सर्गापवाद विजूंभित वृत्तिः स्याद्वादः ॥ ३०॥ : याने साधु काल क्षेत्र के विचार से प्रवृति करें जिसके लेने जेडने और वापरने में छेद न हो ऐसी उपधि को. स्वीकारे । "ममत्व न हो तव उपधि अप्रतिषिद्ध माना गया है", का कारण "ममता ही है । वाल बृद्ध श्रमित और ग्लान मुनि मूलच्छेद न हो इस बात को लक्ष्य से लेकर स्वयोग्य प्रवृति करें। मुनि देशकाल श्रम क्षमा और उपधि को जानकर आहार तथा विहार में प्रवृत्ति करें। ईस प्रवृति में अल्पलेपी के लिये 'चर्तुभंगी होती है जिसमें अपवाद निरपेक्ष उत्सर्ग और उत्सर्ग निरपेक्ष अपवाद ये दोनों भांगे वयं माने गये है.। अति कर्कश आचरण से मरकर असंयमी देव यनना.यह भी अपवाद निरपेक्ष एकान्त हठ रूप होने से अधेय मार्ग ही है । उत्सर्ग और अपवाद से सापेक्ष बर्ताव रखना यानि स्याद्वाद पूर्वक प्रवृत्ति करना यही शुद्ध मुनि मार्ग:है। (भा. कुन्दाकुन्द कृत, प्रवधन सार परंणानुयोग चूलिका) श्रा० कुन्द कुन्द इन पाठों से मुनियों को उपधि रखने की. आम इजाजत देते हैं। भूलना नहीं चाहिये कि ममत्व होने से.दी .. । .
[ २२ ]
इनमें दूपण माना गया है अतः सुनियों के लिये उपाधि रमने की
नहीं बल्कि उसमें सू» रसन की मना है, जो बालग्ग वगैरह
गाथानी से स्पष्ट हैं।
दिगम्बर मुनि भी मोर पीच्छ वगैरह उपधि को रखते हैं
दिगम्बर--दिगम्बर मुनियों के लिय "मार पीछ" यह
चालिंग है, "उपधि"., एवं संयम का उपकरता है । इसके बिना
वे कदम भी नहीं उठा सकते हैं।
१-मोर पीच्छ रखने में ५ गुण है ।
(६० चंपालालजी कृत चर्चा सगर घर्धा-२१०)
२-सप्तपादेषु निष्पिच्छः कायोत्सर्गात् विशुध्याति ॥
..गपूति गमने शुद्धि मुपवासं समश्नुते ।।
(चारित्र सार, तथा चर्चा सागर चर्चा ७
.३-मुनि विना पीच्छ ७ कदम चले तो कायोत्सर्ग रूप
प्रायश्चित करें।
(भा० इन्द्र नन्दी कृत्त । रिम् गा०८०
४-पीछी हाथ से गीरपड़ी अर पवन का वेग अत्यंत लगा।
तब स्वामी (आ० कुन्द कुन्द ने ) कही, हमारा गमन नहीं,
क्योंकि मुनिराज का चाना. विना
मुनिराज पीछाणा, नहीं
जाय।
(एलक वन्नालालजी दि० जैन सरस्वति भूवन बोम्बे का गुटका में आ० कुन्द
कुन्द का जीवन चरित्र; सूर्य प्रकाश श्लो० १५२ की फूट नोट पृ०.४१ से ४७)
- इसके अलावा दिगम्बर साधुओं को कमण्डल, पुस्तक, कलम
कागज, रूमाल, पट्टी वगैरह उपधि रखना भी अनिवार्य है। आज
दिगम्बर मुनि यज्ञोपवीत देते हैं चटाई व पट्टा पर बैठते हैं बड़े २
महलों में ठहरते. हे घास के ढेर पर सोते हैं इनकी भक्ति के लिये
साथ मैं मोटर रक्खी जाती है यह सब मूर्छा. न होने के कारण
--
[ २ ] दूपण रूप नहीं है। मूर्छ हो तो शरीर भी परिग्रह है अत: मूर्छ के अभाव में यह सब अपरिग्रह रूप हैं इतना. तो हमें मंजूर है : जैन- यदि दिगम्बर मुनि उपधि रखने पर भी अपरिग्रही तो श्वेताम्बर मुनि भी उपधि रखने पर अपरिग्रही हैं। और श्री तीर्थकर भगवान भी छै पर्याप्ति की वर्गणाः रूप, पर द्रव्य को लेते हैं मगर वे अपरिग्रही ही हैं। कारण ! मूर्च्छ नहीं है। इसी प्रकार मुनि भी श्रमूञ्छित रूप से उपधि रक्खें तो अप- रिग्रही ही है। दिगम्बर- अजी ! मुनि जी कुछ भी करें उससे हमारा कोई भी धास्ता नहीं है सिर्फ इतना होना चाहिये कि वे वस्त्र धारी न हों, नंगे हो । वास्तव में दूसरी २ चीज परिग्रह हो, या नहीं, मगर वस्त्र तो परिग्रह ही है । शाकुन्द कुन्द दूसरी उपधि की श्राक्षा देते हैं मगर वस्त्र का नाम लेकर निपेध करते हैं देखिये १-पंचविह चेल चायं, खिदिसयणं दुविह सेजमंभिक्खू । भावं भाविय पुव्यं, जिणलिंग णिम्मलं सुद्धं ॥१॥ -: ( मा कुन्द कुन्द कृत भावनामृत गा०, १९:/01) :. : २जे पंच चल सत्ता ॥७६ || ( मोक्ष प्राभृत) ३--पंचच्चेल च्चायो.॥.१२४ ॥ क-प्रति । अंडज: बुंडज रोमज, चर्म च वल्कज पंच चेलानि । ॥ " पारिहत्य तृणज चेलं, यो गृहणीयान्न भवेत् स यतिः। (भा. देवसेन.कृत, भाष संग्रह.गा०:२१.) ४.-.-यदि मुनि दर्प और अहंकार से वन 'ओढले तो.पंच. कन्याणका यदि अन्यकारणसे.ओदले.तोमहाव्रतमंगा हो जाय ।
- 1 [ २४ (पंचम्पालालजी कृत चर्चासागर पृ० ३२५ पं० परमेष्टोदास कृत, चर्चा समीक्षा पृ० २२४ ): ५--लिंग जह जादरूप मिदि भाणदं ।। २१ ॥ ( मा० कुन्द कुन्द कृत प्रवचनसार) सारांश यह है कि मुनि पांचों प्रकार के वस्त्र न पहिने ! नंगा. पन ही मुनि लिंग है जैन--में पहिले से ही बता चुका हूं कि पा० कुन्द कुन्द ने शुरू २ में पाँच प्रकार के वस्त्रों का निषेध किया, इससे तो निम्न वाते विना संशय निर्णीत होती जाती हैं। १-० कुन्द कुन्द के समय पर्यंत जैन निर्गन्ध पाँच प्रकार के वस्त्र पहिनते हैं। २-उस समय तक के शास्त्रों में मुनिओं के लिये पाँच जाति के वस्त्रों की आशा है। ( na - ३-वस्त्र मात्र का निषेध न करके पाँच प्रकार का ही निषेध किया इससे भी पाँच ही प्रकार के वस्त्र उस समय पर्यन्त ग्रहण किये जाते थे, यह भी निर्विवाद हो जाता है। ४-दिगम्बर साधु पाँच जाति से भिन्न वस्त्र पहने तो दोष नहीं है, सिर्फ पाँच काही त्याग होना चाहिये । क्योंकि पाँच जाति में ही परिग्रह दोष है । छंटे प्रकार के वस्त्र में वह दोष नहीं है। ५-दिगम्वर मुनि तृणज चटाई को ग्राह्य मानते हैं यानी लेते है। यद्यपि प्रा. देव सेन ने छठी तृणज जाति का निषेध किया किन्तु दिगम्बर मुनि उनकी एक भी नहीं सुनते। माने पाँच के अलावा छठी जाति का इस्तेमाल करते हैं और "खिदि सयण" के बंजाय पट्ट पर सोते हैं। ! सिर्फ पाँच जाति के वस्त्र के खिलाफ में ही यह रूलिंग ।
. " [ २५ 1 निकाला गया है माने तयं से ही एकान्त दिगम्वरत्व कीजिद जमी है। :::::) सर्व वाती के सोचने से क्या यह विवेक नहीं आता है, कि मुनियों को वस्त्र धारण ही "असली वस्तु है और एकान्त नग्नता का आग्रह नकली घस्तु है ! सब उपधि, रोमज-पीछी, बुंडज-पीली बन्धन, पुस्तक बन्धन, रुमाल वस्त्र और कागज को रक्खें वो तो सच्चा मुनि श्रीर श्रीगमोक्तं होने पर भी सिर्फ श्रा० कुन्द कुन्द द्वारा निषिध उपधि को रफ्खे वह मुनि ही नहीं। यह फहां का न्याय । ऐसी पावन्दी एकान्त बाद में ही हो सकती है। न्याय के जरिये तो दि० श्राचार्य भी वस्त्रादि की श्रीशा देते है, जो श्रागे सप्रमाण बताया जायगा। यहाँ तो इतना ही विचार- णीय है कि आदिम दिगम्बर शास्त्र निमांतानें किस प्रकार जन दर्शन में मतभेद: की, नींव डाली और जैन नाम को हटाः कर "दिगम्बर, नाम को ही प्रधान बनाया: :: PETTE "सिर्फ नंगे रहो, दूसरी दूसरी उपधिकी छूट" इस एकान्त नगें पन की पोट में क्या २ नांचं होरहा है यह देखा जाय तो अपने को दुःख ही होता है । कतिपय "नग्न" माने दिगम्बर परिभांपाक अनुसार "अपरिग्रही" मुनि निम्न प्रकार ज़ाहिर हुए हैं :- १-तिलतुसमेत्तं न गिहंदि हत्येसु ।१६। !' 'दिगम्बर मुनि को सीर्फ हाथ से पैसा को छूने की मना है। (सूत्र मामृत). 1. २. क्वचित्कालानु. सारेण मरिर्दव्यमुपाहरेत् । गच्छ पुस्तक वृध्यर्थ अयाचितमथापकं ॥८६11 ....
:-
:
[ २६ ]
माने दिगम्बर मुनि शास्त्र और संघ के लिय रुपये जोड सकते हैं
(सूत्र प्रामृत गा० १८ की ध्रुत सागरी टीका)
(दि० ० इन्द्र नन्दी कृत नीति सार विक्रम की. १३ वी शताब्दी)
३.दिगम्बर मुनि
मारना
पधारे, एक अच्छे कमरे में ठहरे थे, जाड़ा जारों से पड़ रहा था
भक्तों ने कमरे में घास का ढेर लगा दिया मुनिजी रात को उसके
ठीक बीच में सो गये भक्तों ने चारों ओर अंगीठी जला रक्सी।
कम नसीबी से आग की एक चिनगारी घास में जा लगी और मुनि
जी भुंज गये।
४-वि० सं० १६१६- में भी श्रारा में ऊपरसी ही परिस्थिति
में ३ दिगम्बर मुनि अग्नि शरण हुए है।
५--श्राश्चर्य की बात है कि दिगम्बर मुनि न वस्त्र रक्खें न
लंगोटा रक्खें न गांठ रक्खें पर लाखों रुपये जमा कर सकते हैं।
- नमुना-करीव २ साल पेस्तर की घटना है कि दिगम्बर मुनि
जय सागर जी हैदरावाद दक्षिण में पधारे तव उनके पास लाखों
रुपये जमा थे इनकी खातिर करने के लिये दिगम्बर जैन शास्त्रार्थ
संघ अम्बाला ने एक अपने शास्त्री जी को संभवतः प्रो० धर्मचन्द
जी.B..S: C. को भेजा था ।
६-इसके अलावा और भी दिगम्बरीय अपरि ग्रहता के नमूने
जैन जगत और सत्य संदेश में प्रकट हो चुके हैं।
मूलाचार में भीः गुरु द्रव्य और साधर्मिक द्रव्य का
जिक
.
८-यद्यपि यहाँ पाँच चे बारे में कोई मोक्ष नहीं पाता
परन्तु दिगम्बर विद्वान् पाँचवे बारे में भी दिगम्बर को नग्नता के
कारण ही मोक्षगमन मानते हैं जैसा कि-
1. रहंगे। [ २७ ] तदा ते मुनयो धीराः शुक्ल ध्यानेन सस्थिता !, . हत्वा कर्माणि निःशेष प्राप्ताः सिद्धि जगद्धिताम् ॥ ४२ ॥ (म • नेमिदन कृत आराधना कथा कोश मा०३कया ७३ नंद वंशोच्छे. एकं चाणक्य की कथा श्लो ४२ पृ० ३१३) -~ी पर उसने (चाणक्य ने) उसे बड़ी सहन शीलता के साथ सह लिया और अन्त में अपनी शुक्ल, ध्यान रूपी श्रात्म शाक्ति से कर्मों का नाश कर सिद्ध गति लाभ की. ४. चाणक्य आदि ,निर्मल, चारित्र के धारक थे सव मुनि श्रय सिध्धि गति में ही सदा, (उदयलाल कासलीवाल कृत, भाराधनो कथाको कामहन्दीभाषा: तर पृ० ४३ से ५३). .. १-शान्ति देवी ने भी श्रात्म समाधि प्राप्त की, कारण? दिगम्बरता श्रादि: ...: :(श्रवण येल्गोल के शिला लेखन नित्यस्नान गृहस्थस्य, देवार्चन परिग्रहें। यतेस्तु दुर्जनस्पर्शात्, स्नानमन्यद् विहितं ।।। तत्र यतेः रजखलास्पर्श चण्डालस्पर्श शुनक गर्दम नापित योग, कपालस्पर्श वमने विष्टोपरि पाद पतने शरीरोपरि काक बिएमोचने, इत्यादि स्नानोत्पत्ती सत्या दंडयद् उपविश्यते, श्रावकादिक श्छा- पादिको या जलं नामयति, साँग प्रक्षालनं क्रियते, खयं इस्तमर्दनेन अंगमलं न दूरी क्रियते । स्नाने संजाते सति उपवासो गृयते, पंच नमस्कार शंतमप्टोतरं कायोत्सर्गेण तप्यत एवं शुरिभवति 'मानादिगम्यर मुनि को जल स्नान जा है। सीर्फ घरच जादै (भा. कुन्द कुम्न कृत मोक्ष प्रामृत गा० ५८ बीमारी उपरोक्त सय यातें दिगम्वरीय अपरिप्रदता को भारी है। .. - [ २८ ] महानुभाव ! इस अपरिग्रहता. से तो यही चरितार्थ होता है, कि- गुड़ खानी और गुल गुले से परहेज करना अर्थात-उपधि रखना और प्रस्न नाम का परहेज करना '.. दिगम्बर- वस्त्र वाला मुनि लजा परिषह को नहीं जीत सकता है। - जैन--परिपड २२ है, इनमें लजा नाम का कोई परिषह नहीं है । दिगम्बर ने अपनी मनवाने के लिये यह नया तुक्का चला रक्खा है। दिगम्बर-वस्त्र तो मुनि के लिये पुरुपेन्द्रिय के विकार को छीपाने का साधन है । मान वस्त्र वाला मुनि जितेन्द्रिय नहीं है। दिगम्बर मुनि ही जितेन्द्रिय है । जैन-दिगम्बर मुनि कितने जितेन्द्रिय हैं उनके कई प्रमाण "जैन जगत्" की फाइल में प्रकट हो चुके हैं। पूर्वोक्त दिगम्बर मुनि जय सागर जी ने क्या २ गुल खेला है तथा जबलपुर में दिगम्बर मुनि मनीन्द्र सागर के संघ के तीनों मुनियों की कृप पतन आदि कैसी २ शोचनीय दशा हुई है यह जैन जगत् से छिपा नहीं हैं मगर वे भी वेचारे करे क्या ? मनुष्य को नवम गुण स्थानक तक वेदोदय होता है, जो दिगम्बर होंने मात्र से दवता नहीं हैं। दिगम्बर के प्रायश्चित ग्रंथ भी दिगम्बरी दशा में चतुर्थवत दूपण का स्वीकार करते हैं देखो जंता रूदो जोणी ।। ४६ ॥ अण्णेहिं अमुर्णिदः ।। ५१ ।। परेहिं विएणाद. मेक वारम्मि ॥ ५२ ।। इंदिय खलणं जायदि० ॥ ४ ॥ 1. भाप इन्द्रनन्दि कृत छेदपीठम् ) ::
[ २९ ]
दिगम्बर यदि वे मुनि कत्या का प्रयोग कर लेते तो उन
की यह दशा नहीं होती ये कच्चे होंगे।
"जैन-महानुभाव दयाई प्रयोग से जितेन्द्रियता पाती है
कि मनके मारने से १ दवाई से प्राप्त की हुई वाह्य ऋतिम जितेन्द्रि-
यता से क्या लाभ?
1 : दिगम्बर-दिगम्बर शास्त्रों में दिगम्बर मुनि को नवम
गुण स्थानक तक पुं० स्त्री और नपुं० इन तीनों वेद का उदय माना
है जिनमें पुं० वेद अन्य गोचर है,
..
अतः उसे प्रयोग से दवा कर जितेन्द्रिय बनना श्रावश्यक है
जैन-ऐसी जितीन्द्रयता दिगम्बर को ही मुबारक हो,
नवम गुण स्थान वर्ती दिगम्बर मुनि में तीनों वेद का उदय मानना
और श्वेताम्बर मुनि पर सीर्फ वस्त्र : के ही: जरिये झूठा आक्षेप
करना, यह नितान्त मताभिनिवेश ही है।
;.: दिगम्बर श्वेताम्यरीय आचलक्य कल्प में भीवन का
निपेघ स्पट है। ..
.
जैन इस कल्प से निषेध नहीं, किन्तु विधान ही फिया
गया है।
--
.
जो मानता है कि-अपरिग्रता से वस्त्रों का सर्वथा निषेध
हो जाता है। उसको इस कल्प की आशा से ठीक उत्तर मिल
जाता है।
.
इस अचेलक कल्प के स्वतंत्र विधान से निर्विवाद सिद्ध है कि-
अपरिप्रदत्ता में यर फी व्यवस्था होती नहीं थी अतः इस खतंत्र
कल्प के द्वारा नयी व्यवस्था करनी पड़ी । सचमुच अपरिग्रहता।
माने मममत्य के द्वारा यस के विधि-निषेध फी व्यवस्था फैसे
[ ३० ] हो सकती है। वस्त्रों की मर्यादा के लिये स्वतंत्र विधान अनिवार्य था, जो प्राचेलस्य से बताया गया है। संस्कृत वगैरह भापायों में सर्वधा निषेध या अल्प निषेध करना हो, तब समासमें श्र और अन शब्द का प्रयोग किया जाता है जैसे कि- श्र-निषेध । अ+जीव-जीव से भिन्न, जीव रहित ।, श्र+ वृष्टि-वृष्टि का अभाव । अ-अल्पत्व । अ+नुदरी कन्या-छोटे पेटवाली कन्या: । श्र+श अल्पज्ञ । अ+वृष्टि-अल्पवृष्टि श्रा+शान-अल्प झान विप- रीतज्ञान । अ+वला अल्पवला । इत्यादि .. इस प्रकार यहाँ अचेल का अर्थ भी, अचेल माने "अल्प वस्त्र होना यही किया गया है इस कल्प से वस्त्रों का निषेध नहीं बल्कि मर्यादा हो जाती है । इस मर्यादा से भिन्न या अधिक वस्त्र रखने वाला निर्गन्ध मुनि वकुश है जो चात तत्वार्थ सूत्र के "विविध विचित्र परिः यह युक्तः वहु विशेष युक्तो पकरणा कांक्षी" इत्यादि से स्पष्ट है। दिगम्बर श्राचार्य को भी श्राचेलक्य का यही अर्थसम्मत है। दिगम्बर-दिगम्बरों ने श्राचेलक्य कल्प का विधान ही नहीं किया है। फिर सम्मति कैसी? जो अपरिग्रह से ही अचेलभाव का स्वीकार करते हैं। वे अचेलक कल्प का भिन्न विधान करके अपनी स्वीकृति को कमजोर क्यों बनायें ? जैन- अपरिग्रहता में वस्त्र की व्यवस्था नहीं है अतः एव दिगम्बर ग्रन्धकार आचेलक्य रूप वस्त्र व्यवस्था का अलग विधान करते हैं। देखिये- [ ३१ 2. आचेलुक्कुद्देसिय सेज्जाहर रायपिंड किदियम्म । बद जेट्ठ पडिक्कमणं मासं पजो समण कप्पो ।।..." (दि मा० घट्वरकृत मूलाचार परि० १० गा १८.मा० निगा० १२४६ ) अब घे ही आचार्य मुनि के लिये उपधि वगैरह की भी श्राशा देते हैं । देखिये-:-::. । पिंडोबधि सेज्मा ओ, अविसोधिय जो य भंजदें समणों। मूलठाणं पत्तो भुवणे सु हवे समणपोल्लो ॥ १० ॥२५॥ टीकांश-पिंड उपाधं शय्यां आहारोपकरणाऽऽवासादिकम विशोध्य इत्यादि । समणपोलो अर्थात् श्रामण्यंतुच्छ.ग. फासुग दाणं फासुगउवधि तह दोवि अत्तसोधीए' ।। जो देदि जोय गिएहदि. दोएणपि महष्फल होइ ।।१०१४शा : टोकांश हिंसादि दोप'रहित मुपकरणम् .. ....! 'णाणुवहि संजमुवहिं सउचुवहि अण्णमप्पुवहिं वा । पयदं गह-णिकखेबो संमिदी आदाण णिकखेवा ।। मुनि को शानोपधि संयगोपधि और भिन्न २'उपधि होती है। (परि गां०१४) मुनि के लिये और भी उपधि का जिक्र । (प० ३ गा० ११४) गुरु साहम्मिय दच्वं, पुत्थर्य मण्णं च गेएिहदुं इच्छे । तोस विणयण पुणो णिमंतणा होइ कायच्या ॥ १३८ ॥ गुरु द्रव्य, साधमिक मुनि द्रव्य, गुरु पुस्तक (१०४ गा०1३८) सारांश-अचेल कल्प भी वस्त्र की मर्यादा करने वाला होने से वस्त्र विधान का अंग ही है। दिगम्बर-वन वाले को सामायिक चारित्र नहीं होता है। जैन सामायिक देशाधगासिक और पौषध ये साधुजीवन के प्राथमिक शिक्षा पाठ है । इन सामायिक श्रादि को वस्त्र वाले . . - : .
[ ३२ ] गृहस्थ ही करते हैं, फिर कैसे माना जाय कि संवरन दशा में सा. मायिक नहीं है ? । यद्यपि दि० श्राचार्यों को संवस्त्र सामायिक श्रादि करने की बात खटकती है और उस सिलसिला में किसी २ ने तो इन श्रावक व्रतों को उड़ान तक की कोशीश भी की है, किन्तु वे काम- याब न हुए। इस बात का निम्न लिखित मत भदों से पत्ता पाया जाता है .. A६ दिग् ७ देशा ८ नर्थ दंड विराति ९ सामायिक 10 पोपधा पवासो ११ पभोग परिमाणा १२ तिथिसंविभाग व्रत संपन्नश्च ॥ २१॥ मारणान्ति की सल्लेखनां जोपिता च ॥ २२॥ 1 (दिगम्बरीय तस्वार्थ सूत्र अ०७) . B ६ दिगरिमाण, ७ भोगोपभोगप०८ अनर्थ दंड विरति ६ सामायिक १० देसावगासिक ११ पौपध १२ प्रातिथि संविभाग ( रख करंद श्रावका चार पं भाशाधर कृत सागारधर्मामृत) CE सामाइयं च पढम, ३०. चिदियं च तहेव पोसह भाणियं ।। " तइयं अतिहि पुज्जं, १२ चउत्थं सलहेणा अंते ॥ २६॥ ( आ० कुन्दः कुन्द कृत वारिन प्रामृत गा०.२६ ) * अतिथिसं विभाग की दिगम्बर विधि इस प्रकार है ।। व्रतम तिथि संविभागः, पान विशेषाय विधि विशेषेण । द्रव्य विशेष वितरणं, दातृ विशेषस्य फल विशेषाय । ५। ४१ । ज्ञानादिसिध्यर्थ-तनुस्यित्य-नाय यः स्वयम् । यत्नेनाऽतति गेहवा, न तिथि:र्यस्य सोऽतिथिः । ४२/- यतिः स्या दुत्तमं पात्रं, मध्यमं श्रावकोऽधर्मम् । सुदृष्टि स्तद्वि शिष्टत्वं, विशिष्ट गुण योगतः । ५।४४ । कृत्वा माध्यान्हिक भोक्तु-मुद्युक्तो ऽतिथये ददै । स्वार्थ कृतं. भक्न मिति, ध्यायन्नतिथि मीक्षताम् । ५ ।५। (पं०:आशाधर कृत सागार,धर्मामृत अ० ५.) . ...
i: [ ३३ ] .:DB ऊपर कै.अनुसार (भा शिवकोटिकृत रनमाला) (मा. देव सेनं कृत भाव संप्रा.) F भोगोपभोग विरमण के स्थान पर देशावगासिक का स्वीकार और शेष ऊपर के अनुसार (आ. जिनसेन आदि पुराण पर्व .) G सामायिक पौषध का अाकार, परिभोग का भिन्न आ- विष्कार, देशावगासिक का स्वीकार और शेष ऊपर के अनुसार (प्रा० वसुवन्दीकृत) अाजकल भी दिगम्बर समाज में जो सामायिक किया जाता है, वह ५ या 10 मिनट तक ध्यान रूप और जो पौषधं किया जाता है यह सर्फि उपयास रूप किया जाता हैं, 'माने वे उसमें असली रूप से नहीं रहे है। दिगम्वरत्व की रक्षा के कारण उन सामायिक देशावगासिक और पोषध व्रतों की कैसी शोचनीय दंशा.हुई है ? अस्तु । . T दिगम्बर चन वाले को छहा प्रमत्त गुण स्थान की प्रा नहीं होती है। जैन --यह भी पाप की मनमानी कल्पना है यदि मूच्छा वाले उस गुण स्थान को नहीं पा सकते है ऐसा माना जाय तय तो याकई में ठीक है मगर आपने तो कुछ का कुछ मान रपया है। असल में तो दिगभ्यर श्राचार्य वस्त्र यांल को ही नहीं वरन् गृहस्य को भी छठा और सातवा गुण स्थान की प्राप्ति बताते हैं। ::- फरमाते हैं कि जीप पांच ये गुण स्थान के याद सातवे गुण स्थान में ही चद जाता है । और बाद में लौट कर छटे गुण स्थान में पाता है। गुगण स्थान प्राप्ति का नियम है कि कोई जीप पाये से छठ में नहीं जाता है, मान पंचम गुण स्थान पर्ती - ।
[ ३४ ] श्रावक ध्यान दशा में अप्रमत गुण स्थान को पहुंच जाता है और अंतर्मुहूर्त के बाद छठा में आता है इस प्रकार शुरुमें गृहस्थ दशा में ही प्रमत्त व अप्रमत्त आदि गुण स्थान की प्राप्ति होती है वाद में कोई महानुभाव मुनि भी हो जाता है, मगर नग्न होते ही छहा या सातवाँ गुण स्थान मिल जाय ऐसा कोई एकान्त नियम नहीं है। भूलना नहीं चाहिये, दिगम्बर मत में पांचवें से सीधा छठा गुण स्थान की प्राप्ति मानी नहीं है। : -- .. दिगम्बर-क्या श्राप इस सम्बन्ध में किसी दिगम्बर विद्वान् का प्रमाण दे सकते है । जैन- महानुभाव ! दिगम्बर शास्त्रों में छट्टा सातवा गुण स्थान पाने में यह आम मान्यता है। अतः इस विषय के अनेक प्रमाण है। .. है। आप की प्रतीति के लिये यहाँ एक प्रमाण दिया जाता जैसाकि- "फिर.यही सम्यग दृष्टि जव अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय को ( जो श्रावक के व्रतों को रोकती है ) उपशम कर देता है तब चौथे स पाँचवे देश विरत गुण स्थान में आ जाता है इस दरजे में श्रावक की ग्यारह प्रतिमा पाली जाती है इससे धागे के दरजे साधु के लिये है यही श्रावक जय प्रत्याख्यानवरण कषाय का (जो साधु बत को रोकते हैं) उपशम कर देता है और संज्वलन व कपाय का (जो पूर्ण चारित्र को रोकती है ) मंद उदय साथ साथ करता है तव पाँचवे से सातवे गुण स्थान अप्रमत्त विरत में पहुँच जाता है, छठे में चरना नहीं होता है इस सातव का काल " [ ३५ ] अंतर्मुहूर्त का है। यहाँ ध्यान अवस्था होती है। फिर संज्वल नादि तेरह कपार्यो के तीम उदय से प्रमत विरत नाम उटे गुण स्थान में बाजाता है।"- (भा. कुन्द कुन्द कृत पंचस्तिकाय गा० १३ की ० शीतलप्रसाद कृत भाषी टीका सं० २१) .." ऊपर के प्रमाणों से भी यही मानना होगा कि वस्त्र वाला छटा व सातवाँ गुण स्थान का अधिकारी है, माने गृहस्थ और स्त्री ये सव इन गुण स्थान के अधिकारी हैं. यही कारण है कि भरत चक्रवर्ति को गृहस्थ दशा में ही केवल ज्ञान हुना था दिगम्बर विद्वानों ने भी इस मान्यता को लोकोक्ति के रूप में स्वीकृति दे दी है जिसकी विशेष विचारणा "मोक्ष योग्य" नाधिकार में की जायेगी। दिगम्बर--वस्त्र चाले को जैन मुनि मान लो, मूर्छा के प्रभाव होने से अपरिग्रही निर्गन्ध मान लो, छठा और सातवे गुण स्थान के अधिकारी मानलो मगर उसे मोक्ष हरागज नहीं मिल सकती है, क्योंकि नंगापन ही मुनि लिंग है । और वही मोक्ष मार्ग है । जैसे कि लिंगं जह जादु रूप मिदि भणिदं ॥ २४ ॥ (भाए कुन्द कुन्द कृत प्रवचन सार गा० २४) जैन--"ही" और "भी" ये एकान्त वाद और अनेकान्त बाद के भेदक सूत्र हैं । "नग्नता ही मोक्ष मार्ग है" ऐसा कहना ही एकान्त बाद है, और नग्नता भी मोक्षमार्ग है, ऐसा कहना सो अनेकान्त याद है । आप "अनेकान्त चादी" बन जाश्रो, जब श्राप को अपनी गलती ख्याल में आ जायगी। : नापमानते हो कि “नग्नता ही मोक्ष मार्ग है" तप.तो गनुप्य के अतिरिक्त सब प्राणी, चूहा, कुत्ता, विश्ली, सिंह, तोता, कौमा N .
[ ३६ ] पागल मनुष्य और दिगम्बर मुनि ही मोक्ष के लायक में वे सब दिगम्बर है। और सब सभ्यमनुष्य, दिगम्बर गृहस्थ तथा श्वेताम्बर मोक्ष के लिये अयोग्य है क्योंकि ये सब अदिगम्बर यानी श्वेताम्बर है। क्या यह ठीक मान्यता है ! यद्यपि दिगम्बर के आदि प्राचार्य कुन्द कुन्द दिगम्वरत्व के ऊपर काफी जोर देते हैं मगर वे या कोई भी दिगम्बर आचार्य नग्नता ही मोक्षमार्ग है ऐसा मानते नहीं हैं। खिलाफ में दिगम्बर और श्वेताम्बर सब कोई ऐसा अवश्य मानते हैं कि "सम्यग् दर्शन भान चारित्राणि मोक्ष मार्गः" 1 श्रा० कुद कुन्द स्वामी भी ताईद करते हैं कि- सम्मत्तनाणजुत्तं, चारित्तं राग दोस परिहिणं । मोक्खस्स हवदि मग्गो, भचाणं लद्धबुद्धीणं ।। १०६ ।। (पंचास्तिकाय समयसार गा० १०६) नाणेण दंसणेण य, सवेण य चरियेण संजमगुणेण । चउहि पि. समाजोगे, मोक्खो जिण सासणे दिट्ठो ॥३०॥ (दर्शन प्राभूत गा० ३०.) णय होदि मोक्खमग्गो लिगं जं देहणिम्ममा अरिहा। लिगं मुइत्तु दसण णाण चरित्ताणि सेवंत्ति ॥ ४३६ ॥ दंसण णाण चरित्ताणि, मोक्ख मग्गं जिणा चिंति ४४० (समयसार प्राभूत गा० ४३९-४४०) सामान्य बुद्धि वाला भी समझ सकता है कि आत्मा मोक्ष में जाती है शान दर्शन वगैरह आत्मा के गुण है अतः इन सम्यक दर्शन वगैरह से ही मोक्ष हो सकता है, विरुद्ध में शरीर मोक्ष में नहीं जाता है.वह चाह उपधि सहित हो या उपधि से रहित हो, मगर यहाँ ही पड़ा रहता है । इस हालत में नग्नता मोक्ष मार्ग नहीं हो सकती है। सम्यक् दुर्शन आदि को छोड़ कर नग्नता को मोन
1.
मार्ग मानना यह न्याय रूप कैसे हो सकता है ? वस या उपधि
में ऐसी कौन सी ताकत है जो कि सम्यक् दर्शन, सम्यक शान
और
सम्यक् चारित्र होने पर भी मोक्ष को रोके
"दिगम्बर--नाय ! वस्त्र केवल ज्ञान को रोकता है।
जैन महानुभाव ! यह आपकी सुझ' अर्वाचीन-दिगम्बर
पंडितों की ही कृपा का फल है। परन्तु दिमाग से जरा सा तो
सोचिये कि यह किस हद तक सत्य है । एक मामूली 'शान भी
वस्त्र पहिनने से न रुकता और न दव सकता है । तो केवल ज्ञान
जो कि अधाति चार कर्मों के द्वारा भी नहीं दव सकता है कैसे
दच जायगा उस लोकालोक प्रकाशकं केवलशान को सिर्फ देह से
ही सम्बन्धित वस्र दया देखें या भगा देवें यह तो दिगम्यरत्व के
आग्रही को ही विश्वास हो सकता है
दिगम्बर “शायटायनाचार्य" भी साफ फरमाते हैं कि-घस्त्रा
द् न मुक्तिविरदो भवतीति इस दिगम्बर मान्यतानुसार पाण्डवों को
गले में लोहा होने पर भी फेवल ज्ञान की प्राप्ति व.उपस्थिति
मानी जाती है, फिर सघन दशा में केवल ज्ञान का प्रभाव क्यों
माना जाय।
केवलझान सिंहासन स्वर्णकमल इत्यादि विभूतियों से या देह
गुणों से दब जाता नहीं है, मगर यस्ल से दव जाता है। यह कितनी
धुदिन्य कल्पना है?
(समय प्रा० गा. ३,१५).
सारांश-केयल शान ऐसी पौद्गलकि यस्तु नहीं हैं कि जो
पल से रुक जाय
दिगम्बर उपधि के लिये हमारे शास्त्र का पाठ दीजिये
जैन--उपपि के बारे में दिगम्बरीय प्रमाण निम्न हैं।
[१८] १-अप्पडिकुटुं उवाधं, अपत्थणिज असंजद जणेहि मूच्छादि जणण रहिदं, गेरहदु समणो यदि वि अप्पं ॥२२॥ आहारे व विहारे देशं कालं समं खमां उपधि । जाणित्ता ते समणो चट्टदि जदि अप्पलेवी सो॥ ३० ॥ (भा० कुन्द कुन्द प्रवचन सार) दिगम्बर मुनि उपधि का स्वीकार करे. परन्तु उस में ममत्व नहीं रक्खें । आहार और विहार में उपधि की अपेक्षा को समझ कर योग्य प्रवृति करे ! -- २-सेवहि चउविहलिंग, अम्भिंतरलिंगसुद्धि मावण्णो । बाहिर लिंगमकज्ज, होइ फुडं भाव रहियाणं ॥१०६ ॥ ( भा० कुंद कुंद कृत भाव प्राभूत गा• १ ९) ३-ववहारो पुण णो, दोरिण वि. लिंगाणि भणदि मोक्ख पहे। थिच्छणयओ दु णिच्छदि, मोक्खपहे सव्वलिंगाणि ॥ -कांश-व्यवहारिक नयो द्वे लिंगे मोक्षपथे मन्यते । द्रव्यलिंगमात्रेण संतोपं मा कुरु किन्तु द्रव्यलिंगाधारण निश्चय- रत्न त्रयात्मक निर्विकल्प समाधिरूप भावनां कुरुत । द्रव्य- लिंगाधार भूतो योऽसौ देहः तस्य ममत्वं निषिधं । मान व्यवहारनय मोक्षमार्ग में मुनि वेश और ज्ञानादि एवं दोनों का स्वीकार करता है और निश्चयनय मोक्ष मार्ग में सव लोगों का निषेध करता है : आ. कुंद कुंद कृत समय-प्रामृत गा०.४४४: . भा. जिन सेन कृत तात्पर्य वृत्ति पृ. २०८) ४-पिंडं उवधि सेज्ज, उग्गम उप्पाद णेसणादीहि । चरित्त रक्खणटुं, सोधिंतो होइ सुचरितो ।। २६३ ॥ (भगवती भाराधना गा० २९३ पृ० ११) - [३९] -उपधि, शांनोपधि, संयमापधि, तप उपाधि इत्यादि (मा० कटेर कृत.मूलाधार परि० गा० १५j परि० ३ गा परिक गा. १३८ परि० १० गा० २५,४५) पिंडोवधि सेज्झाओ, अविसोधिय जोय भंजदे समणो मुल ठाणं पत्तो, भुवणे सु हवे समणपोल्लो ।। २५ ॥ फासुगदाणं फासुगमुंबधि, तह दो.वि अत्त सोधीए देदि जो य गिएहदि, दोएहपि मइंप्फलं होई॥ ४५ ॥ पिंड, उपधि, शय्या, संस्तारक फासुक उपधि वगैरह, (.मूलाचार परिच्छेद ।) ६-सम्यक्त्व ज्ञान शीलानि तपश्चेतीह सिद्धये । तपा मुपग्रहार्थाय स्मृतं चीवर धारणम् . (वाचक श्री उमा स्वातिजी) "अविचिक्त परिग्रहाः" "उपकरणाभिवक्त चित्तो विविध विचित्र परिग्रह युक्तः बहु विशेष युक्तापकरणां कांक्षी तत्संस्कार प्रतिकार सेवी" ये सबभिन्नः२.निर्गन्थों के लक्षण है, उप करण के कारण ही निर्गन्थों में जो जो भेद हैं चे यहां बताये गये हैं इसीसे सप्रमाण है कि पांचो निग्रन्थ वस्त्रादि उपकरण को रखते हैं । लिंग श्रमणों का द्रव्य लिंग माने वस्त्रादि वेष भिन्न प्रकार के होते ई और इस व्यलिंग के जरिये निर्गन्थ भी अनेक प्रकार के है (पूज्यपाद कृत सर्वार्थ सिद्धि और भा.कृत राजेवार्तिक पृ०३५४ ३५९) "कम्बलादिकं गृहत्विा न 'प्रक्षालते" इत्यादि '... " (दि. 'आ० ध्रुत सांगर कृत तखार्थ 'भ९ सू० की टीका; चर्चा सागर समीक्षा प्रस्तावना) द्रव्य प्रतीत्य भाज्या [४..] १० तपः पर्याय शरीर सहकारि भूतमन्न पान संयम शौच ज्ञानोपकरण तृण मय प्रावरणादिकं किमपि गृह्णन्ति तथापि ममत्वं न करोति । i. अन्नोंपकरण, पानोपकरण, संयमोपकरण, যালীবন্ধ ज्ञानोपकरण और तृण्ज वस्त्र वगैरह दिगम्बर मुनि के उपकरण । इनमें ममता न करें। (ब्रह्म देव कृत परमारम प्रकाश गा० २१६ को टीका पट २३३) भरहे दुसम समये सद्य कम मोल्लिऊण जो मृढो । परिवहइ दिगविरो, सो समणो संघ बाहिरओ ॥१॥ पासत्थाणं सेवी, पासत्थो पंचचेल परिहीणो। विवरीयकृपयादी, अबंदणिज्जो जइ होई ।। (दि. भद्रवाह संहिता खं० ३ भ० ७ गा० ) ११ कोऽपवाद वेशः ? कलौ किल म्लेच्छादयो नग्नं दृष्टवा उपद्रवं यतीनां कुर्वन्ति, नेन मण्डपहुँगै श्री बसन्त कीर्ति स्वामिना चर्चादि वेलायां तट्टी सादरा दिकेन शरीर माच्छाद्य 'चर्यादिकं कृत्वा पुनस्तन्मुंचतिइत्युपदेश कृतः संयमिना मि- त्यपवादवेषः। तथा नृपादि वर्गोत्पन्न परम वैराग्यवान् लिंग शुद्धि रहितः उत्पन्न मेहनपुट दोष लज्जावान् वा शीताद्यसहिष्णुर्वा तथा करोति सोप्यपवादलिगः प्रोच्यते । (आ. कुन्द कुन्द कृत दर्शन प्राभत गा०, २४ की उमय भाषा चक्रवर्ति दि: कलिकाल सर्वज्ञ मा. श्रुतसागर कृत टीका पृ०.२३ 1 पं० परमेष्टीदास कृत चर्चा सागर. समीक्षा प्रस्तावना - . १२-णिक्खेवो" यत् किंचित् . वस्तु पुस्तक कमण्डलु मुख्य क्यचिनिक्षिप्यते मुच्यते ध्रियते तान्नक्षेप स्थानं दृष्ट्वा तशवे ...
. ..[ ४१ ] प्रतिलिख्य च भियते मयूरपिच्छस्याऽसन्निधाने ,"मृदुवस्त्रेण" कदाचित्तथा कियते निक्षेपणा नाम्नी पंचमी समीति भवति ॥ (चारित्र प्राभृत गा० ३६ श्रुतसागरी टीका) २४-मुनि चारित्रो पकरण पीछी के विना नहीं चल सकता है (पारिप्रसार, छेदपीढगा० ८०, चर्चासागर ध;०७, भा० कुन्द कुन्दं चरित्र) १५-तयोरुपकरणा सक्ति संभवात् आर्तध्यानं कदाचित्कं समवति, आर्त ध्यानेन लेश्यादित्रयं भवतीति । पांचो निर्गन्ध उपकरण वाले होते हैं उनमें से वकुश और प्रति सेवना'कुशील को कभी 'आसक्ति भी होती है जब उनको आर्त ध्यान होता है तब शुरू की तीन लेश्या ये भी होती हैं। ( चारित्र सार, विद्वज्जन बोधक ७९) १६-मोक्षाय धर्मसिध्यर्थ शरीरं धार्यते यथा । शरीर धारणार्थ च भैक्षग्रहण मिष्यते ॥१॥ तथैवोपग्रहार्थाय पात्र चीवरमीप्यते । जिनै रूपग्रहः साधो रिष्यते न परिग्रहः ॥ २॥ माने मोक्ष और धर्म की साधना में शरीर भीक्षा पात्र वस्त्र वगैरह उपकारक साधन है ये परिग्रह नहीं हैं किन्तु उपग्रह है। (वा० अश्वसेन कृत" १७-घस्न पात्राश्रयादिन्य-पराण्यपि यथोचितम् दातव्यानि विधानेन रत्नत्रितयहतव ॥ (आ. अमितगति), १८-शय्या सनोपधानानि, शास्त्रोपकरणानि च '.. पूर्व सम्यक्समालोच्य प्रतिलिख्य पुनः पुनः १२. गृहणतोऽस्य प्रयत्नेन, क्षिपतो वा धरातले भवत्य विकला साधो-रादान समिति स्फुटम् १३. शय्या, श्रासन, उपधान, शास्त्र उपकरण वगैरा.. - [२] (दि० मा० शुभ चन्द्र शासनानणय अ० ८ गो. १२.१६) १६-कोपीनपि समृछत्या ना त्यायों महाव्रतम् ॥ अपि भाक्त ममृच्छत्वात साटक यायिकाईति ॥३६॥ मृा होने के कारगा लंगोटी बाला श्रावक भी उपचरित महावत के योग्य नहीं है, मगर "मूच्छी नहीं होने के कारण" वस्त्र वाली श्रमणी भी उपचरित महानन के योग्य है । मान वस्त्र बाल को महावत है मूली वाल को नहीं है। यदोन्सर्गिक मन्यहा, लिंगमुक्त जिनः स्त्रियाः पुंवत्त दिप्यते मृत्यु काले स्वल्प कृतापधः ।। ३८ ॥ दह एव भवो जन्तो-यंटिगं च तदाश्रितम् ।। जातिवंत्तद् ग्रहं. तत्र, त्यक्त्वा स्वात्म ग्रई वशत् ।। ३६ ।। शय्योपध्या-लोचना-न-चयावृत्या पंचधा ।। शुद्धिः स्यांत दृष्टि-धी-वृत्त विनयावश्यका वा ॥ ४२ ।। खापशटीकांश-स्यादसोशुद्धिः । कतिधा ? पंचधा । केपु ? शय्यादिषु विपयेपु। तत्र, शय्या वसति संस्तरी: उपधिः-संयम साधनमा वृत्त-चारित्र “निरति चार प्रवृत्तिः ॥ ४२ ॥ वाह्या ग्रन्थों गमक्षाणा-मान्तरो विपयपिता ।। निमोहस्तत्र निर्ग-थः पान्थः शिवपुरे यतः ॥ ८६ ।। मान शरीर इन्द्रिय वगैरह वाह्य ग्रन्थ हैं विषयेच्छा अांतर ग्रन्थ है, उनमें "ममता" न रक्खो । * निर्गन्थो को , त्याज्य · वाय ग्रन्ध और अभ्यं तर अन्य का स्वरूप इस प्रकार है- सो विय गथो. दुविहो; बन्झो भम्भितरो अयोधव्यो भंतो.चोइस विहो, दसंहा पुण बाहिरो गयो । ८२३ ॥ - . [ ४३ ".:. विवेकोऽच कपायां ग भक्तो:पधिपु. पंचधा। " " स्यात् शय्यो पधिकायान्न बैयां वृत्य करेषु वा ॥२१॥ इन्द्रिय, कपाय: शरीर; श्राहार व उपधि में यां शय्या, उपाधि, शरीर, श्राहार, व वैयावृत्य में विवेक रखना ॥ २१७ ।। (सं० २९६ में पं० भावापर कृत सटीक सागार धर्मामृतं भ०..) २०-अपवित्र पटो नग्नो, नग्नश्चार्धपटः स्मृतः । : नग्नश्च मलीनोद्वासी, नग्नः कौपीन वानपि ॥ २१ ॥ कपाय बासंसा नग्नो, नग्नश्चानुत्तरीय मान् । अन्तः कच्छो बहिः कच्छो, मुक्तकच्छस्तथैव च ॥ २२ ॥ साक्षानग्नः स विज्ञेयो, दशनग्नाः प्रकीर्तिताः ॥ २३ ॥ माने दश किस्मक नग्न होते हैं। (दि० भा० सोमसेन कृत त्रिवर्णाचार भ० ३ सं.१६६५) .. खेतं' वरयुधस धन', संचओ५ मित्त-गाइ-संजोगो....। शाण संयणासणाणि, दासी दास च फुषियं च ॥ २५ ॥ .... कोही माणो माया.मोमी पेज नहेय दोसोम -मित्त वेद भरह, रहा हास सोगो भय दुर्गा ॥ : .सावजेण विमुका, सस्मिंतर वाहिरेण गण ) : 7. निगाहपरमा य विदू, तेणेय होति निगाथा...८३२.. कई सावधिमुछा, कोहाईएहिं केई भयध्या ॥ २३ ॥ .:: (भी संघदासगणिक्षमाश्रमणकृत, गृहस्कल्पसूत्र माप्य ) क्षेत्रं वास्तु धन धान्यं, द्विपदं च चतुष्पदं । हिरण्यं न सुवर्ण छ, फंप्यं भाण्ड यहिदंश ॥1॥ मिप्यायवेदी हास्यादि-पट काय चतुष्टयं । रागद्वेपी व संगास्यु-ताः घनुदंदा ॥२॥ नकायंपीडी रमाल । भाण्ड-कमंडलु, पात्र ! . दर्शन प्राभून गा: १ टीका, भाव मामृत गा ५६ टीका )
[१]
दिगम्बर--मुनि को उपधि रखना चाहिये, मगर उसमें
उनी रजोहरण और कमली नहीं रखना चाहिये ? क्योंकि ऊन
अपवित्र वस्तु है यदि रजोहरण रखना अनिवार्य है तो मोर पीछ,
गीधपीछ, चलाक पीछ या और कोई पीछ रखनी चाहिये ? क्योंकि
ये पवित्र हैं
जैन-चमडी केश नख पीछे ये सय एक से हैं, इनमें पवित्रता
और अपवित्रता का भेद कैसे माना जाय ?
दिगम्बर--पीछे, कुदरतन मिलती हैं इनके पाने में मोग
आदि की हिंसा नहीं होती है अतः पीछे पवित्र हैं। ऊन कतर के ली
जाती है इसके पाने में भेड़ वगैरह की हिंसा होती है या वह मरे
हुप भेद की मीलती है अतः ऊन अपवित्र है।
जैन
महानुभाव! पीछे खींचने से मोर को बड़ा कष्ट होता है
वह मर भी जाता है, पीछे मुश्किल से प्राधाकर्मीक प्रादि दोषयुक्त
और मरे मोर के भी मिलते हैं, यह है आपकी पवित्र वस्तु । और
जिस वस्तु के पाने में न भेड़ की हिंसा है न कष्ट है. न प्राधाकर्मी
पाप है और ऋतु आदि की अपेक्षा से जिसका काटना अनि.
वार्य एवं उपकार रूप माना जाता है, वह वस्तु है. अपवित्र !
इस प्रकार मनमानी कल्पना से क्या कोई वस्तु पवित्र या
अपवित्र बन सकती है !
यहाँ वस्तु स्थिति यही है कि दिगम्बर विद्वानों ने श्वेताम्बर
मुनिभेष की निन्दा करने के लिये ऊनको अपवित्र लिख दिया है
वास्तव में ऊन अपवित्र नहीं है लौकिक व्यवहारों में भी उनी सूती
कपड़े की बनिस्पत अधिक पवित्र मानी जाती है।
दिगम्बर- जब मुनि वस्त्र रख सकते हैं तो उनको पात्र
रखने में किसी प्रकार का विरोध नहीं होना चाहिये, कमण्डल
--
[४५ ] रक्खें या पात्रं, वह एक सी वात है । एक.नग्न के लिये : उपयुक्त है, दूसरा वस्त्र वालों के लिये। जैन---संभवतः कमण्डल रखना यह सन्यासियों का अनु- ‘करण है । प्रति लेखना की अपेक्षा से तो पात्र रखना जैन मुनि के लिये अधिक उपयुक्त है इसके अलावा दिगम्बर शास्त्रों में पात्र के लिये तिरोहित विधान भी मिलता है । जैसे- 1-तब वाल वुड्ढ सुय आयराहं 'दुब्बल तणुरोह दुहांयरांह। ओसह पय पच्छाय जोगु जासु, दहविणु विजावगु तासु ॥ किरतो णिदियो मुर्णिदु । हुओ णदिमितु नाम. जियणिंदु । (घत्तायध-हरिवंश पुराण). माने-तपस्वी याल वृद्ध श्रुतधर आचार्य दुर्बल और रोगी धगैरह की आहार पानी और औपघि श्रादि से वैयावृत्य करने का विधान है। जो पात्र रखने से ही साध्य है। सर्वथा शक्ति रहित और यांमार साधु की वैयावृत्य करने की शास्त्रों की आशा है। यह उठ भी नहीं सकता है जब दूसरा मुनि पात्र द्वारा शुद्ध आहार पानी लाकर उसकी चैयावृत्य करे तव वह पाहार पानी ले सकता है, इस हालत में चैयावृत्य की सफलता है एवं पात्र रखना ही अनिवार्य है। २-मुनि श्राहार पानी से वैयावृत्य करे । (पूजापाठ) मानेमुनि पात्र के जरिये लाये हुए आहार पानी से प्राचार्य की भक्ति करे साधर्मिक (मुनि) की भक्ति करे। ३-रात्री ग्लानेन भूक्ते स्यादकस्मिं श्च चतुर्विधे ।। उपवासः प्रदातव्यः षष्ठमेव यथा क्रमम् !: ३३ ।। टीका-रात्रौ निशिग्लानेन व्याधि विशेष परिश्रम विविधो- पवासादि परिपीडितेन सता कर्मोदय -वशात् प्राणसंकरे। भुक्ते [४] भ्यव्यवहते सति । स्थात् भवत् । एकस्मिन् भुक्त एकतराहारे भुक्ते सति । चतुर्विधे चतुष्प्रकार अशन पान ग्वाय स्वायत्र ! उपवासः क्षमणं. प्रदातव्यः प्रदेयः पाष्टमय प; यथाक्रम यथासंग्य पकास्मिन्नाद्वारे क्षमा, चतुर्विधाहांग पाट मिति ॥ ३३ ॥ (दिगम्बरीय प्रायश्चित्त चूलिका श्लो० ३३ } यदि मुनि न वस्त्र रग्वे. न श्राहार पानी लावे. तो बह रात्रि भोजन और तज्जन्य प्रायश्चित का प्रसंग कैसे हो सकता है ! भूलना नहीं चाहिये किं-दिगम्बर शास्त्र में दिगम्बर मुनि के लिये ही यह प्रायश्चित बताया है। ४-रत्ति गिलाणभत्ते, चउविह एकम्हि छम्स मगायो उवसग्गे सठाणं, चरित्रापविट्ठस्स मूलमिदी ।। २६ ।। टीका-रात्रौ च्याधियुते चतुर्थिधाहारे पष्टं। एक बिधाहारे भुक्त उपवासः । उपसर्ग रात्रिभोजी पत्र कल्याणं । रात्रौ चोप्रविणः मूलं गच्छति ! "न तस्य पंक्ति भोजनम्" । इतिषष्टं यतम् ॥ २६॥ (छेद शास्त्र प्रायश्चित्त संग्रह) माने-दिगम्बर शास्त्रों के अनुसार इनके मुनि रात्रि भोजन का प्रायश्चित लवे यह बात पात्र होने के पक्ष में जाती है। यहाँ उस मुनि के लिये "पंक्ति भोजन के त्याग' रूप दंड" बताया है। इससे भी सिद्ध है कि श्रमण पात्र को रक्खें उनमें आहार पानी लावे और एक पंक्ति में बैठ कर आहार करें, दोपित साधु इस पंक्ति में बैठने का हकदार नहीं है। यह पंक्तिभोजन भी पात्र रखने के पक्ष में है। --पंचानां मूलगुणानां रात्रिभोजनबजनस्य च पराभियोगात् बलादन्यतम प्रतिसेवमानः पुलाको भवति । (तत्वार्थसूत्र ) माने रात्रि भोजी श्रमण पुलाक है । जैन निर्गन्थ पात्र द्वारा - - .
: " [४७' ] श्राहार पानी लाकर दिन दिन में ही श्राहार कर लेते हैं। मगर कोई मुनि उसको रसले और रात्रि भोजन करे तो यह पुलाके है। ६.मुनि रात को एक बार भोजन पान करे तो तीन उपवास अर्थात तीन वार नमोकार मंत्र का जाप करना चाहिये । (दिगम्बर चर्चा सागर पृ० ३२१ च० समीक्षा पृ० ३२३). भट्ट० इन्द्र नन्दी के नीतिसार श्ला०४६ में भी रोगी साधु की परिचर्या करने का विधान है जो पान के जरिये साध्यं हैं सारांश-जैन निर्गन्थ पात्र को रखें। जिनके जरिये ये आहार पानी ला सकते हैं और दूसरे मुनियों की भक्ति भी कर सकतें: हैं। इत्यादि । : जिनागम में उल्लेख है कि-मुनि लोहार्यजी पान होने के कारण ही तीर्थकर भगवान महवीर स्वामी फ़ी याहार -पानी आदि से या वृत्य करते थे। (श्रा०नि० गा०........ टीका) दिगम्बर--मुनियों को दंड (डंडा) रखना उचित नहीं है, कभी यह अधिकरण भी बन जाता है। जन:- ठीक बात है पाप श्रमण के पास उपकरण भी अधिः; करण बन जाता है, ऐसी हालत में तो दंड ही क्यों पीछी कमण्डल, पुस्तक, यमाल और शरीर, ये सब अधिकरण बन जाते है । मुनि फुस्ति लड़ें, कमंडल पाळी या पुस्तक मे दूसरे को मारे, या पुस्तक के यमाल से फिसी को पांधे तो उसके लिये शरीरादि उपकरण अधिकरण ही बन जात है, इसमें उपकरण का फ़्यादोप? इसमें तो मुनि ही दोषित है। जनजगत और जनमित्र की फाइलों में अनेक ऐसे समाचार उप है कि जिनमें दिगम्बर मुनियों ने उपकरण को अधिकरण यनाया हो उसके प्रमाण है। नधिकार भगवान श्री महाधार स्यामी फरमाते ६ फि- जे प्रासया त परिसंपांज परिसयां ते मासया !" . -1 ।
[४८.]
जो श्राश्रयं के हेतु हैं वे ही संवर के हतु हैं जो संघर के इंतु
हैं वे ही श्राश्रय के हेतु है . कैसा अच्छा खुलासा है ?
समय प्राभूत गा० २८३ में भी इसी का ही अनुकरण है।
इस अंपेक्षा से दंड भी उपकारक उपकरण है और मुनि उसे
आवश्यकता के अंनुसार रखते हैं।
दिगम्बर--- उपधि किसे मानी जाय ?
जैन-जिसके जरिये पांच महावतों का निर्वाह, झानादिकी
पुष्टि और समीति आदि का पालन अच्छी तरह होता है वह
उपधि है, वहीं उपकारक परद्रव्य है । जिसके द्वारा उपरोक्त फल
न हो, वह उपधि नहीं किन्तु उपाधि ही है।
दिगम्बर--उपधि से क्या लाभ है ?
जैन- जैन निर्गन्धों को उपधि द्वारा अनेक लाभ प्राप्त होते
हैं जिनमें से कुछ निम्न प्रकार हैं
1-नग्नता से धर्म की निन्दा होती है, धर्म प्रचार रुक जाता है,
विहार में बाधा पड़ती है, राजा महाराजा विविध फरमान निका-
खते है, बच्चे उरते हैं, सभ्य समाज अपने घरमें नहीं आने देता
अजैन का आहार पानी बंद हो जाता है, एक ही घर से गोचरी
करनी पडती है, और जैन शासन को अनेकों विधि नुकसान
होता है। सिर्फ दो चार हाथ का वस्त्र न होने से इतना नुकसान
उठाना पड़ता है। एक दिगम्बर विद्वान ने ठीक ही कहा है।
अल्पस्य हेतोबहु नाश मिच्छन् । विचारमूढः प्रविभाव्य से त्वम् ।
मुनि जैन धर्म को इस नाश में से चोल पटाके जरिये बचा
। वस्त्रधारी मुनि सब स्थानों में जा सकता है । राजा के
में भी सत्कार पूर्वक प्रवेश पा.सकता
..
[ ४९ ] २-"मुद्दपत्ति". भापा समिति के पालने में अनिवार्य उपधि है। ३--पीछी और "रजोहरण (ोघा)" यह जैन मुनि का लिंग है, अहिंसा का साधन है। श्रा० कुंद कुंद ने भी आकाश में जाते समय इसं मुनिलींग (वाना) को ही प्रधान माना है। ४- केसरिका" से यथार्थ प्रति लेखना होती है चारित्र प्राभूत गा०३६ की टीका में इसी की ही स्वीकृति दी है। ५-जीवाकुल भूमि में जीवों की दया के निमित दंडासणं रखना चाहिये जिससे उनकी फलियों का परिचं बनाया जाय तो भी दोनों पैर के लिये फासुक जगह मिल जाती है, रात्रिको देह चिता के लिये जाने थाने में दंडासण से ही इर्यासमिति पाली जाती है। .६-पात्र अभाव में मुनि को एक स्थान से ही आहार लेना पडता है। जिसमें गोचरी की शुद्धी नहीं हो सकती है। गाय चरती है तब थोडा २ खाते २ आगे बढती जाती है कहीं एक स्थान से ही घास को समूल नष्ट नहीं कर देती है ऐसा करने से उसकी चरभूमि हरी भरी रहती है । इसका नाम है "गो-चरी"। भौरा विभिन्न फूलों से अल्प अल्प रस को पीकर संतुष्ट रहता है। और ऐसा भी नहीं करता है जिससे फूलों को पीडा हो इस विधि का नाम है "भ्रामरी" यानी "मधुकरी"। गघा जहाँ चरता है यहाँ से घास विलकुल सा जाता है यानि बिलकुल सफाचट कर देता है। इस विधि का नाम है "गधाचरी" मुनि को पात्र के प्रभाव में उप- रोक्त कथनानुसार गोचरी और मधुकरी तो हो ही नहीं सकती है। एक स्थान पर श्रद्दार लेने से अल्प कौटुम्पिक को तो फभी दुवारा रसोई करनी पड़ती है, आधार्मिक औइशिकादि दोप भी लगते है, गुरुमक्ति साधर्मिक भक्ति या ग्लान घेयावृत्य को तिलांजली हो M
१
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४८.
'जो श्राव के हेतु हैं वे ही संवर के हतु हैं जो संवर के हेतु
हैं वे ही आश्रव के हेतु हैं कैसा अच्छा खुलासा है ?
समय प्राभूत गा० २८३ में भी इसी का ही अनुकरण है।
इस अंपेक्षा से दंड भी उपकारक उपकरण है और मुनि उसे
आवश्यकता के अनुसार रखते हैं।
दिगम्बर- उपधि किसे मानी जाय ?
'जैन--जिसके जरिये पांच महावतों का निर्वाह, शानादिकी
पुष्टि और समीति आदि का पालन अच्छी तरह होता है वह
उपधि है, वही उपकारक परद्रव्य है । जिसके द्वारा उपरोक्त फल
न हो, वह उपधि नहीं किन्तु उपाधि ही है ।
दिगम्बर:-उपधि से क्या लाभ है ?
जैन---जैन निर्गन्धों को उपधि द्वारा अनेक लाभ प्राप्त होते
हैं जिनमें से कुछ निम्न प्रकार है।
-नग्नता से धर्म की निन्दा होती है, धर्म प्रचार रुक जाता है,
विहार में बाधा पड़ती है, राजा महाराजा विविधः फरमान निका.
लतें है, बच्चे डरते हैं, सभ्य समाज अपने घरमें नहीं आने देता
है, अजैन का आहार पानी बंद हो जाता है, एक ही घर से गोचरी
करनी पडती है, और जैन शासन को अनेकों विधि नुकसान
होता है। सिर्फ दो चार हाथ का वस्त्र न होने से इतना नुकसान
उठाना पड़ता है। एक दिगम्बर विद्वान ने ठीक ही कहा है।
अल्पस्य हेतोबहु नाश मिच्छन् । विचारमूढःप्रविभाव्य से त्वम् ।
मुनि. जैन धर्म को इस नाश में से चोल पटाके जरिये बचा
लेता है। वस्त्रधारी मुनि सब स्थानों में जा सकता है । राजा के
अंतःपुर में भी सत्कार पूर्वक प्रवेश पा सकता है।
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- [ ४९ ] : २-"मुहपत्ति: भाषा समिति के पालने में अनिवार्य उपधि है। .. ३--पीछी और "रजोहरण (ोघा)" यह जैन मुनि का लिंग है, अहिंसा का साधन है। श्रा० कुंद कुंद ने भी श्राकाश में जाते समय इस मुनिलींग (चाना) को ही प्रधान माना है। ४-"केसरिका" से यथार्थ प्रति लेखना होती है चारित्र प्राभूत गा० ३६ की टीका में इसी की ही स्वीकृति दी है। ५-जीवाकुल भूमि में जीवों की दया के निमित दंडासणं रखना चाहिये जिससे उनकी फलियों का परिघं बनाया जाय तो भी दोनों पैर के लिये फासुक जगह मिल जाती है, रात्रिको देह चिंता. के लिये जाने पाने में दंडासण से ही इर्यासमिति पाली जाती है। . १ - ६-पात्र के अभाव में मुनि को एक.स्थान से ही आहार लेना पडता है। जिसमें गोचरी की शुद्धी नहीं हो सकती है। गाय चरती है तब थोडा २ खाते २ आगे बढ़ती जाती है कहीं एक स्थान से ही घास को समूल नष्ट नहीं कर देती है ऐसा करने से उसकी चरभूमि हरी भरी रहती है। इसका नाम है "गो-चरी"। भौरा विभिन्न फूलों से अल्प अल्प रस को पीकर संतुष्ट रहता है। और ऐसा भी नहीं करता है जिससें फूलों को पीडा हो इस विधि का नाम है "भ्रामरी" यानी "मधुकरी" गधा जहाँ चरता है वहाँ से घास बिलकुल खा जाता है यानि बिलकुल सफाचट कर देता है। इस विधि का नाम है "गघाचरी' मुनि को पात्र के प्रभाव में उप. रोक्त कथनानुसार गोचरी और मधुकरी तो हो ही नहीं सकती है। एक स्थान पर प्रहार लेने से अल्प कौटुम्बिक को तो कभी दुवारा रसोई करनी पड़ती है, आधार्मिक औइशिकादि दोप भी लगते है, गुरुभक्ति साधर्मिक भक्ति या ग्लान वैयावृत्य को तिलांजली ही [ ५०] देनी पड़ती है, गुरु को बताने का और गुरु की याशानुसार या गुरुदत्त आहार पाने का लाभ नहीं मिलता है और गुरु को बिना दिखाये आहार लेते २:क्वचित् स्वच्छन्दताका भी, अवकाश, मि- लता है। पात्र के अभाव में बीमार या बूढा मुनि तो भूखा, ही मरे क्योंकि उसके लिये गृहस्थ ला नहीं सकता है, साधु लाकर देता नहीं है, इस हालत में जैन धर्म की निन्दा होती है। मान लिया जाय कि इस हालत में मुनि मरे तो देव बनेगा परन्तु यह तो केवल कल्पना मात्रा ही है। यदि वह आतध्यान में हो तो क्या होगा? मान लो देव बने तो भी क्या लाभ ? सटीक पंचास्तिकाय गा०.३० में इस प्रवृत्ति को अपवाद निरपेक्ष उत्संग मानकर निपिद्ध बताई है। दिगम्बर शासन में इस प्रकार की. अग्राह्य प्रवृत्ति यानि अपवाद निरपेक्षं उत्सर्ग की प्रधानता होने के कारण ही भट्टारक वन हैं और शास्त्री वढे हैं। पात्र रखने से मुनि को उपरोक्त दोपों से बचाव होता है। आहार लाकर और गुरु को वताकर खाने से शिथिलता या स्वच्छ दुता नहीं आती है । दिगम्बर मुनि कमण्डल रखते हैं मगर उसमें प्रति लेखना करना दुःसाध्य है छिद्र होता है उसकी प्रतिलेखना में भी मुश्किल होती है ७--श्रासन और शय्या होय तो वहाँ त्रसजीव एकदम नहीं. आ सकता है। और यदि आजाय तो उसको त्रास न हो वैसे . दूर हटाया जा सकता है। ८-चातुर्मास में जीवोत्पत्ति बहुत होती है, उनके रक्षण हेतु पाटा आदि का चौमासा में इस्तेमाल करना आवश्यक है जैन मुनि को .. पानी की गहराई देखकर नदी पार करने की आज्ञा तो है ही, मगर पानी कितना है. यह कैसे जाना . :- . [ ५१ ॥ जाय? इस उपस्थिति में देह प्रमाण लम्बा डंडा ही उपकारक है। मुनि को बिना गहराई देखे नदी में उतरना मना है। इसके अलावा डांडा की स्थापना होती है, विहार में मुनि फा,कालं धर्म हो जाय तो दूसरे मुनि उसको डंडा की जोली में उठा सकते हैं, घीमार मुनि भी डंडा के जरिये उठाया जाता है, स्थवीर मुनि डंडा के सहारे बिहार कर सकता है। * डंडा रखना भी श्रावश्यक है। सारांश-मुनि चारित्र पालन के लिये वस्र, पात्र वगैरह उपकरण को रखते हैं, वैसे ही डंडा को रखते हैं। इसके अलावा और भी जो २ उपधि हैं वे सब किसी न किसी अंश में लाभकारी ही है । उपधि के द्वारा विशेष शुद्ध चारित्र पालन होता है। 1 दिगम्बर--विचार पूर्वक अगर देखा जाय तो यह सब यात सत्य सी प्रतीत होती है। फिर भी दिगम्बर प्राचार्य नग्नता पर ही क्यों जोर देते हैं ? जैन-नग्नता व पीजी श्रादि किसी भी द्रव्य लिंग पर एकान्त जोर देना बद्द परमार्थः नुकसान कारक ही, है उनसें ही मोक्ष प्रांति मानना वह पकान्तिक कल्पना है. सरासरी गलती है । इस सत्य को दिगम्बर प्राचार्य इस रूप में स्पष्ट और फरत है। भावो हि पढमलिंगं, ण दव्बलिगं च जाण परमत्यं ॥ . भावो कारण भूदो, गुण दासाणं जिणा पिंति ॥२॥ गुण दाप का कारण भाव लिंग ही' है. उससे व्यलिंग का कोई सम्बन्ध नहीं है। स्थानक मार्गी मुनि रंग पाली पाकदीर भीर मोहक दी रखते हैं। पंह अनुपित है क्योंकि ऐसी ही सही रखनी चाहिये जो उपरोक्ष कार्य में सहायक हो । वैन मुनि के दंठे पर ५ समिति वगैरह का निशान रहता है। ...
[ ५२ ] भावेण होइ लिंगी, णहु लिंगी होइ दव्वमित्तण । तम्हा कुणिज्ज भावं, कि किरह दवलिंगेण ॥४८॥ माने-द्रव्यलिंग, नग्नता से कुछ नहीं होता है। भावेण होइ णग्गा, बाहिर लिङ्गेण किं च णग्गण । कम्म पयडीय नियरं, णासेइ भावेण ण दवेण !! ५४ ॥ निर्मम बनो ? नंगा होने से क्या? नंगा हो जाने से कर्म का विनाश नहीं होता है। णग्गत्तणं अक्कज्ज, भावेण रहियं जिणेहिं पन्नतं । इय नाऊणय णिचं, भाविज्जहि अप्पयं धीर ॥ ५५ ॥ देहादिसंग रहिरो, माण कसाएहिं सयल परिचितो । अप्पा अप्पम्मि रओ, स भावलिंगी हवे साहू ॥ ५६ ।। देह वस्त्रादि में निर्मम और निष्कपाय मुनि भाव लिंगी है। ममत्तिं परिवज्जामि, णिम्ममत्ति मुवदिह्रो ।। ५७ ॥ भावो कारणभूदो, सायाराऽणयार भृदाणं ॥ ६६ ॥ णग्गो पावई दुक्खं, णग्गो संसार सायरे भमई । णग्गो ण लहइ बोही, जिण भावेण वजिरो मुइरं ॥६॥ नग्नता मोक्ष का कारण नहीं है। भाव सहिदो मुणिणो, पावइ आराहणा चउक्कं च । भाव रहिदो य मुनिवर, भमइ चीरं दाह संसारे || नंगा संसार में भटता है। सेवहि चउविहलिंगं, अम्भितरलिंग सुद्धिमावएणो। वाहिरलिंगमकज्जं होई फूडं भावरहियाणं ॥ १०६ ।। . भाव समणो वि पावइ, सुक्खाई दुहाई दव्व समणो य। इइ गाउं गुण दोसे, भावेण संजुदो होइ ॥ १२७ ॥ .. - . +more [ ५३. ] मूछी रहित-भाव साधु सुखी होता है और नंगा-द्रव्य- साधु दुखी होता है। अतः भाव साधु ही बनना चाहिये। (भा० कुन्द कुन्द कृत भाव प्राभूत) धम्मेण होइ लिंग, ण लिंगमिरेण धम्मसंपत्ती। जाणेहिं भाव धम्म, किं ते लिंगेण कायन्वो ॥२॥ नंगा हो जाने से साधुता नहीं पाती है। अतः द्रव्यलिंग किंसी काम का नहीं है । कार्य साधना में भाव साधुता माने निर्ममत्वा दि भाव लिंग की ही प्रधानता है। (मा0 कुन्द कुन्द कृत लिंग प्रामृत) निश्चयनय मोक्ष मार्ग में द्रव्यलिंग को निठरला मानता है. (.समय. प्रामृत ३४५) त्यक्तच चाहिरात्मानं ॥ २७ ॥ मोक्ष मार्ग में बहिरात्मा की चर्चा ही त्याज्य है। परत्राहं मतिः स्वस्मात् च्युतो बन्नात्यसंशयम् ॥ १३ ॥ मेरा शरीर, मेरा वस्त्र यह विचारना ही आत्मा को बन्धन कारक है, उनके होने पर भी उन्हें अपना नहीं मानना चाहिये । शरीरे वाचि चात्मानं ॥ ५४॥ शरीर को आत्मा मानना, यह अचानता है शरीर जीव से भिन्न ही है, अतः शरीर सवन हो या अवस्त्र हो, मगर वह आत्मा को मोक्ष को नहीं रोक सकता जीणे स्वदेहे ऽप्मात्मानं, न जीणं मन्यते बुधः॥६४ ॥ इस श्लोक के आशय को लेकर ऐसा श्लोक भी बन सकता . है । . है कि- 4. सबने देहे-प्यात्मानं, न स-बलं चदेव बुधाः ।।
? - [ ५४ ] शरीर वस्त्र वाला होता हैं। प्रात्मा से वस्त्र को क्या सम्बन्ध है ? वह तो.नग्न ही है। नयत्या त्मान मात्मैव, जन्म निर्वाण मेव च ।। ७५ ।। आत्मा ही आत्मा को संसार में फिराता है और मोक्ष में ले जाता है माने-'नग्नत्व से मोक्ष हैं। यह बात कहने मात्र हैं। लिग देहाश्रितं दृष्टं, देह एवात्मनो भवः ।। न मुच्यन्ते भवात्तस्माते ये लिंग कृताग्रहाः ।। ८७॥ जातिदेहाश्रिता दृष्टा ॥८८॥ ब्राह्मण पुरुष या नंगा ही मोक्ष में जा सकता है । इत्यादि लिंग के आग्रह से संसार बढ़ता है जाति लिंग विकल्पेन, येषां च समयाग्रहः ।। ते न आप्नुवन्त्येव, परमं पदमात्मानः ॥ ८६ ॥ में ब्राह्मण हूँ मैं नग्न साधु हूँ ऐसा आग्रह ही मोक्ष का वाधक है ( आ पूज्यपाद कृत समाधि शतक) संघो को विन तारइ, कट्ठो मूलों तहेव निपिच्छो । अप्पा तारइ तम्हा, अप्पा ओझायव्वो (मा० अमृत चन्द्र कृत श्रावकाचारः) : :- पिच्छेण हु सम्मत्तं, करगहिए चमर मारडंबरो समभावे जिणदिटुं, रागाइ दोसः चत्तण ।। २८ ॥ (तांदसी) केकीपिच्छः श्वेतवासो, द्रावीडो यापनीयकः । निष्पिच्छश्चति पंचैते, जैनाभासाः प्रकीर्तिताः ॥ (दि० आ.० इन्द्र नन्दी कृत नीतिसार श्लो०१०) + , . [ ५५ । देह एव भयो जन्तोर्यल्लिगं च तदाश्रितम् : जातिवत्तद् गृहं तत्र, त्यत्वा स्वात्म ग्रहं वशेत् ॥३६॥ शरीर ही संसार है, लिंग उसके अधीन है, जाति के समान पराधित है, अतः नग्नतादि लिंग का श्राग्रह नहीं रखना चाहिये। (पं० आशाधर कृत सागार धर्मामृत) जो घर त्यागी कहावे जोगी, घरवासी कहँ कहे जूं भोगी अंतर भाव न परस्त्रे जोई, गोरन चोल मूरख सोई (घनारसी विकास पृ० २९९) : सारांश-ऊपर के सब प्रमाणों से निश्चित ही है कि अनेकान्त जैन दर्शन को नग्नता या वस्त्र से कोई वास्ता नहीं है । जैन मुनि नंगा हो या चन:धारक हो, किन्तु यह भाव साधु माने मूर्छा रहित अवश्य होना चाहिये, वही मोन-का अधिकारी है। - . TV . .
[ ५६ ] मुनि आचार-अधिकार दिगम्बर-श्वेताम्बर श्रागम में जिक्र है कि गणधर गौतम स्वामी ने स्कंदक परिव्राजक का सत्कार किया था यह क्या । जैन- महापुरुष द्रव्य क्षेत्र काल और भाव को सोचकर अपनी प्रवृति करते हैं। प्रा० कुन्द कुन्द ही प्रवचनसार में-"समणो तेणिह वहदु कालं खेत्तं वियाणित्ता ॥२॥ देसं कालं जाणित्ता • ३० ॥ इत्यादि प्राज्ञा देते हैं। दिगम्बर शास्त्रों में दृष्टान्त भी मिलते हैं कि- भ० श्री ऋषभदेवजी ने भरत चक्रवर्ती को स्वप्न का फल कहा, मरिचि का भविष्य कहा, भ०. श्री नेमिनाथ जी ने बलभद्र जी को द्वारिका भंग का निमित्त बताया, श्रा० कुन्द कुन्द के शिष्यों ने रात होने पर भी देवो ले वार्तालाप किया, इत्यादि। इसी प्रकार श्री गौतम स्वामी ने भी लाभा लाभ को सोच कर ऐसा किया है। वस्तुतः परम शानियों की प्रवृत्ति फल प्रधान होती है। दिगम्बर--श्वेताम्बर शास्त्र में उल्लेख है कि भगवान मुनि सुबत स्वामी ने घोड़े को गणधर बनाया था। जैन-यह झूठी बात है, श्वेताम्बर में ऐसा नहीं लिखा है। हांभ० ने घोडा को सर्व समक्ष प्रति वोध दिया था, मगर उनके गणधर तो "मल्लीकुमार" वगैरह ही थे। दिगम्बर-दिगम्बर मुनि एक ही घर से पर्याप्त आहार लेते हैं, ऐसा सब मुनियों को करना चाहिये। जैन- यदि "गोचरी" ही करना है तो जैन मुनि के लिये एक ही घरका एकान्त विधान नहीं होना चाहिये। एक घर के . 11 आहार विधि में प्राधाकर्मी आदि अनेक दोष लगते हैं, जिनका विस्तृत खुलासा पौत्र की.चर्चा में किया गया है, वहां से समझ लेना चाहिये दिगम्बर जैनेतर के घरका श्राहार पानी नहीं लेना चाहिये ! कारण वे पानी को छानते नहीं हैं, और विना-स्नान कराये ही गाय भैस को दुध निकाल लेते है । ये पानी और दूध जैन मुनि के लीये श्रकल्प्य हैं। जैन भगवान् श्री ऋषभदेवजी ने जनतरो के घरका आहार पानी लीया है; चौधे श्रारे के बीच २ में जैन धर्म का लोप हो गया था, जब भ० श्रीशीतलनाथजी वगैरह ने भी जैनेतरो से.पाहार पानी लीया है । इस.हिसाब से तो जैन मुनि को जैनेतर का श्राहार पानी कल्प्य है । मगर दिगम्बर मुनिजी उनसे बाहार पानी लेते नहीं है, कारण ? जैनेतर.लोग नग्न को अपने घर में लाने को, दीचकते हैं पवं आहार पानी देने में भी घृणा करते हैं, और, इस दालत में दि मुनि भी उनके घर जाते नहीं है । कुछ भी हो, जैन मुनि विवेकी अजनो से श्राहार पानी ले सकते हैं। दिगम्बर जैन मुनि को शुद्ध का श्राहार पानी नहीं लेना चाहिये। . 157 जन-दिगम्बर पं० आशाधरजी श्रावका चार. में 'लीखते है कि जाति हीन भी काल आदि के निमित्त से.धर्मी बन सकता है। वैसे शुद्ध भी उपस्कार से शुद्ध हो सकता है, इत्यादि। ...इस प्रकार दिगम्बर समाज में शुद्र की शुद्धि मानी जाति है- फिर दिगम्बर मुनि को उसके श्राहार पानी लेने में हरजा भी क्या है। मगर आज तो ये जेनेतरो का भी आहार पानी नहीं लेते है. फिर उस शुद्र का कैसे ले सके!
दिगम्बर मुनिजी शुद्र को अपना शिष्य बना लेव जैन मुनि बना लेवे, फिर उसके प्राहार पानी का निषेध कैसा? 4 दिगम्बर-हमार मुनि हमारे लिये भी शूद्र का पानी त्याज्य बताते है। जैन श्राप शूद्र के हाथ का सिर्फ पानी नहीं पीते हो परन्तु उनके हाथ का और उनके पानी से धुल हुए. एवं संसर्गित: शाक, फल, फूल घी दूध इत्यादि को खाते हो शूद्र की मिठाई तक खाते हो उन्हीं चीजों का श्राहार मुनिको देते हो, तियञ्च भैस वगैरह को स्नान से पवित्र बनाकर उसका दृध भी मुनि को देते हो और आपके प्राचार शुद्र भी मुनि को आहार देते हैं। फिर भी आप पानी त्यांग की बातें बनाते हो यह कहाँ तक ठीक है ? इतना ही क्यों? शुद्र तुम्हारे मुनि जी बन सकते हैं। इस हालत में रुद्र के पानी का एकान्त निषेध करना, यह अनुचित आशा यहां इतना ही पर्याप्त है कि जैन मुनि श्राचार शुद्र के घर का आहार पानी ग्रहणं नहीं करें, यहीं न्याय मार्ग है यही स्यादवाद वचन है। ": . 4- दिगम्बर जैन मुनि खड़े खड़े पाहार पानी करे जैन-डे और लब्धिरहित करभोजी के हाथ से खुराक के अंश गिरते हैं, इससे जीव विराधना और निन्दा होती है। गृहस्थ उन्हें उठाते हैं जिसमें पारिष्ठापनिका समीति का विनाश होता है। खडे २ या चलते चलते खाना पीना तो व्यवहार से भी उचित नहीं है। इसमें श्रासन सिद्ध नहीं हैं । एकासन द्विश्रासन आदि व्रत प्रत्याख्यान भी नहीं हो सकते हैं। अतः मुनि पात्र के जरिये शुद्ध स्थान में स्थिर बैठ कर आहार पानी करे, यही प्रसंस- नाय मार्ग है। - -
[१९]
.
दिगम्बर जैन मुनि जी को महावतों से मिन्न प्रत्याख्यान
नहीं होता है। हमारे चै आवश्यकं में भी प्रत्याख्यान नहीं माना
है कि जैसा श्वेताम्बर में माना जाता है । देस्रो-
सामायिक, स्तुति, वंदनकं, प्रतिक्रमण, वैनायक और कृति
कर्म इत्यादि।
(शुभचन्द्र की अंग पति, पंचास्तिकीय भाषा टीका, अझ हेमचन्द्र शत
सुभसंधो गा. 17:६२, हरिवंश पुराग सगं १०.)
सामायिक, चतुर्विंशतिस्तव, चंदनक, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्म
और स्वाध्याय । ।
1
(सोम सेन कृत निवाचार भ०१२ पो० ३६.)
। जैन- महानुभाव । अद्धिक मत के सहकार सें दिगम्बर
समाज ने उसे उड़ाया है। श्रावश्यक भाष्य का प्रत्याख्यान अधि.
कार, पंचांशक, और पंच वस्तु वगैरह में, इस विषय की विशद
विचारणा है । अंवश्यक है है, 1-सामायिक, २-चतुर्विशतिस्तव,
३.चंदनक, ४ प्रतिक्रमण, ५ कायोत्सर्ग और ६ प्रत्यास्यान ।
दिगम्बर विद्वानों में छटे श्रावश्यक के लिये मतभेद है जैसों
कि आपने यताया है।
:: प्रत्याख्यान को उड़ाने से यह मतभेद खड़ा हुआ है मगर आ
वह केर तो "मूलाचार" में छै श्रावश्यक बताते हैं जिन के प्रत्या-
ख्यान आवश्यक में एकासन, प्राचाम्ल, चौथ भक्त, छठ, इत्यादि
प्रत्याख्यान लिये जाते हैं।..
.:. दिगम्बर- मुनि एक दफे आदार करे।..":::.-
जैन--श्रापको जैन तपस्या की परिभाषा के मोसने सभी
इस मान्यता का उत्तर मिल जायगा.!..::-
दिगम्बर जैन श्रमण के तप की परिभाषा निम्न है.
- खमणं छठ्ठ-दुम-दसमखमणं खमणं च छट्ठ अटुमग, ०१. खमणं खमणं खमणं, छटुंच गदस्सिमो छेदो ||७८ (भा० इन्द्रनन्दी कृत-दपिरम् गा०७४) .: आद्यश्चतुर्दश दिनैर्विनिवृत्तयोगः । षष्ठेन निष्ठित कृति जिन वर्धमानः॥ * शेषा विधूतघन कम्मं निबद्ध पाशाः । मासेन ते यति वरास्त्व भवन् वियोगाः ॥ २६ ॥ .. (समाधि भक्ति बलो० २६॥) माने छट्ट, अष्ठम. दशमभक्त इत्यादि तप परिभाषा है, इनका 'मर्थ होता है २ उपवास ३ उपवास उपवास व्रत इत्यादि । यहां उपवास के दिनों की दो २ खुराक और अंतरपारणा (धारणा) तथा पारणा के एक एक दिन की एकेकवार की खुराक का त्याग होता है, इस हिसाब से "दो. उपवास वगैरह में के खुराक के त्याग रूप छ?" इत्यादि संक्षा दी जाती है। वास्तव में प्रति दिन दो २ दफे खुराक लेना माना जाता है, उनकी मयसंख्या प्रतिज्ञा छट्ट आदि शब्दो से होती है। जैन-आप मुनि की तपस्या में प्रति दिन दो २ खुराक का हिसाब लगाते हैं. तब तो ठीक है कि मुनि उत्सर्ग से दो दफे आहार करें और उनके त्याग में चतुर्थ भक्त भक्त श्रादि प्रतिज्ञा भी करें। इस विधान से एक दफे ही प्राहार बताना वह एकान्त वचन हो जाता है । इसके अलावा तपस्वी आदि के लिये तो विशेष आजादी है, वे अधिक लाभ के निमित्त विशेष दफे माहार लें तो भी अनुचित नहीं है। दिगम्बर--मुनि आहार औषध या भेषज में मांस घर को महण न करे - .
[१] . जन--वास्तविक मार्ग यही है, और मुनि मांस लेते, भी नहीं है। किन्तु भूलना नहीं चाहिये कि-जैन दर्शन में उत्सग और अपवाद से सापेक्ष वस्तुनिरूपण है। दि० शास्त्र भी यताते है कि देशकालक्ष स्यापि बाल वृद्ध श्रान्त ग्लान त्वानुरोधेनाऽऽहार विहारयो. रल्प.लेप भयेनाऽपवर्तमानस्याऽतिफर्कशा चरणीभूय क्रमेण शरीरं पातयित्वा सुरलोकं प्राप्योद्वांत समस्त संयमाऽमृत भारस्य तपसोऽनवकाशतयाऽशक्य प्रतिकारो महान् लेपो भवति तन्न श्रेयान् अपवाद निरपेक्षा उत्सर्गः ॥ सर्वथानुगम्यस्य परस्पर सापेक्षोत्सर्गापवाद विजृभितवृत्तिः स्याद्वादः ॥ ३० ॥ 1 .. , -- (प्रवचन सार गाया. रीका) माने उत्सर्ग और अपवाद. का ख्याल. में रख कर प्रवृत्ति करना, यही शुद्ध जैन दर्शन है, यही शुद्ध मुनि मार्ग है। दिगम्बर- समपत्वी को अष्ट मूल गुण' में ही मांस का त्याग हो जाता है। जैन- अष्ट मूल गुण की दिगम्बरीय कल्पना ही नीन है भतः इस विषय में दि० आचार्यों का बड़ा मत भेद है। देखिये।' १-तत्रादौ श्रद्दधेज्जैनी, मांज्ञां हिंसाम पासितुम् । भद्य मांस मधुन्युज्झद, पंचक्षीरिफलानि च ॥ २ ॥ भेटैतान् गृहिणांः मूलगुणान् स्थूल वधादि वा । फलस्थाने स्मरेद द्युतं, मधुस्थाने इहव वा ॥३॥ (पं० भाशापरकृय सागार धर्मामृवं...) २-३ स्यामि समन्तभद्रमते-५ फल स्थान ५ स्थूल पधादि, महापुराण मते-५ स्थूलवधादि मघमांस और मधु के बजाय एता (• भार व मा. र). .
[६२ ] ': ४ मद्यमांसमधुत्यागैः सहाणुव्रतपंचकम् । अष्टौ मूलगुणानाहु गृहिणां श्रमणोत्तमाः ॥ (रत्नकरंडक श्रावका चार, श्लोक ६६) ५ हिंसासत्यस्तेयाद् ब्रह्म परिग्रहाच्चबादरभेदात् युतान्मांसान्मधात् विरतिर्गृहिणोष्ट सन्त्यमी मूल गुणाः ।। ८ . 2 ( महापुराण). ६ मद्यमांस मधुत्यागैः सहोदुम्बर पंचकैः । अष्टावेते गृहस्थानां, उक्ता मूलगुणा श्रुते ।। (21 ( भा. सोमदेव कृत चम्) ७ कल्याण आलोचना में ८ मूल गुणं के स्थान पर ७ कुव्यसन ही लिये हैं (श्लो०१२) पं० जुगलकिशोर मुख्त्यारजी ने जैनाचार्यो के. शासन भेद में इस विषय पर विशद चर्चा की है । श्रा० कुन्द कुन्द व श्रा० उमास्वाति जी तो अष्ट मूल गुण का नाम भी नहीं देते हैं, महा. पुराण, व रत्नकरंड के रचयिता. इन गुणों को विरति भाव में शामिल करते हैं । और प्रा० सोमदेव वगैरह सम्यक्त्व में दाखिल करते हैं । कितना विसंवाद ? इनमें से किसी गुण का धारक देशविरति बन जाता है तो ८ गुण के धारक को अविरति मानना आश्चर्य के सिवाय और है ! हरिवंश पुराण में जैन दि० राजा सुदास के मांसाहार का जिक्र है यह भी अष्ट मूल गुण की मान्यता के खिलाफ प्रमाण है। आदि बातों से पता लगता है कि दिगम्बर अष्ट मूल.गुण की मान्यता.असली नहीं है। दिगम्बर-श्वेताम्बर शाल यादवों को भी मांसाहारी बताते हैं। क्या L 1-12 . [६ श्वेताम्बर-ठीक है,जो अविरति या जैन होंगे वे मांसाहारी होंगे इसमें पाश्चर्य क्या है??.अाज भी अविरति जैन या अजैन अग्रवाला अभक्षभक्षी है,माने कंद, मूल भती है, विदल भक्षी है वैसे ही उन यादों के लिये समझना चाहिये। :: दिगम्बरी राजा सुदास का मनुष्य मांस-भक्षण, भी ऐसा. ही विचित्र प्रान्त है । इसके अलावा त्रिवर्णा चार पृ० - २७२ श्लोक ८२ में मांसाहार का जिक्र है जिसमें पांच पल भक्षण तक का कोई दंड नहीं है, यह सब दिगम्बर मांसाहार का विधान है। दिगम्बर संघ के श्राद्य आचार्य कुन्द कुन्द स्वामी के लीये भी कुछ ऐसी ही विचित्र घटना है। दिगम्बरी जैन हितैषी मा०५ अ० १ पृ० १७ में "धर्म का अनु' चित पक्षपात" लेख छपा है। उसमें वि० सं० १६३६ में दि० काटा संघी भा० "भूषण' लिखित दिगम्बरीय "मूल संघ का कुछ इतिहास" दिया है, जिसका सारांश यह है "एक बार काष्ठासंघी अनंतकीर्ति नाम के प्राचार्य गिरिनार यात्रार्थ गये, यहाँ उन्होंने पभ नन्दी (कुन्द कुन्द स्वामी) आदि निर्दयी पापी कालिकों को देखा, और उन्हें संबोध श्रावक के व्रत दिये आचार्य ने उसका (कुंद कुंद स्वामी का) नाम "मयुर,गी" रक्खा, याद को उसने मंत्र चांद से "नंदीसंघ" चलाया और अपना पचनन्दी' नाम प्रसिद्ध किया। एक समय उज्जैन में उसने गुरु से वियाद किया और पत्थर की शारदा को यलात् घुलवा दिया। तय उसका बलात्कार गए और सरस्वती गच्छ प्रसिद्ध हुआ । आदि......... बाद में उसने मंत्र सिद्धि के निमित्त एक मपूर को मार डाला, तब मयर भर कर व्यंतरदेव हुआ। उसने पहुत उपद्रव मचाया तथा प्रासादिया, अन्त में उसके कहने से 'मयूर- पिच्छ' धारण कर पिंड छुडाया, उसदिन से मूल संघ का नाम 'मयूर संघ'दुभा ॥::, .
[६४..]
(जैन दर्शन २०४ अं०७ पृ० ३२०)
दिगम्बर जैनमुनि रातको पानी न रक्खे।
जैन-जैन मुनि पीने के निमित पानी न रक्खे, किन्तु शौच
के निमित्त चूना आदि से विकृत करके प्राशुक पानी रक्थे ।
दिगम्बर शास्त्र तो अशुचि होने पर स्नान. तक का भी विधान
करते हैं (देखो, पटप्राभृत पृष्ट-३७३) अतः शौच के निमित्त
पानी रखना अनिवार्य है।
दिगम्बर--मुनि को वेदोदय हो तो श्रावक उनको जनाना
समर्पित करके संतुष्ट करे, स्थिर करे। ऐसा श्वेताम्बर शाम में
विधान है।
जैन-
'महानुभाव? यह तो किसी दिगम्वर विद्वान ने
श्वेताम्बर मुनियों को बदनाम करने के लिये ऐसा लिख दिया है,
मैं मानता हूं कि दिगम्वर के श्रावकव्रत में काफी गड़बड़ है।
देखिये:-.
-परविवाह करणेत्वारका परिग्राहिता अपरिगृहितागमः
नानंगक्रीडा तीवकामाभिनिवेशः
(श्री तत्वार्थ सूत्र अ०.७ सूत्र २८.):
२:-पराविवाह०-ताभ्यां सरागवागादि वपुस्पर्शो ऽथवा रतम्
हास्य. आलिंगन भोग दोषो ऽतिचारसंशोपि ब्रह्मचर्य हानये ।
( कवि राजमल्ल कृत लाटीसंहिता.)
३-परविवाहकरणं इत्वरिका अपरिगृहितागमन इत्वरिका
परिग्राहितागमन अनंगक्रीडा तीवकामाभिनिवेशश्च । अपरि ग्रहीता
तस्यां गमनम् आसेवनम् ।
(चामुंडराय, चारित्र सार)..
::: :४-परविवाह करणानंगक्रीडास्मरागसां ॥
परिगृहित्वे त्वारका गमनं सतरं मलाः ॥ ७१ ॥
६५. ]
(पं० मेधावी कृतं धर्मसंग्रह श्रावकाचार-अधिक )
५.अन्यविवाह करणा... नंगक्रीडा:"विटत्व" -विपुलपाः
इत्वरिका गमनं च स्मरस्य पंच व्यतिचाराः ॥
(रल करड़ श्रावकाचार श्लो०६०)-
.
.
।
.
६-इत्वरिकागमन परविवाहकरण विटत्वमाचार
स्मरतांनाऽभिनिवेशोऽनंगक्रीड़ा च पंच तुर्ययम ॥ ५५॥"
"गमनम् श्रासेवनम्" ॥ इत्वरिफागमनादयः पंचातिचारा
स्तुर्ययमे सार्वकालिक ब्रह्मचर्याणुव्रते भवन्तीति सम्वन्धः ॥
(पं० श्राशाधर कृत सागार धर्मामृत अ०४)
७ परस्त्रीसंगमा नंगक्रीडा न्योपम साया।
तीयता रतिकैतव्ये, हन्युरतानि सद्वतम् ॥
वधूवित्त स्त्रियों मुफ्त्वा, संवैधान्यत्र तजने ।
माता स्वसी तनूजेति, मंतिम्रह गृहाश्रमे ॥
(पं० सोमदेवसूरिकृत, यशस्तिलक चम्पू ।
इन अतिचारों के लिये श्राअमीतगति स्वामी कार्तिकेय
और भट्टाकलंक वगैरेह के भिन्न २ मत है तथा तत्वार्थजी के टीका
कार श्रा० पूज्यपाद श्रा० अकलंक श्राप विद्यानन्दी और श्वेताम्बर
श्राचार्य यहां गमन के विषय में मौन हैं ।
(दिगम्बर पं० चलभद्र न्यायतीर्थ का- इत्यारका परिगृहिता
परिगृहितागमन लेख, जैन दर्शन-य०५-अं० ५.पृ० १६६, १६)
है-परयोनिगतो बिंदुः कोटि पूजा : घिनश्यति :-
यावीर्य स्खलन न भवति तायद्. ब्रह्मचारीविथुतिः
(पं० चम्पालाल पांडे कृत चर्चा सागर पृ९ २७०. सर्माना, पृ० २०५)
दिगम्बर शास्त्र कन्यादान , को धर्म. रूप, मानते. है-और संतुष्ट
"
[६६] तथा स्थिर कराने का हेतु रूप भी मानते है जैसे- 1-श्रावक साधर्मिक गृहस्थ श्राचार्य या मध्यम पात्र को कन्यादान करे। कन्या की स्वीकृति तीनों वर्ग की साधना के हेतु रूप है । इस दान का फल दर्शन की स्थिरता है । और चारित्र मोहनीय का उपशम है । पिता साधर्मिक वन्धु को कन्या देता है और दामाद को परिपक्व विषय फल भोग को प्राप्त कराकर उसके द्वारा चारित्र मोहोदय को शान्त कराकर विषय त्याग के योग्य बनाता है मान कन्यादान धर्म का अंग है। (पं० श्राशाधर कृत धावका चार) किया। २-A कन्यादान न देयं B वारिषेण ने अपनी स्त्री का दान करके साधर्मिक को स्थिर (सकलकीर्ति कृत श्रावकाचार) ३--ऋतुर्वती पत्नी को चौथी रातको अवश्य ही भोगना चाहिये ॥ २७१ ॥ (पं० मेधाविकृत धर्म संग्रह श्रावका चार श्लो० २७.) ४-शुद्ध श्रावक पुत्राय, धर्मिष्ठाय दारीद्रणे । कन्यादानं प्रदातव्यं, धर्म संस्थिति हेतवें ॥ १२७ ॥ विना भार्या तदाचारो, न भवेद् गृहमेधिनां । दान पूजादिकं कार्य-मग्रे संतति संभवः ॥ १२ ॥ श्रावका चार निष्ठोपि, दरिद्री कर्म योगतः । सुवर्णदान माख्यातं, तस्मै श्राचार हेतवें ॥ १२९ ॥ गृहदानं ॥ ३० ॥ रथादि दान ॥ १३१ से १२६॥ (दि० भट्टा० सोमसेनकृत, त्रिवर्णाचार अ०६ सं० १६६५) रतिकाल योनिपूजादि ॥ ३८ से ४५ ॥
[६]
(दि० आ० सोमसेन कृत त्रिवर्णाचार म...);
५-जैन राजा सुमित्र ने स्वयं अपनी रानी को
कहा
कि वह
जाकर, उसके एक मित्र की काम वासना की तृप्ति करें, साथ ही
जाने पर उसे दंड देने की धमकी भी दी गई।
(पद्म पुराण स० १२ प्रत्युत्तर पृ० १८, १०३)
६-वारिपेण ने अपनी पहिले वाली बत्तीस ३२ पनियों को
बुलाया और अपने सामने खड़े हुए एक शिष्यको उन्हें अपने घर
हाल लेने के लिये कहा।
(दि० आराधना कथा कोप, प्रत्यु० पृ० १८)
श्राप वास्तव में देख चुके हैं कि ये सब अनाच्छनीय विधान
श्वेताम्बर शास्त्रो के नहीं किन्तु दिगम्बर शास्त्रों के हैं।
इसके अतिरिक्त प्रायश्चित के जरिये शोचा जाय तो प्रायः
श्चित्त विधान दोनों शास्त्रो में एकसा ही उपदिष्ट है ।
शास्त्रकारों ने परिस्थिति की विषमता और.दोषों की तरत.
मता को मिन्न २.रूपसे यता कर प्रायश्चित दान को एक दम.विशद
कर दिया है, इस हालत में श्वेताम्बर या दिगम्बर किसी भी जैन
मुनि को मांसभोजी या काम भोगी बताना । यह सिर्फ निन्दा
रूप ही है।
दिगम्बर---उत्सर्ग और अपवाद दोनों सापेक्ष मार्ग है - उन
को महेनजर रखकर प्रवृति करना चाहिये मगर प्रत भंग नहीं:
करना चाहिये।
जैन-मुनिको, मन वचन और काया से करना, कराना
और अनुमोदन देना इनके त्याग रूप- प्रतिक्षा है, प्राणांत कद में
भी उनका पालन करना चाहिये यह उत्सर्ग मार्ग है और इसमें
--
[ ६८ ] सं.कारण फर्क पड़े वह अपवाद मार्ग है। ये दोनों विधि मार्ग है। अपवाद भी देश काल परिश्रम और सद्दन शीलता के कारण उपयुक्त है, माने, प्रार्तध्यान और रौद्र ध्यान से बचने के लिये विधि मार्ग है और उस अपवाद संबन की शुद्धि तो प्रायश्चित से हो ही जाती है। अपवाद में व्रत प्रतिज्ञा का अधिकल स्वरूप नहीं रहता है। । जैसे कि- उत्सर्ग-मुनि किसी जीव की हिन्सा न करे ? अपवाद-मुनि नदी को पार करे ? . John - उत्सर्ग-मुनि रात्रि भोजन न करे ? अपवाद-पंचानां मूलगुणानां रात्रि भोजन वर्जनस्य च परा: भियोगात् बलादन्यतमं प्रति सेवमानः पुलाकनिर्गन्थो भवति (दिगम्बर तत्वार्थ सूत्र.) उत्सर्ग-दिगम्बर मुनि पांच तरह के वस्त्र को न रक्ने। अपवाद-दिगम्बर मुनि वस्त्रं को पहिनें, कम्बल ओढे १).चर्यादिवेलायां ।, तट्टी सादरादिकेन शरीर माच्छाद्य चर्यादिकं कृत्वा पुनः तन्मुञ्चतीति उपदेश कृतः संयमिनां इत्यप वादवेपः 1 + + सोपि अपवादलिंगः प्रोच्यते । उत्सर्ग वेषस्तु नग्न एवं शांतव्यः । सामान्योक्तो विधि रुत्सर्गः, विशेषोक्तो विधि रप- वादः, इतिं परिभाषणात् । .. (दर्शन प्राभृत गा० २४ की श्रुतसागरी टीका पृ०२०') (२) "द्रग्यलिग प्रतीत्येति' तत्किं केचिदसमर्थी महर्षयः शीतकालादो कंबलशब्दवाच्यं कौशेयादिकं गृहणन्ते, न तत् प्रनालन्ते न सीम्यन्त न प्रयत्नादिकं कुर्वन्ति, अपर काले पसिर दिगम्बर [ ६९ ] न्ति । केचित् शरीरे उत्पन्न दोषाः लजितत्त्वात् तथा कुर्वन्ति इति व्याख्यान ;"भाराधना, भगवती" प्रोता:ऽभिप्रायेणा उपवादरूपं. ज्ञातव्यं । उत्सर्गापवादयो रपवादो विधि चलवान् इति, ... (तत्वार्थसूत्र सर्वार्थसिद्धि की श्रुतसींगरी टीका) (३) श्री पं० जिनदास शास्त्री सोलापुरवाले ने मुनियों में दो भेद माने हैं। एक उत्सर्ग लिंग धारी और दूसरा अपवाद लिंग धारी । उत्सर्ग लिंग धारी दिगम्बर रहता है। और अपवाद लिंग घारी दिगम्बर दीक्षा लेकर भी कपड़ा ले सकता । (जनसमुदाय में सवस्त्र रहना और एकान्त स्थान में दिगम्बर रहना ) और दिगम्बर मुनि भी कारण की अपेक्षा से अर्थात् जिन. के त्रिस्थान दोप है, जो लज्जावान है, थंडी परिपह सहन करने में. असमर्थ है; एसे दिगम्बर मुनि को जन समुदाय में सबस्न रहना चाहिये । और उस वस्त्र लेने से उनको दोप भी नहीं प्रायश्चित भी नहीं लेना पड़ता । और उसे अपवाद लिंग कहना चाहिये, एसी उनका मत है। (वारसं० २४६६ का० शु० ५ का जैनमित्र ३०४. अं०१) वास्तव में उत्सर्ग का प्रतिपक्षी अपवाद ही. है,, इसलिये. उत्सर्ग में व्रत का जो स्वरूप है वह अपवाद में कैसे रह सकता है । जहाँ उत्सर्ग व्यवस्था नहीं कर पाता है, वहाँ स्था करता है, और उत्सग द्वारा जो ध्येय है उसी ही ध्येय को प्राप्त कराता है। दिगम्बर आचार्य भी एकान्त उत्सर्ग यानी मरने की. बातों को महान् लेप में सामिल फरके अपवाद की वास्तविकता को अपनाते है। .:.:............. ....... मनचन सार गाय ३० ट्रीकाल) : माता- है। . अपवाद व्यवः 1.
[ ७० ]
दिगम्बर-हमारे पास जिनोक्त असली गाणी तो है
नहीं, सच छदमस्थ प्राचार्य कृत ग्रन्थ ही हैं। इसके लीये हमारे
पं० चम्पालालजी और पं० लालारामजी शास्त्री लिखते हैं कि-
वर्तमान काल में जो ग्रन्थ है सो सब मूलरूप इस पंचम काल
के होने वाले प्राचार्यों के बनाये हैं । इत्यादि ।
(चर्चा सागर चची-२५० पृ०.५०३).
अर्थात् उपलब्ध सब दिगम्बरशास्त्र तीर्थकरो ने नहीं
किन्तु प्राचार्यों ने बनाये हैं, मगर इन ग्रंथों में सीर्फ नग्न श्रादि
के बारे में जोर दिया है, सब बातों में भी वैसा ही करना जरूरी
था, मान ऊपरोक्त अपवाद वगैरह सब बातो का सुधार करना
लाजमी था। न मालूम उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया? फल स्वरूप
हमारे अाजकल के नये विद्वान तो उन ग्रन्थों को भी उड़ाकर
नये अन्य बनाने को तैयार हुए है।
ता० १८-२-१६३८ के संघ अधिवेशन में पाँच वां प्रस्ताव भी
हो चुका है कि-
"भा० दिगम्बर जैन संघ का यह अधिवेशन प्रस्ताव करता
हैं कि-समाज में फैली हुई दण्ड व्यवस्था की वर्तमान अव्यवस्था
को
दूर
करने के लिये निम्नलिखित (७) विद्वानों की एक समीति
कायम की जाय जो कि शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर इस
अव्यवस्था को
दूर
करने के लिये समाज के लिये उपयोगी दंड
व्यवस्था का रूप निश्चित करे" इत्यादि ।
माने पुराने दिगम्बरीय ग्रन्थ अप्रमाणिक हैं।
जैन--जहाँ कृत्रिमता है वहाँ रद्दोबदल चली पाती है,
"विवेकपतितानां तु भवति विनिपातः शतमुखा" इस न्याय
से
-
[ ७१ ]
आपके शास्त्र बदलते आये हैं और बदलते रहेंगे।। . . . .
वे पंडित भी गृहस्थ ही हैं, जिनको न ब्रह्मचर्य है। न भक्षाभक्ष
की मर्यादा है न चारित्र है । वे मनमानी लिखदे और वह दिगम्बर
समाज का शास्त्र वन जाय । मुबारक हो, इन दिगम्बरीयं श्रासागम
को । महानुभाव ? जैन दर्शन अनेकान्त दर्शन है। अपवाद को
उड़ाने वाला या एकान्त को मानने वाला, जैन कहलाने के योग्य
भी नहीं रह सकता है
दिगम्बर--मुनि दूसरे को दंडे, वांधे या मारे ऐसा अपवाद
तो उचित नहीं है। जैसा कि कालिकाचार्य जीने साध्वी' की रक्षा
और संघ के हित निमित्त किया है।
1.
.
।
जैन-दिगम्बर द्रव्य संग्रह:वृत्ति वगैरह में विष्णु कुमार
ने बचन छल से वलि को वांधा था ऐसा लिखा है । तथा विद्याधर
श्रवण और वज्रकुमार का भी वैसा ही प्रसंग उल्लिनित. है । भाप
इनको ठीक क्यों मानते हैं.१
दिगम्बर-धर्मरक्षण के लिये ऐसा करना पडा। वे अपनी
इन्द्रियों के सुख के लिये ऐसा नहीं करते।
जैन--तब तो आपने अपवाद को स्वीकार कर लिया।
दिगम्बर-यदि ऐसा है तो किसी को बांधे, लंड देवे, मगर
उसको जान से मारना ठीक नहीं है । मारने से व्रत भंग
होता है।
नैन--क्या तीन योग और तीन कोटि से प्रतिज्ञा धारक
मुनि को दूसरे को बांधने में अहिंसा व्रत का उल्लंघन नहीं है।
वचन छल करने में सत्य व्रत का भंग नहीं है।
"दिगम्बर-प्रमंस योगात् प्राणव्यपरोपण हिंसा, और 'द्वेष
दुमा अन्यस्य दुःस्रोत्पान हिसा होने पर भी धर्म रक्षा के कारण
[ २ ] यह हिंसा हिंसा नहीं मानी जाती । • -- - यदि जिनसूत्रं मुल्लंघते तदाऽऽस्तिकै युक्तिवचनेन निषेधनीयाः तथापि यदि कदाग्रहं न मुञ्चन्ति तदा समथै रास्तिकैः उपानद्भि गूंथ लिप्तामिः मुखे ताडनियाः, तत्र पापं नास्ति। उक्तं चोत्तर पुराणस्य वर्द्धमान पुराण- सोपि पापः स्वयं क्रोधा दरुणी भूत वीक्षणः । उद्यमी पिंड माहतु, प्रस्फुरद्दशन च्छदः ॥ १ ॥ सोढुं तदनमः कश्चिद्, असुरः शुद्धदृक् तथा.। हनिष्यति तमन्याय, शक्तः सन्. सहते नहि ॥ २ ॥ सोपि रत्नप्रभां गत्वा, सागरोपम जीवितः ।। चिरं चतुर्मुखो दुःखं, लोभादनु भविष्यति ॥ ३ ॥ :: धर्मनिर्मूल विध्वंसं, सहन्ते न प्रभावकाः । ::. "नास्ति सावद्यलेशन, विना धर्म प्रभावना" ॥४॥ धर्मध्वंसे सतां ध्वंसः, तस्माद् धर्मद्रुहो ऽधमान् ॥ निवारयन्ति ये सन्तो, रक्षित तैः सतां जगत् ॥ ५ ॥ (दर्शन प्राभृत गा०.२ की श्रुत सागरी टीका पृ० ४ ४) जैन तो आप अपवाद को धर्म मानने के दिगम्बर--उपसर्ग और अपवाद को इन्साफ न देने से हमारे दिगम्बर समाज की कैसी दुर्दशा हुई है। उसका यथार्थ स्वरूप दिगम्बर विद्वान् प्रो० प्रा० ने० उपाध्ये M.A. फाइनल इस प्रकार बताते हैं। "आचार-शास्त्र में वर्णित उत्सर्ग और और अपवाद मार्गों के अाधार पर यह कहा जा सकता है कि साधु समुदाय में इस श्रम साक्ष्य प्रबन्ध ने. मतभेद के लिये बड़ा अवसर दिया. जब किसी प्रधान आचार्य का स्वर्गवास हो जाता था तब सर्वदा " तब पक्ष the -- [] । . संघ में फूट पड़ने का भय बना रहता था- दिगम्बर सम्प्रदाय में संघ भेद होने का यही मुख्य कारण है। इस के सम्बन्ध की घटनाओं को जानने के लिये पुरातत्व संग्रह ( Eipigraphical. Record ) को सावधानी से अध्ययन करने की आवश्यकता है। (जनदर्शन, व० ४ ०.७ पृ. २९१) उपाध्ये के इस लेख से स्पष्ट है कि दि० समाज उमर्ग और अपवाद में बचातानी करने से मूल, नन्दी, माथुर, यापनीय काटा. इत्यादि अनेक टुकड़ों में विभक्त हो गयी है।' जैन- यद्यपि दिगम्बर विद्वान श्वेताम्बर उन्सर्ग और अप. याद पर श्राक्षप करते हैं किन्तु दिगम्बर मुनि भी अपवाद और प्रायश्चित से पर नहीं है। श्वेताम्बर शास्त्रों में नमुचि वगैरह का जो उम्लग्य है वह धर्मः रक्षा की दृष्टि से है और अपवाद रूप होने में माकूल भूलना नहीं चाहिये कि जैन दर्शन में उत्सर्ग और अपवाद से ही सारी व्यवस्था होती हैं। दिगम्बर-मुनि को उपासकों के प्रति श्राशीर्वाद में "धर्म- धृद्धि" कहना चाहिये. धर्मलाभ नहीं करना चाहिय । - -वन्धु सहाया धम्मा, अनः आत्मा को म्यभाय का लाभ हो और विभाव का प्रभाव हो यही इच्छनीय वस्तु इसकारण "धर्मलाम" कहना ही उत्रिन प्राशीद है। इसका अध होना है कि श्रान्मा के पाठों गुणों की प्राप्ति हो । जन E..] मोच योग्य अधिकार दिगम्बर मान लो कि वस्त्रधारी मुनि माक्ष में चला जायगा जवतो गृहस्थ भी केवली होकर मोक्ष में चला जायगा। प्राचार्य. कुंद कुंद स्वामी ने तो समय प्राभूत गा० ४३८, ४० में गृहस्थलींग में मोक्ष की मना की है । तो क्या गृहस्थ मोक्ष में जाता है। - जैन--हाँ ? यद्यपि ऐसा क्वचित ही बनता है, परन्तु पेसा होने में तनिक भी शंका का स्थान नहीं है । जैन दर्शन अनकान्त दर्शन है । जैन दर्शन भाव चारित्र वाली. आत्मा की मोक्ष मानता है. शरीर की या वस्त्रों की नहीं । दिगम्बर शास्त्र भी इस बात के गवाह हैं। श्रा० कुंद कुंदजी लमय प्राभूत गा० ४३६, ४०, ४१ में भाव आत्मा को ही मोक्ष बताते हैं गा०४४३ में गृहीलींग ममत्व की मना करते है। दिगम्बर-श्रावक छटे गुण स्थान को भी नहीं पाता है तो फिर मोक्ष को कैसे पा सकता है ! जैन--भूछीवाला छटे गुण स्थान को न पावे, यह तो ठीक बात है, किन्तु श्रावक ही नहीं पावे यह कैसे माना जा सकता है ? दिगम्बर आचार्य तो गृहस्थ को भी छटे सातवें गुणस्थान का अधि- कराि मानते है । ये फरमाते हैं कि पंचम गुण स्थानवर्ति श्रावक ध्यान दशा में अप्रमत गुणस्थान को पाता है और अंत- मुहूर्त के बाद में छटे में आता है। लिखा है कि- फिर यही सम्यग् दृष्टि जब अप्रत्याख्यानावरणीय कषाय को (जो श्रावक के व्रतों को रोकती है ) उपशम कर देता है तव चौथे से पाँचवें देश विरत गुण स्थान में आज़ाता है। इस दरजे में श्रावक ।
. । के की ग्यारह प्रतिमाएं पाली जाती है इसके आगे के दरजे साधु लिये है । यही श्रावक जब प्रत्याख्यानावरण कपाय का (जो साधु व्रत को रोकते है) उपशम कर देता है। और संज्वलन व नौं कपाय का (जो पूर्ण चारित्र को रोकती है) मंद उदय साथ..२ करता है तव पाँचवे से सातवें गुण स्थान अप्रमत्त विरन में पहुँच जाता है छठे में चढ़ना नहीं होता है इस सातवें का काल अन्तर्मुहूर्त का है यहाँ ध्यान अवस्था होती हैं फिर संज्वलनादि तेरह कपायों के तीव उदय से प्रमतविरतनाम छठे गुण स्थान में आ जाता है। .(श्रा कुंद कुन्द कृत पंचास्ति काय गा० १३, की भाषा टीका, खंड २०७३) इस पाठ से सिद्ध है कि गृहस्थ छठे सानवे गुण स्थान का अधिकारी है, एवं तेरहवें गुण स्थान का भी अधिकारी है। भरत चक्रवर्ती ने गृहस्थ येप में ही फेवल ज्ञान पाया है। दिगम्बर--दिगम्बर श्राचार्य भरत चक्रवता के केवल ज्ञान के बारे में कुछ और ही समाधान करते हैं। 1-योपि घटिकाइयेन मोक्षं गताः भरतचक्री, सोपि जिनदीक्षा गृहीत्या, विषय कपाय निवृत्ति रूप लक्षणमा व्रतपरिणामं कृत्वा पश्चात् "शुद्धोपयोग" रूप रत्नत्रयात्मके "निश्चयवता"ऽभिधान घीतराग सामायिक संज्ञ निधिकल्प समाधौ स्थित्वा, केवलज्ञानं लम्धयानिति । परं तस्य स्तोककालन्यात् 'लोका "व्रतपरिणाम न जानन्ति । (द्रव्य संग्रह वृहद् वृत्ति ). २-येषि घटिकाद्वयेन मोक्षं गता भरनचक्रवत्यादयस्तेपि निर्गन्धरूपेणैव । परं किन्तु तेषां परिग्रहत्याग लोका न जानन्ति . स्तोककालत्यादितिभावार्थः । एवं भावलिंग रहितानां द्रव्यलिंग मात्र मोक्षकारणं न भवति । - [५] - (समय प्राभूत गा० ४४४ तात्पर्य वृत्ति पृ० २०६) माने-भरत चक्रवर्ति गहस्थी था, मगर पौन घंट में व्रत परि. गाम को पाकर केवल ज्ञानी होकर मोक्ष में गया। यह बात तीसर युग की हैं अल्प काल होने के कारण जनता उसके व्रत परिणाम को नहीं जानती हैं। जैन--यह समाधान वास्तविक समाधान नहीं है, क्योंकि उन्होंने विषय कपाय निवृति रूप परिणाम धारण किया, निश्चय व्रत स्वीकारा, कवल ज्ञान पाया, और मोक्ष पाया ये चारों बात भरंत चक्रवर्ति के भावलिंग-भायंचारित्र की सूचक है, इनसे द्रव्य चारित्र की समस्या आप ही आप हल हो जाती है । जनता ने तो जैसा था वैसा ही माना । फिर भी ग्रन्थकार को क्या खट- कती हैं, कि लोगो पर अवता का आरोप करते हैं ? यह तीसरे ग्रुग का प्रसंग है । बाद में चौथे युग में २३ तीर्थकर होगये, संख्यातीत केवली होगये, मगर किसी ने भी इस आपकी मानी हुई गलती को साफ नहीं किया, यह भी अजीय मान्यता है । जैन जनता तीसरे आरे (युग ) से आज तक जिस बात को ठीक मानती है वही वात सच्ची हो सकती है कि सिर्फ द्रव्यसंग्रह आदि के वृत्तिकार कहते हैं वही बात सच्ची हो सकती है, इसका निर्णय पुराण प्रिय या इतिहासविद करले । जनता तीसरे युग से आज तक भरत चक्री को "गृहस्थलींग सिद्ध" मानती है, ऐसा ग्रन्थकर्ता का विश्वास है और मोक्ष प्राप्ति में द्रव्यलिंग नहीं किन्तु भावलिंग यानी व्रतपरिणाम की प्रधा.. नता है यह ग्रन्थकार को अभीष्ट है जब तो गृहस्थ भी : इस भावलींग यानी भावचारित्र जरिये केवलज्ञानी और सिद्ध हो सके, यह तो स्वयं ही सिद्ध है। • .
. प्रा० कुन्द कुन्द स्वामी तो हिंसा, परिग्रह आदि वस्तुओं के मुकाबले में साफ साफ नध्यवसाय की ही प्रधानता बताते हैं। जैसा कि- अमरसिंदण बंधो, सत्ते मारेहि मा व मारेहि। एसी बंधसमासो, जीवाणं णिच्छय णयस्स ॥ २८० ।। एव मलिये अदत्ते, अवम्भचेरे परिग्गहे चेव । कीरहि अज्भवसाणं, जंतण दु बज्जंद पावं ॥ २८ ॥ वत्थं पहुच जं पुण, अन्झवसाणं तु होदि जीवाणं । हि वत्थुदो दु बंधो, अज्झवसाणेण बंधो त्ति ॥ २८३ ॥ एदाणि णस्थि जोस, अज्भवसाणाणि एगमादीणि । ते असुहेण सुहेण य, कम्मेण मुणी ण लिप्पंति ॥ २६३ ॥. बुद्धि ववसाओ वि य, अज्झरसाणं मदीय विएणाणं । इकटमेव सम्ब, चित्तो भायो य परिणामो ॥ २६५॥ एवं ववहारणयो, पडिसिद्धो जाण णिच्छय णयेण । णिच्छय णय सल्लीणा, मुणिणो पार्वति णिव्वाणं ॥ २६६ श्रा० कुंद कुंदजी समयसार गा० ४४३ में पाखंडलींग और गृहीलींग वगैरह में ममता रखने की मना करते ही हैं, साथ साथ संव लींगों को छोड कर सीर्फ ज्ञान दर्शन व चारित्र को ही मोक्ष हेतु मानते हैं । ओर २ दिगम्बर श्राचार्य भी मोक्ष प्राप्ति के लीये नग्नता पीछी श्रादि याहा भेप को नहीं, किन्तु प्रात्मा के गुणों को ही प्रधान मानते हैं। देखिये- लिंगं मुहत्तु दंसण-णाण चरित्ताणि संबंति ॥ ४३६ ॥ दसण णाण चरित, अप्पाणं जुज मोक्खपहे ॥ ४४ ॥ गिच्छदि मोक्खपहे सव्य लिंगाणि ॥ ४४४॥ ॥ (समयसार प्राभूत) • . [ ५८1] अयसाण भायणेगा य, कि ते रणग्गेण पावमालगण। पसुराण हाल मच्छर-माया बहुलेग सवणेण ॥ ६ ॥ बने ऽपि दोषाः प्रभवन्ति रागिगां. गृहेपि पंचेन्द्रिय निग्रह स्तपः । अकुत्सिते वर्त्मनि यः प्रवर्तत, विमुक्करागस्य गृहं तपोवनं ॥ १ ॥ भा• कुदकुदकृतभावप्राभूत गा० ६६ श्रुतसागरीटीका (पृ. २१३ ) जह सलिलण गा लिप्पा, कमलिरिणपत्नं सहावपयडीए । तह भावण ण लिप्पड़, कसाय विसरहिं सप्पुरिसो ॥ ९५२ ॥ धात्रीचाला उसतीनाथ-पद्मिनीदल बारिवत् । दग्धरज वदाभासं, भुञ्जन् राज्यं न पापभाक् ॥ अन्नन्नपि भवत् पापी; विघ्नन्नपि न पापभाक् । परिणाम विशेषेण, यथा धीवर कर्षकी ॥४॥ (आ० कुंद कुंद कृत भाव प्राभूत गा० १५२ और १६२ की श्रुत सागरी रीका पृ० २९६, ३०२, ) भावो हि पढमलिंग, ण दव्वलिंग च जाण परमत्थं ॥२॥ भावेण होई लींगी ॥ ४८ ॥ भावो कारण भूदो ॥६६॥ जाणेहिं भावधम्मं ।। २ ।। नयत्यात्मानमात्मेव, जन्म निर्वाण मेव च ॥ ७५ ।। अप्पा तारइ तम्हा अप्पांनो मायव्यो । समभावे जिण दिढ ॥ वगैरह २ । पं. वनारसी दास जी बताते हैं कि जो घर त्यागे कहावे जोगी, घर वासी कह कहें जूं भोगी। अन्तर भाव न परखे जोई, गोरख बोले मूरख सोई ॥
(बनारसी विलास गोरख वचन गा० २०२.९.) माने-अनेकांत जैन दर्शन में शुध्ध परिणाम वाला गृहस्थ लीगी भी मोक्ष का अधिकारी है। - दिगम्बर--मू रूप परिग्रह का अभाव होने से. वस्त्र धारी मुनि मोक्ष में जाता है, गृहस्थ भी मोत में जाना है, तो कमी २ कोई आभूषण धारी भी मोक्ष में चला जायगा। जैन: जहाँ बाह्य वस्तु की प्रधानता नहीं है वहाँ यह भी होना मुमकिन है जैनदर्शन मूछी न होने के कारण उसको भी मोक्ष मानता है। समय प्राभृत गा० ४४४ की तात्पर्यवृत्ति में और दिगम्बरीय पाण्डव चरित्र में तप्त लोहा के आभूषण होने पर भी मोक्ष प्राप्ति बताई है। यद्यपि वह परिपह रूप था किन्तु श्राभूषणों के अस्तित्व में केवल ज्ञान की रुकावट नहीं मानी है । और उसका कारण वही "ममत्वाभावात्" ही बताया है । अपमत्त प्रात्मा को वस्त्र पछी या आभूषण है या नहीं है, ऐसी तनिक भी ममत्व विचारणा नहीं होती है। यही कारण है कि यह उसी हालत में मोत तक पहुंच जाता है। दिगम्बर-तव तो अजैन सन्यासी भी भाव से जैन यनकर क्षपश्रेणी में चढकर केवली होगा, मोक्षगामी हो जायगा ! जैन- सच्चे अनेकान्ती जैन दर्शन को यह भी इष्ट है। मोक्ष के लिये किसी का ठेका तो है नहीं नामजैन नरक में भी जाता है भाव जैन मोक्ष में भी चला जाता है । वल्कलचीरी जैनालगी नहीं था अन्यलिंगी था, फिर भी यह मोक्षगामी हुश्रा । अनः जैन रर्शन साफ २ कहता है कि- - ।
[८.] कपाय मुक्तिः किल मुक्तिरेव । समभाव भावियप्पा, लद मुक्खं न संदहो ॥ सम्यग् दर्शन शान चारित्राणि मोक्षमार्गः ॥ सम्यक दर्शन सम्यक ज्ञान व सम्यक चारित्र वाली प्रात्मा मोक्षक योग्य है । चाहे वह किसी भी वश में, जानि में या वेद में हो। माने योग्यता को पाकर अन्य लिंगी भी मिन्द हो सकता है। दिगम्बर-शुद्र नो पांचवे गुणस्थान का अधिकारी हैं। वह मोक्ष में नहीं जाना है । श्वेताम्बर समाज शद्रों का भी मुक्ति मानता है वह तो उसकी गलती है जैन-जैसे कोई भी द्रव्य लिंग मोक्ष का बाधक नहीं है वैसे ही कोई भी जाति मोक्ष बाधक नहीं है । एकेन्द्रिय घगैरह वास्तविक जाति है और चाह्मण वगैरह काल्पनिक जाति हैं. इस हालत में शुद्र मुक्ति का एकान्त निषेध करना, न्याय मार्ग नहीं है । श्रतपय स्याद्वाद दर्शन शुद्र मुक्ति के पक्ष में हैं। दिगम्बर-दिगम्बर समाज शुद्ध मुक्ति का निषेध करता है उसका कारण शूद्र का नीच गोत्र है । चारो गति में नारकी तीर्यच म्लेच्छ-शूद्र और अंतर पिज मनुष्य नीच गोत्री हैं तथा आर्यमनु. ध्य भोगभूमि के मनुष्य व देव उच्च गोत्री हैं। इससे पाया जाता है कि चन्दन स्फटिक चित्रवल्ली, मारवल वगैरह जो की श्रेष्ट जातियां है जिनकी प्रतिमा बनाई जाती है, जल केसर चन्दन फूल वनस्पति का इत्र वगैरह जो कि तीर्थंकर के ऊपर चढाये जाते हैं, अक्ष, जिसकी स्थापना होती है. गाय सफेद हाथी मृगराज घोडा. कामधेनुगाय इस देशविरतिआदिधर्म के अधिकारी निर्यञ्च व शूद्र ये सव भी नीत्र गोत्री हैं, और धर्म द्वेपी साधुढेषी नमुचि सम्यक्त्व रहित युगलिये अविरतिदेव और संगमक मेघमाली जैसे पापीदेव ये स भी उच्च गोत्री हैं।
[८१ ] गोन की व्यवस्था इस प्रकार है। १--संताण कमेणा गयजीवाऽऽयरणस्स गोदमिदि संरणा । उच्च नीचं चरणं, उच्चं नाय हवे गोदं ॥५॥ ('मा० नेमिचन्द्र कृन गोम्मट सार जीव कार गा० १३) २-यस्योदयात् लोक पूजितपु फुलेपु जन्म तदुच्चै र्गोत्रम् । यदुदयात् गहितेपु कुलेपु जन्म तन्नीचर्गोत्रम् ॥ ( भा० पूज्यपाद कृत सर्वार्थ सिद्धि भ० - सूत्र ११ टीका) ३-दीक्षायोग्य साध्याचाराणां साध्वाचार छत. सम्यन्धाना मार्य प्रत्ययाभिधान व्यवहार निवन्धनानां पुरुषाणां संतानः उच्चै र्गोत्रम् ॥ तद्वीपरीनं नीचे गोत्रम् (आ. भूतमलि कृत पर संडागार : वेदनाखंड ५ वा पयहि भधिकार का सूत्र १२९ की भा० वीरमेन कृत धवला रीका) ४-नीच गोत्र का उदय पांचवे गुण स्थानक तक है देस तदीय कसाया, तिरिया उज्जोय णीच तिरियगंदी छठे श्राहार दुर्ग, थिण तिय उदय घोच्छिण्णा ॥ २६७ ।। देसे तदीय कसाया, नीच एमेव मनुस सामरणे पजते वि य इत्धीवेदा अपजन परिहीया ॥३०॥ (गोम्मट सार -मकर) इन पाठों से शुद्रों का मोक्ष ही नहीं वरन् शूद्रों की दीक्षा का भी निषेध है। जैन--य -यह दिगम्बरसम्मत गोत्रव्यवस्था स्पष्ट नहीं है देखिये -गोम्मटसार में उभं चरणं उच्च गोदं हये, नीचं चरणं नीचं गोदं छये । उच्च प्राचरण से उप गोत्र व नीच आचरण से नीच q . माना [ ८२ ] २-सर्वार्थसिद्धि राजवार्तिक व. श्लोक वार्तिक में-"लोक पूजितेषु", "गर्हितेषु", लोक मान्य और लोक निंद्यरूप लौकिक व्यवहार को ही गोत्र माना है ।* ३-धवला टीका में गोत्र का साधु और असाधु आचार से सम्बन्ध जोड़ा है। यहां साध्वाचार शब्द से "प्रशस्त प्राचार" लेना है यहाँ “दीक्षा योग्य" शब्द कुछ विचित्र ही है क्योंकि दीक्षा का अभिप्राय मुनि दीक्षा का ही लिया जाय तो देव युगलिक और अभाव मनुष्य को उच्च गोत्री नहीं कहा जायगा, देव किसी की संतान नहीं है; युगलिकों को दीक्षा योग्य साधु अाचार वाले से सम्बन्ध और संतानत्व भी नहीं अतः वे उच्चगोत्री नहीं रहेंगे । मगर दिगम्बर आचार्य उन्हें उच्च गोत्री ही मानते हैं । यदी श्रावक के व्रत भी दीक्षा में सामिल हैं तो. पंचे. न्द्रिय तीर्यचं भी उच्च गोत्री ठहरेंगे और उनकी. उच्चता देवों से भी बढ़ जायगी। इसके अलावा उल १२६ सूत्र की ही धवला टीका में "नापि पंच महाव्रत ग्रहण योग्यता उच्चैर्गोत्रेण क्रियते" तथा "नाणुत्र- तिभ्यः समुत्यतौ तद् व्यापारः ॥” पाठ से भी उपरोक्त लिखित अभिप्राय की पुष्टी होती है । ४-इस प्रकार यह गोत्र व्यवस्था सर्वथा अस्पष्ट है .. इस अवस्था में यह मानना पड़ेगा कि सम्यक्त्व या मिथ्यात्व पाप या पुण्य और धर्म या अधर्म के ऊपर गोत्रकर्म का कुछ असर नहीं पड़ता है। इस विवेचन का सारांश यह है कि-दिगम्वर विद्वान् गोत्र कर्म को प्राचार पर निर्भर मानते हैं उच्च, नचि प्राचारों के .. गुणगुण वद्भिर्वा अय्यन्ते (सेव्यन्ते ) इति आयाः ॥ ( सर्वार्थसिद्धि राजवार्तिक) - [ '८३ ] परिवर्तन के साथ उच्च नीच गोत्र के उदय का भी परिवर्तन मानते है जाति और फुल को कल्पना रूप मानते हैं और उच्च श्राचार वाले शुद्र को जिन दीक्षा की प्राप्ति भी मानते हैं फिर मोक्ष का निषेध कैसे माना जाय ? जहां सम्यक चारित्र है जिन दीक्षा है यहां मोक्ष है ही। दिगम्बर-गोत्र का परिवर्मन और जाति श्रादि कल्पना के लिये दिगम्बर प्रमाण यताइये । जैन दिगम्बर विद्वान् गोत्रकर्म की प्रकृति में वापसी परिवर्तन और जानि कुल को असद् रूप मानते हैं उनके पाठ निम्न प्रकार णवि देहो बंदिज्जड, गवि कुलो ण वि य जाइ संजुत्ता को दिम गुण हीणो, णहु समणो णेच सायो- होई ॥ २७॥ शरीर, कुल जाति श्रमण लिंग या धावफ घेप वन्दनीय नहीं हैं; गुण बन्दनीय हैं। ( आ. कुन्द कुन्द कृत दर्शन प्राभूति ) उत्तम धम्मेण जुत्तो, होदि सिरक्खोवि उत्तमो देवो ॥ चंडालो वि सुरीन्दो, उत्तमधम्मेण संभवदि । चंडाल और नीर्यच धर्म के जरिये उत्तम माने जाते हैं। (स्वामीकानिया नुप्रेक्षा ० ४५०) पूर्वविभ्रम संस्कारात्, भ्रान्तिं भूयोपि गच्छति ।। विभाय की विचारणा करने वाला जीय मानी छोन पर भी यह शुद्र है ऐमे भ्रम में पुरान घिभ्रम मकार में पुगः कम जाना॥४५॥ + * प्रामिण - [ ८४ ] जीण वस वयात्मानं न नीर्ण मन्यते तथा । जर्णेि स्वदेहे प्यात्मानं, नजीणं मन्यते बुधः ॥ ६४ ॥ यहाँ पर उत्तरार्ध ऐसा भी बन सकता है कि- शद्रे देहे तथात्मानं न शूद्रं मन्यते युधः जीर्ण वस्त्र होने पर उसकी श्रात्मा जीर्ण नहीं मानी जा सकती (शुद्र देह होने से उसकी आत्मा शुद्ध नहीं हो सकती है) नयत्यात्मान मात्मैव, जन्म निर्माण मेव च ॥ ७५ ।। आत्मा ही प्रात्मा को संसार में फंसाता है और मोक्ष में ले आता है। जाति देहा श्रिता दृष्टा, देह एवात्मनो भवः ।। न मुच्यन्ते भवात्तस्मात् ते ये जाति कृताग्रहाः ॥ ८ ॥ ब्राह्मण ही मोक्ष को पाता है इत्यादि जाति के प्राग्रह रखने वाला संसार में बुरी तरह भटकता फिरता है । जाति लिंग विकल्पेन, येषां च समयाग्रहः । तेपि न प्राप्नु वन्त्येव, परमं पदमात्मान : ।। ८६ ॥ मैं ब्राह्मण हूँ, में नग्न हूँ, दिगम्यर हूँ, एसा श्राग्रह मोक्ष का याधक है परम पद प्राप्ति में गेड़े लगाते है। (भा० पूज्यपादं कृत समाधि शतक) नं जातिगर्हिता काचित् , गुणाः कल्याण कारण । व्रतस्थमपि चांडालं, ते देवा ब्राह्मणं विदुः ।। कोई भी जाति निन्दनीय नहीं है, गुण ही कल्याण करने वाले होते हैं। चांडाल-भंगी भी व्रत धारी होतो ब्राह्मण के समान है। चिन्हानि विटजातस्प, संति नांगेषु कानिचित् । अनार्य माचरन् किंचित् , जायते नीच गोचरः ॥
1 [.८१. ] गोत्र की व्यवस्था इस प्रकार है। -संताण कमेणा गयजीवाऽऽयरणस्स गोदमिदि संगणा । उच्च नीचं चरणं, उच्च नीचं हवे गोदं ॥५॥ (मा० नेमिचन्द्र कृत गोम्मट सार जीव कांड गा० १३) २-यस्योदयात् लोक पूजितेपु कुलेषु जन्म तदुच्चै गोत्रम् । यदुदयात् गर्हितेपु कुलेषु जन्म तन्नौचैर्गोत्रम् ॥ (भा० पूज्यपाद कृत सर्वार्थ सिद्धि भ. ८ सूत्र १२ टीका) ३-दीक्षायोग्य साध्याचाराणां साध्वाचार सत. सम्बन्धाना मार्य प्रत्ययाभिधान व्यवहार निवन्धनानां पुरुषाणां संतानः उच्चै गोत्रम् ॥ तद्वीपरीतं नीचे गोत्रम् (भा. भूतबलि कृत पट संहागर वेदमाखंड ५ वा परि अधिकार का सून १२९ की भा० वीरसेन कृत धवला टीका) ४-नीच गोत्र का उदय पांचवे गुण स्थानक तक है देसे तदीय फसाया, तिरिया उज्जोय णीच तिरियगंदी छट्टे आहार दुर्ग, थिण तिय उदय बोच्छिण्णा ॥ २६७ ॥ देने तदीय कसाया, नीच एमेव मनुस सामरण पजते विय इत्थीदा श्रपजन परिवीणा ॥३०॥ (गोम्मट सार -कम्मर) इन पाठों से शूद्रों का मोक्ष ही नहीं वरन् शूद्रों की दीक्षा का भी निषेध है। जैन-- --यह दिगम्बरसम्मत गोत्रव्ययस्था स्पष्ट नहीं है देखिये -गोम्मटसार में उथं चरणं उशं गोदं हये, नीचं 'चरणं नाचं गोदं हये । उध आचरण से उन गोत्र व नीच आचरण से नीच गोत्र माना है ।
[८२ ] २-सर्वार्थसिद्धि राजवार्तिक व श्लोक वार्तिक म-"लोक पूजितेपु", "गर्हितेषु', लोके मान्य और, लोक निंद्यरूप लौकिक व्यवहार को ही गोत्र माना है । ३-धवला टीका में गोत्र का साधु और अंसाधु आचार से सम्बन्ध जोड़ा है। यहां साध्वाचार शब्द से "प्रशस्त प्राचार" लेना है यहाँ "दीक्षा-योग्य" शब्द कुछ विचित्र ही है क्योंकि दीक्षा का अभिप्राय मुनि दीक्षा का ही लिया जाय तो देव युगलिक और अभाव मनुष्य को उच्च गोत्री नहीं कहा जायगा, देव किसी की संतान नहीं है, युगलिकों को दीक्षा योग्य साधु श्राचार बाले से सम्बन्ध और संतानत्व भी नहीं हैं अतः वे उच्चगोत्री नहीं रहेंगे । मगर दिगम्बर आचार्य उन्हें उच्च गोत्री ही मानते हैं. . 1: यदी श्रावक के व्रत भी दीक्षा में सामिल हैं तो पंचे. न्द्रिय तीर्यचं भी उच्च गोत्री ठहरेंगे और उनकी उच्चता देवों से भी बढ़ जायगी। इसके अलावा उग्स १२६ सूत्र की ही धवला टीका में नापि पंच महाव्रत ग्रहण योग्यता ; उच्यैर्गोत्रेस् क्रियते" तथा "नागुन- तिभ्यः समुत्यतौ तद्, व्यापारः ॥ पाठ से भी लिखित अभिप्राय की पुष्टी होती है । :४-इस प्रकार यह गोत्र व्यवस्था सर्वथा अस्पष्ट हैं इस अवस्था में यह मानना पड़ेगा कि सम्यक्त्व या मिथ्यात्व पाप या पुण्य और धर्म या अधर्म के ऊपर गोत्रकर्म का कुछ असर नहीं पड़ता है। इस विवेचन का सारांश यह. है कि-दिगम्बर विद्वान् गोत्र कर्म को प्राचार पर निर्भर मानते हैं उच्च, नीच श्राचारों के उपरोक्त. । ... गुणगुण वद्भिर्वा अय्यन्ते (सेव्यन्ते ) इति आयोः । (सर्वार्थसिद्धि राजवार्तिक) '[:.८३ ] परिवर्तन के साथ उच्च नीच गोत्र के उदय का भी परिवर्तन मानते हैं जाति और फुल को कल्पना रूप मानते हैं और उच्च प्राचार वाले शूद्र को जिन दीक्षा की प्राप्ति भी मानते हैं फिर मोक्ष का निषेध कैसे माना जाय ? जहां सम्यक चारित्र है जिन दीक्षा है वहां मोक्ष है ही। ! . दिगम्बर-गोत्र का परिवर्तन और जाति आदि कल्पना के लिये दिगम्बर प्रमाण वताइये । 'जैन- "दिगम्वर विद्वान् गोत्रकर्म की प्रकृति में वापसी 'परिवर्तन और जानि कुल को असद् रूप मानने है" ।;17i.. उनके पाट निम्न प्रकार है। णवि देहो बंदिज्जड, णवि कुलो ण वि य जाई संजुत्ता को बंदिम गुण हीणो, णहु समणो णेव सावयो- होई ।। २७! शरीर, कुल जानि श्रमगा लिंग या श्रावक वेष वन्दनीय नहीं हैं; गुण वन्दनीय है ( मा० कुन्द कुन्द कृत दर्शन प्राभनि) उत्तम धम्मेण जुत्तो, होदि सिरक्खोवि उत्तमो. देवो ।। चंडालो वि सुरीन्दो, उत्तमधम्मण संभवदि । चंडाल और नीर्यच धर्म के जरिये उत्तम माने जाते हैं। ( स्वामीकार्तिकेया नुप्रेक्षा गा० ४३०) पूर्वविभ्रम संस्कारात्, भ्रान्तिं भूयोपि गच्छति ।। यिभाय की विचारणा करने वाला जीव झानी होने पर भी मैं ब्राह्मण हूँ वह शुद्र है ऐसे भ्रम में पुराने विभ्रम संस्कार से पुनः फस जाता है . । । १ [ ८६ ]. (भा०मिम सेन कृत आदि पुराण स०१८ - ४५) वर्णकृत्यादि भेदानां, देहे स्मिन्नऽदर्शनात् । ब्राह्मण्यादिषु शद्रायः, गर्भाधान प्रवर्तनात् ।। नास्ति जातिकृतो भेदः मनुष्याणां गवाश्ववत् । प्राकृति ग्रहणात्तस्मा दन्यथा परिकपन्यते ।। गाय घोड़ा वगैरह में भिन्नता है, परन्तु वामगादि जातिश्रा में अन्य जातियों से प्रेमी कोई भिन्नता नहीं हैं। वास्तव में जाति भेद कल्पना मात्र ही है। { भा० गुणभद्रकृत उत्तरपुराण १७४) कुलंजातीश्वरादि मदविध्वस्त बुद्धिभिः । सद्यः संचीयते कर्म, नीचगति निवन्धनम् ।। ४ ।। . ( आ. शुभमन्द्र कृत ज्ञानार्णव अ० २१ प्रो०१८ ) देह एव भवो जन्ता, यलिहगं च तदाश्रितम् । जातिवत्तद् ग्रहं तत्र, त्यत्वा स्वात्म गृहं यशेत् ।। ३६ ।। शरीर ही जीव का संसार है, और लिंग जातियां वगेरह तो शरीर से ही सम्बन्धित रहते हैं। अतएव लिंग व जाति के अभि. मिवेश को छोड़कर आत्मा का पक्षपाती बनना चाहिये । - (पं. आशाधर कृत सागार धर्मा मृतम् ० ) सम्यग् दशन संपन्न मपि मातंगदहजम् । देवा देवं विदुर्भस्म गूढांगारांत रौजसम ॥ २८ ॥ श्यापि देवो पि, देवः श्वा, जायते धर्मकिल्विषात् । कापि नाम भवेदन्या, संपद्धर्मशरीरिणाम ।। २६ ।। सम्यक्त्व वाला एवं धर्म युक्त मातंग और कुत्ता भी प्रशंसनीय है गैरह । . ........... ...
[,८७ ] त्रिवर्गा चार । :: :-(सन का प्रावकाचार मो. २८.२९) विप्र क्षत्रिय विट् शूद्राः प्रोक्ताः क्रिया विशेषतः। जैनधर्म पराः शक्ताः ते सत्र बांधवोपमाः ॥ श्राचार की विशेषता से ग्राह्मण वगैरह संज्ञाएं हैं, किन्तु धर्म में तो ये सब बन्धु के समान है। (भा. 'कृत धर्म रनिक) श्राचारमात्र भेदेन, जातीनां भेद कल्पनम् । न जाति मणीयाम्ति, नीयता कापि तात्वीकी ॥ गुणैः पद्यत जाति गुणधंसे विपद्यते । श्राचरण के भेद मे जाति भेद है । परमार्थ मे नो ब्राह्मण श्रादि काई नियन जानी नहीं है । गुण के अनुमार जाती यननी है । गुणों के बदल जाने पर जानि भी यदल जानी है (धर्म परीक्षा) अपवित्रः पवित्रो वा, सुस्थितो दुस्थिती पि वा । ध्यायेत्पंच नमस्कारं, सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १ ॥ अपवित्रो पवित्रावा, सर्वावस्थां गतो पि वा । यः स्मरेत् परमात्मान, स बाह्याभ्यंतरे शुचिः ॥ २ ॥ मनुष्य कैसा भी हो. किन्तु नमस्कार मंत्र के जाप से वो निश्पाप पचित्र बनता है। पवित्र भी तर्थिकरके जाप करने से वाहिर से और भीतर से पवित्र बनता है। (देव शाम गुरु पूजा, जैन सिद्धान्त संग्रह पृ० १८४.१८५) गोत्र कर्म, यह जीव विपाकि प्रकृति है । 'नामकर्म, शरीर की भेद व्यवस्था करता है गोत्र कर्माचरण रूपः क्रिया की व्यवस्था करता है, गोत्र,कर्म भाव कम है। "वास्तव में द्रव्या- । . ..
[८८ ] नुयोग की अपेक्षा जन्मतः कोई गोत्र य या वर्ण नहीं है" : "वंशकृत अशुद्धताव कोढ आदि बीमारियां परम्परा तक चलती है, यह नियम नहीं है। "सब ही श्रघानिये कर्म गुण थेगि के श्रारोहा में बजान समझे जाते हैं। गोत्रकर्म का परिवर्तन नो एक साधारण - सी बात हैं। अघातिया कर्म जीव के दर्शन शान सम्यक्त्व प्रादि गुग्ग तो क्या अनुजीव गुण स्पपरसगंवर्णादि का जो ज्ञान है उसका भी बात नहीं करसकता और नीच कुल में जन्म लेन पर भी काय योग के अभाव रेन व भाव शुद्धि से नीचस्कार फल को प्राप्त नहीं होते । क्योंकि कुल संस्कार से यने हुए गोत्र कर्मों का पाक जीवन में होने से जीव के संयम रुप परिणाम हो जाने पर पाच- र रण में स्वभावतः परिवर्तन हो जाता है । यही जीव विपाकी गोत्र- कर्म की प्रकृति का प्रकरणांतर गत यथार्थ अर्थ है"। "नाच गोत्र की कर्म प्रकृति..... "नीच गोत्र रूप हो जानी है गा० ४१०, ४२२॥ "यह तीनों संक्रमण अपनी २ बंधव्युच्छित्तिस प्रारम्भ होकर क्रमशः अप्रमत्त (७) से लगाकर उपशांत कपाय (११) पर्यन्त पूर्ण हो जाते है" जैसे नीच गोत्र उच्च गोत्र हो सकता है उसी प्रकार उच्च गोत्र भी अपकर्षण करके नीच गोत्र हो जाता है और गोत्रं कर्म का उद्वेलन होकर सर्व संक्रमण तक होता है। : बंध की अपेक्षा से भी गोत्र का परिवर्तन स्पष्ट है उपशम श्रेणी से उतरते समय सूक्षम संपराय गुणस्थान में १.अनुत्कृष्ट उच्च गोत्र का अनुभाग बंध होता है वह सादिबंध है, २- सूक्षम संपराय से नीचे रहने वाले जीवों के वह अनादि बंध है, अभव्य जीवों के ध्रुव बन्ध है, तथा ४-उपशम श्रेणी वाले
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के अनुत्कृष्ट यंध को छोड़कर जो उत्कृष्ट बंध होता है यह मधुय है।
इस प्रकार अनुत्कृष्ट उच्च गोत्र के अनुभाग बंध में ४ भेद
बतलाये।
"उस जगह ( सम्यक्त्व वमन के याद) इस अजपन्य नाच
गोत्र के अनुभाग बंध को सादिबंध कहना। फिर उसी मिध्या-
रष्टि जीव को उस अंत के समय में पहले जो बंध है यह अनादि
है। अभव्य जीव को वह बंध भुव है । और वहाँ अजघन्य को
छोड़ जघन्य हुना यहां वह अध्रुव
"गोत्र फर्म के परिवर्तन का वह फितना स्पष्ट वर्णन है"
(विधभरदासजी गार्गीयका "गोन कर्मया।"
छेस, मैनमिन्न १० ३९; भंक ३९, १०,१)
A भोग भूमि और कर्म भूमि के जरिये गौत्र का उदयपरिवर्तन
पाया जाता है।
"इस यथार्थ घटना से ही सिद्ध है कि गोत्र का उदय, संतानों
में बदल जाता है।" (० २६०)
B "संतानक्रम से गोत्र का उदय बदल जाता है" (३३८)
C"हमारी समझ में उनके (अंतर द्वीपज मनुष्य के) भोग
भूमि के समान उच्च गोत्र का उदय होना चाहिये। (पृ. ४५४)
(• शीतलप्रसादजी के लेख, मैनमित्र वर्ष. अंक 18,२१,२.)
१७ A तीर्थकर भगवान का औदारिक शरीर उसी ही भव में
यदल कर परमौदारिक बन जाता है वैसे गोत्रकर्म का भी परिव.
तन समझना चाहिये।
B आज कल के ६ करोड़ मुसलमान ये असल में उच्च गोत्र
की संतान है, इनमें जो आचार से शुद्ध बनेगां वह . उच्च. गोत्री
बनेगा। गैरह।..........
न
.
[९.] - रवीना जैन मया की " गोत्र ", मित्र 40. भार.२७.५०) =ন এখান হা । # বা कि आर्यमंड के मनुष्य उच्च शीर नाव मानों मकार, के होने । शुद्र हीन वृत्ति के कारमा चलेका पनि काम नील गायी. बाकी त्रैश्य, क्षत्रिय ब्राहमा और साधु स्वाभिमानी वृति के कारण उच्च गोगी मान जाने .. पोर पाली वृति को सोरकर परिकार मनुष्य या जाति दुसरी नि को स्वीकार कर लेता है तो उसके गोत्र का परिवर्तन भी हो जाता है, उन्ले भोग भूमि की वाभिमानपूर्ण वृति को छारकर यदि आर्यसंट के मनायों ने दीन वृत्ति और करवृति को अपनाया तो वे जमशः द व म्लेच्छ बनकर नाच गोत्री कहलाने लगे। इसी प्रकार यदि ये लोग अपनी दीन तृत्ति अथवा र वृत्ति को छोड़कर स्वाभिमानपूर्ण वृति को स्वीकार कर ले तो फिर ये उच्च गोत्री हो सकते है। यह परिवर्तन कुछ कुछ अाज हो भी रहा है तथा आगम में भी बतलाया है कि छठे काल में सभी मनुष्यों के नीच गोत्री हो जाने पर भी उत्सर्पिणी के तृतीय काल की प्रादि में उन्हीं की संतान उच्च गोत्री तीर्थकर प्रादि महापुरुप उत्पन्न होंगे। (रित बंशीपरमी म्याकरणाचार्य का "मनुष्यों में उपचता नीचता क्यों !" लेख, भनेकांत ३० ३ कि० पृ. ५५) दिगम्बर-शुद्र जिनेन्द्र की पूजा करे ? जैन--इसके लिये तो दिगम्बर प्राचार्यों ने भी श्राशा दे दी है। जैसा कि- १ अपवित्रो पवित्रो वा० (देव गुरु वाम पूजा पाठ ) २---विद्याधर तीर्थंकर की पूजा करके बैठे हैं (३) इन में मातंग जाति के ये हैं (11) हरे वमवाले मातंग (१५) मुदी 7 । की हतियों के भूषणवालें भस्म से भद मैले श्मशाना (६) काले अजीन और चमड़े के वस्त्रयाले, काल वयाकी. (१) पाकी भंगी (१६) ( मा. जिनसेनकृत हरिवंश पुराण, सर्ग २६ बलो. १९४) ३-कियत्काल गते कन्या, आसाद्य जिनमन्दिरम् । सपयाँ महता चक्रु-मनोवाफ्कायशुद्धिनः ॥ ५ ॥ (गौतमचरिन भधि. ३ श्लो ५९ तीन शूद्र कन्या का पूजा पाठ) ४-धनदत्त ग्याले ने जिनमन्दिर में जिनप्रतिमा के चरणों पर कमल पुष्प चढ़ाया। (भाराधनाकधाकोप, कया ३३) ५-सोमदत्त माली प्रतिदिन जिनेन्द्र भगवान की पूजा करता (भाराधनाकथाकोष) दिगम्वर- क्या दिगम्बर शास्त्र में शूद्रों की मुनि दीक्षा और मुक्ति का विधान है? जैन-हांजी है ! कुछ २ पाठ देखिय- १-नापि पंचमहातग्रहणयोग्यता उच्चैत्रिण क्रियत, (पट संद, खं० ४ १०५ सू० १२६ की धवला टीका) था। यदि यह कहा जाय कि उच्च गोत्र के उदय स पांच महावतों के ग्रहण की योग्यता उत्पन्न होती है और इसी लिय जिनमें पांच महावत के ग्रहण की योग्यता पाई जाय उन्हें ही उच्च गोत्री समझा जाय, तो यह भी ठीक नहीं है। (दि० पं. जुगलकिशोर मुख्तारमी का लेख, भनेकान्त वर्ष २,किरण. १० ११) २-अकम्मभूमियस्स पड़िवज्जमाणस्स जहरण्यं संजम- ट्ठाणमणतगुणं (चर्णेि सूत्र) (पट्टागम संजमक्षशि भरि, पूर्णि)
[ ९२ ]
भनायो-शूद्रों का जघन्य संयम प्राप्ति स्थान अनंत गुना
३-पुचिन्लादो असंखेज्ज० लोग मत छट्ठाणाणि उवरि
गन्तूणेदस्स समुप्पत्तीए : को अकम्मभूमि ओ णाम ?
भरहेरवयविदहेसु विणीत सरिण मझमखंड मोचूण,
सेस पंचखडविरिणवासीमणुओं एत्थ अकम्मभूमिओ
त्ति विविक्खओ तेसुधम्मकम्मपत्तिए असभवेण तम्भावो-
ववत्तीदो जई एवं कुदो तत्थ संजमग्गहण संभवो ! त्ति
णा संकणिज । दिसाविजय चकचट्टी खंधावारेण सह
:: मज्झिमखंडमागयाणं मिलेच्छरायाणं तत्थ चकचट्टिया-
दीहि सह जादवेचहियसंबन्धाणं संजमपडिवत्तिए विरोधा-
भावादो ! अहवा तचत् कन्यकानां चक्रवादिपरिणी-
:: तानां गर्भपूत्पन्ना मातृपक्षापेक्षया स्वयमकर्मभूमिजा
इतीह विवक्षिताः, ततो न किंचित् विप्रतिपिद्धम् तथा-
जातीयकानां दीक्षार्हत्वे प्रतिषेधाभावात् ।
प्रश्न-पांच अनार्य खंड के म्लेच्छों को दीक्षा के भाव को
उत्पन्न कराने वाला योग मिलना मुश्किल है फिर वे दीक्षा कैसे
लेंगे!
उत्तर-चक्रवर्ती के साथ में मध्यम खंड में आय हुए म्लेच्छ
राजा दीक्षा लें यह सम्भावित है। अथवा चक्रवर्ती और म्लेच्छ
कन्या की सन्तान माता के जरिये अनार्य है, अगर वे भी दीक्षा
को स्वीकार करें, तो यह भी सम्भवित है। वे दीक्षा लेते हैं, अतः
पांची खंडों में संयमस्थान यताये हैं।
सारांश-पांचों खंड के अनार्य भी दीक्षा ले सकते हैं, फिर
मार्य खर के अनायौँ का तो पूछना ही क्या !
(मा• बीरसेनकृत जयपला टीका दिगम्बर शास्त्र भंडार की प्रति
८२७.८२८).
[ ९३] 4. ४-म्लेच्छभूमिज मनुष्याणां सकलसंयमग्रहणं कथं भव- तीति नाशंकनीयम् ? दिग्विजयकाले चक्रवर्तिना सह आर्यखण्डमागतानां संयमप्रतिपत्तेरविरोधात् । अथवा तत्कन्यानां चक्रवा- दिपरिणीतानां गर्भपूत्पन्नस्य मातृपक्षापक्षया म्लेच्छव्य- पदेशभाजः संयमसंभवात् । मान-म्लेच्छ भूमि के अनार्य भी दोनों तरह के निमित्त पाकर दीक्षा लेते हैं। (सन्धिसार गा० १६५ टीका) ५-दीक्षायोग्यास्त्रयोवर्णाश्चतुर्थश्च विधोचितः मनोवाकायधर्माय मता सर्वेऽपि जन्तवः। उच्चावचजनप्रायः, समयोऽयं जिनेशिनाम् । नैकस्मिन् पुरुपे तिष्ठे-देकस्तम्भ इवालयः ।। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और संस्कारित शूद्र'ये दीक्षा के योग्य है यानी अधिकारी हैं। जैनधर्म यह किसी खास जाति का धर्म नहीं है, किन्तु उच्च नीच सय मनुष्यों से संकलित धर्म है। (যনি তহু) ६ समाधि गुप्त मुनि (चारित्र सार) ७ आचारोऽनवद्यत्वं, शुचिरुपस्कारः शरीर शुद्धिश्च । करोति शूद्रानपि देव-द्विजातितपस्थिपारकर्म सुयोग्यान् ॥ (नीतियाक्यामृत) - शुद्रोप्युपस्काराचार-वपुः शुध्यास्तु तादृशः! जात्यादिहीनोपिकालादि-लन्यौह्यात्मास्ति धर्मभार ।। (दि. ६) मा सागाधर्मामृतम् ) ।
[१४] 8~एवं गुणविशिष्टो पुरुपो . जिनदीक्षाग्रहण-योग्या भवति, यथायोग्यं सच्छूद्राद्यपि । (भा कुन्दकुन्दकृत प्रवचनसार की आ० जगसेनकृत टीका ) १० धीवर की लड़की "काणा नुल्लिका हाकर व्रत करके स्वर्ग को गई। ११-भैंसों तक के माँस को खानेवाल. मृगध्वज ने मुनिदत्त मुनि से दीक्षा लेकर तप द्वारा घातिया कर्मों का नाश करके जग- त्पूज्यता प्राप्त की। . (दि० आराधनाकथाकोप, कथा-५५) १२-सम्यग्दर्शनसंशुद्धाः, शुद्धकवसनावृताः । सहस्रशो दधुः शुद्धाः, नार्यस्तत्रार्यिकाव्रतम् । : (भा० जिनसेनकृत हरिवंशपुराण सं० २ श्लोक १३३) "अशुद्ध वंश की उपजी सम्यक्दर्शनकार शुद्ध कदिने निर्मल पर शुद्ध कहिए श्वेत वस्त्र की धरन हारी हजारों रानी अर्यका भई अर कइ एक मनुष्य चारों ही वर्ण के पांच अणुव्रत, तीन गुणवत चार शिक्षा व्रत धार श्रावक भए अर चारों ही वर्ण की कई एक स्त्री श्राविका भई और सिंहादिक तीयेच बहुत श्रावक के व्रत धारते भये । यथाशक्ति नेम लिये तिष्ट और देव सम्यक् दर्शन ने धारक अव्रत सम्यग्दृष्टि हुए जिन पूजा विष अनुरागी भए । [दि० ६० दौलनराम जैपुरवालेकृत हरिवंशपुराण स० २ श्लो० १३५ से १६५ की वनिका जिनवाणी कार्यालय कलकता से मुद्रित पृष्ठ २३ जै. ३९-२३] १३-गोत्र में जीव के असली स्वभाव को घात नहीं करता, इसी कारण अघांतीया कहलाता है। केवलज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद अर्थात् तेरहवें गुणस्थान में भी इसका "उद्य" बना रहता है, इतना ही नहीं चौदहवें गुणस्थान में भी अन्त समय के पूर्व तक इसका "उदय" यरायर चला जाता है। जैसा कि-गोमट० कर्म० गा० २७३, अस्तित्व [ सत्ता] तो नीच गोत्र का भी केवलज्ञान प्राप्त करने के बाद तेरहवें गुणस्थान में भी बना रहता है, तथा चौदहवें गुणस्थान में भी अन्त समय के पूर्व तक पाया जाता है । यथा गोक० गा० ६३६ (पा. सूरनमानगी धकील का लेख 'भनेकान्त' ५० ३ कि । ०३३) १४-गोत्रकर्म का बंधादि कोप्टक 11, १२, १३ गुणस्थान में १४ वे गुणस्थान में बंध . बंध ०-० उदय ३-३ सत्ता २-३ [ पृ० २१४] गोत्र उदय | गोत्र सत्ता १ २२० २-१ उदय ३ सत्ता २ पृ०२१६ २ गुण०१३ गुण०१४ १ (मोक्षमार्ग प्रकाशक भा.२) १५-अनंग सेना घेश्याने वेश्यावृत्ति छोड़कर जैनधर्म स्वीकार करके स्वर्ग पाया । मछली खानेवाले धीवर मृगसनने यशोधर मनि से व्रत ग्रहण किये । वेश्याल भ्पटी अंजन चोर उसी भव सदगति को प्राप्त हुआ। मांसभक्षी मृगध्वज और मनुष्यभक्षा शिवदास भी मुनि होकर महान पद को प्राप्त हुआ । चाण्डाल की अन्धी लडकी श्राविका वनी । वसुदेव और म्लेच्छ कन्या जरा के पुत्र जरत कुमारने मुनिदीक्षा ली थी। विद्युत्चौर मुनि दुश्ना। वगैरह २ अनेक दृष्टान्त मिलते हैं। (पं० परमेडोपास यामतीर्थ कृत नभम की इदारता) १६-नागकुमार ने वैश्यापुत्रियों से लग्न किया और अंत में मुनि दीक्षा धारण की। दिगम्बर मुनि सत्य की और दिगम्बर अर्जिका ज्येष्ठा का व्यभिचारजात पुत्र रुद्रदिगम्बर मुनि हो गया। कार्तिकपुत्र का राजा श्रग्निदत्त और उसीकी ही पुत्री कृति के संभोग से "कार्तिकेय" और "वीरमती" हुए. कार्तिकेय मुनि दीक्षा धारण कर दिगम्बर मुनि हुए। (नंदलाए जैन कलकतावाले का लेख 'जैनमित्र' व•४०, मं• २६.पू. ४.८) १७-कार्तिकेय "भावलींगी" वनकर शुभ गति में गये । (दि० पं० यामसिाहत भ्रमनिवारण पृ० १) दिगम्बरः शूद्र अगर दिगम्बर मुनि हुश्रा तो मोक्ष के योग्य है ही, किन्तु इतने दिगम्बरीय प्रमाण होने पर भी दिगम्बर समाज शद्रदीक्षा और शुद्रमुक्ति का निषेध क्यों करती है ! जैन -इस शंका का समाधान दिगम्बर विद्वान इस प्रकार है , 1-अतः दिगम्बराम्नाय के चरणानुयोग में शूद्रों को मुक्ति निषेध की जो व्यवस्था यांधी है, और शूद्र क्षुल्लकों के अलहदा बैठ कर एक लोहे के पात्र में आहार लेने की रीति पर अाग्रह वह पीछे के प्राचार्यों का अपने देश और समय के अनुसार (हिन्दुओं की प्रसन्नता के अनुकूल पृ० २५) चलाया हुआ व्यव. हार है न कि जैनधर्म का विश्वव्यापी सिद्धान्त । (दि. विद्वान् भर्जुनलाल सेठी कृत शूद्रमुक्ति पृ० २७) २-चाण्डाल के दर्शन से ब्राह्मण और वैश्य स्त्रियां अपने नेत्र धोती थीं और उन्हें मरवाती थीं। (चित्तसंभूत जातक बौद्ध नन्थ) वद का शब्द सुन लेने वाले के कानों में कीले ठोक दिये जात थे (मातंग जातंक, सद्धर्म जातक).... A
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ब्राह्मण धर्म की पूरी छाप लगी हुई मालूम होती है; इसलिये
उन्होंने ( दिगम्बरी श्राचार्यों ने) शूद्रों से घृणा, आचमन आदि
को जैनियों में भी रखना चाहा है।
(५० परमेष्ठीदास जैन न्यायतीर्थकृत चर्चासागर समीक्षा पृ: ५०-५१)
वस्तुतः दिगम्बर समाज में शुद्रमुक्ति के निषेध के लिये जो
मैमित्तिक व्यवहार था उसको, वादके विद्वान् और खास करके
भाषा टीकाकार और ब्राह्मणीय प्रभाव से प्रभावित ब्रह्मचारी
वगैरहों ने एक जिनाझा रूप बना लिया।
परमार्थ से जैनदर्शन में श्रदमुक्ति की मना नहीं है।
दिगम्बर- श्वेताम्बर बाहुबली को अनार्य मानते हैं।
जैन यह झूठ यात है। कोई भी जैन शास्त्र बाहुबली को
अनाय नहीं मानता है । काल के प्रभाव से कर्मभूमि और अकर्म
भूमिका परिवर्तन होता है। वैसे ही. आर्यभूमि और यवनभूमि
का परिवर्तन हो सकता है । वास्तव में वायली ययन नहीं था,
और यह भूमि भी यवनभूमि नहीं थी। याहुबली की राजधानी
के बंददर संभवतः रावलपिंडी से करीब २० मील उत्तर में रक्सि-
ला के नाम से विद्यमान है।
दिगम्बर- चौथे ओर में आर्य भूमि में म्लेच्छो का निवास
नहीं माना जाता है।
जैन यह श्रापकी मान्यता कल्पना मात्र है । दिगम्बर
विद्वान तो यदी चौथे पारे में म्लेच्छ का होना. मानते
प्रमाण देघिय।
::१-चारियसार में संदिर मील और समाधिगुप्त मुनि का
अधिकार दे!
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. [ ९८ ] २-स्वदेशेऽनदारम्लेछान्, प्रजाबाधा विधायिनः । कुलद्धि प्रदानाद्यैः स्वसाकुर्यादुपक्रमः ॥ ७६ ॥ भा० जिनसेनीय भादिपुराण, पर्व ४२, ५ ..) ३-उच्चगाँवोदयादरायः नीचर्गोप्रादयादेश्च म्लेच्छाः (लोकवार्तिक, भ. १, सूत्र ३.) ४-तथान्तीपजा म्लेच्छाः पर स्युः कर्मभूमिजाः ॥ कर्मभूमि भवा म्लेच्छाः प्रसिद्धा यननादयः । स्युः परेच तदाचार-पालनाद् बहुधा जनाः ॥ (लोक वार्तिक, पृ० ३५.) ५-आर्य खंडोद्गवा श्रार्या, म्लेच्छा केचिच्छकादयः । म्लेच्छ खण्डोद्भधा म्लच्छा, अन्तरद्वीपजा अपि ॥ आर्य खंडोद्भव म्लेच्छ यह आर्य भूमि की वाशिन्दा चौथे पारा की म्लेच्छ जाति है। (श्रा० अमृतचन्द्र कृत तत्वार्थसार अ० १, श्लो० २१२) ऐसे ही ऐसे अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं सारांश-'यहाँ चौथे बारे में म्लेच्छ नहीं होते हैं यह दिगम्ब. रीय मान्यता शुद्रमुक्ति के विरोध के सिलसिले में चलाई हुई कल्पना मात्र है। दिगम्बर-श्वेताम्बर समाज "स्त्री मुक्ति" मानता है यह ठीक है? जैन-दिगम्बर प्राचार्य भी स्त्रीमुक्ति के पक्ष में हैं और यह सर्वथा वास्तविक ही है। । दिगम्बर-स्त्री आति में भिन्न २ प्रकार की त्रुटियां हैं अतः यो मुक्ति नहीं पा सकती है, जैसे कि- -- [ ९९ ] चित्ता सोहि ण तेसि, दिल्लं भावं तहा सहावेण । विज्जदि मासा तेसिं, इत्थीसु ण संकया झाण ।। २६ ।। (भा• बन्दकृत सूत्र प्राप्त, गा.१६) गरगो देवो णग्गो गुरु णग्गो पई तम्हा इत्थीणं । ण होदि चित्तसोही, विणा सोहिं कथं चरणं ॥३॥ (लोकोक्ति) जैन-महानुभाव ! त्रुटियां तो जैसी पुरुष में हैं वैसी ही स्त्री में हैं, फिर सिर्फ स्त्री ही मोक्ष में न जाय, यह क्यों ? तीर्थकर की मातायें, ब्राह्मी बगैरह अजिंकायें और सीता वगैरह सतीयां ये सब पवित्रता की श्रादर्श मूर्तियां है, सीताजी ने श्रग्नि प्रवेश किया इत्यादि चलिदान कथायें स्त्रियों की सात्त्विकना का गान करती हैं। मान-स्त्री में ऐसी कोई त्रुटी नहीं है कि जो मोक्ष की वाधक हो। जिस समाज में पूजनीय तीर्थकर भगवान की शास्त्रोक्त चंदन पूजा वगैरह को देखने मात्र से ही ध्यानभंग-अस्थिरता महसूस होती है, उस समाज में नग्नता के कारण भी अस्थिरता होने का आक्षेप किया जाय तो संभवित है। किन्तु सतीस्त्रियों की कुरवानी सोची'जाय तो उक्त प्राक्षप निमूल हो जाता है । दिगम्बर-लिनों में "अनृतं, साइंस माया" इत्यादि स्वाभा- धिक दृषण रहे हैं, इसका क्या किया जाय ? 'जन-सीसमाज में अधिक अंशानता के कारण ऐसा हो भी सकता है। किन्तु घे दूषण तो पुरुषों में भी काफी पाये जाते हैं। अधमाधम जीवन के लिये मेघमाली, दाहारी, अमाई नमुचि मंत्री, मुनिपी पालक, अलाउद्दीन, वगैरह अनेक दृशंत मौजूद हैं।
[१५6 ] विपक्ष में राजीमनी, चन्दनवाला, लीना, सुभद्रा इत्यादि के आदर्श जीवन भी प्रसिद्ध हैं। : भक्ताम्मर श्लो०२२ में स्त्री की ही गौरवगाथा है, देवगण मी जन्मोत्सव के समय स्त्री की पूजा करते हैं, पांचा कल्याणक में स्त्री को धन्यवाद देत हैं, श्री तीर्थकर भगवान चतुर्विध संघ की ४ प्रास्थानों में से २ श्रास्थान स्त्रीसमाज को देते हैं, उनका "गमा नीयम्स" पाठ से नमस्कार करते और कराते हैं । स्त्रीसमाज की समानता और पवित्रता के लिय इससे अधिक प्रमाण की जरूरत नहीं है। दिगम्बर-स्त्री, स्त्रीपने में है इस भिन्नता का क्या किया जाय ? जैन-स्त्री और पुरुष में गति जाति काय योग पर्याप्त बंधन लेश्या संघातन संहनन संस्थान प्रसादि संहित्य दर्शन शान चरित्र आदि के जरिए कुछ भेद नहीं है;गदि भेद है तो सर्फि शरीर रचना में ही "नामकर्म" के कारण भेद हैं। नामकर्म की पुद्रल विषाकी पिंडप्रकृतियां शारीरिक भेद कराती हैं । ६. दिगम्बर-किन्तु पुरुषचिन्ह स्त्रीचिन्ह वगैरह तो द्रव्य वेद है, ऐसा माना गया है। पुरिसित्थि-संढ-वेदो-दयेण पुरिसित्थिसंढो भावे । णामोदएण दव्वे, पाएण समा कहिं विसमा ।। २७० ॥ गोम्मटसार, जीवकार, गा० २७०) मान-पुरुषचिन्ह वगैरह नाम कर्म की प्रकृति जरूर है किन्तु "द्रव्य वेद" है। * जैन-यह वेबुनियाद-चात है । पुरुषादि की देहरचना नाम कर्म के अन्तर्गत है। औदारिक के अंगोपांगादि तीन भेद है orma . । [...] इनमें मूकता, अंधता इत्यादि पाये जाते हैं, उसी तरह लिंगभेद भी पाये जाते हैं, जो द्रव्यद नहीं किन्तु "नोकर्म" द्रव्य है। भैंस का दही निद्रा का "नोकर्म" है, इसी प्रकार तीनों लिंग क्रमशः तीनों वेद के "नो कर्म" द्रव्य है, यह सर्व साधारण दिग. पर मान्यता है : थी-पु-संढशरीरं ताणं णोकम्म दन्चकम्मं तु । स्त्री पुरुप आरै नपुंसक का शरीर उनको "नोकर्म" द्रव्य रूप कर्म है। (गोम्मटसार, कर्मकाण्ड अधिक, गा००६) तत्त्वार्थ सूत्र-मोक्ष शास्त्र में द्रव्येन्द्रिय और भावेन्द्रिय के भेद यताये है जब कि द्रव्य वेद और भाव वेद का नाम निशान भी नहीं है। फिर भी वेद के ऐसे भेद मानना, यह नितान्त मनमानी कल्पना ही है। उन शरीरों को द्रव्य चेद मानने में और भी बाधा आती है । वेद यह मोहनीय कर्म का अंग है, गोम्मटसार जीवकांड गा० ६ का "वेदे मेहुणसंज्ञा" पाठ मैथुन संज्ञा में ही घेद का अस्तित्व बताता है। इस सत्य को कुचलना पड़ेगा। इसके अलावा जहाँ तक द्रव्य वेद है यहाँ तक द्रव्य मोहनीय कर्म का अस्तित्व मानना पडेगा, और केवलज्ञान का निषेध करना पडेगा। अन्ततः पुरुष चिन्हादियुत शरीर केवलज्ञान का अधिकारी ही नहीं रहेगा। दिगम्बर समाज को यह बात मंजूर नहीं है। यह तो निर्विवाद मान्यता है कि-चार घातिया फर्म चाहे द्रव्य से विद्यमान हो या माय से विद्यमान हो, फेयलशान को रोकते हैं किन्तु चारों अघातिया कर्म फेवलशान को नहीं रोकने है। साथ २ में यह भी निर्विवाद है कि पुरुष स्त्री घ नपुंसफ के शरीर न तो येद है, न कपाय है, न मोहनीय है, किन्तु सपए कप [१२] से नाम कर्म है, अघातिया कर्म है, अतएव ये तीनों प्रकार के औदारिक शरीर केवलज्ञान के बाधक नहीं हैं। दिगम्बर--"वद रुपाय नोकर्म" तो सामनेवाली व्यक्ति का शरीर भी हो सकता है। जैन-अपने शरीर को छोड़कर सामनेवाली व्यक्ति के शरीर को "नोकम्म" मानना यह भी मनमानी कल्पना ही है। इस कल्पना के आधार पर तो यह भी मानना अनिवार्य होगा, कि कभी स्त्री-रमणच्छा और पुरुष-रमणच्छा इन दोनो विरोधी इच्छाओं का नोकर्म "द्रव्य पुरुष" ही हो । मगर ऐसा माना जाता नहीं है, अतः वह कोरी कल्पना ही है । वास्तव में सामने वाली व्यक्ति के बजाय अपने इन शरीरों को "नोकम्म" मानना, और "द्रव्य वेद पाय" न मानना यही बात दिगार प्राचार्यों को अभीष्ट है । इसके अलावा द्रव्य वेद और भाव वेद के बंध कारण कौन २ हैं ? यह समस्या भी खडी हो जायगी, अतएव दिगम्बर आ० नेमिचन्द्रजी ने स्पष्ट कर दिया है कि "ताणं णोकम्म दव्य-कम्म तु"। ( गो. गा० ७६) - -- दिगस्वर--'पापण लमा कहि विसमा गो० जी० गा० २७० इस पाठ से शरीर और वेदों में विषमता भी मानी जाति है। मान- पुरुष को पुरुष-वेदोदय होता है, स्त्री-वेदोदय होता है और नपुं- सक वेदोदय होता है। इसी प्रकार स्त्री. को एवं नपुंसक को भी तीनों प्रकार का वेदोदय होता है। सबको नीनो तरह की भावनायें महसूस होती है। जैन- -यह बात भी कल्पना रूप ही है, दिगम्बर शास्त्र भी इस नामंजूर करते हैं। इतना हो सकता है कि कामांध व्यक्ति संजातीय विजातीय का ख्याल न रक्खे और अंप्राकृतिक प्रवृत्ति करे, किन्तु उनके . ...] वेद कपाय में परिवर्तन नहीं होता है, और ऐसा करने को कोई शास्त्रीय प्रमाण भी नहीं मिलता है । अप्राकृतिक सेवन तो व्यव- हार में भी अधमाधम माना जाता है। ऐसा पुरुष तो समवेदी स्त्री से भी गया गुजरा माना जाता है। मगर वह "स्त्री वेदी" ही बन जाय फिर तो पूछना ही क्या ? वास्तव में शरीर और वेदों में विपमता नहीं हो सकती है। आ० नेमिचन्दसूरि साफ लिखते हैं कि सामान्यतया १२२ उदय प्रकृति में से मनुष्य गति में श्राठो कौ फी क्रमशः ५, ६, २, २८, १,५०,२ और ५ पचं, १०२ प्रकृति का उदय होता है, पर्याप्त अप. याप्त और तीन वेद इत्यादि सब इनमें शामिल है। "पज्जत्ते.वि य इत्थी वेदाऽपज्जति परिहीयो" ॥३०॥ - अर्थ-पर्याप्त पुरुष (मनुष्य ) को स्त्रीवेद और अपर्याप्ति सिवाय की 100 प्रकृति का उदय हो सकता है । गाने पुरुष को सारी जिन्दगी में कभी भी स्त्री वेद का उदय नहीं होता है। (गोम्मटसार, कर्मकांड, गा• ३..) - मणुसिणीए स्थीसहिदा, तित्थयराहारपुरिस सदृणा ॥ ३०१॥ अर्थ-पांप्ता मनूपाणी को स्त्री वेद का उदय है, किन्तु अपर्याप्ति, तिर्थकर नाम कर्म, आहारक द्विफ, पुरुषवद, और नपुंसक वेद सिवाय की ६६ प्रकृति का उदय हो सकता है। माने स्त्री को सारी जिन्दगी में कभी भी पुचंद या नपुंघेद का उदय होता नहीं है, छठे गुणस्थान में जाने पर श्राहारक द्विक का उदय नहीं होता है। तेरहवें गुणस्थान की प्राप्ति होने पर तिथफर पद का उदय नहीं होता है। (-गोमरसार, का...)
[१०] पुरुष चेद में स्त्री वेद आदि १५ को छोडकर १०७ प्रकृति का उदय होता है । (गा० ३२० ) स्त्री वेद में पुरुष वेद आदि १७ को छोडकर १०५ प्रकृति का उदय होता है । नपुंसक वेद में १४४ प्रकृति का उदय होता है । ( ३२. ) उदय त्रिभंगी में भी तीनों वेदवाले को विषम वेदोदय नहीं माना है। ये सब प्रमाण शरीर से विभिन्न वेदोदय की साफ २ मना करते हैं। दिगम्बर-दिगम्बर समाज १ से ९ गुणस्थान तकके पुरुष माने दिगम्बर मुनि को तीनों वेद का उदय मानता है। १-६० बनारसीदासजी लिखते हैं कि- '. जो भग देखी भामिनी माने, लिंग देखी जो पुरुष प्रवानें। जो विनु चिन्ह नपुंसक जोवा, कहि गोरख तीनो घर खोवा २-दिगम्बर ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी ने भी अपने "स्वतंत्रता" लेख में साफ बताया है कि-दिगम्बर मुनि जो नग्न दशा में हैं, वे ६ वें गुणस्थानक तक तीनों वेदों को महसूस करते हैं, दिगम्बर मुनि को छठे गुणस्थान मै पुवेद स्त्रीवदया-नपुंवेद का तीव्र उदय होता है । इत्यादि । (जैनमित्र, व. ३१, अंक ४५, ४६,४७) जैन-दिगम्बर मुनि को स्त्री वेद और नपुंसक वेद का अप्रा- कृतिक या निन्दनीय उदय मानना यह तो दिगम्बर विद्वानों की ज्यादती है। ऐसा वेदोदय होना यह तो नैतिक अधःपात है। यही कारण है कि-स्थानकपंथी जैन चान्दमलजी रतलामवाले ने "कल्पित कथा समीक्षा का प्रत्युत्तर" पृ० १६५, १६६ में दिगम्बर मुनि के बारे में कुछ सख्त लिख दिया है । शर्म की बात है. कि दिगम्बर समाज अपने प्रागम उपलब्ध होने पर भी शास्त्रों के नाम पर दिगम्बर मुनि के लिये ऐसी झूठी बात चलाती है और - - [१.५] दिगम्बर मुनिओं को जगत के सामने निंद्य कलंकित जाहिर करती है, इस भूल को उसे सुधार लेना चाहिये । “कहि विसमा" को झूठा जाहिर कर देना चाहिये और दिगम्बर मुनिमंडली को.इस निन्दनीय आक्षेप से बचा लेना चाहिये। यदि दिगम्बर शाल छटे गुणस्थान में द्रव्य स्त्रीवेद ओर द्रव्य नपुंसक घेद का उदय विच्छेद और नवमें गुणस्थान में तीनों भाव बेदका उदय विच्छेद यताते जब तो उन दिगम्बर मुनिओं के लिए तीनों वेद का उदय या कईि समा फहि विसमा मानना उचित ही था। मगर श्रा नेमियन्द्रजी डंके की चोट एलान करते हैं कि- मरद को नवमें गुणस्थान तक पुरुष वेदका. उदय होता है, स्त्री घेदका उदय तो उसे कभी भी नहीं होता है (गा० ३०० ) एवं स्त्री को नषं में गुणस्थान तक स्त्री वेद का उदय होता है, उसे कभी भी पुरुष चेद या नपुंसक वेद का उदय होता ही नहीं है गा०५० 1. अत:--पुरुष को तीनों घेद का उदय च घेदपरावर्तन मानना यह दिगम्यर शास्त्रों से जिलाफ सिध्धांत है। वास्तविक बात यही है कि-पुरुष, स्त्री व नपुंसक उपशम या क्षपक श्रेणी से नवमें गुणस्थान को पाते हैं वहां तक उन्हें स्वस्ववेदोदय रहता है। महान् व्याकरण निर्माता,दि० प्रा० शाकटायन वेदकपाय लिये व्यवस्था करते है, जिसमें भी वेद परिवर्तन को तर्कणा से भी अग्राह्य बताते हैं देखिये। स्तन जपनादि व्यंगे, स्त्री शब्दोऽर्थे न त विहार्यपः दृष्ट क्वाचिदन्यत्र, त्वग्निर्माणकवद् गौणः ॥ ३७॥ 'आषष्ठया खी' त्यादौ, स्तनादिमिस्त्रीखिया इति च वेदः स्त्रीवेदस्यनुपन्धः पन्यानां शतपृथत्वोक्ति:|| [ १.६ ] न च पुंदेहे स्त्रीवेदोदयभावे प्रमाणमगं च । भावः सिद्धौ पुंवत्, पुंसोऽपि न सिध्यतो वेदः ॥ ३६॥ पुसि स्त्रियां स्त्रियां पुंसि, अतश्च तथा भवेद् विवाहादिः । यति न संवासादिः, स्यादगती निष्प्रमाणेष्टिः ॥ ४२ ।। अन ह्या ऽनड़वाहीं, दृष्टवानड़वाहमनढुहारूहम् । स्त्रीपुंसेतरवेदो, वेद्यो नानियमतो वृत्तेः ।। ४३ ॥ .. नाम तदिन्द्रिय लब्धेरिन्द्रियनिवृत्तिमिव प्रमाद्यनाम् । वेदोदयाद् विरचयेद्, इत्यतदड़ो न तद्वेदः ।। ४४ ।। या पुंसि च प्रवृत्तिः, पुंसि स्त्रीवत् स्त्रिया स्त्रियां च स्यात् । सा स्त्रकवेदात् तिर्यक्वद लाभे मत्तकामिन्याः॥ ४५ ॥ अर्थात्-वेद कपाय का परिवर्तन नहीं होता है। पुरुष को स्त्री वेदोदय नहीं होता है । अतएव कीसी भी वेद के द्रव्यभाव भेद नहीं हैं स्त्री की शरीर रचना यह नामकर्म का ही भेद है। उसके अस्तित्व में केवलशान हो सकता है एवं स्त्री मोक्ष की भधिकारिणी है। दिगम्बर-स्त्री को पहिले के "तीन संहनन" का अभाव है अतः मोक्ष नहीं मिलता है। देखिए- सन्ती छ स्संहडणो, बज्जदि मेघ तदोपरं चापि । सेवट्टादि रहितो, पण पण च दुरेग संहडयो ।। ३१ ।। अंतिम तिग संहडण स्मुदयो पुण कम्मभूमि महिलाणं । भादिम तिग संहडणं, णस्थिति जिणेहिं णिदि8 ।। ३२॥ (गोम्मटसार कर्मकांड गा० ३१, ३.) माने-स्त्रियों को युगलिक काल में पहिले के तीन संहनन होते हैं पीछे के तीन संहनन नहीं होते हैं बाद में कर्मभूमि होसे ।
१०. -- ही स्त्रियों को पहिले तीन संहनन नहीं रहते है किन्तु भत के तीन हिराते जन-विज्ञान के नियमानुसार वस्तु की क्रमशः हामि वृद्धि दोना यह तो ठीक यात है किन्तु आपने तो एक ही हुक्म से एक दम, एक नहीं, दो नहीं, किन्तु तीन २ संहननों का परिवर्तन कर दिया। वाह जी वाह ? क्या पहिले संहनन वाली संब-एक साथ मर गई यानी उन सब को एक साथ में देह पलटा. हो गया न मालूम ऐसी २ कई कल्पित यात दिगम्बर शास्त्रों में दाखिल कर दी गई होंगी । वास्तव में दि० शास्त्र तो स्त्री चेद में. ॐ संहनन का उदय मानते हैं । उक्त गा. ३. में छै संहननों का.विधान है। अन्धसत्वाधिकार में छै संहनन बनाये हैं और गा० ३८८ गा० ७१४ इत्यादि कई स्थानों में स्त्री के लिये क्षपक श्रेणी च अवेदिपन वगैरह पल्लेख है। फिर भी स्त्रियों के लिये यज्र ऋषभनाराच वगैरह सहननों का निषेध करना यह तो किसी भाषा टीकाकार दिगम्बर विद्वान की ही नई सूझ है। स्त्री मरकर छटे नरक में जाती है कि जहां पहिले तीन सहन- नयाले जा सकत नहीं है, इसीसे भी स्त्री को शुरू के ३ संहनन दोना सिद्ध है। दिगम्बर -विद्वान् श्रीमान् अर्जुनलाल शेठी तो स्त्री. मुक्ति पृ० २३ व २७ में उक्त गाथा को क्षपक ही बताते है और दिगम्बर शास्त्रों के अनुसार स्त्रियों को छै संहनन का होना मानते हैं। दिगम्बर-समकाती मरकर स्त्री वेद में नहीं जाता है, फिर स्त्री वेद में केवल शान दोये? - जैन समकीती मरकर मनुष्य गति में भी नहीं जाता है फिर तो मनुष्य को भी केवल शान नहीं होना चाहिये, आपके . , [१०८ ] हिसाब से तो सिर्फ देवों को ही केवल शान होना चाहिये । दिगम्बर-स्त्री तीर्थकर, गणधर, चौदपूर्ववेदी, जिन कल्पी, चक्रवर्ती, वासुदेव, बलदेव, सँभिन्नश्रुतादिलभियुक्त आहारक शरीर चाली, और मरकर अहमिन्द्र देव नहीं हो सकती है। फिर मोक्ष गामी कैस हो ? ... जैन ये सब मोक्ष के अनन्तर या परपसार, कारण नहीं हैं पुरुष इनको बिना पाये ही मोक्ष गामी होता है उसी तरह स्त्री भी इनको वगैर पाये ही मोक्ष गामिनी होती है जो साक्ष्य के कारण ही नहीं हैं उनके अभाव में साक्ष्य प्राप्ति का निषेध मानना यह शान कैसा? मानलो कि जवाहरलालजी नहेरुं हल को नहीं चला सकता है तो क्या राज्य को भी न चला सकेगा ? एक मनुष्य डाक्टर या वकील नहीं है तो क्या राजा नहीं बन सकेगा?. नरक से पाया हुमा जीवं चक्रवर्ती बलदेव या वासुदेव न हो सके तो क्या केवली भी न हो सके! कभी २ ऐसा भी होता है कि परस्पर में भिन्न या असहयोगी शक्तियां एक साथ में ही नहीं रहती हैं दिगम्बर शास्त्रों में भी ऐसी परस्पर विरोध वस्तुओं का निर्देश है। जैसा कि- मणपजव, परिहारो, पढममुवसम्मत्त दोरिणाहारा । एदेसु एक पगदे, णस्थित्ति असेसयं जाणे ॥ - . (गोम्म जीव गाथा ७२८) जब इनमें से कोई भी एक होती है तब दूसरी तीनों वस्तुएं नहीं होती हैं । एवं उक्त तीर्थ कर पद वगैरह भी स्त्री वेद के असहयोगी हैं। अतः वे स्त्री वेद में नहीं रहते हैं। मगर इनके न रहने से मोक्ष प्राप्ति में किसी भी प्रकार की बाधा नहीं आती है..::.,
[१०]
-- : दिगम्बर शास्त्रों में भी स्त्री के असहयोगी कुछ बताये गये हैं।
जैसा कि-
वेदा हारोत्तिय, सगुणोघं णवरं संढ थी खवगे।
किएह दुग-सुहतिलेसिय वामचि णं तित्थयरसत्तं ।।
अर्थ-वेद से पाहार तक की मार्गणाओं में स्वगुण स्थान की सत्ता
है विशेषता इतनी ही है कि क्षपक श्रेणी में चढने वाले नपुंसक
संत्री और पांच लेश्या वाले मिथ्यात्वी को सत्ता में तीर्थकर प्रकृति
नहीं होती है। माने स्त्री-क्षपक श्रेणी में चढती है किन्तु तीर्थकर
नहीं बनती है।
(गोम्म कम्म' गा० ३५४)
मणुसिणी पमत्तविरदे, आहार दुगं तु णत्थि णियमेण ।
. ( गोम्मट सार मीच कांट गा०.१५.).
..: 'अर्थ-मानुपीणी छटे गुण स्थान को पाती है किन्तु उसको
आहारकद्विक (पं० गोपालदासजी वरैया के भापा पाठ के अनु-
सार श्रादारक शरीर अंगोपांग) नहीं होता है।
दाहारोत्तिय सगुण ठाणाण मोघ आलाओ ।
णवरियं संहि-त्थीणं, णत्थि हु आहारगाण दुगं ॥
अर्थ-वेद से श्राहार तक की १० मार्गणाओं में स्व' व गुण
'स्थान के अनुसार श्रालावा होते हैं । फरक इतना ही है कि नपुं.
और स्त्री को श्राहारकाद्विक (आहारककाययोग माहारक मिश्रा
काय योग, भा० टी०) नहीं है।
"माने स्त्री छटे गुण स्थान में जाती है, किन्तु उसे श्राहारक
द्विक नहीं होता है।
: यहां प्राहारक और तीर्थकर प्रकृति के निषेध करने पर भी
दीक्षा क्षपकणी या केवलज्ञान का निषेध नहीं किया है। कारण
-
-
१.] यही है कि उनके अभाव में कवल ज्ञान का प्रभाव नहीं माना जाता है। इससे स्पष्ट है कि स्त्री केवलिनी और मोक्ष गामिनी हो सकती है। दिगम्बर-स्वी प्राचार्य नहीं होती है और न पुरुष को शिक्षा देती है। जैन--स्त्री "गणिनी" बनती है, स्त्री समाज की अपेक्षा से वह श्राचार्य पदवी है, वो "महत्तरा" भी बनती बनती है। क्या स्त्री अपने पुत्र को उपदेश नहीं देती है ? और वह ही उसको सन्मार्ग में लान वाली है। स्वयं दीक्षा लेकर अनेक जीवों को धर्म में लाती है स्थापित कराती है। दिगम्बर-दि० पं० न्यामतसिंह का मत है कि एक पुरुष जिस तरह हजारों स्त्रियाँ रख कर प्रति वर्ष हजारों संतान उत्पन्न कर सकती है। क्या स्त्री भी उस तरह कर सकती है? स्त्री वर्ष भर में १ वश्या कर सकती है । इसलिये पुरुष सबल है स्त्री अयला है मोक्ष नहीं पा सकती है। ( सत्य परीक्षा पृ० ४४ भ्रम निवारण पृ० १२.). जैन-यदि सन्तान की संख्या ही मोक्षगामीके बल-वीर्य का थर्मामीटर है तो सौ पुत्र के पिता ऋषभदेवजी सवल, दो संतान के ही उत्पादक युगालक मध्यमवल और ब्रह्मचारी नेमिनाथजी वगेरह अबल माने जायँगे, इस हिसाब से तो भ. नेमिनाथ श्रादि को मोक्ष ही नहीं होना चाहिये था । उस थर्मामीटर से तो कुत्ता और मनुष्य श्रवन माना जायगा । इतना ही क्यों ? समूलम का आदि कारण सवल, और गर्भज का श्रादि कारण प्रबल ही माना जायगा । मोक्ष श्रापके इन सबलों की ही अमानत बनी रहेगी क्या? . सवल [११] महानुभाव? ऐसी थोथी कल्पनाओं से क्या होता है। मोक्ष में जाने वाला तो प्रात्मा ही है। यह निर्विवाद मत है कि सयल आत्मा:मोक्ष में जायगी और निर्यल श्रात्मा संसार में परिभ्रमण करेगी। चाहे वह पुरुष हो या स्त्री दिगम्बर-सपल श्रात्मा उत्कृष्ट उध्वंगति करे तो मोक्ष में जाती है, उत्कृष्ट अधोगति करे तो सातवें नरक में जाती है। मध्यम बल आत्मा उत्कृष्ट गति करे तो.ऊपर, बीच के देवलोक में और नीची बीच के नारकी स्थानों में जाती है । और अल्प चल मात्मा उत्कृष्ट रूप से शुरू २ के देवलोक में या शुरू २ के नरक में जाती है । इसलिये तय पाया जाता है कि जो आत्मा मोक्ष में जाने की ताकत रखती है वही सातची नरकी में जाने की ताकत रखती है और जो आत्मा मोक्ष की ताकत नहीं रखती है यह सातची नारकी की भी ताकत नहीं रखती है। यानी जो प्रात्मा सातची नारकी पान को समर्थ है वही मोक्ष पाने को समर्थ है। सारांश यह है कि आत्मा की शक्ति उच्च या नाचे गति करने में ठीक समानता से काम देती है। संधयर्णमें भी उत्कंगति निम्न रूपसे बताई है:- - सद्दनन उ० ऊर्ध्वगति उ० अधोगति वऋष मोक्ष नरक २ ऋषभनाराच ११ देवलोक नाराव ४ अर्धनाराच: ५ कीलिका ६ सेवात --- " .....
[१११] (अनधर्मप्रकाश पु. ५६ ० ४ संER आपाइए० १४८) अब इस नियम के अनुसार देखा जाय तो मानना अनिवार्य होगा कि स्त्री मोक्ष में नहीं जासकती है कारण. स्त्री सातवीं मारकी में भी नहीं जासकती है। देखिए श्रागम प्रमाण- पढमं पुढवीमसरणी, पढमं वितीयं च सरिसवा जति । पक्खी जाव दु तदियं, जाव दु चउत्थीं उरसप्पा ॥ ११२ ।। आपंचमीति सीहा, इथियो जति छट्टि पुढवि त्ति । गच्छंति माधवीति, मच्छा मणुया य ये पावा ॥ ११३॥ उवाट्टिया य संता, णेरड्या तमतमादु पुढवीदो। णं लहंति माणुसत्तं, तिरिक्खजोणी मुवणयंति ।। ११४ ।। अट्ठीदो पुढबीदो, उवाट्टिदा अणंतर भवम्मि । मज्जा माणुसलभे, संजमलंभेण उ विहीणा ॥ ११६ ॥ होज्ज दु संजमलाभो, पंचमखिदि-णिग्गतस्स जीवस्स । णत्थी पुण अंतकिरिया, णियमा संकिलेसेण ॥ ११७ ॥ होज दु सिव्वुदिगमणं, चउत्थीखिदि णिगतस्स जीवस्स । णियमा तित्थयरतं, णस्थित्ति जिणेहिं पण्णत्तं ॥ ११८ ॥ तेण परं पुढवीसु, भयाणिज्जा उवरिरमा हुरड्या। णियमा अणंतरभवे, तित्थयरस्स उप्पत्ती ।। ११६ ।। शिरयेहिं णिग्गदाणं, अणंतरभवम्मि णत्थि णियमादो । चलदेव वासुदेवत्तणं च तह चकवाट्टत्तं ॥ १२० ।। 4...'. 4 hr : ( भां० वढेरककृत 'मूलाचार', परिमोद २) [१३] असन्नी खलु पढम, दोचं च सरीसया, तइय पक्खी । सीहा जति चउथी, उरगा पुण पंचमी पुढवीं ॥१॥ अट्ठी य इत्थीयाओ, मच्छा मणुया य सत्तमी पुढवीं। एसो परमोबापो, बोधव्यो नरय पुढवीसु ।। २ ।। मर्थ-पदिल नरक में असंधी (असैनी), दूसरे में सरीसर्प, तृतीय में पक्षी. चतुर्थ में सिंह, पाँचवें में उरपरिसर्प, छटवें में स्त्री और सप्तम में मनुष्य व मत्स्य, जा सकते हैं। इस प्रकार सातों नरकों की उत्कृष्ट उत्पत्ति कही गई है। यहाँ साफ है कि स्त्री सातवें नरक में नहीं जा सकती हैं तो गति की समानता के नियम से मानना ही पड़ेगा कि स्त्री मोक्ष में भी नहीं जासकती है। जैन--महानुभाव ? उक्त महनन वाले ममी जीघ उक्त गति को अवश्य पा सके पसा एकान्त नियम नहीं है किन्तु जीय उनसे आगे न जासके यह एकान्त नियम है। यह उत्कृष्ट उपपान की ग्रान है जो मयको मंजूर है । इस सिध्यांत से नो यन ऋषभनाराच संहनन वाली स्त्री मानये नरक में जाये या न जाये फिन्तु मोक्ष में जा सकती है. इसमें कोसी भी प्रकार मे शंका का 'स्थान नहीं है मगर यापन गति समानता का जो नक्सा घींचा है यानी कीमी की मनक मात्र है। ऐसा नियम ही नहीं है और हो भी नदी मकना है। क्योंकि-कोई नरक में जा सकन ,, मोक्ष में जा मकने ही नहीं. को मोक्ष में जा मफन नग्फ में जाते ही नहीं है और फाईनाने में पिभित्र नर को में जा मकन है किन्तु ऊपर नोनियन म्यगं में जा सकते इस प्रकार जीप पिशपता पा कामं पेचिश्य के कारण यति [ ११४] अधोगति में शक्ति भेद पाया जाता है। देखिए- १-तीर्थकर भगवान मोक्ष में ही जाने हैं नरक में जाने ही नहीं है तीर्थकर के जीवन में कोई पसा कर्म वध होना ही नहीं है कि वे नरक जाय। २-अभवि मनुष्य मानव नरक में जाता है मोक्ष में कतई नहीं यह कहना चाहिये वह मोक्ष पाने में असमर्थ है। 4 जाता है ३-वासुदेव प्रतिवासुदेव नरक में ही जासकते हैं, मोक्ष में नहीं। देवलोक में भी नहीं । यहां गति की साम्यता नहीं रहती है। ४-युगलिक स्वर्ग में ही जाते हैं नरक में नहीं, फिर भी गति साम्यता कैस मानी जाय ? ५-भूज परिसर्प, पक्षी, चतुष्पद, और उर परिसर्प, नाचे तो क्रमशः दूसरे, तीसरे, चौथे और पाँचवें नरक तक में जाते हैं। मगर ऊपर सिर्फ सहस्त्रार देवलोक तक ही जाते हैं । यहाँ तो गति साम्यता की कल्पना का फुरचे फुर्चा हो जाता है। - ६-मत्स्य सात नरक में जा सकता है। मोक्ष में नहीं । यदि गति कार्य में मान्यता होती तो मत्स्य मोक्ष में भी चला जाता । मगर वह बेचारा ऊँचा अहमेन्द्र पद पाने में भी असमर्थ है। ७-स्त्री मोक्ष में जा सकती है सातवीं नरक में नहीं। आगति के नियम में भी वैसी ही विचित्रता पाई जाती है, जैसा कि- 1 - नारकी से श्राकर मनुष्य बना हुश्रा जीव तीर्थकर वन सके मोक्षमें जाय, नरक में भी जाय, किन्तु वासुदेव बलदेव या चक्रवर्ती हो सके । यह आगति की विचित्रता है।
११५ 1 (मूलाधार, परिच्छेद १२, गाथा ।२०) - 5 - .. वैमानिक जीव यहां स च्यवन पाकर शलाका पुरुप बन सकता है मगर अनुत्तर विमान से आया हुश्रा जीव सीर्फ वासुदेव हो सकता नहीं है। प्रागतिकी कैसी विचित्र घटना है ? (मूलाचार परिच्छेद १२, गाथा १२६, ८१४.) इस प्रकार गति की असाम्यता के अनेक दृष्टांत शास्त्रो में अंकित है, वास्तव में गतिप्राप्ति की समानता नहीं पानी जाती है। अतएव स्त्री सातवे नरक पाने में असमर्थ होने पर भी मोक्षको पा सकती है। दिगम्बर वासुदेव और प्रति वासुदेव शुद्ध मध्यवमाय के न होने के कारण मोक्ष पाने में असमर्थ हैं, भोगभूमि के युगलिक अंशुर अध्यवसाय के अभाव से नरक पाने में असमर्थ हैं, और मत्स्य शक्तियान होने पर भी गति और शरीरादि भेद के कारण शुद्ध अध्यवसाय की अंतिम सीमा को नहीं पहुँच सकता मोक्ष पाने में असमर्थ है, किन्तु स्त्री मोक्ष पाने में समर्थ है तो सातवी नरक पाने में असमर्थ क्यों है। जैन-जैसे वासुदेव श्रादि में शुद्ध अध्यवसाय का अभाव, है, युगलिक में अशुद्ध अध्यवसाय का अभाव है, मत्स्य में मोक्ष के योग्य शुद्ध अध्यवसाय का अभाव है वैसे ही अबला में स्त्री शरीर और मातृन्य होने के कारण सातवें नरक के योग्य अशुद्ध अध्यय. सांय का अभाव है। वह चाहे जिननी क्रूर बनें, मगर पुरुष की संमंता नहीं कर सकती है। वासुदेव मस्य वगेरह अशुद्ध अध्यय. साय की आखिरी सीमा तक पहुँच जाने है । अंतः वे सान नरक सफ जाते हैं। किन्तु शुद्ध अध्यवसाय की सीमा तक नहीं जासकत है यानी मोक्ष में नहीं जा सकते हैं। वैसे ही स्त्री शुद्ध अध्यवसाय प्रतः - ११ की अंतिम दशा तक पहुँचती है । और मोक्ष को पाती है। किन्तु अशुद्ध अध्यवसाय की अन्तिम सीमा तक नहीं पहुँचती है इसलिये सातवी नारकी में नहीं जा सकती है । यह सप्रमाण वात है कि किसी में उर्ध्वगति की सामर्थ्य विशेष है किसी में अधोगति की স্বগন্না, यो भी कहा जाय कि किसी में बंध की सामर्थ्य विशेष है है किसी में निझरा की, तो भी ठीक है । स्त्रीका शरीर उत्कृष्ट श्रायु बंध के अभाव का उर्ध्व गति के, अधिक सामर्थ्य का, या उत्कृष्ट निझरा शक्ति का नमूना है। स्त्री की अशुद्ध भावना मन्तिम सीमा तक नहीं पहुँचती है। परमाधामी पुरुष ही होता है स्त्री नहीं होती है, यह समस्या भी स्त्री जाति में आन्तरिक क्रूरता न होने का प्रवल प्रमाण रूप है। दिगम्बर-स्त्री में शुद्ध भावना की विशेषता है और अशुद्ध भावना की अल्पता या मर्यादा है, इस के लिये प्रमाण क्या है? जैन-आज कल का विज्ञान भी उक्त बात को ही पुष्ट करता । पाश्चात्य विद्वान मानते हैं कि स्त्री नम्र होती है। मातृत्व भावना से ओत प्रोत रहती है। वह सर्वत्र अशान्ति के बजाय शान्ति को ही अधिक पसंद करती है। इस विषय में जनवरी सन् १९३८ ई० के “मोर्डन रीव्यु" में भिन्न २ विद्वानों के मत प्रकाशित हुए हैं (पृ. २७) जिनका सार निम्न प्रकार है। स्त्री की हर एक अंगोपांग पुरुष की अपेक्षा भिन्न वनावट का है x x इसलिये स्त्रियों के शरीर में मधुरता व नम्रता अधिक पाई जाती है। २ .:. शारीरिक कमी होने पर भी स्त्रियों में वीरता व साहस पाया जाता है। जब संकट आता है तव स्त्री हृदः रहती है शत्रुओं से [११] अपने बच्चों की रक्षा करती है । और अपनी इज्जत बचाती हैं। यह वीरता मानसिक है, और शारीरिक बल से इसका कोई सम्ब. न्य नहीं है। बौद्धिक क्षत्र में स्त्री का दरजा पुरुष से नीचा है यह जाँच व अनुभव से सिद्ध है कि कुछ काम स्त्रियाँ अच्छा कर सकती है जब कि कुछ काम पुरुष अच्छा कर सकते हैं। स्त्री का मन पुरुष की अपेक्षा भिन्न प्रकार का है हेतु यही है कि उनको माता पने का भारी काम करना पड़ता है । चे शान्ति से सहन कर सकती हैं, बलि कर सकती हैं जिन यातों की पुरुष में अयोग्यता है । माता के समान कोमल मन रखने वाली, स्त्री पुरुष के व्यवसायों में बरावर्य नही कर सकती है (प्रो. कृष्ण प्रसम्न भूरूखा, सेंगनिक साइव वगैरह) - त्रियों को शान्ति स्थापना की बहुत आवश्यकता विदित होती है। स्त्रियाँ जिम प्रकार घर का प्रयन्ध बड़ी विज्ञना और अच्छाई के साथ कर लती है वे उसी भाँनि जगन में शान्ति को भी स्थापित कर सकती हैं । शान्ति स्थापक मंडली में बढ़ीर स्त्रियों मेंम्बर है। लंडन की मिस न्हाईट ने एक पुस्तक लिखी है (Wanen in warld Histary) इसमें दुनियाँ की स्त्रियों ने क्या २ वीरता पूर्ण काम किये है. उनका कथन है। (मोटर्न रिग्यु पृ० ७९ केदारनाथ गुप्त का लेख) दिगम्बर ब्रामचारी श्रीयुत शीतलप्रसादजी ने मोउरिव्यु के रक्त लेन का सार दिया है और लिखा है- "इस लख.का सार यह है कि स्त्रियों का शरीर, मन व उनकी धुद्धि औसत दरजे पुरुष के बराबर नहीं है इसलिये उनको कोमल [११८ ] काम करने चाहिये" ( जैन मित्र. २०३२ अं० २३ पृ० ३६० ता० १४-४-८): इन वैज्ञानिक प्रमाणों से निर्विवाद है कि स्त्री शान्ति की इच्छुका है, नम्र, वीर, साहसिक, सहनशील और कोमल होती है । उससे कठोर काम होना मुश्किल है । माने स्त्री साहस, नम्रता, वीरता इत्यादि गुणों से कर्म की निर्भरा करने वाली और मोक्ष की अधिकारिणी हैं। पुरुष के योग्य कठोर काम करने में असमर्थ होने से सातवे नरक में नहीं जाती हैं। इसके अलावा वर्तमान में भी पुरुषों की अपेक्षा स्त्री जाति में अधिक सहृदयता होने के अनेक प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते हैं जैसे- खून, कतल, चोरी, बलात्कार, लूट और दगावाजी इत्यादि अधम कार्यों में फीसदी पुरुष और स्त्रियों की औसत कितनी २ है ! इसका खुलासा अदालती दफ्तरों से मिल सकता है । साधारण तया ऐसे क्रूर कार्यों में मरदों की संख्या ही अधिक मिलेगी। जब देवदर्शन, सामायिक, तपस्या इत्यादि कार्यों में तो स्त्रियों की संख्या पुरुषों से कई गुनी बढ़ जाती है। एक महर्षि ने ठीक ही कहा सप्तम्यां भुवि नो गतिः परिणतिः प्रायों न शास्त्रीहवें - नो विष्णु प्रतिविष्णु पातककथा यस्या न देशव्यथा ॥ शीलात् पुण्यतनो जनो मृदुतनोः तस्या प्रशस्याशयः कः सिद्धि प्रतिपद्यते न निपुणः तत्कर्मणां लाघवात् ॥ २॥ अर्हतजन्म महे महेन्द्र महिता लोकंपृणे र्या गुणैः ॥ ३ ॥ इस प्रकार भिन्न २ प्रमाणों की उपस्थीति में मानना पड़ता कि स्त्री सातवे नरक में न जायं, किन्तु मोक्ष में जाय, यह होना सर्वथा स्वाभाविक है. है है ।
, । जनाना । [१९] मान-पत्री मोत में जाय, इम मिधान में तनिक भी शंका नहीं है। दिगम्बर- प्रसन में तो स्त्री जिनेश्वर देव की अभिषेक यादि पूजा भी नहीं कर सकती है। जैन-अनेकान्न दर्शन पेसा मफुचित नहीं है कि जिसमें श्वर की पूजा के लिये भी पुरुष ही ठेकेदार हो। भूलना नहीं चाहिये कि नीर्थकर भगवान अपेदी है घीतराग है पतित पावन है मरद और उनके पुत्र पुत्री हैं इनके सर्प मे उनको किसी भी प्रकार का बंदोदय नहीं होता है. अनः पुरुष और स्त्री नार्थकरदेव की सब तरह की पूजा कर सकते है करते है। तीर्थंकर की प्रतिमा लामों के मन्दिर यारश में बैठाने से सराग प्रतिमा नहीं मानी जाती है एवं स्त्री के स्पर्श से भी मांग नहीं मानी जाती है। । दिगम्बर शास्त्र भी स्त्री के लिये जिन पूजा यनात हैं। जैसा कि- पूर्वमष्टान्हिकं भक्त्या, देव्यः कृत्वा महामहम् । : प्रारंन्धा जिनपूजार्थ: विशुद्धन्द्रियगोचगः ॥१४॥ - चारुभिः पंचय]श्च, ध्वजमान्यानुलेपनः । दीपश्च बलिभिरचूर्णः पूजां चकुर्मुदान्विताः ॥१४१॥ (मा. उटामिल नदि हम पाग परिम० १५ १०) उपोपविष्टा प्रमुनेर साई। (पाग चरित्र स० २३ पटो०७१, पृ० १२.) कियत् काले गवे कन्या, पासाय जिनमन्दिरम् । मपर्या महता नः मनोवाक्काय शुद्धिकः ॥ ५६ ॥ नान पद कम्पामों में पूजा की (गौतम बरि अधिक * स [१२.] वध्यते मुकुटं मुनि, रचितं कुसुमोत्करः । कंठे श्रीवृषभेशस्य, पृष्पमाला च धार्यते ॥ कन्याने श्रा० शु०७ के दिन अपभदेव भगवान को मुकट और पुष्प माला पहिनाई। ( कथा कोश मुझट सप्तमी कमा, चर्मासागर पृ०२., २४६) कन्या मुकुट चढ़ाते समय भावना भाती है कि "हे जिनवर श्राप मुक्ति स्त्री के बर हो इसलिये श्रापके लिये यह मुकुट और माला पहिनाये जाते हैं (मुट सप्तमी कथा पं० परमेष्ठीदास कथा पं0 परमेप्पीदास की सागर :समीक्षा, पृ० १८५) दिगम्बर-जब दिगम्बर समाज स्त्री दीक्षा का ही निषेध करती है तो फिर स्त्री को मोक्ष कैसे मिल सकती है। M जैन-दिगम्बराचार्य भी पाँचवे.छटे और सातवें गुणस्थान की उदय विच्छेद प्रकृतिओं में स्त्री का निषध नहीं करते हैं फिर कैसे माना जाय कि स्त्री को मुनि दीक्षा नहीं है.। देसे तदिय कसाया, तिरिया उज्जोय णीच तिरिय गदी। छठे आहारदुर्ग, थीमतिग उदय वोच्छिण्णा ॥ २६७ ॥ ( गोम्मरसार कार्म. गा० २६७ ) पाँचवें गुणस्थान में प्रत्याख्यानी ४ कषाय, तिर्यंत्र आयु, उद्योत, नाचगोत्र व तिर्यंचगति का, और छटे गुणस्थान में श्राहारक शरीरद्विक व निन्द्रा ३ का उदय व्युच्छेद होता है ॥२६॥ सातवें गुणस्थान में सम्यक्त्व प्रकृति व अन्तिम ३ संहनन का उदयव्युच्छेद होता है।.६७। इससे साफ प्रकट है । कि इन गुण स्थानों में स्त्री वेद या स्त्री जाति का निषेध नहीं - - I [११] अतः यो मुनि दीक्षा ले सकती है । उसके "स्त्री; वेद : मोहनीय कर्म का उदयविच्छेद नव में गुणस्थान में हो जाता है। यदि नग्नता का ही आग्रह हो तो स्त्री के लिये नग्न रहना भी कोई मुश्किल वान नहीं है..देखो ? स्त्री पति यादि के निमित्त सर्वस्व पलि-कर देती है, भाँति २ के कष्ट सहती है, जिन्दा ही अग्नि में प्रवेश कर सती होती है, जोहर करती हैं तो वह धर्म के लिये कष्ट सहे तपस्या करें और नग्न बन कर रहे उसमें कौन सी' श्रम. भय बात है ? अंत एवं दिगम्बर शास्त्र भी स्त्री दीक्षा की हिदायत करते हैं। खुद नीर्थकर भगवान ही चारों संत्रों में श्रमणी (अर्जिका )का पवित्र स्थान रखकर स्त्रीदीक्षा फरमाते हैं। जहां अर्जिका का अभाव है वहां सम्पूर्ण जैन संघ ही नहीं है, इस हालत में स्त्रीदीक्षा भी अनिवार्य हो जाती है। दिगम्बर-इसमें तो जरा सी शंका नहीं है कि स्त्रीदीक्षा सिद्ध है नो स्त्री मुक्ति भी सिद्ध है। ऊपर का अनुसन्धान स्त्री दीक्षा के पक्ष में है। किन्तु इस विषय में दिगम्बर शास्त्रों में साफ २ उल्लेख क्या है । वह स्पष्ट कर देना चाहिये । जैन-दि० शास्त्र स्त्र दीक्षा और म्बीमुफ्नि स्वीकार करते हैं । कतिपय प्रमाण निम्न प्रकार दिगम्बर प्रथामानुयोग शास्त्रों के प्रमाण- १-मन्त्रीश्वरामात्य पुरोहितानां पुरनधानर्द्धिमतां गृहिण्यः । नृपाङ्गनामिः सुगति प्रियामिः, दिदीक्षिरे ताभिरमा तरुण्यः (जटाचार्य कृत वसंग धरिन म. ३० श्लो० ६५ स० ३१ पलो ११३) २-भरतस्यानुजा ब्राह्मी, दीक्षित्वा गुर्वनुग्रहात् । गाणिनीपद मार्याणां, सा भेजे पूजितामरैः ॥ १७५. ॥ .
[१२२]
राज राजकन्या मा, राजहंसीर सुस्वना ।
दीक्षा शरनदी शील-पुलिन स्थल शायिनी ॥ १७६ ।।
सुंदरी चात्त निदा, तां ब्राहमी मन्त्रदीक्षत ।
अन्ये चान्याश्च मंघिन्ना, गुरो प्राब्राजिपु स्तदा ।। १७७ ॥
(भाग जिनमेन कृत आदि पुराण पर्व २४)
शमिता चक्रवर्तीष्ट-कांतयाऽऽश सुभद्रया !
ब्राहमी समीपे प्रव्रज्य, भाविसिद्धिश्चिरं तपः ।। २८८ ॥
कृत्वा विमाने सानुत्तरे, ऽभूत्कल्पे ऽच्युते ऽमरः ।।
(-भादि पुराण पर्व~-१७)
३-जिनदत्तायिकाम्यणे, श्रेष्ठीभार्या च दीक्षिता ।। २०६ ॥
(भा० गुण भद्र कृत उत्तर पुराण पर्व ... देव की पुत्र पूर्वमत )
तथा मीता महादेवी पृथिवी सुन्दरी युताः
देव्यः श्रुतवती शांति-निकट तपसि स्थिताः ।। ७१२ ।।
मीताजी अच्युत देवलोक में गई । ७१६ ।
( उत्तर पुराण पर्व ६८ सीताधिकार )
भ० महावीर स्वामी के साधु
श्रार्थि का
श्रावक
और श्राविका की संख्या का वर्णन है। इनमें पलक
खुल्लक का नाम निशान नहीं है।
(महावीर संघ ) ( उत्तर पुराण ५० ४ श्लो० ३०१, ३७९)
चंदना साध्वी ( उत्त० प०७४ श्लो० ३७६ )
सुव्रतागगिनी, गुणवती श्रार्या ( उत्त० ७६ श्लो० १६५, १६७)
पांचवे आरा की अन्तिम आर्यिका सर्वश्री।
( उत्सपर्व १-को०४३६)
ये सर आर्थाएँ पांच महानत धारिणी धी, कटे, सातवें गुण
[१२] स्थान की अधिकारिणी थी, श्रावक (ब्रह्म पलक क्षुल्लक श्रादि) और श्राविका को पाँचवाँ गुण स्थान होता है। ५-राजीमती की दीक्षा (पर्व० ५६ श्लो० १३० से १३.) द्रौपदी दीक्षा प्रयाण ( १० ६३ श्लो०७०) धन श्री मित्र श्री की दीक्षा १२० ६४ ग्लो० १३) कुन्नी द्रोपदी सुभद्रा आदि की दीक्षा (५० ६४ श्लो० १४४ ) जय कुमार मुनि १२ अंगपढ़ा, और सुलो. चना आर्या ! अंग पढी ( पर्व १२ श्लो०५२) तीर्थकर की प्रायिका की संख्या (प०२० श्लो०५१-७८) (10 द्वि०.जिनसेन कृत हरिवंश पुराण) ५-सम्यक् दर्शन संशुद्धाः, शुद्धक बसना वृताः । सदस्रशो दधुः शुद्धाः नार्य स्तत्रायिंका व्रतम् ॥ १३३ ॥ अशुद्धवंश की उपजी सम्यक दर्शनकार शुद्ध कहिजे । निर्मल और शुद्ध कहिए श्वेत वस्त्र को धरनहागे हजारों रानी अर्यका भई । (जिनवाणी कार्यालय-कलकत्ता से मुद्रित पं. दौलतराम जपुर निवासी कृत हरिवंश पुराण स० २, श्लो० १३३ की यवनिका, पृ० २३-२८) ६-वसुदेव की पत्नी प्रियंगुसुन्दरी ने जिनदीक्षा ली थी। ७-अनंग सना नाम की वेश्या ने वेश्यावृत्ति को छोड़कर जिनदीक्षा ली और स्वर्गको गई। --ज्येष्ठा आर्यिका ९-शिवभूति ब्राह्मण की पुत्री देववती के माथ शम्भु ने व्यभिचार किया. बाद में यह भ्रष्ट देववती विरक्त होकर हरिकांता अर्जिका के पास दीक्षा लकर स्वर्ग गई। दिगम्बरीय द्रव्यानुयोग शास्त्रों के प्रमाण- १-दिगम्बरों के नन्दीगण पुन्नागवृक्ष और मूलसंघ के अनुयायी यापनीय संघयाल "यथायापनीयतंत्र" डंके की चोट जाहिर करते है कि- "णा खलु इत्थी अजीवा, गा या वि अभव्या, गा या वि दंगण विरोहिणी, गो प्रमाणुसा, गो अगाग्यिउप्पत्ति, गो असंखज्जाउया, णो अह कृरमह, गो गण उपसंतमोहा, गो गण शुद्धाचाग, णो अमुवाही, गो वयसायवाज्जिया, णो अपुचकारण विरोहिणी; गो गावगुण ठाण रहिया, गो अजोगा लद्धीए, गगो अकल्लाण भायणं त्ति, कहं गा उत्तमधम्म सहिगत्ति"। (मुग्तवा लकित विस्तरा० पृ. १०६) स्त्री जीव है. भव्य है सम्यक्त्व युक्त है, मनुष्य है, प्रायोत्पन्न हैं. संख्याते वर्ष की आयु वाली है, अक्रूर वुद्धि वाली है, उपशान्त मोहनीय है. शुद्धाचारिणी है, शुद्ध बोधि है. व्यवसाय युक्त है, अपूर्वकरण साधिका है। नवम गुग्गस्थान सहित है, लब्धियोग्य है, कल्याण के पात्र रूप है. फिर भी वो उत्तम धर्म की साधिका नहि है. यह कैंस माना जाय ? २-दिगम्बराचार्य शकटायन फरमाते हैं कि मायादिः पुरुषाणामपि, द्वेषादि प्रसिद्ध भावश्च । पएणां संस्थानानां, तुल्यो वर्ण त्रयस्यापि ॥ २८ ॥ "स्त्री" नाम मन्दसत्वा, उत्संग समग्रता न तेनात्र । तत्कथ मनल्प वृत्तयः, सन्ति हि शीलाम्बुधेर्वेलाः ॥ २६ ॥ संत्यज्य राज्य लक्ष्मी-पति पुत्र भ्रातृ बन्धु सम्बन्धम् । परित्राज्य वहायाः कि मसत्वं सत्यभामादेः ? ।। ३२ ।। अन्तः कोटी कोटी स्थितिकानि, भवन्ति सर्वकर्माणि । सम्यक्त्व लाभ एवा, ऽशेपो प्यक्षयकरो मार्गः ॥ ३४॥ अष्टशत मेक समये, पुरुषाणा मादिरागमः।। ३५ ।। क्षपक श्रेण्यारोहे, वेदेनोच्येत भूतपर्चेण । .....
A . 1. F [ १२५ स्त्रीति नितरामभि मुख्येर्थे 'युज्यते नेतराम् ॥ ४०॥' मनुपीपु मनुष्येषु, चर्तुदशगुणोक्ति गायिकासिद्धौ । भावस्त वो परिक्षप्य ०००० नवस्यो नियत उपचारः ॥४१॥ विगतानुवाद नीती, सुरकोपादिपु चतुर्दश गुणाः स्युः। नव मार्गणान्तर इति, प्रोक्तं वेदे ऽन्यथा , नीतिः॥४५॥ न च, बाधकं विमुक्तेः, स्त्रीणामनु शासन, प्रवचनं च। . संभवति च मुख्येर्थे,. न, गौण इत्यार्यिका सिद्धिः ॥ ४६॥. सारांश-पुरुष और स्त्री दोनों में माया श्रादि, द्वेप आदि, है संस्थान वगैरह समान रूप से है । स्त्री राज्य लक्ष्मी पति पुत्र,माई यन्धु वगैरह को छोड़कर दीक्षा लेवे फिर भी ; उसे असत्यः क्यों माना जाय? एक समय में १०८ पुरुष मोक्ष में जाय, उसके अनुसन्धान में भी स्त्री मोक्ष सिद्ध है। नपक श्रेणी में "अवेदि" बनने के बाद भी वो 'पूर्वकाल की अपेक्षा से स्त्री मानी जाती है। मनुष्य और मनुपिणी दोनों १४ वे गुण स्थान में जाते है नय तो आर्यिका- माक्षस्वयं सिद्ध है नव मार्गणाद्वार में पुरुष व स्त्री के लिये एकता है सिर्फ वेद में पुरुप और स्त्री को भेदा है । स्त्री मुक्ति का याधक कोई प्रमाण नहीं मिलता है, स्त्री मुक्ति की भाशा व प्रबधन मिलते हैं।.. (खो मुफि प्रकरण) 1-दिगम्बर भट्टारक देवसेन लिखते हैं कि- प्रा० जिनसेन क गुम्भ्राता विनयसेन के शिष्य कुमारसेन ने सं०७५३ में काष्ठासंघ चलाया, और स्त्री दीक्षा की स्थापना की (दर्शन सार गा) इतिहास कहता है कि श्वेताम्बर दिगम्बर के भेद होने के याद दिगम्बर समाज में स्त्री दीक्षा को स्थगित कर दिया था, तीन संघाकाही शासन चल रहा था। अतः .
[ १२२] मुमकिन है कि श्रा०. कुमारसन ने दिगम्बर आयकासंघ चलाया। 1 मैं : ४-श्रा० पूज्यपाद पर करते हैं कि- येनात्मना नुभृया हमात्म नैवात्मनात्मनि । मोहं न तन्नमा नासो, नको न द्वौ न वा बहु ॥ २३ ।। श्रात्मा अात्म भाव को पाता है तब उस मान होता है कि में न पुरुष हैं. न नपुंसक है, और न स्त्री हूँ । अथात् श्रात्मा प्रामा ही है, और मोक्ष में वही जाता हैं । पुरुष स्त्री, नपुंसक शरीर मोक्ष में नहीं जाते हैं। त्यस्तैव वहिरात्मानम् ॥ २७ ॥ पुरुप हं. इत्यादि बहिरात्म भाव को छोड़ा। यो न वेत्ति परं देहात् ।। ३३ ।। दृष्यमानमिदं मूढः, स्त्रिलिङ्ग मव बुध्यते ॥ ४४ ॥ बचारा कम अक्ल श्रादमी में पुरुष हूं, में नपुंसक हूं, तु स्त्री है, ऐसा मानता है, जव कि मोक्षगामी श्रात्मा इन लिंगों से रहित है। उसके तो लिंग नानादि है। शरीरे वाचि चात्मानं० ॥ ५४ ॥ शरीर को प्रात्मा मानना, यह अज्ञानता है । अतः पुरुष मोक्ष जाय, स्त्री नहीं, इत्यादि कहना भी अज्ञानता है। जीर्ण खदेहे प्यात्मानं, न जीर्ण मन्यते बुधः॥ ६४ ॥ इसके अनुकरण में ऐसा श्लोक भी बन सकता है। स्त्रियो देहे तथात्मानं, न स्त्रियं मन्यते बुधः। स्त्री का शरीर होने से आत्मा स्त्री नहीं बनती है। लिग देहाश्रितं दृष्ट, देह एवात्मनो भवः R [ १२ ] न मुच्यन्ते भवात्तस्मात् ते ये लिङ्गकृताग्रहाः ॥८७॥ पुरुष या नग्न ही मोक्ष में जाते हैं इत्यादि लिंग के ग्राग्रह से संसार बढ़ता है। जाति लिंग विकल्पेन, येषां च समयाग्रहः । ते न आप्नुवन्त्येव, परमं पदमात्मनः ।। ६ ॥ मैं ब्राह्मण हूँ मैं पुरुए हैं. या नग्न है ऐसा आग्रह मोद बाधक है। -पा० नेमिचन्दमूरि "स्त्री मोक्ष' का क्रम बनाते हैं (गोम्मटसार) आहारं तु पमत्ते, तिथं केवलिणि, मिस्सयं मिस्से । प्रमत्त गुण म्थान में श्राहारकद्विक होता है। (गोम्मट मार कर्मकाण्ड गा० २६.) अपमत्ते सम्मत्तं, अन्तिम तिय संहदीय ऽपुवाम्म । छच्चेच णोकसाया, अणिट्टिय भाग भागसु ॥ २६ ॥ वेदातय कोह माणं, माया संजलण मेव ।। २६६ ।। अर्थ ७ अप्रमत्त गुण म्थान में सम्यक्त्व प्रकृति और अंत के नीनं संहनन का, ८ अपूर्व गुणस्थान में हास्यादि छै कपायों का नथा अनिवृत्ति गुण स्थान में निन वेद और तीन कपायों का उदय विच्छेद होता है। ( गोम्मटसार कर्मकांड गा० २६८-२६६ ) माने-पुरुष स्त्री और नपुंसक ये तीनों गुणस्थान को पाते है तय उनके वेदों का उदय विच्छेद है । वाद के गुण स्थान में उनको अपने २ वेद कपाय का,उदय नहीं होता है उनको नाम कर्म का उदय विद्यमान होने के कारण शरीर की रचनामात्र रहती है और वे अवेदी माने जाते हैं। पज्जते वि इत्थी वेदापज्जति परिहीणो ॥ ३९९.५...
म [१३.] - शीतलप्रसादजी न मोक्ष मार्ग प्रकाशक मा. २१०४ मोहनीगम के सत्तास्थान में क्रमशः पंढ या स्त्री वेद के क्षय से १२ की, पंढ या मंत्री बंद में से शप के क्षय से की, हास्यादि ६ नौ कगय के क्षय ले ५. की, और पुवेद के क्षय से ४ की सत्ता लिखी है। माने स्त्री को क्रमशः नपुंसकंबद स्त्रीवेद और पुवेद का क्षय होता है (पृ. १७७-१७६ ) ८-पं० श्राशाधरजी सागार धर्मामृत के अ०८ करते हैं कि- यदौत्सर्गिक मन्यद्वा, लिंग मुक्तं जिनः खियाः पुंवत्त दिण्यते मृत्यु काले स्वल्प कृतोपधेः । ८।३६ मान-भत्री भी जिनोपदिष्ट मुनिलिंग-दीक्षा की अधिकारिणी । इत्यादि । दिगम्बर चरणकरणानुयोग शास्त्रों के प्रमाण- १-अज्जा गमण काले, गा अत्थि दव्वं तथैव एक्केण। ताहिं पुण संल्लाबो, ण य कायव्यो अकज्जेण॥ १७७ तासिं पुण पुच्छाओ, इक्किस्से मय कहिज्ज एक्कोदु । गणिणी पुरओ किच्चा, जदि पुच्छड़ तो कहे दन्वं १७८ साधु और अर्जिकाओं को श्रापस २ में उक्त प्रकार से बर्ताव करना चाहिय। आ० वढेरक कृत मूलाचार अ० ४ श्लोक १७७-१७८) २-दिणंपडिम वीरचरिया तियाल जोगे णियमेण । सिद्धांत रहस्सा धयणं, अहियारो णत्थी देस विरियाणं ( भा० वसुनन्दी सिद्धान्त चक्रवर्ती कृत श्रावकागर.) वीरचर्या च सूर्यप्रतिमा, त्रिकाल योग धारणं नियमश्च। सिद्धान्त रहस्यादि प्वध्ययन, नास्ति देश विरतानाम् ॥ (भावकाचार पर २४९ पृ ५११) -- . . - - ११ श्रावको परिचर्याहः-प्रतिमा तापनादिपु । ... स्यानाधिकारी सिद्धांत-रहस्याध्ययने पि वा ॥ (धर्मामृत श्रावकाचार) त्रिकालयोग नियमो, वीरचर्या च सर्वथा । प: सिद्धांताध्ययनं सूर्य-प्रतिमा नास्ति तस्य वै ॥ (धर्मोपदेश पीयुष वर्षा कर श्रावकाचार) इन पाठों में थायक और धाविका के लिये सिद्धांत वांचना का निध किया गया है, अतः मुनि ओर अर्जिका ही सिद्धांत वाचना के अधिकारी हैं। मान दोनों जिनदीक्षा वाले हैं पांच महाप्रत के धारक हैं सर्वविरति हैं. छंट गुणस्थान के अधिकारी हैं अत एव आगम के भी अधिकारी हैं। श्रावक वैसे न होने के कारण सिद्धा- म्त पाठ के अधिकारी नहीं है। 'दिगम्बर हरिवंश पुराण में दृष्टान्त भी है कि जिनदीक्षा लेने के पश्चात् जय कुमार ने १२ अंगों का और सुलोचना अर्जिका न २१ अंगों का अध्ययन किया (१२.५२)। ३-सह समणाणं भणिय, समणीणं तय होइ मल हरण । वज्जिय तियालजोगं, दिणपडिमं छेदमालं च ॥१॥ (दिगम्बर वर्ग:सार 1८६.): मान-श्रमण और श्रमणियों की प्रायश्चित्तविधि एक सी है। फर्क सिर्फ इतना ही है कि श्रमणी के लिये त्रिकाल जोग, सूर्य प्रतिमा योग और छेदमाल का निषेध है। ४-महत्तराप्यायकाभि चंदते भक्तिभाविता। अद्य दीतितमप्याशुवतिनं शान्तमानसं ॥ (भौति सार) साधु और अर्जिका दोनों दीक्षा वाले हैं, इस हालत में छोटा मुनि बड़ी अर्जिका को चन्दन कर यह स्वाभाविक था, मुनि पर्दै की हैसियत से यह होना संभविन ही था, अतः उसमें यह विशेष व्यवस्था की गई है कि महत्तरा भी नंब दीक्षित मुनि को चन्दन करें। यद्यपि मुनि और अर्जिका ये सय पांच महाव्रतधारी . . ' - [m] है, पूजनांक हैं । फिर भी उनमें अर्जिका गणिनी मुनि उपाध्याय प्राचार्य व गणधर, वगैरह ये उत्तरोत्तर अधिक पूजनीक है। यह व्यवस्था भी सहेतुक और श्रावश्यक हैं, इन व्यवस्था से उन सब का मुनिपद और उनकी उत्तरोनर प्रधानता सिद्ध होती है। मान-प्रस्तुत श्लोक अर्जिका के मुनिपद का एवं पुरुष प्रधा. नता का साधक है। ५-एवं दसविध पायच्छित्तं, भणियं तु कप्पववहारे । जीदम्मि पुरिसभेदं, णादायव्य मिदि भणियं ॥२८॥ जं समणाणं वृत्तं, पायच्छित्तं तह जमायरणम् । तेसिं चेव पउन, तं समीणं पि गायञ्च ॥ २८६ ॥ (मा० इन्द्रनन्दि कृत छेदपिरम् ) ६-मुनि और अर्सिका दोनों पांच महाव्रत श्रादि मूलगुण.. व उत्तर गुणों को स्वीकार करते हैं । और उनका पालन भी करत हैं।.. दिगम्बरीय गणितानुयोग के प्रमाण- (:) दिगम्बर समाज के परम माननीय श्रा० पुष्पदंत और भूतवलि. फरमाते हैं कि- मूलम्--चउराहं खया अजोगिकेवली दव्वपमाणेण केवडिया' ? पवेसेण एको वा दो वा तिगिण वा, उक्कोसेण अठोत्तर सदं ॥ सू० ११ ॥ टीका-उक्कोस्सेण अठुत्तरसयजीवा त्ति खवगसेढि चडेति । (पृ०६३) अर्थ-चारों गुणस्थानों के क्षपक और अयोगिकेवली जीव द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने हैं ? प्रवेश की अपेक्षा एक या दो उत्कृष्टरूप से सौ आठ हैं॥ 1 ॥ पृ० १२ मूलम् -संजोगिकेवली दबपमाणण केवडिया ? * पवेसण एक्को वा दो वा तिरिण वा, उनकोस्सेण । अठ्ठत्तर सयं । सू० १३॥ अथवा तीन और एक । अथ-सयोगिकवली जीव ' द्रव्यप्रमाण की अपेक्षा कितने है। प्रवेश से एक या दो अथवा तीन और उत्कृष्ट रूप से एक सौ पाठ होते हैं ॥ १३ ॥ पृ० १५ ॥ मूलम्-मणुसिामु सासणसम्मइटिप्पहुडि जाव । अजोगि केवलि ति दन्यपमाणेण केवडिया! . संखेज्जा ॥ सू ४६॥ अर्थ-मनुष्यनियो, सासादनसम्यग्दृष्टि गुणस्थान से लेकर अयोगि केवली गुणस्थान तक प्रत्येक गुणस्थान में जीय दव्यप्रमाण की अपेक्षा किनन हैं ? संख्यात हैं ॥४६॥ पृ० २६१ मूल-चेदाणुवादेण इत्थिवेदएसु पमत्तसंजद प्पहुडि जाव अणिपट्टि वादर सांपराइय पविट्ट उवसमा खवा दन्च पमाणेण केवडिया ? संखेज्जा ॥ सू० १२६ ॥ अर्थ-स्त्रीनो में प्रमत्तसंयत गुणस्थान स लेकर अनिवृत्ति चादर सांपराय प्रविष्ट उपशमक और क्षपफ गुणस्थानतक जीय द्रव्यममाण की अपेक्षा, कितने हैं । संख्यात है ॥ २६ ॥ पृ० . घयला टीका-पमत्तादीणं ओघरास संस्नज्ज खंड फर एय डमिस्थिवेद प्रमत्त दानो भवंति इस्थिवेद उपसामगा दस .. म्यवगा बीस २०॥ पृ०.८.६॥ अर्थ--प्रमत्त संयत्त श्रादि गुणस्थान संवन्धी घराशिको संख्यात से खंडित करने पर एक खंड प्रमाण स्त्रीवेदी प्रमत्तसंयत आदि गुणस्थान पति जीय हान हैं । स्त्रीवेदी उपशामक दश और क्षपफ चीस है। पृ० ४१६ ॥ मूलम्--णसय चेदेसु --पम-संजय पहुदि जाव अणियहि यादर सांपराइय पचिट्ठ उवसमा खवा दन्य पमाणेण केवडिया ? संखेज्जा ॥ सू० १३० ।। टीका-इस्विंद गमत्तादि रासिस्स संगजीदभागमेत्तो गाईसय येद पमनादि रासी दोदि ! कुदो ! इहपागगि समाए गपुंसर येदादयेय सारिणदाणेण पर सम्मत-संजमादीण मुगल भाभावादी प्राधाना गा पायति ति जागाभाग मुत्त संगन गिष्ट लो को गाघुसायंवद उवनामगा मंत्र ५. गवगा दम .३० ! अधिवद गाएसय वद गमना यमनाच पत्तिया चत्र होति सि मंगहि ( खान) उत्रामा गन्धि । ०६। अर्थ-प्रमत्त संयन गुगाम्यान स लेकर अनिवृति यादर सांप रायिक प्रविध उपशम और चपक गुगा स्थानक नक ( नासक) जीव द्रव्य प्रमाग की अंपन्ना कितन, संगयात, ॥१२० ॥ मृलम्--सजोगिंकवली सोपं ।। स० १३४ ॥ टीका-सव्वापरत्यागं पदं । पलायदुवं प्रकृत) सम्वन्यावा गपुंसय बेदुवसायगा. { लि ) खबगा समज गया । इन्धि दुव- सामगा तत्तिया चच, तसि पयगा संखजगुणा । पुरिस दुबला मगा संग्वज गुणा तसि खबगा संग्वज गुणा ! पुंसय बंद । अमत्त संजदा संखजगुणा. तम्हि चच पमनसंजदा संबज गुगा, इस्थिवदे अप्पमत संजदा संबल गुणा, तम्हि चेव चमत्तसंजदा संखज गुणा । सजोगि कवली संखज्ज गुणा । (पृ० ४२२) इन सब सूत्र पाठो से स्पष्ट है कि-पुरुप १५८ स्त्री २० और नपुंसक १० नपक श्रेणी करते हैं एवं मोक्ष में जाते हैं। ई (पट खंडागम-जीवस्थान-द्रव्यप्रमाणुगम, धवला सका, मुदित पुस्तक ३ रा) वीसा नपुंसगया, इत्थीवेया य हुंति चालीसा। पुवेदा अडयाला, सिद्धा इक्कम्मि समयाम्म ॥ अर्थ-एक समय में एक साथ में पंढ २०, स्त्री ४०, और पुरुप ४८ सिद्ध होते हैं । माने-स्त्री और नपुंसक भी मोक्ष में जाते हैं। इन सब पाठों से निर्विवाद सिद्ध है कि दिगम्बर शास्त्र स्त्री. दीक्षा और स्त्री मुक्ति के पक्ष में हैं। दिगम्बर-यह तो मानना ही पड़ेगा, कि स्त्री केवलिनी वनती है तो तीर्थकर भी बन सकती है ! - जैन यद्यपि एसा होता नहीं है किन्तु अनन्त काल व्यतीत होने के बाद कभी स्त्री भी तर्थिकर हो जाती है। मगर उस घटना , - 1- . का समावेश याश्चर्य में हो जाता है। श्वेताम्बर और दिगम्बर दोनों अघटित घटनाओं का कभी २ होना मी मानते हैं और उग्ने आश्चर्य की संज्ञा देकर "किसी २ समय में ऐसा होमाता" इतना ही उसक बारे में खुलासा करते हैं.::...।" .. वर्तमान चौवीसी में मल्लिकुमारी उन्नीसवें तीर्थकर हुए हैं। मगर गह श्राश्चर्य, माने अशक्य नहीं, दुशक्य घटना मानी जाती है, अनेकान्तवादी ऐसी नैमित्तिक घटनाओं के बारे में एकान्त इन्कार भी नहीं कर सकते हैं। दिगम्बर- यदि दिगम्वरीय शास्त्रों में भी, स्त्रीदीक्षा और स्त्रीमुक्ति का विधान है तो.दिगम्बर समाज उनका निषेध क्यों करता है। जैन--दिगम्बर समाज नग्नता का एकान्न, हामी है. इसी से उसको क्रमशः वस्त्र, वस्त्रधारी की मुक्ति, और सीलर्साला में म्श्रीमुक्ति का निषेध करना पड़ा है। वास्तव में नग्नता की एकान्त मान्यता हट जाय तो स्त्री मुक्ति का निषेध की भी, पाचश्यकता नहीं रहेगी, अंत एव अनेकान्तबाद के ज्ञाता दिगम्बर प्राचार्यों ने स्त्रीमुक्ति का भी कुछ २. उल्लेख भी किया है। जिनको में ऊपर बता चुका है। इसके अलावा वैदिक माहित्य भी स्त्री को वेदा ध्ययन और मुक्ति का कुछ निषेध करना है.. उसके असर बाल ब्राह्मणों में ग्ने बने हुए ब्रह्मचारी और भट्टारकों ने भी उस विषय को संभवतः ज्यादा जोर दे दिया होगा। कुछ भी हो, किन्तु स्त्री दीक्षा और स्त्रीमुक्ति दिगम्बर शास्त्रों से भी सिद्ध है। दिगम्बर–गाताजी अ० के श्लोक ३२ में कहा है. कि- मां हि पार्थ-1 व्यंपाश्रित्य येऽपि स्युः-पापयोनयः1::.:. सियो वैश्यास्तथा शुद्रा स्तेपि यान्ति परां गतिम् ।। इसके सामने. जैनधर्म तब ही उदार विशाल और विश्व- व्यापक बन सकता है जब कि शूद्रमुक्ति और स्त्रीमुक्ति का विधायक हो । ऊपर के प्रमाणों को देखकर हर एक विचारक को खुशी होगी कि दिगम्बर शास्त्र मी शूद्रमुक्ति और स्त्रीमुक्ति धनात है, यह जैनों के लिये अभिमान की बात है । इतना ही नहीं किन्तु जैन दर्शन इस हालत में ही सर्वोपरि दर्शन है प्रहात प्रयंन । . .
१३६ ] जैन इस बात को दिगम्बर समाज ठीक २ समझ ले नो जैन समाज में एक बड़े एकान्तनाग्रह से खडा हुश्रा सम्प्रदायवाद का अाज ही अन्त होजाय । अनेकान्तवादी जैनों का फर्ज है कि इसके लिये उचित प्रयत्न करे और जैनसंघ को पुनः अविभक्त संघ मनाव ": दिगम्बर-ऊपर के पाठों में पंढ दीक्षा और पंढ मुक्ति का भी विधान मिलता है तब तो पंढ मुक्ति भी दिगम्बर शास्त्रों से सिद्ध हो जाती है। जैन--दिगम्बर शास्त्र नपुंसक को भी मोक्ष मानते हैं। मगर उसमें संभवतः इतनी विशेषता है। कि वो नपुंसक असली नहीं, किन्तु कृत्रिम नपुंसक होना चाहिये। गोम्मटसार कर्म कान्ड गा० ३०१ में पर्याप्त स्त्री को पुरुष वेद और पंढ वेद के उदय की ही मना की है और पुरुष को सिर्फ स्त्री के उदय की ही मना की है। इसी से स्पष्ट है कि--पुरुष किसी निमित्त से पंढ बन जाता है, यह पंढ "कृत्रिम पंढ" है और यही मोक्ष का अधिकारी है। जिनवारणी गांगय को कृत्रिम नपुंसक मानती है और उसको मोक्ष गामी भी बताती हैं सारांश-दिगम्बर शास्त्र स्त्री मुक्ति के साथ पंढमोक्ष की भी हिदायत करते हैं माने "पंढ़ मोक्ष' मानते हैं - प्रथम भाग समाप्त स श्वेताम्बर-दिगम्बर ॥ वन्दे वीरम् श्रीचारित्रम् ।। (भाग-दूसरा) केवली अधिकार दिगम्बर-वन परिग्रह नहीं है, मूर्छा परिग्रह है, ओर २ उपधि भी संयमकी रक्षांके लीए अनिवार्य उपकरण हैं। वस्त्र:- धारीको निर्ग्रन्थपद व केवलशान हो सकता है। जैनमुनि पक, घरसे सम्पूर्ण भीक्षा न लेवे, विभिन्न घरोंमें परिभ्रमण करके गोचरी ग्रहण करे, अजैनोंसे भी शुद्ध आहार लेवें, गृहस्थी अन्य- लिंगी शुद्र स्त्री और नपुंसक भी मोक्षमे जाय। ये सब बातें दिगम्बर शास्त्रोंसे भी सिद्ध है, उसमें तनिक भी शंका का स्थान नहीं है। मगर श्वेताम्बरोंको ओर २ कई बातें ऐसी है जो संशोधनके योग्य हैं। जैन-प्रमाणासे व कसोटीसे सब बातोंका सत्य स्वरूप मिलं. जाता है, आपको दिगम्बर शास्त्रोंके ही प्रमाणांसे ऊपरकी सव यातं सत्य व प्रामाणिक प्रतीत हुई है। इसी ही तरह ओर २ यातका निर्णय भी प्रमाणोंसे ही कर लेना चाहिये। आप प्रश्न करों, मैं प्रमाण वताऊं, आप, शास्त्रके पाठ देखो, सोचो, और निर्णय कर लो। परस्परविरोधी वातोंके निर्णयमें एवं समन्वयमें प्रमाण ही आयना है। दिगम्बर-इवेताम्बर शारनमें केवली भगवान के लिये फई विचित्र वातें लिखी है, वे सब हमको तो ठीक नहीं लगती हैं। '. जैन-सिर्फ कहने.मात्रसे ठोक-अठीक का निर्णय नहीं हो सकता है। केवली भगवान कैसे होने चाहिये ? इसका निर्णय . - 4 .
२ गुणस्थानकी व्यवस्था द्वारा ही हो सकता है। केवली भगवान में जिस २ कर्मप्रकृतिका उदय विच्छेद हो जाता है, उसके कार्य का भी अभाव हो जाता है, यह सीधी-सादी बात है। तो आप उनकी उदय प्रकृति और उदय विच्छेद प्रकृति का विश्लेष करें, जिससे-कवलीओंकी रहन-सहन और प्रवृत्ति का बहुत खुलासा मिल जायगा। दिगम्बर-केवली भगवानको १२२ उदय प्रकृतिमें से घातीये ४ कर्मकी सब प्रकृतियाँ और अघातिये ३ कर्मकी कुछ २ प्रकृतियां एवं ८० कर्मप्रकृतिओंका "उदय विच्छेद" हो जाता है, जो इस प्रकार है। (१) १ मिथ्यात्वमोहनीय, २ आतप, ३-५ सूक्ष्मादि तीन । (२) ६-९ अनन्तानुवन्धी चार, १० स्थावर, ११ एकेन्द्रिय जाति, १२-१४ विकलेन्द्रियजाति । (३) १५ मिश्रमोहनीय । (२) २६-२९ अप्रत्याख्यान चतुष्क, २० से २५ वैक्रीयादि पट्क, २६ नरकायु, २७ देवायु, २८ मनुष्यगतिआनुपून्धि, २९ तीर्यच०आनु०, ३० दुर्भग, ३१ अनादेय, ३२ अयशकीर्ति, (५) ३३-३६ प्रत्याख्यान चतुष्क, ३७ तिर्यंचआयु, ३८ उधोत, ३९ नीचगोत्र, ४० तिर्यंचगति । इन ४० कर्मप्रकृति योंका उदय विच्छेद होने पर मुनिपना प्राप्त होता है। (६) ४१-४२ आहारकशरीर युग्म, ४३ स्त्यानधि, ४४ प्रचला प्रचला, ४५ निद्रानिद्रा इन ४५ प्रकृतिका उद्य विच्छेद होने पर अप्रमत्त गुणस्थान प्राप्त होता है। (७) ४६ सम्यक्त्व मोहनीय, ४७ . सेवार्त, ४८ कीलिका ४९ अर्धनारोच । (८) ५०-५५ हास्यादि पटक । (९) ५६ नपुंसकवेद,५७ स्त्रीवेद, ५८ पुरुपवेद,५९-६१ सं.क्रोध मान माया ।।१०) ६२ सूक्ष्म सं. लोभ । (११) ६३ नाराच, ६४ ऋपभ नाराच । (१२) ६५से ८० ज्ञानावरणीय पंचक, दर्शनावरणीय चतुष्क, निद्रा, प्रचला, अंतराय पंचक । इन ८० प्रकृतिओंका उदय विच्छेद होनेसे मनुष्य केवली होता है। (गोम्म० कर्म० गा० २६५ से २७०) ... केवली. भगवानको ४ कर्म और ४२ उत्तर प्रकृतिका "उदय" हो सकता है, वे इस प्रकार हैं।
(१३) १ शातावेदनीय या अशातावेदनीय, २ वज्रऋषभ नाराच संघयण, ३ निर्माण, ४-५ स्थिर-अस्थिर, ६-७ शुभ, अशुभ ८-९ सुस्वर, दुस्वर, १०-११ शुभ विहायोगति, कुविहायोंगति, १२-१३ औदारिकयुग्म, १४-१५ तेजस,कार्मण, १६-२१संस्थानंपट्क, २२-२५ रूप, रस, गंध, स्पर्श, २६-२९ अगुरु लघु, उपांत, परा: घात उश्यास, ३० प्रत्येक शरीर । (१४) ३१ शाता या अशातावेदनीय, ३२ मनुष्यगति, ३३ पंचे- न्द्रिय जाति, ३४ सुभग, ३५-३७ त्रस, बादर, पर्याप्त, ३८ आदेय, ३९ यशाकीर्ति, ४० तीर्थकर नाम, ४१ मनुप्यायु, ४२ उच्च गोत्र ! इनमेसे ३० प्रकृतिका उदय विच्छेद होनेपर "अयोगी गुणस्थान" और शेप १२ प्रकृति का उदय विच्छेद होने पर "सिद्ध पद" प्राप्त होता है। (गोम्म० कर्म• गा० २७१, २७२) वास्तवमें यह निश्चित है कि केवली भगवान को तेरहवें गुणस्थानमें १२० बंध प्रकृतिओमें से १ शाता वेदनीयका बंध (गोम्म० क० गा० १०२), १२२ उदय प्रकृतिओं में से ४२ प्रकृतिओं का उदय (गा० २७२, २७२), १२२ उदीरणा प्रकृतिओम से शाता, अशाता और मनुष्यायु सिवाय की उदय योग्य ३९ प्रकृतिओंकी उंदीरणा (गा० २७९ से २८१) और १४८ सत्ता प्रकृतिओंम से ८५ प्रकृतिकी सत्ता (गा० ३४०, ३४१ कवि पुष्पदंतकृतं 'अप. भ्रंश महापुराण' संधि ९ गा०...) होती हैं। केवली भगवानको ४ कर्म उद्यमें रहते है- १ आयुकर्म-केपली भगवानको मनुष्यायु उदयमें है, केवल- शान होने के बाद कोई केवली भगवान तो फोडों वर्षों से भी अधिक आठ वर्ष न्यून क्रोड पूर्व तक जिन्दे रहते हैं। उनका आयु मनपवर्तनीय होता है। २ नामकर्म-आयुष्य है यहां तक शरीरस्थिति अनिवार्य है। इसीसें केवली भगवानको मनुप्य गति, यौदारिक शरीर, संघयंण; निर्माण, पंचेन्द्रियजाति वगैरह ३८ प्रकृति उदयमें होती है। ३ गोय-मनुप्यगति है-शरीर है वहाँ तक गोत्र भी रहता है। नीचगोत्र १४ गुणस्थान तक सत्तामें रहता है, किन्तु दीक्षा . 2 लेने के बाद उदयमें नहीं आता है, मुनिको अयश दुभंग अना- देयका उदय नहीं होता है वैसे नीच गोत्रका भी उदय होता नहीं हैं: उच्च गोत्रका उदय होता है। कंबली भगवानको उच्च गोत्र उद्यमें होता है। 2 वेदनीय कर्म-जहां तक आयु है-गरीर है वहां तक वेदनीय तो है ही। केवली भगवान को शाता और अशाता ये दोनों प्रकृति उदयमें आती हैं। यद्यपि ये अघातिग्रे कर्म है पर वे अपना काम अवश्य करते हैं। केवलो भगवान अनन्त बीयबाले हैं, किन्तु उदयमें आई हुई किसी भी प्रशतिको रोक नहीं सकते हैं। आयुष्य को कम नहीं कर सकते हैं। नामकर्म को हटा नहीं सकते हैं और वेदनीय को दाव नहीं सकते हैं । केवली सगवान को उदय में आई हुई प्रकृति का संक्रमण भी नहीं होता है। देखिए दिगम्बरीय गोम्मटसार कर्मकांड में स्पष्ट है कि- बंधुकट्टकरणं संकममोकटुदीरणा सत्तं । उदयुवसाम णिवत्ती णिकाचणा होदि पडिपयडी।। बंध, उत्कर्षण, संक्रमण, अपकर्षण, उदीरणा, सत्ता, उदय, उपशान्त, निधत्त और निकाचना, ये दश करण (यवस्था) हर एक प्रकृति के होते हैं ॥३७॥ आठवें "अपूर्वकरण गुणस्थान' तक ये दश करण रहते हैं ।४४ - आदिम सत्तेव तदो, सुहुमकसानोत्ति, संकमेण विणा । छच सजोगिति तदो, सत्तं उदयं अजोगिति ॥४४२।। (१०) सूक्ष्म संपराय गुणस्थान तक शुरुके ७ करण, (१३) संजोगि गुणस्थान तक संक्रमण विना के ६ करण, और (१४) सजोगी गुणस्थान. में उदय और सत्ता ये २ करण ही रहते हैं ॥४॥ माने केवली भगवान् को संक्रमण, उपशान्त, निधत्त और निकाचना नहीं होते हैं, उदयमें आई हुई प्रकृति अपना फल देती है। सत्तागत कर्मप्रकृति कुछ काम नहीं करती है, उदय में आई हुई प्रकृति अपना काम अवश्य करती हैं। इस प्रकार केवली भगवान को ४ कर्म की ४२ प्रकृतिमों का उदय होता है। जैन केवली. भगवानको “४२ कर्म प्रकृति" उदय में रहती है केवली भगवान का वर्तन भी तदपेश ही होगा। ।
प्रकृति के विना खोले यथार्थ ज्ञान होना मुश्किल है अतः इनका अलग २ विचार और समन्वय करना चाहिये । इसमें भी सबसे पहिले घेदनीय कर्म का विचार करो, कि वाद में और २ कर्म का विचार करना आसान हो जायगा। दिगम्बर-वेदनीय कर्म का बंध १३ वे गुणस्थान तक, उदय १४ वे गुणस्थान तक, उदीरणा छठे गुणस्थान तक, (गी० क० गा० २७९ से २८१) और सत्ता १४ वे गुणस्थान तक होती है । इसकी शाता और अशाता ये दो प्रकृतियां हैं। १४ वे गुणस्थान तक दोनों प्रकृतियां उदय में रह सकती हैं। यह "जीवविपाकी" कर्म- प्रकृति है। जीवविपाकी ७८ हैं, जिनमें वेदनीय भी है। केवली भगवान को दोनों वेदनीय रहती हैं। जौर उसी के जरिये ११ परिपह होती हैं। देखिये (१) मार्गाच्यवननिर्जरार्थ परिपोढव्याः परीपहाः ॥८॥ क्षुत् पिपासा० ॥९॥ एकादशं जिने ॥११॥ वेदनीये शेपाः ॥१६॥ एकादयो भाज्या युगपदेकस्मिन्नेकोनविंशतिः ॥१७॥ (दिगम्बर मोक्षशान अध्याय ९) (२) उक्ता एकादश परीपहाः । तेभ्योऽन्ये शेपा वेदनीये सति .... :: भवन्तीति वाक्यशेपः । के पुनस्ते ? ". क्षुत्-पिपास-शीतो-प्ण-दंशमशक-चर्या-शय्या-वध-रोग- खणस्पर्श-मलंपरीपहाः। (भा० पूज्यपाद अपरनाम आ० देवनन्दित सर्वार्थसिद्धि) (३) (जिगे) तेरहवें गुणस्थानवति जिनमें अर्थात् केवलि भग- यानके (एकादश) ग्यारह परिपह होती हैं। उन्मस्थ जीवों को वेदनीय कर्म के उदय से १ क्षुधा, २ तृपा, ३ शीत, ४ उष्ण, ५ देश मशक, ६ चर्या, ७ शय्या, ८ अध, ९ रोग, १० तृणस्पर्श और ११. मल ये ग्यारह परिपह होती है, सो केवली भगवान के भी वेदनीय का उदय है, इस कारण केवलो को भी ११ परिषद (थ्रीयुत पनालालजीकृत मोक्षशान भाषा टीका जनग्रंथ रत्नार, " वो रन, पृष्ट ८३) दोना कहा है।
(2) एकादश वाकी रहीं, वेदना उदय से कहीं, वाईस परीपह उदय, ऐसे उर आनिये ॥२५|| वाईस परिपह, दि० जैनसिद्धान्त संग्रह पृ० १७६ इस प्रकार केवली भगवान को वेदनीय कर्मके उदय से १३ परिपह होती है। इन ११. परिपह का स्वरूप निम्न प्रकार है। छप्पय--- १ क्षुधा २ तृपा ३ हिम 2 उश्न ५ डंसमसक दुखभारी। ६ निरावरण तन ७ अरति ८ वेद उपजावन नारी ॥ ९ चरया १० आसन ११शयन १२ दुष्ट वायक १३. वध वन्धन। १४ याचें नहीं १५ अलाभ १६ रोग १७ तृण फरस होय तन ॥ १८ मलजनित १९ मान सनमान वश२० प्रज्ञा २१ और अज्ञानकर। २२ दरशन मलीन बाईस सब साधु परीपह जान नर ॥३॥ दोहा-सूत्र पाठ अनुसार ये, कहे परीपह नाम । इनके दुख जो मुनि सह, तिन प्रति सदा प्रणाम ||२|| १ क्षुधापरीपह-अनसन ऊनोदर तप पोपत, पक्षमास दिन वीत गये हैं। जो नहीं बेन योग्य भिक्षाविधि, सूख अङ्ग सव शिथिल भये हैं ॥ तव तहाँ दुस्सह भूखकी वेदन, सहत साधु नहीं नेक नये हैं। तिनके चरणकमल प्रति प्रति दिन, हाथ जोड़ हम शीश नमे हैं ॥३॥ २ तृपापरिपह-पराधीन मुनिवर की भिक्षा, पर घर लेय कह कुछ नाहीं । प्रकृति विरुद्ध पारण भुंजत, वढत प्यास की त्रास तहां ही ॥ ग्रीषमकाल पित्त अति कोप, लोचन. दोय फिरे जव जाहीं । नीर न चहें सह ऐले मुनि, जयवन्ते यरतो जगमाहीं ॥४॥ ३ शीतपरीपह-शीत काल सब हो जन कंम्पत, खड़े तहां वनं वृक्ष डहै हैं । झंझा वायु चलै वर्षाऋतु, वर्पत वादल झुम रहे हैं ॥ तहां धीर तटनी तट चौपट, तालं पाल पर कर्म दहे हैं। सह संभाल शीतकी वाधा ते मुनि तारणतरण कहे हैं |५|| ४ उष्णपरीपह-भूख प्यास पीड़े उर अंतर, 'प्रजुलै आंत देह स्व दागै। अग्निस्वरूप धूप ग्रीपम की ताती वायु झाल सी लागै ।। पहाड ताप तन. उपजति, कोपै पित्त दाह ज्वरजागै । इत्यादिक की वाधा, सह साधु धीरज नहिं त्यागें ॥६॥ 1
'
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५ डंसमस्कपरीपह-डान्स मस्क माखी तनु कार्ट, पीडै यन पक्षी
बहुतेरे । डस व्याल विष हारे बिच्छू, लग खजूरे आन घनेरे ॥
सिंह स्थाल सुन्डाल सतायें, रीछ रोज दुख देहि घनेरे । ऐसे कष्ट
सह सम भावन, ते मुनिराज हरो अघ मेरे ॥७॥
६ चापरीपह-चार हात परवान परख पथ, चलत दृष्टि
इत ऊत नहीं ताने । कोमल चरण कठिन धरती पर, धरत धीर
बाधा नहीं मान ॥नाग तुरङ्ग पालकी चढ़ते, ते सर्वादि याद नहीं
माने । यो मुनिराज सह चर्या दुःख, तय दृढकर्म कुलाचल भार्ने ।
.७ शयनपरीपह-जो प्रधान सोनेके महलन, सुन्दर सेज सोय
सुख जोर्चे । ते अब अचल अंग एकासन, कोमल फठिन भूमि पर
सो ॥ पाहन खण्ड़ कठोर कांकरी, गडत कोर फायर नहीं होवें।
पांचो शयन परीपह जीत, ते मुनि कर्म कालिमा धोवें ॥१२॥
८ बधवन्धनपरीपह-निरपराध निर्वर महामुनि, तिनको दुष्प
लोग मिलि मारें। कोई बच खम्भ से वाध, कोई पावक में पर.
जार ॥ तहां कोप करते न कदाचित् , पूरव कर्म विपाक विचार ।
समरय होय सह यध बन्धन, ते गुरु भव भव शरण हमारे ॥१३॥
९ रोगपरीपह-यात पित्त कफ श्रोणित चारों, ये जब घर्दै
यह
तनु माहीं। रोग संयोग शोक जय उपजत, जगत जाय कायर
हो जाहीं॥ ऐसी व्याधि वेदना दारुण, सबै सूर उपचार न चाही।
भातम लोन विरक्त देह सां, जैन यती निज नेम निबाही ॥१८॥
१० सुणस्पर्शपरीपह-सूस तृण अरु तीक्ष्ण कटि, फटिन
कांकरी पाय विदाएँ । रज उड़ आन पड़े लोचनमें, तीर फांस तनु
पीर विचार | तार पर सहाय नहीं पांडत, अपने फरस फाट
म डार । यो तृणपरस परीपह विजयी, ते गुण भव भव शरण
.
,
धमारे ॥१९॥
११ मलपरीपह-यावजीय जल न्दौन तजो जिन, गा रुप पर
धान पड़े हैं। चलै पसेय धूप को येला, उड्न धूल सय शंग भरे
॥ मलिन देह को देख महामुनि, मलिन भाय उर नादि कर है।
यो मल जनित परीपद नीत तिनदि द्वारा हम शीर धरे ॥२०॥
१० निय को ये मोहनीय कर्मजन्य पण होते नहीं है। यह तो दिगम्बर शास्त्र से स्पष्ट है। वह निर्ग्रन्थ अन्तर्मुहर्त में केवली बनता है, तब मानावरणीय, दर्शनावरणीय च अन्तराय कर्म का क्षय हो जानेसे उक्त १४ दूपणे के उपरांत अशान, मद, निद्रा, हिंसा, जूट व चोरी इत्यादि दृपों से रहित हो जाता है। इस विश्लेषणले तय है कि केवली भगवान के अज्ञानता वगै. रह जो १८ दोष माने गये हैं वह ठीक है। और दिगम्बर शास्त्रों में जो उक्त क्षुधा वगैरह १८ दृषण गिनाये हैं, वे सिर्फ सिद्धोंके हिसाब से हैं, मगर केवलो भगवान से जोड़ दिये गये हैं, वो ठीक नहीं है। : वास्तव में क्षुधा वगैरह १८ दूपण केवलोके दूपण नहीं हैं; अज्ञानता आदि १८ दूपण ही केवलीके १८ दूपण हैं। आचार्य पूज्यपादकृत "सिद्धभक्ति" श्लोक ६ और भी यह मान्यता अधिक पुष्ट होती है। यद्यपि केवली भगवान को आहार निहार रोग मल परिवह उपसर्ग शाता अशाता चलना समुद्धात और मृत्यु ये सब देह प्रवृत्ति अवश्य होती है, किन्तु वे निरीह भाव से होती हैं। दिगम्बरसम्मत शास्त्र में भी निर्देश है कि- प्रातिहार्यविभवैः परिष्कृतो, देहतोऽपि विरतो भवानभृत् । मोक्षमार्गमशिपन् नरामरान , नापि शासनफलेषणातुरः ||७३|| काय-वाक्य-मनसां प्रवृत्तयो, नाभवंस्तव मुनेश्चिकिर्षया । नाऽसमीक्ष्य भवतः प्रवृत्तयो, धीर ! तावकमचिन्त्यमीहितम् ।।७४॥ (स्वामो समन्तभद्र का स्वयंभू स्तोत्र, स्तो० १५). कायवाङ्मनसां सत्तायां सत्यामपि ।। (बोधप्रामृत गा०. ३५ टीका) केवली भगवान् केवली समुद्धात करते हैं। माने केवली भगवान को आहार वगैरह शारीरिक प्रवृत्तियां होती. . , है .
दिगम्बर-विली भगवान् नोकर्म आहार लेते हैं, कहा भी है कि- फम्मा हारु असेसहं जीवह । णोकम्माहारु विभवभाव । लेचाहारु वि दिसइ रुक्वहं । कवलाहारु णरोह तिरीक्खहं ।। ओजाहारु पक्खि संघायहं । मणभोयणु चउदेव निकायह॥ (कवि पुष्पदंतकृत महापुराण, संधी ११ वी) यहां विभव भाव में "णोकर्म" आहार और मनुष्य और तिथंच के लिये कवलाहार बताया है। यद्यपि केवली भगवान् मनुष्य ही है, किन्तु वे "गोकर्म" आहार लेते हैं, कवलाहार नहीं लेते हैं। निद्रा का नोकर्म दही यगरह पदार्थ है, वेदोदय का नोकर्म भोगांग है, वैसे शरीर आदि की अमुक नोकर्म वर्गणा है, केवली भगवान् उनका ही आहार लेते हैं। इसके लिये कहा है कि- आहारदसणेण य, तस्सुवजोगेण ओमकोट्ठाए। सादिदरुदीरणाए हवदि.हु आहारसण्णा हु ॥१३४॥ आहार देखने से अथवा उसके उपयोग से, और पेटके खाली होने से तथा अशातावेदनीय के उदय और उदीरणा होने पर जीको नियमसे आहारसंशा उत्पन्न होती है। (पं. गोपालदासजी यरयाकृत मापानुवाद) उदयावण्णसरीरोदयेण, तदेह-वयण-चित्तानाम् । जोकम्मवग्गणाणं, गहणं आहारयं नाम ॥६६३॥ आहरदि सरीराणं, तिण्हं एयदर बग्गणाओ । भासा मणाणं णियदं, तम्हा आहारओ भणिओ ॥८३४॥ (गोम्मटसार, जीवाद) माने-औदारिफ चैप्रिय आहारफ भाषा और मनको वर्गणाओं का ग्रहण करना, यही आहार है, फेवली भगवान् "गोकर्म घर्गणा" का आधार लेते हैं। जैन-गोकर्म घर्गणा का आहार लेना, उस आदार द्वारा १२ आठ वर्ष की छोटी अवगाहनामें केवल मान पाये हुए केवली भगवान के शरीर की क्रमशः ५०० धनुप तक वृद्धि होते जाना, खाली पेटको भरदेना, शाता अशाता वेदनीय के उदय को भोग लेना, भूख को शान्त करना और क्षुधा परिपह को जीतना, ये सब विकट समस्या है। "नोकर्म आहार" तो विभव भाव में हैं। और कर्मयोगवाले जो कि अनाहारी है वे क्या विभव भाव में नहीं हैं ? यदि मनुष्य कवलाहार करते हैं तो क्या केवली भगवान् मनुप्य नहीं हैं ? क्या उनको मनुष्यायु मनुष्यगति और मानवी शरीर नहीं है ? यदि नोकर्म वर्गणा ही आहार का कार्य करे तो गर्भकी व्यवस्था निरर्थक है, ओर २ आहार भी निरर्थक है, देवों का मनोभोजन भी फिजूल है, और क्षुधापरिषह यह कल्पना ही है । न अशाता को मौका मिलेगा न क्षुधा लगेगी, न आहारशुद्धि का प्रश्न उठेगा, न परिषद ही होगी और न क्षुधा परिपह को जीतना पढ़ेगा। मगर शास्त्र तो केवली के लिये लम्बा आयुष्य, शरीर- वृद्धि, अशाता, भूख, तृपा, भूखपरिपह, रोग, चलना-विहार करना इत्यादि विधान करते हैं इतना ही नहीं किन्तु कई दिगम्बर शास्त्र तो कवलाहार का भी स्पष्ट उल्लेख करते हैं। इस हालत में केवली भगवान् नोकर्म वर्गणा का आहार लेते हैं, यह कवलाहार के विपक्षमें मनस्वी कल्पना ही है। दिगम्वर-केवली भगवान कवलाहार करें यह वात बुद्धि- गम्य नहीं है। जैन-विना तेल दीपक जिस तरह नहीं जलता है उसी ". प्रकार विना आहार के शरीर नहीं टिकता है, यानी शरीर को आहार अनिवार्य है। केवली भगवान् को औदारिक शरीर है, बड़ा आयुष्य है, अंशाता वेदनीय है, भूख है, आहारपर्याप्ति है और लाभांतराय आदि का अभाव है। फिर क्या कारण है कि वे आहार न करें ? दिगम्बर-केवली भगवान को अनन्त ज्ञान है । .. . जैन-ज्ञान और अज्ञान एकान्त विरोधि वस्तु है। अतः इन । दोनों में ही एक के बढ़ने से दूसरे का ह्रास होता है, किन्तु ज्ञान के बढने से या घटने से भूख की हानि वृद्धि होती नहीं है। भूख अशताका फल नहीं है, इसी लोए ज्ञान या अज्ञान से उसका कोई सम्बन्ध नहीं हैं । आहार पाने से या भूख का कारण नष्ट होने से भूख शान्त हो जाती है, किन्तु मान बढने से भूख माटती नहीं है । ज्ञान होने से अज्ञानता नष्ट होती है और उप. योग शक्ति प्राप्त होती है, भूख दवती नहीं है। वास्तव में ज्ञानावरणीय फर्म और भूख का परस्पर सहकार भाव नहीं है। दिगम्बर-खाने से शान दब जायगा। जैन-महानुभाव ! खाने-पीने से सामान्य या विशेष प्रत्यक्ष या परोक्ष कोई शान दयता नहीं है । क्षायिक केवलशान किसी से नहीं दयता है। दिगम्बर-केवली भगवान को अनन्त दर्शन है। जैन-दर्शनावरणीयकर्म और भूख का परस्पर में कोई सह- कार भाव नहीं है, खाना और देखना इनमें कोई सम्बन्ध नहीं है। दिगम्बर-मायालोहे रदिपुण्याहारं (गो० जी० गा० ६) इस कथनानुसार "आहार" मोह विपाफ का फल है, कपाय होता है जय आहार होता है, तो माया और लोभ न होने से माहार नहीं रहता है। अतः अपायी केवली भगवान् आहार न करें। जैन-अधिक मायावी या घडा लोभी दी आहार लेये, ऐसा देखने में नहीं आता है । कपटी भी खाता पीता है, सरल भी साता पीता है, लोभी भी खाता पीता है, संतोषी भी साता पीता है। कहीं कपटी या लोभी भी फम गाता है और सरल या संतोपी अधिक भी ग्याता है । इस प्रकार माया लोभ और आधार क्रिया में किसी भी प्रकार का अन्यय-व्यक्तिरेक सम्बन्ध नहीं है। दिगम्बर-यांना प्रमाद है अतः छठे गुणस्थानके ऊपर साना यंद हो जाता है। जैन-उठे गुणस्थानयती जीव मादारक द्वय, स्त्यानधि प्रचलाभचला और नीद्वानीद्रा इन ५ प्रतियों का टयविच्छेद - २४ करके सातवें अप्रमत्त गुणस्थान में जाता है। इनमें ऐसी कोई प्रकृति नहीं है कि जिससे खाने-पीने का निषेध हो जाय । दिगम्बर-आहारक द्वय का उद्य विच्छेद है। जैन-इन आहारक द्वय से आहारक शरीर और आहारक अंगोपांग का विच्छेद होता है, न कि माहारग्रहण का। दिगम्बर-अप्रमत्त दशावाला क्या खावे पीवे ? जैन-खाना प्रमाद नहीं है, खाते खाते तो शुद्ध भावना से कभी केवलज्ञान भी हो जाता है। अप्रमत्त को निद्रा और प्रचला का भी उदय होता है फिर खाने पीने का तो पूछना ही क्या ? दिगम्बर-केवली भगवान् अनन्त वीर्यवाले हैं, अतः क्षुधा को दवा देवे। - . जैन-जैसे वे आयुष्य को नहीं बढ़ा सकते हैं और न घटा सकसे हैं, वैसे ही क्षुधा को भी नहीं दवा सकते। उनको लाभांतराय भोगांतराय या कोई अंतराय नहीं है अतः आहारप्राप्ति का अभाव नहीं है, फिर क्षुधा को क्यों द्वावे ? अंतराय का क्षय होने से लब्धि होती है, किन्तु क्षुधा का अभाव नहीं होता है । दिगम्बर-तीर्थकर भगवान को स्वेद नहीं है तो आहार भी न होना चाहिये। जैन-स्वेद तो निहार है, वह शरीर से निकलता है, आहार तो ग्रहण किया जाता है। इनकी समानता कैसे की जाय ? फिर भी केवलीको तो स्वेद होता है, आहार भी होता है। दिगम्बर-भूख वेदनीय कर्म की सहकारिणी है! जैन-नहीं, वेदनीय कर्म भूख का सहकारी है । वेदनीय कर्म का उदय विच्छेद होते ही भूख का भी अभाव हो जायगा । दिगम्बर-बेदनीय अघातिया कर्म है, मामूली है, वह उदय में आने पर भी कुछ नहीं करता है । और वे ११ परिषह भी उप- चार से हैं । (सर्वार्थसिद्धि ९-११) जैन-कर्म घातिया हो. या अघातिया मगर उदय में आने से अपना कार्यः अवश्य करता है, इतना ही क्यों. केवलीको -
समुद्धात भी कराता है। वेदनीय मामूली नहीं है, यदि मामूली
होता तो सातवें गुणस्थान से ही वेदनीयकी उदीरणा की क्यों
मना कर दी गई ? मामूली था तो उसकी उदीरणा भी कुछ
नहीं करने पाती। मगर उदीरणा का यहां से निषेध है, अतः
वेदनीयकी ताकतका परिचय हो जाता है जिसकी उदीरणा का
पहिले से निपेध है वह फर्म मामूली फैसे माना जाय ? यह
अपना कार्य अवश्य करता है और उसका फल अवश्य ही
भोगना पडता है।
११ परिपद भी उपचार से नहीं है, सिर्फ उपचार से ही
पताना था तो २२ ही क्यों न यताये ? वास्तव में ११ परिषद
भी उपचारसे नहीं है। परिषद परिपह के रूप में ही होते है और
ये भी अपना कार्य अवश्य करते हैं।
आचार्य पूज्यपादजीने भी परिपहों का उपचार होना लिख
दिया, किन्तु वह दलील कमजोर थी अत एव उन्होंने "न स.
न्तीति" कल्पना भी बताई, अन्ततः "एकादश जिने" इस पाठ के
सामने यह कल्पना भी निराधार बन जाती है। वास्तव में केवली
भगवान को ११ परिपद है और वे सहने पड़ते हैं।
दिगम्बर-मोहनीय कर्म न होने से वे सताते नहीं हैं।
जैन-मशाता घेदनीय व परिपद अपना २ कार्य करते है
किन्तु उनसे केवली भगवान को ग्लानि नहीं होती है। कारण ?
भरतिका अभाव है। किन्तु इससे यह नहीं माना जाय कि फेवली
भगवान को अशाता व परिपह नदी होते हैं।
दिगम्बर-फर्मप्रतिभों का आपस २में संक्रमण भी होता
देतो अशाताधेदनीय का शाता के रूप में संक्रमण हो जायगा।
जैन-दिगम्बराचार्य नेमिचन्द्रसूरिने १३ ये गुणस्थान में
संकमण को मना की है।
(गोम्मटगार, कर्मच, गा. ४४२)
मतः यदां संक्रमण मानना दी भूल अशाता घेदनीय
अशाता रूप मे ही उदयम आयेगी, मोर, उसको यही
भोगनी पटेगी।
- . १६ सागंश यह है कि केवली भगवान को भूख प्यास घर वगैरह होते है और वे आहार पानी लेते है। दिगम्बर-चिली भगवान किस कारणले आहार लेवे ? दिग. स्वर शासनमें आधार के त्याग और स्वीकार के लिये निन्न कारण माने*। छहि कारणेहिं असणं, आहारतो वि आयरदि धम्म ! छहि चेच कारणे हिंद, णिज्जुहवतो वि आचरेदि ॥५२॥ वेणय याचंचे, किरियाहाणेथे संजमट्टाए । तथापाण धम्मचिन्ता, कुजा एदेहिं आहारं ॥६॥ आदंके उबसग्गे, तिरिक्खणे बंभचेरगुत्तीओ। पाणिदया तंबदेऊ, सरीरपरिहा युच्छेदो ॥६।। टीका-तितिक्षणायां ब्रहाचर्यगुप्तेः सुष्टु निर्मलीकरणे, सप्तमधातुक्षयाय आहारव्युच्छेदः ॥६॥ ण बलाउसादु अहूं, ण सरीरस्सुवचयट्ट तेज९ । णाण? संजमढे, झाणटुं चेव भुंजेजो ॥३२॥ (मूलाचार परिछेद ६ पिंडविशुद्धि अधिकार) जैन केवली भगवान शरीर, संयम, धर्म और शुक्ल ध्यान आदि के कारण आहार लेते हैं, और आहारत्याग भी करते हैं। दिगम्बर-दिगम्बरीय शास्त्रमें तीन आहार व चार आहार के त्यागरूप तपस्या है, जिसके नाम चतुर्थ भक्त छट्ट अट्ठम दशम वगैरह हैं। देखिये- (१) खवणं छ? हम दसम खमणं, खमणं च छट्ट अट्ठमयं । खमणं खमणं खमणं, छटुं च गदेस्सिमो छेदो ॥७८॥ ( आ. इन्द्रनन्दिकृत छेदपीडम् ) (२) रत्ति गिलाणभत्ते चउविह एकम्हि छट्ठखमणाओ। टीका-रात्रो व्याधियुते चतुर्विधाहारे ॥२९॥ ( दिगम्वरीय छेद शास्त्रम्) उपवासः प्रदातव्यः पष्टमेव यथाक्रमम् ॥३३॥ टीका-चतुर्विधे चतुष्प्रकारे अशने पाने खाये स्वाये । उपवासंःक्षमणं ॥ (प्रयश्चित्त चूलिका श्लो३३) उपवास में गरम पानी पीने से उपवासका आठवां हिस्सा कम हो जाता है। (भासकल कीर्तित प्रश्नोत्तरोपासकाचार पौपधोपवासकथन, चर्चासागर, चर्चा ३५.) दिगम्बरोंकी तपस्याकी परिभाषामें छह अट्टम वगैरह शब्द. प्रयोग किये गये है इसी प्रकार सामान्य तपस्या के लीए "योगधारण" इत्यादि शब्दप्रयोग भी किये गए हैं। +ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजी "अंग्रेजी जैन गजट" (जुलाई का सार) शीर्षक लेख में लिखते है कि:- "नोट-भादो मास में जैन समाज में स्त्रीपुरुष बहुत उपवास करते है सो लाभप्रद है, ऊपर के वर्णन से यह सिद्ध है कि-चार प्रकार के 'आहारको त्यागते रामय शुद्ध प्रामुक पानी रस लेना चाहिये। यह बात अनुभवसे सिद्ध है कि-पानी के बिना उपवासके दिन यहुत आकुलता हो जाती है। धर्मध्यान भी कटिनता से होता है। श्वेताम्बर समाज में पानी को रख कर उपवास करने का रिवाज है, सो ठीक विदित होता है। जिनको भाकुलता विस्कुल न होवे तो पानी भी न ले। परन्तु 'डाक्टरी सिद्धान्त में पानी लेना लाभकारी है । गृहस्थ को हर भटमी चौदशको पानी देते हुए उपवास करना ही चाहिये ।" (ता. २१-७-३९ वी. सं. २४६४ था. व० ९ का जनमित्र, पु. ३९ अं. ३७.४० ५९४-५९५) * आदिपुराणादि ग्रन्थोमें छह महिना तपश्चरण के पश्चात् : पारणा के लिए चर्याको जाने का उल्लेख है और अंतराय होने पर पुनः छह महिना का योग धारण करने का विधान किया गया है। इस तरह आदि "पुराणादि प्रन्यों से भी एक वर्ष में पारणा होने की बात सिद्ध हो जाती हैं। (पं. परमानन्द जैन शास्त्रीका "त्रिलोकप्रज्ञप्तिमें : उपलब्ध ऋषभदेव चरिन" लेख, अनेकांत व० ४, कि० ५. पृ. ३१० की टीपणी.) - . . ३ . यदि केवली भगवान आहार लेते हैं तो क्या उपत्य तप भी करते है? 'जन-हा, वे बाहार के अभावरूप तप भी करते हैं दिगम्बर-केवली भगवान के आहार और तप के लिये शास्त्र- प्रमाण दीजिये! जन-दिगम्बर शाओं में केवली भगवान के आहार और तपके प्रमाण ये है। (१) सर्व मान्य आ० श्री उमास्वातिजी कहते हैं- एकादश जिने । (तत्वार्थ० अ० ९ सू०.११) केवली भगवान को ११ परिपह होती है माने शुद्ध आहार पानी मिलने पर क्षुधा और प्यास का शमन होता है। (२) आ० कुन्दकुन्द बताते हैं कि- गइ इंदियं च काए, जोए वेए कसाय णाणे य । संजम दंसण लेसा, भविया सम्मत्त सण्णि आहारे ॥३३॥ टीका-आहारे आहारकद्वयमध्येऽर्हत आहारकानाहारकद्वयं । यहाँ टीकाकार ने आहारक शब्द बना लिया है वह उसका अनाभोग है। वास्तविक बात यह है कि-केवली भगवान आहार लेते हैं, नहीं भी लेते हैं, आहारी है, अनाहारी भी है ॥ आहारो य सरीरो, तह. इंदिय आण पाण भासा य । पज्जत्तिगुणसमिद्धो, उत्तमदेवो हवइ अरुहो ॥३४॥ पंच वि इंदिय पाणा, मण वय काएण तिन्नि बलपाणा, आणप्पाणप्पाणा, आउग पाणेण होति दह पाणा ॥३५॥ ( बोधप्रामृत ) (३) आ० समन्तभद्रजी लिखते हैं कि- बाह्यं तपः परम दुश्चरमाचरंस्त्वं । आध्यात्मिकस्य तपसः परिवृंहणार्थम् ।। ध्यानं निरस्य कलुषद्यमुत्तरस्मिन् । ध्यानद्वये ववृतिषेऽतिशयोपपन्ने ॥८३।। r:-11