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Kala Aur Sahitya

Makhanlal Chaturvedi · 2011/03

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मारवनलाल चतुर्वेदी

प्रवाशक प्रभात प्रकाशन चावडी बाजार दिल्ली ११०००६
मुद्रर क्ला भारती नवीन शाहदरा दिला ३२/ सर्वाधिकार सुरक्षित
सस्करण १६८६
म्य तीस रुपय
KALA AUR SAHITYA (collection of Essays)
by Makhan Lal Chaturvedi
Rs 3000
Published by Prabhat Prakashan Chawl Bazar Delhi 110006

भूमिका
सच पूछिए तो यह पुस्तक स्वय भूमिका-जैसी है। इसकी
भूमिका क्सी ? अत यह पाठको के हाथो मे जसी-की तैसी क्यो
न जाय?
इसम कल्पनाओ के आकाश मे विचरण करने की मूखता
नही कर रहा हूँ। यह तो जमीन पर पाव-पांव चलने का
छोटा हा प्रयास ही है।
--माखनलाल चतुर्वेदी

प्रकाशक प्रमात प्रकाशन, चावडी बाजार दिल्ली ११०००६
मुद्रक बला भारती नवीन शाहदरा दिल्ली ३२ / सर्वाधिकार सुरक्षित
सस्करण १९८६
KALA AUR SAHITYA (collection of Essays)
by Makhan Lal Chaturvedi
Rs 3000
Published by Prabhat Prakashan Chawn Bazar Delhi 110006
मूल्य तीस रपये

भूमिका
मच पूछिए तो यह पुस्तक स्वय भूमिका-जमी है । इसकी
भूमिका पसी? अत यह पाठमो के हाथो मे जैसी की-तसी क्यो
ने जाया
इसमे कल्पनाओ के आकाश म विचरण करने की मूखता
नहीं कर रहा हूँ। यह तो जमीन पर पाव-पाव चलने का
छोटा सा प्रयास ही है।
~माखनलाल चतुर्वेदी

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विपय-सूची ५ १२ २१ २४ २६ ३२ १ कला और साहित्य २ काव्य सप्टि काव्य दष्टि ३ सूम और समस्या ४ कमाल की प्रम-कहानी ५ क्ला, श्रम और चितन ६ जो बोले, सो निहाल ७ स्वतत्रता की याद मे द्वार पर ८ प्रतिभा के पैरो पाव पाव & लेखक एक मार डालने की वस्तु १० अभाव-अभियोग ११ जब गद्य व्यक्तित्व ग्रहण करता है १२ इस निर्माण म रस बहा १३ विविध मनोदशा के व्यक्ति १४ प्रिया अभागिन ता कटुता को माहताज है १५ साहित्यिक की मूर्ति पूजा १६ मरम्मत के लिए डाले हुए आदश १७ यथाथ का अयथाथ १८ लेखक अत्यत अरक्षित है १६ कला और गाव २० हमारे गांव और उनके शिक्षक ४१ ४५ ४६ ६४

६८
७१
२१ दीपक के गव का दिन
२२ वर्षा की प्रथम बौछारें
२३ बुनियादी शिक्षण बुनियादी समझ की नीव
२४ बुनियादी तालीम आकषण विदु
२५ कृषक सिपाहियो का विजय दिन
२६ होली साम्य का त्योहार
२७ साहित्य के प्रति मेरा दष्टिकोण
८०
८४
८७

१ कला और साहित्य उस दिन अस्सी वष के बूढे चचिल का, अस्सीवां वप पार करने के उपलक्ष्य मे, ब्रिटिश पार्लामेण्ट के सदस्य सम्मान कर रहे थे। उस दिन चचिलको चगिल का ही एक तैलचित्र भेंट किया गया था । द्वितीय महा- युद्ध का योद्धा अब बोलने के लिए खडा हुआ, तो उसकी आँखो मे कृतज्ञता के आसू थे। ये आसू वीर चचिल की आखो म शायद ही कभी दखे गय क्योकि युद्ध शुरू करते हुए उहान कहा था, "वे आंसू और यत्रणा ही दे सक्त हैं । ' इस अभिन दन समारम्भ मे चचिल साश्रुनयन बाले कि, "मुझे आपने बडा कहा । मुझे बढानेवाली छोटी सी चीज आप जानते हैं कौन है ? यह कि मेरे जीवन मे एक बहुत बड़ी चीज मेरे पास जो बठी हैं मिसेज चचिल । मरे यश की ये बहुत बडी हिस्सेदार, मेरे बडप्पन की य महान् निर्मानी हैं।" और भरी सभा म भावावश मे महान् साहित्यकार और साम त चचिल ने श्रीमती चचिल को वही चूम लिया, कितु श्रीमती चचिल के नत्रा से तो उत्सव के प्रारम्भ से ही आसू निकल रहे थ । यह घटना तो मैं इसलिए कह रहा हूँ कि जब चचिल-जैस महान व्यक्ति का पौरप क्ला बनता है, तब वह साथुनयन हा उठना है और अपनी कला के सम्पूण कीति विदु का नारी की तरफ इगित वरखे बताता है । यो क्ला तो लडकी की तरह है। वह स्वय ज म लेती है और फिर नय ससार को जम देने लगता है। कलाकार भी यही करता है। इस तरह २/क्ला और साहित्य क्ला म जो निर्मात्री शक्ति है, वह माता और निर्माता का पुछ गठबधन- सा दिखायी दता है। क्ला म धनिकता का शायद ही कभी पाई रिश्ता रहा हा धन स भडकवर भागना क्ला का स्वभाव नहीं है कितु धन अभाग में कला तक पहुंचन की शक्ति शायद कभी न हो। इस देश म कदाचित मैन तो धन को सदा ज्वर की तरह देखा। सामन थाली आयी, तो ज्वर मे मुह टढा करेंग, मुह फेर लेंगे और सामन कोई क्लाकृति आयी तो आप देखेंग कि धनिक मुह टेढा कर लेगा मुह फेर लेगा। इस तरह मुझे धन और ज्वर मे एक विचित्र भाई चारा दिखायी देता है। एक बार एक मूर्तिकार मूर्ति बना रहा था। मूर्ति बनाते हुए वह पूर्व तल्लीन था। जिस समय वह नेत्र बना रहा था ता एक आदमी न उसे पुकारा, पूछा 'माई यहा से महाराजा की बरात गयी?' उसन छेनी रख दी हथौडा रख दिया व पूछन लगा, 'यहाँ से? महाराजा की? एक वरात गयी. नीना वाक्यो म जो सतह के चिह्न उमन लगाये वे क्ला की एकात्म कता के प्रशश हैं। उलटे प्रश्नकर्ता के आगतुक से प्रश्न हैं । विश्व यह सोचे कि कला में बहुल भाई-चारा है, सो बात भी नही । क्ला अपन में ऐसी कुछ मणाम रूठनवाली लडक्यिो की तरह है कि वह सीधी तरह बठती ही नहीं । साहित्य का स्वभाव देखिए अथ को आगे करेगा स्वर को पीछे रखेगा! सगीत के स्वभाव को देखिए, स्वर आग अथ पीछे । दानो विपरीत । पर तु साहित्य के विना सगीत नही और सगीत वे विना साहित्य नहीं। दोनो क्लाएं अपने म स्वतन हैं, परतु क्ला की प्टि से जब मैं सोचता हूं, तो मुझे लगता है कि माहित्य बहुत पिछडी क्ला है । मूर्ति को आप देखें। मूर्ति तथा चित्र सगीत, नत्य और साहित्य-ये पाच स्पमैं क्ला के विशेष मारता हूँ। मूर्ति ही आप बनाइए भारतवप म बनाइए स्विटजरलण्ड में बनाइए इग्लण्ड मे बनाइए, एक मूर्ति आप बनाइए और उस मौन मूर्ति का विश्व भर में भज दीजिये। वह स्वय बता देगी कि वह कौन है। यदि वह चित्र जवाहरलाल का है यदि वह चित्र चंचव का है यदि वह चित्र बछडे को दूध पिलाती गैया का है, तो वह चित्र कला और साहित्य/३ स्वय कहेगा कि वह कोन है। उसमे किसी अनुवाद की जरुरत नहीं, किसी इण्टरप्रेटर की आवश्यकता नहीं क्सिी इधर से उधर करने वाले की आवश्यकता नहीं। उस मूर्ति की अपनी अपील पहुंच, अपना भान और अपनी समझ है । वह विश्व-भर की समझ है। चित्र भी उसी तरह है । चिन की समझ भी मूर्तिया को तरह विश्व भर में फैली है । परतु एक कमी है। मूर्ति पर ऋतुआ वा असर नही पडता। इसीलिए लोगो न देव मदिरोम मूर्ति की स्थापना कर रखी है। चित्र पर ऋतुओ का असर पड़ता है इस- लिए मैं मूर्ति से चित्र को गौण मानता हूँ, यद्यपि उसकी अपील को मैं विश्व- ज्यापी मानता हूँ। इनके सिवाय हैं सगीत और नत्य । देश की सीमा म, किसी भी देश की सीमा म वेदश भर मे अपने ताल और स्वर से समझे जा सकते हैं। भारतवष मे एक गाय निव द्रम का है और दूसरा वादक कश्मीर का। इन दोनो के गायन वादन से जो रागिनी उतर रही है, उसे सारे देश के लोग समझ सकते हैं । समझन वाले लोग यह अनुभव करते हैं कि गायक खमाच गा रहा है जैजैव ती गा रहा है ख्याल की दष्टि से कह रहा है टप्पा गा रहा है या कोई और राग गा रहा है। आप बताइये यह कौन सिखा गया किहिमालय पर तो सगीत हो और कन्याकुमारी से समया जाये ? समय के इस मिलन का, देश के मेल की, आप अनुभव करते हैं जो कला की जेब में रखा है । पर तु सगीत और नत्य की अपील विश्वव्यापी नहीं। यदि एक गौन यहाँ गाया जाएगा तो सम्भव नहीं कि उसे स्विट्जरलैण्ड के लोग समय लें चीन के लोग समय लें। यह नहीं होगा। इसकी अपील राष्ट्रीय अपील है, यह क्ला राष्ट्र भर मे समझी जाती है। नृत्य की भी वही हालत है, जो सगीत की है। चाहे कथाक्लो हो मणिपुरी हो, बैगा के नत्य हो, भीली के नत्य हा गोडो के नत्य हा-विसी के नृत्य हो- उन'नयो की पहुँच केवल देशव्यापी है विश्व यापी नहीं । परतु साहित्य को दखिए। वह अनुवाद पर ही मुनहस है। साहित्य थोडी-सी सीमा से दवपर रह गया। आपने अपनी बात अपनी भाषा में कही, अनुवाद हो गया, तो लोगो न समय लिया। अनुवाद नहीं हुआ, तो लोगों ने नहीं समझा। साहित्य बेचारा एक सीमा से बंधी समझी अपन ४/क्ला और साहित्य साथ लिय घूमता है । परतु इसका जीवन वहाँ है ? साहित्य अगर क्ला है, तो उसका जीवन कहाँ है ? सारी चीजें शरीर की समझ म माती हैं, पर सांस का कोई चित्र नही लिया जा सकता। इसी प्रकार सारी क्लाओ मे सांस का काम साहित्य करता है। नृत्य पर जो धुन बठायी जाती है वह साहित्य की है। गीत साहित्य देता है, वे गाये जात हैं। चित्र और मूर्तिया साहित्य-कथाओ पर निर्माण की जाती हैं । गरज यह कि साहित्य ऐसी चीज़ है कि वह सब क्लामा और विकासो को पप्ठभूमि है, सबका पष्ठ विदु है और इतन ही के बल पर साहित्य को हम महान मानते हैं। साहित्य मे एक चीज़ मेरी समझ में नहीं आती है स्पष्ट कह दें, क्याकि वह उसको कला होने से रोकती है। वह है कठिन भाषा। मैं पढ़ लेता हू, मेरी भाषा और लोक-जीवन के मध्य म खडा होकर जो पहुँचन न देना चाहता हो वह चाहे भगवान भी हो, तो साहित्यकार को स्वीकार नहीं होता। कठिन भाषा हमारी वस्तु का फैलन से, आगे बढने से, रोकती है । इसलिए मुझे इस कठिन भाषा के सम्बध मे बडी कठिनाई होती है। 'विषय के अनुकूल' कठिन भापा लिखनी होती है मैं मानता हूँ। उस भापा उस विषय का उद्देश्य जनता मे नही, गिने चुना मे पहुँचना होता है । व ठीक कहते हैं, जो कहत हैं कि अरे भाई, तमिल की परवाह तो करो, तेलुगु की परवाह तो करा, मलयालम की परवाह तो क्रो, आसपास के एशिया क दशा को भी तो देखो कि कला किस तरह मिलती है। एक जमाना बहुत बुरा था कि राजाआ और ऐय्यासो के यहा कला पेट भरने को लाचार हुई । परतु वह चली थी दव मदिरा से। देव मदिरो म उसका स्थान था। इसी देश के नहीं, दूसरे देश के देव मदिरो में भी उसका स्थान था । वह क्ला का स्थान जीवित रहे उसकी शक्ति अपरिमित रहे उसको बल देने वाली ताक्त उसमे रहे। वह देश मेल को जाग्रत कर सके और वह सारे एशि और विश्व के सूपा को मिलान में सफल हो सके। भारतीय क्ला के प्रति इन सदभावो को रखकर मैं अपने क्थन की समाप्ति करता हूँ।

२ काव्य-सृष्टि काव्य-दृष्टि यदि वसूल करन ही निकला, ता बचारे कवि को कविता मे से ऐति हासिक जानकारी, सामाजिर स्थिति, धम और नीति के कुछ आदश तथा कुछ सिद्धात आदि बाता के टुकडे हाथ लग ही जावेंगे, कि तु काव्य-सप्टि के विहरणशील के पास तो काव्य दृष्टि का होना ही अधिक जीवनदायिनी बात है। त्रिवेणी के तट पर, सगम के निक्ट प्रयाग स्टशन वाले पुल पर ख. हावर, सूर्योदय के समय जो सुपमा बिखरनी है, उसका आनद इस बात की याद दिहानी से कसे मिलेगा कि 'क्लेि को सड़क पर कुछ मूग फली बचनेवाल भी मिलते हैं।' काय नटि और काव्य सृष्टि देखन जानवाला ऐसा लगता है, मानो नदन निहारन जानघाला अपनी माखें घर छोड आया हो। किसी अभिनता या अभिनत्री का अभिनय चात्य देखकर मुग्ध होन वाले कुछ चतुर अभिनेता के 'बैक बेलेस' और अभिनेत्री की उम्र का उल्लख करत पाय जाएँ तो उह नाट्य-नरक की उपाधि नि सकोच दे दीजिए। पविता के लिखने मे कवि की कुछ नीयत होती है। कभी कभी, बहुत थोडी । प्राय तो कवि स्वान्त सुखाय लिखता है । वह जम सूझो के बाग मे उतर चुक्ता है और सूयती हुई बारीक्यिा मे रगीनिया में, डूब चुक्ता है, तब दीखते दश्य, उनपर उगते चमत्कार और मानव के कोमलतरमा प्रखर- A ६/कला और साहित्य तम स्वभाव चित्र उसी की क्लम से उतरत हैं, वितु अपने होश की मधुर- तम बेहोशी मे ही। नियति और नीयत दोना के नृत्य या कृत्य का उस ज्ञान नही रहता। यदि आकाश को कादम्बिनी की छहर लहर मे बिजलो किस ओर से, किस आकाश मे चमक उठेगी इसका क्सिी को नान हो सके, तो सूझ भी किस दृश्य कृत्य या स्वभाव का दखबर उतर पडेगी इसकी किसी का पहिचान हो सके। चुल्लू में रग भरकर सफेद दीवाल पर मैंने द मारा, और यह ला एक लाकृति सी बन गयी। कुछ तो बनना ही था, सो बन गया। किंतु यदि कोई कहे कि ठीक ऐसी ही सो आकृतिया एक स्पय फी आकृति बनाकर दो, तो चुल्लू मारनवाला क्या एक भी आकृति ज्यो की-त्यो बनाकर द सकेगा? कवि की प्रतिभा म हिरन की सी छलागे नही हैं । चरन धरत कांपत हियो है। उसम शेर की सी दायें-वायें सवत्र सवकाल सचारिणी गति नहीं है, क्याकि वह शेर जसा इनहि न भावत शोर-जसा ता है कि तु पथ छोड छोड दने वाला नहीं है। उसकी गति तो भगवान् वराह जसी होती है, गति के समय राह म कौन पड गया कब पड गया, इसका भान नही रहता। हाँ कविता म कुछ ऐसे दीखत हैं, मानो ध्येय हो कुछ ऐस मालूम पडत हैं मानो समाज के चित्र हा, कुछ ऐस प्रतीत होत हैं, मानो इतिहास बोल रहा है किंतु वह सोचे हुए ज्ञान की इच्छित गति नहीं है, सूझा के सपना क सस्कृतिमय प्रतिविम्ब मात्र है। यह वात नहीं कि यदि कभी सहतुक लिख ही नहीं सकता। वह लिखता है-बुछ नाटक कुछ उपयास कुछ का य वितु उनम मागमण की थका वट होती है क्रिया के काव्य वनकर करा या चरणो पर उतरने का आनद- मय नत्य नहीं हाता। पहिले म पाठक का जरूरत वा जायज माल मिल जाता है माना वितु प्राण नहीं मिलता। बाजार का सौदा मिल जाता है उमप समपण स्नह, वलिदान और अमर मानद नहीं मिलता। अपन युग की जा जानकारी कवि की लेखनी म आ गयी वह इसलिए काध्य सष्टि काव्य-दृष्टि/७ कि वह उसे टाल न सका, वह उसे टाल नहीं सकता था। युग के बाजारू पदचिह्नो को छोड़ने का परिणाम दखिए-अनेक शताब्दियो पूर्व शकुन्तला हुई, छठी शताब्दी म कालिदास हुए, और बीसवी शताब्दी म हम रहते हैं, यह भविष्य मे शताब्दियों अमर हैं । क्या सामाजिक धारणा, ऐतिहासिक जानकारी, धम तत्त्व, आदश, उद्देश्य आदि का ऊँट का टाडा अपन बोझ के बाद किसी रचना या रचनाकार को इतना अमर रहन देगा? द्रौपदी के पाच पति सुनकर और तिब्बत म बहुपति प्रथा को धम मम्मत देखकर यदि कोई इतिहासकार पाण्डवा को तिब्बती बतावे, तो शोध मे डॉक्टरेट पानेवाला शायद प्रसन हो कि उसन कितना बडा शाव किया, वितु भगवान् वेदव्यास जरूर रा देगा। महर्षि व्यास को इस प्रथा का पता हो सम्भव है कि तु महाभारत को रचना मे तो, द्रौपदी, मात्र प्रतिमा के रगा के महान उत्थान मे, तिब्बत मे नहीं है, भारतीय जमीन से विना बुलाये आ गया दीखता है। इस प्रथा के पते से सम्भव है भगवान यास ने द्रौपदी के निर्माण का, समाज की कठोरता के बीच भी साहस पा लिया हो। r mo ३ सूझ और समस्या मुझे लगता है, हमारा तरुण बहुत रुचिवादी होता जा रहा है, रुचिवादी यान रचि का गुलाम। कभी वह किसीसे कुछ सुनकर लिखता है, कभी दश का उद्धार या क्सिीका भला करने का स्वांग भरता है। कभी सोचता है कि इसस अच्छा मौका नहीं मिलेगा इसलिए इस मौके से लाभ उठा लो । कभी समालोचको और सम्पादकाका पक्षपात अपन प्रलोभन द्वारा उहे अनावश्यक रूप स उकसाता है और इस प्रकारातर से उसकी प्रतिभा और श्रमशीलता का तजोभग करता है। आज तो उससे यह कहनवाला चाहिए कि हमारी यदि समस्या को सुलझाने की दिशा म तुमम थमको शक्ति नहीं है अथवा अध्ययन करने का मानसिक वे द्रीकरण नहीं है, अथवा समाज म जपन को निबाह ले जान की सहिष्णुता नहीं है, तो तुम उस समाचार पत्र की तरह हो, जिसके अग्रलेखो म प्रेम और विश्ववधुत्व पर लेख लिखे जाते हो और अय पृष्ठो म भाइयो भाइयो को लडान को बातें और एक रात म नौ खून के विमापन छापे जावें। हमारे जीवन के 'लैकबोड' को यदि कोई देखे, तो समाज की रूढियो प्रथाआ, आवश्यक्ता, अनुभूतिया और उथल पुथलों से हमाग शायद ही कोई रिपना रहा हो। हम बहुत ऊँचे से बोलें या बहुत नीचे झुक्कर जो हमारे सामने पड़ गया वही तो समाज नही है।

सूझ और समस्या / देश की सीमा पर पचनद स्थान पांचो नदियो के जल और स्थल की सीमा के झगडे म है, पर हमारी समाज रचना को कोई बात इसलिए नहीं मालूम कि इन यगडो के राजनीतिक सुलझाव का उत्तरदायित्व हमने शासन पर छाड दिया। अचम्भा इस बात म है कि पचनद की समस्त सीमा- समस्याआ म इस देश की लेखनी गैरहाजिर है। द्वारका से कामरूप और कश्मीर से रामेश्वरम् तक हमारी भौगोलिक सीमाएँ हैं । विनोबा-जसे साधु, देशव्यापी तीर्थ यात्रा भी कर रहे हैं, कि तु हमारी लेखनी मानो कही उलय । गयी है। अव स्वतत्रता प्राप्ति के बाद हम एक दूसरे के निकट तो आना चाहते हैं कि तु यह निकट कोन लाना चाहता है ? धन का लालच, प्रसिद्धि की इच्छा, सकरपा पर मर मिटने की साध नया युग-निर्माण करने का अहम या कुछ और और इरादो को छुपाकर क्रिया का आगे कर करके विश्व को विकासामुख बनाये रखने के लिए, लगातार उद्योग किये जाते हैं तथा मानव विकारा के मूलधन को कभी उत्तेजित और कभी पराजित कर करके विश्वगति के अग्रगामी पडावा के प्र यक घुमाव को पूरा करने का प्रयत्न किया जाता है उस राजनीति कहते है, जब शदा म अर्थो का छुपावर, मानव- विकाग को सूझा के जाविष्कारो मे गूथ गूथकर मानव चेतना को ऊध्वमुखी, सौ दयप्रिय और ललक भरा बनाया जाता है तथा प्रत्यक क्षण आनवाले युग की आवश्यक्ताआ की पूर्ति की तैयारी की जाती है, वह कलापूण साहित्य कहलाता है। जीवन की दिशा म दानो दिशाआ म काई भेद नहीं है । जब हम भेद अनुभव करते हैं तभी हम कही न कही, किसी न किसी से मिल जुलकर वलिदान अथवा सूझ का सवनाश कर बैठत है। सच बात तो यह है कि मम से अधिकाश का किसी विषय पर कोई मत नहीं है किसी विषय पर काई मत हो भी नहीं सकता। मत प्रकाशन और मतानुकूल वतन एक-दूसरे से इतन जुड़े हुए हैं कि एक को दूसरे स बचाया नहीं जा सकता। १ पजाब!

१०/कला और साहित्य मजदूर तो बडे बडे खनिज या ऐतिहासिक क्षेत्रो म शोधा के रूप में अपने श्रम की सफलता के पथ पर पहुंचा हुआ दिखता रहता है, क्याकि वह शोधक और दृष्टिदान करनवारो की देख रेख म काम करता है किन्तु लखन के मदान मे 'उडद वे दानो मे कौन छोटा और कौन बडा?" परिणामत नहीं बिना दष्टि की सप्टि की भरमार है और कही विना सृष्टि के केवल दृष्टि- ही दष्टि का आडम्बर है । कही कही तो सूय मुखता की हिमायत का ही नाम है। इस क्षेत्र का अहम् इतना वीभत्स है कि यदितली के वल की तरह हम सी अहम के आसपास चक्कर काटते रह तो जीवन और कला उत्तरोत्तर परस्पर शतु होते जाएगे और सूया की अहम् की प्रतिनिया, यदि त्रिया की राजनीति वे जहम में भी जाग्रत होनी गयी ता जिन शक्तिया व मम्मिलन स जगत का सचालन होता है, उनम हाडवर बढाने के लिए ही हम अधिक काम आयेंगे। हम भापा और भाव परिभाषा और शब्द राटी और राग का झगडा ही करत रहे और अणु युग आ गया। कहते हैं किसी समय एक कथा वाचक का वद्धावस्था में एक तरणी से विवाह हो गया। तरणी या मातत्व अपन सुहाग स मातृत्व की भीरा मांग रहा था और कथावाचक अपनी तरण पत्नी का मनोरजन करने के लिए पैरो म घुघरू बांधकर अपन मगीत और नृत्य से उस मगन रखन या जतन करत थे। वही कुछ ऐसी ही अवस्था युग को आवश्यक्ताआके मामन मारी पराजित सूझा की ता नही हा रही काई तीन सप्ताह पहल एक सज्जन न अपन एक मासिव पर वी चर्चा की। मैंन निवदन दिया कि यदि मामिव पत्र सी देश के लिए प्रकाशित मरें तो सबस पहले तो आप उग लखा ये चमवार को पहनी बलि न हान द बिना चमत्वार के शब्दों मचरम सौदय और पुरपाथ चमत्कार भूपत्व स यहीजच्छो लगेंगे । जव किमी आग्रह विवाद और अहम और हाँ अनुभूति व आप पायल हा नावे तो ईश्वर क लिए ध्यान र वि रचना के बीचो-बीच टूट जाना अच्छा नही है न टूट पडना। याणिज्य-व्यापार, तोय यात्रा भरण-पापण, और न जान विन किन पायों ग हम जहान्तहाँ घूमना होता है । हम दयें कि कही इन स्पाना पर सूझ और समस्या/११ ? सकुचितता के दूपित माल ढोने की बारबरदारी तो नहीं कर रह हैं ? इगलिश, अमेरिकन, रशियन और फ्रेंच साहित्य के ग्रथो के बिना हमाग काम नहीं चलता। ऐसा तो न हो कि ऊपर लिखे गये सब इल्जाम हमारे साहित्य या साहित्यिक पत्रकार, लेखक, कवि और कलाकार को उसी के वरदान हो और देश को उसका परिणाम भोगना पड रहा हा अत आवश्यक है कि हम सूझो के अहम से पराजित न हाकर अथवा देशसवा के घमण्ड से अधमरे न होकर अपन अत करण, अपन विशाल दश, अखण्ड विश्व और ब्रह्माण्ड की ओर लौटें तथा सावधानी लें कि दीमक की तरह उपनी कीर्ति के टीले बनाकर हम यही 'अपनी सुदरता' म लपटकर दी जानवाली मूखताआ से आक्लन के अभाव के बीज तो नहीं बो रह हैं 7 कमाल की प्रेम-कहानी उस दिन स्मरना पर ग्रीक लोगो का कब्जा हो गया था और कमाल- पाशा टर्की के भाग्य की डोरी अपनी जिंदगी और मौत से बांधकर टर्की के दुश्मना से लड रहा था। वे दुश्मन तीन थे-निकट व प्रकट सुलतान दूर का प्रक्ट ग्रीस और छुपा हुआ टी के मुल्की टुकडो का हिस्सेदार इग्लण्ड । स्मरना म कमाल की सेना वापस लौट रही थी और रेगिस्तानी खूखार लडाका कमाल अपनी फौज के लौटने का एक पहाडी पर चढा दूरबीन स निरीक्षण कर रहा था। उसी समय कमाल ने देखा जान पर खेलकर एक लडकी कुछ खबर लायी और तुर्दिस्तान की फौजी गुप्तचर टोली को दन चली आयी। [२] लोगाने देखा उस खबर देनवाली सुदर लडको पर टर्की के राष्टपति की मेहर नजर हुई। पूछताछ शुरू हुई.- 'नाम क्या है तीफ्ह ।' "उम्र? २२ वप।' "पिता का नाम ?"

कमाल की प्रेम कहानी/१३
"अवदुस्समद ।"
'निवास"
"यही फौज के द्वारा आग से जलाया जाता हुआ स्मरना।"
"पिता का रोजगार?"
"जहाजी व्यापार।"
सदैव ही मरुस्थल के शान्त एकात को पसन्द करनेवाले ख्खार शेर
ने पूछा-
"कुछ पढी हो।"
"अरेबिक और च।"
"कौन-सा पाठ्यक्रम लिया था ?"
"विज्ञान, इजीनियरिंग।"
"शिक्षा कहा पायी ?"
"स्मरना म-पेरिस मे।"
जबान हिली, भौह घूमी और कुवारी लतीफ्ह कमाल अतातुक की
सेक्रेटरी हो गयी। मगर इस शेर का स्वभाव नहीं बदला । वह युद्ध के
नक्शे बनाता, सेना का नियत्रण करता, देश मे उथल पुथल करता सब
रेगिस्तान की बेरुखी और लडाके जतु की बहादुरी के साथ ।
पर एकात के कुछ क्षण ऐसे भी होते, जब उस अपने साथी की जरूरत
होती। अधिक गर्मी से चट्टानो मे भी कुछ गीलापन आ जाता है, नमी
उतर आती है।
एक दिन लोगो ने देखा लतीफ्ह राष्ट्रपति की सेकेटरी, राष्ट्रपति की
सुहागिन हो गयी, बडभागिन हो गयी।
[३]
दिन बीते, रातें भी बीती, पर इस जोडी के दिन भी दिन होते और रातें
भी दिन होती । अपन मौन ही मे दोनो बोलते। राजा अपन प्रेम से चुप रहकर
बधे पड़े रहने की माग करता। वह प्रेम से बहता अनुशासित सिपाही की
तरह वर्दी और भोजन मे बँधकर उन घडियो की प्रतीक्षा कर, जब मुझे फुसत
मिले जब खूब एकात हो और जब मेरा जी राजकाज की उलयना और

१४/क्ला और साहित्य एवान की लहरो स एप आध दिन ऊब उठे, उस दिन तेरी बारी होगी। उधर प्रेम कहता, विद्यार्थी लतीफह तेरा उद्देश्य सुनकर तरी पूजा करती थी। गुप्तचर लतीफह तेरे लिए प्राणो पर खेलकर खबरें लाती थी सेक्रेटरी लतीफह तुझस भी अधिक सजीदा रहकर अपन मालिक का राजकाज सम्हालती थी। श्रद्धा थी, क्त्तव्य था, जिम्मेदारी थी, दश भक्ति थी परतु विवाह का बधन न था । प्रेमका वह अवतार न था, जब प्रेमसमपण भी बना करता है और अपने आराध्य को अपना सबकुछ बनाया भी करता है। केर- बेर के सग की अधिकार सीमा घेर-बेर का सग हो गयी। [४] कमाल को एकात, राजकाज, उलझन मरुस्थल, चितन शासन उथल पुथल चाहिए था। उसे पता ही न था कि प्रम को भी एक जगह देनी हाती है। उधर लतीफह शासन में सबकुछ कर सक्ती थी, यदि प्रेम का अपमान न हो । प्रम को विश्वास रह कि वह सूली पर टाग नहीं दिया गया है। सिपहसालार अतातुक प्रेम की आशा पर मुह फेरकर देख भी नही सकता था। वह देखेगा ता इस मरम्थन इस सेना, इस शासन इस उथल पुथल इन सूलियो इन वायुयानो, इन जहाजो इन खजाना और हाँ तुर्की की स्वतत्रता का क्या होगा? उधर लतीफ्ह सोचती-~-कौन कहता है कि हम दाना एक हैं महज मौलवियो की वाणी तो प्रेम का पगाम नहीं हुआ करती। विवाह में पढी आयतो के साथ न तो खेला जा सकता, न वह मना ही कर सकती है, न वह प्रेम का अस्तित्व ही दे सकती है। [ ५ ] आखिर क्या होता? फ्रास से शिक्षा पाये हुए दोनो विद्यार्थी थे कमाल और लतीफ्ह । कमाल न पूछा, 'क्या तुम झुकोगी?" लतीफह ने कहा, 'क्या तुम उस झुकाव की कीमत पर खुद झुक्कर उस भुने हुए पन को अपन हृदय से लगाओगे?"

कमाल की प्रेम कहानी/१५ दोना मौन? कमाल न पूछा- 'क्या प्रेम झुकेगा?" लतीफह ने कहा-'जिसन मातभूमि के प्रेम को कभी न युकन दिया, वह प्रेम से झुक्ने की आशा क्यो करता है ?" फिर दाना मौन । फिर भी दिन दिन होते और राते भी दिन बन जाती । एक दिन कमाल न पूछा, "क्या हम किसी एक विषय पर एकमत हो सकते हैं।' लतीफह बीच ही म बोली, "राष्ट्रपति, इसका जवाब अपन हृदय से पूछा।" फिर दाना मौन । जब मौन घण्टा दिना, हफ्नो, पखवारा और महीनो से भी लम्बा था। एक दिन फिर उगा। रात हुई, पर वह दिन ही बनी थी। सूरज डूब गया था पर आखो की पुतलिया जाग रही थी। माल ने उपेक्षा मे पूछा-- "क्या हम किसी विषय पर एकमत हो सकते हैं लतीफह?" लतीफह न उत्तर दिया, 'हा, तुर्की के राष्टपति के हाथा बड़े से बड़ा दण्ड पाने की कीमत पर भी हम दोनो एक दूसरे से विदा लेने पर मिल सकते दिन आखिर उगा ही। लतीफह पुन कुवारी लतीफ्ह थी । सुहाग तुर्की के रगिस्तान के कणा से मिलकर गम हो गया था और चमक रहा था। और रेगिस्तानी शेर यह जानता ही न था कि उसकी कोई चीज गुम गयी। लती फ्ह एशिया के प्रेम की प्रखरता है, कमाल एशिया की सैनिकता का रागहीन स्वप्न।

५ कला, श्रम और चिन्तन विश्व मे साहित्यकार का चाहे जो महत्त्व हो या न हो, इस दश म साहित्यकार अपनी सनक और सूझा मे उलझकर खुद मरने और औरा को मारन के लिए खुला नहीं छोडा गया, वह छोडा भी नहीं जा सकता। एक बार महात्मा गाधी ने कहा था, 'मैं विश्वास करता हूँ कि मेरा सदश विश्वव्यापी होगा, परन्तु इस मैं विश्व म अपन दश म की गयी अपनी कृतिया द्वारा ही भेज सकूँगा। यदि मैं भारत म ऐसी सफ्लना करक दिखा सकू वि जिस लोग अनुभव कर सर्वे, जान म, तो समझिए मरा स दश पूण हो गया।' गाधीजी के इस क्थन का वारिस इस देश का राजनीतिन नहीं हा मक्ता वह ता स्कूल मास्टर वे गुरतर उत्तरदायित्व ग पाली होपर भी दापा म स्कूल मास्टर की तरह है । शाला का अध्यापर युर्मी म एमा चिपका रहता है मानो वह अपनी मां पे पट स कुर्सी लेकर पैदा हुआ है वह अपन विद्याथिया म इतना अहम धारण क्यि रहता है कि वह क्सिीवी सुनना नहीं चाहता, अपनी ही कहे जाता है। यह जीवन और नान के हर क्षेत्र म अपन का योग्य मानता है और उपदश परन बैट जाता है। वह मलाम म्मम योलन का आदी होन के कारण दुनिया का भी क्लास स्म समझकर नान बधारन लगता है और इस बात का भूल जाता है कि उसकी बचकानी बाना स लोगों म अरचि उत्पाहो रही है क्योकि उमरी यात मानव का घिरन्मन समस्यामा वा हस नहीं है। यह एक ही सांस म बाघ परता है कला, श्रम और चितन/ १७ और क्षमा का उपदेश देता है और इस तरह मन और वचन मे अय वस्तु रखन जैस दुरात्मा का काम करता है और सदात्मा का स्वाग भरता रहता है। वह अपनी बातो से अपने श्रोता को समझकर स्वीकृत होनेवाली बातें नहीं देता, वह अपने श्रोता को निरुत्तर करता है। इस तरह अध्यापन और राजनीतिज्ञ अमन चरम अज्ञान की सतह पर साथ साथ चलते हैं और हमारे प्राचीन ग्रथ के इस कथन के साथ कि- "अपूज्या या पूज्य ते पूज्य पूजा तिरस्कृता । त्रीणि तत्र भविष्यति दुर्भिक्ष मरण भय ।।" सो सूझ और ज्ञान का दुभिक्ष, सम्पनता का मरण और अधिकार का भय, तीनो पैदा हुए बिना नहीं रहते। अध्यापक के पास उसके उच्चतर उतरदायित्वो म यह भी होता है कि वह ज्ञान के रूप मे-यथालय मे जाकर अपनी प्राचीन सस्कृति सचित सन्तत्व अपरिमित त्याग, निगूढ चितन और समस्याआ के सुलझाव के इतिहास से ऋण लेता है और अपने विद्यार्थियो की पीढी को ईमानदारी से वाट देता है कि तु अधिकार विजित राजनीतिज्ञ को अध्ययन और समस्याओ स क्या लेना देना । इस देश के चिन्तक की वेचनी यह है कि प्रेरणाएँ लेकर जगत को जीवन और नान देनवाले लोगा की लगभग एक हजार वप पहले ही परिसमाप्ति हो गयी--एसी धारणा लोगो मे बद्धमूल हो गयी और वे समझन लग कि विजय और महानताआ के भारतवप की शताब्दिया तो जान कब की बोत गयी। इस भावना स दो काम एक साथ हात है--प्राचीन के प्रति श्रद्धा दिखान स जन जीवन नाराज नही हाता, वरिक प्रसन ही होता है और प्राचीना की प्रशसा कर दन के सिवाय अपने लिए कुछ बाकी नहीं रह जाता। इस तरह हमारी श्रद्धा का बहाना, हमारी अक्मण्यता को छुपान का एक सफल हथियार बन गया है और एक हजार वप तक गुलामी म प्रयोग वरत करते हम श्रद्धा के दुरुपयोग क प्रयोग मे इतन पटु हा गये हैं कि अव यदि एक पीढी इस व्यवस्था से विद्रोह करती है, तो वह प्राचीन अध्ययन से सचित श्रद्धा से ही विरोध प्रारम्भ करती है। जिस जगत् को हम एक समयते हैं, वह अनक वन्तुओ से वनवर एवं हुआ है। इस देश के उन्नयन मे मनो- बैज्ञानिक उपचार को आवश्यकता है। यह केवल वनानिक आविष्कार लेकर १८/क्ला और साहित्य , उसपर टूटने म क्स सधेगा? व्यक्ति अपनी भिन भिन आदता से पराजित है, यही का नहीं, विश्वभर का । कुछ वे हैं, जा उत्साह के बीमार हैं, जोश की महामारी के पराजित । कृष्ण के साथ रह या दुर्योधन के, देश या विश्व से उह कुछ लेना-देना नही, उहे उत्साह चाहिए। ऐस लोग, बच्चे तो बच्चे ही है बूढे होकर भी बच्चे ही हैं। इनको तो उत्साह के चमचे से ही रचि की भूख लगन पर नपा तुला दूध पिलाना होगा। दूसरे–इनसे ठीक विपरीत हैं, उनका क्सिी विषय पर कोई मत ही नहीं अत देश और विश्व के बुरे भले स सवथा मुक्त हैं। उनके लिए जो करेगा, यदि उनका विश्वास हुआ तो परमश्वर, नहीं तो भाग्य वह भी नही, तो शासन और कुछ भी नही तो उनका अपना विभाग या व्यवसाय माग गरज यह कि विश्व का उनपर कोई उत्तरदायित्व नही। तीसरे हैं, जिनका अहम बहुत जाग्रत् । इह धनिक कहिए । धन के धनिक, जमीन के धनिक अध्ययन के धनी, सूझ के धनी। इनका अहम बहुत जाग्रत् । पृथ्वीमण्डल पर जहां जो कुछ हो रहा है इनकी कृपा स हो रहा है। जन जीवन काय चाहे जिस कौशल से सफल बनावे, कि तु इनके घर इह यश देने जाइए नही तो बने बनाये काय को सफल नहीं होने देंगे। वे तो ढालू जमीन के आदत के गढ़े हैं, जहाँ सिमिट सिमिटकर आदत के अनुकूल धन, विद्या, अध्ययन और सूझें एकत्र हुआ करती हैं। इनके दो ही स्थान हैं, या तो इनके अभिमान के मन्दिर इनके भवन या पागलखाना । दोनो स्थानो पर सूझा के धनिको का कभी टोटा नही पडता । चौये हैं बड़े सीधे देवता-स्वरूप किन्तु वायशीलता म शूय। यहाँ अक्मण्यता पूजा का स्थान लिये हुए है। समाज का कोई व्यक्ति न इनके जैसा अक्मण्य हो सकता है और न अकमण्यता पर एक प्रहार ही सुन सकता है। भगवान की कृपा है कि ससार का जन-जीवन इन व्यवसायिया के घेरे से बाहर है और कृपि, वाणिज्य, खाने, कारखाने और मानव की आवश्यकता के अन्य स्थल आवाद हैं और मानव किसी तरह जीवित है। इन सब दृष्टियो से दखने के पश्चात अब हम सोचें कि हम समस्यामा पर नय सिरस सोचना है और यह अनुभव करना है कि हमारे चिन्तन की उम्र अपवा हमारे विकास का समय केवल पिछले पच्चीस वप नही, कम-से-कम ५००० वप है । उसी दृष्टि से हम निर्माण से महत्त्वपूर्ण कार्यों मे लगना है।

कला, श्रम और चितन/१६ यह सोचना गलत है कि हमे श्रद्धा अथवा प्राचीन अध्ययन ने गुमराह किया है। जिस तरह समय के तीन टुकडे करके हमने अपनी सहूलियत का माग बना लिया है, उसी तरह प्राचीन और नवीन का भेद बनाकर हमने अपनी चितन और क्रिया की कापुरुपता के स्वर संचार के लिए स्थान सुरक्षित कर लिया है। नवीन आविष्कार प्राचीन अध्ययन के ही अगले चरण हैं और नवीन समाज-व्यवस्था प्राचीन के गलित अशो से शेष बची रहनेवाली उज्ज्वल जीवन साधना का नवीन मागदशन है। अत अध्ययन और इतिहास के प्रेरणा-त्रोतो के प्रति हम न निराश हो, न उदास हा। किसीसे न लडना, किसी पर आक्रमण न करना बहुत अच्छी चीज है, कि तु इस आदश को हम मूखता की सीमा तक न पहुँचाएँ । एक हजार वर्षों की गुलामी के पश्चात तो हम अनुभव करें कि सूत्रा, शास्त्रो, और शस्नो का बल वस्तुओ और ग्रथो से अधिक हमारी प्रियाशीलता में निवास करता है। इसीलिए सजक, प्रियाशील साहित्यिक के लिए कला से भिन और क्ला यवसाय से भिन केवल सनक का सौदा और भाड का रोजगार करने लग जाना मैं कलाकार और साहित्यिक के लिए आवश्यक नहीं मानता। हिमालय की धरोहर से लेकर हिंद महासागर के वैभव तक सबकुछ क्ला, विचार और श्रम के देवता को जागीर है । राजनीतिज्ञ मोसम की तरह आवेगा और चला जावेगा, जितु विचार, कला और श्रम की कहानी और याददिहानी पर युग बिगड़ेंगे और बनेंगे। रोटियां बचकर रात के अध्ययन का तेल खरीदने की क्षमता हममे ज्यो ज्यो कम होती जाएगी, त्यो-त्यो हमारा जन जीवन अन्त करण- रहित होता जाएगा। प्रति भवन में प्रकाश करनेवाले गिने चुन ही दीपक होत हैं दीपका की दूकान नहीं सजायी जाती । क्ला, श्रम और चितन के त्रिकोण मे से एक भी रेखा टूटी कि हम अपने युग को अस्पष्टता मे धकेल देंगे। जिम राजनीतिज्ञ को थोड़ी दूर सूयता है, हम यह क्यो चाहे कि वह अपना काम न करे। खयाल जन-जीवन से जितना दूर रहेगा, परिवतन उतना ही कठिन हो जाएगा और उतनी ही अधिक राजनीतिन को जिम्मे- वारियां बढ़ जाएगी। उसे वह करना पडेगा, जो वह नहीं जानता और वह जानता है, उसके लिए उसके पास समय नहीं रह जाएगा, अत' " २०/कला और साहित्य मूलधन काएक तरफ विश्व की विचारक्ता के साथ सामजस्य बैठाकर और दूसरी तरफ श्रम को ज्ञान के देव मदिर का श्रद्धाभाजन बनाकर हम नवीन युग के नवीन ऋषि के जीवन की ओर धीमे धीमे बढें। कला अपने इलहाम से नही, अपने रियाज, श्रम, सौ दय, माधुय और समपण से चिन्तन का भाग आलोक्ति करेगी । यही आकर हम सोचे कि हमारा समस्त विश्व-परिवार एक है उसमे भेद को जगह नहीं है । राजनीतिज्ञ अपनी मर्यादा म रहने को बाध्य होगा, यदि हम चितन ने लेसे-जोखे को त्रियाशील बनन के लिए गांव गांव, डगर डगर और घर घर पहुंचा सकें।

जो बोले, सो निहाल 'वाह गुर को फतह के कितने उपासक इस शब्द को, इस घोर ध्वनि को, इस श्रद्धा वाक्य को नहीं बोलते। कभी-कभी वाणी ऐसी ही हो उठती है कि 'जो बोले सा निहाल । अको की शरारत नही, हकीकत दखिए कि जिस दिन तारीख १५ जनवरी, सन् १९५० को १४ वर्षीय एक भिखारी बालक जम्मू से तेरह मील पर स्थित एक गाव मे करुण गीत गाकर शत शत नर-नारियो को करुणा मै डुबा तरा रहा था। कई दिनो का अधपटा बच्चा सहारा ढूढ रहा था। लोग उस मनाकर सभा मे लाये, यह कहकर कि उसने जम लेने का अभिशाप आज वरदान बनगा, आठ आठ आसू आज रोओ, आज सुननेवाला हाजिर उस दिन कश्मीर के प्रधानमन्त्री उस गाव मे आय थे। वे आये थे, किसाना को 'भूमि का मालिक बनाने के समारोह म। मच बना था। भाषण हा रहे थे। भूमि किसानो को गरीबो को सौपी जा रही थी। आज म वे उस जमीन के मालिक होगे, कोई जमीदार या राजा नही। एक दुल दश्य था । इतन ही मे फट चीथडा मे लिपटी नही मी, मासूम मजीवी मरमें पास आयी और साहस देखिए कि मच पर चढ गयी। टम गमय जीवन की दो दिशाएँ-व्यष्टि और समष्टि बनयर दी। प्रकटीकरण की भूख स भिखारी वालक परशान , २२/ कला और साहित्य मे मच पर से बोलन और अपनी अवस्था का इजहार करने के लिए गरीव 'मानवता। वह भिखारी बच्चा । उसका कण्ठ, मानो हिचकियो और हिलकोरो से घुलकर स्वर और अथ दोना को मिलाकर सजीव वेदवाणी बन गया था। उसने गाया, करुण गान गाया। गरीबी रो उठी, हाय हमारी यह तस्वीर तो क्सिीने नहीं खीची। अमीरी तडप उठी-क्या गरीबी इतनी दुखी है ? स्वय प्रधान मन्त्री चुप न रह सके, वे बोले नही, रितु उनके सस्त भाषणा' स 'बहुत महंगे आसू उनकी आंखो पर भी बरबस, उसी गरीव भिखारी की तरह डरते डरते शान की दढता के ओठा को हिला उठे, जाखो पर तरगित हो उठे। वितु शासन के पास क्या है ? भिखारी बालक के बालो न हा दिया वातावरण । उसन कश्मीर वादी की गरीबी के करुण गान से जिसम हिदू- मुसलमान और ऊँच-नीच नहीं होते लोगो के हृदय को हिला दिया । लोगो को रुला डाला । प्रधान मनी निहाल हो उठे, हरपे बरसे । "सरकारी नौकरी" 'बेपढा है। "मगर लोग उसके बोलो मे से ऐसा पढते हैं जो पढ़ा लिखा नही पढ सकता।" 'मगर वह आवारा जो है।' "हमन देश की गरीबी को आवारा बन जाने दिया है आवारगी तो गरीबी का दूसरा नाम है, उसका पर्याय ।' 'अब क्या होगा? यह वच्चा कश्मीर के प्रकाशन विभाग म 'सरकारी नौकर' हागा।" सरकारी नौकरी की हृदयहीनता कभी कभी इतनी हृदयवान भी हाती x x X किन्तु "क्या, किन्तु ऐसे समय मे भी?' "हां रितु' हमारी कृति का कठोर शासक है। क्या सरकारी नौकरी 14)जो बोले, सो निहाल / २३ मे, इस बच्चे का यही क्ण्ठ रह पायेगा? उसकी जिदगी मे यही तडप रह पायेगी ? फटी चिधियो के उतरते ही, कहीं उसका ईमान तो उतरकर अलग खडा नहीं हो जायेगा? क्या सरकारी नौकरी के सिवा, 'गायक गरीबी' को रोटी पहुंचाने का और कोई साधन सरकार के पास नहीं था? हृदय हिलानेवाले गान का पुरस्कार 'पिंजडा' तो हरगिज न था, भले ही वह सोने का हो।" मेरी इन लकीरो को लडका सुने, तो मुये शायद गाली दे । कि तु मै तो उसके गीत को उसकी ईमानदारी को उसके नववधू जैसे सकुचत सहमत मच पर चढने के साहस का पूज रहा हूँ। यदि ये तीनो चले गय, तो फिर लडके की लाश रहन रखकर कौन-सा पब्लिसिटी विभाग' लोगों के हृदय हिलान की क्रिया का लाज स्केल प्राडक्शन करके सुखी हो सकेगा? मुझे तो भय है कि कश्मीर के भिखारी लडके की तसवीरें खिचेगी, गीत हांगे, वह गायेगा भी, वाला म लच्छे भी होगे, कपडे फट न होग, बढिया होंगे और कश्मीरी रूप कुदन पर यह सब फबगा भी खूब । कि तु बच्चा जहा जहा जायेगा, लोगो का अपना लाडला न होगा, वह होगा पिजडे का पछी । गीत होगा, गाना होगा, रूप होगा, रुपया होगा, पीठ पर राजा भी होगा, कि तु एक और 'किन्तु' के भूकम्प से बचने के लिए उज्ज्वल मानवता न क्तिन जीवित 'मरण' वरण नही किये। मेरी इच्छा है, कोई कश्मीर के प्रधान मत्री से पहता कि उस कश्मीरी छोकरे का रोटी और कपडे, सम्मान और स्नह, प्यार और दुलार, दिलाओ, कि तु सरकारी नौकरी से उसकी रक्षा करो। यह 'गुनाह बेलज्जत' पोछे इसान खाती है, पहले ईमान खाती है । गरीवी पीछे दूर करती है पहले जन मन के प्यार के सिंहासन से आदमी को उतारकर फेंक्ती है। कश्मीर उसका अपना घर है। क्या क्ला' वहाँ अपना मस्तप ऊँचा और अपने देश का मस्तक ऊँचा रखकर नही जी सक्ती?

७ स्वतन्त्रता की याद के द्वार पर मेरा एक पडोमी सरकारी है। वीवी है । बच्च भी दो हैं । सरखारी यानी राप्तीय सरकार का नौकर है । उसका नाम रख दीजिए मनमोहन । मनमोहन जरा रगीला है । उस अपनी एक डाक्टर मित्र के यहाँ जान का अभ्यास है । नाम है अपराजिता । अपनी कृति की सफलता सानी न जाय, अत लक्ष्यभेद के लिए वह अपने तीर कमान का साथ ले जाता है अपनी स्त्री को । अपराजिता को चाह का लालच और मनमोहन को प्रवेश को चिन्ता । राधा,-मनमाहन की स्त्री-शूय है जो उन दा अका के बीच रहकर उनका मूल्य बढा दिया करती है। किसी प्राचीन राजधानी का एक मुहल्ला है । डा० अपराजिता का घर है । अब वह एक गोष्ठी-केद्र का रूप धारण कर गया है। गोष्ठी में कवि आते हैं, सुननेवाले आते हैं। उनमें सरकारी, गैर- सरकारी का भद नहीं है। तिस पर अब तो स्वराज्य हा गया है । सुनन के बहान आय हुए लोग चौकना । चाय हुई। पान हुए। कवि उठे। वितु एक बठक और जम गयी। हमारा सरकारी नौकर कविया के उठते ही उठा नहीं बैठक में जमा रहा । चर्चा हुई। -स्वराज्य मिला ता, वितु विकृत मिला। -यह तो महात्मा राज हो गया।' --शक्कर के इन खिलोनो को ताड खाना चाहिए और दूसर पोलाद स्वतत्रता की याद के द्वार पर/२५ के आदमी इनकी जगह चाहिए।" कानाफूमी का यह सम्प्रदाय वढ चला। वेतन 'सरकार का', नारे पुराने ब्रिटिश राज्य के, ईमान पट का और शरीर? वह उन मिनो का, जो विभाग म नये से-नये फितूर भरकर, समाज मे भेद बुद्धि जाग्रत कर सकें कि कोई दश म मिलकर न रह सके। और ब्रिटिश द्वारा छोडा हुआ समाज ऐसा, जिसम १०० म से ६० ऐसे, जो पढना लिखना नही जानत। X X X मनमोहन उन लोगा मे बैठा पाया गया, जो एक दिन दिल्ली को उड़ा देना चाहते है । रिपोट हुई, पीछा किया गया, पकड म आ गये, सरकारी नौकरी छूट गयी। छट गयी? कि तु कितनो को पकडेग आप? इमान वेचकर जीनवाला का अभी हमारे घर टाटा कहा पडता है ? दूसर दिन गोष्ठी के एक मित्र ने मनमोहन से कहा, 'रोटी इतनी ही बुरी चीज है । अच्छा क्यिा, तुभने गुलामी को लात मार दी। चलो लो, मेरे वध ग्रह म जादमियो का गाश्त बकरे का कहकर बेचन म तुम्ह १५० रुपये तनख्वाह अलग मिलेगी और बिक्री की एजे सी का १० फी सदी और। सरकारी नौवर किराये पर हो गया। आदमियो को जिलान के लिए विद्रोह सोचनवाला व्यक्ति आदमियो को मारकर बेचने के राजगार म नौकर हो गया। सरकारी नौकरी का तांता लगा था। वे रोटी क्पडा मोटरें सामान सब कुछ देशघातको का पहुँचात थे । क्या वे विदेशी थे? -जी नही, शुद्ध ऋपि-स तान । वे सवा के रूप मे तन दते थे, वस्तुआ के रूप म धन दत और अपन राष्ट्र की वारीव खबरें देश के शत्रुओ का पहुंचान के रूप म मन भी देते थे। लोग उनकी बाता मे आते कसे थे? व तपस्या करते, वप्ट सहत, थोडे रुपयो पर जीत और अपन लक्ष्य के आसपास व्यक्तियों, समाचार पत्रा और बदनामियो का एसा घेरा डालते कि एक बार चगुल म आवर वाहर हान की कोई हिम्मत ही न करता । भारतीय समय काटुक्डे-टुकडे कर सोचन का २६/क्ला और साहित्य आदी है वह मातभूमि को भी प्रात म, भाषा म, समस्यामो म टुकड़े-टुकडे करके सोचन का अभ्यासी है । वह तो समाज स, सम्पूण सस्कृति स अलग, अपन बच्चो म, अपनी बीवी मे, अपन-आपम टुडे-टुबडे परवे दनने का आदी है । तब उसका ईमान भी टुक्डो मे विस क्यो न जाय ? यह कोई नहीं बहता कि हम इग्लैण्ड के रूप को ग्रहण करते रह जाएंगे अथवा अमरीकी अमीरी का अनुकरण करेंगे। यह भी काई नहीं कह सकता कि हम रूस के ढांचे का अपन देश के लिए उपयोगी न समझेंगे किन्तु- [१] १९१७ की प्राप्ति के बाद २२ वप तक रूस न युद्ध नहीं किया। वह क्वल पचवर्षीय और दशवर्षीय योजनाएँ बनाकर अपनमा सशका करता रहा। [२] युद्ध के बीचा बीच सारे विश्व के मजदूरो के एक हो जान के उपदेश की खैरात अपने खरीदे हुए व्यक्तियों द्वारा बारते हुए भी युद्ध मे, युद्ध के बाद, समस्त देशो के यम्यूनिस्टो के लिए उसने अपने *श को सीमाएँ खुली नही कर दी-अपनी सीमाना की उसन कठोर रूप रक्षा की। [ ३ ] अपनी कम्यूनिस्ट परम्परा के खिलाफ उसन रूस म कुछ भी नहीं रहने दिया-न समूह, न समाश, न सस्था न उपदेश । [] उमन अपने नताया क और अपन शासन के खिलाफ क्सिी गिरोह को रूस में काम नहीं करन दिया, बलवान नहीं होने दिया। [५] 'स्स जिस वस्तु या देश के साथ रहा, (M स्वतत्रता को याद के द्वार पर-२७, भी कौन मानेगा? दूसरा महायुद्ध शुरू होने के समय अंग्रेज शत्रु और जर्मन मित्र और महायुद्ध के बीचो-बीच जमनी और जापान शत्रु और अग्रज- अमरीका मित्र । परिणाम यह है कि विश्व के महान् राष्ट के नाते, अपनी नव निर्मित आदश परम्परा के बल पर रूस को जीना है और बलवान कहकर जीना है। उधर अमरीका, इग्लण्ड और कितने ही पश्चिमी देशो को, अपनी स्थापित व्यवस्था के बल पर जीना है। इन दोनो के बीच हमारी नयी नयी आजादी है। तीस करोड जनमख्या, खूब खनिज साधन, विश्व की बढिया उपज, बल- वान कारखा। ठीक इसी समय व्यक्ति के पक्षपात का सम्बल बनाकर, समष्टि का विश्व शत्रु हमार भी पीछे पड जाना चाहता है। वह बम्बई का बलिन बनाना चाहता है । वह दिल्ली को उखाड फेकना चाहता है। यह नहीं कि वह दिल्ली को उखाड फेरेंगा, वि तु यह सच है कि वह हमारे खिलाफ अनेक यूठे नारे उठाता आया है। उसन 'दिल्ली चलो' नार का भी उठा लिया है। दूसरी ओर एक और परम्परा है । उसने हैदराबाद की छुरी हमारे देश के कलेजे मे घुमा दी थी, पाकिस्तान को हमारे और रूस के बीच म पहरे पर वठा दिया है। कश्मीर को सूली की तरह हमारे सिर पर लटका रखा है । उमन अग्रेजा को पाकिस्तान को बलवान रखने और हमारे विरुद्ध लडत रहन के लिए भिजवा दिया है और हमे विश्वास देता है कि हम इमानदार रहेंगे । हमारे इस प्रभावशाली न अमरीका स कनाडा का काटा था, आयर- लण्ड से अल्स्टर काटकर आजादी दी, हमस पाकिस्तान काट दिया । यह इस परम्परा का अभ्यासी है। मित्र सूडान से और अरव पथेस्टाइन से क्ट पडे । गाधी न जब भारतीय मानवता कोजाग्रत किया, तब पराधीनता के खिलाफ बगावत की। गाधी का गदर सत्य हुआ। भारत स्वत न हुआ। इस समय गाधी के राष्ट्र को संभलन, बलवान हान, अपन म सम्पूण होन के लिए समय चाहिए साधन चाहिए, बलिदान चाहिए। यदि सरकारी क्षेत्रो मे राष्ट्र का शत्रु किसी देश म निवास करता है, देश के बाहर गाधी से देश का शत्रु हमारे नाश के नक्शे बनाता है, तो हम

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១ प्रतिभा के पैरो पॉव-पॉव कविता जीवन की तरह ही जितनी दुलराये जाने की वस्तु है। उतनी युगा के लिए क्रियात्मक साधना की वस्तु भी है । ऐतिहासिक पृष्ठभूमि धामि धारणा सामयिक नियम, राष्ट्रीय आवश्यकता नैतिक आधार और व्यक्ति की उमगो और आकाक्षाआ के वावजूद यह हमे ध्यान रखना होगा कि कविता, कविता है । यह हमारी न जाने कैसी प्रवृत्ति है कि हम काव्य से दो माग एर साथ करते हैं जो एक दूसरे के विपरीत पडती हैं । हम युग की काय प्रवत्ति से कहते हैं कि "ऐसा लिखा, जिसम अनहोनापन हो, कुछ एसा बालो जिस पर समय की दुहराहट के दाग न पडे हो" जोर जब कोई मस्तानी कलम दुखती-सी क्सको, दीखती सी आपदामा के बीच अपन बनात जीवा का अनाखे अनहोनेपन के माथ कागज पर उतार देती है, तब हम अपनी घिसी यादा का पुराना कारखाना खोलपर यह उठते हैं यह ध्यास- जसा तो नहीं आया, वाल्मीपि जैसा तो नहीं बना, इसम भवभूति जी आय भावना कहा है, कालिदास-जैसा नावीय भी नही है। नवीनता से पुरानापन वसूल करन वा हमारा यह मोह हमारी नवीन पीढी में काव्य म विद्रोह जाग्रत करता है। इसीलिए इस युग के कवि ने प्राचीनता के वैभव रथो काबैठना त्याग दिया है वह अपनी प्रतिभा के पैरा पांव पार चलन को बाध्य है। वह नहीं-नही चिडियाआ जैसा अपने ही पखो पर उड़ने के लिए २८/पला और माहिर १ यह मारर चलमिदाना TAN बनानवाल हमार शव है । और उनकी आर विनयाला हर पनि राष्ट्रायर समोर बसा है यामनार है जा मह भूल जाता है यि गाधी दश म अमीगे या गरीयो के द्वारा पटना में बल पडा रन म जीयन लगाया है रारा सायघात रहना मा परम यतव्य है। हैदराबाद महिद घ्यापारी भारतीय राष्ट्रीय नाणया यो मपापोरी म लालच म बल पहुँचात रहे । गिरजाघर और मसजिद दोना स्थाना या शत्रु माननवाल इन उपायोर देशपातका का पया कृषि-सता' पहग जोगीपर अपनी तरसकी और तनम्वाह लिए भारतीय राष्ट्र को परा- धीन रसन के लिए, भारत को नष्ट परन और गुलाम रपन ये लिए भारत र शत्रु ये हाथा पुरहाडी या पेट रखा उसकी शपथ पर, उमषी दशभनित पर उसके इमान पर विश्वास परना अपन दश की सजग पहरदारी नहीं कहा जा सकती। यदि लनिन न सका और पश्चिमीय परम्परा न यूरोप और अमरीका का कुछ दिया है तो गाधी न हम भी कुछ अवश्य दिया है। प्रयोगाम जिनकी पिडलिया यांपती हैं और जो भी दायें के, कभी बायें वे भादशवादा का उधार लेकर, भारतीय शशुता के समथर बनत हैं, उह अपन ममाग म ममाप्त कर दना, हमारा हमारी वला का हमारे ज्ञान का हमारी पूजा भावना वा, हमार आदर्शों का और हमार सत्याग्रह का एक दिन का खल है । क्वल हम धन पर ललचें और अधिकार-मद स पतित अएन स्वशी प्रातीय और स्थानीय अशा की गलन भरोड समें और विदशा व बल की बात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हम पर लादने और देश की दिशा भग करनवाला को ऐसा मार सकें कि चीन, बर्मा पेलेस्टाइन और सूडान की ममस्या हमारे यहाँ पदान हा सके। ऐमा चाहिए हम हमारा नागरिक ऐसा चाहिए हम सरकारी नौकर। और न दाना पर सतरी को सी दृष्टि रखकर, अपनी कला का निर्माण वरे और अपना बलिदान करें, ऐसा चाहिए हमे आज का भारतीय तरुण, शिक्षित।

प्रतिभा के पैरो पॉव-पॉव पविता जीवन की तरह ही जितनी दुलराये जाने की वस्तु है, उतनी युगा के लिए क्रियात्मक साधना की वस्तु भी है । ऐतिहासिक पृष्ठभूमि धामिक धारणा सामयिक नियम, राष्ट्रीय आवश्यक्ता नतिक आधार और व्यक्ति की उमगो और आकाक्षाओ के वावजूद यह हमे ध्यान रखना होगा कि कविता, कविता है । यह हमारी न जाने कसी प्रवति है कि हम काव्य स दो मागे एक साथ करते हैं जो एक दूसरे के विपरीत पडती है । हम युग की काव्य प्रवत्ति से कहते हैं कि "ऐसा लिखा, जिसमे अनहानापन हो, कुछ एसा बोला जिस पर समय की दुहराहट के दाग न पडे हो और जब काई मस्तानी क्लम दुखती-सी क्सको दीखती सी आपदामा के बीच अपन अन त जीवन को अनोखे अनहोनपन के साथ कागज पर उतार दती है, तब हम अपनी घिसी यादो का पुराना कारखाना खोलकर वह उठते है यह ध्याम- जसा तो नही आया, बाल्मीकि जैसा तो नहीं बना, इसम भवभूति जैसी माय भावना कहा है, वालिदास-जैसा नावीय भी नहीं है। नवीनता से पुरानापन वसूल करन वा हमारा यह मोह हमारी नवीन पीढ़ी के काय में विद्रोह जाग्रत् करता है। इसीलिए इस युग के कवि न प्राचीनता के वैभव- रथो का बैठना त्याग दिया है, वह अपनी प्रतिभा के पग पाद पार चलनको बाध्य है। वह नहीन ही चिडियानो जैसा अपने ही पखी पर उडन के लिए ३०/क्ला और साहित्य लाचार हुआ है, उसकी प्रतिभा के वैभव का बाझ परम्परा के वटवक्ष पर अवलम्बित नहीं है । चाहे वह वक्ष जितना विशाल जितनावाझीला, जितना महान हो, उसकी मूझा की फुदक उसके नहें-नह उडान के पखा पर अव लम्बित है। जब कवि अपने प्रतीक आराध्य, अथवा प्रेरणा प्रवतक ने रूप मे किसी एतिहासिक व्यक्तित्व का उल्लेख अपन काव्य म पर उठता है, तो तिथिया घटनाचना और वश परम्पराआ का टोडा लाद इतिहास उसम अपनी निश्चयात्मक्ता ढूढन क्या आता है ? रघुवश या कामायनी, दोना मे आय परम्परा के महान् वभव को देखा जा सकता है कि तु व उस परम्परा के क्वल इतिहास ग्रथ तो नहीं है । कवि तो युग के पन उलट पुलटकर अपने सम्मुख के जगत को जो अमरत्वदान किया करता है वह अपने ही युग की आवश्यकतामा से लाचार होकर करता है । यदि इतिहास सा, धमशास्त्र सा, नीति ग्रथ सा, शासन परम्परा सा और ऐसा ही कुछ दिख जाय, तो उसकी कविता उन विषयो की विशेषता नही मानी जानी चाहिए। उसका काय केवल इतना ही है कि वह उन घटनाआ, धारणामा और प्रवत्तिया को छुए बिना या उनसे प्रेरित हुए बिना अपनी बात नहीं कह सकता था। यह उत्तरदायित्व तो कवि की क्लम के बरावर ही समाज की धारणा शक्ति पर है कि वह अपने युग की कविता को पढकर समाज को ऊध्वमुखी बनाये या उसे अधोमुखी हो जाने दे । जो भिनवती मक्खिया वाला ससार लिखते हैं और अपनी पीढिया के लिए कुम्भीपाक नरक का निर्माण करते हैं, उन पेशेवर पालतुओ का उल्लेख मैं यहा नहीं करता। मैं केवल हिदी ससार की उन प्रवत्तियो के लिए समाज से सहानुभूति मांगता हूँ, जो सूझ का अनूठा वैभव लेकर नित नवीन भाव से उथल पुथल करती वढी चली आ रही हैं । उनमे कुछ वे हैं जो अपने वणित विपया को इतना ऊँचा उठा देते हैं कि जिनमें उनका व्यक्तित्व और उनकी मौलिक काय प्रवत्तिया कहीं नहीं दिखाई देती। ऐसे लोग पूजा का साहित्य लिखते हैं और अपने वणन को अमर बना देते हैं कि तु कुछ लोग किसी क्षण नही भूलते कि उनसे नवीनतर युग नवीनतम रक्त विदुओ की मांग कर रहा है। वे कालिदास की तरह, पन्त की तरह महादेवी की तरह, निराला की तरह, दिनकर की तरह, नवीन की तरह मस्ताने गायक केवल ।

समपण प्रतिभा के धरो पाहमा /३t- कलम पाडकर लिखने की तरह वण्य विषय की परम्परा नहीं जोड़ते, कि अपनी नवीनता, भावना, शैली, सूझ उपमा, वैदना और, नवीन हो उठत हैं कि उनकी नवीन दुनिया प्राचीन व घो को काटकर छोट- छोट छन्दा म उन विशाल सूझो का वैभव विश्व पर बिखेर देती है, जो पनि को परम्परा की उपेक्षा कर सूझो के देवालय के देवता के प्रासाद का निर्माण क्यिा करते हैं । इन नवीन प्रवृतियो के साथ मेरा मोह है और मैं इह प्यार करता हूँ। मेरे जीवन को सांसें इनकी पूजा मे काम आयें, मैं ऐसी इच्छा करता हूँ। GAM ६ लेखक एक मार डालने की वस्तु वतमान तरुण को समझना कठिन होता जा रहा है । इसलिए नहीं कि हमन उस समय पर उचित आदश नही दिय, रितु कदाचित इसलिए कि हमने उसे जरूरत से अधिक आदश एकत्रचरल दिय। उन आदर्शों का पिताबा, क्ला निकेतना और वमक्षेत्राम देखकर वह यह उठा आदशसफलता -जीवन फार' जीवन। और उस दिन तारीख १६६५१ को पटना म आचाय कृपलानी न कह दिया आदश तो उनीसवी सदी म मन लोगा को भम म डालन के लिए ग य । क्या उनीसवी शताब्दी के पहले जादश थे ही नही उनीसवी सदी अपनी बेईमानियो स ज्यकर आदश इक्टठा करन की ओर अधिक आवषित हुई होगी, जो एक न पूर्ण इनकार बरन माग्य तथ्य है न पण मानने माग्य, यह ता एक सदह वरन योग्य तथ्य है । कि तु आदश पसल की तरह नहीं उगते । शतादिया के मानव यवहार की नाव श्यकताना से प्रेरणा पाते हैं और समस्त मानवता का पथ प्रदशन करन की ऊंचाई स बोलने लगते हैं। यदि हम चाहते हैं कि लेखक श्रेणी के रूप म जीवित रहे वह लखन को अपने जीवन वा यवसाय बनाये, वह विश्व का नान और भ्रमण दानास्वीकार हम उसे भूतो मारने का वतमान यवसाय शीघ्र से शीघ्र वद करें। उसको छपी पुस्तक पर पुरस्कार दन के बजाय उसकी हस्तलिखित प्रति पर पुरस्कार दे और उसे इस लायक बनावें कि एक तो विश्व की समस्या समझने - लेखक एक मार डालने की वस्तु / ३३ के लिए, साहित्य परीदने के लिए वह धन और साधन पा सके, दूसर वह इतन हाके स्तर पर जीन के लिए बाध्य न किया जाय कि जिस स्तर से दी गयी व्यवस्थाएं, सम्मितियों या विचार किसी उत्तरदायित्वहीन लफ्ग के विचार कहकर लोग टाल दें। लोगो में एक विचित्र पागलपन है। वे जन सम्पर का लेपर लिए भी यह तरीका समझत हैं कि वह कही कोई मजदूरी करे और उस अनुभव के आधार पर लिखे। मजदूरी और उसके उत्तरदायित्व, लभाव और उसस उत्पन परिस्थितियो की नाजबरदागे करते-करते उसम का लेखक कभी ना भर चुकेगा। वैसी मजदूरी करने के पश्चात उसमे जान ही कहीं बाकी रहगी, जो वह लेखक होन की मजदूरी का बोझ सम्हाल सके। नहीं, लेखक, मजदूर, साधारण मजदूर से भी बदतर होता है वचारा मिल कारखाने, भट्टी या सेत मजदूर की जिम्मेदारी तव शुरू होती है, जब वह अपने काम पर जाता है और उसका कायक्षेत्र बद हुआ कि मजदूरी बाद । उसके बाद वह पूरा विश्वास कर सकता है। उससे कोई वालता नही वितू आराम क्यो करता है। किंतु लेखक मजदूर जब अपनी कृति कही लिखता बालता या सुनाता होता है तब वह अपने मालिक या उत्तरदायित्व बाजर-खरीद गुलाम होता है, कि तु इसके बाद वह पढन में जुट जाता है और दूसरे दिन अपन मस्तक को साहित्य देकर काम करने लायक बनाता है और जब वह खाली रहता है, तब सोचन और दूसर दिन काय का नक्शा बनाने की मजदूरी से उसकी मुक्ति नहीं । अत लेखक का मजदूर बहनवाले लोग लेखक के प्राणा के ग्राहक न बनकर उसो साहित्य ही के ग्राहक रहा तो उनकी बडी कृपा हो। 'लेखक का तो सब कुछ उधार। जब किताव विक, तब रायल्टी मिते, जबकि मजद तो वोनस, मजदूरी और आवर-टाइम, सब कुछ समय पर पा लेते हैं अत यदि हम लेखक का जिलाना चाहते हो तो उसकी मजदूरी देखकर उमे चुकाव। उसके खून का साहित्यिक स्वाद लेकर महज अच्छा है' न कह दें। न जब यह सुविधा और रोटी की माग करें, तब उसे बुर्जुआ वह पर उसका मजाक उडाव । भूखी जिदगी धिता, जरायम पेशा की तरह दिन रात काम कर और अपना नाम न बढने दे' यह एक पाय नवारी की - ३४/ कला और साहित्य जिदगी है। ऐसी जिदगी लेराव की नहीं हो सकती, उस लेप की जो लोगो व मन खौच सपन की क्षमता के महान् वैभव भो किसी देश की महान उथल पुथल के लिए लगाना चाहता है । उसे प्रसिद्धि के द्वारा टूट पडनवाले सारे अभिशापा को स्वीकार करना ही होगा। उस प्रसिद्धि स बचकर नही रहन दिया जा सकता।" उपयुक्त पक्तियों मेरी नहीं हैं। ये पक्तियां रूस के राजनीतिक निर्माता लेनिन की हैं जिहे मैंने डी० सी० लेविस के एक कथन के अवतरण मे से उठा लिया है। अय मजदूरा की तरह लेखक मजदूर चूकि क्षण क्षण अपनी नीयत का इजहार करने के लिए लाचार है साधारण मजदूरी-जैसी उसकी मजदूरी सुरक्षित नहीं । धन प्रभाव, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धिये क्षेत्रा मे जब यह मालूम हा जाता है कि हमारी हमारे रोजगार की, हमारे मित्रा की प्रशसा नहीं करेगा, तब उसके लेखन की श्रेष्ठता की प्रशसा करके भी उसे भूखा मारन का पडयन सजाया जाता है। यह तो बहुत दूर की बात है कि उसने अपने द्वारा असमथनीय लोगो की आलोचना की हो या उहें भला बुरा कहा हो। गरज यह कि उसकी प्रतिभा का सम्मान केवल एक भागतिक भ्रम है । यथाथ में तो उससे समथन, और अपने स्वाथ के लिए आदश उद्देश्य उपदेश, तक और अवतरण मागे जाते हैं। वह देता है तब तो अतरात्मा का बेईमान बनकर जीते जी भरता है, नही दता है, तो मार डाला जाता है । यदि ऐसे समय चितका और लेखा का मूल्य कूतनवाने लोग भी उनसे मजसरी वसूल करने लगें तो लेखक की सी नारकीय जिदगी बिताने के लिए कौन तैयार हामा 7 जिह्वा या कलम की जिन्दगी की पांच नियो मे छाने जाने के लिए लेखक लाचार किया गया कि फिर क्या शेप रह सकता है। वे पांच िनयाँ (१) वही समाज मरा तिरस्कार या वहिष्कार न परद। (२) कही मेरे साथी और मित्र नाराज न हो जाएं। (३) बही सारी लिपावट का खरीदार और पैसे दनवाला न मिला लेखक एक मार डालने की वस्तु /३५ (४) कही मरी लिखावट से सरकार नाराज होकर बरबाद करने पर तुल गयी तो? (५) कही मरी लिखावट से प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और पैसे की धनिकता ने मेरा पीछा किया और भूखो मार डाला तो? क्या ऐसे महान् खतरा के बीच अपनी बात कह ले जान और महान् परिवसन कर ले जानेवाला लेखक, भूषा मार डाला जायगा? क्या हमारी इसी क्रूर वत्ति ही न लेखक को वह साहित्य पैदा करने के लिए बाध्य नहीं किया, जिसन विश्व को सघर्षो से भर दिया है? क्या ऐसी भी कही कोई दुनिया है, जो लेखक को रचनाआ वे वगैर पढ़े लिखेगी, और धारणाओ को रखकर जिदा रह ले जायगी? यदि नही, तो लेखक को मार डालने के ये जाने-अजान औजार क्या? .

३४ / क्ला और साहित्य जिदगी है। ऐसी जिदगी लेखक की ही हो सकती, उस लेखक की जो लागा के मन खीच सक्न की क्षमता के महार वैभव को किसी देश को महान उथल पुथल के लिए लगाना चाहता है। उसे प्रसिद्धि के द्वारा टूट पडनेवाले सारे अभिशापो को स्वीकार करना ही होगा। उसे प्रसिद्धि स बचकर नही रहन दिया जा सकता।" उपयुक्त पक्तियां मेरी नही हैं । ये पक्तियां रूस के राजनीतिक निर्माता लेनिन की हैं, जिह मैंने डी० सी० लेविस के एक क्थन के अवतरण म से उठा लिया है। भय मजदूरो की तरह लेखक मजदूर चूकि क्षण-क्षण अपनी नीयत का इजहार करन के लिए लाचार है साधारण मजदूरी-जसी उसकी मजदूरी सुरक्षित नहीं । धन, प्रभाव, प्रतिष्ठा और प्रसिद्धि के क्षेत्रो मे जब यह मालूम हो जाता है कि हमारी, हमारे रोजगार की हमारे मिनो की प्रशसा नही करेगा तब उसके लेखन की श्रेष्ठता की प्रशसा करके भी उसे भूखो मारने का पडयन सजाया जाता है। यह तो बहुत दूर की बात है कि उसने अपन द्वारा अममथनीय लोगो की आलोचना की हो या उह भला बुरा कहा हो। गरज यह कि उसकी प्रतिभा का सम्मान वेवल एक जागतिक भ्रम है। यथाथ म तो उसस समथन, और अपने स्वाथ के लिए आदश उद्देश्य, उपदेश, तक और अवतरण मांग जाते है । वह देता है तव तो अतरात्मा का बेईमान बनकर जीते जी मरता है, नहीं देता है, तो मार डाला जाता है। यदि ऐसे समय चितको और लखको का मूल्य कूतनवाले लोग भी उनसे मजदूरी वसूल करने लगे तो लेखक की सी नारकीय जिदगी बितान के लिए कौन तैयार होगा? जिह्वा या कलम की जिदगी की पाच नियो म छा जाने के लिए लेखक लाचार किया गया कि फिर क्या शेप रह सकता है। वे पाच छनियाँ (१) कही समाज मरा तिरस्कार या बहिष्कार न कर दे। (२) कही मेर साथी और मित्र नागज हो जाएँ? (३) कही सारी लिखावट का खगेदार और पंस देनवाला न मिला तो?

लेखक एक मार डालने की वस्तु /३५ (१) यही मरी लिखावट स सरकार नाराज होकर यरवाद करने पर तुल गयी तो? (५) कही मरी लिखावट स प्रतिष्ठा, प्रसिद्धि और पैस की धनिक्ता न मेरा पीछा किया और भूखो मार डाला तो? क्या ऐसे महान् खतरो के बीच अपनी मात कह ले जान और महान् परिवतन कर ले जानवाला लेखक, भूखो मार डाला जायगा? क्या हमारी इसी क्रूर वत्ति हो न लेयक को वह साहित्य पैदा करने के लिए बाध्य नही विया, जिसन विश्व का सघों से भर दिया है? क्या ऐसी भी कही कोई दुनिया है, जा लसर की रचनाआ वे वगैर पढे लिखेगी, और धारणामओ को रपकर जिन्दा रह ले जायेगी ? यदि नही, तो लेखक को मार डालने के ये जान-अजान औजार क्यो?

१० अभाव-अभियोग अभी चालीस-पचास बरस पहले तक हिंदी काव्य मे यही ब्रजवासिनि, कही बुन्न् लखडिन कही वैसवाडिन कही भोपुरिन कही निमाडिन कही मारवाडिन, कही मालव-चाला साफ उतरती थी, रितु इधर ५० वर्षों से नारिया ता ये ही हैं किंतु कविता म मानो उनका अकाल पड़ गया मानो हम एकीकरण की भावना म अनव अका की एक सध्या बनान जा रह थे और बन गयी बड़ी सी शूय की भाकृति । अव 'रास पचाध्यायी यहाँ ? अब 'रामरलेवा' कौन गावे? अब सुदामा चरित' विमये पास रहा ? अब विमणी मगल' कौन सुन ? अव घरव और रवित्त रामायण घर घर म कौन गुन ? भय 'बाहू बिरछ तर भोगत हुईहैं राम लपन दाउ भाई' अवध म आज भी वक्षा-तले नर-नारी भीजत हैं रितु अव उनपर पाव्य यौन लिमेगा? अब हरदौल की बहानी विसवे जयानी सुनें अब दुर्गावती की वीर-गाया गीता म यहाँ सुनायी द? दहात का नारी का, उमरे जीयन को, उसर हर-हर निर्माणा और सुपल्लवित और मुफलित परदाना यो, जाा यहाँ भूल गये हम जा रामायण भागयत और अवतार- नपाएं हमारी मां-यहिा-बटिया ये मुह पर थी, व यहाँ यिसीन हा गयी? बदर म मन मुछ योगा कुछ रगीलापन और कुछ यामी भी पायी दिनु मूरिया चवर माना मिामा की तस्वीरें परीद साय। अनाज यच दिया और यरए यनान मी हिरमा साप और यदि गाया तथा अपनी कहानिया, अभाव अभियाग / ३७ अपन मुहावरा, व्यग्य और विनोद की ओर लौटने को पहिए तो शूय का प्रजनन करसुपी होनेवाले हम अयो के अजनके अभाव मे भी कितने धनवान? स्स की, चीन बी, इग्लण्ड की अमरीका की बात करत नही अघाते । अपने घर की सीढियो की संख्या और बनावट वा अपरिमित अज्ञान है और नियाग्रा की गहराई पर बहस हो रही है, मानो चलता फिरता सजनशील युग सभ्यता नामक सूथ हीनता की चौखट की चढी हुई तस्वीर हो गया है । हम ही थे, जो पिंगल लेकर बैठनवाले को पागल कहते थे और हम ही हैं जो कुछ भी न जानन कुछ भी रस न रखनेवाले को 'काव्य' का स्वामी कहने लगे। तुक जोडे तो मरजी, तोडे तो मरजी और मरोडे तो मरजी, आधा इच की पक्ति हो, डेढ इच की पक्ति हो और फिर पूरी तेरह इचो की पक्ति- 'पांचा सवार दिल्ली जा रहे हैं। हमारी सूथ-बूझ और हमारी आराधना आदि की हमारी सस्कृति थी और हमारा पश्चिम का अपनाया हुआ अत्युच्च वैभव 'कुपच' बनकर हमारी संस्कृति मे ममा गया । 'लाड वजन वुड हैव बीन ए ग्रेट मन इफ ही बुड हैव फारगाटन लाड कजन'। पजन के आलोचक द्वारा वणित इस स्वभाव से हिदी म हमारी गति मिलती जुलती है। कच्ची उम्र म आनेवाले अपरिपक्व आवेगो को काव्य या निमाण कहने का हमारा मोह और अत्यत नगण्य निर्माण अथवा निर्माण के अभाव में भी इस बात की परम सजगता कि हम निर्माता हैं, हमार द्वारा निर्माण क्ला, तत्व चिन्तन और इतिहास म हमारी सबल पीढी वे निर्माण मे सवम बटी बाधा बन जाते हैं। [२] 'कवि जावधारी' और कवि मनुष्य' जब मिलकर एक हान लगत हैं तब उस अवनारी नटश्वर मे 'एक्सेप्श्नल आफेस टू इमोशनल इम्प्रेश स' आय बिना नहीं रहती। इसलिए 'वेदना , कवि मनुष्य और 'कला-प्राणी, दानो की आवश्यक शत नही, यह उनकी लाचारी है। वह दिन धन्य, वह लहर ध य, वह क्षण धय, जव देखा दखी, चोरा-धारी जौर जारा जोरी के वणन स, 'कवि प्राणा' या कला प्राणा वदना की ओर प्रयाण करता है। वह दिन ध य जिस दिन वह प्रमय पीडा सी अनुभव करता है और निर्माता ३८/क्ला और साहित्य शब्द अपना उपसग छोडकर अपने विशुद्ध रूप म, पथ्वी पर स्वग निर्माण करन लगता है। युग-बाला' अपने अमरत्व के पथ म कला के दोनो रूप देखती चलती है, प्रकटीकरण की कला पर वैभव वरम रहा है-उपहार, सत्कार, पुरस्कार, जय जयकार और सबसे परे सुवण की अनमांगी बौछार, और निर्माण की कला पेट भर रोटिया ला सकन मे भी असफल । पुत्र-जम पर दरवाजे बाजे और मकान के एक कोने म निर्मात्री की कराह और कठोर याणा, मानो अस्तित्व की सासें और उसासे सी हैं और हम हैं कि 'कुछ कहे जा रहे हैं कुछ सहे जा रहे हैं । भूखे पेट कराहके रहते हैं 'नक्दवादो अभिमान', युग की निर्माण लहरो पर अंगुली उठाकर पुकारत हैं बचपन जमा वलि दान', कि तु जिनके मस्तक अपमानित हुए जिह मूलियो पर झुलाया गया, उहो की चरण धूलि उही की चिता की धूल पीढियां सिर पर चढाती देखी गयी । रामायण के माग म चाहे जितन गौरव बरस रह हों तुलसी के भाग्य से- "तीन टूक कोपीन के अरु भाजी बिन लोन- कोई मिटा न सका। ईश्वर न तो भरे हाथो अभाव को वरदान दिया था, वितु ईर्ष्या ने निर्माता को तरसा तरसाकर मार डाला और पिर शेष बचे निर्माण के इस तरह नवाह्न-पारायण करन लगा कि लोग अधमता भूल गये और आराधक को ईश्वर का अवतार समयन लगे। जहा निर्माता इस तरह तिल तिलकर मर रहा हो वहां धन की बरसात और गौरव को खैरात से कौन कहे कि राजमहला और राजमार्गों में निर्मातामा जमीन पर यान छा जाओ बीजो और अकुरो के उगन के लिए और इस तरह जमीन और भू- मण्डल को जीवित रपन के लिए भी जमीन चाहिए। यह जमीन अनुराफी, फूला की फ्ला की वेला की, वृक्षा को और दानो की है-तुम्ह ता इम पर छान का नहीं इम तक आन हो या अधिकार है।

११ जब गद्य व्यक्तित्व ग्रहण करता है साहित्य का इतिहास ढूढ रहे हो? वह क्या उठा लाये? साहित्य- तत्त्व चचा नै प्रथ? इन बेचारा में साहित्य कहां मिलेगा? य तो बता देंगे कि साहित्य यो पढो, यो जाता। ये चित्य, धारणा- भूपित विधानों की गहरी चर्चा कर देंगे कि ग्रथ म रस या हो अथवा यो है। हाँ, य कभी-कभी रसात्मक वाक्यो का बेजोड चयन भी उपस्थित कर दंगे। रितु रस का परिपाक | वह तो सामूहिक पदाथ ही नही, रस यानी व्यक्ति की जागीर। वह रचना कसी, जो पाठक को वेदना पटु न बना सक, उसकी रुचि को जाग्रत् और सवेदन-भरी न बना सके? एक क्षण एसा भी आता है जब जैस कवि अन्तरतम की स्फूतिया से अपनी-अपनी कला का निर्माण करता है, उसी तरह आलोचक या विवेचक भी मानो निमाण म प्रजननशील-सा होता चलता है । अतर के सौदय का परिचय ज्या ज्या गाढा हाता जाता है, त्या त्यो विवेचनकर्ता की कलम, प्राणी के रस का अपने म पाकर निहाल हो उठती है। यही आकर आलोचना स्वय निर्माण बनने लगती है। यही आकर वह पाठक से उसी तरह अपना सीधा रिश्ता कायम कर लेती है, जिस तरह एक कहानी, गीत या चित्र किया करता है। ऐसा लगता है, मानो कोई कविता नृत्य, ४०/कला और साहित्य अनहान ढग से मन मोहिनी कहानी विना पात्रा को जीभा का सहारा लिये कहता चला जा रहा है और पाठन है वि निहाल होता जा रहा है। विवेचनमयी रचना मे एक अच्छाई हाती है। श्रेय और प्रेम की सावधानी लेन के लिए पाठन को चौकना नही रहना पड़ता। यही आकर मानो गद्य ध्यक्तित्व ग्रहण करता है।

१२ इस निर्माण मे रस कहाँ ? मैं साहित्य वे मुहफ्ट से डरता हूँ। सूझ का अभाव, निर्माण की पुरुषाथहीनता, माता के से वात्सल्य का दिवाला और विवेक के किसी विदु का मस्तिष्क मे ढीला हो जाना व्यक्ति को, लेखक व्यक्ति का भी मुहफ्ट बनाये विना नहीं छोडता। कुछ लोग हैं जो बहुत ऊँची भाषा बडे मीठे शब्दो मे लिखते हैं, किंतु उनका पेशा मा हो गया है वि व प्रत्येक साहित्यिक को दवता बनाकर या दवना सिद्ध कर छोडें। इस प्रवृत्ति स प्रत्येक तेखक अपन दानवत्व को छुपान और मानवत्व से लज्जित होने और अपने देवत्व का स्वाग भरने के लिए विवश हो गया है, वह विवश कर भी दिया गया है। क्या इसे श्रद्धा कहते हैं ? श्रद्धा विवक नही छीनती। वह विवेक नहीं छीन सकती । जुड़े हुए हाथा और झुके हुए मस्तको पर धूल की तरह चढी हुई झूठ मानो सत्य से अधिक उज्ज्वल साबित होना चाहती है। कैसा भला-सा होता है रूठना, रीझना और रागात्मक आवेगा का मानव के सजन क्षणो मे परि- वतन होन पर किसी रचना म लग जाना। कि तु दवता की, क्या देवता की आराधना की जाएगी? दोपो के लिए हुए ईमानदार मानव 'चोरजार शिखामणि' कृष्ण होकर भी प्यार की वस्तु नही है क्या? वणवत्व इसे स्वीकार नहीं करता। मेरा जी तो कह उठता है कि- ४२/क्ला और साहित्य "बृज की रज को परसिमें पुनि लीज सिर धारि। जावा बृजबाला वधू डार नित्य बुहारि ॥" दखो, श्रद्धा की रिश्वन पर भी मुबसे प्रेम न छीनो, मैं उसे छोड नहीं मांगा। मैं देवत्व का उपासक नहीं। भक्ति का माग ही यह रही। मैं विशुद्ध अपने जसे मानव का और चटखती कलियों चहक्त परिदा और चुम्बनरत समपणशीलता का उपासक हूँ इसलिए कि स्नह का मूलधन पा लेने पर, सिर चढा आन या सिर उनार आने मे पुरुषाथ को कंपकपी न आवे। मैं दूमगे खाई म भी बेखबर रहना नहीं चाहता। यह प्यार के नाम पर शिर दान बढन के बजाय सखी भाव क्यो बढता जा रहा है ? यह पहले भी बढा था और हम साहित्यिका न मानव को दुगधि को न जाने किन- किन सुगन्धित विशेषणो म सजाया था। आज भी हम मानो सखी भाव' के साहित्य-सृजन म गौरव अनुभव करत हैं। यही सखी भाव उतरकर हमारे साहित्य म और जीवन म पीढी की-पीढी को पुरपाथहीन वनाय है। हमारी लचर, हमारी नगाक्त, हमारी बारीक-याली हमारे आसू हमारी अपने पर अपनो को आशिक कर पर ले की जादूगरी, मानो व्यास और कृष्ण, अजुन और भीष्म - सबको अपन सभी भाव से हमन झूटा माबित कर दिया। दृढता भरे निश्चय के नत्र और क्ट की ओर बढाये हुए परण, मानो स्नह और वलिलान के क्षेत्र में पूजा के हकदार नही रह गये। देवत्व और सखी भाव की इन आडम्बर और मिनरत्व स भरी प्रवत्तिया के पश्चात हमारा दावा है, यही हमारे नाम और निर्माण वे साप मानव मनाभाव और मागव गोवन या भिनने जो प्राण छुपावर या प्राण ३ १३ विविध मनोदशा के व्यक्ति समाज के कमजोर अग हमारे दश म ही नहीं, विश्व मे याप्त रहे हैं। एक है अभावा मे रो उठने वाला अश । दूसरा है परिवतन चाहने की नही और बचकानी मनोदशा रखन- वाला अश, जिस परिणाम की परवाह विय बिना परिवतन चाहिए, जो परिवतन के समय सबसे आगे भले ही हो वितु परिवतन के परिणाम भोगते समय या तो वह दुनिया मे न होगा या वह विवेकी वनकर बूढो म शामिल हो जायगा। तीसरा है, जिस हर बात मे 'एकाडिग टू द प्लैन' करन का अभ्यास पड़ गया है, जो हर बात हर चीज भौतिक भाषा मे सोचता है और एक निरकुश शासन की तरह वह और केवल वह ही व्यवस्था चलने दना चाहता है जो उमकी मरजी की हो। चौथा है वह अधा उत्माही जिसे आदालनो हलचला और सामाजिक उथल पुथल म शहीद वनने का मौका भर मिलना चाहिए। वह अपन उत्साह से इतना पराजित है कि समाज के भविष्य को सोच सक्ने का स्वप्न ही वह कभी दख नही सकता जो शहादत के लिए शहादत म विश्वास करता है। पांचवा है वह अश जिसके अपने कोई विश्वास न कभी रह हैं, न कभी रहगे। वह निणय पर पहुंचने से घबराता है और अपनी एकछत्र आना ४४ / क्ला और साहित्य मबपर चलाने का मोह छोड नहीं पाता। शाति जातिवाद की चर्चा करनवाले दुनिया को स्वग बना डालने के भ्रम के स्वग म विचरण करत है। उहे आदत है- हर एक को नीचे गिराआ, हर वस्तु को नष्ट कर दो, हर जगह उलट पुलट से अयवस्था बनालो, ममाज के हर अग मे एक प्रकार का लकवा सा मार दो-निर्माण फिर हाता रहेगा। जो लोग विश्वास की जडो को उखाड़ फेंकने का पेशा करते हैं और उस प्राति कहते हैं, वे जपने निर्मित उपकरणो से स्वय मारे जाते हैं और समाज को अव्यवस्थित छोड़ जाते हैं । जिस समाज ने अपने में अपने परिवारा म, अपन सुहृदो में अपनी सास्कृतिक परम्पराओ म और सबसे अधिक अपन मत निश्चय मत- प्राशन और मतानुकूल-वतन म विश्वास खो दिया, उसका सा देश, उसका कौन-सा साहित्य ? जा राम ईसा मुहम्मद और बुद्ध को उखाडकर पोगा वह क्या, अपन जीते-जी डेमोक्रेसी (प्रजातन) में भी विश्वास जमा पावेगा? यदि हम किसी मशीन के सब कील कोटे उपाहर फेंक दें, तो मशीन चलान का काम हम कर चुके ।

१४ क्रिया अभागिन तो कटुता की मोहताज है मुझे लगता है, जिसमे युग की विशेषताएँ और युग का विद्रोह साथ- साथ न उगे, वह युग की उपज ही नहीं । समय के लथ, समय का व्याकरण अथवा समय की परिभाषा बन जाना नहीं है । समय की यह कमजोरी होती ही है कि एक भला काम करने का सकल्प क्यिा काम तो दूर है तो उसे प्रशसक चाहिए । क्तिना ही बार तो यह स्पष्ट दोखन लगता है कि युग को सकटा से युग निर्माता बना रहा है, और निर्माता की रक्षा सहृदय विद्रोही कर रहा है, क्योकि वह झपकिया आन पर आलपीन गडाता है और विसी आईने के सामने खडे होकर अपना मह निहारकर खुश हान वाले युग के गाला पर एक बहुत शानदार घाटा रशीद करता है। प्रतिभा और विधायकता चाह तो वहती रह, त्रिया अभागिन ता कटुता की मोह ताज है । पिद्रोही दो श्रेणी के होते हैं । कुछ कही हुई बातो का विद्राह करते हैं, कुछ बरते हुए जीवन का। 'कहा' प्रिया कभी भी नही थी उसकी प्रतिक्रिया से निया भले ही बनी हो । वह भी कौत साहित्य और वह भी कौन जीवन, जो जान ही नहीं बे-जाने भी अपने प्रचार की दुकान खोलकर बठ जाय । ज्ञान को भी लोगो ने तिडीबाजिया बना ली। लोग तो रस्सी कूदकर 'हाई जम्प' करते हैं और अपनी पहलवानी दिखाते हैं। ऐसे लोग क्षम्य भी हैं, भले भी हैं। हम समझे कि कुछ लोग खयालो की कूद भी किया करते हैं। ज्ञान से जानकारी ऐसे लडती है कि मुद्दई मुद्दाअलेह क्या +mma ४६ / क्ला और साहित्य लडेंगे। यही आकर समस्याएँ वतमान होकर रह जाती हैं । उस विद्वत्ता से बढकर शोक की कौन सी बात होगी, जो अपने सम्पूण प्रयासो म पीडिया की ओर स आने वाले क्ल, परसो और उस परम्परा के लिए नहीं सोच सकी। कैसे भोले हैं हम। केवल कम्यूनिस्ट को अनीश्वरवादी समझते हैं, यद्यपि ऐसा कहते समय हमे भी कुछ ईश्वर से लेना देना नहीं होता। कुछ खयाल हमन पीढियो से पडे और सडे हुए उठा लिये हैं, और मौलिक बता पर अणु के नवीन आविष्कारो की तरह उनपर बहस करते हैं। अभी उस दिन एक मित्र बता रहे थे कि एक सज्जन रक्त प्राति की वात सोच रहे थे और एक महाराजा के क्हन स ठोक प्राति के विपरीत उद्योग करन लग! लोग पहत हैं कि विवेचक का विवेक खो गया है। जिनके हाथ पांव और किताबें दुरुस्त हैं सोचन की अक्ल भी है, कि तु बेचारा ईमान गायब है । सब विषयो पर अपना मत, कितु स्थिर कही नहीं। उठाये हुए इरादो का चमत्कार तो दिखा सकते हैं, किन्तु अपना बहने या अपना बनान अथवा वैसी ही वस्तु निर्माण की योग्यता कहाँ है ? निर्माण को निपुणता और सहृदयता तो है ही नही, परोसने की क्ला भी नहीं जानत और इसी मौलिक्ता का 'तू मेरी सी कह मैं तरी सी कहूँ' का समझौता पीठ पर लादे वढे चले जा रहे हैं कि विश्व का उद्धार कर छोडेगे। उपवार की वाढ इतने जोर से दिमाग म आती है कि वस्तु के प्रकार से रहित वस्तु का आकार ही हमारी आज की मौलिकता है। हमारे कुछ मिक्के हैं-भौतिवाद, नतिकवाद, रूढिवाद प्रगतिवाद आपणवाद- ये शब्द हमन भी उपजाय हैं, और य अपनी अधी सूम के पांव रखन के लिए बड़ी अच्छी इटा का काम देत हैं। अभी उस दिन कोई यह रहा था कि अणु के इजीनियर के सामन साहित्यिक पो मात पानी पडेगी। हम यदि अपनी शताब्दिया स सचित पायरता को बला पहार मिंगारत बैठे रहग तो अवश्य मात पानी पड़ेगी। हम नाराज न हो। जो कुछ हमन आज की शतानीतर पहा है वह पीरिया के लिए पालतू धन बन गया है। वह युग की नित-नयी आध्या मित्र आवश्यकता का ही सामना नही कर सकता वह अणु या क्या हम त्रिया अभागिन तो क्टुता की माहताज है /४७ मुकाबला करेगा? हमारे भाव और तर्क, क्तव्य और इच्छा, सामजस्य कहा बैठा पाते हैं ? लडको के स्कूलो और कालेजो मे जाइए और बेहिसाब ऊधम देखिए । बस सिफ वहां ऊधम नही होते, जहाँ ट्रेनिंग (प्रशिक्षण) पानेवाले क्षेत्रो मे मासिक वेतन मिलत हैं। जहां चरित्र का नियत्रण 'राटी' करतो हो, वहाँ किसी को साहित्यिक की आवश्यकता ही कहा है ? जो जमान को चुनौती देने की भाषा बोलत हैं, वे, श्रीमान, बाद की क्सिी न क्सिी फेहरत में अपना नाम पहले ही लिखा चुके हैं। और वह वाद क्या हैं श्री अजेय न लदन के विद्यार्थिया से, विगत वप ठीक कहा कि 'वाद बूढे हो गय हैं और वे साहित्य मे अब अधिक नहीं ठहरेंगे। हे भगवान । वाद अगर चले जायेंगे, तो हमारी प्रतिभा की कुलवधू अपनी मूखता को ढाक्ने के लिए कौन सी ओढनी आढकर बाहर आयेगी? हम गणित से यह तो लेखा लगायें कि पृथ्वी के परिवतनो के बीच हमारी विचारशीलता का अनुपात क्या बैठता है ? यही कारण है कि इस या इस जैस देशा मे जब जेल, कालेपानी और फांसी का युग रहा, तब सव विचार प्रदाता उस सकट से गायब हो गये, केवल कुछ को छोडकर, और जब सकट दूर तक दिखाई नहीं देता, तब ऐमे जोर से बोल रह है, मानो शत्रु की दीवार की ईंट मे इट बजावर छोडेंगे। फिर यह शाति और अहिंसा का त्याग भूलकर क्यिा हुआ गुणगान लोगो के चबाये हुए को फिर से अपने मुह मे चबाने की प्रतिक्रिया । क्या कहते हैं इस विचारकता के ? कश्मीर मे यदि इनकी सेना बनाकर भेजी जाय या नेपाल की सीमा पर इहें याद किया जाय, तो इनके स्वर की अपेक्षा इनकी चूडियां ही अधिक आवाज करेगी। हर नय लडके को देखिए उतावला है कि एक नयी वात कहेगा। कुछ नया, फिर कुछ नया, यह जगत् की अत्य त बूढी इच्छा है। इससे बच्चे ही वहलाये जा सकत हैं । विचारकता पथ भ्रष्ट नहीं हो सक्ती। जगत म यह होता भी नही है। हम इस बात पर हमते हैं कि आकाश के नक्षत्रो स भला पथ्वी ये लागो का भाग्य नियमन कसे होता है, किन्तु सिद्धान्त रूप से प्रत स्पस ता आकाश की दूरी तक गये बिना ही जान कौन कौन “यक्ति और वृत्तिया हमारे जीवन की वूझ और अनबूझ पहेलियो का नियमन किया करती हैं। कहते हैं एक मित्र न महात्मा गांधी के सामने शपथ ली कि वे ब्रह्मचय वा ४८/क्ला और साहित्य 1 पासा भरेंगे। यहुत बहे मित्र है व मोर परिणाम यह हुआ कि ठीक दम महीन याद उनमे यहाँ मतान पैदा हुन । मैं इस बात से नाराज नहीं है, मयादि यह तो मनुष्य-गुलम है, मैं प्रतिमा यो प्रतिभाहीनता से दुखी हूँ। जीया अपनी कमजोरी और यठिनाइया सालकर धीरे धार चलता है। हम चाहे जितनी जल्दी पडी हो, उम्र, मौसम, पसल और जीवन का जल्लो नहीं पडी होती। हम अपनी पठिनाई पर मानून बनाते हैं। यानून, कानून मी पुस्तकाम लिसे पड़े रहते हैं। अधिकार मिला है, दोडकर यानून बना डालत हैं। इसलिए नही कि कानूना स समस्या मुला जायगी, वितु इस लिए कि आध्यात्मिकता की आर लौटन म झेंप जो लगती है। कहो बूढ़ी आध्यात्मिकता और कहाँ तरोताजा हम | गणित मे, विज्ञान म, इतिहास म, सब जगह प्राचीनता से नवीनता तक दखेंगे, नवल दशन और साहित्य म हम झेंप लगती है। नतीजा यह होता है कि जस हम लियत है वैस आदमी ही नहीं पैदा होत और जैस आदमी होत हैं, वस हम लिखत भय भीत होते हैं। प्राचान या अर्वाचीन साहित्यिको द्वारा लिखा हुआ काई कोई कथा चरित ऐसा बलवान होता है कि वसा चरिम नायक भविष्य मे जब भी पैदा हो जावे परिस्थितिया को सुलझा या उलझा सकता है। हम ऐसे स्थापाना का बल नही बढाते । हम बलवान चरित्र पात्रो को ज म देन के बजाय खिलोन की प्रजनन निया म लगे हुए हैं काटून पदा होत हैं और चाहते है कि जमाना इहे इतिहास के पात्र कहे। हमारे आज के कपिल और कणाद क्या यही सब नही कर रहे हैं?

१५ साहित्यिक की मूर्तिपूजा खड़ी बोली द्विवेदी युग मे हमारी भाषा के उस रूप का नाम रहा जिस हम आज गद्य और पद्य लिए उपयोग में लाते है कितु बडी बाली नाम मुझ कुछ अच्छा नहीं लगता। मेर विचार से तो पडी बाली उस प्रश्न- वाचक स्वरूप का नाम होना चाहिए, जिसे हम प्रखर रूप में पूछ रह हा । मो आज ऐसी ही खडी बोली म कुछ बाते रख सकू, तो मुझे प्रसनता होगी, परन्तु बहुत स देह है कि मेरे-जैसा अतिसुख और अतिदु ख दोना स भयभीत रहनेवाला आदमी अपने आदमिया में ऐसे प्रश्न पूछ भी सकेगा? साहित्य को स्वर सचार करने की इजाजत न किसी युग म रही हागी, यवतमान युग मे मिल सकती है। क्या साहित्य ऐसी अवस्था बन ही नहीं मक्ता जिस मिलकर रहने की क्ला कहा जा सके? क्या आज वह समय की तान में अपनी तान मिलाकर अनुभव प्रक्ट वरनवाला उपकरण बनन के अयोग्य है ? तव तालोगा में सम्मिलित स्वार्थों का विश्वास उसपर रखा हो न जा सकेगा और एक दूसर के लाभ के लिए सामाजिक नियत्रण की विमी व्यवस्था को स्वीकार करन की क्षमता भी उसम दखी न जा सकेगी। वस्तुमा का विश्व में निर्माण बढ़ रहा है। उनका आवागमन सीमा रहित होना चाहता है। हवाई जहाजा के उडन तय मानव-जीवन म मात्रा अवश्यम्भावी हो गयी है । एक दश का नागरिव दूसर दश की नागरिकता ग्रहण करन के लिए उतावला हा रहा है। भाइ चारा, शिष्टाचार व ५०/कला और साहित्य लाचारी अथवा तीना से मिलकर सुवर देशो तक मानव अपने रिश्ते कायम कर रहा है। और हृदय और मस्तिष्क को सम्मिलित कर आपस म एक दूसरे का विश्वास दिलाया जा रहा है कि मानव को और विश्व को ईमान- दारी को जीने के लिए अभी जगह है। इस आधार के फैलने के लिए विस्तार मान फैल गया है और बढता जा रहा है। क्या इस अवस्था तक फैलने के लिए साहित्य आज अपाहिज हा गया है ? लोग यह कहते सुने जाते हैं कि प्रजासत्ता मक शामन प्रणाली भी कही अमोरो का नखरा वनकर न रह जाय । जरा साहित्य भी अपनी तरफ देखे कि वह कुछ अमीरो का नखरा तो नहीं है। जिस तरह प्रेम पर विश्व की राग पराजित कामिनी मे लेकर नारद के भक्ति-सून में वर्णित शास्त्र तक सवका अधिकार है क्या साहित्य उतना ही लाचार हो गया है ? उनका अपना कोई बल नही? फिर वह बलवान पत्र कला कैसे बनेगी, जो शासन का नियत्रण कर सके वह कोमल सूझ कसे बनेगी, जिसमे पथ्वी के देशो की सीमाओ का अन्तर मिटता-सा नजर आयेगा याने वह समझ का पुल बनकर विश्व भर में फैल सके ? वह मानव जीवन की आवश्यकता कस बन सकेगी कि जिसे पद पद पर शिशु- मानवता रक्षाकारिणी मां की तरह पुकार सके ? साहित्य के घेरे म अजायब घर की तरह हमारे पास पालतू चीजें बहुत हो गयी। अब स्वतत्रचेता खयाल को स्वागत के साथ नहीं, हमसे लडकर ही हमारे बीच आना पडता है, बहुत हरते डरते। तब विश्व से, विश्व की पराजितता से, विश्व की अनुदार प्रति प्रियात्मक्ता से लोहा लेउवाली पीढी हम कम पैदा कर सकेंगे? जगत के साधु अगर यह कहते आये हैं कि मनुष्य जमत अच्छा है, तो व यह भी रहते आये हैं कि उसकी प्रारम्भिव प्रवत्तियो पशु प्रवृत्तियों है इसलिए चार व्यक्ति हा चाहे समाज हो चाहे साहित्य हो चाह राष्ट्र हा, हम अच्छा परत हैं जो उमपर आँख मूदवर विश्वाम नही परत । सपप ही म प्रतिभा को बल मिलता है मनुष्य श्रेष्ठ सप्टनर होता जाता है किंतु माप ही हम उनतर गामाजिब प्यवस्था पी चाह मशासाकी मस्याओ षो माय की गस्थाास अलग परत पर आ रर हैं। भी साहित्य म भी हम इग अलगाव मा स्मरण रहता है। लेयर और आसापर माना दो पिया-गो बनकर हम बैठ गय हैं। मत प्रादीकरण मत निश्चय मन-

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५२/क्ला और साहित्य छोड सक्ते । चितव का सयाल आगे होता है, आविष्कार पीछे पीछे । इस लिए पीढी की, पीढिया की उद्दण्ड आशाओ पर चढकर खयाल मात हैं और आविष्कारो को ज म देकर मानव कही बिलम स जाते हैं जैसाकि किसी न कहा है, "आज या साहित्य क्ल का आविष्कार है।" चिरतन मानव को भी कभी कभी विनोद सूझता है। सदैव आपस म गाली-गलौज करनवाले पचास आदमियो को वह छांट देता है जो अपनी सीमाओ की सुरक्षा के लिए सदा झगडते हैं, और एक-दूसरे पर विश्वास नही करते, किंतु इक्टठ हाकर वे विश्व बधुत्व का स्वांग भरने लगते हैं। प्रजा सत्ता का धनी चाह जा कहता रहे खयालो का धनी इसे जीवन का वचपन मानता है और मानता रहेगा। क्स भोले हैं हम | अभी परसो भारतीय स्वत त्रता के लिए जेला मे थे। उस समय हाथ से रस्सी बटते थ, तो लोगो को छाले दिखात फिरत थ कि हम क्तिना कष्ट है । फिर महायुद्ध आया और अभी क्ल-परसो मित्र और हगरी मे भी चढाइयाँ हुइ। जिनका अपने हाथ मे छाला दुखता था वे टुकुर-टुकुर देखा किये कि इसान को इसान न मार डाला । इन्सान के बनाये चित्र सुरक्षित हैं, साहित्य के सग्रहालय हैं, मूर्तियो पर शोध हो रहा है, खण्डहर पूजे जा रहे है और कराहने और मरनेवाली मानवता मानो समय के झाड स अन त के गम मे फेंक दने की चीज है। क्था-साहित्य मनुष्य से इतनी ही दूर रहना चाहता है ? कृषि-युग म वह राजा राज्य से इतनी दूर नहीं रहता था, भविष्य के युग म भी नहीं रह सकेगा। तृतीयस्व को प्राप्त आज ही के साहित्य मे यह सम्भव है।

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५४/क्ला और साहित्य राष्ट्र-जीवन की सफलता का माप इस बात से जाना जा सकेगा कि उस राप्ट ने अपनी प्रजा के विचार जीवन म, नैतिक बल म, बौद्धिक आनद मे और मानव-जाति को धामिर समाधान और कल्याण का मार्ग सिखान म विचारो की कौन सी किस्त इस पीढी म चुकाई है ?

१७
यथार्थ का अयथाय
हम ऐम हैं ही पहा, जो 'ययाप' वे अयपाय से, साहित्य म पिण्ड हुडा
सय ? 'स्वगत' म भोमस कोई चीज हुई नहीं और जगत् म भोसल हमने
मानी ही । मय वह दिन दूर नहीं, जब हमारी सूझहीनता मो। हम
अपनी
सयस यो मौलिकता पहने लगेंगे।
युग से डरना, उसम भयभीत होना हमारासा स्यभाय
मामापा को जब मैं अपरिपाय आपग प्रियता की प्रगमा मग्न और
प्राचीन सपा नवीन माधनापूण मौमिरता पर पीपर उछामते या पम-गे-
कम उसकी उपसारत देयता हूँ, तर मुम अपनी पीठी ग यह मन की
इण्ठा होती है कि तुमन साहित्य-पारथियों के नाम य हो 'जापानी पितोने
अपन पुस्रिय समन है । जाम मस्सूनी माम म मगार बान र युग
पर मनमा मांगतहरा मा म जमानवियर पापिया'
मम पुजामानाम गाना. पुरोधारा ना मोर भागो ये अपना-
भार, भायों को अपनी जूदन पापमपमें रिमें हम सामनाएँ परम
६. मया पुरी जसपना ही मिमा, सब मरे पायो पागही मिलाना
पड़ता है। भामा गाय पायापर यमनाrrt
पर घोड़े पापर या उनमा-ream ग्राररामीफो।
माग हा, बारमोरि हो. होमरामराय. किती
-frमो ने जहाग होमिया, हार महो।

५६ / क्ला मार साहित्य पाया का पूजन भले ही सगे वितु उहोन निर्माण के दोनो अमर त तुआ स काम लिया है। उहाने यक्ति एसा है को भी लिखा और उसम व्यक्ति ऐसा होना चाहिए और व्यक्ति ऐसा हो सकता है' को भी मिला दिया। सच तो यह है कि अपन स्वप्न के मानव को मिलाये बिना किसी कलाकार को मानव प्रतिभा, चाहे वह नायक की हो या खलनायक की, परिपूर्ण नहीं होती। हमार निन्दा और स्तुति के आरोप तो सूय पर चढ़ामी अजुलिया अथवा फेंकी हुई धूल की तरह हैं-वे जो अपना प्रसाद अपन ही लिए बन कर लौट आती है।

१८ लेखक अत्यन्त अरक्षित है आज साहित्यिक वे पैरो की जमीन सुरक्षित नहीं है। यह रह भी ता नहीं सकती। मीठ स्वप्न पुरान पड गय हैं। इसलिए नहीं कि उनमे स्वप्ना का माधुय ममाप्त हो गया है, पितु इसलिए कि हम विश्व को उपल-पुमल के नवीन तत्त्वो वा माधुप उनम नही जोड पाते। यहा जाता है कि राज- नोति न भिन्न भिन दशा मे उथल पुथल मला दी है और विश्य ये शान चितन को कठिन कर दिया है। इस अद्धमत्य पर विश्वास करते समय हम यह पगे नही सोचते दि माक्स और मायड दाना ही चुनाव लडनयाले राज नीतिज्ञ नहीं थे कि जिनरे चितन म प्रभावित होकर हमन अपन जीवा और माहित्य के मघों के लिए नये मोहरे जमाये हैं और नर पाम फेंगना प्रारम्भ कर दिया है। गच तो यह है पिrितक और माहित्यिक विचार गन पाते हैं और उनके प्रभाव स विश्व के सथप जागरित हो जात हैं, विश्व म पाढिया पदा हो जाती है । तब चितव अपन ही विचारा ये उन परिणामा में पधडान सगत है। यह तो अशोभन है। स मम्भय है कि उस समाज में विश्वास आज या साहित्य बह- सान रह जो आज अस्तित्व म ही नही है और जो ममार अस्तिन्य म आ गया है, यह विचार दान मोक्षमता या वठे। कृत्रिम ढग से पुराण व तु सम्हालय म रगे जाामाम इरादे भी मतिया चित्रा और पुस्तकामा नरह हमारी सभ्यतारे इतिहास के अग हो ये हमार समाज की सपूम गयन यह ५८ / कला और साहित्य नही कहे जा सकते। कितु यह अभिशाप हमे 'धहवाटी' और 'सिरवादी' साहित्यिक देता है । वह वस्तु को टुकडे करके देखता है, सम्प्रण को एक करके नहीं देखता। परिणामत वह अपने निणया मे अद्धसत्य-से प्रक्ट करता है, जो कभी सम्पूण सत्य स दीपन लगते हैं और कभी सम्पूण असत्य सावित होकर रह जाते हैं। लोग कहते हैं जीवन की भयक्रताओ से साहित्य को बचाना आवश्यक है, उसे शान्ति चाहिए। उस व्यभिचारी और चोर का-सा एका त चाहिए । एकात मन की सतह का कहत हो तो वह अनिवाय है, और वह साहित्य के चिन्तक से कभी दूर नहीं होता कि तु यदि वह उसकी पलायनवृत्ति है तो उसका एकात का स्वांग भरना भी उसके लिए भय का कारण हो सकता है । या तो भविष्यवाणियो के दिन बहुत दूर चले गय, कि तु ज्ञान की साधना, विवेक की क्षमता रस के सौष्ठव द्वारा भाव के ईमानदार प्रकटीकरण के युगाम भविष्यवाणियो के लिए अधिक गुजाइश नहीं रह गयी। यह तो बिलकुल सम्भव नहीं है कि राज्यो की सीमा रेखाएँ टूट रही हो, अन त नरमुण्ड सपपरत हा और लोगो का प्रेयसी का रस- दशन ही समाप्त न हो। कुछ 'नवीन' चाहिए, यह अपने म बहुत 'पुरानी' इच्छा रही है और नवीनता को इच्छा के बाद घटनेवाली घटनाएं भी अब मानो बासी पड गयी हैं । अब तो घटनाएँ पहले घटती हैं और सोचनेवालो की लाचारियों पीछे आती हैं। प्रश्न यह है कि हम नवीन घटना से सुलझें या नवीन उपमा से सुलझें? उपमा और घटना में आपस म कोई बैर नहीं है, वितु उपमा वस्तु को मधुरता से समझाने का माग सुलभ करती है और पटना तो स्वय समस्या है जिससे मनुष्य विरत होकर जीवित नही रह सकता। व्यास का कृष्ण और वाल्मीकि की सीता विस नहीं भात ? कोन माता है जो अपने पुत्र को कृष्ण जैसा सोलह कला-सम्पन जगदीश्वर नहीं चाहती, और कौन पिता है जो शताब्दियो बीत जाने के पश्चात् भी वाल्माकि द्वारा प्रदान की हुई सीता सतीत्व को अपनी पुत्री पर नहीं डालना चाहता लाग कहते हैं कि 'जानने की इच्छा और 'प्रकट करन की लाचारी' के मीच विश्व का साहित्य प्रभावित होता चला आ रहा है, किंतु आज मनस्वी वे सम्मुख सामाजिक जानकारियां समस्या बनकर आती हैं, जो बेवल प्रकटीकरण से नहीं सुलयतो । अत आज के साहित्यिक के लिए जान- ?

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६०/क्ला और माहित्य आर जानेवाने महान के सक्टमय वरदान तो उसकी वाणी के द्वारा उसका वाणो के द्वारा ही व्याप्त हुए हैं कि जिन अथवा जैसी वाणियो की छाया लेवर विश्व की लेखनिया न जीवित रहना और पोटिया या जीवित रखना मीखा है । भला कौन माता यह देख सकेगी कि उसका निर्माण क्प्ट पा रहा है ? कौन निमाता यह देख सकेगा कि उसके द्वारा निर्मित युग की पाढी उसको लिखावटा के पथ पर चलकर यत्रणा भोग रहा है। माता का यह म्पादन निर्माता म हाता है जीवन म यह सम्भव नहीं। लोग लेखनी के भी मजदूर-सघ बनान लग हैं। मैं विडम्बना इसलिए नहीं मानता कि लेखन जसे देवत्व में मजदूरी के लिए अवकाश नहीं है । मैं लेखनी की धनिक्ता पर गवित नही हूं। कठिनाई ता यह है कि जीवन का मजदूर यदि आठ घण्टे काम करता है, तो लेखनी के मजदूर के चौबीसा घट बरबाद होत है । जय मजदूर आठ घण्टे काम करने के बाद विश्राम कर रहा हो तर मम काम लेना अपराध माना जाता है और स्वत प्रदेशो मे उचित हो सके विश्राम के क्षणो मे काइ उससे छेडछाह नही बर मवता कोई उमने आराम म खलन नही डाल सकता। कि तु लेखनी का मजदूर क्सिी यायालय रडिया सिनमा राजाश्रय समाराह के रात्रि जागरण अथवा लखन की मजदूरी म लगा होता है तब उस मजदूरी म छूटन के बाद क्या क्ला और कलम को भी वही विश्राम मिलता है जो एक मजदूर को मिलता है? क्ला और क्लम का धनी साना चाहता है वि तु कल की मजदूरी पर उम जो कुछ व्यक्त करना है उसके प्रकटीकरण की लाचारी जा रक्त कर मांग रही है, उसे अध्ययन अभ्याम या रियाज का भोजन पर दिया जाय? रोटी णमा नारी बच्चे और मुख की इच्छाए समय की घडिया की खूटिया पर टंग में हैं । सो लगनी के धनी का जीवन तो दया पर जीन का जीवन दया का आडम्बर हम चाह नया धरें, वितु दया तो बडा ही घाट पर वरता है सान अपाहिज पर ही करता है। दया, पर केस म्वरूप का ही कहत हैं। मजदूर अधिकार स मार मानार उम दिया जाता है किंतु लेखनी का हो, तो दया के यातावरण म वह जीता है। प

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जोर माहित्य
जय मव ममाजो की तरह नयन म भा दम्भ और चमत्य है
भ और जसत्य का ममया नहीं कर रहा मैं वचत लेखन की बाजू
न रग रहा हूँ।
fपर यदि लखक वाति द्रष्टा प्रान्तिकारी हुआ तो उमकी
कौर भी जटिल हा जाती है । एक पातिवारी ता समाज म छुप
काम चला ले जाता है। उसक प्राण उसरे वस्त्र उस शस्त्र
क वाच भी उमयी मब मुविधाएँ सुरक्षित हैं वितु कात्तिकारी
क्षण क्षण जपना लखनी द्वारा अपनी नायत या स्पष्ट इजहार
लए लाचार है इसलिए उसकी रक्षा उतनी सुरक्षित नहीं हा
ननी एक नातिकारा की होती है ।

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२०
हमारे गाँव और उनके शिक्षक
।
गाव भारत के प्राणो का नाम है और उसके दुर्भाग्य का भी। अध
विश्वास और भाग्यवाद वहाँ सदव खिलवाड करते है क्याकि ग्रामीण अपने
को मिलनवाले क्प्टी का कारण ज्ञान के अभाव मे अपन से भिन कुछ घट
नाओ का मानत है । अपन दु खो स झगडने लिए उ होने भाग्य नामक
वस्तु को बडा भारी सहारा बना रखा है। यो ता जो लाग विश्व के नान स
अधिक प्रभावित और परिचित हान के बजाय स्वय पन ही विषय में
अधिक सोचा करत हैं, जो अपनी जरूरतों का उम्र को सांसा के वेग से
वढाया करत और लगातार लेखा रखत हैं जो अपन ही बडप्पन की एक
तस्वीर अपने मन की जेब मे रखकर उन लागा द्वारा बडे न मान जानवाले
दिनो की जन्मपत्री बनाय रहत हैं जा इस बात को अधिक परवाह करत हैं
कि उनके विषय म और लोग क्या कहत हैं जो इस बात का हिसाब रखत
हैं कि किस क्सिन क्व क्व हमारा सम्मान नहीं किया, जो धन और कीति
की दुकान चलाकर भी, हृदय की काम
पर दुखवा
पजाना अपने पाम नहीं रखत, उनस बढन दहीक
हमारे ग्रामीणा की ता यह हालत है कि
यापन करते हैं जितन पर ससार के
न कर सकता हा, और तिसपर भी लो
यह कह रह हा कि
लोग सुखी हैं
ना

हमारे गांव और उनके शिक्षक / ६५ हमम जागरूकता माये, तो इससे बढकर पूजा दूसरी हो नहीं सक्ती, क्योकि पहते तो हमे यह दिखाना है कि ससार के किसान किस तरह रहत हैं और भारत के किस तरह । फिर यह कि बाहर कही से हमारे द्वार पर सौभाग्य नहीं आयेगा, किंतु हमारा ही आज का पुरुपाथ स्वावलम्वन की गोद म बैठकर कल का सौभाग्य बन जावेगा। गांवा के शिक्षा की जिम्मेवारी बडी है, कि तु हम प्रशसा करक ही शिक्षका का सन्तोष न दे। हम अधिकाधिक ग्राममेवा के साधन उह दें और उनके पास ऐसा ज्ञान पहुंचायें, जो उह ग्रामसेवा का दिशादशन करा सके। हम ऐसा साहित्य दें, जो ग्रामीणो के साथ बोलता सा और उनके कष्टो, जरूरतो, त्योहारा और उत्सवो म घुल मिल जाता-सा नजर आये। हम एक यात प्रामीणा मे लगातार बोते रहे जिस तरह ग्रामीण खेत वोते हैं, कि इस देश के वे ही आधार हैं और उनके सिर से बहनवाली पसीन की बूदो की पवित्रता गगा से अधिक है और उनके बदन पर लिपटी हुई मिट्टी भगवान् कृष्ण के द्वारा खायी जानेवाली व्रजधूलि से कही मधुर, कही प्राणदात्री है।

२१ दीपक के गर्व का दिन लोग कहते हैं 'वीरा का हर दिन त्याहार है।' कुछ लोग इस प्राचीन ऋचा को थोडा सा परिवर्तित कर कहते है-"उत्सवप्रियाहि देवा ।" ही शायद । हमे तो ऐसा लगता है कि यदि हमारा हर दिन त्योहार होता तो हम त्योहारो से भी उसी तरह ऊबने लगत जिस तरह जिदगी के काई कोई साधारण दिना से ऊब उठते हैं। दीवाली आ गयी है। घर पर दीये जलेंगे, जो दीये जला सकता है, उनके घर भी, जो नही जला सकता है उसके घर भी। मानो आज मनुष्य अधकार से लड़ने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध होता है। यह त्योहार स्वागत करता है -तारा का, चाद का सूरज का भी। आज मानो दीपक के गव का दिन है कि वह अपने क्षणिक प्रकाश के तारे की आरती बन सका है। कहते हैं एक साम्राज्यवादी नरकासुर था। सोलह हजार गोपिया उसकी यत्रणा म थी। प्राग्ज्योतिष याने आसाम के पूर्वोत्तर किनारे पर वह यही रहता था। श्रीकृष्ण की पली सत्यभामा ने कहा कि मैं उन सोलह हजार गापिया का उद्धार करूंगी, सहायता तुम करना । यह मुनीमी परन का श्रीकृष्ण का पुराना स्वभाव था। अर्जुन न भी उह युद्ध नहीं करन दिया, सिफ मुनीमी का ही काम दिया । सो भारत मी एक रानी न नरकासुर दत्य या वध किया चतुदशी के दिन। इसीलिए अमावस्या का हर मनाया जाता -- दीपक के गव का दिन/६७ दोपावली मे अधकार से लड़ेंगे । दीए जलाएग। वर्षा का कीचड सूख जायगा। लोग राग मुक्त होग। इस वर्ष की पहली फ्मल वा अनाज आयेगा, हमारे घर उजियाले हा जाएंगे, लक्ष्मी भर जायगी और बही-खाता की उलट फेर में बज वा बाय उतरेगा और हम त्योहारा का सुरा अनुभव करेंगे। गरज यह है कि हम दीपावली मनाएंगे-बूढे, बच्चे जवान, नर और नारी मिलकर। गायें पूजी जाएँ, बैला के जुलूस निकले, जगत् रगीन बने और नये अन का पवन बनाकर मनकूट बनायें। इस तरह हमारी दीवाली मने । बच्चा क गाला पर, उनके उपद्रवो,पर, तरुणो के नेत्रो म और उनकी मुट्ठी-बी सपा मे जघडो के दिशा-दशन म, वलि मे, बल मे, वृद्धो की लाठी म और उन जाशीर्वादोम भावाश के तारा से लेकर जमीन के दीपक मजा लो जगमगाती रहे उसका, उसकी दीपावली का स्वांग है। त्याहार हमारी शक्तियो का वह उल्लासपूण विश्राम है, जिसमें हम मानवता के शनुआ स जूझने के लिए बलि एक्न क्यिा करत हैं, बल एक्न करते हैं।

२२ वर्या की प्रथम वौछारे -- सूरज तपकर अपनी सम्पूर्ण शक्ति दिखा रहा था। जवानो की जिदगी झुलसी सी दीखती, धूढो की 'हाय राम' कुहराम बनी रहती वच्चे नतु को। लात मारकर सडको पर लपटो म खेलत तो लू लेकर लौटते काम के घट उगलती आग बेकाम के घट बना दिय थे। और बरसात आ गयी। अरावारो म पढ रह थ, वर्षा का मौसमी पानी लका से चलघर, केरल प्रदेश से गुजरता हुआ पालीक्ट होकर, वाण तक आया है। कारण स! बम्बई तीन दिन और वम्बई से यहाँ (खण्डवा) सात दिन यानी तारीख ६१० जून या वर्षा आयो समया। जा जमीन वे इतने विषले समथर कि आसमान को दयना भ्रम समय, वे भी दिन और रात आकाशम धादल टुकडे दूढत । दिना की, समय की दूरी के लिए बिना ठहरे कल जार की परमात मा गयो । 'लोकल रेन है', विशेषज्ञा वे बीमारा न पहा । 'पानी है बरसात है जन-जन न पहा । यी का स्वागत । वह जो ठेला-युली जा रहा है, वह चाहता है यि ठले का माल न भोग विसी भाट की शरण ढूँढ रहा है ठल लिए। किंतु स्वय विस पाय म घरसाती यूदा म नहा रहा है । दा भाने घटेवाले माइक्लि-रावार उरत यस्ता और उयात पहियों सिनमा में गी। इस मजे स गा-गावर अघट यो उपेगा कर रह हैं माना यरसात पा ली, गव दुष्ट पा लिया। माया म पुधारें जा रहा है रिन्तु ध्यानरपरा उहें मूदार, यूंद-बूंद वर्षा की प्रथम बौछारें/६६ बरसते वरदान का चाव से आगमन मनाया जा रहा है । आखा को बिजली को चमक और काना को यादत की कडव, सी भा रही है मानो वीणा, मदग किसी को इस शातल स्वप्न दे साकार होन के समय मदाखलतवेजा' करने का अधिकार नहीं है। बस यही गरज, यही घुमड, यही टप-टप, यही ठहर-ठहरकर मचक्यिा-मा लेता अधड और यह धर के वस्त्रो और वस्तुओ और नारी नर व मन और विश्वासो को आनद-आभार और वर्षा के ज्वार स औधा-सीधा करता व्यापार चाहिए । मुह खुलता है कि क्सी बुद्धि और वसापान राशि के पुण्यकलेवर को लांघकर वुपिया और किलकारिया मानो फूटकर निकल पडना चाहती हैं। वे सब चहुल, जिह अपनानेवालो को हम चश्मा चढाय, चश्मे क कुछ बाहर और कुछ भीतर से झाकते-शोहदापन कत थे, अब अपनी ही तबियत मे बरबस उगे उठते हैं । सा प्यारा सुहाना है मौसम | क्सी नहीं नहीं पर विस्तत सुकुमार विश्वासो सी हैं बूदें। गर्मी को विदाई दन की याद ही नही रह रही, बरसात का स्वागत कौन करे यहोशी जा है। यदि आकाश के बादलो के पृथ्वी की आर होनवाले इसी बरसात आश्पण के कारण श्यामला भूमि को हरी हरी कर डालनेवाले लोगों ने कृपक नाम पाया था, तो अन त आ 'नद' के पुत्र ने भी इही बादला से श्यामता क्या न ली होगी । इही से रण कौशल, इही से बरस पडना, इही से छा जाना, इही स उग उठना, इही से हरा हरा कर डालना और फूलो म भर और फ्ला सलाद देना क्या न सीखा होगा। और इसीलिए क्यो न इसी आकपण के अनुवरणशील साधक, उस बांसुरीवादक को, अगजग न कृष्ण कहकर मस्तक न झुका दिया होगा? अहा फिर पुहार आयी, यह गरज, यह बरस । तडप वेचारी बिजली के मधुर उत्पादा और वादल की हुकारो मे जा छुपी । और फिर पानी पानी बैसो मनमाहिनी परेशानी है, दुनिया गीती है दुनिया तपन के हीलो. बीच थरथग उठी है कि तु कैसी मस्तानी है । बरसान तुम्हारा स्वागत । और लीजिए वे नाच उठे किलकारी नरेश। नाच उठे ? दौडना है, पाना २२ वर्पा की प्रथम बौछारे सूरज तपकर अपनी सम्पूण शक्ति दिपा रहा था। जवानो की जिदगी झुलसी सी दीखती, बूढो की 'हाय राम' युहराम बनी रहती बच्चे ऋतु भो सात मारपर सडको पर लपटो मे खेलते, तो लू लेकर लौटते काम के घट उगलती आग न बेकाम के घटे धना दिय थे। और घरसात आ गयी। अखबारा म पढ रह थे, वर्षा या मोसमी पानी लया से चलकर पेरल प्रदेश से गुजरता हुआ कालीक्ट होकर, कोकण तक आया है। कोकण स! वम्बइ तीन दिन और बम्बई से यहा (खण्डवा) सात दिन यानी तारीख ६ १० जून को वर्षा आयो समझो। जो जमीन के इतन विषले समथक कि आसमान को देखना भम समझे, वे भी दिन और रात आकाश म बादल के टुकडे ढूढते। दिना की, समय की दूरी के लिए बिना ठहरे क्ल जोर की बरसात आ गयी । 'लोकल रेन है, विशेषना के बीमारो ने कहा । 'पानी है बरसात है जन-जन ने कहा । वा का स्वागत । वह जा ठेता कुली जा रहा है वह चाहता है कि ठेले का माल न भीगे, किसी भोट की शरण ढूढ रहा है ठेले के लिए। किन्तु स्वय विस चाव से बरसाती चूदो म नहा रहा है । दो आने घटेवाले साइकिल सवार उडते वस्त्रो और उखडते पहियो सिनमा के गीत इम मजे म गा गाकर जधड की उपेक्षा रहे हैं माना बरसात पा ली, सब कुछ पा लिया। आंखो म फुहारें जा रही हैं किन्तु ध्यानस्थ से उह मूदकर, वूद-बूद वर्षा की प्रथम बौछारें/६९ वरसन वरटान का चाव से आगमन मनाया जा रहा है। आखो को बिजली को चमक और कारों को बाटर की बडक, कमी भा रही है, मानो वीणा, मदग क्सिा को इस शीतल स्वप्न के साकार होन के समय 'मदाखलतवेजा' ररत का अधिकार नहीं है। बस यही गरज, यही धुमड, यही टप-टप, यही व्हर-सहरसर मचक्यिा सा लेता अघड और यह घर के वस्त्रो और वस्तुआ और नारी नर के मन और विश्वासो को आमद-आभार और वपा के ज्वार माधा-साधा करता व्यापार चाहिए। मुह खुलता है कि कसी बुद्धि और वमा मान राशि के पुग्धक्लेवर को लांधकर किया और किलकारियां मानो पूवर निक्ल पडना चाहती हैं। वे सब चुहुल, जिह अपनानेवालो को हम चश्मा चढ़ाय, चश्मे के कुछ वाहर और कुछ भीतर से झाकते-शोहदापन कहत प अब अपनी ही तबियत म बरबस उग उठत हैं । कैसा प्यारा सुहाना है मौसम मा न ही नन्ही पर विस्तत सुकुमार विश्वासो सी हैं बूदें। गर्मी को विदाई दन की याद ही नहीं रह रही, वरसात का स्वागत कोन कर बेहोशी जा है। यति भाग य वाटला के पथ्वी की आर होनेवाले इसी बरसात भावपाक कारण श्यामला भूमि को हरी हरी कर डातनेवाले लोगा ने वृपष नाम पायापा, ता अन तथा 'न 'के पुत्र ने भी दही बादला से स्याभता क्या न तो होगी । इही से रण कोशल, इही से बरस पडना, इहीं म छा जाना, इहो स उग उठना, इन्ही में हरा हरा कर डालना और फूला म भर और पला सलाद देना क्या न सोखा होगा। और इसीलिए क्या न इमो याकपण में अनुवरणशील साधक, उस बासुगेवादक को, अगजग ने तापहार मस्तक न सुना दिया हो।' अहा, फिर यहार आयो, यह गरज, यह वरस । नडप बेचारी बिजली र मधुर पाता और वादल की हुकारा में जा छुपी। और फिर पानी है मी मनमाहिनी परशानी है, दुनिया गीली है, दुनिया तपन में बीमा बाब परपरा टर है रिन्तु असी मलानी है। वरमा तुम्हारा म्यागत। और मातिए नाच न विसारी नरेश । नाच उठ? दोहना है, २२ वर्षा की प्रथम बौछारे -- सूरज तपार अपनी सम्पूण शक्ति दिखा रहा था। जवानो की जिन्दगी झुलसा सी दीखती, बूढो की 'हाय राम' कुहराम बनी रहती बच्च ऋतु को लात मारकर सडको पर लपटो म खेलते तो लू लेकर लौटते काम के घट उगलती आग ने बेकाम के घटे बना दिये थे। और बरसात आ गयी। अखबारा मे पढ रहे थे, वर्षा का मौसमी पानी लका चलकर, केरल प्रदश से गुजरता हुआ कालोक्ट होकर, कोंकण तक आया है। कोण से । बम्बई तीन दिन और वम्बई से यहाँ (खण्डवा) सात दिन यानी तारीख ६१० जून को वषा लायो समझो। जो जमीन के इतने विषैले समथर कि आसमान को देखना भ्रम समझे, वे भी दिन और रात आकाश में वादन के टुकड ढूढत । दिना की, समय की दूरी के लिए बिना ठहरे कल जोर की बरसात आ गयी । 'लोक्ल रेन है', विशेषना के बीमारा ने कहा । 'पानी है, बरसात है' जन-जन ने कहा । वर्षा का स्वागत । वह जो ठेला कुली जा रहा है वह चाहता है कि ठेले का माल न भीगे क्सिी भोट की शरण दूढ रहा है ठेले के लिए। विन्तु स्वय क्सि चाव से वरसाती वूदो मे नहा रहा है । दा आने घटेवाले साइक्लि-सवार उडते वस्त्रो और उखडते पहियों सिनमा के गीत इस मजे से गा-गावर अधड की उपक्षा कर रहे हैं माना बरसात पा ली, सब कुछ पा लिया। आंखो म फुहारें जा रही हैं किन्तु ध्यानस्थ-स उह मूदकर, बूद-बूद वर्या की प्रथम बौछार/६६ - -- बरसत वरदान का चाव से आगमन मनाया जा रहा है। आंखो को बिजली की चमक और कानो को वादल की बडव, वसी भा रही है, मानो वीणा, मदग किसी को इस शातल स्वप्न के साकार होने के समय मदाखलतवेजा' करने का अधिकार नहीं है। बस यही गरज, यही घुमह, यही टप-टप, यही ठहर-ठहरकर मचरियां-सा लेता अघड और यह घर के वस्त्रो और वस्तुआ और नारी नरक मन और विश्वासो को आनद-आभार और वर्षा के ज्वार से औंधा-सीधा करता व्यापार चाहिए । मुह खुलता है कि पसी बुद्धि और वसा नान-राशिये पुण्यकलेवर को लांघकर कुदक्यिा और किलकारियां मानो फूटवर निकल पड़ना चाहती हैं। वे सब चुहुल, जि हे अपनानेवालों को हम चश्मा चढ़ाये, चश्मे के कुछ बाहर और कुछ भीतर से झांकते-शोहदापन काहत थे अब अपनी ही तबियत में बरबस उगे उठते हैं । सा प्यारा सुहाना है मौसम । कसी नही नही पर विस्तत सुकुमार विश्वासा-सी हैं बूद गर्मी को विदाई दन की याद ही नहीं रह रही, बरसात का स्वागत कौन करे, बहोशी जा है। यदि जाकाश के बादला के पृथ्वी की ओर होनवाले इसी बरसात आक्षण के कारण श्यामला भूमि का हरी हरी कर डालनवाले लोगो न कृपर नाम पाया था, ता अनत आ नद के पुत्र ने भी इही वादला से श्यामता क्या न ली होगी। इही से रण कोणल, इही से बरस पड़ना ही से छा जाना, इही स उग उठना, इही से हरा हरा कर डालना और फूलो स भर और फला स लाद दना क्यो न सीखा होगा। और इसीलिए क्यो न इसी आकपण के अनुवरणशील साधक, उस बांसुरीवादक को, अगजग ने कृष्ण कहकर मस्तक न झुवा दिया होगा? अहा फिर फुहार आयो, यह गरज, यह बरस । तडप वेचारी बिजली के मधुर उत्पाद और वादल की हुकारो मे जा छुपी। और फिर पानी पानी कैसी मनमोहिनी परेशानी है, दुनिया गीली है दुनिया तपन के हीमो- बीच थरथग उठी है, जितु कैसी मस्तानी है। बरसात तुम्हारा स्वागत । और लीजिए वे नाच उठे किलकारी नरेश । नाच उठ? दौडना है, 1 पाना ।

७०/चला और साहित्य मटक्कर चलना है पुदवना है छलांग मारता है और इस सारी महनन की और उसकी धवन की चोरी करके चोरा चोरा सी, वह आ गयी मुमबाट, और वह छा गया आयो म आवेगो तव मानो एक तान पर ये सब हाव- भाव उतरकर आन द का थाप पर आमोद के सम पर उतर-उतर रहे हा जी इसीलिए लगत हैं यच्चे नाच उठे नाच उठे किसीकी नही भुजाएं ऊंची हैं, रिसीवी ऊपर झुकी हैं, विसीको दोनों भुजाएँ किसी के गले म, फिर जूझना है भीजना है । यह नाच नहीं उठे तो क्या वर उठे ? माना अहमदखान थिरकवा को तबला इन गीत भर कुतूहला को नहीं धाध मक्ता, भयाकि इनके मानद भी उडेल का सौदागर आसमानवाला है जिसकी तान पर ससार के नत्य गान ठहर हैं। सो ये नह नह नारायण श्याम गौर किमि कही बखानी तानाच ही उठे। पीच के बीच से हटकर भचलती हुइ निकलती छोटी छोटी पथ गलियां बीहड प्रदेश को भी कुज गलियो बनाती बढी वि वह जोर का जर्राटा, और वह गरज वह बरस । और गलियो कूचो की बाढो म क्तिन आपाढ निहाल नहीं हो हो उठे जब कीच पर कमल और कमल पर सूरज की तरह नहे मुनो को फुलवारी उग उठी है और बरसात है कि बाले वादला, सुनहली बिजलियो, काले खेतो पथरीली चट्टाना हरे मैदानो के रूप ममानो वन अपनी रामायण के सब काण्ड लिखन बठ गया आखिर वर्षा आयी है । आनद की आकपण की, तारत्य की राधा की कृष्ण की वरसाने की, वृदावन की, कामवन की, यमुना को और ऊपर के आसमान की या नीचे की जमीन की, क्सि किसको छवि देखे? भवानी' बेटा के श दो म कहें- "बरसात आ गयी रे घरसात आ गयी रे। १ कविवर भवानीप्रसाद मिथ ।

२३ बुनियादी शिक्षण बुनियादी समझ की नीव . बच्चो की देखरेख करनवाले का, चाहे वह पालक हो कि शिक्षक, एक विचित्र नाम पड़ गया है। उस समय जब बालक की समझ मे कोई बात न आ रही हो और पालक और शिक्षक समझ न पाने के बालक के प्रयास पर चिढ उठे हा, तब वालको के उन रक्षकों का नाम है 'भय, जबरदस्ती', 'बुद्धि से बेवास्तापन' और 'विचार-शूयता'। असल में समय न पाना बालक की जितनी बडी अयोग्यता वही जाती है मनोवैज्ञानिक के सामने उसस बड़ी मूखता उसकी है, जो वालक को समझा नही पाता । लगता है, तेजस्वी बुद्धि का शिक्षक और पालक भी अपनी बुद्धि और ज्ञान की परिभाषा का इतना दास हो गया है, मानो भावना नाम को काई चीज उसके पास रह ही नहीं गयी है । 'सूथ', 'कल्पना' और 'योजना'-ये तीनो ही बालक के प्रति उत्तरदायित्वहीन हैं, यदि ये भावना को आगे करके नहीं चलत। हम यह साचना चाहिए कि शाला की चहारदीवारीही ससार नहीं है, और व्यक्तित्व केवल शिक्षक का ही नहीं है, बालक का भी है । और सच पूछिए तो शिव को आवश्यक्ता वालक विकास के लिए है। बालक को भी रचि है, उसकी भी महत्त्वाकाक्षा है उसके भी नह-नह स्वप्न होते हैं, उसको भी कल्पनामो था खिलवाडा का एक इतिहास होता है और इही नरम-नरम द्रन्या मस शिक्षक को बालक की बुद्धि का निर्माण करना है । लाठी का तत्त्वनान तो अब पशुशाला में से भी रोका जा रहा है। 'छडी लागे छम छम, विद्या आवे .

७२/कला और साहित्य घम घम', 'मार से भूत भागते हैं', ये कहावतें जाने किस युग की हैं ? इन कहावतों को तो मनुष्य बुद्धि को मूखता की परवी प्रदक्षिणा कहना चाहिए। बालक के जीवित रहन का मूलधन उसके लोभ गव, श्रद्धा, सबकुछ बालक म होते हैं, कि तु हमारा प्रयास होता है कि हम तो बालक के साथ पशु से बदतर बरतें और बालव भगवान कृष्ण के गीता मे बताये हुए योग के मारे तत्त्वो के अनुसार हा । अज्ञान से योगी बनने की आशा मूखता ही कर सकती है। शिक्षक के नाते हमारी सबसे बड़ी सफलता ता यह हो कि बालक हम पर विश्वास कर सकें। हमारी छडी, हमारा क्रोध हमारी असहिष्णुता, हमारा अर्धेय और सबसे बडी हमारी घर जान की जत्दी स्पष्ट प्रकट करते हैं कि किसी बहुत गलत आदमो का शिक्षक बना दिया गया है। उस बेचारे पर दो बोझ पड गये हैं। पहला बाझ बालक, और दूसरा बोझ शिक्षकी और इन दो बाझो का सहने की सामथ्य शिक्षक नामक प्राणी म नही है। शिक्षक समझना है कि बालक पागला जैसा वालना है, कसी बेहूदी बातें करता है कितु पागलखाने मे बालक बहुत कम भेजे जाते है, वहा तो क्रोधियो को तादाद ही अधिक मिलेगी। या शिक्षक समाज का बहुत वडा घटक है। उसके साथ एक गहरा अन्याय हुआ है। पाठय पुस्तको और बच्चो मे रहत रहते वह बडी उम्र म भी बच्चा बन गया है बच्चा बनने के लिए बाध्य हो गया है। जब यदि आप चौराहा पर उसे देखें, तो उसकी बच्चो जैसी बातो से समाज चिढ़े नहीं। यह शिक्षक का बहुत बडा त्याग है कि उसन शिक्षकत्व स्वीकार किया है। अब तो समाज, शियर और शासन तीनो को मिलकर सोचना यह है कि बुनियादी तालीम की ओर हम जाना है। इस तालीम को भार ससार के देश जाते रहे हैं। मानव-जीवन का यह स्वाभाविक रझान रहा है। समाज की सेवा करनवाली प्रवत्तियो का क्या कहा? एक व्यक्ति जहाँ श्रेष्ठ सेवा करता है वहा अपना उदाहरण छोडता जाता है। कहते हैं, राजा दशरथ के यहा भरत-जैसे पुत्र न जम लेकर रघुवंश का नष्ट होने से बचा लिया, वितु बुनियादी बात यह है कि विसी सघपरत परिवार में आज भी भरत के स्वभाव का अधिकार सम्पन व्यक्ति पैदा हो जाय तो बर्बाद होते हुए परिवारा की रक्षा कर सकता है। - बुनियादी शिक्षण बुनियादी समझ की नीव /७३ भारत में मेले लगा करते हैं । ससार के अय देशो मे भी मेले लगत है । इन मेलो द्वारा कुछ व्यक्ति, सस्था, धमस्यापका आदि का ही गुणगान नही हाता, किन्तु मानव-मानवी तथा बालको के सम्पक क द्वारा सस्कृतियो तथा अभिरचियो मे वद्धि हुई है और जीवन की बुनियादी वातो के विषय मे लाक जीवन के लोगा ने अनेक बातें वहां सीखी हैं। बातो ही-बातो मे क्तिन ही, मनुष्यो की बीमारियो के इलाज सीख गये हैं। पशुधन को सँभालने और उनको बीमारी के इलाज भी सीख गये । भोजा बनाने की क्रियाएं सीख गये और न जाने कितनी ही बातें युगो से लोग सम्मिलन के इन सस्कारोसे सीखते चले आय हैं । अत त्योहार, उत्सव तथा अय मिलन के अवसर मिलते जाने स सामाजिक सस्कृति आज तक मनुष्य जीवन को जीने योग्य बनाये हुए है । शहर के आदमी के कपडे मे अगर सिकुडन आ जाय, तो वह उसे पहनना पस द नहीं करता, सभ्य जो ठहरा। गांव का जादमी अपन परिवार मे और अपन मित्रा म हृदय में सिकुडन नही आन देता। अत गांव का आत्मी सस्कार- दुष्ट नहीं है वह सस्कार इप्ट है। कथा पढते समय आज भी उसकी आँखा में आसू जाते हैं । घर मे क्सिके बीमार होने पर आज भी वह रात रात जाग पर गुनिया का लाकर बीमार के पास एकत्र करता है । अत यदि बुनियादी शिक्षण की बातें उचित ढग से सामन रखी जाएँ तो मुझे लगता है कि वे गांव म शीघ्र फलगी। गाव के लोग बुद्धि की कुलाटें नहीं खा सक्त, पितु गुण और नान को भूल जान जथवा मजाक उडाने जैसी नगण्य किस्तो मे ग्रहण नहीं करत । वे स्वीकार करत है तो पूरा छाड देते हैं तो पूरा । अत उनके बीच म बुनियादी शिक्षण के अधिक सफल होन की सम्भावना वे इधर हमारे देश म नये नये बाध बँध रहे हैं । नयी पाठशालाएं नये अस्पताल, नयी सड, खेती की नयी विधियाँ, खाद देने के नय तरीके, सभ्यता के इन अनिवाय सक्टा म आज का हमारा देशवासी पिछड न जाए पुराना न पड़ जाए इस बात के लिए बुनियादो तालीम की जरूरत है । उसके मन की इस अवस्था को तो हटाना ही होगा कि नीचे वह वैल- गाडी चलावे नौर ऊपर उडनवाले हवाई जहाज का ओर वह भौचक्का- सा दखे। उसके पास तो इस बात का ज्ञान पहुंचाना ही होगा कि बैलगाडी ७४ / क्ला और साहित्य - । से लगाकर हवाई जहाज तक, याना के सारे साधन एक ही विरादरी के है। यदि जहा हवाइ जहाज जा सकता है, वहां बैलगाडी नही जा सकती, तो जहा वैलगाडी अथवा घोडे की सवारी जा सकती है, अथवा पैदल यात्रा की जा सकती है वहा हवाई जहाज भी नहीं चल सक्ता । अत दोनो के मध्य के मर्यादा विदु की जानकारी समाज के पास पहुंचनी चाहिए क्याकि प्रजा सत्ता के युग में जिमको मत देने का अधिकार है उसको देश का मालिक कहलाने का अधिकार भी है। और विश्व के सारे सम्बधो, सुधारो और हलचलो से आज का मतदाता जानकार नहीं रखा जा सकता। जन तर के व्यक्ति का विश्व की शक्ति से अपरिचित रहना किसी भी दश की प्रजा मत्ता के लिए भयकर सक्ट है, जिसके कारण जन- जीवन को न मालूम होते हुए भी देश की पूरी स्वत नता हाथ से जा सक्ती कानपुर म किसी 'गोरे' न गगा के तट पर अपनी पत्नी के मरने पर एक मदिर बनवा दिया और अपनी पत्नी की मूर्ति स्थापित करा दी। इस मूर्तिपूजक देश के लोग शताब्दियो से बुनियादी ज्ञान से खाली रखे गय हैं अत जिस तरह वे अय मदिरो म जाकर गगाजल और च दन चढाते रहे उसी तरह कानपुर की गगा म स्नान करने आनेवाले ग्रामीण तथा शहराती सीधे साधे अनान की लोग 'गोराग मदिर में भी गगाजल और चादन चढाने लगे। इस घटना में ग्रामीणा का कोई अपराध नहीं है । भारतीय नानक्षेत्र और जन-जीवन के बीच का बुनियादी सम्बध स्थापित न हान अथवा न रहने के कारण यह कठिनाई उत्पन हुइ। इसी तरह शताब्दियो के अज्ञान से जन जीवन की समझ पर जा जो सक्ट उपस्थित है उनकी कल्पना हमे कर लेनी चाहिए । पनघट, बाजार तीथयाना त्याहार और समाज में व्रत तथा उत्सव, गरज यह कि मानव जऔर मानवी के जो सामाजिक मिलन क्षेत्र हैं, उन सबम बुनियादी जानकारी बढाने का एक डारा बुद्धि की बौखलाहट से नहीं शासन के अधिकार से नही, उत्साही समाज सवा के अनान स नही, पितु माता की सी ममता तथा निर्माता की सी दढता के साथ जन-जीवन को समझ के पास, जानकारी का एक डोरा पहुंचना चाहिए, जिससे अथ- बुनियादी शिक्षण बुनियादी समय की नीव /७५ रहित भाषा अथवान जीवन की गुप्त और प्रक्ट भेद देनवाली सस्कारपूर्ण परिभाषा बनती चली जाए। बुनियादी शिक्षण का उद्देश्य वेतन लेकर नह बच्चो के पीछे पड जाना ही नहीं है, समझ के सहारे समाज जीवन मे प्रवेश करना और प्रवेश पाना है। उस समय विभिन धर्मों, विभिन समाजो, विभिन मतभेदा, विभिन लडाई भगडो के बीच सामजस्य ढूढते-ढूढते ऋषि जीवन मे प्रवेश करने की एक ऐसी कडी शिक्षण विभाग के हाथ लग जाएगी, जिस पर ससार गव कर सकेगा।

२४ बुनियादी तालीम आकर्पण विन्दु मच पूछिए ता सातवें आसमान से उतरकर अध्यापक बच्चो से बुनियादी तालीम के जमान म ही मिलन-जुलन लगा है। अब वह परि भाषाआ स वाम नही निकाल सकता। उसे उदाहरणा म ही पुल मिल जाना हाता है, भले ही परिभाषा बन या बिगडे। सच भी है, यदि देश या तरण विगड गया, तो परिभाषा बनी तो क्या वनौ, यदि तयार माल ही बिगह गया ता आट-पपर पर गुणा को पहरिश्त लिपी जान स क्या होगा? पहल यच्चे अध्यापक स मरयन जानवर की तरह डरत प गांव म ता अब भी डरत हा ता अचम्भा नही, पितु जहाँ बुनियादी शाला प्रारम्भ हुई हैं यहाँ बच्चे अपन अधिपाटर के पास अभिभावक यी तरह जाए हैं जानी जात यहां युनियादी तालीम या श्मशान है युनियादी तालीम नहीं। अब तो अध्यापन छोटी-सी गमस्या रप देता है और बच्चे और अध्यापर मिसर उग पर साचन लगते हैं पाह जिमका उग समस्या या हम मूग जाय। पण्डा कैचा रह हमारा या पद मारम् जब गाया जाता है सय दीयार परपंरपरी ज्यान तान गमनन वान वितपित्र की गरह यच्च परतीद गह नहाहा। ऊपादनाचा पा यिषप रहना है। गातों पर यम्घाम म दुतियो परत हैं। जावन की सरा म्यरमें उतार पड़ाय पर की गयम है मना, माशुप है। मसिए प्रापना रम्म अब बुनियादी तालीम आकपण विदु/७७ अदाई से थोडा सा हटने लगी है। प्रार्थना अपने प्रकार हो से माना यह सूचित करती है कि मानव से बडा भी कोई जगदीश्वर है। अब बच्चा में कहानिया -'एक था राजा' स शुरू नहीं करनी है । घट नाएँ घटेंगी, वे किंवदतियो, मुहावरा और कहानिया म भी ढल जाया करेंगी, मानो तारल्य है जो उतार ढूढता हुआ अपन आप एकत्र हा जायगा। जो बच्चे अपने शरीर तक की परवाह नही करते हुए अस्त व्यस्त रहते थे, वे अब बगीचे के वृक्षा तक की दख भाल, व्यवस्था और सार संभाल करन लग हैं । कागज बनान पर और लकही के काम पर भी ध्यान दने लगे हैं । अब भूगोल मे यह न होगा कि बालक को गगा की लम्बाई और मिमिसिपी की गहराई का पता तो हो, कि तु अपने घर के जाने की सीढी की गिनती ही याद न हो। अभी तक हमारे गाने ऐसे थे कि उह नहे बच्चो की नीद आने की दवा कह सकते थे। अब तो बच्चो को सिखायी जानेवाली रचनाओ का सरल राशिक साधा जायगा, एक तरफ 'बच्चा', दूसरी तरफ 'रचना' और तीसरी तरफ उसकी समझ' जिस पर रचना वराबर उतर रही है। जो बच्चा की समय पर नहीं उतरती, उसे समय के वाजार का उतरा हुना भाम समझकर फेंक दीजिए । राष्ट्रीय गाने और उपदेश के गान, यदि बच्चो की सूय के खिलवाड न बन सकें, तो ऐमे गीता को पुराण वस्तु सग्रहालय म बाधकर रख दीजिए। बुनियादी तालीम वह जो 'समझ' से 'सूर्य का रिना बैठावे । यह नहीं हो सकता कि 'सूय' सिर कटी एक् तरफ लटके और 'समझ' धड वनी दूसरी तरफ पडी रहे । सरस्वती के मुख पर ग्रहण लगानेवाले य राहु-केतु जब नही रहगे। अब 'तालीम' की कुला: समाप्त हो गयी, क्याकि बुनियादी तालीम जारम्भ हो गयी। व्याकरण अब उदाहरणा से बनगा। एरिंगटा साहब' को तो अध्यापकजी ही पढेंगे। एक कहानी है कि पाणिनि का व्याकरण रटी हुई एक भील लडको गगा के तट पर झाडिया म बैठी हुई एक माला १ घटन्त विद्या। २ 'भाषा भास्कर' नामर हिदी व्यावरण के प्रारम्भिव रचयिता।

७८/क्ला जोर साहित्य बना रही थी। कुछ मोती गथ रही थी और कुछ सान के गुरिये भी पिरो रही था। व्याकरणाचाय महामति पाणिनि उसी रास्ते से निकले । कहत हैं, न महपि पाणिनि ही जानत ये कि यह लडकी व्याकरण जानती है और न लडकी ही जानती थी कि यही महर्षि पाणिनि है। नपि ने झुयलाहट से पूछा-- काच मणि काचनमेक्सूने अध्नासि वाले तव को विवेक ।' यानी 1-'लडकी, काच, मोती और सोने के गुरिये एक सून मे पिरो रही है तरा विवेक क्या हुआ ?' लडकी ने हौले से डरते हुए जवाव दिया- 'महामतिपाणिनिमेकसूत्रे- श्वान युवान मधवानमाह ।" अर्थात-~"महामति पाणिनि ने ता एक ही सूत्र मे (सज्ञा के उदाहरण मे) कुत्ता, तरण और इद्र गूथ दिया है।" बच्चे जब अपने सिखानवाले से टेढी-आडी बातें पूछने लगें, तब अध्यापक द्वारा उह निरुत्तर न किया जाय, कितु समझाया जा सके, तब बुनियादी शिक्षण सफल होगा। शायद इसीलिए हमारे प्राचीन आचार्यों ने गुरु के लिए लिखा है- शिप्यादिच्छेद पराजय" शिप्य में तो गुरु हारने की ही इच्छा करे। निस्स देह तभी उसके 'गुरत्व' को गाभा है। शाला-गह उदासीन जागियो का अपाडान वह अव्यस्थित पड़ी हुइ वस्तुआ का कचरापर भी न हो। वह नह बच्चा के पिले हुए रूप का नदन-बानन हो। उसम श्मशान को-सी मुदनी नही हानी चाहिए। जो रहे बच्चा को शरारत पर मस्तक नहीं डुला सक्ते, वे कैसे बुनियादी तालीम दे सक्त है, मेरी समझ म नहीं आता। अध्यापक, बच्चों के जेलर बुनियादी तालीम आक्षण विदु/७६ बनत हुए अच्छे नही लगते । वह ब्रिटिश-युग अब कभी न लौट । हमारे अध्यापक के साथ बच्चा अव नयी नयी बाते पूछ पूछकर खेले और खेल- खेलकर नयी नयी वात पूछे। शाला बुद्धू बच्चो का नियत्रण गह न रहकर उसे सूझवानो की समझ का कोडागार होना चाहिए ।

२५ कृपक सिपाहियो का विजय-दिन इतिहास अपन का दुहराता है हम अपन पुरुपाथ से चाह इस क्थन को सच्चा सिद्ध न कर पाते हो, वितु हम इतिहास की स्मतिया को, त्योहार बनाकर दुहरान के आदो जरूर हो गये हैं । कृष्णाप्टमी रामनवमी, पयुपण पव ईद निसमस और विजयादशमी के त्योहार आकर हम अपन पुण्यमय इतिहास की याद दिला जाया करते हैं । इतिहास बनान की धात के लिए पुरुपाथ तेज, तैयारी और तप चाहिए। विजया आयी, और उसी श्रद्धा से भारत के हिंदू समाज न दुर्गा पूजन संवारा, रामचन्द्र की विजय मनापी, अपन शस्त्रा को धो लिया, गनीमत, कि अब पुन उह जग खान को रख दन के लिए नहीं। X स्मरण से विस्मरण की जोर जानेवाले भूतकाल मे से जो उज्ज्वल है, वह शेष जो तजस्वी है वह जीवित, जो निमल है, वह अमर, जो अदम्य है, वह जाग्रत रह ले जाता है । विस्मरण से स्मरण की ओर आत हुए भावी युग की पीढिया को याद की वह धरोहर सौपता जाता है। भारत की पुराण-युग की ऐसी सब यादा म, विजयादशमी, यादा की याद है त्याहारो का त्याहार है। होली म देखकर मुस्वराती है कृष्णाष्टमी कम पथम भक्तिमय चेतावनी देती है रामनवमी त्याग और यष्ट-सहन का बल बताती है शिवरात्रि दारिद्रय को वभवशीलता का सदश दती है, रितु X कृषक सिपाहिया का विजय दिन / ८१ विजयादशमी हमारी जाति की आत्मा को प्रतिवप जोर से पुकारती है और पुकारकर लौट जाती है। X X X वह क्या पुकारती है। बात बहुत पुरानी है-शब्दा के प्रकट करन का तरीका भले ही कुछ और हो । भारत मे एक युग ऐसा था कि प्रजा-पीडा के बल पर लोग साम्राज्य की स्थापना करते, उहे हम राक्षस कहत थे। एस लोग सामूहिक दलन, सामूहिक लूट, सामूहिक शोषण के बल पर जो कुछ निरकुशता करते, उस निरकुश सत्ता का नाश करने के लिए स्वग के देवता और देवियाँ जमीन पर उतरते। जमीन के लडाके, ऐसे राक्षसो से लडकर स्वग में देवता और देविया बन जाते। राक्षसो का यह स्वभाव रहा कि प्रकृति की निमल और प्रभु की उज्ज्वल और स्वाभाविक समाज-व्यवस्था का बिगाडकर अपनी समाज व्यवस्था को चलाते, ऐसी समाज “यवस्था, जो शोषक, पीडक, ऐयाशो और प्रतिहिंसा के लिए सुखदायक हो। पुराणों का महिषासुर ऐसे ही सम्राटो मे था, और उसका नाश करन के लिए दुर्गा ने अवतार लिया और साम्राज्य के नाश का त्योहार बनी हमारी विजया रानी, हमारी विजयादशमी । x X मानव जब प्रकृति से होडा-होडी करता है, तब वह प्रकृति का अपमान नहीं करना । कवि बहत झरनो के गीत लिखते हैं । चितेरे बरसते बादलो के चित्र बनाते हैं। यह तो प्रभु की रचना से की जानेवाली नम्न होड है, अपने निर्माण से निर्माण सीखन को वला विश्व के निर्माता के चरण चिह्नो को ढूढ़-दूढकर निर्माण की दिशा म चलने का प्रयत्न है। फूलो, फ्ला, कदा और पत्तियो स भरे जगला म घूमता हुआ मानव, पशुआ पक्षिया को खात- खाते एक दिन प्रकृति स पशुत्व छाडकर मानवत्व सीखन लगा। उसन पहले दिन अन कण बाये । व उगे, फिर फले । पशु खात और पत्ते पहनत हुए मानव ने जिस दिन पहले अन बोया, क्या उस दिन से बडा भी कोई त्योहार हो सकता है ? विजया वही दिन है। उस दिन विजया जिहें त्योहार ६२/क्ला और साहित्य की तरह, पवित्र त्योहार की तरह, मनानी होती है, वे युगो के शोधा को दिनो म दुहरा लिया करत हैं। x x x आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को मिट्टी लाते हैं। फिर छोटा-सा चौकोन खेत पर ही मे बनाते हैं, और तरह-नरह के अन-कण एकत्र करते हैं, और उस खेत की याद दिलानेवाले, 'बडीयाद' के छोटे खेत मे बो देते हैं। ऊपर से पानी सोच दते हैं। यह अनाज हो गया। अब हाप में कपास से रूई निकालते हैं, बत्ती बनाते हैं। और कुम्हार के यहां का ताजा घडा लाकर उसके ऊपर के दीये मे हमारे प्रयलो को ज्योति को जला देते हैं। उस घट पर हाथ का कता हुआ सूत लपट देते हैं। और जो दीपक दानी हम बनाते हैं, उस उस बोयी हुई खेती के बीचो बीच, घट पर रखकर उसपर, यदि हमारे पास हो तो, रत्न रख देते हैं। क्योकि कृपक-भारत के निवासी हम, जानते हैं कि अन बोया और रत्न फले। हमारा आसन जमा, उस छोटे से खेत को रक्षा होने लगी। अपनी गाय के गोबर से घर लीपा गया । खेत के बीच के घट पर दीपक मे बत्तिया जल उठी। उसे हम 'नदा दीप वह उठे। वक्मि न कृष्ण के पिता नन्द के नाम का अथ लगाते हुए लिखा है कि नद' शब्द के पहले के 'आ' उपसग का लोप हो गया है। यथाथ मे कृष्ण, 'आ नद जमा है। तब यही का न दा दीप भो आनद-दीप क्यो नही? खेत मे अनाज बोन पर, कृपको के जावपण से कृष्ण धनश्याम काले बादल अब जमीन पर उतर आव, और जब रत्न फल उठे तब भला 'आनद-दीप' यो न जले और खेत में फैले हुए 'रतो की कृपक भारत' च दन, चावल, पूजा क्या न करे? फिर उस घट को जो खेतो के रत्नो स भर भर उठे, कृपक पुजारी पुष्पमाला क्या न पहनावे खेती आया, रत्न फले घट-स्थापना हुई जनाज पका दि इम दश व कृपर खेती काटने और अन घर म लान का काम बूढा, बच्चा और दवियो के हाथ मे छोडकर, शस्त्र कर सीमोल्लघन कर दत वे सिपाही बनकर राज सामा अपने मत्ये हथेली पर लेकर खड़े हो जाते हैं। हमारी जाति को सिपहगिरी का खेती म विजय के मोती फ्लानवाला पिसानो को अनदाता स राष्ट्ररक्षक बनान - - धूप, दीप से कृषक सिपाहियो का विजय दिन/८३ वाला और भारतीय राष्ट्र को स्वतत्र उसके ध्वज को विजय ध्वज और उसकी तलवार को तेज पानी को बनाये रखनेवाला यह त्योहार-यही हमारी प्रलय को बेकाबू पुकार उठनेवाली विजयादशमी है। जिनमे बल हा, वे अपनी भुजाओ मे कुछ दूद, जिनमे न हो, वे बदरा की तरह जगलो के पते नाचें।

२६ होली साम्य का त्योहार होली यान जलती ज्वाला, होली याने चिनगारिया, राख । होली अर्थात वष के बीतने को आशा, होली अर्थात नय वष के आने का उत्लास । फाल्गुन के अथ धूल उडाना । परगु के मानी गुलाल । बगाल मे होली, होली नही दोलोत्सव । उस दिन बालकृष्ण की प्रतिमा को झूले म बैठाकर, उहे पारी पारी से घर के आबाल-बद्ध झूले देते हैं । कृष्ण पर फल्गु (गुलाल) चारा जाता है और बचा हुआ गुलाल प्रसाद रूप सबको लगाया जाता है। बगाल के नवाब सिराजुद्दौला उस दिन का उपयोग अग्रेजा के एप्रिल फ्ल की तरह करते । उस दिन वे झूठी खबरें फैलाते,और उनका परिचित जो सरदार उम खबर पर विश्वास कर लेता, उसे मूख बनाया जाता, मूर्ख घोपित किया जाता। उडिया घरो मे बालकृष्ण को मूर्ति ही उस दिन पालकी में बठाकर घुमायी जाती है। इस त्यौहार को बगाल के चत य महाप्रभु पथ के लोग बहुत गरवीले होकर मानते हैं । रग के इस त्योहार के स्वामी होने से दक्षिण मे भगवान् श्रीकृष्ण 'श्रीरग' कहलाये और उन्ही के नाम पर एक पर बसाया गया 'श्रीरंगपट्टन । श्रोरग नाम के साथ पट्टन जुड़ा है । पट्टन सस्कृत 'पट्टनम' स बना है, जिसका अर्थ है 'नगर'। महाराष्ट्र देश मे, पेशवाई युग म यह त्योहार पूरे दस दिनो तक मनाया होली माम्य का त्योहार /८५ जाता था। वहा होली जलन की पूर्णिमा अथवा धुरेंडी की प्रतिपदा को वह महत्त्व प्राप्त न था, जो 'रंगपचमी' को था। चूकि नाटक, प्रहसन आदि इसी महीने म प्राय खेले जाते, अत उनके खेले जाने के स्थान का 'रंगभूमि' नाम साथ होता है। इस दिन उत्तम और शृगार शामन वन्यो को पहनना, मिष्ठान्न भोजन और अपने को भूल जाने तक मनोरजन, यह भारत के उत्तर-दक्षिण, पूर्व पश्चिम सब तरफ एक सा है । इस दृष्टि से, हमारी संस्कृति की हमारी राष्टीयता की विस्तत एकता सिद्ध करनेवाले त्योहारो मे यह त्योहार प्रमुख चूकि दक्षिण देश मे महीना शुक्ल पक्ष मे प्रारम्भ होता है, इसलिए पूर्णिमा को महीना न बदलकर नागामी अमावस्या को बदलता है । अत फाल्गुन का महीना बीत जाने पर हमारे उत्तर भारत म रगपचमी जबकि चत्र के प्रारम्भ म पडती है, दक्षिण मे वह उतरते फाल्गुन ही म पडती है । ऊँच नीच भेद, उम्र का अतर, शिक्षण की विषमता आदि मानव मानव के बीच की किमी विभेदन रखा को देश के किसी भाग में उस दिन प्राय प्रश्रय नही दिया जाता। पजाब में सिक्खों के 'नामधारी'-सप्रदाय मे इस त्योहार पर, सामूहिक विवाह प्रथा सुनी जाती है, जहा धमगुरु महोदय को उपस्थिति मे वर-क या का विवाह होता है और माता पिता को खच आता है, फी विवाह एक-डेढ रुपया। हमारे यहाँ बसन्त पचमी आयो कि त्योहार प्रारम्भ हो गया। माघ मुक्ल पचमी से चैत्र-कृष्ण पचमी (रगपचमी) तक हमारा होली का त्योहार। इस समय हम वसत का स्वागत करते हैं । जाडा गुलाबी रह जाता है। लू और लपटो मे लिपटी गर्मी आन नहीं पाती। बरसात का कहो पता नही उस बीत चार महीने हो गय, उस आने मे चार महीने बाकी हैं । साम्य का युग छा गया। इस समय हम गेहूँ, चना, मटर, अरहर अलमी आदि फमलो का त्याहार मनाते हैं । इस समय आम बौरत महकते और फलते हैं । इस समय ८६ /कला और साहित्य आम की पत्तियो की लाली स तांबा उसके कोपलो से पुखराज और उसके पके फला से सोना निखरता पक्ता है। खेत में खलिहान म, जगल म, वीरान में इस समय मानो मोना उग उठा है वह हमारे जीवन म भी क्या न उग उठे। इस समय कहते हैं, भक्तराज सत्याग्रही प्रह्लाद को राम नाम लेने पर एक जालिम सम्राट ने पिता हाकर भी पुर तक की वाणी का स्वात य छीन लिया था। कहते हैं अपनी राक्षसी बहिन से सम्राट ने कहा कि ऐसे पुन को आग में जला दे जो मेरे सामन 'नारायण' का नाम लेता है। सवभूत- हितेरत प्रह्लाद ने कहा 'गले तोक पहिरावी पाव बेडी ले परावी गाढे बधन बँधाऔ, यो खिचाओकाची नाल सौं। और बीछुले बिछाऔ, तापै मोहि के सुवाओ फेरि आगी हू लगाओ, बांधि कामर दूसाल सौ। गिरि से गिराऔ, काला नाग से डसाओ हा हा । प्रीति ना छुडाओ गिरिधारी नदलाल सौं।" होलिका जल गयी, सम्राट मारा गया, प्रह्लाद बच गये । दशहरा और होली, दो महान त्याहार पुराणा मे, दो महान सम्राटो के सवनाश के और जन-जीवन के उल्लास-पव हैं । और आज हमारे निश्चय हैं हमारे श्रम हैं, हमार त्याग हैं, हमारे उत्सव हैं। आज हम पर पराधीनता का बधन नही है। होली मे हमारे घर 'कट्टर युग' में भी जातिभेद, ऊंच नीच का भेद नहीं होता था। अब तो भेद रखनवाला दण्डनीय होता है। हाली में हम उम घर हठ कर जाते हैं जिनके यहा इम वष भर मे शोक हुआ हा, शोक्ग्रस्त लोगों को साथ लेते हैं, गुलाल लगात हैं रग छाइते हैं, उह जन जीवन के अन त उल्लास में शामिल करते है । उम दिन नजीर देशलाका हम पर रम छा जाता है- 'गोविद छल कुज विहारी की बालोज तुम भी नजीर कृष्ण मुरारी की वोलो जै॥

२७ साहित्य के प्रति मेरा दृष्टिकोण मैं प्रारम्भ में ही निवेदन कर दू कि जिस जगह स जिस धरातल से, जिस बेचैनी स, जिस परिस्थिति से जिस लाचारी से अथवा राप्ट और मानव के जिस बह स, आनद से और मरण स मेरी तुक िदया आती हैं, उसी द्रव्य स मेरी कहानियां, निबध, अय गद्य तथा 'कर्मवीर में अथवा अयन लिखे लेख भी आते हैं। जैसे दीवार पर तस्वीर टागने के लिए कोल की और पांव म गडनवाले जूते की कील ठोक्ने के लिए हथोडी की आवश्यकता होती है, उसी तरह भिन भिन्न रूपा में मुझे भी अपनी बात उपस्थित करनी होती है। खयाल जब उठता है तब जननी की तरह मैं भी उस अत करण में छुपाये जाने की पद्धति से भाषा मे छुपान का यत्न करता हूँ किन्तु भापा सरल रखना चाहता हूँ। मेरी भाषा पर भी कठिन हान का आरोप कही-कही है किन्तु मेरी लाचारी यह है कि उन विचारी का मेरे लेखे उसस सरल भाषा में नहीं लिखा जा सकता था। मेरे एक अत्यत सन्निकट साहित्यिक मित्र न एक बार मुये लिखा था कि आपके गद्य-काव्य' तो लिसे मूसा परे खुदा' की हालत के होते हैं उह कोई पढे तो बस पढ? उह मैन विनोद म उत्तर दिया था, जी, आपके लिए मैं अपन 'कमवीर के अग्रलेख और टिप्पणियां लिखता हूँ, कृपया आप उह पढ़ा करें।' एक दूसरे पत्र म उही मित्र न यह शिकायत की थी कि सभी गद्य-बाप-लेखक तो ऊल-जलूल भाषा लिखते हैं, किस विसका रोना रोइए उसे मैंन फिर +--- ८८/क्ला और साहित्य उत्तर दिया था जिसमे एक वाक्य यह भी था 'आपने यदि गद्य-काय कुछ पुस्तका में पढे हैं तब तो बहुत लाचार हूँ, कि तु यदि किसी नियतकालिक मे पढे है, तो उसम गद्य काव्य के सिवाय और भी बहुत कुछ पढ़ने का रहा होगा क्यो न आप उमे आनदपूवक पढ़ें ?' यह तो विनाद हुआ, कि तु विचारों को पढ़नेवाले लोगो से यही निवेदन है कि अध्ययन के, आन द के अथवा अनुभूति के अभ्यास मे यदि वे खयाल ही ढूढत हैं तो विश्व के पढन- लिखन के क्षेत्र उह कुछ गहरी डुबकी लगानी ही होगी वितु मैं इस कठिन भाषा का समथन नहीं मानता । जो पसी भाषा का लगातार उपयोग करते हैं जिसे लिवते हो कठिन होने के कारण जन जीवन में पहुंचन के पख तोड दिये जाते हो एसी रचनाएँ चाहे जितनी श्रेष्ठ हो, वे जन जीवन से दूर और कभी कभी निम्पयोगी सास्कृतिक बस्तों मे बाधकर रख दन की चीज बन जाती हैं। मैं इस प्रवत्ति से डरता हूँ। मैं इस प्रवत्ति से भी डरता हूँ कि साहित्य के महान क्षत्र में मदमे विनग रहन की प्रवत्ति जाग्रत की जाय। मुझे भय है कि इस प्रवृत्ति में समाज के घटक समाज के दगाबाज बनते हैं। इसी प्रवत्ति मे व्यक्ति अपनी महत्ता के अह के कारण केवल अपने मे व्यस्त, अपने में मस्त और अपना ही अभ्यस्त होकर बट जाता है। जीवन में जो जूझते हैं बलि हो उठते हैं अथवा साधनशीलता मे सर्वोच्च हो उठते हैं वे जीवन को लिख नही पाते। उधर वे हैं जिनका साहित्य कभी जीवन की झड नही झेलता । एसा व्यक्ति बलिदान के गीत गाता है जिसका बलिदान से भी कोई रिश्ता ही नहीं रहा। मेरा नम्र प्रयास रहता है कि मैं बलि और जीवन को सर्वोच्च पूजा भावना के साथ, भूला पर व्यग्यो, और भोगे हुए शूला पर रग तथा श्रद्धा से साहित्य में उतारन का प्रयास कर भले ही वह मुझस सधे या न सधे । वैदिक वाणी म ईश्वर को 'स्वयभू' कहा है-~अपन-आप उत्पन होने वाला । उसे कवि भी कहा है। गणित के हिसाब से जी हाँ गणित के हिसाब से भी, मेरी मा यता यही रहती है कि मैं कचि को 'स्वपभू मानू । भले ही मुझस कविता लिखत समय कुछ न बनता हो, किन्तु मैं जिन कवियों का पढ़ता हूं, उनके प्रति रहन- वाली स्वयभू भावना का सम्मान करता रहता हूँ। जब वे अपनी क्सिी कलाकृति का रूप अपनी यादा म सजाया, बनाया या चिगाटा करते हैं तब साहित्य के प्रति मेरा दष्टिकोण/८६ व अपने ही 'कला पिता' हाते हैं, क्ला पिता होन के दढ भाव से वोझीले होते हैं । जब उनकी क्ला का रूप वन चुक्ता है, तब वे कला-माता के गुण- गौरव स गोद भरे होते हैं, किन्तु जब उनकी क्ला रूप ग्रहण करके कागज पर उतर आती है, तव मानो वे 'क्लापुन' होकर विश्व की नजर और समझ की गोद में खेलने के लिए जगत म चल देते हैं। अपनी इस धारणा का मैंन ही कई बार मजाक उडाया है, किन्तु इस धारणा के प्रति मेरी श्रद्धा है, क्यारि 'स्वयभू' शब्द का अथ मैं अपने सामन स्पष्ट कर पाता हूँ। मैं वहाँ लडन की प्रवृत्ति रखना चाहता हूँ, जहाँ साहित्य को चौमुखी प्रतिभा के व्यक्तित्व को, भले ही वह परिस्थितियो को कैसी ही कठोर भटिठया मे तपा हो, न हम निखरने देते हैं, न उभरन दते हैं। जन जीवन की ओर से तो मुझे यह कहना है कि सूर, तुलसी भीरा और क्वीर को तथा अय सन्त-कवियो को गाव-गवैयो के लोग उतना नही समझते, जितना शह- राती लोग समझते' होंगे, कि तु गांवो की चौपालो पर और समारोहो मे इन कविया और स तो के गीत किस भाव भक्ति से गाये जाते हैं, यह कौन नही जानते। अत विचारो की निगूढता की उपेक्षा करनवाला हमारा समाज तो नही है, भले ही वह आज भी छियासी फी सदी बे पढा हो । यह तो हमी हैं, हमी शहराती हैं कि साहित्य को जन जीवन के पास पहुँचाते भय खाते हैं । एसा कैसा दुगधित और दूषित द्रव्य हमारे पास है, जिसे हम जन जीवन के पास पहुंचाते डरते हैं, उस जीवन के पास जिसका स्थान गांधीजी के शब्दो मे 'जनता जगदीश्वर' कहा जाता है । आत्म सकीतन के स्वर को यदि हम थोडा कम कर लें, तो युग की कला को दूर दूर तक पहुँ- चाने की हमारी इच्छा होगी। इस दिशा का साहित्य बन, फले फूले, यह मरी हिमायत होती है। पौने चार दिमागी एयाशो की बाह पर युग की वाणी के पैरा म बडे बडे पथरीले गहने डाल देना, जिससे वह जीवन म संचार न कर सके, मुझे अभीष्ट नहीं है। गद्य में मैं लेखको और कलाकारो के लिए चाहे जितना लड , कि तु क्ला मे मैं भीख की भाषा पसाद नहीं करता। मैं निवेदन करूं कि कला मे वादा पर मेरा कभी विश्वास नही रहा । विसी रचना का कोई छायावादी कहे, रहस्यवादी कहे प्रगतिवादी कह या प्रतीकवादी हे, इन बाता से मुये - ६०/क्ला और साहित्य कभी कुछ नही लेना-देना । मैं यह भी नहीं मानता कि बारीक-खयाली केवल पद्य म लिखी जा सकती है, गद्य म नहीं । केवल मैं इतना साहस चाहता हूँ कि हम गद्य को गद्य और पद्य को पद्य कह सके। कला का समथ क्ला का, चाहे जो रूप संवारे, वह गा उठेगा तो जगत् भी उसके साथ गा उठेगा, वह अद्ध गद्य अद्ध पद्य म लिखेगा तो लोग उसे पढन लगेंगे वितु इस दिशा म हम इस धारा के दोना तटा का सयत ज्ञान रहना चाहिए। यदि मैं सामथ्यहीन हूँ तो यह क्या न साचू कि मेरी जिद स कोई गद्य को पद्य नहीं कहने लगगा और पद्य को गद्य नही कहगा, हा कला वे दाना ओर रहगी। सिफ इतना ही स्मरण रह कि भापा का कुतुबमीनार खडा करके उस उतने बडे आडम्बर म हम तिल भर वात न कह दें। हमार समालाचक से हमारा चाहे जो रिश्ता बन जाय और वह हमारी प्रशसा एक पलडे पर रख ले और कम से कम पिछले सौ वर्षों स क्ला और कविता पर लगाय जानवाले सदेह चिह्नो का एकत्र कर ले तो हमारे इस कथन से मिलत जुलत कथन हम पीढी दर-पीढी मिलत चले जाएंगे। या वैदिक युग म भी हम सदा छद ही नहीं लिखते थ। गायत्री उप्णक त्रिष्टुप, अनुप्टुप आदि छदा से भिन्न हमारे पूर्वज सूत्र लिखा करते थे। हम आज तक उह मानते हैं । काव्य और मलाओ के नाम पर जो हाट म आ जाय या बाट म पड जाय, वह सब तो काव्य और क्ला नहीं हो सकता नही कहा जा सकता किन्तु नवीन और प्राचीन के पथ-सचलन का अतर न कभी मिटाया जा सकता है न मिटाया जा सकेगा। फिर यह शिकायत अवेले हिदी के कवियो म खिलाफ नहीं है, अकेले भारतवप मे नहीं है। क्ला के पथ-सचलन और सांस लन की यह विश्वव्याप्त धीमारी है । अत हम छदा म क्ला और कला मे छद खोजने का प्रयास कभी-कभी रा सकें और क्ला के समय कला और छद क समय छद देखें, तो न हम ही अपशब्द कहन मे स्वच्छद हो जाएंगे और न कला के नवीन पथ सचलन का ही उद्दण्ड कहन लगेंगे। वादो म बिलकुल आस्था न रखते हुए भी मेरी यह भावना है। मेरे विचार से नीति म वचना का प्रभाव सयम को जाग्रत करता है, सयम प्रकारान्तर से अतप्ति का बल देता है, इसी अमर अतप्ति से विश्व की सृजनात्मक प्रेरणाआ, सूया, आविष्कारो, समपणा और वलिदाना का साहित्य के प्रति मेरा दप्टिकोण/६१ जम हाता है । यो तो प्रतिभा सदा ही भली लडकी की तरह ससार मे नही भायी। चोरी, शरारत, गुनाह पर गुनाह, गलत है कि स्वाध्याय ने जब बनाया, व्यक्ति बडा ही बनाया। हां, पूजा भावना ने गिरते हुए मानव को सम्हाला, सुलझाया और ऊँचे पर उठाया। उसने जिदगीरे घट, दिन, महीन, और वरस भारी नही पडने दिये। उसी की कृपा है कि आनद और भयकर- ताा मे स समान रस की प्राप्ति होती है। व्यक्ति से परे समूह, समूह से परे ब्रह्माण्ड के प्रति चौक ना केवल समपणशील व्यक्ति ही रह सकता है, क्याकि अध्ययन मे औरयाया मे जड गगा को देख तो डाला, कितु उससे जानकारी और कभी कभी ज्ञान के भी दशन हुए, वितु इनके वेवल हाथ पांव मात्र मिले। मानव ग्रथो को पढकर बिना शरीर के नान की अकमण्य आत्मा को घसीटकर घूमते रहे। 00

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Kala Aur Sahitya

Author
Makhanlal Chaturvedi
Title
Kala Aur Sahitya
File name
Kala Aur Sahitya
Text
OCR done
Citation
1986
Published
2011/03
Publisher
Prabhat Prakshan Chawadi Bajar Dehli
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551032
Barcode
4990010031813.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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