Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Premchand Ke Nari-patra
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मार प्रेमचन्द के नारी-पात्र
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प्रेमचन्द के नारी-पात्र
प्रोम् पवस्थी
नेशनल पलिशिंग हाउस, दिल्ली
मेगनम पम्पिधिम हाउस
२६ ए, पगमोक, पवाहरलमर रिली
बिक्री केनमई तक रिम्सी
प्रथम संस्करण
विधम्म, १९६२
पोपपने
हरिपाम स्वामी
पोमा प्रिटर्म
१५ ईस्ट पाई रोज
नई दिल्ली
पारद को
जिस में ही क्या सकता हूँ।
-मोम्
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प्रामुख विपापी जीवन की समम प्रारम्म से ही मुझे प्रेमचन-साहित्य के प्रति पत्तरोत्तर पर्वमती विज्ञासाहीकारण सम्परत यही था कि मैंने पनी अत्रियों में पार से प्रदेश लिया था पौर बटवारे के सपन्त अपनी र परम्पए केशविदम पर किसी-साहित्य से मेरा सपार पाए होमे नया वर मेरे मन में सर्वप्रथम यही का भारी शिदेखें गई में नियम पामे प्रेमधाम हिन्दी सेवा में कोटक फल हो पाये पार में पसी प्रकार से समस्या कि मम्मपन को ऐषी गुमनात्यक पपिवस्व प्रवृधि मरकानी ही तो की किन्तु इसमें संदेह नही किसी का सरल मम सियाबिसके परिणामस्वर रिस्तो विविधामय की एम ए परीधा के हेतु अपने मुमोनीट-परंप-मियम प्रेमचन्द के मामार हो को सील करा सका। प्रस्तुत पुस्तक सौ का संपोषित है। प्रेमचद पर समाज निर्माणात्मक पासोचनाएं बहुत कम हुई है और घी से पके माता विपम में अपार मठ-विम्य मिमहानिस पर पनले मारी-पापरतिमा सपिस्तर विषम का पना स्वाभाविक है। मुझे हो ऐधा प्रतीत होता है कि सामायिक बीपन में भारतीय नारी में अपने अपने प्रति संकरित वाणका कर पिहले समन्ति-युप में मिस प्रभार विकास-बापा की। उसके पनुरूप ही प्रेमचन्द की मारी-पाना एवं नापित्रण को लेकर दिली-मातोषना भाबी एस्पात सीमा पा है। प्रमपम साहित्य में पनुमा मारी-मारमा निरिस पी.मारी पार और नारी-पिल पी ही रहे पिस्तु इस सम्बंध में एक ही समीक्षा की पावताएँ एक मही एवम विस मेसनी ने प्रमपद को नारी पिपरा में पान माना पाही पाय रस पिपरह की पेमा मी अनुभए करती है। ऐसा हो। अपरिपाप माम्पवामा कारण या मविवारी मारयन्ति मोरिस्मेवों की प्रतिभिमा साम? बो भी हो निर्मास की रिया मे यह म स होकर कोई निरिक्त पित तो नही पाता।
पों म पानोपना र पारम्भ से ही मारी हो सही चिपकी हाईप्रपा पूणिों से युक्त महा! ऐसे में बालोरणों की भरमार से म गापा कमरा पर ही पना। यही विलास मुझे पाकिमने प्रेमचम्म-साहित्य का पापोपान्त का पार पम्पयम किया और पिसी भावना को परिपुष्टि प्रथमा म्पप्टीकरण लिए नहीं के बाणों को पासमा मात देकर पाइससे एक तो में प्रेमचम्म के प्रति स्पए प एका इसरे पारम-सन्तुष्ट बी पेस किसे प्रेमचन्द का कोई पिता किसान बो मिनी सीमाओं से मामन्त मले में हो कार तो नही। भान र साहित्य-कलों की समृद्धि पान-माप सनकी समस्याएँ भी मारी होती मा पो पालन की मानवमुना माग साप हो या वममने की भी विशेप पाता है कि कपा-साहित्य से बन रषि को सर्वाधिक प्रमाणित करता है और सरय-कृतियों का प्रेरक हुमा करता है। मुझे यह कहने में तनिक पौरिह नही किफुटपाप का हमारा पश्चिमा साहित्य समापी रोगराए पर पुनकपुरतिर्यो बारा को पाने गाने पम्पास साहित्य को कपित करने और अपरिपसबम-चिको अस्वस्थ बनाने में विप कारण हो । परि ऐसा निस्तर होता गया तो मानव मूल्यों को लेकर हमारे साहित्य पर नही पान-पित पुन मन्त्रिपठेमा गिसकी प्रतिकिया प्रेमपरको नारा-भावना ने अपने गुप में की हो। बाप कोसते हे हम प्रेपचार की नारीको पौर सनकी उपयोगिता की रष्टिको शिस्त पाप मह पर एक भून परब की मपैमा रखता है--ऐपी परब यो साहित्य को युप-गर्म का उपकरण मात्र हो नहीं माने पिस्तु पाम भूक मास्माका हमाल पापि सन से भी होता है। इसके लिए पाया हम सपकी प्रिवेशमान पर हम पनारस्पमिरेले की प्रवृति से बठिपकान प्रहापारी मोटी ही को समीक्षा का मान ग म माने पौर गोशिए प्ररिया में मिली सबसत्त को भी किस्मत म करें। प्रेमबर की नारी निषय हो इस पोर गिन करती है। मन इस मूनी रिया में गाने का प्रपात मिाई और सब ही मारिणा सती संकरी बापि मही मिनी किसममी मातीपी है। पषिक नही कहना है कि पपना कपन तो ति सर हो पा करतो । किनु माम नई पौरम शमों महि प्रसप गुरु प्री महेन्द्र परो यो मिरीयल निगम से ही नहीं पतित हे मी मने पहुच प सीमा है। ऐसी कि पति प्राम्य ही से मिना करती है। मेरे लिए पर्व का विषय है कि पूम्म पुसरा मोडपरमों में रिया-प्राप्ति का प्रसा मुझे मिला है। पदेया समामुदि । माथिली सिना र रिबन मातक रपरप प्रोमा मोबमराव महायम रा योगामाप विमारी तामा• मोम्पका-ऐसे सईमाग्य हवा पारम् मुस्वार्य से ग्ब नही हो सकता। अस्पन्त मामारी हूँ मेहनत पम्मिलिग हाउस के पातक कामिनो कारख वह पुस्तक प्राए में पा सकी है मा मिनके स्नेहमय भार में मुझे पर भापित किया है। परम पुइर भी वन पपर से मेरे संपर्पमय बीवन को भी प्ररसा मिनती ही है पीर प्रस्तुत पुस्तक की पाण-मिपि को उत्साहपूर्वक मुनने के उपरान्त बो परामर्श मिलते रहे हैं मका धम्मद मिम्पत्ति नही मनुभूति हो। एसपीर परमरकर दिनात पोम्पपी
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१ प्रेमचन-पूर्व हिन्दी-रपामास में नारी चिप
२ प्रेमसम्द के मारी-पार्मो को सामाजिक पृष्ठभूमि
३ प्रेमचन्द को मारी भावमा
४ प्रेमचन्द मारी-पानों का वर्मोकरए
. प्रेमवार के विशिष्ट मारी-पात्रों का चरित्र चित्रप
(क) प्रेमिकास
प्रेमा
ममोरमा
पिया
वारा
नम्बा
प्रेमा
सिमिरा
७
१
१
मामती
(ब) परिहासा-म
सुमिश
मन
रिसपती
८४
स
-
बिमासी
पुस्मूम
बामपा
१२४
निर्मला
मुम्नी
धनिया
मोषिती देवी
रानी सारंपा
समा
१४८
() मार-म
पनी बाहरी
समोनी
कपा
(प) राष्ट्रदेविका-स
सुबरा
(1) विषया-म
गायत्री
१०१
.
मासी
१ प्रेमचन्द पूर्व हिन्दी उपन्यास में नारी चित्रण माहिम मौर मारीमा सम्पन्न सास्वत पर उस समय को निमामा मी उधम पारी समस्या नही है। वही कारण है कि माधुनिक युग से पूर्व हिन्दी साहित्य में सामान्य नारी-भाषना की प्रमिम्पति प्रत्यन्त एकापी समाय निरपेम अविकसित एवं प्राय परसी की है। रिक काम में जिस नारी के सहमोवामान में मोक्ष-सिरिता प्राप्य सममी माती रही तमा बिसे मनु में पर्षवाका स्पाम रिया प्रार्मों की पाम्ति-समवावस्था में ही उसे पु-प्राप्ति का सामन-मात्र सममा बाने नमा पा । मुसलमानी सम्पदा के माममन (..) से तो मारी पारीवारी के भीतर पर के पीछे की उत्सुकता बन मा। पुरष पौर मारी का सम्पर्कमा रातों प्रथमा बम बागारी कोठो प्रेसा प गया। फम हिन्दी साहित्य के मारिया की मारी भी पोय प्राधान्या ही दो) भोप से निबटने के दो ही स्पष्ट मा तत्कालीन साहित्य में परिलक्षित होते है-भोप से पत्पन्त रिनिवृत्ति प्रपना उसमें ग्रंप प्रवृत्ति । बोरों एवं नियों के विरतिमूना साहित्य में मारी की चाया तक से हने के उपरेम मिमते हैं तो माममार्गी तो पे ही मिल काममार्गी मिस्तु बहाँ तक मीरगावामों का सम्मान यहाँ भी नारी प्राय वासनारम्य पार्पण काही विषय है और उसका चित्रण पभोप्या का प्रेरक शक्ति प्रपया पुरप की सहनामिनी का नही। वस्तुत इन सभी साहित्य-बारामों में प्टि-मेव माग मारी भावना का हरिकोण मूमन एक सके सम्मोग्या समका दोनों भावनामों (पिरतिमूक्षक पौर बिनास-प्रवृत्तिमूम) में सामवस्य महिकाम में भी स्थापित न हो सका । विरतिमूमक दृष्टिकोण ही बहुषित प्रतिपारित होकर उमर पापा। मीर मे बाबासा भाव हमारे हरे, तुम बिन पिया मेहर का होपा को उसके समक्ष नारी को हिक पापायवा पचाय पी हामी किन्तु मारी को पावरबह पीनहीं दे सके उसकी मार। बहुत दरबाकर ही रहोंने पनाहर मार को प्रसना की। वस्तुन मारी के प्रारर की प्टि से पे बिना उसके मन पी पपार महई तक पहुँचमा २ प्रेपर-पूर्व हिवा-सपम्पास में मारी-विमल पसम्मर, किन्तु दुमतीराम में भी ऐसा नहीं समा पौर पसिधा सम पुति तन' मा 'प्रथम ते पबम प्रथम प्रति मा कह-कहकर उन्होंने साषा- रख नारीको प्रमार की प्टि से देखा है। साथ ही नारी पाप-स्म में उहानि पहुत मारी पौरिया को प्रस्तुत किया। निस्सदह पौवा का पादप पपूर्व पिस्तुपमम्माता को पूमा मानते इए भी उसको मनोमासिनी मारी-सम्पति को पर यह पमुपों की-सी चाइना की पपिकारिणी' मानते है तो सप्ट हो पाता विशेष मारी का विशेष (पचीपिक) स तुबमी को माझा सापारण मारी के प्रति एनकााष्टिकोण भी मूल पम्प प्रेरित हो पा। इस प्रभार मधि-साहित्य में बनी पती बायसी को नाममती पौर परमावती मा भरपरको पषिका और योपिकाएँ। नारी का मरम्म इनमें परस्य उपसम्म होता है परतु मारी भावना इमकी कगात मार सकती सीमित है एकागरी। दूसरे मारी-एनका भी रिपिष्ट । एमम नीति नहीं। पस्त परको बोझै घोड़ा सा न करराम भको रखते है कि सूरमहा चोष हपको भोर भारता से सहानुभूति पते । यहाँ भनेक परों में नारी उपाप्यास्मिक मार्य की बापाप में होरप्टिगोचर होती है। पायसी का प्नसेन पो ऐते स्म पर मुग्म होता है वो इस मोर की वस्तु मही पबना यह भी करता 'तुम तिरिमा मविहीन तुम्हार्य। इस प्रकार हम देखते किगफिनान में भी मारी प्रति स्वाप रष्टिकोण पर ममाग । पारिमत की नारी-भावना प्रबान मसंयत है वो महिमानीन रप्टिकोण पपन्त सम-साप्प पार प्रमुखता संपत है। इस प्टि से पहबापना पूरी मापना से रकष्ट अपाय है कि यापीमस्वरमा कार मस्सायानिक निरोष पवित्रय को पाम देता है। तिनवीन भारी को इसी भावना का पिमर बनना पड़ा। ना कला के मिए हो यह वो पास हो गया। रितुपब या वितासिता के लिए हो पाती है तो समुपे ऐप पर मोर उसमें मी रिपेषत मार्ग पर प्रसस्त प्रभाष परता है। रपाको विनाविता में बाकरमाने मारी के घर-प मोष गते । 'परमाका 'गो' 'बोपकालिमा पाने का मई इसके अतिरिक पौर क्या हो सम्ताकि रीतिभनीन मारी भावना कम रखनारी पर मामित है वो बम तम्सीजन पर है बो निपट-भोग्या । परम्प पासना की तृप्ति का साधनमात्र-बो नितान्त लामाम्या म्पभिचारिणी पहरे को तो पहिलाच में मी मौलिकीपोषी मनिमति र वा प्रेमवरपूरिन्दी-अपम्पास में मार-पिपण ३ पिरपर मारिमाप्यम से हुई है किन्तु एकदो की मारी-मापना प्रार राम्य की रोटि में ही माती है मरे पक्षी सहा अस्पात सप एवं पीरण संमेपर हम रेवते कि भाभुनिक काम के रुप (ग्मीसरी पताम्दी के पूर्षि) तक हिन्दी-साहित्य में मारी के प्रति निम्न दृष्टिकोणों को प्रभिम्पत्ति - (1) मारी से पूर्व मनामन रितिभूमकरपिडोल-मिल्ल बोर एवं न सिमों का पार्मिक माहित्य माव सम्प्रदाय की पनाएं चार बार पसः पारि मिणियों का बाप्प तथा मौति-दियों की रचनाएं इसके अन्तर्पत मी पा सकती है। (२) मारी-विमेव के प्रति पनि एक मारवारी वमा नारी-सामान्य प्रति मितिमूनक हपिकोण-ससीराम ने ही प्रभास टिकोरस का प्रतिपादन किमा। (1) मा प्रति प्रेम-सापना समिकोषसको प्रया। (6) मनोरिक प्रेम-सापना-मीरा सूर सपा मुखियों की समापों में इसका प्रतिपादन हुमा। (ब) मौकिक प्रेम-साधना-पाहम देवता रिसी वीना तक रणवान पार बनानर माहिरनार्मों का पर्ष विपय यही है। () मारो के प्रति निपा-मोग्या भप्टिकोप-याममा निगे पसबा मालित योपियों बिहारी एक सीमा एक विद्यापति कमा पाप गति गंगारियों में इसी प्टिकोण पभिम्पति हुई है। (पर्वत सिम एप्टिपात प्रेमचन्द से पूर्व पिम्पाट में नारी दिए सा एवं प्रेरक पतियों को समझने के लिए मिा पमा है। प्रेमचन्द-पूर्व हिन्दी-अपम्बाप की परिधि प्रापः १५८ र १५f सकसी मानी जाती है। यह समय पापबकि भारतीय समाव का सम्प प्रेमरेजी सम्पदा से तपेपरमा पापा। सम्पता के नाम प्रधानों के मापण एक मुल समाराम हो पा पा--ऐसा समान रिसे अपनी सम्मता संदूषित पा पिसी मग पी पी पौर वो अपने मित्रामा पारचात्य समार सिमित र पना सीप हा पा। इस प्रतिमा सम्म ही माटमार भी कि पर्म की पतासाभावा हुमा मुमारपारको पोरसरममा पापा। नसके सातविक यूपों एवं विरेपी सम्ममा कास चको पहिल्प-समार मी अनुभव कर पापा और पिता के पाप्मम से प्रेमचन्द-पूर्व हिन्दी उपन्यास में मारी-चित्रण इराकी पभिम्पक्ति भी प्राय हो रही पो छिन्तु हिन्पो को पम्पास दो मिमा ही परिषम की ऐन-स्वरूप । इसलिए पाझर्पस की एकमत भावमा पश्चिम के प्रति लालीन उपन्यास-मपको मे माश्य रूप से विद्यमान भी। बावस्तु को पर करने का ग पो ने वहाँ से सीस पे पितु देसम्पापी मुभार पान्दोमनों तवा निधी संस्कारों के कारण पापचाव उपम्यासों के सामाजिक विषय को प्रहण करना उनके लिए कठिन हो पापा। पारी-भाषना के विषय में भी यही हम्दारमा रिपति पी) पाचात्य नारी-म का तात्पनीन हिन-समार मे पहीत होना असम्भव पा । दूसरी पोर सामाविक पम्पार्यो में प्रव साम से मात होता है हिमतालीन उपम्यास-मेहक विकासीन नारी-स्य से मी सम्तुष्ट महीं थे किसी भी निश्चित परिणाम के प्रभाव में सामागिक सपन्यास-मसरों में नारी-चिारण से प्रायः पाव बना कर ही भिकमना पाएमकर रिया पौर मरिमोडी लिए सामालार किया भी तो नैतिकता एवं प्राचीन उपरेसात्मक संसात-साहित्य की प्रेरणा-स्वस्प पातिकत, महनीमता पारिकी मापा वारा राह-पनवे सपनों की पणि पछि-माण कर रो और पषासम्मष 'पुस्प पात्रों के माध्यम से ही अपनी पारणामों का निस्पण करना प्रारम्म कर दिया। किन्तु इतना प्राय है कि इनकी नारी-मानमा रीतिकानीन नारी-भावना से बहुत-कुच हिम्न है । (हिन्दी के सर्वप्रपम पम्पारा पीया मुद' में ही यह विमानक रेखा स्पष्ट हो जाती है "एक विमान से पूछा गया था कि कोई मनुष्य ऐसा होगा को पिसी परती मुम्री के साथ एकान्त में बैठा हो परवाणा मन हो पहरे मामा सोता हो मन जसपा एा हो काम प्रबन हो 'पौर पहमपने सम-एम बस से नियोंप बच सके ! पतर मिला हो या पपती मुन्दरी मे च सम्वा है पिस्तु निन्दको को निन्दा से नही । स्पष्ट है कि रीतिममीन नायक ऐसे प्रसर में कमी मही + समता पा किन्तु प्रीनिवासदास नारी उप स्पून रूप को देखते हुए भी रस प्टि रचाकर साफ निकस मए है। यही है मारी- भागना में अन्तर परिरापित हो पाता है। चिन्तु पन्तर नाममात्र को ही य पाता है क्योकि माम्भक हिन्दी उपम्पास बम नीति को मार पाठकों में वृद्धि म पा सरापरव-से उच्च परामों में तो प्रादसों बी सामापरिपपर पन्यास का पन से ही पमित पा और पवित्र पस्त मप्पा को चाहिए या हरे मुम्के रोमाष । १ परीगर ओनिनाम ! १५ । प्रेमचनपूर्ण मिली-उपम्पास में नारी-विमरस ए मनोरंषन । ऐसी प्रगस्पा में भी कुछ उपत्यार मेखक प्रादर्प पर टि रहे मौर अपने सामाबिक उपचासों पारा नैतिक शिक्षा की अभिव्यक्ति करते रहे किन्तु इस कोटि के भी मप उपम्पासकार बहरू गए भोर मारी का स्तम चित्रण सनहोंने प्रारम्भ कर दिया । प बहुत से उपग्यास-क्षरों मे विषय की बोग प्रेममय पूर्व हिन्दी-उपम्पास में नारी तस्बी उमारो) प परिपीना (पत्नी) कर सामाजिक वरदो-कम सामामिदेवर तस्सी-कप अमिरका निफ्टमोग्पाका प्रेमिक रूप सबी (ती) स्म मा-म गुण-सामान्याम बाममी-रूप । म साभारहस्स मतिमरिमर निप्य कामोदिनी-म सामिष्य मिसालाका पूरपरिषीकाम अपूरपरिमोगमा मातृ-रूप पियन्हा गुप्वविवाशिम स्म मननी मात्र प्रतिपिम-कर प्रेमचन्द-पूर्व हिन्दी-उपन्यास में नारी-चिषण इराकी प्रमिपक्ति भी प्राय हो रही थी तुि हिन्पो को पम्पास दो मिमा ही पश्चिम की रेन-सम । इसलिए भार्पण ही एक कोमल बापना परिचम के प्रति वलामीन उपग्मास-मेपों में पारस्य स्प विद्यमान पी। बयावस्तु को पर करने कारतो ये वही 8 सीब ऐ थे किन्तु ऐशम्यापी सुपार पान्दोमो तथा निजी संसार के कारण पाश्चात्य उपम्यासों के सामाजिक विपप को पहण परमा उनके लिए कठिन हो रहा पा । पारी भावना + निपप में भी यही इनारमा रिपति घी) पारपात्य नारी-स्म का तत्कालीन हिन्दू-ममाष में ग्रहीत होना पसम्भर पा। दूसरी पोर सामाजिक उपप्पार्यो के पन्त सापय से भाव होता है कि तामीन उपम्पास-ममक पविभनीन नारी-स्म से भी सम्तुष्ट नहीं किसी भी निश्चित परिणाम के पगार में सामाजिक सपम्वासनकों ने नारी-चिमण से प्राय भास पा कर ही निकमना प्रारम्भ कर रिमा पीर परि पोड़ी देर के लिए घासात्मर किमा मी तो भविष्ठा एवं प्राचीन उपदेशात्मक संतरा-साहित्य की प्रेरणा-स्मस्म पावित्रत, महनधीमता मारि की म्पाम्पा रा राह-बसते उपयों की पनि पतिमान कर दी पार पासम्मय पुरप-पात्रों के माम्यम से ही अपनी पारणापों का निरूपण करना प्रारम्भ कर दिया। किन्तु इतना मनस्य है कि इनकी मारी-भावना रीतिमाहीन मारी भावना ये बहुत-कुष निम्न है । (हिम्मी के सबप्रथम उपम्पास परीक्षा पुर' में ही यह रिभाषक रेषा स्पष्ट हो जाती है 'एक पिशाम् से पृपा मया पाकिकोई ममुप ऐसा होगा पो किसी स्पाती मुम्ररी पाप एकान्त में हो रवाना बन्द हो पहरे बाला सोता हो मन सममा पा हो काम प्रबास हो और पा पपने धम-बम बम से निदाप बच सके ! पत्ता मिना यह पपती मुन्दरी के च सा है मिस्तु मिनकों की निन्दा से मरी। पर कवितामीन मायक ऐसे अवसर म कभी नही पता पा किन्तु श्रीनिवासास मारी पप स्पून कर को देखते हुए भी उस प्टि बचाकर साफ मिषत गए हैं। यही से मारी भाषना में प्रस्तर परिमपित हो पाता है। पितु समन प्रान्तर नाममात्र को ही ए पाता है पीरिमारम्भिक हिन्दी- उपम्पास बम नीति को मेकर पाठकों में विम पा सका हुव- रन परानों में तो पारों की रक्षा हेतु नारी-विवपर उपम्पास का पठन से ही बमित पा और मरयपि परत पप्पपर्म को पाहिए या हमेमु रोमांस १ परीगर बौनियामाराम । १५
प्रेमचन्द-पूर्व हिम्बी-उपम्पास में मारी-विषम
पारा मनोरषन । ऐसी अवस्था में भी कुछ उपचार सेवक पादय पर टिके रहे
मोर पपने सामाविक उपग्यासोपारा मैतिक शिक्षा की अभिम्पक्तिकरते रहे
पितु इस कोटि के मी व उपम्पासकार बहक गए पौर मार्ग नाम पिपग्म
सन्हनि प्रारम्भ कर दिया। पंप बहुत से उपम्पासनेनों में विपर कीबोग
प्रेमचनपूर्व हिन्दो रपम्पास में
नारी
तरी छमारी) रूप
परिणीता (पत्नी)कर
सामामिट तस्वीर
सामामिगर तम्मी-कम
प्रेमिट रूप निपटमोम्पा कर प्रमि म सबी (ती) स्म
7
गुपचामान्याम
बापसोक्स
सागररकम
प्रतिमरिकी
मिप्म
समोहिनीम
मिलासीता-का
पूर्वारिचीताप
अपूर्वपरिवीना-म
मार
विलास
गुप्ारिवारिमार
मनमाम्म
प्रशिक्षित
प्रेमचन्द-यू हिपो-चममा में पाए मेपर-उपर का सपा पाक की कमपोर इत्तियों की परिप्ति लिए प्रेरण-पस में दो भी पमतारमूब पसाता कही मिता पक्ष एकीकरल में मग गए। जिन्होंने संस्मत-पास्यापिप्रमों की पोरष्टि गन्होंने यामा पण पापाचर्य-वृत्तान्त' की मुष्टि र गती पार पापा तु प्रेम की सफलता सड़यों के प्रति गिरोह के साथ-माप पस्नीयताको मी प्रमय दिया । जिन्हनि बरेपी साहित्य की प्रोरमका भी प्राय मापा- निकया है पर पूरयासूस' पपिका सपोप में पुट पर। एक प्रधान पर्म भरसी प्रेम-पामा दिली-प्रेमामामको तया पविकालीन संस्कार्ये को बपौती मान र कान्ता-पन्तति' मा-म' वा भोगन-पप्पा पारिवहन पूर्ण एवं माममाष की ऐतिहासिक पामों के माध्यम मारी के सत्तेवर प्रेम प्रधान पकी विशेष प्रामाधिक प्रतिक्ति करने मपा। मूतत पड़ी है इन उपम्पामों का नाम इस मारीतासी-स एवं परिणीता-स की। मुख्पत प्रवियक्ति पर पीई वामिका की महायता से हम प्रेमपार-पूर्व हिन्दी मपम्पास के मारी-सको प्रति सप्ट करने प्रयलम। तस्यी-स्प पाणी-प के पास इन उपन्यासों में नारीरस स्प से पिटे मिया में पूर्व की कौमारमा परे ! बिमें किसी प्रकारे प्रति समर्पण पापना मनस्वी पणे मारिसमें विना लिए पपेप गाना प्रत्म्य प्रपाल पारी पते । प्रेमर-पूर्व उपम्पास-साहित्य में सामान्य दो प्रकार मीनों मणि माt-सामाषिक सम्णी-स एवं सामागिता हालीक्स। (१) सामाजिक तरपी-सप प्रामाणिक सपम्पासोमारपी-मम ममातर विमस्मी भषया पासूसी पम्पासोमारी-पकी मांति परिप्पहीन एवं समान में आपसम्म न होने बानी समा-कीड़ा का बलन नहीं है अपितु ऐम नारी-मार प्रजापत पपिण मामारिक एवं शिषसमीर तिष-एम की अभिभ्यक्ति भी परीक्षा दुर' वर पारी मार्ग रम्पकी पूर्व रमिकलास' नायर एवं पमा मादि सपन्याही करणीमानों माम्पम से नही अमवन-पूर्व हिन्दी-उपम्याम में नारी चित्रण . है किसी रपयेस पपया वासनामूलक पाकर्पल के खु ही हमडी सप्टि हुई है। सामाजिक वर्ग के इस तरुणी-सरे अन्तर्पत दो प्रमुख माप-पों की पमिम्पत्ति हुई है-प्रेमिका-म्प पौर मिपटमोम्या-म्म । (6) प्रमिका-म-म सामायिक पर्प की बहुत कम तरणियां प्रेमि काएँ ।योकि मैतिक तमा सुधारवादी उपन्यासों में मैतिकता प्राय पुष्प-माओं में ही उतारी गई है। नारी-पात्रों की संख्या ही एक तो यहाँ बहुत कम है दूसरे एनको पम्पासों में अपर्याप्त स्थान मिला है-पार उस पर भी पत्नी मी पर्णन पत्रिकामा है। ठार पपमोहनसिंह के सामा-सप्न' हिपोरीलाल मोस्वामी के 'पपमा मग्माराम मेश्या के पूर्व रसिकमान' तमा स्वतन्त्र मा पौर पर नामी' एवं लचर कारकत 'मूचन परिव पारि सामाजिक उपन्यासों में मारी के प्रेमिका-म का चित्रणमा है। मंगार का पोहा प्ररर्पन करती हुई एनिष्ठया इस वर्ष की प्रमुख मिसे पता है। प्रेम की साएदवा ये सभी प्रेमिकाएँ चाहती है। सामायिक सदियों के प्रति इनको प्रेम भावनामों में पसन्तोषबन्द काम सुत्रों की पमिति मिनवी । विवाहित पुरप से प्रेम प्रचातीय सवारीविहीन विवाह एवं पस्पस्म काम-प्टामों मिम कर के विकास के सनी मात्र बनकर पित कोई पनामाविक नही है कि इनमें कोई विप्प नही पौर इसका प्रमरो परीरों तक ही परिसीमित पहा है। गोस्वामीगी भी सामाबिक प्रेमिकामों में विविध प्रेमानुभूठिमों पीटे प्रवास मिमवे , हिन्तु पोस्वामीवीस बन से कि "समी गुरुक-युवतिमा एकपूसरे को पापन करना पाते। पर प्रमी तक इसका पाय बों ने नहीं माना है। इस पभाव केयन उपम्पास हो दरखाt"'-निस्सन्देह यही प्रकट होता है कि मोस्मामाची मे इन प्रेमि कापों पर किसी महत् की कल्पना नहीं की बी पौर किस प्रकार उपयोषिता एवं मनोरंजन की प्रार में प्रस्मस्प पाठपस्वस्थ वृत्तियों का साम मठा पर से और भी अस्वस्थ बनाया पया पर भी सहरहो पप हो जाता है। (a) निपटमोम्या :प-तस्सी के प्रति ऐस प्टिकोण पर बहुत बुध रीतिकालीन बाप विधमान है। प्रमिन-रूप एवं निपटमोम्या-प में प्रस्तर करम एकनिष्ठता रही है। ममा दोनों हीम्स पभोग्या है। इस तम्सी- प की मसिम्पति दो माम्पों में हुई स्यापार्यों के माम्पम से सपा सुप्त १ मतोफ्ना प्रभारिपार (101..
प्रेमवन-पूर्व हिन्दी उपन्यास मे नारी-चित्रस सामान्यानों के माध्यम से। (प) वेश्या-म-नीति पर पाबारित उपम्पासों में वेश्याओं का वित उस्लेव ही मितान्तुि पम्प प्रेम-प्रधान तपम्पासों में पाय-प भी उन्हें दिपा गया है। परीक्षा-पुर' में यदि पम्मह-मात्र मिलता है तो मोस्वामीनी की चपमा तपाबीनम्दनबीन कामर की कोठरी में प्ररमम बेश्यापों से सामाकार होता है। (मा) गुप्ठसामाम्पा-म्प-पामागिक पारपीको मेरमार्यों से भी अधिक अनिष्ट की पाका एन गुप्तसामाम्यापों से राती है जिनकी रातें बिकती । पौर दिम पविन पहते है। 'बुमाम दस्तगीर अपनी गिनी के संग एक काम मरवाहमा नबर माया 'रापाकाम्त बसीबणी इसका उपपति से पित सुना रहा है" "तुम मुझे अपने निकट से न हटामो इस मुनसान मुहागनी निसा में मेरी मनोकामना पूर्ण करो ऐसा मुगबो माप्प से मिलता है। तमा 'मित उसका (बबहती ) मी कामिनीमोहन की मोरीचने के लिए मासमती (परकी मामिन) साय करती पारिपारि पाइरस इन उपम्पासों में भरे परे । यपि इस प्रकार की पमनामों से पपेग रखने के उपरांत भो साफ-साब ही चिपका दिये पए वापि इसमें कोई मदद नहीं किनारी का यह प्रत्यक पित एवं पानीमम म्पपौर पात्र विश्राम के प्रभाव में पाठक पर इसका अस्वस प्रभावीपारम्बापी। (२) सामानितर तरुणी-प इस मारी--प से प्रमाण-पूर्व हिम्मी रपम्पास के म तिमम्मी पानुसी एवं प्रेमात तिहासिक सम्सीमानों का सम्बदनिका क्रिया-समाप कौतूहम पर चमत्कारमय भिम्पसहमा है उवाबो समान में प्राय उपमम मावा । पापना की पतिपता के सहारे ही नकी निर्मित है। हो भी पाठक पर विस्मृत मारी कर पाता कि ये परीपती रसिया, पौर नायक की प्रमोप्ट पापापों को माप र सी पन्तिम पड़ाव तक पहुंचना है। इनके तीन प्रकार मिलते है-प्रेमिका-स ती अपना सी म्पसमा बानूनी-गए। " रापान जाननन माप. . । . मिना प्रोपामिरगाभार । १ प्रेमपन-पूर्व हिम्पी उपन्यास में नारी-चित्रण (2) प्रेमिका-प-मायक के प्रमुपही ये समी प्रेमिकाएं प्रमुपम का पसी है पा इनका सदाय भी प्रायः पबम्प वर्ग से है। इसी के प्रम और वीला स्पन्द प्रसंगों को मटर पम्पास का प्रासार पाकिमा पाता है। प्रमी पात्र प्रति ये एकनिष्ठा है वपा बहुपलीक नायक को भी एक बार मन संगमने पर प्रपने 'रामन को पार रखतील प्रेमियों मी दोस्प है (म) एकनिष्ठा-स्प-मोहनी-स्स-इस वन की ममिकाएँ परिन्यम्स हेलिपित । किन्तु इनकी प्रमुख विशेषता नायक को मोहित करना है। मापाको सक्रिय सहायता इनसे प्राप्त नहीं होती। सिसस्मो एवं ऐयारी प म्पासों की नायिकाएँ प्राय इसी वर्ग में प्राती है। संबनापूर्ण ऐया के माध्यम से ही माया तक इनकी पहुंच होती है। यही कारण है कि कातिकप्रसार त्री- विविध जीवनसम्पा' के ठेगसिंह 'फुमपानी के फूल' (परफुमारी) को पाहवे बम न (भीम पुरती) को तुन्ध समझते हैं। (मा) एकनिष्ठा ख्यिाधीसा-रूप-स-माधुरी के साप-चाप इस उप वर्ष की प्रमिकाएं अपने पसाधारण बोरकरयों द्वारा पुरप-बेच भारस करके भी नायक को पापित करणी।कमी-कमी तो मायक के मार्य को प्राप्टक बनाने के लिए नायक प्रमालों से भी महत्वपूर्ण प्रयाम ये कर सतती फांसी सस्ते से नापक को मानाने की ममता मो इनमें पिपमान है। किसोरी नाम गोस्वामी के कारकुसुम' की मस्तानी एसोही नायिका है। अपनी शिला पोलता एर एकनिष्ठता कारस मुस्लिम होती मी सहभागीराब राय पपने पापपुर महीप होती है। रेषीमदन पत्रीकत सुमकुमारी का माया रणवीर सिंह को मायिनगरमाने की माफ हानने में ही अपनी पत समझना है पीर परि मुमदुमारी रमकी पत्रिम महापता रो मही होती वो उमो प्रमीप्ट की सिरि हाचित मम्भर मही यो। (1) ती प्रथा तमी-प-सामाधिोतर रुपम्पार्यो मे नायिका रेप रात इसी मारी-स्म का महत्वपूर्ण स्थान होता है । मापिका के प्रेम को पान बनाने के लिए ये ऐयार भी बनती है पर सम्मेण सहायता करती हुई न इसियों की माप नापकिसी मित्र से पाएमाई भी हो पाती है। यदि मायक का वा विसवासपाल निरुता दो इनके साधारण प्रेम की पभिम्पछि होती एलीमार गरि सापय नायक-सबा माया-मोही हो पया तो भी ये प्राप उस पर बिमाम करती पती है पिस्तु पपन प्रेम का प्रमी पान गराही निर १ समरमारी (प्रथम) वीरभन पत्री पृ ५ प्रेमचन्द पूर्व हिन्दी-उपम्बास में नारी-विपक्ष कार म्हें सम्म नही होता पौर 'भसा रेणुए रे में तुमसे कैसा बना मेवी पारिकह कर प्रतिकारिणी का स धारण कर मती।। (प) बातुनी-म-पह मारी-रूप पश्चिम से रीत पासूसी उपन्यारों का होने कारख एकरम पभारणीय है। इसलिए इन तर्मयों में विभ्म मिमता है।टनीतिपूर्ण हस्पारी कुटिनामों न होते तो प्रवाम पासूस सहा बक प्रमिकापों की मी कमी नहीं है। पस्तुत पासूसी उपन्यासों का परावत सांसारिक एवं विश्वसनीय होते हुए भी इनका तरणीप ममनोपजानिक प्रसामाषिक एष निम है । मोस्वामीजी की 'तारा' के अतिरिक्त महमरीका प्राप' सभी उपग्बारों में इस वर्म के नारीमात्र मिन बाते है। इस प्रकार हम देखते है कि प्रेमबाप-पूर्व हिन्दी-उपम्पास में चिषित वणी रुप सामाजिक वा पसामाधिक दोनों स्मों में रीतिकामीन संस्कारों की खा कारण प्रधानत नारी के प्रति भीम्या भाष्टिकोण से प्रभावित संसाठ एवं पुरसों का पापार पहा मिनाही पत्तिचित् मैतिको बगा। सबा प्रेमापानको प्रभाषस्सस्प इसमें मापिका की प्राप्ति हेतु नायक को प्रयत्नपीन रिवाया गया है। प्रेम में पक्ति से बाहर कर्तप्प के लिए स्थान माही पर ही कम है और यह भी किसानीम पार पहप इसे प्रस्थान एवं पमर्यारित सममाते हुए इससे समाप्त कर पाने में ही अपमा भेट मानते थे। परिणीता-म्प परिणीता पवना पत्नी-प को पपिम्पछि प्रमाण-पूर्ण हिमी-उपम्पास में से प्रकार से -पूर्व-परिसीता का पपूर्ण-परिणीता स्पों के माध्यम से। (१) पूर्स परिणीता-दप पत्नी पर पापविनम्बित स सामागिक पम्बासों में ग्राम ऐसे पसरणों के प्राचार पर ही प्रतिपादितामा माभिवति मनोगाम्यहरयता। म मत नोपा प्राप्नोति सहिम राप्पी नबोभ्यते ॥ १ सम्मारी मातिमौनमानसिं से (भाररितीय) रेम्बरसी प्रेमभान-पूर्व हिन्दी-उपम्पास में मारी-चिषण मभिचारानुम: स्त्री लोके मानोति मिन्दताम् । मृमानमोनिस्वाप्नोति पापपेपैल पोल्पते ॥" 'मित कुसुम' की भूमिका में प्रकापक रामहम्ण धर्मा सिबते है- हमारे पंच की पार्यकुस ममनामों का पावित्रत पब मो भूममम में निम्मक नाक पी बिमम कौमुरी बत् विभासित हो पा है। हमारे यहाँ का पातिव्रत इम भाखमारियों का प्रधान पौरव-स्मन है हिपिस पा मार सुम कर दूसरे पेसों की प्रबलाएँ मणाती और पमताती है। ऐसे रेस की स्त्रियों के ममम बमन कीविच को कसित कल्पना से स्वयं कमुक्ति करना बुद्धिमानी नही है। परीक्षा सुर का पतिव्रता प्रकरण भी इस ष्टि से पठनीय है। 'ममिमा फूल' में भी कहा मपा है कि वो अपने पति की बात नहीं मानवी उसका मला कभी नहीं होता। इस प्रकार हम सभी सामाजिक उपम्पासों में 'प्रबनामों के प्रति पातिव्रत उपरेख मरे पर है। "ससार में इससे हर कोई नहीं कि सामिसी पुष्य मिने 'पौर "ममे ही स्वामी पुष्टी कुचामी कसौर मेथी क्यों न हो किन्तु स्त्री को बस पर पथम मछि रसना ही मुल्य बर्म है। परीमा पुर में परिसीता एक मात्र मुन्दर पक्ष भी उभरा है। मदम- मोहम भी पली पार पत्नी होते हुए भी एक पूसरे पुरुष पश्मिीर को अपने जीवन में धर्म-माई कर देती है।मारी भावना का यह विस्तार प्रमचम पूर्व उपम्यास में अन्यतम है। 'परमागुरु' की यह म्यापक भावमा निगम ही एक महान् उपसम्मि। परिणीतस में पत्नी बारा पति-पुधार एवं माप के परोपकारी सो वर्णन मी कमी-कमी हो जाते हैं। पमित सुम' की 'गुम अपने पापरणो हे रामनापको सुमार्ग पर जाती है। रामनाथ के इस कपन में हि"मुम का उतना ही कहना है कि हो पा मिन सबको यही और मिने-मारी महब स्नापीन एवं परोपकारी का परिचय मिलता है। 8ठ हिन्दी का अठ' में प्रपोम्पाणि पपाध्याय ने अनमेल विवाह की ममस्या को भी सपा है, किन्तुष्टि मूमन भाषा पर ही केमित होने के , रमियमम अतिप्रमार पनीर १॥ १. अमिता प्रोमासिापामा ४ दलित म अनि प्रसादयत्री ११४ - प्रमचम्पपूर्व हिन्दी-उपन्यास में नारी-चित्रण कारण इसे प्रयास-मात्र ही कहा पा सक्या।। सामारिकेचर उपम्पासों में परिमोतामों देशोप मिझते है-पानी तमा सपत्नी-नप । प्राय ये सभी परिणीताएँ पूर्स पवित्रता है पीर हेस-इस पर सपत्नियों का स्वागत करती है क्योंकि उनका विश्वास है कि उनके पति को यही सोमा रेता है कि "मनीत मुमतिन परिपालयन्ति । 'मिसोरीवाम गोस्वामी के 'कमकामम' का एक वर्णन पिये-काठी बाई (पापीराम श्री परनी) अपने देर का पर्दा उठा कर बागीराब के सामने बसी पाई पौर मस्तानी (वामीण की प्रेमिका) को गने लगा पर और उसका हाम भागीराम केर म रचकर प्रसन्नता से कहने ममी 'सीमिये परम्प के सोच-विचारों को घोपिय पार पपनी प्रतिमा के पनुसार प्रब इस पवनकुम-बामा कोल कोरिये । अन्तर्जातीय निगाह की सहन्दता भी यहाँ विद्यमान है। () मातृ--प–पूर्णपरिणीता-स का प्रा एवं विकसित म्प मातृ स्प होता है। प्रेमचम-पूर्व हिन्दी-उपम्बास में इस माव-म्पक साहरण प्रषिक नहीं मिमठे किन्तु जितने भी मिलते हैं उनके प्रापार पर बननीमान वा प्रधि पिका बममी इसके यो म्प मामे मा सकते। बममीमार मा नाममान की मातापिसका तम्प बग्म देने के साप ही सन्तान के प्रति ममाप्त हो जाता परिस्थितियों की माप के कारण प्रपिकाप उपन्यासों में ऐसे ही पविकसित माव-कप की परिम्पत्ति हुई है। किन्तु प्रसिमिका बननी का स्थान महत्वपूर्ण होता है। अपनी सम्तान रो पह पपने पार संस्कारों में राम कर उनका पामम करती है। "मुमको अपने सुबगुबाकोर विचार मही है । म तो उनके (पतिरेष) साप पने में सब तप से प्रसन्न किन्तु इन बोटे-मोरे बन्नों की पया रया होगी इनको रिचा कौन पढ़ापेगा नीति कौम सिबताया मकी उमर केस कटेगी ? परीमापुर के इस मातृ-प की मांति दी 'मपविना प्रत' की पार्वती भी सणनीय है । पुरती देवहूति को सन्या मामिनी बनाने के लिए पर उसे निरन्तर सचेत करठी पपी है बहति । चम भार को रखती हो यो पति इसकी है, टीक यही पानी पुपोपी है। (२) मपूर्णपरिसीसा-प रिपदाएँ, सपायी हर मुमतियां तमा पति परमपूर्ण मिपास माने गामी गुमटाएँ इसी वर्ग के पन्तर्पत प्राती || विपना राबो का पपाराम मनुषित पम्मतम मिशीवात मोसामी " परीगगुम श्रीमियामरास प्र + प्रमचन्द पूर्व हिन्दी-उपन्यास में नारी चित्रण १३ सम्बग्य है ' पत्रागी की नाकी मां को पोमा रेकर सुसरे के साथ भाग लकी छठी पौर पियेटर की प्रपिास प्रमिभत्रियो पिपति मी रखी है। राम वर्ग की परिसीवामी विषय में भी ऐसे कपनों का प्रभार नही है किमी पर अपने शौहर को दिम से मुमार निराम पर मेहरपान हो परिसीमाएँ इस प्रकार हम देखते हैं कि हिमी-साहिय में मारी प्रति विश्वामित भिलार प्रवृत्तिमूना प्टिकोण के प्रबस संस्कार हिन्दी-उपम्यास के बाप में विधमान ! पार मसें भीगमे से पूर्व ही मह काम का शिकार हो गया है। मारी के प्रति एक सहित अफ्किोप के प्रभाव के कारण उठ में नारी-पण को निम्न परिसीमाएँ प्रमुखत परिक्षित होती है- १ प्रेमबाबमूर्ष हिम्दी-उपम्यास में नारी-मारता की परयन्त एकावी पणे पम्पापक प्रमिम्मक्ति है। मारी एमणी-मात्र ही नही बीवन-क्षेत्र में समरे भनेक गाइस्थ्य एवं प्रेरम भी हो । म उपम्यासो के मारी वित्रा में सबसे बड़ा रोप पड़ी है नि में ऐसे एक भी सनीष मारीमान की परतारणा महीई को पुरुष के लिए पाणि-मापनयर रित प्रेरमा बने मौर तरम रापास्मक अनुभूति वार्गे को स्नेह-सरस र मी पुग्प को कमि की पोर प्ररित करके पमकी मसा एवं पना का विषय बन सके। २ मारी-मामों का तनिक भी मनोवैज्ञानिक चित्रकल उपन्यासों में नहीं हमा है। विकास एवं मनोमरे ममाव में ये पार प्रमादृष्ठ अपना पंधव भानु प्रस्तर-प्रतिमाए पन र हपए । प्राय पेठा का सेवा-म्प तया पामा का श्यामाकप होम में उपमय होता है। मामा के पुाप और ठा की पना ही इन नही की पर है। पुष से कही भी मी नई सोपा परनीतता कोही पनिम्मठिबन कर पगा। पार पाठर की महानुभूति से नहीं मिमदी। १ मत मम वालिम्पमारी बनानमार ३ नाम मिनाह मोक्तामा m १४ प्रेमपन-पूर्व हिन्दी सम्यार में मार-विमर मारीबीपम की समस्याों में इन उपन्यास-नेरमों को प्राप्त नहीं किया है। पानी काम में समा एक प्रहर पर्यन पापितु भपने- भाप में भरपूर ममस्या होते हुए भी इसे समस्या का म्पनीमही मिला है। मी प्रसार विगाह प्रेम बीवन-यापन पारित्रिी भी पासव प्रया मापारण ममस्पापों का उपपाटन यहाँ नहीं मा है। गुरु-धर्म की प्रमिभक्ति तोपात दूर की बात है। ४ नारी-पात्रों की अपेक्षा पुस्प पानों को भी प्रतिक महत्वाइन उपन्यासों में मिला है। यहाँ मायै प्रदना काही पर्याय मानी गई विक एवं शिक्षा पर उपग्मामा यो माम ही मापक-समान है, किन्तु पन्य बहरमा सम्मासों नाम मापिका पर मरमम्बित होइए भी पुस्प की समस्या नारी पानास इम में महीं मिलता। पस्तुत हिन्दी के प्रेमचार-पूर्व स्पस्याए-नबारे पवन नापति परस्पर- विरोधी मनोपियों में पुष इस तरह पर मिा माकि भूमियों मेरिलाय-चित्रणको गहित करने पर भी ये स्पर सा में प्राप सपए। सस्ते रोमांच एवं पानीबारे बिना रे मे रह ही नहीं सकते। भार मुटपाय के उपम्पाट दिय प्रकार पस्लाम पाठकों की इटि कर पेसी प्रकार इन पम्पास्मेषकों पपने पापोतने सस्ते अपतन पर मार बड़ा कर दिया कि प्राण पाठक सम्मुख मका निजी परिही परयन्त पूपित बन कर रह पाता है। दुर्गा का निवारण पुर्णवेनी मही होता पाटा सम्मुखएका महल पन्त तक पगार पाना और रस मन्तिम मदिन पर एस प्रवेश लिए निपेष-कियों को विपरीत से उप पाटकका स्पास मे ही पतामो मेरे साप-माप ही भीतर पहुँच गया। दो मी विध प्रकार पप-प्रष्ट मनुप्मी पापारसी में भी माँ काही मिमिम हो पाते है पपी प्रचार पर हम अपने पाप को माया मासा किया बीसबी पताम्दी मही पी पीर यह भी कि हिम्मी-पपात पिसी-पीनगीमतप विषारोप पपन्यासों मारी भिषण में भी पपमम्मियों पिटही कही मिन ही बाते। महर्षि कोण तना ही मामा समता है हिनिमवारत हिन्दी-सम्पात में नारी + प्रति रिसास-प्रतिमूमकतारों को प्रपुरमा होपेर भी इसका प्रपना ऐतिहासिक महत्व सोपामारी-बापना विभातीन प्टिकोण मानिक नारी-पकी निमार पापा की भूमिका में गगनदय सहाय नियवे है 'मे भी पारने पार से भूमिकाम में मना कि प्रेमचन्द हिन्दी-अपम्पासों में नारी-चित्रण १४ पर पटनापूर्ण परनामतामय परिजनापी रसीसी कहानियां पहले यस्ते पाप कोर्यो कापी समाये सब पाप से हाथ में मीबियेगा पार किया किमापनोमों के मन को इससे दुपरिपाम मिलता है या नहीं पाप मोप पुष मुब-पान्ति इसमें अनुभव करते हैं या नहीं।" पारेपन कर वह मिस "भाधुनिक मार्यो पौर पटनामों का इसमें यपेप समावेश है जिसमें परोम म्प से सामानिकपुरी वियों पर साधारण मालोचना की गई है। हिन्दी-मपन्यास के ममप वर्ष में ऐसे कपन भी मिल पाते। देश की स्त्रियों के प्रमत-पस कतिपुष को फस्पित कम्पना से स्वयं कनुपित करना दुरिमानी नहीं है। स्पष्ट है कि उप म्यास-सेवकों के मारी प्रतिष्टिकोण में एक परिवर्तन पनपना बाह रहा पा। पयोप्याधिह पपाप्याय के दोनों रपम्पासों में प्रनमेस पिनाह एवं पौन सम्मानी मारी-समस्यामों के प्रप्रस्फुटित समेत भी मिमते हैं। मारी-भावमा के भेष में से एक उपसम्पिकमा बासमता है पौर निचय ही यह साधारण उपसम्मि नहीं है। मितु सत्य तो यह है कि प्रेमचन्द का पबतरण ममी उपम्यास-साहित्य में होना मापौर नारी के प्रति स्वस्थ सम्तुनिताप्टिकोण एष पुमान्तरपरी मारी पात्रोकी सष्टि प्रमी पसौ परिप्यपर्म में पी। ८.रहित इनुदी भूमिम २ प्रेमचन्द के नारी पात्रों को सामाजिक पृष्ठभूमि साहित्य समान से प्रमप रहकर भी नहीं सकता परिस्थितियों से विभय प र पनप नही सक्ता पौर युमबर्म सेहत पर पाभा में बहाने भर कर पा भानुभूतिपय एवं सामनही हो सकता। नारी सधी समारपीय है प्रत पनिमार्यत पत्-साहित्य में पणिव नारी को समापयत नारी की पपागस्था म बात रस नहीं माना जा सकता । साहित्य को मारी-मामना से परमत होने कनिए तत्कामीम नारी सामाजिक स्म का सम्मान विशेष पहायक होता पार फिर बीसबी पताम्मी हो ही याहित्य में स्वस्थ समाज के मैन्ट्स एवं समान में नारी मिमुप्त सपही पानाम का अम्पाय पिसके प्रारम्ब में प्रेमपाल का पपूर योगदान समाव की बेदना काही प्रतिमा स्थय प्रेमपत्र में सानिय मगप्ट परिमापा 'बीपन की प्रानोपमा मानी है। कम उनके माहिप म प्रतिपादितनाप-मानों की स्म विशेषठामों को सममने लिए पलामीन माती की पामायिक स्थिति का संधिप्त पर्पवमोचन भी पायरया हो पाता है। स्पूना प्रेमवाद-युगीन नारी कोरा बर्मों म विभाषित किमा रासमता 1- मीण नारी पोर नागरिक मारी। यह वर्गीकरण इसलिए पावस्याही गया किलामीन मुषार-पाम्दोगना पर युपी बरमती इरकरवर्टो . परिणाममप यो मारी पेना गारही की मुसका प्राय कारों कफ ही सीमित पा । एक में गनुप प्राचीन ना तो पूसरे में बहुत पपई पीन पार हम पिरोनों बर्मा को विपनाएँ पहारो परिस्थितियों एवं रसा-मोवों मनुसार पृपा-यूपा पी। प्रामीण मारी-दप रा एममारी में 'मानिहिन्दीकाम में मारी भावना' में सन् १॥ से १९५० ईकास को शिमी-पाप में मारी-मारमा पोष्टि से सानित-मुग (१ १९२) पौर परिवर्तन-गुम (१९२ ११५०६) ननरोपीपकों के मन्तर्गत पिमानित किया है किन्तु प्रामीण भागापा- प्रेमचन्द के नारीमानों की सामाधिक पृष्ठभूमि बत् एवं विशेष उल्लेख उनका भी विषय नहीं रहा है। कारण यह है कि इन चारों पधामियों में नारी के बिस मकापर्णन कविता में हुमा है उसमें नारी के सामूहिक एवं बोम्नीय म्प का गान उपस्थित किया गया है और बह रूप प्राय पम्प सिमित एवं विकासोन्मुख नागरिक मारी का ही प्रापर्स-प्ररत्त स्प है। प्रेमचन्द के पास हिन्दी की ही नहीं अपितु पूरे 'सरपार' और 'मिर्गा रसमा भारि मेसों की परम्परा मी पी। इसके अतिरिक्त यह स्वप भी प्राम चीवम पूर्ण पनुभवी थे। इस पि से यह पहमे कमाकार पे गिनकी दृषि सम्पदा के पापरणों को पीती हुई पामीण नारी की निपहन सहमी हुई, भोली-भानी मूकता तक पानी पी पौर पपार्च तो यह है कि प्रेमचन्द की नारी भावमा का पापर्ध भी यही की मनोवृत्तियों की निर्ममता से ग्रहीत है। इसके साब यदि यह भी कहा भाप कि ग्रामीण नारी ही भारतीय संस्कृति के अनुरूप मारी ही है, तो मत्युक्ति नहीं होगी। गुहानार पर महेरी की प्रतीक्षा में बैठी हुई विस्वासपिसी प्रस्तरफामीम नारी की प्रविधिम परम्परा भाग भी भारत के प्राम्य वातावरण में पहुव-कुप सुरमित रूप में उपनम हो सकती है। प्रमचन्द-युप प्राम-प्पयस्वाहास का युग था। सामन्ती सम्पदा की समाप्ति के उपरान्त पार्मों की प्रापिक एकता भी अन्तिम सास से रही पी स्वत सम्तुष्ट प्राम-नसाई को विवेपामित बनाया जा रहा पा। उपोम-बरों पर विधी बालों के पत्र प्रहार हो रहे थे पार बंपावत प्रौद्योगिक मी परती से सी पानीविका पूरने के प्रयास कर रहे थे। भूमि की दशा ऐसी पी कि उसपर पक्तिगत सत्व की स्थापना पो हो पा पौ किन्तु नसके राम्पीकरण के पारण ममान की पमूली के हेतु प्रापत पमीरारी एवं मासयुपारी के दो पाटो में मेवारा मौसठ किपाम पिता का पापा और बसपीवन-चप उसके लिए पसम हो पाता तो उपरपूर्ति के लिए नसे भूमि रहन रखनी प्रपणा करनी पड़ती पी पही तक कि प्राय बरसान होकर उसे कार्यहीन कारीगरों की भांति ही निधन किसान बनकर प्राचे प्रमषा ठिहाई पर किसी प्रम्प की भूमि मोचमी प-ठी पपया मगार बन कर नब की पुन माननी पड़ती या फिर प्राय और में मीं होना पाता था। इस प्रकार किसानों में मी रो वर्ग होते जा ऐ पे-मानिक-किसान पौर ममपुर-किसान । मानिक किसानों की कैचाई का प्रापार भी अधिकारमय भूमि की बहुमता होने के कारण मच्च मम्प पीर निम्न स्तर पहा मी पिच मान थे। इसके पतिरित पीरार हो ही मैबरेची सरकार के क्यमुतने उनके प्रतिरिक्त पारपार पानार रा निम्न प्रेणी के सेवापीय मरों के स्तर बीमारों में पिपमान थे। इस तरह एक प्रकार की रात कृत्ति पारम्म १७ प्रमपन के मारी-पात्रों की सामाणिक पृष्ठभूमि प मेकर पन्त तक ग्रामीण मावायरस को यमेहए। । कृषक पसन्तुष्ट पौर धीरे-धीरे एक परोक्ष जाति को मोर अग्रसर होना चाह कर भी हो नही पा पेपे। प्रेमपत्कालीन पामीरा समान की उपपत्र प्रवस्या के प्राचार पर प्रामीण मारीको स्तर की ष्टि से प्रमुख दो वर्षों में ऐसा ना सकता है- १-वास संपप गिरहित स्विर मारी-रुप २–परित सपर्परत मारी-प । बाम सधप-विरहित स्सिर नारी-समाज के अन्तर्गत पमौरा, साहूकार, एन तमा मध्यवर्गीय मातिम्-किसान मबोदित पम्पापम्पम एव इतिपर बनती बामे कानरारों के परिवारों की मारी स्मिति पी । यों तो इन परिवारों में पार्षिक समानता विद्यमान पी किन्तु नारी की स्थिति की पुष्टि से विप पन्टर नहीं था। पार्टीविका के लिए इस पर्व की नारी को चिन्ता नही बी समार में पति प्रतिष्ठापनुरूप ही उसका भी सम्मान पा और उसका निजी मेष परमी पारपीमारी तक ही यहाँ मी विपत पुस्प-वासना एवं निजी पासपने को भवसम्म देने तक ही सीमित पा । इसलिए पाप चिप को उसके पौवन में कोई स्थान नहीं था और परि कभी परिवार परम्परामा तपा पति की पनगत कामुकता के कारण माम्तरिक संपप रख्खा भी तो समाज में निजी स्थान तपा धान्त बातावरण की परिकल्पना उसे स्फुटित नही होने देवी पी। विवाह के लिए पर्ण-म्पबमा मा पाभिमान सपरिषता से भपिक महत रवत पे पत उसे माम्म भरोसे ही सन्तोप करला परवा पा । प्राय सोमहर्षे पप से पूर्व ही पुरती का परिणवन माराया समय पाठा पा और तुर्माम्पत्य विषा प्राय मान-विमना होने पर उसके पुर्विमाह की सपना को भी गुप +निए कसम-कामिमा समम्म पाता था और यातनामों को तो उसकारी कारा भी कर्मफल भोप केस में ही पहीत किया जाता पा । पारिफ नियममपभाष में उससे रिहतियों की मतम्भावना नही पी। बहुपत्नीत्व के कारल इम पपी नारी को कभी कभी ईर्पा एवं पुरम की माता में गाया भी पड़ता पा । पामि पारियों एवं प्रबसियासों पर उमस पूर्ण गिलासमा करता पा पार मी पिपासानुरूपता है कारण ही गया पति यही अनुगमन करती थी। देर-यति से प्रति पर्व मक्ति प्रपा सम्मान मति की पौर उसे पापित होना पाया और इसमें कोई सम्देह नहीं किए म्यापी सतरलता-मार प्रायः इसी पारा मनव समभी मई की। ममरों में मुपार-पारोमनों के प्रभावनुस्प यह नानी पिता की मोर मार-मार प्रमों प्रेमचन्द के मारीमानों की सामाजिक पृष्ठभूमि से प्रप्रसर की पापी पी पौर मह भी ठर बब शिक्षा के मापन पर में ही पुटा पिए पाते। सर्य तो महइस प्रकार प्राय पत्र-स्यबहार तक की ही शिक्षा प्राप्त कर पाती किन्तु अपनी सन्तान की शिक्षा को या मावस्यक समझने लगी भी। इस प्रकार यह मारी-रुप यदि भौतिक उपसम्मियों में प्रावृत पा तो दुसरी पोर अपमी ही अपर्याप्तियों के प्रतिबिम देखकर नैविक पर पप्ट्रीय विसकी मोर विज्ञासा को रष्टि से देख भी पापा । प्रमपाल ने इस प्रकार के सिर तपा पारम- विरोधी नारी-प को बहुत कम रचनामों में प्रापाप दिया बहा दिया भी है वहां भी इस दूसरे पक्ष पर ही बस रिया है और उसके 'मायत्री' 'ममोरमा' तपा विचायती परिमामित उपयोगी एवं मानवप्राम र को ही पाहण किया है। इम मि से नन्हें समय से थोड़ा पाये भी निकम कर सोचना पड़ा है यह पीर बात है उन मोगो के लिए, मो प्रेमचन्द को मप्टा मानते इप मी पपार्प पीवन प्रप्टा मही मानते । परित संपर्परत भारीप का विषण प्रेमचन्द यो कृतियों में सर्वाधिक सानुभूहिपा। इस नारी-समार पम्तर्गत परीब पक गरी मानि-लमान पाकिहीम बानपार एवं ऐकवर्ग (पस्मृश्य) सम्बन्धी उस स्त्री-पप की स्थिति दी पाहाँ नारी हेतों में पारीरिक पम हरती पी पर में पकी पसाती पी गुफाम पर ठने में भी नही समझती थी पपा बनी परिवार की मामी दिपिक प्रकार से करती थी। इस मारीका संपर्प गत परामपा और इसकी निजी समस्याएँ पुरप-प्रमाब से पाय एक-स्म होने तमा प्रत्येक दृष्टि से स्वयं पुरप की सम्पूर्ति होने के कारण रसको नियो पारिक समस्यामों के उम्मे का काम नहीं पा। बाए प्रयान्ति ही परम्मती को पम नही मेने देवी की। रोटी के गाने पोइए और जिस पर राम्प-कमपारियों की पायरन की अपार उसके जीवन को निराधाग्यान फियेरे पीबी। पुरप प्रोता मा पारित कार्बन में सपर्प नहीं होता व नारी को पारीरिक के प्रत्पेक क्षेत्र में उसरा हपटामा परता पा। पेटी बमाकर हम पीच मे पाने मधाम पर बैठन एटी हुई फसम को पीरने पसरी पीसने पापों की देखरेख करने उपमे पापने पीर मार उठाने हा इस प्रकार पहर रात तक म्पस पने के उपरात मे पैदा करने पण मनोरजन के 4 भारी मार्ग पर पका की पान पाया गाल रवी पी पौरमा मनमाने में ही माम को सीपार करती हुई या का कीर्तन मनन करती भगवान् के मामलों में प्रग्याय को रेखठी रे भी जीत से पूरने का प्रसार पी दी। यह पूर्ण-पण पविपण्यसा पी २ प्रमयत के मारी-मानों की सामारिक पृष्ठभूमि पुनवसमा पी हिम्तु प्राषिकादि से सम्पन्न प्रथमा बर्ष के घोहयों की इष्टि सस पर भी गा बाती पी पौर इस प्रकार की पनेफ फिसमों में से होकर उस बीवन-यापन करला पा पहा पा। विम पर भी पति की समक रष्टियों एवं बीवन की एभी विभीपिकामों से उसने मनमाने म ही परममाव सममौवा कर रखा था। ऐसे ममेक उपाहरण मिमते है परकि विमा मामी को देपर को पति मामना पाता का प्रती बहन को प्रोत्र कृपाप्ती से रोग रिया माता पा पौरई पुर्षों पानी माता को पुषहीना के संकष्टों का सामना करना पड़ता था । पुरप की इयानुसार मारी बिक मी बाया करती थी। बा मह मही पी किन्तु परिस्थितियों के विभिन्न पापों में मम कर पाती हुई पी। पिमा प्राप्त करने की सामर्प पर भी रसती पी किन्तु पेट की समस्या प्रमी हम नही हुई थी। पत्तियां उसकी भी बात पना भारती की किन्तु रहन सहन की माषिक मुत्तियों ने उसे परमात सीमित कर रखा था। पर इस प्रकार सम अपने बारे में जैसे सोचना ही घोर दिया था। अपनी पहनी रचना' में ही प्रेमचन्द मारी के इस रूप की मोर पाहट होकर अपने मामा तक का उपहास कर के थे। यही मही अपनी सम्पूण रचनामों में उन्होंने नारीस मागरिकदेतना से मिदिम तीन भास्थावान् एवं स्वतपूर्ण सप का सर्मपिक चित्रण करते हुए पान्ता' 'सुभामी 'पिमासी' समानी' समा 'मुनिया से सहानुभूति बने हुए 'मुन्नी' एवं पनिपा' के भमर कर की प्रतिष्ठा की। नागरिफ मारी दप प्रेमचाय-एप भारत में नमरों एवं नागरिक सम्मना के विकास मा पुस गा। बगरे पास इस पोर विषेप म्यान रेहे। मार्क्स के इस कपम का कि मम्मंगको भारतवर्ष में दुहरे उद्देश्य को पूरा करना है एक महारारमा दूसरा निर्माणारमक -यही पर था कि प्राम-म्पबम्बा पारि + पुरातन सामागिरि महारोपात गरेरों को भारत म पश्चिमी समार भौतिक पापार की स्थापमा' करली थी। यह मुम बाबा शानियों पारि के प्रागमन-सम्म भारत में पुगीपावी म्पबरमा प्रमचम्म + पों में 'महारमी सभ्यता का पूर्वागमन रहा पा। मोगा के पिम माम्पबार भी पापा पा पा पार इन दोनों के बीच मम्पवर्ष का सम्म स्थिर हो पापा। मरी पोर सत्य एवं पहिमा प्रामारिम: मानवापिसोस प्रेमपद के नारी पात्रों की सामाणिक पृष्ठभूमि को निये ए पापीमाय 'दृस्टीसिप' के मिशान्त पर बम रे पापा। इस प्रकार से स्तर की रष्टि से नागरिक सत्र में मुंगीपछि गएर पकीम प्रापि पेशेवर मोग मध्यवीय सौपागर पवा कामगार, सफारी कमचारी तथा मगर वर्ग पारि के प्रमुख स्वर स्थिर हो हो। मों तो पंचीपति-परिवार, मध्यवर्गीय परिवार एवं मवर-परिवार में मारी की सामाजिक विठि पृपा-पृपापी पौर उसे उसी प्रकार से देखा पा सकता हैसा कि हम प्रामीण मारी-स्प को देख पुरे है पति मगर-वर्ग तपा मम्म बग के सत्तपर के स्तर को परित मारी-सके अन्तगत पा शेष को बाट समर्व-विहित नारी-रप के अन्तर्गत रप सकते है किन्तु यहाँ मायरिफ नारी रूप से पमिप्राय प्रमुखत उस नारी-म्प से। यो प्राय मागरिक क्षेत्र में ही पक नूतन देवना को पकर हा पा और जिसके कारण समाग में उसकी स्वतन्त्र उत्तप्ट तपा पनिमार्य सत्ता की स्थापना हो रही थी। प्रेमचन्द काम में सामानिक मुपार-सम्मम्मी सभी माम्बोधन हकी-मुपार पर विक्षेप बम दे ये। पर्दा प्रपा-निवारण बाल-विवाह को हतोत्साहित करने विषया-बिमाह को सम्माहित करम तपा मारी को रिप मापारिममता के पारपाकी भोर सम्मुख करने में पार्यसमाज विषेप म्प से प्रयत्नपीन बा। बीस वर्ष के मबषक प्रमचन्द ने भी विपणा विमा संस्था' तथा 'पसिन भारतीय स्त्री-मारे विषय में सुना होगा पौर पन् १८१६ म मोदो फेवण काप पूमा में स्मापिठ 'हिन विषमा पर भी सनकी एप्टि से पोमन मही पा होगा। हिम-परम्परामों के विषय पत्री में एक विषया बाह्मणी से विवाह किया था। स्वयं प्रेमचन्द ने भी किया विरानीदेवी का परिणयन च्मिा पा पार इस प्रकार स्त्री-पुकार-सम्बन्धी पान्वोतन में सक्रिय योगदान किया पा बाम-रिपाइ दासी या सती पापि मुमपापों को हतोत्साहित करने में मुबारक ही नहीं अपितु पम्प-सत्ता भी प्यान ही पी। १२३ का पारा पाए मरिज विन' सीरा परिसाम पा मिसके फलस्लम पिसी भी माफी का १४ पर्प की मायु में पूर्व का विवाह प्रमेष भोपित किया भया पा। १९२५ में ग मधुमक्ष्मी रेशो पारि मगीरप प्रपल क फमसम्प पीनस कोर के मिपम बोनावानिग व्यवसाय को अपराध निषित करते र परासियों पर भी लागू किये गए'। परिणामसाप इस मया का पम्त हो पया। इस माधुरिन्दिो-प्रम्प में मारी-थापना सा हमारी प १८-10 २२ प्रेमपद के नारी-यात्रों की सामारिक पृभूमि प्रसर में हमसे पूषकी रामा राममोहन राय की महायता से मामिनियम बेटिक बारा की गई सती प्रथा समसम एवं रागस्पान में पार्मिकारा निवारण करने पानी सुपार-म्यवस्था भी उस्मैपदीय है। इस दुप में स्त्री-विक्षा की पोर भी किप पाम दिया था हा पा। स्वामी विवेकानन्ददी सबसपी मुभार-मारणा पट्टी बी किषिक्षित समार में कोई भी समान-मुपार सम्भव नही हो सका। मोय पा सुधार पाइहै? मह पहा करते पे “पाम उन्हें पार करी समार-पार के लिए प्रपम पम्पमोगों को पिपित करना और तक यह कार्य सम्पन्न मही होता पर 6 प्रतीक्षा दमी की पोपो' ए-समार भी सेतोय तप्प को समझ पा पा किन्तु मामी निकामम की यह रिऐपवा बी कि बह पामृत स्किार एवं मुबार में सिमास रमो मे पौर विश्वा-विवाह पारि सनकी हमि में कागी मुबार पे। 'यहाँ (भारत) की पि पिपनामा के पांमुमों से कभी-कली तर होती है तो पारपास्य देणों का बापत परिया हित स्त्रियों को पानी में भरा पता है। और फिर "विपनारियाह की समस्या ७ प्रतिशत भारतीय मारियों का कोई सम्मान नही है पस प्रकार के सर पाम्दोलनों का समय भारत सम र परमो सही पा मोबम-साधारण बम पर स्वये पिपित एमिनोगों ने अपने-अपने परों को मारने पर परे सम्मुख पपने को सुना विधाने में कोई कमर नही रपी।पर पद हा संसार नहीं करा पा सकवा पंकार करने में हमें भीग भीतर समकी पर तक पहुंचना होता है। इसी को 4 पासून सकारहता। इस प्रकार स्थानीयी माप्तीप पारों में पनीर भारतीय पिपित मापार सभी सराहना करते पे पोर पाचारय रंग म उनका रेपा पाना पान, लिए परनाम मममने। मपेपर ममार मुभारकों में सीनिया की पालत पासायचा अनुमय की चिमके परिणाम साप पूना में महिमा विद्यालय प्रयास में 'मम्मा पाठयाना शमदार माता मारण पोर रिकी मालिप्रतिरमयरों में विगामी घिसा-वेगों हमा कामिकामों लिए लियापीठों पीलापमा ति से होने मयी। मैं गर-से रिसानेगममी थे जिनम परीक्षामहीमही पपितु मारी का मुहगीताने की पिया भीती माती दी। . , मेरी समर-मोनिमामी भिनर १ मरी ममरीरि पापी विमन .
२३ प्रमवार मारीपात्रों की सामाजिक पृष्ठभूमि समार-मुधार पाहोलम मारी समान-सेविका-रप को भी प्ररित कर ऐ थे। पहले-पहन इनमें विषयामों की ही सत्या मपिक होती पी विन्तु बार में इमाम मौर भी विस्तृत होता जा रहा था। १८ ८१ में स्थापित 'पूना सेवा-सदन' के मस्थापक गोपामापण सगर ने लिखा था "या में संयुक्त प्रान्त में प्रकास-उसार कार्य मनमा हुमा बा मेरी पारणा बनमे समी कि राष्ट्रीय उमति के विविध क्षेत्रों में भारत को पुरों में ही समान प्रम्यात स्त्री कार्यकर्ता की भी मावश्यकता है। पूना मापस पाने पर मने कई बार मित्रों- स्त्रियों तथा पुरो-की योठिया की भौर इसका फल हुमा प्रापा दर्गन विष पापों को सामाशिक कार्यकरियों में प म प्रिमित करने ा प्रण।" महारमा यापी मे भीमारी के इसीपका अपने पापों में संचार किया पा। हिम मीना पौर मूत्रा दोनों उनके लिए समाम पी मोर उमकी प्रबल धारणा मी कि परिवार में मारी के मातृ-म्प का प्रावाम्य होने पर समान भी उससे दुष अपेक्षा रखता। यह प्रयना नही है पौर कोरी भागुपता का परिणाम भी नहीं। मैबिनीचरण गुप्त को सिरे गए 'सादेत-विषयक विचार रनरी इसी भारणको परिपुष्टि करते हैं। प्रेमरम्प-युग में नापरिक नारी का एक प्रम्प प्रबल स्प भी विकसित हो रापा। वह पा राष्ट्रवारीप। मारी का यह स्प मुधारयत मारी काही विकसित सपा जिसमें उसकी राप एवं उत्साह की वृत्तियों को प्ररणारी मई पी पौर यह पुस्प केही समान विदेशी यातनामों को सहती स्वतन्त्रता मधाम में सहयोग पी पी। यह वह युप पा जिसमें महातमी बिनोरिया री मृत्यु के उपरान्त महात्मा गांधी अपीका के प्रश्न को सकर परविर मेष में परिसा पत्र महित रतर पो थे। म-मप पौर उसके परिणाम स्वस्प मिगे मा रिफार्मस' हो दुरे से हिल-मुस्मिम एकता में ममस्र का रिपोमा बा हा पा महालिंग पर बम का या पुगा पा पम्पारन में मीन की मेठीकरने वाले अपों पर किये पए मस्यचार महारमा गांधी को पापार रहे पे १८१८ महापुर की ममाप्ति पर रोमर ऐस्ट मागू हो गया पा सत्याग्रह शेर पर पा बनियावाला बाप का मीपण हत्यामाप मुसता को पार कर पुरा या रोपस योग पर पी पी होमस्त की मांग होवा रही पौ पोरस में महापुर हो रहा पा पाना पिपरहोमा पा १ भाइनिक हिम में गरी मनमा रोषयुमारोप रिश ४ माघ १६५ सेगम) २४ प्रमचा नारी-पाों की सामाजिक पृष्ठभूमि पौर शिवीम की देयारी हो रही थी गगरी यात्रा हो चुकी भी हिम्-मुस्लिम दने हो रहे इंगग में परम-टेबन कान्फ्रेंस हो की भी मारत में मुप्प स्पेण हिसारमक काम हो रहे पे गोपीनपिन समते के उपपम्त महात्मा पांबी इमोसे मारने पर प्रसाधन रखपुरेपौर १५ में कांग्रेस मम्मि ममम की स्थापना हो रही थी। ऐप को इस हमषमपूर्ण अवस्था में नारी पश्चिमित न रह सकी पौर पनायास ही उसने पर की पारीवारी पार पर राष्ट्रीय प्रायोतों में मार मैना प्रारम्भ कर दिया। महकाप्रेस की सरस्प बनमे नमी पते एकत्रित करने मगी गांधी-पापमों मपकी पोर नौटने मपी सत्पा में पाम मेने मगी बिपी मासदेचने मामी सपा सराव की कार्मो कपागे पिकेटिंग करने नयी पौर मीही म्तिकारी मर्म-बल में भी पीरने मनी । पेत पाना ही नहीं रेप लिए प्रत्येक स्पाप करले परमा तत्पर हो रही भी यहाँ तक कि प्राय राम्प-मत्ता के पान्तर्गत काम करने पाम पति को मुमार्ग पर जाने की प्रसमर्षता में उसके प्रति उपेमा कोरप्टिकोण को अपना रहीपी पौर पस्ली से अधिक मा तपा बहिन का मत्तम निभा पी पीस सबके परिणामम्बस्पसको राजनैतिक प्रमिसर-सम्बन्धी माम भी सामाविक ही थी। सत्यमती रेपी परमादेवी बोगरानी सा महता रमा बाई रानारे पम्णा पासप्रवी सरोजिनी नाव श्रीमती ऐनी बीसेट तथा विजयामामी परिणत मावि के माम इस सदर्भ में सम्पनीप। मारी इस नवीन म्प की निर्मिति म भारतीय साहित्य के बोगराम को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता। यह प्रभाष परोष पा पार सार ही बिर स्थापी भी। भारत भाप्ती' मीत साधारण बनता में मापे बा ऐसे परत पा रबीर के अनुसार पाबा हो ऐ और नारी गम्भीर सपनी प्रतिष्टा हो ही बी। विस्मिम तपा 'बाम गं में पुरी वीरेस मिनम्' तथा 'भी भी' मारि तमु म 'गमूर' पौर बनायोत पारि मनमासम में सपा माई मोरसिंह मारि गादी में भारत का मौरव-पान कर पेपे । साप ही हिली क्षेत्र में पा यघोष तपा 'मृणाम जुमा पारिपरित्रों को रबला मारीतुर्वम्म एप विसात सकी स्थापना कर पी पी रीतिकालीन मासमता पायावादी विमासा में परिवोपी दी। परत पुष्प-ममार पोरे-बोरे मारी परक प को समझ रहा पा रेप के प्रति समरे तम्प को सार्प महरा र हा ग पार उसके प्रति पानी पम्प पर मरामोंकी धिमपरता गा पापा। परिषमी रिचानी पीप एवं साहित्य प्रभाव-स्पसम पुग में भारी प्रेमवाद के नारी-गानों की सामारिक पृष्ठभूमि का एक पैपरेजी-पसार रूप मी नागरिक क्षेत्रों में सभित हो रहा था। इसमें पिरेपी ईसाई मत में ईमान लाने वाले भारतीय एवं स्वतन्त्रता-पिरोधीपति पय भारतीय बनाइय-सोन प्रकार के परिवारों की स्त्रियां पिपमान थी। यह मारनप भारत की प्रत्येक वस्तु को मापसन्द करता हा भारतीय समान एक संसदि से ममोनीत विरोष मानकर बनता था। इस वर्ग की मारी तिए बहुमूस्य मोबन मांति मांति के वस्त्र तथा ममति के नित-मये साधन ही बीवन पा। शिमा को भी बह विभिन्न वासनामों की सम्पूर्ति के रूप में ही बहण करती थी। सभेपत मति सम्य होते हुए भी यह नारी संसतिहीनदी पौर उसके इसी रप के विषय हमारे समार-सुपारकों ने मावार उठायी थी। इस प्रकार हम ऐसते है कि प्रेमवर-कामीन मारतीय समाय म अंगरेजी सम्पदा के प्रसार, विभिन्न समाव-सुबारों स्वतलवा-सम्बन्धी राष्ट्रीय माम्दो मो तथा साहित्य में नबीन मोकमावमिक रिकोण के प्रसार के प्रभाव-स्थाप नारी भावना का मम्युलान हो रहा था। मामरिक क्षेत्रों में यह परिपतन प्रामीण समार की अपेक्षा शीघ्र शोर पर रहा था। मागरिक मारी अपनी विकार-यात्रा पर बन रही पी पौर प्रामीण नारी विज्ञासापूर्व इष्टि से उस मिहार ही भी। एक तो यात्रा का पूर्ण पाय उसके पास नहीं पा इसरे बह भोली और सीधी-सादी पी पायार ही दी किनीमता कही मार हीनता का पर्याय ही न रह पाय ।
३ प्रेमचन्द की नारी-मायना 'भागिाम 1 सिर्फ़ रपया कमाना ही पादमी का रेप नहीं है। ममुप्पल को ऊपर उठामा और मनुष्य के मन में विचार पैदा करना भी चसा कतम्प है। पर यह नहीं तो प्रारमी पौर पधु पोनों बराबर है। पौर जिसके हार में भगवान से पलम मोरम में पासीर दी है उसका तम्य तो पौर मी या बाता है। निस्सह प्रेमबम्ब के पास कमम भी जिसमें तपसे मी प्रषिक तासीर किमान पी-पौर मुखर्पन के प्रति उनके रत्न पन की धारणा से ही यह स्पयसिस हो सकता है कि उनके साहित्य की मीब ही उनके पूर्वमर्ती मप्पयुमीम तपा ससके प्रभावस्वरुप प्रागत साहिम के प्रति-काल्पनिक पामार तपा निपट मनोरंजनात्मक नोएस दोनों के विपरीत उपयोमिता एवं मोम्-मयम की भावना से भरी गई है। प्रमचा की मारी-माषना की भी सर्व प्रमुप पिोपता यही है कि उसका चित्रण रमली पारपाय पितासात्मक माकर्षस के हेतुनही पपितु 'मनुष्यत्व को चा उठाने मौर मनुप्प मन में हरे विचार पैरा करमे' के हेतु हमा है) समय की माप पाहित्पिर प्रगति पीमा समाजोपयोगी भावना वा निजी पहिली संपर्पमयी मरिमा प्ररणास्वरूप प्रेमचरमो मारी भावना नेम्दी क्या-साहित्म में एक युपान्तर प्रस्तुत किया है। प्रतीत की पोर हप्टिपाव करते हुए प्रेमचन्न सोपा तक साहित्य का काम कैवत मनमहमा का पामान चुटाना देवम मोरिया गा-पा कर मुनाना केवम पोमू बहा कर पीसा करता पा र उसके मिए पर्म की भावापतान पी। पर एक पीनामा पारिसका पम दूसरे माने रे मपर हम पाहिरप को मम मनोरंजन पोर बिमासिवानी सामग्री मही मममते। हमारी मोटी पर वही सारिप वरा उतरेपा मिसमे रन्थ पिवन हो सापौनता का बाप हो मौर्य का सार हो मगन की पारपा हो पोरन की पाइपों का प्रायोको हममें मति संघर्ष पौर बनी पंग करे मुमाये नही पोस्पिब पौर श्यारा मोमा मृर पा मपण मन मियो में हिमपान ! .
प्रेमवर की मारी-भावना - - है। इसी भावमा के अनुरूप उन्होने अपने मारी-पात्रों का स्थन किया है और ऐसी मावस पनुप्रेरणा को अपनाने के लिए विस मात्मस्वातन्त्र्य की जिस निस्वाप नीवनी पौर जिस प्राणवत्ता की भावश्यकता होती है वह प्रमचन केबीवन में पत्त-रावापत बिचमान दी। एक स्थान पर प्रेमचम मे पुस्य को नारी की प्रम-मति का विकास मात्र मामा है। इस मावना की भाप्यात्मिकता में न बह उममे और न कदाचित् मुनझे ही है किन्तु प्रमरूपा स्याममयी मारी को उनोंमे पुष्प से कभी परिक महती प्रमश्य माना है। इस सम्बन्ध में पानी कसोटी उगनि पासना पौर सामसा की मानी है। उनका विचार है कि 'मारी परिष मे अवस्था साप मातृत्वका माग होता पाता है। यहां तक कि एक समय ऐसा माता है बब मारी पीष्टि में युवकमात्र पुत्र-तुस्प हो पाते हैं। उसके मन में विषय पासमा पा मेरा भी नहीं पता। मिस्तु पुल्पों में वह अपस्या कभी नहीं पाती उनकी कामेनिया पिाहीन मोहोहो पाएं पर विपयवासना सम्मवत और मी बमबती हो पाती है। पुरुप पासमामों से कभी मुक्त मही हो पाता पस्कि ध्यो-यों परस्मा रमती है योस्यों पीप्मातु पन्तिम काम की मांति उसकी पासना की पर्मी भी प्रथम होती जाती है।बह तृप्ति के लिए मीच सामनों का महाप मेने को भी प्रस्तुत हो पाता है।" 'प्रेमामम' का ज्ञानप्रकार निर्मता' का होताराम और 'सूत' कहामी के परिवनी तमा मोबान' के मि वना पार बोला प्रेमचन्द इस बम की परिपुष्टि करते है। नारी पुरप से बड़ी है- प्रेमबम्द अनुसार इसकी दूसरी कसोटी यह है किनारी जितमी ही त्याममयी है पुरप सतना ही संपायबसम्मी एवं स्वासापक है। प्रमा ने दामनाव के लिए क्या नहीं किया "पर राननाप को अब भी यही पंगा बनीईपी कि प्रमा को ममृतराप से प्रम है। प्रेमा पाहेबाननाव के लिए प्राण व निकाम कर रख रे पर इस पंका को उनके हरम से नहीं निकाल समतो। मनोरमा सापाव महनयोमा मेकिन ममेक-परलोक राम साहब के मरह के कारण ही एक दिन पाइप की माथी बम बाती है। योविन्द रेवी मे पावित की किस १ साहिल व प्रेमर-पदिशीत मध में बात में . भूव पानी, मानसरोवर माम" ४ मनि । म २८ प्रेमचन्द की नारी-भावना सीमा स्पर्म नहीं म्मिा पिस्तु पति द्वारा उसे निरन्तर यातनाएँ ही नसीब होती है। सुभागी मे प्रवे मूराम को नाम मामी निमाह से देखा हो भैरों मिरम्तर प्रविपास का ही पासरा भेता है। प्रमाहे मनीराम से बापी मई भमा को तो उसके पाक्षिक्त भी गिराने के यत्न किये जाते है। निर्ममा के मामूर पर बार-बार तोताराम के संबह-नमक की खिड़कन होती है। पानी पति के कारण ही रिचा विषपान करती है। खन पो पकील साहब से पषिक महानुमनि पीपदी है पासपा की परिभक्ति रमा को बर्को पावृत कर मेती है 'प्रम की वेशी' की उमा पौर पैनी बों योगराम से कमी पछी मपठी ! रायमरीके बिना संपाम' क्यों बमसान दीसता है ?-सीलिए कि इन परिषों का निर्माण नारी की पुष्प से प्रपिता महत्ता के प्रविपारन के हेतु हमा है। ' मिसन' कहामी की मर्यादा 'भूत' की रिसेपरी 'सोहाग के पब' की मुपदा "सायन को रेषी 'स्त्री और पुरप' की पाया 'पनी सारवा' की मारमा गिकी पनी' की हमारा मारा की बेदी को प्रेमा तपा 'बेटों पानी विषमा' की विपना मा पारिपोक नारी-पान गुरप से महान् सलिए मगते है कि "पुष्प म बोडी पता भी होती है पिसे यह इरादा करने पर भी हटा नही सस्ता । पापाता उसे पुस्प बनाती है। विकास के क्रम में स्त्री से पीये है। जिस दिन यह पूर्ण विकास को पहुँचमा पर भी स्त्री होगामेमा । पास्मस्म स्नोकोममता रया इन्ही पावारों पर मुष्टि बमी हुई है पर ये रियों के गुण है। फिर भी रियों को संसार प्रबमा करता है-स्विनी बरी पूर्तता है। मनुष्य जिस वस्तु का प्राणों से प्रिय वममया है मामी की मुट्ठी में है। इसीलिए रिस मानतीको मेहता से ही प्रेरणा मिलती है उसी को एक दिन प्रमचम्र मेहता स भी बड़ी बना देते || गोशन' के दौमेम्म मीम में पिया पया माता का तो सम्पूर्ण पापण ही नारी को प्रपेसात माता के पोत ना नियोभित किया गया है । प्रेमचन अनुसार पुस्प से मारी इसलिए मी पेप है कि यह पहिमा और भान्ति की प्रतिमूति लिनु रामनिम्ता तपा अनामिकता से पनुप्राणित होते हुए भी पुरुषों की रपी हम मस्कमि में पानिमा सहयोग रहा। महतामों में प्रेमघर ही बोलते। 'म प्राणियों रिकाम मे पीपा पो पुरणों पर से पष्ठ समभनाई भूमि २३ १ पृ.३ ."
१ प्रेमचन्द की मारी-भावना उसी तरह से प्रेम त्याग पोर मया को हिंसा मंशाम मौर कमा से श्रेष्ठ समझता है। पुरप से उतनी प्रेष्ठ जितना प्रकाश मोरे से। किन्तु यह स्वीकार करते हुए भी पर स्त्री-पुष्प के मसामनस्य की समस्या रहती है तो प्रेमचन्द को निफपत इस पारणा को प्रमय देमा ही पाता है किनारी पोर पुस्प दोनो को भून मामा पाहिए कि एक के बिना दूसरे का पस्तित्व सम्भव पुस्प का सम्म पाकर ही नारी सर उस्ती है। नारी में सेगा पौर संयम पौर कत्तम्य वही पैगर सकता है। अगर उसमें इन बातों का प्रभाव है तो मारी में भी प्रभाव पेगा। मत प्रेमबन के पनुमार मर्व पाए यही है कि रोमों ही एक-दूसरे को अपने से महान् समर्म । पुष्प-स्त्री स्वामी तो स्त्री-रप की स्वामिनी है-ये पम प्रेमचन्द-साहित्य में भनेक स्मों पर मिलते हैं। बाइबिल में कपन है-"तुम मेरी सराहना करो मैं तुम्ह सराहनीय समझू बीवन ऐसे ही मप्रसर होता है। उसी प्रकार मैतिक एक पौपचारिक सामबस्य भी प्रेमपम्प के मनुसार उत्कृष्ट होता है क्योंकि यह उम सोलाए पारिमक सामगस्य तक मे पाता है बो भारतीय समतिमी पर्भ नारीपर' की स्पना में साकार हो चुका है और पिमा' कहानी 'रमभूमि' की सोफिया एवं 'मारम-सगीत कहानी में पिसके तोनों सोपाम अम' सप्ट होठे गए है। प्रेमचम की भारी भावनापा पम्पत्तम मार्ग है 'एर होस्पाम पर स्याय सेवा और पवित्रता का केनित होना। स्याम बिना फलीपापा हो गया सर बिना प्रसतोप प्रष्ट किये हो और पवित्रता सीवर की पहली एसी हो जिसके लिए पछताने पी पाययकता न पी। उनके पनुमार दो नारीका पर्तममा देना नहीं। उसय का सम्पूर्ण वात्सप्प समूण पिपास पौर मा मम्पूर्ण पदमा एवं सामयीनता इसी गाय की मोर प्रवाहित होत है । परसान की माधवी हो या प्रमाप्रम की पायधी रंगभूमि' की सोपिया इन्हो या बाहनी कायापकी मनोरमा हो या 'सेवासरन को सुमन 'नबम की बामपा हो या 'कर्मभूमि' की मुमरा 'पोरान की मोनिती पनिया होया मामती-मारी में इस मादप की स्थापना के बिना प्रेमबार एही मही . १११ १ ४ राममाय मानसिनियम । प्रमादकीमारी-भावना - सकते यहाँ तक कि इसके लिए उन्होंने कार मनोविज्ञान के पापा को पोरना और मामोचों पामेर-संधार्मों को मबसर मा भी स्वीकार किया है। उनके पनुसार प्रम मा स्पाविप 'सोफी' सी पवित्रता में होता है परिपता का व्यापक रूप ममोरमासे रयाग में पमपता मोर मी त्यार का मापारमा मृबरा की ऐसी सेवा-माबमा में परम सीमा को पहुंचता है। स्याग का मुमत्तम स बीवन से निवृत्ति मही अपितु सेवा है। 'रमणी का पप गारे रुम परमाणुगों से बना होता है उसका प्रेम भी पैसा उसका पभिकार भी सवाई यहाँ तक पिउसका कोच भी सेवा है। यही कारस है कि ममपनको विचा' एक पबपीमा धर्मनिष्ठा सन्दीप और पाय मारों पा पालन करमे वाली महिमा है। पचपि पति की स्मार्पस्वि से या पर इस भाव को वह अपनी पति-सेवा में बापक नहीं होने देवी । प्रेमगार के सम्मुख परा "एक रेषी कप में भी मासूम होती है उसकी मुखमी एक विसमण पोति । प्रदीप्त । खाप और मनुराग की विचारा मुक्षि जिसके कोमन मेषों में मठि पोर प्रम की किरणे प्रस्फुटित हो रही है। मापी का बीमामी भसमे पर रवाग मौरपासताप पर समर्पण' होता है। तुमन को भी यही उरण मिलता है "पर तुम अपमे लिए पाती की पाइसरों मिए नियो। पाभूपण-प्रिय 'मामपा' “विसासिनीस में बम प्रम के भाषण कसरी परमा त्पापिनी बात कर उसका असमीप चिठीही कारण है किमतराम प्रारिमारी मीठिक पत्रिकाकी समस्या प्रेमघर को सही सपती है। 'ससार में सबसे से परिवार सेगा पौरपाग से मिलते है परमारी बातिको मिमेहए। १ मनुपा "सारा पम्यात्म पीर बोग एक तरफ पोर नारियों का रसाग एक तरफ होता परस्तु विष का मरा परा भी प्रेमपल की प्टि में प्रोमा नही है। गह मात है कि "त्पानी से प्रकार के होते है। एकमेको रयाप में मानन मानते हैं, जिनकी पारमा को स्पाप में पानत प्रौर पन्दीप पौर पूर्खता का मनु भर होता है मिना पाय में माता और सौरम्प है। दूसरे को रिनामे एगी । जिनका पाप पपमी परितिस्पतियों से हिसार यो पपने म्यापपप पर चलने का सामान मंमार से मेते, पोपुर पमते है इसलिए इसरों - प्रगामा ११ ४ सामान 'गाम प्रेमचन्द कीनारी-मावना को भी बनाते है। पपनी नारी-मावना में प्रेमवम् ने प्रथम प्रकार के स्याग को ही महत्व दिया है। पपने पुरप-चित्रण में उन्होंने दूसरे स्याग का निवसन भी किया है अमरकाम्त मौर बिनय उनमें उदाहरण-समास तिये जा सकते है किन्तु यहाँ भी मम्त त्याग को उन्होंने प्रथम श्रेणी के स्माम की पोर प्रप्रसर किया है। इस पापर्य मावना म विश्वास के परिणामस्वरूप ही तो उन्हनि मारी के उस पावर्स रूप की कामना भी करनी है वो न केवल समय से गाव मागे है अपितु समागानुपमम्म भी है। यहां पहुंच कर मह कहते है इस पोमिनी को किसी मे ईसवे या योमते नही देखा उसे म किसी बात का हर्प पा म किसी बात का विषाद । जिस मन में कामनाएँ न हो बह पयो ईसे पार क्यों रोपे | उसका मुखमपम मानन की मूर्ति मा' रस पर राष्टि पर ही पराको क मेज पवित्र मानद से परिपूर्ण हो जाते थे। स्त्री-पुरप के प्रेम का प्रत्यम्त सन्तुलित बप प्रेमबम्ब की रचनामों मे उप मम्म हाता है। पर ही की मांति उनकी मारी भावना में सैक्स मा प्राकाम्य नहीं है। नारी का म्प एवं सेक्स मी उपेषणीय मही है इस तथ्य की मोर सनकी कहानी 'गया बियाह' इपित करती है । परन्तु प्रेमचन्द यह मानते है कि "प्रेम का प्रकुर रूस में है पर उसको पस्तमित पौर पुष्पित करला सेवाही का काम है। विवाह से पूर्व का प्रम प्राय पति-सीमित होता है और उसम सामाजिक भावमा पा सस्व विचार मामुकता के प्रादेयक कारण कम हो किया जाता है। यही कारण है कि इस प्रेम का विषय प्रेमचन्द बहुत कम किया पार पह! पिया भीमही उसे समार-सापेक्ष हो रहा है। वस्तुत प्रेमवर प्रेम को धर्म से पृथक नहीं मानते । धर्म लोकममत का पाहा होता हैमर प्रेम की समार-निरपेक्षता मी प्रमपन का नारा करने में बहुपा समर्थ नहीं होती। परि परिस्थितिवश इस प्रेम में कोई सामाजिक भावना पाहे यह प्रबकरि ही क्यों म हो पिरोष-साप मा उपस्थित होती है वो प्रमचम्म रस प्रम में एक ऐसे रस की सृष्टि करते बिमसे नारी सब-दुप सहन करती ह, परम्पयमों का उत्तर त्याग से हैती हुई मोकसेवा अपना जीवन की किसी पम्प रिण्ट भावना की पोर सम्मुख हो पाती है। रिपन मनोरमा प्रेमा तथा मैना का मार किसी सीमा तक सोफ्री का प्रम इसी प्रकार का है। १ ममि १ १९१ रोमरिया मायमरोबर भाग २१ प्रेमषन की मारी-मानमा - इनका अपराध इमा की है कि विवाह से पूर्व ही में प्रेम कर बैठती पर कि यह प्रेम इनके मारो तक नहीं पा पासा मेमपाल बन्हें मारर्स की मोर मोहरते है और तब उनकी नारी को भी एक रिसासा मिल पाता है पर विवाहोपरान्त वह पमझती है कि सन्धी प्रार्य रमपी कुम-प्रतिष्ठा पर मर मिटने मामी होती है। उसके प्रेम का ही है पतिप्रेम । और यदि मा ऐसा नहीं समझ पाती तो त्याग एवं सेवा के माप पर पमती हुई भी कक्षणात को प्राप्त होती है। र इनाने तो समाज कौष्टि से पपराप कियाकिन्तु भूमिमा विपावती निर्ममा इन्दु सपा पोबिन्दी ने तो या गोषम का कार्य मही किया फिर भी उनका बीवन मयों निशुम्प पगात एवं मातमापूर्ण विस मनाहिक जीवन केरा नर्म प्रतारणाएं ही प्रतारणाएँ मिमती रसका पत्तरवामिस्म किसके उपर 17 प्रेमबर ने इस बाहिक समस्या पर रिचार किया और यह समझते कि भूमध सामाजिक समानता ही इस अपार्म पस्प एवं इन अनमेल विवाहो का कारण है और ऐसे समाषकी स्त्री ही यह अनुभव करती है कि 'स्त्री पुरप की स्पिनी ममीन है मानो स्त्री को निमाता ने इसीमिए माया है कि पुरषों ६ प्रथीन थे। मार सोचते है कि हिम समाज की बंगाहिक प्रगा इतनी इपित बनी चिन्ताजनक बनी मर्यकर हो गई है कि पुप समझ में नही पाता उसका मुबार पाकर हो ?", बहुन सिर खपाने के उपरान्त 'ग्वार कहानी में उम्हीी एक निष्कर्ष की भोर पारा किया है । यह यह पिर तमाम माता पिता पश्चिमके पारस्परिक स्वभाव या सामरस्पटी पोर ध्यान रेकर उन्हें कुएं में रहनते है तो "तड़की के पत्र कसाई मिकर हरपारे । पौर बपि समाग भी नन्हें पग नहीं देता तो न सही या मी यषि सामाजिक संगोष-मर्यादाको विवाह से पूर्व पार नहीं कर पाती तो न सही- किन्तु मागी पति तो अपनी स्थिति सप्ट कर सकता है पौर या उसे करती चाहिए । इसीलिए मय-रोमी हमारीनाम विवाह के दिन नापता हो पाता। पौर अम्मा का उस वता' कारण बार हो पाता है । मितु उन माम- गौम मुस्पों पर पापारित होने पर भी मारकी सामानिक रया में पहम कोई हल नहीं है। समार में अपरोगी ही नहीं बन-मिप्यारोपी प-मोर . से १ प्रनिश २ २ मैरारतीचा मानमरोबर मापन ग्गर मानसरोवर माग १८ मचन्द की मारी-मावना के रोगी पारीरिक व्यापार के रोगी हमारषित मान-मर्माण के रोगी तपा मानसिकौस्य के रोपी भी हो। और यह भी निश्चित है कि ये रोपी रेवता महीं होते। प्रत प्रेमचन्द को पुन मारी के स्याग एवं सेवा-कर्म को मिक्षिप्त पाबार पानी पाती है और भयंकर परिस्थितियों में भी सरे समक्ष पति मतिका पावर्ष-यान पनापना पड़ता है। परिस्पितियों की भयंकरता को प्रेमचम् न समझते हो ऐसी बात महीहै।बहनो पुप सिखते अपमी मारमा मनुषों के प्राचार पर नो सिसते ही। साप ही अपने पार पान के पान पर प्रपमे इम्मानी स्पको भी रखकर परसते है। उन्होंने शिकार जीवन का पाप' पारि कहानियाँ तपा मनोरमा एष मोबिन्दी प्रादि पात्रों के माध्यम से समझाया है कि नारी को बन नही अपितु विश्वस्त प्रेम पर भाषारिख सम्वोप की पावस्यकता होती है और शान्ति पर-बमाई' पूस की रात' सिकार' पारि कहानियों में यह मावना भी पभिव्यक्त की है कि पुरुप पौर स्थी एक-दूसरे के मुमाम होते है। साथ ही मह यह भी मानते है किसी को बीवन में प्यार म मिमे तो उमका पन्त हो जाना ही अच्छा है। किन्तु विवाह-सम्बग्ग में फिर भी परमारी को पाी सम्मानयुक्त उपरेप रते कि 'नारी! तुम नारी हो त्पाप सेवा क्षमा पार बलिदान की प्रतिमा हो! पुरप से तुम गत पो हो।देखो कोधिध परो कि तुम्हारा पति तुम्ह ममझे।', "अपर तुर्मे उसकी बाते पम नहीं पाती तो कोशिस करो कि पमन पायें। बहनुहारे पतिदेव ।। तुमारे लिए उनकी सेवा से उत्तम और कोई पप नहीं है। निष्काम कर्तव्य कमी निष्फल नहीं पाता।" परि कोई महत्य प्रेमचम की इस निष्कर्ष-भावना के प्रापार पर उन्हें परियारी ठहराता है और संका उठाता है "मुझे तो विचार सो साम पिपो हुए मालूम होते है यही सेवा पार पतम्य मारि 'दो प्रेमचम तुरन्त बोन उठो मापको पे पिचार सो साम पिदोए मालूम होते है। तो सपा करके अपने वारे विचार रतनाव। बम्पती कैसे मुही प सकते हैं इसका कोई तावा नुसगा भापके पाम है ? प्रौर पर उत्तर में देवस निसियामापन मिलता है वो ग्हें पुम पहला पाता है 'मापको हात नहीं कि दुनिया में ऐसी बहन-सी पाते । गो १ नि माममरोबर माग ११ ११ २ पनि । ११ पोवार १५ ४ प्रेमचन्द को मारी-भावना ३४ - पुरानी कमी हो ही नहीं सकती। समान में इस प्रकार की समस्याएं हमेशा उठती राती पौर हमेशा ग्ठती रहेगी। प्रमचन्द की नारी भावना का सुन्दर एव सरसतम रूप गो रपसम्म होता है या दाम्मत्य जीवन मे मारी पुरप की प्रेरणा स्पति एवं पूर्ति बनकर माती । मामती सुमना मापा विनासी पौर पमिया कृप ऐसे ही मार पात्र है पो पुग्प को विकास की मोर प्रसार होने में प्ररणा देवमार उससे पाए भी करते हैं। एक-दूसरे के प्रभावों की पूर्ति एवं पार समझौते को ही प्रेमचन्द पारश पराम्पत्य मानते हैं। मुमा को पाकर पसिंहपो समता है कि 'स्त्री सन्तानहीन होकर भी पुष्प के मिए सान्ति पार पानामा पिरम स्रोत है। राम्पत्म भाव का मुमखम म गोदाम की बनिया में परिलमित होता है। संपो मे पिसा हुमा होरी मपी समानता हपा कहता 'साठे तक पहुंचने की मौबत ही मही प्रायेमी बनिया इससे पहले ही पल । बमिया पाषा पाप करती है "पन्या रहने से मत प्रसुम मुह से नियनो। तुम से कोई मन्दीबात मौकरे तो भागते हो कोसने।" होरीकर परसाठी रखकर पर से निम्मा तो बनिया हार पर पड़ी उसे देर तक देखती ही। पसर इन निराणा-बरे मुखों ने पनिया के पोट वामे हुए एप में प्रातकमय कम्पन-सा समरिया पारबह से मपने मारीत के सम्पूर्ण तप मौर व मपमे पति को प्रभयदानही पी। उसके पति करण जैसे मासीवारीका म्यूा-सा निकल कर होरी को अपने प्रमर पिपापे मेवा पिम्नवास प्रमाह मापर में सोहाप ही बहण का विसे पकने हुए यह सासर को पार कर पी पीसही पाठक के लिए यह बरसता एवं पार अमरता। एक मान निमग्राम।फितु प्रमचम यह भी सारपान करतापारम्पती भी पारीरिक यौन विकतियों-सम्मादी सम्भावना एवी है और कभी-कभी तो पती के कारण परस्पी ग्यारहो पाती है। प्रम की बी में उमा और पोन राम सम्पब-माप्यम से उन्होंने पार पम्पतीको सस्प कामपति परपरेप दिया है। प्रमघर के अनुसार नारी का सतीत्व एसपी सबसे बड़ी सम्पत्ति स्त्रीगुप्प के एपित सम्पयो बह पति तपासमार दोनों लिए हानि १. मेवामान ! २२१ बन की मारी भावना - ममते हैं। भास्म-सम्मान के सुर बाने पर यह सर्वस्वहीन हो पाती और अपनी ही दृष्टि में पविता होती है । मुम्नी न्यायालय में बहती है में बीन प्रबमा ! मुझे इतमा पार है कि कई महीने पहले मेरा सर्वस्व सूट लिया पपा और उसके भूरे बाने के बाद मेरा पीवम इवा है। मैं उसी दिन मर एकी।' पोविन्धी (पोदाम) सतील-गरिमा से इतनी मरी हुई है कि सामने बोए पुरुप की मोर उसकी पतः एक बार ही उठती है और फिर मुकी रहती है। 'बहिणार' कहानी की गोविन्दी का बिनाम तो सतीत्व के प्रष्ट हो पाने की कल्पना-मात्र से ही हो पाता है। ऐसे ही प्रेमामम' की मायनी की भी विचारों केही कारण वह बस्तु मुट मई को से मान से भी प्रभिक प्रियपी यो उसके मानकी पाक मारमगौरव की पोपक पेय का प्राचार और उसके बीवन का पबमम्मी। २ 'सती' कहामी की मुमिया की मोर उसके देवर ही की ममवापी रष्टि पाती है तो वह कहती है 'तुम उनके पैरों की पुन बराबर नहीं हो साता ! उबसे कपड़े पोर चिकने मुपके से कोई पारमी मुम्बर नही होता। मेरी मांगो में तो उनके बराबर कोई रिवायी मही देता।" 'रो सखियो बीचमा भी ऐसी ही सतील-मरिता। 'कायापल' की पामीपरी भी अहस्या को सतील काही उपदेश देती है। मनोरमा तो मानो सीलकी देवी ही है। पर कहती है उनकी मुसी की महा तो फिर किसकी मुधी की परवाह करती। जो स्मी अपने पति से रिसे में दीना रहे उसे विप बाबर माणदेमा पाहिए। हमारा धर्म कीना रपमा नहीं समा करना है। प्रेमबर का यह मार शिवास है कि जिसे पाठिबन पैसा सापम मिम गया है उसे और पिसी साधन की क्या प्रावस्यकता! इसमें मुख सम्तोप और शान्ति सब-तप है।" पन्चाई को रिवाने के लिए जिस प्रकार थोड़ी-सी दुराई रिपामा भी प्राव होता है उसी प्रकार बालामुखी सपा 'धर्म-संपट' एवं 'नया विवाह पारिकहानियों में प्रेमपम ने सतीत्व प्रष्ट होने के श्याम पम पर भी विचार किया है। और सतीत्व को नारी का सर्वस्व मानतेए भी प्रेमवार को यह धारणा है कि "मानव परिजन विसुत श्यामन होता १ बमभूमि । १.प्रेमाश्रम १५ । सती, मामभरोपर मान ११ ५ मेलामब १२११ प्रमचन्द की मार-मापना म विमुम रेठ । इस में रोनों हो रगों का गिभित्र सम्मिमण होता है। स्थिति अनुपम हुई वो पर ऋषि-स्प हो पाता है प्रतिदूत हई तो नपषम । या प्रपनी परिस्थितियों का सिमाना मात्र है। यही कारण है nिt बहत कम सही पितु मारी-बरिष कीमतामों का प्रश्न भी उनि किया है। नारी की पाभूपण-प्रियता को गहीन चमकी संस्कारगत पुर्वतया वराया है मौरईया का पुन भाष तो समय के प्राम प्रत्येक नारी-पान में पूमा पिक मनमा प्रबन-अमन्यन स्प में मिम ही माता है। यह भी मारी का पयामम पस ही को 'शत' की पोर इपित करने हेलिभिवमा है। किन्तु सतीत के दूपित हो जाने से अधिक नारी में स्पाममता की पल्पना प्रेमबल महाकर सकते । पचपि यह प्रणम्य है तो भी परिस्थिविषय मरिनारी पतिता हो पाती है तो प्रेमवार पुष्प से पहा दोषी उदारता एवं स्याग की मांग करते क्योंकि एक बार ही की कामानिमा का बह (मुभी की नाति) प्रायश्चित्त परमाना पाहते और इसके बिना हो कोर भी मुबार सम्भव महा हो सस्ता सब पह नारी पीतार करती है मसी प्रबनाइ भोपी तुम पुस्प हो बनवान् हो पाइसी हो। मैं कभी तुम्हारी पी (तुम्हें परीर विशा पा) और मपि समय मुझे तुम से पतप किसे देता है किन्तु मेरी मार तुम्हारे हाप में है। तुम मेरी सा करो !-तो प्रमवार भी पिकत बाते है। 'पगारीम' पौर परीया' कहानियां भी प्रेमचारी सतील मारना की प्टिी महत्वपूर्ण है। पौत्व स्पामात पा से पुरा हुमा सानप नी । सेवापान' वा बम' उपम्पामों पर पाकर मापापी'तपा रेस्पा' मारिकहानियों में प्रेमचन्द ने इस पहनू पर परमात सहानुभूतिपूर्वक विचार किया । वस्तुत नारी *मी भी हो, प्रेमचन्द ने उसके प्रति पहोरामा सौपा ही नहाया भी सा प्रपपार नहीं है ।मामा भी स्वीकार नहीर कि समारस मीमा महीना सस्ता पाटिएमसी प्रान पारण किया मारनाम मामूर नही है हमारी गलतिया से ही पा पार नया नो रिका पोहर परवागार में फरोगों में बैठी रिणावी ती जिम्होंने पानी नग्या पौरठीलोप्टर रिया पसरपीवर का नाम पनि हमी १ मेमानस 1 सम मनमरोएर माग - In प्रेमचन्द की भारी मापना V इसरारा । - । इसलिए मोम है। प्राचीन ऋषियों मे इमियों के दमन करने के दो साधन बताये है-- एकराप । पहमा सायन मरयम्त कठिन मोर दुस्साम है । मेकिन हमारे मागरिक समाज मे अपने मुख स्थानों पर 'मीनाबाबार' सगा कर इसी कठिन मार्य को प्राण किया है। उसने पहस्वी को दीपा कापमम बनाना पाहा है। सामना की हो रेकर हमने विषभरी मापिनो की पुष्टि है। यह पापोगना नही है तो और क्या है। इम म मारमपौरबका इतना प्रभाव पर्यो है ? हमारी निर्जीवता का या कारण है ? ये मानसिक पुरसता के ममरा है। कृय भी हो मोर का मटका बटोही सार्य पर प्रा बाये तो भूला नहीं पाता हमें प्रार विनवास मंत्री पवुनर' पौर प्रो रमेशरत्त से स्या-मुपारकों की भावश्यकता है। हमे येण्यापा को प्रावानी म र रखना चाहिए और वहीं से उनके रवार के सतत प्रयत्म करने चाहिए। यह नहीं ममममा पाहिए कि उन में सत्य की समिर पुरीरबह सो भर पई, केवम उसे बचाने की प्रावापता है। उनके संसारों को मिटाना होमा को तो 'सेरासदन की मुमन परत या बन की बोहरा बरस पी यहाँ तक कि रमके भौगम्य पौर निप्पट म्यबहार, रमानाप की माने मी सोम दी है। भागापीहा' की कोकिला तो स्वयमेव ही परमपई है। पाखिर हम क्यों महीं समझते कि हर काम में एक ऐसी चीर होती है पिसे उसकी मात्मा कर सकते हैं। प्रस्मत निगुस्तानी दहगीर की पारमा है। वेदयाों के लिए सेवासदन होनो पाप कम्यामों को शिक्षा से उन्हें पतुर पहिरिणयाबमा रो। ठीक हैहि समार को उन्हें अपनाने में हिचकिचाहट होपी विस्तु बर मविप्य में मंदा गत ही नहीं रहेया तो रम सयमेव ही भर बायेगा।हो या पौरपात है कि मरने की बेता मे बमन मषिक तीन हो बाती है रिन्तु उसके लिए हमें अपने मानूनों को पाटकर रखना होगा। फिर से यह परम नहीं मरता-यही है मुबारक प्रमथला पतिता नारीक प्रति प्रापावादी एवं महानुभूतिमय प्टिकोण ! बिन प्रेमपम कोरमाननीयह भावना मायन्त पमनाकिम माग है और इतना हयारारकि मुझे मनिपरे हुए पानी रे एक प्याम में - - . ४ गोशन प्रेमपतकी मारी-माषमा मारा पा सकना "यह गत स्रामापिकही कि यह मारी में पारिमर उत्पान एवं तमीम को प्रनिगार्य सममें और इस दृष्टि से भारतीय नारीको पाश्चात्य नारी से माफ सममें। भारतीय मायके त्याप मनस्तुष्टि सौम्मता एवं संकोषाहीमा मादि पारम-गरिमा के गुणों का उन्हें पाश्चात्य नारी में भमान-सा ही दीखता है । वास्तव में उनकी पाद-पासना सुसंस्कृत मारी की। प्रविसम्म प्रामिका की नही । प्रेमबन्न अनुसार पश्चिम में तो 'मारमा को पुषमा पाता था-सेवा एक निसासिता के मिस्प-मये पापनों का पोपस किया जाता है काम पार पर्म ही मही बीवन । उनका पर्म मी विनास है मौर उनका प्रम्यारम भी भौतिक सन्तुष्टि है। फिर भी याराम कि हमारी शिक्षा पौर पम्पदा विचार-मातरम्प के पोषक नसी पारवा पार्ष में पिम्-म्पता है। पारिमा पान्ति स्थान पर यहां की नारी में पारीरिक तुहिकी सएिपदा एवं वसम्म पुप्पएँ रिचमान पठी । सीमिए पोत्री हिन्दु म होते हुए भी हिन्दू धर्म पर बान देती है। वह कहती है, जो पारिमा पान्ति मुझे पार कही म मिती बह पापियों की प्रम-ना में मिल गई। पौर मोपियों की प्रेम-मा सा है निशा महनीमता हिमता सर्वस्वरसाप एवं माना की रात गापा ही. ही पर प्रेमपत्र दोनों नारी-समारों में पम्ठर मानत है। परिचमानुपामी संगनेवम मारी-बर्ग को भारत में देख कर प्रमवार को करना ही पावा "भूमे और हमारी गाने पश्चिम का पार में ही पहा नारी में अपना परमो रिमापौर समामिनी रिर निमास की वस्तु बन पाई। पश्चिम की भी सम्म होना चाहती है इसलिए रिपपिक मषिक विनासकर साहमारी मावामों का पार निमास कभी नहीं रहा। हम बम सेना पार रंग दासी मंचालन म्यिा । पश्चिम में बो भीग पच्ची! उनसे नीरिम (ग्राहरणसप्प 'पुण्पा' प्रामात में पाप्रपा का निवारण अनिवार्य प्रममा पमा ।)। मसति में सब भारान-प्रराम होता मावा है, दिन भग्मी मान तो मानसिक दुमता काही माल है। पश्चिम की सी पार पहाया . माम भागारम भांगना परम मिरा मीनापुरताबारे उनले दारी। प्रभाविपीला मंच में रिमै पए मापण से। . रमभूमि, १५ प्रेमपरकी भारी भावना स्वामिनी नहीं पहना पाहवी भोप की दिदग्व मातमा मे उसे रन्यू यम बना दिया है। मह अपनी नग्मा और गरिमा को को उसकी सबसे गो पिमूति भी परमवा मार प्रामोद-प्रमोर पर होम का रही है मन में यहाँ ही सुसिभिव वामित्रों को अपने पका या भरोहई गोम बाहों या अपनी मानता का प्रार्थन करता है वो मुझे कम पर या भाती है। उसकी माताओं ने पवमा पराभूत कर दिया है कि वे अपनी मग्या की भी एसा नहीं कर सकती। नारी की इससे पपिक और पमा प्रयोपति हो सकती 07ी' कहानी में 'सम्मा' कहानी में 'पाप' कहानी के रिमी बटोही कपन में तमा प्रेम की सनी के प्रारम्भिक रुप में और 'मोदाम मेहता मी परतता में प्रेमचन्द की इस भावना के विधर न किये पा सकते है। "साम्ति कहानी हो इसका प्रम्यतम बाहरण है। यही पानी को अपनी मुसहसा पत्नी को पश्चिम के दुमदुम-प मे वेपमा पाठे थे अन्त में सात ही मानसिक रोगों में प्रस्त हो जाते है और पापना करते है, # फिर तुम्हें नही पाने की-सी सममानी सिर रपन बानी पूजा करने माती पमापण पाने वाली पर का कामकारकरनेवाली परषा कावन पानी पर से परने बानी पति-भता से पूर्ण स्की रेखना चाहता है। यही नही उस नारी की अपनी पारया भी पापार पी -- 'तूमे प्रसन मार बस्थापण में प्रयत्म समपि की तुम् में परने सापों का मान हो गया है, तुम में बीवन के तुर मोगने की योग्यता प्रपिक हो पब पधिक परिणी सदस्य पौर शिक्षा-सम्परत मी हो पई, लेकिन तेरे पारिमकसम का मिनाए नया क्योंकि तू पपने तम्प को भूल गई। परिचय प्रभाषम मानत तमा की प्रमस्या भी मानिस नारी की विकट समस्या बनवी मापी है। अपने सम्पूर्ण साहित्य में प्रेमपत ने इस पर पापारिठ कोई रपना पपमा प्रसंपविक्षेप नहीं लिया। कारप पह पिमह उस सर्वहारा नर पा लिन पर्म का प्रमुभूतियों के wिat बिसमें गाध सकप एवं मसरूफियत कारण तमा का प्रानी बीपसम में उपस्थित नहीं होता। तो बोरा मनाप मदान को निये एक पम मेंस पर उन्होंने अपने विचार मष्ट किये हैं। नियते । सहाए-बर्म में तना १ गोष, 1111 . शाति मानसरोवर मात्र ३ ४ प्रेमचन्द की मारी बाबमा साधारण-सी गाव है। केयन पापित उच्च वर्ग में ही उसने सस्प पारस कर लिया है। पपने प्रष्टतम स्म में विवाह मी एक प्रकार का समझौता और समपण ही है। यदि कोई बम्पती सुधी होना चाहते तो सरें एक- दूसरे लिए मुबाइस रखनी चाहिए । बैंसे ऐसे भी मोप है पो पछी परि स्पिति में भी सुखी नहीं रह सकते । समन प्रम और सभी प्रकार के सों की ष्ट होने पर मी प्रमरीका में उमाक कम हो ऐसी बात नहीं है। चाहे स्त्री हो या पुष्य उनमें से एक को मुगाने के लिए तैयार रहना चाहिए। में यह नहीं मानता कि बोप केवत पुरुष का ही है बहुत से मामले ऐसे है यहाँ स्त्रियो सकट पैदा करती है और काम्पनिकों की सृष्टि कर देती है। पर इस भावमा निश्चय ही नहीं है तिमाह हमारी बाहिक पुराइयों को दूर करेया में उसे समान पर मारना नहीं चाहता। हाँ कुछ मामों में तवा भावावक हो पाता है। लेकिन मेरी समझ में भमरने की या एक-पूरे की पेया को मोड़ पर पीर को नहीं है । परीब स्मी को बिना कुछ दुवारा दिये तमाह विमा पाप यह माम वम कुत्सित म्पतिवार परिखामसहप की पाती है। समानता के पाभार पर निर्मित उमाण में इस मांग को कोई स्थानमा ।' प्रपभी 'कुसुम' मानी में प्रेमचन उमा पद वो पमान पर नही मामे किन्तु कुमुम का मोमी पति बम-माससाकारण जब उसकी उपेक्षा करता है तब असुम का मारमसम्मान पाहत हो जाता 1 से पता है कि उसका पति दूसरी पारी करने वा हारिप्रपने पिता को फिर भी उसके रिनामत पाने का प्रबन्ध नही करने देती । पाना पिपय है कि यहाँ लेखक रा उसके पुनर्विवाहमा मी मोई निरंच महीं रिमा पया। अपितु से त्याग के प्रमात पागर पर पोड़ रिया पपा है । बस्तुत निपने को तो प्रेममय ग मान को निब दिया है कि कुछ परिस्थितियों में समा माषायफ हो पाता है किन्तु यपात पह इसे तमिल भी पसम्म नहीं करते पहा इसका कहानी-नप में पिपण भी उन्हें नापबार गुरखा है। बहुविवार को तो प्रमचन्द ने प्रारे हो मिया ही है किन्तु पन्तर्मातीप ममातपपीय प्रपा प्रबंधपीय बिवाहों से सम्पद एनके सभी प्रयास प्राय पुपास्त होते है। इस रिपर से समर कापर 'पामा-सीमा से पारि कहानियों का रिपभूमि' पर परिपनी टि गती पाय तो सप्ट माठ हो पाताप्पत्तिगत रूप में ही प्रेमवर इमरे पिम में नहीं है किन्तु एक १ गमनाव मरानबोलिये।
प्रेमचन्द की मारी-मारमा वो सामाजिक परिस्थितियों की प्रतिमा में ऐसे दिया को सही सास से कम यह नहीं समझते दूसरे मह मानते है कि सम्बन्धों में पुरुप से स्मी को प्रपेचात मषिक ठोकरे खानी पाठी /सामागिह पर्यावा-स्पी राम भरमारी के मर से उठ बाठो है यही भापका बनी यही है कि निस के लिए उसने प्रारमोत्सर्म च्यिा होता होकही सापारिक पपणा हापाभिक सम्पान की प्रसन्नपि संचयरस प्रथया नारी स्वारको धीरे-धीरे सतरने पर 'दोको रामेन की मांतिकहमरे 'तुम्हारे ही कारण मुझे "मी कापर' कहानी के केही माति सामागित परम्परापों पागे पपक्त होकर मात्र न प्रकट कर रे-"पुरानी बातों को भूत बामो सस समय मैंने हम पापापा की सना नहीं की पो-और परिणामस्मम्म 'प' की साधन रेनी पड़े। यही कारण है कि बिनम पीर घोफी को प्रेमचन्न मयु-रण देते है और हायार' की प्रशाव-नसीमा पदस्या' पर भी राम पिसानसिंह की पुत्री होने की मोहर उम् नपानी ही पाती है । स्तुत प्रेमपन में ऐसे विवाहों की पारणावस्था के पृष्ठ बोल करार समस्या को पाने वाले पान-समान पर घोर दिया है और अपनी प्रभिम्पक्ति के परिणामस्वरूप एक बार समान की पोर इगित मर कर दिया है। प्रेमचन्द रिहा रेना चाहते कि विनामों के यी दिन वापर पीक उठा करती है। इसलिए यह विवा-पिपाह के पक्ष में है। सर पन्होंने रिपवर पिपरानी देवी से विवाह किया था। किन्तु समौ मरार की पिपवारों के परिणाम हो राम मह महीं देते। इसलिए उन्होंने निम्न पौर पदो प्रकार के समावसों की मोर ध्यान रिया है। निम्न पायो प्राय प्रामीण पशिक्षित है बीवन की विभिन्न विषाणामों के कारण जिसकी पिणार-सपाली परम्पराएँ सिधिन पा रीमोर यहाँ मारीत्व र पर पविरप में साफ की पायाममता बनी पती है। ऐसे समान में प्रतिमाश रिएबापोंको योर र बाम-रिपडा रिपोरी पिपरा नवयौवना का प्रोता पादिप पपी प्रकार की विषमामों TRI प्रेमपन पश्ति नही मानवे मोकि यहाँ की नारी म पिपा का प्रसार एवं तम्बम्प पिपर ठपा तुममारमा पप्पपनारा पागत मानसिक स्विोस ममाव होता है और न ही पाकीमी सम्मा की पाप उस पर परी होती है। प्रत पुविवाह में सभी विष मिमी पापा स्पस्पिट ही मही होती। विवाह को प्रप्पारम के स्वर पर ने १ मामय मानमरोतर मग १५८ ४९ प्रेमपादकीमारी-मापना - बाकर सममने पौर उसकी माप के सहारे रिसमी काटने की क्षमता भी इसमें नहीं होती प्रपना यो मह पीरिये कि पसकी यह पम्पस्त नहीं होती। यही कारण है कि महम्मोका कहानी की दो बषों बाती मिपमा मुनिया का विवाह केदार से हो पाता । विवाह को पात मुनते ही मम्म के पोक से मुरमाया हुमा उसका पीठ परन कमम की नाति प्रारस हो जाता है। रस वों में मो एप उसने बोया पा यह सौ सप में मानों प्याब के साप से मिम पाता है वही मारण्य गी विकास नही पापंग बही मोच फिर मा भाता है/मामिनी' हामी की विपमा प्यारी का विवाह प्रपस्पा की पिम्ता रिये बिना ही उसके हमबाहे बोनू से हो जाता है। सुमागी' पहानी की बामविषमा परियम एवं ममम पर तो समीगर समनसिह इतने मोहित होगामे है कि जाति-पाति की भावना को किनारे रखकर उसे अपने पुष के निए पुन मते । भोरान' की मुनिया की मिकतामस्पा से पूर्व ही गोबर से उसका पति-रूप में पारारिक सम्बन्द हो पाता है। माम' कहामी का पंगू गमिपी पोमती से प्राप्त पुष को प्रपनाता हुमा कावा है 'मैंने एक पीया हमा देत मिया तो क्या उसकी फसल को इसलिए घोामा कि उसे किसी दूसरे बोया पार पिस्तु प्रेमचन्द की विशेषता यह है कि इस निम्न वर्ग में भी पिपरा-भिमाह भारत को पनि बना रपा है। भरि पुस्प निभवा नारी की मातृत-राति का तिरस्कार करो मन दो-चार दिन की पारीरिक मूम की तृप्ति के हेही उससे पहमा पथवा इमरा विवाह करना चाहता है तो 'भूत' कहानी को मुनिया तका कर्मभूमि' मी मुभी की मांति के रसमा पिपना-प ही प्रपिक श्रेयस्कर समझ है। दूसरा पर्य। सब वर्ग । या वर्म सिमित है सिर्मपुल है किन्तु पाम्मनों का बात है। सपर्म की पिपरा कहती है "कृपमानूम भी तो हो मंसार मुझसे पसा पाहता है । मुभमें पौर देन। पापकर बन बा ! मुम्मे यह महीं हो सरता कि अपने को प्रमापिनी दुरिया सम पोर एक एमा रोटी मार पी "मैं पपने मम्मान की रपा प्रापसाती । म से पपना पोर पपमान समझती पिग-पग पर मुझ पर पंकी पाम निस्व कोई परवाहों की भांति मेरे पीपे नाटी निये पूमता है कि रिमी रोष मनापा। यह पणा मेरे लिए १ सम्मोम्म मात्रमगर माप १४ १. तमाममोर माप . प्रेमचन्द की मारी भाषमा मम्म। इस एप में पिपरिया की बात करना एक पी पीर है। पो भी विममा बाम वा शिोरीप का पुनर्विका यहाँ प्रेम प्रायश्यक सममाते है। इस इष्टि के रनको कमानी 'राम्य भीमा यथार्थ का सुपर पुट निये हुए है। ताधी को पता ही नहीं विवाह क्या प्रस्तु और मा पिपाशे पाती है। उसे मोड़ से पाए रिसाने के लिए पामोद-प्रमोद, सेगसम्पास मावि पापों को बा बाता है किन्तु ससकी मां को पाक्षिर मही भगवा कि बिना मामी नाव पार सगना कठिन, पिरमा पाती है वह पाती । पौर उसके पिता भी यही कहते है कि इसका रस एक ही उपाय परपसे पान पर नहीं मा समता । स प्रकार की परस्मा में प्रेमबम विषा-विवाह को पावश्यक प्रमझते हैं। हो ऐसी भस्था में बहा कि विपका पुरती के प्रपा प्रोडा किन्तु पति प्रेम तपा वासना की निस्साबा का एक बार पन्तुष्ट अनुभव र मी हो मिषव विवाह की प्पेषा उसे किसी पम्य पारमिनल पर छोड़ देते है। बह पाचार होता है पुष भपका पति की पुनीत स्मृति का मिसे या विषया बकित नहीं करना माइती । 'माँ कहानी की करणा का परिव इस टि से पनीय है । प्रेमचन्द का विश्वास भोग-विकास संर-समारों से भारमा उसी माधि सन्तुष्ट नही होती से कोई बटमी प्रपमा प्रचार साकर अपनी दुपा को पाम्त मही कर सकता । मोरन किसी तप्य (मामार) पर ही टिक समता स्तुमा के पीपम में वह पापार। पमप्रेम करया मोपा पूी मुबामा के पास रह भापार है मादल प्रपा पति की सुमधुर स्मृति पापभी के पास भी ऐसा ही भावार होता है गिसके सिर बाने रह जीवन से गिर पाती है। प्रेमचन्द पानते कि मार का सबसम्म मेना मत्यन्त कदिन होता है, किन्तु साप ही रनी पठीत्व-अपना मौ को परल नहीं है। यह प्रतिमा के प्रथम ससरस में गहन विमा पूर्ण का पुनर्विवाह कर लिया का हिस्सरे संस्करण में पये पसलिए काट दिया गया कि उस सीलको भोट पानी थी। बस्तु हम फिर पहीबईने कि रस नारी से पो मतालको भनीभांति सममती है प्रमपन पुनरिया भी पपेपा सतीत्लार्थना की हो पपिक प्रपेक्षा प्रेमपान वाहते है कि समाव-सुमार पा राण-येगा पर पर पी नारी १ मेगस्थ मीसा पानसरोबर माग 1 ..मि, ॥
मैमषदको नारी-मापना है मी से पीयेम प्र से बाहर निकल रही नहीं अपितु पर-गृहस्पी का सामाग्री भी बह राष्ट्र के प्रति अपने कत्तम्ब को निमा ठी । रंगभूमि' की बाझवी विकार' गाना की पूरी बारित मा पान' की सुमामा की भांति यह पीरबसू हो सठी ही पो अपने ही कामों पसका पता पोट साठी। ममूमि' ही सोमिया प्रेमामा की पहा 'सती कहानी की चिन्ता 'मां की पपा 'पनुमन की बीवी पाप का प्रणिकुणी बजमिनी पौर बिहार की मामा श्री माता वीरमरि पौता हो साती सोहाय की साड़ी की वोप की भांति यह विरेपी बस्तुपों का बहिष्कार कर सकती। इन्दु की पौवि पदारे सकती है, वह पर्श कात समती है-यह क्या मही कर सकती पर से बाहर निकल कर जो उमकी स्थापनापना राग एवं सरसाह-पम पार भी पुराहो सकते है। 'मन बहामी की मृदुमा की तय सम्पूर्ण परिवार मिरान हरप 'बम' को भी सम्मान और भक्ति की रेषा माग समठी मोपवरी की मांति "परली मे पति' बन सकती है सराव की गन' की मिसेर ससना की रूप मिसन र बन्यो 'पलप की मिटुनमाई की मोति यह पहारों के परिवारों को रिमापारे सकती है पर कर्मभूमि' की सफीमा हा मुम्मी की मांति देस सिप पुरषों से भी अधिक गौरव का विषय बन सकती राष्ट्रीय समस्यापों की पोर ती पसरा हार स्नेहपान समान सा की पसा माना है। यह कह सकती है मेरे पूज्य पिता मापकी या करनी मेकिन पापको दूसरोका तन न इसने पो इसे हात नहीं करते। पहपोरी भी नही है। यह पत पुरीररितमाया। बहन चाहे पर पाई परमहरोपी को मिटर मोड़ पौ। म प्रकार यह मुद्या की मावि किमी मी बड़े से बड़े पुस्प नेता * पोरसको प्राप्त कर सरती है पापम पारिको नीव रखना तो उतरे लिए मामूली बात है। रहेर प्रथा पा प्रमा विवाहको प्रेममा नारी विकास में पापा मम । 'एक पार की कतर' गोही' 'राधा' (मामा) पादि 4 सपा मुमन लिमा मा मनोरमा पारिपरिको माप्यम से उन्होंने मद सप्प कर रियाबिस पति पक्तुि समान की पर भी हमा पत्यम्त पारस्प प्रभार पातास उभार मदिवार पारिएका प्रेमपम की मारी भावमा का सापन नहीं उसका नैतिक हा प्रयासम्भायी है। इस प्रकार हम देखते है कि प्रेमचन्द दी नारी भावना में माका-सा स्थापन प्रकाप-पम-मा मापातीक सरिता मी मिसह प्यावहारिकता एवं सपयोगिता मामा-मुलन चिन्तन सितारोहसम-सौ सहानुभूति-ये सरन प्रकार से मिपमान ६ किमामी भी और पनी की स्त्री और पुरम इयों को एक बार में पार सक्दो है और उसके द्वारा मारी के प्रति को एक मया की मापना मधुर होती है उससे पादपा गम्भीर मोडमंगा की पापना इसर-मांस वमद में सम्पर नहीं हो सकती । सो घाम पुरानी मसे होहो किन्तु वीर्य मही उसमें मुम्म जमित ममापानों पी-सी सममी हुई नहलवा भने ही म हो पिता हमारे हप एवं पौरप को कमी नही पीनवी। एक बाठ पौर, पह चैक किािस' को मिस बोगी पा सामान की मुमन पारि पुष मारीपापों के पिपण में पादर्य कोपा रसान के कारण मन्द ने कहीही मनोविज्ञान की परवाह नहीं की है किन्तु इतनी-सी बात को मेयर रनकी मारी-भागना पर मामेप माही प्रियाबा सकता। ऐसे मो रोग होते है वो पातक एष समामक होते है। रोगी के मामै गारोप का पोपा भोत र नीट पाता प्रपितु उसे दिलासा दिया मासस्य होने का निस रिसामा पाता है मार ऐमा विपास किसी भी मोपपिसे पपिक पसर रहता है। प्रेमवार को पपने पापों से प्यार है उसी प्रकार बस एक निन पिता अपने पुत्र को 'पना बटा' कहता है। उनकी नारी नागना पर मह मायेप भी हिरहोंने विवाह प्रारिमारी-जीवन की समस्यामों का कोई समापान नहीं रिया प्रेमचन्द की मारी-पापना को न समझना है। एक वो ये समस्याएँ पिस्तन मौरलका पितर ममापान प्रमचम्मन दिया भी है दूसरे समस्बापो को मानिए परिकोप उपम्पार्यो की पापित ममोशा निमताबीसी में पनकी नारी-मापना को देखना मी सब सेगी गनदी। मार हम मनोविज्ञान को प्रात्यान प्पक्तिपरक सपा प्रमापतिक मुष्ठामों के रूप में पपने पा-माहिम में प्राण कर। यह प्रति निर्मालात्मक नही है। प्रेमरम्द में समस्याओं को संबेदनापों रेस में पण किया है पौर में पानिक समाधानों की प्रसासी पधिक समार की सहायमूर्ति को पीपी है। पौर फिर प्रेमचन्द की मारो मारमा का माल तो इस इष्टि स मषिक कि उसने मिरी-पम्पास में पुगावर उपस्पिट किया। प्रारम्भ से मार पन्त स बह निरिस एवं मिरिमा पीपीर ग्मने हिमाहिम में नारो
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प्रेमचन्द की नारी-भावना
प्रति पिणपनित विमासमवृत्तिमूमक तमा निवृत्तिममक से मारपन्तिक एष्टि-
फोगों को मप्पम मा रिया। उसने समान में मारी की प्रतिष्ठा को स्मा
पित्त प्रान पिया मोर साहित्य-साको सिए विचार भूमि को समतल
बनाया।
देशाबाए दोबारित पौरपकिराए परोपरसरपिरोपी से पनीष पातपरिणका प्रर्षही है उन दिपायोसपण बो एक पापित को सरेम्वति पृषक करती। परिष (पिपेपत प्रौपम्या पिठने वरिष पवने ही प्रकार हमे गिपात लोकही। ऐसा प्रेमचन्द के नारी-पात्रों का वर्गीकरण मोंटो परिष प्रकार तपा चिमण-दिपियों के पनुसार ही पार-वर्गीकरण मी पनर प्रापार हो सकते ६ मे पर्व पारम्पतिका प्राचार पाएवं पौर या का पापार, पति दपा स्थिरता का पावार पौर रिस्परमारमा तमा नाटकीय पनिम्पत्तियों का भावार किन्तु प्रेमकान के मिस व्यापक मारी पिणी पर्वा पीपे हो चुकी ! समके वकिरण के लिए गोही स्पष्ट पाचार सामम माते हैं--प्रवृत्तियों पपरा गुरों पर प्रामित नारी-स का मापार क्या समागम भाषिक सर-पम्प का पापार । इन दोनों में भी पाकिमापार को महण करता मर्वया मासमी का ही परिचायक होगा। कारण यह है कि है परमारी की प्रापिफ मामी पृपक मपस्पा प्राय होती मही दूसरे, पपमी सम्पूर्ण रचनाओं में प्रेमवर पायोपान्त पविभासत नारी के ही पारस को मान पर चमे पार उनका यह प्यार पातमा प्रेम की भाग नामों से अनुप्राणित पार्य समाप की पार्षिक सीमामों से बहुत प्रामे है। उनकी नारी प्रामीण अपना नागरिक होने से पहले भारी-मामाम्य की पार भावना है। दो प्रेमचम्म म पर्व को प्रायः नारी-मपम्पा के मूम में प्रहण किया है और न ही अपने मारीमानों के रिमा में पैकि मिसेपवारों अधिक मास्व उन्होंने पचाई परिस्थितियों को रिया है। उनकी नारी को भी हो हाँ भी हो प्राय सहनशीलता त्याप तथा हैवा पारिप दामन पकड़े हुए परिस्थितियों का सामना करती है और कई बार हम पिसती हुई भी उनसे बहुत मर ठी पती है। सभेपत उगमी मारी मामीप मारी है जिसके विवचन में वर्गीकरण का प्राविक प्राभार प्रत्पन्न कार्याप्त है। हो पूर्वाग्रह की पाप दूसरी। सिक पाप) समावत दूसरे से ही नहीं मिल होनही। ऐसी रहा तो एको ।
प्रेमपगमारी-पापों का पाकररा प्रभामारमक (मानम भूरियों पर मापाखि) प्टिकोख ही सोचते ।। सत्साहित्य में एक सस्पाम्बेपी बीवन-पर्यन अनुस्यूत होता है। सस्प सज एक ही होता है पता को भी परिष सतोमुण पर प्रापित होवे मया मिनो विषय का माप मानम-मंपत होगा उनमें उत्सम्बपी पिचपलापों प्रापाम्प के पररा एकस्मता अनिवार्यत विधमान होगी। यह 'प्रामाम्य ही बकरण में काम करता है। नारी पननी है ममिनी है और प्रेमिका भी है किन्तु मारी रस प्रेमिका बनी प्रपा भगिनी नहीं-यह पठाय है। वर्गीकरण में परम कुछ पात्रों को प्रेमिका-प पत्रमा मातृम्प पपया कामिनी-पपन्तर्गत (d है तो उसका तात्पर्य यही होता है कि अन्य मविपदामों के होवे हए भी ममुफ में राबवत्व की प्रमानता है प्रमुक मे पात्सत्य सर्वप्रधान ! और पमुक में पारीरिक दृप्ति काम-बारको प्रमुखता है। प्रवृत्तियों पपणा कप-विषेप तामों प्रापाम्पसी प्रापार पर प्रेमामनारी-पानों का निम्न प्रकार से पीकरण किया पा सकता है प्रगल यह मो रहा है कि समले सम्पूर्ण नारी पात्र इसमें कही म कही म्यान पा ही जाये। प प्रेमिका-स्प प्रेम से तात्पर्य मूमत दो पुषकायो (स्त्री पौर पुम्प) २ पारस्परिक स्पार्पण सही होता है। यह पापण वासनायम्प होता है जिन्तु गुणापपी होकर हो रटता को माप्त होता है। प्रेमसम्म भी प्रेम का मूलप में स्थित मानते हुए उसी प्रेम को महान् मानते है जो पारस्परिक पिकाप वा त्याग बमिरान एवं विकास प्रारि मानव-मूल्यों को पन्त करके पनपता है । पुरप की पपेना नारी को प्रेमपात्र पम पर पमिक एकनिष्ठ, पवित्रतमा पन धमादीम समझते हैं। इसी कारण उनकी इलियों में नारी प्रेमिका-एका वर्णन पत्यन्त मरिमापूर्वक हुमा है। (यहाँ पुनः यह सप्ट कर दिया पाता किया पावश्यक महीं है कि प्रेमिका परिणीता अपरा भपिनी न हो। बिस पाम में जिस मति नवा मिन मुर्गों का प्राधान्य होना पीप पन्त से एगा बायेगा ।) प्रममा परिणत प्रमिस-पास पल्लवित होने में से कारणों में काम किया है-परिस्मितिननिरपेण निरी गुणों पर परिस्थिति मापेरा वातावरण मे । प्रत निधी वषा परिस्थितियों के पापार पर इस प्रमिकाम का उपपपरण स्पिा पा सम्वा । निधी दुखों मापाम्य थामार परमपदमारीमानों में से प्रकार प्रेमिराससप्टनरने प्रेमचन्द के भारी-पात्रों का बकाए में प्राते हैं। 1 १ राग प्रमान प्रेमिका स्प- पके मनतव प्रेमिकाएँ माती हैबोबीवन में एक ही की होकर ए सकती है। परिस्थितियां देसी भी हो पति तथा प्रेमपाल की पृषक अपना इन प्रसन्न है। ये प्राय मोमी-मामी है पौर इनका धर्म इनका समार इनका सर्वस ही एक पिसके प्रति पनि हम समर्पण किया होता है। इसके पाप से एक मटूट धार में भी होती है पौर रसके लिए मरे से सामान भी कर सकता है यहाँ तक की पसको हुपी देख उससे भी विजय प सस्ती है किन्तु असममिहीन अपमातिरसात होर बीपन प्राय किसी प्रकार का समझौता नहीं कर सकी। इनकी सबसे बड़ी विसरता यही है कि एकनिष्ा परमे पार पपने प्यार प्रति बहुत सच्ची है।पलेपन में प्रेमवार की इस पारणा को प्रमय रती है कि स्त्री को बीवन मेवार न मिले तो उसका पम्त हो पाना ही मचा है। मभूमि' की घोप्रिया ममें प्रतिनिधि पाम क्षिरित 'कार' ही प्रेमा मैना' की मैना कामना-सा की बया भारम-बीत' को मनोरमा 'ऐक्टस की पारा, मोदि की पिया हार की बात' को नया मापापीहा' की पग सपा पिसी सीमा तक 'पोरान की सिनिमा मादि मा मात्र पीसी पर मम्तयंत पाते। २ तस्साह-प्रधान प्रेमिका-रप-बम प से सम्पर मीरमनाएँ एको ग्मुखी परवा एकनिष्ठाएं तो! forतु मोनी मानी पर सरन नहीं। पर से पथिक इमको उत्साह-कृषिपा वामृत है। पपने प्रेम-पान की बर्म के प्रति लोक पवा के प्रति रेप-रसा पपमा प्रारम-सम्मान प्रति बिमुख्या को दे फापप्ता समममी पौर यही कारण है कि मारप-सम्मान के अपयन्त मृम ही पन्हें सर्वाधिक प्रिय है। बिहार कहानी कीश्यामा 'सती' ही पिता 'मर्यात की बेटी की प्रथा वर किमी टीमा रबिन की रानी की हबीब ऐसी ही प्रेमि परिस्थितियारा प्रधानत निमित प्रेमिका-सतत भी से प्रकार के प्रमिका-रूप पाते। १ परिणय-प्रचमित प्रमिका-रूप-- स से उन नारी-पानों का सम्पब बिगत कोपावस्था में बाने पपा पनवानेही कमी किसी को एप समपितररिया पा जितु भवनका प्यार रामपर पगपा। परिस्थितियों से शिमोहनपर गाने अपरों पर जामे गारोपयोकि प्रेम-पार सिी मम्मको एँ पति-म में सीकारला पntial प्रेमचन्द के मारी-पामों कारण मी ये परिस्पितियों से मर पठी हुई रोंकि पूर्व-प्रेम का पानोक इनकी श्याम पवा एवं पार्वम्म की भावर्स मायनापों को प्रामासिव मर कहा पता है। मन में अपनी सम्पूर्ण कम्प-भावना को पति की मोर उन्मुख कर पुकी और इस पाने बाने में अपना मा लोकका कस्पाय भी नहीं सममती । इस प्रकार में प्रमिकाएँ पूर्व प्रेम के प्रति समीहै पति के प्रति सन्धी पौर समाग के प्रति भी भूछी नहीं अपने प्रति क्या है-यह एक सय मिसका पप बना पना ही प्रेमपाद को पसम्म है र्पोकि यह भाषाया नहीं सममते कि पारर्प मारी स्वास प्रपने प्रति भी 'इम' हो ही। कामाम्प' की मनोरमा 'बरसान' को रिबन प्रतिमा की प्रेमा धर्ममूमि की सकीना पौर किसी सीमा म नैना भी इसी कोटि में पाती। परिणयातीत भावोन्मुस प्रेमिका-रूप-स प्रेमिका-स्म के अन्तर्गत मे निमिप्ताएँ पाती वो परिस्थितिमा परिवाहिता है किन्तु मिन्होंने प्रेम की स्मृति मात्र को ही जीवन का मापार मार दिया। पौर सौ के पाप पति के पावन सहवास के इमियातीत पानरम अनुभम करना चाहती है। पानी सम्पूर्स पासनामों को होने सेवा-मार्ग किसी पम्प विराट् पावना पषवा प्रेम-पान की पारस पूति में हम रिका है। इस प्रकार की भारी भावना की पमिम्पत्ति प्रेमपाल ने बहुत कम को श्योंकि एक तो वासना मम्मूमन की पपेशा उसका प्रवृश्चिमूमक स्वात्तीकरण प्रषिक साभाविक होता है इसरे, समाजमत म्पावहारिकता की इष्टि से अत्यात लस भी मही। 'परपार की मामी के अतिरिक्त सेवामा पानी की पारा मा किसी सीमा तक प्रेम की मेरी (माटक) की पैनी परिष का उत्तरायसी रूप में समाहित होते है। 'मोपान' की मावती भी मेहता से पम्तत परिया वीच मिम भाव ही दो पेप बीवन का प्रथमम्म मानती अपा-माप की पोर पासर होती है। परिणीता हप प्रसव पन्तर्गत प्रेमपत मारी-मात्र स्थान पाते । मिकी रेखाएं पस्नी-प में पपिक भी। परिणीता-हा को पार गर से या पा सकता है- १ पादर्श पस्नी रूप-स माकप पम्ठरंत सामीप्त एवं पात्प-रोप-ग्रहित पलियां पाती पो सतीत्वरित रो प्रामामि वा ११ प्रेमचन्द नारी-पानों का बीबरप पति की प्ररक शक्तियां होने के साप ही साप पति अपना पर-युरप-सुपारिका भी है। जिस विवाह को प्रेमचम् मारम-उत्याना साधन मानते है ये उसी पाम्पत्य मावना की पारस पापनाएं। प्रेमचन्द के नारी-पामों में सम्ममा इन्हीं पी संख्या सर्वाधिक है। रंगभूमि' पी स्मूम सेवा-सदम' की मुद्रा 'प्रमापम की पमा बिमासी और सीममणि कायारस की महत्या 'मबम' की मामपा 'रामा हरदौम' कहानी पी लीना 'रानी सारपा' को सारा 'यो सखिया दीपा सतो की मुमिया 'स्पाय' की माता 'गोदान' दी बनिया पौर मिसेव पाला पाहि प्रमेक नारीमान इसी कोटि में पाते है। २ साधारण पत्नी-स्प~ इस मारीका के अन्तर्गत पाती है। पलियां गिनका पातिव्रत तो पगित नही है कि यो सम्पूर्ण परेमू स्थापों संकीर्णतामों एवं प्रम्पविरामार्मों से युक्त हैं। इनका एक सीमित दायरा है जिसमें स्याप तथा सेवा नामबीबरतु समझ से बाहर होती है। पारिवारिक पापिपत्प इनका प्राय पति से भी मधिक होता है। परवान की प्रेमवती सेवा-सरम' की पानी 'निममा' को रेपोतीया 'गबन की मानकी तवा बावरी रंगभूमि की मिसेव सेवक शेसन' कहानी की मापा 'मिमग्नस' की सोना 'पूरी काकी को मा तपा मग्राम (नाटक) को पम्पा मारिनारी-पात्र सी पसे सम्पर है। ३ सपत्नी-तप-परत पम सपरिलों का विषय प्रेमचन्द ने किया है पौर मी साधारण सरलीस से डार उठी हुई है। पविनाएं पे समीर किन्तु ाि एवं मान मापना पर पए इमका नहीं है। वैसे त्याग तपा सेना से भी इनका परिषय है। कायाकल्प की रोहिणी रामप्रिया और बगुमठी मौत परानी की गारापरी और मोमती तया 'प्रम्नि-समाधि की सिमरण पौर सिनिया मारि सालियों में पोशायरी दरिमा रोहिणी गोदो मिती मी पम्प मारी-पात्र समय हस्का महीपा बा समता। ४ निरसता स्प-पली पति के सम्पूर्ण प्रेम तपा विपासपी मूवी होतो पति पानी हो अबस्था भनुमार प्रयोप्य हो अपना योग्य होते हए भो उसे समझने की सामग्र न रखता हो ता प्रत्याराव मम ही यह पीपन माप रिमा प्रकारका सममोना का मे विमा सरता यह है कि भीतर से बह पपने को पगिता एप विणताही मममती है। प्रेमपर मैं अपने विरगना दिसण म पाने मारी पात्रो को निरीह तपा परिस्थितियों से सम्ने पागप में ही प्रार दहग म्यिा है पोर म तिरस्कारमा कारण कमी पक्ति (पुरप) में कमी सामाधिक प्रसमानता में। मापम' कर - प्रेमवाद के नारी-पानों का पकिरह विद्यावती 'निर्ममा की निर्ममा तमा सुषा 'पोशान' की पोगिम्दी जी, 'प्रतिमा की मुमित्रा 'गवनको रतन 'सेवासरन' की सुमन कर्मभूमि की मुम्नी 'रमभूमि की इम्, 'मम' मानी की तुम (पिछे पता नहीं क्यों ग सत्पन्ध विस्त माग पर वाहने पानी मरिमा है) मामा' की नीला 'सोहाम का पब' की सुभता निसिम' की मर्यादा संग्राम (नाटक) की मानी या 'मोदान को सोना भारि ऐसी ही कमर तिरमवाएँ मिन विवषता को स्वीकार करते हुए उनके मुमार की प्रतीक्षा पपना करणान्त पर को रिया गया है। ५ भाष-परिणीता स्मनस रूप से हमारा तात्पर्य प्रेमपन्दन इने पिने नारी-पात्रों से गिनका विवाह सामाषिक रीति-रिवार प्रमुखार नहीं पफ्ति ममोनीत भाषनामों के अनुरप पनायास ही परस्सराकर्पस के कारणो गुफा है । समाव पामे तो इस रूप पर टिप्पणियां कसता है किन्तु धीरे-पीरे इनकी विवाह-मत्ता को स्पोनर कर मता है कि मुखभी तो पनि समार से गुप्त नही रखा रखा। इसमें सम्मेह नही कि ऐसे मारी-रात्रों को पानीवन समप तपा मानसिकात भेसने पाते है किन्तु मे इसका कारण समझाते है सबा परितुष्ट पने का प्रयत्न करता है। कि एहनि बीपन से बहुत पनुमा लिये होते व इनके पादर्भ मी बायरी तपा सोचते नहीं होते। सम्पूर्ण प्रमचन्द-साहित्य में यापी तापी ही परष्टि से प्रमुख स्थान रखती है। मातृ-दप मातृम्प से वात्पर्य यहा बम पौरस पुषवाणी-स्प से ही नहीं है पपितु मारीपबहसार मातृपया स्पो छिमी भी पुष को पकर मात हो उठता है। प्रेमचम भारी-पात्रो में तीन प्रमर मानु-पकी प्रति पति- सहर पस्सस मातृरूप-पुरेसा भी हो इस स्म में स्थान पाने मामी भाग बत्मसाएँ उसे पाहती। क्योकि दोंने उसे परमरिया होता है रतारा उसका पालन रिया होता और अपने साये में उसके पस्मषित होने कामना की होती है। यही नहीं इन पाों में पुष ऐमी पुमहीना रिपए मात्रामा विकाएँ वा गिमाताएं भी हबिनास पात्मस्य रिती भी मार पुष कोसकर गोष पटना ! 'माह भी स्विीकापुर पाली निर्मना प्रेमपदभारीमानों का वर्गीकरण कर्मभूमि' की समौनी 'एबम' की बम्पो मांगा हानी की अमीना 'माता का हरव' की मापनी 'ममता की बुड़िया 'मदिर' की मुखिया 'बेटों पाती विषया' की पूनमती संग्राम' की सबोनी 'विमाता की प्रमा भनम्मोन' बी पन्ना 'षका राम' की ममी तपा 'महावीर्य की मासी भारि पात्र इसी स्म में समारत होते है। २ विशिष्ट मातृ-स्प-इस रूप के पम्तर्गत माताएं स्थान पाती जिन्होंने माननीय पुषो से प्रेम करना नहीं सीमा है। अपने सपूर्वो से ये बातम्य साइस मा देश प्रेम की मॉम करती है उन्पदन वा सन्चन प्रेम प्रसयों की नहीं। 'कर्मता की भूमिका में नवविवाहित बहर की मां कहती है 'मी साहम बि मरा प्रप नेनुर घरबते बिही तासीरे कि पर पिस्ताने मन पुरवई पर तो हसान पर प्रति मेरीरया है कि पपने रक का एक ट मुझे ताकि यह सूप बो तूने मेरे स्तम से पिया है तुक पर हमास हो बाये। इन सभी मावानों की नवमप ऐसा ही माय है मोर परि उसकी पूर्ति नहीं होती तो पुष का न होना पषमा मर गामा ही प्रेयस्कर समझती है। "पभूमि की बाही विकार' कहानी की पुबारिम तवा परवान' की दुनामा इसी विपिष्ट रूप में पाती है। ३ यथाविभुत बिमाता स्प-विमाता कमी स्वमाता अपना तुमाता नहीं होती-मारी इस पहबाहक बस को पाराह कहानी की देवप्रिया में बाबा सकता है। प्रमचन्द ने माता कस प्रमागभिकल्पाविषणपनी प्रगान कृतियों में तो किया ही नहीं कहानियों में भी बहुत कम किया है। राष्ट्रसेविका-प प्रेमषम्रो मारी-माओं में राष्ट्र-सवितापोरे दोस्प उभरे है। १ कर्मप्रधान राष्ट्रसेविका रूप---इसके मन्तत ये नारी-पाच स्थान हैबोरेया मैदान्तिक दृष्टिकोण से ही नहीं अपितु राष्ट्र-सेवा म्यार रिस पेन में भी पुरपों से पीये नही है और परम् पातावरण से बाहर माकर उनसे भी अधिक महिर पौगवान देते हैं। स्याप तपा मिराम प्रत्येक सम्म पमता इनमें भरी परी । स कहानी की मृतुमा इन प्रतिलिपि पाम है । कर्मभूमि' की मुपदा भी यही प सर्वाधिक उर है। इसके अतिरिक्त पराब की दुकान की मिसेर सरसेना 'ममरयामा इस मोहरी तवा पली से पति को गोराबरी भी इसी सवर्ग में मारी प्रेमपम मारी-पामों का वास विधापती 'निर्मला' की मिर्मता तपा पुमा मोवान' की पोपिनी देवी, *प्रतिया' की सुमित्रा 'पवन' की रतन 'सेवासदन' की मुमन कर्मभूमि में मुम्नी रपमूमि की , 'इमुम' माली की कुसुम (गिसे पता नही मों ग सत्पेन्द्र मे विस माग पर चलने मामी मह दिया है) 'पया की मीना 'सोहाय का पर' की सुभता निर्वासन की मर्यारा संपाम (नाटक) की मानी तमा मोदन की सोना पापि ऐसी ही कमर तिरसवाएँ पिन विषमताओं को स्वीकार करते हुए उनके सुधार की प्रतीमा पममा पासान्त पर पोष दिया गया है। ५ भाव परिणीता रूप-नए रूप से हमारा तात्पर्य प्रेमचम रन बने-गिने मारी-पायों से है जिनका पिमा सामारिक रीति रिवार भनुसार नहीं पपितु ममोनीत पावनामों के पनुरुप पनायास ही परस्परार्पण कारण एका है । समान पाने तो इस प पर टिप्परिहा कराना for धीरे-धीरे इनकी विवाह-सत्ता को स्वीकार कर देता है पौकिकृप भी तो पहोने समान से नफा नही रखा होता। इसमें मानहा कि ऐसे मारी-पानों को पानीवन संपर्प तथा मानसिक सम्मेलने पड़ते हैं किन्तु ये इसका कारण सममा परितुष्ट पहने का प्रयत्न करते हैं। किम्हनि बीनन से पनुमा निये होते व इनके प्रार्स भी वायवी तमा सोखने नही हो । सम्पूर्ण प्रेमपर-साहित्य में कायाप' को नामी हो इस प्टि से प्रमुप स्वार रखती है। मासू-कप मातृरूप से तात्पर्य यहा केवन पौरस पुत्रपती-प से ही नहीं अपितु मारीमा सार माया पो मो किसी भी पुष को देख कर मम्स हो उठता है। प्रमपम नारी-पानों में तीन प्रकार मातृ-म्प की पनि म्पति है- सहम बस्सम मातृ-रूप-पुरमा भी हो म मा में स्थान पाने मानी सहर परमसाएँ उस पाहती पोलियोने उसे सम्म रिया होता है रताप रसापानन किया होता है और अपने साये में पहले परमपित होने मोकामना की होती है। यही नहीं इन पात्रों में कुछ ऐमी पुषहीना विताएं माराया सेविकाएं क्या विमाताएँ भी गिना बात्मत्व मिसी भी मारपुर कोव कर सोर रमा, 'यह भी रिसीमा मयाम्पी निर्ममा प्रेमामारीमानों का वर्गीकरण - कर्मभूमि' की सीली गवन' कीबमो पिगाह मानी की प्रमीना 'माता का इवर की मापी 'ममता' की दुम्मिा मिलिरकी मुखिया 'रेटो बानी विषमा' की पुलमती सप्राम' की सलोनी विमाता' की पम्बा ममम्मोम्य' की पन्ना परका राम की मुंगी तथा 'महातीर पीसासी मादि पान इसी स में समाव होते। २ विशिष्ट मातृ-प-इस रस के पन्तर्पत में माताएँ स्पाम पाती है निम्होंने मोचनीय पुओं से प्रम करना नहीं सोचा है । अपने सपूतों से ये परम्प साहस तथा रेस प्रेम की मार करती रतन तवा समर प्रेम प्रसंगों की महकता की भूमिका में माविवाहिक नाम की मां काती है "मी नाम कि मरा पर पुदुर घरबसे हिही वापीरे कि प्रा पिस्ताने मन पुरवा परोसास पर्वद' –पति मैरीपणा है कि तू अपने रक्त का एक —ट मुझे ताकि यह म पो तूने मेरे स्तन से पिया है तुम पर हमान हो पाये । इन सभी माताओं की नगभग ऐसी ही मांग है और यदि रसपी पूठि नही होती वो पुत्र का म होना मषया मर माना ही मेयस्कर समम्मी है। रपमूमि की चाही 'शिकार' कहानी की पुधारिम मा बरमान की सुपामा एसी विशिष्ट म में पाती। ३ यपावियुस विमाता स्प-विमाता भी समाता परया सुमाता नहीं होता-मारी इस हराहक म्प होगा कहानी की मप्रिया में रेखा पा सध्या है । प्रेमचन्द मावास प्रममिनिकस्म का चित्रा पपनी समान मालियों में तो बिना ही नहीं कहानियों में मो बहुत कम किया है। राष्ट्रसेविका-प प्रेमवार के मारी-पायों में राय-विकाों के पोस्प नमरे । १ नर्मप्रधान राष्ट्रसेविका-म-इसक अन्तर्गत नारी-मान स्थान पावे बोल जातिका एप्टिोस में ही नहीं अपितु राष्ट्र-मैया पाप हारिक दोष में भी पुरषों से पीछे नही है पौर परेलू पायावरण सभाहर पाहर रमो भी भिक सहित पोपहान । पाप का निदान की प्रत्येक सम्भव पामता इनमें भरी पड़ी। बेम कहानी की मामा लमें प्रतिनिधि पात्र । कर्मभूमि' को सुना का भी यही समाविक उमर है। इनके अतिरिक्त 'मगर को पान' की पिसेर सम्सेमा 'समरपात्रा' की पूरा मौरीपमा पली से परिकी मोगमप भी मी रपमर्म में प्राती है।
प्रेमचन्द के मारी- पान करत २ रिपारप्रपाम राष्ट्रसेविका-म- म-स उपवर्गक पन्तर्पत उनमारी पात्रों को रखा गया है जिनमे पष्ट्रपति राप सत्याह एवं स्यार की भावना पो मिधमान है किन्तु गाईसय परम्परामो परवा पम्प पिपणामों के पास उनका कमराम पर वक ही सीमित रहवा ।। बाम' बहानीको पम्या सपा 'घोहान की साड़ी की गौरा एमी ही राष्ट्रोनिहाए । विषया-प प्रेमचनके पिषमा-मामा कोदो उपबों म रिमानित किया जा सन्ता १ पाजीवन विधवा-स्प-यो नारी-पान पीरन भर पम्म भोगते । इस नारी-पके मम्तर्गत गाते हैं। ये नारी पात्र भी रो प्रकार :- (प) प्रौड़ाएं न पायो का विषम ही प्रौढावस्था का हुमा है मत' पारिक भूय पवना पुनर्षिमाइका तो प्रश्न ही इनके निपय में मही ठता। निपाए प्राय उप पपनों से समाप रखने याप्ती मोर पति-स्मृति पुन प्रम मचा भवक्ति प्रारि मीने के मुसंगत पापार भी इनके पास रिचमान है । 'कायापास' की मानीवरी निर्ममा' की स्पाणी उपाकर्मभूमि' की रेणुका मादि ऐसी ही पिसाएँ। इनम रणभूमि' कीबनगवा किया भारि ऐसी भी है बोया एवं मोम को ही जीवन के परमम्म-प में इस करती। (प) परमामपी नबपीननाए-इन मामने समस्या है कि यनिय भी तो सिरेमिए । इनमें परिवारात ऐसी हैं जिन्हें विषणा होने तक पति के वास्तविक सम्प का परिचय तक नहीं मिला होता पौर सौपी जिनका पति पर रोगका महमान पर तनमरी विपना को सरा के लिए सस मपर्याप्त स्मृतिको धो गया होता है पो हिडे पप पीपल काप्रापार बनने में प्रम एनी है। मामम' मी मामी पिकार' की मानी पौर 'पपपानीमा भी नामुमारी ऐसी ही पिपाएँ । बहुत प्राप्तामानित मही है कि प्राप उगान्त को प्राप्त होती ।। २ पुमरिवाहिता-मप-दम परे प्रवर्मत पियामीमा गोशनी मुनिया तर पापी मा प्रम' की पाममी भी मात परप पुनरिगाह भी हो सपनामा 'नुमानी की मुभानी पतपोप की पुपाती मुनिया एवं 'रामिनी की पतपोपमा पारीमा परिणयन भी मम्भाप्प है।
प्रेमपम के पारी-पात्रों का वर्गीकरण कामिनी-स्प (कामिनी सम ही रस रमणी का घोतक है बिसको मन्तवत्तियों का बामपेप्टामों पर काममाषमा एवं वरमन्य समता राम्प की है। वैसे तो ऐसी नारी कभी बाप-व महान् मी सोच सकती है किन्तु पृत्तियों की भस्पिरवारे कारण उसे छिमाम्बित कमी महीं कर पातीं। अमरद के मारी- पामों में दो प्रकार से कामिनी-सको देगा पा सकता है- १पाश्चात्य पथवा पाश्चात्य सभ्यता से प्रतिप्रमापिस मारी स्म-- नारी इस तपारमित सम्पनीय साकर इन-सीने पाहर से भाकीने सपा भीतर बोसमे-बीसपी रावामी प्रशनेबल स्मक मन्तर्गत दो सबियो की पएमा 'धर्मपट' की कामिनी की' की मेन 'सम्मा' की ती बिनोर' की भूसी दवा 'गोवान की परोप भारि मारी-पान माते है। २ उत्कट कामपीरिता-स-स्पानामुखी की मुम्बरी मा नया सिाह बी मीना का दो मन्तिम प्रमाण व उत्स्ट कामपीडितापाच-सा ही रहता है। सम्पूर्व प्रेमबार-साहित्य मे बही रो पात्र अपवार-स्वस्म में रिषित प-पानकी प्रवती उपा कापास' की पता माविममिरिया निर्ममा' की मुगी पा 'कायाम्स' की नगराती पारि साधारण सेविकाएं माधम' को यो 'पाभूपद की पीठमा 'मरण का मार्ग की प्रधान पात्री 'पोरान की मोहरी तपा 'मवासन की पोती मादिगिय पलिया सेपासरम' की बोहरामान महापमान मुमपाई पमप्यारी बेरमा' की माषपी पपा 'गबन की मोहप पारि सुधारोन्मुखी बयाएँ पर 'योपान की भीन पुरती पारि प्रर्वपरप पागत मारी-मार परपन्त पौण पात्रों की मेसी पाये। प्रेमवार को मारीपापनारिकास मे इनका विपेप महत्व माहीं।।
प्रेमचन्द के विशिष्ट नारी-पात्रों का परित्र-चित्रण (क) प्रेमिका-रूप प्रेमा मपपि प्रतिमा' पम्पास नारीमाओं में से सुमित्रा में ही प्रषिकाय पालोचकाटियों को पापित किया। समापि इसमें सदेह नहीं कि प्रेमपाल को मारी भावना के भनुम्म पापवम पार पास-पास कोटिवधिक रिकवनपीस पात्र यहाँही प्रेमा सिनाम पर ही पायात का पाना नामकरणहमा पा । मुमिमा पार पूर्ण में दो नारी बीपन को एकानी पनि पठिा। एक में मान ही मान पर सैदान्तिक लिपिम्पटा है तो पूरी में स्परमेम की फिसलनों सुरपित बच निकलने की पानस धमता नहीं है। प्रेमा ही एक ऐसा पात्र जिसमें पति के संपर्व और पीवन के सम कोट की पाक ममता विचमान है। प्रेमा भून प्रमिका दी हैअपनी दोरीको मृत्यु के पन्त सम्ममा समके पूर्व से यह पतपय की पोर पाट है। पतपय के मित्र माननाम रे उत्तके रिमाह की पची पायर की विवाहिवासस्था में भी पती की मार मामला सामाषिक रिपोष्टि उस पोर कनिट होती for एका भीमा । रिपुर प्रपृठण्वी पर सप्टि-विमुपौर रहीं साप उनका कोमात पर-माहार की पतता है। प्रेमिका के पाप-पाप ही ग परी परतर भी बन जाती है। पर पाालय में विवाह होने की पारिप हो ही ही होती दिमागुरु पार पावकारी ममृतराप रिमी समानानुपारक प्रमा-सप सहसा रिसी पिया में विपकरने पीविता मेमेते हैं। मालिनी विचारपीत या गर्ने मान्म पा। सो सरसाहस म समाचार मुनकरयामा विस्फारमही प्रमित पार भी सम्मान करेगी मह भी सौ गाव मा। पपर प्रेमा का हाय और उन सास ममताप को अपने इप-मदिर में स्थापित कर यह पूरा करती पनी माई पी एम मूर्तिको रम हदय से कौन निभा सम्मा पा! किन्तु से मानना ही पातार पसरे मकान सनी अपाम् । पौर ना ही पाता है प्रेमचनविषिष्ट मारी-माों का परिण-चिमस ही पम्मा भी मापके परों पम्ती प्राप उनसे हम नही कीयेगा। उन्हति हमारी गनों की सातिर पो यह प्रतिशा की है। हमारे यहाँ कितने ऐसे पुस्प बोपनी वीरता विकास में इस सुम कार्य में पापक न बन पी। परिणाम-सस उसकी प्रेम माना में पाम भावना का समावेश होता है और रहरा प पीरम उसी प्रेम के पशि मार्ग में प्रेमामा से स्पामस्पी रोपको पामोनिस रसमे में भगा पता है। त्पापिनी प्रेमा कुम-प्रथा पर मर-मिटने वामी सधी पार्य रमसी! "उसकी पतवी तो परिमारिवा ही पना पसन्द करणी किन्तु कुम-प्रतिष्ठा भी उससे त्याप की मांग करती है। ऐसी भरस्पा में उसके लिए सभी पुस समान दे पा किसी के साप भी पीवन का निर्याह कर सकती दी। परिणाम-सम्प रानमार से पसका विवाह हो जाता है। प्रेमा मिनासिनी नहीं है।पामा हिम पत्नी है। पति क पर पाकर यह पति की हो बापी है । " अमृतराय उसके लिए काम एक सनकी बांति पे यो उसने कभी रेखा पा। पति को कर्तव्य ही नहीं अपितु प्रेम भी ती है। पास्त्री की परस्पा में उसके पापमन से बहारमा पाती है। बेशक रामनाप बनी नहीं है किन्तु प्रेमा को धन से मोह नहीं है। ए पये का पास आप में पती विससे रस पूजा को पहस्वामिनी होने का पागम्य तो मिमता एमपनी मुहिणी बहू पर नारा भी कम महीं होता। प्रेमा का सवाल पर में हिन्तु उसकी करणा उसकी कोममता उसकी ममता पौर उसकी सेगा-मापना पर से बाहर भी है। मन पर भी रोकर पह विम्ब बनता में निवा-मबम शोलने का समर्थन करती है। एक दर्ता बारा परमेय होता है निनाय नी तो इसके पिपेपी १ तो पहमती है पिता हो पहिलो पमबा माई हो परि उसने इस समा में निम्न गमने का कोई प्रमान किया है वो मससभम को हेय समझती है।" गरिमा रेतीकि सायनिक परमानिए पचिपत स्वापों को ताक पर रखना ही प्रेयस्कर होता है। पर सब पता है रिन्तु प्रमाके मतिया बीपन में नामन भी कम राननाप दो पर भी यही पेस बनी हर पीकि प्रमा को पवराप "बार-बार प्रमा को उनकी यह मावना दुमतीपा बो हरयको मप पहने पर भी पसके मुख से निपने पाती पी-कम्प पौर पंप चिन्हें पदर ही साली पी-पाम बन कर नियत पानी पी। पितु यह स्पाप एवं प्रतीक्षा पाहामन नहीं पाती। मौर एनिस प्रेम है।
प्रेमपद के पिपिष्ट नारीमानों का परिण रिमस रानमा प्राकर उससे कह । 'नबाने मेरीदि पर पयों ऐमा पर्रा पर गया पिपने परम्प पित्र पर ऐसे समय करने गया तो प्रेमा का मनोमाभिन्न पहलाता है। पर बात बाती है कि स्याप ही बाकि है मोहरप पर शिवम पा साठी है। प्रेमाने दामनाप जाबो मम रेसा पाबा एकापमपी विचारहीन मुटिल मनुष्य का पा। अपर पा परिष रेख कर मीपानना का मार रवी बी हो इसका कारण यह प्रेम पा को राननाप को उससे पा । प्राय उसने उनके सुर भन्यकरण की भनक देसी। पहले यह मोती पर उमा एक-एक ऐम पति को प्राचीन दे रहा था। प्रमा पर पान्द भी है सम्दुष्ट भी किन्तु एक पस्य का पोर ममी तक पसे नहीं मिला । या यह बाम गई प्रेम का परीपति मम है पौर यह भी लिपप को पम पाग और सेना ही परिपुरकर | पिमृतराय सपमका कौन-सा नाता है.-पा एक एस्प है ।म इत्य में बहुत परिवा फिर भी पहबारपार मे पता हैयह बैक अमृतराप अपनी साभारिक सागानुप्रासिव मामा केही कारण नाप की पापी हा प्रतिप्य को पापम माने के लिए उस पर मेरा लिखते पातु उस मेड का एक-एक पन प्रमाप में ऐसी मसनामा कोपों मारता बिम् बह बादवी किन पापा को-को पोंजी पर क्यों होती है कि को पंच पसी को पानी पियरे इए बालों की पोर मे नाप रनका पर गाना ही प्रस्तुत प्रेया या विस्मृत करना चाहती विवाद पूर्व उसने कोई नुहाना सण रेवा पा । किन्तु सर तो यह है कि उसी के सहारे ही समय पतिप्रेम नपा, उसी की प्रेरणा ही मापाप एवं गेषा की पोर सम्मुख होती है पर उसी के मानोक में हो पाम्प पथ पर ममत पमों से पालने में हम होती है। का तात्पर्य परीकि प्रमा भूमत मिका ही पार रस बारित ही प म्यापम्वा एसी एक भावना का प्रसार-पापा मसार चित्रण में मी पापामा ममता को र स्थानों पर सप्रदीप पाती है किन्तु इसकी विपनामा कि मीरारामा पिएन सीमा नापौर मनोरमा परिमों में एक रिमगा परतवाणम्म पाता।
प्रेमपन्दक विशिष्ट मारी-मानों का परिव-पास १ विरयन - 'प्रतिवादी प्रमा की विपिन परिषति ही रचन' की विपन। प्रमषन की नतिक भारनामों को यहां पर मनोविज्ञान का पुट मिलने ममता है सार ही स्त्री-पिक्षा-समानी ततातोन युग को माप भी यहाँ प्रमि मकवाई। म सही रिपन में सेवा-मसार विधमान पप रेतर के सामी प्रवार को सम्ण माता की सेवा प्रत्यन्त तम्मयता सपा उस परस्पा में करती है बरसे रात को मोहर योर म उठा कर पर म पाता। तभी की सेवा भावना ही एक पुन के म में भागीवन उस पर सवार यी है। साप ही विद्या की मोर भी यह पाप से ही पाट। एक नन्हें पा में अपने पिता बी हो वा नियती! 'मनुष्य को चाहिए कि रिमा पन-मन से एकत्रित करे। विचार दूर हो जाते है। एक तीसरी भावना की कोममता मी परपन ही रिजन के मन में पर किये हुए है-प्रताप को यह बहुत चाहती है। उसे नही पत्र, बासना क्या होती है उसे भी यह मी पूर्ण मात नही लिपिकारबपन सहोते है कि मह सोचती मारय है कि 'ब प्रकार से मेरा विराह हो पापा से पानम्र से एंगी। इन तीनों भापतापों का पापु ज्या परिस्थितियों के अनुसार प्रसार ही है गिरगन का पति। रिबन की सेरा-मापना ही साम्य बीवन के प्रति स पापक सहानुभूति वीरबहा ग्राम्य रोगन की निहलता एवं प्रारतिय गोमा रस पारप्ट करती मास्वरिषवा को पान कर उसे सभी होता कि 'पा सुनती पी पोर क्या रेषता है। टेटे कमरे मोर मिट्टी की दीवारें, परों के सायने शायराट के पारेर प्रेमा में लिपटी हुई ममें दुबल मायें-ये पहप रेख कर पी पाइता है किसी चमो पा० । मनुर्पो को रेखो तो रमती पोपनीय मा । हगि निम्तो विपत्ति मूधिया भौर रपिता बारित किमी परीर पर एक या बसस नहीं है पार से माम्पहीन विपक्ष-दिन पसीमा बहाने पर भी भो भरपेट रोटियों नहीं मिलती। पान सेवा-मसा के कारण ही ए मुसीना मानी की पोर माष्ट होती है और उसके परिज मैं स्पाम निरास तपा सेषा पसपार करतीनी केकारण रातादी के प्रति उसकी प्रा प्रमाणाधी पिता में उमः पातीपौर मापी डी सेवापारियो को समरे महार केस में तैयार भरती हैली के कारए बापत पहपकी सफलता १. प्रेमचनविषिष्ट मारी-मानों का परिष-चिपए को प्राप्त होती है और पानी कारण ही उसमें उस सहनशीलता का संपा। होता है जिसके सहारे पर एक नीम विषमा का पारस बीवन-यापन करती है। पिरमन के मन में पर प्रताप से विमाह करने की चा पी बी तय पाम्पाम धमाल उस समय स्पष्ट नहीं पा किन्तु मम पर कि ग्तकी भवस्या भी वह नहीं पी और प्रताप से नहीं अपितु कमनापरम पैसे प्रसिष्टम्माठि से उसका विवाह हो बाण है से 'स्मरण हो पाता है कि एक अपराम मुझस ऐवा हमारे विसकी कानिमा को मैं मिटा नहीं सकती। बताया मुखपन न पापी पी तब तक उसकी हरिमति पवित्रता केम्प और प्रारर्य का कोई नियम मिरामा पा किन्तु पर उसे "भात मा किम कौन और मेप याम्पि मेरा क्या है और क्या उसके निरिकी रीटि। यह सोचकर पिरन प्रेम की पहमी भावों को विक मानकर कतम्पको उससे अरसरती पर धीरे-वारे पानी सम्पूर्ण माग नामों को भी पति ही की पोर मुबाप्ती। प्रताप के प्रति म बो मसात भरना ससे मिलती है ससी मन्तरालमा स्याप की मेरमा पारण करवी पूर्ण पतिपता बन जाती है। यह मानती है किससके पति ने पर में चोरी की। किन्तु महारागिन डाय मह उसका मोबी पिटने बेटी प्रेम-पति रा ही या पति गगन-से गुमेसो का निवारण कपी । प्रेम की रिसेपता यही है कि पार्म और कत्तम की पौर पर स्थित है। 'एक (मत्ता) प्रेम का पास है तो दूसरी (निामा) पनीरी है।" किन्तु विपन के प्रेम का दूसरा पर भी बोरवना पावन है कि पत पर रखा कोई महीमही पतता । प्रताप सससे पपा रप्ट शेता है मानो बीपरी उससे म्ह पाता है। पा प्रताप को महा मारल्ये ही ऐमना पाहती है मौर निस्संदेह प्रताप परिधोरपान के प्रम में शिरपन का प्रेम ही विधमान है। पस्तुन रिजन प्रताप के मन भी रखनी ही मन्त्री है गिनी कि पति मोर एपनि पौर निरसन के परिणबीमारिमा मी इमी में निहित है। मिपमा गिरजा पम्प के तापम पार्म की पामे रमली। पति के कोरियामर भी बनी ऐ मम भी गुपने पाठे कि तुम्हारे पिने मुझे धम निया में क्या पामती मीकि प्रशारे परण लोपामुमकिन्तु रिजन पोतो माननाएं सहकर भी पीना है। पशिनीमार नामाची प्रतिमा अपराकरिता पीसना-पानी से नही पता रितीनों में मान-मीकि रम प्राणों को पामे हुए है। उसे तो - । ।
प्रेमच पिपिट मारी-पात्रों का परिष चित्रस इतना पता है कि "अपने पोमे यवम पर एक ऐसा ठेग रसमा राष्टि में एक पवित्रता मरी रखनी है बो पुषप्टामा हो भण-मात्र में भस्म करने। प्रताप के लिए, मारपी के लिए प्रबना किसी भी अन्य के लिए शुभकामना प्रपा सप्रेरसाों के अतिरिक्त पौर उसके पास है ही क्या ! रिरबम विपुपी मनी' भी है। मन का बोम इसका करने के लिए उसकी पमिम्पत्ति पनिवार्य हो पाती है। विरजन को मामाधार कविता केम्प में मिलता है। "पम्प कवियों के मनों में मिों की वाहवाह मोर काम्प-प्रेमियों * सामाव से उत्साह पैसा होता है पर विरवान अपनी दुब-कपा अपने ही मन को मुनाती है। उसकी कविता इय की सन्नी ममुमतिर्यो की स्वात सुद्धाय अभिम्पति विप की पिचार है 'भाषा' है मानोरकप हमार 'एक गम्म में नपरिकसित पुष्पों की गोमा और हिमणों की सीतसता विचमान ! निसके सम्पर्क में पाते ही इस को एक बारा पार प्रेम एस्म को एक करा स्पष्ट हो जाती है। उसकी कमिता में नोक-मयम की भावना का समावेश है। पार हिन भारी होते ए मा पिरजन को प्रब-परम्परामों से मोह नहीं है। प्राम-बीवन की प्रगति में परिवारों को पर एक बात बड़ी बापा समझती है। प्राम-बीवन की प्रगति में प्रवविणासों को मा एक गत बड़ी बामा समझती है। सी मूर्सवासी पिप्या पति है। यह सोचती है 'ये भावनाएँ इस एप पर पपसी हो एकी।। बामक बीमार हुमा कि भूत की पूरा होने सनी। बेत बविज्ञान में मृत का पाम प्यार पारि में का मान बहा रेसिपे भूव ही भूत पोचते हैं। यहाँ म देगी है नववा मूर्ती काही सामाम्य । यमराग यहाँ परण नहीं रसते मतही बीमारण करत हैम मानों का किस प्रकार मुपार हो?" इस प्रकार विजन का परिण मानवीय मूल्यों पर प्रापारित किन्तु साप हो युग-परिस्थितियों का बोड़ा-बात पंकन करने का प्रपन मी प्रमचन्द मे यही यिा। सेवा रपाय प्रम और पातिवत मानवीय मूल्य तो सी-पिया की मारप्याता पिक-बावन की पतिता तपा प्रत्यापिकासोका सम्मूमन उत्पनीम समस्याएँ। सोफ्रिया 'पभूमि' की निरमता में कवितामयी मोटी प्रारम् के पाप मारो मैं मानवता की रिसा में प्रवाहित हुने बानी रसपम्ती है। सोमा पद का १२ प्रेमचन्द बिसिष्ट मारीमानों का परिपनवास सामणिक पर्ष लाभाम से पपमा रयापुक्त होमे से सम्म हो सकता। किन्तु नामकाण में गृणानुरूपता प्रेमवार के पात्रों में प्राय नहीं है। मप्पवर्ष एवं प्रामीय समाज मही सोचते यह सब । युग-पर्म ही प्रेमपतियों में बापा प्रतिविम्भिव हुमा सय प्रेमचन्द मापन है वमा बहुव सम्मा भी है कि सोफिया की प्रेरणा उन्हें एमी बेसट मिती हो। मोमिया के परिव विपप में म मेव सिा कारस पूर्वाण प्रभिक सहरमवा म्पून मोर पदेपसात्मक विचार-सक्ति की निष्पक्षता म्यूनतम है । यदि उसकी सगा सत्ता का बिनय का स्मी-मसरण' मात्र पर प्ररपारपाम पर रिया पपा है जो प्रेमचन्द के नारी-मामों में पिक सद एक रोपर पा मार्य बालिका मी सोझी को ही ठहपया मरा है। परिलकिन में पर हम मेहर की दाणामों पसी मनुभूतियों उसकी परि स्थितियों एवं चित्रण-पितामों से विरत होकर अपने ही मान-रपोरे पामार पर पाम के पुसरोपों का विशेष विमोपण परने परते है तर पसरा परिणाम हमारी अपनी भावनाओं का ही स्पस्थापन-माप होता है-उसमें पातुपरसता मही ए पाती। पसमे कोई संगप महीकि रंगममि में सोध्यिा को समान सत्ता की पाप विपमान है । बिनम की प्रतिलिपि-मात्र या नहीं। इतमा ही पहा पा सम्वा ६ रिस्पना प्रपपता की एप्टि से मप सरक स साम्य होने पर उसकी पारिति रिपेपता परम पानी में पपेगा बिनय के पहुन-मख समीप है। कारण पद है कि दोनों का प्टिकोण मषिी-युगीन मानवापारी। पर्म हो मा प्रम मारहो पा म्पत्ति-समी प्रति होठी की अपनी माम्मवाएँ वो समी प्रकार से प्रपणम्प होकी भाति पापानिय के सम्पर्क में पाने से पूर्व भी सोफिया मूसास के प्रति मी ही पानुभूति रखती स्तिनी विवाद में। तब भी ग्मे हिमा एवं मानसीर असमानता र प्रतीत होते. सकी पर्म युरिकी पास्ता भी नई-गम्प नही पी पारम-स्ववाण दर भी पा नमी पौसित परवी पुरम ही पसे सब नहीं होती पिन-मनन घे पूर्व भी एक विहग म पोगरामरी समीर बात होती है पौर मी पपिरिपतियों म महापास ही पर यह विनय क सम्पर्क में पाती है १ मम्मरमान गुण रंगभूमि र म (e) वाम निगमगार शिषनाराम मोहिमोगापाम प्रेमचन्द कविशिष्ट मारी-यात्रा का परिण-चित्रप तो स्वाभाविक साम्प ही दोनों को पौष मेठा है। प्रम में वो विपयासरित निहित होती है सोपी के प्रेम में प्रारम्भिक प्रार्पण कापारण या नहीं। विनय से मिमने से पूर्व भी बह सिर से पार तक चेतमानीटना पी पर का काही प्रामास तामा मर अम्त तक उपम्यास की मातना पाठक के ऊपर कापी एती है। हदय-समपण उसने किया। प्रारम-स्वातम्य नहीं । दिमय की भर्सना भी नही करती है। बस्तु बिमय मूबा है वो सोफो प्यासी है यही साम्य पार पही मम्तर है दोनों मे। सोफिया के परिण का प्रत्यन्त सबम पम है उसका मामबादीप्टिकोण बा यल-गाध्य न होकर विपर अध्ययन एवं समकामीन विषम परिस्थितियों के कारण स्वयमेव ही उसके सहर-सरम म्पत्तिा में संस्कार-सा बन गया है मानवतावादीका दाना मौमिकता का नहीं होता। मामबकायारप एवं मान पीय समामता के हेतु बह शिष-गरकी मन्माइयों को विराट स्तर पर सक्ति देखना चाहता है। हिंसात्मक साधनों को यह हेय समझता है। माया की ओर सपीहर ऐषय पी पस्सना उसे अनुप्राणित करती रहती है पारपास्य मान पताबार पहले मास्तिक नही पा। पापीबी मे पर प्रध्यारम का पुट रेकर उसका मस्कार किया। माम्मास्मिक मानवतावाद के इत्री पुम की उपर सोपिया। उसके मठिय में समम्बयन पौर कर्म का पारर्म और पदार्प का घरीर और प्राण का। यतिमत रूप में उसमे हरय पौर बुद्धि मे सामंजस्य रखने का भी भरसक प्रयत्न किया है। धर्म का प्रश्न उठता है तो सोफी सोचतीकियो सत्य है वह शामत है प्रत्येक समय प्रत्येक स्थान पर पमान पर स्वयं सत्त-सम है। एक ही प्रात्मताचबर समस्त प्रमाण में अनुसून तो प्राणि-मोक से भसमानता क्यों ईसाई ईसाई में अन्तर दयों ईसाई-हिम में प्रस्तर पयों पौर हिन्न हिम् में मन्तर पयों ? बम तो प्रत्येक का पतम्य है करणीय है । और मोमिया कोमात होता है कि असमानता की मप्राचीरोंपा कारण साम्प्रदायिकता है धर्म-संपीर्णता है। कट्टरवादियों के प्रम्पविकास में महात्माओं उपदेशों में प्रसंमत भ्याप्याएँ भररी है। इमसिए 'सोधिमा सस्यामस्य निस्पण में सरंग रख दती है। धर्म-सरों को युरिकी सौटी पर कसना उसका स्वामारिक पुण। मोर बर क तर्क-पुरि स्वीकार नको बह केरम धर्म-ग्रम्पों के प्रापार पर पिसी सिवान्त को नहीं माम मरती है। स्वयं रहती है पर 'महारमा ईसा के प्रति मेरे मह से कोई मनुषित पर नही मिपमा में सम्हें धर्मस्याप मोर सहिषारमा पवतार सम मी। मेरित उमरे प्रति पग रखने का यह मापय नहीं है कि मकान प्रेमचम्म के विषिष्ट मारी-मानों का परिणविषण उनके नपरेपो में दो परमत बाते भर दी ! मा उमरे नाम से दो विभूतियां प्रसिय कर रखीचन पर भी ईमान मा। कृष्ण की मीसामों के प्रति निष राम मावमा से यह मारप्ट होतीमहाँ भी पब्गित सीमा है यह सर उठी पती । ईसा पार पण मे सिमी समानता है, पर उनके अनुचरों में ऐसी रिमिम्मता' -पैसा सोच कर ही पा रस हिमुत की सराहना की। कामना करती है जिसमें व्यापकल है। रुपण की पोपिफार्मों के प्रसंग कामही नियर मिर्मम एवं पाहतारकारी सप उसे माम्प है। प्रेमषद के समय कापित पीता-रहस्य से पूर्व की गौतासम्मन्त्री निवृत्तिमूमक प्यास्पामों का एप्परिसास पा होगा पार पो होगी मन भारतीय सिाइयों की पसम्म पापा को पान्त दुष्प्रमाव के कारण न परोपे पौरन पर ही । पर्म का उपयुक्त ससस ही सोझिया के प्रेम-भाव की पृष्ठभूमि है। शोपिया का प्रेम भारतीप समान की प्रत्येक सर्त को पूरा म करते मूमत भारतीय हो । सूष्टि की दम चिरन्तन एष पारि-क्ति की स्वाभाविक सम्वन्दताको भारत पारम्भ मे ही मार के प्रषि मेलामता प्रामा । हमारे यहाँ प्रेम को एक प्रकार से सन्तुलित मानसिक सम्बम्प माना गया है माधिक म्यापार महीं। पही कारण किसमार से दूर यहाँ प्रणय पीर परिणम की पृपक-पृथक पसना में भी प्पषस्या नही की गई। इस प्रकार पारीरिक भूब को मैतिक मार दिया पया है। प्रणय पनिपत पर्म पौरपरिणाम सामासिक । सोध्यिा जीवन में ऐसा तो रुप भी नहीं । मिस पर सापारण भारतीय समार परिणम मपरा प्रणय की मुहर नपा सके मितु प्रेमपर प्रएप को पातीयता से आर ग्ठाने का भरत प्रपरल दिया है पारा सास भी है । मिमय प्रति सोफिया का प्रेम पनि मामुप है। से पानी पापा ९पने विश्वास एवं पार्ण के भनुन पाल मिलने पर मिस मगुर मारना का प्रस्पारण होता है पना प्रति यह मग्मित नहीं है। मुझे पपने प्रम के पोप पमझने है पर मेरे लिए गौरव की बात है -पोनी सपारमा प्रति प्रापारा धर्म- रिप की पाका पठापी पाती है वो वरती" पिार उन मोपों निजिनके प्रम बासना से पुल होती । प्रेप लिए धर्म (माति) को विभिन्नता फोबिम्पन नही। ऐमी भाषाएं उस मनोमार सिए जिसका पन्त विपर। बस्तु पार पा प्रत्येक भार पारगारी प्रेमी यही सोचता है कि प्रेम सपरिवाहनही। मोपी मनुमार की प्रेम का प्रस्त विकार नहीं पिस्तु उतेक्ट पनुमा भी हमा प्रिमीम सीमा त्याग एवं पमिदान ही हुए भी सती प्राप्तिका प्रमचन्द के विशिष्ट नारी-माओं का परिम-चिमण सफम माध्यम विवाह ही इसके बिना जीवम-क्षेत्र में सफलता हापगती पौर प्रारका के प्रसफम बलिदान को बयोपित मान्यता भी मही मिलती। रानीको बचन रेकर भी सोफी कमाई से विवाह क्यों नहीं कर पाती याव मात्र के सहारे ही पिन्दमी कटने की भाषा होती तो क्यों मेठी है गया की परण यह? इसका समामान तो सोफि.मा के पास पहले ही पा। 'माह ममे बड़ा घोसा हाया। पामे मो समझा पा उनसे बम प्राभ्यास्मिक प्रेम कामी। निस्सन्देह सोपी के उपवेतम मे बिमय से विवाह की सुबर कम्पना विधमान सिम' के अतिरिक्त पर मोर की भी बाद उसे। किन्तु सोफ्रिमा कम्पनाबीवी इतनी है कि रानी द्वारा विवाह की अनुमति मिम बाने पर मी प्राव भय की प्रार्घकापसे निरन्तर प्रताड़ित करतीएवी है। एक पवार्य को भून हर बारबार यह सोचती है या सत्य की मीमांसा यही मौर इसी प्रकार या मस्पिर हो पाती गेम बाती है होमती पती है-वहाँ कर पंची पियरे से उदबाता है और पिचरे का प्रबलम्ब मी सोफी नहीं मे पाती। रस्तुत प्रेमबर ने सोफी परिष के माध्यम से यह व्यक्त किया है कि भावीयता विवाह में बाधक नही होती विवाह ही प्रेम के सस्प को मीमांसा नही है पिस्तु सत्य प्राप्ति का पूर्ण एवं प्रपूर माध्यम प्रयाय है। और यह निम्मर्ष भारतीय समति कापही प्रवृत्तिमूमक मार्य है वही पाठ प्रकार के विवाहों में बाघ विवाहकोही सरप प्राप्तिमा प्रयतम सावन स्वीकार किया पया। यह तो पा एक तप का स्पप्टोकाप परतु सोपिया के प्रेम का महत्व पिरस्पायी इसलिए है कि बिनय से न सही पौर किसी के साप मी तो रसका विवाह सम्मान नहीं होता । उसने सिट प्यिायों का सम्बन्ध प्राप्तरिक होता है-प्रम घरीर का नहीं मन का धर्म मौरबाट सरकरणों का व्यापात यहाँ पसमर्थ रहता है सय मृत्यु भी इसका एच नही बिगार सकती। यह मी कि प्रम की सीमा मचित महो। रसा मध्य विषय-वासना एष म्पत्ति पत सम्मम्मों से बहुत परे स्याम एष बनिदान है। प्रेम म मस्ती है और म एक नणाही। पतंम्प की महेनना यह नहीं करता। मार्ग से मटकने पर विसबारा से मुमार्प पर नाया जाता है चाहे प्रेम-मार की ममना ही क्यान करनी पड़े मिस्तु सोफिया के परिम-विकास में उसकी प्रणय मारमा का महत्त रस रष्टि से और पी पपिक है दिइसी सपत प्रेरसा मे रसके परिण एर जीवन की पसनामों को प्रम की तपन के माध्यम से कर्मनप दिया है। - ।
प्रेमचन्द के विशिष्ट मारी-मानों का परिष-वित्रण यत्तिक प्रेम को उसने सामारिक मानबता में उगमा है। उसके नौगम में सेवा का पारमक स में सूमपात होग है । प्रन्या महम्समा की पुतमी मात्र बनी पनी । उसका प्रेम ही सेनापर्म का स मेता है। बापामों से या पर भयमीत नही होती । वह मुक्त कम्ठ से कहती है बिनय मविपत्ति की ही भूसी है।" जीवन रस मिए माम है पापर्य प्राप्ति के लिए संघर्ष-समूह का प्रानन्द का पर्याय नही । उसका एबम है, "मुझे समस्तु से पणा है जिसे सापारण तोय सफ्स बीवन कहते हैं। वह कहती है 'म गिन महारमामों को मसार में सर्वश्रेष्ठ समनार समके जीवन सफल न।" उसका तो विश्वास कि सेवा मिप्तिप्त भाव से ही की जानी चाहिए। साहित्य के प्रमोरन सम्बन्धी रिवार म भी इसी भावना कारण परमोफ-मपस को प्राधाम्प देती है । वह अपने विप्राणा प्रमुवक से कहती है "लेकिन तुम्हारा कर्राम है पिनी इस पनौकिक शक्ति को सोडवणे हित में मपामो । पर मति की रपा में गार और प्रेम का राम मप्तापने की पहल नही होती इसे तुम भी मोकार रोप। इस प्रकार हम देखते है कि माफी परिष में उसकी मानवतावादी बाब मामों को विकासमा परमर पिनय के प्रति उसके पाकर्पण के कारण ही प्राप्त होता है। किन्तु रा देवरान मे या एक और समस्या पठानी है । बनमा पपन है "हमारे उपम्पास में बहुत-सी मपरिपपपवा पादपार नाम पर भी पाती ती।" रंगभूमि' में विनय मार साफिया के प्रेम का चित्रण उप ऐसी ही बीर-हि होने सपना प्रिमचमको मरमारी तीवे प्रेम का अनुभव हुमा पा या माही । पाम बन कर लियो'पपितिस्ता समी पीवर पा नियम !-म्पपिन पौर समारमिए मीपन-समृषि का पारण है तो उसकी महत्ता मिस करने के लिए गौवन + चा को मुठलामा पावरपर नहीं होना चाहिए। इस दृष्टि से टास्सटाप की 'एमा' 'पद्धमि' की मोरिया में पारा प्रषिमा पानी है। तापारण दृष्टि से पमिषारिणी होते हुए भी एना हमारी वृत्तियों का निवना परिमारकर सप्ती उतना सोधिमा नही।' रानी का मत एपम निर्मूम हो ऐमी मात्र महीद निम्नुस ग्पाम परावस पर यह गिम परामिममित प्रेम को पा रयते, बह प्रेमपन्दपी गमोनिशारीपि बाबर है। प्रेमपम पन्त माम कर पाहि पमसापारणमिए मिथ है। ग्नि महायों की बामा लान १९५६ ----- १७ प्रेमचन्द के रिशिष्ट नारी-पात्रों का परिण-चित्र वृत्तियों के परिकार की बात ग राम करते है वैसे रन-पशि बन साभारण में मुश्किल से पांच प्रतिशत भी नहीं होते। हाई स्म से लेकर एम ए की कक्षानों तक प्रेमपद के उपन्यासों का पठन-पाठन होता है। सीमी-सी बात है कि इस परस्पा में 'एमा' नहीं 'सोझी' ही मम्मदी पोर इपित करती है। वस्तुत एना दृत्तियों का परिमार करती है तो मोफ्री मामू मत पम्हें परिपतावस्था का मार्ग रिसनाती है। फिर इस तथ्य को भी विस्मृत नहीं किया था सकता कि एक भारतीय है और दूसरी भारतीय । माखका मोरयनारी साहित्य मी विदेश के साधारण पारावलम्बित साहित्य से कम तीला है। पौर तीसरे यह कहना भी हो पम्पाप ही है कि सोधी पौर विनय के प्रेम विषय में यपाप का सहारा लिया ही नहीं। प्रेम में एक सीमा तक कीपासमा मविलास स्वमन्दता तथा अन्ततीय सरकारों के प्रात पावक भारि का विषण दिनप-मोमिया के प्रेम में सफलतापूर्वक हमा है।हमपा भूत पाते है कि प्रत्येक मेसर का अपना-अपना युग होता है पुप की माप होती है और रसो के अनुसार मेरा अपना एप्टिकोण निर्धारित करता है। प्रेमचन्द पाहते तो 'मोस्वामी की वाराको रपम्पास में उतार सकते पे स्यामा सम' की रचना कर सकते थे और 'टामस्टाय' की एमा की मिमिति की सामर्य श्री उनमें अवश्य बी और इस प्रकार प्रारिक सन्तुष्टि भी सम्भवत उन्हें बहुत होती-रिन्तु प्रेमचन्द को दो उस सोफिया की सृषि करनी पी गिसके लिए मेखक कोझिम माइन के मोतिकमयों को छोड़कर युप-बर्म को पमि पक्ति के हेतु भूम पर पिमपी बसर करनी होती है। मामा कि उसके म में वायवीय तत्तों का समावेश हो गया है पर बहसी भी प्रमौकिकनहीं माई। प्रेमपार की प्रम के प्रति निगी पर्म-सापेक्ष वारणा श्री जिसका विवचन हम तीसरे पम्यार में रहे। इसमें सम्पनहीं कि उस युप में पौर पार भी भारतीय पाठकों की पत्तियों का परिकार भारतीय सवि में रनीसोपी हो पर मस्ती है परिचारिणी 'एना नही। सरा रह सकती है कि सोफी माहे मौर बोपुष भी हो सफन पुषी बह मही है। समाधान ऐसे ही हो सस्ता है कि बीवन की सफलता एक-दूसरे को समझने में होती है किन्तु गोधी एक ऐसी मुगार तपा म्यापक बिपति है जिसके लिए परिवार परिवेप का प्रदरे कोने में पहा हा पिनौना पोपटा मनुपात है। उसके लिए करणीय पही नही गया था पो उमने पिया। सो की मारमहत्या मी पारक केमिए एक बहुत बड़ा प्रश्न-चित है। पसाधारण परिपप्रासाद रमारते माना और पात में भायुक्तापए पप प्रमबदविषिष्ट नारी-पामों का परिणपिपल समार म बिवसता के भय से (पैसा हि प्रम की देवी की पैमी के साप भी हमा है) प्रत्पन्त साधारणता में उसको गिरा देला-पा प्रेमचन्द का अपने पानों के प्रति अपाय माना पया है। एक बहुत बड़ी सीमा तक यह पारोप रषित भी है। माना कि सोफिया की परिस्थितियों को देखते हुए रस का पन्ठ पगार प्रसामाविक नहीं रखता परन्तु इसे उपयोगितामा प्रेमचन्द जी महान् सपमम्मि भी तो नही पहा बा सकता । साधारणतः पहीनता है कि सोने सोफी की महत्वाकांक्षामों कविण्द साप को धोम निमा है पौर मामी कि पावर्ष प्रौर पपा में यहाँ पर सम्तुमन वह नहीं सके। किन्तु यहि से उनके अपराध का ग्तर मांगा पाये तो वा निश्चित स पही कहने 'मरते फिनमें सत्प का रस होता है । विषय-वासना पुतले ऐसे पर पायें तो ससार स्पन हो पाये।' ममोरमा पिप-सिपि दमा परित-विकास की प्टि से मनोरमा सम्भवत सोडिमा से भी भमिक पफम बन पाई है। प्रमा प्रेमवाद की गमी पकाकर पमी है पिरजन की वकासत मी उई स्वयं कई बार करनी पड़ी है वपा सोफिया जैसे सफम परिष साप मो मेवा की पोर से लम्बे समे पाय विपके हुए मिन पारस्तु 'प्रयास' की मनोरमा के पति चित्रण की लिपेपता पर किसी पिाण-रि लिनेपणारमा परषा प्रर्प प्रस्पयन होकर पूर्णत पारपत्र पपा माटीप । प्रेमबरकातील एक प्रमान सामागिन से रामर होते हुए पीपा संस्कार प्रपान वर्ग-परिष नही पपितु पति-परिम। पसमें पूति गरपामना ! स्पिरता नही परमोगोरे भार की परि पोरनही पापलीप पवार्य की प्रतिजति तपा नरेपयत मोम्मम लोम्मुन होते हुए भी पमरे भीतर जीवा सामागिता एवं समतिकी मुष्ठ पपिति विद्यमान है। पार (मसामपार) पोपि में मनीरमा पान' भनि 'गान सी की भीति रियाम पोर पितोपराभूत करती है । पान पनी की भानि पियरे में लाने पानी स्तुि किसी रामनिस ती मानि रोप पौर पटिमा रमसी नाम संसारमा मापारपना परों में मदिरा प्रेमपन ११ । प्रेमचन्द के विषिष्ट मारी-मानों का परिण-चिमण एक ऐसी प्रसाधारणता निहित है पिसकी प्राप्ति सत्य है। बनार की रिप्या केस में ही उपन्यास में उससे सर्वप्रथम सासालार होता है और यहीं यह इस भावना की मभिव्यक्ति करती है कि सत्य की हत्या कर पाना गया पावर्ष मनस्तुष्टि के मिए पर्याप्त है प्रत बस बाझामर है। उदाहरणव परि आता एक सार्वभौम सत्य है जिसकी पायापकता व्यक्ति अपना समष्टि रोगों के लिए समानत बोपनीय है । प्रमि-परीक्षा हो एम्मे पर मी मुटी निन्दा से सपने के लिए राम से पुरुप द्वारा सीता को रिपा ममा निर्वासन यदि भाव मान भी मिया माय तो मनोरमा सम्मों में बह ऐसा माद है यो सत्य की हत्या करके पाना मया है यह पावश नहीं है परिव को सता है। मनोरमा अनुसार, सस्य तो यह है बिस में सत् मर्याद होने का भाव विधमान है-यो एक पी।पौर ममेक में भी जिसकी वही सत्तापिपमान और परिमनेक का पापित सरम एक प्राण-सत्य का तिरस्कार करता है तो वह पम्याम है जिसके पिरख पानाच उठायी ही बानी चाहिए। जब मनोरमा के इस विश्वास को पापरा समर्थन प्राप्त होता है तो वह भरने मस्तक को गत सनत हमा समस्ती मोर कहती है 'मैं मानती पी कि पाप यही पवाब ये पब मन मोगों को दूर मारे हाोगी।" इस प्रकार पानीवन ही यह म्याय सम्पाय की कसौटी सत्य ही को मान कर बनती है। यही कारण है कि दूसरे के प्रति किया गया पम्पार उससे सहा नहीं पाता "पाप प्रासामियों से पयों नहीं प" कहती पहायर से कि एक कौड़ी भी न होई देपा ही नही तो सोग से मेये। तुप मेरी बगह होती तो मासामियों को मना कर देती? पापर मे प्रया। - 'मश्य ! पुनम गुप्ता काती-जबरदार। राणा के प्रारमियों को कोई एक पैमा भीम। भौर बान साहिर (मपने पिता से क्या पाती। 'उनसे भी यहीपाती कि भाप परे से बरपो पाइय नहीं तो मामा महोपा । माप मेरे पम्प पिता, मापकी सेवा परमा मेशिन पापको दूसरों का पूनम पूमने एगी। परीरों को सता र मपना पर मर निया तो कौन-सा गा तीर मार लिया इसाइमन महीयते । यापारी भी नहीं है। यह रेयन मुररे और मिस का तमाया है। एक स्थान पर दोबारा विपानतिर माप में महती है। महापर ममापसे यह धन पाक गया प्रमुख पार पगुता एक हो बस्तु है या उनमें पुष पन्तर "मुझे भए प्रमपन विशिष्ट नारी-पात्रों का परिवार हैरिए पातक पापार पर बने हुए परम भवन का पोम ही पतन हो बायेगा पौर पापको सारी दीति स्वप्न की भांति मिट बाएगी। समिए कि सो पापी साप सापक होना चाहिए इसी म पापका भी मनोमा होणार मधोम प्यार है। इस सस्प को प्रस्ताहति द्वारावर म्स को एममा महीपाती यह पौर पिता की बाठ किया रामाविणाम सिंह को पीपी रामी मी बनती है । पिसाह पुष प्रिया म्प मापर से माती भाप नही पो मेरा किसी काम में भी नही भगवान मुमे तो ऐसा मानूप होतापूर्वबाम में भी मेरा पार पापा किसी चीप में पाषा में मर पर भी पापको नहीं भूल पाती। बह यह भी सोचती है 'पभी बागी परम पचगे । पानी पा गया तोपर भोग पाएन । पर रे बापर पाच गए हो। पर किसी नासीको बिमामिए पसन्द करमे बात है वो रसकी भा गावाती है और बार-बार रमाई पाती। मातोपानर र देस का दौर और परम पविक बन मी बापौर मम मनोरमा भी पा साहब की परिणीता हो पाती है तो भी पहबार को दिपात रिनाती पर भी अपने को पापकी राती पम भनी। रिला दिलो में वह पमा साब से यामाने की संभोग मही करती f; 'म पापको धोखा देना नहीं चाहती। मुझे पापसे प्रम नही है। पनी तो बनमा पारती हूँ पर पिसी की रानी नही। पोर वय पद में भी मददी कि विपरा ममोरमा पपने विगत पति की स्मृति के प्रपनाम पर ही अपितु पपी कीरा पावार के सहारे भीतीपोपसके पानी में प्रतिप्पमित होती एपी है “ोरा । हमें भूम मा ? मारा पुराना पप" "मों पौधों की पक्ति बाना न प रस प्रारमी (सर) की पोर पीरता पा पान पाantr" किन्तु मनोरमा रेस मार्पण का मुम्प पिन पौरमारमा पापण नहीपर का हार-बाप नही प्रपितु समरे पार रम पीपते हैं। पपने दो सिपातों को परम पूति से पर परिमसित होती है। रिस वापरबीररयो को रहसमाचार परों में पानी भीमबहती! 'सौपती पीदिमाप यहाँ पायो पापी पूरा परमो। पायनिक सेवा-नया में भाग मेमा परिमाराम ननिए पोकासास पीपीपणा र पमायो मनोरमा पा सादर बना ली हिरवी पण पैर पारगे से मिर गाने । बाहुन मनो- या प्रेम र प्रपणे लिए पपी मयापही । उमरे ममपन मिथिए नारीमाका परिपत्रस १ अनुसार पो प्रम की परम पूटि प्रेम-पान के लिए पावर्ष सेवा-यात्रा का पाय पुराना । रागा साहब से विवाह करके भी यह पहर के लिए पर-स्पी मनि पार्य उपारामही पुरामा पाती है। पपरदे प्रति उसे यह क्षसिक पिना है कि 'तुम मुझे रिनासिमी समझ हो यह तुम्हारा न्याय है। पौर जिस प्रचार में तुम्हारी सेवा कती ? मनोगमा तो बोटनी अपना रमिवाम रेकर प्पार को बीतीउस प्यार को दो मोहित के लिए बेतों में वापता है उस प्यार को दो सत्यामयी है पौर प्रम्याय को निर्मूल सिद्ध करमा पाता है उस प्यार को,बो मानवमात्र को प्रादनाव में बचना चाहता है रस प्यार को मिसका सेवा-मार्य है मोगीको रेखो' पोर बोत्तम्प स्याम बमिरान तथा सहनीमवा श्री महरी पार्टियों में से होता हुमा पाखिरी मरिन पता है उस प्यार को पिसको पेसा पवित्रता के प्रबार में निहित है पौर दो मनोरमा का पपना होता हुमा भी समो का है। पर एक निविणार तप्प हि ममोरपा को ऐसे दाम्पत्य से भिवृप्पा है यो प्रम पाल मे दर बपि पिबाह पारा परिपुष्ट होने की कम्पमा पर पीवित है। म्पप्टन मह पण साब से कह देती है कि सपे सनसे प्रेम पत्रापि नहीं है पौर एक बार उनकी निपणास्था में पा भी मुना की है कि पारनील पा पित एकही रह मिला है। उसने से विवाह किया। दूसरों उपहार के लिए, किन्तु यमा सार को भी उपाठ पद पवश्य करेपी । पलीबन कर रह सोचती है प्रेम से मैं रवि हो गई पब मुझे सेवा से ही अपना बीरन सफल बनाना होमा। यही कारण है कि "कविता में पौर सब रस पे देवम पार रस मथा।" पपनी सम्पूर्ण गाईप-यापमा को मनोरमा परा साहब की पोर टीममे का प्रपल पाती है और पास में यही दो बचा रस पास पन लिए । रामा पाइप को पसन्तुष्टि से माह याचनाएँ देती है किन्तु यह सम्मुख सहन करतीमती है "मकी नुपी की परमा। नहीं तो फिर हिमती नमी की परवाह कमी! बोली भपने पति से दिन में कीनारसे उसे रिप पाकर प्राण देना चाहिए। हमारा धर्म कौमा रखना नहीं भमा करना है।" निस्सरेह मनोरया इस एपिट से पूण पति-परापरता चिन्तु वा बाप वो राम साहब के लिए रसका पलाल एक अपनाया ही है। ऐसी मृगतृष्णा बिस पर उनका बस नहीं, जिसमें भी उने पाठ स से परपोषी मोर विधापरीषता है तो कमी पत्नी पति से मापाती रोखठो। म प्रापा यह पाधान नीम पूगी।" मिण का यह वात्पर्म नहीं कि मनोरया के पम में नम मही।
०२ प्रेमचन्द 'विषिष्ट नारी-पानों का परिण चिमण मातृल की पाहनही है। उसके पे धम्ही कि 'पापा 1 में पब यह मान तुमही मी । यह मेधउसकी इस भावना के परिचायक है। किन्तु पहने रहें दवा कर सेवा के मार्ग से निकालने या यत्न किया है। ना ही कार सोप पिमा नाप ! मनुष्य का वार पुष से नही अपने पो में होता है।" मनोरमा मे एक पार समझी है। ये पार पापी पर्व में ही बन को विरमार्य समम कर अपने पाप को प्रनते परे है। धन के बिना तो कोई भी सुपार तमा परोपकार पम्भव मही! । मावस्यकता बम र मात की होती है कि मन प्राप्ति के उपरान्त हम रिमासगीरी महोबार्य भौतिक मान्यता मे अपने पारणे म गिर बार्य सय मोफर हम पूसरों को पीरिव पने की घाममै प्ररान रें। इसके लिए त्पा की प्रायस्पकता होती है यह सोचने की घापर्प | "मने सपै की भांति प्राधि पर कर सकी रक्षा के लिए यह पर नही स्वीकार किया है कि अपनी पारमोप्रति पौर दूसरे उपकार के लिए ही। प्रेम को बोरर मन पीपे दौड़ेगी पर तेरा उदार प्रेम ही से होगा '-का पर्प पही है कि किसी भी पारर्स के सानप में पन को पीपम पम परण करना चाहिए, पापम में नहीं। मनोरमा का परमिवात है कि "पारम-सम्मान की रपा हमारा सबसे मापस।" पम्प पाति की होने कारण महत्या का प्रपा हमा पर पार कर पाने महीपाते टोपा पार से कही म महापापी पर होती वो पस पर 4 एक पण मी न इसी। वस्तु विाह को भी मनोरमा पम्प-समर्पण केस में सीपर महीं करती। वह उसे एक मार समोता ही समस्ती है पिसका प्रमुप गंग होता सम्मान-रधा। पर माती में दो समझती है पो विवाहमाली भीमा केपिरत पिया पाठा है पारिवाह ही नही है। पौर यही कारण है कि सही मारमसम्मान प्रियता समश पगसारको भी मार निश्पर होना पाया। पर बामपने पूर्णपिपरमाहित करती रे-"पर में यही एनी पार पाये । मेरी बी पीरियादीरियेमा तो पापाहर को मानसिक साये भी पराभूत मादी पाना। पहानुभूति को पीतने वा पोधि प्मा एकही पार मनोरमा पाम हमिहनौता । प्रम-पात्र पन्या पिगह को वह महेगी' पति रोषापारा पाये-दिन अपमानों को पर सहन करेगी पदवी दिपारी मिला के कारण दिनपर पत्पर ल पी पीर पारितों " प्रेमचन्द के विशिष्ट मारी पानों का परित्र चित्रण - संम्पबाणा उत्तर मी सहनधीमता के मान से ही देमी-किन्तु देरना भेकर भी उसे तो माना है। उसे बीवन से पता मुखी नहीं होना है। मनोरमा देवरित में एक रोटियां भी हैं। उनमें एक है। उसकी यह भावना सम्भवत मास्मसम्मान के पतिकमण का ही परिणाम है। सपत्नी रोहिणी की मृत्यु पर सभी पाते। किन्तु मनोरमा मही माती। इसी प्रकार उसकी सेवातिक प्रतिवादिता मी एक-दो स्पनों पर प्रारम्-मासन की पपेक्षा दोप की सीमा में परिकार तक पनी बाती है। किन्तु इम बोपों का महत्व इसी में है कि ये मनोरमा कोइसी बरती का पात्र बनाये रखते हैं। परिष-संगठन की दृष्टि से मनोरमा और रानी रेवप्रिया के पारस्परिक प्रसयों की मावस्यकता नहीं दी। इससे मनोरमा के परिण विकास में कोई मी मबीन रेवा मही उभरी है। परिज की म्यापरवा भले ही इससे समृट हई हो किन्तु कमात्मक हास उससे अधिक हपा है। किन्तु यह सब होते हुए मी 'कायाकम्स' मनोरमा केही सहारे टिका हमा रुपिया, तारा, सम्बा, लसा सपा धन्या प्रपिका-स में प्रधानत उपस्तिमित पांचों नारी-पात्र प्रेमचन्द की कहानियों में पिपिए है। कहानी में किसी भी भाव की सभी प्रस्थानों की समीण अभिव्यक्ति का योचित प्रबकास सम्मर नहीं होता-उद पम्बन्धी एक पक्ष ही प्राय यहाँ उमरा करता है-इन पार्थो पामों में प्रेमपार की प्रेम भावना वा रसात्मक चिमण में दो तारतम्य (पर पौर तम) परिलक्षित होता है उसके कारण ही इनके परिष-विरमेपण की एक पाप ही पावस्यकता अनुभव है। रपिया-'रयोति' कहानी की रपिया पहानी में प्रधान पान महीं है तो भी प्रमाण की प्रारम्भिक अवस्था की प्टि से महत्वपूर्ण प्राय है। मोहम पुगक है रपिया को भी यौवन के प्रापमन का मादक सर सुनायी पा पाप्रत यह स्वमाबत मोहन की मोर सिंच पाती है। इपिपा प्रेम पापपरा पर भरतम्बित होते हुए भी विसस्त एवं नियत है। यही मोन रोमपने परिवार के घरों के प्रति पासीन बा (रपिपा का प्यार पापर नके प्रति स्नेह करना सीखता है। पिया जा रस इतना ही भारती! "तुम मेरे पास एक बार पर पा गाया ये। बस पार एप ममचम रेरिपिष्ट मारी-मार्चा परिष-विपरस नहीं पाती। बामपन के बिना एमही रस्ती । मोहन कोरिया पूरी यो को पामे ठो पपने बरे का पास पान पसन्द नहीं होवा किन्तु पर यह रेवती कि 'फूम (पिया) में केस रग ही मही है मुसम्म भी है गितके कारण रस पुष की काम्प भावना भी मुगम्भित हो गई, तो उसदे मन में रपिया से बो या हो पईबी परिसी बी मा से सुन-सी बात है। यह सोचती! 'पासान की मारिया प्रपमे बन्यों दी तो परवाह नहीं करता इसरो के लिए कौन मरता है ! पारी पठ (रुपिया) पनिमा के मारे को लिए मामती पी। परिणामतरपीका पन पी रपिया की निगएमवा तपा भोमेपन से प्रमापित हो पाता है और बह रोगों में परस्पर विवाह की पनुमति देती है । इस प्रकार हम देखते है विपपिपा के महान सहब प्रम म परमारम्मिा प्रार्पण है निसा मारक मानोर में म्पति मम्पूर्स मावापरण कोही महमयी इपिस देखता है और दोनों की निपपटता के परम पिसमें पारस्परिक सनसों का नाम-निधाम नहीं होता। ताप-प्रम-सीपान का दूसरा परण है ऐक्स कहानी की वाप। सारा एक पमिनधी जिसकी पयस्मादेवीहरप की है। एक दिम राम्तमा अभिनय में उसे रेतर पहर बनाइप नवयुगकर निर्ममाम्त सब पर मोहित हो जाते। वारा बिसे "भाग बोस पास पहमे एक बार प्रेम काट पमुमय हो चुका होता है एक बार फिर एप में प्रम का दीपक बना बनी। पर गिरी प्रबम ल्या होती है पितु विवाह से एरित पूर्वीपासबातीमा सोचती रिमित 'प्रम देरता' में उमड़ी शातिर कुम-मारा को तिनामि रेराहो पासी सामि पापनों प परिचामिव एकत्रिम पर उसो उपहार योप्म नही हो सरता प्रम नापपौर समोम मारना मिप्या-सरप पर मिप्या दोनों एक साप नही पसकते । परिणामत राना निर मुझे एका गान पाता है हिमपी स्मृति में प्रम के मोष से ही परित मापुर्प मौर पामार है पापरही पप गिर मेने को पहप, किनी प्रमान दिया की पोरगती है। हम ऐसते है कि पिया के प्रेम बहा प्रारम्मिा पापणी पौर रिपार की हया विमान है हमारा परिष में पार्षण भी पौर रिहा भी रिमा सममे नौबड़ी सपरिप है पारतरित प्रेम की पहचान-रापारमा सम्बाप की पानी पमना-मह मोपने पति पिने प्रेम-साप के योग्य भी पपरा नहीं। पौरपर्य को पूर्ण प्रयोप्प दमली तो साग पापप मेमचम रेपिपिष्ट नारी-पात्रों का परिण-चिपए नेती है। तारा का प्रेम परीर से प्रारम्भ होकर त्याप तक पहुंचता है। किन्तु इसमें सम्मेह नहीं कि यह पाम एक प्रकार की बेबसी का हो परिचायक प्रभावत्मक भावात्मक नहीं मरमा-हार की बीत की माया हय में प्रमाहरों के परमपित हो माने पर भी विवाह को भानुभवा नही समझती है। सारवापरण उसकी पोर पाइप्ट मोर पार्षिक रष्टि से उससे अधिक सम्पम्म होने पर भी कहता है भतुम्हारे लिए में भाग रियासत को तिममिमि दे सकता है किन्तु मग्मा सनम है।बह पारपाचरण को बता देती है तुम्हारे कामेव की जीवन पाया में पनाहमा साम्पबार बहुत दिनों तक सांसारिक जीवन की मूमोर सपट कोम सह सकेगा। प्रेरणा-साप सारदावरण सग्मा से शारीरिक स्म में दर रह कर दी उसके प्रेमानोर में सेवा-पप पर पप्रसर होता है। यह कासिन में पा पर कपकों की अधिकार रक्षा का प्रबत पक्ष नेता है। इधर मग्गावती के पों में भी पवा और प्रेम की मात्रा रिनों-दिन पतीबाती। क्योंकि अपने प्रेम को पोस्स पहना बाहवी पी यह उसके लिए पप्राप्य नही रह पाता पव भब उसे विवाह करने में भी कोई हिरक महीं रहती । पर धारापरस अधिक मकेमापन माम न कर सकने के कारण एक प्रम्य पुरती सुशीला की भोर पासष्ट होता है और एक पत्र में मग्मा से माना कर देता है किया क्षयरोग में प्रस्त हो गया है। किन्तु नया बिसे कि पब मारम प्रेम पात्र की प्राप्ति हो चुकी होती है मागीय की यात्राएं सहने को भी वैयार हो बाती है और भविमम्म पारावर पास नैनीताम पहुँचती से बात है कि मुपीना से पारपाका क्या सम्पत्य है पिस्तु सब-पसान करती हुई पर पारवा की सेवा करती मोर पम्तत तपस्विनी बन रही पसे सुनने को मिलता नहीं मग्मा भब हम में मार तुम में कभी बियोग न होगा। इस प्रकार पिया' के प्रेम में परि भारम्मिक मार्पण है पौर 'तारा' में बोम्य अयोग्य को समझने की रयापावित सामर्थ्य विधमान है तो सग्या प्रेम में ऐसी प्रेरक मावना हैमो प्रयोग्प को पोम्प बनाठीबो कोरी मापुस्ता माही परम्प-विरोप से बाहर प्रसार रखती है और बो त्याप प्रपान होती हुई मी प्रत मानम् की भावात्मक स्पिति को प्राण होती है। नया प्रेम सोपान का तीसरा पर है। ता- 'ममा पानी की सेना प्रेमिका-स्प में सग्मा से भी एक वर्ग मापे है। मग्या जिस प्रतोमन को रोक नहीं पाती मेमा की मुट्ठी में है। की समय पा जब यह निरीह भाव से रफनी पर, मुक्त वातावरण में मुक्त 1 प्रेमचन्द विशिष्ट मारी-पापाकापरिष-विपण महीबारावी। ए मोहन रे दिमा इनही पस्ती। मोम की रिमा मां को पाने तो अपने बेटे का पाल-पान पसन नहीं होता प्रित का पह रेवती है कि मृत (पपिया) में केरल रंग ही नही है सुगम्य भी है जिसके पारण ससरे पुष की कप्प भावना मी सुपम्बित हो गई है तो उसके मन में रपिया से दो या होना भी किसी देवी मा घे पुम-सी माती है । परमोचती है भारत की मच्यिा प्रपन बमों को परबाइ मही करवी इसके लिए कौन मजा है | सारी राव (बपिया) पनिया के मारे कोमिए बामवी एही। परिणामस्वस दूरी का मन मो पपिया को निम्नवा तपा भोलेपन से प्रभावित हो जाता है और यह रोगों के परस्पर विवाह की अनुमति दे देती।इस प्रकार हम देखते है कि पिया के संपर्पहीन पाहण प्रम में मामा पापण है बिस मार मामोक में व्यक्ति सम्पूछे पावावरण कोही स्नेहममी प्टि में दवा पर दोनों की निप्परता कारण विसमें पारस्परिक निममा का नाम-मिशान नहीं होता। ताराप्रम-सोपान का दूसरा परम । ऐक्ट्रेस कहानी की तारा। ताप एक मिनेगा। रितको पपरवा पदीय वर्ष की है। एक दिन पहलता पमिमय में उभरणर के पनाम नरयुवक पर निर्मसात सस पर पोधितोपाठेवारा नि 'भाब से बीस साल पहले एक बार प्रेम का का मनुमा दो का होता है, एक बार फिर इसम में प्रम का दीपक बसा तोहै। एयरपोप्रा चा होती! कितु मिया से एक दिन पूर्व हो पात गाती है। सालती है किसिम tal मे सपफी वाविर कुत-मर्यादा कको विनादिरे सेहो बासी वा भिम सापनों द्वारा परिचालित एक निम पर पप स्पहार के योग्य नही हो समता प्रेम पवार सपमोग-माबमा मिप्या-मुस्प और मिप्या दोनों एक बार नही पसको । परिणामत रामा मिरकर, मुझे ऐसा पान 'पता प्रेम की स्मृति में प्रेम के योग से पी पषिक माधुर्य मार भामर तमामरकोपी माप निमार र सेन को पर, किसी पहात विधा की मोर पम रेतीहै। हम रेषत कि पिया के प्रेम में पा प्रारमिक पास मी पौर विवाद की सिमान हाँ पाप परिष में पारण मी पौर विशाही या भी किससे भी बड़ी स्पति पास्तरिक प्रेम को पान--पात्मक सम्बन्प की गामने की ममता-या सोचने पति किम मपने प्रेम-पान के योप्प मोई प्रया नहीं। प्रौर पर इस को पूर्ण प्रयोष एमपी तो त्या का मामय ७८ मधमा विषिष्ट मारी-पायों का परिण-चित्रण मेती है। वाराका प्रेम परीर से पारम्भ होकर रयाग तक पहुंचता है। किन्तु इसमें सम्मेह नहीं कि यह स्पाम एक प्रकार की बेबसी का ही परिचायक अमावरमक भावात्मक नहीं। मरबा-हार की जीत की मण्याहय में प्रेमाडरों के पस्तरित हो बाने पर मौ विवाह को मास्ता नहीं समझती है। शारदाचरण उसकी भोर भाए और मार्षिक रष्टि से उससे अधिक सम्पन्न होने पर भी कहता है “तुम्हारे लिए मैं मान रियासत को तिनामि दे सकता है किन्तु मग्मा समय है।वह भारतावरण को बता देती है तुम्हारे कामेन की पीतम पाया में पना इमा साम्यवार दिनों तक सांसारिक बीबम की मू और कपट कोन सह सकेया । प्रेरणा-साप मारवापर बग्गा से सारीरिक स में दूर ए कर भी ससके प्रमानोक में सेवा-पम पर प्रप्रसर होता है। बाकीसिन में पा कर पड़ों की अधिकार रमा का प्रथम पक्ष मेवा है। पर नग्मावती के पर्चा में भी भरा पौर प्रेम को माना रिनों-दिन बढ़ती जाती है क्योकि अपने प्रेम को पोम पर देना चाहती थी वह उसके लिए मप्राप्य नहीं रह पाता प्रत भब रसे विवाह करमे में भी कोई हिरक मही रावी । पर धारापरल अधिक प्रमापन सहन न कर सकने के कारण एक प्रम्य युबती सुशीमा की पोर मारप्ट होता है और एक पब में अम्मा से बहाना कर देता है कि क्षयरोग में प्रस्त हो गया है। किन्तु सरमा बिसे कि अब पारर्स प्रेम पान की प्राप्ति हो चुकी होती है पापी पम्प की पत्रणाएँ सहने को भी तैयार हो बाती है और पविनम्म धारावरस के पास मैनीतास पहुंचती है। इसे भाव है कि मुखीमा से पारा का क्या सम्बम्ब है किन्तु सब-दुषसहम करती हुई यह धारा की सेवा करती है पौर पम्तव तपस्विनी बन कर ही उसे मुनमे को मिमता है 'मही जग्गा पब हम में मार तुम में कभी पियोग न होगा। इस प्रकार पपिया' प्रेम में पदि भारम्भिक प्रार्पण मोर वारा' में मोम्प प्रपोप्प को समझने की रयानावित सामप्य विधमान है तो सग्या के प्रेम में ऐसी परक बाबमाईबो पपोम्प को बोम्य बमाती है वो कोरी भास्ता नहीं परम्प-नरोप से बाहर व प्रसार रखती है और बो रयाप प्रथाम होती हरबी पन्तत प्रामम्द की भावात्मक स्पिति को प्राप्त होती है। नया प्रम सोपान का तीसरापर है। मताना' कहानी की नेमा प्रेमिका-नप में नग्मा से भी एक पाने है। नग्या मिस अनोमन को रोक नहीं पाती मा की मुट्ठी में ।। कयौ पमप पावर बह निह पार से रफमी प८ मुक्त वातावरण में मुक्त प्रेमवर मिशिष्ट भारी-पापों का परिष-चिरस कारण उसके महीं चाहती। यह मोहन के बिना नहीं सकती। मोहन की मिना पूरी मा को पहमे तो अपने बेटे का पाल पमम पसन्द नहीं होता किन्तु पर यह रेखती है कि 'फूम (पिमा) में गत रेप ही नही है सुनव भी है जिसके पुत्र की कर्तप्प भावना भी सुपित हो गई है, हो उसके मन में पिपा से भो पणा हो गई थी वह किसी भी मर से पुन-सी माती है। पा सोचती। भारत की सकियो भपमे सलों की तो परवाह माही करती. दूसरों के लिए कौन मरवा !! सारी रात (पिया) बनिया के सरके को मिए पामती सी। परिणामस्वरुप पूरी का मन नौ पिया की निश्पनता तथा भोमेपन से प्रभावित हो पाता है और यह दोनों के परस्पर विवाह की पनुमति देती है। इस प्रकार हम देखते है कि पिया के संपर्पहीन बहन प्रम में यह पारम्भिक पार्पण निसके मार पायोक म्पमित सम्पूर्ण पावागरण कोही स्नेहमयी इष्टि से देखता है और दोनों की निप्परता कारण बिसमें पारस्परिक समम्मों का नाम निधान मही होता । तारा-प्रम-गोपान का दूसरा परस । ऐकस कहानी की धारा। तारा एक पभिनेत्री बिसदी अबस्था पतीस वर्ष की है। एक लि पवना के अभिनय में उसे देखकर हर के धमास नवपुमक बर निर्मनकात उस पर मोहित हो पाते है । तारा बिसे "पाप से बीस साल पामे एक बार प्रेम का भट्ट मनुभम हो पुछा होता है एक बार फिर एप में प्रम का दीपक बना ली है। उसेसर बिना भी प्रयत्न चा होती है किन्तु बिमार में एक दिन पूर्व ही पापा पाती है। यह सोचती जिबिस 'मकबवा' मे उसकी शातिरम-मारा तक को पिसाबमि पोहो बासी पा हनिम सापों आप परिवामित एपिम पर उसके उपहार के योग नहीं हो माया' प्रम सरय। पौर नपमोग भावना मिप्या-सस्य पौर मिप्मा दोनों एक पार मही पाते । परिणामत माना निरकर, मुझे एमा जान 'पाता है कि प्रेम की स्मृति में प्रेम के भोप से कहीं अधिक मापुर्य पौर पानन वा पर कोकहीं पाप विवाह कर मेने को कह कर, किसी भात रिसा की प्रोर बम रेती है। हम जो कि पिया के प्रेम में बहाँ प्रारम्भिक भाषण मापौर निगाह की इचा विमान है पारा परिम में पाकरण भी पौर रिणामीम भी किन्तु उससे भी बड़ी पपतमि बास्तरिक प्रेम की पाषान-पगारमा सम्मान को जानने की ममता-या सोबन की मस्तिक में पपने प्रेम-मार मोम्म मोटूप्रपा नही। पौर पद पर सब को पूर्णत भयोम्म पममनी तो खान पपामय ७५ प्रेम विपिष्ट नारी-पात्रों का परिवचित्रण मेठी।। द्वारा का प्रेप पर से पारम्भ होकर मानक पहुंचता है। किन्तु समें सन्देइ नही दिया साप एक प्रकार की परती ही परिचायक है अमायरमक भावात्मक नही। मामा-हार की गी' ही अमाप मे प्रपाकुरों के पात्वरित हो पाले पानी विवाह को मापुस्ता नही समझती है। पारस उसकी पोर पाइप मोर माबिकाटिए उससे अधिक सम्पन्न होने पर भी पड़ता है "तुम्हारे लिए मैं पाम रियायत को रिलायमिरे सकता दिनु सग्या पाप है। यह मारयावरण को रवा देती है "तुम्हारे कामेज की पवित धाया मैं पामा साम्पपारा दिनों तक सांसारिक वामन कापौर पर कोम सहसमा प्ररणसम्म पारावरए बरा से पारीरिक रूप में पूर प कर भी उसके प्रमाहो में पैसा पम पर मप्रसर होता है। यह कोठिम में पा परम्प की परिकार खा प्रबल पम देता है। पर नगावतोपों में भी भरा और प्रेम की मात्रा दिनों-दिन गती पाठी पोंकि अपने प्रम को बोसहसा भादवी पौ यह उसके लिए प्रप्राप्य नहीं रह जाता मत पर से विवाह करने में भी कोई हक नही एती । रपर पापाचरण पनि मनापन सहन न कर सो कापस एक पम्प पुरती मुग्रीक्षा की पोर पाइप होता है और एक पल में समा से बहाना कर देता किया मपरोप में पता है किन्तु परमा रिसे कि पर पारर्म प्रेम मात्र को प्राप्ति हो की होती भावी बम्प की पानशाएँ मान को भी पार हो बाटी और भरिसम्म पाररावर के पास मैनीताल पोषती है। सस सात किमुपीता से जाररामाया सम्मन्य है शिस्तु सब बुध हा ताग पापा को पेश की पार पन्तत तपस्विनी बन कर दी उछ सुनने को मिलवा है 'ही समा परम में और तुम मनो रियोन न होगा। इस मनर पपिया के प्रेम परि प्रारम्भिर पायसमौर 'तारा म मोम्प प्रोम को धमकी स्मानित साम पिपमान होनमा के प्रेम में ऐसौ प्रभावमा पवोपको पोम्म बनाती । यो कोरी मापुस्ता मही सम्पपिप से बाहर प्रसार को पार को त्याग प्रधान होती मी सम्वतः प्रामारी मापात्मक स्विति को प्राप्त होती है। मग्मा प्रम मातार का दौरापरण। मेला-- 'मेला कहानी की नेमा प्रेमियप में नग्मा से भी पारे।पमा लिए होमन को रोक नही पाती मा कीबह मही में है। सोलापाEि पाप से रफनो प, मुक्त पाहाण में मुक्त ७६ प्रेमचन्द विपिष्ट मारी-मानों का परिण पिण पप प्रमापा करती थी तर एक दिन बेहपन पाहणारे की नजर उस पर पी पी पौर सम्मीर के तमे रामम मे उसे रानी प में महमों में पा घोग पामी समर पापा प्रजानी रानी के परोपकाका प्रतिकार प्रया ने गिदोह के स्म में रिमा वा और मिफासित होकर परा के साथ रेप-विदेप की पाक मानते हुए भी पसमै सुधपूर्वक पांच बप यतीत किम पे-किन्तु पान तो यह सब सपना है। वहन का रार प्रासार यही है रागा कप में मारिए भी विधमान है ही पहले की प्रथा मी मिनु भार नैमा नहीं ममात में विलीन हो की है। इसलिए नहीं कि पिया' की भांति उसके प्रेम में मारता मी अपितु इसलिए हिपह प्रेम को हवयों का पर बयान सममती पी इसमिए नहीं कि वह ताप' की माठि पपने आप में पुटियाँ मनुमय करती थी पपितु इसलिए कियार रहकर इसरों की त्रुटियों को पाम्तिमय सम्माना पाहवी मी-पऔर इसलिए नहीं मिह मग्गा की मावि पिमानित प्रेम का परण करती ही मर समिए कि "भमा मुरम्मत की मौतरी पी' पर मुहम्मत म पो तर मैमा क्यों कर पती बस्तु मैमा का प्रम ऐसा प्रेम है पिसे बड़ी-बड़ी प्राचीरों में नहीं बांधा वा तक्या । इसमें पीड़ा प्रसूत एक पापकता है वो समी की सहानुभूति को मनापास ही तीच मेटी मोर साहित्य में धन परिमांकन का यही तो मानरम होता है। चमा-माप्तीय राष्टिकोण से कामनार में प्रभिम्पछ चम्बा की मेम मानना ही सर्वोत्तर बरती है। इसमें रे कान म्पति पौर मृत्यु परे पिण्वन प्रेम का विषय हुपा है । परीरापसेप होगाने पर भी पाया की पारमा पर रामनाथ की भारमा से वितम नहीं होती। चन्दा मे पर से कहा या 'पवना प्रेम करणे फिर भूत माना | किन्तु दोनों के विवाह की तैयारी के पौधन में ही परको पछेमा पाकर उसके पापा ने पाते हैं। बीस वर्ष पारा में पने के बार गरोदेत से भागने का प्रपसर मिमता । परम्त पादा तब तक मनबल प्रतीमा में प्राण साम पुषी होती है। मिडियाम में दुरकोचना की प्रारमा भान होता है। पीर पमनी प्राव किसानों को उसकी भी नाय ही मिलती है। मान भी पपिर्यों का एक मोगा पापा पौर पर बारा मनाये पए पच पर एभपड़े में निवास करता है। मा पक्षियों का बड़ा पर पीर चन्दा का मोड़ा। इसमें किसी को दि नहीं है। इस प्रकार पमा प्रेम में मृत्यु को भी गिमित करने की सामर्म है। बह ससस पीयन मर मेरना की प्रतिमूति ही रितु अपने प्रेम पर उसने पार मही पाने दो। एमका प्रम परीरातीत है। सी कारण है कि मपि पामा मधन के विशिष्ट मारी-पानों का परिष-विपर जिक प्टिस यह मायना संपयारसम्बित होमे के पारण प्रत्येक द्वारा प्राप्त महाँ । पौर सपपि यथार्य से दूर होने के कारण ऐसे प्रेम विवरण प्रमजद साहित्य में अधिक नहीं है तथापि माम्मारिममता करेण मारत मे यही मावमा सोलपट समभी बाती रही है। यह मिट्टी से उमर उठन की प्रेरणा देती है। अस्तुत' भारतीय ससति में सनर विवाह-म बाप-विवाह की मान्यता इमी मादर्भ के सहारेबड़ी की गई दी।मार की यायियी परिस्थिति-सापेम प्रेम-भावनामों wिण में पदा का प्रेम संसारक्षेप-सा बीमता हुपा भी प्यार के नाम परम को प्रसन मानों के लिए एक बीप-स्तम्भ है पर है बासमानों के भारत में पड़ी हुई मौकामों के लिए चेतावनी । प्रेमा तथा सिसिया 'कायर' कहानी की प्रेमा तया 'मोदरान' की सिमिया का परिणाप्ययन सुमना-सापेक्ष है। प्रमा का तो चित्रण ही प्रेमिका रूप में हुमा है और उभर एक परंप थिए की बननी सिनिया का परिण भी प्रेम-प्रभाम ही है। फिर भी रोगों की प्रेप-भावनामों में एक यही एव सम्बी विभावक रेसा विची दोनों का प्रम एकनिष्ठ है। 'पुरान समारोगी काया प्रेमा का 'मये विचारों के मबक कैगन से प्रेम हो बाता है। प्रेमा पौर केशब एक बिरादरी केमही है मत पिता की पोर से प्रमा को मसीति ही हाप लगती है। उपर केयर प्रत्यक्षवादी है और प्रम का पन्त विवाह में ही समझता है वैसे-ससे प्रमा, पिताजी देवर से सम्बम्प जोड़न को पसी हो पाते, पितु पार पपने परिवार में पावित प्रत्यक्षबारी एव परिस्थितिया सामना नहीं कर पाता और प्रेमा को रत्तर में जिम मेगवा है "पुरानी बातों कोम गामा । उस समय मैंने इन बाबामों कीपना नहीं की थी। परिणाम सम्म प्रेमा को पोलिय से केशर काही प्रात्म-समर्पण कर की पी पारम-हत्या करली पाती है इसके अतिरिक्त उसे कोई पम्प मार्ग नबर नहीं पाता । इस प्रकार प्रमाक परिष में एक ही प्रमुख विशेषता है-एफनिष्टवा। पर पुर प्रेमि बिना प्रम-पान के यह बीही नहीं सकती और इसमें सरह नहीं कि उसके पपावलम्बित करणान्त का कारण प्यक्ति की अपेपा समार ही अधिक है। मिस्तु उपर्युक प्पि से सिनिया का परिण पधिक महत्वपूर्ण है।
प्रेमचन मिसिष्ट मारी-पायों का चरित्रचित । एकनिपता राममें भी नमी है जितनी कि प्रेमा में 1 पर मामामाषिक परि स्थितियों से ऊपर उठी हुई है। मानसिक परावत पर माने गए प्रेम का ही पामारीपन नियहि करती है । सिमिया चमारिन है पर उसके स्म पर मोहित होकर पगित रातादीन का पूर्व मातादीन उसके प्रेम का दम भरने नयता है और फिर पोर-मीरे प्रेम की मार में सको मूटता है। कभी उने पा पासिनिया पब तक पम में दम है तुझे माहिता की तपमा । किन्तु पर सितिया का उन और मन दोनों देकर मी बप में प नहीं देना चाहता है। उसकी ममता को बह पोकीएम से मचाता पता है। तो मैं रसस काम करता है और मोरपनी से पति से नही समम्मा । पर सिमिया है कि बियररी द्वारा तिरसत तथा परिवार द्वारा प्रवाहित होने पर भी काठी पाती है मर बारुपी पर हरमाईम बनूंगी। एक बार जिसने र परमी उसी की रहमी। और मातादीन से साहपूर्वक काठी गो रस्सी सुमारे गले में पाया है उसे मास बाहो नही पोर समये । पौर में तुम पर कर कही पायी । परी परमी नीच मागी भेकिन तुम, पोरगी। इस प्रकार सिनिया में एकनिया के साथ प्रारमधम्मान काकी साम भी है। बब उसकी सची सोना ही अपने पति के घर में पानी रात को उसके पायमन पर सकती है दो पापपने अपमान के कारस निस्सा- सीहो पाती है । होरी पर मे बच्चे को बम्म देवी है रितु मरे की बात पाकिब मी मातापीन राबहिपता होने पर बी बहस से उस के प्रति प्रममाव रखती है और एक पक्षात प्रतीमा सहारे लिये पाती है। पर मातारान का पिनास मी बागता है। मा बिर-नए कर अपने बच्चे को बने मी पाता है-ब र सिनिया बात बेचने की होती है और पन्तत बापाका महामण नहीं मार ही रहमा पाहता को पपना बम पाने यही पाप्मण है बो धर्म से मुंह मोड़े बही मारो सिनिया ससे पामा कर देती है और रस के यने में बहिं रात देती है। इस प्रकार सिनिमा सय अपनी सामर्म के सहारे पर पती ।। 'प्रेमा' परिष में यहाँ एकनिष्ठया के पाप परिस्थितियों में दर पर निम को पमाप्त करने की भावमा है वही सिमिया परिष में पासमारमक म्यापार के होते ए भी पप निष्ठता ही नही अपितु वर्षों से ऊपर उठने की शक्ति विद्यमान है। सहानुभूति सानपीलवा सेवा स्याम तपा ममा उसके प्रेम पनि प्रेम पापा मम्मी भी है जो प्रारमसम्मान-लकर नही पौर प्रमा सपात भी कप्पी है वा पारमसम्मान-माहित नहीं। प्रेमा सर्वस्व निभाने प्रमचन्द के विशिष्ट नारी पामों का परिप-विमरण पर किसी को धनी देने की रया में नहीं पा पापी बिस्तु सिमिया अन्त तक देती ही पती-मेने की मावठ उसे नहीं। क्योंकि पसे पपमी बर्मदा पर विश्वास है । इस प्टि से सिनिया का परिण निकषय ही प्रेमा पर हावी सनी तथा माधवी 'सेवामार्म की तारा तपा भावापीमारी भरा की बात ही प्रम दी यो (नाटक) की नी तमा परवान को मापी प्रेमचन्द के उन मारी पार्यो में से है मो प्रादर्भाग्मुख वो है किन्तु मनोविज्ञान से बहुत मुष र बा परेसी कारण है कि इसमें एक प्रकार की मिलहवा-सी वो है पनीयता मी शिपियन है । माटक पूर्वाध के परिकार में वह सस भभारतीय पुरती स में रिषित हो विवाह को काराबास पुष्प की निप्पुरता सपा सन्दरता को जीवन पान पर बसती है । इसी दौरान अपनी सहेमी उमापति योमराज पहिरव प्रभावित होकर उसकी पोर पाए होती है मोर पसरे पपने स्वामार में मी पन्तर पाबाता है। तीन रारक मर्मपातकोतापारए उमा बम बस्ती। बनी को मय योगराया परिक मामीप्य मिमता । योगरारमी में ही समा कोश कर विवाहको या प्रष्ट करता है। नी इबा रखती हुई श्रीमती नही नहीं में तुम्हें समान में प्रदा नहीं बनाना चाहती। पत पह बोपराब को पोरर पपनी मां के पास बसी माती है। वहाँ उसे योपराम की प्रत्यापित मृत्यु का तार पिता और मोटर मेकर यह मनापती हुई बस पड़ती बही प्रमात गुममूहत म एमन (पोपराब) से मेरा विवाह होमा पी एमवार के साथ समानुपकी परिकमा करके भोक पौर मन्त्र पार। मेरे लिए प्रासर पोर हवन-कुप में कोई पम्बर नही । मुफे पति से पर हि पानीलम रतन को निमा सका परिणामसम्म मी योपराम की स्मृति से ही विवाह करोह पाती। दूसरे शो में गभापणिोता बन पाती है। किन्तु पनी के परिण का यह दिरास भस्वाभाविक है। एक दो पसके बोरन की पाम्यवाों एवं संस्था में पहनी सोम परिपन या मोग माहीमही सवा दुसरे मोमामा परिण यो इतना पसापारण नही। उसकी स्मृति की पुरिल न सरे-धीसरे नी दे दिप पार प्रेमचम रे पिपिष्ट भारोमानों का परिप-पिण से इस पार-पापा को सतत सम्भावना मी नहीं की पा सकती । बरुत पनी एक मारिपात पात्र है। पासयं पारमनिरोप रहिव नहीं है पर पर का भार भी सस्म एष पुस्तुमित नहीं है। हमें यह कहने में हिचक नहीं होनी चाहिए. (सोमिया मी इस तथ्य को वापी ) कि प्रेमपाल ममारतीय मारी-पामो को भारतीय माप की घोर उरमुख रिता कर मी उनके प्रम विषण में मटकमाते है। कोई भी पग उठावे समम समान के प्रति सप पोमिता की रमि व रमकी मेवनी पर नती है।भी पना वो यही होगा कि पहनी वा योगराम मिाह ही कर देते । सप्प सम्मा सत्ता परिष पषिक मिषसनीय हो वाता-पार प्रषिक नही तो पाठक लिए म से कम एक मुमाग का स्पस्थापम पो हो ही पाता। 'पररान' की माधवी भी कोरे पाप काही परिणाम है। हैजो गाभी परिस्पमातीत मागोमुखी ही पिस्तु मिची परिस्थितियों के पापार पर पर मी से कहीं अधिक सफल पार है। मिरबन बिसे कि बास्माररमा से हो प्रताप (प-सेवक भानापी) से प्रेम पा रही पन्या विवाहित हो जाने के पपात अपनी सैपिडा की पुषी मानी को सम योम्प पत्नी के रूप मे वेगार करती है। मापनी में बह पारम्भ से ही सेवा-सस्कार प्रति कठी है पिस परिणामसाप माषपी रप से अमरेले बामाची को पति-प में स्वीकार कर देती।पौर नागरी से साक्षात् हो पाने के उपन्त भी बह विवाह गर्ने बानती मही प्ररित पैगा मा पर अग्रसर होते पने में प्रेरणा प्रदान कर सप प्रम-पोगिनी हो जाती है। प्रकार, मापी प्रम म पारर्स का पापार नीलेकाही मपिक सापक स्याणा स की सीमा से सठा मा या दिवपनाय है। मापसी प्रेम का पाम विकास सेवा में ही समाती सिम्मी के पति में ऐमा नाम की कोई पम्त नहीं है। से मापपी पित्रण में भी प्रेमचन्द भूम कर गए और उस मन को मपनी प्रपती विमों में पहमि मुपाए भी है। मापी के परिज में पनि विभा को सेवा मार्य में बाधा कप मे ही दिया है। या प्रेमवार-पूर्व मैतिक सम्पागों का प्रभाव है बोकि उनके पारमिक रोगों रुपम्पामों में सस्टा रितसित होताt for ग्योंगयों उनकी बनी मुषा होती पर एपौरयों से प्रमाण मा पवार्य की मी प्रपिक पाचान होती गई। पही कारण है कि परमान परमात् सनकी सिी भी कृति में किसी भी प्रधान पारको मारपी-सा परिणाम नही दिया गया है।
द के विशिष्ट मारी-पात्रों का परिण-चित्रण मालती 'मोदान' के सभी पान किसी-न- किसी धर्म का प्रतिनिधित्व करते है। मिस नती भी इसका अपवार महीं है। उसके द्वारा प्रेमचन्द मे उस भापरिक परी-बग का प्रतिनिषित कराया हैबो मारी को बट-पट की बस्तु नहीं अपितु समार की सराई या पुस्प की समस्या समझता है बो यह मानकर चलता है कि जिस प्रकार पुष्प पुरुष के साप मित्र-मार से रह सकता है उसी प्रकार स्त्री-पुरप भी परस्पर पति-पली मार से ही नहीं माई-बहन ने मार से भी नहीं मित्र-मार से भी एक साप ए सकते है और बिसके मन्तर ताबास में प्राप पम्प हुमा करता है। उपयोपितावादी प्रेमचन्द ने मालती पतिरिक मामती-वर्ग के किसी भी पम्य पात्र काहीं भी प्रधान स्म से चित्रण नहीं किया है। कारण यह है कि इस प्रकार के चित्रण में व्यक्तिको पधिक उगारमे के हेतु पसके समाजोपयोपी स से दूरबाना पड़ता है पोर मह प्रेमचन्द को पसन्द नही। अम्पमा बह मामती के परिण में मोड़ माए बिना भी उसे छोड़ सके। मामती के भी अन्तर तथा बाल में सामंजस्य नहीं है। उसके परिण के प्रारम्भिकम में बहिरंग तत्वों का प्राधान्य है और उत्तराद में पाम्पंतरिक गुणों सालय प्रमय दिखते है "मानती बाहर से वितमी है भीतर से मधु मस्ती। उसके बीवन में हसीनीसी महीं है केवल मुबाकर कौन बी सकता है। पौर रिये भी तो यह कोई सुखी बीवन न होया। वह (सती है पसमिये कि उसे इसके मी पाम मिलते यह इसलिये महकती पौर विभोर करती है कि इससे उसके पत्तंम्मका पार कुप हस्सा हो जाता है। उसके दमाम पिता प्रमिन चिरने से कार हो गए ये विस पर पराब का चौक रोपमान महर्ने पौर मो इन सबका भार मामती हीको पालकरमा पाता ।मतः 'मामठी मुपासे पहर रात तक ही रहती है। उसके मपरों की मुस्काम स्पी है पौरासी को बनाए रणने के मिए ही बह पुष्प-समार में भी निम्हि एवं मबाब पति से मती एती है अपने बहिरम में मम्वर को वाती बमवी है। मातता परिष प्रारम्भिक प्रयया बहिरंग पत्र में ये समी पिपेपताएँ है जो एक मुक मारी में होती है। पमिपारिपी पर कापि मही उसने इम्र में गटरी पास की पत रसके परीर प्रसाधन सी र म पये हए है। पी एड़ी का रवा वामीमारिपम्प पार-सामीतिरिक गात मी कोमन : विधर्म चपलता दूट-बूटकर भरी हुई है।मारी-मुमन मया ८२ प्रेमचम रे विशिष्ट नारी-मानों का परिण-चित्रण । का माम निणन मही नुते बागार में सुनाती है "मने प्रतिज्ञा को किसी मिासकर से भारी कमी। बता की पाकपटु भी है बन्ना की नगाम बीच सकती है तो मेहता को उभार भी सकती है। प्रामोद-प्रमोर में मस्त पती है संपारकर्मोकारलाप को सराब पिलाकर मह रस्मू पनाती है कि पानीवन मार थे। "पुरप-मनोविज्ञान की पम्ही जानकार होने का दावा भी करती बम्ना की मुटियों से प्रायदा उठाती है तो मेहता के पौम्पमुक्त गुणों पर रीम भी पाती है सिर मे विश्वास नही किम्त सबने के भय से भापगमों में यार भी कर मती है। प्रवर्मन की कमा में भी निपुण । पुस्तकों का पम्पयम विप नहीं है किन्तु बात करती है तो ऐसे से बचपन में ही मिपमाविपरल या हो । मबसरवारिता का महत्व देती है सरकार की बाटु परी करके भी परि उमरठाबा समठामो सम्पादक ोकारमाप को समाहरेती इसमें कोई नही है। सर्प पिडाम्तों के प्रति विभकतर किम राबा यह है कि सिमान्तवाहिनी पौर या भी कि 'नो पक्ति धर्म पार पचन में सामंचस्प नहीं रख सकता बह पोर पारे बो गुम हो सिमान्तमापी नहीं है।" गोविश्वामारिनी भी परमे की है "पत बन से विप प्रम रखती है" पुलाम में पाना चाहती "मगर झी पास मिम पाय तोबिस किसी से भी स्वार्प सप सरवास ही पपमा समस्तीपौर इस भावना का स्पष्टीकरण इस प्रकार करती है कि "मैं मानवठाबार कीया नही कर सकती। यह पायेंगे तो मैं पुएरागी नही। साधारण बीपम में कभी क्या करना पीना मी पत्त मेहण से प्रम भी करती है तो उसमे प्पिा को छिपा नहीं पाती भीम मुमती के प्रति इसीलिये उपेया का रष्टिकोण रखती है कि महवा से सराहनीय समझते । विवाह उसकी प्टि से उत्तम पौर घोपा पार्षद पारमा की तृप्ति मही यही कारण है कि मेहता उसके साथ निक्षिप्त रहने का ही पायास करते हैं। संक्षेपत प्रेमचन्द के प्रमों में भाप नायुप की सामात प्रविमा है। किन्तु मरपुणीम ही पही मारिए महीं तक सीमित होकर पह माये-पह प्रमषन को माग्य नही। प्रतः बह मामती को मेहता से मापर्मवादी नारी-अपराक की भोर माक्रप्ट करते। मेहका प्रम में मार मामली में पत्रीका का पहला रही मामती की परिभामिम्पत्तिमा तय है। मेहता मे उसे पाने-पी प्रमाण प्रेम ही गाठापौर पर प्रेम-सप ही सही मुप्तानुभूतियों को बारव करके जीवन के माम्भीर्य की पोर प्ररित परखा। मामती समम बाती है कि माह हीदि प्रपने पहले वर्षों में भी मा परिवार प्रति प्रपना तम्म निभाती प्रेमचन्द के विशिय नारी-पात्रों का परिष-विपण यही है किन्तु उस पतम्प माप में सरंक फिसलने की भाषा है। पत बह अपनी इच्छामों को सीमित क्या स्वयं को अधिक मास्म-निर्मर एवं सम्पूर्ण रखने का प्रपल करती है। मना को कौतूहल होता है "पर मानती अपने हाप से पाना बनाने मपी है।" पुरष-समान में निषि पति से सौ प्रबमा नहीं पाती बम्ना का मुंह महीनों मुरार बाते मानती रिसने दया करना सीवा ही नहीं पाएमय पातु है पौर या तपा सहानुभूति से मौ परिपित। मेहता के एक मेम्प-बाप को सुनते ही उसके गौमू नक माते पापामधासा के लिए बह पांच सौ रूपये का दाम भी रेती।बह पपम्पय को दुरा समझती है किन्तु बन प्रेम पड़ा। इस सत्य पर मी पर से पूर्ण विलास पहना से निर्धाक्वापूर्वक करती है "यह समझ मो किचन में मानक किसी मारीय पर बियप नहीं पाई और न कभी पायेगा। पोषस्य के स्थान पर एक दिनमता भी उसमें पापई है। इन्होंने (मेहता में) मार-मारकर ख बना रिया इनका हम कैसे टाम सक्ती"-इसमें एक मप्रवा एष पावर की भावना निहित है। मेहता के समई में मार मानती की रयान या सेवा की भारमार्य भी बाग उठती है। मेहता पाम सुधारक है 'सेगा ही पर मनका सार्प होती पाती पी मौर उनकी इस नापत्ति का असर पशात मसे मामती पर भी पड़ता पाता था। अब तक जितने म उसे मिमे सबने उसकी दिमास-वृत्ति ही को उकसाया ! उसकी त्यागवृत्ति रिन-दिन पीए होती बाठोपी पर मेहता के संसर्म में पाकर ससकी स्याग भावना मुबप हो पठी पी। समी ममस्त्री प्राणियों में यह भावना बिपी पती है मौर प्रकाश पाकर चमक उठली है। भारमी मगर बन या नाम के पीपे पाई तो समझ मोसमी तक यह किसी परिणत मात्मा के सम्पर्क में महीं माया। मालती पर प्रामीण मुपार में मेहता को सहयोग देती है और गरीबों पर बिना भीम निपेही मरोगेको रेबने पनी पाती। सामाभिक समस्यामों पर सोपरिचार करने की महापारण क्षमता भी रसमें मा पा है। यह कोई पूर्वाग्रह मैकर महीपमती-पुरप मिसीह माना दिम है दो ही मावापों का बेटा। क्यों माता पुत्र को ऐसी शिक्षा नहीं परीकियह माता की स्त्री-नाति की पूजा करता? मामठी में बालस्य का हल्प-सा पुर मी तब मिमता है जब हमापी रात को मपने नौकर पोपट करनेको गुमराती है। इसके माय हीरतको प्रेम-भावना मी महत्वपूर्ण है प्रेप का मून परम पियाम मे मानतोला प्रबस विश्वास है निप्रति प्रेम में परीगा की पी लामोपोंगो भरना ।
४ प्रेमबन पिपिए नारीमानों का परिण-चित्रण तुम परीक यह देखती है कि जिस मेहता के प्रति दह मना का भाव रखती ही पस के सार पति प्रश्न पठाता है ता पर मान करती हुई पाती या तुम इतना मी नहीं बानते कि नारी परीक्षा नहीं पाइती प्रेम पाहती है। परीक्षा गुर्गों को प्रवमुण मुन्दर को पसुन्दर बनाने वामी चीर है प्रेम प्रयासों को गुस बनाता प्रमुम्बर को मुन्दर । मने तुमसे प्रेम किया में कस्पना ही मही कर सकती कि तुम में कोई बुपा भी है, मगर तुमने मेरी परीक्षा की मार तुम मुझे पस्विर-संचन पौर पाने क्या-क्या समझार मुमसे हमेशा र भापते हे प्रेम रह की वस्तु नही पात्मा की मस्तु है । वह का यहां परा मी स्थान नहीं पार हिंसा (प्रतिद्वन्दी को रेकर प्रेमपाल की) वो सह का ही परिणाम है। यह सम्मुख पात्मसमर्पण है। उनके मन्दिर में बनकर नही उपासक बनकर ही बरवाम पा सकते हो।" इस प्रकार बरसे विश्वास हो पाता है कि मेला की प्टि परीक्षा की। वो उसका मा एवं मात्मसम्मान बात हो उठो है। 'भार मेहता ने बैंस उसे ठुकरा कर पसकी पात्म-पक्ति को बना दिया। उसके मन में पामोहन बसता एवा है पौर मा मन्तत यही निरषय रखी है कि "मित्र बनकर रहना सी पुस्प बनकर रहने से कहीं सुधार है। पौर वह मेहता से पात्रह करती है कि मेरा-मार्म ही प्रयतम मार्य है प्रत बह उसका पपरर्स मिड बनकर ही उस पर पर बरता बने । मेहवा उत परणों पर पिर पड़ता है पोर पन्त रोनों पानिमनपर हसर से पधाम एने की सपम मेते है। इस प्रकार एक मिनासिनी से उठाकर मामती को समाप-सेविकाका म रिमा पमा है। मेमनर के पुराने पाक को इसमें कुछ भी पसाभाविक नहीं ममता क्योंकि यह इसका विरकाम से पम्पस्त हो पुश होता है और प्रेमपर मी मानकर चलते कि यह परिवर्तन अप्रत्यापित मही होता । हमें इस विपप में फुध नहीं करना है किन्तु श्वना भवस्य है कि मेहता के मुख से मिस निवृत्तिमा पा प्रवृत्तिमा के सामरस्प–मेपामार्ग-की पात फहमान हैरोनोमिन-मान से उसका सर्पशाम म सप्र महीं होता। वस्तुत मानती चरित-माप्पम से प्रेमचन ने नारी उस भावनिकतम प को प्रस्तुत किया है पिसका पंकन परपर्य पम्पास-साहिल मे मनोविज्ञान ही पार मेकर पुष्यों के मिस्सेपण म में पहुंचता से हा है। यह तो मेक है कि एक तिवमी-वृत्ति की नाऐ भी मुसंगतियस बीपन की मम्मीरवा में उतर सकती! मितु यह प्रेमी से पति नहीं अपितु प्राचीवन मित्र स्म में ही पातिमन-पट होकर रह पाये--यह भारत भूमि पर निवित अमान-सापेक्ष प्रेमचन्द विशिष्ट मारी-पात्रों का परिण चित्रण ८१ सत्साहिलय का सस्थ मा म्पावहारिक दृष्टिकोण कापि नहीं है ।पस्तुत मामती पौर कायास की मौमी एक ही प्रेम-समस्या के दो प्रात्पन्तिकोर है जिनमें एक भारतीय इसरा प्रभाप्तीय । सामाविष्ठा की नबर से दोनों को ही अपनाना कठिन है। यहां तक परिष चित्रण की कला का प्रश्न गोदान' केसम्म पामों दीदी भौति मानवी चित्रण में मी प्रेमवाद को प्रसापारस समता मिली है। एमष्टि परिण की पपेक्षा यह स्पष्टि परिण ही पषिक है। (म) परिपीता स्प सुमित्रा मेमचम्मकी नारी-बापना या परिष चित्रण की ष्टि से 'प्रतिमा की सुमित्रा का महत्व रतमा अधिक नहीं है बितना कि हिन्दी उपन्यास में परिण रिफास की परम्परा की प्टि से । ऐतिहासिक प्टिमा पपने मका सर्वप्रथम परिणबो किसी मांति भी 'सेवासदन' की सुमन पारि से पौण मही। तो भी इस पीप में उसे गमत समझ मने का विधा मया पठा है और विपक्ष उसे पुस्प-समाम के प्रति विशोही पात्र समझकर बहुत से नों हारा प्रत्यापित मान रिया भी गया है। ऐसा हम तपी समझते है पर उसके वास्तविक परिणरे साप चिपकाये मए दो-बार सिहोलापों को सस्प मानकर माम महार, मारम-सम्मान गिोह पचा विचार पोर कम के परस्सर सम्बम्ब को सूरमाप्टि से नहीं परहते। मुमिका एक पिता है मान-शपिता । मान ही उसके चरित्र की साचित सबम वृत्ति है। रीतिकामीन नायिका हो मस्तित्व के पमित होने पर भी पारीरिक सुर मोप छ पति पर पासक्त पती पी किन्तु प्रेमचन्द की मुमिमा पुप बैठने पामी नही है। उसके मान का गितमा ही विकार होता है मारना हो प्रषित मान करती है। उसका विस्वास है कि यदि पति उसके प्रतिकार तो यह मौ क्यों किसी के प्रमुगम बसे । वह पूर्णा से काती है "कन महाग रात पर गाया ऐ समझो हरि मनाने पाती होगी। पैरी बना पाती। मने पादर से द्वार पर निये"। उसका पति रिस है किन्तु यह भाभर से रिला रिसादर करती है। एक पोर हो पर पूर्ण मे कहती है "अपर मुझे कही मापय सेवा तो इस पर में पण भर भी न वी और दूसरी भोर पर कममा (पति) उसे पिठापर पनी गगने को करता है तो गा मामपूपमती "मेरारी हाँसे पौर प्रेमवर बिमिट नारी-पानों का परिम-विषy कही मही मा पाठी। पति अपनी प्रावत के अनुसार सिएम है पूर्वा भी रोपी होती है किन्तु दबर पुमिमा हारमोनियम पर पाती हुई दीखती है। पौर से सही नही रिस्पास हो पाता है कि कममा विषा पूर्ण पर प्रासत है पोर सही पूर्णमेस प्रबहेमना कर रहा है तो गहरुममा की तनिक भी परवाह करना मोर देती है। इस प्रकार मुपित्रा एक पूर्व मानवठी है। उसके इस भाषरण को देशभर प्रेमचम्प सियत है रमशीन मान प्रमेय है पर मनात है किन्तु सो पाकिरपली का मान नही अपितु उसका परलीत्व अमर है पसम सप्तनिहित प्रेम की प्यास पनन्त हा करने का तात्पर्य या कि सुमित्रा की मनोष्टि को गनने वाला सबसे प्रबम पत्त उसका पयतुष्ट पत्नील है। यह पहाड मध्यवतीय होती मी माषिक स्तर की दृष्टि से एक रनवीय स्नी है। रति मा पीहर दोनों मोर से सपे एन-सहन की किसी भी सामग्री का प्रभाष नहीं । प्रत पास संपर्प नाम की कोई वस्तु पर पीवन में नहीं है। ऐसी पयस्मा में पौर मी सामारिक हैहि पति प्यार की इस पत्रिक तीव्र हो fog पसे बह प्यार मितता ही नहीं। कममा बार-बार बजे तक रात को नौटवा नहीं है। मुमिना समझती है "मेरा विवाह वो महन माह पूर्ण सेवी है "मुझे पो पा रोना है कि सरप ही नही । कमरे में पाते है वो पहली पात कोमके मह निकलती है कि अभी तक पती पदों नही युवा पनि एक पम की भाषमा पौरे-धीरे पसरे मन में तीपतर होती पाती है। उसका मान बोगा उगम पारस कणा है। इतना दल पर भी पर पति रस को पाने के लिए नित्य नये-नरे रिपार पठी। पा पति को पसकी परवाह मही होवो मर मरमान प्रावस्म को रखती हुई मी भीतर से उस समी कार्यों को इंकित प्टि खती है। कममारो सादिया माता है एक पूर्ण के लिए, एक रसके लिए । पति की प्रमापतिको तापकर बनती है दोनों साड़ियों को रखकर माथे पर पानी में देती है। वह पूर्णा से पुरषों द्वारा स्थिपों पर किये गए युपमान्तरों के प्रत्या पा के प्रति रिमोग प्रकट करती हुई पपने पाप को एक शिदिखी श्री बताती है कि मास्तरिम्ता मह र मान का महरा सौम भरवी हानी पति-यूम के साये में विमाम : विए मसाठी ही पडती है । "सारे बिने पौर पिक भूमते पाते पर अभी तक मान का बबन नहीं टूटा था--मली काय पपनी पपनस स्पोमानकर समता पा। यह कममा को मनाने के लिए एक स उचो द्वारा बातो पीतु मान सा पसरा संपोष 50 प्रेमपन बिसिष्ट मारी-पानों का परिवरिण गरण भोवर कदम नहीं रह पाती। इतने में परिस्थिति और भी दिया पाती है। पूसा पर मसा का प्रेम रसे मात हो पाता है। प्रताप पौर भी मभिक मेम से पति का प्रतिकार करती है। दूसरी भोर पर पूर्ण पर से गाने गती तो बह से रोकतो भी नहीं। निश्चित म्प से उसके मन में यही विचार होता है सम्परत ऐसा हो जाने से पति प्टि उसकी भोर पापित हो पाये । मन्तवमा उसम पति ठोकर चाकर और मार्ग पर मापाता tो मह बसको परण पार से स्वास्प हो पाती है। इस प्रकार हम देखते सुमिमा परिम में मह वपा पलीव का संपर्प विधमान ! fतु नसका मान पति पपीकरण का मष मार ही है। उसके परिध मे भान की अपेमा पासे पलोल का प्रामस्प है। मामसम्मान कोपरम सीमा को उसका मान स्पर्श नहीं कर पाया है । स्पष्ट प्रमों में उसका पात्मसम्मान प्रपना माई मान मात्र बनकर रह गया है। वह पम्प है पितु सनम मही। प्रेमामम' की विचारती पौर निर्ममा' की सुमा- इसके चतरमा पठम म। पाली-क्स में भूमिका की निगोहिसी मुमित्रा माम से भी पर्वा की माती है। निषय ही इस सम्प की अभिक्ति 'प्रतिमा में पूर्ण से बह प्रपती है "माखिर पुरप अपनी स्मी पर पोखना और मावा है? बहन उप तुम्हारी समझ में पाता है "पूर्ण उत्तर देती है कि पुरप ने ली की पर रक्षा को फिर रोय पोपमाये। इस पर मुभिषा की "सा को वो पपने स्मार्य से पसलिये मही किस्मियों के प्रति सनद भार पा मार। मपनी पामार के लिए उन्हें सम्तान की बात म होती तो कोई स्त्री की बात भी न पूवार यह भी कही मग तो तर पाये पबाकी बाहेनी सपियों का ऐल मेने न।" माही भी कहीर 'पपर मां पपने परिपार भरको विमा सस्ता है तो या ती अपनी माई भपमा पेट भी नही भर सकती।" किस्तुपावत यह सब कहती ही पती है काठी कुल भी नहीं । पसके परिष में मामिक हाइस नहीं है उसमें पिचार पार पहारा पम्प है। ऐसा भपता है मानो वह किमी मुपारवादी की रस्तृवा को निगम माहो पर पूसा सामने मामा से मिलकर फें रही हो। यह पर पति है यह कारती हिमपात मे माफर पाप हो पाया पहीना सेपी पोका मारा बह पर्मी होती इनो पितृपक्ष से पचास रुपये मासिकप में पसे मिमती है। ऐसा म होता वो मपने रिद्रोही सप को उसने नियान्वित पर सिरिया होता। किन्तु ८८ प्रमषद विशिष्ट नारी-मानों का परिणविपण पर तो से पन्त में पुजामी पति का भी साप करने को बड़ी सती है पब ठीक हो गए । पनामी ईमो क्या पर ठीक रास्त पर मा पय । प्रा तो वो कुछ है में है 'स सुमित्रा की परितृप्ति के लिए तो इतना ही पर्याप्त है। विचार पार पबहार में साम्य पान पर उसमे एक वीर बोहमा सा मचीलापन रिचमान पो उसके परिण को पलटा मौर सस्ता बना देते है। कभी पति को पदी है ऐसे बोमा मप नही करते ," मी लम्पट भी पूर्व पार कभी क्या नही। वस्तुस परिष विषण की दृष्टि से प्रेमवार यहाँ गत सपन नही । तिस पर पी श्री हंसराब 'इबर नियते है मुमिमा वो मी-पात -सन पर बी परिस्थिठियों पपातों पौर विपत्तियों परसे मुस्करा पीरपया की मुहवाम नही है उसकी चाई का नसूना तो हम देख ही पुरेपहाँ तक मा की मुरसान होने का प्रण है माना ही नहीं कि भाषीगन बोध भी उसने रिया पति की या प्राप्ति हेतु ही स्मिा पपितु मा मिसकी भी सहानुभूति पती उसी से दवा को मीस मापती। मिस पिन पूजा उसके घर में भाई उस रिल 'सुमित्रा पूर्ण से बनती पी चिन्तु मममे ही दिन या रो रोकर बापना करती है स पर मै मेरा कोई अपना मही हैरान परपाती पड़ी ! मेरे भरमे बीने की किसी को परवाह नहीं है । तुमसे मही प्रार्थना कि मुझ पर ा रखना। इस ष्टि से तो 'कुसुम' कहानी को मुम पुमिता से कहीं पनि हो स्थत पूर्ण पराकम पर बड़ी है। निमर्पत सुमित्रा परिण को तीन प्ठियों से प्राका मा समता ।। पहनी प्टि परिषरमण की। इस एप्टि से यह एक निफिस परियो काम मरण ही सक्ता बरस मही पत प्रारम्भिक प्रयास मात्र है। दूसरी इपिट प्रमषम की नारीमावना को। प्रमचन्द मारी को त्याप सेना भारम मम्मान सहनमीलवा तमा समर्पण प्रारि गुणों से समन्वित मानते है। त्याम नाम की वस्तु का मेरा मी सुमित्रा में नहीं है-पिता आप मैने मए मासिक पचास रपयो का बाम मात्र ही करते पना प्यार नहीं कहलाता पूर्ण को पर वार सम प्रमहाम रिमा को बह प्रपनी पार पति में अंबा नठाती तो मिाषप ही पन हो पाती। सेवा की बात को मा कि मास तक को बह पिकाती पती। फिर पति की सेना रातग्मा पर माना दो टपो बात है। सहनशीलता भी उसमें नही , सहनीन म्पति को मुंह में पा पायै बर नहीं रेते । समयमा प्रर्द होता है में है मोर महिर कुरा सम्म । एमा भी कोई शिपाम मिना को नहीं .
प्रेमचन्द कबिगिष्ट मारी-पानों का परिण-चित्रण । है। इस प्रकार मे-देकर पची पती है प्रात्म-सम्मान की मारमा । एक दो यह भावना म्पत्ति-सीमित होने के नाते से भी पेप सभी से गौण बाती है दुसरे सुमिमा परिण में पापी पान पपणा पा के एक सौमित्त प्रकार तक हो पपई। और फिर एक तत्तका सफल मिपण तो प्रेमचम कहानी में गत ही सुन्दर रंग से क है। किसी कहानी का विषय बनकर सम्मवत सुमिना भधिक निबर गई होती। प्रत प्रेमचन्द की मारी-मावना पीष्टि से भी मुमिमा एक प्रपूर्ण परिण है। पीसरी हप्टि ऐतिहासिक महत्व की। इस पिट से मिाथ ही सुमित्रा हिन्दी-उपम्पास की महान उपसम्पिों में से एक है। पाप ही प्रेमपार की विकास यात्रा के प्रथम समस्यामा परण होने के कारण भी भुमिका का परिण मात्वपूर्ण है। सुमन मुमन प्रेमचन्द की एक ऐसी परिष-मुष्टि । रिसको सामयिक प्रसिदि वो बहुत मिनी दिस्तु मिसको पावृत्ति उनके साहित्य में नही। इसका कारण सम्मबाट यही है कि पासपन' पर पूर्व प्रेमान नैतिक सपन्यासों सपा 'सरपार पारिग उपम्पास मेसों का प्रपा का मप्रत्पम रूप से मनार रिपमान है। म्यों माँ प्रेमपाकी मारी के प्रति मिनी वारणा स्पिर होती गई स्यों-स्पोपा उसके धास्मत मूल्यों की भोर मारप्ट होवे पए। बेश्या समस्या को समान एक-दो कहानियों को पोरकर, पुन नहीं समाए । यहाँ प्रसपरपरिषण किया भी यहाँ यह रसकी विकृतियों के कारणों में म रमम कर उसके मुबारोमुखी पो ही प्राधान्य देते रहे। रेगन मुमन हो एक ऐसा परिण है निसके माध्यम से इस समस्या पर पगति मुनी प्टि गयो । पौर मध्यवर्गीय नारी की पहेलना के परिस्थिति-सापेभ पुपरिणामों का निर्यान भी दिया है। साप ही अपनी मारी मारना के मादी पिस्म के मानक भी नुमन की परिम-मरिस्पति में से निर्धारित कर लिए है। लहप्टिपों से मुपन का माल पाते की सभी परिणीतामों की अपेक्षा अधिक है। मेमा की समस्या को चोर मनोरमा में भी पा पठी सुमित्रा की समस्या रिपावती में समा बा सकती है किन्तु मुमन को मुमन मे पाहर पामर एमा प्रसम्मरसा हो जाता है। मुमन परिण क पप्याद्रीन पर-सरकारपर मारी-सनिमय मारीनप तपा प्रादय नारी-स्म । प्रेमचन्द ने इन दोनों कामयः एमरे से स्फुरण दिखाया।
प्रेमपन विशिष्ट मारा-पापों का परिपत्रण संस्कारपर भारीनप के अन्तर्गत मुमन के परिष का बह पप प्रावा जिसकी निमिति पिता के पर में ही हो की होती है और जिसमें प्रापर हो घर वा पति पर माती है। पत्नी रप में उसे अपने पहले के संस्कारों के रुपमा विपरीत विषम परिस्पितियों का सामना करना पड़ता है किन्तु संस्कार गत भौतिकाम्यापो को कोई समुक्ति मोर न दे पाने की असमर्थता में यह एक गित मार्ग पर बढ़ जाती है। रोपाहणषद की बड़ी महकी सुमन कौमार्यावस्था मे हो"सरों से बरफर रहना चाहती थी। परिवागार से दोनों बहनों की एकही प्रकार की साडियो प्रावी पी वो सुमन मुह फुला मेवी पी । पाता (पोरी माकी) को वो कुछ मिन बाता पसी मे प्रसन्न एवी पी। उबर रारोगा बी भी किफायत-गुमार नहीं थे। इन सपियों को प्राए से भी अधिक प्यार करते थे । पनके लिए प्रदे-म-पच्छे कपड़े बाते मार पार से नित्य तरह-तप की पौर मपाया करते। बागार में कोई तरहबार कपड़ा रेत कर उनका भी महीं मानता वा मात्रियों के लिए प्रयत्व मे पारे कोई सूट के बन पर भी इस भांति न टूटता होपा । सहकियों को पढ़ाने पर सीना-पिरोना सिखाने के लिये उन्होने एक ईसाई मेडी रण मीभी'--यह मुमान का भारम्भिक परिवेश विसका प्रभाव पम पर सर्वाधिक पाता है। विवाह के पूर्व ही या "पुनरम पार पभिमानिनी' 1 परत की भारत भी उसमें है। पूरे में फूंक मारला उसने कमी नही पीसा पास्थी का वास्तविक पर्व पपने कमी नहीं समान । पाएमा प्रषा वर्म नाम की कोई पस्तु पये बात नही है। उसमें इमामा-दीनवामों का प्राधान्य सुख-भोग ही उसके लिए पीपन-पर्यस्त है । सामाषिक है कि ऐसी पुरवी पम्पन समु राम में भी पति को पीवन-सर्वस्व मानकर नहीं चल सकती किन्तु मुमम का तो विवाह भी होता है तो एक पन्द्रह मरे मासिक पाने पाते गुहार पाडू पगापर प्रसाद पर उसके पिता विपत मेनपपाष मे कारावास में बनाकर सहनि रपा नही पा फिर पम्बर की प्राप्ति से सम्भव पी। छनोन तो पो पर पुना हुमा का वह मुबरामीम पौर मुगिनित" पा-"पपा पौर बनी भी। पर पर सुमन के मामा एमालाब में पह पानवे भी कि मुमन क्सिनी म्पपती पौर पी-मिची बोप से बार पपावर रप में मान विधा मुण पोरस की पोर से प्रार्थ बन करके मम पुतीमा ही को पत्रमा मुमन ही माता मार को बकर गात पेई से ऐसा सपा मानो सुमन को सिी पुएं में फेत दिया। मगार पर में मार को प्राली भी नहीं एक सीमा पी ११ प्रेमचन्द के विशिष्ट मारी-मानों का परिवर्तवमा मुमम के पाते ही पम बसती है। घर के पास से घोड़ों की मुगर होती एवी है येस्याओं के मकान भी घर के सामने ही है और पास-पड़ोस की स्त्रियां मी ममी-की-समी निम्मवीय है।--ऐसा है सुमन की ससुराम का परिपेशा। परिणामस्वस्प यह अपने संस्कारों को परम नही पाती है। उसने पहिरपी बनमे की नहीं इन्द्रियों के मानम भोम की पिक्षा पाईपी पद पलीके म्स में ए पूर्णत प्रसफम है। यह प्रयास में सफर म होने के कारण महीने के पाले में ही पैसे सब हो बाते है मई सादियां तवा माभूपों पारि की प्राप्ति भी उसके लिए सम्भव मही एती। पर हो हो महीने के उपरान्त उसे पति से वितृप्पा-सी हो जाती है। उसका पय मसन्तोष से पाहुन हने" ममता है। सुबप्राप्ति की उसकी तृप्पा पुट-घुट कर उबमने नपती है। सामने मन की भोली माम की बेश्या के ऐश्वर्ममय बीवन को रेष कर उसकी पोर पाङ्गप्प होती है। बिहा रस भोपने + लिए पति से कपट को बह पाने हीपरले मम पड़ीबी प्रब सौन्दर्य-रस की मतृप्ति भी मार्ग पा माती है । पर के सामने से मुरारमे माने ग्रोहरों को पिक की पार से ही एक ममा रिता देती है। उसे स्वयं अपनी दृषियों की उत्तेजना के पर एक बार मोड़ा-सावेद भी होता है और यह मेगा स्नान पारि के पार मरों द्वारा अपनी पार्मिक वृत्ति को बनाने का मसफल प्रयल भी करती है। पर पा संसारों मामे पुन पर बाती है। पूठी पान-गौरत उसे पुन प्रापट कती है। यह रेखती है कि भोमी उससे कहीं अधिक सुबी है समान प्रापक स्थान पर उसका पारर होता है यो-यो मोपों की पन एसकी रार में विध माती 1- 'मुम्से दो गया भोली ही भाग्यपामिनी है। वह भोली की मोर पौर मी पाए होती है। इसका मवसर भी उसे मिस बाता है पर एक रात पपनी नई सहनी मुमारे पर से भोनी का माप रेबार रात को विसम्म से मौरती मौर मगार रसेपर से मिकाम देता है। यह मपने मान के कारण ममा तक नहीं मानती मोर बर मुगा समार सुबा रक पनि ही उसकी पोर से उपेक्षा प्रष्ट करते तो मुमन मोती के बार पर पावही होती है यादेपा बन पाती है। यही है मुमन परिण का पलीमप। इस प्रकार स्पष्ट हो पाता है कि उसके मम्प में निजीपतिस निमकी विशेषताओं की मपेक्षा प्रामाम्य है बाह परिस्थितियों का पली रूप में यह पूर्णव असफल है। स्वास सेवा प्रेम पारम-मंचन मारि किमी भी जीवन के बाबत मूल्यों की पेया रसमें काम पार पर्ष की दीरता का ही मान्य है। धर्म के संरमणामार में उसकी ये दोनों वृत्तियां ही मिलन - ૧૨ प्रेमघर के विषिष्ट नारीमा का परिणपिपरा तमा मस्पस्प होकर पतिमादिवा का पाप पाती। इस रूप में इसकी विरा पताएँ-पोगसिप्सा सौंपाभिमान परिस्म मिम्मा-मार प्ररमन प्रस म्सोप तवा परमप्सा । पर्यहीन पति-पम उसकी प्टि में प्रेम की मंशा को प्राप्त महीं हो सस्वा पा उससे समयता करने की बात नही रोचती। सकारों ने बहुत पुरी तरह से पका स्वा हा ससे । मुमन के परिण का इसप परण है उसका पित मारी-प प्रपति रेया रूप। इस स्म महोप माता पीर बीयर पपा का पामास होता। पति के साथ उसका बीपन अपार रहित नौका के समान' गेमा करवा या किन्तु भव मात्र है। इसे बीवन को पोड़ी मार्ग से रेसने पौर सोचने का पबसर मिमता है और साब-ही-पाप मार बोलसेपन का साक्षात्कार भी होता है। यह यह ममी मौतिक सेती tf जितना पार मैप पर होगा पसरा सा भी हम नही होता था। एक बार में पेठ रिम्मममानहापुरारे में भूना रेहने पर भी सारी रात बाहर की पीरी पी चिो मे मोवर नही पाने रिया मेकित का उसी ठाकुर पारे में मेरा पाना पा तो ऐसा पान परतापा मार्नो मेरे चरणों से मह मस्बिर पवित्र हो गया। किन्तु साप ही-माद महमा भी समझ पाती है कि भोमनिप्सा ही बोपन सर्वस्व नही है। अभी तक के सम्पर्क में कोई भी मना ममुप्प मही पापा पा पर यहाँ पापार विसरात के रूप में एक सन्चे समाज सुधारक से उसका साक्षात्कार होता है। 'सुमन ने मार किसी से ऐसी बाते न सुनी पीनियों सुधको अपने पापरको बीवन प्रमुम्प रेस्प समझती थी। पान माम मा कि मुन सन्ताप से प्राप्त होता है मोर पार सेवा से। पारिनराए से कहती है 'म सुर मार मार दोनों होको बोर सकती है, पर बीवन-निर्वाह करतोष पाय करना ही पोमा । उसका प्यान पर वास्तविक गार्हस्प्प पाम्ति की भोर भी जाता है। प्रेमचन्द के पमों में "यापक प्रकार की चेतावमा होतीमो मारमा की पोर में मोग विमास में लिप्त मन को मिलती है। यह पायाभूति को तृष्णा-सापर कर है। "यहाँ पा जो प्रत्येपासोपती या माता कौर कोई पपने पन का बाम विधाता है कोई अपनी पिकनी परी पातों का। उनके इस मावसम्म पुष और मोशेषन से मरे हुए होते हैं। परिणामस्वरूप यह अपने मापार केरों को सरा-सरा + मिए बम्द कर देती है रसीवए पिस उपबह पतिनार को सपने लिए पाई दी। इस प्रकार मुमन के बीवन के इस दूसरे चरण में मानव-पोवन की सार्थकता की पोर रिमाया प्रमचम्म के विशिष्ट नाप-मानों का परितविपण गरी प्टि विधमान है। यह समझने लगती है कि सुत्र से यहा सन्तोप है पौर भार में प्रेष्ठ मेगा । इस धाम ही पेस्या-म में ही उसे एए प्राय सत्य की उपलम्पि भी होती है। प्रम 1 सबन माम मा पुषक उसके कोठे पर पापा का पा'सुपन इस समय सहन के प्रेम-बाम में सीधी। प्रेम का पामत से कमी नहीं प्राप्त हुमा बा । दुर्तभ रन को पाकर एसे एप से नहीं माने ऐना राइली श्री" विस्तु राममणी का माप करते हुए उसे मोबन में पहली बार पामास होता है कि प्यार केवल परीर का विषय ही नहीं। पपितु ससका मापार हो त्याप होता है। मह सोचती है कि वैसे अपने हाम से एक सरत हरप पुषक का बीवन नष्ट कर साप ही यह भी विचार पटता सिकिन सदन को कैसे मुनापो। पौर पन्तत बह पही निएचय करती है किस्साई पर भाषारित स्मार्पण से मुख प्रेम की पपेसा रसकी स्पागापित बेदनामयी स्मृति कही पषिक भयस्कर है। इस प्रकार हम मते कि सुमन के चरित्र का पहला परण परि मनाम का मिप्पा की स्थिति है तो दूसरे में ससे उसका प्राभास हो पाता है और उसकी प्टि अपने ही अनुमगों के पानोक में बीवन पावत मूस्यों पर केन्द्रिव हो पाती है। प्रमबस यही यह मान कर पमे कि "पिस वह परमर पाकर मनुप्प को पाप-बटा भारत हो पाती है उसी प्रकार मबसर पाकर उसकी धर्म पेप्टा भी बाप्त हो पाती है।" मुमन के बीवन- विस का तीसरा तपा पन्तिम चरण है उसका पाद मारी-रप-पासपपीकर सेवासरन तक की मारा। "भग बदपिपपायम में एवी पर सब उससे प्रसनरसको कर्म-निप्य रेकार सोग पति हो पाते हैं। इसम में पस परिष की सबसे पानी पिपता है उसकी बर्म निप्छ । पेग गंगा स्नान कोबादी पार उसके पति पवापर सम्वों में बह पर एक विशुपी माकर्तप्प का काम होने पर मुमन के मन में तीन पापाताप की भावना का उपय होता है। यह भपनी ही रष्टिम पर पिघाधिमी मानूम होती पी। विस प्रकार कोई रोपी सोपेफाम नेने के परबाद होप में मार अपने पोरे पोो के गहरे पार देखता है मार पीग तपा भप से फिर मूदित हो जाता ही गया इस समय मुमन की पी। परषा वाप मार में यह प्रारमहस्पा तक का प्रपल पी फितु पंवार पर महारमा पगापर प्रसार के साक्षात्कार से पहले पीवन में सेवा का मूमपाए होता है। बस्तुत सेवा भावना ही मुमन के इस मानवी रूप का मून तय है। "पर न तुम मपने मिए पीती बी पर दूसरों के लिए गियो"-मयाबरका प्रेमबन विसिट मारीमानों का परिम-चित्रण यह नपरेस-वाक्य ही पब उसके लिए बीवन-सार है। उसकी बहन पान्ता विपवामम में उसके पास पा पाती है। यह उसके मायाण के हेतु पापम को पुन समय के लिए स्पाप देती है और सदन को उसका परिणयन करने की कम्प-प्रेरणा देती है। शान्ता के घर में पाकर भी पा उसकी सेवा में ही रख एती है । चाम्ता गाती है मुमन बाना पकाती प्राम्वा मपने बेगों को संवारती । मुमम कपड़े सौती है पर का पाप काम भी करती है पोरगाहर का भी। सेबा सरन में प्रपन्चों को पिमा नेमका भार संमार कर तोपामपनी सेवा-भावना को पौर मी म्पापक पुट कर बिपाम्बित करती है। मबा-भावना साप-ही-साप उसके हरम में एक ऐसे स्नेह का भी प्रयोग होता है वो उसके लिए पहले प्रभावप्राय वा । सान्ता को या पोवा में पहनी पार गहन स्नेह की प्टि से देखती और 'सेवासदन' में भी बच्चों को अपने स्नेह से पचित नहीं रखती। स्नेह के प्रतिरिक्त प्रब रसके परिण में मसा पारण सहनशीलता का पुट भी मिन मना है। माता की पपने प्रति सपेमा को बती भी बह रसको पर्यावस्था में रेस भात पती पती है और सबन माता पिताम्मबाणों को छिपकर तुन मेने पर भी पापोवन है समझौता किने ही रहती है। प्रब उसे सच्चे पत्नीत्व का मापास भी हो पावापौर मामगार से मा-याचना मी र मेती है। प्रब उसका पिपास बम सुम्मों में ही बनाता है। पाठ पा कि सुमन का यह स्म पूर्ण मानवी का स्म है पीर पर्म-निष्ठा सेना स्पाम स्नेह वा सहनशीलता पारिइसकी प्रमुख विशेषताएँ है। इस प्रकार हम देखते है कि एक मिपट विलासिनी (म्पभिचारिणी नहीं) से उठकर मुमन एक पारर्स सेवावमारिणी के रुप तक पाती है। जीवन के प्रथम चरण में परमसमनुर मामसार्यों को मोर माकष्ट होती है। दूसरे चरण में पपनी विकृतियों के मुकर में फसरिय प्रतिबिमको निहारती है और तीसरे चरण में उसके प्रामुम प्रमानन का सम्म प्रयत्न करती है। किन्तु ममी समके चरित्र की एक परख पेप है- यह कि पारसंगर की पुन में प्रेमचन्द मुमन के चित्रण में वरिष-रिफास की मनोमानिक रष्टि से पिस पर सफम हुए है । इस एप्टि से सुमन का परिवचित्रण निश्चय ही पुटिरपित नहीं है । राममपी तक तो प्रेमपत्र मै सुमन परिकको भरपम्त माम तमा विस्वस्त मनोहानिक उभाग। किन्तु पाये पाकर उसके पमाया- पित परिष-परिपतम में प्रपुर प्रस्वाभाविया का समावेश कर दिया है। वह पनापास सीवर के नाम की एट मपाना प्रारम्भ कर देती है। बात यह है कि प्रेमचारे विधिप्ट नास्याओं का परिण चित्रण प्रेमसम्म अपने सम्पूर्ण नारी-पात्रों के विषय में यह मान कर बसे हैं कि अनुरम सामायिक परिवेश मिस गाने पर प्रधा परिष से सत्पानुभूति हो जाने पर संस्कारों को बदना ना सकता है पर हम भी उनके साथ किसी वीमा तक सहमत है किन्तु संस्कारों का उपना भास्तिक वा पीघ परिणम पसम्भव है बितना कि सुमन परिष में हमा है। उसके पात्म-रिप्रम में एक तपा दौड प्रारम-संघर्प दिवाकर उसे एक सस्म सामाणिक मान की पोर मोरकर मृत्पु-या से पे पवन कमाये होते तर तुम्हें कैसे पाऊँ ? मुझे उस प्रकार से निकानों तो प्रषिक उपयुक्त होता । और फिर कौन कह सकता है कि सेवासदन में प्रति विका का कर्तव्य निभाती हुई पी मुमन एक पकेनेपन का अनुभव न करती हो निवृत्ति-मार्ग की पभावात्मकता से न मारती हो पर इस प्रकार प्रय भी रखापरिक प्रसस्प एकोणी तपा भपूर्स ही न रह पया हो। यह तो भानना ही पड़ेगा कि साप्टि से मुमन परिष-चित्रण में मनन्द पफत महीं हुए है। हाँ ऐतिहासिक प्टि में जैसा कि हम पारम्म में से बह युके है मुमन प्रमाण की भारी-भावना का मात्वपूर्ण विकास-विक है। इसके उपति उन्होंने किसी अन्य मुमन को सष्टि मही की। एक बात पौर । प्रेमबम की मुमन को परत् की किरणमयी वा पर मामी से तुमनीय सममा बाता है। हमारे विचार से कोई भी रो परिष एक समान महोते । फिर एकही मेसो परिमों में तो समानान्तर रेखा भिन सरतीकिन्तु पृपक-पृषक मेवों के दो परिणों में साम्य वा पम्प माप पना बहिरप तक ही सीमित एपाया या है। मुमन पौर किरण- मपी में भी महिरप इष्टि से ही तुमना को पा सकती है। बाहरगत रोगों को पति-पार से प्रम नहीं मिलता रोनों भपूर्व सौन्दर्य से पामूपित पीर दोनों ही पति के पतिरित एक पम्प पुरप की पोर विपिएस पापित ऐडी है-मादि-मारि पम्प को दृटिस किरणमपी में दो दुधि की प्रसरता है मुमन में पहका प्रभाव है हिरएमपी एन पर्ष में प्रसार मही है जिस पर्प २ सुमन एक प्रारमा से नहीं मानती तो गुमरो मारमा को पागार मपाती पती एक मुक्त प्रेम का प्रमर्पन रजी हुई भो पभिचारिणी नही तो इमरी विचार के पाप मांगों पर भी मुक्त प्रेम से प्रभाव ही पदवी है एक पं पामिक पदों के प्रति विमोह नो मरो समापण पापिनय-परित कोही नीरमाय मानती है पोर एक में प्रतिगोष की भावना पर पिये ए १टो इमरी में ऐसी कोई पम्पि नहीं!-पारिमारित प्रेमचन्द पौर प्रेमचन्द बिसिष्ट नारीमानों का परिण विषण घर की नारी-भावनामों में बीकहीं मामून मंतर रिचमान है । परत् यहाँ मारी को समारत पुरप की प्रपेक्षा प्रबमा ही मानते है प्रेमबन ही ऐसी को स्लीपति महीने पर नारी प्रधिकारों की सरप्ट मांग करते है विस्तु प्रेमबम्द ऐसी कोई प्रस्पस पाबार नहीं मनाते प्रौर परत परिकहते है कि 'नारी का मूल्य निर्भर करता है पुस्प के स्नेह सहानुभूति पौर म्याप-धर्म पर तो प्रेमबन मारी को पुष्प से कही परित महणी मानते हुए त्याग सेपा तमा रत्सर्प पारि उसी की प्रान्तरिक विसपतामों प्रापार पर उसका मूस्याहम करते है। बेश्या समस्या से भी बात तो दोनों ही प्रत्यन्त सहानु- भूति पूषक करते है किन्तु परत पाहा प्राचीन के प्रति ग्रिोह तथा भौतिक मुखबार को भी मात देते हुए पमते यहाँ प्रेमचम मुक्त प्रेम पारिको प्रोपनीय समझ कर उसकी मभिम्मति से भी सम्भय सीमा तक बचकर निकल पाते। परत की एबमम्मी मेपणा होते हुए भी अपनी पति-भक्ति, अपने बासस्प अपनी पहलपीमता एवं प्रपनी समर्पण-भावमा प्रपना अपने उत्सर्ग के प्राण उन्हें प्रत्यधिक प्रिय हो सकी है किन्तु प्रेमपत्र देण्या को मारी का प्रसत् म्प मानकर बनते और उसकी वियपतामों से महानुभूति रखते हुए भी यह कभी विस्वास नहीं करते कि प्रसत् रूप में ही पसे सस्प की पपम्बि सम्मम है । वह पहला काम यही करेंगे कि पसे पसन् से सत् में साच बायेमे पौर नही से नसे पाठ मानवीय वृत्तियो की पोर पाकप्ट परी । यही कारण है कि श्रीकाम्त' की प्रभया तमा पेप प्रन' की कमान को परमा परिणहीन' की किरणमयी वा 'मीकान्त' की परमम्मी को वहाँ पप्प इनके पमार बारा प्रस्ताव रप-माप्पम से ही बिमापों का प्रसार प्रान करते है यहाँ प्रेमचन्द मुमन को मार सेवासदन में स्पापित करते। विद्यावती 'प्रतिमा की सुमित्रा की अपेक्षा प्रेमामम' की रिचावती परिक भारतीय है। पत्नी-स में पोगों की समस्या प्राप एक समान है।रोगों ही पगिताएँ .किस्तु परिवविकास परितक परिमा तथा प्रमाणोत्सारल की प्टि से मुमिमा पिपामती से बहुत पीधे पनाती है। प्रात्म-मम्मान की भावना के ताप-सार दो पनावापक तया परषामाविक नबोलापन मुमित्रा के परिण में विचमान है रिचापती मसका प्रामून परिकार पाहै। सुमित्रा ही की प्रविध पहरी प्रमिक म्यापक प्रषिक सन्तुलित पषित भारतीय मा परिक प्रेमपर विशिष्ट नारी-पार्थो का परिश-पिस ठी परिम्पति विद्यापती । रिपाठी के परिदकरो पर है-एक देयक्तिक दुसरा पारिवारिक पषमा पापहारिक । प्रस्पेड म्पक्ति बीपन में ये दोमों पर होते!-पासा अन्तरस पक्ष होता है दूसरा बहिरम । किन्तु गिरी कमोरियों पपया परि स्थितियों की परहेनमारकर सहने के कारण बिरले पक्सियों में ही इनका सन्तुलन रपसम्म हुमा करता है। पति के साथ यदि विचारती की वृत्तियों का पमेनन हो गया होता तो उसके परिपके इन रोनों पों में कोई भी नारी दिवाना-पानीबीसीमा सम्ठी पी किन्तु यहाँ तो मात ही मनमेल स्वमारों की पार यह निश्चितपतमेस से मेहकलेकी पनिवार्यता +हेतु परिव को पपने प्रति एक प्रकार की शिदिसता पपरा पिरान पारना सीमानी पड़ती है-सम से पोगर होना पाता है। प्राणायाठा इस माय की होती किश्व समझने में पाप से कहीं रममा पो। वत्तिक में विधायवीपरिष में समाव स हो पर मेह, ममता सन्तोष तथा पान-म पर दृधिो का प्राधाम्य है। इनमे भी प्रमुख पपीमता बो साधारणत: पाई-बरिषों में ऐप पायें साप पण साम्ब नही रसवी शिस्तु रितारती के पति की यह निरी तथा बालीम विशेषता है। पारम्म से पन्त तक एसमें पपीसता बनी एटी। रसका पति मानकर मेबारी होते हुए मो मोभी है और सिर भी उमति की भनक पाता है पर ही मारने का प्रयत्न करणा, किन्तु निपावती श्व पास्म-सम्मान के लिए पाठ समाती है। यह ग्ससे स्पष्ट हावी है रपानोम दूसरों कीसम्मति पर महनहीं फैमाते अपने मागतका भरोसा रखते।"मायत्री देवी उसकी शिकायान पोर एक रियासत की स्वामिनी है। रियासत के प्राप लिये बासो पति को मैनेगरी का निमन्त्रण रेती किन्तु पर्यग्रीमा विचारती रही है 'मीबह तुमारी बड़ी साती तुम से विना प्रेमरठी! म्निी ही पार पुमारी पारपाई. रिपा है। इन उपासन से पिरकर मर तुम उनके मौकर हो पापोगे पौर मुझे पी पहन पर गिराकर नौस्पनी बना रोम ।' मानकर सुनी-मनमुनी पर रेता है। पम्ता विचारतो को पर्षणोता प्रतिमारण ही मारमास परमा राता है। पापी छोए प्रपने पहिगाव में रेपकर सोबतो है कि "समरे पाप में परि सनी गति होती दिपहले रसाकर भस्म कर देता दोगमबार माप रे लो।"पापपने पारको गर्व-पगिता समठी पार निस पर सरे पुर मापारिको भी गात पुट बनाकर न निरा १५ प्रमपन्दरिष्ट नाराका परिष-विपण भाता है तो पा बासस्प-सपिता उदय को उस परस्पा तक पहर बाती है पाहो उसको मानवीनता की पपायरे माती है। उसे विष साकर प्राए मे पावे रिवायती प्राचीवम एक स्नेहममी मारी पी है। स्नेह सम्बनों कारण ही पह सयुक्त परिवार के पार सममती । स्नेहमयी बहन होने के कारण ही यह पपमे एकमात्र माई की मृत्यु पर मूभित होकर गिर पपणे है। इसीलिए वह सीममसि को सहानुभूति देता है और यही कारण है कि बायत्री पारम-पतन के उपरान्त भी पा से पहनाती है। इसके प्रति रितमीवि उपमम्पिानिए पह प्रपनी मातोप-भावना को भी स्मगाने माही देती । पन की पोर ठोमा पसे एमम नि सिनेमा भापि बीपन की रंगीनिया उसे नापसन्द या बातों रो परिचय प्राप्त करने की बाद मी उसे नही है। हो स्वाम में उसका विवाह है। सर्व प्रेमबमक पदों में 'बसे परमार्प पर साई से पपिक पता है । पदोपवयही है विधायती मस्विरमका मिषी पक्ष । मानहारिक पपमा पारिवारिक पि से विवावती गाव पभापी । इस क्षेत्र मे पपमे से बाहर उमका निकटतम सम्पर्ष है अपने पति जानकर से । पति महोदय ऐथे कि समें पत्नी को पमस्त मन्तवृत्तियों से का विरोष है। वह पर्वमोसा है तो पर बिना मारम-सम्मान की पुरावे स्लेहमपी है तो रमाई-स्नेह है पा रपार करना चामती है तो पन्हें किसानों का एक प्रसार माय को घरण रोती पाएकमिप्यो नई मापन अपने मिमै मान्य नही पीर बह सन्तोप का रामन पका कर बनती है तो समझते। पैर्य और गन्तोप पुगिहीनता का प्रमाण है।" संक्षेपत विधावती के पास सर्पर हाय है तो उसके पति के पा0 मुक तमा मंतप्त मुहिप का उत्तम पो देना होता है। लिये विचामती अपनी सम्पूर्ण ताम्माप भावना में कम नही पठी पपि इसे मुखमम बनाना उसकी सामय से बाहर है। शामर स्त्री का पार पासे पषिक नहीं करते गितना अपने पैरों का नो मी विद्यावती पनकी राह पेच पी' होती है और पूषही होती है "माप और पोरोपोगम हो कभी से पार है। सफोर-मीना होते हुए भी बह पति मे पर प्टिी प्पासासिंह की पत्नी से मिलने पाती है। यह मानती है किसके पति में मनोविहनियों का समाव नही है, फिर भी बा रहके अपने पिता मी मस पोर सरत करते है पो बह पोन सस्तो'पाप मेरे साममे उनकी गई कीजियेमने सदैव प्रापम पास पिाहै पीर पापी पपा ए मुझे भेमपनविषिष्ट मारी-मानों का परिम-चिमण वियना हो पाएपन नही र सम्मी पापापके कममानुसार परित ही दुरात्मा सही मामी सही परम्नु मेरे लिए उम्प मौर देवतुम्प है। मोर मन में सोचती प्रब पा सकी चिों का पता हुमा पामोरपौर सम्ताप होता पापह उसी बफ हवा पा पर यहो पाकर पा पुम पया । पदि से इस प्रकार का पसामरस होते हुए भी पद सोपती है कि बनारस पर उन्हें मुपारने का प्रयत्न करेगी। पर यह एका कर नहीं पाती भोषिबनारपरकर पर देखती है कि यह पूर्णपरिणता होती है। किन्तु इसमै सम्पमहीं किसके पत्नी-म में पति-सेवा पति- पालन ता पति से माता का पारनाम्पत्य की चाह विधमान है। पति अतिरिक्त पारिवारिक बीवन में उसका दूसरा निकटतम सम्बन्य भपने पुष मामाकर से। मानप में भी काम्पपरापणा है। यह बनमी माम नही। अपितु एक प्रविनिता पनमी की भांति सोचती है "मेय सरका गाय ऐना अपने पसीने की कमाई खाना देगिम पर तक मेरा बरा बसेमा उसे इस बायपार की, मयने मी। इस प्रकार एक सफर मातृ-भावना भी रिया के परित्र में विधमान है। पुष तथा पति के उपरान्त नियामती का एक सरस मी निसका पम्याच परिवार पम्प परस्मों से है। इस रूप में पायुक्त परिवार प्रपा का ही समर्थन करती है । गुणनों प्रति रति पया भी यह रहती है। इस प्रकार हम रेमो हि पारिवारिक मेन की रिपारती एमके पादर्थ को मेकर सती है। तम्म सपा मारा-पामन इस क्षेत्र में सरे परिणकी दो प्रमुख विपनाएँ। किम पर उप हो एरिवारठी मपमे पति गठ दोनों पक्षों में तुमपुर गावस्य पापित नहीं कर पाती। उसे पिप पार पारमारपा कामी पाती है। परिस्थितियों का पानी पर सिर से मावा है को विपापती जैसी गधीमा कोमात्मा सरमदीपरिपालना मिप रसमें बना दी पाता है। पति कुमाप्ती पा पुम भी एगी बीन मिपा गया था। पसरे सामने समस्या दीबिपे तो किसके लिए पौर यह पता निपणीपरन सीमा पर पा रखा है। ऐसी मानसिक स्थिति में किया पया मारमात भी परायाम्प नहीं होता साहिरिपारती का पम्प मानकर पा पायत्री दोनों को पपेपा प्रपिक स्वामारिक है। यहाँ हा पितो परिप में मेकअप्टिनीतु का प्रान र निरामय ही प्रार्थदी हैन मलाई मिस विपाती में प्रात्रीपन मायापपी वृत्तियों का प्रापाम्प एणगी मारपहत्या पराया मे कौन १ प्रेमचन, विषिष्ट मारी-पानों का परिष-चिपए सी उपयोगिता के भाव का युम सिमाया है। इसका पता ही है कि मृत्यु बबन को तोड़कर ही मम्तव गिया बरिष मे सत्य की पिगम होती है । मृत्यु को भी पैसे मह सस्प नही अपितु परिस्थिति मात्र समम्ती है। बीते भी यह योग कर सकी उसकी पूर्ति मृत्यु के उपरान्त स्वयमेव ही हो पा । उसका पुत्र मापारकर बीवन में अपनी मां के भारत को लेकर ही रखना है और उसके पति मानकर को भी उसी के पादों की साम्ता से पराजित होकर पंचा की खरए सेनी पड़ती है। पत प्रेम की रष्टि से विचामती की परिष- मरिमा युप-विषेप की नहीं अपितु गुप-युग की भादर्स-मारी की सफ्वा भिम्पक्ति है। भदा प्रेमचम्प की पत्नीत्व-कापमा का एक उवात पप हमें 'प्रेमामम' की पता में उपसम्म होता है। कहा जाता है कि एक पेष्ठ कलाकार के पास भी अपने सप्टा के प्रति विद्रोही हो पाया करते है परिस्थितियों द्वारा पनकी निमिति के समम सेवा विस्य हो पाता है। परन्तु मया विषय में यह सक्ति पात परिवार्य नहीं होती। प्रेमपत्र मे बो पादर्स पसके सामने प्रस्तुत किया है वही उनकी भगा मे करणीम समझा है। पाने का तात्पर्य यह है कि पमा प्रेमपरकी भारी-मापनाका सरत प्रतीक है। भवा के परिण की सर्वप्रमुख विशेषता यह है कि उसने धर्म को प्रम से कम महत्व नहीं दिया है। पास-पड़ोस का विचार है कि उसके पति प्रेमधकर सापर-पार अमेरिका हो पाने के कारण हिमुत्ल से प्रष्ट हो चुके है। इसलिये मन में पति-प्रेम का प्रसार विस्वास रखती भी यह मान-मर्यारा का उत्तपन नहीं करना चाहती । 'एक बार वह प्रभीर होकर बनी कि प्रेमकर का हाप पा कर फेर ना हार तक पाई, पर माये म पड़ सकी। जानकार कर कहा-प्रेम नार। निस्सार कौन किसका पति और कौन किसकी पली? यह सब मायाबाट है"।पहपति को भी एक पत्र में निवती है "मुझे मापसे मिलते हुए अनिष्ट की भाएं होती है। धर्म को तोड़कर कौन प्राणी मुखी यसकता है। मापके विचार को ऐसे नही फिर पाप पों मेरी मुषि नहीं मेते ?" परा का पति-प्रम हिस्सर से बात पर हा भा है। वो- मरा का पालन तो उसका एक पनिवार्य भर ही उसके प्रम में पटम विश्वास सान-माप पति के प्रति भक्ति-भावना का समारोप भी है। प्रेमवार के सदों में प्रेममम पिपिए नारी पात्रोका परिष-विपण "भाभिए प्रेमपंकरदेत एकसमा पे इसी कापना पर पहप्राणार्पण कप्तानी।"ामवासिमों की या अपपप में उसके पति कोस भेग दिया जाता है। उसका सर इस पिपप में पुजहवाई दो मंदो तर ती है। "तुम पानेदार की दुपारले की कोई बात नहीं। पपनी रखा पाप कर सह।" इस प्रकार का विशवाय मापारण नही हमाकरता। पहास पनि सेरपती है, किन्तु उधका विश्वास पोर प्रेम पति के पारमविकास म निकर स्मृति प्रेरक्षा प्रदान । पसिप लिए मोरात को ए पत्यन्त कम समसर पपने पापमों पारि से रसकी पहायता मी करती है। साधारण स्त्रियों की मौदि रमम धाममय-प्रियता नहीं है। त्याग मोर काहीस पास्तविक पाभूपण जमकर पने तो रसडी मोर-मतिको निष्ठुरता से कम नहीं बममा पेतु बहायता को पारो सामुग "धरा एक बीम में की मालूम होती थी। उधकी पुकमी एक निशण योनि से परीय पी। स्पाय पोर पनुपम की रिमात मूति पो रिस कोमन रेनों में भक्ति पीर प्रम को किरणे प्रस्फुटित हो यही पौ।" सरष्टि से मसा एक महर पतिवा है। एसकी अपनी पनुभूति एक प्रेम करतयों को मिनाता है पर बका बस नही है। पाका विपास पिसत् को भी पाकर प्रायश्चित हारा मन म पति मिा वा सकता है। मत रह प्रापरिषद को बीवन में पारस्या सममी है।बह प्रमार प्राषित करणे लिए पाती है मौर गाया परप्रापरिषत की पर्न नपाकर तुम मुम पर गड़ा पम्पाप कर ही ऐ तोमरती! पाप गित से ममी मईयरमा मिटरको मिटारपेया पियों पोपा बारवी सपा मम पापी।" स प्रकार र मईकारको विषयमा का पररोष धमली है। इसका यह तात्पर्य नही कि रसके परिण में पारमसम्मान की भावना महो।पार पत सचे मेगा सापति मदम की सर्वनापरले राती सोप्यर में तुर भी सिये गाती है पौर गाती है मेरी रक्षा के लिए यह काफी है। उसका तो मिरचय वा स्त्री रीमान है सो रिना यह सपी नरही है कि पार की एक पिणारी सादर करती है।"बह तीत-माहीमारी के मिए सरबरा पानसम्मान समझती है और यह सोपहर बमती है कि मरि माहिप पवित्र । म साप को पछि धिपान को पुष्प हार रसिया हो मार पर हो र पाठिया हो पर मेरे गने रिनु प्रेमपाद के विशिष्ट मापसानों का परिप-विपण सती स्त्रियों पर उसका एक मन्य भी नहीं चल सकता । बह पास हो गया वो एक निमाह में पुस्प ही बाल-नाम को पार न मे । पमामा पाय का पुण है पर हरी ममी को भी किसी ने पमती रचा है। इस प्रकार भवा नारी को प्रबमा नही मानती। पदा मन को पपनी ही पति-सेवा का माम्पम मात्र मही समझती । या यह माम कर चमती है कि भगवान् होने का प्रसी मात्रा में पथिक परोपकारी होना । मा गायत्री से करती है तुम भवान् ने बम रिया है। उससे सभी काम करा। मनायो पार विषयामों को पामो धर्मपामाएँ जनमामो तानार पोर कुएँ पुरवापो मति (मीता पारि के पास से मुक्त निवासामयी) का पोरकर हान (विकास) पर पतो। इस प्रकार, ससरे परिण मे सेवा भाव स्वभाव मे ही विधमान है। इस प्रकार हम देखते है कि पाके पलील मे पाकास-वितान-सा म्यापार है। प्रेम पामिश्या पाप-सेवा मात्र प्रारिमोम्मानिक वृत्तियों का पपूर्व धमाधम उसमें विद्यमान है। पीप पर्पले पोष म्ममपान में पह पांमुषों पर भाषारित विरह मे नहीं पी है अपितु उसके परिण में प्रेमचन्द में सीता से मारा-मामन ही पात प्रपना का समावेश किया है। केगम इस बात का है कि भया के चित्रण में प्रेमवार कोस्मानामान गाय पाविस कारण वह पम्पास का पौण पात्र बनकर प पर है । निवासी के साथ मी यही प्रम्पार हुपा है और भाये चमकर मुस्लम को भी यह प्रहार सहन करना पड़ा है। मस्तुत प्रेमचम्म पपमी प्रत्येक हति में एक बार बरे म्पापकरण को मकर मते है । मापन की मांग होतोममा पर्म भरमा बीचम-म का विषण। प्रत भने एक ही आपापास में बहुत-से पालों को मतारला पाता है। परमे 'प्रेमाश्रम' में ही पात-पाठ मारी-पानों की गणमा को पा सकती है। सप्टि से असा को भी सम्मवत' परामोम्म की ग्रो मही अपने भाग को अपमामि हो ही पर है। उसका पग नाम पार्षक हो गया है। विसासी 'प्रेमाघम' की पितासी एक निम्नवीय पक-पलीस नाते उसके परिष में इन सभी विपनामां-पश्चार्यों गुणों का समावेप है पो प्राम्म बीवन का प्रतिनिधित्व करती है। पपने माप में प्रपूस होवे हए भी एसोपरिएका महल इस प्टिमोगरे पषिक हि प्रेमचन्द मी एप प्रेमचन्द बिसिष्ट मारी-पात्रों का परिष चित्रण निफ्या सर्वप्रपम अभिव्यठिमो समय पाकर पनिया के स में प्रमर हो - पितासी अपने पति समोहर की समूर्ति है। समपों से दो ए मनोहर बीवन में उसे पाकर एक प्रबीब-सी सहनवीनता माप्त है। वह मनोहर के प्रस्तश से मनी मांति परिपित है। पेट भरकर पाना मही बता दो पूछती है क्या साम मन्या नहीं ? गा! उत्तर में पर निशामा को शान्ति नही मिनती दो चिन्तित सी पुन प्रपती है किसी से पहा-सुनी तो नहीं ई" भौर पर प्रसनी मारण का पता चल पाता है तो मोपन-पानी पर्दा बाटममे के हेतु प्रसरो मार सशिप प्रयत्न करती है। ग्रहस्पी के कार्यों में भी वह बहुत व्यवहारडमा है । सम्होप उस प्रकारे कार्यों का पेय पन महै। इसलिए माबीपन में तनिक मुकार बमने में भी ही नही समझती है। पति से कहा है "मारी मादप है कि देणे एकम एमालेका मनाये ही रहते हो।बर सारा गार पी दे पहा हैम दम पर गौर से बाहर है। ये बन पोमा रेम । में कोई परमी हेठी मोड़ी ही दई माती है। मोर बेपारी परीब मुस्लिम मास्तिक हुए बिना कैसे सन्ताप एक पाती है। पर पामे करती है ऐठा तो मारायण ने ही बना रिमा है। ठो मा पमने है शेजार्यम। मोगा सा मी हारी में है रो-बार दिन में पौर बटोरगी पाकर वाच पामा। मह जानती है कि उसके पति दया बरान मेरे की मकर मात्म-सम्मान मतिरिक दुध माी है तो भी पह सय मामरिक्त करने के लिये नौपाम परती है और पारिसे मौस पा से पर पर प्रार्थना करती है सरकार कहीं पीएमी । बोगोर पाहेगा पीलिए, यो सरा बाहेरीरिने मानिकों के कान में या बात न मिये। पितु श्वना होते हुए भी यह ममता की सीमा का अतिक्रमण नही करती है। पर सर्व मारम-सम्मान को मपनी बाती समझकर पमती है। पसे पपने बेटे और पति पर गई है कि उसकी सम्मान रक्षा कर सकते है। इससिप पर पोस उसके ममपिरों को पेरकर पाना पाहता है तोहरती 'तुम हो तो वाशिम ऐमी पुरकी नमा से हो से मैं तुम्हारा दिया साठी " तिस पर मी पर सीस व सुनी-मनमुनी करके उसका प्रमावर रता हो उसप पारमन्नम्मान मभक रखता है। यह पारंप में पार, या पानती मी दि इसका परिणाम पर होगा प्रपमे पति पा बेटे से शिकायत करही गसती है। प्रेमबारसम्बों में बह "उन पुष्पों में मपनी पपमान-पापले पती गो नमक मान और माता के सर । परिणामाप पौस पाकाम प्रेमपम के विशिष्ट मारी-पार्यों का परित्र-विपस होता है पौर मनोहर को कारावास में प्रारमहत्या करनी पाती है। वितासी मिया हो पाती है। स्वभाव से भी होती हुई मी का अपमान नहीं सद सकी पी। मिषना-प में विमासी पार भी मानपीम हो जाती है। मनोहर के बेत पाते ही घर के सभी मानकर हो पाते । पौर बिसे रेखिये वही वितासी को बनो-कटी मुनाता है। परन्तु रिनासी तनिक मो भवराती नहीं है। महतो पही करती है मही रादा मा पा से कोई उनीफ नहीं है। ना ही नही 'पिचासी की बातचीत बामगम से प्रब पात्म-पौरप टपका परवा पा ।" कभी-कभी वह मा पाकर बातें करने ममती। पड़ोसियों से कहती-तुम भनी सापकर मपनी चमड़ी को बचानो यही हसत के पापबाम तक बेते हैं । म विषय हो गई सो क्या पर सस्पानापमा तो क्या किसी सामने पाँच तो मीची नहीं। अपनी बार तो मथी। इसी प्रकार विषया रिसाती के परिष की रो प्रमुख विशेषताएं 8-सहनपीसता पौर प्रारम गौरव । पिनासी परिष में शुटिमों की भी कमी महीं है। उसम सहमधीपता के पत्त तो । किन्तु का प्राभार उमा की पहराई मे नहीं पपितु सरिता - प्रगाह में है। दूसरे पदों में उसकी पर्वाभिम्पक वृत्तियों को दो पारिक मार्ग से महाग मिल पाता है। स्वस कभी नहीं सोचती कि सहनपीवता मारमा का एक गुण है । मनोहर की मृत्यु के उपरान्त पौ से पति-पौरप से अधिक गौष होता है अपने पर । पौरप्रति उसकी निवामय जितनी अधिक होती जाती है उसी मात्रा में ही पाय को अंपी सठी हुई ममती । उसका भारम-मारर भी से एक भाषेप मात्र मी प्रकार से उसके पति की धारमहत्मा गमो पारेप का परिणाम है। किन्तु बना अपश्य है कि इन सब पर उसका प्रपना पप कोई नहीं है। प्रेमचन्द मी पहा मह रिखामा पाहवे हि पन्तबाप रे मंपर्य में पिसी हुई एकपा-मारी पहन पहरे सोचने की क्षमता रख ही महीं सो रसके गुण प्रौर रोप-सभी ससकी भावस्पताों मतिरिक्त कुछ मही।। इस प्रकार विमाप्ती का परिण पवि प्रेरणा सुहिणी पारमामिमानिमी माननीया मादि की विऐपतामों का सामाषिक सम्मेपरण।मान देने योप्प सतनी ही बात है कि सममे इन पिपतामों को बाम-संस्कारों से ही पहण किया है पम्पयन पिन पक्षमा मनन हा पर्यन मही। यहाँ तक रिलपिए की कमा हा प्रश्न है निमामी परिम में पर प्रेमपद रिपिष्ट मारी-पार्जमा परिवपिण मी एसी की पति निर्षम है। उसमें मिस्वार है, प्रतिपादन का घमार पौर न ही पूर्ण विकास । सिमका पितासी का पा हपा होगा बसराय रे बेग से कर पाने पर उसके माताप का विकास साहा होगा पति की स्मृधि को यह कहाँ पर सेमात पाई होगी-ये हर प्रम विमो पाठक को सपना पर पूमिप्यक्ति के परिणामस्वरूप मयेही पर है। बमे ही रणनि' में वाणिती का प्रसप फ्मा की हरि से पनावश्यक से मिलूम दे पनर पार की पूष्टि उसके बिना भावव प्रसम्म थी। इस्सुम प्रेमवाल की नारी भावना का महत्वपूर्ण सोपान है। इस रपम्पास के प्रति विस्तार में जितना सहब साभारणार असूम के साथ होता है उतना भीम वादारम्य सम्मवत सूरराय से मी नहीं होता होगा । पुस्मुर पप्परीय मुस्लिम परिवार की एक मा परिसीता है।सतो पर्या-प्रथा पुस्तिम मारी के लिए प्राय अनिवार्य सी विस्तु पनी म में भी पुम्सुम के लिए हमारी-मुनम नया धस्स पारण कर ली है। पति वहिरमनी को एक प म पोट प्रा पाती है किन्तु राम में बामहापा पाती । "परम में सुन रठ पापा पर पति के मुखको भोर तापते ही उसे भूर्प-सी पाने मगठी पी दर पी पी या विचार मी मन में चट पापा किये सर पारमी पपने रित में क्या काठे हपि । इसे पति के प्रति पराधी प्रेम नहीं। यह रोती रहती है और जब एक-एक करके सब पादमी पसे पाते तर पित्त को सामधान करके पति के पास पाती है। हिम में से रस कर मी नोक- मरा का पालन करणाहीस्तुत भारतीय नारी को गुममती पादा रेता है। मिस्तु मम के पास होने का पता नही कि यह पपूर्ण पतिपरापणावह पूर्ण पवित्रता है। पति ही रसके लिए सस है। "तुम पनामत रहोगे वो हमारी फिर पाराम से गुररेगी और पहले से सारा पनीता पति से यही कहकर संबो में बने एने की प्रेरणा ली एती है।मा परोपकार एक कम्पति में विश्वास रखती है जितु सब पति के प्रति ही समममी है। पति बीमार पौर देवर की श्रीस भी पुत्री होती है तो वह पी गटर को कीस उनकी प्रेस से परी है। वह पाकर समे कमायमै तो मेरा परम भरेगा । मुझे तो तुम्हारीही मारा भरोसा है।" यहाँ पर उसका स्वा श्री गुरण-मापन बापा क्योंकि मा पसकी पति-सेवा का मन बनकर हो पाता है । पिपताण पदिरा से बहाकम्म प्रेमवाद के विषिष्ट नारी-पात्रों का परिण-चित्रण - सवे एपने के प्रपराप को मह पहिज समझवी । पर उसे को भी पाता है किन्तु ऐसे से किसी को अपने बच्चे को बाह से मनी काटो देखकर गुस्सा पाये। यों ही पारिसमी को बरी बनाएर मे पाया ना हा होता है सो ही यह पपार पाकर गिर पाती है । बस्तुक पुरसूम का पति प्रति प्रेम मान्तरिक है पामारम्बर मही पौर बितना ही बह पान्तरिक उतना ही महरा एवं मर्मस्पी है । साथ ही पुस्सुम त्यागममी मुपहिणी भी है। पति बेम चमे पाने पर वह अपने परिपम बस पर ही पहस्मीका संपा मन करती है। मा सिमाई की है और बलों का पेट पामतीहै । उसे अपने परिपम पर विश्वास है मौर यही कारण है कि वह प्रारम-सम्मान तमा पुविचारों को बीवन में महत्वपूर्ण स्थान देती है। उसे बात है कि मोम से बहकर मम्म कोई कारण प्रात्मा के पतन में सहायक नहीं हो सस्वा । बाहिर पमी रोका से पैसे से मेने की बात करता है तो बह पाती है "प के लिए कही यास न करमा। रोका को काला साप सममो। मही धारण है बिह पीपरी द्वारा सहायता नार्य गए पन को ग्रहण नहीं करती है और पही कारण कि हमले का तो बेच समयी है किन्तु पोरी से मर्म को पन्य समझती है । उसका निवास है कि पन से पकाई नही होती धर्म से होती है। पौषरी के रूपमों को मोटा कर उसका मस्तक गर्व से गलत हो पाता है। पति की मेनामी को सराहतो र मह सोचती है या इमत कि पीठ-पीये दुनिया पाई करती है । उस योग्यती पे तो भर पाना ही मचा है कि पोटे-बरे पारमी मुंह पर नवाद मुनाम । इस प्रकार हम देखते है कि पली-अप में गुम्म्म भारती कम्पपरापस्या पवित्रता सुहिणी परिपम बीपी सपा प्रात्म-सम्मान की रक्षा करने पाती है। ऐसे परिपके लिए सपोप परा पहनधीनता की परम पावस्यकता होती है । ये रोनों गुण भी पुस्मूमक परिष में समाविष्ट ।। उपहे सन्तोष का प्रपान कारण उसकी मास्तिपता है। उसका मदर विश्वास है कि सुरा मै से सने रिन गरी पी वैसे फिर देना मना मिसेमा न सही इसका पाबा तो मिडेगा दोनों पक बनाये एक ही बात सही। इसी सम्तोप-वृत्ति के कारण ही दो बह कर्म करने में ही मानव-जीवन की सार्पया समझती है । फल की एपकासा को यह पवन का मार्प समाती है। जाहिरप्रमी मे यदि पपने अनुयो का मरण पोपण ना वो बहते रसका कत्तम्मकर्म समझती है। यह उससे दावी "इन्सान किसी और के साप मी नेकी करता है तो गरिमा में गत देता है पा नही किरमून करता हिरे। तुममे यो पुष किया मुरा राह में प्रेमवारशिपिष्ट नारी-पात्रों का परिपत्रण - प्मिा प्रपमा पूर्व समझकर पिया नहीं दिया था कि सूर के साथ रापस मे मो सोसिये तो यह प्रतिकार में गिरावास नहीं रमती । उसकी धोनो घासे मृपस उसी के पति की कमाई का पैसा भी उनके पास है किन्तु बीमार ताहिर के लिए भी उसे गोठ से नही दोसतों। इसी प्रकार बिस देवर को सरे पति ने पापा-मिहाया पी प्रम्य ब ग दुरुप देवा तो रवि की मिथुमता को रेखकर यह कहती है सुरा उन्हें पुणे रखे हमारी भी तो किसी तय कट हो पई। इस प्रकार की मन्दीप भाषमा एवं समापीमताक लिए रिस में पोर हामशक्तिको पावश्यकता होती है पर पुरुसूम मिए पादत सी बन पा है । पहने देखा है कि उसकी मौसा के मर्म पन्हों से नुमन्य उठ रही है और उसके अपन बचे रोटी को बिसय ६६ पया भी ऐपती है कि दो पर सखी एक पर पता नही पान सपने परिवार की बात भी नहीं पूछा-परस्तु पासा सहन करती पावी पाने को "उपके लिए प्रम ही है। धीरे-धीरे उसकी यामधीमता ही रमकी समी पारिषिक रिपतापों में बारस्मता भरती है और पन्तत पर इन सब के पहार परिस्थितियों से सर ठही पातीपरवा र्यो। नपरिस्पितियों से पावर्ष समठारही मेवी है। बस प्रकार, पुसूप एकमा पली रेस में विभित हुई है और उसके माम्मम से यह भी पता पम पावा ह कि प्रभवन के लिए हिन्दू मपमा मुस्लिम नारी में कोई पन्तर नही पा शिन्तु हा एक वर्ग के प्रतिनिपिस्त प्रमा भाषिक विकास के मिए उपयुक wिणसमी का प्राम है महा निश्चय ही पुनम का विकास सानामा परण पुट-पुटा-सा ए पया है । 'रमभूमि' पार विप्म का प्रहार रस पारी पर पाभिकहा है। इस सरह नहीं कि म्मिी प्रम्य उपम्याप एम बातावरण में मुम्म का परिण पार मी पिकनिपर माता पा । - प्रासपा "गबन' की वासमा पुष्प-विसा निमित एक पाव परली प्रतिमा । मिसको निमिति में पपा की दृमिका भी प्रपोप में माना है। इसी मना- वैमानिकाप्टिकारीगन्यास ऐप सभी प्रमुख पात्रों को प्रपेक्षा पहस्समापितामपिकनिष्ट। उसके परिण में प्रेमबम यह सोचकर पमे प्रिवत् पपमा प्रमाणिक संस्थाको पपात सत्य के प्रारमें मार पाना पा सम्ता है। संसाण दीवानों के पाम्प्यूट से निगमकर प्रेमबह विभिए नारीमानों का परिम-चित्रण मानमतामा के विशाल निर्माणात्मक कर्म-मेष को प्यापक पहुंची बामपा के परिणको मापारमूव मिसिष्टता है। कुप मामोषको बामपा परिण को दो मामों-रमानाप के पनापन से पूर्व तथा पमावन सपन्त-में विभाबित कर, या तो पूर्ण पलको माधान्य र पा फिर पत्तर पपको प्रविरंजना मात्र कहा, उसके परिण के साप पम्पाय माहित में यह नही भुममा चाहिये कि पापा पारवे मोठे प्रेमचम गोदान' से एक ही प्रथम पीपे । यहां उनकी मखनी गत और कौमार उसके साथ ही निपार प्रमा की प्रत्याकाण पता से थी 'एबा' कोसों पर है। बस्तुत पानया के परिसर रोनो फ्य ही एक-दूसरे से पनिष्टतापूर्वक सम्परामामूपणप्रियता का प्रर्प सत्य के प्रति निमुमता पपा पाहीनपा कभी नही होता । युरावस्था से पहले हमारे मौतर गोप पधिक होता है होप नहीं क्योकि हमारी विचारचूमि उस समय सरा होते हुए भी असमतम होती है अपमै सस्कारों को बदल समने की मामप्प उस ममय हम म नहीं होती। भासपा को भी पापों की पार पन से ही मिमी।।दाम्पापस्था में ही पब मार सपने को पाती है तो उसको मा सरलता से उसे एप सकती है कि माने पये मही होते किन्तु महतो रस्टा बहीबहती हवी है नहार हेरे लिये रोसनुराल से मायेगा पौर उसके पिता रामरमान बीमा कमी प्रयाग पाते तो बानपा लिये कोर-म-कोई माभूपए पर नाते । उनको म्यानहारिक पुद्धि में यह विचार हीन पाता था कि बासपा किसी पीर बीर से भी अधिक प्रमहोतच्या ची। पीर बानपा को सहेसिया मा मिनती (दो परिकार प्रापूपलपिमा । ऐसी परस्पा म सामामिक ही है कि वामपाका पाभूपणारे प्रति वीव भापह हो और पारी समुरात को भी प्राभूषणामार समझे। किन्तु प्रमबाप की से पह मी सिना प्रारम्भ कर देते है कि प्राभूपणप्रियता पंधानुमत प्रभाव होने पर भी नारी की गम मा पाठ वृत्ति नहीं है। विवाह प्रपत्र पर मपुरात से परहार केपाने पर बानपा समी विमुग्ण वो भवास होती है k पूजा की पूधि तक को उठाकर देती है किन्तु पक्षियों से रमानापकी माम मुसाहतिको बार उसे माम्तरिक मानार भी होता है। समारनार का मूम प्रेम की स्वाभाविक इति में है । विवाह से पूर्व तो नासपा ऐम प्रेम रे सम्पर्क में पाई नहीं होती है फिल मिमाह के उपरान्त निपर ही यह समय पाठी किम की पाव पासूपणों की माह से कहा कि सबजी है। भाभूपण उसके लिए प्रब प्रेम से कहीं गौण हो बाते फितुर नानाप रसे प्रेमचन्द विशिष्ट मारी-पानों का परिणविण मुलाने में पर मपनी सम्पन्नता की में मारता है तो पाचन्हें मनानायक पीनही एमसी-परमरागत प्रभाव का प्राबिर पनी बीयवा सेटोबरमा पा नहीं सकता । पर इसके साप ही रहम बामपा की सामाबिक पारम सम्मान की भावना तक नहीं पहुंच पाते को निकषय हो हम उस परिकको पमत समझी। असुपन में पापों की कमी का पुश तो से है ही किन्तु सससे भी भारी बरसे यह है सम्पन्न होने पर भी उसके सास उसकी पारमसम्मान की भावना को ठेस पहुंचाना चाहतेस पिचार मन में पात होगह दस पती "यर यहाँ कोई मेरी बात मही पूमा वो में किसी को अपना नहीं समझती। मा0 पिन पनामों कोतपरी पी कोई माता तक नहीं। मविडिपा महा। बिसका बिदा पाना-पानी रखकर बन कर दिया जाये। 4 भी प्राइमी भाइस पर में मैं पसमा मम्मी। पीर पार उसे पानी बार होता है कि उसका पति बेकार है। पर यह पसे नौकरी मे लिए मना मेवी । पामा लिएर का विस्तार को भी दुम पाने देता है-इमिये नही कि इससे पसी भारुपएप्रियता को पहारा मिलता है अपितु समिबे कि प्रेम में यो पारम मम्मान की भावना होती है इसके द्वारा उसे परितोष मिलता है । इस प्रकार बह पारम्परों से पारम्भ होकर धीरे-धीरे पपा के निष्ट तक पाना प्रारम्प करती है । यस प्रेम में भर यह मारमा समाविष्ट है "मही मेरे लिए की परत मही। मैं पेपा नही कि तुम्हें नोच-मोट कर प्रपना रास्ता । मुझे तुमारे पाच मीना पीर मरना है। उसकी मां से समाार मेगती किन्तु बह पार्मन माटा रेता । समारमा पर भी ससे भविर मे रखे हुए है। वह अपनी माम्लपिक या उससे चियाताही पता है। ए मेना भारम्भ करता है। बामपरक मिए हार पाता है सादिया पाठीही पाती है-ऐश्वर्य के सभी सामान गुरने लगते है। परिणामसस्प एक दिन रमा को रणभार से सार सपन या मुरम करमा पाता है और सानि सपने के लिये पर से भागकर माता पाना पड़ता है। भानपानी या रति भी उसके काम में होती है तुम्हें पाकर मर सपे की परवाह नही पी" और यह मारमा पारेख प्रपर नियर रोकर पवावो मेरा पीरन रिवना पारम्पमय होवा। इससे भी इसी तप्प पर प्रमाप पावा कि पति-मली + प्रेप में प्राभुपराधियया बापा सम्म वो पौपितु सनी नहीं सिवनी विरमानापरी दुराष-तीमा । इस प्रपर इस रेप रिबासपा परिण में रमानार के पमाल त पूर्व पापणों प्रति परिस्थिति-सापेय प्रेमकन पिरिष्ट नारी-पानो का परिवभिषण प्राग्रह होने पर भी प्रम पारम-सम्मान तपा सरपी पोर मुकाब रखने पासी वृत्तियों पा ही परोक्ष रूप से प्रापाम्य । सेवा के प्रकुर भी उसमें तमी से मिपमान है।पर मानाप ने साधारण मौकरी में पचास-साठ रपये पर से * बनाने की बात कही थी तो उसमे पणारमा रंग निहाया पो तुम पूस नोमे गरीयों का गला काहगि ?" रमा पमापन के पापार ही बातपा की परिस्थितियां करपट बरमती है। मसे मात होता है कि मुठे ऐश्वर्य तथा पवास्तविक प्रसन्नता को मपीमी पवा पिनाकर पैसे उसे महान की बहरी नि में मुना दिया गया पा। पग पर निरषय कर लेती कि पमिक और 6 मही सोयेगी। बह दिया मी कि मामूपणप्रियता मृत्प मही सत्य है पसका पति प्रम पोर त्याप । पर बह पन्नहार को कर रमा का कर पुका देवी । 'ससे मासूम हो पा मा मैच भी हो पा पार रसका पिप बीवम इसी विकास की कहानी है। पमती उसको भी है अव यह पानापाप करेगी। भाग उसके मन मे पहमी भार स्वीकार किया कि यह सब उसी की करनी का पस है। यह सच है कि उसने कभी माभूपणों के लिए पापह नहीं किया मेणि उसने कमी स्पष्ट रप से मना भी तो मही किया। पापावाप रेबिये साल सीमा की प्रावायच्या होती है। मानो उसे सास-ससुर रामपामै पए इस्लाम मी सिर मचिों पर ।। गिय को पाकर उसकी प्रेम-भावना और भी दमक उठती है। मा सममकर ही दुप सन्तोप पर मेती है कि रसना पा तब सती बी पर ऐना है तब रोगी । पाकाते कोसों पमे मर हो. पर मुझे तो हरपम मही 48 रिहाई देते है। प्रेम के साथ ही उसकी पही स्यान मारना भी पाप पाती है। पर सब पहनों सपा ऐमर्म की वस्तुओं को पसार पमा बी में पाती है। प्रेमचन्द सपो मेंहो महास्तव में पात्रा ही पी-रे से पाते को मिला ये सत्य को। पानिकषम करती है कि अब परि पर की रया हुई और मह फिर नौटकर पाये वो पा इव तरा पर रोगी कि पोई-से-फोड़े में निर्वाह हो मापे । पैसा भी पर्व वर्ष म करेगी। प्रपनी मरी के कार एक कही भी परम पाने पी। भार उसके ममे जीवन का प्रारम्भ होगा। गा ममे बीपन की बात मोचकर दो नही माती प्रपितु सम्मि समे उसकी विकास यात्रा पर सघन पों से निकल भी पाती है। ऐसपैकी मामपी पंपा में प्रवाहित के पपरान्त बह रमा को निमती है। रिस-यात्रा पर शिवनी प्रषिक पपसर होती है तो ही यह सरपति । 4 प्रेमवाद बिधिष्ट मारीमार्यों का परिम-विषय समीप पहुंचती मादी है।बह या बान पाती है कि मारम-सम्मान की भावमा मारी सिपे परमापामक होती है। फीम साहप की पहली एवम उसे पैसे रेना चाहती है किन्तु यह समै सप्ट कर देती है 'तुम अपने में सोचो तुम्हारे इस बहनापे में पया का मार मिमा मा पा नही ? तुम मेरी गरीबी पर वरण पार । इसके साप ही भासपा के मन में मानव-मन सहानुभूति का भी रम होता है। उसे स्वयं की पहचान है मत रतन के पिमा हो पाने पर यह पसे अपनी सम्पूर्ण महानुभूति से सहावी पासपा परिवार की मेरा भी करती है। यह समय पर पोसठी है और रानी की बात कि पिता के पर उसने कभी मे में फरक पारमा नही मीचा या परिस्पितिरण राहाँ ससा पर बाती है। किन्तु यह परिवर्तन मसामायिक नहीं लगता क्योंकि अब उसे परिस्थितियों की पापाम है और गह रमसे अगर पल्ले के सतत प्रयाल में है। परमर का परिवार भी गारठता है सरपरमा रमा का पया पापाने उपपम्त उसके पास कमाता पाती है। पहले पापा भपने पामोर प्रमोर पक सोभित दी फिर उसे पति-प्रम की चिन्ता हो, उसके उपरान्त पर परिवार के प्रति चिन्तित हुई फिर परिवार मेगाहर खन वक मी उसकी सहानुभूति पाईपीपार प्रम प्रमकता पर तो पैसे पर सत्व हो भपनी मुट्ठी में कम नेती है। यह न ममी क्षेत्रों से मार ठकर मामरता म्पापफ पेत्र में पहुंचती है। पपना प्राति रवी-करती बह कानपत्ता पहुंची है किन्तु पापा अपने विप्रम-पस्त पति का प्राय पित करके मानवतावादी भावना तक पहुंची है। माता पार गह ऐपती किरमा दणके भर में सरकारी पाबन गया है। उसे सपा परोपर पाया हानि म पाई से हापों का सहाप देकर सदमरत में नियामनेभिए रमका मन रिमन हाउस बह पसे पापा के चमेरे पल मगिरले पी। यह मोपती पार चलो पुर मपाल ना हो में प्रदाता में पाकर पारा सा विट्ठा मोत गौ पारे नदीमा घ हो। इस प्रकार यह माप को रिसी मी मूम्प पर पोना नहीं पाती। परती है वह रमानाप गे 'पमर पुगे या पाप की ती कमी है तो मुझे पार ही मही दिवाकर दो। मह में शामिप ममाफर यहाँ पे बसी पारंगी और फिर तुम दिकपरले पो म माझ दी। 'ममी प्रायश्चित पूप नहीं पा है इसलिये यह सना हमारे पीछे पी मरेप हो। पाहमा सर्वनाश रोगी" । बिन्तु उस समय पाया करने पर भी प्रमथन के पिसिए नारी-पानों का परिष- चित रमानाप पहली बार एक भूठे प्रभियोप की पनाही ही देता है निमो परिणामस्वरूप दिनेस माम को फांसी की सरा मुनाई पाती है और पेप प्रभियुक्तों को और की भया । बानपा को वेद वो बहुत ही हुमा किन्तु उसका 4 मन पपनी हार मानने के लिये किसी तए राषी न होता पा" पारमा को दुलार देती है। प्राबिर रमा को सोचना हो पाता हिमालपा पार करमे की ही नहीं पासना करमे की वस्तु है “मासपा मैं तुमारे योग्म नही है। विस चाई पर तुम मुझे मे पामा चाहती हो यहाँ तक पहुंचने की मुममें पक्ति नही है। किन्तु मालपा पन्तठ से दस रचाई तक पहुंचा कर ही मोड़ती है। वह हाईकोर्ट में पहुंचार मुकामे की सच्ची मबाहरी वा है पौर न्यायामय में ही करता है 'पासपा के त्याग निष्ठा पोर सत्यप्रेम में मेरी परिजोनी है। पार पाष पासपा मीनेबिस से पनुभम कर पुको कि पितासिनी म में पह मन प्रेम के प्रावरण पर्पन कर सकी। पार स्पापिनी बनकर उसने ससका पधनी रूपरेखा। कितना मनोह, कितना मिटर तिमा विपाम किवना गोमप । रमा हो पाता है। अब वामपा सके साप प्रमाम के पास एक पाप में बमीन के सहारे हपी। उसके एक मना पिए भी । मह पपनी प्रास्त्री में बहुत सन्तुष्ट है।माम मार्ग पर पर मी पासापान मा जिीवत कितना अस्थिर। इतना पस्थिर कि मप + मूस तक पहुँचने के मिए भी अपर्याप्त । कलकत्ता पहुंचकर मानपा परिष में सरम के प्रेम नपा स्याप पाही नहीं मरे पपितु उसमें सेरा समता तथा पापाता का प्रार पुट मी मिना । दिनेश के परिवार की पह जिस सेवा-भाषमा से सहायता करती है पह साधारण नहीं रखनको महाविप नापे से तमा पोहा मी रया को बिस भावना से पन्त 6 पपने साथ रखती है मामसके प्रेम की प्यापकता की परिचापक मार बिस गांधीवापी सबा मार्स से भी परिचित पुष की सृष्टि होने के कारण पर बहती है 'म एस चमार को उस परित से पन्या समर्मनी को हमेपा इसरों का बन पापा करता है वापसको समता मानना है बो प्रत्येक मानव को पुमत दूसरे के समान हो रखकर रेवती है। निष्कर्पत हम देखते किसी भी पासपा के वरिष-विकास में प्रस्सा. भारिश्ता नही। नी भारत वृत्तियों का उसमें उपोषन हुमा १ दिनका प्रामाप उसके परिष में प्रारम्भ से ही मिमता किन्तु मो एक मिम्मा मिश्रम कारण सो पर पई पी। हम भी अप्रत्यापित मही बटा। उसके चरित्र में। हममें से मो मोप उसकी पाभूपएप्रियता साप चिपके रहो। पौर प्रेमपद विशिष्ट नारी-पात्रों का परिप-चित्रण उसको परिव-परिणति पर पामेपपूर्ण माचर्य प्रकट करते रहें कम-स कम प्रेमचन्द की प्रौड सेवनी पर विश्वास होना चाहिये स्वमा मी नही तो पनको मेसमी क साथ-पार पम ये सुपार-युम की पहभान होनी चाहिय और यदि हम इवनी सामः श्री नहीं रखते हो कम--कम पर भी हम बामपाको इचना हवे हुए तो सुन पकिन पापों का पुष प्राषित विमापौर पेप बीपन पदककती। यह नही करती कि मोन विनास ये मेरा पी मर गया मामले कपड़े से मैं नया सेल्समार से मुझे पसा हो म पम मिनापाए म्या की त्यों ।। (योंकि प्रधान है और मामा नाम ही मुझ में पिषमान है)। पुरपाई से पपने परिचय से अपने सदुपयोग में उन्हें पूप कर सकी वो क्या कहना मेसिपीमत बोटी के मामा को मुक्ति को एक मास मी मामी तो मैं कप और प्रापरण में ऐसे भी प्राणी डेहकर बसे गाये है मो मूतत देना हो की दृष्टि होते हैं। उनके पीवन में पुष भी नापापक मही होगा। पनका प्रेम उनका त्याप उनकी सेगा उनका कप्पा पर्षस हो निष्ठर बोल के साप मनचाहा समोता होता है। बानते कि संसार म निरास का उपयुक्त स्थान नही मितुरे मान र पसते कि सास वो मेनी हो। तरपनों का मन पसार मर्याय का पासम करने बामे उन पिन ने बिनादियों में एक पर की जन भी है जिसका सम्पूण बीपन हो पयमिता का एक समता, धमाता बो कि मुमत प्रभावारमा ही होता है। एखन सम्पर्स परिष का गिरनेषण एकी रत्तिएणपत में किया पा सम्वा ।पन प्रभाग मापारमाहीमा परवा है कि उठ पूनम की प्रामा होली पर उससे उप्रेम पावर का मिपय होता है । पिस्तु रसका एक प्रमागरम पध भी होता है रिस निमामी कतम्या की मांग का प्रावस्य पा करता है। प्ररपेक पति पौरन में एप (पपमा व्यापक प्रेम) ये दोनों पर विधमान होते. मागरमा वा प्रभावात्मा पोरहो पावार पर रममा मुली पपपापुदीनीषण पाप पा कणा मन्तिपत इपिस पदको एप पपा पार पो ही गोपन-सत्य मान करते रितुपराजमारमा गरम हीरे - प्रेमचनो विधिप नारी-मामोंगा परिपत्रण भीषन माना जाता है। एवम एक युवती है। पौरन राम प्रधान इमा कावा है किन्तु । सान का गम मानों के प्रपिक प्रयारों से प्रस्त-ह प्रचामता प्रभागारमा और पौण प से भापारमः । रागपमानात्मक पक्ष पन्तत पाती है उन की बीवन मर भी पास तृपा बो पागीयम युझ म सकी । मौवन-सम्पम्ना पप की सामाक्षिक तपा प्रमुख मांग होती है प्रणय ऐसा प्रेम विमरे परितोप का सफत माप्पम होता है सस्म पिपाह। पर प्तन तो विवाहिता होती हुई नी परिवाहिवासी है। साठ वर्ष के भयममाहात पीक साहब में अपने एकमात्र पुत्र की मृत्यु पर से पनी म मैं पीपमापार बनाया है। उसकी सभी बाबा पर पहती पार पसरेर माती है पो समझ नहीं पाती दिन बीम सार की बेटी है भरमा पली । प्रेमपाल के सभा में भी 'बकीम साहब को खन से पति का सा प्रम मही पिता का-सा स्नेह पा उनके पास उसे प्रसन्न करने के लिये पन के सिंगापौर पीर ही क्या मी ? उन्हें अपने पोषन में एक मापार की परत मी सदेह पापार की । प्रति वकील साहब के लिये रतन का पस्नीरव एक पापार मात्र है। पर वन भी बानपा से कहती है "मुझे तो नके उपर बया पाती है।" पति पकिपरक रप्टि से रतन का पत्नील या मात्र है। किन्तु पानीलम तो प्रमुख पति पापार मान होता है और , ही उसकी सफमता पति पर तरस थाने में होती है। राम्मत्पमा मन तो बाह समर्पया भी मावना होती है जिसमें एक गुरगुरी-पी होती है भारम-प्रसार की सकर बाह होती है पौर जिसमें से कन्या मितारणीवन में पोलाप अग्रसर होने की सामर्ष होती। पासो हस्ती र मिराहपी मापारमा स्पिति । परन्तु न किसके पापापा मिलाकर पहे। उस कन्ये साप बिसे पप पापारी बात है। उम! मरे पोगन का समर्पण रिसके प्रति करे- उसके प्रति पो पवस्था में समा समाप से पिता तुम? तो फिर क्यों है न का पालीत्व नैसर्षिक प्रमाणे का संकलम हो । यस्तु खनका विसरमन मेह विसरमौर मनमेल विवाह भावात्मा कभी नही हो सण योनि पमा रहित हो तो भारसहित होता है। प्रेम रहिट विवाह की पम्पमा मरी पिका होती है। मयान से प्रमाण हो की सटि सम्मको मत एवन को पौर भी विचारप्रम हो पाता है। वह अपने प्रमागरे मिए पापार की पोर में बन पड़ती है और यह बात सत्य है कि ये स्वम इसका मान नही किन्तु उप पपनी सीमाओं का मान प्रसस्प । उसके घर पर जीत साहब पाकीवारीकर पता उप भी शोषती है मर्यादित होकर ही।
प्रेमचन्द विशिष्ट मारी-मानों का परिण पित्रए मकीन माहब को उसका भाषार है किन्तु वह स्वयं अपना मापार एंग्ली मरम्पस्त पने में । मापस से इसीनिये प्रिय है पार्टियों का भायोजन इसीमिपे बह नित्य प्रति पर पर काली ही पती है क्योकि रस एकान्त नीरव बीवन इन विषयों की पोर उस मांति मपमता पा से प्यासा पानी की मोर नपठाई।" किन्तु इतने भी अमावस्त मानव-मन की परितृप्ति सम्भव नहीं। पत भर खन की सस्य मारना भी उमरती है। पहनी पार पर यह बानपा को पर दुनाती है तो कहती है "पार तुम्हारे पाने सेबीबा गुमाया।लि पर प्रफेनी पड़ी एदी है। बीमाराया करता है किसके पास पाई।" सायही वह सबी मी ऐसी चाहती है बो पम्तरम हो यह वहीं बोसमय के कारस विपी पाए । वह बताती है पासपा को 'रो एक महिनामों ने एमाग उनके घर पई, चाहा कि पहनापा बोर मेकिन उनके प्राचार विचार कर उनसे दूर रहना ही प्रथा मासूम हमा। दोनों ही मुझे पस्तू बनाकर मुटमा चाहती थी। मुझसे रूपया उबारने पर मोर पार करेगी। गंमार की बीवों पर मैंने उनका इतना प्रेम रेवादिको नग्गा भाती है। तुम हो माप-बगी के लिए रोजचमी भाया करो बहन ।" इस तरह का पावह यही म्पत्ति कर सकता है जिसके बीवन में समवयस्कीय रमेह अपना प्रेम का भाव हो। यही कारण किबो मी कोई उसके सम्पर्क में पाता है वह सये पैसे के सिमसिमे में उसे संदेह की रष्टि से होती है। बामपा के पति को कनन बनवाने मिये रुपए देती है किन्तु उसमें प्रपिक बिसम्म हो जाने पर बीम कर बहतीन सये मिलते हैं और अपन मिमवा है पौर पपपि सवापिस मे भेती है पर इसका यह वात्पर्य नहीं करते पन से प्यार है यह दो सतके मिये शिवास-पान की परख पौ। पर संदेहनत्ति मी महार-मूर्ति की पसन मपया सपना की पोर ही इपित करती। एक स्थान पर दोपदये इस प्रमार उपपच को पौर मी इका-सा कित किया है। पापा के पति रमा साप वह मना झूमती है तो वैसे उसमें परोष मसे उसे एक तस्कीन-सी मिमती है पर उसके प्रतियह एकरम समय हो जाती है पौर सम्भवतः यहीकारणहरिबहरमा के पर प्ररत्तर नहीं देती। बस्तुत कई बार तो न स्याही भरने से बहुत दूर हो पाती है और अपने माप में एक मारम पिरोपमा प्राती है। इस सहनहीं किबहमारी मोर ससमें मातृ-भावना प्रविमोपनहीं है परन्तु वहाँ एक स्थान पर तो याबामपा से कहती है बहन मुझे तो मतान की मालसा नहीं। यहाँ इमरे स्पान पर या भी मुनने को मिलताहगमन प्रेमचनबिसिष्ट मारी-मानों का परिष-चिमण बाईको बाम-समान से बा स्नेह है। मानेमा से इसने माकेबमा हो पाते है। बस्तुत मह सब बरतन के बीषन मे एसकी पतृप्त प्रम-त्ति का ही परिणाम है। उसकी प्यास ही नार मचाती है उसे । 'मुझे पो करमा से परेवा' और 'म नहीं वो कौन करेमा' -एक ही पस्तु को देखने से दो इष्टिकोस। रतन की रामवृधि में प्रथम कम ही प्रापाल है पौर निमम ही यह प्रभारमन्य है। किन्तु खनके राग के इस पभागारमा पम की मी एक पार पपसम्बिई और यह मर्मापा का पालन । कहीं भी रतन पत्नील को स्थनित मोहोने ती पौर सहित सो क्या रेसने पाने को प्रतीव सक मही होने देती यह बीवन प्रभावों से समता किए है पपना सान पीनता के सहारे टिकी है-प्रपा उसे कोप्पास भी है । इस प्रकार हम रेखते कि रन के जीवन के प्रभावात्मक पम में उसके प्रतृप्त पत्नील के साथ उसकी सस भावना भामूपएप्रियता पम्प का मान सपा सहन सीमता पारिकी विशेषतामों से की होने के कारण जिस सत्य की प्राप्ति होती है मारा-पासन । इस मणि-मासन के पवन में है कुष्टाएँ। वह पली है और इसका पति भी बीवित है प्रमी उसके पास है। दूसरी पोर बानपा का पति पर से मापा हुमा है और सामाविक है कि उसे एज हो किन्तु पर खम बीमार पति को मेकर कमाता माठी तो "माघ पसे (पानपा को) खन का असली रूप दिखाई दिया । यह सचमुच प्रमागिनी है पौर मुमसे पाकर। रहम का यह मणिपामन मस्तुत मुष्ठित पति का पावर है। इसरी भोर, रतम की रापवृत्ति का नामारमा पर भी है जिसके पार सम्बन सकी रोपा-भावना कम्प-भागता प्रषा मानप सहानुभूति पारि की निपटाएँ । बामप्रेम साहब से प्रसन्तुष्टि की तपिक भी पपिम्पक्किा मही करती। ऐसा मामास होता है से बह ठीक ही बासपा से कहती है मुझे वो कमी यह स्पाम भी नहीं पाया गान कि म पुरती पौर में है। बनम साल मति पसे सहानुभूति ही महीं अपितु यह पता समझकर उनकी सेवा ही करना चाहती है । उनके बीमार होने पर उसकी दय होती "प्रवर कोई मेरा सर्वस मेकर भी इन्हें मम्मा कर जि इस बीमारी की बर माये तो मैं पुपी से रेपौ। कमत्ता पवार या यकीम साल की पवनी सेवा करती है कि राम रहना परता है 'मुझे गई कि मुमे प्रया होकर तुम्हारी मा करनी पो। पौर र प्रभास बब किस बाते है वो नई विगत हो जाने पर भी रहे भोम रहता है कि मा उनकी मनायोप्प प्रेम विशिष्ट नारी-पानों का परिष पिए सेवा मकर सकी। उम परणों को मस्तक से स्पर्श पर पाब उसके हरप में कितना अनुपन उममा प्राता था मानो एक युप की सचिव मिपि को यह भान हो इसो भए नुटा रेमी। भाव के दिन वह अपने सारे वस्त्र और मामूपण महापान को दान कर देती है। विषया के रूप में उसके परिष को सेवा-मावमा को स्यामा पर मिलता है। यही खान पिसने सयों की कमी हकीकत न समझी इस एक ही महीने में रोटियों को भी मुहताप हो गई थी किन्तु पति की सम्पत्ति को समेटमे बामे मणिभूपण के समम यह अती नहीं है। रमा वा बानपा के साथ या एक पांच में पता है और यही पोहरा माम की बेरपा को वो सहानुभूति यह देती है बामपा भी पहनही रे पाती। पन्तत यही विषया रतन की मृत्यु किसी रोग के भरण हो जाती है। भाजी. मन प्रमावस्त हकर भी उसने दूसरों के लिए भारों की सुख-सपा की दी। मेमचनसमों में 'वन की मृत्यु का पोक यह घोकमपा जिसमें पादमी हाय-हाय करता है बल्कि यह घोक विसमें हम मूक स्वन करते है जिसकी पार मी नहीं भूमती जितका योमरिन सेकसी मही उतरता।" इस प्रकार रवम के परिण में सामाविकता की एक बड़ी रिपमान है। वितु मानव-बान पर पापित होते हुए पी रसके सम्पूर्ण परिम को प्रेमषम्द परित विकास नही पाये है। यह बात बहुत ही बनती है कि विमा हो बाने के उपरान्त मृत्युपर्यन्तमसका पिषण उपम्याम में गुप्तप्राय है। पर पर रोबार सूष शिखर कर उसके परिण का प्रस्वाभाविक पन्त कर दिया पपा है। निरषय ही उसकी परिवामिम्पक्ति यहाँ रोपपूर्ण है। वस्तुतः यह अपराध प्रेमचन्द की उपपोनितावादी दृष्टि की मविवारिता का विषया खन को रहनि मत सने से तप का माप्यम बनाकर रख दिया है कि मापिक प्टि नारी बहुत ही पराधीन है। उम ममप हिन्दू कोर गित सी व्यवस्था भारतीय म्याय महिता में नहीं पी और सम्भवत प्रेमचम्म मे विपना लन स्स में इसी सामयिक उपयोपिता की मोर ईनित किया है। इसीलिये परसे समय मी रतन की पुतलियों के माने कार मौर बगीचाही भूमते रहो। परन्तु पप्प गर्व की रतन या विषया रवन में परि तुमना करें दोमात होता है कि पति-समाति त्याप के उपरान्त यो प्रेमपन में कहा था कि "प्रार सतके वास्तविक मोरन का पारम्म हुमा या पास्तविक जीवन' नाम की पस्तु खनचरित माम्पम मे स्पष्ट नहीं हुई है। एक तो मारी के लिए मधिकार प्राप्ति सी मायनो प्रेमबम सर्व ही वास्तविक बीवन की सार्पपता मही मानते (गोगन में मेहता का बातम्प इस एप्टि मे प्रप्टम्प है) पौर मरे ।
प्रमादरे विशिष्ट नारी-पात्रों का वरिपरिणाम हैं - इसका पर्ष यही है कि यौन भावना को मुठताया नहीं जा सकता उसमें मारम-समर्पण की तीवता होती है गिसकी पूर्ति का स्वाम-सापन होता है सम्म विना । मो विवाह-पूर्व की निर्ममा में पीन भावना प्रधान पर मम्भीरता मागुप्ता एकाम्तप्रियता भाई-बहनों के प्रठिबागम स्नेहचीनमा निराय एक प्रनिष्ठामकिया इना पारि--सकी म सम्पूर्ण परिष-पितामों में बौन भावना पपा भाषी पत्नीस्व की मिनासा का सर ही प्रपाम है। उपर्युक्त रेखाएँ निर्मता के चित्रण से पूर्व ही प्रेमन मस्तिष्क में विध मान थी। उसके पिनाह उपरान्त रम्होने इन रेखामों में रंग भरने मारम्भ कर दिये । मौन भावना की पृष्ठभूमि पर सर से पहमा पबो बम्होंने भए पापासना का समाप्तीपर । निर्ममा के परिण में सर्वप्रमुख विधवा यही कि उसमें बासना का मूमन महीं अपितु उशतीकरण है । उस पिका स्वाम-मेव ही नही मयस्वा भर से भी प्रममेम है। विवाह की मार-माग नग माने से हो सावाषिक पासनात्मक सस्कारों की समस्या हल नहीं हो पाती। निर्ममा के मन में भी इठलाती हुई उमगें है। पति के बोसी प्रम-प्रपन को रेवर सके मन में पाता है इस पर में पान। "वह अपना पौर मोबन पन्हे नही रिसाना पाहती क्योकि यहाँ रेबने पानी प्राय नहीं है।" इसका क्यापित् यह कारण बा कि पब एक ऐसा ही एक भावमी ससका पिता पा जिसके सामने पर तिर मुकार, हराकर निकलती थी पर उनकी परस्पा का एक मारमी उसका पति पा। उसे प्रेम की नहीं सम्मान की बातु सममती पी। प्रत निर्ममा बहुत तक प्रपनी यौन भावना को मुरमा नही पाती । समम पासना तृप्ति पाहती है। मह उसे अपने समरबस मम्मा पम-पतिबिमाके से सम्पई का में मिलती है। 'मन्सापम से सपने बोमने में उसकी मितासिमी पापना रत्तेवित भी होती है और गप्पा मौ। स्पर्य निर्मला भी इस तप्प को स्वीकार करतीपाती है "यह म पानती है कि पपर रमा मन में पाप होता तो मैं उसके लिये सब कुछ कर सती दी ।" इस प्रकार निर्मना के परिण में पासना का निर्मूलन नहीं है नियुमरी पोर उसे एक माममिक रिपा की पीर प्रमाहित किया गया है। इसमें वो सह नहीं कि भारतीय इप्टि मनुसार पसना को प्रपरा दूपित विचारों को भी कर्म ही मन्तर्गत रपा गया है किन्तु यह मी मुठ नहीं है कि निर्ममा रती सपना रे सहारे हीधी चौहै। मम्माराम हे प्राममन को पाकर या पण में भी उससे मनुपित प्रेम करणेबाबात म मोष एवी पी-पह प्रेम पारका बन है दिमती पहा हमारे विचार प्रसनकी निर्ममा ने ही सप पपद के बिपिष्ट पारी-मानों का परिणचित्रण ऐकतीपयों में करना होतेए मौ निर्मक्षा के इस प्रम प्रसंग भ महत्व इस दृष्टि से अधिक है कि उसी पार पसरे परिण में स्थान मारप-निदान एवं मन्य मानवीय मदनापों के साथ ही उस रपारस का भी दूमपात होता है कोसी होमी मुभा आफ्टर पवि एकाच विला निमन्तख भी सके अतीत को गित नहीं होने देता। यह एक पार परमपितु सस्प बात है कि सतीत्व एरा का पाठ उसमे पति है पविक मन्साराप के पास से पीता है। एम्स मम्साराम के लिए सपने रत की परिवार र तक रेमे को तत्पर हो पाती ।। ही पृत्यु पाचीवम उसकी मासों के सामने मन को पता है मिसके माप्पम है मम्माराम मै उसे नामक प्रमाणित कर ए पो सम्बोमन द्वारा माल गम्भीर पर मोर मनरा होने की प्रेरणा प्रदान की पी पौर इस सत्य कीयस्य करा रिका पालन नही पई से सिर रखा। रश्मिामी जैसी कठोर एशि मरकामा निर्ममा परिजरी पाय पस मे कारण मर्म होना परता है। बाबा साठा निर्मता की पालना का उपात्तीकर पारिरिक प्राकारलवा की अपेक्षा परिस्थिति सापेश पिक है। हमारे मिधार मही भारत का प्रषिक सामाजिक एवं शिक्षसनीय है-मापनी (परमान) एवं मुमन (सरा-सदन) पारि की परित्र-परिणावि से भी पी प्रति सिपहनीय। निर्ममा पति की इस प्रमुख विशेषता है सहनशीलता । एक को पनमेल विवाह गरे प्राषिक हास और विध पर माईस्म-पम्प । सामारिक ही निर्मला पन्तमान में देना ही की प्रतिभाति हो। परिमपी भी करती है तुम्हारा पग पग महापमी। निवप्रति स्य-माओं की बोपर सदि हरियों की साफ-मक विपिन अपरामों का प्रारोपण पार रामही-निर्मला को हर समपर पिसने सपरिसर में शिपाय मागासी मती पी पी गितको परेला मे से मशाहीन-मा कर रखा पा! 'मन' की रतनपति भार नहीको रतन का समय तोबा इनके प्रति मायाप को सादार टोकिया मा चितु निर्मला को तो प्रभावामा हाम्लना नी मम्रीय नहीं है।बह दो से पनी ही समान प्रेपार पमा में निर्माता की रमा विहीन भी दीपप हो पीपी मोम को मपनी मोर पाते देसार नाना पाहता पागनी जा रमनना है पौर निर पाया है. पं काफी कर रह भाता है। सर ही परते पद मिर्ममा बीपन से पामौता पिाt पमान मही।
t૨૨ प्रेमचन्द के विसिप्ट मारी-पानों का परिवचित्रण निर्ममा अपने कम से भी कभी पुरानी हई है। पत्नी के स्स में पहिणीम में विमाठा केस में पुत्री मनिमी एवं पोलीस में- सरा नसमे प्रत्येक सम्भव मारा का पासन किया है। इसमें मेघमात्र मी सद नहीं कि पति से प्रेम इसे मही है पन्त में तोताराम पर पर घोड़कर पावेतो भी एसे उनके लिए नाच नही होता मपितु नहीं बची भषिष्प की एक ऐसी चिन्ता होती है पो गई कान म दावे के प्रभाव में होती है। पोताराम के प्रेम-परामरते वितृम्मा ही नहीं दीप पणा भी पी । फिर भी यह एक सियाम से हम नहीं है कि उसमे पनको सम्मान ही नहीं दिया उनकी सेवा ही नती की पहली का मेवा-चोखा ही उनके सामने प्रस्तुत नहीं किया पपितु सम्पूर्ण मानि को तम्म + भाषन में समेटकर सरीरन मी रिमा-पिता के समान पुष्प की पासना को परमम्म दिया है पारमौरस म्मिा है । पहिणीम में उसने सबको मिलाकर फिर स्वर नाया है। विमाता होती ह भी महसीस साहा (पति) से अधिक सरकों मषिष्म के निपम में चिन्तित रही है। पुषी के रूप में उसे पए की भांति जिव पर में हरिया पया है भी उसने अपने पिपच की मरमा का निराकरण नहीं किया है। गिनी के रूप में उसमे रुप्सा को अपनी सीपुरंधा नहीं होनेरी है मौर सोपी के रूप में भी यपि यह बहुत सपत नही ती मी सिमातिनी नहीं बनी है। वस्तुत कम्पके घेत्र में निर्ममा सबके प्रति उप-न-कुप परस्म ही है, मही ही तो अपने प्रति-पिपुग्न होने के अतिरिषदी पीच पामोष म निर्मता के परिज केस पा को पतिवारी भारत के मन्तवत रखते हुए प्रस्वाभाषिक व्हाया है। हमारे विचार , कैरम निर्मता पम्पास को पा मेने से ही ग भान्ति होती है प्रेमचनको नाप भावना से प्रथमत हो जाने पर पह प्रसपत पतिरिक पप ध नहीं प पाती। पोड़ी देर के लिए पार्ष प्रतिपादन की प्टि से से दुष प्रस्वाभाविक मान भी दिया जाये तो प्रश्न मा ग्या है कि इसके पतिरित निर्ममा के परित की प्रोर मा निर्माचारमा परिणति हो सकती पीको प्रवायोत्पादकता के साथ ही हमारे मूपों का हमग मीम करती ! निर्मता का मातृत्त भी उसके परिष-सफ्ठम में महत्वपूर्ण पा है। पार सपम्पास नपा समस्याओं के समान में पुपती के पत्तोलमयमा मसाल समरा विस मातृतको सपमित समझतप्रेमचम की निर्ममा में उसके पार पारम्म से ही विचमान है। बोताराम के रोते हुए बालक को पोर में निम हर उसे ग तुष्टि हो पी मी पो ममी तापी नदी।मान मपनपिसिष्ट भारी-पाचोंबा रिक्षण १२३ पदमी बार से पारमदेखना हई चिसक विमा पाप नही पुनती अपना करम्प-मार्प नहीं समझना। यह यो निर्मता का दुर्गाम्म कि पिमाता कम में मका पारसम्म मा दया पर्याय से अधिक नहीं समझा गया पर अपनी मानी कम्बा की वाम देने के पराम्त उसे से पीने का सहारा मिस पाता है । "पासिका कोप से तमा पर मापनी मारपिता भूल नई पी माकृत के इस सदगार पर मारे देश रिसीम हो पए थे।" का पति नीति परासीन हो बाताबो यह मन-ही-मन पायाठी है अमर तुम रके दोरीबाहे हो तो पाय में इस पर तुम्हारा साया भी म पोली। जिस रान मैंने श्वनी तपस्पा मार पाय है उसका निराकर एप पम्हारा हपष्ट नहीं पाता ?"--पस्पा शपी माही मर्ममा की भारमलाही पानी होगी कि इतना पवन है कि मपिम्प में या कम्बारे विमति विपत चिम्तिव एड्नी और पति पाये में मादे के रिमों में एक-एक कोही रात माने जनठी है । मरते रमता निर्मदा को यह चिन्ता नगीहीएवी पाया इसमिरे कि विस कम्पको की अपनी मा मिना नहीं पाtी मातृत्व की एपहर प्रतिक्रिया रपे वय कोरती रहती थी। स्प मापारस्त पिपतामों के पविरिष्ठ निर्ममारपरिष में उसकी मित्रा मुटिया भीम से एक महरि पारेप की पपस्मा उपरान्त पर मन में समाई हुई प्रथमा प्रब से निकली बात को तीमी है। ऐसे पपको यो फिल्टी तिहार का किसी के बम्पका कारण हो समाष २ पाना एक मार्ग मोरी होती है । मुगा पति की मृत्यु रसकी इमा पचापपानी का परिणाम है। वो पासमा स्मी सरसके हारा भीमनिषित पीपी मारे पति के प्रम में श्री का प्रभम्प नहीं पी। इसी प्रकार निर्मसापी पारिवारिक समसामनाने पर से पार उसकी पारम-सम्मान की मासना को किसी सीमा सरयोग रहा है। पीर कहीं नहीं तो क्या के दिमाह में पति के समय उसी मिथुम्पा के गिोही सहप कासग करोगावा पारिस या। यहाँ का परिचय पान है, परि मन्तिम प्रभावोसारन ही स साकी कसोटी सो निरपर ही निर्मता की पमिति सम्पूर्ण प्रमचम धाम में जोर लिममा भारी-चोपन का एक सरलतम प्रमाय है शिसे पाइने उपयत समाव के प्रति प्रेमपाद एक पिकाम में प्टि रोबर हो । प्रपिकास पानोपों का मत है कि निर्मता में भी प्रेमसम्म । प्रेमपाल विशिष्ट नारी-पापों कावरिष-पिपरा को विवाह-समस्या के हम का कोई पोर नहीं मिमा है। हमारे विचार से बात एसी महीं है। सोफिया की समस्या समापानरहित हो सी है गुमन पौर मारपी भारिपरिनों की समस्यामों के इन प्रपूर्ण हो सकते हैं-पितु निर्ममा मे अपनी समस्या का हल सम ही हमारे सामने प्रस्तुत किया है। उसको समस्या है अनमेल विवाह की । मृत्यु-पम्पा से संबंध के रूप में पखने उसका समाधान पोका है “निर्ममा की पांच परमेय से चलने समी। फिर पाट पर मैट मा पोर मन्त्री को मोर एक ऐसी हष्टि से देश को उसके भीषन की सम्पूर्ण विपत्ताया की पर पामोपना भी पाणी में इतनी सामर्म मा" पस्तुत यहाप्टिपही पिसे निपमा' ने चोरती पत्पर में जो मार मा रोई नहीं कहा है। निर्ममा पान भी कह पी!"बन्नी को पापकी पोर में घोर बाती है। भयर पौती-बापती ऐवो किसी पोएम में विवाह कर पिएमा बाहे कगारी रबियेमा पाहे विय कर मार गमिएमा पर अपात्र बिसेन महिएगा इतनी ही पापसे विनम है।* मुनी मुम्ली प्रेमचन्द की पमर-पाच-सप्ठि ।।बीपन की विरक्तिमक लिया नुभूवियों का सारिणा परिवर्तन कर्मभूमि' की मुम्नी पिरिम में उपसम्म होता हैसा सम्पूर्ण प्रमपन-साहित्य में नहीं मिमता । मारपीपषमा नी की भांति मुन्नी को वीराने में नहीं बो रिमा पमा है। मुन्नी दो एक ऐसे पर पर मप्रसर दाबहाँ पपने पराये का भेद भाव मिट वातावहाँहरण की प्रपाह मेरमा समिप मोकमंगल की पोर मा माती पौर बहाँ पक्ति परम्परागत पापों के पाप को जिन-विमान रखामा पारम-मिप्य के सहारे पावन है प्रारर्म समता पर बिनम मार है पर सठने का प्रबल करता है। मुन्नीपरिष के तीन मोर स्वत स्पष्ट है। पहम मोर की गामा पति गा से मेकर पति की मृत्यु प्रपना मारमहत्या के प्रपल तक की है। पति साप मुन्नी सम्पर्कको पमिम्पमित मपि बहुत कम है वापि उसके पलाल साप की पापान यहाँ पर ही होती है। प्रत उसके बीवन इस पम को ससका परली प भी कहा जा सकता है। पत्नी म में मुन्नी मतोल रसा को सर्वप्रथम मात देती है। अतीत को यह परिणीता की एकमात्र बचप्रपापिनी सप्ति समझनी है। इससे पवित होकर एक मारी धमार की और मपनी गरम पिरमाची पोरे सिपाहियों तौल बगित हो पाने के सात मुम्नी पाठीवन किसी भी पति की कामना को मन मै समुचित प्रमशन लिपिष्ट मापमानपरिष-विषण ५२२ स्थान नहीं देती। यह उस परीमार ही तिरस्कार नही अपितु उसके उठीत का सपके लिए मपहाण पा । प्रमचनसमों में उसकी मिस वस्तु का पाहरण पिापा उसे फोन रिमा सवा पा! दुष्टों को मार गनो पसे तुम्हारी न्याय-मुदिको प्रयोप होमा उसकी हो वो भीरमानीको गई। मुम्ली स्वयंम्पावानर में पापो है "म तो गवान् से मनाती है कि मिनी बरी हो सके मुझे संसार दे रख में बरपायर र पापो को कर पमार बाहे उस स्थान हैमरे सनदी अपनी प्टि में ही र सवालको मृत्यु हो एकीम सतीत्व की मिस यूठे पर यह पार भी किसी से कहने के लिये विमविता उस्ती में तुमारे पति को पपन पठि हारमोने योप्प मी नहीं समझती कितना पर्वा उस पप पलीत्ल पर। 'मेपर मारा-सा पसार पिसना समय पापार भीमा इस पाको सुम मही पाई है किन्तु पार तो मा एक कहानी है उस पार बी के सतीत्व को बरबह एक पानी बना दिया गया है। पुलमी दो उस कहानी की पार को हो सनसे कोई नहीं न साठा या रसकी मपनी सबा-सा लिए अपनी । सवीरवारमा के हेतु विस बारम-सम्मान की भापरयता होती है तो कभी नहीं शोक सोपी पौर पर भी। ती परम सम्मान प्रेरणा सही जो पोरों से प्रवियोष निया है चसन पोरइसी के कारण ही पसमा याचन को एकप भी देती है।परे की बरा को पापारम-मम्मान में बापक समझती है।कावी है यह " तक में पपने पाप को इस पोचे । गमे हुए पी रियामर मेरे मुप से कानिट पर पोर भर मुझे भी अपनी प्रारबहनों की तप विकास पार सम्मान दिनेगा। परन्तु मन को मिग स्वार से किसका पेट माहै। परिवार सरकार मुझे धोरमी मेरे भाई-बल मेरे बने में फूलों की माता की गात र मुझ परमपत्रिों की बरसा मोरोपमा मया पप गागी! हमें बीवन इसलिए प्यार होता है कि हमें अपनों का प्रेम पोर इसरीका पारर मिलता है। पर इनरो में से पर मिलने की मासा घी नही तो बीपन पा है। अपने मुम से परमो प्रेयरग्निाच्या होपी प्रेम नहीं।" उन पन्नों में मिति प्राम-सम्मान की मामासाहीसे मरमे सीख अमित बीपन वितृष्णा होगावी पौरपदमारमहरपाका प्रपाल परवीर गमती है। सतील एवं पारम-पम्मान के साथ ही सम मेहमय बालस्य भी पसक परिपप्रमुग रिऐपता है। यदि सतील तुट पाने के उपपम्त यह अपने गले पर पपनी पापा नही पाने रेती तो भी समय मात्र मना १२१ प्रमचारिसिष्ट नारी-पामों का परिण-चित्रस पास ही पूछ सध्या । बामक बात पुरमा हो पया होगा।" मारी में बाते समय उसने बामक को दूर रेखा पा 'उसने दोनों बरें ना पीबी मानो पामक को पोद मे मे ही हो-प्रौर मूभित होकर गिर पड़ी थी। अपने ही चिए के मिए नहीं पपितु पित्ती के पिमुक हेतु मी यह उनकी नौकरानी तकन माती है। प्रमर का प्रपनी कमा सुनाती हुई मह पाती। मैं तुमसे पमा कई मादूगी मेरे स्तनों में दूध मी उतर पाया और माता को मने इस भार मी मुक्त कर दिया। इसी बस्सम मानना के सहारे ही वह पपने मेप पोषम में सभी के लिए स्नेह बिसेरती बनती है। इसके अतिरिठ मीषा के पहले मोह पर ही एक मोर भावना मी उसके परिण में नाव विसका कि उसके जीवन में विपेप प से उत्तरोत्तर विकास पा है।पह। समान-मयम की भावना । म्यायामप में यह सभी को सम्बोधित करती हामी यहाँ मेरी जितनी पान न माग्न सबसे में यही मिना मांगती है कि रस समाज के ग्वार के लिए भगवान् के प्रार्थना करें जिसमें ऐसे मरपिसाप उत्पम्न होते है।" वस्तुत' यही सपा पकाकर इस भावमा मनिम्प में मुम्नी को रेपमपित का फल प्रदान किया है । इसी प्रकार जीवन के पहले मोड़ तक पहुंचते-पाते मुन्नी के परिणम वासना का नम्न नृत्य रेत मिया ( समाज की यमा स्थिति को पहचान मिया है और सतीत्व पारम-सम्मान पास्सस्म मितृष्णा एवं मुमार पारिको बिपतामों को पारमशाद कर मिया है। मुली के परित्र का दूसरा मीड़ उसके पति की मृत्यु पपमा पात्महत्या के मिमे बिये पए प्रयास से मकर बेल-बमम की विकास यात्रा को लिये हुए है । इसे प्रामीण-विषया-पुरती का स्मशा पा सकता है। उसे मारमहरुमा के हेतु बरती रसकर एक चमार गचाकर मपनी रैदासों की बस्ती में माता है। इस छोटे-से मार में प्राकर रावपूवनी मुम्भी पूर्गत पासिन मुन्नी बन चुकी है और पूबर चौरी की विषया बहू के माम से पििहत होती है। प्रतः इस रूप में उसकी सर्वप्रथम विवेपता है उसका समभाव । मुम्नी लिए प्रम पातीप प्रापार पर मानर मानय में कोई मन्तर नहीं है। बमित होने पर पिस पारम-विस्मृति एवं सामाधिक सम्मान की सम्भावना उसे रामपूर-धमाष से नही मिमी पी इस निर्णन एवं निम्नवीय समाज में उसकी पूर्ण परितृप्ति ह। प्रेमपम पमों में 'यहाँ उसका पार मान है वाप्रपनी पात- पौत मूमना, पाचार-विचार न गई और पीपाति की मुपन पतों साप प्रपत्र बमकर पानम्वपूर्णकराने पी। मह पर की मानकिन दी बाहर का सारा काम पर करती भीतर की रसोईमानी पटना पीसमा पोमों समय विधिए भारी-पात्रों का परिण-चित्रण १२० पनियां बरती पी । पर बाहरी न पी। बोपरी की गह हो या बी। यह अब सारे पाव की मामी है और इसी में पारम-तुष्टि मी अनुमय करती है । प्रपन माचीन सामाविष्टाप की साया तक भी मन नपती है। प्रमर मिसन कि पूर्व कपिट मुकरम को बीतने में उसकी नैतिक सहायता की होती है पर पपनी पामिजात्प पारिपारि परम्परामों के कारण पहात्माप करके भाग्यवछ मुम्मी को गौर में पा निकलता है तो यह उससे कहती है तुम्हारे हाप पोड़ती है यही किसी से रहना नहीं । अस्तुत यह षमार के एक सपाकषित चिरा उत से उतर पर नीचे पाई है पर उसने इस तप्प को पहचाना है कि यहाँ को सरलता एवं पारसजता हो की मानमर्मा एवं परम्परामों से पार वर्ग है क्योंकि यहां भी अपने बह पोरे-पीरे यह भी समम पाती है कि यदि वास्तव में ही हमें निम्न-बातियों में कोई नाति नानीtो मह कोट-पवतून पान कर कारों में बैठकर नही पपितु उच्च ऊँचाई से एक परम नीच उत्तर पर गर्म हिन-मितकर ही प्रसारित की जा सकती है चाई पर बैठकर पागार मपा ने में ही बेहवर एवं वास्तविक यह होता है किमीचे उतर कर पर्व में पर हुए पति की गौह बामकर से पपनी रिचारपूमि तक नामा नाये । इसके लिए पावापावा होती है उस समभाव मी पो बवरणी से नफरत का रस में यूपये प्राणियों से नहीं। जिस प्रेरणा एवं मिस ग से मुम्मी समी गामीणों से मृत-गो-मास के भमण की सोग मेती है वह उसके उदात्त सममारपी प्रगम साक्षी है। उप इस सममाप को उसके परिण के साय पिपामा मही पपाई पपितु, सेवा प्याग एवं अनिवाम र पाबार पर रिपवित किया गया। पो-मांस की भोर भपते हुए मारों के मामे पद गरन रेफर करती है “पर बनापोवामा पाला परासा मेरी पर्वन पर होगा। परसोई गुनी की समभावना बीवन म मरे मीर में उसो परिषी एक पम्य भाषामक निवेपता भी सर्व प्रमुष्प से विकास की मंतिम बार पहुंची। पर उसकी प्रेम-बारना । खनी सस्य एवं सियसनीय राप-भावना पायरही प्रमम्मिी पम्प मारीपाप में उपमम्म होजी हो। मुम्नी को पमा से प्रेम और धम प्रम प्रमूम बानर की मार पासना में {--इस सप्प में नई सनेह नही पिम्नु मुन्नी प्रेम सहष्टि गे महत्वपूर्ण है कि रतौ मानना का उदात्तोरण है। इस प्रेम में से पमर के बाप की नहीं पापितु बीवन साप एक रापारमा तार में बांभरिया है। गोबर के प्रथम मोर पर जिन जीवन वितृप्तमारए उसने पापा “मन मेरी पापमे यही मिती है कि मुझे पिार या मिी मरे तोरपान में १२८ प्रमचम्ब निसिप्ट मारी-पात्रों का परिण-सिमरा मेव गोषिय" विरक्ति सम्बनत उसके लिए बीवन में मोर भी अधिक पुम्हार्यों की सारिनी होती मितु पपरम्प में एक साकार पापार को पाकर पहबीपन-स्वास्थ्म की पोर चिची है । शारीरिक तृप्ति को यह पब तक गत परम पुषी पौरमापायद यह भी मानती है कि प्रमर परिवाहित नहीं है पर इससे उसकी धारणा में कोई अन्तरमही माता । उसे तो केवल स्वनी बार कि चमारों की पस बस्ती मे कोई ऐसा पहुँचाहमा भी होबो उसे सही रूप में पानी समय सीमा पार से बार-बार करती है मैं तुमसे और कुष नहीं मांगवी। बस इतना ही चाहती है कि तुम मुझे अपनी समझो और यह मुम्नी ही की नही साधारण से प्रसाधारणतम पति की भी मुख होती है कि कोई उसे ठीक समझे। अमर पसाचारण गुलों से युक्त होते हुए भीमर मुन्नी को अपने साथ भाग पमने को कहता है तो यह अनायास ही उसके मुंह पर हार रहती है और कहती "बस पार कुपनहीं मना । मई सब एक से होते है।ममा मातीपी तुम क्या तमरुपए । मैं तुम से प्रवाई नहीं करती तुमारी खेती भी नहीं बनी। तुम मुझे अपनी देरी समन् पो यही मेरे लिए गहै। इस प्रकार यो प्रेम की परिपुष्टि सेवा में निहित है। समर को कोई कएन हो कोई मानसिक दुधमहो-ही उसका प्रेम है । ममर समार-सेवक उसकी परिण-गरिमा कापस मुम्नी को ससकी निरवर चिन्ता नमी यी है। तुम कहाँ पाठ हो कर तक प्रायोमे"-षा पर माश्रित अपनी प्रेम भावना का यह स्तना पषिकार पो समझती ही है। हो प्रमर साब मुम्नी के मान एवं हास-परि हास कोपकर एकरो यावापी माहोलको ने बह पारणा पण की किब तो मुली अमर हायों में युतनी है किन्तु सामायिक विषमतामों कारण यह बी-रबी-सी पतो है, प्रेम की किसी माती प्रेरणा के पास नहीं। हमारे विचार से यह ठीक मुली ममर प्रेम की कमतमा परन्तु इसका कारण यह एप्रिमर के बरमान पर प्रभारसम्पमा बीरे-वारे उसे प्रषिकार का नहीं अपितु पना का विषय सममती पाती है मान पर हास-पिास या इसनिय करती है कि प्रमर पसे मामीपणा । सामाबिक पिता नाम की कोई वस्तु रसके परिण मोड़ में नही है। भारम-सम्मान की पामे ती भावनाही भव मी सहमें मिपमान गितु उसने विमानता काका पारण कर रखा है। फिर भी पर प्रपाम पम्प कसवा है किपर अमर से सगाई पो नही कर मेवी गोमा बिह-सौ करती हुई बहाक के पत्तर रेती है 'चम मेरे मन में यह बात मा मामयी तो कोई रोक की म सकेमा । मरि उसका प्रेम बासना पर प्राधारित होता तो सम्मपन बह प्रेमचन्द विषिष्ट मारी-मानों का परिष पिए १२ इसमा निस्सदोष उत्तर नो पाती को प्रेम का सम्पूर्ण कि उसके सम्पूर्ण यादित मामरों से बाब सो सम्मुर सहा मस्मित रहता है। अपने पली- पक असिम्ले त्रिम मसे में जब भमर उसके प्रति उदासीनता प्रकट करता है तो यह सब कृष मापतोम हती है "तुम्हारे मन की भाव हमर रही है मरिन तुर्म प्रमो मया है। इस प्रकार मुम्नी का प्रेम पासमाहित विहीन एवं सेवा प्रादि बीवन के उन्म स्पों पर भाधारित है। इसके विमा उसका जीवन एक एक रेतीसा पहा मन पावा है। पति की मृत्यु के पराम्परपमर बहती है पर मरते भी न बता किसके लिए मती-और प्रमरप में उसे यही पाचार मिला है, इससे मपिक नहीं। प्रेम की इस सत्त-भावना प्रतिरिक्त बीयाफे सो मोड़ पर पास्म-सम्मान एवं पामोलान पापि की विशेषवापों का समाहार भी उसके परिण में हुमा है। पक्ति में परिवर्तन मरि उत्पान-पिता की पोर नही इम्वा सा मुनो के पसुतार र एक हीन कोटि गोषन हातानिसमें मनुष्य कोचत मान प्रासों की चिन्ता पती है। पारती है 'बाम उन प्रिय हाती मोमी भोर मीच मने पना पाहते पिसमें माष मोकिमी के नाम घिर नहीं ना करना पाहता या मर भी सकता है। इसके साथ ही एक मापक महानुभूति को भी उसके परित्र में प्रथम मिमा है। गांव में स्थिी मे मी सका विरोग नही । पूरीमरीमा पिसमी समस्या में एकदम ही पाय पीना घोररता है तो मुभी चिम्वित हो जाती है और महती । तुम बनके (पमर) भने में न पामो रादा । पर पोड़ना तुम्हें भामुन करैया। कहीं हमें सर होने भो।" इस प्रगर की सहानुभूति उस पर से ही नही पौष भर मे ही मही प्रपितु समस्त पसीना मानव-सम्पति *याय है। यही पर है कि उसकी गिबासा समान एम रेशमी समस्पामों प्रति परली पाती है और मिनी ही भपिक पासातवी है ग्वना ही पपिक सय पत्तिय पिगम्भ हसर पुम्म एवं पोपण के प्रति किवि भर पठता है। मोती। हाकिम सार पर राम का वो पा रयत का इसी म मुनेवा? और कर इन प्रान का स्तर से प्राम बारात्मर मिता तो वह बन पाती है और रस बाम में ममीको हान्तिमय देना बाहती है। समर को बब मुकमोरेवापुनिम एमसर मे मापी होती है तो मुम्मी से नहीं रहा गाजा र पिस्सा रटती ने पने बरे पापामार मो मोटर।" पोषण मटिगिरमा पापीमा स्परही पाये बनकर उसकी पति की भावना में प्राण मरवा रहा है।
प्रमपदक बिपिष्ट नारो-पायों का परिणचित्रण इस प्रकार हम रहते है कि मुन्नी के परिज के इस दूसरे मोर पर समभाष प्रेम त्याप सेमा प्रारम-सम्मान प्रारमौलाम मापा सहानुभूति एवं किसी सीमा तक बिद्रोह प्रापि रिसेपतापों का प्राधाम्य है । ये विशेषताएँ उसके परिण के पामे मा की ही विपनामा का परिस्पिति-सापेष विकास एक पाकस्मिक मा भस्वाभारिक स्फुरण नही। यहाँ का सतीत्व यहाँ पावन प्रम पी पोर मुा गया है प्रारम-सम्मान मिग्रोह की पोर सम्मुख हो गया है जीवन की वितृप्ता को त्याग बनियान एवं सेवा की पहचान हो गई। यहाँ का पासस्प यहाँ के समभाव म परिणत हो गया है और यहाँ की समाज-मेयम की भावना पारमोत्थान एष व्यापक सहानुभूतिमयी सक्रियता की मोर पग्रसर हो । तथापि न समी विमपवार्यों में कोई निश्चित बिमारक रेखा मही मीमी पा सकती। ये सभी एकसरी की परस्पर-पूति है क्योंकि मानववा का तन्तु इन सब म प्रमुख रूप से मनुस्यूत है। मुम्नी के परिण का वीसप मोर महन्तगी के गुण म्पबहार से मारम्ब होता है और उसकी सम्पूर्स येम-पाषा तक के विकास को समेट मेवासे मुन्नी का सेविका सहा बा सस्ता है। इस रूप में उसके परिणी सर्वप्रमुख निपपता है रेशमन्ति पार पम्पाय के प्रति मसहनसीमता म्याप की भरपूर मांग रेघीय समस्यामों के प्रति पारर्पह सत्यनिष्ठा एवं स्वार तप सेवा प्रारि पाप पारिभिक पिरोपवाभों का चित्रण बसी की परिपूर्तिक हेतु हमा। निर्णन समान के सम्पर्क में भाकर तपा प्रमर से महती प्रेरणा मेकर मुन्नी रेसठि की पोर सम्मुप होती है। सामाषिक समस्यामों को अब यह पूर्णस्पेण समममी है।कहती । "बिसे गरी सही रह पूसने को तैयार है। हम पमा करने को मही मापते न हमें भोर-पितास की इन्दा मेकिन पेट की रोटी पोर न सपने को कपड़ा तो चाहिये । इस ममस्पा + मुमम्मका सर्वप्रपम साधन उसके पास यही है कि अपने प्रहको पम स्तर क विकसित किया पाए पाहाँ पहनकर पा निरी एवं पसीन भाव से पम्याप को सहन न कर सके। इसीनिये मुम्नी का पहं यहाँ प्रत्वात गागृत है। पैन में पीपीगरिन तक पी गट-सपा को सहन न करती हुईमा पहती हा रानी बनकर पाई है। किसी की पाकरी करना मेरा काम माही । “समनसी से कहोगी तो मैं तुम्हारे भगो के पर में मार मपा भी मरिन मारमा भय दिखापर तुम मुमसे पगा के घर में भी भाग नहीं सपा उम्ती । "वना समझ रयो। मुम्नी समझती है कि इस प्पापक प्रारम-सम्मान के सापही म्पपिरिण में स्पाप आप पा सेपाकी प्रेमचन्द के विशिष्ट सामानों का परिण-विषण गरिमा भी होनी चाहिये। सुभपा मारावास में कहती है मनमाम् तुम्हारा मनोरथ पूरा करेंगी। परी मसनर याने गासी रानियां बर पपस्या करने ममी को समवान् पररान भी बादी ही मे । देशभक्ति तो ऐसा पुरत है जिसका रमार परिस्थिति-सापेक्ष होता है। जिस प्रकार विपान मापर ही सरस र माटे के उपरान्त पुन परिमुग्ध एर प्रयन्त-भीमवती सी प्रकार धमक्ति प्रमा समागमति की नहर मी सामयिकामा रखी है। बतायुम्नी मी कारावास के बीरन के उपरान्त पुन' अपने म्पत्तिगत बीवन में रम reी मितु यहादबीबम को पार भी प्रषिक मुनसान एवं परनामय माती है । पमर को अपनी पत्नी मुखमा मिमा मुभी प्रब स लिए षणमीम मते ही हो सापारिक पपरा दाम्पत्य जीवन में महत्वहीन है-पहने र रसे भामा' हवामा बम 'मुन्नी पहन' कहा है रह-नए मात्र मचाकर से सससे ममग हो पया। मुन्नी को हो सराहना ये कही पनिक पात्मीयता की प्रामकता किन्तु भागोमासे बिताण शिमाई राजा मह अपने मापको नाना की पहन मिया में बीवन-सागर पिमारे परामोप पड़ी हर्ष भावी निस्वाम निट पमी ममप विरल-माप से सिर मुकामे पी है। पर नही पहीं है मुनी के जीवन में एक भाषा और सर्व मोर पा बापाविसकी भोर इमित काही प्रेमषार ने और रिया पार नही उसकी परिण-अनि कम करना है कि मुम्मी कमी है पीर पो पसी इतकी मीर पर मारठ पमा बाबह पापपामी होमेकमाते उसकी पहिया पानी से जी एवरगार बना गया है। नहीं पा ममी नाही बोगम की स्मृति सपकी मपनी है पसी की मार सी पनी है- देना उसकी प्रपनी है। जीवन मे कौन सा प नही था ? पत्नी म में धारिफ मुख मोपा विपास में परिण प्रेम रेन किसे है पमिदमी स में समान को परा है-ऐसा है या वो उसने नही रेखा है। कपना ? मही पब सभी समरे पपमेसकी पावन मापनेपर की प्रत्येश पावार पर साराम जाया रेपी। पनिया होरी रिसान दो पाली पनिया प्रमपनरनिर-समार विपक्षपूर्ण मात्पसंपनी मूत संगमा गिमा प्रमपवनाहित्य में पापोरा भातो रोज पहा है चोर पोलियो सनौरा तीता विषमता पर पापा - प्रेमपत पिपिए मारी-गारों का परिपत्रण की सोमष्टता के कारण अमर हो गई है। उसके परिन में ऐसा पहेको सुमिना घिमामो एवं मुम्नी मारि में लिए तो पा पर भर 'गोपान में एकाम्मिट होकर बोल ही नही नठा प्रपितु पनुपम्प मान को विकास रेखामों पर पासर भी हुपा। सप्टि से पनिया प्रेमपनकी प्रीतीय परिण मनिया बीपम में सा भए पनी पर पशम नहीं। मबाप प्रति विशाह का स्वर ही उसके पति की महत्वपूर्ण विषेपत्ता है। मनीष पर मायारित पान की जिम सामाजिक परस्याप्रमावस्मम प्रेमामम' की बिलासी मटकती ही पी 'पूसरा की मुम्मो भगानी हो रह मई, संग्राम' (मारक) की परेस्वरी माती पी पीर 'कमभूमि की मुम्नी मी निरिप पापार के लिए सकती ही पी-भनिया उसके प्रति मनामस्मक एवं तमा अपित सहनशीलता की उपेसा कर पापिरी घाँस तक समठो पी।विगोर का पूर्वाग्रा कर तो यह भी नहीं पता किन्तु उसले अन्त में एक पहप भमत्तीय विधमान है जो सही सन पहा है। "मरने विवाहित भीषण के इन बीस बों में उसे पच्ची ठए मनुभन हो गया था कि पाहे मिठानी हो बतर-पोत करो कितना ही मेर-सन काटो पाहे एक-एक पौरीको पात पमपर प्रमान बेबाक होना मुश्किल है। फिर भी वह हार न मानती थी और इस रिपय पर स्त्री पुष्प में पापे रिन पपाय पिता भा। समदीपसम्तामा मे मावीम बिन्दा तीन मरपन ही में मर गए । उसका मन पार मो कालापा प्रगर उनी बाबर होती तो पर पाते पर बह एक पसे कोसा भी न मममा नकी दी । उसही ही म सभी सीबत्तोसा ही मामलोपा पर गारेगारा पर गए ऐ बारे पर भरिया पर गई थी। सारी लगा पी रह मुन्दर रहमा म सोपमा हो बना पा और प्रमों मे भी कम गुमने मगा का पेट की चिन्ता ही के कारण होगी वो बीवन का मुमन भिमा । म रिसायो बीविस्पा ने रसके पारपसम्मान को साठीनता का दिया पाजिस परली में पट को रोटियां भी म मिमें उनके लिए इतनी पामरों ? इस परिस्थिति म उसका मन पर निोद रिमा करता था पौर-बार पिया ना मैने पर ही पसे पभाई का मान हवा ~-प्रेमचन्द के पलों में यह पनिया * मन का पनातीप। यही प्रमहोप बार-बीरे उपके परिण में ममाम्पसमा प्रति वितृप्या काप भारम र मेवा है। रमे रिकृष्णाम मपाव पस्या में गिम प्रारिक पाइयो पिणमान सिमुप पशाम ममार प्रमचन्द विशिष्ट मार-मानों का परिण चिमण सको पम्प सदियों पर परम्परामों कारण मनुष्य पी सिपस गरिमा को कुबम गमवारे अपने स्टोर नियन्त्रण म उसे विकसित होन का भार एक मही देतान्यो समान पति के प्रति चिन्तित होने का दम तो मरता है किन्तु प्रत्पेरापी परवाह नहीं करता उसे समझने का कप्टक नही परता। पुन प्रतिष्ठा प-मीप एक गाति भेद की प्राचीरों कोबो समाज रतमी नीय पर सही करना चाहता है उसका दो ग्रापार ही सहारात्मक है। सपिन निर्माण मा पर तो पारम्बरों से रहित होता है। पत बनिया महसूस करती है कि परम्परा की एषा से प्रपम एक मानव की एषा को स्थान सिमना चाहिए । यह दीव रामों में करती है 'हमको म प्रविफा इतनी प्यारी नही महाराबकि एमपीध एकबीपीएया करामत । प्याहता न सही पर उसको दाह वो पानी मेरे बेटे ने ही। किस मुंह पे निकाम देती । वही काम करेगा करते। मुरा उनसे कोई नही बोमता सम्हें पर्मक ही नही भगता । वही काम दोटे पादमी परते है तो उनकी मरमार गिपर बाती है मापट बाती है। परे भारमियों को अपनी मार दूसरों की मान से प्यारी होगी हमे तो अपनी नानी प्यारी महो।" पनिया को ऐम समान से भी मरत है पिसम गुप्त मेरा पारावार को प्रोरसाहित किया जाता है किन्तु पापी से तो पापी पाती है और इतना ही नहीं बदि कोई पठा हुपा हाप सय भुषार मिरे हुए को पामना चाहता है तो रमकी तपाणित गुटिक हेतु मिरिप णे मता रणापों एवं प्रायश्चिों मा रिपान किया भाता है वो उसकी मी मर तोर समते ।। समार को निणय का प्रनिगार है किन्तु पर निणय परिस्थिति पापेग निप्पम एवं निमोना चाहिए विभिन्न साचो पर पापारित मही। रमम पापों के निराकरण की क्षमता होनी चाहिए पापी ठिरपार माप की की।पनिया देखती है दिम रचि से दामारी पौर भी प्रषिक पदमित होने की सम्भावना है। पुरप सिौ बीबौह परमार बासना तृप्ति क उपरान्त मंद में कासिमपाकर पाप मरता है पर मारी ? पोर फिर ऐमा ममार? म कल्पना से होरी निया सिहर उठी । और पनायाम उस आप भूनिया एवं सिमिपा को पाप मेन * तर बा-"वही मामी गिमने होरी मिरा पिसी पुरप को पौष भरकर दया मीम पाइन पापिया कामो ममार्य समः पासू पोपी पी पौर रस पठायको पपने फोमरा दातों में पान्त कर रही पी गे हो चिड़िया पपने बम को परो में दिया मैठी हो।" बन ममी हो मुना-मुनार परती है मुझ में सना का रोना इममिये लिया पारामिने अपनी बाको पा प्रमचनविपि मारी-पापोंकापरिष बिमल 1 अपने पर मैं पहा । यो उसे पर से निजामकर सक की मिपारिन नही बना दिया । यही पाय है ऐं। मैं म एक मा प्रनाप एपी र एक कोडीग हमें नहीं पना है गिरी में । बिरादरी में पारहमारी मुतन हो जायेगी। अब भी पपने पसीम की कमाई का है तब भी पपने पसायकी कमाई वाये।" बनिया का बस चले तो या परीयों का रहसन पाते इसमोर सरकारी कर्म पारियों एवं सामायिक रेवारों को मोमी से सारे । जिस मुठी रबर की रमा तु निम्नवर्गीप पा सकोरी को ससा रेते से पीय समझती है। बाप उस गरीर की मरी है समापी भी रती पर दी होने को पापी है और तिस पर उपका पति कि मुगना पाहता है। यह पाकी रम्मत की रक्षा के हेतु भारोना से कावी है हरिया। अपनी माय की पार गमी फिर किसी दूसरे का पानसर तो मही पारा। तुम्हारे सहकी आत में यही निममता है तो यही लिखा । पहना दो मेरेशाप में हपकालिया। लिमा तुम्हाण म्याम मौर तुम्हारे पालन कौर नीम का पता परमा इमरी भाव है। पूरा मोर पानी का पानी भरना इसी बात" । पमिया कारि पति के पम्पाम के प्रति पत्नी का शिोह भी बोबर यसका सपना टासाधारण मानावे पुष के गुनाहों पर पावराण ही नामा कप्ती है। किन्तु पति-पस में बबरह मी असा रहता है तो निरा उसका दोष पुनियामाचे मही मस्ती । उसको पुर्वधा हो यह पति का सम्पाप ही समझती है। अपने पति को वह मुभा देती वीरोकिसी मई सेमा। जिसकी वारपार माया बसे मारकर पाएर म कमायेया। सम भता होगा में इसे रोटी-पाता। भाव प्रपमा परमभात देतो इसी नौर में देरी धावी पर मन पतकर पाती दिनी पोर इससे पन्या पापी पहन मी या हो । भमिया का सिर वत पारिवशिक मन्पाय के प्रति बीई विषम एक मार के प्राणों का साहको पौरपूसरा उपचाप परने पो मताओं को गिरोबार मानता बामे । उपरे अनुसार भार का गुम तो पीने का अधिकार ही हमी देता है गदर कामगार पून से नही पत्पर में शिया माप । इसके बिना पारम-मम्माम की रमा समप नहीं है। भो पर उसके पति कामह पम्मी पमा नदी पर साठी। पवि पदवी है र 'मने तुमसे मोबार हमार बार बारिश मेरे मैट पर भारपाका बतानन दिया करो सनहा नाम मुनपर मेरीह में पाप मग पाठी। साप गौर रखने माया उपही के पौष में मापी मनीही पाने? बमल हो ही होपी किस पर माम पागई। पाती फटी समपनविभिप्टमारी-पायों का परित्र चित्रण १३५ बाती होगी । पुष बकरे पाप को निमा विस्मृत नहीं कर पाती। एक रिलो माबर पास दो-तीम दिन के लिए पाने का प्रस्ताव किया। पपर बनिया पमी तर बोर के कोर धन म भुमी थी। मोर एक पैदा मी म मेना चाहती थी। -सक्षेप वही है पनिश का विद्रोही स्प। जैसा कि हम परमे कम है इस सस्प की बोर माह में नहीं करनी चाहिये । पस्तुर पनिया मिोह मार्स मावि से पषिक पनुरित होकर पाय पुष मानपामारी है। उसके परिप में इसका मूल पुष्ठित मारम सम्मान दिखने निरन्तर अपनी प्रमिभ्यक्ति एवं कार्यान्विति का अवसर देग है। यही कारण है कि निया की प्रपसा करके कोई भी मदतर ऐम मा मन्दा है। मोमा बारा 'ऐसा नदमी ऐवी सतीगर' मारिरिपों को मुनका गहमी नही समावी । मन्याय के प्रति पनिया की समूल गि भाषना में प्रारम-सम्मान की लीप ष निहित है। पीपन सोम पन्तव पडकी कमर हो गती है पर पर प्रयाय के प्रापे नहीं भुलीयपपि यह भी मस्प है कि परमार उसकी प्राण-पक्ति पर मानिरीम तक बोट कप्ता पा है। बनिया के हर नही पानी पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि पसमे जीवन में मुना मीचा ही नहीं। उसका कहना है रामबाब बाहे पत्थर होम समान कामबाब तो नाती नहीं है। उसने अपना नामांकन सम्मान सहित सम्पपा प्रेमाप के पदों में स्त्री-पुस्प दोनों से समाज को मोतीकिकोई रमा थापर नेता पोरसपर मुमार मी रितारेषा दिसकी मर्यारा पोपने पाने सुप की नीरमाही मो सच्चे। म गों के मन में प्राय यह भी विसामा पानि ममार को मालिका पारम्पक्ति को दमारा ध्यान नहा है, आप तक समस्या का कोई गो मुनिश्चित पोषा समाधान सम्पप नही। रनियापारिएकी मविपता मा किपा पा पात्य टिपपने पति की हती पहा पान्तरिक प्टि मे समकी पनी हुई पारमा भी है। हापा ममा पिपिया होरी पियुब पन्धरा हम दोरायपितल की पबसे बड़ी पूजी-मानश मुरमता एवं कामपालता वा राणा मादि मुण-पनिया दीका म्यापारिक सपान धाम से मरिकसरी पार पोपित वर्ग का प्रतिनिधित्व करता इमा रिन पाम र सीपन के प्रतेक मोर समशकले दो मुकावा है तो पनिया इस पोषित पनपन्तएमपी आन्धि है की पर पर सपने की हाम रपतीपी गौरन ही विनामों को पर्णा नही कर प्रमचन्द के पिपिष्ट भारी-पात्रों का परिण-पित्रए पाती। यही कारण कि होरी पौर पनिया दाम्पत्य में एक प्रमुपम साम अस्प है। पस्त्री की प्टि से मनिया होरी की प्रेरणा है सम्पूर्ति सर्वस्व है पीर समे पोषन-सर्वस्व मानकर पाती है। इसी से बनिया दाम्पत्य में एरपता पौर मापुर्व रो पोषप्रोत एक सजीवता विधमान है। यह ठीक है कि पनिया में म्पक्तिपत बीपन में निस्तर अनागों का ही मह देखा है और माम्म की पिसम्बनापों को ही पहा है किन्तु होरी से पति को पाकर से बह सब पुष विस्मृत कर देना पाहती है। दोरी मे उसको पीटा भी है बुरा-भवा भी कहा है किन्तु उसके बीमार होते ही वह मान का प्रषिक प्रणाम नहीं कर सकी है। हो सका बारम्प एवं दुर्मम हीरा है। बिना पाये कही बाहर पाने मगण वो पनिमा कहती है "परे रुष रसगानी वो कर मो ऐसी पती क्या है। पौर पर मजाक-मजाक में ही होरी अपनी मनोम्पपा को दबाता हमा करवा ! 'साठे तक पहुंचने की नौबत न माने पायेपी पनिया | उसके पहले ही बस " तो धनिया की सम्पूर्ण रामारमक अनुभूतिया से एक साथ ही भाना उटती है। पच्छा पने दो मत मधुभ मुर निकायो। तुमसे कोई भी बात भी कहे वो सकते हो कोधन' -मत्त मुहस मनायास ही मिल पाता है। होप पाठी माने पर रहकर पर से निकता ता बनिया द्वार पर दी उसे देर तक रेलवी दी। पर निपपा भरे पणों ने पनिवारेचोट खाये गए हब में पावकमय कम्पन-वा राम दिया था।बह पपने मारीत से सम्पूर्ण तप पौर व पप पति को पभयदान रेदी पी। उस पन्त रस से पासीर का मूह-सा निफ्तार होप को मपन पातर पिपाय मेता पा । विपन्नता के इस प्रगाह सागर मे सोहाग हो पा व पा चिसे पाइए यह सापर को पार कर दी पी। इसीलिमे तो बनिया सतीत्वको नारी की एकमात्र सम्परा सममती । मामा की पत्नी सतील पे भए हो पाती है तो पनिया कहती है मोता को 'पप तो तुम्हारा धर्म यही है कि मदास से उसका सिर काट मो। ती वो पापोम । फांसी इस धीवालवर से पम्मी है। पीर सही होरीको मन्तिम सांस मेते रेतकर पनिया को तमता है जैसे उसके बीवन पार पतील का प्रापार जिसम्वा ना पहा । 'भब गपित हो पौर विना कठोर करे? अपने पतिप्रति उसका बोर्म है क्या यह पसको बवाना पड़ेगा ? गोपीवन का सबी वा रसवाम को रोना ही क्या उसका धर्म है? पौर पावार भाषी-मोशन करा से भर यही समय है। धनिया यन्त्र माति गठी पात्र पो मुतती रेपी भी उस बार पाने पैसे मामी पौर - प्रेमषद विशिष्ट नाप-यात्री का परिवपिस पति को हाप में रखकर सामने प्रो हातादीन से बोमी- 'महाराम पर में म पाप है म विदा न पैसा। यही पैसे है यही इनका गोरान है । पौर पपरमार पिर पड़ी। पर बीवन-याचीही मही रहा तो बनिया मी ए पर क्या करे? किसके लिए लिये। बीपन मर उसने पति का साप दिया मृत्यु को प्रस्परा रह फैस पीछे हट बाये।-पही है धनिया का अमर पालास्ट। हममे ही पमपर पेबारिन है किन्तु माझ पड़ी सिणियों को पत्नीला पाट पा सकती है। गृहिणी पपवा हस्पिन म में भी बनिया का परिण महत्वपूर्ण गम हामीम बीवन की पारर्स स्वामारिया का प्रतिनिधित्व करता है। सप में उसकी मपम विशेषता है सहनपीमता । पापाय के प्रति मह जितनी ही प्रमहनपीन है पाईस्प्य विवरतामों को भारतमे ही पैर्य से भेमठी मी ।। मह पर की मासरिन पपत्य है किन्तु होरी रेपमा में म मासिकपन में गोबर की मां की दो पुति हुई है मह में ही मानता है। चारी अपनी रेब यनियों फटे सुपर कपड़े पहनकर निकाटती पीर भूखी सो नही होनी पकिन महर्मों के लिए पसरान का प्यान रखती थी। अपनी रह पर पहने माम पाना मीनपा पनिों के लिए दो-दो बार-बार महने बनवा रिमे।" होरी भाइपों को पची पमन दी कि उसकी परवामी हार में काम करने क्यों नहीं पाती। भार उमस प्रमम्पोसार मनापी होकाया पनवा तो धनिया से यही इवा-- परठो पर देखने वाला भी डोई पाहिए कि नहीं। मेना-देना परला उठाना ममासना-सहेजना पा कौन को। किन्तु भार तो बनिया कोपर से बाहर रोवों में भी काम फरमा पाता १ भरपूरी पर बीता पता पनिया पीर बीमों मारिया मा के 8 भिमे गीनीमारियों पप दीपा में सभी पाती है पीर पट्ट परफर दम मारने हीमपती रिवारीन की डोर मिर पर सवार हो जाती है पहम्पी समाप्त हेतु यह भी करना पड़ता है पनिया को। पर मे बाहर पह सक्रियता भीमिया काहिणीप की विशेषता है। सिम पर भी बहोरीका पार पनसान ही इन साप पग्पाय करना है तो वह रोकी और मारपी है-"-म पा में उसने प्राकर पा नहीं मा मिषितरह पेट तन नही काग पिम ठरह ए-एक सातको मी किस वय एक-एक पैसा मागा को हरा पीला किस परह पर मर को सितार भाप पानी पोकर हो रही पौर पालन मा तिनों का यह पुरस्मा" प्याप मी इस प्रकार भनिया गासप सप को विश्पता है। संबयों के पनारत महारों में प्रवादिय पति ।
प्रमचन्द विषिष्ट मारी-पापों का परित्र-पिपरा प्राप' विरोम्मुखी हमारते हैं। पहिणी-प में बनिया भी नास्तिक नहीं है। बिना यह को कि 'भगवान् बैठे मह सब मम्वाय देन रहे है और उनकी रमा को नहीं दौड़ते । नर पौर द्रोपदी की रमा करने एप से पोरे - भार पर्यो मीर में सोये हुए हमसे सत्तीप धारण कर सकती है । साप ही पनिमा एक प्रामीण पहिणी की मिित पुरक परम्परागत मायका-मुक मन्नागिनासो में मी पास्मा रखती है। यह पायाध को पोर बार बोमवी t-*गाय पाने का पानम्म हो पर कि उसका पौरा भी मच्चाएँ। ममवान् के मम की बात है। गा गाय को सात परवा के पावर पिपाकर रसना चाहती है उसे कि किसी की हाप्टिन नम पारे । स्वयं मनी उसने पूरा नहीं किन्तु रातादीन को कावा है भरे माही महाराज स्वना अब कहाँ पुपिया तो हो गए है। फिर महाँ रातिब कहाँ बरा है। इसके अतिरिक्त परिणी पनिया की एक अन्य विशेषता भी ।। पारम प्रशंसा की सामाषिक इन्चा होए भी ग मातिप्प-पत्तार में विपास एसी।। इस एप्टि में उसका मास्मि रुप स्वार्थ पर मामित एवं संकुषित नही है। पा पोखर को समझाठी 'भारमी द्वार पर बेटा। उसके लिए पाट-बाट पो राम महीरी उपर से मये सुनमुनाने । पुष तो मनमसी पीयो । भनिया के परिला एक प्रमापारण एवं पर्षसणानाम मोपविक पन उसकी मानवीय एवं पापक सहानुभूति । साबारस पत्नी यहाँ निपी समे-सम्बन्धिों को भी दर-दर से ही बना पाहपी पापनिया पर में तो पन पाम्प प्रबवितामोरे लिए भी प्रदुर मान गिमें मात्र पवि तामों की मशा रेता है। मुनिया एवं सिमिया के प्रति समका पबहार इसी प्रतामाम्ब उतारता का परिचायक है । विषया मुनिया को उसके पोबर पारा गर्म रहनाता है। पनिया इस पारर्महीनता को पपने पर पाई देखकर पहले तो पत्तेषित हो जाती है किन्तु परिस्थिति पर ठमे मन से रिपार करने पर पर होरी से इतना ही नही कहती 'रियो तुम्हें मेरी शाह इस पर हाम न उठाना गा पाप हो रो हो। अपितु मुनिया को विवाहिता की भांति रखती है और बब मुनिया का पिता उसे निकाम देने को कहा। तो पनिमा पत्थर की मकीर बीमती हुई कहती है "ती महलो मेरी भी मुम मो। को मात तुम पाहवे हो नही होपी पौ बाम न होपो । भुनिया हमारी पान के माप है। तुम बम ही वो म बामे को कहते हो मे पामो पर इससे तुम्हारी कोई ना पाती हो तो गोडमो पुगों की भावर बचठी होगे ममा भो। मुनिया से दुराई पर गिन दिन म्मने मेरे पर मौका ।
३१ - - प्रमपम विशिष्ट मारी-पात्रों का परिण-चित्रण में पार रखा म माद मेकर मारने सठी पी मेकिन जब उसकी प्रमों म मर मर मामू पाने माने तो मुझे उस पर स्यामा गयी। तुम सब पूरे हो गये मनो। पौर पर मार भी तुम्हें सपाई की धुन सबार है फिर यादो प्रभी बनी है। पमिपा मावो से ही नही समायबर से टक्कर मेती है मुनिया की रक्षा के हेतु । ऐसा ही व्यवहार उसका सिबिया के प्रति है। मुनिया तो मसा उसके बेटे की कुप मपती पी। परन्तु सिमिया पमारिन से तो मानवता के पतिरिक्त उसका कोई ऐसा माता भी नहीं है। रातादीन के बेटे मातादीन रा पर उसके गौ ए माता मातारीन उसे ठोकर मार देता है मौर चमारों की बिरादरी तकबर उसका बहिष्कार कर देती है वो बनिया ही है बो उसका हार पामकर पौर या होकर कहती है 'बह की कौन कमी है बेटी! बस मेरे पर । तना ही नहीं वह उसकी सारीरिक रक्षा को रेसती उसके हिस्से का काम भी स्वयं करती है। इसका सहम स्नेहमय मातृस्प से किसी भी पीड़िता को रेबार उमा भाता है और उसके हाप सहायता कुछ करने को मबस र है। यहाँ तक कि वह अपनी उस देवरानी पुनिया के प्रति भी अत्यन्त सहालातिपूर्वक पबहार करने समती है-निसके पति ने रसकी पार को पहर देकर मार मा पा पार उसकी सवा उसके पति की दोर अवहेलना की थी। किसी भी मतमस्तक को मुनिया पक्षम्य नही समझती। यह वो पा बनिया का मापक मातृत्व किन्तु उसका एक निजी मातृभम है वहाँ पहबम तीन मतानों की मां है। इस रप्टि से पमिमा एक सहर बत्सना एवं स्यापमपी बननी है। गोबर परदेश से भर पाता है तो पनिया उसका मिर मपनी पाती से नपाकर मानो अपने मातृत्व का पुरस्कार पामयी। रसराप पर से उमा पावापामार तो बह रानी है। इन फटे हात भी रानी है। कोई उपका मुजो उसकी प्रा देखे रमकाय सकीवान देखे । रानी भीममा गायवी। प्रौर पर मोबरठहर सा मादा है दो प्रेमवर निपते है पनिया बैठी रोपही पी से कोई उसके हरप को पारे से वीर हा हो । उमय मातृत रसपर के समान हो हावा पिस में पाम मय पर हा पीर सरपच भस्म हो गया हो। हर रोनेसिए मी स्थान नपरा हो।" पुष दयाबरोपमे बामे पर "पनिया को बार-बार मुम्न पी पार माती पवी है । रने की मां तो मुनिया दी पर रमन पालन भनिया होकरवीपी वात्मत्या यह मण हो रही विपत्ति को सुनावा हवा या। बीवन भर मनियाकोपों कोटमगाए जीने नहीं सुना हाप रटाते हुए पिसी मे मही रेषानुमा मब होने पर भी बनिया के पात्मात्य प्रपबन्द बिपिट मारीपात्रों का परिवणि मपमा मातृस्म की विशेषता यह है डिपापमो परनीत का साबन बनकर प्राया है। मातृस्प की वृत्तियों को विन से निकाल फेंना तो असम्भर है किन्तु मह सच है कि प्यापहारिकप में धनिया मे रस पास्सस्य को बरा सामना हो पति समझा है बो रसके पस्तीत्व अपना दाम्पत्य भाव के सामएस्य में पिण गमता हो।बह पामे पहली है फिर पानी है और सपके उपपन्त मामयी है। धनिया पति का एक ऐसा पक्ष भी है पो सप उसकी मानि का कारण है किन्तु विस पर रसका कोई सय भी नही है। बीवन की विषयतामों मे उसे इस मकार सोच रपाकरमार उसे दूसरे की सहानुभूति पर पीना परया है। घर में जाने को चनही है, वह स्वयं तो दामी पेट प माती है किन्तु परिकार पम्प सदस्यों की पा देशकर अपनी देवपनी शारा पहायता माने पए पनाम को भी पसे पहण करमा माता है। प्रेमपम के बपों में पनिया ने मनाब तो रमसिया पर मन में नामित मार पपमानित हो पीबी। इसी परिस्पिति का सामना पसे अपनी पुनी सोमा के विवाह में मोरला पाया है। पति से परोपकाती है "साफ-साफ क्यों नहीं बोलते कि मकी कोपने को पाते हो और सामरसता दो यह अपनी माफी को पिसी पना को सस्पती पितु यहाँ भी उसे परारित होना परा है-यही सोनार सन्तोष करना पड़ता है किनमेत प्रापुरे मनुष्य के हाप ही ही पाते-पीते पर हो वा ही प्राषिक शामिरे मह कितनी पराधीन है- म पम तक यह इस तप को मुठमा नही की। म मिलाकर गोगन के प्रत्येक स में पनिया में पपिस्थितियों से भी का भरसक प्रयत श्यिा है और मस्तियत क्षेत्र में बह एनसे भी मार उठी हुई है। यही कारण है कि प्रारम्भ कर मन्द दर बेदनामों से भरे गए उमरे परिण में एक प्राणपत्तामो विदी भी पाप की सहानुभूति को परपस पीच मैने की सामर्म रखती है। भार यहां पर पहले पनि में पिकमा का प्रान है वहाँ पो हमारे विचार ऐसी सावारिकता प्रेमवाद मिा भी पम्प मारीपान में पपममनही होती। एक पत्पन्त पीमित रोग भीतर निस कीवन जिस अनुभूति पर मिस म्पापा के साप पनिपा की मामिल पमिप्यक्ति रह सकी प्रभाबोराणासप्टि स हमें यह कहने पनि मी सदोष मही कि हिन्दी साहित्य दीप पमर-मिरिनिरा में प्रेमपन पूनरपेण सफल हुए है।
विपचन्द रिशिष्ट मारी-पात्रों का परिण-चित्रण पोविन्दी देवी 'योरान की योगिन्ती मोर पाप कहानी की प्रियंपरा-इन दोनों की मुष्टि प्रेमचन्द ने पारचात्य नारी से भारतीय नारी की तिप्टवा के निमित्त की है।मत यह स्वाभाविक ही है कि इनमें उनकी मारी भावना का पार गर्दाश्त मरा पया हो । यहाँ हम केवप पोरिमो देवी कोही में मोदि उमके पिषण की रेखाएं प्रिया से भषिक पुष्ट। मठ अधिक पिवसनीय 'बह बोबारको माड़ी पहने बहुत यम्भीर और विचारपीम भी। इम प्रारम्भिक परिचय से ही प्रामार हो पाता है कि मिस्टर खन्ना की पली योगिनी एक भारतीय महिला है। उनके प्यक्तित्व का प प्रत्यय भारतीयता का परिचायक है। पर प्रप्सरा म हो पर स्पाती प्राय है मेहुपा रेप मग्यापीन पनि यो एप बार सामने उठकर फिर मुक जाती है भय-विम्यास मुगम पोम यहि मुख पर एक प्रकार की प्रापि निमम गर्ष की मला मी मानो प्रसार के पबहार पोर स्यापार को हेम ममम्मी है". '-इन पदों में निहित र मग्मा पारम-सम्मान एवं अनासक्ति पारि विशेषताएँ पामिनी की भारतीयता दी ही ममिप्यरित है। बस्तुर पाविम्दीमा सम्पूण परिष एक माप मारतीय परिणीता दीप पन्तर्पत मामित किया था सकता है। पादर्य भारतीय पत्नी की मांप्रमुख दिपता होती है उसका सानपीस पाति बत पति मा भी हो यह माना गया है कि यह पपने को सर्वदा उमके अनु प्प राम पिया करती है। पति प्रणय पी प्टि में गोपिन्दी भी एक पवित पतित्प है किन्तु यह मर चुप होने पर भी गाना उसके मयंसह दमिता और अपमानिदाहकर भी मन्ना कीमती है। उममे भरेगी रोयेपी पर ऐमी उगी की। रनमे पृपा बीवन की कामाईपासना से नहीं कर एक भार वह गिर होकर बना मे दूर हो जाने की फरमा परती भी है परन्तु पुन पप्प-बग्पना पाप मत हो पाती है। भारतीय परिलीना पी मरी विशेषता होती है उसकी मरोगीमना तथा एक मौमित मामाथि पारे भीतर ही रहना । सो पारिन्दो भी पारवाय मम्पवा मे सोहई मामती की मांति समाय भर की पुस्सा एवं निर्वाध रूप से पुरुष नमार तपा ममा-मोमारियों दीवानी नही है। रमे पीरन । मरप-परा को उपदेश पर्वा मुना देती है यह पर जीवन कीमापकता तुप पाण मरेप जाती है। मेहता पीपलता यामीमिये मुनने माता रि उममें मारी के प्रति भीषन भारपामबहन होता है। पार । साती।
प्रेमघर मिचिम्ट नारी पात्रों का परिष-चित्रण माखीय मारी के मन में कभी भी यह प्रापका नहीं रख्खी दिया पुरप की बस और बस्तुत पुरष से अप्ठ है प्रत पसे अपने भषिकारों की सम्मि माप करनी चाहिये । मेहता बब पुरुष को मेवा' पौर भगाकार या मारी को रेषता' पौर 'प्रका' मान कर चमते है पो मोबिन्दी इसे मारी और पुरुष बीच की साई मानती गई कहती है “भूत पाये किनारी घेष्ठ है सारी मिम्मपारी नसी पर भेष्ठ पुष्प है और उसी पर गृहस्थी का सारा भार है। नारी में सेवा पौर संगम पार पत्तम्प सी पैरा कर सकता है पगर पस में इन बातों का प्रमाण है तो नारी में भी प्रसार पेगा। यह भाषमा पौर कोई नही भारतीय मांगनी' ही म्याम्मा मात्र है। भारतीय नारी मोम विमास को न तो बीवन का साबन पोर न साम्य ही मानती है । मर्म-सत्व भी उसकी दृष्टि में बीवन का प्रत्यन्त मौण तत्व होता है। उसके लिए तो प्रेम पौर तम्य सापन मा प्रारिमक धार्मवस्य बीवन-सम्म होता है। पारिवा रिक रूप में प्राषिक रष्टि से पूर्णरपेण सम्पम होने पर भी गोविम्ती पति प्रेम के लिए उस तृपिता की मति हमसती रहती है भो तूपापान्ति के हेतु सापर-राट पर पहुँच गई हो। ऐछौ बसा में यह धर्म अपना कम्पका प्रबमम्म मेकर ही बीवन से समझौता किये पाती है। प्रेमवादसमें बिनास के इस बारे सापर में यह प्यासी पड़ी पीबों का नामन-पालन पोर पास्पी कमोटे-मोटे काम ही उसके लिए पर पहै।मागमें श्वनी म्पस्त पहनी कि मोम की मोर उसका ध्यान महीं पाता ।" पारर्स भारतीय बली के सम्मुह पर परिस्थितिवस पा समस्पा मा सगी होती कि म यस माता ही दो नही | मारी मी 'तो प्रषस्था-विचार रो पर इसी निणर्प पर पाँचती किनारी काम माता पौर उसके उपरान्त बह वो अप है यह सब मातृत्वमा उपक्रम मात्र है। मोबिसी मोबीने का प्राधार ही उसकी पत्तन मापना है। अपनी पन्तान प्रति प्रदर कम्पियन्मनों कारह पीपह प्रपना अस्तित बनाये रखती है। भारतीय मारी सुसमति तथा संस्कार प्रभार में मौ विस्वास रखती है। मोमिनी का मी पद पवन पिसाप है। पना पब सैफ मार्म पर पा पाता है बमह उनसे काटी है "अब तुम्हारे नाके मारमी बर्मये। एक मारर्भ मारतीय मुहिणो सपर मीरममा कर्म- धित में गिराम रसती हुई त्याप मा सहमसीसवा को कभी भी हाप से पाने मही रेती पोंकि विपत्तियों को एपका प्रबसर समझती है। गोबिन्ती देवी पत्य की साक्षात् प्रतिमा है। वह पति से करती है सिरि प्राप्त करने में प्रबर कोई ट भी हो तो उसका स्वागत करो। तुम से विपत्ति सममोहीमों १४३ प्रमादिपिट मारीमामाका परिष-विपण से? क्यों नहीं समझने तुम्हें प्रयाय नाने का यह प्रकार मिला है। मेरे रिवार में हो पोर होने से पीपित होना पठहै। अपमी त्यामवृत्ति के कारण ही या पति के दीवाने को भी विशेष मास नही देती बाप्पाग पाप पात्मा की प्राप्ति सौरे को गा माईना नहीं समझती। एक पारक सहमति मी भारतीय सुपहिली की विशेषता होती है । गोपिन्दी भी इसमे पसमा माळी मेजा नहीं अपितु सुपारोन्मुखी सहानुभूति है। मग की समस्या का यह माता के इम्ही समो में समर्थन की यो पारमी पपमा बाम पावे है का हक न मोमों से क्या मी केवम सपा समावे। इसके पतिरिक्त प्रतीया एवं ममा भी भारतीय नारी दी मिनी स्पिपठा है। मोषियो पति के बहाने पर "हां प्रिये हम तबाह हो पये दिस सान्त्वमा सपकार ममे मा कर देती है या उसकी सी ररावा काही पण सास है। मनट मेहता हो के पदों में बाबा Salt कि मोरिसीवी एक भमपति की पानी है पर पितास को तुम समझो वो स्पेयर पार पना- रहार पी पपने कर्तम्भ मे विमित नहीं होती को मातृत की पर अपने नियम कप्ती,विधरे लिए त्याग ही र सेना परिवार पौर दीप पोपसकी प्रतिमा बनाकर पूरी बाये । प्रतिमा प्रस्थापन पार पमाारसा के माध्यम से विधामरेखण के हेतु किया जाता है। मोदिनी की मिमिति पी एप्रयोग है। रानी सारन्या प्रमामा-मानों में रानी सारा रिपिट स्थान है। जीवन में मारी का भूपर माय भपा कोमात पाको पार ही अधिक होगा। मिसाल्पासिरिल में इलाइ ति का प्रसाधारण प्रस्फुटन हुपा है। यही कारण है कि एक मास पर पानी की भांति भार पर मामिला ही पसरे परिष की प्रमुप पिपा । सारखा के लिए बीरन की पाता सी राधीस प्रमिमाम एप पारिमक दवा में निहित है। उसक अनुधार पपपी पान का पालन ही सप्रिय कवि-पालन होता है। पहली मापी टोक उसके प्रतिश्च बहशम्पाय बीपम को परिस्तितिरों की निदेशी परत पान के लिए, होम ला वहीं भारती। एक बार उसरा पति मनिपानि पुरा म परमुख होकर मार पाया पर दो उसन उसी रिमा को अपनी मावस की पहली पाहीदी पणतु धाएमा मे पहा बा 'भया प्रेमपर बिसिष्ट नारीपापों का परिण- विस तुमने गुम की मर्याश तो दी। ऐसा कभी महमा पा और पानी मामी को पतर देती है कि उसका पति इस प्रपस्पा म भागकर माता वो बह उसकी घाती में पुप मोर देवो । यह तब की पात है पप साल्या अविवाहिता पो। विवाहिता होने के उपरान्त हो वह अपनी प्रान मापना को समिम प देती है। उसके पति बपतम्प प पोरक्षा की स्वाधीनता को छोड़कर मुस्लिम राम्य की बागीर रिस्मी में माना है तो सारस्पा तब तक पवाय एवी है पप तक पसका पति पापिस पोरण नहीं पा पाता। ना ही मही या एक मोरेको पामे के लिये 'उच्च राम मौर राम-सम्मान' सब हाप से हो देती है। मापसाह उससे पूछता है कि क्या यह एक मोरे के लिए ही राम्प का त्याग कर पी वो मह निर्भीक होकर उत्तर ६वी है नहीं उस पसाई केसिए यो संसार में सबसे भपिक मुस्पबाम ।। पर रामा पुन पूपा । किया गया है तो यह रहती है भरमी मान" । इसमें कोई अन्य नही कि प्रपनी पान की भावना से किसी प्रकार भी समझौवा न कर पकने कारण ही उसका मविप्प गएकमम बनता है पर ससे मासिी भी मुस्प पर माम्प नहीं सममाती। पति की प्रेरणा पाकर उसकी हया कणी है मसराम्त अपनी भी पर अपनी प्रान को प्रागीवन नहीं पोरवी । उत्साहवृत्ति पर प्राधित वीरता उसके परिण की दूसरी प्रधान विधेपत्ता है। बा पति को पाणी मात्र से ही प्ररित नही करती पपितु पुरमूमि में माम्मार पुरसबारों का रस्सा लेकर पीहारी हुई सेना में माभीवन भी भरती है। युवमूमि में जिस प्रकार को पाने की सामर्ष किसी में भीम पी से पा महम ही पपने पीपे भगा मती है। निर्माता के कारण ही बह साही रवार में पाप की मांग हेतु पनिकों सहित पाला-मी भमस्ती हा पर माती है। पिस भांति परमपना तथा पति का पन्त करती है ना मी प्रसा पारप पीरता का मार है। यह पौर-परिणीता ही नही पीर-मस्समा भी है। प्रपन मप्रिम पुर पासास को पापपो ही हाथों मौत के मुंह में भरने से तमि भी नही पतराठी। परन्तु सारम्पा की वीरता में मुसता नहीं है। पा पर भी गा गिगिरा कर सहायता लिए हाप फैलाता है तो वह अपने पति से करती है "पापको माप करमी होगी । इस प्रकार उसकी माता मारता को मनोमै हुए। गीरन ही साल्पा मिए रणगेम है । पली मा में समा भौषम तनिक भी 4 का धीरन नही है कि होली पापत्तियों में भी अपनी बीर मावना के कारण ही या पल्पित पीवन से पमायन करने की बात पर भपरों पर नहीं माती।
मिषन के विषिष्ट मारी-यानों का परिण-चिमण सारमापत्तिव में यपि कोमम तत्व कठोर तत्व से अपेक्षात प्रत्पम्त मौण है तथापि इसका यह तात्पर्य नहीं किया अपने रापारमक पत्तयों के प्रति उदासीन है। पर एक प्रारण परली भी है वो पुरुभूमि में भी मोरे से उतरकर पति के बरपों पर सिर मुगा देती है और भीषण प्रापदामों में भी मही करती है "मेरी हारिक पमिसापा है कि मई तो यह मस्तक प्रापके पर-नमनों पर हो। पति को प्राशा को उसमे अपनी उबासी को सिाकर थी अपनी उत्साहसत्तियों को रखाकर भी शिरोधार्य समझा है। पति-पाता से पवन-र होकर ही यह पति की स्वधिक मृत्यु का कारण बनी पर पति से पिलम एकर स्वयं उसने भी बीमा नहीं चाहा। यह बाती तो बीवित एसपती पी। उसके साहस और पैर्य को देखकर मुमम सरबार मे मा मोबा-"पनी साहिबा पूषा गवाह है हम सब पापके पुमाम है। भापका को हुक्म हो उसे बसरोपरम बजा माये" परन्तु सती मारल्या इसका उत्तर तमबार मपने एप में मुसाकर देती है। यह मागीयम अपने पति की प्रेरसा एक राजपूत पति की सम्पूति पी है। 'रावा को भी हात पा कि यह देवी पो हरय में मेरी पूरा करती है सारखा है। इसलिये बिस पति को पाकर साबा को 'महमानी' मुरार की प्राप्ति होती है उसके बिना यह कैसे बी सस्ती दी। सारमा को कोमल वृत्तियों से समर उसका मातृत्व भी मर नहीं पुकाम भर के लिये ही सही पर यह सोपती भवस्य है"हाय ! पर पूर्व के लिये ममे अपना प्रिय पुष हार से बोरिया' पर पपों ही मा विचार माता कि कारटुमेको इतने महपे पामो किसने मिया होपा" स्वयं को पात्वस्य-यरिता समझती है। इस प्रकार मारपाका परिण परम्परामत बीर पगपूतनी कम में चिमित पा है। सम मापक देशभकि दो नहीं मार मानवीय सेवा प्रादि का सम्मिश्रण भीनही मितुपातीय सम्मान एब मक्ति अवश्य विद्यमान है। इस रष्टि से उसके परिष की प्यापरता की सीमा दर तक नही पाती परम्तु निस एक बागोरोचन निपे हानी में परिवामिम्पक्तिहमा करती है उसकी प्टि से यह पवाय ही सफम है। यहाँ तक सामाविष्ठा का प्रान - परम्परा-विषण प्राय स्वाभाविकता की परवाह नही पिया करता। सारखा परिष में एकनो स्थान पर प्रेमवार मेयसी मनोबैज्ञानिक दुटियों की पोर निय रिया भी है पर प्रम्प पारिधि रिपपतामों की पीपा समप पह भावना पुनको हुई-मी सपती है। होबा - प्रेमचम्म के बिरिष्ट मारी-पात्रीका परिष-विपण समा पोडी-पी भनक रिसाने के उपरान्त दी 'प्रेम पी पी (नाटक) की उमा देवीमन का पटाक्षेप हो पाता है परन्तु प्रमावोत्पादन की इपिसे यह झलक मार्मिक एवं पिरस्पापी है। इसका मात्र पर भी प्रषिक इस दृष्टि से कि सम्पूर्ण प्रेमचन्त-साहित्य में इस सम्प-विधेप से ऐसी पनिम्पक्ति प्रायन कहीं मही है। एक सुपली किस प्रकार एकनिष्ठ पति की ही पापरत बासना का भिकार होकर मृत्यु का प्रास बन पाती है --उमा परिण का प्रठिपाप सध्या पमितप से उमा के परिण मे पया निझामना मम्मा एम नारी मुतमायुक्त प्रणबताइन चार पिपतालों की भिमामिपछि हुए। उमा विवाह-सम्बन्ध को पार भारतीय युवती की मांति प्रारर एवं भया का विपम ही नही मानकर पक्षती प्रपितु समस्त सोहामचिों को पी बाप प में पाए म करके कर्तव्य पार पात्म-समर्पण के प्रतीक मानकर पबती । पानी से कहती है जिसे तुम गुनामी की इसमी पौर गुलामी का शौक महती हो तसे मत पौर कम्प पौर भारम-समर्पण का मित्र समझती है। मप्ने समय भी यह पति से पम्मान पात्रमा यही करती है पचम दो कि म मर गाउँमी तो मेरी मोहाम-सितूर की रिबिया पर रोग पो म चड़ापोये । उसी सिम्र मे तो मुझे तुमाए प्रेमरान रिया पा। तुम्हें घोड़कर मुमे ससार में उससे प्रिय पौर कोई वस्तु नहीं है। निमाम भाषना रसकी यहाँ प्रकट होती है यहाँ पानी से कहती पुस्प अपने कर्तप्प से पार बनकर मे तो क्या स्त्री भी बम्द करने स्त्री परिवार का मुख्य मंग। इसलिये इसे बन्पों की रवावा पर है। बह या मानकर बनती है पौर अपने निविशेष जीवन में कियाम्बित करके भी निशा देतीरि निष्काम धर्म के लिये सभी को पुस्प से पषिक मषिकार प्राप्ति प्रममा समन्दता प्रादि की मार करना होमा नहीं देता। पर अपनी प्रसमा निस्संकोच होकर अपने ही मुंह पर नही सुन सकती। इससे उसकी स्वामाविसम्बासीमा का पता चलता है। तुम दोनों मिलकर मुझे बनामोरे तो में बमी बागी' -ये सम्म उसके एम की सरवता एम एमी पापता घोतक है। उसके परिष में एक पुरु सबगता मी विधमान है। उसकी सही मेनी उसके पति के पास मिमम्ती हैपोमा पेनी को तीन नेत्रों से बीमार पर बेनी बेनुफ्री से मोप राब को पालो मुनाने के लिये प्पानो पानी कोठरी में मे पाती है जो बह 'मने अम्मा में कहा भी नहीं तो प्राईबह मुम पर मार होने समेंपी' H प्रेमवर विशिष्ट मागे- मागे कापरिष पिस -~ -पा पर ही परसू पुरा सेती है। पत्नी-म में नमा पारपास्म विधा से प्रमाणित बेनी से पम्प-वन के सनिषित हुई। बेनी ने एक बार कहा था-भपती इस्ती को पति की हस्ती में मारेगा इवना या स्माग है जो मैं पीर सकी।" मिल पा परिष की तो पर्ने प्रमुख विऐफ्ता हो यह है कि समने अपने अस्तित्वको पति के अस्तित्व में मिग्येप कर दिया है। सहनशीलता पाप तपा समर्पण के पाटिलत पनिवार्य एमएससका पति पर बीते भी एकनिष्ठ पर परमासमाधि पर नियंत्रण नहीं रह सकता। परम् उमा नसे भी पति को पाना एवं पत्नी-पम मि में स्वीकार्य ही सममली है। पास मर में दो वर्भपात पार हीसरा ग स प्रसव मेला मे उपाको स्विनी पारी रिकता मानसिक यातना री होनी या सहर पनुमान का विषय है। मेरो गायर के पत्रों में 'विध रक्त उमा देवी पाईपी मन उन्हें रोचपा। जिसे हए मुमार का-सा पाया। एक साम के पार नमी सहसा होगा कि रोह में पिरका माम नही सके किम्मेपर पाप है। रितु सहनधीमा पमा पहिरोपीन बराती हुई यही सोचती हवी है 'पोरन सना पस्थिर मरे रसकी प्रपना भी नको यो मानौ एक स्वप्न पापा मतेही रापर हो नया पर वास्तविकता हो या पिसन अपने घर को सुम उपकार पतिनिये त्वाम दिया है, विपन कर दिया है। पहले तो पानीपत समर्पत की भावना से ही पहि-प्रेमको पहल रिया।बह मृत्यु पम्या परी परकर पति को भारमपों पर मानि होपी होती पही पाहती है "मुने मनके पाने हेप्ट होपा?या उना प्रेम है भो मुझे बिम्बा हए है जम्मा परम्पोति मुरे बापन प्रशनर रही है नहीं तो भबकरीबनमा पपाता। रोरासरसके पति से परासी पपने पत्तैम्प का रेशान न पाहो मा हो बानती पी कि माप उसके सामी पापी रचायों के पापे लिए मनाना सम पम्प है। पसे मा मासूम बारिबह पापकी अमुकणारे मामे सिर मुहार पपने गि विप कोदो रहा है। पति प्रेम में निहित कामुष्ठा का प्रान मा हो मी पा-यह माना तो सौ परिष-मरिमा दो रूप कसा हैपरने मगित मका सिपासनहीपरलील। यदि रोगों में परमानेपर एवं प्रमाणावत होवे पो ऐसारा पा समठा पा पातुकः मा में ना ही देना सीसा है पति रे मदिराम में पसने पिता भी पस्तुपाह नहीं पौरमौर दो दिन पपा है पति की रातिका मर्म बार पि १४८ प्रेमचम्म के विभिष्ट नारी-पात्रों का परिम-विषण बार्य किया है। महात्मक दृष्टि से उमा के परिण-विषम में विकास उभार भषया स्मानापिकवा की बोष करना पतमा हो म्पर्य है जितना कि प्रेमचम के माटों में विकास की मबीन वापों का मन्वेपण करता। पराप प्रेमषम्म की मा-भावना में मन्तनिहित उपयोगितामाधी अपना लोकोपमिक तलों को अनिवार्यता की दृष्टि से उमा का परिण मिसेप वा निधी महत्व रखता है। हमारे विचार से पति-पत्नी के मान-सम्बन्यो के मौधित्म का प्रतिपारन समाष बिये प्रत्यन्त प्रामपयक ।। पोक का विपम है कि हिन्दी उपन्यास तमा नाटक पारि दो-मपत्र के ऐसे पदों से बहुत दूर अनायास्पक समस्पामों एवं ममोरैमानिक गुत्पियो र मुनमाप के प्रबल में और भी पपिक समतेचा घामाम्य पाठन की मनोवृत्तियों की नैतिकतापूर्स तृप्ति उनकी दृष्टि से पोकल होती जा रही है। स्वम प्रेमवाल भी यहा बेनीपरिष को समा परिष से पथिक विस्तार कर मा साप प्रम्यान किया है। समा ही परिष पर अधिक बस दिला होता तो मह अपने मकी पीतीय सष्टि होती। साँगी "प किसी पुस्म का एक भी सार पति-पत्नी का-सा सम्बन्ध हो जाये तो पुस्प का बर्म कब तक स्त्री की पोर से कोई विस पापरणन से भय सम्पन्चको निगाहे पाहे स्त्री किसी भी नाच पाति की हो दूसरे पमों में एक सेम भी पार पलो हो सस्ती है और सममी पा सकता है-पी गेम्स को मेकर 'कामाकर' में नापी की परिणामिति "नामीको चो-स परेशाक्य माध्यम से प्रेमचन्द नेतापी की सेगा-भावना को प्रमरल प्रदान किया है। ठाकुर हरिसेवक सिंह के घर की 'माँ' मांगी उनके रिगुर होने के पश्चात् मपनी सेगा-मामना भरोसे ही उनकी 'माणेपपरी पर पर प्रमिपित होती है। प्याज और मत्सर उसे भी नहीं मया है। घर साहब से तो पपमी इस मामना का प्रतिवान भी वह नहीं चाहती है। गन्होंने उसे को-एकबार मारा भी पर उसके मारे परपरा भी मन न प्राता बा। उनका "सिर भी रे हो सकी बान निकन बाती पी। पर उसकी स्नेहमयी सेना ही पी जिसने से हिंसक पौरको पम रखा पा ठाकुर साहब से धुप-ममा म पो भी उसके बिना नहीं प्रेमवर विशिष्ट नारीमानों का परिष-विमरण १४१ सकते। तीर्थ यात्रा पर जब यह नई पी दरोगाम साहब दीवाने हो मये थे।" दुरसेवा मामी के पति का पुत्र होते हुए भी उसका विरोधी है किन्तु उसे मौकभी-कभी यह स्वीकार करना ही पड़ता है कि "वामी का पर में होना पिता की पक्षा के लिये पी। वह गदुर साहब की प्रेरणा है सम्पूति सर्वस्व है, यहाँ तक कि रोमान साहब कोबर रावा रिणामसिंह से भी कोई महत्त्वपूर्ण बात करनी होती है तो वह चिन्तित हो जाते है क्योंकि उनकी रक्षा करने के लिये यहाँ सीपी मही होती। पौर नापी को अपनी सेना भावना पर विश्वास है गई है उसमें निराधा नहीं अपितु मगन का मिययो लात है। यह पति की सेवा करती है तो उस पर अपना अधिकार भी समझती है। उसे पूर्ण विश्वास है कि 'माय से कोईम्माहिता नहीं होती सेमा पौर प्रेम से होती है यही कारण है कि उसे अपनी सेवा भावमा एक पलीत पासना पर पर भी बर मुर सेवकसिह उसे दूसरे मकान में रखने की बात करता है तो पहरर पाती है तो रमा सुनो बर तक मामिक बीता है मामी रसीपर में ऐनी और इसी तरह ऐमी' मैंने अपने मानिक की जितनी मेवाको पार करने को तेपार। उतनी कौम माहिता करेपी ? इस प्रकार उसकी सेवा-मावना एक रिपती मावमा नहीं पपित, मामा मारिनी की भावास्मिका मानना है। मनोरमा के प्रान को मेकर बह पति के समय सनी अवश्य है, विस्तूही मी यह उन पिमी दुनी स्त्रियों में प्रमुख स्पान पाती है बिहें विकर प्रेमचन्द कहते हैं "रमणी काय सेवा के मूल्म परमालुओं से बना हुमा है। उसका प्रेम भी सेवा है पसका प्रपिचार भी सेवा है यहाँ तक कि उसका कोष मी सेवा है। मार-परिणीता नायीका पलीत ही नहीं मातृत मी प्रत्यम्त विकारित है। विमाता नाम कोपामिर तोसे रस सर्प मात्र से पुल बादी है। मनोरमा परबहबार देती है। मनोरमा में उसे पाकर कमी पर्व को मनाप नही समा "मातृस्नेह का बो एपब से मिसा पा सौपी ही से मिलता था।" पर रमे पता चलता है कि मनोरमा का विवाह रे रामा साहर से होने वा पाई तो पनमेन विवाह एप को मनी प्रकार सममती हुई मह किसी श्री माता से प्रशिपिवित हो उठती है। बहरूपियों से पिलाकर पदवी भामा पर तुम्हें पन का मोम हो दो बितमा बाहो मुमसे मे पामो। मेरी बिटिया कोपुर में न रोसो । क्यों पसरमन बने हुए हो" मनोरमा के माईमपुर पुर सेमसिंह उसे 'मटा' तक पहते है किन्तु उगको सदैव पही राह पो -"मुग्रोवर सिह मुंह पम्मा' सुनकर मुझेरपी प्रेमचन्द के विशिष्ट मारीमानों का परिष-चिमण होमी यो संसार की रानी मकर भी नही होगी। सामी की मृत्यु के उपरान्त वो उसके पीने का एकमात्र मममम्म ससका यह निरी-सा पात्सप्प ही है। उसे साह पाकि पुरसेपकमिह नीप बाति की होमे कारण उससे पणा करते। किन्तु मग एक दिन वह भी पाकर कहते है ही बांधकर " मोमी का मन बस्तियों हम पाता है और सचमुच ही परम्यावस्था में भी यह बीवन साष वात्सस्प के पट तारों से बाती है। और फिर मन तो उस साग-वत्समा के लिये एक तुम-सी बस्तु है। यह ठीक कि ठाकुर साहन हर में लक्ष्मी ही मापी के स्म में प्राई किन्तु सोनी उससे सरंग निक्षिप्त ही पी है। पर उसे मनोरमा द्वारा हात होता है पिता बी मे सारी बायपाप तुम्हारे नाम लिख दी ह" तो गांधी पर इस सूचना का तनिक भी प्रसर मही होता । पत्यास उत्सुकता पर्व से कोसों परे रसका चाय भावपूम्य-मा पीच पाया है।परमती है भोप तुम यह वसीयतनामा ने बाकर उन्हीं (पुरुक्षेपकसिंह) को रो। तुमारे पारावी मे पर्व ही सोमव विधायी। पर पुम्सेवक पपपम में बीमार परा पा“चो या मौनी ही बी बिसने उसे मौत मुंह से निकाल लिया पा' कोई माता अपने मामा की इतनी सेवा नहीं कर समती मी उसका पंबर पोद में मेकर सोबा करती पी"या पाप एसकी समस्त मातृ-भावना का सिधा एक काम से पुकाया पायेमा ! नहीं मॉपी एसा कमी नहीं होने देगी । मह पो मा मात्र ही चाहती है कि ममोरमा तपा गुलेगा यही समई कि 'घर तक मां-बाप बीते ६ ब तक नरकों को बोलने का प्रतियार हो मा है। उसके परितोप के लिये अपना हो पर्याप्त है कि उसे कोई मा पमझे । इस प्रकार, उसका मातृत्व नोम मही अपितु पत्सर्ग पर पामित-निपाई एवं निर्विकार है। पर पाकर नापी गर्म में पर नहीं होती प्रपितु यह एक सुरहिणी है पार सामान्य मावहारिक जीवन में सौधम्म एवं सा सड़े परिपके माम सापा रए धर्म । । र हरिसैरक सिंह को धन से मोह। किन्तु नापी कि एक परिचारिणा से ऊपर उठी है पत बह परिवार के नौकरों की स्थिति से माती मांति परिचित है। "पह उसकी सजनवा मी की मौकरों को देवन म मिमने परी बामे ती थी।" पानि पिट से बह नित्य ही अपुर मारा के पपीन । किन्तु उसकी सहानुभूति सम्बनता हा साखा पर वो कोई प्रतिवम्बमहीं मगा सकता । हॉपी का निवास है कि "माम्य परमा भरोसा करता है विधम पौरप नहीं होता । पत पी-पामा प्रादि की पास्तिक भावनामा के होते हुए मी - प्रेमपरिशिष्ट मारी-पात्रों का परिम-विमरण यह पुरपाई को मात देती है। उसकी धारणा है कि मनुष्य को प्रारमबम से पर पठमा चाहिये "मोसा कर पेट पामने से मर जाना मना है। यही पारण है किसीगी में एक स्वावलम्बी पात्म-सम्मान की भावना पर किये हुए है। अकुर साहब की मृत्यु पर पम्प के गोल के साथ यह मान कि म किसी दूसरे की रोटियों पर परी रसके लिये प्रसव पा" । घर साहब के जीवन में भी पारम-सम्मान के प्रति पारह भरने का प्रयल उसमे किया था वहसीनरार साहब तुम दोधमकाते हो वैसे हम रामा के हाथों बिक गए हों। रानीठेगी पपना मोहास मेंदी। अपनी नौकरीहीये से बार्य भगवान् का रियावाने भर मापी प्रत्यम्त व्यवहारपुराम है और मामब-इप की महरी पहचान भी उसे है। घर में कोई महीं जानता किन्तु मामी को पता है कि ममोरमा को पकार से प्रेम है। यह विनामिना कर ए पाती है-हाय | चारे पर पिरने पानी चिपिया को मोती माने की पेप्टा की वापी है। सूरत देखते ही यह प्पलि को पहचान पाती है। मिमको बायोतिषी के वेश में उसके सामने साकरा लिा पाता है वो या मेरी बयार पररस पाती है "माना तुमने बहुत दिनों वासीमारी की तो मने भी एप में नाम नहीं पकाये है। एक गपिये को नारा कर दिया उमर से कहते है बोतसी है। ऐसी ही मूरत होती है बोसी को? मान्म होता है महीनों से राने की सूरत नही देखी। तौनी मोटापे बर्णन द्वारा यपपि प्रेमपद मै बोड़ी बिनोद-सामग्री पुटाई पर नित इस पोर प्रविक है कि उसकी मौतिक-ए-बाप बाप स्पूनता अन्तर्रप कोममता रा भय नहीं कर पाई। मांगो जितनी अधिक रसूत होती गई है उसकी मानवीय भावनामों में भी से उतना ही प्रसार पाता यया है। यह पौरपात कि उसमें पितों की मी नहराई नहीं है सामाम्प मानवतावादी मूस्य ही बिस्तु पामी ककि सामाम्य म्यार हारिक जीवन में भी सामान्य मुस्यों के सहारे ही मर रठा बाता है। इस स्म काया प्रति ही मनोरमा 'प्रेम पगा मर्द पार पारपर्य से रेल पीपी मानो पह मोईलीहो। - (ग) मातृ-रूप रानी मागणी पभूमि पी पीर प्रभू गरी भारत को पास रामात माता के म प्रमवार के विधिप्ट मारी-मार्थों का परिष-चित्रल में ही प्रधानत रिषित । समालो की कचम्म-निष्य एवं रेप-मेरा में योमरान ही उसके बीपन को मक्य-साधना है। उसका पिएमा है कि पम्पाय प्रत्याचार एप परतायता के पास सबा पमिदान एप त्याग से घटते पोर मातामों मारा देश-सम्पति के संस्कारों म न मूस्यों को सपेष्ट संयोगना होनी चाहिये। देस म प्रारमसेवी पुरषो पार सन्तान-सेवी मावापों का प्रभाव नहीं है। पाती उनके बोझ से पी पाती है। मैं अपने बेटे को सन्बा राजपूत बमाना चाहती है। इसी भावना से प्रेरित होकर यह पारम्भ से ही अपने मातृत्व को हरम से प्रषिक शिसपि म सामना पारम्म करती है। भारत की परिपुष्ट सास्कृतिक सम्मरा मे उसे पमिमन्यु पुर्मास पोर प्रताप को मोर अपने पुष बिनय बम्म से पूर्व हो प्राप्ट किया है। पुष-सम्म के उपरान्त यह पब से ही उसे कठिनाइयों के मार्ग पर अग्रसर करती भी परी पर सुनाती है म कमी महरिया पार पाइयों की गोर में जाने देती है पर म कमी भये मावि स्थापिष्ट पार्थ ही उसे बिनाती है। शिक्षा मी पा पोगी प से नहीं अपितु सनिश्चित प्रणाली से देती है। बस वर्ष की अवस्था केबल वामिक पापा हारा ससकी पिया होती है इस बार बापटर मागुनी से मुयोग्य प्रशिमक के निरीक्षण में सोर दिपा पाता है पौर संत तबा प्रम्प भारतीय मापामों के प्रतिरिक्त पूरोपी माम मापापों काहान मी उसे दिया जाता है। इस मतिरिक्त भावस्पा को पांच-पहुंचते बह पूची के अनेक प्रदों का पर्यटन करने के साथ ही अमीत पारिचित सामों में भी पारपद हो जाता है। दुक होवे ही देश के प्रति सम्म पा सपा का प रसे रिया पाता है। रानी के सपने ही पम्दों में पा पर पूरा स्पापी है। इस प्रकार रानी पासपी सम्वान की प्रारम्भिक शिक्षा को परपन्त महत्वपूर्ण समझती है। उसने समय पुरपामन का पारपरत मिया हुआ है। मही कारण है कि सस फोमानिमी की सौम्य मुखाकृति पर पसाधारण मातृत्व का तेन विधमान है पिसके प्रभावस्वल्प सोझिया ने मुपुप्तावस्था में उसे पेंट पमा वा पोर यही कारण है कि माइली सन्तान-गविधा भी है। पोशी से यह महती सोफी भपमान में मुझे रोग रिये पौर दोनों को रेखाबर एक पीतल हो पाता है। इस माप की रानी का परमी विलास है कि एक सपूत अपनी सत्यनिष्ठा एवं पम्प पारिमिक पाइयों के परिणाम सम्प पिता तक को प्रभावित किपे बिना नहीं पता। ससक पों में उसके पति पर साहिब को धो सेवा समिति स साना प्रेम है मह मिनय हीरे तस्मंग का कम है । मातृ-रूप में मारपी प्रनेक मन्दानाभिमापिनी भी नही है प्रेमवर विशिष्ट नारी-पानों का परिम-विषम - पौर मही उसे पोतों को सिमाने पार की तामसा है यह दो पुष केबीवन में निमासिता से कहीं प्रपिक महत्व तम्म एवं उसके हेतु उत्सर्प को देती है। यह सप्टापती कि "बातिरमारे लिये उसे प्राण भी देना पड़े तो मुझे परा भी मोहमहोमा भोक तब होपा पर मैं उसे ऐश्वप के सामने सिर मुकाते या पत्तथ्य के क्षेत्र में पीछे हटवे देगी। पौर पर यह विनय को सोफी के प्रति मातापित देखती है वो उसका विकसित शान्त मुस-ममत तमतमा उखा है। पा उसी भस पसे उससे दूर मेव देती है। बसबम्तनयर में बिनय मापुस्ता बम तनिक भी विपनगमम करता है कि नाही की प्रतारणा पहुँचती है "णि धार पर कोई चित्र बनाते देखता है कि इससे उसके मन के भाव म्पत नहीं होते तो वह तुरस्त उसे मिटा देता है। उसी भांति में तुझे भी मिटा देना चाहती हूँ।" उसके इसी नियन्त्रण का फम है कि बिनय पात्लम्मानि से माकुन होकर पागेपुर के सत्याग्रह में प्राणाहुति देता है। उसकी यह बीर-मृत्यु मी रामी को रहना नहीं पाती है। उसके चेहरे पर सोक-धामा की विकृति नहीं अपितु पासुमों के स्थान पर संकस की कठोरता उभरती है क्योंकि उसके पनुसार "रिय मृत्यु रिम्य जीवन से ही रत्तम है। रिम्प पीवन में समुपित मृतुकी का एती रिस्य मृत्यु में यह कहाँ कोई बीर रियनहीं बर तक उसका पम्त भी रिस्य न हो। भौर पनी बाइपी एक पुन की विमति का मम्य उदाहरण पनेक पुषों के समक्ष रखतीकापी कम्पि के मेन में हिम् और मुसनमान का भेद नहीं पामो पौर विनय की भांति प्राण देना सीयो।निया बम पेट पामने की जगह नहीं है। देश की प्रार तुम्हारी मोर ममी हुई। तुमी इसकायेगा पार मपामोये। इस प्रकार रानी मारपी एक माता के स्म में सवार को रवाती पदमौर कर्तव्य को निरन्तर दुद्धिप्रपय में होती गई है। यका मातृत्व हाय की कोमलता से नहीं अपितु बुदि तर्कसंमत नियन्त्रण में बना हमारे पिसकी सर्व प्रमुख विपेपता है देश-भक्ति मौर उपयुक्त प विशेषतायें जिसके सामन म में चित्रित हुईपितु इसके साथ ही प्रेमचम यानी रिता देना चाहते हैं हिवाही का वामस्य पत्तष्प-भावमा सेक ठित हो दाहो-ऐसी बात नहीं है। रगहोंने उसके एक मारी-महब तरम मातृ-पकी पोर मी इपित पिया है।बत्ल प्रेम के कारण ही वह विपिन सोपीकेहिए बिमय से परिणप पी पारधीय रिपिप नियामती, मौर एक स्थान पर तो प्रेमषम्म मियते भी हमी "स्पष्ट तो रह सकती पर मरतों से पिनप को पागेपुर में सम्मिलित होमे से रोस्ती भी। परत की हत्या पम्हें गाव के सत्पात प्रेमचन्द के विशिष्ट नारी-मानी का परिवविण मकर दिया था। एक और स्थान पर तो रानो फूट-फूट कर रोवी भी है पौर मिनाप-सा करती हुई कहती भी है "मैं इत्यारिन । मुम से पी पपा गिन सार में और कोई न होगी। म बाने विनर का मा हाम हुमा होपा। रानी के माल के इस पल को इसका तरल ममल पा उपरोपत पक्षको उसका पाए पका पादर्य प्रताप कहा पा पकता है। पररान दोनों के बीच विषण की मस्यामाषिकता की एक कही भी पिएमान है । फूट-फूट कर रोने बामी नाही पुष की मृत्यु पर तनिक भी पोक-गितान न हो पपना पाति रक्षा के लिये उसे प्राप्स भी ना परतो मुझे परा भी धोकम होगा" ऐसा कसने मासी पिपिप्ट इपया माता सुबकने मन पाये--यह एक प्रसंगति है। हम यह महीं कहते कि मातृल के में दोनों पक्ष हो ही नहीं सकते-पापपीत पस पो नारी-इवर की बहुत बड़ी विप्रेषता होती है कि हम माना चाहते है हिपाही ने मातृत्वमम्तरण मा बीरंप अपना पसझे दाम मा बुधि में प्रमचन्द एक ती मन्तवन का विमान महीर पाये। ऐसा समता tir पहिरप पषमा भादर्स मातृल का चित्रण करते-करते उने मनापास विचार मा बावा है कि-महीं-नही मातृत्ल का एक तरल पा भी होता है उसकी प्रमि मक्ति मी पालयको-प्रत पोही पपसर मिना सनॉनि पनी को मताहर अपमा मृत्यु से पोड़ी बहुत पाशित रिचार सन्तुलन का प्रयास किया है। पर इसे पो पन्ता'मनहीं कहा जा सकता। यह प्रलाभारिकता ही है। बारा मही समाप्त नहीं हो पाती। बापी पतिपतप एवं मातृ-रूप में भी परस्पर विरोप है। पुत्र से पहपाप को माप करती है किन्तु सप त्यापिनी नहीं है पुनपी बिमासिवा का कठोरगती है पर स्वयं उसी भवन में पती है जिसमें सवाए मए, 'एक-एक मित्र पौर एक-एकप्पाने के निरागस किम है। पुषको यह सावलम्बी बनाना पाहणेपर स्वयं पर में नौकर-चाकरों से मुक्त महीं -पौर वो पार भी पुष की मांति स्थापती तथा विचार पीना नहीं-सपासिनी मानही भोप करने पामी पा पाहती मी । वास्तव मागी बिस पुधार्य की बाधा रखती है परि उसरे नियी परिष में पौ यह पप्तिान किया नया होता तो हमारे विचार से सारे मातृत्वकामा जोतनापन रखनी ही अधिक मात्रा में उसकी पीवृद्धिका उपकरण हुमा होता। एम मिमाकर पाली के परिण मातृ-पक्ष के विषय में समा हा बा सपना है कि पापीजी पहिसामपाम रिस पुन में प्रेमचम्म मे बिस परिण की पप्टि प्रिस मारको पक्ष्य बिन्दु में मेकर की बी उसमें टोस गरिमा का प्रमाण होते हुए भी अन्तिम प्रभार की एपिट से माबोबीवन का दिया में १११ प्रेमपनविरिष्ट भारी-मानों का परिष चित्रण एक महत्वपूर्ण सीमा तक कार्यसिदि। पली-गम में वाही पूर्ण पतिपरायणा है और पति-भक्ति में विश्वास रखती है। इस स में उसका चित्रण अभिक तो नहीं हमा पर इतना स्पष्ट है कि अपने पति की दिनासप्रियता पर उसमे कभी कोई मामेप मही किया। इनु को दिये गए उसके उपरेए से भी यही प्रतीत होता है कि अगर पति सिर बम पनमे को कहे तो नारी का धर्म है कि यह सिर के बस बसे पौर पर इद पति से बिपाप की बात करती है तो वह कहती है 'प्रगर फिर मेरे सामने मुंह से ऐसी बात निकामी तो तेरा पना बोट दूगी ममर तुम्हें उनकी बाते पसन्द नहीं पाती वो कोशिश कर किपसम्ब पायें। यह तेरे पति है। मिये उनकी सेवा से उत्तम पौर कोई पप नहीं है। इस प्रकार बाइपी पतिपरमेश्वर की उपासना में ही पली का स्याण एवं धर्म समझती है। उसका विश्वास है कि पली का काम मेना कुछ नहीं देना सर्वस्व है। मुसहिसी म्स में प्रशिक्षिका बननी होने के साप हो धर्म-प्रबों वपा मार दान करमा' मादि परम्परागत मान्यतामों में भी उसे विश्वास है। रानी पानी पश्चिम की तुलना में बारतको पारर्स की प्रत्येक रष्टि से अधिक समय मानती है चाहे उसका एक विलास पर पाचारित ।बर मिसेर सेवक किसी सभा में समानेत्री हो बामे की शेषी बमारती हुई कहती है किसी हिम्या मुस्लिम मेसी को यह सम्मान म प्राप्त हो सकता था तो रानी नोकझोंक पर उतर पाती है। उमकी राष्ट्रीयता को या मियामास मात्र प्रतीत होता है। यह पाती है हिम्मों में पो मोग वियों से पानपान रहते। उन्हें लोग अपमान की प्टि से देखते है पारी-विवाहपादो करना ही क्या। रानीतिक प्रमुख की बात और है गगुपों का एक रम विशनों की एक सभा को पात प्रासानी से परास्त पर सकता है लेकिन इससे किसानों का महत्वपुष कम नहीं होता। प्रत्येक हिम्बानता कि मसीह गौरकान में पहाँ पाये पे यही सनकी सिया हरे बी पीर बोबान रन्होंने यहाँ प्राप्त किया उसी का परिणम में प्रचार किया फिर से हो सकता है कि हिम पंपों को मष्ठ सममें ?" स्यता यदपि भौतिक सम्पन्नता एवं पारमाभिमानका सार र पम रेती वो भी रामी बाहवी की यह निजी दिन विशेषता है। सोफ्री मे विनय पी रक्षा प्रमिदी मपों में से पीपी पादती पानीवन सरे प्रति पामारी एती है। उस समय दो रमे पर पुनदी या परने पाती वी स्प में रियाई रती है पिम्मो रपराम्त भी पय कमी यह सोपो के - प्रमचन्द विषिष्ट जारी-पागेका परिष-विषण स्वमहोगी प्रति मम्माई है तो उसके मम में सर्परा यह भाव उन है "पोफ्री तुम मुझे । विनय-मोफ्री-परिणयन का मुहूर्त निकममाने से पूर्व भी उसकी बाह यही होती है कि विधी 'मोम करने बामी ब" का उन पर में समग्यागमम हो किम्तू पर अपने हयगत माों को मूमकर भी मुंह से न निकामवीपी। नहीं पा इस विचार को मम में मामे भी न देना चाहती श्री इसे वप्मता समझती थी। स्वमता के प्रावेश में ही मह मिसेर सेवक के पन निपट पाती है और रास्टर पानुनी के प्रति मी उसके मन में अपने पुष के प्रशिसक होने का यतामिमित भया भाव ही विद्यमान है। रानी एक तुच सफमता पर मकर कुप्पा नहीं हो पाती। मायसिस की पोर बमते-बनते यदि बीवन के प्रथम चरण पर ही किसी पारर्स प्राप्ति में सफलता मिल पाती है तो रानी के अनुसार मा पिजप मही अपितु जीवन की पहली परीमा' होती है बिसके उपरान्त मनुष्य अपने म्याप-पम एक काम्प का बोष हो जाने पर प्रषिक सणापूर्वक नाम की भोर मप्रसर होता ।। रास्ते का पाप विस प्रकार मन्तिम मषिम नहीं होता उसी प्रकार एक बार की सफलता भीवन की परम सिशि नही होती । मि कमाई का तवा जमा हो जामे माष पर समी की पारम प्रसारमक चक्तियों को सुनकर बह कहती एकदम सफ्मता पर पाप मोम इतने से नहीं समाते । इसे भिवप व समापसे या पास्तव में परामय है मो मापको मपमे पभीष्ट कोसों दर हटा देती है पाप गमे में फले को पौर भी मर कर देती है। बाये बामे सरों में पाने को प्राय से सबसे । यत इसीनिये कि उसमें से प्यार स्वर निम्मे । माप बोय मी सबा पे प्रब बोटों के लिये पीठ मत कर सोचिये। एफ एसपूत-मारी होने के नाते पनी को प्रास्म-सम्मान सर्वप्रिय है। भास्म-सम्मान का उपात्ताप हो पात्मपारण होता है। यही कारण है कि रामी भारमनीष की एता के समय पुष रमा को भी पस्यम्त हेप सममानी है। उसके अनुसार "संसार में कोई ऐसी वस्तु भी है बो सम्मान से भी परिकप्रिय है-या पारम-पौरप। पपनी पारम-सम्मान-प्रियता के कारण ही बह गएटर मागुमी कासिम बोर पाने पर उनका स्वागत करती है और कवी गिनमें पारम-सम्मान का मार बोषित उनके लिये पाही स्थान नहीं । पानी की पो परिष-परिणति पम्त में हुई मह पत्वप सग्रहनीय है। निमय तमा पोफी के बीते बीमाबोकर सकी ससकी पोर प्रब पा समिम पप से ग मामी तपा मपनी बेटी इन्दु साप पपसर हम्पी है।
अंगार पिपिष्ट मापात्रों का परिण-चित्रण पाने उसने कैयन पुष-ममता को ही ताक पर रखा इमा पर विस्तु पर पपने सम्पूर्ण ममत का त्याग कर चुकी है। वो सिपाही सोने की ईट पर्दन में गोप पर पनवा है वह कभी महाँ मा पकवास तप्य में अब ससका पूर्स निवास पर रानी प्रपनी पा अपनी सभी के पते सेट का रपाम माग ही नहीं बरती मरम् स्पाम के मारमा पम-या को भी समि स में अपनाती है। यह "भाष की पाली स बार का ही है मेरा के हेतु । किन्तु पवना हम अपस्य कही विपिनय के बीवन-मास में ही परि प्रेमचम्न ने एनी के हिपत पीपल में स्पाप पा सजिम्पा को अनुमारिपत किया होता जो उसका मातृ-पान मी प्रषिक स्थानाविध समा ठोस हो गया होता । सलोनो मामि' की प्रापीण पूरा महोनी के परिश की सरंप्रमुख विशेषता है चपका सार स्नेहमय वात्सम सामान्य भोमप्टिको इस समय की कोई भी पार सन्तान नहीं मितु पारसस्प की पाक दि से उसका प्रय पर भी पातरम । ममर मे पब सपके पास में कदम रखा था तब मह पर मभित मुखमपत को फिर मनापास ही होकर मोल छठी पी "यहाँ वो सर सास पते (मेवा' पीर पर प्रमर मे कहा था कि यह बात पति को नहीं मानता तो उसमे मागीरि देकर पौर भी पार कर पूषा 'कहाँबाना है बेटा? पार “पमह की कौन कमी। कहनावे उसे अपनी निर्धनता का निधार भी हो पाया था तब उसने कहा मा 'मम्बिर चौतरे परोपना पर मन्दिरबाप तो सामों पारायणे सार उसके उस बेटे की सारी बीवो उनकेर में पहपर मुप्त हो गया था और ताण पमर को अपनी ही धीर भोपड़ी में है पीपी पौर दुमराते हुए कहा था ये हो बोड़ा-सा वृष वा पोमो। तर उसने म्पप पायरे की रोटी पाई पी पोर पमर को यकी पिसाई पी। किन्तु पर पर पिमर उसकी मास्वरित परेनरमा से परिचित हो पपा । वह बुढ़िया के परामम बन दुपा है। उसके बीवन में एक महीन माण-संचार सा हो गया है।गीतो मपी पोपना मुंह है जिसमें एक भी नहीं पर पा पर समीप पाकर बैठ जाता है तो उसे यह रिन पार पा पाते।"या उसके प्रपने पने उसे पम्मा-अम्मा पारमेर मत पे पार पहें मेरती पी। उस उन प पर में पान ए दिया बताया एम पुषक की भोर क्यों आपकी इतनी ममता हो तो भी 'प्रमर का सरन पासकों समा मिषपट प्यमार, मन प्रमचन्द के बिपिष्ट मारी-मानों का परिष-विपास का मारनार पर में माना और हरएक काम करने को तैयार हो जाता उसकी सूची मातृ-भावना को सौपता हमा-सा पान पाता पा मानो अपने हो सिमारे हुए पामर की प्रतिनि कहीं पर से उसके कानों में पा ही है। मौर पर भमर एक सुपुत्र की मांति उसे पो सानिया नाकर देता है 'उसके अन्तकरण से मानों की पारा पाने कमी। उसका सारा धम्म सारा मातुल पासीमाद बनकर उसके एक-एक प्रेम को स्पन्वित करने सपा। ऐसा है सलोनी का बास्सस्म पारदो ही प्रेमचन्द नारी का सतप्ट स मानते परन्तु ष पामोषनामों में समोनी के तरल पात्वम्म को भातिप्प-भलार मान कहा गया है । साक्षी इस तप्प की री परिसमोनी को यदि प्रमर से अपने ही पुष पैसा स्नेह होता तो मह प्रपनी भूमि नसे पेया पर देने से इनकार करती। हमारे विचार से इस भावमा के कारस तो समोती के भासम्म में और भी महानुमतिमम प्यापकत पा पा । म साह नहीं किस भपने पुस्खों की भूमि प्रत्तन्त प्रिय है परन्तु बोड़ी पौर पैनी ष्टि से तो उस पापीकार के भीतर अपने सारे देतु किसी पर की पाबीविका मप्रनने की भावना निहित है। पाती है 'बिसके पास मेरे पेठ प्रामकत है बहवो मेप ही माई-वन है। इससे बीमकर तुमरे,वो मा पपने मन मैं क्या पडेगा । सोको प्रगर में पनुषित प्रती है तो मेरे मुंह पर पप्पा मारो सो मं की रोटी छीनकर तुम करो तुम मुझे मना कहोगे बोलो ?" यह भावना पात्सस्प का यह पक्ष । मिले एक निर्णन माता ही बी किसी पन्म को भी किसी माता का पुत्र समम्तो बान सम्वीहै। दूस जोपरी भी इसके समम निस्चर हो पाता है। यहाँ का पाविम्य-सत्कार का मन । मानो एक प्रतिनिगि प्रामीण माता के हिप्सीम्स का अनिवार्य अंग होता ही है पर समोभी का भमर से सम्मान पातिप्प-सत्कार मात्र का ही नही ।। सदोनी स्वयं प्रती है कि भर दोपा हमा पुष भी पर मौट माता तो “पाते दिन उस नारे की भी मेहमानी की पाती है।" समोती के वरिष की पूसरी प्रधान विपता घोपक मा सोपित की पापान पोर पारमसम्मान की रक्षा की भावना । यह एक निपट प्राम-विषमा पर गौचन पर अनुमों में से सिमा दी है कि मापार पोपक होवे । पौर यह भी कि भोपक तवा एपिम म्याय प्रथमा पिपिडार को भी नहीं मुमते निर्माता ही प्रक्रिया मीराने में विलीन हो पाती है। "मानी से रियार को कोई नही पुनेमा बेटा में कदे देती है बरो-वीन बार ही होको पुराती है। परन्तु इसके साम हो उसे मह भी विलास कि प्रेमपद रिषिष्ट मारी-मानों का परिण-विनर । प्रारमरम्म कायरता होती है। निवन भी मास्म-सम्मान होता है उसका परिमममप पर ही उसे ऊपर उठा सकता है पात्मरम्म मपमा प्रनयस मनुहार मही विमान रेचकर एक ही स्सया उसे प्राप्त होता मा भी प्यादा प्राकर मापम नपता है सलोनी को तो विरोरी करना पसल है। मत यह मुभी को बातों-ही-बातों में बताती है कि प्यावा घर में पाप मगाए देवा पा। क्या करखी मिकामकर फेंक दिया। उस पर ममर भैया कहते है-महन्त जी से परिपार करो। यह रूपया देवी नहीं फेंकती है। संबपों के पाटों मे बह पिस गाह पर बोलियों एवं इष्टरों के समक्ष भी प्रारम-सम्मान को इस महीं समन्त्र रसने । हीमार हुई है बहुत कण्ही भी है परन्तु पैर्य एवं साहस को कमी महीोगा उसने। भारम-सम्मान की भावना एवं पोपण के सम्मकी पहचान ही समोमीके परिष में गिोह माती है। वह समर्प के मार्ग पर सक्रिय स से पपसर होती पिमर के पागमन से पूर्व भी उसका मन कई बार समसा कर रह गया नपता है। किन्तु दर एक पचित नियम का उसे प्रभाव पा । यह ममाव प्रेमचमकासीम पार किसी सीमा तक भाप के भारतीय पामों में भी परि मधित होता है। इसके साप ही समोनी परिपके इस पक्ष से यह भी मात होता है कि सपप गावमा प्रधिक देर तक रमित नहीं रहती है अबसर भपा निपन पाते ही दाबामन-सी ममा उटवी।।पौर सनोनी तो साक्षात ही रासका विमुम्म मन पर मनियम्बित हो पाता है। सनीम उसे हटर नया पे पट "सहसा समीम को देखकर बह पीपे हट नई और से पानी री-यह तो हाकिम है। फिर सिहनी की भांति ममटकर पहमे समीप को ऐसा बसा दिया कि यह मिरठ-पिरतेपचा और बर तक पबरकात स्मे इटाचे सलीम को नरपन पकरार इस तरह बाई, मानों पोट देवी। इससे पहले उसने कहा था उसे रिकापी कि दुनिया देरी पाती पर मग मने को बेटी है।" उसकी पाय पुलिस र पोन माती। "मने प्रचित सिर पे उतारकर कमर में बांधा और माठी संमान कर पीये से रोनों साइपों को पीटने मयी।" यह रही पियवा सनोनी है बीमाठी ऐककर पतता है किन्तु पिसकी पिपुम्म पास्मा उसके परीर से पिशोर कर रुती है। एक बमा की सहमधीमता भी समोनी काफी में व्याप्तामाठी बताते समय बोरसो पार पिर परती। पर उसे कोई चिन्ता नहीं। एटर पाने परान्त सनोनी को मरवाहमा पा पार सारी रेह प्रेमपनपिपिष्ट मारीमानों का परिवरिषरए फोरे की भांति पुष ही पो मपर से गाने की पुन सबार पी। राहो गया था। पातक ने सारे मांग को पिसाब की भांति पाप मियापा। मोप सोफ से मौन और भातक के मार से दो मरने सामों की मा उठा रहे थे पहर रात पाठे-बाले चारों पक्षिा मंका को पोर पड़ीं। समोनी मारेका हर मागे-मारे माती पाती थी- 'सपा मेरा म्म बाम समीरी ।" मनोनी की सहनपीसता की यह परम सीमा है। गिगोहरना है अन्ति मानी ! मागति फेमानी है तो समोनी कहती है कि उसकी भयंकर बापापों को भी सहर्ष मेममा होगा तूफान मन में रखकर मी बेला को पन्तर में समेटकर भी पांचों में पानी नहीं प्रपित, पहरों पर पुषार मानी है। म्पतिगत जीवन में भी सलोनी रसिकता को प्रभय देवी है। पानोक- प्पबहार में प्रत्मन्त पुष्पम है परन्तु उसका या कौपम्प निष्कपट एवं सरम है पौर रसिम्ता के प्रागरस में अपनी निर्धनता को पिपाये है। उसके परिण मैं एक भवीप-सी प्राणवत्ता है पो पुरापे में भी उसे मामा नहीं पाती पपितृ बीवन के प्रति मास्था पर करती। बीवन में रस मेती। पमर पब पलीको पोड़कर पिरळ भाव से उसके पांव में पा जाता है जब वह कहती है 'इस उमर में तो मममी माही ममती बेटा" पौर मुम्मी से पहती "यह सब टीको पररापार पस पर बन ममा ।" झापे में भी पापमर के पिता अमरकान्त का बयान भाभी की-सी रसिकता से स्वागत करती है-'हो हो रेवरची पापन में पाते तो तुमारे साथ मा मुमती। ऐसी पीयम्त मात्मा कभी भी साहित्य में मंपुर नहीं होती। मरेप के मिये पार भी समोनी की रिसपता है । पुरषों की भूमि से बह मारम-गौरव पषम्म पहण करती। किन्तु भूमि से चिपटीई ह मही है। सनोनी काकी में अपने घर की बह पाठपामा के लिये पी है। पण ही । सकता है। हाँ गाम का हेतु ऐसा होना चाहिये पो उसकी नपर में उसके मर-मर के संबे हुए बन के योग्य हो। काकी प्रमर की मोपड़ी में ऐनी । एक किमारे-पाय बाप मेयी । एक किनारे पर रहेगी । पर इस वाम पारा पाग सनोनी लिवनी सुप है पतनी माया पौर कमी मई हो। उसका स्पार भाषात्मक प्रमाबों की सप्टि नहीं। यह एक सरह एवं मुख पामीमा । परियो रमको ममम्प दे दिगिम, रिमा में, ममे प्रेरित किया, पा रहा है पर महान् गेम्प की पोर जाती है वह उसके हेतु प्राण तक पानी। इस प्रसार सनोनी का परिण अपने समय के प्राधिक सार ही की प्रमि प्रपन विशिष्ट मारो-पादों का परिण-चित्रण मस्ति मात्र नहीं है अपितु प्रेमचन्द मे मनुष्य की विमुटता एवं महती मास्मा के रूप में उसे चित्रित किया है। निचय ही प्रमर है। प्रमार की ष्टि से 'म कहानी की करपा प्रेमचन्द र सम्पूर्ण मातृ चित्र में सर्वाधिक मरिमापूर्ण एवं प्रारक परिण है। उसमें मातृत्व के विशेषठ भारतीय मातृत-सहन स्नेहमय एवं रस्सर्पप्रधान शाश्वत पका विपापा है वाहवी माविकी भांति एक सामपिक संस्कारातीत वा पुद्धि नाम परिशेप का नहीं। यही कारण है कि करपा बादी को अपना सामाम्प साण्यानुभूति को पविक मित्र एवं प्रषिक स्थायी रूप से पापित - बनी पारित्य रेशमतोम में कठोर कारावास भोम कर पर प्राता । परन्तु रापता की अवस्था में अधिक रेरावीवित महीं ए पाता । मत पपणा पर विपना मार दीन सात के मर्म प्राण कारापित एसके उपर विषयाम्प में भी यह पति-गविता है। समे 4 कि उसका पति एक रेषता था। यही कारण है किबह मनोकामनामों से अधिक पारमा को तुप्टि को महत्व देती है। मृत्यु परया पर परे हए पति से यह कहती है "तुम्हारा पीरन देवतापों का सा बीवन बा निस्वार्प निमिप्त पीर मार्ग प्रगर तुम मोहमाया में फर होरे तो पापिन् मेरे मन को पपिक सन्तोप होता मेकिन मेरो मारमा कोहर्व पोर रस्सास न होता मो इस समय हो पाई। मैं पपर किसी को सेवा प्राचीर सस्तो । हो मा यही होपा कि रसमा बीवन तुम्हारे बसाए। हम प्रसर विपणा करणा पूणम्मेण पति परापणापौर र मरते समय पति मगहें प्रकाप की मोर रंगित करता हुपा पापाता "इम बनेको पौर मुझे कोई गंगा महीं है ६ उमे इससे परिक पुपम हारों में ही सो सम्वा" तो करणा के समक्ष मागीवन संपा पौर परिण मारम एता है। उसे ऐमा जान पाता है किपारिस्प की पारमा सर रमपरी रक्षा करती एती है। उसकी यही शरिक पमिनापा है कि प्रभामबान होर रिता का परयामी हो । मत पासी मरिमेही मरने मानव को मानने का भरसक प्रयल करती है। उसके इस मातीत मगर पाप-पप ममता-मम एवं दिए-पत। पिसा करणा में प्राण के अभ्युत्पान एवं भरण-पोषण के बोल सिरह उसके मानकतम्पपम के पम्तयार पाता है। पिया प्रेमचन्द लिमिट नारी पात्रों का परिण-पिषस बिनाती है। वस्तुत' यह सब और कुछ नहीं उसके पित मातृत्व का पारित पहनेकज विधापरिवर्तन प्रपा प्रजमम्म पर। उसके परिण में प्रमानता वरष मातृस्म की है परन्तु बीवनारस के घाव ससका सतत संघर्प नया पता है और यही संघ की मृतु का कारण भी परवाह पुष के लिए बीती रही है और पति लिए प्राण त्याग ।। इस प्रकार, हम्णा का परिण कर्तव्य उत्सर्प र्य तपा अपना कीमामी है। उसमें म्यापकता है विश्वसनीयता है और है पावर्ड सपेरनीयता । कया सो प्रषों में करता है। यही पसके परिण-मित्रस की सफमता एवं सार्व कता। (घ) राष्ट्रसेविका-प सुहवा 'कर्मभूमि' प्रधानत राजनैविक पम्पास है। उसके सर्म-प्रमुख मारी-माम 'सुबरा की परिष मिमिति भी रेस-मविकास में ही प्रकिइ । यही कारण है कि वर्गीकरण में हमने उसे राष्ट्रसैविका रूप अन्तर्गत रखा है। से ससके परिणीता-स का भी पाव-भाष ही महत्वपूर्ण प्रस्फुटनामा। इस प्रकार पुषरा के परिण के री स्प पिभित ए-रेपपिका रूप प्रधानत और परिणीवा स्म पपेक्षामा पोरण परिणीता-रूप में सुबराबरिम के तीन पक्ष-रिनासिनी पक्ष सुधारणत मानवती पक्ष एवं पापिनी पक्ष । न तीनों को उसकी पिकास-याणा तारखम्म परण भी पापा सकता है। प्रारम्भ में उसके बिनाधिमी-पक्ष की ही पमिम्पति हरितु धीरे पीरे बटिस परिस्थितियों के सम्पर्क में माकर उसने स्वयं को पहनामा है, संस्कारों का स्थाप किया है और पति सामगम को सर्वस्व माना है। रितासिनी पप में पा पति से बहुत पर विवाह इए दो साम हो पुपरनो में कोई सामंजस्य नही चोनों के विचार प्रमम-मनम भ्पहार प्रमग संसार प्रनय है से दो मिन्म बनमा के बन एक पियरे में बन कर दिये गए हैं। यह एक सम्मत्तियामिनी विषया की पुत्री प्रभाव पसने कभी गाने नहीं है पर स्वाभाविक है कि सहन- पीमता पपना धिमाधीमता भी इस स में उस गुण नही है। र पनि से स्पष्ट कह रेती ' 'तुम पनपन से बरामे गए हो पौर कष्ट सहने समस्त हो। मेरे लिए यह ममा पनुमा है। इसके साथ हीट कापमान पत्नर से समपिष्ट पारीमानों का परिण-विमरण सा भी रसने सीखा है। सिने पौर सिमटने का प्रभ्यास उस नही है। "होले दो में भी बोलती है। मुझसे किसी भी मुतामीम होयी' सी बाबा रा स शापाम्प माइती है कि हर कोई उसकी विचारसरण से पम्सर हो स्वयं मपनी यह नमोहमी सका पति मगरी पर पारमिरे, रो मा माट। मरी को यह परिमम का पीवन वहीं अपितु इसरों की पारी समस्या है। पुकी (किसह पति के पब एक सेमिव दायरे में ही एक सापारण पहली के समान इमापों को प्रति परती - हो पाती मुझे मारनबन मे पमो और निश्चित होकरो।" इसके साप हा सामो-वियेटर पाने का बी से पोका पति मापन भोको मीमावावी ही पोंकि उसकी गिरको बसना पासाम नहीं। इस प्रकार परि पदम्बरे ही पर्यों में तो मुखमा के विमा मिनीस में 'त्याप मोबपद मोम शीत की पमह ठेव पौर कोमल को पह तीकारा!" उसके पानी पादूसरा पक्ष है मुपारगत मान बती पहा परिस्थितियों के समाधव से उसने देखा जिविस ससार में यह पारस पली महतो जीवन-यवाई से बात पोमन है पमान में निर्धनता पाहाहाकार वासनाओं की विमुक सीमा एक पतीन पीपटू पपार्प भी है।यह मन में सोच रसठीसाको मिद्यमा गाभत मह पति के विपुष गरम पापी है। घोष-मममसर मरे मरता है"पर में मेय माता तुमारे पाचार पर है- तम पोये यहाँ में भी रहेगी।" पानी म-बापनाको म्यापक पानोर में महारती हो उसे पता समता मितिका माठाता हवाम एमावतमा रेग के प्रति भी में होना है। इस साल पाहोन म्यापक सहानुभूति मारे भी पहले हामद मामती किसकीना पहारे पति के साप प्रमसम्मान र पात्पर्य की बात यह किएपीना से उपे मेरमा मीमही है मिरा पपना पनि परमेहरम सैरालिमित किमी पशप स्थान पर पमा परामपाकीना को भी अपनी ही सहित प्रपने से भी परिक मौसममतोकोस मुनी के सीत-हरण सिपवार प पपने पास रखने भयो दत्साह रिलाती हमी उसकी मासा पठिाही परिणामस में मच गत्वम्प भी भारत होवा।। रिख पिए भोपा ने हमारत रिमा-पिता र पास सोपी उसके गरात रपमै पिचोरीपी-सी अपनता तमा पभिसी को प्रातस्पमप पाखासत पर माता 4 UP पूरा मंचतपय रिकाम' ही पेपर प्रेमबम विषिष्ट मारी-पात्रों का परिम-विषण पाता है । सबीना सम्पर्क में भाकर मह पह भी पान माती प्रेम प्रपा पलीता मापार भसा त्याप एवं विश्वास में हवा मत पपने पिछले प्रमानों पर भी उसकी प्टि मत ही पा पाती है। मा सोचती मेरे इषय मे कमी रखनी भवान हुई । मने रनसे सबर दोमने आस-परि पास करने और अपने सप पौर बीवन के प्रदर्शन में ही अपने कर्तम्प का मन्त समझ लिया न कभी प्रम श्मिा , प्रेम पाया प्राय मुझे कृषकुम बात पा कि मुममें क्या भूटिया है। यह पारमन्तानि हो पस्तुत पक्ति के जीवन में मोर माया करती है । परातु इससे या तात्पर्य नहीं कि सुपरा निरस्वर बम्प-भावना से गुमी भाती है नही पति से कोसों दूर रहती हई मी पाह मामिनी एवं पारमाभिमानिमी । बा सीमा से कहती है "म तो बा तक उनकी तरफ से हावामा पाया में अपना हाप नही पा सकती बाहे सारी निम्रगी इसी पसा में पड़ी मारत निरंत मौर इसीमिये उसे मान-अपमान का सभी क्यारा होता है। मान भी यह भाषमा ही अपने मम्मीर सप मे प्पत्तिमा बीरन की पारम-सम्मान प्रथमा पारमापिमान की भावना बना करती है। मैना की मुसरास बह बिस माता सापकर पाती है वह पटना ससके उन्नत पास्माभिमान की प्रथम सामी है । इसके पतिरिक्त मुसरा को प्रब मापण प्रारि दिना-सामनो के प्रति भी ममल नही है । वह कहती है रोटियों में मारा पर्च नही होता होता पारमर में । एक बार मीरी की पान पोरसे फिर पार पाने में काम पतताए। संवेपत यही है सुहवा का सुभारपत मानबती-म बिसमें बितास संसारों का पूर्णपण ममम-रिणा की पोर प्रवर्तन हमा है पौर विसर्म कम्पोन्मुनता याशीन म्यापक सहानुभूति मानापमान नासम्म त्याग भया विसास एवं पास्म-बाम प्रादिविपितापों का समाहार हुआ है। मुबा पस्नील का तीसरा पा सर्वोत्तम पक्ष है उसका स्थामिनी पथरा रत्सर्ग प्रणाम पक्ष । रेस-सेमिका का कार्य मिलाती हुई भी बह पति के नियम तपी है पतों को रोई भी है और परोमत पति-रपन के लिए नामायित भी पी है। तम्स में पपपाताप तपा समर्पण की राह से पति साप पूर्णस्पेस सममित होना ही उसके परितकी सर्वप्रमुख विशेषता है। इ पपने सपुर सेकहो मने महाँ एकाद में इस प्रश्न (प्रसामवस्म) पर पूर्ण विचार किया है और मुझे अपना दोप स्वीकार करम में मधमान भी संकोच नहीं है। पाप एक पण मी यहाँ म ठहर । बहानाकर प्रधिकारियों से मिलें और पनके (बादी पति) भिए पो कुछ भी हो सके करें। हमने उनकी विपाम तपस्वी - प्रमबम रिसिप्ट मारी-मानों का परित्र-विमरण पारमा को मोपदापनों में बांधकर रखना चाहा पा मार मुझे मामून होपाई यह मेरा परम सौभाग्य पा'। यह सुमदा का परम पति-परिवार । म से टूट कर बव रसका पति से मिमम होता है तो उमेनपता है भार एमकी रिक्ति में वैसे मधुमास भर गया है, या माणता असे पल्लवित हो पा है। मान उसने पुरप के प्रेम म अपने नारीत्व को पाया है। उसके हत्य से निपटर अपने को बो देने के लिए पात्र उसरे प्राण कितने भ्यागुम हो दरापान उसकी तपस्या मानों पतीभूत हो पर है। भारतीय ममति के मनुमार यही है सोग राम्पत्य-सतना मागिनी हया प्रर्थनारीवर पी माम्पता। राष्ट्रसेविकास में सुबरा की सबप्रमुख विशेषता या पपता नही सबना है। उममें एक प्रमापारण जिराधीनता तथा प्राणवत्ता सपरित है।हातानों के व्यस्त पापोरन या मोसियों की बौछारों में भी यह परिप रहती है। मिरामा माती पर मुहवा को पूर मिझम जाती है मानो किसी पणिस्पनिंग का सर्प कर मिया हो । उपका विश्वास है कि "बिना तकलीफ खाये माराम नहीं मिलता।" एवान के लिए उस मकमी की जिया पीमता का देखकर ही पम्माप रहता है यह जी ने पराकमया पाया है। ना बरस शान्त पारवासन दिवाती हुई पाती है कि समय पान पर परीयों पर मोबन बार्य तो बहाम निपिप भाग्यवादिनाको मराठीहुई पहती है 'मह ताकापरों की नीति है पुरपार्यबहाको समय को परमे मनु दूप बनाये।" उसकी बेस-यात्रा भी एक परमून प्राणताही परिणाम है। उममी म पिता यह है कि यह पम्याप दो सान नगी पर सपती । पह वृत्ति पो मारम्भ से ही रस पिएमाम है। मुम्नौन पपन मीरा अपहरण मा बरना मियानुवापनुमार पर रसको कोमोरोपतो मैं सम भूपी मेंमार मे म्याय सठ पया। उसने कोई प्रपाम नहीं पिया। रिन दुष्टी मे उस पर ऐमा प्रत्याचार पिया पर्ने पीण मिसना पाहिप । पम्पाय प्रति इम प्रमहनगोमता का ही परिणाम है पिपने परिमी प्रथा परने राजनीतिक मिसानों में महलमीन महीं है। गरीबोंदी एक बम्तो बनानी पौर उममें भी समास स्वाप मी पापा पागणे होती वोह मम भारती हुई रहती है कि समाचारों पर पामोसनो माम नहीं बनेपा “मही नती मानसीम नही "मर पनी गति प्रपन पाना परेमा हमने मारए-मिन्नत से पाम निशामना पारा पा पर मामूपमा सीपी पती से भी नहीं मिलता। हम विना व में सपामीरमें प्रेमचम के विशिष्ट नारी-मानों का परिष- पिपरा - उतना ही बचायेंगे। पर इसका यह तात्पर्य नहीं कि सुसरा हिंसा में विस्वास रखती है। यह मांधी-युग में पैरा हुई है। मामलों को चतना ही महत्त्वपूर्ण सपा निर्माणात्मक समझती है गिवना की साम्य को। वह कहती है 'रस-बीस प्राणियों की माइति देनी पड़ेगी तब मोर्यों की पाईपुगी । इस प्रकार यह पम्पाय के प्रति विद्रोहिणी वो है किन्तु दिघा की मपेक्षा बलिदान को अधिक मात देती है। इसके साथ ही एक माणबारिता भी उसमें विधमान है। पर यह कभी नही सोचती कि रमन से पाम पर पायेया। नसका शिगमावलमन से म्पाय पौर मी उभरता। उसी प्रकार जिस प्रकार पोट सामे पर पैद की मति में पौर भी नमार प्रा बावा है । मैतिकता पर भी यह बम देती है। मोबाची सपा समोरा पारिको मह परयन्त हेय समम्मी है ।समे उसने ऐस्पर्म को बोरकर निर्मनों की कतारो में स्थान मिया (पा त्याग की विजय मे भी उस की भाषा है । माग नसके परिण का महत्वपूर्ण अंग है। सभका मिस्मास है किस्माग के रिमा पति दूसरे को प्रभावित नही कर सकता मत प्रपनी पारर्ष प्राप्ति मे असफल पता है। निर्धनों का उत्थान निर्मों की सी अनुभूति से ही किया जा सकता है। मैं इस पर में हर पौर प्रमौर का अठ रखकर ममता के रिमों पर काबू नहीं पा सकती। मुझे पाप करना पड़ेपा -यह सोच कर ही या साधारण म्पनहार में हो गया कारावास भी नौकरानीको हटा देती है और मैट्रन से समप्र करती है म पम किसी तरह की रिमायत मही पाहतो । म चाही कि मुझे मामूभी रियों की तप र बाम । स्मान के साथ ही सेवा तमा वा के भाष भी माम मामात्मा सम में उसके परिण में विद्यमान है। सेवाप्रम को साचार्य मह प्रत्येक मोहल्ले में गुमगाती हैपौर नितों ही पणा देखकर उसकी पयामावना भी उमर पाती है। का की मुबा और भाष की सूबा में कितना पातर हो गया है। भोग पौर विनास पर प्राण दे पानी रमणी पार सेवा पौरपा की मूर्ति बनी हुई है। इसके अतिरिक्त राष्ट्रसेमिका कप में मुथा मालाकामिणी तो प्रसस्प है परन्तु मिथ्यामिमानिनी नही। उसकी पारम-परिमा में भी एक समता पाप्त है। यह मन्दिरका सिमाम्पाट करती है, "पप-पम पर उसके माम की पय जय कार होती है किन्तु सापही पा स्त्रियों से गमे मिमती है बामको को पार करती पौर पुस्यो को प्रणाम ली| यक्तिगत पीवन में भी सुबरा अब पनि गम्भीर एवं पप्पपनमीमा हो गई। उपग्मासों की प्रपेक्षा उसे इतिहास और राममिक विपयो में रस मिमता उसके मापण भी सार ममित होते।
प्रमवर के विशिष्ट नारी-पानों का परिम-विषय रस्तुत सुबा का राष्ट्रसेविका-स उसके परिणीता-सपी परिपूर्ति भी है। इसके बिना पति साप उसका सामंजस्य सम्भव नही पा। प्रेमचन्द ने पमिप्यक्ति में रमसेविकासको प्रषिक प्राधान्य देते हुए भी गोकोपस से यह रिवाया है कि पति और पत्नी दोनों नानवीय मूल्यों के सहारे ही परस्पर विकास के प्रेरक बन सकते है। किन्तु इसमें भी पपिक युप-धर्म के निर्वाह को रम्हनि सुखश के परिण-माध्यम से महत्व दिया है। अम्पाय तया घोपण के प्रति मुबरा की दीव मिोहनपनि यूरोप में उन दिनों के उपठे हुए पारिस्टमार तपा पस्त होते हुए पूरीवार की दार को दिरे हुए है। हिटलर मोर मुसोलिनी का पतिवार कदरपारको प्राप्त हो टापा और भारत में अंग्रेजी सामाग्पबार पनेक प्रतिनियापो का सामना करत ए निरोपमाप हो हापा । युम के इसी गिरोह का पारीकरण प्रमपम ने मुहरा के परिष में लिया है। मुबरा में युष-बर्म भी है और पाबत मानवीय मूल्य भी इस हष्टि से यह एक पत्यम्त सरम परित्र है। - मृता 'देन' कहानी पी मूना की परम विकसित राप तपा माह मतियों को देखते ही बनता है। बीवन की समूर्ण बरनामा को उसने देश प्रम में गा दिया। पति सास रुपा म पुर का रत्मप कर देने के उपरान्त भी यह बीपित है इसलिये किबीवन में रमकी प्रनम्र प्राम्या है ऐमे बीवन में जिसका मस्य रेप-सेवा के विणात प्रामार की निमिति के एपीबारी में जुन बाना होता है। रसे यार! मान पनी दोसनी भाषा में पाकला पा मम्मा तामए प्रमामा पपेनी पम्पनी मौकर होते हुए मी समर्प पति मे देश प्रम में प्राणाहुति की पी पौर यह मौ कि रमपी पूरा माग पुराने रिवारों कीदोती हुई मी पुत्र का अनुगमन कर गई थी। भार सब नहीं पिस्तु मृाना मे बीवन से पतापन नहीं किया है पपितु अपने मातृत पपने पत्नीत्व अपने पारिवारिकपतम्य अपने सायो एमने एक मामित्र परिवार से निकाल कर राष्ट्र-परिवारकी पोर उम्मुप र रिया है। मृदुमा पानती है कि अन्याय के हाप पान नमे। यादी तोपर तरह से मरन है। भयर रस-चीन मारमी पमा हो पाते है तो पोनीम पहली है हममे ताने मारे है। पनाने पुर परती है और प्रगर कोई पापी मेष में मार पाया देता है तोगनियां पनाली रिनुपर पर भी बामडो है प्रिया में पदर रत्साह सपा परम्परन हानुभूति रिपमान १७२ प्रमपम के विशिष्ट मामानों का परिपबियर उठती है 'म तो इनके सामने बारमी-सी हो पाती कमी योपिका की भांति जानकर पी पण के प्यान में प्रोत-सी हो जाती है-नकी सूरत उसकी मांखों में फिरा करती है उनकी बात कानों में गा करती है। किवना मनोहर स्वम्म है फित्तनी रसीसी बातें ! साषा पण स्वस्प है कभी पिता को भी मार्ग का पत्थर समझती हा स्वयं ही बाबहाने मपती है मपितापी उनसे माराब है तो हुमा करें। म यो प्रेमनीति से मुंह मोई। प्रम का समंच किया पो हपयों से है किसी तीसरे प्राणी को पसमें हस्तक्षेप करने का प्रमि कार नही कभी इतनी उत्तेमित हो जाती है किसानपर मुह पर ही पाने मगती प्रियतम मेरी भी यही दया है। मैं मी इसी पाप से एक ही है। यह तन पीर मन मग तुमारी भेट -पौर फिर ऐसा अवसर मी माता । मम पापी मानसंकर के मानिगन-पास में प्राबर हो पाती। किन्तु इससे पाये मह मही पा पाती पर्योकि उसकी निमावृति का एक नैविक पम भी है गिस मते से चिपकाये रखने पर भी सपने बार-बार जिसकी ममममा पपस्स की है पर तिनानि नहोदी पौर पमारित एक प्रयप यौनाकापा से पषिक महत्व भी पिसे दिया है। पर्ममीता उसके इस मैधिक पक्ष का प्रधाम मंग है। मृत पति की स्मृति को पामनवा से संगोये रखना यह प्ररमा पनिकाय कम्प सममानी है । "वह प्रेम का रस-पान कर की पी उसकी पीतम पाह पौर मुखप पीड़ा का स्वार बी पी पर सतीत्व रक्षा की प्रान्तरिक प्रेरणा प्रमी सहम मईपी। इसी भावना से प्रेरित होकर मामानकर को 'छोटे भाई तुस्प' समझने का प्रयास भी करती है और फिर वह यह भी पो सोचती है कि हिन-मिमा पारयों के प्रतिम यह सब-"मेरे लिए पर वीर्ष-पापा ममा स्नान पूजा-पाठ पान पोर है। यह विहारपसास सोहा गिम के लिए है।" वर मापार्मिक प्रापोवों की पोर मी प्रवृत होती है। पर पासबब होते हुए भी यह पारनार भून कर पाती है। पौन-वृत्ति का पस्वाभाविक निरोप से निरन्तर एकत्रिम समझाने की प्रोर मे बामा पाता है-नारस प्रयाग इपिार पाकेप विमष्ट मा बौनाप के मार्ग पर अग्रसर होने को बाप्प करता है किन्तु पपस्व-स्याप के उपरान्त भी पा मूल पर्वम्त जीवन साप एक प्रणम्त तवा पम्भीर सममीता नहीं कर पाती। काम-कुष्ठाएँ से उसका पीपा ही मही सोती है। इस प्रकार गायत्री की पितामहति में काम-मावना तथा प्रतिष्ठा का परम्प सपप विधमान है पौर मणि प्रसार मे प्रपनी नैतिक ममपा उपपोगितामाही प्टि परिसामसम्म मैतिकता को प्रापाम्प रिया है तापि पौन-मापना को भी उनि कम प्रेमचन्द निशिए नारी-पात्रों का परिणविषय महत्वपूर्ण नहीं समन्ध है। गायत्री माध्यम से मानो रममि समारो मत पिया हिमायत्री दो बसे-ससे पर ही निरमी है फिन्त र विपदा गायनो नहीं होती। पायत्री के परिषदी एक महत्पूण विशेषता यह भी है कि यह सरिता कोही कर्म नहीं अपित भावना भपका सोच-विचार को भी कम समझती है। उसका परचाताप न दोनों प्रकार के कर्मों की फसानुम्पशा में दिखामा ही परिणाम है। परनी शिम्बना उमजे लिए सहयों उपरेयों में प्रधिक शिधार और समपारी पी।" प्रमथ ने सुमन परिष की भांति ही यहाँ यह भी दिखाया है कि सत्संमति में साकर प्रबलतम मस्कारों को भी एक नबीन रिसादीमा समतोमा समई में पाकर गायत्री मी परामय रोपातीपौर प्रण करती है पर मे यह जीवन स्थान पोर पारत्ताप पर समर्पण होपा । म पनी रिपाया से इस्तीफा दे देती। मेरा रम पर कोई परिकार नहीं है। परन्तु यह एक टिममा होती है कि देवयोग से मुर्मपति में पड़ने पौर पुनः मम्माम पर मामे के उपरान्ड भी मारवारी परिष प्रात्म ग्लानि से विमुक्त नहीं हो पावे पर बीवन उनके लिए प्राय समझौते का मेष नहीए पाना। पायमोके परचाताप में मी पारमम्मानि ही पथिक सबरी है। पायत्री माकपा हार भी है। मनुहार मपमा गोपर होना चाहकर मी बहनहीं हो पाती है। पहले दो पासोबती है किसान पोस्ट मी हो पाए पपरमपी पासामियों से ही परन्तु पुन गितार करतीको प्रबों कौशय से भरना हो पपा नहीं।" हमाईबारी पोर वाममामे में मेकर मैनेजर तकनिमी को भी यह पमन्तुष्ट नहीं करती है। हमारी में वृद्धि करने को मौतसर हो बाटोमपर पीपाटसापार्यो। निरीक्षण करके रिपा (अनुरा) के नाम पर पारितोपिक ले लिए रपये वीरमाती है। मापसी को यो तोर पोषक वर्ग में योग मम्भवत पारती म सदार अन्तरंगो विस्मृा पर है!पोर माप ही यह भी मन पाकिमी घोष मारोप रसके मन में स्थान पाता भी है तोप स्थायी नहीं होगा- पदो रमोनियनिस्महाय नारी रिपोम मार है। इसरो पोर पात्री उपाहारा माया तास मी नही है कि उसमें रिवारों का मिर स्माताम्य है।ए मनातन धर्म में सिखास रणने वाली विषय पर यह एक सीमा तक मतिपत विचारों दोप पर रखने में भी पना सपा समारपारपाए मममती ।यही पारएटिम पारपार नमार सपा १०४ प्रेमबह पिषिप्ट मारी-पात्रों का परिण-चिपए सम्मता से पणा है। जिस विचार-स्मातरम्प के कारण पम्पत्पमित होता हो पायत्री के अनुसार हर मह दिन यहाँन माए पर मोपों में रिचार-सातत्य का इवना प्रकोप हो पाए ऐसी पण में परिषम मार्मों का मनुसरण करना मारानी है। प्रपामा की मुनामी इम्पापों की मुमामी से मप्ठ है। गायत्री सभापत गविता पव' पारमप्रससा की माससा भी उसे है। पषिता तो पानी है कि उसके समम पिता या प्रेमपाल तक को तुच्चसम मती है। वह अभिमान की पुतमी है, अपने कप पर भी उसे पभिमान . किन्तु प्रेमचन्द के सदों में सुग्रामर पभिमान का सिर मीचा कर देती है।" 'मायनीदेवी' मेव को पाकर यह फूली नही समाती पसका पमुगार करके कपों को सुनाती है। सब कुछ स्याम करने की चि रखवी भी यह करती है 'हा' पह मानसा पपाय है कि मेरी स्मृति बनी ऐ मेरा नाम प्रमर हो पाए, भोप मेरे पास मौर कीर्तिीवर्चा करते रहें। पही चिन्तामो भर तक मेरे पैरों की मेड़ी बनी हुई है। गायत्री में 'एमसीबता पोर मासिरप के पार पुष्पों का-सा भी है।" परफोममागिनी है किन्तु कापी सरों के मां और पुल से मी' भापती नहीं है। पर अपने विसाम मगन में बहुत कम पापमपूर्वक बैठती है कभी इस मांग पाती है कमी उस छावनी मे ठहरती है सभी सदर पाना पड़ता है तो कमी निरन्तर अधिकारियों से मनमोल की प्रापरयाता पाठी है।पर पप दबाकेक समस्त प्रामों को बचा समय बरे पर बाकर देखती है। उसके जीवन में एक समिता है। किन्तु पायत्री परिम-विषण में अनेक गोप मी परिलक्षित होते हैं जिनमें से पो तो पत्पन्त स्पष्ट है। इनका उत्तरदायित्व गायत्री पर नहीं अपितु प्रेमचन पर है। उसके चित्रण की पहली मुटि उसका मस्सामारिक पन्त । से प्रात्मम्मानि में सपा कर बौषित भी रखा वा तक्ता पा। इसपरोप है पसकी गिण विधि में बो कि नाटकीय महीं अपितु पिस्से परमात्मा गायत्री को स्वयं गात कम पाना परता प्रेमबर स्पर्म ही उसकी मकामत मधिक करते है यही कारण है कि मायनी की पिनास-पति को पुनौती तो मिलती हो। पिस्त एकवी भम्तान का स बह चारण नहीं कर पायी। और फिर इन रोनों दोपों का कारण मी सष्ट है। ऐसा न करने से पो प्रमती गायत्री मिए ही एक 'प्रमापमी पापश्यता होती। फिर से सम्मक पाक 'प्रेमा पम' पर पारी ही का प्रापिपरम होता। कई बार वो प्रेमवार को मह विषमता बहुत है मबरती है।
१०५ अपचर विषिष्ट मारी-पानों का परित्र-चित्रण सासी पिका-विवाह के प्रेमचन्द किसने पक्षपाती है-इसका सबनतम प्रमाण 'नैराश्यनीबा' हामी की कमासी है। गायत्री में दो समेत प्रस्फुट पा है माही में उसकी सचेप्ट प्रमिभ्यक्ति हुई है। महि-मस्त समान में किस प्रकार पूर्स-बावना निषा के माता-पिता चाहकर भी एसके पुनर्विवाह की कल्पना को पपरों तक नहीं मा पाते-यह विधाना ही प्रेमचन्द का यहाँ प्रमीप्ट है। सापही इंगित इस पोर भी है कि मापनही तो कम समान-स्वास्थ्य के हेतु इस मैसयिक भावश्यकताको पवान पर जाना ही पड़ेगा। नैरास्य नासी के चरित्र का सर्वप्रभान भय है। इस पाय का मूत है काम-कुष्ठा। मासी कुमारी का ममी गौमा भी नहुमा पा बह ममी तक यह भी न मानने पाईपी कि विवाह का माधय क्या है कि उसका मोहाम पठ पा । पम्प में उसके बीबम की प्रमिनापाों का दीपक गुम्न दिया।"तेरह वर्ष की इस विषना , पपवेतन में ही निराणा पर करमा पारम्भ कर देती है। मां-बाप एवं सवे सम्बन्धियों का प्रेम नहीं अपितु सम बेरना पौर सहानुभूति के प्रथु ही उसे नसीब होते हैं। परिणामस्वरूप पय सन्धि में ही नासी एकान्तप्रिय हो पातीपर के कोने में बैठी किस्से कहामियां पड़ती इती। एकान्तप्रियता के उपरान्त नासी के जीवन मे विनास का माममन होता है। उसकी एकान्तप्रियता को बीवन का समापन म समम कर उसके माता पिता से पति-गोकप में यात पास है। प्रत उसके मनःप्रसारनके मिये मिनिम्न विमास-सामग्रियो गुरागातीहै। सरसपाटे की इतमी पारी हो पाती है कि एक छिन भी बियेटरन पाने से कत्ल-सी होने नमती। इस रिमासिनी रूप में उसके परिण में प्राणियों के प्रति असहानुभूति पबममा दया पवि-पर्व प्रादिकी भावमार्यों का प्रस्फुटन होता है। परिणाम सम्म मोहस के मोय पाबारे पसने लगते है और उसके माता-पिता सभी प्रकार के दिनोर प्रसाधनों को उसके लिए पाप करने पर बाम्म हो जाते है। मासीका बिमासिनी म्प भी नैराश्य में पाबाता है। प्रामासी मपभप होनह सामपि बीपन पितराम में पासमा पपिक टीजरेप से गार होती है इसमें भरपामारिकम्प से पुस्- रीपारीगाठी है। उसे समम्पपा बाता विषम्म पूर्वनों का फल एवं पनी प्रापरिवठा अपतर विशेष होता है। सोचने मपती परम्प यातना नहीं। बीवनीसारका सापन! मेरा रगर स्यान दिराम मछि - प्रेमबर के विशिष्ट मारी पामोंका चरिण चित्रस पौर उपासना ही में होगा।" पत पुरीनिवा रूप में यह एकात सापना की मोर मप्रसर होती है और एक दिन ऐसा भी पाता है जब कि यह सम्पास पारण करने का पूर्ण निरषय कर मेती है। परन्तु उसका यह म मी स्थिर नही । पनेसपिम्ता स्थिर हो भी से सकती है । समान को भी पुन चिन्ता हो पाती है पौर निकषय किया जाता है कि संन्यासिनी होने से तो पप्यापिका होना ही पपिक मेयस्कर पोंकि सम्पास जो समाननिापेप माषरण की रिया है निवृत्ति है। मत मासीका या पक्ष मी निराशामय है। उन्नीस साल की मासी अब समाजमारिणी प्रमापिका है। उसकी सेवा-प्रवृत्ति विनोदिम वीव होने नपती है। पाठपाला परिवार का म पारस हर मेती है । परन्तु किसी भी वाहाकी तणावस्था में बरबह पत पत भए उसके सिरहाने बैठी पती है मोमन की परोसी पानी पड़ी रहती तो पर मानों को पपाम बाकी के उग्मार की पुन चिन्ता होती है पीर परिणाम सम्म पाठपामा बन्द हो पाती तासी की निराठा पर इस सीमा पर पहुंचता है कि यह सौ-सौ में करने भी गठी है 'मर बाउंगी तो मापने सिर से एक विपत्ति टम बायेमी । इस प्रकार हम देखते हिमासी + प्रत्येक परिष रूप का परिणाम मेराप ही होता है। प्रस्तुत पतृप्त मौन-वृत्ति करिया परिवर्तन के समी पणा स्तर प्रमास पतिवार की सीमा को बाया करते हैं। पतिवारिता में एकामी प्रामाविम्ता विचमाम होती है प्रत यह पन्तत मेयार नही होती । पुननिमाहिणा होकर परिसासी सेवा प्रबरा स्पाम की रिक्षा में प्रप सर होती तो निश्चय ही उसकी सेवा प्रापि में प्रपिक स्थिरता वा प्रति स्थामाविकता होती। सीपीए निरापा पारममात मार्म पपया गिरोह का निपन किया करती है। पायत्री को मृत्यु कारण भी यही निरासा पो परमासी का पब उसे गिोह की मोर रामुखकरता है । ताप्ली में प्रा पषिक सहन करने की सामर्प नही है।ह विमुम्न होकर पिता उठसी , "पुष मासूम भी वोहो कि संसार मुम से क्या चाहता है। मुझ में पीपवना है पर गोरखा । गुमरे यह नही रुपमा लिपपोको पापिनी पुलिया समार और एक टुमा रोटी भाकर पी रहें। ऐसा क्यों पर । संसार मुझे बो चाहे समझ में पपने को प्रमादिमी नहीं समझती। मैं अपने पात्म सम्मान की सा पाप कर सकती है। इसे अपना घोर अपमाम समझती कि पप-पय पर मुरु परपंका की बाब निरस कोई परवाहों की मांति मेरे पीये माटी प्रमचम वितिए मारी-मानों का परिपश्चिम) लिए मता पेफिक्सिी वन में न मा पापा स्पा मेरे लिए प्रप्सम है। बीस वर्ष की पूर्व-पौरमा मासी को पर अपनी रेपसी का बरा न होने कपा है। पड़ी पुरप की रिसमी मीनमामो स्त्री को विपासासी निये बनाया है कि पुरषोभवीम है। यह सोचकर एपमार याबार पर पासपीधमे समठी पी। इसी पासपीसने का परिणाम होता है कि एक दिन सासो सुन्दर - विपास दी है पोर परे में मुमाब का फूल भी बनाती है दुसरे दिन मौन रेशमी साड़ी पहन सेती है मार दोसरे दिन उपवास त पादि घे भी उसका विवाह वह बाताई-अन्तत उस विवाह के नाम से भी पता हो पाती"रातों को शिकारियों के पत्ते सममती है पोर विवाहको मी का अमिरान । परन्तु मासी की या मिर-भाषमा उमाटिकी भावना नहीं पोरि इसका मत प्रात्म-सम्माम में मही पपित राय में पिपमान है। प्रेमचन्द के पो में यह सिह राम की प्रतिम अपस्मा" इस प्रकार मासी का परिण पस्तृत ही पर रामप-सीहा है। प्रेमचन्द प्रत्यम्त उम्प में यह सप्ट किया है कि यह एक माविकाशीन मौसमान है सकी बीबर नौका मेयाय सामर में मामी समाप में ग्पकमाती ही ऐसी जूतरे एम्दों में उसके रायर एकमात्र स्वम्म पपाम विवाह ही है। प्यारी 'सामिमी' हानीको प्यारी साधारण तर ही एक पापील पर- रिकामपारस मामय पासप्ट किया किरिया के लिए बीवन-मेड में किसी पापार का होगा परिणाम होता है। मंगना इस पाप कीमा सामाजिक स्तरीष्टि है प्यारी पठित एवं पायली हा नादी की भला ही पिक निम्नाय होते हुए भी सरला एवं स्वतन्त्र है। उन पाएनौपी होता लिपिनियों की पर माम्यतामों रिपरा एवापत पिया की पारामापका का कारण पमा कमी-कमी रमापारमा समाना है। इसके विपरीत पो पनि समार प्रस्ताव पर्परत एक परिपपीपी होता है प्रत सिरानीमहो प्रत्येक दामबाने पामे प्राणी की रसे पायरयता हुमा करवी है। प्यारी पियरे रो पश-पारसम्म पपा बाबारपा पत्र । या नियमम अपना प्रभावात्मक पप । प्रथम नगरे समर्मत रमा प्रमचरबिमिट मारी-पात्रों का परिचाल सापिनी ल पाता है। पिना होती हुई मी पर सामिनी पनी थे वह नई भारया भी पत लिए पति , प्रमाल का सबसे बड़ा भवामहै। परतु उसकी या पभिकारमा सर्प की पुती नही पपितु मानवापारी मापता की पर्याय है। पसके लिए स्वामिल का है मक परियम । मगुर से मारपीरवी पाने के पातमा मापिकाको नति निटनी नही ती पर हम-मन-धन से यह प्रबाप की मुबारता में पुट बाती हैनदुर विधानमती है म दुसरों को मेने देती है।" ए इस परिमन करसम्म ही परिवार में "होमन पहले से पन्ध मिमता है, और समय पर मिलता है। इस प्रतिक होता है की पत्रिक होता है और काम पवित होता है। प्यारी के सामिल का पर्व है कम्प-पूर्ति निकाम-सीत्तम मूर्ति परामे सुर भारत मुबकी मारना । बर पिपास नाप समाता किमाई मोगा किती केही होते पर मह उत्तर में निपह-सी पवना होमहवी, "को अपने हरे भी मा पूर्व को अपने ही पोहै। मेरापर्म मेरे सार है, एनका धर्म भने पाए। मरमानी तो वा कापी पर मार करबा मी? प्यारीके सामित्वका पत्यार जिन मापणों के लिए मारी-मााप-पावान करता है पर पदस्पी चामन में पमी कायम तया सत्व करती है। अपने लिए तो उघ रसदी ही नहीं पर नारी माल (रानी मी) की योडी कों की भार होती है सस म्पप-बाणों का शिकार बनती र मी किसी नसी प्रकार करना ही देती है। पर में सनी मुखी है मी सपने "हा मगर कोई मNिur महिमप में वो यह प्यारी।"वस्तु जिस समाप्पाती।सकीप्पि पारिवारिक स्पान की पार गौ मत्पम्त पहत्तपूर्ण होती है। प्यारी सामिल का है मोकमारा पानम पा समाप में अपनी उम्पाम रमा। सापारणा मितम्पपिनोई 'परपणतीबाट पापाठी परिस भोनकरबरीपनर माग में होगा दो या बाद पी। मोन राप्ती का नाम वो पर मारी + पुरसम्म परमह भविपकी बिन्दागों से विमुख-सौ होकर मपाम है उसके भानोसपा प्रताप की है। प्यारी सापाल का पापीलता । नारी दुपारीका पछि मपुरा मोर कमी-कमी पारधी सनी उसकी भाप भापों का मत विश्लेषण र सिकी भी मारकी प्रति किम नहीं होती ही रस सिर पर सवार हो पाता है। उसकी बहन पोरवप परी मनापा तनही रखतीपर के सभी पारमी प्रपने-अपने परसर पर प्यारी को रो-बार कोटीमारी मुना पापौर परीद पास सिकर पाती है।
प्रेमबार विशिष्ट नारीसामों का परिष चित्रण पसकी सामित्व-करपना तो इन प्राधाों से और भी स्वस्प होती है। प्यारी के स्वामित्वका है ममता । ममता का हा बबन ही उसे परिवार से बाये पता पितु ससुर की मृत्यु के उपरान्त पर ममुरा तपा पुतारी बाम-गयों समेत परदेष की राह मेने नपते पोर दुनारी की गापा होती है कि उस स्थान पर मानद से निवास परे यहाँ प्यारी हो तो उसका हरप करोड साकर ए पाता है। पसने तो इन पयको स्वामिनी की-पी प्रवाहमा नही मो का सा प्यार रिया है पोर पान पर निर्मोही रसके सम्पूल ममस्व को ठुकरा कर पा रहे हैं उसके भी मैं मातामह भी इसी भांति निामा ये मोहपौर ममता को परों से पत गते किन्तु मह ममता मिस नाच को चाकर पनी पी से अपने सामने से हटाये बाते देखकर मुम्ब होने से न सच्ची पी।" विलोम की इस अवस्था में भी उसका ममाव बह ही उठता है "देखो पन्नों को मार मारना-पीटना मत मारने से गले निही पीर बेहया हो पाते।" पौर पर गुवारी उपरेनों को इस तर मन हो पर सुनती है मानो कोई सनी या पाहो। इस प्रकार मुमत पारी के स्वामित्व पर सेवकत्व है ।पा स्वामिनी है किन्तु नाममात्र से ही प्रम्पपा परिपम करम्प-मूर्ति स्याम मारा-पाहम सहनशीलता ममता मा सेवा-ये समी गुण धाधारणत स्वामिनी नहीं मार मैषिका ही के होते है। प्पारी मेरम्प का दूसरा पर है निरवनम्म प्रपमा ममावारमा पाको कि अधिकार तक स्पिर नहीं रहता । सामिल पमा रकम भी तो किसी हेतु पर टिके हए होते है। हमारा बीवन के प्रति मगाग प्रमुचत इसीलिए होता है कि हम अपने लिए ही नहीं अपितु किसी मम्प बिसे कि हम अपना घममते के लिए भी बीते हैं। पर प्यारी से तो बह प्राचार भी पर बिन गया है। इसका एप्रन्त बीवन से सम्म में टिका हमा है। मत पसके मिस पलीत्व तपा मारीत्व पर स्वामित्वमाकर्षक पर्व पर पए पे बह पुन बाबत होता है। पहले भी कुमारी वषा मपुरा पानिपन को पार एवं पिपु-संसार में उन्हें परितृप्त रेखकर उसने कमीकमार परपर बरसी की। प्रापिर यह मी एक प्राशी है उसके माल ना पालीत्व में मीहरू पठती है। विध मापार के कारण इसे सामायिक प्रतिष्ठा मिती पो बह मी पर विलुप्त ऐना है। माना यह निराम रहने ममती है। कई रिन पर मूदित-सी परी रहानपर से निम्मतीमा बनाती पोरम हाप-महही बोटी है।" बीरे-वीरे रसका राम मिसोम में परिवर्तन को प्राप्त होता पौर गिमोन प्रारमाभिमान में ।बह मारमामिमाना पबमानकर पुम सनी १८. प्रेमचन्द के विषिष्ट मारी-पापो का परिण-चित्रण पौर करती है या (मथुरा) सममता | म रसके सहारे ठी। यहाँ उसको मी सिमाने का दावा करती है। निराणा पितोम तपा प्रास्माभिमान-पही है उसका प्रभावारमक पक्ष । किन्तु बीवन कमी मूग्य महीं होता।मति भार्यों को प्रभाों के स्पाना पम्स बनाने में निरन्तर निरत पता ही है। पारमामिमान पूण-भावमा के पैषम्म का स्वस्म पापार भी नहीं हो सकता। यही कारण है कि पारी की ममोवृत्तियों में भी भय विचित्र परिवर्तन पा पाता है। इन पत्तियों में दो सबसे पपिक उभरती है माह पौन-वृत्ति प्रथा अनुराग । मरपूर यौवन में प्यारी विषयाई पी। पर पपड़े एकान्त नीष बीवन में हनमाहा बोलू पार्पण करता है। पारी से पतिरूप में स्वीकार कर देती है। सामिनी स्म में मिस मापार को उसने होया पा रखसे भी अधिक भावपूर्ण पापार की प्राप्ति उसे पुन हो जाती है। प्रेमचाय मे रिवाया है कि उसका पास्तविक स्वामित्व पत्नीलकी दिशा में ही है। उसके पास प्रम पुन उमंगे। पासा । पौर स्पास्म है। गायत्री पौर मातीने दिन भी मौटकर नही थे।
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