Sanmati Library, Jaipur

Sanskrit Praveshini-2

Jain, Shrilal · 2010/02

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

वक्तव्य। विज्ञवर महोदयगण ! लीजिये ! आपके करकमलों मे यह संस्कृत प्रवेशिनीका द्वितीयभाग भी आज हम सादर समर्पित करते है । इस पुस्तकके लिखे जानेके प्रधान कारण इसके प्रथमभागमें लिख आये हैं अतः उनकी यहांपर पुनरुक्ति करना निरर्थक है। हम यह अपना सौभाग्य समझते है कि हमारे इस प्रयलको समस्त देशवासियोंने अपनाया है और इसकी लेखन प्रणालीका सर्वथा अनुमोदन किया है। इस भागमें प्रायः ब्या- करणके मुख्य २ उपदेशी उदाहरणों सहित समस्त नियम आगये हैं जिनके कि पढनेसे लघुसिद्धांतकौमुदीके बराबर व्याकरणका बोध हो- सकता है । शब्दसिद्धिके नियम और धातु तथा प्रत्ययोंके अनुबंध, सुगमताके लिये जैनेंद्रव्याकरण के अनुसार लिखे गये है। जोकि सर्वत्र प्रचलित पाणिनीय व्याकरणसे सर्वथा भिन्न न होनेपर भी बहुत ही सरल और सुपाठ्य है । उन नियमोंके भली भांति ध्यानमें रखलेने से, विनाही किसी लघु व्याकरणके पढे सिद्धांतकौमुदी, शब्दार्णव- चंद्रिका प्रभृति वृहद् व्याकरणकी टीकाओंमें विद्यार्थीका अच्छीतरह प्रवेश होसक्ता है । इस पुस्तकके बनानेमें जिन२ ग्रंथोंकी हमने सहा- यता ली है उनके नाम अन्यत्र प्रकाशित है और उनके रचयिताओंके हम चिर कृतज्ञ हैं। पुरातन हस्तलिखित प्रथोंके देखनेसे यह बात भली मांति सिद्ध होती है कि पूर्व में विद्वान् लोग व्याकरणसे अशुद्ध होनेपर मी साहित्य- प्रचारकी सुगमताकेलिये परसवर्ण पंचमाक्षरको अनुस्वार करकेही लिखते थे अत एव हमने भी इस सनातनी प्रवृत्तिको अत्युत्तम समझकर पंचमाक्षरकी जगह अनुस्वार ही लिखा है। अंतमें हम अपने हितैषियोंसे निवेदन करते है कि इस ग्रंथमें जो - २ प्रथम भागपर- कहीं प्रभादवश या बुद्धिभ्रमसे अशुद्धिया रहगई हों अथवा कहीं पर कुछ त्रुटियां आगई हो तो उनसे हमें सूचित करें जिससे कि द्वितीयसंस्क- रणमें वे सब दोष निकाल दिये जाय । कलकत्ता। विद्वत्समाजका सेवक श्रीलाल जैन ॥ 30- - संस्कृतप्रवेशिनीके सहायक ग्रंथ जैनेंद्रव्याकरण, चद्रप्रभचरित. धर्मसंग्रहश्रावकाचार. सुभाषितरत्न- सदोह, क्षत्रचूडामणि,आराधनाकथाकोप. सामायिक पाठ, धर्मगाभ्युदय, महावीरपुराण, श्रेणिकचरित, हेमलिगानुशासन, ईसब्नीतिकथा, सस्कृत- शिक्षा, संस्कृतशिक्षिका, सस्कृतमार्गोपदेशिका, संस्कृतप्रवेश, दश कुमारचरित, हितोपदेश, गणप्रदीप । अभिज्ञानशाकुंतल, कादवरी, तत्त्वार्थसूत्र, एडस् टू दासलेशन इन टू सस्कृत, वृहत्स्वयभूस्तोत्र । प्रथमभागपर समाचारपत्रों की संमतिया- सरस्वती। यह पुस्तक इसलिये वनाई गई है जिसमें संस्कृत भाषाकी सजाओ और धातु- ओं आदिके रूपीका शान विद्यार्थीको होजाय और उन्हें सस्कृतम बातचीत करना आजाय । “इस भागमें शब्दोंके प्रथमा, द्वितीया तथा सवोधन विभक्तीके, धातु- ओंमें भ्वादि और तुदादि गणीय धातुओंके वर्तमान, भूत, भविष्यत और आज्ञा अर्थक रूप बतलाये गये है " सस्कृतसे हिंदी और हिंदीसे सस्कृत अनुवाद करने के लिये पाठ भी दिये गये हैं। शुद्ध करनेके लिये अशुद्ध पद भी दिये गये है। पु- स्तककी रचनामें जैनव्याकरणोंका अनुसरण किया गया है जिस प्रयोजनके लिये यह पुस्तक लिखी गई है उसकी बहुत कुछ सिद्धि इससे हो सक्ती है १ विभक्ति और क्मिकी दोनों ही शब्द है हस्व इकारात क्तिन् प्रत्ययात तो विना ही स्त्रीत्वद्योतक प्रत्ययके स्त्रीलिंग है और क्तिच् प्रत्यात दीर्घ ईकारात स्त्रीत्व योतक दीप्रत्ययात है। जैनेंद्र व्याकरणमें इसी विभक्ती शब्दसे इसकेस्वरोंमें प्और समाचारपत्रोंकी संमतियां। ३ विद्यार्थी इस पुस्तकम हिंदीके साथ संस्कृत भाषाके सीखनेका अच्छा कम रक्खा है। पुस्तक संस्कृत सीखनेवालों के बड़े काम की है। जैनमित्र। यह एक संस्कृत व्याकरणका प्रथ नई पद्धतिसे विद्यार्थियोंके हितार्थ तयार किया गया है ।इससे बहुत ही सुगमतासे व बहुत कम कंठ किये संस्कृत का अनुवाद करना आजायगा । अलाहाबाद विश्वविद्यालयमें प्रचलित ऋजुन्याकरण व ववई वि वि. में प्रचलित मार्गोपटेशिकासे यह पुस्तक बहुत उपयोगी है । इसमें शब्द, और धातु व उदाहरण बहुत हैं । हरएक वालक सुगमतासे समझ सकेगा। हमारी सम्मतिसे सर्व जैन व अजैन विद्यालय पाठशाला व स्कूलोंमें ऋजु- व्याकरण, मार्गोपदेशिका आदि वदकर इसीको पढाईमें भरती करना चाहिये । प्रकाशकसे मंगाकर एकबार इसको देखना चाहिये । इसके द्वारा हिंदीका ज्ञाता अपने आप सस्कृत सीख सकता है। दिगंबर जैन । संस्कृत पढनेके लिये मार्गोपदेशिका आदि जितनी पुस्तकें प्रकट हो चुकी हैं उन सबसे यह पुस्तक बात ही उपयोगी है। पुस्तककी रचनाशैली ऐसी है कि रोज एक २ घंटा ध्यानसे पढनेसे विना गुरुके चार छह महीनेम सस्कृत समझ- नेका ज्ञान प्राप्त होजायगा । इसमे सब प्रकारकी समज हिंदी भाषामें दी गई है। हरएक जैन विद्यालय और पाठशालाओंमें अब इसग्रंथको ही प्रवेश कर देना चाहिये। संस्कृत पढनेवाले भाईयोको अवश्य ही मंगाना चाहिये । छपाई सफाई अच्छी है और मूल्य भी कम है। कान्फरंस प्रकाश। संस्कृत सिखानेकी प्रचलितरूढि विद्यार्थियोंको कुछ बोझारूप है और समय भी बहुत लगता है इससे कुछ कम वुद्धिवाले विद्यार्थी उसे थोडा पढकर छोड देते हैं इस कठिनाईको दूर करनेके लिये हिंदी भाषा भाषियोंके हितार्थ यह ग्रंथ व्यंजनों में 'आ' लगा देनेसे सातो विभकियोंके नाम निकाले हैं। जैसे-वा, भा, अप का, ता, ईपू ।

समाचारपत्रोंनी संमत्तियां। बनाया गया है। पाठशाला और अंग्रेजी रालोमें गस्तान मदनगान के लिये यह ग्रंथ बडा ही उपयोगी है। इससे गस्कृत भाषा गुगपुग अवरोध होग साथ ही साथ तस्कृत भाषामे वातालाप या अनुपाद परनेमें गगमता होगी। नयोधक। तोही प्रथ सर्वजनानी विशेषत. उत्तरीय हिलोकानी साना ममा गाणे अत्यत अवश्य आहे । यात संस्कृतभाषेत निगम गरे मुगोगन करण्याचा त्रास न करिता सहजरीतिने गंस्कृत भापत प्रवेग रोया साम्गिी पगम्या केलेली आहे । आमच्या मते हे पुस्तक रनर हिंदुस्थानाच्या पाठगारंग नाद क ल्यास त्याचा फार उपयोग होण्या सारिगा आहे। मलाफागा प्रमाण जगंजी प्रवेग वगरे अनेक प्रथ परभाषा शिकण्यासाठी प्रकागिनत आहेत न्यानोगे अनेक मुख वस्तु सगृहस्थाना आपल्या फुरसती प्रमाणे पगमन तीभाषा fri त्याच प्रमाणे आपने धर्मप्रय समजण्यासाठी असर अराल्येल्या मस्कृतभाषेने जान सहजरीतिने सपादन करिण्यासाठी प्रत्येकाने हे पुस्तक गग्रही ठेवण्यामारिमा हे। जैनप्रभात । इसे वर्तमान ढगसे सपादन किया है और सरल यनानेका प्रयल रिया है। संस्कृत पढनेवाले विद्यार्थियोंको यह बहुत ही उपयोगी है। सत्यवादी। इसप्रथकी छपाई सफाई उत्तम है, साथ ही नाम भी अन्वर्य है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जो परिपक्व विद्यार्थी संस्कृतसे अनभिन्न है उनको इसके द्वारा सं- स्कृतमें प्रवेश हो सकता है। इस वातका प्रयत्ल किया गया है कि इसके अभ्यास करनेवालेको शुद्धाशुद्धका ज्ञान होजाय और बोलने तथा अनुवाद करनेका अभ्यास होजाय । त्रुटि इतनी है कि इसमें संस्कृत प्रयोग यनानेका सिद्ध करनेका नियम एक मी नहीं बताया है। यदि थोडेसे नियम भी बता दिये जाते तो उससे अभ्यास करनेवालोका वोध दृढ होता । तो भी नि संदेह यह विद्यार्थियोंके अतिलाभकी चीज है। १ नियम प्रयोगोके सिद्ध करनेके प्राय मुख्य २ सव बतलाये गये है। परंतु वे टिप्पणीमे लिखे हैं।

सनातनजैनग्रंथमाला।
१३
संस्कृतप्रवेशिनी
द्वितीय भाग।
प्रथम अध्याय।
द्वितीया (कर्म) विभक्तीका मिन्न २ रीतिसे व्यवहार
(१) प्रथम पाठ।
१ हा देवदत्तं वर्धते व्याधिः-हाय । देवदत्तको व्याधि वढ रही है।
हा त्वां अविचार्यकारिणं हा विना विचारे काम करनेवाले तुझको।
हा मां पापकारिणं-हा पापकरने वाले मुझको।
२ अवरा त्वां मां च पुस्तकं वर्तते--तुम्हारे व मेरे वीचमें किताब है।
निषधं नीलं च अतरा विदेहस्तिष्ठति-निषध व नीलपर्वतके वीचमें
विदेह है।
वाराणसींकालिकात्तांच अंतरा पाटलिपुत्रः-बनारस तथा कलकत्ताके
बीचमें पटना है।
-३ भतरेण विद्यां मनुष्यः पशु:-विद्याके विना मनुष्य जानवर है ।
अतरेण पुरुषकारं न किंचित्-पुरुषार्थके विना कुछ नहीं होता ।
अतरेण गुरु विद्यालाभो न-विना गुरुके विद्याकी प्राप्ति नहीं होती है।
१ हा आदिक शब्दोंका जिन शब्दोंके साथ संबंध रहता है उन शब्दोंसे
द्वितीया निमकी होती है अर्थ कर्मका रहे चाहे न रहे ।

सनातनजैनग्रंथमालायां- ४ विक् ब्राह्मणं पलांडुभक्षिणं-प्याज खानेवाले ब्राह्मणको विकार है। धिग् जैनं मद्यपायिन-मद्यपीने वाले जैनको धिकार है। धिक् कवि कुनृपप्रशंसिन-खराब राजाकी प्रशंसा करनेवाले कविको धिकार है। ५ निकषा पर्वतं नदी वर्तते-पर्वतके पास नदी है। निकषा मां कुमारी तिष्ठति-मेरे समीप कुमारी बैठी है। निकषा मुनि श्रावको वसति-मुनिके पास श्रावक रहता है । ६ समया जिनालयमुद्यानं शोभते जिनालयके पास वर्गाचा शोभता है। समया तीर्थकरं भव्या ब्रजति तीर्थकरके निकट मव्य लोग जाते हैं। समया केवलिनं विरोध मुंचंति हिंसका:-केवलीके पास हिंसक जंतु विरोध छोड देते है। ७ अतिशोभते काष्ठांगारं जीपंधरा-जीवंधर काष्ठागारसे अधिक शोभित होता है। को मां अतिगच्छति-कौन मुझे उल्लंघन करता है। अयं अमु अति धनं अर्जति यह (व्यक्ति) इस (व्यक्ति) की अपेक्षा अधिक धन कमाता है। ८ प्रजाः पश्यति नृपं प्रति-प्रजा राजाको देखती है। वृणीष्वभरे प्रति मातियत्त्वां भद्रे ! जो तुझे अच्छा लगे उसे घरण कर। मां प्रति कथमिदं दुर्वचनं मेरे प्रति यह दुर्वचन क्यो' ९ अनुजीवकमेवान (जीवलोके) विपश्चिता-इस लोकमें विद्वान् जीब- घरसे (अनु) नीचे हैं। मां अनु वदति स्म सामेरे बाद वह बोला। वाराणसीमनु प्रथते प्रयाग-वाराणसी (बनारस) के बाद प्रयाग (इलाहाबाद) प्रसिद्ध है। नीचे लिखे शब्दोंके व्यवहारसे वाक्य वनाओ- हा, अन्तय, अन्तरेण, घिम्, निकषा, समया, अति, प्रति, अनु।

३ संस्कृतप्रवेशिनी। *द्वितीय पाठ। १ परितो ग्राम सेना वसति-गावके चारो तरफ सेना रहती है परितो वृक्षमालवालो वर्तते-पेडके चारो तरफ आलबाल [क्यारी है। परितो राजान सेना गच्छति-राजाके चारो तरफ सेना चलती है। २ अमितो मामनुचरास्तिष्ठति-मेरे चारो तरफ नौकर हैं। अमितस्त्वां नार्यों वर्तते तुम्हारे चारो तरफ स्त्रिया है। अमितो हस्तिनं सिंहाः गर्जति हाथीके चारोतरफ सिंह गर्जते हैं ३ सर्वत पुष्पाणि भ्रमरा नमंति-फूलोंके चारो तरफ भ्रमर घूमते हैं। सर्वतो गृहं सरोवर्तते-घरके चारो तरफ तालाव है। सर्वतो धनवंतंखला भ्रमंति-धनवालेके चारो तरफ दुर्जन घूमते है । ४ उभयतो मार्ग वृक्षास्तिष्ठति-मार्गके दोनो तरफ वृक्ष हैं। उभयतो वाराणसी नदी वर्तते-बनारसके दोनो तरफ नदी है। उभयतो जिनमिंद्री गच्छतः-जिन भगवान्के दोनो तरफ इद्र चलते है ५ ऋते धर्म कुतः सुख-धर्मके विना कैसे सुख हो । ऋते शानं कुतो मुक्तिः-विना ज्ञानके कैसे मोक्ष हो । ऋते दयां कुतो धर्मः-दयाके विना धर्म कैसे हो । ६ विना ध्यानं कुतो मुक्किा-विना ध्यानके मुक्ति कैसे हो । विना श्रमं कुतो विद्या-विना परिश्रमके विद्या कैसे हो। विना विद्यां कुतो यशः-विना विद्याके यश कैसे हो । नीचे लिखे शब्दोंके व्यवहारसे वाक्य बनाओ- परितः, अमितः, सर्वतः, उभयता, ऋते, विना। * तृतीय पाठ। १ अघोऽधो नरक नरका वर्तते नरकके नीचे नरक है । अधोऽघो ग्रंथं ग्रंथा:-अंथ के नीचे ग्रंथ है। * पहले पाठकी-टिप्पणी देखो।

सनातननग्रंथमालायां- अघोघरछात्र छात्रा:-एक विद्यार्थीसे नीचे दूसरा विद्यार्थी है। २ अध्यधि पात्रं पात्राणि तिष्ठति-वर्तनके नीचे वर्तन हैं। अध्यधि नृपं नृपा राजते-एक राजाके बाद दूसरा राजा शोभता है। भध्यघि गृहं गृहाणि-एक घरके नीचे दूसरा घर है। ३ उपर्युपरि स्वर्ग स्वर्गा वसंति-एक स्वर्गके ऊपर दूसरा स्वर्ग है। उपर्युपरिभृत्यं भृत्याः--एक सेवकसे ऊपर दूसरा सेवक है। उपर्युपरि विद्यां विद्याः-एक विद्या दूसरी विद्यासे अच्छी है । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- उपर्युपरि, अभ्यधि, अधोऽधः। * चतुर्थ पाठ । १ मास (एक) गुडापूपा भक्षिताः-एक महीने तक गुडके पुवे खाये । द्वपक्षी दुग्धं पीतं-दो पक्ष ( पखवाडे ) तक दूध पीया । धीन सवत्सरान् दधि न खादित-तीन वर्ष तक दही नहीं खाया । कोश पर्वतो वर्तते-एक कोश तक पर्वत है। द्वौ कोशी राजमार्गः-दो कोश तक राजमार्ग ( सडक ) है। असंख्यानि योजनानि आकाशःप्रसते असख्यात योजनतक आकाश २ मास मथुरा कल्याणी-महीने भर तक मधुरा कल्याणी ( अच्छी ) है । दिन समनं वृष्टिभविष्यति-सपूर्ण दिन भर वर्षा होगी। +कालवाची तथा मार्गके प्रमाणवाची शब्दोंसे द्वितीया विमनी होती है यदि कोई काम वे नागा किया गया हो। जैसे-मासमेकमपूपामक्षिता -एक महीने तक पुऐ साये अधात् एक दिनका भी वीचमें नागा नहीं पड़ा । कोशं कुटिला नदी एक कोश तक नटी टेढ़ी है अर्थात्-वीचमें विलकुल सीधी नहीं है यह अर्थ होता है अदि एसा मतलब कहने वालेका न होगा वो द्वितीया विमकी न होगी।

-
संस्कृतप्रवेशिनी।
पक्षक परीक्षा भविष्यति-एक पक्षतक परीक्षा होगी।
कोश कुटिला नदी-एक कोरातक नदी टेढी है ।
३ बहूनि योजनानि गृहाणि न दृष्टानि-बहुत भोजनतक घर नहीं दी।
मासमेकमधीतं-एक महीने तक पढ़ा ।
श्रीन् सवत्सरान् संस्कृतविद्या पठिता--तीन वर्षतक संस्कृत विद्या पढी।
नीचे लिखे शब्दोंको व्यवहारमें लाका वाक्य रचो-
मासं, योजने, कोशी, पक्षान्, संवत्सरं, दिनानि, समयान,
घटिकाः, रात्रि, गम्यूति (दोकोश)
-
पंचमपाठ।
१ मुनिः पर्वतमधितिष्ठति-मुनि पर्वत पर रहते हैं।
जीवंधरो दंडकारण्यमधितिष्ठति सजीवघर दंडकवनमें रहे थे।
योद्धारौ अश्वौ अधितिष्ठतः-दो योद्धा दो घोडोपर चढते है।
२ पक्षिणो नीडमनुक्सति-पक्षी घोंसलेमें रहते है।
मत्स्याः जलमनुवसंति-मछलियां पानी में रहती है ।
३ वणिजो नगरमुपवसंति-चनिया नगरमें रहते हैं।
साधवः वनमुपपसंति-साधु लोग वनमें रहते है।
छात्राः पाठशालामुपवसंति-विद्यार्थी लोग पाठशालामे रहते हैं ।
४ पितृहीनो वालो मातुलालयं आवसति-पितारहित लडका मामाके
घर रहता है।
ब्रह्मचारी गुरुकुलमावसति-ब्रह्मचारी गुरुकुलमें रहता है
५ शिष्यः पाठकगृहं अधिवसति-विद्यार्थी गुरुके घर रहता है।
शवरा धनमधिवसति-मील लोग वनमें रहते है।
६ सच्चरित्राधर्ममार्ग अमिनिविशंते-सच्चरित्र लोग धर्ममार्गमें प्रवेश करते हैं।
का पापं समिनिविशते-कौन पापका आलंघन करता है।
मनो विद्यां अमिनिविशते–मान विधामे लगता है।

सनातनजैन ग्रंथमालायां ५. नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचो- अनुवसामि, उपवससि, अधितिष्ठामि, आवत्स्यति, अभिनिवि- स्यते, अधिवसंतु, उपवस, अमिनिविशेथा, अमिनिविष्टवान्, अध्यु- षितवान्, उपोषितवती, अनूषितवत्यौ, अधितिष्ठ, अभिनिविशावहै । षष्ठ पाठ। +द्विकर्मक धातु। १ श्रावको मुनि धर्म पृच्छति-श्रावक मुनिसे धर्म पूछता है । श्रेणिका श्रीवीरं धर्म पृथ्वान्-श्रेणिकने श्रीवीर भगवानसे धर्म पूछा । चेलना बौद्धसाधून प्रश्नं पृष्टवती–चेलनाने बौद्ध साधुवोंको प्रश्न पूछा। २ निर्धनो गृहस्थं धनं याचति (ते)-गरीब गृहस्थसे धन मागता है। अहं तं पुस्तकं याचिये-मैं उससे किताच मागूंगा । को मां विद्यां याचते-कौन मुझसे ज्ञान मागता है। का समुद्रं रत्नानि मंथितवान्-किसने समुद्रसे रनोको मथा । के समुद्रं रत्नानि मंथिभ्यंति-कौन समुद्रमेंसे रत्नोंको मथेंगे। ४ स त्वां पुस्तकं मिक्षिप्यते वह तुमसे पुस्तक मांगेगा। मुनयःगृहस्थान् धनंन मिक्षते-भुनि लोग गृहस्थोंसे धन नहीं मांगते । ५ सा तं मधुरं वाचं भाषितवती-उसने उससे मीठे वचन कहे । अहं तं वचनं वदिष्यामि-मैं उससे बात कहूगा । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचो- पृच्छतिस्स, याचिप्यते, मंथितवती, भाषितवान्, पदामि, पदति, भापते, भिक्षतेस, पृष्टवान् । + अधि-स्था, अनु-चम्, उप-चस्, आ-चस्, अधि-वस्, अभिनि-विश् धातुओंके आधारमें द्वितीया विमती होती है। + पृच्छो (पूछना) याघ्रम् (मांगना) मंथ (मथना) मिक्ष (मागना) भाषे, बद (कहना) इन धातुओंके दो दो कर्म होते हैं।

-
संस्कृतप्रवेशिनी।
द्वितीय अध्याय ।
क्रियाके विशेषण।
प्रथमपाठ।
*काल और स्थान वाचक अव्यय ।
१ चिर जीवतु गुणी भवान्-गुणी आप बहुत दिनतक जीवो ।
जनाः शश्वत् प्रणमंति मां-लोग मुझे नित्य प्रणाम करते हैं।
अमी शिशवोऽमीक्ष्णं दति-ये लडके हमेशा रोते है
नगरमागच्छंति मुनयः कदाचित्-मुनि लोग कभी २ नगरमें आते हैं ।
दिवा राजते सूर्य:-दिनम सूरज गोभता है ।
नक्तं शोभते चंद्र:-रात्रिम चंद्रमा शोभता है।
दहति स सद्य कर्माणि भरतः-भरतने शीघ्रही कर्म जला दिये।
मपदि वेष्टते स नगर सेना-सेनाने शीघ्रही नगरको घेर लिया।
'प्रातरुत्तिष्ठ नित्यं हमेशा सवेरे उठो ।
सायं पठंतु शुभस्त्रोत्र-सांझको शुभस्त्रोत्र पढो ।
मद्य फलवत् जन्मा जातोऽहं--आज मै फल सहित जन्मवाला हुआ ।
पूर्वेद्यु. १स मुनि बंदते स्म-कल (वीता हुआ) उसने मुनिकी वंदनाकी।
अन्येधु श्रेणिकश्चेलनां पृच्छति स्म-एक दिन श्रेणिकने चेलनासे पूछा ।
कदा त्वमागमिप्यसि-कब तुम आवोगे ।
तदा क्यं क्रीडिष्यामः-तब हम खेलेंगे।
युगपत् मेधा स्मृतिश्च वर्धयां एक साथ ज्ञान व स्मृति वढें ।
अधुना सफल नेत्रं जातं-इस समय आंखे सफल हुई।
साप्रतं गढामि तत्त्वं-इस समय सच्ची बात कहता हूं।
*-अव्ययोंके लिंग तथा वचन नहीं होते। अव्यय शब्द ज्योंके त्यों वाक्यों
में रखदिये जाते हैं। १ एतत् तथा तद् शब्दके कतीके एक वचनके विसर्गोका लोप
हो जाता है यदि व्यंजन उसके बादमें हो

सनातन ग्रंथमालायां। सदा यूयं धर्मरता भवत-तुम लोग हमेशा धर्मम रत होयो । सकृत् दुःखकरं मूर्खपुत्रमरणं-मूरी पुत्रकी मृत्यु एक बार दुग देती है। यावद् असो न म्रियते तावद् त्वं सेवस्य-जयतक यह न मरे तमतक तुम सेवो। परुत् छात्रा अत्र आगताः-परसाल विद्यार्थी यहा आये थे। पुरा महावीरो जिनो भवति स्म-पूर्वकालम महावीर जिन हुये थे। २ कोऽयमत्र आगच्छति यहा यह कान आता है। तत्र के जना वसति-वहा कीन लोग रहते है। कुत्र यूयं गछथ-तुम लोग कहा जाते हो। विद्वान् सर्वत्र पूजितो भवति-विद्वान् सब जगह पूजा जाता है । अधार्मिकाः इह दुःखमनुभवंति–पापीलोग इस संसा में दुराभोगते हैं। परत्र अमुत्र व धार्मिकाः सुखं लभते-धर्मात्मालोग इस लोक व परलोक में सुख पाते हैं। प्राक् विद्योतते विद्युत्-विजली पूर्व दिशामें चमकती है। उदक् प्रतिष्ठते स्म श्रीवर्मा अरिजयार्थ-श्रीवर्माने दुइमनोंको जीतने लिये उत्तर दिशामे प्रस्थान किया। सायंसूर्यः प्रत्यक् गच्छति-सामको सूरज पश्चिममे जाता है । पुर पश्य देवमंदिरं भोः-सामने देवमंदिरको देसो । समंतत समायाताः सामंतास्तं सेवते स-चारो दिशावासे आये हुये सामंत [ योद्धा लोग उसकी सेवा करने लगे। आरात वसंति मुनयः-समीपमें अथवा दूरमें मुनि लोग रहते हैं । मुहुर्मुहुरीक्षते स्म सा-वह वार वार देखती थी। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्यरचना करो- परेयुः, अन्येयुः, सर्वदा, यदा, तदा, कदा, सदा, सर्वदा, अभी- क्ष्ण, शश्वत्, नित्य, पूर्वाः, परारि, परुत्, प्रत्यक्, प्राक्, उत्तराहि, (उत्तरदिशामें) पुरः, पुरस्तास्तु, ( सामने ) आरात, समंततः, पश्चाद -

संस्कृतप्रवेशिनी।
मुह, पुना, ( फिर ) नक्तं, दिवा, रात्रौ, परत्र, अमुत्र, इह, कुत्र,
तत्र, अत्र, सर्वत्र, सायं, प्रातः, निशि, (रातम) सपदि, सकृत,
उदक, युगपत् ।
द्वितीय पाठ।
प्रकारवाचक [अव्यय]
१ झटिति गच्छति स्म सा-यह शीघ्र ही चलागया ।
साक् स तं मुञ्चति स्म-उसने उसे जल्दी छोडा ।
अहाय स पठति स्म-उसने शीघ्र पढ लिया ।
तिर सर्पाः सपैति-सांप तिरछे सरकते है।
साचि असौ वर्तते-यह आदमी टेडा है।
यथा अयं पंडितस्तथा त्वमपि-जैसा यह पंडित है वैसा तू मी है।
सर्वथा मुनयः शिवं इच्छंति-मुनि लोग सब तरहसे मोक्ष चाहते हैं।
इत्यं इमे दिवसा गताः-इस तरह ये दिन चले गये ।
शीघ्रं आगच्छ-शीघ्र आवो।
सत्वरं गच्छ-शीघ्र जावो ।
"क्षिप्रं कार्यमारभस्व-जल्दी कार्य आरंभ करो।
सहसा सत्यजति स्म,मां--उसने मुझे अकस्मात् छोडदिया ।
मां दृष्ट्वा ईपत् हसति स्म सा-वह स्त्री मुझे देखकर थोडीसी हंसी।
मनाक् अपि पापं न कर्तव्यं थोडा भी पाप न करना चाहिये ।
कथं सा एवं मां उक्तवती-उसने मुझे ऐसा क्यों कहा।
तूष्णीं भव भो थाल! ऐ लडके ! चुप रह ।
सिंहो गर्जति स्म प्रसह्य-सिंह वल पूर्वक गर्जा ।
नूनं दुर्जनो विपदं लप्स्यते-निश्चयसे दुर्जन विपत्तिको पावेगा ।
सा एवं भापितवती-यह इस तरह बोली।
मिथ्या असौ वदति-यह झूठ बोलता है।
-

१० सनातननग्रंथमालायां आशु कार्याणि सेधति धीमंतः-मानी लोग शीघ्र कार्य गिद पर रेने हैं। शनैः शनैर्लभते स विद्यां वह धीरे धीरे विद्याको प्राप्त करता है। पहिर्वसंति यतयः-मुनि लोग बाहर रहते हैं। अथ स पठनं प्रारमते स्म-इसके बाद उसने पटना शुरू किया। प्रादुर्भवति स्म यक्षः पुनः-फिर यक्ष प्रकट हुआ। आविर्मपति नक्तं चंद्र:-रात्रिमें चंद्रमा उगता है। स एव अयं राजा वर्तते-यह ही यह राजा है। यतिररिरपि पूज्या-मुनि दुश्मन भी पूज्य है। अतोऽहमेवं गदामि-इसलिये ऐसा मैं कहता हूं। यत स त्वां निदति-क्योंकि यह तुम्हारी निंदा करता है। ततोऽहं दुग्धं पियामि स्म-उस लिये मैने दूध पिया । कथमयं वृथा भापते क्यों यह व्यर्थ योलता है। इति मंत्रिणः काठांगारं विज्ञापितवंत:-इस तरह मंत्रियोंने काष्टागारको स पुनरागत:-वह फिर आया। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्यरचना करो- सहसा, प्रसा, इति, पुनः, एव, पवं, यतः, ततः, कुतः, अतः कथं, तथा, यथा, सर्वथा, झटिति, मनाक्, ईपत्, शीघ्रं, शिंप, द्रुत, साचि, बलाव, इत्थं, त्वरितं, तूष्णी, नून, वृथा, मिथ्या, वहिः,अथ. प्रादुः, भाविः, अपि, सर्वत । [जतलाया। , " , तृतीय पाठ। एक क्रियाविशेषणका भिन्न २ अर्थों में प्रयोग। अथ। १ मंगलसूचक- अथ अहं ग्रंथ प्रारो-मैं अंथ शुरू करता हूं।

संस्कृतप्रवेशिनी। ११ अथ श्रीजिनेद्राभिषेकसमयः उपस्थितः-श्रीजिनद्रेभ वान्के अभिषे- कका काल उपस्थित हुआ। २ अनंतर- अथ तो परस्परं मित्रतां संप्राप्तौ अनंतर वे दोनों मित्रताको प्राप्त हुये। अथ जीवंधरो व्याधान् जयति स्म-अनंतर जीवंघरने व्याघोंको जीता। अथ स पापीधर्म आचरितवान्-अनंतर उस पापीने धर्मका आचरण किया। अथ तत्र मेघा वर्षेतिस्म-अनंतर वहा मेघ वरपे । ३ आरंभ- अथाहं तं वदामि तो मैं उसको कहता हूं । अथ कोऽयं द्वतीयः-यह दूसरा कौन है। अथ को मां सेवियते-कौन मेरी सेवा करेगा! अथ सा कुत्र वर्तते-वह [स्त्री ] कहा हैं ? ५ और गुणवान् अथ रूपवान् जनो दुर्लभः-गुणी और सुन्दर आदमी दुर्लम है। जीवकोऽथ नंदाग्यो राजपुरी गच्छतास्म-जीवंधर और नंदाढ्य राज- पुरीको गये। ६ सम्मति सूचक- प्रभ-कार्य किं कृतवान् क्या काम करलिया ? उत्तर-अथ किं-जी हा। प्रभ-कि त्वं तत्र गतवान् क्या तुम वहां गये थे ? उचर-अथ किं और क्या [जी हा ] प्रश्न-पाठं पठितवान्-पाठ पढलिया ? उत्तर-अथ कि-जी हा । ननु। नइ स्वंसद् कार्यमारग्धंवान् !-क्या तुमने उस कामको शुरू कर दिया !

१२ सनातनजैनग्रंथमालायां- ननु सेवकस्त्वां सेवते ? क्या सेवक तुम्हारी सेवा करता है। २ निश्चय- स ननु पंडितः-वह निश्चयसे पंडित है। [ होती हैं। ननु गुणलुन्धाःस्वयमेवसंपदः-सपत्तियां निधयसे शुदही गुणोंकी लोमिनी ननु वृष्टिभविष्यति--जरूर मेध वर्षेगा। ३ अनुनय-मनाना। ननु मां प्रति मोदस्व-मेरे ऊपर प्रसन्न हुजिये । ननु मद्गृहं प्रविश कृपया मेरे घरमें प्रवेश कीजिये। ननु तान् तिजवं-कृपाकर उनको क्षमा कीजिये । अपि। अपि सुखं वर्तते ?-सुख तो है। अपि मां प्रति रुष्टा? क्या मुझसे रुष्ट होगई हो। अपि स मां कदाचित् पृच्छति-क्या वह कमी मुझे पूछता है ? इस पर भी- २ उहंडोऽपि अहं क्षतव्यः-उइंड हूं तो भी मैं समाके योग्य हूं। मुनिरपि मिथ्या गदितवान्-मुनि भी झूठ बोला !' समुश्चय-(तथा, मी) ३ जीवंधरोऽपि तत्र आगतः-जीवघर भी वहा आये। चेलना अपि तं हटवती-बेलनाने भी उसे देखा । खलु। - कोऽयं खलु अत्र आगच्छति ?--यहा यह कौन आता है ? कथं खलु एतत् कार्य कार्य ?-यह काम कैसे करना चाहिये । २ अनुनय- न खछनखळ हंतव्योऽयं मृगा-नहीं नहीं! यह मृग मारनेके योग्य नहीं है ।

संस्कृतप्रवेशिनी। मां सल पृच्छ-कृपापूर्वक मुझसे पूछिये । यूयं सल जैनेंद्रं पठत-आप लोग कृपाकर जैनेंद्र व्याकरण पढिये । ३ निश्चय-- स खलु महामुनिः-वह निश्चयसे महामुनि है । जीवकः खल महापंडितः-जीवंधर निश्चयसे बडा भारी पंडित है। श्रेणिकः खलु सम्राट्-श्रेणिक निश्चयसे सम्राट् है । इति । १ हेतु- शिष्योऽहं इति त्वां अर्चामि-मैं विद्यार्थी हूं इस कारण तुमको पूजता हूं। गुरुरहं इति त्वां उपदिशामि-मैं गुरु हूं इस कारण तुझे उपदेश देता हूं। दुर्जनः स इति जनास्तं निंदति वह दुर्जन है इस कारण लोग उसकी निंदा करते हैं। २ प्रकार- इति जैनेंद्र महाव्याकरणं संपूर्ण-इस प्रकार महाव्याकरण जैनेंद्र पूर्ण हुआ। इति गुरुस्तं दिशति स्म-इस तरह गुरुने उसको कहा । इति दिनानि गच्छति-इस तरह दिन बीतते हैं। ३ यह (जो कुछ कहा जाय उसके वादमें) "यूयं शानध्यानतत्परा भवत" "तुम लोग ज्ञान और ध्यानमें लीन होओं" इति जीवंधरस्तपस्विनो वदतिस्म-यह वात जीवंधरने तपखियोंसे कही। सूरिः "त्वं वर्षमेकं काष्टांगारं "तुम एक सालतक काष्ठागारको क्षमा करो" तिजस्व" इति जीवककथितवान्-यह बात आचार्य ने जीवधरसे कही। तावत्। १ पहिले-(प्रथम)। तावत् पतत् वदामि-पहिले मैं यह बात कहता हूं। त्वं तावत् वाराणसी ब्रज-तुम पहिले वनारस जावो । २ इसके वीचमें (मध्यमें)।

[ सेवा करो। [हो जाता है। सनातनजैनग्रंथमालायां ततो ऽहं तावत् मुनीन् दृष्टवान्-इतनेमें मैंने मुनियोंको देखा । ३ तब तक (पर्यंत)। यावदसौ जीवति तावत् असु सेवस्व-जब तक यह जीवे तब तक इसकी हि। १ हेतु-(क्योंकि )। कालायसं हि कल्याण कल्प- क्योंकि रसायनके सबंधसे कोहामी सोना ते रसयोगतः। लोको हि-अमिनवप्रिया क्योंकि लोग नवीन वस्तुके इच्छुक होते हैं। अनवद्या हि विद्या (स्थाद) लोक- क्योंकि निर्दोष विद्या दोनों लोकों व्यसुखावहा। में सुख देनेवाली होती है। अपुष्कला हि विद्या (स्था) अ- क्योंकि अधूरी विद्या कहीं केवल अप- वईकफला क्वचिद। मानरूपी फलकोही देनेपाली होती है। २निमय-(ही)। अन्याभ्युदयखिन्नत्वं तत् हि दौ- जो दूसरेके ऐश्वर्यसे जलना है बह- जन्यलक्षणं। निश्चयसे दुर्जनताका चिन्ह है। न हि नीचमनोवृत्तिरेकरूपा स्थि- निश्चयसे नीचोंके मनकी वृत्ति एक ता (भवेत्)। रूपसे स्थित नहीं रहती। अलंध्यं हि पितृषाक्यं-पिताके वचन निश्चयसे उल्लंघन करने योग्य नहीं होते। ३ केवल-(मात्र)। मूर्खा हि पंडितान रिपंति-मूर्ख लोगही केवल पंडितोंकी हिंसा करते हैं। स हि सततदरिदी (यस्य)- वही हमेशा गरीव है जिसकी- तृष्णा विशाला तृष्णा बढी हुई है।

संस्कृतप्रवेशिनी। तृतीय अध्याय असमापिका क्रिया प्रथमपाठ तुम् १ अहं जैनेंद्रं (१) पठितुं इच्छामि-मै जैनेंद्र के पढने की इच्छा करता हूं। स्वर्ग गंतुं को न ईहते-खम को जाना कौन नहीं चाहता । ईश्वरं ईक्षितुं को नकांक्षति ?-ईश्वरको देखनेके लिये कौन नहीं चाहता। कृषीवलोभूमि कई(२)यतते-किसान भूमिजोतने के लिये प्रयास करता है। सा मां उष्ट्या कंदितुं प्रवृत्ता-चह मुझे देखकर रोने के लिये प्रवृत्त हुई। गर्ज छषितुं सिंह आरब्धवान्-हाथी को मारने के लिये सिंह प्रवृत्त हुआ। सेवका भारंवोढुं असमर्थाः--सेवक लोग वोझा ढोने के लिये असमर्थ हैं। जीवको वनंक्रमितुंचेष्टतेस्म-जीवंघरने वन उलंघन करने के लिये चेष्टा की सावालानदींतरितुंयतवती-उस लडकी ने नदी पार करने के लिये प्रयत्न किया विद्वांस एव शास्त्राणि गाहितुं पटवा-विद्वान् लोग ही शास्त्रों का अव- गाहन करनेकेलिये चतुर होते हैं। भोमहाराज !(३)अरीन लवितुंयतस्व-हे महाराज दुश्मनोंको नाश करने के लिये प्रयत्न करो। सुधर्म सेवितुं यतध्वं यूयं-अच्छे धर्मको सेवनेके लिये यह करो । (१) धातुओंसे तुम् प्रत्यय होनेसे धातु के व तुमके वीचमें इ (इट्) आता है। (२) तुम् होमेसे धातुके-इ, उ, ऋ को क्रमसे ए, ओ, अर् होजाता है जैसे-चिन (इकट्ठा करना) से तुम् किया तो विस्तूं-चेत, स्तु-तु+स्तोतुं, स्मृतुं स्मर्तु । -जिन धातुवाका ल, औ, इत् गया है उनसे, तथा जिनके अंतमें दीर्घ आ, इ, ई, हख उ, हख , है उनसे तुम् प्रत्यय करने पर वीचमें इ (द) नहीं आता परंतु, पतूल, वि, श्रि, शी, डी, रु, शु, भु, स्तु, नु, यु इनके लिये यह नियम नहीं हैं। (३) थानु के भंतके ए, ओ, ऐ, औको वादमें स्वर रहनेसे कमसे अय्, अव्, आय, आव होजाते हैं।

सनातनजैनग्रंथमालायां- राजा प्रजाः रक्षितुं समर्थः-राजा प्रजाकी रक्षा करने में समर्थ है। यूयं जीवान हंतु मा चेष्टध्वं-तुम लोग जीयोंको मारनेकी चेष्टा न करो। सीतां हर्तु रावणः संप्रवृत्ता-सीताको हरनेके लिये रावण प्रत्त हुआ। धीरानलाधितुं ग्रंथान लि- वीरोंकी प्रशंसा करनेकेलिये हम ग्रंथ लि. खामो वयं। सते हैं। जीवंधरो दीक्षा लब्धं थी. जीवंधरने दीक्षा लेनेकेलिये श्रीचीरभगवान्- वीरं श्रितवान् । का आभय लिया। पंडितानष्टं शोचितुंनइच्छति-पंडित लोग गई हुई चीजका शोक नहीं करते। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचो- कर्तु, हर्ते, श्रयितुं, गदितुं, प्राप्तुं, नर्तितुं, भ्रमितुं, जेतुं, शातुं, दातुं, विधातु यतितु, ईहितु,एपितु,पष्टु,सोढुं,सहितुं रोष्टु रोपितु रेष्टु,रेषितुं चोर्दु,रोदितु,शपितु',प्रष्टुं स्थासु ,सेक्तु, गृहीतु, पातु, सृष्टुं, खादितु, भक्षयितु', अर्चितु', पूजितु, अटितु ,जितुं, भवितु, घटित, शमवर्धितु,प्रष्टुं,स?, जीवितु', अंचितु', स्फुटितु', एपितु', फलितु',चलितु',चरितु', कथितु ,लाधितु, ग्रसितु,दीक्षितु',धोति- तु, प्रकाशयितु,प्रथितु दोग्धं, द्रष्टुं स्मेतु ,नंदितु, चेएितु, सेलितु, क्रीडितु। द्वितीय पाठ) - - . , . णम्। १जीवकः तीर्थस्थनानि (१) याजं जीवंघर तीर्थस्थानोंको पूज पूजकर याज अटतिमा जाते थे। बालमहासंहासंआगच्छतिस्म-लहका हंस इस करके आता था। सोऽसत् तपो दर्श दर्श वदति-वह झूठा तप देख देखकर कहता है । पांथाः पक्षिकूजनानि श्रावना- पथिक लोग पक्षियोंके शब्द सुन सुन- वं चलति। कर चलते हैं। (७) धातु से णम् प्रत्यय होने पर धातुवों के अंत अक्षर से पहिले म को आ हो जाता है।

मोदे। संस्कृतप्रवेशिनी। अहं सदुपदेशं सारं (४) सारं- मैं अच्छे उपदेशको स्मरणकर करके आनंदित होता हूं। माता सुतं(५)स्पर्श स्पर्श चंबति-मा पुत्रको स्पर्श कर करके चूमती है । मानचा मुनीन् सेवं सेव उ- मनुष्य मुनियोंकी सेवा कर करके उन्न- नता भवंति। त होते हैं। शिशुः ज्वारं ज्वारं ग्लायति-लडका रुग्ण हो हो कर क्षीण होता है । निर्धनः काठ काठं म्रियते--निर्धन जन दुखी हो हो कर मरते हैं। लोकाशास्त्राणि (६)नाय नायं लोग शास्त्रोंका मनन कर करके विद्वा- विद्वांसो भवंति। न होते है। विद्यार्थिनः ग्रंथान पाउँपाठंप- विद्यार्थी लोग ग्रंथोंको पढ पढकर परी- रीक्षा तरंति। क्षा पास करते हैं अध्यवसायिनः चेष्ट चेष्टं श- अध्यवसायी लोग चेष्टाकर करके शक्ति- क्तिमंतो भवंति। वाले होते हैं। औषधं प्रासं प्रासं रुग्णो स्वा- दवाई खा साकर रोगी खस्थ स्थ्यं लभते। होता है। गुरु मानं मान शिष्या उदारा गुरुका सम्मान कर करके शिष्य उदार- भवंति। होते हैं। जनान गई गर्ह जना निंदुका लोगोंकी निंदा कर करके मनुष्य निंदु. भवंति। क हो जाते हैं। ४-नित् णित् (ञ्ण जिनमें लगा हो) प्रत्यय होनेसे धातुके अतके इ,ई के स्थानमें ऐ, उ ऊ के स्थानमें औ, ऋऋ के स्थानमें आर् होजाते हैं । जैसे ति-अम् (णम् ) : अम्=क्षायं, शी+अम्-शायं श्रु+अम्-श्राव, भू+अम् भावं, स्मृ+अम् स्मार, तृ+अम्-तारं। ऐ, औ को आय, आव १५ पृष्ठकी तीसरी टिप्पणी से होते हैं । ५ धातुके अतके अक्षरसे पहिले अ, इ, उ, ऋ को क्रमसे आ, ए, ओ अर् हो जाते हैं यदि कित् डित्त्' (क, जिसके इत् हों) प्रत्ययसे भिन्न प्रत्यय वादमें हो। ६ आकारात धातुवोंसे नित् णित् प्रत्यय होनेपर वीचमें 'य' आजाता है जैसे-पा+अम्पाय, म्ना-अम् (णम् ) म्नाय ।

सनातनजैनयमालायां- गो मुनि होते हैं। दोषिणः तेनं तेज मुनयो य- अपराधियोंको क्षमा कर परफे मुनि थार्थी भवंति। पर्वताःक्षायं क्षायं समतला जाता:-पर्वत नष्ट हो होकर गमतल होगये। प्रभु ईस ईक्ष नयनानि न वृप्तानि स्वागीको देरा देशकर नेत्र तृप्त न हो। सा सायं सायं पतिमानंदित- उस स्त्रीने मुस्करा मुस्कग कर पनिको- वती। आनंदित किया। स धर्म देशं देशं जीवान् नं- उसने धर्मका उपदेश दे देकर जीयोशे. दतिम आनंदित किया। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचना करो- सारं, मेप,वेप, शंक,व्या, प्याय,प्रासं, वेष्टं, कत्य, शिक्ष, शायं, जायं, प्रच्छं, प्राहं, श्रायं, हार, भोज, से, लाभ, शोचं, गाई, मामं । तृतीयपाठ। (७) त्वा (क्त्वा) १ ईश्वरं अर्चित्वा पुण्यं लभध्वं-भगवान्की पूजा करके पुण्यकी प्राप्ति करो। तत्र स्थित्वा स पठति स्म-पहा रहकर उसने पढा । श्रावका (८)स्नात्वा जिन अर्चति-श्रावक लोग मानकरके जिनको पूजते हैं धनं दत्वा ते न सिर्षति-धन देकर वे गर्व नहीं करते । जीवकं (९) दृष्ट्वा यक्षो हृष्टा-जीवधरको देखकर यक्ष हर्ष युक्त हुभा । ७-धातुवोंसे "करके" अर्थमें क्त्वा (वा) प्रत्यय होता है । एव धातु तथा त्या के बीचमें इ (इट् ) आती है। जिन धातुवोंका ल, औ-इत् गया है उन से तया जिनके अन्तमे वीर्घ आ, इ, ई, हस्व उ, हस्व क है उनसे क्या करने पर मध्यमें इ (इद) नही आता परतु पत्ल शी, डी, वि धातुवोंको छोड देना। ९-प्रथमभागमें-क, कवतु प्रत्यय करनेसे धातुके रूपमें परिवर्तन श्-को ५ होना आदि बतलाया है वह यहा भी समझना । , मति। संस्कृतमवेशिनी। सम्राट् अरीन् जित्वा राज- चक्रवर्ती दुश्मनोंको जीतकर राजधानी- धानीमागतः। को आया। स जिनालयं गत्वा जिनान् न- वह जिनमंदिरमे जाकर जिनको नम- स्कार करता है। स जिनं नत्वा स्तोत्रं पठति-वह जिनको नमस्कार करके स्तोत्र पढ़ता है। गुरु (१०)सेवित्वास वरं प्राप्तवान्-गुरुकी सेवा करके उसने वर पाया । यद्धान् मुक्त्वा पुण्यमर्जति- कैदियोंको छोडकर उसने पुण्य प्राप्त स्मसः। किया। तमिदं पृष्ट्वा समागतोऽहं-उसको यह बात पूछकर मैं आया हूं। आलयान दग्ध्वा अग्निस्तृप्तः-घरोंको जलाकर आग तृप्त हुई। अरिं हत्वा क्रोधाग्निःशांतः दुश्मनको मारकर क्रोधाग्नि शात हुई। अत्र उषित्वा अहंसंस्कृतं शिक्षितवान् यहा रहकर मैंने संस्कृत सीखी। शश्वत् (१०)रुदित्वासाइदलब्धवती-बहुत वार रोकर उसने इसको पाया। दुग्धं पीत्वा पुष्टस्त्वं दूध पीकर तू मोटा हुआ है। विद्यां लब्ध्वा का पापी भविष्यति-विद्या पाकर कौन पापी होगा। भारं ऊद्वा मृत्यः क्लांतः–भार ढोकर नौकर थक गया। वाचं उदित्वा शीघ्र प्रत्यागच्छ-संदेशा (वात)कहकर शीघ्र लौट आओ। विद्वासं श्रिवा मूर्खा अपि पंडिता भवंति-विद्वान्का आश्रय लेकर मूर्ख भी पंडित हो जाते हैं। मिक्षित्वा अन्नं खादति मिक्षु:-मिखारी मांग करके अन्न खाता है। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- अचित्वा, अर्चित्वा, कृत्वा, उषित्वा, गदित्वा, अटित्वा, गत्वा, उदित्वा, सृत्वा, ईहित्वा, एपित्वा, एष्ट्वा, रुषित्वा, एधित्वा, भिक्षित्वा, मयित्वा, वेटित्वा, शंसित्वा, शोभित्वा, शिक्षित्वा, शं- - १०.१० सेट् (जहा वीचमें इट् आया हो)क्त्वा परे रहनेसे धातुके इ, उ ऋ को क्रमसे ए, ओ, अर् होजाता है। परंतु रुद्, विके लिये यह नियम नहीं ।

२० सनातनजनग्रंथमालायां कित्वा, मृत्वामृष्ट्वा,शोचित्या, लिखित्या,लेखित्वा, फ्रीहित्या, नत्वा, बजित्वा, सेवित्वा, पतित्वा, श्रुत्वा, जित्या, स्थित्वा, गृहीत्वा, भुक्त्वा, शपित्वा, हत्वा, पृष्ट्वा, नांत्वा, भ्रमित्या, (११) श्रांत्वा, ज्वलित्वा, दुग्ध्वा, विष्ट्वा । चतुर्थपाठ। (१२) य (प्य) १ पुष्पाणि आघ्राय भ्रमरा मोदंते-फूल रांधकर भ्रमर हर्पित होते हैं। अहं तं प्रणिपत्य इदं उक्तवान्-मैने उसको प्रणाम करके यह बात कही। अरिं(१३)निहत्य धोतते राजा-राजा दुश्मनको मारकर शोमित होता है । अधीत्य शास्त्राणि अपि भवंति शाम्रोको पढकरके भी लोग मूग रहते हैं । लोका मूर्खाः। जिनालयं प्रविश्य जिनं स प्र- जिनालयमं प्रवेश करके जिनभगवानको णतवान्। उसने प्रणाम किया। वाचं परिष्कृत्य पंडितागदंति-पडितलोग वाणीको परिष्कृत करके बोलते है गृहं उन्मुच्य सकुत्रापिनगच्छति-घर छोडकर वह कहीं भी नहीं जाता है तरु मारुह्य वानरः फलानि खादति-पेडपर चढकर वंदर फल खाता है। , ११-जिन धातुवोंका "उ" इत् गया है उनसे क्त्वा प्रत्यय करने पर वीचमें इद् विकल्प (इच्छानुसार)से आता है । १२-प्र, परा, अप, सम् अनु, अव,निर् दुर्, वि, आड् , नि, अधि, अपि, अति,म,उद्, अभि, प्रति, परि, उप ये शब्द उपसर्ग कहलाते हैं ।धातुमे पहिले उपसर्ग रहनेसे "करके" अर्थमें य (प्य) प्रत्यय होता है क्त्वा नहीं। १३-हस्थ-अ, इ, उ, ऋ के बादमें पित् (प्-इत् जिसका हो) प्रत्यय होनेसे वीचमै 'त्' आता है । जैसे 'नि' उपसर्ग पूर्वक हनी (मारना) धातुसे प्य (य) किया तो हन्+य हुमा नकारका लोप होनेसे हन्य रहा अब 'ह' के असे पर पित् प्य प्रत्ययका 'य' है इसलिये वीचमे न आनेगे निहरा हुआ। इसी तरह परिष्कृत्य आदि समझना ।

। संस्कृतप्रवेशिनी। जिनं समर्थ्य अन्नं खादति श्रा- श्रावक जिनकी पूजा करके भोजन वका। खाता है। धनं प्राप्य के दरिदा भवितुं धन प्राप्त करके कौन दरिद्र होना- एषिष्यते। चाहेंगे। ईश्वरं प्रणम्य (स्य) प्रथं लिखामि-भगवान्को प्रणाम करके ग्रंथ लिखता हूं। पुत्रं विद्वांसं प्रेक्ष्य के न मोदंते-पुत्रको विद्वान् देखकर कौन नही हर्षित होता है पर्वतं उत्तीर्य वयं उपत्यकांआ- पर्वतको पार करके हम लोग उपत्यका- गताः। में आगये हैं। विपन्नान् परित्राय यश: पुण्यं- विपद्प्रस्तोकी रक्षा करके यश तथा चलमध्वं। पुण्यको प्राप्त करो। • असि आकृष्य स आदिशति स्म-तलवार खींचकर उसने आज्ञा दी। मां आदिश्य स प्रस्थित:-मुझे आज्ञा देकर वह चला गया । स प्रातः उत्थाय ईश्वरं स्म- वह सवेरे उठकर भगवानको स्मरण रति। करता है। फलानि आनीय अहं भक्षितवान्- फल लाकर मैंने खाये । नदी अवगाह्य अहं शीतलोजात:-नदीमे स्नान करके मैं ठंडा हो गया । स पुस्तकं आदाय गृहं गतवान्–यह किताव लेकर घर गया । धैर्य अवलंब्य साधवः कार्याणि धीरताको अवलंबन करके साधु लोग साधयति। कार्य करते हैं। स वहिनिसृत्य मां पश्यति स्म-उसने बाहर निकलकर मुझे देखा । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य रचना करो- पदाय, विधाय, प्रतिक्षाय, परिशाय, संपाल्य, आलिंग्य, परिव- ज्य, चिमिद्य, पूछिद्य, आगत्य, आनन्य, निरूप्य, विकीर्य, विस्तीर्य, आकम्य, परिवज्य ( संन्यास लेकर ) संत्यज्य, विमुच्य. आलोच्य, संवीक्ष्य, अवलोक्य, निधाय, प्रत्यावृत्य, विमृश्य, उपसृज्य, नि:- सृत्य, उद्धृत्य, आसाथ (पाकर) संपूज्य, उपसृत्य, समेत्य, पूकथ्य, . . , सनातनजैन ग्रंथमालायां- प्रणध, आनंद्य, संस्तुत्य, निपीय, संहृत्य, निक्षिप्य, संचेष्ट्य, विलिख्य, आकर्ण्य, संश्रुत्य, महस्य, संदृश्य, प्रदीव्य, (जुआ खेल करके), मलिनीकृत्य, स्तब्धीकृत्य, नमस्कृत्य । परिशिष्ट (१४) समासयुक्तपद-(अव्ययी[१५]भाव) १ विभक्ति अर्थ (मे)- अधिस्त्रि [१६] रागः क्रूरोऽयं-स्त्रीमें जो प्रेम करना है वह झूर है । अधिवनं वानरा वसंति-चनमें बंदर रहते हैं। अधिनदि इमे तरंति-ये लोग नदीमें तैरते है। अधिमंडपं राजानः समागताः-राजा लोग मंडपमें आये । अधिनगर जना वसंति-मनुष्य नगरमें रहते हैं। अधिनारि विश्वासो न कर्तव्य:-स्त्रीमें विश्वास नहीं करना चाहिये। सिंहोऽधिगुहं गर्जितवान्-सिंह गुहामें गर्जा अघिपाठशालं छात्राः पठति-विद्यार्थी लोग पाठशालामे पढते हैं। २ ऋद्धिका अभाव- दुर्यवनं जातं-मुसल्मानोंकी संपत्तिका नाश होगया। ३ अमाव- भवान् निर्मक्षिकं कृतवान् एतत् गृहं-आपने यह घर सूना कर दिया। वालको निःशब्दं स्थितः-लडका शब्द रहित (चुपचाप) खडा होगया । १४-परस्परमें सर्वधवाले दो या दोसे अधिक पदोंको मिलाकर समुदायसे विमतीका लाना समास है। १५-विभवी आदि दश अर्थोंमें जो अधि वगैरै अव्यय हैं उनका दूसरे शब्दोके साथ जो समास होता है उसको अव्ययीभाव समास कहते है १६-अव्ययीभाव समासके रूप हमेशा नपुंसकलिंगके समान चलते हैं प्रथमभाग- के तृतीय अध्यायकी टिप्पणी देसो) परतु अकारातसे भिन्न इकारातादि अव्ययीभावके रूप सब विभक्तियोंके सब वचनोंमें कर्ता [प्रयमा ] के एक वचनके सदृश होते हैं ।

संस्कृतप्रवेशिनी। एतत् वनं निर्जनं वर्तते—यह वन मनुष्यरहित [सूना] है । उल्लंघन करना (अत्यय)- पक्षिण; अतिमेचं उत्पतंति-पक्षि मेधको अतिक्रम करके उडते हैं । सुकर्माणि अतिबाधं फलंति-अच्छे काम वाधाको उल्लंघन करके फलते हैं। ४ पश्चात् शिशवः अनुशकटं धावंति-लडके गाडीके पीछे दौडते हैं। अनुरथं पदातयो गच्छंति रथके पीछे प्यादे चलते हैं [करते हैं। अनुमानं जिनं अति श्रावका:-श्रावक लोग स्नानके वाद जिनकी पूजा ५ वीप्सा- प्रतिवृक्ष सिंचति सेवका-सेवक हर एक वृक्षको सींचता है। प्रतिदेशं अयं सामाचार: प्रच- हर एक देशमें यह समाचार प्रसिद्ध- लितः। हो गया। प्रतिनगरं रक्षका वसंति-हर एक नगरमें सिपाही [ रक्षक ] रहते हैं। ६ अनतिक्रम-[अनुसार ] | यथाविधि श्रावका व्रतमा- श्रावक लोग विधिके अनुसार व्रतका आच- चरंति रणकरते हैं। यथाशक्ति धर्म आचरणीयः-शक्तिके अनुसार धर्म करना चाहिये । यथावृद्धं साधून अर्च-साधुवोंको वृद्धोंके क्रमसे पूजो अर्थात् जो बढा है ७ मर्यादा- [उसको पहिले और छोटेको पीछेसे पूजो । आपाटलिपुत्रं मेघो वृष्टः-पाटलिपुत्र [अर्थात् पाटलिपुत्रके पहिले तक अत तक नहीं] मेह वरषा। आजलस्थानं अतिथिरनु- जलस्थान तक अतिथि [ मिहमान ] गंतव्यः। के पीछे जाना चाहिये। आनदि वृक्षपति शोमते-पेडोंकी लेन नदी तक शोमती है । ८ अभिविधि- [अर्थात् लडके भी उसको जानते हैं। आचालं यशोगतं समंतभद्रीयं-समंतभद्र खामीका यश लडकोंतक फैला है- - २४ सनातनजैनग्रंथमालायां आवाल्यं अहं दुर्बल-सडकपनसे मैं दुर्बल हूं। ९ आसिमुख्य- धेनवोऽमिगोशालं धाति-गायें गोशालाकी तरफ दौडती है। हस्तिनोऽमिनदि जति हाथी नदीके संमुख दौडते हैं। १० समीपार्थ- उपगृहं जलाशयो शोसते--धरके पास तालाव शोमित होता है। उपघट कुलालो पर्वते-घडेके समीप कुम्हार है। उपमेघ पक्षिण उत्पतंति-मेघके समीप पक्षी उडते हैं। नीचे लिखे शब्दोंमेंसे एक एक शब्दसे वाक्य बनाओ- निरन्नं, निर्विघ्नं, उपनदि उपगुरु, आछात्रं, आवाराणसि, आसमुद्रं, आशिशु, अनुनृपं, अनुगिरि, प्रतिमासं, यथामति, अध्य- नि, अधिपर्वत, अमिगृह, प्रत्यक्ष, समलं, प्रतिसंवत्सरं, अनुविद्य, उपकुलालं। विभक्तीयुक्त शब्द । तृतीया विभकी। पुंलिंग। अकारात। १ छात्रेण सह गुरुरागत:-विद्यार्थीके साथ गुरु आया । विवादेन किं प्रयोजन--विवादसे क्या मतलव है। स्वभावेन स सरल:- यह खभावसे सरल है। हस्तेन माता मां स्पृशति-माता मुझे हाथसे स्पर्श करती है। होने लगा। प्रकृप्यमाणरागेण कालो विलयमीयिवान-बढतेहुये रागसे समय नष्ट देयतेन पूजिता भवंतिधार्मिकाः-धीत्मा लोग टेबोंसे पूजित होते हैं। तदवीक्षणमात्रेण वैभव निर्णीत उसके देखने मात्रसे ऐश्वर्यका निर्णय कर लिया।

संस्कृतमवेशिनी। २ वालकाभ्यां अहं पृष्टः-दो बालकोंने मुझे पूछा । हस्ताभ्यां स स्पृशति-वह दोनों हाथोंसे मुझे छूता है । छात्राभ्यां गुरु सेवितः-दो विद्यार्थियोंने गुरुकी सेवा की। क्षत्रियाभ्यां ग्रामो रक्षितः-दो क्षत्रियोंने गांवकी रक्षाकी । अनलाभ्यां वृक्षा दग्धाः-दो अग्नियोंने पेड जलाये। पाठकाभ्यां प्रशाः कृता:-दो पाठकोंने प्रश्न किये। ३ छात्रैः ग्रंथा लिखिताः-विद्यार्थियोंने ग्रंथोंको लिखा । वाले ओदनाः खादिता:-लडकोंने चावल खाये। जिनः दयाधर्म: उपदिष्ट:-जिन भगवानने दया धर्मका उपदेश दिया । अश्वैः नदी तीणी-घोडीने नदीको पार किया । संस्कृत बनाओ- मद्यसे मनोम्रम होता है । मनोभ्रमसे अशुभकर्मबंध होता है। पापसे दुर्गति मिलती है। इसलिये कृतकारितानुमोदनसे मद्यको छोडो। सम्यग्दृष्टि जीव देवोंसे पूजा जाता है। पतिव्रता स्त्री अग्निसे भी नहीं जलती है। पुण्यसे सांप भी रज्जु हो जाता है। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- सज्जनेन, वचनैः, खलाभ्यां, क्षुधातुरेण, देवेन, मधवशेन, गायति, मांसमोजनेन । इकारांत। १ अहिना वालो दष्टा-सापने बालक काटा । मुनिना धर्म उपदिष्टः-मुनिने धर्मका उपदेश दिया । ऋपिणासह विवादोन कार्य:-ऋषिके साथ विवाद नहीं करना चाहिये। कपिना सह क्रीडा न कर्तव्या-वंदरके साथ क्रीडा न करनी चाहिये। २ नृपतिभ्यां आशा इयं प्रचारिता-दो राजाओंने यह आज्ञा निकाली। मुनिभ्यां परस्परं विवादो न कर्तव्यः-मुनियोंको परस्परमें विवाद न करना चाहिये।

सनातनजैनग्रंथमालायां कविभ्यां आदिपुराणं रचितं-दो कवियोंने आदिपुराण रचा। अरिमिः स हतः दुश्मनोंने उसे मार डाला। मुनिमिः सुप्रवर्तित-मुनियोंने अच्छा किया । कपिमिः वनमिदमाक्रांत-अंदरोंसे यह बन घिर गया । सस्कृत यनाओ- अग्निने इस घरको जलाया। दुश्मनोंने इसको घेर लिया। राजाने यह बात कही। मुनियों ने उनको क्षमा किया। कवियोंने बहुतसे ग्रंथ लिखे।, उकारांत। १ बंधुना सह विवादो न कार्य:-भाईके साथ विवाद नहीं करना चाहिये । शत्रणा मैत्री न उचिता-दुश्मनके साथ मित्रता ठीक नहीं है। गुरुणा वयं आदिवा:-गुरुने हम लोगोंको आज्ञा दी। २ शिशुभ्यां इदं कृतं-दो लड़ोंने यह काम किया। तरुभ्यां गृहं वेष्टितंदो पेड़ोंने घरको घेर लिया । परशुभ्यां वृक्षश्छिन्नः--दो परशुओं (कुल्हाड़ी) ने वृक्ष काटा । ३ साधुमिः उपकृता वयं-साधुओंसे हम उपकृत हुये। अंशुभिः प्रकाश्यते जगत्-किरणोंसे ससार प्रकाशित होता है। प्रभुमिः भृत्या आदेष्टव्याः-स्वामियोंसे नौकर लोग आज्ञापित होने चाहिये सस्कृत वनाओ- सूरजने (भानु ) किरण फैलाई। किरणोंने जगत् प्रकाशित किया। बंधुओंने आशाकी। दो वाहुओंसे उसने ऐसा किया । दो शत्रुओंने उसे घायल (आहत) किया। चंद्रमा (हिमांशु) रात्रिमें (न) शोमता है। अकारांत। १ गृहीत्रा दाता आर्चितः-गृहीताने दाताको पूजा । सवित्रा राजते दिवा-सूर्यसे दिन शोमित होता है ।

संस्कृतप्रवेशिनी। २७ - श्रोत्रा पृष्टो वता-श्रोतासे वका पूछा गया । २ भ्रातृभ्यां आदिष्टोऽहं--दो भाइयोंने मुझे आज्ञा दी। कर्तृभ्यां कृतमिदं कार्य-दो खामियोंने यह काम किया । उपदेष्टभ्यां सर्वत्र भ्रांतं-दो उपदेशकोंने सर्वत्र भ्रमण किया । ३ जेभिर्वद्धा अरयः-जीतनेवालोंने शत्रुओंको बाध लिया। दोग्धृमिः धेनुर्मुक्ता-दोहनेवालोंने गाय छोड़ दी। पितृमिः पुत्राः पाठनीयाः-पिताओंको पुत्र पढाने चाहिये। संस्कृत वनाओ- छेदनेवालेने (छेत्तृ) वृक्ष काटा। माता पिताके साथ (माता पितृ) विवाद नहीं करना चाहिये। भाइयोंके साथ तेने धन चुरा या। देवके साथ (विधातृ ) कलह अनुचित है। व्यंजनांत पुंलिग। १ (च) जलमुचा चातकोसंतुष्टिंगच्छति-मेघसे चातक संतुष्ट होता है। (ज) परिवाजा सर्वत्र गंतव्यं-सन्यासीको सब जगह जाना चाहिये । (ज) सम्राजा राजान आदेष्टव्याः-चक्रवर्ती द्वारा राजा लोग आज्ञा- पित होने योग्य हैं। (२) पापकृता दुःखमनुभूतं -पापीने दुख भोगा। (मत्) बुद्धिमता आशुकार्य साध्यं-बुद्धिमान्को शीघ्र कार्य करना चाहिये। (मत) बलवता सह विरोधो न विधेयः-वलवान्के साथ विरोध न करना चाहिये। (अत्) गायता रुदन अहं पृष्टः-गातेहुयेने मुझ रोते हुयेको पूछा। (इ) सुहृदा सह सर्वदा वसनीयं-मित्रके साथ हमेशा रहना चाहिये । (अन्) राज्ञा सह विरोधो न विधेयः-राजाके साथ विरोध न करना (अन्) मूर्धाअहंतं प्रणतवान्-मस्तकसे मैंने उसे प्रणाम किया। [चाहिये। (अन्) दुरात्मना सह वार्तालापोन कार्य:-दुरात्माके साथ बातचीत न करनी चाहिये। .

૨૮ सनातनजैनग्रंथमालायां- (इन्) स्वामिना भृत्य आदिष्टः-स्वामीने नौकरको हुक्म दिया। (इन्) मंत्रिणा राजा उक्का-मंत्रीने राजासे कहा । (अस) चंद्रमसा रात्रिः राजते चंद्रमासे राति शोमित होती है । (वस्) विदुषा धर्मः कार्य:--विद्वान्को धर्म करना चाहिये। (वस्) जग्मुषा सह सर्वे गताः-जानेवालेके साथ सब गये। (ईयस्) ज्यायसा अहं आज्ञप्तः-चढ़े भाईने मुझे आज्ञा दी। २ वारिसुग्भ्यां पर्वतः कुवितः-दो मेघोंने पर्वत ढक लिया। देवराभ्यां देवा आदिष्टाः-दो इंद्रोंने देवोंको आज्ञा दी। पुण्यकृद्भ्यां सुखकर एतत् स्थान-दो पुण्यात्माओंसे यह स्थान सुख शानवद्भ्यां अहं उपदिष्टः-दो ज्ञानवालोंने मुझै उपदेश दिया। [कर है । ज्योतिष्मद्भ्यां इदं जगत् प्रकाशते-ज्योतिवाले दो पदार्थोसे यह जगत गायद्भ्यां ते संतुष्टाः-दो गानेवालोंसे वे सतुष्ट होगये । [प्रकाशित होता है। सभासद्भ्यां समा सम्पन्ना-दो सभासदोंसे सभा अच्छी हो गई। राजभ्यां सह ब्रजति सम्राट्चक्रवर्ती दो राजाओंके साथ चलता है। उक्षभ्यां भग्नोऽयं नदीतट:-यह नदीका किनारा दो साड़ोंने तोड़ा है। धर्मात्मभ्यां शोभते गृहं—दो धर्मात्माओंसे घर शोभता है। पक्षिभ्यां इह आगतम्-दो पक्षी यहा आये। तपस्विभ्यां सह स वनं गतः वह दो तपस्वियों के साथ वनको गया । उदारचेतोभ्यां ग्रंथोऽयं दत्ता-उदारचित्तवालोंने यह प्रथ दिया । विद्वद्भ्यां शिक्षितोऽयंजनः-दो विद्वानोने इस आदमीको शिक्षित किया । ज्यायोभ्यां कनीयान् आदिएः-दो बढे भाइयोंने छोटेको आज्ञा दी। ३ जलमुग्भिः आकाशः कृष्णो जातः-मेघोंसे आकाश काला होगया । राजरामिः साधवः सेविताः-महाराजाओंसे साधु सेये गये। पापकृद्भिः सह निवासो न विधेयः-पापी लोगोंके साथ निवास न चक्षुमद्भिरिदं दृष्टव्यं नेत्रवालोंको यह देखना चाहिये । [करना चाहिये। ज्ञानवतिः पयं पृथा.-शानियोंने हमें पूछा । M - . संस्कृतप्रवेशिनी। धर्म ध्यायद्भिः मुक्तिर्लन्धा-धर्मको ध्याते हुओंने मुक्ति पाई। ग्रामंगच्छद्भिः तृणानिस्पृष्टानि-प्रामको जाते हुयोंने तृणोका स्पर्श किया। दिविद्भिः साहाय्यं कृतं-देवतायोंने सहायता की। सुहृद्भिः महत् उपकृत-मित्राने वडा उपकार किया । राजमिः यथाक्रम त्रिवर्ग सेव्यं-राजायोंको क्रमानुसार त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) का सेवन करना चाहिये । अशामिः निर्मितमिदं-पत्थरों से यह बनाया है । द्विजन्ममिः उपदिष्टं इदं शास्त्रंब्राह्मणोंने इस शास्त्रका उपदेश दिया है। बानिमिः प्रशंसितोऽयं जनः-शानिगेंने इस पुरुषकी प्रशंसा की है। दिवौकोमिर्जिनः पूनितः-देवताओंसे जिन पूजित हुये है। उदारचेतोमि दानं दत्त-उदारचित्तवालोंने दान दिया। विद्वद्भिः विचार्य कार्य-विद्वानोंको विचार करके करना चाहिये । जग्मिवद्धिः तस्थिवांसः गदिताः-मनकारियोंने बैठेहुओंसे कहा। कनीयोमिः ज्यायांसः प्रणमिता:-छोटोंने बडोंको प्रणाम किया । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनावो- सुहृद्भ्यां, गुणवद्भिः, उदारचेतसा, धर्मवचोभिः, महामनोमिः, गरीयोभ्यां, लघीयसा। संस्कृत वनावो- जो प्रेमके साथ पत्थरकी भी पूजा करते हैं वे लोग देवताओंसे (दिवौकस्) उपकृत होते है। सच्चे मित्रोंसे (सुहृद) बहुत उप- कार होता है। क्योंकि वे उदार चित्तवाले होते है। ब्राह्मणोंसे (द्विजन्मन्) पहिले बहुतसे ग्रंथ रचे गये है। तपस्वियोंने सचे धर्मका उपदेश दिया उसको सुनकर विद्वान मुग्ध हुये। भक्ति वाले श्रावकोंने इक्षुरसका आहार दिया। उसे देखकर देवताओं ने रनवृष्टि की। पापियों (पापकृस् ) ने पुन्यात्माओंको दुम्स - ३० सनातनजेनग्रंथमालायां दिया। शरीरवालोंको (वपुष्पत्) धर्म अवश्य करना चाहिये। छोटे भाइयोंने बडे भाइयोंसे कहा। सर्वनाम पुंलिंग। एकवचन द्विवचन बहुवचन सर्व-सर्वेण साश्या सः ताभ्यां तेः याभ्यां यैः काभ्यां के इद-अनेन आभ्यां एमिः अदस्-अमुना अमूभ्यां अमीमिः अस्मद्-मया आवाभ्यां अस्मामिः युष्मद् त्वया युवाभ्यां युष्माभिः सस्कृत वनावो- तद्-तेन यद् येन उस पंडितने उसे पराजित किया। जिस आदमीने यह काम किया है वह प्रशंसाके योग्य है। किसने यह कविता बनाई है। इस विद्वानने यह बात कही है। इस पंडितके साथ मैने वात- चीत की। क्या तुमने इसे पढ़ा है ?। सब लोग इस वातको कहते हैं। जिन्होंने धर्मका उपदेश दिया वे पूजनीय है। इन लोगोंने जैनेंद्र पढा है। हमलोगोंने आज भगवानकी पूजा की। स्वरांत स्त्रीलिंग एकवचन द्विवचन बहुवचन आ-कन्यया कन्याभ्यां कन्याभिः इ-मत्या मतिभ्यां मतिमिः ऊर्मिभ्यां ऊर्मिभिः इ--ओषध्या ओषधियां ओषधि नदीभ्यां नदीभिः - ३१ संस्कृतप्रवेशिनी। ई-तस्थुप्या नस्थुषीभ्यां तस्थुषीमिः उ-रेण्या रेणुभ्यां रेणुभिः उ---धेन्वा धेनुभ्यां धेनुभिः उ.-चंच्या चंचुभ्यां चंचुभिः क-बध्या वधूभ्यां वधूभिः क-चस्वा चमूभ्यां चमाभिः --दुहित्रा दुहितृभ्यां दुहितृभिः व्यंजनांत। एकवचन द्विवचन बहुवचन च-कचा ऋग्भ्यां ऋग्भिः वाचा वाग्भ्यां वाग्भिः त्वचा त्वग्भ्यां त्वग्भिः विपद्भ्यां विपद्भिः परिपदा परिपझ्या परिषन्द्रिः शरदा शरद्भ्यां शरद्धिः वीरुद्भ्यां वीरुद्धिः समिधा समिद्भ्यां समिद्भिः क्षुधा क्षुद्भ्यां श्रुद्भिः योपियां योषिद्भिः सरिता सरिद्भ्यां सरिद्भिः विद्युता विद्युद्भ्यां विद्युद्भिः सर्वनाम-सीलिंग सर्व-सर्थया सर्वाभ्यां सर्वाभिः अपर-अपरया अपराभ्यां अपरामिः अन्य-अन्यया अन्याभ्यां अन्याभिः तद्-तया ताभ्यां বাসি द् विपदा ध् वीरुधा त्योषिता 1

यद्यया
३२
सनातनजैनग्रंथमालायां-
याभ्यां
याभिः
किम्- कया काभ्यां काभिः
इदम्-अनया आभ्यां
आभिः
अदस्-अमुया अमूभ्यां अमूभिः
ऊपर लिखे शब्दों से एक २ शब्द लेकर वाक्य बनाओ।
संस्कृत वनामो-
केवल अर्थकरी विद्यासे क्या मतलब है। सुंदर भायासे घर
शोभता है। लड़कियोंके साथ लड़के खेलते हैं। किस लत्ताने
तुमको मोहलिया । विदुषी नारीके साथ वातीलाप करना चाहिये।
किस (स्त्री) ने यह काम किया है। मैं भूखसे पीडित हू । नदीले
बहुत उपकार है । तोता (शुक) लाल चोंचसे आम खाता
है। नवीन बहुवोंके साथ दासियां बातें करती हैं। दुर्जन मीठे
वचनोंसे वशीभूत करता है। इन स्त्रियोंने इस ग्रंथको बनाया
है। माताने पुत्रोंके साथ भोजन किया। सेनाने (चमू) घर
घेरलिया। आपत्तिने उस नगरको देखा भी नहीं था।
तैबालाभिः सह कुत्र गच्छसि त्वं? अनया नरेण किं कथितं ।
तया मातृणा आदिपासा।बधूना कदा आगतं । अल्पजलै. सरिद्भिः
देशो विभक्तः। संपदेन विहिता तप्यति वधूः । शानं वितरन्द्रिः
परिपदैः आमतः सः मनोहारिणी अनेन योषिता मोहिता सर्वे ।
दुहित्रा क. स्त्री न संतुष्यति ।
स्त्रीलिंगके स्थान पुलिंग करके वाक्य वनावो-
परिसूचनया (३) विनाऽपि पना शाता जातिकुलोन्नतिस्तदीया।
परगितझया तया सखी गदिता।
१-स्त्र तथा दीर्घ अ, इ, उ, असे परे हस्व तथा दीर्घ अ, इ, उ, ऋ होंगे
तो उन दोनोंके स्थानमे एक दीर्घ हो जायगा । जैसे-विना अपि, इस उदाहरणम

२ संस्कृतप्रवेशिनी। नरनाथ ! युवा यदा स दृष्टो भवतो (आपकी) देहजया महेंद्र- मर्दी। मुपिता बदनश्रिया मम (मेरी) श्रीरनैयेतीव (अनया इति इव) रुपोप (रुपा उप) जातमूछी विदधाति मुहुर्मुहुर्मुगाक्षी विपनियंदिमिरंशंमिः शशांकः। वनवह्निशिखावलीव (आवली इव) सापि (अपि) चलयत्यं (ति+अं) बुजकोमलं तदंग। एकवचनके स्थानमें द्विवचन करके लिखो- विदुम्या तया अहं आहूतः। कन्यया पृष्टा सा गदितवती । सरिता अयं देशो विभक्तः। धेन्वा यवा भक्षिताः। अमुया दु- चरित्रया किं कृतं। नपुंसकलिंग। नोट-नपुंसकलिंगमें तृतीया आदि विभक्तियोंके रूप प्रायः पुलिंगके समान होते हैं तो भी स्पष्टज्ञानके लिये नीचे लिख देते हैं। । 'ना' में के 'आ' से पर 'अपि' का 'होनेसे दोनो मिलकर एक 'आ' हो गये तो "विनापि” हुआ। इसी तरह दघि इट-दधीदं, नदी+इयं-नदीयं, मधु+ उरिउष्टं मधूच्छिष्टं, वधूम्ऊढा-बधूढा, पितृ ऋकार:-पितृकार. आदि जानना । २-हख अथवा दीर्घ 'भ' से परे हख अथवा दीर्घ कोई भी इ, उ, होंगे तो उन दोनोंके स्थानमें क्रमसे ए, ओ, भर हो जायेंगे। अर्थात् 'अ' से परे (वाद) में इ, ई होगी तो दोनोंके स्थानमें 'ए', उ, ऊ होंगे तो 'ओ' ऋ, ऋ होगे तो 'अर' होगे। जैसे-अनया इति, इसमें 'या' के 'आ' से परे 'इति' का 'ई' है इससे दोनों (मा, इ) के स्थानमें एक 'ए' होनेसे 'अनयेति' होता है। इसी तरह रुषा+उप-पोप, महा+ऋषि-महर्षि, आदि समझना | ३-हख तथा दीर्घ इ, उ, * के स्थानमें क्रमसे य, व्, र हो जाते हैं यदि उनके बादमें कोई स्वर हो । परंतु जहा नं. १ नियमकी प्राप्ति होगी वहा यह नियम नहीं लगेगा । जैसे ज्यलयति अबुज यहा पर 'ति' में के 'इ' को 'अंबुज' का 'अ' घादमें होनेसे 'य' हो गया तो ज्वलयत् य् अवुज हुआ सब अक्षरोंको मिलाकर लिखनेसे ज्वलयत्ययुज हुआ । इसीतरह-मधु अपनय अध्वपनय, धातृ+मश+धात्रंश आदि समझना । -

समातनजैन ग्रंथमालायां-
एकवचन द्विवचन
बहुवचन
कुसुमेन कुसुमाभ्यां कुसुमैः।
दानेन दानाभ्यां
दानः।
धारणा धारियां वारिमिः
मधुना मधुझ्या मधुमिः।
सानुना सानुभ्यां सानुमिः।
"व्यंजनात।
श्रीमता श्रीमद्भ्यां श्रीमद्भिः।
शर्मणा शर्मयां शर्ममिः।
पयसा पयोश्यां पयोमिः।
चेतसा चेतोभ्यां चेतोमिः।
ज्योतिषा ज्योतिश्यों ज्योतिर्मिः।
धनुषा धनुम्यों धनुर्मिः।
सर्वनाम।
सर्वेण सर्वाभ्यां
सेन ताभ्यां
तैः। इत्यादि पुंलिंगके
संस्कृत वनामो-
लडका दूधके साथ चांवल खाता है। इस धनुषसे लोग
'मस्तक छेदते हैं। वडे २घरोंसे क्या प्रयोजना है। मोरे शरीरसे
लोग दुःख पाते हैं।
सर्वैः।
समान जानना।
--

संस्कृतप्रवेशिनी.... वाच्य परिवर्तन। प्रथम पाठ। के और कवतु (क) कर्तृवाच्य कर्मवाचं १ अहं शिशु स्पृष्टवान्। मया शिशुः स्पृष्टः। मैंने लडके को छुआ। मेरे द्वारा लडका छुआ गया। अहं विद्वांसौ पूजितवान् । मया विद्वांसौ पूजितौ। मैंने दो विद्वानोंको पूजा। मेरे द्वारा दो विद्वान पूजे गये। त्वं गुरु पृष्टवान् । त्वया गुरुः पृधः। तुमने गुरसे पूछा। तुम्हारे द्वारा गुरु पूछे गए। त्वं ग्रंधान पठितवान् । त्वया ग्रंथाः पठिताः। तुमने, ग्रंथ पढे। तुम्हारे द्वारा ग्रंथ. पदे गए। ४-वाक्य बनानेकी रीति विशेष (प्रकार) को वाच्य कहते हैं उस वाच्यके तीन भेद हैं-कर्तृवाच्य, कर्मवाच्य, भाववाच्य । कर्तृवाच्यमें कर्तीके आधीन किया रक्खी जाती है। अर्थात् कर्ताका जो पुरुष (उत्तम, मध्यम, मन्य.) होगा और जो वचन होगा वही पुरुष और वचन क्रियाका भी रखना होगा । जैसा कि । प्रथम मागमें बतलाया गया है। परंतु कर्मवाच्यमें क्रिया कर्मके आधीन होती है अर्थात् कर्मके पुरुष और वचनके अनुसार क्रियाके भी पुरुप वचन होते हैं। कर्तकि अनु- सार नहीं, कती चाहे कोई पुरुष और कोई वचनमें रहे। और जब पातु अकर्मक है उसका कर्म न होनेसे क्रिया सर्वदा अन्यपुरुष तया एकवचनकी होती है उसे भाववाच्य कहते हैं। इस तरह हम एक वाक्यको दो तरह, (कर्तृवाच्य या कर्मवाच्य कर्तृवाच्य या भाववाच्य) से बोल सके है । ५। सकर्मक धातुओंसे कर्मवाच्यमें, तथा अकर्मक धातुवोंसे कर्तृवाच्य या भाववाच्यमें 'क' प्रत्यय होता है। जवत प्रत्यय कर्तृवाच्यमें ही होता है। इन दोनों प्रत्ययातोंके रूप बनाने के नियम प्रथममांग ८३ अध्यायमे देखो। ६-कर्मवाच्य होनेसे कती तृतीया विभकीका और कर्ममें प्रथमा विभकीका प्रयोग करते हैं। धातु के रूप में पुरुष, पचन करके वाधीन रखने में तीके आधीन नहीं । .

३१ सनातनजनग्रंथमालायां- मुनिः धर्म उपदिष्टवान् । मुनिना धर्मः उपदिष्टः। मुनिने धर्मका उपदेश दिया। मुनि द्वारा धर्म उपदेशा गया। फास वृक्षौ छिन्नवान् । फारुणा वृक्षौ छिौ। पढईने दो वृक्ष काटे। बढई द्वारा दो पेड काटे गये। २ आवां ईश्वरं पूजितवंतो। आवाभ्यां ईश्वरः पूजितः। इम दोनोंने भगवानको पूजा। हम दोनोंके द्वारा भगवान् पूजे गये। आवां पितरो प्रणतवंती। आवाभ्यां पितरौ प्रणतो। हम दोजनोंने मातापिताको प्रणामकिया हम दोके द्वारा मातापिता प्रणाम कियेगयो युवां अश्वं दृष्टयतौ। युवाभ्यां अश्वो इष्टः।' तुम दोने घोडा देखा। तुम दोके द्वारा घोडा देखा गया। युवां पी खमितवंती। युवाभ्यां पौ खनिती। सुम दोने दो कुए खोदे। तुम दोके द्वारा दो कुए खोदे गये। अश्वी धासान खादितवंतौ। अश्वाभ्यां घासा: खादिताः। दो घोडाने घास खाई। दो घोडोंके द्वारा पास खाई गई। प्रभू भृत्यो आदिवंतो। प्रभुन्या मृत्यौ आदिष्टौ। दोखामियोंने दो नोकरोंको आज्ञा थी। दोखामियों द्वारा दो नोकर आज्ञापित हुए। ३ धयं चंद्रमीक्षितवंतः। अस्मामिश्चंद्र ईक्षितः। हमने चंद्रमा देखा। हम लोगों के द्वारा चंद्रमा देखा गया। घयं वालान शिक्षितवंतः। अस्माभिर्वाला: शिक्षिताः। हम लोगोंके द्वारा लडके पढाये गये। यूयं मोदकान् वितीर्णवंतः। युमामिोदका वितीणीः। । तुमने लड्डू घाटे। तुम लोगों के द्वारा लाइ घाटे गये। “जना अर्थ लम्धवंतः। मनुष्योने धन पाया। 'मनुष्यों के द्वारा धन पाया गया। पालका,लाजान विकीर्णतः पालकैलोजा विकीणा बलों द्वारा पान विवरे माये ॥ हमने उडयोंको पढाया। जनरर्थो लब्धा . भारकाने धान विरे) । संस्कृतमवेशिनी। ३७ संस्कृत बनाओ- विद्वानोंके द्वारा इस ग्रंथकी प्रशंसा कीगयी। श्रावकोंके द्वारा मुनिलोग पूजे गये। हमारे द्वारा यह बालक पढाया गया। सूर्य के द्वारा यह लोक प्रकाशित किया गया। तुमारे द्वारा दो पर्वत अतिक्रमण किये गये। पुत्रशोक द्वारा पिता दुःखी किया त्या । विद्यार्थी द्वारा अध्यापक पूछा गया। नदी द्वारा ग्राम विभक्त किया गया। -- द्वितीय पाठ। कर्तृवाच्य । " बालकौ नदी कर्मवाच्य । थावका आर्यिका अर्चितवान्-श्रावकेन आर्यिका अर्चिता। मुनिः श्राविक पृष्टवान्-मुनिना श्राविक पृष्टे । सर्वे नारीः मानितवंत:-सर्वैः नार्यः मानिताः। के कथां कथितवंतःकै कथा कथिता। ते वाचा उच्चारितवंत:- धाचा उच्चारिताः। इक्षितवंती बालकाभ्यां नदी ईक्षिता। स्वामी भाया पृष्टवान्-स्वामिना भायो यूयं सरितः अवाहितवंतः-युष्मामिः सरिता अवगाहिताः। सर्वे परिषदं मानितवंता-सर्वैः परिषद् मानिता। शुद्ध करा- अनया नरेण मुनि इम अचिंता। कया नायर्या स पृष्टवान् । पाठकेन पाठिका पृष्टवती । चम्या पर्वता निर्वृक्षाः कृतवंतः। केन 'सुमधुरंधाचं उता। कैरियं कथां कथितवत्ती। ताभ्यां बालि- काभ्यां माता पृष्टपती। कर्णधार: नद्यः, तीणा ! बंधुभ्यां मुनि । पृटा। - . सेवितवतो, सनातननग्रंथमालायां- - सस्कृत बनामो- पवन द्वाराजल विखेरा गया। अग्निद्वारालडकी दग्धकी गयी। लडकी द्वारा माता सेई गयी। किस दो स्त्रीके द्वारा अपराध हुआ। मेध द्वारा घातक संतुष्ट किये गये। दो नंदों (ननांड) द्वारा बधू प्रशंसित हुई। किस सेनापति द्वारा यह सेना पराजितकी गई। फिस अध्यापक द्वारा ये छात्री पढाई गई (पाठिता)। पुस्तकं तृतीय पाठ। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य । अहं पुस्तकं पठितवान् । मया पठितं। अहं बने दृष्टवान् । मया वने पक्षी फलानि खादितवान् । पक्षिणा फलानि खादितानि । अशि: धन दग्धवान् । अग्निना इंधनं दग्छ। धीरः धपि कांक्षितवान् । वीरेण धनूंषि कांक्षितानि । शिशुः पयांसि पीतवान् । शिशुना पयासि पीतानि। हिंदी बनाओ- नृपेण सुतं वीक्ष्य चितितं यत् (कि) मयाऽध स्वजन्मफलं लब्ध। मदीयं (मेरा) कुलमनेन पुत्रेण गुणैर्दीपितं। यथा फुसुमेन वृक्षा, नवयौवनेन वपूंपि, प्रशमेन पंडिताः शोमिता भवंति तथा सुपुत्रेण फुलं दीप्तं भवति । अथ केनचिद् दूतेन राजसमामागत्योक्तं नृप ! स मत्प्रभुः स्वतेजसा उद्धतानपि राइस्तप्तवानिति विनयरहितं त्वां कथितवान् यद् (कि) त्वदीया वंशजा मदीयान्वयजं सदा प्रणतवंतापरं त्वया सा पद्धतिलेधिता। मवेन मूढबुद्धिः-जन्मना अंधभक्षुषाहव बुद्ध्या स्वहितं न पश्यति । भदादयः षड् रिपो नयविद्भिर्गदिवाः । हेमदीयनपेण पूर्व यव जिवा: । यः स्वमनोभवं मदावि संस्कृतप्रवेशिनी। जेतुं न शकस्तं त्यक्त्वा संपदः सत्वरमेव ब्रजंति । मया त्वदीया शठता चिरसवधीरिता परं त्वया तद् सर्व न विचारितं । “मदीयो 'द्विपाधिपः स्वयमागत्य त्वदीयं पुरं संविटवान । स त्वया धृतः (पकड लिया) इति शीघ्रगामिभिश्चरैः (दूतैः ) निश्चित्य निवेदितं । अतः स्वयमेव तं गजराज मदीयसमीपं प्रेषय (मेजो)। नो चेत् स मत्स्वामी त्वां अर्दिष्यति । संस्कृत बनाओ- उस रानीने सुंदर पुत्र जना । लडकोंने पुस्तकें पढी। नौकरोंने मार ढोया।राजाने वहां एक हिरण देखा। हिरण हररोज (प्रत्यहं) धान्य खाता था। एक दिन (एकदा) वह किसानके द्वारा देखा गया । मेरे द्वारा पत्र लिखा गया। "नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- दयावत्या, सुंदराणि, उद्योगिमिपुरुषेण, नद्या,ऋजुनी, उदार- घेतसा, पवित्र, कंदत्या, गच्छंत्या, जिनं, अर्चत्या, किरण, रज्जुभ्यां, रटेन, द्विपाधिपेन, चरैः, संप्रविष्ट, ऊढं। चतुर्थ पाठ। कर्तृवाच्य। भाववाच्य। जीवितवान् । राज्ञा जीवितं। धेनुः गतवती। धेन्वा निर्धनः कठितवान् । निर्धनेन कठितं। रूप्यका कांतवान् । रूप्यकेण कात। धीरः क्रांतवान्। वीरेण क्रांती बालकाः श्रीडितवंतः। चालकैः क्रीडितं। हस्तिनः नर्दितवंतः। हस्तिमिः नर्दितं। -भाववाच्यमें किया सर्वदा एकवचनकी होती है को चाहे कोई-वचनका हो। औरि लिंग नपुंसक लिंग ही होता है। - गतं।

सनातननग्रंथमालायां- सुतं। स्फुटितं । इषितं। ईहित सिंहः गर्जितवान् । सिंहेन गर्जित। मृगाः चरितवंतः। मृगैः चरित। सेनापतिः जितवान् । सेनापतिना जितं । शिशु ज्वरितवान् । शिशुना ज्वरित। औषधयः ज्वलितवत्यः। औपधिमिः ज्वलितं। मनः तप्तवन । मनसा त। दे फलितवत् । देवेन फलित। सर्पाः सूतवंतः। सः बालिका होच्छितवती। बालिकया होच्छितं। पुष्पाणि स्फुटितवंति। पुष्पैः नार्यः ईषितवत्यः। नारीसिः परिधमिणौ ईहितवंतौ। परिश्रमिभ्यां संपत् पवितवती। संपदा पधितं। वेश कचितवत् । वेशेन गुणग्राहिणः कत्थितवंतः। गुणग्राहिमिः कत्थितं। मनः क्षुधवत् । मनसा अध्यवसायिनः चेष्टितवंतः। अध्यवसायिमिः चेष्टितं। ब्रह्मचारिणी दीक्षितवंती। ब्रह्मचारियां दीक्षित। रतानि घोतितर्वति। रतः घोतितं। वाराणसी प्रथितं। साम्राज्य प्रसितवत्। साम्राज्येन प्रसितं। चि मोदितवत् । चित्तेन मोदितं। दीप: चर्चित। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनायो- पति, व्यथितं, शंकित, शिक्षित, शोमितं, श्वेतितं, सितं, स्फुटितं, मृतं, उद्विग्नं, ग्लान, अतितं, मिषितं, चित, गर्वित, सीणं, फुलं, उषित, रुदितं। कचित। क्षुग्ध। प्रथितवती। वाराणस्या चितवान् । दीपेन संस्कृतप्रवेशिनी। " पंचम पाठ। वर्तमान ( लड्विभकी ) काल । अन्यपुरुष कर्तृवाच्य। * कर्मवाच्य। १ छात्रः जैनेंद्र पठति छात्रण जैनेंद्र पठ्यते शिष्यः ग्रंथ लिखति-शिष्येण ग्रंथो लिख्यते श्रावकाः धर्म चरंति-श्रावकै धर्मः चर्यते मुनिः मोक्ष इच्छति-मुनिना मोक्षः इज्यते '"सेने ग्राम रक्षतः-सेनाभ्यां ग्रामो रक्ष्यते अग्निः काष्टं दहति-अग्निना काष्ठो दाते भृत्यः ग्राम गच्छति-भृत्येन ग्रामो गम्यते शिशुः फलं खादति-शिशुना खाद्यते विद्यार्थी उपाध्यायं पृच्छति-विद्यार्थिना उपाध्यायः पृच्छ्यते स्वामी सेवक चदति-स्वामिना सेवक उद्यते सर्पः वृद्धां दशति-सपेण वृद्धा दश्यते दासी आदिशति-राक्षा दासी आदिश्यते पिता चुंवति-पित्रा पुत्रः चुंब्यते चालक पश्यामि-मया बालको दृश्यते त्वं मुनि अर्चसि त्वया मुनिः अय॑ते आचां वकारं गदाव:-आवाभ्यां वक्ता गद्यते * कर्मवाच्यमें क्रियाके पुरुष और वचन कतीके अनुसार नहीं होते। कर्मके अनुसार होते हैं अर्थात् यदि कर्म एकवचन है और युष्मद्, अस्मदो मिन्न है तो क्रिया भी एकवचन और अन्यपुरुषकी रक्खी जायगी कती चाहे कोई वचनका और कोई पुरुषका हो । कर्मवाच्यमें (प्रथमपुरुषमें) धातुओंसे 'यते, येते, यंते' प्रत्यय,क्रमसे एकवचन, द्विवचन, बहुवचनमें लगते हैं। और परस्मैपदी, उभयपदी, आत्मनेपदी धातुओसे केवल आत्मनेपद ही होता है। १ - पुत्रं - इज्येते लमे भया सनातनजेनग्रंथमालायां- युवां शवं अर्दयः युवाभ्यां शत्रुः अर्थते घयं जिन अहोमः अस्मामिः जिना अद्यते यूयं घट सृजथ-युप्मामिः घटः सुज्यते २ पुत्राः पितरौ प्रणमंति-पुत्रः पितरी प्रणम्येते भृत्याः अश्वी स्पृशति-भृत्यैः अश्वो स्पृश्यते পু प्रहरतिराहा प्रहियेते सेवक तरू आरोहति-सेवकेन आमहोते श्रावकाः जिनौ यति-श्रावक जिनौ अहं विधे विद्य लश्येते त्वं घटौ यच्छसि वया घटी यम्येते आवां वस्तुनी याचाव:-आवाभ्यां वस्तुनी याव्येते युवां पुष्पे जिघ्रथा-युवाभ्यां पुप्पे घायेते शंखे धमामः-असामिः शंखे धमायेते यूयं अजे नयथ-युष्मामिः अजे नीयेते नारी मानते-जनेः नारी कर्पकाः क्षेत्राणि उक्षति-कर्षक क्षेत्राणि उक्ष्यते छात्राः शास्त्राणि मनंति-छात्रैः धार्मिका: ग्रंथान् वितरति-धार्मिक ग्रंथा: प्रभवः अनुजीविना तर्जेति-मभुभिः अहं विदुषः शंसामि-मया विद्वांसः शंस्यते त्वं जनान् लुभसि वया जना: वयं मान्यते शाखाणि सायंते वितीयते अनुजीविनः तन्यते लुन्यते -अकारात धातुओंके अंतके 'ऋ'कारको 'रि' आदेश होजाता है यदि 'या' ( भाववाच्य, कर्मवाच्यका प्रत्यय ) लिड् ( आगे कहेंगे ) प्रत्यय हुये हो। जैसे ह ( हरना) धातुसे कर्मवाच्यका अपनाने के लिये यते प्रत्यय लाये तो 'हृयत्ते' एसी अनस्या हुई अब इस नियमसे ऋके स्थानमें रि होगया तो वियते रूम हुआ इसी प्रकार द्विवचनादिकमें दियेते, ड्रियते, आदि समझना ।

आवां युवां वयं यूयं संस्कृतप्रवेशिनी। ४३ क्षेत्राणि शीकाव:--आवाभ्यां क्षेत्राणि शीक्यते जलानि मथथः-युवाभ्यां जलानि ' मध्यंते शत्रून् तीम:-अस्माभिः शत्रवः तर्धते गृहाणि प्रविशथ-युष्माभिः गृहाणि प्रविश्यंत - पष्ठ पाठ। स वालो तो जनाः त्वं युवां यूर्य २ माता पितरौ साधवः त्वं युवा यूयं ३ दुर्जनः यधको उत्तम पुरुष। मां महति-तेन अहं मो मां आमृशति-चालेन अहं आमृश्ये मां जयत:-ताभ्यां अहं जीये मां प्रणमंति-जनः अहं प्रणम्ये मां ईक्षते-त्वया अहं ईक्ष्ये मां सेवेथे- युवाभ्यां अहं सेव्ये मां श्लाघवे-युष्माभिः अहं लाध्ये आवां उपदिशति-मात्रा आवां उपदिश्यावहे आवां तर्जत:-पितृभ्यां आवां तज्यावहे आवां पश्यंति-साधुभिः आवां दृश्यावहे आवां लोचसे-त्वया आवां लोच्यावहे आवां कवेथे युवाभ्यां आवां कन्यावहे आवां कांक्षय-शुष्माभिः आवां कांक्ष्यावहे अस्मान् तुदति-दुर्जनेन वय तुद्यामहे अस्मान् शसतः-वधकाभ्यां वयं शस्यामहे अस्मान् दहति-अग्निमिः वयं दह्यामहे अस्मान् तिजसे त्वया वयं तिज्यामहे अस्मान्, गहेथे युवाभ्यां वयं गद्यामहे अस्मान् महथ-युष्मामिः वयं मलामहे अग्नयः त्वं युधां यूयं , सनातनजैनग्रंथमालायां- सप्तम पाठ। पृच्छ्यसे 4 ...... ' मध्यम पुरुष। त्वां स्पृशति-तेन स्पृश्यसे वालौं त्वां पृच्छता-चालाभ्यां त्वं सजनाः त्वां प्रशंसंति-सजनैः प्रशंस्यसे अहं त्वां महामि-मया महासे आवां त्वां गदावा-आवाभ्यां त्वं गद्यसे वयं त्वां दिशामः-अस्मामिः त्वं दिश्यसे २ वाला युवां आमृशति-चालया युवां आसृश्येथे नायौँ युवां उद्वहेते-नारीभ्यां युवां उद्-उह्येथे गुरवः युवां मानते-गुरुभिः युवां मान्येथे अहं युवां जयामि-मया युवां जीयेथे आवां युवां तर्जावा-आवाभ्यां युवा तज्येथे वयं युवां कत्यामहे-असामिः यवां कत्थ्येथे ३ नारी सुष्मान् निंदति-नाया यूयं निंद्यध्वे आवां युष्मान् श्लाघावहे-आवाभ्यां यूयं श्लाघ्यच्चे वयं युप्मान् गहामहे-अस्माभिः यूयं गयध्वे नीचे लिखे शब्दासे वाक्य बनाओ- विकीर्यसे, तीयते, गम्यते, तिज्यध्वे, लभ्यते, पठ्यते, सेव्ये, अय॑से, उह्यध्वे, दृश्यामहे, दाते,मुच्यसे, शुच्ये, पीयंते, त्यज्यच्चे। सस्कृत बनाओ दो गुरुओंसे दो विद्यार्थी तर्जित होते हैं। मेरे द्वारा इंद्रियसुख अनुभूत होते हैं। दो पुत्र द्वारा हम दो जने स्पर्श किये जाते हैं। सालोगोंके द्वारा तुम प्रशंसित होते हो। दुर्जनोंके द्वारा हमलोग निदित होते हैं। उनके द्वारा घे छोड़े जाते हैं। पिताके द्वारा पुरको , - संस्कृतप्रवेशिनी। उपदेश दिया जाता है। हमलोगोंके द्वारा जैनेंद्र पढा जाता है। स्त्रीरागसे सब लोग ठगे जाते हैं । (प्र-४)माता पिताके द्वारा पुत्र साँडा जाता है। भाववाच्य । अष्टम पाठ। कर्तृवाच्य। शिशः ज्वरति-शिशुना ज्वर्यते पक्षिणः कूजति-पक्षिभिः कूज्यते चाला हीच्छति-चालया हीच्छ्यते दैवं फलति-देवेन फल्यते संपत् एधते-संपदा एध्यते वेश कचति-वेशन कच्यते रुप्यकं कनति-रूप्यकेण कन्यते कन्या: क्रीडति-कन्यामिः क्रीच्यते उद्योगिनः ईहते-उद्योगिमिः ईह्यते ओषधयः ज्वलंति ओषधिभिः ज्वल्यते' मृगाः चरंति-मृगैः चर्यते सिंह गर्जति–सिंहेन गज्यते छात्रा वसति छात्रैः उष्यते" गजी नर्दत:-जाभ्यां नर्धते राजाने जयंति-राजभिः जीयते पुष्पाणि स्फुटंति-पुष्पैः स्फुट्यते त्वं वर्द्धसे त्वया वय॑ते भवामि- मया भूयते भाववाच्यम एकवचन, और अन्य पुरुषही होताहै द्विवचन, पहुंदवर्ने, उत्तमप, मध्यमवर्ष नहीं होते।

सनातनजैन ग्रंथमालायां- नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनामो- कम्यते, तप्यते, कयंते, फल्यते, स्फूज्यंते, मिष्यते, वयेते, पत्यते, अंच्यते, रुच्यते, रुद्यते, विलप्यते, गद्यते, वय॑ते, शिक्ष्यते, दीत्यते, यत्यते, मोक्ष्यते, नियते, स्मर्यते, दीप्यते । नीचे लिखे वाक्योंको वाच्य वदलकर लिखो- चौद्धपरिवाट् श्रेणिकं गदति स्म । "हे कुमार! त्वं यदि स्वपितृराज्यमिच्छसि तर्हि बौद्धधर्ममाचर । बौद्धधर्म एव एका सत्यधर्मों वर्तते। विज्ञानादयः पंच संज्ञा एवात्र जीवान तुदति। इदं जगत् प्रतिक्षणं नाशं गच्छति। यान पदार्थान् भगवान् बुद्ध उपदिशति स्म ते एव समीचीनाः" इति । तद्वाक्यं श्रुत्वा कुमार- श्रेणिको बौद्धधर्ममावरति स्म। तथा तेन एव सह कंचित् कालं वसति स्म। अथ बहुदिनपर्यंतमनेन सह निवासोऽनुचित इति स कुमारस्ततः प्रतिष्टते स। कुमारेण सह केनचित् श्रेष्ठिवर्येण इंद्र- दत्तेनापि प्रस्थितं। कंचित् मार्ग गत्वातौ कांचित् नदी स पश्यतः। तो प्रवेष्टुं कुमारश्रेणिकः स्वकीये उपानही (जूते) हस्तमध्यं नयति ल, इदं दृष्ट्वा श्रेष्ठिना विचारितं यत् अवश्यमेवायं कुमारो नियु- द्धिः, अन्यथा कथं लोकविरुद्ध कार्यमाचरति । शुद्ध करो- त्वया अहं प्रच्छ्यसे। मया त्वं आदिश्ये। छात्रेण पुस्तकं पठ्ये । तेन यूयं सेव्यते। युवाभ्यां आवां स्लाध्येथे । आवाभ्यां युधां संदिश्यावहे । युष्माभिः ईहते । मुनिना अहं भाष्यामहे । पंडितैः शाखाणि गाोते मात्रा पुत्रीं स्वज्यसे । सर्वैः वयं उपहस्यते । सस्कृत बनाओ जिसमे किया भाववाच्य वा कर्मवाच्य हो । कुमार श्रेणिकने जिस समय (यदा) कुमारी द्वारा मेजा हुआ (मेपित थोडा पानी देखा उस समय विचारा कि (यत्) इतने (यव) जलसे इतभी फीचड (पंक), किस तरह (कथं) दूर हो संस्कृतप्रवेशिनी। संती है । पश्चात् एक वनखंडसे अपने (स्वीय) पैर पोंछे (मार्जित) और जलसे उनको धोया (धौत) इस चातुर्यको देख कर कुमारी बोली-अहो जैसा (यथा) यह कुमार बुद्धिद्वारा कार्य करता है (आचरति) वैसा कोई नहीं करता। पश्चात् विनय सहित प्रार्थना 'की (प्रार्थ्यते स्म) कि महाभाग ! आज यहां (अत्र) ही भोजन करें। । ऐसे वचन सुन कर कुमारने कहा। लोद विभक्ति। नवम पाठ। पठतु-छात्रण । अन्य पुरुष। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य। 'छात्रः जैनेंद्र जैनेंद्र पठ्यतां श्रावका धर्म चरतु-श्रावकेण धर्मः चर्यता क्षत्रियो ग्राम रक्षतां-क्षत्रियाभ्यां ग्रामः रक्ष्यतां अहं मोक्षं गच्छानि-मया मोक्षः गम्यतां आवां ग्रंथ इच्छाव-आवाभ्यां ग्रंथः इप्यता वर्य सेवक वदाम-अस्माभिः सेवकः उद्यतां त्वं गुरु पृच्छत्वया गुरुः पृच्छ्यतां युवां पुत्रं चुंबतं-युवाभ्यां पुत्रः चुंब्यतां यूर्य अर्चत-युष्माभिः मुनिः अर्च्यता पितरौ नमतु-पुत्रेण पितरौ नम्येतां भृत्यो अश्वौ अश्वौ स्पृशतां-भृत्येन अश्वौ स्पृश्येतां श्रावकाः जिनौ यजंतु-श्रावक जिनौ इज्येतां अहं विद्य विद्य लभ्येतां आषां' धर्मायौं याचावहे-आवाभ्यां धर्मार्थों याच्येतां मुनि २ पुषः ल-मया ४८ सनातनजैनग्रंथमालायां- वयं शंखे धमाम-अस्माभिः शंखे धम्येतां त्वं विद्य लभस्वत्वया विद्य लभ्येतां युवां पुष्पे जिघ्रतं-यवाभ्यां पुष्पे घायेता यूयं अजे नयत-युप्माभिः अजे नीयेतां ३ जनः नारी मानता-जनेन नारी मान्यता कृषीवलौ क्षेत्राणि उदंतु कृषीवलाभ्यां क्षेत्राणि उत्यंतां छात्राः शास्त्राणि मनंतु-छात्रैः शाखाणि सायंता अहं अनुजीविनः तर्जानि-मया अनुजीविनः तज्यतां आवां गृहाणि शीकाव-आवाभ्यां गृहाणि शीपयंतां वयं शत्रून तर्दाम-अस्मभिः शत्रवः तर्वतां त्वं जनान् लुभ-स्वया जनाः लुभ्यंतां युवा जलानि जलानि मध्यंतां यूयं गृहाणि प्रविशत-युष्माभिः गृहाणि प्रविश्यंतां मथतं-युवाभ्यां महतु-तेन नन्य। दशम पाठ। उत्चमपुरुष मां अहं महो। बालो मां आमृशतां चालाभ्यां अहं आमृश्यै । जनाः मां नमंतु जनैः अहं त्वं मां अहं ईक्ष्यै। युवां मां अहं भाये। यूयं मां श्लाघवं युष्माभिः अहं लाध्यै। २ माता आवां उपदिशतु-मात्रा आवां उपदिश्यावहै। पितरौ आवां तर्जता-पितृभ्यां आवां तयावहै । साधवः आवा पश्यतु-साधुभिः आवां दृश्यावहै। आवां आवां लोच्यावहै। ईक्षस्व त्वया भाषेथा युवाभ्यां त्वं लोचस्व-त्वया संस्कृतप्रवेशिनी। युवां आवां कवेथां-युवाभ्यां आवां कव्यावहै । यूयं आवां कांक्षत-युष्माभिः आवां कांक्ष्यावहै। ३ सज्जनः अस्मान् पृच्छतु-सजनेन वयं पृच्छ्यामहै। वधको अस्मान् त्यजतां-बधकाभ्यां वयं त्यज्यामहै। अग्नयः अस्मान् परिचरंतु-अग्निभिः वयं परिचर्यामहै। त्वं अस्मान् तिजस्व-त्वया वयं तिज्यामहै। युवां अस्मान् शंसतं-युवान्या वयं शंस्यामहै। यूयं अस्मान् महत-युष्माभिः वयं मद्यामहै। - एकादश पाठ। स्पृशतु तेन स्पृश्यत्व पृच्छ्यस्व प्रशंस्यस्व महास्व मध्यम पुरुष 'त्वां त्वं वालो त्वां पृच्छतां-बालाभ्यां त्वं सजनाः त्वां प्रशसंतु- सज्जनः त्वं अहं त्वां महानि-मया आवां गदाव-आवाश्यां त्वं वयं त्वां दिशाम-अस्माभिः त्वं २ वाला युवां आमृशतु-चालया युवां नायौँ युवां उन्-चहेता-नारीभ्यां युवां गुरवः युवां मानंतां-गुरुमिः युवां अहं युवां जयानिमया युवां आवां युवां तर्जाव-आवाभ्यां युवां वयं युवां कत्थामहै-अस्मामिः युवां ३ नारी युष्मान् निंदतु-नाया यूयं आवां गुष्मान् श्लाघावह-आवाभ्यां यूयं वयं युष्मान महाम-असामिः यूयं गद्यस्व दिश्यस्व आसृश्येथां उद-उह्येथां मान्येथा जीयेथा तयेथां कत्थ्येथां निंद्यध्वं लाध्यध्वं माध्वं सनातननग्रंथमालायां- नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनामो- विकीर्यस्व, तीर्यता, गम्यता, तिज्यध्वं, लभ्यस्त्र, पठ्यता, सेव्यै, अन्य, उप्यंतां, उह्येतां, दृश्यामहै, दातां, मुच्यस्व, शुच्यै, पीयतां, त्यज्यध्वं, उद्यतां, लुप्यंतां, सस्कृत बनामो- दो गुरुओंसे दो विद्यार्थी पूछे जाय। मेरे द्वारा आत्मसुख अनुभूत हो। कोके द्वारा हमलोग छोडे जाय । विद्वानोंके द्वारा तुम उपदिष्ट होओ। विद्यार्थियोंके द्वारा जैनेंद्र पढा जाय । उनके द्वारा तुम पूजित होओ। ये दो वृक्ष दो बढइयोंके द्वारा काटे जाय। विद्यार्थी लोग गुरुको सेवें। द्वादश पाठ। कर्तृवाच्य। भाववाच्य। शिशुः नंदतु-शिशुना नंद्यतां पक्षिणः जंतु-पक्षिमिः कूज्यतां विद्या फलतु-विद्यया फल्यता संपत् एधतां-संपदा एध्यतां कन्ये क्रोडतां-कन्याभ्यां क्रीव्यता जनाः यता-जनैः यत्यता मृगाः चरंतु-मृगैः चर्यतां छात्रा वसंतु-छात्रैः उष्यता राजानः जीवंतु राजमिः जीव्यतां पुष्पाणि स्फुरंतु-पुष्पैः स्फुव्यता १०-कर्मवाच्य या भाषवाच्यमें धातुके और आत्मनेपदमें आनेवाले 'ते, एते, अते आदि प्रत्ययके वीचमें यक् (क इत् है) प्रत्यय आता है शेष 'ते आदि को ता आदि कार्य सं० प्र० प्रथम भागके दशवें अध्यायकी टिप्पणीके अनुसार होते हैं।

संस्कृतप्रवेशिनी। - नीचे लिखे शन्दोंसे वाक्य बनाओ.- कम्यतां, तप्यता, स्फूर्यतां,जीव्यता, मिष्यता, पय॑तां, पत्यता, अंच्यतां, रुच्यतां, रुद्यता, विलप्यतां, गद्यतां, पय॑तां, शिश्यता, दीस्यता, यत्यतां, मोद्यतां, म्रियतां दीप्यतां । वाच्य परिवर्तन करो- कमठः श्रीमंतं पार्श्वनाथं गदितवान्-मिक्षो! त्वं मया सह युद्ध- माचर। त्वया पूर्व महदपकतं । अधुना मदीय अवसर इति व्यर्थः कालक्षेपः शीघ्रमेव योद्धु सन्नद्धो (तय्यार) भव। त्वं मित्रं एतं तुंग (पर्वत) आपृच्छख (पूंछ), अनस्थान् देवान अनुसार, सिद्धिक्षेत्र रामशैलं (चित्रकूटपर्वत) वा गच्छ, वा प्रेम्णा हर्षितचित्तः सन् मां निजभुजाभ्यां निगृह परमहं तु त्वां मंच (शीघ्र ) एव यमराजगृहं नयामि । शुद्ध करो- गजेन दुर्जन: तुचंता, बालिकामिः पुष्पाणि विकीर्यतां, संपद्भिः पध्यंता, गुणिमि साधवः पृच्छ्यस्व, ब्रह्मचारिमिः शिक्ष्यंता, आ- धाभ्यां पुस्तकं पठ्यै, कर्ममिः संसारिणः त्यज्यस्व । भाववाच्य या कर्मवाच्यमें संस्कृत बनाओ- तुम लोग हमेशा पुस्तकें पढाकरो। अधिक इंद्रिय सुखको न भोगो। मांस मध मधुको छोडो। जो सर्वदा सच्चे संयमको पालन करते हैं वे मुनि मेरे (मदीय) हृदयमें प्रविष्ट हो। जिसने संसारवर्ती समस्त जीवोंको जीत लिया है उस कामको मी जिन्हों- ने जीता है उन मुनियोंका दर्शन करो। जो सच्चे तपको करते है धे तुझे सचा मार्ग घतलावें। * ४९ की टिप्पणी देखो।

१पिता त्वं' सनातननग्रंथमालायां- सैट् विभक्ति। त्रयोदश पाठ। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य। १ मुनि वनं गमिष्यति-मुनिना वनं गमिष्यते २ छात्र पुस्तके पठिष्यति-छात्रेण पुस्तके पठिप्येते ३ विद्यार्थिनः गुरुन् सेविष्यंते-विद्यार्थिमिः गुरवः सेविष्यंते मां स्वक्ष्यते-पिता अहं स्वक्ष्ये २माता आवां उपदेष्यति-त्रा आवां उपदेश्यावहे ३ साधवः अस्मान् प्रत्यंति-साधुमिः वयं प्रक्ष्यामहे १ अहं त्वा ईक्षिप्ये-मया ईक्षिष्यसे २ साधवः युवां श्लाघियंते-साधुमिः युवां श्लाधिध्येथे ३ वयं युष्मान् स्पामः-अस्मामिः यूयं स्पयध्वे नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनायो- अर्चिष्ये, द्रक्ष्येथे, लप्स्यते, जेष्यामहे, स्मेष्ये, स्मरिष्यामहे, धक्ष्यध्वे, याचिष्यध्वे, तोत्स्यसे, अंचिष्यते । चतुर्दश पाठ। कर्तृवाच्य १ छात्रः वत्स्यति छात्रेण पत्स्यते। कन्ये क्रीडिष्यत:-कन्याभ्यां कीडिष्यते। उद्योगिनः ईहिष्यंते-उद्योगिमिः ईहिष्यते। अहं एघिष्ये-मया पयिष्यते। त्वं जेष्यते। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनामो- नर्दिष्यते, ग्लायिष्यते, मोदिष्यते, स्फुटिष्यते, कूजिष्यते, वर्द्धि- -प्यते, ज्वलिप्यते। ११-प्र० भा० नषम अध्यायकी टिप्पणी देखो। भाववाच्य जेप्यसे-वया - - संस्कृतप्रवेशिनी। - - भाववाच्या या कर्मवाच्यमे संस्कृत बनाओ.- श्रेणिक तीर्थंकर होंगे। इन्द्रादि उनको पूजेंगे। वे जिससमय माताके गर्भ में (मातृगर्भ) प्रवेश करेंगे उससमय कुवेर रत्न विखे- रेगा। जय माता उनको उत्पन्न करेगी (जनिप्यते) तब देव यहां आवेंगे। इंद्राणी इंद्राशासे प्रसूतिगृहमें जावेगी। वहां माताके साथ पुत्रको सोता (शयान) देख उसकी मनसे पूजा करेगी। माता दुःख न पावे इसलिये (अतः ) इंद्राणी एक मायामयी पुत्रको रचेगी उसे वहां रखकर (निक्षिप्य ) भगवानको लावेगी (आ-नी) और इंद्रको देगी। हिंदी वनाओ- तीर्थकरशरीरेण सप्तहस्तप्रमाणं भविष्यते, आयुपा च षोडशा- धिकशतवर्ष (१९६) प्रमाण। त(द)नारीमिः नानागुणपण- • मंडितामिः सुवर्णसमकांतिधारिकाभिर्युवतिमिरधिकं शोभिप्यते। यथा आदिनाथपुत्रेण भरतेन चक्रवर्तिना भूयते स्म तथा एव पन- नाभपुत्रेणापि चक्रवर्तिना भविष्यते । आदिनाथेन इव तेनापि प्रजाः रक्षिज्यंते, देशग्रामनगराणि लक्ष्यते । एवं नीतिपूर्वकं राज्यं कृत्वा तेन स्वामिना विरक्ष्यते । एवं तीर्थकरविरक्ति ज्ञात्वा लोकांतिक- देवैरागमिष्यते। पंचदश पाठ। ये, तव्य, अनीय । पुंलिंग कर्मवाच्य कर्मवाच्य १ छात्रेण गुरु स्पीते-पात्रेण गुरुः स्पृष्टव्यः, स्पृश्यः, स्पर्शनीयः। १२-सकर्मक धातुसे कर्ममें और अकर्मक धातुसे भावमे तव्य, अनीय, य, ण्य [पा-इत् ] और क्यप् [क, प-इत् ] प्रत्यय होते हैं । तव्य प्रत्यय होनेसे धातुके अंतमें हद कार्य मादि तुम् के समान होते हैं पृष्ठ १५ देखो 'अनीय प्रत्यय हो. - . .

५४ सनातनजैननंथमालायां- श्रावकेणातिथि सेविष्यते- केणातिथि सेन्या,सेवितव्या,सेवनीय: सेवकै वृक्ष धक्ष्यते-सेवकै वृक्षः दायः, दग्धव्यः, दहनीयः। राशा चौर मोक्ष्यते-राज्ञा चौरमोच्या मोकव्यः, मोचनीयः। २ मृत्यै स्वामिनी सैविष्येते-भृत्यैः सेन्यौ, सेवितव्यो, सेवनीयौ। पुत्रेण पितरौ अचिंध्येते--पुत्रेण पितरौ अच्यौं, अर्चितन्यौअर्चनीयौ। ३ पित्रा पुत्रा स्वक्ष्यते--पित्रा स्वञ्ज्या: स्वतव्याः स्वंजनीयाः। वृष्टया वृक्षा उक्षिष्यते--वृष्ट्या वृक्षा उख्याः, उशितव्या, उक्षणीयाः मया प्रथा पठिष्यते-मया ग्रंथाः पाठ्या, पठितव्याः पठनीयाः । . षोडश पाठ। स्त्रीलिंग १ तया नदी इक्षिष्यते-तया नदी ईख्या, ईक्षितव्या, ईक्षणीया मात्रा कन्या स्वक्ष्यते-मात्रा कन्या स्वंज्या,स्वट्तव्या, स्वंजनीया। २ तेन पुस्तिके पठिष्येते तेन पुस्तिके पाठ्य, पठितव्ये, पठनीये। गोपेन धेन् मोक्ष्येते-गोपेन धेनू मोच्ये, मोक्तव्ये, मोचनीये । ३ पृष्टया वीरुष सेक्ष्यते-वृष्ट्या वीरुधासेच्या,सेक्तव्या सेचनीयाः। दुहित्रा जनन्यः सेविष्यंते-दुहित्रा.. सेन्या सेवितव्या,सेवनीयाः। - सप्तदश पाठ। नपुंसकलिंग द्रक्ष्यते-मया वनं हश्य, द्रष्टव्यं, दर्शनीयं । पास्यते त्वया दुग्धं पेयं, पातव्यं, पानीयं । मया वनं - . त्वया दुग्ध नेसे धानुके, उ, को कमसे ए, ओ, अर हो जाते है। फारके सिवाय शेष सरात धातुओंसे रोता है। सकारात और व्यंजनात धातुओंसे 'प्य' और जिनके मतके अक्षरसे पहिले कौनसे क्यप् प्रत्यय होता है। १३-याका- पाव भातुके सतके 'आ' प्ो 'ए हो जाता है प्रजय होनेसे ।

संस्कृतमधेशिनी। २ बालकेन पुष्पे धास्येते-बालकेन पुष्पे श्रेये, नातव्ये, घ्राणीये। राज्ञा सरसी सक्ष्येते-राशा सरसी सन्ये, सृष्टव्ये, सर्जनीये। ३ मया फलानि खादिष्यंते-मया • खाधानि,खादितव्यानि,खादनीयानि • अग्निना काष्ठानि धक्ष्यते-अग्निना दाह्यानि,दग्धव्यानि, दहनीयानि अष्टादश पाठ। भाववाच्य भाववाच्य देवेन फलिप्यते-देवेन फल्यं, फलितव्यं,फलनीयं । संपदा एघिष्यते-संपदा एव्यं, एघितव्यं, पथनीयं । छात्रैः वत्स्यते-छात्रै वास्य, वस्तव्यं, वसनीयं । साहित्य परिचय अथ नगरं प्रविष्टः सोऽजितसेननामा' राजकुमार पलायमान (भागतेहुये ) लोकं विलोकते स्म। तत उपजातकौतुकः सन् एकं पुमांसमुपसृत्य (पास जाकर) पलायन (भागनेका) हेतुं पृष्टवान् । स राजपुत्रपृच्छया (प्रश्नेन ) निर्विष्णमनाः (उदासी- नचित्तः) सन् गदितवान् “किं त्वमेतद प्रसिद्धमपि उदंत (वृत्तां- तं),न जानासि। अयमरिंजयामिधानेन (नामसे) प्रथितो धन- धान्यान्यजनाकुलो देशो धर्तते । यत्रस्था धरित्री (जमीन) सदा नवसस्यांकुरैहरिद्वा शोमते । तदमध्यवर्ति विपुलामियां दधानं पुरं, यदुञ्चसौधश्टंगैर्विलखदाकाशं खचराधिधासतुल्यं गजते । तत् नगरं जयवर्मनामधेयः पृथ्वीपतिः शास्ति। तदुनृपदुहिता सर्वज- गल्ललामभूता शशिप्रभारया वर्तते । तां महेंद्रनामा कश्चित् क्षितीशो याचितवान् । परं तां प्रदातुं स जयवा निमित्तिना (ज्योतिथी) निषिद्धः । अतो निराकृतमार्थनो महेद्रवमा समस्तराजलोकैः सह संभूय, जयवर्मसेनां निहत्य पुरमावृत्य वितिष्ठते तद् स्वविनाशमी- क्षमाणः सकलो राष्ट्झन इतस्ततो धापति, इति ।

सनातननग्रंथमालायां- . - हिंदी इसके बाद नगर में जाकर उस अजितसेन नासक कुमार ने भागतेहुये लोगों को देखा इसलिये क तुकसहित हो एक आदमी के पास जाकर भागनेका कारण पूछा। उस आदमीने राजपुत्रके प्रश्नसे उदासीनमन होकर कहा कि-"क्या तुम इस प्रसिद्ध वृत्तां- तको भा नहीं जानते। यह अरिंजय नामसे प्रसिद्ध धन धान्यवाले जनोंसे व्याप्त देश है । यहां की भूमि सर्वदा नवीन नवीन धान्यों के अंकुरोंसे हरेवर्णकीसी शोभित होती है । इसदेशके मध्यमें "विपल" नामको धारण करनेवाला नगर है जोकि ऊंचे २ मकानोंके शिखरों से आकाशको घर्षण करनेवाले विद्याधरोंके निवासस्थानके समान शोभित जानपड़ता है। इस नगरको जयवी नामक राजा पालता है। उस राजाकी लडकी संपर्ण जगत्की भूषणस्वरूप शशिप्रभा नामकी है। उस लडकीको महेंद्रनामक दूसरे राजाने मांगा लेकिन उस लड़की को देनेके लिये जयवमीको ज्योतिषीने रोकदिया। प्रार्थना अस्वीकार होनेसे महेंद्रवी संपूर्ण राजाओं के साथ जयवमीकी सेनाको मारकर नगरको धेर बैठा है। इसलिये अपने नाशको देखते हुये संपर्ण देशवासी इधर उधर भागते हैं। सस्कृत धनामओ- मणिवतदेशवी एक दारा नामक नगर है क्षत्रियवंशी मणिमाली नामक राजा उस नगरकी रक्षा करता था। उसके (तदीय) मणि- शेखर नामक पुत्र था। वह राजा इंद्रिय सुखोंको अतिभोगताथा। किसी समय उसने अपने शिरमें (स्वशिरस्थ) श्वेत थालको देखा। उसको देखकर अपना मृत्युसमय निकट जाना। इसलिये राज्यभार पत्रको देकर (पत्रनिक्षिप्तराज्यभारः) वह वनको चलागया और वहां गुणसागर मुनिके समीप दीक्षाली तथा जैनसिद्धांत पढा। अंतमें जव कि उन तपस्वी होगया तव एकाकी विहार करनेलगा (विहरति स्म) राजन् ! इस तरह विहार करते २ (विहरन्) वह उजयिनी पहुंचा संस्कृतप्रवेशिनी। और वहां मशानभूमिस्थ होकर (सन् ) ध्यान करने लगा। उस समय रात थी इसलिये एक मंत्रवादी-जातिका (जात्या) कोली (कौलिक) वैताली विद्याको सिद्ध करनेके लिये (साधयितुं ) वहां आया। और उसके (तदीय) शरीरको मृत समझा इसलिये उसपर उसने (तत्र) अग्नि जलाई। हिंदी वनामो- श्मशानभूमिमागत्य जिनदत्तादयः श्रावका मां भक्त्या प्रणत- वंतः । मदीयां दुरवस्थां विलोक्य परमदुःखिताः संजाताः । केन दुप्टेन महानुपसर्गोऽयं रचित इति ध्यन् (शोधकरता हुआ) जिनदत्तो मामुत्थाप्य (उठाकर ) स्वगृहमानीतवान् । एवं तदा एव कंचित् वैद्यमाहूय (बुलाकर ) मदीयां व्याधि दूरीकर्तुमौष- धि याचितवान् । वैधन कथितं-भोः जिनदत्त! रोगोऽयमसाध्यो- ऽतो लाक्षामलतैलं विना पतदीयं (इसका) दूरीभवन-(दूर- होना) मशक्यं । तद तैलमानेतुं यतस्व । अत्र एव सोमशर्मनामा ब्राह्मणो निवसति । तदीयं गृहं गत्वा तत् तैलमानय" इति । अथ- तद् गृहं गतो जिनदत्तस्तत्र तुकारीनामधेयां प्राझणमार्यो दृष्टवान् । एवं तां भगिनी( वहिन ) शवदेन संबोध्य (बुलाकर) तैलंच याचि- तवान् । तयोक्त श्रेष्ठिन् । निर्भया सन् मदूगृहं प्रविश तैलंच गृहाण (लेलेओ) जिनदसस्तत्र गत्वा घटमेकं गृहीत्वा चलित यदा प्रारब्धवान् तदा एव स घटः पतति स्म तथा तत्रस्थं सर्व तैलंच विकीर्ण। शुद्ध करो- १ शीतं रविर्भवतः शीतरुचिः प्रतापी, स्तन्धो नभो जलनिधी सरिदम्वुतृप्तः। स्थायी मरु विदहनं दहनोपि जातु (कदाचित् ) लोभानलस्तु न कदाचिद (अ) वाहकं स्यात् ।

सनातनजैन ग्रंथमालायां- इति श्रुत्य तेन गदितवान् । भोः पडितः त्वं सत्यं उक्त एवमेव पूर्वैः शास्त्रज्ञैः अपि उपदिष्टवंतः। २ ब्रह्मारण्यस्थ कर्पूरतिलको नाम हस्तीः वर्तते । तं अय- लोक्त्वा सर्वैः शृगालैः चिंततः। यदि अयं केन अपि उपायेन मृत्यु गच्छति तदा अस्माकं [हमारा] एतद् देहेन मासचतुष्टयपर्यंत भोजनं भोप्यति। तत्र एकेम शृगालेन प्रतिक्षातवान् अहं बुद्धिप्रभा- वेण अयं मारणीयः। अनंतरं स वंचकः कर्पू रतिलकसमीपं गत्य साष्टांगपातं प्रणत्या गदितः । देव! रष्टिप्रसादं कुरु । हस्ती गदितः। का त्वं ? कुतः समायातः ? स उक्तं जंबुकोऽहं सर्वे वनवासिमिः मिलित्य भवत्सकाशं प्रस्थापितवान् यदू विना राक्षेण अवस्थातुं, न युक्त। तद् अत्र धनराज्यं कर्तुं भवाम् सर्वस्वामिगुणोपेतः निरुपितवान् तद् यथा लग्नसमयो न विचलतः तथा कृत्वा शीघ्र आगम्यतां देवेन । इति निगदित्वा उत्थित्वा च चलितवान् । ततो- ऽसौ राज्यलोमाकृष्णः कपूरतिलकः शृगालमार्गेण धावन्तः महा- पंकनिमग्नौ जाते ततः तेन हस्तिया उक। मित्रः शृगाल! किम् अधुना विधेयं पंकमग्नवान् अहं प्राणा त्यजति । परावृत्वा पश्य । शृगालो गदितः। देव! मदीयपुच्छकावलंबनं कृत्य उत्तिष्ठ । यद मदीयं वचनं विश्वस्तं तद अनुभूयेतां अशरणः दुःखं । चतुर्थी विभक्ति। प्रथम पाठ। १ श्रावका छात्राय पुस्तक वितरति-श्रावक विद्यार्थीके लिये पुस्तक देता है। १४-कता-कर्मके द्वारा जिसको प्राप्त करे उसे संप्रदान कहते हैं। जिसकी संप्रदान सज्ञा होती है उस शब्दसे चतुर्थी विभक्ती छानेका नियम है। जैसे धावक छात्राय मादि वाक्यमें की श्रावक है वह कर्म जो पुस्तक है उसके- द्वारा छात्रको प्राप्त करता है इसलिये छात्र शब्दसे चौथी विभक्षी हुई। अथवा- जिसके लिये कोई चीज दो और उसे फिर वापिस न लो' तो जिसके लिये वह चीज दी गई है उससे चतुर्थी विभकी लायी जायगी।

संस्कृतमवेशिनी वातन्यं मपति विदुपा संयताय अनशुद्धं--विद्वानको संयमीके लिये शुरु अन्न देना चाहिये। नमः श्रीवर्धमानाय--श्रीवर्दमान भगवान के लिये नमस्कार है। मुनये चतुर्विधं दान देय-मुनिको चार तरहका दानठेना चाहिये । बंधवे मोदको रोचते-बंधुको लाइ अच्छा लगता है। गुरवे किं न प्रदेयं---गुरुको क्या देने योग्य नहीं है। वाने कोऽपि न कध्यति-दाताके लिये कोई भी क्रोध नहीं करता है। पित्रे नमः-पिताको नमस्कार है। [सुखकारी है। अयं प्रस्तावः बालकाभ्यां सुखकर:-यह प्रस्ताव दो घालकोंके लिये सश्वाभ्यां घास: आइत:--दो घोडोंके लिये पास लाई गई है। फलानि कपिभ्या सुखानि-फल दो बंदरोके लिये सुखकर हैं। दुग्धं अहिभ्या हितं-दूध दो सापोंको हितकर है । शिशुभ्यो फले आनीते-दो लडकोंको दो फल लाये गये है। बंधुभ्या चिरजीवितं भवतु-दो भाई चिरायु हो । पितृभ्या नमः-माता पिताको नमस्कार है। दातृभ्या आशिषः प्रदत्तास्तै-उनने दो दाताओंको आशीर्वादे दी। १५-नमा, स्वस्ति, साहा, वषड्, खधा, हित और "अलं" के पर्याय वाची शब्द जिसकेलिये प्रयोगमे लाये जाय उस शब्दसे चौथी विभकी होती है। १६- रुचि [अच्छा लगना ] अर्थ वाली धातुओका प्रयोग करने पर जो प्रीयमाण [जिसे अच्छी लगे ] होगा उससे चौथी विभक्ती लायी जायगी जैसे ऊपरके वाक्य में लाइ बंधुको अच्छा लगता है तो वधु शब्दसे चौथी विभकी होती है। १७- क्रोध, द्रोह, ईया, असूया अर्थ वाली धातुओंके योगमें जिसके प्रति क्रोधादिक किये जाय उससे चौथी विभकी होती है। १८-जहा "के लिये" एसा अर्थ मालूम पडे उस जगह जिस शब्द से "के लिये" का संबंध हो उससे चौथी विभक्ती होती है। १९-कल्याण, और आयु अर्थवाले शब्दोंके गोगमें यदि आपीर्वाद हो तो जिसके लिये आशीर्वाद दिया गया है उस वायसे चौथी विभकी होती है।

सनातननग्रंथमालायां- ३ वालकेभ्य मिष्टानं स्वदवे बालकोंको मिठाई अच्छी लगती है। मुनींद्रेभ्यो नमो नमः-मुनींद्रोंके लिये वार वार नमस्कार है। मुनिभ्यः दान देयं-मुनियोंको दान देना चाहिये। कपिभ्या दुःख न विधेयं-बंदरोंको दुख न करना चाहिये। गुरुभ्यः सर्वदा नमः-गुरुओंको हमेशा नमस्कार है। साधुभ्यः कल्याणं भवतु-साधुओंका कल्याण हो । उपकर्तृभ्य क्षेमं भवतु-उपकारियोंका कल्याण हो । सस्कृत बनामो- पात्रके लिये धन देना योग्य है। मनियोंको जो भोजन देते है वे पुण्यभाग होते हैं। दुखी लोग सुख चाहते हैं (स्पृहयंति) एक सेठने विद्यार्थियोंको पस्तके घांटी। वह मल्ल उस मल्लके लिये काफी है (अलं)। लडकोंको कटु चीज अच्छी नहीं लगती। जीवंधरने साधुओंके लिये धर्मको उपदेशा । भन्यलोगोंका चिर- जीवन हो। रथके लिये लकडी लाओ। द्वितीय पाठ। व्यंजनांत पुंलिंगशब्द नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- जलमुचे जलमग्भ्यां जलमुग्भ्यः। परिवाजे परिवाभ्यां परिवाइभ्यः। सम्राजे सम्राभ्यां सम्राइभ्यास पापकते पापकृद्धां पापकद्भ्यः। बुद्धिमते बुद्धिमभ्यां बुद्धिमद्भ्यः। बलवते बलवद्भ्यां बलवद्भ्यः। गायद्भ्यां गायदभ्यः। सुहवे सुहद्भ्यां । लाभ्यः। गायते म भ्यः। , संस्कृतप्रवेशिनी। ६१ राहे राजभ्या राजभ्यः। मूने मुद्ध भ्यां दुरात्मने दुरात्मभ्यां दुरात्मभ्यः। स्वामिने स्वामिभ्यां स्वामिभ्यः। मंत्रिणे मंत्रिभ्यां मंत्रिभ्यः। चंद्रमसे चंद्रमोभ्यां चंद्रमोभ्यः। विदुषे विद्वद्भ्यां विद्वभ्यः। जग्मुपे जग्मिवदुभ्यां जग्मिवदभ्यः। ज्यायसे ज्यायोभ्यां ज्यायोभ्यः। सर्वादि सर्वस्मै सर्वाभ्यां सर्वेभ्यः। तस्मै ताभ्यां तेभ्यः। यस्मै याभ्यां येभ्यः। काभ्यां केभ्यः। अस्मै आभ्यां एभ्यः। अमुष्मै अमूभ्यां अमीभ्यः। मा आवाभ्या अस्मभ्यं। युवाभ्यां युष्मभ्यं । संस्कृत बनामो- उन महात्मा लोगोंको नमस्कार है। विद्वानोंके लिये कल्याण हो। स्वामीके लिये सेवक प्राणोंको भी देदेता है। छोटे भाइयों- के लिये बडे भाई शुभकामनायोंको करते हैं। सबके लिये सुख चाहो। राजा मंत्रियों पर क्रोध करता है। मित्र [सुहृदू] के लिये दो किताबें दो। पाप करनेवालेको धर्मका उपदेश दो। तपस्वियोंके लिये चतुर्विधदान देना योग्य है। मुझे विद्वानोंकी संगति [विद्वत्संगति] अच्छी लगती है। तुम्हारा कल्याण हो। सर्वस्मै .

१२ सनातनजैनग्रंथमालायां- कन्याभ्यः। तृतीय पाठ। स्त्रीलिंग कन्याय कन्याभ्यां वालायै बालाभ्यां मत्यै मतिभ्यां ऊम्य कर्मिभ्यां नये नदीभ्यां तस्थुथै तस्थुषीभ्यां रेण्वै रेणुभ्यां धेनुभ्यां बध्ये वधूभ्यां चम्वै चमूभ्यां मात्र मातृभ्यां दुहिने दुहितृभ्यां ऋचे ऋग्भ्यां त्वचे त्वग्भ्यां विपदे विपद्भ्यां परिषदे परिषद्भ्यां वीरुधे वीरुभ्यां क्षुधे योषिते योषिभ्यां सरिते सरिभ्यां सर्वस्यै सर्वाभ्यां अपरस्यै, अपराय अपराभ्यां अग्यस्यै अन्याभ्यां ताभ्यां वालाभ्यः। मतिभ्यः। ऊर्मियः। नदीभ्यः। तस्थुषोभ्यः। रेणुभ्यः। धेनुभ्यः। बधूभ्यः। चमूभ्यः। मातृभ्यः। दुहितम्यः। ऋग्भ्यः। त्वग्भ्यः। विपदभ्यः। परिषद्भ्यः। वीवदभ्यः। क्षुदूभ्यः। योषिभ्यः। सरिभ्यः। सर्वाभ्यः। अपराया। क्षुद्श्यां अन्याभ्यः ताम्मः।

. १ संस्कृतप्रवेशिनी। ६३ यत्यै याभ्यां याम्पः। कस्यै काम्या अस्यै आभ्यां आभ्यः अमुष्यै अमूभ्यां अमूभ्यः सस्कृत वनायो- १। जिन (यदीय) नारियोंकी संतानसे यह पृथ्वी सफल है उनको मैं चाहती हूं (स्पृहयामि) २। मुझे संतुष्ट करनेके लिये (परितर्पयितुं ) शाति मित्रादि कोई भी समर्थ नहीं हैं। ३। एक समय राजा मित्रों के साथ वन देखने वनदर्शन] गया। ४। पापको नष्ट करनेके लिये [पापनाश] बहुत दूर जाकरके भी मुनि दर्शन करना चाहिये। ५। इस लडकीके लिये वर ढूंढना चाहिये [अन्वेष्य] ६। सभाके लिये योग्य योग्य सभासद ढूंढने चाहिये। ७। गायको भूसा [स] अच्छा लगता है ८ माताके लिये हमेशा नमस्कार है। इसके सिवाय [विहाय] उसके लिये हम क्या कर सके हैं ? जो उपकारके लिये काफी हो [अलं] चतुर्थ पाठ। नपुंसकलिंग कुसुमाय कुसुमाश्यां कुसुमेभ्यः दानाय दानाम्या दानेभ्यः।। वारिणे वारियां धारिभ्य। मधुने मधुभ्यां मधुम्या। सानुने सानुभ्यां सानुभ्यः। .

६४ सनातनजैनग्रंथमालायां- श्रीमते श्रीमद्भ्यां श्रीमद्भ्यः । गुणवते गुणवभ्यां गुणवझ्या शर्मणे शर्मभ्यां शर्मभ्यः। कर्मणे कर्मभ्यां कर्मभ्यः। पयसे पयोभ्यां पयोभ्यः। चेतसे चेतोभ्यां चेतोभ्यः। ज्योतिष ज्योतिभ्यां ज्योतिर्म्यः। हविषे हवियों हविर्यः। घनुषे धनुया धनुर्म्यः। सर्वस्मै सर्वाभ्यां सर्वेश्यः। तस्मै ताभ्यां तेभ्यः। अमुष्मै अमूभ्यां अमीभ्यः। अस्मै आम्घां एभ्यः। चतुर्थी विभक्तीका व्यवहार शातारं (विश्वतत्त्वानां) वंदे तदू- समस्ततत्त्वोके] ज्ञाताको उसके गुणकी गुणलब्धये। प्राप्तिके लिये मैं नमस्कार करता हूं श्रयामि तानमलपदाप्तये यतीन-उन यतियोंको निर्मलपदकी प्राप्तिकेलिये ते गुरवो विमुक्तये भवंतु-वे गुरु मुक्तिके लिये हों। [आश्रयण करता है। स राजा राज्यस्थित्यै दंड्यान दं- वह राजा राज्यकी स्थितिके लिये अप- डितवान् । राधियोंको दंड देता था। ते प्रसूतये नारीखते स्म-वे संतानके लिये स्त्रियोंको विधाहते थे । सायालाभवता विदेशकाय वितीणा-वह लटकी आपने विदेशीके लिये दी है इति दूतमसो विसृज्य राजाऽजि- इसतरह दूतको विदाकरके राजाने अ- तसेनाय कार्य कथितवान् । जितसेनके लिये कार्य कहा। राजा प्रजायै राज्यमारमायह- राजाने प्रमाके लिये राज्यभारको धारण किया। ति स्म।

लिये हुआ। संस्कृतप्रवेशिनी। ६५ मिपतिः पल्यैतत्कथयन् अति- राजाने पत्नीके लिये वह वात कहते हुये क्रांतमपि मार्ग नशातवान् । वीता हुआ मार्ग भी न जाना। टिमात्रोऽपि गिरिगरीयान् प्र- वह देखागया ही महान् पर्वत हर्षके मोदाय भवति स्म। भार्याय तस्मै राज्ञे सर्वाः प्रजा पत्नीसहित उस राजाकी सब प्रजाने अर्हणां कृतवत्यः। पूजाकी। [ देते हैं। शेद्धार शस्त्रेभ्यः तोयं रांति योद्धा लोग शस्त्रोंपर जल चढाते हैं धर्मार्थकामसेवकाय राज्ञ श्लोधते धर्म अर्थ कामको सेवनेवाले राजाकी लोका। लोग प्रशंसा करते हैं। महा धर्मः स्वदते मुझे धर्म अच्छा लगता है। निर्धना धनाढ्याय शतानि साय- निर्धन लोग धनाढयों के सैकड़ों रुपये काणि धारयति । धारते हैं [कर्जा करते हैं। 'यत्रस्था जना:-अर्थ धर्माय सेवंते जहाके लोग-धनको धर्मके लिये, कामं संतानवृद्धये। कामको संतानवृद्धि के लिये सेवते हैं। मया छात्राय पुस्तकं प्रतिश्रुतं । मैंने विद्यार्थीकेलिये एक पुस्तककी प्रतिज्ञाकी । पापिनो धार्मिकाय द्रोति-पापी लोग धर्मात्माका द्रोह करते हैं। संयमाय श्रुतं धत्ते पमान धर्माय मनुष्य संयमके लिये शास्त्र और धर्मके संयम लिये संयमको धारण करता है। धर्म मोक्षाय मेधावीधनंदानाय” बुद्धिमान् आदमी धर्मको मोक्षके लिये धन- मक्तये। को दान और भक्तिके लिये धारण करते हैं इदं मंगलाचरणं विघ्नध्वंसाय अलं-यह मंगलाचरण विघ्नध्वंसके लिये काफी है "तुष्ट्या ददत् स्वसुतजन्म निवेद- अपने पुत्रके जन्मको कहनेवालोंकेलिये यद्भ्यो देयं न देयमित्यथवा क्षि- संतोपले दान देता हुआ राजा देय तीश नो योधति स्म। और अदेयको नहीं समझता हुमा । ९-लाथ, न्हुइ, स्था, शप धातुके योगमें जिसके श्लाघादिक किये जाते हैं उससे चौथी विमती होती है।

सनातननग्रंथमालायां- नामश्रोशब्दानुगतंकृत मंगलाय-मंगलके लिये श्रीशब्दसे सहित नाम रक्खा इति [त्या] आशास्य तं [मा] इस तरह आशीर्वाद और धैर्य देकर माश्वास्य कच्नं स तपसे गतः। कष्टपूर्वक वह तपके लिये वनको गया। ते विद्याभ्यासाय वाराणसीमागता:- वे विद्या पढने काशी आये। संस्कृत वनाओ- १। कुमार ! हमें आपके [ भवदीय ] वचन अतिप्रिय लगते हैं। कृपाकर हम ठंडे ही फल दीजिये। २। श्रेणिकने चेलनाके लिये महादेवी पद प्रदान किया। ३। महाराज पुत्रके लिये युवराजपद देकर संसारसुखको भोगते हुवे ४। वह पुत्रके लिये मुनिसे प्रार्थना करता है। ५। वे दोनों धनके लिये परस्परमें । परस्परं ] कलह करते थे। ६। उन स्त्रियोंने राजसभामै जाकर राजासे निवेदन किया । ७। अभयकुमारने उन स्त्रियोंको लानेके लिये नौकरसे कहा। ८. माता पुत्रके लिये दुख कभी नहीं चाहती। पर पुत्र माताके लिये कभी २ दुःख पहुचाता है [ यच्छति ।] ९। कुमारने सब लोगोंसे यह बात कहकर वसुमित्राको पुत्र दिया। १०। यदि आप मोक्षके लिये ही तप करते हैं तो वृद्धावस्था पाकर [प्राप्य ] करना,, ऐसा उस दुश्चरित्राने मुनिसे कहा। पंचेंमीविभक्ती। प्रथम पाठ। खरांत शब्द १ भृत्यः अश्वात् पतति-सेवक घोडेसे गिरता है। अहं सार्थात् अवहीनः-मैं सगसे छूट गया । १२०-जिस पदार्थ से साक्षात् या बुद्धि द्वारा किसी पदार्थका वियोग मालूम पडे तो उस पदार्थ के अर्थको कहनेवाले शब्दसे पाचवीं विभक्ती होती है। जैसे- संस्कृतप्रवेशिनी। देवत्तो जिनदत्ताद् आगतः-देवदत्त जिनदत्तके पाससे आया। शरःशंगाद् जायते वाण शींगसे उत्पन्न होता है । अंकुरो वीजाद् अवरोहति-अकुर वीजसे उगता है। नद्यः अद्रेः उत्पतंति-नदिया पहाडसे गिरती हैं। अहेः बालो यिमेति-सांपसे बालक डरता है। पिता गुरोः नाभ्यः-पिता गुरुसे मिन्न नहीं है। दस्यो धनं रक्षति-चोरसे धनकी रक्षा करता है। गृहीतुः दाता श्रेष्ठ:--लेनेवासे देनेवाला अच्छा है। हंतुः निर्वलो विभेति-मारनेवालेसे निर्वल डरता है। २ वृक्षाभ्या फलानि पतंति-दो पेडोंसे फल गिरते हैं। आसनाभ्या उत्तिष्ठते छात्रौ-दो आसनोसे दो विद्यार्थी उठते हैं। शिशुः व्याघ्राभ्या रक्षितः-दो थाघोंसे लडकेकी रक्षाकी । छात्रैरियं विद्या मुनिभ्या शिक्षिता-विद्यार्थियोंने यह विद्या दो मुनियोंसे सीखी गुरुभ्या के श्लाघ्यतरा:-दो गुरुओंसे अधिक कौन प्रशंसनीय है। अहं पितृभ्या सदाचारंलब्धवान्-मैने माता और पितासे सदाचार पाया। ३ अलसाश्छात्रा उपाध्यायेभ्य अंतर्दधते-आलसी विद्यार्थी उपाध्यायोंस छिपते हैं। माथुराः पाटलिपुत्रकेभ्यः आक्ष्यतरा:-मथुरावासी लोग पटनावासि- योसे अधिक धनाढय हैं। जना जिनरथोत्सवं प्रासादेभ्यः पश्यति लोग जिनरथोत्सवको मका- नॉसे देखते हैं। 'अश्वात् मृत्य पतित' इस उदाहरणमें घोडेसे नौकर वियुक्त साक्षात् मालूम होता है तो घोडेके अर्थवाले अश्व शब्दसे पाचवीं विभकी आती है इसीप्रकार पापसे डरता है इस उदाहरणमें 'पापसे दुख होता है एसा विचार कर मनुष्य बुद्धिसे उसके पास जाता है फिर उसको भयका कारण जान लौट आता है तो पाप शब्दसे पाचवी विभक्ती होगी यहां बुद्धि द्वारा वियोग मालूम होता है । संक्षेपमें- जहा हिंदीमें से लगता है वहा संस्कृतमें पाचवी विभकी होती है।

६८ सनातनजैनग्रंथमालायां- गीतानि प्रथिकेभ्यः शृणोति राजा-राजा गीतोको नटोसे सुनता है । कृषीवला यवेभ्यो पशून् वारयति-किसान जौके खेतोंसे पशुओंको- अहिभ्य सर्वदा भयं कार्य-सापोंसे सर्वदा भय करना चाहिये [रोकता है। मुनिभ्यः उपदेशः श्रोतव्यः-मुनियोंसे उपदेश सुनना चाहिये । गुरुभ्य विनयपूर्वकं विद्या पठनीया-गुरुओंसे विनयपूर्वक विद्या पढनी- दस्युभ्यः द्रव्यं रक्षणीयं-चोरोंसे द्रव्यकी रक्षा करनी चाहिये [चाहिये । हंतृभ्यो दूरीभवनमेव श्रेया-हताओंसे दूर होनाही अच्छा है। दातृभ्यो धनानि यांचति मिक्षुकाः-दाताओंसे भिखारी धन मागते हैं। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- विभावसो:, अंशुभ्यः, गिरेः, मुने, शिशुभ्यः, अधर्मात्, कले, प्रामाभ्यां, शिक्षयितुः, अध्ययनात्, भोजनात, शत्रुभ्यः, नेतृभ्यः, वक्तृभ्यां, श्रोतुः। संस्कृत वनामओ- १ हमेशा पापसे दुःख होता है इसलिये इसको छोडो। २ जो धैर्ममें प्रमाद करता है वह अपनी हानि चाहता है। ३ गांवसे बाहिर चांडालों के घर होते है। ४ पर्वत समुद्रले एक योजन है। वहां [ तत्र ] बहुत बंदर हैं । ५ द्वारपाल से यह वृत्तांत सुन कर राजा सिंहासन से उठा। ६ पूर्वजन्मकृतपुण्यसे जीव सुखी होते हैं। ७ अन्य से क्या यह जीव शरीरसे भी वियुक्त होजाता हैं, एसा विचारकर राजा संग्रामसे विरत हुआ। २१-प्रमाद, निंदा, विराम और भय अर्थवाली धातुओंके योगमें जिससे प्रमाद आदि किये जाय उससे पाचवी विभक्ती होती है। जैसे "धर्ममें प्रमाद करता है" इस वाक्यमें प्रमाद धर्मसे किया गया है तो धर्म शब्दसे पाचवी विभकी होगी।

संस्कृतप्रवेशिनी। ८ मुनि लोग गृहस्थोंके पाससे पूजाके योग्य हैं। धानीको आया ९ सुधर्माचार्यसे धर्मोपदेश सुनकर श्रेणिक समवशरणसे राज- १० जिसतरह मियान [कोप] से तलवार मिन्न है उसीतरह [तथा एव ] शरीरसे आत्मा अलग है। हिंदी वनाओ- १ मित्र विरम त्वं निष्फलात् आरभात् । २ तदीयसंगात् [द] अखिलोऽपि [ही] भीरुरन्यो जनः शूरतरो बभूव [हुआ]. ३ अन्योन्यकृताद स्पधादू इव गुणा वृद्धि गच्छंति स्म । ४पितु [पिताकी ] निदेशाद् [६] अथ सुदरांगी स राजकन्यां विधिना नो] उपयेमे। [न युक्तः। ५ दुष्कर्मक्षयात् कथंचित् मानुषजन्म लब्ध्वा स्वहिताय प्रमादो ६ यावत् इमानि इंद्रियाणि प्रबलानि तावद् एव दुःखितं आत्मानं प्रयत्नात् भवात् यूयं मोचयितुं यतध्वं । ७ इति क्षितीशः सह शिक्षयाऽसौ विश्राणयामास [वितीर्णवान् ] सुताय लक्ष्मी । सोऽपि प्रतीयेष [स्वीकरोतिस्म गुरूपरोधात् (गुरुके आग्रहसे)। ८ न काचिद् दी] ईहा कृतकृत्यभावात् न च क्वचित् प्रेम शमत्व- योगात् [शांतिगुणसंयोगात् ] इयं हि कल्याणकरी प्रवृत्ति - गद् हिताय यैव एव भिवादृशानां] । ९ नराधिप! त्वां प्रियविप्रयुक्तं प्रियरहितं विलोक्य दिव्येन सुलो- चनेन । गुणानुरागाद दि] अहमागतोऽस्मि [आया हूं]! द्वितीय पाठ। व्यंजनांत-पुंलिंग १ जलमुचः वारि पतति-मेघसे पानी गिरता है।

७०
सनातनजैनग्रंथमालायां-
परिवाज उपदेशः श्रोतव्यः-संन्यासीसे उपदेश सुनना चाहिये।
सम्राज शत्रव पलायंते-चक्रवतीसे वैरी भागते हैं।
पापकृत भयमुचित-पापीसे डरना योग्य है।
बुद्धिमत शास्त्रमध्येयं बुद्धिमानसे शास्त्र पढना चाहिये।
चलवत निर्वलो विमेति-चलवानसे निवल डरता है।
गायत गीतं श्रुतवान् राजा-राजाने गानेवालेसे गीत सुना ।
सुटूद अन्य स्वं न दृष्टव्यं-मित्रमे मिन्न अपनेको न समझना चाहिये ।
राज्ञ इतरः कोऽन्यः प्रजा रक्षति-राजाके सिवाय और कोन प्रजाकी
मूर्ध्न शिरस्त्राणं पतित-शिरसे टोपी गिरगई।
[ रक्षा करता है।
अम्मन वहिर्वहिर्गत:-पत्थरसे अग्नि निकल आई।
स्वामिन अधिको धार्मिको भृत्यः-स्वामीसे नोकर अधिक धार्मिक है ।
चद्रमस ज्योत्स्नाः निस्सरति-चद्रमासे चादनी निकलती है।
विदुप मूर्खः पराजयते-विद्वान्से मूर्स हार जाता है।
ज्यायस मेतव्यं चडेसे डरना चाहिये।
नोट-व्यंजनांत शब्दोंके पंचमी विभक्तीके द्विवचन और
वहु-
वचनके रूप चतुर्थी विभक्तीके रूपोंके समान होते हैं इसलिये यहां
दुवारा नहीं लिखे गये हैं।
संस्कृत बनाओ।
१। राजासे बढकर कोई उपकारी नहीं है इसलिये उसके साथ
विरोध न करना चाहिये।
[निकली है।
२। हिमयान् । हिमवत् ] से गंगा और महाहिमवान्से रोहित् नदी
३। गजन् ! मन तेरा ( त्वदीय) वृत्तांत सुधर्मनामा मुनींद्रसे
४। दयाने मनुष्य बर मांगते हैं।
[मुना है।
५। विद्वानम भूर्य दुःखी है। छोटॉस मी विद्या पढनी चाहिय ।

संस्कृतप्रवेशिनी। तेभ्यः। येभ्यः। तृतीय पाठ। सर्वनाम सर्वस्मात् सर्वाभ्यां सर्वभ्यः। तस्मात् ताभ्यां यस्मात् थाभ्यां कस्मात् काभ्यां केभ्यः। अस्मात् आभ्यां अमुष्मात् असूभ्यां अमीभ्यः। मत् आवाभ्यां अस्मन् । त्वत् युवाभ्यां युष्मत् । ऊपर लिखे हुये शब्दोंसे वाक्य बनाओ। संस्कृत बनाओ। १ इस मोही [ मोहिन् ] मुनिसे तो [तु] धूती गृहस्थ अच्छा है। २ किसी शत्रुसे भयभीत हुआ मनुप्य राजाके समीप आया। ३ मुझसे वह गांव बहुत दूर है इसलिये मैं वहां नहा जा सका। ४ जो शास्त्रज्ञाता मुनि हों उनसे पढना योग्य है। ५ इस पेडसे गिरे हुये सव फल मीठे मधुर हैं। ६ तुम कहांसे आये हो ? मैं पटनासे आया हूं। ७ संमंतभद्र स्वामी भट्टाकलंकले पहिले हुये हैं। ८ आचार्य देवनंदिके बाद श्रीगुणनंदी हुये। ९ गंगा कहां से निकलती है और रोहित् कहां से। [कहा। १० माम? मुझसे मिन्न पद्मास्यको मत जानो पश्य] एसाजीवंधरने ११ जो शरीरमात्र से मिन्न होते हैं वे ही सांचे मित्र हैं। १२ दारिम्य से दूसरी चीज कोई अधिक दुःखदायक नहीं है। १३ तत्त्वज्ञानसे सर्वत्र सुख मिलता है। १४ शिथिल दो हाथों से पुस्तक गिरगई। १५ उदारचेताओं से भिन्न कौन दान दे सक्ता है?

७२ सनातनजैनग्रंथमालायां- कल्यायाः कन्याश्यः। बालायाः मत्याः, मतेः ऊाः ऊमः नद्या तस्थुष्याः रेवाः रेणोः धेन्वा घेनोः चतुर्थ पाठ। स्त्रीलिंग कन्याभ्यां वालाभ्यां मतिभ्यां ऊर्मिभ्यां नदीभ्यां तल्थुषीभ्यां रेणुभ्यां धेनुभ्यां वधूभ्यां चमूभ्यां मातृभ्यां दुहितृभ्यां ऋग्भ्यां त्वरयां विपद्भ्यां परिषद्भ्यां वीरुभ्यां बध्वाः बालाभ्यः। मतिभ्यः। ऊर्मिभ्यः। नदीभ्यः। तस्थुषीभ्यः। रेणुभ्यः। धेनुभ्यः। वधूभ्यः। चमूभ्यः। मातृभ्यः। दुहितृभ्यः। ऋग्भ्यः। त्वग्भ्यः। विपदभ्यः। परिषद्भ्यः। वीरुभ्यः। चम्बा: मातु: दुहितुः ऋचः त्वचः विपदः परिपद वीरुधः क्षुधः योषितः सरितः सर्वस्याः क्षुभ्यां क्षुद्भ्यः। योषिद्भ्यः। सरिभ्यः। सर्वाभ्यः। योषिदश्यां सरिद्भ्यां सर्वाभ्यां अपराभ्यां अन्याभ्यां ताम्यां अपरस्याः अपराभ्यः। अन्यस्या अन्याभ्यः। तस्याः ताभ्या।

संस्कृतमवेशिनी। अमूभ्यः। 1 यान्यो यास्यः॥ कस्था: काभ्यां काभ्यः। अस्याः आभ्यां आभ्यः अमुष्या अमूभ्यां १ । कामपीडितो जनः पराराध- कामसे पीडित मनुष्य दूसरे लोगोंकी नात् उत्पन्नाया दीनताया:, सेवा शुश्रषासे उत्पन्न हुई दीनतासे, पिशुनतायाः, परिवादात् चुगली खानेसे, निंदासे, और तिरस्का- पराभवात् अपि नाविभति। रसे भी नही हरता है। २। इति ईशवाक्यं शुश्रूषी महि- इस तरह पतिके वाक्यको धुनती हुई षी तन्मुखग्लाने र्छिता भ- पटरानी राजाके मुखकी मलिनतासे पति स्म। [को देखकर ] मूर्छित हो गई। ३। तदवाण्याः सर्वे सभ्याः त्रा- उसकी वाणीसे संपूर्णसमाके लोग संगच्छंति स्म। त्रासको प्राप्त हुये। ४। गुरुगोचयभ्य: प्रथयशुश्रषा- गुरुके लिये की गई विनय, सेवा और चतुरताभ्यः विद्याः स्मृता चतुराईसे विद्यायें याद सरीखी हो इव भवंति। जाती हैं। ५। विधायाः परं किं श्लाघ्य- विद्यासे दूसरी कौनसी वस्तु प्रशंस- भूतं वस्तु। नीय है। ६। तल्याः परिषदः शिक्षार्थि- उस सभासे विद्यार्थी लोग ज्ञान नो शानं लभते। ७। आक्रोशंवचाश्रुतेः काष्ठ- चिल्लानेके वचन सुननेसे काष्ठागार गारो रुष्टो जातः। हृद्ध हुआ। ८। अमुष्या कन्यायाः पराजिताः दस लडकीसे राजा लोग हार गये। पार्थिवा। ९। अस्याः महिन्याः चक्रवर्ती इस महारानीमे चक्रवर्ती पुत्र पैदा हुआ सुतो भूतः। पाते हैं। - ७४ सनातनजैनग्रंथमालायां- १० । गुणसंपदः परं किं लभ्यं । गुणरूपी संपत्तिसे दूसरी क्या चीज प्राप्त करने योग्य है। सस्कृत वनाओ- १ । गुरुवाणीसे अधिक कोई हित करने वाला नहीं है । २। मातासे किसने शान नहीं पाया क्योंकि [यस्मात् ] सब उससे उत्पन्न हुये हैं। ३। संपूर्ण सेनासे एक आदमी हारगया तो क्या आश्चर्य है। ४। गुरुभक्तिसे दूसरी कोई भी वस्तु कठिन नहीं है । ५। उपाध्यायीसे लडकियां छिपती है। पंचम पाठ। नपुंसकलिंग नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- पुप्पात् पुष्पाभ्यां वनात् वनाम्यां दानात् दानाभ्यां वारिणः वारिभ्यां मधुनः मधुग्यां सानुनः सानुभ्यां श्रीमतः श्रीमद्भ्यां गुणवतः गुणवदुभ्यां शर्मणः शर्मभ्यां फर्मणः कर्मश्यां पयसः पयोभ्यां चेतसः चेतोभ्यां ज्योतिषः ज्योतियों पुष्पेभ्यः। वनेभ्यः। दानेभ्यः। वारिभ्यः। मधुभ्यः। सानुभ्यः। श्रीमदभ्यः। गुणवश्यः। शर्मभ्यः। कर्मभ्यः। पयोभ्यः। चेतोभ्यः। ज्योतियः।

तेभ्यः। संस्कृतप्रवेशिनी। ७५ हविषः हावियाँ हविर्यः। धनुपः धनुयों धनुर्व्यः। सर्वस्मात् सर्वाश्यां सर्वेभ्यः। तस्मात् ताभ्यां अमुष्मात् अमश्यां अमीभ्यः। अस्मात् आभ्यां पश्यः। यस्मात् याभ्यां कस्मात् काभ्यां केन्यः। १। धनाद् वहिन गंतव्यं चनके घाहर न जाना चाहिये । २। आशैशवात् चपला सा-वह लडकपनसे चपल है । ३। सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रेभ्यः सम्यग्दर्शन ज्ञान और चारित्रके विना ऋते न मुकिर्भवति। मोक्ष नहीं होती है। ४। मधुभक्षणात् महती हिंसा भवति । मधुखानेसे वडी हिंसा होती है। ५। पयसा नवनीतं उत्पद्यते-दूधसे मक्खन पैदा होता है। ६। धनुपः शरं निर्गच्छति-धनुषसे वाण निकलता है। तप है। ७। किमतिदीनोद्धरणात् परं तपः-दीनोंके उद्धारसे अधिक बडा कौनसा ७। वाराणस्याः परं कालिकाता वर्तते-बनारसके बाद कलकत्ता है। ८। पतितं कुसुममपि दुभाग्य- गिरा हुआ फूल भी दुर्भाग्यके वशसे घशात वज्राद् अपि निष्ठरं अपि निष्ठर वज्रसे भी ज्यादा निष्ठुर हो जाता है। भवति। ९। पुण्यात वज्रोऽपि कुसुमं जायते । पुण्यसे वज्रमी फूल हो जाता है। १० । दारुणःअग्निः, अग्नेः उष्णता काठसे आग, आगसे गरमी पैदा उत्पद्यते। संस्कृत बनाओ- १। एक दत स्वामिवचनसे राजसभासें आकर कहने लगा। २। छलसे जो किसीको मारता है वह अवश्य ही पापी है। होती है।

७६ सनातनजैनग्नंथमालायां- ३। राजा चार (चतुर्भिः) उपायोंसे शत्रुको वश करते है (न- यंति ) उनमें (तत्र) दानसे धनहानि, दंडसे बलहानि, मे. दसे निंदा होती है इसलिये सामके सिवाय दूसरा कोई अच्छा उपाय नहीं हैं। ४। इसतरह मंत्रिमुल्योंसे सम्मति नकर राजाने कहा। ५। तृणसे हलकी (लघु ) रुई [तूल ] होती है और कईसे भी हलका याचक होता है। [ऊंगा (आनेष्यामि)। ६। मैं तुम्हारे लिये मुम्बई [ मोहमयी ] से बहुत सी कितावे ला. ७। मेरे [मदीय] वचनोंसे तुमने यह दुष्कर्म किया है इसलिये- ८1 मोहसे लोग अति दुष्कृत्य कर्म भी करते हैं। [मुझसे घर मांगो ९। तिरस्कृत होनेपरभी स्वामीले विरक्त न होओ। इने चाहिये। १०। तत्त्वज्ञान कठिन है इसलिये तत्त्वशसे प्रयत्नपूर्वक तत्त्व जान- ११ । दुर्जन स्वभावसे सजनोंकी निंदा करते हैं। १२। मैंने बड़े भारी वैयाकरणसे व्याकरण पढा है। १३ । जो लोग संसारसे डरते हैं उन्हें जिनधर्म सेवना चाहिये। १४। तुमसे उसने पढा? और तुमने किससे पढा। १५1 मकानोंसे गिरता हुआ जल अतिशोभता है। साहित्य परिचय। हिंदीम अनुवाद करो- गर्वण मातृपित्यांधवमित्रवर्गाः सर्वेभवंति विमुखा विहितेन पुरुषादी धर्दस्व, जीव, जय, नंद, विमो! चिरं त्वमित्यादि चाटुवचनानि विमापमाणः । दीनाननो (दीनमसः) मलिननिंदितरूपधारी लोमा- कुलो भवति ॥२॥ चौरं कुलं विशति लोमवशेन मयों नो धर्मकर्म विदधाति कदाचिए (द) अपाः॥३॥ तिठंतु वाह्यधनधान्यपुररसरार्थी सर्शिता:प्रचुरलोभवशेन पंसा (जनेन) कायोऽपि नश्यति निजोऽय- संस्कृतप्रवेशिनी। मिति प्रचिंत्य लोभारि (मु) उग्रं (मु) उपहुंति विरुद्धतत्त्वं ॥४॥ वरं हालाहलं पीतं सद्यः प्राणहर विर्ष । न पुनर्भक्षितं शश्वद् दुखदं मधु (देहिनां प्राणियोंको) ॥५॥ प्रमादेन (नापि) अपि यत् पीतं भवभ्रमणकारणं । तद् (द) अनाति (खादति) कथं विद्वान् मीतचित्तो भवात् मधु ॥६॥ योऽश्नाति मधु निस्त्रिंशः (राक्षसः) सजीवास्तेन मारिताः। चेद नास्ति खादकः कश्चिद् वधकः स्याद् (होगा) तथा कथं ॥७॥ दीनैर्मधुकरैर्वर्गः संचितं मधु कृच्छूतः । यः स्वीकरोति निस्त्रिंशः सोऽन्यत् त्यजति किं नरः ॥८॥ संसारमीरुमिः सद्भिर्जिनाशां परिपालितु । यावजीवं (जीवनभर ) परित्याज्यं सर्वथा मधु मानवैः ॥ ९ ॥ प्रवर्तते यतो दोषा हिसारंभभयादयः। सत्यमपि न वक्तव्यं तद् वचः सत्यशालिमिः ॥१०॥ इह दुःख नुपादिभ्यः परत्र (परलोकमें) नरकादितः निरकादेः । प्राप्नोति स्तेयत (चौर्यात् स्तेन स्तेयं त्याज्यं सदाबुधैः ॥१६॥ येऽपि (प्य) अहिंसादयो धास्तेऽपि नश्यति चौर्यतः। मत्वा (त्वे) इति न त्रिधा ग्राह्य परदन्यं विचक्षणैः ॥ १२ ॥ मातृस्वस्सुतातुल्या निरीक्ष्य परयोषितः। स्वकलत्रेण (नाया ) यस्तोपश्चतुर्थ तदणुव्रतं ॥ १३ ॥ किं सुख लमते मर्त्यः सेवमानः परस्त्रियं । केवलं कर्म बध्नाति श्वन (नरक) भूम्यादिकारणं ॥ १४ ॥ हिंसातो विरतिः सत्यं (म) अदत्तपरिवर्जन । स्वस्तीरतिः प्रमाणं [तृष्णा रोकना] च पंचधाऽणुव्रतं मतं ॥१५॥ चेतो निवारितं येन धावमानं मि] इतस्ततः।। किं न लब्धं सुख तेन संतोपामृतलामतः ॥ १६ ॥ निग्रंथं (परिमहशून्य) निर्मलं तन्य पूतं .(पवित्र) जैनेंद्रशासनं १७ . १ ७८ सनातनजैनग्रंथमालायां- मैथुनं त्रीसंग] भजते मयों न दिवा [दिनमें] यः कदाचन। दिवा मैथुननिर्मुकः स बुधैः परिकीर्तितः ॥ १८॥ संसारभयं मा] आपन्नो मैथुनं भजते न यः । सदा वैराग्यं मा] आकढो ब्रह्मचारी स भण्यते ॥ १९ ॥ सप्तधा पृथिवीमेदात् नारकोऽपि प्रसिद्यते । अधोलोकस्थिताः सप्त पृथिव्यः परिकीर्तिताः ॥ २० ॥ आद्या [प्रथमा] रत्नममा नाम द्वितीया शर्करामभा। सिकतादिप्रभान्या च परा पंकप्रभा मता ॥२१॥ धूमप्रभा ततो ज्ञेया परा तस्यास्तमम्प्रभा । महातमा प्रभा च [चे] इति तासां] नामानि (न्य) अनुक्रमं ॥ २२ ॥ रक्षायै प्रजया दत्तं पष्ठांश [छठवां भाग] वेतनोपमं नौकरीके समान] गृह्णन् भृतकवत् मूढो राजाहं [ मि ] इति मन्यते ॥ २३ ॥ भ्रातॄन् हंति पितॄन हंति बंधून् [न] अपि निरागसः [निरपराधिनः] हंति [त्या] आत्मानं म] अपि क्रोधात् धिक, क्रोधं मि] अविचारकः२४ भोगान् घिग धिग, धनंधिग, धिग धिग धिग, (गि) इद्रियजं सुखं धिग, घिग परोपघातेन (परहिंसया) यद, (द) अन्यदपि जायते।२५। न परं बंधनं प्रेम्णो न विष विषयात् परं । न कोपा द] अपरः शत्रुर्न दुःखं जन्मनः परं ॥ २६ ॥ विशुद्ध्यति दुराचारः सर्वोऽपि तपसा ध्रवं ॥ २७ ॥ अंगारसरशी नारी नवनीतसमा नरा। तत् (इसलिये) तत्लांनिध्यमात्रेण द्रवेत् (पुसां) हि मानसं ॥ २८ ॥ संलापवासहासादि तद् वयं (त्याज्यं ) पापमोरुणा। चालया, वृद्धया, मात्रा, दुहिना वा व्रतस्थया ॥ २९ ॥ भुकपूर्व (मि) इदं सर्व त्वयाऽऽत्मन भुज्यते ततः [(प्राणियोंकेजन्म) उन्छिएं (जूठा) त्यज्यतां राज्यं (म) अनंता हि (ह) असुभृद्भवाः पा (पवित्रतां) त्याग (दान) विवेक वैभवं मानितां म अपि संस्कृतप्रवेशिनी। कामार्ताः [कामपीडिता] खलु मुचंति किं [म]अन्यैः स्वं च जीवितं गुरुभको भवाद् भातो विनीतो धार्मिक सुधीः । शांतस्वांतो शांतचित्ता] हि [] अतंद्रालुः [परिश्रमी] शिष्टः शिष्योऽयं (मि) इष्यते । ३२। ऊपर लिखे हुये श्लोकोंमें वाच्यपरिवर्तन करो। सस्कृत बनाओ- मुनिश्रेष्ठ यशोधरने श्रेणिकसे कहा-नरनाथ ! तुमको विपरीत वात न विचारनी चाहिये। पापविनाशार्थ जो तुमने आत्महत्या विचारी है सो अयोग्य है आत्महत्यासे थोडाभी पाप नष्ट नहीं होता है । इसकर्मसे पुण्यके स्थानमें पाप ही होता है। मगधेश ! जो जीव अज्ञानवशसे तलवार विष आदि द्वारा आत्महत्या करते हैं कि हमारी (अस्मदीय) आत्मा कष्टोंसे मुक्त हो जायगी और सुख मिलेगा वे दुःख पाते हैं। आत्मघात से कदापि सुख नही मिलता। आत्मघातसे परिणाम संक्लेशमय होते हैं। संक्लेशमय परि- णामोंसे अशुभकर्मबंध होता है और अशुभबंधसे नरक आदि दुर्गतियां मिलती हैं। राजन् ! यदि तुम स्वहित चाहते हो तो इस अशुभ संकल्पको छोडो। अपनी आत्माकी निंदा करो। एवं इस पापकेलिये शास्त्र विहित प्रायश्चित्त आचरो। पापोंसे विनिर्मुक होनेका यही उपाय है। मुनिराजसे यह उपदेश सुनकर महाराज श्रेणिक आश्चर्यान्वित होगये वे महारानीकी तरफ देखकर बोले "सुंदर ! यह क्या वात है ? मुनिने मेरे मनोमिप्रायको कैसे जाना अहो! ये मुनि साधारण मुनि नही किंतु कोई महामुनि है" महाराजसे यह बात सुन कर चेलनाने कहा-नाथ ! हस्तरेखाके समान समस्त पदार्थोंके जाननेवाले ये मुनिराज है । प्राणनाथ ! भवदीयमनोवाती मुनिरा- ने स्वकीय परमपवित्र शानसे जानी है। आप आश्चर्य न करें। मनि- सनातननग्रंथमालायां- राज आपके पूर्वमवोंको भी कह सक्ते हैं । यदि पूछनेकी इच्छा हो तो पूछिये" चेलनासे इसतरह अपूर्वमहिमान्वित शानधारी मुनि को जान कर श्रेणिकने अपने [स्वकीय] पूर्वभव पूछे । प्रश्नमाला- आत्महत्यया किं भवति? श्रेणिकेन किं विचारितं? पापनिर्मुक्तये क उपायः ? मुनिज्ञानं कीदृशं ? चेलनया के प्रति किं मुक्तं ? श्रेणि- को कि श्रोतुमिच्छतिस्म। आत्महत्याफलं लिख्यतां । षष्ठी विभक्ती। प्रथम पाठ। स्वरांत पुलिंग १ वीरस्य चरणं सेवते लक्ष्मी-वीरके चरण लक्ष्मी सेवती है। जंबूद्वीपस्य मंडनं भरतक्षेत्रं-जबूद्वीपका भूपण भरत क्षेत्र है। मुने वचसास धर्ममाश्रितः-मुनिके वचनसे उसने धर्मका आश्रयण किया हरे गर्जनं श्रुत्वा स भीत:-सिंहकी गर्जना सुनकर वह डर गया । गुरो आशया गृहं गतः-गुरुकी आज्ञासे घर गया । विभावसोः तेजोऽसह्य-अग्नि या सूर्यका तेज असह्य है। [विवाहा। पिनियोगात् तेन भायी परिणीता-पिताको आज्ञासे उसने भायाको दातुः सत्कारः कार्य-दाताका सत्कार करना चाहिये । २ बालकयोः पुस्तकानि अपहृतानि-दो लडकोंकी पुस्तकें चुराली है। मुन्यो ग्रंथोऽयं-दो मुनियोका यह ग्रंथ है। गुर्वो पुस्तकानि इमानि-दो गुरुओंकी ये पुस्तकें है। पित्रोः आशा अनुष्ठेया-माता पिताकी आज्ञा करनी चाहिये । २२-सवध अर्थमें षष्ठी विमकी होती है जैसे "वीरके चरण" यहा वीरका और चरणका अवयव अवयवी संबंध है सामान्यसे हिंदीमें जहा "का-की-के" बोलें जाते हैं वहा संस्कृतमें छठी विभक्ती है।

संस्कृतप्रधेशिनी। ३ जीवानां ज्ञानं महत् हितकरं जीवोंको ज्ञान बडा हितकारी है। खलानां वाणी असह्या भवति-दुर्जनोंकी वाणी असह्य होती है। कवीना रसवत् वचः-कवियोका वचन रसीला होता है। मुनीनां देहोऽपि अप्रियः-मुनियोंको देह भी प्यारा नहीं होता है। गुरुणा मधुरं पाक्यं भवति-गुरुओंके मीठे वचन होते हैं। शिशूनां चपलता दृश्या भवति-पश्चोंकी चंचलता देखने योग्य होती है। प्रातॄणां मनांसि प्रफुल्लानि-भाईयोंके मन प्रफुल्लित हैं । उपकर्तृणां उपकारो विधेयः--उपकारियोंका उपकार करना चाहिये। हिंदी बनाओ- है। अलंध्यं हि गुरोवाक्यमयत्यैः (पुत्रैः) पथ्यकांक्षिमिः। २। दितेरपि सुतो मदीयामाशामप्राग्य इमां भूमिमागंतुंन अलं। ३। दुहितुश्चित्तवृत्तिं स्वकीयचित्तवृत्तेः सघशी शात्वा भूपः हृष्टो ४। कामस्य वशं गतो जीवो हिताहितं न विचारयति । भवति स्म। ५। सत्यंधरस्य अतिगुणी पुत्रो जीवंधरो जातः । द्वितीय पाठ। अन्यान्य पुंलिंग शब्द नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनामो---- जलमुचः जलमुचोः परिवाजा परिवाजो समाज: सम्राजो पापकृतः, पापकृतो बुद्धिमतः घुद्धिमतोः बलवतः बलवतो गायत गायतो सुहृदोः ११ जलमुचा। परिवाजां। सम्राजां। पापकृतां। चुद्धिमतां। बलवतां। गाया। सुहदां।

सनातनजैनग्रंथमालायां- राक्षो राज्ञां। मून: मूनों: मुनी। अश्मनः अश्मनोः अश्मनां। स्वामिनः स्वामिनो स्वामिनां। चंद्रमसः चंद्रमसोः चंद्रमसां। विदुषः विदुषोः विदुषां। ज्यायसः ज्यायसो ज्यायसां। सर्षस्य सर्वयोः सर्वेषां। तस्य तयोः तेषां। यस्य ययोः येषां। करय कयो केषां। अस्य अनयोः एषां। अमुष्य अमुयोः अमीषां। मम आवयोः असा। तव युवयोः युष्माकं । हिंदी बनामो- १। परस्परदर्शनस्य उत्सुका इव सकला: नरनाथविद्यास्तं राजानं २। स्वस्वामिनो मनो वशीकर्तु सा राशी अलं । [प्राप्तवत्यः। ३। सराजातमालतरुमूलगतस्य तपस्विनश्चरणौ मूना नमति स्म। ४। विशुद्धपाठः स महर्षिरपि आत्मनो योग परिसमाप्य आशी- पंचांसि पठति स्म। ५। भवतः पुत्रोदयेऽपि जन्मांतरस्य अंतरायोऽस्ति । ६। इयं तव अग्रमहिषी अस्य नगरस्य एव देवांगदस्य पणिज: सुनंदा नाम्नी पुत्री वर्तते स्म । ७। रागादिदोषाणामगारो (घर) देवः प्राणिनां मोक्षदायको न । ८। अस्य विदुपोऽपि कश्चिद् विसंवादो न जातः ।

संस्कृतप्रवेशिनी। ९। अत्र विद्यापदायिनों का प्रत्युपक्रिया अस्ति? १०। ज्यायसो लघीयसो वा भ्रातुर्विलोकनं प्रीत्यै भवति यदि वे वियुक्ताश्चेद् पुनः किं ? ११ । सुहृदां हितकामानां वचांसि विधेयानि भवति । संस्कृत बनामो- १। जव उस राजपुत्रका जन्म हुआ तव वैरियोंके हदय भी विक- २। विद्वानोंका सत्कार विद्वान् ही करते हैं। [सित हो गये। ३। जोजिसके गुण नहीं जानतावह उसकी हमेशा निंदा करता है। ४। मेरा मन संसारके भोगोंसे विरक्त हो गया है। ५। हमारा यश चिरस्थायी हो ऐसी भावना सजनोंकी होती है। ६. जयशाली, गुणोंसे भूपित, गुरुवंशसमुद्भूत राजाके थोडासा [मनाक ] भी मद नहीं हुआ। ७। चंद्ररुचि नामक दैत्यने पृथिवीपतिके पुत्रको हरा था। ८। हे पुत्र ! तू मेरे यश, सुख और तेजका कारण था। ९। संपूर्ण देहियोंकोअनिष्टका संयोग और इष्टका वियोग होता है। १०। चंद्रमाका प्रकाश ठंडा और मनको मोदक होता है। ११ । पत्थरके आघावसे शिर फूटगया [भिन्नं] तृतीय पाठ। स्त्रीलिंग नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य धनामो- कन्याया: कन्ययो घालाया: घालयोः मत्या, मते मत्यो नद्या नयो तस्थुष्या वस्थुष्योर कन्याना। बालानां। मत्तीनां। नदीनां । तस्थुषीणांत सनातनजैमसंथमालायां- रेवाः रेण्वोः धेन्वाः घेन्वोः बध्वाः बध्वोः चम्बा: चम्वोः मातुः मात्रो दुहितुः दुहिनोः चोः त्वचः त्वचो विपदः विपदो परिषदः परिषदोः वीरुधः वीरुधोः क्षुधा क्षुधोः योषितः योषितः सरितः सरितो सर्वस्याः सर्वयो अपरस्या अपरयो अन्यस्याः अन्ययोः तसाः तयोः कस्याः कयो अनयोः अमुच्या अमुयोः चतुर्थ पाठ। नपुंसकलिंग मीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य घनाओ- पुष्पस्य पुष्पयोः घनयो रेणूनां । घेनूनां । बधूनां। चमूना। मातृणां। दुहितॄणां । ऋचां। त्वचा विपदां। परिषदां। वीरुधां। क्षुधां। योषितां। सरितां। सर्वासां। अपरासां। अन्यासां। तासां। कासां। आसां । अमूषां। पुष्पाणां। बनानां ६ - संस्कृतप्रवेशिमी। दानस्य दानयोः दानानां। धारिणः वारिणो चारीणां। मधुनः मधुनोः मधूनां। सातुनः सानुनोः सानूनां। श्रीमत श्रीमतो श्रीमत। गुणवतः गुणवतोः गुणवतां । शर्मणः शर्मणोः शर्मणां। कर्मणः कर्मणोः कर्मणां। पयसः पयसो पयसां। चेतसः चेतसोः चेतसां। ज्योतिषः ज्योतिषोः ज्योतिषां। इतिषः हविषोः हविषां धनुषा धनुषोः धनुषां। सर्वस्य सर्वयोः सर्वेषां। अपरस्य अपरयो अपरेषां। तयोः तेषां। यस्य ययो येषां। कयो केयां। अस्य अनयोः एषां। अमुल्य अमुयोः अमीषां। हिंदी बनामो- १। असंख्यजीवानां घातात् एको मधुनः कणो जायते । २। भ्रमरा एकस्य एकस्य पुष्पस्य रसमादाय (लेकर) मधु एकत्र ३१ जना दानस्य प्रभावेण स्वर्गसुखमनुभवंति । कर्वति। ४। चेतसो मलिनतया अशुभकर्मणां बंधो भवति । ५। हरियो धूम ऊर्व पोन गच्छति। - ८६ सनातनजैनग्रंथमालायां- पंचम पाठ। षष्ठी विभक्तीका व्यवहार । १। स राजपुत्रस्तस्य योधुर्व- उस राजपुत्रने उस योद्धाके वचनोंसे चोमिः क्रुद्धः सन् एकस्य युद्ध होते हुये एकके हाथसे धनुष छीन फरात् धनुर्हरति स्म। लिया। २। पूर्वजन्मकृतपुण्यकर्मणः अनंतर-पूर्वजन्ममें किये हैं पुण्यकर्म पाकशासनसमानतेजसः । जिसने ऐसे तथा इंद्रके समान तेजवाले चरनमथ तस्य खंडिता- उस चक्री (चक्रवर्ती) के खंडित किया रातिचक्रमुदपादिचक्रिणः॥ है शत्रुचक्र (समूह) जिसने ऐसा चक्ररत्न उत्पन्न हुमा। ३। कामकल्पवपुष नगरी प्र- कामके तुल्य शरीरवाले, नगरीमें प्रवेश विशंतं तं सम्राजं वीक्ष्य पुर- करते हुये उस सम्राट्को देखकर नगरकी सुंदरीणां निवहः क्षुब्धः। सुंदरियोंका समूह क्षुब्ध होगया। ४। जनैः संकुलं मार्गगच्छंत्याः लोगोंसे व्याप्त मार्गमें चलती हुई कस्याश्चित् कृशांग्या हार- किसी कृश अगवाली स्त्रीकी हारलता लतिका त्रुटिता। टूट गई। ५। कम-सरोज-मताया जन- चरण कमलोंमें नमहुये जनसमुदायका वाया रक्षकः स भूपोराज- रक्षक वह राजा राजमंदिरमें प्रवेश करता मंदिर विशति स्म। ६। नव-नवांकुर-लीनामलीनां नये नये भकुरों में लीन भ्रमरों के समूहको संहतिं दृष्टुं विरहिणो न देखनेके लिये विरही समर्थ न थे। समाः। ७। वियोगिनीनां हृदि कलि- वियोगिनियोंके दृदयमें कलियुगके समान कालं मधुकरं धारयंती के- काले भ्रमरको धारण करती हुई केसर सस्तरोःकलिफाऽलंन्ययां पक्षकी पाठी व पीडा करती हुई। छतयाती। हुआ।

संस्कृतप्रवेशिनी। ८ हे मानिनि! मम तांतं मा- हे मानशीले ! मेरे लात मनको वसंत- नसं मधुदिनानि नितांतं ऋतुके दिन अत्यंत संतप्त करते हैं। तापयंति। ९। अविचारितरम्यं हि रागां- रागाधोंका काम विना विचारे रमणीय धानां विचेष्टिवं। होता है। १० । अस्वमपूर्व जीवानां न हि- जीवोंका शुभ, अशुम विना स्वप्नके जातु शुभाशुभं। नहीं होता। ११ । नृणां विपदः परिहाराय मनुष्योंको विपत्ति दूर करनेके लिये शोको न उचित शोक करना ठीक नहीं है। १२। जीवितात् तु पराधीनात् पराधीन जीवनसै तो प्राणियोंका मरना जीवानां मरणं वरं। अच्छा है। १३ । अर्थिनां जीवनोपायमपायं याचकोंके जीवन के उपायको शत्रुओंके चाभिमाविनां । कुर्वतः खलु नाशको करनेवाले राजा लोग होमा- राजाना सेव्या हव्यवहा यथा। मिके समान सेवनीय हैं। १४। पित्तज्वरवतः क्षीरं तिकमेव पित्तज्वरवालेको दूध कडुआ ही ल- भासते। गता है। संस्कृत वनाओ- १। अनुनय महात्मा लोगोंके माहात्म्यको बढाता है। २। माताओंके स्थूलप्राण पुत्र होते हैं। ३। तत्त्वज्ञानके अभावमें रागादिक निरंकुश हो जाते हैं। ४। संपत्ति और विपत्तियों की प्राप्ति किसी छलसे होती है। ५। खियोंका भूषण लज्जा है उहण्डता नहीं। ६। नदियोंके जलसे समुद्रको विकार नहीं होता। ७। प्राणियोंके मनोरथ करोड [कोटि] से भी अधिक होते हैं। - १-पृष्ठ ३२-३३ की टिप्पणी देखो।

सनातनजैनग्रंथमालायां-
८। संपत्तिके लाभका फल विद्वानोंका पोपण करना है।
९। जो स्वामीके गुप्तमंत्रको प्रकट करदेता है घह अवश्य ही नरक
को जाता है।
१०। जिस आदमीके धन है वही वडा है क्योंकि सम्पूर्ण गुण
सुवर्णका आश्रय करते हैं।
११। मनुष्यका रूप विद्या है विद्या गुरुओंकी गुरु है विद्याके
अभावमें मनुष्य पशु है।
१२। जिस जिसको देखो उस उसके सामने दीन पचन मत कहो।
१३ । बहुत कहनेसे क्या! राजाके समक्ष ही हम दोनों की
परीक्षा होगी।
१४। सुखके अनंतर दुःख, दुःखके अनंतर सुख होता है ऐसी
संसारकी रीति है।
१५। पक्षियोंका भूषण एक चातक है क्यों किया तो वह पिपासासे
मर जाता है या फिर प्रथम मेघकी ही बूंद पीता है।
१६ । हे विद्वन् ! शोक मतकर । तेरा नाश नहीं है और संसार
सिंधुके तरनेका उपाय है।
१७। सुर असुरोंसे नमस्कृत श्रीजिनेद्रको नमस्कार कर गृहस्थोंके
व्रतोंको कहूंगा।
१८ । शोकके वशीभूत हुये आदमीका सुख चला जाता है।
१९ । जो भव्यकमलोंको हर्ष देती है, अशान अंधकारके प्रभावको
हरती है, संपूर्ण पदार्थोको प्रकाशित करती है ऐसी जिनेद्रकी
पाणी हमलोगेांका कल्याण करे।
२० । इन्द्रियविषय देवताओंको भी दुख देता है।
२१ । जो जीव-देव, देवेंद्र, चक्रवर्तियोंके भोगांसे तृप्त नहीं हुआ
वह सामान्य मनुष्यके भोगोंसे कैसे तृप्त हो सका है।

संस्कृतप्रवेशिनी। ९ 3 , साहित्य परिचय। सूचना-लोकोमा म विचारते समय विद्यार्थियोंको चाहिये कि ये सबसे पहिले लोकोंके संघिसे जुड़े हुये पदोको अलहदा करें उसके याद उनकी विभकी विमक्कियोका अर्थ, धातु, धातुसे आये हुये प्रत्यय और उनके अर्प तथा एक चूसरेफे साथ उनका संबंध विचारे और तय हिंदी यनावें । तवं रूपस्य सौंदर्य पृष्ट्वा तृप्ति (म) अनापिवान् ( अप्रातः )। डाक्षः (द्विने:) शक्रः सहस्राक्षो बभूव (जात) बहुविस्मयः॥१॥ आपगा (नदी) सागरस्तान (मु) उञ्चयः (संग्रहः) सिकताऽश्मनां । गिरिपातोऽनिपातच लोकसूद निगद्यते ॥२॥ प्रहत मरणेन जीवितं जरसा (धुढापेसे) यौवनं (मे) एप पश्यति । प्रतिजंतु, जनस्तद् (द) अपि (प्य) अहो स्वहितं मंदमतिन पश्यति ॥३॥ नसंति (है) वाह्यामम केचना भवामि तेपांन कदाचन (ना) अहं। इत्थं विनिचित्य, विमुंच वाय, स्वस्थ सदात्वं भव मद! मुक्त्यै ॥४॥ स्वयं कवं कर्म यद् (दा) आत्मना पुरा, फलं तदीयं लभते शुभाशुभं । परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं, स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥५॥ निजार्जितं कर्म विहाय देहिनो, न कोऽपि कस्यापि ददाति किंचन । विचारयन् (अ) एवं (म)अनन्यमानसः, परो ददाति (ती) इति विमुंच शेमुपी (बुद्धि) ॥ ६ ॥ शरीरता कर्ग (म) अनंतशति विमिन्नं (मा) आत्मानं (म) अपास्तदोपं । जिनेंद्र! कोपाद् (दि) इच खड्गयटिं, तव प्रसादेन मम (मा) अस्तु (हो) शक्तिः ॥७॥ पकेंद्रियाद्या यदि देव! देहिनः, प्रमादतः संचरता इतस्ततः। क्षता विमिना मिलिता निपी- डितास्तदू (द) अस्तु मिथ्या दुरनुष्ठितं (दुष्कार्य) तदा ॥ ८॥ विमुक्ति- मार्गप्रतिकूलपतिना मया कपायाक्षवशेन दुर्थिया । चारित्रशुद्धेर्यद (द) अकारि लोपन, तद् (द) अस्तु मिथ्या मम दुश्कृतं प्रभो ॥९॥ अतिक्रमं यं विमतेर्व्यतिक्रम, जिन ! (ना) अतिचारं सुचरित्रकर्मणः । व्यधाम् [किया हो] (म) अनाचार (म) अपि प्रमादतः, प्रतिकर्म १२ २० मनालयमालार्या- तस्य कागेगि गुरुये ॥ शनि गतिपिंगविमर्म, यतिकर्म शीलतेचिंधनं 1 प्रभो!मिनाये विमें] बत्तंनं, धर्मति (स्य) अनाचार (fr) (riyanमिना या (द) अर्थमात्राणदयारादीनं, मया प्रमागत नन नो! उन्हें । तत् मे क्षमिन्या विदधानु (फरीदेवीसामाती ययनयोधन्धिाश सुसितम्य दुःसितम्य च नमार सिंगारमें] धर्म पय तय कार्यः । सुसितम्य नमिध्य गुरगुजानपणाताय ॥१३॥ धर्मः सुरवस्य हेतुनुन विरोधक म्वकार्य । तस्मात् सुखभंगमिया मा भूः मनमो धर्मम्य विमुररस्यं ॥ १४ ॥ छत्वा धर्मविघातं विषयमुपानि म्य) अनुमयंति ये मोहात् । आच्छिा काटफरतगंमूलात फलानि गृति लिने] ने पापा.१५ स प्रमों यत्र न (ना) अधर्मस्तन सुरव यत्र न (ना) असुखं । तत् झानं यत्र न (ना) अशानं सा गतिर्यन नना) आगतिः ॥१६॥ अर्थिनो धन [म] अप्राप्य धनिनोऽपि प्य] अविवृप्तितः। कष्ट सर्वेऽपि सीदंति परं मि] एको मुनिः सुखी ॥ १७ ॥ पलित श्वितकेश] च्छलेन देशात् निर्गच्छति शुद्धिरेव तव युद्धः। कथं मि] इव परलोकार्थ जरी वराफस्तदा सरति ॥ १८ ॥ प्रशा [3] एव दुर्लभा सुष्ट, दुर्लमा साऽन्यजन्मनि दूसरे भवमें] । तां प्राप्य ये प्रमाद्यति ते शोच्याः खलु धीमतां ॥ १९ ॥ [(किया) कंठस्थकालकूटोs [विष] पि शंभोः किं [मा अपि न (ना] अकरोत्। सोऽपिदंदाते जलाया जाता है] स्त्रीमि', स्त्रियो हि विपमं विपं ॥२०॥ लोकद्वयहितं वक्तुं श्रोतुं च सुलभाः पुरा। दुर्लभाः कर्तु, मि] अद्यत्वे [आजकल वक्तुं श्रोतुं च दुर्लमाः ॥२१॥ निर्धनत्वं धनं येषां मृत्युरेव हि जीवितं । किं करोति विधिस्तेपां सतां मानकचक्षुषां ॥ २२ ॥ जीविताशा धनाशा च येषां तेषां विधिनिधिः।

सरुटारागारागा किं करोति विधिस्तेषां,येपांमा]आशा निराशता निराशा होगई है]२३ पर कोटिं समारूढौ द्वौ [द्वावे एव स्तुतिनिंदयोः । यस्त्यजेत् [छोड़दे] तपसे चक्र यस्तपो विषयाशया ॥ २४ ॥ अपि रोगादिमिर्वृद्धैन मुनिः खेदं [म] ऋच्छति [गच्छति । उडुपस्थस्य [नावमें बैठे हुयेको] का क्षोभः प्रवृद्धेऽपि नदीजले ॥२५॥ पापाद् दुःख धर्मात् सुखं मि] इति सर्वजनसुप्रसिद्ध मि] इदं । तस्माद् विहाय पापं, चरतु सुखार्थी सदा धर्म ॥ २६ ॥ संस्कृत बनाओ। मुनिराज यशोधरके मुखसे अपने पूर्वभवके वृत्तांतको सुनकर राजा श्रेणिकको जातिस्मरण होगया। जातिस्सरणके प्रभावसे शीघ्र ही उनने पूर्वभवका वास्तविक हाल जान लिया। वे मुनि- राजके गुणोंकी प्रशंसा कर ऐसा विचार करने लगे "अहो ! मुनि यशोधरका ज्ञान धन्य है। उत्तमक्षमा इनकी प्रशंसनीय है। परी- पह जय तो लोकोचर है। इनके प्रत्येक गुणोंसे जाना जाता है (ज्ञायते ) कि ये अद्वितीय मुनि हैं मुनियोंके शिरोमणि है । इनके आगमज्ञानको भी धन्य है। इनके प्रतिपादित पदार्थ सत्य है पदार्थोंका जिस रीतिसे स्वरूप कहा गया है ये वैसा [तादृशं] ही कहते हैं। जीवादितत्त्वोंसे भिन्न तत्त्व मिथ्या है"। इसके वाद अथ श्रेणिकने श्रावकके व्रत ग्रहण किये और पट्टराशी चेलना सहित विनयसे मुनिके चरणोंको नमस्कार कर अपने राज- मंदिरकी तरफ प्रस्थान किया। कदाचित् बौद्धसाधुओंको समाचार मिला कि महाराज श्रेणिकने किसी मुनिके उपदेशसे अन्य धर्मको धारण कर लिया है उनके परिणाम बौद्धधर्मले विचलित होगये हैं। तो वे चौद्धसाधु महाराजके पास आकर धर्मका उपदेश देने लगे। उनके उपदेशले जिसतरह जलके न होनेसे नवीन लता १२ सनातनजैनग्रंथमालायां- मुरझा जाती है उसीतरह श्रेणिकका अभिनव अन्य धर्मका ज्ञान मुरझा गया। उसका चित्त संशययुक्त होगया। कदाचित् मंडलेश्वर श्रेणिकने मुनियोंकी परीक्षाके लिये एक गढा खुदवाया। उसमें [ तत्र] हड्डी [अस्थि] चर्म आदि अ- पवित्र चीजें रखदी [नि-क्षिप] और रानीसे जाकर कहा- "प्रिये 1 मैं अब उस थर्मका भक्त होगया हूं इसलिये कदाचित् कोई मुनि उस धर्मके आवे तो उन्हें भक्तिसे अहार देना"। ऊपर लिखे गयमें प्रश्नोत्तर भाला रचो। सप्तमी विभक्ती। प्रथम पाठ। ११ वादे वादे जायते तत्त्ववोधा-फिरफिर वाद होनेपर यथार्थ ज्ञान होता है। अतत्त्वोऽपि तत्त्वज्ञर्भवितव्यं दयालुमिः-मिभ्या तत्त्व जाननेवालों पर भी तत्वोंको दयाल होना चाहिये। कूपे पातुमिच्छन् शिशुर्न केन अपि उपेक्ष्यते-कुएमें गिरनेकी इच्छा करनेवाला वचा किसीसे भी उपेक्षित नहीं होता है। मही विषं तिष्ठति सांपमें विष होता है। मुनी वयं विश्वस्ताः-मुनिमें हम विश्वासू है। गुरी भकिमुरौ भक्तिर्गुरौ भक्तिः सदाऽस्तु सर्वदा गुरुमे भक्ति हो । पशी कृपा उचिता-पशुमें दया करना योग्य है। दातरि कृतज्ञता विधेया-दातामें कृतज्ञता करनी चाहिये। पितरि शिशवोऽनुरता:-पितामे लडके अनुरक हैं। २॥ वृक्षयो पुष्पाणि शोभते-दो पक्षोंके फूल शोमते हैं। मामयोः पंडिता निवसंति-दो गावोंमें पंडित रहते हैं। मुन्यो विद्वांसो भक्तिमत:-दो मुनियों में विद्वानलोग मक्तिवाले हैं। १-हिंदीमें जहाँ में, पै, पर मर्थ होता है वहा सातवी विभकी होती है।

संस्कृतप्रवेशिनी। ९३ . गिर्योः बहवो वानराः-दो पहाडोंपर बहुत बंदर हैं गुर्वो: शिया अनुरक्ता:-दो गुरुमों में शिष्य अनुरक्त हैं। विश्वो चांधवाः स्निग्धा:-दो लडकोंमें वाधव स्नेही हैं। दातृगृहीनो दाता श्रेष्ठ:-दाता और गृहीतामें दाता श्रेष्ठ है। पित्रो. को महान् माता और पितामे कौन बड़ा है। ३। खलेषु उपकारोन कार्य:-दुर्जनोमें उपकार न करें। विवादेषु अहं साक्षी भवामि-विवादमे मै साक्षी [गवाही] हूंगा अद्रियु हिमवान् उच्चा-पहाडोंमे हिमालय ऊंचा है। मुनिषु क्षमावान श्रेष्ठा-मुनियों में क्षमाधारी मुनि अच्छा है। शिशुपु विश्वासो न विधेयः लडकोंमें विश्वास न करना चाहिये। शष्टषु अपि क्षमा विधेया-शत्रुओंमें भी क्षमा करना चाहिये । भ्रातृपु को बलवान् भाईयोंमें कौन बलवान है। पितृषु भक्ति कार्या--पिताओंमें भक्ति करना चाहिये । हिंदी घनाओ- १। दुष्प्रवेशे ऽपि पुराणसागरे यथाशक्ति यतिष्ये। २१ फलकाले समागते किं पुष्पसमुदायः प्राप्तो भविष्यति । ३। तत्र सर्पकुलेषु द्विजिहता, मुनिघु ध्यानतत्परता दृश्यते। ४१ स राजा समीपस्थे जलगः पयः परिपीय उत्तरंतं गोगणं पश्य- ५। यः हितकरे मार्गे न प्रवर्तते सोऽवयं दुःख लप्स्यते। [तिस्म। ६। सुख मि] इष्टसमागमे यथा विरहे तस्य तथैव च च असुखं । ७। चारुचेताः स मुनिमार्ग चेतसा विशति स्म। ८ देय देयोचितस्थाने सुगंधिपवने वने । मुनिरेका समायातः शब्दार्थीभ्यां मनोहरे ॥ २१ दशे दश्यते सामुनिस्तेन स्थितो नीलशिलातले। १०॥ देवसाध्ये पदार्थ शोको न युक्तः । गिमिन्यति। ११। ममनोऽसिरामे सूना [पुत्र राज्यमा निमिप्य नरमे वं सनातननग्रंथमालायां- संस्कृत बनाओ- १। प्रसूति समय प्राप्त होनेपर शुभदिनमें रानीने पुत्र जना । २। घरकी छत्त गृिहपृष्ठ) पर बैठे हुये राजाने आकाशसे गिरती हुई विजुली देखी उसको देखकर वह विषयों में विरक्तवृद्धि होगया । ३। उसने श्रीप्रभ मुनिके चरणसमीपमै तप करके मुक्ति पाई। ४। उसने द्वीपोंमें दुर्गामें देशोंमें कोई भी वैरी नहीं छोड़ा। ५। दैव अनुकूल होनेपर क्या अनुकूल नहीं होता । ६। धार्मिक राजाके रक्षा करनेपर पृथ्वी बढ़ती है। ७। मन सांसारिक पदार्थों में स्वयं चला जाता है। ८॥ तत्त्वज्ञानसे उभयलोकमें सुख मिलता है । ९। दीपकोंसे प्रकाशित देशमें अंधकार नहिं जा सका। [नहीं। १०। सजनलोग यशरूपी कायमें प्रीति करते हैं पौगलिक शरीरमें १९ । अविवेकी लोग विपाक होनेपर हितकर वाक्योंका विश्वास करते हैं विश्वसंति] । - द्वितीय पाठ। अन्यान्य पुंलिंग शब्द । नीचे लिखे शन्दोंसे वाक्य वनाओ- जलमुचि जलमुचोः परिव्राजि परिव्राजोः सम्राजि सम्राजो पापकृति पापकतो बुद्धिमति बुद्धिमतो: वलवति बलवतो गायति गायतोः मुहदि सुहृदोः जलमुक्षु। परिव्राट्। सम्राट्स। पापकृत्सु। बुद्धिमत्तु। बलवत्सु। गायत्सु। सुहत्सु।

संस्कृतप्रवेशिनी। ९५ राशि राश राजसु। मूनि मूनों मुर्धसु। अश्मनि अश्मनो अश्मसु। स्वामिनि स्वामिनोः स्वामिषु। चंद्रमसि चंद्रमसो चंद्रमासु। विदुपि विदुषोः विद्वत्सु। ज्यायसि ज्यायसो ज्यायासु, सवैस्मिन् सर्वयोः सर्वेपु। तस्मिन् तयोः तेषु। यस्मिन् ययोः येषु। कस्मिन् कयोः केषु। अस्मिन् अनयोः येषु । अमुमिन अमुयोः अमीषु। मयि आवयोः अस्मासु। त्वयि युवयोः संस्कृत चनाओ- १। विद्वानोंमें भक्ति, गुणियोंमें प्रमोद, क्लिएजीवोंमें दया, शत्रुओंमें माध्यस्थभाव सर्वदा करना चाहिये। २। सजन-सुखमें, दुःखमें, वैरीमें, मित्रमें, संयोगमें, वियोगमें और जंगलमै समान भाव रखते हैं। ३। मैंने अपनेमे ही पुण्य पाप दोनों देखे। ४। स्थायी आत्मामै अपनी बुद्धि स्थिर करो। ५। इस कार्यकारण रूप प्रबंधक अनादि होनेपर जिस पदार्थसे तुम दुःख पाते हो उसको छोड़ दो। ६। सेजोनिधि, कल्याणधाम,सुवर्णनाभ नामवाले पुत्रमें युवराजपद व्यवहृत कर [प्रवर्त्य] वह राजा मोगोंका अनुभव करने लगा। युप्मासु। . - सनातनजनग्रंथमालायां- - ७। उस सम्राट्के रक्षकानेपर मा सुगी हुई। ८। दूसरेआदमियों में तो क्या? देवनाओम भी मन्युनय नित्य नहीं :। प्रणयीआदमीम कोप ठीक नहीं है क्योंकि पश्चात्ताप होता है। १०१ कृतार्थ ! तुम्हारे दीसनेपर मय कार्य सफल होते है। हिंसी मनायो- १। स रुती रात्रिपु नरमूलं आस्थितो घोरपनांधकारिणि गणकाले धारिधागः सहते स। २। तप्तसूचिसरशः रविकिरणः पीडिनोऽपि म योगनो न चलति स्म । सत्यं-"स्थिरा' हि संतः फरणीयवस्तुनि" । ३। “वसुधातले प्रस्तपसेन्यर्मदीयो मदिमा बंदिनः" इति लजयाश्व नमः अध्ययुगातः प्रवृच रजसि तिरोभवति स्म। ४। परिचितेऽपि महीभ्यरे पतंति नगरनागनयनानि तोपं न गच्छं. ५। सुरमुतानि पुष्पाणि पतंति स मदीनाथरथे । [ति स्म। ६। जिनजन्मदिवसे देवसदसि मणिचंटिकाः करताडनं विना शदं कृतवत्यः। (जिनं तवती। ७। इंद्राणी जिनमातृपक्षसि मायया निर्मितं शिशु निधाय रखकर हे प्रभो! यदीये हृदयसरसि त्वटीयं चरणकमलं प्रतिदिनं स्फुर- ति स एव अस्मिन् साररहिते संसारे सारवान् । मिंतो भवति । ९। ईश्वर ! त्वटीयचरणसमीपं आगताः पशवोऽपि त्वयि भक्ति- १०। तस्मिन् नृपे मही रक्षितरि अखिलेषु अपि अंतुषु अकाल- मरणं न जातं। तृतीय पाठ। स्त्रीलिंग। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनामो- कन्यायां कन्ययोः बालायां यालयो कन्यासु। यालासु।

संस्कृतप्रवेशिनी। मतिषु। ऊर्मिषु । नदीषु। सस्थुषीषु। रेणुषु। घेनुषु। घधूषु। चमूषु। मातृषु। दुहितृषु। ऋक्षु। मत्यां, मती ऊयों, ऊमाँ नद्यां तस्थुष्यां रेवा, रेणौ घेवां, धेनौ वध्वां चम्वां मातरि दुहितरि ऋचि त्वचि विपदि परिपदि वीरधि क्षुधि योषिति सरिति सर्वस्यां अपरस्या अन्यस्यां तस्यां यस्यां कस्यां अस्यां अमुष्यां मत्योः ऊयो नद्यो तस्थुष्योः रेवो घेन्वोः वध्वोः चम्वोः मात्रो दुहित्रोः ऋचोः त्वचोः विपदोः परिषदोः वीरुधोः क्षुधोः योषितोः सरितो सर्पयोः अपरयोः अन्ययोः तयोः ययोः कयो अनयोः अमुयोः त्वक्षु। विपत्सु। परिषत्सु। वीरुत्सु। योषित्तु। सरित्स। सासु। अपरासु। अन्यासु। तासु। यासु। कासु। आसु। अमूषु।

सनासनअनग्रंथमालायां- चतुर्थ पाठ। नपुंसकलिंग कुसुमेषु। दानेषु । वारिषु। सानुषु। श्रीमत्सु। गुणवत्सु। शर्मसु। कर्मसु । पयासु। कुसुमे कुसुमयोः दाने दानयोः वारिणि वारिणोः मधुनि मधुनोः सानुनि सातुनोः श्रीमति श्रीमतो. गुणवति गुणवतो. शर्मणि शर्मणोः कर्मणि कर्मणोः पयसि पयसोः चेतसि चेतसो ज्योतिषि ज्योतिषोः इविषि हविषोः धनुषि धनुषोः सर्वस्मिन् सर्वयोः तस्मिन् तयोः कस्मिन् कयो यस्मिन् ययोः अमुष्मिन् अमुयोः अस्मिन् अनयोः कपर लिसे शब्दोंसे वाक्य रचना करो- चेतःसु। ज्योतिःषु। हविषु। धनुषु। सर्वेषु। तेषु। केषु । येषु। अमीषु।

संस्थतप्रवेशिनी। . पंचम पाठा सप्तमी विभक्तीका व्यवहार । १ भूतपतिपदेषु भक्तिः,सत्यतत्त्वे ईश्वरके चरणों में भक्ति, वास्तविक प- भावनाः, विषयसुखेषु विरक्ति, दार्थो चितवन, इंद्रियसुखोंमें विरागी- प्राणिवर्ग मित्रता, श्रुती, शमे, पना, जीवोंके समूहमें मित्रता, शास्त्र, यमे च शक्तिः, अन्यदोपकथने शाति और संयममें समर्थता दूसरेके मूकता करणीया। दोपोंके कहनेमें गूंगापन करना चाहिये । २ कोपो प्रशो:यगं, वपुपि कंपं, क्रोध-आखोंमे लालिमा, शरीरमें कप- चित्त थैलव्य, बुद्धौ मालिन्यं कपी, मनमे विक्लयपना, त्रुद्धिमै मली- विदधाति, अतो बुद्धिमता स नता करता है इसलिये युद्धिमानसे त्याज्य:। मह छोउने योग्य है। ३ दोषेषु सत्सु यदि कोऽपि ददाति दोपके रहनेपर यदि कोई गाली है शापं, सत्यं ब्रवीति (त्य) अयं तो यह सत्य कहता है ऐसा विचार (मि इति प्रविचित्य सहां। दोपे- कर सह लेना चाहिये । दोपोके नर- घु वि) असत्सु यदि कोऽपि हनेपर यदि कोई गाली दे तो ददातिशापंमिथ्याब्रवीति त्य] यह झूठ बोलता है ऐसा समझ सह- अयं मि] इति प्रविचित्य सा ।। लेना योग्य है। माने कृते यदि भवेद् [दि] इह मान करनेपर यदि यहा कोई लाभ कोऽपि लामा, यदि [य] अर्थ होता और नव्रता करनेपर कोई चन- हानिरथ काचन मार्दवे स्यात् । की हानि होती तो मान करना तदा मानःसफल ।। सफल होता। ५ इति मानदोष बेतसि प्रविचिं- इसतरह मानकरनेके दोषको दिलमें वि- त्य गुणदोषविचारदक्षोऽहंकारं चार कर गुण दोषके विचार करनेमें च- न आचरति। तुर भादमी अहंकार नहीं करता है। ६ नरो निकृत्या मलिननिदितरू- मनुष्य मायासे मलिन और निदित पासु नारीयु भ लभते। रुपपाली नियों में जन्म लेता है।

१०० सनातनजैनग्रंथमालायां- ७ यथा वारिणि प्रच्छादितं वर्गों जिस तरह जलमें छिपाई हुई विष्ठा प्रकाशमुपगच्छति तथा एवं प्रकट होजाती है उसीतरह संसारमें लोके कपटेन संछादितोऽपि कपटसे छिपाया हुआ मी दोप प्रकट दोष प्रकटतामटति । जाता है। ८ अतिविमले विपुले जले तिष्ठन् अतिनिर्मल बहुतसे जलम बैठा हुआ भ्रमरः जिह्वावशात् निष्कारणं भ्रमर जीभके वशसे निष्कारण मरण- मरणं लभते। को पाता है। ९ येऽनपेक्षाः संतोऽपकारकारिणि जो अपेक्षारहित हुये अपकारकरने- जने अपि उपकारमायरंति ते वाले आदमीमें भी उपकार करते हैं मान्याचाराजना विरलाः। वे मान्य आचरण वाले लोग विरले हैं। १० कल्पांते तिऽ] अपि व्रजति वि- कल्पात होनेपर भी सज्जन स्वभावसे कृति सज्जनो न स्वभावात् । विकारको प्राप्त नहीं होते । ११ पृथिव्यां विमुक्तपापे विचिने पृथिवीपर पापरहित नानाप्रकारके सु- सुलमे आहारवर्गे विद्यमाने ये लभ आहारोंके रहनेपर जो मासखाते मांसं खादंतिते नरा नृशंसाः। हैं वे लोग राक्षस हैं। संस्कृत वनाओ- १। जिन शास्त्रों में प्राणिवध लिखा है वे अपठनीय हैं। भोगते हैं। २। कुयोनियोमें जो २ दुख होते हैं उन सबको मांसभक्षक लोग ३। कामपीडित आदमी घरमे, नगरमें, कुटुम्वियोंमें, तथा अन्य लोगों में कहीं भी शांतिको नहीं पाता है। ४। जो द्रव्य देनेवाले अकुलीन मनुष्यमें भी प्रीति करती है और निर्धनको छोड देती है उस वेश्याको बुद्धिमान नहीं सेवते हैं। ५। जो वचनमें कोमल और चित्त में कठोर है ऐसीगणिका छोडने ६। सत्यवचनोंमें रत तपस्वी मुझे सुखदें। [योग्य है। ७। जिसप्रकार वनमै भ्रमणकरने वाले सिंहकेमुखमै प्रविष्ट मृगकी रक्षा करने में कोई भी नहीं समर्थ है उसीतरह संसारमैनांत और संस्कृतमवेशिनी। यममुखमें प्रविष्ट जीवकी रक्षा करने में भी कोई समर्थ नही है। ८। यदि मृतक मनुष्य शोक करनेपर पुराने शरीरको पाले अथवा अपना मरण होजाय तो शोक करना उचित है। ९। हे विद्वानो! तुम लोग सर्वदा सम्यग्दर्शनशानचारित्ररूप नदि- योंमें स्नान करो। १०। नगरको जाते हुये लोग वृक्षच्छायामे बैठते हैं । ११। गंगाप्रभृति नदियों में बडे २ मत्स्य रहते हैं। १२ । करणीयवस्तुमे भाग्य ही प्रमाण है। १३। चंद्रवदने! मैं तेरी (त्वदीय) सरल. आज्ञानुकूल प्रवर्तन करने वाली दासियोंमें भी अविनयकी संभावना नहीं करता हूं (न संभावयामि)। साहित्य परिचय। यदि भवति समुद्रः सिंधु नदी तोयेन तृप्तो यदि कथमपि वहिः काष्ठसंघाततश्च । अयमपि विषयेषु प्राणिवर्गस्तदा स्यात् होगा] इति मनसि विदंतो जानते हुये] मा व्यधुः (मत करो) तेपु यत्नं ॥१॥ सततविविधजीवध्वंसनाद्यैरुपायैः स्वजनतनु शिरीर, निमित्तं कुर्वते करते हैं] पापमुग्रं । व्यथिततनुमनस्का जंतवोऽमी सहते नरकर्ति [मु] उपेताः [प्राप्त हुये) दुःखमेकाकिनस्ते ॥२॥ किमिह परमसौख्यं निस्पृहत्वं यदेतत्, किमथ परमदुःखं सस्पृहत्वं यदेतद। इति मनसि विधाय करके त्यक्तसंगाः परिग्रहरहित] सदा ये विदधति (धारते है) निजधर्म ते नराः पुण्यवंतः ॥ ३ ॥ त्यजत युवतिसौख्य क्षांतिसौख्यं श्रयध्वं [होओ) विरमत (विरकहोओ) भवमाात् मुक्तिमार्गे रमध्वं (आसक्त- जहित (छोड़ो) विषयसंग ज्ञानसंगं कुरुध्वं (करो) अमितगति (मोक्ष) निवासं येन नित्यं लभध्वं ॥ MIG १०२ सनातनजैनग्रंथमालायां- आत्मानं (म) अन्य (म) अथ हंति (मारता है)जहाति (छोड़ता है)धर्म पापं समाचरति युकं (म) अपाकरोति (दूर करता है)। पूज्यं न पूजयति वक्ति (वदति) विनिंद्यवाक्यं किं किं करोति न न खलु कोपयुक्तः ॥५॥ तावद् नरो भवति तत्वविद् (६) अस्तदोषो मानी मनोरमगुणो मननीयवाक्यः । शूरः समस्तजनता(जनसमूह) महितः कुलीनो यावद् हृषीक (इंद्रिय) विषयेषुन सक्तिमेति (प्राप्त होता है)॥६॥ यथाऽन्धकारांधपटावृतो जनो विचित्रचित्रं न विलोकितुं क्षमः । यथोक्त (वास्तविक) तत्त्वं भवनाथभाषितं निसर्ग (स्वभाव) मिथ्यात्वतिरस्कृतस्तथा ॥ ७॥ परं विपं भुक्तं म] असु [प्राण] क्षयक्षम वरं वनं श्वापदघद् (हिंस्रजंतु) निपेवितं । वरं कृतं वह्निशिखाप्रवेशनं परं न मिथ्यात्वयुतं हि जीवितं ॥ ८॥ विचित्रवाचित (सहित) चित्रं (मु) उत्तम यथा गताक्षो (अंधः) न जनो विलोकते प्रदयमानं न तथा प्रपद्यते (विश्वास करता है) कुदृष्टि (मिथ्याष्टि) जीवो भवनाथशासनं ॥९॥ सुरेंद्रनागेंद्रनरेद्रसंपदः सुखेन सी लभते भ्रमन् भवे । अशेष (सर्व) दुःखक्षयकारणं पर न दर्शनं पावनं (म) अश्नुते (पाता है)जनः ॥१०॥ न याधवा नोसुहृदो न वल्लभा न देहजानो धनधान्यसंचयाः। तथा हिताः संति शरीरिणा (जीवोंको) यथाऽत्र सम्यक्त्वं [सचे पदार्थों फा श्रद्धान करना] (म) अदूपितं हितं ॥१०॥ विनश्वरं पापसमृद्धि- वर्श निपाफ (अंतम) दुःखं बुनिंदनीयं । तदन्यथाभूतगुणेन (विष- संस्कृतप्रवेशिनी। रीत गुणधाले) तुल्यं शानेन राज्यं न कदाचिद् (द) अस्ति ।। १२ ॥ पूज्यं स्वदेशे भवति (ती) इह राज्यं, शानं त्रिलोकेऽपि सद् (द) अंचनीयं । ज्ञानं विवेकाय, मदाय राज्यं, ततो न ते तुल्यगुणे भवेता [हिं] ॥१३॥ सर्वेऽपि लोके विधयो यथार्थी शानाद् ऋते नैव भवंति जातु कभी] । अनारमनीयं [ आत्माके अहितको] परिहर्सफामा- स्तदर्थिनो [आत्माके हितेच्छु] ज्ञानमतः श्रयंति॥ १४ ॥ धर्मार्थकामव्यवहारशून्यो विनष्टनिःशेष सर्व] विचारखुद्धिः। रात्रिंदिनं भक्षणसक्तचित्तो ज्ञानेन हीनः पशुरेव शुद्धः ॥ १५॥ वरं विषं भक्षितं [H] उपदोपं वरं प्रविष्टं ज्वलने (अग्नौ) ऽतिरौद्रे । वरंकृतांताय थिमाय] निवेदितं स्वं, न जीवितं तत्त्वविवेक शान मुक्तं १६ परोपदेशं स्वहितोपकारं ज्ञानेन देही वितनोति [करता है] लोके । जहाति छोड़ता है] दोषं श्रयते गुणं च ज्ञानं जनस्तेन समर्चनीयं ॥१७॥ निरस्तभूषो [भूषणरहित] ऽपि यथा विभाति [शोभते] पवित्रचा- रित्रविभूपितात्मा। अनेकभूषामिरलंकृतोऽपि विमुक्तवृत्तो [चारि- प्रशून्य न तथा मनुष्यः॥१८॥ विनश्वरमिदं वपुर्युवतिमानसं चंचलं भुजंगकुटिलो विधिः पवनगत्वहिवाके समान गमनशील जीवित। अपायवहुलं धनं यत परिप्लवं विनाशीक] यौवन तथापि न जना भवन्यसनसंततेर्विभ्यति डरते हैं ॥ १९ ॥ बांधवमध्येपि जनो दुःखानि समेति [पाता है| पापपाकेन । पुण्येन वैरिसदनं [घर] यातो गतः] ऽपि न मुच्यते सौख्यैः॥ २० ॥ द्वीपे जलनिधि समुद्रामध्ये गहनवने वैरिणां वैरियोंके] समूहेऽपि । रक्षति मयै सुकृतं पूर्वकृतं भृत्यवत् सततं ॥ २१ ॥ तापत् नरो कुलीनो मानी शूरः प्रजायतेऽत्यर्थे । यांपत् जठर [उदर पिशाचो वितनोति न पीडनं देहे ॥ २२ ॥ दासीभूय मनुष्यः परवेश्मसु नीचकर्म विदधाति ।

१०४ सनातनजैनग्रंथमालायां- चाटुशतानि [सैकड़ों मीठे वचन] च कुरुते जठरदरी [कंदरा] पूरणा- संस्कृत वनाओ। [कुलितः॥ २३ ॥ अति विनयी श्रेणिकसे मुनिने कहा कि यदि तुम स्वकीयपूर्व- भव सुनना चाहते हो तो ध्यानपूर्वक सुनो-शृणु] मैं कहता हूं- इस लोकमें एकलक्षयोजनपरिमित जम्बूनामक द्वीपमे भरतक्षेत्र है उसमें सूर्यकांत देश है वह देशधनधान्यादि पदार्थोसे सर्वदा शोमित रहता है वहांके सूरपुर नामक नगरमें एक मित्र राजा राज्य करता था। जो कि नीतिमार्गानुसार संपूर्ण प्रजाकी रक्षा करनेमें प्रसिद्ध था । कालवीतनेपर महारानी श्रीमती सुमित्र और मंत्रिपनी सुषेण नामक पुत्रोंको जनती हुई [सूतवत्यौ] उनमै सुमित्र अमिमानवशसे सुषेणको दुःख देताथा और सुषेण भयवश उस दुःखको सहता था। बादको जव मित्रके मरनेसे सुमित्र राजसिंहासन पर विराजा तय मंत्रिसुत्त सुषेण अतिचितान्वित हुआ उसने यह विचारकर कि "सु- मित्र अति क्रूर है उसने मुझे लड़कपनमै अति दुःख दिया है । इस समय वह राजा होगया है इससे अधिक कष्ट देगा इसलिये इसके राज्यमै रहना ठीक नहीं है" कुटुंबमोहको छोड़ दीक्षा लेली। जबसे सुषेण वनको गये तबसे राजमंदिरको न आये। राजा सुमित्र भी राज्य पाकर भोगोंका अनुभव करने लगा। एकदिन राजा एकांतमें बैठा था कारणवश उसकोसुषेणकी याद आई (सुषेणं स्मृतवान्) पूछनेपर किसी पार्श्वचरने कहा कि वे तो दिगंबर मुनि होगये हैं। उन्होंने समस्त संसारसे मोह छोड़ दिया है। किसी समय मुनि सुषेणको सूरपुरके बगीचे [सूरपुरारामे में आया जान- कर राजा सुमित्र अतिप्रसन्न हुआ। तत्काल वह दर्शनके लिये गया। प्रवल मोहनीयोदयसे मुनिमुद्राको न विचार राजा कहनेलगा "प्रियमित्र ! मेरा राज्य अतिविशाल है शुभकर्मसे मैंने उसे पाया है। ऐसे विशाल राज्यको छोड़कर मेरे विना पूछे आपने । संस्कृतप्रवेशिनी। १०५ दीक्षा लेली यह ठीक न किया। आप मेरा आधा राज्य ले इंद्रिय सुखोंका अनुभव करें। राजा सुमित्रके मुखसे मोहपूर्ण वचन सुनकर मुनि सुषेणने कहा-"राजन् मै अपनी आत्माको शांतिमयी अवस्थामै लाना चा- हता हूं। परमवमें मेरी आत्मा शांतिस्वरूपका अनुभव करे इसलिये मैंने दुष्कर तप आचरा है । मैं विश्वास करता हूं कि उत्तम तपस्यासे मैं अवश्यही अपरिमित सुखका अनुभव करूंगा।" मुनिराज सुषेणसे यह उपदेश सुन राजाने कहा-"मुनिनाथ! आप तप छोडना नहीं चाहते तो कृपाकर मेरे राजमंदिरमें आहा- रार्थ अवश्य आवें। मुनिने कहा- मैं यह काम करने में भी अस- मर्थ हूं। दिगंबरमुनिको पेसा करनेका पूर्णतया निषेध है" राजाने इसतरह विरक्त मुनिको देख नमस्कारफर राजमंदिरकी तरफ प्रस्थान किया। - उपसंहार। हिंदी वनाओ- वीरो वीरनरामणीगुणनिधिवीर हि वीराश्रिताः। वीरेण (णे) इह भवेत् [ हो ] सुवीरविभवं वीराय नित्यं नमः। वीरात् धीरगुणा भवंति सुधियां विद्वानोंको वीरस्य नित्या गुणाः। वीरे मे दधतो मनोऽरिविजये है वीर शकिं कुरु ॥१॥ यो जानाति समं समस्तमनिशं यं सूरयः आचार्य] संश्रिताः येन (ना) अदर्शि दिखा] विमुक्तिवम सुधियोयस्मै स्पृहां कुर्वते । यस्मात् तत्त्वविनिश्चयोऽप्रतिहतं यस्य स्यै] एव शास्त्रं जयो यस्मिन् विस्मयनीयपुण्यमहिमा भूयात् (हो) स वः (युप्माकं) श्रीजिनं निगाथै समर्चितपदद्वयं। [श्रेयसे ॥२॥ नत्वा पाथरस्य (स्यो) उचैर्जिनमक्तिकथा (थो) उच्यते ॥१॥ . १ सनातनजैनग्रंथमालायां- देशेऽत्र मागधे रम्ये मिथिलायां महापुरी। राजा पारयो जातो विख्यातो मुग्धमानसः ॥२॥ एकदाऽसौ महाटव्यां पापद्ध्यै ( शिकारखेलने)भूपतिर्गतः । दृष्ट्वा (ट्दै) एक शशकं पृष्ठे तस्य (स्था) अश्वं वाहयद् द्रुतं ॥ भूत्वा (त्वै) एकाकी धने कालगुहां प्राप्तः स्वपुण्यतः ॥३॥ तत्र दीप्ततपो-योगात् विस्फुरदकांतिमद्भुतं । सुधर्ममुनिमालोक्य रत्नत्रयविराजितं । शांतो बभूव संतप्तो लोहपिंडो यथाऽम्भसा (जलेन) ॥४॥ तुरंगाद् (द) अवतीर्याशु तं प्रणम्य महामुदा। धर्ममाकर्ण्य जैनेंद्र सुरेंद्राद्यैः समर्चितं ॥ सम्यक्त्वाणुव्रतानि (न्यु) उचैः समादाय सुभक्तितः। संतुष्टः पृष्टवान् (नि) इत्थं सुधीः पनरथो नृपः ॥५॥ भो मुने! भुवनाधार! जैनधर्माम्बुधौ विधो! धक्तृत्वादिगुणोपेतस्त्वादृशः पुरुषोत्तमः ॥ कि कोऽपि वर्तते क्वाऽपि परो वा न नि] इति धीधन । संदेहो मानसे मेऽ [मम]स्ति ब्रूहि [कहिये ] त्वं करुणापर ॥ ६॥ तत् श्रुत्वा स मुनिः प्राह (बोले) सुधर्मों जैनतत्त्ववित् । ऋणु त्वं मो महीनाथ | चम्पायर्या विवुधार्चितः। तीर्थकत्वासुपूज्योऽस्ति द्वादशो भवशर्मदः ॥७॥ तस्य वासुपूज्यस्य शानदीप्तिगुणोदये। अतरं मे [मम] तरांचाऽस्ति मेरुसर्षपयोरिव ॥८॥ तदाऽऽकर्ण्य मुनेवाक्यं धर्मप्रीतिविधायकं । तत्पादवंदनासक्त्यै संजातः सोत्सवो नृपः ॥९॥ यावत् चचाल [चला ] सद्भत्या प्रभाते प्रीतिनिर्भरः ॥ १० ॥ तावत् धन्वंतरि ना सुधीर्विश्वानुलोमवाक् । तौ सखायौ [मुहदौ ] सुरौ भूत्वा-समागत्य महीतले।

संस्कृतप्रवेशिनी। २०७ तस्य भक्त परीक्षार्थ मार्गे संगच्छतो मुदा । दर्शयामासतुः (दिखलाते हुये ) कष्टं कालसर्प तिरोगतं ॥ ११ ॥ मायया छत्रभंगं च पुरोदाहादिकं पुनः । अकालेऽपि महावृष्टिं निमग्नं कर्दमे द्विपं ॥ १२ ॥ मंत्री [ज्या ] आदिमिस्तदा वार्यमाणोऽपि बहुधा नृपः। "अमंगलशते जाते गम्यते नैव भूपते" ॥ १३ ॥ "नमः श्रीवासुपूज्याय" भणित्वा [त्वे] इति प्रसन्नधी। कर्दमे प्रेरयामास [हांक दिया] भकिमान निजकुंजरं ॥ १४॥ तथाभूतं तमालोक्य जिनमक्तिभरान्वितं । स्वमायां (मु) उपसंहृत्य संप्रशस्य सुरोत्तमौ । सर्वरोगापहरं हार मेरी योजन-नादिनीं। धर्मानुरागतस्तस्मै दत्वा स्वस्थानकं गतौ ॥ १५ ॥ यस्थ चित्ते जिनेंद्राणां भक्तिः संतिष्ठते सदा। सिध्यति सर्वकार्याणि तस्य नैव (वा) अत्र संशयः ॥१६॥ ततः पद्मरथो राजा प्रष्टहदयांबुजः । गत्वा चंपापुरी तत्र दृष्ट्वा त्रैलोक्यमंगलं ॥ वासुपूज्यं जिनाधीशं समभ्यर्च्य सुभक्तितः। स्तुत्वा स्त्रोत्रैस्तथा नत्वा श्रुत्वा तत्त्वं जिनोदितं । दीक्षा (मा) आदाय जैनेंद्री पादमूले जिनेशिनः संजातो गणभृत् चारुचतुझानविराजितः ॥ १७ ॥ अतो भन्यैः सदा कार्या जिनभक्तिः सुशर्मदा । स्वक्त्वा मिथ्यामतं शीघ्र स्वर्ग-मोक्ष-सुखाप्तये ॥ १८॥ यथा पारथो राजा जिनसक्तिपरोऽभवत् (हुआ)। अन्यैश्वाऽपि महाभव्यैर्भवितव्यं तथा श्रिये (लक्ष्म्यै )॥ १९ ॥ सस्कृत बनामो- काशीके राजा पाकशासनने एक समय अपनी प्रजाको महा- .. .

सनातनजैनग्रंथमालायां- मारी (अतिदारणरोग) से पीड़ित देखकर ढिंढोरा ( राजाशा) पिटवाया (निःसारिता) कि-"नंदीश्वर पर्वमें आउदिन पर्यंत किसी जीवका वध न हो, इस राजाशाका उल्लंघयिता प्राणदंडसे दंडित होगा" वहीं एक सेठपुत्र धर्मनामक रहता था वह महा अधर्मी सप्तव्यसनकासेवक था। वह मांसभक्षणके विना एक दिन भी नरह सक्का था । एकदिन वह राजाके बगीचे (उद्यान) में गया। वहां यजा का एक मेंढा (मेष) था उसको उसने मारडाला और वह उसके कच्चे (अपक) ही मांसको खागया। दूसरे दिन जब राजाने बगीचेमें मेंढा न देखा तय उसके अन्वेषण करनेको बहुतसे गुप्तचर नियुक्त किये उनमेसे एक गुप्तचर राजाके बागमें भी गया। वहांका माली ( आरामरक्षक ) रातको सोते समय सेठपुत्रद्वारा मैढेके मारे जानेका वृत्तांत अपनी खीसेकह रहा था । सो वह उस गुप्तचरने सुनलिया और महाराजाले जा यह वात कह दी । राजाको प्रेष्ठिसुतपर बड़ा गुस्सा आया और कोत- पालको कहा कि-"पापी धर्मने जीवहिंसा तथा राजाशोल्लंघन कि- या है अतः इसको शूलिपर चढ़ा (आरोग्य) मारडालो।" कोतवाल धर्मको शूलिगृहमें लेगया और नौकर यमपालनामक चांडालको बुलानेको मेजे क्योंकि यह कार्य उसीका था यमपालने एक दिन सर्वोपधिऋद्धिधारी मुनिराजसे धर्मोपदेश सुन प्रतिज्ञा ली थी कि "मैं चतुर्दशीके दिन जीववधन काँगा" इसलिये उसने राजसेवकों को आते हुये देख अपने व्रतकी रक्षा के लिये अपनी स्त्रीसे कहा कि- "प्रिये ! किसीको वध करनेकेलिये मुझे बुलाने (आह्वयितुं) राज- सेवक आरहे हैं। सो तुम उनसे कहदेना कि घरमें वे नहीं हैं दूसरे गांव गये हुये हैं" इसप्रकार कहकर वह गृहके एक कोने (कोण) में छिप रहा । जब राजनौकर उसके घरपर आये तब चांडालप्रियाने उसीतरह कह दिया । इलयातको सुनकर नौकरों ने कहा-हाय ! (इंत) संस्कृतमधेशिनी। यह घड़ा अभागी है देवने उसे ठग लिया (वंचितः) आज ही तो एक सेठसुतके मारनेका अवसर हाथ आया । आजही वह प्रामां- तर चला गया । यदि वह आज यहां होता (स्यात्) तो उसे वस्त्र- भूपण प्राप्त होते (प्राप्येत्) चांडालिनीने इस बातको सुनकर अंगुली के इशारे (संशया) से उसे बता दिया (दर्शितः)। राजनौकरोंने उसे घरसे बाहर निकाला चांडालने निर्भय हो कहा कि "मैं आज चतुर्दशीको वध न करूंगा" यह सुन राजकिंकर उसे राजाके पास ले आये। वहां भी उसने वैसा ही कहा। राजा ने ऐसा सुन आज्ञा दी कि इन दोनोंको मकर मत्स्यादि क्रूर जीवोंसे पूर्ण तालाबमें डाल दो। राजाशाके अनुसार तालाबमें डालते ही पापी धर्मको तो जलजंतु खागये और यमपालकी उस व्रतमें हड़ता देख देवोंने सहायता की । उसको तालायमें ही सिंहासनपर वन- आभूषणोंसे सज्जितकर बैठाया [स्थापितः]। जब राजा और प्रजाको यह मालूम हुआ तब उनने भी उसका सत्कार किया और बहुत पारितोषक दिया। यद्यपि यमपाल जाति (जात्या) का चांडाल था पर उसके हृदयमें बढ़ प्रतिज्ञापालनकी पवित्र वासना थी इसलिये उसका देवोंने भी सत्कार किया। । परिशिष्ट । पुलिंग पतिशब्द दीर्घ इकारात ग्रामणी शब्द एक. द्विवर बहुव. द्विव. बहुव० तृ. पत्या पतिभ्यां पतिमिः ग्रामण्या ग्रामणीभ्यां प्रामणीमिग १ सरिस शब्दके रूपभी इसीके समान होंगे। २ सुधी और नी आदि एक स्वरवाके शब्दोंको छोडकर शेष दीर्घ कारात शब्दोंके रूप इसके समान होंगे। . एक० ११० सनातनजैनग्रंथमालायां- एक. द्विव० बहुव० एक. द्विव० बहुव. च. पत्ये पतिभ्यां पतिभ्यः प्रामण्ये ग्रामणीभ्यां प्रामणीभ्यः। पं. पत्युः पतिभ्यां पतिभ्यः ग्रामण्यः ग्रामणीभ्यांग्रामणीभ्यः। प. पत्युः पत्योः पतीनां ग्रामण्यः ग्रामण्योः ग्रामण्यां। स. पत्या पत्योः पतिपु ग्रामण्यां ग्रामण्योः ग्रामणीपु । सुधीशब्द क्रोष्टुशब्द तु. सुधिया सुधीभ्यां सुधीमिः प्रोष्ट्रा, क्रोष्टुभ्यां कोष्टुमिः । कोष्टुना च. सुधिये सुधीभ्यां सुधीभ्यः क्रोष्ट्र, क्रोष्टुभ्यां क्रोष्टुभ्यः । क्रोएवे पं. सुधियः सुधीभ्यां सुधीभ्यः क्रोष्टुः, फ्रोष्टुभ्यां क्रोष्टुभ्यः । फोटो प. सुधियः सुधियोः सुधियां क्रोष्टुः, क्रोष्ट्रोः, क्रोष्ट्रनां । क्रोटोः क्रोष्ठोः स. सुधियि सुधियोः सुधीषु क्रोष्टौ, क्रोष्ट्रोः, कोप्ट्रो, कोष्टुषु। कोष्टरि कोष्टवोः दीर्घ ऊकारात खलपूशब्द लूशेन्द तु. खलप्वा खलपूभ्यां खलपूमिः लुवा लूभ्यां लूमिः। च. खलप्वे खलपूभ्यां खलपूभ्यः लुवे लूभ्यां पं. खलप्वः खलपूभ्यां खलपूश्या लुवः लूभ्यां ष. खलप्वः खलप्वोः लुवो स.खलप्वि खलप्वोः खलपूषु लुवि लुवोः लूभ्यः। लूभ्यः। लुवाम् । खलप्वां लुवः ३--नी शब्दके रूप इसके समान होंगे परंतु सप्तमीके एक वचनमें 'निया' रूप ४ दम्भू, करभू, पुन, वर्षाभूको छोडकर शेष शब्द जिनके अतमें 'भू' है उनके रूप 'ए' के समान होते हैं और इन्भू आदि चारोंके 'खलपू' के समान होगा।

संस्कृतप्रवेशिनी। गवां राय: रासु। एक. द्विव. द्विव बहु. ओकारात गोगन्द कारात रेशन्द गवा गोभ्यां गोभिः राया राभ्यां रामिः। च, गवे गोभ्या गोभ्या राये राभ्यां राभ्यः। पं. गोः गोभ्यां गोभ्या रायः राभ्यां राभ्यः। गो गयोः रायोः रायां। स. गवि गयोः गोषु रायि रायोः आकारात ग्लौशब्द जफारात मिपशब्द तृ. ग्लावा ग्लौभ्यां ग्लौमिः मिपजा मिषग्भ्यां मिपग्भिः। च. रलावे ग्लोभ्यां ग्लोभ्यः सिपजे मिषग्भ्यां मिपम्भ्यः । पं. ग्लाव: ग्लोभ्यां ग्लौभ्यः भिपजा मिपग्भ्यां मिपरभ्यः। प. ग्लायः ग्लावोः रलावां मिपजः मिषजोः मिपजां। स. ग्लावि ग्लायो ग्लोषु मिपजि मिपजोः मिषक्षु। श्वन शब्द युवन् शन्द ४. शुना स्वभ्यां युवभ्यां युवमिः। च. शुने श्वभ्यां श्वभ्यः यूने युवभ्यां युवभ्यः। पं. शुनः श्वभ्यां श्वभ्यः यूनः युवम्या प. शुनः शुनोः यूनो यूनां । स. शुनि शुनोः श्वसु यूनि यूनोः नकारात पथिन् शब्द तकारात ददत् शब्द तु. पथा पथिभ्यां पथिमिः ददता ददश्या ददद्भिः। च. पथे पथिभ्यां पथिभ्यः ददते ददश्यां ददभ्यः । पं. पथः पथिभ्यां पथिभ्यः ददतः ददम्यां ददद्भ्यः। श्वमिः यूना युवम्या। शुनां यून युवसु। १-जिन शब्दोके अतमें भूज, सृज्, मृज्, यज राज्, भाज् हैं उनसे तथा परि- बाज् युज इन शब्दोंसे भिन्न शब्दोंके रूप इसके समान होंगे।

सनासनननंथमालायां- यह पथां ददतः पथिषु ददति ददतो ददतो. विशब्द एक. द्विय प. पथः पथोः स. पथि पथोः पुरस् शब्द तृ पुंसा पुभ्यां च. पुंसे पुंज्यां पं पुंसः पुंभ्यां ष. पुंसः पुंसोः स. पुंलि पुंसोः यहु. ददतां। ददत्म। त्रिगद त्रिमिः। त्रिश्या निभ्या प्रयाणां। पुम्भिः 'भ्यः पुंश्यः पुंसां पुंसु द्वान्या द्वाभ्यां तयोः बयोः ० ० त्रियु। स्त्रीलिंग त्रिशब्द तिसमिः। . . . तिसभ्यः। तिसभ्यः। जरा शब्द तृ. जरसा, जराम्यां जरामिः जरया च. जरसे, जराम्यां जराभ्यः जरायै पं. जरसः, जराभ्यां जराभ्यः जराया प. जरसः, जरसो, जरसां जरायाः जरयोः जराणां स. जरसि, जरायां जरयोः श्रीशब्द तृ. थिया श्रीभ्यां तिरुणां। जरसोः जरासु तिखषु। चतुर शब्द चतमिः। १४ी, भी, धीके रूपसी इसके समान होगे।

- . भूम्यां संस्कृतप्रवेशिनी। द्विव. बहुव एफ. द्विष. बहुव. च.त्रिय, श्रीम्यां श्रीभ्यः चतसृभ्यः। • श्रिये पं. श्रियाः, श्रीश्यां श्रीश्यः चतसृभ्यः। श्रियः प. श्रिया:, श्रियोः श्रीणां चतरुणां। श्रियः स. श्रियि, श्रियोः श्रीषु चतसृषु। श्रियां दीर्घ ऊकारात धूशब्द इर् भागात गिशब्द तृ. सुवा गीया च. • भुवै भूभ्यां गीय गीभ्यः। पं. . ध्रुवाः भ्रूभ्यां गिरः गीयों गीर्य। प. ध्रुवाः ध्रुवोः गिरोः गिरा। स. ध्रुवां भ्रुवोः भ्रूषु गिरि गिरो गीर्छ । भफारात ककुभ् शब्द ह. ककुभा ककुभ्यां ककुभिः अद्भिः। च. ककुमे ककुभ्यां ककुभ्यः अद्भ्यः। पं. ककुमा ककुम्भ्यां ककुभ्यः अश्यः। प. ककुमः ककुभोः ककुभां अपां। स. ककुमि ककुभोः ककुत्सु अप्सु। दिश शब्द आशिशब्द प्र. दिक् दिशौ दिशा आशीः आशिषौ आशिषः। १-इन्भू, करभू, पुनर्भू, वर्षाभूके सिवाय शेष शब्दोंके जिनके कि अतमें 'भू' है उनके रूप इसके समान होंगे। २-पुर आदि उर् भागात शब्दोंके रूप भी इसके समान होंगे। भूमिः गिरा भ्रूभ्यः गिरे भ्रूभ्यः भ्रुवां गिरः अप शब्द ० .

११४ सनातननग्रंथमालायां- एक द्विव. बहुच एक द्विव. बहुव वि. दिश दिशी दिशौ दिशः आशिर्ष आशिण आशिषः। १. दिशा दिग्भ्यां दिग्भिः आशिषा आशीया आशीमिः। च. दिशे दिग्भ्यां दिग्भ्यः आशिपे आशीया आशीयः। पं. दिशः दिग्भ्यां दिग्भ्यः आशिपः आशीया आशीर्यः । प. दिशः दिशोः दिशां आशिपः आशिपोः आशिषां । स. दिशि दिशोः दिक्षु आशियि आशिपोः आशीषु । दिव शब्द एक द्विव बहुव प्र. धौः दिवी दिवः। द्वि दिवं दिवी दिवः। तृ दिवा पयुभ्यां ब्युमिः। च. दिवे ब्युभ्यां व्युभ्यां प. दिवः दिवोः दिवां। स. दिवि दिवो पं. दिवा दयुभ्यः। व्युम्यः। व्युषु। अक्षि शब्द बहुव. नपुसकलिंग कर्तृ शब्द. द्विव बहुव द्विव त. अक्षणा अक्षिम्यां अक्षिमिः कर्तृणा कर्तृम्यां कर्तृमिः। च. अक्षणे अक्षिभ्यां अक्षिस्य, कर्तृणे कर्तृभ्यां कर्तृभ्यः। पं. अक्ष्णः अक्षिभ्यां अक्षिभ्यः कर्तृणः कर्तृभ्या कर्तृभ्यः । ष, अक्षणः अक्ष्णोः अक्षणां कर्तृणः कर्तृणोः कर्तृणां । स. अणि अश्णोः अक्षिषु कर्तृणि कर्तृणोः १-दपि, अस्थिके रूप भी इसके समान होंगे। कर्तृषु ।

संस्कृतप्रवेशिनी। द्वि. नाम नामन् शब्द पायिन् शब्द एक द्विव. बहुव. एक द्विव. बहुच. नाम्नी नामानि पायि पायिनी पायीनि। नाम्नी नामानि पायि पायिनी पायीनि। सु. नाम्ना नामश्यां नाममिः पायिना पायिभ्यां पायिभिः । च. नाम्ने नामभ्यां नामभ्यः पायिने पायिभ्यां पायिभ्यः। पं. नाम्नः नामभ्यां नामभ्य: पायिनः पायिन्यां पायिभ्यः। ष. नाना नाम्नो नानां पायिनः पायिनोः पायिनां। स. नाम्नि नाम्नो नामसु पायिनि पायिनो पायिषु। अहम् शब्द द्विव. बहुष. प्र. अहः अहनी, अही अहानि। अहनी, अही अहानि। तु. अहा अहोभ्यां अहोमिः। .च. अहे अहोभ्यां अहोभ्यः। अहोभ्यां अहोभ्यः। अहो अहां। स. अहि, अहनि अहो अहम्सु। द्वि. अहः पं. अहः " त्रिलिंग शब्द प्र. पंच पंचेन् शब्द षष् शब्द अष्टन् शन्द बहुवचन बहुवचन बहुवचन षट द्वि. पंच षद १-सप्तन्, नवन्, दशन् आदि नकारात सख्यावाचक शब्दोंके रूप इसके समान होगे एकोनविंशति [१53 से आगेकी सख्याके अर्थको कहनेवाले सब शब्दोंके कप एकवचनमें ही चलते हैं और वे अपने समान शब्दवालोंके समान ही होते हैं। अष्टौ, अष्ट। अष्टौ, अध।

सनातनजैनग्रंथमालायां- बहुपचन बहुवचन बहुवचन तु. पंचमिः षड्मिा अष्टमिः, अष्टामिः। च. पंचभ्यः षड्भ्यः अष्टभ्या, अधाभ्यः। प. पंचभ्यः षड्झ्या अष्टभ्यः, अधाभ्यः। घ. पंचानां षण्णां अष्टानां । स. पंचम अष्टसु, अष्टासु। नोट-प्रथमभागके परिशिष्टमें तो जो शब्द दिये हैं और यहां नहीं दिये गये हैं उनके तृतीया आदि विमक्तियोंके रूपोमें कुछ अतर नहीं समझना, उनके रूप उन सारिखे शब्दोंके समान ही चलेंगे । चतुर्थ अध्याय । (भ्वादि और तुदादिगणीय धातुओंका विधि [लिङ्] अर्थमें व्यवहार) प्रथम पाठ। परस्मैपदी घातु । १ शानार्थी विद्वांसं श्रयेत्-ज्ञानका इच्छुक विद्वानका सहारा है। तृष्णात जलं पिबेत्-पिपासाकुल पानीको पीवे । मुखार्थी ईश्वरं अर्चेत्-सुखका इच्छुक ईश्वरको पूजे । तपस्वी सत्तपः चरेत्-तपस्वी सच्चे तपको करे । जिशासुः गुरुं पृच्छेत्-जाननेका इच्छुक गुरुसे पूछे । ब्राह्मचारी असंयमं त्यजेत् ब्रह्मचारी असयमको छोडे । जनः सदा सत्यं वदेत्-मनुष्य सदा सच बोले । १-विधि (नियोग, आज्ञा करना) निमंत्रण, आमंत्रण (इच्छानुसार करनेकी आज्ञा देना) अधीष्ट (सत्कारपूर्वक किसी कामको करने कहना) संप्रम (पूछना) प्रार्थना (नामा करना)जन अमें लिट् लकारका प्रयोग होता है। 1 . संस्कृतमवेशिनी। २ शिशू खेलेतां-दो लडके खेलें । क्षत्रियौ कवचं वहेता--दो क्षत्रिय कवच पहिने । राजानी दुर्जनान् अर्दैतां-दो राजा दुर्जनोंको दंड दें । काक तक इंतेता-दो वढई दो पेड काटें । ३ मुनयः कर्माणि संहरेयु:-मुनि कर्मोको नष्ट करें। कुलाला: घटान् एजेयु:-कुम्हार घडोंको बनावें । केऽपि कानपि न रिपेयुः-कोई भी किसीको न मारें। जनाःमा मुधा लपेयुः-लोग व्यर्थ न बोले। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनावो- वांछेत्, ध्यायेतां, सरेयुः, अर्हेत्, पश्येतां, अंचेयुः, स्पृशेत्, दिशेतां, कांक्षेयुः, निदेव, तुदेता, रिषेयुः, नमेत्, श्रणेतां, यजेयुः, अटेत्, यच्छेत, याचेयुः, शपेत्, विशेतां, कुंवेयुः, सरेत्, कूजेता, भ्रमेयुः, जिनेत्, धमेतां, नयेयुः, धावेव, पतेता, तिष्ठेयुः, मनेत् । हिंदी वनाओ-- सत्यपूतां वदेत् वाणी । क्वचित् काणो भवेत् साधुः । वर्तमानेन कालेन, विहरेत् हि सदा वुधः। अशातकुलशीलेषु न कदाचन विश्वसेत् । सर्वदेवमयो राजा मनुना संप्रकीर्तितः, तस्मात् तं देव- पत् पश्येत् न व्यलीकेन [मिथ्या कर्हि चित् ॥ दहेत् खमेव रोषा- मिनी [] परं विषयं ततः। प्राप्ते तु पोडशे वर्षे पुत्रं मिश्रमिव [वा] आचरेत् । यस्तु भोगान् परित्यज्य शरीरेण तपश्चरेत्, न तेन किंचित् न प्राप्तं तद् मे बहुमतं फलं । यस्मिन् देशे न सन्मानं न प्रीतिर्न वांधवाः, न च विद्यागमः कश्चित् तं देशं झटिति त्यजेत् ॥ अर्थ- नाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च, चंचनं चापमानं च मतिमानो वहिवैदेत् ॥ अनित्यं यौवनं रूपं जीवितं द्रव्यसंचया, आरोग्य प्रियसंसर्गो गृध्येत् तत्र न पंडितः। अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः, आत्मनेष सहायेन यश्चरेत् स सुखी भवेत् ॥ .

११८ सनातनजैनग्रंथमालायां- - संस्कृत वनाओ- प्रतिदिन ईश्वरकी पूजा करनी चाहिये । विद्यार्थी गुरुकी सेवा करें। रथसे उतरते समय ऊपरकी तरफ देखना न चाहिये । जो इस ग्रंथको पढ़े यह अवश्य ही शानी होवे । वह सर्वज्ञ हमको सुख दे जिसने सच्चे धर्मका उपदेश दिया। विद्वान् लोग गरीबोंको विना मूल्य शिक्षा दें। धनाढ्य गरीबोंका पालन करें। दो शिष्य गुरुके चरणोंको प्रणाम करें। आपके रक्षक रहनेपर हमारा घर क्यों निरापद न होगा । आत्मा अपने स्वभावको प्राप्त करे। यदि अर्थ, मात्रा, पद और धाक्योंमें कुछ भी अशुद्ध कहा हो तो सरस्वती माता उसे क्षमा करे। हे भगवन् ! तुम्हारे प्रसादसे संसारमें शांति हो । द्वितीय पाठ। आत्मनेपदी धातु। १ जना गुणिनं कत्थेत-लोगोंको गुणी मादमीकी प्रशंसा करनी चाहिये । शिशुः चंद्र ईक्षेत-लडका चन्द्रमाको देखे । पापभीरू अनृतं न भाषेत-पापसे डरनेवाला आदमी झूठ न बोले । परिखा दुर्ग वेष्टेत-खाई किलेको वेष्टित करे । कश्चिदपि न नियेत-कोई भी न मरे । २ इमौ विद्यार्थिनौ ईहेयाता-ये दो विद्यार्थी यन करें। घने शरीरं कवेयातां-दो कपडे शरीरको ठकें । बालिके स्मयेयातां-दो लड़कियोंको मुस्कराना चाहिये । वर्षायां नद्यौ एघेयातां च में दो नदियोंको बढना चाहिये । सूर्याचंद्रमसौ द्योतेयातां-सूर्य और चंद्रमाको प्रकाशित होना चाहिये । ३ धार्मिकाः सुखं लमेरन्-धर्मात्मा लोग सुख पावें । जना: गुणिनो न ईजेरन्-लोगोंको गुणियोंकी निंदा न करनी चाहिये । विद्वांसः गभीरान् ग्रंथान् गाहेरन्-विद्वानोंको गभीर ग्रंथोंफा अवगाहन - संस्कृतप्रवेशिनी। ११९ साधवः सीन् तिजेरन्-साधुलोग सबको क्षमा करें। [करना चाहिये कर्मवीराः जगति प्रथेरन् काम करनेमे वीर आदमी संसारमें प्रसिद्ध हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- मिक्षेत, मानेयातां, मोदेरन्, नियेत, रोचेयाता, वर्चेत, यल्मेरन्, उचहेत, वयाता, व्यथेत, वेपेयाता, शंकेरन्, शिक्षेत, श्वेतेयाता, स्वादेरन्, स्फुटेत, स्यंदेयातां, मयेयाता, आद्रियेरन , उद्विजेत, प्यायेरन्, प्रसेत, गाद्धत, बाधेरन्, दधेयातां, ददेत, यतेरन् , अंथेत, चंडेयातां, कंपेत, पेरन् , काशेत, घूर्णेयातां, ऊहेरन् । संस्कृत बनाओ- विद्यार्थियोंको तर्क वितर्क करना चाहिये। राजाको प्रजाकी रक्षा करना चाहिये। मनुष्योंको पापसे डरना चाहिये। कायर आदमी सिंहसे डर। लड़कोंको खेल देखना चाहिये । जहां कहीं घे रहें पर उनको साधुओंकी सेवा करनी चाहिये। वह राज्य बढे । इससमय दिये जलने चाहिये। हिंदी थनाओ- परलोकं प्रयातस्य न गर्हत कदाचन । माऽनृतं कदापि कत्थेरन् । अप्राप्ये न ईहेत । स्वजननीं निरीक्ष्य मोदेत प्राणेभ्योऽपि गरीयसीं। सखायौ सखायौ ईक्षयातां । आपत्सु मित्र परीक्षेत। विनयिनछा- वान् पाठकाः शिक्षेरन् । शुद्ध करो- जना शोरपि गुणान् वदेरन् । सपीः शनैः सरेयातां । पक्षिणी मधुरं फूजेत् । मधाहे शंखान् छात्रा: धमेरन् । पापांत्य धर्म हेत् । रुग्ण औपचं स्वदेयातां ! सजनो दुर्जनान् दुरात् परित्यजे- रन् । केऽपि कानपि न यायेयुः । श्रावको मुनि वीक्ष्य हादेव ।

१२०
सनातनजनग्रंथमाला-
तृतीय पाठ।
उभयपदी धातु।
कर्षक: गते खनेत् [१]-किसान गहा खोदे ।
निर्धनः धनिनं भजेत् [त] गरीव धनवालेकी सेवा करे।
पुण्यात्मा दरिद्रं मरेत् [त-पुण्यात्मा दरिद्रका पोपण करे ।
२ रजको वस्त्राणि रजेता [ यातां दो धोयी (रंगरेज) कपडे रंगे ।
नृपा बद्धान मुंचेता [ याता -दो राजा कैदियोंको छोडें ।
मृगौ अद्रिं श्रयेतां [ यातांदो मृग पहाडका सहारा है।
३ दुर्जना हवयं मा तुदेयुः [रन् ]-दुर्जन हृदयको व्यथा न दें।
भृत्या मार बहेयुः रन्नौकर भार ढोवें ।
शिष्याः समिधा आहरेयुः [रन्]-शिष्य लकडी लावें ।
नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ।
गृहेत, छपेयाता, भजेरन् , यजेत् , याचेतां, वयेतां, भृज्जेत्
लुपेयुः, तुदेयाता, चषेत।
संस्कृत बनाओ--
मनुष्योंको कोई जीव न मारना चाहिये । शूद्रको तीनों वर्णोंकी
सेवा करनी चाहिये । जुलायोंको कपड़ा बुनना उचित है । मुनियों
को सच्चे तपका सहारा लेना ठीक है। मनस्वियोंको याचना
करनी ठीक नहीं। दो विद्यार्थियोंको वनसे लकड़ियां लाना चाहिये।
समर्थीको दीन दुखियोंकी सेवा करनी चाहिये।
-
चतुर्थ पाठ।
उत्तम पुरुष।
परमैपदी धातु ।
१ अहं पुस्तकानि पठेयं-मुझे पुस्तकें पढनी चाहिये।
अहं किमपि न इच्छेयं-मैं कुछ भी न चाहूं।

'संस्कृतप्रवेशिनी। १२१ अहं क्लिष्टं सततं रक्षेयं-मुझे दुखियाकी हमेशा रक्षा करनी चाहिये । अहं व्यर्थ न वदेयं-मैं व्यर्थ न बोलूं । २ आवां उचितसमये खेलेव हम दोनों उचित समयमें खेले । आवां भिक्षाथै चरेव-हम दोनो मिक्षाकेलिये चले। आवां सुपात्रदानं श्रणेव-हम दोनों सुपात्रदान देवे । ३ वयं पूज्यान् नमेम-हमलोग पूज्योंको नमस्कार करें । वयं दुग्धं पिवेम-हमलोग दूध पीचे । वयं अस्पश्यं न स्पृशेम हमलोग अस्पयको न छूवे । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- यच्छेयं, लिखेव, गच्छेम, नमेयं, वितरेम, विकिरेव, क्रीडेयं, अतेव, जीवेम, कूजेयं, गर्जेम, तपेयं । संस्कृत वनायो- मैं कभी भी झूठ न बोलूं। हमें तुरा काम न करना चाहिये। हम दोनोंको प्रतिदिन ईश्वरकी पूजा करनी चाहिये । मुझे गुरुके पास जाना चाहिये। भाई ! हमको शत्रु जीतने चाहिये । हमलोग विद्यार्थी हैं हमें इससमय ध्यानसे पढ़ना चाहिये। हम दोनोंको अभक्ष्य न खाना चाहिये। हमलोग स्त्रियां है हमें शर्म करना योग्य है। मुझे क्यों खेलना चाहिये । तुम दोनों पंडितोंको अच्छे अच्छे ग्रंथ देखने चाहिये। हिंधी बनाओ- अहं सदा धर्मतत्परो भवेयं । घयमेव पर्वतं किं गच्छेमा आवां सर्वदा विद्यादानं यच्छेव । दूतोऽहं नृपमर्चेयं । शठ ! त्वया सह नाहं वदेयं । हा! तामावां पश्येव ।

१२२ सनातनजैनग्रंथमालायां- पंचम पाठ। आत्मनेपदी धातु। १ अहं सुखं लमेय-मैं सुख प्राप्त करूं। अहं अपराधिनं तिजेय-मैं अपराधीको क्षमा करूं। अहं सततं ईहेय-मैं सर्वदा काम करूं। २ आवां शत्रोर्न क्षोमेवहि-हम दोनों शवैसे न क्षुब्ध हो । आवां कमपि न गवहि-हम दोनों किसीकी भी निदा न करें। आवांशास्त्राणिगाहेमहि हम दोनोंको शास्त्रोंका अवगाहन करना चाहिये। ३ वयं सत्तपसि दीक्षेमहि हमलोग सचे तपमें दीक्षित हो। वयं शंकेमहि हमलोगोंको शंका करनी चाहिये । वयं कदाचन न उद्विजेमहि हमलोग कभी भी उदिम न हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनावो- आद्रियेवहि, प्यायेमहि, ईक्षेमहि, कचेय, ईपेवहि, ईजेमहि, मिक्षेय, द्योतमहि, एधेय, प्रथेमहि, मानेवहि, वल्मेय, वढेमहि । - . शुद्ध करो- , - वयं साधून कत्थेयरन्, आवां मयेव, अहं स्वादेयं, आवां शिक्षयातां, क्यं शेमेयुः, अहं व्यथेत्, वयं क्षोमेय, आवां गहेमहि. अहं ईहेमहि । हिंदी वनाओ- अहं सर्वोत्कृष्ट वार्तिकादिरहितं व्याकरणं गाहेय । आवां सजन कत्थेवहि । अहं भगवद्विषयक गीतं शिक्षय । विपदाऽभिभूतोऽप्यहं धर्म न त्यजेयं । शिम्यस्याविनयमहं न सहेय । प्रजानामनुरंजनाय राजनो वयं यतेमहि । वर्धमानं व्याधि जयंतं शत्रु च नोपेक्षेमहि । सस्कृत बनामो- मुझे गुरुके पास न्यायशास्त्र पढ़ना चाहिये। हमलोगोंको शुद्ध अंत:करणसे ईश्वरपूजा करनी चाहिये।हम दोनोंको गरीब आदमि- - संस्कृतप्रवेशिनी। योंकेलिये धन देना चाहिये। मैं उसके साथ लड़ाई करूं । यदि मैं खराव काम करूं तो मुझे तर्जना देनी चाहिये।मा वाप प्रसन्न हों इस- लिये मुझे सदाचारी होना चाहिये । पष्ठ पाठ। उमयपदी धातु। १ कपकोऽहं गत खनेयं [य] मुझ किसानको एक गड्ढा खोदना चाहिये। अहं परपरिवादं गृहेयं [य]-मैं दूसरेकी निदाको छिपाऊं । अहं भक्ष्यं चपेयं [य] मुझे भक्ष्य चीज खानी चाहिये। २ आवां शत्रु छषेव [ वहि हम दोनोंको शत्रु मारना चाहिये । आवां निस्वं भरेव [वहि ] हम दोनो निधनको पालें। आवां ईश्वरं यजेव [ वहि ] हम दोनों ईश्वरको पूर्ने । ३ वयं वीज वपेम [ महि-हमलोगोंको बीज बोना चाहिये । वयं विदुपं भजेम [ महि] हमलोगोंको विद्वानका सहारा लेना चाहिये। वयं वनं श्रयेम [ माहि-हमलोग यनका आश्रय लें। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- आहरेयं, तुदेम, आदिशेमहि, भृज्जेय, लिंपेव, लुपैयहि, सिंचेम, भृज्जेमहि, पहेयं, नयेमहि । संस्कृत बनामो- यदि मैं काशी जाऊं तो बहुतसी पुस्तकें लाऊं। मुझे जहर न खाना चाहिये । हम दोनोंको धनाढयोंका सहारा न लेना चाहिये। हमलोगोंको शरीर लेपना चाहिये। मैं किसीका भी धन नहीं। हिंदी बनाओ- पंडितानां समाजेऽपंडिता वयं मौनं भजेमहि । कुसुमः सुरमिणि अपनेऽध्वखेदं अपनयेयं । धर्म रता वयं सर्वशं पश्येमा विपत्ती धर्म न परित्यजेम। - सनातनजैनग्रंथमालायां- शुद्ध करो- अहंज्यायांसंश्रयेमहि ।आवां वृक्षान्लुम्पेमहि, वयं वस्त्राणि वयेय। सप्तम पाठ मध्यम पुरुष । परस्मैपदी धातु। १त्वं चिरं जीव-तुम चिरकाल तक जीवो । त्वं शीबूं जवे:-तुम जल्दी चलो। त्वं कदापि मा कर्वेः-तुम्हें कभी मी घमंड न करना चाहिये। त्वं सततं मा क्रीडे:-तुम्हें हमेशा खेलना न चाहिये। २ युवां मत्तौ मा गर्जेत--तुम दोनों मत्तोंको गर्जना न चाहिये । युवा व्याकरणं पठेतं-तुम दोनोंको व्याकरण पढना चाहिये । युवां पत्र लिखेतं-तुम दोनोंको पत्र लिखना चाहिये । युवां ग्रामं गच्छेतं-तुम दोनों गावको जाओ। ३ यूयं शिवं इच्छेत-तुमलोग मोक्षको चाहो । यूयं तत्त्वं पृच्छेत-तुमलोग तत्त्व पूछो । यूयं दरिद्रान रक्षेत-तुमलोगोंको दारिद्रोंकी रक्षा करनी चाहिये। यूयं मा मृपा वदेत--तुमलोग झूठ न बोलो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- कंदे, खेलेतं, अर्देत, अचे, दिशेतं, ब्रजेत, कृतेः, इच्छेत, गदेः, स्पृशेः, अहेत, उपदिशेः, कांक्षत, अबे, पश्येतं, विकिरे, सृजेत, रिपेतं। हिंदी वनाओ- मा मुधा त्वं लपेः। यूयं वहन् दिवसान् जीवेत । युवां दुग्धं पिवेतं । यूयं स्वनयनरीश्वरं पश्येत । त्वमतीतं वृत्तांतं कथं न सरेः । सद्धर्म सदा उपदिशेः । अलभ्यं न कक्षित । युवां निरप- राधिन न निदे।

संस्कृतप्रवेशिनी। मंस्कृत वनाओ- तुमको जीवोंकी हिंसा न करनी चाहिये। तुमलोग प्रतिदिन स्मान करो। तुम दोनोंको पेड़ सींचने चाहिये। तुम संसाररूपी समुद्रको तरो। तुम दोनोंको प्रतिदिन पाठशाला जाना चाहिये । तुम्हें सच्चे शास्त्र पढना चाहिये । पंडितजी महाशय ! इस लड़के को कृपया पढ़ाइये । हमारे चिरंजीव नेमिचंद्रका विवाह है उस दिन अवश्य २ पधारियेगा। अष्टम पाठ। आत्मनेपदी धातु । १ त्वं जगत्स्वामिमूर्ति सततं ईक्षेथा:-तुम ईश्वरकी मूर्तिको हमेशा देखो। त्वं कमपि कदापि न ईजेथा:-तुम किसीकी कभी भी निंदा न करो। वं सत्कार्याणि सर्वदा ईहेथाः-तुम अच्छे कामोंकी हमेशा इच्छा करो । वं विपदि न क्षोमेथा:-तुम आपत्तिमें क्षुब्ध न होओ। २ युवां शत्रुमपिन गयाथां-तुम दोनोंको शत्रकी मी निंदा न करनी चाहिये। युवा न्यायशास्त्राणि गाहेयाथां-तुम दोनों न्यायशास्त्रोंका विवेचन करो युवां सततं चेऐयाथां-तुम दोनोको हमेशा काम करना चाहिये । युवां अपराधिनं तिजेयाथां-तुम दोनोंको अपराधीपर क्षमा करनी चाहिये । ३ यूयं वृद्धत्वे दीक्षेवं-तुमलोगोंको बुढापेमे दीक्षा लेनी चाहिये । यूयं साधून कत्थेध्वं-तुमलोगोको साधुओंकी प्रशंसा करनी चाहिये । यूयं विद्यां मिलेध्वं-तुमलोग विद्या मागो । यूयं गुरून् मानेवं-तुमलोग गुरुओंका सन्कार करो। नीचे लिखे शब्दासे वाक्य बनाओ-~- रोचेछ, यल्मेथा, वर्द्धयाथा, व्यथेथाः, वेपेचं, शंकेथाः. शि- क्षेथा, मयेचं, शोमेयाथां, आद्रियेचं, म्रियेथा, उद्विजेयाधा।

१२६ सनातनजैनग्रंथमालायां- हिंदी बनाओ- न्यायरीतिषु प्रवतथाः। युवा मंद मंदं स्मयेयाथां। रुग्णा यूयमौ- प, स्वादेध्वं । विपदि मा उद्विजेथाःसंपदिच मोदेथाः । सजना यूयं सजनान् आद्रियेवं । यस्मिन् कस्मिन् न विनंमेथाः । संस्कृत बनामो- तुम्हें घी न मांगना चाहिये। भाई ! तुम गरीबोंको दान दिया करो। गुणवान आदमीको देख तुम दोनोंको प्रसन्न होना चाहिये। गुरुकी आशा तुम्हें उल्लंघनी न चाहिये। डरसे मत कपो। तुम्हें मुनियोंकी वंदना करनी चाहिये। शुद्ध करो. आवश्यकेषु त्वं मा अंथेय । सततं सत्कार्येषु युवां यतेवहि । गुरुषु यूयं न चंडेमहि । इतस्ततो यूयं निष्प्रयोजनं मा मयेरन्। क्लिऐषु जीवेषुत्वं दयेतायुचां गुरून् दृष्ट्वात्र पेयातीयूयं जीवान् न वाधेयुः। नवमा पाठ। उभयपदी धातु । १ त्वं विदुपः श्रयेः [ था: तुमको विद्वानोंका सहारा लेना चाहिये । त्वं परधन मा हरेः [था:-तुम दूसरेके धनको मत हरण को। त्वं ओदन पचेः [थाःतुम चावल पकाओ। २ युवां धनाणि वयेतं [ याथां-तुम दोनों कपडे धुनो । युवां शरीरं लिपेतं [याथां-तुम दोनों शरीर लिंपन करो। युवा ईश्वरं यजेतं [ याथां-तुम दोनों ईश्वरकी पूजा करो। ३ यूयं विद्यां याचेत []- तुमलोगोंको विद्या मागनी चाहिये । क्षेत्राणि सिंचेत [-तुमलोग खेतम पानी दो । यूर्य बंदिनं मुंचेत [4]-उमलोग कैदियोंको छोड दो।

संस्कृतप्रवेशिनी। १२७ नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ.- खनेथाः, गृहेयाथां, चपेत, छपेतं, भजेध्वं, भरेतं, एधेयाथां, उद्वहेत। संस्कृत चनाओ- तुम्हें गरीवोंको न सताना चाहिये । तुम लोगोंको नौकरों केलिये आशा देनी चाहिये। तुम दोनोंको एक कुआ खोदना चाहिये। भाई ! तुम गरीबोंका पालन करो। शुद्ध करो- त्वं भृत्यं आदिशेतं । यूयं निर्धनं मा तुदेरन् । युवां क्षेत्र क- बैत । त्वं हतं धनं गूहेतां। दशमा पाठा विधिलिके व्यवहारका दृष्टांत । आरंभ मोत्कटं चरेत-बहुतसा आरम न करना चाहिये। पत्युः स्त्रीणामुपेक्षैव वैरभावस्य कारणं । लोकद्वयं हितं वाछंस्तदपेक्षेत तां सदा ॥ पति और पन्नियोंकी परस्परकी उपेक्षा ही वैरभावका कारण है इसलिये दोन लोकके हितको चाहनेवालेको सर्वदा परस्पर अपेक्षा (चाहना) ही रखना चाहिये सदपत्ये गृही स्वीयं भारं दत्त्वा निराकुला। सुशिष्ये सूरिवत्प्रीत्या प्रोयमेत परे पदे॥ अच्छे शिष्यमें आचार्यके समान प्रीतिपूर्वक गृहस्थ अपने भारको सुपुत्रम दे कर निराकुल हो परम (उत्कृष्ट ) पदमें उद्यम करे । यत्नवान् निष्कषायोऽसावहिंसाणुवतं श्रयेत् । यह कषाय (मोध, मान, माया, लोम) रहित हो प्रयक्षपूर्वक अहिंसाणु बत (क्रिसीको न सताना) का आश्रय करे। सां त्यजेत् यथा नैव प्रतिक्षा हानिमाप्नुयात् ।

सनातनजननंथमालायां- जिसप्रकार प्रतिज्ञाकी हानि न हो उसप्रकार हिंसाको छोडे । वस्त्रेणातिसुपीनेन गालितं तत्पिबेजलं । अत्यंत गाढे वस्त्रसे छाना हुआ पानी पीना चाहिये । अंधुगालितशेष तन्न क्षिपेत् क्वचिदन्यतः। तथा कूपजलं नद्यां तजलं कूपवारिणि ॥ कपडेसे छाननेके वाद जो जल वचे उसे कहीं दूसरी जगह न डारे तया कूए के जलको नदीमें और नदी के जलको कूएमें न डाले। कदाचित्प्राणिरक्षार्थमसत्यं सत्यवद्वदेत् । कमी ( समय पडने पर) प्राणियोंकी रक्षाकेलिये अमत्य वातको भी सत्यके ममान बोल देना चाहिये। होना चाहिये। त्वं पंचाणुव्रतधारको भवेः-तुमको अहिंसा आदि पाच अणुनतोका वारक सर्वदा मत्कार्येषु प्रवत्तथा हमेशा सत्कार्योंमें प्रवृत्त होओ। सिना करें। वयं प्रातरुत्थाय ईश्वरं उपतिष्ठामहे हमलोग सवेरे उठकर ईश्वरकी उपा- यूयं सन्मुनीन् सदा सेवेवं-तुमलोगोंको हमेशा सच्चे मुनियोकी सेवा करनी चाहिये। सस्कृत बनाओ- १। राजाओंको क्रोध, मान, माया, लोम जीतने चाहिये। २। संसारमें सव जीवोंको एक दूसरेपर दया करनी चाहिये। ३१ भाइयो! तुमलोग युद्ध में जाओ ओर शत्रुओंको मारो। ४। हमारे यहां आज महावीरनिर्वाणोत्सव होगा कृपाकर आप लोग अवश्य ही पधारें। ५। हमलोगोंको सर्वदा पापोंसे डरना चाहिये। [चाहिये। दो लडको! यही समय पढ़नेका है तुम्हें इससमय न खेलना ७। बेटी ! तू सासुरेमें (श्वसुरालय ) जाकर अपनेसे बड़ोंकी सेवा करना, अपनी सोतों (सपत्नी) को सखी समझना, अपने पतिसे कभी भी रुट न होना, दासियों पर दया करना,, संस्कृतप्रवेशिनी। १२९ अपने सौभाग्यका घमंड न करना। राधनिकोंको धन, विद्वानोंको विद्या विना स्वार्थके देना चाहिये। ९। मुझे सर्वदा माता पिताकी आशा माननी चाहिये। १०। मनुप्योंको इंद्रियविषयोंमें आसक्त न होना चाहिये। ११ । गुरु महाशय ! इसने व्याकरण पढ़ लिया है कृपाकर इसे अव न्यायशास्त्र पढ़ाइये। १२। अनाथरक्षक ! मैं बहुत गरीव हूं मुझे मिक्षा दीजिये। १३। या तो मैं मर जाऊंगा या इस कार्यको करूंगा। २४॥ विनयी शिष्योंको ऊटपटांग शंका न करनी चाहिये। .३५। हमलोगोंको साफ सुथरे (परिष्कृत ) घरमें रहना चाहिये। एकादश पाठ। वाच्य परिवर्तन। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य। १ सुखार्थी ईश्वरं अर्चेत्-सुखार्थिना ईश्वरः अर्यंत । तपस्विनी सत्तपः चरेतां-तपस्विभ्यां सत्तपः चर्येत । ब्रह्मचारिणः असंयमं त्यजेयुः-ब्रह्मचारिमिः असंयमं त्यज्येत । अहं पुस्तकं पठेयं मया पुस्तकं पठयेत। आवां হাস্থ रिपेव-आवाभ्यां शत्रुः रियेत। वयं दुर्जन अर्दैम-अस्मामिः दुर्जनः अद्युत। त्वं गुणिनं अहे: त्वया गुणी अर्थात। युवां साधु पश्येतं-युवाभ्यां साधुः दृश्येत । यूयं शत्रुमपि न निदेत-युष्मामिः शत्रुपि न नियेत । २ शिशुः क्रीडनके दोखिलोने] ईक्षेत-शिशुना क्रीडनके ईध्येयातां । परिखे दुर्गों वेप्टेयातां-परिखाभ्यां दुर्गों वेष्टयेयातां । जनाः सुखदुःखे लमेरन् 'जनैः सुखदुःखेलभ्येयातां ।

शत्रू तिज्येयानां। सनातनजैननथमालायां- अहं ग्रंथौ गाहेय-मया ग्रंथौ गाोयातां। आवां विद्वांसौ मानेवहि-आवाभ्यां विद्वांसौ मान्येयातां । वयं मोदको वल्मेमहि असामिःमोदको वल्भ्येयातां । त्वं शत्रू तिजेथाः-स्वया युवां कीटकौ न वाधेयाथां-युवाभ्यां कीटकौनवाध्येयातां । यूयं पितरौ सेवेध्वं-युष्मामिः पितरौ सेव्येयातां । ३ कर्षक: गान् खनेत् ति कर्षकेण गताः खन्येरन् । शिष्यौ पाठकान् श्रयेतायाता-शिष्याभ्यां पाठकाः श्रियेरन् । शिष्याः समिधः आहरेयुरिन्]-शिष्यैः समिधः ओहियेरन् । त्वं दुर्जनान् तुदे दिया त्वया दुर्जनाः तुद्येरन् । युवां बद्धान मुंचेतं याथा युवाश्यां बद्धाः मुच्येरन् । यूय दरिद्रान् भरेत-युस्लामिः दरिद्राः निंयेरन् । अहं गुणिनः भजेयं [य-मया गुणिनः भज्येरन् । आवां विद्याः याचेव विहि]-आवाभ्यां विधाः याच्येरन् । वयं ओदनान् पचेम मिहि] -असामिः ओदनाः पच्येरन् । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनायो- सेव्येत, मान्येरन्, गायेत, ईज्येयाता, गहीरन्, लिख्येत, पठथे- यातां, दोरन्, रत्येयाता, दिश्येत, रिष्येयाता, लुप्येत, अटोरन्, सिच्येत, मुच्येयातां, व्रज्येत । हिंदी बनाओ- धर्मार्थकामा जनैरविरोधेन भज्येरन् । राजमिः प्रजा: सत्का- येपु दिश्येरन् । गुरुणा छात्रोऽवहितमनसा शिष्येत । सुशियमान्ये रन् गुरवः। प्रातरुत्थाय नित्यं पितरौ पालैनम्येयातां। पवित्रैर्धमा- न्ममिः पापिनो न स्पृश्येरन् । धर्मोपदेशमिरसत्यं न लप्येत । - 1-पृष्ट ४२ की टिप्पणी टेखो।

संस्कृतप्रवेशिनी। १३१ संस्कृत बनाओ पर किया कर्मवाच्यकी हो- हमलोगोंको उपकारियोंका प्रतिदिन स्मरण करना चाहिये। इन नेत्रोंसे अच्छे २ पदार्थ देखने चाहिये। यदि प्रतिदिन ईश्वरकी पूजा की जाय तो अवश्य ही मनोरथ सफल हो। विद्यार्थी एक दूसरेको गाली न दे। श्रावकोंको अभक्ष्य पदार्थ न खाने चाहिये । तुमलोग इस मुंहसे अच्छे २ वचन बोला करो। द्वादश पाठी अहाय । त्वं उत्तम पुरुष। कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य । १ ईश्वरो मां रक्षेत्-ईश्वरेण अहं रक्ष्येय। बालको पृच्छेतां-बालकाभ्यां अहं पृच्च्येय । जनाः मां अहंतु-जनैः अहं मां स्पृशे:-त्वया अहं स्पृश्येय। युवा मा सरेतं युवाभ्यां अहं स्त्रियेय । यूयं मां न अर्देत-युस्मामिः अहं न अद्यय । २ शिष्यः आवां नमेत्-शिष्येण आवां नम्येवहि । पितरौ आवां तजैता-पितृभ्यां आचां तज्येवहि । भूषणानि आवां भूपेयुः भूषणैः आवां भूप्येवहि। आवां वंदेथाःत्वया आवां वंद्येवहि। युवां आवां पायेयाथां-युवाभ्यां आवां त्रायेवहि । आवां मानेवं युस्लामिः आवां मान्येवहि । ३ माता अस्मान् चुंवेत्-मात्रा घयं चुंब्येमहि । पाठको अमान् उपदिशेतां-पाठकाभ्यां वयं उपदिश्येमहि । छावा असान् भजेयु:-छात्रैः धर्य भज्येमहि । त्वं अस्मान् सेवेथा:-त्वया घयं सेव्यमहि। -- यूयं १३२ सनातनजैनग्रंथमालायां- युवां असान् हरेतं-युवाभ्यां वयं वयं दियेमहि । यूय अस्मान् मर्पयुः-युस्सामिः वयं मृप्येमहि । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- ईक्ष्येवहि, ईज्येय, गमहि, मान्येय, स्पृश्यमति, मुच्येमहि. शंस्येवहि, चुच्येमहि, दिश्येय, ध्येमहि । सस्कृत बनाओ परतु क्रिया कर्मवाच्यकी हो- स्वामिन् ! तुम मेरी रक्षा करो। गुरुजी ! हम दोनोंको शिक्षा दीजिये । हा पुत्र ! क्या तुझे हमलोग छोड़ने थे? महाशय ! हम अनाथों पर दया कीजिये। लड़कपनमें रमको अच्छे २ उपदेश दीजिये । माता पिता मुझे प्यार करें। बेटी ! तू मुझे याद करना । शुद्ध करो- सुतया अहं स्त्रियेत । पुरावां भज्येथां । साधुमिर्वयं मृप्यरन्। प्रभुणा अहं दिश्येवहि । धर्मण आवां रक्ष्येमहि । सवयं अशय। शिक्षेत-गुरुणा त्रयोदश पाठ। मध्यम पुरुप । कर्तृवाच्य। कर्मवाच्य । १ गुरु त्वां त्वं शिक्ष्येथा। दासौ वां सेवेयातां दासाभ्यां त्वं सेव्येथाः। जनाः त्वां पश्येयुः जनः त्वं दृश्येथाः। अहं त्वां उपदिशेयं-मया त्वं उपदिश्येथाः। आवां त्वां वंदेवहि-आचाभ्यां त्वं वंद्येथाः। वयं त्वां त्यजेम-अस्मामिः त्वं त्यज्येथा। युवा अनुगच्छेत्-मैत्रिणा युवां अनुगम्येयाथां। पुरुषौ युवां अनुवःयातां-पुरुषाभ्यां युवां अनुवय॒याया। जना: युवां भणेयुः जनः युवां भण्येयाथां। २ मंत्री संस्कृतप्रवेशिनी। १३३ अहं युवा मुंचेय-मया युवां मुच्येयाथां। आचां युवां नमेव-आवाभ्यां युवां नम्येयाथां । वयं युवां तुदेम-अस्मामिः युवां तुद्येयाथां । ३ बाल युष्मान् प्रतीक्षेत बालेन यूयं प्रतीक्ष्येवं। शिशु युष्मान् स्पृशेता--शिशुभ्यां यूयं स्पृश्येध्वं । विद्वांसः युप्मान मानेरन्–विद्वद्भिः यूयं मान्येवं। अहं युष्मान् स्मरेयं-मया यूयं स्त्रियेध्वं । आवां युष्मान् दिशेव-आवाभ्यां यूयं दिश्येध्वं । वयं युष्मान् पश्येम-अस्माभिः यूयं दृश्येवं। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- प्रविश्येथाः, कत्थ्येवं, शिक्ष्येयाथां, ईथाः, पाध्येध्वं, यलम्ये- था, हियेवं, याच्येयाथां, भज्येध्वं । संस्कृत वनाओ जिसमें कि क्रिया कर्मवाच्यको हो- सबलोग तुम्हें ही याद करें। विद्यार्थी तुम्हें पूजें । शत्रुलोग भी तुम दोनोंकी प्रशंसा करें। लतायें तुमलोगोंको आलिंगन करें। बेटा ऋद्धियां आकर तुम्हें प्राप्त हों। यदि राज्य समृद्ध होजाय तो तुम्हें धन्यवाद मिले। शुद्ध करो- धनिना निस्वस्त्वं रम्येत । गुरुभ्यां युवां शिक्ष्येयातां । अरिमि- रपि यूयं न निधेवहि । विवद्भिस्त्वं तिज्येमहि । सुभटेन सुभटौ युवां प्रहियेरन् । सेनया यूयं नीयेमहि । कर्तृवाच्य । चतुर्दश पाठ। भाववाच्य । कर्वत्-मूढेन नर्देतां-हस्तिभ्यां कन्येत। नयेत। हस्तिनौ २३४ सनातनजैनग्रंथमालाया- मृगाः चरेयुः-मृगैः चयत। त्वं ज्वरे: त्वया ज्वयेत। युवां जयेतं युवाभ्यां जीयेत। यूर्य एवं युष्माभिः एज्येत। अहं मोदेय-मया मोघेत। आवां दीक्षेवहि-आवाभ्यां दीक्ष्येत । वयं अध वसेम-अस्सामिरत्र उष्येत। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनामो- अंच्येत, जीव्येत, हट्येत, स्फुट्येय, श्रीयेत, क्रीडवेत, कूज्येत, नियेत, भूयेत, उद्विज्येत, कन्येत, इति । संस्कृत बनाओ परंतु किया भाववाच्यकी हो- मेध वर्षे । संपत्ति बढे। भाग्य फले। हमलोग प्रयक्ष करें। वे प्रसन्न हो । विद्यार्थी यहां रहें। मालायें मुरझा जावें । कृपाकर अब तो जाइये । रन चमचमावें । शुद्ध कर वाच्यपरिवर्तनसे लिखो- यदि कश्चित् भवेदन मंच आगच्छेतं सः । गुरुन् दृष्टा मोदेत शिष्टः । सजनाः शत्रौ मित्रे चाऽपि समदृष्ट्या ईसयुः । भारतवर्ष प्रतिदिन विद्यायां प्रथेरन् । वर्षायां पघेतां नद्यः । - साहित्य परिचय । हिंदी बनायो- एकदा प्रवलवाते वहति सति तजनितक्षोभवशात् समस्तमही- रहेषु कंपितेषु सत्सु भूतलगतशुष्कपत्रेप्पतितेषु सत्सु, सर्वासु दिक्षु धूलिच्छन्नासु सतीषु कामपि क्षेत्रवृत्ति (मेंड) मानयंत शशाः परमया भीत्या इतस्ततो धावति स्म । महताऽऽयासेन क्षेत्रवृत्तिमु- संध्य प्राणरक्षणपरा: प्लायमानाः पुरतो महतीमापगां (नदी) पश्यति संस्कृतप्रवेशिनी। स्म । तदा निर्विण्णमनसोऽन्योन्यमुक्तवंत:-"अहो ! कीदृशीयं विप- त्परंपरा। यत्र यत्र वयं व्रजामस्तत्र तत्रैवानुधावति सा (विपत् ) वरं तर्हि मजनं कृत्वा प्राणत्यागः। न पुनरीदृशेषु व्यसनेषु काल- यापन" । एवं विनिश्चित्य सर्वे नदीनिकटतीरमागच्छंति स्म । तत्र वहिर्निर्गतास्तीरे वर्तमाना मेकास्तान् शशान् वीक्ष्य जले उत्पतंति मतले मज्जितवंतश्च । तदेकेन वृद्धशशेन दृष्टं । स तानंगुल्या नि- दिश्य सखीन भाषते स्म-'भो मित्राणि! भीरखिलानाक्रम्य तिष्ठति । यद्येवं तर्हि किममामिरेव प्राणास्त्यज्येरन् ? कुतो धैर्यमवलंव्याप- तितानि दुःखानि सहित्वा व्यसनं प्रत्यमिमुखैन भूयते” । तच्छ्रुत्वा सर्वे धैर्यमवलंध्य तत्रैव वसति स्म । एवं कृते कतिपयैरेव मुहूत्तै- चीत्या (आंधी) शांतिं गतवती ते च स्वस्था भूताः। कंचन पुरुषा नानाविधानि साध्वसानि प्रकल्प्य "हा हा कथं भवेत् , का गतिः स्यात्" इति रात्रिंदिवं चिंतयंतः कालं नयंति । "वयमेवाखिलानां दुःखानां भाजनानि" इति च तेषां प्रतिभाति । "इतरत्र सर्वे सुखिनः" इति च मन्यते तैः । परं यान् ते सुखभाजो बोधंति तेषां दुःखानि यदि ईक्षेरन् तर्हि 'वयमेव सुखिनः' इति ते मन्येरन् । भगवता विश्वसृजा देवेन सुखदुःखयोरंशा यथायथं सर्वेभ्यो दीयंते। संस्कृत वनाओ- पुरुष अपने दोषोंको दूर करनेमें असमर्थ है वह दूसरेके दोषोंको दूर करनेकेलिये यन न करे। जो दूसरेको उपदेश दे उसे वैसा ही आचरण करना चाहिये जिससे कि उसमें कोई शंका न करे। ऐसा करनेसे उसका उपदेश मान्य होता है। क्योंकि जो दोष दूसरों को छोड़ना चाहिये उसे ही यदि हम करें तो लोकमें हमारी क्यों न हंसी होगी। घरमें आग लगनेपर कुआ न खोदना चाहिये। जो लोग ऐस ।

सनातननग्रंथमालायां- करते हैं वे सूर्ख हैं । इसलिये जबतक बालक अवस्थामें हैं संसारके भारसे आक्रांत नहीं हुये हैं तब तक हमलोगोंको खूब विद्या पढ़- लेनी चाहिये जिससे कि युवा अवस्थामें आनंद प्राप्त हो। और युवा अवस्थामें इंद्रियोंका दमन करना चाहिये, दुश्चरितोंसे अपनी रक्षा करनी चाहिये, धनको इकट्ठा करना चाहिये जिससे कि बु- ढ़ापेमें सुखसे रहें। जो पुरुष पहिलेसे सब काम कर लेता है वही निरालस है, वही पंडित है, वही पुरुष है और उसीने बुद्धिका फल पाया है। जो मनुष्य इंद्रियोंको वश करना चाहता है उसे पहिले अपने मनको जीतना चाहिये। क्योंकि सेनापतिके जीत लेनेपर सेना स्वयं ही जीतली जायगी। अपने इस मनरूपी चंचल वंदरको पहिले तो शान और वैराग्यरूपी सांकल (शंखला) से बांधना चाहिये बाद को शास्त्ररूपी वगीचेमें इसे छोड़ देना चाहिये। यदि कदाचित् मन दूसरी तरफ जाय तो उसे वैराग्यकी तरफ खींचना चाहिये। आत्मन् ! जब तैने पराधीन अवस्था नाना दु:ख सहे हैं तब इससमय भी कमौकी निर्जराकेलिये उन्हें सहना चाहिये। अपने शुद्ध स्वरूपका ध्यान करते हुये जब तक तुम इस जगतमें रहोगे तय तक बहुतसे पापोंको नष्ट करोगे।

संस्कृतप्रवेशिनी। पंचम अध्याय । (भ्वादि और तुदादिगणीय धातुओंका अनंद्यतन भूतकाल [लड् ] में प्रयोग) प्रथम पाठ। परस्मैपद (अन्य उत्तम, मध्यम पुरुष) १ छात्रोऽयं व्याकरणं अपेठत्--इस विद्यार्थीने व्याकरण पढलिया। अहं मुनि अपश्यम्-मैंने एक मुनि देखे। त्वं गुरुं अपृच्छः-तुमने गुरुको पूछा । २ दास्यौ पुत्रोत्पत्ति अवदतां-दो दासियोंने पुत्रकी उत्पत्ति कही। आवां शत्रु आदीव-हम दोनोने शत्रुको पीडा दी। युवां मुनी अपूजतं-तुम दोने दो मुनिकी पूजाकी । ३ जनाः वनं अगच्छन्--लोग जंगलको गये। वयं भृत्यान् अदिशाम-हमने नौकरीको आज्ञा दी। यूयं अनाथान् अरक्षत-तुमलोगोंने अनाथोंकी रक्षा की। हिंदी बनाओ- एको वृपो जलं पातुं नदीमागच्छत् । अश्वमारोहुँ मतिरभवत् । १-आधी रातसे लेकर सपूर्ण दिन और आधीरात पर्यन कालको अयतन कहते है और उससे पहिलेका काल अनद्यतन भूत है। अर्थात् जिस दिन हम किसी बातको कह रहे हैं यदि वह वात उसदिनको आधीरातसे पहिले हुई है तो इस लकारका प्रयोग होगा। जैसे-किसीने आज किसी समय कहा कि-'अलिखत् पत्रं देवदत्त -देवदत्तने एक पत्र लिखा । तो इससे यह अभिप्राय निकला कि उसने पत्रको आजकी आधी रातसे पहिले लिखा है आज नहीं। २-वर्तमान कालके जो 'पठति, पठत' मादि रूप बतलाये हैं उनमें जिन धातुओके आदिमें व्यंजन है उनसे पहिले तो 'अ' और जिनके आदिमे सर है उनसे पहिले 'आ' लगादेनेसे तथा 'ति, त , न्ति, मि, वः, म , सि, थः, ये जो प्रत्यय हैं उनके स्थानमें क्रमसे 'तु, ता, न् , म् , व, म, (विसर्ग), त, त' करदेनेसे इसके रूप होजाते हैं।

१३८ सनातनजैनग्रंथमालायां- सखीमिः पृष्टा ललना अगदत् । षदि निषण्णो गुरु शिष्यान् धर्म- मुपादिशत् । केकैय्या दारुणं वचः श्रुत्वा महायजो दशरथः सहसा भूमावपतन्निश्चेष्टश्चाभवत् । अस्मिन्नेव लतागृहे त्वमभवः। अमू तौ तरू यो होऽपश्यम् । पुर्या पुराऽस्यां किल कालिदासो नाना- ऽभवद् योन्यवसत् कवीशः। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनामओ- अशंसत्, अकांक्षस्, अनिंदन, अवजा, अस्पृशत, अगायाम, अध्यायन अमरत,व्यलपत् , अगच्छन् ,असृजाव, आवत्,अरिषाम ! द्वितीय पाठ। आत्मनेपद। १ धरित्रीपतियतिमेकं ऐक्षत-राजाने एक मुनिको देखा । अहं कुत्रापि सुखं न अलमे-मैंने कहीं भी सुख न पाया। १-वर्गके पहिले और तीसरे अक्षरके वाद यदि 'न, म, इ, ण, न' में से कोई होगा तो उस (वर्गके पहिले वा तीसरे अक्षर ) को उसी वर्गका पाचवा अक्षर हो जायगा । जैसे-वाग् मधुरा-वाङ्मधुरा, तत् नयन-तन्नयन । २-हस्व स्वरके वाद यदि 'न, इ, . में से कोई होगा और उस (न् , इ, ण, ) के बाद भी कोई स्वर होगा तो वे 'न्, इ, ण, दो हो जायगे। जैसे-'अस्मिन् एवं यहा पर मका- रकी हत्व इकारसे पर 'न्' है और उस 'न' के बाद फिर 'एव' का 'ए' स्वर है इसलिये 'न' दो होगये तो 'अस्मिन्नेव' हुआ। ३-पृष्ठ ३३ की न० २ की टिप्पणी देखो। ४-आत्मनेपदी धातुओंके ला प्रत्ययके रूप बनानेकेलिये प्रथमपुरुषमें 'त, एता, अत' उत्तमपुरुषमें 'ए, आवहि, आमहि' और मध्यमपुरुषमें 'थाः, एया, व' लगा देना चाहिये । एवं जिनके आदिमें व्यंजन है उन धातुओंसे पहिले '' और जिनकी आदिमें स्वर है उनसे पहिले 'आ' लगा देना चाहिये। ५-जो लई आदिके रूप बनानेकेलिये धातुसे पहिले 'आ' आता है यदि उसके बाद ' हैं होंगे तो उन (आ और इ, ई ) दोनोंके स्थान में है ,जहोंगे तो 'औ ऋ होग तो 'आर' हो जायेंगे। जैसे-आदेक्षत-ऐक्षत।

संस्कृतप्रवेशिनी। १३९ त्वं उद्यमेन धनं अलमयो:-तुमने परिश्रमसे धन प्राप्त किया। २ छात्री शीतेन अपेतां-दो विद्यार्थी ठंडीसे कापे । आयां व्याकरण अगाहावहि-हम दोने व्याकरण शास्त्रका अवगाहन युवां तान् अगhथाम्-तुम दोने उनकी निंदा की। [किया। ३ जनाः मुनि अलोकंत-मनुष्योंने मुनिको देखा। वयं अन्नं अमिक्षामहि-हमने अमकी भीस मांगी। यूयं मंद मंदं अस्मयध्वं-तुमलोग मंद मंद मुस्कराये । नीचे लिखे शब्दासे सस्कृत बनाओ- अशोमत, अमानावहि, अप्रथचं, अमोदंत, अद्योतेयां, अनि. यामहि, अशिक्षेतां. अपंत, ऐजत । हिंदी बनाओ- कदाचिद् वामदेवशिष्यः सोमदेवशमा नाम, कंचिदेकं वालक राक्षः पुरतो निक्षिप्याऽभापत । "देच! रामतीर्थ मात्वा प्रत्यागच्छ- अहंकाननावनौ वनितयाकयाऽपिधार्यमाणमेनमुज्वलाकार कुमार विलोक्य तां वृद्धा सादरमभणं । 'स्थविरे ! का स्वं? एतस्मि- नटवीमध्ये बालकमुहंती किमर्थमायासेन भ्रमसीति वृद्धाऽप्यग- दत्। "मुनिवर कालयवननाम्निहीपे कालगुप्तो नाम धनाढयो वैश्य- वर फश्चिदस्ति । तनंदिनी नयनानंदकारिणीं सुना नामंतस्माद द्वीपादाम्लो मगधनायमंत्रिपुत्रो रतोद्भवो नाम रमणीयगुणालय उद- 'पाहत । फालप्रमेण ननांगी गर्ममधरत् । ततः सहोदरविलोकनला. लसया रमोन्नवस्तया सह प्रवहण (जहाज) मारता पुष्पपुरमभ्या- गछन् । जलतरंगताडितः पोतः ( जहाज ) समुद्राभस्यमजस् । तां ललनां धात्रीभायेन कल्पिताऽहं कराभ्यामुतईती फलक (काठका टुकड़ा ) मेकमधिषध दैवषशात् तीरभूमिमलमे। सुहजनपरिवृतो रजोनिवस्तन निमनो या केनोपायन नीरमगलबान योधामि । शस्य परां काठामपिगता सुतृत्ताऽस्मिन्त्रटपीमध्येऽध मुनं सूतवती!

१४० सनातनजैन ग्रंथमालायां- प्रसववेदनया निश्चेष्टा सा प्रच्छायशीतले (छायासे ठंडे) तक्तले निवसति । जनरहिते बने स्थातुमसमर्थतया देगगामिनं मार्गमन्चे- टुमुयुक्ताऽहं विवशायास्तस्या. समीपे बालकं निमिप्य गमनम- नुचितमिति कुमारमप्यनयमिति" । तस्मिन्नव क्षणे कंचित् वन्यं (जंगली) वारणं (हाथी) वयमलोकामहि । तं विलोक्य भीता सा वृद्धा बालकं निपात्य (गिराकर ) पाद्रवत् । अहं च समीपलता- गृहे प्रविश्य परीक्षमाणोऽतिष्ठम् । निपतितं बालकं गृहीतवति गज- पतौ भीमरखो (भयंकर शब्द वाला) कंठीरत्रो (सिंह) न्यपतत् । भयाकुलेन तेन दंतावलेन वियति समुत्पात्यमानो (फैकागया) बा. लकोभूमावपतत्तं चाहं ततःपरिगृह्यभवत्सकाशं समागच्छमिति । सस्कृत बनाओ.--- किसी जंगली पशुकी लड़की यहुत ही रूपवती थी। एक दिन उसे किसी सिंहने देखा और वह उसको जी जानसे [प्राणपणेन ) चाहने लगा। उसे कामदेवके वाणोंने इतनी पीड़ा दी कि उसकी यादमें वह खाना पीना भी भूल गया। इसलिये वह निःशंक हो शीघ्र ही उस लड़कीके पिताके पास पहुंचा और उसे मांगने लगा। लड़कीके पिताने उस सिंहकी अनुचित इस प्रार्थनाको सुन विचा- रा "यदि मैं पुत्री देनेसे निषेध करता हूं तब तो यह अभी मुझे मार डालता है और लड़की दे दूं तो इसके संगसे लड़की भी मर जायगी इसलिये इसको किसीतरह [ केनापि प्रकारेण] उगना चाहिये"। इसके बाद वह सिंहसे बोला-“हे मृगराज ! खुशीसे [प्रीत्या ] मैं अपनी लड़की आपको दे दूंगा परंतु आपसे यह प्रार्थना करता हूं कि-मेरी पुत्री बहुत ही कोमलांगी है और तुम्हारे नख और दांत अति तीक्ष्ण है उनसे उसै पीड़ा होगी। इसलिये आप अपने दांतों को गिराने [ पातन ] और नखोंको कतरने [कर्तन ] की माझा दीजिये"। उसकी यह प्रार्थना सुन कामांध सिंह बोला "अच्छा , संस्कृतप्रवेशिनी। [साधु] क्या हानि है ऐसा ही करों" उस जंगली पशुने यह सुन शीघ्र ही उसके नख काट डाले और दांत तोड़ डाले [अपातयत् ] अनंतर एक मुद्गर लेकर उसकी कमरमें [कटिभाग] मारा जिससे कि उसीसमय वह मर गया। नोट-जो धातु उभयपदी है उनके रूप दोनों प्रकार (परस्मैपद, आत्मनेपद ) से चलते है इसलिये उनके रूप दोनो प्रकारकी धातुओके समान चलाना । . परिशिष्ट (क)। अदादिगणकी धातुओंका वर्तमानकाल (लद) में प्रयोग । परस्मैपदी धातु । र वधकः पशन हन्ति कषायी पशुओंको मारता है। अहं सद्वाणी वच्मि- मैं अच्छी बात कहता हूं। त्वं अनाथान् पासि--तुम अनाथोंकी रक्षा करते हो । २ राजानौ तेजसा भातः-दो राजा तेजसे शोभित होते है। आवां व्याकरणं विद्य:-हम दोनों व्याकरण जानते है। युवा किमर्थ नाथः--तुम दोनों किसलिये मान करते हो । ३ गोपाः गाः पांति-वाले गायोकी रक्षा करते हैं। वयं सज्जनं स्तुमः-हम सजनोंकी स्तुति करते है। यूयं अनर्थ घूथ-तुमलोग अनर्थ कहते हो। नीचे लिखे शब्दासे वाक्य बनाओ- हंति, हतः, वलिं, भांति, पांति, स्वाति, वेति, वित्तः, विदंति, १-जिसप्रकार भ्वादि और तुदादिगणीय धातुओके और प्रत्ययोंके वीचमें '' माता था [तु+म+ति आदि ] उसप्रकार अदादिगणकी धातुओंके वीचमें नहीं ' आता पर प्रत्यय वेही [ति, तः, अति आदि] आते हैं। जैसे-इन्+ति = हन्ति । २-प्रथम, उत्तम, मध्यम पुरुपके एकवचन' ति, मि, सि' को तथा और मी प्रत्यय • जिनका कि [प] इत् गया है उनको पित् कहते हैं और इनसे मिन जो त अति, सनातनजननंथमालाया- स्तौति, नंति, वक्ति, वक्तः, ब्रवीति, ब्रूतः, ब्रुति, ब्रवीमि, यूथा, ब्रूवः, ब्रूमः, ब्रवीषि, बेथ, अस्ति, तो एति । संस्कृत बनाओ धीवर लोग मछलियोंको [मत्स्यान्] मारते हैं। हम क्या कहैं। था, थ, व , म जिनका प् इत् नहीं गया है और ड भी इतु नहीं है तो भी वेडित कहेजाते हैं । जिन हित और कित् [क् जिनका इत् है] प्रत्ययों की आदिमें वर्गके पाचवे (न, म, इ, ण, न) भक्षरको छोडकर कोई भी क से भ तकका या श, ष, स व्यंजन है ऐसे प्रत्ययके पर होनेसे हन् , मन् , यम् , रम् , नम्, गम्, वन और तनादि गणकी धातुओंके मंतके न् और म्' का लोप होजाता है। जैसे-हन्-श- हत । ३-शब्दके चवर्गको कवर्ग हो जाता है यदि ग, म, ड, ण, न, य, व, र, ल,से भिन्न कोई व्यजन वादमें हों । जैसे वच्-सि चक्-सि हुआ। कवर्गके बादमें यदि स होगा तो ष होजायगा जैसे-वक् सि वक्-षि-वक्षि (क् और ए मिलकर क्ष लिखा जाता है)। ४-पित् प्रत्यय परे होनेसे धातुके आदिके 'ई' को और 'उ' को 'ओ' होजाता है। जैसे-विद्-ति-वेद-ति । अर्गके दूसरे, तीसरे और चौथे अक्षरको उसी वर्गका पहिला अक्षर होजाता है यदि उसके बादमें किसी वर्गका पहिला वा दूसरा अक्षर होगा। जैसे-वेद-ति-वेत्ति, विद्-तम्-वित्त । ५-उकारात अदादिगणकी धातुओंके अतके 'उ' को 'औ होजाता है यदि ति, सि, मि, और त् या विसर्ग बादमें हो । जैसे स्तु-ति-स्तौति, स्तौषि, स्तौमि । ६-'अई' प्रत्ययसे भिन्न कित् और डित् प्रत्यय वादमें होनेसे 'गम् , हन् , जन्, खन्, घस्' धातुओंके 'अ' का लोप होजाता है। हनु धातुके हू को 'घ' आदेश होता है यदि 'न्' वादमै हो । जैसे-हन्-अन्ति-इन् अन्ति-घ्न् अन्ति-नंति । ७-इसी पृष्ठकी न ३ की टिप्पणी देखो। ४-धातुके अतके 'इ' को इय्, 'उ, के' को 'उन्' होजाता है यदि पितसे भिन्न खरादि प्रत्यय बादमे हो । जैसे-+ अति-अन्+अतिवति । ९-बू धातुसे परे यदि ति, सि, मि, तू और (विसर्ग) बादमें होंगे तो बीचमें 'इ' आवेगा। जैसे-बू+विजू ई ति ॥ धातुके उ, छ को 'ओ' और इ, ई को 'ए' होता है पित् प्रत्यय परे होनेसे । जैसे-बू+ईतिबो- ईति, हुआ । वादको १५ पृष्ठकी तीसरी टिप्पणीसे 'भव हुभा तो ब्-अब-ई- ति अवीति हुआ। इसीतरह ब्रवीषि, ब्रवीमि । १०-क्ति दित् प्रत्यय परे होनेसे भस् धातुके 'अ' का लोप होता है । जैसे-अस्तः स्त.। , .

संस्कृतप्रवेशिनी। , चह गुरुकी स्तुति करता है। जो सब पदार्थोंको जानता है वह सर्यक्ष कहलाता है। लोग गंगामें नहाते हैं। धात्वर्थ । . हनौ-मारना। अन जीना। टुञ्-स्तुति करना। पा-रक्षा करना। रा-देना। अस—होना । भा-शोभित होना। ला-लेना। इण्---[३] जाना। 'विद-जानना। ष्णा-ना नहाना । जौ-बोलना । आत्मनेपदी धातु। . १क एवं आस्ते-कौन इसतरह बैठता है। अहं दिवसे न शये- मैं दिनमें नहीं सोता हूं। त्वं किं अधीषे अघि---तुम क्या पढते हो। २ त्रियौ व्याकरणं अधीयाते-दो स्त्रिया व्याकरण पढती हैं। छात्रौ परस्परं बुवाते-दो विद्यार्थी परस्परमें बात चीत करते हैं । आवां न्यायं अधीवहे-हम दो जने न्याय पढते हैं। युवां ईश्वरं स्तुवाथे-तुम दोजने ईश्वरकी स्तुति करते हो। ३ अलसा: दिवसे शेरते-आलसी दिनमें सोते हैं। वयं धर्मशा अधीमहे-हम धर्मशान पढते हैं। यूयं परस्परं किं ध्वे-तुमलोग परस्पर क्या बोलते हो । १-आत्मनेपदके प्रथम पुरुपम 'ते, आते, अते' मध्यम पुरुषमें 'से, आथे, ध्ये और उत्तमपुरुषमें 'ए, वहे, महे' प्रत्यय लगते हैं । २-शीक् (सोना) धातुमें दीर्घई है तो मी उसकी 'ई' को 'ए होता है । जैसे-शी-ए-शेxए-(१५ पृष्ठ की तीसरी टिप्पणीसे अय्) शये । ३-इ (पढना) धातुका प्रयोग 'अघि' उपसर्ग पहिले लगाकर ही करते हैं फेवलका नहीं। जैसे-अघिद-ते अधीते । ४-पृष्ठ ४२ की ८ वी टिप्पणी देखो। ५-केवल शीइ धानुसे प्रथम पुरुषके बहुवचनोंमें 'रते' प्रत्यय आता है।

१४४ सनातनजैनग्रंथमालायां- इह-पढना। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- आसाते, शेपे, अधीये, आस्से, ब्रूते, स्तुते, आसते, शयाते, अधीते, स्तुवते, शेरते। धात्वर्थ । आस-बैठना (रहना) शीद्-सोना (नींद लेना) हिंदी बनाओ- नास्ति संदेहो महाप्रमावोऽयं मुनिः। महदपि परदुःखं शीतलं सम्यगौडः। क्षणे क्षणे यन्नवता [नवीनपना] मुपैति तदेव रूपं रमणीयतायाः । साऽधिशेते कथं देवी ज्वलंतीमधुना चितां । स्तु- वेऽहं तं प्रथम जिनेंद्र। परिशिष्ट (ख)। दिवादिगण धातुओंका वर्तमान कालमें प्रयोग। परस्मैपदी धातु । १ हविः शरीरं पुण्यति-घी शरीरको पुष्ट करता है । अहं सततं दीव्यामि-मैं हमेशा खेलता हू। त्वं अल्पेन तुष्यसि-तुम थोडेम सतुष्ट होजावे हो । २ स्त्रियो परस्परं लिप्यत'-दो स्त्री परस्सर आलिंगन करती हैं । आवां तं निह्याच: हम दोनों उसमें प्रीति करते हैं। युवां किं कुष्यथ:-तुम क्यों नाराज हो । १-भ्रून् पातुके लटके प्रथमपुरुपके एकवचनमै आह, द्विवचनमें आहतु , बहु- वचनमें आहु , मध्यमपुरुपके एकवचनमें आत्य , और द्विवचनमे आइथु होता है। २-नुद आदि धातुओंके रूपोंके समान इस गणकी धातुओंके भी चलते है केवल इतना ही मेद है कि उन वातुओंके और प्रत्ययोंके वीचमे 'अ' आता है और इसके बीच 'य'। जैसे-पुष्पम्य+ति-पुष्प्यति। 3-दिवु, पिवु, धातु ओके 'इ' को दोजाता है। रूप संस्कृतप्रवेशिनी। - ३ खियः वस्त्राणि सीन्यंति-स्त्रिया कपडे सीती हैं। वयं तं दृष्ट्वा नश्यामः-हम उसको देखकर छिप जाते हैं। यूयं नद्यां लुख्यथ-तुम लोग नदीमें लोटते हो । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- पुण्यामा, शिलप्यथा, स्निह्यति, कुप्यसि, सीव्यसि, नश्यति, लुट्यति. हासि, मुह्यति, माद्यति, क्षाम्यति, शाम्यति, श्राम्यति । घात्वर्थ। दिवु-खेलना, जीतनेकी पिवु-सीवना । क्षिप-प्रेरणा करना। इच्छा करना, चमकना। पुष्प-खिलना । पुपौ-पुष्ट करना। शुप-सूखना। तुपौ-संतुष्ट होना । शिलषौ-आलिंगन करना। पश-छिपना, नष्ट होना । द्रुह-द्रोह करना । मुह-मुग्ध होना । प्णिहनिह)-प्रीतिकरना। लुठ-लोटना । कुप-क्रोध करना। मदी-हर्पित होना, शमु-शात होना । श्रमु-थकना । मत्त होना। म्रमु-चलना। क्षमु क्षमा करना। क्लमु-दुःखी होना। दमु-दमन करना। नृतु-नाचना । संस्कृत चनाओ- पानी सूखता है ! बेले खिलती हैं। कामी पुरुष सुंदर स्त्रीको देखकर मुग्ध होजाते हैं। दुष्ट लोग उपकारीको द्रोह करते हैं। देव नंदनवनमें क्रीडा करते हैं। आत्मनेपदी धातु । १ मृतः को वा न जायते-मरा हुआ कान आदमी पैदा नहीं होता । १-मदी, शमु,श्रम, मु, समु, दमु, क्रमु क्लम इन धातुओंके 'अ'को 'आ' हो- जाता है 'य' वादमें होनेसे । जैसे-मद्यति = माद्यति, शाम्यति, श्राम्यति, क्षा- म्यति, क्लाम्यति । २-पृष्ठ ५९ की १७ टिप्पणी देखो । ३-आत्मनेपदमें भी 'तुद' मादिके समान लड्लट् लोट्और विधि लिड्में रूप समझना और बीचमें 'य' लाना २-जनी (उत्पन्न होना) धातुके 'न' को 'भा होजाता है लट्, लइ, लोट् , विधि- सनातननग्रंथमालाया- अहं संसारे क्लिश्ये-मैं ससारमे दुःख पाता हूं। त्वं तेजसा दीप्यसे-तुम तेजसे दीप्त होते हो। २ छात्रौ तत्र खिद्यते-दो विद्यार्थी वहा खेदको प्राप्त होते हैं। आवां तेन सह युध्यावहे-हम दोनों उसके साथ युद्ध करते हैं। युवां कि न्यायं वुध्येथे क्या तुम दोनो न्याय जानते हो ! ३ पंडिता एवं मन्यते-पंडितलोग ऐसा मानते है । वयं न दूयामहे-हम खिन्न नहीं होते हैं । पक्षिणो यूयं वियति उई-डीयध्वे-पक्षिगण! तुम आकाशमें उठते हो। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ- ये, उड्डीयते, खिद्ये, मन्ये, युज्यते, जाये, क्लिश्यसे, युध्यते । हिंदी बनाओ.- भृत्ये कृतागसि [कृतापराधे] भवत्युचितः प्रभूणां पादप्रहार इति सुंदरि ! नात्र दूये। परिणामसुखं शरीरिणां जिनवाक्यं न विहाय विद्यते । तावजपति, सर्पति, तिष्ठति, माद्यति, विलासति, विभाति । यावन्नरो न जठरं देहभृतां जायते रिक्त ॥ गायति, नृत्यति, बल्गति, धावति पुरतो नृपस्य वेगेन । कर्षति, वपति, लुनीते [फाटता है], दीव्यति, सीव्यति, पुनाति [साफ करता है। वपते च। विदधाति किं न कृत्यं जठरानलशांतये तनुमान् ॥ धात्वर्थ । जनीड़-पैदा होना । दीपी ---दीप्त होना। क्लिशै-दुख पाना । विदौड़-होना। खिदौह-सिन्न होना । युधौद्- बुधौड़-जानना। मनौर-जानना। युजौर-संभव होना। दूरी-दुःखी होना। कि इन चार लकारोंमे । 1-पृष्ठ १४८ की ५० की टिप्पणी देखो। -प्रहार करना। डीडो-उडना ।

संस्कृतमवेशिनी।
परिशिष्ट (ग)!
स्वादिगणकी धातुओंका वर्तमानकालमें प्रयोग।
१ जनः धर्मेण सुख आप्नोति-मनुप्य धर्मसे सुख पाता है।
अहं एवं कर्तुं शक्नोमि में ऐसा करनेकेलिये समर्थ है।
त्वं धर्मशास्त्रंणोपि-तुम धर्मशास्त्र सुनते हो ।
२ पापपुण्ये प्राणिनः दुनुतः-पाप पुण्य जीवोंको सताते हैं।
आवां परकार्य सानुवः-हम दोनों सरेके कामको सिद्ध करते हैं।
युवां पुष्पाणि चिनुया-तुम दोजने फूल चुनते हो ।
३ नार्य: नरान् वृण्वंति-स्त्रिया पुरुषोंको वरती [पसंद करती हैं।
घयं वृक्षान् धुनुमः- हम पेडोंको कॅपाते हैं।
यूयं सत्फलं आनुथ-नुम लोग पञ्छा फल पाती।
नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनामो-
ऋग्वंति, शक्नोति, दुनोमि, आनुवंति, चिनुषः, धुनोति,
शफ्नुवंति, चिनुते, वृण्वते, चिन्थे ।
घात्वर्थ ।
आप्ल-पाना। शक्ल-समर्थ होना।
श्रु-गुनना।
इदुदु पी होना।
साध-रिदकरना। चिम्---दका परना।
वृष-परना।
धुकेपाना।
नोट-जिस गणमें स्थल आत्मनेपदी पातु नहीं हैं उभरपदी और परस्मैपदी हैं
उसमें जप उभयपदिगोफ आरमनेपदम रुप नलाने कोनोरियणी लिली
रीतिसपनाकर चलाना।
१-सादिगणकी धातुओंसे 'सद निधि लिए, सर, गेट् लकार नि. स.
भति, मि, वः, मः, शि. य., प. से. , अतं. ए. मद, मो. सं. प्रते. ये आदि]
प्रत्यय परे रहते पीचमे तु पाता है। - सनना भावगे नह, लिए,
गर् मोट्में मममना । -सरात पानुभोरे यार यदि ''पा और उसके
AM-PM

समातनजैनग्रंथमालायां- परिशिष्ट (घ) रुघादिगणकी धातुओंका वर्तमान काल (लट् ) में प्रयोग। १ परशुः काष्ठं मिनत्ति-कुल्हाडी काठको काटती है। अहं पापं छिनधि-मैं पापको छेदता है। त्वं महीं भुनैक्षि-तुम पृथ्वीका भोग करते हो। २ देवी नदीजलं रिक्त-दो देव नदीके जलको खलाते हैं। आवां व्यजन मज्व:-हम दो जने पंखेको तोडते हैं। युवां गोधूमान पिष्ठः--तुम दो जने गेहुओंको पीसते हो। ३ मुनयः पुग्यपापानि मिंदंति-मुनिगण पुण्य और पापोंको भेदते हैं। वयं सेवकं अनु-युमः हम लोग सेवकको प्रेरणा करते हैं। यूयं तान् वि-शिष्ठ-तुम लोग उनको शामित करते हो। बाद कोई कित् या डित् खर होगा तो 'नु' क 'उ' को व् होगा। जैसे-रम- ति - घृण्वति । परतु व्यंजनात वातुओंके वादके 'नु' को कित् या ठित खर बादमें होनेसे 'उज्' होगा । जैसे-आप्नुमति = आप्नुवति । १-स्वादि गणकी धातुओंके अतके अक्षरसे पहिले इलम् [न ] वीचमें आता है यदि 'लट्, लट्, विधि लिह, लोट्र' के ति, त आदि प्रत्यय बादमें हो। जैसे-भिदि- मोंमे 'ति', लाये तो इसमें अतका अक्षर जो 'द' है [ 'इलो' नहीं क्योंकि इत् है] उससे पहिले 'न' आया जिससे कि मि न दति' आ। फिर १४२ पृष्ठकी चौथी टिप्पणीसे 'द्' का त् हुआ तो भिनत्ति हुआ। २-पृष्ठ १४२ की ३ री टिप्पणी देखो ३-'ति, मि, सि' को छोडकर शेष जितने आत्मनेपद परस्मैपदीके प्रत्यय है वे डित् कहलाते हैं। सो उनके तथा 'कित प्रत्ययोंके परे होनेसे श्नम् [न ] के अकारका लोप हो जाता है । जैसे मिनररते = भिन्तुते मिते । Rxनच तरिक ४-'न्' कोवादमें जिस वर्गका अक्षर होता है उसी वर्गका पाच- वा अक्षर हो जाता है। न त =रिक्त , भन्ज्यः भञ्ज । ५-षकार, वा टवर्गके परवर्तीया पूर्ववर्ती सकार, और तवर्ग कमसे षकारटवर्ग हो जाते हैं। पिष्+ -य-पिंष्ठ उद्दीयते नहीयते। ।

संस्कृतप्रवेशिनी। १४९ नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- मिन्त्तः, छिनत्सि, भुनक्ति, रिणच्मि, भनज्मि, युनक्ति, विशिन- टि, पिपंति। छिदिनों-[इौं-इत् है] मिदिो-दो टूक करना। रिचिों-खालीकरना। भुजो-रक्षा करना। पिप्ल-पीसना । उमंजो-[उ, ओ. इत् है ] युजिों-मिलाना । शिष्ट-गोभित करना। मर्दन करना। विदीर्ण करना। परिशिष्ट (ङ)। तेनादिगणकी धातुओंका वर्तमान कालमें प्रयोग १ आचार्यः व्याकरणं तनोति-आचार्य ब्याकरणको विखारते हैं। 'अहं ग्रन्थरचनां कैरोमि-मैं ग्रंथ रचना करता हूं। त्वं कटं करोषि तुम चटाई बुनते हो। २ छात्रौ विवादं तनुतः-दो विद्यार्थी विवाद करते है। आवां स्वकार्यहानि न कुर्व:- हम दोनों अपनी कार्यहानि नहीं करते हैं।' युवां किमेवं कुरुथ: तुम दोनो क्यो ऐसा करते हो। १ तनादि गणकी धातुओके और लट् उड् विधिलिड् लोट् लकारीके ति, तः, अति आदि परस्मैपट प्रत्ययोंके तथा ते, आते,अते, ए, वहे, महे, से, आथे, एवं आदि आत्मनेपट प्रत्ययो वीचमें 'उ' आता है। जैसे तन्+उ+ते तनुते । २-पृष्ठ १४२-की ९ न० की दूसरी टिप्पणी देखो। ३-'कृ' धातुकी 'ऋ' को 'बर' होजाता है पित् प्रत्यय वादमें रहनेते परंतु डित् प्रत्यय वादमें रहनेसे 'उर्' होजाता है। जैसे कृxxति-कXXति=करोति, कृ+उ+याकुर उxय-कुरुमः । ४-जिन प्रत्ययोकी आदिमें 'व' अथवा 'म' है उन प्रत्ययोंके बादमें होनेसे वीचके विकरणसवंधी 'उ' का इच्छाधीन लोप होना है। परंतु कृपातुके वीचके '' का सर्वथा लोप होता है। जैसे- तप-तनुवः, त-- नब.उथ (इसी पृष्ठकी ३ नं. की टिप्पणी देखो )कुरकुर्वः।

सनातनजैनग्रंथमालायां- ३ साधवः सत्तपः तन्वंति-साधु लोग श्रेष्ठ तप करते हैं। वयं एवमेव सदा कुर्मः हम सदा ऐसा ही करते हैं। यूयं न्याय्यं कुरुथ--तुम लोग न्याय्य बात करते हो। नीचे लिखे शब्दोंसे सस्कृत बनाओ- तनोमि, करोति, तनोषि, कुरुतः, कुर्वति, तनुते, तन्वते, मनुते, कुर्वीते, तन्वे, कुरुषे, तन्वहे, तनुवहे, क्षिणोति । धात्वर्थ तनुम्-विस्तार करना । हुकम करना।मनु-जानना। क्षिणुम्-हिंसा करना। परिशिष्ट (च) कवादि गणकी धातुओंका वर्तमानकाल [लट् ] में प्रयोग १ वणिक् धान्य क्रीणाति-बनिया धान्योका क्रय विक्रय करता है। अहं छात्रं प्रीणामि मैं विद्यार्थीको सतुष्ट करता हू । त्वं कि सर्व जोनासि-क्या तुम सब जानते हो। २ कृषीवलौ धान्यानि पुनीत:-दो किसान धान्योका साफ करते हैं । आवां पुस्तकानि गृहीवः-हम दो जने पुस्तकें लेते हैं । युवां वृक्षान् लेनीथ:--तम दो जने पेड़ों को काटते हो। ३ चौराः धनं मुष्णति-चौर धनको चुराते हैं। १ क्रयादिगणकी धाओके और लट्, विधि लिङ्, लड्, लोट् लकारके ति, ते आदि प्रत्ययोंके वीचमें ना [ता ] आता है । जैसे--xिनाति-क्रीणाति मादि। २- मा [जानना] धानुयो लट्, विधि लिङ्, लट्, लोट्के प्रत्यय परे होनेसे 'जा' आदेश हो जाता है। -अजनादि त , ते आदि वितु या टित् प्रत्यय परे होनेसे ना [ना के 'माकारकोई होजाता है जैसे कि-क्रीनारत = क्रीणीतः, जानीव , लनीते । ४-पून और दम् धानके 'क' को हस्व 'उ' तथा धन्ध, और अन्य के 'न' का लोप हो जाता है लट्, विधिलिड्,उद्द, लेट् के प्रत्यय वादमें होनेसे । ५ जिस- की आदिमें स्वर है ऐसे रितु या हित [५.१४१ टि. २ देखो] प्रत्यय परे होनेसे 'ला''भा' काटोप होनाता है। जैसे-कीरना+भति-कीर्णति, क्रीण-ए-कोणे - ।

। संस्कृतप्रवेशिनी। वयं चौरान वध्नीमः-हम लोग चोरोंको बाधते है। यूयं शास्त्राणि प्रथ्नीथ---तुम लोग शास्त्रोंको रचते हो। 'नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य वनाओ- क्रीणीते, जानंति, पुनीवहे, गृहीथाः, प्रीणंति, गृह्णाति, गृहति गृहते, क्रीणे, लुनते। धात्वर्थ डुक्री-लेन देन करना। प्री-तृप्त करना । झा-जानना। पू-साफ करना। गृह-प्रहणकरना। लूझ-छेदना । मुष-चुराना। वंधो-बाधना । ग्रंथ-पुस्तक रचना। परिशिष्ट (छ)। चुरादिगणकी धातुओंका वर्तमानकालमें प्रयोग । १ स्तेनः धनं चोरयति-चोर धन चुराता है। अहंत चितयामि मै उसकी याद करता हूँ। त्वं जीवान् पीडयसितम जीवोंको पीडा देते हो। २ बाली मोदकौ भक्षयतः-दो लहके दो लड्डू खाते है । आवां तान् छादयावः हम दो जने उनको ढकते हैं। युवां चोरं ताडयथा--तुम दो जने चोरको ताडना देते हो। ३ नार्यः शरीराणि मंडेयंति-स्त्रिया शरीरोको भूषित करती हैं। १ चुर आदि धातुओंसे सब कालके रूप चलाते समय 'णि आता है । '' इत होनेसे धातुओंके भत अक्षरसे पहिले 'भ' को 'मा' 'इ' को 'ए' और 'उ' को 'ओ' हो जाता है। जैसे-छद्-इ-छा+इ, चुरxइ - चोर् इ । उसके बाद णिके, 'ड' को अय् हो जाता है। जैसे चोर्न = चोर्न अय = चोरय् । इस तरहका रूप होजानेके बाद ति आदि प्रत्यय आनेसे भ्वादि गणकी धाराओं के समान रूप चलते हैं। ये धातु सब उभयपदी हैं । २-प्रथम भालके १६२ पृ. को २ री । टिप्पणी देखो।

सनातनजैनग्रंथमालायां- वयं ईश्वर ईडयामः-हम ईश्वरकी स्तुति करते हैं। यूर्य धनं अर्जयथ-तुमलोग धन कमाते हो। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ--- चेतयते, चोरयसे, पीढयध्वे, ताडये, छादयावहे, ईडये, अर्ज- यामि, मंडये। धात्वर्थ । चुरचुराना। चिति-चिंता करना, पीड-पीडा देना। मक्ष-खाना। याद करना। छद-ढकना। तडमारना। मडिभूषित करना। ईड-स्तुति करना। भूष-भूषित करना। सूच-सूचना देना। अर्ज-कमाना। परिशिष्ट (ज) जुहोत्यादिगणकी धातुओंका वर्तमान (लद) कालमें प्रयोग । १ पुरोधाः अग्नौ हवि: जुहोति-पुरोहित आगमें घीकी आहुति देता है। १-हादिगणकी धातुओं के लट्,लड् , विधि लिङ्ग, लोट् इन लकारोंके और अन्य समस्त्र गणकी धातुओंके लिट् लकारके रूप चलाते समय दो रूप होजाते हैं। परत जिन पातओंकी आदिमें स्वर है उनके उस स्वरको दिल न होकर बचे हुये अक्षरोंको द्वित्व होता है। धातुके दोरूप होनेपर पहिले रूपके खरको हख हो- भाता है । जैसे-हु धाउसे लटके रूप चलानेकेलिये 'ति' प्रत्यय लाये तो धात 'हु' के दो रूप 'हुाहुति होगये (यहा घातक पहिले रूपमे हल 'उ' है इसलिये हस्वका हस्व ही रहा। दीर्घका हस्व जैसे-दा धातसे दा+दा+तिदादा+ति- ददाति) [ख] धातके जो दोरूप होते हैं उनमें पहिले रूपके वर्गके चौथे अक्षरको उसी वर्गका तीसरा अक्षर, वर्गके दूसरे अक्षर को उसी वर्गका पहिला अक्षर कवर्गको चवर्ग और हकारको जकार होजाता है। जैसे-हुरहु+ति इस जगह पहिला रूप ओ 'हु' है उनको 'जु' होगया तो+हुति हुमा । १४२ पृष्ठकी नंबरकी टिप्पणी *को 'ओं होगया तो जुहोति हुआ।

संस्कृतप्रवेशिनी। १५३ महं तस्मै पुस्तकानि ददामि मै उसे पुस्तकें देता हूं। त्वं अनाथान दधासि तुम अनाथोंको पोषते हो। २ छात्री चौरेभ्यः बिभीत:-दो विद्यार्थी चोरोंसे डरते है। मावां कुकृत्यं जहावा- हम दोजने कुकर्म छोडते हैं । युवां हविः जुहुया-तुम दोजने घीका हवन करते हो । ३ छात्रा अष्टद्रव्यं जुव्हेति-विद्यार्थी अष्टद्रव्यका हवन करते हैं। वयं धनं देना हम धन देते हैं। यूयं दरिद्रान धत्थ-तुमलोग दरिद्रोकी रक्षा करते हो। बिमेति, विभ्यति, बिमेमि, बिभीवा, विभीमः, बिमेषि, विमी या विमीथ, दत्ता, ददति, दध्वः, दध्मः, दधासि, धत्था, दधाति, "धतः, दधति। धात्वर्थ । -इवन करना । हुदा-देना। इधाञ्-धारना, पोषना। मिमी-डरना । सूचना-परिशिष्टमें दिये गये गणोंकी धातुओंके लड्, लोट्,विधिलिट् और नट्र आदि लकारोंक तथा क आदि प्रत्ययोंके रूप पृथक् २ नहीं बताये गये हैं सो उनके रूप भ्वादि और तुदादि गणकी धताओंके लडादिके रूपोंकी तथा जिसगण की वह धातु हो उस गणकी टिप्पणीको देख कर चलाना। १-पृष्ठ १५२ की १ न० की टिप्पणी देखो । २-इस गणमें प्रथमपुरुषके बहु- वचनमें 'अति' प्रत्यय न आकर 'अति' आता है । संधिक लिये ३३ पृष्ठ नं. ३ की टिप्पणी देखो । ३-जुहोत्यादि गणकी आकारात धातुओंके दूसरे रूपके 'मा' का लोप हो जाता है विधि लिइ, लट् लोट् और लट् के कित् वा डिम् प्रत्यय पर होनेसे। जैसे-दा-दाम-दम । ४ दुधाञ्धातुके दोरुप होनेसे जहाँपर कि . दूसरे रूपके 'आ' का लोप होगया हो वहा पहिले रूपके 'ध' को जो १५२ ५ श्री नं. १ (ख) की टि से 'द' होगया था उसको फिर ध हो जाता है य, र, रू, ब, न मरण नसे मिन्न व्यंजन वादमें रहनेसे ।

सनातननग्रंथमालायां- साहित्यपरिचय हिंदी बनायो- रुणद्धि पापं, कुरुते विशुद्धिं ज्ञानंतदिष्टं सकलार्थविद्भिः ॥५॥ क्रोधं धुनीते, विदधाति शांति, तनोति मैत्री, वि-हिनस्ति मोहं। पुनाति चित्त, मदनं लुनीते, येनेह बोधं तमुशंति चिदंति]संत ॥२॥ तमो धुनीते, फुरुते प्रकाश, शमं विधत्ते, विनि-हंति कोपं । तनोति धर्म विधुनोति पापं ज्ञानं न किं किं कुरुते नराणां ॥३॥ मीणाति, खनति, याचति, गणयति, रचयति विचित्रशियानि । अठरपिठरौं न शक्तः पूरयितुं गतशुभस्तदपि ॥ ४॥ सद्यः पातालमेति, प्रविशति जलधि गाहते देवगर्भ मुंक्त भोगान् नराणाममग्युवतिमि संमं याचते च । घांछत्यैश्वर्यमार्य रिपुसमितिहतेः कीर्तिकांतां ततश्च धृत्वा व जीव ! चिचं स्थिरमतिचपलं स्वस्य कृत्यं कुरुष्व ॥५॥ पापंर्धयते, चिनोति कुमति, कीर्त्यगनां नश्यति, धर्म ध्वंसयति, तनोति विपदं, संपत्तिमुन्मदति । भीति हन्ति विनीतिमत्र कुरुते, कोपं धुनीते समं किं वा दुर्जनसंगतिनं कुरुते लोकद्वयध्वंसिनी॥६॥ धर्ममन्ति तनुते गुरुपापं या निरस्यति गुणं कुरुतेऽन्य (दोषं)। सौख्यमस्यति ददाति च दुःखं तां घिगस्तु गणिका बहुदोषां ॥७॥ १-समस्त गणकी समस्त धातुओंसे णि प्रत्यय आता है और उसके रूप बु. रादि गणकी धातुओं के समान होते हैं परंतु अर्थमें भेद होता है । चुरादि गणमें तो जो धातुका अर्थ है वही रहता है और अन्य गणकी धातुओंका 'प्रेरणा' मर्थ बढ जाता है। जैसे कि देवदत्तो वदति-देवदत्त बोलता है । देवदत्तो व १४बाद मतिन्यादयति-ठेवदत्त धुलवाता है अर्थात् स्वयं नहीं बोलता दूसरे । को बोलनेकी प्रेरणा करता है। इसीतरह 'दुर्जनसगति पाप वर्धयते इससे यह भभिप्राय निकलता है कि-दुर्जनकी संगति पापको वढनेमें प्रेरणा करती है।' - , संस्कृतप्रवेशिनी। हंति, ताइयति, भाषते वचः कर्कश, रटति, खिद्यते, व्यथां । संतनोति, विदधाति रोदनं, यूततोऽथ कुरुते न किं नरः ॥ ८॥ रुप्यतेऽन्य कितनिषेध्यते वध्यते वचनमुच्यते कटु । नोद्यतेऽत्र परिभूयते नरो हन्यते च कितवो विनिंद्यते ॥९॥ एकदा धर्मकालं आतपक्लांत एकोऽजशिशुः पिपासापीडितो भूत्वा जलं पातुमदूरवर्तिनीमल्पसरितमैत् । तत्रोन्नतप्रदेशे जलं पिवंत वृकमीक्षित्वा निम्रप्रदेशस्थ जलमादातुमारभत सः। वृकस्तु दूरात् तं दृष्ट्वा "केनापि निमिचेन कलहमुत्पाद्याहमेनं व्यापादयामि भक्षयामि च" 'एति मनस्यकरोत् । ततस्तममिगत्यावोचत्-"आ. पाप! कथं मान गणयसियदेवं जलमाविलयसि (मैला करते हो) किनिमित्तोऽयमनुचितारंमः । इति तूर्ण नि-वेदय, नो चेत् वध्यो भ. वसि" मीतः सोऽजशिशुः सविनयमकथयत् “भो वृकश्रेष्ठ! यदा भवान (पूज्य ) बूते तत्कथं संभवेत्, भवतो यज्जलं वहति तदहं . पिवामि, एवं स्थिते मयाकलुषितं जलं प्रतिकूलं त्वां कथं यायात्"। वृकोऽवोचत "अस्तु नामैतत् । त्वमधमोऽसि । षण्मासात् प्राक् मां त्वमशप इत्यहमणवस्" सोऽजशिशुरब्रवीत् 'हा कष्टं ! कथमस्य संभवः ? यद् मां जातस्य मासत्रयमपि न पूर्ण सोऽहंपण्मासात्माक् भवतमशपमिति कथं संभवेत्" वृकोऽत्रापि निरुत्तरोऽभवत् । ततो महताऽऽवेशेन नेत्रे विस्फार्य दंतैर्दतान् विघट्टयन पादाघातैर्भुवं कं- पयन्निव तमुपसंगम्य तारस्वरेणावोचत्-"भो दास्याः पुत्र ! यदि चं नाशपस्तहि शप्ता तव पित्रा भाव्य । नो विशेष:" एवमुक्त्वा सते दीनमहन् । ! १-धर्मवाच्य और भाववाच्यमें समस्तगणोंकी धातुओंके एकसे ही रूप होते हैं। इसलिये ३५ पृष्टके वाच्य परिवर्तनकी टिप्पणी देखो। २ हस्व अकारके वाद यदि 'य' यथवा 'व्' होगा और उस य् अथवान् के बाद कोई स्वर् होगा तो य् और छ नईछाधीन लोप हो जायगा। जैसे-धर्मकाले ओतप-धर्मकार आतप, धर्म- ? साच्यातपा - सनातनजैनग्रंथमालायां- षष्ठ अध्याय। संपूर्णगणकी धातुओंका परोक्षभूत (लिट् ) कालमें प्रयोग प्रथम पाठ। परस्मैपदी धातु । १ छात्रः व्याकरणं पैपाठ,-विद्यार्थीने व्याकरण पढ लिया । अहं मचा बहु जगैद, जगाद-मै मत्त हुई बहुत बोली। त्वं ग्राम वनजिथ-तुम गावको गये। २ क्षत्रियौ नगरं रक्षतुः-दो क्षत्रियोंने गावकी रक्षाको । आवां स्वप्ने जमिव-हम दोनों स्वप्नमें चले। १-लिट् लकारके परस्मैपदमें रूप चलानेके लिये प्रथमपुरुष में णश् (अ) अतु, उ. उत्तमपुरुष में णश् (अ) व, म, मध्यमपु में थ, अयुः अश् (अ) प्रत्यय आते हैं। जैसे 'पठ' धातुसे णश [प्र पु० ]आया तो पxम' हुमा । १५२ पृ. १ नवरकी टिप्पणीसे दो रूप हुये तो पट-पट-अ हुथा । (ख)धातुके जो दो रूप होते हैं उनमें पहिले रुपके आदिके स्वरसहित एक अक्षरको छोडकर याकीके सब अ- क्षरोंका लोप होजाता है। जैसे-'पल्-पट्-अ' यहा पर पहिला रूप जो पठ् है उसमें पहिलेका स्वर सहित एक अक्षर 'प' बच रहा और वाकीका जो ' था उ- सका लोप होगया तो प-पठ-अ रहा । भव-मित् और णित् प्रत्ययवादमें रहनेसे शब्दके अत अक्षरसे पहिले अक्षरोंके 'भ' को 'आ' हो जाता है । इसलिये 'प+ परम' यहा पर णित् प्रत्यय णश् का 'अ' वादमें रहनेसे पटमेंके 'प' के 'भ'को 'भा' हो गया तो पपाठ हुआ । इसीतरह जुहोत्यादिगणके और यहाके नियम देख- कर अन्य धातुओं के रूप चलाना। २-उत्तमपुरुषके णश प्रत्ययके बादमें रहनेसे धातुके मत अक्षरके पहिले 'म को मा इच्छाधीन होता है-अर्थात् होता भी है और नहीं भी होता । ३-धातुसे यदि लिट् उट्, लट्, लड् और उड् लकारका ह और य व्यंजनसे मिन व्यंजनादि प्रत्यय बादमें होगा तो वीचमें इ (इंद) भावेगा जैसे बज्+व+म+पचनजिथ । ४-पूछ १४२ की ६ नंबरकी टिप्पणी देखो।।

, संस्कृतप्रवेशिनी। युवां ओदनं चखादथुः-तुम दोनोंने भात खाया । शिष्या गुरुं पप्रच्छु:-शिष्योने गुरुको पूछा। वयं मत्साः जगदिम-हम लोग मत्त हुये बोले। यूयं धनं जह-तुम लोगोंने धनको हरण किया । नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ--- जहार, चकर्त, दिदेश, आनर्च, आर्ट, रिरेष, जग्मुः, पैस्पर्श, तुवोदिव, विविश । उचाच ऊचतु, ऊचुः, जघान, जन्नतुः, जघ्नु, पपौ. पपतुः, पपुः, विवेद, विविदतः ततान, तेनतुः, तेनुः, चिकाय, चिक्रियतुः, चिक्रियुः। १-जिस धातुमें 'g' है उसके दो रूप होनेपर पहिले रूपकी ऋको 'अ' हो जाता है। जैसे दृ+१+अ=(१५२ पृष्ठकी ख टिप्पणीसे हकोज) ज++अ=जह । २-पृष्ठ १७ की चौथी टिप्पणी देखो। ३-जिस धातुकी आदिमें 'अ' स्वर है और उस स्वरके बादमे संयुक्त व्यंजन है तो उस 'म' को दीर्घ 'आ' होजायगा और उन व्यजनोंके और 'आ' के वीचमें 'न' (नुक्) आजायगा। जैसे अर्च+अ-आ+ न च्म-आनर्च। ४-(क) जिन अकारादि धातुओंके अतमें सयुक्त व्यंजन नहीं है उनके अकारको केवल दीर्घ ही होगा नुक् नहीं । (ख) धातुके दो रूप होने- पर आदिके व्यंजनको छोडकर दूसरे तीसरे आदि सब व्यंजनोंका लोप हो जाता है। जैसे-अट (जाना ) धातुसे लिट् लकारके प्र पु. एकब मे णा आया तो • १५२ पृष्ठकी १ नंवरकी टिप्पणीसे स्वरके वादके अक्षर ट को दोरुप होनेसे 'अट्+ +अ हुआ और इस टिप्पणीके खि] नियमसे आदिके टू को छोड दूसरे ट्रका लोप होगया जिससे कि अट् +अ रहा । पश्चात् इसी टिप्पणीके [क] नियमसे दीर्घहुआ तो माट आ। ५-जिस धातुकी आदिमें श, ष, स मेंसे कोई है और उन श, ष, सके बाद वर्गका पहिला वा दूसरा अक्षर है तो उस धातुके दो रूप होनेसे पूर्व रूपके श, ष, स नष्ट हो जाते हैं और दूसरे व्यंजनको छोड़कर शेष ओर पासके सब व्यंजन नष्ट होनाते हैं अर्थात् केवल स्वर सहित दसरान्यजन वाकी रहता है। जैसे स्पृश+ स्पृश्+अ-पस्पर्श । ६-पृ. १६७ टि. १ देखो । ७-पृ. १५८ की दूसरी और १५९ की टि. १ देखो। -पृ. १५८ टि. ४ देखो । A - सनातनजनग्रंथमालायां- द्वितीय पाठ। आत्मनेपदी धातु । १ इति हिरण्यनामा कश्चित् अमिर्दधे यह हिरण्य नामक किसी मनु- ष्यने कहा। अहं दृष्ट्वा तं स्वमे अति-मुमुदे-मैं स्वप्नमे उसे देखकर अति प्रसन्न हुआ त्वं सत्तपस्विनं ईक्षांचकृषे तुमने श्रेष्ठ तपस्वीको देखा था । २ पंडितौ तदेवं जनाते-दो पंडितोंने उसे ऐसा समझा । आवां पूर्व ववृधिवहे. हम दो जने पहिले वटे थे। युवा महद्धनं चोरयांचकाथे-तुम दोनोने बहुत धन चुराया था ३ जनाः तदाज्यकाले मुमुदिरे-लोग उसके राज्यसमयमें प्रसन्न हुये थे। वयं वस्त्राणि चिक्रियिमहे-हम लोग वस्त्रोका लेन देन करते थे। यूयं ओदनं पेचिवे-तुम लोगोंने चावल पकाये थे । नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य वनाओ- मुमुदाते, दधिरे, पेचे, चोरयांचके, जशे, मुमुदिषे, पेचाते, चोर- यांबभूवतुः, चोरयामासुः, शिश्ये, शिश्याते, शिश्यिरे, चक्रिरे। हिंदी बनाओ- भगवान् हसन्निति जगाद कारणं। धर्मरुचिरिति सुरस्त्रिदि- १ आत्मनेपदम लिट्लकारके रूप चलानेकेलिये प्र पु में ए, आते, इरे, म- ध्यमपु. मे-से, आथे, वे और उत्तमपु० में ए, बहे, महे प्रत्यय लगते हैं और द्वित्व आदि कार्य परस्मैपदके समान होते हैं । २ आकारात यातुके द्वित्वके दूसरे रुपके अंतके 'आ' का लोप होजाता है। ३ जिनधातुओंकी आदिमें दीर्घ 'ई ऊ, ऋ है। उनकै (अच्छ, कणके सिवाय) तथा काम्, अनेक स्वरवालियो और णि सन् आदि प्रत्ययात धातुओंके लिट्में दो रूप नहीं होते लेकिन अतमें आम लगाकर , म अम् धातुके लिट्के म्प लगा देते हैं और कृ, भू, अस् का जो पद है उभयपदया परमपद' है उसीम रूप चलते है। जैसे-देश-आम्-चक्रे,= ईक्षाचक्रे, ईक्षा- चकार, ईक्षामास, इताम्बभव, चोरयामास आदि । ४-लिट्लकारका कित् या .

संस्कृतप्रवेशिनी। है . ; वात् ( स्वर्गात् ) समुपा-ययौ विकृतवृद्धविग्रहः । भेजुरमरनि- वहाः स्वभुवं । तस्य जननसमये पवनः सुरभिर्ववो सुरभयन् दिग- गनाः । प्र-जगर्जुरूर्जितरवं गजारयः [सिंहाः] 1 महिमानं स हिर- ण्यजं विवेद । विलुलोके स जनं पलायमानं । उपजातकुतूहल: कुमारः परि-पप्रच्छ पलायनस्य हेतुं । ददृशे च गतेन तेन तस्मिन् नगरं तद् रिपुसैनिकैः परीतं । विधवां स चकार तस्य राज्यलक्ष्मी। रामा वुवुधे जातिकुलोन्नतिस्तदीया। गुरुविष्टर सिंहासन ]मा- स्थितेन तेन स्मितपूर्व स कृताशिपा वभापे । अधिपस्तं विससर्ज नम्रमौलिः । नृपः पुरं रुरोध गत्वा सभयैः पौरजनौर्वलोक्यमानः । हँदि सस्मार दृढस्मृतिर्हिरण्यं । मुमुचे नृपन तेन कोपादरि- मोहप्रवलेन तामसाटे । द्विपता वले विपुलतेजसि य प्रवबंध कीट- कधियं प्रधने (युद्धे । निजनामसर्वभुवनप्रथितं दधुरर्थशून्यमधिपाः ककुमा (दिशा) । तिलक मितेरुप-चिकार्यकलाः जनता (जनसमूह) तं प्र-णनाम चालमिव चंद्रमसं। मनो न जहे व्यसनमनस्विनः। अधीश्वरः सुतेन तेनैव रराज जिष्णुना [जयशीलेन । तपः समधि- शिश्रिये नृपतिभिः समं भूरिभिः [वडुमिः]। विनीतः शिष्यवद् भेजे देश मुनिसमाश्रितं। लोक शीतांशवेचिंद्राय]न नितरा स्पृहयांबभूव । 'सवा बुभोज वसुधां निजतेजसैव । या कांतिमापधिपतेः परिभूय दित् प्रत्यय अथवा जिसकी आदिमें इट है ऐसा प्रत्यय परे होनेसे पहिले रुपके असयुक्त व्यजनके वाद यदि दूसरे रूपका प्रारमका ब्यंजन अकारात होगा तो पहिले रूपका तो सर्वथा नाश हो जायगा और दूसरे पके प्रारभिक व्यजनके "अ' को 'ए' होजायगा । जैसे-पच्-अतु = प-पच्-अतु = पेचतु , पच-चे- प-पच-इ-"वे = पेचिश्वे । १-आकारात धातुसे परके णश् को औ होजाता है । २-कर्मवाच्यमें आत्मनेपद हो जाने के सिवाय कुछ विशेष मेद प्रायः नहीं होता। -चिन (इकट्ठाकरना) धातुके लिन्के दूसरे रूपके 'च' को 'क' इच्छाधीन होता - है । चिकाय, चिचाय। - १६० सनातनजैनग्रंथमालायां- तस्थौ । स नृपः' देव्या सुखान्युनुभवन् दिवसान निनाय । 'स'देवी- मुदनुनयनांसहसा ददर्श गर्म कियद्भिरथसा दिवसैर्वभार ! अभ्यु- द्यमः [प्रयत्न सह ननाश वलित्रयेण। उदयनिलये (उदयशील) जाते तस्मिन् ननंदसनंदने (पुत्रे)।नपस्पृशेदोषगणैः कुमारतानृपाः प्रणेमुः प्रणतैकवत्सलं विलोकमायासम सेवयाऽऽगतं सभाऽजिरे (अंगणे) राजगजं प्रजापतिः । धीरधीर्जधानमुष्टाधनपीवरे करे । नरेश्वरस्तं प्रणिपत्य योगिनामधीश्वरं स्तोतुमिति प्रचक्रमे । अपि शशंस स गोकुलवासितां (गौओंके झुडमें रहनेको) क्षितिषु गौरिव गौ-(वाणी) जगतीभुज-(नृपस्य) चिरतरं विचचार निरंकुशा। वसुमतीपतिराप स वाहिनी (सेना)। सप्तम अध्याय समस्तगणकी धातुओंका सामान्यभूत (लुइ)कालमै प्रयोग प्रथम पाठ। परस्मैपदी धातु । १ नेत्रद्वयं धवलतां अगमत्-दोनों आखे श्वेत होगई। अहं शत्रु अजैषम्-- मैंने शत्रुको जीता। १ धातुओसे लुट् लकारके [ तू, ता, उ, , त, त, अम, व, म] आदि लडके समान प्रत्यय आनेपर मध्यमें कहीं अह [अ] कहीं कच् [भ] कहीं क्स (स) कहीं नि [ह) और कहीं सि [स् ] आता है एव व्यंजनादि समस्त धा- तुओंके प्रारममें अतथा स्वरादि धातुओंकी आदिम आ' लगाया जाता है। २ जिन- धातुओका 'ल' इत् गया है उनसे 'अड्' आता है जैसे गम्लू, आप्लके गम्+अ+ - अगमत, आप्रअत्-आरआप्+अत आपत् । ३ जिनधातुओंके लुके मध्यमें अड् आदि कोई नहीं आते उनके मभ्यमें सि [स् प्रत्यय आता है और परस्मैपदम उस सिके आनेसे धातुके अतके 'ई' को ऐ, 'न,' को औ, क, *' को आर् हो जाता है। जैसे-जि+सू+अ अ-जि-अ-अजैष ।

, - संस्कृतप्रवेशिनी। त्वं किमेव अवादी:--तुमने ऐसा क्यों कहा । २ मिक्षुको मिक्षा अयाचिष्टाम्-दो मिखारियोंने भीख मांगी । आवां वाराणसी अनाजिब हम दोनों वनारस गये थे। युवां जीवान् अवधिष्ट-तुम दोने जीवोंको मारा । ३ छात्रा विद्यालयं अमुचन्-विद्यार्थियोंने विद्यालय छोडा । वयं सर्वशं अनसिप हम लोगोने सर्वज्ञको नमस्कार किया। यूयं हृषीकसुख अन्वभूत--तुम लोगोंने इंद्रियसुखको भोगा। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- अजैषीत, अजेष्टाम्, अजैपुः, अजैषीः, अजैष्टं, अजैष्ट, अजैव, अजैम, अगमता, अगमन्, अगमः, अगमतं अगमत, अगमं, अग- माष, अगमाम, अवादीत, अवादियां,अवादिषुः, अवादी:, अवादिष्ट, अवादिन, अवादिपं, अवादिप्व, अवादिष्म, अभूत्, अभूतां, अभू- १-जिन धातुओंका 'ल.' या 'औ' इत् है या जिनके अतमें 'आ, इ, ई, उ' मेंसे कोई स्वर है उन धातुओंके तिवाय समस्त धातुओंके और 'सि' प्रत्ययके वीचमें इद [ ] आता है । जैसे "वद्रस्+ =अविद्+स्x-भव-इ-स्-" हुआ । अब-(ख) “ति [स् ] और त् [प्र. पु. एकव ] एवं ' (विसर्ग-म. पु ए. व ) के बीचमें ईद (ई) आता है। [ग] यदि वह सि (स्) इट् और ईट्र के वीचमें आ- जाय तो नष्ट हो जाती है। इस नियमसे 'ई' आया तो 'अवxxसई+ यह अवस्था हुई। यहां इट एवं इंट्के वीचमें 'स्' आगया है इसलिये वह नष्ट हुआ तो संधि होनेसे तथा [५] 'वद ब्रज, और रकारांत, लकारात,धातुओके अंतके अक्षरसे पहिले हस्व "अ' को सि परहोनेसे दीर्घ होजाता है" इसनियमसे 'आ' होनेसें 'अ- वाद:ई- अवादी.' हुआ है । २ यम् रम्, नम् और दा, धा के सिवाय शेप आकारांत धातुओंसे सि [स] आनेपर उस सि [स् ] से पहिले 'सि' आती है। जैसे नम्रैस्+म = अनम्-सि-रम-अनसिष्म । ३-द, धा,भू, स्था, इश्, इक्पा [ पीना ] इन धातुओं के परवर्ती परस्मैपदके सि [स् ] का लोप होजाता है । ax भूस् त अभूत, भदात्, अधात् ।

१६२ सनातननग्रंथमालायां- वन्, अभूः, अभूतं. अभूत, अभूवं, अभ्व. अभृम, अनंसीत्, अनं- सिष्टां, अनंसिपुः, अनंसी:, अनंसिएं, अनंसिष्ट, अनंसिपं. अनंसि- व, अनंसिप्म, अयासीत्, अयासिष्टां, अयासिपुः, अटात्, अढातां, अदुः,अटाः, अदातं, अटात,अदां, अदाव, अदाम, अविक्षेत्, अवि- क्षता, अविक्षन. अविक्षः, अविक्षतं, अविक्षत, अविलं, अविक्षाव, अविक्षाम, अचूचरत्, अचूचुरतां, अचूचुरन्, अंचीकरत्, अची. करतां, अचीकरन् , अचकथत्, अर्चकथतां, अचकथन् , १-दृश यातु को छोड कर जिस बातुके अतका अक्षरश, प, सम में कोई एक है और उस अतके श, प मने पहिले यदि इ. ई, उ, क, ऋ, क में में कोई स्वर है तो उस धातुके तथा तु आदि प्रन्ययाक वीचमे क्स स] आता है। जैसे विशxत्-अ+विश्न सरन [पूर्वक नमानश् को प और उस पको क, तथा सको प+प- अविक्षत् । २-जिन धातुओमे णि होता है उनमें लुट् लकारके रुप बनानेके लिये त् भादि परस्मैपद और आत्मनेपद प्रत्ययोंके वीचमे कच् [अ] भाता है। [क] कच् प्रत्यय होनेसे णिका लोप होता है और धातुका म्पजैसा शुद्ध पहिले था वैसा ही होकर द्विगुणित होजाता है। जैसे-त्रु+६ [णि] चौरि+आरत् [कटिप्पणीसे] चुस्+अ+त [पृ. १५६ के न 1[ख]की टि देखो] अ-चुम्वुअन [ख] जिस व्यंजनादि और व्यजनात घातुके कच् परे होने से दो रुप हुये हैं उसके पहिले रूपके व्यजन मिले हुये स्वर को दीर्घ होजाता है और यदि वह पहिलेका स्वर् अ है तो उसे इ ई जाता है । जैसे-अरचुचुअल-अचूचुरत्, छादिxअ+त्--अ+छ+अत्-अर + च्छत अचिच्छदत् । ३-जिस धातु का द्वित्व होनेसे आया हुआ पहिल रूप सयुक्त व्यंजनसे पूर्व नही होता है उस धातुके पहिले रुपके अको दीर्घ ई होत है । जैसे अचिच्छदत् में तो हुआ नहीं, क्योंकि पहिला रूप च च्छ से पूर्व । इसलिये हस्व इही हुआ और कारिअन अच कृमद अधीकरत् यहा ई हो गय ४-यह अकारात धातु है व्यजनात नही । जिनके मतमें व्यंजनात है उनके यहा अधीकथश्च मत्रिभ्यो राजद्रोहो विधीयता [क्षत्रचूडामणि १सर्ग ] होता है संस्कृतप्रवेशिनी। १६३ हिंदी बनाओ। सुरथो नाम राजाऽभूत् समस्ते क्षितिमंडले। भर्तुर्विप्रकृताऽपि रोषणतया मा स्मै प्रतीपं गमः। अन्यत्रमना अभूवं नादर्शमन्यत्र- मना अभूवं नाश्रौषं । शुकनासोऽपि महांतं कालं तं राज्यभारम- नायासेनैव प्रज्ञावलेनाऽभार्षीत् । यथैव राजा सर्वकार्याणि अका- पीत् वदसावपि द्विगुणितप्रशानुरागश्चकार । उद्भूतमूच्छीधकारा च पातालतलमिवावतीणी तदाक्काहमगमं किमकरवं किं व्यलपमिति सर्वमेव नाऽशासिषं प्राणाश्च मे तस्मिन् क्षणे किमतिकठिनतयाऽस्य मूढहृदयस्य, किमनेकदुःखसहिष्णुतया हतशरीस्य किं भाजनतया जन्मांतरोपात्तस्य दुष्कृतस्य, किं दुःखदाननिपुणतया दग्धदैवस्य केन हेतुना नोद्गच्छंति स तदपिनावेढिपं। कदाऽगुरोकसो भवंतः । स आह-नाहं तस्य किमपि वस्तु अमोषिष । स तेनेटका- भारानवीवहत् । स दृष्टपूर्वोऽपि सुरासुराणामजीजनत् कजलशै- लशंकां । तटाग्रभूमिर्जधनस्थलीव जलैरुदाऽऽप्लावि धनापगायाः (वननद्याः) सुरनिवहमवादीद्वारपालः कुबेरः। वृद्धि परामुदर- माप यथा यथाऽस्याः, श्यामाननः स्तनभरोऽपि तथा तथाऽभूत् । 'पंचदश' मासान् व्यधत्त नृपधामनि रत्नवृष्टि । परिजनपरिवेष्टितः सोऽत:पुरमयासीत्। कस्यचिद् वनवासिनो नदीतटवर्तिनं वृक्ष लुनतो हस्तात् सहसा निःसृतः कुठारो जलमभजत् । ततः सोऽशोचीत् मुककंट चारोदीत्। तस्य विलापं श्रुत्वा वरुण प्रादुरभूत् । तं धनस्थ: स्वशो- ककारणमचकथत् । तदा पाशी (वरुण) जलांतः जिलमध्ये] प्रविश्य शातकौम्भ (सुपर्णरचित) स्वधिति (कुठारं ) हस्तेनादायोदमजत् १-जय कि 'मा'का या माल का संबध घात से रहता है तब अ, आ मान से पहिले [४. १६० टि १ के अनुसार नहीं आता है । ६ पृ. १६२ टि.२-३ देखो।

१६४ सनातनजैनग्रंथमालायां- (ऊर्ध्वमागमत् )एवं तं वनवासिने दर्शयित्वा अपाक्षीत् “रे किमयं ते परशुः" । सोऽवादीत्" नायं मदीय इति । ततो भूयोऽपि निमज्ज्य राजतं (चांदीका धना) प्रश्चन (कुठार) मुदधरत् । तं दृष्ट्वा" नायमपि मम" इत्यरण्यसदुवाच । तृतीयोन्मजने विपिन (वन) चारिणो नष्यं वृक्षादनी (कुठार ) गृहीत्वोदगमत् । तां स मुदा स्वीवकार, वरुण- मत्युपकारिणं चौबोधि। तदा वनचरस्याजिय (क)व्यवहारदर्श- नेन संतुष्टो यादसांपति(वरुण)स्तापनीय(सुवर्णनिर्मित )राजते देऽपि कुठारे तस्मै पारितोषिकत्वेनादात् । सस्कृत बनाओ परंतु क्रिया सामान्यभूत (उइ) की हो- इस वृत्तांतको सुनकर उसका एक जातीय भाई भी नदीके किनारे गया और अपने कुठारको जान बूझकर नदीमें डाल रोने लगा। उसके रुदनको सुनकर पहिलेकी तरह (यथापूर्व) वरुण किनारे पर आया और सोनेके तथा चांदीके दो फुठारों को क्रमसे नदीमें डूब २ कर लाया तथा "क्या यही तेरा फुठार है" इस तरह उस जंगलीसे पूछा । उत्तरमें जंगली ने कहा कि-"हां ! (वाद) यही मेरा कुठार है" धरुण इस प्रकारके मिथ्यावादीको देख कर बडाही कुद्ध हुआ और उसे उसकालोहेका भी कुठार न दिया। सो ठीकही है जो लोग सत्यपर रहते हैं मायाचाररहित होते है उनपर सव लोग दया दिखाते हैं और जो लोमके वशीभूत हो झूठ बोलते हैं वे अपनी भी चीज खो बैठते हैं। द्वितीय पाठ। आत्मनेपदी घातु। १ छात्री गुरुं निरीक्ष्य अमोदिष्ट-विद्यार्थी गुरुको देखकर हर्षित हुआ । १-पृ १५४ टि. १ देखो २-पृ. १४२टि.३ देखो। ३-दीप,जन,बुध, धातुओंसे इच्छानुसार, और पद धातसे तथा भाववाच्य, और कर्मवाच्यमें समस्त धातुओंसे लके [प्र. पु. व.] त परे होनेसे वीचमे 'नि' (इ) आता है। १ आत्मनेपदमें घातुओंसे त, आता, मत, था, आया, ध्व, इ, बहि, महि संस्कृतप्रवेशिनी। अहं दिवा अशयिषि-मैं दिनमें सोया। त्वं आहारदानं दिया:-तुमने आहारदान दिया । २ भृत्यौ कटं अकृपातांदा नौकरोंने एक चटाई बनाई। आवां शत्रुसेनां व्यजेबहि-हम दोनोंने शत्रुकी सेना जीती । युवां किं शानदानं अदिपा-क्या तुम दोनोंने शानदान दिया। ३ के शत्रुसेनां अरुत्सत-किन्होंने शत्रुसेनाको रोका । [ढका। ' वयं वस्त्रेण स्वशरीरं अचिच्छदामहि-हमने कपडेसे अपने शरीरको यूयं कदा अंशयिध्वन्द्वं-तुम लोग कब सोये । प्रत्यय आते हैं और उनके मध्यमे सि [स] आदि पृ १३० टि १ में दिये गये अनु- सार समझना । आत्मनेपदमें धातुके अत अक्षरसे पहिले इ को ए और उ को ओ होजाता है इटके वाद यदि सिका स्परे हो। जैसे मुद् स् त-मुद् इस् त-अमोदइ यूत [पृ. १४८ टि. ५ देखो] अमोदिष्ट । ३ दा, धा, और स्था धातुके आ को इ होजाता है लुट् आत्मनेपदमें [क] हस्व स्वरके वाद यदि सिका स् होगा और उसके वाद य, र, ल, व, अ, म, ड, ण, न, के सिवाय कोई व्यंजन होगा तो उस स् का लोप हो जायगा । जैसे दा त अंदा म् त-अ दि स् त, अदित, अदियाः । कृ त, अकृ स् त अकृन । ४ दा, धा, और स्थाके [इसी पृष्ठमै ३ नं० की टिप्पणी देखो इको छोड़कर शेष धातुओके इकारको एकार, उकारको ओकार होजाता है वि परे होनेसे 1 (क) वि और परा उपसर्गपूर्वक जि धातु आत्मनेपदी है। वि जि स्त वि अ जे प् त-व्यजेष्ट ५ जिन धातुओंका इर् इत् है उनसे क्स आता है । पृ. टि. देखो । ६ य, र, ल, व, अ, म, ड, न, म, झ, और भ इन व्यंजनादि प्रत्ययोंके परे रहते पूर्वके अको दीर्घ होजाता है। जैसे पृ १६२ न० २-३ की टिप्पणीमे अचिच्छद महि अचिच्छदामहि । ७-इ, उ, ऋ, ए ऐ, ओ औसेपर जो पीध्य, लट्, और लिट् का ध्वं होताहै उसको वं नित्यं होता है और इट् या बि के 'इ' से पर होनेसे इच्छाधीन ढ्व होता है और 'ये' से पहिलेका जो सि- का स् होता है उसका लोप होजाता है। जैसे अचेव, अशयिध्वं, अशाबिड्वं ।

सनातनजेनग्रंथमालाया- नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- अमोदिपि, अजनिपत, अवर्तिष्ट, अतीतडिचं, आर्चिपि, अश- यिपाता, अशयिषत, अशयिष्टाः, अशयिपाथां, अशयिम्बहि, अश- विमहि, अचिच्छदि, अचिच्छदावहि, अचिच्छदथा, अचिच्छदार्था, अचिच्छदध्वं, अचिच्छदत, अचिच्छदातां, अचिच्छदंत, अरुद्ध, अरुत्सातां, अरुद्धाः, अरुत्साथां, अरुवं, अरुत्सि, अरुत्स्वहि, अरुत्स्महि, अद्विक्षत,अद्विक्षातां, अद्विक्षत, अद्विक्षथाः, अद्विक्षाथां, अद्विक्षध्वं, अद्विक्षि, अद्विक्षावहि, अद्विक्षामहि । हिंदी वनाओ--- कैस्मिंश्चित् काले कोऽपि कंठीरवो मति व्यधित “यदहं खरं (रासभ) सहायं कृत्वाऽऽखेटे (शिकार करनेमें) व्याप्रियेय" इति । स चक्रीवंतं (गर्दभं) निर्दिदेश" भो रासभ ! त्वं वृक्षगुल्मच्छा- दितो भूत्वा तिष्ठ, तथाऽस्मिन् काले च भयोत्पादकं चीत्कारं कुरु, तस्मादारंभाच्च मा विरंसीः। एवं त्वयाऽनुष्ठिते सर्वे पशवो मिया- क्रांताः पलायितुं प्रवत्तेरन् । अहं तु निर्गमपथं रोत्स्यामि। तेन मार्गेण गच्छतः सर्वान् च रेपियामि।" ततः खरेण यथानिर्देश कृते दृत- गतीन् धावतः पशून निर्गममार्गस्थितः सिंहोऽश्रमेणवैकैकमवधिष्ट, यदेमानि पशुशवानि ममोदरपूर्तये पर्याप्तानीति सिंहोऽमानिष्ट तदा स गर्दभं व्यावयाभ्यधात्" भो चक्रीवन् ! साधु, साधु , साधु कृतं १-य,र, ल,प,न, म, ङ, ण नसे भिन्न किसी व्यंजनसे पर यदि स होगा तो उसका लोप हो जायगा य, र, ल, व, ञ् म, ङ, ण, न से भिन्न व्यंजन पर होनेसे २१ १६२ टि १ देखो। ३ शब्दके अतके न् के और स्वरसहित च या छ के वीचमें श् स्वरसहित माठ के बीचमें ए और स्वरसहित त या थ के बीचमें स आता है और न को अनुस्वार [ ] या अनुनासिक हो जाता है। जैसे कस्मिन् चित् करिमश्चित् कस्मॅिचित, भवाश्छादयति ।

1 संस्कृतप्रवेशिनी। 'सखे, अलमधुना ते चीत्कारेण । विरम तावत् । इत पहि" इति । तमाहानमनुखरश्चित्रकाय (सिंह)प्रतिनिवृत्य स्वनियोगः सुथ्वशून्यः कृतः" इति मत्वा तं सलीलममाक्षीत् "भो मृगाधिप! यदहं कृत- वांस्तत् तुभ्यमरोचिष्टनवा।" हर्यक्ष आह-"मतं तव कृत्यमिति किं कथयामि । अतीवामिनंदामि तत् । अष्टम अध्याय। समेस्तगणकी धातुओंका आशीवाद अर्थ (लिड्) में प्रयोग १ कुशलं ते भूयात्-तेरी कुशल हो। अहं वः श्रियं पुष्यासं-मैं तुम्हारा धन वढाऊ । त्वं मे शिवं दद्याः--तुम मुझे कल्याण दो । २ मुनी युष्मभ्यं शिवं क्रियास्तां-दो मुनि तुम लोगोंका कल्याण करें। आवां नृपा भूयास्व-हम दोनों राजा हों। गुवां दीनान न तुद्यास्तं-तुम दोनों दीनोको न सताओ। ३ वीतरागाः युप्मान पुण्यासुः--वीतरागी तुम्है पुष्ट करें । वयं आहारदानं सर्वदा देयास्म हम हमेशा आहार दान दें। यूयं सत्तन्वं श्रद्धेयास्त-तुम लोग यथार्थतत्त्वोका श्रद्धान करो। नीचे लिखे शब्दोसे वाक्य बनाओ। मुच्यासं, चोर्यास्व, अद्यासं, झ्यास, दीव्योत्, निश्चीयास्तां, शयिपीय, शयिपीवहि, शयिषीमहि, शयिपीठाः, शयिषीयास्थां, शयिपीढ्वं (ध्वं) शयिपीट, शयिपीयास्ता, शयिषीरन्, उंच्यात्, १ आणीलिंड् में परस्मैपदधातुसे यात्, यास्ता, यासु , या , यास्त, यास्त, यास, यास्त्र, यास्म प्रत्यय आते हैं ! २ दा धा,स्था, गै पा (पीना) धातुके आ को ए होजाता है परस्मैपदके आशीलिंड् में । ३ धातुके हस्व इ,उ को दीर्घ इ, ऊ होजाते हैं आशीलिङ्में । ४ आत्मनेपदी धातुओसे आदिलिड्में सीट, सीयास्ता, सीरन्, सीष्ठा , सीयास्था, सीड्वं, सीय, सीबहि, सीमहि प्रत्यय लगते है और इट आनेका नियम लिट् या लुके समान प्रायः समझना ।५ परस्मैपदमें बच् धातुके , १६८ सनातननग्रंथमालायां- उच्यास्तं, उच्याख, वक्षीय, वक्षीवहि, वक्षीमहि, निश्चिपीय, भुक्षीट, तनिपीट, कृपीट, नवम अध्याय । समस्तगणकी धातुओंका अनद्यतन भविष्यत् अर्थ( लंद) में प्रयोग १ देवदत्तः कदा पाठं पठिता-देवदत्त कब पाठ पढंगा । अहं गुरुं प्रश्न प्रष्टास्मि-मै गुरुसे प्रश्न पूंडूंगा। त्वं कदा ग्राम गंतासि-तुम कव गाव जाओगे। २ इमौ छात्रौ नूनं पंडितौ भवितारौ-ये दो विद्यार्थी निश्चयसे पंडित होंगे। आवां स्वगृह यातास्व:-हम दोनों अपने घर जावेगे। युवां धर्म उपदेयास्थ:-तुम दोनो धर्मका उपदेश देोगे। ३ प्रजाः राजगृहं गंतार:-प्रजा राजगृह जायगी। वयं कदापि धन न चोरयितास्म:-हम कमी धन न चुरावेंगे । यूयं किं कार्य कर्तास्थ-तुम लोग क्या काम करोगे। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- हासि, भोक्तारः, तनितास्मि, तनिताहे, काहे, एधिता, एघि- तारौ पघितारः, एधितासे, एधितासाथे, एधिताध्वे, एधिताहे, पधितास्वहे, एधितास्महे। दशम अध्याय। समस्तगणकी धातुओंका क्रियातिपत्ति अर्थ लिंड् ] में प्रयोग १ वृष्टिर्न यदि अभविष्यत्-यदि मेह न वर्षा तो वको उ हो जाता है ।१-परस्मैपदी धातुओंसे लट्में ता, तारौं, तार , तासि,तास्थः तास्थ, तास्मि, तास्त्र तास्म प्रत्यय आते हैं इट्का नियम लुट् की. भाति समझो, २--आत्मनेपद धातुओंसे छट्में ता, तारौ, तार , तासे, तासाथे, ताध्ये, ताहे, तास्वहे, तास्महे प्रत्यय आते हैं । इट आदिका नियम परस्मैपदके समान हैं। १--परस्मैपद धाराओंसे जुडमें-स्थत, स्यता स्थन्, स्यः, स्वतं, स्वत, स्य, स्थान - - . - संस्कृतप्रवेशिनी। अहमवश्यमेव आगमिप्यं-मैं अवश्य ही आऊंगा । यदि त्वं न अपठिष्यःयदि तुम न पटोगे तो कथमपि पंडितो न अभविष्यः-किसी भी तरह पंडित नहोओगे। २ यदि ती मत्समीप आगमिष्यतां-यदि वे मेरे पास आवेगे तो बहु पारितोपर्क अलप्स्येतां-बहुतसा इनाम पायेगे । यद्यावां स्तेयं अकरिष्याव-यदि हम चोरी करेंगे ताई तत्फलं दुःख अन्धविष्याव-तो उसका फलदुःख भोगेगे ।' युवां यदि मिक्षार्थ आटिप्यतं-यदि तुम भिमाके लिये जाओगे- सहि महदनं आप्स्यत--तो बहुतसा भन्न पावोगे । ३ यदि ते स्वामिसेवा अकरिष्यन्-यदि वे स्वामीकी सेवा करेंगे तो नूनं स्वर्ग अयास्यन्-निश्चयसे स्वर्गको जायगे। यदि वयं सवूनतं आचरिष्याम-यदि हम लोग श्रेष्ठ व्रत आचरण कैरेंगे कथं न संसारसमुद्रं अतरियाम-क्यों नहीं संसारको पार करेंगे। यदि यूयं जीवान अरिषिप्यत-यदि तुम लोग जीवोंको मारोगे तो 16 - - - तहि नरकं अनजिष्यत-नरकको जाओगे गीचे लिये शब्दोंसे वाक्य बनाओ- अभोक्ष्यावहि, अमोक्ष्यत्, अरक्षिप्या, उद्-अपत्स्यत मजनिया- महि, अस्खनिष्यत्, अयाचिप्यत, अजेप्यन् । सस्कृत बनामो- १। यदि माता पिताकी आझा मानोगे तो संसारमें सुख पावोगे। '२। यदि तुम इस बातको थोड़ा भी विचारोगे तो जहर ही आग्रह (सकेगा। ३। यदि वहां संव लोग निरालस रहेंगे तो कोई भी कुछ न ले. साम और आमनेपदियोंसे स्पत, स्येता, स्यंत, स्यथा , स्यया स्यध्वं, स्से, स्पापह, स्यालाई प्रत्यय लगते हैं और व्यंजनादिसे अ एवं स्वरादिसे आ पहिले, मृगता है । इट्का नियम पृ. नं टि. के समान समझो। छोड़ दोगे!" .

૨ सनातननग्रंथमालायां- ४। यदि मैं भी तुम्हारे शब्दको सुनता तो अवश्य ही डरजाता। ५। यदि वे दोनों उसकी वात न सुनते तो सुखसे रहते। तद्धित प्रत्यय अपत्यवाचक [इन्, "य, अण्, एयम्, ईय] १ सात्यरिस्तु तच्छ्रुत्वा तद्घोषणमवारयत्-सत्यंधरके लडकेने तो उस घोषणाको सुनकर रुकवा दिया। सैनापत्य स्वपितरमाह्वयत्-सेनापतिके लडकेने अपने पिताको बुलाया । प्राजापत्योऽयं वहूननीन् नाशयति यह राजाका लडका बहुतसे अनाको नष्ट करता है। ३ चैत्रगेवोऽध समागतः-चितकवरी गायवालेका लडका आज आया है। यामुनोऽयं वाल:-यह लडका यमुनाका पुत्र है। विद्याधर है। ४ वायुवेगेयो कृतधमी विधाधर-चायुवेगाका लहफा कृतधानामका १ जो प्रत्यय धातुसे न आकर विभकयंत शब्दोंसे आते हैं वे तद्धित प्रत्यय कहलाते हैं । तद्धित प्रत्ययात शब्द विशेषण होते हैं । २-हस्व अकारात शन्दोंसे 'उसका पुन' इस अर्थमें इम् प्रत्यय होता है, जैसे सत्यधरस्य पुत्र सत्यंधरxइ (क) मित् और णित् तद्धित प्रत्यय होनेसे शब्दमें जो एक वा भनेक स्वर होते हैं उन सब स्वरोंमें पहिला स्वर यदि अ है तो वह आ, इई हैं तो ऐ, उ ऊ हैं तो औ, हैं तो वे आर् होजाते हैं। जैसे-सत्यधरxइ, यहापर सब स्वरोंमें पहिला स्वर 'स' का अ है उसे आहोगया तो सात्यंधर+इ हुमा । (ख) यकारादि और म्बरादि तद्वित प्रत्यय वादमें रहनेसे शब्दके भतके 'अ आ, और इ ई का लोप हो जाता है और उ को ओ होजाता है। जैसे-सात्यधर + सात्यंधरिः।३-पति मान्दात शब्दोंसे पुत्र अर्थमें ण्य प्रत्यय होता है याकी नियम २ री टिप्पणी के देखो। -जिनशब्दोस पुत्र अर्थमें विशेष नियमसे कोई प्रत्यय नहीं होता उन सबसे अण् आता है। जैसे चित्रगुप-चैत्रगव । इसी पृष्ठकी नं० २ की टिप्पणी देशो। ५.जिनशब्दोंके स्वरोंमें सबसे पहिला स्वर था, ऐ, अथवा औ है ऐसे जोखी -- । संसाराप्रवेशिनी। १७१ वासवदतेय या अहर्ष सा-वासवदनाके उसकेको देख कर वह हर्षित हुआ। नामेयमादिनाथ सततमानता स्मः नाभिराजके पुत्र आदिनाथको हम लोग सदा नमस्कार करते हैं। ५. म्बनीयं को न पूजाति-वहिनके लडके (भानेज) को कान नहीं पूजता । प्राचीर्य को न स्लिाति-भाईके लडके (भतीजे) को कान नहीं प्यार करता नीचे लिये इन्दौसे वावय बनाओ- अवधार, आंजना, सोलोचना, वाईस्पत्या, चांद्रमसः, राधेयं, मानोरमा, ऐगपतिः, मायेय, वैनतेया, कौकिलेया, माणेयं । T रतादि अवधाले तद्धितप्रत्यय १ होरि परिदधाति पटमेपः यह हलदीमे रंगे हुये कपटेको पहिनना है २ भाहना हि स्याहादिना इन होग एक बम्जुमें अनेक गुण गन्द है। 'पवा विष्णुमति-अनुष्य मा श्रीकृष्णको पूजने हैं। ३ पाकरएमया घने यनने मेने तृदों (मंडियों) समूह देना। जनता एकीभता तता-मलिय गाय इंगिय ।

सनातननग्रंथमालायां- ४ वैयाकरणोऽयं विद्वान्-यह विद्वान व्याकरण जानता है या पढताहै । सौवागमा इमे छात्रा:-ये विद्यार्थी स्वागम पढ़ते या जानते हैं। ५ माथुराः पाटलीपुत्रकेभ्योऽधिका:-मथुरावासी पटनावासियोंसे ज्यादा है। [उत्पन्न होते हैं। ६ कंट्या: अकुहविसर्जनीया:-अ, कवर्ग, हकार और विसर्ग कंठमे दंत्याः लातुलसाः-लू, तवर्ग, ल और स दातोंसे बोले जाते हैं। ७ पूज्यपादीयान् ग्रंथान पठामि मै पूज्यपाद स्वामीके बनाये प्रयोको पठता है। [रोका गया खिन्न हुआ। ८ दौवारिकेण निषद्धोऽखिद्यत सा-यह द्वारमै नियुक्त किये गये मनुष्यसे शोल्कशालिको मामभाषत-शुल्कशाला (खजाना ) में नियुक्त किये गये मनुष्य (खजानची) ने मुझसे कहा। [की रक्षा करते हैं। ९ शरण्या: सजना जगत् रक्षति-शरणदेनेमें साधु सज्जन लोग जगत शब्दोसे समूह अर्थमें 'ता' प्रत्यय आता है। जैसे-ग्रामोंका समूह-ग्रामरता- प्रामता, जनता, वधुता, सहायता । ५-पढता है या जानता है' इस अर्थमें अण् प्रत्यय होता है । (क) शब्दकी आदिमें यदि इ, ई, के स्थानमें सघिसे आया हुआ य् और उ, ऊ, के स्थानमे आया हुआ व् होगा तो नित् और णित् प्रत्यय होनेसे उनके स्थानमे क्रमसे ऐय् और आव आदेश होजायेंगे। जैसे-व्याकरण अ यहापर णित् प्रत्यय 'अ' पर है इसलिये पहिले जो विxआ+ज्या हुआ था अर्थात् सधिके नियमसे य् आया था उसके स्थानमे ऐय् हो गया तो ऐयूx आकरण अ-चैयाकरण , सुxआगम स्वागमxअ सौवागम । ६-'रहने वाला' अर्थमें अण् प्रत्यय होता है। जैसे-मथुरामें रहनेवाला-मथुरा+अमाथुर । ७-शरीरके अवयववाची शब्दोंसे 'पैदा-होनेवाला' अर्थमे 'य' प्रत्यय होता है । जैसे दतमें होनेवाला-दंत-य-दत्य । ८ । नामवाची शब्दोंसे तथा तद् आदि सर्व- नाम शब्दोंसे अपत्य अर्थसे भिन्न अर्थोंमें इय प्रत्यय होता है-पूज्यपादका बनाया हुआ-पूज्यपाद ईय = पूज्यपादीय , तस्येद-तदीय । ९-नियुक्त अर्थमें इकण् प्रत्यय होता है+द्वार में नियुक्त द्वार-इक = दौवारिक [इसी पृष्ठ टि ५ देखो ] १-"उपकारी है, अच्छा है" इस अर्थमै 'य' प्रत्ययहोता है । जैसे शरणमें १ संस्कृतप्रवेशिनी। १७३ - सर्वे सभ्यास्तत्रसुः-सम्पूर्ण समाके प्रवीण लोग डर गये। १० उष्ट्रीयोऽयं वृक्षायोहि पुररसंतिष्ठते-यह पेड जो कि सामने पदा है ऊँटको हितकर है। पित्रीयोऽयं वाल: यह लडका पिताको हितकर है। ११ मथुरीवत्मान्यखेटे प्रासादा:-मान्यखेट नगरमै मधुराकेसे महल हैं। पात्रवत् अपात्राय न देयं-पात्रके समान अपात्रको न देना चाहिये। १२ मनुयंता मनुष्ये घसति-मनुष्यपना मनुष्यमें रहता है । किं गवि गोत्वमुतागवि गोत्वं--गायमें गौपना रहता है या गायसे भिन्न पदार्थमें! १३ सौरोज्यं हि सुखावह-सुराजता सुखदेनेवाली होती है। वार्हस्पत्यममात् तस्मिन्-उसमें बृहस्पतिका कार्य शोभित हुआ। जाइये नास्ति सुखं क्वचित्-मूर्यपनेमें कहीं सुस नहीं है। कविः करोति काव्यानिलालयत्यपरो जनः कवि काव्य ( कविका कर्म) बनाता है और दूसरे लोग उसे लालते पालते हैं। गौरवं हि मुखमंडन सतां-सज्जनाके मुखका भूपण गुरुता है । एकमात्राया लाघवेन पुत्रोत्सव-एकमात्राकी लघुता [कमिताई] से मन्यते वैयाकरणा: वैयाकरण लोग पुत्रके समान उत्सव मानते हैं । १४-कियन्मात्र जलं विप्र! हे ब्राह्मग स्तिना जल है? उपकारी शरण+भ्य-शरण्य । २-उसके लिये हित कर है" इस अर्धमें देय प्रत्यय होता है। ३-" वरावर" अर्थ वत् प्रत्यय होता है।४-'भाव (पना) अर्थमें त्व औरत (तल्) दोनों प्रत्यय होते हैं । जिसमेसे त्व प्रत्ययातोंके नपुसकनिगमें और तल् प्रत्ययांतोके नीलिंगमें रूप चलते हैं। ५-'उसका काम, या भाव इस अर्थम राज, शब्दात और पति शब्दात तथा गुणवाचक शब्दोसे टयण (य) प्रत्यग होता है। मराज का भाव वा कर्म-सुराजन्य- मौराज्यं । ६-गुणवानक शब्दों भाव अर्थमें अण् प्रत्यय होता है । ऊर्ध्व प्रमाण अर्थमें मावद् दमट, इचमत् प्रत्यय होते हैं। भौर लेने, तिरछे प्रमाण अर्थ में केवल मामट होता है।

१७४ सनातनजैनग्रंथमालायां- जानुदनं नराधिप!-राजन् । जाधके बराबर है। पादमात्रस्थानं देहि-पैरकी वरावर जगह दो । पुरुषद्वयसं वारि वर्ततेऽस्यां इसमें एक आदमीकी बराबर पानी है। १५ अयमनयोः पटुतर, पटीयान्- यह इन दोनोमें अधिक हुशियार है । अयमेषां पटुतमः, पटिष्ठ- यह इन सवोंमें अधिक चतुर है। १६ कृष्णीकरोति सतां यशांसि दुर्जनः--दुर्जन सज्जनोंके शुभ्र यशको काला कर देता है। लघूभवति सर्वो दीनताया प्रसंगात्-दीनताके कारण सब लोग लघु नही करमी लघु होजाते हैं। १७ श्रीकल्पाऽभूदकिंचना-लक्ष्मीसे कुछ ही कम वह [रानी] दीन हो गई। इद्रदेशीयोऽयं नृपः- यह राजा इंद्रसे कुछ ही कम है । अष्टादशवर्षदेश्योऽयं बाला-यह लडका १८ वर्षसे कुछ कम है। नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- सैद्धांतः, नैयायिका, मीमांसकः, छांदसा, आपणिकः, पाणि- नीय, सामंतभद्रा, नादेयं, पाण्यः, पाद्यः, श्रीना, ऐंद्रप्रस्था, काकं, आपूपिक, पैतः, कौसुंभः, कापायः, सहायता, ग्रामता, बंधुता, १-दो पदार्थीम जब एकको बडा [अधिक] बताना होता है तब तर और ईयस् और जब बहुतोंमें एक को बढा बताना होता है तब तम और इष्ठ प्रत्यय 'गुणवाची शब्दोंसे' होते हैं। २-'जो पदार्थ पहिले तो वैसा नहीं होता परतु किसी अन्य पदार्यके कारणसे वैसा हो जाता है जब ऐसा अभिप्राय रहता है तब चिकिल इत् है] प्रत्यय आता है कृ भू और अस् धातुका रूप परे रहते । और उस चिके होनेसे अकारात शब्द ईकारात तथा हस्व इकारान और उकारात दीर्घ ईकारात, सकारात हो जाते हैं। जैसे अकृष्ण कृष्ण करोति कृष्ण+च्चि (च्चि इत् होनेमे नहीं रही तो) कृष्णxकरोति= कृष्णीकरोति । असाधु साधुर्भवति–साबू भवति 'कुछ कम अर्थमें कल्प, देश्य, देशीय प्रत्यय होते हैं । ४-५-न्याय भादि कुछ गन्दासे जानना या पढना' अर्थमें इकण और मीमासा आदिसे अक प्रन्यय होता है। -अचेतन पदार्थवाचीगन्दोंसे समूह अर्थमें 5कण होता है। .

संस्कृतप्रवेशिनी। कर्मण्या, मणीयः, यौवराज्य, नार्पत्यस्य, मौर्येण. स्थौल्यं, हस्त- मात्र, शिरोदनं, आयतराय, पंडिततमान, गुफ्लीकरोति, गुरु- करोति, सत्यकल्प, नृपदेशीयं, सुंदरीभूतं, पंडितकल्पस्य । समासयुक्त पद। (तत्पुरुष, बहुव्रीहि, द्वंद्व ) १ शय्यागता रोगिण: दति-शय्या पर लेटे हुये रोगी रोते हैं । सुखप्राप्ता देवाः क्रीडति-मुख को प्राप्तहुये देय क्रीडा करते हैं। धर्मश्रिता श्रावका जिनमर्चति धर्मात्मा श्रावक लोग जिन भगवानकी पूजा करते हैं। २ मापोनमपि तत् न ग्राह-वह मासे भर कम भी न देना चाहिये । आत्मकृतं कर्म कस्मै न रोचते-अपना किया हुआ काम रिगे अच्छा नहीं लगता। परशुच्छिन्ना लता अम्लायत्-कुठारने काटी गई सता मुरमा गई। ३ कुंडलहिरण्यं मंच आनेयं कुंडलके लिये सुवर्ण शीघ्र साना चाहिये । मजाहित राजमिः कार्य-माओको प्रजाका हिन करना चाहिये । पित्रयं पुवा:प्राणानपि त्यजेयुः-पिताफे लिये पुत्रोंयो प्राण गी में देने भागि। -" वृकमीतोऽजशिशुरवदत्--भेडियासे बरा हुमा यकरीका बच्चा मोगा । मृत्युभयं सयान तुदति-मृन्युफा हर सबको दुख देता है। १-दो या दोसे अधिक पदोसे विभफीका लानाममास है। [2 गो] 'उसके सराय गार नेद हैं-अव्ययीभाव, तन्पुरुष, महुपौहि. भोर इंद्र। रिम दो पदों के समाममे पहिले पदका अर्थ प्रधान न होकर दूसरे पदमा का पारन हो- ता दै यद्द नापुरुष समास कहलाता है और प्रथमपद गामात द्वितीयान र विमर्गत विमहमें रहता है जैसे दायां गताः दाप्यागठाः, गण अनमापोग, इंदलाप हिरम्म फुटलदिरी, एकाद् मीत - कमीना, मोक्षस्य मार्ग कमाई, गद निपुणः पतमिपुतः। 1 १७६ सनातनजैनग्रंथमालायां- ५ मोक्षमार्गस्य नेतारं-मोक्षके मार्गके नेता, कर्मरूपी पर्वतोंके भेदने मेत्तारं कर्मभूभृतां-बाले और समस्त तत्त्वीके ज्ञायक ईश्वर सातारं विश्वतत्वानां-को उसके गुणोंकी प्राप्तिके लिये वंदे तद्गुणलब्धये।मैं नमस्कार करता हूं। ६ यूतनिपुणा जनाः कठंति-जुएमें चतुर आदमी दु.स पाते हैं। क्रीडासका वालका न पठंति-कीटामें लगे हुये वालक नहीं पड़ते हैं। ७ केवलज्ञानमुदियाय तस्य-उसके असहाय[इंद्रियों की सहायताके विना होनेवाला] जो ज्ञान उसका उदय हुआ। नवानं भुज्यतां भो:-अजी । नवीन जो अन्न उसे खाईये । ८ निपुणेमति पुरुष कथयामासैव-निपुण धुद्धिवाले मनुष्यने ऐसा कहा। त्रिकालगोचरं द्रव्यं स हि जानाति पश्यति-तीन काल हैं गोचर जिस के ऐसे द्रव्यको वह जानता वा देखता है । जिसने ऐसा वह वहासे लौटा । पराजितपरविभवः स ततो न्यवतिष्ठहराया है दूसरेके ऐश्वर्यको ९ रामलक्ष्मणौ वनमगाहिष्य-राम और लक्ष्मण दोनोंने वनमें प्रवेश किया। धवखदिरौ छिधि-धव और खदिर को काटो। हुये देखे। हंसचंकवाकास्तत्र परिभ्रमंतो हटा:-हस और चक्रवाक वहा घूमते नीचे लिखे शब्दोंसे वाक्य बनाओ- पाशपाणिः हितधुद्धिः, सपरिवार वीहियवान, जीवादीन, कर्मरता, दुःखातीतस्य, रथदास, राजपुरुपेण, गोक्षीरं, पुराण- पुरुषं, कृष्णतिलान् , क्षत्रियभीरुः, पंचगोधनः । ॥समाप्त॥ १जो विशेषण और विशेष्योंका समास होता है उसे कर्मधारयनामक तापुरुष बोलते हैं। जैसे केवलं च तत् ज्ञानं च [ केवल जो ज्ञान] केवलज्ञानं । २-जिससमासमें समस्तपदोंसे मिन्न पदका अर्थ प्रधान रहे उसे बहुव्रीहि कहते हैं। जैसे-निपुणा मतिर्यस्य-निपुणमति , यहापर निपुण और मति दोंनो पदो का अर्थ गौण है और अन्य पदार्थ जिसकी कि बुद निपूर्ण है वह शान है तो इसे वहुव्रीहि समझना । ३ जिसमें कि समस्त सभासमै आये हुये पद मुख्य हॉलसे कि कहते हैं । रामश्च लक्ष्मण

Sanskrit Praveshini-2

Author
Jain, Shrilal
Title
Sanskrit Praveshini-2
File name
Sanskrit Praveshini-2
Text
OCR done
Citation
1916
Published
2010/02
Publisher
Vishvakosh Press, Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
181
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain Sahitya
DLI number
344532
Barcode
99999990234391.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
cYJMzQLZPHp
Download PDF

Sanskrit Praveshini-2