Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Urvashi Uplabdhi Aur Sima
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उर्वशी : उपलब्धि और सीमा
[दिनकर की सर्वशी' का एकम मौलिक रिसेपण ]
प्रो. विजेन्द्र नारायण सिंह
मागमपुर विश्वविधालय
शानालोक, पटना-४
मानामोक
प्रमोक राजपथ पटना४
प्रथम प्राति १९५५
मुस्य । तीन रपये पचास पैसे
सरपानी प्रेस
डा० धर्मवीर भारती को
जिनकी अद्भुत प्रतिमा से
मैं अभिभूत रहा हूँ
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- मूमिका पप इस पुस्तक समर में स्पा नि ? पिछले तीन वर्षों स शिकार ही पाता पाई। ममता मूडमार पीर होती है। उसकी क्या कोई मास्मा की मा माती है? 'उबी' मेरी इस ममता का मुख्य कल रही है। उन कितनी बार पड़ गया हूँ मार नहीं है। रिमु पामोचक का वो ममता स मुक्त हाना ही पाना है। तृमना पौर विश्लपण यही पौगार मेरे सहायक ऐहै। कोई भी माहित्यिक हनि निःसंप पीर नहीं होती है। रेकना यह हावा है कि पपन इतिहास की पर म्परा म उसका क्या स्पान हा सकता है ? यही पर तुममा की प्राण्यकता पाती है। पून शिसपण वा प्रासापक की प्रतिमा का ही पर्याप है । ति पी मामन का उद्घाटन इमी म संनय हो पाता है। मैंने दम पुस्तक में इन्दी रो प्रणामियों का सहारा लिया है। पी हमारी प्रमार द्विवेदी न उवमा को नार का पुरवा को पिया का पौर पौगीनरी को प्रतिक्रिया का प्रतीर माना है। मन पुमा के एक पप्याय का शीपक ही दिया है 'नाद मिया पीर प्रतिक्रिया' पीर्षक के पतिरिक्त इस पम्पाय का समप सिमपए मरा सपना है मौसिक ई और उउ त्रिी जी से पुष नमा बना नहीं है। फिर भी मैं इस मिए पादरणीय विनी जी का प्रणी है। पुस्तक-मजन रे गम में मुझे बराबर मापनपुर विविधालय के पर रेबी बिमाम के यम्मी पापापापी पमेवर प्रसाद मिनहा का सहयाग मिमता रहा है । उनका प्य विस्मयमा पौर प्रमार है। माहिस्प की मग पहचानने में रहें कोई भूत नहीं होती है। विकायों में तो उनकी पैठ मदन पहरी है। मैं उमा रम हुँ। अपर सुस्प प्रो. पी रामारपण सहान पा मह मुम पर सरा बना रहा है। ये तो मेरे 'गार'ही है। मित्रवर प्रो सपा प्रमा' टाहर और प्रसिर पप्य मेला भी दिन मन प्रगामी का भी में मम मन नहीं है। पामती पवि श्री रामसेस पुरी
पात्री मी स्नेह की क्या पर्वा करे। 'समुभि माह मम रहिए'। मेरे
प्रिम मार रत्तम मार मा एवम् पी लामन सिंह भी पामिपि संसार
परम में मेरी पकी सहायता की है। मैं इन सब महामुमारी का सम पौर
गर्ने पप से पम्पमाप देता है।
कित बालासोर परस्पापक मी पपारमरा गोस्वामी बी को बम्पर
मतो यह एक अपराप होगा। उनके सहसोय पार उत्साह के बिना दो
पस्सा पादुनिपि ही बनो पाती। मैं उनकायम भामारी।
बए पाप नही।
-
मलमा मदन
बिवेन्द्र नारायण
भाममपुर-२
विषय-मूची
१
२
३
मायबाराका बिकाम-कम
कामाम्माम को कविता
पिम्प-योजना
मार त्रिमा प्रतिपिया (उर्वशी पुरवा प्रौनीमरी)
स्मारमहपास
कापासीपनकी समस्या और बपी
उपमणि पौर मीमा
४
प्रयुक्त कतिपय पुस्तकों के सक्षिप्त नाम
. सं.बा.प्र.
2 A propos
संततिबार प्रध्यान
A propos to the Lady Chatterly Lover
and other cays.
सहायक पुस्तकों की सूची १ रेसुका ३ रमवती ४ मीठ ६ मीम कुसुम ७ सये सुभापित उबपी १ धर्म मैतिकता पार रिमान १. बेगमन १५ प्रर्षमारीपर १२ संमतिबार अम्पाय १५ कामायनी १४ सात गीत पप पपकर प्रसाद धर्मबीर मारती " १५ दिमित राष्ट्र कपि १५ दिनकर दधि पर प्टि २८ दिनहर की चपी ११ वी कविता कानम २. वाग्मिीमप में पाठष्टि RT Tho Hornton of Marriage प्रो.कामेपर पर्मा पाठापन प्रकाशन पाजियाबार १. रमामरहिवारी निपता ग. पोपीनापविराम Radba Kampal Vakberler Aula Poblishing Hour २२ Apropon to the lady Chatterly Lorer and other Esant २१ Lady Chatterly Lorer RX Sclerod Letters २. Marriage and sfonts ९९ Selected Prore D H. Lawrence, Pengala Seria DH Lawrence Peogaln Seria Allen and Dowia. TS Elion
भावधारा का विकासक्रम
हिदी पाप्तोपों न 'मी' के प्रशमन को एक भागस्मिक
घटना मान लिया है।"पायर ही रिसी भाषावारोत्तर पतिको दिनकर म
परिक मावि मिनी हो पाए ही इतना पसत मुम्पांजन भी किया गया हा ।
यही मूमपानोपकों ने 'सबम्ती' के प्रकाधन के बाद की भी। दिनकर
औरत कति परिकमी नहीं रह । सही सामाणिक पटना पपादाय का
पनि कमी नहीं रही। निमार पाणी रोमांटिक कवि रोमांटिक कवि
को पठन पर काम्प पता है-एक परातत है सामाजिक चेतना र पौर
दूसरा डोदय-प्रेम पोर निनामा का। पर मार पधी सकारस
मा प्रमाण। किन्तु हिन्दी के एप प्राप्तोपों में दिनकर की एनपी
पररपीई पबमम कीरों को हपिम पौर मापावित मान सिया ।
१ र 'पुस्कर पीर मरमी' फपि में मिपम को अपने
समान में पाठ मिल पुना रिम्नु, शहार बहाने उस्ने करिता ऐसी रस
सपी निमकी तुलना पौर किसी काम्प से नहीं की पा सकती है।'
-~-मम्मरमाय मुष्ठ नवनीत सितमर १९९१ ।
२ (क) र पार रसाती का प्रकाशन ठीक उसी प्रकार है
रित प्रसार किमी पारंपारीका कामे पानी से बाहर मारेबाद मर
बमापा "या माँ कहिये कि 'हाहाकार सिर मे रसगम्ती' में पापर
प्रपने कानों में पसार पनी दूस दी है।'
--प्रो.कामेपर पर्मा प्रिपित राष्ट्रप्री पृफ ४ ।
(1) 'एक पोहुए सिपाही की वय दिनार में सब पटाकर
देर में पानी भने मरे निकरा पर ना ही है कि उन्होंने
'रमपन्ली में पानी पापा से सवारी।
२ उबण उपसषि पार पीमा सप तो यह है कि विमकर के साहिरिपक प्यक्तिरय का निर्माण रति और उत्साह के केन्द्र-बिन्दु पर हुमा है। रति पौर सत्साह के रो उपपूर्मो से होकर पनकी कविता बाप प्रवाहित होती रही है। मे ही रो स्मायी भाव कमी समानान्तर पसते है, कभी एक दूसरे को मदित करते पतते है कभी एक पौण पर बाता है और दूसरा मबम । किन्तु ये दोनों तमाम प से बर्तमान । "रेणका में रति भार उत्साह का समयाय है। बेनीपुरी में पैक ही मिला है कि प्रमारा बिस पर इमपनु खेम पा हो मा पुका के दिनकर का परिषय है। कार में उत्साह प्रपन पर बाता है, पति गुम हो पाती।गीत' में रति पौर उत्साह का गुम्फन है एस पोर परमा पार्पण है दूसरी पोर क्रांति की परचाप मी सुनाई पड़ती है। रसगन्ती' में कपि पर नीट पाता है । यह ना पबरों का रस पासना-तट पर अमीर होकर पीता है। सामोनी में पाकर मह पुन' रतिप्रोत गीतस रत को उम्ण करने के मिए पिशोर की समिमाएँ मनाता है। इसी पृष्ठभूमि पर 'कुरुक्षेत्र की रचना होती है । रश्मिरमा' में भी उत्साह का प्रादुम है किम्नु, ताजगी का प्रभाव । रेणुका के दिनकर से यो पापऐ फूटी-'इकार' पौर रसबन्दी । कार' का उत्साह 'पुरम में परम-बिनु र पाता. 'रमपन्ती' की रति 'ग्गी' में पूर्णता पाती है। पत 'रु' पौर संपी' परस्पर विरोपी मही बल्कि एक ही नदी के दो किनारे है। शिमकर का रोमांस कभी भी मसमय बोर नहीं मारने सयापा ।। पकार' और 'रसबम्ती की कविताएं समानान्तर रह से मिली गई। 'रमबन्ती पीपंग करिता १९५५ में, मारो १९ में तरा प्रम्प कविताएँ भी इसी पाठपास सिमी पई पी। कार की रचनापो का समय भी माही है। यह एक अद्भुत बात है कि रिसी रचना प्रकाराम-कास गरमासीन रामनीतिक स्पिति का मेन बैठाया जाता है। १ नकर दुर्भाग्य स दिनार पा यह रोमाम्म टी ऐमे ममय मोर मारने मम मया जबकि भारत का राजनीतिक वातावरण परमात विपात बनाया पा, परि उनको विपपगामी प्रपने हाप में उनबार हामी पी। -~-प्रो. कामेश्वर पा लिगणमिन गाषि.
मायबारा का विकास म रेणुका एष तो यह है कि 'रेणका' पौर रसपम्ती के कपि वारा यदि उसी पी रचना मही होती तो यह पाश्चर्य की बात होती है। रेणका' में यदि एक पोर हिमालय वो दूसरी पोर प्रम का सौदा' भी। यदि एक पोर 'मामा' पर कविता है जो दूसरी मोर कोमम' पर भी। रिस्का' में ही दिनकर की रवि की प्रथम किरणों की झिलमिलाहट है। सौन्दर्य-प्रेम उनमें प्रारम्म से ही है। मिथिमा में पारद कविता मौम्वम-प्रेम से मुखरित है। (वनगर मे पा विधे पाण सुनारिया यह कर ही स्नान । पापीय पारि के बीच सी मा ही मधुर प्रत्येक परी। x x रमरिणयाँ समाती है व्सर ही पठाती है, बममग्न बचत को होग-याय मनुपावनिया मग्नाती है। 'मी' विकसित चिन्तन के अनेक बीर रेणका' में ही मिल पाते हुबकी उपती में मादकता देती लेकिन प्रक्षम उत्प नहीं पाकर्पस में पृष्ठि पौर मुम्परता म ममरत्व नहीं। यहाँ प्रेम में मिती पिकत्तता पीवन में परितोप नहीं माम-युवतियों के पार्मिगन में पाया संतोप नही ।। 'चपी में भी रम्मा कहती है- यहाँ प्रम यहाँ रामसी मूत से सण-अण प्रामाता है। प्रथम पास में ही पौवन की स्मोति निगम पाता है। (परदेशी) रेगका ५८. रेसका ७ पसी उपमबि और सीमा . पर देता है भून म को वाहक प्रातिपम से, घमि को प्रवाहीन कर देवा वापरात एम्पन से पतन का उपमाम बमा देता बाटिका हरीको मौर मता पता फिर सुन्दरता की दरी हो। 'परखेपी' से उपरिरदस्त पत्तियों में गो कमि में महा कि माम-युवतियों मासिहन में पाया तोप नही उसी पा सौपा विकात 'उगी' में पा है। पुरुरवा कहना है किन्तु एस के पात्र पर ग्याँ ही सपाटाइपरको भूट या भूट पीवे होम बामे किसमता में मार या पाठा अभी तक भीम समभा। एप्टिकोबो पेय है यह रक का भोजन नही है। बप की माषमा का मा पानिजान नहीं है। संन्यास का पहसार मष भोप की सीमा का पतिपमण कर मागे बढ़ने की यह सातसा पररपी' कपिता में ही मुखर है- 'म मा इस भूत्रम पर बीवन-यापन प्रेम पेसर, पायु, पारन मुम्मो महा कहीं इस मग से बाहर।' रेहकी सीमा पवित्रमण की यही भावनावरंगी' में पुरमा मात्र होती है। मेकिरण न कि अन्तिम सोपान नही होगा पात र मर इस पारो पर सात, उस पमर तक जिसकी बात पर से यह मृत्तिका-विहार रिम्प-किरणों का हीन मयेमा। किन्तु मौमिकता का विज्ञापन करने वाले एक परयन्त ही 'पुण्य मी मानोपर रेणुकाकी उपरिपृष्ठ पटियों को पमायमानी महार मानिरताका पवा दिया था। १ कपी १५ २ वही ४ । रेरा २ ४ संधी
मागमाराका विकास-कम
रसवन्ती
रसबम्ती' नर्मपी की पूर्व पीठिका है। "उबंधी के सभी प्रमुख माग
समी विचार मीन स्म में 'रसरम्ती में मिमते है। दिनकर मातृत्व को
मारीत का परम उरकप मामते है। दिनकर इसीलिए प्रामुनिकता की
मर्सना करते है वो फेमस ह की भूम मिटाना चाहती है। परनन्दी में
प्रामुनिका के भीतर सममानी एक मोर मारी को देखते हो
'मामयुती है।
मुस्प बखमेसन का सूबा, सो पर निबने माती
साउ पत्थरों के मीरे। रबी भभी तक तुम में ।
तुम जिवना विप्रम करती मह पाकुस होती रतनी
जिटमा म्पर्य बनाव मीण उतनी होती जाती है।
मृपा एमस पोमाइस में प्राण निकम है उसके
मापीन पुम्मन से उसका दम पुखा जाता है।
कोमहास-विकास एमस की पाप-समीर प्रतिमानो!
यो निब में झाक की रस म्मान-मुखी मारी को।'
-बारी
पाष की प्रामिकाएं चमड़ी को ताबनी और कोमलता पर
रहने के लिए रिम संप्पत्व को पोकारनी। रिलार मामठे या
भारी का वास्तविक समही-
'काम ! समझती परम मिरामातुर भिम रेप्याएँ,
पुष-कामना पया है पपने का ही पाने की।
एका मुरही न दुख नहीं प्रेम में वो सन का प्रतिक माहो
पाता है। संधी' की भूमिका में नरनारी के सिविल तिल का नाही
पग्ध विमेषण करते हुए उन्होंने मिहा।
'नारी मरका र वृप्त नहीं होती मरमारी पामिशन में संशोप
मानवा कोई पठिया मारी कोपर पौरमर को मारी पमम नहीं
१ रसस्ती ।
सर
सबंधी उपसम्धि पार सीमा
हने देवी पौर पर मिम बाते , हर भी उनके भीतर किसी ऐसी कृपा
का सवार करती है जिसकी तृप्ति पर के परावध पर प्रमुपमय।
'भारी भीतर एक मोर नारी पो प्रपोर पोर इमिमावीत है।
इस नारी का सपान पुष्प तब पाता है व पीरमी पारा मासते
ज्यामवे उसे मन के समुद्र में फेंक देती है, बहिन्येतना से परे, यह
मेम की पुर्गम समाधि में पापार निस्संद हो जाता है और पुम्प
भीतर मी एक पौर पुराप है, यो परीर परातल पर नही पता जिसके
मिमम की मानता में नारी अंग-संहा के पार पापामा पाहती है।
हो यह है कि नारी के मौतर यो एक और मारी है उसी के पाए रसबम्ती
मैं 'मृपा रभसकेकोमाहत' से विकन हो गये पे पौर मा म्मानमुवी' पी।
पी' की यह तिमि पनि बाली मारी बाम रसबन्ती' में ही
गुफा का 'पी' में प्राबर मा पुषती बन गई।
उस नारी की पो मात्र पर पतस पर उपभग मतमा करते
हए निकर बस्तुब मान रहिक भासक्ति की ही भर्सना करते है। सपी में
यही धीर विणत पप बन गया है पिसे यमत पापही पामोचरों
मौर मयं करि में भी कामाप्पारम की कविता नहा है। उण
कहती है--
पर या पाम् । गया हूँ?
प्रावि यह वह भार !'
पुरा भूपा रमम तिमिर-मासे निकलने को पर है। वह पाता
में मनुष्य पापना-नायु मेरे भीतर गती है
कमी मरगति से प्राणों में मिाल-पुसा बनाकर
कभी गति को मरोमंगा की रापण गति से,
मन
बमार तिमिपयत पय को।
मानवादमागे?
में पह फिर
11
भावपारा का विकास क्रम
मत यह स्पष्ट है कि 'रसवती' पाता एप्टिकोण ही उधी में सस्प
पौर पुष्ट होकर उभरा है।
रसगन्ती में ही दिनकर ने मारीत्व का परम उत्कर्ष मातृत्व में माना
.
'मंचन के सुकुमार फूम को पह यों पर रही है,
फूट रही हो भार पूर्ण की ही ग्यों मरे नमन से।'
पषवा
परमाती बैठी थी उत्सुफ पपू प्रसूनि-सदन में
मिकती है मेकर पुनीत मभीर पय माता का।
पर से उगम प्रेम उबम प्रारम में फूट पड़ा है,
एक सरम संतोप ममकता है उसके पानम पर।
'उर्मपी' में नारी की परम उपसग्पि पर प्रकाश गमते हुए पुन मही
बाठ दिनकर ने कही है--
'पमती है हिमपिता सत्य है पठन पकी होकर
पर हो पाती यह मसीम तिमी पसस्मिनी होकर।"
दिनकर ने 'रसवन्ती' में पुषती नारी पर मां बनती है, पर उसके
मानन पर भमकने बामे सरस सतोप' की पर्वा की है। मासना की भट्टी
में अमने बासी मारी माता बनने पर पमित-अहि हो पाती है। इस पमित
बहि नारी का पारमतोप संभामा होता है । 'रसबम्ती' में उस पुरन सोप'
काही विकास उधी में इस संपामा प्रभाव उत्पन करने वामी मित
बहि नारी कप में हुपा है।
पुमा सममि को देख पति मन में सी पपटी है।
रूपमती पी सती। मुझे तो नही दिया मगती है
पो मोदी में परे पीर-मुष गित को सुमा पी हो।
पपमा सही प्रसम पुष का पमना भुमा पी।"
१ एमबन्दी ..
३खमी १४
सबंधी उपसम्मि पौर सीमा
रहने ती पौर पर मिस मावे , हर मी 'उनके भीतर किसी ऐसी तृपा
का संचार करती है जिसकी तृप्ति परीर पराठस पर अनुपमम्म है।
सच
भारी के भीतर एक मार मारी है यो प्रपोपर पौर पद्रियातीत है।
इस मारी का संपान पुस्प तब पाता। पर परीर की नाप बामवे
उचानते उसे मन के समुद्र में फेंक देती है, बब हिप-पेतना से परे बह
प्रेम की दुर्गम समाधि में पाकर मिस्पर हो पाता है और पुष्प के
भीतर भी एक पौर पुरुप है, पो पर परान पर नही पा चिसो
मिसम की मालमत्ता में मारी अंग-ममा के पार पहुंचाना चाहती है।
तो यह है कि नारी के भीतर यो एक और मारी है उसी के पास रतवन्ती
में 'मृपा रमम के कोमाइन' से विकत हो पमे पौरम्मानमुखी' भी।
उपा' की यह विविध व्यक्तित्व मी नारी का बग्म रिसबन्ती' में ही हो
पु मा "पी में प्राबर मा पुगती बन गई।
उस नारी की, मो मात्र परीर के परावस पर पत्तम पर्सना करते
हुए दिनार वस्तुत' मात्र हिन भासति की हो मतना परते। पपी में
पही वीर विणाम परपस बन गया है जिसे मसठ या मही पासोपों
पौर सप कवि ने नी कानापारम की करिता महा। सपी
कहती है--
'पर मया दोन्पया ?
मोति यह है मार ।"
पुरमा मृपा--मस क विमिर-मर से निकलन को देन है। बहकावा
में ममुप्प काममा-बापु मेरे भीतर रहती है
कमी ममपति से प्राणों मे निहरण-गुसक बनाकर
कभी गलियों को मरोग मादी पाषण गति से,
मन का दीपक दुम्म बनाकर तिमिरापमहप को।
पिन, पुष्प क्या मी मानता है हमके पासन को?
चिर होला सम खिमिर में दीपक फिर ममले।"
१ रवपी १४
मारमाराम विकास म पत पह स्पष्ट है कि 'समम्ठी' मामा दृष्टिकोण ही उबंधी में स्मस्म पौर पुष्ट होर उभरा है। रसमन्ती में ही दिनकर मे मारीत का परम उसर्प मातृत्व में माना . 'मंचस के सुकुमार फून को यह यों देख रही है पूट ही हो पार दूध की ही यो मरे नयन स ।' परमाठी 4ठी पी उत्सुक बमू प्रमूनि-सहन में निकमी है मेकर पुनीत मभीर हम माता का। पब से उगवत प्रेम उपस प्रापत में फूट पड़ा है, एक सरत संठोप ममाता है उसके मानन पर । 'उबंधी' में भारी की परम उपाधि पर प्रकाश गमठे हुए पुम पही बात दिनकर मे कही है-- 'ममती है हिमपिसा सरम है पठन देह की बोकर पर हो पाती यह असीम कितनी पपस्थिती होकर।" दिनकर ने 'रसबम्ती' में पुषती भारी पर मां बनती है तब उसके भानन पर ममकने बाने सरम संताप' की पर्चा की। बासना की मट्टी में पनने मामी मारी माता मनमे पर मिव-बधि हो पाती है। इस समित बहिमारी का पारमटोप समामा होता है। समस्ती में उम 'सरस संतोप' काही विकास पी में इस संपामक प्रभाव उत्पन्न करन मामी पमित- यहि मारीस 'सुमा जननि को देश पाटि मन में रैमी अगती है। पमती मी सन्नी ! मुझ तो नही पिया नगदी, पो मोदी में पो भीर-मुष सिमु को मुना पी हो। अपना बड़ी प्रसप पुत्र का पनमा मुमा रही हो। हुमा। रममन्त्री ... २ नही . संधी १५ उर्मपी सपनाम्बि पौर सीमा मारी के प्रति बिमार का प्टिकोण प्रारम्भ से ही मामी पाहै। इमानी प्टिकोए वा मानता कि मारी पिया से अधिक प्रेरणा है। पुरप में उत्साह मरती है। गपत के संबप में उसका योग प्रथम मही है। मारी परिमी है, मन की माम, बनम की नहीं पी रहै । 'रसबम्ती' रेकरिने सिमापा- 'गार है तुम तो सुधा की पार पार है, तुम चादनी कुमार पार है, तुम तो कमन की मात मंगरीपासपामी नर्म कॉपस नाम। मारी पुरुप प्ररमा देती के पाप को प्रीत करतीt- कमियों ने रेखा पर तुम्हें टूरने लगे पाप । मेबो नगा सय गोरीष पुष्प के सिमने मपे प्रताप । x एक गित पर सूर कम-मृग पर होकर हव शाम । पियों के ठप का मोम तुम्हारी एक मपुर मुसान ।' 'सपी के पास में मारी पुम इसी एप में विभित है-- इतिहासों दो मका पि मत बस एक पिया पर किम्त, मारिया भिमा नहीं मरणा प्रीत करणा! उद्गमम्पनी पारप वहाँ से सभी कर्म रखते है पर, दर भी हम पिम इणिों की मारा। कौर नही पानवा, पुरुष पर बरता कमी समर में किय मुहकार प्यान पारर फिसके स्निग्ध पों को मात बोरह पुप मे पुमों से भर पाता है?' निकर मानते है किनारी एक भार करना है। पपाप बमत की परीर-गुगरी तो उस पपनानपीरी की एक मामक नर पिपाती है। इस सपन्दी ४. २ बही २८ ३ उणी १५॥
मारवाएका दिशाम-क्रम P मुत केस के प्रमोष प्रभाव का पराम रसवन्ती में गार दिनद्रा त 'रवि तुमने फरी जिम पोर गई विस कमस-पति पम्मान हिन्न मानव के घर में प्रस्त विपिन दिए पए पनुप पौवासा हो पपा मन्दिर हों को दर मिर विषयी और नापार । भई एक मु में मारि मया बंध पर गमम पुमार। . 'धर्मपी में इसपना-किसोरी ममोम प्रमाण का पियार स्पों पर है। (१) विपार + पण पर प्रमूर पत्ति परम्प पर बम पर पोप मृणात (२) 'मैं सम्मुख मठ हो पढे पसरार मर कैपरी पर पाईन म नि हिम भाष समृप समापि अहिम बनकर जीते। मग स्पितिको रेक पति बिस्मित पिमोर पूरला निमिप बोसे मार रद पाते है एमप हो पाता सममेव गिगिनीका कसाब संमत करों में समुपण मिर पाते हैं।' (१) 'परमवा मार मा है। पत्र प्रभाष पुष्प बो मग मम्या है सिंह से माहे मिशहर देम सकता है पूम के मारे पी प्राशय का गठा पति के रहते हुए सिरपाय बन पाता तार 4 १ रसानी २७॥ २ उसी १.
नधी उपमगि प्रौर सीमा पिस हो पाता सार पदिम नयन के बाण से पीत सेती अपसी मारी से मुस्कान से।' 'गी का रसबम्ती' से यह साम्य कहीं-कहीं तो प्रत्यम्त ही सष्ट को मुकुमारि हत्य निय पपारों ने पीर बहाबी पय की रम्पत पार। पाराती इम को भर में लिया उधार। एप इंगिठ पर कम-मृम पर होकर व मान हुरे पिमों के तप का मोन तुमारी एक मधुर उर्वशी के रितीय मर में मनिका कावी है- पानिए भरका सेपित तप और शान-शानी का मममीन का मान गर्ष गमि पभिमानी का सब पर बाते भेट पर ही समारणों पर उप मी बामही पाता पारी से मिल कर।' गरनारी के प्रेम के समरम में रिनकर का परम गरम की सीमा का प्रतिक्रमण ही है। लेकिन रहिक सुख को रिनारही मी त्याम्प नही माना है। रिमार के काम में ऐनिक नामसाप-पत्रिपा स्पर्ष से रत्तम मुसका मोहक बरपेन है। भारी को रेसकर गरम में एफ फरपुरी-सी जमती है। नारी सम्पर्क में ही पुरप उपवन में मापने पापी भावनाएं सब पर रखकर जमने लगती है। हरियामी को रखते ही अपने उमर म सरासीपन कारने पोहता है- १ परी १५४॥ १. रसबन्ती १८॥ पी ३४. 5
भागमाराका निकासस
रिवार
'नृम नवी फिरण-सी नदी मुझे सहसा प्रभाग का शान हमा
विनिशा यह हरित मोउ अपने सरमाम हुमा ।"
की को नगरप नहीं मानते। 'रसपती' की 'मामपात
कविता में भपमा स्टौ हुई प्रियतमा को मनाते हुए कवि रहता है-
'जीवन दिन पार, भरवि उससे भी मस्प जवानी की।
उस पर भी तिमी दोध निधि होती प्रणम-कहानी की ?
हम रोनी की प्रथम राठ पा पार मत मान प्रिपे।
मिट म मरेमी रसाकमा परि यों ही हमा विहान प्रिपे।"
पनि ममा को 'यो हो मा बिहान रिपे की पना बनाना
भनावाया है। निर गर भौर नारी शारीरिक मितन का 'बंदी' में
भी पाप नहीं मानते हैं। बसी पहली है-
'या निम्मय स्पण तिमिर है पाकर निमे पाकी
मोर टूट गाठी रामों में दीपक बस सो ?
मह मामिमन पर है, जिसमें बच पाने पर
हम प्रकार के महासिंधु में नवराने तपते है?
पौर महोगे तिमिर-पून रस पुस्बम का मौ जिससे
माता की परिपया निषित वन-मन की गुम बाती है?"
इस काम मुत्तके वर्णन में मिार उम्पी में पपम प्राप पर है--
बसस्थान पर इसी मोति मेय पोम पने से।
पसेपा बस इसी भांति पर-पीएफ पामियम में
पौर बताते यो एपर पुट को पटोर मन से
हिनुमाइ ! यों नहीं, सनिकता शिपित रोगों को
निपेपित मत करो यपि इस मा निप्पपण में भी
ममा पाठिार मानान एक दाम्ण है।
१ रसडी ४.
२ रमती ४
पी
सर्वधी उपमरिम और सीमा सपी में दिनकरन बिम विस-प्रिया की कम्पना की है स्पन भी 'समन्दी' में ही मिल पाती है। पुरप-प्रिया' कविता में दिनकर' मिया है- सुन्दर पी तुम अब पुष्प पना सुपर प्रब पी पाप पया बा हा सम्म मम म्पम नहीं मिमा पागे कुष ज्ञान गया। बाबा फिर माता पुरुप पाव तब तुम कहती रस मम्म 'पिया। मिसठी म उसे फिर बात गयी मुष से कम दो पण 'प्रिया।। 'धर्मग्री में पुररमा पसी पिएक मिपा को कह हाt- बिनी म्यात में ही मनमामिम बनार तुम मेरठा पापा माकुम अपनी बाहों से जिसके मो सामन किया कि तुमने मारा को समता में ही मौद यह मुम्बन रसिक पुस्प वा। स उर्वपी कहती है- 'म भूत भविप्पा, वर्तमान की पिम बापा निमुक्त म शिप-प्रिया मह मिर-प्रिया पिरम्तम नारी मिाहोममा को हर पुरुष के हत्य में निवास करती है। इन्दगीत पीठ' कामदापनिज परातम पर ही प्रतिपनि इमानही मे रिनार त्रिम पनि कविता का मग वन मार पिया मा रखकी परम परिणति पन्ना 'मणी में HIT निर रोमानि पिर १ रमानी. २गी १..
भावपारा का विकास-क्रम पसमिए ससार को व पूण नहीं मानते हैं। एक प्रभात मार मनिपनीम सत्ता के प्रति विज्ञासा पौर कुलहम का माष उममें प्रारम्म से ही है। रोमांटिक कवि अपने पास-पास के सौन्दर्य को परामगुर मानता है, फिर भी उसे इस महीं समझता है। यह मामता है कि प्रत्येक सुन्दर वस्तु क्षण-भगुर ही होती है, वहां चिरता है यहाँ सौन्दर्य नहीं है। उन्गीत' में दिनकर हाय मिय "मैं रोता पा हिमकण की कम्ण कहानी है सुन्दरता बसठी मरपट में मिटती यहाँ बवानी है पर बोना कोई कि परा मोठी की मोर निहारो तो दो दिन ही हो सही जिन्तु रेखो कैसा यह पानी है। संधी' में भी रिनका मानते है कि महाँ पोन्दर्य होता यहाँ नरम सा भी निवास करती है। इसकी महिमा इस बात में है किसका स्पाव पादिम होता है । मेनका कहती है- 'पर सोचो तो मस्य मनुर कितना मधु-रस पीता है। दो रिन ही हो पर कैसे पर बार-बार मीता है। इन बसत अगों के माये मलिन पान्ति सारी है मण भर भी राम्मद तरग पर चिरता पमिहारी है। स्माद मने ही पौन्दर्य का अद्भुत होता है, पर उसकी नाबरता से इन्कार कसे किया जा सकता है! प्रत्येक पसत में पतझर सिा होता है। 'मीत' में (ग्ससे भी पहले रिका को परदेशी भीक पारिता में) कपि इस सत्य का साक्षात्कार किया है-- 'मो देखा चौवनी एक दिन राब प्रमा पर छोड़ गई १ मीत । २ मंसी ११ १४ सर्वशी उपसम् िपौर सीमा गमे मुम्बरता दियां रोकता या मार फोयस बम से मुह मोर गई और पारस्पारी क्यों मनी परे बवा पिसने देशा गलवाही काम सग किम पोर गई। पप का चाक चित्र मणिक हाता है । प की बातस्विनि या सूब जाती तोबत रेत सेप रखी है। मृगनयनी की परम बास्तरिकता पान्य कोरर ही है कुसुम के समान मुमित मास में उमरी हुई पस्ति प्रया उरोगों की उठान स्वामी मही है सब मर होते हैं सब मुरमा गाते है- कोरको चिपा पी मदमाती मात्र नाम सखी पस्थितन्तु पर ही पो है में शिसे कुसुम के गास ससी औरों के मत ! मंगे ये तो जीवन से पहले कुछ पोड़ा सा मांस प्राण का दिशा पा काम सयो।' 'उसी में भी स्म की बनी हुई रेवडा भरिको इतना ही मार्मिक पोप है । मुकम्पा चतुर्व मंक में पित्रमेवा मे कहती है- 'परम मित्र पपिर माह के भनुप सिकुश बाप में टेगी परिणमा कपीनों के माम फर्मों पी। पार गए पर मो तरग यौवन को माराती है, पीये समतम छोर परा में पाकर मो जाएगी। मानी पकी प्रत्येक पिता की यति मग मृएि की स्वामाषिक प्रत्रिया . १ मीत, १.। २ नही, २५॥ सगी १८॥
भावमारा का विकास कम दिनकर मारी-रेर को बासना का कोत्तम महीं सममते । नारी पप प्रतक मरण में प्राति के किसी ममसर का ही घोपर निहारते सपनपए में ऐसे निमपसों का प्रयोग करते है वो एकदम निप्यनुप है। विपशों की पवित्रता के प्रति के सर। 'मगीत में ही मिझते है- ये मगनीव कपोम सुमारों की जिनमें मामी मामिनी-सी मोस बही कागल बम मधु प्रनिनि सोई कॉपल से मपरों को रमकर बसन्त र बग्य मा किस पिपी ने वन की या अमिमा पासुमों में कोई " पहाँपोल मनीत सा है। शिवमी सका है। ममिनी-सी माल मैं कागल बन मा प्रमितीका साना तिना निणसुप है।कोपम से रंगा पमा प्रपर पवित्रता का प्रकर्ष है । पुन की समा गसता प्रामों में कुमार निसरी है। इसी प्रकार 'वर्षी' के स्प-विमरण में भी कपि से उपमानों का मन करता है जिनसे वासना की मोड़ी भी नहीं पाती है-- मे मोपन भो किसी भन्म पर के गम के एर्पण भेमोन बिलकी पुति में देरी किरण पाकी में रियाय से प्रपद माता पिपरस्म पदन है, रोती है कामना वही पौड़ा पुकार करती है। ये प्रतिमा मिनमें उद्यमों के पविष्ट करते है मे बह रिपु के प्रकार की दो भवीन किरणों-सी ॥ मा सम्पूर्ण पपिए निकलुप है। पपी की पांस म्सिी मम मम मम पंप है। अन्य कम ही हम को पम्म देने लिए पर्याप्त है। फिर एसा नमसा होया ! मग मी नही, पड़ सष नमको पविण्धारित करने मामा । यह सूममता ही पवित्रता को सम्म देती है। कपोम पर १षीत ।। २ संधी ११ १४ समी उपमधि और सीमा निगा ऐकता हा भाप कोयस मन से मुंह मोड़ गई और पारस्पारी क्यों मूमी परे बवा सिमै पैसा गमबाही गमे सुगरता कास बिम प्रोर गई। रुप का पाक चित्र मणिक होता है । रुप की मोतस्मिनि पब सूर माती है तो बस रेव पेप राती है। मृगमयनी की परम बास्तविकता से भूम्य कोटरी कुसुम के समान मधुमित मास में उमरी हुई पस्पि मन्यम है उरोगों की ठान स्थायी नही है सब नर हावे है सब मुरम्बा गाते है- 'रो कोटर को पिपा ही मरमाठी प्रतिमाम सखी मस्पि-वस्तु पर ही वो. ये बिमे पुसुम से गाम ससी। पौर कुत्रों के समान ! मंगे ये तो बीवन से पासे कुध पोड़ा सा मौस प्राण का छिपा पा बास सदी। 'सपी में भी सकी पनीत का कपि को बचना ही पार्मिक पोप है । मुकम्पा चतुप प्रा में पिछमेका से करती है- 'पर ये पिम मपिर मौई अनुप सिहा पायेंगे फुटेकी पणिमा कपोषों के प्रस्म फूलों की। पार गए पर पो तर्रप यौवन को सहराती पीप समवन पोर परा में जाकर पो पाएगी। पानीस की प्रत्येक पिता की पति भंग मुधि की सामाषिक प्रपिया - , मीत, १.। २ वही, २६। वधी १०८।
मारमाराका विद्यामकम दिनकर मारी-देह को बासना का पतन मही समझो । नारी- रूप के प्रत्येक पवन में प्रहति के किसी पावर काही मौन्दर निहारते पपिस में एम विप्रेषणों का प्रमाप करते है या एकदम निप्पनुप है। निमेपणों की पवित्रता के प्रति के सवेश है। इसमीर' में ही सित- में मानीव पपोत सुमागे की निमें माती यह मसिनी-सी मात्र यहाँ कारम बन मा पमिनि मोई कोपन से पपरों को रंगकर बमम्त कर सम्म हमा पिन विही , उन की यह पालिमा भोसूमों से बोई? पहा पोम नवमीतमा है। शिनी स्मन्मता है। महिनी-सी पर में कागल बा ममु प्रमिनी का सोना विना निषनुप कोपन स रंपा गमा भयर पविता का प्रक। पुम की समग्र परसता मौसुपों म दुमकर निवरी है।धी प्रकार उपयरी के रूप-विमए में भी कपि ऐसे उपमानों का पान करखा, रिमसे वासना की पोड़ी भी नहीं पाती है- ये सोचन भो किसी प्रम पर है नमकर कपोम निमकी दुठि में हैरती किरण रपा की परिसप्तम से पार, माता गिनपर सर्प मान है, रोती है भामना वहाँ पी पुकार करती है। मै मुतियां गिन रहो रे प्रमुषिद भरते पबह पिके प्रमही वो ममीन हिरो मी ॥२ पर सम्पूण पशिस निष्ठमुप है । समर्श की मांस किमी मम्प बम नाम का पस है। पम्प अप ही राहत को पम्प ले लिए पर्याप्त है। फिर मानम कसा होगा ? नम मी नहीं यह सम मम का प्रतिभ्यापित कल मामा रपए। यह सूक्ष्मता ही पपिपता को धम्म देती है। कपात पर १ उमपीठ । २. Kधी १.
२० सपी उपमणि पौर सीमा उपा की पूति का वेरमा कितना पावन है । भपर किसमय की तरह है। मौर, मे महि , विषु पी पो नमान किरणों की तप है। कहीं भी वासना के कण का इला भी क्ति नहीं मिलता है। सब मुध निकमुप सर दुष पवित्र । नारी-सके विषय में विशेषणों की इन पवित्रता में भी कामा प्यारम की महिमा को ज्योवित किया है। यों पिमकर मे यह कमा थापा बादियों से सीबी है। प्रत्येक रोमाटिक कवि की तरह रिनकर भी यह मानते है कि सौदर्य पमान्ति का मिटाने का साधन है। नीयम के मस्प्रदेस में पमते पत्ते पर पपिका पाता है, तब सौन्दर सुपा की तए संजीवनी प्रदान करता है। पर तक पीवन में पतान्ति है तब तक सौन्दय की महिमा प्रमुरण है। म प्राणों में मई हरियामी भर देता है। यानी रूप एक सापन।बह साम्य नही । पहबीवन हमारी मात्रा का एक पान है। हमारी मंत्रिम दुसरी है। हमें पस्यन्त पर पेय पाना किमा परम की धरती पर पपिक को -पाति मिटाने का साधन तो चाहिए । यही काय पप का । पपा-- रति ममङ्ग पासित यह परणी मधु रस पोमे इन पूमों की पार पड़ा मे मुक प्रबर मीसे पाग मुमन माप मैं सोकर परदेसी निय धादि मिरा के हमि हेरे पर बो मगम मर टीसे पर परदेश में परदेधी की ममता बह गाती है। रमे रप पाना तो फिर भी पा मुत मोगने यह ठहर गावा है। मषिप्य को कौन पाया हैपएक पितु मनुमप पर्तमान उपभोप है । दिनकर संमृति की पास्त शिलाको समस्येपर, रसड़ी मोहम्मा से मापने में गोममे होता है। मनुष्य का विपमता का यह मार्मिक विषय है- 'यात्री ई पति दर देश का भर पहा हर पथिक पम दर बाई पपीत २२॥
भावपारा का विकासत्रम -- १७ साप बका हुपा है सुरता के पैठ मम बहला है बम पौर' हाम रे ममता घोर पk से दर देध बाना है मरिम यह मुख रोग कहाँ पाई। 'गी' में भी भारीप मुम्बाम म दिनकर का प्टिकोरम यही है। पर देम बान माम पपिक की कुछ दूर के सिए नारी क सामिप्य से शाति मिलती है। इसम पुरुप की साम्ति पुल गाती है-- 'पौर पक्ष के मुमुम-कर मुरमित निमाम नमन ये पहा मृत्यु के पविक ठहरकर पाम्ति दूर करते हैं। में मृत्यु के पपिर' दूर देश के यात्री हैं। पुरषा यही बात कहता है- 'पत किसी भी मांति पाप अपनी सीमा मपित कर प्रम्हस्थ उमर रेम में हम सब को मामा t यहाँ न उठ्ने प्राण न कोई का ही जमती है।' या दूर देश दिनार का प्रपना रेप है। इस 'प्रभासी' को इस मृत्यु पमिकको अपना का सीप हो पाता ही पता। मगीत' में 'सर्मपी का यह साम्म गम भाव पर विचारों का नहीं है, अपित, गनिमे एघ बिम्म भी नहीं से उठा मिए है। सबा उर्मपी की प्रथम पति पर हैपत्रमा, हादगी का निमंच पमन में 'पीत' से ही यहां पाया है।वधी का पन्द्र दिनकर को महत प्रिय है। पह कदाचित् म्पत्तिमा पिलगता है। क्योंकि पापणी के बम की हमारे साहित्य में कोई महिमा नही पतमापी पमी है । मा, हो सकता है कि दिनकर पषिप्ण सौदर्य के लिए इसे उपयुक्त समझते हैं । यो हो 'गीत' में ही १ नमीन २४। २ पौ २१॥ १ उपमी ५ ४ रमपम्मी की 'प्रथामी पीपकविता। २ २८ उसी उपसम्पि मौर सीमा उन्होंने लिखा पा-बार-बार मारपीसम की किरणों में तू मुसकाई । सो प्रकार उर्मपी के प्रपम पनुन्दर (पद) में ही एक दूसरा रिभ्य नीम पारि'का पापा है-भीम-वारि को फोड़ ज्योतिरीप निकल पाये हों। इस बिम्ब का मी पाहमा प्रयोग दिनकर मे 'गीत' में ही पिया पा- 'भीम-मारि को परण करो परणों का राम बहामो दो। कहनाप होगा कि यह मीना ग हिन्दी कवियों को गत प्रिम हा है। मुरबास इस रसिक प्रेमी पेरेसो युपति पत्र में ही मीत-बसन तन गोरी । उसी मकार मौषल मोर प्रेम के कमि प्रसार भी इसकी महिमा से सपत है- भीम परिणाम बीच सुमार हुन रहा मृदुम ममनुमा प्रय बिमा हो ज्यों विरामी का फूल मेष-वन बीच गुनायो रप । कमर-कन्ट्रास्ट (colour-Covunt) 24 सब पन्चे बाहरण है। पानी 'गीत' से पपी में विचार साम्प ही है प्रत्पुत समरे की प्रमामधामी विम्म भी पाकर 'पी' में पोर पोविक गए है। कुरुक्षेत्र बिनकर सौम को सरा उपभोग्य माना। इस सम्मान में पा पस पानी प्टिकोण को नहीं मामठे पो सौन्दर्य को नम रेहने की वस्तु मानना है और नये यह मानते है कि पो मन्मा है सुतर रमणीय है सर पेमणोप: । 'कुलर' काम्प में भी यह प्टिकोण हीही पटता है माप उमर कर पाया है। भीम युधिष्ठिर से 'मुविक साल मुरम्म मुमन को मरण नीति रिसप्ताकर कती है रस मेप कान का भोजन से बवापर। पी मौत ऐन, सुख सबसे हीन बना ली है पर पिति मानर को दुर्दम पीन बना ली है।" x x x कामायनी ॥ २. पुरोष, १५.।
भावपारा का शिकास कम
'पम्प सप रस प्रम, स्पर्ष मानो सब कुछ पाता हो।
रसना, सपा, प्राण प युति यों मित्र नहीं पाठक।"
दिनकर मिति के इस सन्मास की कटु भार्समा परते हैं। कुरक्षेत्र
के पर्सेन की पीठिया नहीं है। दिनारा समस्त काम प्रति के उत्पार
का काम है। 'कुक्षेर राता यही प्रवृत्तिमूमक इप्टिकोण उर्वषी' में
प्रष्ट हुमा है । चर्मपी पुरवा से रहती है-
'पको एक की मापा को विपास इस मिपि का
यह मापा, मह मिपि, मानस को कभी ममरमायेमी
धमी दुषि की भांति पिसे सुस-यूष हे परे मन में
पाप बता नही पहा सुमरता सस रही हो
पौर पुएम-बम यहाँ गहाँ ककान, सिप कटि है।"
दिनकर ने मतिभूम प्टिकोण को प्रपनामा तो सही किन्त, कही
भी गहमि मात्र देह की मुभा कोही पन्तिम सत्म नहीं मान मिया । यह
प्राचि रेणुका से ही समाती पिसाई पाती है। "येणुका' में ही 'परदेशी'
पीर्षक कविता में मन के सम्पाय का गोड चित्रण है। वहीं से दिनकर
देह की धुषा मार 'मन के संन्यास' दोनों बिपिनों का समित कर पा
ऐहै।पकी माग को उन्होंने परम भार केप में कभी भी स्वीकार
मही मिा । 'रमपी में जो हकी भूषा भी है और मन का संपा' भी
मह दिनकर काम्प का पत्यन्त सामायिक विकास है। दिनकर योग को
स्पाम्म नहीं बनाया । किन्त, सदोंमे भोप को परम सास भी स्वीकार नहीं
किया। उसे मौत का पत्पर ही मामठे पेपो मंगित का संकेत भर करता
है। 'पुरात्र में ही रहोंने मामा-~-
'भोयो तुम इस मांदि मृतिको राप नही पाये
पिट्टी में तुम नहीं नहीं तुम में विभीन हो नाम ।
मन का होगा माधिपत पिठ रिल मनुष्य के न पर
होगा पाप प्रतिष्ठित रिष दिन भोग सिप्प बोरन पर।
१ कुरक्षेत्र ११५॥
२
मंत्री 11
बंदी उपप्तम्भिमौर सीमा १ उस दिन होगा मुममात नर के सौभाम्प सरय का समरिन होमा धापमित मानव की महामित्रय का। यह बात कितना ही विरोषपूर्ण क्या न नपे किन्तु यह एक निर्मम सत्य है कि 'धर्षशी' का पर्थम 'कुक्षेत्र में समिप में ही सही किन्तु पूर्व तरह प्रतिपादित हो का पा। बिमार ने कभी भी काम को स्पाग्य और परिणत मही माना। उसे बीबम का पनिवार्य प्रश मानते है है। पहार्य का उपदेश इन्होने काही नही दिया है। जनकी पिपता फेवत इतनी ही है कि काम में मिसा नहीं रहनी चाहिए, नही तो वह कमुपित हो पाया है। काम-मार की उपयोगिता मोर पनिवायता पर प्रकाध गलते हुए उन्होंन भीष्म के मुंह से पहनाया है- बह्मदर्य के प्रस के दिन यो सहुई पाय, 'गुल्मेर में फूट उसी ने पनकर प्रेम पुकारा। बहीन कोमम बाइज मन का बानी मोसा पत्तों पुरमुट में पिपकर हिप न कोई बोमा । प्रष्टी होती मार प्रेम की मुझसर ही अमरता, स्पात् पता को 'परपर' का रिन न देखना पड़ता। 'खपी में जिम रक्त की उप्णवा को बुद्धि की मिप्राणता से प्रेप्ट बनाया गया है, उमरे पंकुर 'रसबम्ती और पुरुष को मर्मरी में ही तैयार हो पे थे। यपा- 'हिम रिमुक्त, निषिम तपस्था पर सिमता पौषन नपी पछि, न सौरम मे पला मरा भुषम है। मिस्तु, मुमि मिती तार में राती पात लगाये पर जीवन का मार गिधिन हो परमह उसे पाये। पौर सस्प ही ममी रविर का पेग तनिक कम होता, मुस्वाने को ही मर गाता जीवन का सोता। पुदि पाती तुरत पाम निर मानर म पाता है जमी-नयी उमर में सिपे जीवन सम्मुम पाता है।" १ कुरोष १९।। २ बही ॥११॥ उस्लेष
मारपारा का विकास-बम
पची पात को नईपी पौर स्पष्टया माती है-
'रत दुदि से परिह बनी है पौर नितानी भी
क्योकि यदि सोचती मोर पोरिणत मनुभव करता है।
मिरी वृद्धि की मिमितियां निप्पास हुपा करती है
पित और प्रतिमा इनमें बाबी महराता है
या मूमो मु नहीं, पर पापों म पाया
कमाकार मन्तर के हिमोरे हुए सपिर ।'
'नील कुमुम पौर 'नए सुभापित
'नीम-मुम' में कपिधाएँ एमी हरियमें रिनारका समापिस्प चिन्तन
साना-ना म सका है। एक है 'सप्प पार सस्प', दूसरी है. मतकी ।
स्थान पर सव' पीपर कविता मही रिनार में पहली बार सोप को
फाडियन प्रतीक प में उपस्थित किया है। पि काम-भुषा का प्रतीक
बम पया है, 'मा में रपये तपत हा साप मोमेपही शिम 'पी'
मे मी पापा है-'पने मयदे सहमो सौप माने रपिर में।"
जय श्री रधि में परमी पानी पछिमें पति निवार मा पमा ।
मिन, सिर में फायरियन प्रतीक के रूप माप बिम्स का प्रयोग
कम ही प्रिया 117 विपरीत इस गीवन की निभवामी
का प्रतीक मानते ह। सांप का रखने की यह रष्टि स है। निति
मुंम्पास का उपहात व प उन्होंने 'मए मुनापित' में लिखा है-
'पा-वहाँ है पूम, पहा सा साप है?
पही नहीं है प यहाँ क्या पाप है।
पूनों में क्या है कि प्रम म दुनते हो ?
पर, पूमों को रेप पीय क्यों चुनते हो !
मार पास निम को मदिम बोर हैं तो यही पातासी मापा
में 'गंपी में भी हो रही मापा' वाली पंछियों में पह पर ।
१
मी LI
२ नही, ११.
२२ बंधी उपहारिप और सीमा इस प्रकार 'उसी का प्रकापन रिमार साहित्य की कोई प्राकस्मिक पटना मही है। सच तो यह है कि उसी के सभी पास्विक निम्तन किसी न किसी रूप में दिनकर + पूर्ववती कार्यों में मिल जाते है। पिचार की छोटी-बड़ी सरिता 'सगी' में प्राफर सागर बन पर है। हमारी राम में गंपी' कान निभाना एक विस्मयमनक बटवा होती। सय दिनकर मिला है कि प्रत्येक विभपने जीवन में एक ही काम्प निपता है। उसकी पौर पनाएँ उसकी प्रयोमपाला की पाई-पारपट माग होती है। प्रयोग कम में उनकी पदाइस होती है । पिन्त, पह मिस नाम के लिए प्रपोप किए चमता है, यह किसी एक ही काम्प में प्रतिमित होता है। 'रामचरित मानस' पोर 'मायनी' इसी कोटि के काम है। तुमसी मौर यसवर प्रसाद की पन्य रचनाएँ गा-ियोगर मान है । 'उपती' निकर की प्रयोगशाला बाचित पारिकारों पर विचारणीय है किया पाविष्कार कितनी दूर तक सफल हमा है। हमारी यह स्थापमा t है कि म मम रेगपुका' और 'रसबम्ती पति पुग' भी उबंधी की पूर्व पीठिका है। यह बाय दूसरी है कि परमेज' का पायो भार रविन होकर निर पोर रस्साह है। 'पी पप्पयन की यही पूर्व पीटिका है।
कामाध्यात्म की कविता 'ती'को कामाप्मारपदी पिता कहा पया है। शाम को पप्पात्म का मामा व समा बाम भमा पब मितिमार्गी पर्मो का मम्मप में पान मा । गुम्यूह में धर्म पनी ही रोम मगना पाकि विवाहित स्त्री मुस्प किसी तीसरे पति से पौन-सम्मम्प स्थापित न करें। 18 समय निगाह करना पका पहस बनकर रहना तो पाप सममा पाठा पा फोरम अध्यात्म का रापक ही। किंतु, बरर्म का निर् तिवारी माता कामापार दुराचार का पयाम बम पया पार यह माना पाने तथा कि पर मर जारी एक दूसरे को पान लेते है वम में पिर पास नहीं पहुंच सकते । पोर न भौर सिमर्म निधि-मूनक है। इन पों में माईस्म की महिमा का बाल दिपा और पुषहों का सम्पास भने की प्रेरणा री। म पर्मों की शिक्षा से पह निष्कर्ष निना कि वीर भारस करने वाले सम्पासी को रेगम पर्ष का सोग नही होना पाहिए और पति को पपनी पारमा मुमार राम को समरम मही देना चाहिए। इन बर्मों की यह मारण पनी पराभूम हो पर कि नाप यह मामने सप मए हि बहा-यहाँ नारी का स्प है महाँ-वहाँ पाप है। उससे गारही पना चाहिए। पुरष मारियों को मिपुरणी होने का अधिकार नहीं ला पाहते रे मोर अपने प्रिप पिप्प पार भनुरोष पर गा उन्होंने मारियों को पा परिकार दिया हो र महा पापात्ताप भी हमासाई मर्म के भाषा संत पोल ने कहा-पुरप के मिए मह प्रभा है कि यह मारी का सच नरे। प्रादुनिक युम में पानी पी भी नारी-ममापम को प्रधी रप्टि में नहीं ले थे। कान पर नियन्त्रण स्थापित पाने का कार परमम् दुर सिमापा । हर पुस ,हरदेस में पर्स पर काम भयावे पाए पार मषित बार पा एमा दि काम की वायु से गम का दीप बुम पसा ! मारारियों न स्सनित होने बाम नरमारियों की कटनगरा को पिस्नु पह स्वतन पप नहीं । काम सर्वशी रपमणि पौर सीमा की म्याप्तियाँ बहुत दूर तक पाठी । मौर मनुष्य के माश्य मापरणों को भी प्रमापित करता है। इसे प्रपरस्त करने की पाहे मिनी भी बप्टा की जाए, यह बार-बार सिंहासन के असर पा पटता पौर पास्त्र एवं मतिकता के प्रहपै उसे धमकीबो भी मारी कर उसपर सेक्स का रेस्ता पम्प से मुसहगता है, मामो, वह यह कह पा हो कि उतने पान तो में दोष का , इस बार तुम सी कड़ियां तैयार करते हो। मम्पारम का नाम लिए माना गया कि प्रमपप निप्तिमार्फ पो के प्रभाष मे मोगों ने मण्यारम भौर प्रकृति को पास्सर पिरोपी मान मिया । पप्मारम की श्याम्या मिपेपारमा ग से की गई विममाग्मटप से नही । अम्मारम को हममे इस राष्टि से समझा किया क्या नहीं है इस प्टि नही किमहमा है। पिघ रटिस देखने पर प्रध्यात्म प्राधिका रोधी नही मनाम पप्पारम का मासपेगा।" पानिक पुग मे बर पिमान का उदय हुमा हो पुरानी मैतिमन्तता की रीट पई विमान न ममुष्य के पित्तमे च विमार्यो के मार भवार को उमा मना पोर नए मुस्पों की पाइप हुई। विही पौर मनानिमान में पारिका मे ममुप्म की संकीर्णवा को कम किया और उप पवार बना दिया । मिकी के प्राषिकारों से मनुप्प पा सममने नम गया कि काम शरीरामिणाम पम है और मनुष्य तौर मास समा सनमनाइटों से पंग है। की पुकादीह प्रमोगना मही कर ममता है। पर माया माए तब मनोविज्ञान की म्पोति में मनुष्य में अपनी सीमामों पोर पत्तियों को पाचाना पोर यह विश्वास अमन मया नि मनुष्य के प्पत्तिस्य संतुलित विशाम के लिए काम-सुरा से पलायन समस्कर नहीं । पापर मै पपमै मनो गानिक अनुमपानों पारा निर्मात पनपा प्रतिपादित किया frकाम मुन पस्यन्त उतप्ट मुन है और ममुप्प को इनसे भागना नहीं चाहिए । पापा अनुसंधानों में संसार में विप्लव मा रिया है और नित्ति-मागी बौनाइम बार में यह पए। पुपर्ने पर्माचार्यों के सेगम-पिपर मान पर भी प्रतिबंप मगा दिया पा रुपा पुषक पार पुरती बलकोठरी म ही, सुर-छिपकर, पौन पिपापों का पप्पयन कर सकते थे। प्रेगो १ पर्म ठिकठा पोर शिान १ रिनारम्पतिमा नोट में कामाभ्यास्म की कविता भारिपार ने पुम्वों को सस्वा बमा दिया और पल मुबक पौर मुबती कतिों से शामरका पम्पपन कर मिकममे भो तो उन्हें इस बात का भय मही र पपा कि काम सापों का विपकर मध्यपन रें। समाग पर भी पुराने संस्कारों से मुक्त मही हा सका है पर ऐसे मोग मर भी है पो माया से सहमत नहीं है । यूरोप में ऐसे सोय मग अस्पसंस्मक मार हमारे ६प में पर भी बहुतायत में क्या सुमार का नेतृत्व सन्हीं के हापों में है। किन्तु विज्ञान ने समय का नीसा कर दिया है या मेस रिप मक शान मार के सुबक र पुनियों कहायों में बहुत बहराम में पाप या है। इस स्थिति का वर्णन करो टए हिनहर में कपिलपूण मापा में निrt-~-'यह मान हो पानों से पुकार याहीसर साकों पर पन्तकारीर पाहै फिलम के परो पापक रहा है मौर उपन्यामों तमा मम्प माहित्य के परिए पर-भर में प्ररंग कर रहा है।" अनुभूतिया पहले काप पर्भ में पकती . पिता रमका माम्मान Hिeartोई भी कर पहले पपने समय का मादि का होता है मोर पुष कान वा इयित पर पाता है और उन्हीं की पनुभूतियों को पापा प्रान करता समिए काई भी कवि समय से पहले नहीं पाता करि पानिक तो नही होगा किन्नु पनकी निषेप पाप ससकी कविता को प्रभावित करती है। मम्मयुग में मम एकादशी मोर पूर्णिमा की पीर पा विस्तु बर्म की पूर्ण मानवा तर परदा मनुष्य के र माणों को प्रभावित करे और वह प्रत्येर माम में समा माए। पर्म के प्रति पााप्टिकोप्स भर बिहान के मामा में उमरमे सपा है। भार मनुष्य यह नहीं मानता हि काम मम्मान का बाप है। यह पर्व की महिमा काम नहीं है। प्रातित लोप पात भी और पाम पौर।। frozाति समठो यह कहती है कि चामो ही म यही रिपनाम करो। उपवास की दए गएपर्य मी म्याप्प र प्रमर भक्ति तिरिगे से निमकरसी पम्प रिमा में काम करे । रेशम पामिर प मानकर समापय मारण परमे वास का रोप गरेकबह काम को मप्पारसका विरोषी मातार चलता है। इसलिए पार का पपिरम ऐसे पोवों १ पम विपदा पर निशान ५ . दिनकर केम्पत्तिमा मार से नवी उपमग्धि मौर सीमा से प्रभावित होता है मो प्रोत या ता काम के पर्वत से निकलते है या काम के समुद्र में जाकर समाहित हो जाते है। पर निशान के पनुसथानों प्राप्तोक में काम की महिमा पड़ी मोर गृहस्यों को प्रतिष्ठा बात ची रठ गई तब कपि मौर नितक बचन क ऐसे मा के पास पांपने लग गए गो पाम के वटों से होकर पवार एसे पानों के प्रति निझामाबड़ी हा मोगों ने मारपर्य से देखा कि झापा से पहन भी कितने ऐसे पार्मिक सम्प्रदाय हुये यो काम को गहित नहीं समझते परम पितों को इस सत्प का साक्षात्कार होने सग या कि सेक्स में मनुष्य के चिन्तन बार्मिक मम्बेपणों में बराबर महत्वपूर्ण योगदान पिया है। पमिममित करने की पो पार्मिक प्रपा गत बरे पमाने पर मारिम ममुप्पों में प्रचलित है ये प्रधाएं मौन रहस्यों को शिक्षा से सम्बम्बित है। स्टार्गक मार गिाल मे बम परिगतम समय में जो मास्पिकी एकत्र की है उससे यह निष्कर्ष निकलता है कि यह धर्म परिपतन मुबायस्मा + प्रापमन के समय ही प्रपिक होता एक ने यह भी बताया है कि पर्म परिवर्तन और युवावस्था ये दोनों एक दुसरे को प्रभावित करते है। धनिफर्ष की पुष्टि पम्प समानिक तम्मों से भी होती है। पिकार, मछली मारमा पा रुपि स्यादि से समस्थित पारिम पामिक उत्पन हमेघा किसी न किसी स्पष्ट मा प्रतीकारमक रूप में पौन-मत्तियों की पभिम्पत्ति हुया करते । पितनी मारिम जातियों के सतोत्पलों में फमत होने पर काटने से सम्बन्धित गापुर पामिर पापा में प्रारिम बर्तनों की प्ररपना मार गिहों का उप-सएनों प्रौर पार्मिक मनों बापू-गोने मादि में हम मस्या मा पन्ध प में यौन अभिपति पाते हैं। धर्म-परिवर्तम करम माते पत्तियों के जीवन-परिपके पप्पयन से यह पता चला कि धर्म परिवर्तन पहने पर वीवन में पौन ममापी तनाव पौर विवि पी । पूर्ण पारिक मनुप्प पीरम में भी कभी-कभी पूर्ण पानामेप पोर उसकी परिम्पति पाई जाती है। ऐसे कई धार्मिक सम्प्रपाप है पो यौन पभिप्पाठ को पाप नहीं मानते । मूफीमठ में पातमा में नमवार में पौर परों के सहाया सम्प्रदाय में जिमीन रिपी रूप में पौन पभियक्ति का विधान है। न बत पम्ही पामिर तमार्यों में बलिप्रीम मिम पौर मारण पुपन धर्मों में हम पाते है जिसमाधार म्यापी प्राण-पक्ति पामर पा वाहा । पोर एमी में मृत्यों का पिपान हुपातमा पनि पमिपनि का विपित करने बानी - कामाभ्यारम भी कविता मूर्तियों का निर्माण मंदिरों में किया मया । सेक्स में इस प्रकार पार्मिक मनोति के संगठन में योगदान विमा है। श्रमिक दृष्टि से सेक्स के विकास के लिए दिन हारमोम्स का परीर में सरण होता है परीर की भग्य माों को भी ग्तमिव करते हैं। युवावस्था में सेक्स से दो उतेजमा होती हैमही सत्तेपना मनुष्यों को को पादों को प्रोर भी बीचती है। समिए पावस्था मे हो ममुष्य प्रापबादी भी होता है और रणीमियों की पोर भी मामठा है।" हमारे देश मे पर प्रवृत्ति का वाम पा र सोगों ने मित्ति-मार्गी नों से छुट्टी पाती । नई नैतिकता काम को त्याग कर बम मही सकती पी। इसलिए ऐसे बर्मनों की पोर तार्यों की दृष्टि पई बो काम से विदयते महा। ऐसे पार्मिक सम्प्राय हमारे देश में तीन प्रमुख बाम मिवाम्त पौर काम । मिण भी मतों में ग और पाक मत काम को गहित नही सानते है । यह पाप की बात नहीं है कि कामाम्मात्म की कमिता सिंचन के लिए कामामनीकार को भी पैर-मात धनों का सहारा मेना परा। वर्णकार पब कामाप सम्पारम की भूमि पर पाने की पेप्टा करने ममा पो रक्षे मी बों पर पाकों के रसनों को ही प्रापार पिता मानमा पा सहमिया सम्प्रदाय की परण की पड़ी।ग प्रौर सक्ति मत की पारा काम के तटों से होकर बहती है बामापार का पोर पाम के पर्षत से फूटवा है और प्रविमा सम्पराय की मंतिम परिणति काम समा में होती है । रिमकर पी परिमयो पछी समुद्र से अपना मैप-बम मे पाई। पौर परिषम से महकर पारे पानी मरिम्स प्रमृति पिचारकों सी नदी पर बरच सकी।पी की सरासनिक पीठिका की यही मनोवानिक पृष्ठ- भूमि है। उर्वशी में शाफ दृष्टि पाक महारतम्मी पाच-नाम को रसमा ही प्राचीन मानवे १ विमा प्राचीन रिकवर्म है यार अनुसार मृष्टि का रमा भौर विकास शिम मार पति के संयोग से होग बाणिों की पि में भिवसमा १ Tho Hortion of Aurige रापा मम मुपरी, ३११-५॥ (पिपेष गिरण के लिए देखिए) - नभी उपप्तरिम पार सीमा पाक्ति म कोई भेद नहीं है। मूतत दोनों एक ही है। पो परम मिय गही परमगति है। पति के बिना विग इन्धाहीन भामहीन भिमाहीन पौर स्पदन म असमप सब मान है, और प्रकापास्मक शिष बिना पाक्ति प्रारम प्रकाश में भी अपमर्प है। दोनों ही बिएप होने कारण स्पस्मत' मभिम है, एर एकको घोरकर दूसरा ए भी महीं सकता । वस्तुत पित्त साप में सिम मव नही है। इसलिए वह पनि होडर मी सर्पनिंग स म प्रभावित होता है तथा नानानिय रूप में प्रकट होने पर भी प्रमिम है । गृहणी में लिखा है- पिया देव घिया रेबी पिवम्पौतिरिति पिया। प्रमिंगमपि तत्व मिग भेदेन कम्पते ॥ (हुमार तामप्रकाश काप) यह निम्न निविष्ट श्वेताश्वतर भूवि की ही प्रतियनि है- परली न पुमानेप न नाप (स्पात) नपुसा । 'मिष पति मिलने के कुछ दूसरे सात भी है जिनका उममेन गांगम पार पुराणों में पाया पाता है। परीर पाम भाग म कि बसठी है और रमिण मास में गिर एकही परीर में पिच पोर मकि का एकत्र निवास यही मर्पमारीवर की कल्पना है। योग-पर्पन के पनुसार पमिण वास का नाम पिंगमा है जिसमें घिर का निवास है पार पाम स्मास का मामा रिसमे पति निवास करती है। सारा का कत्तस्य है कि मह पिंगता पौर एक स्थान पर भाकर एकाकार कर।बासी स पकीपरमा पारिभाषिक माम मुपुम्ना है । पर ये एक दूसरे स बार या पररमही पसते तब देवरस्य स्थिति मे पापकर समरसता को प्राप्त इसी प्रकार परीर पर मनरेनों को भी पटस्थ बनाना उम्हे समरमता की भवस्था में से पाना साधना का ध्येय है। योग साम काम का मिमण मागिों ने इस विचार से किया कि साप पोर मापिका रानी इस अनुभूति तक पहुँच सर्फ कि पास्तव में देगर-मारी नाही प्रासुन, उससे भिन्न होई पौर तत्व है जिसमें तपिस भरो मारोप नहीं लिया जा सकता भो पुर र पौर सभी नियमापक गुणों से स्तन 'सिमर का पुरा इसी बानिक उपपति का उपस्थित करते हए गिनाको स ..
पामाध्पारम की कविता २१ 'मह मिरा भाकाम यहाँ की मिर्षिकस्प सुपमा म मनो पुप में पुरुप न तुम भारी केवम मारी हो पोनों है प्रतिमाम किसी एक ही मूम सत्ता के ऐनुरि से परे, महाँ पो नर अपना नारी है। 'वन माग की एक फातिकारी पापसा यह भी पी मित्र मापना करने से सापक इस्प होगा हुमा भी सिर हो सकता है। शिन्तु मिति का प्रामाम्य पाक-सापना म बार कोमा। से यह साबना भी मोक्ष की ही साधना है। भीष मात्र को शतवन टीम कोटियों में विभक्त करते है। सब नीचे 'प' है वो माया के पास में भारद है। उसने कार पार' पौर उससे भी ऊपर रिम्स' बीर की पोटिया साधना के पम मे 'पम् को ऊपर तार बीर' की मोटि में पाना पड़ता है और वो बीर' की कारि से धमर उह नया वह रियबन पाता है। 'परमा रसु से मार हा हा प्राणी है बो 'वीर' से दिम्म कोटि तक पापमा पाहता है। उमग्री प्राप्यारिमा पीप वही है-- हिरणे * फूल किन्तु, मन्तिम सोपान मही है रना होगा बहत र मर इनके पाऐं पर स्पात, ऊ उस प्रमर तक जिसकी पाई पर से माह मृत्तिका-विहार दिप्प पिणों का हीन नपा।' पौर माहिस्प में परमास्मा की तीम यात्रामों का विवरण मिलता है। उनमें पहली यात्रा -परमारमा बहिर्मक होने पर प्रपिश मापन सायबाप-बार पार कर मनुष्य माव की प्राप्ति 16 दूसरी पाना है- ममुप्प भाव में मान-प्राविारा भविधा को हटाकर फिर समेतन मार में निन-माल का परमात्म मार की प्राप्ति एक सोहम् रूप में पपन पोष मरस का पूण परिषर होने की पहनी मात्रा प्रधान की यात्रा है और दूसरी पाषा है माम की। मान की मात्रा माय के विपरीत पमने के समान है। 'बामातार रस्टी पारादी सामना पामि भाचार यह सम्पना किपिर-पक्कि से ए कर पीर माया के प्रभार में रहतानाता सम्म १ दी। २.पा.प्र. १२५ ३ उपमी १
मी उपाधि प्रौर सीमा
पाण करता है। प्रवएप बह परि मोम पाना चाहे तो उसे समट कर उस
उद्गम की पोर गमन करना चाहिए जहाँ से मापा की पारा नि मृत हुई
है।'पहन की मात्रायता नही कि यह रस्टी यात्रा मात्पम्त कठिन कार्य
है। इसलिए पीप गवत से मद मोक्ष नहीं पाता है । पुरपाकावा-
'एक मुरि से प्रपिक जमी है मषिक समर्ष तभी तो
मित्र उद्यम की मोर पार हम मोट नहीं पाते हैं।
पर नही पात उस प्रस्थय एक पूर्ण सरिता तक
पोपे हुए पोत मामयी फिरणो के कमरब में।"
'बामापार मे इस विषय पर पोर दिया कि संसार से मुक्ति का उपाय
उमसे मापना नही प्रत्युत् सर्वतोमादेन उसे सीहार करमा है। दामा
पारियों का विकास किमो पीर मनुप्य को भीचे गिपती ही रसे
में गावी। इसी विकास के बारम बाम-मार्च में मप मांस-मीम
मुगा पोर मधुन से पुछ पंचमदार पूजा का प्रचलन पा विधये श्चिमीही
मुगाया उत्पन्न हुई और पाक्त-गर्म इपित एन मुपित समम्म बाने
सपा दिनकर भी काम के सम्बग्द मे यही राय रखते हैं कि सारा
मनुप्य अंपा भी वह सकता है पोर मोरे मी गिर सकता है। एबंधी
काम धम काम ही पाप है काम किसी मानद का
राममोर गिण होल पमु समतु बना देता है।
पौर किसी मन में प्रसौम मुपमा को कृपा कमाकर
पापा देवा उमे किरण-मित प्रति रथ सिर पर।'
'शापौर गिर-पक्ति में निहित मा, तब यह मपितामर सरप और
पांत की स्मिति में पा । पिप पक्ति से निभूत होने पर ही में पड़ा
है।सीलिए संसारको कुप वस्तुओं को ग काम्प तपाइपको पकाम्य
सपमा पुष को प्रिय मोरप हो प्रप्रिय मानवा
पा.प. २२०
२पी १
एस.पा.प. २२४
पीर
.मा.प्र. २२५
कामाप्यात्म बीमिता 'मन की ति यह दव, प्रकृति में, सचमुष, ांच नहीं है। पर व प्राति विभात पड़ी है हवेत-पाम हों में विश्व तभी हर मामा का मिथ्या प्रवाह मयता है। किस्तु, भुभामुभ मानों से मन में एटस्प होवे ही महो दीलना मेद म कोई एका ही रहती है। इसी प्रिय और प्रप्रिय भयने के मात्र में विधि और निपे के नियम बनेको बिस्छम पिम है। ममत में सुधार का कोई भी सत्य करणीय मा भारतीय नहीं है। मिमि और मिपम मुक्ति के मार्य नहीं है ये मन के पन । मिधि और मिपेष के बिना पीवम रहने बाना मम ही नव मानरता का मन है । विपि पौर मिपेम विपपः कल्प से देव पंथा होता हैवना पार पुश मेनपम होता है । उसी कहती है- 'हम मनुप प्रमोद के, पर, मह प्रमुर निरामय विधि निपेष-मब संपर्षों सलों से पाप्प नही है। अनायास स्टा करती है सानी से टहनियां पौर पत्तिमा म हनी से पा रहस्य कि के मम मे स्पर्म की बाती है ते किरम माम मोक की मेर ममम सत्ता का पुन -'विषि निदेष बहा, महाँ पर कर्म प्रकाम नहीं है विधि नियेष पुष नहीं मिमम है रे पगन-बजन के। इसी बात को पुररमा पार पषिक सबसता से उपस्थित करता है- विधि निपेग सत्म ही स्पात् बात पर की रेखाएँ, कोई मेल नहीं उपता भीवर के प्रथम समिन पर। और बार भो नौ ता ऊपर परत-पातम से सिमि-मिपेप का उस पर कोई बोर नहीं पाता है। प्रता १२४ १वधी र २ से. पाप ३ बंधी ७१ ४ वही . ५ बही, उबंधी उपलम्बि पौर सीमा दिनकर मानते है कि पिषि पीर निपप एनतम मानवता की पहचान मही है ये मता पर के फेन पार बुमबुमे है। मनुष्य का परम नम्य मोब है। नई पनुसार- 'मुक नही मो सहर भावना म इममें बहते है, विधि निषध से पर छूकर समी कामनाभों से किती प्येव के लिए नहीं बस पहते पने को क्योंकि पौर कुप भी करना नमक या भाग्य मही ।' तोषिक सापकों का विकास इस बात म हा है कि पिर मोर मार पोर्मों एक है।मो शक्ति महाबहार में फसकर मृधि की मीमा का विस्तार करती है, वही पिए (परीर) मे भीतर भी अपना काम कर रही है। मानर परीर के भीतर पो और नियम पियागीतही मौतिक नियम बमपर पाड म काम रहे हैं। प्रतएव सत्य के लिए प्राकाग-पातास मानने का मपन प्य है। सरप मनुष्य के परीर के भीतर पिपाहमा है पौर रसे उपतम्ब करने का साधन मी मानक परीर ही है। इसी बझारम्पापी पति के सम्मान में बंधी कहती है- शिप में यो मान बही झरनों में गरब पहा है कार विस की ज्योति छिपा ही ग रेसम में। 'यह विचार तर्क समम्त है कि नीर मुक्ततमी हो सकता है पर उसमे सार पाय घर पाएँ । पार्यों में से कामिनी पौर कापम पे दो पाप महा माना। दिक पर्म है पर बो भी सम्प्रदाय बने, उनि यही सिताया कि मोए प्रातिनिए माया के पापों से फ़्टमा परमम्त पापा । कर्मचारियों में कर्म के बारा मानमापियों ने नाम के आय इम्ही पाओं समे का प्रपाम दिया। एक पाठ धर्म ही ऐसा निकसा गितमें यह कहा कि माया रे मसत्य होने कारण रमो गई हुए पाप मी प्रमाण है। रुपमही में कुप होने के मम मात्र मएर उनम भापना पर है। उशी पुपरपाको उमप्रवे हए कहती है- ४ १र्षी ८२ २४.बा.प. २२५ सपी - ४.पा. २१० कामाम्यात्म ही कविता प्रति नहीं माया माया है नाम प्रमित इस भी का पीचों-बीप सप-सी सिसकी रिहा फटी हुई एक भीम से बो कहती ष सुरु अमित रन का पर पूसरी से पाकी का बगन सिहाती है। १ 'कामिनी माया का सबसे प्रथम पारा मानी जाती थी। पात बम न प्रपन नीर-कोटि के सापकों से कहा तुम उस म्पिति में मा गए हो कर मारी समायम मी तुम्हारे लिए पास नहीं उवातीत मानद का ही प्रतीक होगा । तुम इस माय स समागम करो कि प्रत्येक पुरुप में पिक पौर प्रत्येक नारो में पिया प्रमौर बही भी मर-नारी का समापम होता है, यहाँ असम में घिम और मक्ति ही समापम कर रहे है। बिनकर का पुररमा इसी ऊँचाई समानता है- 'या प्रति पन्ति पियोग नहीं पारिएत के तप्प मसन का परिवर्तन है स्निग्ब घान्त रीपक की सौम्प पिता में। मिम्बा नहीं प्रशस्ति प्रेम की ममना नहीं समर्पण स्याम नहीं संचय उपत्यकामों के सुम-र्मों को मे दाना है यह सम्म नगपति के सुंग पिचर पर, यहाँ यहाँ फमास प्राम्स में घिन प्रत्येक पुरप । पौर पक्तिदायिनी भिषा प्रस्पेक प्रणयिनी मारी ।। प्रम्य धर्मों में काम को पाप माना पा । पात सापकों में उसे भी पवित्र कर्म मान मिया । सर्वपी की भूमिका में दिनकर ने मिया है-पग्रियों के माम से प्रतीन्द्रिय परातन का म्पर्ष यही प्रेम की प्राण्यारिमक महिमा है। देव पौर कान की सीमा म बाहर निकलने का एक मार्म मोप है कि उमकी दूसरी राह नर-नारी प्रेम के भीतर से भी निकलती है मनुष्य का यह पनुमान परपन्न प्राचीन है। प्राइमत इस एप्टिकोण का समबन करता है। पापम में सापक का सापिका सान ममागम का प्रतीक है। योगी पोप करा लिन मपुमती भूमिका में पाते। प्रसपी प्रातिपम-पान में १ उपी २ से.चा.प्र. २२० बधी १४
भी पसम्बि और सीमा
पावसकर उसी भूमिका का सापात्कार करते है। रात्रि के रोमारिष
मम को प्रस्तुत करते हुए पुरषा कहता है-
मिक्षा योप-यावृति का क्षण और उप प्राप की
ऐफामनिर समाधि काम के इसी मात के मीचे
भूमा के रस-पपिक समय का प्रतिक्रमण करते है
योगी को अपार योग में प्रापी मानियन में।"
पाक्त संस्कारों म दीक्षित निकर मह महल मानते है कि मन पौर
तिम एक ही सत्य के सागर में पाप कर रीत पाने पाती दो मरिया है।
हस्प हीन नहीं होता है। लचा मोर कपिर की उप्यता को भोगते हुए भी
मह सिर वा पा सकता है। वर्षमी कहती है-
'देषवा एक पषित नही इस मदिर सान्ति की चाया में
पारोहण के सोपान मगे है तथा एपिर में पाया में।
परिरम-पाप में बोइए उस पम्बर 6 उठ पामोरे।
देवता प्रेम का सोया है, गुम्बन से उसे पनामा ।
सारेन्स का प्रभाव
पूरोप में पर झामर का पागमन मा तब काम के समय में समार
का प्टिकोण बनने ममा पौर धर्म भी पाप बार हो ममा । मानिक
युग का मेणा पूरोप है । पितन पहसे यूरोप में होगा। तब उसकी बारा
भारत में भी बहकर बती पाती।पूरोप में ही रिहान भामे प्रकर्ष पर
पापा मारमही रसकी प्रतित्रिमा भी पुरुहर। विझान दुनिवार की
है मौर मुटि के ही रह रास्म के समी पोर वर पचना पाता है।
मानना होगा कि जीवन में पना पाप पस पहा दुरि की मुनहमी
किरण मही पाती है। पूर्वप में हम बुद्धिमारका विरोष नीस्मे मनातोसे
फास पार रिम्स ने किया । मरिम शिकार पाविरोपी का पिनाम
का सदस्त धमका। उसका कहना है पवित्राबाद में सरपान
समान को पर्यतुमित बना दिया है। मप्पयुग में पवित्रतावार का परवान
हपा और समान सोपसे मारबार प्रस्त हो गया। मरिम्स का परमा
१पी १८
१ ची २५
कामाभ्यात्म की कविता ११ है हिमप्रेमी समाज पौसर के समय में सेक्स से स्तमा मही 'भापता गिना कि यह सवपिपर के समय से भागने ममा सिर काम के पारीरिक पक्ष का पर्णम वारी ममता से करता है और उस कोई सिपा नहीं है। किन्तु, गेक्सपियर के साहित्य में यह बात नहीं है । बरिन्ध मे हेमनेर की मन स्मिति का सिमेपण कसे हुए बनाया है कि वकी प्रन्धि काम के पारीरिक पल की बिमसेट अपनी मां के प्रबंप प्रेम से गिरा हुमा है । हममेट को प्रपनो मां के प्रमम्म पौन-सम्पद (Incer love) से प्रति बनती है। यही अपि उसे मोफेलिया के प्रेम से भी मिरख रखती है । ऐक्सपियर स हो चांसर के निराधम प्रेम का रूप मिसना संग हो गया। इसके कारण का पिलेपन हए नरिव ने बताया है कि ५५वी पताब्दी के उत्तरा से ही इपसर में स्परप रोग का पाना पुरू हो मया मा पार सेक्सपियर के समय तक तो यह बहुत बोर से इयर में का मा बारिस मे हासा दिया है कि ऐक्सपियर के साहित्य में इस पपप रोप की पाया विसावी परती है। प्रेसपिपर बार-बार मभिपाप के लिए PM का सस्तेष कणा सोक्षहमी सवारी का उपरेष रोप बहुत पापक हो मया वा पौर इसका प्रमाव एस युप की कामिनी पेटमा पर पड़ने सपा वा । मर और कोटमेरदे पर-परिवार उपपंप से प्रस्त एनिमावेष प्रथम औरठा एग्गा पैदापी परपर । एनिबार को इसी रोग के कारण हि नहीं पी, उसके tay पर ये मौर अपने को उसने माह के पोप नही सममा होमा । बा एम सी ऐप से चपन में ही मर पा । इसी परंप रोम के कारस मेरी मिसम्तान ही मर मपी । इसी तरह टयूर पर के सभी पने मर गए पौर स्परस से प्रस्त हमरा सम्राट सिंहासनास माम्म प्रयम । स्काटर की रामी मेरी का भाग्य भी इसपर रागापों से पापा नहीं पा । पर सेंट एस. का भाई पिएप मेरी पुष गेम्स का नामकरण कर रहा पा तब मेरी उसे (पार विपकी) कर पा गई पी क्योंकि पसकी सारी देह पर परस के पापीको कपामा किसी को भी या रोग एकम मम । पर मय को पिता म्पर्य बी क्योकि बेम्म प्रपम बम्म से ही यह रोप ने मामा पा। इस प्रकार पेम्स प्रपम को ईसाई दुनिया का सबसे बुद्धिमान चपा इन पंपस प्रपनी संधान को मया पा और स्ट्रपट बंधही इस ऐप से बाहित पापा । पर इगनेर मार सॉटमा राम संस को पह हासत पी सब पहा पारों भौर सामंतों की पाही 1 उसी उपमम्मि और सीमा बेकार है। गले के सभी मीन परिवार व्यापार करते थे। पूर्व रेयों से पार भमरीका से चमका पापार चमता मा और इस प्रकार उपबंग रोग उनके बुन का सामी बन मया । बर मह गेप रपिर में प्रवेप पर पपा तम यह उनकी पतमा में पुसा पोर पावना में पुमा तर मी प्रारपती कल्पना पाभी मामलर मगा। परंप ने मंन पाति की प्राणपता को मारना। चॉसर का इसमेर प्रेम पारिक पम से मागता नही पा प्रत्युत् उसमें प रस मेता वा । पिर काम रससे कतराने मग बमा मौर पेलोवपाकीट्स का इमर उससे बाल र रदन में पोप मानने समा। कमस्माप ऐसे-ऐसे सिम्त बाब गरे पर जो एक प्रियमारण सम्मता के प्रती-वैसे मोरम करेब है (Beauty Hinare) मुदत पाई को मुम्बर पाषाण करता है (Handometu handsome does) बहरा देसार निर्सग मत करो (Dont judgo by appearances) | कहमा म होगा कि मैं सब मा सम्यता परेश में इन सबोलपमेर को मार दिया--को का यह मुषोपमा बा। एक मरा रे अमा- रिम्स के पदों में हस्तमैन की सम्पता। मरिस्त इसी सम्पता की प्रतिनिया में गत्वाइमा बा। मरिन्स की पामार हस्तमैमून की सभ्यता के विरोष में उमई मां पामार है। सरित काम का भारी समर्षक है। उसका कहना है कि हम विना भी स्टोर पार सममी बनने का प्रमिनय पो म को हममें से प्रपिकाप मोर मुक्स के सामाग्म (Moderar) वापरणको पसब परते हैं । सेरम में उम्पमा प्रदान करता है किसी बरसी लि मे प्रकट होमे पानी भूप की ठण नवरित वाहै हममें शिवमी को मार दोहा ताt। मानव जीवन में समका ही पक्तिसामी वामदायक पोर पावरपा पीर है और हम साम पाहिए क्योंकिकामी पिठी मुम की किरण की सद इस प्रकारका हम पपमे भीतर मरतम परा हम कामा गरमा पाते है।रिनार की उपी तपमप नाम्स की ही मापा में पली- या निमम स्पर्ष तिमिर है पाकर पिसे सा की बीर दूर पाती रोगों में दीपक बम उठो ? पह प्रार्मिमा पकार है बिममें प गाने पर हम प्रभाग के मान 4 छतराने माते ? - -- . Prem63 कामाभ्याम की कविता - और कहोपे तिमिर-पूल उस मन को भी जिससे पावा की पिया निहिल तन-मन की चुत पापी है? रक मनापी काकीकी का सोपान है। प्रेम की सुरमार मीविकता में होती है पीर परिपाठ पम्यारम म । तरिम्स का कहना है कि पापर ही कोई युग मा प्रविश्य माधुक मास्तविक अनुभूति से रहिव तपा धप अनुभूति स पूर्व हा हो गिना कि हमारा गुण है। प्रतिधम पाहुण्या पौर पदम अनुभूति एक प्रकार का वेत बन गए। जिसम हर पक्तिमपने पड़ोसी को मात कर देना चाहता है। पारा मामी बम पमुभूति में बीता है, सप प्रमुभूति के लिए मोठा है। प ममप ठक ऐसा मपता है कि समय भन्या ही पापा सम पुछ ठीक है और तब एकाएक समी समय इट पाते हैं। सारा म्पटिस्य कनारो पाता है। हम एक नमे प्रलं तर अपनी अनुभूतियों के समय में ही पपन का मोसा रे सह मेकिन यह सब दिन तक नहीं बम समता । मन में हमारा परीर ही हमें ठोकर मारता है-बड़ी मेरहमी में पौर बिना किसी परबाटाप सेक्स या भाषेम पर पारमण करता है।दप प्रेम के पिता इसका पालमण मिमय होता है । प्राय हन रेब है कि पी पति किमी दूसरे से प्रेम करताही पस उसी में पोर में पूजा करने सप पाता है। यह भनीयोलार वीग मी नकती प्रेम की ल है। यह प्रेम ही भूठा है। पणा वा उसी का सामाणिक परिणाम । यो मापीर हर युग म पती पाई है, परम्न इम पुप में जितनी मामा में है उनी कमी नहीं पी। जो पारमी मरे से प्रेम करता है बहुत दिनों का प्रेम रिये ममा पही एकाएक देखा कि सबसे प्रबल पसा एकाएका यई। सरिस अपवाद दि यदि यह बटमा युवावस्था में नहीं हो पपासा के समीप पटगी पाटिया समम बरे परिवर्तनो-यौन भावना के परिजनों-या होता मारे युग मेंनसमे भपिक विमानना और कोई बात नही कि गरमा गो कमी एक दूसरे के प्रम करते थे वीज प्रणा करने मपते है। महापसा पिपिपिलिप रे पटठी है।' १पी ७ २' Propou, 93-5 ३ 1b1967 शी उपमणि मोर सीमा १ उसंत्री की माय भूमि यही है । दिनकर मे हमारे युग भी इस समस्या को यही विषमता से उपस्पित किया है। पुपरमा प्रोमीनरी से प्रेम करता है पौर मौपीनरी माय म्पत्तिस्य पुररणा को समर्पित कर दिया है। पुरमा को कोई प्रभाव है इसका उसे तब तक पता भी नहीं पा पर तक कि उसने दर्पणी को रेवा नहीं। माता है- 'एक मूर्ति में सिमट पयी फिस मांति सिठियां मारी। कर पा हात मुझे इतनी सुन्दर होती है मारो ! उपी हमारी जिसकी पुस्पा को सोर भी इस मारी के बिना उसका पतिस्प पपूर्ण पा-किन्तु, उसे इसका पता नहीं था। धी को सकर उसे मान पा कि उसका जीवन भर का पा । इस लिए उर्मपी को पारमा निहाम हो उठता है-- क्या उपचारकाम? इस माल परग को मा समेट पर? गहा पाहता सिंधु प्राण का कल पाय दिनारा ? पुपा चाहती हप को फोर रक को बारा ! काल मुरभि की रिम्प रेमि प्राणों में समर उठी " मयी तारिका कौन पार मूर्षा पर धमर पटी? किस पाटम मापनमा म पार पनिम-नहर में माम मर सिर पे पार पासों के मार मर में ? दिनकर ने इसी पृष्ठभूमि पर पप प्रेम की प्रतिमिया में उत्सम्म प्रसा में बड़ी मन्त्री पाम्पा की है। पर से पुरुषा का उगी में मिनन हुमा तर से दिमकार में कमी-कभी पुकरणा-मोपीनरी का पिसन महो रिसमामा है। पन्त तक भी नही मिलते हैं। या दिनकर की भरपूष कनारमा पप सरिष है-हिन्यो कविता में सर्वप्रथम । प्रेम के विमा सेम मानी होता र उसकी सारी सावता प्रेम सागरीर और गरीर का मिलन प्रेम मही होता है। मेप में परीर मन पार पारमा तीनों के पगवन पर भर मारी एकाकार होते हैं। पासीनरी से पुरा को वह नही मिमा पा जो प्रेम नाममिए बधीको रेपकर उसे पाकर यह मब एप पून पाता है। १ उर्वशी १४ कामापारम की ऋषिता - मुतील या नर-नारी समाप की एकनिष्ठता प्रेम में उपगती है। तरिम्म की मेरी पटरती नी मा धित पुस्प पा गावी कहती है I kore charity now boczne its the peace that come of loving I love belag chap ROW I love it o Anom-drops lore thomom I love the chashty, which the parko al price of our lovint, between us now like a wow drop of foded white firma o gosd to be chasto like a river of coal inter in my walnारी 'मटाते समय + म प्रेम का मरते ६ टिमु सम प्रेम पता होता है । यो एक बार बास्तरित प्रेम का माद पा मेता है बड़ी पटा महीं है। पुनरमा फिर कमी पोपीनरी पाम माता मही मी पर पामे पार भी नहीं। हमारे इस की मसब भावना पम-मरणय-पारमा का मा प्रपामार हमारी मापा किसी और कदि में नहीं लिया है। परिम्म ने रिमापी सेक्स' (Ser m band) की बड़ी निंदा की है। मह पर नमीप भाविकार है। यह-योप रमये शिजीनियों में देना है । रचने मे सममहीन रन और मसति * मतों साका उपा भवामों पर (Babeman) समारहा है। रमका कहना है कि मेरम विवना पीरिक मेमोपटखमा समाग का मोर कोई भी बय मही। उसकामना किन बोगों में सेल्स इमरे गएिन भी परित मानमिन और उनके पारीर की मारपबत्ता भूतों का तुमना में भी नहीं देगा । मरिम्म इस प्राधिको पारमा निम म्यिा मया पाप पखा है। पै मोपस के रिपम में मोगते ही ऐसा साठे कि सेक्स को मृति करनी ही चाहिए प्रमाकि वास्तविकता यह पती है कि सेक्स इनमें गता ही नहीं है। रगडा सेक्स बनामी होश है। एम सोप सेसी हिरा में समिए सत्त हाकिमोचते कि एनसे ऐसा करने की पोशा की मावी है। सरि धममियत बर या मन मो पामत हाला है और गरीर से बह बनान रत्तेमिकाला है।मोम्म कशा क हमारे पूषों में सेक्स के माप मा मनिचार किया है-नीता मोरे-समझे Lady Chatterts kriet, 326 २ APropor,79 चधी उपमणि पौर सीमा मा महमूस पिप किया यह श्यिा पानि पौर मोपड़ी {dun) हो गई। साहित्य में पानीमता हो तब मातीपब मन शरीर से ररता और प्रसा का है पौर शरीर मन से पणा करता है और उसका प्रविषम करता है।' दिनकर भी बनी में सभी प्रमों की पर मन को ही बताते है । उसी कुममाका कहवी “न का काम अमृत, नेकिन यह मन का काम परत है। दिनकर मे हमारे युग में सेक्स की सपस्मा और पौन पम्प पर समय विचार किया है। सिखते है काम ठन में तो हवा हो, कभी-कभी उसका निवास मा में भी हो जाता है। उन का काम स्वाभाविक । प्रवृत्ति किन्तु, मन का काम ऐग है। यह भी कितन काम की मावश्यता सीमित होती है किन्तु, मन का काम निस्सीम होता है। तन का काम अपनी मावस्यकता से पाये महीं पाता किन्तु मन का काम रसपा प्रविमरस ही नहीं करता पदमामी मावस्यक्तार्मोको पम्म रेवा है। यह पंछी में भी बालित्यपूर्ण ग से करते है- 'इन का क्या अपराध मह यह तो मुडमार प्रति का मौषित उसकी पति और सीमित मापयवा है। मह तो मन ही है मिबास जिसमें समस्त रिपरों का नही प्पा म्पायुम पसीम पपनी कासनिक पुमा है। होम-हाक जन को रम पस को मलिन बना देता है, विम्बित होती किरण पपोषर को मिस वन्य-समिम में निम पनिष बम में समाधि के सहबार मिलते है। दिनकर पामे मिलते है तना काम बस में लाया जा सकता है मिनु मम का काम काल्पनिक होम के कारण पका में नहीं पाता। मसम माहर है कि भय को भरोमा भय की पसना प्रषित मपानक होती है। सेमा भी पपर के परातन पर साप्प विस्तु रिमाम म पुम 'पान पर प्रमाप्प हा जाता है पौर सपान का रखिए दिपारिक प्रवृत्ति पर सण राम गाकर परिमापी सेक्स की कितनी पत्तेरना रहा है। . Ibd,89-90 २ बंधी, ५ ३ धर्म मंदिष्ठा पर पिशान १० ४ पीर बनविषलापौर मिशान १०-५
कामापारम की रिया
कामा नहाया कि यह मापा मरिम्स की है। वर्षी का करित पिउन
की इसी कुक्षि स निकला है। पपा-
'मन पर हो प्रासत काम स सम्प प्रनर सुखों पर,
शिवन में भी उनी मुनामी स्मृति पाए फिरता है
सिम प्पस फिर फिर, मधु-मर म प्रहम करने को
महाप्ट नहीं तो बसों म घनस बस ममी
वनी काम से बतातार . पाप पम्म मेते है,
सभी काम पुटप रानपी किस्पिस बन पाता है।"
काम र प्रावि में सपानिय हा दर या सामारिफ है, पम्पपा बा
मार बन जाता है । एमी स्मिनि म मिापी बन पाता है-Sa in
head एतन मास में लिखा है इस प्रकार मौन पनुमूधि की कामना माया
हैपबधि मह रिमाप पर हावी हा गयपि यह, एकरम एगिएर मार कम्पनिक
मातमारा गिसके प्रति परीर की प्रतिषिमा या वा प्रनिन्दित रूप से होती
या एकदम नहीं हाती है। मरिम्म का माना है कि भार मोग प्रम
करन मिए प्रम परत। इस मनोवृत्ति में प्रम का दूपित कर लिया
है। पारा पारमी मासिम प्रम करता है। ए मिलती है, किन्तु
पारमा पौर मन हहार करत रह पाते है । निकर मुमताकर
'काम-प + मभी इष्ट है, जिनके सम्मान में
मन मारमाएं नहीं मात्र दो पप्रम मिमा पर है
या धन नहीं गिर पालिक विषम पिया पाठा है
मुन पाने को भी कपल मन की मिप्मा स
गो महो मिनट नरनारी उस सानार्पण म
पैसे दाबोधिो पनामधि पा मित गाठी
पर मुगए की नामुषता में हिस-पिो पर से
एफसर का पाम सम्पाम पिया करत है।
१ नगी ४
२. उबगी र
पंधी : उपसम्पि और सीमा
कहीं-कही उबगी में कपि इस ऐसी बातें रह गया इमो उमकी मार्मिक
मझ ही है, पितृ मरिम्स के विचारों से उसकी समता है । यह ममता ही है
प्रभाव नहीं। मरिम्म मानता है कि सेक्स एक सर्वनामक प्रति है।सफर
सापमोप हो वो भावमी बहुत कसा उठ सकता है, पयोष होने पर पपु से
मी हीन बन सकता है।' यही बात निकर भी है पर मिषय ही यह
मरिम्स का प्रभाव मही-
'काम धर्म काम ही पाप है नाम किसी मानव को
उप मोक से गिप हील पशु-बंतु बना देता है।
और बिसी मन में असीम सुपमा ही तृपा बमाकर
पापा रेता उसे किरण सपित पति व पिवर पर।'
इसी प्रकार रिलकर कई बगह मरिम्स की तरह ही बात कह मए है।
नारस इस बात को एकरम पस्ति करता है कि कमा में ऐक्स को पीस
पामीम हाती है। उसी को सेक्स पाएका केद्र पा पिरचन
नारी का प्रतीक है, पारम-परिपप रेती रेठी--
'मैं मा-देवता का मपुमय प्रधान मोत
रेखापों में प्रकित कर पनो के रमार,
ममिमा रमिप रत्तनता, बीविया सहर
तन की प्रकान्ति रमों में लिए गवरखी ।"
परिन्स न मिला है कि ससार की पापी महान कविताएँ, पिश नंगीत
पौर पदामियां पौन-पार्पण (Ser apaal)के कारण महान है। मी
मारम-परिषय में निकर पी इस सत्यापनावरण करते है
'भू मम का सब समीत मार मेरे निस्सीम प्रणय का है,
सारी कविता पयपाम एक मेरी यमो विषय है।'
A Propon 69
२पी ४
५A Propon 65
। उसी
LA Propos 65
संती 0
कामान्मारम की कविता मरिस पत्र में लिख पा पा प्रत यह पापी रचनामों की बात करता है। निष्प, कविता को मापा में बोल रहे है इससिए पर संगीतनाद' पौर 'सारी फरिवा' है। अनुभूतियां काम के गर्भ में पड़ती है और प्रत्यक साहित्कार एक हीम की बात सोच पाता है। ऐसा न होता तो पय भारत में तुनसोवास राम गम्भ की कस्पना कर ऐ ये नमी समय सर टॉम मूर योरोप 'यूगेपिया' की कम्पना से कर सेते ? प्रेम में मौन समागम में, मर और नारी दोमो और से प्रारान प्रराम होता है। ऐसे मण में मरिम्स का कहना है कि पुष नया हमारे म्पक्तिव में प्रवेश करता है और एप पुरामा पस देता है । उसका कहना है कि यह समी प्रकार समागम में होता है, और वो पौर, सममान सम्माय मे पर से मारी को स्फूति प्राप्त होती है और नारी से मर रुप मेकर अपमे को सींचता है। निकर भी इस दुध के पाराम-दाम का पन्छी तरह समझठे- 'या प्रपाम सस प्रास्म प का निस विमुग्न नपन से प्रमेपित करता है प्रेमी-पुरप प्रिया रे मन में । मौन पहण या रन अपार घोमाछामी विमों का बोनारी से निकल पुष्पके मन मे समा दे।' बिसे दिनहर में पोसापानी विमा से परिम्स में (Item imulus) मा। यह माराव प्रदान हो सेक्स की शक्ति है। इम का है कि रिम्स बुधिभार का पिरोपी पापा भी शा निकों का मुठा करता था। उसका यह मत प्रतिवाद की सीमा तक पहुंचा हुमा है। पि कोट्स ने एक बार यूटन को भिसाप दिशा योषि रसमे एनुष की प्याम्पारने का प्रपराम किया मा । सी प्रकार मरिम्स मी १सी ६४ २ हमारी राम में इन पंक्तियों की यो प्यास्या श्री कुमार विमान में भानपीठ पत्रिका प्राबर १९५२ २ पेक में फोरम्स सियाम के भाभार परमी है यह पमत है । यो कुमार पिमान पनि काफी प्रामा Selecte Letters It .
उनी उपनाम्धि प्रौर सीमा पतिशय नाम को तरजीह नहीं देता है क्योंकि इससे मनुष्य में विस्मय मौर कुतुहम की भावना पटदी है और उनकी सम्मेवना भोपड़ी पर जाती है। ऐमा मादमी, म्यामाविक है कि दुरि की तुलना में रत की पुकार को प्रपिक महब रेया । मरिम्म बड़ी प्रास्पा से कहता है-विर में विपास ही मेरा सबम गा पम है। मांस बुधि की तुलना में प्रषिक चतुर होता है। हमलोग अपन मन में गमती कर सकते है। लेकिन हपिर बो अनुभव करता है बो विश्वास करता है, वो कहता है यह हमेशा सही होता । दिमकर भी उतने ही विश्वास से कहते है- . . रक युति से मधिकती है और अधिक जानी भी क्योंकि दुटि सोचती और घोसित मनुभव करता है। निरी दुशिको निमितियां निष्प्राण हा करती है चित्र और प्रतिमा इनमे पो बीवन बहराता है, बह मुझो से नहीं, पा-पापाणों में पापा है बमाकार के अन्दर के हिमकोरे हुए पपिर से। प्रम की वह विवाह विषय में भी खारेम्स मप मुपितित मन है । उस पनुसार यह रिवाह कोई विवाह नही है तो दभिर का मादाम प्रम ( correspondams ) नही है। क्योंकि पारमा का मरव हभिा ही है, साप ही गहरी बतना का भी। यह गिर है जिसके कारण हमारा पस्तित्व सुरक्षित है और यह हाप पार पात है रिसा कारण हम गीत १ पूमते-फिरते है यानी जिमसे हमारा अस्तित्व बना एमा पिर ही है जिसम हमारा शान हमारी प्रकृति या अनुमति सब एक पौर प्रमाग्य है किसी सर्प या सेब कोई दरार नही बनाई है इसलिए पब तक पिरका रुभिर से संयोप नहीं होगा तब तक रिवा पूर्ण नहीं होता है।मर का पिर पौर मारी के पिर ये सरा मे दो पृषक पाएँ पा पभी मिनाए नहीं गा । विज्ञान से भी हम यह पानते है। लेकिन "मीरिए र ऐमी समरिया है जो हमारे समा जीवन को परे ए पोर प्याह में यह पक पूरा हो गाता है मौर सेक्म मे ये रो मरिया एक दूसरे का ।यह दो - Ltd 10 २ उपीए कामाम्यारम की कविता पर्य कर वारी प्रदान करती हैं। हामौकि ये न तो एक दूसरे म विलीन होती । म एक दूसरे को प्रमित करती है। हम यह बानते हैं। हमारा नि भिर का एक स्तम्भ है यो मारी पिर को पारी का मर दना है।पर रमिर की महान नदी मारी हघिर की महान मवी स्परा करती है पूरी गहां तक तो भी कोई प्रपना किनारा नहीं होती है। ममी पम मानते है कि यह मबस अपार सम्पा। सम्मोग की निविता का चित्रण करते हुए निकर पित्त की गरिमा में समिर मियांत का हो पास्मान करते हुए सब कुछ कह बाने- युति-पुट पर उत्तप्त पास का सर्प और पपरों पर रखना को गुदगुदी प्रदीपित निम के पोषणाने में रस-माती भरती मसियों का सपरण त्वचा पर, इस नियम का मापय दुटि समझ सकती है? उसे सममता रक्त एक कंपन मिसमें उठता है पिसो पनी मपी से पापा पाने पर मी।' पूरोप में पिता की या बारा फोसीसी उपग्यासकार फसायेपर से ही मा पर पी। रमीसवीं सदी में ही सैमूएम परसर में अपनी प्रतिर पुस्तक Tbe mydandesh मिली । पसारेयर न सिसा है 'सस्प ऐमिमता पौर यपार्प एकही पीब है। हमें कोई उपदेस पाना वो पा पागों इन्द्रियों का सपा ही है। रुप ऐसी ही बात Transpord Heads मामा उपन्यास में टॉमस मान भी कहा है-मा संसार ऐमा नहीं है किमारमा केबस प्रारमागे प्यार करे और सौदर्य परम सौर्य को। पारमा मोदय को पाना चाहती है और सौंदर्य भी पास्मा की भोर रामा पाहता है। अमिर रानिक पार कमाकार साय Intimacy नाम कहानी म मिलता है-रह हमें नहाकर ले जाता है मही तो जीवन ।हम म को मिए य करते समझ सकते। बम पपमे को पम पएन के लिए मोर सकत है। अब तो यह है कि हमारे यूप में मुधि पीनन पौर पम्प्या वर्षन और मदिरप्स और प्रेरक पर्थन में संपर्प पिता हमा - १ Apropon 12 २बनी.
४९ उर्मपी उपमपि और मीमा है। सभी बितक यह विश्वास करते है कि यह प्रादमी मूर्त यो पपने उप्ण हरप की पुकार की मबहेमना कर ठो दिमाग की बात सुनवाई। हमारे युग की भापा रक्त की मापा । पर उसी की पुकार में मुमनी पाहिए । रक्त की भापा रिस्पाम की भाषा होती है और विश्वास की भाषा हमें मरमाती महीं है । दिनकर कावे है- 'पडो रकको भापाको विश्वास रोम मिपि का यह मापा यह मिपि मानस मोमीन मरमामेमो घमी बुधि की भांति रिसे सुन र स मरे भुवन में पाप पोपा हाँ यही मुम्बखा हमस यही है, पौर पुरप पप यहाँ यहाँ काम सुमिरा, काटे ।' यह स्पाम रमने की बात है कि पिार के प्रति या मशिनार सरिर मादि का पाकर नही पाया है। कुरक्षेत्र में ही या प्टिकोण बरा साफ रखरा मोर पर बात का कोई प्रमाण नही है दि उस समय उन्होंने मॉरेग्स पापा । हो, यसमा प्रय हुमा है कि हॉरस की पारा मी उनकी मपनी पारा मे उर्दपी में पारा संगम पा सकी है। सपी का रमिता अपने पारीन मतिमता काबा प्रपंसा है। उसने यह प्रमास किया है कि काम। पर्म का बाप समझने का प्रम दर बाए । यह प्रपास हमारे युग में घोरेपो पर करियों में किया है, परन्न, मितने मरे पमान पर हिन्दी कविता में यह पाम दिनकर में किया। उतनपरे पमान पर पिदी पौर कवि ने मही लिया है। सोरेम्स की दी तरह पयाचित् पनका भी यी साय है कि माग सके विषय में स्परता पौर मानरारी स सो। दिनकर का मपि यह प्रयास सफम एमा तो पपने देश मे, गम से कम हिन्दी भापी क्षेत्र में नई निम्ता मेवा मान लिए गाएम। रसल पा प्रभाव ररान प्रम पोर मविकता सम्बपी पिचार उनकी पुस्तक "विवाह मार मतिकता (Aarriage anirah) म सपहीत। रसत मास्तिक पार निमारी पिकामा पुपमी मतिकता करे पहर पिरोपी है। १ उपी, १ कामाभ्यात्म की कमिया मापुनि मुप में यौन सम्पों की ममस्या पर उन्होन विस्तार से विचार पिरा है। बिहार ने रसम को पा है और एमम के प्रमेक रिपार उमर प्रपर निसार बन गए है। इस समस्या पर रिसर मरो चितम मौर मगर हिमा है पर गमकी पुस्तक म तिमता पोर विमान म समहीत है विपकर पपन रिवारों पर मनेट जगह रसन की मापा मिलती है। ग्युम पाहमा है कि ये सन्य मनुष्य नि पिसी प्रकार का निपथ (Inbiharom ) नही रहता है मामाम्पतया एक नारी से समुप नही होत है। किसी एक म्मति प्रम मे रतन सा परि एप पो तक यहाँ प्रम में भी पाते हैं पर कुछ दिनों के बारे मह महसूस करन कप है कि मौन परिपप उमड़ी वासना की पिपिम बना गलता है और घर में पुरानी वानगी ही प्राति के लिए दूसरी हरियामी की पोर प्रांत चठाये है । रसस का कहना है कि नैतिकता का प्रपिक याम रहने बाल मोग इस प्रवृत्ति पर निममरण पा मेते हैं, पर, इस प्रनि के पस्तित्व से कार नहीं श्मिा मा सकता है। हर पुरुप में मह प्रधि की सलाना से पटी है।" मम का पहना है कि मानी प्रमपी मुम्प प मा नि प्रिम बस्तु की प्राप्ति प्रापत कठिन हो पर प्रिय असु पापम्त मूस्पकाना। ऐसी स्पिति मममी को प्रमिका को पाने में परे प्रबल करन पाये। कमिया में पात में, युर-कोलसे, या प्रम्प किसी भी तरीके से सिमे किं भिसा राम मरती है। सिमारी को पाने में कठिमाई होती है रमत्त र मनुमार उसका मनोजानिक मूल्य का गाया है। दूसरे शनों में बिस मारी का पान में भर को कोई कम्मिानही झलती पाती है यह प्रेम रमानी प्रम नही बन सकता है। लिकर भी सवाचिन् या मानते है कि प्रम री एवं अपरिचित का रोमाम बाता है- "कान पर मह प्रम भय की बात बड़ी उममम है। मा मातम्य गो दूर, उमीरो पषित पाहता मन है। रमन ने जो पुरपरे हतिग्य मापषय का विएनेपा रियाध समी भाषा में मनिकाएकी है-- १ Varuto & Morrls 12 २ Varriage & Morals 56 ३ उमपी, उसपी उपाधि प्रौर पीमा 'उस पर भी भर में प्रवृत्ति है भण-भाग प्रकुनाने की नयी-नयी प्रतिमापों का नित नया प्यार पाने की, गरा में पाई गई वस्तु से इसको पोप नही है पोत सिया जिसको उससे प्राग सतोप नहीं है । उपग्री में रिलकर पुम्प प्रकृति का गाही पन्ध पिसेपण उपस्थित परत है । पुरुप मरस में पिषमता है। यह एक पार पर ठहरन पाना प्राणी नहीं होता है- कर स्पर्प दर पण मसराम नरको मावा है। घसकर पिसको पीग सका बह जप्त भर का भाता है। सीमा में मुमठे सुम पर प्रीति नही पगी है बो पर पर पर पई पारमी फीकी यह मगती है। यह मान बेकार है कि पुरुप की यह प्रावि मन्धी है गा दुरी। यह प्रहविसे परता नहीं पा सकता है। तब यह मा उपाय है निमसे साम्पस्म को मुनी या सफल बनाया जा सकता है? रमत ना "इसका मी मुस्ता मामूम है। मारी पो चाहिये कि पह पुष्प को एकबारमी पूर्ण ममर्पण मी न करे। अपने पति से कुछ दूरी रमे बनाए रणनी चाहिए पानी नारी को मिाह के पार भी एक प्रापरण में प्रथम एना चाहिये । रम ने कहा है किनारी को शिकार बार मी पप्मरावत् गोपनीयता (Sphine me Serect) पपने मातरिक विचारों पौर भाषणामों में बरतना चाहिए उपरक शारिक गोपनीयता भी। बाहिक जीवन की सफलता के लिए मा एक भावापक पर्व नही तो पुरप को हरियाप्ती की पोर पान सटाने मग बाता है। मनिका पौधोमरी को भी कमा सात पी ~- धारण-सरप प्राटे पूरे छिपे फिर-फिर यो कुपन मेर स ममर गो निनको प्रिय सपिन घर में कर को मारने के माप वायु में बड़ी-बड़ी पाठी हो पौर नहर मी मोर लिमिर में पप गाती हो, - उबंपी २ Variage & orals YI हामाप्यारम की कविता निमतम को रख सके निमग्मित जो मतृप्ति के रस में, पुरप ब मुब म रहा है उस प्रवास में ।' 'महर सी सौर तिमिर में इस बाती हो' की म्मेबना अपूर्ण है। से पकार मे रखने मामी सार मकार में ही इव गाती है उसी प्रकार भारी का षकार में हो पूरप की मोर उन्मुख होना चाहिये भार पुम अपकार में ही अपने को समट मेना चाहिये। प्रभास मे पुष्प का रोमान्स समाप्त हो पाता है। यह स्पाम रखने की बात है कि रोमाटिक प्रेम में प्रिय बस्तु मकामत नही शिबनाई पस्वी पह एक इन्द्रपनुपी पनका से मान्यम रिहमाई पाती है। उसी मिाटिक प्रेम से बानित होकर पुररमा 'सस्प ही रहवा नही मह ज्ञान तुम जिवा मुम या कामिनी हो। उसी में शिमर का संदेश यह है कि यौम-समामम के क्षणों में र भाप में माता है और मारी मर में इन माती है। इस पौन-समापम की | तम्ममता से नर और मारी पोमों का एक तरह से पुमर्मग्म होता है । सेक्स अपने पाप म महत्वपूरस नही है। उसकी सापकता प्रेम से सिव होती है। भीगा में जब पहन प्रसान्त सापठी पर प्रेम ही इससे मनुष्य को मोष रिमाता है । सक्स पारीरिक मिमन है दिन, समी पारीरिक मिसन प्रेम मही होता है। संधी का कपिमा निकाम काम सुनको पाठ करता है सर रसका सरेह मह महीकि सम्वान भनारपया है। ठीर इसके विपरीव मुठान सुप का पिपस उसने बड़ी समता स किया है। मावृत्त की परम सफमता में हो वह नारील की पूर्णता मानण है। परन्तु काम * मुख को परम पई में महान उत्सत करने का मम्य नही माना कि प्रेम के बिना भी दो सतार उसान हो पाती है। संताम पौन-समागम का परिणाम है कि मान-समापन का परम माम नर-नारी का गरीर मम पौर भास्मा रातम पर पटाकार होना ही है। निमाम की पही पौक्ति माझ्या हो सकती है। विमा प्रेम भी गम स्मापित हो सकता है, उगी । + Harriye & Moral, Y! ३ उमी १२ Y
1.
उबपी । उपमणि पौर सीमा
पैसा बिमालार में होता है। मत गर्मापान काम सुसका लम्य मही है,
बह एक परिणाम मान है।
मौर पुष कामना कहो तो यपि बह सुखकर है
पर, मिकाम काम का अचमुच यह भी मेम नहीं है।
निकाय निकाम काम-सुत की पचत पारा में
सताने पहात मोक से माफर पिम माती है
पारिवस्मरी में फूलों सी निराकार के हो
स्वयं निकम पाने मामी बीवन की प्रतिमानों सी।"
सीकार भी वस्तुत मारेन्स की ही तर नर-मारी समागम में मोश
की कल्पना करता है।
उबंधी प्रम की पत्रिमता का मास्मान है। इसी प्रर्प में यह कामा-
प्यारम की कविता या प्रेम केवम शारीरिक मिहन नहीं है। मगर
धर्म में पाये भितिष को भी प्रवाहै।
उपशी ।
-
शिल्प योजना उबंधी का भूत प्रतिपादन काम्बारमा है। किन्तु इषि ने इसे काम्य- नाटक (Vear-drama) का रूप दिया है। काम्प-मारक में कविता पनकरण मात्र नहीं होती है। सच तो यह है काम-नाटक में सरि कविवा देगा समापट हो बाहर से प्रारोपिठ हो पिता सुनकर बम कविता सुनमे जैसा ही मानद प्राव हो वो बह पिता मनामश्यक है। यहां का पिता को अपनी प्रनिमार्यता मारकीय परावत पर सिमरनी ही पाती है। नाटकीम मेम मे पिता फिट कर देना और बाद है पर कविता का माटणीय भौचित्य से मुक्त होमा और बात है। मारपीस कविता ( Dramade Poetry ) म पो नाटक के कार्य-मापार में बापा गमती है पोर न से शिपित बनाती है। कविता पर पपमुष मारकीय होती है दो नाटक को वीरता पोर भी प्रकार हो जाती है। ऐसी परिवा शहरी सजावट पार रसीली नही होगी गो माटकीय स्थिति की विकता से उत्पन्न मापा का ऐसी पारयनिक पठन होती पहा वाय मन नए पौर पर पाप को परख नहीं पाता है। काम्पबाटक में कविता पर इस पाई पर परतावनी समर्थ हो पाती है कि यपाबीपन के समय भी उसके राही मारमळा से पत होते है। प्रेसपियर के नाटकीय पिस की महिमा इस बात में है कि कविता माप्यम से उसने ऐऐ तमो को भी मत पिया यो सामान्यतया कविता के विपय नहीं थममे पाते है। पेन्तपिपराप्यारमक नाटक, निबार मारटीम करिताही पिपी मोर मी सफ्नवा से मिची किप में मिडे गए, इम्पन पौरों के भेष्ठतम नाटक भी नपठा कि वह इसीलिए लिये मए हिस्सपियर की महिमा माय मी समम सरि समय में करना होती है। Schected proxe, 61 १२ वर्षशी: उपमाग्मि और सोमा - मेक्सपियर पर अपने किसी नाटक में किसी काम्पारमा पक्कि या प्रमुन्येव का समावेश करता है तो इससे न तो काय-यापार में पापा होती है। और न पह पक्ति या प्रमुष परिष-निरपेष होते है। ठीर इसके विपरीत उससे कार्य व्यापार और परिष दोनों को बम मिलता है। घर कि मकोय बस गहन्यत वाक्याग का प्रयोग करता है- To-motrow od to-morrow and tomorrow, या जब कि रात में अपने पर ससुर और मित्रों के सामने पायेतो यह स्मरणीय पक्ति करता है- Keep up your bright swords for the duo will run then, हम यह नही महसूस करते कि मेक्सपियर मुम्बर पबिता में साचताt तब उसे किसी तरह भाटा में फिट करता है परपा ऐसा भी नही समता कि उसकी माटकीय प्रेणा समाठ हो गई है पौर पद भरती के लिए कविता की मोर गया है। ये पंछिया विस्मयजनक, साप ही पति के साप उनका मेन बता। मष द्वारा कही गई पंक्ति एक ऐसे पुस म्पति पी पिता व्यक्त करती हैबो अपनी पत्नी द्वारा अपनी प्रम्ममनरल कामना सपा पली की महत्वकामा को पूरा करने के लिए विषय लिया गया हो मौरी प्रपनी पत्नी के मरने के बाद विभिम में पा गया है। पामो की पंक्ति में एक पाप ही पम्प स्वाभिमान और निर्माता साप ही सामा- निकों को यह पता बम गाता है कि यह एप रात का है। मह बिनपाण उपत्तरिय कविता पी ही हो सकती है। पर मह नाटकीय कविता है यो मादकीय स्पिति को तीरम बना देती है।' उपी में रममा माटकीय पिता का सफल प्रपोप निशिया है, कि पपिप स्पन रविता बिमास मान । नाटक पौर काम्य की परस्पर सदा काम्प-माह की पारमा है। कविता मारतीय होती है पौर मारप पाम्पारवा होता है। बिति ऐसी प्रावी है कि अपनी पमि म्पति में माटा पसारमक बन जाता है। बंशी में या मारतीय पपिता प्रपिर नही।कीहीमपि ने यह विषाणता दिपताई रिममे भाप्प मारक बमा सपना है सपा प्रपम प्रक के प्राराम में ही मूत्रमार १ Ild 1
पिस पोजना
५
'सारी येह समेट निविध मासिमन में भरने को
गमन बोतार माह बिसुध पमुषा पर मका हुआ है।"
इन पकियों में गगन का पोह कोतकर बसुपा पर मुहमा पुरुरवा की
को पापापी प्रथम मीना दो पूर्वाभासित करता है। समर पर इसका
प्रदर्मा प्रभावशाली ऐसा । मह पंक्ति कहते हुए मूमबार बसंत की
मुम-विमा में मटी की पोर मुझेया। उईपी का सारा कप्प सी से स्पष्ट
दो बायमा । याकरिता है किन्नु नाटदौर करिता । मी प्रकार असम मक
में पर पप्पयों का नामाप पत पहा है जब पहनम्या मना से
महवी!
'साधु ! सामु ! मैनके 'मारा मी मन कहीं फंसा है ?
मिट्टी का मोहन काई भतर में पान बमा है।
तुम मी हो बन गई महीम पर पसी किसी की।
पिम्ही माय नपनों सी रमप्रतिमा संधी किधी की।
--
पडिम पंक्ति में 'उबपी किसी भी कहने से मिपित कपामर को एक
मला ममता पर यह पामे पता है। मानम्या सौ मन से रम्मा
उम्पी दीपांकरती और कमान मापे गाता है-
परी ठीक न महम्मे ! मी गार दिमाई।
पार हमारे साम सही खपी नही क्यों पाई ?'
इसी प्रकार स्वीप पंक पत्र में नाटकीप पिता का एक उत्तम
साहरण बम गहा है । यी रहती है--
"हिप-मात सिध पम्मरी पुगारिन को देखो
पति को पूनों हा ममा हार पहनाती है,
गों में परमा बम कोई इस ही
पर प्रमान विपापमि तोहर पाती है।'
१पी ५
1४ सपी उपसदि मौर सीमा उर्वगी के इस कथन से प्रमग अंक में प्रायु के बम की सूचना मिमी ही है, रात बीत चान का भी पता नम है। फिर यहाँ करिता भी बड़ी सम्मt- किन्तु, इम सभी उदाहरणों की तुलना में पचम पंक में पुररणा के स्वम की योजना सबसे अधिक माटकीय पौर मह सम्पूर्ण प्रसप माटकीय करिता का उतर उपाहरण है। इस प्रकार स्वम की पोजना कार पाए निक पुप का कपि ही कर सकता है मामायनी में भी प्रसार ने स्वम की पोरना की है, किन्तु प्रसाद का सपना एक पख है जिसमें पामामी पटना की प्रतियापा पीब पाती है। 'मा का पा स्वप्न किन्तु यह सत्य बना पा या पंकुषित उबर प्रगा में सोम पना पा परनु पुरा का सारा स्वप्न प्रतीहारमक है। प्रतिष्ठानपुर के निया- सियों का एक नया बट-पादप में माना और उसे रोपना मायु के गम्या रोहण का प्रतीक है। पुन' पुपरवा मी मीर-बर मार पुष उम नबीन पिको सोचना चारण है। यह पुपरमा वात्साय प्रेम का प्रचार है। किसी मापरिक की परषा की पोर प्टि नही है। यह एक वरिष्ठ पर पर पार प्रविष्ठानपुर से गहर एक कानन में पर पाए और माँ पानमे पर पाबर भी र प्रोगकरपमा पाता है यह पुपरवा के पागामी सम्पास का प्रतीक है। पयाम ही यह स्वप्न-योगना कामायनी की स्पण पोरगा की अपेक्षा प्रषिक प्रभाषणानी है। पुररमा पर पापहवाt- 'एकाकी नि सग भटक्या हमा विपिन निर्मन में पा पा में पाई पर पुमरा बहती है पवनामम पाम प्रत्तोमा कोपपारा भी।" तर संपी पार कहती है- 'पदनापम । हा! रम्त। पपासे मुझे पूंट १ मापनी १९. ए ३
पिल्प योगमा
बहसपना नाटकीम पन पर है। पुन मार्ग पुरखा कहा।
निपर उपर गप्ता टहनियाँ गमों पर
देवि! पापका यही कुमुम प्रामम मममपा पहा पा
हेमना हुमा प्रष्ट सरप ही मसुरित इमसमा ।
रिनु, हाप ! दुर्भाग्य पिपा भी पास करम को
इस गया यह पमी पृप्प पनों की हरिपामी में।
यह ममन्त ही काम्यामक रसेन है हिमु साप ही नाटकीय भी।
पुरमा के इस बयान स पया यह पसी पुष्प पर्वो की हरिलामी में' में उग
कमानी मिशन पर पानाम है। इसके बाद पुरमा रहता है-
चकित माठ बिस्मिठ प्रधीर बम मिरम्प मापा से
स्मात उग रया छोर प्रपनीस उप पान में
मौर तरवा पा र बाम कर सक बासर मा।
बपा पन्त हो गग रिमारी पूरी न हुदी पी।'
सर्बधी में पानारतीय पिता का भरप है । 'प्रकम्मान र पया पार
प्रमनीवर रम पमन में 'पुरमा की पाय रिमा वाम का प्रतीक है मौर
मन्त में 'गगा, पम्मको गरिमापरी पूरी पीठ पुरी दी' प्री-साना
का पमतार है । या पुररमा के प्रमान मार मार जान के प्रकाग में पर
जान का प्रतीक
नि टी में नाटपरीय विधा में मार रिपे गए गहरण पिन
पुनकर ही गिर गई । उगी के पिराध म्पम पुर पिता के बाहर
हैमोमारक की मून पारा में विभिन में भगवे । प्रपम पंक में मम्मरापों
का पानाप पार पूरे का पूरा डीप प्रेस प्रन्टी परिता के उपाहरण है
हित, नगारकोप किसी भी वप में नहीं पहना मात्रा । ती ती
मिस-पौरना अप्पास्या है, मामीय महो।
काम्पमाटको मापा पाप नही होती है, मिन रसार मातार
सामाम्प बापान की भाषा ही होती है। हम रंगमप पर चाहे पाका
प्रयोग करना पछारिनु पपने माप में सापन मात्र पर और
उसपो २५०
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सर्वसी: सपनाबि मार सीमा पर की मापा में दो साफ मंटर हम देखते हैं बह ऐसा महीसा इम समझते हैं। हमारी यह पारणा बन गई है कि पप की तुलना में पर भी भापागनिम होती है और सामान्य बोम-पान की मापा , परिकार होती है । यह कपन मत्यन्त सकीर्ण पर्व में ही ठीक है। समकामीम पप की पापा बोलधाम की भाषा में प्रति मिष्ट हो सकती है किन्तु मार बासी पीढ़ी के लिए बह भी उतनी ही भिम होती है जितनी कि पच की भाषा हो सकती है। बनर पारे माटक प्रपने युग केहिप दोमनाम की मापा के निकट किनु, मासी शताम्मी में यह मापा भी बनावटी ही नमेगी । पाकी मापा भी पार की पीढ़ी में पर की ही मापा की तरह प्रकोप पीर मोमचान की मय से उतनी ही र पनी बाती है। समिए, जैसा कि एमियट में कहा है, रंगमच पर गप भी उतना ही कृत्रिम होता है जितना कि पप । प्रपमा यो हामा सकता है पिच भी गए की विपनसर्गिक हो सकता है।' वर्षको पर नाटक और उसकी मापा का ममम ममम प्रमाप नही परना चाहिए । प्रसारक माटकों की मापा का यह पोप मही है कि वह काम्पारमा बकिया कि यह मापा नाटक समन प्रभाव से मिन्न पसर गमती है । प्रसार के नारकोपी नापा पपने समय की बोमनाम की भापा से एकदम भिम है । बह भापा बनावटी है। समिए सामाजिर पर उसका बो प्रभाव पड़ता है पापांकाने वाला प्रभाव है । मापा एक माप्यम है ससका प्रभाव मायम प्रही होना चाहिए । इसीमिए प्रमार के मारक भोरष मही तो मापा की प्टि से मौ पसारमक स्तर पर पसफन है। पी में मापा मंपिक नही है । प्रषिक समों पर प्यों पी पापपी मम मिल कर वी है । मापा कवि ने पुस्तक से भी है नीम स कम । सणी में रोपमो पर भाषा का महा हप रिलताई पावा है- पृष्ट ४८ से प्रारम्भ होन पासे पुररया के बकम्प में मोर मरा १४ पृष्ठ से प्रारम हाने माने पीपरा में । पार ये से स्पन भाषा की मिसे इने सहन बने सफम इतमै प्रमावगामी किए हम मापुनिक काम्म मेष्ठतम पाहरणों के रूप में उपस्थित कर सकते। नरोपमहाँ पर पापा पा विस्त बनावटी नहीं है। कवि यहाँ सार | Scoard Proto 69 चिसयागना १० ही परम्परा मुख धनों की कार से निकल कर समय घर की भूमि में विपरम कर सका है। माग मनुष्य के शीण प्रक्षिप्त पार टूटे हुए मन को बीपी सिए याधिक नहीं चाहिए । टूटे हुए मन को बामने के लिए इटामा मंद चाहिए । सतत् वनपीस मार पुराने बरों की सीमित यति-गति में नहीं बाबा सरता । राष्ट्र में पर नई पेठना का पावन पातावर मुरू दन्द की पवाइस स्वय होती है। काम-पता के पर्म स पर भी पममता है। अमरीका में अब नए राष्ट्र का समय हुमायब सास हिटमैन पाए । उनके पानी सन्दरता में वस्तुव नए राष्ट्र की सातमा थी। हमार रेप में भी इस घवादी में पर नया राष्ट्र पनमन भपा तय मिरामा पो में सामरता पाई। सर्वधी में दो स्मनों पर घरों की सन्दरता प्रमुमति की तीव्रता का प्रमाण है। और पा पर कपि ममस्त कमाएमकवा हेमजूर बाह पाम की भाषा स बहुत पर नहीं है। दोनो भकुष इस में भी मही पापानता हूँ पत्ति गर में भी मगभग मी सरहनही पाती। इस प्रषिक म पपिक सालिग पच बनाम के लिए, 'कौन पहप है इस तद भिक्षा मा कहा पा सकता है । 'माग है कोई नहीं यो पार होता को मम बनाने के लिए कोई पाय है वो त नहीं होची' में किषित परिवन ही पर्याप्त है। हम बममा को हाप से घर पर निषा एवम साभिध गप है। यही या पोर रिठा बीच का बात प्रतिपात है जिसे एमिमट में साहित्य की प्राण-पता + लिए पनिवार्य बताया है। किन्तु, मही तर संपी में सब पमह नही है। सहि दिनकर नरागों की तप उघी में कपित्त का स्वर सब अपह एक समान रत पाठो नियम ही यह एक ऐमीनियम पाली सि पाकर कोई भी भाषा निहाल हो उरती। मी की तुलना में 'मायुम' का पकौमम पर है। प्रपा में उसी का पय-नाटक पाना कप पारोपित सा भगवा है। मपा पुष' में पिता हर जमा पच से स्टी है। मह पत् नपी है रिनु मनहीं। बापुप में मारती र पारमीप है। यह मापा हमें बहुत परिचित सीममाठीपमा- प्रहरी राजा की प्रमाण दर रे । दोश नहीं परवा हो पाया पास सुप'मी उशो : उपमनिपौर सौमा ८ प्रारी २ 'मादम नहीं है में गिय है नामा कराणों पा सोसे" x x x - 1 प्रहरी र पापो मुक दामो सामोंकमी दिस जामो गर ममी है ये मिस मूरे है। भारती नै समप्र पंचायुग में गव की भाषा को ही कविता के बरातन पर कार्यपातित किया है। ठीक इसके विपरीत सर्वगी में निकर की मापा बनावटी पुस्तकीय है । 'मपा-युप' में धर्मवीर भारती का सिस बहुत सभामा । उसका एक भी पद एक भी कारस निष्प्रयोजन नहीं है । साहरण के लिए उमी पौर 'मायुप के फोरम की तुलना की वा सकती है। सभी प्रथम अंक में अप्सरामो के दो समवेत पान है। समप्र पपा के विकास में रनरा प्रयोजन एप भी नहीं है। किन्तु, वा-युम में भारतीमेबोई यह कवा-गायन की योजना की है। समर कमानक के मनिवास पंग है। प्रथम अंक का प्रारम्भिक कपा-यापन हमें कपापी पृष्ठ भूमि से परिचय कराता है- "यह महापुर मंतिम दिन की संप्या है पापी पारी मोर पवामी मारी पौरबके महनों का सूना पनिपाए है घूम रहे बस से पूरे प्रहरी" यह कया-गायन न केवम कपा बस्तु मे हमारा परिषम ही कराता है बसि वातावरण की मामिकता को तीर भी बना देता है। दिनहर का पिस पान की इतनी पनिवार्यता उत्सम नहीं है। पोपापन नाटक दीपसाटी है। येष्ठ नाटसार स्वामारिक पोपकपन मिलता है। नाटक माहिरम सी सभी रिणामों की तुलना में सबसे पावादी पता। - १ अंपायुष १४ पिस मोमना १६ । रंगमंच पर पैसा कुभ ठहर ही नहीं सड़ता को बहुत बनावटी है। सम्मे म्मामान नाटक के विषय नहीं हो सकते । पोपकपा में तुमम प्राय स्प है। 'वा-युम' मोपकपन यो सार । रमकी सममता का एक यस्य यह भी है । विमार को परोपकरम मिलने का मकर नहीं है। इस रोप में उनकी सियों के असारमा स्तर को सतिनत किया है। 'पुरोग' में इसी म्यापि से प्रस्त है। इसी पोप को पर्वमी के मनभिनेय बना विना है। मैषिमीमरण युप्त की प्रार नाहे रिखनी पानोचना की पाय पिन्ट रूपोपकानम के पारणा है। उनके कामों की सोनप्रियता का एक रहस्य यह भी है, जिसका रमेस ला हिन्दी प्रासोरा प्रतिष्ठा की बात नहीं समझते हैं। उनके बार इस क्षेष में विषमएका पपीर मानी ने ही दिखना संधी मैं नोपान फीमपापी है। पृष्ठ ७० में प्रारम्भ होने वाला पंधी का पम पम पृष्ठों का है। पृष्ठ ४८ से प्रारम्भ होमे पासा पुररसा का पायार पार पृष्ठा का है। पुन पृष्ठ १४ से प्रारम्भ होने माला चर्चमी का पळम्म पाँच पृष्ठों का है। हम नही पाह पर भी श्री देवी कार अपस्त्री को इस पक्तियों को पाठ कार का मोम पंपरण नहीं कर सकते...परते-पढ़ते ऐषा तमता या सामने मार फोरम है और भामने-साममे पो चोटियों पर रखपी पौर पुरबाको हाहर भने पनि यस्तारक मा पर पारा प्रकार बोमट पसे पापे पायापकता पर पानी तो कामापारम ही नहीं देश भक्ति एवं राष्ट्रीय कर पर भी इसी गति से मौत बाते।" स्थी बी केकपा में देश भटि एवं राष्ट्रीय संकट की पर्यापमाणसादी रीमती है पर मह मनावश्यक है नही । पराम ही का संकेत कार' की कविताएँ मौर 'परपुराम की अपीमा से है । इस रंग की कवितामों में दिनार की पारत विमारी है। परिकोई नायक पप में लिखा बाटाहो पच समय माटम में भाषमाणे को मक्तले का पाप्याप होश... दि एक बापट खरे धम्मारक में मवृतिको पाने का माम्पम करिता बन पाती है पौर विमपोलिसारमा मापा का परिणाम प्रप है एकरम समपोमन (Funerkonul) होता है। संयी में नामाप्यारम की रपसमि का माम्मम सपना बारी, १९९४ संबंधी उपसम्पि मौर सीमा बिम्ब-याचना को भी बनाया मया है। पिपादक प्राप्त की पात करता है तब बिम् मौधिक होते ,पार्षिय होपे है। किन्तु पर पुरुरवा में हकी सीमा सूपन म विनामे मग गाती है और यह पाप्मास्मिक कृपा से बरन हो पाता है तब बिम्ब-योगमा भी प्रपार्पिप हो पाती है। पाप्यात्मिक तृपा के क्षण में कमि पापिय परिषि से पाव दूर बसा पाता है और फोस्मिक (Cormuc) बिम्र की योचना करता है। नारी का सामिप्य पुरमा को मासना की तुपा से बेपन कर देता है। इस बात को दिनकर सरोवर और बम बिम से पक्त करते है- पर सरोबर किनारे बैठ में दो बम पी है उस पा रस बेवमा को पानवा है।' पिमकर ने महा पुल पार प्यास के गिों की भी मारी। सपी म पापक विमा (Recurrent mags) तो पयह है किन्तु उसका पर्वष्ठ बाहरण पृष्ठ ४ से मारम्भ होने पाने पुरवा के मत्तम्प में ही मिलता है। पहले हम मुख-प्यास मिटाने के साधन को त । सरोबर सुपा रस के पास पैव मोचन पामि प्रबर पुन पिया स्वरूप ट या रोट~~दिनकर मानी पस्तुमाँ का रस्मेन किया है । जिम्ना तो यह है कि मुमा सरोपर पीर पिर बसपि ब मी पर पारमी परम पावा है तो पूल पाको पूट पीकर ही रह जाता है। प्राधुनिक मनुप्य रे पाप्या रिमा संपर्प का इससे अच्छा वर्णन हमारे साहित्य मिठी पौर कपि नहीं किया- किन्तु म के पार पर फ्यों ही नगाताई अपर को मूंट या राट पीते ही मपान किस प्रवम से माप यह पावा 'पभी तक भीम समन। हप्टिका या पैम है, माता भोग्न नहीं है पीपावना का माम मानिगलनदी। मार का भोजन की पूरी प्रपंसा नही को पा साली । मानो १पी ४० २बपी ४९ उबपी उपसम्णि प्रौर सीमा बिम्ब-योजना को भी बनाया गया है। कवि पर रहिक प्रासक्ति की करता है उस पिम सौकिकहावे, पार्मिक होते है। किन्तु, जब पुरावा की सीमा सुनेपन म पिसाने मम पापी है और यह प्राम्मास्मिक तृपा बन हो जाता है तब बिम्ब-योजना भी पार्थिव हो पाती है। माम्मास्मिक तृपा के पण म कषि पापिय परिधि से गठ दूर पता गाता है पार कॉस्मिक (Cosmic) विम्म की योजमा करता है। नारी का साग्निप्प पुररमा को पासमा को तृपा से पैन कर देता है। इस बात को मिकर सरोवर पार पतन के पिम्प से व्यक्त करते- 'पर सरोवर के किनारे कंठ में दो पस पी उस तुपा उस वेदना को मानता है।" दिमकर न यहां भूत पार पास के बिम्बों की भड़ौ ममा दी है। पर्मपी म पावत्ता बिम्ब (Recurrent image) वो का पाकिस्तु, उसका सर्वपेष्ठ उगारण पृष्ठ ४८ से प्रारम्भ होमे पासे पुरवा के बलम्प में ही मिलता है। पाने हम भूख-प्यास मिटाने के सामन को में । सरोबर मुपा एस के पात्र पेय मोचन बषि प्रपर पुन पिया सम्म ट या पोट-रिनकर ने पवनी वस्तुओं का उम्मेख म्मिा है । सिम्बना दो यह है कि सुपा सरोबर पार फिर पनषि पर भी पर पापमी पीन पाता है वो पूर पा यो पूर पीकर ही रह पाता है। मानुनिक मनुष्य के प्रामा रिमक समर्प का इससे प्रचा बलन हमारे साहित्य के किसी और कपिने नही किया है- किन्तु, रस के पात्र पर ग्मों की ममाता अपर को पूट या पूट पीते ही मामाने किस भवम सेनार यह पाठा प्रमीठा भीमसमभन? रप्टिका गो पारतका भोरम नही। प की पायवना का मार्प पार्मिपन नहीं है। यहाँ रह का भोजन की पूरी प्रपंसा नहीं की जा सकती। यह १सपी ४५ २ उनपी ४ पिस्प यायमा यहाँ कुछ भी प्रपापिय महा। बम प्रौर मही पुष्प एन पोर पूरी सय्या सन्मदिर, एकात याप युवती पौर सुबक य सर एक म से प्रपर का एहस्प हामठ । प्रणय पाया में नहीं हो सकता इसलिए पग और मही का रस्मस करि करता है । पुष्प, मन मोर पूर य उहीपन है।र-मंदिर पार एशत माप सहट स्पप्त है यहां प्रणय का पापार चमता है। सुबती' पर 'युबक' मातमन पोर मामय है। इस प्रकार निकर मन बिम्ब-याचना हारा ही काम पौर प्रप्यारम---अन्तत कामाम्पारमको स्पष्ट कर रहे है। पादमी मामना तिमिर-म्पूह से एक पण भी अपने को मुक्त नहीं कर पाता है। नीद मनी वासना उसकी बाह नहीं पाती। महरी नार में गगठनासपाती है सब परपतन पादमी को उद्विग्म बनाम पता है। भारमी म्मों ही सोकर उठता है पोंही यह पिरतन पृथा हागिर हा जाती है। इस बात सविनार न फितनी कमात्मता से कहा है- किन्तु, जसकर दबवाई कामनाएँ मत्तिका-सी बम हो। बिम तप पहन पिपासा स विकत भी प्पास स पाकुत प्रनी भी बापी। राठ मर, मानों उन्हें दीपक माप उतना पड़ा हो नीर में मानों किसी मरेप में पसना पड़ा हो। पारमी वासना म बसता है इसमिए दिनकर पड़ पोर पर्तिमा के समान रसम की मात कहत है। पुम मारप म पतन वाम पपिक की सृपा भी पाठ नहीं होती है। उसी फार मोर म बासना की यमन भी मिटती नही है। अपन पर भी वही मुसर सपी रहती है। इसी बात को मीर में मानो किसी माय म पवना पा होत्या पछि तिमी सन्यास पाती है । पारमी का माम्य भी विपित्र ! मीर में मास की पात्रा और यमन पर पारे पर कहा पुषि-प्रविपि पर फिर पिरन बरपासमोर साप । प्रारमी करे ठोसा करे ? अपने रपिर पौर मास कोनाका कमा! १ ममी ११-२
उबंधी उपमम्मि मार सीमा
पम-मोरना है। पसा भूम्म में भी कोई रेखा पीपी पा सकती है। तो भी
मह वितमा सच है हिप में पीची यो रेषा पृमी पर बीची रथा से
प्रषिक स्पष्ट होती है। कम से कम मारमी ऐसा मामता है। रिनार पुररमा
की मापारिमा तपाको गी समई से मत कर सके है। मही हमापा
बिसे रेतकर यह गावटी है कि अनुभूति की प्रबणा देवा कविता
में ही म्पत की भा सम्ठी है।
यह प्राप्पास्मिक उडान बाब नही होती पोर इसीलिए सिम्म मोजमा
भी प्रपाणि ही बनी रहती है। पुराग-पर यहाँ तक भी ग.
इस प्रश्न का उत्तर मही है।
मृत्ति महाकाल में शोकमा पर मुम्बई सम।
पौर नीचे भी मही सोप,
मिट्टी केएस से
पर होता ही कली प्रमार नहीं है।"
इन पकियों में महाबार' प्रय' पौर ममर' पापिय बिम।
किया ग (गना) है। यह क्रिया भी मिट्टी से मर रओ की ही बात
पली है। फिर पारे पनि प्रकार की निस्सीमा पार पवन की यूपता'
की बात करता है । कहना होगा कि मत प्रामारिमक पप (Metaph
yolcal reality) TT TTT ATT (atraterrestria realhy)
ही समय से प्पकरते है। इस बार पुरषा की भाप्पारिमा गाम
रहो पाती है और यह पुन हि-मात भावा । परिणामत'
बिम्ब-पोरना एनम रामिर और मापक हो रहती है।
'पौर इतने में यही का गान पिर रेता मुवापी
हम बही उपयहाँ पर पम सिसते है।
दूर है समा हमारे देवता की,
पुप्पर मतिर
यहाँ पीतम हरिण एकवि बंप में प्रकृति के
कवि राठी-युषा मन्या मितवे है।
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शिस योरना यहाँ कुछ मी पपापिय नही है, पग पोर मही पुष्प एम पौर दूब सम्मा ग-मपिर एकांत मम्प युक्ती पौर युवक ये सम एक कम से प्रणय का एस्प बोलत है। प्रणय पाका म नहीं हो सकता इसलिए पग पोर महीका सह कवि करता है। पुष्प, फूल पौर दूर य दीपम ।। फुल-मदिर और एकात माप ाट स्पस ! यहाँ प्रणय का पापार पमता है। 'पुषी' पोर युगक' पासम्मन पार पामय है। इस प्रकार दिमकर बम बिम्ब-योजना के द्वारा ही काम पौर प्रयात्म-अन्तत कामापारम-को स्पष्ट करते है। पारमी वासमा तिमिर-म्यूह से एक घण भी सपने को मुक्त नहीं कर पाता है। नीर म मी बासना उसकी बाह नहीं घोरवी । पहरी नीर में पर रेतना रख पाती है तब प्रपतन भारमी को तीन बनाये रहता है। पाएमी ज्यों ही सोकर रठता है स्पोंही यह पिरतन पृच्या हापिर हो जाती है। इस बात का दिनहर मे स्विमी कमारममता से कहा है- मिना पाकर देवता कामनाएँ गतिका-सी बम रही। बिस तप पासे पिपासा स विकस पी प्यास स प्राकृत अभी भी पा रही है। रात मर, मानों उन्हें परीपक साप बसना पड़ा हो नीर म मानो किसी मारप में पमना पड़ा हो।' पादयी पासना म बसता है इसलिए दिनकर रीपक पोर पतिका' के समान बसने की बात कहत है। पुम मारए म पसन पासे परिकभी सुपा कमी पास नहीं होती है। उसी प्रकार मीर में पासमा की पसन भी मिटती नहीं है। बपने पर भी नही पुहार नपी पती है। इसी बात को मीद में मानो किसी माघ म पाहमा पाहो'--यह पति कितनी सम्पया से मठकरती है। पारमी का भाग्य भी विषिषमीर में महवपकी यात्रा पीर गगन पर दरवार पर बड़ा धुपिक-प्रतिपि पौर फिर पिरम पन बाद सोने के माप । प्रायमो करे तो क्या करे ? पपने कपिर मार मार को बहका करेमा ? १११-२ ४ उवधी ! उपसम्बि और सोमा फिर भापत कोई प्रतिपि पागार देता फिर अपर-पुट बोजन अपने प्रपर को कामना कर तथा को फिर मावी रेमन नपवे सहस्त्रों सांप सोने के पिर पेतना रस की मार म प गावी है।" सुमित कोई प्रतिमि की क्या म्याम्मा की गाए? यह महा सरस्वती का नमस्कार है। 'प्रतिदि' उसे कहते है जिसके प्रामे को कोई तिमि नही होती । वासना भ पाएगी इसको कौन बता सकता है ? इसलिए पर पतिमि है। प्रतिषि का विषेपण कोई। पर स्वामी मही बामठा कि मह पतिमि कौन है? बासना का सम्म भी प्रस्पष्ट होता है। कोई की मही साया है। पुपित' तो गासना का धर्म है। जब कोई 'सुमित पतिपि पावाण देताब पपर-पुट' प्रबर को गोपने ही सपते । प्रकार प्रबर बासना की प्रमिपंचना दिनकर मे साक पिम्प-योजना से की है। संपी के ये ही पंप पापुनित काम्म के सबसे उप पियर और कामायमी मम्मा सर्प के साथ हिन्दी का पाठक से भी बार-बार परता रहेपा । इन स्पर्मो मे मिकर वास्तष प्रविम्म स्थापित करने में एकत्रम सफम है। पीको विमकर मे जो काम्प-नाटकका सप दिया है उसकी इसके सिमा पार कई मौफिजम्माम्मा नहीं की पा सकती कि यह कानिरास का प्रभाव स्पष्ट ही माटक पटकविता प्रमुप समय माठ में नारकीय स्थम कम ही है। पपवार है तो पंचम प्रा यहाँ नाटकीयता प्रार है। समप्र नाटक में परिणका निमम भी नहीं के बराबर है। प्रथम दो मई का कार्य उस स्थिति का गुमासा कखा है ना वीर पर का प्रतिपाय है। इस प्टिस प्रपम दो प्रकों को मुध्यास मात्र हा पा सम्ता है। उपधी की मारमा तृतीय परमो माटकमही कविता ही।भी हमारी प्रसार यी पम्दों म-तृतीय पापि समापिस्प पिठ की देम है। पम मह-पुमाकर म वर्णन का निमित बनता है, मापा मुग्प सविका की वि गित परौनी रहती है, प्रसमा अनायास नियमित निसरणी की - संधी १२ मिस्प योगमा भौति रुप पोर पन्द को पजित करती रहती है और उस्सास मुखर कपि पर्दे के पीछे बैठा हुमा मूत्रमार की भाति पुतमियों को नबाता रहता है। कमि के ममोचमतले पत्यम्त निमृत कम म बेठे हए रिचार स्वयमेय स्पर पावे गाते हैं। उसी का तृतीय पक कमि के प्राणों को मेरकर उसका समप रस प्रारमसात् करफ निकली हुई काम्ममता का सर्वाधिक कमनीम कुसुम ई-पीन मारक पामका ।" उबंधी की मबभेष्ठ उपतमि तृतीय प्रफ है और तृतीय प्रफ की महिमा कविता की महिमा है। पवि कपिल का यह प्रकप यह न होता तो दिनकर * माम्य म ईर्ष्या करम का कोई कारण नहीं होता । तृतीम पफ का पन मी या मारमक है। सुबह हो गई है सभी पा-पितई धमित हो गए है. माम योत गया हैयह माम गिसे प्रेम में मत प्रेमी युगों ने गम-मारय पर्वस पर बिताया। यह उनकी एक रात- एकपप । पाठक पुररमा परि रबपी 5 साप तृतीर पक म एक कामहीम देश में पहुंच जाता है जिसके मायाम मोपय प्रेम मौर ची पौरिकता। हिन्दी कविता के पास का सौगय प्रेम पार पी गौरिकता के समबर का रस मेन का पह पहला अवसर मिप्ता है। उसी का पौधा क मुम्प पारा नही है। यह पारा एक वट है। उर्वपी का पिता एक प्रतिभाधानी कपि! कितु, उम्पी को पढ़कर ऐसा काई प्रमाण नही मिमता किए नाटकीय एिप पर भी उतना ही अधिकार रखता। धी म नाटक पर कविता एक दूसरे स तराते है। दूसरे पदों में रगी की कविता सजावट और रगीमी है। वह माटक का अपरिहार्य पा नहीं है। कहीं-कहीं प्रतिभा का प्रवर निस्फोट होता है सासकर विम्ब यागना में बही-कहीं नाटकीय कबिता भी कपि मम्मा लिस मया है। यहाँ तक कि प्रत्यन्त स्पूष तप्प मी बा करिता के माम्पम से कम पया से विएबमना-ग्मोविपी का पापा योग का वर्णन करना। म्यातिपके परिष्ठ तथ्यों को बिनकर ही मुफतवा म कविता में पचा परे है। किन्तु समय म में उर्वशी का नारकीय पिस मिपिम पौर विपक्स है। हमारी पप म यह दिनकर की प्रतिमा की सीमा है। ( रिमकर मृष्टि पौर दि २९६ ५ नाद, क्रिया और प्रतिक्रिया पुरुरवा : क्रिया दिनकर का पुरषा एक राण पोर पोर महीं है, कामो माग कपिपौर प्रेमी है। सिहासनासीन गि-साठ की परिकल्पना परिषम में सपपिर मे अपमे माटक रिचार द्वितीय में और रेलम ने अपनी पुस्तक 'एमटी पारस्ट' में की है।इम से मतियों को पाने से कवि-समार के सम्मान में हमें परिमी विचार-बारा का पता want परिषम की निधार-पाय यह मानठी कि एकही म्पतिय में कपि पौर सम्राट का समन्बय होना एक म्पतिकम। गिन पुणों के कारण यह पति पनि की मगीपा से संपन्न है, ने ही पुण उसके समाटो लिए बाप। इसके विपरीत भारत में परमे कामि पास में पपने 'विमोषधीय' में प्रौर पर रिनकर ने 'उघी में रिस पुरखा का निर्मास किया है। यह सिंहासनासीन एक प्रामोम्प पछि (रोकि यह कपि) का मिलापस न होकर, एष पोर पोर रापौर परिर मे कपि प्रतिमा रमसीय पप्पमन है। पुरण निर्माण में रिनकार को मरमत कमारक उपसम्पि मिसी। समारपीरार पोपाल और पीर के अनुप को दिनार भूमि के म्म में उपस्थित म्मिा पार से एपने मुख्य प्रतिपाय का सापक नहीं बनने विमा काम्य में रिमित किसी भी प्राट को रिपतीय को भी पापा का समय प्रात महा। मू और पास बटे का। रिलारपुरा में प्रतिमपुरवा की प्राति ही रमीन है । यह कपिलमय पीनी उनकी पपनी विपेपठा है। यह उसको गम्मपाव प्राति हैविषमय रपीनी म देखता है, सोपता । बामता है। पसका मन साराम की भापा का निमम पित्रापार है। मपनी रिपट पासना की ममा स्नान कराए बिना नाम वोकाईबीच रेस सस्ता पौर मकर भी माम मामुस र सम्वारे । रसके पार पाकवि कीनार मम पृप्प नाव घ्यिा और प्रतिभिरा पर्यवेभरण पति है, पनियता पार साकार में मारने की पत्ति है। प्रकृति की को पी उसने एक बार बस मी हरेकभी फिर उसकी मौत सभानम नहीं हाती है । उग्गबम मों का बन, मान-मात कमल गुम पौर गारक उपा की ताती चांदनी को पुकार समुद्र का किनारा न मिए मम- कना, पमित की महर में पाटन क रनों का उगना, सितासित नभ म रजनी का पाना-बाना, पामर विफल तर की राप्ती पर मिप्तहरियों का उपमना पत्नों में विपकर काम का बोलना गमियों को मरोगकरना का वारस पति महमा पुष्प कम-मरिर बस्नरी में बिने हुए म बम का स्रोत मबन धापा मामम मम पार पीतप्त पवन पुरुरवा को पमहसपा म सब याप पाते हैं। विस्व को रसमें एसी प्रदः पठिहै कि महारानी प्रौपीनरी को मा माइन-विहार के लिए पावे समर को सपार यह परवा है उसम पसमियत को भाई उत्तम कर दवा और प्रपन सम्मका ऐसा प्रनारपासी काम करता है कि सभासर पिस्सित य पाते। मौर्य की इतनी विराट कल्पना को बही प्राध कर सकता है निमका मन करिता की सात हो पौर जिसका गरिमामय बीवन पापा का मर्म एक माकाम हा तथा मिसको पारमा सिर से पादार हो। यही पुरा है, यह मक्ति को मामा प्रकारका पहरे, मामा पनियों से पराम्तहा। पत निरनप ही एक पर्ष में पुरुरवा का सम्पूर्ण पूर्व उन्मों का गीवन उपो से मिलने की तयारी या है। या ठीक ही अपने नाम की सापवा सिर करता है, रस्तुर तक गाने गाता रप करता है फिर भी अपनी पारमा की वास्तविक पुष्पर को ठीक-ठीक मामूम नहीं कर पाता है। बागपती बार ममी को लता तब उसका मन सारे मेप से उसके प्रम म एष गाता है। उसपी यह समुहहो पापकर यानी की तय व रावा- पिनु, पार पापा पनामी पापी मठवासी है मुक पेरर नही हो पर मूवन हरिखामी ।" उमा गीवन की सबसे प्रबार काममा बैंस उमकी प्रकृति, भरत परस्य पौर विम सिम उसको स्मृति मरी , पपना मरिमा पोर पोखा सरत्तम उमरे पानन मादि परम पाट। म मन में पटन बाम पी १२ - उबंधी उपसम्भि पर सीमा प्रस्वक विचार पाये पोर चिपका ग्यके प्रेम से प्रपरिहास समाई पौर क्षण भर लिए पैसे वे उसी की पाक-पटुता की मोदि मे उद्भावित हो उठोपा पुररमा को अपने पितृत्व का पता बनता है तब यह प्रपनी पनुभूति पोर फापना की अनन्य साकारता (Concreetnes) मार पर गत देता है- 'पुत्र ! परे मैं पुत्रवान बोपित करो ममर में जोहो गई वहीं से मेरे निकट उसे पामे दो। पार मोस काप भवन का कहपौर जनों में तिमा भी पाहे सुपर्स भाकर से या माते है। ऐम 40 के नाम पर मपा सूर्य निकमा पुत्र प्राप्ति का सान भाग मनुपम उत्सम ।। पुष! परे कोई संभान रपो मरी मंगा का मतो इप से मनी मिकम-मिभिप्स पा जाता है।" पुन पाणु से पवा- पिनु नाम पर मामिम सर मार मकोये यह अनुप्त का नाही, पये का मुख बाइ-सम्मम है।" अपि भार बामे सच मे उसका पिपामित पारमय ही अपनी विकलता में मछपा। हिनी पिता मार ही कही पिता के माकुम पास्मस्य की ऐमी पमिम्पति मिनदी हो। इम पिने मारास की रपोवर की तय दिनकर का पुरवा भी बिनधण निर्माण है। कामिदाम मे विमोषीय के प्रथम मामे ही पुारबारे पराम का वर्णन यिा। बिमकर बस पयगम का मुग पन करते है। पुररवा का प्रेम गिती साहसिकता को चम्म नही पता। मार रा यो कमरों मौष का विस्तार हवा । मो पुपरवा में नही है। पुरा में पत विपी ग्रामता का कोई प्रोणिस्य नही है। कवि पारेप भीम रामता 1 म्यापार के पयतम पर कोई मामरस्प मही उपस्थित कर साबपी को सय इन बात की पिगपत है जिसका २ उधी १४१ माद श्मिा पौर प्रतिध्यिा मिमन सपना की मर्याद' गंवाकर ही सम्भव हो सका है। पुरमा बम इस भराम बैठा हा कि उसके मन का राह अमरपुर को भेव' उपग्री . मन का संतप्त कर दया और वह भूतल पर सय घमी पाएपी । पुरुरवा का यह एक छि उमन न तो कभी दूसर की बसुधा रहने को समप किया और कभी दूसरे क स्वाधीन मुकुट पर हाप पड़ाया बसक चारित्रिक तरूप का अवश्य पोतित करता है परन्तु इसम उसके नाम प्रेम का पौबिल नहीं सिर हा माठा। यह ठीक है कि इस मन्दिरका द्वार सदा मन्तपुर स तुमता है किन्तु 'भगाफ-सुमन' को रस कमियों की प्रत्पत्रा स टकार ता निकपनी ही पाहिये । सच तो यह है कि पुरुरा के पास उबसी इम उपासम्म का काई उत्तर मही है कि 'वही बम्प या मानमयी प्रणयी बाबमय म वित्री नहीं रिकम तर पर बड़ी पाती है। बाप कार्य-म्पापार स यह सामवस्म बार में भी पटित नही हुमा है। उबंधी वर प्रामु र पान पर स्वर्ग पमी जाती है तर पुरुरवा का पात्रोध इस मोमा तक नहीं पाता है कि उसकी रति की सिता का पौषिस्य सिरहा पाए। खपी कपन बान पर यह उपमायो उप्रेमापों की कमी तमा तामकिन वास्तविक ध्यिा में प्रत नहीं होता है। 'ममन मी स्पम्पम' का समाकर पर बयान की धमकी में कोई जान मही । पहाँ पाठक म यह नावना उसठी है कि क्या हो प्रन्या होगा कि पुरका सप मर ठाम निम्न पाहिन्न, उप प म बैठी प्रपनी ही निभा रमा गए सभासदों पर प्रमेपित प्रपनी ही 'कायरता की बाप उमा पनर श 'सम्पाठी' उम्र 'मृपा मोह माया' म फुरसत रिमा दता है। सर स बयान पर ता य सारी गावे रिनकर पम नही पाठी। पौर मयताकिदिन एक बाल पान की दृष्टि काई। पर पानी मी पाराई मनाते ही रिनार के विराट् विपन' स हमारा परिचप होन मयता है।हम कहकिकानिरास की तरह दिनकरा पुरा पाप कर्म परातल पर नहीं रखरखा है। दिनकर बम उसक पराम का मुख कसम करत है। इसलिए पुरया परिव में यह पमा नहीं पा पाठी,गो कामियाम पुररया है। रिमा, इसीलिए एमा ममता है कि रिनार का पुरमा मानिक मनुष्य कोहिमा का सब बड़ा प्रतीक है। पास के मनुप्प D. रमी उपम्पि पोरसीमा का कर्म पथ निस्तेज हो गया है। प्राण का ममुम्म चिवन में मम्मी-नाम्नी पाठरता है, पर कर्म में बह पाचित ही कमी मृत होता है। पान के मनुष्य का संपर्प प्रषिक पापंभिक पौर एफेमिक ही होता है। मेरा मरस्ट इसी कोटि का ममुप्प है। प्रेमपिमर का हममेट ऐसी ही परिकल्पना है। उपप्री पर पसी जाती है. तब पुरावा उपमापी पोर उत्प्रेक्षाओं की मी लगा देवा मेकिन वास्तविक थिमा में प्रवृत्त महीं होता है। कासिम का पुरवा पत कर भी सपाट् पौर पर भी ठप ही रिपसाया गया। निएकी सबस बाहो का सहारा विद्यापों को राक्षसों-दानी से मरने में पाहिए । परस्त, लिकर का पुरवा म्यास मेटर पमता है। हार रे । पानिक मनुष्य का भाग्य | पार ही क्या सकता है? पुरा हिन्दी का हेम। ऐसा बिजनको प्रत्यामिक ष्टि से सम्पन्न कमि ही रेस सकता है।हिली कविता के सहयाधिक बों के विहास में पुरवा बिमस निर्मास है। हिम्नी सविता नावों की परी' से मपि पुररमा को निकाय दिया जाए तो रह पैमरी प्रमाहौल हो गाएमो। या पुरवा पुम्पाधिक पुस्यास परममित की पार है और प्राणों में पड़ी उसकी उपसिया कसियों की है पोर मुहिगो परबर की। मयाचित् यह बीमनाय की परिकल्पना मनुस्म है मो मनसे मुहमार पौर परीर से । एक पा सके विपय में संपी ऐसी ही जाती भी है- 'स्मात् रियाये को भरती या महाऔर बाती है प्रमुरों यह बही सुरों है भी मनोड होता है।' या पुररमा का ही मुसळ मनुप्म है। प्रम में भीगा माता- 'पिरस सामुडा हित । पारो मुससत मनुष्य कोही रुप हया मानता है कि मारियों फारस करना मर गोवा हे मोर पिताटन म्मानिमय। सभी ना उससे बसपूर्वकरण की बात कहती है पुरानी पण्डिता काही समोण करवीण पुराने समय में पौर गप्प युग पत्र या प्यापार पता पा । पार का मनुप्प पुरानी मैतिता पर पाराम बड़ी समतापम को एकाापी पा पूणिमा कोपीय नी ममता 1 - उपधी १ माप भिया पौर प्रविध्यिा ७१ है। प्रार परि पम उसमें है वा बह प्रत्येक मास में समाहित है। कम से कम उसकी कामना यही है। धर्म की मापकता पाय इस बात में है कि यह और परावस पर मनुष्य + पाचरण का प्रमाणित करे। निकर का पुरजा उन क बरातम पर मनुष्य है कि मन पराप्त पर सम्पासी है। इति + प्रगाइ भगों म भी यह बा माता है। उसके लिए प्रेम शारीरिक दृष्टि मी है और रसायबाद भी । यह पार की सभ्यता की प्रमुख समस्या है । मन न मनुष्य को पूरा बना दिया है। मान के मरदेश म भावना की धारा मुख दी है। प्रम पोर गिप में मार बह तीवता मही पीपा कामिदाम के समय म पी। विज्ञान न इनका ठीपता बीन सी है। पहने का प्रारमी सीमा पार सरम हाता वा । यदि उम मुस्सा हवा पा तो प्रपन पड़ोसी काममा भी पर बिना शिषक कटीप दता पा पौर यदि प्रसमता होती पी वा मस्नियों उपमन मयप्ठा पा । किम माग की सभ्यता प्रपिक मस्तिप्ट हो गई। स प्यार में पस पर पत पितका बड़ा यता है, उसी प्रकार पार + मनुष्य पर कई परत भावना की पर पहै। यह पता ममाना कठिन हो यया है कि उसकी वास्तविक परत कोन है। भावना की अपक्षा बह धिस पकि बालित होता है। परि उमे काई बड़ी प्रसमता होती है तो इस र म कि पड़ोसी गान गाए, यह उन माम मक मेता है पोर पर किसी प्रापरस से रस कोई ठेस पहुंचती है तो वह उस इस भय स माहिर नहीं होमे रता है कि कही प्रविणाम मेने मन मापा हा बाए । प्रठ प्रम पार पूणा बिए और मिशन को तीव्रता उसमे पर पहसे मौन पी। उसकी हर पनुभूति जमी हुई है। डिर, मिशन में भी उसकी प्रमुभूति को वीरता धीन भी है। प्राय का मनुष्य विमो भी दर पपनी प्रिया स एया पसाचार कर सकता है टेसोपान पर पाठर सकता है। फोटो का मान-प्रदान यह पत्रोकाय कर सकता है। रसका विय विमा वीर हो ही महो सकता कि कामिराम कपियी यम की पप मेप स पपनी पपा निवेखि कर। पतः पार मनुष्य की भावना वोर मही पगई नहा रमकी पपा प्रखर होती है प्रम गाम । न तो उसका मिमन उत्सुजाता पिए का बहाहा पया है शानो गोर । धर्मगर भारती ने अपनी रिता 'नपा रस में प्रानिक मनुष्य की इसी म्पपा का पिमण किया है-
उर्वशी उपसमि और सीमा
प्रमा
इस नमे रस को क्या करते हैं?
जिसमे मजार की मासहि मही
जिसम निकी पिरतिमही
बिमम बाहों के
फूमो बैस वपन के
पाकुम परिरम्मण की यात्री तग्मयता के पण म भी
ध्यान कही पौर पमा गाता है
तन पिफ फूलो की पाग पिया करता है
पर मम मकई प्रम-विध उमर पाते।
गुमन पार्मिपन का जादू
मन को मे उपरी पर से पार पाता है।'
पुररपा का निर्माण इसी बिन्दु पर हुपा है। मिझम उसमें प्रारम्भ से
से ही है। उबंधी से यह प्रेम करता है पर उमे प्रात करने लिए नामा
नहीं सकता है। कर्म उसकी कोई विपता नहीं है। मपमापन परत पर
मपुपामिनी मनाने पाठा है तो प्रौशीनरी को सार पनपूर्ण भेगता है।
तृतीय पा में प्रमासि घणों म भी यह मन के बगतम पर बसी मंग
नहीं पाता । नारी में परप की अपेक्षा प्रषिक सहल शान होता है। पी
मह भांप जाती है यह मुभमार कहती है--
उन स मुभगो से हुए प्रपन प्राधिगन म
मम म न्नुि विपएण र तुम मा गमे गाठे हा?
परसाकर पीप प्रमा प्रायों से प्रामों में
मुझे रात हुए कहा तुम गाकर सो गाते हो?
कमी-कभी सगवारे तुमस गा प भी पाती।
प्रापय उमा नही पम बस मेरे मुमते हो।
बास्तविक पुरमा यही है। मगर उपर से गा भोग म सा हमारे
पर भीतर से बह विपाए ।समी गाने पर चिनी पार पापपनी
सात पीतषप पर्मबीर भारती।
बपी "
माद भिया मोर प्रतिषिया
अन्तरारमा की पुकार का दवा दुका है। नोम रसका मेप नहरे है। का
प्रायु प्रावापौर बी सी जाती है, तामण पर सिए उसमें उगम
होता है पर पुम' पर प्रतिस्प हो सम्पास मार पस देता है। यह संन्यास
दिनकर को विसषण फताना याचना है। मामाम्प बोहन का इसम पश्चा
पबमर सही नहीं सकता। उसका म पब तक चिन्तन का पापर नहीं
बन सका पा। कवि प्रहति की यही विपपता होती ही है। उसक
मोगमय मुराप पीबन म उसकी प्रातरिफ पकि घोपण का यह कम
पनवरत पमता पमा पा रहा था। पम्तरतम इदन को यह मुनकर भी
मनमुमी कर बता पा-
इम हिक सिडियों, कीत्तिा कपन पावरण में
भीतर ही भीतर, विपएण में कितना रित रहा!
प्रन्तरतम वन, प्रभार भी पम्पक गिरा को
कितनी बार पण पर भी मैंने महों मुमा है।"
मा मन्यास पमायन नही है। यह सम्पास बाम मही है। या तो प्रात्री
जन पर काम करने बाद मनर का मदिम पर पापकर बाम उतार कर
रखना है। इस सम्पास का मुह ममृत हाता है । पुररणा सर परकी
स्यास्यानों परता है-
विन मर मुटा प्रकार विनावमुनी साप पान पर
पारी रपिम समट न क पार उतर बात है
बैठ किसी एकांत प्रति नियम नारा परी म
अपना प्रम्ठमगन त म नामित करम को
मों में ही क्यों एका पता पम्पा पपन में'
मय मूर्य को भिविन पोर पर मन म पान दी।
पार मया मरा मत किग्ण समर प्रमर म
मामक पार विचम में कहीं उतर गाम का।"
पुरा का यह सन्यास उसके बावनी पनिकाय परिणति है। प्राति
पर पति से मूम्म पुडया मवी है । पुररणा का भी माग का मूस्य रेमा ही
, उबपी R
७४ सर्वधी । उपनाभि पर सीमा पा । सम्पास दो प्रोम 7 मूम्प ही है। इसलिए पुपरवा पंत म अपनी पारमा भी पार मुनता है, प्रारम बता की भाषा के प्रहारे । तर यह सम देता है। कामिदाप्त के विमोबपीमम्' म मा पहा म उठतो ई पनी ही पागाव की प्रतिप्पनि मुनता है। रिनार में हमारमनवता की प्राशय बम पाती है । रिनार की इस कारीपरी की विसनपवा पद्मा है । पुरमा का यह सम्मार रिकर की मारमा पाइन नी । लिकर प्रम को, मारी प्रेम को सिर तक पाने का माम्मम मामटे है। प्रेम मनमवार से पर उसकी प्रतिम परिणतिस्प से प्रम्प की पोर होती है। यही भाकर सौर पौर भवमान एक ही बन पाते। ऐसी स्थिति में नारी कामिमी नहीं होकर परम मिभा की पापा बन पाती है। पुरवा पा पतिम रिपात कामाप्यारम को पार है। दिनकर ने मारी सौम्य को सपाला काही प्रचार बना दिया है। प्रेम यहाँ कामना नहीं प्रापमा पर निरिम्पायन है- 'परमेमा सर्म उसी को फिर मे पाएगा! अपना अपन मामय के समानी पनों पर पापसीम गपन परेवा मब के महापबम में यहाँ बिया कामिनी मही चापा है परम मिमा की जहाँ प्रेम कामना नही प्रार्थना मिरिष्मासन है?' पुरारमा दिनहर की बिममस प्रतिमा का कीर्ति-स्तम्भ है। हिन्दी नापों की परम्परा मुबोध पौर विशाल है। बसपा के पृमीपन से मेकर प्रमादरी के मनु र यो एक पट गवमा र पाखी है यह परपन्त मम्म है। उसी तता की नबोनतम की पुरा है-मीनतम किन्तु पोतिर्मम । प्रसार यो का मनु पापिम मनुष्य के प्रषिक निकर।। माधुनिक मनुष्य की भी सबके मकिस में मोहाकी है। पुराया पूर्वपया पापुनिक मनुप्म है। पमपिपर में हममेर में और मेरे अपने पारस्ट में इस पानिक मनुष्य का स्पंन किया है। हिन्दी नायक-नामिकों री परम्परा में पुरुरवा की म्पोनि मगर हैमानिस मान-पोष का पूण प्रतिनिधि है। पातोपा मोहिपी सो नहीं होता किम्नु मेरा अनुमान है कि जिस प्रकार मनी में हमनेर विपया एक साहित्य ही पार हा या है उसी प्रकार दिनी गुमरवा पिपया साहित्य का निर्माण कासावर मापा। । १ बमो १५१ नाद मिा पौर प्रतिश्मिा सहिम एक बात तब समझ में नहीं पाती है। इन र यतिम का निर्माण र भी कमि ने पुस्मा का नामकरण उवमी क्या किया ? क्या मापिस प्रमान माम हमारे गुग की विधपता हो गई है ? कामायनी' 'पोपरा' पोर 'नुप्रिया' --क्या य नाम मास्मिक या एक प्रति को मूषना रते हैं। हमारी राय में यदि पुस्तक का माम पुरुरवा होता तो प्रषिक पाहावा । प्रौशीनरी प्रतिक्रिया पोपीनरी कपिपमों में कोलाम के बीच मुष्ता की परुप रेला मी है। यही उसकी सीमा भी है मही मामम्म भी। पर परम्परा-मुक माखीय मारी का प्रतिनिपिलाता है पपमी प्रपप समता प्रियतमक परयों में समपित कर भी सास दाम्पत्य का उपमाम इसलिए नहीं कर पाठी कि उसम पृहस्प के चातुप का प्रभाव हाता है। पोनीनरी के राम्मल नीवन की सफलता का कारण यह है कि यह अपने कामिनी-सी महता समन नहीं पाती है। भार्या को कसा में मामिम है । उस प्रारम्भ में यह गात समझ में नही पाती है कि उबमीन नि कारणों, पुरवा को गीत निपा । पुररबा ऐसा नर नही है जो माँ ही किसी पम्प मारी की पोर पापित हा जाए । मानपट नहीं है। उसका पारित्रिक तर्प परेप है। फिर भी पहिया प्रोमोमरीकी उपेक्षा कर उसपी की पार पापित हातावा रसका कोई प्रबस कारण होना ही पाहिए । अमरचि पुरुरवा की कोई रिपेपता मोहै। मन पराम्पत्य के निर्माह के लिए पपप समपम ही पर्यात मी है प पातुम मी पाहिए। गीन बीन की नी एक कमा होती है। पुरुप पोर मारी की प्राति एक नहीं होती है । पुस्प देर प्रमान गोष हाता है। नारी ममता प्रधान प्राणी दोपी है। पुरप म पम्नि का मार अधिक होता है। वारपार प्रपन समन में पर कोही रागमना पाहता है। सताप उसकी प्रानि नहीं । सबों समान शान पर या मारी की पापा चाहता है। यह निममत निरम जीर हावा । उस रिस भौवरी मात मे पोप का प्रसार करना है रसी सपणन की निगरसी भी निकलती है। रोग एवं पराम्म पी प्रणि पार स्निापता एवं माता का पीयूप रोगों पाएं एक ो पपन से फूटती है। पुरुप रितना प्रतापी हाता है, उसमें पता भी रखनी ही । - उबंधी उपलबिपौर सौमा - प्रबर होती है। पुरुप भण-बीवी प्राणी है । क्षण में ही उफन पाता है, मण म ही पिषत पाता है। सफम दाम्पत्य - मिर के लिए पुरुप की यह प्राति सममना प्राणायक है। जीवन की सफाई में पीतवे जो सभी पार-पेंच मानते हैं। वो केवल बोर है, मगाई की कला मही पामते में हार जाते है। प्रोसीनरी के दाम्पत्य की प्रसफमता उसी के पक्तिस्व में समिदिव। उसके पकिरय में देगस्मिता नही ।महसप करना भी मही पास्टी है पपने सार प्राप्य को वापस माने के लिए उपाय महों सोचती है। यह मिरास होडर मृत्यु काही कामना करती है- मागीवन के साथ रहये? वो अब क्या करमा? पीवे गी यह मरण मेनने से प्रथा मरना है। मबनिका पौधीनरी को पुरुप के निसर्य का संकेत करती है। पुरुप की प्रकृति का प्रत्यन्त ही सय मिसेपण गायों करती है- 'नमी सिदि हित मित्य नया सपप पावा नया पाव भय जय मिश्य तुम इर्प पाहता है गर । कर स्पर्म सर, सपन मसमम नर को नाता है, बार जिसको पी म सका यह बम भर को भाता है। पौषा में भूमते कुसुम पर प्रीति मही जमती है यो पद पर पर मई पादमी यह फीकी मपठी है।' पुष्प का प्रेम पपरिचित पपरी का रोमांस पसम्म करता है। पुष्प का पकिरण रोमाम के प्राम्तरिक पुलर स्पर्म से उसमय रहा है। रोमारिक म्पति को एक दुबमवा या होती है कि उसमें मेरा का पभाष पता है। उसका पित पषस यता है । साम दाम्पत्य के लिए मारी को पुष्प की प्रावि को ठीक से सममना होता है पोर तदनुकूम अपने पापरण को प्रमियागिरमा पड़ता है। ऐसी बात होनी है कि प्रौपीनरी यह बात एकम समनी म हो। कुपवो भी ममम्ती ही है। स्नुि पीरम की सबस को देगी तो - १पा २ २ वही ।
माद ध्यिा और प्रतिक्रिया
यही होती है कि पाश्मी सममकर मी नहा ममन पाता है। प्रौपीनरी
कालीt-~
गहिसी पाती हार सब नम्पूण ममपण कर
सचिनी रहती बनी प्रप्यारा मसक पुस्प म भरक।
पर, या गान ससफ बगामा नर में गरणी मारी ?
गीत गयी अप्सरा सबी रानी बनकर हारी।"
पोपीनरी टोकी रानी रनकर ही पनोपन कारण ही हार गरी ।
प्रपन प्रमर की प्रप्सरा को उसन भी उनग्न नहा रिया । मानिया
पोपोनरी मरतमाती है कि भारतात पुप नारी का सस्पत पाहता
है।निपुणिका समेत म पापोनरी का यह याद दिलाती है कि महाराज
मापारण नर ना पप्परा सहन हो उन्हें मोहना सकती है।
'महारास पी क्या कोई पुरत नर माधारण है
जिसका पित प्रप्सराएं कर मस्ती मार हरण?
कार्तिकेय सम पूर खदारों के गुरु सम सानो
रवि-मन वेबन्त मुरपति + माम प्रतापी मानी
पनर-साए संपही मोमबत मुक्त, मसर मिन स्यामी
मुम-माप मपुमा मनास मुमायुप-से पनुरागी ।
ऐम मर + लिए नपामा स्या पुछ कर सकती है?
कौन बस्नु है मिस मही परणों पर पर मानी है?
पर पोपीनरी पपनी नूस मुमर नहीं पाती है। वह निपुरिणा का
यह उपर देवो है-
'परो कौन प रिम में प्रबठाकर म सका।
कौन पुप्प है मिम प्रणय-री पर पर न सकी है?
पोपीनरी या नहीं जानती है कि पठि भी अपनी पत्नी म दुध मारवा
है।परमले पनि का करम प्रापार' ममती रमापरी नहीं मार
मनुपरी बन कर पाती है । पपने परिकार को ग प गंगा रती है-
१ वापी १
२दी ५
उर्वशी उपमणि पौर सीमा
'पति के सिवा पोपिता को कोई प्राचार नहीं है।
पठि यहाँ केवम पत्नी का मापार बन पाता है. यहाँ नारी का कामिनी
स्प पिप जाता है। तब उस मारी के प्रासुमों को से बोया जा सकेगा।
प्रोमोनरी प्रपनी सीमा तय समझ सकी पर समझने का कोई मतमय
नहीं रहा । मौनीनरी पुरुरवा को यह भावमय पाहार नहीं पायी जिसकी
उसे नितान्त प्रायस्पस्ता बी-
'हाय सती ! मैं ही कवर्य दोपी मनुवार पस।
केबम सुभ कामना मंगभैपा से क्या होता है?
में ही रे पापी न भाषमय बह पाहार पुरुप को
जिसकी में पपार मुमा उतनी पावसकता पी।
सिर बुनती हईपा कहती है-
गीत मी ये पो महरों पर मचम-मपम चमती पी
उप समाती पी सुपी भूप में मनों भरे गम में
हारी में इसलिए कि मेरे दीदा-विकम जों में
पुमी पुप की प्रभा किरण कोताहम की माती पी।'
मापीनी के ठीक विपरीत सुभम्पा को पुरप की प्रकृति का मुम्म शाम
है । पुरुप प्रपन ही मन की दरग से हार पाता है। बाहर के सत्र में से
कारा नही होता है। पराग्ति होता है पपने ही प्रस्तर में
प्रहम मनु । मुकम्मा मौसीनरी को कहती है-
पर + पोहए पास से पुरुप नहीं परवा ।
मा. पाय ही काट फावा उसे पाहु के बन ।
पर, फेस पाता पभी पीर पपनी मिमित उममम म
निच मापन की ठर रसको राह नहीं मिमवी है।"
इसीलिए स्प मार्गका रामित्व पुस । उठे क्षणभरण सोप्ट
पना । पुस्प की पारमा में उठने यामी पीड़ा की प्रत्येक ठरम का उस
१ खपी ३६
२ नही ११.
पही १५५
मार त्रिमा मौर प्रतिक्रिया मौसी शान होना चाहिए । हर पाष पर उसे ममहम मगाना है । मुकन्या मरी को कहती है- 'इसीलिए, गायिस्व गहन दुस्तर हस्प नारी का । षण-पण समम प्रनिद्रष्टि दाना उस होता है प्रमी कहाँ है पपा ? समर से मोटे हुए पुरुप को कहां कमी है प्यास प्रारण में काट कहाँ शुभ है।' दिनकर पौधीनरी के दाम्पत्य की ममममता का प्रा पिपमपण किया है। उन्होने परम्परामुक्त सम से भारतीय नारी के साप महानुभूति प्रकट कर पाक की भावना को एक्सप्माइट नही किया है। यही काम--- एक्सप्माइटेपन-गुख भी ने पामरा मे भिया है । गुम भी मे वो केवल भारतीय नारी के करण रूप का चित्रण किया है। प्राचप्त के पूष को पादों का बारा पानी फार गमता है, यह तो ठीक है । किन्तु, कम से कारण है निसस इस देश के हट्टे-कटटे नगर मसमय ही सम्पास प्रहण करते रहे पुरानी इसका जिमेपस्य मकर सके । यह शानिक रष्टि उम पास नहीं है। यह काम काचित् पहली बार हिम्पी फपिता में दिनकर न किया है। प्रोसीनरी हिन्दी कविता का प्रासा देषिक पात्र है। मुमरी की महापरा ट्रपिक पात्र मही बन सकी है। यह बात दूसरी है कि उसका बीवन दृविक है । पाप की परामय स यो नाटक समास होता है वह मुखात होता है । पुएप की परामय दगी को पन्म दती है। ट्रेणिक पात्र की विधपता यह होती है कि पापमो यह मसा होता है, दुरा काम ना करना नहीं पाता। पर उसके परिप में कुछ ऐसे होप होवे । यो मवत' म पतन का कारण बनत है । हम उस समय यही कहते है कि यह पारमी या भम्पा वा परा उममें यह मुटि म यती। ट्रैनिक पात्र कही-कही एकापी होता है । रसम पारमविपण की भक्ति मही पदी है। पौधोनरी की दूसरी रसके परिष से यामी है। पर अपनी बुटियों का परिमार्जन नही कर पाती । प्रत में पहवापपता कर ह बाती है- १बपी १५१
७८
नर्यपी उपसम्मि और सोमा
पति के सिमा पोपिता को कोई प्रापार नहीं है।"
पति जहाँ कबम पत्नी का पाभार बन पाता हो मारी का कामिनी
म चिप पाता है। उप उस नारी के प्रामुमों को से मोया या सफेगा ।
प्रोसीनरी अपनी सीमा तब समझ सकी पब समझने का कोई मतमा
नहीं रहा । मोमीनरी पुरषा को यह भावमय पाहार नही रे पायी जिसकी
से भिवात पावस्यकता पी-
हाय सती | मैं ही कार्य दोपी अनुरार पण
केवम मुभ कामना मनपा से क्या होता है?
में दे पायी म भाषमय पह माहार पुष्प को
जिसकी उन्हें पपार क्षुषा उतनी मागायक की।'
सिर पुनती हुई बह काठी है-
'बीत गपी पो सहरो पर मरम-मपम । नवी पी
उस सस्ती पी मुमी भूप में मों मरे पवन में
हारी में इसलिए कि मेरे पीमा बिकम यों में
नुमी धूप की प्रभा किरण कोमाहम की गाठी पी।'
पोपीनरी के ठीक विपरीत मुहम्मा को पुरुप की प्रकृति का सम्म शान
है। पुस्प प्रपन ही मन की तरय छ हार जाता है। गार + अ से उसे
कोई बतरा नहीं होता।मह परापित होवा है मपने ही प्रम्पवर मैं
प्रभात शनु से । मुकन्या प्रोमीनरी को कहती है-
पर पर हुए पाए से पुरप नहीं गरा
मा भवाय ही काट फाता उसे बाग से
पर स पाता पमी वीर अपनी मिमिव उप्तम में
निकम भागने की तब उसको यह नहीं मिलती है।
इसीलिए पास्थ मारी का गयित्व पर है। उसे पणमस सरेप्ट
बना है। पुष्प की पारमा म रख्ने बासी पौड़ा की प्रस्पेक कप का से
१चर्यधीस
२ वही ११.
४ ही ११
मार प्रिया और प्रतिक्रिया साल होना चाहिए।र पाय पर उसे ममाम मराना है । मुमा मोपी नरीको कहती है- 'सीलिए वापिस्व यहन दुस्वर गास्प नारी का। भश-पस सग पनिा-प्टि पेपना उस हवा है पनी कहा है म्ममा १ समर से मोटे हए पुस्प को काही नमी हैप्पास प्रारण म कटि मा भ है?' दिनभर म पापीनरी के दाम्पत्म की माफमता का अन्धा मिसपरण पिमा है। मोने परम्परामुकम से भारतीय मारी के साथ सहानुभूति प्रकट कर पाक की भावना को 'एक्सप्साइट नहीं किया है। यही काम- एक्सप्माइरेपन गुप्त बी ने सपोषरा म किया है। मुठ पी में तो पान भारतीय मारी कम्य मा यिा है। प्रषित दर को पारों का बारा पामी फार गमता है, मानो ठीकtif, वे कौन से कारण। जिससे इस देश के स्टेबटटे मग्युबक पसमय ही सन्यास पण करते मुखगी इसका विामपण न कर सके। यह जानकारि उन पास नहीं है। यह काम समापिद पहली बार हिन्दी कविता मे दिलकर मा पौधीनरी हिन्दी कविता का प्रहमा दृषिक पाग है। पुधरी की समोधरा ट्रषिक पात्र नहीं बन सकी है। यह बात दूसरी है कि रखा जीवन गिरे। पाप की परागस स ग माटा समाठ होता है, यह मुबात होता है। पुरम को पराय दयरी का जन्म देती है। इंगिक पारी विषपता यह हावी है कि पारमी वह मक्षा एता है, मुरा काम यह करना नही चाहता है। पर, उस परिव में कुप ऐसे पोप होवे। मो पंत उसके पतन का कारण बनते हैं। हम उस समय यही कहत है कि यह पादमी गगा पन्या पा रा उमर्म या टिन यदी। दैनिक पाचहीही एकामी होता है। उसमें मारमपिम्मपण की पठिनही गती है। मोमीनरी की ग्यटी उमरेरित म मममी है। यह पपनी चुटियों का परिमार्जन महो कर पाठी। प्रत प्रश्ना-पापना कर पाती है- १ उर्पयो १५१ उबपी रुपमा म्प पौरपीमा पताती हाय रक पावरण प्रापीका का प्यनित होने रिया नहीं क्यों मैंने रम प्रमाको जो केवल प्रमरा मही मुझमें भी दिपी हुई पी" यही तो उसकगीवन भी देगी । पौपीनरी पुरुरवा की ही तप्प हिम्पी कविता कतिहास का एकाम नया प्रम्माय है। दिनकर पर मममने मय गए है कि दुनिया के कर में गोस्नु बुना गाता है. यह बम ताना पौर भरनी नही है। जीवन की सभी रेणाएं त्रु मही होती है। पुण्य की सरा विजय ही नही होती है तथा पाप हमेमा हावा ही नही है। पायक महीं कि पुण की पूजा ही की गाय और पाप को पति दी रिमा गाय । पोरीगरी कषि की इसी सिमाम जीवन-धि की अक्षि अनमी है-- कबिन पोपीनरी पारसस्प का विषण र उसको पास्मा की हाहाकार कोही प्रकारान्तर में बनाया है। पपमे वपठे हुए मामन में मापु में यह तुमसी पोपा ही मयावी है। प्रामापकों में इस बात पर विपिपिता की है कि पुरराम से हट गान पर प्रोपोमरी को साना और उसे स्वमा स्थान ला गावक रपित है। परिकाप मामापकों न इस पनौचित्य पर ही प्रकार रामा है। किन्तु, पोपीनरी की ट्रेनरी बासी बात पर ध्यान रातो पाप रकार पान पर है। दिनार की पीपीनी हमारे पारिवारिक गारम की ट्रगती का प्राध्यान मही उमकी मोहिस्सा है। यही उसकी रिपता। उर्वशी नाद थी हवारी प्रसार हिरो पनुसार परिए पमित विपर मी है-माम मामम बम । ' सम्पूर्स रूपकको स्पष्ट करते ए पे मिपठे है- 'मी मार 41 प्रतिनिपित करती है पुरषा च्यिा पोर पोपीनरी पतिश्मिा का। माद का ही पापप पास्त्रीय नाप 'मा' । मृष्टि के पूर्ण झा के मन म एकोहम् म्यामि' ही काममा हुई थी। यही काम सपी बसी का प्रतीक है। या तो मृष्टि की प्राणपाराही है । रसीके सबषम पुरुरवा कहता है- १ सपी ११ २ मिकर मृपि पोर रि २१५ ।
माष क्रिया पार प्रतिक्रिया पुरवा करता है- जब से तुम पायी पृथ्वी कुछ अधिक मुरित मगती है ऐन समझते है, उनके प्राणों में गो पारा है बहती है पहले से यह कुछ प्रषिक रमवती होकर जब से तुम पायी मरती पर फूस प्रषिक हिलते हैं पौड़ दो कुछ नयी वीठि सी पीतल हरिमामी म।" पुस्प के मन में बसने पानी इमो नारी को युम ने एनिमा' की सभा की है। या वा कम्पमा किसोरी है जो प्रत्येक पुरुप करती है। . हाय में मिवान रूप-चित्रण उसपी का सवित्रण अत्यन्त ही बारीक कविता का उदाहरण है पौर यहाँ कषि की सरस्वती अपने प्रकर्प माग रामती है। मह स्प वर्णन निमस पार और निप्प है। याचित् स म पपिता का समा मेम करकवि मे उस कामामात्म को मिडकरने का माध्यम बनाया है। पीके पपिपस में ऐम विपण माए गए हैं जिनसे बासना की तीखी पच नहीं निकलती है। कविता म विषेपण (साप ही गिम भी) कपि ममोरन के माम्पतरिक पस्यों के उद्पाटम का पावन होते है। बिपों का पुनर कवि प्रनमान रूप से करता है और उन विधपणों से कषि की प्रकृति का उद्घाटन होता है। पिरोपण कवि-प्रतिभा के निर्य है। इस टिप दिनकर को परन्त ममता मिमी है। उसपी सका पारस्प मह विराट प्रकृति में है। प्रकृति म मो मी रमणीय है, मारक है, साप ही मिनुप पौर सधसभी के स स मारम्प के मोम्म है । पूल मृपि र स सुकुमार पौर निष्णमुप उपकरण ? पपिता की मेरे सम्मभूमि है। दिनार रवधी मका सारस्प-नारी स का सारस्य पपिकवर पन में ही पाते हैं। नृवीय अंक मारते है- 'इम पोमों की मनाई रेप हो पौर अपरों की मी या पु-मी सी-समी मी? १ बमी ७५ २ विमा रियरस कमिए मारमा पर पामा परिमोर पिए।
उर्वशी उपमाग्धि मौर सीमा पोर पक-यष्टि-सी या देह एव पुप्मामरस से ससस की प्रतिमा कला सम-सांचे में जमी सी?' अवश्य ही यह उबधी का सप पिमण नही एक मामाम्प कपन है, किसी भी स्पसी मारी के मम्मम्प में सभी स्पसीमारियों सम्बम्ब में। पर प्यान देने की पीर है, कवितकी स्वता । पासी पक्ति में कोई भी उपमा मही रीमई है फिर भी पंक्ति प्रती है। सब तो यह है कि कवि उपमा रता ही क्या उसका मन कही ताप नही पा सका। कोई भी मामी मारी के कपोनों की नामी में होड़ नही म मकती है।मारी के पोनो पर धामगामी वर्मक के हरय पर भी छा गाती है और मन अनुराग के म एबम ममता है। प्रतः कवि कितनी ढिठाई से पूमता है की मनाई देखते हो ? फिर पपरों के कमारों में बहन बाली ईसी Tr पौर नही की कमी सी बप है। यहाँ कुन पर नी की कमी की उगवसता ही अभिप्रत नही है। म्पषित यह मी होता है किसी निरामयम है निमतुष है हसी कुम्द मी बुही की कमी सी पर रेह पपक की मष्टि सी ~~-पीताम काम । पर पुप्मा का मामरण पुन पौवन का विस्म । यहाँ बसप' कितना मजा है ! पुष्म-वियों की पावना म एक विलक्षण मारकता तो उत्तम की ही है साप हा निष्पमुप पाबमता भी नही से बनमी है । पुष्प-बिम्बो र प्रतिरिक्त और किसी भी तय पामर मा उप मम्मि समब महीं है। उबंधी का स्म-विमरण रक्ष-कोटि की प्रतिभा की देन है और सपूर्ण उर्वशी मे बिनकर ऐस स्थलों पर प्रभिष्यमनाकी साम प्रमित कर सके है। माधुनिक काम्य में सभी प्टियों स उसकी तुममा वन पाप पर्यनसकी पा सकती है। ही तन्मयता नही परिणता नही करमपाहीनता। पुरुषा सर्वपीका दसकर विस्मृति के रिस सुधा सिंधु में रख पाता उसका बरर्पन भापा का बमवार है- पौर व सासा नपाने, प्यान दो पाता का पर। १ खग्री १२ २. वही १२ माद श्मिा पौर प्रतिश्मिा समागम के खम्मम क्षणों म पर सभी रोष तोपकर पुष्प का पार अगता है तब पुरप का माम मा सो पाता है? क्या किसी प्रग विक्षेप में क्या प्रोमा नप में ? या फिम पटाप में ' या मोहर उरोगो में ? या मुर्मभीर मामी म? या प्रमणाम पोमों पर ? या प्रम के पार ? कौन बतमा सम्वा है ? इस मनोभूमि को न माने पान पो गामा कहाँ पर । कितनी सफाई सम्पत करता है। फिर, यहाँ प्राम पापक मित्र भी नही है। पुस्या प्रश्न पूषवा ही नहीं है। प्राम पर पूषा जाता है या कोई रचर मी हो । यहाँ उत्तर की अपेक्षा भी नहीं । एक विम्मय है, प्रसन्न विस्मय । माये की पषितया है- समा 'सरप ही रहना नहीं यह शान तुम कविता कुसुम मा कामिनी हो। पुस्रणा उस मम स्पिति में पहुंच गया है यहां मारीत्व कई मायाम एक साप महमूस हाव।नारी म पानम्द की परत अनेक हैपौर प्रत्येक परत का अपना रस है। एक स्पिति यह हाती है जब नारी पुरप का उपासमा की पीर बीवी है । म पुष्प मारी का भूमा की आप सिडि का पर्याय मानता है । यह कविता साचित् प्रार्थना की कविता' का बापट है। इमस पास कवि मिस युग-युवती मारी नहीं प्रार्थना की कोई कविता 'सी प्रकार नारी का सुम' समन्ना पामर की दूसरी परत है । गमाटिक प्रम नारी को करस बमे की वस्तु समझता है। मुम' पाशुप प्रत्यक्षीकरण का सर्वोत्तम उपकरण । पुन रोमाटिक प्रम की निप्पमुपता भी कुसुम से ही मित्र होती है। किन्तु, नारी को कुमुम समझना पर मम स्मिति है पाप्रम की परम परिणति है। मारी म्प की परम यमा है रमाकामिमी बाना स्प। प्रम र परीर के पराम पर उतरता ग्म मावा तर सिट होती है। यही प्रानन्द की तीसरी परत है। दिनार ममी परत पर पपमा परण रख सके हैं इसम में राय नहीं है। रे एकापी ता नहीं है, फिर भी अभिपना निप्पाप है। गुमरा को सम्मयता निस्मीम है। पर उग्रीमय हो गया है। यह १ उबपी उबंधी उपममि पर सीमा भारती की ग्योति को मुग में समटे मैं तुम्हारी पोर अपमक देवता एकता मम से म के उपम पयम फा मेर पुनता है।" चर्मपी की स्पून रेह को कपि न मारती की म्योति' बना दिया है। ममापम रेषणों में पुरुष की बाहों में मार सिपर सिम पान मासी तम्बगी स्पप्ती पौर प्रारती के समय भी हुई वहाँ के बमय म पूरा की म्याति म पो विपरीत स्पिदियो का या कितना मुम्म समीकरण है। फिर, पुष्प का एकान्त मम से अपतक निहारना मनमोम है। एकान्त मन' ऐसा मन बहो उस समय केबस यही पारती की म्योति बम बी है और सुध नहीमह एकान्त मन' बम एक ही बिपिपिस्या में उसभा है कि ऐसा म कहा से पाया ? फिर पुरुरवा अपनी जांच-परतान में पास चर्मण को सूंघता है, पाता है मास में सौरभ' । सांस मे सुरभि परती रेता है-वर्ष में पायम भरा है। पस पीतमय (Lordeal) , पस हर भगिम से संगीठ फूट याशिम प्रकार कपि में पाप प्रतिस्प का भरणारिया का विषय बना दिया है। सामायिक कि मप की भीनी महर सबह पारस को सींचता । प्राण का सीना कितमा माहात है ! अन्त म पुरमा गर्मपी के 'रम का समीत मुमता है। उबली का रसका मारा व्यक्तित्व उसके नारीत्व समप गुम्बक है, उसका पप, उसकी पारमा सब च है। पत या 'रंग का समीत' मुमता है। प्रतीकवादी प्रमिम्पसमा और या मुन कर प्रकट हुए। उष्ण हदय की पुकार उर्बपी निर्जीव युरिकी तुलना मे सप्प हप की पुकार है। उसका समग्र भीमा प्रकृति हे एकाकार है। प्राति ही है। माधुनिक सम्मका पमा ।।दुखि मनीर्स स ममुष्य के हार + रक-वित मुगवे गा रहे है। माप : मनुष्य का समय सीवन-वन ही निम हा गया है । उसका भाप निर्गीय होता है, उसका प्रम पिपिम पौर उस गिरह में कोई गामता नही होती है। प्राति के साप एकाकार होना सार्म भी मामा का काम नही है। मित्तिमागी भयो न प्राकृतिक जीवन का निरोप या १ उपमी ५२
माद किया और प्रतिक्रिया
और मनुष्य पर प्रतिबन्ध समाए । यह प्रम फैमापा पया कि गो पीरम का
रस भोगता है, सिर से दूर हट जाता है। हम विश्वास ने भने-ने
मनुप्प अपनी मामी में पपट निया पोर मनुप्प प्रसार बनम ता।
बह्मपर्म मनुष्य की प्रसहर वृत्ति है। उगी पुरवा + ठीक विपरीवि
हिवाहीन नारी है। उसे कोई मिना नहीं है। यह मिम होकर परलीका
रस मामना पाती है। वह मही मानतो कि यो नारी नर को पान
गाती है उस सिए परम सत्ता का मान मनम्य है पीर न बह यह मानती
है कि वो पुरुप किसी रमणी को प्रातिपन में बीच गुफा है उसकी
अर्थमुभी यात्रा प्रकार हा की है। गमला र पुराना म
कावी-
किमने कहा तुम्ह, ना नारी नरको पान गुकी है,
उमा सिए प्रसम्म पान हो गया परम सत्ता का।
पोर पुरुष वा पानियन म सब पुश रमणो को,
दगम को मद मपन म उठने योग्य नहीं है।'
यह पति परमाबर तक पहुंचने का पप है, पपित के साम्म वगन की
नापा म उपची कहती है-
'सिन सा तुम्हें परमपर पौर प्रावि, र दोनों
माय नहा पर विमको भी गिर र गामा है,
न वा समे हापे मारे समम्म प्रति स
पौर प्राति रस में पिमा मम्तर रमा हुपा है
उम पोर यो मिसे किन्तु परमाबर महीं मिमगा ।
बुद्धिक पोत वर्णन 7 मिस पार ससार को परस्पर पिरापी
बउमाया। ममुप्प काय पा नहीं मानता है। हाय रे पवम न स उठन
माती पुकार ममत्व कम हो सकती है। रपिर ही इमारा गौषम है। उसपी
मानती है कि मिर्गास मार ससार एक दूसर सयराते महें। मोपा
प्राति म भिन्न मोसा प्रस्सित नहीं है। जीवनमुल की पापान यह
१ मी.
२ वही, ७०
सर्बपी उपम्यि प्रौर सीमा
मही है कि यह फिवमा संयमी है, बल्कि यह उसका जीरम कितनी र
वक प्राति से समरस है भीमनमुक्ति नैसर्गिक पौरन जीता है। करों
की तरह महब हावा, पायु में भूमने वामी गलियों की उप मस्त होता
है, पक्षियों की आय प्रसन्न होता है मार दावों की तरह मटरसस्ती परता
निस्थित हाता है । इयम मनुष्य की प्रति पुकार है । पुरि इसकी महिमा
क्या पाक समझेमी-
मुतिपुर पर उस मास का स्पस पौर प्रबरों पर
रचना की गुरपुरी, परी पित निति के मंपियामे में
रसमानी, मरकची उपसिया का चरम ला पर
इस नियूा मन का प्राध्य एशि ममम सम्धी ।"
पी कहती है कि इसे पिर, समझता है। किसी पुरकी फुलगी में
पापक जाने पर भी रसम एक कपन उठता है। यही बीवन है।
गंधी राम है। इसी का प्रामम पास्त्रीय माम 'भार' है। यही इच्छा
है। मही राम हमारा जीवन है। एम के प पर परमाही मनुप्प पप
मात्राको निकलता है। यह मही। ठो जीवन में कोई रस नहीं है। उबधी
पुरा कानी-~-
'जर का रह पाबक ऐप तभी तक भाषा के समक्ष १,
पारी-बारी से मही, सर्प दोनों ही मुमर भगवे ।।
मरपट की पाठी याव भी तक फुस्त प्रमुमो बन में
मृने इमाम को देन बमनी-ग्री फूलती। मन
पम्पा को मार तभी तक देगामय म तुझे सताती है
मो' समन-कम में मूर्ति विद्याकी मम में फिर बाठी है।
-
सुरपति मरी मारमान एहटे मार पपनाना,
एम्सरा स्पर्म से माही परों का मान पाने की
१ सी, ..
मार पिया मोर प्रतिक्रिया ८७ यह पावक ही पौरप की पहचान है निर्णय न तो प्रमाउ केमिक सरसों में नारी प्रमो को मोट की तरह गप ही माना है और न मिसन का कतु ही पहरा सस्ता है। प्रम पुस्प के प्रामिमन में महीं बसता है। या उनकी प्रांतों से टपकने मामे धीर मार का ही दूसरा नाम है। यह रम रप्टि हो जीवन है। पुबम का रस भी मन क मुमार म प्राता है। रप्टि की महिमा भोगीनरी भी मममती है- इस रस 'बह प्रवमोन पुल बयम की मिसस एम जाती है प्रोडा पाकर गिमे कुमारी युबती बम गाती है। प्रति पवित्र मिरी धोरमय एम की या मुसकारी जिसमें कर प्रबगाह नयी फिर हा उठ्यो । नारी।' प्राचीनरी रिसका प्रमाण मामुम करती है, तो म बही बस्तु पुपरवा को दिया। इसीलिए उसपी की पप्परा पोपीनरी की सती को परास्त करखी है। प्रत्यक मारो म एक प्रप्परा बसतो है । पुरप इसी प्रप्परा स प्रम करता है। उसपी की यह प्रप्मरा प्रश्पन्न प्रयम मात्रक नी । उस काई पपि नहीं है । मह सम मत को निश्चित होकर नागमा चाहती है बो मुख पुरतो मारी को पुस्प की पट्टान सी बाहों मगार मिला है। तृतीय पर म समोम का एक सिक्षण चित्र पाया है। पुरुरवा पानिमन-पाप में भी पी धीव-महिमा की बात कर या गो गो पारिजात घुम भी प्रकारानी सांप पामी है । तब उबयो उमम रखी है- 'पर, मैं पापा नहीं यहाँ भी रहो, भूमि या मन में, बक्षस्पन पर, इमी भौति मेरा कपास पने दो। कस पो बस इमी मावि र पीक पानिमन में पौर बताते पो पपर-पुट को कठार पुषन ।' मगता है कि उपो के पनुनर को पुरा ने मुना पार पती प्रामुरी मति के पास पासोम में रम पोम गमा। पी कोम्पापिन् मपुरापार मह प्रस्त्वम्पत हाती हुई रहती है-'पिनु, पार। १ २ सपी १७ पही १२ उबंधी रपमाथि पौर सीमा यह 'माह ! सिमा मधुमय है। वह कहती है-'या नहीं वनिक हो तिपिम करो माहों को संभोग के द्वार पर विरती हुई नारी निषेपस से पचने का प्रमुनय-विनय करती है किन्तु पाठक भी ममझा है कि इस मा निस्वेपण में भी मर्मान्तक धाम्ति और पानम एक बाण है। रुमानी प्रेम पोसीनरी के विपरीत, उसी का प्रमभमानी है। परितों में स्मानी प्रेम तीम तत्व बतलाय पायेग कम्पना पौर कोममता। यह प्रादेय सबनी म पूरी प्रबरता से है । बहती है- पदि प्राथ कान्त नहीं पाउंगी वो परीर को छोड़ पबम मे मिाय मिन पाम्पी।" स्मानी प्रम प्रेमी को गीग्न पना दहा है। उस न तो दिन में न मिलता है पार न रात में। उसका समा चिन्तन एक ही दिया 2 पोर प्रवाहित होने लगा है। प्रेम चेतना का अपरिहार्य मन बन गठिा है। इमका बाही प्रमाषणामी परम बिनकरन यो किया है- 'ममता है कोई पोणित में सास-तरी बाता है एप मुझ उठा प्रपनी बाहों में भर मेता है। कौन देवता है बो यो धिप-विष कर देख रहा है प्राशों म रस की प्रम मापुरी पीन पा है।" हमारा प्राचीन काम्पसार इन पंक्तियों की प्रेम-ठीक म्यामा मही कर सकता है। पामो में निरिष्ट एकारमा' में हम प्रमादित मही पिया जा सकता है। या ती मामी प्रेम का प्रायेम है। श्री रमाएकर तिवारी में इस भिए 'पाणित- विभव' की सारी है। माषामता के अनुरूप काही कही तो रिमकर की पमिम्पमना गाई हा गई है। था- । २ पईपी ३ यही २१ दिनकर की पी चौखम्मा प्रकापन। ।
नार किया पौर प्रतिश्यिा निराकार मन की उमर का प महा ६ पाऊँ पटे उम की प्राम भार में उजम वर महा।' ८२ मामी प्रम भार का इसम प्रश्या वर्णन हिन्दी कविता में मैंन प्रग्या महीं रखा है। चरित्र का विकास उबगो का परिष तृतीय पकता प्ररमी कसम हो पाया है। यह पनिवर पसी है, दिनकर म ठमका चिरग मा-पिता नारी कप में हो पिया है।धी हमारी प्र• दियदी मिखरे, प्रिया कप में पाप्रपा ना है। ती नानोर दती है पर पराई नहीं सी पका में नही माती।'तुर्व पक म उनका ममरव जमा है । यही या म्पप्टि मारी का धापा प्रती है। तृतीय पक तक की पी रपनी है, पुस्प मिस पर रोनना है। किन्तु, उमा परिण म यह भनक नहीं है निमक कारण ही किसी पान को पतिय मिमता है। मृतीय पाठक को उसपी रवि की उधम रग। यो मन में प्रमोम कम्पन भर दी है और मन कपन मपेपर मरने मगता है। किन्नु, उस परिष म मामिवार नहीं है निमक कारणही किसी पात्र को महाकाम्पारमा सातवा पाठ हाती है। यह उगतमा उममें पतुप प्रक में पाई है। मातृत्व हा मारीपनी परम उपमणि है। उसपी यहाँ मातृत पाठरपमित-डि बम गाती है। इस प्रमित- गदिमागे का मनोप मामा होता है। यही उनकी महिमा है ।णि, यह ना निपति की मिटमना है कि मारी महिमामयी तव हावी है पर पौरन का हिमामय समम ममता है। भी हमारी प्रसाद तिरी तुप प्रक सो पमित-नति मारी विषय मित्र है- माता स म वह सरम माम्पिनी है, फ नहीं मम्मी पर पमी हुर, करती हु । इन दोनों उगनापष्टि नारी की पापा नती है।" उर्मपी पति का निवार मामयीय म से पाया है। मन मोक्न पानि मा पिसेरता है । म्पोति वा पाता है प्राम विपदा , सपप स । २ उसपी २१ निकर मृरि पौर रघि २२२ नही २२२ उसी उपमम्मि प्रौर सीमा मनुप्प को इस प्राकुम बियपता के सम्बन्ध में पीननाप की पत्तियों में फिपित परिपत्तम कर या कहा पा सकता है-बीवन में तिनी पूनाएं। यो पूरी नहीं हो पाती किवने फल है मो सिमने के पहले ही पृपो पर भर गावे कितनी मरी है मो मरभूमि के मार्य में हो अपनी पारा या बठवी है । चशी की देवना है, भरत का पाप । पनिर ससी उसी पुरवा प्रपय में रखी है। किन्तु, ना उसे मातृत्व प्राप्त होता है उसकी बेरमा उसे मपने मगती है। या तो यह पुरमा को पा सकती है, या मायुको । यह भी तब तक ब तक कि उसका पति पपन पुर का मुह मही बम्पष्टि पारी की यह पीड़ा झे उसके परिण को म्याति देती है। पप्टि नारी पा समर्प पति और पुत्र का संग । सुकन्या उर्वसी से कहता है- कौम भामिमी है पो अंगर पुष पौर प्रियतम में किसी एक को मेकर सुब से भायु बिता सकती है? कौन पुरधी वम सकती है पति के लिए तमय को। कौन सठी मुव निमिव स्वामी को त्याग गोपी ?" सपी में पास करवासी कामिनी पति की उपेक्षा नही कर सकती है पौर उसमें वास करने मामी माता पृष को स्याप नही सकती है। इनी वो विमों के संगम पर उसकी करमा का करित मापता है। उसके पीपन की विशम्बना यह है कि-- हाय मत म मुम प्रमापिनी पाम इस्त भारी की म हो प्राणप्रिय पुष न तो प्रियतम मिमने पाये। उसके जीवन की यह भारी कम पार्मिक नहीं है। पौपीनरी का ठो मन्त पापु ही मिम ममा कि पपी को म तो पुारणा का साहचर्य ही प्रभुराम ए सका और न पायुका समिम ही। एक ऐसी मारी। नो माभूमि के मार्ग में ही अपनी पाप गो बैठी है। १सपी १२१ २. नही १२८ माद रिया पार प्रतिश्यिा उर्वशी भौर श्रद्धा सनी म यह प्रमान्ति ना है जो प्रमार की प्रमाको मार प्राप्य है पर पा की विजीबिपा उमपी की तय दुरनीय नहीं है। उनमा प्रमानक है, पटा सहर भीर। उबपी रस सती मार दती है। पता उम माती नी है। पता कि पगति का प्रतीक बन गाठी है, प्रत उपमी उनकी गुमना में प्रपिक विश्वममीय मगती है पर था बासी महम उदात्तता सा उममें मना है। मानवी पया र पापरम सत्य की नमक है पर बी नबसी पाचरण में मामी की उप्मा है। गानों की प्रकृति महो कही गा मातो। चरित्र को कुछ विगेपताएं उबपी को पारदपिता बनोकभी प्रावाम का गरिमा माम हो वायु जैसी उसकी उम्मुकशा प मुब उमक परिवरा प्रण है उस म्पक्तित्व का पपयिाप मम महा। उसकी वास्तविक ना इमन नि । बहस पिक,मारी मुसम पारपरम मे युक्त साप ही उसकी प्रति म पदा कार्य बनावट का नाम नही है। उसकी पम्मा भी मरसता मोहापौर पिगई निर्दोप । निमा म में पहषम प्राधा पौर सोफ माना और माली कप में उसका नाप्रपा है। उसकी प्रपा पावार उसकी प्रनारमा का प्रतिपनि है इसलिए उमा कौमार का मपात उसके यौवन परत पर नमानम बरसता है। मप्यरा की पारमारिए मरिमा उमकी कोई निपता नहीं है। पांचों को मुम्परार या सम्मे पासे पाम, मह की मिठास नकानुी पमई मार पार पपस नपिमाएँ, ये सब नियम कामदार परि उसमी मग की प्रपरा है. मोसम प्राय ही प्पी की सप मुमर हामा । देवो रसपी का यह यह मानगा प महर विश्वमनीर है। मानियता रमन्त्री प्रति नहीं है । महा गुभाष उसकी गिमपचा है। मोती प्रपा मार-मा। रिनारी उसपी ही रह कह सकनी पी-रण पिया सों नहीं मार मेने में यदि पपपम पा।' उसपी को मामलोपारिक उपमित्रम पार पामना में उमरी मान- १ उपमा ५ 5 उबपी उपसम्पि पीर सीमा . पारी है। पुरमा स उसका प्रम विमपण म्स से सम्मा ती पौर पविर है। पहसी बार पर उसन पुरमा को देगा पा यही मम पनगर सवार प्रामों पर बैठ गया पा? ' से मेकर अंत में भामु के पाने पर 'उमा प्राण कही कष्ठ में मामा पटक पपी। तक उसको सुचाई एकरम है। हिन्दी मापिकापा की सम्बी परम्परा में या पाने का साहस करत उसी को है- 'पड़ो मतभी मापा को विश्वास करो इस सिपि का यह मापा यह निपि मानस को भी म भरमायपी।' मरवानी मौरस विचारणीय यह है कि उर्वमी को यह सब कहने का साहस कहाँ स पाया पिकास मारियो की स्थिति को प्रसार की भाषा में पही पी. कि अब प्रतर्मन ही करना चाहता है, तब बीमन मा क्यों कहया देता है। प्राय हो उसी को यह कहने का साहस बिनकर की जीवन हप्टि से प्राया निकर की कम्पना का मनुष्य मर्षनारीपर है। मिस 1-अर्धमारीपर केगा इसी बात का प्रतीक नहीं है कि नारी पौर मर जब तक दोनों प्रपुरे हि इस बात का भी कि जिस पुरप में नारीत्व माही पा मारा है, एवं पिस मारी में पुष्पाल मही या पपूर्ण है। 'पानी मई पूरा दब होता है पर पाष पारवानी हो पौर पौरत पूरी तब होती है पर यह एप मरणामी भी हो। पौरवानी मई पौर भररानी पौरत यही प्रनारीवर की समा । मनोज्ञानिक रष्टि स पौधीमरी का परिण ति मतिम का माहरण है। यह पौरखानी मौरत का पूर्ण प्रतिनिधित्व करती है । ऐसी नारी में पुष्प की पुकार पर पूरी प्रविरिया नही उत्पन्न होती है । पौधीनरी उस पुसे प्रागण मे उतर मही सबी या नर-मारी को मिनाकर पमने है नर पारी के मबाट म धम तगाता है पौर नारी नर का फायका रठा मती । उपी म्पसी है, मुमार है, मारक है सबसी है पर उत्तम पौर्य पौर माइस भी है। १ उपमी १ ३ बही ११ ४ येणुबम नार, भिया प्रौर प्रतिक्रिया २३ इसलिए पीपन को सहीत पाती है । यही दिनकर की कामना की मरानी पोरत सटि मे हिनी मे दिनकर की उपधी अप्रतिम है। प्रसाद की श्रया से उसकी कोई तुसमा नहीं की जा सकती । उमकी निनीक साहसि पता है उसे परिष की कोटि मे आर उठाकर पक्तिस्य मना दिया है। सामान्यतया करिता म नारियों का पिपण सवही ही होता है। एस कपि निम् मारी के परिव में पहरी पठ है बहुत कम है। संसपियर निश्चय ही इस मेष में सर्वोपरि है जैसा कि वह प्रत्येक क्षेत्र मे है, किन्तु विस्तार में दो मही पर गहराई में उसकी तुमना केबस बास्मीकि मे की मा सकती है । यह कमा रेसीम में भी है हावा बह सीमित है किन्तु कानिवास में यह कमा निस्सीम है, यद्यपि कि उममे भी दोक्सपियर की बह प्राप्ता पोर पापकता महीं है पो उमको सार रिसेपता है । मानिक हिन्दी साहियकारों में मह कला प्रसाद ही अपनी विधेपता । रिमकर उस ऊँचाई के प्रपिकारी नहीं है, यहाँ क्सपिपर, बास्मोकि रसीन कातिवास सहन ही पहुँच सके है। सर्पकर प्रसार की म्यापकता और बिराटवा भी उन्हें महीं मिली है। फिर भी उबंधी का नो wिण उन्होनि थियारबरा मही है।
रूपात्मक पक्ष - पंधी के सभी पाप परिण मी पौर प्रतीक भी रिनार में रोमा पक्षों को बड़ी सफलता से निभाया है। प्रत्येक व्यक्ति सबसे अधिक प्रपन से प्रम करता है। पान का मना विज्ञान बताता है कि पारम रति की पति बहुप ही प्रश्न होती है। हमारी दिसचस्पी का सबसे बड़ा कम भी है। दूसरे की प्रम पा म इसलिए रस मेते है कि हम भी रति माग से पूर्ण । कवितामो म स्पा स्मक पब के उद्भव की यही मनोवानिक पृष्ठ भूमि है। निकर मे मिसा * पितापणे म हम प्रिय नारी का बसान मुनते है या किसी की भी मटी बहन मा माया नहीं होती। पर दो प्रमामिका पपरी कस्पना की प्रतिमा मिस प्रम पर उम्र के दाग नहीं मगते को स्पर्म मे पर सहरी हमार सपनों पर राम करती है। कहन का तात्पर्य यह है कि पाहिल म म सभी नाम पक्ति सापेक्ष सम्मम्प से मुक्त रहते है। पात्र हमारे विचार पौर भावमा का प्रतीक बमकर पाते है । साधारणीकरण का मही रहस्य है। पीएम मारायण के पम्यो म हम समी प्रपनी प्रेमिका के महान अपनी कम्पमा की मारी को ही प्यार करता है। अपनी पलो में हम पित प्यार करते है वही हमारे ससुर की पटरी मही होती।।यो गात भारी समय म ही जाती है यह ममी पात्रो से सम्बन्ध मे की या गती है। प्रस्पक पाप को हम किसी भावना के प्रतीक क प म प है। संधी को निश्चय ही दिनहर में एक म्पक काय्य (Alegory)प में उपस्पिट किया है। उपशी प्रस्पक पुस्प हवय म एक कम्पना किमोरी का निवास होता है। परीर-चमत् की सुम्बरी तो उस पस्यमा-फिपोरी की भनक १ बम विकता पौर विशाम ३२ २ दिनकर मृष्टि पौर हम २४
रूपारयापम
१५
-
रिसाती है । मह रविन्द्रनाप के पो म मात्र मुम्बरी' स्पसी है, उबपी
है-'महमाठा नहाया नया स्युमि सुन्नरी मसि, उसपी। दिनार में
पिरन्तन नारी (Univeral woman) की कल्पना यही समी है। उसी
कपल नारी ही नहीं है यह सम्पर्य की प्रादया मृष्टि भी है। दिनकर ,
बपी और पुगएका का सनातन नर और समातन भारी का प्रतीक माना
है। उन पदों में 'उपभी सब का कापम पर्व होगा उत्तर प्रधिमापा
अपरिमित पासमा धा प्रथा कामना। पंधी का चित्रण मी कवि में
सी भप म किया है-
मक्ष स्बम पर इसी भाति मरा पोन रहन दो।
कम बम सी मोवि उर पीक मामिगन में
पौर गत्याते हो प्रमर-पुट का कठोर पुम्बन स । २
पुन पिकार मियत है उबंधी पम् रमना प्राण वक रुपा पाव
की कामनामा का प्रतीक है।
"
सपी सपा प्रमण्य में निवास करम पामी। पि ने उस
गिर मामब हम म निमास करम पानी सनातन नारो का पर्याय माना
है।-
अनबन , मन की मधुर यहि प्रत्येक हरर की उसमानी
नारी की 4 कम्पमा परम भर, मन म बमन बानी ।
बहमारी रेहमती होकर भी प्रदाह हावी है । यह विार पुरप के हर
मही निवास करती है-
में वह पसना मुझे ना मान बैर हो
म प्राय नुम पार सुनको उपर हो
मागर की पारम या मानसिक तनया मापयर की।
१ समी (मिमा) २१
४ हो १५
रूपात्मक पक्ष "मी' के सभी पाम परित्र मी है, और प्रतीक भी बिनकर में दोनों पक्षा को बड़ी सफलता से निभाया है। प्रत्येक म्पति, सबसे प्रषिक प्रपने संप्रम करता है। पार पा ममो विज्ञान मतसावा है कि पारम रति की प्रवृति बहुत ही बम होती हमारी दिनपसी का सबसे बड़ा केन भी है। दूसरे की प्रेम का म इसलिए रस तेते है कि हम भी रति मात्र से पूर्ण है। पितामो में मा रमक पर के उदभव की यही ममाहानिक पृष्ठ भूमि है। दिनकर मे लिखा कवितामा म हम मिस मारी का बखान मुनते रह किसी की भी बटी बहन या माया मही होती । वह तो अनामिका परी सत्पना की प्रतिमा है जिसके प्रेम पर उमराव मही सगवे बो स्पस मे परे बरी हमारे सपर्मों पर राज करती है। कहने का तात्पम या कि साहित्य प म मभी नाम पक्कि सापेक्ष सम्बन्ध स मुक यो ११ पात्र हमारे विचार पौर भावना का प्रतीक मार पाव है। साधारणीकरण का यही रहस्य हे। बीता नारापम पमों म इम सभी अपनी प्रेमिका के बहान अपनी फरसना की मारी को ही प्यार कर है। मपनी पत्नी में हम रिस प्पाररत है वही हमारे समुर की मी नही होती ।यो पाठ नारी सगरम म कही गाठी पा ममी पामो के मम्मम्प म कही जा सकती है। प्रस्पफ पाम को हम किसी भावना प्रतीक कप में देखते है । संगी को मिरचय ही रिमकर न एक म्पक काम (Algort)प में उपस्थित किया है। उर्वशी प्रश्मक पुरुप म एक सना पियारी का नियम होता। परीर-अमत् को नुपरी तो रस यस्सना- नमोरी की नमक भर १ धर्म मविकता मार विहान ११ २ रिसकर मृष्टि और रपि १४५ ।
स्पारमक पक्ष
दिखाती है। यह रविन्द्रमाप क पम्पों म मात्र मुम्बरी, स्पसी है, उभी
है.---'महमावा नहम्म्या महायुमि मुम्दरी मसि बसी। दिनकर न
पिरम्तम मारी (Unrveal wormn) की कम्पना यही स मी है। उपग्री
कबम मारी ही नहीं है यह सौन्दर्य की प्राद्या मृष्टि भी है। दिनकर न
उबगो पौर पुस्रा का मनातन नर मोर सनातम मारी का प्रतीक माना
है। उमक पमा म 'उर्वशी सम्म का कापपत प्रर्प होमा उलट प्रभिमापा
अपरिमित वासना इच्छा प्रपमा कामना। उर्वमी का चिपस भी कवि म
पसी प म किया है-
मध स्मम पर इसी भांति मरा कपास रहन दो।
कस ए बम इसी भांति उर पीड़क मामिपन में
पार गरयाते हा मपर-पुट को कठोर पुम्बन स । २
पुन निमकर मिनते है 'उर्वगी पशु रममा प्राण स्पक तमापत
की कामनाों का प्रतीक है।
उबंधी पर का पप है पर म निवास करन वामी । कमि म उम
पिम मानव य म निराम करन मामी समातम मारो का पर्याय माना
है। यथा--
जन-वन + मन की मधुर यहि प्रत्यक हुपम की रगयामी
नारी की + कल्पना परम मर , मन में बमन बामी ।
यह मारी बती होकर भी पप हाती है । यह विष पुस्प काय
महा नियाम करती है-
में
पा करमा
मुक ए माम मैट हो
में प्राय तुम रूप देखकर मुनको समर रहे हो
मामर की पारम-जा मानमिक नया नापण की।
१ उपपा (भूमिरा) २१
यो १५
२. बही ६३
उखमी उपम रिप और सीमा
यह तो मारी का कासगयी है। मतीत मौर भविष्य मर की सीमा
का यह प्रतिक्रमण कर जाती है। यह ममातन मारी हर पुष्प कादय
म
निवास करती है। स्वय उबशी + सयदा म~ कर पा एमा समय कि पर
मेरा अस्तित्व मही मा?
कर पाएपा गा भषिप्य जिस विम में नही रहेगी?
कौन पुष्प जिसकी समामि म मेरी मनक नही है ?
कौल त्रिया में नहीं राबती। जिसके यौवन म ?
कौन मोक फौपती मही मरी हादिमी यहाँ पर ?
कौन मेष जिसका न सर में अपनी बमा चुकी है।
कई कौन सी बात और एन र कपा कहाँ की'
मेरा तो इतिहास प्रकृति की पूरी प्राण कपा है
उसो भौति नि:सीम मामीमित 48 सय प्रकृति है।
इस समातम नारी का सम्म विषण पुष्प की समावन पीया साहाता
है। ऐसा कोई हवय मही पिसम कामना की पुकार मही उठती है पौर
काममा की इसी पुकार की दोस पर मनातम नारी तृपा घात करने + मिर
पाती। स्थय म समातन मागपा प्रतीक उबपी प्रपन बाम का कारण
बतमाती हुई कहती।
काममा तरयों से प्रधीर
पर विरुष-पुरुप का हरय-सिंधु
पासोडित मुमित मपित होकर
अपनी समस्त गागाम्नि
कर में भरकर मुझे दुमाता है
नब में अपूर्व गोयना
पुरप निमृत प्रारपतम मे उठकर
प्रसारित करखी निमम मुभ हेमाम काति
कम्पमा मोड़ म उमर भूमि पर पाती है
१ उधी १५
रूपात्मक पक्ष ७ १ नियमिनी विपनर को अपने उत्तम पक्ष पर सुना ममित कसो को मम मुखाती हैं। दिनकर की उर्वशी इसी समातम मारी का प्रतिमिमित करती है। देस पौर काप की सीमा का प्रतिकमणबर बह निसीम प्रसार में पीसी है। उसका पास्म परिषय यह है- 'मरेप काम से परे पिरम्तन मारी। में पारमतन्त्र मौवन की नित्य नमान प्रमा अपनी प्रमर में पिर युवती कुमारी है। तुम निमुवन में अपना शिकास में यहां कही भी हो पम्तर में बम्ब परो। सरिता सा पिरियन मेरे मामान नहीं । म मूठ नपिप्मन्, वर्तमाम की भिम बाबा से विमुक्त में विस प्रिया ।। मी विन प्रिया के समय में रोमनाथ ने कहा- 'कानो कामे पिने माकि अमिका बरसी प्रनन्त यौवम परंपी। अपनि मागत पिये मौषम पठिता पूर्ण प्रस्फुटिता।" विन प्रियापही सापना दिनकर का काम है। पुपरवा भी एक पुष में सभी पुष्प सब हिरणे एक किरण में तुम प्रति एकत्र एक भारी में सब मारी हो। प्रवियप की परिपिता रसाबर्षण प्रति सम्मातर का विन प्रिया सस्प ही महारानो सबसपोदी।. । १,११ सोन्द्र कविता कानन पिसा १३१-३ ४ संपी, १.१ ७ १८ सपी उपनम्पि और सीमा गगारी प्रसाद द्विवेदी के अनुसार सभी समष्टि चिपकी हाम बदमा' का प्रतीक है। उन्होने पुन' उस नाम मानस देम' कहा है। समस्त स्पक को सप्ट करते हुए ये विपत है।'उरखी मार का प्रति- निपिस्व कपी । पुरवा क्रिया का प्रौर पौसीनरी प्रतिकिया का। समष्टि में म्यात बाकी इचा को पास मते है। उगमी, हिरोपी पी के अनुसार, कम्स नारी का प्रतीक है । उनक पो म पारम्म में प्रनक काम्य बस्तुओं की भौति उगंधी की मी उत्पत्ति हुई थी। ऐसा कहा गया है कि पक्ति म यो मन है बह पमष्टि चित्र का ही प्यप्टिपत सप है। किसी दिन हिरण्यगम नारायण को समष्टि पिब के प्रपि रस्ता मान पए है। समाधि म चीन पे । उन्हीं में समाहित चित्र से मनोमम्मा रेषता की मांति इस मनोयम्मा नारी की उत्पत्ति हुई थी। प्रति उर्बपी धमष्टि चित्रकी उपब । म्पष्टि चित्र में यह बराबर होती रहती है।' मनोमामिक प्टि मधी मानव मन की कामेच्या या मिविगे का प्रतीक है। पाध्यात्मिक सष्टि से यह कामना-सिवा पिपर की जीरेधा है- पपया पर अप-सुपमा को पारित करने को अपि सौरर्यममापि पौष तम्मम पनि बिलमम बैठे ५ निपत भी मारी बन निकम पड़ी तुप मापयरा की माा कापमा से एकापन मन से।' इस प्रकार कविता में उर्वशी के मुभ म्पत्तिस्य के साप-माप मातम मारी माना प भी एकरम स्पष्ट 1 माता के ममें बंपी पप्टिनारी की पाया स्पर्ष कर सेवो । पत भी हवारी प्रसाद विषदी का यह कहना कलगता है कि 'मी मरम नारी का पूरा प्रतिनिधिस्व मही करती। १ पिनकर मृष्टि पौराप्टि २१५ २ सी २५ ३ नही २१९ उघी १२ ५. दिनकर मृति पौर रपि २१२
पारमकपम
पुरुरवा
१६
जिन प्रकार वर्षमी ममातम मारी का प्रतीक है उसी प्रकार पसरवा
सनातन मर का प्रतीक है।
मैं मनुप्प
यह पुम्बा थी हमारी प्रसाद तिवेदी अनुमार सीमावठ गीमई
पो इस हाम मानस पेग का भिकार है।' उवमी की भूमिका म स्वय कपि
न निवा? पुमरवा स रस मम स्पर्ष पार भय से मिलने बासे मुगा
ने उसमित मनुष्य है। पुराण में है क्योकि म मे एना मनुप्प का
बमार है । मनुप्प मुव की कामना मी करता और पौर उसस प्रमे
निकमने का प्रयाम भी ।" पुकरमा का चित्रण कपि न इसी म म किया
भी है-
काममा-पायु मर नीकर बहती है
कभी मर गति से प्राणों में सिहरन-युमक जमाकर
कभी गलियों को मरोग मना की दाम्ण पति से
मम का दीप गुम्न नमाकर तिमिरान्छन हाय को।
किम्त पुस्प क्या कभी मानता है वम मासनको?
फिर होता समप तिमिर म रीपक फिर असते हैं।
सनातन गर का प्रतीक यह पुरुरवा सम्म नमाम्मर से इसी समावन नारी
योग म बम होकर र हा पा । उभी के यह पूछने पर कि कौन पुष्प
तुम ! पुरा उत्तर देता है-
अनेक कस्पों पषियाते
तुम्हें बोरवा फिरा तैरकर परिवार भरण को
सम्मों क पना गो पीपियों प्रापनापों में
पर तुम मिमी एक दिन मामा भिम गुप्र मर्मा पर
एक पुरुष म पमित पुगों के स्मों की मापा-पी।
म
१रिनार मृधिपौर रठि २१५
२ सपो सीमिता।
धर्यती उपनामि और सीमा
पुरा हर युग में उर्वशी का गुम्बन रसिक पुरुष या है। यह तो
अवश्य ही सनातन मर का ही पर्याय है को हर युग में नारी के
पाकुषित प्रपरों का पुम्बन मेता है-
यहाँ-वहाँ तुम किसी स्यात में ही ममयानिम बनकर
तम, पेरता माया हूँ अपनी मागुम बाहों से।
जिसके भी सामने किया तुमने कषित प्रमरों की
मगता है में ही सदैव बह गुम्बन-रसिक पुरुप पा।'
दिमकर मागे की पत्तियों में इस सनातन मर ही म को मषिक
स्पष्ट करते है-
मरी ही की तमा बिसे फूमों पूज-भवन में
पम्म सम्म में दुन पानिमन से हरवी पायी हो।
कस्स-कम्प में सुसा प्रएप नमित बमोणों पर
प्रभु पाचवी मामी हो मेरे पात मों का।।
इस प्रकार पुरा सम स स भिम एक विश्व पुस्प का स्पनी
उमणा।
मायु
निम्मत के अनुसार प्रायु का अब भी ममुप्प ही होता है। हिमकर
रामों में इस प्टि से मनु और तवा पुरषा और उमंत्री ये दोनों ही
पाएँ एक ही विषय को मषित करती है। मृष्टि-विकास की विस प्रश्मिा
केकय पक्ष का प्रतीक मनु पोरगा का पास्पान है उसी प्रषिया का
भावना पर पुरया और पसी की क्या में कहा गया है।'
गधमादन
पपमारम भी काम भीमा प्रेम का प्रतीक माना पा सकता है। यह
एसा मेरई हो नर-नारी समागम में किसी प्रकार का कोई प्यमान नहीं
होता है।
१सपी १.१
३ उपी भूमिका प
पात्मक पक्ष पुपरवानपी पास्मान पासे से भी प्रन्योकि परक माना जाता रहा है। सर पितिपम विनमम के अनुसार स्वरूपा की नायिका उमा है मोर भापक मूग । इन दोनों का मिसन प्रतिदिन कुष ही भा के लिए होता, फिर य रोमो बिा गाते है कि, दिनकर का गम भग्मेप के मापान की पुनरावृत्ति नहीं हार्मोन म माम्पाम के सहारे सनावम मर पौर सनातन नारी की ही कमा कही है। समी' में दिनकर अपने पात्रों का नियमिता देने में सफल हो सके हम यह मानते है कि यह सफमता पापिही है। तृतीय पंकही यह भूमि है वहाँ म रो! पाप किसी भी पक्कि विशेप की मामा , मुरू है। तीसर म म प्रणय की माघि में भीन से प्राणी कोई भी भरना हो सकते हैं। रममे एमा कुप भी नहीं कि हम यहम सरें कि यह म्पत्ति पुरवा ही है और यह उममी इस प्रकार यो एक सपा-काम (Alcory) है।
काव्यालोचन की समस्या और उर्वशी ग. भगवतपरण उपाध्याय ने परस्पना प्रमेम १९६५ मा म 'सपी की पो पालोचना प्रस्तुत की उसकी म्यापक पर्श हिन्दी-वगत् में हुई । कुष मोगो न कापमा' के सम्पारों को मात्रा मरे पर मिले कुष माम प्रसन्न मी हुए। विवाद समा बमा है और हिन्दी के सभी प्रमुख साहित्यकारों ने अपना अभिमव प्रकर च्यिा । किन्तु, जो बात सर्वधा महत्व पूर्ण पी उसकी प्रापित स्पष्ट रूप स हिसां भी सबक मन की। उस समीक्षा में कही गई बात ठीक या गसव पिपारणीय यह नहीं है है। विचारणीय पह है कि ग• अमवसरण पाम्पायन को उप मी कहा क्या नाकाम्पसोवन का विषय हो सकता है ? यरियेत काम्पमापन की परिष में माते है, तो ये ठीक है, मसे ही हम उनसे सहमत नही हो। किन्तु पनि काम्पमोपन की परिधि में मही प्राते हैं तो म. मममवसरण उपाध्याय में एक साहिरिया प्रपराप किया है। उस पानोपना सम्पयन ने यो पात स्पष्ट म्प में उभरती है वह पह कि उपाध्याय पी मे काम्पतर मुम्पों को ही अपना निकप बना लिया । काम्पेठर मूल्यों को हो महत्व दल के कारण ये पुस्तक + मृत्य की पर भर्त्सना करते है, मेवर और प्रकाप पर होने कारण नये प्रांतपार' की उपहासात्पर भभिभा का निर्माण र पौर दिनकर जान दी पामापना भए ति के प्रतिपाय + साब नमका सम्बन्ध स्थापित करने का प्रयास करणे। यह इसी बाम्पेतर मूम्प का परिणाम है कि पत्तिय पौर अतिस्व को एक ही पायमूमि में रखने का प्रयास करते है। पञ्चा होता कि उपापाय पी प्ररिप का रम्टाम्ठ न लावे । यह बाब समिए नही कही पा रही है कि पीपानाप मे उनके मावस मारी पाहित्य मान मम्मपन की कमाई बोन कर रख दी कि इसपिए कि इसस माम्पमारी मसावि बरे ही मिाप्ट म्प का उपाटन होता है। श्री उपायाय नीरा पप्पनाप जी का पसी होना चाहिए कि ऍमस्स + सम्म को नोने प्रष्ट काम्पामोधन की समस्या पर सर्वशी मम उपस्थित होने से बचा लिया है। यों यदि ऐसी मात एगस्स भी सिख ममे हात ता यह अनुकरणीय पादप से बम पाता ? हिन्तु, सबस महत्व पूर्ण प्रश्न यह उमरता है कि यो पक्कि पुस्तक न पार भूमिका लिखने के मिए पी नहरको पालोचना करता है, उसे यही पुस्तक बिना पढे मेडा के पराधम पर यप दन का क्या अधिकार है ' पुम मिहार यषि उपाधिविवरण की प्रतिपय मारता विशाता है तो यह किस दृष्टि से काम्पमोचन की परिपि के पम्तर्गत पावा है? दूसरा प्रपन पो उभर कर पाता है यह यह कि पुरास-विहास द्वारा उपनहित कपा को परपती मेला किम स्म में उपस्थित करे ? उपाध्याय गो का पानप यह है कि दिनकर ने कमा को बहू कामिपास स ठा निया है। उमा पनुसार पहिलो नमो' सत्ता विमोबपी' का कमामुगाव है। बात एमी नहीं है। रिमार न पुरवा साप्न प्रसप द्वारा कासिमास की कपा को एक प्रबम मोर दिया है । एसा प्रतीकात्मक सन बल प्रमुनिक पुस का कवि ही मृगन कर सकता है । पुन 'उबपी' की समाप्ति पर नता कालिराम का प्रभाव है, अरविन्द का न योनमाप का। यह दिनकर की जीवन-नप्टि का परिणाम है। प्रत हिन्दी 'बी' संसठ बिषमोषपो का कमानुसार मही। किन्तु, परि होता ही तो क्या यह पमत हाला? परितमानस के कमि न पौराणिक पायान का ही प्रापार ग्रहण पिया । पात्र भी नही है। तो क्या रामचरित मानस पास्मोकि की रामायरस या स्पम्पनू की रचना का ही कपानुवार है? पापाय पो पनि रामपारित मामस की प्रामाषमा मिसवे वो क्या पही बात लिख सकते पे परि कोई परपती कवि पूर्वी कवि की कथा को ग्ठा सेवा है, वो एक पधम्म पपराप करता है एमा सये उपाम्पाय नी भी नहीं मानते। हिन्दी कपियों उत्सम-म्यामोहक प्रसग म दिनारको परसमा कम पनगान रूप से दे पाप-पान कर मा है। रहीं के पनुसार वीन विषिष मरिमों में होत नाम पेपनी दोन महापापियों-पक्सपिपर राम पार पान प्रायः एक ही सम को एक ही प्रकार म प्रपन नाटो-~ऐम्टनो एग मियोपेगा 'पाम पर मर पौर मीगर एलियोपेट्रा' में मिया है। क्या प्राची समान महापारियों ने ना किया रिलार को पा भी रन मा पपिकार मही है ? पपा इस रप्टाना पयोग सम नापास टि से ही हो मावा है ? क्या मानो परामर ही ? उसी प्रभार समारोह प्राग' सर्वधी उपचम्मि पौर सीमा गाने पिम्प कीटु प्राधोपना करने में मई को स्टुना माई गई है। पता देस का कवि गदि बनता के प्रतिनिधि की हैसियत से पानी में पता पौर मात्र पास्ट' देखता तो कायसोचम के प्रसंप में इस बात के उमप का क्या पौषिस्य है ? पाप्याप बी में यदि पोड़ी भी निरपेषता होती तो ये का कर परा इस विम्म मौदर्य पर विचार कर मेते । सामाम्पवा दिनकर में रोमाटिक बिम्म ही लिए है। किन्तु, यह वह सबम है नहीं स्मानियत भेण्यदा के स्वर पर कर्म-पातित हो गई है। यहां बमकार बम मानपीकरण का नही है । दिनकर रापि का पत्यन्त मारक म्म सस्मित कर सकते में किन्तु ऐसा उन्होने किया नही । यह विम्म तो रजनी की मारकता की अपेक्षा उसकी प्रम विष्णु विराटता को पावित करता है। जयपाकर प्रसार में कामायनो म रखनी का चित्रण किया है। किन्तु मा विषण मारnt, यथा--- बचत । पगली ही सम्हाम मे से पड़ा तेरा पचप विचरती है मणिपणी परी ठा सुप फटा हुमा बा मीन बसन क्या पो यौवन की मतमानी। - मतिम बमत मूता तेरी मोली भाली। प्रसार की मधुमारकता के बीच दिनकर को प्रादु विपदा प्रसनीय है। मपासे कोई समाशी भरपाधिश्य में पाभिशाप की गरिमा के साप पायी हो । पशि भर के इस मूर्त पिक की पूरी प्रसमा मही की पा सकती । एक ही सम पर बार-बार इमियों की परितृष्ठि का पिपान है। कभी पाठे इसको रेखा में मेष का मोर मुमा है । प्रस्तुत्र मर-मर कौऐप बसमका में प्रति 'बुपे हुए पिर म तुर्मित वाम त फलाक? में प्राण पोर मम्मित उस्मक मन-कम्प पर्पसा है' में पस्पम मम्बाबी ऐमिक तोप मिमता है। समम स में चित्त पर गो विम का प्रभाव पड़ता ईमा मिरास्ता पम्प है। किन्तु, ग. भमरवमरण उपाध्याय मिए पा सम्पर्ष है मौषि रिम्नी में निवास करने माना हमारा यह कवि 'प्रवासी।
काम्यामोचन की समस्या पर बनी इसी प्रसंग में कामगिरत-दोप मी विधारसीय है। कोई रपमाकार पर किसी पुरातम संरम को उठाता है तो मध्य यह नहीं होता है कि वह पुरानम सहति का निर्माण गरे । यदि यह ऐमा करता है तो काम की पेवना का बाहक महीं बन सकता । यह प्रतिमामी होकर रह पाएगा। प्रापीन प्रस्थान इसमिए गए जाते है कि उनका सम्मन्न हमारे सरकारी से रहता है। परिणामत साधारणीकरण में गी मुविधा हो पाती है। यह भी एक कारण है जिससे प्रापीन प्रास्माम म को ग परिवतन कपि नहीं कर सकता । परिवा कर देता है तो हमारे मस्सार उस स्वीकार नहीं करमे । 'मेपमाव- पर' में माइकेम मधुसूदन रचने परिपतम किमा पोर यही उसको मममर्यता का कारण बन गया। पत' प्राचीन मास्पान नव सवर्मका प्रमिपंजित पल के लिए ही मारा पाते हैं। काम पुराना पता है किन्तु पाना एकपम नई । इसमिए पनात्मक साहित्य में कामनिम्वनोप न के लिए प्राचीन इतिहास पौर सहति + निर्जीव तर्पो को लेकर प्रस्तुत हाना काम्मालोपन की सीमा का प्रतिक्रमण कर गामा है। हां यह ता ठाकरे कि एसे ठप्प नही पाय गो पुरावन सदर्भ में एकरम बमेम रीमते हो, किन्तु सम्मों को भार पर्या पाम का हिासना और बात है। मदि कोई पम पम्मेर में नहीं दो उमका प्रपोम पारा कपि उस युग के पाना सभ मानकरे, यह बात समझ में नहीं पाती है।म प्रसंग में 'सबम' गम के पाविर्भाव का मिषन करते हुए पत्रेय गो ने जमवरी १९५६ की 'सना' में दो मियामा एक नया समेत देता है। यह मया सम्म यह किम किमी पम की मुसत्ति के सम्माप में गो ध गान बही पन्तिम प्रमाण से हो सकता है। कामिदास ने यदि पी पम का प्रयाग किया तो वह सम्म , किन्तु संसह पापाम' दिनकर परि उसका प्रयोग करते तो यह सम्म नहीं है। यह बात काम्पमोचन किस सिरत में मपा पा पुरामा मि मृत होती है हमें नहीं मासूम । इसके मन में क्या या पप्प नहीं है कि दिनार मे संस्कृति पार पम्याप' पिसार गो प्रपण उपाप्माय की रपि में किया बही 'मी' पाम्पानापना निकप बन पपा । रमी प्रकार 'पणिहिम' प्रयोग की मरममा करने में या मनोवृत्ति उभर र पाती है कि मोग पाप्याय जी के विसामान में बाधि हो। पिण, सामग्रियोर समय में सरसे प्रपिक हास्यास्सर स्परा ना उपस्पिड हाना है जब साम्याप गी ना मा मयुमर प्रपन पाल' पारस्मेल कर मा मि इतिहास का विपनपण करन मम गात, सधी उपसम्मि और सीमा पम्पूण उममी' पककर उन्हें यह प्रमिशान न हो सका कि 'उसी बस्तृत अरबव-कास की कोई नारी नहीं बल्कि पिरतन नारीत्व का प्रतीक है। 'उषष्ठी' एक स्पा-काव्य (Allegory) मी है, क्या यह तमी मुबम बात है कि उस सममाया जाय । विस्तू समावि के पाचा दिनकर के शान पर म्यग्य म मुस्कुरान बाते . उपाध्याय परा प्रपन मान पर गौर फरमाम । अम्बेर की पसामों का निर्माणकाम सिा लगभग बारह हजार वर्ष पूष वक माना पाया है। श्री भगवतपरण उपाध्याय ने यह निष्पप निकाम लिया कि इन कमापो का अस्तित्व ही नहीं रहा होमा सोकि मारपर्व मे उस युग की कमामों के प्रक्षेपमही है। यह वो दुर्भाग्य की बात है कि तत्काम कमा-कृतियाँ भाग किसी भी रूप में उपसम नही है। परन्तु हम समग्र ससार विहाय पर प्यान गयो इसमें काकी कोई गपाइप नही हमानी कि ईसा के बारह हमार वर्ष पूर्व भी पलामो का अस्तित्व पा । केबल मस्तित्व ही नहीं पा कि प्रत्यन्त ही परिपत और सरगमम मम पाय भी रे पपाएँ मिस पापी । उनीसपी पवामी के प्रतिम बारे मपभग पुरातत्ववेता सतायोमा न प्रस्टामीरा की गुफापों में जिस भिकारी को मिकामा दे पपनी सभ्यता में प्रद्मुत है। प्रार पूरोप के परातल नेता इस बात से सहमत है कि पम्टामीरा नुफापों की चित्रकारी ईसा से गाह हमार पप पूर्व की है। बाद में तो परावस्वरतार्पो ने समय पिणी युरोपको गैर रिया पार ऐसी समातियों के अनेक उपारण र निकाले । प्रन्या हो कि ग उपाप्याय सर विनियम प्रोपेम द्वारा सम्पारित पुस्तक दिपारट लाइम पॉष्ठ पार्ट पम परिभोर को पड़ उनमें रिये पये पियों पर ममन करें और अपने मान को वापा बना में। पुम परम' मन का प्रयाम र प महा। यह गार पायोधक मरयम्त ही सीमित पौर की इप्टिकोण का परिचय दिया है। क्या भाषेद पार मिस रूप म उपमा, नही उसका समय स? क्या उसकी सभी प्रसाएँ प्राध अपरा उस युग के सभी विश्वास उपमम्म चार्मों में ही समझे पाएं? और यरिया बस्तु अम्बेर में महीं। वह उस पुत्र में नही हो पी? यह सब कौन बता सकता है? कानपिस्तनापों में यह तो प्यक होता है वि पपाम्पार की को इतिहास पर ससति का कुछ मान किन्तु काम्यासोपा प्रापमिक सिम्तों में भी ये परिचित है यह हम मही काम्मालोचन की समस्या और उर्वशी १.७ खामरा प्रपन काम में सत्य साप का भार उठठा है। उपाध्याय पी न मुमपम की दादमी के 'तारों भर ययम' + सम्बन्ध में सिक्षा है पद्रमा गरा दीपिठ मुक्तपक्ष की शादी का प्राकाण या तारा भरा हो साया है कि उपाभ्यार बी ठीक कहा किन्तु, क्या यह इतना महत्वपूर्ण तय है गिमा उत्सव काम्पाप्तोषम के प्रसप में किया जाना चाहिए ? 'नाच पीर पर चादी यूट' कितना इस्तर पर कारे पए है प्रम यह महत्वपूण नहीं है । महायपूर्ण या किकाम्प-सरप का स्वरूप क्या है कीटम की ववि पावसेट एममम' नाम की कविता में एक नाविना का मन पाया निसर्म यह एक कमरे में मटी पानी रात है और विरको की काप म धन-यन कर पान बामी रोशनी का रगा का एक गरण मरीर पर कारगो हा पाती है और उमम बह मायिका विम टती है। एक मामोषरून अपनी गुदि की प्रवरता का परिचय देते हुए इबठमाना किनामा को किरण में एसा नहा हाता है। एसा तो ri हिरण में ही होता है। बात ठीक है बिमा, उमा उस्लेव गमत बेवा ममबा मी मासोपा को रचर 46 ए काम न कहा कि मुम्पर ही सत्य है और मस्प हो मुम्बर तुमतमा ही मानन की ? पापा प्रश्न काम्म म उपमान-यापनाक पौषित्व का मकर रखता है। उपाध्याय मोम इस प्रमय में बाबा उटायी के मठ प्रपिक मकर हैं और हम गार-बार पार मा यह विराम मही हाता है कि यह किसी पापाराराणा पया है। बाम्पमात्र + पलकार प्रकरण का या एकदम नही मिसामफिरपमा एकरणीय हावा छिमी को गमा पा गाता है तो समेट करन उमरी मुमता स रहता है। यदि कोई पह ममन मिह पानी का सातिसम्म बाहन है और उस पर पा सादा गामा तो रस हम समन्य पो म माम ? साम्बाय गो का पुष का समापन पर पार भापति है। रे नि कसम होकर फिर पुष नहीं रह पाएगा बघ पर नही मब उस सिर पर पारग करना पडेया निमम रस मप होपा । माको ना गान काई पोरा भी पोरा पपन मना से उसमा से वीर उगी। शिर मग मिट्टी पाए पाह मरका पाही। कमरा न म दा परम हाप म मने पलेसीलाईगदी माफी मागिरम हार्यों को पारायच्या संधी उपसम्मि प्रौर सीमा पातु-फमध की नहीं ऐसे पाप के कमरा की है जिसके म्पर्य से उप्स पर ठो हो म भाप में काम की परम्परा में, गर्मी में भी भारी मोवस उम्मुख नर को उपकरको ४ा परती है। जिस पम्स को प्रकार पारा का सवही चान होगा वह मी ऐसी बात नहीं घिदेना । परि ऐस तई का पाभप निया पाए, तब तो गो पामुखी कामाती है उसके घर में बिबनी रसाने की प्रावश्यकता ही मही परे । पिर चम्ममा पातना बड़ा मुह किस पर में पंटिगा? चमत्तारवादी बिहारी मे इसी मास का सहारा लपर 'पना ही विपि पाइप या परसाई' लिखकर अपनी पता * प्रभाव का परिचय दिया था । बम्तुत उपमान पक्षोप होते रकमम मगम के प्रतीक है। मयम कमयों को दान पर रखने की प्रना है। उसका का विषपण काति को संबैठित करता है। पुम समय पैस्य प्रदान करता है। इसलिए उण कर ममय ही उसके सर्व से पविल हनि । मम्मट भयरस- मिन प्रसन में पाया पोप का ग्राहरख दिया है। यदि उपाध्याय बी का मापस लिया जाए तब पो मगा की धारा में मना पोप की सा हिमाकत होमी ठहरने की। उसी प्रकार उपाप्पाप जी साप + मने बानी गाव नहीं समझ पाते । पाप कामरियम प्रतीक है। यह काम भुमा का प्रतीक है। सोन' विषेपण को पोरार दिनकर इस बिल को पौर प्रमाणसासी बना दिया है। सोना' कामना का प्रतीक है। समे पम्प से माप मारने बानी पासना की प्रमता मत हुई है। एष मिम का प्रयोग दिनकर ने पहली बार 'नीस-मुम' में सपहात स्वम पोर तत्प' पीपक कविता में किया है। 'मी' में यह विमा ही से पाया है। सत्र तो यह किस विम मारी भाषा की पभिम्पबना पति को बराया time' मीमांसा की हो तप सपा की नीर टूटना' की पानोपमा भी गौशिक-परिणीणता पार पायता से प्रभाष की मूषमा देवी सर्भ मुब से सपा के रोम रोम टिक्ति हो जाते है। रममें एक विद्युत का समारहाता है। इसका पापार विक। रिमकर ने इसी समय में इस बाप-वर का प्रयोम किया है। उपाप्माव की यमुम- के प्रमय में संपुलित कोई कम-निपा की सपना कारण है तो इसी माती है। सुम कोममता का प्रतीक होता है । समगे एक सुरमि फूटती ही सीमिए दिनकर से मुरनित रिपाम मरन' कहा । ये उपों के पुष की ही तरह मम्पक पोर माह होता है। प्रपाप का प्रापिरम यही है। मुमो का पाकर मां का प्रमुखता प्रशन करने का यह परिणाम है।
कामासाप की मनस्पा पोर उवधी दिनार मे मा म पट्टान की समा दी। वा मारय उसकी बात' म नहीं किया गया है। पापाय भी यह पोहाइ वाली बात यहाँ म भाए समझ में नहीं पाती। चट्टान तो मा मे समरता का यह करतो पायी है।कही जमा अम है । प पर म उसका प्रयाप महाग है। मुबाएं पुस्मा को जीही कोर मी उसका करत नुर रोहोमी दिनार पहना रही पाहत । ममम नारखीच मागिय न चहान' का पयाम इनी शार पन सम्बत करन लिए माइमारी राप में यह पापना किनी प म परिव हार पायर मी मिची पनी है। मेन बस्नु कम्पपास की सतही गातों का भी माम नहीं है पर यह माम्यमन मनाकापडी प्रमियरमा पर । 'म प्रामाषा की मध्यमा पोर विधनसीमन कलकर पाई। या प्रामापक यत पात्र किन हाना है प्रया रस बहदय मी हाना पाहिए . उपाम्पाय गरी की समीक्षा पास भागन सामने पाती है वह यह किसका नेहा x रिमान तो नहीनी. माप । म पावारण पाठक की मनमासना भी नही है। मिलत है पथरपना म पार पादमी को 'मा काम यार पाला हा माट में सुती का पयाम पद पाडा यह कम्पना परिपी पपमी हो भरती नु मामाग्य मर की पाई नहीं है। पुरती का पोम्बाम गमत माम पराया। पम्यारावा किसयारीपतिनाम FRas RO नी वा सम्मा' "मम पापती, साकि सस गप्पाय मी काप उमरताई यह पस्पतही मयेम गन्य पति का । मम्मान र तारा प्रयोग है। शासन प्रपसी का स्मृति म। मा फदि नारीपणापा रात ममन्ना पर पुराने स्वति कामपार करता है। उस स्मरण र पुर पर गम को म्मानिस सपना पानामा वा पर प्रिया रैम पायसी उपान्य मार मी मानामपि मग ! उन माग गेम पाया गप्पा उम्बाम में भी नारी मम्मी पदी पियोग उभरता है। निर्ग पार मो मला कोणी माजा हारत हा गोड पए । इस गीत की माता काय है नुन पार एक नया मनुकर पा । महिला की महानुनि को जीत रना मातो? पस्दा हाय हा नेहा + सा में मानुभूति परमापार पर हानि परे लिए पण्प को पिरस में परिवनिक उबंधी उपसम्मि पौर सीमा कर दिया । निराला की राम की शक्ति पूना में यह एष्टिकोप मौर म्स मे उपस्थित होता है। पि पस्त हो ममा पा पौर स्पोति के मिते राम और रावण के प्रपराम समर में प्राज राम के पराक्रम को ममा पा । प्राण उनके सभी तीष्ण प्रहार निष्कस हो ऐ ५ । से समय पुर विराम इपा मार राम समुद्र के किनारे किसी सानु पर सेनाप्मक्षा के साथ विचार विमर्म के लिए बैठते है किन्तु समय से राम का मम विषम हो उठता है स्पिर रामयेन्द्र को हिमा रहा फिर-फिर साम रह रह उठसा जगजीवन मे रापण बम भय इसी मकट क षण मे राम को भागी परापम की सानि की सीता की कुमारिका परिका स्मरण होता है। फिर निरामा प्रत्यक प्रणामी से पुष्पमाटिका मिलन का विभ बीच देते है प्रपम न मतान्तराम मिमम ममनों का मयनो से प्रिय योपन सम्भापण कापरे फिसहय भरते पराग समुश्म स्वीय स्पोति प्रपात मारि मोर इस भावे ही हर पनुर्भग को पुनकारियों ना हस्त' । नारी प्रेरणा का होती है, परित यही होता है । सभी भूपानों में केवल सप ही धनु समर हो सके इसका कारण यह है कि सीता कौमार्य को पुप्पण म बम सम्हान देखा पा । इसलिए उनके हम में स्फूर्ति बी मात की प्रबर कामना की। इसभिए उनमें विश्व विजय की भागना पाती संकट म पुस्ती का पय्यान' माप प्राता है, इसकी सार्थकता यही है। प्रकार उपाध्याय नी मां का बर्षा मर्म भी मही समझ सके । ताप मा ही है। मां का वर्म' पुस्प के लिए ममता मौर सक्ति दोनों प्राम का सामन होता है। इसका भी मेष्ठ सप्टान्त राम की पत्तिमगा । उपस्थित हुपा है। मक्तिमपबना में तीन राम अब पम्तिम इन्दीवर एन पर नए पाते तब असफलता को सामन और शिम हो रटे किन्तु इसी समम राम को मा की पार पाती है वह मां गा प्रपप । का ममम मोप देती-ती पी माता मुम समापनीय नयन । हम निष्कर्ष पर पपते है कि साध्याय जी सापाएण पाठक की सादयता काम्पामोचन की समस्या और उर्वशी कि उपक्षी की भापा किस कोटि की है परन् यह कि उपाप्पाम बी ने काम्पासोचम के प्रसंग में मापा सम्मम्मी पिन मुटियों का उत्सव किया है देमा विचारणीय भी है ? इस प्रसग में उनका पहमा प्राक्षेप मुहावर के किमित् गित रूप को लेकर है। प्रीति व प्रपम प्रपम बगती है। प्रपम प्रपम' के प्रयोग पर उपाम्पाप पी को मापत्ति है। उनके पनुसार पहले पहम' होना चाहिए । क्या उपाध्याय गी यह मही पान कि कविता की नापा गप को मापा नहीं होती है। कविता की भाषा का गद्य की भापा की ही तरह बाजार और मापार में मी नवरमा चाहिए, यह बात पूसरी है। किन्तु, मबहार के पशवम पर उसकी पनक सीमाएं रहती है। कास घबगत मात्रा का ही प्रान नहीं गया है, मति-पति की पारमा को भी समझना पड़ता है । उपाध्याय जी का सुझाव है कि पहले रख देने से काई यही पति नहीं होगी मात्रा पम्प की चिन्ता उन्होंने मही की क्योकि उर्मी में प्रपत्र या मुटि कहीं है । पहले सुम्भय के अनुसार पति पर मी पाय-'प्रीति पर पहले महम जगती है। सपाप्माय पी क्या पर इस पति को तुकबन्दी मी मान सकते है ? उसी प्रकार पुष मा बामा सुभाष भी प्रकाम्यास्मक मोंगा। दूसरा प्राधेप तत्सम के प्रयोग को मेकर है। रिनार स्वप मी ब्रह्मचर्य मापा' के हिमायती नहीं है। यह ठीक है कि 'मी' में कई पदों का प्रयोग कर्ण-टु ममता है। किन्तु उसकी भयंकरता पाप्माय जी ने एक ही जगह एका कर बड़ा है। हम एक बात मौर नहीं समझ पाते। पाप्याय को कई मह वा मह प्राधेप करते है कि परम जैसे पनवेद में नहीं है, पर समका प्रयोम मापनीय नहीं तो फिर ऐधे प्रमय प्रयोगों की बाहर क्यो करते हो मेद में तो नही ही हो सकते है। पाम्माय नी पुरसी बात क्यों कहते है? ईसी की भाषा प्रदी है पापुरी मह मप्न पूसरा है। एक ही पति का दो मामों का उपाप एकही प्रामापना में करम क्या प्रधिकार है? तीसरा प्राधेर प्राम्य प्रयोगों से संगपित है। इस प्रसंग म उपाध्याय नी म महा रामी देह करेंगी रोमी' प्रम रेमता' प्रापि प्रम का उत्मण किया है। महारानी पाम्प प्रपोप है यह पन भारतीय काप्प साम का उपाप्पार बीका मूतम पवन है । 'मी' एम बना हो पाए। पौवन - खार *साब-साम पर की कसावट पिषित पान ममतो है। इस बात का यह पर बहुत ही पम्धी ठहम्मनित कर देता है, रीमापद' तिषिमता गोवित खा है। प्रसाद ने मन के सेपन की पर्वा कामायनी' में की ई-पर उर्वशी उपमपि पौर सीमा मन मी मा पतना ठीसा अपने ही होता पाया है। बीमा पामेप किसी पम्प भापा पपया प्रग्य कवियों के मास्प मंग के अनुसार से सम्बर।। इस प्रसग में उपायाप पो ने मेरठ पनपर के प्रमोम का प्रमाण मानते गए हम मरती 'हम फिरती है (पृ.१), हम बरसाती फिरती (प पाधि को रात कर दिनकर पौर प्यार से गिगार पर तीखा म्पंग्य किया है। उराध्याम पी हिन्दी मापा की प्रकृति से बाकीफ नहीं है। मध्य-वेप कीबह मापा जिसने संमत के स्थान पर मम्पदेमीप ससहति के बइम करन का दामित्व उठाया हिन्दी पहभाती है । समिए भोजपुरी वेग * कबीर मैपिनी मेरे पियापत्ति प्रबंधी मेण तुमसी पौर बगमापा हेग + मूरदास मे भोजपुरी, मषिवी प्रबपी और पबमापा मो नखनी ही है जितनी कि पान की सही मोमी में बड़ी मोती । पिस कपि में समय मभ्य बस को प्यान में रखकर सिखा वह हिन्दी का कवि हो सका मोर को अपने जनपद की सीमा का प्रविषमण कर सका यह बोमी का परि मात्र शाकर रह गया । इसलिए मूर की भाषा में पंजाबी पौर भागपुरी कमी प्रयाय मिलते हैं। मो मोम कविता में राम मेरठ की बड़ी बपी कोही प्रमाण मानन को करियर न हिन्दी भापा की प्रहति का सूक्ष्म जान नहीं है। पांचवा प्राक्षेप किसी प्रपिर पि पयमा प्रम्प मापा ने बाम व मनुवार से संबधित है। उपाध्याय पी ने बड़ी कठिनाई सो पार उदाहरण निगमे ।। वैसे-'बासी रपव मौत पर 'शस न । समुठा मुरो से हमें दनुज वाहो में कवि प्रमी एकही तल पापि म इस मम्बन्ध मे यही कहना है कि पब तुमसीवान को उपाध्याय जो स्या कारे । यो मोम काम्प में उमरने वामी समग-बीवनसष्टि को उपधित कर Jध वाक्य-संग के अनुसपान में ही रम मेते. उमकी प्रतिमा की प्रसंसा तो करम हो । काम्पमत मासिकता की स्वनी सही पर्वा हिन्दी पागोपना में पोर काही रेखने कोम मिनी । थी ममगत परण उपाध्याम के रस निबरम का पार में ही मुम्म प्रश्न ग्मरत है। हिन्दी कामामोघम के भैग में पीय सौवा प्रा गई है। पार हिन्दी का पि काम्पोतर मूस्यों से मापा पाता है। इसीलिए पसना' के एक पर मेवा का पयत पर म उतर ए पीनी मामुपों स नहीं बस्ति परपुराम की प्रतीक्षा' स मारतीय प्रजातन्त्र का भविष्य पतरे म रिसमाई पर। या एक अद्भुत बात है कि यहाँ भी नेमियन न 'पपी' को प्राधुनिक प्रति का काम्प मही मान राही भी भारत-भूपस अपमान संधी को प्रत्याधुनिक प्रवृति का काम्प मान पाध्यासोपन की समस्या प्रौर उर्बपी । इन प्रसन में हम इतना ही कहेंगे कि पुरावा की पिस हिमा का चित्रण भकर न किया है या कोई पाधुनिक युग का कमि ही कर सकता है। निी काप्पासोपन को गति मत ना तो उसे काम्येतर सीमामों म पवित्रमरस करना होमा । काम्पालोपन के सभी नियम पापी प्रयवा स से मही प्राप्त किए पा सकते हैं। प्रयमा ग. रामविलास धर्मा की बानी चाहिए यो काम्पेतर भार मसागों में उलझ कर महीं रह पए ।
उपलब्धि और सीमा पई प्टियों से 'बंधी'का महस्स परी योमी काम्प के इतिहास में प्रप्रतिम है। इसके बाराही मोसी को सामH + नमे मायामो का उद्घाटन प्रा है। मापा की पीधि में मिहित को माधुर्य होता है उसका वस्कप 'उम्मी' में है। पत्तमाम काम्य गो कई मुरों पांच-पावास कर पा पा रन सब की परिणति 'पर्यती' में हुई है तथापि 'उईसी' र काम्प मही है जिसकी प्रतीपा हिन्दी का पाठ कामायनी' के प्रकाधन क मारकर महाकाव्यत्व 'उबंधी महाकाम्प नहीं है। स्वयं बिनकर मे मिपा है महाकाम्प पनी मिबा गावा है पर पुप की अनेक पिचार धारा बैग से बहती हुई किसी महासमुर म मिमना चाहती है। रब एसी भनक पाराएँ वेगवन्त प्रवाह में होती तिमी महाकाम्प की रमा का समय माता मोर को कपि ग्मा महामिसन के लिए सापर का निर्माण कर सकता है, वही महाकाप्य निपने का अधिकारी होता है। महाकाप्प की रपमा मनुष्य को विकास करन मामी अनेक मारपारापो पीप सामपस्य पान का प्रयास है महापाप्म की रममा समय के परस्पर विरोधी प्रश्नों के समाधान की चेष्टा । पर परम्परा से पामेबाट महान प्रश्नों और भावों की प्रमुभूति में परिणतन होता तय मनुष्य का सस्कार भी परिवर्तित हाल समता है या इस परिवर्तित संस्कार को पित्रित करन के लिए ही महालाम्प मिप भाव है। महाकाम्म पुग की समय बेतमा उसरे ताप उसकी म्पपा एब उसकी पापा का बपण होता है को मनुष्य को मनवामी प्रस्नो का समाधान मारवापरातम पर उपस्पिनखा है। सभेप म, प्रनारीवर १ उपसम्मि और सीमा सभी में ऐसा कुछ नहीं है । समग्रता में चीवम की स्पाम्या की तो गाव ही पर है पना विचार पायमों के मपबन्त प्रवाह की कई माफी भी मही है । महाकषि मुम ताप को भीरकर निकलता है, संपर्पो से चूमता है उसक काप्य में इस सपप को विकमता रहती है। 'बंधी कपामा म इस मापक काममास (Camra) का प्रत्म ही मही उठता है। हालीव पर एक घोटी-सी मूबमुख तस्वीर पवार बनाइ पा सकती है पर निरषय ही उसम परम्ता पौर एनोरा की पुप्रमों की विणता पौर विनियता नही पा सकती है। ऐम कार्यों को पनी भी महाकाम नहीं कहा गया । कामिरास हा 'मनात प्रत्यन्त ही पप्ठ काम्प परन्तु कामदास की माता कारण उस किसी न महाकाम्प नहीका है । 'उबंधी' में कहीं-कहीं पर ही अप्ठ काम की गरिमा किनु महाकाम्प की उपायता म्पापण्या मानोर्य भार स्पापरय का निर्वाह मही हो पाया है। हिमात्रस्त समुप्प को मानता का बगा, चित्रण है, किन्तु बिमा की गुहा को पीरपर समाधान को भुमी पूप कही नहीं है। पुरुरवा अत्याधुनिक नाववोध को उपज पा निवासस्ठ मनुप्प पुररथा है। यह पुररवा रिमार की प्रत्याधुनिक परिपतना (Uma Modern Consciousnas) का बिमक्षण उदाहरण है। बिधान , यहाँ मनुष्य की पुरानी माम्बतार्यों का पम्त पिया नही ना माम्यताएं मुम्पिर नहीं बन सकी है। विधाम का रप पर पाया तब उसने पहना पसा धर्म पतरे का रिया। ममुप्प हाप म गणुमार पति कम्ति हा पापौर उममे सिर उपासना में उतनी उत्कटमा मही प मई। यानी मनुष्य की प्राप्तिमा कुपोतो पड़ो। फिर, कति पर मनुप्प न रिचय प्राप्त की और प्रारतिक गीवन म यह रिमुव हाम नपा । नवीगा यह हुमा है कि पार के मनुप्प पा गीवन-यापन म तो निसर्प-मिर है पौरम उसकी मास्तिकता पूर 'सर' । मारा मनुष्य स्वयं एक प्रपन हि । यह विपिम म म उसम मया है । पापा पब मी कसा उसकी पगुमा पर भी मप है। माग हो मा बल म इमे भागंज होने मपटी है। पिरमी पाप कम मार भी मकरसोय पापरणोंठेन भर उस मकर नी उसकी मनुप्या मरी नहीं है। पर भी यह पाहना कि पाया मा बापार मिट्टी को मारा सम्पार है। पिमान म, भाव नर पिनन में उमड़ी समस्या का पौर भी ग्मन्म दिया है।
र्यपी : उपसम्धि पौर सीमा पही पुरता है। उसका पर्प 'एकरमिक है। उसका प्रेम रासनिक है। यह प्रेम किसी साहसिकता को बम्म नही देता है । मार द्वारा कमरमों के कर्ममेव का पो निस्वार होता है, उर्ममी' में उसकी कोई माकी भी नहीं है। पुररया ये म्पत विरह की उड़ाम विकमवा का कोई पोषिल्प नहीं है। कषि प्राग की इस मामता का मापार के पराठम पर कोई सामयस्य नहीं उपस्पित कर सका है। उसी को स्वयं इस राव की शिकायत है कि उसका मिमन 'सनना की मर्याद' पंवाकर ही सम्भव हो सका है। पुरषा बस बप मरोस बैठा पा कि उसके 'मन का पार बार पूर को मेर पंकी ने मन को सम्स कर देपा पार यह मूवम पर स्पम बमी मागी। पुरषा का यह तर्क कि उसमे म तो कभी दूसरे के स्वामीन मुकुट पर बाप माया पौर न कभी दूसरे की बसुपा हरन का संघर्ष किया उसके पारिधिक स्पं को पवाय पोधित करता है परन्तु इससे उसक गाम प्रेम का पौषिरम नहीं मिस हो पाता है। मर से देखने पर तो ये सारी मा रिनार के पत्र में नहीं पाती है पौर ममता किकपि मे एक बाल पान की सृष्टि की है। पर मोदी भी पहराई में जाते ही दिनकर के विराट 'पियन' (Vilon) से हमारा परिचय होन लपण है। कानिवास की तरह दिनकर का पुरवा पपा कम के परातन पर नहीं स्वरता । दिनकर बम रसके पराक्रम का मुस कपन करते है। किन्तु, इसीपिए ऐसा लगता है कि दिनकर का पुरषा प्राथमिक मनुष्य की विधा का सबधे बड़ा प्रतीक है। मान के मनुष्य का कर्मपम निस्तेज हो पपा है। पाप का मनुप्प तिन में सम्मी-बम्बी मात करता है पर फर्म में पायाचित् ही कभी प्रवृत्त होता है। भाग के मनुप्प का संबर्प प्रपिफरार्थमिक पार एकरमिक' ही होता है। गंटे का पास इसी कोटि का मनुष्य है । ऐक्सपियर का इममेट ऐसी ही परिकल्पमा है। उम्पी बब पसी राती र पसरा उपमानों पर उत्प्रेक्षामों की ममी मगा रेवा मेकिन वास्तविक मिया में प्रकट नही होता है। पुरुरवा और मनु मही स्मिति कामायनीकार के समय भी पी। कामायनी में मनु प्रपमी परिसीता को प्रोड हाकी पोर ममावे। उर्मपी में भी पुराणा पोपीनरी को मोह संधी के प्रति प्राम्प्ट होता है। कित, मनु की उपम्पि पौर सीमा रवि में ना मार पा किदे प्रकले नी रागरस को बय पना मुछेप। 'रोम्र मनु का हाप न पर भी सवा पा। प्रापम का नी म किन्तु साहस मुकता पा।" या मनु एक बार मनुष्य है । इसका जीवन प्राति से एकाकार है। म्य प्रति को यह बीत महो सका है। सति की या उपसम्मि हाती है असम इसका परिषय नहीं है। मिसी प्रज्ञा की मोर यह इन्धा मरे नपन मनिहारता ईमार उसकी दृष्टि से प्रामपए का राग न पाकर उस पर "ता है। गिप्टता उसकी कोई विषपता नही है । संयम उसकी प्राति मही है। ठीक इसके विपरीत पुरणा पूर्ण मुसहरा मनुष्य है। मनु म बर्गर मामला है पुरवा में समातिनीसा । पुरवा ही ऐमा कामकता 1-'पिर एयर हूँ इस मामुता हित । प्रसाद पोर दिनकर की रप्टि में पही पन्तर है। 'मनु' एकरम भनपा मनुष्य है। पुपरवा में पनभिगाग्य का प्रसार है। इसीलिए उसकी रति निराण प्रौर बियोग की पट्टान से टकराकर सम्मास की पोर मुग गाती है। हाय रे । मानिक मनुष्य का माग्य ! पर ही पा सम्मा? पार के मनुप्प का कपि पिटना प्रार है उसका दापनिक रखना हो प्रथम पारित पकिरण है। कम की कठोर भूमि पर रमक पर उतरन में मनाते है । इसीलिए उसक ागीरन की पन्तिम परिम्मति समके भावना अनुदम नहीं होती है । पसकी कामना की पमा किसी मित्र की पटा में पटक गाती है। पुरा हिन्दी का हममेट है। एसा विचन (Vitam) कोई पत्याधुनिक प्टि स सम्पन्न कपि ही देश माया है। हिम्पो कविता के मासाधिक वर्षों के इतिहास में पारणा निमपण निर्माण है। हिम्मी कपिता नायकों की 'सरी से यदि पारमा को निसान रिया गाय दो पा करी नाहीन होगापपी। इम पुरषा की पैराश्य एकाएक महीं हुई है। कार की 'भषिप्य की पाट पोर्पक करिता में दिमकर एफ एम ही मनुप्य की प्रतीक्षा कर रह पेइम पुपरपा पो पाप पुत्र म भी मुनाई पाती है। सक्षम सर्म में 'मानम बोरपन सा गमन बामा पुस्प'-पही पुररमा है दिनकर की १ कामायनो २.१ चक्षी उपसम्मि और सीमा माइम पेठना इसी पुरसा की वोर में अब तक पी । पंपकार भरी हुई बोषियों होकर मानवता का कारवां पुएप पिचर की पार गवा पाया है। हर मुग मारधार इस प्रकार में पार वाकर निता पाया है मफिल ममुप्प की पप-यात्रा पर नहीं हुई है। इसी का प्रतिश्प पुपरसा में है 1 फिन्तु 'उबंधी' की मम्तिम परिणति कपि की पपनी भावना के प्रमुाम मही हा सकी । प्रन्स में मारी पृथा बम्प विक्रम विसाम' पार पहिक सिडियों की कृमि के लिए परियों से उपेभिठ देस मारी ही बनकर ए बाती है। सहरी या बात मन में उठती है कि पेप्पी मनुष्य की इम परिगति पर एक प्यम्प (Sauire) तो नही है ? पुरखा मम्यास मगर पम देता है। इससे निप्पप तो यही निकलता है कि काम मोप का सहन मार्य नही है। मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति के लिए रुधिर मोर मास-पुत्र की सनसनाहटों सम्पर उठना ही होगा । पुररणा की पर देगी सम्पर्स मानवता की ट्रेपलरी है। मौर या पुरर इस परी का प्रतीक है। यह पुपरवा पर उपर से भोम में पाहुपा है किन्तु, मीतर से विपप्ण । ठन पराधम पर यह मनुप्म है किंतु, मन के भरावम पर सन्यासी । माधुनिक सभ्यता और ससति की मम्पूर्ण सरिकप्टता का प्रतिस्प है यह पुपरपा । उसकी उममन माधुनिक सभ्यता की नमन है और उसकी देरी इस सभ्यता का जिमना । दिनकर के मन में ही मनुष्य का मिजम' (Vinon) रहा होगा जिसको म्पत करने के लिए उम्हान कुरक्षेपम सिमा पा- 'मोपावर इस एक पुस्प पर कोटि-कोटि सम्पासी । नही बह पुस्प है । दिनकर की राष्ट्रीय कविताएँ काम पपी नही बन मुकगी सूर पौर बिहारी की समृश परम्परा में उसकी प्रम सम्बम्पी कविताएं पापर पपना मारपण यो बैठे कितु, सी पुररा कारण हिन्दी साहित्य इतिहास में रमका स्पान प्राप्त पगा। यह उनका मिसयस निर्माण रति-विकास का क्रम 'वणी में पति का कोई स्वाभाविक विकास भी मही दिसनामा है । प्रेम के समय म कपि का शिकाए रमानी । ईपी पोर पुरया का प्रेम पिसी सम्म पाषर्य का परिणाम नहीं साकि सूर न मा पोर उप्प के प्रेम म रिपधाया है। राधा-पण साप-साप पतिमौनी एमठ
उमरिप और मीना
भ, माप्ट म माप-साप गान मान रात म परों भर म गाकर एक दूसर
पर पनावे और मिटावे में। उमा प्रम प्राकस्मिक विष नही पा।
मिन्न मामी इष्टिकोण प्रम के पागमन को मास्मिा मानना है।
मारिका का नापा म किसी विपति स रा पर मिला, तुरत मन
हो गया । और वा पौर, संधी' न रतिमा का विकाम नही
दिवसारा गया है वैसा कि प्रसाद न 'भमानी' म दिपसाया है।
मामना' में प्रणप पीर-धीरे मुसित हुपा है, परन्नु 'पी' में पह
एक बारमी पिस पमा है।पदा में पहन मिरहिपा है या
मामा-
"मिर पी पन भी मी नासिका की नोक ।
मू सवा पीन पी पी बरोक।
समरने यो जग्गा समित कर्णपोम ।
भरा पुमा रम मा पा मरे पद-पद् बाम ।'
रिम्' ता प्रयम पपन से ही 'कानना बद्धि की पिपा मुख
में पनामा, म इनिबार बन गावो है। मनोविज्ञान की रट म यह एप
चना महीप शिर , 'रमबी' में प्रायनरकास का एक न
माया-
'कुछ पिम्मर दुध पीन सपा में
परिमापा कुछ मन में।
पर ममाप पात मुन्न मरिया
प्रपन अपम परिवर।'
मह पर 'T' परिमाही लिना मुरा।
रामाख्यारम
"उसमी मसिम प्रमानाबीशको गावो है हम भी उन
भूमि पनिरिठ मोर इम ही नहीं। सर कपि न मारता
कामारनी २४
२ ग्यो.
संधी उपसम्पि और सीमा 'भौतिकोत्तर सौन्दय' का संकेत दिया है। काम को प्रमात्म की पोठिया पर प्रस्तुत करने का भय तबाद में गाव पाने हो पा है। रिनकर में सय भूमिका में इसका संकेत किया है। घायब महामूम्प सहस्त्रार पनि तबार प्रनक परिभाषिक सों का प्रमीम उघी म इसीलिए हुमा है। 'उबपी' का कामाभ्यारम प्रमिनर मनोविज्ञान के पामोक में स्पोतित हो सका है। यूरोप में अब फाया पापे तग धर्म के निवृतिवादी स्प के पाप उपाने ममे पौर मनुष्य की पुर्रम बिजीविपा में काम की महिमा को समम्म । इसी क उपन्यासकार १९वी भवाम्बी में सेमवेस बटसर पोर बारमयर इप । काम पर प्रमाातिक नियत्रण म मनुष्य की जिजीविपा को मार दिया था। परिणामत एकपमा सम्पता पौर सति परा में ही पी। किसी पुरक का एक युवती की पोर निहारना भी पाप सममा पाता या। इसी परिस्साम में १९ पी सताब्दी में अप्राकृतिक पौन-सम्बन्मों का प्रचार पोर-मोर मुकापा । गे ए. भारस की पावाप हस्तमैवम की सम्यता के विरोप में उठाई पई मानाप है। मारेंस प्रमृति उपन्यासकारों ने यह बताया कि सस का पारीरिक पप गहित पौर हेय महीं है। सेक्स हमें पता प्रदान करता है। मनुष्य में इससे ममी ति मखी है। सारेन्स ने बनाया है कि नर पौर मारी समायम के पलों में मनुष्य का एक वय पुनर्नम्म हावा । यही मोड है। देश की पर पपड़ी टूटने नपती है तो पारमा में भी प्रसीम मानोक पर बाता है । दिनकर भी यह मानते हैं कि प्रेम पनमता है वह से किन्तु, रसके विचरण की सारी मीमा-भूमि लगा पौर पिर तक ही सीमित नहीं है। प्रेम भावना है किन्तु, यह वासना प्रारमा में पसीप प्रसार भर देती है कि सर्प का परम सत्य म से पस की मोर माना है। मिदवे प्रेम करने की क्षमता साधारण पता नहीं है। यह तो हरम के मापारिपा प्रसार का माम 1 या मनुष्य की ग्स पछि का नाम है, को रिकसित होकर उसे दूसरे ममुप्प के साथ एकागर कर रती है। जिस हम साधारण प्रीति कहते है मी हमारी सधानों में पर पीर बेतमा म बिषमी भगाकर हम पर ला सकती है।' दिनकर काटामाप्यारम यही है। पही प्रेम की प्रतीन्दियता है । कापिक सम्पर्क फू भी गाता है, तब भी उसके माधुर्य का मोव नहीं सूबता है। म जनमनाहर बनी रहती है। दिनकर मियते, पर मप्र हो। मिरठी १ पर्षनारीसर, १६.
निभूत गुफा में 'मम्मिपिनामा सेवा पा। किन्तु प्रधानता एक में की भूख की बी पौर सरे में मनकी प्रासक्ति की। किन्तु 'पो म प्रम का चित्रण ठ-प्रतिपय मानवीयवहप की भया मी, मन का सम्पास पी। दिनकर ने ठीक ही पुरावा मासे पहनवापा है कि उपमम्पि पौर मीमा मसार महीं मानी।' बंपी' प्रेम की प्रतीप्रियता का पाम्पामा इसी प्रप में यह कामाप्यारम की कविता है। बस्तु सम्मपानी पिनि ही ऐसी होती है परम्पति 'रत के रण में समार प्रापना गी' माना पाहता है । दिनकर काम की अनिवार्यता पर पाह विवमा अपरेमिय यह कमी नहीव्हते कि काम मात्र रेह की भूल है। उमनि 'सीम हम पनुप का रन मांग कर यह प्रयास पिया है कि ममिनता मोर मयाममा से मरी भूमि मे थे प्रनन्तता का बीम यो दें। यह प्रयाग मिनी पर सफ सफम हुमा है काम्पानोपन का विपम यही है । परि उनका प्रमाम मध्य हमा पो हिन्दी सेन में नमी नतिकता के नवा मान मिए पाएमे । पदि प्रयास सफल महीं पा तो पा भी कम नहीं होगा कि मपी पोप उन्हें पापमा बार सममी। प्रेम का स्वरूप रीति काम्म मारमता की उपासना करता था। उस सुप का कवि पिसी भी पुरती मुमरी को निको मेना पाया । घामामारी काम में मार मा प्रचामतमा मानम-मोक की प्रणामिनी य गई पिके हाप उसकी रको ने में मिलने का यो रीति मुग का भी कपि मम दो पिया के भांबरे मरत' की वर्षा कर मेवा पा पार पायापार का कमि भी अपनी मूमते जिसे सस्प ही यह यम पमी अनुग है। विधा का सबसे बरा चितेरा पौर यह बात स्पष्टता से नही पानी पाहिए कि 'मी' में ममुप्पी हिमा का बेगो भित्रम्प हुपा है। सिया प्रस्त मनुप्प---- मनुष्य जिसमें मिट्टी का ताप भी है, पगन की पीवसता मी-पापो पम पौर रियप बीप हिम्न एवारे-पा पा ही मार्मिक चित्रण 'उबपी' में है। सपा- १उवधी १
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उपशी उपसम्बि पोर मीमा
प्टि का पा पय है बह रक का भोग्न नहीं है।
स्प की माराधना का माम प्राप्तिगन नही है। .
किन्तु मनुप्प के मम का पशु पुन प्रपनी सम्पूर्ण गबरता के माप जग
उखा है-
पडी प्रारापमा का माग
प्राप्तिमन नहीं तो और क्या है?
म्नेह का सीमार्य को उपहार
रस गुम्बन नही पा पार गया है?
कही-कही इस हिमाका पिनग्ग एक ही प म दो ममा है -
सण म प्रम प्रभाष मिन्यु हो पामोग्न में 18
पौर पुन बह धाति महा पग पत्ते भी हिमत हों।
पनी पियुष-युग के परिषम से उत्तुस्न हरी सी
मौर ममी मह माय गोद म पी 3 में जैसी
पुरती नारी ही प्रार्पमा की कोई करिता।"
दिनकर मुसतः दिपा के कवि है। और इस दिषा के पिषण म पाहे
यह 'कुयर' हो पा पो+रे पापुनिक साहित्य में सर्वोपरि ठहरते है।
इसके पगाव म पुरखे' या 'मी' सापारण रचना बनकर एयर होती।
पनुभूति की तीपता-पानी कविता का वास्तविक उपारान लिबर में है-
किन्तु पाम की तमाम में-अभिष्मप्ति के परावम दर मावे-पावे बह
उस कप में महीप पाती है। कुम्मेष पौर उसपी' फे स्पापरम में प्रपम
मसी की प्रतिमा का कोई सन्त महीं मिमता है। परिसामत' दिनकर
पिबर पर नहीं पाते है।
२ खपी,
२ वही
३ पही
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