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Rajasthani Sahitya Ka Sankshipta Itihas
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राजस्थानी साहित्य का
संक्षिप्त इतिहास
डॉ. गोरधनसिंह शेखावत
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दी स्टूडेण्ट्स बुक कम्पनी
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राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास
प्रयम सस्करण: 1989
50.00
प्रकारक । दो स्टूडेण्ट्स बुक कम्पनी
धौड़ा रास्ता, जयपुर-302003
कोतिमान प्रिन्टर्स, जयपुर
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फोन - 72455
74087
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भूमिका - राजस्थानी साहित्य के इतिहास को लेकर डॉ. मेनारिया, सीताराम लालस एवं डॉ. होरालाल माहेश्वरी के शोधपूर्ण एवं कटिन परिश्रम से लिसे हुए ग्रंथ उपलब्ध होते हैं । डॉ. होरालाल माहेश्वरी का प्रप्रेजी में लिखा 'हिस्ट्री मॉव राजस्थानी लिटरेचर' राजस्थानी साहित्य की प्रयतन प्रवृत्तियों को प्रस्तुत करने वाला पूर्ण इतिहास ग्रंथ है लेकिन फिर भी मान इतिहास लेखन की आवश्यकता बनी हुई है, इसका कारण है- साहित्य चेतना का युगबोध से जड़ कर निरन्तर बदलते रहना और फिर उनके अनुकूल प्रतिमानों को स्थिर करके, उसका मूल्यांकन करना । राजस्थानी के प्रारम्भ काल मोर मध्यकाल का साहित्य प्राज हमारे सामने है तथा विद्वानों ने इसका मूल्यांकन भी किया है लेकिन आधुनिक साहित्य निरन्तर लिखा जा रहा है अतः उसकी साहित्यिक प्रवृत्तियों को पहचान कर उसको रचनात्मक शक्ति का मूल्यांकन प्रति मावश्यक है । मैंने इस इतिहास में इसकी सीमा को ध्यान में रखकर ही माधुनिक काल की साहित्य चेतना, तत्कालीन परिवेश और बदलती रचना-दृष्टि को मूल्यांकित करने की कोशिश की है तथा उपलब्धिपरक रचनामों की विशिष्टता का सकेत भी दिया है। माधुनिक काल को रचनामों का मूल्यांकन करते समय साहित्यिक प्रवृत्तियों को तलाशने, उनके अनुकूल कवियो का विभाजन करने एवं उनका प्रवृत्यात्मक आकलन करना, मेरी दृष्टि रही है। मैं नहीं कह सकता कि मैंने भद्यतन प्रकाशित सभी रचनाओं को इसमें समेट लिया है, फिर भी कुछ का सन्दर्भ दिया गया है तो सम्भव है कुछ सन्दर्भ छूट भी गये हों। इसका कारण मेरी और पुस्तक के फलेवर की सीमा ही कही जा सकती है। मैंने उपलब्ध इतिहास ग्रंथों, समीक्षा पुस्तको एवं पत्र-पत्रिकामों से इस प्रकार सामग्री जुटाई है कि जिससे राजस्थानी साहित्य के इतिहास की एक सक्षिप्त रूपरेखा बन सके, ऐसी स्थिति में, मैं सभी विद्वानो, रचनाकारी एवं पनों के सम्पादको के प्रति भाभार प्रकट करता हूँ। प्रादरणीय हॉ. हीरालालजी माहेश्वरी का इतिहास मेरे सामने आदर्श के रूप में रहा है, मैं उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु अगर मुझे चिन्मय प्रकामन के मालिक भादरणीय ताराचन्दजी वर्मा की ओर से प्रेरणा और प्रोत्साहन न मिलता, तो यह पुस्तक तैयार होना असम्भव थी, उन्हें किन शब्दों में धन्यवाद ! गोरधनसिंह शेखावत
अनुक्रम
राजस्थानी भाषा का स्वरूप
प्रारम्भ काल
1
मध्यकाल
16
प्राधुनिक काल
30
56
अध्याय 1 राजस्थानी भाषा : स्वरूप-विवेचन राजस्थानी माज राजस्थान की मातृ-भाषा है । राजस्थानी भाषा का साहित्य सम्पूर्ण भारतीय साहित्य में अपनी एक अलग पहचान रखता है । राजस्थानी का प्राचीन साहित्य अपनी विशालता और अमाधता में इस भाषा की गरिमा, प्रौढता और जीवन्तता का सूचक है। आज भी हस्तलिखित प्रथों एवं लोक साहित्य का जितना बड़ा भण्डार राजस्थानी भाषा में है, उतना शायद ही किसी भाषा के पास हो। जिस तरह राजस्थान की परम्पराए अद्भुत रही हैं, ठीक उसी प्रकार यहाँ का साहित्य भी अद्भुत । राजस्थान अपने वैभवपूर्ण अतीत, गौरवमयी परम्पराओं और सांस्कृतिक जीवनादर्शों के लिए पूरे विश्व मे सुविख्यात रहा है । अनुपम त्याग, महान बलिदान और उच्च कोटि के शौर्य, वीरत्व तथा पराक्रम के लिए प्रेरणा-स्त्रोत रही है, यहाँ की वीर-प्रसविनी मरूधरा-राजस्थान की मूमि । जीवन हर क्षेत्र में, जीवन-मूल्यो और मान-मर्यादाओ की सीमा स्थापित की है, यहा के रण-बाकुरों ने । उज्ज्वल कीर्ति और दैदीप्यमान गाथाओं में परिपूर्ण रहा है, राजस्थान का इतिहास । इस तरह की धरती से जुडा राजस्थानी साहित्य लौकिक और सास्कृतिक परम्परामो का धनी रहा है, यही कारण है कि देश और विदेश के विद्वानों ने राजस्थानी साहित्य की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है । रस, भाव और स्फूर्ति से परिपूर्ण राजस्थानी साहित्य की तरफ सर जार्ज ग्रियर्सन, डॉ. सोटरी, डॉ. सुनीतिकुमार चाटुा प्रादि भाषाविदों के अतिरिक विश्व-कवि रवीन्द्रनाथ,' ठाकुर एवं महामना पं.मदनमोहन मालवीय का ध्यान भी प्राकृष्ट हुआ है । वीर रस को जैसी उच्च कोटि की कविता राजस्थानी साहित्य में है वैसी अन्य भाषा के साहित्य में दुर्लभ है। यह कविता उन कवियों के द्वारा लिखी गई, जिन्हें युद्ध का प्रत्यक्ष 'मनुभव था क्योकि वे कलम के साथ-साथ करवाल-ग्राही भी थे । वीर रस को रचनामों पर मत्र-मुग्ध होते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था - 'भक्ति रस का काम तो भारतवर्ष के प्रल साहित्य मे किसी न किसी कोटि का पाया जाता है परन्तु राजपान ने जो साहित्य निर्माण किया है उसको जोड़ का साहित्य मोर कही नहीं सम और उसका कारण है। राजस्थानी कवियों ने नि सबके बीच में " नगारो के बीच अपनी कविताएं बनाई थी। इस मन से प्रार" 2 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास । i. भूतिमय चित्रण के कारण राजस्थानी का वीर रसात्मक साहित्य मार्मिक और भुजानों को फडका देने वाला है । अपने परिवेश को स्वाभाविक अनुभूतियों का उल्लेख ही तत्कालीन रचनाकार रचनात्मकता का महत्वपूर्ण विन्दु था । इसी भांति महामना पं. मदनमोहन मालवीय ने भी राजस्थानी साहित्य की प्रशसा करते हुए कहा था- राजस्थानी वीरो की भाषा है। राजस्थानी का साहित्य वीर साहित्य है । संसार के साहित्यों में उसका निराला स्थान है। वर्तमान काल के युवको के लिए उसका अध्ययन अनिवार्य होना चाहिए । इस, प्राण-भरे साहित्य और उसकी भाषा के उद्धार का कार्य अत्यन्त आवश्यक है"..."में उम् . दिन की प्रतीक्षा मे हूँ जब हिन्दू विश्वविद्यालय में मर्यागपूर्ण विभाग स्थापित हो जायेगा, जिसमे राजस्थानी भाषा और साहित्य की खोज तथा अध्ययन-अध्यापन . का पूर्ण प्रबन्ध होगा। इससे प्रकट होता है कि राजस्थानी साहित्य के जीवंत. और. निराले.रूप ने देश के विद्धानो को प्रभावित किया है । साहित्य को जीवंतता. और उसका प्रेक... स्वरूप ही किसी,साहित्य को कालजयी रूप प्रदान कर सकता है । राजस्थानी साहित्य.. के मूल में ऐसी भावनाएं रही है, यही कारण है कि राजस्थानी के विद्वान... प्रो. नरोत्तमदास स्वामी ने लिखा है-'राजस्थानी साहित्य जीवन, का माहित्य. है वह जीवन से प्रतग पागलो का प्रलाप नहीं किन्तु जीवन के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाला है ! वह जीवन को प्रेरणा देने वाला. और उसमें नयी. चेतना फूकनेवाला.. है .........राजस्थानी साहित्य जनता का साहित्य है। जनता के जीवन के नानारंगी चित्र उसमें प्रचुर.सख्या मे मिलेंगे। राजस्थानी साहित्य मे जिन भावनाओं एवं मूल्यों का चित्रण हुआ है, उनकी व्यापकता जीवन और राष्ट्र के समग्र रूप से जुड़ी हुई है.।, जननी और जन्मभूमि के लिए त्याग और बलिदान, देशभक्ति और धर्ती,प्रेम, तारी. का प्रेरक व्यक्तित्व, मरण-त्यौहार की अद्भुतता, शत्रु, से प्रतिशोध, की भावना, स्वातन्त्र्य भावना, राष्ट्रीयता और अखंडता, शृगार और वीर रस का चित्रण, आदि... कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिनके कारण राजस्थानी साहित्य महत्त्वपूर्ण माना जाता है ।... राजस्थान का नामकरण-राजस्थानी भाषा राजस्थान प्रान्त की है लेकिन । पाहर ; भी कलकत्ता, बम्बई, मद्रास प्रादि प्रमुख नगरो। में राजस्थानी भाषी लोगों की काफी सस्या है अतः राजस्थान के नामकरण पर थोडा विचार कर लेना चाहिए क्योकि राजस्थानी नाम राजस्थान पर ही प्राधा- रित है। राजस्थान में साहित्य-सृजन की एक, लम्दी परम्परा रही है और इसके विशाल माहित्य की भाषा के भी कई नाम प्रचलित रहे हैं। राजस्थान । के 1 राजस्थानी साहित्य : एक परिचय, पृ. 19-20 राजस्थानी भापा: स्वस्म-विवेचन : - 'राजस्थान' शब्द का प्राचीनतम प्रयोग 'राजस्थानीयादित्य' वि००' 682 में उत्कीर्ण वसतगढ़ (मिरोही) के शिलालेख में उपलब्ध हुआ है ।। इसके बाद मुंहगीत नैणसी (वि० सं० 1667-1727) की ख्यात और 'राजरूपक' 2 (स० 1788) में राजस्थान' शब्द का प्रयोग हुपा है लेकिन यहां इसका प्रयोग 'राजधानी' के अर्थ में है । प्रान्त के अर्थ मे 'राजपूताना' शब्द का सबसे पहले प्रयोग जार्ज टॉमस ने सन् 1800 में किया। इसके बाद कर्नल टॉड ने सन् 1829 मे अपने इतिहास (Annats and Antiquities of Rajasthar में राजस्थान शब्द का प्रयोग किया और फिर व्यवहार मे यही शब्द प्रान्त के अर्थ में रूढ हो गया। आजादी मे पूर्व इस प्रान्त में छोटी-बडी 21 रियामतें थी। आजादी के बाद धीरे-धीरे उनका विलीनीकरण हुआ और राजस्थान पूरे प्रान्त के वांचक अर्थ मे स्वीकार कर लिया गया । जार्ज ग्रियर्सन ने अपनी पुस्तक. लिंगविस्टिकं सर्वे ऑफ इंडिया' में राजस्थान प्रान्त की भाषा को राजस्थानी कहां है, उसका प्राधार बहुत सम्भव है कर्नल टॉड की पुस्तक ही हों। प्राचीन काल में राजस्थान के विभिन्न भूखंडों के अलग-अलग नाम थे जो शासकों के परिवर्तन के साथ समय-समय पर परवर्तित होते रहे है यथा-राजस्थान के उत्तरी भाग का नाम 'जांगळ', पूर्वी का मत्स्य (जयपुर, अलवर तथा भरतपुर का कुछ भाग) दक्षिण पूर्वी का शिवि, दक्षिण का मैदपाट, बागड़, प्राग्वाट, मालव और गुर्जरत्रा, पश्चिम को मंद, मांडवल्ल आदि तथा मध्य भाग के अर्बुदव सपादलक्ष : आदि नाम थे। सॉल्वजनपद और परियात्र-मण्डल भी राजस्थान के ही मंग थे। अरावली पर्वत की श्रेणियां ; राजस्थान को.दो भागों में विभाजित कर देती : है-एक उत्तरी-पश्चिमी- भाग तो दूसरा दक्षिणी-पूर्वी भाग । उत्तरी-पश्चिमी भाग मे बीकानेर, जैसलमेर, जोधपुर और शेखावाटी का अंश सम्मिलित है । · सामूहिक रूप से यह भाग मारवाड़ या मरू देश कहलाता था तथा इसी भूखंड की भाषा मरू- भाषा कहलाती थी। इससे प्रकट होता है कि मरूभापा राजस्थानी के लिए प्राचीन नाम'या। मरू-भाषा--मारवाड़ या मरू देश में वोली जाने वाली भापा को मरूभापा की संज्ञा दी गई तथा एक समय यह समूचे' प्रान्त की प्रधान एवं साहित्यिक भापा थी। कालान्तर में राजस्थान का अंजमंडल के पास पड़ने वाला क्षेत्र बज एवं गुजरात के निकट पंडने वाला क्षेत्र 'गुजराती भाषा के प्रभाव में प्रा गया। राजस्थानी साहित्य का इतिहास': डॉ. पुरुषोत्तम लाल मेनारिया, पृ. 4 वही पृ. 4 मिलिटरी ममायर्स प्रॉफ मि. जार्ज टॉमस : पृ. 347 सन् 1805 एनल्म एण्ड एन्टीक्यूटीज प्रॉफ राजस्थान वाई कर्नल टॉड । 16 1. 2 3 4 4: राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास मरूभाषा का प्राचीनतम उल्लेख उद्योतनमूरि लिखित 'कुवलयमाला' कथा- पंच में मिलता है। यह ग्रंथ 8-~-9वी शताब्दी का है । इस ग्रंथ में 18 देश भाषामों के साथ मरू, गुर्जर, नार और मालव प्रदेश की भापामो के उदाहरण निम्नलिखित रूप में हैं- 'अप्पा-तुप्पा' भगिरे ग्रह पेच्छइ मारूए तत्तो 'न 3 रे भल्लाउ" भणिरे ग्रह पेच्छइ गुज्जरे अवरे 'अम्ह काउ तुम्हे' भणिरे अह पैच्छइ लाडे 'भाइ य भइणी तुम्भे भणिरे मह मालवे दिठे जैन कधियो ने अपने ग्रंथों की भाषा तथा कुछ विद्वानों ने राठौड़ पृथ्वीराज की 'वेलि' की भाषा को भी मरूभाषा स्वीकार की है। मरूमापा के दूसरे नाम 'महमूमभापा' 'मारूमापा', 'मरूदेगीय भाषा' 'मरूवाणी' आदि भी मिलते हैं । वैसे मरूभाषा ही आगे चलकर मारवाड़ी के, परिनिष्ठित साहित्यिक रूप 'डिंगल' के नाम से विख्यात हुई। वैसे रघुनाथरूपकार ने मरूभापा को 'भुरभूम मापा', 'रघुवरजमप्रकाम' के रचयिता ने 'मरूधर भाखा' और 'शभास्कर' के रचनाकार ने 'मरूबानी' नाम से अभिहित किया है । इससे स्पष्ट होता है कि मूर्यमल्ल मिश्रण तक आते-पाते 'मरुभाषा' या मरूबानी', "डिंगल' के प्र में ही रूढ हो गई थी और यह राजस्थानी के ब्रजभाषा प्रभावित रूप "पिंगल' से सर्वथा भिन्न थी। प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक डॉ. सुनीतिकुमार चाटुया ने भी इस भिन्नता को प्रकट करते हुए लिखा है कि 'पुरानी मारवाड़ी भाषा' जो कि मारवाडी और गुजराती दोनों की मा पी, उसमें साहित्य-सर्जना होने लगी फिर मध्य युग की मारवाड़ी के माधार पर पिंगल की प्रतिस्पर्धी साहित्यिक भापा 'डिंगल' भी प्रस्ट हुई अतः प्राचीन काल में जिसे 'मरूमापा' कहा गया, उसी का व्यापक नाम आज राजस्थानी है और इसमें राजस्थान के अन्तर्गत बोली जाने वाली समी बोलियों का समावेश हो जाता है। राजस्थानी मापा की उत्पत्ति--भारतीय भायं भापा का सबसे प्राचीन रूप वैदिक सस्मृत है। इसे ही वेदी की भाषा कहा गया है लेकिन सभी वेदी की रचना एक गमय में नहीं हुई प्रत उनमें भाषा सम्बन्धी अन्तर भी दिखाई देता है। वैदिक परफूल से संस्कृत का विकास इपा । पाणिनि ने इमे व्याकरण के नियमो मे बाप दिया सहन का काल 1500 ई.पू. से 500 ई.पू. तक माना जाता है । सस्कृत राजम्यानी भाषा पोर माहित्य : डॉ. होरानाल माहेश्वरी, प. गरम्यानी भाषा : हाँ मुनीतिकुमार बाटुरा, पृ. 58 2.
राजस्थानी भाषा : स्वरूप-विवचन : में पोळि का विकास हुआ और इसका काल 500 ई. पू. से पहली ई. तक है । बौद्ध प्रथों मे पालि का जो स्वरूप दिखाई देता है वह बोलचाल की भाषा का ही परिष्कृत रूप है। फिर पहली ईसवी तक पात-पाते घोलचाल की भाषा मै फिर परिवर्तन हुया और पहली ईसपो से 500 ई. तक इसका जो स्वरूप दिखाई देता है उसे 'प्राकृत' की संज्ञा दी गई। प्राकृत भाषा के समय कई क्षेत्रीय वोलिया भी थी जिनमें मुख्य गौरसेनी, पंशाची, प्राचड़, महाराष्ट्री, मागपो और अधमागधी थी । प्राकृतों से ही विभिन्न क्षेत्रीय अपभ्र शो का विकास हुमा । अपभ्रंश भाषा का काल मोटे तौर पर 500 ई. से 1000 ई. तक है। 1000 ई. से अब तक का समय आघु- निक भारतीय पापं भाषामो का है जिसमें राजस्थानी भी एक है । अाधुनिक प्रायं भापानो का जन्म अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों में इस प्रकार माना जा सकता है- अपभ्रश प्राधुनिक भाषाएँ तथा उपभाषाएं शौरमेनी पश्चिमी हिन्दी, राज नी, पहाड़ी, गुजराती। पैशाची लहंदा, पजावी। ध्राचर्ड महाराष्ट्री मागधी बिहारी, बंगला, उड़िया, असमिया। अर्घ मागधी पूर्वी हिन्दी। उपयुक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि राजस्थानी भाषा की उत्पत्ति अपे- भ्रंश के शौरसेनी रूप से हुई है । अपनश मुख्य रूप से पश्चिमी भारत की चोली थी और नागर अपनस अर्थात् परिनिष्ठित अपभ्रंश इसी धोली का साहित्यिक रूप थी। मार्कण्डेय और दट ने अपभ्रदा के भी कई भेद स्वीकार किमे हैं। ऐसी स्थिति में राजस्थानी किस अपभ्रश से निकली, इम सम्बन्ध में विद्वानो के विभिन्न मत हैं। डॉ. ग्रियर्मने के अनुसार राजस्थानी को उत्पत्ति नागर अपभ्रंश से हुई है। जबकि डॉ. सुनीति फुमार चाटुज्या सौराष्ट्री अपभ्रंश से राजस्थानी का उद्भव मानते हैं। कन्हैया लाल माणिक लाल भुशी ध श्री नरसिंह राव भो. देवटियो गुर्जरी व गुर्जरी भपका से राजस्थानी की उत्पत्ति मानते हैं। राजस्थानी विद्वानों में डॉ. मोतीलाल मेना.. सिंधी। मराठी। : 1 1. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र, पृ. 22 2. Ling iistic Survey of India, val. ix Part it 3. राजस्थानी भाषा : डॉ. सुनोतिकुमार चाटुग्र्या, पृ. 45 अ. भा. हि. मा. सम्मेलन के 33वें अधिवेशन का विवरण, पृ.9 6 : राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहास रिया, और डॉ. हीरालाल माहेश्वरी' भी गुर्जरी अपनश से राजस्थानी की उत्पत्ति मानते है । इस तरह गुर्जरी अपभ्रंश से राजस्थानी और गुजराती का तथा शौरसेनी अपभ्रंश से हिन्दी का विकास हुा । जिसे प्राचीन काल में गुर्जरी प्रान्त कहा गया, उसमें गुजरात एवं दक्षिणी पश्चिमी राजस्थान का कुछ भू-भाग सम्मि- लित था यही कारण है कि राजस्थान एवं गुजरात का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से परस्पर गहग सम्बन्ध रहा है। 15वीं शताब्दी तक तो दोनो प्रदेशों की भाषाएं भी एक थी। 16वी शताब्दी मे दोनो का (गुजराती-राजस्थानी) स्वतन्त्र विकास हुग्रा' डॉ. सुनीतिकुमार चाटुा के मतानुसार भी गुजराती और राज- स्थानी की उत्पत्ति प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी से हुई है और फिर आगे चलकर सोलहवी शताब्दी में गुजराती प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी से अलग हो गई। इस तरह गुजराती और राजस्थानी, दोनो भापाए' महोदरा हैं । भारतीय प्रार्य भाषानो का प्राविर्भाव लगभग दसवी-गयारहवी शताब्दी के मासपास होता है अत: उम समय जो भाषाए धीरे-धीरे विकसित हो रही थी, उन पर अपभ्रंश भाषा का प्रभाव लम्बे समय तक बना रहा। राजस्थानी के साथ भी यही स्थिति रही। 11वी शताब्दी से 15वी शताब्दी के बीच जो भाषा रही, उसके नामकरण के सम्बन्ध मे विद्वानो में मतभेद रहे हैं । चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने उसे 'पुरानी हिन्दी" मोहनलाल दलीचन्द देसाई ने जूनी-हिन्दी-जूनी गुजराती और कुछ गुजरोती विद्वानों ने इसे 'जूनी गुजराती' नाम दिया है जबकि डॉ० टसीटरी पौर डॉ० हीरालाल माहे. पवरी इरो 'प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी भाषा कहते है। इस तरह 11वी से लेकर 15वी शताब्दी तक का जो माहित्य उपलब्ध होता है, वह राजस्थानी और गुजराती दोनों भाषाओ का है। इसे राजस्थानी का आविर्भाव काल या विकास काल कह सकते है । ग्यारहवी शताब्दी से प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी भी बोल चाल की ही भापा रही होंगी। 1वी शतानी में '15वी शताब्दी तक के साहित्य पर अपभ्रंश भाषा का जो प्रभाव भाव और शिल्प पर पडा, उनमें राजस्थानी का लोकप्रिय छंद 'दोहा' एक है। यह छर भी राजस्थानी को अपनश की ही देन है । इस काल में जितने भी प्रेमान्यान (दोता-मारू रा दूहा, जेठवा-उजळी अादि) लिमे गये, उनमें इस लोकप्रिय छद का खूब प्रयोग हुआ है। 1. 2. राजम्यानी भाषा और माहित्य : डॉ. मेनारिया, पृ. 4 कान्हदे प्रबन्ध, पृ 5 राजस्थानी भाषा और माहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, प. 34 राजस्थानी माहित्य : एक परिचय : प्रो. नरोतमदास स्वामी, पृ. 7 गजम्मानी भाषा और माहित्य : हो माहेश्वरी, पृ.30 3. 4.
राजस्थानी भाषा : स्वरूप-विवेचन राजस्थानी के स्वतन्त्र स्प की चर्चा करें तो प्रतीत होता है कि पहले राजस्थानी अपभ्रंश से अलग हुई और फिर प्राचीन राजस्थानी से नवोन राजस्थानी के रूप में उसने अपनी अलग पहचान बनाई। प्रो. नरोत्तमदास स्वामी ने नवीन राजस्थानी की निम्नलिम्बिन विशेषताएं बताई है जो उसे प्राचीन राजस्थानी में भलगे करती है- 1. ए मोर प्रो-इन दो नवीन म्वगे को विकास 2. वर्तनी यो हिज्जे में अई-प्रउ के स्थान पर ऐ पोर पो का प्रयोग 3. नान्यर जाति (नपुंसक लिंग) का उठ जाना 4: शन्नों के अन्त में इ, उ और प्र के उच्चारण का लोप।। डॉ. सुनीतिकुमार चाटुर्या ने राजस्थानी भाषा को प्रमुख विशेषताओं को इस प्रकार बताया है- 1. राजस्थानी में 'अ' का उच्चारण 'ई' रूप में । 'मनुष्य' की जगह मिनग्य'। 2. मूर्धन्य 'ण'और 'ल राजस्थानी को दो विशिष्ट ध्वनियां है । मूर्धन्य है- ध्वनियों की तरफ भी झुकाव है । 3 कई पोलियों में च, छ, ज, # तालव्य ध्वनियों का उच्चारण दन्त्य सुनाई पड़ता है। 4. 'ऐ' तथा 'प्रो' यथाकम 'ए' और 'नो' के रूप मे उच्चारित होती है। 5. राजस्थानी मे महाप्राण प्रघोष वर्ग के थ, झ, ढ, ध, भ का उच्चारण विशेष एव मोलिक है। 6. अघोप महाप्राण ध्वनियों ख, छ, 8, थ, फ मे परिवर्तन नहीं होता। 7. घोप' महाप्राण घ, झ, ढ, ध,"भ शन्दों के पहले प्रयुक्त होने मे वे कठनालीय स्पर्श में मिल जाते है। 8. बहुत से स्थानों पर 'ह' लिखा तो नहीं जाता लेकिन अन्त में उच्चारण में 'ह' की ध्वनि का प्रयोग होता है । राजस्थानी को उपभाषाए या बोलियां- राजस्थानी यद्यपि मुख्य रूप से राजस्थान की मार्ट भाषा है लेकिन इसके बोलने वाले मध्य प्रदेश में इन्दौर तक फैले हुए है । इसके अलावा देश के अन्य दूसरे प्रान्तों 'मासाम, बंगाल, गौहाटी, महाराष्ट्र आदि में भी राजस्थानी भाषी लोग रहते है । राजस्थानी बोलने वालों की सल्या तीन करोड़ से ऊपर है। भाषा-विज्ञान के विद्वान राजस्थानी को हिन्दी राजस्थानी साहित्य : एक परिचय : प्रो. नरोत्तमदास स्वामी, पृ. , 1. 7 8: राजस्थानी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास से अलग भापा स्वीकार करते है लेकिन साहित्य जगत मे राजस्थानी को हिन्वी की ही शाबा स्वीकार किया है । प्रो. नरोतमदास स्वामी ने राजस्थानी की मुख्य चार बालियां मामी है- 1. पश्चिमी राजस्थानी या मारवाड़ी-जिमका क्षेत्र उदयपुर, जोधपुर, जैसलमेर, चीकानेर और शेखावाटी प्रदेश है । 2. पूर्वी राजस्थानी या ढूढाडी-जिसका क्षेत्र जयपुर और हाडौती का क्षेत्र है । 3. उत्तरी राजस्थानी--जिसमें अलवर प्रदेश की मेवाती और अहीरी बोलियां पाती हैं। 4. दक्षिणी गजस्थानी–जिसमे मालया और उसके दक्षिण प्रदेश मेमाढ़ आदि की बोलियां सम्मिलित हैं। राजस्थानी की इन बोलियों में विस्तार और साहित्य की दृष्टि से मारवाड़ी का विशेष महत्त्व है क्योकि मारवाडी ही सदा से राजस्थान की साहित्यिक भाषा रही है और राजस्थान के अलग-अलग अंचलों में रहने वाले सभी लेखको ने मुख्य रूप में इसे ही लिखित रूप में ग्रहण किया है। प्रो. नरोत्तमदास स्वामी के मतानु- सार डिंगल का मूलाधार भी मारवाडी ही है ।। डॉ० मोतीलाल मेनारिया और डॉ. हीरालाल माहेश्वरी ने राजस्थानी की पांच मुख्य बोलिया मानी है जिनका सक्षिप्त परिचय इस प्रकार है-~- 1. मारवाड़ी-~यह बोली जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर, मिरोही, शेखावाटी क्षेत्र, किशनगढ़-अजमेर और मेरवाडा क्षेत्र तथा कुछ स्थानीय भेदो से गगानगर, पंजाब एवं हरियाणा के कुछ क्षेत्रो में भी बोली जाती है । वैसे इसका विशुद्ध रूप जोधपुर और उसके प्रासपास के स्थानो मे देखने को मिलता है । मुख्य रूप से राजस्थान की साहित्यिक भाषा यही है और इसका साहित्य विशालता और विविधता को लिए हुए है। यह ओजगुण प्रधान भाषा है। सोरठा, छद और मांडराग के लिए यह अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त एवं प्रभावी है । मारवाडी को ही राजस्थान की परिनिष्ठित (स्टेण्डर्ड) वोली माना जा सकता है । 2. दूदाड़ी-यह जयपुर, लावा, किशनगढ़ और अजमेर-मेरवाडा के उत्तरी-पूर्वी क्षेत्र में बोली जाती है। हाडौती इसकी उपयोली है जो कोटा, बूंदी 1. राजस्थानी माहित्य : एक परिचय : प्रो नरोत्तमदास स्वामी, 4 3-4 4 3. राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. मोतीलाल मेनारिया, 4. राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृ. 34 : 2. 4 राजस्थानी भाषा : स्वरूप-विवेचन : प्रो झालावाड क्षेत्र में बोली जाती है। इस बोली पर गुजराती एव प्रज भाषा का प्रभाव भी दृष्टिगोचर होता है। इम बोली में भी प्रचुर मात्रा मे साहित्य उपलब्ध होता है। संत दादूदयाल एव उनके शिष्य-~-प्रशिष्यों की रचनाएं इसी बोली में है। 3. मेवाती-यह अलवर, भरतपुर तथा दिल्ली के दक्षिण में रोहतक एवं गुडगांव जिलों के क्षेत्रों में बोली जाती है। इस पर ब्रजभाषा का प्रभाव अधिक है। इस बोली में थोडा साहित्य भी उपलब्ध है, मुख्य रूप से चरणदासी पंथ के प्रवर्तक संत चरणदास और उनकी दो शिष्याओं-दयाबाई और महजोबाई की रचनाएं मिलती है। 4. मालवी--यह बोली मालवा प्रदेश में बोली जाती है। इसमें कुछ विशेषताए मारवाडी और ढूंढाड़ी की पाई जाती है। इस पर थोड़ा गुजराती एवं मराठी भाषा का प्रभाव भी है। 5. भोली या बागड़ी-यह बोली डूंगरपुर, बांसवाडा और मेवाड़ के कुछ क्षेत्रो में बोली जाती है । भीली को डॉ ग्रियर्सन ने एक स्वतत्र भाषा स्वीकार किया है लेकिन डॉ. हीरालाल माहेश्वरी इसे स्वतन्त्र भाषा नहीं मानते । उनके मतानुसार उसका मुख्य अंश राजस्थानी के अन्तर्गत है । यह क्षेत्र गुजरात प्रान्त से जुड़ा हुआ है इसलिए इस बोली पर गुजराती भाषा का प्रभाव भी है । इस तरह हम देखते है कि राजस्थानी भाषा की पाच प्रमुख बोलियां या पभापाए है जिनमें मारवाडी बोली की प्रमुखता है और साहित्य रचना के लिए पूरे प्रान्त मैं इसे ही अपनाया गया है । पद्य के अलावा गद्य में भी मारवाड़ी बोली का ही प्राधान्य रहा है। लिपि-राजस्थानी भाषा की लिमि देवनागरी से मिलती है लेकिन कुछ' अक्षरों को बनावट मे थोड़ा अन्तर है। राजस्थानी मे ल और ळ की अलग-अलग ध्वनियां है । इनका सही रूप में उच्चारण न करने से कई बार अर्थ-परिवर्तन हो जाता है । यथा--'गाल' शब्द में 'ल' ध्वनि होने से इसका अर्थ कपोल के रूप में है: लेकिन अगर गाल की जगह 'ळ' अक्षर का प्रयोग कर दिया जाय तो फिर 'गाळ' का अर्थ गाली से हो जायेगा। इसी भांति 'ड' और 'ड' की भी राजस्थानी में अलग- अलग-ध्वनिया है तथा इनका अलग-अलग स्थानो पर अर्थ-सन्दर्भ में ही प्रयोग किया जाता है अन्यथा अर्थ-परिवर्तन हो जाता है। राजस्थानी में हिन्दी के स, श, प वर्णी की जगह केवल म (दस्य रूप) का ही प्रयोग होता है । . 1. राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृ. 35 10- बोध' चारण उजास ॥ 10 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास डिगल और पिंगल-राजस्थानी साहित्य डिंगल और पिंगल दो भाषामों में उपलब्ध होता है । डॉ मोतीलाल मेनारिया के अनुमार 'डिंगल गजस्थान की बोल- चाल की भापा राजस्थानी का साहित्यिक रूप है और पिंगल की अपेक्षा अधिक प्राचीन, अधिक साहित्य सम्पन्न तथा अधिक प्रोजगुण विशिष्ट है। राजस्थान में पिंगल भाषा मे भी काफी साहित्य मिलता है । पिंगल का अधिकांश माहित्य भाट जाति के कधियों द्वारा लिखित है तो डिगलं का अधिकांश साहित्य चारण कवियों द्वारा । भाट जाति चारण जाति से सर्वथा भिन्न है । राजस्थान में पिंगल भाषा का नाम भाट जाति के प्राधार पर 'भाट-भायखा' अर्थात् भाटों की भापा भी है । इसके प्रमाण में सोलहवी शताब्दी के चारण कवि उदराम द्वारा रचित 'कवि कुल प्रन्थ मे प्रस्तुत दोहा मिलता है-- डिंगल चातुरी, पिंगल भाट प्रकास । गुण सख्या-कल-बरण-गण, यांगे करो प्रतः डिंगल और पिंगल दोनो एक दूसरे से भिन्न भाषाए रही हैं तथा व्याकरण छंद-शास्त्र आदि की दृष्टि से दोनों भिन्न है । पिंगल का विकास शौरसेनी अपभ्रंग हुअा है तो डिंगल का गुर्जरी अपभ्रंश से । कहते हैं कि चारण और भाटो मे इन दोनों भाषाओं को लेकर लम्बे समय तक प्रतिद्व द्विता रही । आगे चलकर चारणों ने भी पिंगल को अपनाया । पिंगल मे चरित्र-काव्य, पौराणिक काव्य, महाभारत काव्य और भक्ति काव्य उपलब्ध है। भूर्यमल्ल, स्वरूपदास 'गणेशपुरी जैसे कवियो ने पिंगल भाषा में भी रचना की। सूर्यमल्ल के 'वशभास्कर' ग्रन्थ का तीन-चौथाई भाग पिंगल में है । इमी भांति पृथ्वीराज रासो, रतन रासो, विजयपाल रासो आदि प्रन्थो में भी पिंगल भाषा का प्रयोग ही किया गया है । यहां इस बात पर भी विचार कर लेना चाहिए कि डिंगल और पिंगल शब्दों को लेकर भी विद्वानो मे काफी चर्चा रही है । एक मत के अनुसार "पिंगल' हिंगल' से ज्यादा पुरानी है और पिंगल के वजन पर ही डिंगल - शब्द -पड़ा है और अधिकाश विद्वान यही मानते है लेकिन डॉ. मोतीलाल मेनारिया के मतानुसार 'डिंगल' शब्द पिंगल मे अधिक पुराना है अतः पिंगल के सादृश्य पर डिंगल नाम रसे जाने की कल्पना निर्मूल है । इस प्रकार यह एक 'विवादास्पद प्रश्न है । पर, यह भी संभव हो सकता है डिंगल और पिंगल शब्दो का प्रयोग साथ-साथ हुआ लेकिन इतना निश्चिन है कि पिंगल' डिंगल से भिन्न है। डॉ. सुनीतिकुमार पाटुा भी डिंगल मोर पिंगल को दो भिन्न भाषाए मानते है 1. हिंगल में वीर रम . मोतीलाल मेनारिया, पृ. ! 2. भारतीय प्रायं भापाए और हिन्दी : डॉ. चाटुा, पृ. 185 राजस्थानी भापा : स्वरूप-विवेचन : 11 इमी भांति "डिंगल' शब्द को लेकर भी विद्वानों में कुछ भ्रांतियां है जैसा कि हम ऊपर कह आये है कि डॉ. मोतीलाल मेनारिया डिंगल को एक स्वतन्त्र भाषा के रूप में स्वीकार करते है लेकिन कुछ विद्वान डिंगल को एक काव्य शैली भी मानते हैं । प्रो. नरोत्तमदास स्वामी के अनुसार डिंगल राजस्थानी से भिन्न कोई भाषा नही, वह राजस्थानी की ही एक काव्यगत शैली विगेप है। साधा ण राज- स्थानी और डिंगल मे मुख्य अन्तर, जैसा कि कहा जा चुका है, या तो शब्दावली का है या दाब्दी की वर्तनी का; व्याकरण का अन्तर सर्वथा नगण्य है। 1 इससे यह प्रकट होता है कि बहुत संभव है टिंगल भी कभी बोल-चाल की भापा रही हो, फिर बाद में डिंगल का प्रयोग माहित्यिक भापा के लिए किया जाने लगा हो । प्रो. स्वामी जी के शब्दो में डिंगल अपभ्रंश ली का ही विकसित रूप है । कभी "डिंगल' शब्द का प्रयोग सम्पूर्ण गजस्थानी भाषा के लिए तो कभी चारणी शैली के लिए भी किया जाता है । 'डिंगल' शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग राजस्थान के प्रसिद्ध कवि आसिया बांकी दाम ने अपनी रचना 'कुकविवतीसी' (म. 1871) के निम्नलिखित दोहा में किया डिगलिया मिलियां कर पिंगल तणों प्रकास । सस्कृती है कपट सज पिगल पढ़िया पास ॥ संवत् 1863 में सेवग मछाराम ने डिंगल गीतों का विवेचन करने वाला ग्रन्थ 'रघुनाथ रूपक' डिंगल में लिखा लेकिन उन्होने डिंगल शब्द का प्रयोग नहीं किया अपित, अपनी भापा को मरू भाषा या मरूभूमि भाषा कहा। बाकीदास के बाद डिंगल शब्द का प्रयोग करने वाले कवियो मे सूर्यमल्ल मिथग का नाम उल्लेखनीय है । वे 'वंशमास्कर' ग्रन्थ में लिखते है-- डिंगल उपनामक कहुक मरू बानी हु विधेय । अपभ्रंश जामे अधिक, सदा वीर रस धेय ।। इससे डिंगल का अपभ्रंश की तरफ झुकाव और वीर रस के उपयुक्त होने की बात सिद्ध होती है । इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि डिंगल प्रारम्भ में बोलचाल को भापा रही हो लेकिन आगे चलकर जब उसने साहित्यिक भाषा का रूप धारण कर लिया तो वह डिंगल के रूप में स्थापित हो गई हो । अतः डिंगल का प्रयोग कभी सम्पूर्ण राजस्थानी भाषा के लिए तो कभी शैली के रूढ़ अर्थ मे भी प्रयुक्त होता रहा, वैसे चारणो द्वारा प्रयुक्त राजस्थानी का साहित्यिक रूप ही 'डिंगल' नाम से प्रसिद्ध रहा है। 1. राजस्थानी साहित्य : एक परिचय प्रो. नरोतमदास स्वामी, पृ. 17 2. वांकीदास ग्रन्थावली, भाग 2, पृ. 81 : ना. प्र. स. 3. वगभास्कर, प्रथम भाग, पृ. 140 4 संयुक्त राजस्थान, वर्ष 6, सस्था 8, मार्च 1957, पृ. 31 1. 12 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास डिंगल शब्द की व्युत्पत्ति-डिगल' मन्द की व्युत्पनि के सम्बन्ध में निम्नलिखित मत दिखाई देते है । वैसे ये सभी गुत्पत्तिया अनुमानाश्रित हैं- डॉ. एल. पी. टेसोटरी डिंगल को गवार और अनियमित भाषा मानते थे लेकिन ऐमा कहना तर्कमेगत प्रतीत नहीं होता। डिंगल पई-लिये पारणों को एव राज दरबार में मम्मान प्राप्त भाषा थी जिमका अपना ईद-शास्त्र, रस, अलकार मादिथे । 2. श्री हर प्रमाद शास्त्री डिंगल की व्युत्पत्ति 'डगळ' या 'इगर' गाद से करते है लेकिन यह भी मान्य नहीं है । डग पहले जगल या मरूदेश को भापा का नाम था, पिंगल के माम्य पर उसका नाम डिगल हो गया। अपने समर्थन में ये एक दोहा भी उद्धृन करते है - दोस जगल-डगल जेथ जल बगळ चाटें । अनता गळ दिये, गळा हुँता गल काटे ॥ 3. श्री गजराज मोझा के अनुसार 'ड' वर्ण की बहुलता के कारण पिंगल के पजन पर डिगल नाम रखा गया है लेकिन कही कही 'ड' वर्ण की प्रधानता के आधार पर समस्त डिंगल को 'ड' वर्ण प्रधान मानमा युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता। 4. श्री पुरूषोतमदास स्वामी के अनुसार डिगल शब्द डिम+गळ से बना है। 'डिम' का अर्थ डमरू की ध्वनि और 'गळ' का अर्थ गले से है अतः गले से निकलकर जो कविता डिम-डिम की तरह वीरो के हृदय को प्रोत्साहित भरती है, उसे डिगल कहते हैं । लेकिन यह मत भी निराधार है। 5. थी किशोरसिंह वाहस्पत्य के अनुसार डिंगल शब्द 'होड विहायसा गतो' अर्थात् उडना अर्ध वाली डी धातु से बना है और इसका अर्थ है उड़नेवाली । श्री बदरीदान कविया भोर सत्यदेव आदा पहिस्पत्यजी का समर्थन करते है और कहते है कि गिल कविता अचे स्मरो में पढ़ी जाती थी पर पाने पाली बहा गया है। डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने डिगल दारद का सम्बन्ध डोग से माना है। हिंगल का अर्थ है-डोंग वाली भाषा प्रति वह भापा जिसके प्रन्यों में होग मारी गई है । धारण लोग आश्रयदाता की प्रामा में अतिसयोक्तिपूर्ण रचनाए करते थे। डॉ. मेनारिया के अनुमार माज भी धारण हिंगल न कहकर धीगल कहते है। प्रो. नरोत्तमदाम स्वामी ने डिंपल की युति के सम्बन्ध में दो प्रकार को मंभावनाए ध्यान की है जिनमे एक गंभावना के अनुसार यहुन संभव है कि पिल नागरात के ममान उडिगस नागराज की कल्पना की गई। यह गिन शम्द ही गिल का मूल है। 6.
राजस्थानी भाषा : स्वरूप-विवेचन 13. hai - इस प्रकार प्रत्येक विद्वान ने अनुमान के आधार पर डिंगल शब्द की व्युत्पत्ति को तलाशने की कोशिन की है लेकिन ठोस प्रमाण के प्रभाव में किसी एक मत का समर्थन करना उचित प्रतीत नहीं होता। डिंगस का माहित्य विशाल है । डिंगल साहित्य के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने लिखा है कि डिंगल साहित्य में राजस्थान के संकड़ों वर्षों के संस्कार, उसका संघर्षमय लोक-जीवन तथा उमका इतिहास प्रतिविम्बित होता है और उसमें उसकी भावनाएं व्यक्त हुई है। डिंगल साहित्य में इतिहास विषयक सामग्री की प्रचुरता है अत: मध्ययुगीय इतिहास लेखन में डिंगल का साहित्य काफी सहायक हो सकता है। डिंगल का साहित्य गय और पद्य दोनों में मिलता है। गद्यात्मक सामग्री ख्यात, वात, विगत और पीढी वंशाव- लियों के रूप में उपलब्ध होती है । चरित्र नायकों के नाम पर लिखे गये ग्रन्थों में रासो प्रकास, विलाम, रूपक, वनिका और छन्दों के आधार पर लिसे गये ग्रन्थों में नीसाणी, झूलणा, वेल, झमाल, गीत, तथा दहा आदि हैं। इसी प्रकार डिंगल में फुटकर कविता, दोहा, कवित्त और गीतो के छंदों में लिखी हुई सामग्री भी प्राप्त होती है। डिंगल कविता मुख्य रूप से वीर रसात्मक है । अन्य रसों का भी यथा- स्थान अच्छा परिपाक हुआ है । डिंगल के अलंकारो में वयणसगाई अत्यन्त लोक- प्रिय अलंकार है और यह डिंगल का अपना अलेकार । संस्कृत और हिन्दी में इस अलंकार का कोई उल्लेख नहीं मिलता। राजस्थानी साहित्य : फाल-विभाजन-राजस्थानी साहित्य की एक लम्बी परम्परा रही है जिसमें कई प्रकार के उतार-चढाव एवं दिशा-परिवर्तन की स्थिति समय-समय पर उपस्थित होती रही है । ऐसी स्थिति में साहित्य के विकास-क्रम को समझना और उसमें उत्पन्न होने वाले विविध, परिवर्तनों को प्रवृत्तियों के आधार पर प्रस्तुत करना आवश्यक हो जाता है। सबसे पहला प्रश्न तो हमारे सामने यह उपस्थित होता है कि काल- विभाजन का आधार क्या हो ? जिस प्रकार प्रवाह के अन्दर अनेक धाराए होती हैं, उसी प्रकार साहित्य में भी अनेक प्रवृत्तियां होती हैं। और इन प्रवृत्तियों का आदि-अन्त या उतार-चढ़ाव ही इतिहास का काल- विभाजन अर्थात् विभिन्न युगों की सीमाओं का निर्धारण करता है। इस तरह किसी भी साहित्य के काल-विभाजन का प्राधार उस काल को प्रमुख प्रवृत्तियों और साहित्यिक चेतना होनी चाहिए। जिस काल में जिस प्रवृत्ति की प्रधानता हो, उसी आधार पर उस काल का नामकरण और सीमा निर्धारण किया जाना चाहिए। राजस्थानी का प्राचीन साहित्य अाज भी हस्तलिखित ग्रन्थों एवं मौखिक परम्परा 1. राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. मोतीलाल मेनारिया; पृ. 48 2, हिन्दी माहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र पृ: 55 14 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास में बिखरा पड़ा है अतः जब तक उसका पूरा संपालन नहीं हो पाता तब तक उस के साहित्य का मूल्याकन-विवेचन और साहित्यिक प्रवृत्ति का निर्धारण असंभव है । जहाँ तक राजस्थानी गाहित्य के काल-विभाजन और नामकरण का प्रश्न है डॉ. पुरुषोत्तमलाल मेनारिया के अतिरिक्त किसी ने भी माहित्यिक प्रवृत्ति के आधार पर नामकरण नही किया है। काल-विभाजन करने वाले विद्वानो में डॉ. एल. पी. टेसोटरी. डॉ. मोतीलाल मेनारिया, सीताराम लालस, गजराज प्रोझा आदि है । प्रो. नरोतमदास स्वामी और डॉ. हीरालाल माहेश्वरी ने राजस्थानी के इतिहास का काल-विभाजन और नामकरण लगभग एक जैसा किया है जो निम्न लिखित है-- प्रारम्भ काल सन् 1050 में 1450 तक मध्यकाल सन् 1450 से 1850 तक माधुनिक काल सन् 1850 से अब तक माधुनिक काल को भी दो भागों में विभाजित किया गया है- स्वतन्यता पूर्व सन् 1850 से 1947 तक स्वातन्त्र्योत्तर सन् 1947 से मागे काल की सीमा का निर्धारण करते हुए' प्रो. नरोत्तमदास स्वामी ने उन विशेषतामों की तरफ सकेत किया है जो सं. 1200 के प्रासपास स्पष्ट' होने लगी थी और इस आधार पर ही आधुनिक भाषाओं के काल-विभाजन की भीमा सं. 1200 के भासपास मानी जानी चाहिए। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी का मत है कि सं. 1200 के पहले ही उन विशेषताओं के कुछ रूप उभरने लगे होंगे प्रतः लगभग मंवत् 1100 से प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी का प्रादिकात माना जा सकता है। प्रारम्भ में गुजराती और राजस्थानी एक ही थी । कुमारपात में हेमचन्द्र का जन्म संवत 1145 और मृत्यु सं. 1229 मानी गई है । हेमचन्द्र के समय में जो बोल- पाल को मापा थी, उसे 'मगती गुजराती' कहा गया था लेकिन संभव है यह 'गती गुजरातो हेमचन्द्र के समय से पूर्व प्रचलित रही होगी मतः गुजराती 'के विद्वानों ने भी गुजराती भाषा को उत्सान्ति बारहवीं शताब्दी से मानी है। इससे प्रकट होता है कि गुजराती, प्राचीन पश्चिमी राजस्थानी अयया 'जगती गुजराती' वा काल मोटे तौर पर म. 1100 में माना जाना चाहिए। राजापानी और संवैधानिक मान्यता~भापा-शानिफ दग गे गजस्थानी भाषा के स्वरूप का विवेषन करने पर प्रतीत होता है कि राजम्पांनी स्वतन्त्र भाषा है' विसा नपा और पुराना विशाल माहित्य है सया जिमरा अपना मन्द-बग एवं' म्याकरहै । मात्र राजापानी भाषा मे निरन्तर लिया जा रहा है तथा रामरमानी' का माहिहम अपनातन प्रत्तियों में पुरा हुपा है। यपि देश के प्रमुम भाषा • History of Rajasthani Literature : Dr. }{itala1 Maheshwari P. 26 राजस्थानी भापा : स्वरूप-विवेचन : 15 -- वैज्ञानिकों ने इसे स्वतन्त्र भापा स्वीकार किया है लेकिन कुछ विद्वान राजस्थानी को हिन्दी की ही शाखा स्वीकार करते हुए उसकी संवैधानिक मान्यता में बाधा पहुंचा रहे है. ऐसे लोगों का कहना है कि राजस्थानी की कोई लिपि नहीं, राजस्थानी में एकरूपता का अनाव है तथा आधुनिक माहित्य मे मृजन की स्थिति भी सतोप- जनक नहीं है । दूसरी तरफ सरकार जनमख्या.के.प्रांकडो के प्राधार पर यह जानना चाहती है कि राजस्थानी भाषी लोगो को पावादी कितनी है । इस तरह राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता का प्रश्न लम्बे समय में उठाया जा रहा है लेकिन अभी इस सम्बन्ध में कुछ भी नहीं हुअा है ! यहाँ इम-बात पर भी थोड़ा विचार कर लेना चाहिए कि राजस्थानी को भाषा स्वीकार न करने वाले लोगों के तक, वेबुनियाद है। जब मराठी. देवनागरी लिपि में लिखी जाती है. और वह स्वतन्त्र भाषा का दर्जा प्राप्त कर लेती है तो राजस्थानी की लिपि देवनागरी होते हुए, उसके सम्बन्ध. मे ऐसा तर्क क्यो दिया • जाता है ? इसी भाति राजस्थानी की एकरूपता का प्रश्न केवल इसलिए पैदा किया जा रहा है, ताकि अलग-अलग क्षेत्रो में अपनी-अपनी वोली को राजस्थानी मानने का विवाद पैदा हो जाय । वैसे राजस्थानी भाषा के अन्तर्गत पाच बोलियां है लेकिन. इनमें जिसे मारवाडी कहते है उसी का साहित्यिक रूप राजस्थानी है और वही.. इस प्रान्त की प्रमुख प्रतिनिधि भापा,वन सकती है । इस तरह राजस्थानी की बोलियों को स्वीकार करते हुए रागस्थानी का एक परिनिष्ठित साहित्यिक रूप है और प्राज. उसमें उत्कृष्ट कोटि का नया-पुराना साहित्य उपलब्ध है । केन्द्रीय साहित्य अकादमी ने इसी आधार पर राजस्थानी भापा को माहित्यिक मान्यता प्रदान कर, रखी है तथा प्रकाशन एव पुरस्कार की:योजनायो मे राजस्थानी भी उसी प्रकार सम्मिलित है जैसे देश की अन्य संवैधानिक मान्यता प्राप्त. भाषाए है। राज्य सरकार ने राजस्थानी भाषा के लिए 'राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति- अकादमी' . (बीकानेर) की स्थापना की तथा जोधपुर,एव. उदयपुर विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा का स्वतन्त्र विभाग भी है जहाँ स्नातकोत्तर डिग्री राजस्थानी भाषा मे दी जाती है । इसी तरह माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (अजमेर) ने भी राजस्थानी भापा को ऐच्छिक विषयं के रूप मे लागू कर रखा हैं । आज राजस्थानी में स्तरीय पत्रिकाओं एवं नवलेखन की स्थिति भी काफी संतोषजनक कही जा सकती है। .. ऐसी स्थिति में राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवी सूची में सम्मिलित न करना राजस्थानी के विकास मे वाधा उपस्थित करना है.। यह निश्चित है कि किमी भी प्रान्त का सास्कृतिक विकास तभी संभव है जब उस.प्रान्त के लोगों की. मातृभापा को सर्व- धानिक मान्यता दी जाय । इतनी .समृद्ध और उत्कृष्ट रचनाओं, वाली. राजस्थानी भापा को सवैधानिक मान्यता न मिल पाने का एक मात्र कारण, लोगो की भापाई जागरूकता का अभाव है । .
प्रध्याय 2 आरम्भ काल (सन् 1050 से 1450 . ई.) किसी भी काल के साहित्य के इतिहास को समझने के लिए आवश्यक है कि हम उस परिवेश को भी अच्छी तरह समझलें क्योंकि साहित्य अपने परिवेश की ही उपज होता है । इस दृष्टि से प्रारम्भ काल की जनीतिक, धार्मिक और सामा- जिक स्थितियो पर भी थोडा विचार कर लेना चाहिए । अन्तिम हिन्दू सम्राट हर्ष- वर्द्धन के समय से ही देश पर यवनों के आक्रमण प्रारम्भ हो गये थे लेकिन हर्षवर्द्धन उन्हें रोकने में असमर्थ रहा। हपंवर्द्धन की मृत्यु के बाद देश में केन्द्रीय सत्ता का ह्रास हो गया था और जो राजपूत राज्य उस समय सामने आये, वे निरन्तर युद्धों की आग में जलते रहे । 'आठवी शताब्दी से पन्द्रहवी शताब्दी ईस्वी' तक के भारतीय इतिहास की राजनीतिक परिस्थिति हिन्दू-सत्ता के धीरे-धीरे क्षय होने तथा इस्लाम- मत्ता के धीरे-धीरे उदय होने की करुण कहानी है। इसका तात्पर्य यह है कि यह काल राजनीतिक दृष्टि से उथल-पुथल, आक्रमण, युद्ध अव्यवस्था, अस्थिरता और र जाओं की पारस्परिक फूट का था फलतः इस परिवेश मे जो साहित्य लिखा गया, उसमे भी इन परिस्थतियों का सकेत स्पष्ट दिखाई देता है अतः ' किसी एक प्रवृत्ति की प्रधानता इस काल के साहित्य में नहीं रही। राजनैतिक परिवेश :--हर्षवद्धन की मृत्यु के बाद उत्तरी भारत मे गुर्जर प्रतिहारो ने अपना विशाल तथा शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित किया था, लेकिन प्रतिहारो की केन्द्रीय सत्ता के कमजोर होते ही अन्य सामन्तों ने अपने-अपने स्वतत्र राज्य स्थापित कर लिये । ऐसे सामन्तों मे चौहानो का स्थान सर्वोपरि था। इनके साभर, जालोर, नागौर, भडोच, नाडोल आदि मुख्य शामन केन्द्र थे । इनमें सांभर या सपादलक्ष के चौहान इतिहास में अपनी शूरवीरता और साम्राज्यवादी महत्त्वाकाक्षा के लिए विशेष प्रसिद्ध रहे हैं। पृथ्वीराज चौहान तृतीय (1172-1192) जब सिंहासनारूढ हुमा उस समय मुसलमानो का दबाव बढ़ता ही जा रहा था। 1178ई. मे मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज के राज्य से गुजर कर गुजरात पर प्राश्मण किया 1. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र, पृ. 70 प्रारम्भ काल: 17 जिससे उसको पराजित होना पड़ा । चौहानों को दक्षिण-पश्चिम से चालुक्यों का भी भय था । दक्षिण-पूर्व में उस समय महोबा के चंदेल शासक थे । 1282 में पृथ्वीराज ने चंदेलों पर अाक्रमण किया। इस युग में आल्हा-ऊदल ने तत्कालीन राजा पर- मारदी की सहायता की थी। पृथ्वीराज रामो और परमाल रासो ग्रंथ में इस युद्ध का उल्लेख मिलता है। इसके बाद पृथ्वीराज ने गुजरात के चालुपयों पर आक्रमण किया। पृथ्वीराज और मोहम्मद गौरी के बीच प्रथम संघर्ष 1190-91 में हुमा था। दसवी शताब्दी के अंतिम दशकों में शाकम्मरी के चौहानों की एक शाखा ने नाडोल में अपना राज्य स्थापित कर लिया था। चौहानों की एक अन्य शाखा ने परमारों को परास्त करके जालोर में अपना राज्य कायम किया। इस वंश के सस्थापक कीर्तिपाल से लेकर कान्हड़दे तक के शासकों ने तुर्को से निरन्तर संघर्ष किया। मेवाड में गुहिल वंश का अत्यधिक प्रभाव था। इस वंश मे सबसे शक्तिशाली शासक बप्पा रावल हुए जिनका समय 8वीं शताबी माना जाता है । इस वंश को समय-समय पर चित्तौड के मोर्यो, कन्नौज के प्रतिहारो, गुजरात के चालुक्यों, मालवा के परमारों और शाकम्भरी के चौहानों के अधिकार में रहना पड़ा । बारहवी सदी के अन्त में जालोर के कोतिपाल ने मेवाड़ के शासक सामातसिंह को परास्त करके मेवाड पर अधिकार प्राप्त कर लिया था। सामन्तसिंह बागड़ चला गया और नये राज्य की नींव रखी। इधर उसके छोटे भाई कुमार सिंह ने सिसोदिया सामन्त की सहायता से पुनः मेवाड़ पर अधिकार प्राप्त किया। रणथम्भौर के चौहान शासको में अन्तिम एवं महत्त्वपूर्ण शासक हम्मीरदेव था । 'हम्मीरकाव्य' और 'हम्मीर रासो' मे हम्मीर के शौर्य और पराक्रम का वर्णन है । 1299 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने रणथम्भौर पर आक्रमण किया और काफी समय तक रणथम्भौर की घेराबंदी की। हम्मीर की रानियो ने अन्य राजपूत वीरा- गनाओं के साथ जोहर दिया और स्वय हम्मीर भी अलाउद्दीन के साथ युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुभा । सन् 1301 में रणथम्भौर पर अलाउदीन का अधि- कार हो गया इसके बाद उसने चित्तोड पर आक्रमण किया। इस समय चित्तौड़ पर राणा रतनसिंह का शासन था। इस आक्रमण का एक कारण अलाउद्दीन का राणा रतनसिंह की सुन्दर रानी पद्मिनी को प्राप्त करना था। अन्त में रानी ने जौहर किया और अलाउद्दीन को चित्तौड़ पहुंचने पर चिता की राख प्राप्त हुई। मलिक मोहम्मद जायसी के महाकाव्य 'पद्मावत' की कथा का आधार भी यही ऐतिहासिक प्रसंग है । रणथम्भौर और चित्तौड़ को जीतने के बाद अलाउदीन ने जालौर के स्वतन्त्र राज्य को जीतने का निश्चय किया उस समय जालोर मे कान्हड़दे का शासन था। इस युद्ध में भी राजपूत ललनाओं ने जौहर रचाया तो कान्हड़दे, वीरवोच, 18 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास जेता आदि लोग दुर्ग की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए । जालौर का पतन सन् 1311-12 में हुआ था । इस युद्ध में कान्हड़दे के परिवार के एक सदस्य माल- देव ने सुल्तान के सामने आत्म-समर्पण कर दिया था बाद में सुल्तान ने चित्तौड़ का शासन मालदेव को सौप दिया। 'कान्हड़दे प्रबंध' में कान्हड़दे के युद्धो का विस्तृत वर्णन मिलता है। जब चित्तौड़ पर अलाउद्दीन का अधिकार हो गया था तो वाद में सन् 1336 के आसपास हम्मीर ने चित्तौड़ पर पुनः अधिकार जमाया । हम्मीर के बाद उसका बडा पुत्र क्षेत्रसिंह मेवाड का राणा बना और उसने 1382 ई. तक शासन किया। क्षेत्रसिंह के बाद महाराणा लाखा ने 1382 से 1397 ई. तक चित्तोड पर शासन किया । वृद्ध लाखा ने मारवाड़ नरेश राव चूड़ा की पुत्री तथा रणमल की बहिन हंसा से विवाह किया। लाखा के पुत्र चूडा को यह प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि यदि हंसा बाई के पुत्र उत्पन्न हुमा तो वह मेवाड़ के सिंहासन पर अपना अधिकार त्याग देगा और हंसावाई का पुत्र ही मेवाड़ का राणा बनेगा। इस विवाह के तेरह महीने बाद हसाबाई ने पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम मोकल रखा गया । सन् 1397 में लाखा की मृत्यु हो गई। बाद मे जब चूंडा और हंसाबाई के सम्बन्धों में तनाव उत्पन्न हो गया तो चूडा मेवाड़ छोडकर मांडू चला गया ! चूंडा के चले जाने के बाद रणमल की स्थिति दरबार में सर्वोपरि हो गई। यद्यपि उसने महाराणा की निष्ठापूर्वक सेवा की किन्तु उसके बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर सिसोदिये सामन्त आतंकित हो गये । इधर रणमल के पिता राव चूडा को मृत्यु हो गई और रणमल का छोटा भाई कान्हा नया शासक घोषित हुआ.। संयोगवश कान्हा की मृत्यु मारवाड़ में सिंहासन-प्राप्ति के लिए गृह युद्ध हुआ लेकिन महाराणा मोकल की सहायता से रणमल मारवाड़ के सिंहासन पर बैठ गया । रणमल के चले जाने पर मालवा के सुलतान होशंगशाह ने मेवाड़ के गाग- रोण दुर्ग पर माक्रमण किया। दुर्ग का रक्षक प्रचलदास खीची इस युद्ध मे वीरगति को प्राप्त हुआ। ''अचलदास खीची री वचनिका' में इस युद्ध का पूरा उल्लेख मिलता है। मोकल की मृत्यु के बाद चित्तोड पर कुमा ने सन् 1433 से 1468 तक शामन किया। उसने मेवाड़ के निर्माण के लिए गितना कार्य किया, उतना अन्य किमी राणा ने नहीं किया। इस प्रकार सत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों से यह तथ्य प्रकट होता है कि यह युनों का ममय था सपा युद्ध निरन्तर होते रहते थे, यही कारण है कि इस कास में जो चारण-साहित्य उपलटप होता है उग पर वीर रस को गहरी छाप है । राजस्थान के आरंम्म काल में प्राप्त होने वाला साहित्य मप्रलिखित रूप में विमारित किया जा सकता है- बाद • प्रारम्भ काल : 19 1. जैन साहित्य 2. लौकिक साहित्य 3. चारण साहित्य । जैन साहित्य-राजस्थानी के आरम्भ काल में जैन साहित्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है । अपने मत का प्रचार-प्रसार करने के लिए जिस प्रकार जैन साधुओं ने प्राकृत और अपभ्रंश को अपनाया था, ठीक इसी प्रकार आगे चलकर राजस्थानी भापा को भी माध्यम के रूप मे स्वीकार किया। जैन साहित्य काफी विशाल और प्रचुर मात्रा में लिखा गया है। यह गद्य और पद्य दोनों रूपों में मिलता है। विषय- गत और शैलीगत विविधता को दृष्टि से जैन साहित्य का प्रारम्भ काल में विशिष्ट योगदान माना जायेगा। नैन साहित्य का मुख्य स्वर धार्मिक मोर चरित्र-निर्माण का रहा है । रस की दृष्टि से उसमें शान्त रस की प्रधानता है। प्रो० नरोत्तमदास स्वामी के शब्दों में गद्य साहित्य की प्रचुरता उसको दूसरी बड़ी विशेषता है। हिन्दी आदि भाषाओं में प्राचीन गद्य का प्रभाव-सा है पर राजस्थानी में चौदहवी शताब्दी से गद्य साहित्य बराबर मिलता रहा है और प्रभूत परिमाण में मिलता है । जैन साहित्य का कथा-साहित्य तो स्वयं अपनी विशिष्टता रखता है । इन काव्यों के माध्यम से जैन मुनियों का मुख्य लक्ष्य जनसाधारण को धर्म की तरफ प्रेरित करना था यही कारण है कि इन काव्यो, को मापा साधारण बोलचाल की है । डॉ. हीरालाल माहेश्वरी ने जैन साहित्य के पद्य को मोटे रूप मे चार भागो में विभाजित किया है:- 1. चरित काव्य या क्था काश्य-चरित काव्य दो प्रकार के मिलते हैं- ऐतिहासिक और पौराणिक । ऐसे काव्य जन पुराणों में परिणत महा- पुरुषों और प्रमुख व्यक्तियों से सम्बद्ध हैं। ये विभिन्न काव्य रूपो में लिखे गये हैं, यथा--रास, चौपई, ढाल. पवाड़ा, संधि, चर्चरी, प्रबंध, चरित्र, सम्बन्ध, आख्यानक, कथा मादि । 2. उत्सव काव्य-ये किसी विशेष त्यौहार या अवसर से सम्बन्धित होते हैं । इनको फागु, धमाल, बारहमासा, विवाहलो, वैलि. धवल, मगल प्रादि नाम दिये गए हैं । 3. नीति फाम-प्रत्येक कवि ने नीति या उपदेश देने के लिए ऐसे काव्य की रचना की है। इसके रचना-प्रकारों मे संवाद, कपका-मातृका- बावनी. कुलक, हीयाली आदि है। 4. '' स्तुति काव्य-ऐसे काव्यों में विभिन्न तीर्थंकरों, तीर्थस्थलों, साधुपुरुषों, मादि की स्तुति की गई है। ये रचनाएं बहुत छोटी-छोटी है और 1. 2. राजस्थानी साहित्य : एक परिचय, प्रो. नरोत्तमदास स्वामी, पृ. 22-23. सास्कृतिक राजस्थान : सं. रतनशाह, पृ. 15 20 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास स्तुति, स्तवन, स्तोत्र सज्झाय, वीनती, गीत, नमस्कार आदि नामों से उपलब्ध है। इससे प्रकट होता है कि जैन कवियों ने चरित, फागु रास आदि अनेक शैलियों एवं अनेक काव्य रूपों को अपनाया । इनमें 'रास अधिक प्रभावशाली रचना. शैली है इसमें जैन तीर्थकरी के जीवन-चरित को जैन-मादर्श के अनुरूप 'रास' नाम से पद्यबद्ध किया गया है। राजस्थानी का प्रारम्म काल राजस्थानी और गुजराती के सम्मिलित स्वरूप का काल है, यही कारण है कि इन जैन कवियों के काव्य मे गुज राती का प्रभाव भी दिखाई देता है। राजस्थानी भाषा के उद्भव और विकास के लिए जैन-माहित्य का आधार एक महत्त्वपूर्ण देन के रूप में माना जायेगा। जैन साहित्य की प्रमुख कृतियो का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार है- भरतेश्वर-बाहुबलि घोर-प्रस्तुत कृति वचसैन सूरि द्वारा लिखी गई है। इसका रचना काल संवत् 1125 है और यह राजस्थानी की प्राचीनतम रचना है जो मारू-गुर्जर भाषा में लिखी गई है। 48 छदों के इस छोटे से काव्य में भरत और बाहुबलि के युद्ध का वर्णन किया है। इसमें वीर और शान्त रस का वर्णन मिलता है। भरतेश्वर बाहुबलि रास-इस ग्रंथ की रचना संवत् 1241 में शालि भद्र सूरि ने की थी । यह जैन साहित्य की रास परम्परा का प्रथम ग्रथ है । इस ग्रथ में भरतेश्वर और बाहुबलि का चरित-वर्णन है । इन दोनों चरित नायकों को लेकर प्राकृत और अपभ्रंश मे भी कई काव्य लिखे गये हैं। इस काव्य में जो कथा मिलती है उसके अनुसार भरतेश्वर और बाहुबलि अयोध्यावासी ऋपम जिनेश्वर के यहाँ सुनन्दा और सुमंगला से उत्पन्न हुए थे। भरत आयु में बड़े थे अतः उन्हें अयोध्या का राज्य दिया गया तो बाहुबलि को तक्षशिला का। कवि ने प्रस्तुत कृति में दोनों पराक्रमी वीरों के शौर्य और युद्ध का वर्णन किया है तथा हिंसा और वीरता के पश्चात् विरक्ति और मोक्ष के भाव का प्रतिपादन करना उसका मुख्य लक्ष्य रहा है । "मरत-बाहुबलि रास' देशी छदों और राग-रागनियो मे लिखित सुन्दर खड- काव्य है । प्रो० नरोत्तमदास स्वामी के शब्दों में शालिभद्र सूरि राजस्थानी का सबसे महत्त्वपूर्ण कवि है । इम ग्रंथ की माषा में नाटकीयता, उक्ति-वैचित्र्य एवं अनुप्रासों की घटा है । सेना-वर्णन, दिग्विजय-वर्णन. हाथी, घोड़ो और सैनिको के अनेक वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण हैं । इस ग्रंथ की कविता का एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है-- प्रहि उग्णमि पूरव दिसिहि, पहिलउं चालिय चक्क । धूजिय घरयल परहर ए. चलिय कुचाचल-चक्क ।। बुद्धिरास-प्रस्तुत कृति भी शालिमद सूरि द्वारा लिखित 63 छंदों का संकलन है । इन पदों में सामान्य लोगों के लिए नीति, उपदेश और ज्ञान की बातें राजस्थानी साहित्य : एक परिचय-प्रो० नरोत्तम दास स्वामी, पृ. 25 प्रारम्भ काल :21 कही गई हैं। इसकी भाषा सीधी-सरल है। लोक व्यवहार, सामान्य प्राचरण और सद्गति के मार्ग को पाने के लिए सीधी उक्तियों से परिपूर्ण यह रचना काफी लोकप्रिय हुई है। जीवदया रास-प्रस्तुत रचना जन कवि आसगु द्वारा लिखित है। इसका रचना काल संवत् 1257 है जो इस रचना मे दिया हुआ है । इसमें कुल 53 पद्य है। मानव मन में करूणा और दया की भावना उत्पन्न करना तथा जीवों पर दया करना इस रचना का मुख्य लक्ष्य है । इममें जैन तीर्थों का भी वर्णन किया गया है। चन्दनबाला रास~यह पैतीस छंदों का लभु खंडकाध्य है । इसके रचनाकार भी प्रासगु है । इसकी कथानायिका जैन परम्परा में प्रसिद्ध सलियों में से एक- चंदनवाला है जो चम्पानगरी के राजा दधिवाहन की पुत्री है । कहते हैं कि एक पार कौशाम्बी के राजा शतानीक ने चम्पानगरी पर माक्रमण किया जिसमें शतानीक का सेनापति चदनवाला का अपहरण करके ले गया और उसे एक सेठ को बेच दिया । सेठ ने चदनवाला को अनेक कष्ट दिये लेकिन चदनवाला अपने सतीत्व पर अटल रही । अंत में महावीर से दीक्षा लेकर मोक्ष को प्राप्त हुई । माव-सौन्दर्य की रष्टि से यह मामिक एवं करूण रचना है । जम्बू स्वामी रास-प्रस्तुत रचना महेन्द्र सूरि के शिष्य धर्म द्वारा संवतू 1266 में लिखी गई । इसमें सुप्रसिद्ध जम्बू स्वामी की कथा को पद्यबद्ध किया है । इसमें कुल 4। पद्य हैं । पूरी कथा मार्मिक एवं उपदेशमूलक है । नेमिनाथ बारहमासा और पावरास ये दोनो रचनाएँ पाल्हण कवि द्वारा लिखी हुई हैं । नेमिनाथ बारहमासा में 15 पद्य हैं और माबूरास मे 51 पद्य । इन रचनामी का रचना-काल वि. म. 1289 है । जम्बू स्वामी की मांति जैन काव्य में नेमिनाथ और राजमती का प्रेम प्रसग भी काफी प्रिय विषय रहा है। नेमिनाथ 23वे तीर्थकर थे तथा महाराजा ममुद्र विजय के पुत्र थे उनका विवाह उग्रसेन की बेटी राजमती के साथ तय हुआ था । कहते है कि जब नेमिनाथ ने शादी से पूर्व बारात के भोजन के लिए एका पशुओं को करूण-पुकार सुनी तो उनका हृदय द्रवित होगया और वे संसार त्याग कर तपस्या के लिए गिरनार चले गये। बाद में राजमती को जब इस घटना का पता लगा तो उसके दिल को ठेस लगी और उसने नेमिनाथ का अनुसरण करते हुए दीक्षा ग्रहण की। नेमिनाथ धारहमासा मारू-गुर्जर कविता का पहला बारहमासा है।' "मावूरास' में मंत्री विमल और वस्तुपाल तेजपाल द्वारा आबू पर्वत पर बनाये गए जैन मंदिरो का उल्लेख है। शान्तिनाथ देवरास-लक्ष्मी तिलक ने संवत् 1313 में 'शान्तिनाथ देव रास' की रचना की थी। इस रचना में जैनियों के 16 वें तीर्थकर शान्तिनाथ का जीवन - ।
22 : राजस्थानी साहित्य मा मशिपा इतिहास प्रस्तुत किया गया है । जिनपति गरि ने गं. 1201 में मेट गांव में तथा जिनेश्वर गरि ने मं. 1256 में जामौर में सीकर गान्तिनाग की प्रतिमा स्थापित की थी प्रतः डग रमना में इनका वर्णन किया गया है । इस रचना का ऐतिहासिक महत्त्व भी है। रेयंतगिरि रास-यह विजयमेन गरि की याश्य कृति है। इसी रचना 1231 ६० के नगमग हुई थी। इसमें नीर्यकर नेमिनाथ की प्रतिमा तथा रेवंतगिरि तीर्ण का वर्णन है । भावपक्ष और कसापा की दृष्टि में यह मुन्दर काव्य है । इसमें प्रकृति का मनोरम चित्रण मिलता है । जन साहित्य को अन्य रचनामों में अभयतिलक ग गी का 'महावीर राम'. (वि. सं. 1307) विनयचन्द्र का नैमिनाथ चउपई' (वि. सं. 1325) सोममूर्ति को धार छोटी रचनाए-जिनेश्वर मूरि विवाह वर्णन रास,' 'जिन प्रबोध गरि पर्चरी', "गुरावली रेनुआ' तथा 'गिन प्रयोष गरि योलिका' (यि. मं. 1331) उदयधर्म का 'उपएसमाल कहाणय छप्पय' (81 छप्पय) रल्ह अथवा राजसिंह का 'जिणदत्त चरित' (वि. मं. 1354) मुनि राजतिलक का 'शालिभद्र रास' जिनप्रभ मूरि का 'पद्मावती चौपः' (वि. मं. 1385) जिनपद्म गरि का 'स्यूलिभद्र फाग' (वि. सं. 1390) पूर्णिमागच्छ के शालिगद्र मूरि का पंच पाडव गरित रास' (वि. सं. 1410) उपाध्याय विनयप्रग का 'गौतम स्वामी राम (पि. मं. 1412) जयशेखर सूरि का त्रिभुवन दीपदा प्रबंध', 'नेमिनाथ फागु' और 'अरबुदाचल वीनतो' (वि. ग. 1462) तथा हीरानंद मूरि का 'वस्तुपाल तेजपाल' (वि. सं. 1485) प्रमुख हैं । अन्य कवियों में राजशेखर सूरि, महोपाध्याय जयसागर, देपाल प्रादि उल्लेखनीय हैं। इससे प्रकट होता है कि राजस्थानी के प्रारम्भ काल में मैकड़ो जन वादियों ने अपनी रचनाएं प्रस्तुत की लौकिक साहित्य राजस्थानी साहित्य के आरम्भ काल मे लौकिक साहित्य भी उपलब्ध होता है वैसे तो अनेक जैन ग्रंथों एवं हेमचन्द्र के अपभ्रश व्याकरण में भी प्रेम, शृंगार, विरह, वीरता आदि से सम्बन्धित अनेक दोहे मिलते हैं । इनमे कहे दोहै तो प्राज भी किचित परिवर्तित रूप मे लोक प्रचलित हैं । लौकिक काव्य मे उपलब्ध होने बाली रचनाओं का परिचय इस प्रकार है- योसलदेवरासो- इस ग्रंथ की रचना नरपति नाल्ह कवि ने वि. सं. 1212 मे की थी। इस प्रथ मे इसका रचना-काल इस प्रकार दिया गया है-- बारह से बहोत्तरां हां मझारि । जेठ वदी नवमी बुधिवार । इस पंक्ति का अर्थ कुछ विद्वानो ने 1272 भी लगाया है लेकिन अधिकांश विद्वान इमका रचना काल सं. 1212 और नाल्ह को वीसलदेव. चतुर्थ का भारम्म: काल : 23 मकालीन मानते है । वीसलदेव रासो रचनाकार नूर के सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध नहीं होती है। डॉ० माताप्रसाद गुप्त ने 'बीसलदेव रासो' के 128 छंदों का सम्पादन कया है और इसे ही मूल पाठ माना है । डॉ. मोतीलाल मेनारिया के अनुसार इसमें चार खंड हैं सब मिलाकर 216 छदों में ग्रंथ समाप्त हुआ है । इसकी भाषा गुजराती-राजस्थानी का मिश्रण हैं । वीसलदेव रासो विप्रलंभ शृंगार फा श्रेष्ठ भव्य है तथा इसकी कथा सरस शैली में प्रस्तुत की गई है। अजमेर के चौहान दाजा वीसलदेव का भोज परमार की पुत्री राजमती के साथ विवाह होता है लेकिन जमती की व्यंग्य एवं तीखी बातो से नाराज होकर बीसलदेव उड़ीसा चला नाता है इधर बारह वर्ष तक राजमती राजा के वियोग मे दुःखी हो जाती है था अपने कहे व्यंग्य वचनों पर पछताने लगती है फिर वह एक पण्डित के द्वारा उन्देश भेजती है और राजा लोट पाता है । वीसलदेव रासो में प्रेम के निश्छल वरूप की अभिव्यक्ति के साथ-साथ गार के वियोग और संयोग पक्षों का अत्यन्त मार्मिक रूप में चित्रण किया गया है । इसमें 'मेघदूत' और 'सन्देशरासक' की देश परम्परा भी मिलती है। काव्य में मामन्ती जीवन के प्रति प्राक्रोश नो नामुलम भावनामो की विवशता और लाचारी का मार्मिक वर्णन मिलता जमती को ध्यंग्यमयी वाणी किसी भी कठोर हृदय को द्रवित करने में मावी है । राजस्थान की प्रकृति का रमणीय चित्र वीसलदेव रासो में है। विरह । की विभिन्न दशामों में प्रकृति वर्णन सहायक हुमा है । वीसलदेव रासो की भाषा सरल और बोलचाल की है इससे प्रतीत होता है कि इसका रचनाकार अधिक पढ़ा लिखा नही था । वीसलदेव रासो की कविता का नमूना इस प्रकार है- प्रीय तो चालियो कातिग मास, सूना मन्दिर घर कविलास । सूना घरा. चोखण्डी । नयंण गमायोपथि सरि जाई ।। । भूख नहीं श्रीस उच्छली ! उणी-धड़ा. नीद कहा थी होई। आघण कर दिन छोटा होई । सपी ! संदेशो मोकलोऊ कोई ।। हंसावली-असाइत ने वि. सं. 1927 में :हंसावली' नाम से एक प्रेम काव्य लखा । इसमें मुख्य रूप से चौपाई घंद का ही प्रयोग हुप्रा है , लेकिन बीच-बीच में कहीं-कही दोहे मी प्रयुक्त हुए हैं । रचना सरस और सरल है। हंसावली का रचनाकर असाइत सिद्धपुर में पैदा हुभा था तथा जाति से औदिच्य ब्राह्मण था । हंसावली काव्य का उदाहरण इस प्रकार है- . . * 1. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र, पृ. 86। राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृ. 891 24 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 7 किलकिलती वन विचरती पर बीसास सघि सामी साहस कीउ, हूँ एकसी निराम ॥ मगि असाइत भव अंतरि, समरि सामणी कंत । हमाउलि घरती ढली पीउ पीउ मुखि मनि ।। यसन्त विलास-लौकिक काव्य की श्रेष्ठ कृति के रूप में 'वसन्त विलास' जैसी साहित्यक रचना इस काल में मिलती है । डॉ. माताप्रसाद गुप्त ने इस रचना के महत्त्व को स्वीकारते हुए लिखा है कि मह एक अत्यधिक सरस साहित्यिक कृति है और आधुनिक भारतीय आर्य भाषा साहित्य के प्रादिकाल के इतिहास में वैजोड़ है। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी के अनुसार इस कृति का रचना काल लगमग वि, मं. 1350 के प्रामपास होना चाहिए। इस कृति के रचयिता का पता नहीं चला है। इसमें चौरासी दोहे हैं जिनमे वसन्त और स्त्रियों पर पड़ने वाले उसके विनासपूर्ण प्रभाव का सुन्दर चित्रण किया गया है। इस काव्य में प्रकृति और नारी के मदोन्मत्त स्वरूप का मार्मिक चित्रण है। इस काव्य की सरसता सूर के शृंगार वर्णन और रीतिकाल की शृगारिकता की परम्परा को हमारे सामने प्रस्तुत करती है । इस कृति में प्रादिकाल के जन-जीवन का वह सरम पक्ष उमरता है जिसे प्राचार्य रामचन्द्र शुक्ल शायद तलवारों की झनझनाहट के आधिक्य के कारण मही मुन पाये थे । स्त्री-पुरुष-प्रकृति-तीनों मे अजस्त्र बहती मदोन्मत्ता का इस काव्य मे जैसा चित्रण मिलता है वैसा रीतिकालीन हिन्दी-कवि भी नही कर सके । एक उदाहरण देखिए- इणि परि कोइलि कूजइ, पूजई युवति मरणोर । विधुर वियोगिनि धूजइ, कूबह मयण किमोर । लौकिक काव्य के अन्तर्गत जो अन्य काव्य मिलते है उनमे एक है--गार शत । इसमें 105 छंद हैं और इसका रचना काल लगभग वि. सं. 1350 है । विजयभद्र द्वारा लिखित 'हंसराज-बच्छराज चौपई' रचना उपलब्ध होती है जिसका रचनाकाल सं. 1354 है। संवत् 1409 मे भीम ने ‘सद्यवत्स वीर प्रबंध' की रचना की जो 730 छदों में लिखा हुआ है तथा यह आख्यान राजस्थान, गुजरात और इसके आसपास के क्षेत्रों में काफी लोक प्रचलित है। वसन्त विलास और उसकी मापा : हो.'माताप्रसाद गुप्त, पृ.9 2. History of Rajasthan Literature: Dr. H. L. Maheshwari, P.34. 3. हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र, पृ.93 भारम्भ काले:25 माणक्य सुन्दर सूरि ने 'मलय सुन्दरी कथा नाम से प्रेमाख्यान लिखा है जिसका रचनाकाल सं. 1421 है। अन्य लौकिक काव्यों में होरानंद सूरि रचित विद्यावितास पवाड़उ (वि. सं. 1428) तथा हीर भाट कृत 'मानवती विनयवती बन्ध' । पाय वौर मड्डरी की मौसम सम्बन्धी कहावतें भी प्रायः इसी काल की रचना है। धारण साहित्य-चारण साहित्य से तात्पर्य चारण शैली में लिखित साहित्य से है । यह साहित्य चारण कवियों के अलावा ब्राह्मण, राजपूत, ढाढी, होली, राव, सेवक आदि जातियों के कवियों द्वारा भी लिखा गया है । चारण 'जाति कविता भी करती थी और अवसर आने पर युद्ध भूमि में जूझती भी थी! राजस्थान में चारणों का राजपूत जाति के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । चारणों ने जहाँ एक मोर राजपूतों की उज्ज्वल कीर्ति गाथाओं का गुणगान किया है, वहीं मोका पड़ने पर अपने प्राश्रयदाता के साथ युद्ध भी लड़े है । यही कारण है कि चारण साहित्य में वीरत्व का सजीव भोर साकार रूप उत्पन्न हुआ है । चारणा साहित्य काफी समुन्नत है और देश के सभी विद्वानों ने इसकी प्रशंमा की है । इस साहित्य में वीर और शृंगार रस को प्रधानता है इसके अलावा अन्य रमों का भी सुन्दर परिपाक हुआ है। चारणों ने उच्चकोटि के भक्त भी हुए है। चारणों का सम्पूर्ण साहित्य ऐतिहासिक सन्दमों को उपज है। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी के अनुसार 'ऐतिहासिक साहित्य का वाहुल्य चारण-साहित्य की एक प्रमुख विशेषता की है।' धारण-साहित्य प्रायः डिंगल भाषा में लिखा गया है । प्रो० नरोत्तमदास स्वामा के शब्दों में चारणी शैली का साहित्य वीर रसात्मक और ऐतिहासिक है। इसको भापा डिंगल कहलाती है । डॉ, हीरालाल माहेश्वरी ने चारण-माहित्य को मुख्य रूप से दो मागों में बाटा है~1, ऐतिहासिक-बीररसात्मक तथा 2. पौराणिक- धामिक। राजस्थानी साहित्य के प्रारम्म काल की चारण साहित्य की रचनाएँ निम्नलिखित हैं- रणमल्ल छेद- इसका रचयिता श्रीधर व्यास है जो इडर के राजा रणमल राठौड़ का समकालीन था । इस ग्रंथ का रचना काल सं. 1457 है। 'रणमल छद' में 70 पद्य हैं तथा इसमें पाटण के सूबेदार जफरखां और रणमल की लड़ाई का वर्णन है। इसकी भाषा मोजस्वी, अलंकारमयी एवं सजीव है । ऐतिहामिक दृष्टि से इस काष्य का अपना महत्व है 1 वीर रस से परिपूर्ण इस लघु काव्य कृति का एक उदाहरण देखिए- । . 1. 2. राजस्थानी साहित्य : डॉ. हीरालाल माहेश्वरी, पृ. 10 राजस्थानी साहित्य : एक परिचय प्रो. नरोत्तमदास स्वामी. पृ. 25 26 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास दमदमकार दमाय दमाह, मढम ढमढम ढोल ढमाकई । तरवर वेस पहट्टा, तरतर तुरक पड़ा तलहट्टिइ। श्रीधर व्यास इस युग का एक महत्वपूर्ण कवि था उसने ऐतिहासिक दौर रमा. मिक काव्य के साथ-साथ धार्मिक एवं पौराणिक काय दो मी रचना की । 'रयमत छंद' के अलावा श्रीधर ध्यास का अन्य काव्य कृतियों में संपृमती रा छंद' (129 छंद) 'कवित्त मागवत' (127 छंद) मादि हैं। पौरमायण-वीरमायण का रचयिता बादर या बहादर जाति का मुसलमान बाढी था । स्वयं कवि ने एक स्थल पर लिखा है- बादर ढाढी बोलियो निसाणी गला । पं. रामकणं आसोपा ने इसका रचयिता रामचन्द्र माना है जो कि उचित नही है । इस प्रथ के रचनाकाल के सम्बन्ध में डॉ. मोतीलाल मेनारिया ने दो मत रखे हैं । एक तो वे इसका रचना काल स 1440 मानते हुए. कवि को राब वीरमजी का प्राधित बताते हैं दूसरी ओर ये इसे अठारहवीं शताब्दी के मध्य की रचना मानते हैं। प्रो. नरोत्तमदास स्वामी इसे चारणी शैली की प्रारम्भिक रचनाओं में स्वीकारते हैं ।- डॉ. माहेश्वरी इसकी रचना मवत् 1460 के बाद संवत् 1500 के आसपास मानते हैं । इस ग्रंथ में कुल 285 पय है तथा इसमें दला जाईया और वीरमजी के बीच होने वाले संघर्ष का वर्णन किया गया है । इसमें निर्माणी चंद का प्रयोग हुआ है। वीरमायण वीर रस की उत्कृष्ट एवं प्रोजस्वी भाषा से परिपूर्ण रचना है। एक उदाहरण प्रस्तुत है-- बटका डडगा बगतरां झटका कर झाडे पतसाहां दल पाधर राठोड़ रमाई घोड़ा पागल गैव का वाजा बजवाई तेग बहे मुतां तणी राठौड़-अगाई इतिहास की दृष्टि से यह ग्रथ महत्त्वपूर्ण है क्योंकि इसमें इतिहास की प्रत्यन्त मूल्यवान सामग्री सुरक्षित है । इस य में कवि ने अपने चरित नायक का यर्थातथ्य वर्णन किया है, उसमें कही किसी प्रकार की प्रतिशयोक्ति प्रतीत नहीं होती। युद्ध वर्णन मैं जैसा प्रयाह और संजीवंता है वैसी अन्यत्र दुर्लभ है। अचलदास पाँची री धानको इसका रचयिता सिवदास गाडण है । इसने अपने एवं इस रचना के निर्माण काल के बारे में कुछ भी नहीं लिखा है। यह तुकान्त गद्य-पद्य मिश्रित छोटी सी रचना है। इसमें दोहा, सोरठा, छप्पय मोर कुंडलियों का प्रयोग हुआ है । मय-समुच्चय मोर छंदों की संख्या 120 है। 1. 2. 3. हिंगल में वीर रस : डॉ. मोतीलाल मेनारिया, पृ. 226 राजस्थानी साहित्य : एक परिचय-प्रो. नरोत्तमदास स्वामी, पृ. 29 राजस्थानी साहित्य : डॉ. माहेश्वरी, पृ. 76 पारम्म काल : 21 - - इस काव्य में गागरोनगढ़ के राजा अचलदास खोची और मोड़ के बादशाह होसंगगोरी के युद्ध का तथा राजपूत स्त्रियों के जौहर का बड़ा सजीव वर्णन है । इसके रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वानों में मतभेद है। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी के मता- नुसार 'युद्ध'का समय सं. 1490 तथा इसका रचना काल संवत् 1500 के आसपास है । यद्यपि यचनिका वीर रस प्रधान रचना है लेकिन एक स्थल पर करुण रस का उल्लेख भी मिलता है। इस ग्रंथ में लोक प्रचलित 'वास' शैली के दर्शन होते हैं बहुत संभव है कि जन-साधारण की भावनाओं को ध्यान में रखकर ही वनिका की रचना की हो। ऐतिहासिक तथ्यो की दृष्टि से तो यह य उतना महत्त्वपूर्ण नहीं लेकिन भाषा और काम्य की दृष्टि से निश्चित रूप से उल्लेखनीय माना जायेगा । एक उदाहरण देखिए-- बिहू छेहि बांणावली । सरपुडिंग सलली । प्रणी प्रणी अतुली । पग पगां पली । रूधिर घर रलतली । बहु नाचे कंमुद महाबली । मालूझ आंगावली । ग्रालय अचलेसरि अड़यां ।। कवि ने इस काव्य में युद्ध का प्राखो देसा वर्णन किया है अतः उसमें सजी- वता और यथार्थ वर्णन है। चारण साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों में 'वचनिका' की गणना की जाती है । बचनिका का गद्य भी काफी सुन्दर है तथा उसमे 'वात' शैली का सहा प्रवाह एवं पोज है। इसी मांति जाखो मणिहार की रचना 'हरिचंद पुराण' (वि. सं. 1453) भी चारण साहित्य की अच्छी रचना है। प्रारम्भिक काल को उपलब्धियां--राजस्थानी साहित्य के इतिहास का यह काल साहित्यिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण कहा जायेगा। इस काल के साहित्य पर विचार करने से पता चलता है कि इस काल में चारणी शैली, लौकिक शैली और जैन शैली मे साहित्य लिसा गया। जैन शंली का साहित्य विविधता और प्रचुरता को लिए हुए हैं। राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भिक काल का पता जैन साहित्य से ही चलता है । इन जैन कवियों में जहाँ साहित्य का निर्माण किया, वही जैनेतर कृतियों को संगृहीत करके सुरक्षितं भी रखा। राजस्थानी साहित्य के संरक्षण में जैन विद्वानों की सेवा ऐतिहासिक महत्त्व की मानी जायेगी। प्रो. नरोत्तमदास स्वामी ने लिखा है कि जैन विद्वानों ने साहित्य की रचना ही नहीं' की किन्तु साहित्य की रक्षा करने का महत्त्वपूर्ण कार्य भी किया । जैन और जैनैतर सभी प्रकार के साहित्य को उन्होने संग्रहीत किया और उसे लुप्त होने से बचाया । संकडो जेनेतर मय जो अन्यत्र मलभ्य हैं. जैन भंडारों में देखे जा सकते है। . 2. राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. माहेश्वरी, पृ. 83 राजस्थानी साहित्य : एक परिचय-प्रो. नरोत्तमदास स्वामी, पृ. 27 है लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि प्रारम्भिक काल में ही राजस्थानी धीरे-धीरे साहित्य का माध्यम बनने की भोर भप्रमर हो गई थी जो प्रागे पलकर भारम्भिक के कई रूप विकसित हो रहे थे। चारणी साहित्य में उसका साहित्यिक रूपडित 28 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास माया को दृष्टि से देखा नाम तो हम साहित्य का गापा राजस्थानी-गुजराठी फा मिश्रित रूप है तथा करना पर अपना भाषा का प्रभाव भी दिखाई देता काल के पश्चात् गुजराती से अलग हो जाती है। मामा की दृष्टि से भी राजस्थानी के रूप मै तो जैन साहित्य और मौकिक साहित्य के रूप में उसका सीधा, सरल और सम्पपीय रूप कथ्य मौर शिप की दृष्टि से भी राजस्थानी का प्रारम्भिक काल कापी महत्वपूर्ण है इसके साथ ही राजस्थानी साहित्य की कुछ परम्पराओं का स्रोत मी इस काल के माहित्य में दृष्टिगोचर होता है। जैन साहित्य में धार्मिक भावना चरित नायकों के प्रेरणादायी मास्यान तथा पनि निर्माण पर बल दिया गया है तो चारणी माहित्य में वीर रस और लौकिक साहित्य में शृंगार रस का सुन्दर परिपाक हुआ है। पान्त, वीर मौर शृंगार-~~ये लोन इस काल के साहित्य के प्रधान रस हैं और देखा जाम तो आगे के राजस्थानी साहित्य में भी इन तीनों ही रसों से सम्बन्धित जीवन क्षेत्रों को लिया गया है। इस साहित्य में एक और जहाँ जीवन से विमुख होकर मोटर प्राप्त करने को उत्कट प्रमिलापा दिखाई देती है तो दूसरी तरफ युद्धोन्माद में मस्त वीर योद्धानों को युद्ध ललकार, तो फिर कही- कही प्रेम और शृगार की मादकता मे डबे प्रेमिमो की प्रेमानुभूतियों का मच्चा स्वरूप दिखाई देता है । धर्म, प्रेम, शृंगार और वीर भावना भारम्मिक साहित्य का कथ्य कहा जा सकता है। शिल्प की दृष्टि से देखा जाय तो राजस्थानी साहित्य के इतिहास का मह काल कई प्रकार की विविधता लिए हुए है। जैन साहित्य मे जैन कवियों ने काध्य के विभिन्न रूपों को अपनाया। जैन काव्य के इन काब्य रूपों का प्रमाव परवर्ती काव्य पर भी दिखाई देना है। जैन कवियों ने 'रास' को एक प्रभावशाली रचना- शैली के रुप मै अपनाया मोर जैन तीर्थंकरों के जीवन-चरित को जैन-आदशों के भावरण में 'रास' नाम से प्रस्तुत किया गया । लौकिक काव्यों में 'वीसतदेव रास' कोरबना हुई तो फिर इससे भिन्न विषय-भूमि को लेकर चारण-साहित्य में रासो ग्रंथ लिखे गये। इस साहित्य में प्रकृति के भो भनेक रुप मिलते हैं। जैन कायों में काव्य स्मों की विविधता में रास, चौपई, ढाल, पवाड़ा, संघि, पर्चरी, प्रबंध, चरित्र, सम्बन्ध, प्रास्यानक तया कथा आदि हैं। 'बचनिका' भी पारण साहित्य का एक अलग काव्य रूप है जो गद्य-पद्य मिश्रित है। इस काम युग ने मध्ययुग मे अनेक चारण कवियों को इस विधा को अपनाने के लिए प्रेरित किया और कई वनि- गए लिखी गई।
आरम्म काल :29 आरम्भ काल के साहित्य में छंद प्रयोग की विविधता भी दिखाई देती है। दोहा, छप्पय, तोटक, तोमर, चौपाई आदि छंदों का प्रयोग चारण साहित्य में खूब हुपा है । दोहा छंद तो प्रारम्भ से ही राजस्थानी का प्रिय छंद रहा है । छद के अतिरिक्त कथा कहने की भी कुछ शिल्प पद्धतियां इस काल के साहित्य में उपलब्ध होती है । 'प्रचलदास खीची री बचनिका' एक ऐसा काव्य है जिसमें गद्य और पद्य दोनों दिखाई देते हैं। इस काव्य में कथा-वर्णन को अपनी विशिष्ट शैली है । 'वचनिका' को चम्पू काव्य की संज्ञा दी जा सकती है और यह मारम्भ काल की एक उल्लेखनीय कृति है। इससे प्रकट होता है कि राजस्थानी में गद्य का उद्भव भी 14वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हो गया था । शैली के अन्तर्गत जैन कवियों ने ले.कगीतों की धुनों पर भी अपने काव्यों का निर्माण किया है । आरम्म में तर्ज के रूप में लोकगीत की प्रथम पंक्ति दे दी और फिर काव्य रचना की है। ऐतिहासिक दृष्टि से इन लोकगीतपरक रचनाओं का काफी महत्त्व है और इनके स्वतन्त्र अध्ययन से कई नवीन तथ्य प्रकाश में आ सकते हैं । इसी माति जैन कवियों ने लोक प्रचलित और परम्परागत कथानों को भी अपनी रचनामों में सुरक्षित रखने का प्रयत्न किया । कतिपय काव्य-रूढियों का प्रयोग भी जैन काव्य मे दिखाई देता है। इस दृष्टि से देखें तो राजस्थानी के आरम्भ काल के साहित्य में जैन कवियों का योगदान सबसे महत्त्वपूर्ण माना जायेगा-कथ्य और शिल्प की विविधता के कारण। धर्म भावना का सात्विक रूप, वीर रसात्मक कविता का प्रोजस्वी स्वर, युद्धों का सजीव वर्णन, प्रेम की उदात्त व्यंजना, गद्य का आविर्भाव आदि आरम्म काल की कुछ प्रमुख विशेषताएँ कही जा सकती हैं। रचनात्मक विशालता और भाषागत प्रौढ़ता भी इस काल के विशेष लक्षण कहे जायेंगे।
अध्याय-3 मध्यकाल : (सन् 1450 से 1850 ई.) पारम्भ काल में इस स्थिति पर विचार कर चुके हैं कि साहित्य मंततः अपने परिवेश की अभिव्यक्ति होता है। राजस्थानी मा रचनाकार अपनी परिस्थितियों में जिस युग-योष मे जुड़ा हुआ था, उसको ईमानदार ममिव्यक्ति उमको रचनामों में प्रकट हुई है । राजस्थानी साहित्य के मध्यकाल पर विचार करते हुए, हमे पुनः एक बार राजनीतिक और धार्मिक परिवेश पर विचार कर लेना चाहिए । राजनीतिक परिवेश-मध्यकाल के राजस्थान के इतिहास पर दृष्टिपात करें। तो प्रतीत होता है कि चौहानो के पतन के बाद राजस्थान में कुछ नये शासको का उदय, दिल्ली में मुगल साम्राज्य की स्थापना, मुगलों का प्रत्याचार और मनाचार ब्रिटिश राज्य की स्थापना और अंग्रेजों के खिलाफ बगावत का भाव मादि मुख्य- मुख्य स्थितियां दिखाई देती हैं । राजस्थान में राजपूत शासको ने लम्बे समय तक तुर्कों के साथ संघर्ष किया। लेकिन वे उनके बढ़ते हुए प्रभाव को रोक नहीं सके और अन्त मे पराजित हो गये। मेवाड में राजनीतिक स्थिति काफी गमीर रूप धारण करती रही। कुभा को हत्या के बाद उदयसिंह मेवाड के राजसिंहासन पर बैठा । उस समय मेवाडी सामन्तों में फूट थी फलतः ईडर से रायमल ने चित्तौड पर आक्रमण किया और वह सम्पूर्ण मेवाड़ का राजा बन गया । रायमल की मृत्यु के बाद महाराणा सांगा (सन् 1509) सिंहासन पर बैठा। इतिहासकारो ने लिखा है कि सोलहवीं सदी के आरम्भ में उत्तरी भारत की राजनीतिक स्थिति एक उबलते लावे की तरह थी। दिल्ली में उस समय सिकन्दर लोदी का शासन था। उसकी मृत्यु के बाद इब्राहीम लोदी सुल्तान बना । उसने चित्तौड़ पर आक्रमण किया लेकिन सांगा के हाथो पराजित होना पड़ा । इधर गुजरात और मेवाड के बीच बरावर तनाव बना रहा । इस समय मारवाड़ के राठौड पामेर के कच्छवाह तथा हाडौती के चौहान अपनी-अपनी सीमाप्रो मे अपने राज्य का विस्तार करने में लगे हुए थे। सन् 1508 मे राव गागा मारवाड़ के सिंहासन पर बैठा तथा उसने राठौड़ो की अन्य शाखाओ मेडता, बीकानेर आदि को अपने प्रमुत्व में लेने की योजना बनाई। फलतः बीकानेर और मारवाड के राठौड़ों मध्य काल:31 - मे संघर्ष प्रारम्भ हो गया। सन् 1520 में आमेर का शासक पृथ्वीराज बना और उसने भी अपने क्षेत्र को बढ़ाना शुरू किया। इधर राणा सांगा और बाबर के बीच खानवा में युद्ध हुआ जिसमें सांगा पराजित हो गया। रणमल का बड़ा लड़का राव जोधा था जिसने सन् 1459 मे जोधपुर वसाया और उसे मारवाड़ की राजधानी बनाया 1 सन् 1489 में राव जोधा की मृत्यु हो गई फिर सातल. सूजा और गांगा शासक बने। गांगा को मृत्यु के बाद सन 1531 में मालदेव मारवाड़ का शासक बना । मालदेव ने विस्तारवादी नीति को अपनाया। उसने मेड़ता, अजमेर और बीकानेर पर भी अधिकार जमाया। सन् 1562 में माल- देव का देहान्त हो गया। मालदेव ने अपने सैनिक पराक्रम और कूटनीति द्वारा एक विशाल राज्य की स्थापना की। मालदेव की मृत्यु के बाद राजस्थान में मुगलों के सैनिक केन्द्र स्थापित हो चुके थे और राजपूत राज्यों के प्रान्तरिक गृह कलह ने राज्यों में हस्तक्षेप करने का भी अवसर प्रदान कर दिया था फलतः इस प्रान्त पर पराधीनता की काली छाया मंडराने लगी। मेवाड मे जब महाराणा प्रताप राजगद्दी पर बैठे उस समय चित्तौड़ पर मुगलो का अधिकार या तथा जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर के शासकों ने अकबर की अधीनता स्वीकार करली थी । जून 1576 में राणा प्रताप और अकबर की सेना के बीच हल्दीघाटी में इतिहास प्रसिद्ध युद्ध हुआ । दुरसा पाढा ने प्रताप के शौर्य और स्वाभिमान को अपने ओजस्वी दोहों मे अभिव्यक्त किया है । औरगजेब की मृत्यु के बाद मुगल साम्राज्य पतनोन्मुख हो गया था। मुगलों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने के साथ ही राजस्थान मे मुगल-राजपूत सहयोग के विचित्र परिणाम भी नजर आने लगे। दुरसा माढा और पृथ्वीराज राठौड़ की 'वलिं क्रिसन रूकमणी' इसी काल की कृतिया है.। 18वीं शताब्दी में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजस्थान की राजनीति मे नवो- दित मराठा शक्ति ने प्रवेश किया और मराठो ने मालवा, दो, मेवाड़, जोधपुर आदि पर आक्रमण किया और धीरे-धीरे समस्त राजस्थान पर मराठा शक्ति का आधिपत्य हो गया। राजस्थान के राजपूत उस समय,राग-रंग में ड्वे हुए कूप-मण्डप बने रहे। 18वीं शती के उत्तरार्द्ध मे मुगलों की केन्द्रीय शक्ति पतनोन्मुख होने के कारण राजस्थान पर नियंत्रण रखने वाली कोई सर्वोच्च शक्ति नही रह गई. फलतः यहाँ के राजपूत परस्पर राडने-झगड़ने लगे । उस समय भारत मे अंग्रेजो की शक्ति का विकास हो रहा था अत: सर्वप्रथम सन् 1781 में जोधपुर के शासक विजयसिंह ने मराठों के विरुद्ध अंग्रेजों से पत्र-व्यवहार किया और फिर तो जयपुर, कोटा प्रादि के शासको ने भी अंग्रेजों से सहायता प्राप्त करने का आग्रह किया। ब्रिटिश संरक्षण स्वीकार करने के बाद राजपूत नरेशों को बाह्य स्वतन्त्रता खत्म हो गई और राज्यो की स्थिति अत्यन्त दयनीय हो गई । आर्थिक दशा कमजोर होने के कारण अव्यवस्था फैल गई और 32 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास राजस्थान भ गया। सामन्तो के खिलाफ विद्रोह की भाग महक उठी। सन् 1818 में सभी राज्यों ने भग्रेजों की अधीनता स्वीकार करली थी फलत: 1857 में राजस्थान में विप्लव की स्थिति पैदा हो गई। इस तरह राजनीतिक स्थितियों पर विचार करने से पता चलता है कि मध्यकाल युद्ध, अव्यवस्था, अराजकता और आक्रमणों का काल था। इस काल में मुगल साम्राज्य का पतन हुआ लेकिन ब्रिटिश कम्पनी की स्थापना हुई और मध्यकार के प्रतिम वर्षों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ भी वगावत का भाव पैदा हो ऐमी स्थिति मे सामाजिक दशा मी अशान्तिपूर्ण , थी और आर्थिक स्थिति का कमजोर होती जा रही थी। राजपूत शासको की पारस्परिक फूट और कलह जनमानस को काफी परेशान कर दिया था। इस काल का समाज रूढिनस्त और कई कुप्रथाम्रो जकडा हुआ था। मध्यकाल की प्रमुख प्रवृत्तियां-मध्यकाल के राजस्थानी साहित्य पर विचार करे तो प्रतीत होता है कि यह काल वर्ण्य-विषयों, काव्य रूपो तथा रचना शैलियों की दृष्टि से विविधता लिए हुए है। इस काल मे जैन माहित्य, लौकिक साहिर और चारण साहित्य मे जहाँ अनेक रचनाकार हुए, वही प्रास्यान काव्य और सं काव्य का निर्माण भी हुआ । चारण साहित्य में वीर, शृगार और भक्तिभावना का चित्रण मिलता है. तो संत परम्परा मे धार्मिक सद्भाव और ईश्वर के निर्गुण: सगुण स्वरूप का गुणगान भी दिखाई देता है । अपभ्रंश साहित्य की कई विशेषताएं मध्यकाल के साहित्य मे भी प्रकट हुई हैं। राजस्थान में नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव आरम्भ से ही रहा है फलतः इस काल में कई ऐसे सम्प्रदाय दिखाई देते हैं जिन पर नाथ सम्प्रदाय का प्रभाव लक्षित होता है। इन सम्प्रदायों ने जीवन मे सदाचार और योग-साधना पद्धति को अपनाने पर बल दिया तो दूसरी तरफ संत साहित्य मे भक्ति भावना का स्वर मुखरित हुमा। मुसलमानो के प्राक्रमणों के कारण जनता भयभीत थी फलतः उसमें भजन-कीर्तन और पूजन-मर्चन की भावना बलवती होती गई। इम काल में आस्यान काव्य भी लिमे गए जिनका उद्देश्य लोकजीवन में प्रवेश करके लोक चेतना और सांस्कृतिक भावना को मृदृढ़ करना था फलत: इन आख्यान काव्यों मे जिन प्रसंगो को लिया, वे आदर्श और उदात्त भावना से परिपूर्ण भी थे तो उनको प्रस्तुति साधारण बोलचाल की भाषा में की गई । ऐसी रचनामों का लोक रुचि की दृष्टि से बड़ा महत्व था । 15वी दाताब्दी में राजस्थानी गुजराती भाषा से अलग अपने स्वतन्त्र रूप में मा जाती है प्रतः इस काल में राजस्थानी का साहित्यिक रूप और बोलचाल की सोकभाषा वाला रूप भी दिखाई देता है। विभिन्न काव्य-रूपों, याव्य शैलियो और विषयगत विविधता के प्रापार पर मध्यकाल को राजस्थानी साहित्य का स्वर्णयुग भी कह माते हैं । बीर, शृंगार और भक्ति की प्ठ रचनाओं से परिपूर्ण मध्यकाल Nw प्रारम्भकाल:3: Eena का साहित्य मौखिक और लिखित परम्परा में काफी विशाल है, प्रवृतियो- पर मध्यकाल के साहित्य को निम्नलिखित रूप मे विभाजित किया जा 1.चारण काव्य 2.प्राख्यान काव्य 3. संत काव्य 4. लौकिक काव्य 5. जैन काव्य चारण काव्य-राजस्थानी साहित्य के प्रारम्भ काल में जो चारण-काव्य उपलब्ध होता है, उसका मूल स्वर वीर रसात्मक है क्योकि उस समय युद्धमय परिस्थितियां थी। ठीक इसी प्रकार 15वी शताब्दी से लेकर 19वी शताब्दी के उत्तरार्द्ध तक का काल भी युद्ध और आक्रमणों का समय था । राजपूत और मुगलों में बराबर युद्ध हो रहे थे तथा केन्द्रीय मुगल साम्राज्य के पतन का समय भी शुरू हो गया था फलतः ब्रिटिश सत्ता का बढ़ता आधिपत्य और उसके ही विरुद्ध में उभरता विद्रोह का स्वर~इस काल को प्रमुख राजनीतिक स्थिति थी। यही कारण है कि इस काल का साहित्य देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा में जूझने वाले वीरों की कीर्ति गाथानों का यथार्थ रूप है । चारण काव्य मुख्य रूप से दो धाराओ मे विमाजित किया जा सकता है- (क) ऐतिहामिक वीररसात्मक काव्य । (ख) पौराणिक-धार्मिक काव्य । (१) ऐतिहासिक वीररसात्मक काप-इस धारा के अन्तर्गत ऐसे चारण कवियों का काव्य पाता है जिन्होंने अपने आश्रयदातागों के शौयं और पराक्रम का वर्णन भी किया है तो मौका पड़ने पर स्वयं युद्धभूमि में जाकर जूझे भी है, यही कारण है कि वीर रस का जैसा और प्रभावशाली वर्णन चारण काथ्य मे मिलता है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है । चारण काव्य का वीररसात्मक काव्य जहाँ एक और ऐतिहासिक तथ्यों को समेटे हुए है, वहीं वह शिल्पगत विविधता से भी परिपूर्ण है । इस काल में वीर रस की प्रौढ और श्रेष्ठ कृतियां दिखाई देती हैं जिनमें प्रबंध काव्य, वेलि. वचनिका, विशिष्ट छंद प्रयोग प्रादि काव्य रूप हैं। कालक्रम की दृष्टि से ऐतिहासिक वीररसात्मक काध्य के प्रमुख कवियों का परिचय निम्न प्रकार है- गाउण पसाइत-मध्य युग के प्रारम्भिक कवियों में गाडण पसाइत का महत्त्वपूर्ण स्थान है । पसाइत की रचनामों में 'राव रिणमल रो रूपक' और 'गुण जोधायण' प्रमुख हैं । 'राव रिणमल रो रूपक विविध प्रकार के 71 इंदो में लिसा काव्य है जिसमें मारवाड़ के राव रणमल के यश एवं कुम्मा को है । 'गुण जोधायण' जोधपुर के संस्थापक राव जोधा की प्रशंसा में लिसा काव्य है। मृत्यु का वर्णन 34 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास इसमें कुल 75 छंद हैं । गाडण पसाइत की अन्य फुटकर रचनाओं में 'कवित्त राब रिणमल चूडे र वर में भाटिया ने मारीया ते समंरा, 'कवित राव रिणमल नामोर र घणी पेरोज ने मारीया ते समरा' और 'कवित्त राणं मोकल प्रां री खबर प्राय। रा' प्रमुख हैं। खिड़िया चानण-अपने समय के प्रतिष्ठित कवियों में खिडिया चानण का नाम उल्लेखनीय है । ये राणा मोकल पोर राव जोधा के समकालीन थे । कुछ इन्हें बीकानेर के संस्थापक राव बीका के समकालीन मानते हैं। बीकाजी ने इन्हें लाख पसाय भी दिया या । मुक्तक काव्य के रूप में खिड़िया चानण की दूहा राव रिणम रा,' 'दूहा राव रिणधीर रा' आदि रचनाएं उपलब्ध होती हैं। सिंडिया जग्गा अपनी 'वचनिका' में भी खिडिया चानण की “दूहा राव रिणमल रा' रचना के उल्लेख किया है जो खिड़िया चानण की प्रसिद्धि का परिचायक है । सिंढायच चोभुजा-इनकी गणना भी वीर रसात्मक रचनाएँ लिखने वाल में की जाती है । सिंढायच चौभुजा का रचना काल संवत् 1500 के आसपास र है । इन्होने भी राव रणमल के बारे में काव्य लिखा था । पनाभ-जालोर के चौहान अखैराज का आश्रित कवि पद्नाम था। इस संवत् 1512 मे 'कान्हडदे प्रबंध' की रचना की है। इस काव्य में जालौर के सोर गिरा चौहान कान्हडदे पर जब अलाउद्दीन खिलजी के प्राक्रमण होते हैं उस समय कि प्रकार कान्हडदे अनेक राजपूत सैनिको के साथ संघर्ष करता हुआ वीरगति को प्रार होता है. इसका प्रभावशाली चित्रण किया गया है। "कान्हड़दे प्रबंध' चार खंडो विभाजित है और इसमे चौपाई, दोहा, सर्वया आदि छंदों का प्रयोग किया गया है 'कान्हड़दे-प्रबध' सोलहवी शताब्दी के काव्यों में विशिष्ट स्थान रखता है । इस का० के सम्पादक प्रो० के. वी. व्यास ने इसकी तुलना पृथ्वीराज रासो से की है। इ काव्य मे तत्कालीन समाजिक, धामिक, माथिक और भौगोलिक परिस्थितियों का यथातथ्य वर्णन हुप्रा है । साहित्यिक दृष्टि से प्रसाद शली मे लिखित 'कान्हड़दै प्रब एक सशक्त काव्य कृति है । इसमें पाच लौकिक शैली के गीत दो गद्याश मी दिये हैं। इसमे कुल 1000 छद है । भाडउ व्यास-इन्होने संवत् 1538 मे रणथमौर के प्रसिद्ध हठी एव चौहान वीर हम्मीरदेव के सम्बन्ध में 'हमीरायण' काव्य की रचना की । इस काव्य में हम्मी देव के शौर्य, पराक्रम और शरणगात रक्षा के भाव का सुन्दर चित्रण किया गया है इसका कथानक मी 'कान्हड़दे प्रवध' से मिलता जुलता है । 321 छदों में लिखे इन काव्य मे दोहा, गाहा, चौपाई प्रादि विविध छंदों का प्रयोग हुग्रा वोटू सूजा-वीठू सूजा राव वोका और लूणकरण का समकालीन कवि था राव जैतसी ने वोठू सूजा को जागीर के रूप में एक गाव मी दिया था । वीटू सूजा ने 'राव जैतसी रो पाघडी छ।' काव्य लिखा, जिसमे 401 छद हैं । इतिहास की दृष्टि से यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण काव्य है। - ।
प्रारम्म काल:35 राव जंतसी से सम्बन्धित दो अन्य काम्य 'राव जैतसी छद' और 'जैतसी रासो' भी मिलते हैं लेकिन इनका रचयिता अज्ञात है । मारहठ प्रासा-इनका जन्म सवत् 1563 के प्रासपास हुमा था। ये राव मालव देव के विशेष कृपापात्र थे । सुप्रसिद्ध भक्त कवि ईसरदास इनके भतीजे थे। इनकी कुल सात रचनाएं उपलब्ध होती हैं जिनमे 'उमादे भटियाणी रा कवित्त' और 'वाघजी रा दूहा' काफी प्रसिद्ध हैं । उमादे मटियाणी इतिहास मे रूठी राणी के नाम से विख्यात है। कहते है उमादे का विवाह जोधपुर के राव मालवदेव के साथ हुआ था लेकिन विवाह की प्रथम राम्रि में ही जब उमादे ने अपनी दासी भारमली के साथ मालदेव को क्रीडारत देखा तो वह रूठ गई और आजीवन रूठी रही । मारमली बाद मे कोटडा के स्वामी बाघजी के पास रहने लगी । वारहठ पाशा की दोनों रचनाएं उमादे एवं बापजी से सम्बन्धित हैं । 'बाप जी रा दूहा' वारजी की मृत्यु बाद लिखे करुण रस से प्रोतप्रोत पिछोले (मरसिया) हैं यथा-- बाधा प्राव वलेह, घर कोटड़े त घरणी। जासी फूल झड़ेह, वास न जामी वापरी ।। बोट मेहा-बीटू मेहा के रचना-काल के सम्बन्ध में कोई प्रामाणिक सामग्री उपलब्ध नहीं हैं । हो, हीरालाल माहेश्वरी के अनुसार इनका रचना-काल सत्रहवी शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना जाना चाहिए। इनकी रचनाओं में पाबूजी रा छंद', 'गोगाजी रा रसावला' 'करणी जी रा छद', 'चादाजी री वेल' आदि प्रमुख हैं। 'पाबूजी रा छंद' पाबूजी के शौर्य और पराक्रम से सम्बन्धित एक श्रेष्ठ रचना है । बारहठ ईसरदास-ईसरदास का जन्म जोधपुर राज्य के भादस गांव में हुमा था। इनके जन्म के सम्बन्ध में दो मत हैं । कुछ स. 1595 मे मानते हैं तो कुछ सं. 1515 में । लेकिन डॉ. हीरालाल माहेश्वरी और डॉ. मोतीलाल मेनारिया के अनुसार इनका जन्म संवत् 1595 मानना ही उचित है। ईसरदास भक्त कवि थे लेकिन इन्होंने वीररस की रचनाएं भी की हैं । चारण कवियों में ईसरदास कवि के रूप मे माने जाते हैं। इनकी तेरह रचनाएं उपलब्ध होती हैं--1. हरिरस 2. छोटा हरि रस 3. बाल लीला 4. गुण भागवत हस, 5. गरुष्ट पुराण 6 गुण आगम 7. निदा- स्तुति 8. देवियाग 9. गुण वैराट 10. समा पर्व 11. हाला झाला रा फुडलिया 12. रास फैलास और 13. दाणलीला। बारहठ ईसरदास का हाला:झालां रा कुडलिया' राजस्थानी भाषा की श्रेष्ठ वीर रसात्मक कृति है जो माला रायसिंह और हाला जसाजी के बीच हुए युद्ध से सम्बद्ध । वीर रस से परिपूर्ण इस ग्रंथ में युद्ध का सजीव चित्रण हुआ है । इन ग्रंथो के अलावा ईसरदास के कुछ फुटकर गीत एवं दोहे भी मिलते है। उदाहरण के रूप में एक दोहा देखिए- राजस्थानी भाषा और साहित्य : डॉ. माहेश्वरी, पृ. 112 . 1. 2. . १. 126 36: राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास सैल धमोड़ा किम, सह्या, किम सहिया गजदंत । कठण पयोधर लागतो. कससमतो तू कंत ॥ दूदा प्राशिया-ये राव सुरताण के कृपापात्र थे । इनकी कुछ फुटकर रचना प्राप्त होती हैं इनमे राठौड़ वीर कल्ला पर लिखित कुडलियां काफी प्रसिद्ध हैं मो इनकी संख्या 17 है। सांदू माला-सांदू माला बीकानेर के छठे शासक राजा रायसिंह के समकाली थे। रायसिंह ने इन्हें पुरस्कृत भी किया था। सादू माला ने बादशाह अब महाराणा प्रताप और रायसिंह के पराक्रम का वर्णन तीन अलग रचनाओं में झूला छंद में किया है । सांदू माला 'झूलणा' छंद के विशेष कवि माने जाते हैं । स माला की रचनाएं निम्नलिखित हैं- 1. झूला महाराज रायसिंघजी रा 2. झूलगा दीवांण श्री प्रतापसिंघजी रा 3. झूलगा अकबर पातसाहजी रा दुरसा पाढा-मध्ययुग के श्रेष्ठ, यशस्वी और लोकप्रिय कवियों में दुर माढा का सर्वोच्च स्थान है । श्री शंकरदान जेठोभाइ देथा के अनुसार, इनका जा संवत् 1595 मे गाव जैतारण मे और स्वर्गवास संवत् 1708 मे हुआ । इनके सम्ब में कई बातें प्रचलित हैं। कहते हैं कि छोटी अवस्था में ही जब इनके पिता का देहा हो गया तो बगड़ी के ठाकुर प्रतापसिंह ने इनका पालन पोषण किया । दुरसाजी ६ अकबर से अच्छा सम्बन्ध था और उसके शाही दरबार में इनकी अच्छी प्रतिष्ठा थी दुरसाजी हिन्दू धर्म और हिन्दू संस्कृति के अनन्य उपासक थे यही कारण है f तत्कालीन युग में हिन्दुओं की विपन्नावस्था को देखकर दुरसाजी ने अकबर व कूटनीति पर तीखा व्यग्य किया है । इनकी रचनाओं मे मेवाड़ के राणा प्रताप, राव चन्द्रसेन और राव सुरताण के देश प्रेम का ओजस्वी भाषा मे चित्रण किया गया है । दुरसा आढा की प्रमुख रचनामों में 'विरुद्ध छिहतरी' 'किरतार बावनी' प्रादि हैं । कुल मिलाकर छोटी-बड़ी व कृतियां, 125 डिंगल गीत और फुटकर पद्य प्राप्त होते हैं । इनमें "विरुद्ध छिहतरी' काफी चर्चित रही है । प्रबंध रचनाओं में "भूलणा राव अमरसिंह गजसिंघोत री' दुरसा आढा की सर्व प्ठ रचना है । इनकी कविता के उदाहरण देखिए- लो में हिन्दू ताज, सगपण रोप तुरक सू। प्रारज कुल री प्राज, पूजी राण प्रताप सी।। अकबर कूट प्रजाण, हिया फूट छोड़ न हठ । पगां न लागण पारण, परधर राण प्रताप सी॥ दूदा विसराल-इन्होंने 'राठोड रतनसिंह री बेलि' की रचना की, जिसमें जैतारण के शासक रतनसिंह का मुगलों के साथ हुए युद्ध का वर्णन है। 72 छंदों का रिम्म काल:37 यह लघु काध्य वीर रस को उत्तम रचना है जिसमें युद्ध और विवाह के रूपक का निर्वाह किया है। फेसोदास गाडण-ये सत्रहवी शताब्दी के उत्तरार्द्ध के महान कवि है। ये जोधपुर के महाराजा गजसिंह के प्रिय कवि थे। इनकी प्रसिद्ध रचना 'गज गुण रूपक वध' महाराज गजसिंह के विभिन्न युद्धों मे सम्बन्धित हैं। युद्ध वर्णन की प्रधानता से इसे युद्ध काध्य भी कहा जा सकता है। 130 छंदों में लिखित इस प्रबंध काव्य में वीर रस को सजीव वर्णन हुआ है । इस काव्य पर नाथ पंथ का प्रभाव मी परिलक्षित होता है। महेसदास राव -इन्होने लगभग सात रचनाएं लिखी, जिनमें "बिन्है रासो' । सर्वाधिक ख्याति प्राप्त है । इसमें शाहजहाँ के तीन विद्रोही शाहजादो का शाही सेना के साथ हुए युद्ध का सजीव वर्णन है । कई स्थलों पर गौड़ धोरों का वर्णन भी है। गिरधर प्रासिया-इनका लिखा हुआ 'संगत रासो' 943 छंदो का प्रबंध काव्य है जिसमें महाराणा प्रताप के छोटे भाई शक्ति सिंह के वीरतापूर्ण कार्यो का । उल्लेख है। जागा खिड़िया-मध्यकालीन राजस्थानी साहित्य में जग्गा खिडिया द्वारा रचित 'वनिका राठौड़ रतनसिंह महेसवासोत री' अत्यन्त प्रसिद्ध रचना है। (रचनाकाल---संवत् 1715) इसमें रतलाम के धीर योद्धा रतनसिंह और शाहजादा औरंगजेब के बीच हुए युद्ध का सजीव वर्णन है । अंत मे रतनसिंह ने युद्ध भूमि में ही वीरगति पाई। कवि ने अपनी इस रचना मे पुद का कलात्मक वर्णन किया है। 1 कुमणकर सांदू-इन्होने संवत् 1732 के आसपास 'रतन रासो' ग्रन्थ की रचना की। इसके अलावा सांदू ने 'जयचंद रासो', 'महाराजा रायसिंह री सतियां रा कवित्त' एवं कुछ फुटकर गीत तथा दोहे भी लिखे । रतनू धोरभाण-~जोधपुर के महाराजा अभयसिंह और सर बुलन्दखों के बीच । संवत् 1787 में अहमदाबाद में युद्ध हुआ था फलत: इस प्रसंग को लेकर राजस्थानी काव्य में तीन प्रसिद्ध कवियों ने अपने-अपने ढंग से रचनाएं लिखी। रतनू वीरमाण ने "राजरूपक', करणीदान ने 'सूरज प्रकास' मोर खिडिया बखता ने 'महमदाबाद से झगडा रा कवित' नाम से रचना लियो । 'राजरूपक' मौर 'सूरज-प्रकाश' बीर रस की प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठ कृतियो है । हमीरधान रतन-इनको प्रसिद्ध कृति 'देसलजी री धनिका' है। कहते हैं कि इन्होने विभिन्न विषयों पर 175 ग्रन्थ लिखे हैं । मादा पहाइसाम-इन्होंने 'गोगादे रूपफ' की रचना संवत् 1780 एवं 1811 के योग की। इसमें राठोड़ गोगा का जोइयों से युद्ध कर वीरगति प्राप्त करने का वर्णन है। इसको कथावस्तु बादर ढाढी कृत 'रामायण' से मिलती- जुलती है।
38 : राजस्थानी साहित्य का मंक्षिप्त इतिहास गाडण गोपीनाथ-इन्होने अठाहरवीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में 'प्रन्धराज से रचना की जो बीकानेर के महाराजा गर्जामह के जीवन से सम्बद्ध है। खिड़िया हुकमीचंद-ये उन्नीसवी शताब्दी के प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय डिपन गीतकार थे। इनके डिंगल गीत काफी चचित रहे हैं । चारणों में इनके गीतों के कठस्थ करने की परम्परा रही है । बांकीदास~ये मध्य युग के प्रतिम बड़े कवि हैं। इनका जन्म जोधपुर राज्य के पंचभद्रा क्षेत्र के माडियावास नामक गांव में सं. 1828 में हुआ था। वर्ष की उम्र में ये जोधपुर मा गये और काव्य, व्याकरण, इतिहास प्रादि की शिक्षा दीक्षा पाकर तत्कालीन महाराजा मानसिंह के कृपा-पात्र कवि हो गये। बाकीदार सस्कृत डिंगल. फारसी और व्रजमापा के मी विद्वान थे। इन्होने लगभग 30 ग्राम एव फुटकर गीत लिसे। बांकीदास की गणना आज डिंगल को प्रथम पंक्ति में कवियों में की जाती है। बांकीदास माधुनिक जीवन की प्रसंगतियों पर भी तीसा प्रहार करने वाले कवि थे। अंग्रेजी माम्राज्य के विरुद्ध वाकोदाम ने देशवासियों को तीखी चेतावनी दी है। इनका 'चैतावरणी का गीत' काफी प्रसिद्ध है। उनकी कविता का एक उदाहरण देखिए- सूर न पूछे टीपणो, सुकन न 'देख सूर । मरणा में मंगल, गिर्ण, समर घो मुख नूर ।। हिन्दी कविताओं में राष्ट्रीय भावनाओं का श्री गणेश जहाँ मारतेन्दु हरिश्चल के काल से मानते हैं. वहाँ यह जानकर आश्चर्य होगा कि वाकीदास ने बहुत पहले जातीयता में ऊपर उठकर हिन्दू-मुस्लिम ऐक्य को राष्ट्रीय भावना को इस प्रकार अभिव्यक्त किया था- प्रायो इंगरेज मुलय र ऊपर रामों रे फिहिक रजपूती. मरदां हिन्दू की मुगलमाण । हम तरह बांकीदाम का मह उद्बीयन गीत तत्कालीन युग यो एक महत्त्वपूर्ण रचना कही जायेगी। वीर रस की कविताएं लियने वाले अन्य कवियों में यारहठ संकर बारहठ लामा, कल्याणदाग मा पादि प्रमुग है। (न) पौराणिक पार्मिक काम्य-इम पारा के अन्तर्गत धारण कविमों का ऐसा माथ्य पाता है जो पौरागिन मोर धार्मिक विषयों को लेकर लिया गया है। इसमे भगवान के सभी पक्तारी को लेकर रचनाएं मिलती है लेकिन राम और हटेग मे गम्बन्धित अपिक कांप उपलब्ध होता है। इनमें प्रमाया दुध साहित्य भारणी देवियों पर-आयत्री. महमाय, पालेराय, करणीजी- मति पसरपनानों के कप में निगाई देता है। मां गन्ध । र में सामने वाली प्रमुग रमतामोग घनिगुंग प्रारम्भ काल:39 पृथ्वीराज राठौड़-राठोड पृथ्वीराज बीकानेर नरेश राव कल्याणमल के बेटे और जैतमी के पोते थे। इनका जन्म सं 1606 और मृत्यु सं. 1657 में हुई। बहुमुखी प्रतिभा के धनी पृथ्वीराज राजस्थानी साहित्य के सर्वोत्कृष्ट कवियो में एक हैं। ये कवि और भक्त दोनों रूपों मे ख्याति प्राप्त कर चुके थे। इन्हें डिंगल, नज, और संस्कृत का गहरा ज्ञान था । पृथ्वीराज स्वाभिमानी, स्पष्टवक्ता एवं राष्ट्रीय विचारधारा के व्यक्ति थे । यही कारण है कि उन्होंने अकबर के लिये 'अकबरियाह' 'तुरकडा', ठग आदि शब्दों का प्रयोग किया था। पृथ्वीराज की निम्नलिखित रचनाएं प्रसिद्ध हैं- 1. वेलि क्रिसन रुकमणी री 2. ठाकुर जी रा दूहा 2 गंगा जी रा दूहा 4. फुटकर दोहे और गीत पृथ्वीराज राठौड़ की प्रमुख कृति 'वेलि क्रिसन रुकमण री' है । शृंगार, भक्ति और वीर रम के सुन्दर समन्वय से परिपूर्ण प्रस्तुत कृति 304 छंदों में लिखी हुई है जिसमें कृष्ण और रुकमणी का प्रेम-वर्णन है । इसे डिंगल की सर्वश्रेष्ठ रचना बताते हुये कवि दुरसा पाढा ने इसे पांचवा बेद और उन्नीसवां पुगण कहा है। 'वेलि' पर अनेक टीकाएं लिखी गई जो इसकी लोकप्रियता की सूचक हैं । भावपक्ष, कलापक्ष उपमा वर्णन, प्रकृति चित्रण प्रादि की दृष्टि से यह प्रोढ एवं सशक्त कृति है । श्रृंगार और प्रेम का चित्रण अत्यन्त मार्मिक, मौलिक और नवीनता लिए हुए है। इसकी भाषा साहित्यिक राजस्थानी है। इसमे डिंगल के प्रसिद्ध छद वेलियो गीत का प्रयोग हुआ है । एक उदाहरण देखिये- संग सखी सील कुल वेस समाणी, पेखि कली पदिमणी परि। राजति राजकुरि राय अंगण, उडियरण अम्ब हरि ।। किसनो-इनकी प्रसिद्ध रचना महादेव पार्वती री वेलि है जो 382. छंदों में लिखी हुई है । इसमें शिव के सती और पार्वती के साथ हुए दो विवाहों का वर्णन है। रचनाकार का नाम किसनउ (किसनो) मिलता है । केसोवास गाडण केसोदास ने वीर रस की रचनाओं के साथ-साथ भक्ति विषयक रचनाएं भी लिखी जिनमें निसाणी विवेकवार' 'छंद महादेव जी रो' तथा "छंद श्री गोरखनाथ' उल्लेखनीय हैं। 'नीसाणी' में; वेदान्त और भक्ति का सुन्दर वर्णन है। माधोदास दपवाड़िया-ये दधवाड़िया गौत्र के धारण चूडा जी के बेटे थे इनका जन्म सं. 1610 और 1615 के बीच मेड़ता के पास बलूदा गांव में हुआ । माधोदास उच्चकोटि के कवि एवं भक्त थे। इनकी प्रसिद्ध कृति "राम रासो' है जो मध्य युग की उल्लेखनीय कृतियों में एक है । वाल्मीकि की रामायण से प्रेरित । कारण विशिष्ट रचना मानी जाती है। 40: राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास यह रचना माव और माया की रष्टि से सगक्त है। कवि की दूसरी रस 'नीसाणी गजमोय' भी महत्वपूर्ण है। सापाजी झूला-ये ईडर राज्य के लीलया गांव के निवासी चारण स्वामी दौस के दूसरे पुत्र थे । इनका जन्म संवत् 1632 में प्रौर स्वर्गवास सवत 1703 में हमा । सामाजी कृष्ण के अत्यन्त मत थे । इनकी रचनाएँ कृष्ण भक्ति से प्रोतप्रोत हैं । इनके दो पंथ उपलब्ध है-'हामणी हरण' और 'नागदमण' । 'नागमन सायाजी का सजीव एव प्रौढ़ काव्य है। इसमें कालिय मर्दन की कथा कही गई है। 'नागदयण' दुश्म-वर्णन, रूप-वर्णन मोर संवादों सुरजनदास पूनिय (स. 1640-1748)-इनकी रचनामों में 'कथा हरिगुर्ष 'कथा गजमोख' और 'रामरामो' प्रमुख है । इनमें "रामरासो' 176 छंदों में लिखित धीर रसात्मक कृति है और कया की दृष्टि से इसमें पर्याप्त नवीनता है। कल्याणदास इन्होंने 'गुण गोविन्द (रचना काल. सं. 1700) की रचना की है जिसमें गम और कृष्ण की लीलाओं का वर्णन है । साहित्य की दृष्टि से यह अत्यन्त महत्वपूर्ण कृति है। बारहठ ईसर दास हाला-झाला रा कुडलियां' के रचनाकार बारहठ ईसर दास ने कुछ भक्ति सम्बन्धी रचनाएँ भी लिखी जिनमें 'हरिरस' और 'गुण निंद्यातत:' प्रमुख हैं। मुरारीदास बारहठ-इनकी लिखी' 'गुण विजय ब्याह रचना प्राप्त होती है इसमें कृष्ण-रुकमणी विषयक कथा का उल्लेख है। कृपाराम खिड़िया (सं. 1800 से सं. 1890)-इनका जन्म जोधपुर क्षेत्र में खराड़ी गांव में हुआ था । ये खिडिया शाखा के चारण थे। ये बड़े होने पर मीकर के रावराजा देवी सिंह के पास आ गये थे और रामराजा लक्ष्मण सिंह के समय तक यहीं रहे । इन्हें जागीर में गाव भी मिला जो आज मी 'कृपारामजी की दागी' के नाम से जाना जाता है। राजिये के सोरठे नाम से इनकी प्रसिद्ध कृति है जिसमे इन्होंने अपने नौकर राजिया को सम्बोधित करके नीति से सम्बन्धित सोरठे लिये है । राजिया के मोरठे लोक-जीवन में काफी लोकप्रिय हैं । राजस्थानी के नीति काव्य में कृपाराम को यह मौलिक एवं अनूठी देन है । एक सोरठा देखिए- मुख ऊपर मीठास, घट माही खोटा पड़े। इसड़ा सूइसलास, राखीज नह राजिया ॥ प्रोपा आढा-यै गध्ययुग के अन्तिम प्रसिद्ध मक्त कवि हैं । इनका रचना काल सं. 1860 से सं. 1890 माना जाता है । इनके फुटकर गीत ही उपलब्य होते हैं। इनके गीतों में सरमता और मामिकता है। इस तरह पौराणिक धार्मिक काव्य लिखने वाले इन कवियों में श्रीधर व्यास की 'दुर्गामनी' जनिट (16वी शताब्दी) का हरिराम'. प्रल्लू जी कविया (सं.
आरम्भ काल:41 1:25-1625) के भक्तिपरक छद, बारह मासा (सं. 1550-1650) के 'गुण निरजण प्राण', चूडो जी बंधवाडिया (रचनाकाल स. 1620-1625) की निमंधाबध और गुण वाचक वैलि, सांखला करमसी इणेचा को क्रिसन जी री वेलि, कुशलाम की 'दुईसात्तसी', विठ्ठल दास का 'रुकमणी हरण' महेस दास राव का 'रघुनाथ चरित नव रस वेलि' मुहता रूपनाथ का रूघरासो' अईदान गाडण का 'श्री भवानी शंकर रो गुण शिव पुराण', केसरी सिंह जतायत का 'पंखी पुराण', जती जयचन्द की 'माता जी री कनिका' प्रादि रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। 2. प्राण्यान काव्य-मध्य युग में आख्यान कार्यों की लम्बी परम्परा रही है ये आस्पान पौराणिक और धार्मिक प्रसंगों पर आधारित हैं तथा जन सामान्य की भाषा में अनेक राग-रागनियों में प्रस्तुत किये गए हैं । नाटकीय शैली में लिखे इन आख्यानों का सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से बड़ा महत्व है और इनके द्वारा परिण निर्माण एवं समाज सुधार की मावना पर बल दिया गया है । कुछ प्रमुख प्रख्यानों के रचनाकार निम्नलिखित हैं- डेल्हजी (सं. 1490-1550)~-इन्होंने अभिमन्यु की कथा को आधार बनाकर 'अहमनी' नाम से 717 छंदों का पाख्यान लिखा है इसमें वीर एवं करुण रम की प्रधानता है तथा यह युगीन परिवेश एवं लोक प्रचलित मान्यताओं को लेकर चला है। पदम भगत- इनका 'कमिणी मगल' तो राजस्थान में सर्वाधिक लोकप्रिय भाख्यान रहा है तथा इसे लोक जीवन का अभिन्न अंग माना जा सकता है । इस प्रास्यान का रचना काल संवत् 1550 के माम-पास रहा होगा। मेहोजी-इन्होंने रामचरित पर आधारित अपने ढंग का 'रामायण' नाम से प्रास्यान लिया है और यह मध्य युग का सर्वोत्कृष्ट आख्यान है । पाख्यान को पात्र योजना नवीन और यथार्थवादी है। इस प्राश्यान का रचना काल संवत् 1575 है। फैसोजी (सं. 1630-1736)-इनके चार प्रास्मान उपलब्ध होते हैं- 'कथा भी दुमासणी' 'कथा सुरगा रोहणी', 'कथा वहसोवनी, और प्रहलाद चरित । , इनमे प्रहलाद चरित सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्राख्यान है । इसमें कुल 696 छंद हैं तथा वात्सल्य एवं करुण भावों की प्रधानता है । युग के अन्य प्राख्यानो मे सुरजन जी रचित 'कथा उपा पुराण' तथा 'प्रहलाद पुराण, रुस्तम जी रचित 'किसन व्यावलो, सरवण जी रचित 'सीता पुराण' तथा परशुराम देवाचार्य द्वारा रचित कई उल्लेखनीय प्रास्थान हैं। 3. संत काव्य-राजस्थानी लोक जीवन में संतों का सम्पर्क और प्रभाव भारम्भ मे हो रहा है। इन संतों ने धार्मिक एवं माध्यात्मिक भावना के जागरण एवं उत्यान में महत्वपूर्ण योग दिया है । इन संतो के कारण राजस्थानी साहित्य की 42 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास पृथ्वीनार अच्छी अभिवृद्धि हुई । ये सत प्रधिक पढ़े-लिखे मही ये तथा काव्य-निर्माण के प्रति जागरुक भी नहीं थे क्योकि इनका मुख्य उद्देश्य तो मीधे-सरल रूप मे अपने विश्वास एव मान्यताओं को प्रस्तुत करना या इसलिए धर्म-सिद्धातों के प्रचार एव लोक कल्याण की भावना के कारण इनके काव्य में कलात्मकता का ममाव है । सर्व कविमों को दो भाग में बांटा जा सकता है- 1. सम्प्रदाय विशेष से सम्बद्ध सत कवि। 2. सम्प्रदायेत्तर कवि । इनमे प्रमुख सम्प्रदायों का परिचय निम्नलिखित है--- 1. नाथ सम्प्रदाय-नाथ सम्प्रदाय का प्रवर्तन गोरखनाथ (लगभग 11वी शताब्दी) ने किया था। इनकी परम्परा में नौ नाथ और नाथों के बारह पंथ प्रमुख रहे हैं । राजस्थान में नाथों का व्यापक प्रभाव रहा है। (17वी शताब्दी) मध्य युग के प्रसिद्ध सत हुए हैं जिनकी 29 कृतियों का पता चला है । जोधपुर के महाराजा मानसिंह (सं 1839-1900) नाथों के परम भक्त रहे हैं । बनानाथ (रचनाएँ-'अनुभव प्रकाश' और 'परवाना') नवलनाग और उत्तमनाथ इस सम्प्रदाय के अच्छे कवि कहे जा सकते हैं। 2. विश्नोई सम्प्रदाय- इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक जाम्मो जी (सं. 1508- 1593) थे । यह सगुणोन्मुष निर्गुण सम्प्रदाय है । इस सम्प्रदाय के कवियों की भाषा राजस्थानी है. इनमें दोजी नैण, वोल्ही जी, केमो जी. सूरजन जी. परमानद जी हरचन्द जी प्रादि प्रमुख है। जमनायी सम्प्रदाय-इस सम्प्रदाय के प्रवर्तकः जसनाथ जी (सं. 1539- 1:631 थे। यह सम्प्रदाय विचार-दर्शन में विश्नोई सम्प्रदाय से मिलता-जुलता है। इस सम्प्रदाय के करमदास, देवोजी, लाल नाथ, चोखनाथ मादि कुछ ऐसे प्रसिद्ध कवि हैं जिन्होने राजस्थानी भाषा में अपनी रचनाएँ लिखी हैं । निरजनी सम्प्रदाय---यह पंथ हरिदासजी से चला है। इनके अनुयायी मिर जन निराकारकी आराधना करते । इनमे कुछ गृहस्प है तो कुछ निहंग । इस सम्माय पर बाद में मगुण भक्ति का प्रभाव भी पड़ा। डीडवाना के पास गाढा निरजनिपो का प्रधान केन्द्र है। हरिदासजी की वाणी में राजस्थानी के साथ ब्रज भाषा के बाद भी हैं। तुलसीदास, जगजीवनदास, भगवानदास. मनोहरदास, सेवा. पास प्रादि हम सम्प्रदाय के कुछ ऐसे संत कपि हैं जिन्होंने राजस्थानी भाषा में भक्ति परक रचनाएं प्रस्तुत की हैं। शाद पंप इस पंथ के प्रवर्तक संत दादूदयाल मे। इनके जीवन सम्बन्धी सध्यों के मारे में मतभेद है. पर कुछ भी हो दादू का मायदोन राजस्थान रहा। राजस्थान में विभिन्न स्थानों पर घूमने हुए ये जीवन के अन्तिम दिनों में नराया में रहने मग गये में पौर फिर वहीं ब्रह्मलीन हुए। पानरामा दादू पंचो माधुओं आरम्भ काल:43 की प्रधान गद्दी है। दादू पंथ भागे चलकर पांच शाखाओं में विभाजित हो गया- 1. खालसा, 2. नागा, 3. उत्तराढी, 4. विरक्त और 5. खाकी। दादू की कविता की भाषा राजस्थानी है । दादू पंथ के अन्य कवियो में वखनाजी, रज्जवजी, सुन्दर- दासजी (छोटे) संतदास बारह हजारी, भीखजनजी, वाजिद प्रादि प्रमुख हैं जिन्होंने मी राजस्थानी भाषा में अपनी रचनाएं की है । कई स्थानों पर राजस्थानी मिश्रित प्रज एवं खड़ी बोली दिखाई देती है । लालदासी सम्प्रदाय-लालदासी सम्प्रदाय या लाल पंथ के प्रवर्तक लालदास जी हैं । इनका जन्म भलवर के पास घोलीदूप में एक मेव परिवार में हुआ। इनके उपदेशो में परमात्मा का स्मरण-कीर्तन एवं कमाकर खाना है । इनकी प्राप्त रचनामों में 125 दोहे और 60 पद हैं । इस सम्प्रदाय के अन्य कवियों में हरिदास, डूगरजी साध प्राणी साध, भोखन साध आदि की गणना है । धरणदासी पंथ-~-इसके प्रवर्तक चरणदास हैं । यह पंथ कबीरपंथ से मिलता जुलता है। इस पंथ में गुरुचरणों का आश्रय सर्वोच्च साधन है। चरणदास ने मूति पूजा का खण्डन करते हुए निराकार ईश्वर की उपासना पर बल दिया। इस पंथ की दयाबाई और सहजोबाई की रचनाए भक्ति परम्परा में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं । इनके पदो की भाषा राजस्थानी, अज और खड़ी बोली मिश्रित है । जोगजीतजी, रामरूपजी आदि अनेक कवि इस पंथ में हुए लेकिन इनकी भाषा खड़ी बोली है । रामस्नेही सम्प्रदाय-रामस्नेही सम्प्रदाय की राजस्थान में चार शाखाएं दिखाई देती है :. 1. रामस्नेही सम्प्रदाय, शाहपुरा-इसके प्रवर्तक रामचरणजी महाराज (सं० 1776-1855) थे । इनके अनुगयी निर्गुण परमेश्वर को राम के नाम से मानते हैं तथा मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते। इनकी वाणी में 36 हजार श्लोक हैं जो निर्गुण भक्तिपरक विषयों का विश्वकोप कहा जा सकता है । इस मम्प्रदाय के अन्य कवियो में रामजनजी, भगवानदासजी, नवलरामजी, रामप्रतापजी, दुल्हेरामजी, जगतापजी भादि हैं। 2. रामस्नेही सम्प्रदाय, रेषा (मेड़ता)-इसके अनुयायी दरियावजी को अपना मादि गुरु मानते हैं। इनका गुरुद्वारा रैण मे है। इनका रहन-सहन और उपासना पद्धति शाहपुरा और खड़ापे के रामस्नेहियों से.मिलती है । ये भी निर्गुण ईश्वर को मानते हैं। दरियाव जी की 412 साखियो मोर लगभग 30 पद मिलते हैं। इस सम्प्रदाय के अन्य कवियों में पूर्णदास, किशनदास, नानकदास, मनसाराम; हरपाराम मादि 3. रामस्नेही प्रदाय, सोपस (चोकानेर)-इस सम्प्रदाय के प्रवर्तक हरि- राममो है । मोपल उनका जन्म स्थान है। यह भी निर्गुण प्राय है। इस प्रमुख हैं।
44 : राजस्थानी माहिम का गशिप्न प्रतिहारा सम्प्रदाय के पपियों मे हन्देियागजी, नारायणदासजी. पीरारामजी मादि प्रसि फाय है। 4. रामस्नेही सानदाय, संडापा-सफे प्रयतंक रामदासजो (सं० 1783. 1855) है जो सोपान मार के प्रतिक हरिदासजी के शिष्य थे और उन्हीं की मान से इस मयीन माया को स्थापना हुई। इनकी वाणी मी निर्गुण परक है । इस घास के माविमों में दयालुदाग, परशुराम, पीयोदारा. पूरणदास प्रादि प्रमुख हैं । मध्ययुग के अन्य संत सम्प्रदायों में रसिक सम्प्रदाय (वासा) निम्बार सम्प्रदाय (रासेमायाद) मूह पथ (तिहा, भीलवाड़ा) मलसिया सम्प्रदाय (बीकानेर) भईपंथ (बिलाटा) प्रादि हैं। इस सम्प्रदायों में जितने भी संत थे, उन्होंने अपनी पारपी को राजस्थानी भाषा में प्रमिध्यक्त किया है। सम्प्रदायेत्तर संत कवि कुछ ऐसे काय थे जो किसी सम्प्रदाय से नहीं जुड़े हुए थे लेकिन उनको संत वाणी राजस्थानी साहित्य की अनमोल निधि के रूप में मानी जाती है । सम्प्रदायेतर संत कवि निम्नलिखित हैं- पीपा जो-पीपा जी की कुछ सासियां मोर 25 पद मिलते हैं। पदों में निगुण भक्तिपरक भावनाएं हैं। इनको मापा राजस्थानी मिश्रित प्रज है। काजी महमूद (सं. 1450-1550)~इनके 35 पद मिलते हैं जिनकी मापा राजस्थानी मिश्रित खडी बोली है। भोराई-मक्त कवयित्री के रूप में राजस्थान की मीराबाई का नाम सर्वोच्च प मे विस्यात है। मीराबाई के जन्म स्थान, जीवनकाल भोर व्यक्तित्व के सम्बन्ध में मिन-मिन्न मत दिखाई देते हैं । मीरा का जन्म कुडको (मेड़ता) गांव में 1504 ई. में एवं मृत्यु 1558 से 1563 ई. के मध्य हुई। मीरा वैष्णव भक्त राव दूदा की पौत्री थी। इसका विवाह राणा मांगा के ज्येष्ठ पुत्र भोजराज से हुआ था। दुर्भाग्य से भोजराज का स्वर्गवास हो गया और फिर मीरा लौकिक बन्धनो से पूर्ण मुक्त होकर कृष्ण भक्ति में समर्पित हो गई और बाद मे द्वारका धली गई। कहते हैं वही रणछोडजी के मन्दिर में भजन-कीर्तन करते हुए, मीरा ने शेष जीवन व्यतीत किया। मीराबाई द्वारा रचित पूर्ण या अपूर्ण रचनायों में कुल ग्यारह है-गीत गोविन्द की टीका, मरसोजी का मायरा, राग सोरठ का पद, मलार राग, राग गोविन्द, सत्यभामान रूसणं, भीरा की गरबी, रकमणी मंगल. नरसी मेहता की हुण्डी, घरीत (चरित्र) स्फुट पद। इनमे स्फुट पद' ही मीरा की प्रामाणिक रचना है । मीराबाई के काव्य की मापा राजस्थानी मिथित ब्रज है। दोन दरवेश---(संवत् 1810-1850)-मध्ययुग के श्रेष्ठ संत कवियों में इनको गरगना है। इनकी दीनप्रकाश, अन्य-अदलानन्द, परमार्थ प्रमंग प्रादि दस चनाएं प्राप्त हैं । मापा राजस्थानी मिश्रित खडी वोनी है।
आरम्मकाल:45 सम्प्रदायेत्तर अन्य कवियों में संत ज्ञानीजी, गद, गवरीबाई, संत मावजी, नामदेव श्रीकृष्णदास भादि हैं। 4. लौकिक काव्य-मध्यकाल मे प्रेमकाव्य से सम्बन्धित अनेक रचनाएं मिलती हैं इनमें कुछ ऐसी हैं जिनके रचयिता अज्ञात है तो कुछ ऐसी हैं जिनके रचयिता ज्ञात । अत: इन्हें निम्नलिखित दो रूपों में विभाजित किया जा सकता है- (क) ज्ञात रचनाकारों की रचनाएं। (ख) अज्ञात रचनाकारों की रचनाएं। (क) ज्ञात रचनाकारों की रचनाएं :-- ज्ञात रचनाकारों की रचनापों में पाठ की दृष्टि मे विशेष अन्तर नहीं दिखाई देता है । ये निम्नलिखित हैं:- गणपति- इन्होंने 'माधवानल कामकंदला प्रबन्ध' की रचना की है। इसमें महाकाव्य की शैली में लगभग 2500 दोहों में लिखी माधव और कामकदला की भेमकथा है.। समाजशास्त्रीय अध्ययन की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण काव्य है। इसमें 'बारहमासा' के माध्यम से विरह-वर्णन किया गया है। इसमें कई स्थलों पर समस्या- मूलक पहेलियां भी दी गई हैं। जल्ह-इन्होंने 'बुद्धिरासो' (रचनाकाल 16वीं शताब्दी) काव्य की रचना की है जिसमें चम्पावती के राजकुमार और एक वैश्यापुत्री को प्रेमकया है । अन्त में राजकुमार और वैश्यापुत्री दोनों एक-दूसरे को पति-पत्नी के रूप में अपनाने को तैयार हो जाते हैं । 'बुद्धिरासो' की भाषा अपभ्रंश मिश्रित राजस्थानी है । दामो-इनका लिखा हुमा काव्य 'लखमसेन पद्मावती चउपई (रचनाकाल सम्वत् 1516) है । इसमें लखमसेन के वीरतापूर्ण कार्यों और उसके प्रेम की कथा लगभग 300 दोहों और चौपाइयो में कही गई है। काव्य रूढियों मोर मापा की दृष्टि से यह महत्वपूर्ण रचना है । अन्य प्रेम काव्यों में जैन कवि कुशलाभ का 'माधवानल कामकंदला चउपई" (रचनाकाल सम्वत् 1616) दामोदर का "माधवानल कथा' (मत्रहवी शताब्दी) मादि मिलते हैं। (ख) अज्ञात रचनाकारों की रचनाए-कुछ ऐसे प्रेमाख्यान भी मिलते है जिनके रचनाकारों के सम्बद्ध मे प्रामाणिकता से कुछ भी नहीं कहा जा सकता । ऐसी प्रेमकथाएं कई रूपों में मिलती हैं अतः उनके कई पाठान्तर भी मिलते हैं । प्रमुख प्रेमकाव्य निम्नलिखित हैं- ढोला मारू राहा~-इस ग्रंय के रचनाकाल मोर रचयिता के सम्बन्ध में मतभेद की स्थिति दिखाई देती है । जैन कवि कुशलाभ ने इसके बिखरे हुए दोहों को कथा-सूत्र में पिरोकर 'ढोला माग्वण री चौपई को रचना सवत् 1617 में की थी। इसमें 'दूहा पणां पुराणां प्राइ' पंक्ति से संकेत मिलता है कि इन दोहों की रचना 46 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास संवत् 1617 से पूर्व ही हो गई थी। डॉ. हीरालाल माहेश्वरी के अनुसार इसको रचना संवत् 1500 के प्रासपास हुई होगी ।। 'ढोला मारु रा दूहा' शुद्ध प्रेमास्थान है जिसमें ढोला एवं मारवणी को प्रेमकथा दोहों में वणित है । इसे जातीय काथ्य पर लोक मापा काव्य की संज्ञा दी गई है । इस लोक प्रसिद्ध प्रेमगाथा में विप्रलम शृंगार का मार्मिक चित्रण हुमा है । नारी हृदय को हृदयस्पर्शी भावनामों का भावनिक पुट के माथ मनोहारी वर्णन किया गया है। मारवणी का विरह वर्णन राजम्यानी शृगार साहित्य को उपलब्धि कहा जायेगा । शृगार के भावपूर्ण दोहों के कारण काम में मरमता मोर सजीवता मा गई है । मारवणों के विरह-वर्णन के कुछ दोहे उदाहरण के रूप में देखिए- विज्जुलियां नीलज्यिां, जलहर तू ही लज्जि । सूनी सेज विदेस प्रिय, मधुर मधुरं गज्जि ।। पंथी हाथ संदेमड़इ, पण बिललती देह । पगासू कादइ लोहटी, उर आंसुमा मरेह ।। जेठया र सोरठा-इन सोरठो में जेठवा और उजली की प्रेमकथा वर्णित है। दोनो में अगाध प्रेम होते हुए भी वे जातीय बघन के कारण विवाह नहीं कर सके फलत: उजली ने जेठवा के प्रति अपने विरहोद्गारों को प्रकट किया है । इन सोरठो का रचना-काल सं. 1400-1500 के बीच माना है। नागजी-नागमती-नागजी-नागमती प्रेमकथा से सम्बन्धित लगभग 50 दोहे मिलते हैं । नागमती या सुगना नागजी को चाहती थी लेकिन उसका विवाह किसी मन्य से कर दिया । जन सुगना अपने ससुराल जाने लगी तो उसने नागजी की चिता को देखा क्योंकि उघर नागजी ने नागमती के विरह से पीड़ित होने के कारण प्रात्म हत्ण करली थी फलत: नागमती इसी रिता मे जलकर भस्म हो गई। प्राप्त दोहों में नागमती को करुण पुकार है । देखिए- नागा नागर वेल, पसर पण फूलं नहीं। मासपणं रो मेल, पिछड़े पण भूल नहीं ।। सेरणीयोजाणंद--सेपी-बीजाणंद की प्रेमकथा भी लोक प्रचलित है।' योजाणंद सेणी के घर के सामने आकर धीणा पजाता था जिससे दोनों में प्रेम हो गया लेकिन बाद में सेयो के पिता ने वीजाणंद के सामने एक ऐसी शतं रखी जिसको यह निर्धारित समय पूरा नहीं कर सका। इस पर सेणी हिमालय में गनने के लिए चली गई। बीजाणद जब उसको लाने के लिए गया तो सेणी ने वीणा सुनते-सुनते प्राण त्याग दिए । इस कपा से सम्बन्धित 80 मामिक दोहे प्राप्त होते हैं। इनका रपना पास लगमग सवत् 1550 है । एक दोहा देसिए- में I. साहनिक राजस्थान : गं. रतनगाह, पृ. 22 प्रतीत होते हैं। - राजस्थानी भाषा में काफी साहित्य की रचना की है जिग* "मृगया प्रारम्मकाल:47 बौझा हूं बिलखो फिरूं, दवरी दाधी बेल । वणजारा री भाग ज्यू, जयो धुकती मेल । बोझां-सोरठ-यह प्रेमकथा राजस्थान और गुजरात में काफी लोकप्रिय है । इससे सम्बन्धित 75 दोहे मिलते हैं । इममा रचना काल गो मोहलवीं शताब्दी का भारम्म है । एक दोहा देखिए- बीमा था कह कारणइ, तोड्यउ नवसर हार । लोक जाणई मोती चुणइ निम निम करूं जुहार ।। जलास-बना-इस प्रेमकथा में जलाल और दूबना का प्रेम, मिलन और विरह चियित है । इसमे सम्बन्धित लगभग 1 0 दोहे प्राप्त है । इस प्रकार प्रेमाख्यानों सम्बन्धी कई दोहे और सोरटे मध्ययुग में लिखे हुए जैन काव्य-जन काव्य सोद्देश्य रूप में लिखा गया है। इसमें जो चरित मोर कथाकाव्य मिलते हैं उनका उद्देश्य पापो के दुष्परिणामों से मुक्ति दिलाकर जन साधारण को धर्मोन्मुख करना है अतः धर्म इन काव्यों का मूल तत्त्व है । चरित काव्यों में इन्होंने ऐसे ही महापुरुषों के जीवन को प्रस्तुत किया है जो प्रेरणादायी हैं । मध्ययुग के प्रमुख जैन कवि निम्नलिलित हैं- ब्रह्म जिनदास-ये विद्वान एवं कवि थे। इन्होंने 50 से ऊपर हिन्दी एवं राजस्थानी मिश्रित गूजराती में अपने काव्य लिखे । इनके अधिकांश काव्य ‘रास' हैं जिनमें 'रामायण' या 'राम सीता रास' सबसे प्रसिद्ध रचना है। छोहल-ये 16वीं शताब्दी उत्तगर्द्ध के कवि थे। इनकी पांच छोटी- घोटी रचनाएं प्राप्त होती हैं-'पंच सहेली गीत' पंथी गीत, 'उदरगीत' 'पंचेन्द्रिय बोल' तथा 'नाम बावनी' । 'पच सहेली' बोलचाल की राजस्थानी मे प्रमावशाली कुशललाभ-ये चचित जैन कवि रहे है । इनकी समस्त रचनाएं राजस्थानी माषा में हैं ! कुशललाम की रचनाएं चार रूपों में दिखाई देती हैं- 1. प्रचलित लोगाकथाओं पर-माधवानल चौपाई, ढोला मारवणी चौपाई। 2. जैन परम्परा में प्रचलित कथानकों' पर पगड़दत्त रास, पूज्यवाहण 3. देवी या शक्ति पर -दुर्गासात्तसी, भवानी छंद प्रादि। 4. छंद शास्त्रीय ग्रंथ-पिगल गिरोमरिण ! इनमें 'माधानल' और 'ढोला मारवणी री चौपाई गरम काध्य है। समय सुन्दर--17वी शताब्दी के जैन कवियों में इनका विशिष्ट स्मात इनकी प्रतिमा पाहित्य एवं कवित्व से परिपूर्ण थी। इन्होंग गरा रचना है। गीत ।
48: राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 'पुण्यसार रास', 'नलदमयंती चौपाई', 'सीताराम पौपाई', 'वस्तुपाल-तेजपाल रान' आदि प्रमुग है। हेमरतन पूरि-इनकी प्रसिद्ध रचना 'गोरा वा चरित्र' है। यह 619 पधों में लिमित उत्तम कोटि का काथ्य है । पदमिनी--अलाउद्दीन विषयक प्रसंग में लिरो गए माल्यो में यह महत्वपूर्ण रचना है । मूरि की अन्य रचनात्रों में महिशन चौपाई, भमरकुमार चौपाई, सीता चौपाई मादि हैं। सम्पोदय-इन्होने सगमग प्रबन्धात्मक कृतियां लिखी जिनमें पदमिनी परित चौपाई', 'मलय सुन्दरी चौपाई' 'रत्ननूह चौपाई' तथा 'गुणावली चौपाई प्राप्य हैं । काव्य की दृष्टि से पदमिनी परित चौपाई का विशेष महत्त्व है । जिनहपं-इन्होंने लगभग 74 बड़ी रचनाए लिखी, जिनमें 'चंदन मलयगिरि धौपाई', 'कुसुमयी महासती चौपाई, विद्या विलास रास प्रादि प्रमुख हैं। इनके मलावा इन्होने प्रेम, नीति, धर्म से सम्बन्धित 300 पद एवं छद भी लिसे । धर्मवद्धन-प्रठारहवीं शताब्दी के जैन कवियों में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। जैन कथानको के अतिरिक्त इन्होने मीति, स्तुति, ऋतु, मादि के बारे में भी लेखा । धर्मवद्धन को रचनामों में धर्म-बावनी, कुडलिया बावनी, छप्पय बायनी, इप्टान्त-छतीमी मादि प्रमुख हैं। दौलत विनय (सं. 1700-1800)--इनकी महत्त्वपूर्ण कृति “सुम्माण रास जिसकी रचना मं. 1767 के प्रासपास हुई। इसमें कुल 3576 छद हैं तथा (प्पा रावल से लेकर महाराणा राजसिंह तक का उल्लेख है । यह वीर और शृगार की सुन्दर कृति है। विनय चन्द्र (रचनाकाल सं. 1725-1769)--ये सुकवि थे तथा इन्होने वतन्त्र रचनामों की रचना की थी। 'उत्तम कुमार चरित चौपाई' इनकी प्रबधात्मक कति है जिसमे प्रेम और सौन्दर्य का प्रभावशाली चित्रण हुआ है। जयमल्लजी (सं. 1765-1853)-इनकी रचनामो की सख्या भी काफी है जिन्हे नीति-उपदेशात्मक, स्तुति और माख्यान के रूप मे बांट दिया है । अर्जुन । गली, उदयो राजा, कार्तिक सेठ, तेतली पुत्र प्रादि इनकी प्रमुख काव्य रचनाएं हैं। भोखरएजी (सं. 1783-1860)---ये तेरापंथ (श्वेताम्बर) सम्प्रदाय के विर्तक थे । इन्होंने सं. 1817 में तेरापंथ सम्प्रदाय की नींव डाली थी। भीखरण जी धर्मग्रन्थों के वचनो को मौलिक और अनूठी व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं । स्पष्टता और निर्भीकता इनके काव्य का प्रमुख गुण हैं । 'भिक्षु अन्य रत्नाकर' नाम से इनका राध्य दो खंडों में प्रकाशित हुआ है। इस तरह मध्यकाल में अनेक जैन कवियों ने अपनी रचनामों से राजस्थानी विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। रोति ग्रंथ एवं छद-मनंकार-मध्ययुग में रीति ग्रंथों के अतिरिक्त छंद एवं कारों के सम्बन्ध में कुछ रचनाएं प्राप्त होती हैं । इस सम्बन्ध में पहली पुस्तक . म मध्य काल:49 ईन कवि कुगललाम की पिंगल शिरोमणि' दिखाई देती है। इसके बाद चारण कवि जोगीदास का 'हरि पिंगल प्रबंध' (रचना काल सन् 1664) प्रोर हमीरदान रतनू बा पिंगल प्रकाश 'लखपत पिंगल' और 'हमीर नाम माला' अन्य मिलते हैं। सेवग मतसा राम का; 'रघुनाथ रूपक गीतां रो' इस परम्परा में एक प्रौढ़ ति है जिसकी रचना - सन् 1806 में हुई तथा इसमें हिंगल गीतों, छंदों एवं मलंकारों का अच्छा विवेचन हुमा है। आदा किसना ने सन् 1824 में 'रघुवरजस कास' लिखा, और उदयराम ने 'कटिकुल वोघ' की रचना की। इन दोनों ग्रन्थों में मी हिंगल गीतों के प्रकार, छंद एवं अलकारो के सम्बन्ध में उल्लेख मिलता है । इनके अलावा इस क्षेत्र में 'रूप दोष पिंगल' (हरिकिसन) छद दिवाकर (सिंढायच हरदान), डिंगल कोश' (मुरारिदान)..मादि रचनाएं भी महत्त्वपूर्ण मानी जायेंगी। गद्य साहित्य--राजस्थानी गद्य की परम्परा बहुत प्राचीन है। हिन्दी रिवार की भाषाओं में ग़द्य का उन्मेष कालक्रम में सर्वप्रथम राजस्थानी मै प्राप्त होता है। प्रायः सभी विद्वान इस बात को मानते हैं कि राजस्थानी गद्य का प्रारम्भ. रहवी शताब्दी के मध्य से हुआ। तब से लेकर आज तक राजस्थानी में गद्य की अविच्छिन्न परम्परा चली आ रही है । मंवत्: 1330 मे लिखित प्राराधना' नामक प्पणी को पुरानी राजस्थानी गद्य का सर्वप्रथम नमूना माना जाता है। चौदहवीं रतान्दी में संग्रामसिंह रचित 'बाल शिक्षा' (सं. 1336) नवकार व्याख्यान (संवत्. 1358) धर्मकथा प्रादि में गद्य के कुछ नमूने मिलते हैं लेकिन ये रचनाएं छोटी हैं तः गद्य की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण नहीं कही जा सकती। जैन साधुओं ने जैन धर्म के उपदेशों के प्रचारार्थ धर्म कथाएं लिखी। गद्य के विकास में इन धर्म कथाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। ये कथाएं जैन धर्म के ग्रन्थों की व्याख्याओं तथा उनमें प्रतिपादित सिद्धान्तों के उदाहरण रूप में लिखी गई हैं। ऐसी कहानियों वाली याख्याएं वालावबोध नाम से प्रसिद्ध हुई। श्री नरोत्तम स्वामी और डॉ. हीरा: इल माहेश्वरी के मतानुसार गद्य का प्रौढ रूप पन्द्रहवी शताब्दी में मिलता है तथा वित् 1411 में लिखित प्राचार्य तरुणप्रम ;रि का, 'पट्टावश्यक-वालावबोध' राजस्थानी गद्य की सर्वप्रथम प्रौढ कृति है। इस तरह तरुणप्रम राजस्थानी के पहले वोढ गद्यकार हैं। . मध्य युग में गद्य के विविध रूप दिखाई देते हैं जिनमें बालावबोध, टब्बा, गौक्तिक, कथा ग्रन्थ, चरित्र-मन्य, प्रश्नोत्तर, पट्टावली. नियम-पत्र, बिहारपत्री, चिनिका, काव्यग्रन्थो गद्य, शिलालेख या ताम्रपत्र, पत्र तथा पट्टे परवाने, वात," व्यात. पीढियां-वंशावली प्रादि है । इस युग में उपलब्ध गद्य साहित्य को अंग्रलिखित रूप में विभाजित किया जा सकता है- 1. 'हिन्दी साहित्य का इतिहास : डॉ. नगेन्द्र, पृ. 273 50 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 1. धार्मिक गद्य 2. ऐतिहासिक साहित्य का गद्य 3. ललित गद्य पार्मिक गद्य-जैसा कि उल्लेख किया जा चुका है राजस्थानी गद्य के विश में जैन लेखकों का विशेष योग रहा है। जन कवियों ने अपने धर्म के उपदेशों के लोकप्रिय बनाने के लिए गद्य में धर्म कयाएं लिखी। इनमें बालावधोध तथा दमा प्रमुख हैं। धार्मिक गद्य लिखने वालों में प्राचार्य तरुणप्रम सूरि, सोमसुन्दर सूरी, मेयसुन्दर, पाश्वंचन्द्र, माणिक्य चन्द्र सूरि प्रादि प्रमुख हैं । माणिक्य चन्द्र सूरि का 'पृथ्वीचन्द्र परित्र' (सं. 1470) इस शताब्दी के कलात्मक गद्य की श्रेष्ठ कृति है । इसका दूसरा नाम वागविलास भी है। इसमें भाषा संगीतमयी एवं तुकमय है तथा संयंत्र काव्यात्मक गद्य का प्रयोग हुमा है। ऐतिहासिक साहित्य का गद्य-ऐतिहासिक रचनामो में प्राप्त गद्य इतिहास, संस्कृति और साहित्य को दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है तथा यह भी कई रूपों में पाया जाता है । यया स्यात, वात, विगत्, वनिका दवावत आदि । वनिकामों में शिवदान कृत 'अचलदास खीची री वचनिका' में गागरोनगढ़ के सोची (चौहान) वंशीय राजा अचलदास की वीरता का वर्णन है। इसकी रचना पन्द्रहवी शताब्दी के चतुर्थ घर में हुई। दूसरी वनिका खिडिया जग्गा की 'राठोड रतनसी महेसदासोतरी धनिय है जिसमें औरंगजेब और · जसवन्तसिंह के बीच होने वाले युद्ध मे राठौड़ रतनसिंह के वीरतापूर्ण युद्ध और मरण का वर्णन है । ये दोनों चंपू काव्य है अर्थात् इनमें गा के साथ पंथ मिला हुमा है । दवावंतों में भाट मालीदास कृत "नरसिंह दास गौड़री दवावत' काफी प्रसिद्ध है जो अठारहवी शताब्दी के पूर्वाद में लिखी गई थी। ऐतिहासिक साहित्य के गद्य का एक रूप ख्यात के रूप में भी मिलता है। वात किसी ऐतिहासिक घटना या व्यक्ति का संक्षिप्त इतिहास होता है तो ख्यात में या तो बातों का संग्रह होता है या पूर्णरूपेण इतिहास होता है । स्यातकारों में मूता नेगसी, भोकोदास मोर दयालदास हैं । 'मूता नैणसी री स्यात' में राजस्थान के राजपूत राजाओं को इतिहास है । बोकोदास री ख्यात' में 2500 से ऊपर वातों का संग्रह है। ये बात मेणसी री स्यात से मिन्न है तथा छोटी-छोटी टिप्पणी के रूप में हैं। इस स्यात में राजस्थान से बाहर के राजपूत राजामों, ठिकानदारो, मुसलमानी, मराठी और मोसवाल जातियों के इतिहास से सम्बन्धित सामग्री भी है । 'दयालदास री स्यात' में बीकानेर के राठौड राजवंश का इतिहास है। राजस्पानी गद्य की दृष्टि से इन तीनों स्यातों का विशिष्ट महत्व है क्योंकि इनमें प्रौढ गद्य के दर्शन होते हैं। इसी सन्दमं मे 'दलपत विलास' नामक ग्रन्थ महत्वपूर्ण है। ससित ग-ललित गद्य में वर्णनात्मक और कथारमा दास को से सारे है। राजस्थानी का वात-साहित्य काफी समूड है तथा ऐतिहासिक, पौराणिक, मध्य काल:51 । काल्पनिक आदि कथानकों को लेकर ये बातें लिखी गई है। इनमें धर्म, नीति, प्रेम, हास्य प्रादि की सैकड़ों बातें उपलब्ध होती है। एक तरफ देवी-देवताओं और भूत: प्रेतों की कहानियां है तो दूसरी तरफ पोर-लुटेरों प्रौर डाकुओं की। राजस्थान में बात कहने की भी अपनी शैली है। ये बातें सरस, रोचक और मनमोहक हैं । कुछ बातें तो लोक कथाओ के साहित्यिक संस्करण जैसी प्रतीत होती हैं । कुछ प्रसिद्ध बातें इस प्रकार है-राजा भोज, माघ हित और डोकरी री वात, राजा भोज और सोफर चोर री वात सयणी-चरणी री वात. फोफानंद री वात, जसमा ओडरण री वातः चौबोली री यांत 'प्रचलदास खीची री वात, ऊमा मटियाणी री वात, मूमल महेन्दरे री बात, पलकं दरियाव री बात भादि । 'कलात्मक गद्य की रचनामों में ''खीची गंगेव नीबावत रो दोपहरो' महत्त्व- पूर्ण है। इनके अलावा 'राजान रावतरो वात बणाव', समा-गार आदि विविध विषयक वर्णनों के सुन्दर संग्रह हैं। इन सभी संग्रहों मे तुकान्त गद्य का प्रयोग म. हुया है। इस तरह मध्ययुग में जो गद्य मिलता है, उसके दो रूप है-तुकमय पधाभास गध और तुकरहित शुद्ध गद्य'। तुकमय गद्य की प्रवृत्ति राजस्थानी भाषा के प्रारम्भ में रही है। लोक साहित्य-लोक साहित्य की दृष्टि से राजस्थानी भाषा काफी समृद्ध है। लोक साहित्य मौखिक परम्परा से प्राप्त साहित्य है। यह किमी व्यक्ति विशेष की रचना न होकर सम्पूर्ण जन-समुदायें या लोक की रचना होता है तथा मौखिक रूप मे पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता है। लोक साहित्य के माध्यम से किसी भी जनपद या प्रदेश के लोक जीवन, लोक-संस्कृति और लोक निर्माण के स्वाभाविक तथा सहज रूप को समझा जा सकता है। लोक साहित्य का वर्गीकरण निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है---- 1. लोकगीत। 2.पवाड़ा 3. लोक कथाएं- 1" 4. ख्याल या लोक नाटक 5. लोकोक्तियां और पहेलियां । लोक गीत- राजस्थानी लोकगीतों का अपना अलग संसार है। उनमें स्वाभाविकता. विविधता और लोकधुन को मनमोहकता है। राजस्थानी लोकगीतों को दो भागों में वोटा जो मकता-है । 1. धार्मिक लोक गीत 2. मनोरंजनात्मक लोक गीत धार्मिक लोक गीत-राजस्थानी लोकगीतों में धार्मिक विधि-विधानों एवं किया-कलापो का भी विषण हुआ है। ऐसे लोक गीतों में संस्कार सम्बन्धी गीत.
. 52 : राजस्थानी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास देवी देवतामों के गीत और प्रत सम्बन्धी गीत देखे जा सकते हैं । संस्कार सम्बन्धी गीतों में जन्म-नामकरण, विवाह सम्बन्धी गीत है तो देवी देवताओं में लोकदेवता (रामदेय जी. पाश्री. गूगोजी प्रादि) सीतला, मावल्यां, पारणदेवी आदि के गीत सम्मिलित है । 'हरजस' और 'सबद भी लोकवाणी के रूप में प्रचलित हैं। मनोरंजनात्मक गीत-ये ऐसे गीत है जो राजस्थान के तीज-त्योहार, गोदामों, ऋतुषों और मानव जीवन के भनेक सरस प्रसंगों से जुड़े हुए हैं। राजस्थान फे त्यौहारों में गणगौर, तीज, दीपावली, होली आदि के गोत है तो क्रोमो में शिकार, फाग, झूला यादि के गीत हैं। इसी मांति सेती-बाड़ी करते समय ऋतुओं अनुसार कृषकों के अपने गीत है। विभिन्न भामोद-प्रमोद के अवसरों पर गाये जाने वाले, दाम्पत्य प्रेम और परगृहस्थी के लोकगीतों का अपना एक मल माकपंग है। विभिन्न राग-रागनियों पर प्राधारित लावणी, धूमर, मांड विशेष उल्लेखनीय हैं । ऋतुमों के गीतो मे 'सावरण रा गीत', 'फागण रा गीत' धमाल काफी लोकप्रिय हैं । अन्य गीतो में बच्चों के गीत. जुम्मे जागरण के गीत, दरबारी गीत, परित गीत और पेशेवर गायक जातियो के गीत हैं। अपनी सरसता, मृदुता और मोहक घुन के कारण राजस्थानी लोकगीत महत्त्वपूर्ण माने जाते हैं । 'जीणमाता' मौर 'डूगजी जुवार जी' का गीत जनसमाज में काफी लोकप्रिय है। पवाड़ा-'पवाड़ा सस्कृत के 'प्रवाद' णब्द से बना है। इसे अनेक विद्वानों ने लोकगाथा भी कहा है । इन पवाडों की अपनी कुछ विशेषताएं हैं यथा-रचयिता का अशात होना, प्रामाणिक मूलपाठ का प्रभाव, संगीत और नृत्य का मेल, स्थानीयता को प्रचुरता, मौखिक परम्परा, लम्बा कथानक, टेकपर्दी की पुनरावृत्ति तथा मलंकृत शैली और उपदेशात्मक-प्रवृत्ति का अभाव । राजस्थानी पवाडौं गे पाबूजी का पवाडा, बगडावत, निहालरे सुलतान आदि काफी प्रसिद्ध हैं । पाबूजी के पवाड़ों की संख्या 52 मानी जाती है। अपने प्रलोकिक चरित्र के कारण लोगो ने पाबूजी को लोकदेवता के रूप में मान लिया था। पाबूजी राठोड कुल मे उत्पन्न प्रतापी घाघल जी के पुत्र थे। ये स्वय दृढ़-प्रतिज्ञ, वीर योद्धा, शरणागत रक्षक और देवतुत्य पुरुष थे । देवल चारणी की पुकार पर गायों की रक्षा के लिए पानी हालेवा छुड़ाकर जायल खीची से युद्ध करने के लिए चल दिये थे । मत में इसी युद्ध में वे वीरगति को प्राप्त हुए । पाबूजी के पवाड़े लोक- काव्य की दृष्टि बड़े मामिक एवं उत्कृष्ट हैं । भोपे 'पाबूजी री फड़' का प्रदर्शन करते हुए माज मी गाव-गांव में पाबूजी के पवाई गाते रहते हैं। 'बगड़ावतारा पवाड़ा' भी इसी प्रकार काफी लोकप्रिय हैं तथा भोपे इस लोकगाया को भी फड़ के साथ गाते हैं । इस लोकगाथा में बगहावतो के 24 भाइयों युदो का सजीव चित्रण हुआ है। अजमेर, भीलवाड़ा आदि क्षेत्रों में भाज भी मध्यकाल:53 यह गाया लोकप्रिय है। रानी लक्ष्मीकुमारी चूंडावत ने 'देवनारायण की गाथा' नाम से इन पवाड़ों का सम्पादन किया है। "निहालदे सुल्तान' भी राजस्थानी का अत्यन्त सरस लोक महाकाव्य है । लोक मैं यह 'निहालदे सुल्तान रा बावन पवाड़ा' के नाम से प्रसिद्ध है। प्रबंध रूप में इसकी कथा शेखावटी क्षेत्र में अधिक प्रचलित है। इसे जोगी सारंगी पर गाते है। डॉ. कन्हैयालाल सहल ने इस लोक महाकाव्य को लिपिबद्ध करके पुस्तक रूप में प्रस्तुत किया है। लोक कथाएं-लोक कथा को राजस्थानी साहित्य में 'वात' कहा जाता है । गद्य के रूप में स्यात, विगत, वचनिका आदि 'वात' से सर्वथा भिन्न हैं । विषयानुसार राजस्थानी लोककथानों को शौर्य प्रधान प्रेम प्रधान, हास्य प्रधान, नीति प्रधान, निर्वेद प्रधान और कूतूहल प्रधान लोककथाओं के रूप में बाटा जा सकता है। राजस्थानी साहित्य में शौर्य प्रधान लोक कथाओं की बहुलता है । ऐसी लोक कथाओं में 'राव रिणमल री वात' राजा नरसिंघ री बात, राव चूण्डे री वातः पाबूजी री वात आदि चचित हैं । अन्य लोक कथाओं में ढोला मारू, जलाल बूवना, ममल महेन्द्र पोपाबाई री वात, बिणजारा-बिणजारी री बात, पदमै चारण री बात आदि काफी लोकप्रिय हैं। राजस्थानी लोककथामों के सन्दर्भ में डॉ. कन्हैयालाल सहल, डॉ. मनोहर शर्मा, गोविन्द अग्रवाल, लक्ष्मी कुमारी चूण्डावत, विजयदान देथा भादि का कार्य उल्लेखनीय है । ख्याल या लोकनाटक-राजस्थान में लोकनाटक के रूप में अनेक ख्यालों का प्रदर्शन होता रहा है । ख्याल के लिए सिर्फ खुले मच की मावश्यकता है जिसके चारों तरफ दर्शक बैठ जाते हैं और फिर रुयाल शुरू होता है जो रात मर चलता है । इस काव्य, प्रमिनय, संगीत और नृत्य का समावेश होता है । ख्याल प्रधानतः गेय होते हैं लेकिन बीच-बीच में संवाद के रूप में गद्य का प्रयोग भी होता है । ख्याल वस्तुतः प्राचीन नाटय कला का ही प्रतिनिधित्व करते हैं। अगरचंद नाहटा के अनुसार राजस्थान में लिखित ख्यालों का प्रचार-प्रसार 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध या 20 थो दाताब्दी के प्रारम्भ में हुआ होगा। उन्होंने 189 प्रकाशित ख्यालों की सूची मी प्रस्तुत की है। ख्याल लिखने वालों में मोतीराम, पूनमचंद, नानूराणा, लन्छीराम आदि प्रमुख हैं । अलग-अलग अंचलों में इनको प्रस्तुत करने की शैली के आधार पर इन्हें चिड़ावाकेस्याल, कुचामणी ख्यात, मेवात के ख्याल, आदि के रूप मे विभाजित किया गया है । अमर सिंह चकवा बंण, जगदेव कंकाली, ढोला भरवण, नल दमयन्ती, मोर ध्वज आदि कुछ लोकप्रिय मंचीय ख्याल हैं। ख्याल । 1. प्राचीन कान्यों को रूप-परम्परा : अगरचंद नाहटा, पृ. 1401 -कन्हैयालाल 54: राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास सोकोक्तियां और पहेलिया-राजस्थानी में पारस्परिक बातचीन और लेखन में लोकोक्तियो और मुहावरों का प्रयोग भी होता रहता है। इनसे जहाँ भाषा में सौन्दयं उत्पन्न होता है. वहीं अयं में भी नवीनता और चमत्कार पैदा होता है। राजस्थानी कहावतों मोर पहेलियों में राजस्थानी जन-जीवन और लोक संस्कृति का सजीय चित्रण उपलब्ध होता है । इस क्षेत्र में प्रो. नरोतम स्वामी, डॉ०. महल भादि ने संग्रह एवं सम्पादन का कार्य किया है। डॉ. मनोहर शर्मा ने राजस्थानी कहावतों के पीछे प्रचलित कहानियों को मी लिपिबद्ध किया है। डॉ. कन्हैयालाल सहल का 'राजस्थानी कहावते : एक अध्ययन' कहावतों के लिए पहला सागपूर्ण माधारभूत एवं प्रामाणिक ग्रंथ है । इस प्रकार लोक साहित्य की दृष्टि से राजस्थानी का साहित्य एक महत्त्वपूर्ण परोहर के रूप में दिखाई देता है तथा इसके माध्यम से राजस्थान को लोक संस्कृति, मूल्य-मर्यादा और लोक जीवन का स्वाभाविक एव यथार्थवादी रूप प्रस्तुत किया जा सकता है। मूल्यांकन-मध्यकाल के राजस्थानी साहित्य पर विचार करने से प्रतीत होता है कि इस काल के साहित्य में कथ्य और शिल्प की विविधता रही है । इस काल में एक तरफ वीरता, भक्ति और शृगार परक साहित्य-को त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है तो दूसरी तरफ गद्य का विकास हो रहा है। वीर रस से सम्बन्धित कृतियों में भति. उदारता के साथ राष्ट्रीयता का चित्रण हुमा है। बांकीदाम की रचनामो में साम्प्रदायिकता, और प्रान्तीयता से ऊपर उठकर राष्ट्रीय उद्बोधन का स्वर है । माह भूमि के लिए त्याग, बलिदान और सर्वस्व-अर्पण की भावना से ओतप्रोत मध्यकाल का साहित्य वीर रस की प्रेरणादायी विरासत है । वीर रस के साथ शृंगार का समन्वय राजस्थानी साहित्य को अपनी विशिष्टता रही है । इस काल के साहित्य में शृगार रस की श्रेष्ठ कृतियां दिवाई देती हैं। इसी भांति मक्ति के क्षेत्र में ईश्वर के सगुण और निगुण रूप को लेकर काफी रचनाएँ लिखी गई । इस समय संत कवियों के अनेक सम्प्रदाय भी प्रचलित थे। मीरा- बाई जैसी सुप्रसिद भक्त कवयित्री भी मध्ययुग की ही देन है । मध्यकाल में लौकिक काव्य के रूप में काफी प्रेमाख्यान उपलब्ध होते हैं जो अपनी सरसता, मार्मिकता मोर माव-गाम्भीयं के कारण काफी लोकप्रिय रहे हैं। 'ढोला मारू राहा' शृंगार काम्प का ऐसा ही लोकप्रसिद्ध प्रेमास्यान है। पद्य के साथ-साथ इस काल में गध का उन्मेप मी हिन्दी परिवार की मापाओं में सबसे पहले राजस्थानी में ही दिखाई देता है। राजस्थानी गध का प्रारम्भ तेरहवीं शताब्दी के मध्य से हुआ मोर तब से लेकर माज तक गद्य की अविच्छिन्न परम्परा दिखाई देती है । गद्य के विविध प भी राजस्थानी साहित्य की प्रपनी विमिष्टता है। गद्य क्षेत्र में जन कवियों का योगदान महत्वपर्ण भाना जायेगा। ललित गद्य मध्यकाल:55 के रूप में राजस्थानी का वात साहित्य विविधता के लिए उल्लेखनीय है । गद्य के विविध रूपों में वालावबोध, टब्बा, प्रोक्तिक, कथा-ग्रंथ, वनिका आदि हैं । इसी मांति प्रस्तुत काल में पद्य की दृष्टि से प्रबंध काव्य, खंडकाव्य, मुक्तक प्रादि विविध काव्य विधानों को प्रचुरता रही। मध्यकाल की उल्लेखनीय कृतियों में 'कान्हड़दे प्रबंध', 'हम्भीरायण', 'हाला झालारी कुडलियां' "विरूद्ध छिहतरी', वनिका राठोड रतनसिंह महेसदासोतरी 'चेतावणी का गीत' 'वेलि क्रिसन रुकमण री', 'रामरासो', 'नागदमण', 'राजिया रा सोरठा मीराबाई की पदावली' 'ढोलामारू रा: निहातदे सुलतान,' 'बगड़ावत' आदि हैं। छंद वैविध्य भी इस युग की कृतियों में दूहा', मिलता है। इस प्रकार नये काध्य-विषयो पौर शिल्पगत विविधता की दृष्टि से मध्यकाल को देन निर्विवाद है । प्रारम्भ काल की तुलना में इस काल में रचनात्मक भूमि का मधिक विस्तार हुमा है।
अध्याय-4 आधुनिक काल : (सन् 1850 से अब तक) आधुनिक काल का प्रारम्म 19वीं शताब्दी के उत्तराखं से माना जा सकता है। क्योंकि इस काल खड से रचनात्मक स्तर पर कथ्यगत चेतना में बदलाव प्रारम्भ हो जाता है । इस समय की राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियो को उथल-पुथल से जिस नवीन परिवेश की शुरुआत हुई, वह साहित्य के लिए एक नया सन्दर्भ था। 18वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में मुगलो की केन्द्रीय शक्ति के पतनोन्मुष होने पर अंग्रेजों की शक्ति का विकास होने लगा था। राजस्थान में राजपूत शासको की शक्ति इतनी क्षीण हो गई कि वे अपने सामन्तों को नियन्त्रित करने में असमर्थ थे फलतः सन् 1818 में उन्होंने ब्रिटिश संरक्षण को स्वीकार कर लिया जिसके परिणामस्वरूप राजपूत नरेशो की बाह्य स्वतन्त्रता समाप्त हो गई । राजपूत नरेशों ने अपनी माथिक स्थिति को सुधारने के लिए, अपने अधीन सामन्तों से अधिक से अधिक धन वसूल करना शुरू कर दिया जिसके कारण राज्यों में अव्यवस्था फैल गई और सामन्तों ने अपने शासकों के विरुद्ध विद्रोह प्रारम्भ कर दिया। ऐसी स्थिति में राजपूत नरेशों ने मिटिमा कम्पनी की सहायता से इन सामन्तों को कुचलने का प्रयाम किया तो दूसरी तरफ ब्रिटिश कम्पनी को प्रान्तरिक मामलों में हस्तक्षेप तथा प्रशासन पर नियन्त्रण करने का अवसर प्राप्त हो गया। भप्रेजों को इस कार्यवाही के प्रति भारतीय जनता में गहरा असंतोष एवं प्राक्रोश व्याप्त होता जा रहा था गोसन 1857 में विप्लव के रूप में ब्रिटिश मत्ता के विरुद्ध भड़क उठा। जय उत्तर भारत में अंग्रेजी के विष्ट विद्रोह उत्पन्न हुआ तो राजस्थान में सबसे पहले नसीरामाद में इसका सूत्रपात हुआ भोर तत्पश्चात् इम विवाह की लपटें 1. - राजस्थानी मापा मार साहित्य : si मोतीलाल मेनारिया, पृ. 314 राजस्थानी ससदकोस : मीताराम लालस. (प्रथम मंड) पृ. 172 History of Rajasthan Literature : Dr H.L.Maheshwari, P.20 माधुनिक राजस्थानी माहित्य : गान्तिलाल भारद्वाज राकेश, पृ. 18 याधुनिक काल : 57 . भीमर, जोधपुर, मेवाड़ और कोटा प्रादि रियासतों में फैल गई । भरतपुर, अलवर, धौलपुर, टोंक आदि स्थानों पर तो इस विद्रोह ने विकराल रूप धारण कर लिया लेकिन अंग्रेजों की सनिक कार्यवाही ने इस विद्रोह को दबा दिया और 1857 की कान्ति अमफल हो गई। मारत में अब ईस्ट इण्डिया कम्पनी का शासन समाप्त हो गया और इंगलंण्ड के ताज के नाम से वहाँ का मन्त्रिमण्डल भारत पर शासन करने लगा। इस विप्लव का स्वरूप कुछ भी माना जाय. इतना निश्चित है कि राजस्थान मैं विप्लवकारियों का दृष्टिकोण ब्रिटिश विरोधी था और इसका समर्थन यहाँ के तत्कालीन कवियों ने भी किया था। बाकीदास, सूर्यमल मिश्रण, शंकरदान सामौर, बुद्धजो भासिया, गिरवरदान क या आदि कवियों ने ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ प्राक्रोश और उत्तेजना पैदा करने में अपने प्रोजस्वी स्वर का परिचय दिया। वठोठ-पाटोदा के इंगजी-जवाहरजी ने अंग्रेजों के विरुद्ध में तहलका मचा दिया और जगह-जगह लूटपाट की । पाज भी गजी-जवाहरजी के गीत (छावली) भोपा-भोपी गर्व से इससे प्रतीत होता है कि 1850 के प्रासपास की समसामयिक घटनामों, बदलती परिस्थितियों और जन-चेतना के जागरूक आयामों ने प्राधुनिकता को प्रक्रिया को जन्म दे दिया था। अंतः हम आधुनिक काल का उप विभाजन इस प्रकार कर सकते हैं- '1. "जागरणकाल (सन् 1850 से 1947 तक) 2. स्वातन्त्रयोत्तरकाल (सन् 1947 से 1965 तक) 3. नवलेखनकाल (सन् 1965 से अब तक) अब हम पहले मन् 1857 से लेकर सन् 1947 तक के राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवेश का विवेचन करेंगे मोर तत्पश्चात् स्वातन्त्र्योत्तर , परिवेश का । - राजनीतिक परिवेश---प्राधुनिककाल की शुरूआत मन् 1850 से मानते है । राजनीतिक दृष्टि से यह उथल-पुथल का काल था सन् 18: के विप्लव के कारण ईस्ट इन्डिया कम्पनी का प्रभुत्व समाप्त हो गया और भारत ब्रिटिश साम्राज्य का उपनिवेश बन गया । इस नवीन परिस्थिति के कारण जहां एक तरफ भावात्मक संगठन और एकता के वातावरण में सक्रियता आई, वहीं अंग्रेजों की नयी नीति ने नयी चेतना.और नये सोच को पैदा किया । सन् 1885 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना हुई और जन-साधारण में इसका प्रभाव बढ़ा । आगे चलकर काग्रेस में नरम और गरम विचारों के आधार पर दो वर्ग भी बन गये। 1903 ई. में दिल्ली दरबार और 1905 ई. में बंग-भंग को घटनागों ने राजनीतिक क्षेत्र में काफी हलचल पैदा कर दी। दूसरी तरफ भारत- वामियों में देश की प्राजादी के लिए त्याग, बलिदान और संघर्ष का मान उत्तरोत्तर 58 : राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहास चढने लगा। 1905 ई. में जापाम ने हस जैसे शक्तिशाली राष्ट्र को पराजित कर दियो जिसकी प्रेरणा भारतवासी लोगों को भी मिली । प्रथम विश्व युद्ध (1914 ई.) के पश्चात् अंग्रेजों ने बढ़ती हुई जन-चेतना को कुचलने का हर सम्भव प्रयास किया लेकिन देश के प्रमणो नेताओं गांधी, तिलक आदि के कारण स्थिति सुदृढ होती गई। अग्रेजों की दमन-नीति को देखकर गांधीजी ने असहयोग मान्दोलन (1920-21 ई.) शुरू किया। इन घटनाओं और परिवर्तनशील स्थितियों के कारण देशवासियों में आत्म सम्मान का माव जागृत हुआ। ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीति के फलस्वरूप निरंकुश राजशाही के विरुद्ध भी भावाज उठने लगी और राजस्थान में भी क्रान्ति की भावनाएं सक्रिय हो गई। कोटा के केसरीसिंह बारहठ, जोरावरसिंह, प्रतापसिंह, खरवा के गोपालसिंह, ब्यावर के दामोदरप्रसाद राठी भौर विजयसिंह पथिक ने क्रान्तिकारी आंदोलन को राजस्थान में गति प्रदान की लेकिन बाद में ये समी क्रान्तिकारी गिरफ्तार हो गये। इस समय को दो महत्त्वपूर्ण घटनामों में विजोलिया और बेग् के किसानों का आन्दोलन भी उल्लेखनीय कहा जायेगा जिन्होंने मागीरदारी प्रत्याचारों एवं शोषण के विरुद्ध मे आवाज उठाई । जयनारायण व्यास, हीरालाल शास्त्री, माणिकलाल वर्मा, हरिभाऊ उपाध्याय, सागरमल गोपा आदि 1930 ई. के आसपास के प्रमुख नेता थे जिन्होंने पराधीनता के खिलाफ में आवार उठाई और आजादी के संघर्ष को गांव-गांव तक पहुंचाया। जयनारायण व्यास, गणेशीलाल व्याम, उस्ताद, मुमन जोशी जैसे कवियों ने प्रोजस्वी रचनामों के माध्यम से जन-जागृति मे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् राजनीतिक क्षेत्र में काफी परिवर्तन हुआ । 1942 ई. में 'भारत छोड़ो आन्दोलन का नारा दिया गया मोर 'माजाद हिन्द फौज' के गठन से राष्ट्रीय चेतना का संचार हुमा। अंतत: 15 अगस्त, 1947 ई. को देश ने माजादी प्राप्त की। सामाजिक एवं धार्मिक परिवेश-राजनीतिक हलचलों के साथ-साथ इस काल में सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि से भी कुछ ऐसे पान्दोलन उत्पन्न हुए जिन्होंने समाज मोर धर्म को एक नयी घेतना प्रदान की। प्रिटिश राज्य में माधुनिकफरण की जो प्रक्रिया प्रारम्भ हुई उसने सामाजिक मान्यतामों एवं धार्मिक चितन को नये रूप में परिवर्तित करने की कोशिश की। बाह्म समाज, प्रार्थना समान मोर मार्य समान ने देश के सुदूर कोनों में अपनी विचारधारा को फैलाया। 1828 में रागाराममोहन राय ने बाह्म समाज की स्थापना को मोर इसके माध्यम से पर्म पोर ममात्र को कई कुरीतियों पर सीमा प्रहार किया, इनमें सती प्रथा, विधवा-विवाह मादि प्रमुख थी। 1867 ई. में केशवपन्द्र सैन ने प्रार्थना समाज की स्थापना की और सामाजिक सदियों तथा विश्वासों के विरुद्ध गहरा संप किया। 18671. में ही रमानन्द सरस्वती ने बम्बई मे मार्य समाज की स्थापना की तथा सामाजिक मायुनिक काल:59 " एवं नैतिक मूल्यों के लिए एक आचार संहिता बनाई। इन मान्दोलनों का राजस्थान को सामाजिक और धार्मिक स्थिति पर गहरा प्रभाव पड़ा स्वामी दयानन्द सरस्वती, और विवेकानन्द ने रियासतो . में घूम-घूम कर सामाजिक सुधारो के लिए काफी प्रयत्न किया फलतः बाह्यिाडम्बरों और पाखंडों के प्रति जागरूकता उत्पन्न हुई । सामाजिक जीवन में बाल-विवाह. कन्या-विक्रय, पर्दा-प्रया प्रशिक्षा जैसी अनेक कुरीतियां फैली हुई थी, जिनमें नवयुग की चेतना से काफी सुधार हुमा । सुधारवादी विचारों का प्रभाव कई कवियों की काव्य-चेतना पर भी पड़ा और उन्होंने ऐसे सुधारवादी गीत भी सिमे । आर्थिक क्षेत्र में भी काफी परिवर्तन हो रहा था। देश की आर्थिक व्यवस्था काफी छिन्न-भिन्न हो रही थी। लोगों में असन्तोष फैलता जा रहा था तो दूसरी तरफ औद्योगिक विकास की गति , अवरुद्ध हो गई थी जिससे गरीवी, महंगाई आदि समस्याएं फैल रही थी। सांस्कृतिक परिवेश-अंग्रेजो के अधीन रहने के कारण देशवासी पाश्चात्य सम्यता और संस्कृति के संपर्क में आये जिसके कारण आधुनिकता का संचार हुप्रा और सांस्कृतिक स्तर पर भी बदलाव आया। अंग्रेजों की नयी अर्थव्यवस्था, नयी शिक्षा नीति, यातायात के साधन प्रादि ने विचारों में भी परिवर्तन उपस्थित किया पोर इससे सांस्कृतिक चेतना का नवीनीकरण हुमा । प्रारम्भ में तो लोगों में अपनी संस्कृति के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा थी लेकिन धीरे-धीरे पाश्चात्य सभ्यता और संस्कृति का व्यामोह बढ़ता गया और लोग पाश्चात्य संस्कृति को अपनाने में गौरव महसूस करने लगे। समाज का उच्चवर्ग उस समय पाश्चात्य संस्कृति का भक्त बना हुआ था। औद्योगिक क्रान्ति, सांस्कृतिक चेतना और पाश्चात्य साहित्य का प्रभाव जन मानस पर दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था जिससे भारतीय जीवन के प्राचार- 'विचार और सोच मे काफी परिवर्तन नजर आने लगा। अंग्रेजी और बंगला साहित्य का प्रमाव भी तत्कालीन साहित्यिक चेतना मे पाया जिसके कारण साहित्य के कथ्य और शिल्प मे परिवर्तन उपस्थित हुग्रा.। ..इस तरह, 1850 ई. से 1947 ई. तक की राजनीतिक सामाजिक मोर सांस्कृतिक परिस्थितियों ने साहित्य की रचनात्मक चेतना को प्रभावित किया और उसके अनुरूप काहित्य लिखा, गया । .. काव्य-जागरणकाल की परिस्थितियों ने एक तरफ', राष्ट्रीय चेतना को उद्बुद्ध किया तो दूसरी तरफ समसामयिक जीवन बोध के सामने ऐसी धुनौतियां उपस्थित की, जिनके कारण माधुनिकता की प्रक्रिया अपने हिसाब से गतिशील बनी रही । राजस्थानी भाषा के कवियों ने इन विकट परिस्थितियों में अपनी जागरूकता भौर कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। सूर्यमल्ल मिश्रण और शकरदान सामौर इस काल के दो विशिष्ट कवि कहे जाने fan 60: राजम्यानी माहित्य का गंक्षिप्त इतिहास युग यवि की भूमिका निमाई । इम काल के अन्य कवियों की कविता परम्परागत फाय्य के अन्तर्गत मानी जायेगी । यहाँ सबसे पहले सूर्यमल्ल मिश्रण और शंकरदान सामौर के काव्य का परिचय प्रस्तुत है- सूर्यमल मियण-सूर्यमल मिश्रण विलक्षण प्रतिमा, बंदुष्य और पांडिल्य के धनी थे । धारणकुल के महान कवि के रूप में उनकी स्याति है । इसमें कोई सन्देह नही सूर्यमल्ल मिश्रण जैसे महान कवि कई शताब्दियों बाद पैदा होते हैं। सूर्यमल्ल का जन्म सं. 1872 में यूदी में हुमा । भाप बूदी नरेश महाराव रामतिर फे राज्याथित कवि थे। सूर्यमल्ल की रचनाओं में वंश मास्कर, वीर सतसई, बलवद् विलास, रामरंजाट, छंदोमयूस आदि प्रमुख हैं। 'वंशमास्कर' प्रापका सबसे बड़ा और प्रसिद्ध अन्य है जिसकी रचना 1840 ई. में हुई। यह बूदी राज्य का पद्यात्मक इतिहास है । इसे महामारत के समान एक विश्वकोपीय ऐतिहासिक काव्य की संज्ञा भी दी गई है। सूर्यमल्ल का विशद ज्ञान, अपार शब्द मंडार और अनेक भाषामों की जानकारी 'वंशभास्कर' अन्य से प्रमाणित होती है । ऐतिहासिक दृष्टि से 'वेशमास्कर' महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है इसकी भाषा . पिंगल है । सूर्यमल्ल का दूसरा ग्रन्थ 'वीर सतसई' है जिसमें कुल 288 दोहे हैं और यह वोर रसात्मक दोहों से परिपूर्ण टिंगल की की अनुपम कृति है। सूर्यमल्ल ने इन दोहों में राजस्थान के मध्ययुगीन जीवनादों को नये सन्दर्भ में प्रस्तुत किया है। शौर्य, त्याग, बलिदान, धरती प्रेम आदि उदात्ततम जीवन मूल्यों की गौरवमयी परम्पराओं को 'वीर सतसई' मे सफल रूप मे अभिव्यक्त किया है। 'वीर सतसई' काव्य को रचना के पीछे 1857 ई. को राज्य क्रान्ति की प्रेरणा रही है। 'बीर सतसई' मारत के इतिहास की एक महान घटना (स्वातन्त्र्य संग्राम) का काव्यमय उद्गार है । इस कान्ति की भोर संकेत करते हुए वीर-सतसई मे लिखा है- बीक्य बरसां बीतियां, गण चौ चंद गुगोस । विसहर तिथ गुरू जेठ बदि, समय पलट्टा सीस ।। 'पलवद् विलास' चरित काव्य है जिसमें रतलाम के महाराजा बलवंत सिंह का चरित्र-वर्णन है । इसमें कुल 584 छद है । रामर' जाट सूर्यमल्ल की प्रारम्भिक रचना है जब उनकी उम्र 10 वर्ष की थी। यह 145 छन्दों को कृति है। इस तरह सूर्यमल्ल मिश्रण प्राधुनिक काल के प्रथम एवं डिंगल परम्परा के अन्तिम कवि हैं । वीर रस के सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में सूर्यमल्ल मिश्रण की ख्याति भतुलनीय है । प्रापकी मृत्यु सं. 1920 में हुई। 7 1. सांस्कृतिक राजस्थान : सं. रतनशाह, पृ. 38 2. वीर सतसई : सं. डॉ. सहल एवं गोड. प. 74 माधुनिक काल : 61 के कवियों शंकरदान सामौर ( 1881-1935)-अंग्रेजी शासन के अत्याचार पोर मनाचारपूर्ण रवैये की तीखी मत्र्सना करने वाले माधुनिक काल के कवियों में शंकर दान सामौर मप्रणो माने जायेंगे । आपका जन्म वि. सं. 1881 में चूरू जिले की सुजानगढ तहसील के बोबासर गांव में हुमा । मामान्य चारण परिवार में जन्में सामौर की कविता मसाधारण थी। ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ आग उगलने वाले राजस्थान शंकरदान के मुकाबले का दूसरा कदि नहीं है। उन्होंने एक तरप. अंग्रेजी राज्य में फैले अन्याय, शोषण, भ्रष्टाचार और नीति का तीखे स्वर में विरोध किया तो दूसरी तरफ यहाँ के जागीरदारों और ठाकुरों की निष्क्रियता का -चित्रण करते हुए उन्हें अंग्रेजो सत्ता के खिलाफ जूझने के लिए प्रोजस्वो स्वर में प्रोत्साहित किया। शंकरदान की आवाज मे निर्भीकता और क्रान्ति की तेजोमय -भाग थी। शंकरदान प्रगतिशील विचारधारा के प्रथम कवि कहे जा साकते हैं। उनके काव्य में शोपित, पददलित और उपेक्षित वर्ग का यथार्थवादी चित्रण है तथा मौजूदा व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य है । सगती सुजस, भागीरथी महिमा वखतरो बायरो, देस दर्पण, साकेत सतंक मादि शंकरदान की प्रमुख रचनाएं हैं और ये सभी मुखश्रुति से प्राप्त हुई हैं । अंग्रेजों को साम्राज्यवादी नीति की तरफ संकेत करते हुए शंकरदान कहते हैं- महलज लूटण मोकला, चढया सुण्या चिंगेज । लूटण झूपा लालची, माया बस इंगरेज ।। प्रसाद भोर पोज गुण सम्पन्न शंकरदान सामौर की भाषा में सहज लालित्य है। .. इससे प्रकट होता है कि सूर्यमल्ल मिश्रण और शंकरदान सामौर जागरण काल.के दो विशिष्ट कवि थे जिन्होंने तत्कालीन परिस्थितियों में जन-मानस में राष्ट्रीय भावना के वीज-वपन करने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इस काल में इन दो कवियों के अतिरिक्त शेष काव्य परम्परागत शैली में लिखा गया जिसमें किसी एक प्रवृत्ति की प्रधानता नहीं दिखाई देती है। परम्परागत काव्य-पारस्परिक शैली में रचित काव्य और उनके कवियों का परिचय इस प्रकार है- Ja रामनाप कविया (1801-1879 ई.)-अपनी, प्रसादमय शैली के कारण रामनाप कविया राजस्थानी भाषा के लोकप्रिय कवि रहे हैं । आपकी रचनाओं में 'पाबूजी रा सोरठा' और द्रोपदी विजय या 'करुण बहत्तरी' है । 'करुण बहतरी' में दुःशामन द्वारा द्रौपदी का चीर हरण करने पर द्रौपदी की कृष्ण को की गई करुण पुकार का मार्मिक चित्रण है। इसके अतिरिक्त आपने धारण देवी करणी जी की महिमा और कुछ प्रमुख परित नायकों के बारे में भी कविता लिखी है यया पानजी .
साहित्यिक काव्य कृत्ति है । इसमें पट्ऋतु क माध्यम से महाराजा के मारता तिमे हैं। सूर्यमल मिश्रण और शंकरदान सामोर को मृत्यु के बारे में आपने सुध मानि स्परपदास (1801-1863 ई)-नवरूपराम का जन्म पारस हमा था लेकिन बाद में दाद मम्प्रदाय में दीक्षा लेकर दाद पंपी साधु हो । संस्कृत, पिंगल, हिंगल मादि मापाओं के विद्वान थे तथा रतलाम, सौवामा दरबारों में इनका अच्छा मान-सम्मान था। आपको लिखी हुई नामाकर रत्नाकर, पागंह संडन, वर्णनाथ मंजरी, दृष्टान्त दीपिका, वृत्तिबोध, पान चन्द्रिका प्रादि प्रमुख है। इनमें पांडव यशेन्दु चन्द्रिका विशेष ख्याति प्राप्त । राय बतायर (1813-1894 ई.)-मे टाक शाखा के राव पे इनकार मेवाड़ के वसी गाव महुआ था बाद में ये उदयपुर के महाराणा वा सिंह के दरवारी कवि हो गये और उनकी तीन पीढियों तक सम्मान प्राप्त करते रहे। केहर प्रकाश, रसोत्पत्ति स्वरूप-यशप्रकाश. शभु यश-प्रकाश आदि थोकी की जिनमें 'केहर प्रकाश इनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसमें लगमा,148651 समान बाई (1825-1885 ई.)--समान बाई ख्याति प्राप्त कवि राममा कविया की सुपुत्री थी। प्राप भक्त कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध है। मापने पर कृष्ण लीला के सम्बन्ध में पद लिखे है। भापकी कृतियो में ईश महिमा, राषि शरीरोपमा, श्री कृष्णोपमा, पतितपोपमा आदि मुख्य है। आपने राजस्थानी ।। चिमन जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे सुयोग्य कवि एव विद्वान मारे। कविया चिमनजी (1833-1887 ई.) चारण काव्य को.ष्टि से गरिन्। ग्रंथो की रचना की। मापके काव्य में चारण काव्याकी सभी परम्परागत शैलिया। ऐतिहासिक-वीररसात्मक, भक्तिपरक एवं छदशास्त्रीय विपयो पर कुल मिलाकर 21 दर्शन होते है । 'सोदायरा' प्रामकी प्रसिद्ध काव्य कृति है जिसमे सोडा राजपा महाराजा मंगलसिंह के राजदरवारी कवि थे। 'मलवर को पट्ऋतु ममाला शिववस पालावत (1844-1899 ई.)-शिवदवस पानावत मलवार जिसे के दावरवाड़ा ग्राम में प्रा.था। बाल्यावस्था मे माता-पिता का देहान्त हो कमरान लालस(1851-1993 ई.)-उमरदान.लालसका जन्म गांजा पानंद सरस्वती के उपदेशों में प्रभावित होकर पुनः गृहस्थी हो गये। कारण मे सपा के रामस्नही सम्प्रदाय मे दीक्षित हो गये। बाद में माना। 62 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास जिसमें महाभारत को सार रूप में प्रस्तुत किया गया है । और भापा राजस्थानी है। अलावा ब्रजमापा मे भी पद लिरो हैं। एव शौर्य का प्रभावशाली वर्णन किया गया है । वीरत्व । एवं लोक जीवन का सुन्दर चित्रण किया गया है।
माधुनिक काल : 63 . वताओं का संग्रह 'ऊमर काव्य' नाम से प्रकाशित हुआ है। आर्य समाज से प्रभावित ने के कारण अपने सामाजिक कुरीतियों एवं पाखंडों पर तीखा व्यंग्य किया है। पकी माषा सरल बोलचाल की होते हुए भी प्रभावशाली है । सुधारवादी दृष्टिकोण के कारण दारा दोस' प्रबार को हाल, विभिचार बुराई, अमल.रा ओगण, तमाखू को ताड़न , धर्म फमोटी मादि रचनाएं काफी कप्रिय हैं । इसमें कोई संदेह नहीं लालस का काव्य परम्परागत काव्य शैली से ल्कुल मिन्न था जिसमें जन-जागृति का स्वर प्रधान था। महाराज चतुरसिंह (1879-1929 ई)-सहज सरल प्रकृति के अनुरूप हाराज चतुरसिंह सहृदयी कवि थे। आप मेवाड़ मे करजाली के स्वामी महाराज घसिंह के वंशज थे। प्रापका जीवन एक योगी और भक्त व्यक्ति जैसा था क्योंकि त्निी के देहान्त के बाद मापने उदयपुर शहर के बाहर एक गांव के पास कुटिया नाकर साधु जीवन व्यतीत किया। प्रापने 18 ग्रंथों की रचना की, जिनमें भगवत गीता को गंगाजली टीका, परमार्थ विचार, योगसूत्र की टीका, अलख पचीमी, चतुर- चतामणि, अनुभवप्रकाश, चतुर प्रकाश प्रादि प्रमुख है । आपने राजस्थानी एवं ब्रज दोनों माषाओं में काव्य रचना की। माव प्रवणता, मौलिकता और स्वाभाविकता आपके काव्य को प्रमुख विशेषताएं हैं। मेवाड़ में मीरां के बाद लोकप्रिय कवियों में दूसरा स्थान महाराज चतुरसिंह का है । 'मोड़सिंह महियारिया (1861 ई.)-मोडसिंह महियारिया चारण काव्य के प्रमुख कवि थे मापने सूर्यमल्ल मिश्रण को अधूरी वीर सतसई को पूरा करने के लिए 453 दोहे और लिखे लेकिन वे भाव व्यंजना की दृष्टि से उतने प्रभावशाली नहीं हैं क्योंकि सूर्य मल्ल की तुलना में महियारिया सामान्य प्रतिमा के कवि थे । हिंगलाजदान कविया (1861-1948 ई.)~चारणशैली के प्रभावशाली कवि हिंगलाजदान कविया का जन्म जयपुर के निकट सेवापुरा गांव में हुप्रा । आपकी रचनाओं में मृगया मगेन्द्र, प्रत्यय पयोघर, साल गिरह शतक, मेहाई महिमा, दुर्गा वहत्तरी, मासेट अपजस बाणिया तसो प्रादि प्रसिद्ध हैं। आपने करणी जी एवं इन्द्रबाई की स्तुति भी लिखी है । हिंगलाजदान कविया डिंगल के उद्भट्ट विद्वान थे। भाषा पर प्रापका अच्छा अधिकार था । - केशरीसिंह बारहठ (1871-1941 ई )--केशरीसिंह बारहठ प्रसिद्ध क्रांति- कारी और देशभक्त कवि थे। इनके सम्पूर्ण परिवार ने देश को आजादी के लिए . बलिदान किया। प्रताप चरित्रः राजमिह चरित्र, दुर्गादान चरित्र, जसवतमिह चरित्र. और रूठी राणी आपके प्रमुख काव्य ग्रंथ है। मेवाड़ के महाराणा फतेहसिंह को, सम्बोधित करके आपने 'चेतावणी रा चूगट्या' (13 सोरठे) लिखे जो काफी चर्चित । रहे। वीर रस का प्रोजस्वी वर्णन प्रापके काव्य की प्रमुख विशेषता है। उदयराज ऊजल (1885-1967 ई.)-परम्परागत काव्यशैली के सुयोग्य कवि और चारण साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान उदयराज ऊजल का जन्म मारवाड़ में :
62 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास सूर्यभल्ल मिश्रण और शंकरदान सामौर की मुत्यु के बारे में प्रापने कुछ मरमिये लिखे हैं। स्वरूप दास (1801-1863 ई)-स्वरूपदाम का जन्म चारण परिवार में हुआ था लेकिन बाद में दादू मम्प्रदाय में दीक्षा लेकर दादू पंयो साधु हो गये। ये संस्कृत, पिंगल, हिंगल आदि भाषाओं के विद्वान थे तथा रतलाम, सीतामक प्रादि दरबारों में इनका अच्छा मान-सम्मान था। आपको लिखी हुई रचनाओं में रस- रत्नाकर, पाखड खंडन, वर्णनाथ मंजरी, दृष्टान्त दीपिका, वृत्तिबोध, पांडव यशेन्दु चन्द्रिका प्रादि प्रमुख है । इनमें पांडव यशेन्दु धन्द्रिका विशेष ख्याति प्राप्त रचना है जिसमें महाभारत को सार रूप में प्रस्तुत किया गया है । राव बख्तावर (1813-1894 ई.) में टाक शाखा के राव ये इनका जन्म मेवाड़ के बसी गांव में हुआ था बाद में ये उदयपुर के महाराणा स्वरुप सिंह के राज दरबारी कवि हो गये और उनकी तीन पीढ़ियों तक सम्मान प्राप्त करते रहे। इन्होंने केहर प्रकाश, रसोत्पत्ति, स्वरुप-यश प्रकाश, शंभु यश-प्रकोश आदि 11 ग्रंथो की रचना की जिनमें 'केहर प्रकाश इनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है । इसमे लगमग ,1486 छंद हैं. और भापा राजस्थानी है। समान बाई (1825-1885 ई.)--समान बाई ख्याति प्राप्त कवि रामनाथ कविया को सुपुत्री थी । पाप भक्त कवयित्री के रूप में प्रसिद्ध हैं। मापने राम और कृष्ण तीला के सम्बन्ध में पद लिसे है। भापकी कृतियो में ईश महिमा, राधिका शरीरोपमा, श्री कृष्णोपमा, पतित - पत्रोपमा आदि • मुस्य है। आपने राजस्थानी के अलावा ब्रजभाषा में भी पद लिखे है। कविया घिमनजी (1833-1887 ई.) चारण · काव्य की दृष्टि से कविया चिमन जी का महत्त्वपूर्ण स्थान है । व सुयोग्य कवि एव विद्वान थे । मापने ऐतिहासिक-वीररसात्मक, मक्तिपरक एवं छदशास्त्रीय विषयो पर कुल मिलाकर 21 ग्रंयों की रचना की। मापके काव्य में चारण काव्य की सभी परम्परागत शैलियो के दर्शन होते हैं । 'सोदायण' आपकी प्रसिद्ध काव्यं कृति है जिसमे : सोढा राजपूतों के वीरत्व एवं शौर्य का प्रभावशाली वर्णन किया गया है । शिवपस पालावत (1844-1899 ई.)-शिववक्स पानावत ' प्रलवर महाराजा मगलसिंह के राजदरवारी कवि थे। 'मलवर को पट्ऋतु. झमाल' प्रापकी साहित्यिक काव्य कृति है । इसमे पट्ऋतु क माध्यम से महाराजा के क्रिया-कलापो एवं लोक जीवन का सुन्दर चित्रण किया गया है। कमरदान सालस, (1851-1903 ई.)-उमरदान,लालस का जन्म जोधपुर जिले के ढाडरवाहा ग्राम में हुआ था.। बाल्यावस्था मे माता-पिता का देहान्त हो जाने के कारण ये सेडापा के रामस्नेही सम्प्रदाय में दीक्षित हो गये। बाद में सालस दयानंद मरस्वती के उपदेशों में प्रभावित होकर पुनः गृहस्थी हो गये। भापकी -- के माधुनिक काल : 63 . कविताओं का संग्रह 'ऊमर काव्य' नाम से प्रकाशित हुआ है । आर्य समाज से प्रभावित होने के कारणं अपने सामाजिक कुरीतियो एवं पाखंडों पर तीखा व्यंग्य किया है। आपकी भाषा सरल बोलचाल की होते हुए भी प्रभावशाली है। सुधारवादी दृष्टिकोण के कारण 'दारु रा दोस' प्रबार को हाल, विभिचार को बुराई, अमल. रा ओगण, तमावू को ताड़न , धर्म कमोटो मादि रचनाएं काफी लोकप्रिय हैं । इसमें कोई संदेह नहीं, लालस का काव्य परम्परागत काव्य शैली से बिल्कुल भिन्न था जिसमें जन-जागृति का स्वर प्रधान था । महाराज चतुरसिंह (1879-1929 ई)-सहज सरल प्रकृति के अनुरूप महाराज चतुरसिंह सहृदयी कवि थे। आप मेवाड़ में करजाली के स्वामी महाराज बाघसिंह के वंशज थे। आपका जीवन एक योगी और भक्त व्यक्ति जैसा था क्योंकि पत्नी के देहान्त के बाद प्रापने उदयपुर शहर के बाहर एक गांव के पास कुटिया बनाकर साधु जीवन व्यतीत किया। प्रापने 18 ग्रंथों की रचना की, जिनमे. भगवत गीता को गंगाजलो टीका, परमार्थ विचार, योगसूत्र की टीका, अलुख पचीसी, चतुर- चिंतामणि, अनुमवप्रकाश, चतुर प्रकाश प्रादि प्रमुख है । आपने राजस्थानी एवं व्रज दोनों भाषाओं में काव्य रचना की। भाव प्रवणता. मौलिकता और स्वाभाविकता आपके काव्य की प्रमुख विशेषताएं हैं । मेवाड़ में मीरां के बाद लोकप्रिय कवियों में दूसरा स्थान महाराज चतुरसिंह का है । 'मोड़सिंह महियारिया (1861 ई.)-मोडसिंह महियारिया चारण काव्य के प्रमुख कवि थे आपने सूर्यमल्ल मिश्रण को अधूरी वीर सतसई को पूरा करने के लिए 453 दोहे और लिखे लेकिन वे भाव व्यंजना की दृष्टि से उतने प्रभावशाली नहीं हैं क्योंकि सूर्यमल्ल की तुलना में महियारिया सामान्य प्रतिमा के कवि थे हिंगलाजदान कविया (1861-1948 ई.)-चारणशैली के प्रभावशाली कवि हिंगलाजदान कविया का जन्म जयपुर के निकट सेवापुरा गांव मे हुमा । आपको रचनाओं में मृगया मृगेन्द्र, प्रत्यय पयोधर, साल गिरह शतक, मेहाई महिमा. दुर्गा वहत्तरी. प्रासेट अपजस बाणिया रासो प्रादि प्रसिद्ध हैं । आपने करणी जी एवं इन्द्रबाई की स्तुति भी लिखी है । हिंगलाजदान कविया डिंगल के उद्भट्ट विद्वान थे। भाषा पर प्रापका प्रच्या अधिकार था। • केशरीसिंह बारहठ,(1871-1941 ई) केशरीसिंह बारहठ प्रसिद्ध क्राति.. कारी और देशभक्त कवि थे। इनके सम्पूर्ण परिवार ने देश, को, प्राजादी के लिए बलिदान किया । प्रताप चरित्रः राजसिंह चरित्र, दुर्गादान चरित्र. जसवनसिंह चरित्र पौर रूठी राणी आपके प्रमुख काव्य ग्रंथ है। मेवाड़ के महाराणा फतेहसिंह को . सम्बोधित करके आपने 'चेतावणी रा. चूंगट्या' (13 सोरठ) लिखे जो काफी चर्चित . रहे । वीर रस का प्रोजस्वी वर्णन प्रापके काव्य की प्रमुख विशेषता है । उदयराज ऊजल (1885-1967 ई.)-परम्परागत काव्यशैली के सुयोग्य , कवि पौर चारण साहित्य के प्रसिद्ध विद्वान उदयराज ऊजल का जन्म मारवाड़ में , .
64 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास : ऊजला गाव में हुआ । 'दो वारा देश ज्योरी साहित जगमगे जैसे उदुवोधक वावर के रचयिता उदयराज कजल के काव्य में राजस्थान की धरती, इतिहास और भाषा के प्रति गहरा प्रेम है । घुड़सार, मारवाड़ रा वीर, दूधप्रकाश, मातृभाषा दोहावली. मानिया रा दूहा, स्वराज सतक, तंज सतक, सर्वोदय सतक, थम सतक सती-सतक, मापा सतक पारि आपको चचित रचनाएं हैं। आपने अपनी कृतियों में दोहा. सोरठा, छप्पय एवं डिंगल गीत शैली को अपनाया । नायसिंह महिपारिया (1891-1973 ई.)-परम्परागत धारण शैली को अपनाते हुए भी नासिंह महियारिया ने वीरस्व एवं जीवनादर्शों की नवीन व्याख्या प्रस्तुत की। ईसरदास. बाकीदास और सूर्यमल्ल मिश्रण जैसे कवियों की वीर परम्परा में ही इन्होने 'वीर सत्तसई' काव्य की रचना की। अन्य रचनामों में गाधी शतक, हाडी शतक, चू डा शतक, झाला मान शतक, वीर शतक, कश्मीर शतक आदि हैं । काव्य सौन्दर्य की दृष्टि से 'वीर सतसई' महत्त्वपूर्ण कृति है जिसमें युगानुकूल रूप में वीरत्व और त्याग के आदर्श का वर्णन करते हुए राष्ट्रीय भावना के प्रखर रूप को प्रस्तुत किया है। रावल नरेन्द्रसिंह (1893-1967 ई.)-रावल नरेन्द्रसिंह इतिहासकार एवं चारण शनी के सुयोग्य कवि थे प्रापने 'वीर हजारा' नाम से एक हजार सोरठे. लिखें हैं जिनमें राम, हनुमान से लेकर शैतानसिंह भाटी तक के चरित्रों का वर्णन किया गया है। परम्परागत काव्य के अन्य कवियो में बालावश पालावत (हणूतिया) मुरारिक दान (दी) कविराजा मुरारिदान (जोधपुर) किशन जी (डूगरपुर, कविराव मोहन सिंह (उदयपुर) राव मानकुमारी (उदयपुर) गणेशपुरी (जोधपुर) प्रतापकुवरी (जोधपुर) आदि है । परम्परागत काव्य मागे भी स्वातन्त्रव्योत्तर काल में भी उपलब्ध होता है। स्वातन्त्र्योतर काल: नवचेतना का उदय भाजादी किमी भी राष्ट्र के जीवन का महत्त्वपूर्ण मूल्य है। 15 अगस्त, 1947 को जब हमारा देश स्वतन्त्र हुपा तो उसके राजनीतिक, सामाजिक और वाधिक परिवेश में बड़ा परिवर्तन हुप्रा । 'स्वाधीनता के बाद एक नवीन चेतना का विकास स्वामाविक या। लोगों को आशा थी कि आजादी के बाद सामाजिक और प्रापिक दृष्टि से नव-निर्माण होगा तथा लोगों को अधिक से अधिक सुस्त-सुविधाएं मिलेगी। राजस्थान में भी भाजादी के बाद महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। अप्रैल, 1949 ई. में राजस्थान सघ को स्थापना हुई और सामन्ती व्यवस्था की समाप्ति के बाद प्रजातान्त्रिक व्यवस्था ने जन माधारण मे अपार हर्षोल्लास का वातावरण पंप कर दिया। 1952 ई में प्रथम ग्राम चुनाव हुआ और जन प्रतिनिधियो देश को शासन पवस्था अपने हाथों में मंभाली। राज्यों का विलीनीकरण, जमीदारी .
भान. माल • • प्रथा का उग्मूलन, मजदूरों के हितों की रक्षा, अछनोद्धार के लिए अनेक योजनामों का लागू करना इत्यादि कुछ ऐसे कार्य थे, जिनसे लोगों को आजादी का प्रहमास प्रा और लगा कि कुछ निश्चित रूप से होगा । लेकिन परिवर्तन को यह परिकल्पना 1935 ई. के बाद टूटनी नगर पाई और जिन लोगों ने देशो की बागडोर सम्भाली को उन्होने अपने क्षुद्रस्थारों और भ्रष्टाचार से पूरे राजनीतिक परिवेश को दूपित कर दिया । चारों ओर भाई-भतीजावाद, स्वार्थपरता, अनावार रिश्वतखोरी, पक्ष. परता, और संकीर्णता फैल गई। 1960 ई. तक प्राते-गाते नेहरू युग का अन्त हो या और राजनीतिक तथा सामाजिक स्तर पर मूल्यों के मोहभंग की प्रक्रिया पारम्भ हो गई। 1962 ई. में चीन का प्राक्रमण, 1964 ई. मे नेहरू की मृ यु, 1965 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध, 1971 ई. में बंगला देश की लडाई, 1973 ई. में विहार में छात्र-ग्रान्दोलन, 1976 ई. में प्रापात स्थिति, 1977 ई मे सत्ता परिवर्तन और 984 में इन्दिरा गांधी की हत्या -ये राजनीतिक क्षेत्र की छ ऐसी महत्त्वपूर्ण घटनाएं थी जिन्होने पूरे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को झकझोर देया और सत्ता पक्ष को अपनी नीति और योजनामों में कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाने हे। प्राधिक क्षेत्र में देश के सर्वागीण विकास को दृष्टि से 1951 ई. में पर- पीय योजनाओं का श्रीगणेश हुग्रा तथा आर्थिक क्षेत्र में कुछ निर्धारित लक्ष्यो की ति भी हुई। सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की दृष्टि से देश में पचायत राज की व्यवस्था की गई और 2 अक्टूबर, 1959 ई. में प जवाहरलाल नेहरू ने नागौर मे पचायती जि व्यवस्था को शुरूपात को । राजस्थान मे शिक्षा, चिकित्सा, कृषि, सिंचाई, तायात, उद्योग धन्धो के माध्यम से विकास कार्यों को बढ़ावा दिया गया। ग्रामीण वकास को कई योजनानों ने पिछड़पन को मिटाने मे सहयोग दिया लेविन राज- तिक धोपणानों और प्रायिक योजनामों का परिणाम निराशाजनक ही रहा । स्नुग्रो के बढ़ते मूल्य, खाद्य ममस्या, वेरोजगारी, पूजी के केन्द्रीयकरण प्रादि मस्यानो ने राष्ट्र व्यवस्था के सामने संकट उपस्थित कर दिया था जिमसे चारों इरफ असतोप की लहर नजर आ रही थी। प्रशासन की प्रापराधानी, नौकरशाही और भ्रष्टाचार ने जन मानम में विरोध और आक्रोश की भावनाये पंदा कर दी। त्तिाधारी लोग राष्ट्र निर्माण की अपेक्षा स्व-निर्माण में लग गये । दूसरी तरफ आजादी बाद पाने वाली युवा पीढी ने अपने बुजुर्ग नेतानों की स्थिति को देखा तो उसमे वरोधस्वरूप उच्छृखलता, उद्दण्डता, लक्ष्यहीनता और विध्वमक प्रवृत्ति पनपने लगी जसके कारण नारों तरफ अनुशासनहीनता और अराजकता का वातावरण दिखाई देने लगा। मोहभंग की इस मानमिकता का अाशात सबमे अधिक मध्यवर्ग को लगा। फलतः वैयक्तिक और सामूहिक स्तर पर तभी वैचारिकता उटने लगी और विकास 66 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास प्रवाह में लोगों ने प्रजीच सरह का व्हगा महसूस किया। सामाजिक मूल्यों का विघटन, गहरी सम्ममा का प्राय परा, संयुक्त परिवार प्रया का पन्त, गांवों से शहरों की तरफ दौड़ना, जीवन व्यापन को नयीन ममस्यायें प्रादि कुछ ऐसी स्थितियाँ धी जो बदलते परिवेश को प्रमाणित कर रही थी। साहिरिया चेतना - स्वाधीनता के पचात उत्पल होने वाली राजनीतिक, सामाभिक और धाषिक मितियों ने राजस्थानी साहित्य को भी प्रभावित किया है और युगानुम्प साहित्य को गाना कथ्य और शिल्प की दृष्टि से बदलाव पाया है। दहती सामन्ती व्यवस्था, सद्विवादी मनोवृत्ति, ग्रामीण क्षेत्रों का पिछड़ापन पचायत राज व्यवस्था से प्रदुपित गवई पग्विा, वेरोजगारी, मायिक दयावो से टूटते सम्बन्ध, शिक्षा के फैलाय में उत्पन्न जागकता, प्रकार की महराती काली पाया, राजनीति की उठा-पटक से फैलता जनाकोश प्रादि काछ ऐमी स्थितिया है जिन्होंने यहाँ के परिवेश को प्रभावित किया, फलत: राजस्थानी साहित्य की सवेदनायो में काफी परिवर्तन आया है तथा नवलेपन की सनोपजनक स्थिति दिखाई देती है। प्राज राजस्थानी माहित्य में एक तरफ मोहनंग से उत्पन्न निराशा भी है तो दूसरी तरफ मौजूदा स्थितियों से जभने और संघर्ष करने की हिम्मत भी। यहा के व्यक्ति का मह जूझना कई स्थितियों और कई स्तरो पर है और इससे जो मानसिकता बनो है वह राजस्थानी की नमी कविता में नये सन्दभी के साय स्पष्ट रूप में उजागर मे प्राजाटी के पास-पाम को चेतना ने राजस्थानी माहित्य में रचनात्मक लेखन, शोध और पत्रकारिता के क्षेत्र में नवीन परम्परामों को जन्म दिया। स्व सूर्यकरण फारीक, नरोत्तमदास स्वामी, अगरचन्द नाहटा, डा मोतीलाल मेरिया, डा. कन्हैया लाल सहल प्रादि विद्वानो ने राजस्थानी के प्राचीन साहित्य को हिन्दी जगत प्रस्तुत किया तथा.रचनात्मक लेखन को भी प्रोत्माहित किया। सूर्यकरण पारीक ने 'बोलावरण' या, 'प्रतिज्ञापूति' (1933 ई.) नाम से एकाको सयह प्रकाशित किया। इसके बाद राजस्थानी काव्य की महत्त्वरणं रचना चद्रसिंह की 'बादली' (1941 ई.) प्रकाशित हुई जिसमे पहली बार परम्परिक शेती से अलग हटकर नवीन विषय-वस्तु को अपनाया । यह प्राधुनिक राजस्थानी की प्रथम, काव्य वृति है ।। 'बादली' के बाद मेघराज मुकुल की लोकप्रिय मधीय रचना 'सैनाणी' (1944 ई) ने राजस्थानी भाषा को लोकप्रिय बनाने में आशातीत सफलता प्राप्त की। इन दोनों रचनामो का राजस्थानी काय मे ऐतिहासिक, महत्त्व है तथा इन्होने , परवर्ती लेसन को नयी प्राधुनिक राजस्थानी माहित्य प्रेरणों और सोते : डा. किरण नाहटा, 2. History of Rajasthani Literalule': Dr. H. L. Maheswari, 2.215. - 1. 1 . 29 । R अाधुनिक काल : 67 प्रेरणा एवं दिशा प्रदान की है। 1944 ई. में दिनाजपुर मे राजस्थानी साहित्य सम्मेलन हुआ जो गजस्थानी का पहला सम्मेलन था और मुकुल ने पहली बार इसी सम्मेलन में 'सनाणी' का कविता पाठ किया । इस ममय कुछ राजस्थानी पत्रिकाएं भी प्रकाशित हुई जिनमें राजस्थानी (1946 ई.), राजस्थान भारती (1946 ई.), मारवाड़ी (1947 ई.) एवं 'जागती जोता' (वि. स. 2004) आदि पत्रिकाओं ने रचनात्मक लेखन को प्रोत्साहित किया । यद्यपि इन पत्रिकामों मे जो रचनाए प्रकाशित हो रही थी, वे परम्परागत शैली की थी तयापि लेखन की तरफ रुचि बढ़ती जा रही थी। 1950 ई के बाद लेखन में कुछ गति एवं नये रचनाकार पाये जिनमें राजस्थानी गद्य और पद्य के प्रति उत्साह का भान था। वस्तुतः आजादी के बाद जो 'सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से परिवर्तन हो रहा था। उसका प्रभाव तत्कालीन रचनामों में धीरे-धीरे पा रहा था । 1953 ई में रावत सारस्वत ने 'मरुवाणी' (जयपुर) पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जो आजादी के बाद को पहली माहित्यिक पत्रिका थी। 1954 ई. में किशोर कल्पना कांत ने 'मोलमो' (रतनगढ़) पत्रिका प्रारम्भ की। इन दोनों पत्रिकाम्रो का ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान क्योकि इन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से रचनायों को प्रेरित किया और राजस्थानी भाषा के प्रति लगाव और जागृति पैदा करने मे विशेष भूमिका निभाई। छोटे कलेवर वाली ये दोनों पत्रिकाएँ राजस्थानी गद्य और पद्य की चचित रचनाओं को प्राकर्षक रूप में छापती रही हैं। राजस्थानी भाषा के लेखक एवं पाठक तैयार करने एवं भापाई एकरूपता लाने में दोनों पत्रिकाओं का योगदान विशिष्ट माना जयेगा। सन् 60 के पास-पास रचनात्मक लेवन ने गति एवं व्यापकता धारण की और काव्य विधा की प्रधानता रही. यद्यपि गद्य की विविध विधानों में भी रचनाए लिखी जा रही थी लेकिन राजस्थानी कविता को मचीय लोकप्रियता मिलने के कारण अन्य कवियों ने भी खूब गीत लिसे । इस काव्य धारा मे राष्ट्रीयता, शृंगा- रिकना, प्रगतिशीलता, प्रकृति-चित्रण प्रादि की प्रवृत्तियां उभर कर पाई। 1965 ई. के बाद कविता में अधुनातन प्रवृत्तियो के फलस्वरूप कथ्य और मित्प में नवीनता याई और राजस्थानी को नयी कविता में कुछ सशक्त हस्ताक्षरो ने युगबोध को वर्त- मान सामाजिक परिवेश के सन्दर्भ में अभिव्यक्त किया। इसी भाति राजस्थानी गद्य के क्षेत्र में कहानी लेखन अन्य विधाम्रो की तुलना में अधिक रहा । अब हम इन दोनों विघाम्रो के विकास और तत्सम्बन्धी प्रवृत्तियों का मूल्याकन करेगे। काव्य-धारा: स्वातन्त्र्योत्तर राजस्थानी कविता में कथ्य और शिल्प की दृष्टि से व्यापकता पौर विविधता है। इसमें एक तरफ परम्परागत शैली के दर्शन भी होते हैं तो दुमरी तरफ समसामायिक परिवेश के प्रति जागरूकता भी । राजस्थानी कविता की विविध प्रवृत्तियो को प्रगतिसित रूप से विश्लेपित किया जा सकता है- . 5 S 68 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 1. राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा 2. ध्यक्तिवादी गीत धारा 3. प्रगतिवादी धारा ६. प्रकृति-चिरण 5 हास्य-व्यग्य 6. नयी कविता राष्ट्रीय सांस्कृतिक धारा--प्राजादी में पूर्व परम्परावादी बौर काव्य की रचना तो राजस्थानी भाषा मे बराबर होती रही है लेकिन प्राजादी के पश्चात् वदतती हुई परिस्थितियो मे भी कुछ मामयिक घटना-प्रमग के सन्दर्भ में राष्ट्रीय भावना से श्रीत-प्रोत काव्य की रचना हुई है । ऐमो रचनामों की पृष्ठभूमि पूर्ववर्ती बोर काव्य परम्परा रही है फलतः पारम्परिक शैली और नवीन दौली में कविताएं लिखी गई। 1962 ई. का भारत-चीन और 1969 ई का भारत-पाक युद्ध इसका उदाहरण इन दोनों युद्धो ने राजस्थानी कवियो को वीर रसात्मक काव्य लिखने के लिए प्रेरित किया। राष्ट्रीय भावनाओं का चित्रण करते हुए कवियों ने राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर व्यापक राष्ट्रीयता का परिचय दिया है। ऐसी कवितानों में मातृभूमि के प्रति त्याग, बलिदान और सर्वस्व अर्पित करने का भाव अभिव्यक्त हमा है। इन रचनात्रों में सकुचित मनोवृत्ति का परित्याग और देश के लिए पारणोत्सर्ग करने की भावना प्रधान रही है। राजस्थानी कवियों ने राष्ट्रीयता के भाव सुदृढ करने के लिए एक तरफ ऐतिहासिक चरित नायको के प्रेरणादायो चरित्र को प्रस्तुत किया है तो दूसरी तरफ पद्य कथावो के माध्यम से प्रादर्श प्रसंगो को मामिक अभिव्यक्ति की है। इससे प्रतीत होता है कि इस तरह काव्य अपनी गौरवमयो वीर परम्परानों से अछूता नहीं रहा। वीर ममि राजस्थान और उसके प्रेरणादायी श्रेष्ठ चरित्र--महाराणा प्रताप या वीर दुर्गादास । इस तरह कवियो ने एक तरफ महान वीर पुरुषों के प्रादर्थ चरित्र को लिया तो दूसरी तरफ सेना में लड़ने वाले वीर मिपाही का भी गुरागान किया । राष्ट्रीय भावनाओं मे प्रोत-प्रोत यह काश्य किसी राष्ट्र के लिए प्रेरणा का प्राधार स्तम्भ माना जा सकता है। कवि ग्राने परिवेश से जुड़ा रहता है, उसके कान में युगीन समस्याग्री का चित्रए दिखाई देता है अतः कई बार वह पौराणिक और ऐतिहासिक प्रसंगों के माध्यम से आज की समस्मानों का समाधान प्रस्तुत करता है । कवि का यह सास्कृतिक बीच मस्कृति के मान-मयो को युगीन परिप्रेक्ष्य में नये ढंग से व्याख्यायिन करता है और इससे चिन्तनगत नवीनता को एक नया आयाम मिलता है। इसमें कोई संदेह नही कि बीसवीं शताब्दी की चिन्तन-पति ग्राज की वैज्ञानिक एवं तकनीकी उपलब्धियों में प्रभावित है और याज का विचारात्मक संघर्ष मानवता के सामने कई तरह की चुनौतियां पैदा कर रहा है, ऐसी बदलती परिस्थितियो में मानव मूल्यो प्राधुनिक काल : 69 र मानव को अस्मिता को बनाये रखने के लिए कवि सांस्कृतिक धरोहर का सहारा जा है। राजस्थानी कवियों ने अपने काल में राष्ट्रीयता के साथ-साथ मास्कृतिक ना के सकट को भी महसूस किया है और ऐसा साहित्य लिखा है जो मानवतावादी ट से परिपूर्ण है तथा जिममें मानव के गौरव को प्रतिष्ठित किया गया है । राष्ट्रीयता और सांस्कृतिक धाग का यह काव्य कथ्य की टि से परम्परागत र नवोम भावबोध को तथा शिल्प को दृष्टि से परम्परागत एवं मुक्त छंद विधान लिए हुए है। राष्ट्रीयता को विकसित और व्यापक रूप में प्रचारित करने के लिए इतिहास सिद्ध वीरों और महत्वपूर्ण पद्यकथानों के माध्यम से देशभक्ति, शौर्य, त्याग, वर्तध्य- नष्ठा, स्वाभिमान प्रादि गुणो को उभारा गया जो किसी भी राष्ट्रभक्त व्यक्ति के लिए पावश्यक है । मेघराज मुकुल की सेनाणी (1944 ई.) पहली ऐसी श्रेष्ठ वीररसात्मक नचना थी जिसने अप्रत्याशित लोकप्रियता हासिल की और श्रोताओं को मंचीय कविता के प्रति अभिरुचि जागृत की। रीनाणी' के बाद अनेदा ऐसे ही ऐतिहासिक प्रसंगों को लेकर राजस्थानी मे अनेक पद कथाएं लिखी गई। इन पध कथानो में कन्हैयालाल सेठिया की 'पातल और पीथल' भी ऐमी रचना थी जिसने मंचीय दृष्टि से पर्याप्त लोकप्रियता प्राप्त की। त्याग, कत्र्तव्य और स्वाभिमान के अपूर्व भावो से अोतप्रोत दोनों रचनाए राष्ट्रीय काव्य धारा की प्रेरक और ऐतिहासिक रचनाए कही जायेगी । ऐतिहासिक और पौराणिक पद्यकथानो में मुकुल की 'कोडमदे' और 'हिरोल' डॉ. मनोहर शर्मा की 'मुजानसिंह शेखावत', 'बाल जो पचावत', मानसिंह झाला, गिरधारी- मिहापाडिहार वो मेघनाद' और 'घडकोट करणीदान बारहठ की 'दोवड़ा पासू' मादि प्रमुख हैं। ऐसी पद्य कथानों में राजस्थान की गौरवमयो सस्कृति को प्रेरणादायी रूप प्रस्तुत करते हुए रणग, शीयं, बलिदान, स्वाभिमान और कर्तव्यनिष्ठा के अनुपम पादरी को प्रस्तुत करना है । पञ्चकथा की यह प्रवृत्ति पौराणिक प्रसंगो के अतिरिक्त प्राधार बनाकर भी प्रकट हुई। राष्ट्रीयता का एक स्वर भारत-चीन और भारत-पाक युद्ध की प्रेरणा से लिखी गई रचनामो में भी दिखाई देता है, जहां कवियों ने साम्प्रदायिकता, मकीर्णता और स्वार्थपरता को त्यागकर मातृममि की रक्षा के लिए मर मिटने को ही परम पतंव्य माना है। एमी रचनाए मरूवाणी', मोलमो', 'सघशक्ति' मादि पत्रिकायो में खूब प्रकाशित हुई है । परमबोर पोर मिह मौर परमवीर शंतानसिंह को तेकर पुटकर रचनामों के अतिरिक्त परम्परागत वीरकाव्य भी लिया गया यथा-पीरू प्रकार' और 'संतान सुजश' (सं सवाईसिंह धमौर ) इनमे मुकुनसिंह, रेवतमिह भाटी, प्रनपदान बारहठ, राबल नरेन्द्रसिंह, उध्यराज उज्ज्वल प्रादि की रचनाएं उल्लेखनीय हैं। ये रचनाए छंदोबद्ध और डिगल भली में लिखी गई है। इस वीर काव्य परम्परा में नारायणसिंह भाटी (परमवीर), उदयराज उज्ज्वल, हनुयन्तसिंह देवड़ा, बनवारी साल सुमन मादि को पुटकर रचनाए भी दोरकाल को दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी लौकिक प्रेमाख्यान जायेंगी।
70 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास वीर काव्य परम्परा के अन्तर्गत कुछ कवियों ने ऐमे चरित्रों को प्रस्तुत किया है जो ऐतिहासिक चरिय होते हुए भी मनुष्य चरित्र का प्रतिनिधित्व करने वाले हैं । नारायणसिह माटी कृत 'दुर्गादास'(1956) मुक्त छद मे रचित राजस्थानी भाषा की पहली सशक्त एवं प्रौढ रचना है। मानवीय भावनानो को साकार रूप देने वाला और मनुष्य को अस्मिता के लिए जको वाला दुर्गादास का चरित्र निःसंदेह महान है । 'दुर्गादास के बहाने कवि ने एक ऐसे मनुष्य को प्रवतरित किया है जो सम्पूर्ण रूप से अपनी मनुष्य सज्ञा को चरितार्थ कर सकता है। कथ्य और शिल्प की दृष्टि से 'दुर्गादास' अनुपम रचना है । परम्परागत वीरकाव्यो में बनवारीलाल सुमन की 'देल्या रो दिवलो' (1963) एक महत्त्वपूर्ण कृति है जिसमें महाराणा प्रताप के प्रेरणादायी चरित्र को मानवीय रूप में रखने की कोशिश की है । शेखावाटी की सरल, सहज मापा और प्रभावशाली अभिव्यक्ति इस कृति की विशिष्टता है । रामेस्वरदयाल श्रीमाली की 'हाडी राणी' (1965) मी मुक्त छंद मे लिखित रचना है जो नारायणमिह भाटी के 'परमवीर' की तरह श्रद्धाजालि काव्य है । हणवन्त सिंह देवडा की 'सा दीवा देसरा' (1967), मुकुनसिंह की 'सेतान सतसई' अमरासिंघ री वेलि (1965), पावजी की बेलि (1964) आदि कृतियां भी यशस्वी चरित नायको का सामयिक सन्दर्भ मे गुणगान है । मु कनसिंह डिंगल दोली के रचनाकार हैं अतः उनकी रचनाए क्लिष्ट एव दुम्ह है। सत्यनारायण अमन द्वारा लिखित 'शीश- दान' (1961) मे जगदेव पवार के त्याग की प्रोजस्वी कथा दो मों में वर्णित है। रघुराजसिंह हाडा की रचना 'हरदोल' (1978) मे बुदेवखण्ड के वीर योद्धा हरदोल का शौर्य और त्याग पाच सों में प्रकट किया गया है। इससे प्रतीत होता है कि उपयुक्तं रचनायो में कवियो ने ऐतिहामिक चरित नायको के त्याग और बलिदान की अमर गाथा को इस रूप में प्रस्तुत किया है जिससे लोगो मे देशप्रेम और राष्ट्रीयता का भाव जागृत हो। चरित्र काव्यों की इम परम्परा मे महात्मा गाधी को ग्रालम्बन बनाकर भी 'गाधी गाया','गाधी शतक' (नाथूमिह महियारिया) 'गांवी प्रकाश (स. वेदप्रकाश), बाप (डॉ. मनोहर शर्मा) और सूर्यमल मिश्रण को प्राधार बनाकर प्रेमजी प्रेम का 'सूरज' (1978) काव्य भी उल्लेखनीय है। सांस्कृतिक चेतना का स्वर राजस्थानी काध्य में बराबर मुनाई देता रहा है तथा सास्कृतिक याती के शाश्वत जीवन मल्यो को नवीन सन्दर्भ मे व्यायायित किया गया है। ऐसे कवियो मे डॉ. मनोहर शर्मा, डा. नारायणसिंह भाटी, मत्यप्रकाश जोशी, गिरधारीसिंह परिहार, महाबीरप्रमाद जोशी, मागीलाल चतुर्वेदी, मुमेरसिंह शेखावत अादि प्रमुख हैं। डॉ. मनोहर शमा राजस्थानी के वरिष्ठ कवि हैं उनको काव्य कृतिको मे गा, गोपीगीत, अंतरजामी, प्रमरजामी, अमरफल प्रादि प्रमुख हैं । इन कृतियों - 1. दुर्गाशम . नारापर्णामह भाटो, भूमिका, पृ. 28 आधुनिक काल 71 में लोकी संस्कृति और प्राध्यात्मिक सरकृति के बीच ऐसा समन्वय स्थापित किया है कि प्रत्येक व्यक्ति उसकी तरफ आकृष्ट हो जाता है । 'गोपीगीत' पौराणिक प्रसग को तो 'अमरफल' और 'अन्तरजामी' रचना उपनिपदो के प्रसग को प्राधार बनाकर लिखी गई है। सत्यप्रकाश जोगी की महत्त्वपूर्ण काव्यकृति 'राधा' (1960) कृष्ण और मे राधा के पौराणिक प्रणय-प्रसंग को नवीन रूप में प्रस्तुत करती है । मुक्तछद लिखी 'राधा' में कथानक की स्थलता न होकर उसके भावमय अतरग के तन्मय क्षणो की सहज प्रेमानुभूति है और यही प्रेम 'राधा' काव्य का मूल स्वर है जिसमें व्यापकता मोर उदादत्ता है । प्रेम की चिर प्रतीक राधा विश्व के समस्त दु.ख ददों एवं पीडा को अपने प्रेम मे समा लेती है । अन्त मे जहां राधा अपने मन के मीत कान्हा को युद्ध से लोट पाने का आग्रह करती है, वहां राधा का युगीन परिप्रेक्ष्य मे युद्ध विरोधी चरित्र उभर कर पाया है । यथा-- मन रा मोत कान्हा रे-- जग में जे मंडग्यो धमसाण, तो भाई पर माई करसो वार आपस में लडसी, मरसी मानखो। चुड़ला फौला फाला प्रोट अमर सुहागण धारी गोपियां । युद्धोन्माद, भय और विनाश के विरुद्ध राधा का स्वर आज की मानवता का स्वर है। सत्यप्रकाश जोशी की दसरी काव्य कृति है 'योल भारमली' (1974), इसमे भारमली के ऐतिहासिक चरित्र को ग्रात्मक यात्मक शैली में प्रस्तुत करते हुए पूर्ण पुग्प को प्राधुनिक अभिव्यक्ति है। मामन्ती ताने वाने से युने समाज की मर्यादानी, के भीतर रहने वाली भारमली के मनोजगत का यथार्थ रूप इम काव्य में उभरा है । प्रेम और सौन्दर्य को सरल अनुभूतियो मे रचित इस काव्य मे पूर्ण पुरुष को गाकार करने वाली नारी से कवि कहता है- भोगण दो थारी देही मिटावरण दो थारो रुप अकाकार कर दो थारी पातमा कर दो मुगत आवागमण सू तुगायो थे देवो जुग नै पूरण पुरुष । सांस्कृतिक चेतना के नये आयामों की प्रस्तुति में डॉ. नारायणसिंह भाटी कृत 'मोरा' (1976) राजस्थानी काय को विशिष्ट उपलब्धि है। ऐतिहामिक चरित्रो को भवतारणा में डा. भारी को मौलिक हटि रही है। मध्यकालीन समाज के मामन्ती 72 - राजस्थानी माहित्य कामात इतिहास परिवेश में बंपी मीरा के अन्त मन को विद्रोह कथा को सम्पूर्ण नारी मुक्ति संघर्ष के सन्दर्भ में डा. भाटी ने सफलता के साथ मभिव्यक्त किया है। अपने संघर्ष के साप जूझने वाली मीरा पुष्प को सहयोगिनो वन फर अपनी पीडित स्थिति के लिए चेतावनी देनी हुई कहती है - थे कोई देयो पर घर में सतियां री साम थारी अरयगी ने सूपियो घेसेजारीन भिता रोई आप नेय जलती जीवण पारें जोड़ थे जग से कोई समर नो हारता। भाव बोध और नये मिल्प को सरिट से 'मीरा' सात कास्य कति है । नारी स्वातन्ध्य जैसी विश्य समस्या के समाधान में मीरा का स्वर युगीन इष्टि से महत्त्वपूर्ण कहा जायेगा। महावीर प्रसाद जोशी ने कृष्ण चरित्र को प्राधार बनाकर विन्द्रायन (1978) 'मथर' (1982). 'सारिका' (1986) पोर 'घरमक्षेत्र, (1988) महाकाव्यों की रचना की है। जोशी ने जन मानस के लोकप्रिय पौराणिक प्रसग को लेकर नये जीवन- सदों के परिप्रेक्ष्य में जीवन्तता प्रदान की है। वैचारिकता, भाव विदग्यता और सरल भाषा की दृष्टि से चारो महाकाव्य कृष्ण काव्य परम्परा में अपना विशिष्ट स्थान रसते हैं । प्राज जहाँ मुक्त छद का प्रचलन है वहा जोशी ने परम्परागत छद विधान को ही अपनाया है। कृष्ण काव्य को इसी परम्परा मे मागीलाल चतुदी का 'कृष्ण चरित्र' भी दो साडी में विभाजित प्रयय काव्य है जिसमें कृष्ण नरिय को नवीन रूप में प्रस्तुत किया गया है । इतिहास और सस्कृति में जुड़ी चेतना की अभिव्यक्ति योमन्तकुमार व्याम के 'रामदूत' (1966), कान्हमहाप के 'मह भयक' (1961), विश्वनाथ शर्मा विमलेग के 'रामकथा' (1968), गिरधारीसिंह पडिहार के 'मानखों' (1964); करणी दान पारहठ के 'शकु तला' (1974) काव्य में भी दिखाई देनी है । 'रामदूत' मे हनुमान के नमे चरित्र को, 'मरू मयक' में रामदेव के जन सेवक स्वर को, 'रामकथा' में राम के बाद रूप को, "मानखो" मे राष्ट्रीय भावना को तथा शकुन्तला' में प्रान के नारी सम्मान को सुरक्षित रखने का भाव प्राधुनिक सन्दर्भ में प्रकट हुआ है । सुमेरसिंह दोखावत का 'मर मंगल' कवि की प्रसर चिंतन दृष्टि से सकलित कविताओं का सकरान है जिसमें उन्होने सास्कृतिक चेतना के विकसित पायाभो को नवीन जीवन मूल्यों के रूप में प्रस्तुत किया है । वाल्मीकि और मैथिलीशरण गुप्त काव्य में जिस मास्कृतिक प्रौदात्य को चित्रित किया गया है उसी परम्परा में सुमेरसिंह बावत को भाव चेतना भो यथार्थ रूप में प्रकट हुई है। के आधुनिक कान : 73 . राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना के अन्य कवियों में नानूगम संस्कर्ता का 'लंकारणधरणो' और 'गोपीचन्द', मत्यनारायण अमन का 'शोगदान' (1961), सूर्यशकर पारीक का 'घरती' (1976), प्रम्ब शर्मा का 'अम्बु रामायण' और 'यीशु हजारा', नागयरसिंह शिवाकर का 'दुर्गादाम सतसई' है । भानसिंह शेखावत का 'हल्दीघाटी', धोकलसिंह चरला का 'मरू महमा, ताऊ शेखावाटी का हम्मीर महाकाव्य', रामसिंह सोलौकी का जन नायक प्रताप (1976) उम्मेदसिंह स्वीदासर का 'महाराणा री प्रोल' (1956) उल्लेखनीय है । राष्ट्रीय चेतना का एक रूप प्राज भी परम्परागत शैली के काव्य में दिखाई देता है । ऐसे कवियों में, मुकुनदान, रावत सारस्वत, प्रायुबानसिंह, गणपतिस्वामी, सवाईसिंह धमोरा अक्षयसिंह रत्नू, लक्ष्मणदान कविया, सुरजसिंह दोखावत प्रादि प्रमुख हैं प्राधुनिक शैली के रचनाकारों मे रघुराजसिंह हाडा, गजानन वर्मा, शक्तिदान कविया, कल्याणमिह गजावत, रामसिंह सोलको, बस्तीमल सोलंकी, भगवतीप्रसाद चौधरी (तुलसी चन्नण), कल्याण गौतम (पीवलावव र भेरू) बद्रीप्रसाद राकेश, बजरंगलाल पारीक हैं। इस धारा के प्रमुख कवियों का परिचय इस प्रकार है - मेघराज मुकुल : माजादी से पूर्व कविता लिखने वालों में मुकुल ऐमे कवि है जिन्होने 'सनाणी' (1944) जैसी प्रोजपूर्ण रचना लिसकर मचीय कवियो में अमृतपर्व सफलता और लोकप्रियता हासिल की। इस कविता ने राजस्थानी कविता की तरफ लाखो थोतानो का ध्यान आकर्षित किया और फिर इसको प्रेरणा से ऐम मार्मिक ऐतिहासिक प्रसगो को लेकर कई पद्य कथाएं लिखी गई। स्वय मुल ने भी ऐमी मवेदना के आधार पर 'कोडमदे' 'प्राण री बात' 'दगावती', 'चवरी' प्रादि रचनाए लिखी। 'सनाणी री जागी जोत' और 'किरत्या' मुकुल को प्रकाशित रचनाओं के संग्रह हैं । प्राजादी के पश्चात् की मुकुल की कविताओं में प्रगतिशीलता का स्वर दिखाई देता है जहाँ वे भ्रष्टाचार और शोषण के विरुद्ध आवाज उठाते हैं । मच को सफलता मुकुल की कवितामों की सीमा बनी, यही कारण है कि वे मफल कवि होते हुए भी साहित्यिक स्तर की रचना नहीं दे पाये। मुकुल की भाषा में प्रोज, प्रवाह और सरलता है। । की प्रात्मा, डॉ. मनोहर शर्मा-इनका जन्म संवत् 197 वि में मुन्झुनू जिले के विमाऊ नगर में हुआ । आप राजस्थानी के प्रतिष्ठित विद्वान्, ममर्थ कवि एव लोकसाहित्य के मर्मज्ञ हैं । आपने राजस्थानी गद्य और पद्य में काफी माहित्य लिखा है। अरावली गोतकथा कूजा, गोपीगीत, अमर फल, अम्त रजामी, पछी, घरती माता, जन जन नायक, प्रारजघारा, अबला, गजमोती, घोरा रो सगीत, फूल पोखही प्रादि काव्य कृतियाँ है । डॉ. शर्मा की काव्य चेतना भी विवियमुखी है, उसमें एक तरफ राष्ट्रीय-सास्कृतिक भावधारा है तो दूसरी तरफ आध्यात्मिक सत्य की सफल मभिव्यक्ति । उनको कई रचनामों में यदलते परिवेश और युग चेतना के प्रति जागरूकता भी है । सास्कृतिक गरिमा, प्रखर चितन, महज-सरल अभिव्यक्ति रमधारा, 1919 74 : राजस्थानी साहित्य का गक्षिप्त इतिहास शिल्पगत विविधता शं शर्मा ने काम को प्रमूस विशेषताएं यही जायेंगी। पापकी रचनामो शेखावाटी बोलीमा प दिखाई देता है। कन्हैयालाल सेठिया-प्रापका जन्म चम् जिले के गुमानगढ़ कस्बे ६. में हुमा । 'रीनारणी' के बाद पातल और पीयल जमी लोकप्रिय रचना से सेठिया को काफी प्रसिद्धि प्राप्त हुई। प्रापको काव्य कृतियों में भीभर, रमणिये रा सोरठा, एक, लीलटास, घर ना घर मजला, मायड रो हेलो, सबद सतवाणी, अपारी काल, हेमाणी और दीठ प्रमुख हैं । सठिया की काव्य चेतना में सास्कृतिक, प्रगतिशील और प्राध्यात्मिक बोध के विविध मायाम है। चिन्तनात्मक दृष्टि, सोक जीवन का प्रभाव और सवेदनात्मक अभिव्यक्ति को गहनता सेटिया के काव्य की विशिष्टताएं मानी जायेगी। सहग, सरल-भाषा पोर जीवन टि के स्पर्श के कारण सेठिया के कविताएं अपनी अलग पहचान रखती है । प्रकृति और ईश्वर सम्बन्धी रचनामो में अन्योक्ति, प्रतीक और बिम्बों का भी सुन्दर प्रयोग हुप्रा है । में नारायण सिंह माटो प्रापका जन्म 1930 ई. में जोधपुर जिले के माल गा गांव मे हुप्रा । डॉ भाटी राजस्थानी भाषा के समर्थ एव श्रेष्ठ कवि हैं । 'पोल', 'साम', 'दुर्गादास', 'जीवन धन', 'परमवीर', 'कलप', 'मीरा', 'बरमा रा डीगोडा डूगर लाघिया', और 'मिनस ने समझारणों दोरो है' भाटी की प्रमुख काव्य कृतियां है। प्रेम और सौन्दर्य की संवेदना पर आधारित भाटो के काव्य में सांस्कृतिक जीवन का प्रौदात्य, वैचारिक दृष्टि की नवीनता और भाव व्यंजना को सूक्ष्मता का जो स्वरूप दिखाई देता है, वैसा राजस्थानी के किमी अन्य कवि मे नहीं। मूलत हमानो स्वभाव के कवि हैं अत यह रूमानियत कभी प्रकृतिक चित्रण (माझ) में तो कभी वियोग ” गार (प्रोस) मे सहज रूप में प्रकट हुई है। 'जीवण धन' फुटकर रचनामों का संग्रह है तो 'कलप' चिन्तनपरक गीतों की गुनगुनाहट का । 'दुर्गादास' भाटी की मशक्त काव्य कृति है जो राजस्थानी काय की गौरव. शाली उपलब्धि मानी जायेगी। जिम मानवीय घरातल पर दुर्गादास जमे चरित्र को विश्व मानव के के रूप मे उजागर किया है उम ऊंचाई तक भाटी की कोई परवर्ती रचना नहीं पहुँची है । सास्कृतिक विराराज को दतमान जीवन मन्दों में पुनर्परीक्षित करके चिन्तन का नया ग्राभाम देना भाटी की प्रपनी विशिष्टता है। 'दुर्गादास' में राजस्थानी का प्रथम मुक्तछेद है । 'मीरा' जैसे काव्य में मध्य पुगीन चरित्र के माध्यम से नारी जीवन की प्रबलतम वेदना का यथार्थ उद्घाटन हुआ है । भाव और भाषा की दृष्टि से भाटी के काव्य प्रौढता और मौलिकता है । अती करपना, प्रतीक, विम्ब-विवान और नवीन उरमान भाटी की काव्य कृतियों की शिल्पगत विशेषताएं है। मृजनात्मक चेतना की गहराई, व्यापकता और चिन्तन की प्रौढता के कारण भाटी की कविता की अपनी अलग पहचान है। भाषा में डिगल शब्दों का यायान्य है। भाटी याधुनिक काल : 75 सत्यप्रकाश जोशी-प्रापका जन्म 22 मार्च, 1920 ई. को जोधपुर में हुमा । पूर्ववर्ती काव्य चेतना के प्रभावस्वरूप जोशी ने 'ढोलामारू' और उजेली जमी पद्य कथाएं लिखी । 'दीवा काप क्यू', 'लस्कर ना थमै', 'राधा', 'बोल भारमली' प्रादि प्रमुख काव्य कृतियाँ है । जोशी मंच के भी मफल कवि हैं । उनकी काव्य यात्रा के भी कई पडाव दिखाई देते है ।' जोशी ने फुटकर गीतों से लेकर 'बोल भारमलो' जैसे खण्ड काव्य की रचना की है। रूमानी रुझान, लोकगीतो को पदावली और चिंतन की सहजता जोशी के काव्य में सफल रूप में अभिव्यक्त हुई है । 'राधा' और 'बोल भारमली' जोशी की दो विशिष्ट काव्य कृतियां हैं जहाँ कवि ने सार्वभौम मानवता के प्रश्न को (राघा) तथा स्त्री-पुरुष के यथार्थ मत्य (बोल भारमली) को संवेदना और चितन के धरातल पर प्रभा रूप में प्रस्तुत किया है। 'मागत-प्रणागत', 'सोन मिरगला', 'साहतिया', 'जोडायत', 'गांगेय' प्रादि जोशी की ऐसी रचनाएं हैं जो प्राज के बदलते परिवेश में मानव-मूल्यों के सार्थक रूप को गहराई के माथ चित्रित करती हैं । जोगो की काव्य यात्रा में भाव और भाषा की विविधता है । लोक जीवन की मरलता, मृदुता और भाषागत गेयता प्रापके काव्य को अपनी विशेपताएँ है। महावीर प्रसाद जोशी-पापका जन्म झझुनू जिले के डूडलोद कस्बे में 1914 ई. में हुआ। पाप संस्कृत, हिन्दी और राजस्थानी भाषा के विद्वान है । मापने स्कृत, हिन्दी और प्रायुर्वेद सम्बन्धी काफी लेख लिखे है। कृष्ण काव्य परम्परा में जोशी के चार महाकाव्य प्रकाशित हुए है -बिन्द्रावन, मथरा, द्वारिका और धरम- म । सांस्कृतिक चेतना को युगानुरल प्रस्तुति, दर्शन की सरलता, सुबोध प्रार प्रसाद गुण सम्पन्न शैली जोगी के काव्य को प्रमुख विशेषताएं है । छमारद रूर में लवे चारों महाकाव्य काय मौन्दर्य की दृष्टि से राजस्थानी काव्य की महत्वपूर्ण उपलब्धि माने जायेगे। सुमेरसिंह शेखापत-प्रापजन्म मीकर जिले के सम्बडी गांव में 1935 ई में हुमा । मुमेरसिंह शेखावत को काव्य वतना में प्रकृति के पहज विवरण से लेकर संस्कृति की गरिमा तक का वैचारिक पक्ष है। कविता के कथ्य और शिल्प में उनकी अपनो निजी प्टि है। 'मेघमाल' पोर 'ममंगल' प्रापको दो काव्य कृतियाँ हैं । "मेघमाल' कनुकाव्य तो 'ममंगल' इतिहास, दर्शन और कला की सफल रचना । माननीय प्रश्नों मोर नयो सवेदना की दृष्टि में 'मममंगल' की रचनाएँ सांस्कृतिक प्रास्थावादी रवर यो लिए हुए है । छंद विधान की कमावट, गन्द चयन का अर्थ-- साम्भीर्य और टपमाली भाषा का अपना मुहावरा बायत की कुछ ऐमो शिपगन विपाएं हैं जो उन्हें दूसरों में प्रसा करती है । भावात्मक और वैचारिक गाभीयं नको रपनामों का साने गुरु है।
76 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास ध्यक्तिवावी गौतिधारा गीत राजस्थानी काव्य की लोकप्रिय विघा रही है। मध्यकाल में भी डिगल गीतो का पठन प्रचलित था तथा चारण कवि प्रोजस्वी स्वर में डिंगल गीतो का पाठ किया करते थे। आजादी के पूर्व जन-जागति के लिए जिन ममाज-सुधारकों और जन-नेताम्रो ने प्रयास किया, वहीं, उन्होने भी जन साधारण मे आजादी प्राप्त करने का माहौल पैदा करने के लिए गीतो का सहारा लिया क्योंकि गेयता गीत का प्राव श्यक तत्त्व है इससे गीत के प्रति सहज ही पाकर्षण पैदा हो जाता है पौर गीत भनेक काठो मे सजने लगता है। वैयक्तिकता, भावात्मकता, स्वाभाविकता और भापा की सरलता कोमलता गीत के प्रमुख तत्व स्वीकार किये गये हैं । आधुनिक राजस्थानी काव्य मे प्रारम्भिक गीत जन-जागृति और उसके पश्चात् पद्य कथा के रूप में प्रचलित हुए । ऐसी पद्य कथाएँ जब मंच पर प्रस्तुत की गई तो उन्हे पाशातीत सफलता प्राप्त हुई और फिर ऐसे गीतो को अलग धारा ही दिख ई देने लगी । मेघराज मुकुल की 'सैनाणी' और कन्हैयालाल सेठिया की 'पातल और पीथल' ऐसी ही प्रारम्भिक प्रेरक पद्य कथाएँ थी। इन दोनो कवितामों ने गीति धारा को नयी दिशा प्रदान की। आजादी से पूर्व क्रान्ति और आजादी के पश्चात प्रगतिशील दृष्टिकोण को अपना कर चलने वाले गीतकारों ने भी इसी गीत विधा को अपनाया। स्वातंत्र्योत्तर काल के गीतकारों ने अपनी संवेदना को लोक जीवन से जोड़ने के कारण लोकगीतों की भाषा शैली को खुले रूप में अपनाने की कोशिश की है। इसका कारण इन गीतकारों का ग्रामीण अचत से जुड़ाव, गाँव की भली-बिसरी स्मृतियों की जुगाली और प्रेम तथा सौन्दर्य का चित्रण कहा जा सकता है। कुछ गीतकार तो लोकगीतो की भाषा शैली से इतने प्रभावित है कि उनके गीतों और लोकगीतो मे कुछ अन्तर नही दिखाई देता। ऐसे गीतो के लिए मंच का सला अामन्यया था और मंच पर ऐम गीत लोकप्रिय हो चुके थे फलत. इम भाव-चेतना पर मबसे अधिक गीत लिरो गए । लोकजीयन की मधुर स्मृतियों मे सने ऐम लोक गीतो का रचना संमार काफी मीमित रहा जिसमें एक ही भाव की कई कवियो द्वारा पुनरावृत्ति होती रही। इसमें कोई मदेह नहीं कि जनमानम तक पहुंचने में तथा राजस्थानी कविता को मय पर स्थापित करने में इन गीतकारो को विशिष्ट 37. लधि मानी जायेगी लेकिन जब मय और चौतामों की मांग पर गीतों की रचना होने लगी तो कई गीतगारों के लिए मच एक सीमा वन गया। गीत मूल रूप में मानी दृष्टि को लिए होता है और वह जीवन के प्रति भावनात्मक दृष्टिकोण को अपना कर चलता है । गीत में कवि अपने निजी सुस-पुरा, यया पीडा प्रादि की अनुमतियों को प्रकट करता है । वैयक्तिक भावनामों में उपल मीन में मन का मानका संघर्ष उजागर होता है। - आधुनिक काल : 1 इसलिए गीत में भावों को तीव्रता और अनुभूति की सच्चाई होती है । राजस्थानी में जो गीत काव्य लिखा गया उसमें प्रेम, गार, प्रकृति चित्रण, माटी को सौंधी गंघ, धरती प्रेम, और प्रगतिवादी स्वर दिखाई देता है । इस दृष्टि से राजस्थानी गीतो मे विषयगत विविधता होते हुए भी संवेदनात्मक सोमितता है । सहग, सरल और सतरंगी अनुभूतियों के मन-मोहक संसार को मोठ-कड़वी स्मृतियो से रचे इन गीतों की दुनियाँ छोटी पोर लुभावनी है। कथ्य पोर भाषबोध की दृष्टि से ये गीत कल्पना पौर भावना से रचिन लोक की अज हैं जिनका सत्य बिजली की कोच की तरह एक धार भाव संवेग को तरंगित कर देता है। राजस्थानी गीतो का एक रूप लोक जीवन से जुड़े लोकगीतों और लोकधनों पर प्राधारित है तो दूसरा प्रापुनिक भावबोध से समन्वित । रचना-प्रकार की दृष्टि से ध्वनि गीत, युगल गीत और सामूहिक गीतो का रूप दिखाई देता है। भाज, राजस्थानी मे नवगीत एवं गजन भी लिखी जा रही है । मोजाधी गीतों को परम्परा के बाद (मुकुल और सेठिया) जिन गीतकारो ने मचीय जगत में लोकप्रियता हासिल की उनमें सत्यप्रकाश जोशी और गजानन वर्मा फे नाम उल्लेखनीय हैं। हमानी मिजाज के गीतकार जोशी की गीत-संवेदना लोक गीतो और लोक कविता की पदावली से जुड़ी हुई है इसलिए लोकगीतों के कई 'मोटिफ' उनके गीतो में अनेक सन्दों में प्रकट हुए हैं तथा कई गीत लोकगीत के प्रभावस्वरूप लोकगीत शैली में ही लिखे हुए हैं ।।. लोकगीतो का यह रूझान उनके दोनो खडकाव्य 'राधा' पार 'बोल भारमली' मे भी दिखाई देता है। 'दीवा का पy" और 'लस्कर थाम्यो नी थमै' जोशी के दो कविता संग्रह हैं जिनमे उनके गीतों की संवेदना प्रेम, परिवार, लोक जीवन और सामयिक सामाजिक चेतना को लिए हुए हैं । जिन गीतों का मूल स्वर प्रेम है उनमे 'मुगधा री माड', 'सोवन माछली', 'सपना रोलरा', 'दलती रात रो गीत', 'प्रोलू' और 'मुलक' गीत हैं । लोक जीवन फे स्वाभाविक की मौकी सीख', 'जामण रो सपनो' इत्यादि गीतो में है तो 'जागरण रो गीत' 'जैमानखा', 'सेतडला ललकार', 'माज गिगन पर लाली छाई' प्रादि गीतों में युगीन भाववोध के अनुहल प्रगतिवादो स्वर है। नि.सदेह जोशी की गीत-यात्रा के कई पड़ाव है लेकिन रोमानी रूझान और लोकगीतों के शिल्प से जाव उनकी प्रमुख काम्प प्रवृत्ति है । उनके 'सोवन माछनी' गीत का एक प्रश पाछो तो बाबड़ थारो झुपड़ी रे मछवा पारी थाली में चानण चौक तड़फा तोडे र सोवन माइलो देखिये-- : 1. हेमाणी : डॉ. तेजमिह जोधा, पृ. (177) कोमल कोठारी का लेख 'कवियों री सतावणी। मारी ववितावा : डॉ हीरालाल माहेश्वरी : रावत सारस्वत, पृ. 13 2.
78 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास लोकगीत और लोकसंगीत में गहरे जड़कर गीत लियने वालो में गजानन वर्मा का प्रमुख नाम है। सुरीला स्वर, लोकगीतो का मिठास और लोकधुनो का मोठा सगीत उनके गीति संसार की मुख्य विशेषताएं है । लगता है वे लोक गीतों में मागे उसी रचना संसार में अपनी संवेदनाम्रो साथ गृजन कर रहे है लेकिन उन्हें लोकगीतो का रचनाकार कहना भून होगी। 'घरती री धुन', 'सोनो निपजे रेत में' और 'यारहमासो' उनके तीन गीत मग्रह है। गजानन वर्मा की गीति संवेदना के विविध पक्ष हैं जहाँ वे ग्रामीण परिवेश, पारिवारिक प्रसगो एवं प्रगतिवादी चेतना को अपने गीतो मे अभिव्यक्त करते हैं । हलदी रो रग सुरंग और 'सस्कार गीत' तो मैवाहिक प्रसगो मे गाये जाने वाले गीतो के लिए इमो भावभूमि पर रचित गीत हैं । इस प्रतीत होता है कि गजाननवर्मा की काव्य-सवेदना लोकगीतो के रचना ससार के पास पाम की है। 'सोवन थाल' कविता की ये पक्तिया देसिए--- पो फाटी जद बोलण लाग्या पोख पखेरू पीपल डाल छोटी छोराणी पोसण बैठी यानर मोठ चिया री दाल बडी जिठाणी जाणे गीगलो बाजण लाग्यो सोवन थाल। ध्वनि गीतो की दृष्टि मे गजानन वर्मा के गीत महत्त्वपूर्ण एव प्रेरक कहै जायेगे । नरोत्तमदास स्वामी के शब्दो में-~-जीरन की अबाध गति और उसकी हर चंचल लहर का मगीत वे अपने गीतो मे उतार पाये हैं। इस दृष्टि से 'सटकनली' और 'घुण रे पिंजारा' ध्वनि गीत सफल एन लोकप्रिय रहे हैं । राजस्थानी गीतो मे किशोरकल्पना कांत के गीतो को एक अलग पहचान है वे आजादी से पूर्व काव्य -सृजन मे लगे हुए निष्ठावान साधक हैं और इस साधना के कारण हो उनके गीतो की सवेदना व्यापक और प्रभावी रूप लिये हुए है। भावात्मक अनुभूतियो के साथ निजी चिंतन की गहनता उनके गीतों की विशिष्टता है, जिसके कारण गीतो मे परिपक्वता दिखाई देती है। राष्ट्रीयता, मातृभूमि प्रेम, आध्यात्मिक चिन्तन का सहज स्पर्श, किशोर कल्पना कात के गीतों में अधिक उभरा है । कल्याणसिंह राजावत के गीतो मे शृगारपरक भाव चेतना की प्रधानता है । लौकिक प्रेम, प्रेम के सयोग एव वियोगजन्य भावो को अनुभूति के धरातल पर सूक्ष्म एव मर्मस्पर्शी चित्रण रहा है । राजावत की संवेदना मूलरूप मे श्रृंगारिक है लेकिन 1. हेमारणी : डॉ. तेजनसिंह जोधा, पृ. 178 (कोमल कोठारी का प्रालेख) 2. मोनी निरन रेत मे गजानन वर्मा (भूमिका), पृ. 16 प्राधुनिक काल : 79 14 खेत-खलियान, ग्रामीण परिवेश, प्रकृति और युग यथार्थ का स्थितियों के अनुभव- बिम्बो से उनके गीतों की दुनियां प्रोतप्रोत है । मस्ती, उमंग और मादकता राजावत के गीतो की अपनी विशेषता है। 'रामतिया मत तोड़' (196) और 'प्रा जमीन प्रापणी' उनके दो गोत संग्रह है ! लक्षमणमिह रसर्वत का प्रकाशित गीत संग्रह 'रसाल' है । रसात की मल- चेतना शृंगार और ग्रामीण परिवर्तन के सहज प्रात्मीय चित्रो से जुड़ी है। रघराजसिंह हाडा हाडौती अंचल के प्रमुस प्रतिष्ठित गीतकार है । अापने . मंचीय और साहित्यक दोनो तरह के गीत लिये है । 'फा केसूला फूल' और 'प्रणयाच्या अासर', गीत संग्रह में शृंगार, मातृभूमि और युगीन समस्याओं से घिरे मानव मन के संघर्ष के गम्भीर गीत हैं। मोहम्मद सदीक के गीतो में युग की प्रसंगतियो के प्रति तोखा प्रायोश और व्यग्य है । 'जूझतीजूण' (1982) उनका कविता संग्रह, है । शृंगारिक चेतना ने प्रारम्भ होने वाले त्रिलोक गोयल के गीतों का रचना-संसार बदलते परिवेश मे माज ९ को स्थितियों को यथार्थ रूप मे प्रस्तुत करने वाला है । सीताराम महपि के गीतो में भाव-गांभीर्य और चिन्तनात्मक दृष्टि है तो मदनगोपाल शर्मा (गौमे कभी गोरडी) के गीतो मे शृंगारिक मादकता। माज के युवा गीतकागे में भागीरसिंह भाग्य विषयगत नवीनंता और शिल्पगत ताज़गी के कारण अपनी अलग पहचान रखते हैं । 'दरद दिसावर' और ' 'गीता पली धूपरी' उनके दो गीत सग्रह है जिनमें लोक जीवन को अछूती सवेदना का यथार्थ चित्रण है। अन्य गीतकारो में नारायणसिंह भाटी, गणेशीलाल व्यास उस्ताद, रेवतदान चारण, सुमनेश जोशी, गिरधारीसिह पडिहार, केशवपथिक, भीमपांउवा, विश्वेश्वर कार्मा, दुर्गादान गौड, प्रोकार पारीक, बशीलाल बेकारी, श्यामसुन्दर भारती, धनजय वर्मा, कान्हदान कल्पित, मम्वू शर्मा, रामगोपाल शर्मा नवल, मुकुट मणिराज, श्रीमती प्राश शर्मा, प्रोम पुरोहित प्रादि प्रमुख है। गीत के साथ गजल का प्रचलन भी राजस्थानी काव्य में दिखाई देता है। गजल लिखने वाले रचनाकारो मे सत्येन जोगी, कुन्दनसिंह सजल, सवाईसिंह शेखावत, भागीरथसिंह भाग्य, प्रेमी प्रेम, श्याममुन्दर भारती इत्यादि प्रमुख है । गीतिधारा के प्रमुख गीतकारों का परिचय इस प्रकार है- किशोर कल्पनाकान्त:--अापका जन्म चूरू जिले के रतनगढ़ कस्वे में 1930 ई. में हुमा । 'मोलमो' जैसी साहित्यिक पत्रिका के सम्पादन में प्रापने राजस्थानी भापा की जो सेवा की, वह ऐतिहासिक महत्व को है । एक वरिष्ठ गीतकार की दृष्टि से किशोर कल्पनाकात के गीत मानव सौन्दर्य के साथ-साथ आध्यात्मिक जीवन . , निमे । यही राजनीतिक चेतना मागे चलकर प्रगतिशील काध्य की प्राधारममि भी 80 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास की चिन्तना भी लिये हुए हैं । 'मानखो हेला मारै' प्रापका पहला प्रकाशित कविता संग्रह है। कुण सो छोटो, फुण सो मोटो, गीत नाद नै बुझे गूगो ऊमो ग्यान मिनख रो सायर कथं, अमझें अनुभव रे परवाण अंक, पण भेद नीत सून्यारा दुख-सुख दोनू जुडवा माई, रलता है उणियारा। मन्त मुी किशोरकरपान्त के गीतों में सौन्दर्य और प्रेम का उन्मुक्त रूप है तो चिन्तन की गहराई भी। कल्याणसिंह राजावत : दिस. 1939 को नागौर जिले के चितावा गांव में जन्में कल्याणसिंह राजावत मंच के लोकप्रिय गीतकारो मे है। प्रेम, सौन्दर्य और नारी देह की मासलता के स्वानुमति विम्बो के कारण राजावत का काव्य लौकिक प्रेम के धरातल पर टिका हुआ है । 'रामतिया मत तोड', और प्रा 'जमीन पापणी' आपके दो कविता संग्रह हैं । 'प्रायोतो हुवैला', 'रूप तिजोरी' 'बेलड़ी' शृगार की दृष्टि से तो 'फूल-फूल रो मोल', 'रामतिया मत तोड़' इत्यादि कविताएं साहित्यिक विचारधारा, की दृष्टि से चर्चित एव महत्त्वपूर्ण रही है । रघुराजसिंह हाडा--प्रापका जन्म 1933 ई. में चमलासा (खानपुर-झालावाड) हुप्रा । हाडौती अचल के वरिष्ठ एवं गभीर गीतकारों में हाडा का स्थान सर्वोच्च है । घूघरा, 'अरण वाच्या प्राबर', 'हरदोल', 'अामल खीव रा' और 'फूल केसूला फल', आपके प्रकाशित कविता संग्रह है। सवेदनशील गीतकार की दृष्टि से हाडा के गीति संसार में विविधता एक तरफ प्रकृत्ति के मनमोहक चित्र है तो दूसरी तरफ प्रेम की रममय निमन्त्रण । मृजन यात्रा के परवर्ती गीतो मे चिन्तन को प्रौढता और युगीन यथार्थ की कड़वी-मीठी अनुभूतिया है। प्रगतिवादी धारा-राजस्थानी काव्य में प्रगतिशील चेतना का उदय अग्रेजो उपनिवेशवाद एव मामन्तो के अत्याचार एव मनाचार के विरोध स्वरूप उत्पन्न हुमा । प्रथम विश्व युद्ध के पश्चात् महात्मा गाधी के प्रयास से स्वाधीनता प्रादोलन में अधिक सक्रियता पाई और पूरे देश में ग्राजादी के लिए सघर्ष प्रारम्भ हुना। इस संघर्ष में राजस्थान के जननेता और ममाज सुधारको ने भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निमाई लेकिन ग्राम जनता दयी हुई होने के कारण विद्रोह नहीं कर सकी । विजयसिंह पथिक, अर्जनलाल मेठी और वैसरीसिंह बारह का परिवार राजस्थान में प्रप्रेजों के खिलाफ माल की शुष्मात करने वाले थे। इनकी प्रेरणा में बाद में जन नेतानों जयनारायण व्यास, माणिकलाल वर्मा, होगलास पास्त्री, प्रादि ने राजनीतिक जागति लाने के लिए जन-जागरण वाले गीत मे के साम्राज्यवाद, अाधुनिक काल : 81 बनी और जन कवि उस्ताद, रे तदान चारण, सुमनेशी जोशी, मनुज देयावत आदि ने काव्यधारा को एक नयी दिशा प्रदान की। इस समय तक विश्व के अन्य राष्ट्रों मे प्रगतिवादी विचारधारा फैलने लग गई थी । प्रगतिवाद का मतलब माक्सवादी दर्शन के परिप्रेक्ष्य में मामाजिक चेतना और भाव बोध को प्रस्तुत करना था । लेकिन राजस्थानी कवियों ने प्रगतिवाद की इस वैचारिक मान्यता से प्रभावित होकर कविताएं नहीं लिखी वैसे परोक्ष रूप में उनके काव्य में शोपण, प्रत्याचार और जुल्म के खिलाफ उग्र प्रतिक्रिया दिखाई देती है । बाजादी के बाद सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में जो पूजीवादी और सामन्ती मनोवृत्तियां उत्पन्न हुई, उनका इन कवियों ने तोय रूप में विरोध किया है । इनकी कविताओं में एक तरफ अन्याय और शोपण के प्रति प्राक्रोश है तो दूमरी तरफ किसान और मजदूर को जागृत करने का भाव । गणेशीलाल व्यास उस्ताद इस प्रगतिशील काव्य धारा के अगुमा कवि है । इन्होंने प्राजादी पूर्व की साम्राज्यवादी और आजादी के बाद की मामन्ती मनोवृत्ति का निर्भीकता के साथ खुलकर विरोध किया है । 'जन कवि उस्ताद' (1972) के नाम से उनकी कविताओं का एक सकलन प्रकाशित हुआ है। सुमनेश जोशी पौर मेघराज मुकुल की कविताप्रो मे भी जोर-जल्म के प्रति तीखा व्यंग्यात्मक स्वर सुनाई देता है । रेवतदान चारण ने अपनी कवितायो के माध्यम में पूजीवाद और सामन्तवाद की डट कर धज्जिया उड़ाई हैं । भाव और शिल्प की दृष्टि मे रेवतदान चारण के काव्य का विशेष महत्त्व है । ग्रामीण परिवेश आजादी के बाद भी शोषण का शिकार बना रहा क्योकि ठाकुर और मेठ की मनोवृत्ति में परिवर्तन नहीं पाया प्रत· कुछ कवियों ने भोली- भाली ग्रामीण जनता के मन मे प्राजादी का भाव पैदा किया और मगदूर तथा किसान का मनोबल ऊंचा किया । गजानन वर्मा, मनुज देथावत, श्रीमन्नकुमार श्यास, भीम पाण्डिया, प्रेमचन्द रावल, त्रिलोक शर्मा आदि ऐसे ही कुछ कवि है । सामाजिक रूढ़ि ग्रस्तता, सही गली मान्यताप्रो और विसंगतियो से मुक्ति पाकर युगानुकूल सामाजिक चेतना के नये स्वर को प्रचारित करने वाले कवियों ने भी अपने प्रगतिशील दृष्टिकोण का परिचय दिया है । ऐसे कवियों में कन्हैयालाल मेठिया, किशोर कल्पनाकांत, कल्याणमिह राजावत, रघुराजसिंह हाडा, सत्य प्रकाश जोशी, हनुवत सिंह देवड़ा, ओंकार पारीक, वेद व्याम, मोहम्मद सदीक, भंवर सिंह सामोर, करणीदान बारहठ, दुर्गादान गौड प्रादि हैं। प्रगतिशीलता का स्वर राजस्थानी को नयी कविता में भी दिखाई देता है जहाँ कवि माज के ग्राम प्रादमी के मवयं का हिस्सेदार बनकर उसे ययार्य रूप में प्रकट करता है लेकिन फिर भी कुछ नये कवियों में प्रगतिवाद की वैचारिक मान्यतामों के प्रति झुकाव रहा है। ऐसे कवियों में डॉ. तेजमिह जोधा, नन्द भारद्वाज, ।'
82 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास बोहरा, पुरुषोत्तम छंगाणी, चन्द्र प्रकाश देवल, श्याम महपि, प्राईदानसिंह भाटी प्रादि प्रमुख है। इस प्रगतिवादी काव्य चेतना के प्रमुख कवि इस प्रकार हैं- गणेशीलाल च्याम उस्ताद-माम्यवादी विचारधारा के समर्थक गणेगीलाल प्यास 'उस्ताद' का जन्म जोधपुर में 1904 ई. में हुमा । ये फ्रान्तिकारी थे और प्रागादी से पूर्व कई बार जेल भी गये । 'जन कवि उस्ताद' नाम में इनकी कविताम्रो का गग्रह प्रकाशित हुआ है । उस्ताद ने नृत्य गीत रूपक गीत नृत्य प्रादि की रचना भी की है। हिन्दी, उर्दू एव अग्रेजी भाषा को उस्ताद को अच्छी जानकारी थी । जन- नायक जयनागपरण व्याम के साथ जन-आन्दोलनो मे भाग लने वाले लोगों में उस्ताद का स्वर सबमे ग्रागे था इसलिए इन्हें जन कवि का सम्मान भी दिया गया। उस्ताद की मृजनात्मक सवेदना के कई स्तर दिखाई देते हैं। उनकी कविता रबोधनात्मक, राजनीतिक गैनना और सामाजिक जन-जागरण को समेटे हुए हैं इमलिए उनकी कविता मे जागृति, विद्रोह और व्यग्य की तीखी तुमन है । पूजीवादी और सामन्ती व्यवस्था को पलटने के लिए उस्ताद लोगो को उद्बोधित करते हुए कहते है- थे गिणती में घणा मायला, हा सूपडरपो गिणती रा तिणखा है चुगलो, बाढेती ले झड़पो थे धरो धमक नै घोल सायो, फर दो बीटा गोल बंदा मैनत री जै बोल इसी तरह 'जाग रण वका सिपाही', 'माया देखा पडसी मुलक न मोट्यारा', 'परण्या उरै मती' आदि कवितायो मे उद्बोधन का स्वर है । जिस त्याग और बलिदान के वाद अाजादी प्राप्त हुई और उसके पश्चात् उस्तार ने जब राजनीतिक जीवन में व्याप्त भ्रष्टाचार, शोषण एव अन्याय को देखा तो उन्हे वडा दुख हुग्रा- लोग कयं सूरज पो. पण फट गयो परकास । हाय-हाय नै सावण दोडे, किण री राख आस । मुलक री आ कैड़ी आजादी पूत पितर में मच्यो छिनालो ध्याह दिस वरबादी। उस्ताद मुह फट थे । वे जो महसूस करते थे उसे तोसे स्वर में प्रकट भी करते थे- मूल करी जननायक मारी, घरै गधेड़ा केसर क्यारी। निःसदेह उस्ताद की कविता के पीछे एक विचारधारा थी वे सर्वहारा वर्ग के समर्थक एव जुझारू व्यक्तित्व के धनी थे । आधुनिक राजस्थानी काव्य मे उस्ताद की कविता का स्वर सबसे अलग है । रक्तदान कारण-आपका जन्म जोधपुर जिले के मयाणिया गाँव में 1924 ई. में हुमा । रेवतदान का काव्य प्रगतिवादी जन-चेतना की दृष्टि से विशिष्ट है । उस्ताद - किमान गजानन के गीतों में नयी नवेदना के माथ है। पने पनि गीतों के माध्यम प्राधुनिक काल : 83 का स्वर जन-जागरण में गूजा तो रेवतदान का स्वर कवि-सम्मेलनों में । अापने मत्रीय कवियों में काफी लोकप्रिया प्राप्त की। 'चेत मानखो' आपका प्रकाशित कविता-मगह है । रेखतदान की कविता में एक तरफ सामन्ती एवं पूजीवादी व्यवस्था पर तीखा व्यग्य है तो दूसरी तरफ मजदूर एवं किमान को जागृत करने का प्रोजस्वी स्वर । आजादी से पूर्व की कवितागो में किसान विद्रोह की झलक है । इंकलाब की आँधी, चेत मानखा, माटो थनै बोलणी पडमी, इत्यादि रेवतदान को चचित रचनाएं हैं। किसान को उद्बोधित करते कवि कहता है- मांग्या घेत मिल नी करसा मोल चुकाणो पड़सी मोत्यां मूगी इन घरतो रो, कोल निमाणो पड़सी सामी छाती जे कोई आयो, जोर जताणो पड़सो खेत खतां हल जे रोक्यो, हाथ कटाणो पड़सी लोई बिना रंग नी आव धरती पड़गी धोली फितरा दिन तक सबर करता, माटो हसने बोलो रे बदा चेत मानखा चेत, जमानो चेतण रो आयो। रेवतदान को भाषा में प्रोज, वेग और पना व्यंग्य है । 1-अापका जन्म चूरू जिले के रतनगढ़ कस्बे में 1927 में हुप्रा । गजानन राजस्थानी के लोकप्रिय गीतकार हैं जिन्होने कवि-सम्मेलनो में अपने गीतों के कारण खूब ख्याति प्राप्त की है। परती री धुन', 'मोनो निपजे रस में बारहमामा' आदि प्रापके कविता मग्रह है। लोकगीतो को सवेदना और लोकसंगीत के प्रभाव के कारण गजानन वर्मा के गीतो का विशिष्ट भावपंण रहा है। ग्राम्य जीवन के मनमोहक प्रसगो को अवतारणा में ही गजानन ने अपने प्रगतिवादी म्बर का परिचय भी दिया है लेकिन अपने स्वर को वे अन्त तक ममर्थन नहीं दे पाये हैं । जनयी काव्य चेतना के कई पहा है लेकिन मूल रूप में वे लोक जीवन की मस्ती पौर मगहाली ये गीतकार हैं। 'हाली हलकारो दे' 'धरती अब परावाडो फेरे', पुरब में गाल गूरज उग प्रायो, भाड्यो सेन रूपाले इत्यादि प्रगनियादी ना की कविताएं । गत पौर में उन्होने मेहनत-मजदूरी से पेट भरने या महाग वर्म का प्रभागे पित मनुम देपावत-प्रगतियाने घेतना में मार रियो में मनुः मापन या उल्लरानीप नाम है । देवापत का प्रत्यायु में ही निन्न हो गया था धमलिए उनरी मरविताएँ हो काम में पाई है लेकिन फिर भी उपनाम रयनामो में मो. को पसग पहपान नगर पाती है- गजानन धर्मा- पिया है।
84 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास 7ठ खोल उणीदी आवडल्या, नरणारी मीठी नौद तोड़ रै रात नहीं अब दिन उगियो, सुपना रो झटो मोह छोड़ थारी आंख्या में राच रंया, जजाल सुहाणी राता रा तू कोट पणावं उण जनोडे, जुग रो चोदी माता रा प्रकृति चित्रण---प्राजादी से पूर्व भी प्रकृति का चित्रण राजस्थानी काव्य में बराबर होता रहा है । प्रायः कवियों ने उद्दीपन रूप में ही प्रकृति का चित्रण किया है । 'वसन्त विलास' पालम्बन रुप में प्रकृति चित्रण की दृष्टि से राजस्थानी की प्रथम कृति मानी गई है। 'वेलि किसन रुकमणि री' और 'ढोला मारू रा दूहा' में प्रकृत्ति उद्दीपम रूप मे ही गृहीत हुई है, मे दो चार स्थल ऐसे भी मिलते है जही प्रकृति का पालम्बन रूप भी दिखाई देता है। प्रकृति का विशुद्ध घिषण हिन्दी की सरह राजस्थानी में भी आधुनिक युग की देन ही कहा जायेगा। इस दृष्टि से पद्रसिंह की 'बादली' (1933) स्वतन्त्र प्रकृति-चित्रण की प्रथम महत्वपूर्ण कृति है । रेतीले सूखे राजस्थान में वर्षा का अपना पाकर्षण एक विशिष्ट महत्व है, ऐमी स्थिति में किम प्रकार 'बादली' को देखकर जन-मानस में प्रानन्द और उत्साह को हिलोरे उठने लगती है, इसका स्वाभाविक एव मनमोह के चित्र प्रस्तुत कृति में प्रकट किया गया है । विषयगत नवीनता, चित्रात्मकता और लोक जीवन सापेक्ष वर्णन 'बादली' काम की अपनी विशेषताएं है । यही कारण है कि हिन्दी और राजस्थानी के सभी विद्वानो ने 'बादली' की भूरि-भूरि प्रशसा की। चन्द्रसिंह की दूसरी कृति 'ल' में भी प्रकृति का विशुद्ध चित्रण है । ग्रीष्म ऋतु की प्रच०डता और सब कुछ जल कर खाक कर देने वाली भयकर लू रेतील रेगिस्तान के संघर्ष को कठोर तपस्या है। काव ने लू को अाधार बनाकर मानवीय भावनामों का सुन्दर वित्रण किया है । पारम्परिक छ, प्रसाद गुण युक्त शैली और सहन अभिव्यक्ति के कारण लू राजस्थानी प्रकृति काव्य में मौलिक कृति मानी जायेगी। चाहि के कृति-काव्य को इस शुरूपात से कई कार प्रभावित हुए और रास्थान में विशुद्ध प्रकृति चित्रण की परम्परा आराम नानूराम साता ने 'कलायण' (1949) और 'दसदेव' (1955) प्रति फाट्य लिखे । उनको अन्य काव्य कृति 'छqय सतमई' (1972) मे भी 'प्रारती सइकडो' नाम से प्रकृति-चित्रण के सौ छा रखे गये है। यादगी' की परम्परा में ही लायरा' लिखी गई जिसमे वषा ऋतु के साथ ग्रीष्म, पारद एक बसन्त ऋतु का विगण भी किया है। 'दस देव' में, प्रकृति के दस उपादानो (नीम, रोजडा, फोग मादि) का चित्रण किया गया है। 'प्रकरतो साझे' में प्राकृतिक व्यापारी को मानवीय भावनाप्रो के साथ जोड़कर प्रमिध्यरत किया गया है। * मनोहर शर्मा के काव्य में भी प्रकृति का यथास्थान वित्रण दिखाई देना है। 'राक्ली वी मरमा', प्रमरफ दि सकलनों में उनकी 'उपा', 'वनदेवी', Tren'दि रचनाएं प्रकृति में सम्पत्ति है । गजमोती' रखना तो प्रकृति काय सुदर उदाहरण है। - प्राधुनिक काल : 85 - नारायणसिंह भाटी की 'सांझ' (1954) प्रकृति काव्य की सक्त काव्य कृति है । मरू प्रदेश के एक गांव की सांझ को कवि साधारणीकरण द्वारा सार्वभौम धनाने में सफल हुआ है । सान्ध्यकालीन ग्राम्य परिवेश के सूक्ष्म एमं मामिनः चित्रों के कारण मांझ का अपना वैशिष्ट्य है । यावादी सवेदना, विम्ब विधान और भाषा की चित्रोपमता भाटी के काव्य की अपनी विशेषताएं रही हैं । 'सांझ' इमी भावबोध की रमना होने के कारण 'बादली' की परम्परा में एक अनुपम काप कृति है । भाटी की अन्य कवितानो में भी प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण उपलब्ध होता है । सुमेरसिंह दोसावत की 'मेधमाल' (1964) ऋतु-वर्णन की परम्परा में सरम एवं सजीव रचना है । वर्षा ऋतु के सौन्दर्य और जन-जीवन की आकांक्षाओं का प्रभावशाली चित्ररा इस काल में है। पारम्परिक छद में 'वयण सगाई' का प्रयोग सुन्दर हुअा है। उदयवीर शर्मा की 'डाफी' (1973) और 'सूटो' (1980) प्रकृति काव्य की दो सुन्दर रचनाएं हैं । 'हाफी' मे शरद ऋतु मे चलने वाली शीत लहर का और 'मंटो' मे तेज हवा के साथ पाने वाली वर्षा का मार्मिक चित्रण है। 'सूटो' को प्रतीकात्मा के कारण काम्य-सवेदना मे गहराई दिखाई देती है। कल्याणसिंह राजावत की 'परभाती' (1979) प्रात.कालीन दृश्यों की मनोरम झांकी प्रस्तुत करने वाली मरम रचना है । 'परभाती' अर्नुपम सौन्दर्य वाली नायिका भी है तो प्रतीक रूप में जीवन को जागृति और शक्ति भो । 'परमाती' का मानवीय- करण कई स्थलों पर लुभावना है। राजावत की अन्य कई रचनाएं भी प्रकृति से सम्बन्धित है। प्रकृति को पालम्बन एवं उद्दीपन रूप में चित्रित करने वाले अन्य कवियो में कन्हैयालाल मेठिया डॉ मनोहर शर्मा, गजानन वर्मा, मनोहर प्रभाकर, किशोर कल्पनाकान्त, सुमनेश जोशी, स्खेतदान चारण सत्य प्रकाश जोशी, गिलोक गोयल, महावीर प्रसाद लोशी प्रादि है जिन्होंने रचनायो मे प्रकृति को विभिन्न रूपो में चित्रित किया है । सेठिया ने प्रकृति के माध्यम से जहाँ मनुष्य को प्रेरणाएं दी है वही मौजूदा मानवीय समस्याम्रो का समाधान भी प्रकृति के माध्यम से किया है । 'मीझर', 'लीलटांस' प्रादि संग्रहो की कविताओं में प्रकृति के सुन्दर रूप के साथ-माथ विचार और मानवीय भावना का भी सुन्दर चित्रण किया गया है। डॉ, मनोहर शर्मा को प्रकृति सम्बन्धी रचनाओं में भारतीय दर्शन और रहस्यानुभति की भलक भी मिलतो है। प्रकृति का सहज और सरल चित्रण डॉ. मनोहर शर्मा की अपनी विशेषता है। प्रकृति का प्रतीकात्मक रूप में विवरण भी कई कवियों ने किया है। इस दृष्टि से कन्हैयालाल सेटिया को कुछ रचनाएँ महत्वपूर्ण है । 'लोलटाम' और 'घर मजला घर कूचा' में अधिकांश रचनाएं जीवन की समस्याओ और आध्यात्मिकता को प्रतीक रूप में विश्लेपित करती हैं । इसी प्रकार रक्तदान चारण (इंकलाब री 86 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास प्रांबी), मेघराज मुकुल (टाफर, छिया-तावड़ो प्रादि), गजानन, वर्मा (रोहिड़ो, लाल मूरज प्रादि), उदयवीर शर्मा (मू टो), कल्याणसिंह राजावत (फूल-फूल रो मोल) प्रादि कवियों की रचनानो में भी प्रतीकात्मकता है। गजानन वर्मा ने 'वारहमासा' में बारह महीनो में बदलते हुए प्रकृति रूप की सुन्दर झांकी प्रस्तुत की है। 'बारहमासा' यो पारम्परिक रचना मे लोक जीवन के मधुर भावो एव परिवेशगत प्रकृति का सगीतात्मक रूप छिपा हुआ है। आधुनिक जीवन की जटिलतम मवेदनाप्रो को प्रकट करने के लिए न्ये कवि ने भी प्रकृति का सहारा लिया है लेकिन यहां कवि का प्रकृति के प्रति नवीन दृष्टिकोण दिसाई देता है। सौन्दर्य बोध के पग्विनित मापदण्डो के कारण नयी कविता में प्रकृति का सश्लिष्ट प कवि की मन स्थितियों और प्राज की मवेदना को सही स्प मे प्रकट करता है। यहां न तो प्रकृति के प्रति भावनात्मक दृष्टिकोण है और न किसी प्रकार का भावात्मक ग्रारोपण । मरिण मधुकर, नन्द भारद्वाज, गोरधनसिंह शेखावत, प्रोकार पारीक चन्द्र प्रकाश देवल ग्रादि की रचनामो में प्रकति का नवीन झप दिखाई देता है जिसमे युग वोय को नये प्रतीको एवं नये बिम्बो के माध्यम से व्यजित किया है। प्रकृति काव्य के प्रमुख कवियो का परिचय इस प्रकार है- चन्द्रसिह ह-प्रापका जन्म विरकाली (गगानगर) मे श्रावण शुक्ला पूणिमा सवत् 1969 में हुग्रा। प्रारम्भ से ही प्रापकी रुचि परम्परागत साहित्य के अध्ययन की रही है । राजस्थान को प्रकृति से गहरा लगाव होने के कारण प्रापने 'बादली' जैमी महत्त्वपूर्ण काव्य कृति राजस्थानी साहित्य को दी। इस रचना का ऐतिहासिक महत्त्व है क्योकि यही से आधुनिक राजस्थानी कविता का एक नया परिदृश्य प्रारम्भ होता है । 'ल' आपकी दूसरी प्रकृति काव्य की विशिष्ट रचना है। अन्य रचनाप्रो मे माझ वाल जैरी कोर, बलमार ग्रादि उल्लेखनीय हैं। 'बादली' मे काव्य में प्रकृति के बदलते रूप के साथ मानवीय भावनामो का सुन्दर अकन किया है-- पहरं वदलं बादली बदल पहर यदलाय । सूरज साजन नै सदी, आसी कुण सो दाय ॥ 'बादली' राजस्थानी जीवन में सुख का सनार करने वाली है इसलिए ग्रीष्म ऋतु से तपी मरू घरा 'वदली' की प्रतीक्षा करती हुई मनुहार करती है- आयो घणो अडोकता, माघर फोड करें । पान न स सूफिया कांई भेंट पर। सोने सूरज अगियो, दौठो बादलियां । मरुधर लेवे वारणा, मर-मर आंखड़ियां ।। राजस्थानी लोक जीवन के विविध रूप, मुन्दर करपना, प्रसादमय भाषा और कतिक व्यापारो का सूक्ष्म अकन बादली को विशेषताएं कही जा सकती हैं। T मानिक काल : 87 - इमी भौति 'लू' काव्य में भी चन्द्रपिह ने ग्रीष्म ऋतु चलने वाली लूगों को प्रचण्डला को संस्लिष्ट रूप में चिक्ति किया है । तप्त लुत्रों का वर्णन करता हुप्रा रवि कहता है--- परा गगन शल गले, लद लद लूमा आय । घप-चप लागे घरड़का, जोय छिपालो भाय ।। जीव तिसाया जापता, जोड़ा हुया अधीर । डाल-दाल हिवड़ो यो, चाली चीरा चीर ।। इस प्रकार चन्द्रसिंह के काव्य में प्रकृति का विशुद्ध चित्रण दिखाई देता है। 'लू' के माध्यम से राजस्थान की मांस्कृतिक श्रेष्ठता का उद्घाटन भी कई दाहो में सुन्दर बन पड़ा है । कुछ दोहो में वयरण सगाई का प्रयोग रसमयता को बढ़ाने वाला, प्रतीत होता है। उदययोर शर्मा-मापका जन्म बिसाऊ (झन्मुनू) में कार्तिक शुक्ला 14 संवत 1988 में हुमा । माप में प्रारम्भ से साहित्य के प्रति रूझान था, यही कारण है कि मापने राजस्थानी भापा में कहानी, कविता, एकांकी, लघु कथा आदि लिखी । प्रापकी प्रमुख काव्य कृतियों में फिर भी राज सुरजां (1964), एमना कवार (1965), हॉफी (1973), सूटो (1980) आदि प्रमुख हैं । इनमे 'डांफो' और 'मूटी' इनके दो प्रकृति काव्य है। 'सूटो' काव्य में कवि ने जहां प्राकृतिक स्थितियों का सुन्दर और आकर्षक चित्रण किया है, यही 'सूटो' प्रान्ति का प्रतीक भी मान लिया गया है । इस दृष्टि से इस काव्य में सामाजिक विषमता, वर्ग संघर्ष और विद्रोही भावना को भी प्रभावी ढग से चित्रित किया है। गरीबी का चित्रण करता हुमा कधि कहता है : सून पसीनो कर दिन तोई, ल्याणो-पाणो नित रो काम । वो दूदा मे पy सिर फोड़े, दया दिखा ययूं तो मन थाम ।। रोटी पोता मठ न जाये, खायण देता नै २ दाल । करम घांवदा देल गरोयो, मणी रोटियां गैरे काल । उदयवीर शर्मा के काष्य में प्रकृति वा सश्लिष्ट रूप, सावाटी की भाषागत सहजता, मोजस्विता और अभिव्यक्ति की प्रसरता दिखाई देती है। मान्दयालाल सेठिया, नारायणमिह भाटी, सुमेरसिंह दोसावत का परिचय प्राप काव्य-प्रवृत्ति के मन्दर्भ में पौधे दिया जा चुका है। हास्य-याय कविता: भाधुनिक राजस्थानी याव्य में हास्य-व्यंग्य की रचनाएं भी उपलब्ध होती हैं। हास्य भौर ध्यंग्य दोनों परस्पर जुड़े हुए हैं और करिता में इनका मतुलन भावमा है। मगर वोई रचना विशुद्ध हाम्प को होगी दो यह केवल मनोरजन करेगी । लेकिन हास्य के साथ यग्य होने से कविता पनी प्रौर मर्म पर नपा प्रहार 88 : राजस्थानी माहत्य का संक्षिप्त इतिहास : करने वाली होगी। आधुनिक काल में सुधारवादी आन्दोलन के फलस्वरूप सामाजिक कुरीतियों और बुराइयोको लेकर तीखी हास्य-व्यंग्य कविताएं लिखी गई। ऐसे कवियों अमरदान लालरा का नाम अपणो है। लालम की सभी कवितामों का स्वर व्यायात्मक है । 'दारू रा दोम', 'तमाख की ताड़ना', 'ममल रा मोगरण', 'सोटे संता रो खुलामो' प्रादि कुछ कवितार हैं जिनमें यामाजिक बुराइयों पर तीसा प्रहार है । लालस की कविताएं सरल होते हुए भी उनको जागरूकता का परिचय देती हैं। पाजादी से पूर्व साम्राज्यवाद, आथिक शोपण, मत्याचार प्रादि के खिलाफ राजनीतिक चेतना जागृत हो गई थी फलत: तत्कालीन मावियों ने प्रग्रेजों के विरुद्ध जन प्रादोलन छेडने के लिए जो कविताएं लिखी उनमे माक्रोश अधिक और व्यग्य कम है। आजादी मिलने पर सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में साम्प्रदायिकता, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी प्रादि स्थितियों ने एक बारगी प्राजादी से मोह-मंग की स्थिति पैदा कर दी जिसको प्राधार बनाकर गणेशीलाल व्यास उस्ताद, मनुज देपावत, रेवतदान चारण, गजानन वर्मा ग्रादि ने व्यग्य कविताएँ लिखी। गणेशीलाल व्यास उस्ताद की कवितानों में राजनीतिक स्थितियों के प्रति तीसा आक्रोश और गहरा व्यंग्य है । 'म्हें प्राया प्रकल बताया नै', 'उस्तादारी भारत फिरे', 'अाजादी से उतारो', 'नेताबारी निगरमाई', 'भस्टरा 'मूल, करी जन नायक भारी', प्रादि कवितामों में उनाद ने मोजदा स्थितियों पर तीखा प्रहार किया है । प्रगतिशील विचारो के पोपक उस्ताद ने प्राने काव्य में सामाजिक पाखंडों और धार्मिक अधविश्वासो का खुला चित्रण किया है । सामाजिक यसगतियो का यथार्थ रूप उस्ताद की इन पक्तियों में कितना तोया है... मूड मिनस पिता ने हाक, फतवन्ता ने मोड । कला खेत में नितंग चरै है, रुखाला रा सांड ।। इसी प्रकार गजानन वर्मा, रेवदान चारण प्रादि कवियों ने भी पूजीवादी मनोवृत्ति और शोषण के खिलाफ तीखा व्याय किया है। राजस्थानी कविता में हास्य के साथ व्यंग्य की स्थिति कवि-सम्मेलनों को व्यंग्य के कारण पैदा हुई और कुछ कवियों ने मय को ध्यान में रखकर हास्य व्यंग्य कविताएं लिपी, ऐसे कवियो में विश्वनाथ शर्मा विमलेश, वुद्धिप्रकाश पारीक, नागराज शर्मा, अनाराम सुदामा, भंवरलाल सोनी, मुरली मापुरी, ताऊ दोखावाटी, सत्यनारायण अमन ग्रादि प्रमुख है। इन कवियों ने समसामयिक जीवन, सामाजिक प्रमगलियो और राजनीतिक स्थितियों पर तीसा व्यंग्य किया है। नेता, सता, परिवार नियोजन, महंगाई बेरोजगारी, समाजवाद, अकाल आदि बुछ ऐसे सामान्य विषय हैं जिनके बारे में प्राय. मभी कवियों ने ध्यंग्यात्मक कविताएं लिखी हैं। विश्वनाथ शर्मा विमलेश हास्य-व्यय कवियों में मर्वोपरि हैं। इन्होंने प्रमुख Fप मे सामाजिक और राजनीतिक विषयों को हास्य-अंग्य का प्राधार बनाया है। .
माधुनिक काल : 89 'विरमा जी को बार', 'नई साल को नयो कलेण्डर', 'वीनणी उघाड़े मूडे पाई', 'इन्टरव्यू', 'चुणाव भासण', 'रासन की दुकान पर', 'परीक्षा', 'गुजरात को दोरो चडवाजो ने', 'भासण पर भासण', 'बीस सूत्री भासण', 'परिवार नियोजन', 'अापरेशान' और 'वैडबाजो मादि विमलेश की कुछ चचित कविताएं हैं जिनमें बढ़ती हुई मावादी, फैशन, परिवार नियोजन और सामाजिक तथा राजनीतिक स्थितियों पर सफल व्यग्य है । कविता का प्रस्तुतिकरण और शब्द चयन इतना प्रभावी है कि हास्य स्वत: पैदा हो जाता है । घुद्धिप्रकाश पारीक की कविताओं में भ्रष्टाचार, अनाचार और सामाजिक विषमतामों पर तीखा व्यग्य है। 'मैं गयो देव इन्दर के घर', 'मै गयो सुरग में एक वार', 'म्हें गया देखबा दीवाली', 'म्है चड्यो निकासी की घोड़ी' प्रादि पारीक की चचित हास्य व्यंग्य कविताए हैं जिनमें निम्न-मध्यमवर्गीय समाज की कुरीतियो पर गहरी चुटकी ली है। हास्य-व्यंग्य कवियों में सत्यनारायण अमन का विशिष्ट स्थान है । 'चठिया' इनकी हास्य-ध्यंग्य कवितामो का संग्रह है। अमन ने मुख्य रूप से राजनीतिक स्थितियों पर गहरा ध्यंग्य किया है । 'धे मत प्राया', 'रामराज', 'कई होसी' आदि चचित रचनाएं हैं । अमन में स्पष्टता एव तीलापन है । नाजराज शर्मा रोजमर्रा की जिंदगी में घटित होने वाली प्रसगतियो और समस्यामों पर तीसा व्यंग्य करते हैं । 'यारो के ल्या हा' (1974) कविता मग्रह में 'मन्नं टिकट दिवा रे राम', 'राज लुगाया रो', 'नेताजी और भासण', गरीबी हट ज्यागी' इत्यादि कविताएं बाज की सामाजिक एव राजनीतिक समस्यानो की प्रसगति से जुड़ी हुई हैं। राम चयन के माध्यम से हास्य व्यंग्य को गहरी स्थिति पैदा करने वालों में मोहन माधुरी को पानी अलग पहचान है। 'दड़ाछः' मग्रह की रचनामों में सामा- जिक विषमता और माधुनिक जीवन को कृत्रिमता पर तीखा व्यग्य है। प्रनाराम सुदामा के 'पिरोल में कुत्ती व्याई' कविता संग्रह में वैयक्तिक स्वार्थपरता, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार मादि पर व्यंग्य है । हास्य-व्यंग्य कवितामों का शिल्प तुकान्त एवं अनुकान्त दोनों रूपों में दिखाई देता है । इपर य्यम्य कवितामों में 'पैरोडो', 'हायला' (तुक्तक) प्रादि का प्रयोग भी हुभा है । मुरलीपर व्याम, युद्धिप्रकार प्रादि ने पैरोडी लिखी तो मोहन प्रालाके ने सला' के माध्यम से व्यंग्य के नये शिल का प्रयोग राजस्थानी कविता में दिया। सन् 60 के बाद राजस्थानी को नयो कविता में भी व्यंग्य प्रवृत्ति का प्राधान्य रहा है तथा नये कवियों ने मौजूदा जीवन को विमगतियो, मूल्यहीनता, निरागा, मनास्या, कुठा प्रादि पर तीसा व्यंग्य किया है। इन करियो में मणि मधुकर, 90 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास तेजसिंह जोधा गोरधननिह शेखावत, नंद भारद्वाज, पारस प्रारोड़ा, कृष्ण गोपाल शर्मा, प्रेमजी प्रेम प्रादि प्रमुख है । प्राजादी के बाद पाये यदलाव को तीसे व्यंग्य के रूप में अकित करने वाली तेजसिंह जोधा की कविता 'ईगाव मे कई की हैगो' ससक्त रचना है। प्रमुख हास्यव्यग्य कवियों का परिचय इस प्रकार है- वियनाय शर्मा यिमलेश-प्रापका जन्म 5 अप्रैल 1927 को मुन्मन में हुप्रा । अापने हिन्दी एव राजस्थानी भाषा मे कविताएं लिखीं। हिन्दी में कविता, गीत और प्रबघ काव्य लिखा तो राजस्थानी में रामकथा लिखी। विमलेश को हास्य. ध्यंग्य कवितामो मे 'सतपकवानी', 'छेडखानी', 'कुचरनी', 'टसकोली', 'नौरस में हास्य रस', 'लोकप्रिय जनता दरबार' और 'खरी मसखरी' संग्रह प्रकाशित हुए है। विमलेश मूल रूप में लोकप्रिय मचीय कवि है इसलिए उनकी कविता में कही विशुद्ध हास्य है तो कही पैना व्यग्य । ठेठ शेखावाटी की सरल भाषा, ध्यंग्यपूर्ण शब्द चयन और विषयगत विविधता विमलेश की काव्यगत विशिष्टता मानी जा सकती है राजस्थानी भापा को मच पर लोकप्रिय बनाने में विमलेश का योगदान महत्वपूर्ण यहा जायेगा। युद्धिप्रकाश पारीक-आपका जन्म 31 दिसम्बर 1922 को जयपुर में हुअा। राजस्थानी हास्य कवियो में वृद्धि प्रकाश का अपना प्रतग स्थान है। के ढाड़ी भाषा के तहगे मे प्रस्तुत प्रापकी रचनाओं में निम्न, मध्यमवर्गीय समाज की गरीबी, अनैतिकता, कृत्रिमता, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी ग्रादि पर तीखा व्यंग्य है बडका (106), चूटक्या (1964), तिरमा (1961), 'फलदार', 'इन्दर न इन्टरव्यू' आदि प्रापकी हास्य-व्यंग्यात्मक कविता सयह हैं । अन्य व्यग्य कवियो मे पन्नालाल मुमन, करणीदान बारहठ, बिलोर गोयन, भंवर वैरागी, सम्पतमिह, भगवतीयमाद चौधरी, (मुरण स्याणी), हरफूलसिंह रसिक आदि दिखाई देते है। मयी कविता परम्परागत राजस्थानी कविता में मन् 1980 के बाद कथ्य मौर शिला की दृष्टि से परिवर्तन उपस्थित हुप्रा । इस परिवर्तन के पीछे युग की बदलती संवेदना और परिस्थितियों का गहरा दयाव या। सन् साठ के बाद राजनीतिक स्तर पर घन्टाचार, भाई-भतीजावाद, गुटबदी, नौकरशाही, प्रानीयता की भावना थी तो मामाजिक क्षेत्र में गरीबी, बेरोजगारी, टूटते मूल्य, खिरत मानवीय सम्यन्य अगमता और भटकाव की स्थिति थी। इन स्थिर, प्रसतुलन पोर निराशा से परिपूर्ण स्थितियों ने प्रगतोष को जन्म दिया, जिसके कारण व्यवस्था के प्रति प्रा का भाव पैदा प्रा इसलिए मन् माठ में याद की पगियों ने युवा रगना गरों को प्रभाविन प्रिया जिम कारण उनकी संशा पर शिय-विधान में बदलाव आधुनिक काल : 1 1 - प्राया । यद्यपि पिछली पीढ़ी (सन् साठ के पूर्ववर्ती) के कवियों ने काव्य शिल्प के स्तर पर नयो कविताएं लिखना प्रारम्भ भी किया लेकिन वे युग सन्दर्भो से उत्पन्न भावबोध को अनुमति के धरातल पर प्रात्ममात नहीं कर पाये। वंसे राजस्थानी कविता में नानूगम सस्कर्ता को लिप्ती समय, बायरो' (1953) मुक्त छद को प्रथम कृति । इसके बाद नारायणसिंह भाटी का 'दुर्गादास' (966) भी मुक्त छंद में लिखा गया लेकिन इनमे शिल्पगत नवीनता होते हुए भी युग यथार्थ की सवेदना का अभाव है फलतः नयी कविता को शुरूमात सन् 60 के वाद की कवितामों से ही मानी जानी चाहिए । सन् 1971 में डॉ. तेजसिंह जोधा ने 'राजस्थानी प्रेक' नाम से नयी कविता की मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया था जिसमें पहली बार राजस्थानी नयी कविता के कुछ कवियों की रचनामों को प्रकाशित करते हुए इस बात को रेखाकित किया था कि राजस्थानी कविता कय्य और शिल्प की दृष्टि से परम्परागन कविता मे बिल्कुल भिन्न है और यह भिन्नता हो उसकी नवीनता को प्रमाणित करती है । इस पत्रिका के सम्पादकीय को तीखी प्रति- किया भी हुई, खैर कुछ भी हो अाज मन् 60 वाद को राजस्थानी कविता नयी कविता के रूप में अपने को स्थापित करने में समर्थ हुई । 'राजस्थानी ग्रेक' के सम्पादकीय मे राजस्थानी नयी कविता की सवेदना और शिल्प की तरफ से भी सकेत किया है। नया कवि मूल रूप मे जीवन के प्रति प्रास्था- वादी दिखाई देता है । वह जीवन को सभी चुनौतियों को स्वीकारता हुमा मसे भूझता है, उन क्षणो को जीता है और उनके सवेदनात्मक रूप को ईमानदारी स कविता में प्रकट करता है अतः उमका स्पा स्वीकार का है, नकार का नहीं। नये कवि ने जीवन सत्य को यथार्थ के जिस धरातल पर देखा है उनके पीछे उमको कोई प्रतिवद्ध दृष्टि नहीं प्रथांत् वह जीवन को जीवन के रूप मे, उसके यथार्थ में देखना है और ऐसा देखने के पीछे सहज मानवीयता है कोई विशेष विचार दृष्टि नहीं। अन्य दूसरी भापामो की नयी कविता की तरह राजस्थानी नयी कविता में भो अनुभूति की सच्चाई है । युग श्रेय मे सम्पृत कवि अपनी अनुमति को अभिव्यक्त कर रहा है। जीवन का प्रत्येक क्षण उमकी चेतना को प्रभावित करता है क्योंकि सा बोध उमके शाश्वत हैं इसलिए नयी कविता क्षणों में अनुभूत होने वाली प्रत्येक मन.स्थिति को साकार रूप में प्रकट करती है। इस दृष्टि में कुछ कविताएं छोटी भी हैं तो कुछ लम्बी। गोरधनसिंह शेखावत (किरार), ओंकार पारीक (नैनी कवितावा), सावर दहया (हाइ) ग्रादि ने बुछ क्षणों की मनः स्थिति को हिमी बिम्ब के माध्यम से प्रकट करने की कोशिश की है तो तेजसिंह जोधा (कटैई की व्हेगो है, म्हारा बाप), गोरधनसिंह गेवावत (खुद भू खुद री बाता), नद भारद्वाज (मुनसान गाथा, अंधार पस), प्रकाश परिमल (पा, प्रेकर सी तो मा, म्हारा 92 : राजस्थानी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास मागोतर), पारम मरोहा (यापो) प्रादि ने जीवन की संस्लिष्टता को लम्बी कवितानो के माध्यम में प्रकट किया है। जीवन सत्य की तीखी अभिव्यक्ति ग्रामीण परिवेश को लेकर लिखी कवितामो में अधिक है । यद्यपि कुछ कवियों ने गहरी जीवन को सवेदना को भी चित्रित किया है। आजादी के बाद प्रामीण घेतगा के टूटते-बिखरते रूपो की ययाय अनुभूति राजस्थानी नपी कविता में अधिक मुखरित हुई है । ऐसी कविताओं में तेजसिंह जोधा को 'कई की गो है', गोरधनमिह शेखावत की 'गांव' और 'पनजी मा',नंद भारद्वाज की 'सने गाव र उपरापर' मथा 'म्हैं पर म्हारी गांव' पारस अरोडा को 'जुड़ाव प्रादि कवितामी को देखा जा सकता है। मणि मधुकर, हरमन चौहान, पुरुषोत्तम छगारणो मे धान की संवेदनाएं शहरी परिवेश की हैं । लोकजीवन की ताजगी, बदलता परिवेश और शिल्पगत विविधता नयो कविता की शक्ति मनकर पाई है इसीलिए नये कवियों ने प्राधुनिक जीवन की जटिलतम अनुभूतियो को प्रकट करने के लिए विम्बर रमकता, प्रतीक योजना और नये विरोपए तथा नये उपमान भी अपनाये हैं। सपाट भाषा में भी अनुभूति के अनुरूप गहरे प्रयों को व्यजित करना राजस्थानी नपी कविता की विशेषता कही जायेगी। इस तरह नये कवि ने रचनात्मक स्तर पर व्यक्ति और परिवेश की भीतरी समस्यानो और नुनौतियों को पहचाना तथा एक ईमानदार रचनाकार की हैसियत से उन्हे मन्दर्मगत रूप में समग्रता के साथ प्रकट किया। नये कवि की जीवन यथार्थता के प्रति यह नयी रष्टि थी पोर इसी से नयी कविता की यह विकास यात्रा है जो पूर्ववर्ती कविता से अपने को अलग करती है। राजस्थानी के नये कवियो का अपना सवेदन अपना अनुभव और अपना सोच भी रहा है इसलिए प्रत्येक की कुछ उपलब्धिया भी है तो कुछ खामिया भी । राजस्थानी के नये कवियो का परिचय इस प्रकार है---- तेजसिंह जोधा---प्रापका जन्म 7 जुलाई 1950 को रणसीसर (नागौर) में हुा । आप राजस्थानी के समर्थ एव अग्रणी युवा कवि है। राजस्थानी कविता मे वदनाव की तरफ ध्यान आकृष्ट करने वाले और अपनी लम्बी कविताओं के नये कम्प और शिल्प से अपनी पहचान बनाने वाले सेमिह जोधा पहले कवि है । भाप कवि के साय समीक्षक एव पत्रकारिता में भी गहरी रुचि रखते हैं। राजस्थानी अक', 'दीट' और 'हयाई' जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं का सम्पादान किया तो 'माएक' जैसी व्यावसायिक पत्रिका के सम्पादन में ख्याति भी प्राप्त की। तेजसिंह जोधा की काव्य यात्रा 'मोल री प्रोल्यां' (1970) काव्य कृति है प्रारम्भ होती है। सवंदना और बौद्धिकता का समन्वय जोधा की कवितामो की विशिष्टता कही जायेगी । 'कई की हगो है', 'म्हारा बाप' और 'दीठाव र वेजा माय' उनको सशक्त वचित कविताए रही हैं । इन कवितामो में तेजसिह जोग ने जिंग मुहावरे को ग्रहण किया है उसे प्राग चलकर हिन्दी एवं राजस्थानी के कवियों ने भी अपनाया । प्रभावोत्पादकता को दृष्टि से जोपी की कविताप्रो'का अपना MMS रूप है। दीठाव र बेजां मांय' कविता का एक अंश देसिएर मां। - वो कड़ो सपनो हो मा के निको बने, दलतो रात रानड़गो सद, जद म्है गरम में हो अक अटपटाहो रे मांय, ते म्हेतोड़ी मां की अडोई तो हो वो सपनौ, के जिणरो जिकर ५ घणा दिन पर्छ ताई करती हो। मणि मधुकर-- इनका जन्म सितम्बर, 1942 को राजगढ़ (चूरू) में हुमा । मणि मधुकर हिन्दी एवं राजस्थानी भाषा के नये कवियो में विशिष्ट है। गोतों से काव्य यात्रा प्रारम्भ करने वाल मणि मधुकर ने आधुनिक जीवन को संवेदनाओं को नये सन्दर्षों में प्रस्तुत किया है। शिल्प का चमत्कार मधुकर को अपनी खासियत है जिसके कारण उनकी कई कविताएं संवेदनाहीन दिखाई देती हैं। 'कालो घोडो', 'नरक वाहो', 'सोजती गेट', 'अम्बादास रो चितराम', मधुकर की चचित कविताएं रही है । 'पगफेरा' प्रापकी नयी कवितानों का सकलन है। गोरपतसिंह शेखावत- इनका जन्म सन् 1943 में झन्झुनू जिले के 'गुड़ा' गाव में हुमा । आप राजस्थानी नयो कविता के प्रमुख कवि हैं । 'किर कर' (1971) और 'पनजी मारू' (1988) मापके दो कविता संग्रह है। कविता के अतिरिक्त प्रापने 'तीसमारखा' (1988) एवं 'बस्ती राम' (1989) नाटक भी लिखे है। ग्रामीण परिवेश के विविध आयामो के अलावा प्रापकी कविताओं में आज के व्यक्ति का संघर्ष और उसकी जटिल अनुभूतियो का गजीव चित्रण है । 'पनजी मारू', 'काल', 'जुझार', 'मुरझायोड़ो पल', 'गाव' प्रादि चचित कविताएं हैं। पारस अरोड़ा-प्रापका जन्म 1937 मे अजमेर में हुआ। कविता के माथ गद्य विधा में उपन्यास (खुलती गाठा) डायरी प्रादि लिखी। 'जाणकारी' नाम से नवबोध की मासिक पत्रिका का सम्पादन भी किया। 'झल' और 'जुडाव" आपके दो कविता संग्रह प्रकाशित हुए हैं । पारस प्राधुनिक जीवन की संवेदना को सोच के धरातल पर गहराई से अभिव्यक्त करने वाले समर्थ फेवि हैं । उनको कवितामों का परिवेश शहरी मध्यवर्गीय जीवन का परिवेश है । 'पन टुट्यो', घिर विद्रोह' पौर 'बधापो' पापको चचित रचनाएं रही हैं। • नन्द भारद्वाज भापका जन्म 9 अगस्त, 1948 को बाड़मेर जिले के भाडपुरा गांव में हुमा। प्राग्ने हिन्दी एवं राजस्थानी में वविता, वहानी, नाटक, एकांकी, मालोचना प्रादि लिये है। 'हरावल' जैसी माहित्यिक राजस्थानी मासिक पत्रिका का सम्पादन भी नन्द भारद्वाज ने किया। 'अधार पंख' (1974) नाम में प्रापका राजस्थानी कवितामों का प्रयम संग्रह प्रकाशित हुना है। नन्द भारद्वाज का प्रगतिवादी दृष्टिकोण ग्रामीण परिवेश और मानवीय समस्यानों के साथ जमता हुमा दिखाई देता है । 'अन्धार पस' की कविताएं जहाँ सवेदनाएं ज गत करती हैं, वहीं हमें - - नयी कविता का। तभी करिता टूटते मूल्यो, विखरते मानवीय सम्बन्धी, भ्रष्ट व्यवस्था 94. राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहास एक विचार स्थिति में भी पहुंचाती हैं । राजस्थानी की नयी कविता में नन्द भारद्वाज का महत्वपूर्ण स्थान है। चन्द्रप्रकाश देवलापका जन्म संवत् 2006 में उदगपुर जिले के गोटीया गाय में हुमा । देवल कवि और कहानीकार हैं । 'पागो' (1977) मोर 'कावड़ (1987) देवल के दो प्रमुख कविता मरह है। लोक जीवन को सहमता के माथ-साथ देवल की कविता में प्राज के ग्राम यादमी की तकलीफो एवं उसकी चुनौतियों का यथार्थ चित्रण है। विम्ब और प्रतीकों की नीना देवन की कविता को रचनात्मक दृष्टि से बल प्रदान करती है। प्रापकी कविताग्रो के गिल्प में ताजगी और सहजता है। ओंकार पारीक~~-प्रापका जन्म :6 मार्च, 1935 को बीकानेर में हुग्रा! प्रापने हिन्दी एव राजस्थानी में कविताएं लिखी। प्रोकार पारीक की करिनामो में माधुनिक जीवन की विपगनियों पर तीखा पग्य है । क्षण योग को अनुभूति के रूप में प्रापने भनी कवितावा' भी लिखी। दन ऋवितायों में इनका प्रपना चिन्तन है। मधुमती और जागती जोत जैमी पत्रिकामों के सम्पादन के बाद प्राप अव 'माणक' इसपे कोई मन्देह नहीं कि प्राधुनिक राजधानी काव्य में नयी कविता विशेष चचित रही है तथा अन्य विधाम्रो की तुलना में कविता अधिक लिखी गई है । प्राज नयी कविता में काफी लोग लिख रहे हैं जिनमें पूवीं पोटी के कवि भी शामिल हैं यथा----कन्हैयालाल मेठिया, नारायण सिंह भाटी और मत्यप्रकाश जोशी । नयी पीढ़ी के रचनाकारों में कृष्णगोपाल शर्मा (चेतन री पाणी) पुरुषोत्तम छंगाणी (मामा रो सूत). भगवतीलाल व्याग (प्रणहद नाद), श्री गोपाल जन (काल चेतना रो चतुर्भुज), अर्जनदेव चारण (रिघोही), मोहन मालोक (ग-गीत), श्याम महपि(उकलती मोकल), चेतन स्वामी, प्रेमजी प्रेम, मावर दइया, हरोग भादाणी (बाथा में भूगोल), पाईदान मिह भाटी (हमतोडा होठा गे मांच), रामस्वरूप परेश, रमेश मयंक, मानसिंह शेखावत (मूग्यो “मदर', प्रकाश परिमन, अन्नाराम सुदामा (पिरोल में कुत्तो ब्याई। शिवराज छगाणी, मोठेग निर्मोही. माणक तिवारी 'बन्धु', रामेश्वर दयाल श्रीमाली, सत्येन जोशी, आदि है। इस तरह गजस्थानी नयी कविता कथ्य और शिल्पगत विविधता को तिये हुए युग बोध के नये आयामी की और अमर है। मूल्यांकन-प्राधनिक गजस्थानी कविता के अध्ययन से स्पष्ट है कि वानिक काल में जहां एक ओर परम्परागत काव्य लिखा गया, वही मन् 1857 की क्रान्ति के फलस्वरूप कुछ ऐमे कवि भी प्राये जिन्होने युग कवि के रूप में अपनी भूमिका निभाई। अाजादी के बाद जिम नवीन परिवेश का उदय हुघा, उसने काव्य को चेतना को धीरे- धीरे प्रभावित किया। इसके कारण एक तरफ जहाँ राष्ट्रीय, सांस्कृतिक मोर वैयक्तिक गोति प्रधान झाय्य धारा का विकास हुमा तो दूरी तरफ प्रकृति, हास्य-व्यंग्य मोर प्राधुनिक काल : 95 - और असन्तोष की कविता थी जो अपने परिवेशगत यथार्थ को रचनात्मक घरातल पर गहराई से अभिव्यक्त कर रही थी । सन् 1960 से पूर्व की पीढ़ी मे जहाँ शाश्वत मानवीय मूल्यों और सांस्कृतिक बोध का स्वर प्रधान था तो राजस्थानी की नयी कविता में अनुभूति, दृष्टि और शिल्प का ऐमा नयापन था जो उमे पूर्ववर्ती कविता से अलग करता था । जीवन सन्यो को यथार्थ के धरातल पर तलाश और अभिव्यकि के सार्थक रूपो मे अन्वेपण नयी कविता का अपना रचनात्मक संघर्ष था। राष्ट्रीय और सास्कृतिक धारा के अन्तर्गत काध्य सवेदना को एक व्यापक प्रायाम मिला जिसके कारण दुर्गादास', 'मोरा', 'वोल भारमली', 'लीलटास', आदि अनुपम पाव्य कृतिया राजस्थानी को मिली तो दूसरी तरफ बादली, ल, सांझ पोर मेघमाल जैसी प्रकृति काव्य वी विशिष्ट रचनाएँ भी। प्रगतिवादी काध्य ने मामाजिक विषमता और विसंगतियो को पहचानते हुए, तीये स्वर में युगीन परिवेश को अभिव्यक्ति दी । राजस्थानी मे प्रगतिवाद न मान्दोलन बना तो न किसी तरह का नारा । प्रगतिवादी चिन्तन एक समय की काव्यात्मक उपलब्धि होते हुए भी अपनी काव्य धारा को विचार के धरातल पर अधिक प्रागे नही बढ़ा सका । नयी कविता समकालीन परिवेश से जुड़कर जिस यथार्थ चेतना को रूपायित कर रही थी, वहां प्रगतिवादी स्वर का ग्रामाम भी कई रचनाओं में बगवर हो रहा था। इस दृष्टि से 'मोल री प्रोल्यो', पगफेरो, अधार पस, झल, पागी, पनी मारू ग्रादि नयी कविता की उपलब्धि परक कृतियां मानी जायेगी। इस तरह सूर्यमल्ल मिश्रण और शकरदान मामौर प्रारम्भ प्राधनिक राजस्थानी कविता भावबोध, चिन्तन और शिल्प के रूप में विकसित होती गई। गद्य साहित्य राजस्थानी का गद्य साहित्य प्राचीन एवं काफी समृद्ध है और ऐसा प्रतीत होता है कि राजस्थानी में चौदहवी शताब्दी के पूर्वाद से ही राजस्थानी गद्य प्रारम्भ हो चुका था तथा ।वी व 17वी शताब्दी तक वह उन्नत अवस्था को प्राप्त हो चुका था । प्राचीन गद्य साहित्य को निम्नलिखित रूप में बांटा जा सकता है- 1. अनुमानत. राजस्थानी पद्य का प्रारम्भ तेरहवी शताब्दी के मध्य से हुप्रा । -- राजस्थानी भाषा और साहित्य : मोतीलाल मेनारिया, पृ. .73. (क) 10वी व 11वी शताब्दी से राजस्थानी में प्रवाध गति से गद्य लिखा जा रहा है। -राजस्थानी भाषा और साहित्य और संस्कृति : डा रामप्रसाद दाधीच, पृ. 24. (ख) राजस्थानी गद्य । ३वी गताब्दी से प्राधुनिक काल ना प्रविधिन्न रूप में उपलव्य होता है। -राजस्थानी माहित्य का इतिहास : डा पुरुषोत्तम मेनारिया (ग) राजस्थानी गद्य को परमरा चौदही शताब्दी से निरन्तर प्रवाहमान है। -सांस्कृतिक राजस्थान : स. रतनसाह, पृ 53 - 96 . राजस्थानी साहित्य का सक्षिप्त इतिहास 1. धार्मिक गद्य 2. ऐतिहामिक गद्य 3. कलात्मक गद्य 4. अन्य रूप धार्मिक गद्य-गद्य के विकास में जैन साधुनों का योगदान उल्लेखनीय है । इन्होंने अपने धर्म के प्रचारार्थ एवं प्राने उपदेशो को लोकप्रिय बनाने के लिए धर्म कथाएं लिखी। वैसे देखा जाय तो ये कथाएं मौलिक न होकर धार्मिक ग्रन्थयों को टीकाएँ थी । ऐसी टीकाएँ दो रूपो में मिलती है- 1. वालाव बोध और 2. टब्बा। 1. बालाय बोध-ये सरल और सुबोध टीका होती थी जिसे कोई भी सामान्य व्यक्ति अच्छी प्रकार से समझ सकता था जैन धर्म से सम्बन्धित मग, उपांग, मूल सूत्र, चरित प्रादि को लेकर कई वालावबोध टीकाएं लिखी गई। इसमें मूल की ध्यास्या के साथ जन धर्म के सिद्धान्तों को सरल रुप में ममझाने के लिए कई कथाएं हुआ करती थी। जैनधर्म मे ऐसे संकडो बालावबोध उपलब्ध होते हैं। 2. टब्या--यह बालावबोध मे संक्षिप्त होता था तथा इसमें मूल शब्द का अर्थ उसके ऊपर, नीचे या पाश्र्व में लिखा जाता था। सवत् 1930 में लिखित 'अराधना' नामक टिप्पणी को गद्य का मबसे प्राचीन उदाहरण माना गया है। चौदहवी शताब्दी के गद्य के अन्य नमुने सम्रामिह रचित बाल शिक्षा (सं. 1936), नवकार-व्याख्यान (सं. 1958) आदि में पाये जाते हैं। धार्मिक गद्य मे प्राचार्य तरुण प्रभसूरि का 'पडावश्यक वालावबोध, (स. 1411) राजस्थानी गद्य की प्रथम प्रौढ कृति मानी जा सकती है । अन्य बालाव- बोधकारो मे सोमसुन्दर सूरि, मेरू मुन्दर, पार्श्वचन्द्र आदि प्रमुख है । धर्मकथाओं में माणिकचन्द्र सूरि द्वारा लिखित 'पृथ्वीचन्द्र चरित्र' (सं. 1478) एक प्रौद्ध कलात्मक कृति है इसका दूसरा नाम वागविलाम भी है। धार्मिक साहित्य दो शैलियो में मिलता है-एक जन शैली और दूसरी जैनेतर शैली। ऐतिहासिक गद्य-धार्मिक गद्य के बाद ऐतिहासिक गद्य को शुरुमात हुई। ऐतिहासिक गद्य मे ख्यात, वात, वमावली, पट्टावली, पीढ़ियावली, पीठियावली, विगत हकीमत, हाल मादि मिलते हैं । 'स्यात' में सामान्य रूप में राजामो का वंशानुक्रम लिखा गया है । तत्कालीन शामा स्वयं अपना इतिहास इन ख्यातो के माध्यम से लिखवाते थे इसलिए इनमें अनिरजनापूर्ण प्रगमा भी है फिर भी ऐतिहासिक तथ्यों की दृष्टि मे ये महत्वपूर्ण मानी जाती है। आज भी राजस्थान के इतिहास के सन्दर्भ में मुहगीत नेणमी, प्रासिया वाकोदाम मौर दयालदास को स्मात प्रसिद्ध है । पावली', A माधुनिक काल : 97. - शैली! में प्राचार्यों के जन्म, दीक्षा आदि का विवरण तया दफ्तर वहीं एक प्रकार की डायरी शैली में लिखी जाने वाली रचना थी । 'वात' के सैकड़ों संग्रह मिलते है जिनमें प्रसिद्ध ध्यक्तियों की ऐतिहासिक बातें प्रस्तुत की गई हैं । ऐतिहासिक गद्य भी दो शैलियों में लिखा गया--जैन शैली और चारण जैन शैली की भाषा सीधी सरस है तो चारण शैली की भाषा परिष्कृत। कलात्मक गद्य-~-कलात्मक गद्य की दृष्टि से राजस्थानी साहित्य का अपना महत्व है । कलात्मक गद्य मुख्य रूप से वचनिका, दवावैत, सिलोका, वर्णक और वात के रूप मे मिलता है। पचनिका गद्य-पद्य मिश्रित रचना है। प्रादर्श वनिका में पाया गद्य होता है तथा वह गद्य भी तुकान्त होता है। इसमें अपभ्रंश मिथित राजस्थानी भाषा दिखाई देती है। यद्यपि राजस्थानी में वनिका साहित्य प्रचुर रूप में मिलता है फिर भी दो.वचनिकाएं काफी प्रसिद्ध है। एक गाडण शिवदास को लिखी हुई 'प्रचलदास खींची री वनिका' जो चारण शैली की प्रथम प्रौढ़ मोर महत्वपूर्ण रचना है तथा दूसरी खिड़िया जग्गा की वनिक राठौड़ रतनसिंघ महेसासोतरी'। 'मचलदास खींची री वनिका' में गांगरोन गढ़ के स्वामी अचलदास खींची मोर मोडूपति सुल्तान होशंगशाह का युद्ध, जौहर और अंत में प्रचलदास खींची का वीरगति प्राप्त करना दिखाया है। यह युद्ध स.1480 में हुमा । इसमें युद्ध और जौहर के वर्णन प्रभावशाली हैं। 'वनिका राठौड़ रतनसिंघ महेसदासोत री' में औरंगजेब और जसवन्तसिंह के बीच उज्जैन में होने वाले युद्ध (सं 1716) में राठौड़ रतनसिंह के वीरतापूर्ण युद्ध एवं बलिदान का वर्णन किया गया है। कलात्मक गद्य में दवावंत भी उपलब्ध होती हैं । इन दवावत की भाषा राजस्थानी मिश्रित खड़ी बोली (उदं) होती थी। इनका गद्य भी वचनिका को तरह तुकान्त होता था। दवावत में पद्य भाग कम मिलता है। दवावंत में भाट मालीद स को लिखी 'नरसिंहदास को दवावत' काफी प्रसिद्ध है जो 18वीं शताब्दी के पक्ष में लिखी हुई है। कलात्मक गद्य का एक रूप “सिलोका' है। इसमें भी अन्त में तुक मिलती है तथा इसको प्रश्नोत्तर रूप में एक शैली है। 'वर्णक' रूप में विभिन्न वस्तुणों का वर्णन है । 'समा-गार ऐसा हो वर्णक ग्रंप है। कलात्मक गद्य का अन्तिम रूप बात हं भोर यह राजस्थानी साहित्य में विपुल मात्रा में मिलती है । ये वात भी गद्यमय पद्यमय मोर गद्य पद्यमय रूप में मिलती हैं। इनके विषय ऐतिहासिक, पौराणिक और, काल्पनिक दिखाई देते हैं। 'वात' के कहने की अपनी शैली है । प्रसिद्ध वातों में सुपर रणमल री वात, राजा नरसिंघ रौ दात, विणजारा री बात, साहूकार री । यात मादि हैं। अन्य रूप-उपयुक्त गद्य रूपों के अतिरिक्त राजस्थानी गद्य, का प्रयोग शिलालेखो, पट्ट परवानों, पत्रों प्रादि में भी पिलता है. 1 इसी तरह वंद्यक, ज्योतिप, योगशास्त्र, व्याकरण प्रादि प्रन्थों में भी गद्य का रूप दिखाई देता है : -- .
9 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास T इस तरह राजस्थामी गय को प्राचीन परम्परा कापी समृद रही है। यह गय साहित्य, इतिहास, संस्कृति और सामाजिक जीपम की सांगोपांग स्वीर प्रस्तुत करता है। आधुनिक काल का गद्य साहित्य राजस्थानी का प्राचीन गद्य साहित्य को समृद्ध रहा है लेकिन उसकी तुलना में प्राथमिक काल का गद्य साहित्य कम मात्रा में है। प्राज धीरे-धीरे अन्य गई विधानो में रचनात्मक साहित्य सिसा जा रहा है। माधुनिक गद्य साहित्य को प्रमुख विधाम्रो मै उपन्यास. कहानी, नाटक, एकांकी, निमय, गमालोचना प्रावि है। इन ' गद्य विधानों की प्रगति को इस प्रकार देखा जा सकता है- उपन्यास-राजस्थानी भाषा में मबसे पहला उपन्यास शिवचन्द भरतिया का लिखा हुआ 'कनक सुन्दर' (1903) उपलब्ध होता है । इसके लिए लेखक ने गुजराती में प्रचलित 'मयम कथा' शब्द का प्रयोग किया है। दो परिवारों के जीवन दृष्टिकोण पर बाधारित यह एक भादर्शवादी उपन्यास है 1 ए३. मारवाड़ी परियार. अपनी फिजल पची, अशिक्षा और शान-शौकत में फंसा रहता है तो दूसरा परिकार इनमें - मुक्ति पाकर युगानुरुल जीवन जीने के लिए तत्पर है। 'कनक सुन्दर' के बाद श्रीनारायण अग्रवाल का 'चाचा' (1925) राजस्थानी का दूसरा उपन्यास है। यह भी भामाजिक उमान है तो इसमें 'वृक्ष विवाह की समस्या को उठाया गया है। इन दोनों उपन्यासों की विषय वस्तु और शिल्प पर विचार करें तो प्रतीत होता है कि ये सौंदेश्य लिखे हुए उपन्यास है तथा इनका लक्ष्य समाज सुधार की भावना रहा है । तत्कालीन रचना-दृष्टि से भी ऐस उपन्यासों का लेखन स्वाभाविक प्रतीत होता है क्योंकि उस समय अन्य भारतीय भाषाओं में भी समाज सुगर को भावना से प्रेरित होकर उपन्यास लिने जा रहे थे इसलिए मंमा सुचार, प्राद परिवार और दुरीतियों का खण्डन, इन उपन्यामों का मुख्य पथा। इन दो उपन्यासों के बाद उपन्यास तदन में एक नया नारा दिखाई देता है तथा स्वतन्यता के बाद सन 1956 में श्रीलाल नयमल जोशी.. का 'प्रामे पटकी उन्याम प्रकाशित होता है । इसे स्थानोतर काल का पहला उपन्याम कह सस्ते है । इस उपन्यास में दिया विवाह की समस्या को उठाया है। 'सेड देवीदयाल की बेटी किमना जर विषया हो जाती है तो उसका देवर मोहन उसमें दादी करता है, इससे समाज में हंगामा मच जाता है और मोहन को समाज में यहि कृत कर दिया जाता है । इस अन्यास में भी सामाजिकमको समाधान प्रादर्श हा में प्रस्तुत किया गया है। श्रीलाल नयमन जोशी के दूसरे मोरा रो घोरी' (1968) xx 'एक बीनणी दो बोन' (1973) है 'घोर रो घोरी' राजस्थानी भाषा और साहित्य - .
अाधुनिक काल 199 मे गहरा लगाव रखने वाले इटली निवामी डॉ हेमोटोरी की जीवनी पर आधारित है । इस उपन्यास मे भी लेखक का आदर्शवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है । 'एक बीनणी दो बीन' उपन्यास अंग्रेजी भाषा के कवि टेनीसन की लम्बी कविता ईनक गार्डन के कथानक पर आधारित है। किसी परिवेश और संस्कृति को जिये बिना उसे उपन्यास का प्राधार बनाना महज किमी प्रादशं को प्रस्तुत करते का लोम ही कहा जा सकता है और यह जोगी के दोनो उग्रन्यामों को सीमा है । अन्नाराम सुदामा को कथा चेतना अपने परिवेश से गहरी जुड़ी हुई है लेकिन उनका आदर्शवादी झझान उनके सभी उपन्यामों में दिखाई देता है। मैक्ती कायाः मुलकती धरती' (1966) में मुयारी नानी की पीडा को प्रात्मकृयात्मक शेती में अभिव्यक्त किया गया है। राजस्यानो जन-जीवन की भीतरी झांकी और घरती प्रेम की काव्यमय भावनानी के कारण इसमें रोचकता मा गई है। मुदामा का दूसरा उपन्यास 'पांघी और ग्रास्था' (1974) है जिसमें राजस्थान के गंवई जीवन, अकाल और अपनी इज्जत के लिए संघर्ष करते हुए जगन्नाथ की कथा है । गरीबी, बेरोजगारी, सेठ की व्यभिचारी प्रवृत्ति, सरपंच का ईर्या-द्वेष पूर्ण व्यवहार, जगन्नाथ द्वारा मेठ की हत्या, जेल और जेल मे मुक्ति। जगन्नाथ विपत्तियों की प्राधी मे जूझता है लेकिन वह अपने परिवार और जमीन के प्रति प्रास्था नहीं छोड़ना। अन्नाराम सुदामा के अन्य उपन्यासो में 'मैव रा रूख' (1977) 'डकोजता मानवी' और 'घर समार' {दो भांग) है । 'मेवे रा ख' उपन्यास प्रापातकाल की स्थिनियो को लेकर लिखा गयां उपन्याम, है ! प्रापातकाल में किस प्रकार गावों में अबग्न नसबंदी हुई तथा उमके प्रातक ने किस प्रकार गाव वालों को सत्रस्त कर दिया, इस स्थिति का यथार्थ चित्रण इस उपन्यास में है. । वैसे मूल रूप में यह उपन्यास गंवई जीवन में साहूकार को स्थिति को चित्रित करता है । 'डकीजता मानवी' उपन्यास सेठ की शोपण प्रवृत्ति का पर्दाफाश करता है तो 'घर संमार' उपन्यास में दहेज वे लोभी मास-स्वमुर से संघर्ष करती हुई 'सुधा' (मुख्य पात्रा) दिखाई देती है । यह उपन्यास ग्राज की बलत सामाजिक ममन्या और नारी की मघर्पगील चेतना को प्रस्तुत करता है। यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र नहूँ'गोरी किण पीव री' (1970) पार 'जोग-मनोग' (1971) उपन्याम लिये है । ये दोनो सामाजिक उपन्याम हैं । हूं गारी किरण पाव री' में निम्न वर्ग को मुरजडी अपने पति के कलकत्ता चले गाने और वहाँ से मृत्यु का तार भिजवाने के कारण अपने देवर से नाना (पुनर्विवाह) कर लेती है लेकिन कुछ समय पश्चात् उसका पनि जब कलकता मे वापस पा जाता है तो "सुरंजड़ी चकर में पड़ जाती है । इम सयोग के कारण मुरजड़ी की जिन अन्तईन्दपूर्ण मनःस्थिति को चित्रण किया गया है, वह स्वाभाविक एवं यथार्थवादी है । 'जोग-सजोग' उपन्याम महानगरीय परिवेश और स्थिति को लिए हुए है। लाला दटुक प्रसाद का लड़का 100 : राजस्थानी माहित्य का गंक्षिप्त इतिहास - गणेश एक पंजाबी लहको मुरजीत को चाहता है लेकिन घन के लोम में प्राकर उसका पिता कुरूप रतन से उसका विवाह कर देता है लेकिन एक दिन गणेश रतन के गहने और रुपये लेकर कलकत्ता माता है पोर एक क्रिश्नियन लड़की रीना मे शादी कर लेता है । इधर मुरजीत अपने पति से परित्यक्त होकर गणेश के घर रहने लग जाती है । जब हैजे के कारण गणेग को पारिता, रतन और मुरजीत को मो के मरने की खबर मिलती है तो वह रीना को लेकर घर प्राता है तथा मा मे शादी की बात बताता है उघर मुरजीत जहर खाकर प्रात्महत्या कर लेती है । एमपतिसिंह का तिरसंह' (1974) अनिश्चय और प्रनिर्णय के द्वन्द्व में फंसे पवन (नायक) को मंघर्ष कहानी है । यह कभी गाव तो कभी शहर और फिर शहर से गांव इमी में भटकता हता है । पवन में यान्ति की भावना है लेकिन उसका कोई स्थिर रूप उभर नहीं पाता । एक तरह लीना का देहगत माकपंगा पौर दूसरी तरफ शैल की क्रान्तिकारी विचारधारा । पवन इनके बीच विगंर की स्थिति में है । उपन्यास में क्रान्ति की अपेक्षा रोमांस का अधिक चित्रण है। मत्येन जोशी का 'कंवल पूजा' (1974) राजस्यानो का पहला ऐतिहामिक उपन्यास है। इस उपन्यास में तनोट के राजा विजयराज और महमूद गजनवी के बीच हुए युद्ध का वर्णन जिया गया है । मोचलिक स्पर्ग के कारण उपन्यास में नवीनता और रोचकता प्रतीत होती है। विजयदान देथा के दो लोक उपन्यास 'तीराव' (1966) एवं 'मां रो 'बदली प्रकाशित हुए हैं। ये दोनो उपन्याम ध्यग्यात्मक शैली में लोक कथा के जरिये व्यक्ति और समाज की स्थिति पर तीखा प्रहार करते हैं । 'तीडोराव' प्रतीक है उन व्यक्तियों का जो प्रयोग्य होते हुए भी अपनी तिकड़म और छल प्रपंच से जीवन में पागे बढ़ जाते । निस्सन्देह याज का युग तोडोराव जैसे लोगों का ही है । 'मा रो बदनो' उपन्यास सामन्ती व्यवस्था की विकृतियों पर कड़ा प्रहार है । रामनिवास शर्मा का 'काल-भैरवी' (1976) गांवों में फैली तन्त्र मन्त्र को साधना और उसके प्रभाव को मनोवैज्ञानिक ढंग से चित्रित करता है। गांव के वातावरण में अब भी मेरव और मैरवी को देवयोनि से अलग योनि स्वीकार किया जाता है ! उपन्यास में ग्रामीण लोगों के भोलेपन और उनके प्रन्यविश्वासो का चित्रण किया गया है। पारस अरोडा का उपन्यास 'खुलती गांठा' (1977) आधुनिक जीवन की ममस्या को लेकर लिखा गया है । सहज और सरल शैली की यह प्रेमकथा अन्तर्जातीय विवाह में अपना समाधान ढ ढती है । बी.,एल. माली ने "मिनस रा खोज' और, 'अबोली' (1987) उपन्यास लिखे हैं। "मिनस रा खोज' उपन्यास में जातिगत बन्धनों से मुक्ति के लिए तडफत समाज का तो 'प्रवोली' में नारी जीवन को समस्या को मौजूदा परिवेश में उभार है। . .
माधुनिक काल : 101 . + इन उपन्यासों के अतिरिक्त कुछ उपन्याम लघु प्रकार में तो कुछ समय समय पर 'हराघल', 'प्रोलमो', 'लाडेसर', 'राष्ट्र पूजा', 'हलो' प्रादि पत्रिकाओं में भी प्रकाशित हुए हैं। इन उपन्यामों में सीताराम महर्षि के दो उपन्यास 'युग समझ चंधरी रा बोल' और 'लालड़ी अकर फेह गमगी', डॉ नृसिंह राज पुरोहित का 'भगवान महावीर', दीनदयाल कुन्दन का 'गुवार पाठो', रामदत्त सांकृत्य का 'प्राभल दे भूरसिंह राठौड का 'राती पासी'. प्रेमजी प्रम का 'सेली छांव खिज्यूर की', किशोर कल्पना कान्त का 'पात्री' मालवन्द तिवाड़ो का 'भोलावण', करणीदान बारहठ का 'मत्री री बेटी' प्रादि उल्लेखनीय है। यहाँ मगर राजस्थानी उपन्यासों को विकास यात्रा पर विचार करें तो प्रतीत होता है कि 'फनक सुन्दर' से लेकर अब तक के उपन्यामों को प्रवृत्ति-भेद के प्रापार पर-सामाजिक, ऐतिहामिक, पौराणिक और राजनीतिक उपन्याम प्रमुख हैं । भादगंवाद, घटनात्मक समांग, इतिवृत्तात्मकता, समस्याग्रो का सतही चित्रण राजस्थानी उपन्यासो की कमजोरी कही जायेगी । 'कनक सुन्दर', 'चम्पा', 'मेक्ती काया पर मुलकती घरतो', 'हूं गोरी किरण पीय री' और 'जोग-संजोग' उपन्यास प्रादर्शवाद, सुपारवाद और एक ठोस विचार भूमि के अभाव में पटनात्मक रोचकता को लिए हुए है । गंवई जीवन का यथार्थवादी चित्र और पांचलिकता इन उपन्यासों को प्रमुख विशेषता कही जायेगी। इस दृष्टि से पनाराम गुदामा, रामदत्त सहित्य, विजयदान देथा और सत्येन जोशी के उपन्यासो को देखा जा सकता है। शिल्प की दृष्टि से देखें तो 'माम पटको', 'मकती काया मुलाती धरती', 'मपी मार प्रास्था', 'हूं गोरी किरण पीय रो', 'तिरसंक' प्रादि उपन्यामो में 'परम्परागत शिल का रूप दिखाई देता है। संयोग, घटनात्मकता और वर्णनात्मक दांसी के कारण राजस्थानी के उपम्पास प्रत्र भी प्रेमचन्द युगोन सवेदना पौर शिल्प 2. दायरे में प्रतीत होते हैं। 'मैकती कामा मुलकतो परती' में प्रात्मकथात्मक तो 'तीराव' में प्रतीक शैली का प्रयोग हुमा है। भापानी दृष्टि से इन उपन्यामो में सहजता पोर प्रवाह का प्रभाव है। प्रनाराम मुदामा को भाषा में गहरी व्यंजना, काव्यमयता पोर ठेठ राजस्थानी शनों, मुहावरी और कहावतों का मुन्दर प्रयोग है। विजयदान देथा की भाषा में मजाव और छत्रपतिसिंह की भाषा में काप्य की प्रधानता है। इम तरह कहा जा सकता है कि राजधानी उपन्यास कप्य पोर शिल्प की दृष्टि से बदलते दुग बोय पोर जीवन की गटिनतम समस्या का साक्षारसार करने में भी पपरे है । प्रमुख उपन्यासकारों का परिचय इस प्ररार है- पारवेग शर्मा धन-पाका बन्म 13 अगस्त, 1932 को बीकानेर में हमा । पन्द्र हिन्दी के प्रतिशित कथाकार है. सर पन्द्र ने राषस्थानी में भी बहानी, माटक मोर उभ्यास लिगे है । 'गोरी fry पोय रो' और 'मोग मंजोग' मापके 102 • राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहास . - अब तक प्रकाशित दो उपन्यास हैं । चन्द्र के हिन्दी उपन्यासों में जिस युग बोध और प्रगतिशीलता का चित्रण हुआ है, वैमा राजाधानी उपन्यासों में नहीं दिखाई देता । श्रीलाल नथमल जोशो-आपका जन्म बीकानेर में सन् 1921 में हुआ आजादी के बाद जोशी के उपन्यास 'ग्राम पटको' से उपन्यासो को परम्परा प्रारम्भ होती है । 'ग्राम पटको', 'धोरां री घोरो', और 'एक बीनणी दो बीन' मापके प्रकाशित उपन्यास हैं। अनाराम सुदामा-आपका जन्म उदयरामसर (बीकानेर) में हुआ । प्राप बहुमुखी प्रतिभा वाले हैं। प्रापने उपन्याम, कहानी, नाटक, कविताएं प्रादि लिखी हैं। राजस्थानी उपन्यासकारो मे अन्नाराम सुदामा का विशिष्ट स्थान है । 'मैकती काया मुलाती धरती', 'माघी पर प्रास्था', 'मेवै रा रूख' और 'घर ससार' आपके प्रकाशित उपन्यास है । सुदामा के उपन्यासों में लोक जीवन को गहराई, भापा दौली की रोचकता और प्रगतिशील विचारधारा को झलक दिखाई देती है। विजयदान देथा-यापका जन्म बोरदा (जोधपुर) में 1926 में हुमा। आपने राजस्थानी में कहानिया और उपन्यास लिखे है । लोक कथावा को परिष्कृत भापा और वैचारिक स्पर्श देने में देथा का योगदान महत्त्वपूर्ण है। 'मां रो बदलो', 'तीडोराव' देथा के दो लोक उपन्यास है जिनमे लोक कथानो को आधार बना कर गमाज व्यवस्था पर तीखा व्यग्य किया गया है । लोक उपन्यासो में लोक कया के सभी तत्व ज्यो के त्यो मौजद है। कहानी-राजस्थानी का वात साहित्य तो काफी समृद्ध है तथा उसकी प्राचीन परम्परा दिखाई देती है लेकिन कहानी प्राधुनिक विधा है। राजस्थानी उपन्यास और नाटक के प्रथम लेखक जिम प्रकार शिवचन्द्र मातिया माने जाते हैं, ठीक उसी प्रकार कहानी के भी । भरतिया की प्रथम कहानी विश्रान्त प्रवास' सन् 190+ में कलकत्तं से प्रकाशित होने वाले 'वैश्योपकारक' हिन्दी - मासिक में प्रकाशित हुई। इसके बाद गुलाबचन्द नागौरी की 'बडी तीज', 'बेटी को विकरी' और 'बहू की खरीदी' प्रादि कहानियां अलीगढ मे प्रकाशित 'माहेश्वरी' पत्रिका में प्रकाशित हुई। नागोरी के बाद शिवनागया तोशनीवाल को 'विद्यापरदेवतम्' तथा 'स्त्री शिक्षा को अोनामा' नागिक में प्रकाशित 'पचराज' में छपी । प्रवासी रचनाकारों द्वारा लिखी इन कहानियों में समाज सुधार और प्रादर्शवाद की छाप है। इन कहानियो के बाद लगभग 20 वर्ष तक कोई कहानी नहीं , लिखी गई। सन् 1935 के ग्रामपास पुनः कहानी लेखन प्रारम्भ होता है जिसमें मुरलीधर व्यास, श्री चन्दराव माथुर प्राद प्रमुख है । इन रचनाकारों को कहानी लिखने की प्रेरणा बंगला एव हिन्दी भाषा मे प्राप्त हुई। मुरलीधर ध्याम का पहला कया संग्रह 'बरस गाठ' मन् 1956 में प्रकाशित हुया लेकिन इससे पूर्व व्यास को काफी कहानियां प्रकाशित हो चुकी थी । व्याम के बाद कहानी लिखने वालों में नानूराम सस्कर्ता, 'ननिह राजपुरोहित, पंजनाय पंवार, श्रीलाल नथमल जोशी, डॉ. मनोहर शर्मा, प्राधुनिक काल • 103 i -- प्रन्नाराम सुदामा, दामोदर प्रसाद शर्मा, करणीदान वारहठ, रामेश्वरदयाल श्रीमाली, मूलचन्द प्रारणेश, दीनदयाल शोभा, किशोर कल्पनामान्त प्रादि हैं । इन कहानीकारों का, प्रवृत्तिगत रूप में विभाजन नही कर सकते क्योंकि कहानी लेखन मे ऐमी किमी प्रवृत्ति का व्यापक रूप में चित्रण नहीं हुग्रा है । एक ही समय में कई तरह की प्रवृत्तियों से प्रभावित कहानियां लिखी गई है । कथ्य और शिल्प को दष्टि से जो बदलाव राजस्थानी कहानी में ग्राना चाहिए उमको झलक तो सन 1970 के बाद कुछेक कहानीकारों में दिखाई देती है अन्यथा अब भी राजस्थानी में घटना प्रधान, प्रादर्शवादी और परम्पगगत शिल्प को कहानि हो लिसी जा रही हैं । मुरलीधर व्यास और उनके परवर्ती कहानीकार की मूल दृष्टि सामाजिक चेतना से जुड़ी हुई है इमलिए ममाज मृधार और प्रादर्शवादी भावना कहानियों में प्रधान है। मुरलीधर ध्याम की कहानियां शहरी जीवन से जुडी हुई हैं लेकिन उनके कहानियों में ममाज सुधार और सामाजिक कुरीतियो पर तीखा व्यंग्य है यया 'न्याय', 'पलमै रो मोल' और 'नरमेध या समाज रो नीरा' कहानियां ली जा सकती हैं । इन कहानियों में चरित्र-चित्रण एवं वातावरण की तरफ ध्यान न देकर समस्याग्रो के समाधान को ही प्रधानता दी है। नानूराम संस्कर्ता के 'सोही' (1957), 'दस दोष (1006) और "घर की रैल' (1970) नाम मे कहानी संकलन प्रकाशित हुए हैं। इन सग्रहो की कहानियों मे यांचलिक जीवन की परम्परागों, लोक विश्वास, सुख-दु स और सामाजिक कुरीतियो काचित्रण किया है । परम्परागत शिल्प वाली इन कहानियों में प्रादर्श, उपदेश, मनोरंजन और वर्णनात्मकता की प्रधानता दिखाई देती है। मिह राजपुरोहित का राजस्थानी कहानीकारों में विशिष्ट स्थान दिखाई देता है । ग्रामीण परिवेश के बदलते मन्दों एव युगानुकूल चेतना को नृसिंह राजपुरोहित ने अपनी कहानियो मे गहरी सदना के साथ अभिव्यक्त किया है। राज- परोहित के प्रकाशित कथा संग्रहों में 'रातचासो' (1961), 'अमर चूनड़ी' (1969), "मऊ घाली मालथै' (1973), 'परभातियों तारो' मादि प्रमुख है। आजादी के पश्चात् बदलते सामाजिक मूल्यों, भ्रष्ट राजनीतिक स्थितियों, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, 'भकाल को प्रासद स्थिति और समाज की कुरीतियों को विषय बनाकर नृसिंह राजपुरोहित ने कहानियों लिखी हैं । नसिह राजपुरोहित को कहानियों में प्राज को विगतियों और निम्नवर्गीय जीवन को चेतनाको ईमानदारी से प्रकट किया है। उनकी सब कहानियो यथार्थवादी हो. ऐसा तो नहीं कहा जा सकता लेकिन फिर भी रातवानो', "उतर भीखा म्हारो "यारी', 'गिरजड़ा', 'भारत भाग्य विधाता', 'कुग्रं भांग पी' आदि कहानियां यथार्थवादी एवं श्रेष्ठ मानी जा सकती हैं। नसिंह राजपुरोहित की कहानियों में शिरपगत नवीनता भी दिखाई देती है। ग्रामीण परिवेश को अनुभूति के धरातान पर प्रकट करने वाले कथाकार है वैजनाथ पंवार । पंवार के दो कहानी सपा 'लाडेसर' (1970) मोर 'नया सूट्यो। .
104 : राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहास नीर' प्रकाशित हुए हैं । पंवार की कहानियों में प्रादर्शोन्मुखी यथार्थवादी दृष्टि दिखाई देती है । 'लाडेसर', 'भरी', 'इनामी भाभी', 'जापो', 'नणा राट्यो नीर' प्रादि पंवार की चचित कहानियां है। प्रादर्शवादी चेतना से प्रेरित श्रीलाल नयमल जोशी की कहानियां हरी जीवन फी मानमिकता और उसकी समस्यामों को अपने ढंग से चित्रित करने वाली है । 'भाडेती' में कु वारे व्यक्ति के लिए मकान की समस्या, 'मोलायोड़ी लाड़ी' में अनमेल विवाह की समस्या और 'परण्योड़ी कंवारी' में पति-पत्नी के सम्बन्धों की मनोवैज्ञानिक गुत्थी को प्रस्तुत किया गया है । डॉ. मनोहर शर्मा की कहानियां सामाजिक समस्यामों को उजागर करने थाली प्रादर्शोन्मुखी यथार्थवादी कहानियां हैं । 'कन्यादान' (1971) नाम से आपका कहानी संग्रह प्रकाशित हुमा जिसमें सेठ साहूकारों की उदारता, साम्प्रदायिक सद्भाव और निधन जीवन की बेवशी का चित्रण किया गया है। 'कन्यादान', 'फतिय रो न्याव', 'खोजी' प्रादि रोचक कहानियां हैं। नृसिंह राजपुरोहित के बाद कहानी क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अन्नाराम सुदामा हैं । मृदामा मास्थावादी रचनकार हैं और युग यथार्थ के प्रति उनकी अपनी दृष्टि है । 'प्राधे में प्रास्यां' (1971) और 'गलत इलाज' नाम से इनके दो कथा संग्रह प्रकाशित हुए हैं । मुदामा की कहानिया ग्रामीण परिवेश की भीतरी तहों को उजागर करने में समर्थ हैं । उनके पात्र संघर्षशील और परिस्थितियों से जूझते हुए नजर पाते हैं फिर भी बोध और चिन्तन के धरातल पर उनकी अपनी सीमा है। कई स्थलो पर काव्यात्मकता और वैचारिक बोध के कारण शिल्पगत प्रभावहीनता भी प्रा गई है । 'ढल डुगर : फलं घट्टान', 'सुलतान नेको रो सम्राट' 'लागोपगा', 'आन्धै नै प्रख्या' इत्यादि सुदामा की प्रमुख कहानियां हैं । करणीदान बारहठ ने ग्रामीण परिवेश के बदलते स्वरूप को अपनी कहानियों में चित्रित किया है । 'प्रादमी रो सीग' इनका प्रकाशित कहानी संग्रह है जिसमे पारिवारिक एव सामाजिक समस्याओं को उठाया गया है। टूटती सामन्ती व्यवस्था, गवई जीवन पर राजनीति का बढ़ता प्रभाव और शिक्षा के कारण ग्राने वाले परिवर्तन को करणीदान ने अपनी कहानियों का मुख्य विषय बनाया है । 'दोजख', "चिमनी रो च्यानणो', 'मौत री गोठ' प्रादि उनकी प्रतिनिधि कहानियां हैं। दामोदर प्रसाद शर्मा की कहानियों की संवेदना ग्रामीण एवं शहरी जीवन से जुडी हुई है । मानव मन की भोतरी प्रवृत्तियो के मूक्ष्म संघर्ष को चित्रित करने में दामोदर प्रमाद समर्थ रचनाकार है। 'प्रेतात्मा री प्रीत' नाम से आपका एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुया है। "चितराम', 'प्रेतात्मा री प्रीत', 'हमजोली' प्रादि आपकी श्रेष्ठ कहानिया हैं। मूलचन्द प्रागंश की कहानियों में यथार्थ परिवेश को झलक दिखाई देती है । प्राणेग ने मध्यवर्गीय परिवारों की प्रायिक तगी, विवशता मोर मन्तद्वंन्द्वो को चित्रित - मायुनिक काल : 105 किया है । 'उकलता प्रांतराः सीला सांस' (1973) और 'चश्मदीद गवाह' प्राणेश के प्रकाशित संग्रह है। विजयदान देथा मुख्यत. लोक कथाकार हैं लेकिन 'मलेखू हिटलर' कहानी संग्रह मे इनकी मौलिक कहानियां हैं । देथा ने ग्राम्य चेतना के बदलते रूप और यथार्थ को प्रगतिशील दृष्टि से यथार्थ के ठोस घरातल पर प्रस्तुत किया है । मौलिक कहानियों का शिल्प लोक कथा शैली से प्रभावित है। आजादी के पश्चात् प्राधिक दवावों के कारण सयुक्त परिवार प्रथा का विघटन ठेठ ग्रामांचल तक दिखाई देता है । इस कारण परिवार के आपसी रिश्तों एवं पति-पत्नी के सम्बन्धों में भी नयी प्रकार की जटिलताएं दिखाई देती हैं। राजस्थानी के कुछ कहानीकारों ने इस संवेदना को भी अपने स्तर पर पकडने की कोशिश की है। यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र, रामनिवास शर्मा, रामेश्वर दयाल श्रीमाली प्रादि ने ऐसी कहानियां लिखी हैं । आपसी सम्बन्धों का बदलाव रामनिवास शो की 'सुहागण-मागरण' और यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र की 'बाप और वेटो' कहानियों में दिखाई देता है । औद्योगीकरण और मशीनीकरण ने किस प्रकार अाज के व्यक्ति को जड या मात्र यंत्र बना दिया है, इसका चित्रण रामनिवास शर्मा की 'लैम्पपोस्ट' और 'पातम बोध' तथा रामेश्वरदयाल श्रीमानी की 'सलवटा' कहानियो में दिखाई देता है । श्रीमाली की कहानियां दलित वर्ग की पीड़ा, विवशता और दीनता को प्रकट करने वाली हैं । 'खाजरू', 'जसोदा' प्रादि श्रीमाली की चचित कहानियां है। 'सलवटा' नाम से उनका कहानी संग्रह भी छपा है । अकाल जैसी प्राकृतिक आपदा ने राजस्थान के प्रार्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन को काफी प्रभावित किया है । अकाल की चपेट में आने वाले गावो का खाली होना, पशु धन का मरना और रोजगार की तलाश में भटकते निम्न वर्ग की पीड़ा का चित्रण भी कई कहानियों में किया गया है । मुरलीधर व्यास, (मेह मामो), नृसिंह राजपुरोहित (गांव रो हथाई, 'सिनगारी'), वैजनाथ पवार (घापी, भूवा), रघुनाथसिंह (अकाल ऊपर लो काल) प्रादि ने अकाल पर अच्छी कहानियां लिखी हैं । प्रादर्शवादी, प्रादर्शोन्मुखी यथार्थवादी और अन्त में यथार्थ की पोर उन्मुख होने वाली कहानियों में सामाजिक समस्याओं की प्रधानता रही है। स्त्री-पुरुष और पारिवारिक जीवन की अनसुलझी स्थितियो को मनोवैज्ञानिक रूप भी कई कहानियो में दिखाई देता है । इस दृष्टि से नृसिंह राजपुरोहित, (प्रोब्लम'चाइल्ड, निबली नाड), रामेश्वर दयाल श्रीमाली, रामनिवास शर्मा आदि हैं। ऐतिहामिक कथानको को लोक कथा शैली में प्रस्तुत करने वाले कहानीकारों में लक्ष्मीकुमारी चूडावत 'माझल रातें', 'मूमल', "गिर ऊचा, ऊचा गडा', 'करे चकवा बात' ग्रादि कहानी संग्रह, सौभाग्यसिंह शेखावत, प्रजमोहन जावलिया आदि 106 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास है। इसी तरह पौराणिक और धार्मिक प्रसंगो को आधार बनाकर भी कहानिया सिपी गई है। माशादी के बाद सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्तर पर जो परिवर्तन पाया, उसकी मही अभिव्यक्ति राजस्थानी कहानियों में मई 1970 के बाद दिखाई देती है लेकिन जिस तरह राजस्थानी नयी कविता नै युगयोध के अनुकूल संवेदना ग्रहण को, उसको तुलमा में कहानी आज भी पिछड़ी हुई है। राजस्थानी में आज भी परम्परागत शिप विधान को लेकर कहानियां लिखी जा रही हैं तो दूसरों तरफ कुछ कहानीकारी ने क्या चैतमा के इस परम्परित हप को छोड करे मयार्थवादी कहानियां लिखी है । ऐमे कहानीकारों में सोवर वइया, रामस्वरूप परेश, मनोहरसिंह राठोड, यादय द्र शर्मा चन्द्र, वी. एस माली 'प्रशात', भवरलाल सुधार, चन्द्र प्रकाथ देवल, सवाई सिंह शेखावत, मालचन्द तिवाड़ी, हनुमान पारीक, नन्द भारद्वाज, हरमन यौहान, मोहम पालोक, प्रेमजी "प्रेम', नगा राज पारीक, अमोलक बन्द जांगिड, श्री गोपाल जैन आदि हैं। नयी पीढी के कहानीकारों में मौवर दइया ने पारिवारिक ययार्थ को संवेदनात्मक अनुभूतियो के साथ प्रकट किया है। उनकी कहानियों में जीवन की विसंगतियो, खोखलेपन और अध्यापकीय जीवन को कुठानो पर तीखा व्यंग्य है । 'असवा पमवाडे', 'धरती कद ताई घमेली' और 'ग्रेक दुनिया म्हारी' मांवर दया के तीन प्रकाशित कहानी संग्रह है। दइया की कहानियों के शिल्प में नवीनता और नाटकीयता है । 'हालत' दइया की नाटकीय शैली में लिखी श्रेष्ठ कहानी है अन्य कहानियों में 'गली वणता घर', 'सुकीड़जता प्रांगणा', 'जुड्या कट्पा' प्रोजू बसन्त आदि यथार्थवादी कहानियां हैं। रामस्वरूप परेश ने अपनी कहानियों में मध्यवर्गीय जीवन की गम्भीर समस्याओं को ठोस धरातल पर प्रस्तुत किया है । इनकी कहानिया मानवीय स्थितियों के नये मन्दर्भ उजागर करने वाली हैं। 'उड़ीक', 'मांधी रो अना' मादि कहानियाँ महत्वपूर्ण है। मनोहर सिंह राठौड़ ने अपने प्रासपास की जिन्दगी के जीवन्त पात्रों को तसाग कर मानवीय संवेदना से भरपूर कहानियां लिखी है। 'रोशनी राजीव (1983) इनका प्रकाशित कहानी संग्रह है । इस संग्रह की 'बन्द', 'रोशनी रा जोध' और "विराजारी' श्रेष्ठ कहानिया है । यादवेन्द्र शमा चन्द्र ने समकालीन जीवन की प्रसगतियों को व्यग्यारमक रूप में अपनी कहानियों में प्रस्ट किया है। बी. एन. माली प्रशांत की कहानियो समय सत्य को अपने ढग से प्रकट करती है। काजल री हत्या', 'चिगल्योड़ा हाय', भिखारी' प्रादि चर्वित कहानियां हैं। किती किली क्टको' पशांत का प्रकाशित कहानी संग्रह है। मालचन्द तिवाड़ी की कहानियों में कथ्य और शिल्य को काफी .
माधुनिक काल 107 नवीनता है । 'नाजायज', 'याद' आदि उल्लेखनीय कहानियां हैं। मंवरलाल भ्रमर के 'तगादों' और 'अमूजो कद ताई' दो कहानी संग्रह हैं। भ्रमर की कहानिया प्राम मादमी की पीड़ा, प्रभाव और घुटन को व्यक्त करने वाली है। इन कहानीकारो के अतिरिक्त जिन कहानियो ने यथार्थ चेतना के नये सन्दर्भो को अपने परिवेश में अन्वेपित किया है इनमें 'घोड़ा रो डागदर' (चन्द्र प्रकाश देवल), 'ठस्योडो मून' और 'अकाल मौत' (नन्द भारद्वाज), ताम्र पतर (कृष्ण कल्पित), भीत (हनुमान पारीक), बुद्धिजीवी (मोहन पालोक), जमूरो (ममोलक नन्द जागिड), कूपल (सवाई सिंह शेखावत), खजानो (प्रेमजी प्रेम) प्रादि हैं । आज काफी कहानिया लिखी जा रही हैं । अन्य कहानीकारों में मदन केवलिया, माधव नागदा, मोठेश निर्मोही, चेतन स्वामी, शिवराज छंगाणी, दीनदयाल प्रोझा, मुरलीधर शर्मा विमल, शान्ता भानावत प्रादि हैं। राजस्थानी में लघुकथा लिखने वालों में डॉ. मनोहर शर्मा, डॉ. उदयवीर शर्मा आदि प्रमुख है। इस तरह राजस्थानी कहानी अब धीरे-धीरे यथार्य को प्रोर अग्रसर हो रही है तथा उसमें कथ्य और शिल्प के स्तर पर काफी परिवर्तन हो रहा है। कहानी की भापा चेतना भी रूढ रूप को छोड़ कर प्राज की जीती-जागती स्थितियों से जुड़ कर सामान्य भाषा का रूप ले रही है। नाटक-राजस्थानी नाटक का प्रारम्भ शिवचन्द्र भरतिया द्वारा लिखित 'केसर विलास' (1900) में माना जाता है और यह राजस्थानी का प्रथम नाटक है। इसमें तत्कालीन मारवाडी समाज को ध्यान में रखकर सुधारवादी दृप्टिकोण को अपनाया है। इसके बाद भरतिया के 'फाटका जंजाल' और 'युढापा की मगाई' नाटक प्रकाशित हुए जिनमें सामाजिक कुरीतियों का चित्रण किया गया है । समाज सुधार की भावना से लिखे जाने वाले अन्य नाटकों में भगवती प्रसाद दारुका का 'बाल विवाह नाटक', 'वृद्ध विवाह नाटक', 'सोठया सुधार नाटक', गुलाब चन्द नागौरी का 'मारवाड़ी मौसर' और 'सगाई जंजाल', बालकृष्ण लाहौरी का 'कन्या विक्री' एवं नारायण दाम अग्रवाल का 'याल व्याव को फासं' उल्लेखनीय हैं । इन सभी नाटकों में गामाजिक कुप्रथा, मादसवादी ममाधान और उपदेशमूलक प्रवृत्ति दिखाई देती है। अभिने यत्ता को दृष्टि से इनमें भरतिया के 'केसर विलास' को जैसी सफलता मिली मी अन्य सामाजिक नाटकों को नहीं। मामाजिक नाटकों को परम्परा में मदनमोहन मिद्ध का 'जयपुर की ज्योणार' (1978) काफी लोकप्रिय नाटक रहा है जो दो खण्डों में प्रकागित हुमा । इसके बाद 1929 मे कलकत्ता से ठाकुरदत्त जी दाधीच का 'माहेश्वरी पंचायत से वायस्कोप' नाटक प्रकाशित हुमा । इसको मापा जैमलमेरी है । इसके बाद राजस्थानी नाटकों के क्षेत्र में फिर एक लम्बा अन्तराल दिखाई देता है। - 10 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास पर प्रस्तुत गीतकार भरत व्याम ने दो नाटक 'रंगीलो मारवाड' (1947) और 'ढोला मरवण' (1949) लिसे । रगमच को ध्यान में रख कर लिग इन नाटको ने काफी लोकप्रियता प्राप्त की तया बाद में इन पर फिल्म भी बनी। इन नाटकों पर भी पारसी थियेटर का प्रभाव दिसाई देता है। स्व सूर्यकरण पारीक का ऐतिहासिक नाटक 'मोरा अब प्रकागित हुपा है। इन नाटक में पारीक जी ने मीरा के चरित्र को शोवार्ण सामग्री के प्राधार किया है। इसका रचना काल सन् 1930 मे 1936 के बीच होना चाहिए। भरत व्यास के याद समाज सुधारवादी भावना में जमना प्रमाद पचोरिया का 'नई योनणो' (196) नाटक प्रकाशित हुमा । इसमें नारी के पिछड़ेपन एय अनमेल विवाह की समस्या को प्रकट किया गया है। मामाचन्द भण्डारी का ऐतिहायिक नाटक ‘पन्नाधाय' (196:) मैं प्रकाशित ९मा । इसमें पन्नाधाय जमे अमर चरित्र को बड़ी गलता के माय प्रस्तुत किया गया हैं । राजधानी में इससे पूर्व ऐतिहासिक नाटको मे यी नारायण अग्रवाल या 'महाराणा प्रताप' पहला नाटक कहा जायेगा । महाराणा प्रताप के चरित्र को प्राधार यनार गिरपारीलाल शास्त्री ने भी 'प्रणवीर प्रताप' नाम से मेवाड़ी भाषा नाटक लिसा सत्यनारायण प्रमन ने 'गुदाइ पो जायेडी' माटक लिसा जो 'हराबल' मामिक में धारावाहिक रूप में सपा । यह भी सामाजिक नाटक है मौर रगमच को ध्यान में रगकर लिखा गया है । कपाकार यादवेन्द्र शर्मा चन्द्र ने 'तास रो पर' (1973) पौर बद्रीप्रसार पोगो ने 'पानी पनी पाम' (1973) नाटक लिगे । 'ताम रो घर' माधुनिक जीवन पी रावेदना को सफलता के माय प्रस्तुत करने याला नाटक है। इस नाटक में राजम्यानी नाटक में मुगर का रचनात्मक स्वप नाटकीय प्रभाव में माप प्राद रोता है। पानी पली पाल' हाडौती बोली में सिमा ऐतिहामिक नाटक है जिसमें नारी लिग, मीची, प्रजातन्त्र पार पंचायती राज के महत्व मादि स्थितियों पर प्रभाग नाममा है। नाटक ये माय रंगमय जादमा है और रगमंच का प्याप भी मुगानुाग बना रहा है। पारमी मनियों का प्रमा गमन या और माधुनिक नाटोंग मानिस रंगमय । राजस्थान में माधुनिक रंगमंच का प्रभाव है पसनः ऐगे नारी पिनो माहत नहीं मिला कर भी माराम गृक्षमा का 'पो प्रमा पनप पारा रा दोष नारा' मोर को म्हारो मतो पा, 1. म . , 1983.7.56.
- त्रिलोक गोयल, मानन्द लिईदरमो. उसमें विदिष्ट है.me \ लिए परमगार मंगर." भाधुनिक काल : 109 पी. एल. माली 'प्रशांत' का 'बोलता प्रास', लक्ष्मीनारायण रंगा का 'बह पियो', रामकृपण महेन्द्र का 'म्हार तो गिरधर गोपाल', और 'कहत कबीर सुरगो भाई माधो' तथा गोरयमिह शेखावत का 'तीममारमा' (1988) और 'वग्नीराम' (1989) उल्लेखनीय नाटक हैं । अर्जुन चारण के नाटक रगमंचीय दृष्टि में प्रभावोत्पादक हैं तथा उनका जोयपर व अन्य स्थानो पर मंचन भी हुपा है । 'प्रशात' या नाटक प्राज को राजनीतिक स्थिति पर तौसा प्रहार करने वाला है तो गोरधनसिंह शेखावत का 'तीसमार खां' राजस्थानी का पहला पग्य नाटक पोर 'वस्तीराम' लोक नाट्य शैली में लिषा पहला नाटक है। इस तरह हम देखते हैं कि राजस्थानी नाटक गहरी मम्भावनानों को लिए प्रकट हो रहा है लेकिन उसके विकास को गति मंद है जिसका एकमात्र कारण मंच का अभाव है। एकांकी-नाटक की तुलना में राजस्थानी अंकाको की विकास यात्रा अधिक सन्तोपजनक दिसाई देती है। राजस्थानी में एकारी लेसन की शुरूपात सन् 1930 फै प्रासपास होती है। सन् 1930 में गोमाचद जम्मड का 'वृद्ध विवाह विदूषण' एकाकी मामने प्राया जिसे राजस्थानी का प्रथम एकापी माना जा गश्ता है । राजस्थानी नाटक और रगमच में शोभायन्द जम्मड का महत्त्वपूर्ण पोरान है। इसके बाद 1931 मे श्रीनाथ मोदी पा 'गोमा जाट' एकांकी प्राति नन एकांकी की रचना शैली परम्परित है । 1933 में सूर्यकरण पारीक का मान एकांफी छपा । यह एकाकी प्राधुनिक एकाकी की गली में लिया। 'योलावरण' के बाद एकाको क्षेत्र में भी लम्बा अन्दग:- 1954 मे गोविन्द लाल माथुर का सात एकांकियों का मन होता है । माथुर के सभी एकाकी सामाजिक मारली गए हैं । इस सकलन का 'लालची मा-बाप' दहेज ट ट की। माथुर का दूसरा एकांकी संग्रह 'पंचायत एकांकी विधा के लेखन वो 'मदरार','हार' प्रादि पत्रिकामों में गहरा प्रोत्साहन - मनन एकांकी प्रकाशित होते रहे । गोटिन रेट: एक बालों मे डॉ. मनोहर शर्मा, नगर, मन्द्र सांकृत्य, प्राज्ञाचन्द मास, मकर नारद जोशी, बैजनाथ पंचर, गटर कन्टर, नगर . राजस्काई 110 : राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहाम दिखाई देती है । सामाजिकः गयस्यामों को लेकर लिगे गये एकांकियों में गोविन्द माथुर, निरजननाय प्राचार्य, नारायणदत श्रीमाली, दामोदर प्रसाद शर्मा, नागराज गर्दा प्रादि के एकांकी लिये जा सकते है । गोविन्द माथुर ने मूल रूप में समस्या- मूलक एकाको लिगे हैं। उनके 'सतरगिणी' नाम मे दो गण्डो में एकांकी प्रकाशित हुए हैं। इनमे 'लालची मां-बाप', 'हायटर रो पाव', 'याल विधवा' प्रादि मुम्य एकाकी हैं जिनमें सामाजिक कुरीतियों का चित्रांकन किया गया है। इसी तरह नारायणदत्त श्रीमाली का छिया तावडो', दामोदर प्रमाद का 'तोरगे लाइसेन्स', सुरेन्द्र प्रपल का 'रगत एक मिगस रो' पारिवारिक जीवन, भ्रष्ट शामन व्यवस्था और साम्प्रदायिक उन्माद को प्रकट करने वाले है। ऐतिहासिक एकांकियों में लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत, डॉ. मनोहर शर्मा, प्रामाचन्द भण्डारी, रामदत्त साकृत्य आदि के एकाकी राजस्थान के गौरवमय प्रतीत, शौर्य और वीर परम्परामो को यापी प्रदान करने वाले दिसाई देते है। लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत के 'सामघरमा माजी' में राजपूत ललना का अपूर्व शौर्य, मामाचन्द भण्डारी के 'देम रै वास्त' एकांकी में मां की कठोरता, रामदत्त साकृत्य के 'देस रो हेलो' में प्रताप का स्वातन्त्र्य प्रेम, डॉ. मनोहर शर्मा के 'कवि रो कलक', 'उमादे' 'राजदण्ड' प्रादि एकाकियो में सामन्ती समाज की दुर्बलतामों का चित्रण किया गया है । राजस्थानी के हास्य व्यग्य एकांकीकारों में मालवन्द कोला, गोविन्द माथुर, नागराज शर्मा प्रादि प्रमुख हैं । मालचन्द कोना के 'कुमलो फौज में' (1967) और राजस्थानी हाम्य एकाकी' (1967) दो संग्रह प्रकाशित हुए है । 'राजस्थानी हास्य एकाकी' में तीन हास्य एकांकी श्रीमन्तकुमार व्याम ('गादो रीपूछ', 'पोपावाई से सालो' और 'मामी मू ममखरी') के भी हैं । गोविन्द माधुर के हास्य व्यंग्य एकांकियों में 'कता री मिसाल', 'दायजो मू गो पडगो' और 'रकमक बणगा भवमक' प्रमुख हैं। नागराज शर्मा के हास्य व्यग्य एकांकियों के दो साला 'इबतो चेतो' और 'राम मिलाई जोड़ी' प्रकाशित हुए हैं। समसामयिक समस्यानो पर हास्य व्यंभ्य शैली में लिखे ये एकांकी रंगमच की दृष्टि से काफो मफल हैं । अन्य व्यग्य एकाकियों में 'आपणो खास आदमी' (वजनाथ पवार) सम्पादक की मौत (रावत सारस्वत), 'तोप रो लाइमेन्स' (दामोदर प्रसाद शर्मा) इत्यादि उल्लेखनीय है । इस तरह राजस्थानी मे एकांकी विधा घोरे-धीरे अपना स्वरूप तो बना रही है लेकिन अन्य विधामो की तुलना में कुछ पिछड़ी हुई है । अाज रगमच को प्रावश्यकता है जिससे इस तरह के लेखन को मचित किया जा सके । निबन्ध-राजस्थानी मे निवन्ध विधा का भी अभी तक पूर्ण विकास नही हो पाया है। निबन्ध का प्रारम्भिक रूप शिवचन्द्र भरतिया की राजस्थानी कृतियो (कनक सुन्दर, फाटका जंजाल आदि) को भूमिका में देखा जा सकता है । इसके बाद 'मारवाड़ी हितकारक', 'पच राज' प्रादि पत्रों में भावात्मक तया हास्य व्यंग्य शैली के माधुनिक काल : 111 - निवन्ध प्रकाशित होने लगे। जलाल बियाणी के 'मोगरा कली', 'गुलाब कली' 'बड़ी फंजर को दोवो' प्रादि भावात्मक शैली के श्रेष्ठ नियन्ध माने जा सकते है। बाद में जब 'जागती जोत', 'मारवाड़ी' राजस्थानी आदि पत्रिकाए प्रकाशित हुई तो उनमे भी यदाकदा कुछ निबन्ध छपे । निवन्धो का नियमित लेखन 'मरूवाणी' और 'गोलमो' जैसी साहित्यिक पत्रिकामों के प्रकाश से ही शुरू होता है । इन पत्रिकामो के माध्यम से राजस्थानी में वर्णनात्मक, विचारात्मक, विवेचनात्मक और हास्य-व्यग्य शैली के नियन्य लिखे गये । इन निबन्धों में कही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है तो कही सांस्कृतिक धरातल को उदात्तता; कही वैयक्तिक अनुभूतियों का गहरा स्पर्श है तो कहीं विचार और दर्शन का ठोस रूप और कही साहित्यिक समस्यायों की विवेचना है तो कही व्यंग्य विनोद की अपनी छटा । राजस्थानी के निबन्धकारी में लक्ष्मीकुमारी चूडावन, डॉ. मनोहर शर्मा, रावत सारस्वत, कृष्णगोपाल शर्मा, सुमेरसिंह शेखावत, जहूरखां मेहर, शक्तिदान कविया, बी. एल. माली 'अंशात', डॉ. किरण नाहटा, अन्नाराम मुदामा प्रादि उल्लेखनीय है। चूण्डावत के 'मेवाडी फागण' और 'मेवाडी दिवालो' निबन्ध राजस्थान के मास्कृतिक गौरव को अभिव्यक्त करने वाले हैं। डॉ. मनोहर शर्मा ने धर्णनात्मक और विवेनात्मक निबन्ध लिखे है । 'रोहिड़े ग फूल' (1973), डॉ. शर्मा के व्यंग्यात्मक निवन्धों का संग्रह है । 'राजस्थानी साहित्य की झाकी' प्रापका विस्तृत विवेचनात्मक निबन्ध है। रावत मारस्वत का 'थोथी बातां और कृष्णगोपाल शर्मा 'अनक', 'चोलो', 'ग्रारजू पुराण' श्रेष्ठ निबन्ध हैं । कृष्णगोपाल शर्मा के निबन्धों में पंक्तिकता कां गहरा स्पर्श है । 'सुमेरसिंह शेखावत के निबन्ध ममह 'माणक मांतो' (1988) में राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विविध पक्षों पर मौलिक चिन्तन दिखाई देता है। साहित्येतर विषयो पर सुमेरसिंह शेखावत ने ललित निनन्य भी लिखे है । उनकी भाषा का अपना मुहावरा है तो कथन की अपनी ली। जहूर या मेहर के 'राजस्थानी संस्कृति रा वितरामा' और 'धरमजला घर कोसा' नाम से दो नियन्ध मग्रह प्रकाशित हुए है। ऐनिहामिक परिवेश, गहरी मांस्कृतिक दृष्टि मोर भाषागत' लालित्य के कारण जहर वो मेहर फे निबन्धो को अलग पहबान है । शक्तिदान कविया का 'सस्कृति री सौरभ' नाम से निबन्ध संकलन छपा है जिसमें सांस्कृतिक चेतना की गहरी' सवेदनानों को उद्घाटित किया है। डॉ किरण नाहटा फे 'भल लुप्रा बाजो कत्ती निवन्ध सग्रह में विवेचनात्मक शैली के दर्शन होते है । बी. एल. माली 'यगांत' के दो निबन्ध संग्रह 'माटी मजाक' और 'तारा हार्द रात' प्रकाशित हुए है इनमे चिन्तन पक्ष की प्रधानता दिखाई देती है। युलाकी शर्मा के 'कवि, कविता और घर प्राली' संग्रह में व्यग्यात्मक गली में लिसे गये निवन्ध है।
112 : राजस्थानी माहित्य का संक्षिप्त इतिहास इन निबन्ध सग्रहों के प्रतिरिक्त पत्र-पत्रिकामों में जिनके निबन्ध छपते रहते हैं उनमे श्रीलाल नयमल जोशी, दीनदयाल प्रोझा, मूलचन्द प्राणेश, सूर्यशंकर पारीक, महेन्द्र भानावत, विलोक गोयल ग्रादि हैं । निबन्ध विधा में प्राज भी अपेक्षित प्रौढ़ता का अभाव है। समालोचना-राजस्थानी पत्र-पत्रिकामों में समय-समय पर समीक्षात्मक लेख प्रकाशित होते रहे हैं। राजस्थानी कृतियों के आधार पर अभी तक कोई सर्वांग समीक्षात्मक ध नहीं छपा है और न किसी ने समीक्षक जैसे गम्भीर दायित्व के आधार पर रचनात्रों के गुण-दोपों को ध्यान में रखकर रचनाकारों का मार्ग प्रशस्त ही किया है । इम दृष्टि से समालोचना का प्रभाव अब तक बना हुआ है । आधुनिक रचनात्मक साहित्य को लेकर 'हरावल', 'दीठ', 'जागती जोत', 'मरूवाणी', 'गोलमो' प्रादि पत्रिकामो मे कुछ लेख एवं समीक्षात्मक टिप्पणी छपी है । 'मरूवाणी' और 'जागती जोत' पत्रिका के 'समीक्षा अक' भी प्रकाशित हुए जिनमें प्रकाशित पुस्तको की समीक्षा एव साहित्य की विधानो पर कुछ लेख प्रकाशित हुए हैं । राजस्थानी मे नये रचनाकारों ने समीक्षा की शुरूपात अवश्य को है भले ही इनमें तटस्थता का प्रभाव हो । डॉ. तेजसिंह नोघा, नन्द भारद्वाज, डॉ. गौरधनसिंह शेखावत, डॉ. रामवक्म, डॉ. किरण नाहटा, डॉ. पुरूपोत्तम प्रासोपा, डॉ. मदन केवलिया, प्रोकार पारीक प्रादि कुछ नये समीक्षक हैं। डॉ. तेजसिंह जोधा की समालोचना मे मौलिक दृष्टि एवं विषय वस्तु को गहराई से समझने की सामर्थ्य दिखाई देती है। 'राजस्थानी अक' (भूमिका), 'दीठ' और 'हेमाणी' ('परम्परा' का अक) अक के समीक्षात्मक लेख इमके प्रमाण है। नन्द भारद्वाज की समीक्षात्मक कृति 'दोर पर दायरो' मूल्याकन को अपनी प्टि लेकर चलती है। इसी प्रकार 'सिरमण री परख' डॉ. पुरूपोतम प्रासोपा के समय-समय पर प्रकाशित समीक्षात्मक लेसों का मग्रह है। गद्य साहित्य को अन्य विधाएं : राजस्थानी में जीवनी रेखाचित्र, संस्मरण, यात्रावृत्त, इन्टर ब्यू, गद्यकाव्य प्रादि माहित्य विधामो में भी कुछ लिखा गया है लेकिन अन्य गद्य विधानों की तुलना में बहुत कम । इनका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-- जीवनी- राजस्थानी में जीवनी साहित्य आजादी के बाद लिखा गया है तथा 'मरूवारणी', 'पोलमो', 'हरावल' प्रादि पत्रिकामो में समय-समय पर सन्तों, महात्मामों, लोकप्रिय माहित्यकारों, कवियो प्रादि की जीवनी प्रकाशित होती रही हैं। श्रीलाल नयमल जोगी को गाधीनी की जीवनी 'पापणा बापूजी' (1969), डॉ. किरण नाहटा की 'शिवचन्द्र भरतिया' (1970), दीनदयाल मोझा को 'देस रा गौरव' (1972) 'भारत रा निर्माता' (1972), 'छोटी उमर : बड़ा काम' (1972), शान्ता भानावत को 'महावीर रा मोलवाण' ग्रादि उल्लेखनीय रचनाएं हैं ।
माधुनिक काल : 113 रेखाचित्र-राजस्थानी में रेखा चित्र लगभग 1946-47 के ग्रामपाम लिये जाने लगे । भवरलाल नाहटा का 'लाभू बाबो' प्रथम संस्मरणात्मक रेखाचित्र है। 1946 में श्रीलाल नथमल जोशी का 'फरामल' रेखा चित्र प्रकाशित हुना। इसके बाद धीरे-धीरे इस विधा में पत्र-पत्रिकायो मे रेखाचित्र छपने लगे। रेखाचित्र लिखने वालों में मुरलीधर व्यास, श्रीलाल नथमल जोशी, मोहनलाल पुरोहित, शिवराज छगाणी, नेमनारायण जोशी, सूर्यशंकर पारीक, मोकार पारीक आदि प्रमुख है । 'जना जीवता चित राम' (1960) में मुरलीधर व्यास और मोहनलाल पुरोहित ने ममाज के उपेक्षित पात्रों को अपने रेखाचित्र का विषय बनाकर मानवीय संवेदना का परिचय दिण है। श्रीलाल नथमल जोशी के 'सवडका' (1960) मे अपने निकट मम्पर्क में आने वाले व्यक्तियो की मधुर स्मृति को प्रस्तुत किया है। इनमें कुछ हास्य-प्रधान रेखाचित्र भी हैं। भंवरलाल नाहटा की 'बानगी' (1965) शिवराज छंगाणी की 'उणियारा' (1970) व्रजनारायण पुरोहित की 'अटारवा' (1970), 'वकील साहब' (1974) ग्रादि कुछ रेखाचित्री की उल्लेखनीय कृतियां है जिनमे सवेदनापूर्ण रेखाचित्र लिखे गये है । अन्य रेखाचित्र लिखने वालों में दाऊदयाल जोशी (भैसो होय न मिनख री बोली बोल), ओंकार पारीक ('हेमी', भागीरथजी) आदि हैं। के संस्मरण लिखने वालों में मुरलीघर च्यास, मोहनलाल पुरोहित, मंवरलाल माहटा, श्रीलाल नथमल जोशी, ब्रजनारायण पुरोहित आदि है । प्रनाराम सुदामा की 'देस-दिसावर' (1975) कृति मे यात्रा के सस्मरण तिखे है । यात्रावृत्त कम लिखे गये हैं फिर भी रामकुमार प्रोझा बुद्धिजीवी, (जात्रा अमरनाथ धाम री), कल्याण सिंह राजावत (तल्लीताल-मल्लीताल नैनीताल) प्रादि यात्रा-वृत्तान्त रोचक हैं। इन्टरव्यू-राजस्थानी में इस विधा का भी अच्छा विकास हुमा है ता "विणजागे', 'माणक', 'परम्परा' (हेमारणी अक) मादि पत्रिकामो मे विविध क्षेत्रो र काम करने वाले लोगो के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की झांकी इस विधा के माध्यम से प्राप्त हुई है। डॉ तेजसिंह जोधा ने 'माएक' में 'मामी-मामी स्तम्भ' के अन्तर्गत भलग-अलग क्षेत्रो के लोगों के. इन्टरव्यू लिये हैं (शिवचरण माथुर, प्रताराम सुदामा, गजसिंह भादि)। डॉ. गोरधनसिंह शेखावत ने 'बिरगजारो' पत्रिका में डॉ. मनोहर शर्मा, विमलेश, दूलिया राणा, भावरमल शर्मा प्रादि के इन्टर व्यू लिये हैं । 'परम्परा' के 'हेमारणी' अंक में प्राधुनिक कवियो के लिए हुए इन्टरव्यू :उनके व्यक्तित्व, रचना- प्रक्रिया प्रादि को स्पष्ट करने वाले हैं । ऐसे इन्टरव्यू में नारायणसिंह भाटी में लिया गया डॉ. तेजसिंह जोधा का, सत्यप्रकास जोशी और चन्द्रसिंह में लिया गया नन्द भारद्वाज का मोर रेवतदान चारण से लिया गया मोह्नदान चारण का इन्टरव्यू उल्लेखनीय है।
114 : राजस्थानी साहित्य का संक्षिप्त इतिहास गद्य काव्य-गद्य काव्य का प्रारम्भ राजस्थानी में 1946 में चन्द्रसिंह द्वारा 'राजस्थानी' पत्रिका में प्रकाशित 'सीप' से प्रारम्भ होता है। इसके बाद गद्य काव्य की प्रवृत्ति विकसित होती है जिसमें कन्हैयालाल सेठिया, मुरलीधर व्यास, वैजनार्थ पवार, लक्ष्मीकुमारी चूण्डावत, डॉ. मनोहर शर्मा, गोविन्द अग्रवाल, माणक बंधु तिवारी आदि प्रमुख है। कन्हैयालाल सेठिया की 'गलगचिया' (1972), चन्द्रसिंह की 'बालसाद', गोविन्द अग्रवाल की 'नुक्तीदाणा' (1978) आदि उल्लेखनीय कृतिया हैं । " अनुवाद-~-राजस्थानी मे अन्य दूसरी भापानी के साहित्य से भी महत्त्वपूर्ण रचनाप्रो के अनुवाद वरावर होते रहे है । राजस्थानी में संस्कृत, अंग्रेजी, बगला, उर्दू एक विदेशी भाषाम्रो की प्रतिष्ठित कृतियो एव रचनात्रों के अनुवाद दिखाई देते हैं । अनुवाद की दृष्टि से चन्द्रसिंह ('रघुवंश', 'गाथा सप्तशती', 'मेघदूत')डॉ. नारायणसिंह भाटी (मेघदूत), डॉ मनोहर शर्मा ('रवीन्द्र वाणी' 'मेघदूत 'उमर खय्याम'), मनोहर प्रभाकर ('उमर खयाम', 'भरथरी सतक'), विश्वनाथ शर्मा विमलेश (भगवद्गीता). किशोर कल्पनाकांत ('रितु सहार', 'नप्ट नीड़', 'शेक्सपीयर री गता'), रामनाथ व्यास परिकर (लेनिन कुसुमाजली-रूसी भाषा से), रावत सारस्वत (जफरनामोः यसरी गाथा सप्तशती, रिग्वेद की रिचवा), जोगीदान कविया (कुरान की आयतां), युसूफ झुन्झनवी (गालिय राजस्थानी) आदि के अनुवाद उल्लेखनीय हैं । अन्य अनुवादको मे गिरधारीलाल शास्त्री, टॉ नृसिंह राजपुरोहित, गोविन्द माथुर, मागीलाल चतुर्वेदी पाई. के शर्मा, कृष्णगोपाल कल्ला, भगवतीलाल शर्मा, सत्यप्रकाश जोशी देवदत्त नाग प्रादि हैं। नयी पीढी मे डॉ. तेजसिंह जोधा,. नन्दं भारद्वाज पारम परोड़ा, डॉ गोरधनसिंह शेखावत, प्रोकार पारीक, मनोहरसिंह राठौड ने विदेशी रचनात्रों के अनुवाद किये हैं । इनमे डॉ. तेजसिंह जोया के किये अनुवादो को राझ्या सबमे अधिक है । उन्होने 'रमूल हमजातोव' को कवितामो के अनुवाद के अतिरिक्त फ्रेंच, जर्मन, हमी, बंगला, पंजावी मैथिली प्रादि रचनामों के श्रेष्ठ अनुवाद किये हैं । पत्र-पत्रिकाएं- रचनात्मक साहित्य को प्राग बढ़ाने में पय-पत्रिकानों का महत्त्वपूर्ण योगदान है । अाजादी में पूर्व कुछ ऐमी पत्रिकाएं थी जिनमे राजस्थानी की रचनाएं छपा करती थी । इन पत्रिकामो में 'वेश्योपकारक' (कलकत्ता), 'महेश्वरी' (अलीगढ़); 'पंच राज' (नामिक), 'हम' (इलाहाबाद), विशाल भारत (फलकता), 'मारवाडी' (अहमदनगर), 'माग्वाडी भास्कर' (शोलापुर), 'प्रागीवाण' (ब्यावर), 'राजस्थानी (कलकत्ता) प्रादि प्रमुख हैं। राजस्थानी के रननात्मक लेपन को प्रकाश में लाने एवं रचनाकारो को प्रोमान देने में 'मावाणी' (जयपुर) और 'मोसमो' (रतनगढ) जैसी साहित्यिक पतिमो ना ऐतिहामिक महत्त्व है । इसके बाद राजस्थानी में 'जाणकारी' (जोधपुर), 'जलम भोम' (वीगनेर), 'हरावन' (जोधपुर), नणमी (कलकत्ता), 'राजस्थती' प्राधुनिक काल : 115 (गरगढ), 'जागती जोत' (बीकानेर), हेलो (बीकानेर), अोलखाण (जोधपुर), 'राजस्थानी ग्रेक' और 'दीठ' (रणमासर), 'वाचनार' (अंता), 'इमरलाट' (जयपुर), 'अपरंच' (जोधपुर), बतलावरण (पिलानी), बिणजारो (पिलानी), गोरबद (लक्ष्मणगढ़), मरत्रण (बीकानेर), पणिहारी (जयपुर), 'माणक' (जोधपुर), प्रादि है । डॉ. तेजसिंह जोधा में सम्पादन-कुशतता और मौलिक दृष्टि दिखाई देती है जिसके कारण उन्होंने 'राजस्थानी अक', 'दीठ' और 'हथाई' जैसी बहुचर्चित साहित्यिक पत्रिकाओं को जन्म दिया तो 'माणक' जैसी व्यावसायिक पत्रिका को शुरूपात भी की। 'मरूवाणी' और 'गोलमों' के बाद 'हरावल' पत्रिका ने साहित्यिक रचनामों को प्रकाश में लाने का सराहनीय कार्य किया। 'अपरंच', 'राजस्थली' और 'जागती जोत' पत्रिकामो ने युवा पीढ़ी के रचनाकारों को खूब छापा है। बालोपयोगी रचनाओं के लिए 'झुझरिणयो' (लक्ष्मणगढ) एक मात्र मासिक पा रहा है जिसमे डॉ. मनोहर शर्मा, बी. एल. माली, अशात, भानसिंह 'मरूधर', सवाईसिंह धमोरा आदि की वालोपयोगी रचनाए प्रकाशित होती रही है। राजस्थानी में साहित्यिक पत्रिकाएं निकली और आर्थिक सकट के कारण बन्द हो गई अब 'मारणक', 'जागती जोत', 'विराजारो' आदि कुछ नियमित पत्रिकाएं हैं अतः राजस्थानी में पत्रिकामो का प्रभाव ही माना जायेगा। मूल्यांकन -राजस्थानो गद्य साहित्य की विविध विधानों की उपलब्धि का मूल्यांकन करें तो ऐसा प्रतीत होता है कि कहानी को छोड़कर शेप विधाप्रो मे बहुत कम रचनाए उपलब्ध होती है फिर उपन्यास, नाटक, एकाकी या अन्य गद्य विधानी में केवल कहानी ही ऐसी विधा दिखाई देती है जिसने समसामयिकता और प्राधुनिक संवेदना को ग्रहण किया है। इतना अवश्य है कि गद्य मे अब लिखना प्रारम्भ हुआ है तथा धीरे-धीरे उसमें नवीन प्रवृत्तियों का समावेश होता जा रहा है। आजादी के बाद की परिस्थितियों ने राजस्थानी के रचनाकार को झकझोरा है, फलत: उसने आज की राजनीति, जड व्यवस्था प्रादि पर गद्य में तीवा व्यग्य किया है । उपन्यास, नाटक, एकाकी, रेखाचित्र, संस्मरण आदि मे कथा और शिल्प की विविधता का अभाव है, फिर भी इस बात की प्रसन्नता है कि राजस्थानी का गद्य अपना स्वरूप बनाने की दिशा मे अग्रससर हो रहा है। 000
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