Sanmati Library, Jaipur
Awatar Memansa
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अवतर मीमांसा
भीमापरसंहसावतंस मिडिशा निष्णात पानि
कविवर्य श्री स्वामिकालिगोपाख्यान
विनिर्मिता
मोडलस्य मोती संस्कतं पाठयालाध्यापक
मावोहरेषविरचितया सरलार्य
भाषा कोपेता
पुरास्थ
संसाध्यापक
पाक्षिणा संशोषिता
जिसको
श्रीराम महत परमानन्दजी
मावानुसारगोर
सिटी निवासी सन्त संधी सेठ देवीदास फकीरमाई
पसरवाळेबमारिया ने स्वरव्य व्यय में
धमा करें प्रकाशित किया।
सार्विकार खरक्षित
स
संशत् १९८१
सन् १९२४
का पञ्चकम् । कश्चि ध्यान परायणो मृगते, कृष्णं स्वकीये हृदि, घेदान्तेषु यति बिचार चतुरो, मन्ता सुनिः स्वातानि । कश्चिज्ज्ञश्च चराचरेप्यचपलो, नाना क्रिया कर्म सु. कालिन्दी पुलिनेषु तच मृगये, काहिस्त्वहं कश्चन ॥१॥ वैकुण्ठे विविधाश्च वैष्णवजना, जानन्ति कृष्णं स्थितं, गोलाके गुरवश्च केचन सदा, क्षीराब्धि धाग्नीश्वरम् ।। लोके केचन केशवं भूतिवचो, भित्रंहाणो वैदिका, जाने नन्द नृपालये तमधुना, काणिस्त्वहं कश्चन ॥२॥ कृष्णं चारु चतुर्भुजश्च चतुरा, जानन्ति पौराणिका, ईशं केचन भास्करं त्रिनयनं, नागाननं केवन । जाने तं परमेश्वरं द्विनयनं, कृष्णं द्वि बाई मजे, वंशी वादन .तत्परं प्रियवरं, काशिवह कञ्चन ॥३॥ पूर्ण निर्गुण मक्रियं चितिमयं, ज्योतिः स्वरूपं विभु, मानन्दं तनु नाम रूप विधुरं, काश्विजनो मन्यते ॥ वृन्दारण्य कदम्ब कुज ललिते, रामोत्सवे स प्रियं, मन्ये नृत्यपरं प्रभु प्रिय तरं, काणिस्त्वहं कश्चन ॥ ४ ॥ शीर्षेबहधरं सु चेतस कर, विनाधरं श्यामलं, मन्ये वे वनमालया मणि मयः, भी मण्डनै मंण्डितम् ॥ गोपं गोप युतञ्च धेन्वनुगतं, ब्रहा द्वितीयं परे, वामं काम कदम्ब कान्ति कवलं, काणिस्वहं कश्चन ॥५॥ इति श्री स्वामि काणि गोपालदास विनिर्मितं कागिपञ्चक समाप्त।
हार्दिक धन्यवाद पत्र श्री मत्परमहंसावतंस बाजकाचार्य निखिल शास्त्र निष्णात ब्रह्मनिष्ठ श्री १०८ स्वामी कोणि गोपालदास महाँ- राज जी को, कोटिशः हार्दिक धन्यवाद हैं। जिन्होंने लोको- पकारार्थ, संस्कृत तथा प्राकृत भाषा में भगवत्प्रेमियों के हितार्थ श्रुति स्मृति अनुसार अनेक ग्रन्थ रचकर, अति दुस्तर दुवोध उपासना और ज्ञान मार्ग को अत्यन्त स्पष्ट दिखा दिया है। और अतीव अनुग्रह दृष्टि से अस्मदादि बहिर्मुख पुरुषों को भगवत्यम मार्ग तथा भगवत नामस्मरण का यश श्रवण कराकर मोक्ष मार्ग में उपस्थित किये हैं। तिस में भी-ईश्वरा- वतार सम्बन्धि अनेक शंकाय होने से, ईश्वरावतारोपासक भगवतानुरागि पुल्पों के संदेह निवृत्त्यर्थ "अवतार मीमांसा" ग्रन्य संस्थत में रचते भये। परन्तु संस्कृत होने से सो अन्य सर्व साधारण के उप- योगी न होता भया । इस लिये सर्व के सुलभ विज्ञानार्थ- गोकुलस्थ रतमोती संस्कृत पाठशालाध्यापक पं० माधव मनोहर शालिजी ने सरलार्थ भापा टीका से भूषित किया है। यद्यपि भगवत्सम्बन्धि ग्रन्यों के निर्मित होने से, भगवता- नुरागी पुरुषों को परमानन्द होता है, तथापि-मुद्रित हुए विना सर्व के उपकारिक नहीं हो सकता यह विचार कर- कनखल के श्री स्वामी महंत परमानन्द जी तथा पेधोर के श्री स्वामीमहंतसच्चिदानन्दजी औरमहावन केश्रीस्वामी भास्करा 'नन्दजी केत्राज्ञाकारी सेवकभक्त.मंगोलाल होतीलाल रामचन्द वा बाबूलाल जी, तथा भतगवत्कृपापात्र मथुरा के बाबू नवल किशोर कपूर, और जैत्री के भक्त विहारीलाल नन्दलाल इन सर्व उदारत्मा भगवत्प्रेमी महानुभावों ने कहा, कि-इसकी छपाई का जो खर्च होगा,वो हम सर्व मिल कर करेंगे।इन महानुभावों कर उत्साह बढ़ाने से ही मैं ने अवतार मीमांसा छपना प्रारम्भ करा दिया। परन्तु बीच में ही बंगलोर निवासी भग- वत्कृपा पात्र संत सेवी सेठ देवीदासजी ने अत्यंत हर्षदायक पत्र भेजा, कि-अवतार मीमांसा की छपाई का जो कुछ सर्च हो, सो मेरी तरफ से हो, यह प्रार्थना अवश्य ही स्वीकार की जाय, अतः ऐसे धर्म विवसाई दानवीर सेट देवौदाम जी को शतशः धन्य पाद है, केवल यह मेरा हो कथन नहीं है, किंतु उपरोक्त महात्माजन तथा हरि भक्त सर्व ही श्रापको हार्दिक शतशः धन्यवाद प्रदान करते हैं । जो न्यायोपार्जित निजद्रव्य व्ययसे भगवत्सम्वन्धि सदग्रन्यो को श्राप छपाकर धर्मार्थ प्रदान करते हैं। शुभं भूयात विशेपु- भवदीय कृपा कांक्षि- कार्ष्णि हरिनामदास, भिक्षु ।
ga
श्री वृन्दावनविहारिणे नमः
श्रीमत्परमहंसावतंस निखिल शास्त्र निष्णात ब्रह्मनिष्ट
श्री १०८ स्वामि कामि गोपालदास जी
गोलोक निवासी का संक्षिप्त
* जीवन परिचय *
शतशः धन्यवाद उस करुणामय परिपूर्ण परमपिता
परमात्मा को है, कि जिसने लोक में भगवत्प्रेमाभक्ति के वृद्धि
निमित्त भगवत्म अनन्य भावादि देवी गुण युक्त श्रीकाणि जी
को प्रकट किया है। जिनके दर्शन संभापण से अस्मदादिक
बहिर्मुख पुरुषों को यदकिंचित्भगवतोम का लवांश प्राप्त
हुआ है। उन श्रीकार्णि जो ने श्राजन्म साधुता के गुणों को
धारण करके स्वकर्तव्य का पालन किया है । इसी तरह हम
आशा करते हैं, कि उनके चरित्र को अवलोकन कर तथा उनके
निर्मित ग्रन्थरूप उपदेशों से शिक्षा प्राप्त कर भगवत्में अनन्य
प्रेम को प्रगट करते हुए स्वजन्म को सफल करेंगे।
(१) जन्म भूमि देश पंजाब, प्रांत सरहद, जिले हरिपुर
• हज़ारा, मौजे वगड़ा, में सम्वत् १९१९ फाल्गुण मिती ३ को
द्विजाती कुल, भार्गव गोत्र में जन्म पाया, और भगवानदास
नाम रखागया, पिता का नाम जुवाहरमल था, और पांचवें वर्ष
मुण्डन कृष्ण जन्माष्टमी को हुश्रा, दसवे वर्ष जनेऊ, और
चौदहवे वर्ष संवत् १९३३ में विवाह हुश्रा, तथा अठारहवे वर्ष
एक कन्या उत्पन्न हुई।
(२) विद्यारम्भ-जनेऊ होने के बाद कुलाचार्य पंडित
जयराम शर्मा जी से कुछ व्याकरण तथा धार्मिक विद्या
(क) अध्ययन की, और मास्टर श्यामसिंह जी से व्यवहारिक विद्या की शिक्षा प्राप्त की, परन्तु गृहस्थाश्रम में भी भगवत्प्रेमी हरि भक्तों में, और साधु महात्माओं के सत्संग की, अधिक रुचि रहती थी, और व्यवहार ऐसा शुद्ध था, कि श्रावाल वृद्ध सर्व प्रशंसा ही करते रहते थे, तथा माता पिता श्रादि की सेनाभी श्राप पूर्व ऋपियों की नाई किया करते थे, परंतु चित्त में यही विचार रहता था, कि-कर इस आश्रम को त्यागकर स्वतंत्रता से गंगादि के तट पर वास कर अनन्यभाव द्वारा भगवत्स्मरण करू, इस प्रकार निष्काम कर्म करने से चित्त अत्यात गुद्ध होकर संसार से उपरामता को प्राप्त होते भये, उसी समय पिताजी का स्वर्गनिवास हुआ, तव श्राप स्वतंत्र होगये अत्ययंत वैराग्य के कारण वीस वर्ष की ही अवस्था में गृहस्थाश्रम को त्याग दिया। (३) सन्यास धारण-धीस वर्षको अवस्था तक ब्रह्मचर्य, गृहस्थाश्रम वानप्रस्थ रहे, उसके बाद मधुपुरी"श्रीमथुराजी में श्रीमत् परमहंस स्वामि कार्पिण शानदास जो से सम्बत् १८४० में विधि पूर्वक संन्यास ग्रहण किया । तब से नाम श्री स्वामि गोपालदासजी हुअा। उससमयसे निवास आपका भीव्रज भूमि में ही रहा। तव स्वस्वामिजी से विशेष व्याकरण और वेदान्त तथा श्री मद्भागवतादि श्राप ग्रंथों का अध्ययन किया। परन्तु बीच में ब्रजमंडल श्री जगन्नाथ जी हरिद्वार ऋपिकेश पंजाय कीयात्रास्व स्वामिजी केसाथ भी की। और एक समय स्वामि जी की आज्ञानुसार स्वासहचारी महात्माओं (स्वामि नरोत्तम दास जी, स्वामि हीरानन्दजी) के साथ चारों धाम और साता पुरियों की यात्रा को जाते भये उस समय उड़ीसा, मद्रास, वम्बई, दक्षिण, मध्यदेश तथा हिमालय की यात्राको भी करते भये । स्वपूज्यवयं गुरू महाराज जी के गोलोक निवास के (ख) । - वाद स्वतन्त्रता से विचरने लगे। कभी काशो, चित्रकूट, हरि द्वारादि शुभ स्थानों पर तथा गंगा यमुना के मध्य में विचरते भये । परन्तु अधिक निवास ब्रजभूमि में ही होता था, उनही दिनों में ज्ञान, वैरीग्य भगवत्प्रेमाभक्ति के परिवर्द्धक अनेक ग्रन्थ भगवत् रसिक महात्माओं की प्रेरणा से बनाये । इसके पीछे सम्बत् १९६८ से विशेषता कर, हरिद्वार कनखल, चेतन देवाश्रम्, महावन, जयश्री पैघोर, वृन्दावन इत्यादि स्थानों में निवास होता रहा । ग्रीष्म ऋतु में हरिद्वार और चातुर्मास व्रज में तथा शीतकाल जयश्री में निवास करते थे। इस समय भी भगवद्भति तथा नीति मिश्रत वेदांत ग्रन्थ कई निर्माण किये । आज पर्यन्त श्रापका विद्यादि सद्गुणों का भाण्डार केवल हृदय मंजूपा में ही पूर्ण रहा, वो हरिद्वारादि शुभ स्थानों में भगवत्प्रेमी रसिक महात्माओं की अत्यन्त प्रेरणा से श्री मद्भागवत् तथा गीतादि सग्रन्थों के व्याख्यान द्वारा प्रगट करते भये । उस काल में चेतन देवाश्रम में उपस्थित श्रोतागण अपने जन्म को तथा हरिद्वार यात्रा को सफल मानते भये। और मुक्त सुख से घोषणा करते भये, कि-जैसा शास्त्रों द्वारा वक्ता का लक्षण “निर पेक्षादि" श्रवण किये हैं सोसर्व आप में पाये जाते हैं। उस समय आपके सद्धर्मोपदेश और.साधुता की कीर्ति पंजाय, सिंध, मारवाड़, पूर्व गुजरात, दक्षिणादि सर्व देशों में फैल जाती भई । उसका प्रभाव इतना पड़ा जो भगवत्प्रेमी थोड़े काल के लिये हरिद्वार आते थे, वो नियम से अधिक काल निवास करके अर्थात् घर से अनेक चिट्ठी पत्री श्राने पर वापिस होते थे। (४) स्वभाव श्रीस्वामि जी बड़े दयावान्, मिलनसार, वीत रागता, निष्किञ्चनता, सारग्राहिता, नम्रता, उदारता,भगवत्परायणतादि सद्गुणों से युक्तथे। आपके (ग) पास जिस किस्म का पुरुप श्राता था वो आपके वचनामृत रूप सद्धर्मोपदेश श्रवण द्वारा, स्व, स्त्र, संदेह निवृत्ति पूर्वक भगवतोपासना स्वीकार कर, अत्यंत हर्प को प्राप्त होकर जाते थे, निष्किञ्चनता श्रापको ऐसी थी, फेई भगवत्प्रेमी मारवाड़ी कलकत्ते के तथा झांसी के गुजरात के, आपके चरणों में द्रव्य समर्पण की इच्छा कर प्रार्थना किया करते थे, परंतु आप स्वधर्म में ऐसे शुद्ध थे, कि साफ़ जवाब देते भये, कि हमको इस माया जाल में मत फंलाश्री, जहां तुम्हारी इच्छा हो वहांसर्च करो, आज पर्यन्त सवा नितिके प्रवृत्ति अङ्गीकारही नहीं की। (पञ्च तत्व तिथि ) इकसठ (६१) वर्ष की अवस्था में शनिवार. पीपे शुदी ६ सम्बत १६७६ सूर्य उत्तरायण काल में गोलोक निवास ब्रजमण्डल के अत्यन्त समीप राज्य भरतपुर मुकाम जै श्री नन्दवंशीय भक्त विहारी लाल नन्दलाल जी के परमहंसाश्रम में हुआ। और मथुरापुरी मध्य जल समाधि दी गई थी। यद्यपि आपका जीवन बहुत विस्तृत है; और सम्पूर्ण मेरे को मालूम भी नहीं है । तथापि अापके सत्संग से जो कुछ श्रवण किया था, उसको संक्षप से लिखकर, काणि समूहकी सेवा में समर्पण करता हूं। यदि सम्पूर्ण लिखें तो एक दूसरा ग्रन्थ त्यार हो जाता, इस लिये इसका नाम "जीवन परिचय" रक्खा है । यह सब काणि जलाप को श्राज्ञानुसार लिखा गया है। ॥ इत्यलं विशेषु॥ दो०-काणी हरिनाम कश्चिद, नियतवास से होने । काणि गुरु की झपा से, यद किञ्चित लिख दीन । भवदीय- काणि हरिनाम दास भिनु ।
रस्तावना संसार में जीवमात्र अत्यंत दुःख निवृत्ति तथा परमा- नन्दरूप मोक्ष की अभिलाषा करते हैं। क्यों-कि-मोक्ष को प्राप्तः हुआ यह अधिकारीपुरुप,पुनःजन्म मरणादिक संसार चक्र को प्राप्त होता नहीं । यह वार्ता लोक विपे प्रसिद्ध है, तथा "नस पुनरा वर्तते" "यगत्वा ननि वर्तन्ते" "अनावृत्ति शब्दात इत्यादि अति-स्मृति, सूत्र करके भी प्रसिद्ध ही है । परन्तु-प्रथम तो परमात्मा के पवित्र यश का श्रवण व कीर्तन विना, द्वतीय नाम स्मरणरूप, त्रितीय ध्यानरूप, इन तीन साधनों के विना, परम कल्याणरूप मोक्ष की प्राप्ति अतीव दुर्लभ है । "मन मोदक नहिं भूख बुझाई" इस न्यायानुसार कर्तव्य से ही, सच्छात्रों में व्यासादि मुनीश्वरों ने विविध स्थलों पर सवि- स्तार वर्णन किया है, अतः भगवत् नाम स्मरणादि से ही परम पद की प्राप्ति है । तथापि इदानमें काल के नवीन मताव- लम्बो शालाशय शुन्य स्वपंडित मन्य, ईश्वरावतारोपासनादि मोक्ष के साधनों से अत्यंत दूर भागते हैं । जो-कि-ईश्वरावतार इतना शब्द श्रवण मात्र से ही चौक पड़ते हैं, और सहसा कह देते हैं । कि-ईश्वर का अवतार नहीं हो सके. है । यदि.तुम पुराणों के प्रमाणों से अवतार सिद्ध करो, तो हम पुराण मानते ही नहीं है, क्योंकि-पुराण तो पोपजी का गप्य है। कंचल वेद को ही प्रमाण हम मानते हैं । ऐसे विचार कुशलं पुरुषों का पुराण प्रमाण्य नहीं मानना, प्रायः स्वभाव सिद्धही. है। क्योंकि-पुराणों को प्रमाणीक मानें, तय पुराण तो राम कृष्णादि को भगवदवतारत्व के निरूपण में अग्रणी ही हैं।
(घ) फिर तो अवतार विषयक शंकाका अवकाश ही नहीं होसकता इसलिये ऐसे आस्तिक मन्य प्रथम से ही पुराणों को तिलाञ्जली दे बैठते हैं। परञ्च-राम कृपणादि अवतारों के विपय अनेक प्रश्न पुराणों के आधार को लेकर ही करते हैं । कि-रामजी सीता के वियोग से वन में शोक करते भये, और कृष्णजी ऊखलादि से वांधे गये इत्यादि शंकायें करते हैं। यदि उनसे पूछा जाय, कि-पुराण तो आप मानते नही, और औरामचन्द्र जी का सीता के वियोग ले विकल होना,तथा श्रीकृष्णजीका ऊखलादि सेवांधा जाना यह वेद में कहां लिखा है। यदि इस विषय में पुराण का वाक्य कहो, तो उसको तो तुम प्रथम ही अप्रमाण मान चुके हो, यदि कहो कि-किसी अंश में पुराणों को प्रमाण मानते हैं, तो एकही ग्रन्थ को किसी अंश से प्रमाण मानना, तथा किसी अंश विपे नहीं,.यह विचार-सत्य परिपाट के अत्यंत विरुद्ध, तथा विद्वानों के अतीव हास्यास्पद '. दूसरी बात यह है, कि-ईश्वरावतार यह व्याकरण से प्रसिद्ध है, वा इसका अर्थ ईश्वर की ईश्वरता में हानीकारक है।.वा किसी व्यक्ति में सम्भव नहीं है। इसका विवेचन यह है, कि व्याकरण से तो प्रसिद्ध है ही नहीं। परिशेप जिस अर्थ से ईश्वर की ईश्वरता की हानी नहीं हो,और किसी चमत्कारी . व्यक्ति में सम्भव भी हो, सो अर्थ स्वीकार करना चाहिये। क्यों-कि-व्याकरण से एक पदके अनेक अर्थ होते हैं, जो अर्थ वेद विरुद्ध नही होय, सो अर्थ माननीय है । पदका निषेध करना उचित नहीं। तीसरा-यदि कोई कहे-कि-अवतार का अर्थ जन्म है, सो ईश्वर का जन्म कहना वेद विरुद्ध है, इस कारण से ईश्वरा- वतार पद को स्वीकार नहीं करते । सो ऐसा अर्थ मानना आपकी भूल है, आप लोगों को इस पद के अर्थ का निश्चय ही. नहीं है। इस वास्ते इस "अवतार-मीमांसा" ग्रन्थ में ईश्वरा- वतार पदके अनेक अर्थ दिखाये हैं, वेद विरुद्ध अर्थों का त्याग करके उचित अर्थ के ग्रहण से शाल प्रसिद्ध ईश्वरावतार सिद्ध हो सकता है, तात्पर्य यह है, कि-जो कोई ईश्वरावतार पद का वेद विरुद्ध अर्थ करे, उसका. खण्डन करना चाहिये, किन्तु ईश्वरावतार का खण्डन करना योग्य नहीं है । जैसे दयानंद पद के अनेक अर्थ हो सकते हैं, परंतु आर्य लोग अयोग्यार्थ को त्याग करके, योग्य अर्थ के ही ग्रहणसे दयानंद पदको स्वीकार करते हैं । यह नहीं कि-अयोग्य अर्थ को श्रवण करके, स्वामि दयानंद जी को त्याग दें। इसी प्रकार अवतार विषयक जानना योग्य है। हम आशा रखते हैं, कि-श्री स्वामी वाणिज़ी निर्मित अंव- तार मीमांसा इस ग्रंथ के प्रचलित होने से, अवतार विषयक तो सनातनी तथा आर्य समाजादिको का परस्पर विरोध नहीं रहेगा । और तैसे ही हमारे नवयुवक, शास्त्र विज्ञान शून्य भी, श्रास्तिकाभासों के उपदेशों को श्रवण कर, ईश्वरोपासनादि स्वधर्म से पतित हुऐ भी, पुनः इस ग्रन्थ के सम्यक अवलोकन से, नास्तिकों के फंदे से छूटकर,, ईश्वरावतारोपासनादि स्वधर्म में प्रारूढ़ होकर, भगवद्भक्ति द्वारा जन्म मरण रूप संसार चक से छूटकर, अवश्य ही परमानन्द रूप मोक्ष पद को प्राप्त होंगे। किञ्च-बहुत से पण्डित भी "कार्णि” इस शब्द को सुनते
(च)
सो उन महात्माओं के भ्रम निवृत्त्यर्थ, पाणिनि सूत्र, पुराण,
इतिहास, कोशादि सद्ग्रंथों के प्रमाणों से कार्पिण "शब्द की
सिद्धि भी इसमें दिखाई गई है" आशा है, कि-हंसवत सार
ग्राहक विज्ञंजन प्रेम पूर्वक इसको अवलोकन कर इसके उद्देश्य
को, तथा ग्रन्थकर्ता के श्रायास को सफल करेंगे।
॥ इत्यलं विज्ञषु॥
भवदीय-कृपाभिलाषी,
काणि हरिनामदास, भिनु ।
विज्ञापनम् ।
भो भोः परमेश्वरा वतारो पासका भवतां वरिष्ठे
हत्रिविष्टपे विशद विस्तृत यशश्छायो, विविध
विषय सुख कुसुम निकायो, यम नियमादि योगाङ्ग..
दलः, खलैन्द्रिय विषय वैतृष्ण्य वैराग्य विज्ञान फलः,
परमोदार परमेश्वरा वतारो . पासन कल्पतरुरभूत ।
तन्त्विदानी तनानामास्तिकता छद्मना छन्न नास्ति-
कानां दुरुक्ति परुष परशु प्रहार च्छिन्न मवलोक्य.
अनेन नाना निगमागम पुराण प्रमाण लक्षण लक्षिता-
वतार-मीमांसा सुधाऽऽसारेण पुनः प्ररोदु महं कृतो-
द्यमोऽभव मतो भवद्भि महद्धि श्श्रुति सृति हृद्गतेन
स नगो रोढव्यो येन मदीयायास साफल्यं स्यात् ॥
किञ्च-यथा सजल जलदो देवै स्स्व शक्तया सम्पादि-
तोपि, योग विना न वर्षति । एवं मया भगवद्दत्तया
स्व शक्तया स सुधाऽऽसार स्सम्पादितापि, परञ्च ग्रन्थ
मुद्रण योगेन विना सर्व सुलभो न भविष्यतीतिमत्वा
यै स्स्व द्रव्य व्ययेन मुद्रापयित्वा सर्व सुलभः कृत स्तेहि
भवतां धन्यवादास्पदतां यान्तु शमस्तु । ओमिति ।
भवदीय--
कार्षिण गोपाल दास-चेतन देवाश्रम्-
मूल विज्ञापन की भाषा। हे ईश्वरावतालेपसक सज्जन पुरुपो ! आप के सुन्दर हृदय रूपी स्वर्ग में, परम उदार परमेश्वर के अवतारों की, उपासना रूपी कल्प वृक्ष उत्पन्न हुआ है, जिस में निर्मल विस्तृत भगवद्गुणानुवाद ही छाया है। अनेक प्रकार के विषय सुख ही कुसम समुदाय हैं, यम (अहिंसा १ सत्य २ अस्तेय ३ ब्रह्मचयं अपरिग्रह ५ ) नियम ( शौच १संतोपरतप३ स्वाध्याय ४ईश्वर प्रणि धान५)यह योग के अङ्ग ही पत्र हैं, और दुण् इन्द्रियोंके विपयों की तृष्णा निवृत्ति पूर्वक ज्ञान-और पैराग्य का होना ही फल है। उस कल्प वृक्ष को मैं श्राज कलके श्रास्तिकता के कपट से ढके हुप नास्तिकों के दुष्ट वाणी रूप तीक्षण कुठारों से कटा हुआ देखकर, इस अनेक वेद, शास्त्र, पुराणों के प्रमाण और लक्षणों से युक्त, अवतार मीमांसा रूपी सुधासार की वृष्टि से, पुनः अङ्कुरित करने को उद्यत हुआ हूं, इससे आप जैसे महान्पुरुषों की कान रूपी अञ्जली से, उस . मीमांसा रूपी सुधासार को, हृदय रूपी श्राल वाल में सोंच कर, उस वृक्षका पोषण करना चाहिये, जिससे मेरे प्रयास की सफलता हो। दूसरे-जैसे देवतायों ने अपनी शक्ति से, मेघ को त्यार किया, परंतु वह विना योग (स्त्री पुरुष नक्षत्र का योग) के नहीं बरसता, इसी तरह मैंने सर्वशक्तिमान भगवान् की दी हुई शन्ति से, उस अवतार-मीमांसों रूपी सुना सार का सम्पादन किया परंतु ग्रन्थ मुद्रा योग के विना वह सर्व को सुलभ न होगा, यह विचारकर-जिसने स्वद्राव्य खर्च करके, उसको छपवाया है तथा सर्व को सुलभवनाया है, वेही आप के धन्य- वाद के पात्र बने । शमस्तु । श्रोमिति । इत्यलं विशेषु- भवदीय-
AJH
१
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श्रीवृन्दावन विहारिणेनमः। अवतारमीमांसा अथ मूल मंगलाचरणम् ॥ कारुण्येन वयं येषां गताः पारं भवाम्बुधेः । नत्वेश्वरा वतारां स्तानानकं गुरुमीश्वरम् ॥१॥ पर प्रेमास्पदं कृष्णं कान कृष्णप्रियां स्तथा । गुरू काफ्रिरहं कश्चित्ममाण लक्षणान्वतामा। कुर्वेऽवतार मीमासां यस्यां मुह्यन्ति मानवाः। ये पुराणानभिज्ञाश्च वेदाशय विवर्जिताः ॥३॥ * इति विशेषकम् । नोट-* द्वाभ्यां युगम मिति प्रोक्तं, विभिः इलोकै विशेषक मितित लक्षणात् । अर्थ-दो इलोकों में जिसका अन्वय हो उसको युग्म कहितेहैं | तैसे ही तीन श्लोकों करके जिसका अन्वय हो, उस को विशेषक कहिते हैं।
(२) अथ भाषा टीका कारकृत मङ्गला चरणम् । श्रीकृष्णं राधिका प्राणवल्लभं कमलेक्षणं, पालकं धर्म सेतूनां वंदे गोपाल बालकम् । राधां रासेश्वरी दन्दे श्रीकृष्ण प्राण वल्लभां, यत्कृपा लेशतः कृष्णे परां भक्तिं लभेन्नरः॥२॥ अत्यंत आश्चर्य का विषय है, कि जिस भारत- वर्ष से यूरप अमेरिका आदि दूर दूर देशों के रहने वाले विद्वान् सहस्रों वर्ष से अध्यात्म विद्या प्राप्ति का प्रयत्न कर रहे हैं। परन्तु अब पर्यन्त भी अन्त नहीं प्राप्त कर सके । और जिस भारत वर्ष के ग्रन्थों को सहस्रों बुद्धिमान् पुरुष भिन्न भिन्न भाषाओं में अनुवाद कर रहे हैं । परन्तु दर्शन शास्त्रोंके सांकेतिक शब्दों के अनुवाद के लिये प्रति रूप न पाने से न्या- यादि शासों के अनुवाद में, असमर्थ हैं । तथा जो भारतवर्ष धर्म का केवल एक मात्र आधार था, जहां के निवासियों की अनेक धर्म सम्बन्धी आश्चर्य प्रद कथायें अब तक अबाल वृद्ध वनिता के हृदय मंजूषा (पेंटी) में सादर निहित है । उसीभारतवर्ष में आजे एक ऐसा समय विचित्र उपस्थित हुआ है, कि जिसमें वैदिक धर्म तथा जाति भेद, आश्रम भेद, मूर्ति पूजा,
.
अवतार आदिक सभी प्रसिद्ध भारत वासियों
नित्य प्रति अनुप्ठेच विषयों पर नाना प्रकार की
शंकायों का प्रादुर्भाव हो रहा है, ऐसी. दुर्घटना को
अवलोकन कर किस सहृदय का हृदय पुष्पन विदीर्ण
होताहोगा क्योंकि "यतो धर्मः ततो जयः" इत्यादि
प्रमाणों से, धर्मादिकों का सेवनकर्ता पुरुष को ही
धर्मादि चतुष्टय फलकी प्राप्ति होती है, इस लिये उन
नाना विषयों में से यहां केवल अवतार के विषय पर
ही व्याख्यान विचार किया जाता है। और हमारा यह
कथन उनके लिये है, जो भगवत्प्रेम से परिपूर्ण, और
अवतार के विषय में कुछ श्रवण किया चाहिते हैं।
अथवा नवयुवक आस्तिका भासो के कुछ प्रश्न सुन
आय हैं, और उनकी मीमांसा सुनना चाहिते हैं। अब
इसके आगे अवतार मीमांसा की भापा टीका का
प्रारम्भ करते हैं।
अथ आदि में"अवतार मीमांसा"ग्रंथकी निर्विन
समाप्ति के लिये, तथा शिष्टाचार के अनुसार, और
वेद की आज्ञा से भी तदुक्तं-सांख्य शास्त्रे, मंगला
चरणं शिष्टाचारात्फल दर्शनातश्रुतितश्चति” तथा
श्रुतिपंच-समाप्ति कामो मंगल माचरेदिति" सो मंगला
चरण का करना सांख्य शास्त्र में कहा है, कि मंगला
. (४) चरण का करना श्रेष्ठ पुरुषों के आचार से प्रमाण है, 'और फल के भी देखने से तथा श्रुति की आज्ञा से भी,कि-ग्रंथकी समाप्ति की कामना वाला पुरुष मङ्गला चरण करे । इत्यादिक प्रमाणों से श्रीकृष्णजी के अ- नन्य उपासक निखिल शास्त्र निष्णात कार्णि कलाप शिरोवतंस महाकविवर्य श्रीस्वामि काणि गोपाल दासजी, स्देष्टदेवता का नमस्कारात्मक मङ्गला चरण को "कारुण्येनेत्यादि" विशेषक से करते हैं, अर्थात लिखते हैं ॥ "मङ्गला चरण का अर्थ" टी०-जिनकी कृपा से हम संसार रूपी समुद्र से पार हुए हैं, उन ईश्वर के अवतारों को, तथा श्री गुरू नानक देवजी को, और अत्यंत सर्व से श्रेष्ठ प्रेमके स्थान श्रीकृष्णजी के अनन्य उपासक श्री १०८ श्री स्वामिकामि ज्ञानदासजी को नमस्कार करके श्री कृष्णजी के उपासक कार्णि मैं गोपाल दास लक्षण, और प्रमाणों से युक्त 'अवतार मीमासा' को अर्थाद अवतार विषयक विचार को, जिसमें पुराणों के तथा वेदों के अभिप्राय को नहीं जानने वाले मोह को प्राप्त होने हैं, अर्थात् अनेक तर्क कुतर्कों कर विक्षिप्त चित्त होते हैं, उनके लिये करता हूं। अब इस ग्रंथ के विषयादिक अनुवन्ध चारि निरूपण करते हैं, तात्पर्य (५) यह है, कि-विषय १ प्रयोजन २ अधिकारि३सम्बन्ध४ यह चारि अनुवन्ध ही विवेकी पुरुषों की ग्रन्थ विषय प्रवृत्ति के हेतु होते हैं, अर्थात् पूर्वोक्त अनुबन्धों को जान के ही बुद्धिमान् पुरुप ग्रंथ. विपे प्रवृत हो सके हैं। या कारण से ही ग्रंथ कारने 'अवतार-मीमांसा' इस वाक्य करके सूचन करे हुए अनुबन्ध इहां स्पष्ट करके निरूपण करते हैं। अर्थात् अवतार विषयक विचार करना ही ग्रंथ का विपप है। और तिस विचार से अवतार विषयक संदेह निवृत्तिपूर्वक श्रीकृष्ण जी की उपासनासे परम कल्यान की प्राप्ति प्रयोजन है । तिस परम क- ल्यान की इच्छा वाले 'जिज्ञासू पुरुष, गुरु भक्ति संयुक्त ब्रह्म श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ गुरुके द्वारा पुराण तथा वेद के आशय को जानने वाला इस ग्रंथ का अधिकारी है। और ग्रन्थ का तथा विपय का पररपर प्रतिपाद्य प्रतिपादिक भाव सम्बन्ध है । अर्थात् ग्रन्थ प्रति पादिक है, और अवतार निर्णय विषय प्रति पाद्य है। और विचारका तथा फल का जन्य जनक भाव संबंध है। विचार जनक है, और तिस विचार से संदेह निवृत्तिरूपी फल जन्य है, इत्यादिक अन्य भी परस्पर प्राप्य प्रापक,कर्तृ कर्तव्य भावादि सम्बन्ध जान लेने। (नोट) १ निवेदन है, यदि पूर्वोक्त अनुवन्धों को (1) वेद शास्त्रों के ज्ञाता (२) अनुवंभी ब्रह्मज्ञानी ।
सम्बक अवलोकन कर ग्रन्थ विचार विषे प्रवृत्ति होंगे
तो,शीघ्र ही ग्रन्थ कर्ता के आशय को समझ जावेंगे।
२ अवतार विषयक अनेक पूर्व पक्षियों ने विवध
प्रकार से शंकायें की हैं और तिन सर्व शंकाओं का
समाधान अन्त में मिन्न २ किया गया है, इस लिये
शकाओं को अच्छी तरह से समझ कर समाधान
समझने विष प्रवृत्त होवें, ताकि-अवतार-विपयक
अन्त में सन्देह न रहे।
मू-ननु “यः सर्वज्ञः सर्व विद्यस्य ज्ञान मयं
तपः" मु० उ० मं०१॥ “सत्यं ज्ञान मनन्तं
ब्रह्म” तै० उ० ७०व०॥ "दिव्योह्यमूर्तः पुरुषः
सवाह्याभ्यान्तरो ह्यजः मु० उ० ख०१ मं०२॥
क्लेशकर्म विपाकाशयै रपरामृष्टः पुरुष विशेष
ईश्वरः” यो पा०शा“जन्माद्यस्ययतः वसू०
२॥ इत्यादि श्रुति शास्त्र प्रति पादित ईश्वरो
भवतु । सत्सम्प्रदायाचार्यः श्रीगुरु नानको-
प्यस्तुच । तत्त्वोपटारो गुरुवोऽपिसन्तुच ।
लावण्यैकधामा, ब्रजवनिता व्यूह हृदयललामम्
पराजित कोटि कमनीय कामः सकल कल्याण
(७) गुण ग्रामः केकि कण्ठाभिरामः सर्वध्यातृ धी वृत्त्येक विश्राम कौवेर्य यमलार्जुन मोक्षार्थ धृतोदरदामा। नवातसी प्रसूनसन्निभश्यामः' परितिरस्कृत. त्रैलोक्य निखिलवाम स्त्वेवंविधः श्रीकृष्णोऽपिश्रूयतेच । कास्तुित्वां पश्चात्त्र- क्ष्यामि । परञ्चेश्वरावतारा कति, कतिधा, के किंप्रयोजन' किंलक्षणञ्च तेषां, तत्रकिं प्रमाणञ्च, यतोलक्षण प्रमाणाभ्यां वस्तु सिद्धि भवतीति । -साधारणतः अवतार विषय में प्रश्न ये होते हैं क्रमशः इनी की विवेचना.से हमारा उद्देश्य.साधना होगा। "जो परमात्मा समान्य विशेष रूप करके बुद्धि आदिक सर्व क्षेत्र का जानने वाला है" और जिस अक्षर रूप परमात्मा का रचे हुए सर्व पदार्थोका ज्ञान मय (ज्ञान का विकार ही सर्वज्ञता रूप) तप है; मु० उ० ख०१मं०९॥"त्रिकालावाध्य (नाश रहित) ज्ञान स्वरूप (चेतन स्वरूपं ) देश, काल. वस्तु, परि- १ समष्टि रूप माया नामक उपाधि सामान्य कहिये है। २ व्यष्टि रूप अविद्या नामक उपाधि, विशेप, कहिये है। टी- ( 6 ) च्छेद ( अन्त) रहित सर्व व्यापी ब्रह्म है, तै. उ. ब. व"और ब्रह्म की अनंता अन्य शास्त्र विपे भी कहा है।"न व्यापित्वादेशतोऽतो नित्यत्वान्नापि कालतः ॥ न वस्तु तोपि सात्म्यिादा नत्यं ब्रह्मणिविधा, अर्थ- सर्व देश विपे व्यापक होने से,याते ब्रह्मका देश ते भी अंत नहीं, और नित्य होने से काल से भी अन्त नहीं, और सर्व का आत्मा रूप होने से वस्तु कृत भी अन्त नहीं है, इस रीति से ब्रह्म विपे तीन प्रकार का अनंत पणा है। जो दिव्य (स्वयं जोति रूप प्रकाशमान अलौकिक है,) अमूर्तः ( सर्व मूर्तिन से रहित वा नियत्त सूर्ति से रहित है) पुरुष ( सर्वत्र परिपूर्ण वा शरीर रूपी पुरीन विये रहता है) ऐसा दिव्य और अमूर्ति (आकार रहत) जो पुरुष है सो बाहिर और भीतर सर्वत्र विद्यमान है' और (अजन्मा जन्म रहित ) है, अर्थात् वह अजन्मा दिव्य प्रकाशमान आलौकिक सर्वत्र पूर्ण पुरुप है । मु० उ० ख०१ मं० २॥ और योग सूत्र में भी कहा कि-जो ॥ केश कर्मविपाकाशयै रपरा सृष्टः पुरुष विशेष ईश्वरः" अर्थ क्लेश १ कर्म २ विपाक ३ आ- शय ४ इन चारों के संबद्ध से रहित जो पुरुष विशेष है ताका नाम ईश्वर है ॥ तहां प्रथम क्लेश-अविद्य १ १ देह की अपेक्षा से जो बाहिर- और भीतर रूप देश प्रसिद्ध है
नाम
(८)
अस्मिता २ राग ३ द्वेष ४ अभिनिवेश ५.इस भेद ,
कर के पांच प्रकार का होता है । कार्य और कारण
रूप से अविद्या.दो प्रकार की हैं। देहादिको विषे
आत्मत्वादिक बुद्धि रूप भ्रान्ति ज्ञान है, तिसका
नाम कार्य अविद्या है । और मूलविद्या का
कारण अविद्या है ॥ अंहकार का
कारण रूप जो सूक्ष्मावस्था है, तिसका नाम
अस्मिता' है । इसी अस्मिता को 'सांख्य मत
वाले' तथा योग मत वाले महत्तत्त्व कहते हैं। और
वेदान्त शास्त्र विषे अस्मिता को सामान्यं अहंकार
कथन करते हैं। यह प्रिय वस्तु है मेरे को प्राप्त हो,
इसका नाम राग है। और क्रोध का नाम द्वेष है। तथा
अहंता ममता रूप से ग्रहण किये जे देहादिक पदार्थ
हैं, तिनों के त्याग को नहीं सहन करना इसका नाम
अभिनिवेश है ॥ (कर्म) शुक्ल १ कृष्ण २ मिश्र ३
इंस भेद करके तीन प्रकार के हैं। तहां शास्त्र विहित
पुण्य कर्म का नाम शुक्ल कर्म है। शास्त्र निषिद्ध.
पाप कर्म का नाम कृष्ण कर्म है । पुण्य पाप दोनों
का नाम मिश्र कर्म है। यह तीन तरह का कर्म तौ
अयोगी पुरुषों का होता है । और योगी पुरुषों का
तो अशुद्ध कृष्ण' यह चतुर्थ कर्म होता है। यह उक्त
अर्थ पतलि भगवान ने "कर्माशुक्ल कृष्णं योगिन स्त्रि
(१०) विधमितरेपाम्" इस सूत्रकर के कहा है ।। (विपाक) कर्मों के फल का नाम है । सो फल जाति १ आयुप २ भोग ३ इस भेद से तीन तरह का है। और कर्म फल के भोग जन्य जो संस्कार रूप वासना है। तिस का नाम आशय है। इस प्रकारक्लेश, कर्म, विपाक,आशय, इन चारों कर र्युक्तजीव होता है। और ईश्वरतो तिन चारों करके असंबद्ध अर्थात् रहित होता है । तथा सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान स्वतंत्र होता है । इति ॥ यो.पा. १सू. और ब्रह्मसूत्र में भी कहा है, कि-जिस सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान कारण ते इस आकाशादिक दृश्यमान प्रपंच के जन्म, स्थित, लय, होता है,सोई ब्रह्म है। इत्यादिक वेद शास्त्र प्रतिपादित ईश्वर को, तथा श्रेष्ठ सम्प्रदाय के आचार्य श्री गुरु नानकदेवजी को, और जो अत्यंत सुन्दर स्वरूप युक्त, तथा गोपियों के हृदय को आन- न्दित करने वाले, और अपनी सुन्दरता से करोड़ों कामदेवों को पराजित करनेवाले, तथा सम्पूर्ण कल्यान दायक गुणों के आश्रय, मयूर ग्रीवा की तरह श्याम मुन्दर स्वरूप, ध्यान करने वाले चोगीजनों के बुद्धि की वृत्तियों के विश्राम देने वाले, कुबेर के पुत्र यमला- र्जुन (नल कूवर ) को मोक्ष के लिये रस्सी से कमर को बंधाने वाले, नवीन अतसी (अलसी) के पुप्प .." (११) सदृश श्याम स्वरूप, तथा त्रिलोकी के सम्पूर्ण स्त्री वर्ग को मोहित करने वाले, इत्यादिक विशेषण संयुक्त श्रीकृष्णचन्द्र जी को भी हम इस वक्त अवतार मान लेते हैं। और कार्णि शब्द की व्याख्या को हम पीछे से पुछेगे। परन्तु पहले इन प्रश्नों का तो उत्तर दो, कि-(१) ईश्वर के अवतार कितने हैं (२) और कितने प्रकार के है । (३) कौन से हैं । (४) सर्व शक्ति मान ईश्वर को अवतार लेने की क्या आवश्य- कता है अर्थात् किस निमित को लेकर अवतार धारण करते हैं (५) और अवतार का लक्षण क्या है । (६) तथा अवतार सिद्धि में प्रमाण क्या है क्योंकि-लक्षण और प्रमाण से वस्तु की सिद्धि होती है, केवल कथन मात्र से ही सिद्धि नहीं हो सका है। इसलिये अवतार विषयक लक्षण और प्रमाणों को स्पष्ट रीति से कथन करें। मृ०-ईश्वरस्य यदेहाकारेणावतरणं प्रादुर्भावो १-समाना समान जातीय व्यवच्छेदो लक्षणार्थः । अर्थ-समान और असमान जाती के भेद को भिन्न करके दिखलोव, उसको लक्षण कहते ॥ २ प्रमायाः करणं प्रमाणम् ” अर्थ-प्रमा नाम यथार्थ ज्ञान का जो. असाधारण कारण अर्थात्-जिस साधन से पदार्थ का यथार्थ ज्ञान हो, उसको प्रमाण कहते है ॥
(१२) भवेत् स ईश्वरावतारः । एवं हि सुसिद्धान्तो- तमादीनां कर्तारः प्रियदास प्रभृतयः केचि- द्वैष्णवा मन्यन्ते' यथोदकं हिहिमतां प्राप्नोति, तत्र घनी भूत हिमपिण्डे न कश्चिद्ध्यांशाऽन्त- बहिः सर्व सलिलमेव । एवं निराकार ईश्वरो हि श्रीकृष्ण व्यक्ति भावं प्राप्तोऽतश्चिन्मयी श्रीकृष्ण व्यक्तिनतु भौतिकी' नचमायिकी देहि देह विभाग स्तत्र नास्ति । एतदभिप्राये- णैव सूतेनोक्तम् । “कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्” भा० स्क० १ अ० ३ श्लो०२८॥ टी०-इस प्रकार पूर्व पक्षि के प्रश्नो को श्रवण कर के बीच में एक देशी स्वमत के अनुसार समाधान करता है ईश्वर काजो देहके आकार से प्रादुर्भाव (प्रकट) होना है, वही ईश्वर का अवतार है। इस प्रकार मुसिद्धान्तोत्तमादि के कर्ता प्रिय दास आदिक कोई कोई वैष्णव मानते हैं । उदाहरण यह देते हैं । जैसे जल जम के वर्फ के रूप को धारण करता है, उस वर्फ के पिण्ड में जल से अतिरिक्त भीतर बाहिर और कोई त्याज्य अंश वाली वरतु नहीं है, किन्तु भीतर . .
(१३). बाहिर सब जगह जल ही है । इसी तरह निराकार ईश्वर ही श्रीकृष्ण स्वरूप को धारण करता है। इस लिये श्री कृष्ण जी का स्वरूप चिन्मय है अथात सच्चिदानन्द मयं श्री कृष्ण जी हैं, और श्री कृष्ण जी में भौतिकी पंच भूतों का कार्य पणा, अथवा माविकी माया का कार्य पणा नहीं है। और हमारी तरह तिस में देह. स्थूलादि देह, तथा देही, देहाभिमानी जीव पणा इत्यादिक विभाग भेद भी नहीं हैं। किन्तु शुद्ध चिन्मय स्वरूप हैं । इसी अभिप्राय से ही सूत जी ने श्रीमद्भागवत् प्रथम स्कन्ध में कहा है कि "श्री कृष्ण जी तो स्वयं सच्चिदानंद स्वरूप भगवान् ही अवतीर्ण अथात् प्रकट हुए हैं भा० १३॥ २८॥ i मू०-इतिचेद्गोलक्षण एकशफवत्त्वंवदं सम्भव दोषं दूषित मिदंलक्षणम् । “यजायते तदेवास्ति वर्धतेविपरिणमतेऽपक्षीयतेनश्यतीतिच" अज- स्य परिपूर्णस्य सर्वाश्रयस्य परमेश्वरस्य परिणामो न सम्भाव्यते"। "जन्माद्याः षडिमें भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः भा० स्क०७ अ०.७श्लो०.२८ इत्यादि शास्त्र विरुद्धत्वाचनह्याकाशस्य मूर्तिः (१४) कचिद् दृश्यते' यथा रक्तवर्णेन रक्तं वस्त्रं रक्त मुच्युत' एवं पारमेश्वर गुणाविष्टत्वाच्छ्री कृष्णः स्वयं परमेश्वरः सूतेन प्रोक्तो नतु परमेश्वर विकारे तस्य तात्पर्यम् ॥ १॥ दी०-इस एक देशी के समाधान में पूर्व पक्षी की. शंका-हे एक देशी! यदि तुम ऐसा लक्षण अव- तार का करोगे, तो यह आपका लक्षण असम्भव दोष से दूषित है। (लक्षमात्रावृतित्वमसंभवः) जो लक्षण लक्ष्य मात्र में भी न रहे, उसको असम्भव दोष कहते हैं, जैसे कोई एक खुर वाली गौ है" यह लक्षण गौ का बतलावे, तो यह लक्षण असम्भव दोष करके दूषित है, क्योंकि गौ का एक सफवत्व. ( एक खुर) कभी नहीं हो सकता, जहां तक गाय देखने में आती हैं दो खुर वाली ही देखने में आती है, इसी तरह सर्व व्यापक, अजन्मा जन्म रहित, सर्वाधार, परमेश्वर का देहि देह विभाग सहित वर्फ के समान परिणाम अर्थात् रूपान्तर का मानना सर्वथा असम्भव है। क्यों कि जो " जन्म लेता है, उसी का अस्तित्व है, अर्थात् वही व्यवहारिक सत्ता को प्राप्त होता है, और सोई ही वृद्धि पाता है,और वही परिणाम रूपान्तर को (१५) प्राप्त होता है, और वही घटता है, और सोई नाश को प्राप्त होता है " तात्पर्य यह है, जो जन्मता है उसी में . ही पूर्वोक्त षड विकार माने जाते हैं । परन्तु परमात्मा एसा नहीं है। इस लिए श्री मद्भागवत् सप्तम स्कन्ध में भी कहा है,कि-"जन्मादिक षडंभाव (६ विकार) देह के ही दिखाई देते हैं, आत्मा के नहीं"भा० ७७॥२८॥ इत्यादिक शास्त्र विरुद्ध होने से परमेश्वर का परिणाम को प्राप्त होना.सर्वथा असंभव है। दूसरी बात यह है, कि- निर्विकार परमात्मा की आकाश के समानमूर्ति कही भी दिखाई देती नहीं' इस लिये जैसे लाल रंग से रंगे गये बस्त्र को लाल कहने के सामान, तैसे ही, परमेश्वर के गुणों सहित होने से श्री कृष्ण जी को सूतजी ने स्वयं परमेश्वरावतार कहा है, और इसी अर्थ में ही उनका अभिप्राय है। और निर्गुण निराकार ईश्वर का परि- णाम मानने में नहीं है ॥१॥ ( यहां पर्यंत एक देशी के समाधान को पूर्व पक्षी ने खण्डन किया है) मू-ईश्वरस्यावतरणं यस्मिन्देहे प्रवेशः स्यात् सईश्वरावतार इति । टी०-अब दूसरा एक देशी स्वमत के अनुसार अवतार का लक्षण करता है, कि-जिस. देह में ईश्वर (१६) का अवतरण अर्थात्-प्रवेश हो वह ईश्वरावतार है ॥ इति । मू०-चेदेकांशस्य प्रवेशः, किं सर्वस्य दितीये पूर्ववदसम्भव दोपो, नहि सर्वस्य व्योम्न एक स्मिन्कुम्भेप्रवेशो दृश्यते पादोऽस्य सर्वाभृतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि'ऋ० पु० सू०॥ "विष्टभ्याह मिदं कृत्स्न मेकांशेनस्थितोजगत् गी० अ० १० श्लो० ४२॥ इत्यादिश्रुतिस्मृतिविरोधात् । प्रथम पक्षे-“तत्सृश तदेवानुप्राविशत् ते. उ० मं० ६॥"सदाजनानां हृदये सन्निविष्टः। श्व० उ० अ० ४ मं० १७॥ "ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुनतिष्ठति" गी० अ० १८ श्लो० ६१॥ इत्यादि श्रुति स्मृतिषु सर्व देहेष्वेकांशेन तस्य प्रवेशश्श्रूयतेऽतोगोलक्षणे शृङ्गवत्त्ववदत्राति- व्याप्ति दोषः ॥२॥ टी-अव पूर्व पक्षि पूर्वोक्त अवतार लक्षण में भी दोष बतलाता है, यदि ऐसा अवतार का लक्षण करें,
.
(१७)
तो उसमं यह शंका उत्पन्न होती है, किं ईश्वर का
एकांश से देह में प्रवेश है, अथवा सवाश से, यदि
द्वितीय पक्षमाने, तो द्वितीय पक्ष प्रथम की न्याई
असम्भव दोप करके दूपित. है । क्योंकि-ऋग्वेद में
कहा है, कि " त्रिकाल में होने वाले प्राणी मात्र इस
ब्रह्म के चतुर्थांश में स्थित है, और इस पर ब्रह्य का
अविशिष्ट त्रिपाद स्वरूप अमृत है अर्थात् विनाश
रहित प्रकाशात्मक स्वरूप में स्थित है" ऋ० पु० सू।।
और गीता में भगवान श्री कृष्ण जी ने अर्जुन के प्रति
कहा है, किं-" मैं इस. संपूर्ण जगत को एकांश से
धारण करके स्थित हूं अर्थात् यह सम्पूर्ण दृश्यमान्
प्रपंच मैं परमात्मा के एकांश में कल्पित है"गी०अ०
१० श्लो० ४२ ॥ इत्यादिश्रुति तथा स्मृति के विरोध से
सर्व व्यापक परमात्मा का, एक घड़े में सम्पूर्ण आकाश
के प्रवेश के समान, एक देह में सवाश से प्रवेश होना
असम्भव है । और प्रथम पक्ष में यदि ईश्वर के एकांश
का प्रवेश मानों तो इस लक्षण में अतिव्याप्ति
दोप आता है। क्योंकि अति में कहां है “सों परमात्म
देव इस जगत् कू रचके आप ही तिस जगत् विषे
प्रवेश करता मया" तै०उ०म०६॥ तैसे अन्य श्वेता-
श्वतुर उपनिषद् में भी कहा है कि-"परमात्मा सर्वदा
प्राणियों के हदय में रहता है" श्वे० उ० अ०४ म०
(१८) . १७ ॥ और गीता में अर्जुन के प्रति भगवान ने कहा है, कि हे-अर्जुन ? ईश्वर सर्व. भूतों के अर्थात सर्व प्राणी मात्र के हृदय स्थान में विराजमान है" गी० अ० १८६१॥ इत्यादिश्रुति स्मृत्यों से प्रतीत होता है कि-सर्व प्राणियों में एकांश से परमेश्वर का प्रवेश है जैसे " शृंगित्वम् गौर्लक्षणम्" अर्थ-सींग वाली गौ है, इस प्रकार गौ का लक्षण कहने पर, गौ से अन्य भैंस बकरी आदि को भी सींग वाली होने से, यह तुम्हारा लक्षण उनमें चला जायगा, तो उनको भी गाय कहना पड़ेगा, यह अति व्याप्ति कालक्षण है कि लक्ष्य के अतिरिक्त दूसरी वस्तु में (अलक्ष्य विपे) भी लक्षण घटित (प्राप्त) हो जाय, उसका नाम अति व्याप्ति है। इस लिये यह भी अवतार का लक्षण समीचीन नहीं है ॥२॥ मू०-ईश्वरस्यावतरणमेकांशेनयास्मिदिव्ये देहे प्रविश सईश्वरावतारः जन्मकर्मचमे दिव्यम् " गी० अ० ४ श्लो० १ ॥ इति भगवद्ध- चनादत्र नैवोक्त दोषौ, दिव्यत्वं-नामालौकि- कत्वं, तदुक्तं देवक्या श्रीकृष्णं लक्षीकृत्य “उप; संहर. विश्वात्मन्नदोरूपमलौकिकम् " भाव (११) स्क० १० अ०.३ श्लो०-३०॥ सजलजलद:: संकाश श्यामलत्वंदेहस्यालौकिकत्वं लोकए- तादृशस्यादृष्ट. श्रुतत्वात् । “पीताम्बरं सान्द्र पयोद सौभगम्” भा० स्क०१० अ०३.श्लो०९ इत्यत्र श्रीकृष्ण श्यामलता निरूपितत्वादिति । टी० इस तरह पूर्वोक्त असम्भव तथा अतिव्याप्ति. दोष के आने पर दूसरा एक देशी अपने लक्षण में. प्रति शोधन करता है । ईश्वर का 'अवतरणम्' नाम जिस दिव्य देहे में एकांश से जो प्रवेश है वह ईश्वरा: वतार है। क्योंकि भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्णजी ने स्वयं कहा है “ मैं ईश्वर के जन्म तथा कर्म दिव्य है" गी०४।९॥ इत्यादि गीतोक्त वचन से ईश्वर के जन्म कर्म दिव्य माने हैं, इसी से यहां पर पूर्वोक्तं असम्भव, तथा अतिव्याप्ति दोष लक्षण में नहीं आ सकता। अब विचार करना इस बात का अवशिष्ट वाकी है, कि कौनसा देह दिव्य है, सो दिव्य अलौकिक को कहते हैं, इस लिये भागवत् दसम स्कन्ध तृतीये अध्याय में देवकी ने श्रीकृष्णजी को उद्देश करके कहा है, कि "हे विश्वात्मन् ! आप अपने इस अलो- किक रूप को छिपालो" भा०:१०॥३॥३०॥ सजल मेव ..
(२०) के समान श्याम शरीर लोक में न देखा है, और न सुना ही है। और ईश्वर के अवतार श्रीकृष्ण आदि तो, जल संहित मेघ के समान सुन्दर श्याम स्वरूप हैं, और जो श्रेष्ठ पीरे रेशम के वस्त्रों सहत हैं "मा० १० ३।९॥ इत्यादि प्रमाणों से श्रीकृष्ण जी का स्वरूप मेघ के समान श्यामलतादि से युक्त कहा है। मू०-चेत् कपिलत्ववदव्याप्ति अस्तमिदं लक्षणं तथाहि “ऋषिभिर्याचितो भेजे नवमं पार्थिवं वपुः । दुग्धे मा मौषधी विपिस्तेनायं स उश- त्तमः” भा० स्क-१ अ० ३ श्लो० १४ ॥ इतिअवतार गणनायां पृथुमवगणय्य ॥ "प्रांशुः पीनायत भुजो गौरः कञ्जारूणेक्षण” भा० स्क० ४ अ० २१ श्लो० १५॥ अत्र स गौर वर्णोदर्शितः । तथाच "एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी । रामकृष्णा विति भुवो भंगवानहरद्धरम् ' भा० स्क० १ अ०.३.श्लो०.२३: ।। अत्र श्रीबलदेवो भगवद- वतारः प्रोक्तोऽमुष्य शुक्ल वर्णत्वं तु प्रसिद्धम् ॥ E
(२१)
.
टी०-इस तरह लक्षण का प्रति शोधन करने में
अर्थात् पूर्वोक्त दोषों के हटाने पर भी पुनः पूर्व पक्षी
इस लक्षण को दूषित करता है। यदि ईश्वरावतार का
श्यामवर्ण लक्षण आपको अभीष्ट है, तो यह लक्षण
अव्याप्ति दोष करके ग्रस्त है। क्योंकि-तैसे ही
श्री मद्भागवत् के प्रथम स्कन्ध में पृथु और बलदेवजी
भी ईश्वर के अवतार माने गये हैं। यथा "हे शौनका-
दिको! अतिश्य करके ऋषियों कर प्रार्थना किये हुए
भगवान् नवमों पृथु राजा के शरीर को धारण करते
भये । तिस पृथु रूप अवतार करके इस पृथ्वी से औषि-
धियों को दुहते भये, अर्थात् प्रजा पालन उपयोगी
सम्पूर्ण वस्तुओं को प्रकट करते मये" भा० १४१४॥.
तैसे ही चतुर्थ स्कन्ध में भी कहा है कि "ऊंची और
पुष्ट अर्थात् बलशाली लम्बी भुजा जिनकी, और
गौर वर्ण तथा कमल के समान सुरखाई. वाले नेत्र
जिनके" भा० ४।२१ । १५। इसमें पृथु अवतार
का गौर वर्ण कथन फिया है। और तैसे बलदेवजी
को भी अवतार कथन किया है, यथा “उनीसवें और
बीसवें अवतार में भगवान वृष्णि वंश में राम तथा
कृष्ण स्वरूप को. धारण करके भूमि के भार को दूर
करते. भये हैं". भा० १।३।२३॥ और बलदेवजी.का
(२२) गौर वर्ण तो सर्वत्र सुप्रसिद्ध ही है। आगे कपमदेव को भी भगवतावतार कहा है, सो श्रवण कीजिये। मू०-किञ्च । “वर्हिपि तस्मिन्नेव विष्णुदत्त ? भगवान्परमर्षिभिः प्रसादितो नाभेः प्रिय चिकीर्षया तद वरोधायने मेरु देव्यां धर्मान्दर्श यितुं कामो वातरशनानां श्रमणाना मृपीणामू- प्र.मन्थिनांशुक्लया तनुवाऽवततार"भा० स्क० ५ अ० ३ श्लो. २०॥ अत्रर्षभावतारस्यापि शुक्ल वर्ण उदीरित इति ॥३॥ टी०-और मागवत पंचम स्कंध के अनुसार ऋप- • मावतार का भी शुक्लवर्ण निरूपण किया गया है, जैसे " हे विष्णुदत्त-परीक्षित ! तिस वर्हिषि नाम नाभि राजा के यज्ञ में, परम श्रेष्ठ ऋषियों करके प्रसन्न किये हुए भगवान्, तिन ऊर्ध्वरेता नैष्ठक ब्रह्मचारी तथावाता हारी और दिगम्बर तपस्वी ऋषियों के धर्म दिखाने की इच्छा कर के, और नाभि राजा के हित करने की इच्छा करके, तदंवरोधायने-तिस नाभि राजा के अन्त: पुर में मेरु देवी रानी के द्वारा शुद्ध सत्वात्मक शुक्ल 'मूर्ति (-गौर मूर्ति) करके अवतार लेते भये " मा० (२३) पा३।२०॥ इत्यादि पूर्वोक्त प्रमाणों से पृथु तथा बलदेव जी तथा ऋषभावतार गौरवर्ण होने से यह आपका लक्षण उनमें घट नहीं सकता, और पूर्व कहा अव्याप्ति दोष भी किसी प्रकार से निवृत्त नहीं हो सकता, सो अव्याप्ति दोष कालक्षण यह है कि "-क्वचिदलक्ष्यवृत्तित्वे सति क्वचिदवृत्तित्व मव्याप्तित्वम्" जो लक्षण किसी जगा तो लक्ष्य में घटे, और किसी जगा नहीं घटे उसका नाम अव्याप्ति है। जैसे "कपिलत्व.गोत्व लक्षणम् " अर्थ कपिलवर्ण युक्त गायका लक्षण है- यह कहें,, तो कपिलवर्ण वाली समगाय नहीं होती, क्योंकि कोई श्यामवर्णवाली है, और कोई श्वेतवर्ण- वाली है, इसलिये केवल कपिला कहने मात्रसे सब गायोंको बोधनहीं होता,जैसाकि-"श्रृिंगसास्नादिमान" कहने से होता है। इसलिये उक्त लक्षण की नाई केवल श्यामवर्ण युक्त ईश्वरावतार कहने से अव्याप्ति दोष सम्भव ही है ॥३॥ मृ-ननु अलौकिकत्वं चतुर्भुजत्व मेतल्लक्षण मवतारेषु प्रसिद्धं यथा श्रीकृष्णा विर्भाव समय उक्तम् - “तमद्भुतं बालक मम्बुजेक्षणां, चतुर्भुज शङ्ख .
(२४) गदायुदायुधम् ॥ श्रीवत्स लक्ष्मंगलशोभिको स्तुभम्, पीताम्बरं सान्द्रपयोद सौभगम् ॥१॥ महार्ह वैदूर्य किरीट कुण्डल, विपा परिष्वक्त सहस्र कुन्तलम् ॥ उद्दाम काञ्च्यङ्गद कंकणा- दिभि, विरोचमानं वसुदेव ऐक्षत् ॥ २॥ भा० स्क० १० अ०३ श्लों ९ । १०॥ तथाच "तेनैव: रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रवाहो भवविश्व मूर्ते गी. अ. ११ श्लो. ४६॥ इत्यर्जुनेनाप्युक्तमेवं बहुषूपाख्यानेषु श्रीकृष्णस्य चतुर्भुजत्वं प्रसिद्ध मितीदमप्यव्याप्तिग्रस्तं श्रीदाशरथि रोहिणेय राम व्यासादीनामी श्वरावतारत्वेनोक्तानां चतु- झुंजत्वं पुराणेष्व श्रुतत्वात् ॥ ४॥ टी०-अब पुनः एक देशी स्वसिद्धांत सिद्धि के लिये प्रकारान्तर से लक्षण करता है (शंका) अली- किक का अर्थ चतुर्भुज करते हैं यह चतुर्भुज लक्षण अवतारों में प्रसिद्ध ही पुराणों द्वारा श्रवण किया जाता है, जैसे श्री कृष्णजी के प्रादुर्भाव के समय कथन किया है, जिसके कमलके समान सुन्दर नेत्र थे; और चतुर्मुजाओं के. सहित शंख गदादक श्रेष्ठ
.
'(२५)
आयुधों को धारण किये हुये, और श्री वत्स की
चिन्ह है वक्षस्थल में, तथा गले में अथवा गले करिके
शोभायमान है कौस्तुभ मणि जिनके, और. पीताम्बर
पहने और जल सहित मेघों के समान ,शोभायमान
श्याम शरीर है जिनका, और जिनके केश बहुमूल्य
के वैदूर्य रत्नों करके जटित किरीट की और कानों के
कुण्डलों की कान्ति से प्रकाशित होरहे थे, अर्थात्
शोभायमान होरहे हैं। और श्रेष्ठ कांची कटि मेखला
अंगद बाजुबन्द कंकणादिक भूषणों करके शोभायमान
तिस अद्भुत अलौकिक बालक को वसुदेवजी देखते
भये भा० स्कं० १०॥३९॥१०॥ इत्यादि प्रमाणों से
अलौकिक का अर्थ चतुर्भुज संभव ही है इति । पुन:
पूर्व पक्षी पूर्वोक्त लक्षणं में दोषारोपण करता है, यदि
भागवत् दसमस्कन्ध तथा गीता एकादशाध्याय के
अनुसार अलौकिक. का अर्थ चतुर्भुज मान भी लें, तो
भी.अव्याप्ति दोष प्रथम जैसाही प्राप्त होता है, इस
आपके लक्षण से कुछ विलक्षणता तो नहीं हुई, क्योंकि
श्रीरामचन्द्र, बलदेव, परशुराम, व्यासादिकों को मी
ईश्वरावतार कथन होने से, इनको किसी पुराण में
भी चतुर्भुज नहीं माना गया है। और लोक में भी
द्विभुजही प्रसिद्ध हैं, इस लिये यहमी आपका लक्षण
(२६) " 'समीचीन नहीं है ॥ ४॥ मू-अथवा अलौकिकत्व मयोनिजत्वं , यथा श्री कृष्णस्य शंख चक्र किरीट कुण्डला- दिभि स्सहा विर्भावोक्तया ऽयोनिजत्वं ध्वनितं 'यतो. भूषणायुधैः सहितस्य योनिजत्वं नहि सम्भाव्यत उक्तञ्च देवक्यापि- विश्वं यदेतत्स्व तनौ निशान्ते यथा वकाशं पुरुपः परोभवान्. ॥ बिभर्ति सोयं ममर्गभगोऽभूदहोनृलोकस्य विडम्बनंहि तत् भा० स्क० १० अ०.३ श्लो० ३१ ॥ तथा चाह वैयासकि शुकः "जयति जन निवासो देवकी जन्म वाद” भा० स्क० १०आ० ९० श्लो० ४९॥ नृसिंहादीनामयो निजत्वं स्पष्ट मेवेति टी० अब पक्षान्तर से एक देशी स्वाभीष्टं अव. तार के लक्षण को कहता है, यदि अलौकिक का अर्थ अयोनिज (योनिसन उत्पन्न होने वाला) अवतारका लक्षणं करो; क्यों कि-शंख चक्र किरीट कुण्डलादि के 'साथ श्रीकृष्ण जी का अवतार कहा गया है, और :
(२७) भूपण आयुधों के सहित योनिज होना असम्भव है। तैसे ही श्रीकृष्ण जी के आवर्भाव समय देवकी ने भी कहा है, कि-"जो परम पुरुष परमात्मा प्रलयके समये इस सम्पूर्ण जगत् को अपने शरीर विपे संकोच रहित धारण करताहै,वही आप मेरे उदर विषे जन्म धारण करने आयेहैं, यह जो कथन है, सो केवल मनुष्यों में असम्भव रूप प्रतीत होने का है, अर्थात् अत्यंत हास्य के कराने वाला होगा, भा० स्कं० १. अ० ३ श्लो. ३१॥ और "देवकी विपे जन्म को धारण करने वाले, तथा सर्व मनुष्यों में है निवास जिसका एसे भगवान श्रीकृष्ण जी श्रेष्ठ यादवोंकर सेवित होते हुए जयति (उत्कृष्टता) को प्राप्त हो रहे हैं, मा० १,०१९०॥४८॥ . मु०-नृसिंहादीनामयोनिजत्वं स्पष्टं मेवेति चेदत्राप्य व्याप्ति यतो जामदग्न्यादीनामवतार- त्वेनाभिमतानां शंख चक्र किरीटादिभिस्सहा- विर्भाव कुत्रचिदपि नैवोक्तोऽतोजन्मसमये यावत्प्रमाणाः शिशवो भवान्त · तावत्प्रमाणा स्तंन्मातृभिः प्रसूता अनुभृताश्चातो केषांचिद्यो निजत्व मप्यस्ति । नृसिंहादयस्त्वयोनिजास्सन्तु (२८) तेषां प्रादुर्भाव समये तथैवाक्तत्वात् । परञ्च मनुष्या वतारेषु तन्मातृणां गर्भ धारण प्रसवादि व्यवहारः स्फुटमेवोक्तोऽतः प्रायोयोनिज व्य- वहारः॥ टी० और नृसिंहादिक ईश्वर के अवतार अयो- निज प्रसिद्ध ही हैं। यदि इस प्रकार से भी लक्षण करो तो भी यह आपका लक्षण अव्याप्ति दोप करके पूर्वकी नाई दूपित ही है, क्यों कि जस परशुरामादि कों ईश्वर का अवतार रूप करके स्वीकार किया है, तैसे ही परशुरामादिको शंख चक्र किरीटादि के साथ कही भी आविर्भाव नहीं कहा गया है। इस लिये दूसरे बालक जन्म के समये जितने प्रमाण अर्थात् आकार वाले होते हैं, उतने ही प्रमाण वाले परशुरा- मादि को उनकी माताओं ने जन्मा था, और देखा भी था इससे वे योनिज ही सिद्ध हैं, नृसिंहादिक तो भले ही अयोनिज रहे आवें, क्यों-कि-उन का प्रादु- र्भाव (प्रकट) होना उसी तरहसे ही पुराणों में कहा गया है, परन्तु मनुष्य अवतार परशुराम आदिकों के अवतारों में उनकी माताओं का गर्भ धारण प्रसव आदि व्यवहार स्पष्ट कहा है, इस लिये उन (परशुरा (२९) आदि) में योनिजत्व ( योनि से:उत्पन्न होना) स्पष्ट व्यवहार है। मृ०-अथवाऽवतारमात्रस्यायोनिजत्वे स्वीकृते तिव्याप्ति दोष आयाति, यतो धृष्ट द्युम्न वृत्रा सुरादयो प्ययोनिजाः समुदीरिता, स्तथाहि धृष्टद्युम्नो उपदस्य राज्ञो यज्ञामि कुण्डा- सरथों जात, इति महाभारते श्रूयते, तथाच श्रीमद्भागवते.चित्रकेतो राज्ञः पार्वती शापात्त्व- ष्टुरभिचारामि कुण्डाद् वृत्रासुर देह जन्म कथानात् ॥ ५॥ टी०-अब इस अवतार के लक्षण में पूर्व पक्षी अन्य प्रकार से दोष दिखाता है, दूसरी बात यह है कि- हे एक देशी? यदि अवतार मात्र को ही.अयोनिज तुम मानोंगे, तो धृष्टद्युम्न, वृत्रासुर आदिको भी अयोनिज होने से उनमें, भी यह आपकालक्षण अति व्याप्ति रूप हो जायगा, अर्थात् प्राप्त हो जायगा, क्योंकि महा- भारत में धृष्टद्युम्न के विषय में कहा है, कि वह द्रुपदं राजा के प्रज्ञ :कुण्ड. सें ध्वजा और रथ के सहित . (३०) उत्पन्न हुआ है । तैसे ही वृत्रासुर के विषय में माग- वत् में कथन किया है, कि चित्रकेतु राजा पार्वती के शाप से आभिचार यज्ञ (शत्रु विध्वंसक यज्ञ) करते. हुए त्वष्टा के अग्नि कुण्ड से वृत्रासुर के रूप से उत्पन्न हुआ है । इस प्रकार से आपको इन धृष्ट युनादिको भी अवतार मानना पड़ेगा, और यह ईश्वरावतार गंणना में आये नहीं हैं, इस लिये यह लक्षण अति- व्याप्ति दोप करके दूपित ही हैं, इस से इस लक्षण का त्याग ही श्रेष्ठ है.॥५॥ मृ-ननू अलौकिकत्व . मकर्मजवं, यथा श्रीकृष्णा विर्भाव समये ब्रह्मादिभि रुक्तम्- "नतेऽभवस्येश भवस्य कारणम् विनाविनोदं वततर्कया महे" भा० स्का०१० आ० २ श्लो० ३॥" नह्यस्य जन्मनो हेतुः कर्मणो वा मही- पते।आत्ममायांविनेशस्य परस्य द्रष्टुरात्मनः भा० स्का०९ आ० २४ श्लो० ५७ ॥ इतिचेदिद मप्य व्याप्ति दोष दूषितं, तथाहि “ आरब्धानेव बुभुजे भोगान पुण्य जिहासया " भा० स्कः ४ आ० २१ श्लोक. ११॥ इति पृथ्ववतारस्य (३१) कर्मजलं श्रूयते ॥ टी०-पुनः एक देशी अवतार के लक्षण, में बहुत देर तक विचार कर प्रश्न. करता है किन्हे पूर्व पक्षी ! पूर्व कथन किये लक्षण में, तो आपने अति व्याप्ति दोष दिखाया, परन्तु यह लक्षण निर्दोष है अलौकिक. का अर्थ अकर्मज हम करते हैं, अर्थात् ईश्वर का प्रादुर्भाव अवतारकर्म जन्य नहीं है। अर्थात् जीवों की नाई पूर्व जन्म में किये कर्मों के अनुसार ईश्वरावतार का प्रकट हाना नहीं है, किन्तु स्वइच्छामय है। क्यों किं श्रीकृष्णजी के आविर्भाव समय ब्रह्मादिक देवतायों ने भी स्तुति में कहा है कि-" हे नित्य मुक्त ईश्वर ! जन्म रहित आपके जन्म का कारण, आपकी क्रीडा के अतिरिक्त और कुछ हमारी तर्क करने में अर्थात समझ में नहीं आता है" भा० स्क० १०।२। ३९॥ तिसी प्रकार मागवत् नवम स्कन्ध में भी कहा है कि हे राजन्! माया के नियंता असंग, सर्वसाक्षी व्यापक- परमात्मा आत्म माया अर्थात् अपनी इच्छा के विनोद विना जन्म और कर्म का कारण कुछ नहीं, कथन किया जाता है भा० स्क०९।२४।५७ ।। इत्यादि प्रमाणों करके अकर्म जन्य ही सिद्ध होता है। पूर्व पक्षी कहता है,, कि यदि इस तरह भी अवतार का .
भा० (३२) लक्षण मानों ? तो भी यह लक्षण अन्याप्ति दोष करके दूषित ही है । क्यों कि, तैसे ही पृथु अवतार का भाग- वत् नवम् स्कन्ध में कर्म जन्य बतलाया है, कि "वे पृथु राजा अपने पूर्वारब्ध कमी के अनुसार प्राप्त भये गोगों को भोगता था उस का भोगों का सेवन केवल धुण्य कर्मों से मुक्त होने की इच्छा से ही था स्क० ४। २१ । ११ ॥ इस प्रकार पृथु अवतार कर्मज श्रवण किया है। मू-तथाच “ तृतीय मृपि सर्गच देवर्पित मुपेत्यसः॥ तन्त्रं सात्वतमाचष्ट नैष्कम्यं कर्मणां यतः " भा० स्क० १ अ० ३ श्लो० ८॥ इति नारद ईश्वरा वतारेषु गणितोपि- "अहं पुरा भवं कश्चिद्गन्धर्वउपवहणः॥ नाम्नाऽतीते महाकल्पे गन्धर्वाणांसुसम्मतः॥१॥ रूप पेशल माधुर्य सौगन्ध्य प्रिय दर्शनः ॥ स्त्रीणां प्रियतमोनित्यं मत्तस्तु पुरुलम्पटः ॥२॥ एकदा देवसत्रेतुगन्धर्वाप्सरसांगणाः॥ उपहुता विश्व सृग्भि हरि गाथोपगायने ॥३॥ अहच गायस्ताददान स्त्रीभिः परिवृतोगतः॥: - (३३) ज्ञात्वा विश्व सृजस्तन्में हेलनं शेपुरोजसा ॥ याहि त्वं शूद्रता मासु नष्टश्रीः कृत हेलनः॥४॥ तावद्दास्या महं जज्ञे तत्रापि ब्रह्म वादिनाम् ।। शुश्रूषयानुषङ्गेण प्राप्तोहं ब्रह्म पुत्रताम् ॥ ५॥" भा० स्क० ७ अ० १५ श्लो०६९।७०/७१।७२। ७३ ॥ इत्यत्र तेनैव नाना संसार गति भ्रमता कर्मज स्वजन्म दर्शितम् ॥ ६ ॥ टी० तैसेहि श्रीमद् भागवत्प्रथम स्कन्ध में भी कहा है, कि-"सोदेव परमात्मा ऋषि वंश में देवऋषि नारद नामका तीसरा अवतार लेकर भक्ति शास्त्र (नारद पंच रात्र) का वर्णन करता भया, जिस शास्त्र के अनुसार किये हुए कर्म से मोक्ष की इच्छा वाले अधिकारी पुरुषों को मोक्ष की प्राप्ति होती है". मा० १॥३८॥ इस प्रकार नारद जी ईश्वरावतार गिणे गये हैं। और उन्ही. नारदजी ने अपने जन्मको भाग वत सप्तम स्कन्ध में स्पष्ट कर्म जन्य बतलाया है, कि. "हे राजन् ! गत महाकल्प में मैं गन्धवों में श्रेष्ठ उप- बर्हण नामका एक गन्धर्व था। और सुन्दरता तथा वाणी की मधुरता से, और मुगन्धि के कारण मेरा
दर्शन सर्व को प्रिय था। इसी कारण से स्त्रियों को भी
मैं अत्यन्त प्रिय था, इस लिये में उन स्त्रियों में
अत्यन्त लम्पट होकर सदा उन्मत्त रहता था। एक
दिनं देवताओं के सन्न ( यज्ञ) में दक्ष आदि प्रजा
पत्तियों ने, श्रीहरि विष्णु परमात्मा का यश गाने के
निमित्त सब गंधवों को तथा अप्सराओं को बुलायां
था। यह जानकर स्त्रियों से घिरा हुआ में गान करतार
ही तहां चला गया, तब उस मेरी करी हुई अवज्ञाको
जान कर प्रजापत्तियों ने क्रोध के. वेगसे, वा नीतिके
विरुद्धा चरण होने से, कहते भये, कि तुमने जो हमारी
अवज्ञा करी है, इस कारण तुम निस्तेज होकर शीघ्र
ही शूद्र योनि को प्राप्त हो । इस प्रकार का मैरे को
शाप दिया । वह शाप होते ही मैं ने एक दासी के
उदर में जन्म लिया, परन्तु उस शूद्र योनि में' मी
मेरे को ब्रह्म ज्ञानि' महात्माओं का सत्संग रहा और
उनकी सेवा करने का अवसर मिला, उस सत्संग के
* इस नारद जी के वाक्य से हंगको यह भी उपदेश मिलता है, कि
माता, पिता, गुरु, राजा, देव स्थानादिकों में अर्थात् अपने पूज्य वर्गों के
सामने, अत्यंत शांति नम्रता पूर्वक जाना चाहिये जिससे हमारे पूज्य हन
पर प्रसन्न होकर वरदान (आशीर्वाद) दें। ऐसा नहीं करने से अर्थात्
शांति पूर्वक नहीं जाने से, नारद जी की नाई हमारी दुर्गति में भी कोई संदेहं
नहीं होगा है।
.
(३५) " प्रभाव से आगामी जन्म में मैं ब्रह्मा जी का. पुत्र होता भया" मा० ५. ६९।७० । ७१ ॥ ७२ । ७३ ॥ इत्यादि पूर्वोक्त भागवत् के प्रमाणों से कोई. अकर्मज़ कोई कर्मज,दोनों ही सिद्ध होते हैं । इसलिये दिव्य अलौकिक का अर्थ अकर्मज कदाचित नहीं हो सकता है।॥ ६॥ मू-अथवाऽलौकिकत्व मभौतिकत्वं तदुक्तं श्री कृष्णं प्रति ब्रह्मणा- "अस्यापि देव वपुषो मदनु ग्रहस्य । स्वेच्छा मयस्य नतु भूत मयस्य कोपि ।। नेशे महित्व वसितुं मनसान्तरेण । . साक्षात्तवैव किसुतात्म. सुखानु भूते..॥१॥ भा० स्क०.१० अ० १४ श्लो०२॥ इत्यत्र श्री. कृष्णावतारऽभौतिकत्वं प्रदर्शित मिति वेदना- प्य व्याप्तिप्रतीयते ॥ तथाहि- देहं विपन्ना खिल चेतनादिक, पत्युः पृथिव्या दयितस्य चात्मनः ।। आलक्ष्य किञ्चिच विलप्य-सासती (३६) . - चिता मथा रोपयद द्रिसानुनि ॥" भास्क० ४ अ०२३ श्लो० २१ ॥ इत्यत्र पृथोदेह दाहेन भोतिकत्वंधानतं, भौतिकस्यहि कायस्य भौतिकामिना दाह योग्यता, ऽभौतिकस्वप्नार- ण्यादिकं भौतिकोवह्निर्भस्मीकत्तुं नैवशकोति, समानयोहि साधक वाधक भावो दृश्यते । तथाहि- "लोकाभिरामा स्वतनुं धारणा ध्यान मङ्गलम् । योगधारणयामेय्या दग्ध्याधामा विशत्स्वकम् ॥ मू०-भा० स्क० ११ अ०३१ श्लो० ५॥ इत्यत्र श्रीकृष्णविग्रहस्या भौतिकत्वा भौतिकामिना दाहोनैवोक्तः, किन्तु माया मयस्य माया मय हुताशनेनं दाहो दार्शतः ॥७॥ टी०-अब यदि अलौकिक का अर्थ अभौतिक (पंच भूतों के विकार से रहित) मानों; तो जैसाकि . भागवत् दशम स्कन्ध में ब्रह्मा जी ने श्री कृष्ण जी से कहा हैं, कि-" हे देव ! भक्तों की इच्छानुसार प्रगट (३७) . हुए, तथा मेरे ऊपर अनुग्रह करने वाले, इस आपके अति सुलभ अवतार की महिमा को मैं ब्रह्मा व दूसरा और कोई भी जानने को समर्थ नहीं। क्योंकि यह अवतार ( स्वेच्छा मयस्य ) अर्थात् आपका लीलामय अचिन्तनीय शुद्ध.सतोगुणी है । पंच भूतों का विकार नहीं है, यदि इस आपके. शरीर.(.अवतार) की महिमा नहीं जानी जाती, तो-केवल आत्म के अनु- भव मात्र से, तुम्हारे त्रिगुणा तीत स्वरूप की महिमा को एकाग्र करे हुए मन से जानने को कोई भी समर्थ नहीं है, इसका कहना ही क्या है,अर्थात् ईश्वर अनु- ग्रह विना भगवत्स्वरूप का दर्शन अत्यन्त दुर्लभ है मा० १० । १४ । २। इस प्रकार श्री कृष्ण अवतार को भौतिक अर्थात्-पंच भूतों के विकार से रहित दिखाया है। अब पूर्व पक्षी कहता है, कि-हे एक देशी ! यदि तुम इस प्रकार का भी अवतार का लक्षण मानें, तों भी पृथु अवतार में यह लक्षण नहीं घट सकता है, इस लिये यहां भी अव्याप्ति दोष प्राप्त ही है क्योंक- भागवत् चतुर्थ स्कन्ध में पृथुः अवतार की ब्रह्म में लय वर्णन करते समय यह कहा है, कि "तिस अर्चि-. नाम पृथु अवतार की रानी ने पृथ्वी का पालन करें .
(३)
ने वाले, अपने पति राजा पृथुके शरीर को चेतनादि
सर्व धर्मों से रहित हुआ देख कर, अर्थात् मृत्यु को
प्राप्त हुआ जानकर, उनके वियोग के दुःख से कुछ
काल पर्यंत विलाप कर, पुनः तिस पति व्रता ने पति
के साथ गमन ( सत्ती) होने के निमित्त, पर्वत में एक
स्थान पर काष्ठों की चिता बनाकर, उसके ऊपर पति
के शरीर को स्थापन किया भा०४।२३। २१ ।।
इस प्रमाण से प्रतीत होता है, कि-पृथु का शरीर
भौतिक था क्योंकि भौतिक शरीर ही भौतिक अग्नि
से दाह के योग्य होता है, (उदाहरण) जैसे अभी-
तिक स्वप्न के वन को तथा स्वप्न के सिंह चौरादिका
को भौतिक. अग्नि दाह नहीं कर सकती, अर्थात्
जाग्रत के अग्री, और शस्त्रादिक कुछ स्वप्न में काम
नहीं दे सकते, स्वप्न के ही काम देंगे, क्योंकि यह
धात देखने में ही आती है, कि-समान वस्तु का ही
आपस में साधक तथा बाधक भाव हो सकता है। अर्थात्
वस्तु को सिद्ध करने वाली और नाश करने वाली
होती है, जैसे मृतिका और श्टकी समसता है, याते
मृतिका घटका साधक है,काष्ट और अग्नि की समसता
है, तहां आग्न काष्ट का बाधक है, - मरूथल जलकी
और प्यास का सम.सता नहीं, याते.मरूथल का जल
.
प्यास का बाधक नहीं, इसमें यह रहस्य है, कि
स्वप्न के पदार्थ स्वप्न मे ही सहायक होते हैं, जाग्रत
में नहीं, और जाग्रत के स्वप्न में नहीं, तैसे ही
भागवत. एकादश स्कन्धों में श्री कृष्ण जी के शरीर
को अभौतिक दिखाया है।
"लोकाभिरामा स्वतनुं धारणा ध्यान मंगलम् ।।
योग धारणयामेप्या दग्ध्वा धामा विशत्स्वकम
भा० स्कं० ११ अ० ३१ श्लोक ६॥
टी०-इसका अर्थ यह है-कि-"लोकों को आनंद
देने वाले, धारणा के द्वारा ध्यान करके के उत्तम
विषय, ऐसे अपने शरीर को, अग्नि की योग्य धारणा
से भस्म न करिके, भगवान् श्रीकृष्णदेव जी स्वधाम
अर्थात-अपने लोक को जाते भये" भा० १११३शक्षा
इस तरह श्रीकृष्णजी के शरीर को अभौतिक
* नोट-शंका-योगि पुरुषों की भी स्वच्छन्द (स्वइच्छा के अनुसार
मृत्यु होती है, इसमें कृष्णजी की विशेषता क्या रही। समाधान यद्यपि
आपका कथन यथार्थ है) तथापि-वह योगि पुरुष अग्नि की योग धारणा से
स्वशरीर को भस्म करके परलोक जाते भये हैं। और भगवान् श्री कृष्णदेव
जी ने तो,भक्तों के ध्यान के निमित्त,तथा उनको साक्षात् दर्शन होय,इसलिये
अपने शरीर को भस्म नहीं करा । इसी वास्ते अनन्य भगवत प्रिय सूरदास
आदि महात्माओं को उस मनोहर श्याम सुन्दर मूर्ति का दर्शन भी हुमा
तभा अव भी ध्यान कर्तायों को भगवत विप्रहका दर्शन होता है)
(४०) होने से, भौतिक अग्नि से दाह नहीं दिखाया-किन्तु माया मय शरीर का, माया मय अग्नि से दाह दिखाया है ॥ इत्यादि प्रमाणों से कोई भौतिक, और कोई अभौतिक, शरीर सिद्ध होते हैं। इस लिये अलौकिक का अर्थ अभौतिक करना यह लक्षण अवतार का निर्दोष नहीं है अर्थात अव्याप्ति दोष करके-ग्रस्त है। इति ॥७॥ (सूचना) अब यहां तक तो-अवतार के विषय एक देशी तथा पूर्व पक्षी के परस्पर शंका समाधान कहेहें इससे आगे सिद्धान्ति के ही सम्पूर्ण वाक्य आवेंगे। ॥ इति ॥ मृ०-इत्येवं नाना विकल्प कलापे प्राप्ते सति, प्रत्युत्तर मभिधीयते। तत्रत्रिविध दोषवि धुराणी- श्वरावतार लक्षणानि निरूप्यन्ते- टी०-इस तरह अनेक विकल्पों के प्राप्त होने पर, सिद्धान्ति अपने मत के अनुसार प्रति उत्तर कथन करता है ।। और तिसमें भी तीन प्रकार के दोषों से रहित-अर्थात् अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव इन दोषों से रहित ईश्वर अवतारों के लक्षणों को निरूपण करते हैं। मु०-“परास्य शक्ति विविधव श्रूयते, स्वा- भाविकी ज्ञानबल क्रियाच ॥ श्व० श्व० उ० ( ४१) अ. ६ मं० ८ ॥ “धर्मावहं पापनुदं भवेशम्" श्वे०-श्व० उ० अ० ६ म० ५॥“य आत्माऽप- हतपाप्मा " सत्य कामः सत्य सङ्कल्पः " छा० उ० अ०८॥ विवक्षित गुणोपपत्तेश्व ” ब्र० अ० १ पा २ सू०॥ इत्यादि श्रुति शास्त्रप्रद- र्शिता ज्ञानादयस्तेजः स्वातन्त्र्य प्रभृतयश्चा- नन्ताः परमेश्वरे गुणास्सन्ति । ईश्वरेण ज्ञाना- दय स्स्व गुणा अवतारिताः प्रकाशिता येषुत- ईश्ववरावताराः॥ टी०-श्वेताश्वतुर उपनिषद् में कहा है, कि-"इस परवा की परानाम शक्ति अनेक प्रकार की श्रवण की जाती है, और उसकी शानि शक्ति, बल शक्ति, क्रिया शक्ति, स्वभाविकी अर्थात् अनादि सिद्ध है" श्वे०-६८॥ तैसे ही श्वेताश्वतुर उपनिषद् के पांच वें मंत्र में भी कहा है, कि-" धर्मावह "-यज्ञदान तपादि समाराध्य रूप कर्मो करके अर्थात तप यज्ञादि कर्मों कर प्रसन्न किये हुए भगवान्, तिन कर्मो करके धर्मरूप (सुखादि) फलके देने वाले हैं। और "पाप- नुदं" तिसही यज्ञादि रूप समाराध्य रूप शुभकर्मों .
(४२) द्वारा पाप ध्वंसक हैं, श्वे० ६५॥ और तैसे ही छान्दो. ग्य उपनिषद में भी कथन किया है, कि-"जो आत्म स्वरूपबर ( अपहत पाप्मा) पापों से रहित शुद्ध निर्विकार है, सोई सत्यसंकल्प तथा सत्यकाम अर्थात् पूर्ण काम है" छां००८॥ और ब्रह्म सूत्र में भी कहा है, कि-"विवक्षित गुणोपपत्तेश्च" ब० अ० १ पा०२ इस सूत्रके भाष्य में कहा है, कि-"तदिह ये विवक्षिता गुणा उपासनाया मुपादेयत्वे नोपदिष्टाः सत्य संकल्प प्रभृतयस्ते परास्मिन् ब्रह्मण्युपपद्यन्त इति भाग्यम् अर्थ-जो विवक्षित गुण उपासना में उपादेयत्व रूप (ग्रहण रूप) करके कथन किये हैं, वो सर्व सत्य संक- ल्पादि गुण परब्रह्म में ही प्राप्त होते हैं" ०१।२॥ इत्यादि श्रुति शास्त्रोक्त प्रमाणों से दिखलाये हुए ज्ञानादिक, तथा तेज स्वातन्त्रतादि अनन्त गुण परमे श्वरविषे ही प्राप्त होते है । उन गुणों को ईश्वर ने जिस व्यक्ति अर्थात् शरीर में प्रकट किये हों, वे ही ईश्वरावतार कहे जा सकते हैं। और तैसे ही कपिल देवजी के विषय श्वेता श्वतुर उपनिषद् में कहा है। मू-“ ऋषि प्रसृतं कपिलं यस्तमग्रे, ज्ञाने बिभर्ति जायमानञ्च पश्येत् " श्वेश्व०उ० अ०
(४३)
५ मं० ६॥ इति कपिल देव विग्रहे परमेश्वरेण
ज्ञानादय स्स्वगुणः स्थापिता, अत स्स ईश्वरा-
वतारत्वेनोच्यत, इत्थं यत्र यत्र परमेश्वर गुणाः
सन्तित ईश्वरावताराः॥
टी०-ऋषि नाम सर्वज्ञ पूर्व काल में प्रकट हुए,
तथा सगर राजा के पुत्रों को जलाने वाले श्री वासु
देवके अंश कपिल देवजी का अवतार वर्णन है और जो
परमात्मा पहले निस अपने करके उत्पन्न किये सर्वज्ञ
कपिल ऋपि को सर्वज्ञतादि सम्पूर्ण अपनी शक्तियों
से पूर्ण करता भया, और फिर उत्पन्न हुए को जो
स्वयं साक्षी रूप से देखता है। और जो तिस सम्पूर्ण
विश्वको पॉपण करे है तथा देखे है,श्व० ५६॥ ईश्वर
ने अपने ज्ञानादिक गुण कपिल कषि में स्थापन किये
है, इस लिये वे ईश्वरावतार कहे जाते हैं । इस प्रकार
जहां जहां जिस व्यक्ति में ईश्वर के गुण मिलें
वह ईश्वरावतार हैं।
मृ-तदुक्तं भगवता यद्यदिभृति मत्सत्वं
श्री मर्जित मेव'वा॥ तत्तदेवा वगच्छत्वं मम
तेजाज्श सम्भवम् ” गी० अ० १०॥ श्लो० ४१ ।।
(४४) . टी०-वही बात मगवत् गीता दशम अध्याय में भगवान् श्री कृष्ण देव जी ने अर्जुन से कहा है, कि- "हे अर्जुन ! जो जो प्राणी विभूतिमान अर्थात् ऐश्वर्य वान् श्रीमान् है, अथवा किसी अन्य गुणों करके श्रेष्ठ देखने में भी आता है, उसको ही तुम मेरे तेज के अंश से उत्पन्न हुआ जान" गी० १०। ४१ ॥ तात्पर्य यह है, कि संसार में जो पदार्थ श्रेष्ठ हैं, वे वे सब भगवान् की हीविभूति है । जो जिस गुण से श्रेष्ठ समझा जाता है, वह भगवान् का ही अंश है। जैसे "आनन्दोब्रह्म" इस श्रुति से स्पष्ट प्रतीत होता है, कि- आनन्द रूपब्रह्म है, तो फिर जो जो पदार्थ. विशेष आनन्द तथा प्रियता उत्कृष्टता का जनक है,-सो भगवाद्विभूतिरूप अंश ही है ॥ तैसे इसी विषयको श्रीमद्भागवत्प्रथम स्कन्ध में भी भगवत्सम्बन्धी गुण कथन किये हैं । सो इस प्रकार हैं- सत्यं शौचं दया क्षान्तिस्त्यागस्सन्तोष आर्जवम्।। शमो दमस्तपःसाम्यं तितिक्षो परति श्श्रुतम् ॥१॥ ज्ञानं विरक्ति श्वर्यं शौर्य तेजो वलं स्मृतिः ॥ स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्ति धेय्य मार्दव मेवंच ॥२॥ पागलभ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो वलं.भगः।। - (४५) गाम्भीर्यस्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहंकृतिः।। एते चान्येच भगवन्नित्या यत्र महा गुणाः । प्रार्थ्या महत्त्व मिच्छद्धि, वियन्तिस्म कहिचित्" भा० स्क० १ अ० १६ श्लो० २७।२८।२९।३०॥ एवं विधाः परमेश्वर गुणाः श्री कृष्ण विग्रहे प्रदर्शिता अतश्श्रीवासुदेव ईश्वरावतारः॥१॥ टी०-सत्यं-( यथार्थ भाषण) शौचं (..बाह्या- भ्यान्तर पवित्रता अर्थात् शरीर और मन की शुद्धि) दया ( पर दुःख दूर करने की इच्छा) क्षान्तिः (क्रो- धादि की सहन शक्ति) त्याग (सत्य पात्र में दान वा उदारता) संतोपः ( यथा लाभ सन्तुष्ट) आर्जवम् (सरल स्वभाव ) शमः (मनोनिग्रह) दमः ( इंद्रिय निग्रह ) तपः (स्वाध्याय वा स्वधर्म पालन वा कृच्छ्र चान्द्रायण व्रतादिक ) साम्यं ( शत्रु मित्रादि में समान बुद्धि) तितिक्षाः (शीत उष्णादि की. सहन शक्ति) उपरति (शब्दादि विषयों से उपरामता) श्रुतं (शास्त्र के अर्थ का विचार) ज्ञानं (सर्व पदार्थों का ज्ञान वा स्वस्वरूप ज्ञान ) विरक्तिः (विषयों की इच्छा का त्याग), एश्वर्यम् (स्वपमाव से नियामक
(४६)
शक्ति).शैर्य. (माक्रम संग्राम में चोरों को नष्ट करने
की सामर्थ्य ) तेजः (प्रभाव) चलं (शरीर सामर्थ्यता
वा चातुरता) स्मृतिः (कर्त्तव्य अर्थका अनुसंधान)
स्वातन्त्र्य(स्वतन्त्रता-अपराधीनता)कौशलम् (क्रिया
निपुणता वा चातुरता) कान्तिः (सुन्दरता ) धैर्य
(अनिष्ट प्राप्ति में सावधान रहना घबराना नहीं)
मार्दवम् . ( कोमल स्वभाव वा निम्रता) प्रागल्भ्यं
(प्रौढता) प्रश्रयः (विनय) शील ( श्रेष्ठ बर्ताव)सह
(मनोबल) ओजः ( ज्ञान इन्द्रियबल ) बल (कर्म
इंन्द्रियंवल)भगः(स्वतन्त्र भोग)गम्मर्यि (गंभीरता)
स्थैर्यम्-(क्रोधादिकों के निमित्त होते भी चित्त से
अव्याकुलता वा निर्विकार रहिना)आस्तिक्यं(गुरु वेद
शास्त्र के वाक्यों पर विश्वास)कीर्तिः (सुयश) मान
(पूज्य भाव)अनहंकृतिः ( अहंकार से रहित ) भगवन्
(हे.धर्म ) महत्व की इच्छा करने वाले पुरुषों के प्रार्थना
करने योग्य यह उनतालीस गुण,तथा बाह्मणो पर दया
करना, शरणागत की रक्षा करना, इत्यादिगुण जिनके
विषेनित्य स्वभाव से रहते हैं,वह कदापि नाश को नहीं
प्रास होते हैं "भा० १११६३२७।२८।२९।३०॥ .
इस तरहं मग़वत् गीता तथा श्री मद्भागवत में कथन
किये सत्य शौचादि' अनन्त गुण परमेश्वर के .शी.
(४७). कृष्ण विग्रह में दिखाये गये हैं, इस लिये वासुदेव श्री. कृष्ण ईश्वरावतार है ॥१॥ मृ०-अथवा- “ यावदधिकारमवस्थिति रधिकारिकाणाम् ० अ०.३ पा० ३ सू० ३२॥ टी०-जहां तक जो कार्य जिसके द्वारा कराना होता है, वहां तक उस कार्य के साधक गुण उस व्यक्ति में ईश्वर द्वारा आविर्भावित (प्रकट) होते हैं भावार्थ यह है, कि अधिकारिक भी ईश्वर स्वरूप हैं क्योंकि सृष्टिकै आदिकालविपे जगत् व्यवहार के चलाने के लिये परमेश्वर ने स्थापन किये जे देवता आदिक अधिकारी पुरुप है, तिन अधिकारी पुरुषों को जितने काल तक, सो अधिकार होने हैं, जितने काल पर्यन्त. तिनों की स्थिति होवे है, बीच में किसी वर, शाप, के क्श से; तिन अधिकारी पुरुपों को जन्मांतर की प्राप्ति होने पर भी आत्मज्ञान का वाघ होता नहीं, तथा ता अधिकार की समाप्ति काल विषे तिनों को मोक्ष भी अवश्य होवे है" इति ब० अ०३ पा०३ सू० ३२॥ मृ० अत्रोक्ता येऽपान्तर तमश्शेषादयोधि- कारिकास्ते वैदिकधर्मोपदेशार्थ वा धर्म विरोधि (2) दुष्ट जन संहारार्थ मीश्वरेणावतारिता देहान्तरैः संयोजिता इतीश्वरावताराः॥ यथा कस्मिांश्च- त्पुराणे दृष्ट्वोक्त सूत्र भाष्ये भाष्यकारैः प्रोक्तम् । “अपान्तरतमा नाम वेदाचार्यः पुराणर्षि विष्णु नियोगात्कंलि द्वापरयोः सन्धो कृष्ण द्वैपायन स्सम्बभूवेति ” तथाच शेषनागो भगवदाज्ञाया बलदेवो बभूव तदुक्तम्- टी०- इस नियम के अनुसार कथन किये जो अपान्तर तम ऋषि तथा शेष आदिक भी ईश्वर के अवतार हुए हैं, क्योंकि वे वैदिक धर्म का उपदेश करने को, और धर्म के विरोद्धि दुष्ट जनों के संहार करने के लिये, ईश्वर द्वारा स्वगुण अलौकिकादि स्थापन पूर्वक प्रकट किये थे, अर्थात् इनका पूर्वोक्त कार्य सिद्धि करने के लिये देहान्तर से नियुक्त किया था। इस वास्ते यह भी ईश्वर के अवतार हैं । यह बात उक्त सूत्र के भाष्य में भाष्यकारों ने किसी पुराण को देखकर स्पष्ट कहा है, कि "अपान्तरतम नाम वेदाचार्य ऋषि विष्णु की आज्ञा से, कलि झापर की सन्धि-कलियुग तथा द्वापर. के मध्य में () कृष्ण द्वैपायन (वेदव्यास) के रूप में अवतीर्ण अर्थात् प्रकट हुए हैं। और शेषनाग विष्णु भगवान की आज्ञा से बलदेव रूप होते भये हैं। यह प्रसंग भागवत् दसमस्कन्ध में कहा है कि- मू-“वासुदेव कलानन्तः सहस्र वदनः स्व- राट् । अग्रतो भविता देवो हरेः प्रिय चिकी पया ॥" भा० स्क० १० अ १ श्लो २४ ॥ इमावीश्वरा वतार गणनाया मपि गणितौ तथाहि- टी-सहस्त्र मुख वाले, और अपने तेज से प्रकाश मान जो वासुदेव भगवान् के अंश दिव्यरूप शेषजी' वह भी श्री हरिः का प्रिय करने की इच्छा से तिन से पहिले अर्थात् तिनके ज्येष्ठ भ्राता रूप से अवतार धारण करेंगे" भा.१०।१।२४॥ ये दोनों ही अव- तार गणना में भागवत् प्रथम स्कन्ध में गिने गये हैं। तैसे ही भागवत प्रथम स्कन्ध तीसरे अध्याय में भी कहा है कि- मु०-"ततःसप्त दशेजातःसत्यवत्यां पराशरात् । चक्रेवेद तरोश्शाखा दृष्ट्वापुंसोऽल्पमेधसः॥१॥ एकोनविंशे विंशतिमे वृष्णिषु प्राप्य जन्मनी ।
( ५०.) राम कृष्णाविति भुवो भगवान हरद्धरम् ॥२॥ भा० स्क० १ अ० ३ श्लो० २२॥२३॥ टी०-जैसे सप्तदशे अवतार में पुरुपों की अल्प बुद्धि देख करके' पराशर ऋषि द्वारा सत्यवती में जन्म लेकर, वेद रूपी वृक्ष की शाखाओं का विभाग करते भये, और उन्नीसवें तथा वीसवें अवतार में भगवान् वृष्णि कुल में राम तथा कृष्ण स्वरूप धारण कर पृथ्वि के भार को दूर करते भये हैं "भा. ११३ २२ । २३॥ मू-अनेनाभि प्रायेण भगवताप्युक्तम्- "बहूनिमे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ॥ तान्यहंवेद सर्वाणि नत्ववेत्थपरंतप ।। गी० अ० ४ श्लो० ५॥ अतोऽधिकारिका एव जन्मान्तरेष्वीश्वरावतारसज्ञिताभवन्तीति॥२॥ टी-इसी अभिप्राय से भगवान् श्री कृष्णदेव जी ने भगवदीता में कहा है, कि "हे अर्जुन ! तेरे और मैरे बहुत से जन्म पूर्व हो चुके हैं। परन्तु उन सर्व को मैं जानता हूँ, तुम नहीं जानता है" गी. आ. ४ .
(५१) श्लो.५॥ इसलिये इत्यादिक प्रमाणों से यह सिद्ध होता है, कि-अधिकारिक ही जन्मान्तर में ईश्वरावतार संज्ञा को प्राप्त हो जाते हैं ॥२॥ मू०-अथवा अवतरण मधिकारि जनानां बोधार्थ प्रादुर्भावो येषांते अवतारा ज्ञानिन इत्यर्थः। ईश्वरस्य अवतारा ईश्वरावतारा राजपुरुष वदीश्वर निदेश कारिणः इत्यर्थः । ईश्वरस्येति सम्बन्धेषष्ठी ॥३॥ टी०-अब दूसरी प्रकार से कहते हैं, कि-आत्म ज्ञान प्राप्ति की इच्छा चाले मुमुक्षु पुरुषों के ज्ञान उपदेश के लिये जिनका अवतार है, वे तत्त्वनिष्ठ ब्रह्मवेता ज्ञानी पुरुष भी ईश्वरावतार हैं, क्योंकि बह्म वित्त ब्रह्मैवभवति" इस श्रुति प्रमण सेमी "ब्रह्मज्ञानी ब्रह्म स्वरूप ही है" अन्य श्रुति में भी कहा है, कि"एव मेवैष संप्रसादोऽस्माच्छरीरा समुत्थाय परं ज्योति रूपं संपद्य स्वेन रूपेणा भिनिष्पद्यते ।.स उत्तमः पुरुषः॥ " अर्थ-और संप्रसाद नामा जीव विचार ते स्थूल सूक्ष्म शरीर के अंभिमान को त्याग के अहं ब्रह्मास्मि या प्रकार ते पर ब्रह्म कुं अपना (५२) आत्मा रूप जानके, वो परब्रह्म रूप होवे है । और जो अधिकारी पुरुष ब्रह्म साक्षात कार करके परब्रह्म भाव को प्राप्त हुआ है, सोई सर्व से उत्तम श्रेष्ठ है, तथा सर्वत्र पूर्ण पुरुप है ।। इति । इस लिये ब्रह्मज्ञानी को ईश्वरा- वतार कहना निर्दोप है । क्यों, कि-राजपुरूप में जैसे पठी तत्पुरुप समास से राजा के प्रधान आज्ञाकारी पुरुप राज पुरुप कहे जाते हैं राजा के सम्बन्धी होने से इसी तरह ईश्वरके आज्ञाकारी प्रधान गुण सम्पन्न ज्ञानी भी ईश्वर के अवतार कहे सकते हैं, इस पष्ठी तत्पुरुष समास से ईश्वर की आज्ञा के करने वाले ज्ञानी भी ईश्वरावतार हैं। ईश्वरस्येति' यह सम्बन्ध में पष्ठी है, यथा ईश्वर संबंधी अवतार ॥ ३॥ मुं०-अथवा-अवतरणं चरम देह ग्रहणं येषां तेऽवतारा, ईश्वरस्य प्रियावा ईश्वरः प्रियो येपांत ईश्वर प्रिया,इश्वर प्रियाश्चतेऽवताराश्चतीश्वरा वतारा अन शाक पार्थिव वन्मध्यम पदलोपी समासः । भगवलियास्तु भगवता प्रोक्ताः "प्रियोहि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहंसच ममाप्रियः॥ ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम् गी० अ०७श्लो०१७ ।
.(५३) टी-पक्षान्तर से समाधान-ईश्वर में अवतरण करने वाले अर्थात् मोक्ष उपयोगी अन्तिम शरीर को धारण करने वाले जो पुरुप हैं, सो ही ईश्वरावतार कहे जाते हैं। फिर ईश्वर प्रिंय (ईश्वर के प्यारे अथवा ईश्वर जिन को प्रिय प्यारा है) जो अवतार का लक्षण इस तरह कर्म धारय समास करने पर, शाक पार्थिवादि की नाईं होनेसे, उत्तर पद (प्रिय) का लोप हो जाने से, ईश्वर के प्यारे मोक्ष उपयोगी चरम-आन्तिम शरीर को धारण करने वाले जीव भी ईश्वरावतार हैं। इस प्रकार भगवान श्रीकृष्ण देव जी ने अपने प्यारे मनुष्य गीता में स्वयं बताये हैं, कि-"ज्ञानी को मैं बहुत अधिक प्रिय हूं, और ज्ञानी भी मेरा बहुत अधिक प्यारा है । बहुत अधिक कहने से क्या प्रयोजन है, अर्थात् ज्ञानी तो मेरा आत्मा ही है !" गी०७॥१७॥ इस प्रकार ज्ञानी पुरुप को तो भगवान अपना आत्मा करके कथन करते हैं, इस "आत्मा" कहने से यह सिद्ध होता है, कि ज्ञानी का और मैरा यद किंचित भी भेद नहीं है दोनों एक ही हैं। मू०-भगवत्प्रियाणां विशेष लक्षणानितु- "अदेष्टा सर्व भूतानां मैत्रः करुण एवच ।। .
(५४)
निर्ममो निरहंकारः सम दुःख सुखः क्षमी॥१॥
सन्तुष्ट स्सततं योगी यतात्मा दृढ निश्चयः ।
मय्यर्पितमनो बुद्धि ? मद्भक्त स्समे प्रियः।।२।।
गी०अ० १२ श्लो० १३॥१४॥ इत्यादिना भगवता
सन्दर्शितानि ॥४॥
टी०-तैसे ही भगवत् पियों के विशेष लक्षणों को
भी भगवान् ने गीता के द्वादश अध्याय में निरूपण
किये हैं “सर्व प्राणियों से मैत्री रखे, द्वेष न करे, दुखी
तथा अनाथों पर दया करना, अहंता ममता से रहत
होना,सुख तथा दुखको सामान जानना,क्षमावान होना,
यथा लाम में संतुष्ट रहना, अष्टांग योग अर्थात् यम
'नियमादि के सहित होना, और जीता है स्वभाव
जिसने, अर्थात पूर्वावस्था में बर्हिमुख चित की वृत्तियों
को अन्तर मुख किया है जिसने, स्व स्वरूप में तथा'
वेद शास्त्रों में संशय और विपर्य से रहित है निश्चय
जिसका, और मैं सच्चिदानन्द रूप परमात्म में अपर्ण
किये हैं मन और बुद्धि के व्यापार जिसने अर्थात्
नित्य प्रति जो कर्म करताहै सो मेरे ही अर्पण करता है,
ऐसा जो मेरा भक्त है, सो मैरे को अत्यंत प्यारा है"
गी० १२ । १३ । १४ ॥ ४॥
(५५) • मु०-ईश्वरस्या वतरणं तादात्म्येना परोक्षता येषुत ईश्वरावतारा एवं वा भगवत्प्रिया ईश्वरा- वताराः॥ ५॥ टी०-अब अन्य प्रकार से समाधानानरूपण करते करते हैं, ईश्वर का अवतरण नाम 'तादात्म्य संबन्ध करके अर्थात् अभेद सम्बन्ध करके ईश्वर का अपरोक्ष ज्ञान अर्थात् प्रत्यक्ष दर्शन जिनको होता है, वे ईश्वरा- वतार हैं, अथवा ऐसे भगवत्मिय भी ईश्वरावतार हैं॥५॥ मृ०-अत्रायं निष्कर्षों, वहुविधाः परमेश्वरा- वताराः, केचन श्याम वर्णाः केचन शुक्ल वर्णाः केचित् चतुर्भुजाः, केचित् द्विभुजाः, केचन भौतिक,कर्मज,योनिज देहा। केचना भौतिका- कर्मजा योनिज कायाः।परञ्चज्ञान तेज स्स्वा- तन्त्र्य धर्मावहत्व पापनुदत्वादि परमेश्वर गुणा- १ तहां-"भिन्नत्वे सत्यऽभिन्न सत्ता कत्वं तादात्म्य" अर्थ-जो दो पदार्थ व्यवहार दृष्टि से परस्पर भिन्न हुए भी वास्तव ते एक सत्ता. वाले होवे है, तिन दो पदार्थों कातादात्म्य सम्बन्ध होता है। जैसे तंतु पटादिकों का, तथा गुण गुणी आदिकों कातादात्मय संवध है, तैसेही जीव और ब्रह्म कातादात्म्य सम्बन्ध है। • - .
(५६) विष्टत्वेश्वर प्रियत्व परमेश्वर निदेश कारित्वा- दीनि लक्षणानि तेषु नैवव्यभिचरन्तिोश्यामल- वादीनि त्ववतार विशेप ' लक्षणानि । ईश्वर शक्तया विष्टवादी न्येव सामान्य लक्ष- णानि ॥ तत्रये चतुर्भुजाः श्यामला भौतिका कर्मजा योनिज देहास्ते श्रीकृष्णादयः पूर्णा वताराज्ञेया, ये च द्विभुजारशुक्ल वर्णाः कर्मज योनिज कायास्ते पृथु प्रभृतयः प्राचीनाः, श्री गुरुनानकादयोऽ वर्वाचीनाश्च परमेश्वरस्यांश कला वतारादिना कथ्यन्ते ॥ टी-इस विषय में सारांश यह है. कि ईश्वर के अवतार अनेक प्रकार के हैं। कोई श्याम वर्ण हैं, तो कोई गौर वर्ण भी हैं, कोई चतुर्भुज हैं, तो कोई दो भुजवाले भी हैं, कोई भौतिक (पंच भूतों के कार्य) तथा कर्म जन्य, योनिज देह वाले हैं। और कोई अभौतिक (भूतों के विकार से रहित) अकर्मजन्य अयोनिज देह वाले हैं, परन्तु ज्ञान तेज स्वातन्त्रयता धर्मावहत्व (धर्म का संरक्षण) पापानुदत्व (पापों को नाश करना) इत्यादि जो परमेश्वर के गुण हैं तिन (५७) कर युक्त होना, ईश्वर के प्यारे होना, तथा ईश्वर के आज्ञाकारी होना, इत्यादि लक्षण उनसे दूर कभी नहीं हो सकते, अर्थात् पूर्वोक्त लक्षण उनमें नित्य ही रहते हैं। श्याम वर्ण आदि तो अवतारके विशेष लक्षण हैं। और जो ईश्वर की विशेष शक्तियों कर युक्तं होना है, सोई अवतार का सामान्य लक्षण है। उनमें भी जो चतुर्भुज, श्याम वर्ण, अभौतिक, अकर्मज, अयोनिज देहवाले श्री कृष्ण आदि. अवतार हैं । वे पूर्ण अवतार हैं, और जो द्विभुज, गौर वर्ण, भौतिक, कर्मजन्य, योनिज देह वाले पृथु आदिक प्राचीन, और श्री गुरु नानक आदि नवीन, ये सर्व परमेश्वर के अशावतार तथा कलावतार कर कहे जाते हैं। मृ-वैदिक धर्म प्रचार स्तद्विरोधिना मुप- संहार स्त्विति प्रयोजनस्यापि सवावतारेष्व- व्यभिचारः॥ तदुक्तं भगवता- “यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानि भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥१॥ परित्राणाय साधूनां विनाशायच दुष्कृताम् । धर्म संस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥२॥ गी० अ०४ श्लो०७।८॥
(५०) टी वैदिक धर्म का प्रचार करना, तथा वैदिक 'धर्म के विरोधियों को संहार करना इत्यादिक अव- तारों के प्रयोजन तो सर्व अवतारों में पाये जाते हैं, अर्थात् यह प्रयोजन तो विरोध रहित सर्व अवतारों में सामान ही प्राप्त है, इस विषय में किसी प्रकार का भी व्यभिचार नहीं है । तेसे ही यह अवतार का प्रयो- जन स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण देवजी ने गीता में कहा है कि-हे अर्जुन ! जिस जिस काल में वैदिक धर्म की हानि होती है, और अधर्म की वृद्धि होती है । तिस- काल में ही मैं अपने आत्मा को प्रकट करता हूं ॥ अर्थात् अवतार धारण करता हूं ॥ (दूसरा प्रयोजन यह है, कि-साधु महात्माओं की रक्षा के लिये और दुष्टों के नाश के वास्ते हर एक युग में अवतार लेकर मैं धर्म की सम्यक स्थापना करता हूं ॥ गी० ४।७। ॥८॥, इस करके सर्व शक्ति मान परमात्मा का अवतार धारण करने का प्रयोजन सिद्ध हुआ है । मू-अयं भावः कैश्चिद्धराहादिभि हिरण्याक्षा- दयो धर्म विरोधिनो धुपंसहताः। कैश्चिद्वेद व्यासादिभिर्वैदिक मार्गा एवोपदिष्टाः। कैश्वन श्रीराम कृष्ण प्रभृतिभिरुभयं कृतं तेऽवतारत्वेन
(५४)
सर्वे सदृशा अपि, पारमेश्वर गुणानां न्यूनाधि-
क्येन परस्पर मुपास्यो पासक भावेनापि वर्तन्ते,
तेन नेश्वरावतारत्व क्षतिः॥
टी०-तात्पर्य यह है कि कोई बराहादिक अवतार
तो हिरण्याक्ष आदिक धर्म के विरोधियों को संहार
करते भये हैं, कोई बेद व्यासादिक अवतार वैदिक मार्ग
का उपदेश करते भये हैं, वे सब यद्यपि अवतार होने
के कारण सामान ही हैं । तथापि ईश्वर सम्बन्धी गुणों
को उनमें न्यूनाधिक होने से वे परस्पर उपास्य उपासक
भावयुक्त भी थे,अर्थात् कोई वेदव्यासादिक तोउपासक
है, और कोई श्री कृष्णादि उपास्य हो जाते हैं। परन्तु
तिस करके ईश्वर अवतारमानने में कोई क्षति (हानि)
नहीं हो सके है। भावार्थ यह है, कि-धर्म की रक्षा करना,
'तथा दुष्टों को नाश करना, यह अवतार को प्रयोजन
दोनों में सदृशही है, इसमें किसी प्रकार का भी विरोध
नहीं है।
मू०-अथवा “यद्यदा चरित श्रेष्ठ स्तत्त देवे-
तरोजनः सयामाणं कुरुते लोक स्तदनुवर्तते"
गी० अ०३ श्लो० २१॥ इति गीतोक्त न्याय
(६०) माश्रित्य लोक शिक्षार्थं तेषां परस्पर मुपास्यो पासक भावोज्ञेयः॥ टी०-दूसरी बात यह भी है कि-गीता मै श्री कृष्ण जी ने कहा है कि-"श्रेष्ठ पुरुष जो जो आचरण (कर्म) करते हैं, दूसरे समान पुरुप भी वैसे ही आचरण को करते हैं। तथा श्रेष्ठ पुरुष जिस को प्रमाण मानें हैं, तिनके अनुसारी पुरुप भी उसी को ही प्रमाण भूत मान, उसके अनुसार वर्त्तते हैं" गी०३ । २१ ॥ इस गीता उक्त न्याय (युक्ति) को लेकर लोक शिक्षा के लिये तिन अवतारों का परस्पर उपासक उपास्य भाव भी जानना चाहिये ॥. मू-मुमुक्षुभि स्तु सर्वे परमेश्वरावतारा उपास्याः । यथाह सूतः "मुमुक्षवो घोर रूपान् हित्वा भूतपतीनथ । नारायण कलाः शान्ताः भजन्ति ह्यनसूयवः" भा० स्क०१अश्लो०२६।। एतेनातीता ये श्री शंकराचार्य प्रमुखा इदानीं तनाश्च विद्धांसः पुराणेष्वनुक्ता अपि श्यामलत्वाद्यवतार विशेष लक्षणा भावेपिपार- (६१) मेश्वर ज्ञानादि गुणा विष्टत्व भगवत्मियत्वाद्य- वतार सामान्य लक्षणोपेतत्वादी श्वरावतार- त्वेन श्रेयस्कामै रुपास्या स्तदुक्तम् “यं यं लोकं मनसा संविभाति, विशुद्ध सत्त्वः कामयते. यांश्च कामान्.॥ तन्त लोकं जायते तांश्च कामां, स्तस्मादात्मज्ञंघर्चयेभूति कामः” मु० उ० तृ० प्र० ख० मं०.१०॥ टी० इस लिये मुक्ति की इच्छा वाले मुमुक्षु पुरुषों को परमेश्वर के सब अवतारों की उपासना करना चाहिये । जैसा कि सूतजी ने भागवत् प्रथम 'स्कन्ध में कहा है, कि- "मुक्ति की इच्छा वाले मनुष्य किसी में दोष दृष्टी ने करते हुए भयंकर रूप वाले भूत प्रेत पिशाच आदिकों को छोड़कर शान्त स्वरूप नारायण के अवतारों का ही सेवन करते हैं" भा० १ । २॥ २६ ॥ इस करके पूर्व काल में उत्पन्न हुए श्री स्वामि शंकराचार्य आदिक, और आजकल विद्वान् पुरुपों के नाम पुराणों में न कहे जानेपर भी, और श्याम स्वरूप आदिक अवतारों के विशेष लक्षण न होने से भी, तैसे ईश्वर सम्बंधी ज्ञानादिक पूर्वोक्त गुणों कर युक्त होने से, और भगवत्मिय होना, इत्यादि
(६२)
अवतार के सामान्य लक्षणों से युक्त होने से, वे ईश्वर
के अवतार कहे जाते हैं। इस लिये कल्याण की इच्छा
वाले मनुष्यों को उनकी उपासना अवश्य ही करनी
चाहिये । और यह प्रसंग मुण्डक उपनिषद में भी
कहा है, कि-"श्रद्धा भक्ति पूर्वक शुद्ध अन्तः करण से
अर्थात् कपट माया जाल को त्याग कर ज्ञानवान्
पुरुष के पूजनादि को करता हुआ यह अधिकारी
पुरुष, जिस जिस लोक प्राप्ति की इच्छा करता है।
और जिन जिन पदार्थों के प्राप्ती की इच्छा करता है।
तिस तिस लोककू तथा तिन तिन पदार्थों कू प्राप्त होवे
है ॥ याते संपदा की इच्छा वाला पुरुप श्रद्धा भक्ति
पूर्वक ब्रह्म वेत्ता पुरुष का ही पूजनादि करें मु० उ०
तृ० मु० ख० २ मं०१०॥ और ब्रह्मवेत्ता की सेवा का
फलं स्मृति में भी कहा है “योको ब्रह्मविद्भुक्ते
जगतर्पयतेऽखिलम् । तस्माद्ब्रह्म विदे देयं यद्यस्ति
वस्तु किंचन" अर्थ-जिस पुरुष के गृहे विषे एक भी
ब्रह्म वेत्ता पुरुष भोजन करे है। तभी सर्व जगत् कू
तृप्त करे है, अर्थात् सर्व जगत् की तृप्ति करने तैजो
पुण्यं होता है । सो पुण्य एक ब्रह्म वेत्ता के भोजन
कराने से होता है, इस लिये इस पुरुष के जो कुछ
अन्न वस्त्रादि प्रियवस्तु होवे, सो वस्तु मुमुक्षु पुरुष ने
ब्रह्म वेत्ता पुरुष के ताई देना योग्य है, तहां और प्रमाण
.
.. (६३) भी है-"यत्फलं लभते.मर्त्यः कोटि ब्राह्मण. भोजनैः । तत्फलं समवाप्रोति ज्ञानिनं यस्तु भोजयेत् ॥ ज्ञानि: भ्यो दीयते यच्च तत्कोटि गुणितं भवेत्" अर्थ-यह जीव कोटि ब्राह्मणों के भोजन करवाने करके,. जिस फल को प्राप्त होता है, तिस फल कू यह पुरुष एक ज्ञान- वान् पुरुष के भोजन सेवादि करवाने करके प्राप्त होता है, तथा ज्ञानवान के ताईं जो वस्तु दिया जावे है-सो कोटि गुणाधिक लाभदायक होवे है ।।' इत्यादि अनेक श्रुति स्मृति वचन ज्ञान वान पुरुष की सेवा तै मन वाछित पदार्थों की प्राप्ति कथन करे है। इति मू०-अनेन कतीह्याकाङ्क्षापि निराकृतायत ईश्वरावताराणाम नन्तत्वात् तदुक्तम् “अवतारा. ह्यसङ्ख्येया हरेस्सत्त्व निधे दिजाः। यथाऽवि- दासिनः कुल्याः सरसः स्युस्सहस्रश” भा० स्क० १ अ०३ श्लो २६॥ टी०-और-इस करके कितने ईश्वर के अवतार हैं, यह आकांक्षा भी दूर हो जाती है, क्योंकि ईश्वर के अवतार असंख्य (अनन्त ) हैं । सो अनन्तता श्री मद्भागवत् में स्पष्ट कहा है, कि-"हे ब्राह्मणों ! जैसे- उपक्षय शून्यात्सरसः .(नाश रहित महां सरोवर से) (६४) सहस्रों छोटीर नदीयां वा नहरें निकलती हैं, तैसे ही संत्त्व निधि-सत्त्व-गुण के समुद्र अर्थात्-सत्य स्वरूप श्री हरि से असंख्य (अनन्त ) अवतार प्रकट होते हैं। भा०१।३।२६ ॥ इस प्रमाण से निर संदेह ही हरि के अवतार अनन्त सिद्ध होते हैं । मू०-अत्र यद्यपि तत्र तत्रोक्तान्यपि प्रमा- णानि, तथापि अन्यान्यपि प्रदर्शयामि । “इदं विष्णु विचक्रमे त्रेधानिर्दधे पदम् ऋ०म०१सू० ५ मं०७॥अनेन त्रिविक्रमा वतारः कथितः । टी०-इस अवतार निर्णय के विषय में हमने जहां तहां तत् तत्स्थानों पर संदेह निवृत्ति के लिये प्रमाण कथन किये भी हैं । तथापि हम और दूसरे प्रमाणों को भी निरूपण करते हैं ॥ ऋग्वेद में कहा है, कि" इस विश्व को विष्णु भगवान् कमण करते हुए अर्थात् मापते हुए तीन प्रकार से चरण स्थापना करते भये, एक पाद पृथिवी पर दूसरा पाद अन्तरिक्ष में, तीसरा पाद स्वर्ग लोक में इस प्रकार से चरणों को स्थापन करके समय भूमी मापते मये" ऋ० मं० १ झू०. ५ में ७॥ इस प्रमाण करके त्रिविक्रम (वामन) अवतार कथन किया है ।। सो वामन रूप धारण करके विश्व-
(५)
का मापना श्री मद्भागवत स्कंधर अध्याय७ श्लोक ४.
में विस्तार से कहा है । और तिसी प्रकार साम वेदी
केन उपनिषद में भी कहा है-
मृ०-"ब्रह्महदेवेभ्यो विजिग्ये तस्यह ब्रह्मणो
विजये देवा अमहीयन्त'त ऐक्षन्तास्माकमेवायं
विजयोऽस्माक मेवायं महिमति ॥१॥ त?षां
विजज्ञौ तेभ्योहप्रादुर्वभूव तन्नव्यजानन्त किमिदं
यक्षमिति॥२॥ सा० के० उ० ख०३ ॥ इत्या-
दिना यक्षा वतारो दर्शितः॥
टी०-"देवता असुर संग्राम में, देवताओं को
भगवान जय देते भये, तिस सर्व व्यापक ब्रह्मके जये
हुए, इन्द्रादिक देवता इच्छा करते भये, कि यह अंसुरों
को हमने ही जीता है। और यह महिमा भी हमारी
है ॥ १॥ देवताओं के इस मिथ्या अभिमान की परं-
मात्म देव जानते भये, तिनके मिथ्या आभिमान की
निवृत्ति के वास्ते, देवताओं के सन्मुखु यक्ष रूप से
(किसी विशेष रूप से) प्रकट होते भये, सो देवता
यह नहीं जानते भये, कि-यह यक्ष कौन है."॥शसा के.
०ख०३॥ आगें जिस प्रकार से परमात्माने देवताओं
(६) के अभिमान को दूर किया है, सो जिसको अधिक जानने की इच्छा हो, वे साम वेदी केन उपनिषद में देखलें ॥ इस प्रकार से यक्ष अवतार का कथन किया है। मू-चिन्मयेऽस्मिन्महा विष्णो जाते दाशरथौहरी रघोः कुलेऽखिलं राति राजते योमही स्थितः ॥ सराम इति लोकेषु विद्वद्भिः प्रकटी कृतः॥१॥ धर्म मार्ग चरित्रेण ज्ञान मार्गश्च नामतः ॥ तथा ध्यानेन वैराग्य मैश्वर्यं स्वस्य पूजनात् ।। तथारात्यस्य रामाख्यांभुवि स्यादथ तत्त्वतः॥२॥ चिन्मयस्या द्वितीयस्य निष्कलस्या शरीरणः।। उपासकाना कार्यार्थं ब्रह्मणो रूप कल्पना॥३॥ इति राम पूर्व तापिन्यु पनिषच्छुतिः ॥ तत्र रामा वतारो दर्शितः॥ टी०-और राम पूर्व तापिनी, उपनिषद् में भी कहा है, कि, "चैतन्य धन (चेतन्य स्वरूप)अद्वितीय- देतरूपी कल्पना से रहित, अशरीरि महा विष्णु परब्रह्म परमात्माने रघुकुलमें दशरथके पुत्र होकर, अपने भक्तों। - (६७) की सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करते भये । जो दशर- थात्मज( दशरथ के पुत्र) रामचन्द्रजी भगवतावतार, अपने चरित्र से धर्म मार्गको, तथा नाम स्मरण से ज्ञान. मार्ग को, और ध्यान से वैराग्य को, तथा पूजनादि सेवा से एश्वर्य को देते भये हैं । इस कारण से विद्वानों ने उनको लोक में राम इस नाम से प्रसिद्ध किया है । इस प्रकार राम पूर्व तापनी उपनिषद में रामावतार कथन किया है। मू०-सच्चिदानंद रूपाय कृष्णाया क्लिष्ट कर्मणे । नमो वेदान्त वेद्याय गुरवे बुद्धि साक्षिणे॥शा कालिन्दी जल कल्लोल सङ्गिमारुत सेवितम् ॥ चिन्तय चेतसा कृष्णं मुक्तो भवति संसृतेः ॥२॥ तस्मात् कृष्ण एव परमो देवस्तं ध्यायेत् ॥ तं यजेत् । तं भजेत् । इति गोपाल पूर्व तापिन्यु पनिषदि, तत्र कृष्णा वतारो दर्शितः॥ टी०-और गोपाल पूर्व तापिनी उपनिषद में भी कहा है-कि-"सच्चिदानन्द स्वरूप वेदांत वेद्य, वेदान्तं शास्त्र कर जानने योग्य है स्वरूप जिसका, अक्लिष्ट • (६) . कर्म (नहीं है कठिन कोई कार्य जिनक्) सर्व जगत् के गुरू, बुद्धि के शाक्षी श्रीकृष्ण चन्द्र जी के प्रति हमारा नमस्कार है॥१॥ तथा श्री यमनाजी की तर- गों के जलं कणों से, तथा शीतल वायु से, सेवन किये गये श्रीकृष्ण जी को, जो पुरुष अपने अन्तःकरण में नित्य प्रति चितवन करता है। वह अनन्य उपासक संसार से मुक्त होजाता है । इस लिये श्री कृष्णं ही परम श्रेष्ठ देव हैं । तिस से श्री कृष्ण जी को ही मुमुक्षु पुरुष ध्यान करें। उनका ही भजन करे । अर्थात्-अ- • पना सर्वस्वं श्री कृष्ण जी को ही जानना चाहिये ।। इस प्रकार गोपाल पूर्वतापिनि उपनिपद में श्री कृष्णा यतार की महिमा निरूपण की है। मु०-“योऽसौ सूर्ये तिष्ठति, योऽ सौगोषु तिष्ठति,योऽसौगोपान् पालयति,योऽसौ सर्वेषु देवेषु तिष्ठति, योऽसौ सर्वं देवैर्गीयते, योऽसौ सर्वेषु भूतेष्वा विश्य भूतानि विदधाति, सवोहि स्वामि भवति साहोवाच गान्धर्वी कथंवाऽस्मासु जातो गोपालः कथं वा ज्ञातोऽसौत्वया मुने कृष्णः॥ सहोवाचाव्ज योनिः । योवाऽवता.
राणां मध्ये श्रेष्ठोऽवतार, इत्यादि.गोपालोत्तर तापिन्युपनिषदि। टी०-तैसे ही गोपाल उत्तर तापिनि उपनिषद् में भी कहाहै, कि-"जो सूर्य में स्थित है, तथा जो सूर्य की किरणो में वा गौवों में स्थित है, और जो गोपों की रक्षा करे है, तथा जो सर्व देवताओं में विराजमान है, और जो परमात्मदेव सर्व देवताओं करके स्तुति किया जाता है, अर्थात् सम्पूर्ण देवता जिसके यश कोगान कर- ते हैं। तथा जो यह सर्व प्राणि मात्र में प्रविष्ट होकर संपूर्ण प्राणियों को धारण करता है, वो ही हमारा स्वामि है, तब सो गान्धर्वी बोली किन्हे मुने! हमारे में गोपाल कैसे उत्पन्न हुए, और हे मुनीश्वर ! श्री कृष्ण आपने कैसे जाने । तब ब्रह्मा जी ने उत्तर दिया, कि- ये सर्व अवतारों में श्रेष्ठ अवतार हैं" और छांदाग्यो- पनिपद के तीसरे अध्याय १७ खंड में भी कहा है, कि "कृष्णाय देवकी पुत्राय" इत्यादि श्रुति प्रमाणों से श्री कृष्ण जी का प्रादुर्भाव (अवतार) प्रसिद्धही है । मृ०-"एवं यथा जगत्स्वामी, देव राजोजनार्दनः अवतारं करोत्येष, तथा श्रीस्तत्सहायिनी ॥ वि० पु० अ० १ अ०४॥
(७०) टी०-विष्णु पुराण में मी अवतार के विषय में कहा है,कि-"जगत् के स्वामि देवताओं के राजा जना- र्दन भगवान जैसे जैसे अवतार धारण करते हैं, तैसे तैसे ही लक्ष्मी भी अवतार धारण करती है" वि० पु. अं० १ अ४ ॥ इस प्रकार लक्ष्मी जी का भी अवतार कथन किया है। मू-"अधुनैकादशं जन्म रामनाम्नो भविष्यति। नारसिंहेनवपुषा हिरणय कशिपु हरिः॥१॥ जघान वारत्रितयं मृगेन्द्र इव वारणम् ॥ वसुदेव गृहे विष्णो, (वो भार निवृत्तये ॥२॥ अधुना षोडशं जन्म भविष्यति मुनीश्वर ॥ इति महर्षि वाल्मीकि कृित योग विसिष्ठ नि० प्र० स० २१ ॥ महर्षि वाल्मीकि कृत योग वासिष्ठ में भी अवतर के विषय में कथन किया है कि 'हे मुनीश्वर ! अब श्रा रामचन्द्रजी का. ग्यारहवां नृसिंह अवतार होगा. वे ही हारे भगवान् नृसिंह स्वरूप को धारण करके, जैसे सिंह हस्ति को मारता है, तैसे ही हिरण्य कशिपुराक्षस को तीन चार मार चुके हैं। और अब पृथ्वी को भार (७१) दूर करने के लिये, विष्णु भगवान् का सोलहवां अव- तार वसु देवके ग्रह में होगा। मू-वसिष्ठं प्रति काक भुशुण्ड वचनम्- "एवं दत्वा वरंदेवो देवानां विष्णुरात्मवान् । पितरं रोचयामास तदा दशरथं नृपम् ।।" वा० रा० वा. कां. स. १५॥ . इत्यादिषु वाल्मीकि महर्षिणा स्पष्ट मेव श्री रामो विष्ण्व वतारो दर्शितः॥ टीव-तैसे ही वाल्मीकि रामायण में वसिष्ठ जीके प्रति काक भुशुण्ड जीने कहा है, कि-"सच्चिदानन्द स्वरूप विष्णु भगवान् इस प्रकार देवताओं को वरदान देकर, पिता राजा दशरथ जी को प्रसन्न करते भये" वा-रा-बा-का-स-१५॥ इत्यादि ग्रन्थों करके महर्षि वाल्मीकि जीने श्री राम चन्द्र जी को साफ साफ ही विष्णु का अवतार कथन किया है। मू-ननु बुद्ध उक्त परमेश्वरावतार लक्षणा- नामव्याप्तिः प्रतीयते' यतोवैदिक मार्ग विप- येय स्त्रत श्रूयत इति नचवाच्यं, वैदिकानां - (७२) भगवत्तियाणां रक्षार्थमसुराणां विनाशार्थ च तेन तथा कृतम् । तदुक्तम्- “देव द्विवां निगम वर्मनि निष्ठितानाम् । पूभिर्मयेन विहिताभि रदृश्य तृभिः॥ लोकान् प्रां मति विमोह मति प्रलोभं । वेषं विधाय बहु भष्यत औप धर्म्यम् ॥ भा० स्क० २ अ०७ श्लो० ३७॥ टी०-इस प्रकार सिद्धान्ति ने अपने पक्ष की, अनेक श्रुति स्मृति उक्त प्रमाणों से, तथा अनेक ऊहा पोह (युक्तियों) पूर्वक स्थापना की; अब पूर्वोक्त लक्षणों में प्राप्त कुछ विरोधियों के दोषों को, अनुवाद पूर्वक परिहार (निवृत्ति) करता है। सिद्धान्ति कर कहे हुए अवतारके लक्षण पूर्व पक्षी पहले शंका करता है, कि हे सिद्धान्ति ? आपके कथन किवे अवतार के लक्षण अनुसार बुद्ध भगवान् अवतार सिद्ध नहीं हो सकते, क्यों,कि-बुद्ध भगवान के विषय में सुना जाता है, कि-उन्होंने वैदिक धर्म का खण्डन किया है। इस- लिये इस लक्षण में अव्याप्ति दोष आता है इति ॥ इसका उत्तर यह है कि हे पूर्वपक्षी! बुद्ध अवतार
(७३)
विपय ऐसीशंका आपको कभी भी उत्पन्न नहीं होनी
चाहिये, क्यों, कि-उन्होंने वैदिक, मार्ग के विपरीत
आचरण, तथा वैदिक मार्ग का खण्डन, केवल वैदिक
मार्ग में स्थित पुरुषों की, तथा भगवत् भक्तों
की रक्षाके लिये किया है, और असुरों के विनाश के
निमित्त कियाथा, अर्थात जो भगवत् भक्त होंगे,
और जो वैदिक मार्ग में निष्ठा अर्थात् श्रद्धा वाले
होगें, वे इस खण्डन से भी मोह को प्राप्त नहीं होंगे।
और जो. इसके विपरीत होंगे, वे इस खण्डन से भूल
में पड़ते हुए इसवैदिक मार्ग से दूर होजायगे।यही बात
श्रीमद्भागवत में भी कहा है, कि-"वेद मार्ग में निरन्तर
स्थित ऐसे जो देवताओं के द्वेपी, सो मय दैत्य के
वनाये शत्रुवों को आश्चर्य अर्थात् भय उत्पन्न करने
वाले अदृश्य (गुप्त) नगरोंमें बैठकर लोकों को नाश करते
हुए दैत्यों की बुद्धिको व्यामोह (भरमाने) के निमित्त
अर्थात् वैदिक मार्ग त्याग कराने के लिये, और तिनकी
बुद्धिको प्रलोभ (वेद विरुद्ध मार्गअगीकार कराने) के
निमित्त पाखण्ड धर्म की व्याख्या करेंगें, भा०२।७।
३७ ॥ तात्पर्य यह है कि बुद्धावतार विषयक "यदा
यदा हि धर्मेस्यति" इस लक्षण करके अव्याप्ति दोष
नहीं मानना, क्यों, कि-असुर वैदिक मार्ग में स्थित
होकर धर्म का नाश करते थे। इस लिये बुद्ध भग.
(७४)
वान ने पाखण्ड धर्मकी व्याख्या करके उनको बहकाय
! के, असुरों से वैदिक धर्म का त्याग कराया है, इस से
बुद्धावतारभी धर्म रक्षार्थ ही हैं।
मू-ननु “जन्म कर्म च मे दिव्यम्" गी०
अ० ४ श्लो० ॥ इति भगवदचनादीश्वरा-
वताराणां जन्म कर्मणो दिव्यत्व मुक्तं, श्मामल
शरीर त्वादिकं जन्मनो दिव्यत्वं नैव,चेत्तदाकि
दिव्यत्वं, किञ्च कर्मणो दिव्यत्व मपिकिं ज्ञेय
मित्या काक्षायां ब्रूमो, जन्मनो दिव्यत्वम्
नाम चरंमत्वम्, “नमा कर्मणि लिम्पन्ति गी.
अ० ४ श्लो० १४॥ इति भगवद्धचनात्,कर्मणो
दिव्यत्व मलेपत्वम् । अथवा भगवता यत्स्व
जन्मनो दिव्यत्व मुक्तं तत्तु पूर्णा वताराणां
जन्म दिव्यत्व दृष्टया कथितं, नत्व वतार मात्र
दृष्ट्या; तेषु श्यामलत्वादीनि दिव्यत्वानि
सन्त्येव ।।
टी०-शंका-अब "जन्म कर्म चमेदिव्यम्" इस
7...
( ७५) भगवतं वचन से अवतारों के जन्म और कर्म दिव्य कहे गये हैं, सो यहां यह प्रश्न होताहै, कि यदि श्याम शरीरादिक होना जन्मका दिव्यत्व.(दिव्य पना) नहीं तो फिर उनमें दिव्यत्वं क्या वस्तु है। और उनके कर्म भी दिव्य कैसे मान जायेंगोइस प्रकारकी आकांक्षा (पूछने की इच्छा)के प्रकट होने पर इसके उत्तरमें हम कह सकते हैं, कि जन्म, का चरमपना अर्थात् अन्तिम जन्म (वर्तमान जन्म में किये कर्मों के अनुसार दुबारा जन्म) न होनाही दिव्यपनाहैं। और"मैरेको शुंमाशुम कर्म लिपाय मान नहीं होते, अर्थात् अन्य जीवों की नाईं हर्ष और शोक तथा जन्म. और मरण के देने वाले नहीं होते हैं,क्यों,कि-मैं नित्य मुक्त आनन्द रूप हूं इति" गी०४।४॥ इस भगवत वचन से भी अलपत्व नाम कर्मोकालिपाय मान नहीं होनाही कर्मोका दिव्य पना कहा है। अथवा सच्चदानन्द स्वरूप श्रीकृष्ण देवजी ने जो अपने जन्मकों दिव्य कहा है, वह तो पूर्ण अवतारों का जन्म दिव्य होने की दृष्टि से कहा है, अर्थात् उनको अलौकिक चतुर मुजादि स्वरूप युक्त होने से कहा है, कोई सामान्य अंश,कला, अव- तार मात्र की दृधिसे नहीं कहाहै । इस लिये श्रीकृष्ण आदिक में श्याम शरीर चतुर भुजादिक दिव्य पना प्रसिद्ध ही है ।। :.
मू०-ननु "एते चांशकलाः पुंसः, कृष्णस्तु भगवान स्वयम्” भा० स्क० १ अ० ३ श्लोक २८॥ “मत्तः परतरं नान्यत्, किञ्चिदस्ति धन- ञ्जय । मयि सर्व मिदं प्रोतं, सूत्रे मणिगणाइव" गी० अ० ७ श्लो ७॥ “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्न मेकांशेन स्थितो जगत्। गी० अ० १० श्लो० ४२॥ इत्यादीनि बहुनि प्रमाणानि श्रीकृष्ण स्वयं परमेश्वरं दर्शयन्ति । अतः कथं परमेश्वर निदेशकारी स उच्यते इति चेद्वैष्णव मन्या- होते बुद्धि वैभवम् ॥ टी० शंका-श्रीमद्भागवत् में कहा है, कि-" यह सनकादिक ऋषि जो पूर्व कथन किये अवतार हैं, सो इन मैं तो कोई अंशावतार हैं, कोई कला अवतार हैं,परंतु श्रीकृष्ण जी तो स्वयं भगवान् पूर्ण पुरुपोत्तम हैं भा० १३॥२८॥ तिसी प्रकार गीता में भी कहा है,कि "हे अर्जुन ! मैरे से जुदा श्रेष्ठ जगत का कारण और कोई नहीं है, जैसे डोरे ( सूत्र) में मणि गण, और तन्तुवों म पट पुहिरहे है, तैसे ही मैं ब्रह्म स्वरूप सर्व का कारण तयाअधिष्ठान रूप मैरे विये यह चराचर - (७७) हश्यमान अव्याकृत से स्थूल पर्यत सम्पूर्ण जगत पुवा हुआ है" गी० ७७॥ यह बात श्रुति में भी कहा है, कि-" रसातलादि ब्रह्मान्तान्सर्व लोकानं पोह्य, सर्वे लोका आत्मनि ब्रह्मणि भणय इवौताः प्रोताश्च" अर्थ-रसातल से लेकर ब्रह्मलोक पर्यन्त सम्पूर्ण लोक व्यापंक ब्रह्मरूपआत्मा में माण के समान पुवे हुएहैं, और गीता में भी कहा है, कि हे अर्जुन ! मैं ही निविशेष परिपूर्ण परमात्मा आपही इस दृश्यमान स्थावर जङ्गम रूप सम्पूर्ण जगत् को एकांश में धारण करके स्थित हूं, गी०१०। ४२ ॥ इत्यादिक बहुत से प्रमाण श्रीकृष्ण देवजी को स्वयं पूर्ण परमेश्वर कथन करते हैं। इस कारण से श्री कृष्णजी को ईश्वर का आज्ञा- कारी आप कैसे कथन करते हैं, इतिचेट् ( यदि ऐसे कहें) तो. हे वैष्णवराज ! हे वष्णवं मन्य !! यदि आप ऐसे कहें, तो आपकी बुद्धिकी कला कौशलता को धन्य हैं, अहो बड़े आश्चर्य की बात है, कि-यह छोटी सी बात तुम्हारी समझ में महीं आई। अच्छा अब ध्यान देकर श्रवण कीजिये। मू6-"संवं खाल्वदं ब्रह्म तत्त्वमसि श्वेत- केतो,छांउवा "वासुदेवः सर्व मिति स महात्मा सु दुर्लभः” गी०अ०७श्लो०१९॥ इत्यादीन्यपि
:
. (७)
बहूनि श्रुति स्मृति प्रमाणानिकि त्वां मां सर्व
विश्वं स्वयं परमेश्वरं न वदन्ति:यतः श्रीकृष्णा-
द्विन्नान्सर्वानीश्वर निदेश कारिणो मन्य से ॥
टी० छान्दोग्योपनिषद् में कहा है, कि-"यह
सम्पूरण जगत् ब्रह्म स्वरूप ही है, हे श्वेत केतो! तुम
भी ब्रह्म स्वरूप है" छां-उ०अ०६॥ और गीता में भी
कहा है,कि-यह सर्व चराचर अस्ति भाति प्रिय रूपजगत
वासुदेव रूपही है" इस प्रकार से-सर्व को वासुदेव रूप
मानने वाला महात्मा दुर्लभ्य है, गी-७।१९। इससे
आदिऔर भी बहुत से श्रुति स्मृतियों के प्रमाण क्या
तुझको, मुझको, और सर्व विश्व को परमेश्वर नहीं
बताते, जिससे तुम श्री कंष्णजी के अतिरिक्त और
सबको ईश्वर के आज्ञा कारी मानते हो । और भी
प्रमाण श्रवण करो-
मू०-“यतो वाइमानि भूतानि जायन्ते येन
जातानि जीवन्ति । यत्प्रयन्त्य भिसंविशन्ति
तद्धिः जिज्ञासस्व तद्ब्रह्मोत.” तै उ०. भृ० व०
अ० १:म० १॥ इत्यादि श्रुति वचनाकारणे
ब्रह्मण्येव सर्वं विश्व मोत प्रोतञ्च ।
(७) टी०-क्यों, कि-यह प्रसंग तैतरी उपनिषद् में भी कहा है, कि जिस से यह सम्पूर्ण प्राणि मात्र उत्पन्न होते हैं, और जिस कारण रूप परमात्मा करके उत्पन्न हुए, जिसके द्वारा जीवनकू धारण करते हैं, अर्थात् स्थिति को प्राप्त होते हैं, और अन्त में जिस कारण ब्रह्म में तादात्मय (अभेद) संबंध से लीन होजाते हैं, उसको तुम जानने की इच्छा करो, सोई ब्रह्म है, तै-उ-भू-व- अ-१ मं-१ ॥ इत्यादि श्रुतियों के प्रमाणों से कारण ब्रह्म में ही सम्पूर्ण जगत् . ओत प्रोत अर्थात् ताने वाने की तरह पुवा हुआ है । वास्तव दृष्टि से विचार किया जाय तो, पट ( वस्त्र ) में सूत से अतिरिक्त, और कोई वस्तु नहीं है, इस प्रकार कारण कार्य रूप सर्व ब्रह्म ही है, अर्थात् दृश्यमानं समपूर्ण प्रपंच ब्रह्म ही है। मू०-"पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपाद स्यामृतं दिवि” ऋ० पु० सू० ॥ इत्यादि मंत्र वर्णादेकांशे सर्व विश्वं स्थितं तत्तादात्म्य- तया यथा श्रीकृष्णेनोक्तं तथा वयं यूय मिमे सर्वे वक्तुं शक्ताः सर्वेषां ब्रह्मत्वात् ॥ त्वाह शानांहि दुर्विदग्धानां मनीषा व्यामोहेन मूर्छि- ,
(८०)
ता बहवो नास्तिका भवन्ति यतस्व मेवं न
विजानासि ह्यात्म दृष्टचैव श्रीकृष्णः स्वयं
परमश्वरो निरूपितोऽवतार व्यवहारस्तु देह
दृष्टयैव भवति ।
टी०-और ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में भी कहा है,
कि-"त्रिकाल में होने वाले प्राणीमात्र, इस ब्रह्म के
चतुर्थांश है, और उसी पर ब्रह्म का अवशिष्ट त्रिपाद
स्वरूप में अमृत है, अर्थात्-विनाश रहित प्रकाशात्मक
स्वस्वरूप में स्थित है, ऋ-पु-सू-॥ इत्यादिमंत्र प्रमाण
से ब्रह्म के एकांश मे संपूर्ण प्रपंच स्थित है, इसी
आशय से ही, जैसे गीता में तादात्म्य सम्बध अर्थात्-
अभेद संबन्ध से श्रीकृष्ण जी ने कहा हैं, कि मैरे से
श्रेष्ठ दूसरा (सृष्ठि उत्पत्यादिक का स्वतंत्र कारण)
कोई नहीं है, अर्थात् मैरे से भिन्न और कुंछ पदार्थ
नहीं है । तैसे ही हम तुम और भी ये सब मनुष्य
अपने को ब्रह्मरूप कहने कू समर्थ है, क्यों, कि-श्रुति
स्मृति उक्त प्रमाणों कर सर्व को ब्रह्म स्वरूप होने से,
तथा यह सम्पूर्ण जंगत ब्रह्म के एकांश में स्थित ही
है, इस लिये तब तो हम तुम सबंकी परमेश्वर के साथ
अभेद सम्बन्ध वाले होने से संपूर्ण प्राणि मात्र को
-
• (१)
ब्रह्म स्वरूपता सिद्ध ही है, उदाहरण-जैसे सुवर्ण का
विकार कटा कुण्डलादिक सुवर्ण से जुदा नहीं है, और
मृतिका का कार्य घट सरावादिक मृतिका से जुदा
नहीं है,और जल का विकार फेन, तरङ्गादिक जल
से जुदा नहीं है, वास्तव से जल.. रूपही है॥ तैसे ही
यह सम्पूर्ण प्रपंच ब्रह्म से भिन्न नहीं है । तुम्हारे
जैसे कोरी चातुराई छाटने वाले विक्षिप्त चित्त हुए
मनुष्यों को बहकाने वाले भूले हुए। बहुत से
नास्तिक होजाते हैं। क्यों, किन्तुम इतना नहीं जानते
हो,कि-आत्म दृष्टि से ही श्री कृष्णजी को सूतजीने
स्वयं परमेश्वर कहा है। परन्तु अवतार व्यवहार तो
उनका केवल देह दृष्टि से कहा गया है । इस लिये
श्री कृष्ण जी स्वयं परमेश्वर ही सिद्ध हैं, इसमें किसी
किसम का भी संदेह नहीं करना चाहिये।
मू०--किञ्च “मयि भृत्य उपासीने भवतो
विबुधादया। वलि हरन्त्य वनताः किमुतान्ये
नराधिपा भा० स्क०१० अ० ४५श्लो०१४॥
इतीदं भगवद्धचनं त्वया किन्न विकल्पितं यत्या-
कृत प्राणिन उग्रसेनस्यापि भृत्यता भगवतां
स्वीकृता । तथाच तत्र तत्र गोप बधू युधिष्ठिरः
(२)
प्रमुखानां निदेशानु वर्तिनः श्रीकृष्णस्य स्वयं
परमेश्वरता न दृषितावभूव । सर्वान्तर्यामिणः
परमेश्वरस्य स्वात्म भूतस्य देहेन निदेशानु-
वर्तनेन तस्य साकिं दुष्यति । अतोयथा लौ-
किक व्यवहारे स्वजन निदेशा नुवातिवं भग
वत स्तथैव देह व्यवहारेण स्वात्मभूत परमे
श्वर निदेशानुवर्तन मप्युचितम् ।
"टी०-दूसरी बात यह भी है, कि श्रीमद्भागवत में
श्रीकृष्ण जीने राजा उग्रसेन के प्रति कहाहै, कि, "हे
राजन् ! मैं भृत्य (सेवक ) आपकी आज्ञा में रहने
से,तो देवता आदिक भी नम्रता पूर्वक आपको भेटा
अर्पण करेंगे, अर्थात् सर्वथा आपके आज्ञाकारी होंगे
जव देवता आपके आज्ञाकारी हुए, तब दूसरे. सब .
राजा आपकी भेट करें, तो इसमें संदेह ही क्या है
भा० स्क० १० अ० ४५ श्लो० १४॥ इस भगवत्
वचन का आपने विचार क्यों नहीं किया, जो प्रारुत
प्राणि.(साधारण मनुष्य)उग्रसेन राजा की भृत्यता दास
की.नाईसेवा आपने श्री मुखसे स्वीकार की है। तैसे ही
ब्रज में गोपियों के आज्ञानुसारी रहे है । और इन्द्र प्रस्थ,
(३) (हस्थना पुर) में पाण्डवन के आज्ञाकारी रहे हैं। तिससे तो श्रीकृष्ण जी की स्वयं परमेश्वरता दूपित नहीं हुई कही, और अब सर्वान्तर्यामि स्व. आत्म स्वरूप परमेश्वर की केवल देह से आज्ञाकारी होने से, तो इतने मात्र से श्रीकृष्णजी की स्वयं परमेश्वरता कैसे दूषित हो सकती हैं, अर्थात् कदाचित भी नहीं दूषित हो सके है । इस लिये लोक व्यवहार में जैसे भगवान अपने भक्तों के अर्थात् उग्रसेन, तथा गोपी जनों के, और युधिष्ठिर आदि के आज्ञा कारी हुए हैं, वैसे ही देह व्यवहार से, अपने आत्म स्वरूप परमेश्वर की आज्ञा पालना भी उचित ही है.। . मू-किच-यथा श्रीकृष्ण वचनात्सर्वाधार सर्व कारं विजानासि, तथा “ अहोनः परम कष्ट मित्य साक्षी विलेपतुः" मा० स्क०१० अ० ५७ । श्लो० ९॥ इति श्वशुरस्य सत्राजितो वधं श्रुत्वा श्रीराम कृष्णयो विलाप रोदनैस्त- योर्जीवत्वं किन्न समर्पयसि । अतो यथात्र परमार्थ व्यवहार दृष्टि भेदेनोभयं घटते, तथैव-
(४)
स्वयं परमेश्वरत्वमीश्वर · निदेश :कारित्वञ्च
सम्भाव्यते ॥
टी और तीसरे इस प्रसंग का भी ध्यान रखना
चाहिये, कि जिस श्रीकृष्णजी के वचन से ही, आप
श्रीकृष्णजी को सर्वाधार, तथा सर्व का कारण मानते
हो" वैसे ही" हमको बड़ा कष्ट प्राप्त हुआ है, इस
प्रकार वे दोनों भ्राता ( रामकृष्ण) नेत्रों में जल भर
के रोने लगे, भा० १०॥ ५७१९॥ इस वचन से अपने
श्वशुर सत्राजित के बध को श्रवण कर, बलदेव और
श्रीकृष्ण के विलाप रोदन से, उनको सामान्य जीव
क्यों नहीं मानते। इस लिये जैसे यहां पर परमार्थ
दृष्टि से, तथा व्यवहारिक दृष्टि से दोनो ही बातें वन
सकती हैं, वैसे ही श्रीकृष्ण जी को स्वयं परमेश्वरता
तथा ईश्वर आज्ञाकारी होना दोनों ही सम्भव हैं ।
तात्पर्य यह है, कि, इस प्रकार जितने ईश्वरावतार हैं
तिन सर्वमें परमार्थ दृष्टि से ईश्वर व्यवहार रहे है,
और व्यवहार दृष्टि से संसारी भाव रहता है, क्यों, कि-
दोनों प्रकार के ही चरित्र राम कृष्णादिक. ईश्वर :
अवतारों में शास्त्र के प्रमाणों से श्रवण होते हैं, इसी
से ही श्रीकृष्णं स्वयं परमेश्वर तथा ईश्वर आज्ञाकारी
सिद्ध होते हैं, यह सिद्धान्त निर्दोष है।
(म्पू) मू-ननु ब्रह्मादिभिः पूज्येन भगवता श्री कृष्णेन गोवर्धन धारणाद्यति मानुष दुर्घट कर्म कारिणा यदुक्तं तत्तुच्छा वयं कथं वक्तुं शक्ता इति चेत्पुन स्स्व मुग्धतां प्रकटयसि मुग्ध ! टी०-शंका-ब्रह्मादिको करके पूज्य तथा गोवर्धन धारणादिक जो मनुष्यों से न होने वाले, कर्मों को करने वाले भगवान् श्रीकृष्ण देवजी ने जो बात कही है कि " मत्तः परतरं नान्यत्किंचिदस्ति धनंजय' मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणि गणाइव" इत्यादि वचनोंको हम सरीके तुच्छ बुद्धि वाले मनुष्य कैसे कहे. सकते हैं । इति चेद् इस प्रकार से यदि तुम . फिर शंका करते हो, तो हे मुग्ध ! तुम फिर अपनी अज्ञता बहिर्मुखता को ही प्रकट करते हो, अब इन श्रुति वचनों को फिर श्रवण करो, जिससे आपके सब संदेह निवृत्त होजावें। मृ०-"एक मेवा द्वितीयं ब्रह्म, नेह नानास्ति किञ्चन।मृत्योःसमृत्युमामोति यइहनानेवपश्य- ति"क० उ० "एको देवः सर्व भूतेषु गूढः सर्व नोट-इस स्मृति का.अर्थ पीछे कर आये हैं ७६ के पृष्ठ में ।
(६)
व्यापी सर्व भूतान्तरात्मा ॥ कर्माध्यक्षः सर्वे
भूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च"
श्वे० श्व० उ० अ० ६ म० ११ ॥ इत्यादयः
शतशः श्रुतय एकात्मतां घोषयन्ति । आत्म
दृष्टयास्वसर्वाधारव वक्तुं सर्वेऽहो, उक्तञ्च
पूर्व, पारमेश्वर गुणाधिक्येन श्री कृष्णादयः
परमेश्वरावताराःसर्वे रुपास्यानत्वात्माधिक्येने-
त्यलं सर्वमत्रा नवद्यम् ॥
टी०-और कठ उपनिषद में भी कहाहै,कि-"सजा-
तीय, विजातीय, स्वगत भेदसे रहित एक अद्वितीय
बह्म है" तथा 'इस ब्रह्ममें नाना नाम रूपात्मक प्रपंच
वास्तव से किंचित मात्र भी नहीं है। और जो पुरुष
इस अद्वितीय ब्रह्म में भेद दृष्टि से नाना पने को
देखता है, वह वारंवार जन्म मरण को प्राप्त होता
है" क. उ० ॥ तैसे ही श्वेता श्चतुर उपनिषद् में भी
कहा है, कि "आत्मा एक अर्थात् अद्वितीय है, और
तेजोमय (प्रकाश स्वरूपहै) सर्व प्राण धारियों में गूढ
(गुप्त वा दुर्लक्ष्य ) है, सर्व जीवों का अन्तर आत्मा
है, और सर्व प्राण धारियों के नाना कर्मों का अधि.
(८७) -- ठाता अर्थात् शुभ अशुभ कर्मों का फल देने वाला है, तथा सर्व प्राणियों में जो निवास करें है वा सर्व जीव जिस कारण में निवास करें है, सर्वका साक्षी है, और सर्व अनात्म जड़ समूह को चैतन करे है, तथा केवल निरुपाधिक है, तथा माया के सत्त्वादि गुणों से रहित है, यद्यपि आत्मा सर्वत्र व्यापक है; तथापि हृदय स्थान में तिसकी उपलब्धि प्राप्ति होती है, इसलिये हृदय में स्थित कहा है" ॥ श्वेश्व० अ० ६ मं०११इत्यादि सेंकड़ों श्रुतियां तिस नाम रूपात्मक प्रपंच की 'एकात्मता' बंबक स्वरूपता को घोषयन्ति घोषणा करती हैं, अर्थात् सम्पूर्ण प्रपंचको ब्रह्म स्व- रूप ही उच्ची स्वर से उच्चारण करती हैं, तब हम तुम सर्वही ब्रह्म स्वरूप सिद्ध हुए, और जैसे श्रीकृष्ण जी ने कहा है ' मत्तः पर तरंनान्यत् । अर्थात् मैरे से दूसरा अधिक श्रेष्ठ और कोई नहीं है" तैसे आत्म दृष्टि अर्थात्-अभेद सम्बन्ध से हम सर्व मनुष्य अपने को, सर्व का आधार, साक्षी, चेता सर्व व्यापक निर्गुण मुक्त मुख से क्यों नहीं कह सकते अर्थात् कह सकते हैं.। यह बात प्रसंगानुसार पहले हम कह भी आये हैं, कि-परमेश्वर सम्बन्धी गुणों के अधिक होने से परमे- श्वर के अवतार श्रीकृष्णादिक की सर्व मनुष्य मात्र को उपासना करनी चाहिये, न किं-आत्मा की आधि- () कता से, क्योंकि श्रीकृष्णजी के और हमारी आत्मा में न्यूनाधिक भाव नहीं है ।। इस लिये अवतारों के विषय में श्रुति स्मृति युक्ति अनुसार जो कुछ विचार किया है, सो सर्व निर्दोष है। इस वास्ते अब इस विषय को समाप्त करते हैं ।। मू०-"ईश ईशावतारोवा,कृष्णो भवतु मानवः । तस्मादन्यं न जानामि,सर्वस्वं सहि मामकम्॥१॥ टी-अब ग्रन्थकर्ता श्रीमत्परमहंस निखिल शास्त्र निष्णात ब्रह्मनिष्ठ कविकुल भूषण श्री स्वामी कार्णि गोपालदास जी महाराज श्रीकृष्णजी के विषय अनन्य प्रेम को, तथ स्वअनुभव को प्रगट करके कहते हैं,कि- श्रीकृष्णजी चाहे ईश्वर हों, अथवा परमेश्वर के अव- तार हों, या मनुष्य हों। परन्तु हमारे तो सर्वस्व श्रीकृष्ण ही हैं, तिस श्रीकृष्ण जी के बिना दूसरे को हम जानते ही नहीं हैं, इतने करके ग्रन्थ करता ने अपना सर्वस्व श्रीकृष्ण जी को ही प्रगट किया है, यदि इनका श्रीकृष्ण जी में विस्तृत प्रेम देखना हो, तो आपका बनाया हुआ "काणि करुणाभर्ण ब्रजवासोल्लास” मंगवाकर देखें, तो स्वयं ही आपको अनुभव हो जायगा, कि भगवत् प्राप्ति का मार्ग कैसा है, और किस रस्ते. चलने से भगवत् का कृपा पात्र यह जीव हो सकता है । ।
(९) इस प्रकार अवतार विषय की सर्व शंकाओं के निवृत्त होने से, पूर्व पक्षी पूर्व प्रति ज्ञात दूसरे विषय में प्रश्न करने की इच्छा से अवतरणका को प्रारम्भ करता है। मू०-ननु-मया तु नैवालं कृतं भवान् कथ मलं करोतीति चेत्पृच्छ किं प्रष्टु मिच्छसी त्यन- ज्ञातः पुनः पृच्छति ॥ टी०-प्रश्न-हे सिद्धान्ति ? मैं ने समाप्ति तो नहीं की' आपने उपसंहार (समाप्ति )क्यों करदीया, हे पूर्व पक्षी ? गदि. ऐसा कहते हो, तो पूछो! क्या पूछना चाहते हो! इस तरह अनुमति ( आज्ञा) को पाकर पूर्व पक्षी फिर पूछता है ॥ मू-ननु-कथं काणि शब्द इअन्तः स्वी- कृतः "अतइञ्।। ४।११९५॥ अनेन सूत्रेण चेत् "ऋष्यन्धक वृष्णि कुरुभ्यश्चा११४॥ अनेन वृष्णि विञोऽपवादादण विधानाच्च काणि रित्यजन्तता पाणिनि मत विरुद्धति चेत्त- र्युच्यते।
(२०) टी०-यश्न-कार्णि शब्द इञ् प्रत्ययान्त कैसे सिद्ध होता है क्यों, कि-' कृष्णस्या पत्यं काजि यहां कृष्ण शब्द से अपत्य अर्थमें 'अतो इनू' इस पाणिनि सूत्र से इञ् प्रत्यय करके काठिण शब्द सिद्ध होता है, उस (अत इञ्) सूत्र का अपवाद अथार्त निषेध करता " ऋष्यन्धक वृष्णि कुरुभ्यच इस सूत्र से कृष्णं को वृष्णि वंशमें उत्पन्न होने से, तो कृष्ण शब्द से, अण् प्रत्यय होना चाहिये, जिससे कार्णः ऐसा शब्द सिद्ध होय है। इस लिये कार्णि शब्द का इञन्त होना पाणिनि मत से विरुद्ध है । हे पूर्व पक्षी ! यदि ऐसी शंका करो, तो इसका उत्तर यह है- मू०-"कृषिवाचक शब्दो णश्च निति वाचकः । तयौ रैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभि- धीयते " ॥१॥ इति निर्वचनात सच्चिदानन्द परिपूर्ण परमेश्वर एव कृष्ण शब्द वाच्य स्तत्र तावंद् वृष्णित्व मेव नास्तिं यत इञ् प्राप्ति स्स्यादतः। यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते" तै-उ. भृ० व० प्र० अ० मं० १ जन्मा द्यस्ययतः” व
(५)
सू०२॥“ पिता ह मस्य जगतो माता धाता
पिता महः गी० अ. ९ श्लो० १७॥ इत्यादि
श्रुति. शास्त्र प्रमाणादुक्तलक्षणाच्छ्री कृष्णा-
ज्जाताः कार्णय उच्यन्ते ।
में
टी०- समाधान-कृष्णजी को वृष्णिं कुल
उत्पन्न समझकर यह कार्णि शब्द नहीं सिद्ध किया,
किन्तुं कृष्ण शब्द का निर्वाचन इस तरह से किया
जाता है- कि-"कृषि शब्द सत्ता का वाचक (बोधक)
है' णकार आनन्द का वाचक है' तिन दोनों पदों की
एकता से सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म ही कृष्ण शब्द
का अर्थ सिद्ध होता है। अर्थात्-सम्पूर्ण जगत को
उत्पन्न, पालन, लय, करनेवाला संच्चिदान्द स्वरूप
परब्रह्म कृष्ण ही है। इससे यह सिद्ध है-कि-सत्तामात्र,
आनन्द स्वरूप परबह्म परमात्मा का ही मुख्य नाम
कृष्ण है । उस कृष्ण को वृष्णि कुल में उत्पन्न न
होने से "ऋष्यन्धक वृष्णि कुरुभ्यश्च" इस सूत्र से
अण् प्रत्यय न प्राप्त होकर' पूर्वोक्त "अतो इं" इस
सूत्र से इञ् प्रत्यय ही प्राप्त होता है इसलिये तैत्तिरि
श्रुति में भी कहा है कि-"जिस परब्रह्म परमात्मा से
यह सम्पूर्ण प्राणिमात्र उत्पति, स्थिति लय को प्राप्त
(२) . होते हैं" ते उ० भृ०व० प्र० अ०म०१॥और ब्रह्मसूत्र में भी कहा है, कि-"जिस सर्वज्ञ सर्व शक्तिमान 'कारण से इस आकाशादिक प्रपंच के जन्म स्थित लय होता है सोई ब्रह्म है" ब० सू २ ॥ तैसे गीता में भी कहा है, कि-"इस जगत् का माता, पिता, विधाता, पालक, पितामहा मैं हूं" गी० ९॥ १७॥ इत्यादिक श्रुति शास्त्रोक्त परमाणों से तथा लक्षणों से श्रीकृष्ण से उत्पन्न भये सब प्राणि काणि कहलाते हैं। मू.----ननु-केते कार्णय इति चेत्सर्व एव, 'यथा ब्रह्मणो जाताः सर्वे विप्रा ब्राह्मणा मनो र्जाता स्सर्वे मनुष्या मानवा मनुजाश्च कथयन्ते॥ टी०-प्रश्न-जिनको तुम कार्णि मानते हो, वे काणि कौन से हैं, यदि आप ऐसे पूछते हैं, तो इस- का उत्तर यह है, कि-जैसे ब्रह्मा से उत्पन्न हुए सम्पू- र्ण विप्र ब्राह्मण कहे जाते हैं, और मनु से उत्पन्न . हुए सब मनुष्य मानव या मनुज कहे जाते हैं, वैसेही सच्चिदानन्द स्वरूप परब्रह्म श्रीकृष्णजी से उत्पन्न हुए हम तुम सर्व ही कार्णि कहे जाते हैं। इस प्रकार
(३)
से हम सबको कार्णि मानते हैं, अब और जो पूछना
हो सो भी पूछो।
मू-ननु-सर्वेस्वात्मानं काणिं नैव मन्यन्त
इति चेन्मा मन्यन्ताम् । “सर्वखल्विदं ब्रह्म"
"तत्त्व मसि श्वेतकेतो छां० उ०॥ इत्यादि
श्रुति सिद्धमपि स्वब्रह्मत्वं ये नैव मन्यन्ते किं
तेषु तन्नैव । यथाच श्रीरामादिभ्यो दाशरथित्वे
सत्यपि राघवत्वं नापयाति । एवं शैव शाक्ता-
दिमात्मानं मन्वाने ष्वपि ब्रह्म रूप श्रीकृष्णा-
पत्यत्वात् पूर्व सिद्ध कार्णित्वं स्थास्यत्येव ।
ट्री०-प्रश्न हे सिद्धान्ति ! आपने जो कहा है
सो सबही श्रेष्ठ है, परन्तु सर्व मनुष्य अपने को कार्णि
क्यों नहीं मानते, हे वादि ! यदि तुम ऐसी शंका करो,
तो इसका उत्तर यह है, कि वे मत माने, उनके लिये
हम क्या करें। किन्तु-ब्रह्म के साथ हम सर्व की एकता
तत्व मसि:आदि वेद वाक्यों करके सिद्ध है, जैसे कि-
छांदोग्योपनिपद में कहा है, "निसंदेह यह सर्व जगत्
बह्म स्वरूप है" छां० उ० अ०३॥ इस श्रुति के
प्रमाण से, तथा: "वासुदेव सर्व मिति" गी० अ०७
-
कहा है, कि-" (६४) श्लो० १९ ॥ यह सम्पूर्ण जगत् वासुदेव भगवान् स्वरूप ही है " गी० ७। १९ ॥ और छान्दोग्योप निषद् के पठे अध्याय में उद्दालक ऋषि श्वेतुकेतु से कहते हैं, कि-हे श्वेतुकेतु ! इस सर्व चराचर रूप जगत् की उत्पति स्थिति प्रलय जिस परब्रह्म रूप पर- मात्मा से होवे है, सो ब्रह्म तू है" छां० उ० अ०६॥ तैसे ही वृहदारण्य कोपनिषद् के प्रथम अध्याय में भी य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मि सइद सर्वं भवति" वृ० उं० अ१॥ अर्थ-देवता मनुष्य, तथा ऋपियों के मध्य में जो कोई, मैं ब्रह्म हूं, ऐसे जाने हैं, सो ज्ञानी इस सर्व रूपता को अर्थात्-सर्वात्म भाव को प्राप्त होता है." वृ० उ० अ० १॥ इत्यादि श्रुति स्मृति प्रमाण से हम सर्व ब्रह्म स्वरूप ही हैं। और यद्यपि व्यवहार में अज्ञान पश से “ अहं- ब्रह्मास्मि" में ब्रह्म हूं, इस प्रकार से सर्व को मी स्वस्वरूप ज्ञान नहीं होता है, किन्तु-अज्ञान निवृत्ति से ही होता है-तथापि वैदिक प्रमाणो से सिद्ध जीव ब्रह्म की एकता तो कभी भी अप्रमाण नहीं हो संकती है । दृष्टान्त-जैसे कोई द्विजाती कुसंग से मदरा: पान करके उन्मत्त हुआ कहे, कि-मैं चण्डाल हूं, द्विजाती नहीं हूँतो उसके सहचारी कहे, कि तुम चण्डाल नहीं द्विजाती हो, यद्यपि वो परवश हुआ (५) नहीं मानता है, तथापि वास्तव से. तो द्विजाती ही सिद्ध है, चण्डाल नहीं " " तैसे ही अज्ञानी पुरुष. अपने को चाहे कैसा ही मानें, परन्तु ज्ञानी पुरुष तो. अपने को कार्णि ही मानेंगे, और उनका मानना भी वैदिक प्रमाण से सिद्ध. अर्थात्-निर्दोष ही है उदाहरण-जैसे श्रीरामचन्द्र जी दाशरथि (दशरथ के के पुत्र) लोक प्रसिद्ध भी. थे, परन्तु रघुकुल में उत्पन्न होने से वे राघव भी कहे जाते थे-अर्थात् उनका राधवपना दूर नहीं हुआ है। इस प्रकार जो अपने को शैव शाक्त,इत्यादि मानते हैं, परन्तु वास्तव से विचार करें, तो वे पर ब्रह्म स्वरूप श्री कृष्ण के अपत्य स्थानापन्न होने से अर्थात् पुत्र पौत्रादिक रूप से, पूर्वोक्त श्रुति स्मृति लक्षणानुसार कार्णित्व- कार्णि नाम उनका सिद्ध ही है-भावार्थ यह है कि- कार्णि नाम उनका कभी भी नष्ट नहीं हो सकता किन्तु बना ही रहता है ।. मू०-अथवा-यद्यपि-तज़त्वात्सर्वेः कार्णय स्त: थापि । “उत्तम श्चिन्तितं कुर्यात्प्रोक्त कारी तु मध्यमः' अधमोंऽश्रद्धया कुर्यादकोंच्चरित पितुः भा० स्क०९ अ० १८ श्लो०४४॥ अनेन: .
(१६)
पितु राज्ञा पालनादि भक्ति मानेव पुत्रोऽन्येतु
तत्पुरीष पाया एवम् “श्रुति स्मृती ममैवाजे"
इति भगवदचनाच्छ्रुति स्मृत्युक्त श्री कृष्णाज्ञा
पालनादि भक्ति मन्त एव कार्णय उच्यन्ते
नतु सर्वे ॥
टी०-अब दूसरे प्रकार से समाधान करते हैं-
यद्यपि पर ब्रह्म स्वरूप श्रीकृष्ण जी से उत्पन्न होने
के कारण सभी काणि ही सिद्ध होते हैं, तथापि
उत्तम वही है, जो बिना कहे से करे, और मध्यम
वह है, जो कहने पर करै, और अध्यम वह है, कि-
जो कहने पर भी अश्रद्धा से करे, इस तरह तीन
प्रकार के पुत्र हैं, परन्तु-चौथे प्रकार का, जो कहने
पर भी आज्ञा का पालन न करे, वह पुत्र नहीं है,
किन्तु-वह माता पिता के मल के समान है" भा०
९।१८।४४ ॥ इस भागवतोक्त न्याय से-पिता के
आज्ञा पालनादि में श्रद्धा-भक्ति वाला ही श्रेष्ठ पुत्र
है। इसी तरह “ वेद और धर्म शास्त्र मैरी आज्ञा है"
इस भगवान् के वचनानुसार श्रुति स्मृतियों में कही
गई श्रीकृष्ण जी की आज्ञा पालन में भक्ति वाले ही
कृष्ण
के
पुत्र काणि कहे जाते हैं, सब कार्णिं नहीं
हो सकते हैं।
(७) मू०--अथवा-मनुष्यावतार दृष्टया तद् वृष्णि त्वेपि वाहादिभ्यश्च"४।१४५॥अनेन पिवृष्णिषु केचिदैयासकि काफ़्यादय इअन्ता अपि श्री व्यासादिभिरङ्गी कृता स्तथाहि । "किमन्यत् पृष्टवान् भूयो वैयासकिमृर्षि कविम्" भा० स्क० २ अ. ३ श्लो १३ ॥ “हरेर्गुणा- क्षिप्त मति भगवान वादरायणिः भा. स्क. १ अ० ७ श्लो० ११॥ अथ हो वाचो हाल- क मारुणिम्" छांउ०अ० ५॥वैदिर्गागिरोद्दाल- कि रित्यादा वृषि वाचकेभ्यो पीञ्" इति भद्र वासुदेवः॥ टी०-अब प्रकारान्तर से कहते हैं, कि-अथवा मनुष्यावतार दृष्टि से श्रीकृष्णजी को वृष्णि होने पर भी "बाह्वादिभ्यश्च" इस सूत्र करके ऋषि वाचक तथा वृष्णि वाचक शब्दों में, वैयासकिः कार्णिः आदिक इञ् प्रत्ययान्त व्यासादिक महऋपियोने अंगीकार किये हैं। सोई श्रीमद्भागवत में कहा भी है, "किमन्यत्पृष्टवान् भूयोवैयांसकि मृपिकविम्" अर्थ-पुनः न्यासजी के पुत्र ऋपि सर्वज्ञ शुकदेवजी (९८) से राजा परीक्षित क्या पूछता भया" मा० ॥३॥ १३॥ यहां पर व्यास शब्द को, ऋषिवाचक होने पर भी, "ऋण्यन्धक-वृष्णिकुरु भ्यश्च" इस सूत्र से अण् प्रत्यय नहीं हुआ, किन्तु बाह्वादिगण पठित होने से, वैवासाक ऐसा इञन्त प्रयोग सिद्धि होता है। इसी तरह "हरेर्गुणाक्षिप्त मतिर्भगवान् बादरायणि" मा० १७।११॥ अर्थ "भगवान् के गुणों में लगी है बुद्धि जिनकी, ऐसे जो भगवान् ( बादरायणि) व्यासजी के पुत्र श्री शुकदेवजी" इस जगह पर 'बादरायणि' शब्द है, और छान्दोग्योपनिषद् में भी कथन किया है कि-"अथहो वाचोद्दालक मारुणिम्" उद्दालक ऋषि से श्वेतकेतु कहते भये" इस जगह पर आरुणिम्-शब्द है, तैसेही वैदिः, गार्गिः, औद्दालांकः इत्यादि प्रयोगों को ऋषि वाचक होने पर भी इञ् प्रत्ययान्तही सिद्धि किया है। इस प्रकार वासदेव भट्ट ने कहा है। मू-"प्रसज्जती तु तामाह काणिः कमल लोचनाम" वि० पु. अं. ५ अ० २७ श्लो० १४ "नाति दीर्घेणकालेन स काष्र्णी रूढ यौवनः भा० स्क० १० अ० ५५ श्लोक १०॥ "मुमुचेऽस्त्र मयं वर्ष काष्णों वैहायसोऽसुरः"
(५)
भा० स्क० १०अ० ५५ श्लोक २१ ॥ “तामाह
भगवान् कार्णि" भा० स्क० १०अ०५५ श्लोक
११॥ विवाहे तत्र निवृत्ते प्राशुम्नेः सु महात्मनः"
वि० पु० अंक ५ अ० २८ श्लो० ११ ॥ तत्र
सुप्त सुपर्यङ्के प्रायम्निं योग मास्थिता ॥
गृहीत्वा शोणित पुरं सख्यै प्रिय मदर्शयत्"
मा० स्क० १० अ०६२ श्लो० २३ ॥ " रेमे प्रा-
यूनिना समम्" इति तत्रैव श्लो० २४ ॥ “शूरः
शौरि जनेश्वरः" इति विष्णोर्नाम्नां सहस्रे ॥
"श्री निकेतं वपुः शौरेः " भा० स्क० १०अ०
८२ श्लो० २७ । “देवकी नन्दनः शौरिः"
इत्मयरः॥ अस्य व्याख्यायां भट्टोजि दीक्षिता-
त्मज भानुजि दीक्षितेन "शूरस्या पत्यं तदंश
जत्वाद् वृष्णित्वेपि वाहादित्वादि इत्यनेन
शौरिरिजन्तो राद्धः॥
टी०-और विष्णु पुराण में भी कहा है, कि-
"कमलके सहश हैं नेत्र जिसके तथा अत्यन्त अनुराग
करके पूर्ण होरहा है हृदय कमल जिसका, ऐसी
(१००)
मायावती रती से 'कार्णि' श्रीकृष्णजी के पुत्र प्रद्यु-
मनजी कहते भये, वि० पु० ५।२७॥ १४॥ सो यहां
पर भी मूल में कार्ष्णि शब्द आया है । तैसे ही
श्रीमद्भागवत् में भी कहा है, कि- फिर थोड़ेही समय
में वह काणि अर्थात्-श्रीकृष्णजी का पुत्र प्रद्युम्न
तरुण अवस्था को प्राप्त होता भया" भा० स्क०१०
अ० ५५ श्लो० १०॥ इस जगह पर भी मूल में कार्णि
शब्द आया है । और तिस भागवत् में यह भी कहा
है, कि वह-" शम्बरासुर भी मयासुर की उपदेश
करी हुई अन्तर्धान होजाना रूप विद्या का आश्रय
करके "आकाश में स्थित हो, प्रद्युम्न के ऊपर शस्त्रों
की वर्षा करता भया" भा० स्क०१० अ०५५श्लोक
२१॥ यहां पर भी मूल में कार्गो शब्द आया है।
और "तामाह भगवान कार्णि:" तब वह भगवान्
कृष्णजी के पुत्र, उस मायावति से कहने लगे, भा०
स्क० १० अ० ५५ श्लो० ११॥ इत्यादि स्थानों पर
प्रद्युम्नजी को काणि प्रयोग ही व्यासजी ने दिया है
तथा विष्णु पुराण
में भी कहा है कि-"महान् उदार
मन वाले "प्राद्युम्नेः" अर्थात-प्रद्युम्नजी के पुत्र
अनिरुद्ध का विवाह जब होचुका, तब वि० पु अ०
५०.२८ श्लो. १०॥ तिसी प्रकार भागवत में
(१०)
लिखा है कि-"तहां सुन्दर पलंग पर सोये होए प्रायुम्नि
प्रद्युम्न के पुत्र अनिरुद्ध जी को, योग सिद्धि
प्रभाव से लेकर, फिर शोणित नगर में आगई, और
उसने उया सखी को उसका प्रिय पति दिखाया"
भा० स्क० १० अ० ६२ श्लो० २३॥ तिसी अध्याय
में यह भी श्लोक है, कि-उस अनिरुद्ध के साथ
क्रीड़ा करने लगी, २४॥ इत्यादि स्थानों में 'प्राधुम्नि'
शब्द कहा है । और "शूरः शौरिर्जनेश्वर" यहां
विष्णुसहस्त्रनाम में शौरि शब्द इञन्त अर्थात् इञ्
प्रत्ययान्त सिद्ध किया है. तथा-"श्रीनिकेत वपुः
शौरः" भा० स्क० १० अ० ८२ श्लो २७॥ तात्पर्य
लक्ष्मी के पति तथा अत्यंत शोभायमान शरीर जिनका
ऐसे श्रीकृष्णजी को देखके सर्वांश्चयमय होते भये".
भा० १०१८२१२७॥ यहां पर भी शौरि शब्द आया
है। "देवकीनन्दनः शौरिः" देवकी के प्रिय पुत्र
श्रीकृष्णजी, इस अमरकोश की टीका में भडोजी
दीक्षित के पुत्र भानुजी दीक्षित कहते हैं, "कि शूर
'वसुदेव' को वृष्णिकुल में उत्पन्न होने से अर्थात्
वृष्णि वाचक होने पर भी-शूर शब्द को "बाह्वादि-
गण" पठित होने से ऋप्यन्धक वृष्णि कुरुभ्यश्च हिस
सूत्र करके अण् प्रत्यय न करते हुए 'बाहादिभ्यश्च'
इस. सूत्र से इ.प्रत्यय करके शौरिही सिद्ध किया है।
(१०२)
मृ०-उदाहृतश्च काणि रिति सारस्वते
व्याकरणेपिं ।। चूंष्णिवर्णन्तास्तु वासुदेवादयः
केचन ज्ञेया नतुसवें ॥ कृष्णस्या पत्यं कार्ण
इत्यणन्तः कुत्रापि व्याकरणे नोदाहतो नच
शास्रपुदृष्ट श्रुतश्च ॥ अदृष्टाश्रुतस्य स्वीकरण
मंयुक्त मतः श्रुतदृष्टत्वात् काणि रेव साधु
प्रयोगो मन्तव्य इति ॥
टी०-और सारस्वत व्याकरण में भी कार्णि यह
ही उदाहरण दिया है । और वृष्णि वाचके शब्दों में,
"ऋष्यन्धकं वृष्णि कुंरुंम्यश्च" इस सूत्र से अण
प्रत्ययान्तं निष्पन्नं केवल वासुदेवादिक थोरे शब्द ही
दिखाई देते हैं, किन्तुं सभी वृष्णि वाचक शब्द अण
प्रत्ययान्त नहीं है।
और "कृष्ण का अपत्य कार्ण" अर्थात्-कृष्ण
का पुत्र काणं है, इस अर्थ में कार्ण-ऐसा अणन्त
प्रयोग का, तो, किसी व्याकरण में उदाहरण नहीं
दिया है। और जो देखा वा सुना ही नहीं, तो-उसका
मानना ही अयुक्त अर्थात् युक्ति रहित निष्फलं है।
इसलिए सुना जाने से भी तैथी शास्त्रों में देखा जाने
से भी काणिं प्रयोग .(शब्द) इन प्रत्ययान्त ही साधु
(१०३).
श्रेष्ठ है.। और सोहीहम सर्वको मन्तव्य-अर्थात् मानने.
योग्य है।
,
मू-नन्वस्तु कृष्णादिन् : परचाधुना. तद्वं-
शोच्छेदात् कथमिदानीन्तना आत्मानं काणिं
मन्यन्तः इतिः नचवाच्यम् ॥ वंशो दिविधः
पुत्र पौत्रादि शिष्य प्रशिष्यादिश्च; तदुक्तं
चन्द्रकीर्ति वैयाकरण सूरिणा, “ अपत्ये पुत्र
पौत्रादि सन्ताने शिष्य प्रशिष्यादि सन्ताने
वाच्ये सति' इत्यादिकमः । यद्यप्यधुना
तत्पुत्रादि वंशस्योच्छेदोस्ति, परञ्च शिष्यादि
वंशस्येदानी मपि. सद्भावों वर्तते, तथाहि श्री.
कृष्णस्यः प्रथम शिष्या अर्जुनोद्धवादयो बभूवुः
स्ततोगीता भागवतोक्तःपरम गुरो श्रीकृष्ण
स्यो पदेशो. गुरु, परम्परयायैरस्मदादिभि रुप
लब्धो, येचतग्रहीष्यन्ति, तेश्रीकृष्णस्य शिष्य
वंशापत्यलात् कार्ष्णयो. ज्ञेयाः ॥ :
टी०-हे. सिद्धान्ति ! कृष्ण, शब्द से अपत्यार्थ
में वाह्वादिभ्यश्च इस सूत्र से इप्रत्यय होने में हमारे.
।
(१०४)
को कोई वैमत्य.अर्थात् विरोध नहीं है । परन्तु आज .
कल श्रीकृष्ण के वंश का उच्छेद (नाश) होने से
फिर इदानी काल के मनुष्य
अपने को कार्णि किस
प्रकार मानते हैं । इस लिये श्रीकृष्णजी के वंश को
इस काल में नहीं होने से अपने को काजि
मानना सर्वथा व्यर्थ है। इति ॥ तो इसका उत्तर यह
है-हे पूर्व पक्षी ! ऐसा संदेह तो आपको कभी भी
नहीं होना चाहिये। क्यों-कि-वंश दो प्रकार का
होता है । एक तो पुत्र पौत्रादि परम्परा से, और
दूसरा शिष्य प्रशिष्यादि परम्परा से चला आता है।
यह बात चन्द्रकीर्ति वैयाकरण सूरि (पण्डित) ने भी
कहा है, कि-अपत्य के पुत्र पौत्रादि संतान, और
शिष्य प्रशिष्यादि संतान ये दो अर्थ हैं ॥ यद्यपि
श्रीकृष्ण के पुत्र पौत्रादि वंश का नाश आज कल
हो गया है, तथापि-शिष्य प्रशिष्यादि वंश तो आज
कल भी विद्यमान है । सो इस तरह से श्रीकृष्णजी
के सब से प्रथम शिष्य अर्जुन और उद्धवादिक हुए
हैं । तदअनन्तर गीता भागवत् में कहे परम गुरु.
श्रीकृष्णंजी के उपदेश को गुरु परम्परा से हम जैसे
जिन मनुष्यों ने ग्रहण किया है, और करेंगे, उन सब
को श्रीकृष्णजी के शिष्य वंश के अपत्य (पुत्रं ).होने
से कार्णि जानने चाहिये ।।
(१०५) मृ०-अथवा गोण्या श्रीकृष्णस्य पुत्रत्वमपी- दानीतनेष्वस्ति तथाहि “सपिता सांच जन- नीयौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत्" भा० स्क० १०अ० ४५श्लो० २२ ॥ इत्यादि वचनात्पालकोपि पिता भवति, "उत्तमाश्चिन्तितं कुर्यात् इति पूर्वोक्त प्रमाणा त्पितु राज्ञा पालनादि भक्ति मानहि पुत्रः ॥ “मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ” गी० अ० १८ श्लो० ६५॥. इत्यादि स्वाज्ञा पालनादि भक्ति मताम् “तेषाः नित्यांभि युक्तानां योगक्षेमवहाम्यहम्” गी० अ० ९ श्लो०२२॥अनेन भगवता पालनं स्वय मेव स्वीकृत मतः पाल्य पालकत्वेनो पास्यो पासकत्वेनच भगवद्भागवतयोःपित्र पत्य भाव सम्बन्धो स्त्येव ॥ टी०-अब दूसरे प्रकार से कथन करते हैं, कि अथवा आज कल के मनुष्य गौणीवृत्ति से श्रीकृष्णजी के पुत्र भी कहे जासकते हैं, क्यों कि-श्रीमद्भागत् मे कहा है कि "वही पिता है तथा वही माता है जो
(१०६)
अपने पुत्र के समान पालन करता है!' भा० १० ।
४५॥२२॥ इस भागवत वचन का पालन करनेवाला भी
पिता होता है। और श्रीमद्भागवत में कहा है,कि-"तिस
में भी जो पुत्र, पिता के मन में का' कार्य-(बिना
कहे ही) करता है, वह उत्तम है। जो कहा हुआ
कार्य करता है वह मध्यम है। जो कहे हुए कार्य को
श्रद्धा रहित होकर करता है वह अधम है। और जो
पिता के कहे हुए कार्य को अश्रद्धा से भी नहीं करता
है, वह पिता के विष्टा के समान है। भा० ९।१८।४४॥
इत्यादि पूर्वोक्त प्रमाणों से पिता की आज्ञा मानना
आदि भक्ति वाला ही .पुत्र होता है। ॥ तैसे गीता में
भी श्रीकृष्णजी ने आज्ञा की है, कि-मैरे विषे ही मन
वाला हो, और मैराही भक्त हो, मैरी ही पूजा करे, और
मैरे को ही नमस्कार करे । गी० अ०१८ श्लो०६५॥.
इत्यादिगतिामें कही गई भगवान् कीआज्ञाओंके पालन
की भक्ति रखने वाले. उनका और " जो पुरुष नित्य
ही मेरे परायण हैं तिनको योग(अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति)
को, तथा क्षेम (प्राप्तिकी रक्षा) को में प्राप्त करता
हूं" गी० अ०९ श्लो०.२२॥ इस वचन से पालन
करना भगवान ने स्वयं अङ्गीकार कियाहै । इस लिये
पाल्य (पालन के योग्य) पालक (पालन करने वाला)
उपास्य (उपासना योग्य भगवान का. विग्रह)
(१०७)
उपासक (उपासना करने वाला भक्तजन) भाव से
भगवान का, और भगवद्भक्तों का परस्पर पिता पुत्र
भाव सम्बन्ध अवश्य ही हैं ।
मू-यथाच जन्मना जायते शूद्रः संस्कार
र्दिज उच्यते” इति स्मृति वचनाद् द्वितीय
जन्मा भावेपि संस्कार मात्रेण पुरुषो दिजो
दिजन्मेत्युच्यत एवं मुख्यापत्यत्वा भावेपि
भक्त्यवेदानीन्तनेषु कृष्णा पत्यत्व सम्भवः॥
टी०-और जैसे स्मृति में कहा है, कि "जन्ममात्र
से तो मनुष्य शूद्र होता है,परन्तु उपनयनादि संस्कार
से, वह द्विज कहा जाता है" इस धर्म शास्त्रके वचन
से, दूसरा जन्म न होने पर भी, केवल उपनयन
संस्कार मात्र से ही मनुष्य द्विज या द्विजन्मा कहा
गया है, इस तरह, यद्यपि आज कल के मनुष्य श्री
कृष्णं के मुख्य पुत्र नहीं भी हैं, तथापि भक्ति(भगवत
आज्ञा पालनादि) से श्रीकृष्ण के पुत्र माने जा सकते
है, अर्थात् इस प्रकार कृष्ण शब्द से अपत्यार्थ में
इञ् प्रत्यय द्वारा आज कल के हम सर्व निसंदेह
कार्णि सिद्ध हो सकते हैं।
मृ-नन्वस्तु त्वदुक्तं परञ्चान्य वंशोद्भवो
(१००) ऽन्यस्यापत्यं न भवति, यतोऽपत्यप्रत्यय स्स्यात्, स्वगोत्रजो ह्यपत्यं भवति, तब्रह्म- पत्यं प्रत्ययः स्वीकृतो नतु कृत्रिमे पुत्र इति नच वाच्यम् ॥ "क्षेत्रं शोधयता लब्धा नाना सीतेति विश्रुता। भूतलादुत्थितासा तु व्यवईत ममात्मजा" बा०.रा० बा० का० स० ६७ अस्माज्जनक वचनाद्यथा भूमिजापि सीता जनकना पत्य- तया स्वीकृता जानकी त्युच्यते । एवं द्रौपदचिः। टी. प्रश्न हे सिद्धान्ति ! तुमने जो समाधान किया है, सो समीचीन नहीं है,क्यों, कि-दूसरे वंश में उत्पन्न हुभा मनुष्य दूसरे का पुत्र नहीं हो सकता, इस लिये अपत्य प्रत्यय (इञ् ) नहीं होगा, क्यों, कि- जो अपने गोत्रका अपत्य होता है, उसी जगह अप- त्यार्थक प्रत्यय होता है, कृत्रिम पुत्र में अपत्यार्थक प्रत्यय नहीं स्वीकार किया है। हे पूर्व पक्षी ! यह आपका प्रश्न भी विना विचार (or) से ही है, क्योंकि "खेत को कर्पण करते (जोतते) हुए, मैंने भूतल (पृथ्वी) से उत्पन्न हुई सीता नामकी यह अपनी कन्या पाई है" वा०रा० बा० का० स०६७॥ इस वाल्मीकि रामायण में जनक के वचनसे भूमी से उत्पन्न हुई भी सीताको, जनकने अपनी पुत्री माना है। भाव यह है, कि यद्यपि भूमी से उत्पन्न भई लिखी है, तथापि ( जनकस्या पत्यं स्त्री जानकी) इस प्रकार अपत्यार्थक ही प्रत्यय मानके ही, जनक की बेटी कही जाय है । और ऐसे ही अग्निकुण्ड से उत्पन्न भई द्रौपदी कही जाय है । सो यहां पर भी "द्रुपदस्यापत्यं स्त्री द्रौपदी" अपत्यार्थक ही प्रत्यय माने हैं। इस द्रौपदी की उत्पत्ति की कथा का वि- स्तार महाभारत के आदि पर्वमें प्रसिद्ध है, ग्रन्थ वि- स्तार के भय से नहीं लिखा। मूल-किच-यथाच ऋक्षोऽभद्धार्गव स्तस्मा- दाल्मीकियोंभिधीयते” वि० पु०॥.भार्ग- वेणेति संस्कृती। भार्गवेण तपस्विनाश्वा०रा० वा० कां०॥ इत्यादिषूक्तो. भृगुः पुत्रो निश्चल तया तपसि स्थितो. वल्मीकेना वृतोऽभूत्तदा कृपया प्रचेतो नाना वरुणेन कृतःनिरन्तर (१९०) वृष्टया ऽनावृतः कृत एवं रक्षकस्य प्रचेतसो ऽपत्यत्वात् । टी०-और जैसे "भृगु ऋषि के पुत्र ऋक्ष ऋषि हुए हैं, उनको ही बाल्मीकि नामसे कहा जाता है" वि०पु० ॥ "भार्गवेणेति संस्कृतौ" भृगु, ऋषिके पुत्र 'ऋक्ष कपि ने जब संस्कार किया तब।"भार्गवेण.तप- स्विना" तपस्वी भृगु ऋपि के पुत्र ऋक्ष ऋपि करके -वारा-बा-का-॥ इत्यादि स्थानों पर कहे गये वाक्यों करके, भृगु के पुत्र ही जब तप में निश्चल समाधि लगाये के बैठ गये थे, तब उनको चल्मीक (वामी) -ने, ऊपर से ढक लिया था, तब तिस काल में अचेता नाम वरुण ने, अपनी दयालुता से, निरन्तर वृष्टि करके, उनको (भृगु पुत्र को ) उसके भीतर से निकाला, (इस प्रकार वामी से निकलने से वाल्मी- कि भी कह जाते हैं ) और इस प्रकार रक्षा करने वाले प्रचेता के भी 'अपत्यत्वात्-पुत्र होने से, अर्थात उनको प्रचेता का, पुत्र, होना भी स्पष्ट ही है। मू०-" चक्रे प्रचेतसः पुत्रस्तं ब्रह्माप्यन्व: मन्यतेति । वेदः प्रांचेतसा दासीत् साक्षा: द्रामायणात्मना" इत्यादिषु स एव प्राचेतस के ।
(११)
उच्यते । स च वल्मीकस्यानपत्य मपि ततः
प्रादुर्भाव मात्र सम्बन्धेनापत्य बन्मत्वा
वाल्मीकि रिति भाष्यते । एव-मन्यत्र जाता
अप्य न्यापत्यत्वेन स्वीकृता, यतः केनचित्स
वन्धेन कृत्रिम पुत्रे प्यपत्यत्वं भवति ॥
टी.-और ब्रह्मा ने भी तिस वाल्मीकि ऋषि
को प्रचेता का पुत्र कहा है, और आप मान्या भी है।
और साक्षात् जो वेद हैं -सो प्राचेतसात, अर्थात
वाल्मीकि ऋषि-द्वारा रामायण रूप से प्रकट हुए हैं"
इत्यादि स्थानों पर प्रचेता का पुत्र प्राचेतसः वाल्मीकि
ऋषि कहा गया है। सो यहां पर भी "प्रचेतसः अपत्यं
प्राचेतसः" कहाहै, इस वास्तै यहाँ"तस्येदम्"४।३।११
इस सूत्र से सम्बन्ध मात्र विवक्षा (कथन करने की
इच्छा)होने से अण प्रत्यय नहीं है, किन्तु 'प्रचेतसः
अपत्यम् इस अर्थमें है । और वही वल्मीक के
पुत्र
न होते हुए भी, वल्मीक से कैवल निकलने मात्रके
सम्बन्ध से ही पुत्रवत भाव मानके, अर्थात् पुत्र के
समान जान कर, अपत्यार्थक इञ् प्रत्ययान्त होने से
वाल्मीकि कहे जाते हैं । इस तरह मनुष्य दूसरे कुलंमें
उत्पन्न होकर भी, दूसरे के पुत्र माने जाते हैं। क्यों
( १९२० कि-भिन्न भिन्न सम्बन्धों से कृत्रिम पुत्र में भी अपत्य- त्व अर्थात् अपत्यार्थक प्रत्यय होजाते हैं। मू०-यथाच-"आत्मानं स्पर्शयेद्यस्मै स्वयं दत्तस्तुस स्मृतः” मनु स्मृ०अ०९श्लो० १७७॥ इत्यत्र यो यस्मा आत्मानं सर्मपयति सतस्य द्वादश धा पुत्राणां मध्ये स्वयं दत्त सज्ञितः पुत्रो मनुनोक्त एव मात्म निवेदनेन भक्तोपि श्रीकृष्णस्य स्वयं दत्ताख्यः पुत्रो भवति । अतो निरङ्कुशतया ऽस्मदादिषु श्रीकृष्ण भक्तेषु कार्णित्वं स्थास्यति । टी०-तीसरे यह बात है, कि-मनुस्मृति में कहा है, कि जैसे “जो अपने को जिस के लिये समपर्ण करदे, वह उसका स्वयं दत्तक संज्ञक पुत्र कहा गया है। म. स्मृ०९।१७७ ॥ इस मनु के वचना नुसार बारह प्रकार के पुत्रों में, एक स्वयं दत्तक नामका भी पुत्र होता है। उसी तरह भक्त भी अपना समपर्ण कर देने से, श्री कृष्ण जी का स्वयं दत्तक नामका पुत्रहै, इस लिये हम जैसे श्री कृष्ण भक्तों में निर्विवाद रूप करके अपत्य प्रत्ययान्त कार्णि- पना रहता हैं अर्थात हम सर्व श्री कृष्ण के भक्त, उन के पुत्र होने से, अप- त्य प्रत्यान्त कार्णि कहे जा सकते है। मू-नन्विदानींतनेषु कृष्णापत्यत्वं मदीय बुद्धिं नैवारोहतीति चेदाल्मीकः पिपीलका कृत मृत्पिण्डापत्यत्वं त्वबुद्धि मारोहत्, कृष्ण भक्तेषु कृष्णा पत्यत्वं नैवारोहत्य हो ते तर्क कुशलते त्यलम् ॥ टी०-प्रश्न-हे सिद्धान्ती! आज कल के मनुष्यों को, श्री कृष्णके अपत्यत्व . पुत्र स्वीकार करना हमारी बुद्धिमें नहीं आता,अर्थात् यह आपका कथन हमारी बुद्धि में नहीं बैठता, क्यों कि यह असम्भव सी बात है, आज पर्यन्त किसी ने भी अपने को का- प्रिं नहीं कहा है, इस लिये संदेह होता है. कार्णि कहने में इति । हेवादी! यदि ऐसा तुम कहता है, तो यह तुम्हारे विचार की सिथिलता ही संदेहजनक हो रही है, क्योंकि बाल्मीक को.आपकी बुद्धि, दीमक करके रचा हुआ मट्टीके पिण्डका, अपत्यत्व पुत्र स्वी. कार करती है, जो कि चीटियों ने बना दिया था,किन्तु कृष्ण.भक्तों.को कृष्ण के पुत्रं होना स्वीकार नहीं करती।इस प्रकारवि..... आपका द्धि तथातर्क कुशलताकोधन्य है अर्थात अत्यन्त आश्चर्य है।भावार्थः यह है, कि-जैसे भूमी से उत्पन्न भई सीता, सो जनक की बेटी मानी गई है, और अग्नि कुण्डसे उत्पन्न भई द्रौपदी, सो जैसे द्रुपद राजाकी बेटी मानी गई है, और वामी से प्रकट हुए भृगु के पुत्र ऋक्ष ऋषि, सो वाल्मीकि माने जाते हैं। सो जिस प्रकार पूर्वोक्त उदाह- रणों में,गौण सम्बन्धको मानके, ही यहां पर अपत्ययार्थ में प्रत्यय । ता है, तैसे ही गौण सम्बन्ध से, कार्णि शब्द में भी अपत्ययार्थ प्रत्यय होता है, अर्थात् श्रीकृष्ण जी की आज्ञा पालनादि भक्तिवाले होने से भक्त भी कृष्णजी के पुत्र ही हैं "जैसे सिंहो देवदत्तः" अर्थ- देवदत्त नामा पुरुप सिंह है यद्यपि पुरुष सिंह नहीं हो सक्ता, तथापि सिंह के गुण शूरता बलिष्ठतादि अर्थात् सिंहके नाई कर्तव्य करने से पुरुष सिंह कहा जाताहै। तैसे ही भगत भी श्रीकृष्ण जी के पुत्र प्रद्युम्न तथा, मेष्य अर्जुन उद्धवादी के समान आज्ञा पालनादि भक्ति वाले होने से गौणी वृत्ति से पुत्रही हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है, यदि इस प्रकार गौण पुत्रों में भी तुम्हारे को कृष्णजी के अपत्यपना मान्य नहीं होता, तो यह ही आपकी बुद्धि की कुशलता का तथा आश्चर्य का जनक है। क्योंकि श्रुति स्मृति युक्तियों करके.कार्णि ( १९५० शब्द सिद्ध किया है, और तुम्हारी समझ में भी आता है। और पीछे फिर संदेह करते हो, तो यह तुमारी बुद्धि की मलीनता का ही दोष है, इस वास्ते पूर्वोक्त श्रुति स्मृति युक्ति अनुसार कथन किये काणि शब्दका मनन करना ही श्रेष्ठ है, मनन करने से तब स्वयं ही तुम्हारे को निश्चय हो जायगा । इति । इस लिये इस (कार्णि) शब्द की व्याख्या को भी, समाप्त करते हुए कहते हैं, कि, यद्यपि कार्णिप्रयोगको “अत इन" इस सूत्र करके इञ् प्रत्ययान्त मानने में कोई भी दोष नहीं है, तथापि ग्रन्थकर्ता स्वनिश्चय को कहता है। मू-चयं कृष्णस्य कृष्णोनः,सर्व भावे रतस्ततः। तद्धित प्रत्यया स्सन्तू,चिताअन्ये प्यणादयः॥१॥ योयोयस्यप्रियोभावः शास्त्रोक्तोऽर्थोऽथवासच । स्वीकरोतुतमेवेह,विकल्पोऽत्रास्ति न सताम् ॥२॥ इति श्री मत्परमहंसोदासीन शिरोवतंस स्वामि ज्ञान दास शिष्येण कार्णि गोपाल दासाहयेन विनि र्मिता वतार मीमांसा समाप्ता।
(११६)
टी० इस लोक में तथा परलोक में सम्पूर्ण भावों
से हम श्रीकृष्ण जी के हैं, और श्रीकृष्ण जी हमारे हैं।
इससे हम तो यहां पर इन प्रत्यय को अच्छा मानते
हैं। दूसरो के मत से, दूसरे अणादिक प्रत्यय भी भले
हो जाय, क्योंकि,शास्त्रोक्त अर्थों में जो जिसको, उचित
प्रतीत होता है, वह उसी को ग्रहण करता है, इसविषय
में सताम्, श्रेष्ठ पुरुषों को किसी प्रकारसे आग्रह नहीं
होताहै ॥ इति शुभम्यूयात् ॐ शान्तिः शान्तिःशान्तिः
इति श्री निखिल शास्त्र निष्णात कार्णि जनावतंसकवि
वर्य ब्रह्मनिष्ठ श्री १०८ श्री मत्परमहंस स्वामी कार्णि
गोपाल दास जी विरचित अवतार-मीमांसा सरलार्थ
भाषा टीका ब्रजमण्डलान्तर्गत गोकुलस्थ रत्नमोती
संस्कृत पाठशालाध्यापक पण्डित माधव
मनोहर शास्त्रिणा कृता समाप्ता।
* शुद्धि पत्रम् * पंक्ति अशुद्ध खलन्द्रिय रभूत लणान्यताम् पृष्ठ वि. वि. ६. सलेन्द्रिय रभूत लक्षणान्विताम् के भासों १ ३. १३ का १६ ६ २ भासो के प्रवृत्ति अनंता संवद्र अविद्य स्थित ३ २१ को. प्रवृत्त अनन्तता संबन्ध अविद्या स्थिति के देयांशो पक्षी लश्य समान विश्वा श्यता स्मृतियों प्रवेशः १२ ५ १२ १२ दयांशा पक्षि लक्ष सामान सर्वा इयतुर स्मृत्यों प्रविशः नेह मैं १६ १७ १२ སྒྱུ, ལས་ ཉྙོ ཡྻོ , १८ ५ १७ १८ १९ मुम नृतीय ११ नृतीये अशुद्ध पंक्ति २१ ११ ३ पृष्ठ अतिश्य अतिशय नवमों नवम औषधियों ओषधियों भगवतावतार भगवदवतार २२ दर्शयितुं दर्शयितु कपिलत्व गोत्व लक्षणम्, कपिलत्वं गोर्लक्षणम् २३ श्रृिंग शृङ्ग २३ ऐक्षत् ऐक्षत आवभाव आविभीव नृसिंहादीनाम योनिजत्वं इतना अधिक छप २७ २२ ७ २. 6. ६ २७ १४ स्पष्ट मेवति गया है २ ३ स्सन्तु २७ जस जैसे कथानात् कथनात् कमजवं कर्मजत्वं मे ३१ उपहुता उपहता गति भ्रमता गती भ्रमता ३३ यों ने अधिक है ३४ कृष्णावतारऽभौतिकत्वं कृष्णावतारा भौतिकत्वं ३५ देह देह ३६ अर्थ अर्थ ३६ গান आत्मा ३७ चौरादिक चौरादिकों ३८ ' ३ पृष्ठ पंक्ति अनि ४० श्व . ४० ईश्ववर वताराः ४१ ४१ ज्ञानि स्वातन्त्रातादि इश्वरा अग्नि श्वे ईश्वरावताराः ज्ञान स्वतन्त्रतादि ईश्वरा श्वे. प्रागल्भ्यं और ३ २३ 10 १३ १५ १८ १२१ . ४२ ४३ प्रागलभ्यं वह ४८ ४८ बभव बिरोदि प्रमण बभूव विरोधी प्रमाण ईश्वर रहित विपर्यय अर्पण करते १३ १६ १० इश्वर रहत विपर्य अपर्ण करते करते १६ शक्तया शक्त्या स्वातन्त्रयता चरित •कतीह्या जये स्वातन्त्र्य चरति कतीत्या ६५ १२ सन्मुखु अशगरि सन्मुख अशरीरी भगवदवतार ६६ भगवतावतार ६७ पृष्ठ पंक्ति १२१ अंशुद्ध तापिनि स्वामि हिरणय कृित विसिष्ठ ६८ ६८ १८ ७. तापनी स्वामी हिरण्य कृत वासिष्ठ श्री ७० ७० १३ १३ १६ श्रा १९ ७१ ७२ ७२ स्त्रत भष्यत सिद्धान्ति अगी धर्मेस्यति वैष्णव मन्या १८ ७३ ७३ १० वष्णव सम्पूरण stu. 10 भाष्यत सिद्धान्ती अंगी धर्मस्येति वैष्णवंमन्या वैष्णव सम्पूर्ण हो दुर्लभ कृष्ण तैत्तिरीय तादात्म्य परमेश्वरो सम्पूर्ण कट मृत्तिका शरावादिक चतुराई १० ७८ दुर्लभ्य कष्ण तैतरी तादात्मय परमश्वरो संपूर्ण कटा मृतिका सरावादिक चातुराई • वाले ७९ ८. 1 ८१ ८१ से 55 ८६ श्वतर कर्णाभरण १६ ८८ श्रशुद्ध सतर करुणामण अतो इय तो निर्वाचन अत इय तयो निर्वचन ८ अतो इस अत इन '९९ मदग मदिरा ૨૧ अध्यम अधम ११ इत्यमरः इत्यमरः १३ निशतया निरहुशतया ११२ १० सूचना । पाठक महाशयों को विदित हो कि ऊपर लिखे शुद्धि पत्रानुसार पुस्तक फो शुद्ध करके पाट करे जिससे अर्थ ज्ञान में श्रम नहीं रहे।
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दोहा ईश्वर में गुण अमित हैं, जिस जन में दो चार । ज्ञानी योगी भक्त सो, ईश अंश अवतार ॥१॥ ईश्वर के गुण सकल हैं, जिनमें परम उदार । श्याम चतुर्भुज सर्ववित, ते पूरण अवतार ॥२॥ ईश अंश अवतार की, भक्ति करत है जौन । हरि पूरण अवतार की, भक्ति पाय है तीन ॥३॥ पूरण की भक्ति किय, विरति बोध उपजात । कर्मनाश होवे तभी, हरि में विज्ञ समात ॥४॥ या विध वेद विचार कर, गुरु में राखो प्रीत। ईस अंश अवतार की, भक्ति कीजिये मीत ॥५॥ जिस जन पर करुणा करे, ईश अंश अवतार । सो नर विना प्रयास से, उतरत है भय पार ॥६॥ निराकार की भक्ति को, कर न सकत जन अज्ञ। भक्ति करे साकार की, बननचहत जोतज्ज्ञा गुरु ज्ञानी हरिभक्त नृप, पुन पूरण अवतार । तिनके चरण सरोज में, करहै कालि जुहार | * इति *
श्रीमत्परमहंस निखिल शाखविणात
काणि गोपालदास निर्मित
पुस्तक सूचीपत्र तया मिलने का पता
बैराग्य भास्कर संस्कृत भाषा टीकों सहिवः।
-कारिणः कण्ठाभरण- अमरेश्वरीय टिप्पणी
टीकोपेतम् ।
राज श्रीकृष्णदास, श्रीदुरेश्वर प्रेस बन्यो
भक्ति.प्रकाश-जिसमें दशंधा भक्ति (परा-अपरा मामखें
से वर्णन
गोगांक विलास जिसमें श्रीमद्भागवत दशम तयां
में और गर्ग:संहितामें कवन की सीकृष्ण
का भाषा छन्दों में अनुवाद
क्रीडा का सार जिसमें मीकृष्णजी की सीलालों
अत्यन्त मनोहर भाषा छन्दों में वर्णन
कीर्तन-गुरु भक्ति, ईश्वर भफि, शान वैराग्य
भजन गाने
प्रेम पत्र रामायण इसमें भाषा दोहे चौपाई है।
पता-लकमी वेंकटेश्वर प्रेस, कल्यान, मुम्बई
प्रबोधचन्द्रोदय नाटक-भाषा छन्दों सहित
९-कार्णि: कवच-काणि किरीटमः।
२०-काणि कर्णाभरण.ग्रज चासोझास: भाषा छन्
भजन ।
४.सु.साधुता सुघा सिन्धु भाषा टीका सहित
१२- साधु सिंहोपन्यास।
पंता-भगत बिहारीलाल नंदलाल पटेल परमहंस
म० जय भी,,
पोशीकरी, रिक
१३-प्रेम अपेटिका हरिमायकन्य--यह भी देखने
-पूर्व विलाकर गोपीचन्द विनोद)भाषा धर्म
thA
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