Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner

Jain Dharam Shikshavlli Bhag 4

Jain,ugrasen · 2011/03

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लेखक के दो शब्द जैन पाठशाला के पठन क्रम में जो पुस्तकें अब तक प्रचलित रही हैं, उनमें या तो ऐसा पुस्तकें हैं जिनमें केवल धर्म शिक्षा के हो पाठ हैं या ऐसी पुस्तकें हैं जिनमें नीति पे पाठ भौर कथा कहानियाँ ही हैं। भारत वर्षीय दिगम्बर जैन परिषद् ने उन दोनों विपयों को एक ही कोर्स को तय्यारी के लिपे मुझसे विशेष अनु रोध किया । परिषद् की भाज्ञा पालन व्या शिता प्रचार के भाव को हृदय में रखकर मैंने यह कोर्स पाच पुस्तकों में वय्यार करने का प्रायास किया है। यह कार्य निज ख्याति या लाभादि के वशीभूत होरर नहीं किया गया। जिन २ महानु भावों ने इन पुस्तकों के सम्बंध में अपना शुभ-सम्मति द्वारा सहायता दी है, उनके प्रति हम अपनी हार्दिक कृतज्ञता प्रकट करते है। वथा उन पत्रों, पुस्तक रचयिताओं तथा कवियों के भी हम अत्यत आभारी है कि जिनकी पुस्तकों में से कुछ गद्य और पद्य पाठ इसमे उद्धत किये गये हैं। इस सकरण में परीक्षा बोर्ड के मनी महोदय तथा अय शिक्षा प्रेमी विद्वानों के मुभार पर कई सशाधन इन पुस्तकों में यया योग्य स्थानों पर कर दिये गये हैं। हम समझते हैं कि वे छात्रों तथा अध्या पको दोनों के लिये लाभदायक सिद्ध होगे। उग्रसेन जैन LALUB

विषय-सूची
पृष्ठ
१
***
नाम पाठ
१ स्तुति (दौलतराम फत)
२ धीर धीर चन्द्रगुप्त
३ अष्ट मूल गुण
४ अभदय
५ दरश दिखायो है
१४
३०
३२
३७
४६
७ भजन-रे मन (पद्य)
जम्युकुमार
६ मरहत परमेप्टी
१० सिद्ध परमेष्टी
११ आचार्य परमेष्टी
१२ उपाध्याय परमेष्टी
१३ साघु परमेष्टी
१४ गुरु पवन (पद्य)
१५ गृहरयों के देशिक पर्म
१६ श्रावण के ५ अणुक्त (अ)
१७ श्रावक के प्रत (2)३अणुमत
.

(२)
पृष्ठ
८६
नाम पाठ
१८ श्रावक फे ४ शिक्षा प्रत
१६ महावीर स्तुति (पद्य)
२० भगयान् पार्श्वनाथ
२१ सती अजना सुन्दरी
२२ वत्व और पदार्थ
२३ विद्यार्थी का कर्तव्य
२४ श्रावक की ग्यारह प्रतिमा
२५ नीति के दोहे (६० चानतराय जी)
२६ वीर विमलशाह
११६
१३१
१३२

* ओरमन्त्र
श्रीवीवरागायन नम
धर्म शिक्षावली
चौथा
भाग.
पाठ १
स्तुति
पं० दौलतराम जी कृत
दोहा
सकल ज्ञेय ज्ञायक तदपि, निजानन्द रस लीन ।
सो जिनेन्द्र जयवन्त नित, अरि रज रहस पिहीन ॥१॥
पद्धरि छद
जय वीतराम विज्ञान -पूर
जय मोह तिमिर को हरन पुर।
जप छान अनन्तानन्त धार, ।
हग सुख-धीरज पडित अपार ॥२॥

२ यत्न करने पर भी न मिले तो निराश न होवो। जय परम शान्ति मुद्रा समेत, भविजन को निज अनुभूति हेत। भवि-मागन-वश जोगे वशाप, तुम धुनि व्है सुनि विभ्रम नशाय ॥२॥ तुम गुण चिंतत निज पर विवेरु, प्रगटै विघटै आपद अनेक। तुम जग भूपण पण वियुक्त, सब महिमा युक्त विकल्प मुक्त॥४ अविरुद्ध शुद्ध घेतन स्वरूप, परमात्म परम पावन अनूप । शुभ अशुम विभाव भभाव कीन, स्वाभाविक परणतिमय भछीन । अष्टादश दोष विमुक्त धीर, स्व चतुष्टय मय राजत गम्भीर । मुनि गणधरादि सेवत महन्त, नव केरजलब्धि रमा घरन्त ॥६ तुम शासन सेय अमेय जीव, शिव गए जाहिं हैं सदीय । मरसागर में दुख चार-वारि, तारन को और न माप टारि ॥७ H

भाग्य भरोसे राजा भी नहीं बैठता।
पह लखि निज दुख गद हरन काज,
तुम ही निमिच कारण इलाज !
जाने वाते मैं शरण श्राय,
उचरों निजदुख जो चिर लहाय ॥८॥
मैं सम्यो अपनपो विसरि आप,.
अपनाए विधिफल पुण्य पाप।
निज को पर को करता पिधान,
पर में अनिष्टता इष्ट ठान ॥६॥
थाकुलित भयो अज्ञान धारि,
ज्यों मृग मृग-तृष्णा जान वारि ।
तन परणित में प्रापो चितार,
कवहूं न अनुमवो रवपदसार ॥१०॥
तुमको पिन जाने जो कलेश,
पाए सो तुम जानत जिनेश ।
पशु नारक नर सुरगति मझार,
भव घर २ मरयो अनन्त बार ॥१॥
अब काल लन्धि वलत दयाल,
तुम दर्शन पाय मयो खुशाल ।
मन शान्त भयो मिट सकल द्वन्द,
पाख्यो स्यातम रस दुख निकन्द ॥१२॥

1
माव पिता धरी भये जिन न पढ़ाये वाल ।
तात अब ऐसी करहु नाथ,
पिडुरै न कमो तुम चरम साथ ।
तुम गुण गण को नहिं छेव देव,
जगतारण को तुव विरद एव ॥१३॥
भावम के माहित विषय कपाय,
इनमें मेरी परपति न जाय ।
मैं रहों भाप में भाप लीन,
सा करो होई ज्यों निजाधीन ॥१४॥
मेरे न चाह कछु और ईश,
रत्नत्रय निधि दीजे मुनीश ।
मुझ कारज के कारण सु श्राप,
शिव करहु हरहु मम मोह ताप ॥१५॥
शशि शान्ति करन तप हरन हेत,
स्वयमेर तथा तुम कुशल देत ।
पीवत पीयूप ज्यों रोग जाय,
त्यों तुम अनुभव ते भर नशाय ॥१६॥
त्रिभुवन तिहु काल मझार कोय,
नहिं तुमचिन निजसुखदाय होय ।
मो उर यह निश्चय भयो भाज,
दुख जलधि उतारन तुम जहाज ॥१७॥

जो गरी की मदद करते हैं वे बड़े कहाते हैं। दो-तुम गुण-गयमणि गणपती, गणय न पारहिं पार। 'दौल' स्वन्प मति किमि कहै, नमों त्रियोग ससार ॥१८॥ प्रश्नावली १-यह स्तुति किसकी बनाई हुई है? २-स्तुति से तुम क्या सममते हो। इस स्तुति को कय और क्यों पढ़ते हो? ३-नीचे लिखे छद सुनामो (क) “भ्रम्यो अरन पो" से लेकर "मयों अनत बार (ख) आवमा के अहित धक सक। (ग) आदि के चार छद पढ कर सुनाओ। पाठ २ धीर वीर चन्द्रगुप्त चौद्धो के ग्रन्थ महावश से प्रगट है कि मगध देश में रहने वाले शाक्य घराने के कुछ राजा अन्य राजाओं के आक्रमण से पीड़ित होकर हिमालय पर्ववत पर जा बसे । वहाँ एक नगर मप्र की गर्दन के समान रच कर उसका नाम 'मयूर नगर रखा । वहाँ के रहने वाले मौर्य कहलाने लगे। इन्हीं मौर्य राजकुमारों में एक चन्द्रगुप्त नाम का राजकुमार मी था। उसकी मावा मोर्याख्य देश के क्षत्रियों ६ सदेव वह जिन्दा है जिसकी ससार प्रशसा करे को राजकुमारी थी। राजा दुष्ट था, इसलिए चन्द्रगुप्त की माता पटना चली गई । यहाँ उसने पीर पुन को जन्म दिया और उसका पालन पोपण किया । गजकुमार चन्द्र- गुप्त पड़े पराक्रमी और युद्धिमान थे । वह शास्त्र और शास्त्र विद्या में निपुण हो गये । चाणक्य नाम के एक वाक्षण ने चन्द्रगुप्त को पढ़ाकर प्रवीण किया। उस समय मगध में महा पद्मनन्द का राज्य या जिससे चाणक्य को सन्तोप न था । वह राजा को हटा कर चन्द्रगुप्त को राजगद्दी पर बिठाना चाहता था उन दिनों भारत पर यूनान के सम्राट सिकन्दर महान का आक्रमण हो रहा था। और उसने उत्तर पश्चिम सोमा प्रान्त पर पाव पर अपना अधिकार जमा लिया था । चन्द्रगुप्त ने यूनानियों की वोरता की प्रशसा सुनी यो। चाणक्य की सम्मति से वह सिकन्दर महान की सेना में बेघरक चला पाया और उन विदेशियों को सेना में भरती हो गया। चन्द्रगुप्त को यूनानी सेना में रहते अभी पहुर समय नहीं बीता था कि उसका पत्रिय तेज महल उठा । भारतीय क्षत्रियों का लहू उसकी नसों में खौल रहा था। यह स्वाभिमान खोकर अपना जीवन मलीन

.
देखे तुम्हारे देश में पहले से बलवान होते थे।
करना नहीं चाहता था। एक दिन बातों ही बातों में
सिकन्दर से उसकी बिगड़ गई । सिकन्दर का साथ छोड़-
कर वह कहीं चल दिया। अब चन्द्र गुप्त के भाग्य का
सितारा चमका ! चाणक्य के सहयोग से उसने नन्दराज
को हरा दिया । चन्द्रगुप्त मगध का अधिपति हो गया,
और उसने अपना राज्य सारे मारतमें फैला दिया। राजा
नन्द की पुनी का विवाह चन्द्रगुप्त से हुआ।
चन्द्रगुप्त ने यूनानी गजा सैन्युकस को मी पड़ी
चीरता से हराया । सैन्युकस ने अपनी पुत्री चन्द्रगुप्त को
विवाह दी, व काबुल, कन्धार व ईरान के प्रदेश मी मेंट
किये । चन्द्रगुप्त ने भारत के बाहर के राजाओं को भो
अपने प्रभार से वश में कर लिया। प्रजा उसके राज्य में
रामराज्य के सुख भोगने लगी। धर्म और सत्य की
पड़वारी हुई।
चन्द्रगुप्त जैनधर्म का दृढ़ श्रद्धानी था । सदेव गृहस्थ
का धर्म पालता था। उसने पशुओं की रक्षा के लिए भी
हस्पताल खुलवाये थे। वह बडा दानी तथा जीव दया
प्रचारक था । एक बार चन्द्रगुस ने जनगुरु श्री मद्राह
स्वामी का उपदेश सुना ! उसे वैराग्य हो गया और अपने
पुत्र बिंदुसार को राज्य देकर वह साधु हो गया।

.
।
-
जो वस्तु चली गई उसका पिटन क्रो।
दक्षिण भारत के श्रमणबेलगोल नामक पवित्र स्थान
पर इसने गुरु का समाधि मरण कराया, उनकी खूब सेवा
की । गुरु तो स्वर्ग पधारे। पीछे चन्द्रगुप्त ने भी जैन
मुनि हो कर जन्म मर तप किया और स्वर्ग पाया।
चन्द्रगुप्त ने २२ वर्ष तक राज्य किया। इसका समय
सन् ईस्वी ३२२ पूर्व से २६८ पूर्व तक रहा। चन्द्रगुप्त
ससार में एक श्रादर्श सम्राट हुआ । उसको शासन पद्धति
अत्तन्त उत्तम थी। उसके पास एक बड़ी मार सेनो
थी। देश में हर एक को सुख था। जनता की आर्थिक
दशा बड़ी अच्छी थी। बाहर विदेशों स भी यानो थाते
थे। इसके दरबार में मेगस्थनीज नम का य नानी राजदूत
रहता था। उसने चन्द्रगुप्त के राज्य का हाल लिखा है।
पालको ! तुम भी चन्द्रगुप्त के समान धीरता और वीरता
से काम लो। यदि ऐसा कोगे तो सफलता का मुकुट
तुम्हारे शिर पर सोहेगा।
प्रश्नावली
१ चन्द्रगुप्त किस वश में उत्पन्न हुये थे और बताओ उनके
वंश का वह नाम किस प्रकार पड़ गया था?
२ चद्रगुप्त पे गुरु कौन थे और वे क्या चाहते थे।
३ चन्द्रगुप्त कौनसी विद्याओं में निष्णो

1
लोभ से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है।
३
मगध का राज्य किस प्रकार प्राप्त करके अपना विवाह
किसके साथ किया था?
४ पद्रगुप्त ने अपना राज्य किस प्रकार चलाया और क्यों
कर थपनी प्रजा का पालन किया?
५ घद्रगुप्त ने अपना अन्तिम का किस प्रकार सफल किया?
६ मेगस्थनीज कौन था, उसके बारे में तुम क्या जानते हो।
पाठ ३
अष्टमूल गुण
मूल जड को कहते हैं। जैसे जड के बिनो पेड़
नहीं ठहर सकता, उसी प्रकार कुछ नियम ऐसे होते है
कि निनका पालन किये बिना मनुष्य धर्म मार्ग पर नहीं
चल सकता । इसलिए धर्म पालन के सब से पहले मुख्य
नियमों को मूल गुण कहते हैं।
निन मुख्य नियमों को पहल पालन किए बिना
मनुष्य श्रापक नहीं कहला सकता, वे ही नियम श्रावक
के मूलगुण कहलाते हैं। वे मूलगुण है।
(१) मध त्याग (२) मांस त्याग (३) मधुत्याग (४)
अहिंसा (५) सत्य (६) अवार्य (७) ब्रह्मचर्य (८) परिग्रह
परिमाण ।
A
--

दूसरों के भरोसे पेट भरने वाला मरने तुल्य है।
(१) मद्यत्याग-शराम वगैह नसीली चीजों के
सेग्न का त्याग मद्य त्याग है। शरीर अनेक पदापों के
सड़ाने से पैदा होती है। सड़ाने से अनेक कोई पैदा
होते और मरते आते हैं। जीव हिंसा के बिना शराब
क्सिी प्रकार तैयार नहीं हो सकती। इसलिए शराय
पीने से जीव हिंसा का पाप लगता है शराब पीने से
मनुष्य पागल सा हो जाता है उसे भले युरे का ज्ञान
नहीं रहता | शराबी के मुख में कुचे पेशार कर जाते हैं।
इसी प्रकार शराबी की और भी दुर्गति होती है। इस
लिए शराब नहीं पीना चाहिए । तथा भग, गांजा, अफोम
कोकीन, चरम, तम्बाकू पाड़ी चुरट शादि और मी
नशीली चीजों का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए ।
(२) मासत्याग-मांस खाने का त्याग करना
मांस त्याग कहलाता है। मांस प्रस जीवों के घात से
उत्पन्न होता है। उसमें अनेक जीव पैदा होते और मरते
रहते हैं। मांग के छूने मात्र से ही जीव मर जाते हैं।
इसलिए जो मास खाता है वह बड़ी हिंसा करता है।
मांस खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। अनेक प्रकार के
रोग हो जाते हैं। मास खाने वालों के परिणाम कर हो

कंगाली से मौत उत्तम है
जाते हैं। मांस खाने से शरीर पुष्ट नहीं होता। इस
लिए भी समी स्त्री पुरुषों को मांस छोड़ना ही उचित है।
(३) मधुत्याग-शहद खाने का त्याग मधु
स्याग है। शहद मक्खियों का उगाल(वमन) होता है। मधु
में हर समय सूक्ष्म-प्रस जीवों को उत्पत्ति होती रहती है,।
मधु मक्खियों के छचे को निचोड़ कर निकला जाता है।
छत्ते में छोटी २ मक्खियां रहती हैं। छचे को निचोरते
समय ये सब मर जाती है, और शहद में उन सबका
निचोड़ आ जाता है इसलिए ऐमी थपवित्र हिंसा की
स्वान, घृणा करने वाली चीज का त्याग करना हो
उचित है।
(४) अहिंसा अणुव्रत-जान घूझकर इरादा
करके जन्तुओं को हत्या करने से बचना अहिंसा अणुव्रत
है। किमी मी मानव को धर्म के नाम से पशुओं की
पलि न करनी चाहिए। न शिकार के लिए मारना
चाहिए । नऐसा शौक चमड़े, रेशम व हिंसाकारी यस्तुओं
फे व्यवहार का करना चाहिए जिससे जन्तुओं का अधिक
घात हो । सेती, व्यापार, शिल्प, राज्य प्रबन्ध सम्बन्धी
हिंसा ग्रहस्थी से छट नहीं सकती। सेमी हिंसा

--
------
१०
दूसरों के भरोसे पेट भरने वाला मरने तुल्य है।
(१) मद्यत्याग-शराब वगैह नसोली चीजों के
सेपन का त्याग मद्य त्याग है। शराब अनेक पदापों के
सड़ाने से पैदा होती है। सड़ाने से अनेक कीड़े पैदा
होते और मरते गते हैं। जीव हिंसा के बिना शराब
किसी प्रकार तैयार नहीं हो सकती। इमलिए शरार
पीने से जीव हिंसा का पाप लगता है शराब पीने से
मनुष्य पागल सा हो जाता है उसे मले बुरे का ज्ञान
नहीं रहता । शराबी के मुख में कुत्ते पेशाब कर जाते हैं।
इसी प्रकार शराबी की और भी दुर्गति होती है। इस
लिए शराब नहीं पीना चाहिए। तथा मग, गांजा, अफोम
कोकीन, चरम, तम्बाक बाड़ी चुरट आदि और मी
नशीली चीजों का सेवन कदापि नहीं करना चाहिए ।
(२) मासत्याग-मांस खाने का त्याग करना
मांस त्याग कहलाता है। मांस घस जीनों के पात से
उत्पन्न होता है। उसमें अनेक जीव पैदा होते और मरते
रहते हैं। मोम के छूने मात्र से ही जीव मर जाते हैं ।
इसलिए जो मास खाता है वह बड़ी हिंसा करता है।
मास खाने से बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। अनेक प्रकार के
रोग हो जाते है । मास खाने वालों के परिणाम झ र हो
-
।

।
फगाली से मौत उत्तम है.
जाते हैं। मांस खाने से शरीर पुष्ट नहीं होता। इस
लिए भी सभी स्त्री पुरुषों को मांस छोड़ना ही उचित है।
(३) मधुत्याग-शहद खाने का त्याग मधु
त्याग है। शहद मक्खियों का उगाल(वमन) होता है। मधु
में हर समय सूक्ष्म-प्रस जीवों को उत्पत्ति होती रहती है।
मधु मक्खियों के छत्ते को निचोड़ कर निकला जाता है।
छत्ते में छोटी २ मक्खियां रहती हैं। छत्ते को निचोड़ते
समय ये सब मर जाती है, और शहद में उन सबका
निचोड़ आ जाता है इसलिए ऐमी अपवित्र हिंसा की
सान, घृणा करने वाली चीज का त्याग करना हो
उचित है।
(१) अहिंसा अणुव्रत-जान बूझकर इरादा
करके जन्तुओं को हत्या करने से पचना अहिंसा अणुव्रत
। किमी मी मानर को धर्म के नाम से पशुओं की
पलि न करनी चाहिए। न शिकार के लिए मारना
चाहिए। नऐसा शौक चमड़े, रेशम व हिंसाकारी वस्तुओं
फे व्यवहार का करना चाहिए जिससे जन्तुओं का अधिक
घात हो । खेती, व्यापार, शिल्प, राज्य प्रबन्ध सम्बन्धी
हिंसा ग्रहस्थी से छूट नहीं सकती। इसे भारम्मी हिंसा

-
जितना तुम्हें मिला है उसी पर सत्र करो।
कहते है। जोर दया के लिए पानी छान कर पीना
चाहिए। विना छाना पानी पीने से बहुत प्रस जीवों
की हिंसा होती है। जीव दया के लिए राति को भोजन
न करने का भी जहाँ तक हो सके अभ्यास करना
चाहिए। रात्रि भोजन से बहुत से जन्तुओं की हिंसा
होती है, जो रात्रि को अधिक उड़ते हैं। सूर्य के प्रकाश
में भोजन करने से भोजन पाचक भी होता है।
(५) सत्य अणुव्रत-पोडाकारी वचन कमी
नहीं फहने चाहिए । झूठ बोलने से दूसरों को कप्ट
पहुँचता है। झूठ पोलकर अपना मतलप निकालना
धनादि कमाना पाप है। असत्य हिंसा का हो अंग है।
(६) श्रचौर्य अणुव्रत-बिना दी हुई वस्तु
रागवश उठा लेना चोरी है। मनुष्य को सत्य व्यवहार
करना चाहिए : चोरी करने से दूसरे के प्राणों को कष्ट
पहुँचता है। यह मी हिंसा का मेद है।
(७) ब्रह्मचर्य अणुव्रत-ब्रह्मचर्य बड़ा गुण
है। जब तक विवाह न हो पूर्ण ब्रह्मचर्य पालना उचित है।
विवाह हो जाने पर अपनी पत्नी से सतोप रखना उचित
पर स्त्री का व्याराशेनामादि।

फजूस स्त्री की चौकसी करना चेलाभ है।
१३
(6) परिग्रहण परिमाण-गृहस्थ को जितनी
इच्छा व जरूरत हो उतनी सम्पत्ति का परिमाण करना
चाहिए । जब उतना धन हो जाये तब सन्तोप से अपना
जीरन धर्मध्यान व परोपकार में विताना चाहिये ।
नोट-किन्हीं प्राचार्यों ने मद्य, मास, मधु और
पाँच उदम्मर के त्याग को ही अष्टमूलगुण कहा है।
पाच उदम्बर यह हैं:- (१) बड़फल (२) पीपलफल
(३) पाकर (पिलवन) (४) गूलर (५) कटुमर (अजीर)
इनमें प्रसजीव पाये जाते है। इनमें से कमी किसी फल में
साफ नहीं दिखलाई पड़ते हैं, तो भी उनके पैदा होने की
सामग्री है। इसकारण जीवदया के लिए उनका त्याग
हो उचित है।
मद्य, मांस, मधु इन तीनों को मकार कहते हैं, क्यों
कि इन दोनों का पहला अक्षर 'म' है।
प्रश्नावली
१ मुलगुण किसे कहते हैं। और इनका पावन कोन करता
है ? यह भी भवाओ कि इन गुणों का नाम "मूलगुण"
२. भूल गुण कितने होते हैं ? नाम यतायो।
३ मद्य, माँस व मधु सेवन में क्या धुराई है । अहिसाणुव्रत का
धारी इन वस्तुओं का सेवन करेगा या नहीं।
क्योंपदा १
.

१२
नितना तुम्हें मिला है उसी पर सत्र करो।
कहते है। जीव दया के लिए पानी छान कर पीन्ग
चाहिए। बिना छाना पानी पीने से पहुच प्रम जीवों
की हिंसा होती है। जीव दया के लिए रानि को भोजन
न करने का भी जहाँ तक हो सके अभ्यास करना
चाहिए। रात्रि भोजन से बहुत से जन्तुओं की हिंसा
होती है, जो रानि को अधिक उहते हैं। सूर्य के प्रकाश
में भोजन करने से भोजन पाचक भी होता है।
(५) सत्य अणुव्रत-पोदाकारी वचन कमी
नहीं करने चाहिए । झूठ बोलने से दूसरों को कप्ट
पहुँचता है। झूठ बोलकर अपना मतलय निकालना
धनादि कमाना पाप है । असत्य हिंसा का ही भग है।
(६) अचौर्य अणुव्रत-पिना दी हुई वस्तु
रागपश उठा लेना चोरी है। मनुष्य को सत्य व्यवहार
करना चाहिए। चोरी करने से दूसरे के प्राणों को कष्ट
पहुचता है। यह भी हिंसा का मेद है।
(७) ब्रह्मचर्य थावत-प्रदाचर्य बड़ा गुण
है। जब तक विवाह न हो पूर्ण ब्रह्मचर्य पालना उचित है।
विवाह हो जाने पर अपनी पत्नी से सवोप रखना उचित
है। पर स्त्री का त्याग होना चाहिए ।
--

फजूस स्त्री की चौकसी करना वेलाभ है।
() परिग्रहण परिमाण-गृहस्थ को जिवनी
इच्छा व जरूरत हो उतनी सम्पत्ति का परिमाग करलेना
चाहिए। जर उतना धन हो जाये तब सन्तोप से अपना
जीवन धर्मध्यान व परोपकार में विताना चाहिये ।
नोट-किन्हीं प्राचार्यों ने मद्य, मांस, मघु और
पाँच उदम्मर के त्याग को ही अष्टमूलगुंण कहा है।
पांच उदम्बर यह है - (१) पड़फल (२) पीपलफल
(३) पाकर (पिलखन) (४) गूलर (५) कटूमर (अजीर)
इनमें भसजीव पाये जाते हैं। इनमें से कभी किसी फल में
साफ नहीं दिखलाई पड़ते हैं, तो भी उनके पैदा होने की
सामग्री है। इसकारण जीवदया के लिए उनका त्याग
ही उचित है।
मद्य, मांस, मधु इन तीनों को मकार कहते हैं, क्य
कि इन तानों का पहला अक्षर 'म' है।
प्रश्नावली
१ मुलगुण किसे कहते हैं। और इनका पावन कौन करता
है ? यह भी पताओ कि इन गुणों का नाम "मूल्य"
२. मूस गुण कितने होते हैं ? नाम बताओ।
३ मद्य, माँस प मधु सेवन में क्या पुरद है। कई सालमा
घारी इन वस्तुओं का सेवन करेगा या नहीं।
क्यों पड़ा

जो न पढ़े उसका पदाना बेकार है।
४ आहिंसागुमत से क्या अभिप्राय है? सेती व्यापार आदि
करने में हिंसा होती है या नहीं १ तुम्हरी समझ में सेवी
च्यापार फ्रने याला गृहस्थी अहिंसाणुनव धारण पर
सकता है या नहीं ?
पाठ ४
अभक्ष्य
१-जिन पदार्थों के खाने से घस जोवों का घात होता
हो जैसे बड़, पीपल आदि पांच उदम्बर फल । मिस (कमल
डएडी बीघा श्रम, गले सड़े फल जिनमे प्रस जीव पैदा
हो जावें तथा मास, मधु, द्विदल और चलित रस ।
नोट-द्विदल फच्चे दूध,कच्चे दही और कच्चे दूध की जमी
हुई वस्तुएं उड़द,मग, चना आदि द्विजल वस्तु (जिसके
दो टुकड़े परावर २ हो जाते हैं) को मिला कर खाना ।
चलित रस-वह पदार्थ जिनका स्वाद बिगड़
गया हो, जो मर्यादा से रहित हो गये हों, जैसे बदबूदार
पी सुरसली वाला आटा वया बहुत दिनों की बनी हुई
मिठाई मुरबो, भाचार प्रादि ।
,

ज्यादा परिश्रम करने से बीमारी का डर रहता है।
.
[२] जिन पदार्थों के खाने से अनन्त स्थावर जीवों
का घात होता हो जैसे--भालू , अरवी, मूली, गाजर,
लहसन, अदरक, प्याज शकरकन्द, कचालू , तुच्छफर
( जिसमें बीज न पड़े हों व जो बहु छोटे हों और पड़े
हो सकते हों)
[३] जो पदार्थ प्रमाद तथा काम विकार के पढ़ाने
घाले हो जैसे--शराब, कोकीन, मग, घरस, तमाछ
मादि नशीली चीजों, मौजून भादि ।
(४) अनिष्ट पदार्थ अर्थात् ऐसे पदार्थ जो खाने
योग्य तो हों, परन्तु शरीर को हानि पहुंचा। जैसे, खाँसी
दमा रोग वाले को मिठाई खाना, पुखार वाले को घी
खाना, अधपका कच्चा देर से पचने वाला, अपनी प्रकृति
विरुद्ध भोजन।
(५) अनुपसेव्य-वे पदार्थ जिनको अपने देश
समाज तथा धर्म वाले लोग पुरा समझे
इसके सिवाय मस्खन, चमड़े के कुप्पे, तराज भादि
में रखे हुए तथा छूवे हुए थी, हींग, सिरका भादि पदार्थ
भी प्रमरप हैं।
--

यह न जानो कि सवयलयान नौजवान बने रहेंगे।
प्रश्नावली
१ अभक्ष्य से तुम क्या सममते हो और यह कितने प्रकार
का होता है पताश्री।
२ द्विदल किसे कहते हैं। दही में डाले हुए उड़द के बडे
द्विदल हैं या नहीं?
३ घलित रस दिसे कहते है। बहुत दिनों की बनी हुई मिठाई
पुराना अचार और एक माह का पिसा हुआ आटा चलित
रस हैं या नहीं और क्यों?
४ घताओ
अभक्ष्य साने से क्या हानि है?
५ अनिष्ट और अनुपसेव्य किये कहते है? और कौन से
पदार्थ अनिष्ट और अनुपसेग्य की श्रेणी में गिने जा
सकते है!
.
पाठ ५
दरश दिखायो है
सवैया
[]
स्याग जग राग, ले चैराग, पाग निज रस,
भातम में लीन होय, भासन लगायो है।
देख योतराग रूप शान्ति स्वरूप छवि,
ध्यान की अन्पता से मन हायो है।
T
,

ज्ञानवान किसीरत का शौक नहीं करते।
।
.
श्राप के बताए हित मग पर पग रख,
जगत के जीरन ने लाम अति पायो है।
धन धन वीर महावीर 'जिनराज पान,
मम अहोभाग्य तुम दरश दिखायो है ।।
[२]
या उपदेश दया धरम का हितकर,
हिंसा में पाप
महापाप बतलायो है।
ज के कपाय अरु विषयों की वासना को,
यातम कल्याण करो मग यह सुझायो है ॥
र से ममत छोड़ निज से स्नेह जोड ,
मातम में लीन निजाघोन पद पायो है।
न धन ऐसे महावीर जिनराज आज,
मम अहोभाग्य तुम दरश दिखायो है ।।
(ज्योतिप्रसाद)
प्रश्नावली
इस कविता के रचयिता कौन हैं, उनके सम्बध में तुम क्या
जानते हो?
भगवान महावीर का उपदेश सक्षेप में अपने शब्दों में
वर्णन करो।
: थात्महित का मार्ग क्या है।
! चीतराग शात छवि से क्या समझते हो।
M
--
T
--

अखवार सदैव पदो जिसमें गसार की हालत जानो।
।
पाठ ६
कर्म
प्यारे यालको! तुम नित प्रति ससार में देखते हो,
कोई सवेरे से शाम तर कठिन परिश्रम करता है, फिर
भी उसे सफलता प्राप्त नहीं होती कोई थोड़े ही परिश्रम
से अपने कार्य में सफलता प्राप्त करता है। कोई २
थोड़े परिश्रम करने से ही अधिक विद्या सम्पादन कर लेते
है और कोई २ थोर परिश्रम करने पर भी मूर्ख बने रहते
हैं। कितने ही लोग घन उपार्जन के लिए दिन-रात नहीं
गिनते, फिर भी दरिद्रता उनका पीछा नहीं छोड़ती।
स्वामो और सेवक में से सेफ ही अधिक परिश्रम करवा ।
है.और यही निर्घन होता है। एसी ऐसी बातों पर विचार
करने से विदित होता है कि जहाँ छोटे से छोटे और बड़े
से पड़े कार्ग में सफलता प्राप्त करने के लिये परिश्रम की
मावश्यकता है वहाँ साथ हो किमी और शक्ति विशेष
को मो आवश्यकता है। वह शक्ति कर्म है, जिसे लोग
भाग्य कहा करते हैं। जब कर्म परिश्रम के अनुकूल होता
है, तभी कार्य में सफलता प्राप्त होती है । देखो, दो छात्र
साथ पाते हैं, समान परिश्रम करते हैं, उनमें से एक

। ऐसा मखर पदो जो अच्छी सच्ची जल्दी मवर दे। १३ परीक्षा के समय बीमार हो जाता है, परीक्षा देने नहीं पाता। दूसरा परीक्षा देकर पास हो जाता है, यह सब फर्म का माहात्म्य है । पहिले विद्यार्थी ने क्या कुछ कम परिश्रम किया था? यह भी ध्यान रहे कि पदि अकेले "कर्म"के मरोसे निठल्ले बैठे रहोगे और हाथ पैर न हिलाणेगे तो सफलता नहीं मिलेगी। सफलता तो प्रयत्न से मिलती है, किंतु उसके लिए कर्म की अनुकूलता होनी चाहिये। कर्म- कर्म कहते समी है पर तु कर्म के मर्म को कोई नहीं जान । पामो तुम्हें मक्षेत्र में इस पाठ में कर्म का कुछ रहस्य समझा। कर्म-उन उन पुद्गल परमाणुओं को कहते हैं जो श्रात्मा का अमलो स्वमान प्रकट नहीं होने देते। जैसे बादल सूर्य 'सामने पार उसके प्रकाश को ढक देते हैं उसी प्रकार बहुत से पुद्गल परमाणु (छोटे २ टुकड़े) जो इस लोक में सब जगह मरे हुए है, आत्मा में क्रोधादि कपायों के पैदा होने से खिंच कर श्रात्मा के प्रदेशों से मिलकर प्रात्मा के स्वभाव को ढक देते हैं। पापों क सबन्ध से उन पुद्गल परमाणुमों में दुख देने की शक्ति भी हो जाती है। इन्हीं पुद्गल परमाणुओं को कर्म कहते हैं।

२०
सवेरे कुछ न कुछ ईश्वर का भजन करो।
कर्म पाठ हैं (१) बानावरण (२) दर्शनावरण (३
'चैदनीय (४) मोहनीय (५) आयु (६) नाम (७) गो:
और (८) अन्तराय ।
१-ज्ञानावरण-कर्म उसे कहते हैं जो आत्मा
ज्ञान गुण को प्रगट न होने दे। उसे एक प्रतिमा प
पर्दा डाल दिया जवे, तो वह प्रतिमा को के रहता है
उसे प्रगट नहीं होने देता। इसी प्रकार ज्ञानररणी कम
श्रात्मा के ज्ञानगुण को उके रहता है प्रगट नहीं होने देता
जैसे मोहन अपना पाठ खूब परिश्रम से याद करता है,
"परन्तु उसे याद नहीं होता, इससे मोहन के ज्ञानावरण
कर्म का उदय समझना चाहिए। ईर्षा से सच्चे उपदेव
की प्रशसा न करना, अपने ज्ञान को छुपाना अर्थात्
दूसरों के पूछने पर न पताना। दूमग को इस भाव से
। कि पद फर'मेरे घरायर हो जायगा, नहीं पड़ाना । दूसरों
के पढ़ने में विघ्न डालना, उनकी पुस्तकें छुआ दना,
पिगाड़ देना, दूमरी को सत्य उपदेश दने तथा सुनने से
शेकना । सच्चे उपदेश को दोप लगाना, गुरु और विद्वानों
को निन्दा करना, पढ़ने में बालस्य करना। इत्यादि
T
,
कार्यों से ज्ञानावरण कर्म बंधता है। जितना २ ज्ञानावरण
कर्म हटता जाता है-ज्ञान चमकता जाता है।

उपन्यास उत्तम पदो, सराव बुद्धि को खराब करते हैं। २१ २-दर्शनावरण कर्म-उसे कहते है वो श्रात्मा के दर्शन गुण को प्रगट न होने दे। जैसे एक राजा का दरवान पहरे पर धैठा हुआ है, वह किसी को भी धन्दर जाकर राजा के दर्शन नहीं करने देता सबको बाहर से हो गेक देता है। इसी प्रकार दर्शनावरण कर्म किमो को दर्शन नहीं होने देता। जैसे सोहन मदिर में दर्शन करने के लिए गया, परन्तु मदिर का ताला लगा पाया, इससे सम- झना चाहिए कि सोहन के दर्शनावरण कर्म का उन्य है। ३-वेदनीय कर्म- उसे कहते हैं जो अत्मा के लिए सुख दु ख को मामग्री का सबष मिलाये । इस कर्म क उदय से ससारी जीवी को ऐमी चीज का मिलाप होता है जिनके कारण यह सुख दुख मालूम करते हैं । जैसे शहद लपेरी तलवार की घार चाटने से सुख दुख दोनों होते हैं अर्याद शहद मीठा लगता है, इससे तो सुख होता है, परन्तु तलपर को धार से जीम कट जाती है, इस से दुग्व होता है । इस प्रकार वेदनीय कर्म सुख और दुख दोनों देता है । जैसे प्रकाशचन्द ने लड्डू खाया अच्छा लगा और पैर म काँटा गड़ गया दुख हुआ। दोनों ही हालतों में वेदनीय कर्म का उदय समझना चाहिए। वेटनीय कम के टो मेद हैं। १) सातावेदनीय

प्राचार्य से ताकत बढ़ती है।
(२) असाता वेदनीय।
साता वेदनीय कर्म-उसे कहते हैं जिसके उत्य
से सुख देने वाली वस्तुएँ मिले।
श्रासाता वेदनोय-उसे कहते हैं जिसके उदय से
दुख देने वली वस्तुएं मिलें।
सब जीरों पर दया करना, चार प्रकार का दान
देना, पूजन करना, यत पालन करना क्षमा धारण
करना, लोम नहीं करना, सतोष धारण करना, समत भाव
से दुख सह लेना, इत्यादि कार्यों से सातायेदनीय (सुख
देने वाला कर्म ) का बन्ध होता है।
अरने अपको या दूसरे को दुख देना, शोक में
डालना, पछतावा करना-कराना, माग्ना , पीटना, गेना,
रुलाना तथा गे गे कर ऐसा विलाप करना कि सुनने
चाले का दिल घड़क उठे। इस प्रकार के कार्यों से
असाता वेदनी कर्म का बन्ध होता है।
४-मोहनी कर्म-निसके उदय से पह आत्मा
अपने आपको भूल जये और अपने से जुदो चीजों में
लुमा जावे । जैसे शराब पीने वाला शराब पीकर अपने
अपको भूल जाता है उसे भले बुरे का ज्ञान नहीं रहता
और न वह माई बहिन स्त्री पुनादि को पहिचान सकता है,
।

२
-
दिमाग से उतना ही काम लो निवना वह दे सके
इसी प्रकार मोहनीय कर्म इस जीव को मुला देता है।
जैसे कोई शीतल, पीपल आदि को देव मानता है,
तथा क्रोध में आकर किसी दूसरे के प्राणों का हरण
करता है या लोम के वश होकर दूसरे को लुटाता है तो
ममझना चाहिए कि उसके मोहनीय कर्म का उदय है।
मोहनीय कर्म सब कर्मों का राजाकहलाता है। इस
लिये इमी पर विजय प्रप्त करने का उद्यम करना चाहिए।
५-आयु कर्म उसे कहते हैं जो अत्मा को नरक,
तिर्यश्च मनुष्य औ देव शरीरों में से किसी एक मे रोके
रक्खे, जैसे एक मनुष्य का पैर काठ में शिम्जे में) फंसा
हुआ है, अब यह काठ उस मनुष्य को उस स्थान पर
रोके हुए है। जब तक उसका पैर उस कार में जकड़ा
रहेगा तब तक वह मनुष्य दूसरी जगह नहीं जासकता ।
इसी प्रकार आयु कर्म इस जीव को मनुष्य तिर्यच आदि
के शरीर में रोके हुए हैं। जन तक आयु कर्म रहेगा तब
तक वह जोर उसी शरीर में रहेगा। हमारा जीर मनुष्य
शरीर में रुका हुआ है । इमसे समझना चाहिए कि हमारे
मनुष्य मायु कर्म का उदय है।
बहुत प्रारम्म करने से, बहुत परिग्रह रखने से क्या
घोर हिंसा करने से नरक आयु का बन्ध होता है अर्थात्
ऐसा करने से जीर नरक में जाता है।
।

।
२४ मनुष्य का एक एक मिनट अमूल्य है, येकार म मोनो।
छल, कपट, दगा, रेप करने से जीर के तिन
आयु का नन्ध होता है, अर्याद ऐमा । रने में यह जीव
तिर्यश्च होता है।
थोड़ा प्रारम्भ करने मे, थोड़ा परिग्रह रखने से,
कोमल परिणाम रखने से, परोपकार करने, दया पालने
में मनुष्य आयु का बन्ध होता है। अर्थात् ऐमा काने में
यह जीप मनुष्य पैदा होता है।
व्रत उपवास आदि करने म, शांतिपूर्वक मन्य प्यास
गर्मी सी श्रादि के दु ग्व सहने से, सत्य धर्म का प्रचार
करने से, सत्य धर्म की प्रभावना करने से, इत्यादिक धीर
शुम कारणों में यह जीर देव होता है।
६-नाम कर्म-उमे कहते है जिसके दय से इस जीव
के अच्छे या पुरे शरीर और उसके प्रोपाग की रचना
हो। जैस कोई चित्रकार (तसवीर पनाने वाला) अनेक
प्रकार क चित्र बनाता है, कोई मनुष्य का, कोई स्त्रो का,
कोई घोड़े का और कोई हाथी का ।
किमी का हाथ लम्बा, किमी का छोटा, कोई कुरड़ा
कोई बौना, कोई रूपवान, कोई भद्दा । इसी प्रकार नाम
फर्म भी इसी जीर को कभी सुन्दर, कमी चपटी नाक
वाला,कमी लम्बे दाँव वाला,कमी कुबड़ा,कमी काला कभी
।

.
--
सदैव हानि वह करता है जिसे तुम्हारा भेद मालूम है । २५
* कभी मुगेली अावाज वाला कभी मोटी अावाज वाला,
अनेक रूप' परिणमाता है। हमारा शरीर, नाक, कान,
श्राख, हाथ, पाव आदि सब गोपांग नाम कर्म के उदय
से ही बने हुए हैं।
+1 इस कर्म के दो मेद हैं अशुभ नाम कर्म और शुमनाम
कर्म । कुटिलता से, घमण्ड ररने से, श्रापस म लडाई
भगरा क्लह करने से, भूले देवों को पूजने से, किमी की
चुगलो ग्ने से, दूसरों का युग सोचने से तथा दूसरों
को नकल करने से, अनेक मशुम कार्यों के अशुम नाम
कर्ग का बन्धन होता है।
सरलता से, आपस में प्रेम रखने से, धर्मात्मागुणी
जनों को देख कर सुश होने से, दूसरों का भला चाहने
से झ्यादि और शुभ कारणों से शुभ नाम कर्म का पन्ध
होता है।
७-गोत्र कर्म-उसे कहते हैं जो इस जीप को ऊँच
इल या नीच कुल पैदा करे- जैसे कुम्हार छोटे पड़े
सब प्रकार के वरतन बनाता है, उसी प्रकार गोत्र कर्म
इस जीप को उच्च या नीच बना देता है । उच्च गोत्र
कर्म क उन्य से यह जाव अच्छे चारित्र गले लोक
मान्य कुल म जन्म लेता है और नीच गोत्र सर्म के उदय
-
न
का

-
सिधागे हम करो तुम्हारा क्या पसंख्य।
ममाता वदतीय, पारित मोतीय, गुम नाम "
ऊँप गोत्र किन कि पारणों से पंपो है।
५ सयसे महा कर्म कोनसा है गनायरली, परानाकर
फर्म का क्या कारा है।
६ पवायो सम्हें मनुष्य शरीर म गेकन थाना कानसा
है और की से कार्य करने में सम्ह मायाति मिली
७ पतराय फर्म किसे कहते है १ एप लायी थे. मातti
ने जयराती अपणी लक्ष्मी को पाठशाला से पति
सोधतायो उसके माता पिता को फोसा पर्म भैध हुण्या
पताधो नीचे लिखो कारिन २ कों का उदय एषा
(क) श्याम ने वर्ष भर ३ खूप कठिन परिपम किया ।
परीक्षा में उतीर्ण नहीं हुआ।
(ख) मोहन नित मति दीन दुसी जीयों को परणावृद्धि से
पात्र प्रादि का दान दवा हे । परन्तु लोग रिभीर
निदा करते हैं।
(n) यद्यपि राम के यहाँ नित प्रति अच्छे २ वादिष्ट फल
को पाते हैं. पर डाक्टर न उसे सान से मना क्यिा हु।
(प) सोहन यहा थालसी है, दमाम दिन्द्र
ts) गोविद यहा मालदार है,इम पद
तथा कन्या पाठशाला के
इस पंजूस है कि

गरीष मनुष्य के गुण धीरे-धीरे प्रकट होते है। २६
(घ) मोहन को ऑसों मे ऐसा दर्द हुधा कि अन्त में विचाग
अन्धा ही हो गया।
'सममा कर यताओ कि नीचे लियों को निर्मका
--
-
बध हुआ
भ
।
(क) लड़के के फेल हो जाने पर श्याम ने अध्यापकों को बड़ी
गालियाँ दीं। और पाठशाला को ताला लगा कर छोड़ा।
खि पाठशाला से आते हुए, कुछ छात्रों को एक शराबी ने
बड़ी गालियाँ दीं। धनकी पुरतमें फाड डाली, किसी की
थाख फोड़ दी, किसी की टाँग वोड़ दी।
(ग] गम कैसे धर्मात्मा आदमी है नित प्रति मन्दिर मे शास्त्र
परते हैं, कुछ वेतन नहीं लेते, पर फिर भी लोग मन्दिर
से बाहर निकलते ही उनकी निदा किया करते हैं और
युरे से बुरा लाइन लगाने को तत्पर रहते हैं।
(घ) सोहन बड़ा अभिमानी है। आज त्यागी जी महाराज और
हम एक बार की सहायता के लिये गये, बात तक नहीं
सुनी, तेवड़ी में यल डान लिया और मासे हमें पादर
खड़ा कर घर मे घुस गया।
(1) सुभद्रा सवेरे सात यजे से आठ बजे तक मन्दिर में बैठी
रहती है, जो कोई भी लड़की या स्त्री आती है, किसी को
आलोचना पाठ व भतामर सुनाती है किसी को किसी प्रत
की कथा सुनाती है और किसी से पैसा तक नहीं लेती।

धुरा जो देखन में ला, धुरा न दाखा काय।
(च क्या कहने हैं राम फे। बड़ा उदएड है। मदिर में प्राता
है वहाँ भी चुपका नहीं रहता। किसी की निदा, तो किसी
पो गाली। महामानी। जो मिल ज य उसी को धमकाना।
किसी की पूजा में विघ्न डालना तो किसी को स्वाध्याय
न करने देना । निराले ही ढंग का भादमी है।
1
पाठ ७
भजन (रे मन ।)
रे मन ! भज मन दीन दयाल,
जा को नाम लेत इक छिन में।
कट कोटि अघ जाल,
रे मन! भज मन दीन दयाल '
(२)
परम प्रक्ष परमेश्वर स्वामी,
निहाल ।
सुमरन करत परम सुख पावत,
सेवन माज
रे मन ! मज मज दीन दयाल,

जो घट देखा आपना, मुझसा बुरा न कोय ।
.
३
(३)
इन्द्र फनीन्द्र चक्रवर गावे ।
को नाम । रसाल,
जा को नाम ज्ञान परसाशे।
नाशे मिध्या जाल
रे मन । मज भज दीन दयाल ।
+
-
रे
जा के नाम समान नहीं कुछ,
मध्य पताल ।
सोई नाम जपो नित 'चानत',
छादि विषय विकराल।
मन । मज मन दीन दयाल ॥
प्रश्नावली
१ दीन दयाल से तुम क्या समझते हो और पवामो दीन
पयाल कौन है?
२ परमात्मा का नाम जपने से क्या लाभ है।
३ मताभो इस भजन फे पनाने वाले कौन हैं ।
४ इस भजन का तीसरा छदं एठस्थ सुनायो।
५ इस पद को पढ़कर सुनायो और इसका अर्थ भी
समम्प्रभो।
ma
41

है
३२
सच और झूठ पनाने से नहीं बनता।
पाठ
जम्बु कुमार
तीर्थकर महावीर स्वामी के समय की बात है। उस
समय मगध देश में राजा श्रेणिय राज्य करता था। उस
समय के राजाओं में श्रेणिक बहुत प्रसिद्ध और पराक्रमी
राजा था। राजग्रही उसको राजधानी थी। वहीं पर
उसका राज्य सेठ रहता था। उसका नाम जिनदत्त था।
बम्युकुमार इसी राज्य सेठ का पुन था।
जम्युकुमार ने जर होश संभाला, तो उसे पिगिरि
जैन श्राश्रम में पढ़ने के लिए भेज दिया गया। जहाँ
जम्बुरुमार ने एक बयचारी का जविन रिवाया था और
अपने गुरुओं को आज्ञानुमार शास्त्र विज्ञान, कला कौशल
और शस्त्र की शिक्षा पाई थी। इसी प्रकार तपोवन में
गुरुषों की सगति में रहते हुए युवावस्या तक पहुचते २
जपुम्कुमार शस्त्र शास्त्र में निपुण हो गया । गुरुजन ने
उसको अपने आश्रम से विदा किया। वह विनय पूर्वक
गुरुजन का भाशीर्वाद लेकर घर माया, माता पिता
अपने पुत्र को सप विद्यामों में निपण देख कर इसे अंग
न समाये।
1

+ अपनी शक्ति देख कर कोई काम शुरू करो। ३३ तपोवन में रहने से जम्मुडमार का स्वमार घड़ा पल और सत्पनिष्ट हो गया था, उसके मन को दुनिया- की योषी पाते नहीं रिझा पाती थी। सत्य और यि के लिए पह अपना सब कुछ देने के लिए तैयार वा था। इन गुणों के साथ २ जान्नुहमार देखने में म सुन्दर और रूपवान था। उसके रूस और गुणों की सारे राजग्रहों में होती थी। राज्य सेठ ने देखा, कि उसका पुर विवाह के योग्य पपा है, उसको उसका विवाह करने की चिन्ता दुई। र सेठों की पुत्रियों के साथ बम्पुछमार झा सम्बन्ध- श्चित किया गया। राजा भोगिक को खबर मिली कि रत्नचूल नामक याधर राजा उसके विरुद्ध होगया है। उसे शत्रु को करने की चिन्ता हुई।..एक दिन समा में राजा 'णिक ने कहा कि "कौन पोद्धा ऐसा है, कि जो शत्रु पश कर सके।" समा में सेठ-कुमार जम्मुत्रमार मी ठा था। वह मटके उठकरालमा हो गया और कहा मैं वश कर ले धाऊँगा।" राजा ने आज्ञा दी। त्रियों की राय से राजा थेषिक ने जम्युकुमार को सेना कर रत्नल को वश करने के लिये मेजा।

4 F १ हिम्मत भी एक वस्तु है दुःखों का नाश करती है। जम्युकुमार ने अपने रण कौशन्य से उस राजा को जीत लिया। वैश्य पुत्र होते हुए भी उस वीर ने उस धप्रिय की वीरता को परास्त कर दिया। राजा श्रोपिक जम्युकुमार विजय पर पड़े प्रसन्न हुए और वुमार का पड़ा होम्मान किया। जप जम्युकुमार विजय का ईन्डा बजाते हुए राजनही में प्रवेश कर रहे थे, तब नगर के पाहर पन में श्रीसुधर्मा- चार्य का उपदेश हो रहा था | जम्युबुमार भी सुनने पैठ गए। उपदेश सुनकर कुमार को ससार से वैराग्य हो गया। कुमार ने ह ठान ली कि पर जाकर हमः श्रर विवाह नहीं करेंगे और कल ही भाकर साधु हो जायेंगे। और आत्म कल्याण करे गे! इघर माता पिता जम्युकुमार की वीरता के समाचार सुन कर बहुत प्रसन हुए। पुन ने अवसर पाकर पिता कोमपने दीक्षा लेने का वचार कह दिया और विवाह करने से इन्कार कर दिया। यह खबर जप उन लड़कियों को पहुंची, जिनके साथ जम्युकुमार का सम्बन्ध हुआ था, तो उन्होंने यह भविता की कि"हम तो कुमार को छोड़ कर और किसी के साथ विवाह नहीं करेंगी।" लड़कियों को ऐसी इट होने पर माता पिता के प्रति आग्रहयश- -

-
r
1
सीक देसी बुहारी में किचने कूडे को चुहारती है। ३५
पारों बधुवें रात्रि को जम्युकुमार को अपनी रसीली
ली बातों से मोहित करने लगी। कुमार चैराग्यमगे
तो से पेमा उत्तर देते थे कि वे मन में अपनी हार मान
ती थीं।
- सवेरा होते ही जम्युकुमार अपने दृढ़ सकप वश घर
चल पड़े। पीछे २ माता पिता, चारों स्त्रियां व एक
धु तचर चोर जो चोरी
करने आया था और वुमार
र उनकी स्त्रियों को सब बार्तालाप सुन रहा था. चल
है। कुमार ने सुधर्माचार्य के पास केश लौच कर
घुव्रत ग्रहण क्रिया। माता पिता चारों, स्त्रियों ने व
घि तचर चोर ने भी दीक्षा धारण की। अब जम्युकुमार
दल लग कर आत्म ध्यान करने लगे और शीघ्र ही
विल ज्ञान को प्राप्त किया। ६२ वर्ष पीछे जम्युकुमार ने
युक्ति प्राप्त की। केरल ज्ञान के पीछे श्रीजम्युकुमार ने
बहुत वर्षों तक ससार का परा उपकार किया। मधुरा
चौरासी का स्थान श्री जम्युकुमार का निर्वाणान प्रसिद्ध
है।
पालको! तुम मी जम्मुकुमार के जवन से शिक्षा
ग्रहण करो। प्रतिज्ञा कर लो कि जब तक तुम खूब लिख
पढ़ कर होशियार न हो जायो विवाह नी करोगे । पढ़ते
an
ग

हुए तुम परे ब्रह्मचारी रहोगे और व्यायाम करके शरीर
को पुष्ट रक्खोगे। यदि तुम जम्वुमार के समान वीर
सैनिक मनोगे तो अपने देश की सच्ची सेवा कर सकोगे
तथा अपना प्रात्म कन्याण कर सकोगे। मावना करो
तुम में से प्रत्येक जम्युकुमार हो, और माता पिता का
मुख उज्ज्वल करो।
प्रश्नायती
१ जम्बुकुमार किन के पुत्र थे? इन्होंने कहाँ तक अध्ययन
किया था और इनका स्वमाय पैसा था!
२ जम्नुकुमार की वीरता के कार्य वर्णन करो।
३ जम्बुकुमार को कहाँ और क्यों वैराग्य हो गया था ?
४ चारों स्त्रियाँ कौन थीं, जो जम्बुकुमार से गृहत्याग के
समय पीछे २ गई थीं ? बम्युकुमार के घेराग्य होने के
पश्चात् उन स्त्रियों ने क्या किया
५ जम्बुकुमार को कहाँ पर निर्वाण हुआ था।
६ जम्पुरवामी की जीवनी से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है ?
?
म

दस्तकार मनुष्य भूखा नहीं रहता। ३७ 1 A अरहंत परमेष्ठी पाठ. परमेष्ठी उसे कहते हैं जो परम पद में स्थित हो। परमेष्ठी पात्र हैं। १-अरहत, २-सिद्ध, ३-आचार्य, ४-उपध्याय और ५-साधु। यह पाँचों परम इप्ट हैं। इनका ध्यान करने से भायों की शुद्धि और वैराग्य को उत्पचि होती है। श्ररहत परमेष्ठी के ४६ गुण अरहन्त उसे कहते हैं जिनके ज्ञानावरण दर्शनावरण मोहनीप और अन्तराय यह चार घातिया फर्म नाश हो गये हों और इनमें ४६ गुण हों और १८ दोष न हों चौबीसों अतिशय सहित प्राविहार्य पुन माउ। अनन्त चतुष्टय गुण सहित, ये छपालीसों पाठ ॥१॥ अर्थात् भरइन्त के ३४ अतिशय, प्राविहार्य और ४ भनत चतुष्टव ये सब ४६ गुण होते हैं। ३४ अतिशय में से १० अतिशय जन्म के होते है । दस फेवल ज्ञान के होते हैं और १४ प्रतिशय देवकत होते हैं। पह देवकत अतिशय भी फेवल ज्ञान होने पर होते हैं। अतिशय . .

३८ तुम्हारे पास कोई विद्या या हुनर है तो दूसरों को भी बताओ
ऐसी अद्भुत पात या अनोखी बात को कहते हैं जो
साधारण मनुष्यों में न पाई जावे।
जन्म के दस अतिशय
अतिशय रूप सुगन्ध तन, नाहि पसेव निहार।
प्रिय हित यवन भतुल्य बल, रुधिर श्वेत प्रामार ।
लक्षण सहमरु माठ तन, सम चतुष्क सन्ठान ।
पत्रपमनाराच जुत, ये जनमत दश जान ।।
(१) अत्यन्त सुन्दर शरीर (२) अतिसुगन्धमय शरीर
(३) पसेव रहित शरीर (४) मलमूत्र रहित शरीर (५)
प्यारे हित के वचन पोलना (६) अतुल्य बल (७) दूध
समान सफेद रुधिर () शरीर में १००८ लक्षण (8) सम
चतुत्र संस्थान (सुडौल सुदर थाकार) १० बजपम
नाराच सहनन (हाड़ के वेष्टन और कीलों का पञमयहोना)
ये दस अतिशय तीर्थकर भगवान् के जन्म से
होते हैं।
केवल ज्ञान के दस अतिशय
योजन शव इकमें सुमिख, गगन गमन मुख चार ।'
नहिं अदया उपसर्ग नहिं, नाही क्वलाहार ॥
सब विधा ईश्वर पनो, नाहिं पढ़े नख केश।
'अनिमिप डग छाया रहित, दश केवल । येश ।।
+

लो अपने आपको जीत लेते हैं वह सको जीत सरते हैं |
(१) एक सौ योजा में सुमितता अर्थात् जिस स्थान
में एक केरली हो उनमें चारों तरफ सौ सी योजन या ४००
कोस में सुझाल होगा। (२) पृथ्वी से श्रघर धाशश में
गमन । (३) चारों ओर मुख का दिखाई देना । (४) हिंसा
का ममाव । (५) उप सर्ग का न होना । (६) मगवान् के
करलाहार (प्रासरूप माहार) न होना अर्थात् मोजन
नहीं करना । (७) समस्त विद्याओं का स्वामीपना । (८)
नाखून और बालों का न बहना ! (E) नत्रों की पलके
न झपकना । (१०) उनके शरीर को चापा का न पड़ना।
पह दस प्रतिशय कंवलज्ञान के होने के समय तीर्थ
कर तथा अन्य सर्व फेवली अरहन्तों के प्रगट होते है।
'देव कृत चौदह अतिशय
.
दोहा
देव रचित है चार दश, अर्द्ध मागधो भाप ।
पारस मौही मित्रता, निर्मल दिश श्राकाश ।।
होत फूल फल ऋतु सच, पृथ्वी कांच समान ।
चरण कमल तल कमल व्हे, नमते जय जय बान ।।
मन्द सुगन्ध क्यार पुनि, गन्धोदक की पृष्टिा
भूमि रिपै कण्टक नहीं, हम मपी सर सृष्टि।
4
-

जिसका जो स्वभाव है वह जी से नहीं जाता।
धर्म चक्र भागे रहे,
रहे, पुनि पसु मगल सार ।
अतिशय श्री अरहन्त के, ये चौतीस प्रकार ॥
अाहन्व भगवान के देव कृत यह चौदह अतिशय
होते हैं।
(१) भर्द्धमागधी (जिसको सम जीव समझ ले।)
मापाका होना।
(२) समस्त जीवों म आपस में मित्रता होना ।
(३) दिशाओं का निर्मल होना।
(४) भाफाश का निर्मल होना।
(५) सर वस्तुओं के फल फूल सा धान्य आदि
का एक ही समय फलना।
(६) एक योजन तक को पृथ्वी का शीशे की तरह
निर्मल होना।
(७) मगगन के चरण कमलों के नीचे सोने के
फमलों का रचना।
(5) श्राकाश में जय जय होना।
(6) मन्द सुगन्धित पवन का क्सना।
(१०) सुगन्धमय जल की वृष्टि होना ।
(११) भूमि का कपटक रहित होना ।
(१२) सारी सृष्टि का श्रानन्दमय होना ।

५ यदि संसार में सब पदार्थ मले है तो चुरे भी हैं। ४१ (१३) भगवान के आगे धर्मचक्र का चलना। (१४) छन, चमर, झारी, कलश, पखा, दर्पण, स्वस्तिक, ध्वजा, इन भष्ट मगल द्रव्यों का होना। इस प्रकार दस जन्म के, दस फेवलज्ञान के और १४ देवकत अतिशय मिलकर श्ररहन्त के कुल ३४ पति- शय होते हैं। अष्ट प्रातिहार्य दोहा तरु अशोक के निकट में, सिंहासन विदार। तीन छर सिर पर लस, भामण्डल पिछतार ॥१॥ दिच्य पनि मुख खिर, पुष्प वृष्टि सुर होय । डार चौसठ चमर जख, पान दुन्दुभि जोय ॥२॥ भाद१---अशोकवृक्ष का होना। २- उसके पास में ही छविदार सिंहासन का होना। ३-~भगवान् के सिर पर तीन छयों का होना। ४-भगवान की छवि का मामपडल बन जाना। ५-दिव्य पनि का होना मर्याद मगवान की भघर रहिव सपके समझ में आने वाली अनुपम वाणी का खिरना। ६-देवों का फूलों की घृष्टि करना । , । Jar

.
गलती भाष्य से ही होती है।
७-यक्ष जाति के देयों का भगवान् पर चार दोलना।
दुन्दुमि पानों का बजाना 1 य पाठ प्राविहार्य है।
अनत चतुष्टय
दोहा
ज्ञान अनन्त अनन्त सुख, दर्श अनन्त प्रमाण ।
पल अनन्त अरहन्त सो, इष्ट दर पहिचान ॥१॥
भगवान के अनन्त ज्ञान, अन त सुग्य, अनन्त दर्शन
और अनन्त यल होता है। इन्हें अन त चतुष्टय कहा
है। जिसम यह अनन्त चतुष्टय पाये जाते हैं, यह इष्टदेव
कहलाते हैं । यह सब रहन्तों के होते हैं चाहे तीर्थकर
हों या अन्य।
३४ अतिशय, प्रातिहार्य और ४ अनत चतुष्टय
यह सब मिल कर श्ररहत भगवान् के उल ४६ गुण
होते हैं।
नोट-
:-अरहत में नीचे लिखे १८ दोष नहीं पाये
जाते।
दोहा
जन्म जरा तिरपा क्षुधा, विस्मय भारत खेद ।
रोग शोक मद मोइ भय, निद्रा चिन्ता स्वेद ॥१॥

अपनी गलती को न मानना यह इन्सानियत नहीं ४३ राग द्वेप अरु मरन युत, ये अष्टादश दोष । नाहिं होत अरहन्त के, सो छविलायक मोप ॥२॥ १-जन्म २-जरा (बुढोपा) ३-तृष्णा (प्यास) ४-क्षुधा (भूख) ५-विस्मय (आश्चर्य ६-भारत (पीड़ा) ७-सेद (दु ख) ८-रोग है-शोक १०-मढ ११-मोह १२-भय १३-निद्रा १४-चिन्ता १५-स्वेद (पसीना) १६-राग १७-छप १८-मरण नोट- इस पाठ में उपर लिसे ४६ गुण जिनमें पाये जायें भोर नो १८ दोषों से रहित हैं वही सच्चे देव अर्थात् अरहन्व कहलाते हैं।रही को जीवन मुा या साकार परमात्मा समझना चाहिए। रहीं से धर्म का उपदेश मिलता है ।जैन मन्दिर में रहीं की प्रतिमाएं विराजमान होती है। यह सर्व कथन पूर्ण रूप से शीर्थकरों के लिए सममना चाहिए। सामाय पक्षियों में आत्मा ये अंत रंग के गुण समान है पाइरी पातों में कुछ अन्तर होता है, क्योंकि वीर्यकर अधिर पुण्ययान होते हैं। प्रश्नायली परमेष्ठी किसे कहते हैं और ये किदने होते हैं! म 1 यतामो । भरहन्द किरहें कहते हैं। और इनमें कितने गुण होते हैं। नाम सहित पायो। १

मतलब पाले मनुष्य का दिल नीच होता है।
२ अरहत किन्हें कहते हैं और इनमें कितने गुण होते हैं।
पाम सहित पता।
३ अतिशय से तुम क्या समझते हो। यतायो पुल अतिशय
स्तिने होते हैं.१
४ जय भगवान का नम होता है बतायो उस समय कौनसे
अतिशय प्रकट होते हैं। कृषभपारायसंहनन का क्या
तात्पर्य है।
५ (प) केवल ज्ञान के दस अतिशय कौनसे है।
(मा) देवरत अतिशय कितने होते है। नाम पवाभो।
६ पाठ प्रविहार्य तथा अनतचतुम्टयों के नाम लिखो। वतामो
ऋषभ भगवान् और श्री बद्ध मान स्वामी में एक से
गुण थे या कुछ कम ज्यादा?
७ बरहंत में कौन से अठारह दोप नहीं पाये जाते !
पाठ १०
सिद्ध परमेष्ठी
सुम पर धुके हो कि कर्म भाठ हो है। इन्हीं कों'
के कारण जीवों को ससार में घूमना और दुख पाना पड़ता
है। जो जोन इन कर्मों में से जब ज्ञानावरण, दर्शनावरण,
मोहनीय और अतराय इन चार घातिया कर्मों का पथरण

-
--
-
पुरुष हो तो अपना पुरुषार्थ दिखाओ।
द्वारा नाश कर देते हैं, अरहत परमात्मा हो जाते हैं। वे
ही अरहत जर शेष भायु, नाम, गोत्र और वेदनीय इन
चार अधातिया कर्मों का मो नाश कर देते हैं, तो वे
शरीर और ससार के बन्धनों से सदेव के लिये छूट जाते
हैं। और तीन लोक के शिखर पर सिद्धालय में विराजमान
हो जाते हैं। उन्हें सिद्ध भगवान् या मुक्त जीव कहते हैं।
इन्हीं का नाम निराकार परमात्मा है।
यादरक्खो-सिद्ध उन्हें कहते हैं जो अष्ट फों का
नाश करके ससार के पन्धन से सदैव के लिये मुक्त हो
मये हैं, अर्थात् जो लौट कर फिर कभी संसार में नहीं
प्रायेंगे सिद्ध मगवान् के नीचे लिखे मुख्य गुण होते हैं।
सोरठा।
समकित दर्शन ज्ञान, अगुरुलघू अवगाहना ।
सूक्ष्म धीरजवान, निराबाध, गुण सिद्ध के।
(१) क्षायिक सम्पक्त्व (२) मनन्त दर्शन (३ अनत
ज्ञान (४) अगुस्लघुत्व (छोटे बड़े का प्रमाद) (1)
अवगाइनत्व (जहाँ एक सिद्ध है यहाँ अन्य सिद्धों को
भी जगह मिल जाती है) (६) समत्व (इन्द्रियों) से
जाने नहीं जासकते) (७) अनन्तीय () अन्यावायत्त
(कोई बाधा नहीं)।
५
a

.
४६
आलसी मनुष्य का जीवन पृथा है।
१ सिद्ध कि हें कहते हैं ? अरहव मे धौर सिर में क्या अंतर
२ बताओ दूसरे परमेष्ठी कौन है और वे कहाँ रहते है?
पतामो वह यहा से लौट कर था सस्ते है या नहीं?
३ निराकार से तुम क्या समझते हो? याश्री सिद्ध भगय
निराकार है या नहीं?
४ सिद्ध परमेठी में कितने गुण होते है ? और योग से
नाम बतायो । सूत्सत्य और श्रव्यापापत्य अर्थ लिये
-पाठ ११
आचार्य परमेष्ठी
थाचार्य उन्हें कहते हैं जो पाचौ याचारों
पालन करते है, और दूसरे मुनियों से उनका पाल
फगते है तथा जो दीक्षा और शिक्षा देते हैं। प्राचा
मुनियों के सघ के अधिपति होते हैं। उनमें नीचे लिग
हुए ३६ गुण होते हैं।
दोहा-द्वादशतप दश धर्म युत, पाले पचाचार ।
पद प्रापश्यक निगुप्तिगुण, प्राचारज पद सार ।
अर्थात् १२ तप,१० धर्म, ५ प्राचार, ६'आयरप
गुण और ३ गुमि यह कुल ३६ गुण होते है।

यदि तुम सचाई पर रहागे तो संसार भी साथ देगा। वारह तप दोहा-अनशन ऊनोदर करें, त सख्या रम छोर । विविक्त शयन थासन घरे, कायफलेश सुठोर ।। प्रायश्चित घर विनययुत, वैष्यात स्वाध्याय । पुनि उत्सर्ग विचार के, धरै ध्यान मन लाय ॥ १-अनशन---सर्व प्रकार के भोजन का त्याग कर उपवास करना। २-ऊनोदर-भून से कम खाना । ३-व्रतपरिसख्यान- -भोजन के लिए जाते, हुए शाखड़ी लेना और किसी से न कहना । आखड़ी पूरी न हो तो उपवास करना। ४-रस परित्याग-छहों रसों का या उनमें से एक दो का त्याग करना । रस छ है-घ, घी, दही, मोठी, तेल, नमक। ५-विविक्त शग्यासन-एकान्त स्थान में सोना बैठना। ६-कायक्लेश-शरीर का सुग्वियापन मेटने के लिए कठिन तप करना।

मनुष्य की सच्ची हितो उसकी स्त्री है।
७-प्रायश्चित-लगे हुए टोपों का दण्ड लेना।
-विनय---सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्पचारित
रूप रत्नत्रय तथा रत्नत्रय धारकों की विनय करना ।
-वैयावत-रोगी को या वृद्ध मुनियों की सेरा करना।
१०-स्वाध्याय-शास्त्र पढ़ना।
११-व्युत्सर्ग-शरीर से ममत्व हटाना ।
१२-ध्यान-प्रात्मरूप का ध्यान करना। इनमें से
पहिले ६ बाह्य तप [ चाहर क तप कहलाते हैं ]
और पीछे के ६ अन्तरङ्ग तप कहलाते हैं।
दस धर्म
दोहा–उत्तम छिमा मार्दव प्रार्जब, सत्य वचन चित पाग।
सजम तप त्यागी सरय, आकिंचन तिय स्वाग।।
१-उत्तम क्षमा-पीडित किए जाने पर भी अपने में
सामर्थ होते हुए क्रोध नहीं करना ।
२-उत्तम मार्दव-बिल्कुल मान न करना।
३-उत्तम आर्जव-विल्कुल कपट न करना ।
4-

४६
1
मनुष्य को नम ही से मुक्ति होती है।
४-उत्तम सत्य-शास्त्रानुसार सच बोलना।
५-उत्तम शौच-पन्तोष रख कर लोम न करना,
अपने अन्तःकरण को शुद्ध रखना । ।
६-उत्तम सयम-छह काय के जीवों की दया पालना
और पाँच इन्द्रियों और मन को वश में रखना।
७-उतम तप---गरह प्रकार का तप करना ।
८-उतम त्याग--चार प्रकार का दान देना तथा राग
द्वेप आदि का त्याग करना । ।
६-उतम याकिचन-परिग्रह का सर्वथा त्याग करना।
१०-उतम ब्रह्मचर्य-स्त्री मार का त्याग करना ।
'छह श्रावश्यक
दोहा-ममता धर वन्दन करें, नाना युती बनाय ।
प्रतिक्रमण स्वापाययुन, कायोत्सर्ग लगाय ।
१-समता-समस्त जीवो से समतामार रखना तथा
सामापिफ करना।
२-वन्दना- हाथ जोड़ कर मस्तक से लगा निनेन्द्र
देर को नमस्कार करना।
३--स्तुति-पच परमेष्ठी की स्तुति करना।
४-प्रतिक्रमण-लगे हुए दोषो का पारचाताप करना ।
"
--
+

कोध में कहे शब्द वीर से भी ज्यादा है।
५-स्वाध्याय-शास्त्रों का पढ़ना ।
६-कायोत्सर्ग-खड़े होकर ध्यान लगाना तथा शरीर
से ममता छोड़ना।
पचाचार और तीन गुप्ति
दोहा-दर्शन ज्ञान चरित्र तप, वीज पचाचार ।
गो मन बच काय को, गिन छत्तीस गुण सार ।
१ दर्शनाचार-सम्यग्दर्शन को निर्मल पालना ।
२ ज्ञानाचार-सम्यग्ज्ञान की वृद्धि करना ।
३ चारित्राचार-सम्यञ्चारित्र को विशुद्धता से पालना ।
४ तपाचार-तप की वृद्धि करना।
५ वीर्याचार-आत्मवल का प्रकट करना ।
ये पांचों माचार कहलाते हैं।
गुप्ति का अर्थ है वश में करना । गुप्ति तीन होती है.-
१ मनोराप्ति-~-मन को वश में करना ।
२ वचनगुप्ति-वचन को वश में करना।
३ कायगुप्ति-शरीर को वश में करना ।
इस प्रकार सब मिल कर प्राचार्य के ३६ गुण हैं।

दान उसको दो जिसको आवश्यकता हो।
प्रश्नावली
१ आचाय किसे कहते । आचार्य उपाध्यायों से बड़े हैं या
छोट।
२ धाचार्य में कितने गुण होते हैं और कौर-कौन से नाम
वताओ।
३ (क) तप कितने होते हैं और बताओ इनको कोन धारण
करता है।
(स) वाहतप और अन्तरग तप से तुम क्या सममते हो?
वह कौन से हैं ? कायक्लेश श्री प्रायश्चित का क्याअर्थहै ?
४ (क) गुप्ति किसे पहने हैं।
(स) श्रापार और गुप्ति को कौन पालते हैं तथा ये कितने
प्रकार के होते हैं ? नाम लिसो।
५ दस धर्म तथा षट् आवश्यकों के छन्द पतायो।
-
--
पाठ १२
उपाध्याय परमेष्ठी
जो मुनि स्वप पहते हैं तथा शिष्यों को पढ़ाते हैं।
वे उपाध्याय कहलाते हैं। वे ११ श्रग और चौदह पूर्व
के पाठी होते हैं। ११ श्रग तथा १४ पूर्वो का ज्ञान
होना ही इनके २५ गुण हैं।
दोहा-चौदह पूरव को घर, ग्यारह अग सुजान ।
उपाध्याय पच्चीस गुण, पढ़े पदावे ज्ञान ।।

मुसीयत के यारते भी रुपया जमा करो।
११ अगों के नाम
प्रथमहि आवागण गनि, दजा एकतांग।
ठाण मग तोजो सुभग, यौथा समवायांग ।।
व्याख्यापपणति पांचमो, ज्ञावफा पट धान ।
पुनि उपासका-ध्ययन है, अन्त कृत दश ठान ।।
अनुत्तरण उत्पाद दश, सूनविपाक पिछान ।
बहुरियरन व्याकरणयुत, ग्यारह श्रग प्रमान ।।
(१) भाचाराग (२) सूत्रकृताग (३) स्थानांग
(४) समवायांग (५) व्याख्याप्रज्ञप्ति (६) ज्ञानकथाग
(७) उपासकाध्ययनाग (८) अन्त कतदशाग
(६) अनुत्तरोत्पादक्दशांग (१०) प्रश्नव्याकरणांग
(११) विपासूत्रांग, ये ग्यारह अग हे
१४ पूर्व
दोहा-उत्पादपूर्व अग्रायणी, तोजों- वीरजवाद ।
अस्ति नास्ति परमाद पुनि, पचम मानप्रवाद ।।
छट्ठा कर्मप्रवाद है, सतप्रवाद पहिचान ।
अष्टम अात्म प्रसाद पुनि, नवमों प्रत्याख्यान ।
विद्यानुवाद पूरव दशम, पूरल्याण महन्त ।
प्रायवाद किरिया बहुर लोकविन्दु है अन्त ।।

नकी करो और यश कमाओ। (१) उत्पादपूर्व (२) अग्रायणो पूर्व (३) बीर्यानुवाद- (४ अस्ति नास्ति प्रवाद पूर्व (५) ज्ञान प्रवाद पूर्व (६) कर्म प्रवाद पूर्ण (७) सत्यप्रवाद पूर्ण (८) मारम प्रचा-पूर्व (E) प्रत्याख्यान (१०) विद्यानुवाद पूर्ण (११) कल्याणपाद पूर्व (१२) प्राणानुवाद पूर्ण (१३) क्रियाविशाल पूर्व (१४) लोकवि दु पूर्व । तीर्थकर के उपदेश को गणधर सुन क ११ अग १४ पूर्ण में या द्वादशांग में गूयते हैं। इनके ज्ञाता उपाध्याय परमेष्ठी होते हैं। प्रश्नावली १ उपाध्याय परमेष्ठी कि हें कहते हैं। २ ये परमेष्ठ कितने गुणों के धारक होते हैं। . ३ पूर्व फितने होते हैं छन्द निसो । श्रग कितने होते हैं ? नाम सहित यताओ।। । - 44 पाठ १६ साधु परमेष्ठी जो मोष पुस्पार्थ का साधन करते हैं, उन्हें सामु सहत है। उनक पास कुछ भी परिग्रह नहीं होना और म

पाप करते हुए यह जानो कि कोई देखता है।
वह कोई प्रारम्भ करते हैं। वे सदा ज्ञान ध्यान में ल
लीन रहते हैं।
उनके ५ महायत, ५ समिति, ५ इन्द्रियविजय
६ श्रावश्यक श्रीर ७ अन्य शेप गुण, पुल २८ मुलग
होते हैं। इन्हीं साधुओं में से योग्यतानुसार आचार्य
उपाध्याय पद होते हैं।
पच महाव्रत
दोहा-हिंमा अन्त तकरी, श्रम परिग्रह पाय
मन बच तन ते त्यागौ, पच महानत थाय
हिंसा, भूठ, चोरी, कुशोल और परिग्रह इन 4
पापों का मन पचन, काय से सर्वथा त्याग करने ।
नाम ही पचमहावत है।
१ अहिसा महानत-मन, वचन, काय से मई
हिंसा का त्याग करना।
२ सत्य महानतमन, वचन, काय से सर्वथा चं
का त्याग करना।
३ अचौर्य महाव्रत-मन, पचन, काय से सर्वा
चोरी का त्याग करना।
४ ब्रह्मचर्य महावत-मन, पचन, काय से सर्व
मैथुन का त्याग करना।

धर्म दोनों लोक में साथ देता है। परिग्रह त्याग महानत-२४ प्रकार के परिग्रह का मन वचन, काय से सर्वथा त्याग करना। यह २४ प्रकार का पग्ग्रिह इस भौति जानना चाहिये। १४ अन्तरङ्ग परिग्रह-मिथ्या दर्शन,, क्रोध, मान माया, लोम, हास्य, गति, अरति, शोक, मय, जुगुप्ता, स्त्रीवेद, पुरुषवेद, नपु सकवेद । १० वाह्य परिग्रह- क्षेत्र, मकान, धन, (गाय मैंस थादि) धान्य, हिरएप (चाँदी) (सोना), दासी, दास, कपड़े वर्तन । पच समिति दोहा-ईयो भाषा एपणा, पुनि क्षेपणादान । प्रतिष्ठापना युत क्रिया, पाँचों समिति विधान ।। १ ईर्या समिति—पालस्प रहित, चार हाथ भागे देखकर दिन में (प्राशुक) भूमि पर चलना । २ भाषा समिति-हित मित प्रिय वचन बोलना। ३ एपणा समिति-दिन में एक बार निर्दोष शुद्ध आहार लेना। ४ यादाननिक्षेपणप समिति-अपने पास के शास्त्र, पोथी, कमण्डल आदि को भूमि देखकर सावधानी से धरना उठाना।

सासारिक नियम अटला है।
५ प्रतिष्ठापन समिति-जीउ जन्तु रहित
(भाशुक) भूमि देखकर मलमूनाटि डालना।
ये पाँच ममिति हैं।
दोहा-~सपरम रमना नासिका, नयन श्रोत का रो
पद प्रावम मजन तजन, शयन भूमिका शे
वस्नत्याग कचलुञ्च भरु, लघुभोजन इक
दाँतन मुख म ना करें, ठाड़े लेहि प्रहार
१-स्पर्शन, २-रसना, ३-घ्राण, ४ चक्षु,५-7इन
इन्द्रियों को वश में करना । इनके इष्ट अनिष्ट रिप
राय द्वेप नहीं करना यह इन्द्रिय विजय कहलात
६ श्रावश्यक-समता, यन्दना, स्तुति, प्रति
स्वाध्याय और कायोत्सर्ग ये छह आवश्यक पहला
यह तुम पढ़ चुक हो। इनका पालन माधु भी करते
७ शेप गुण यह है-
१-स्नान का त्याग ।
२ सच्छ शुद्ध भूमि पर सोना ।
३-वस्त्र त्याग करना ।
४-पाला का लोच करना।
५-दिन में एक बार छोटा पोrth,

१
कोध में मनुष्य कोधी हो जाता है।
३-दन्तवन नहीं करना।
७- खड़े होकर आहार लेना।
इस प्रकार पांच महानत, पाच ममिति, पाच इनद्रिय
विनय, छ. यावरक और मात शेष गुण मिला कर
साधुओं के २८ मूल गुण होते हैं।
इन्दी मूल गुणों का पालन करना आचार्य और
उपाध्याय के लिये भी जरूरी है।
प्रश्नावली
१ साघु मिन्ह करते हैं। साधु और मुनि में क्या अतर है ?
२ साधु परमेष्ठी मे रितने मूल गुण होते हैं. १ जुदागिनाओ!
३ महावूनों और अणुपूतों में क्या भेद है और यह भी पताओ
कि महाजन कौन पालते है और अणुवन कौन ?
४ परित्रह कितने प्रकार का होता है ? नाम लिप!
५ समिति, महापूत शेष गुण ये स्तिने होते हैं ? नाम लिग्यों ।
६ साधु, श्राचार्य, उपाध्याय इनको क्रम से जिसकर बताओ कि
कोन सय से बड़े हैं कौन छोट?
।
.
पाठ १४
गुरु स्तवन
ते गुरु मेरे उर यमी, तारन तरन जहाज ।
अपा तिरे पर तारहीं, ऐसे श्री मुनिरान ।। गुरु । टेक

दूसरों के कष्ट में सहायता करो।
मोह महारिपु जीत के, छोड़ दियो घर पार ।
होय दिगम्बर वन बसें, भातम शुद्ध विचार ॥१॥ ते.
रोग उरग वपुनिल गिन्यो, भोग भुगग समान ।
कदली वरु ससार हे छाड् यो सब यह जान ॥ २॥ .
रत्न त्रय निधि उर धरै, घरु निथ त्रिकाल।
जीत काम ग्वबोस को स्वामी परम दयाल ॥३ ।। ते.
धर्म धरै दश लक्षणी, मा भावना सार ।
सह परिसह पीस T, चारित रत्न भडार ॥ ४ ॥ते.
जेठ तपै रवि धाकरो, सूखे सर पर नीर ।
शैल शिखर मुनि तप व दाहें नगन शरीर ।। ५ ।। ते.
पावस रयन डरावनी, परसे बल पर धार ।
तरु तले निवौं साहसी, धाले झमा ययार ॥ ६॥ ते.
शीत पड़े रवि मद गले, दाहे सब पन राय ।
ताल तरगनि तट विप, ठाड़े ध्यान लगाय ॥७॥ते.
इस विधि दुद्धर तप तपै तीनो काल मझार ।
लागे सहज स्वरूप में, तन से ममता टार ॥॥ते.
रङ्ग महल में सोवते, कोमल सेज विछाय ।
ते सोने निशि भूमि म, पोढ़े सबर काय ॥ ६ ॥ ते.
गज चढ़ चलते गर्व से, सेना सज चतुरङ्ग ।
निरख निरख पग वे घरे, पाले करुण श्रग ।।१०॥ते.

नहाँ अपनी इज्जत नहीं यहाँ न जाओ
पूग्य मोग न चितवै पागम यांचा नाहि ।
पहु गति के दुग्व से डरें, सुरति लगी शिवमाहि ॥ ११ ॥ते.
चे गुरु चरण जहाँ धरें, जग में तीरय होय ।
सो रज मम मस्तक चदो, 'भूघर' मांगे सोय ॥ १२॥ ते.
प्रश्नावली
गुरु स्तवन से तुम क्या सममने हो? यताओ इसके बनाने
पाले कौन है?
२ वास्तविक गुरु कौन है ? और उनमें क्या क्या विशेपतायें
होनी परमावश्यक है।
३ परिपह कितनी होती हैं और इनको कान और किस लिये
सहते हैं।
४ संसार-सागर से तारने के लिये गुरु किसके समान
होते हैं।
५दशलक्षण धम के नाम बतामो?
६ यारह भावनामों के नामयसायो।
रत्नत्रय किसे कहते हैं।
पाठ १५
गृहस्थियों के दैनिक पट्कर्म
गृहस्य लोग पाप क्रियाओं का सर्वथा त्याग नहीं
कर सकते । गृहस्य में रहते हुये खाने पीने, धन कमाने,

६०
जिस दिल में दया नहीं यह पत्थर है।
मकान बनाने, विराद श्रादि काने क लिये अनक प्रकार
के आरम्भ करने पड़ते हैं, जिनको करते हुए भी हिंसादि
के दोप लग ही जात हैं। इन्हीं के साथ दोपों को
करन, पुण्य न्ध करने तथा पाना धारमोनति करने
लिये शास्रो म गृहस्थ क छह दैनिक कर्तव्य बताये गये हैं
"देवपूजा गुरुनास्ति, स्वाध्याय सयमस्तर ।
दान चैव गृहस्थाना, पट कर्माणि दिने दिने ।'
अर्थात नित्य प्रति जिनेन्द्र देव की पजा करना, गुरु
भक्ति करना, ध्याय करना, सयम का पालन करना
तप का अभ्यास करना और दान को देना, ये गृहस्थ
के छह दैनिक कतव्य है।
(१) देवपूजा-श्रा अरहन्त तथा सिद्ध भगवान् का पूजन
करना । यदि अरहत भगवान् माक्षात् मिलें तो उनकी सेव
म जार अष्ट द्रव्य से भक्ति महित पूजन करना चाहिये
अन्यथा उनका पैसा ही ध्यानाकार शान्तिमय वाता
प्रतिमा को निराहमान करके उमक द्वाग अरहत भगवान
का पूजन करना चाहिये । हमारी आत्मा पर जैसा प्रभा-
साक्षात् अरहत के दर्शन व पूनन से पता है वैस
ही प्रमार उनको ध्यानमय वीतराग प्रतिष्ठिः

६
१
-
अपने चित्त को सदैव साफ रखो।
प्रतिमा के दर्शन र पूजन से पड़ता है । प्रगट देखा जाता
है कि जैसे चिन देखने में माते हैं वैसे ही भाव देग्ने
नाले के वित्त में अवश्य पैदा होते है । मन्दिर में भगवान्
की वीतराग शान्तिमय प्रतिमा के देखने से हृदय थाप ही
पाप वैराग्य भार से भर जाता है और उनके निर्मक्ष गुगा
म्मरण हो जाते हैं । उमसे भार शुद्ध होते हैं। इसलिये
गृहस्थो को चहिये कि वे नित्यप्रति श्रप्ट द्रव्य से या
किसी एक व्य मे भगवान का पूनन करे । प्रतिमा या
स्थापन मार मारों को बदलने के लिये है, प्रतिमा से कुछ
मांगने को न जरूरत है, न प्रतिमा इसलिये स्थापित ही
की जाती है।
देव पूजा से पापों का क्षय और पुण्य का पन्ध होता
६ तथा मोक्ष मार्ग की प्राप्ति होता है । दशन तो प्रत्येक
बालक-बालिका, स्नी पुरुष को नित्य करना चाहिये ।
'पूजन यदि नित्य नाहो सके ता की कमी अवश्य करना
चाहिये । जहाँ गतिमा या मन्दिर का समागम हो वहाँ
पोक्ष ध्यान करके स्तुति पद लेना चाहिये, तथा एक दो
आप और जप करक भोजन करना चाहिये।
२. गुरु भक्ति-गुरु शब्द का अर्थ यहाँ सञ्चे धर्मगुरु
अर्थात् मुनि महाराज से समझना चाहिये, निम्रन्य
v

६२
जो जवान से कहो उसे अवश्य पूरा करो
गुरु की सेवा पूजा तथा संगति करना 'गुरुमक्ति'
कहलाती है। गुरु साक्षात् उपकार करने वाले होते हैं,
ये थाने उपदेश द्वारा गृहस्थों को सदा धर्म कार्य की
प्ररणा किया करते हैं। गुरु तारण तरण जहाज है। आप
संसार रूपी समुद्र से पार हो । हैं और दूसरे जीवोंको भी
पार उतारते हैं। इसलिये गृहस्थों को सदा भक्ति पूर्वक
गुरु उपासना तथा से करनी चाहिये । यदि अपने
स्थान में गुरु महाराज न हों तो उनको स्मरण करके मन
पवित्र करना चाहिये। तथा धर्म के प्रचारक ऐलक,
सुल्लक, प्रभचारी आदि हों तो उनकी सेवा सगति करके
धर्म का ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।
३ स्वाध्याय-तत्व बोधक जैन शास्त्रों को विनय
पूर्वक भक्ति सहित समझ कर पढ़ और दूसरों को
सुनना चाहिये-यदि पढ़ना न आवे तो सुनना,
चर्चा करनी चाहिये । जिस जिस तरह हो सके ज्ञान को
बढ़ाना चाहिये । स्वध्याय एक प्रकार का तप है। इससे
बुद्धि का विकास होता है। परिणाम उज्जवल होते हैं
अनेक गुणों की प्राप्ति होती है।
४ सयम-पापों से बचने के लिये अपनी क्रियाओं
व धर्म

धर्म में दृढ़ रहना अपना कर्तव्यजानो।
का नियम वाँधना चाहिये । पाँचों इन्द्रियों और मन को
वश में करने के लिये नित्य मवेरे ही २४ घण्टे के लिये
मोग उपभोग के पदार्थों को अपने काम के योग्य रखके'
शेष का त्याग करना चाहिये, जैसे आज हम मीठा भोजन
नहीं खायेगे । सामारिक गीत नहीं सुनेंगे या रेडियो नहीं
मुनगे । वस्त्र इतने काम में लेंगे इत्यादि । तथा पृथ्वी,
जल, अग्नि, वायु, वनस्पति और बस इन छ। प्रकार के
जीवों की रक्षा का भाव रखना और व्यर्थ उनको कष्ट न
देना चाहिये । इसलिये गृहस्यों के लिये जरूरी है की यह
नित्य प्रति सयम पालन का अभ्यास कियो करें । सयम
एक दुर्लभ वस्तु है । सयम का पालन केरल मनुष्य गति
ही हो सकता है । सयम के बिना मनुष्य जन्म निष्फल
होता है। विद्यार्थियों को चाहिये वह मावना भावे कि
उनके जीवन की एक घड़ी मी सयम के विना न आवे ।
पालने के लिये उचित है, कि हम बुरी आदतों को
छोड़ें। अपना खान पान पहनाव आदि सादा रक्से ।
पंशन के दाम न बनें। चाप, सोडा, तम्बाकू, बोदी चुरट ,
शगव आदि नशे की चीजें, मसालेदार चाट, खोमचे भौर
पाशार की बनी हुईअशुद्ध मिठाई भादि का सेवन न करें।
भावों को रिमारने, बाले नाटक, सिनेमा, नाच स्वाग,
--

।
व्यापार करने से रुपया जमा होता है।
तमाशे न देखें तथा विकार पैदा करने वाले उपन्यास
तथा कहानियों न पढ़ें।
५. तप-से मतलब नित्य सवेर व शाम एकान्त में बैठ
कर सामायिक करने से है। श्रात्मभ्यान की अग्नि में
थात्मा को तपाना तप है। इससे कर्मों का नाश होता
है। ईदी शान्ति मिलती है । श्रात्म सुग्व का स्वाद आता
है। श्रात्म यल की वृद्धि होती है । इसलिये सवेर शाम
सामायिक अवश्य ही सना चाहिये।
६ दान-अपने और पर के उपकार के लिए. फल की
इच्छा के बिना, प्रेम भाव से, धनादि का तथा मार्थ
का त्याग करना दान कहलाता है। जो दान गुनियों,
प्रती श्रावकों गया श्रमती सभ्यता श्रेष्ठ पुरुषों को भक्ति
सहित दिया जाता है, परदान कहलाता है । और जो
दान दीन दुग्वी, भूसे, यपाहज, विघा, अनारों को
फरूपामाव से दिया जाता है, वह करुणादान कहलाता है।
दान चार प्रकार का है-१-माहार दान, २-योपधि-
दान, ३-ज्ञानदान, ४-अमयदान ।
(क) अहार दान-मुनी, त्यागी, पारक, ब्रह्मचारी

मान का त्याग कर दो।
तथा लगडे, खूले, भूरी, अनाथ विधाओं को भोजन
देना आहार दान है।
(ख) श्रीपधि दान रोगी स्त्री पुरुषों को योपधि
देना उनकी सेवा टहल करना, औषधालय बोलना
औषधि दान है।
(ग) ज्ञान दान-पुस्तकें बाँटना, पाठशालायें खोलना,
-व्याख्यान देकर तथा शास्त्र सुनार धर्म और कर्तव्य
का ज्ञान कंगना, अममर्थ विद्यार्थियों को छात्रवृति देना,
'किमी मे यिनो कुछ लिए परोपकार पुद्धि से पढ़ा देना
ज्ञान दान है।
(घ)अभय दान--जीवों की रक्षा
करना, धर्म
साधन के लिये स्थान बनवाना, चौकी पहा लगना
देना। धर्मात्मा पुरुषों को सस्ट से निकालना,
दोन दुग्वी मनुष्य, पशु पचा मयभात हो, वा तन मन धन से
पाण यचार उनका मय दूर करना भमय दान है।
मानयो य पशुओं क भय निवारण के लिये धर्मशाला
पशुशाला बनवाना अभय दोन है।
उपर लिसे चारों प्रकार के दानों में से कुछ न कुछ

६
६
ऋण का पिता शत्रु तुल्य ।
त्य प्रति करना गृहस्थो का नित्य दैनिक दान कर्म है।
रे भोजन करने से पहले रोटी आधी रोटी दान के
ये निकाले विना मोजन न करना चाहिये । गृहस्थियों
उचित है कि जो पैदा करें उसका चौथाई भाग, या
या आठवा पा कम से कम दसवा माग दान
धर्म की उन्नति के लिये निकालें, अपना जीवन सादगी
वितायें, विवाह आदि में कम खर्च करें परोपकार में
धिक धन लगायें।
प्रश्नावली
गृहस्थियों के दैनिक कर्तव्य कितने हैं ? इनका पालन
किस लिये करते हैं।
दैनिफ कर्म कितने हैं । नाम बताओ पितामो इनका नाम
"दैनिक कर्म" क्यों रक्खा गया ?
देव पूजा से क्या अभिप्राय है ? यदि साक्षात् भगवान न
मिले हो उस अवस्था में क्या करना चाहिये १ देव पूजा
से क्या काम है।
मतिय स्वाध्याय से तुम क्या सममते हो! पतामो
स्वाध्याय करने से क्या लाभ है।
संयम किसे कहते हैं और सयम रखना क्यों आवश्यक
है १ सक्षेप में बतायो कि कौन से कर्मों का त्याग संयम
माना जा सकता है।
बतायो गृहस्थी के दैनिक कर्मों में तप का क्या अर्थ है।

. जिस घर मेश्रम है वह स्वर्ग तुल्य है। ७ दान किसे कहते हैं और ये कितने प्रकार का है। ८ घमशाला धनवाना, पाठशाला खुलवाना तया भौषधालय खुलवाना भौर भिक्षुकों को भोजन देना, ये कौन से दान है। m पाठ १६ श्रावक के पॉच अणुव्रत (अ) हिंसा, झूठ, चोरो, कुशील और परिग्रह इन पांच पापों का पुद्धि पूर्वक त्याग करना व्रत कहलाता है। चूत के दो भेद हैं ! महाव्रत और अणुक्त । मन बचन काय से पाँचों पापों का बुद्धिपूर्वक संपूर्ण त्याग काना महावत कहलाता है इनका पालन प्रनिराम होकर सरते हैं। हिमादि पांच पापों का मोटे रूप से एक देश त्याग अणुक्त कहलाता है (१) अहिंसा अणुन्त (२) सत्पाणुव्रत (३) प्रचौर्याणचूत (७) प्रशचर्याणुपूत (५) परिप्रहपरिमाणमणुसूत । (क) अहिंसाणुव्रत- -अप जीवों की सकल्पी स्याग करना भक्त कहलाता है। करना । मणुव्रत पाँच है. हिंसा का

+
2
दूसरी स्त्री को माँ बहिन के समान सममो।
दुसरे माग में तुम पहचुके हो कि प्रसाद के चश,
होकर अपने या दूसरे के घात करने या दिल दुखाने को
हिंसा कहते हैं यह हिंमा चार प्रकार की होती हैं।
(१) सकल्पी हिसा उसे कहते हैं जो इरादे से की
जाय, अर्थात् माँस भक्षा के लिए, धर्म क नाम पर बलि
चढ़ाने के लिए शिकार वगैरह का शौक तया-फैशन को
पूरा करने के लिए जो जीवों का किया जाता है वह
सकल्पी हिंसा है।
(२) उद्यमी हिसा-सेती'च्यापार करन' कलं
कारखाने चलाने आदि रोजगार करने मे जो हिंसा होती
है उसको उद्यमी हिंसा कहते हैं।
(३) श्रारम्भी हिसा-रसोई बनाना, अप को कूटना
तथा बुहारी देना, मकान आदि बनाना, उनको जीपने
पोतने आदि में जो हिंसा होती है उसे प्रारम्मो हिंसा
.
A
४
(४) विरोधी हिंसा-शत्रु से अपने बान माल तथा
अपने देश और धर्म की रक्षा करने के लिए युद्धः श्रादि
करने में जो हिंसा होती है उसे विरोधी हिंसा कहते हैं।
इन चारों हिंमायों में से श्रावक केवल सकन्या
.

.
६६
सदैव सूय मिलने से पहले च्छों
हिंसा का त्याग कर सकता है, स्थावर जीवों की मी
व्यर्थ हिंसा नहीं करता है। यपि चाकी तीन-हिंसाओं
का मर्पया त्याग धारक गृहयों में रहते हुए नहीं कर
सकता तो भी उसको सब कार्यों के करने में यत्न और
नीति से ही व्यवहार करना चाहिए । इस व्रत का धागे
शावक पाय से किमी मी पापों को बधन में नहीं डालता।
लाठी चायुक श्रादि से नहीं मारता । किसी जीव के
नाक, कान पूछ आदि अगोशंग का छैन नहीं करता
है। किमी जीर पर उसकी शक्ति से अधिक बोमा नही
'लादता । अपने प्राधीन पशुओं को भूखा प्यासा नहीं
रखता है । यदि. यह ऐसा करता है तो उसके व्रत में दोप
लगता है।
(ख) सत्याणु वत-स्थूल भूठ बोलने का त्याग करना
सत्याणु चूत कहलाता है। इस चूत का पालन करने वाला
स्थूल (मोग) झूठ न तो आप बोलता है न दूसरों से
घुलवाता है और ऐमा सच मो नहीं योलता कि जिसके
पोलने से फिमो जीव का अथवा धर्म का पात होता है।
इम चूत का पारी भूटा उपदेश, नहीं देता है। दूसरे के
दोप प्रगट नहीं करता है विश्वाषात नहीं करता है | भूठी
गगही नहीं देता है। भूठे
son
-
है
५
T

दान करना पुण्य है।
नहीं बनाता है, जाली हस्ताक्षर मोहर वगैरह नहीं कर
(ग) श्राचोर्याणु वृतप्रसाद के घश होकर दूस
बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण करने का त्याग
अचौर्याणुवत है । इस पत का धारो किसी की गिरी
भूली या रखी हुई वस्तु को न वो भाप लेवा है
न उठाकर दूसरों को देता है।
इस मत का घारी दूसरों को चोरी का उपाय
भवाता। चोरो काम ल नहीं लेता राजा के महाल
की (जैसे महल चु रेलवे टिकट मादि) चोरी
करवा । पढ़िया चीनों में घटया मिलाकर पद्रिय
मोल में नहीं बेचता । जैसे दूध में पानी मिलाकर,
धरी मिलाकर नहीं वेचता । नापने तोड़ने के गज
पराजू कोह होनाधिक (कम या ज्यादा) नहीं रखत
पदि ऐसा करता है तो उसका व्रत पित हो जाता
(घ) ब्रह्मचर्याणु व्रत-अपनी विशहिता स्त्री
सिवाय अन्य त्रियों से काम सेवन का त्याग करना
पर्याणवत है । इस मत का धारी अपनी स्त्री को बोर
पाकी सियों को पानी पुत्री और बहन के समान समझ
।
।

।
९
७१
दूसरों से जर मिलो प्रेम पात चीत करो।
अपन प्राधीन छुटम्बोजनों के सिवाय दुसरो के रिश्ते
नाने नहीं करता। वेश्या तथा व्यभिचारिणी (पदचलन)
स्त्रियों को सगति नहीं रता और न उनसे किसी प्रकार
का सम्बन्ध रखता है। काम के नियत अगों को छाडकर
और अगों में कुचेष्टाय नहीं करता । अपनी स्त्री से भी
काम सेवन की अधिक लालसा नहीं ग्वता है। यदि यह
ऐसा करता है तो उसका नत मलीन होजाता है।
नोर:-स्त्री को विवाहित पुस्प में ही सतोप धारण
करना चाहिये । अपने पति के सिवाय अन्य पुरुषों को
पुर भाई तथा पिता के समान समझना चाहिये। ऐसे
माव करने से ही पतिपत धर्म रूप ब्रह्मचर्य का पालन
होता है। स्त्रियों को भी उन सब कारणों से बचना चाहिये
जो उनके शीलात को पित करने वाले हों।
(ड) परिग्रह परिमाण अणुव्रत-अपनी इच्छानुसार
खेत मकान, रुपया पैमा, सोना चाँदी, गौ, चैल, घोड़ा,
अनाज, दासी दास, वस्त्र, वर्तन वगैरह वस्तुओं का उम
प्रकार परिमाण कर लेना कि में जन्म मर के लिये इतना
रखू गा, पाको सवका त्याग कर देना परिग्रह परिमाण
मग प्रत है। इस व्रत का पारी अपने किए हुए परिमाण.

-
७२
ऐसा काम न कगे जो पीछे पडता पडे।
का उल्लघन नहीं करता। किन्तु जितनी परिग्रह उसने
गया है. उसमें ही सतुष्ट रह अधिक तृप्या नहीं करता
है। जब प्रतिज्ञा पूर्ण हो जाती है, तो सतोष से अपना
जीवन धर्म साधन व परोपकार में बिताता है।
प्रश्नावली
१ प्रत किसे कहते है और प्रत के कितने भेद है?
२ हिसाणुमत किसे कहते है १ यतामा हिंसा कितने प्रकार
की है ? श्रावफ सभी हिंसाओं का त्याग कर सकता है।
३ सत्याणुसूत तथा अधौर्याणुव्रत का पारी कौन २ से कामों
को नहीं करेगा १एक योर की प्राण रक्षा के लिए झूठी
गवाही देना अच्छा है या चुरा ?
४ ब्रह्मचर्याणवूत किसे कहते है १ ब्रह्मचर्यत ये धारी के
लिए कौन कार्य त्याज्य हैं १ बताओ इस व्रत का धारी
चरया का नोय देखेगा या नहीं।
. परिपह परिमाण या क्या अभिप्राय है।
पाठ १७
श्रावक के व्रत (ब) ३ गुणव्रत
गुणवत उह कहते हैं जो अणुव्रतों का उपका करें
और अणुवतों का मून्य गुणन रूप पदा देवें ! गुणवत
तीन होते हैं । १-दिग्यूत २- देशवत ३-अनर्थदडवत ।
म

-
।
है
इन्साफ काना मनुष्य का धर्म है।
(क) दिग्वत-लोम के प्रारम को कम करने के लिये
जन्म भर के लिये दसों दिशाओं में श्राने 'नाने से इन
बाँध लेना दिग्वत कहलाता है । इस वृत की धारी इस
प्रहार नियम करता है कि म जन्म -पर्यन्त अमुक दिशा
में, प्राक नदी पर्वत नगर से आगे नहीं जाऊँगा, जैसे
किमी मनुष्य ने पूर्व में कलकत्ता, पश्चिम में सिन्धु नदी
उत्तर म हिमालय पर्वत और दतिया में रामकुमारी से
आगे नहीं जाने का नियम ले लिया हो, पह नियम
दिग्वत कहलाता है।।
ir इम चूत क धारी कोचाहिये कि अपने किये नियम
की मर्यादा को भली भांति याद रखें, और लोमादिक
के वश में होकर उसमें कोई घटा पढ़ी न फेरे।
[स] देशवत-पड़ी, पण्टा, दिन -पक्ष, महीना,
वगैरह नियत समय तक दिग्वत में की हुई मर्यादा और
भी घटा लेना देशबूत है। जैसे दिग्त में किसी ने यह
नियम किया कि जन्म मर वह पूर्व दिशा में कलकत्ते से
आगे नहीं जावेगा; अब - निपम करता है कि मैं चौमासे
में अपने शहर से बाहर की नहीं जाऊँगा। वह पह
नियम और फिर फिमी दिन कर लेवे कि आज मैं मदिर
A

७४ मृत्यु को सदैव सामने मानों। में ही रहेगा मदिर से बाहर कहीं नहीं जाऊंगा, तो यह उसका देशमन समझना चाहिए इस यूत का धारा मर्यादा से बाहर क्षेत्र में न माप जाता है न किसी दूसरे को भेजता है, वहाँ से कोई चीज वगैरह मगवाता है, न मेजता है, न कोई पत्र व्यवहार करता है । धर्म कार्य के लिये मनाई नहीं है। याद रक्खो दिग्वत जोपन पर्यंत होता है और देश- पूत घुछ नियत समय के लिये होता है। (ग) अनर्थ दडवत-पिना प्रयोजन हो जिन कार्यों में पाप का प्रारम हो, उन उन कार्यों का त्याग करना भनय देडबूत है। इस पत का धारी पाँच प्रकार के अनर्थो से अपने को बचाता है.. १-पापोप देश-विना प्रयोजन किसी को ऐसा कोई कार्य करने का उपदेश नहीं देना जिममें पाप हो। २-हिमादन-हिंसा के भौजार तलवार, पिस्तौल, फावड़ा हाल, पीजरा, चूहेदान थादि किमी दूसरे को पश के लिये मांगे नहीं देता। ३-अपण्यानसरों का पूरा नहीं चाहता है। दूसरों

किसी का उपकार करके उसे उलाहना न दो।
के स्त्री पुत्र धन प्राजीवका भादि नष्ट होने की इच्छा नहीं
करता है। दूसरे मनुष्यों तथा जानवरों की लड़ाई देखकर
सुश नहीं होता, किसी की हार जीत में आनन्द नहीं
मानता।
४-दुःश्रुति-परिणामों को दिगार देने वाली कहानी
किस्से, नाबिल, स्वांग, तमाशे, नाटक वगैरह की कितायें
नहीं पढ़ता और नहीं सुना।
५-प्रमादचर्या-पिना प्रयोजन बल नहीं खिंदाता
अग्नि नहीं जलावा, जमीन नहीं खोदता, घृक्ष, पत्त,फल,
फूल मादिक नहीं तोड़ता। इस व्रत के पालन करने वाले
को चाहिए कि अपना जवान से कोई झूठ पचन न कहे
शरीर से कोई अचेटा न करे। व्यर्थ वकवास और फिजूल
की दौड़ धूप से बचता रह और अपनी आवश्यकता से
अधिक मोग उपभोग की मामग्री इकट्ठा न करे। यदि यह
ऐसा करता है तो वह अपने नियम को मलीन करता है।
प्रश्नावली
१ गुणयुत का सपण मतलाओ, गुणपूत क्दिने होते हैं नाम
लिसो।
२ दिग्यत किसे कहते हैं. १ दिग्यूत तथा देशवम में क्या भेद
है। बतायो देशवत कापारी अपनी मर्यादा के बाहर
7

७
AM
जो पास आये उसका सत्कार करो
किसी दूसरे मनुष्य को भिजवा कर अपना कार्य कर सकता
है या नहीं है और क्यों।
३ अनथ एडयूस किसे कहते है ? वो कौन से धमध हैं जो
इस प्रत के धारी के लिए त्यागने योग्य हैं। अनर्थ एएस
प्रती अपना चूहेदाम अपने परिवार के मनुष्यों, को माँगा
देगा या नहीं ? उत्तर कारण सहित लिखो।
४ मतामओ कोई मनुष्य विना अणुमत के धारण किए गुणवत
धारण कर सकता है या नहीं? और गुणनत पा धारी
अणुनती है या नहीं। कारण सहित उत्तर दो।
पाठ १८
श्रवक के ४ शिक्षाव्रत
शिचानक उसे कहते हैं कि जिनके धारण करने से
मुनिनत पालन करने की शिक्षा मिले।
शिक्षाबत चार हैं-१-सामायिक, २-प्रोशयोपवास,
३-मोगोपभोगोपरिमाण, ४-अतिथि संविभाग ।
१-सामायिक शिनावत-समस्त पाप क्रियाओं
का त्याग तथा सबसे राग द्वेप छोड़ समता मानो के

-
पालना देखकर पैर पसारो।
साथ नियत समय तक प्रात्मा ध्यान करने का नाम
सामायिक है।
सामायिक करने की विधि-सामायिक करने वाले
को चाहिये कि शांत, एकांत स्थान में जाकर किमी
माशुक शिला या भूमि पर पहा आदि पिछाकर पूर्व
पा उत्तर की ओर मुख करके खड़ा होवे, और दोनों हाथ
जोड़ कर मस्तक से लगाकर तीन बार शिरोनति फरमा
(मस्तक झुका कर नमोस्तु फरना) और ॐ नम: मिद्धभ्य
ॐनम सिद्धेम्पः इन मन्त्र का उच्चारण करना चाहिये।
फिर सीधे खड़े होकर दोनों हाय सोधे छोड़ देने चाहिये।
दोनों पाव की परियों में चार अगुन का और सामने
अगूठों में पारह अगुल का अन्तर रहे इसी प्रकार मस्तक
को मो मीधा पौर नाशाय , दृष्टि रखना चाहिये और
नौ वार णमोकार मन्त्र का जाप करना चाहिये । इसके
पाद उसी उत्तर या पूर्व में दोनों घुटने पृथ्वी पर लगाकर
और दोनो हाथ जोडकर मस्तक से लगा कर और मन्तक
भूमि में लगाकर अष्टाग नमस्कार करना चाहिए। फिर
खड़े होकर काल आदि का प्रमाण कर लेना चाहिए कि
में पड़ी चार घड़ी या दो पदी तक या अमुक ममय

७८ अपने दिल का विचार दूसरों पर जाहिर न होने दो।
तक सामायिक करूगा । उतने काल तफजो परिग्रह शरीर
पर है उतना ही ग्रहण है। इत्यादि परिग्रह तथा काल
क्षेत्रादि सम्बन्धी प्रतिज्ञा करनी चाहिए । पश्चात् उसी
दिशा में बिल्कुल साधे दोनों हाथ जोड़कर पहले को तरह
खड़े होकर नौ या तीन नगर पामोकार मन्त्र का जापकर
दोनों हाथ जोडकर तीनमावर्ग करे अर्थात दोनो हाथों
को अजुली बनाकर गाँई पार से दाहिनी ओर को ले
जाते हुये तीन चक्कर करे और फिर उस अजुली को
मस्तक से लगा कर मस्तक को झुकाना चाहिए । इस
प्रकार शेष तीन दिशामों में भी प्रत्येक में तीन मन्त्र
जपकर तान पावर्त और एक शिगेनति करना चाहिये।
इस प्रकार चारों दिशाओं में भी सब मिलाकर बारह मत्रों
का जाप बारह आवर्त भौर चार निगेनति हो जायेंगी
पश्चात् जिम दिशा में पहले खड़े होकर नमस्कार
किया था, उसी दिशा में चाहे तो मूर्तिवद
स्थिर खड़े रहकर, अथवा पद्मासन या भई पद्मासन
से स्थिर पैठ कर सामायिक पाठ पढ़ें । णमोकार
मन्त्र का जाप दें। भगवत् की शांतिमय प्रतिमा तथा
अपने आत्म स्वरूप का विचार करे। दशलादणी धर्म
तया पारह भावना का चिन्तरन करें । इस चूतधारी

७५
अपने कर्मों का फल भोगने में कष्ट न मानो।
श्रावक को चाहिये कि वह सामायिक के काल में अपने
मन वचन काय को इधर उधर चलायमान न होने दे।
सामायिक को उत्साह के साथ करे । और सामायिक की
विधि और पाठ को दित की चचलता से भूल न जाये।
सामायिक का काल समाप्त होने पर खड़े होकर पहले
की तरह नौ बार समोकार मन्त्र को जप उसी दिशा में
फिर अष्टांग नमस्कार करे । मामापिक प्रतिमा का धारी
प्रात दो पहर और मध्याकाल में नित्यप्रति सामायिक
नियम रूप से किया करता है।
नोट--अध्यापक को पाहिये कि मामायिक की
विधि, पावत', शिरोनति, अष्टांगनमस्कागदि करके
धानों को मती मांति समझा दर्थे ।
२-प्रोपधो पास शिक्षाबूत-प्रत्येक अष्टमी और
चतुर्दशी को समस्त प्रारम्भ तथा रिपप कपाय और सर्व
प्रकार क ामार का त्याग करके १६ पहर तक धर्म
ध्यान करना प्रोपधोपवाम कहलाता है। एक बार भोजन
करना 'प्रोपध' कहलाता है और सर्वथा भोजन नहीं
करना 'उपवास कहलाता है। दो प्रोपयों के बीच में,
एक उपयाम करना 'प्रोपघोपवास' है जैसे किसी
पुरुष को अप्टमी का प्रोपयोपवास करना है, तो वह सप्तमी

अपो गुणों को पढ़ाने का यान करो।
और नवमी को एक बार भोजन करे, और अष्टमी को
भोजन का सर्वपा त्याग करे। उसे चाहिए कि प्रोपपोर
यास के दिन पांच पापो का, गृहस्य के बारोपार का
वथा झार भतर, तेल, पुनेन, साधुन भजन भजन
भादि का और ताश चौग्म गमका श्रादि सेलने का
सर्वथा त्याग करे, और १६ पहर तक अपना समय
पूजन, स्वाध्याय, सामायिक तथा धर्म चर्चा में गतीत
करे। यह विधि उचम मोपयोपवास को हम
प्रोषधोपास १२ पहर का और जयन्य ८ पहर का हाता
है। इस मत के धारी प्रायफ को चाहिये कि वे मय
क्रिया यत्नाचार के माय करें और उपवास सम्बन्धी
उपयोगी वातों को न भूलें। यह भी ध्यान रह कि उपनाम
को बेकार समझ कर न करे हर्प और मानन्द
साथ करे।
३-भोगोपभोग परिमाणनत-मोजन वनाटि
मोगोप भोग की वस्तुओं की मर्यादा करके बाकी सब का
त्याग करना मोगोप मोग परिमाणवत है। जो वस्तुयें
एक पार हो भोगने आवे उन्हें भोग कहते हैं नसे
रोटो, पानी, दूध, मिठाई भादि । और जो चाजे धाग्यार
के
.

कहलाता
। इम चूत
चुराई का पश्चाताप न कगे।
मोगने में आ यह उपभोग कहलाती है। जैसे वस्त्र,
चारपाई, मकान, सवारी आदि । जो वस्तुयें भभक्ष्य है
अर्थात् सेवन करने योग्य नहीं हैं उनका जीवन पर्यन्त
त्याग करना चाहिए, और जो पनार्थ भक्ष्य हैं अर्थात्
सेग्न करने योग्य है उनका भी त्याग घडी, घटा दिन,
महीना, वर्ष वगैरह की मर्यादा पूर्वक करना चाहिए।
जन्म पर्यन्त त्याग को "यम" कहते हैं और थोड़े,
समय को मर्यादा को लिये हुए त्याग करना 'नियम'
के धारी को चाहिए कि नित्य प्रति
सवेरे उठते ही वह इस प्रकार का नियम कर लेवे कि
श्राज में मोगपभोग , की वस्तुए इतनी खूगा और
उनका इतनो पार और इस प्रकार सेवन करू गा।
इम वत का घागे पियों को अच्छा नहीं समझता,
पहले भोगे हुए भोगों को इच्छा रूप याद नहीं करता।
आगामी भोगों की इच्छा नहीं करता । वर्तमान भोगों में
भी अति लालसा नहीं खता है । इस व्रत के धारी को
निम्न लिखित १७ नियम विचारने चाहिए
(१) मोजन के बार करू गा।'
(२) रसों में से कौनमा छोड़ा।। ---
।
।

जो लोग मतलब निकालते हैं उनसे बचो।
(३) पान-मोजन के सिराय पानी कितनी पा
लूंगा।
(४) कुमकुमादि विलेपन-आज तेल तर फुलेट
थादि लगाऊँगा या नहीं, यदि लगाऊँगा तो कौन
और कितनी बार।
(५) पुष-फूल स धूगा या नहीं।
(६) ताम्बूल पान खाऊँगा नहीं, यदि खाऊँग
सो कितने टुकड़े और के पार ।
(७) गाना बजाना-गाना सुन गा या नहीं।
(८) नृत्य कर गाव देखू गा या नहीं।
(e) ब्रह्मचर्य पालूगा या नहीं।
(१०)स्नान-स्नान बार गरूंगा।
(११) वस्त्र कपड़े कितने काम में लूगा।
(१२) श्रामरण-जेपर कौन र से पहनू गा।
(१३) भासन-पैठने के आसन कौन २ से बस्य गा
(१४) शरया-सोने क आसन कौन २ से रखू गा
(१५) पाहन-सवारी कौन २ ख गा ? या नहीं
(१६) सचित वस्तु-हरी भाज कौन कौन खाऊँगा
(१७) वस्तु सख्या-कितनी सम वस्तुयें खाऊंगा या छोड़ ग
४-अतिथि संविभागवत - फल की इच्छा के बिना

-
-
समय की कदर और परलोक का भय रखना चाहिए ।
भक्ति और आदर के साथ धर्म घुद्धि. से धनि, त्यागी
तया अन्य धर्मात्मा पुरुषों को आहार. औषधि, ज्ञान
और अमय चार प्रकार का दान देना प्रतिषि सविभाग
मत महलाता है । जो मिता के लिये भ्रमण करते हैं,
ऐसे साधुनों को अतिषि कहते हैं। अपने पुटुम्म
लिये पनाए हुए भोजन में से माग करके देना
सविभाग है।
पदि मुनि त्यागी आदि दान के पान न मिले तो
किमी मा सहधर्मी माई को आदर पूर्वक दान देवें अथवा
फरुण धुद्धि से दीन दुग्वी अपाहज मिखारियों को
भोजन वस्त्र औषधि प्रादि यथा शक्ति दान देवे । श्रावकों
को उचित है कि भोजन करने से पहले कुछ न कुछ दान
अवश्य ही करें। यदि और कोई दान न बन सके वो
अपने भोजन में से कम से कम एक दो गेटी निकालकर
दुखित भूखे मनुष्यों को तथा पशुओं को दे दें। किसी का
थादर सत्कार विनय करना, पोग्य स्थान देना, कुशल
पूछना, मीठे बचन बोलना एक प्रकार का बड़ा दान है।
दान नाम त्याग का भी है। खोटे भाव, परनिन्दा, चुगलो.
विकषा, तथा स्पायों और अन्याय के धन का त्याग

धर्म और परमात्मा पर विश्वास रक्सो।
करना मी महादान है वह के बीज की तरह भक्ति
सहित पान को दिया हुआ थोड़ा भी दान महान फल
को देता है, दानी को इस लोक में यश और परलोक में
परम सुख की प्राप्ति होती है। दानी के शत्रु भी मित्र
हो जाते हैं । इस वा के धारी को चाहिये कि कोधित
'होकर अनादर से दान न देखें । छल कपट तथा इर्षा भाव के
'साथ दान दवे, दान देकर ग न करे तथा दान के फल
की इच्छा न करे।
प्रश्नावली
१ शिक्षावूस किसे कहते हैं और क्तिने होते हैं।
१२ सामायिक किस प्रकार करनी चाहिये, पूरी तरह से पताश्रो
11 नीचे लिखे हुओं में क्या बतर है?
उपवास, प्रोपधोपवास भोग और उपभोग यम और नियम
४ भोगोप भोग परिमाणप्रत किसे कहते हैं तथा इस व्रत के
घारी के लिये विचारने योग्य कम से कम १० नियम लिखो।
१ दश भोग और दश उपभोग यस्तुओं के नाम लिस्रो।
५ शिक्षाबूत के अश्विम भेद का लक्षण लिखकर बतायो कि
तुम अतिथि से क्या समझते हो?
६ सविभाग का क्या अभिप्राय है, और दाा का क्या
P
।
महत्व है.
।
--

नित्य थोड़ी देर अच्छी २ पुस्तकें पढ़ने में सर्व किया करो ८५
पाठ १६
महावीर स्तुति
धन्य तुम महावीर भगगन्
लिया पुण्य भवतार, जगत का करने को कल्याण । ५०१ ।
बिल विलाट करते पशु उन को, देस दयामय प्राण ।
परम आहिंसामय मुधर्म को डाली नीव महान ॥१०१२
ऊँच-नीच के मेद-भाव का, बढ़ा देख परिमाश।
सिखलाया सबको स्वाभाविक, समतात्व प्रधान | प०/३
-मिला समरसत में मुरनर-पशु, मयको सम सम्मान ।
समता और उदारता का यह कैसा नुमग विधान | घ०४।
अन्धी श्रद्धा का हो जग में, देख राज्य बलवान ।
कहा न मानों गिना युक्ति के कोई बचन प्रमाण । ०५॥
प्रश्नापली
१' इस फयिाता में किन की स्तुति की गई है।
. भगवान महावीर के उपदेशों को एक संक्षिप्त निरंध में लिमो
पाठ २०
भगवान पार्श्वनाथ
भगवान महावीर चौगोम तीर्थदरों में से प्रतिम

६ उदय में उद्देश्य का विचार माघ लो।
तीर्थकर थे। नक पहले तेईसवे तीर्थकर श्री पाव नाय
जी हुए है। उनका पाल जीवन मृत्य धर्म का पाठ
सिखाने के लिये अनुपम है।
तीर्थकर उस महा पुरुष को कहते हैं जिसने इन्द्री
और मन को जीत कर सर्वज्ञ पद पालिया हो। इस प्रकार
सर ही ज्ञान के द्वारा जो भटकते हुए जीग यो समाररूपी
महासागर से पार लगाने म सहायक हो। इस प्रकार मम
हो सीधकर लोक का गच्चा उपकार करने वाले महान
शिक्षक थे । इनमें सबसे पहले ऋषभदेव हुए उनके याद
भड़े २ लम्बे चौडे समयों के बाद प्रमश: तेईम तीर्थकर
और हुये थे। इनम से चौगोमा तीर्थकर भगवान महावीर
जी की बापत पालको तुम पहले ही पड़ चुके हो।
श्री महावीर स्वामी के निर्वाण से ढाई मी वर्ष पहल
श्री पार्श्वनाथ जी निर्माण पधारे। उनके पिता राजा
विश्वसेन बनारस में गेज्य करते थे इनकी माता महिपाल
नगर क गजा की पुत्री थी। उनका नाम वामादेवी या ।
राजकुमार पार्श्वनाथ पडे पुएयशाली जोर थे । यह
पचपन से ही महान ज्ञान को बातें करते थे। लोग उनके
चातुर्य को देखकर दंग रह जाते थे।
एक रोज राजकुमार पाव नाय मन विहार के लिये

दूसरों को सुग्वी रखने की चेष्टा करो।
निकले । सखा सायो उनके साथ थे । घूमते रिते वै एक
पेड़ के पास से निकले, जिस पर एक सन्यामी उल्टो
लटक पचाग्नि तप कर रहा था। यह उनके नाना थे।
राज पार उनकी मूद क्रिया देख कर इसे और साथियों
से बोले देखो इम मूसन्यासी को ! यह जीव हत्या करके
ग के सुखों को अभिलापा कर रहा है, जिस लकड़ को
इसने सुलगा रखा है, उसमे नाग नागिनी हैं, यह भी
इसको पता नहीं है।
सन्यासी इस बात को सुन कर भाग ययूला हो गया
और बोला हाँ हाँ तू पा ज्ञानी है। छोटी मह पड़ी
बातें कहवे तुझे डर मो नहीं लगता, तिस पर भी तेग
नाना और सन्यासी । इस मेरी तपस्या को तू हत्या का
काम यताता है।
राज कुमार पार्थ नाथ ने सन्यासो की इन बातों का
पुरो न माना पनिक उन्होंने उत्तर में कहा साधु होकर
क्रोध क्यों करते हो १ पुद्धि उम्र के साथ नहीं बिकी है।
ज्ञान बिना कोई भी फग्नी काम की नहीं ! तुम्हें अपनी
उरस्पा का बड़ा धमड है तो जरा इम लकड़को फाड़
कर देखो, दो निरपराध जीवों के प्राण बागे। क्या
पही धर्म कर्म है ? सन्यासी मोला वो कुछ नहीं पर लफड़

उदय में उद्देश्य का विधार पाप लो।
तीर्थकर थे। इनके पहले तेईसचे तीर्थकर श्री पावनाप
जी हुए है। उनका बाल जीवन सत्य धर्म का पाठ
सिखाने के लिये अनुपम है।
तीर्थकर उस महा पुरुष को कहते हैं जिसने इन्द्री
और मन को जीत कर सर्वन पद पालिया हो। इस प्रकार
मर ही ज्ञान के द्वारा जो भटकते हुए जीवों को ससाररूपी
महासागर से पार लगाने म सहायक हो । इस प्रकार सब
हो सीथकर लोक का मच्चा उपकार कग्ने वाले महान
शिक्षक थे। इनमें सबसे पहले ऋषभदेव हुए उनके बाद
पड़े २ लम्बे चौडे ममयों के बाद प्रमश. तेईम तीर्थकर
और हुये थे। इनम से चौबास तीर्थकर भगवान महावीर
जी की वानव बालको ! तुम पहले ही पढ़ चुके हो।
श्री महावीर स्वामी के निर्माण मे ढाई मी वर्ष पहल
श्री पार्श्वनाथ जो निर्माण पधारे। इनके पिता राजा
विश्वसेन बनारस म गेज्य करते थे इनकी मावा महिपाल
नगर क गजा की पुत्री थी। उनका नाम वामादेवी था।
राजकुमार पार्सनाथ बडे पुण्यशाली जीव थे । वह
एचपन से ही महान ज्ञान की बातें करते थे। लोग उनके
चातुर्य को देखकर दंग रह जाते थे।
एक रोज राजकुमार पार्श्वनाथ पन बिहार के लिये

-
दूसरों को सुसी रखने की चेप्टा करो।
निकले । सखा साथी उनके साथ थे । घूमते रिश्ते वे एक
पेड़ के पास से निकले, जिस पर एक सन्यासी उन्टी
लटक पचाग्नि तप कर रहा था। यह उनके नाना थे।
राज कपीर उनकी मूह क्रिया देख कर हमे और साथियों
से बोले देखो इस मूहसन्यासी को! यह जीव हत्या करके
स्वर्ग के सुखों को अमिलापा कर रहा है,निम लाड़ को
इसने सुलगा क्या है, उसमें नाग नागिनी है, यह भी
इसको पता नहीं है।
सन्यासी इस बात को सुन कर आग ययूला हो गया
और बोला हाँ हाँ तू बड़ा ज्ञानी है। छोटी मुह पड़ी
पातें कहते तुझे डर मी नहीं लगता, तिस पर भी तेग
नाना और सन्यासी । इस मेरी तपस्या को तू इत्या का
काम यताता है।
राज कुमार पार्थ नाथ ने सन्यासी की इन बातों का
पुगे न माना पल्कि उन्होंने उत्तर में कहा साधु होकर
क्रोध क्यों करते हो ? बुद्धि उम्र के साथ नहीं बिकी है।
ज्ञान पिना कोई भी फग्नी काम की नी ! तुम्हें अपनी
वास्या का बड़ा घमर है तो जरा इस लकड़को फाड़
कर देखो, दो निरपराध जीवों के प्राय जागे। क्या
पही धर्म कर्म है ? सन्यासी भोला तो कुछ नहीं पर सफड

अपने बल और ज्ञान का शेकी मत यधारो।
चीरने पर जुट पड़ा । उसने देखा सचमुच उस लड़के
भीतर साँपों का एक जोड़ा है। वह दंग रह गया, परन्तु
अपने नरप्पन को डांग मारतो ही रहा । वे युगल नाग
शस्त्र से घायल हो गये, परन्तु उनके परिणामों में भगवान्
पार्श्वनाथ के वचनों ने शान्ति उत्पन्न करदा वे समती
भाव से मर कर घरवंद्र पद्मावतो पैदा हुए । एक बार
अयोध्या से एक दूत गजा विश्वसैन की सभा में पाया।
पार्श्वनाथ जी ने अयोध्या का हाल पूछा तो उसने
पभ प्रादि तीर्थंकरों का चरिंग सुनाया, सुनते ही प्रभु
को ध्यान आया और वे वैराग्यवान हो गये। निना
विवाह कराये ही तीस वर्ष की अवस्था में साधु दोचा ले
ली और घोर तप करने लगे।
एक बार कमठ के जीव पूर्व जन्म के बैरी देव ने
घोर उपद्रव क्यिा । सृष्टि की, भोले बरसाये, सर्प लिपटाये,
परतु भगवान् सुमरू पर्वतवत् ध्यान मे स्थिर रहे। युगल
नाग के जीवों मे से धरणेंद्र ने सर्प के रूप में छाया की,
पद्यावती ने मस्तक पर उठा लिया उपसर्ग दूर हुआ।
भगान् को केवल ज्ञान हुआ । केरल ज्ञान होने के बाद
भगवान् ने विहार करके धर्मोपदेश दिया। भनेक जोगे
का उपकार किया। सौ वर्ष की आयु में हजाराबाग जिले

५६
1
-
स्मरण शक्ति बहुत बड़ा गुण है।
के सम्मेद शिलर पर्वत से मोक्ष पधारे। इसी कारण इस
पर्वत को पान कल पार्सनाथ हिल (पहाड ) कहते हैं।
प्रश्नावली
। तीर्थकर किसे कहते है। बताओ भगवान् पारवनाथ
कौन से तीर्थकर थे !
मन्यासो कौन था १ श्रीर वह क्या कर रहा था १ भगवान्
पार्श्वनाथ को किस प्रकार ज्ञात हो गया कि लण्ड में
नाग और नागिनी है?
'३ भगवान् पाश्वनाथ को पैराग्य' क्यों होगया था ? कमठ
कौन था और उसने क्या उपद्रव किया और यह उपद्रव
किस प्रकार दूर हुआ?
४ क्या कारण था, जो नाग चौर नागिनी घायल होकर
मरने पर मी धरणंद्र और पद्मारती हो गये।
५ भगवान पश्चिनाय कहाँ से मोक्ष गये थे और उस
स्थान का क्या नाम पड़ गया था?
य
-
।
,
पाठ २१
सती अंजना सुन्दरी
मती प्रजना सुन्दरी महेन्द्रपुर के राजा महेन्द्र व
रानी हृदपवेगा की परम प्यारी पुत्री थी। यानकपन में
हो वह सब विद्यामों और कलामो में निपुण हो गई थी।

किसी के एहसान को मत भूलो।
का पहाड़ टूट पड़ा। इस समय उसे परमात्मा के ध्यान
के सिवाय और कोई सहाग न रहा ।
चलते चलते पवन कुमार मानमगेवर पर पहुंचे वहाँ
उन्होंने अपना डेरा डाल दिया। गनी के समय जय
टहल रहे थे, तो उन्होंन एम चकरी का चकवे के वियोग
में रुदन करते हुए सुना, रुदन सुन कर विचारन लगे ।
देखो ! हम चारों को अपने प्रिय का एक रात्रि का
वियोग होने से इस समय इतना कष्ट हो रहा है तो
श्रजना को २२ वर्ष के वियोग से न जाने कितना कष्ट
श्रा होगा। प्रेम के अाध कुमार की आँखों से गिरने
लगे. तुरन्त ही गुप्त गति से अपने मित्र सहित उसी रात्रि
को विमान में बैठ कर चुपके चुपके अञ्जना सुन्दरी के
महल म पहुंचे, अजना कुमार को देख कर फूली न समाई।
पति की अनेक प्रकार से विनय व भक्ति करने लगी।
कुमार ने अपने अपगों को क्षमा मांगी। सारी रात
महल में अजना सुन्दरा के साथ पिताई। ।।
सबेरे होते ही कुमार वहाँ से विदा होने लगे तो
सुन्दरी ने कहा " जान पड़ता मुझे गर्म रह गया है
कृपा कर आप मुझे अपनी कोई निशानी दे जाये जिससे
मेरा अपमान न हो सके।" तर कुमार अपनी अगूठी।

--
जवानी और खुदापा दोनों समय की शोभा है। ३
सुन्दरी को देकर चले गये। इधर उसके गर्भ के चिन्द प्रति
दिन प्रगट होने लगे, उमझी सासु केतुमती ने यह देख
कर रसे दपित ठहगया। अजना ने पवनकुमार की दी हुई
अगूठी को दिखा कर, उमके भ्रम को बहुतेग दूर करना
चाहा, परन्तु उमने एक न मानी, और अजना सुन्दरी को
उसकी सखी वसतमाला सहित उसके पिता राजा महेन्द्र
के पहा मेज दिया।
माता पिता ने भी अजना को क्लकित समझ अपने
नगर में घूमने नहीं दिया । इस तरह दुखी होकर बेचारी
श्रजना अपनी सखी वसतमाला सहित विलाप करती
भयानक पन में एक पर्वत की गुफा में पहुंची। वहाँ
देवयोग से उसे बड़े तपस्सी जानी मुनिराज के दर्शन हुए ।
श्रजना ने बडी विनप से उससे अपनी इस आपत्ति का
कारण पूछा । उत्तर में मुनिराज ने कहा-'पुत्र ! तूने पहले
जन्म में श्री जिनेन्द्र मगरान् की प्रतिमा को पारड़ी के
जल में फिकरा कर पड़ा अनादरें किया था, इससे तूने
घोर पाप का बन्धन किया। उसी के कारण अंब तुझे
२२ वर्ष का पति वियोग और अनेक दुख सहन करने
पदे । अर घरा मत, धर्म साधन कर, तेरे कप्ट का अन्त
होने ही वाला है । एक बड़ा- पराक्रमी शूरवीर

कर्म का फल भोगना ही पड़ता है।
और धर्मा मा पुत्र होगा। यह मुनिराज तो वहाँ से
विहार कर गये। गति के समय जब श्रजना बसतमाला
सहित गुफा में यो कि एक भयानक सिंह गुफा के द्वार पर
श्राया। उसे देखकर अजना यही भयभीत हुई। परंतु उसकी
सखी पसतमाला ने बड़े साहस और पराक्रम से सिंह का
सामना करके उसे वहाँ से भगा दिया। अब अन्जना अपनी
सखी सहित धर्म ध्यान पूर्वक उस गुफा में रहने लगी और
श्री मुनिसुग्रत मगरान् को प्रतिमा का विगजमान करके
नित्य अभिषेक व पूजन करने लगो । यहाँ ही उसने परम
प्रतापी जगत् प्रसिद्ध हनुमान को जन्म दिया।
एक दिन अन्जना वन में अपने पति का पाद कर
फूट फूट कर रो रही थी उमी समय कारणवश हनुरुह
द्वाप का राजा प्रतिस्य उधर से जा रहा था, अन्जना का
मिलाप सुन कर अपना रिमान उतारा और गुफा में गया।
तुरन्त ही अपनी माननी,म-जना को पहिवान लिया और
उसको हृदय से लगापार प्रकार से शान्ति दे उसे
अपने साथ अपने नगर को ले गया।
इघर जय पश्नकुमार युद्ध में राजा वरुण को जोत कर
अपने नगर पानित्यपुर में आये तो अन्जना को वहाँ न'
पाकर बड़ दुखी हुए। जब पता चला कि वह अपने पिता

712
म
-
I
विद्या ऐसा धन है जो सदैव बढ़ता है।
क यहाँ महेंद्रपुर गई है तो वे वहाँ पहुचे । परन्तु जब वहाँ
मी परम सती अजनों के दर्शन न हुये, तोपनों में उसकी
खोज में पागलों की तरह घूमने लगे। अब तो राजा
महेंद्र को भी यह हाल बीनकर बड़ा दुख हुयी । दोनों
ओर से पवन कुमार श्रीर अञ्जना की खोज में देत मेजे
गये । उनमें से एक दूत गजा प्रतिसूर्य के पास पहुंचा और
कुमार का सब हाल कह सुनाया। अजना यह हालामुन
कर पूर्षित हो गई । राजा प्रतिस्र्य ने उसे समझाया और
भार आदित्यपुर आये । यहाँ से राजा, प्रहलाद , को
लेकर कुमार की खोज में निकले । खोजत २ कुमार को,
एक भयानक पन मे वृक्ष के नीचे पठे देखा । कार की
चड़ी शोचनीय दशा पी। कुमार को देखते ही राजा'
प्रहलाद के हृदय में प्रेम उमड़ आया, दौकर'जन्दी से
उसे हृदय से लगा लिया। तथा अञ्जना के मिलने का
उसके प्रतापी पुत्र होने का सिर समाचार कह सुनाया।
कुमार यह समाचार सुन कर प्रसन्न हुए।
यहाँ से चल कर ये सब राजा प्रविर्य के यहाँ।
हनुरुहद्वीर पाए । पवन कुमार अपनी प्राण प्यारा अञ्जना
से मिले। दोनों ने अपने २ 'टु व एक मरे को सुना
कर दिल को शान्त किया । और कुछ दिनों तक वहाँ हो
.

१६
स्वस्त्री मे ही सतोप रक्सो।
रहे । फिर यहाँ से आदित्यपुर मे जाकर दोनों पति पत्नी
पुन सहित प्रानन्द से समय बिताने लगे। अन्त
अ जना ने श्रायिक बन बड़ी तपस्या की और धर्मध्यान
पूर्वक मर कर स्वर्ग प्राप्त किया।
प्यारे बालको! सती अजना के चरित्र से हमे बड़ी
शिक्षा मिलती है। देखो कर्मों की गति कैसी विचित्र
है। महान् पुरुष भी कर्मों के फल से नहीं बच सकते ।
पह चरित्र पतलाता है कि जिन शासन की अविनय
करने से बड़ा बुरा फल मिलता है । यह चरित्र मनुष्य के
आलस्य को छुड़ा कर कर्मवीर बनाता है। यह चरित्र
पताता है कि विपत्ति में साहसहीन न होकर धर्म पालन
करना ही उचित है । यह चरित्र सिखाता है कि एक बार
कार्य सफलता प्राप्त करना चोरों का धर्म है। कमों
का खेल, पतिप्रत की रक्षा और एक 'भवला के साहस
और पराक्रम का सदा उदाहरण इस चरित्र
मिलता है।
प्रश्नावली
१ अपना कौन थी ? और किसकी पुत्री थी तया इनका विवाह)
।
-
--
10
किनके साथ हुआ था?

1 लो मनुष्य किसी काम को करता रहेगा कामयाय होगा। २ पवनकुमार श्रजना से क्यों अप्रसन्न हो गये थे। तथा यह इनकी अप्रसन्नता कब तक बनी रही। ३ पति की रुष्ठावस्था में अजना ने क्या किया और उसकी क्या हालत हुई। ४ पवनकुमार मानसरोवर पर क्यों गये थे। तथा फिस प्रकार उनकी अपनी २२ वर्ष की लोकी हुई पन्नी की मुध मा गई । ५ सास ने अजना को क्या कांक लगाया था उसे कहाँ मिनया दिया। वन मे अजना ने क्या २ कष्ट दठाये तथा किस प्रकार अजना अपने मामा के घर पहुची। ६ यताओ फिर किस प्रकार अजना और पवनकुमार सयोग हुआ ? अजना को अपने पति से २२ पर्ष का लम्बा, वि सहना पड़ा था? ८ जना की कहानी से तुम्हें क्या शिक्षा मिलती है। F- पाठ २२ तत्व और पदार्थ जिनके जानने से हमें अपने सामने हित का ज्ञान हो सके, हम अपने अत्मा गरियकर सके उन पातों को, पा वस्तु के समान को तव कहते है । जिसमें तत्त्व पापा मारे उसी को ५ N १८ विना परिश्रम कोई काम नहीं होता। कहते हैं। थत्मा की उन्नति को समझने के लिए सात तत्वों का जानना थारश्यक है। वे सात तत्व ये है:- (१) जीव (२) अजीव (३) आस्रब (४) बघ (५) सवर (६) निर्जरा (७) मोक्ष । (१) जीव-उसे कहते हैं जिसमें चेतना अर्थाद देखने जानने की शक्ति पाई जावे । जीर प्राणों से जीते हैं। प्राण दो प्रकार के होते है भावप्राण और द्रव्यमाए भावप्राण-ज्ञान और दर्शन सुख वीर्यादि अत्मा के गुण है। द्रव्यप्राण-दश होते हैं। ५ इन्द्रियाँ-स्पर्शन, रमना, घाण, चक्षु कर्ण । ३ पल-मनोपल, वचनवल, कायवल। २ आयु भौर सासोच्छवास । नोट-मुक्तजीवों मे केवल मावप्राण, ज्ञान और दर्शन सुख वीर्य भादि हो पूर्ण रूप से पाये जाते है, पर ससारी जीवों में किन्हीं अशों में ज्ञान दर्शन होते हुए द्रव्यप्राण, मी पाये जाते हैं। (२) जीव-उसे कहते हैं जिममें चेतना न ई जाये । अजीव के पाँच मेद है ग-

-
है
बुद्धिमान का सब जगह भादर होता है।
पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल, (इनका स्वरूप
तीसर भाग में बताया जा चुका है।)
(३) आस्रव-राग द्वेप आदि मारों के कारण
पुद्गल कर्मों का खिंचकर भात्मा की भोर पाना आस्त्रव
है। जैसे किमो नाव में छेद हो जाने पर पानी माने
लगता है, वैसे ही प्रात्मा के शुभ अशुम रूप भाव होने पर
पुद्गल कर्म खिंचकर प्रात्मा को श्रोर थाते हैं।
श्रात्मा के जिन मावों से कर्मों का पाना होता
उन मावों को मावावर कहते हैं।
(१) मिथ्यात्व, (२) अपरति (३) रूपाय पोर (१)
योग ही पासूब के मुख्य कारण हैं।
(थ) मिथ्यात-राग द्वेप रहित अपनी शुद्ध परम
पवित्र आत्मा के अनुमों में श्रद्धा न करने का नाम
सम्यक्त्व है । सम्परत्व आत्मा का निज भाव है। इस
सम्परत के विपरीत अर्थात् उन्टे भाव को ही मिथ्यात्व
कहते हैं । इस मिथ्यात्व माव के कारण समारी जीवों
के अनेक सकल्प विकल्प हुआ करते है। यह मिथ्यात्व
mmA

रखना और
दूसरे को नसीहत कर उसे विचारो।
ही जीव के शाति समाव का नाश करता है और इसी से
यह जीव के कर्म बन्ध का कारण है। मिथ्यात्व पाँच
प्रकार का है:~ एकान्त मिथ्यात्व, विपरीत मिथ्यार,
स्निय मिथ्याल, सशय मिभ्यास, अन्नान मिथ्यात्य ।
(मा) अविरति-मात्मा का अपने शुद्ध चिदोनदमय
समाव से विमुख होकर बाहरी विषयों में लवलान होना
अविरति है । पाँचों इन्द्रियों और मन को वश में नहीं
छ काय के जीवों की रक्षा न करके उनकी
हिंसा करना अविरति है। ये अविरति बारद प्रकार के हैं।
(इ) कपाय जो आत्मा को कपे अर्थात् दुःख दे,
वह कपाय है। जैसे क्रोध, मान, माया, लोम, हास्य,
शोकादि ये कपाय पच्चीस होती है।
अनन्तानुबन्धी क्रोध मान माया लोम (चार)४
अप्रत्या ख्यान क्रोध मान माया लोम (चार) ४
प्रत्याख्यान क्रोध मान माया लोम (चार)४
सन्चलन कोष मान माया बोम (चार) ४
हास्य, रति, भरति, शोक, भय, जुगुप्ता, स्त्रीवेद,
पुरुषवेदानपु सकवेद, (8 नो कपाय) इस प्रकार १६ कपाय
मोरह नौ कपाप मिलकर कयाय के कल पचीस मेद होते है
8

गुरु व माता पिता का आदर करता फर्म है। (६)योग-मन -मन वचन काय की क्रिया द्वारा भात्मा में हलन चलन होना योग कहलाता है । अत्मा में हलन चलन होने से ही कर्मों का प्रास्रव होता है। योग के मन, वचन, काय रूप मुख्य तीन भेद हैं। इसके विशेष मेद १५ होते हैं। ४ मनोयोग, ४ वचनयोग और ७ कोपयोग। (१) मत्य मनोयोग (२) असत्य मनोयोग (३) उमय मनोयोग (४) अनुभय मनोयोग (५) सत्य वचनयोग (६) असत्य वचनयोग (७) उभय वचनयोग (८) अनुमय वचनयोग (६) औदारिक कायायोग (१०) औदारिक मिश्र काययोग (११) वैक्रिया काययोग (१२) वैफियक मिश्र- काययोग (१३) थाहारक काययोग (१४) भाहारक मिश्र- काययोग (१) कर्माणयोग। 'नोट:-इस प्रकार ५ मिथ्यात्व, बारह अविरवि पच्चीस कपाय और १५ योग, ये कुल मिलाकर श्राप के ५७ मेद होते हैं। (४) बन्धतत्व-राग द्वेष के निमिर से भाये हुए शुभ अशुभ पुद्गल कमों का श्रात्मा के साथ अल और दूध की तरह मिलकर एकमेल हो जाना बघतत्व है । जसे निाव में छेद के द्वारा पानी पाकर नार में इकट्ठा हो 1 . १०२ सच्चे को लक्ष्मी दासी होती है। जाता है, वैसे ही कर्म आफर आत्मा के साथ वध जाते है। बध के भी दो भेद है । माव बन्ध और द्रध्य बन्ध, श्रात्मा के विकार परिणामों स कर्म पन्ध होता है, उन विकार परिणामों को भाव बन्ध कहते हैं। और उस विकार मार से जो पुद्गल कर्म ,परमाणु अत्मा के साथ दूध और पानी की तरह एक्मेक होकर मिलते हैं उसे द्रव्य बन्ध कहते हैं। पन्ध मौर सिम साथ साथ एक ही समय होते हैं । पासव कारण है, वध कार्य है । इसलिये जितने प्रसव वे सबही वध के कारण हैं। यध चार प्रकार का होता है- (१) प्रतिबन्ध (२) प्रदेश पन्ध (३) स्थिति बन्ध (४) अनुभाग वन्धी (५) सवरतत्व-मासमकान हना अर्थात् थाते हुए कर्मों का रोक देना संवर है। जैसे जिस छेद से नाक- में पानी आता है उस छंद मे डाट लगाकर पीनी को भाने से रोक दिया जाता है वैसे ही शुद्ध भावों के द्वारा फर्मों को रोक दिया जाता है। मघर के भी दो भेद हैं, मावसवर, द्रव्यसवर भाव सवर-जिन परिणामों से कर्मों का आना रुकत है वे भाव सबर कहलाते हैं और उन्हीं के रोकने -- , ।

m
सवर अच्छी भावनाओं, दस परों वाहन कान
और परिपह अर्थात् भिन्न प्रकार के 5 मामात्र
भावना, ५ प्रत ५ समिति, १० घई, र परिहाइप,
सिरपला जाय पर प्रतिज्ञा मानना। ५
इगल परमाणुमों का कर्म सोश पलाच भोर
मयर के मुख्य कारण गुमा अनुप्रेक्षा
होने का नाम नत है । व्यवहार हो, सन्च, प्रचौर्य
माचर्य और अपारग्रह यह पाना मनात हैं। इनका
(ब) समिति-अपने काम सरे बीजों को पौदा
न होने की इच्छा से पलायन करना ममिति
पा, मापा, एपएक दिौर उत्सर्ग
भानाद्रव्य सबर है।
झेलने आदि से होता है।
पीर ५ चरित्र हैं।
वर्णन पहिले पद गु हो।
ये पांच समिति ई।
--निश्चप में राग द्वारिकानों से रहित
।
कहलाता है।
इनका वर्णन पर
के हो।
साधु
परमेठी में

M
१०४
पिसी दशन की निदान करो।
(ज) गुति-मन, बचन और काया के व्यापार को
वश करना-काबू मे लाना व रोकना गुप्तो है । गुप्ती तीन
होती हैं -१ मनीगुमि २ वचन गुमि और ३ काय गुप्ति
( देखो पाठ १४ आचार्य परमेष्ठी)
(झ) दशधर्म- (१) उत्तम क्षमा (२) उत्तम मार्दय
(३) उत्तम प्रार्जव (४) उत्तम मत्य (५)उत्तम शौच
(६) उत्तम सयम (७) उत्तम तप (क) उत्तम त्याग
(8) उत्तम अकिंचन्य (१०) उत्तम ब्रह्मचर्य, यह दस
--
[देखो १४ प्राचार्य परमेष्ठी]
(ट) अनुप्रेक्षा-मारपार विचार करने को अनुप्रचा
या मारना कहते है। ये भावनायें पारद हैं। इन्हें ही
मारह भावना यहा करते हैं।
१-अनित्य २-~माशरण ३-मसार ४-एक्त्व
५-~~अन्यत्व ६~-अशुचि ७. शासन
--सवय
-निर्नग १०-लोक ११-बोधिदुर्लभ १२-~-धर्म
(१) अनित्य भावना-ऐमा विचार करना कि धन
धान्यादि जगत् की सर यस्तुये विनाशीक है इन
से कोई भी नित्य नहीं हैं।

१०५
१
पह जीप ससार में रुलता है, इसलिये जो पासव
अधिक घ्याज न लो।
[२] अशरण भावना-ऐसा विचार करना कि जग
में जीर का कोई शरण नहीं है। कोई किमी को मन्ने में
बचाने वाला नहीं।
[३] ससार भावना-ऐमा चिन्तयन ता कि यह
ससार आपार है और संसार म कहीं भी सुनन्दी है।
[४]एक्त्व भावना-ऐसा विचार करना कि जीर
सदा अकेला ही है अपने कर्मों के फन को बम्जा आर
ही भोगता है।
[५] अन्यत्व भावना-ऐसा विचार करना कि शरीर
जुदा है और मै जुदा हूँ । जब यह शोर दो मरना नहीं
है तो फिर ससार का कोई मी पार्थ मरा अपना कैसे
हो सकता है।
[३] अशुचि भावना-एसा विचाग्ना कि यह शरीर
अत्यन्त अपवित्र और पिनावना है। इससे ये ममत्व
करने योग्य नहीं है।
[७] पालव भावना-
से
कारण हैं, उनका विचार करके उनके बचने का ही उगार
करना चाहिये।
विभग्ना कि
पासूव
।
३

आजीविका की विद्या का सेवन न करूं।
[८] सवर भावना-एसा विचार करना कि सबर से
हो अर्थात् प्रासूब के रोकने से ही यह जीव ससार से पार
हो सकता है और इसीलिये सबर के शरणों का विचार
करक उनको ग्रहण करना चाहिये।
[8] निर्जरा भावना~-ऐसा विचार करना कि को
का क्छ दूर होना निर्जरा है इसलिये निजंग के कारणों
को जान कर जिस तिस प्रकार पन्धे हुए कर्मों को दूर
करना चाहिए।
[१०] लोक भावना-उर्द्ध लोक, मध्यलोक,
पाताललोक इन तीन लोक के स्वरूप का चिन्तन करना
कि लोक कितना पडा है, उसमे क्या २ स्थान है और
किस किम स्थान में क्या २ रचना है और वहाँ क्या २
होता है ऐसा विचार करना लोक मावना है। इस माधना
से समार परिभ्रमण की दशा मालूम होती है और ससार
से छूटने और मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा होती है।
[११] बोधिदुर्लभ भावना-ऐसा विचार करना कि
यह मनुष्य देह पड़ी कठिननाई से प्राप्त होती है। ऐसे
अमोलक मनुष्य जन्म को पाकर धृथा हो नहीं खोन
चाहिये, किन्तु सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक् चरित
1

पुत्री को पढाये बिना न रहूँ। १०७
रूप रत्ननय धर्म को पालन कर अपना जन्म मफल
करना चाहिये।
[१२] धर्म भावना धर्म के स्वरूप का चितवन करना
तथा धर्म ही इस लोक और पग्लोक के सुखों को देने
वाला है और धर्म ही दुग्व से छुड़ाकर मोक्ष के श्रेष्ठ सुख,
का देने वाला है। ऐसा विचार करना धर्म भावना है।
[] परीपहजय-मुनि महाराज कर्मों को निर्जरी और।
काय क्लेश करने के लिये जो परीपह अर्थात् पीड़ा समता
मानों से स्वय सहन करते हैं। उनको परीपह नया कहते
है । परीपद बाईस है।
[१] सुधा [२] कृपा [३] शोत [४] उप्य [५]दश
मशक [६] नग्न [७] अति [८] स्त्री [६] चर्या [१०].
भासन [१२] शश्या [१२] भामोश [१३] वध [१५]
पाचन [१५] अलाम [१६] रोग [१७] तृणर्श
[P] मल [१६] सत्कार पुरस्कार [२०] प्रज्ञा [१]
अज्ञान [२२] अदर्शन।
शक्षुधा परीपहजय-भूख की वेदना होने पर
उसके पश न होकर दुःख सह लेने को कहते है।

-
१०८
कुटुग्य को स्वर्ग बना।
[२] तृषा परीपह जय-प्यास को तोव वेदना पर
उसके वश न होर दुख मह लेने को कहते हैं।
[३] शीत परीपह जय-शीत अर्थात् आड़े के कर
महन करने को कहते हैं।
[४] उष्ण परीपह जय-उष्णता अर्थात् गर्मों के
सताप सहने को कहते हैं।
[५] दश मशक परीपह जय-डाँस, मच्छर, बिच्छू
कनवरे आदि जीरों के काटने की वेदना को सहन
करने को कहते हैं।
[६] नग्न परीपह जय-किसी प्रकार के भी वस्त्र न
धारण कर नग्न रहने को न होने देने को कहते हैं।
[७] परति परीपह जय-ससार के इष्ट अनिष्ट
पदार्थो म रागद्वेष न कर समता भाव धारण करने का
कहते हैं।
[[स्त्रो परीपह जयममचर्य चूत भग करने के लिये
स्त्रियों द्वारा अनेक उपद्रव किये जाने पर भी चित्त में
किमी प्रकार का विकार भाव नहीं करने को कहते हैं।
f

यदि तू युवा हो तो उद्यम और ब्रह्मचर्य की ओर दृष्टि कर १०६
[६] चर्या परिपहजय-किमो प्रकार की सवारी की
इच्छा न करके मार्ग के कष्ट को न गिन कर भूमि
शोधन करते हुए गमन करने को कहते हैं।
[१०] श्रासन पीरपह जय-देर तक एक ही सन
से बैठे रहने का दुब सहन करने को कहते हैं।
[११] शय्या परीपह जय-खुर्दरी, पथरीली, काँटों
से भरी हुई भूमि में शयन दरके, दुखो न होने को
कहते है।
[१२] ग्रामोश पीरपह जय-दुष्ट मनुष्यों द्वारा
कुवचन कहे जाने पर तथा गालियों दिये जाने पर भी
किंचित् मात्र भी क्रोधित न हो कर उत्तम क्षमा धारण
करने को कहते है।
[१३] वध परीपह जय-दुष्ट मनुष्यों द्वारा वध
अधनादि दुख दिए जाने पर ममता मार धारण करने
और उन दुखों को शान्ति पूर्वक सहन करने को
कहते हैं।
[१४] याचना परीपह जय-किसी से - भो किमी.
प्रकार की मी याचना न करने (मांगने) को कहते है।
1

है
.
राज भूख प्यास लगने अथवा, गेग हो जाने पर भी
न औपधादि नहीं मागते ।
1) अलभ परीपह जय-अनेक उपवासों के बाद
में भोजन के लिये जाने पर भी निर्दीप श्राहार
न मिलने पर मो फ्लेशित न होने को कहते है।
) रोग पीपह जय-शरीर में अनेक रोग हो जाने
मता भाव के साथ पाडा को सहन करते हुए अपने
मोग दूर करने का पाय न करने को कहते हैं।
) तृणस्पर्श परीपह जय-शरीर म 'शूल काटा
फॉम आदि चुम जाने पर दुखो न होने और उनके
नने का उपाय न करने को कहते हैं।
) मल परीपह जय-शरीर में पसाना आ जाने।
धूल मिट्टी लग जाने के कारण शरीर के महा
हो जाने पर स्नान आदि न करके चित्त निर्मल
को कहते हैं।
.
सत्कार पुरुस्कार परीपह जय-किमी के आदर
र अथवा नियम प्रणाम वगैरह न करने पर तथा
से

जिसने आत्मा जान ली उसने सब कुछ जान लिया। १ तिरस्कार किये जाने पर इर्ष पिाद न करके समता भाव धारा करने से कहते हैं। (२०) प्रज्ञा परीपह जय-अधिक विद्वान् अथवा चारित्रगन हो जाने पर मा किमी प्रकार के मान न रखने को कहते हैं। (२१) अज्ञान परीपह जय-बहुत दिनों तक तप- रचरग करने पर भी अधिन्नान आदि न होने से अपने आप खेद न करन को और ऐसी दशा में दमरों से "अज्ञानी" 'मू-" आदि मर्म-मेदी पचन सुनकर दुखित न होने को कहते हैं। (२२) अदर्शन परीपह जय-बहुत दिनों तक अधिक तपश्चरण करने पर भी क्मिी प्रकार के फल की प्राप्ति न होने से सम्यग्दर्शन को पित न करने को T - - (ड) चारित्र-आत्म स्वरूप में स्थित होना चारित्र है इसके पांच मेद हैं:-सामायिक चाथि, छेटोपस्थापना चारित्र, परिहारविशुद्धि- पारिन, सूक्ष्मसापरायाचारित्र, यथास्यात चारिन।

११२ सत्सग यह पारमा की परम हितकारी औषध है। (६) निर्जरा तत्व-आत्मा के साथ बघे हुए कमों का थोड़ा २ करके आत्मा से जुदा होना निर्जग है। जैसे नाव में छिद्र के द्वारा आकर जो पानी भर गया था, उसको थोड़ा २ करके बाहर निकाल दिया जावे। वैसे ही आत्मा के साथ यधे हुए कमों को धीरे २ तप- श्चरण द्वारा आत्मा से जुदा कर दिया जाता है। आत्मा के जिस परिणाम से पुद्गल कर्म फल देकर नष्ट हो जाते हैं, यह भाव निर्जरा है । समय पाकर पा तपश्चरण द्वारा कर्मरूप पुद्गलों का आत्मा से उड़ना द्रव्य निर्जरा है। फल देकर अपने समय पर कर्म का प्रात्मा से जुदा होना सविपाक निर्जरा है। वप करके समय से पहले ही किमी कर्म को पात्मा से जुदा कर देना श्रविपाक निर्जरा है। (७) मोक्ष तत्व सर्व कमों का नष्ट होकर आत्मा के शुद्ध होने का नाम मोत है। जैसे नाव मन्दर मग हुआ सब पानी वित्पुल निकाल कर नाव को साफ कर दिया जाता है, वैसे ही सब कों से सर्वथा रहित होने पर आत्मा शुद्ध परमात्मा स्वरूप .

स्थाद्वादशैली से देखने पर कोई भी मत असत्य नहीं ठहरता ११३
होता है। श्रात्मा का शुद्ध परिणाम जो मर्व पुद्गल
कर्मों के नाश का कारण होता है यह भाव मोक्ष है।
श्रात्मा से सर्वथा द्रव्य कर्मों का जो दूर होना है वह
द्रव्य मोक्ष है।
पदार्थ
इन्हीं ऊपर बताये हुए सात तत्वों में पुण्य और पार
मिलाने से हो नौ पदार्थ कहलाते हैं।
पुण्य-उसे कहते हैं जिसके उदय से जोरों को सुख देने
वाली सामग्री मिल । जैसे किसी को व्यापार में खून
लाम होना, घर म सुपुत्र का होना, उच्चपद का प्राप्त
होना ये सब पुण्य के उदय से होते हैं।
परोपकार करना, दान देना, भगवान् का पूजन
करना, ज्ञान का प्रचार करना, धर्म का पालन करना
आदि शुभ कार्यों से पुण्य का वध होता है।
पाप-जिसके उदय से जीवों को दुख दने वाली चीजें
मिलें। जैसे रोगी हो जाना, पुत्र का मर जाना, धन
चोरी हो जाना इत्यादि यह सब पाप के उदय से होते
है। हिंसा करना, भूठ बोलना, चोरी करनो. जमा

युवा भार ज्ञान में वृद्ध प्राण पाये जाते ११४ यताव में थालक, सत्य में घनो। दूसरों की निन्दा करना, दूसरों का पुरा चाहना आदि बुरे कायों से पाप का बघ होता है। प्रश्नावली १ तत्व किसे कहते हैं ? और कितने होते है ? नाम यतायो । २ (अ) प्राण कितने प्रकार के होते हैं। बताओ मुक्त जीवों के कौन से प्राण होते हैं और ससारी जीयों के कोन २ से प्राण होते हैं? (भ) नीचे लिखों मे कितने और कौन हैं। बी, देव, नारकी, फुर्सी, इअन, चिड़िया, वृक्ष, चिंउटी, मक्सी, लडका, लट ? ३ यताभो सातों तत्वों में कौन कौन से तत्व प्रहण करने के योग्य और कौन से तत्व दूर करने के योग्य है ,मोक्ष, सवर निजरा, आस्रव इन तत्वों को क्रम वार लिसो । और इनका स्वरूप दृष्टान्त सहित समझाओ! ४ संक्षिप्ततया बताओ की तीसरे तत्व के कितने व कौन से मुरय कारण हैं। मिथ्यात्व और अविरदि में लक्षण लिख कर ५ योगों के नाम लिसो। १" बध किसे कहते हैं ? और यह कितने प्रकार का है १ वध और भासव में क्या भेद है। ६ सवर तत्व के मुख्य कारणों को लिखो। अनुप्रेक्षा त्या भावना मै क्या भेद है। निम्नलिखित के लक्षण लिखो अन्यत्व भावना, निजरा भावना, ससार भावना, लोक भावना, धर्म भावना। -७ चरित्र किसे कहते हैं ये कितने होते हैं। नाम लिखो। 1 1 T

U
-
हे जीव भोग से शांत हो विचार यो, इनमें कौनसा मुस है ११५
पदार्य क्तिने व कौन से होते हैं कौन २ से कार्य
करने से पुण्य और किनसे पार का वध होता है ?
१ (क) परीपह किसे कहते हैं ? परीपह कितनी है और इन
। को कौन सहन करते हैं और क्यों ?
ख) नीचे लिग्नी परीपहों का स्वम्प यताश्री
माकोशपरीपह, याचनापरीपह, अलाभपरीपह,
मत्कार तिरस्कार परीपह, चर्या परीषद, ।
१. (क) नीचे लिपे साधुओं ने कौनसी परीषह सही
अपम देय स्वामी को हार के लिये जाने पर मी
आहार नामिला, छह महीने तक बरावर अतराय रहा।
(स) अानम्न स्वामी जर यन में ध्यानारूद खडे थे सो सिह
ने उनके शरीर को विनाग।
(ग) राजा श्रेणिक ने यशोधर स्वामी के गले में मरा हुश्रा
सॉप हाल लिया उससे चिउटिया उनके शरीर पर
चढ गई और उह बड़ा कष्ट दिया।
(घ) श्री मा तुगाचार्य को राजा भोज ने जेल में हलवा
दिया।
(१) सनत्कुमार मुनि को कुष्ट हो गया यही पीड़ा हुई-वैद्य
मिलने पर भी उहोंने इलाज की इच्छा प्रगट नहीं की।
(च) सूर्यमित्र मुनि वायुभूति को सयोधन के लिये उसके घर
गये। पायभूति ने उनको बहुत कुछ बुरा भला कहा -
उन्होंने सव शाति से सहन कर लिया
(क) एक मुनि कही धूप में खड़े हैं, 'कई दिन से आहार
नही लिया है, प्यास के मारे गला सूख रहा है, शरीर
-

६ संतापी जीव सव सुखी, तृष्णा वाला जीय सदा मिसारी।
पर पसीने के कारण रेत जम गया मांस में युनक गिर
पड़ा है-ये कष्ट यिना सैद सहन कर रहे हैं?
एक समय में अधिक से अधिक कितनी परीप हो सकते हैं।
२ नीचे लिखे कामों से पुण्य होगा या पाप -छात्रों को छात्र
गृत्ति देने से, लंगडे, ल्ले, अपाहन आदिमियों को रोटी
ग्विलाने से, जुवारी तया शरावी को रुपया पैसा दान देने
से, मैंदा, तीतर लडाने से, प्याऊ और सदाबूत लगाने से,
छोटी उम्र तथा घुदापे में शादी करने कराने से, विवाह
शादियों में व्यर्थ व्यय करने से, औषधालय तथा कन्या
पाठशाला, खुलवाने से, टूटे पृटे मदिरों का जीर्णोद्धार
करने से, चोरी करने से, शिकार खेलने से, पदचलनी
करने से, सिगरेट पीड़ी पीने से, लड़के लड़कियों को अपने
से, या काम करन से।
पाठ २३
विद्यार्थी का कर्तव्य
प्यारे बालको ! इस पाठ में हम तुम्हें यह बतलाना
चाहते हैं कि एक विद्यर्थी का क्या कर्तव्य है। वैसे
तो कर्मयों की ओर तुन्हारा ध्यान दिलाना चाहते
है। जिनका पालन करके तुम अपना जीवन सुधार
सकते हो।

।
.
जिस प्राणी को परिग्रह की मर्यादा नहीं, वह प्राणी सुखी नहीं ११५
स्वास्थ्य
मदा नोरोग हने का यत्न करो । अपने स्वास्थ्य
रक्षा की भोर अधिक ध्यान दो। यदि किमी का स्वास्थ्य
बिगड़ जाता है, तो वह किमी काम का नहीं रहता है।
स्वस्थ पुरुष का वित्त प्रसन्न रहता है, उसके शरीर में
चुस्ती रहती है । स्वस्थ पुरुष का मन अपने आप काम
करने को चाहता है। स्वास्थ्य का ब्रह्मचर्य व्यायाम
खान पान की शुद्धि से गहरा सम्पन्य है।
ब्रह्मचर्य
ब्रह्मचर्य एक प्रकार का नए है। विद्यार्थियों के लिये
भावारी राह पर विद्या पदना मावश्यक है। विद्यार्थी
होते हुए भपने मन को क्मी किसी विषय पासना की
मोर न जाने दो। सत्प, सन्तोप, घमा, दया, प्रेम आदि
गुप बनवारियों के लिये पड़े ही सुलम हो जाते हैं।
मनचर्य क लिए धन की, न समय को भोर न सास
स्थान को हो मावसकता है। पावरपकता है तो एक
६ प्रतिमा का । इमलिये जप यक विद्यार्थी दो मनचर्य
का निपम लो। उधम गति से उसका पालन करो।
फिर तुम पच दिनों में इसके मीठे फल को भी चखोगे।

११५ चार प्रकार के आहार रात्रि में त्यागने का महान फल है
मन में दृढ़ता रख कर बुरे विचार न माने दो, वीर्य
का दुरुपयोग न कगे, युरो सगत से बचो। तुम्हारा
आत्म पल पढ़ेगा। तुम देशोन्नति करने को समर्थ होगे।
विद्वानों में तुम्हाग आदर होगा । तुम्हारे पास धन की
कमी नहीं रहेगी। श्राने धर्म को भली भाँति, पालन
कर सकोगे।
व्यायाम
विद्यार्थियों को बड़ा मानसिक परिश्रम करना पडता
है। वे यदि काई व्यायाम न करें तो गत दिन बैठे बैठे
उनके हाथ पार शिथिल हो जायेंगे। उनका शरीर अस्वस्थ
हो जायेगा | व्यायाम करने से शरीर हष्ट पुष्ट और बलवान
होता है। व्यायाम करने से पाचन शक्ति बढ़ती है, भूख
अधिक लगती है। व्यापाम से शरार में पमीना आता
और पसीने के साथ शरीर का मैल बाहर निकल जाता
है। व्यायाम करने से मन तथा शरीर में एक प्रकार की
फुर्ती और ताजगी मा जाती है, शरीर नीराग रहता
अपने शरीर के अनुमार जो व्यायाम, योग्य जान पड़े
उसी का अभ्याम करना उचित है । मागना दौदना काहो।
खेलना, क्रिकेट, हाकी, फुटयौल आदि खेलों का खेलना
लामदायक है। सवेरे शाम खुले मैदान में सैर करना भी
।
है
1

+
अभयदान आत्मा के परम सुख का कारण है।
उपयोगी। इस लियेनियत समय पर किसी न किसी
प्रकार का व्यायाम करना विद्यार्थियों का सर्तव्य है।
खान पान तथा रहन सहन
अपने खान पान की शुद्धि की ओर अधिक ध्यान
दो। इससे शरीर स्वस्थ रहता है। सड़े गले या अधाके
पद र्थ कभी न खामो । भूख से अधिक मत खायो । देर
से पचने वाला भोजन मत करो। रानि मे मत खायो।
सदा नियत समय पर भोजन कगे। शुद्ध छना हुआ जल
पीसो । मदिग, तम्बाकू पोड़ी आदि मादक पदार्थों का,
सेवन मत करो।
उदारता
अपने मन को शान्त और प्रसन्न रखो । युरे
भावों को अपने मन में न आने दो। छल कपट से सदा
दूर रहो । सरल परिणामी रनो। यदि कोई मनुष्य तुम्हारे
साय कोई उसकार करे तो उसे न भूल जामो। सदा उदार
चिच बनो। सब के साथ अच्छा न्यवहार करो। किमी से
द्वेष न कगे। सकुचित दृष्टि को छोड़ो। सहन शीलता
सारखा । इस गुण के बिना मनुष्य उदाचित नहीं हो ..
सकता। यदि किमी दूसरे का तुम से अपराध हो जाये ता
उससे अपने अपराध को। आमा कराओ। अपनी ..
-

१२० मादक पदार्थ मन को उमार्ग पर ले जाते हैं।
दवात, कलम आदि चीजों को सदा नियत स्थान पर
रक्खो। ऐमा करने से जरूरत पड़ने पर तुम्हारी चीजें
तुरन्त ही मिल जायेंगी, उसके हूँ दने में व्यर्थ ही समय
न जाएगा।
विनय
सदा अपने माता पिता की आज्ञा पालन करो।
ऐमा करना तुम्हारा परम कर्तव्य है। सदा ही प्रयत्न
करो कि वे तुमसे प्रसन्न रहें। उन्होंने तुम्हाग पालन
किया है तुम्हारे लिये पड़े कष्ट उठाये, जितना उनका
श्रादर को थोड़ा है। माता पिता के दूसरे स्थान पर
विद्या-गुरु हैं। वह ज्ञान देते हैं। भले बुरे को पहचानना
सिग्वाते हैं गुरु की आज्ञा मानना और उनका भादर
करना तुम्हारा कर्तव्य है 1 पाठशाला जाकर पहले गुरु
जी को प्रणाम कगे। फिर श्रादर से अपने स्थान पर
बैठो। जो कुछ पूछो, पिनय से पूछा और जो कुछ वह कहें
ध्यान से सुनो, और उसे याद रखो । जो विद्यार्थी तुम्हारे
ऊँची कक्षा में हैं, उनकी विनय को | जो नीची कक्षा
मे है उनसे प्रेम करो। अपने सहचारियों का मो यथायोग्य
आदर करो। आपस में झगड़ान करो, सबके साथ मेल
रक्खो। खोटे लड़कों को सगत से पचो । तुम्हारे साथियों
.

पनालों । जिस काम के लिये वो गर सपा से उन
उत्साह के साथ खेलो। मुमद सपाटयाला
है
-
पहुमून्य पदार्थ है। बहुत से अमाप की
अपनी पढ़ाई लिखाई वगैरह का , टनको
आयु पानी के लहरों साहै।
में जो निर्वल हो उनकी सहायता कोनिय
रक्ख । सब पड़ों को योग्यतानुसार र
मित्रता
अपने मित्रों से प्रेम रक्खो,
निमें
साथी होता है । किसी को मित्र नेस
खूप परख करलेना चाहिये, नहीं जान
,पडता है। यदि मित्र कपटी हो
दरले
श्रमेक दुख मिलपे हैं।
समय
पालो 'सदा समय में एक
बालस्य में खो देते हैं । बहुत से गाने में नए
कर डालते हैं । यह ठीक नहीं है। वही समय पर
7
पीछे पछताना पडता है, परीक्षा हो जाते
है। इसलिये हर काम समय पर समय-दिमाग
समय में ही कर डालो । धर्म के रस में धर्म का पहा
करो। पढ़ने के समय सूब पता मजन के समय

१-२ काम भोग आकाश में उत्पन्न हुए इन्द्रधनुष समान है। इ यादि। अाज का काम कल पर मत छोड़ो। ऐसा-समय- रिग बनायो कि पहले जरूरी २ काम को को। एक समय में एक ही कार्य कगे। जिस काम को हाथ में लो उसे पूरा करके छोयो, अयूग न रहने दो । रात्रि को सोते समय विचार लो कोई काम रह तो नहीं गया । । परिश्रम जो काम तुम्हें करना हो परिश्रम के साथ करो। जो कुछ पदो मन लगाकर पढ़ो। किमी वात को एक बार न समझ मको तो उसे मरी यार समझने का यत्न करो। पढ़ने में खूब परिश्रम करो । परिश्रम करने से मोटी बुद्धि वाले भी बड़े विद्वान् हो जाया करते हैं। यदि तुम्हें कोई कार्य कठिन मालूम हो तो उसे घबड़ा कर न छोड दो। साहम छोड़ कर 7 वैठ जाओ। परिश्रम करके उस कार्य को पूरा करके छोड़ो जो भी कार्ग कगे उसे उत्साह से करो । परिश्रमो और साहसी पालकों का हर समय मान होता है। जो अपने पैरों पर खडा रह कर शार्यता के माथ साहम पूर्वक कार्य करता है उसी की जय होती है - और यही वीर कहलाता है। श्रात्म गौरव 7 सदा माने देश, जाति, कुल तथा धर्म - मर्यादा

मोह ससार का प्रयल कारण है।
का पालन करते रहो । इनका प्रतिष्ठा रखना ही यात्म
गौरव है। प्रात्म गौरव रखने के लिये विद्या, इमा,
परोपकार, विनय आदि गुणों की वही प्रापश्यकता है।
कमी भी कोई कार्य ऐमा न कगे कि जिससे तुम्हारे धर्म
पर दोप लगे तुम्हारे देश, तुम्हारी जाति, तुम्हार पुल
तथा तुम्हारी पाठशाला की प्रतिष्ठा मग हो। जहां तक
तुम से पन सके उनकी सेवा कगे कि जिम से उनकी
प्रतिष्ठा मसार
मदा रज्ज्वल पनी रहे।
"जिनको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है।
यह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।"
भावनायें
मदा अपने दिल में यह भावना को, कि मेरी
श्रात्मा में किसी समय भी खोटे मान न हों । मेरे यह
भाव रहे कि जगत् के सब जीनों का भला हो, सर ही
जीव मेरे समान हैं। गुणगानों को देखकर मेरे हृदय में
ऐसी सुशी हो कि जैसे किसी रङ्क को चिन्तामणिरत्न
के मिलने से प्रस होती है । मेरा यह अमितापा है कि
दोन दुग्वी जीवों पर मेरे हृदय में दया उत्पन्न हो । उनको
देखकर मेरा, चित्त काँप उठे और मेरा यह दृढ़ विचार
।

सो सन्तोष में ही है।
हो जावे कि जिस तरह भी बने उनके दुख दूर करने का
प्रयत्ल करू।
मेरो यह भावना है जो पाखडी तथो अधों हैं, दुष्ट
है, जो मलाई के बदले बुराई करते हैं, अथरा जो मेरा श्रादर
तथा सत्कार नहीं करते हैं, मैं उनसे न राग करून द्वेष ।
प्यारे यालको ! हम सब कथन का सारांश यह है कि सदा
अपने मन और शरीर को पवित्र रक्खो । विषय वासनाओं
का त्याग करो। स्वार्थ बुद्धि को हटायो । तुम में जो
दोष हैं, उन्हें दूर करने का सकल्प करो, तथा गुणों को
बढ़ाने में प्रयत्नशील बनो । ऐसा करने से अवश्य ही
तुन्हारा जीवन सु दर, उदार, सुखी और शात बन जायेगा
प्रश्नावली
१ विद्यार्थी किसे कहते हैं। विद्यार्थी ये कौन २ से कर्तव्य है।
२ पारथ्य किसे कहते हैं और इसको प्राप्त करने के लिये
कौन २ सी धातों पर तुम ध्यान दोगे?
३ व्यायाम किसे कहते हैं ? और व्यायाम करने से क्या
जाम हैं। बतायो ऐसे कौन से व्यायाम है जो लड़कियों
के लिये उचित समझे जा सकते हैं।
४ विनय किसे कहते हैं ? तुम अपने माता पिता गुरु और
सहपाठियों तथा अपने से नीची कक्षाओं के छात्रों के प्रति
इस गुण को किस प्रकार पालन करोगे!
५ मित्रता करने से प्रथम क्या ख्याल रखना चाहिये । समय
-

तृप्या ससार-वृक्ष का बीज है।
का पादर क्यों करना चाहिए और अपना समय किम
प्रकार व्यतीत करना चाहिए ?
६ संसार में ऐसी कौन सी शक्ति है जिससे
मनुष्य प्रदेश
कार्य में सफलता प्राप्त कर सकता है। 'भारम गर'
क्या अभिप्राय है । तुम्हें अपने दिल में कौन सोमा
लानी चाहिये १
पाठ २४
श्रावक की ग्यारह प्रतिमा
श्रावकों के आचरण के लिये ११ टाबर है।
उन्हें ग्यारह प्रतिमा कहते हैं । श्राप ऊँचेर
पहले से दुमरी में, मरी से तीसरी में रहने
ग्यारहवीं प्रतिमा तक चढ़ता है, और
उसमा
या मुनि हो जाता है । अगली २ प्ररिक
प्रतिमाओं को क्रिया का पालन भी बात
[१] दर्शन प्रतिमा-निर्मल सम्म निर.
तिचार आठ मूलगुणों का पालन न ध्यपनों
का अतिचार सहित स्याग करना गरीन।
इस प्रतिमा का धारी दाहिनाटा
है
यह जिनेन्द्र देव,
देपालप
सिवाय और किसी की मान्यय भी नहीं
निग्रंय गुरु

१२६धमरामनादर, उमाद बालस्य, पाय प्रमाद के लक्षण है जिन धम में उसका दृढ़ विश्वास होता है। उमको किमी प्रकार की शका तथा भय नहीं होता। वह का साधन करके विषयसुखों की इच्छा नहीं करता वह धर्मात्माओं तथा किमी मो दीन दुखी मनुष्य तथा पशुयो को रोगी और मलीन दखकर उनसे ग्लानि नहीं करता । भृढ़ता से देखा देखो कोइ अधर्मी क्रिया नहीं करता । यदि फिमी ममय कोई धर्म से डिगता हो तो वह उसे सहायता दरर धर्म में हद करता है और यथा शक्ति उनका उपकार करता है तथा सन्चे ज्ञान का प्रकाश का धर्म की प्रभावना करता है। भूल कर भी अपनी जाति, कुल, धन, बल, रूप अधिकार विद्या और तप का गर्व नहीं करता । निरभि- मानी और मन्द पाया रहता है। यह कुगुरु कुदेर को चन्दना नहीं करता तथा पीपल पूजना, क्लम, दावात तथा रुपये पैसे का पूजना श्रादि लोक मूदता नहीं करता। कुगुरू, कुदेव, पुशास्त्र व इनके भक्त जनों को प्रशसा तथा सगति इस प्रकार नहीं करता, जिससे उसके सम्य- ग्दर्शन म दोष लगे। इस प्रकार सब प्राणियों से प्रेम रखते हुए। वह अपने श्रद्धान की रक्षा करता

-
एक पल व्यर्थ सोना एक भव हार जाने के समान है. १२७
[२] व्रत पतिमा-५ अणुनत अहिंसा, सत्य, अचौर्य,
ब्रह्मचर्य, परिग्रह परिणम ।
३ गुणनत दिग्नत, देशनत, अनर्थ
दडवत।
४ शिवबूत सामायिक, प्रोषधोपवास,मोगोपमोग परिमाण
अतियि सविमाग । इन १२ व्रतों का पालन करना येत
प्रतिमा है । इस प्रतिमा का धारी व्रती श्रावक कहलाता
है। यह अपने व्रतों म कोई अतीचार नहीं लगाता ।
(३) सामायिक प्रतिमा-प्रतिदिन सवेरे, दोपहर,
शाम को छ घडी या कम से कम दो घड़ी तक निरति
चार सामायिक करना सामायिक प्रतिमा है।
(४) प्रोपध प्रतिमा-प्रत्येक अष्टमी और चतुर्दशी
को १६ पहर का अतिचार रहित उपवास करना और
प्रारम्भ परिग्रह को त्याग करके एकति में बैठकर कन
ध्यान करना प्रोषध प्रतिमा है। १६ पहर का रोड
उत्तम होता है । १२ पहर का मध्यम और
कम
जघन्य प्रोपध कहलाता है।
(५) सचित्त त्याग प्रतिमा-हरी बना दि
कच्चे फलफूल वीज, पचे नगैरह नयनरत
त्याग प्रतिमा है। जिसमें जीव होते हैं:
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-

१२८ आहार विहार धादि में नियत सहित प्रवृत्ति करनी चाहिये
इसलिये ऐसे पदार्थों का जिनमें जीव न हो खाना सवित्त
त्याग प्रतिमा है । इस प्रतिमा का धारी कच्चे जल का
भो त्याग करता है, परन्तु वह स्वय सचित्त पदार्थ
को अचिव बनाकर ग्रहण करता है।
(६) रात्रि भोजन त्याग प्रतिमा-मन बचन काय से
और कृत, कारित, अनुमोदना से गति में हर प्रकार के
आहार के सर्वथा त्याग करना रात्रि भोजन त्याग प्रतिमा
है। इस प्रतिमा का पारी सूरज छिपने के दो घड़ी पहले
से सूरज निकलने के दो घड़ी पीछे तक आहार पानी का
सर्वथा त्याग करता है।
(७) ब्रह्मचर्य प्रतिमा-मन, वचन, काय से स्त्रो मात्र
का त्याग करना तथा निरविचार ब्रह्मचर्य पालन करना
ब्रह्मचर्य प्रतिमा है।
(6) प्रारम्भ त्याग प्रतिमा-मन, पचन, काय से
और कत, कारित, भनुमोदना से गृहकार्य सवधी सर्व प्रकार
की क्रियाओं का त्याग करना प्रारम्म प्रतिमा है इस
प्रतिमाका भारी पूजनार्थ स्नान पूजा व दान कर सकता
(ह)परि ग्रह त्याग प्रतिमा-धन' धान्यादि दस
प्रकार के वास परिग्रह को त्याग कर मतोष धारण करना
परिग्रह त्याग प्रतिमा है। इस प्रतिमा का धारी अपने लिये

१२६
।
चचज चित्त सर विषम दुखों का मुल है।
कुछ आवश्यक बस रख लेता है। काया पैसा पास नहीं
रखता । घर का त्याग कर धर्मशाला में रहता है।
[१०] अनुमति त्याग प्रतिमा-ग्रहस्थाश्रम के किसी
मी समारिक कार्य की अनुमोदना नहीं करना अर्थात्
सलाह नहीं देना अनुमति त्याग प्रतिमा है। इस प्रतिमा
की धारी भोजन के समय जो कोई भी उसे भोजन के
लिये पुलावे उसके यहाँ शुद्ध भोजन कर आता है, परन्तु
यह नहीं कहता कि "मेरे लिये अमुक भोजन, पनादो।"
[११] उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा पन में या मठ में तपश्च
रण करते हुए रहना, खड वस्त्र धारण करना और मिक्षा
घृत्ति से पोग्य थाहार लेना उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा है।
इस प्रतिमा का धारी अपने निमित बनाये हुये मोजन
को ग्रहण नहीं करता है। इस प्रतिमा के दो भेद हैं:-
चुल्लक योर ऐलक
[१] सुल्लक उचित समय पर अपनी डादी आदि के
केश उस्तरे र कैंची से कतरवाते हैं, लगोटी और उसके
साय एक प्रोछ। चादर वया कमडलु और पोछी रखते हैं।
ये गृहस्थी के यहाँ बैठकर किमी पान में मोजन करते हैं।
[२] ऐलक-यह केशों का लोंच करते हैं, और केवल
लगोटो धारण करते हैं तथा कमडल पोछी

६ यताभो मझधारी कौन से प्रतिमा के धारी हैं? और उनके
१३. समस्वमाली के मिलने को ज्ञानी लोग एकान्त कहते हैं।
गृहस्थी के यहाँ बैठकर अपने हाथ में ही भोजन करते है।
प्रश्नावली
१ प्रतिमा रिसे कहते हैं और इसके कितने भेद है। नाम
मतायो। पहली प्रतिमा के धारी के लिये क्या र करना,
और क्या २२ करना जरूरी है ?
जप दूसरी प्रतिमा में सामायिक व्रत और प्रोपयोपवास बत
धारण कर लिये जाते हैं तो फिर सामायिक प्रतिमा और
प्रोपर प्रविमा जुदा र क्यों रवी ?
३ प्रतिमा का पालन कौन करते हैं ? एक मनुष्य सचित्त त्याग
प्रतिमा का पारी है वो बतायो वह और कौन सी प्रति
मानों का पालन करता है?
४ सचित्त किसे कहते हैं ? पाँचवीं प्रतिमा का स्वरूप क्या है ?
इस प्रतिमा का पारी कक्षा जल पीता है या नहीं ? उत्तर
कारण सहित लियो।
५ पटी प्रतिमा में रात्रि भोजन हा निषेध किया गया है,
इससे पहली प्रतिमानों का धारी रात्रि को भोजन कर
सकता है या नहीं ? यदि नहीं तो फिर इस प्रतिमा में क्या
विशेषता है?
फ्या २ नियम है?
माठवी प्रतिमा का पारी क्या २ पाम कर सकता है और
क्या नहीं?
८ नयाँ प्रतिमा के धारी का क्या कच्च है। इस प्रतिमा का
धारी पर में रह सकता है या नही और क्यों ?
। पषी प्रतिमा का पारी पार्मिक कार्यों में अपनी अनुमति
देगा या नहीं?

गि यिना संसार नहीं और संसार बिना राग नहीं । १३१
१० (क) उद्दिष्ट त्याग प्रतिमा किसे कहते हैं । इस प्रतिमा के
धारी के लिये भोजन का क्या नियम है?
(स इस प्रतिमा के कितने भेद हैं और उनमें क्या अंतर है?
पाठ २५
' नीति के दोहे (पं० द्यानतराय जी)
-
नर की शोभा रूप है रूप शोभ गुणयान ।
गुण की शोभा ज्ञानते, ज्ञान छिमात जान || १ ||
चेतन तुम तो चतुर हो, कद्दा भये मति हीन ।
ऐसा नरभव पाय के, विषयन में चित दीन॥॥
निशि का दीपक चन्द्रमा, दिन का दीपक भान!
कुल का दीपक पुर तिहुँ जगदीपकमान 21
घर की शोभाधन महा, धन की शोभा नान।
सोमै दान विवेक सो छिमा विवेक प्रदान
फला पहत्तर पुरुष की, ताम दो सहन
एक जीव की जीविका,दूजे जीव BEITT
मोष समान न शन है, क्षमासमान न
निदा समानन गिलान है, प्रमुफे समर
रुखाभोजन करज सिर और निक
चौधे मैले कापडे, तरका
उद्यम बिन अरु माँगना, पेटीचन्द्र
सब दुसजिन के मिट गोता.
'दाना दुश्मन ह भला, जो
डे भाग्य त पाइये, athaxEL :

१३२ युवावस्था का सर्वसग का परित्याग परमपद को देता है। धन जोरे वेंच नहिं, उघ दान ते होत सागर नीचे ही रहे, उपर मेघ उदोत ॥ १० ॥ प्रश्नावली 'नीर के दोहों से क्या अभिप्राय है ? और इन दोहों में बनाने वाले कौन हैं? २ तीनों लोकों में प्रकाश करने वाली कौन सी वस्तु है ? * मनुष्य के लिये किचनी फलायें होती हैं और उनमे मुरय कौन सी होती है। ३ इस ससार में सब से अधिक शत्रु और मित्र कौन है ? ४ ससार मे मनुष्य किस प्रकार ऊँचा धनसक्ता है ? ५ नीति के दोहों से अपनी पसंद पे ४ दोहे मुसाम सुनाओ। पाठ २६ वीर विमलशाह चोर विमलशाह पाटन के वोर मन्त्री के पुत्र थे। पिता के दीक्षा लेने पर विमलशाह को माता वीरगती अपने पुनों को लेकर पिता के घर चली गई। उसके भाई की स्थिति ठीक नहीं थी। विमल अपने मामा के माथ खेती करता था। वह बहुत पराक्रमी था। उसने घाण विद्या म अच्छी निपुणता प्राप्त करली थी । उनका नैपुण्य और पराक्रम देखकर श्रीदच सेठ ने अपनी पुत्री के साथ विवाह कर दिया। विवाह के पश्चात् वीरमती और विमलशाह पुन. पाटन में रहने लगे। N

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गुणियों के गुणों में अनुरक्त
होयो।
एक बार पाटन में राजा की ओर से चोगेत्सव हो
रहा था। विमल ने वहाँ चाण विद्या के अनेक अद्भुत
पराक्रम दिखलाये, तब भीमदेव राजा ने प्रसन्न होकर
विमलशाह को दएडनायक बनाया।
रिमलशाह एक सफल सेनापति हुभा । उसने
अनेक युद्धों में विजय प्राप्त करके कीर्ति बढ़ाई थी। यह देख
कर राज्याधिकारी पड़े बुदने लगे और उसे मारने के भनेक
प्रयत्न किये । विमलशाह के विरुद्ध राजा के भी कान
भर दिये गये। एक बार एक सिंह छोड़ कर विमलशाह
से पकड़ने को कहा गया । विमलशाह ने पढ़ी ही वीरता
से सिंह को पार कर पीजरे में बन्द कर दिया।
एक बार मन्लयुद्ध मे भी रिमलशाह विजयी हुए
तव मनो तया अधिकारियों ने कहा कि विमलशाह के
माप दादों ने राज का ऋण लिया था यह अभी तक
अदा नहीं हुया है। रिमलशाह यह असत्य प्रारोप सुन
कर राज्य सभा में से चले गये और चुनौती दी कि राज्य
से जो हो सके कर लेवे।
एक वार चन्द्रावती के उद्धव राजा घधुक पर भीमदेव
फो विजय प्रास करने की इझी परन्तु इमक लिये विमल
शाह के मिवाय अन्य कोई वीर दिखाई नहीं दिया, तब
राजा भीमदेव ने पुन रिमलशाह को मान पूर्वक
युद्ध करने को कहा
पुलगाया और

३४ भारत आत्म थल से सब कुछ जीत सकता है।
चोर विमलशाह ने देशभक्ति से प्रेरित होकर यह
अपने हाथ में लिया और धधुक पर चढ़ाई करदो ।
वक अपने प्राण पका कर भागा । रिमलशाह ने
मदेर की जय घोपणा की और सामिभक्ति का
दर्शन करते हुए सोलको राज्य का झंडा फहरा दिया।
सके पश्चात् विमलशाह चन्द्रावति में ही रहने लगे, और
बार की बहुत सुन्दर रचना की।
इसके पश्चात् इसी रणवीर न पा पर्वत पर अठारह
रोह तीस लाख रुपया खर्च करके जैन मदिर
नवाये जो माज विमलशाह की रिमन कीर्ति का
मरस दिला रहे हैं और जैन समाज का गौरव और
शमसार भर म उज्जल कर रहे हैं।
इस प्रकार पिमलशाद वीर होने के माथ ही एक
महान् धर्मात्मा भा थे। वे सिंह जैसे पराक्रमी और बलवान
२, परन्तु उनमें सिंह जैसी क्रूरता नहीं थी।
प्यारे चालको ! तुम भी वीर विमलशाह की भांति
अपने पूर्ण बल पौरुप को पढ़ानो और अद्भुत
लौकिक तथा पारमार्थिक कामों को करने के लिये अपने
को वीर साहसी पनायो।
१ वीर विमलशाह कौन थे?
२ उनकी चोरता और पराक्रम के कारनामे सुनाओ।
३ विमल शाह की कीर्दि के स्मारक आज क्या हैं? ।
प्रश्नायली ।
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Jain Dharam Shikshavlli Bhag 4

Author
Jain,ugrasen
Title
Jain Dharam Shikshavlli Bhag 4
File name
Jain Dharam Shikshavlli Bhag 4
Text
OCR done
Citation
1949
Published
2011/03
Publisher
Dehli,bharatvarshiya Digambar Jain Parishad Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Classification
Devotional
DLI number
551890
Barcode
4990010032586.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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