Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Karmgranth Part 1

Ummedchand Raychand · 2011/07

PDF Proofread

Front matter

No text on this page.

INIKETICSY श्री कर्मग्रंथ.- प्रथम नाग जैन पाउशालाथोमांजणवाना उपयोग सारु Seks- हपावी प्रसिद्ध करनार, मास्तर उमेदचंद रायचंद खनात निवासी श्री जैन ज्ञानवर्धकशालाना पार्षिक सिक. अमदावाद. xxxxx संवन् १९६८ वीर संवत् २४३८ सने १९१२ सर्व हक स्वाधिन. श्री लक्ष्मी मिन्टंग मेसमां चा मगीगाल उगरचंदे छाप्यु. प्रण दरवाजा-अमदावाद. किंमतहसीओ FINITax IAS

नथी, नरक नथी, एवं घोलनारा नास्तिकोनु खमन करनार था
कर्मग्रंथो ठे.
था कर्मग्रंथनी टीका श्री देवेंसूरि महारांजे करेसी ने
थने तेनो चाळाववोध श्री जयसोम महाराजे करेसो ठे, ते या-
ळावयोध जीमसीद माणेके प्रकरण रत्नाकरना चोथा नागमा
उपावेतो , ते घणो लंबाण दोवाथो तथा तेनी कीमत वधारे
होवाथी घणाखरा लोको तेनो उपयोग करी शकता नथी. तेथी
अमोए ठपावेला पंचप्रतिक्रमणनी पद्धतिए उपायबा केटलाएक
ज्ञानरुची सद्गृहस्थोनी सूचना थवाथी या पुस्तक उपाववानो
में प्रथम प्रयास कयों ठे, कर्मग्रंथ संबंधी अनुनब में पण तेज
पुस्तकमांथी मेळव्यो हतो. अने मारो धंधो पण धर्म संबंधी
शिक्षण थापवानो होबाथी ते विद्यार्थीयोने केवी रोते शिखg
सुगम पमशे तेनो अनुलव थवाथी ते पुस्तकनी, तथा केटलेक
ठेकाणे जीवविजयजीकृत वालाववोधनी मदद स ा कर्मग्रं-
थर्नु पुस्तक वनाववामां आव्यु ठे.
अमोने श्राशा ठे के अमारं पंचप्रतिक्रमण जेम लोकप्रिय
था तेनी उपरा उपरी पांच आवृत्तियो काढवानी जरुर पही
ठे तेम या पुस्तक पण लोकप्रिय थ पम्शे.
था पुस्तकमां मारी मति दोपथी, दृष्टि दोपथी, तथा मु-
जित दोपयो जे कांश जिनाझा विरुक लखायुं होय तेने माटे
क्षमा मागी विनंति करुंतुं के तेमां रहेली खामीयो खखी मो.
कक्षवा तस्दी लेशो के जेथी वीजी थावृत्तिमा ते सुधारी शकाय.
सी. प्रसिद्ध कर्ता.
:-
2

५ १२ १२ शुद्धिपत्रक. રીટી भशुद्ध गुदा १३ पंजना परनु स्वरूप हटानयी बनावी सफाय नही परंतु पाळफोने समजारा सारु स्पादि बतान्या थे. अनंता पर्याय. असंख्पाना पर्याय. २८ पडुन पप-पाटो पव-पाटानी जेम अरपिझानावरणीय भने अवधिज्ञानावरणीय, मनापर्यवज्ञानावरणीयअने ३ मंग्वलन अनंतानुसंधी पयाप्तना. पतिना०, . पंदर मति मोठी थाप वीस प्रकृति ओछी थाय पीनार था पीनां प्रायया तथा तेनें: तेनी साये जोडतांत्रण थयां हवे ए एने हवे ए प्रगन २१. यज-पीने 'वज्ज-बनने सिणिद-रक्ष (लुखो) सिणित-चीफणो २८ ३५ ४ ७ पादर अपर्याप्ता यादर पर्याप्ता ४ ४८ वादर पृथ्वीकाय पादर पर्याप्ता पृथ्वी काय औदारिफ पंधन ना० भीदारिफ औदारिक घंधन'ना० बंकना अंकता ४९ रुदो रहो भप रहिमो मय रहियो २४ अमदा अनहा वैक्रिय अने आहारविना वैक्रिय अने आहारक २१ अयश नाम कर्म सतर सनर ८४ दिरणायंत्रमा ६८-६३-६७ ६९-६३-५७ १२ सास्वादनेन सास्वादने नज २५ स०७४ मि०७४ सम्यकई ७१ सभ्यस्त्वे ७७ यश नाम कर्म १ PAL श तथा बंध, उदय, उदीरणा अने सत्तादि नेदे करी ग्रंथर्नु रचवू तेने कर्मग्रंथ कहीए, तेमा प्रथम कर्मविपाक नामा प्रथम कर्मग्रंथ ते कर्मना पुद्गल अंजन चूर्णथी नरेला दावमानी पेठे सर्व लोकाकाशमां निरंतर व्यापी रहेलाठे तेनो कीर नीरनी पेरे तथा अग्नि अने सोहनी पेरे आत्मानी साथे संबंध तेनो अनुन्नब जणावनाएं जे शास्त्र तेने कर्मविपाक कहीए. सिरि वीरजिणं वंदिय, कम्मवियागं समासओ वुद्धं ॥. कीरई जिएंण देनहि; जेणंतो जन्नए कम्मं ॥१॥ सिरि-श्री, लक्ष्मी घुच्छं-कही जेण-जे माटे वीरजीणं-महावीरस्वामी फीरइ-कराय तो-ते मारे मंदिय-बांदीने कम्यविवागं-कर्मविपाकने जिएण-जीवकरीने मनए-कवाय समासमो-संक्षेपयी हेहि-देतुए कम्म-कर्म थर्थः-केवलज्ञान रूप लक्ष्मीए करी सहित एवा श्री वीरप्रनुने बांदीने कर्मनो जे विपाक एटसे कर्मनुं स्वरूप जणा- वनारो जे ग्रंथ तेने संक्षेपे करीने कदीश जे माटे जीवे हेतुये करी कराय ते माटे ते कर्म कद्देवाय ॥१॥ पय विश्रस पएसा तं चनदा मोअगस्स दिता॥ मुखपग उत्तर, पगइ अमवन्न सय नेअं॥२॥ नन पगाह-मममातिभाट दि-स्थिति पादा-चारमा उत्तरपगा-गरमहाति रस-रस मोमगरम-पोदाना भरसममप-पासोमारन परमादेर दिना-नान | भैभ-भेदे पप-महानि ३ - थर्प:-प्रकृति पंध, स्थिति पंध, रस पंध थने प्रदेश पंध पम ते कर्म चार प्रकारे मोदकना (सामुना) दृष्टांते जावई तेनी मूल प्रकृति थाप थने उत्तर प्रति एकसो श्रावन नेदे होय ॥२॥ ॥ पोदाना रष्टाने फर्मना पार भेद सपनाचे थे.॥ महानिरंपा-मेम रिफड (एंड, परी, पीपर)नो लाइ पनान्यो होप सेनो स्व- भार पुरानो होय वेम कोइ कर्मनी सभाव शानने आवरण करे, फोरदर्शनने आररण करे से. स्थितिधः-जैम कोर ला दिवस, कोइ दश दिवस सुधी पगडे.नहीं (नाश पामे नहीं) तेप कोइ कर्म अमुक मुदत मुधी रहे ते स्थितिबंध फहेबाप. रमपा-म को साइनो रस पीगे, कडवो रोप तेम कर्म पापती वखते कपाय मेरो दिम, मंद, शुभ, अशुम, होय तेवो नो रस पंप कहीए. प्रदेशधः-मेम कोइ लारपां प्रदेश (कण) पोडा होप कोइमां पधारे होप तेम कोइ कर्मना पुदगल पारे होप कोइना ओछा होप ते प्रदेश पंध कोवाय, ॥ वे कर्मनी एकसो महावन मकति गणावे . ।। शहनाण दसणावर, ण वेअमोहाननामगोआणि॥ विग्धंचपणनवज्य, वीसचनतिसयदुपणविदं ॥३॥ भाउ-आयु नाम-नाम अहवीस-महावीस दंसण-दर्शन गोमाणिनगोत्र चर-चार विग्य-अंतराय तिसप-एकसो प्रण चेभन्दनी पण-पांच दुपण-पे तया पाप मोह-मोहनीय विह-भेद थर्थः-अदीयां पेदेखं झाना वरणीय, वीजु दर्शनावरणीय, श्रीजु वेदनीय, चोथु मोदनीय, पांचभु थायुःकर्म ग्वं नामकर्म, नाण-ज्ञान आवरण-आवरण नव-नव १ तथा बंध, उदय, उदीरणा अने सत्तादि दे करी ग्रंथर्नु रचन तेने कर्मग्रंथ कहीए, तेमां प्रथम कर्मविपाक नामा प्रथम कर्मग्रंथ-ते कर्मन पुद्गल अंजन चूर्णथी नरेला दावमानी पेठे सर्व लोकाकाशम निरंतर व्यापी रहेलाठे तेनो कीर नीरनी पेरे तथा श्रग्नि अने सोहनी पेरे श्रात्मानी साथे संबंध तेनो अनुन्नव जपावना जे शास्त्र तेने कर्मविपाक कहीए. सिरि वीरजिणं वंदिय, कम्मविवागं समासओ वुद्धं ॥ कीरई जिएण देनहिजेणंतो जन्नए कम्मं ॥१॥ सिरि-श्री, लक्ष्मी बुच्छं-कहीश जेणे-जे माटे वीरजीणं-महावीरस्वामी फीरइ-कराय तोते माटे बंदिय-चांदीने कम्मविवागं-कर्मविपाकने, जिएण-जीवेकरीने भन्नए-कवाय समासमो-संक्षेपयी हेहि-देवए फम्म-कर्म अर्थः केवलज्ञान रूप सक्ष्मीए करी सहित एवा श्री वारमनुने चांदीने फर्मनो जे विपाक एटले कर्मनुं स्वरूप जणा- वनारो जे मंथ तेने संक्षेपे करीने कहीश जे माटे जीये हेतुये करी कराय ते माटे ते कर्म कद्देवाय ॥१॥ पय विरस पएसा तं चनदा मोअगस्स दिता॥ मुखपग उत्तर, पगइ अमवन्न सय अं॥२॥ पपा-प्रकृति मलपगार-मलमतिमार विध-रियति গা-খাসা उनरपगा-गरपति मोमगरम-मोदना भासनमय एकसोभमारना परमार सिंता-रात । भेभ-भेद ३ अर्थः-प्रकृति पंध, स्थिति पंध, रस बंध थने प्रदेश : एम ते फर्म चार प्रकारे मोदकना (सामुना) दृष्टांते नावयु तेनी मूल प्रकृति पाठ थने उत्तर प्रकृति एकसो श्रष्टावन नेदे होय ॥२॥ ॥ मोदकना दर्शने कर्मना चार भेद समनाने हे ।। महातपंपः-मेम त्रिकटु (संड, मरी, पीपर)नो लाइ पनान्यो होप नेनो स्व भार पापु हररानो होप सेम कोइ कर्मनो सभार मानने आवरण करे, फोरदर्शनने आवरण करे ते. स्पिनियंपा-मम को मार दिरस, कोई दर दिवस सुधी पगडे.नहीं (नाश पामे नहीं) नेम कोइ फर्म भमुर मुदत मुधी रहे से स्थितिपंप कहेवाप. रमरंप-नेम कोर साहनी रस मीठो, कस्बो होप तेम कर्म बापती वखते पाय मेरो तिम, मंद, गुभ, अशुम, होप तेवो तेनो रस बंध कहीए. प्रदेशपंधः-नेम कोई लामा प्रदेश (कण) थोडा रोप कोइमां पधारे होय तेम कोई कर्मना पुदगल पारे होप कोइना ओण होप से मदेश पंष कोयाय. ॥ व कर्मनी एकसो महावन महति गणावे 0.॥ शहनाण दंसणावर, ण वेअमोहाननामगोआणि॥ विग्धंचपणनवअ, वीसचनतिसयदुपणविहं ॥३॥ इह-मही आउ-आयु, अहवीस-महावीस दंसण-दर्शन गोपाणि-गोत्र आवरण-आवरण विग्य-अंतराय तिसप-एकसो प्रण वेभ-वेदनी पण-पांच दुपण-पे तया पाच मोह-मोहनीय बिह-भेद थर्थः-थहीथा पेद्देशाना वरणीय, वीजु दर्शनावरणीय, त्रीजु वेदनीय, चोथु मोहनीय, पांचभु थायुःकर्म ग्वं नामकर्म, नाण-ज्ञान नाम-नाम चउ-चार नव-नव ४ सातम गोत्रकर्म अने थाव,.अंतराय ए कर्मना श्राउ मूख जेद कहा. ए थावे कर्मना थनुक्रमे पांच, नव, ये थहावीस, चार, एकसो नप, वे थने पांच एम कर्मनी एकसोने अहावन उत्तर प्रकृति के. मानावरणीयः जे कर्म मानने आवरग करे एटने ज्ञान न पा दे ते. दर्भनावरणीयः-जे कर्म दर्गन (देख ते), आररग करे ने. पेदनीयः- कर्मपी मुख दुःस मोगराय ते. मोरनीया-ने कर्मयी मोरेकरी पोताना दिन मालिनी विचारणा करीन काय. मापुरम:- कर्म बीना भरने विप उदय आरे एटले बीमा कर्म पग पीना मरना उदप मारे गरी अने कोइ न पण मारे परंतु भायः मो माश्य. पता परमा उदय आवे. एदले ने कर्मना उदयपी मारता भरमा मनुक मुदत मुधी ही काप ने. नापा:- कर्मना उपयी भीत ने गति के नानिमा दोग तेने भोसरी. मता:- कर्मना उदपयर्या नीर पोताना गुगरहे उप नागपगुमान की मंगरम:- कना रदयी नीव दानादिक भाग्मानी मपिषी मानकरी नहीं ने. ॥ न करनी नदीजी नर मातियो पर .॥ मामुपोहो मण के, यसाणिनाणापितहमश्नाण ॥ वंजणवग्गढ़ घनदा, मणनयाविणिदियचनका ॥४॥ मा-विधान नागागि-गान सुषमान मन- पग- बीमार पहनाम-निशाना मिना पर-बरन गागर-नारमा रामनारास पामा या- अर्थ:-मनितान, तहान, यधिदान, मनःपक्षान, হন ন ই বা ন , নবম মনিলা ধ্ব- मग-पन कावीस नेद जपावे . चार प्रकारे व्यंजनावग्रह. मन भने चा विना चार इंजिना श्रवमद ए चार प्रकार व्यंजना मदना ॥४॥ पातेहाना-पांच इंदिप भने एटुं नोइंदिप मन ए बडे. वस्तुनु सामान्य वि- मोप नाण. श्रुतमानः- पस्तु नागी तेना जूदा ज्दा पर्यापोर्नु जे ज्ञान ते. अरपिताना-इंदिपादिफनी अपेक्षारिना दव्य, क्षेत्र, काल अने भाव ए पारनी मादार ने रुपी दम्पनुं ज्ञान याप . मनापर्यशानः-समि पंचदिना मनोगत भाग्नुं जाग ते. केरलमानः-लोकालोकने विपे रहेला रूपी अरूपी सर्व पदार्यो जे संपूर्ण मान यापते. ॥ मा प्रथम पतिशानना महासि भेद कहे छे.॥ पंजनावग्रहः-स्पर्शनादिके फरी वस्तुनो जे अत्यंत अव्यक्त पोप ते. नेम कोई वस्तु हायमा लेरायी टाही, उनी, हलकी, सारे लागे तेनुं जे ज्ञान ध{ ते सदिनो अवग्रह. फडरो तीखो स्वाद जीभना स्पर्शयी जाग्यो ते रसें- दिनो अवग्रह, तथा सुगंप माणदिना स्पर्शयी जाप्यो ते माणदिनो अवगा, कोइए साद फों तेना पुद्गल कानने फरस्पा तेथी सम्दनुं नागपशुं थ' से मोहिनो भवग्रह एस धार इदिभोनो व्यंजनावग्रह होय छे; परंतु मन तपा धभुदिनो पंजनावग्रह नपी कारण-नेम कोइ शीसानी अंदर पाणी भर्प दोपतो ते जाणवाने सौ फरवो पहतो नपी. परंतु मन अने चक्षुषी से भागी संकाय ऐ नेपी से थे इंदिनो मनावग्रह नपी माटे मन भने चक्षुविना पारइंदिमोनो व्यंजनावग्रह छे. अध्युग्गदश्हावा, यधारणाकरण माणसेहिं व्हा ॥ अ अध्वीसनेअं, चन दसहावीसहाचसुअं ॥५॥ घरा-कारे घरदसहा-पदभेद इहा-रहा इभ-एम बीसता-पीसभेद पवाय-अपराय अहवास-महानीस धारणा-धारणा घ-भपरा करण-रंदियो भेभं-भेद मुभमनमानना अभ्युग्गह-अर्याचा अर्थः-एक अर्थावग्रह, वीजी इहा, बीजो अपाय थने चोथी धारणा ए चार जेद, पांच इंजि अने मन ए उना ते. एटले ए चोवीस नेद व्यंजनावग्रहना चार लेद साथे मेळ- वतां कुल अहावीस नेद मतिज्ञानना थया अने चोद तथा वीस प्रकारे श्रुतझान होय ॥ ५ ॥ अर्यावग्रह-वस्तुना अर्थ- ग्रहण कर ते अर्यावग्रह. जेम कोई वस्तु आपणा शरीरे अडकी तेयी जाण्युं जे कोइक वस्तुनो स्पर्य ययो एवं जे सामान्य अव्यक्तनान ते अर्यावग्रह. इहा-जे वस्तुनो अर्यावग्रह ययो ते अमुक हो ए जे जाणवू ते. अपाय-ते इहित वस्तुनो निश्चय करवो के आ फलाणीज वस्तु छे ते. धारणा-जे वस्तु निश्चय फरी तेने हृदयने विपे धारी राखवी ते. उपरना भेद दृष्टांत आपी समजावे छे. गेम आपणे कोइ वस्नु मामां मुझी तेनो सर्श जीमने धयो सेयी रसनेंद्रि- पने अति अव्यक्तपणे रसनुं ने ज्ञान ययु ते रमनेंद्रियनो व्यंजनावग्रह, त्यार पछी नागवामां आव्युं जे आ फाइक ससाद जणाय छे. ते अर्यावग्रह, त्यारपछी एम लाग्यं के वी लागे छे माटे मरी के पीपर हो, ते इहा. त्यारपछी एम नकी क के ए पीपरन छे ते अपाय, पछी तेने पारी राम के पीपरनो स्वाद एवोन रोप ऐ वे धारणा, ए ममागे वीसी इंदियोना भेद पण नाणी लेरा. व्यंजनारनदनो काल अंतर्मुहर्न ममाण होय छे. अविप्रनो काळ एक समय प्रमाण होप ऐ. इहा अने अपायनो काल पण अंतर्मुह प्रमाण होप छ, अने धारणानो असंव्यात काल ममाण होय . ए रीने पनिझानना महावीस भेद फरीथी जगावे . फरमादिना-व्यंजना प्रह-प्रविग्रह, हरा, अपाय, अने पारगा रमेदिना- प्रादिना- मोदिना- परराग्निा- ." " " " " " ५ " " ४ ४ पना- " S ४ चार मारेयं मना वग्रह, ६ प्रकारे अपविग्रह, ६७ प्रकारे हा, ६० सारे अपाय, अने ६ ७ प्रकारे पारणा. व भुत मानना घदि भेद दखारे छे. अकरसन्नीसम्म. साश्रंखलुसपज्जवसिअंच ॥ गमिअंअंगपविठं, सत्तवीए एसपमिवरका ॥६॥ भाकर-मारभुत सपग्नवासिभं-सपर्यव अंगपविहं-अंगाविष्टभुत समी-सहीभुत सितभुत मत्तविए-सात मम्म-सम्परथन च-भने साइभ-सादिथुन खलु-निश्चय गमिभं-गमिथुत सपडिवरूखा-प्रतिपक्षसहित अर्थः-थहरथुत, संझिश्रुत, सम्यक्श्रुत, सादिश्रुत, सप- पवसितश्रुत, गमिकश्रुत, अंगप्रविष्टश्रुत, ए सातने प्रतिपक्ष सहित करीए एटसे अनदरभुत, असंज्ञीश्रुत मिथ्यात्वश्रुत, थनादिश्रुतं, थपर्यवसितश्रुत. थगमिकश्रुत, अनेअंगवाह्यश्रुत, ए चोद नेद थया. ॥ ६॥ १ अरमन:-तेना प्रग भेद छे १ संघातर ते अहार प्रकारनी लिपि प्रमुख लखवू ते. २ व्यंजनासर ते अकारादि उच्चारथी जे अक्षर बोलाय ते, ३ लब्ध्यार ते सांभळवामी तया नोवायी वस्तु ने विशेष शान याय ते. २ अनक्षरथुतः-खांसी तथा भास आदि क्रियावडे पुरुषादिकनुं जे ज्ञान याप ते. १ संशोथत: संज्ञा ३ छे (१) हेतु पदेशीकी एटले इष्ट अनिष्ट वस्तु जाणीने मति निवृत्ति ते (२) दीर्घकालिफी अटले अतित अनागत घगा का. लनी पिता फरवी (३) रष्टिवादोपदेशिकी एटले जे ने सपोपशम माने फरी सम्यक् द्रष्टिपणुं होय ते ए प्रण संमा मध्येधी ही दीर्घ का- लिका संज्ञा ते संत्रीश्रुत. ४ असंघीयतः-दीर्घकालिकी संज्ञा रहित मनविना इंद्रियथी ने ज्ञान याय ते.

५.सम्यक्यत:-आगम अनुसारे खोयने खोह अने सराने खरं नाणे ते.. ६ मिथ्यात्वतः-मिथ्याष्टिए करी खोटाने खरं अने सराने खोटु नाणे ने. ७ आदिश्रुत-भरत तया अवतक्षेत्र आश्री ज्यारे प्रथम तीर्थमवर्चे ते वखते श्रुतनी आदि थाय ते. ८ अनादिश्रुत-महाविदेह क्षेत्रने विप सदाकाळ तार्यनो विच्छेद न होय. 'तेयी त्यां श्रुतनी पण मादि वया विच्छेद न याय तेषी त्या अनादियुत. ९ सपर्पवसितश्रुत-मरत औरत क्षेत्रने विप तीर्थनो विच्छेद याय त्यारे श्रुतनो पण अंत आवे ते आश्रीने सपर्यवसितश्रुत. १० अपर्यवसितशुत-महा विदेह क्षेत्रने विप तीर्यनो विच्छेदन याय यी त्यां श्रुवनो पण अंत आवे नहीं माटे से क्षेत्र आश्रीने अपर्यवसितात. १. गमिकयुत-दृष्टिवाद प्रमुख जे सरखा पाट अने आलावायी वांधे] ने श्रुत १२ अगमिकत-कालिकश्रुतनी पेठे जेमां पाउ सरखा न होय. . १३ अंगमाविष्टश्रुत-भंग केहेतां ने धार अंगनुं ज्ञान याय ते. १४ अंगवापर्यंत-वार अंग सिवाय उपांगादिकनुं ने ज्ञान पाय ते. ए सिवाय द्रव्य, क्षेत्र, काल अने भाव ए चार भेदे शुतज्ञान छे द्रव्ययी यु. तमानी उपयोगवंत यफो उत्कृषी सर्व द्रव्यने जाणे, क्षेत्रयी लोकालोकने जाणे, कालयी सर्व कालने जाणे, मावी सर्व भावने जाणे. एटले संपूर्णभुत मानी; कवली सरग्वा जाणवा. हवे नमानना पीना वीस भेद को छ. पज्जय अकर पय सं. घाया पमित्रत्तितहयअणुगो ॥ पाहुम्पाहुम पाहुड, वथ्यू पुयाय स समासा॥७॥ पम्नप-पापभुत तहप-नेमन | पाहुर-माभृतयुत आवर-अक्षरधुन अशुभोगो-अनुयोगयुन । वष्य यस्युत पप-पदान मंचाय-मयानभन पारपार-बाभूतमाः । पुयाय-पूर्ववत যাবেন-বিলিয়ন नपुन । ममपामा-ममारामात थर्थः-पर्यापश्रुत, थक्षरथुत, पदश्रुत, संघातश्रुत प्रति पचित तेमन पळी थनुयोगशून, मानृतप्रानृतश्रुत, मान- - तश्रुत, यस्तुश्रुत थने पूर्वश्रुत ए दस नेद तथा ते दरेकनी साथे समास शब्द जोमवाथी वीजा दश नेद थया. जेम पर्यायसमासश्रुत, थदरसमासश्रुत ए रीते दशे नेद जाणी सेवा. एम सर्व वीस नेद श्रुतझानना है. ॥ ७॥ पर्यापश्रुतः-शाननो एक योदामांपोने भाग से एटले मूक्ष्मनिगोदीमा लगि अपर्याप्ता जीपने प्रथम सपये जेटलं जयन्य कुथुत तेथी योजे समपे जेटलो माननो एक अविभाग परिच्छेद अंश वधे ते पर्यायधुत. पर्याप समासभुन:-तेया घे चार पर्याप ते. अक्षरथुतः-अकारादि लभ्यक्षर अनेक व्यंजन पर्याय सहिन जाणवो ते. भार समासयुतः-तेवा पे चार अमरनुं ज्ञान से. पदभुनः-अकारादि स्वर तथा ककारादि पद मळवायी पद (पाप) याय तेनुं जे मान ते. पदसमासथुतः-सेवा अनेक पदानु जे ज्ञान से. संघातधुतः-मार्गणाद्वार मध्ययी गत्यादिक एक मार्गणाना एक गतिना नोव भेदन जे ज्ञान संघात समासधुतः-तेवा एक फरता वधारे गनिना जोर्नु ज्ञान ते. प्रतिपरिश्रुतः-गनि भादिक मार्गणादारमायो एक गतिमा सर्व संसारी जीवना भेद अवतारवानुं ज्ञान. मनिपत्ति समासथतः-उपर काया तेवा एक करता धारे गतिमा संसारी जीवना भेद अवतारवान शान. अनुयोगधुनः-सत्पद रुपणा इत्यादिक अनुयोग कहीए, ते माहेना एकनुं ज्ञान ते. अनुयोग समामथुन:-तेवा एकथी वधारे अनुयोगनू जाणवू ते. माभून प्राभृतथुन:-आभून माभृतथुत ए दृष्टिवादना एक अधिकार (भाग )न नाम छे. तेवा एक भागनुं शान. माभूत प्राभूत समासधुतः-तेचा वे चार पाहुड पाहुइनुं ज्ञान ते. माभृतयुल:-यणा पाहुड पाहुढे एक पाहुर थाप में, तेवा एक पाहुइन शान से मामृत समासभुन:- एक करना वधारे पाहुड (अध्ययनk) जे भान ते. पस्तुभुनः गा पाहुरे एक अध्ययन थाय छे तेवा एक अधपनमान ते. .

१० वस्तु समासथुता-एवा वे चार अध्ययन, ज्ञान ते. पूर्वश्रुतः-उत्पाद पूर्वादिमांथी जे एक पूर्व- ज्ञान ते. पूर्वसमासश्रुतः-एवा एक करतां वधारे पूर्व- अथवा संपूर्ण चौद पूर्वनुं जे ज्ञान ते हवे अवधिज्ञानना भेद कहे छे. अणुगामि वढमाणय, पमिवाईयर विदा व्हा ही। रिजम बिजलमईमण, नाणं केवल मिगविहाणं ।।। अशुगामि-सायेचालनार। इयरविहा-विपरित भेदे । विउलमइ-विपुलमति वमाणय-वर्द्धमान(वघत)/ हा-छ प्रकारे मणनाण-मनःपर्यवज्ञान पडिवाइ-प्रतिपाति (आ- ओही-अवधिज्ञान केवलं केवल वीने पाछु जाय ते) रिउमइ-ऋजुमति इगविहाणं-एक भेद अर्थः-अनुगामि, वर्द्धमान, थने प्रतिपाति एत्रण तथा तेथी उत्तर एटले धनानुगामि, हियमान, तथा अप्रतिपाति ए प्रकारे अवधिज्ञान . थने ऋजुमति तथा विपुलमति ए ये प्रकारे मनःपर्यवज्ञान . तथा केवलज्ञान एक प्रकारे ॥४॥ अवधिमान पे प्रकार छे. एक गुणपत्ययिक अने पोर्नु भयमस्पपिक. गुणमस्पपिक मनुष्य तया तिपैचने होप छे. अने मामापयिफ से नारकी सपा देवनाने होय अनुगामि-जे क्षेत्रमा अवभिन्मान उपन्यु होय भने ते पार दिशाभो तरफ जेटला क्षेत्र- ययुं होय तेदलु ते क्षेत्र ोडीने पीने गमे ते ठेकाणे माप तोपग धारे दिशाए सेग्लं देखें, एटाखे यो माप त्यो पानी पेठे सापे मारे अनानुगापि-जे क्षेत्रमा जेटली मर्यादा गुरी, अवधिमान पोप ते मर्यादा मोटंगी त्यांरी पाने क्षेत्रे नाप नो देवी के नहीं दिया दीनी पेठे, पटमान:- दिवमें सिम भाय. पपान:- दिवम दिवम घर नाय, तिनि:- पानि पहन पाईने गारपीमाल पराम्प होने देगी पर अने दी भावनापानी परें एक पासमान र. मानि:- मार भार्ग नाय नमाज पोर राम्प सोहमे दो भने.

भलोपना पण एक प्रदेशधी मारी भतपादो भमोर देखे. परी अरविमानना ए भेदणे, भने दय, क्षेत्र काल भने भाषयी तेना असंरूप भेद पण पा सके , अवधिमानधारी नपापी अनंता कपीदव्यने नाणे देखे भने उत्कष्टण सर्व सीदव्यने नाणे देखे. क्षेत्रपी जयन्यपणे मंगला असल्पानमो भाग भने उसएपी अल्पात लोकाकाशने नाणी देखी सके. कालपी मागलिना अमापातमा भाग जेटलं अतित अनागत काल नए- म्यपी भने उत्कटपणे असरूपाता काळ अतित अनागत कामना भावने माणे देखें. भाषयी जपाय नपा उटपणे अनंत भावने जाणे. बिगान मे अवधिशाननी जाति ऐ पण ते मिथ्यालीमाधी वापी महीनो सेपी चीपरित जाणे, हये पन:पर्यवज्ञानना भेद कहे थे. (१) अनुमनि-समी पदिना मनोगत भाप सामान्यपणे जाणे हे. एटछे से माणसे अमुक यस्तु मनमा विनवी हे. (B) रिपुलमति-जे पन्नु चिनवेली . ते अमुक जाग्याए अनक माणसे पना- बेली, पगेरे घणा पर्याय सहित भाणे. ९५ प्रकारे मनःपमान सर्व विरतिनेज होप. व्यपफी नुमनि अनंत प्रदेशी स्कंध लेने नाणे देखे भने विपुलपनि तेहीम कंपो विश्वपणे जाणे देखे, क्षेमयी अनुमति तिन्ही दिगिमा भी दोष सुधी उ ज्योतिपीना अपरना पर धी, अने नीचु समप्रभा बीना शुद्ध पर लगी हारसे योगन मुपीना समिपंदिपना पनोगन भाइ भाणे भने विपुलमति सेयी भी अंगुल पधारे जाणे. कालपी अनुपनि अनिन अनागत मनोगा भार पल्पोपमना मत. पानमा भाग गुधी जाणे भने विपुलमनि सेयी काइक पधारे माणे भावी काजुपनि चितयेला द्रव्यना अनंता पर्याप जाणे भने विपुलमति तेयी कारक बचारे जाणे दाये. কৰষ্কাৰ-নিৰ অৰ্যৰ মন বণমান থাঃ গ% কান্তানা ঃ क्षेत्र काल भने भावने नाणे दवं. ए गने जानना ( २८-१४-६-२-१ ) कुल एकावन भेद यया. चना प्रावरण कई. !! एसि जं आवरणं, पमुच्च चरूखुस्स तं तयावरणं ॥

एसिन-ए जान जे पच्च-पाटो ૧૨ दसण चउ पण निदा, वित्तिसमं दसणावरणं ॥ए॥ चलसुस्स-ओखनो चर-चार भावरण-आच्छादन पणनिहा-पांच निद्रा फरनार तयावरणं-तेनुआवरण वित्तिसम-पोळी जेवू दंसण-दर्शनना । दसगावरण-दर्शनावरणीय थर्थः-ए पांच ज्ञानने जे थावरण करे तेने झानावरणी कर्म कहे वे, जेम श्रांखना प्रकाशनुं थावरण पाटो वांधवाथी थाय , तेम ज्ञान- यावरण झानावरणीय कर्मथी थाय . दर्शन चारनां आवरण चार, अने पांच नेदे निमा एम नव नंद दर्शनना , ते दर्शनावरणी कर्म पोळीयाना जेते. ॥ए॥ ज्ञानावरणीय कर्म पांच प्रकारे छे. मतिज्ञानने आवरण करे ते मनिन्नानाव. रणीय तेज शुतज्ञानावरणीय, अवपिज्ञानावरणीय अने केवलज्ञानावरणीय, तया दर्शन एटले सामान्यरुपे वस्तुनो अवयोष ( देख) तेनुं जे आवरण करे ते दर्शनावरणीय फर्म कहेवाय. दर्शन चार प्रकारे छे चा, अचा, अवधि अने केवलदर्शन तेनुं जे आवरण करे तेने अनुक्रमे पक्षुदर्शनावरणीय, अचक्षुदर्शना वरणीय अवधिदर्शनावरणीय अने केवळदर्शनावरणीय कहीए ए चार तया (१) निद्रा (२) निद्रा निद्रा, (३) अचला (४) अचला प्रचला, अने (५) थीणदी, ए पांच निद्रा मळी दर्शनावरणीयना नर भेदयया. ते दर्शनावरणीय फर्म पोळीमा जे छे, जेम कोइने राना पासे मन्दा जहोय पण पोळीभो नवा दे नहीं तेम दर्शनावरणीय कर्मयी देखो शकाय नहीं. चख्खू दिहि अचख्खू, ससिदिय यदि केवनेहिं च ॥ दसणमिह सामन्नं, तस्सावरणं तयं चनहा ॥ १० ॥ घरु दिहि-चक्षुदर्शन । ओरि-अवधिदर्शन तसावरण-तेन भावरण अचरण-भवपदर्शन कवलेच कंबलदर्शन संस-पाकीनी(माख रिना) दसगपिह-रदर्शन तयं नमामे दिप-दिपायो । मापन -मामान्य प्रयोष घमा-बार भेद मुह-मुखे अर्थः-चक्षुदर्शन (थांखवमे देख ते), श्रचतुदर्शन (यांख विना वीजी इंजियोथी घयदुं ते,) अवधिदर्शन थने केवसदर्शन तेनां थावरण पण तेज नामना चार नेदे होय ॥१०॥ भाखरटे देखq ते पक्षुदर्शन, आँख विना पाकीनी चार तथा मनवहे जे पस्तुनुं जाणवु याय ते अचादर्शन जेम आंधळी माणस हाथ फेरवीने जाणे छे के मा फलाणी वस्तु ऐ अथवा मुगंपोथी जाणे के आ मोगरो छे अथवा गुलाब थे, श्रीजु अवधिदर्शन से द्रव्य, क्षेत्र, काल अने भाव ए चार मर्यादामा रहेला रपीदव्पन देखवू ते भने केवलदर्शन ते मई वस्तुनुं देखy. इवे पांच निद्रा फहे छे सुद पमिबोहा निदा, निहानिहाय दुख्खपमिबोहा॥ पथला विनयविठस्स, पयलपयलाय चंकम ॥११॥ दुःखखपटियोहा-दुःखे पेठाने आये परियोहा मतियोष (जाग) जागी शकाय पपलपपलाय-भवलाम- निधा-निद्रा चला निहानिहाय-निदानिद्रा ठिोवविहस्स-उभा तथा| चंकमभो-चालता थका श्रर्थः-मुखे जागी शकाय ते (१) निझा, उखे जागी शकाय ते (२) निभा निझा, उनाने तथा 'गने थावे ते (३) प्रचता, चासतां थकां पण थावे ते (1) प्रचसा प्रचसा, ॥११॥ निद्रा इंद्रियोना अवयोधने रोके छे तेथी तेने पण दर्शनावरणीय कर्म कहीए. दिण चिंतिअथ्थकरणी, थोपदी अचकि अवता॥ महुखित्त खग्गधारा, खिदणं व उदाउ वेषणोकं ॥१॥ दिणचिनि-दिवसे चिंत- अदचकि-चासुदेव लिहणंर-घाटवासरवी घेलो अदयला-अविलवाली अध्यफरणी-अर्थनेफरनारी मलित-मधीप्लेपाली दुहाउ-पे भेदे धीपदी-वीणदो ग्वग्गधारा-खडगनी धार घमणिभं-वेदनीकर्म पपला-मचला - २४ अर्थः-दिवसे चिंतवेतुं कार्य ( रातने समये जागृतनी पेठे) करनारी निना ते थीणही निझा कहीए, ते निझा स- मये ते प्राणीमां अर्द्धचक्री जे वासुदेव तेनाथी अधु वल होय . ( ए रीते दर्शनावरणीयना नव नेद थया हवे वेदनीय कर्म कहे .) मधथी खरमायेली तरवारनी धार चाटवा सर वे प्रकारे वेदनीय कर्म है. ॥ १५ ॥ थीगदी निद्रावालाने घासुदेवथी अरधु वल का ते वऋपमनाराच संघ- यणवालाने जाणवु अने छेवहा संघयणवाळाने तो यमणु त्रमणु जोर वये. वेदनीय वे मकारे-जेम तरवारनी धार मधयी खरडायेली होय तेने जीभवडे चाटतां मधने लीये मीगश लागे तेना जेवू (१) शातावेदनीय एटले मुखनुं भोगवयु. अने धार उपर जीभ फरवायी जीभ कपाय अने तेथी जे भोगर पडे ते (९) अशातावेदनीय. उंसन्नं सुरमणुए, सायमसायं तु तिरिम निरएसु ॥ मांव मोहणि, विहं दसण चरणमोहा ॥ १३॥ ओसन-पाये निरिम-तिर्यच दुविहं-ये प्रकारे मुर-देवताने' निरएम-नारकीनेविप दसण-दर्शन मणुए-मनुष्यने मन-मदिरा चरण-चारित्र सायम्-धाता वेदनीय व-पेठे मोहा-मोदनीय असायं-भशातावेदनीय । माइणी-मानी कर्म । थर्थः-घणुं करीने देवता थने मनुष्यने विपे शातावेदनी. यनो उदय , थने तीयच तथा नारकीने विपे थशातावेद- नीयनो उदय होय . ( हवे मोहनीय कर्म कहे ,) मदिरा (दास)नी पेठे जीवने विकत करे (मुगावे) ते मोदनीय कर्म घे देठे, एक दर्शनमोहनीय थने योजु चारित्रमोहनीय ॥१३॥ भीमा वेदनीयकर्ममा पाप फईबा→ कारण के मनुष्य नया देवगनिमा - पण अशातावेदनीय घेदे पण पणा भागे सातावेदनीय घेदे कारण के तेथे गति पुन्य प्रकृनिनी ऐ तेमन नियंच भने नारकी फोइक पखल शातापेदनीय पंदे जेम कोइ पद के हापी कोइ रामा प्रमुखने त्या होय भने आदर पामे स्यारे ते शातावेदनीय वेदे से. तेम नारकीने पण कल्याणक समये शाता उपजेछे. मोदनीयकर्म-से जेम कोइ माणसे दारु पीयो होय सेने पोताना मला डानी समजण पदे नहीं, तेम मोहनीय कर्मना उदयथी जीवने पोताना हित भ. हितनी खबर पढे नहीं, तेना घे प्रकार छ (१) दर्शनमोहनीप एटले मिथ्या. त्वना उदययी जीवने शुद देव गुरु धर्म उपर रुची थाय नही अने (९) पारिन मोहनीय एटले जेना उदययी धर्म उद्यम करी न शके. दसणमोहं तिविहं, सम्मं मीसं तदेव मिच्चत्तं ।। मुई अझ विसुद्धं, अविसुई तं दवइ कमसो॥१४॥ दसणमोह-दर्शनमोइनीप, मिच्छत्तं-मिथ्यात्व मो० ते-ते तिविह-प्रण प्रकारे मुदं-शोधेलं सम्म-सम्यक्त्व मोहनीय अदविशुदं-अर्द्ध शोधेलं हवा-होय तहेर-तमन अविशुद्ध-अशो' फमसो-अनुक्रमे थर्थ-दर्शनमोहनीय त्रण प्रकारे वे. (१) समफित मोह- नीय, (२) मिश्रमोहनीय, तेमज (३) मिथ्यात्व मोहनीय ते अनुक्रमे शुद्ध, थर्द्धविशुद्ध अने अशुद्ध होय ॥१४॥ ॥से एांत आपी समजावे.॥ कोदरा जे एफ जातनुं धान्य याय छे. ते फेटलाएक एका होप के के ते खापायी मीणो (केफ) पदे छे. परंतु तेना छोतरा कादी नांखी छडीने छात पाणीवडे घेवार घोर नाखीए तो ते शुद्ध थाप . सेम जे जीर मिथ्यात्वी होप से मनना शुभ परिणामे करी मिथ्यात्वना दळीभी काढी नांखी शुद्ध पाप ते समकिन मोहनीय, पीनुं मिश्रमोहनीय त जे कोदरा छोरा फाटो त्या नपी स्पारे सेमा मीणानो काइक भाग रहे ऐ तेनी पेठे यो मुपी मिथ्यात्खनो अंश होय स्पा मुधी विश्रमोहनीय अने धोनुं मिथ्यात्वमोहनीय से तो तदन भान फोदरानी पेठे एक मिथ्यास समकिनमोहनी तत्परचो फराद पग संकारिके सदहा-सह खइगाइ-सायकादि फरी मुंशावे, मिश्रमोहनीयवाळाने तत्वमा पण रुचि न होय अने अनन्त्रमा एग रुचि न होय, अने मिश्यात्वमोहनीपयी कुमार्गने शुद मार्ग लेखे (गणे) जिअ अजिअ पुन्न पावा, सव संवर बंध मुल्ख निकरणार जेणं सद्दहश् तयं, सम्म खगाइ बदुनेअं ॥ २५ ॥ जीव-जीवतत्व संबर-संवरतवं. अजीव-मनीवतत्व बंध-यंचतत्व तयं-तेनुं पुण-पुन्यतत्व मुरुख-मोशतल सम्म-सभ्यकत्व पाव-पापतत्व निजरणा-निरा आसव-आश्रयतत्व -जेणं-जेने बहुमेअं-बहु भेदे हे. अर्थः-जीव, अजीव, पुन्य, पाप, थाश्रव, संवर, बंध, मोक्ष, श्रने निर्जरा ए नव तत्व जैने सदृहे तेनुं नाम सम. कित ते क्षायक आदि बहु नेदे . ॥ १५ ॥ तेमांना केटलाक नीचे वतावे . एकविधसम्यकत्व-तत्यायनी सहगा ते निधयसम्बत्त-मात्मानो शुद मानादिक परिणाम. क्षायफसम्परत्व-चार अनंताधि पाय अने प्रण दर्शनमोहनीय ए सात मतिना क्षययी जे तत्वरुचि प्रगटे ते. आपशपिफसम्यरत-ए सात प्रकृतिने उपशमाये (दबाये ) परंतु क्षय फरी पके नहीं. क्षायोपिकसम्पप-ए सात प्रकृतिनो जेटलो रस उदय आगो तटलो ख. पायो पाकीनो जे उदय नपी आव्यो सेने उपरामायवे करी जे तत्वनी रूचि प्रगटे से. एस पीना बदकादि अनेक प्रकारे सम्परत नाण. मोसा न राग दोसो, जीण धम्मे अंतमुदु जहा अन्ने। नालियर दीव मणुणो, मिहं जिण धम्म विवरीअं ।१६।

महा-जेम - पीसा-मिभमोदनीय अनमुहु-भंतमहर्ष पणुणो-मनुष्यने न-नहोय मिच्छ-मिथ्यात्व रागदोसो-रोगटेप भने-अमनेविषे [रदीपना मिणधम्म-जिनधर्मयी निणपम्मे-जिन धर्मने विप नालिभरदीव-नालि के विवरी -चीपरित अर्थः-मिश्रमोदनीना उदयधी जीनधर्मने विषे राग- वेप न होय तेनो काळ अंतर्मुहुर्त सुधीनो होय हे, जेम ना. सिकेर छीपना मनुष्यने अन्नने विपेरागद्वेष न होय तेनी पेठे. श्रने मिथ्यात्व ते तो जिनधर्मथी वीपरितज जाणवू. ॥१६॥ नालिकरदीपना मनुप्पो नालिएर खाइ उदर निर्वाह चलाये छे तेमने अना- जना सादनी खबर नथी तेथी तेमने अन्न उपर रुचि पण न होय तेम भरुचि पण नहोप संवी रीते मिथ मोहनीयवाला जीवने जीनधर्म उपर राग पण न होय सेम देप पण न होय. हये पच्चीस चारित्र मोहनीय कहे छे. सोलस कसाय नवनो, कसाय विहं चरित्त मोहणीयं॥ अण अप्पच्चरकाणा, पञ्चरकाणाय संजलणा ॥१७॥ सोलसकसाय-सोल फ- दुविहं-(एम.ये प्रकारे स्याख्यानीय परिचमोहणीयं-चारित्र नवनोक्साय-नवनो फ- मोहनीय छे स्थानीय अण-अनंतानुबंधि संजलणा-संज्वलन अर्थः-सोख कपायमोहनीय तथा नव नोकपायमोहनीय एमचे प्रकारे चारित्रमोदनीयना पच्चीस नेद वे. थनंतानुबंधी, थप्रत्याख्यानावरणीय, प्रत्याख्यानावरणीय थने संज्वलन ए चारना दरेकना चार चार नेदे सोल कपाय मोहनीय जाणवी । कपोय-प+माय (कपके०) संसार तेनो (मायके ) लाभ जेयकी जीवने होप एटले जेथी जीवने संसारमा परिभ्रमण करवू पड़े से कपाप, तेना क्रोध, मान, मापा भने छोर ए चार प्रकार छे ते दरेकना पार पार भेद नीचे ममाणे. अप्पच्चख्खाणाय-अम- पाय मोहनीय पचख्खाणाप-प्रत्या- पाय मोहनीय ३ अनंतानुबंधीः-जेयी अनंत संसारनी वृद्धि याय तेवा क्रोध, मान, माया, अने लोभ. अमत्याख्यानावरणीय-जे देशविरतिपणाने आवरे, एटले कोई पण विरनिना मणाम न यवा दे तया सर्व विरतिपणुं न आया दे. पत्याख्यानावरणीयः-जे सर्व विरतिपणुं न आक्या दे. संज्वलनः परिसहादिकयी काइक दीपकनीपेरे कपाय यइ तरत विसराल यइ नाय, तेवा मंद कपाय, जेयी संयममा अतिचार दूषण लागे अने शुद्ध ययाख्यांत चारित्र यतां अटकावे. जाजीव वरिसचउमा,स पख्खग्गा निरयतिरियनरअमरा सम्माणु सबविरई, अदखाय चरित्त घायकरा ॥१८॥ जाजीव-यावत्जीवलगे | तिरिय-तिर्यंच सब्यविरई-सर्वविरति परिस-घरसलगे नर-मनुष्य अहखाय-ययाख्यात घउमास-चारपासलगे अमरा-देवता चरित्त-चारित्र सम्म-सम्पक्व परूखग्गा-पखवाडीपालगे अणु-अणुव्रत पायकरा-घातकरनार अर्थः-ए चार प्रकारना कपाय थनुक्रमे जावजीव सुधी, एक वर्ष सुधी, चार मास सुधी, अने पंदर दिवस सुधी रहे. तथा पेद्देखो नरकगति, चीजो तिर्यंचगति, श्रीजो मनुष्यगति श्रने चोथो देवगति अपाये, वळी पेहेलो सम्यकत्वनो धात करे, वीजो देशविरतिनी, त्रीजो सर्व विरतिनो श्रने चोथो यथारपात चारित्रनो घात करे ॥ १० ॥ जबरेणु पुढवी पक्षय, राई सरिसो चनधिहो कोदो। तिणि सखयाकऽमिश्र, सेखत्थंनो वमोमायो॥१५॥ मर-जठरेला जेवो । सरिसो-सरसा । अहिप-दारकाना रेणु-रेतौनीरेखा जेरीपनिहो-पारपार सेल-पध्याना परी-माटीनी कोरो-मोध मोवमो-पापलाजेश पाप-पर्यननी विगिसलया-नेपनी मोटी मागो-मान का-काष्ट (माकडाना । 'रा-सा

१ए
अर्थः-पापीनी रेखा सरखो, धूलनी रेखा सरखो, माटीनी
रेखा सरखो. तथा पर्वतनी रेखा सरखो अनुक्रमे संज्वलन,
प्रत्याख्यानावरणी,थप्रत्याख्यानावरणीथने संज्वलन एम चार
प्रकारे मोध जायवो. वळी नेतरनी सोटी सरखो, फाप्टनी ला.
को सरखो, हामका सरखो श्रने पथ्थरना चल सरखो मान
जाणवो ॥१॥ हवे तेने विशेष जणावे ते.
जेम पागोमां लोटो करीए से तरत भेगी थाप छ, सेम जे क्रोधवडे जुदा
परेला मन तरत भंगा याय ते संचलन कोष जाणवो.
धूळने विप रेखा करीए ते जेम केटलीक मुदत पछी परन संगोगे भेगी
मळे सेम मागेलं मन उपाये करी पळे ते पीनो भत्याख्यानी कोष
भाटीनी रेखा सरखो एटले सळावमा पाणी मुकाइ गया पछी तेमा रहेली माटी
(फादव) मुकाइने तेमा जे फाट पडे हे, ते ज्यारे वरसाद आवे त्यारे मळी माय
हे, तेम तुटेलु मन पणा उपापे घणे वखते मळे ते श्रीनो अमत्पाख्यानी फ्रोध.
वया जेम पर्वतमा फाट पढ़ी होय ते कोइ काळे मळे नहीं तेम जेतुं भाग्यु
मन कोइ काळे मळे नहीं तेने अनंतानु पंधी क्रोध कहीए.
हवे मान कहे थे.
जेम नेतरनी सोटीने वाला कोई मेहेनत पडती नथी, म जे माणस पोतानी
दल थोर उपदेशयो मुसो दे अने सीधे मारगे चाले ते संज्वलन मान. तथा
जेम मुको काटने सेलादिक चोपडी दुःखे नमावीये, तेम जे माणस यगा मपासे
करी सोधे मार्गे आवे ते प्रत्याख्यानीमो मान जाणो. तथा जे अत्यंत पगा
काटे हाडनी पेरे नमावीये, मार्ग सन्मुख करीए तेवो दुःसाध्य अमत्याख्यानीप
मान जाणवो अने पत्यग्नो यंम कोइ रीते नमे नहीं, म जे कोइपण पाये
फदारान छोडे ने अनंतानुवधी मान जाणवो.
मायावलेदि गोमु, ति मिंढसिंग घणवंसम्ससमा ॥
सोहो दलिह खंजण, कहम किमिराग सारित्थो ॥२०॥

.
माया-माया मिसिंग-घंटानांशीगडा हलि-दळदरं
मरलेहिन्यांसनी छोल
सरखी खंगण-सरावलानो मेर
सरखी
1 घगवंस-फडणवांसना
फदम-गाडानी मी
गोमत्ति-वळदना मूत्रनी मूलसमा-मूलसरखो
किमिराग-करमजनो रंग
रेखा सरखो लोहो-लोम
सारिथ्यो-सरखो
अर्थ:-माया थनुक्रमे वांसनी बोले सरखी, बळद मुतरे
तेनी रेखासरखी, घेटाना शांगमा सरखी, तथा यांसना मूळ स.
रखो वे, श्रने सोन हळदरना रंग सरखो,
सरावलाना चीकणा
मेस जेयो अथवा नगरना खाळना कादव जेवो, गामानी मळी
जयो थने कोरमजी रंग जेयो . ॥२०॥ तेने विशेष समजायेठे
भाग्नी प्रेग्नें बांकाRY सेहेन हाय फेरवापी न रहे थे सेम संग्गलनी
माया गुग्गयी टली के से. नया पळद घालता चालता गुतरे तेनी यांकी पुत्री
पार नीन र पाप है, ने ग्यारे गुफाप पारे जती रहे तनी पेठे प्रत्यारपानी
पापा जाप करी सुटे. नया जेम पान शीगई महामानने अने पगा कष्टे परे
व मनायाम्यानी मायानी पटना पर कटे फरीने टट भने भनंगानुपी मापा
देर वामन मूट गमे दटला उगाये गोधु थाप नहातेम में पग रोड नही.
मंगटनों मोर दाना रंग जरो छ, एटले दलदानी रंगजेम पोना
पारस भाप .प मंगलन योग (पनाकिसानी ग) पोरी
नां नाय.या मगरला महिनो मैन म पगो मेनो नापत
या पानी भी कोर गद्गम भाहिना पगा यी पगी मनी नापमा
भारी नीराम पहा मरे पगी मीना प्रारम भापाया.
सरा म योगी नया दिएकी भने का.
बसमा याराम पीपण नाप नीम
बरदार: कोसी.
उन्मुदया हो जिएहामर प्राय मांग नयकुला।।
मनिमिन मन्नहाया, नं वदामा मांडणी ॥२॥

ना-अपना आइ-अति हवा-होप ३२ जस्सुदया-जेनावदययी ! होग-शोग होइजीए-जीवने रोप भय-भप हास-हास्य कुच्चा-दुर्गा इह-अर्शी सनिमितं-कारणसहित हासार-मास्यादि अनहा-मन्या 1 मोदणीभ-मोहनीकर्म अर्थः-जेना उदयथी जीपने हांसी, रति, थरति, शोक, जय श्रने दुगंछा ए उ वानां कारण सहित थथवा कारण रहित थन्यथा होय ते थहीं दास्यादि मोदनीय कर्म जाण॥२१॥ पुरिसिथ्थि तदुलयं पर, अहिखासो जव्वसा हवह सोज । थी नर नपुं वेन दन, फुफुम तण नगर दाद समो॥२२॥ परिस-पुरुष जबसा-जेनारगयी फुफम-कोदा ( इटिप-सी नीलीवनोबार सोत-ते पी-सीद तण-तणदार पर-भरपे नर-पुरुषर्षद नगरदार-नगरपा महिलासा-ममिलाप भोदभो-पेदना उदपयो| समो-सरग्यो अर्थ:-जे कर्मना घशे जीवने पुरप, स्त्री तथा ते पेनी मेधुन संहारूप श्वा दोय ते श्रनुफमे खोपेद, पुरपद, धने नपुंसकवेद जाणवो. तेर्नु तिम्रपणुं अनुक्रमे पकरानी सांगीना थमि समान, घासना नमकानी समान, थने नगरनी दा. पना देवतानी समान जाण. ॥ २२ ॥ तो पेदन निवपणू ते जेप पारोनी सोरोनो ताप पोगर मनोरंस नहीं लेम सीने पुरुषना पर्दयी रिपर इसा वो जाप, मने इरादेशिक १jम पासनोभतो पाने पाम मोरगा नापतेम पुरस्नोतिपको पपया पीनरत समा जाप . मने नमारत शिरते जे नार पळे भने पणा दिवस पी देशा मोगपरिपन परदारपोजेतिर कोररी नि नरो एकदिएनागदपरोमानोरापा. तभपं-सेषे २२ सुरनरतिरि निरया, हमि सरिसं नाम कम्मचित्तिसमं॥ वायात तिनवा विहं, ति उत्तरसयं च सत्तही॥ २३ ॥ मुर-मुरायु इडिसरिसं-देडसरखो तिनवाविई-पाणु दे नर-नरायु नामकम्म-नामकर्म तिउत्तरसयं-एकसोत्रण तिरि-तिर्यंचायु चित्तिसम्म-चितारा जेवो च-वळी निरयाउ-नरकायु वायाल-चैतालीस सत्तही- -सडसठ अर्थः-देवायु, मनुष्यायु, तिर्यंचायु श्रने नरकायु ए चार नेदे थायुः कर्म , तेनो स्वन्नाव हेम समान ठे, अने नाम- कर्मनो स्वन्नाव चितारा समान वेते वेतालीस नेदे तथा त्राणु नेदे, वळी एकसोत्रण नेदे पण ते अने समसउन्नेदे पण ते २३ जे कर्मना उदययी जीव देवपणुं पामे ते देवायु, मनुष्यपणुं पामे ते मनुष्यायु, तिर्यचपणुं पामे वे तिर्यंचायु अने नरकपणुं पामे ते नरकायु. एम चार प्रकारे आ- पुःकर्म हेड समान छे. एटले लाकडानी हेडमां जेने पाल्पो होप ते हेड भाग्या सिवाय नीकळे नहीं तेम आयु पूर्ण कर्या विना तेजीव ते गतिमायो नोकळे नहीं, हवे चौद पिंड प्रकृति कहे छे. गजाश्तणु उवंगा, वंधण संघायणाणि संघयणा॥ संगण वण गंधरस, फास अणुपुधि विदगग॥२४॥ गइ-गतिनाम संघायणाणि-संघातननाम । रस-रसनाम संघयणा-संधयणनाम फास-स्पर्शनाम संठाणा-संस्थाननाम अणुपुब्धि-नुपूर्वीनाम एवंगा-उपांगनाम वण-वर्णनाम विहगगति-विहायो गति यंधण-बंधननाम गंध-गंधनाम थर्थः-गतिनाम, जातिनाम, शरीरनाम, उपांगनाम, पं. धननाम, संघातननाम, संघयणनाम, संस्थाननाम, वर्णनाम, गंधनाम, रसनाम, स्पर्शनाम, थानुपूर्वीनाम, थने विहायो- जाइ-जातिनाम तणु-रीरनाम नाम ३३ गतिनाम ए चोद पिंमप्रकृति की प्रकृतिमां ये चार प्रकृति नेगी दोय १ गतिनामः-देवादिक गति पामाकारण- २ नातिनामः एकदिपादिक जीवपर्यापन कार १ शरीरनाम:-औदारिफादिकारीर पायवान १ अपांगनामा-हायपग बगेरे शरीरना अवयव ५ पंधनमाम मौदारिकादिक पुद्गलन प पान हेतु जे फर्म ६ संघानननाम-जेणे करी आपणा शरीर एकठा करीए. ७ संपयणनाम-जेम सीमादिक करी कमाइ परीरने विचार संपिनु र फरवार्नु ८ संस्थान नाममा-शरीरनो शुभ नपा अ हेहभून जे कम. ९ वर्ण नायकर्मः शरीर पुद्गले कृष्ण, गौरव १० गंपनायफर्म:-शरीरे मुगंध दुधपणु पवार्नु ११ रसनामा-शरीरे निकादिक रस पानी इतर १२ स्पर्शनाम:-जे कर्पथी शरीरमा चोत, उष्णा १३ आणुपूर्ती:-जे कर्मना उदययी वकगलियो स्थानकरूप गमाणे जी आये. १४ विहायोगनिनाम:-जे कर्मयो जीवने शुभ क्षय पिंपयमित्ति चनदस, परधानस्सा- अगुमसतित्थ निमिणो, बघाय पिंडपडिनि-पिंडमकति मायर-आनपनाम पउनम-बाद, उनो-योतनाम অযু- মথুন नित्य-नाधकानाम पश्या-पायातनाम उस्सास-श्वासनाम ३४ श्वास नामकर्म, आतपनामकर्म, उद्योतनामकर्म, श्रगुरुलधुनाम कर्म, तीर्थकरनामकर्म, निर्माणनामकर्म, यने उपघातनामकर्म, एम ए आठ प्रत्येक प्रकृति जाणवी. ॥ २५ ॥ पराधातनामकर्मः-जे कर्मना उदययी वीजा कोइनो जीत्या न जाय. उच्छ्वासनामकर्मः-जे कर्मयी धासोधास पूर्ण करे एवो लन्धिवंत होय. आतपनामकर्म-जे कर्मना उदययी जीवनुं शरीर उष्णप्रकाशवान् होय. उद्योतनामकर्म:-जे कर्मने उदये अनुष्ण प्रकाशवंत जीवनुं शरीर होय. अगुरुलघुनामकर्म-जे कर्मना उद्ययी जीवन शरीर अत्यंत स्थूळ पण न होय तथा अत्यंत कृश पण न होय ते. तीर्यकरनामकर्म-जेना उदययी तीर्थंकर पदवी लहे ते. निर्माणनामकर्म-जे कर्मना उदययी शरीरना अवयवो योग्य स्थळे गोठवाय. उपयातनामकर्म-जे कर्मना उदययी पोताना अधिक तया ओछे अंगे करी पीडा पामे ए आठ प्रत्येक प्रकृति कहो. तस वायर पजातं. पत्तेयथिरं सुनं च सुनगंच ॥ सुसरा इज जसं तस, दसगं थावर दसं तु इमं ॥१६॥ तस-सनामकर्म मुभ-शुभनामकर्म तसदसर्ग-प्रसदशक यादर-चादरनाम मुमगंच-सौभाग्यना० यावरदसं-स्थावरदशक परज-पर्याप्सनाम मुस्सर-मुस्वरनाम पत्तेप-मरपेफनाम तु-तो आइग्ज-मादेयनाम पिरं-स्थिरनाम जत-जशनाम इमं मामयाणे थर्थः-सनामकर्म, यादरनामकर्म, पयासना०, प्रत्येकना० स्थिरनाय, शुलना सोनाग्यना०, सुस्वरना, थादेयना, य. शना०, ए सदशक जाणवो थने तेज प्रमाणे स्थावर दशक कद्देवाशे. १ नाम कम:-जेना उदययी प्रस सरीत्नी माणि याय ते सादर-जेना उपयी पादर शरीरनी प्राणि पाप से. १पर्यापा- जेना उपपपी पानाने पाय प्रारंभेली पाणिपूरी करे से.

94 ४ प्रत्येकनामकर्म:-जेना उदययो साधारण शरीर मुकी पोताना एक पारीरको स्वामी थाप. ५ स्थिरनामकमी-जेना उदययो दांत, हार प्रमुख हरबंध होय ते. ६ शुभनामकर्मः-जेना उदययी नाभि उपरनो भाग सुंदर होय से, ७ सभाग्यनाममः-जेना उदययी जोर, उपकार कर्याविना तथा संबंधविना पण सीने पिप लागे हे. ८ गुस्वरनामकर्मः-जेना उदययी घणा मधुर स्वरनी माप्ति थाय ते. ९ आदेयनाममः-जे फर्मना उदये जीवन वचन सौने मानवा आदरवा योग्य होव से. १. यवनामकर्म:-जेना उदयथी जीवनी यशकोर्ति सर्वत्र मसरी नाय ते. यावर मुहम अपड, साहारण अधिरअसुनउनगाणि॥ दुस्सर अणाजाजस, मिअनामेसेबरावोस॥ २७ ॥ यावरन्यावरनाम अमुभ-अशुभनाम इअनामे-एनामे मुहम-सूक्ष्मनाम दुभगाणि-दौभाग्यनाम सेयरा-इतरसहित (स. अपज-अपर्यातनाम दुस्सर-दुस्वरनाम इयरा) साहारण-साधारणनाम अणाइज-अनादेयनाम : बीस-बोस अधिर--अस्थिरनाम अजसं-प्रपशनाम थर्थः-स्थावरनामकर्म, सूक्ष्मना०,अपर्याप्तना०, साधार- पनाए, थथिरना, अशुजना, दोनोग्यनारा, दुःस्वरना०, अ. नादेयना०, थयशना०, ए स्थावर दशक इतर (प्रसदशक) सहित गणतां वीस प्रकृति थ. ए रीते १७ पिंमप्रकृति, ७ प्रत्येक प्रकृति, १० सदशक बने १० स्थावरदशक मळी नाम कर्मनी ४२ प्रकृति यः ॥ २७ ॥ ? स्थावरनामकर्म:-जना उदययी स्थावर शरीरनी मामि थाय ने, २ सुक्ष्मनामकर्म -जेना उदयथी घणां शरीर मले उने पण ओख देखाय नाही एवा शरीग्नी मामि थाय ने १ अपर्याप्तनापः-जेना अपयी म्बयोग्य पर्याप्ति पुरी कर्या विना मरण पामे ने. । . . ४ . . ថ្មីច थर्थः-गति थादि चोद पिंप्रकृतिना अनुक्रमे उत्तर वेद कहे वे गति चार दे , जाति पांच नेदेठेशरीर पांच नेदे , उपांग प्रण दे , वंधन पांच लेदे , संघातन पांच नेदे , संघयण व लेदे, संस्थान नेदे, वर्ष पांच नेदे ने, गंध वे दे ठे, रस पांच लेदे के, स्पर्श था लेदेठे, था. नुपूर्वी चार नेदे , विहायो गति वे नेदे एम चनद पिन प्रकृतिना सर्व मसी पांस नेद श्रया. अमवीस जुआ तिनवइ, संते वा पनरबंधणे तिसयं ॥ वंधण संघाय गहो, तणुसु सामण्ण वण चक ॥३१॥ अंडचीसजुआ-अष्टावीस | पनरर्थयणे-पंदरबंधन गहो-ग्रहण प्रकनियुक्त तिसयं-एफसोत्रण तणमु-दारीरसाये तिनबह-प्राणु यंत्रण-पंचन सामन-सामान्यपणे संघाप-संयातन वष्णचउ-वर्णचनुष्क थर्थः-उपरनी पांसठ प्रकृतिने (पराघातादि थान, प्र. शकादि दश, थने यावरादि दश ए) थहावीस प्रकृति युक्त करीए तेबारे नाम कर्मनी वाणु प्रकृति याय. (था प्राएं प्र. कृति एकसोथमतालीस प्रकृतिनी सत्तानी थपेक्षाए समजवी) थथवा पांच बंधनने काणे पंदर बंधन गणीए तो एकसोत्रण थाय, (त्यारे पिंम प्रकृतिना पांसठन वेकाणे पंचातेर वेद थाय थने सर्व मळी एकसो थहावन प्रकृति सत्ताए याय) हवे नाम कर्मनी समसः प्रकृति केबी रोते थाय ते कई ने. पंदर पंधण थने पांच संघातन ए वीस प्रकृतिनुं ग्रहण पांच शरीरने विप करतां पंदर प्रकृति योगी याय तया सामान्यपणे वर्णच. नुष्क ए बार गणीए तो (एटसे पधारना उत्तर नंद वीस वा-अथवा य-न होप एए प, तेने ठेकाणे चार गणतां) सोळ प्रकृति ए श्रोठी थ :रीते एकसो प्रणमाथी उत्रीस प्रकृति श्रोती करतां नामक- नी शेप समसठ प्रकृति रही ॥३१॥ श्य सत्तही बंधो, दएअनय सम्म मीसया बंधे ॥ वंधुदए सत्ताए, बीस ऽवीस वण्णसयं ॥ ३३ ॥ असचट्टी-एमसहसठ सम्म-समकित मोहनी अने सत्ताये घोदएम-यंघ, उदय मिसया-मिश्रमोहनीनो वीस-एफसोवीस अने उदिरणा पंधे-बंध दुवीस-एकसोचावीत घंधुदएसचाए-यंघ उदय- | अहवनसपं-एकसोअहावन थर्थः-ए उपरनी समसठ प्रकृति पंध, उदय थने उदी. पानी अपेक्षाये होय, तेमां पण सम्यक्त्व मोहनी थने मिश्र मदनीनो घंध न होय माटे बंधे एकंसोने वीस, उदये एक- पोचावीस थने सत्ताये एकसो हावन प्रकृति होय ते नीचे माणे॥ ३ ॥ झानावदर्शनाय विदनीय/मोहनीयमायु नाम गोत्राअंतराय कुल पंध १२० १२२ उदीरणा १५८ १४८ सम्यकरव मोहनी तथा मिश्र मोहनीय ए पेनो ध न होप कारण के ते येर्नु ळ मिथ्यात्व मोहनीनू ऐ नेनुं शुद्ध, अर्द्ध शुद म्यरुपते समकित भने मिश्रमोहनी, गटे बंध एफ मिथ्यान्व मोहनीनोन होय अने उदपमा प्रण होप. नरय तिरिनर मुरगइ,इग विथ तिअचउ पणिंदिजाश्यो ओरात विनयादार, ते कम्मण पण सरीरा;(पाठांतरे) ओरातिय वेशोधिय, आहारगे तेल कम्मश्गा ॥३३॥ २ २ २ ४६७२ ४६७१२ दय अने। ५ ९ ५ ९ २ ४१०३/२ ३० नरय-नरकगति बीभ-येईदिजाति विउव्व-वैक्रिय तिरि-तिर्यंचगति विश-इंद्विजाति आशर-आहारक नर-मनुष्यगति चउ-चौरिद्विजाति तेज-तेजस कम्मण-फार्मण मुरगइ-देवगति पणिदि-पंचेंद्विजाति पण-पांच इग-एकेंद्रिजाति ओराल-औदारिक सरीर-दारीर नाम. अर्थः-नारकी, तिच, मनुष्य अने देवता ए चार गति; एककि, वेइंडि, तेइंडि, चौरिडियने पंचेखिए पांच जाति; यौदारिक, वेक्रिय, थाहारक, तेजस थने कार्मण ए पांच श- रीर ॥ ३३ ॥ अहीं गतिजातिनो अर्थ सुगम ठे. तेथी ते . विशेपे नहीं लखतां शरीर कहे ते. १ औदारिक:-उदार एटले सर्व शरीरमाई प्रधान, कारण फे, शरीरवटे मोक्ष साधी शकीए, तीर्थंकर गणधरादिनी पदवी भोगवीए, ते मादे औदारिक. ते शरीर मनुष्य तथा तिर्यंचने होय. २ वैक्रियः-जे शरीर नानु मोअथवा सारं खोटुं यह शके ते वैक्रिय. ते ये प्रकारे छे (१) भवमत्ययी एदले ते गतिमा जे जीव उत्पन्न याय तेनुं शरीर क्रियन होय, ते देवता तया नारकीने होप.(२) लन्धि मत्स्यते लन्धिवंत मनुष्य तथा तिर्यंचने होय. ३ आगरक:-तीर्थकरनी ऋदि प्रमुख जोवाने चौद पूर्वधर मुनिराज मा हाय प्रयाग शरीर करीने तीर्थकरनी पासे जाय से. ४ तेजसः-सापला आहारने पचावयानी शक्तिवार्छ नया तेजो वेश्यानिर्गम हेतु. ५ कार्मणः-कर्म पुद्गल मिश्रित ते फार्मण शरीर. वाढू रु. पिहि सिरउर, उअरंग उवंग अंगुली पमुदा॥ सेसाअंगोवंगा, पढमतणु तिगस्सुवंगाणि ॥ ३४ ॥ वा-सुना उभर-उदर : सेसा-पाकीना अंग-ए आठ अंग अंगोवंगा-भंगोपांग लिहि-पीट वंग-उपांग तशुनिस्स-प्रण गरीरने मिर-का अंगली-प्रांगो उबंगाणि-उपांग भादियोप Tर-रे ! पापमुख उप-सायळ ३१ अर्थ:-ये पुजा, घे साथळ, वांसो, मस्तक, वाती थने उ. दर ए थात थंग , तेना दाय, पग, श्रांगळीयो, वेढा प्रमुख उपांगले धने पाकीना पर्व, रेखा, नख, रोमादिक अंगोपांग ठे ते, प्रथमनां प्रण शरीरे होय, योदारिक शरीरे औदारिक अंगो पांग, वेकिय शरीरे वेक्रिय थंगोपांग अने थाहारक शरीरे श्रादारक अंगोपांग कदीये ॥ ३४ ॥ उरखा पुग्गखाणं, निवड वऊतयाण संबंधं ॥ जं कुण३ जज समं तं, बंधण मुरलाई तणु नाम॥३५॥ उरलाइ-भौदारिफादि संबंध-जोडे पंधणं-बंधन नामकर्म पुग्गलाणं-पुद्गलने ज-जे उरलाइ-औदारिकादि निए-पूर्वे पधिला कुणा-करे सणुनामा-पचि शरीरने पन-(हमणा) पाता जउसपं-लाख-राळसर नामे तयाण-तेनी साये अर्थः-थोदारिकादि शरीरनापुद्गलने पेहेला वांधेला थने हाल घंधाता तेनी साथे संबंध करे, एटसे जेम साख अथवा राळ घे वस्तुथोने सझम जोमी दे , तेना जेई (साखना जेई) घंधन नामकर्म ते ते थोदारिक बंधन, वैक्रिय थंधन वगेरे पांच शरीरने नामे जाणवू. ॥ ३५ ॥ हथे संपातननाम कहे हे. जं संघायंश्नरला, इपुगले तणगएंव दंताला ॥ ते संघापं बंधण, मिवतणु नामेण पंचविदं ॥ ३६॥ ज-जे नगगणव-लगना समूह থাৰৰনাথ मंगायइ-एक करा माये रघणमिन बंधणनीपरे उरला!-ौटारिकादि वदनाली-नालोनी पैट नणनामेण-शरीरनामे पुगखे-पुद्गल मन्ये नं-ने पंचवि-पांच भेद ।

दु-नीसाय अर्थः-औदारिकादि पांच शरीरना पुद्गल प्रत्ये, दंताली जेम तृणना समूहने एकगे करे , तेनी पेठे जे कर्म एक करे ते संघातन नाम कर्म जाणवू थने बंधननी पेठे तेना पण पांच शरीरने नामे पांच नेद ठे ॥ ३६ ॥ जे कर्मना उदययी जीव भौदारिकादिक पुद्गल मेळवे ते औदारिक संघा- तन अने जे कर्मना उदपथी जीव औदारिक पुद्गल मेळवी शरीर बांधे ते औदारिक बंधन एम पांचे शरीरनु जाणी ठेवु, ओराल विनव्यादा, रयाणं सगते कम्मजुत्ताणं ॥ नव बंधणाणि अर, दुसहिआणि तिन्नि तेसिंच ॥३७॥ मोरान-श्रीदारिक तेज-तेजस साये अर-इतर रिजम्न-क्रिय तथा । फम्म-फार्मण साये भारपागं-माहारकने । जुत्ताणं-युक्त करता सहिमाणि-सहित फरता सग-पोतपोतानी माप नवपंधणाणि-नर बंधन | तिमि-त्रण प्रण यंधन जोहना तेसिंच-सेमनां थर्यः-थोदारिक, वेक्रिय थने थाहारक एणने पोत- पोतानी साये जोडतां प्रण पंधन थाय थने तेजस तथा कार्मण साये जोमतां पोजां व थाय (पटसे नय थयां) थने ते बने तेजस तया कार्मण साये जोडता योजांच थयां पटसे सर्व मळी पंदर बंधन थयां ॥ ३० ॥ १ घोटारिश श्रीदारिकवंधन, २ परियाक्रिय पंचन, १ भागरक मारक पंचनपपने देनम भने कामंग मा मोहना, ४ भोटारिक नग पंधन, निम वंचन, ३ मारक नग बंधन, ७ भागारिक कार्मग यंपन, विपणन, ९ मा वामंग पंचन, एएने नग नपा बाग मा नोटा १० घोटाकि गाग पंचन, ११ परिपनना गवंदन, १ माग पंधन, १३ मग पपन, १४ मरगन, गागपन, याप सहय-तेमज ३३ हवं संघयण फह. संघयण महिनिचओ, तं उदा वारिसह नारायं । तय रिसद नारायं, नारायं अदनारायं ॥३८॥ संघयणं-संघपण ते संसा-ते छ प्रकारे रिसहनारायं-कपमनाराष परिसइनारापं-व- अहि-अस्थिनो पम नाराघ नाराय-नाराष निचो-समूह अदनारायं-पटनागर अर्थः-दामकांनो जे समूह ( मेळाप) तेने संघयण क- हीए, ते ठ प्रकारे ठे. (१) यजझपन नाराय, (२) अपननाराच (३) नाराच, (8) थर्द्धनाराच. ॥३०॥ संघयण पटसे सांधाना वे हामकांनुं जोमावं ते. घन्सपम नाराच संघरण-जे साशा पासे ट प दोष से उर भरम एटटे हारनो पाटो से उपर से प्रणेने भेदे दीपमोली. एरी रोजे संपपण नोसरला होप. अपमनाराय:-उपरना करना बन्न (ग्योलो) ओशीदोपते. नारापा-पाटो भने योगी नोय. अर्धनाराष:-जेने एक पासे मर्कटपए भने एक पासे वीरोरोपते. कीवि व इद, रिसदो पटो अ कीलिया बङ ।। उन्नओमकमबंधो, नारायं इममुरायंगे ॥३०॥ । पीलीभा-रीशी रुपते नाराप-नाराष -रई -पीने 14-ए संपपण -हीमा उभभी-६ पासे राग-दाकि पिहो-अपमते पाटो पारो पर c. अर्थः-(५) कालिका संपपण (६) वह मयपण घदीदा अपन ते पाटा सर दाग समजवं घने बाप . मानारदाने पर परमार

मजवं, अने वे पासे यांकमा नराबवातेने मर्कटवंध एटले ना.
राच कहीए. ए संघयण थौदारिक शरीरे होय ॥३ए ।
कीरिका:-ज्यां हाडसंघिमां एक खाली मात्र होय.
बढु:-ज्यां हाड फक्त, एक धीनाने अडकीने रया होय.
हवे ते संघयणनां संस्थान होय माटे संस्थान कहे से.
समचनरसं निग्गो, ह सा खुजाइ वामणं हूं।
संगणा वम किण्ह, नील लोहिय हलिद सिआ ॥४०॥
समपरंसं-समचतुरस
वामगं-चामन
नील-नीलोवर्ण
निगौर-पग्रोध
लोहिन-लामवर्ण
मा-मादी
संगणा-संस्थान [मर्म इलिद-पीतरर्ण
सना-ज यणकिण्ड-कृष्णवर्णना-सिपा-भतवर्ण
थर्यः-रसमचतुरस्त्र, २ न्यग्रोध, ३सादि, कुन्ज, ५वा.
मन थने ६ टुंग ए. व संस्थान जापयां दवे पांच वर्ष कदे
कृष्ण (काळो) वर्ण, नीस (नासो) वर्ण, सोहित (सास) वर्ष,
इसिद (दळदर जेयो पीठो) वर्ण,थने श्वेत (पोळो) वर्ण वण
माप्रमस्थान:-पठांटी वालीन पेठा या चारे पूर्ण सरस अंतर रोप, ते
मर देना नगानीकानेर
न्यवदानः परना प्रारनी पेटेनामी सरनो भाग मानोरन भने नामी
नौवनी माग निर.
म.दिसम्याना-नानी नानो माग मानो पर मने गाना अंगीन होपते.
दुर:-जेना हाती, पेट, बने पामो एरण मग ममप मने पगाप,
हर, बीरादिक उप.
कार:- भरे पानी परेपी भंग होप.
एस-नरम अंग प्रारी.
मुरदी दृम्ही रम पागनिन कर कसापश्रपिता मदुरा।।
पामा गुरु पद मिदग्यर, मिनगढ़ सिणिका॥४२॥

३५ सरपिगंध रिला-साटोरस खर-घर (परसर) -दुरभिगंध महुरा-मधुर सी-गीत -रसपांच फासा-स्पर्श उन्ह-उष्ण -तिक्तरस गुरु-भारे सिगिद-रक्ष (लुखों) लहु-लघु (हलको) रुरुख-रक्ष (लुवा) बाप-फपापेलोरस मिउ-मृदु (फोमळ) अट्ट-ए आठ स्पर्श अर्थः-गंध चे प्रकारे . (१) सुरनि ते फूसना सुगंध सरखो शरीरनो वास होय, (२) दुरनि ते खराव गंध युक्त शरीर होय. रस पांच प्रकारे वे (१) तिक्त ते कमवो, (२) कटु ते तीखो, (३) कसाय ते कपायेसो, (४) थाम्स ते खाटो, (५) मधुर ते मीगे. हवे श्राप स्पर्श कद्दे (१) गुरु ते नारे, (२) लघु ते हळवो, (३) मृदु ते कोमळ, (४) खर ते वरसर, (५) शीत ते ठमो, (६) पण ते उन्दो (७)स्निग्ध ते चीकणो, (७) रुक्ष ते सुखो ॥४२॥ ए प्रमाणे जे जे स्पर्श युक्त शरीर होय ते ते स्पर्श नाम कदीये. वर्णादिनी वीस महति माहे शुभ अशुभ फेटली ते कसे. नील कसिणं दुगंधं, तित्तं कमुअंगुरुं खरं रुकं ॥ सीअंच असुह नवगं, कारसगं सुन सेसं ॥१२॥ नील-नीलवर्ण गुरु-गुररपर्स } अमुह-अशुभ रे. फसिणं-कृष्णवर्ण परं-परस्पर्श वारसगं-भगिमार दुर्गधं दुर्गध सक-रसम्पर्श भं-गम नितं-तिक्त, कटनी सोभन-सीतम्प मेम-दानी काम-कदु, नीग्रो नवग-नर पति थर्थः-( उपरनो वर्ण चतुप्कनी पोम प्रतिमांधी ) नीम थने कृष्ण ए ये वर्ण, पुरनिगंध. कमो धने नोग्यो ए ये रम --

गहन्य-गतिनीपेरे
वस-पभ
नाम
नो उदय
पूर्वी दुग
नाम.
३६
गुरु, खर, रुक्ष अने शीत ए चार स्पर्श, एम नव प्रकृति अशुन
जाणवी. वाकी श्रगीबार प्रकृति शुल्ल ठे ॥ ४ ॥
हवे आनुर्बी नाम कर्म कई छे.
चनहगश्वणुपुवी. गइ पुषिदुगं तिगं निआउजुअं॥
पुवि ऊदओ वके, सुद असुद वसुट्ट विहगगइ ॥४३॥
चंह-चारभेदे निभाउजुआ-पोताना मुह-गुम
आयुसहित करता अमुह-अशुभ
अणुपूची-आणु पूज्बी | तिगं-त्रिक याय
पुब्बीउदो-आनुपूर्वी- | उट्ट-उंट
गान्धिदुर्ग-गविआणु
विहगगइ-विहायो गति
वके-चक्रगतिये होय
अर्थः-चार प्रकारे गतिनी पेठे अनुपूर्वी . गति अने
अनुपूवीं मळीने द्विक कहेवाय, अने तेमां आयुष्य मेळवतां
श्रणुपूर्वी त्रिक थाय. अनुपूर्बानो उदय ते विग्रह गतिये
होय. घळदनी पेठे शुज अने उंटनी पेठे अशुन्न चाले ए वे प्र-
कारे विदायोगति नाम कहीए ॥ ३ ॥
आनुपूर्वी वक्रगतिये एक गतिमांची पीनी गतिमा जतां नाथवडे बब्दनीवरे
खेंची नियमित रस्ते लइ जनार, ते चार प्रकारे छे नरफानुपूर्वी, तिपंचानुपूर्वी,
मनुष्यानुपूवी, भने देवानुपूर्वी. अनुपूर्वी, गति अने आयुष्य ए प्रणे संबंधवाय
से, तेथी ज्या दिक कहे त्या गति अने अनुपूनी सेवां अने त्रिक कहे त्या
आपुप्प वपारी . जेम नरफदिक, एटले नरफनी गति भने नरफनी आणु
पू. अने नरक पिक एटठे नरगति, नरकनी अगुपूर्वी भने नरकायु एम
चार गति आधी.माणी टेयु.
व आठ प्रत्येक प्रकृति स्वरूप काहे रे.
परघा उदया पाणी, परेसिं बलिणंपि होश दुःक्षरिसो ॥
जससिण सब्जुित्तो, हवेइ उसासनामवसा ॥४४॥

परथा-परायातना होर-दोष (पामवं) उदया-उदयपी दुसरिसो-दुःखे जोनवाहबर-होप पाणी-माणी योग्य होय उसासनाम-वासनाम परेसि-पीना उससिण-पासोधासन फर्मना बलिणंपि-चळवननेपण लदिजुत्तो-सन्धि युक्त- वसा-बकरीप. अर्थः-पराघात नाम कर्मना उदयथी प्राणी पोताथी पळवाळा वीजा जनो वझे पण जीतावो दुष्कार यशपमे थ. र्थात् तेने जीती शकाय नहीं. थने श्वासोश्वासन पामपुं ते उ. च्यासनामकर्मना वशे करी होय ॥ ४ ॥ रवि विवेन जिअंगं, ताव जुआं प्रायवाउ नउजखणे ।। जमुसिण फासस्स तदि, खोदिय वण्णरस उदनत्ति ॥४॥ रविपियेउ-म्परिंपरिषे आयवाउ-भातपनाउदपे उष्ण पनो उप निभंग-(रत्नना) जीवन नउजलणे-अमिना शरीरे तार-ते अग्रिना शरीर थंग न होप छोरिभरस्म रानावनो तापजुभं-तापयुक्त । जमसिणफासस्स-जे माटे उदधि-उदय रो. थर्थः-रवि मंगळमां पादर थपर्याप्ता रत्नना जीपन थंग ताप युक्त एटसे पोजाने तापकारी पाय ठे. ते था नाम कर्मना उदयची. तेवो थातप फर्मनो उदय अग्निका जीवने नथी. फेमके तेने तो उप स्पर्श थने पासपा जदय ॥४५॥ पर्परळनो जे पास भावे रोने पर विमानका गला रनोनो रन पार पृथ्वीराय अने म्पने भीत से. परंतु नमन! कारण के तमने आनए नाम मनो उयमिराय रोमानेन कोई संग बरे प्रिनी पणा पा भपिन शरोम . प नेने उपना CSA 3RD परना भया पामे मार्ग पर IT RIT गी नाम है ૨૬ गुरु, खर, रुक्ष थने शीत ए चार स्पर्श, एम नव प्रकृति थशुन जाणवी. बाकी श्रगीथार प्रकृति शुन॥ ४२ ॥ हवे आनुनी नाम कर्म कहे छे. चनहगवणुपुवी. गइ पुषिदुगं तिगं निआउजुअं॥ पुधि ऊदो वक्के, सुद असुद वसुट्ट विहगगइ ॥४३॥ घउह-चारमेदे निआरजुअं-पोताना मुह-शुम गइच-गतिनीपेरे आयुसहित करता अमुह-अगुम अणुपूची-आशु पूनी तिगं-त्रिक याय वस-पम पुवीउदओ-आनुपूर्वी- उट-उंट गइपुग्विदुर्ग-गविभाणु उदय विहगगइ-विहायो गति पूर्वी दुग वके-चक्रगतिये होय थर्थः-चार प्रकारे गतिनी पेठे अनुपूर्वी ठे. गति थने अनुपूर्ती मळीने हिक कद्देवाय, अने तेमां थायुप्य मेळवतां श्रणुपूर्वी त्रिक थाय. अनुपूर्तीनो उदय ते विग्रह गतिये होय. बळदनी पेठे शुन्न भने उंटनी पेठे श्रशुन्न चासे ए वे प्र- कारे विद्दायोगति नाम कहीए । ४३ ॥ आनुपूली वगतिये एक गतिमांथी बीनी गनिमां जनां नायवडे यन्दनीपेरे पी नियमित रस्ते लइ जनार, ते चार प्रकारे ऐ नरफानुपूर्ती, तिर्यंचानुपूर्वी, प्पानुपूर्वी, अने देवानुपूर्वी. अनुपूर्वी, गति अने आयुष्य ए प्रणे संबंधवाय यी ज्या दिक कहे त्या गनि अने अनुपूनी देवां अने त्रिक कहे त्या प्य पपारी टे. जेम नरकदिक, एटठे नरकनी गति अने नरकनी माणु भने नरक कि पटले नरकगनि, नम्फनी अणुपूर्वी अने नरफायु एस ति माग्री नानी टे. एवं भाट प्रत्येक मातिनुं माप कई ऐ. उदया पाणी, परेमि वक्षिणंपि होइ दुहरिसी ॥ ण सदिजुत्तो, हवे उसासनामवमा ॥४४॥ नाम.

३७ उसासनाम-वासनाम परया-परापातना दो-दोप (पाम) उदया-उदययी दुसरिसो-दुखे जोनवा हवा-होय पाणी-प्राणी योग्य होय पसि-बीना उससिण-मासोश्वास कर्मना पलिणंपि-चळवंतनेपण । दिजुत्तो-लन्धि युक्त वसा पोरीप. अर्थ:-पराघात नाम कर्मना उदयथी प्राणी पोताथी पळवाळा घीजा जनो वझे पण जीतायो दुष्कार घर पमे थ. र्थात् तेने जीती शकाय नहीं. श्रने श्वासोश्वासनुं पामयुं ते उ- वासनामकर्मना वशे करी होय ॥ ४ ॥ रवि विवेज जिअंगं, ताव जुधे आयवाउ ननजसणे ।। जमुसिण फासस्स तहिं, लोदिय वण्णस्स उदनति॥४५॥ रविरिपेउ-भूपरिंपरिपे आपबाउ-भातपनाउदपे उष्ण पर्शनोदप निभंग (रलना) जोवर्नु नउजटणे-अपिना घरे साहि-त भनिना शरी अंग नहोय टोरिभरस्समारो सावजुभ-तापपुक्त । जसिणफाससा-जे माटे उदति-उदय . थ:-रवि मंमळमां पादर थपर्याप्ता रत्नना जीगर्नुज अंग ताप युक्त एटसे पोजाने तापकारी थाप दे. ते घातप नाम फर्मना उदयची. तेयो यातप फर्मनो उदय थग्निकापना जीपने नथी. फेमके तेने तो वा स्पर्श थने सासवपना ऊदय ॥४५॥ गुर्पपंळनो जे बारा भावे . पाश विमाना गया नोनो रन पार पृथ्वीरायो भने र शीतो पो FIR माप परे कारण मने भानप नाप मनो उप मिरा भाने नरा. ही कोइ का बरे के भनिन? पणन RTRO नुदो र अधि शरन . में उR नापनों पर पर्य करना अपरा पा अमाप . परंतु दरपी का वही.

४० जे शक्ति विशेष ते, शरीर पर्याप्ति एटले लीयेला आहारने पचावीने शरीर वांधवानी जे शक्ति विशेष ते, एम छ ए पर्याप्ति जाणी देवी; ते पर्यासियो एकेंद्रियने चार होय छे. विकलेंद्रि तया असनी पदिने पांच होय छे अने सत्रि पंचेंद्रिने छ होय छे, ते माहेनी पोतपोताना जेटली पर्याप्तिमो होय तेटली पर्या- प्तिमओ पुरी कर्या विना जे जीव मरे नहीं, ते पर्याप्ति नामकर्मना उदययी होय. पोत पातानी जेटली पर्याप्ति होय तेटली पर्याप्तिो जीव उत्पतिना प्रयम समययी साये आरंभे, त्यार पठी आहार पर्याप्ति एक समये पूर्ण करे, ते पक्षी अंतर महर्ने शरीर पर्याप्ति पूर्ण करे, ते पछी औदारिक शरीरवाळो अंतरमुहूर्त मुहूर्चने आंतरे पाकीनी चार पर्याप्ति पुरी करे, अने वैक्रिय तया आहारक शरीर- वाळो समय समयने अंतरे पूर्ण करे. आगली ये पर्याप्ति स्म छे. तेथी काळनो फेर थाय. जेम छ जणीयो कांवनारी साये कोतवा वेठो वेमा जे जाई कांत वेहेलुं फोकडं पूरु करे अने सूक्ष्म कांते ते मोडं पुरुं करे. हवे ते आरंमेली पर्याप्तिमो पूरी कर्या पछी जे जीव मरे ते जीव लन्धि पर्याप्तो कहेवाय. तया करण एटले आहार, शरीर अने इंद्रिय एत्रण पर्याप्ति पूर्ण यइ नयी त्यां मुधी तेने करण अपर्याप्तो कहीए अने ए त्रण पुरी थया पछी करण पर्याजो कहीए. अयवा जे जे पर्याप्ति पूरी नयी करी ते तेनी अपेक्षाये करण अपर्याप्ती अने पूरी करी तेनी अपेक्षाए करण पर्याप्ती फहीए. अने जे कर्मना उदपथी आरंमेली पर्याप्ति पूरी कर्या विना जे जीव मरे ते लब्धि अपर्या- तो कहेवाय, ते अपर्याप्ना नाम कर्म. पत्तेअ तणू पत्ते, उदणं दंत अधिमा थिरं ॥ नानुवरि सिराश् सुहं, सुनगाओ सब जण हो ॥५॥ पचेमतगु-भरपंफर्नु । अहिमाइ-अस्यिमादि मुमगाभा-सौभाग्पनाम शरीर पिरं-स्थिर दोप कर्मना उदयपी पत्त-प्रत्येक नापकर्म मासुवरि-नामि उपरना सम्बनण-सर्व जणने उदएग-उदपेकरी मिरा-मस्ता पाटि होनाए, यल्लमलागे दंन-दांत मुहं-गुमाय थः-जना उदययी जीव एक शरीरने विपे उत्पन्न याय, साधारणपणुं न पामे ते प्रत्येक नामकर्म कहेवाप. जेना उद- म जागर पहुर-मीठो यची दंत अस्ति वगेरेनो बंध स्थिर होय ते स्थिर नामकर्म. जेना उदयची नाति ऊपरनां मस्तक वगेरे आंग सारां होय तथा तेना स्पशें कोई अप्रिति पामे नहीं ते शुन्न नामकर्म, तेनायी वीपरित ते अशुन नामकर्म. तथा जेना उदययो विना कारणे सर्व मनुप्यने पण प्रिय सागे ते सोजाग्य नामकर्म तेथी विपरीत ते दोनोग्य नामकर्म कहीए । ५०॥ सुसरा महुर सुद झुणी, आश्का सघतोय गिफवो जसो जस कित्तीओ, थावर दसगं विवडाधं ॥५१॥ मुसरा-मुस्वर आइजा-आदेयना. जसप्री-जगना०पीरोय सबलोप-पर्वलोकने সন্তৰিীমা-বাণি थापरदसगं-पावरदरा गुह-मुखदाइ गिन-प्रहवायोग विजय-धीपरिक धुणी-चनी, स्वर वो वचनहाय अर्थः-मधुर थने सुखदाइ ध्वनी (सुर) होय ते थान मुस्वरनाम कर्मना उदययी होय, नवमा थादेय नाम फर उदयथी जेन वचन सर्व सोकने माननीय एटसे गृदण य योग्य होय.जेना उदयची सर्व काणे यश कीर्ति प्रसरे ते यशनाम कर्म ए प्रसदशक नाम कर्म प्रकृति जाणवी तेथी रीत स्थायर दशक नामफर्म जाण ॥ १ ॥ गोभ-गीप नामम गुपर-सारा पा जे लाभ-लाभांग सुभलाभ-मटिगहिना भाग-मोगारा ༡གཙིའི་ बगेर उप- नीभ-नीगंगा fm-भागया fairo - बुलावरमानी पर जाना गोकं दुधनीअं, कुलाव इय सुधम जुनसाइट विग्धं दाणे लाने, जोगुवनोगेसु विरिष॥५२॥ श्रर्थः-गोत्रकर्म के प्रकारे ते. एक उच्चेात्र थने वीर्जु नोवोत्र ते कुंजारनी पेरे घमेसा सारा घमा सरखं उबगोत्र थने खराव मदिरादिनो घमो धमे तेना सर नीच्चगोंत्र तथा थंतराय कर्म पांच प्रकारे ठे. (१) दानांतराय, (२) सानांत. राय, (३) नोगांतराय, (४) उपनोगांतराय, (५.) वीयाँ- तराय. ॥५२॥ गोर-जेना उदपपी क्षत्री, काश्पप विगेरे उसम नातिमां तथा उसम कुलमा जन्मपाय. मोम-विद्यम मादिनीय कुलमा उत्पा याप. दातगप-जेना उदपपी अपात्र मळे यो तथा दान देयानी इन ते तपा शरदय ने पण दान दा काप नही. बामदिराप-जेना मी दनार मागम दातार ए तपा सेना परमा पस्तु जा भने मागनार सो पण इशित पस्नु न म ते. मंगर ना योगानगर-जेना उदपी मोगोमोग्य यस्तुनी माति पपा मिमा पनि मोगरा योग्य स पग भोगगार काय नही. सासार-जना दसपी पति तुरान, रोगालि रा पळयान पर पो. भानी निकोबा माय नहीं. से कमनी परमीप्रमारन प्रहरि नगारे रे. ची यानि ७ गापाम साली ८ गया २१गरानीमा নায়াগ सदा १धिनानीय ४ माननीय ५ जप प्रामिनामानात राग सान पारिवमोनीय २५ नरनाकाप ५ फेवलज्ञानावरणीय ९ दर्शनावरणीयनीमकति १ चक्षुदर्शनावरणीय २ अधक्षुदर्शनावरणीय ३ अवधिदर्शनावरणीय ४ केवदर्शनावरणीय ५निद्रा ६ निदानिद्रा ७मचला ८मघलामचला ९पीगदी १ घेदनीयकर्मनी ! शातावेदनीय २ अचानावेदनीय २८ मोहनीयफर्मनी १ सम्पकत्वमोहनीप २ पिथमोहनीय ३ विध्यारवमोहनीय ४ मतानुबंधकोष ५ अमत्याग्यपानीपमोध (मत्यारुपानीयग्रोध ७ संग्खलनक्रोध ८ अनंतानुषंधीमान ९ अपाग्यानीयमान १० सम्पाम्पानीयमान ११ मानएनमान १२ अननानुमधिमाया १३ अमायागयानीमाया १४ सम्पारपानीपमाया १५ संज्वलनमाया १६ अनंतानुरंघि लोम १७ भारपाख्यानीय लोम १८ मस्पाख्यानीय लोम १९ संग्वलन लोम २० हास्य २१ रति २२ अरनि २१ नोफ २४ भप २५ दुर्गा २६ पुरुषवेद २७ प्रीवेद २८ मघुमकवेद १०३ नामकर्मनी मति १ नरकगति नामा २ पिचगति नाप. १ मनुप्पगति नाप. ४ देगानि नाप. ५ एकैदिपमाति नाय. ६ दिपनाति मा. ७ ते दिपमाति ना. ८ चारिदिप मानिना ९पंचेंद्रिय मानिना. .. शारिक वर्गाना "शवपापा नाम १५ भातार हाना. Ashan १४ nirn दर्शनमोर निय १ गतिनाप मोटापाय 3 সানাই १५ औदारिक अंगोपांगना. १६ वैक्रिय अंगोपांगना १७ आहारक अंगोपांगना० १८ औदारिक बंधनना० १९ औदारिफ तेजम वं- ४ अंगोपांग नाम. . ६ संघातन धन नाम -- ७ संघायन नामफर्म ८ संस्थान नामक ५ बंधन नामफर्म ४४ ३५ आहारफ संघातन ना. ३६ तेजस संघातन नाम ३७ कार्मण संघावन ना० ३८ वऋपम नाराच सं. ३९ ऋपमनाराच सं० ना. ४० नाराच संघयण ना० ४१ अर्दनाराच संघयनना. ४२ किलीका संघयन ना. ४३ छेवटुं संघयण ना. ४४ समचतुरस्त्र संस्थान ४५ न्यग्रोध संस्थान ४६ सादि संस्थान ४७ वामन संस्थान ४८ कुब्ज संस्थान ४९ हुंद संस्थान ५० कृष्णवर्ण नाम ५१ नीलवर्ण नाम ५२ लोहितवर्ण नाम ५३ हारिद्रवर्ण नाम० ५४ श्वेतवर्ण नाम ५५ मुराभिगंध नाम० ५६ दुरभिगंध नाम० ५७ तिक्तरस नाम ५८ कदुकरम नाम ८२ पायरम नामक ६. आम्लरम नाम ६. मथुरग्स नाम ६. पारस्पन नाम २० औदारिक कार्मण ब- धन नाम २. औदारिक तेजस का- मण बंधन नाम २२ वैक्रिय वैक्रिय बंधनना. २३ वैक्रिय तेजस बंधनना. २४ वैक्रिय कार्मण वंधनना. २५ वैक्रिय तेजस कार्मण बंधन नाम २६ आहारक आहारक बंधन नाम० २७ आहारक तेजस बंधन नामक २८ आहारक कार्मण - धन नामक २९ आहारफ तेजस फार्मण पंधन नाम ३० तेजस तेजस घंधन ना. ३१ तेजस कार्मणयंधन ना. ३२ कार्मण कार्मण पं. ना. ३१ औदारिक मंचानन নামম नाप. ९ वर्ण नामकर्म १० गंध नामकमें १. रस नामको नामकर्म १२ सन नाम ८८ भार म नारा ..ITE रामा ismo gerú ९. माRH "MITHITE ६. माय ६४ गुणाप नाम ६५ PM ना. ६६ मा नाम ५७ उष्णा माम गि नाम. पमा ७. महानुपूची ७१ मा ৩৪ নমুণাগ ७२ पानी ७म रिपनि ७५ एम योगनि ७६पापानमा ৩৬ ? যা ७८ मा पोलमा ८. भारतमा नामा निर्माणमा ८१REN प्रिो." HERE • muTRITTE REMIRE V Nyu PRE voorling mere १. MERRIER Auth ५ unti Ritwan • evin मा AN

,
पण
४६
सिरि हरिअसमं अं, जद पस्कूिलेण तेणराया॥
नकुण दाणाश्चं, एवं विग्ण जीवोवि ॥ ५३॥
सिरिहरिअ-श्रीगृही, भंडारी तेणरायाइ-ते राजादिक | विग्येण-अंतरायकर्मेकरी
समंए-ते सरसुं
नकुणइ-न फरी शके
जीवोबि-जीव (रुपराजा)
जेह-जेम
दाणाइअंदानादिक
पडितलेण-पतिकूलधके । एवं-ए मकारे
थर्थः-सिरिश्रीलक्ष्मी तेनुं घर एटले नंमार तेनो अधि-
कारी ते नंगारी तेना सर अंतरायकर्म कर्दा ठे. एटसे जेम
नंमारी प्रतिकूखयके राजादिक दान थापवानी छाकरे पण
ठते योगे दान, साल, नोगादिक न करी शके एम अंतराय
कमें करी जीयरुप राजा पण, दानादिक करी शके नहीं ॥५३॥
एवे ए आठ फर्म पाध्याना मुख्य हेतु मिथ्यात्य, अविरति, कपाय भने
योग ए चार ऐ ते आगळ कहेवाशे परंतु अहीं स्थूळ हेतु कहे छे.
त्या प्रथम मानावरण तया दर्शनावरणना पंध हेतु कहे छे.
पमिणीअत्तण निन्दव, उवधाय पोस अंतराएणं ॥
अचासायणया, आवरण गं जीयो जयई॥ ५४॥
परिलीमनग-(गुल था. पभोम-मदेप रापये
भागातना फरये फरी
टिकनीमन्यनीताए) अंतरापेणं-मंतराय करये भाररण दुर्ग-ये भापरण
निन्दन-धारवा
फरी मिमी-नीय
समास-गर्ग
अमागायनपाए-भंरपंत | गई-उपार्ने
थर्य:-गुरुयादिकनुं प्रत्यनीक पटसे अनिष्ट याचरणा
फरवं करी, गुम्ने योखवयं की, दगाये कर, प्रप गायये
की यंतराय करवे की, अत्यंन यानानना फरये फरी, पा.
नावाप यन नावाणन जी उपाजें ॥ ५४॥

, 83 मतिश्रुत प्रमुख पांच माननी तथा मानवंतनी नया मानोपगरण पुस्तकादिकनी मत्पनीकना एटछे अनिष्टपणु, मनिकुलपणुं फर. जेम मान, मानवंतने माटुं याप तेम करे, तथा निन्दव एटले जेनी पासपी भण्यो होय ते गुरुने मोलयता, तपा जाण्याने अनाण्यु कहेना तथा मानवंत तथा ज्ञानोपकरणनो उपयात एटटे अनि शनादिके करी विनाश करता, नया तेना उपर प्रदेष करना, अंतरंग अरधि, मत्सर घरता, तया जाणताने अंतराय एटटे अन्नपाणी, वस, बम्ती, निपेपना, पीना कार्यमा नोरता, वारि लगाता, पठन विरछेद परता, मया मानवतनी अत्यंत आशानना फरता, मर्म उचाडो फरता एटले आ दीननाति एप पहला, अने आलदेष फरी, तथा आचार्य उपाध्यापने मन्सर फरता, अगाणे गाताप फरना, योगउपधान हीन भणता, असन्मापे सम्झाप करना, ज्ञानोपगरण पारी एता पा लघु मीनि, पटीनीति, तथा मैथुन करना, पग लगाना, भुंक गाना, मानदम्प विनाशना, विणपती स्पेलता, मानावरण धंधाय, तम दर्शनारण पण दर्शन पनीरवादिक दोपे फरी संधाय, पण एट रिप के दर्शन एटाटे पशु अवतु ममुख दर्शनी साधु ना पापे इंदिप लेना उपर माई पिता नया सम्मति तत्वार्य नपपक पालादिक दर्शन प्रभाषपातारा गेनो पुग्नात पर म. स्पनीफनादि समापरता या दर्शनावरण कर्म पंपाय. एमये भापरणमा ५ हेतु प.सा. ये शाता तथा भाता घेदनीपना पंधन पर. गुरुजत्तिखंतिकरुणा, ययजोगकसाय विजयदाण जुनी। दढ धम्मा अाइ, सायमसायं विवऊयत्रो ॥ ५५॥ गुरुभक्ति-गुरुभक्ति फसायापिनप-कपापने माह-पा ग्वंति-समापेकरी जोगमा सायं-सातारनी करणा-पर-गाभा दाणमा-दाना गुण अमाय-मशागत विय-पदी- नोग-गपांग न घर्ष.-गुरनामा करी ६.माय फर।, यरुपानाय कार प्रत पासता, यमयाग कर कापायने जीतकरी '. . पप-प्रत पालना युत.

४G शीळगुणे करी सहित होय, दृढधर्मी, प्रीयधमी ( इत्यादिक शुन्न कारणे करी जीव ) शातावेदनीय उपाजें, अने अशाता वंदनीय एघी विपरीत पणे बांध ॥५५॥ गुरु परे पोगान मातिा, पर्मानार्य, तेनी भक्ति एटले सेवा करना, म पो भनिए पारमा अपराने सहन करता, परनोग्ने दुगीपा देसी न मानी मांगरता, पांच मान तया अणुग्न निर्दपण पाना, पोदर पार समानारीप मंयमयोग सामाना, फापता I am गर ना अभयदान देता, सनीने पार करता smart पर्मने गिगिर परिणाम रामना, पाप, पर, ग्लानादिरून VII ने पर्प कांगमा पर्णता सहाय देशा, भरय मति कसीरे N, Tणी पाठया, ना पाम निर्निग, पालाप, योग, Trafगामे गमतो भी गातागंदनीय कर्म मानें भने गीत. Prerit grafinit मापाप धनतो, निलगा पागतो, मातारी गोली, पगों क.पाप धीरतो, हाताप पर्मने मति गादान मानापे, मागील होगता, हामी, गोरापालने न irat देसा, पर शोर. संत नाना प्रति *Fair प्रमातादिनीय बा. नियात्रीगना Arigin. उमण दमणानग, नामणा देव दर दरादि ।। दंगाईजिपामुण, चंय गंवाय पनिणीयो॥५६॥ Titraa गिना Pri - in Pati 141-4MER गर-दनाना, सम्मागनी कानां सारा सां, बर्टी (मा, मनि, मगर पए थादिनुं प्रतिकूलपणुं श्राचरतो, निंदा करतो जीव दर्शन मो. हनीय कर्म घांधे ॥ ५६ ॥ उन्मार्ग एटछे संसार हेतु जे हिंसादिक आश्रय तेने मोक्ष हेनुपणे दग्वारनी तया एकांत मार्गनो उपदेश करना, वो ज्ञान, दर्शन चारित्रना समुदापरण मोक्षमार्गनो विनाश करतो, सन्मार्गे रहेला परजोबने एनयनी देशनाये करी मार्गथी चुकवतो, बळी देवदव्य तया ज्ञानद्रव्य हरण करनो, देशसानी पम्नु पोताना फाममा वापरतो, परने देवदव्य विणासता दंग्यी छनी शक्ति उनी मुकनार मिथ्यास मोहनीप कर्म पधि, बळी केवको मया तीर्थकरना अरण बाद योलनागे, साधु, साधनो, श्रावक, धाविका आदिनो निंदा करना, देष धरना, मिन प्रवचन- माटुं देवाडनो घणा जीवना पोषियोन एणे हे करीने मिथ्यात्व मोहनीय पधि भने पूर्व पाध्यु होय सेने निकाधित करे. हये चारित्र मोहनीयना यंध देत कई ए. विहंपि चरणमादं, कसाय दासाइ चिसय विवसमणो॥ बंध निरयाज महा, रंज परिग्गद रो रुदो ॥५७ ॥ दुविहंपि-चे प्रकारन हासा-दास्यादि निरयाउन्नरराष परणमोह-पारिष मो. विसपविरम-विषय परारंभ-महामारंभ परिग्गह-परिमाया पणो-चियो रमोरनापत पंपा-यां रो-पानी अर्थः-एक कपाय मोदनीय तथा चीजें नोकपाय मोद- नीय घांधे ते कपाय हास्यादिक तथा विषयने शिप तत्पर सोनुपी परवश चित्त धको पांधे, श्रने नरयायु पधि ते जीर मदारंने पर्त्ततो, परिमदमा रातो पको, रोद्रयाने पर्ततो एटसे महाफपापवंत, जीरयातनो फरनार, दुष्ट परिणामो हो। जेशीर फसायने अपेपराय पोरनीय त. ए मनीषा सोपादिकने उपे सपा पाप सालानीपाने पर कसाप-कपाप - 20 पोरे, मत्पाल्पानीपाने उदये (चार पत्यारुपानीया तया पार संग्गलना) माउ कपार गांरे, अने संचलना पार बांध, गस्य बोलतो, भांड कुचेष्टा करतो, परपोतो नीरस्य मोहनीय कर्म पांघे, देश देखवाने रसे, लगाठीपणे, पान, मोरन, करतो, रती मोहनीय फर्म या रानवेध करतो, नवोरागास्थापतो, परने उनाट जानारतो. परने अगुभ काम फराबानो उत्साह वधारतो, शुभ सानो उत्मा मागतो, निष्कारणे आप भ्याने वसंतो नीव भरति मोरनीप की. परमारने पारा पमानो तया निर्दय परिणामी जी भय मोहनीय फर्म परने मोकना संगाप नारतो जीर शोक मोहनीय कर्म पागे, साधु मनितो, ना गं करनार जोर जुगपणामो० कर्म पत्रि, पार, का, rr.kr.ए भनु पिपने पे भरपंत माशक्त को पानी भरेगा. गाग, माली, हरिष्ठ परिणामे परदारा सेयतो जीरसीवेद पात्र, .i, हितमंद कपागे भी प्रमाणेद पार, मिक मीर भंगामी, नीर विषपी, पपाता, पिध्यारसीमोर, मसक गाना दो देगाना भगाना गुण ग्रहण करतो पाप न मोडनी कमी माना कई-पहारमा पनि मापनी प्रति भोग- परेलीमा पनि गरिन, प्रतिनि परिगापि, मनंगानु पंधिया कलाप गानिक का, गाने गगन गानो, भिती. पार पापानी, मा, मियागनी मरिमा पालो, गि माग बनानी पाप परिणाम करी निभाना निरिधानो गृहिनी, मदाममखानहामाणुम्मायो। पपईय ना कमाया, दाणा मन्तिम गाणी ॥५॥ तास !! -! मा +mummuan. परब 14 IA ५१ अर्थः-तिर्यंचनुं थायु, जे जीव गूढ हृदयवाळो, मूर्ख, धूर्त, मिध्यात्वादिक शख्य सहित दोय ते जीव पांधे तथा जे जीव प्रकृतिये एटले स्वन्नावे थल्पकपायवंत होय, दान देवाने रचित, मध्यम गुणवंत होय ते जीव मनुष्यायु पांधे ॥णा नदय एटटे जेना हदयनी फोइने खबर न पडे तेवो होप, कपटी होय, मुखे मीठो भने परिणामे दारण होय, आध्यानी, मा लोकमां मान पूना हेतुपे तप फरनो, करलो पापने पूर्ण आलोचे नहीं, शल्प राखे ते जीव तिर्यंचायु पांधे. इथे मनुप्पायु पांघराना हेतु फहे ऐ-त्या देवता नपा नारकीनो सम्यक्त्व कर्तव्यतापे शुमभाये करी मनुप्पनुं आयु यांचे ते भणी भवमत्यये शेने देवायु न पंचाय, नया मनुष्य निर्यच जेह प्रकृति केहवा सेहेन उपाप कर्या विना मिथ्या स्वने मंद रसोदये फरी कपायनो पण मंद रसोदय होय. यी तणु एटले दुर्वल पच्या एका कपाप जेम पान्य न मळवायी शरीर दुर्यल याय. एको मतिये भद्रक धूलि रेखा समान पाये पर्वतो, सेहेजे मुपात्र कुंपात्र परीक्षा फर्या विना विशेप पीर्ति ममुख अणवांछतो पग स्वभाये दान देवरानी रुवि जेने तीन सय एषो समा, मानव, माईव, सत्य, शौचादिक मध्यम गुणे वर्ततो, कापोत ऐश्या परिणामे जीव मनुप्पायु पांधे. हवे देवापुना बंध हेतु काहेछे. अविरय माश्सुराओ, वालतवोऽकाम निरोऊय॥ सरखो अगारविल्लो, सुहनाम अन्नद्दा असुअं॥थए । अविरयमाइ-अविरतिस-| अकामनिन्जरो-अफाम अगारविल्लो गारवरहित म्यक् दृष्टिआदि निर्मरायेकरी मुहनाम-गुमनाम मुरामो-देवायुवांधे पालतवो-पालतपेकरी सरलो-सरळ अमुहा-अशुभनाम थर्थ:-श्रविरति सम्यक् दृष्ट्यादिक देवायुवांधे, पास तपे करी, ब्रह्मचर्ये करी थकामनिर्जरा उपार्जे, थने निष्कपटी, ज्जयइ-उपार्ने अन्नहा-अन्यथा गारवरहितथको शुन्ननाम कर्मनी प्रकृतियो वांधे तथा अन्यथा कपट गारवसहित अशुन्न नामकर्मनी प्रकृतियो वांधे एए। : अविरति सम्यष्टि, मनुष्य, तियेच देवायु यावे, बोलना परिणामे मित्र संयोगे, धर्म रुचिपणे, देशविरति गुणे, सराग संयमे देवायु वांधे. बालतप एटले दुखगभिंत, मोहगर्भित वैरागे करी, दुष्कर कष्ट, पंचाग्नि साधन, रस परित्या- गादिक अनेक मिथ्यात्वज्ञाने तप करतो, अत्यंत आकरो, रोप गारवे तप करतो, अमुरादिक योग्य आयु वांये तया अकाम निर्जराये, अज्ञानपणे भूख, कृपा, टाट, ताप, रोगादिक कष्ट सेहेतो, स्त्री अणमिलते शीयळ धारण करतो विषय संपत्तिने अभावे विपय अणसेवतो, इत्यादिक अकाम निर्जराये तथा वालमरण एटले काहिएक तरसायोग्य शुभ परिणाम वर्ततो रत्नत्रयि विराधनाये व्यंतरादि योग्य आयु पांवे. तया आचार्य प्रत्यनीकताये किल्लिपिकायु वांवे. तया मुग्यनन मिथ्यालीना गुण प्रशंसतो, महिमा वधारतो, परमापामीनू आयुष्य यांचे. गुमनाम मनिना बंध हेतु कहेछे-सरल, कूडांमान मापे फरीनहीं ठगनारो, परवंचन पुदिरहित, दिगारव रसगारव अने गाता गारव रहित, पापभीर, परोपकारी सर्वजन पिय, क्षमादि गुणयुक्त, एवो पुरुष शुम नामनी श्रीस प्रकृति पांचे तथा अप्रमत्तपणे पारिप पालनो, आहारादिक यांचे, अरिहंतादिफ वीश स्थानक आरायतो, गुणवंतनुं येयावच्च फरतो जीन नामर्म बांये,तेयो विपरित पणे वर्तनारी जोर नरकगत्यादिक. चोत्रीम अशुम नामकर्मनी प्रकृति यांचे ए सहमठ मनिना यंध हेनु काप्रा. एवं उमगोत्र कर्मना यंय हेतु कहे छे. गुणपेही मय रदियो, अझयणकावणा मई निचं ॥ पकुणा जिपा ननो, नचं निधे ऽअरदाओ ॥६॥ गुगरी-गुणनोंदेमनार उग-गोत्र भयगीभो-पटगत मनिश-निय निनाद निप्र-नीपगोत्र पट्टया- भादामीनपी ना जिगाटममा मनाटिक पटर विपरीतगणारी 11 माप्रपन-मध्यपन प नामन.

अर्थः-पारका गुणनो देखनार (अवगुण देखीने निदेनदी)
शाठमदरहित, नणवा जणाववा उपर निरंतर रुचिवाळो होय.
प्रकर्षे करी. जिन अरिहंतनो लक्त उच्चगोत्र उपार्जे श्रने तेथी
थन्यथा. विपरीत गुणे करी नीगोत्र उपार्जे ॥६॥
हवे अंतराय फर्मना बंध हेतु कहे छे.
जिणपूआ विग्धकरो, हिंसा परायणोऽजय विग्धं ॥
श्य कम्म विवागोअं. लिहिओ देविंदसूरिहिं ॥६॥
निणपूभा-निनपूनानी | अव्या-उपार्ने
पाकग्रंथ
विग्यारो-विघ्न फरनार विग्य-अंतरापकर्म लिहिओ-लख्यो
हिंसा-हिंसादिकमा
इम-एणीपेरे
देविंदमुरिहि-श्री देवेंद्र
परायणो-तसरयको फम्पविवागोमं-कर्मवि-
सरिए
थर्थः-जिनपूजादिकनो विन्न करनार, (पूजानिपेधनो करनार),
हिंसादिक श्राश्रवने विपे तत्पर यको, अंतराय कर्म उपार्जे
(वळी श्रद्धार पापस्थानकनो सेवनार साधुने दानादिकनो
अंतराय करनार जीव थंतराय कर्म उपार्जे.) एणीपेरे कर्म
विपाक एवे नामे ग्रंय ते श्री देवेंष सरिए सख्यो ॥ १ ॥

५६ कित वमता खीरनीरना स्वाद सरखो भाव मिथ्याल गुणस्थानक पाम्या पेहेलो जे होय. एटले कोइ माणसे खीर खाधेली होप देने उलटी थतां जेम खीरनो स्वाद मुखमां रही जाय तेम सास्वादन गुणठाणुं जाणवू. ३ मिश्रगुणठाणुं:-मिश्र मोहनीयना उदयथी जीनधर्म उपर रुचिपण न होप तेम अरुचि पण न होय, मिश्रपणुं होय एवा जे, अध्यवसाय ते. ४. अविराति सम्पदृष्टि गुणा[-विरति गुण जाणतो, अपत्याख्यानीया कपायोदये आदरी के नहीं. तेना त्रण मांगा छे. १ जाणीन न आदरे, न पाले ते श्रेणिक राजानी पेठे. २ जाणीने न आदरे, पाले ते अनुत्तर विमानना देवतानी पेठे. '. ३ जाणीने आदरे न पाले ते संविन. ए प्रण मांगे वर्त तो सायक, औपशामिक अने वेदक ए त्रणमापी-एक समफितनी मचि पामी जेजे अध्यवसाये निनवचन ययावस्थित पण परिणमे ते. ५ देशविराति गुणठाणु: देशविरति जे श्रारक तेना गुण सम्यक्त्व सहित जाणे, आदरे अने पाले, अहीं समकिन सहित नोफारशी करे ते पण एमां जाणची. ६ ममत्तगुणठाणुं:-चारित्र लीयां छां पण जे अध्यवसाय प्रमादे (मद, विपप, फपाय, निद्रा भने विकयाए ) करी मलीन होप. ७ असमत्तगुणठाणु:-भमाद रहित अनंतगुण विशुद निचय चारित्रे स्थिरता रूस सहित ने अध्यवसाय. ८ निनिगुणग:-चारित्र मोहनीयनी एकवीर प्रकृति ग्वपापया तपा उप. मावा रूप भरपंन विशुद्ध अपवसाय, अहीं एक समये अनेक नीर गुगटाणे पट्या, ते भुद शुद्ध नगदिक अध्यवसाय भेटे फरी निति कहना फेरफार रोप भ्यां पनुं नाम निषि गुगगणं करीए ही गमय मपये अनंतगग विद होण. . अनिता गटाणु-मा गुगागे एक मपे भने नीर पं, मना अपरमायमा फेरफार न दीप नेपी नेनु नाम भनिति क. नया पापी नाप बादा माय पग कटीए कारण के ही फायना मारामार पग

१. मुस्मरंपराप-शेप रहेंली मोरनीय कर्पनी मासिनो सप तथा उपत्रम.
पाना ने पिपुर मध्यरसाय से मुस्मसंपराय, भीमा,कापना मन
स्मफरे.
११ उपोतमोहनीप-पोरनीपना उप समयी भापरसाप निपल यांप. परंतु
सतापे कपाप रहेला तें जो उदय झाये तो मेला पवाना संभरणे,
नेयी सेनुं नाम उपधात मोहनीय, एने एपस्थ पीतराग राणाशुंकाए.
भहीं अन्य परे भने जो मरण पामे तो अनुपासी देवता याय,
भने पोप गुणठाणे भारीने रहे, अन्यथा पदेतो 'दशमे आने, 'तयों
नपमे, भाठमे, सातपे, पण आरे अपवा पेहेले पंग भावे..
१२ सीगमोह वीतराग गुगठाणु-महीभी सर्व मोहनीप साति खपाने-प
ने अत्यंत रिशुद अध्पवसाय स्थानक से..
११ सपोगी फेरली गुणगाणु-केरलमान पाम्पा परी ज्यां सुरीपादरयोग
(पार) मन, वचन, कापा मार्च हालें, पाले, घोले त्यो मुधी सं-
योगी केवली गुणगणुं कहीए.
१४ अयोगी केवठी गुणठाणु-शुक्ल ध्याननो चोपो पायो ध्यावतां पादर-यो,
गना भभारे (मूदमझाययोगे) अयोगी केली गुगा नाण..
ए रीते चौद गुणठाणानुं वा फ रखे तेनुं का मान.को..
मिपाव गुणाणानुं काळमान अभवी जीवने अनादि अनंत अने भनी
जीवने अनादि साव तथा सादि सांत होय. सास्वादननो काल ए.आमलि
प्रमाण, श्रीमा, आठमा, नरमा, दशमा, भगीभारमा भने पारमा गुणाणानो
काल भंतमुहर्चनो छे. चोथान फाळमान तेत्रीस सागरोपम अधिक पचिपा,
एटा, सानमा अने मेरमा गुणठाणानुं कालमान देशे उणां कोड पूर्वमुं. अने,
चौहमान पांच हम्म असर पोलता जेटलो बखत धाप तेटलं प्राण.
हवे बंध महनि को..
अभिनव कम्मरगहणं, बंधोपोहेण तत्थ बीस संयं ।।
तिचयरा हारग जग, वजं मिमि सतर सयं ॥३॥

ԱԵ अभिनव-नवा वीससयं-एकसोवीस वज्ज-वर्जीने कम्मरगहण-कर्मन ग्रह तिथ्ययर-तीर्थकर नाम / मिच्छमि-मिथ्याखे बंघो-चंधे आहारगदुग-आहारफदिक सत्तरसर्य-एकसीसचर ओदेण-गोचे 'अर्थ-नवां कर्मर्नु जे ग्रहq तेने बंध कहीए, त्यां जोबने श्रोघे एकसोवीस प्रकृतिनो वंध होय.तेमाथी तीर्थकरनाम थने थाहारकदिक.(आहारक शरीर तथा थाहारक अंगोपांग) ए प्रण प्रकृति वर्जीने वाकीनी एकसो सत्तर प्रकृतिनो वंध मिथ्या व गुणगणे होय ॥३॥ उपरनीत्रण प्रकृति न बंधाय तेनुं कारण के ते त्रण प्रकृति शुद्ध चारित्र अने समकित पाश्रीने वे अने शुद चारित्र तथा समकित मिथ्यात्वगुण वाणे होय नहीं । हर परेले गुणठाणे केटली मतिनो विच्छेद थाप से कोछे. नरय तिग जाइ थावर, चन ढुंमा यव ग्विा नपु मिचं ॥ सोखंतोगदिअसय, सासणि तिरि यीण उहग तिगं॥ मरपनिग-नरकत्रिक छिवट-ठेय संघयण सासणि-सास्वादने भार-जानिधनु नपुं-नपुंसक वेद निरि-निर्पचत्रिक पाररपट-यावरच विच्छं-मिथ्यात्व मोहनीय पीण-भीगीयीक -मस्थान मोलंगीप सोमनाभंत करे दुहगतिग-दीर्भाग्यविक इंगदिमसप-एकाएक था-नरकनिक, जातिचतुष्क, स्थायर चतुष्का, इंग संस्थान, थातपनामकर्म, बहु संघपण, नपुंसकयद थने मि. प्यारव मोहनीय पम सोळ प्रकृनिना धन मिथ्यास्य गुणगाणे हाय, यने दोष एकाने एक प्रकृनिनो यंध साम्पादन गुणगाणे होय ॥ व सास्गदने केटसा प्रनिनो पिच्छेद हाय ने कहे नियनिक, चीनीतिक, थने दोनोग्यनिक नप nun यापर-आनयनाम १

य
नरफपिशनरफनीगति, अनुपूर्जी, भने भापु. नाति चतुक रहि
तेदि भने चोरिदिशावर चतुष्प-स्थारनाय. मुस्मनाम, मा नाम भने
साधारण नाम. तिर्यचत्रिक ने नरकटिकनी पेठे, योगदविकाधीगदी, निट
निठा, भने मपलामचला.टीभाग्पत्रिक-दीर्भाग्यनाम,दुस्वरनाम भने अनादेयनाम
अण मजागिसंघय, ण चननिनोअकुखगचित्तिा
पण वोसंतो मीसे, चउसयरि उहाजअ अबंधा॥५॥
अण-अनंतानुपंधी उन्नोभ-पोतनाम मीसे-मिश्रगुगाणे
ममागिइ-मध्याकृति कुरखगह-शुभविहायोगति पउभपरि-चुम्मोतेर
संघपण-संघपण त्यित्ति-सीवेद दुहाउ-रे आपुप्पनो
पर-१ प्रगत
पणवीसंतो-पचीसनोभंत अबंधा-प्रबंध छे...
नि-नीचगोत्र
थर्थः-थनंतानुबंधी(क्रोध, मान, माया, लोज) चतुष्क
बच्चनो चार संस्थान (न्यग्रोध, सादि, वामन भने कुब्ज)
मध्यसंघयण (ऋपन्न नाराच, नाराच, थर्द्धनाराच, अने की
खिका) ए प्रण चतुष्क, नीच गोत्र, उद्योतनाम, थशुनविदा
योगति अने वीवेद मोहनीय ए सोळ तथा प्रथमनी नव मळी
पचीत प्रकृतिनो थंत बंध विछेद सास्वादन गुपगणे थाय.
ए रीते जोतां मिश्रगुणगणे होतेरनो घंध थवो जोए पण थ-
हीयां (देवायु तथा मनुप्पायु ए) ये थायुनो श्रयंध होय
तेथो चुम्मोतेरनो घंध होय ॥५॥
अहीमा आयुर्वध योग्य अध्यवमापनपी नया त्या देवायु अने मनुष्यायु
पण न बंधाय, पण आगल धार्य गुणठाणे बंध फरशे तेयो तेनोविच्छेदन फपी
पण अबंध का अहां कोई मनिनो बंध विरलेट नयी.
सम्मे सगमयनिजिणा, नबंधिवइरनरतिप्रविअकसाया।
उरल दुगंतो देसे, मनही लिय कसायंतो ॥६॥

६० सम्म-सम्पष्टिए वहर-चन ऋषमनारांच | देसे-देशविरतिए । संगसपरि-सीरपोतेर नरतिम-मनुष्यत्रिक संचही-सरसह निण-जिननाम विभकसायाःवीनामा | ति-श्रीनामत्यारुपानी आउ मनुष्यायु तथा त्याख्यानीचारकपाय | कसायनो-पायनो अंत देवायु | उरल दुगंतो-औदारिक करे पंधि-वधि द्विकनो अंत करे अर्थः-चोथा अविरति सम्यक्दृष्टि गुणवाणे सात्योतेर प्रकृतिनों बंध होय. कारण के अहीं जिननामकर्म, मनुष्यायु थने देवायु ए त्रण शुन्न प्रकृतिनो बंध थाय. श्रने वजूऋपन्न नाराच संघयण, मनुष्यत्रिक (मनुप्यगति, थनुपूर्वी अने थाय) थने वीजा (अप्रत्याख्यानीया) चार कपाय तथा श्रोदारिक- हिक (शरीर थने अंगोपांग) ए दशनो विच्छेद थाय एटले पांचमा देशविरति गुणगणे समसम्प्रकृतिनो बंध करे.श्रने त्यां त्रीजा (प्रत्याख्यानीया चार) कपायनो अंत करे ॥६॥ एटले- तेवहि पमत्ते सो, ग अरइ अथिर दुगअजसअस्साय।। बुटिक उच्च सत्तव, नेसुराओजया निहं ॥७॥ सेवाहि-त्रैसठनो अनस-अयशनामकर्म सचव-सातमकति पमते-प्रमत्तगुणठाणे अस्सायं-अशांतावेदनीय मुरामओ-मुरायु सोग-शोक मोहनीय वुच्छिम-विच्छेदपामे । जया-जो अरह-परति मोदनीय उन-उमति अथवा -नि-मेष्टा अपिरदुग-प्रयिरद्विक थर्थः-प्रेसठ प्रकृतिनो बंध हा प्रमत्त गुणगाणे होय.अने शोक मोहनीय, थरतिमोहनीय, थस्थिरहिक (अस्थिर नाम 'थने थशुननाम), थयशनाम, थशातावेदनीय, ए प्रकृतिनो विछेद होय.यथवा सात प्रकृतिनो विछेद जो कोश् प्रमत्त साधु, .

. . .६१ देवायु बांधवा मांमेथने संपूर्ण करी नेटा पमामे तो करे ॥६॥ गुणसहि अप्पमत्ते, सुराज वदं तु जइ इहां गच्छे ।। अन्नह अहावन्ना, जं आहारग दुगं बंधे ॥ ७ ॥ गुणसहि-ओगणसाठ जा-जो जे-जे भणी अप्पमने-अप्रमत्ते हागडे-भहीं भावतो आहारग दुगं-भाहारक मुरायु-देवापु अमा-मन्पपा परंतु नापतो यको अगवमा-भगवननो घंधे-वधेि अर्थः-तातमा अप्रमत्त गुणवाणे श्रोगणसाउ प्रकृतिको बंध होय, पण ते देवायु बांधतो थको जो था गुणगये श्रावे तो अन्यया तो बहावन प्रकृतिनो बंध होय. जो के प्रमत्तगु- पगणे प्रेसर प्रकृतिनो बंध हतो, तेमाथी ठ नो बंध विष्ठेद पतां सत्तावन रहे, परंतु थप्रमत्त गुणगणे थाहारकरिकनो बंध होय एटले श्रोगणसात अथवा सुरायु विना श्रावन प्र. कृतिनो बंध सातमा गुणगणे होय ।। ७ ।। अडवन्न अपुवा इमि, निबदुगंतो वपन्न पण नागे॥ सुरउगपणिदिसुखगइ, तसनवनरलविणुतणु वंगा ॥॥ अरंबल-अठावन छपम-उपननो पंध पपुवाइमि-अपूर्व करण | पण भागे-पांच भागे उरलविण-भौतारिकरिना नी आदिने विप सुरग-गुरद्विक वणु-शरीर धार निदगंतो-निद्रादिकनो पणिदि-पंचेदिय जाति उबंगा-उपांग चैक्रिय तथा अंकरे । मुखगह-शुभविहायोगाने | आहारक थर्थः-हवे अपूर्वकरण गुणवाणाना सात नाग करीए ते- मांना प्रथमन्नागने विपे उपर कद्देसी बहावन प्रकृतिनो बंध होय, थने ते पठीना पांच नागने विषे निसादिक (निाथने तस-प्रसनरक ।

बंधयंत्र. पहेला कर्मग्रंपनी एकत्रीसमी तथा वत्रीसमी गाथामा दर्शाच्या प्रमाणे जे प्रकृतिओनो समावेश वोजी प्रकृतिओमां बंधनी अपेक्षाए पाप से, ते अही जणावी नथी ते सिवायनी एकसोत्रीस मध्येयी,जे प्रकृतिनो जे गुणगणे विच्छेद थाय छे त्यां.. आवी निशानी छे. अने जेनी बंध होय त्यां १,आंवी निशानी छे. कया गुणठाणे कइ प्रकृतिनो बंध होय. अपूर्व करण अनिवृत्ति मूल मनि नाम उत्तर प्रकृति नाम मिध्यावे सास्वादने अविरतिये देशविरतिये ममत्तसंयते अप्रमत्तसंपते पेहलाभागे वाजाभागे श्रीनामागे. घोथाभागे 'पांचमाभागे मिथे छहाभाग सातमाभाग पहेलामागे वीजाभागे बीजाभागे चोथाभागे पांचमाभागे मुश्मसंपराये उपशांतमोहे- क्षीणमोहे सयोगीकेवलीये अयोगीफेवलीये १ १२/१२/१३१४ ७ ७७७ ७ ७ । मूल प्रकृति संख्या उत्तर प्रकृतिसंख्या पनिशानावरणीय युवज्ञानावरणीय ७४७७६७६३ . १५६५६५६५६५६२६/ २ २१/२०१५ DIA १७ ww छ5 । M .0-0.w .

10010 ० माना . . . . . 10 0 . . : प्रारिमानावरणीय ४ पनःपर्यवधानावरणीय নাম ६ नर्मनावरणीय 'अनावरणीय अविनातील बदनावरणीर निद्रा निद्राना दना पनापना . . . LINE . . . १ C . 010 0 o० 10 . C. .. . .. . . . ०० .... 0.1010 .. .. पर . . . . 0. . 01.. . ८ .०८ . O . ... . . ... G . o el " ol. . . ० . . वातावदनीय अमाना वेदनीय fANATीय प्रमगन री कर प्रधाननीयर, प्रमाानीय और -117an मागे पान पानी पान METIME .. ३ 0 . .. ...10000000000000 १.०० 0 0 0 . . . . . 0000000000 D, DO0 ...00000000000 0000 .

. ४७ नरकगनि नामकर्म . 5 . ००[.. 101010101010101010 1. o lolololololo ००००००० ००० . . olo o 1०००० ००० o . . ०००००० . ०० . to o lo Elbar las आयुकम . . . . . . o ०००००० . ४५ तिर्यगायु या देवायु ४२ नपुपक वेद ४१ खौवेद . . o ..०० 10 . ० . . . . ०० . . ० ० . ७ . ३९ दुगंछा ३८ भय 0 . . . . . . . . हास्यपदक ३७ शोक ३०/ अरनि . . ० 10 wr . . ० . . D o . . . . . . . TO . . . . . २६/ रति १४१ हास्य २१ संज्वलन लोभ ३२, मत्याख्यानीय लोभ अपत्याल्पानीय लोभ १० अनंतानुबंधी लोभ २९ संचलन माया २८ प्रत्याख्यानीय माया २७/ अपत्याख्यानीय माया २६, अनंतानु पंधी माया . . . [.. . . २/२०१२ २०००.०००० .००००००० ० ००० ००० ००० ० ००... ००००००८ ००० Now . . . . . . . . . . . उ ० ० . . . 0 .

क ००००० 0 . ० ००००० गण ० . . OF . . . . . . 10 . . of . . ० ट a ० ०/० 10 . . . . ० . . . . . . . . . ४८ तिनातिनाम ४९ मनुष्पगनिनापूर्व ५: देवपतिनाम ५' पदिपजानिनाम .२ शिनाति ५३ नेद्रिय नाति ५. मागिदपनानि .. पशिना ..६ प्राहाकिमगिरनामर्द ५७ किरिना ५८ पारस्परिना. .. नमरीना. ६. क. पगरीरना. ६. प्रीकिगोशंगना ६. कामगारांगना. ६. पाहारगोशंगना) ६. वामनाग मं० १५ मापनागपघाग. ६६ नागमर्मरगना १७ अनारामगंण १८ कमिशागना. • परगना. ७. गमनारमानना . ००० . a (0 . . 10 . . . . . . : . . . . . . . o . . ०० . . . . . . . . . . ............. . . ००० . .. . . क . . 0000 . . . . .

०1०1०10010101010 . . . . ०००० उपानापप निगनापास ९१ नोकरनाम to o . . ०० . . . bial Lcilik . ० . 010 . . ... 10 J . o 10 O . ... . . ० ०० . ० ० . 10 . 0 . Oolo ० ० . . . O 10 . o . 10000000 10000 ००० ० . 10-0 ०० 100 00.00 . . ० otoo ००० . . उपासनापाम ८८ प्रारनामा ८७ सामनापकर्ष ८६ पEARE ८. महिपोगतिनाः ८४ शुभवियोगनिना देशानुना मनुष्यानुपूरीना " बिचाना ना * नागनुपूर्शनाः ७. पनाम रमनाम ५. गंगनाम पनाम ७५ सम्मानना ७. मगंग्यानना. ७. पाशानना गारियानना ७. मोरगरधानना .. . folo 0 ०० 000 . 101010 .... . 10 10 ०० ००० 0 0 . ०० . ००० . . . .. . . • [0 . . 10 . . O ० . . . 010 . . 010 ० . . ... ol ܘ ܘܐ ܘܐ ܘܐ ܘܐ ܘܐ ܘܐ ܘ ܘܨ ܘ| ܘ ..... C ० 0 ० ९४) प्रसनापकर्म ९. वादरनामर्म ९६ पर्यापनाम ९७ प्रत्येकनामा ९८ स्थिरनामकर्म ९९ शुभनामकर्म १०० सौभाग्यनायकर्म ११ मुस्वरनामार्म १०२ आदेयनापर्म १०३ यशोनामार्ग १०४ स्थावरनामार्म १०५ मूक्ष्मनापर्म १०६' अपर्यापनामर्म १०७ साधारणनाम १०८, अस्थिरनापर्म १०९/ अशुभनामर्द ११० दीर्भाग्यनापर्म १११ सरनामकर्म ११२/ अनादेयनामर्म ११३ अयगनापकर्म उनि "नीर्मात्र ११६/ दानांतराय ० ६ए ८ o . ol. o . ०००००.०० ०]010100. 0.1010] ०००००० 이이이이이 ... ०० 0 . . ८ ००० 1० . . tol०० . . o ० ० . . ० . . o . . ० . ० . २/१॥ १/२] ० ८ सनरायकम . . . . ५८ ७४ ११७ लाभांतराय ११८ भोगानराय २॥ २॥ ११९ उपभोगांतराय, २/ २॥ वीर्यातराय एकंदरदरेकर्मनी ५६५६,५६५६५६५६ शानावरणीयकर्मनी ५५ ५ ५ ५ दर्शनावरणीयकर्मनी वेदनीयफर्मनी २ २ २ २ २ २ २ १, २ १ १ मोहनीयकर्मनी २६/२४२९/१२/१५/२२ ९ ९/९ ९ । १/२ ० नामानी ६४५१३६३७३२३२३१३१३१३१३१३२ गोत्रकर्मनी १ २ १ १ १२ अंतरायकर्म ४] ४४४ ०००० । आयुर्मनी . . o o २ 06 . . गुणठाणा - से बांधनी पनि पोनपोनानो भराधा काल पीतेपके शुभाशुभ विपाक देग्गर पटारे भोगाये, जे पाटे बंध पाली उदप फरे तिहां मपम उदय लक्षण नपा ते सग्गा भणी उदीरणा करण दिप नेनुं पण लक्षण कहेचा पूर्वक चौद एमाणा माथीने उदय स्पीच रिचरे से. जदओ विवाग वेषण, मुदोरण मपत्तिइह वीससयं । सत्तर सय मिच्छे मी,स सम्म आहार जिणणुदया॥१३॥ उदमो-उदय (ते) सम्म-सम्पक्समोहनीपनो चिराग-रिपाक (काळे) 'दुीसप्तपं-एकसोरावरीस आहार-आहारकदिनो पेमण-पद सतरस-कसोमर उदौरणं-उदारणा (ले) जिण-मिन नाप फनो पि-मिथ्याले अति-भणपविखेंची.] अणुदपा-३६य न होय भीस-मिश्रपोहनीयनो. थर्थः-कर्मरसन विपाककाळे वेदबुं तेने उदय कहीए थने उदयकास श्रण पहोंचे खेंचीने वेदवु ते उदीरणा. एमां एकसोने घावीस प्रकृतिघे दोय. थने एकसोने सचर प्रकृ. तिनो उदय मिथ्यात्व गुणगणे होय, केमके ए गुणगणे मिश्र मोहनीय, सम्यक्त्व मोदनीय, थाहारक शरीर, थाहारक थं- गोपांग थने तीर्थकर नाम कर्म ए पांच प्रकृतिनो उदय न होय ॥ १३ ॥ संघमा जे एकमोवीस प्रकृति हती ते फरता सम्पास मोहनीय अने मिश्र मोहनीय एये मकति उदया वधारे होयणे, तमाथी उपरनी पांव मातिनो उदय मिथ्यात्व गुणठाणे न होय कारण के मिश्र पोहनीपनो उदप मित्र गुण- ठाणे होय, सम्यक्त्व मोहनीयनो उदय चोयाधी सातमा गुगठाणा पधी होय, आहारक शरीर अने अंगोपांग पौद पधर मुनिने प्रमत्त गुणठाणे होय, अने तीर्थकर नाम कर्मना दलनो उदय चोथायी घारमा गुणठाणा लगे होय, तेमां पण उपशान मो गुणठाणु नीर्षकरने नन होग. नर्यिका नाप फर्मनी रसोदय नो तेरपे अमे चौटम गुणठाणे होय. नीर्षकरने मिपान, मास्वादन, मिश्र भने उपशांत मोह ए चार गुणाणा न होय, ने नकिर नाम कर्मनो उदप नेर ३२ चौदमे गुणगणे लाभे वीना वार गुणठाणे न लाभे. तेथी ए पांव प्रकृतिनो र दय मिथ्यात्व गुगठाणे न लाभे. ते पांच अनुदय काढतां एकसोस तर प्रकृति उदय आगले गुगठाणे जाणवो. अने आ पांच प्रकृतिनो उदय आगळ यया स्थान लामशे तेथी तेना उदयनो विच्छेद न करो। हवे जे प्रकृतिनो उदय मिथ्यावेन पग आगळ नयी ते कहेछे. सुहुम तिगा यव मिच्छ, मिच्छतं सासणे गारसयं । निरयाणुपुब्विणुदया, अण थावर इगविगल अंतोर मुहमतिग-मक्ष्मात्रिक सासगे-सास्वादने अण-मननानुवांधिचार आयर-भातपनाम इगारसय-एकसो अगियार यावर स्थावरनाम पिछं-मिथ्यात्वमोहनी निरयाणुपुब्धि-नरकानुपू- इग-एकेंद्रियनानि मिउत-मिथ्यात्वगुणा बीनो विगल-विकलदि पाने अंने अणुइया-अनुदयछे अंतो-अंत होय थर्थः-सूक्ष्मत्रिक (सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारणनाम) श्राद पनामकर्म, मिथ्यास मोदनीय ए पांच प्रकृतिनो उदयविच्छे मिथ्यात्व गुणगणाने भंते होय. श्रने नरकानु पूर्वीनो श्रहींथ थनुदय ने तेयो वीजा सास्वादन गुणगणे एकसो थगिया प्रकृतिनी उदय साने. थने थनंतानु बंधी चार, स्थायरनाम कर्म, एकैडि जानि थने प्रण विकद्विजाति ए नव प्रकृतित उदयनो थंत सास्वादने होय ॥ १४ ॥ मीसे सय मणुधी, णुदया मीसो दएण मीसंतो॥ चनसय मजए सम्मा, पा पुटी खेवा बीस कमायार भीम-मिश्रगुमागे मागो-मित्रो भंन मम्म-गम्य पाय त्या भणुपुथ्वी-गार मना मानी उपनदोष मेगा- मुर पीमान-विधवार धनर-पगतम्या योन यानाम पाया नीपना पहाय गदाग. कमाय-पानी यो । पम्पससमोहना मनीनुदया-मनाः भाग-पकमोपारनी - अर्थः-मिश्र गुणगणे सो प्रकृतिनो उदय होय. श्रदीक्षा देव, मनुष्य धने तियेचानुपूर्वी ए अपनो उदय होप नहीं थने मिश्र मोहनीपनो उदय होय एटले (एकतो थगिया. रमांची नवनो विछेद अनेत्रणनो अनुदय एम पार फाढतां नवाणु रदी, तेमा मित्र मंदनीयनो उदय होय ते वधारता) एकसोनो उदय होय. अन मिन गुणवाणानो थंत थाय तेबारे एकसोचार प्रकृतिनो उदय चोथा विति सम्यक्दृष्टि गुण- गणे होय. एवी रीते के, ही मिश्र मोहनीनो विछेद पता नवाएं रही थने सम्यक्रम मोदनी तथा चार अनुपूर्वी उमे- रतां एकसोचार यई. थदी घीजा थपत्याख्यानीय कपायनी चौकमी ॥ १५ ॥ मणुतिरिडणुपुधिविनय, इदुद्गप्रयागसतरवेो। सगसीदेसि तिरिगड, आज निउजोअतिकसाया१६ मनिरि-मनुष्य भरे भगाएग:-मनादेपदिक भाउ-निधाय : पिंपनी मतर सगरनाविरद नि- निगो मपुत्री-मनुएमी सगसी-सत्याशी उनीम-नाम विवकिपाटक देशि शरिरति नि-धीमामयागानी दाग-दो पनाम निरिगइ-निधान फमापा-कपापनी पोती थर्थः-मनुप्पानुपूर्वी, तिपंचानुपूर्वी, मियाष्टक (पे- क्रिय शरीर, क्रिय थंगोपांग, देवगति, देवायु, देवानुपूर्जी, नरकगति, न नरकानुषी ) दोनोग्य नामकर्म, म फर्म ) ए सतर प्रकृसिनो 1. एटसे सपासी प्रकृमिनी थदीपां निधन धना.

No text on this page.

vो-नोविच्छेद मदि-साटनो मृत्पमि-मूल्यसंपरा सगवन्न खीण दुचरिमि, निद दुगंतो अचरिमिपणवना ।। गुषाणाना उद्या घे समयमांना सा समय पगे हाप स्य य ला) प्रकृतिना उदयनो विच्छेद होय, त्यारे वासर प्रकृ तिनो उदय नवमा थनिवृत्ति गुणगणे होय तेमाथी वेदनिक (पुम्प,.बी, अने नपुंसक) ॥ २७ ॥ संजलण तिगं आओ, सही सुहुमंमि तुरिअ लोलतो॥ जवसंत गुणे गुण स, हरिसह नाराय दुग अंतो ॥१९णा संमलमतिर्ग-संगलमात्रिक सरिभ-चोगो गुगमहि-भोगणमानो स्लोभतो-लोभनो अंत रिमहनारापग-पम- उवासंतगुगे- उपनात मोह नाधिदगी गुगठागे । भनो-अनवाय श्रयः-संज्यसनत्रिक (क्रोध, मान, माया)ए प्रकृतिना उदयनो विश्छेद थाय तेवारे सूक्ष्म संपराय दशम गुणगणे साठ प्रकृतिनो उदय होय. त्या संज्यसन लोचना उदयनो अंत पाय, पटले उपशांत मोद अगीयारमे गुणवाणे श्रोगणसान प्रकृतिनो उदय होय. त्यां ऋपननाराच थने नाराच संघयण एप प्रय- नाणंतराय देसण, चमो सजोगि वायाला ॥३०॥ परिमि-मर्ग टंगण-मनालीप थर्थः-उपर प्रमाण मनान प्रानना नुय । र तिना उदयनी थत श्राप ॥ १५ ॥ सगरम-गमापन खीण-भीगयोना दूधगिभ-लालम्पलगे निरदुर्गना-निंद्रादिस्नो अंधाग पणवन्ना पंचावन नाना शाम भरण-प्रसपाने गा- মা নিজাকি । নিড়া, দুবা। না হয় এবং ঘাষ শ - - फनो उदय पारे पंचावन प्रकृतिनो उदय ने समय होय पां झानावर पीय-पांच, अंतराय पांच, दर्शनावरणीय चार, एम चोद प्रा. तिनो उदय विच्छेद थाय, तेबारे सयोगी गुणवाणे घेतानीस :प्रकृतिनो उदय होय, श्रींयां हिसाये तो एकताळीस रही परंतु श्रागली गायामां समजावशे ॥ २० ॥ तित्युदयानरमाथिर, खगइ डग परित्त तिग व संगणा अगुरुवहु वन्नचउ निमि,णतेअकम्माइग संघयणा॥ तिधुदया-नर्यकरनाम | परित्ततिग-प्रत्येकत्रित निमिण-निर्माणनाम वरल-औदारिकद्विक छमंठागा-संस्थान तेम-तेजस शरीर भधिर-अस्थिरद्विक मगुरुलहु-भगुरु लघु वनुष्क फम्मा-कार्मणशरीर संगइदुग खगतिविक बन्नच-वर्णचनुपम इगसंषर-एकसंधपण अर्थः-अहीया तीर्थकर नामकर्मनो उदय होय. माटे चेताक्षीस प्रकृतिनो उदय करो. अहीं थोदारिक हिक (श- तया अंगोपांग,) अथिरदिक (थस्थिर अने अशुलनाम,) खगतिहिक ( शुन अने श्रशुज विहायोगति, ) प्रत्येकत्रिक '(प्रत्येक, स्थिर अने शुननाम,) ठए संस्थान. अगुरु लघु चतुष्क (थारुलघु, उपघात, परायात, अने उश्वास, ) वर्ण चतुष्क, निर्माणनाम, तेजसशरीर, कार्मणशरीर, एक संघपण (वजपननाराच ) ए सत्तावीश प्रकृति. ॥१॥ सूसर दूसर साया, ऽसाए गयरं च तीस वुझेओ ।। वारस अजोगि सुनगा, इजा जसऽनयर वेअणिश्शा मसर-गुस्तरनाम असाया-प्रशानावेदनीयतीस-त्रीसनो दूसर-दुःस्वरनाम भग-(एमांनी) एक पुन्छे भो-विच्छेद होप साया-गातावेदनीय अपरंच-परीने पारस-बारनो उदय..

जस-पशनाम 99 भगोगि-अयोगीपणठाणे आइज-आदेपनाम भनपर भाण-पेमा- सभगःसौभाग्पनाम हैन भनेरु एक वेदनीय अर्थः-सुस्वरनाम, दुखरनाम, शाता थने अशाता ए धेमांथो एक वेदनीय, ए प्रण तथा प्रथमनी सनावीस मळी घोस प्रकृतिनो विछेद तेरमे गुणगणे थाय. तेवारे चार प्रकृ- तिनो उदय श्रयोगो केवली गुणगाणे होय, ते कद्दे . सोनोग्य नाम, श्रादेयनाम, यश-कीर्तिनाम अने ये मांटेनु थने एक शातावेदनीय ए चार ॥ २५॥ तथा. तस तिग पणिदि मणुआ, उगइ जिणु चंति चरिम समयंतो ॥ उदो सम्मत्तो ॥ उदनखुदीरणया, परम पमत्ताइ सग गुणेसु ॥ पागंतरे ॥ पमत्ताइ सगति गुणा ॥२३॥ तसतिग-प्रप्तत्रिक परिमसमय-अंतसमपे परम-पट, विशेष पणिदि-पंचेंदिजाति अंतो-अंत थाप अपमघाइ-प्रसाद उदो-उदयनो अधिकार सगुणे-सामगुणठाणे मशुभाजगह-मनुप्पमापु सम्मतो-ममाप्त थपो भने गति उदय-उदयनी परे निगुणा-धिकरणुमाण. निणुवंति-जिननाम भने | उदीरणया-उदीरणा ना. उपगोत्र नवी थर्थः-प्रसनिक (प्रस, पादर, पर्याप्त,) पंचेंजिय जाति, मनुष्याउ थने भनुप्पगति, जिननाम अने उच्चेंगोत्र, ए चार प्रकृतिनो थयोगी गुणवणाने थंत समये थंत घाय. थदीयां उदयनो अधिकार समाप्त पयो दये उदीरणा ते उदयनी परज जापतो. पण एटसुं विशेष के अप्रमत्तादि सात गुणवाणे उदयनो प्रकृति कदो, तेषी उदीरणामांप्रणप्रय प्रकृति उटी करयो ।।

ថ្មីថ្មី जं वेअणि आदार उग, थीण तिग नरान अपमत्तता। गुणयाल सजोगि उदी, रणंतु अणुदोरगुअजोगी॥२४॥ वेमाणि-जे वेदनीय() अ-पाट 1 লীগ-যুগা आहारग-आदारकटिक पमना-मनगुणठाणे . उदीरणनु दीरमा योगानग-भीगदीत्रिक अंतयाय अणुदीरगु-अनुष्का नरा३-मनुप्यार गुणयाल-मोगणवाली अोगी-योगी गुगठाने अर्थः-जे वेदनीय थे तथा थाहारकद्धिक, पीपद्धीत्रिक, मनुप्याउ ए था प्रकृतिनी उदीरणानो विच्छेद प्रमत्त गुणवाणे थाय, तेथी थप्रमत्तादि गुणवाणे उदयथी उदीरणा त्रण प्रण प्रकृतिनी ऊनी करीए, तेवार यायन् उंगणचालीत प्रकृतिनी उदीरणा सयोगि गुणगणे होय, थने अयोगी गुणगणे थनु- दीरक होय ॥२४॥ एसा पयमी तिगुणा, वेअणि आहार जुअलयोणतिग।। मणुआन पमतता,अजोगि अणुदोरगो जयवं ॥३॥ नदीरणा सम्मत्ता॥ एसएयडी-एदीरगार. माहानुभनामाहारकादिक अजोगी अगोगी कृति योगानग-पीगीतिक मयां-भगवन বিগ-গাগা নামৰ প্ৰধা-মনুকাব্য देश देनीवर पपनना-मननापनलंग थर्थः- दीरणा प्रकृति व्ययकी प्राण जैत्री जाणवी. वंदनाप ये, श्रादार कडिक योद्धत्रिक, मनुष्यानु पथाव प्रनिती नदी प्रमनगृणनाणाना यंन सुगीज दोय. श. योगी नगवान मयं कर्मना थनुदीरक जाणवा ||२५ ए उदी চা শ্রধিকার সমান গখা, अगुदीगो-अनुहार %3D (ए-2) उदय अने उदीरणा छटा गुणठाणा सुधी सरखी होप छ, पण सातमे गुणगणे उदयमा छोतेर प्रकृति होप अने उदीरणामा तोतेर होय त्यायो दरेक गुणगणे उदय करता उदोरणामां मनुष्यायु अने शाता तथा अशाता घेदनीय ए प्रण प्रकृति मोडी जाणवी. कारण के मनुष्पायु ममत्वना योगे फरी उदरीपे सेथी बहूकाळ वेदना योग्य ते योहा कालमा वेदी, अपवर्णन करण विशेष करो दे तेथी सोपक्रम आयु होय. अकाल मरण पामे अने अपमत्तादि गुणगणे अकाल मरण न होय, तया शाता अशातानी उदीरणा पण ममत्त पणे होप.भने उदयतो सर्व गुणगणे लाभ हवे सचा अधिकार कहे छे. सत्ता कम्माण हिश, बंधाश्म खक्ष अत्त लानाम् ॥ संते अभ्यास सयं,जा जवसमु विजिणु विष तइए।२६। सत्ता-सचा | लाभाणं-लाभ कर्मीपणुं पठाणा मुधी फम्माण- -कर्मनी संघ-सचाए होप বিলি-সিনা বিনা हिर-स्थिति अत्यालसयं-एफसो अ-पीभ-पोना (सासाइन पंधाइभ-चंप आदिये फरी डतालीस गुणटाणे) सर-साध्युं छे जा-पाव सहए-धीमा (पोधपुणठाणे) उपसमु-उपांन मोरगु- अर्थः-सत्ता एटले फर्मनी स्थिति श्रवस्थान बंध तथा संक्रमण थादिके करीलाध्यु आत्मसान कर्मीपणुं जेणे. (था. मानां यांधेसां कर्म ज्यां सुधी खरे नहीं तथा अन्य प्रकृतिपणे संक्रमे नहीं त्यां सुधी ते कर्म सत्तामा ठे एम जाणवू ) एवी सत्तामा एकसो थमतालीस कर्मनी प्रकृति यावत् उपशात मो- हनामे थगिधारमा गुणगाणा सुधी जाणवी. पण चीजे सास्वा- दने धने प्रोजे मिश्रगुणगाणे जिननाम विना एकसामूमनासीत फर्मप्रकृति सत्ताए होय. ॥ २६ ॥ सीकर नामक जने सनापा परो जोरपोजे प्रोजे गुजाणे मा. अत्त-भारम

| सत्ग-सात प्रकृति
(3ए-२)
वतो नयी, अने मिध्यास गुणठाणे निननायनी सत्ता अंतर्मुहत संभो, जेन
कोई सायोपशिमक सम्पदृष्टि जीव पूर्व मिथ्यात्व प्रत्यय नरकायु यांची परी
सम्यक्त्व पापी जिननाम बांयी ते मरण समय सम्यस्त्वयो मिथ्या जाय, पग
सास्वादने न जाय, तेयी मिथ्यात्व गुणठाणे अंतमुहूर्त मात्र जिननाम सचाए
होय, पण सास्वादन अने मित्र गुणठाणे न होय तयी ते वे गुणठाणे एकसो-
डताळोसनी सत्ता होय.
अपूचाश्अ चनके, अपतिरि निरयान विणु विआलसया।
सम्माश् चनसुसत्तग, खयंमि ग चत्तसय महवा॥राजा
अपूनाइम-प्रपूर्वकरणा- | निरयाउ-नरकायु
: दिक
विणु-वे विना [लीस सयंमि-क्षय गह
घउक्के चारगुगठाणे बियालसयं-एकसो येता. इगचचसपं-एकसो एक
अग-अनंतानुवंधि चोकडी सम्माइ-सम्यष्टि आदि
तालीस
तिरि-तिचापु
चमु-चार गुणगणे
अहवा-अयवा
अर्थः-अपूर्वकरणादिक चार गुणगणे एटले -ए-२०११
मे गुणगणे अनंतानुवंधिया चौकमी, तिर्यंचायु अने नरकायु
ए प्रकृति बिना एकसो चैतालीस प्रकृतिनी सत्ता होय. थने
थविरति सम्यक्दृष्टि थादि एटले ४-५-६-७ ए चार गुणठाणे
वर्त्तता हायक सम्पदृष्टि जीवने (अनंतानुबंधीनी चोकमी,
सम्यकस्वमोहनी, मिश्रमोहनीय थने मिथ्यात्वमोहनीय) ए
सात प्रकृति क्षय ग माटे एकप्सो एकतालीस प्रकृति सत्ताए
होय अथवा पक्षांतर ए थर्थ थागली गाथामां कद्देवाशे २२
खवगंतुपप्पचनमुचि, पणयाले निरय तिरि सुरान विण
सतग विणु अमतीसं, जा अनिअही पढम जागो॥श्न।

निरप-नरकायु (ए-३) खेवगतुपाप-पक केवली, विरि-तियैधायु जा-पावत् বন মরী मुराउ-देवायु अनिश्री अनिचिना घरमुचि-ए चार गुणगणे विणा-विना पटम भागो-मपम भोग पगपालं-एकसोपीस्तालीस, सचगविणु- -सात विना लगी अहतीसं-एकसो अनीस अर्थः-(पक्षांतरे) चरम शरीरीक्षपककेयसीने ४-५-६-७ ए चार गुणगणे नरकायु, तिर्यंचायु थने देवायु ए प्रण बिना एकसो पीस्तालीस प्रकृत्ति संताए कही. थने सात प्रकृति बिना क्षायिक सम्यक्दृष्टिने एकसो थमत्रीसनी सत्ता चोया गुणगणाथो यावत् थनिवृत्ति नवमा गुणगणाना प्रथम नाग लगे होय. ॥ २॥ यावर तिरिनिरयायव, गथीण तिगेग विगत सादारं॥ सोल खोविस सयं, विसि विधतिअफसायंतोश्ए पावर-स्पावरदिक -হিলাশি दुबिसस-एक्सोवास निरि-निपैचारिक सिंगल-विकलेंद्रियनिक | विमंसि-पोजे मांगे निग्य-नरकटिक साहार-साधारण नाम (नरमाना) भायएं-भातपदिक सोर-सोलना रिमतिभ-योमा भने मा धीणतिग-योदिषिक । सभो-क्षप प.सायनो-कापनोभापाय श्रयः-स्थावरहिक (स्थावर थने सूदमनामकर्म, ति. पंचहिक तियेचगति श्रने अनुपूर्वी, ) नरकटिक (नरकगति थने अनुपूर्वी,) थातपदिक (थातप थने उद्योतनाम.) पी. णमोनिक (थोणची, निजानिता, थने प्रचसाप्रवना,) ए. द्विजाति, विगसनिक (पेइंति, तेइंडि, पौरिजिजाति.) तपा साधारण नामकर्म ए सोल प्रहसिनो दाय नवमा गुपनापाना ឬ០ उदययंत्र. . ہم اس [ه اتمی همه ام उचर प्रकृति मुळ प्रकृति. अनुक्रम. मिथ्याचे सयोगीकरलाय १३ सास्वादन अविरते प्रमत्ते | देशविर ने अपूर्वकरणे अप्रपने | अनितिकरण मिश्रे मुक्ष्मसंपरा 6 | उपशांतमोद | | अयोगीकरलार्य १४ दक्षीणमोहें १०० ओये मूल प्रकृति ८ 22 । . 80 ८७ ७६७२६६६०५५ (४२१२ ११ १/२] १ झानावरणीय मोघे उत्तर प्रकृति, शमविज्ञानावरणीय | १) १ १ २श्रुतज्ञानावरणीय अवधिझानावर० मनःपर्यवज्ञानाव. ५ फेवलज्ञानावरणीय . २ दर्शनावरणीय ६/चक्षुदर्शनावरणीय ७ अचक्षुदर्शनावर० अवधिदर्शनावर. ९ केवलदर्शनापर. १०निद्रा १२ निहानिद्रा १२मचला १३चला मचला २४ीणदी www बदनीय SRICI . मारपानीप १८पिथपानीप निध्यात्मोनीय २८ भनसानुबंधीप्रोप २१ मारपाम्पानोप २ सम्मानकाप शमंचन प्रोष २४ मनमानुपीवान । २५ प्रपत्पारपानीप. ६iमस्याम्पानीपमा २७ मंग्व मनमान २८/मनमानुपीमापा २प्रमत्पागनीप त्याप्यानी १२मंगरलनमाया ३२ मनमानुरंधीमोम (३. ममत्याग्यानीय ३४)मरपाल्पानीप ३५सिंचालन मोम ३६)हास्प नोकपाप হৰি নাথ ३८ मति नोकपाप 1३९/शोक नोपाय पप नोकपाय जुगुप्सा नोकपाय ४२ पुरुषवेद नोकपाय ४ स्त्री नोकपाप ४. नपुसमवेद नोक. ४ मोडनायक . . . . . ५देवायु . (आयुरप ४६ मनुप्यायु ४७नियंचायु ४४८ नरमायु o .

० . . 0 . . . ० . ८ ८ ४९ नरकगातिनामक २० तिर्यंचगतिनाम: २१/ मनुष्यगतिनामकर्म देवगतिनामार्म ५३ एकैदियनातिना. २४ इंदियनातिनाप० १] ५५ तेइंदियनातिनाम ५६चद्रियमानिना पदिय मानिनाम | १८ औदारिकशरीर० ५९ क्रियशरीरनाम ३० माहारकशरीरना. ६१ तेजमशरीरनाम ६२ काम गशरीरनाम औदारिक भंगो १६४/क्रिय अंगोपांग ६५ आहारक अंगोपांग ६६ बजऋषभनारा. १७ऋपभनाराचसं० १८ नाराचघपण ६९ अर्द्धनाराचसंघ० ७० कालिकासंघय० ७२ छेवहुसंघयण ७२ समचतुरस्र संस्थान |७३ न्यग्रोधसंस्थान ७४ सादिसंस्थान ७५ वामनसंस्थान ७६, कुम्जसंस्थान . ६ नामकम uy . 이이이이기. ७७ हुँइसंस्थान ७८ वर्णनाप ७९गंधनाम ८० रसनाम । নার नरकानुनी . . .

CC . . । नामकम ८३ तिर्य चानुनी ८४. मनुष्यानुपूर्वी ८५दिवानुपमा ८६ शुभविहायोगति ८७ पशुपवियोगति ८८परापातनामकर्म ८९ परमवासनामार्म ९० तपनामकर्म ९. उयोतनामकर्म ९२ भगुरुलघुनामकर्म ९ तकिरनापकर्म ९५ निर्माणनापकर्म ९५ उपयातनायक ९६ प्रसनामार्म ९७ पादरनामकर्म १८ पर्याप्तनापकर्म ९९मत्येकनामकर्म १०० पिरनामक १० गुमनामकर्म १०२ सौभाग्पनासम्म १० गसरनाम 1200भादेपनामा १.५/पशाकामिनापकर्म 20 स्थानापक १०७ गत्यनामा मपातनामा २०९ साधारणनामा ११. स्थिरनामा ११. भासनायाम दर्भारपनार्म ११३सारना ११५ भनारेमामा ११५मपनिse !!" ... . .

ចុច अथ श्री बंध स्वामित्व नामा तृतीय कर्मग्रंथ ।। बुच्छ-कही| : बंध विहाण विमुक्कं. बंदि सिरि व माण जिणचंदें। गंई आईसु बुलं, समासर्ड बंध सामित्तं ॥१॥ पंध-जीवसायकर्म बंधाधु सिरि-भी मार्गणाभोने विपे विहाण-कर, निपजावबर्द्धमान-चीरस्वामी विमुक-विशेष मूकाणाजीगचंद जीनीने विपे | समासमो-संक्षेपयो (रहित) चंद्र समान बंघसामिन-वंय स्वामि- बंदिअ-चांदीने गइआइम-गतिमादि चौद लपणु : अर्थः-जीव प्रदेश साथै कर्मनो जे संबंध ते बंध कहिये, तेर्नु मिथ्यात्वादिक हेतुए करीने निपजाववं, ते बंध विधान, तेथी विमुक्त ( रहित) एवा श्री वर्द्धमान स्वामी जे सामान्य केवलीमांहे चं सरखा ते प्रत्ये वांदीने, गति थादि मार्गणा स्थानने विपे संक्षेपथी बंध स्वामित्वपणुं (कयो जीव केटली प्रकृति वांधे ते) कहीश ॥१॥ हये चौद मार्गणानां नाम कहे छे. ग इंदीए काए, जोए वेए कसाय नाणेय ॥ संजम दसण लेसा, जव सम्मे सन्नि आदारे ॥२॥ गइ-गतिमार्गणा कसाय-पायमार्गणा भव-भव्यमार्गणा दिए-द्रियगार्गणा माणेय-ज्ञानमार्गणा सम्मे-सम्यक्त्वमार्गगा पाए-कायमार्गणा संगम-चारित्रमार्गणा सनि-सनिमार्गणा नोए-जोगमार्गणा दसण-दर्शनमार्गणा आहारेक-माहारकमार्गमा पए-वेदमार्गणा स्टेसा-टेश्यामार्गणा + करन सायक इंदि -~- पारिदि ក្នុង अर्थः-गति, इजिय, काय, जोग, वेद, कपाय, ज्ञान, चा रित्र, दरशन, लेश्या, नव्य, सम्यक्त्व, संज्ञि थने थाहारक ए चौद मूल मार्गणा , तेना उत्तर वास नेद थाय . ॥२॥ १ गतिमार्गणा जोगमार्गणा३७ धानमा० ८९ दशेनमा० ४१२सम्यक्त्वमा० ६ देव मनयोग ' मनिज्ञान चक्षु দিঘী मनुप्य वचनयोग भुतमान अचा শালী तिर्यच काययोग अवधिहान अधि पिन না वेदया. ३मनापर्यवहान हायपरवि २६दियमार्गणा५ स्त्रीवेद फेवनमान १०लेश्यामार० भोपपिक ঝিরি पुरुपवेद पतिभमान । कृष्णलेल्या नपुंसकचंद धुन भज्ञान नील १३समिमा ६पायमा०४ विभंगमान कापात समि कोप ८चारित्रमा०७ मेशा असन्नि पंचेंदि मान मामायक ४आहारमा २ फायमार्गणा । छेदोषस्थापका शुमाश्या पृथ्वीकाय टेम परिहारविशु०११भव्यमा०२ अपकाय मुहमसंपराय। उपाय यपारख्यात अपप्प घायुकाय देशविरति बनस्पतिका শৱিাৰি प्रसकाय जोणसुर विवाहारउ,देवाउ अनिरय मुहुम विगवत्तिर्ग एगिदि थायरा यव, नपु मिच्छं हुंम वेबठं ॥ ३ ॥ जीण-मीननामहर्म निग्य-नागरिक সাব-সান मुर-गुहिक गुप-ममति नगमा रिकितिक बिगर-गिनिधी ति मिथ्यायसोनीप भामा-आदि लिशि ( उपनाम ११-१. स्यार -क ( पानांप्रण) पांग:-पिमान मपन देशाउ-देवाय माया भव्य शास-याराना 00 अर्थः-(इवे १२० मांदेली केटलीक प्रकृतिको अनुकम संग्रह कहे, धागळ जे प्रकृतिथी जेटली प्रकृति सेवी कदेशे त्यांची तटसी प्रकृति अनुक्रमे सेबी,) जिननाम (१) सुरधिक ३, (देवगति, देवानुपूवी),वेक्रियहिकर (वैक्रियशरीर, वैक्रिपथंगो. पांग), थाहारकदिक ७ (थाहारक शरीर, थाहारक थंगोपा- ग), देवायु , नरकत्रिक ११ (नरकगति, नरकनो थनुपूर्वी, नरकायु) मूरमत्रिक १४, (सूक्ष्म. अपर्याप्त, साधारण), वि. गत्रिक १० (पंडि, तेइंति, चोरिजि), एजिपजाति १०, स्पार नामर्म १५, घातप नामकर्म २०, नपुंसकोद २१, गि पाररमोदनीप२२, ढुंगसंस्थान २३, भने ठेवहुं संघयण २४ ॥३॥ मग मका गिई संघयण, कुखगई निथ इथिय उदग घोणनिगं ।। अतिरिगं तिरि, नराम नर उरत गम्मिदं । भय बनानु पानिप्र-निगंगा FAR-सिंग (मा) दिन-गी ना ना, मनपा :- पानि(. गनीमंग (पीक) मार मात्र रमजान नगम (वि कान मात्र f-fir Triinfortan) -Tinाप fini-HATHI एमर-मन मिदिम- वर्ष:-मानवादि । काय, मान, मापा जान ) कलाप मर, नया मापान । ममार, मानापान, माननागन, नागम, यांनााय, पर! यरियापन, निमगांव ३०, नाम) , स्त्रीवेद ३ए, तथा दोनोग्यत्रिक (दो ग्य, दुखर, धनादेय), थीपरीत्रिक (निद्रानिद्रा, प्रचसाप्रचसा, बीपदी) एवं ४५, उद्योत नाम कर्म ४६, तिर्यंचहिक ४०, (तियच गति, तथा अनुपूर्वी) तिर्यंचायु भए, मनुष्यायु ५०, मनुष्परिक ५२, (मनुप्य गति तथा अनुपूवीं),थोदारिकधिक ५४, (थोदारिक शरीर तथा थंगोपांग), वजूऋपन नाराच संघयण ५५, प.पं. चावन प्रकृतिनी क्रम संझा जाणवी ॥४॥ नरकगनिने सिप पंध वापिरवपणुं कई. सुरइ गुण वीस वर्क, गस नदेण बंधहि निरया । तित्यविणा मिच्चि सयं, सासणि नपु चनविणा नुइया पुर-मुरादिक पंधहि-पत्रि सयं-सो इगुणवीस भोगणीस निरया-नारकी सासणि-सारसदमे पन-वाये विष्य-नोकरनापार्म नपुर-नपुमारि इगसमो-एकसोएक विणा-रिना विणा-रिना भोईण-भोधे, सामान्यपणे मिचि-विध्यारये थर्थः-दये गप्ति मार्गणाए पंध फदेठे प्रथम नरफातिए सुरग थादि थातप नामकर्म मुधोनी थोगणीस प्रकृति . जीने एकसोएक प्रकृति सामान्ये (गुणगणानी अपेक्षा दिना) सर्प नारफी समयपणे पांधे, (नारकीने ना मना ज ए योगणीसनो यंध न होय.) मिष्याय गुणगणे तीर्थंकर नामनी पंध न होय ते माटे ते घिना सो प्रमिनो वंध होय. कारण- दने नपुंसकादि (नपुंसक, मिपारच, हुंग गहुँ) पार दिना उन्नुनो पंध होय ॥५॥ Ur.vj अग नाके . प्रग नरके एक विणु अण ववीसमोसे, बिसयरिसम्ममि जिण नराउजु ईअ रयणाइसु जंगो, पंकाइसु तित्थयर हीणो ॥६। रिपुभग-अनंतानुधि सख गुगडाणे आदि विना निग-जिननामर्म भंगो-मांगो नीम-उन्नीस नराउ-मनुष्याउए पंफारमु-पंक मभादित मीमे-मिधाणाणे जुभा-युक्त रिमयरि-योतर नित्थपर-नीकरनापाम सम्बनि-भतिरति सम्य- | रयगाइम-रत्नप्रभादिक । होणा-हीन (भोग) थर्थः-धनंतानुयंधि थादिथी नरायु सगे तब्बीस प्रकृति पिना मित्र गुणगाणे सित्तेर प्रकृति वांधे. थने जिननाम तथ मनुष्यायु नेळयता योतेर प्रकृति अविरति सम्यक् गुणगाए पां गम रत्नानादि प्रण नरके थोघेथी चार गुणगणां सुध पज नांगी जाणयों, पंक प्रनादि प्रण नारकीए तीर्थकर नाम फर्मनी पंध दीन करीये ( तेयारे थोघे २०१, मिथ्यारये १०० मारवादन ए, मिये ७०, श्रने सम्यक्त्वे १२ प्रतिनी पंध प इंसी, पीजी थने प्रोजी नारफी, होय, थने घोघे १००, नि- पात १०, गाम्यादने ए, मिधे २०, सम्पयरव १ प्रसिनो पंध चाची पांचमी थने की नारकीय होय, कारण के प. प्रण नारकीनांपी थाव्या जीरनीर्थकर न थाप मादे ने नाम- कर्मनी यंध न होय. ॥ ६ ॥ समय नामता पायो भी पार, वामीको अमरमर कस कर पाना । ही पाया कि भाग. Engi sms रियल प्रमाणे प्रारin निक ए३ अजिण मणुआन ओदे, सत्तमिए नरगुच विणु ग नवई सासाणे, तिरिआन नपुंस चन वङ अ-नहीं नरदुग-मनुप्पद्विक सामाणे-सा निण-निननामकर्म उप- उर्गोत्र निरिभाउ-तिचाप मणुमाउ-मनुप्यायु विणु-रिना भौहे-ओषे मिर-मिथ्यात्वे नपुंमचार-नपुंसकादिचार ससपिए-सातमीए वन-वनीने इगनवइ-एकाj अर्थः-जीननाम तथा मनुष्यायु ए ये प्रकृति एकसो एकमाथी हीन करीए ते वारे श्रोघे नवाणुं प्रकृति सातमी नारकीए बंधाय, [सातमी नारकीनो थाल्यो जीय मनुप्य न थाय माटे ] अने मनुष्यहिक तथा उच्चगोत्र ए प्रण प्रति विना मिथ्यात्वे उन्नुनो बंध होय, तथा तिर्यंचायु, थने नुपुंस- कादि (नपुंसकवेद, मिथ्यात्व, हुंमसंस्थान, थने ठेयषुसंघपण ए)चार एम पांच प्रकृति पर्जीने एकाएं प्रकृतिनो यंध साम्मा दन गुणगणे होय ॥७॥ अण चवीस विरहिया, सतर गुयाय सपरि मीसगे। सतरसओ प्रोदि मिच्छे, पज तिरिया विणु जिणाहारं ॥ ८॥ भण-भनंनानुधि मरि- मिर पन-पता पउदीम-पोवीम मोमदगे-पिथविक (मिश्र निरिभा-विधपति मिहिमा-विरहित भने विति। विण-रिका ससहित ममममी-पापना जिर जोनमाया भी- नादुग-पनुष्पष्टिक किया HIN-पति .

ए अर्थः-अनंतानुवंधि थादिथी तिरिदुग सुधीनी चोवीस प्रकृति एकाएं प्रकृतिमाथी उठी करीये, तथा मनुष्य- हिक अने उच्चगोत्र ए त्रण प्रकृति [साहित करीए ] नेळवीए, तेबारे मिश्र अने अविरति सम्यक्त्व ए ये गुणवाये सितेर प्रकृतिनो बंध होय, सातमी नरकेथी नीकल्यो मनुष्य न थाय पण मनुष्यधिकने नवांतरे उदय श्रावे. हवे तिर्यंच- गति बंध कहे के पर्याप्ता तिर्यंच पंचेंजिने जिननाम अने था. हारकद्रिक ए प्रण बिना एकसो सनर प्रकृतिनो घंध उपे थने मिथ्यात्वे होय. तिर्यंचमां गति प्रत्ययेज जिननामनो यंध न दोय थने संयमविना थाहारकदिक पण न बंधाय. ॥७॥ विणु निरय सोख सासणि, सुरान अण एगतीस विणु मीसे ॥ स सुरान सयरि सम्मे, बीअ कसाए विणा देसे ॥ ए॥ रिगु-तिना अण-मननानुविभादि । सपरि-सिगर रिण-नरक (विकादि) पगतीग-एकत्रीश सा-या मोर-मोर मोग-मिश्रागटाणे पीमं-योना(ममत्यारा নাবীব ) मामनि-माम्पादन म-सहित कमाप-कपाप मृगरवाय गुगर-बापु देश-देशपिरतिगगाणे थः नरकनिक यादि [सने इंग यह सगेनी ] सोळ प्रतिदिना माम्पादन गुणगणे एकमाने एक प्रामि यधि, देवायु थने थनंतानुयंषि यादियी मिट संगनी एकत्री मी यतीम प्रामि विना थगनांतर प्रालि मिय गुणगाणे হাখ, ঘন শ্বাস নিন প্রতি সম্মক যুগাল এখ, সপ্তা এরা গান। যা বাদিন না E ए प्रकृति पांचमा देशविरति गुणगणे घांधे. पर्याप्तिा तियेच पंचे. जिने ए पांचज गुणगणां होय. ॥ ए॥ हवे मनुष्य गति मध्ये वंध स्वामित्वप' कहे छे. श्अ चगुणेसु वि नरा, परमजया सजिण ओह देसाई ॥ जिण इकारस हीणं, नवसय अपजत्त तिरिअ नरा॥१०॥ अ-एमजे सनिण-जिननाम सहित हिणं-हिन घउगुणेन-चार गुणठाणे ओहु-ओघे | नवसय-एफसोनव विनरा-मनुप्पनेपग देसाइ-देशविरतिआदिये । अपमन-भपर्याप्तपदि परम्- -विशेष मिणकारस-निन एका• निरिमनरा-निर्यप तथा अनया-अविरति गुणठा' दशक मनुप्यो अर्थः-एज प्रमाणे चार गुणगणाने विपे तिर्यंचनी पेठे मनुप्यने पण जाणवू. [एटसे मनुष्य उघे १२०, मिथ्यात्वे ११७, सास्वादने १०१, मिश्रे ६ए, वांधे ] पण एटडं विशेष के थपि. रति सम्यक्त्व गुणगणे जिननाम सहित ७१ पांधे. देश विर- त्यादिक गुणगणे उघ एटसे कर्मस्तवोक्तनीपरे [वीजा कर्म- प्रयमां कद्या प्रमाणे ] कदेई [ ते केवी रीते ? पांचमे ६५, वडे ६३, सातमे एए, थाउमा गुणगणाना पेदेसा नागे ५७, पोजा, श्रीजा, चौथा, पांचमा थने ठहा नागे ५६, सातमा नागे २६, नवमा गुणगणाना पेहेसे नागे २२, योजे २१, प्रोजे २०, चोये १ए, थने पांचमे १७, दशमा गुणगणे १७, थगियारमा, पारमा थने तेरमा गुणगणे १ तथा चउदमा गुणगाणे थयंधक होय अने जिनादिकची नरकत्रिक सगे जिनएकादशनी थगि- यार प्रकृति दिन कीधे एकसोनव प्रकृतिनो यंध थपर्याप्त नि.

- ए यंच थने थपर्याप्ता मनुष्य बांधे. कारण के एने एकज मि. ध्यान गुणगणुं होय. यद्यपि करण अपर्याप्ता मनुप्यने सम्य. क्व होय त्यां जीननाम पण बांधे . पण थहीं सब्धि थप- यीप्ता मनुप्यनीज विवक्षा करीने, ते माटे एकज मिथ्यात्व गुणगणं होय ॥१०॥ व देवगतिने विप बंध कहे हे. निरयव मुरा नवरं, ओदे मिच्छे इंगिदि तिग सहि आ ॥ कप्पदुगे विमएवं, जिणहीणो जोइ नवण वाणे ॥ ११॥ सिम-नारानी परे । पदितिग-एट्रिनिक निण-नीननामा गाभा-गदिन दिगो-गीना (राण) नानास क.पगे ये देवलों मोर-पोलिपि मी-नार शिम-पण भाग-मानाति निविण्या पण यंता घ:-नारकीनी पर दयनाने पण पंध कइयो, पण एट' विप जयने मिथ्यारत्र गुणगाणे पद्रिय, स्थायर, थने घातर एप्रण प्रकृति सहित कईया, जे माटे देवता एकदि. पर वधि, ने माद थोप १०४, मिथ्या १०३, सास्थाने १५ मिन , मम्य २२, नी यंध होय. पदसा में देवसों के जय पमत बंध कटेया, योनिवि नवनपनि थने ना मिन नान हिण (यां) कई कारण के स्पांना थाल्यो जी जीन पार नहीं, माटे यांचे १०३, मिथ्या १०१, गारानं नि:, मम्या बांध. ॥ ४ ॥ गुगता ए-रमम . अपकाप យ स्यणुव सणं कुमारी, ३ आणयाउौथे चतर दिया। अपजा निरिअवनवसय, मिगिदि पुढविजसतरुविगले॥ ॥१२॥ रपणुव-पत्लमभानी पेठे पार | अंगिंदी-पद सगंरुमाराइ-सनत्कुमार | रहीआ-रहित पुरवी जस-पृथ्वीप, मादि अपज-अपर्याप्ता आगापार-मानत आदि तिरिसर-तिर्यचनी पेठे तर-पनशतिकाप उज्जोमचर-उघोतादिक | नरसप-एकसो नर विगले-निगदिप अर्थः-रत्नप्रना नारकीनी पेठे सनत्कुमारादि (सनत्कुमार, माहेज, ब्रह्म, सांतक, महाशुक्र, सहसार) व देवसोफना देय- ताने यंध कद्देवो, एकेंद्रिमा उपज, नयी ते माटे एट्रिक त्रिक न घांधे, तेथी श्रोघे १०१, मिथ्यात्वे १००, सास्वादने ए६, मिधे 10, सम्यक्त्वे १२, वांधे. श्रानतादि (श्राणत, प्राणत, थारण, 'थच्युत) चार देवलोके थने नवमेवेयकना देवता ग्योतनाम, तिर्यचहिक (गतितथा थनुपूर्वी) थने तिर्यंच थायु ए घार 'प्रकृति विना रन प्रनानी पेरे बांधे, ए देवता तिर्यंचमां न जाप ते माटे ए चार प्रकृति न पांधे, ते पारे थोघे ए3, मिप्यावे ए६ सास्वादने ए२, मिश्रे , थविरतिये १२, बांधे, (धनु. तर विमाने एक सम्यक्त्व गुणगएं . माटे त्यां २ पांधे), (इये इंजिय मार्गपा तथा काय मार्गणाए घंध कहे ). . पर्याता तिर्यंचनी पेरे मिथ्यारय गुणगाणे एकसी नव प्रकृतिनी पंध थोघे एफेडि, पृथ्वीकाप, थपकाय, वनस्पतिकाप, घने विकसेंजिन होय ॥ १२॥ U

{"
.
पुण-वळी
तणुपज्जत्ति-शरीरपर्याप्ति
បចំ
उनव सासणि विणु सुहु, म तेर केइ पुण विति
चलनवः ॥ तिरिय नरांकदि विणा, तणु पङात्तिं
• नजति ज ॥१३॥
छनवर-छन्नु । केह-कोइक
नरा-मनुष्य
सासणी-सास्वादन
आहि-आयुष्य
विशु-विना
बिति-कद्दे
विणा-विना.
मुहम-धूक्ष्म
घउनवइ-चोरा'
तेर-सेर
विरिअ-तिच नतिजमी-पूरी न करे
अंर्थः-सास्वादन गुणगणे सक्ष्म त्रिकादिची ठेव लगेनी
तेर प्रकृति १०५ माथी उठी करतां उन्नुं प्रकृतिनो बंध होय,
श्रने कोइक श्राचार्य एवी रीते कहे वे के अपर्याप्ता, तिर्यंचायु
श्रने मनुष्यायु ए वे विना चोराणं प्रकृति सास्वादने घांधे
फारणके एजियादिक सास्वादन वंत थका शरीर पर्याप्ति पण
पूरी न करी शके तो थायुप्य केम बांधे ? ॥ १३ ॥
रया पहेले मते शरीर पर्याप्ति या पछी पण सास्वादन रहे, त्या आप
यंपाय, त्यारे हे ९६ यधि, अने पीजे महे तो शरीर पर्याप्तिथी अगाउन सार
स्वदिने नाय तो आयु पयांधी परि ? त्यारे ते ९४ यधेि. ए ये मत जाणा.
ए पेमा ९४ मा मत परी मासे से, जे मणी केंद्रियादिकन जपन्य भायुपण
१५६ आयटिकानो शुलक पर रोप से आपुना ये माग गये एकसो इकौतेरमो
भावठिकाए भाप पाय भने सास्वादनपणुं तो उराएं पण छ आपत्रिका
प वेटलामरि परमपनं आपु केस धाप ? ते मारे ९४ अ पंपाप एमा
द मगाय रे..
नदु पणिदि तसेगड, तसे जिणिकार नर ति
गुय विणा ॥ मणवय जोगे रहो, उरसे नरजंगु
तम्मिस्से ॥२४॥

- एए मोद-भोपपंध नरनिंग-मनुष्यधिक उरटे-आदारिक मादा- पणिदि-पंचेंद्रि (मार्गणा) उच्च- उत्र रिफ काययोगे मसे सफाप (मार्गणा) विणा-रिना गातसे-गतिस(सेउका- नर-मनुष्य पनीरे मनवच-पनवधन 'यअने घाउकाप मार्गण) मंगु-मांगो निणिकार-निनादिकम- जोगे-योगमार्गणारे सं-हेमन गीभार ओरो-पौधे मिस्से-पौरारिक मिश्रयोग थर्थः-पंचडिय श्रने प्रसंकाय मार्गणाये चोदे गुणगये 'श्रोध ते घोजे कर्ममंथे कह्यो तेम कडेवो. दये गतिम्रत ते तेलकाय वाउकाय, तेने जीन नाम थादे देने नरकनिक खगे थागयार थने मनुप्यत्रिक तथा उच्चेगॉन एम पंदर प्रकृति एकसो वीसमाथी टाळीने एकसो पांचनो धंध होय, गुणाएं 'एक मिथ्यात्व होय. (हवे योग मार्गणाये पंध कहे हे.) 'मनोयोग वर्गणा चार नेदे ( सत्य मनोयोग, मृपामनोयोग, सत्यामृपा मनोयोग, थसत्या गृपा मनोयोग ) सेमज (मनो. योगनी पेरे ] वचनयोग चार लेदे ए थान योगने विप तेर गुणगाणे उघ ते फर्मस्तयना पेरे धंध कदेवो. थोदारिक काय योगने मनुप्पनी परे पंधनो नांगो कदेयो तेमज थागळ तर गुणगणे थोदारिक मिश्रयोगे पंध कदे ॥ १५ ॥ से औदारिक कार्मण सापे पियाापयोगी भएपमारस्पा जे मनुष्य तमा तिर्पच रोप स्या पंप कसे. पाहारग विणोदे,चनदससन मिच्छिजिण पणगहीण। सासणि च नवशविणा, तिरिधनरान मुहुम तेर ॥१॥ आरएफ-माहारग निगपग-निन । निरिभराउनीमा বিগ-বিনা हिणं-णि (मोडी) हा पास भोर-भोपे पाससा-एसो चोद सामणि-मासादा मिशि-मिप्यारे पाना-पोरा* तर-दर , १०० अर्थः-श्राहारकादि (थाहारकद्रिक, देवायु, नरकत्रिक ए) रविना योधपणे एकसो चोदप्रकृति बांधे ( औदारिक मित्र कापयोगी मनुष्य तिर्यंचने अपर्याप्त पणे श्रीदारिक मिश्र होय, थाहारकहिकतो श्रप्रमतज यांधे, ते अपर्याप्त पणे होय नहीं घने देवायु तथा नरकनिक ए चारतो पर्याप्तोज पांधे, ते माटे ए प्रकृति न बांधे.) श्रने मिथ्यात्वे जिन पंचक (जिननाम, सुरक्षिक, अने वेकियदिक)नी पांच प्रकृति इन करीये त्यारे एकसो नय प्रकृति पांधे, तथा सास्वादन गुणगणे तिर्यंचायु, मनुप्पायु, अने सूक्ष्मप्रिकादिक तेर एम पंदर प्रकृति १ एमांची काढतां घोराणुनो बंध होय, श्रीदारिक मिश्रनो तो अपर्या- सपणे पण अपमाळ . तेटसा माटे श्रायुबंध न होप थने मदमादिक तेर प्रकृतितो सास्यादनेज बंधाय, मिश्रगुण वाणु तो दोपज नही ।। १५ ।। यण चवीसाइ विणा, जिणपण जुध सम्मि जोगि. णो सायं॥ विणुतिरि नराम कम्मे, यि पयमादारऽगि पोहो ॥१६॥ अप-अनंतात याविरागिनी-मोगी एग कमेरिकामंग भार मार्ग नातागनी पोनीने ति-रिता हिसार-रिवार विण-रिना पतंगमन लिग्निगर-पिन प्रने मरिमामा मनुमा मा- यः- भोग मारपी थनमानुधीयादि पिंप. कि नशेमानदार धनं जिनक (भिनगाम, मानि-भारत १०१ सुरद्धिक, क्रियधिक, ए पांच) सहित करीए, तेवारे पंचोतेर प्रकृति अविरति सम्यक्त्व गुणगणे यांधे अने सयोगी गुणगणे एक शातानो बंध तथा तियेच थने मनुष्यायु ए घे प्रकृति विना शेष कार्मण काययोगीने पण थोदारिक मिश्र योगीने परे, एमज थाहारक काययोगे अने श्राहारक मिश्रकागयोगे पण उघ एटसे कर्मस्तवमां कह्या मुजव बंध कद्देवो ॥१६॥ सयोगि गुणठाणे फेहि समुद्यात करता २-६-७ समपे औदारिक मि- अफाप योगी होप त्यांतो एक शाता घेदनीन बांधे, पूर्व भव थकी हा उत्पनि देशे माग्यो यको नीव प्रथम समपे फेवल फार्पण कापयोगेन आहार ठे, परी पीमा समययकी औदारिक मिश्रित फार्मणे आहार ले त्यारे औदारिक मिश्रका- पयोगी कहीये.शरीर निष्पचि लगे शरीर नीपन्या पछी औदारिक कापयोगकरीये. पवउक्तं जोएगफम्मएणं आहारेइ भणंतर जीयो । तेणपरं मोसेणं । जायसरीर निप्पची ॥१॥ ए औदारिक मिश्रने पोलं पीजु घोषू तेरमं ए पार गुणठाणा होप त्या पेटेले गुणठाणे तिर्यंचायु मनुप्यायुरंधे का ते औदारिक मिश्रण तो परीर पर्याप्ति पूरी फर्या अगाउन होय ते पछी मौदारिफ पोग होय, भने आपु. वो शरीर पर्याप्ति पळीम पंचाय, त्यारे मिथने एपे भापुनो पंप .प पटे! तया पळी चोये एणठाणे तिर्यंच ७० यांचे, मनुष्प ७१ धे, अने औदारिक मिषकापयोगी ७५ बधि एम कई वे पशुं विचारता योग्य ऐ, पारण के प्पदिक सपा औदारिकदिक भने पमपम नाराप संपपण ए पाप महति वि. पैष मनुप्प सम्पटी न पाये भने औदारिक मिश्रायपोगी गांध, मनुष्य तिच टाळोने मोमो भौदारिक पिकापयोगी कोण रोप! ते पार्ट १ पांच महति एने बंधे केप पटे? ए ग्रंपकारे कोग आणे पा अभिपाये भाप से! ते पंरित विचार ए संदो टीकाकार पण विक्ष्यो नपी कार्मण कायपोग भरतराल पाटे बहना भने उपभराने वाले सागर तथा पलि ममुरातने मोजे घोपे पांच सपये रोप, एने गुणगो (ोले, बोर्ड चोपुं तेरम ए ) चार रोप ने निर्यगाय नया मनुष्याय वीने मोहारिक , तिम-श्रीमा फसाप-कपार नव-ना गोंगबनानी पं. पायं १०४, पिप्पा.२, मास गाना , नो धागत समीप Fun farmय पंग लागत, पण पर न...ी मला मानाने m. turn, मत विधगुगा. २०३ मिश्रनी परे बंध कहेवो. जेम ओघे ११२, मिथ्यात्वे १०७, “सास्वादने ११, सम्पावे ७५, अने तेरमे एक शातावेदनीय यांचे, आहारक कार्ययोग भने आगरक मिश्रकाययोग ए येनो उदय छठे गुणगणे हे, ते माटे त्या आरती परे ६३ नो बंध होप, ए आहारक प्रमत्त साधु चौदपूर्वीन करे, अने से मार घेग श्रीदारिक सापे मिश्र होय. (जीवविजयजी कृत टयामापी) सुर ओहो वेनधे, तिरिअ नराज रहिओअ तम्मिस्से।। वेअतिगाश्म विमतिअ,कसाय नव ऽचन पंचगुणा गर-देखतानी पेरे | तं-सेमन भोरी-मोरे मिसे-क्रिय मियफाय किग काय योगने योगोने गिरिपनगी माप पतिग-पेदत्रिक घर-चार भाइम-पहेला पंच-पांग परियो-गरिन वे-पीना थर्यः-क्रिय फाययोगने देवतानी परे यंध कहेयो, तेमन प्रक्रियमिश्रकाययोगीने तिचायु थने मनुष्यायु ए पेषीरहित यक्रिपनी परे कद्देयं. (इये येदादिक मार्गणाये यंध कई ) वेद प्रगने प्रयम नव गुणवाणां ट्रोय, श्रादिम एटसे धनंपा. नुवर्षी चार कपाययंतने पेहला ये गुणगणां होय, पीजा एक पाण्यानोया चार कपाययंतने पहेला चार गुणगाणां होप, श्री राप्रपा पानीया कपाययंतने पांच गुणवण होय ॥१७॥ गर्ग ना. भने मनुष्यापु যুগ-যুগাগ २०३ ET प्रण गुणगणे पण तिर्यगायु अने मनुप्पायु न पारे, लधि अपर्यामो देनना नपा नारकी न होय तेथी अपर्याप्तावस्याये आयु न पांधे सारे आरे १०२, मिथ्या- त्वे १०१, सास्वादने ९४, मिश्रगुणाधू शेप नहीं अने चोये गुणटाणे नो घंध होय. पाकीनां गुणठाणा होप नहीं. प्रणे वेदने भयमनां नर गुणठाणा होय त्या मोरे १२०, सिध्याले ११७, सास्वादने १०१, मिग्रे ७४, अविरनिये ७७, देशविरनिये १७, ममचे ६३, अप्रमत्त ५९-५८, अपूर्वफरणे ५८-५६-२६, चादर संपराये २२-२१, ने पजी अवेदो पाय. पेहेला अनंतानुपंधी चार कपाये ओघ ११७, मिध्यावं ११७, मावादने १०१, पीना अप्रत्याख्यानीपने भोपे ११८, मिध्यान्ये ११७, मारमाने १०१, पित्रे ७१, सम्परत्वे ७७, तया मत्यारुपानीपने भो ११८, पिध्याय ११७, सास्वादने १०१, मिथे ७४, अपिरतिये ७७, दाविपतिये ६७. संजलण तिगे नव दस, सोदेचर अजइतिअनाणतिगे वारस अचल्खु चख्सु, पढमा अहखाइचरिम चन१७ नलणनिये-संग्वलनभिक दुनि-पीमुं भधवा भी परमा-पग इस-नवमा दामा भनाणनिगे अज्ञानपिक भारवाह-पधारपान २-लोभ पारस-पार মি-ঘষি -पार अपरम्पराम-भवन पर-पार दर्शने थर्थ:-संज्यसनत्रिक (मोध, मान, माया)ने नय गुप- होय, त्यां श्रोपनी पर पंध, संज्यसन सोनने दश गुण- टोय. त्यां संयमहार अधिरनिने पार गुणगाणां घाय मिथ्यात्य ११७. सास्वादने १०१. मिधे ४, सम्पर 23. -प्रणन ये थषषा प्रण पण गुणगणा रोप घो० ॥ 23. सा० १०१. स० १४. पशु दर्शनी सपा पर पे १२ गुणगणां दाय, स्पां घोप ते फर्मस्ता -সৰিণি सग-सात त मानीने विप दो-ये तथा दर्शनीने रिपे १०४ कर्मग्रंथ) नी पेरे बंध कडेवा. यथाख्यात चारित्रने ठेशां चार गुणगणां होय, त्यां त्रण गुणगणे एक शातानो बंध अने श्र- योगी श्रबंधक (बंधरहित) होयः ॥ १७ ॥ मणनाणी सगजयाइ, समश्य अचन इन्नि परिहारो। केवल उगि दो चरिमा, अजयाश्नव मसु ओहि उगेर मणनाणी-मनःपर्यवज्ञानीने परिहारो-परिहार विशु- दिपी दिने नव-नवमा सुधी जयाइ-ममचादिकयी केवळदुगि-केपळदिक मासु-मतिज्ञानी तथा शु. समहम-सामापक (ज्ञान, दर्शन) भ-ऐदोपस्थापनिय मोहिदगे-अवधिमान, घउ-चार (६ यो ९) चरिमा-ठेल्ला दुमि-ये (६-७) अजयाइ-अपिरति आ- अर्थः-मनःपर्यवज्ञानीने प्रमत्तादिक हाथी धारमा लगे सात गुणगणां दोय. (उघे ६५, प्रमचे ६३, अप्रमत्ते एए, ५७, निवृत्तिये ५७, ५६-२६, अनिवृत्तिये २२-२१-२०-१५-२०, सूक्ष्म- संपराये १७, उपशांतमोहे , क्षीण मोदे १.) सामायक तथा वेदोपस्थापनीय चारित्रने हाथी नवमा सगे चार गुणगणों होय (उंघे ६५, प्रमत्ते ६३, थप्रमत्ते पए,-५०, निवृत्तिये ५७. ५६-२६, थनिवृत्तिये २२-२१-२०-१५-२०,) परिदार विशुद्धि चा. रिनने हुं सातमु पये गुणगणां होय (थोघे ६५, प्रमत्त ६३, थप्रमत्त ५०,) केवळझानी तथा केबलदर्शनी ए पने रेखा गु. पापां दोय, सयोगी एक शाता बांध, ययोगी थयंधक, म. तिहानी, श्रुतझानी, थयपिहानी, थवधिदर्शनी ए चारेने थ. विरति सम्याट प्रमुख दीपमोह सगे नय गुणवाणां दोप, (त्यां थोघे ए, सम्यक्त्वे ३१, देशे ६७, प्रमत्ते ६३, थप्रमचे एए, ५०, निवृत्तिये ५७, ५६-२६, थनिवृत्तिये २२-२१-२०-२५-१७, सूक्ष्मसंपराये १७, उपशांतमोदे १, क्षीणमोहे १,) ॥ १५ ॥ अमज्वसमि चन अगि,खइए इकार मिच्छतिगि देस।। सुदुमि सगणं तेरस, आहारग निअनिअ गुणोहोरा अर-आठ (४ थी ११) | फार-भगिभार (४यो१४, ठाणं-गुणा एक्समि-उपशमिक मिनिगि-मिथ्यात्व पिक तेरस-तर घउ-चार (चोपाथी सात) प्रण गुणा भारग-भारफमार्गणा भगि-घेदक (सायोप | देसे-देशरिरनि निमनिम-पासपोगानो प्रमिक सम्परती) | मुगुपि-गुस्मसंपराय गुण-गुणठाणे सहए-शायक (सम्यक्त्ती) स-पोनपोतान भो-भोप थर्थः-(चोथाथी थगिथारमा मुधी) था गुणगणों उपशमिक सम्यक्त्वीने दोय. (चोथाची सातमा सुधी) पार गुणवाणां चेदक एटले दायोपशमिक सम्परवीने होय.(पो. थाथी चोदमा सुधी) थगिथार गुणगणां दायक सम्परत्वाने होय मिथ्यात्वी, सास्वादनी, मिथदृष्टी, देशविरति, घने सूक्ष्म संपराय चारित्री एटसाने पोतपीताने नामे एक गुणगएं दोप. (समये समये थाहार फरे ते) थादारक मार्गणापाळाने स. योगी सगे तेर गुणगणां होय, ए स पूर्व फरा तेने छाप थापणे गुणगणे प्रतिनो पंध थोपते कर्म स्तयनी पोकदेवी-२० पो. पाप. सई भने सान ए पा गुगाणा दि सितिमिलि उरिक सम्मान पाना नाना मोरनी मार रोप. ता मा. ना. हस भने अपिशामु पार Omme भेगोरे होप. रमेश र क्षायोनि मारापरहीर.

२०६ कन्न मोहनीय वेदे ते माटे वेदक नाम कगुं. लां ४-५-६-७९ चार गुणगण होय, त्या ओचे बंध ७९, अविरतिये ७७, देश विरतिये ६७, प्रमते ५९-५८. सायक सम्पकत्व मार्गगाय चोयाथी मांडीने अयोगी गुणठाणा मुधी अगीमार गुणठाणाये ओ वंय ७२, अविरतिय ७७, देशविरतिये ६७, प्रमचे ६३, अमपत्ते ५९-५८, निवृत्ते ५८-५६-२६, अनित्तिये २२, इत्यादिक अहाभा विचारया योग्य से. जे भणी पूर्व बदापु मनुष्य सापक सम्परत्व लड़े सने तो आयु बांधवू नयी कारण के पूर्व वांधी मुक्युं छे. अने अबदायु मनुष्प शायफ सम्यक्त्व लहे, वे तो चरम शरोरी होप ठेने पण आयुबंध न होप तो पांच अने छहे गुगठाणे मुरायु घंपनो स्वामी कोण ? तथा कोई कोगे जे 'पहरगोउमणुसो, निवगोचउमविगइम्" ए अपेशाय दर्शनक्षायिक निष्टापक मनुष्य अने निच देशविरति गुणठाणे सरायु पांच ते खोदं के कारण के तो असंख्याता पीयुवाला मनुष्य तियेच होय तेने देशविरनि गुणाणु नोप पग भी संभवीये ये जे "निस्पयरत्तंसमत्ताबाई असत्तमाईतईभाए , इस्पा. रिफनी परे सा संभवीये छोपे. पाध्ये ममि सिग्नंनि सहच सम्पते ॥ सर निरयनुप लिमुगारमंत निगमालिपनराणं २ पदाउपाणएवं । सिननि अभ्यये अपदाऊ॥ पवगोत्र पगुस्मा । निगा परमूरिंग ॥३॥ एने गुणाणां अगिमार रोप पिथ्याटीने ११७ पंप, सास्वादन यतीने १०१, मिश्राटिने दमिति ६७, माप संपराप शारितीने १७, ना यंध होय. भागने और १००, पिध्याय १२, इत्यादि पार गयोगीर 07, . पर बांध. परमुवसमि बटता, पान नबंधति तेण अजय गुणे ॥ देव माणुान दीपा, दमासु पुण मुराग विणा ॥२१॥ परना समरि-mar मार-प्राण 3-7 पाप-प्रतिमा {០ ១ गुणे-गुणगणे हिणो-हिन पुग-यो देव-देवायु देसाइम-देशविरति प्रा. मुराभो-देयायु मणुभाउ-मनुप्यायु . दिने विष | विणा-विना अर्थः-पण एटलुं विशेप जे उपशमिक सम्यक्त्वे वर्तता 'ति सम्यष्टि गु- दिन करवी (एटसे सम्यक्त्वा ५ बांधे i) देशावरति, रंकज देवायु पिना मचे ५७, मनुप्पायु संयुएन जत्वरम मीह केसर आज-मृगभग संव पल्बुञ्युत्पर जलनहीत बसुन्तलि शान्त= सच प्रकार माया णवतम: नवल नीनपचनाला। मलमबमलर-भास्तारोप- मा रिलवली मास्तरब-- बिया तात . सतिगे॥ १॥२२॥ -विध्यारे हाणासु-सास्वादनादिर लावारि-सर्व गणठाणे मोहो-भौधे तां एकसो घटार कापोत) सश्याने ल्हा सगे थने सेना)ते तीर्थकर पाएं एयासोने हात्मा - सर्व ....

.
200
तो सर्व लेश्यावंतने कर्म स्तवनी पेरे सामान्ये बंध जाणयो.
इहा प्रण लेश्यावंतने चोये गुणगणे घे आयुनो पंप को पग पर
मनुष्यापुनो यंध घटे, जे मणी नारको देवतातो मनुप्यायु यांच, पण मनु
तिर्यंच देवायु न पांघे, जे माटे जे लेश्यामां आयु यंघाय ते. रेश्यामा ३१
मोइए अने सम्यक दृष्टि तो वैमानीकनून आयु बांधे, अने ते वैमानिकमा
कृष्ण, नील अने कापोत नथी, ते माटे अशुद्ध लेश्यावंत सम्पदृष्टि देवायु
घांधे. एमन भगवती सूत्रना श्रीशमा शतकने पेहेले उद्देशे कधू जे क्रियावादी
प्णादि प्रण लेश्यावंत सम्पदृष्टि देवायु न बांधे, देवता अने नारकी मनुष्या=
पांत्रे पण मनुष्य तिर्यच एके आयु न बांधे एम का छे, अने घटे पण एम
पली ग्रंयकारनो अभिमाय तो वहु श्रुत जाणे ॥
तेक निरय नवूणा, जजोअचननिरय वार विणु सुक्का
विणु निरय वार पम्हा, अजिणाहारा श्मा मिहे॥२३
तेज-तेजोलेश्याये निरयवार-नरकत्रिकादि: पम्हा-पाटेश्या
निरप-नरकादिक विशु-विना [ वार | अ-नहीं (वनीने)
नवूणा-नव प्रकृतियेउणो | मुक्का-मुक्कलेश्यावंतने . निण-जिननाम
उन्नोभ-उद्योतादिक विणु-विना
आहाराइ-आहारकट्रिय
घउ-चार
निरयवार-नरकनिकादि वार मिर-मिथ्यात्वे
अर्थः-तेजो सेझ्यावंत नरकादिक (नरकत्रिक, सूदमन
क, विगलनिक ए) नव प्रकृतिए नो, एटले एकसो अनि
थार प्रकृतिनो धंध ओघे करे, उद्योतादिक (उद्योतनाम,
यचदिक, तिर्यंचायु.) चार तथा नरकादि (नरकत्रिक, सूक्ष्म
निक, विगलत्रिक, एकैछि, थावर, पातप) वार ए सोळ विन
एफसोचार प्रकृति शुक्ल लेश्यावंत बांधे. (अहीं उहा सातम
थाउमा कल्पना देवता सर्व शुक्ल लेश्यावंत ने श्रने
तो उयोत चतुष्क वांधे ठे त्यारे पंचेंजि तिर्यंचमां उपजे ।

. १०ए तो अहीयां उद्योत चतुष्क केम टाल्यु ए पण संशय बहुश्रुत गम्य ) तथा नरकादिक बार प्रकृति विना पद्मलेश्यावंत योघे एकसो श्राव यांधे. तथा जिननाम थने थाहारद्धिक ए त्रण प्रकृति वर्जीने वाकीनी मिथ्यात्वे कद्देवी. हेलो, पद्मशफल टेश्याने ते केम ? मोटेश्याने ओये १११, मिप्यारे १०८, सास्वादने १०१, पांधे पछी भोपनीपेरे सात गुणाणां दोप पद्म टेश्यावंतने भोघे १०८, मिथ्यात्वे १०५, सास्वादने १०१, पो भोपनी. पेरे सात गुणठाणा लागे, शुक्र लेश्यावंतने भोपे १०४, मिथ्यात्वे ?.१, सा. स्वादने ९७, ते पछी ओघवत् तेर गुणटाणा लागे. सब गुण जव सन्निसु, उदु अनघा असन्नि मिच्छिसमा। सासणि असन्नि सन्निव, कम्मणनंगो अपाहारे॥२४॥ सन्द गुण-सरे गणगणा | भसमि-भसमि कम्मग-मानकाययो. भर समि-भग्य भने सं- मिउिसमा-मिपाव गीनो मिने विप भंगो-मांगो मोहु-भोपनी परे सासणि-सास्वादने भणारे-भणारीने रिप सनिव-भिनी पेठे अर्थः-नव्य श्रने संझी ए ये मार्गणाने विपे सवें गुप- गण होय, त्यां प्रकृतिनो धंध थोपनी पेरे कदेवो, थनव्य मार्गपाए श्रने असन्नि मार्गणाए तो मिथ्यात्व गणगणा सर- खा पंध फदेवा, थने सास्वादने थसन्नि थने सलिनी परे पंध कदेयो तथा श्रणादारीने पिपे फार्मषकाय योगीनो नांगो फदेवो ॥२४॥ सिदानमा परीने भार मन नपी पारे मामहोबने मोदी कमाते मभिमाये तो सीने पर एणया परे न कहीं दागने इस मन ते रिक्षा संशोकदो, वे पार पाद एजाजतं. पठाणा सरखा अभना-प्रभव्य बांध. अ , ११० यतःऽव्य चित्तविनालावं चित्तं न स्याद संद विनापिन्नाव चित्तु अन्य केवलिनो भवेत् ॥१॥इति वच अभव्य भने असंझी गोवे अने मिथ्यात्वे ११७ वां, अभय एकन गुणठा' होय, सास्वादने असंही ते संघीनीपेरे १०१, बेज गुणठाणां होय, कार्मण काययोगीज अणाहारी होय ते माटे गुणठाणुं १-२-४ ए चार होय त्या ओचे ११२, मिथ्यात्वे १०२, सास्वादने ९४, अवि ७५, सयोगीए एक होय. तिसु दुसु सुकाइ गुणा, चन सग तेरतिबंध सामिर देविंदसूरिश्रं, नेयं कम्मत्वयं सोनं ॥ २५ ॥ तिम्-त्रण लेश्याये चउ-चार देविंदररि देवेंद्रमूर्ति दुस-ये ठेश्याये रह-रच्यू नेयं-जाणवा वेरति-तेर कम्मम्पयं-कर्मस्तव गुणा-गुणठाण यसामित्तं-घस्वामित्व सोई-ते अर्थः-(कृष्ण, नील, कापोत) प्रण लेश्याने विपेच गुणगणां होय . ( तेजो अने पद्म ए) चे लेइयाने विपेस गुणगाणां होय, शुक्स.लेश्याने विषेतेर गुणवाणां होय (अय गीतो अखेशी होय) एवीरीते ए बंध स्वामित्वपणुं श्री तपार छाधिराज लहारक श्री जगचं सूरि शिष्य पमनाकर श्री वेंजमुरिये रच्यु, जाणया निमित्ते बंधस्वामित्वने कर्मस्तव स नळीने चित्तमां धारयो ॥ २५ ॥ सग-सात सकाइ-गुलटेश्या इति पंप स्वामिर नामे मोमो कर्पग्रंथ संपूर्ण यो.

वासठ मार्गणाझारे दरेक गुणगणे केटखी प्रकृतिनो बंध होय तेनो यंत्र. मार्गणा किटलां गुणठाण होय. ओष बंध. मिथ्यात्व. सास्वादन. देशविरति. अविरति. मिथ. अनिति. निरति. मूक्ष्म सपराय. उपशांत मोर. सीण मोह. सयोगी केवली. अयोगी केवली. ममत्त. ५ १० ११) १२ ४ ४ १०१ १०० नरकगति. रत्नप्रमादि ३ पंकमपानि ३ तमतमाममा. ४॥ ९६ ७० ७२ ९६ ७० ७२ ९६, ७० ७१| ९२, ७०० ७० १०० १०० ९९/ ४ तिर्यंच पर्याप्त निर्गच अपर्यान म ११५ ११७ १०२ ६९/७० ६६ १ | १०९/१०९ २४ | १२० ११७ १०२ ६९ ५२ ६७ ६३ ५९, ५८ २२ १७ मनुष्य पर्याप्त मनुष्य अपर्याप्त ४ देनगति भवन, व्यंतर, ज्योनिप. ४ सौधर्म, ईशान १०४ १० ९६, ७०,७२/ १०३ १०३ ९६, ७० ७१ १०४ १०३ ९६७० ७२

Pitam, KER,
५८, २२ २
११७ १.० ७० ६५ ६३ ५९ ५०२२ १७ ?
२२३
ܕ ܘܕ
R, १
११७.१ ७४ ७७६७ १५० ५०/२२ १७
4mfere:
१४
htt३
rikar
४
k...,
५८२०

मतानुसी ममत्याभ्यानीय मत्साम्पानीय मंगलन ३ मंगलन लोम ११७] ११७ १८११ ४ ११० ११७ १०२/७७७ ११०१ ११७ १०१ ७४ ७७६७ १२० ११७ १०१ ७४ ७७ ६७ ६३५९५८ २२ १० १२० ११७ १०१ ७४ ७७६७६३५९ ५८ २२ १७ ५८, २२] १७ ६३ ५९/५८ २२ १७ ११ मति, युत, अभिमानी/ ९ पनामानी समानी पति, थुन, भिंगप्रदान ३/११७ ११७ १०१ ७४ मापाय,मेदारयानीप, ४ परिशिक्षि गरपमरगय ६५ ६३ ५९/ ५८ २२/ ११३ १७ ४ प्रपत्र १८११७१०१/७४ ७७ १. पार्वन १२/१०/११५१.०७४/७५६६ ६३५९/५८ २२/ १७ ७.३७६३५९/५८, २२ १५ हनीवाला. गोरेगा पटेल १७.१७४७ १.०१.२ ७७६७/६३ ५०

शुक्ल लेश्या
१०१ १०१ ९७.७४/७७ ६७ ६३ ६९/५८ २२ १७ ॥
भव्य
अमन्य
१२० ११७१ १०१ ७४ ७७ ६७ १३.५९/ ५८१ २२) १७ २
१ ११७ ११७
থয়নি
सास्वादन
क्षायोपसमिक
तापक
e roronaron a
मिथ
७४
७५/६६ ६२/ ५८ ५८ २२/ १७ १
१०२४१०१
७९||
७७ ६७ ६३ ५९/
७७ ६७ ६३ ५९ ५८ २२/ १७ २
७४॥
११७/ १२७
१४ | १२०१२७ १०१/ ७४ ७७ ६७ ६३ ५९/ ५८ २२ १७
१२७ ११७ १०१
मिथ्याल
१२४
गाहारी
१२० ११७/ १०१/ ७४ ७७ ६७ ६३| ५९ ५८ २२ १७

॥ोमि॥ अथ पमशीतिनामा चतुर्थ कर्मग्रंथ. नमिअजिणं जिन मग्गण, गुणगाणु वोग जोग सान बंधप्प यद नाये, संखिजाइ किमपि वुद्धं ॥१॥ मपिम-नाकार बने । रमोग-उपयोगटार भार-मार (उपश्यादि- मिण-मिनेने मोग-योग कपांच) निमारस्थाना साउ-टेश्याहार संसिम्माइ-संख्यानादि গল-শালার पंप-पंच मिरि-काइक राण-एणस्पाना भएपहु-मस्परसदार पुरणं-कहीश थर्पः-जीनेश्वरने नमस्कार करीने १ जीवस्थानक, २ ग. त्यादि मार्गणास्थानक, ३ गुणस्थानक, ४ उपयोगहार. ५ यो- गदार, ६ लेश्याहार, घंधकार, अस्पवहुलंदार, ए नावद्धार, १० संग्न्यातादि (संख्याता, थसंख्याता, थनंता) नो विचार ए दश द्वार स्वरूपमात्र कदीशुं ॥१॥ नमिय जिणं वत्तधा, चउदस जिअ गणएसुगुणगणा। जोगुवोगो खेसा, बंधोदो दीरणा सत्ता ॥२॥ पचवा-हेवा गुणगण-गुणठाणा घंध-धंध पदम-पद भोग-योग उदो-उदय भीमटाणे-नीरस्थानने उपभोगो-उपयोग दीरणा-उदिरणा विप टेसा-खेन्पा थर्थः-जिनेश्वरने नमस्कार करीने ए पोल कहेवा. चोद जीवस्थानकने पिपे एक गुणगाप, पोजा योग, श्रीजा उपयोग, सत्ता-सत्ता घउद-चौद चोथी लेश्या, पांचमो मूल प्रकृतिनो वध, ठहो उदय, सातमी उदिरणा, श्रावमी सत्ता ए था प्रतिद्धार कद्दी\ ॥२॥ तह मूल चैलेंद मग्गण, गणेसु वासहि उत्तरेसु च ॥ जिअ गुणजोगु वोगा, खेसप्पवहुं च उहाणा ॥३॥ डान्तमनगममांसठि-पासठ जोग-योग : .. मूल-मूळ उत्तरेम-उत्तर ( मार्गणा. उवभोगा-उपयोग: .. स्थान )ने विपे ठेस-लेदया मगण-मार्गणा जीम-जीव भेद अप्पबई-अल्पपटुत्वं गणेमु-स्थानकने विपे | गुण-गुणठाणां छठाणा-र छ स्थानक अर्थः-तेमज वळी मूळ चौद मार्गणास्थानने विपे थने वासव उत्तर मार्गणास्थानने विषे एक जीवन्नेद, घीजा गुण- वाणां, वीजा योग, चोथा उपयोग, पांचमी लेश्या, हुं अल्प- घंहुत्वं, एवं स्थानक कहीशुं ॥३॥ चन्दस गुणेसु जिअजो, गुवओग लेसाय बंधदेऊयं॥ बंधाश्य.चनअप्पा, वहुंच तो नाव संखाई॥ ४ ॥ चवदसगुणेनु-चौद गुण | उपभोग-उपयोग अप्पा पहुंच-अप बहुत गणाने विपे खेसाय-टेश्या तो-ते पछी निम-जीवना भेद पंपहेऊय-बंध हेतु मोग-योग बंधाइयचउ-बंधादिक चार संखाइ-संख्यातादि थर्थः-चळी चोद गुणगणांने विपे, एक जीवना नेद, वीजा योग, त्रीजा उपयोग, चोथी सेश्या, पांचमा बंध हेतु, हा पंध, सातमा उदय, थाउमी उदिरणा, नवमी सत्ता, द. श{ एर्नु थल्पवदुत्व, त्यार पठी थगियारमुं नाव. थने यारमुं संख्यातादिकनो विचार कहीशु. ए प्रण गायाए व्यास कार कक्षा ते अनुक्रमे कदेशे ॥४॥ भाव-भाव -- ..

-- " इह सुहुम वायरेगिं, दिविति च असन्नि सन्नि पंचिंदी॥ अपजत्ता पत्ता, कम्मेण चनदस जिअहाणा ॥५॥ ह-मा ति-तेदि पज्जता-पर्याप्ता मुहम-मुस्म घउ-चौरिधि कम्मेण-अनुक्रमे रायर-पादर असनि-असमि पंचेंदि पउदस-घउद... एनिदि-पकेंदि सनि-सनिपंचेंद्रि निमहाणा जीवना स्थानक पि-इंदि अपनता-अपर्याप्ता अर्थः-अहींयां (श्रावी रीते सर्व संसारी जीवना चौद नेद थाय) सुक्ष्म एकेंजि थने घादर एकेजिए घे, तथा घेइंडि, तेइंडियने चौरिडि ए पांच तथा असन्नि पंचेंतिने सन्नि पंचेंजि ए सात, ए सात पर्याप्ता तथा सात अपर्याप्ता ए अनु. क्रमे जीवनां चोद स्थान जाणवां ॥५॥ बायर असन्नि विगले, अपछि पढमविभसन्नि अपजते॥ अजय जुअ सन्नि पळे, सत्वगुणा मिठ सेसेसु ॥६॥ पापर-मादर एकेंदि परमविम-पटेलं पीर्नु समिपने-सभि पर्याप्ताने असमि-असभिपंचेंद्रि सनिभपनते-समिपर्यासाने मवगुणा-सर्वगुणस्थानक विग-विगलेंद्रि अनयनुभ-अविरति युक्त | मिस-मिथ्यात्व गुणग मपन्जि-अपर्याप्ता पण गुणठाणा सेसेमु-शेप जीवोने अर्थः-(इवे चोद जीवस्थानकने विपे गुणगणां कदेठे) पादर एकेनिथपर्याप्ता थसन्नि पंचेंजिथपर्याप्ता थने प्रण विकसेंजिथपर्याप्ता ए पांचने विपे पेदेखं धने घीनुं गुणगाएं होय तथा सन्नि पंचेंजि थपर्याप्ताने विपे थविरति गुणगणा महीमा ए सर्व भीर सदाप मिथ्यात्ती मो ऐन पण कोइकने पामरी सम्परत्वपमीने आपना घटालाला न्याये सम्परत्वना धेच भास्वादता उरति ११७ सहित एटले पेदेखें, वीजें, घने चोथु ए प्रण.गुणगणां होय (सम्यक्त्व सहित जीवने उपजतां चोथु होय पण थपर्याप्ता मिश्र गुणगणुं न होय, मिथ थको काळ न करे ते माटे (" सम्ममिठो कुणकालं ॥ इति वचनात् ॥) अने सन्नि पनि पयार्थ्याने विषे सर्व चोदे गुणगणां होय, (तेने सर्व शुजाशु- परिणाम होय ते माटे) वाकीना (सूक्ष्म अपर्याप्ता, सूक्ष्म र्याप्ता, बादर एजिपर्याप्ता,वेइंतितेति चौरीजिएत्रण पर्या थसन्नि पंचेंद्रि पर्याप्ता)सातेने एकज मिथ्यात्व गुणवाएं होय।। अपजत्त कि कम्मुर, लमीस जोगा अपज सन्नीम् ॥ ते सचिनव मीसएसु. तणु पसु उरल मन्ने ॥ ७ ॥ अपना-अपर्याप्ता अपनसनीम-अपर्याप्ता शि-जीवने विण सनिने विपे फम्मुरल-श्रीदारिकफार्मगत-ते ये योगने ने रिपे मोस. भोदारिक मिश्र सविस्वमीस- वैक्रिय मिधे उरल-औदारिक योग मोगा-योग सहित प्रण योग थर्थः-(सूक्ष्म एकेंडी, वादर एकैछि, घेखि, ते चोरिंजी, असंन्नि पंचेंडी) ए अपर्याप्ता जीव नेदने दि थार्यामा भवस्याप जीवने सास्वादनपणु पामीये पण पछी न होय. हा रण अपलो नाणयो पण यन्धि प्रपामो नहीं सन्धि अपर्यामाने नो सारखा रोपम नहीं. अपर्याप्त गरम पटिमा पण साम्पादन न होप, सास्वादन सगारेक गुम परिणाम मा भने महममानो पति मंशिष्ट परिणामी उपने, ते कोरक कहे य, परेंटिपने गाम्पादन नयी की पटिप गर्ग प्रशानीन है, भने सिक्लेरिया मावान का तानी कपा माइए भावानं मान माछा' पनो मा पागल "गामण माना ২ লাগা ঘষয়স : যা সাগৰী. , সামিসসা হবোমী। एम-एमा वळी तणु पन्जेमु-शरीर पर्य भन्ने-मानेछे १२ए यौदारिक कार्मण पने पोदारिक मिन एघे योग होय (थं- तराल गनिये प्रने उत्पत्तिने पेहेले समये कार्मण योग दोय ध्यने पछी शारीर पर्याप्ति पुरी घया पेदेसां श्रीदारिक मिश्र योग होय) सति पंचेंडी थपर्याप्ताने विपे पूर्वोक्त ये योग ने क्रिय मिश्र सहित परतां प्रण योग दोय (त्यां मनुष्य तियेच थप- पाताने फार्मण थोदारिक मिश्र ए पे दोय श्रने देवता नार- कीने कार्मण वैक्रिय मिश्र ए ये दोय घेने मळीने प्रण होय ए साते थपर्याप्ताने ), शरीर थपर्याप्तिये पर्याप्ताने श्रोदारिक योग पण होप एम अनेरा श्राचार्य कदेठे (ते मते अपर्याप्ताने प्रण योग दोय थने सन्नि थपर्याप्ताने विप चार योग होय. घंधकारे ए मतांतर कयुं पण शरीर पर्याप्ताने मिश्रपणं टल्यु स्यारे थोदारिफ योग दोयज, त्यारे ए मत खरो जपाय)॥७॥ एपे पंदर योग फई-जीवने परिस्पंदनादिक धीर्य से योग कहीए १ सय मनोयोग-अस्तिनीव इत्यादि तयां सर्वने हिन चिंतन ते. २ मृपा मनोयोग-नास्तिमोर इत्यादि तथा परने विमतारण पुदि ते. २ सत्यामृपा मनोयोग-ते पेपे मिश्र एटठे पाक सत्य भने फाइफ मृपा ते ४ असत्याभूषा मनोयोग-सस पण नहीं असत्य पण नहीं विधारणा रुप ते. ५ सत्य पधनयोग, ६ मपा पचनयोग, ७ सरयामपा पधनयोग,८ असरपासपा पचनयोग ए पार पचनयोग मनोयोगनी परे जाणवा एवं.८ ९ भादारिफ कापयोग मनुष्य नियधने उपजता प्रथम समये होय ते. १० औदारिक मिश्र-तेन मनुष्य तिर्यंचने उपमता एक समय पछी शरीर पर्याप्ति पूरी करे स्पो लगी फार्मण साये मिश्रपणुं ने औदारिक मिश्र तथा केव- गरी समुदातें पोजे उट्ठे सातमे समये औदारिक मिश्रकाययोग होय. ११ पक्रिय काययोग-देवता नारकीने तथा लब्धिवन मनुष्य, पंचेंद्री तियेच भने वायुने शेय.

२२० १२ वैक्रियमिश्र काययोग-तेहीन देव नारकीने उपनता फार्मण साये वैक्रिय मिश्र होय तथा मनुष्य तिर्यचने वैक्रियारंम काळे अने छोडवाने काले औदारिक साये वैक्रिय मिश्र काययोग. १३ आहारक काययोग-चौद पूरव धारीने आहारक शरीर काययोग होय. १४ आहारफ मिश्रकाययोग-तेने पारंम काळे अने छोडवाने काळे औदारिक साये आहारफ मिश्रकाययोग होय. १५ फार्मण काययोग-अष्ट कर्मनो जे विकार ते कार्मणकाययोग, जीवने अंतराळ गतिये भने उपजवाने पेहेले समये तथा केवळी समुद्घातने प्रोजे चोये पांचमे समये एनुं प्रयोजन ते. सवे सन्नि पऊत्ते, उरलं सुहुमे सन्नासु तं चनसु ॥ वायरि सविनवि उगं, पजसन्निसु वार जवांगा ॥७॥ सब्वे-सर्वे सभामु-भाषा सहित पर्याप्ताने) सनि-संही तं-ते सविउविदुर्ग-वैक्रियविक पजते-पर्याप्ता चउमु-चार (विगलत्रिक साये मुहुमे-सूक्ष्म (एकैदिने) पार उवोगा-बार उप- जरलं-औदारिक वायरि-चादर (एकद्रि योग अर्थः-सन्नि पचेंजी पर्याप्ताने विपे सर्व पैदर योग हो- य, [ोदारिकमिश्न अने कार्मण ए वेतो केवली समुद्घाते होय थने वैक्रिय मिश्र मनुष्य तिर्यंचने उत्तर वोक्रय करता होय, थने शेष चार योगतो यथायोग्ये होयज) सूक्ष्म एकेंति पर्यासाने एकज थोदारिक काय योग होय, विगोडी थने असन्नि पंचेंजि ए चार पर्याताने थोदारिक योग भने नापा सहित एटले सत्यामृपावचनयोग ए वे योग होय, पादर एकति पर्याप्ताने रिपे थोदारिक साथे वेक्रिय थने येकिय मिश्र सहित करतां प्रण योग होय, वायुने वैकियहिक होय, (दये अने असनि पंचेंदि) पज्जसनिम्-पर्याप्तासनिने ..

4 २२१ चौद जीवस्थानने विषे उपयोग कहे . जीव संदणं रूपे थे. ववोध ते उपयोग कहीए ते पांच ज्ञान, प्रण अज्ञान थने चार दर्शन एम वार प्रकारेठे) पर्याप्ता संझी पजियने विपे ए वारे उपयोग होय (अनुक्रमे होय पण समकाळे न होय "जुगवं. दोनछिउवगा इति वचनात्") ॥ ७ ॥ पङा चरिंदि असन्निसु, उदंस दुअनाण दससु चस्कुविणा सन्नि अपज मणना, ण चस्कुकेवल उग विदणा ॥ ए॥ पनचरिदि-पर्याप्ता चौ-दु मनाण-चे अज्ञान प्तिाने दो दसमु-दशने विषे मणनाण-मन पर्यवसान असमिमु-भसमि पंचेंदि घरसुविणा-चच दर्शन घख्खु-पशु दर्शन (पर्याप्ता) केवलदुग-केवळदिक दुदंस-ये दर्शन सनि अपन्जे-संमी अप- | विहगा-बिना अर्थः-चलरिंजी पर्याप्ता थने असन्नि पंचेंजी थपर्याप्ताने चा थचक्षु चे दर्शन तथा मतिश्रुत ए घेथशान मळी चार उपयोग होय, तथा चाकीना दसने विपे (धार एकेंडि, घे ये इंदी, घे तेइंजि, चरिंकी अपर्याप्ता, थने असन्नि पंचेशी अ. पर्यासाने विषे) चतुदर्शन विना (थयधु दर्शन, मति धान, श्रुत थज्ञान) ए प्रण उपयोग होय, सन्नि पंचेंडि अपर्याप्ताने एक मनः पर्यवज्ञान बीजु चष्ठ दर्शन प्रीजु केवळझान चोथु केवळदर्शन ए चार विना शेष थाउ उपयोग होय ॥ ए । सन्नि दुगि उखेस अप, जाबायरे पढम चन ति सेसेसु ॥ सत्तह बंधुदीरण, संतुदया अ तेरससु ॥ १० ॥ दिना " प्रण अह-आठ कर्मना १२२ सनि दुगि-ये समिने विष विससेम-याकीनाने रिपे दीरणा छ छेस-छ लेश्या अपन-अपर्याप्ता संतु दया-सत्ता तया दर बायरे- सत्तह-सात तथा आठ -पादर एकैदि पदमचउ-प्रथमनी चार यंघुदीरण-बंध तया उ-- वेरसमु-तेरने विपे अर्थः (हवे चोद जीव स्थानके सेझ्या कहेठे) सन्नि पं. खि पर्याप्ता तथा अपर्याप्ता ए वेने विपे व लेश्या होय, थ. पर्याप्तावादर एकेंद्रिने विपे पेहेली चार सेक्ष्या होय. (कृप्य' नोक्ष धने कापोत ए प्रणतो सर्वने होयज, पण कोशक तंजो खेश्यावंत देवता मरीने पृथ्वी, थप तथा वनस्पति कायमा उ: पजे तेने थपर्याप्तपणे तेजो सेश्या होय ते माटे चार लेश्या कही) शेप अगिथार जीवस्थानके कृष्ण, नील अने कापोत ए प्रण सेझ्या दोय. हवे चोद जीव स्थानके मुळ प्रकृतिनो यंध, उदय, उदीरणा थने सत्ता कहे, संझी पर्याप्तो वर्जीने शेष तेर जीव स्थानकने विषे सात यथया था प्रकृतिनो यंध थने उदीरणा होय तथा तेरे जीव स्यानकने विपथावे कर्म सत्तापे थने उदय होय-त केवी रीते? थायुबंध काळे यावे कर्मनो बंध होय थने ते थायु न यांधतो होय त्यारे सातनो घंध, एक नये थायुबंध एफजधार होय थने सात कर्मतो जीव सदाये समय समय यघि .तथा ग्यारे लोगवना नबर्नु थायु एक थायति पाकी होप रपार से थानी ठदीपा न होय, रपारे माननी उदीरणा होप थप. यानी होय. नया उपमांन माह सग या फर्मनी सगा दयने मूहम मंगय सगे याना उदय- यमेर जीर म्यानरने विपना पहें यौन धन पार्थ गुणवाणु पागोयामा सपठ-सात आठ ऐग-3 सपा एक १२३ सत्ता रे ग बंधा, संतु दया सत्त अठ चत्तारि ॥ सत्तठ व पंचदुगं, उदारणा सन्नि पजाते ॥२१॥ संत-सपा पंचदुर्ग-पांच भने पे उदया-उदय उदीरणा-उदीरंगा पंपा-बंध सत्तठ छ-सात, आठ, छ | सनि पजते-समि पर्योता अर्थः-सातनो, थाउनो, उनो तथा एकनो ए चारवंध संन्नि पंचेंति पर्याप्ताने' होय. अने संझी पंचेही पर्याप्ताने सत्ता बने उदय थाश्रीने सातवें श्राग्नुं अने चारनुं ए प्रणस्थान- क दोय, तथा सन्निपंचेंडि पर्याप्ताने उदीरणा स्थानक सात, थान, व, पांच थने ये ए पांच' होय. ॥ ११ ॥ १ तेमा आयु पर्जीने सातना पंध से अपन्पयो अंतर्मुहूर्तलगे ऊत्कटों पीस सागरोपम छ मासे ऊणां, ते बळी पूर्व फोडोने त्रीजे भागे अधिक पटलो रहे. भाउखाने बंब काळे आठनो घंध, ते जयन्यथी भने उत्कृष्ट पण अंतर्महर रहे आउखानो संघकाळ अंतर्मुहर्तन होय ते माटे. तया आयु भने मोहनीय वन ने छ पांचे, सूक्ष्म संपरापे से जपन्य एक सप्य रहे, कोहक जीव त्यां एक समय रहीने अनुचर विमाने जाप त्या अविरति गुणठाणे अवश्य सातनो बंधक यापं, ते माटे छनो घंधक जपन्य एक समय रहे. उत्कृष्टो अंतर्मुहुर्त रहे सूक्ष्म संपरा. पर्नु पटल्न मानछे, पछी एफनो बंधक थाप तया सातनो बंधक थाय तया ते छ मायी पांच प्रकृतिना यंपने व्यवदे एक साता घेदनीयनो मंधक होय, . पन्ययी एक समय, उपशम भेगीये उत्कृष्ट पणे देशे उगी पूर्वकोंडी लगे रहे, ते. रमे गुणठाणे एजीर पहेलायो सातमा गुणठाणा लगे सान सया आठनो पंधक, बीजे आठमे नवमे सातनोन पंधक, दशमे छनो पक, भगीपारमे पा. रमे तेरमे एकनो पंधक होय. २ त्या आठनी सत्ता अभव्यने अनादि अनंत, भव्यने थपी अनादि सांत होप तया मोइने ये भीणमोह गुणठाणे सातनी सत्ता ते जपन्य अने उत्कृष्ट पण अंतर्मुहन होय, पानिकर्म वारने सये चारनी सत्ता सपोगी गुण. गणे ते नपन्य अनन, उत्कष्टपणे नव घरसे उगी पूर्व कोही होय, नया पाउनो उदय अभव्य आश्रीने अनादि अनन, भय भाभीने अनादि सान होप. उपांत मोरपी पदेला भम्प भायोने सादि सांत, ते उदय नपन्पयो अंतमहत पाम १२४ भेणी यकी पटीने अंतर्मुहुर्ते फरी श्रेणी पडिवजे तेने उत्कृष्टो देशे वणी म पुगळ परावर्ष एटले काळे फरी श्रेणी करे. मोहनीय वीने सातनो उदय ते उपचार मोहे वया क्षीगमोहे पामीये, त्या नपन्य एक समय उपांत मोहे सातनो उदा- याने भवापे पडे ते पाजो आठनो उदयी याय, उत्कृष्टो अंतर्मुहूर्त, ते उपशांत मोर सीगमोहनुं मान अंतर्मुह छे पछी आठनो उदयी याय, अयचा घारना उदय- याप पार पाति कर्मने ये धारनो उदयी तरमे चोदमे गुणठाणे जपन्य अं- मुहर्च उत्तष्टे नव वरसे उणी पूर्वकोडि होय, एनो विशेप-मिथ्यात्वयी मारीने उपशांत मोह लगे आउनी सत्ता भीगमोहे सातनी सत्ता, सपोगी अयोगीर चा- रनी सत्ता तया मिथ्यालयी सूक्ष्म संपराय लगे आठनो उदय, उपशांत मो तया सीगमोहे सातनो उदय, सयोगी अयोगीए चारनी उदय होय. ३ त्यां ज्यारे भोगवता भवनुं आयु एक आवलिका शेप होय त्यारे मा कर्मनी उदीरगा न होय, एटछे सातनी उदोरणा होय. ते विना आठनी दीर- पाप या मिथ्यात्व यकी प्रमत्त लगे सात अथवा आठनी उदोरणा, भने स्त्रिको सदैव आठनीन होय "मरणाऽभावात् " तया अभपत्त थकी सम्म सं रापनी एफ आरलिका याती होय त्या लगे वेदनीय आयु वर्जीने उनी नदी- रणा ते भावनिका थाकस मोहनीपनी दीरणा न होय, आपलिका मरिष्ट मा वीपी यार पारमानी आरलिका याकनी होय त्यां लगे पांपनी दीरणा के सरगमोरनी मालिका पाकते मानावरणी, दर्शनावरणी अने अंतराय ए गर्न भारलिका मरिष्ट पया मार्ट उदीरणा नहोप. स्पारे नाम भने गोत्र एनी - दौरगारोप एम मयोगीपे पग पेनी उदीरणा अयोगीए अनुदीरक होग, पनि योगीर, मोरयाही पार कनो उदय मो पग योगने ममारे उदीरणार और टोरगा नो योगने पर ने माटे। (नोमिपी कृत मारियापी) गई इंदि एथ काए, जोए वेए कसाय नाणेसु ॥ संजम दंसण खेसा, जब सम्मे सन्नि याहारे ॥ १३॥ ए-नंद (ग) हैमा देशपा (७) दिदि (ब) कमाण-पाय (म) पर- (नस) नाग -गान (मा) गाम- रनार (3) मधि-मि (2) - (म) गन-चा) मार-2() मा-पम्प (पे) -माद (0) मरयम (मान) १२५ अर्थः-(हवे चौद मार्गणास्थान कहेठे) १ गति चार, इजिपांच, ३ काय उ, ४ जोग त्रण, ५वेद प्रण, ६ कसाय चार. ज्ञान श्रा, संजम सात प्रकारे, ए दर्शन चार, १० सेश्या उ, ११ नव्य घे, १५ सम्यक्त्व , १३ सन्नि थे, १४ श्राहार थे, एम चोद नेद मूळ तथा उत्तर चास नेद जाणवा ॥ १२ ॥ हवे चौद मूल मार्गणा द्वारना उत्तर पासठ मार्गणाद्वार कहेछे. सुरनर तिरि निरयगइश्ग विमतिअ चउ पणिदि उक्काया नूजस जलणाऽनिलवण,तसाय मण वयण तणु जोगा।१३ मुर-देवगति तिअ-तेइंदि अनिल-वानकाप नर-मनुष्यगति घउ-घरिदि वग-वनस्पतिकाप तिरि-तिर्यंचगति पणिदि-पंचेंद्रि (ए पांच | तसाय-प्रसकाय निरय-नरकगति इंद्रिय मार्गणा) मण-मनोयोग गइ-ए घारगति मार्गणा एकापा-छकाय मार्गणा वयण-वचनयोग इग-एकेदि भू-पृथ्वीकाप तणु-काययोग विभ-इंदि जलण-तेउकाय সীমা-মাযাশা थर्थः-देवगति, मनुप्यगति, तिर्यंचगति थने नरकगति ए चार गतिमार्गणा, एकैछि, घेइंद्रि, तेइंद्रि, चोरिद्रि थने पं. चेंद्रि ए पांचइंद्रियमार्गणा, तथा पृथ्वीकाय, थपकाय, तेलका. य, वानकाय, वनस्पतिकाय अने प्रसकाय एकायमार्गणा, श्रने मनयोग, वचनयोग थनेकाययोग ए प्रण योगमार्गणा १३ वेध नरिस्थि नपुंसग, कसाय कोद मय माय खोनित्ति॥ ममुअऽवदि मण केवल,विनंग मश्सुअनाण सागारार अल-अपकाय पक्व १२७ खइंग-सायंक सम्यक्त मिच्छ-मिथ्याल सम्यक्त्व व्यक्त उत्सम-भोपशविक स. मीस-मिश्र सम्यक्त सन्दि-सन्नि सासाण-सास्वादन स- | इअरे-असन्नि अर्थः-खेश्यामार्गणा प्रकारे ठे. कृष्ण, नील, कापोत, तेजो, पद्म अने शुक्ल.नव्यमार्गणा वे प्रकारे एक नव्य अने वीजी बनव्य तथा सम्यक्त्व मार्गणा प्रकारे ठे, वेदक, दायक, थोपशमिक, मिथ्याव, मिश्र थने सास्वादन. तथा जव्य भने थानव्य एम वे प्रकारे नव्य मार्गणा,थने सनि तथा प्रसन्न एम घे प्रकारे संझीमार्गणा जाणवी ॥ १६ ॥ टेश्या छ जंयुक्षना घटते जाणवी जेम कोइ छ पुरुष जांयु सावा गया त्या एक जणे चिंतव्युं के जांबु म पडमांयी छेदीए, से कृष्ण पान पीने कामुक शाला छेदोए, ते नील खेश्यावंत, प्रोजे फयु के लघु पासा दो हे कापोत देश्यावंत. घोपे कयु के गुच छेदो ए तेजी लेश्यान. पांच कर्प फे फल तोडी त्यो से पद्मालेश्यावंत. छठे कायु के नीचे पडेला खाए ते. पल टेण्यात. मन्यः-जे जीव कोइ बारे मुक्ति नया पोग होय से, अने जे नीर फोर फाटे पग मुनिए न जाय से अमन्य. पदक (सापीमिक)- नव नयनी श्रदाये करी जे सम्परत मोहनीपना मंदेश दे पाने पिण्याय मोइनोयनो रम सर्व पानिनो उदय भाग्यो पको मोगली सय कीबी, अने जेटलो उदय नयी भाष्यो, न गयो एता प्रांतर जे धान्यानी नमामि ज्या मगे नागे नेने पोल पोप सम्परलीये. हार मानश्री निनाये प्रथम संपपगी मनुष्य अंगी करलो भ. नंदादांनी डोर, मान, पाया, पोम ए पार कराय नपा मग दर्शनमो. 7 नेवार जे म यो प्राम्पानो ग प्रदान मारने में पाय पानी भशाप नो पारिसर प.मोर मान महरियो वं प्रीति मान - -, १७ए मिथ्यात्व-मिध्यात्वने उदये जे विपरीतरुचि ते पोपुं मिथ्याल.. मिथ-मिथने उदये जे मिश्ररुचि ते पांच मिश्र. सास्वादन--ते सम्परत्व षमता जे मिथ्यात्वे नयी पहोच्यो तेनी पच्चे जे शुद्ध रचि ते छटुं सास्वादन. आदारे अर नेआ,सुर निरयं विनंग मश्सु ओहि उग। सम्मत्त तिगे पम्हा, सुक्का सन्नीसु सन्निदुगं ॥१७॥ आहार-भहारक मा-मतिमान मुका-शुक्ल लेश्या इभर-इतर (अणाहारक)| -श्रुतमान सन्नीम-सनिया : भेभा-भेद भोहिदुगे-अवधिज्ञान सनि दुर्ग-संनिदिक (स- पुर-देवगनि अवधि दर्शन नि पंचेंद्रि पर्याप्ता निरप-नरकगति सन्मचविगे-सम्परत्व विक भने अरर्याता विभंग-विभंगशान पम्हा-पद्मलेश्या अर्थ:-आहारक थने अपाहारक ए ये आहारक मार्ग: पाना नेद. हवे वासठ मार्गणाये चौद जीव नेदकहे . देवगति, नरकगति, विनंगहान, मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधि. झान, थवधिदर्शन, एम सात. सम्यक्त्वर्नु त्रिक एम दश थने पद्मलेश्या, शुक्लाखेश्या थने, सन्नीया ए तेर मार्गणाए संझी चंद्रि पर्याप्ता यने थपर्याता ए चे नंद जीवना होय ॥१७॥ हाभा "फार्मण फायपेागो विग्रहगति समापन "जीर तथा अयोगी फेपली इत्यादि जीव अगाधारक जाणवा. अने जे भोनाहार ते अपामा भरस्याये होप अने लोमाहार तथा प्रक्षेपाहार एपे पर्यावावस्थाये होय एम प्रण मकारना प्रधा उपशमावे ते आहारफ जाणवा. देवगति तथा नरकगनि ए ये मार्ग गाने विपदिय पर्यामी अने कर. ॥ अपर्याप्तो छेवो के लाभ अपर्याप्तो नीच देव भने नारफी नदोय मादे. प्रोमा विभंगनाने अपर्याप अवस्याये विभंगशानी होरा मोक्षाये नया पंच संग्रह माहे विभंगे एकन जोरमेट मान समिपयोमानोन को गे ते असमि पा मादयी भाष्या जे देवता भने नारका ने अपर्यापापस्पाये विभंगान न. ไง १२ खरंग-सायंक सम्पस मिच्छ-मिथ्यात्व सम्यक्त्व म्यक्त सवसम-भोपथमिक स. मीस-मिश्र सम्यक्त्व सन्नि-सनि म्यक्त सासाग-सास्वादन स- | इअरे-असन्नि अर्थः-सेश्यामार्गणा ठप्रकारे वे. कृष्ण, नील, कापोत. तेजो, पद्म थने शुक्ल नव्यमार्गणा वे प्रकारे एक नव्यथने वीजी अन्नव्य तथा सम्यक्त्व मार्गणा व प्रकारे ठे, वेदक, क्षायक, थोपशमिक, मिथ्याव, मिश्र ने सास्वादन. तथा नव्य श्रने थनव्य एम वे प्रकारे नव्य मार्गणा,थने सन्ति तथा पतन एम घे प्रकारे संझीमार्गणा जाणवी ॥ १६ ॥ टेश्या छ जंपुरक्षना ते जाणवी जेम कोइ छ पुरुप नायु सागा गया स्पा एक जणे चिंतव्यु के ना या यडमांयी ऐदीए, ते कृष्य पान पीने कधू के शाग्या दोर, ते नील लेश्यावंत, प्रोजे कयु के लघु गाला दो ते कात टेपान. चोये,कयुं के गुज दो ए तेनो देश्यान, पांचमे कई फे फल मोतील्यो ते पालेश्यात. छ? फयु के नीचे परेला साप ते ४. पन देण्यात. मया-जे जीद कोई वारे मुक्ति नरा योग दोय ते, भने जे नीर को पाटन मुनिए न जाय ते अमव्य. REE (मायोपित)ना नवनी अदा करी जे मम्यार मोहनीयना देश वंदं एटले पिण्याम मोहनोपना रम सर्ग पातिमो दस भाग्यो पही मागणी तय कीया, भने जेटलो उदय नपी भाग्यो, ने यो एना यांतरे जे पायानी नवा चि ज्या मग जाग ने पाल पोषणम मम्यानप. मा-श्री निकाय प्रयम मंगी मनुष्य अंगी करलो . बंगदारी कोर, मान, माया, माम प गाा कामाबग दर्शनमो. रिमारने वाले प्राममो मायानगर प्रबार मापन पानी पक्षापात पीर नमामि गोनामा At In " १२ए मिपाव--मिथ्यात्वने उदये जे विपरीतरुचि ते घोषू मिथ्याल.. मिय:-मिथने उदये जे मिश्ररचि ते पांचमं मिय. सास्वादन-ते सम्यक्त्व समतो जे मिथ्यात्वे नपी पोच्यो सेनी पच्चे जे शुद्ध रुचि ते उ९ सास्वादन. आदारे अर नेा, सुर निरय विनंग मश्सु ओहि उगे। सम्मत्त तिगे पम्हा, सुका सन्नीसु सन्निदुर्ग ॥ १७ ॥ आहार-महारक मा-मतिमान मुका-गुस्ल लेश्या इभर इतर (अणाहारक)| सु-श्रुतहान सन्नीसु-सनिया : भेभा-भेद भोहिदगे-भवधिज्ञान सनि दुर्ग-संविदिक (स- मुर-देवगनि भवधि दर्शन नि पंचेंद्रि पर्याप्ता निरप-नरकगति सम्मचतिगे-सम्परत्व विक अने अपर्याप्ता विभंग-विभंगशान पन्हा-पद्मलेश्या अर्थः थाहारक थने श्रषाहारक ए वे आदारक मार्ग- पाना नेद. हवे वासर मार्गणाये चोद जीव नेदाकहे . देवगति, नरकगति, विनंगहान, मतियान, श्रुतहान, थवधि- ज्ञान, अवधिदर्शन, एम सात. सम्यक्त्वर्नु त्रिक एम दश थने पद्मलेश्या, शुलवेश्या थने, सन्नीया ए तेर मार्गणाए संझी पद्रि पर्याप्ता थने अपर्याप्ता ए ये नेद जीवना होय ॥१७॥ अंहीमा “फार्मण फायपोगो विग्रहगति समापन " जीव तथा अपोगी फे.पली इत्यादि जीव अणाहारक नाणपा. अने जे ओमाहारते अपर्याप्ता परस्याये होय अने लोपाहार तथा प्रक्षेपाहार एघे पतावस्थाये होय एम प्रण मकारना सुधा उपशमाये ते आहारक जाणवा. देवगति नया नरकगति ए घे मार्ग गाने विस पदिय पयोमी अने कर. ण अपर्याप्ती लेवो दमक लधि अपर्याप्तो जीप देव भने नारफी नहोय माटे. भीमा विभंगलाने अपर्याप अवघ्याये विमंगलानी, ते पक्षाये ले सया पंच संग्रह मांद विभंगे एफन जीवभेद मात्र ममिपमानोन फोछे ते असमि पामादयी भाम्या जे देवना भने नारका ने अपर्याप्रापस्पाये रिभंगवान न. , १२७ खरंग-सायंक सम्यक्ता | मिच्छ-मिथ्यात्व सम्यक्त्व म्यक्त्व उसम-भोपशनिक स. मीस-मिश्र सम्यक्त सनि-सनि साप्ताण-सास्वादन स-/ इअरे-असन्नि अर्थः-खेझ्यामार्गणा प्रकारे ते. कृपण, नील, कापोत, तेजो, पद्मथने शुक्ल नव्यमार्गणा वे प्रकारे एक नव्य श्रने धीजी अन्नव्य तथा सम्यक्त्व मार्गणा व प्रकारे ठे, वेदक, हायक, योपशमिक, मिथ्यात्व, मिश्र अने सास्वादन. तथा नव्य थने थन्नव्य एम वे प्रकारे नव्य मार्गणा, थने सन्नि तथा थप्सन्नि एम घे प्रकारे संझीमार्गणा जाणवी ॥ १६ ।। प्टेट्या छ जंयुक्षना शांत जाणवी जेम कोइ छ पुरुष जांपु सावा गपा त्या एक नणे चिंतव्यु के जांयु मा यडमांयी छेदीए, ते कृष्ण सेश्यान पीने क' के शाखा छेदोए, ते नील छेश्यावंत, प्रोजे क' के लघु भासा ऐदो ते कात खेदयावंत. पोये कयुं के गुर छेदो ए तेजो छेश्यावंत. पांचमे कई के फल तोडी ल्यो ते पद्माटेश्यावंत. छ? कयु के नीचे पडेला साइए तेश. पर टेण्यावंत. मन्या-जे नीर कोइ वारे शक्ति नवा योग होय हे, अने जे जीर कोई काटे पग मुक्तिए न नाय ते अमन्य. पदा (सायोपिक)-नव नवनी प्रदाय फरी जे सभ्यास मोहनीपना परम वेद एटले पिण्यास मोनोपनी रस स पानिमो उदय भाग्यो पको मोगली सय कोयो, भने जेटलो उदय नयी भाष्यो, ने उपयो एना मांतरे जे आन्यानी नवनि या मगे नागे ने पल शापोसम मम्परत की. सपा मम्मान-श्री निनका प्रथम गंपपगी मनुष्य अंगी कालो . नंदानुसंधी मोर, मान, माया, पाम र पार पाय ना ग नमो. सिंगो मामाको १८ प्रकार मारपीट ल, ना पानी भसापनी पागरिमपंप.मोर -सानो मान तिमो नमो माया प्रीपनि माप १२ए मिपाव-मिध्यात्वने उदये जे विपरीतरुवि ते घोषू मिथ्यात्व.. मिभ--मिभने उदये जे मिश्ररचि ते पांचमं मिय. सास्वादन-ते सम्पपत्र ममता जे मिथ्यात्वे नयी पोयो तेनी पञ्चे जे शुद रपि ते मुटुं सास्वादन. आदारे पर लेआ, सुर निरय विनंग मश्सु ओहि उगे। सम्मत्त तिगे पम्हा, सुका सन्नीसु सन्निदुगं ॥ १७ ॥ माहार-मारक मह-मतिझान मुका-शुक्ल लेश्या इभर इतर (अणादारक)| सु-श्रुतमान समीम-सन्निपा : भेभा-भेद ओहिदुगे-प्रवधिज्ञान सनि दुर्ग-संनिदिक (स- मुर-देवगनि भवधि दर्शन निद्रि पर्याप्ता निरप-नरकगति सन्मपतिगे-सम्परत्व त्रिक भने अपर्याप्ता विभंग-विभंगज्ञान पन्हा-पालेश्या अर्थः याहारक थने थणाहारक ए वे थाहारक मार्ग- पाना नेद. हवे वासर मार्गणाये चोद जीव नेदकहे ते. देवगति, नरकगति, विनंगहान, मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधि- झान, थवधिदर्शन, एम सात. सम्यक्त्वर्नु निक एम दश भने पनवेश्या, शुलासेश्या अने, सन्नीया ए तेर मार्गणाए संझी पचंद्रि पर्याप्ता थने अपर्याप्ता ए ये नेद जीवना होय ॥१७॥ ही "कार्मग फायपोगो विग्रागति समापन" जीव तथा अयोगी घे.पली इत्यादि नीव अगाहारफ नागपा. अने जे भोनागर ते अपर्याप्ता अपस्यापे होप अने लोमाहार तथा प्रक्षेपाहार ए पे पर्याशावस्थापे होप एम प्रण मकारना पा उपशमावे ते पाहारफ जागवा. देवगनि नया नरकगति ए ऐ मार्ग गाने वितिय पर्याप्ती भने कर. अपर्याप्ती लेवा के.मके लधि अपर्याप्तो नीर देव भने नारफी नहोय मादे. पीमा विभंगहाने अपर्याप भवम्याये विभंगनानी होर, ते अपेक्षाये ले तथा पंच संग्रह माहे भिंगे एकन जीरभेद मात्र समिपोशानोन फो ऐते असमि पामारपी माग्यो जे देवमा भने नारका सेमे अपर्याशायस्पाये विभंगहान न.

२३० होय, तेथी से अपेशाय एक भेद लीयो . ए विशेष छे. मविज्ञान, युतज्ञान, अवधिनान ए प्रगान अने दर्शन मार्गणा माहे एक मपि दर्शन ए चार मार्गणाद्वारे सन्नि पंचेंद्रिय करण अपर्याप्ती जीव गमा सहित सम्यक्दृष्टि अवतरे, ते अपेक्षाये अपर्याप्ता लीपा, तया बीजा समिपर्याप्त सम्यष्टि जीवने पण होय. एटले ये जीवभेद होय. प्रग सम्यस्त्वे पण ये जीवभेद होय, त्यां यदायु सात प्रकृति मोहनीस पाची पार गति माहे उपजे त्या अपर्याप्ता अवस्थाये क्षायिक सम्यग्लोय. ते अपेक्षा एक संगो अपर्याप्त वा तया उपश्रम श्रेणी उपशम सम्पटि पर मरण पामीने अनुत्तर वासी देवता याय. ते अपेक्षा बीना संधी अपर्याप्ता पर टेगा अहीमा कोइ एम फोछे जे संधी अपर्याप्ताने उपशम सन्यस्त्व फेम होप हेनो उपर जे महीकरणअपर्याप्ता लेवा पण लचिपर्याप्ता न टेवा. पदक सम्परत्ये, पाटेश्याये, भूगलेश्याय तथा संनी मार्गणापे । पार मार्गगापे तया उपर नगावो है ना, एम तेर मार्गगाये सनिभाना पर्ग भने भार्यानो एप भेद पोय. त्या अपर्याशा उपनती घेळाए करगयों ठेवा, जे मना समि माहातो तयारिध, विशुद्धिन अभाय ए तर मार्गणारे नका. मोर. एवेर मागंगाप जीवमेद फमा गही यंदा भने क्षायोकि ससार पात्र . एटेर मार्गगा कही. तमसनि थपडाजु, नरे सवायर अपना तेनए ॥ धावर गिदि पढमा, चयार असन्नि विगते ॥१७॥ पायर मनदादर पार-सपना पारा भाष-अमी अपांना माहित ममनि-प्रमा वाद-परियामा मारो माया गया ये भोग ह-पन, महिम पार-चार (4) गिप-प्रारमिला गरेर गरिने वि गटि-दि माहर परवाना धार चःतये नंदधतीसधियपासामदित (परसे सहि पपांतो, शिमग्यांसा बने पसंदीनि अपांग - .. त्रण नेद) मनुष्यगतिने विषे. होय. धने ते वेद पादर अ. पर्याप्ता सहित तेजो सेश्याने विपे होय.श्मने कायमार्गणामांधी प्रसकाय विना पांच स्थावरकाय अने इंजियमार्गणामाची एकछि- पमार्गणा ए उने विप्रथमना चार नेद (सूक्ष्म एकें पर्याप्ती तथा अपर्याप्तो एथे, तथा वादर एकेजिय पर्याप्तो थने अपर्याप्तो ए वे मळी चार नेद)जीयोना होय.तथा (सन्निपंचेंघियपर्याप्ता थ. ने थपर्याप्ता विना)जीवना प्रथमना वार नेद थसन्निमा होय. श्रने घे वे जीवनेद प्रत्येक विकलेजिमा होय (एटले घेखि मार्गणाये घेइजिपर्याप्ता थने थपर्याप्ता ए ये जीवनेद, तेइंति मागणाये तेति पर्याप्ता ने अपर्याप्ता, थने चोरिदमार्ग- पाये चौरिति पर्याप्ता भने अपर्याप्ता जीवन्नेद पामीये)॥१॥ दसचरिम तसे अजया,दारग तिरितणु कसाय अनाणो पढम तिखेसा नविअर, अचस्कु नपु मिति सचि॥१॥ दस परिम-दस ऐसा तिरि-तिर्यंचगति मा० भषिभर-भव्य तथा अ- भव्य मार्गणाये फसाय-पाय मागाये अचल-अचसुदर्शनमा० अम-विरवि मार्गणाये दुभनाणे वे अज्ञान मार्ग-नपु-नपुंसक वेदमा०' आहारफ-आहारक मापम-प्रयमनी (णायेमित्यि-मिथ्यात्वया. गंगापे मिसा-प्रगटेश्या मार्गणा सध्वेवि-सर्व भीवमेद. थर्थ:-जीवना दश वेखा नेद प्रसकायमार्गणाये पामीये तथा अविरतिमार्गणा, थाहारकमा०, तिर्यंचगतिमा०, फाययोग माण, चार कपायमा०, वे अज्ञान मा०, प्रघमनी त्रण (कृष्ण, नीत, कापोत ) लेश्यामा०, नव्य तथा बजव्यमा०, क्चक्षुद- र्शनमा०, नपुंसकदमा, मिथ्यात्वमा०, ए अढार मार्गणाने विषे जोवना सर्व एटले चौदे नेद पामीये ॥ १५ ॥ वसे-प्रसमाय मार्गगाये | सणु-कापयोग मार्गणाये घर-चार अचल-अचधु दर्शनीर १३४ चार गुणगणां देवगति तथा नरकगतिये जाणवां (याकीना दश गुणगणां जयप्रत्ययेज विरतिने अन्नावे तेमने न होय.) मनुप्यगति, संझी, पंचेंजिय, नव्य अने त्रस ए पांच मार्गणाये चौदे गुणठाणां होय, तथा एकँडिय विकजिय, पृथ्वी,थपथेने वनस्पति ए सात मार्गणाये पेहेतां ये गुणगणां होय. अने गति प्रस (तेनकाय तथा वाउकाय ) तथा अनव्यने विपे एक मिथ्यात्व गुणगणुंज होय. ॥ २२ ॥ वेअति कसाय नव दस,लोजेचन अजइ दुति अनाणतिगे पारस अचफ चरकुसु, पढमा अहखाइ चरिम चका॥२३॥ पति-अगोद कपाप- प्रताप अना-प्रविरति मागाये | घरुसुम-चक्षुदर्शनीप परमा-मथमना दुति-ये तथा प्रण অয়ালসিযথা अनाण-प्रधान पिके हान-मोम मार्गगाप पारस-योर श्रयः प्रणयदे यने सोन विना प्रण कपाये नय गुणगणां होय थने सोन मार्गणाये दश गुणाणां दोय. चार गुणगा थपिरति मार्गणाये होय, ये तथा प्रण गुणगणां थाननिके होय, नया थवदर्शनीय थन पददर्शनीय जीपने प्रथमना पार पुरवायां होय. थने ययाग्यान चारि मां पार गुण. वाला होय. एम योग मार्गणा यः ॥ २३ ॥ गालामा पनि गरे नंगाको यो १६. करिता बारेशम ना मागो. गागा गयो ने योगी ग. ना-ना चारिणे प-चार चर-चार १३५ मणमाणि सग जयाइ, समय अचन उनि परिहा केवल दुगि दोचरिमा, जयाश् नव मइसु नहि दुगे ॥ गणनाणि-मनापर्यवज्ञान { दुनि-ये अनयाइ नय-अविरा सग-सात परिहारे-परिहार विशुद्धि आदिना जपाइ-मसचादि चारित्र मन-मतिज्ञान मार्गण सपास-सामायक केवलगि-केवद्विक (के. ऐस-दोपस्थापनीय वलशान तथा केवलदर्शन)/ भोहिंदुगे-अवधिज्ञान दोघरिमा-ये ऐल्ला अवधि दर्शनने वि अर्थः मनःपर्यवज्ञान मार्गणाये प्रमत्तादि सात गुणवा। होय. सामायक थने वेदोपस्थापनीय चारित्रे चार गुणा। होय. परिहार विशुद्धि चारित्रे वे गुणगणां होय, केवलझा अने केवखदर्शन ए मार्गणाए खां वे गुणगणां दोय. तर थपिरति थादि नव गुणगणां मतिज्ञान मार्गणाने विपेता थवधिज्ञान अने थवधिदर्शनने विपे जाणवा. ॥ २५ ॥ पारित्रियाने अप्रमत्त गुणठाणे मनापर्यवज्ञान उमजे ते बळी ममते भा से अपेक्षाये प्रमत्त गुणटाणुं पण फयु अने ते पछीना गुणागाए ते साधु उपश श्रेणी तथा क्षपक श्रेणी फरे ते अपेक्षाये सात गुणाणा लाभ, सामायक अने छेदोपस्थापनीय एवं पारित जीरने ममत, अममर निवति भने अनिवृत्ति ए चार गुणठाणां लाभ एवं चारित्र क्षापोपशमिक मा सथा उपराम श्रेणीय नवमे गुणठाणे पिगमिक चारित्र होप, तेने मते औपर मिक भाव तथा क्षपणीय नवमे गुणठाण क्षायिक भाव एम ग भार होय परिहार विशृद्धि चारित्र प्रमत्त अने अमपत्त एवं गुणाणा होय पारिम उपरामजी तथा भगोए बहु धेगी नहोप नेधी भागमा एणग --Ramadan आहार-आहार मार्गगा अमानवसमि चन वेअगि, खइए कार मित्र तिगि देस। सुहुमे स्सहाण तेर, सजोग आहार सुकाए ॥ ३५ ॥ अड-आठ गुणठाणां इकार-अगियारगुणाणां स्थानके होय. उपसमि-औपमिके मिच्छतिगि-मिथ्यात्वत्रिक तेरस-तेर गुणठागां घउ-चार गुणठाणां देसे-देश निरनि योग-त्रण योग मार्गणा अगि-वेदकसम्यदृष्टीये मुहुमे-मूक्ष्म संपराय खइए-सायक समकिते स्सहाण-पोनपोताने गुण- मुक्काए-शुरूलेश्यामार्गणा अर्थः-(चोथाथी थगिधारमा लगी.) था गुणवायाँ उपशम सम्यक्त्वे होय, (चोथाथी भाउमा लगी) चार गुण- गणां वेदक सम्यक् दृष्टिने होय, दायक सम्यकत्वे (चोथायी चौदमालगी) अगीयार गुणगणां होय. मिथ्यात्व, सास्वादन बने मिश्र ए प्रण तथा देशविरति धने सूक्ष्म संपराय ए पांच मार्गणा पोतपोताना गुणस्थानके होय, थने योगनी प्रण मा- र्गणा, तथा आहार मार्गणा थने शुक्ललेश्या मार्गणा ए पांच मार्गणाये पेहेला तेर गुणगणां होय. ॥ २५ ॥ मनोयोग, वचनयोग, अनेकाययोग ए ऋण योगे सामान्य नये मिथ्या- स्वीथी लेइ तेर गुणठाणां लाभ अने विशेप अपेक्षाये तो एक सत्य, वीमो अ. सत्यामृपा ए चे मनोयोगे अने एज वचनयोगे तेर गुणाणा होय. अने चीना मनोयोगे तथा वचनयोगे जे चार योग याय ते चार योगे वार गुगठाणा जाणवा. औदारिक मिश्र काययोगे. मिथ्यात्व, सास्वादन, अविरति भने सयोगी ए पार गुणठाणां नाणां नया चैक्रिर काययोगे पहेलां सात गुगठाणां जाणवा. पक्रिप मिश्रकाययोगे. मिथ्यान्व, सास्वादन, अविरनि देशविरनि, अने प्रमत्त ए पांच गुणठाणां नाणवां भाहारक काययोगे प्रमत अने अप्रमत्त ए ये गुणठाण। जाणवा. भाहारक मिश्रकाययोगे एक ममत्न गुणाणु नागg नया कार्मणयोगे एक मिथ्यात्व, पोखं सास्वादन, प्रोजु भरिगति चोयुं सयोगी ए पार गण. हाणांप.

१३६-२ बासठ मार्गपामारे चोद जीवन्नेदनो यंत्र. सनिपदिपासा अपर्याप्ता सानपदभपर्या० असनिवदिप प्रसभिपंचति अप०/ चोरिदि पाता निदि पर्याप्ता लिइदि अपर्याप्ता दिपोता नगदप्रपयाप्ता रदिस्यता सापर करियर रएदिर पारिदि Obaisy - -- MEE24 पानमालापागना,पदमा यिोगमा ३ काम मार्गणा.२ इंदिर पागणा. गनिमार्गगा. देवान मागणा मनुष्यगति मा० तिधगति मा० नरकगति मा. रिकामा इंदि मा० तेइंदि मा० चौगिदिमा० पंचेंदि मा० सीकाप मा. भपकापमा० विउपाय मा० वाउापमा. वनस्पनिकाय मा० पसकायमा मनोयोग मा० पचनयोग मा. कापयोग पा० प्रपद मा० खोपेदमा नमपदमा कोषमा मानमा मापामा. मोमा. मिशन भूताना. मारिकान मा.

-mmm प्रचक्षुदर्शन १३६-४ मनापर्यव मा० ३० केवळज्ञान मा० ३१ मतिअज्ञान मा० १/२ १ ३२ शुतअज्ञान मा० ३३ विभंगज्ञान मा० ३४ सामायक मा० ३५/ छेदापस्थापनीयमा |३६/ परिहारविशुद्धि मा. ३७ मुक्ष्मसंपराय मा० ३८] यथाख्यात मा० ३९देशविरति अविरति ४२) चसुदर्शन ४२ अवधिदर्शन ४४ कियळदर्शन ४५. कृष्णाटेश्या ४६ नीलखेश्या कापोतटेश्या ४८ निनोटेश्या ३९ पद्मालेदया | शरटेल्या २/२/११/१२ मयमागंगा भमन्यमार्गणा विसमभ्ययस सायमम्यरत 'गोपकि.मम्य ५६ रियालसकिन? ও মিসর ac माम्बाइनमध्यन मनिमागंगा নিসা মাদাগ मनाएगा ? १ . . । , १३० असन्निसु पढम गं, पढम तिखेसासु उच्च उसुसत्त॥ पढमंतिम ग अजया, अणहारे मग्गणासु गुणा ॥२६॥ असमिस-भसंझी मार्गणाये दुस-वेजो भने पद्म ये अनया-भविरति पदमदुग-पहेला गुणाणा लेण्याये अणहारे-भणाहारफ मा० पहमतिसामु-पहेली प्रग सत्त-सात गुणठाणां मगणामु-मार्गणादारने टेश्याये पटमंतिमदुग-पहेला ये रिप - মুলমালা अने छेल्ल ये गुण-गुणठाणां अर्थः-घसंही मार्गणाये प्रथमनां वे गुणगणांहोय, पेद्देसी कृप्यादि प्रण लेश्या मार्गणाये व गुणगणां जाणवांथने तेजो तथा पद्म ए चे लेश्याये सात गुणवाणां होय, प्रथमनां घे गुण- गणां तथा रेखा चे गुणगणां ए चार तथा श्रविरति एम पांच गुणवाणां थाहारक मार्गणाये जाणयां ए रोते पास मार्ग- णाबारे गुणगाणां विवरीने कयां. ॥ २६ ॥ अगाहारफ मार्गणा मिथ्यात्व, सास्वादन भने अविरवि सम्पष्टि ए प्रग गुमागां महीना यागनि पांच सम्पनी फरनां पपला मग ममप अया पार समय भगाहारी होय, ने अपेक्षाये ए प्रण गुणाणा पाटे पता जीव माय पानी तथा फे.पली समुद्यात आठ सपयनो करे के मध्य प्रोजे चोर भने पांच ए प्रण समय फार्मणयोगी भगो अणारोप एरले दरस गुण. गोय. सया भयोगी गुगठागु पौदम् अ, इ, उ, अन एरा पर असर उधारमा टोप तेटलो काळ प्रणाारी होप. अपना अनादि मनः सिद नीर तेने पण योगने अभाई भगार पगु होय पोमा सई जोर सरप माप पण भणारी नाय पर पाम पागणादार पदर योग . सधेयर मीस अम, च मांस मायय विधिमादारा उरखं मीसा कम्मण, अजोगा फम्म अणदारे ॥२॥ - मनो०) १३७ सच-सत्मनो योग मग-मनोयोग कम्मग-कागयोग अर-असत्समनोयोग वय-वचनयोग इम-एम मीस-मिय, (सत्वामृपा. विउन्नि-क्रिययोग जोगा-जोग आहारा-माहारकयोग सम्म-कार्मणयोग असवमोस-असत्यामृपा- उरलं-ौदारिफयोग अगदारे-मनापारी मार्ग मनो मीसा-ौदारिक मिश्रयोग जाये थर्थ:-सत्य मनोयोग, थसत्य मनोयोग, (तेमज सत्य वचनयोग, असत्य वचनयोग) सत्यामृपा मनोयोग, असत्या मृषामनोयोग, (तेमज सत्यामृपा वचनयोग, थसत्या मृपा पचनयोग ) ये क्रिययोग, थाहारकयोग, थोदारिकयोग, थोद रिकमिश्रयोग, ये क्रियमिश्रयोग, थाहारकमिययोग, थने का मंधयोग, एम पंदरयोग. ते थनाहारी मार्गणाये होय. (भनेता साप पस्तुत चिंताय ते) सत्य मनोरोग (१), नेगी fr- नरममप मनोयोग (२), रोमन सापा यपन भारमाने नोई ने सर सपी (1), नयी सिरीत ते मातरप पपनयोग (1), काकराय भने का समय निताई त मायामा मनोयोग (५), भने ते प्रमाणे भागते राया। पर (६), मने जेा साप नयी तेम जाग यी नेम अमुक मागम संग, विभा पातु यार. मायाना, ने भगयामा मो (भने ने हमारे समयमा यपनयोग (८) जिप नगर गा भागात दिनाहियोग (९)मा पारीमा मामाने नोi मपंग (2.) मादा गांप भापानमा भागरिर- (११) मित्र पर मासिक राग गा वि मोर जिविस (१) घोटाला मानिस पिय(११) भी HiruingREL मावि (11) मोग राग पासायी भनि राग (मारामा indian तर EC ATTACi 11 भष-मध्यमा फसाय-पाय तस-प्रसकाप १३ए एम पंदर योग कग्रा. हवे मार्गगाद्वारे तेनं विवरण फरे छ. त्या पर अणाहारी मार्गणाये एक कार्मण योग होय, पीमा चोद योगे पर्सयो जीव भाहारी होय ने फार्मगयोगे वर्षको जोर आहारी होप सेप भगाहारी पग होय जे मणी मथम समय कार्यगयोगे आहारी होय. नरगश्पणिदितसतणु, अचस्कु नर नपुकसायसम्मदुगे सन्नि वसा हारग, नव मइ सुअदिगिप्तघे ॥श्ना नरगा-मनुष्यगति नपु-नपुसमवेद पणिदिय-पंचेंदिप मर-मतिमानमा० सम्मदुगे-सम्परस्वति । गुम-दानमा सणु-काययोग समि-दीमा मोरिदुगे-भरविधानमा अधरुसु-मधदर्शन इलेसा-छस्टेवया तया भवधि दर्शन मा० नर-पुरुपवेद हारग-माहारकमा. गम्य-मई अर्थः-मनुष्यगति, पंचेंडि, प्रसकाय, फाययोग, एच. शुदर्शन, पुरुपयेद, नपुंसकवेद, चार कपाय, एम थगीयार मार्गणा. थने सम्यकत्व मार्गणामध्ये दायक थने दायोपरामिक सम्यक्त्व मार्गणा तथा संझीमार्गणा तथा उसेश्या मार्गणा, हारीमार्गणा, जव्यमार्गणा, मति, श्रुत थने थवधि ए प्रपशान मार्गणा तथा थवधि दर्शन मार्गणा, ए बीस मार्गणादारेसमें योग होय. ए रोते सत्तावीस मार्गणादारे योग कसा ॥ २० ॥ तिरिहि अजय सासण, अनाण उपसम अनयमिकेतु तेराहार पुगणा, ते नरत गृण सुर निगए ॥ ५॥ निरि-निगतिमाः -सादेपी परिप-सी पेदमा उसरा मोहारिता भाप-मनिनिमा० मिग विमा. MAITH-. राणा मुर्गनगर-सा बरे उरसप-भाषितम सागर नातन राम' भध... भाग सासण-सम्मानदार भनाण-पग भमानमा १४० अर्थः-तिर्यंचगति'मार्गणा, स्त्रीवेद मार्गणा, अविरति मार्गणा, सास्वादन मार्गणा, तथा प्रण अज्ञाननीत्रण-मार्गणा एम सात तथा थोपशमिक सम्पय मार्गणा, अन्तव्यमार्गणा मिध्यात्व मार्गणा, ए दश मार्गणाद्वारे.॥ (पंदरमाथी) था- हारकदिक उदु करतां तेर योग होय ॥ते तेर योगमांदेसी थोदारिकहिक अंदा करता थगिधार योग देवता तथा नार- कीने दोय ॥ (कारण के तेमने थोदारिक शरीर होतां नयी- एम सर्व मळी अंगणचालीस मागणाद्वारे योग कह्या ॥२॥ पाट पहेता पे भरने बच्चे नीरने कागयोग होप. तया मीने 'केरल मार्गमा परेले प्रग समपे होर, तया मोहारिक पिप्रयोग भपयांसारस्यापे शेर, नया श्रीदारिकादिक अगिमार योग यांसारख्या रोप, मां वैरि भने पति पियोग लिप उतर पक्रिय करे, ते साये कया. शेत 'भार भने भारत पित्र एवं योग पारिपने अमारे पाद पूरिना नरोर बोले पारिताप पग तुला गारवाहमादिक दोषार करीने पोदपूर माई वि.पी मने पण भार या भागारपिर से योग नहोर. নকা নাৰ বশ মালা কাগযা নখ দীন থৈ मने गा गोमंगापयानि पुरी न करो यो गुण कित. पर अने पविया पूर्ण पणा पो चार माग, गार पनपाए भने रसामनाया जाय. कम्मरावगं थायरि, ते सविनधि उगपंच हा पक्षणे ।। घसन्नि चरिम ययजुन, ते विगविगणयन विग३० मार्ग-नारंग नया मांग पवननयोग राम-गु परिवार Thi मी 71 nिumari शिरसिया समय निमः कर. नाना M (० था-कार्मणयोग, योदारिकयोग तथा औदारिकमिय. 'योग एत्रपयोग गतिघावरने होय, ते प्रणयोगने चैक्रिय भने वैकिय मिश्रयोगे सहित करतां पांच योग एंकलि अने वाज- कायने होय ॥ तथा ए पांचने ठेखा वचनयोगे (श्रसत्यामृपा. 'वचनयोगे) सहित करतां च योग असन्निमार्गणाने विपदोय. ते उमांथी वेक्रियहिक उणा करतांचारयोग विकलेंजिने होया३० मही सेउकाय गतियावरमा गगिपे कारण के इंधनादिक संयोगविना तेउकाय स्थानांतरे न जार अने वाउफाय तो पोतानी रक्तिये सेंकरी जोनन माय माटे वाउकापने गतित्रस कहीए. एटठे तेना विना पृथ्वी, अर, तेउ भने वनस्पनिकायने उपना कार्मणयोग होय. वळी एने अपर्यापारस्याये भीटारिक मिश्रयोग होप अने पर्याप्ता यया पठी एक औदारिक योग होय. पादर घाउकाप धनाने आकारे उत्तर वैक्रिया करे सारे पक्रिय भने वैकिप मिय एप योग पधारे होय तथा फार्मण अने औदारिक पिन ए प योग भपर्याप्ता वस्याये होय तया औदारिक योग तो मूळ शरीरनी अपेक्षा दोप एम पांच योग वाउकायने होप. कम्मुरलमीसविणु मण, वय समयअ चरकु मणनाणे उरल दुग कम्म पढम,तिम मण यय केवल गंमिा३॥ कम्म-कार्मग प्रीमो कम्म-कार्मण भरलमीस-औदारिकमिथ | छेभ-छेदोपस्थापनीय पार्मतिम-पहलोभनेता বিহু-বিনা चारिणीभो माय-मनयोगदपा मण-मनयोगी पगु-पदर्शनी पचनयोग पप-वपनयोगी मगनाणे-मनापर्यवसानी कसर दुर्गरि-एसदिस समहम-सामायफ पारि- उरलग-भोदारिषदिक अर्थः-एक कार्मण अने पीजो थोदारिक मिश्र एपे पोग विना याकीना तेर योग मनयोगी, परनयोगी सामायक १४० अर्थः-तिर्यंचगति मार्गणा, स्त्रीवेद मांगया. थपिरति मार्गणा, सास्वादन मार्गणा, तथा प्रण श्रझाननी प्रय-मार्गमा एम सात तथा थोपशमिक सम्पय मार्गणा, थनव्यमार्गमा मिथ्याल मार्गणा, ए दश मार्गणाद्वारे ।। (पंदरमाथी) था. हारकदिक उ करतां तेर योग होय ।। ते तेर योगमादयी थोदारिकहिक अंग करता थगिथार योग देवता तथा नार• कीने होय ॥ ( कारण के तेमने थीदारिक शरीर होतां नथी. एम सर्व मळी गणचालीस मार्गणादारे योग कह्या ॥ २ए । घाट पहना ये भवने वच्चे जीवने कामंगयोग होय. तया नीने केवळ समुदातमा पहेले प्रग समये होय, तया औदारिक मित्रयोग अपयांतावस्याये होप, तथा औदारिकादिक अगि पार योग पर्याप्तावस्याये होय, त्यां वैरिय अने पक्रिय मिश्रयोग तिच उत्तर पक्रिय करे, ते अपेक्षाये कया छे. शेप आहारक अने आहारक मिश्र ए पे योगचारियने अमावे चौद पूर्वीविना न होय. स्त्रीने चारित्र होय पग तुच्छना गारखबहुलतादिक दोपोर करीने चौदपूर्व भगवं निषेध्यु छे. तेथी तेने पण आहारक तया आहारक मिश्रर वे योग न होय.. देवता तया नारकोने परभवथी आवतां फार्मणयोग एक समय लगीन होय अने त्यारपछी ज्यां लगे सई पयाप्ति पुरी न करो होर त्यां मुधी वैक्रिप मिश्र- योग होप अने पर्याप्तिभो पुरी यया पछी चार मनायोग, चार वचनयोग भने वैक्रिययोग एम नव योग होय. कम्मुरलगं थावरि, ते सविधि उगपंच श पवणे ॥ असन्नि चरिम वयजुअ, ते विनवि दुगूणचन विगले३० कम्मुरलदुगं-फार्मण तथा ' पंच-पांचयोग वय-वचनयोग औदारिकदिक | इग-एकदिने जुम-युक्त यावरि-गतियावर पवणे-चाउकायने विपे त-ते मध्येयो ते-ते प्रणयोगने छ-छयोग विउविदुगुण-क्रिपतिक विचिदुग-वैफियदिक असन्नि-असनि मा. साये करना चरिम-चेला चउ-चारयोग विगले-विकदिने . उगा करता २४२ अर्थ:-कार्मणयोग, थोदारिफयोग तथा थोदारिकमिश्न योग ए'प्रणयोग गतिथावरने दोय, ते प्रणयोगने पकिय थन वैकिय मिश्रयोगे सहित करतां पांच योग एकति थने याद कायने होय ॥ तथा ए पांचने वेखा बचनयोग (यसत्यामृपा वचनयोगे) सहित करतां व योग थसनिमार्गणाने विपदोय ते उमांची क्रियधिक तणा करतां चारयोग विकडिने दीया मही तेउकाप गनियावरमा गगिये कारण के पनादिक मंयोगविना तेउफाय स्थानांतरे न भार भने पाउपाय तो पोतानी शनि में जोमन नाप पाटे बाउकायने गतिषस काहीए. एटले मना विमा पृणी, मरत भने बनस्पनिकायने उपना फार्मणपोग होप. पकी एने अपमानम्मा भोटारित मिययोग होप अने पर्यामा यया पाठी एक भीटारिश पोप होय. पादर पाउफाप पनाने आकारे उतर पनिपार करे न्यारे परिबी किए मिथ एप योग पधारे रोप तया फार्मण भने भौदामिविध राग अपर्याप्त पस्याये रोप तथा श्रीदारिक योग ता मूळ पानी भसारोप एम पांच योग बाउकापने होप. कम्मुरलमीसविणु मण, वय समश्या अचम्मणनाणे बरस दुग कम्म पढम, तिम मण यय फेरस पुगंमिा३॥ सम्म कामण बीमो माग घरलमीस-औदारिकपिध सेभ-दोपस्थापनीय पानिप-परमानेन रिणु-शिना पारिधीशे मनाप-नागरा मण-मनयोगी पशु-पासनी নো पप-पपरयोगो मणनाणे-मनापरबानी कम पिर समाम-सामापय पारि. एरस्तुग-भाशारितिक धर्षः-एक फार्मण धने पोजो घोहारिक मिथए पोग बिना पायीना तर योग मनयोगी, पपनयोगी मामादक - ---- -- - चा दर्शन १४४ मांहे प्रण अज्ञान अने चतु तथा अचा ए ये दर्शन, एम पांच उपयोग ला अने सम्यदृष्टि देवादिक चार मार्गणा मध्ये त्रण ज्ञान तथा त्रण दर्शन ए छ : पयोग लाभे, एक समये जीवने एक उपयोग होय पण ए ओघ.माने कहा, तस जोअ वेअसुक्का, हार नर पणिदि सन्निनवि सके। नयणे अरपण लेसा, कसाय दस केवल दुगुणा ॥३४॥ तस-सकाय मुक-शुक्ल लेश्या पणिदि-पंचेंद्रियनाति जोम-त्रण योग आहार-आहारी मा० सनि-संज्ञीमार्गणा वेग-व्रण वेद नर-मनुष्यगति भवि-भव्य मार्गा सन्वे-सर्व उपयोग पणलेसा-पांच लेश्या केवलदुगुणा केवल दिव नयणेअर-च दर्शन अ- कसाय-कपाय हीन करता दस-दश अर्थः-एक सकाय, त्रपजोग, अपवेद, शुकललेश्या, भा. हारीमार्गणा, मनुष्यगति, पंजियजाति, संशोमार्गणा श्रने जव्यमार्गणा, ए तेर मार्गणाद्वारे सर्वे (बारे)उपयोग पामीए॥ चतुदर्शन, थने अचक्षुदर्शन, शुक्स सिवायनी पांच लेश्या, चार कपाय एम अगीयार मार्गणाद्वारे केवलदर्शन अने केव- सज्ञान उंग करतां दश उपयोग पामीए ॥ ३५॥ चरिदि असनि दुधना,ए दुदंस ग विति थावरि अचम्क । ति अनाण दंगण दुर्ग, अनाण तिगि अन्नव्य मिन गे॥३५॥ पादि-परिधिमा । पदि-तादि प्रमाण निगि-प्रग मान भसनि-मममि মাথা .. न मिस्टगे-पिपार पा च या भर-भपम्पमा गग भवान २४५ अर्थ:-चनजि तथा श्रसन्नि ए वे मार्गणाद्वारे, मतिथ. झान तथा श्रुतअज्ञान ए वे थझान, तथा चक्कु थने थचतु एचे दर्शन एम चार उपयोग होय. तथा एकेंजिय, घेइंति, थने तेति एत्रण इंपिय मार्गपा, थने कायमार्गणा मध्येनी पांचे स्थावर, एम थाप मार्गपाझारे मतियज्ञान, श्रुत थकान अने थचक्षुदर्शन ए प्रण उपयोग होय. ॥ प्रण थहानमार्गमा थन्नव्यमार्गणा, मिथ्यात्व मा० थने सास्वादन एठ मार्गपाये मति, श्रुत अने विनंग ए त्रण थज्ञान तथा चतु, थचक्षु ए ये दर्शन एम पांच उपयोग होय, जे लपीथहींयां सम्परवन पामीए, तेथी शेप सात उपयोग न होय ॥ ३५ ॥ केवलगंनिअगं, नवतिअनाणविणुखश्अअदरकाए देसण नाण तिगंदे, सि मीसि अन्नाण मीसंतं ॥३६॥ फेवलदुर्ग-केवलधिक खइभ-क्षापक समफित । देमि-देश पिरतिमार्गणार निभदुर्ग-निमदिक भाखाए-यपाल्पात पा. मीसि-मिध मार्गणाए रिष अमाण-मनाने फरी तिमनाणरिणु-प्रण अज्ञान दंसणनाण निगं-प्रग मान पीसनं-पिथ विना सया प्रगदर्शन थ:-फेवलहान थने फेवस दर्शन ए ये मागंणाय तंज पे उपयोग पामीए. तेथी निजदिक कयु (जे नषी पाकीना गद्मस्थिक जे दश उपयोग ते ते फेयसीने न दोय.) ये पार उपयोग मध्येधी प्रण थहान विना नव उपयोग दापक स. म्यक्त्व थने पयाल्यात पारिन ए पेमार्गणादारने विप पामीर, (तेमा मतिज्ञान, तहान, थयधिज्ञान, मनःपर्यवहान, पा. दर्शन, घयकुदर्शन, धने घयपिदर्शन, ए सात उपयोग पनि नव-नव २४६ थारमे अने बारमे गुणगणे ययाख्यात चारित्र दायते श्रपेदाय लेवा भने केवलज्ञान तथा केवखदर्शन ए ये उपयोग केवलीनी अपेक्षाये ययाख्यात चारन माटे सेवा, विरतिनणी थान त्रण न होय.) एक केवल दर्शन विना आणदर्शन तथा मति, श्रुत अने अवधि ए प्रण ज्ञान एम व उपयोग देशविरति मार्गणाये पामीए. तेज उ उपयोग मित्रमार्गणाये होय, पण एटद्यं विशेष के प्रण ज्ञान ते थाने करी मिश्र लेखवयां. त्यां मतिझान मतियज्ञाने मिश्र, थने श्रुतज्ञान श्रुतबझाने मित्र तथा विनंग अज्ञान थवधिज्ञाने मित्र होय एमबण दर्शन पण मिश्र सेवां. एम उ उपयोग मिश्रमार्गणाये पामीये ॥३६॥ मणनाण चरकु वजा, अणदारे तिन्नि दंस चननाण ॥ चननाण संजमो वस, म वेअगे नाहि दंसेय॥३७॥ मगनाण-मनापर्यवज्ञान {तिनिदस-ग दर्शन वेअगे-वेदकसम्यस्त्वमा मोहि दसैम-अपषि दर्शन बजा-वर्जीने संजम-संयम मा० अणहारे-अगाहार मा० उपसम-उपशमसम्यक्त्वमा थर्थः-मनःपर्यवज्ञान श्रने चक्षुदर्शन वर्जीने याकोना दश उपयोग अनाहारक मार्गणाये होय. तथा चकु, अचा श्रने अवधि ए व्रण दर्शन तथा केवळझान विना चार ज्ञान एम सात उपयोग थगिार मार्गणाकारे होय ते कहे . फेवळ सिवाय चार ज्ञानमार्गणा झारे,तथा सामायक,दोपस्था- पनीय, परिहार विशुद्धि अने सूदम संपराय ए चार चारित्र मार्गणा हारे, ए था तथा नवमी उपशम सन्यरत्व, दशमी वेदक सम्यक्त्व थने थगीयारमी थवधिदर्शन मार्गणा प बागार मार्गणा द्वारे उपरना सात उपयोग पामीए॥३७॥ चतु-चक्षुदर्शन पउनाण-चार ज्ञान

No text on this page.

१४७ हवे मार्गणाद्वारे । छेदया कदे ऐ. कारण के मार्गगास्थित जीवनी उपयोग शुसि लेश्या शुदिए फरी जगाप माटे, उसु खेसासु सगणं, एगिदि असन्नि नूदगवणेसु ॥ पढमा चनरो तिन्नड, नारय विगलग्गि पवणेसु ॥३॥ छमुलेसासु-छ लेश्यादारे दग-अकाय मा० नारय-नारकी सठाणं-स्वस्थान वणेमु-चनस्पतिकायमा०ये विगल-विगलेंद्रि एगिदि-एकेंद्रि मा० पठमाचउरो-अयमनी चार अगि-अनिकाय मा. असनि-असनि मा० भु-पृथ्वीकाय मा० तिनिउघग टेश्या पवणे-चाउकाय मा० अर्थ:- लेझ्या मार्गणाधारे स्वस्थान ते श्राप थापणी एक लेश्या होय, एटखे कृष्ण लेझ्या मार्गणाये कृष्ण लेश्या अने नील सेझ्या मार्गणाये नीज लेश्या होय, एकेंजी मार्गणा, असंझीमार्गणा, पृथ्वीकाय मार्गणा, अपकाय मार्गणा, वनस्पति काय मार्गणा, ए पांच मार्गणाद्वारने विप्रथमनी चार लेश्या होय. कृष्ण, नील अने कापोत ए ण वेश्या अशुन परिणामे होय,ते नरकगतिमार्गणा तथा विकलेंद्विय मार्गणा,अने पांचमी अग्निकार्य मार्गणा तथा उही वायुकाय मार्गणा ए उ मार्गणा द्वारे ए प्रथमनीत्रण लेश्या होय. ए ठए मार्गणा स्थित जीव थशुन यध्यवसाय स्थानके वर्ते ठे तेजणों एने ए अशुन लेश्या घणे होय शेप प्रण शुल लेश्या न होय ॥ ३ ॥ * महीमा प्रण लेश्या सेहेजे होय, अने पोथी तेनोटेश्या तो पृथ्वी अप अने बनस्पनि माहे सौधर्म इशान देवलोकना देवता चवीने अवतरे, जे भणी ते देवता पोताना भवनी ऐश्या गेप होय, सेनी साये घरे तेथी एकेंद्रियादिफ मध्ये गोटेदया पामीर.

, अदरकाय सुहुम केवल, उगि सुका गधि सेसगणेसु॥ नरनिरय देवतिरिया, थोचा 5 असंखणंत गुणा ॥४॥ भावाप-पणत्पात पापा-फर ऐश्या पारि निरिभा-निच हम-एस्प संपराप पा सेसटाणे-शकीना स्था, यो-योद्धा रिम पंपलग-पान अने नर-मनुष्प भसंख-असंख्यातगुणा दर्शन निरय-नारकी अर्णतगुणा-अनंतगुणा थर्थः पयाख्यात चारित्र, सूक्ष्म संपराय चारित्र, केवल- ज्ञान, केवखदर्शन ए चार मार्गणाद्वारे एक शुक्ल लेश्या होय, कारण के त्यां थति विशुद्ध अध्यवसाय होय वे. अने एकता. वीस मार्गणाद्वारे ( देव, मनुष्य, तिर्यंच, पंचेद्रिय, पण योग मार्गणा, प्रसमायमा०, प्रण घेद माण, चार कपायमा०, सात झान मारा, पांच संयम मार, प्रदर्शन मा०, नव्य माय, थ. नव्य मा०, व सम्यक्त्व मा०, संहो मा, थाहारक मा, थनाहारक माण्ये ) व सेक्ष्या होय. थहीथां अन्नव्यादिकने अशुद्ध परिणाम अपी थशुद सेश्या होय पण व्यवहारे शनयोग प्रवृत्तिये करी, जैन शुद्ध अव्य क्रियाए करी नवमा ग्रेयेयक सुधी पहोंचे ते माटे एने गुप्त खेझ्या कही. हवे पक्क मार्गणार अल्प पाहुन्य कहे . त्या प्रथम गति मार्गणाये सर्व जीवथी मनुष्य गतिना जीव थोमा नथी नरकगतिना जीव असंख्यात गुणाधिक होय तेथी देवगतिना जीव असंग्यान गुणा होय थने देवताथी थनंतगुणा तिर्यंच होय (तिर्यचमा जळचर, पळचर, खेचर थने . ।

२५० चौरिजितेजि, घेद्रि, एकेजि सर्व जाणवा ॥ ४० ॥ अहीं मनुष्य गतिमा गर्भज मनुप्यनी संख्याना ओगणत्रीस आंक लखीये छीये ७, ९२, २८, १,६२, ५१, ४२, ६, ४३, ३७, ५९, ३, ५४, ३९, ५०, ३३६, एटला आंकनी संख्याए गर्भज मनुष्य जाणवा अने उत्कृष्ट पदे तेयो अ. संख्याता समूर्छिम होय, समूर्छिम यद्यपि असंख्याताछे तथापि ते अध्रुवछे जे भणी तेनुं आयु अंतर्मुहर्त्तनुं होय तथा देखाय नहीं अने तेने उपजवानो विरह- फाळ जघन्यथी एक समय तथा उत्कृष्थी चोवीस मुहर्त छे. तेथी कोइवारे होय अने कोइवारे न पण होय, अने गर्भजनो विरह तो न ज होय. ते तो सदैव होप न अने ते पण वळी संख्याता होय असंख्याता न होय. ते संख्णताना असंख्प भेद छे तेनुं अहीं प्ररूपण करे छे. कोइ संख्याने मी ते संख्याए गुणीए ते तेनो धर्ग कहीए. त्या एकनो वर्ग न होय अने नो वर्ग २x२=४ याय ए प्रथम वर्ग, अने चारनो वर्ग ४४४-१६ ए बीजो वर्ग. सोळनो वर्ग १६४१६-२५६ ए बीजो वर्ग. २५६नो वर्ग २५६४.५६-६५५३६ ए चोयो वर्ग. अने ६५५३६ नो वर्ग ६५५३६४ ६५५३६-४२९४९६७२९६ ए पांचमो वर्ग, अने तेनो पर्ग .१८४४६७५४८७३७०९५५११६१६ ए छटा वर्ग, तेने पाचमा पर्ग सापे गु. जीए त्यारे पूर्वोक्त भोगणग्रीस आँफनी संख्या यह एटले सात कोडाकोटी कोटा फोडी, पाणु लाख फोडा फोडी कोडी, अहाचीस हजार फोडा फोडी कोडी, पासठ कोडा कोही कोडी, एकायन लाख कोडा फोडी तालीस हजार फोडा कोही छसे फोडा कोही, तेंतालीस फोडा फोडी, साडीस लास फोडी, भोगणसाठ हजार फोटो, प्रगसे फोडी, चोपन कोडी भने उपर भोगणचालीस लाख, पचास हजार, मगसेंने छत्रीस यया. अथवा एकने छन्नुवार गणा यमणा फरीए तो पगए भांक थाप. एम पनवणामा कडूं ऐ. एटला नपन्य पदे गर्भन मनुष्य होप अने जेरारे समृमि दीप से साये गणीप, तेयारे उत्कृष्ट पदे भरंगयाता दोप. पणचनति एगिंदी, योवा तिन्निअदिआ अणंतगुणा। तस थोय असंखग्गी, नूजसानिल अदिश अणंता ४१ पनवचंति ति-तादि पांगदी-पति घर-परिधि १प इंदि पोगा-पोरा लिपि र-प्रग रामी बारिदि, योर-पोहा जल-अपकाय असंलगी-मसंख्यात गु- अनिल-वायुकाय महिमा-मधिक গা মিয়াৎ অসি-খি ময়লা-ময়লা भू-पृथ्वीकाप अणंता-अनंतगणा दिय मार्गणामध्ये अल्प पत्र दार फहे छे. थर्थ:-पंचडि चारिजितेति, बेईजिपने एडितेमा साची थोमा पंचडि, तेथी चोरिडि, तेइंडियने येजिए त्रण राशीना जीव एक पीनाथी विशेषाधिक ( घमणा न होय त्यां सुधी विशेषाधिक कदेवाय ) जाणवा थने वेजियथो एकति थनंत गुणा जाण्या. कारणके निगोदीयाजीव एकषिमायावी जाप ये हवे प्रोजी काय मार्गणामध्ये सर्वधी थोमा सका. पीथा जीव, ते करतां असंख्यात गुणा अग्निकायना जीव ठे तेषी पृथ्वीकापिथा जीव विशेषाधिक . तेथी थपकायनाजीव विशेपाधिक वे तेथी वायुकायना जीव विशेषाधिक वे ते थकी बनस्पतिकायनां जीप थनंतगुणा जापवा ॥४१॥ मण वयण काय जोगी, थोवा असंखगुणा अनंत गुणा। पुरिसा योवा इत्यी, संखगुणा अणंत गुणा कोवा ॥४शा मण-मानयोगी भमरगुणा अमायानगुणा योश थोडा रयण-परनयोगी अणनगुणा-अनंनाणा. पायनोगी-यापयोगी पुग्मिा-पुरुषवेदी कीवानघूममवेदी थोरा-योडा थर्थ हवे चांथो योग मार्गणा मध्ये मनोयोगी जीव स. थी थोमा जाण्या (जेनी संझी पंचेति जीव मनोयोगी होय, ते सर्वधी थोमा दे), ते थकी वचन योगी यसंख्यात १५२ गुणा जाणवा (वेडि, तेइंति, चोरिजिअसन्नि पंचेंडियने सन्नि पंचेंजि ए सो वचन योगी ते तेथी असंख्याता ठे). ते करता काययोगी जीव अनंत गुणा ठे (कारणके निगोदादि- कमा अनंता जीव पण काययोगोठे).हवे पांचमी वेद मार्गणा मध्ये पुरुपवेदो जीव सर्वथी थोमा जाणवा, ते थकी स्त्रीवेदी जीव संख्यात गुणा अधिक जाणवा ते थकी नपुंसक वेदी जी अनंत- गुणा जाणवा. ॥४२॥ कारणके एकेंद्रि, विकलेंडि, तथा समूर्टिम मनुष्य भने तिच तथा नारको एसर्व नपुंसक वेदी माटे. माण कोह। माइ, खोजी अहिअ मणनाणिणो धोवा॥ ओहि असंखामसुअ,अहि सम असंख विनंगा४३ माणी-मानी मगनागिणो मनापर्यवज्ञानी, मुभ-शुतज्ञानी फोहि-कोषी योवा-योडा माई-मायो ओहि-भवधिज्ञानी असंख-असंख्यातगुणा लोपी-लोभी असंखा-असंख्यातगुणा विभंगा-विमंगवानी अहिप-अधिक मइ-मनिशानी थर्थः-हवे वही कपाय मार्गणा मध्ये सर्वथी थोमा मा. नीजीव जाणवा, तेथी मोधी जीव विशेषाधिकवे, तेथी मायी जीव विशेषाधिक, तेथी सोनी जीव विशेषाधिकवे. कारण के दामा गुणगणा सुधी पण सोन होय माटे. हवे सातमी ज्ञान मार्गणा मध्ये मनःपर्यय ज्ञानी जीव योमा जाणया, तेथी थ. वधिज्ञानी असंख्यगुणा, तेथी मतिझानी तथा श्रुतानी विशे- पाधिक जाणवा, मतिझानी तथा श्रुतझानी ए ये मांदोमांदे सरया जाणया कारण के ए ये साये होपत्रे, तेथी विनंगज्ञानी जीप थसंख्यातगुणा जाण्या. ॥ ३ ॥ सम-सरखा चहा-परोर १५३ केवलीणोणंतगुणा, मासुअ अन्नाणिणंत गुण तुल्ला ॥ सुहुमा थोया परिहा, र संख अदखाय संखगुणा ॥४॥ केपटीपो पलझानी जी अमाणि-मानी संख-संपाताणा অয়লা-সৰলা आरूखाप-पपारुपात का-मति (पानी) मामा याम संपरायवाली संखएणा-संभपाताणा इम-भुन (भमानी) परिहार-परिवार रिति थर्थः-विलंगानीयो केवलज्ञानी जीव अनंतगुणा जाण- पा (फारण के सिद्धनाजीव पण केवसझानी .) ते केवमझा- नीची मति थडानी ध्रुत थहानी धनंत गुणा के, (कारण के निगोदीथा जीव सिद्ध थकी अनंत गुणावे. तेमने मति अज्ञा- न थने धृत घशान ; ते वे मांदोमांदे सरखा ठे, कारण के जेने मति अज्ञान वे. तेने श्रुत थज्ञानपण दे. हवे थामी संयममार्गणा मध्ये सूदम संपराय चारित्र- वाला जीव सर्वधी योमा (कारण के ते उत्कृष्टा एक मां शत पृथक्त्या पामीये) (पृथक्त्व एटसे घेथी नवनी सहाजा- पावी.) तेथी परिहार विशुद्धि चारित्रीपा संख्यातगुण्या होय (कारण के ते सहल पृथक्व लाने) तेथी यथाख्यात चारित्रीया संख्यातगुणा जाणवा (कारण के तेकोटी पृथक्त्व लाने) आ समश्य संखा, देस असंखगुणऽयंत गुण अजया। थोव असंख दुणंता, ओदि नयण केवल अचकू ॥१५॥ ऐमा-दोपस्यापनीय असंखगुणा-भतरुयानगुगा दुर्णता- अनंता समाम-सामापक पारि- अलगुण-अनंनगुणा मोही-अधिदर्शनी श्रीया अनपा-प्रविनि নবজ-মুনী संता-यातगुणा योरन्योटा संदल-परमानी मेस-देशविरति असंस-मतल्यातपणा থ-বয়ানী १५४ अर्थः ते यकी वेदोपस्थापनीय चारित्रीया जीव संख्यात 'गुणा जाणवा, (कारण के ते शतकोटी पृथक्त्व साने माटे) ते यकी सामायिक चारित्रीया संख्यातगुणा जाणवा, (कारण केते सहलकोटी पृथक्त्व साने)ते थकी देश विरति जीव थ. संख्यात गुणा जाणवा, ते थकी वळी थविरात जीव थनंतगु. पा जाणवा. (कारण के प्रथमना चार गुणगणे वर्त्तता जीव सर्व थपिरति ) ए रीते थाम्मी संयम मार्गणाए थप पहु सहार कj-दये नवमी दर्शनमार्गणामांदे थयधि दर्शनीजीव सर्वची योगा जाणया, ते थकी चतुदर्शनी जीय असंन्यात गुणा, तेयी ये थनंता कहेंया पटसे तेथी केयसदर्शनी अनंत. गया थने तेयी थयडादर्शनी थनंतगणा जाणया कारण के ए. केंशियादि जीयोने थचतुदर्शन होय. ए रीते नयमी दर्शन मार्गपाप थापयवहार को. ॥ ४५ ॥ पहाणु पुरि सेसा, धोया दोऽसंखपत दो अधिया। अनवि थर थोवऽणता, सासणा थोयोवसमसंख॥४६॥ मालियानानि प्रांत-अनंतगुणा पी-1 (ऐन्टेसी पोष्ट बात दो- गाना अगंगा-माणा मा-गा परिमा-frin. गागग-गापानी मा-ममय मागंगार , जय-. मा-मय मागंगा गंगा-गानामा ब-याग ध-दामी या मार्गणाग धानु िपटले. शुभ ऐसी मादीने प्रयास थायर से पनाव के. rina या पागा कार पा.

No text on this page.

२६०
तनामे के गुपवाणे होय, (केमके पदीयां श्रादारकना
दे
मन भियना एवं चार योग सन्धि प्रत्यये दोय त्यो सन्धि
प्रजन प्रमत्त दोय ते माटे) से सेरयोग मांदेची एक वादा
मिने घीजो किय मिश्र (एपे योगधप्रमत्त गुणगाणे
न होजे नापी एपे योग पेकिय सपा पादारक पारंजतो
दो.. पिडा सो सभि प्रगुंजे रोगरे प्रमरो होय पण सामने
पनि अग नगी रोषी प्रमरी होय पण एपधारीता
MEETTS पेदापे पक्रिय थने शादारक एपे पोग
कराना मिन होय. माटे) पिना प्रगती
HT Tण रोने पिलगिधार पोग दोप. एक
मरवा शारारिक मितपकिराणा पदेशाधने
Erin ( मायांग थने गगरणाराणा गा.
Ararilग एमगार योग रापांगी नागा
in (मीको गनायोग शनुमा गिगानना देता
नना यानि नोग.
मनायोगर्न कार्ग पशगगांग
मनगटाने थोकि माग
गाना छोहारियांग गुण
। म माता दीन मा. गगन
.
यजय देगनाणदेhिi
, जयादा दृश्यंत ॥५१॥

ये
.
বিনাণ-গুণগান
देसि-देशविरति समणा-मनःपर्यव शनि
दुदंस-अचा
नाणदंसतिगं-शानदर्शन
सहित
दर्शन
त्रिक
जयाइ-ममत्तादि
आइमदुगे आदि ये गुण- ते-वे
केपलदु-केवज्ञान तथा
टाणे मीसि-मित्र
केवल दर्शन
अजय-अविरति मीस-मिश्र गुणठाणे अंतदुगे-ऐल्लारे गुगठाणे
ঘঃশব স্থান
थने चक्षुथचक्षु ए वे दर्शन ए पांच
उपयोग पेहेसा वे (मिथ्याव श्रने सास्वादन) गुणगणे होय.
अने चोथे थविरति गुणवाणे तथा पांचमा देशविरति गुणगणे
मति, श्रुत थने अवधि ए) प्रण ज्ञान तथा (चटवा, अचा
प्रने श्रवधि ए)त्रण दर्शन एम व उपयोग होय.थने तेज प्रण
जान अनेत्रण अज्ञाननी साधे मिश्र थयेला एवा प्रण ज्ञान, तया
मज अप दर्शन एवं उ उपयोग मिश्र गुणवाणे साने. ते पूर्वोक्त
। उपयोगने मनःपर्यवज्ञान सहित फरीये पटसे चार ज्ञान
पने प्रण दर्शन एम सात उपयोग प्रमत्तादिक एटसे प्रमत्त
पाणाथी मामीने चारमा क्षीणमोद गुणगणा सुधीनां सात.
पाणे वर्तता जीव सर्व विरति होय तेथी एने मनःपर्ययझानः
ण साने माटे सात उपयोग होय. अने सयोगीतवाथयोगी
-ये वेखा गुणवाणे केवळझान भने केवसदर्शन ए ये उपयोग
यः शेष दश उपयोगी वाद्मस्थिक ते ते शहांन होय ॥५१
सम्मनपणे वेटला एक घोर अहीमा धर्मग्रंपनयी मापात साणे.
नासण नावे नाणं, बिनध गाहारगे नरस मिस्सn :
गिदिसु सासाणो, नेहाहि गयं सुथ मयंपि ॥५२॥

२६० तनामे के गुणगणे होय, (केमके श्रहींयां थाहारकना वे थने क्रियना वे एवं चार योग सब्धि प्रत्यये होय त्यां सब्धि प्रयुंजतां प्रमत्त होय ते माटे) ते तेरयोग मांदेथी एक श्राहा- रकमित्र ने बीजो वेक्रिय मिश्र (एये योगथप्रमत्त गुणवाणे न होय. जे नणी ए वे योग वेक्रिय तथा थाहारक थाम्नतां होय, तिहां तो सब्धि प्रयुजे तेवारे प्रमत्ते होय पण थप्रमते सब्धि, प्रयुंजवू नथी तेथी प्रमत्ते होय पण ए वे शरीरवतां चप्रमनपणुं थावे ते थपेक्षाये वैक्रिय अने थाहारक एवे योग फया. थने एना मिश्र न होय. माटे)ए ये विना प्रमतथी तर जे अप्रमत्त गुणगणुं तेने विपे थगिधार योग होय. एक फार्मण थने पीजो थोदारिक मिश्र ए हिक तथा पेदेसा थने हा ए ये मनयोग (सत्य मनोयोग बने थसत्यामृपा मनो- योग) तया एज ये वचनयोग एम सात योग सयोगी नामा नरम गुपनाणे होय (तीहां मनोयोग थनुत्तर विमानना देवता जेवार मंदेह प्रश्न पू तेयारे उत्तर थापया निमित्त तेजरपे म. नोप्रव्य परिषमा स्यां मनोयोगर्नु कार्य पथने यवनयोग धर्मदेशना कार्य काळे होय थने थोदारिक मित्र तथा कार्मप ए ये योग केवळ समुदयातमांद होय यने थोदारिफयोग मूस होय थयांगी गुणगाणे घपक्षता टळी ते माट एके योग न होप)॥५॥ सोद गुमटाकार योग वि. निधनाय दुदंसाश्म, दृगं अजय देसिनाण दसति ते मास मीस समणा, जया केयख दुभंत दुगे।५.१॥

तिभनाण-प्रणभज्ञान देसि-देशविरति समगा-मन-पर्यव मान दुदंस-पशु अचा थे नाणदेसतिगं-शानदर्शन सहित दर्शन त्रिक जयाइ-ममतादि आइमदगे-आदिये गुण- ते-ते केवलदु-केवान तथा ठाणे मीसि-मित्र केवल दर्शन अजय-अपिरति मीस-मिश्र गुणठाणे अंतदुगे-ऐलाये गुणाणे अर्थः त्रण अज्ञान थने चक्षु चतु ए पे दर्शन ए पांच उपयोग पेहेखा चे (मिथ्याव थने सास्वादन) गुणगणे होय. श्रने चोधे थविरति गुणगाणे तथा पांचमा देशविरति गुपवाणे (मति, श्रुत अने अवधि ए ) त्रण ज्ञान तथा (चष्टा, थचा अने अवधिए) प्रण दर्शन एमठ उपयोग होय.अने तेज प्रण ज्ञान अनेत्रण अज्ञाननी साथे मिश्र थयेला एकात्रण इंशन, तथा तेमज प्रण दर्शन एवं उ उपयोग मिश्र गुणवाणे खाने. ते पूर्वोक्त उपयोगने मनःपर्यवज्ञान सहित करीये एटले चार दान थने प्रण दर्शन एम सात उपयोग प्रमत्तादिक एटसे प्रमत्त गुणगणाथी मामीने पारमा क्षीणमोद गुणगणा सुधीनां सात, गुणगाणे वर्तता जीव सर्व विरति होय तेथी एने मनःपर्यवहान. पण लाने माटे सात उपयोग दोय. थने सयोगी तथा योगी ए ये व्हा गुणगणे केवळझान श्रने केयसदर्शन एवं उपयोग होय. शेप दश उपयोगी मास्थिक लेने शहांन दोय ॥ ५१ एवं मूष सम्मनपणे वेटला एक बार प्रहरीश्रां वर्मग्रंपेनधी मापात देसाई सासण जावे नाणं, विजय गादारगे उरस मिस्स। नगिदिसु सासाणा, नेदादि गयं सुथ मयंपि॥५२॥ ।

२६२ मान्या पण .. सोसणमावे-सावादन वाळाने नेहाहिग-अहीांग्रहण भावे (उरलपिरस औदारिकमिश्र नाणं-मति भुतज्ञानी नेगिदिन-एकैदिने विषे कर्यु नथी. विजनगाहारगे-क्रिय नयी कार्यु मुभमपंपि-म्पने रिपे अने आहारक शरिर । सासाजो-सास्वादनपणुं श्रर्थः-सास्वादन नावे (सास्वादन गुणगणे सास्वादन सम्पदृष्टिलणी) सिद्धांत मांहे मतिथनेश्रुतज्ञानी पण कह्या . एटछे विफदिमा उपनता जीव सास्वादनपणे ज्ञानी कया छे. तेज कर्मग्रंप ममिमापे मान नयी कार्य. सेना ए अभिमाय जे सास्वादन सम्यालयी पड़ता पोय, ते मिथ्यात्लने सन्मुख छ. माटे मलीन सम्पयस्य छे. संथी सो मान पग मलीन . मादे अज्ञानम कपुं. तया पनयणा भने भगवती प्रमुख भूमने ' पिपिपत्यपिकक्रिय शरीर अने माहारक शरीरले प्रथम प्रारंभकाखे परिप पद्गम भौतारिक साये मिश्रभार माटे भौदारिक साये पिरथी हे पोगर्ट नाम भीदारिक मिश्र श्री सिमांतने रिप फागुं. फर्मये अंगीकार न कसू, भने कर्मग्रंपने अभिपापे तो सपि जप परन सपना भगी पक्रिय पैक्रिप मिश्र को. तपा मारक भारक मित्र j. भोपारिक मिश्र न फयु तेनो देतु पयो के जे एक पसयिक सभिने पान करीने जे शरीर करपा मार से शरोरन पवार दोप, हे सरिने पटारा करीने जे शरीरने या मटिते गरीर पर सो पार ने मारकाटे ना परित्यागका पग किग भि भने परमिश्र तया सिद्धांतने विप एकप्रिय मांद सास्यादपणु गथी क. सास्वादनी जी एकप्रिय मोहन उपजे थने कर्मग्रंथ. बा एडिय मांद सास्वादनपाणु कडं एनो ऐतु फार गातो नपी जे मिति स्पष्ट ना कहा से कर्मचारी पार ९ नाव करवी जाण ॥ पण योस ग म माया के.पर पर्नु यहीं पदण नपी कयु ॥ ५ ॥ .

- प.साप-कपाप . पौद एमाणे या कहे . उसु सहा तेउ तिगं, इगि उसु सुका अजोगि अलेसा॥ पंधस्स मि अविर. कसाय जोग त्ति चन हेन ५३ - एमाणाने रिप गुश-रदेश अरिए-अविरविपणं सास | असोगि-भयोगि परमिग-तमो, पद्म भने | महेता-ऐश्या न होप (जोग-योग शाएग पंपरस-पांघराना चिचगेट-विधार बंप रगि-पा (पए) ने रिप'मिस-मिथ्यात्व देख करा. थर्षः-पसा व गुणगणाने विपेसर्व (4) सेश्यायो दोप, घने तेजो पन तथा शुक्स ए प्रण खेश्या एक प्रमत्त सातमे गुपचाणे होय, थने घाउमाघी तेरमा सुधीनां व गुणवाणे एक सुस्त सेट्याज दोप, तथा अयोगी गुणगणे योगना बनावे संड्या न होय कर्म बांधवानां मूस चार कारण (मिप्याव (९) थशिरति (३) कपाय (1) योग प्रण, इति ए चार मूल पंध हेतु कया ॥ ५३॥ थीथा प्रमाद, विकया वगेरेनो समावेश ए चार मध्ये यायचे. ए मूल घार बंध हेतुना उत्तर भेद सचारन को रे. अनिगदिन मणनिगहिया, निनिवेसिभ संसश्स मणाजोगा॥ पण मित्र वार अविर, मण करणाऽनि- अमु र जीवहीं ॥ ४ ॥ मभिरिभ-अभिहिन पणाभोगा- अनायोग करन-इदियो मणमिगरिय अनभिग्रहित पर्गाम-ए पाच मिध्याव अनिश्रम-निरचर्चावनी अभिनियमिभ-अभिनिश वार अगि बार अधिगति निभाहो- कापली. संसाम-मांसपिर मण-मननो अविर्गत . बनी थप - २६४ अर्थः-अनिमंहित,थननिग्रहित, अजिनिवेश, सांशयिक अने श्रनानोग ए पांच प्रकारे मिथ्यात्व, दवे वार अविरति कद्देठे एक मननी थविरति (मनने विपे हिंसादिकनो संकस्प करे.), तथा पांच इंजियोने पोतपोताना विषयथा निवर्नाववानो परिणाम न करे ते पांच प्रकारे पंचेंजियनी थविरति, तथा जे ठकाय जीवनो हीसाथ विरमवानो परिणाम नहीं ते कायनी थविरति, ए वार थविरति थथहींयां मृपावादादिक विरमण ते पण चार प्रकारनी अविरति मध्ये अंतर्नवते. कारण के ज्यां ईडियना विषयथा विरम्या त्यां मृपावादादिकथकी अवश्य विरम्या जाणया. ॥ ५४ ।। मभिरित-परीक्षा कर्या गिना पोताना पर्मनो कदामा मूके नही. मनमिति-सर पर्मने सरमा जाणे पण कोइने निगेप नाणे नहीं. मारिनी-पोतानो मत यापवा माटे गय अपं विपरित करे, संपिक-गिन पचनमा शंका परलो रहे, भने गुरु गोताना सामग्री मल्पा पना से नहीं, मनामोग-योग दर्शनने मनु मुंट जाणे नहीं जेम म्गं पामेलो मनुष्य को मोटी गम न मागे हनी पेंटे, परिप गोरो अनामोगिक मि. प्पामत. न सोनु कमाया पन, रि जोग इअन्त्तगजमगवणा ॥ श चन पनि गुणेम, चन नि दुग पयन बंधी ५५ दामोटामदानाना पाक्दिाग-पा, का. पति नाचा, मोटीमापार पण, ग रागि-हास पर.टागामार ममापि ओर मगरमा-गना २६५ अर्थः-नव नोकपाय तथा सोळ अनंतानुबंधीयादिक मळी पच्चीस कपाय, मनना चार, वचनना चार अने कायाना सात ए पंदर योग, ए प्रमाणे पांच मिध्यात्त्र, चार थपिरति, पच्चीस कषाय अने पंदर योग ए सत्तावन उत्तर नेद थया. ए सत्ता- बनने थाश्रय पण कहीए. हवे चौद गुणगणे मूल घंध हेतु कहे. एक, चार, पांच अनं त्रण एम तेर गुणगाणे अनुक्रमे चार प्रण वे थने एक प्रत्ययियोज बंध होय. ॥ ५५ ॥ १,मिथ्यात्व गुणठाणे-मिध्याव, अविरति, कपाय भने योग ए धार मूल घंध हेतु छे. २ सास्वादन, ३मिश्र, अविरति अने ५ देशविरति-आ पार गणठाणे मविरति, फपाय अने योग ए त्रिमत्यपिओ बंध होप अहीं मिथ्यात्व टन्यु माटे मिथ्यात्व बंध हेतु न होय. ६ ममत्त, ७ अममत्त, ८ अपूर्वकरण, ९ घादर संपगय अने १० नाम संपराय-मा पांच गुणठाणे एफ फपाय अने वीनो योग ए दिमत्पपिभो पंध नागरी कारण के अहीं अविरतिपणुं टल्युं छे. ११ उपानमोह, १२ क्षीणमोह अने १३ सपोगी-भा प्रण गुणगणे एक योग प्रत्यविभोरंथ होय कारण के अहीं फपाय टल्यो से, १ अयोगी गुणगणे ए चार महिलो एक पण हेतु नयी माटे हेतुने अमाथे पंच पण न होप. हवे एसोने वीर उत्तरफ प्रति आयोने मूल पंध हेतु रिचारे से. चन मिच मित्र अविरइ, पञ्चश्मा साय सोख पणतीस जोगविणु ति पञ्चश्आ, हारग जिण वजा सेसाओ॥५६॥ पउ-चार पचाभा-मन्वयिक पिय-मिथ्यात्व गुणठाणे मोल-मोळ भाग-भाहरपति पिरा-मिथ्यात्व प्रत्ययिकी पणतोमा-पानीम निप-मिन नाम শনিং-বিনি जोगविणु-योगविना ववर्भाने पपरामा-मयिकी नि प्रग यो। मेमार- माप-शाना घेदनीय २६४ अर्थः-अनिहित,अननिग्रहित, अनिनिवेश, सांशयिक घने थनानागं ए पांच प्रकारे मिथ्यात्व, दवे यार थविरति कहेठे एक मननी अविरति (मनने विष हिंसादिकनो संकरप करे), तथा पांच इंडियाने पोतपोताना विपयथा निवर्ताववानो परिणाम न करे ते पांच प्रकारे पंचेंजियनी थविरति, तथा जे उकाय जीवनो हीसाथी घिरमवानो परिणाम नहीं त उफायनी थविरति, ए वार थविरति यइ.थहींयां मृपावादादिक विरमण ते पण चार प्रकारनी थविरति मध्ये यंतनवेठे. कारण के.ज्यां इजिपना विषयथो विरम्या त्यां मृपावादादिकथकी अयश्य चिरम्या जाणया. ॥ ५४॥ मभिरित-परीक्षा कर्या स्निा पोताना धर्मनो कदाग्रह के नही. मानिरिक-मां पर्मने सरया भाणे पण कोइने विशेष नाणे नहीं. प्रविनिम-गोतानो मत यात्रा माटे गम अपिरित करे, मरिक-जिन वनमा का परती रहे, भने गुरुगीतायन सामग्री माया पास नहीं, भगमोग-योग दर्शनने भन्दु भंड माणे नहीं जे मूग पामेलो मनुष्यायो मोटी गगन नाणे नी पंटे. पदिय नो भनामोनिक मि. प्पात. न मोल कमाया पन, रि जोग इअनत्तरा उसगवाणा।। श चन पण ति गुणेम, चम नि दुग पथ बंधो ५५ समटरमापा-नादा नागिपा, ar समान , ना. पवनार पिंग- गांगपति भोग प्र१०६ मगनपा-गजपत्र पाय, 1 पानामा ទី១ पत्री, उगोत्रनी एक, अने अंतरायनी पांच ए पांसद प्रति तथा देशविरति महिथी जे सहसठ प्रकृतिनो बंप छे ते मांडेयी शातावेदनीय तथा निननाम ए पे मति विना शेप पांसह प्रकृति वारे मिथ्यास गुणटाणे बंधाय वारे मिथ्यात्र मत्ययिकी कवाय अने जेवारे तारवादनादिक चार गुणटाणालगे यंधाय सेवारे अविरति मत्ययिकी चाय ए रीते) पांसठ प्राति एक योग बंधहेतु रिना एक मिथ्याव बीजो अविरति अने श्रीजो कपाय ए प्रण बंध हेतु मत्ययिकी पपाप आहारफशरीर अने आहारकोंगोपांग ए मति निरवध योगरूप सराग संयम प्रत्यये करी बंधाय तथा निन नाम कर्मनो अरिहंतादिक भक्तिरूप सम्परर कर्तव्ये करी बंधाप, परंतु प्रशस्त रागे करी यंधाय तथी ए पण परमार्थे पाप त्यापकी होय एम सर्व प्रत्ययिकी कृति एफ.सोनेवीस पंध योग्य से, सेना मूल पंध हेतु विचार्या, जीव विजयजीएती ए प्रण मति धार हेतु महिला फोहर नबंधाय, मात्र एक सम्यक्त्व रज परी पंधाप एम सत्य ए. "सम्मच गुण निमनित्ययर संजमेण आहारं" इति पचनात् एवं पद गुणठाणे उपर पहेतु यह ऐ. पणपन्न पन्नतिअहि, अचत्त गुण चत्त सच उगवीसा सोलसदस नवनवस, त हेलपो नम अजोगमि 149 पणपन्न-पंचावन उघउद्गवीसा-उचीत, सत-सान पम-पचास घोत्रीस भने याचीस हेरगोन-तु नयी तिभ-सेतालीस सोलस-सोल अभोगीम-प्रमोगो एण हिमपत्त-तालीस दस-दस राण गुणपष-भोगणचालीस नव-नव अर्थः-मिथ्यात्व गुणगाणे पंचावन सास्वादने पचास मिभे तेतालीत, थविरनिय नाओम, दशविरनि गुणगाणे धोगए. चालीस, थने प्रमत्त, नया अपूर्वकरण ए प्रण गुणगाणे धनुः झमे होस, चोवीम श्रने वा मानिनि पादरे सोस, भूदम संपराये दश, उपशान मोहे ना, दीप माद नद धन सपांगी २६६ अर्थः-शातावेदनीय चारे बंध हेतुये करी बंधाय (एटले चार हेतु मांडेना गमे ते एक हेतुये करो शातावेदनीय बंधाय) सोळ प्रकृति मिथ्यावने जदय बंधाय. तथा पांत्रीस प्रकृति मिथ्यात्व तथा अधिरतिना (ए मांथी गमे ते एकना) उदये बंधाय; तथा थाहारकडिक यने जिननाम वर्जीने शेष पांसर प्रकृति योगविना त्रण बंध हेतु (मिथ्यात्व, अविरति अनेक- पाय एत्रण) प्रत्ययीकी बंधाय. ॥५६॥ अही योगा पदना यश पद साये प्रयमनां त्रण पट जोडीए एटटे एक घाता वेदनीय चार यहेतुये करो पंचाय, त्यां मिथ्यात गुणठाणे मिथ्यात्व मत्ययिकी वंधाय, (केमा वेदगेयनी प्रकृति मिथ्यावयी मांडो सयोगो गुणठाणा लगे धार छे. ते माटे मिथ्यात्वे मिथ्यात्व प्रत्यायिकी, सास्वादन, मित्र, अवि- रति अने देशविरति ए चार गुणाणां मुघो अविरति प्रत्ययिरी अने प्रपनादि पांच गुगठाणे पाय प्रत्ययिकी भने उपमत मोहादिक त्रण गुणाणे योग प्रत्य विकी पंधाय एम शातावदनीयना बंध मांहे चार हेतु माहेलो एक हेतु होय त्या लगे पण पंघाय ते माटे चनुमत्ययिको बंगाय.) अने। नरकत्रिक, एकैदिया. दिक चार जानि, यावरनाम, मुस्मनाम, अपर्याप्तनाम अने साधारण नाम ए स्थावर चतुष्फ इंडसंस्थान, आतपनाम, नपुंसमवेद, ऐबटुं संघयग, भने मिथ्यास मोहनीय ए सौर प्रकृति मिध्यावने उदये थाप माटे ) सोल मति मिप्पा मलपिकी कहेवाय. तया ( अनंतानुसंधीमा चार, मन्य संस्णन पार, मध्यासंघ- पग पार, कृपगनि, दोर्भाग्पत्रिक, निर्यचत्रिक, मनुष्यमिक, भीदारिकदिक, ग्रीवेद नीवर्गोत्र, योगदीपीक, उद्योतनामकर्म, ववकपभनागर मंथयण, अने अप्रत्या- रुपानी पार पाय पांगीम माति मिथ्यान्य गाणे मिथ्यात्व पायपिकी च्याप भने मिथ्याची मागण्ट गुणठाण प्रविनिमन्पगिकी मंशाप एम मिष्पा न्द नया अगिन एवं मादलो एफ. हेतु दोष ना पग यंधाप पातु एग्निा मारनये न राय ने पार प. पानाम प्रति पिध्याय तथा अमिति प्रत्यपि, की वाय, ना प्रासादिक भने निन नामा मनाने शेप (मानापरणीपनो पाय. दर्शनारगीपनी छ, प्रगाना पदनोपनी ए, मोहनीवनी पदर, नामनी, फपाप २६ए सजमीस कम्म अजए,अविर कम्मुरत मीस वी कसाए मुतु गुण चत्त देसे, व्वीस सादार पमत्ते ॥ ए. स-सहित | कम्म-कार्यपयोग गुणचत-भोगणचालीस दुमोस- पिय उरलमोस-भौदारिफमिथ' देसे-देशविरति गुणगणे क.म्र-कार्मणयोग पीकसाए-बीना पार छवीस-वीस সম-সৰিৰ যু | साहारदु-आहारकदिक अरिरह-अविरति मनु-गळीए पमत्ते-ममत गुणगणे थर्थः-(मिश्र गुणगणे तेतालीस हेतु कह्या तेने) एक बैंक्रियमिश्र, वीजो योदारिक मिश्र भने श्रीजो कार्मण ए प्रण योग सहित करीये तेवारे थविरति गुणगणे तालीस बंध हेतु मोघे होय, ( कारण के अपर्याप्तावस्थाये पण ए गुणाएं होय) (थने विशेपादेशे तो जघन्यथा मिश्रनी परे नव बंध देतु, थने उत्कृष्टा सोस होय अने बंध स्थानक मिश्रनी परे आव होय.) दवे देशविरति गुणगणे ए वेतालीसमांधी, एक सकायनी थविरति, कार्मण तथा बौदारिक मिश्रयोग, तथा वीजा अप्रत्याख्यानावरण चार कपाय, ए सात टाळीए तेबारे ओगणचालीस बंध हेतु होय. तथा प्रमत्त गुणठाणे वीस पंध हेतु होय ते एवी रीते के योगणचालीसने थाहारक तथा था. हारक मिश्र सहित करतां एकतासीस धया थने तेमांथो पंदर ठा करवा ते थागसी गाथाए कहेवाशे ॥ ५५ ॥ रिशेपादेशे अविरति गुणठाणे जपन्यथी मिथनी पेरे नव पहेतु होप भने स्टा सोल होय त्या पंध स्थानक मिश्रनीपेरे आठ शेय, भने देशरिरति गुण गणे रिपादेशे जघन्यपद, पांचकाय मध्ये एक कायनो पंथ, दिपनी परिरति मध्ये एकैदियनी भविरति, एक युगल. एकवेद, धार कपाय मध्ये एक कपापना । भेद अने अगिभार योग मध्ये एक योग एम भाठ संधानु लाभ.

पन्न-पचास न होय qd ए सात, बंध हेतु जाणवा. अयोगी गुणगाणे बंध हेतु नथी.५७।। पणपन्न मिचिहारग, जगूण सासाणि पन्न मिच विणा ॥ मीस उग कम्म अणविणु, तिचत्तमीसे अह उचत्ता ५० पणपत्र-पंचावन अण-अनंतानु बंधी मिच्छे-मिथ्याल गुणठाणे | मिच्छविणा-मिथ्यात्व विणु-विना तिचत्त-तेतालीस आहारगदुग्ण-आहारक मोसे-मित्र गुणठाणे द्विक हीन मीसदुग-मिश्रतिक अह-दवे सांसाणि-सास्वादने कम्म-कार्मणयोग छचत्ता-तालीस अर्थः-मिथ्यात्व गुणगणे थोघे सर्व जीवनी अपेक्षाये थाहारकहिके हिन पंचावन कर्मबंधना हेतु होय (केमके तेने विशिष्ट चारित्र नथी. तेथी थाहारक लब्धि न होय, माटे था- हारक शरीर थने थाहारकमिश्र ए वे योग न होय शेप मि. थ्यात्व पांच थविरति वार बने कपाय पच्चीस तथा योग तेर एम पंचावन कर्मबंधना हेतु पामीये ) थने वीजे सास्वादन गुणगणे पांच मिथ्यात्व न होय माटे पच्चास बंध हेतु थोघे होय, थने मिश्रदिक (थीदारिक मिश्र थने वैक्रिय मित्र) तथा त्रीजो कार्मण, ए त्रण योग थने अनंतानुवंधिया चार कपाय ए सात कर्मबंध विना शेप तेंतासीत बंध हेतु थोधे मिय गुणगणे होय. हवे चोये गुणगणे तासीस बंध हेतु होय (ते थागसी गायामां कदेशे) ॥ ५ ॥ बहीमा मिय्यार गुगटाणे विशेषादेश एक जीपने एक समये नपायपदे दश पोनु हाप अने 31 मा कर्मयं ना हेतु होप भने साधादन गुण. गर्ग नबन्पपदे दा भने शमना यंयोतु पापोये भने मित्र गुणठाणे भयपाद ना अनेरा माठ र पामो मेनो विस्तार ( भागासहित) मीनमी मागाला मारग नाका माग पोशामा गोर यां.

कपाय २६ए समोस कम्म अजए,अविर कम्मुरख मीस वी कसाए मुत्तु गुण चत्त देसे, व्वीस साहार 5 पमत्ते ॥ ५ ॥ स-सहित कम्म-कार्ययोग गुणचन-ओगणचालीस सुमोस- मिय उरलमोस-मौदारिकमिथ' देसे-देशविरति गुणगणे कम्म-कर्मयोग पीकसाए-बीना धार ज्वीस-वीस अभए-मविरति गुरु साहारदु-आहारकदिक अपिए-मविरति मनु-टाळीए पमत्ते-प्रमत्त गुणठाणे अर्थः-( मिश्र गुणगणे तेतालीस हेतु कह्या तेने) एक क्रियमिश्र, घीजो श्रोदारिक मिन थने त्रीजो कार्मण ए ऋण पोग सहित करीपे तेवारे अविरति गुणगणे तालीस बंध हेतु थोघे होय, ( कारण के थपर्याप्तावस्थाये पण ए गुणगणुं होय)(थने विशेषादेश तो जघन्यथी मिश्रनी परे नव वंध हेतु, श्रने उत्कृष्ट सोल दोय श्रने बंध स्थानक मिश्रनी परे थाव होय.) वे देशविरति गुणवाणे ए वेतालीसमाधी, एक प्रसकायनी थविरति, कार्मण तथा श्रोदारिक मिश्रयोग, तथा पीजा अप्रत्याख्यानावरण चार कपाय, ए सात टाळीए तेवारे थोगणवासीस बंध देतु होय. तथा प्रमत्त गुपटाणे वीस पंध हेतु होय ते एवी रीते के भोगणचासोसने थाहारक तथा था. हारक मिश्र सहित करतां एकताखीस थया थने तेमांधी पंदर उठा करवा ते थागती गाथाए कयाशे ॥ ५ ॥ विशंपादेश अविन गुणठाण जयन्यथी मिश्रनी परे नव बंधहेतु रोप अने उस्कृष्टा सोल होप त्या पंध स्थान मिनीपेरे भाठ होय, अने देशविरति गुण- गणे रिशंपादेश जघन्यपद, पाचकाय मध्ये एक फायनो यंध, दिपनी भविरनि पाये सेंद्रियनी अविरति, एक युगल, एकवंद, चार कपाय मध्ये एक पापना भेद अने अगिभार योग मध्ये एक योग एम भाठ धातु लाभ, २६७ ए सात, बंध हेतु जाणवा. अयोगी गुणगाणे बंध हेतु नथी.५७।। पणपन्न मिबिहारग, उगूण सासाणि पन्न मिळविणा ॥ मीस उग कम्म अणविणु, तिचत्तमीसे अद उचत्ता ५० पणपन्न-पंचावन पन-पचास अण-अनंतानु बंधी मिच्छे-मिथ्याल गुणठाणे मिच्छविणा-मिथ्याल विणु-विना आहारगदुग्ण-आहारक तिचत्त-तेतालीस न होय मोसे-मित्र गुणठाणे द्विक हीन | मीसदुग-मिश्रतिक अह-हवे सामाणि-सास्वादने कम्म-कार्मणयोग छचचा-छेतालीस अर्थः-मिथ्यात्व गुणगणे थोघे सर्व जीवनी अपेक्षाये थाहारकहिके दिन पंचावन कर्मबंधना हेतु होय (केमके तेने विशिष्ट चारित्र नथी. तेथी थाहारक लब्धि न होय, माटे या- हारक शरीर अने थाहारकमिन ए चे योग न होय शेप मि- ध्यान पांच यविरति वार अने कपाय पच्चीस तथा योग तेर एम पंचावन कर्मबंधना हेतु पामीये)थने वीजे सास्वादन गुणगणे पांच मिथ्यात्व न होय माटे पञ्चास बंध हेतु यो होय, थने मिश्रद्धिक (श्रीदारिक मिश्र थने वैक्रिय मित्र) तथा त्रीजो कार्मण, ए त्रण योग थने अनंतानुवंधिया चार कपाय ए सात कर्मबंध विना शेष तेंतालीस बंध हेतु श्रोधे मिय गुणगणे होय. दवे चौथे गुणगणे वेतालीस बंध हेतु होय ( ते श्रागसी गायामां कहेगे ) ॥ ५ ॥ पहीमा मिथ्याप गुगठाणे विशेषादेश एक जीवने एक समय अपम्पपई दश बंधानु राप भने उस पार करना होप भने सास्वादन गण. गणे नव्या दम भने उ.मा मना बन पामोपे अने मित्र गुणा अभयपदे ना प्रने या मार बहेर पामोये मेनो विस्तार ( मांगा सहित) भीपमी मागावाम मारग ना मग पोवाणि भोईवी.

1. २७१ अव हास सोल वायरि,सुहुमे दस वेअ संजलण तिविणा खोणु वसंति असोजा, सजोगि पुषुत्त सग जोगा- ॥६॥ मास-स्पादिक छ । पेम-वेद प्रग अलोभा-लोभ न होय सोल-सोल संजलन-संवसन प्रण सजोगि-सयोगी एणठाणे पापरि-पादर संपरा विणा-बिना पुबुच-पूर्वोक्त एहमे-एस्म संपराये खीणुवसनि-भीग मोह सगमोगा-सातयोग दस-दा तया उपांत मोहे थर्थः-नवमा चादर संपराये हास्यादिक व नोकपाय न होय तेवारे यावीसमांधी व काढतां, सात कपाय श्रने नवयोग एवं सोल पंधदेतु होय, तथा सूक्ष्मसंपराय नवमा गुणवाणे वेद प्रण तथा संज्वलन क्रोध, मान थने माया ए व विना दश (एक सोन अने नव योग) बंधहेतु होय. अने क्षीण- मोद्द तथा उपशांतमोद सोन्नविना नव योग ज बंधहेतु होय तथा तेरमा सयोगी गुणगणे पूर्व कथा ते प्रमाणे पे मनना ये वचनना अने त्रण कायाना एवं सात बंधहेतु सा- मान्ये दोय, ॥ ६॥ नवमा गुणठाणे विशेषादेशे नपत्यपदे एक जीवने, संग्वलनो एक कपाय तथा एक योग ए ये बंध रेतुना स्थानक होय अने उत्कृष्ट एक वेद सहित प्रण दोप, अने मूक्ष्म संपराये जघन्यपदे एक नीरने एक समये ये ये बंध हेतु होय अने उत्कृष्टे पण एक संचलन लोभ अने एक योग ए ये यंय हेतुन होय. अ. गीपारमे नया वाग्मे गुणठाणे विशेषादेश एक जीवने एक समये जपन्यपदे एक योगन बंध म्यानक होय अने रमे गुणठाणे पण एक योगन बंध हेतु स्थानक होय. ए. मत्तावन बहेनु ये करी आठ कर्मना बंध होय में वार पछी से बांध्या फनो विपाक काटे उदय होय, न उनीग्णा करणे करी उदयावली माह पदे. शीये नेने उदीग्णोद्रय कही अने ने मर्व कर्म सनाये होग, ने भणी चौद गुण- गणे ज्या जेटला वाटिकना म्यान मभवं कहे .

इमार-अगियार कपाय १०० अविरगार तिकसा, यवङ अपमतिमीसगरदिया चवीस अपुधे पुण, उचीस अविनधि आदारा ॥६॥ अविरह-भविरति अपमति-अममत्त गु० पुण-वली मीसद्ग-मिथदिक दुवीस-बावीस तिकसाय-पीना चार रहिमा-रहित भरिजन्धि आहारा-क्रिय चचीस-चोवीस अने आहारक एथे मज-वरा अपुल्चे-अपूर्षे योग न होय. अर्थः-(पांचजिय, हं मन तथा पांच यावर ए) अगीथार थविरति, तथा त्रीजा प्रत्याख्यानावरणीय चार फषाप, ए पंदर बंधदेतु वर्जया तेबारे व्वीस बंधहेतु प्रमत्त गुणगणे होय, थप्रमत्त गुणगणे थाहारक मिश्र थने येमिय- मिन ए ये योग न होय. ( कारण के श्राहारक तथा क्रिय शरीर फरया मांगतां तेनी पर्याप्तिये थपर्याप्ताने ए योग होय, रपांतो सब्धि प्रयुजया जणी प्रमत्त होय.) तेयो ( कपाय तेर थने योग थगिथार एम) चोयीस घंधदेतु होय, तथा थाउमा धपूर्वकरण गुणगाणे येक्रिय थने थाहारक ए ये योग न होय स्पार (सम्यान चार कपाय, वेद प्रण, हास्यादिक उ, तपा पोग नव माओ) पास थंध हेतु दोय. ॥६॥ मन मागितादो पर माय एकर, गंगमनना पार पाप र दालो भया बीनी पक काप, सम्पातिक गर म एक गुगमन फरक परगोग मतपय पर मोरने एक गम मा भने रमटा मारक बाबीद पा ने प्रारक विष योग मार, बना किसी रात HTTARinपनी पर स, पुगर, भने भगिमा योग एवम १०३ अर्थः-मिध्यावधी मामीने दशमा सूदमसंपराय सगेछ कर्मनो उदय तथा था। फर्मनी सत्तापण दोय, थने एक है हनीय धिना क्षीपमोहनामा घारमे गुणगणे सात फर्मनो उa तथा सात कर्मनी सत्ता होय. ( कारण के त्यां वीतराग ठे माटे मोहनीपनो उदय न होप तथा सत्तापण न होय.) वेल्लां ये गुणगणे नाम, थायु, गोत्र अने वेदनी ए चार कर्मन उदय तथा चार कर्मनी सत्ता पण दोय थने थगीधारमा = पशांतमोदे मोदनीयनो उदय नथी तेयो मोहनीयपिना सा कर्मनो उदय श्रने थाउ कर्मनो सत्ता होय कारण के थर्ट मोदनीय उपशम्युं ते तेथी उदय नथो पण सत्तामा . ॥६॥ एपे रेक गुणठाणे उदीरणा स्थान कहे . उति पमत्तंता, सगळ मीसा वेध आउविणा ॥ ग अपमत्ताइ त, उ पंच सुहुमो पणु वसंतो॥६॥ पारंति-उदीरणा वेभ वेदनीपार्म অল লিয়া पपर्वता-ममत गुणठाणा | भाउ-भायु कर्म पंच-सयालेष लगी रिणा-विना मुमो-गस्य संपरा सगह-सात, पाठ पज-पांच मीसह-मिथे पाठ भपयचाइनभो-अश्मचारिसंतो-उपयोरे अर्थः-( मिन विना मिध्यावधी मांगीने ) प्रमत्त गुण गणा लगे पांच गुणगणे थाउ फर्मनी उदीरणा होय, मां ठेही थारसीये थायुकर्मनो उदीरणा होय. तेगारे रोप मान कर्मनी उदीरणा दाय. मिश्र गुणगणे काम न करे नेवी था. युनी अंत्यावलिका पण त्यां न होय पी स्पा भाउ पर्मनी ज उदीरक होय. धने थप्रमत्त, धपूर्वकरण धर्म धनिति एग- .. गया पर्यंत १७२ अपमत्तंता सत्त, हम्मीस अपुत्व वायरा सत्त ॥ बंध ठस्सुहुमोए, ग मुवरिमाऽ बंधगा जोगी ॥६॥ अपमत्ता-अप्रमत गुण- | यापरा-चादर गुगठाणे | एग-एफनो सत्त-सातनी उपरिमा-उपला गुणठाणे सच-सात माउनो पंथ घर-चांचे अपंधग-प्रबंधक मोस-मिश्र गुणठाणे छ-छनोग्य अजोगी-अपोगी गुण. अपुल-अपूर्व गुणठाणे । मुहुमो-मूक्ष्मसंपरापे अर्थः-मिश्रविना मिथ्यात्वथी मामी अप्रमत्त गुणवाणाना थंतमगे (थायुःकर्म बांधतेवारे) थाउ कर्मनो बंध होय, अने थायुन यांधे तेवारे सात कर्मनो बंध होय, त्रोj मिश्र, थाउमुं थपूर्वकरण थने नवमुं यादरसंपराय ए प्रण गुणगणे (थायु. पंध न होप) तेयी सात कर्मनो बंध होय, थने दशमा सूक्ष्म संपराये एक थायु थने योजें मोदनीय ए ये कर्म थतिविशुद्ध थापयसायनणी न यंधाय तेथी व कर्म यांधे, थने तेथी उपसा उपशांतमाद, दीपमाद थने सयोगी ए प्रण गुणगणे एक वंदनीय कर्म यांचे तथा थयोगी गुणगणे कोई कर्म न पधि त माट थबंधक होय. ॥ १२ ॥ दसएगटाणे उदय अन मनाना स्थानाको. थामुदुमं संनुदए, अवि मोहविणु सत्त खीणति ।। चन चरिम पुगे अन, संते वसंति संतुदए ॥६३॥ बाना-मान र मां-पापा ग:गनिमीग मी महार-मनानमा रहर | रगतामा बारी-बारी गिम गाना -Trai कोरियन यि . सान मन-मान पराग मी श्वर्थः-मिध्यावधीमामीने दशमा सूदमसंपराय सगेथावे कर्मनो उदय तथा आठे फर्मनी सत्तापण होय, थने एक मो. हनीय विना क्षीणमोहनामा बारमे गुणगणे सात कर्मनो उदय तथा सात कर्मनी सत्ता होय. ( कारण के त्यां वीतराग ते माटे मोहनीयनो उदय न होय तथा सत्तापण न होय.) थने ठेक्षां ये गुणगणे नाम, थायु. गोत्र थने वेदनी ए चार कर्मनी उदय तथा चार कर्मनी सत्ता पण होय श्रने यगीधारमा उ. पशांतमोहे मोहनीयनो उदय नथी तेयो मोदनीयपिना सात कर्मनो उदय श्रने थाव कर्मनी सना होय कारण के थदी मोहनीय उपशम्युं ठे तेथी उदय नथो पण सत्तामा दे.॥३॥ हये दरेक गुणठाणे उदीरणा स्थानफ फहे. नरंति पमत्ता, सगळ मीसह वेअ आजविणा॥ ग अपमत्ताइ तजे, व पंच सुहुमो पणु वसंतो ॥६॥ पारंति-उदीरणा भ-वेदनीयकर्म प्रण एमाणे पमरता-मन गुणठाणा आउ-भायु कर्म पंच-उपाध लगी विणा-विना सामो-गस्य संपरा सगह-सात, आठ पण-पाप मीसह-मिथे आठ अपसमाइनभो-अभमणादि उपतो-अपशको थर्थः-(मिश्र विना मिथ्यात्वषी मांगीने ) प्रमत्त गुप गणा सगे पांच गुणगणे थात कर्मनी उदीरणा होय, तमा ठेही थावलीये थायुकर्मन उदीरणा दोय तेशरंप सान कर्मनी उदीरणा दाय. मिश्र गुणगाणे कास न करे नेयी था. युनी थंयावलिका पण त्या न होय तेषी त्यां धाउ पर्मना. ज उदीरक दोय. अने थप्रमत्त, अपूर्वकरण धने मिति -- ठाणा पर्यंत १७५ अपमत्तंता सत्त, छम्मीस अपुष्व वायरा सत्त । बंध उस्सुहुमोए, ग मुवरिमाऽ बंधगा जोगी ॥६॥ अपमत्ता-अप्रमत गुण- | पायरा-चादर गुणठाणे । एग-एकनो सत्त-सातनो उपरिमा-उपला गुणाणे सत्तह-सात आठनोबंध बंधइ-चांचे अबंधग-अबंधक मीस-मिश्र गुणठाणे स-छनोवंध अजोगी-अयोगी गुण. अपुन्व-अपूर्व गुणठाणे | मुहुमो-मूहमसंपराये अर्थः-मिश्रविना मिथ्यात्वथी मांगी अप्रमत्त गुणगाणाना थतलगे (आयुःकर्म वांधेतेवारे) आठ कर्मनो बंध होय, अने थायुन वांधे तेवारे सात कर्मनो बंध होय, त्रो मित्र, थाउमुं अपूर्वकरण थने नवमुं वादरसंपराय ए त्रण गुणगणे (थायु- बंध न होय) तेथी सात कर्मनो बंध होय, अने दशमा सूदम. संपराये एक थायु थने बाजु मोहनीय ए ये कर्म थतिविशुद्ध अध्यवसायनणी न बंधाय तेथी व कर्म वांधे, अने तेथी उपसा उपशांतमोद, कोणमोद थने सयोगी ए त्रण गुणगणे एक वेदनीय कर्म यांधे तथा थयोगी गुणगणे कोई कर्म न बांधे ते माटे थबंधक होय. ॥ १२ ॥ दरेक गुणाणे उदप भने सचाना स्थानक कहेगे. आसुहुमं संतुदए, अवि मोहविणु सत्त खीणंति ॥ चन चरिम उगे अमन, संते उपसंति संतुदए ॥६॥ मामाम-मूहम मंपराप अउसंत-पाउ तपासा. सीगंनिशीग मोहे संदर-सना नया दप संवृदए-माता तथा दप पारि-माटो चरिम दंगे-मागुउपमंति-माल मोरे मारिगु-मानी रिना । पहाणे सत्त-सान गुगटागा सगी चा-चार १७३ अर्थः-मिथ्यात्वधी मामीने दशमा सूदमसंपराय खगेथावे कर्मनो उदय तथा श्रावे कर्मनी सत्तापण होय, थने एक मो. इनीय विना क्षीणमोहनामा पारमे गुणगणे सात कर्मनो उदय तथा सात कर्मनी सत्ता होय. (कारण के त्यां वीतरागते ते माटे मोदनीयनो उदय न होय तथा सत्तापण न होय.) थने ठेवां ये गुणगणे नाम, थायु, गोत्र थने वेदनीए चार कर्मनी उदय तथा चार कर्मनी सत्ता पण दोय थने थगीधारमा उ. पशांतमोहे मोदनीयनो उदय नथी तेयो मोहनीयविना सान कर्मनो उदय थने थार कर्मनी सना होय कारण के थदी मोहनीय उपशम्युं ते तेथी उदय नथो पण सनामां ते. एवं दरेक गुणटाणे उदीरणा स्थान पर उरंति पमत्ता, सगळ मीसा वेध आजविणा ग अपमत्ताइ तर्ज, व पंच सुहुमो पणु वसंतो॥६॥ चारति-उदीरणा घेम-पेदनीयकर्म प्रण एमाले पमचंता-ममत गुणटाणा | माउ-मायु फर्म एच-बाप लगी रिणा-रिना शापो-गरम संपराएं पण-बाप सगढ-सात, माठ भीमा-मिथे भाउ अपमसाहतभी-अपचादि संनो- थर्थ:-(मिथ विना मिघ्यावपी मांगीने ) प्रमर गुप वाणा सगे पांच गुणगणे थाउ फर्मनी उदारता दोप, मां वेशी श्रावसीये श्रायुकर्मनी उदीरणा होय मेरे शेर मान कर्मनी उदीरणा होय. मिश्र गुणवाणे कास न करे नवी या युनी थंयावलिका पप स्यां न दाय नी या शापना ज उदीरक होय. धने अप्रमत्त, अपूर्वपरए ने शनिवृति २७६ अयोगी गुणगणाना जीव अनंतगुणा , तेथी मिथ्याटिजीव अनंतगुणा . ए रोते चार गुणगणे असंख्यातगुणा अने वे गुणगणे अनंतगुणा कहीये. ॥ ६६ ॥ जबसम खय मीसोदय, परिणामा दु नव गरशवीसा॥ तिअनेअ सन्नि वाइअ, सम्मं चरणं पढम नावे॥६॥ उपसम-औपचामिक परिणामा-पारिणामिक सम्म तम्यक्त औपथमिक क्षय-सायिक दुनवारइगवीसा। वे नव चरण-चारित्र औपत्रमिक तिप्रमेय मीस-मिय एकवीस अने प्रण मे पंढमभावे-प्रथम औपथमिक उदप-भादपिक प्सभिवाइस-सभिपात भावना ये मैद · थर्थः-थोपशमिक, क्षायिक, मिश्र (कायोपशमिक), श्रीदायिक तथा पारिणामिक नाव एना अनुक्रमे सादि धना- दिये, नव, थढार एकवीस थने त्रण नेद जाणवा. थने ते. मांना येत्रण चार नाव एका मळे तेने सन्निपातिक नाव जाणवो. तेमांपेहेसानावना सम्यस्य थने चारित्र ए ये लेद. १ मोहनीयना उपशमयो प्रगटयो एपो जे जीव समाय तेनाम भीपथमिक मार. २ सयाजे कर्मना तप यकी एटले मूल उरोदयी थयो एत्रो जे भीर स्यभार सायिक. , तया जे रदय आव्यां करमनी शप को प्रने जे उदय नपी भाग्य सेना अनुदये ग्मने अवेय तना अंतराष्ट्र प्रगटपो एदो से नीर समार ने বাবিন ও বিষণাৰ ধী । कमना उपयी योजेनीवनी पप त भोदायिक मार नागमो. ५ भादपि समार पंगे परिजमत पारिगानिसमार. ६माता पार मार पाम मंटने गमिसाविक मार.

s औपशामिक भावना घे भेद-(१) औपथमिक सम्पत्ति एटले अनानुरंपी चार तथा दर्शन मोहनीय प्रण ए सात मतिनो रस तथा प्रदेश नहोप ते औपमिक कहीये अने सेयी मगटोने तत्वरचि तेने औपरमिक सम्परत कर तथा शेप पचीस मोह प्रकृतिनो उपशम यवायी जे स्पिरता का पारित गट थाय ते चीजें औपउमिक चारित्र ।। वीए केवल जुअलं, सम्मं दाणा सहि पण चरणं ॥ तश्ए सेसुवजेगा, पण ही सम्म विर दुगं ॥६॥ पीए वीजा क्षायिकना परणं-चारित्रगुण पण धी-पांच सरिभ केवलजुभलं-केवलपुगल तइए-धीना क्षायोपश- सम्म-शापोपचरिक स. शान तथा दर्शन মিশাধ सम्म-सम्परत्व सेवभोगा-चाकीनादर | विदुर्ग-विरतिदिक- दाणाद-दानादि रदिएण-पांच लब्धि उपयोग परिरनि, सर्व रिती) अर्थः-हवे चीजा दायिक नावना केवल युगल (२), (ए चे उपयोग) क्षायक सम्यक्त्व (१), पांच सन्धि (4), तथा दा. पिक चारित्र (२) ए नय नेद ने तथा प्रीजा दायोपदामिक भावना अढार नेद कहे. (केवलयुगस बिना) शेप दश उप- योग (१०), तथा दानादिक पांच सब्धि (ए) (वास्थनी), दा. योपशमिक सम्यक्त्व (१),थने विरतिधिक (२), ए थढारपणा अन्नाण मसिद्धत्ता, संजम खेसा कसाय गश्येया॥ मि तुरिए नया, ऽनयत्न जिअत्त परिणामे ॥६॥ अभाण-अमान जागनि पार अतिदता-असिवन्न भाषण असमम-अपम मि-पियार भिमा-मोर लेता-टेस्या (?) म्पि-धोयाना दग्विार-माग्विालि भरा-मम्प एमागSurur) २७६ योगी गुणवाणाना जी अनंतगुणा , तेथी मिप्याटिजीर थनंतगुणा . ए रोते चार गुणगणे थसंख्यातगुणा अने बे गुणगणे अनंतगुणा कहीये. ॥ ६६ ॥ उपसम खय मीसोदय, परिणामा दु नव गार गवीसा॥ तिअनेथ सन्नि वाइन, सम्मं चरणं पढम नावे॥६॥ पर रसिक परिणामा-पारिणामिक सम्म सम्पमा मोरपिक राविक दुनामावीमा। ये ना भरण-पारित भीपिक शिममेम ग-विध गर-मादवित এম্যিাস-খন্নিান थः-यापशमिफ, दायिक, मिश्र (दायोपशमिक), शोपिक नया पारिणामिक नाय एना अनुक्रमे सादिघना. निये, नत्र, थदार, एकवीस यने प्रण लेद जाणया. थने ते. मांना पत्रा पार नाय एकला मळ तने सनिपातिक नार आयो. नेमां पदसा नायना सम्पररव यने चारित्रए पनेर. १लागी प्रगटयोलोजीरपमानाम भागामा. माना भरी पर मीमा अहाग एकीम अने अगम पाममावे-मपम भोपिक मारना भर , टाटा मोलमों घरे नी माना स्ट मरे प्रांटीना अंग गोरे IIT Mरा विसार साव धीमातिमi. मा : Tfilam. REE.भि.पा.

म्यक्त्व १७७ औमिक भावना पे भेद-(१) औपरमिक सम्परत्व एटले अनंतानुरंथी पार तथा दर्शन मोहनीय प्रण ए सान प्रकृतिको रस तथा प्रदेश नशेय ते भोपापिक कहीये अने यी मगदीजे सत्वरुचि तेने औपचारिक सम्यक्त्व काहीए सपाप पपीस मोर मानिनो उपशम यवायी जे स्थिरता रूप पारिप मगट पाय हे पोर्नु भोपसमिक पारिप ।। वीए केवल जुअसं, सम्म दाणा सहि पण चरणं ॥ तए सेसुवजेगा, पण सधी सम्म विर दुगं॥६॥ पीए-मीमा तापिरना धरण-चारित्रगुण पणलब्धी-पांच लधि फेवलनुभलं-केवलयुगल तइए-पीना लायोपरा सम्म-सायोपथमिक स. मान तथा दर्शन मिकमावे सम-सम्परत्व सेवभोगा-चाकीना दय पिरदुर्ग-विरविद्रिकाद- दाणाद-दानादि सतिपण-पांच लपि । उपयोग । शरिरति, सर्व विरती) थर्थः दवे घीजा दायिक भावना केवल युगल (२), (ए घे उपयोग) क्षायक सम्यक्त्व (१), पांच सब्धि (५), तथा क्षा- यिक चारित्र (1) ए नय द वे तथा श्रीजा क्षायोपशामिक भावना अढार नेद कहवे. (केवलयुगल विना) शेष दश उप- योग (१०), तथा दानादिक पांच सब्धि (५) (वास्थनी), क्षा- योपशमिक सम्यक्त्व (१), थने विरतिष्ठिक (५), ए श्रढार ॥६॥ अन्नाण मसिदत्ता, संजम खेसा कसाय गश्वेश्रा॥ मिवे तुरिए नया, जमत्त जिअत्त परिणामे ॥६ए। अमाणे-अहान गर-निाचार) { परा-सम्प असिद्धत्ता-प्रसिद्धल वा-वेद(त्रण। अभयच-अभम्पत्व असनम- मिन-बिध्याय निभम-जीरत लसा-टेस्या (सर) रिए-चोथाना १ परिणामे-पारिवारिक '-असयम कसाय-पाय (चार) २७६ थपोगो गुणगणाना जी अनंतगुणा , तेधी मिप्याहि जी धनंतगुणावे. एरोते चार गुणगणे असंन्यातगुणा अने में गुगाये अनंतगुणा कहोपे. ।। ६६ ।। उपसम सय मीसोदय, परिणामा दु नव गर गयीसा ।। निसन चाइल, सम्म चरणं पढम नाय॥६॥ परिगामा-पारिगामिक सम्म नापासमोरपित HT-nir सीमा नाना-पारित भीमति भिम fr নিঃসন্নিা चप-गामिक दायिक, मिश्र (दापोपशनिक), मसिना पारिणामिक नाय एना अनुक्रमे गानिशाना , ना, या ने गानेद जाणवा. धो. मटा ना ना ना मन गहिनि नार मामा नारनामम्म अने गाग्नि एयरटे. , Tamil नानापरमार • मरीना एती भने गा पापभामा भी मारना भर 14 रानी मातin prin: initi Forat xxEETIT 3:11. Atme, 1 म्यक्त्व २७७ औपशामिक भावना पे भेद-(१) भोपामिक सम्परत एटले अनंतानुबंधी पार सपा दर्शन मोहनीय प्रण ए सात मतिनो रस तथा प्रदेश नहोय ते भोपामिक कहीये भने तेथी मगटीने नवरुचि तेने औपशमिक सम्पपल कहीए सया गेप पचीस मोह मतिनो उपशम थवाथी जे स्थिरता रूप पारिप मगंट पाप ते पोर्नु औपशमिक पारित्र ।। वीए केवल जुअलं, सम्मं दाणाइ सहि पण चरणं ॥ तइए सेसुबजेगा, पण सही सम्म विर दुगं ॥दना पीए-बीना क्षायिकना घरणं-चारित्रगुण पणलधी-पांच सन्धि केवलजमलं केवलयुगल । तइए-बीना बायोपश- सम्म-मायोपशामिक स. ज्ञान तया दर्शन मिकभावे सम्म-सम्यक्त्व दाणाइ-दानादि सेवभोगा-चाकीनादेश विरहगुग-विरतिदिकाद- रदिपण-पांच लधि उपयोग शपिरति, सर्व रिती) धर्थः-दवे धीजा क्षायिक नावना केवल युगक्ष (२), (प पे उपयोग) दायक सम्यक्त्व (१), पांच सब्धि (५), तथा क्षा- यिक चारिन (१) ए नय नेद वे तथा त्रीमा दायोपशमिक भावना अढार नेद कहे. (केवसयुगल विना) शेप दश उप- योग (१०), तथा दानादिक पांच सब्धि (५) (उमस्थनी), क्षा- योपशमिक सम्यक्त्व (१), थने विरतिहिक (२), ए बढार ॥६॥ अन्नाण मसिद्धत्ता, संजम खेसा कसाय गइवे॥ मिचे तुरिए जवा, उजवत्त जिअत्त परिणामे ॥६णा अमाणं-प्रदान मानानि चार) भसिदत्ता-असिदल वे भा-वेद(वण) असंनम-असंयम मिन्छ-मिथ्याव निभस-नीरख लसा-हेस्या (छ) इरिए-चोयाना परिणामे-याग्णिारिक कसाय-पाय (चार) . भना-पम्प अभवत्त-अभन्यत्व - .

अर्थः-अज्ञान, श्रसिद्धवं, असंयम, व य, चारगति, प्रणवेद, तथा मिथ्यात्व एमए औदायिक नावना ; तथा नव्य, अजव्य जेद पारिणामिक भावना ठे॥ ६ ॥ मिथ्यात्वीन कान ते अज्ञान, जीवने संसारी पर्याय त्यांख्यानाचरणी चार कपायने उदये असंपमपणु. जे पृक्ति जागा योग्य दिवसभाच ते भन्यपधुंए. जावाने अयोग्य जे पर्याय ते अभव्यत्वनाम अनादि अनंत- द्रयमाण तथा भावमाण पारण स्वमार जे जीवपर्याय अनंत सिद छे. परंतु फोइनो कों नयी. चल चल गईसुमीसग, परिणामुदएहि र जवसम जुएहि वा चन, केवलि परिणामुन धव-चार भेद चउगास-वारगतिभाश्री खदरादि-सायकमाये मीसग-मिग्रमा उपसपनुपाहि-उपशमस- पनि परिणावरहि-पारिणा- मस्तियुक्ता मिस तथा औदपिकमाये । वा-अथवा ये ए भोपशमादिक पांच भावना विक संयोग दरभं देशभंग तथा पासपोगे पांचभंग भने पंच संपोगे एक भांगा पाप से नीचे प्रमाणे. दिफ संपोगीमा दशमंग. कि संयोगीमा दश भंग.' पत्र , भोपामिर, सायक १ औपषिक. सायक, १ ऑपशपिक, मित्र पिथ } परमु-धारने । .

. १७॥ ५ मिम पारिजापित भोदपिक मने पारि ६, भोपि. स्म, पिम, भेदयिक नासिक रा, पारिवापिस , ५ उपप, निम, पारि-४ श्रीपशापित, पिन, मिश्र, भादपिक णापित मौदापिसभमे पारित १ लिपारिजातिक ६ उपशम, भाषिक, पा जामिक १० भारिपारिवारिक रिणापिक ५ सायर, विभ, मोदन समामो मांगी 'शायिक,पिथ, भोषिक पिक भने पारिणामिक गिरनो मतो मारो, शापित, पिथ, पारि. के पांच मापेथी एक भए नर भागा प . गापित पोषो भंग पार गतिना ९ शापित, भादपिक, उपशम समति दिजी. परिणामिक धने शेप भने पांचपो १. मिश्र, भादरिक, पा. भांगोधारगतिना सायफ रिणामिक सपकिनारधिनीरने होय. हे मध्ये नरपो मांगो। पाकीना गून्य फपीने हो भने दामो भागो पार गरिना भी बने पते विना शेप माउ भग गय. पदमपो पंप संयोगीभो ( भोपराम, शापिक, पिथ, मौदपिक, अने परिणायिक ) सामिपातिक भार ते, उपशम येगीए पना मनुष्यने नरमे, परमे, भने भगीमारम, एप्रग एणगणे होप. उपरना उप्वीमोथी जे प्रण मांगा पार गनिना जोर माथी प्रा. देना ५३-१२ पाप ते भा गाथामा फही देवा रे, थः-(तमांत्रिक संयोगीयो दशमो नंग मिश्र योदयि. कथने पारिणमिक) नना चार गतिधाश्री चार नेद घाय. (मनुष्य गनिमां मनुष्य ) मिश्रनावे पारिपामिक जाये थने भादयिक नाव हाय. ( ने एक नंग, वीज रीते वीजी त्रण गतियाश्री प्रण. एम चार जंग थया) तथा तेज चार गतिना . ១៥ अर्थः-अज्ञान, असिद्धत्वं, असंयम, लेझ्या, चार कंषा- य, चारगति, प्रणवेद, तथा मिथ्यात्व एम एकवीस नेद चोथा औदयिक नावना के तथा जव्य, अन्नव्य अने जीवत्व एत्रण नेद पारिणामिक नावना ठे॥ ६ए । मिथ्यात्वी, ज्ञान ते अज्ञान, जीवने संसारी पर्यायपणुं ते असिदत्व, अमल त्यांख्यानावरणी चार कपायने उदये असंयमपणुं. में मृक्ति जावा योग्य बीवस्वभाव ते भव्यपणुं ए सहन सिद्ध छे. मुक्ति जापाने अयोग्य जे पर्याय ते अभव्यखनाम अनादि अनंत पारिणामिकमाव अने द्रव्यमाण तया भावमाण धारण स्वभाव जे जीवपर्याय ते जीवत्व, ए पण अनादि अनंत सिद्ध छे. परंतु कोइनो को नयी. चन चन गईसुमीसग, परिणामुदएहि च सुखइएहिं॥ उवसम जुए हि वा चन, केवखि परिणामुदय खइए ॥७॥ घउ-चार भेद चर-चार गतिनानीवने चंउगइस-चारगतिभाश्री सदएहि-शायफमावे केवलि-केवलिने मीसग-मिश्रमावे उसपनुपहि: उपराम स-परिणामुदवखइए-पारि- परिणामदरहि-पारिणा- मफिनयुक्त , णामिक, मौदपिक अने मिरु तया औदपिकभावे | वा-अथवा सायिकमाये ये ए औपशमादिक पांच मावना द्विक संपोगें दसमग अने विक संपोगे देशभंग तथा धनुःसंयोगे पांचभंग भने पंच संयोगे एकभंग मलीने उनीस भांगा याप ते नीचे प्रमाणे. दिक संयोगीमा दशग. त्रिक संयोगीमादश भंग. चतुःसंयोगो माघमंग. १ भोपामिक, सापक १ भोपामिक. सायक, १ ओपथमिक, मिश्र, सा. १ औपरमिक, मित्र मिश्र यफ भने मौदपिक ३ भोपामिक आदपिक । २ श्रीपपिफ, सायक, २ औपरमिक, पिथ, सा. ५ बीपरमिक, पारिणा औदापित पिक भने पारिणामित ३ उपसपिक, सापक, । ३ भोपथमिक, सापिक, चमु-चारने - " १७ए ५ सायफ, मिभ पारिणामिक भोदयिक भने पारि ६ क्षायक, औदपिक ४ उपसम, मिथ, अदयिका गामिक ७ सायक, पारिणामिक ५ उपग्रम, मिश्र, पारि-४ औपथमिक, मिश्र, ८ मिश्र, श्रीदपिक णामिक औदायिक भने पारि ९ मिथ, पारिणामिक ६ उपशम, भौदायिक, पा जामिक १० भौयिक,पारिणापिक रिणामिक ५ बायक, मिश्र, औद. ते मध्ये सातमो मांगो ७ तापिक,मित्र,भादपिक यिक भने पारिणामिक सिदनो बसतो जाणवो, ८ वापिक, मिश्र, पारि• वे पांच मापेयी एक शेप नव भांगा शून्य ऐ. गामिक पोयो भंग पार गनिना ९ क्षायिक, औदपिक, उपम सहित टिभी. परिणामिक घने र भने पांचमो । १. मिथ, मौदपिक, पा. भौगोचार गतिना क्षापर रिणामिक सपकिन रष्टिनीरने प. । सेमध्ये नवमी भांगो पाकीना गन्प । फेवलीने होय भने दामो भांगो पार गविना जी- बने होप वे विना शेष । पाठ भग शून्य रो. छब्बीसमो पंच संयोगीभो ( भोपशम, लापिक, मिथ, मौदपिक, भने पारिणामिक) सामिपातिक भाव से, उपशम भेगोर पना मनुष्यने नरमे, दामे, अने अगीभारमे, ए प्रग एणणे होय. उपरना उध्वीसमाधी जे प्रण भांगा पार गनिना जीव माथी सारे. सेना ५४३-१२ याप ते भा गाथामां की देखा, अर्थः-(तेमांत्रिक संयोगीथो दशमो नंग मिश्रोदपि. कथने पारिणमिक) नना चार गतिधाश्री चार नेद पाप. (मनुप्य गतिमां मनुष्य ) मिश्रन्नावे पारिणामिक नाथने शोदपिक नावे होय. ( ने एक नंग, नेवीज रोते पीजी पर गतिधाश्री प्रण. एम चार नंग घया ) नया नेज चार गतिना ( - ឧទថ្មី अर्थः-अज्ञान, असिद्धरवें, असंयम, क्लेश्या, चार कंपा. य, चारगति, प्रणवेद, तथा मिथ्यात्व एम एकवीस नेद चोथा थोदयिक नावना है तथा नव्य, अन्नव्य श्रने जीवत्व एत्रण नेद पारिणामिक नावना ठे ॥ ६ए । मिभ्यालीज्ञान ते अज्ञान, जीवने संसारी पर्यायपणुं ते असिद्धरव, मा. साख्यानावरणी चार कपायने उदये असंयमपणुं. जे शक्ति जावा योग्य जीवस्वभाव ते भव्यपणे ए सहन सिद्ध . मुक्ति भाराने अयोग्य जे पाप ते अमव्यसनाप अनादि अनंत पारिणीमिकमाव जने प्रत्यमाण नया भावमाण पारण समाव जे जीवपर्याप से जीवन, ए पग अनादि मनन सिद . परंतु कोइनो कर्यो नयी. चन चन गईसुमीसग, परिणामुदएहि चनसुखइएहिं ।। उसमजुएहि वा चन, केवलि परिणामुदय खरए ॥७॥ पर-पार भेद घउमु-धारने पर-पार गनिनानीरने पगा-चारगतिमाथी सापहि-शायफभारे परियलिने पीमग-मिश्रमाचे समपनुपादि-उपप स. परिणामहापाए-पारि- এদিশাবিলা- मकिनपुन | गामिक, मौदपिक अने मिया बादपिकमात्र वा-प्रथया साविकमारे हए औरणमादिक पांच मारना कि मंयोग दार्मा भने वि.संपोगे सग नपा पायोगे पामभंग भने पंच संयोग एकमंग मने एपीग मांगा पाप नीने ममान. किमयोगीमा दसर्भग. मि.गंयोगीपादा भंग. ! पागंयोगो मापंपग. , मंति, भायक १ भोपिक. साया, १ भोगकिमिश्र, . १ भारत, निय मित्र पा भने भोपित ३ सिपाहत मोरमपित माया, . भीमा,वि.m. vari. पोरर दिन पारिभावित ति, RE, ३ मानिmkिs .

. , २ मनुप्प उपशम श्रेणी करे, तेने उपशम श्रेणीने विषे (नवमे दशमे अने अगीआरमे गुणगणे एक जीवने विपे एक समये) पांच नावनो मेळाप होय', ए पंदर नेद सानिपातिकमा उता होय. शेष वीशनांगा असनावी एटखे शून्य , कारण के ते नांगा कोइ जीव पामता नथी. ॥ ३१ ॥ १ अहाँ उपशमभावे चारित्र होय, सायक भावे सम्पक्स होय, विश्रमावे शानदर्शनादिक होप, औदायिकभावे मनुष्यगत्यादिक होप, अने पारिणामिक भावे जीवत्वादिक होय. इवे ए औपशमादिक पांचभाव माठ कर्पने विप शिवरीने देखा. मोदोक्समो मीसो, चन घाइसु अ कम्मसु असेसा ॥ धम्मा पारिणामित्र, नावे खंधा उदइ एवि ॥२॥ मोदोषसमो-मोहनीयनो | अहमम्ममू-सर्व माठे क. | पारिणामिप्रमाणे पारित उपशम होय मैने विपे णाविकभाये मीसो-सायोपशम असेसा-शेप रद्या खंया-बंध चल्याइस-चार याति कने विष धम्मा:-धर्मास्तिकायादि । उदएरि-प्रौदपिकभारे श्रर्थः-मोदनीय कर्मनो उपशम होय तथा दयोपशम चार घातीयां कर्मनो दोय, शेपरह्या जे प्रण लावते थावे कर्म ने विप होय, तथा थजीवनी श्रपेक्षाये (धर्मास्तिकापादि पांच अव्य पारिणामिक नावे , तेमां (थनंतप्रदेशी) पुद्गस स्कंध ते औदायिक नावे पण होय ॥ १२ ॥ मोहनीयकर्मने विष पाच भाव होप अने मानावणी दर्शनारी भने प्र. तराप ए प्रण कर्मने विष पर श्रापमा विना चार भाव प. ना नाम, बानो श्रीदपि भने गोत्र, आयु अने वेदनीय सार वर्मन विप एक शापित, श्रीनो पारिणामिक ए प्रण भाव पापी ៥០ (सन्नि पंडि) जीवने (पूर्वोक्त प्रण नायनी साथै चोयो) दाधिक नाव मेजवतां चतुःसंयोगीयो नांगो पाय (तेना चार गतियात्री चार नांगा) तेने उपशम सम्यक्त्व सहित करीए त्यारे पंच संयोगीयो नांगो घाय. (सेना चार गतिधाश्री पार मांगा एम पार नंग या) तथा केलीने एक पारिणामिक, रमिकने दायिक ए त्रिकसंयोगीयो एक नांगो दोप दरगया ॥30॥ भाभी कि पोगो, गोगोमा पने पो. मा. प. दो मामा का का भेदकर गी भाभी (Afri-a, प्रधान भने वन भि. (२) पारिगामिकमारे-मो. TRIT (२) पोशिमा-(गति भाभी होग), पा. TT () mगामा-मागि. (५) भीमाभार-मो. पाने मिसा, नराण पणा जोगु वराम गटीए॥ ग्रपना गनिवाइन, नंग्रा यो अनिविणा ।।११॥ PATHI- त्रिपिग-11 ग1ि FAT-ग Min मेगा- मगरम-मंना यमिदनाजपने हित मंगाया गदिमा गाल. मिनिनांगो नाम) हर र गमगा ii, intml ने दिन बना 24taiपाग रनर गा गया, mare) - - ឬ धर्षः-पेदेखो धनवस्थित प्यायो घीजो शसाकाप्यासो, श्रीजो प्रतिशिखाकाप्यालो थने घोषो मदाशिसाकाप्यालो, एं चार प्यालानां नाम कयां. ते थनवस्थितप्यालो एक हजार जोजन उमो पेदिकासदित वेदिकाना थंत सुधी सोग सुंधी सरस करीनरीए ॥ १६ ॥ तो दीवु ददिसुशकिक सरिसवं खिविध निहि पढमा पढमवतदंतचित्र, पुण नरिए तम्मि तह खोणे॥॥ को-प्पालाने लिविभ-यूकता सतंचिप-सेना अंत मी दोपदरिय-दीपसमुद्रने रिपे निविभ-निठे(खाली याय) पुणभरिए-वही पुग भरीये निश्व विध-एक एक परमे-पहेलाना तम्मि-से प्यालाने पण सरिसब-सरसर । पटसंव-पेहलानी पेठे तहखीणे-तेमजमूकतोजा अर्थः ते प्यासाने (को देवदानब) उपामो तेमांथी एक एक जीप समुज्ने विष एक एक सरसवनो वाणो मुकतो जे छीप समुमने विषे ते प्यासो खाली थाय तेवको एटले वचमांनाहीप थने समुह ते मध्ये समा जाय, तेवो बीजो प्यालो फपीने पेदेखानी पेठे फरीने भरीए, तेने पण तेमज (एकेक सरसय एकेक दीप समु) मुकतां खाली थाय. तेवारे शुं करीए ते कदे . ॥ ७ ॥ खिप्पा सिखाग पल्ले, गुसरिसवो इय सिखाग खिवणे। पुरमो वीन अ तन, पुर्वपिव तम्मि दरिए ॥ ७ ॥ खिए-नाग्वीय मिलाग-लाका प्यालो | तभी-ते वार पडी, सिलागपल्ले-शीलाक पाला विवण-नाग्वीये पुर्वपित्र-पूर्वनी पेरे में विपे पूण्गो-फरोने नम्मि-लेने पगुसरिसी-एम सरसर पोभोभ-पीनो उरिए-लाए इप-ए मकारे प्रमाण . २७४ लदु संखिऊ उचिअ, अपरं मझिमंतु जा गुरुवे ।। जंबूदीव पमाणय, चनपल्ल परुवणाइ इमं ॥ ७ ॥ लहुराखिन-जघन्य सं- मन्जिमंतु-मध्यमसंख्यातु ख्यातु जागुरुभ-यावत् उत्कृष्टया उपल्ल-चारपालानी दुचिम-थी मुधी परुवणाइइम-परुपणाये अभोपरं-ए.उपरांत जंयुदीवपमाणय-जंयुद्वीप करीने 'थर्थ:-जघन्य संख्यातु वेने कहीये अने घेथी उपरांत या- वत् उत्कृष्ट संख्यातामा एक रूप हीन होय त्यां सुधी मध्यम संख्यातु कहीए, ते उत्कृष्ट संख्यातु जंबुदीप प्रमाण चार पा. लानी प्ररुपणाये करीने जाणवू ते कद्देठे ॥ ५ ॥ . जंबुद्वीप जेवो एक लाख जोजन लांबो पोहोळो. तया फरनो परिघ तो त्रण लाख सोल हजार बसेंने सत्तावीस जोजन त्रण कोश एकसो अहावीस धनुष्य तेर आंगल एक जव, एक जू, एक लोख, अने एक वालाग्र, सात त्रसरेणुं पांच परमाणु एटलो, अने एक हजार जोजन उंडो तया आठ जोजननी जगति (कोट) अने ते उपर ये गाउनी वैदिका एटले एक हजार साडामाठ जोमन रंडो अने एक लाख जोगन बच्चयो लांगे पोहोळो एवो एक प्यालो कल्पीए ते पालो सरसबना दाणावडे टोच मुधी एवी रीते भरीए के तेमा एक दाणो पण उपर ठरे नहीं, ते प्यालाने उपाडी तेमांथी अकेको सरसवनो दाणो एक एक द्वीप स. मुदने विपे मूकना जइए, पछो जे द्वीपे अपवा समुदे ते प्पालो खाली थाय ए. बडो, एटले जेटला सरसपना दाणा तेटला द्वीप तथा समुद्र माहे समाइ नाय तेपी एक पीनी प्यालो फल्लीए तेनुं नाम अनवस्थित पालो कहोर ॥ पल्लाणवहिअ सिला, ग पनि सिखागा महासिलागरका। जोयण सहसो गाढा, सवेइ अंता स सिह नरिआ ७६ पल्लागरहिम-प्रनय स्थित महासिलागरख्या-महा मवेदना-वेदिकाना अंत प्याली বিলাস্কা महिन मिनाग-शलाकाप्यानो जापगमामा-दनाग्नोगन ममिा-गोग गरी নিপা-নিশিখাদ্ধা নারী- भरिमा भर्ग २०५ थर्घः-पेदेखो धनवस्थित प्यालो पोजो शसाकाप्यालो, श्रीजो प्रतिशिलाकाप्यासो थने घोघो मदाशिक्षाकाप्यालो, एं चार प्यासानां नाम कहां. ते श्रनवस्थितप्यासो एक हजार जोजन उंगो घेदिकासहित वेदिकाना थंत सुधी सीग सुंधी सरस करीनरीए ॥ ६ ॥ तो दीवु दहिसुइकि, कसरिसवं खिविध निम्लेि पढम।। पढमंवतदंतचित्र, पुण नरिए तम्मि तह खोणे ॥७॥ वो-तेप्पालाने विविध-मूकता सरतचिम-सेनाअंत मुभी दीपरिस-दीपसमुदने विष नितिभ-निठे(खाली याय) निश्च पुणभरिए-वळी पग भरीये इफिक-एक एक परमे-पहेलाना सम्मि-प्यालाने पण सरिसवं-सरसव | पटव-पहेलानी पेठे सहीणे-तेमज मूफतो नाप थर्थः-ते प्यासाने (कोई देवदानव) उपामी तेमांधी एक एक द्वीप समुप्रने विपे एक एक सरसवनो वाणो मुकता जे छोप समुभने विपे ते प्यालो खाली थाय तेवको एटले घचमांनाहीप थने समुज ते मध्ये समाइ जाय, तेवो चीजो प्यासो कल्पीने पेदेसानी पेठे फरीने नरीए, तेने पण तेमज (एकेक सरसव एकेक द्वीप समुझे) मुकतां खाली थाय. तेवारे शुं करीए ते कहे . ॥ ७ ॥ खिप्पा सिखाग पढे, गुसरिसवोश्य सिताग खिवणेणं॥ पुणो बीन अ तन, पुवंपिव तम्मि नरिए ॥ ॥ लिप्पा-नाग्यीय सिलाग-शलाका पालो | तमो-ते पार पछी सिलागपल्ले-शीला पाला पिवणेण-नास्वीये पुर्वपित्र-पूर्वनी पेरे ने विषे पुण्यो-फगेने तम्मि-तेने पगुसरिसवो-एग सम्मर पोभीभ-पीजो उठरिए-लइए " प-ए मकारे ममाण (8 बहु संखि अच्चिअ, अपरं मजिमंतु जा गुरुवे ।। जंबूदीय पमाणय, चनपल्ल परुवणाइ इमं ॥५॥ लगुसंखिन-जघन्य सं- मिनिमंनु-मध्यमसंख्यातु ख्या जागुरुमं यावद् उत्कृष्टा । चउपल्ल-चारपालानी दुपिभ-येयी . मुपी । परुवणाइइम-मरुपणापे अमोरं-ए.उपरांत जंयुदीपमाणय-जंयुद्धीप थर्थ:-जघन्य संख्यातु ने कहीये थने वेथी उपरांत या पत् उत्कृष्ट संख्यातामा एक रूप हीन होय त्यां सुधी मध्यम संख्यातु कहीए, ते उत्कृष्ट संख्यातु जंबुद्रीप प्रमाण चार पा. सानी प्रापणाये करीने जाणवू ते कद्देठे ॥ ५ ॥ नंदी जो एक लास जोजन लांगे पोहोलो, तया फरतो परिप तो प्रग मार मोट हमार पौने समाधीस जोनन प्रण को एकसो अहानी पनुप्प और भगिन एक ना, एक ज़, एक लोस, अने एक पालान, सात प्रसरेणु पाग परमाणु पटतो, भने एक नार नोनन अंडो तया भाठ जोनननी नगति (फोट) पने में सरपं गाउनी वैदिका पदणे एक इनार माहाभाउ गोमन सी भने पर माग भोमन वर्गयों लग पोतोको पलो एक पालो फल्लीर ते पालो मरमाना दागावर टोप गुपों एवी रोम भरीर के नेमा एक दागो पग पर हरे नहीं, प्यायाने उपाठी नेमाशी भोको गरमपनो दागों पर एक टीस हने कि मला नाए, पोज दो भाका गमुदे ने पाली गाणी गाप ए. बरी पर ला मामाना दागा नेटमा र नया समुद्र महिगमा माप तो पानी कन्नीर ननुं नाम प्रमाणित पानी कोर ॥ पवाणपहियमिता, ग पनि सिखागा महासितागका।। जोपण सहमी गाढा, मय यंता ममिह नरिया ७६ दाप-नागिन पिटागण! RI ARRI-ना दिप fa मिरातार art-RAMAR गिर मार्ग R-सारा 1-17 4rathi थर्थः-पेदेखो अनवस्थित प्यालो चीजो शसाकाप्यालो, जो प्रतिशिलाकाप्यालो थने चोघो महा शिक्षाकाप्यायो, ए र प्यासानां नाम कह्या. ते धनवस्थितप्यालो एक हजार जिन उमो वेदिकासहित वेदिकाना थंत मुधी सोग मुधी रसवे करीनरीए ॥ ६ ॥ दीवु दहिसु शकि,क सरिसवं खिविध निहिपढम।। ढमंवतदंतचित्र, पुण नरिए तम्मि तद खोणे ॥७॥ -ते प्पालाने खिविभ-मकता तचिम-नागणे परिम-दीपसमुद्रने रिपे नितिभ-निटे(पाली पाय) पुणरिए-बी पग भरी निध के.क-एक एक परमे-पहेलाना मंम्मि-सेप्पालाने पर रिसर्प-सरसर परमव-पहेलानी पं महावीण-दमन मालोमा थर्थः ते प्यासाने (कोश देवदानव) उपाम तेमांची क एक छीप समुज्ने विपे एक एक सरसवनो दापो मुफता छोप समुभने विपे ते प्यासो ग्पाली पाय सेयगो एटसे वमांनाहीप धने समुड ते मध्ये समाइ जाय, तेयो पीजो सो कम्पीने पेदेखानी पेठे फरीने जरीए, तेने पर तेमज एकेक सरसव एकेक दीप समुजे) मुफतां ग्यासी पाय. वारे फरीए ते कदे . ॥ १ ॥ वप्पसिसाग पल्ले, गुसरिसवोश्य सिखान खियणेणं लो बी तन, पुवंपिय तम्मि उरिए ॥ १७ ॥ पा-नाग्गीये मिमागागा पारो नमी-नारी गगपी-सीमा पारा गिरण नापी शि-पनी से मेषि यो-पगने सरिमरी एगमरमर पाभोग-कीमा पए-गए २७६ थर्थः-(तेवारे तेनी संख्या निमित्त) शलाक नामा वीजा प्यासाने विपे एक सरसव नांखीए, ए प्रकारे बसी बीजो अनवस्थित प्यालो कल्पीये ते खाली थयेथी घीजो सरसव ससाका पक्ष्यने विपे मुकीये, एम अनवस्थित प्याला जरी जरीने खाली करतां अने एक एक सरसत्र शलाकापल्यने विपे मुकतां ते शलाकापल्य शिखा पर्यंत नराय त्यारे शलाका पल्यने उपामी जे हिपसमुझे लेखा श्रनवस्थित प्याखानो अंत थाव्यो ठे. त्यांधी शलाकापल्यने विपेथी एक एक सरसय नांखता जर्बु, ते शलाकापल्य खाली पाय त्यारे शुं करीए ते कहे . ॥1 अहीं अनवस्थित प्यालाना गणत्री माटे जे शलाकापश्यने विप सरसव मुरुवामां आव्यो. ते यावतमां कोई आचार्यनो मत एवो छे के पीनो सरसव लेवो अने कोइकनो मत एवो छ के ते अनवस्थित प्यालामांयोग टेवो. त्यांतल केवली जाणे तया कोइ एम पूछे के पहेला अनवस्थित प्यालो भरायो ते वखते एफ सरसब शलाकापल्यने विप केम नास्युं नहीं? अने वीनायी नांखया मांडयुं! तेनुं फारण के-अनवस्थित एटले जेनुं प्रमाण नयी. ते. परंतु पहेला प्यालानुं ममाण तो जंयुद्वीप जेटला विस्तारवाळु वताव्युं छे. माटे तेने अवस्थित कहीए. अने वीजा प्यालाने अनस्थित कहीए, माटे पहेलो प्यालो व ने वीनान ... ग्रहण कीधुं छे. खीणे सिलागि तश्ए, एवं पढमेदि वीअयं जरसु ॥ तेहिअ तश्शं तेहिअ, तुरिअंजा किर फुमा चनण खिणेसिलाग-लाका प्या, वीमयं-बीजो शलाका जाकिर-जे निश्चे 'लो खाली यये कुडा-स्फुर(शिखा सहित) ताए-त्रीना तहितइग्रं-तेवढे श्रीनो चउरो-चार एवं-ए रोते तेहिरिभ-तेवडे चोयो थर्थः एम करतां ते शलाका प्यालो गलो थाय त्यारे श्रीजा प्रतिशक्षाका पक्ष्यने विपे एक सरसव मुकीए. एवी रीते भरमु-मरीय (បទ (थनवस्थित प्यालाए करी शलाका पल्य जरीए थने ते)श. साकाये करीने त्रीजो प्रतिशलाका पक्ष्य जरीए, ते त्रीजा प्रति शलाकाये करी चोथो महाशाखाका पख्य जरीए, ते चौथो प्यालो जर्या पठी, घीजो प्यालो खाली धयेलो ते ते पूर्वनी रीते जरीए, ते पठी वळी पूर्वनी रीते थनवस्थित प्यासाय करी पोजीश. साका:प्यालो जरीए, ते पठी ते प्रणे प्याला जे द्वीप समुन्ना श्रनवस्थित प्यासे भरा रखा ठे, तेहीप समुह पर्यंत थनव. स्थित प्यालो कल्पीने सरसये करीने जरीए. एटले ए नि चारे प्याला फुमा पटखे शिखा सहित संपूर्ण नराया. ॥ ॥ पढमति पल्खु-क्षरिया, दीवुददी पक्ष चन सरिस वाय।। सद्योकि एस रासी, रूवृणो परम संखिळां ॥ ॥ पढ़पतिपल्लू-पेहेला प्रण पलपर-चार प्पालाना रासीमापो प्याले फरी सरिसवाय-परवानी रसगो-एकरूप मोबए उदरिभा-उदर्या सवोविएसरासो-सई ए परममंपिम्ज गरमपार दिदी-दीप तथा समुद्र थर्थः-पदेखा प्रण प्याले फरी उद्धर्या जे छोप समु तेना सरसव एटसे प्रथमयी सरसव जे होप समुझे मुक्या तेना सरसवनी संख्या थने जे चार प्यासा नया रसा, से मांदेसा सरसवनी संख्या एकठी करीये, ए सर्वनी राशी (एकग) करतों जेटसा सरसव धाय तेमांघी एकरुप एटसे एक सरसर उठने करीये तेवारे उत्कृष्ट संख्यातु घाय. ॥ ७० ॥ से उत्कृष्ट संग्ग्यातापांधी एकरप मोईनरी न्योपो परतो पगरी मंगला पुधी मध्यम मंगपात पदोर भने पेनी माया ने भवन्य मंगपाएमा साना प्रण भेद पदा. .

... २७६ .. अर्थः-(तेवारे तेनी संख्या निमित्त) शलाक नामा वीजा प्याखाने विपे एक सरसव नांखीए, ए प्रकारे वली बीजो अनवस्थित प्यालो कल्पीये ते खाली थयेथी बीजो सरसव सलाका पट्यने विषे मुकीये, एम श्रनवस्थित प्याला नरी जरीने खासी करतां श्रने एक एक सरसव शलाकापल्यने विपे मुकता ते शलाकापल्प शिखा पर्यंत नराय त्यारे शलाका पक्ष्यने उपामी जे द्विपसमुझे ठेवा अनवस्थित प्यालानो अंत थाव्यो ठे त्यांधी शलाकापल्यने विपेथी एक एक सरसव नांखता जवू, तें शलाकापक्ष्य खाली थाय त्यारे शुं करीए ते कहे . Gn अहीं अनवस्थित पालाना गणत्री माटे जे शलाकापल्यने विपे सरसव मुकवामा आव्यो. ते पायतमा कोइ आचार्यनो मत एवो छे के बीजो सरसव ठेवो भने कोइकनो मत एवो छे के ते अनवस्थित प्यालामांथोन लेवो. त्यांतल फेवली जाणे तया कोइ एम पूछे के पेहेला अनवस्थित प्यालो भरायो ते वखते एक सरसव शलाकापल्पने विषे केम नांख्युं नहीं? अने वीनाथी नाखवा मांडयुं? तेनुं फारण के-भनवस्थित एटले जेर्नु प्रमाण नथी. ते, परंतु पेहेला प्याला- ममाण तो जंयुद्वीप जेटला विस्तारवाळ वताव्युं छे. माटे तेने अवस्थित कहीए. भने घीना पालाने अनवस्थित कहीए, माटे पेहेलो प्यालो वर्जीने बीमानं ग्रहण फीधुं छे. खीणे सिलागि तइए, एवं पढमेदि वोअयं नरसु ॥ तेहिअ तश्यं तेहिअ, तुरिअंजा किर 'फुमा चन। खिणेसिलाग-चालाकाप्या पीभयं-बीमो शलाका जाकिर जे निथे लो खाली पये भरमु-भरीपे फुटा-स्फुट(शिसा सहित) हाए-धीना सेहिमताभ-तेवढे श्रीनो चउरो-चार एवं-ए रोते तेरिमारिभं-तेबडे चोयो थर्थः-एम करता ते शसाका प्यालो गलो थाय त्यारे नीजा प्रतिशक्षाफा पढ़पने रिपे एक सरसय मुकीए. एवीरीते पर्यंत थनव- (35 (थनवस्थित प्यालाए करी शलाका पत्य जरीए थने ते). साकाये करीने त्रीजो प्रतिशलाका पल्य जरीए, ते श्रीजा प्रति शलाफाये करी चोथो महाशलाका पल्य नरीय, ते धोधो प्यासी जर्या पनी, घीजो प्यासो खासी थयेलो ते ते पूर्वनी रीते नरीप, ते पठी पळी पूर्वनी रीते थनवस्थित प्यालार्य करी पीजी श. खाका:प्यालोरीए, ते पग ते प्रये प्याला जे वीर समुना शेनवस्थित प्यासे जरा रखा ठे, ते डीप समुद्र स्थित प्यालो कल्पीने सरसये करीने जरीए, एट ए निधे चारे प्याला फुमा एट शिखा सहित संपूर्ण जगया. Me !! पढमति पल्लु क्षरित्रा, दीवुददी पल्ल चन सरिस पाया। सद्योवि एस रासी, रूवृणो परम संखिकं ॥७० ॥ কৰিব-বশ সখ पडप-धार पाटाना रासीमायो प्पाले फरी गरिसवापारयांनी पगो-पार मोतीर उरिमा-उदर्गा सानोविएससोई पापिE-TTART दिवली-दीप तथा समुद थर्थः-पदसा प्रण प्यासे करी उद्धर्या जीप गमुड तेना सरसय एटले प्रथमथी सरसय जे कोप समुझे सपा नेता सरसयनी संग्या थने जे चार प्याला जा रहा , महिला सरसयनी संपन्या एकती फरीये, ए सर्वनी राती (एकाना)परनों जेटमा सरस घाय तेमांधी एकरूप एटस एय, सरस उठी फरीपे तेयारे उत्कृष्ट संन्यातु पाय. | 0 | मेंकाRTAIII ए भारा' महरा एपी मा भने HERE ARREY. गाना भए ចុច रूव जुअंतु परित्ता, संखं बहु अस्सरासि अनासे॥ जुत्ता संखिजां खहु, आवलिया समय परिमाणं ॥२॥ रुवं-(एक) रूप अस्स-एने युक्त असंख्यातु चाय जुभंतु-युक्त करता रासियभासे-राशि अभ्या आवलिया-मावलिना परित्ता-प्रत्येक सिंख-असंख्यातु स करता समय-समयनुं लहु-जयन्य जुचासंखिज्जलहु-जयन्य / परिमाणं-प्रमाण अर्थः-ए उत्कृष्ट संख्यातामां एकरूप मेळवतां जघन्य प्रत्येक असंख्यातु थाय,ए जघन्य प्रत्येकयसंख्यातानो राशि- ल्यास करतां जघन्य युक्त असंख्यातु थाय तेटला एक था. लिना समयनुं प्रमाण थाय. ते मांहेथी एकरूप हीन करीये तेवारे उकृष्ट प्रत्येक असंख्यातु थाय, तथा जघन्य प्रत्येक थसंख्याताथी मामीने एकरूपे हीन उत्कृष्ट प्रत्येक असंख्याता लगे सर्व मध्यम प्रत्येक असंख्याता जाणवा. ॥ १ ॥ अहीराची अभ्यास एटले कोइ संख्याने तेनी ते संख्याए तेटलीवार गुणीए एटखे जेम पांचने पांचवार पांचे गुणीए स्पारे पांचनी राशी थाय. सातने सातवार-सावे गुणीए स्पारे सावनी राशी याय. पारने पार वार यारे गुणीये स्यारे घारनी राशी थाय. वित्ति चन पंचमगुणणे, कम्मा सग संख पढम चन सत्ता णंता ते रूव जुआ, मझारूबूण गुरू पहा ॥७॥ वि-पीतुं संख-संख्यातु मेळीप ति-प्रीतुं परम-पहेलं मन्ना-मध्यम युक्त मसं. पठ-चोय घर-घो) ययातु पंधर-पाच सत्त-सात गुम-राशिमायाम करता स्वग-एकस उगु करता पंता-मनानंतु कम्मा-अनुक्रमे गुरुपग-पाल মাথা सग-मान, मानुभा-नेने एकमर संग्गयाइ चीजें जघन्ययुक्त असंख्यातु, त्रीजें जघन्य थसं. यातु, चोधुं प्रत्येकानंतु थने पांचमुं मध्यमयुक्तानंतु अन्यिास करतां, अनुक्रमे सातमुं जघन्य असं. यातु, पद्देडं जघन्य प्रत्येकानंतु, चोथु जघन्य युक्ता- हातमु जघन्य अनंतानंतु घाय. ते जघन्ययुक्ता वळी एकाद रूपे युक्त करीये तेवारे. मध्यमयुक्त दोय थने एकरूप हीन करीए ते वारे पाठलु उत्कृष्टा यातु होय ॥ २ ॥ प अग्न्याता असंख्यातामा एकरुप भेळीए तो मध्यम असंख्या- थाप तथा एकरूप काहीये तो उत्कृष्ट युक्तासंख्या होय एम नंता महियी एफस काटे यके उत्कृष्ट असंख्यातु होप अने एक यम मत्येकानंनु होय. रुया असंख्यातु अने अनंतु ए अणना सर्व एकवीस भेदनी स. माणे. या ते (१) जयन्पसंख्यातु, प्रणयी माडीने जंयुद्वीप प्रमाण चार नवनी संख्या जे उपर कही तेमांयी पे ओठा करता (२) मध्यम एक ओछु करना अथवा मध्यम संख्याता करता एक वधारे थे ख्यान, ए प्रण भेद संख्याताना. पातामा एक रूप वधारता (१) जघन्य प्रत्येकासंख्यात, जघन्य तानी राशि अभ्यास करीने तेमांथी ये पोछा करता (२) मध्यम ., मध्यम प्रत्येकासंगपातामा एक वधारता (३) उत्कृष्ट मत्येका- उत्कृष्ट प्रत्येकासंख्यातायी एक पधारे एटले जयन्य मत्येकास. 5 अभ्यास तेनी यरोवर (४) जघन्पयुक्तासंख्यानु, जघन्ययुक्ता शि अभ्यासमाथी ये ओछा करता (५) मध्यमयुक्ता संख्यात, अने _ता अथवा मध्यम युक्तासंख्यातामा एक वधारता (६) उत्कृष्टयु. पाय, भने तेमा एक वधारतां एटले जयन्ययुक्ता संख्यातानो करना (७) जघन्य असंख्याता संख्यातु थाप, मपन्य अमंख्या- २० ता संरुगताना राशि अभ्यासमायो पे ओग करता (८) मायम असंख्यातासं. रुयानु थार, असंस्थानासरुपातायो एक वधारतो (९) उस्कृष्ट असंख्शाता सं. स्पात याय. ए ना असंख्याताना भेद थया. नाम संरगा संख्यातानो राशि अभास करता एटाले अरु मसं. म्याता मंकपागमा एक वधारतो (१) जपाय प्रत्येकाननु थाप. एम उपर . पाने अनंताना पगनर भेद सरनी ले पटले (२) मापस भरपेकानं, (३) बारा प्रत्येकानं. (४) जप युतानं, (५) मायम युक्तानंत, (६) उरष्ट पुकान. (७) मग अनंतानं, (८) मध्यम अनंताने, (९) अकूर अनंगाना. श्य मुलुतं अने, वग्गिय मिकसि चनथ्य मसंखं ॥ दो संसासंख, सहु रूवजुअं तु तं मां ॥ ३ ॥ Ti-di उप-गो गुभ-एकरूपपुर धना भाग-भगंगयातु तुने-ते बारे नगर मास-ममम ममा निनावी वां) भगंगाम-नाम्प गंदगार भगंग पानापा भार्थ:- गूगोल पटले राम्याता, थरांगपाता थने . नंतानां माप थनुपोगदारादि गन प्रमाणे कदा. पोजा शा. ना या प्रमाणे कई व. गाया जघन्य युका समसालानो पर्ग सगर, (वर्ग पट कोड म्याने मनी में प्यार गुणीप, मनानी वा पपानी) या जयन्य माना गया घार, ने मां का नेगी म शान्याना मंत्र पार मदत माइम गम, निवाणियां ननिमदाये। नमः, यामाया गनिन्य देगा ॥ GHIM

No text on this page.

२५२ अर्थः-(५) स्थितिबंधनां अव्यवसाय स्थानक, (६) अनु. नाग (रस)नां स्थानक, (७) योग वेद पलिन्नाग स्थानक, () थे (उत्सर्पिणी, थवसर्पिणी)ना समय सरखा ठे, तेना एटले एक काळचक्रना समय, (ए) (साधारण वर्जीने) प्रत्येक जीवना शरीरंनी संख्या, तथा (१०) सूक्ष्म थने चादर निगो. दनुं एक साधारण शरीर एवा निगोदीया जीवनां शरीर (ए दश बोल असंख्याता ठे) ते पूर्वला राशिमाहे नेळीए ॥५॥ स्थितिबंधनां अध्यवसाय स्थानक असंख्याता के ते एवी रोते के मोहनीव. कर्मनो नयन्य स्थितिबंध संचलना लोभनी अपेक्षाये अंतर्मुहुर्तनो ऐ. अने उ. को सीर कोडाकोडी सागरोपमनो छे, ते जपन्या एकेक समय वधारता जेटला समपे उतार स्थिति पुरी याय तेटला मोहनीपकर्मनां स्थिति स्थानक होय भने ते एकेक स्थितिस्यानानां कपायनी तीवमंदतादि फनमैदे लोकाकाश मभाग भमण्यानां अध्यवसाय स्यानक होय ते पांचमुं. रसना म्यानक असंख्याता लोकाका प्रमाण ऐ. सेनापंप हेतु अपाना अपवसाय पाना . ते पण मळीए त टुं. सात मन, वचन अने फापान पळ करणवीर्य, नो पलिमाग एटी फेरीती मनाया ना करो ऐदता जे वार्यावनी भाग न देवाय, ते वीपात्र रिमागर्नु जयन्य स्थानक निगोदीमा अपर्यामा जीवने उपनिने मपम समर्प दोर, मोजे मयं वीनु स्याना होय एम अमंल्याना बीयाँग रिप मगी भर्मप्याता पोर रिमाग म्पाना होप ने मानम. आमा समपिगी, सामपिगी मने बीम कोरी सागोई पावर देना अपाता मपप गाय, पानी भने पगं मागं नका. सको प्रमोट हंटोnal अपना मप याशि पारना बंटा मार यार ते पार पानामा भीर, ना माना जरना वर्गग्नों में पान माग ना. पारगम, मायाप, कार रे मल. निराम पर मां नर नावं यात्रामा मेर । २५३ 4. IT प्राय भने पार निगोरन एक साधारण सरीर, सेवा नि- मोक्षमा नीता अमपात पर रोये जे असंहशते रो के असंन्यात ठेवू २ स्थान. एशेने दस स्थानानो राशी, नयर असंख्याता असं. मनोजेनिफरलो, मी भए. पुण तमि तिबग्गिए, परित्तणंत बहु तस्स रासोणं ॥ 'अप्लासे खहु जुत्ता, अणतं अनव जिअमाएं ॥६॥ पुर्नभि-पगे रायले हस-नो भ्यास जुताभगन-युकानंतु तिमिर-शिगये सोगंभमासे-राशिम- अभव-अभव्य परिवर्गा-मयम म. समान निममार्ग-जीवन मान स्ट-पु. जयर अर्थः-पळी ते राशिने प्रणवार पर्गिये तेवारे जघन्य परेकानंनु होय, बळी तेनो राशि थन्यास करीए. तेवारे चोयो जघन्य युकानंतो होय, तेटसा जघन्य युक्तानते अन्नव्य जोपर्नु मान दोय, तेटसा थनव्य जीव होय, ते मध्ये एकरूप उतुं करीये तेरे नष्ट प्रत्येकानंतु त्रीजें याय ॥६॥ तघग्गे पुण जायज्ञ, णताणंत खहु तंच तिरस्कुत्तो।। चग्गनु तदधि न तं हो, इणंत खेवे खिवसु आश्मा मनग्गे-मी मर्ग णत-अनंत पुग-यो तिम्पो-गषेला खेवेलिकम-मेळयता नाप-याप पामे-माछ गंगाणला-अप. माहि-तोषग नंतान नहो-नेहोष श्रर्थः-ते चोथा थनंतानो वर्ग करीप तेवारे वळी सातमो जघन्य अनानंतो घाय, वळी ने सातमानो करीये. नापण उत्कृष्ट थनंतानंतु न पाय, ते न्यनंतानेकोप ॥७ . संघ-सेने पगगु-पाये M ना पर्याय रए४ सिहा निग्गोअ जीवा, वणस्सई काल पुग्गला चेव ॥ सब मलोग नहं पुण, ति वग्गिजे केवल गंमि ॥७॥ सिद्धा-सिद्धना जीय फाल-त्रणे काल पुण-वळी निग्गोमजीवा-निगोदना पुग्गला-सर्व पुद्गल तिवग्गिभो-त्रिवर्गीय जीव सव्वं-सर्व केवलदुगंमि केवल द्विक वणस्सइ-वनस्पतिकाय अलोगनहं लोकालोकाकाश थर्थः-(१) सिद्धना जीव अनंता . ते, (२) सूक्ष्म अने वादर निगोदना जीव, (३) प्रत्येक साधारण वनस्पति कायनाजीव, (४) अतित अने अनागत कालनासर्व समय, (५) सघळा पुद्गल स्कंधना परमाणु ते पण यनंताठे. (६) सर्व लोका- काश अने अलोकाकाशना प्रदेश, ए दरेकनी संख्या अनंत अनंत .तेसर्वनोराशि करीने तेनोत्रण वेलावर्ग करीये, तेमां केवलज्ञान तथा केवक्ष दर्शननाजे अनंतापर्याय तेनेळीयोन्जा खित्ते पंताएंतं, हवेई जितु ववदर मऊ ॥ श्य सुदमथ्य विआरो, लिदिओ देविंद सुरीहिं आए। खिते-क्षेपवेयके चवहरह-व्यवहार विआरो-विचार गंताणतं-अनंतानंनु मझिम-मध्यम अनंतो लिहिमो-लख्यो हवेइ-होय देविंदमुरीहि-श्रीदेवेंद्रमरिये निईन-उत्कृष्ट मुहमध्य-मक्षमार्य थर्थः-ते क्षेपये (मेळवे) थके नवमु उत्कृष्टानंतु थाय, (परंतु ए उत्कृष्ट थनंते कोई वस्तु सोकालोकमां नथी) सो- कासोकमां जेटसा पदार्थ जे ठे तेनो व्यवहार थारमो मध्यम थनंतानंतोज प्रवः . ए रीते सूक्ष्म अर्थ विचार, तपगठाधि- राज श्री देवें सूरिये खयो । । तिपमशीतिका नामक चतुर्थ कर्मग्रंथःसमाप्तः॥ । --

No text on this page.

ना पर्याय १४ सिक्षा निग्गोअ जीवा, वणस्सई काल पुग्गला चेव ॥ सध मलोग नहं पुण, ति पग्गिज केवल गंमिना सिदा-सिस्ना नीर फाल-त्रणे काल पुण-वळी निग्मोमजीवा-निगोदना पुग्गला-सर्व पुद्गल तिवग्गियो-त्रिवगाये नीर सवं-सर्व कंबलयुगंमि केवलाधिक वणस्सइ इ-वनसनिकाय । गलोगनहं लोकालोकाका थर्थः-(१) सिद्धना जीव धनंता . ते, (२) सूक्ष्म थने वादर निगोदना जीव, (३) प्रत्येक साधारण वनस्पति कपनाजीच, (४) यतित थने अनागत कासना सर्व समय, (५) सपळा पुद्गल स्कंधना परमाणु ते पण थनंतावे.(६)सर्व सोका. काश थने थलोकाकाशना प्रदेश, एव दरेकनी संख्या थनंत थनंत .ते सर्वनो राशि करीने तेनो प्रण बेलावर्ग करीये, तेमां केवमान तथा केवल दर्शननाथनंतापर्याय वे ते नेलीया खित्ते पंताणंतं, हवेई जितु ववदर मां ॥ श्य सुदमथ्य विधारो, लिदियो देविंद सूरीहिं | मिने-संपवयक पाहण-व्यवहार विभारी-शिधार पंतागत-अनंतानंतु मम्मम-मध्यम अनो निहिमो-लायो विनर देविदा-धीदेखें रिपे नि- | मुहमध्य-गामा श्रर्यः ते परे (मेळय) यके नवम यानंतु थाप, (परंतु ए उत्कृष्ट यनंने को यस्तु सोकासोकमां नयी) सो. कायोकमां जेटमा पदार्य जननी व्यवहार श्यागमा मध्यम धनंतानंनोज प्रबनें . परीने मःम थर्य विचार, गपगप्राधि- गत श्री देवेंद्र यि खग्यो l ॥ इनिपातिका नामक गनुयं करप्रयागमागः ।। --

No text on this page.

Karmgranth Part 1

Author
Ummedchand Raychand
Title
Karmgranth Part 1
File name
Karmgranth Part 1
Text
OCR done
Citation
1912
Published
2011/07
Publisher
Ahamdabad,lakshmi Pressice
Language
Sanskrit
Pages
208
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313116
Barcode
99999990311090.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
cmI7pdgAiaX
Download PDF

Karmgranth Part 1