Government College, Kota
Viddhasalabhanjika Of Rajasekhara
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GOVT. COLLEGE, LIBRARY
KOTA (R8j.)
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BORROWER'S
No.
DUE DTATE
SIGNATURE
रानीय महाविद्यालय
सोपेता
विद्धशालभञ्जिका
..
चौखम्बा विद्यारभवन,वाराणसी-1
BE
Government College, Library
KOTA (Raj)
0942
Accession No........
Clas No..................*.***
Book No............... Vol. No..............
॥ श्रीः॥
विधाभवन संस्कृत ग्रन्थमाला
महाकविधोराजशेखरविरचिता
action
विद्धशालभञ्जिका
'प्रकाश' हिन्दी व्याख्योपेता
नाख्याकार
पं०रकान्त त्रिपाठी
पी-एच ० (स्कालर)
संस्कृत विभाग : लखन विश्वविद्यालय लखनर..
चौखम्बा विद्यामवन, वाराणसी-१
शंक: चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी
मुदक
विवादिलासप्रेस, वाराणसी
संस्करण : प्रपन, वि. संवत् २०२२
मूत्व सोषित सूप
The Chowkhamba Vidya Bhawan,
Chowk, Varanasi-1 ( India )
1965
Phone ! 3076
THE
VIDYABHAWAN SANSKRIT GRANTHAMALA
,125
安安宁一
VIDDHAS'ALABHANJIKĀ
OF
RĀJASEKHARA
EDITED WITH THE PRAKASA HINDI COMMENTARY
BY
RAMĀKĀNTA TRIPATHI
Fh. D. (Schclar ), Sanskrit Department,
Lucknow University,
Lucknow.
THE
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
VARANASI-1
1965
Also can be had of
THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE
Publishers and Antiquarian Cook-Sellers
POST BOX 8,
VARANASI-1 (India)
PHONE: 3145
भूमिका काव्य:दृश्य एवं भव्य संस्कृत अलंकारशास्त्रियों में वामन सर्वप्रथम एवं अप्रगण्य हैं जिन्होंने अन्य-रचना में रूपक (दृश्यकाव्य ) को श्रेष्ठ माना है। अपने में पूर्ण होने से चित्र की तरह रूपक आश्चर्यजनक होता है। चित्रवत्ता के कारण ही दृदयकाव्य श्रेष्ठ है। यह रूपक ही है जिससे कया, अख्यायिका एवं महाकाव्य आदि निःसत हैं। रूपक अपने में पूर्ण है, आख्यायिका और महाकाव्य आदि इसी के रूप परिवर्तन हैं। रूपकों को अधिक श्रेय देने का वामन ने एक ही कारण दिया है। रूपक प्रत्येक वस्तु में वर्तमान रहने से पूर्ण है, अतः रूपक चित्र के समान विचित्र है। परन्तु रूपक का चित्र के साथ तुलना करने में क्या महत्व है ? विशेष साकल्य का क्या अर्थ है ? इसको वामन ने समझाने का प्रयत्न नहीं किया है। वे विशेषताएँ क्या हैं, जो महाकाव्य एवं आख्यायिका आदि में नहीं प्राप्त होती, परन्तु जो रूपक में वर्तमान हैं, इन सन प्रश्नों को वामन ने विस्तृत रूप में समझाने का अल्प प्रयास भी नहीं किया है। वामन के मत का अनुसरण करते हुए संस्कृत साहित्य एवं दर्शन के प्रौढ़ विद्वान एवं आलोचक अभिनवगुप्त ने नाटक को रसास्वाद की दृष्टि से अन्य की अपेक्षा पूर्ण माना है। अभिनवगुप्त का कथन है कि जहाँ तक रस के आनन्द का रसास्वाद का सम्बन्ध है, मुक्तक में उतना आनन्द नहीं आता है, क्योंकि विभाव एवं अनुभाव आदि का वर्णन इसमें नहीं होता है। अतः एक पूर्ण प्रबन्ध में ही सम्यक् रूप से रसास्वाद की प्राप्ति सम्भव है । ब्रह्मानन्द १. सन्दर्भेषु दशरूपकं श्रेयः । तद्विचित्र चित्रपटवद् विशेषसाकल्यात् । ततोऽन्यभेदल्लतिः। ततो दशरूपकादन्येषां भेदानां क्लतिः कल्पनमिति । दन- रूपकस्य हि इदं सर्व विलसितं कयाख्यायिके महाकाव्यमिति । (काव्यानुशासन सूत्र और विवृत्ति १३-३०, १२) [ २ ] वाद सहोदर रस का आनन्द प्रबन्ध काव्य की अपेक्षा नाटक से ही होता है, यह जब मञ्च पर प्रस्तुत किया जाता है। वेष-भूषा, चाल-दाल और प्रवृत्ति आदि का काव्य में केवल वर्णन मात्र होता है। परन्तु नाटक में सामाजिक प्रत्यक्ष रूप से इन सबको चक्षु इन्द्रियों से देखता है। अतः रसास्वाद का अन्तिम उत्कर्ष नाटक से ही प्राप्त होता है। नाटक की अपेक्षा कम रसास्वाद महा- काव्य से प्राप्त होता है। सबसे कम रसास्वाद मुक्तक से होता है । यद्यपि अभिनवगुप्त ने भाषा, वेप आदि की प्रत्यक्षता के कारण दृश्य का अविलम्ब प्रभाव स्वीकार किया है, फिर भी श्रन्यकाव्य में इसकी योजना का अमाव प्रमाणित नहीं होता है। अभिनवगुस ने स्पष्टरूप से इस बात का उल्लेख किया है कि काव्यानुभूति सहृदय से सम्बन्धित है। सहृदय ने यदि काव्य का अनुशीलन कर लिया है, जिसके कुछ प्राक्तन संस्कार हैं वो भाव आदि के उन्मीलन के द्वारा काव्य के विषय का साक्षात्कार किया जा सकता है। कहने का सारांश यह है कि यदि हत्यकाव्य समस्त वातों को प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित कर देता है तो अव्यकाव्य में इसकी उपस्थिति के लिए सहृदय की कल्पना अपेक्षित है। अभिनवगुप्त के बाद 'शृंगार प्रकाश' और 'सरस्वतीकण्टामरण' के रचयिता भोज ने कवि और काव्य फो नट और अभिनय की अपेक्षा उच्च स्थान प्रदान किया है। भोज ने अपने अन्य के प्रारम्भ से ही इस बात का उल्लेख किया है कि रसास्वादन सामालिय प्रोतागण के द्वारा तभी किया जाता है, जब यह १. च ( रसास्वादोतर्पकार विभावादीनां समप्राधान्यम् ) प्रबन्ध एवं मयति । वलुतस्तु दशरूपक एव । यदाद वामनः-सन्दर्भ दशरूपक श्रेयः । तद्विचित्र चित्रपटयद् विशेषसायल्यात् । (अभिनव भारती, पट अध्याय, पृ.२८७) २. तपरसचर्पणया तु प्रयन्वे भाषावेपमहत्यौचित्याटिकल्पनात् , वदुप- जीवनेन मुक्तके । (अभिनव मारती, पट अन्याय, पृ. २८७) ३. सेन ये फाल्यान्यसि प्राक्तनपुण्यादिहेनुर्वरादिति सदृदयारते परिमितवि. भावाद्युन्मीलने-पि परिस्फुट एव साक्षात्कारपलः फाय्यार्थः स्फुरति । अतएक तेषां पाव्यमेव प्रतिव्युत्पत्तिकटनपेक्षितनाट्यमपि । (अभिनयमारती, पर अध्याय, पृ०२८७) । [ ३ ] एक प्रवीण नट के द्वारा अभिनीत होता है या प्रबन्ध काव्य में महाकवि के द्वारा वर्णित होता है। किसी पदार्य के श्रवण मात्र से जितना आनन्द आता है, उतना उस पदार्य के साक्षात्कार करने पर नहीं। इसीलिये मोज ने कवि को नट की अपेक्षा उच्च स्थान प्रदान किया है एवं काव्य को अभिनय की अपेक्षा अधिक महत्व दिया है। संस्कृत अलंकारशास्त्र में नाटककार के लिए अन्य शब्द नहीं प्रयुक्त होता है । नाटककार को भी कवि ही कहा जाता है। नाटक की मी 'काय' ही नाम 'से सम्बोधित करते हैं। मोज का यहाँ यह कथन कि कवि और काव्य को नट एवं अभिनय की अपेक्षा अधिक महत्त्व देना चाहिए, अभिनवगुस के मत से सूक्ष्म विरोष प्रकट करता है। भोज के अनुसार नाट्यकार कवि का, जिसने रस के आनन्द के लिए काव्य लिखा है जिसमें आनन्द प्रास करने के लिए नट के योग की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती, नट की अपेक्षा विशेष महत्त्व है-जो (नट) रङ्गमञ्च पर सामाजिक के समक्ष अभिनयों के द्वारा उसे अमिनीत करता है । यर्दो काव्य का तात्पर्य नाट्य की पाठ्य पुस्तक से है । नाटक को दृश्य काव्य की मी संज्ञा दी गई है। नाटक का जब तक रङ्गमञ्च पर प्रदर्शन नहीं किया जाता है --जब नाटक के अध्ययन से ही आनन्द की प्राप्ति होती है, तब न नाटक कान्य ही कहा जाया करता है। भोज ने कवि और काव्य का मो प्रयोग किया है, वह नाटककार और उसके 'नाटक' के लिए ही है। भोज इन्हीं को नट और उसके अभिनयों की अपेक्षा विशेष महत्व देते हैं। १. स (रतः) च अनुमवैकगम्यवाद् असर्वविषयत्वाच्च दुरवसेयः । सम्य- गभिनयेउ वा विदग्धशेषैः प्रदयमानः सामाजिकैश्च धार्यते । प्रबन्वेषु वा महाकविमिः ययावद् आख्यायमानः विदुषां मनीषा विषयमबतरति । तत्र न तदा पायोः प्रदीयमानाः रूदन्ते, यथावग्मिनां वचोभिरावेद्यमानः । उदाह- 'अत्यणिवेता गवि तह चिचविआसं कुणन्ति सच्चेविआ। बह उगते उमिल्लन्ति सुरविवाहिं सुसीसंता ॥ अतोऽमिनेतृभ्यः कविनव बहुमान्यामहे अभिनयेभ्यश्च काव्यमेवेति । (शृंगारप्रकाश, चतुर्थप्रकाश ३-४) काल में अनुभाष एवं विभावों का वर्णन रहता है। इन्हींको रगमञ्च पर प्रयोग करने के कारण नाट्य कहा जाया करता है । नाट्य जब अभिनीत किया जाता है, तब हमें प्रत्यक्ष साक्षात्कार होता है। इसके विपरीव काव्य में कवि को अद्भुत वर्णनाशक्ति भी किसी पदार्य के स्वरूप का जीता-जागता चित्रण कर देती है। यही नाट्य और काव्य में सूक्ष्म अन्तर है। अतः एक सहृदय सामाजिक के लिए नाट्य-जिसका अभिनय न हो रहा हो एवं नम्र ने कुछ भी मेद नहीं है। एक उत्कृष्ट नाटक के लिए नर एवं नाट्यशाला की कोई आवश्यकता नहीं है। सामाजिक पढ़ने से हो आत्मविभोर हो जायगा। पुनः जहाँ तक नाट्य ( दृश्य ) एवं काव्य (अन्य ) इन दोनों को मार्मिकता का प्रश्न है, वहाँ भी परखर कोई भेद नहीं है। यदि दृश्य काव्य के मनोहर दृश्य दर्शक के मानस पटल पर सदैव के लिए अहित हो जाते हैं, तो अश्य काव्य की मनोहर पंक्तियाँ भी सहृदयों के कण्ट में सदैव के लिए विराजमान हो जाया करती है। नाटिका भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में 'नाटिका' का उल्लेख 'नाटी' नाम से किया है। इनके अनुसार 'नारी' की उत्पत्ति 'नाटक' और 'प्रकरण' के योग से हुई है। अभिनवगुप्त ने भरतमुनि के 'नारी' सम्बन्धी लक्षणों की व्याख्या परते लिखा है कि आचार्य के अनुसार नाटिका में टो नायिकाएँ होनी चाहिए- एक 'स्वकीया' बो देवी होती है और दूसरी टच्चकुल की मुन्दरी होती है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र के अनुसार नाटिका चार अहों की होती है। इसमें म्त्री पात्रों की बहुलता के साथ रंगार रस की प्रधानता रहती है। अतएव वैशिशी वृत्ति का प्राधान्य होना स्वाभाविक हो है । स्रो पात्रों में देवी, दूती, सखी, चेये एवं कन्या आदि का समावेश होता है। इसका नायक धीरललित होता है, थतएव सर्वत्र गज्योचित व्यवहार का प्रदर्शन होता है। नाटिका का फल प्री- अनुभावविभावानां वर्गना काव्यमुच्यते । पामेव प्रयोगनु नाट्यं गोदादिरमितम् ।। (व्यतिविवेक में उद्धृत) अगसिद्धा, (३) देवी प्रसिह, कन्या महाविद्यालय [ ५ ] लामपूर्वक राज्य प्राति है। कन्या और देवी एक साथ ही इस रूपक की नायिका होती हैं। देवी' को वयोवृक्षा, मानिनी, दक्षा और चतुरा के रूप में चित्रित करना चाहिए। कन्या को मुग्धा एवं अपूर्व सुन्दरी के रूप में प्रदर्शित करना चाहिए। क्षत्रियवंशजल, नय, विनय, लज्जा, महत्व एवं गाम्भीर्य आदि धर्म दोनों में चित्रित किया जाना चाहिए । प्रायः कन्या के प्रति अनुराग को जान लेने पर 'देवी' राजा पर क्रोध का प्रदर्शन करती है। राजा उसको प्रसन्न करने का प्रयत्न करता है। राजा और कन्या परस्सर रति का प्रदर्शन करते हैं। इस प्रकार नाटिका में शृंगाररस के अङ्गी का बार बार निबन्धन किया जाता है। कन्या और देवी के प्रसिद्ध एवं अप्रसिद्ध होने से नाटिका के चार भेद होते हैं-(१) देवी अप्रसिद्धा, दीपातखारदेवी अप्रसिद्धा, कन्या देवी प्रसिद्धा, कन्या प्रसिद्धा। आंमुख जहाँ सूत्रधार, विदूषक, नटाधा माप के साथ वार्तालाप करती हुईवक्रोक्ति (साक्षात् विवक्षित अर्य का अप्रतिपटक यो स्पष्टोक्ति (साक्षात् विवाहित अर्थ का प्रतिरादक ) के द्वारा प्रस्तुत काक के उपक्षक को व्यक्त कर, महाँ आमुख होता है। इसे प्रस्तावना के नाम से भी मा किया उद्र चतुरङ्का बहुलीका नृपेशा वो महीकला । कल्प्यायां कैशिकी मुख्या" ( नाट्यदर्पण पृ० १०६) २. देवी दक्षाऽपरा मुग्धा, समा धमों द्वयो पुनः । क्रोधप्रसादमल्यूहरतिच्छ्दमादिभूरिशः॥ .(नाट्यदर्पण, पृ० १०७) अख्यातियातितः कन्या देव्योनाये चतुर्विधा ।। (नाट्यदर्पण पृ० १०८) विदूषकनटीमाः प्रस्तुताक्षेपि भाषणम् । सूत्रधारस्य वक्रोक-सष्टोक्तैर्यत वदामुखम् ।। (नाट्यदर्पण पृ० १३६) [ ६ ] हमारे देश में रूपक के प्रारम्भ में प्रस्तावना देने की प्रथा रही है। पैसे । पूर्वरङ्ग के पाठ्य आदि कई भेद हैं किन्तु उनमें से प्ररोचना एवं नान्दी काही विशेष महत्त्व है। क्योंकि पूर्वरंग के कुछ अंग या तो निष्फल हैं अथवा उनका प्रयोग अवश्यम्भावी नहीं है। प्रायः सभी कवियों के द्वारा ईप्सित प्रन्थ झी निर्विघ्न समाप्ति के लिए आरम्भ में आशीर्वचनात्मक एवं नमस्कारात्मक स्तुति की जाती है, इसी को नान्दी कहते हैं। यह नमस्कारात्मक स्तुति देव, द्विज एवं नृप आदि के प्रति की जाती है।। शारदातनय ने अपने 'भाव- प्रकाद्यन्' में नान्दी का निम्न स्वरूप दिया है-- (i) शंकर के वैल नन्दी ने सप्ट्यारम्भ में नृत्य करते हुए फल्पना योग से रंगता प्राप्त कर ली थी। इसलिए उस रूप के सम्बन्ध से रूपक के प्रारम्भ में देवता आदि को नमस्कार या मंगलारम्म किया जाता है, वह 'नान्दी' है। (ii) अयवा जो क्रिया सामाजिकों को प्रसन्न करे, यह 'नान्दी' है । (iii) अयवा पूर्वरंग के सम्बन्ध से नाट्यारम्भ में प्रसन्नार्थ पाईस अंगों वाली क्रिया को 'नान्दी' कहते हैं। प्रायः कवि ही नान्दी का पाठ करता है। इसीलिए नाटक में 'नान्द्यन्ते सूत्रधारः' का प्रयोग मिलता है। इसके विपरीत जहाँ कवि नान्दी नहीं करता है अपितु सूत्रधार एवं स्थापक व पारिपाविक हो नान्दी करते हैं, वहाँ 'नान्यन्ते सूत्रधार' का प्रयोग नहीं किया जाता । आमुग्वागभूतनाट्यपात्रप्रवेशविधिः-पाष ( मुख्य नायक आदि की भूमिका धारण करने वाले नट आदि) के मय पर प्रथम समय प्रवेश करने की अनेक विधियाँ हैं। कहीं समान इतिवृत्त वाले याक्य को लेकर उसी के समान इतिवृत्त वाले वाक्य को लेकर उसी के समान उक्ति का प्रयोग करते हुए पात्र प्रवेश करते हैं। यही समान वाक्यार्थ को लेकर पात्र मन पर प्रवेश आशीर्वचनसंयुक्ता नित्यं यस्मात् प्रयुज्यते । देवदिजनमदीना तरमान्नान्दति संशिता ।। (नाट्यशास्त्र ५.२४), २. भावप्रकाशन् , सप्तम अधिकार, पृ १९६ ।
[ ७ ] करता है। कहीं काल ( ऋतु आदि) का वर्णन करते हुए इलेप से किसी पात्र के प्रवेश की सूचना दी जाती है और कहीं पर आह्वान के द्वारा ( यह वह आ रहा है, इस प्रकार के वचनों द्वारा ) पात्रों का मञ्च पर प्रवेश कराया जाता है। वृत्त वृत्त दो प्रकार का होता है-मुख्य और प्रासंगिक । प्रबन्ध में सर्वव्यापक होने के कारण इष्ट फल से युक्त प्रधानवृत्त मुख्यवृत्त कहा जाता है । अंग वृत्त प्रासंगिक वृत्त कहा जाता है। यह वृत्त मुख्य वृत्त का अनुयायी होने के कारण इसका अवयव है। कोई वृत्त स्वभावतः ही मुख्य या प्रासंगिक की संज्ञा को नहीं प्राप्त करता है अपितु समस्तफलों में कवि के विशेष रूप से अभिप्रेत फल युक्त वृत्त को मुख्य वृत्त कहते हैं। इससे व्यतिरिक्त प्रासंगिक वृत्त होता है। दशरूपककार के अनुसार जो वृत्त दूसरे प्रयोजन के लिए होता है किन्तु प्रसंग से जिसका स्वयं का भी फल सिद्ध होता है, वह प्रासंगिक, वृत्त है ।' संक्षेप में हम कह सकते हैं कि मुख्य वृत्त मुख्य फल से सम्बन्धित रहता है एवं प्रासंगिक वृत्त गौण फल से युक्त रहता है। वृत्त का फिर से चार तरह का विमाजन होता है-सूच्य, प्रयोज्य, अब और उपैश्य । नीरस वृत्त का रंगमञ्च पर प्रदर्शन करना अनुचित है। इसी प्रकार सरस होने पर मी जो वृत्त रंगमञ्च पर प्रदर्शन के योग्य नहीं है, उसकी सूचना ही विष्कम्भक आदि के द्वारा दिलवानी चाहिए। प्रयोज्य वृत्त सूच्य के ठीक विपरीत है। नट सामाजिकों के सामने वाचिकादि अभिनयों के द्वारा प्रयोज्य का अभिनय करता है। जिस वृत्त का स्वयं वितर्क किया जाय, वह उह्य कहलाता है। ब्रीडा आदि के जनक होने से जिसकी अवहेलना अथवा उपेचा कर दी जाय, वह उपेक्ष्य कहलाता है। प्रयोज्य के अतिरिक्त इन सूच्य आदि वृत्तांशों की सूचना पाँच प्रकार के अयोरक्षेरकों द्वारा दी जाती है। ये अर्थोपक्षेपक निम्न है-विष्कम्भक, प्रवेशक, प्रासङ्गिक परार्थस्य स्वायों यस्य प्रसङ्गतः । (दशरूपक, प्रथम प्रकाश, २) २. सूच्यं प्रयोज्यमन्यूह्यम् , उपश्यं तच्चनुर्विधम् । (नाट्यदर्पण, पृष्ठ २७) - [८] अङ्गात्य, चूलिका और अहारवार। यहाँ हम प्रवेश और विष्कम्भकका ही वर्णन करेंगे क्योंकि इन्हीं दोनों का हो प्रबन्ध में बहुलता चे निरूपण होता है । विष्कम्भक दो प्रकार का होचा है-शुद्ध एवं संकीर्न। यदि भूवकालीन अथवा वर्तमान- कालोन वृत्त (अरञ्जक अथवा रक्षक पैत्ता भी रो) मा अभिनय एक दिन में असम्भव हो, तो वह प्रेक्षको को साक्षात् उपलबनान न हो सकेगा। अपए। अङ्क में उसका निवन्धन न करके समातहत अथवा पदार्थ समात्युक्ष तत्कृत भाषा के माध्यम से मध्पन भेगी के पात्रों द्वारा अंक के आदि में चित कराना चाहिए । ऐसा विष्कम्मक शुद्ध कहलाता है। अपम पात्रों के उपस्थित रहने चे विष्कम्भक संकीर्ण हो जाता है। अधम पात्रों के रहने से संत्री विक्रम में प्राकृत का भी प्रयोग होता है । किम्मक में मध्यम भेगो के पात्रों का रहना आवश्यक है, नहीं तो वह प्रवेशक' हो जायेगा। यह विष्कम्मक अंक के आदि में भी और दो अहों के बीच में मी आ सकता है । विष्कम्भक की समी उपर्युक्त बातें प्रवेशक ने पापी शादी है। केवल इवना ही अन्तर है कि प्रदेश में केवल अधनकोटि के पात्रों का ही प्रयोग होता है, जो प्राकृत बोलते हैं। यह दो अहो के बीच में ही होता है। नाटक, प्रकरण, नाटिका और प्रकरणी में ही प्रवेशक और विषम्भक का प्रयोग करना चाहिए। के. पुनः निम्न भैर होते है-प्रसाय, संगत, यावारित, बनान्टिक एवं आकायोति । जो वृच गोपनीय न होकर अग्ने ते पविरित दूसरों के नुनने योग्य हो (अपांत् रंगम पर उपस्थित पात्रों के मी सुनने योग्य हो) उसे 'प्रका' कहते हैं। जो दूसरों के लिए गोप अपने मन में ही स्थित रखने पोग्य हो, उसे 'स्वगई' कहते हैं। जत्र उपस्थित व्यक्ति की ओर से धनकर कई रहप की रात की जानी है, तब कहाँ 'अरकारित होता है। जब विरताकाकर की मुद्रा से रंगमय पर उपस्थित अन्य लोगों की मोट करके दो पति इन प्रकार बातचीत करें कि उनके व्यतिरिक्त अन्न पनि न सुनें, तब 'जनान्ति • . । १. एवं प्रवेशको नीचे, परार्थः प्रास्तादिना । एती प्रभूतकार्यात्, नारकादि चतुष्टये ।। (नास्पदपंग, पृ. ३५) [९] होता है। रंगमञ्च पर प्रविष्ट पात्र बहाँ दूसरे पात्र के विना ही आकाश की ओर मुख करके स्वयं ही प्रश्न और प्रत्युत्तर करे, वहाँ आकाशोक्ति होती है। वृत्त में सुखावबोध होने के लिए परिमित पद्य और गद्य का होना श्रेयस्कर है । सामाजिकों को समासबहुल एवं कर्कश गद्य दुबाघ होने के कारण रसास्वाद • नहीं करा सकता है। वृत्त में दिलष्ट प्रधान फल से ही सम्बद्ध अवान्तर कार्यों की योजना करनी चाहिए । रूपक में उन्हीं अवान्तर वृत्तों का आयोजन करना चाहिए जो प्रधानफल के साधक हो। नदी, समुद्र, सूर्योदय एवं चन्द्रोदय आदि का भी ययावसर वर्णन करना चाहिए। वसन्त आदि ऋतुओं का एवं मधुपान, जलक्रीडा आदि का भी वर्णन करना चाहिए। सभी रसों में केवल एक ही रस की प्रधानता होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त अन्य रसों को गौण स्थान मिलना चाहिए एवं अन्त में अद्भुत रस का मी समावेश करना चाहिए । इलेप, उपमा एवं यमक आदि अलंकारों का मी निवेश करना उचित है। अंगभूत रस का नियोजन इस प्रकार होना चाहिए कि वह मुख्य रस का विरोध न कर पाए । पहले कहे हुए या पूर्व प्रकाशित किए हुए वृत्त को यदि प्रयोजनवरा पुनः कहने को आवश्यकता हो तो उसे कान में ही कहलाना चाहिए जिससे पुनरुक्त दोष न आ पाए । सकल प्रबन्ध में रसारोहणार्य रजक मावों का वर्णन करना चाहिए । नायक अयवा रस के विरुद्ध और अयुक्त वृत्त को या तो छोड़ देना चाहिए या उनमें उचित संशोधन कर देना चाहिए। अर्थ प्रकृति अर्थ प्रकृतियों पाँच हैं. बीज, पताका, प्रकरी, विन्दु व कार्य । रूपक के १. प्रकाशं ज्ञाप्यमन्येषा, स्वगतं स्वहृदि स्थितम् । परावृत्य रहस्यास्याऽन्यस्मै तदपवारितम् ।। विपताकान्तरोऽन्येन, जल्यो यस्तजनान्तिकम् । आकाद्योक्तिः स्वयम्प्रश्न-प्रत्युत्तरमपात्रकम् ॥ (नाट्यदर्पण, पृ० ३०) २. अयुक्तं च विरुद्धं च नायकस्य रसत्य वा । वृत्तं यत् दत् परित्याज्यं प्रकल्यमयवाऽन्यया ॥ (नाट्यदर्पण, पृष्ट ३०) [१०.] प्रारम्भ में योडा सा उद्दिष्ट वह तत्व जो रूपक के इतिवृत्त के मुख्य नाम का उाप है 'बीज' है । यह वन इतिवृत्त में पान आदि के चीन के समान पक्षरित होता है । जिस प्रकार कृषक वृक्ष एवं पल आदि की इच्छा वे भूनि में भोज का निक्षेर करता है, उसी प्रकार नायक आदि पात्र भी धर्म, अर्थ एवं कामरूप पाल के लिए आमुख के बाद बीज-मरन करता है। गम्भीर होने के कारण आरम्भ में बीज को सूक्ष्मरूप वे निर्दिष्ट किया जाता है। अपने अर्थ में प्रवृत्त को चेतन हेतु प्रधान के प्रयोजन को सम्पादित करता है उसे पता कहते हैं। स्वार्य को अपेक्षा न परता हुआ एवं वृत्रदेशगत होता हुआ मी मुख्य नायक के प्रयोजन को समादित करने वाला चेतन सहायक प्रकरी' कहा जाता है। बैते वृक्ष की रक्षा के लिए छोटे-छोटे साधनों को आवसरता पड़ती है, उसी प्रकार नायक को मी धर्म, काम तथा अर्थरूप वृक्ष की रक्षा के दिए ऐसे ही छोटे-टोटे सहापों की आवश्यकता पड़ती है, इन्हें ही 'प्रहरी फहते हैं। नाट्य छ अनुशनों के प्रति धान उपस्थित हो जाता है। ऐसी परिस्थिति में उस कार्य सम्पादनार्य नायक व प्रविनापक आदि के अनुन्धान यो विचारात्मक पल-लाम के प्रति उपापभूत होने के कारण बिन्दु' कहते हैं । या पीज-वरन के बाद बिन्दु-निक्षेप करना पड़ता है, उसी प्रकार नाटक का नायक मी यरने धर्म, अर्थ एवं कामरूप फल के टिर 'बोज' कान के अनन्तर विन्दु निक्षेर करता है। विन्दु' के रूप में नायक के प्रपन्नों का अभिमान होता है । पद विन्दु' वृत्त में ठीक उसी तरह से प्रसारित होता है, जैसे तैलविन्दु इल में प्रसारित होता है। बीज-तारी साधन समूह को 'दा' कहते हैं। धनिक आदि विद्वानों के यनुसार पर्म, अर्थ एवं कान र त्रिवर्ग पुरवाय भार्य है। साहित्यदर्पगार विनाय मी पनिक से सहमत हैं किन्तु पदमन टंक नहीं है, क्योंकि इन विद्वानों के मतानुसार कार्य नामक यति स्वयं प्रपोजन है।रियोजन उकैका निदिदत बन सकता है ! अवस्या पद्धन नायक के प्रधान कृच में पारम्म, पत्र, मारवाया, निपानि और पापन । ११ ] अवस्याएँ अवश्य निबद होती हैं। किसी भी पल की प्राति के लिए नायकाटि में इच्छा होती है एवं उस फल के प्रति औत्सुक्य मी पाया जाता है। इसी पलौत्सुक्य को 'आरम्म' कहते हैं । मुख्य साध्य के प्रति यह विचार आना कि यह इसके द्वारा साध्य है, यही आरम्म है । व्यापार में होने वाली त्वरा (चेष्टा ) को प्रयत्न कहते हैं। इस उपाय के बिना फल-प्राति नहीं होगा' इस निश्चय से मन में जो उत्सुकता होती है, वही प्रयत्न है। इसके अन्तर्गत नायक या नायिका अग्नी इष्ट क्लु को प्राप्त करने के व्यापार में संलग्न रहते हैं । औत्सुक्य मात्र का पाया जाना प्रारम्भ है, फल के लिए की गई चेष्टा यत्न है। यही प्रारम्म और यन में भेद है। हेतुमात्र से फल की किञ्चित् सम्मांवना 'प्राप्त्याया' है । प्राप्त्याद्या का विश्लेषण इस प्रकार किया जा सकता है-प्रधान फल के लाभ की आशा 'प्राप्याशा है। इसमें फल-प्राप्ति के विषय में निश्चय नहीं होता क्योंकि पल अनेक विघ्नों एवं शंकाओं से युक्त रहता है। उपार्यों की सफलता से होने वाला कार्य-निर्णय 'नियताति' ५ 1 नियताति में पल-प्राप्ति निश्चित हो जाता है । नायक के लिए साक्षात् रूप से अर्थात् अव्यवहित होने वाली इष्यर्थ की सम्भूति पलागम है । घनञ्जय के अनुसार मी समस्तफल की प्राप्ति 'फलागम है । सन्धि विचार नाटक में कई कांशों का निबन्धन रहा करता है। उन प्रत्येक कयांगों का प्रयोजन भी भिन्न-भिन्न ही हुआ करता है। एक ही प्रयोजन को लक्ष्य में १. आरम्मन्यन प्राप्त्याशा-नियताप्ति फलागमाः। नेतुत्ते प्रधाने स्युः पञ्चावत्या ध्रुवं क्रमात् ॥ (नाट्यदर्पण, पृ० ४४) २. पलापौत्सुक्यमारम्मा...। (वही, पृ०४४) ३. प्रयनो व्यापृतो त्वरा 1(वही, पृ० ४५) ४. फलसम्भावना किञ्चित् प्राप्त्याशा हेनुमात्रतः । (वही, पृ० ४५) '५. नियप्तिमायानी ताकल्यात् कार्य निर्णयः। (वही, पृ० ४६', ६. समतालसंगतिः फलयोगो यथोदितः। (दशरूपक, प्रथम प्रकाश, २२) [१२] रखकर व्हाँ भिन्न-मिस कपांच परसर अन्तित र दिए राते हैं, वहाँ पर भिन्न- भिन्न कयांगों का अवान्तर प्रपौवन से सम्बन्धित होना ही सन्धि है। काहित्य दपनार के अनुसार एक प्रयोजन में मन्दिव यांगों के सशान्तर सम्बन्ध को सन्धि शब्द का अर्थ है-सन्धान वरना। नारक के किसी भी भयानक ग उचित रूप से निवांद करने के लिए उसको भागों में किम कर देना चाहिए । हस्ते कथानक का सन्यान उचित रूप में हो जाता है। इस प्रकार हम देखते है कि सन्धियों का नुरुप उस है-पान का उचित कर में सन्मान करना । इसके अतिरिक साल के कई मह मो है। रूपक में उनका भी नियोजन अत्यन्त उपदेय है । नाटक की रचना करते समय यदि नाटककार सन्धि के यहीं पर मान देता है तो उसके टिर इष्ट अर्थ का समावेश नमन हो जाता है। वह नाटक में सरटतापूर्वक एवं सुगमता के साथ अन्ने अमोष्ट अों का समावेश कर सकता है। रूरक में बहुत सी चोठे ऐनी । दिना संगमन्च पर प्रदर्शन उदित नहीं माना गया है। सन्धि के अद्रों का मान रमने से उन निषिद्ध क्यांशों का परित्याग भी करतापूर्वक किया करा सकता है । नाटकार के लिए दिल बात को प्रस्ट वरना अमीष्ट है, उसे प्रकट करने के लिए भी नाटककार को संपनों का प्यान रखना चाहिए। यदि नाटककार संबगों का पान नहीं रसग तो बहुत सम्भव है कि किसी प्रकट करने योग्य पतु कोन्द बाप । मालर भी सन्धि के बड़ों का प्यान रखना बाकसक है । मन्धि के अली का एक भगोदन यह भी है रिनवे दयंगन में नारक के प्रति निराग नहीं उसम हो पाता, सोकि संपदों हे रसना सम्पन्न गरित हो जाती है। रूरक में सत्कार टाने के लिए भी पदों की सापडा लेनी पड़ता है। संपट्दों का मान रखने में वृतान्त योग नहीं हो पादा है। कया के प्रति लोगों में विधात रहती है। समता पदों के इन्ही उद्देनों को पान में मरते हुए मलमुनि ने नाटक्यार में कहा है 'दिन प्रकार संगीन मनुबदुर के अपोप होता है, उसी प्रकार संगीन शत्रमा प्रयोग के लिए स्वरसुद १. एफेन मनोरनेनान्दिदानांकनातकोदनवन्यासन्धिः। (सालिग, पर परिच्छेद, पृ० १११) [ १३ ] रहता है। किन्तु इन संध्यङ्गों का समस्त रूपकों में क्रमशः प्रयोग हो, यह आव- श्यक नहीं है। यदि इन संधियों से एवं इनके मङ्गों से कथानक का निवांह ठीक रूप में हो जाता है, तब तो इनका प्रयोग करना चाहिए । वस्तुतः मुख्य बात तो यह है कि यदि नाटककार अपनी नाटक रचना पर स्वयं ध्यान दे दो सन्धि एवं सन्ध्यङ्ग उस नाटक में स्वयं ही आ जायेंगे। परन्तु यदि कोई नाटककार सन्धि एवं सन्थ्यङ्ग के फेर में पड़कर नाटक-निर्माण में संलग्न रहेगा तब तो उसका नाटक, नाटक न होकर सन्धि एवं सन्ध्यन को उदाहरणमाला बन जायेगा । इसलिए यदि सन्धियों से कयानक में व्याघात उपस्थित हो तो इन संधियों का स्यात्यान परित्याग भी कर देना चाहिए । मुख, प्रविमुख, गर्म, अवमर्च और निवडण ये पाँच सन्धियाँ हैं। ये पाँच सन्धियाँ प्रारम्भ आदि अवस्याओं से अनुगत रहती हैं। मुखसन्धि में प्रारम्मा- वस्था, प्रतिमुख सन्धि में पन्न, गर्भसन्धि में प्राप्त्याचा, अवमी में नियवाति और निर्वहन सन्धि में पलागम का सन्निवेश रहता है। इन पाँचों सन्धियों में मुन्न और निर्वहण संन्धियों को मुख्यता है, क्योंकि प्रतिमुख, गर्म एवं अवमर्श सन्धिों का यपावतर परित्याग मी किया जा सकता है। जब तक हम रूपक में आरम्भावस्या का वर्णन नहीं करेंगे नाटक प्रारम्म ही नहीं। सकता। यदि हम फलमाप्ति का प्रदर्शन नहीं करते, नाटक अधूरा ही रहेगा। प्रारम्म और फल- प्राप्ति इन दो अवस्याओं के वर्णन करने का वात्पर्य है कि मुख और निर्वहण सन्धियों का समावेश स्वयं ही हो जाएगा। रूपक की प्रथम सन्धि मुखसन्धि है। इस सन्धि में रूपक के बीज की सूचना दी वाती है । रस एवं माव आदि से रमगीय मखसन्धि प्रारम्भावस्था में होने के कारण मुख के समान है। मुखसन्धि में बीज अल्परूप से ही प्रका- शित रहता है, प्रतिमुख सन्धि में प्रधानोपाय के उद्घाटन से बीज का प्रबल रूप में प्रायन होता है। मुखसन्धि में बीज का वरन होता है, प्रतिमुख सन्धि में आकर वही बीज फूटने लगता है। परन्नु इस सन्धि में मी बोज कुछ असष्ट ट्या में रहता है। सामालाम की गवेषगा के द्वारा जिसमें बीज का औन्मुख्य १. नाट्यशास्त्र (२१-५४) (Translation of the Natya Shastra by M.Ghosh) २वि भू बीज का [ १४ ॥ हो, यह गर्भ नामक संधि है । प्रतिमुख सन्धि में फिञ्चित् प्रकाशित पार-पार थाविर्भाव, तिर्गमाव तया अन्वेषण होता रहता है किन्तु गर्भ सन्धि में-~ प्राप्याशा से परिच्छिन्न होने के कारण-पल का ऐकान्तिक निश्चय नहीं हो पाता। नहीं पसन, शाप, देवो आपचि या झोप आदि से फल-प्राप्ति में विज उपस्थित हो जाता है, यहाँ 'अयमा सन्धि पायी जाती है। रूपक फे प्रधान वृत्तांश में कथावल के चीज का विकार ( उत्पत्ति, उद्घाटन, फलोन्मुखता आदि ) प्रारम्भ आदि अयस्थाएँ, विचित्र भाव, उपाय ( पिन्दु आदि) और मुख, प्रतिमुख, गर्म एवं विमर्श आदि संधियाँ एक अर्थ के लिए नायक, प्रति- नायक, नायिका, अमात्य आदि के व्यापारों के साथ सम्यक् औचित्य से जय सम्बद्ध कर दी जाती हैं, तर फटागमावस्था से परिच्छिन्न निर्वहण सन्धि की प्राप्ति होती है। नायक भारतीय नाटक के लायक में धैर्य फा पाया जाना अत्यन्त आवश्यक है। यही कारण है कि नायक के सभी मेदों के साथ घोर विरोपण अयश्य मयुक, किया दाता है (नाट्यदर्पणकार के अनुसार मपम और उत्तम नायक के स्वभाव के अनुमोर चार प्रकार के पद है-पीरोइत, पीयेदात, धीरललित भीर धार- शान्त' । देवताओं को पोत के रूप में चिपित करना चाहिए। संनापति और मत्रियों को धीरोदात्तयारूप में निबद्ध करना चाहिए। राजा का निधन पीरटलिग के कोटि में औरैय चादिए । ब्राह्मण और पैश्य धीरशान्त होवे है। धारो माया अनवस्थित, शोर्यादि के गर्व से युक, कूट प्रयोग करने वाला उद्धवोदावललितगान्ताधारविरोपणाः । वाः स्वमाश्चात्यारः गेतृणां मध्यमोत्तमाः ॥ (नाट्यदर्पण, पृ० २६. २. देवा धीरोद्धता ज्ञेया निशालु दृशः स्मृताः । सेनापविरमात्सथ घोरोदाची भीतिती । মায়ান্বিষ্টন্য না নিশাে। (नाट्यशास्त्र, यध्याय ३४-१८९) [ १५ ] एवं स्वप्रशंसी होता है। धीरोदात्त कोटि का नायक अति गम्भीर होता है। उसके मन पर क्रोध, शोक आदि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। वह न्याय करने वाला, क्षमावान् और स्थिर प्रकृति होता है । इस कोटि का नायक स्वप्रशंसा- रहित हुआ करता है। इसका गर्व संयत रहता है। वह अपने प्रण को जीवन के अन्त तक निभाता है एवं शरण में आए हुए की रक्षा करता है। वह लोक व्यवहार और शास्त्र का ज्ञाता एव धर्म में रुचि रखने वाला होता । स्थिरता, दृढ़ता आदि गुण सामान्यतः प्रत्येक नायक में पाए जाते हैं परन्तु इन गुणों की पराकाष्ठा धीरोदाच नायक में ही देख पड़ती है। धीरललित नायक शृंगारी होता है। वह मंत्रियों के ऊरर राज्य-मार छोड़ | देने से राज्य की चिन्ता से मुक्त रहता है । इसका स्वभाव अत्यन्त मृदु होता है । यह गीतादि में भी अनुराग रखता है | इसमें शृंगार रस की प्रधानता पायी जाती है। अतएव इसका समस्त आचरण सुकुमार हुआ करता है। घोरशान्त नायक अहंकार से सर्वथा रहित, कृपालु एवं विनम्र (गुरुधन आदि की आज्ञा का उल्लंघन न करना) होता है। नायिका के प्रति व्यवहार आदि की दृष्टि से उपरोक्त नायकों के पुनः चार | मेट किए जा सकते हैं-अनुकूल, दक्षिण, शठ और सट। जो नायक एक ही नायिका में अनुरक्त रहता है, उसे 'अनुकूल' नायक कहते हैं। दक्षिणायक | एक साथ ही कई नायिकाओं में अनुराग रखता है परन्तु उसका व्यप्रेदार भी नायिकाओं से एक समान होता है। घृष्ट नायक लजाहीन हुआ करता है। यह अपनी पूर्वा नायिका से अपने नवीन प्रेम को छिपाता नहीं है । इसारीत शठ नायक अपने नवीन प्रेम को छिपाया करता है। प्रकृति भेद के अनुसार नायक के तीन भेद होते हैं-उत्तम, मध्यम और अवम । उत्तम नायक विनम्र, मधुर, त्यागी, दक्ष, प्रिय बोलने वाला, बातचीत करने में कुशल एवं युवक होता है । इसी प्रकार इसमें और मी उत्तम गुण पाए १. धीरोदतश्वरश्चण्डो दो टम्मा विकत्यनः । (नाट्यदर्पण, पृ. २७) २. धीरोदात्तोऽतिगम्मीरो न्यायी सत्त्वी हमी स्थिरः। (वही, पृ० २७) ३. शृंगारी धोरललितः कलासक्तः सुखी मृदुः। (वही, पृ. २७) ४. धीरधान्तोऽनहकारः नाविनयी नयी । (वही, पृ० २७) [१६] जाते हैं। मप्पन भकृति के नायक न वो बहुत 'उत्कृष्ट और न बहुत अरष्ट गुण पाए जाते हैं। निम्न प्रकृति का नायक पापो, चुगलखोर, आलसी, कृवर्मा, हीन सत्त्व, स्त्री-लोलुप, रूस और बड़ होता है। नायक के पुनः तीन भेद किए जा सकते हैं-दिञ्च, अदिव्य एवं दिव्यादिव्य। देवता दिल्य, मनुष्य अदिव्य और मनुष्य का रूप धारण किए देववा दिव्यादिम्य होते हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर नायक के १४ मेद होते हैं। नायक में पुरुषत्व युक्त आठ सात्त्विक गुणों का होना परमावश्यक है। ये सात्त्विक गुण निम्न हैं-तेज, विलास, माधुर्य, गोमा, स्थैर्य, गाम्भीर्य, औदार्य एवं ललित । इन्हीं उपरोक्त गुणों के कारण हो नायक की उत्तमता, मध्यमता या अधमता निर्धारित की जाती है। 1 नायिका यद्यपि नाटक आदि रूपक में नायक का विशेष महत्व है, तथापि नायिका का इससे कम महत्व नहीं है; विशेषकर शृंगाररस-प्रधान रूपक में| याचार्य मरत ने नाट्यशास्त्र में नायिकाओं के चार भेदों का उल्लेख किया है-दिव्या, नृप-पत्नी, कुलस्त्री और गगिा। काम और अर्थ का प्राधान्य होने से ललितोटार रूपक में पप्पकामिनी का निबन्धन करना चाहिए। प्रहसन से भिन्न रूपक में गनिसा को नायक के प्रति निक्ति करना चाहिए । 'दिव्या' नापिका दिव्य कुल से उत्पन्न रहती है। इसी प्रकार, नृप-पत्नी भी उदयोद्वा होता है। अपस्या तथा काममावना है आधार पर कुलजा आदि नायिकाएँ तीन प्रकार की होती है-मुग्धा, मप्पा और प्रगल्मा । मुग्धा नायिश यौवन और काममायना से युक्त रहा करती है। अनभिज्ञ होने के कारण यह नुरत आदि क्रीडायों से विपरीत रहा करती है। मघ्या नायिका यौवन और कामभावना दोनों से पूर्ण रहा करती है। इसके अन्दर काममावना का स्वल्प उद्रेक पाया घाटा है। यह मुरत को मूछ के। चन्ता रकसद सपदी है। मारक के प्रतिकूल आयरल करने पर यह मारमा करती है। ऐसी अवस्था में उसके चीन मेद होते हैं-धीय, अघीय और पीपपीय। प्रिय के अपराध करने पर घीरामध्या पक्रोति के द्वारा उसके हृदय फोदुखितफरती है। अघीय नेत्रों में अभुमरे हुए फटोर पचन सुनाती है। योगधीरा मया रदन [ १७ ] करने के साथ ही साथ व्यंग्य वचनों का प्रयोग भी करती है। प्रगल्भा नायिका में यौवन, क्रोध और काम अत्यन्त दीप्त रहा करता है। वह प्रिय के द्वारा सर्श किए जाने पर ही अपने चैतन्य का त्याग कर देती है। वह अचेतन सी हो जाती है। मध्या नायिका के समान इसके भी तीन मेद हैं-धीरा, अधीरा और धीराधीरा। घीरा प्रगल्भा या तो आवश्यकता से अधिक नायक का सत्कार करती है या सुरत के प्रति उदासीनता प्रकट करती है। अधीरा प्रगल्भा क्रोध में आकर नायक की ताडना करती है। धीराधीरा प्रगल्भा व्यंग्य और कठोर वचन कहती है। नायिकाओं का वर्गीकरण अन्य आधार पर भी किया जा सकता है। नायक के सम्बन्ध के आधार पर नायिका के पुनः तीन भेद किए जा सकते हैं-स्वीया, अन्या और सामान्या । 'स्वीया' नायिका नायक की स्वयं परिणीता पन्नी होती है । 'अन्या' या तो किसी व्यक्ति की अनूदा कन्या हो सकती है या किसी की विवाहिता पत्नी। तीसरी श्रेणी की नायिका साधारण स्त्री होती है। उपर्युक्त सभी नायिकाएँ प्रकृति भेद से तीन तरह को होती हैं-उत्तमा, मध्यमा और अधमा। उत्तम प्रकृति की स्त्री लज्जायुक्त; मृदु स्वभाव वाली, धीरा, गम्भीरा, स्मित हास करने वालो, विनीता, कुलजा, चतुरा और स्नेहला होती है। मध्यम प्रकृति की स्त्री में मध्यम गुण और नीच प्रकृति की स्त्री में नीच गुण पाए जाते हैं। अवस्था के भेद से नायिकाएँ आठ प्रकार की होती हैं--प्रोषितप्रिया, विप्रलब्धा, खण्डिता, कलहान्तरिता, विरहोत्कण्ठिता, वासकसज्जा, स्वाधीनमर्तृका और अभिसारिका । जिस नायिका का प्रिय धनोपार्जन, राज-प्रयोजन आदि के कारण देशान्तर में स्थित रहता है, शृंगारादि से रहित वह नायिका 'प्रोपितरिया' कहलाती है । समय पर प्रिय के न आने से दुःखित नायिका को 'विप्रलब्धा' से अभिहित किया जाता है । 'खण्डिता' नायिका असूया से युक्त रहती है। 'कल- हान्तरिता' नायिका नायक के अपराध करने पर ईयां तया कलह के कारण उसका परित्याग कर देती है और बाद में पश्चात्ताप मी करती है। अनपराधी प्रिय (जिसने अन्य स्त्री के साथ मुरत आदि क्रीड़ाएँ नहीं की हैं) के आगमन में विलम्ब देखकर उत्सुकता से उसकी प्रतीक्षा करने वाली नायिका 'विरहो- त्कण्ठिता' कहलाती है । प्रिय के आगमन के समय हर्ष से अपने को संवारती हुई .
[ १८ ] नापिका 'वासकसज्जा' कहलाती है। स्वाधीनमर्तृका' नायिका का पति इसके वश में रहता है। सुरतायिनी नायिका स्वयं नायक के पास गमन करे या मिष को अपने समोर बुलए, 'यभित्तारिका' कही जाती है। विदूपक नाट्य में विदूषक का प्रयोग प्रधानरूप से हास्य के निमित्त ही किया जाता है। इसका मुख्य कार्य हास्य का उत्पन्न करना ही बताया गया है। नाट्य- दर्पणकार के अनुसार दिपक खल्वाट होने के कारण, दन्तुर, कुबड़ेपन और विकृताननत्वादि मागिक विकारों के द्वारा, आकाश-विलोक्न, गमनादि नेरम विकारों द्वारा एवं असम्बद्ध, निरर्थक और अदलील भापण आदि याचिक विकारों के द्वारा हास की उत्पत्ति करता है । पुनः इनके मतानुसार विद्रूपक शान्ति को कलह के द्वारा और क्लह को शान्ति के द्वारा नष्ट करता है। राना को वियोगावस्था में विनोददान के द्वारा विदूपक उसको प्रसन्न रखता है। साहित्य- टर्पणकार विश्वनाथ ने भी आगे चलकर यह बताया है कि विदूषक नेम-व्यापार में नृप का अनन्य मित्र हुआ करता है। यह अपने कर्म, रूप एवं भाषण के द्वारा हास्य की अभिव्यक्ति करता है। यह ईप्पालु, दलहप्रिय एवं अपने पत्र का ज्ञाता भी होता है । इसके अतिरिक्त विदूषक नायक का अन्तरगनिए भी हुआ करता है । वह प्रेम विषयक व्यापार में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से नायक के साथ परिहास भी किया करता है। इसके अतिरिक्त विदूषक पूर्वरङ्ग में भी उपस्थित होकर कयायलु का संकेत करता है । यह पूर्वरण में त्रिगत के अवसर पर सूत्रधार और उसके सहायक फे १. हास्यकृच्च विदूषकः (दशरूपक, द्वितीय प्रकाय, नवी कारिका) विदूरको हास्पनिमिचं मवति (नाट्यदर्पण, पृ० १७७) २. हास्यं चास्याङ्गनेस्ययचोविकारात् त्रिधा । तत्राशदास्य गलदि- सञ्ज-दन्नुर-विकृताननत्वादिना । नेपथ्यहास्त्रमत्यायदाम्बरवोल्लोदितक्लिोस्ति- गमनादिना । वचो हास्यमयसम्बवानयंगलीलभाषणादिना मयति । (नारचटर्पन, पृ० १७७) ३. कर्मवपुर्वपमापार्यः। हास्यकरः कलदरतिर्विदूषकः स्पायनशः। ( साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, पृ० १०६) [ १९ ] साय प्रवेश करता है। विदूषक सहसा मञ्च पर भाकर पहेलीयुक्त बात करता है । तदनन्तर वह कुछ प्रश्न करता है। यया यहाँ कौन है ? किसने विजय प्रात की ? आदि,आदि। इसके साथ वार्तालाप करते हुए सूत्रधार कथावल की सूचना देता है। भरत के अनुसार विदूषक द्विज होता है। इसके दाँत बड़े-बड़े और आँखें रक्त वर्ण की होती हैं। यह कुबड़ा और विकृत रूप वाला होता है। इसके द्विज होने का अभिप्राय यह है कि विदूषक शूद्र जाति का नहीं हो सकता । शारदावनय ने भी मरत के शब्दों को यत्किञ्चित् परिवर्तनों के साथ दुहराया है। द्विज होने के कारण विदूषक यज्ञोपवीत धारण किए रहता है । यह अपने हाय में ठही मी लिए रहता है जिसे दण्डकाय अपवा कुटिलक कहते हैं। ब्राह्मण जाति का होने से स्वभाव से ही वह पेट्र, मधुर-प्रिय एवं भी होता है। नापक के चार मेदों के आधार पर विदूषक के मी चार भेद हैं-लिङ्गी, द्विज, राजजीवी और शिष्य; जो क्रमशः दिव्य, रुप, अमात्य और ब्राह्मण नायक के विदूषक होते हैं । शारदावनय ने चारों प्रकार के नायकों के विदूषकों के गुणों का उल्लेख किया है। देवताओं का विदूषक सत्यवादी, भूत, वर्तमान और भविष्य का शदा, कृत्याकृत्य का विशेषज्ञ, तर्क और वितर्क करने वाला और यथार्य, दृष्टिवादी हुआ करता है। राजा का विदूषक शिष्ट परिहास करने वाला, अर्थ और स्त्रियों में शुद्ध मन वाला और देवी की परिचारिकाओं का १. तया च मारती मेदे त्रिगत सम्प्रयोजयेत् ।। विदूषकत्वेकपदा सूत्रधार असम्बरकयात्रायां कुर्यात् कथानिकां ततः ॥ वितण्डा गण्डसंयुक्तां नालोकं च प्रयोजयेत् । कस्तिष्ठति जितं केनेत्यादिकाय... (नाट्यशास्त्र, पञ्चम अध्याय, पृ० २४२) २. वामनो दन्नुरो कुनो द्विजन्मा विकृताननः । खलतिः पिङ्गलाशश्च स विषेये विदूषकः ।। (नाट्यशास्त्र, अध्याय ३५-५७) ३. भावप्रकाशन, पृ० २८९, दशम अधिकार । ४. नाव्यद्यास्त्र, अध्याय ३४, १६-२० । . .....
[ २० ] मियतम होता है। यह अन्तःपुर में भी भ्रम च्यिा करता है। यह इन्सोड, कलह-युक्तः और प्रणय कोष में देवी को प्रसन्न करने वाला होता है। अमात्य का विदूषक अश्लील क्का, टमति के अपराधों का प्रकाशन, मन और अमन सभी पदार्थों का प्रेमी होता है। इसके अंग और वेष समी विरूप होते हैं। कांगञ् के विदूषक का वेप, अङ्ग, वचन एवं परिहार सभी विरुप होता है। प्राप्तण होते हुए भी विदूषक माकृतभाषा का ही प्रयोग करता है। मरत ने स्पष्टरूप ने कहा है कि विदूषक को वार्तालाप करते समय प्राच्च प्राकृत का प्रयोग करना चाहिए । इसी नियम का उल्लेख सागरनन्दिन आदि विद्वानों ने भी किया है। राजशेखर 'सर्वमापाविचक्ष' एवं 'सर्वमापाचनुर'' महारवि राजोखर का बन्न यायावर कुल में हुआ था। इनके पिता का नाम दुर्दुक एवं माता का नाम शीलवती था। इनके रिदामह महाराष्ट्रचूडामगि अफालदलद थे। इन्होंने अवन्तिसुन्दरी नाम की चौहानवंशी विदुपी धतिय ललना से विवाह किया था। इन्होंने अपने को पाल्मीकि, मर्तृमेण्ट और मयभूति का अवतार माना है। ये कान्यकुब्ज नरेश महेन्द्रपाल के यहाँ याचार्य में रहते थे। सिपी- २. भावप्रकायन पृ० २८१-८२ । २. प्राच्या विदूषकादीनाम्-- (नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, ३८ वोलोक) ३. चौरसेनीमथप्राच्यामवन्ती पहिचेत् पठेत् । एता एव पणिक भेष्ठि बालकारच विदूषकाः ॥ (नाटकलशगरनको) ४. कर्पूरमञ्जरी, प्रथम बानिकान्तर । ५. तदकालजलदत्य प्रगप्नुस्तस्य""1(विशालमडिया, मपम अक) ६. चाउदाणकुलमौलिआलिआ रामहर कइंदरोहिणी । भनुमोकिदिमविलुंदरी सा पठंजइदुमेटमिच्छदि ।। (कर्पूरमजरी, प्रथम जयनिरान्तर, ११) ७. बभूव वल्मीकमवः कविः पुरा ततः प्रपदे मुवि मतृमष्टताम् । स्थितः पुनयाँ भवभूतिरेखया सवे सम्प्रति गजशेखरः ।। (बालरामायण १०१६) ८. रघुकुटविटको महेन्द्रपाट, सलकलानिलयः त यस्य शिप्यः । (विदालमनिका, प्र० स०, ६) [२१ ] टोनी के शिलालेख से ज्ञात होता है कि महेन्द्रपाल ने ९०३ ई०-९०७ ई० तक राज्य किया। अतएव राजशेखर का स्थितिकाल ९०० ई० के लगभग निद्ध होता है । पुनः कुछ अन्य तथ्यों से भी इनके काल-निर्णय में सहायता मिलती है। एक ओर राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में उद्भट (८०० ई.) एवं आनन्दवर्धन (८५० ई० ) का उल्लेख किया है। दूसरी ओर यद्यस्तिलक चम्पू (९५९ ई०), 'तिलकमलरी' (१००० ई.) और 'व्यक्तिविवेक' (११५० ई.) में भी राजशेखर का उल्लेख है। इस प्रकार राजशेखर दसवीं शती के प्रारम्भ में हुए थे, ऐसा सिद्ध होता है। इनके बनाए हुए निम्न ग्रंय हैं-(i) काव्यमीमांसा, (ii) भुवनकोष (iii) बालरामायण, (iv) वालमारत, (v) कर्पूरमञ्जरी, (vi) विद्याल- मक्षिका । काव्यमीमांसा के अवलोकन से इनकी अद्वितीय प्रतिमा का पता चलता है। यह प्रायः कवियों की शिक्षा का ग्रंथ है । 'भुवनकोष' कदाचित् भूगोल का अन्य था । बालयमायण दस अड्डों का नाटक है। इसका दशम अङ्क भौगोलिक वर्णनों से ओत-प्रोत है। वालमारत के केवल दो ही अङ्क उपलब्ध हुए है। कर्पूरमञ्जरी चार अों का सट्टक है । सम्पूर्ण ग्रंथ प्राकृत भाषा में लिखा गया है । इसमें राजा चम्डपाल और कुन्तलराजकुमारी कर्पूरमञ्जरी की प्रेमकथा का वर्णन किया गया है। विद्धशालभञ्जिका राजशेखर विरचित 'विशालमलिका' चार बडों की एक नाटिका है । इसका कयानक इस प्रकार है-लाटपदेश के अविपति नृपतिश्रेष्ठ चन्द्रवर्मा के एक पुत्री पैदा हुई । निप्पुत्र होने के कारण उसके दूतों ने मन्त्री से पुत्रोत्पत्ति की सूचना दी। उन लोगों ने उस पुत्री को पुत्रवेश में सम्राट् विद्याघरमल्ल के संदर्शनार्थ बड़े सफल ढंग से पहुंचा दिया। विद्याघरमल अपने मित्र विदूषक से कहता है कि आज मोर के समय स्वप्न में कमनीय अङ्गों वाली अबला दिखलाई पड़ी। मैंने उसे पकड़ने का प्रयल किया किन्तु वह अपने मोती के हार को छोड़कर अन्यत्र चली गई। इघर राजा मंत्री भागुययण को इस रहत्य का शन या कि मंगाकवर्मन् कन्या ही है और जिसके साय उसका पाणि- १. Keilhorm, Epigraphia Indica i, 171 [ २२ ] ग्रहण संस्कार सम्पन्न होगा वह चक्रवर्ती सम्राट बनेगा। अतएव वह मंत्री इस बात का प्रयत्न करता है कि विद्याधरमल एवं मृगांकवर्मन परसर प्रणयसूत्र में बँध जायें। पुनः संयोगवश राजा अपनी चित्रशाला में अग्नीवप्नगत प्रेयसी की खुटी हुई मूर्ति (शालमञ्जिका) देखकर उसके गले में मोतियों का हार डाल देता है। यह प्रथम अङ्क का फयानक है। दूसरे अह में रानी कुन्दनराड- कुमारी कुवलयमाला का पाणिग्रहण सत्कार अपने मामा के पुत्र मृगांकवर्मा के साय सम्पन्न करना चाहती है। इधर विदूषक के साथ राजा अरने वन की मुन्दरी मुंगाकापली को प्रणय लेख पढ़ते हुए देखता है। इस प्रकार ये दोनों परस्पर अनुरक्त हो जाते हैं। तीसरे अङ्क में नायक एवं नायिका का परसर मिलन होता है। चाये अदा में रानी हसी करने के उद्देश्य से मृगांकरमा को वस्तुतः बालक ही जानकर उसे स्त्रीवेश में रख कर राजा के साथ विवाह कर देती है। किन्तु रानी स्वयं ही टली जाती हैं। उधर चन्द्रवमा का प्रधान दूत आकर सूचित करता है कि मेरे राजा ने पुत्रदान होने के कारण मृगांकावली को पुत्र प्रसिद्ध किया। अब उन्हें पुत्र की प्राति हो गई है। अन्त में रानी मृगांकावली का विवाह राजा के साथ कर देती है, कुवलयमाला का भी विवाह उनचे कर देती हैं। इस प्रकार इस नाटिका का कथानक अत्यन्त रोचक है। नाटिका में श्रृंगार रस प्रधान होता है, अतएव ' विशालमझिका' भी Zगाररस ते परिपूर्ण है। गजदोखर के स्त्री-सौन्दर्य की कल्पना देखिए- चक्षुर्मेचकमम्बुजं विजयते वक्त्रस्य मित्रं राशी भ्रसूत्रस्यसनाभिमन्मयधनुलांदण्य पण्यं वपुः । रेखा कापि रदच्छदे च मुतनोगांत्रे च तत् कामिनी मेनां वर्णयिता रमरों यदि मवेद्वैदग्भ्यमभ्यस्यति ।। (म० अ०,३३) और भी माधानतितमण्डन ददनं किंचियगल्म दृशी स्तोकोद्भद-निवेशितस्तनमुरो मध्यं दरिदाति च । अस्य पापनं च फलया पत्पमेणोशः सत्कार इव स्मरफमुद्ददा दद् यौवनेनापितः ॥ (म० अ०,४०) प्रभाव-वर्णन, राज्या-वर्णन, यसन्त-वर्णन और चन्द्रिका का वर्णन भी अत्यन्त सर्जव है। यथा-प्रभाव-वर्णन ही देखिए-
[ २३ ]
मजत्यपरवारिधि रजतपिण्डपाण्डुः शशी
नमन्ति बलजुबुद्द्युतिसपतयस्तारकाः।
कुरण्टकविपाण्डुरं दधति धाम दीपाङ्कुरा-
वचकोरनयनारुणा मवति दिक् च सौत्रामणी ।। (च. अं०, १)
(चाँदी के गोले के समान गौरवर्ण चन्द्रमा पश्चिम समुद्र को जा रहा
है, पंक्तिबद्ध तारागण पानी के बुलबुले की भाँति झुक रहे हैं। घरों के दीपक
की ली
कुटज पुष्प की माँति उज्ज्वल हो रही है। पूर्व दिशा चकोरों के नेत्री
की मांति लाल हो रही है।)
धत्ते पद्मलता दलेप्सुरुपरि स्वं कर्णतालं द्विपः
शम्पस्तम्बरसान्नियच्छति शिखी मध्ये शिखण्डं शिरः ।
मिथ्यालीढमृणालकोटिरसमाद् दष्ट्राङ्कुरं शूकरो
मध्याहे महिषरच वाञ्छति निजच्छायं महाकर्दमम् ! (प्र० अं० ४३)
(पद्मलता के दलने का इच्छुक हाथी दोपहर को गर्मों से व्याकुल होकर
अपने ऊरर अपने बड़े-बड़े कानों को चला रहा है। घासों के रसास्वादन को
त्यागकर मयूर अपने सिर को अपने पंखों के अन्दर छिपा रहा है। सूअर ने
कमल की जड़ को खोद-खोदकर खाना बन्द कर दिया है। सुअर और भसे
अपने शरीर पर लेप करने के लिए गहरे कीचड़ की इच्छा कर रहे हैं ) उपरोक्त
दलोक में पशुगण गमों से कितना व्याकुल हो रहे हैं, इसका कितना ही स्वाभा-
विक चित्रण हुआ है।
पदध्वनि से भी पदार्थ की प्रतीति कराने में राजशेखर अत्यन्त निपुण है ।
'अमन्दमणिनूपुरक्वणनचारचारक्रम,
झणजज्ञणितमेखलं स्खलिततारहारच्छटम् । (द्वि० अं०६)
इस नाटिका में लालित्य यत्र-तत्र-सर्वत्र भरा पड़ा है। इसका मंगलाचरण
ही लालित्य से मरा हुआ है-
कुलगुरुरवलानां केलिदीक्षाप्रदाने परममुहृदनंगो रोहिणीवल्लभस्य ।
अपि कुसुमपृषकैर्देवदेवस्य जेता जयति सुरतलीलानाटिकास्त्रधारः।।
विद्यालभजिका में लोकोकियों एवं सूचियों का भी सुन्दर प्रयोग हुआ
है। यथा-
[ २४ ] श्रियः प्रसूते विग्दो रणद्धि यद्यांसि दुग्वे मलिनं प्रमाटिं। संस्कार-शौद्धयेन परं पुनीते शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ॥ (म० अं०८) 'न खटु अनुत्पीडितः सहकार-पृष्ठ-प्रन्यिः रससर्वस्वं मुञ्चति' आदि, आदि। मुहाविरों का भी प्रयोग दर्शनीय है-'घरं तत्कालोपनतस्तितिरः, न पुनर्दिवसा- न्तरितो मयूरः' 'यदरिष्टमधिरूढा कारपली-बल्लरी किमुच्यते फटुक्त्वं मति' । (क्रमश: प्र० अं0, च० अ०) इनकी इस नाटिका में यद्यपि प्रवाह की शिथिटता पायी जाती है, तथापि इसमें भावों को अत्यन्त ही प्रभावोत्पादक ढंग से व्यक्त किया गया है। आँसुओं के गिरने का कैसा अन्छा वर्णन है- अन्तस्तारातरलितजलाः स्तोकमुत्पीडमाजः पक्ष्माग्रेषु प्रसृतपृषतः कीर्णधाराः क्रमेण । चित्तातई निज-गरिमतः सम्यगासनयन्तो निर्यान्त्यस्याः कुवलयदृशो वाप्प-वारा प्रवाहाः ॥ (तृ. २०२४) (नील कमल के समान नेत्रों वाली इस सुन्दरी के आँस पहले पुटियों से सरल-भाव को प्राप्त हुए, क्रमशः थोड़ा सा दबाव पड़ने से वरौनियों के अग्रभाग पर दूंदों के रूप में फैल गए । तदनन्तर परस्पर गुंथ कर एक धारा में परिवर्तित हो गए और अब अपनी गुरुता से आन्तरिक पीड़ा को सम्पक प्रकार से प्रकट करते हुए प्रयाह के रूप में बाहर निकल रहे हैं।) इसी प्रकार से और भी बहुत से उदाहरण दिए जा सकते हैं। इन सब बातों देखते हुए निम्न उक्ति यथार्थ ही प्रतीत होती है- पातुं शोर-रसायनं रचयितुं वाचः सतां सम्मता व्युत्पत्ति परमामवाप्नुमवधि लब्धं रस-स्रोतसः । भोक्तुस्वादुफलं च जीवित-तरोयद्यस्ति ते कौनुकं तद् भ्रातः ! शृणु राजशेखर फवेः सूतीः मुधास्यन्दनीः !! (प्र. ०७) प्रथम अह में राजा की यह उक्ति "अहो । गाहन्यम् ! अहो ! शिखरिणी पाः। अशे ! सूक्ति-युक्ता वाचः। अहो ! हृद्या वैदी रीतिः। अहो! माधुर्य पर्यासम् । अहो ! निष्प्रमादः प्रसादः" । पूर्णरूप से विद्यालमनिका नाटिका पर भी लागू होता है।
२ ११ ८७ २३ श्लोकानुक्रमणिका अ किमु परमपरैः परोपकार ३ अकवणमकुण्डलं घरगि ७५ । कुन्दलतायां विमुक्त अत्रान्तरे ललितहार १२) कुलगुरुरवलानां अन्तस्तारातरलितजला: क्रमपरिणतरेखामांसलर २५ अमन्दमणिपुरक्षपानचारुचारिझम ४५ कमसरलितकण्ठप्रक्रमल्लासितोर अयि तव विद्याधरमल्लदेव ५८ | कथितदुग्धमुग्धकरतरलित ७३ अयि पिवत चकोराः क पातव्या ज्योत्रा अस्यास्वेदाम्बुबिन्दुच्युततिलकतया४६ ग अहो वपुत्रीलिखिनुर्जनस्य २४ गर्भ ग्रन्थिपु वीरुधां सुमनसो आ गंगापातपूतप्लुतनलिनतलात् ११९ गोनासाविनियोजितायत २ भालिखितामिव चेतः धदुर्मेचकमम्युज विजयते इयं चरणकुकुमच्छुरितकुहिमा चञ्चलचरणचण्इचारक्रम ४५ इह विचकिलचापे सन्दधत् ९९ चन्द्रं चन्दनकर्दमेन लिखित ५३ इह हि नववसन्ते १९ / चन्द्रो जडः कदलिकाण्डमकाण्डशीत ४३ चेलावलेन चलहारलतामकाण्डै उत्तालालकमानानि कयरीमारेषु ४४ उत्तंस केकिपिच्छेमरकतवलपश्यामले७२ जनानन्दश्चन्द्रो लसति ७३ उपप्राकारानं पहिशु नयने जाने स्वप्नविघी ममाद्य क जलाः संज्यानं विसकिसलयः कण्ठे मौकिकमाटिकाः स्तनतटे जातः सम्प्रति मे कुलैकतिलकः १४ क्यय किमिद वाले १२ गलीलाश्वसितमरुतशतपी कयं ते तरक्षणस्फुटितशुक्तिसंपुट कयर रवया ज्ञायन्ते ५८ तद्वक्त्रं यदि मुदिता शशि कथा कन्येति सूचयति वेप-विशेष तनुलना इव ककुमा कारमिः कारितं तेन तरहसदृशोऽङ्गने पततु, कार्णाटो युद्धनाटपे चतुरतरमतिः 10 तरुणी कुरुनियमिव शनैरेव ३ ४८ २० १० ५०१ ८ २४ ८९ । ८१ ८२ ८८ त्तस्मिन् पञ्चवरे स्मरे भगवता म तापोऽम्मा प्रसूतिम्पचः प्रचयवान् | यन्द्रादरः कुसुमपत्रिपु पेलपेषु ३० तारान्तः पुरवान् विपत्यपि शशी १० मयि शिशिरतरोपचारयोग्य नालीदलं यदकटोरतरं यदा * । माधानतितमण्डनभु बदनं मानो यासांन सण्डिता इशा दग्धेमनसिज १ मुरवाऽनाकुमुमविशिरसान् देवीझोरकषायितं नामिता मूलं वालधि-वीरां सुरमयो देत्या निधायोरपि बामपाद EE मृगालमेतलयीकृतं नया द्वियोनि पुराणमौक्तिम्मगि य पर पश्यन्ति मरियपाइसरगि धत्ते पालता दलेप्सुरुपरि रवं ३. पालीदलपारुपा दुपदनं पद्मूलते तरलिते न यात्रद्रावितकैनकोदरदल मखदलितहरिद्राग्रन्यिगोरे ७९ यन्मनुशिक्षितमितोराना मगीना२० नयनरमलेन मुतनोदिनजित यस्य कृते वहसि रुजा न स्वप्नानुमवस्य कट्रिपर २० ये दोटालिकारा मनधि मृगहशो १८ निसूनुना मा परिकल्पिताऽभून् 114 | येनोपलानि च पाशीच निविपरकितन्दुसर ५२ | ये पूर्व यवसूचिसूत्रमुहदो निवासरजीवपिण्डकरणं र नो मालतीदाम विमर्दयोग्यं ६. उजनिवामयामेदादिशन्ती प पागि मेहणतो विशीर्णविरसः ८५कातोरणमालिकातरलिनो पातुं श्रोत्ररसायनं रचयितुं हाचम्पपिरवपानिमः १०४ प्रणालीदीर्घस्य मतिकलमपादस्य टेन्द्रपन्द्रवर्मा भरपनितिटया पिपाविरहमदोमामम य प्रेयान मे दन्तिदन्त प्रदमदपुर १ वनश्रीजितलजिनेन्दुयदिदं बागान संघर मुख कार्नरला धामा पुलम्ननग्नपकिन विधत्ते सोडून्य कतरदिह विसीयेन्दुः साचादमुनरममापी भवनमुवि एजन्तरवार विशन्तीनां पार्नु बचन विनिवेश भार्या दासन पुनिधनाः स्यजनमरतः वामगी मिन्दाना मुग्दीमा पतिपु • मजदपरशारिधि रजवापिसातुः २ २६ ९५ ४ ८२ १२. ६५
७५
सुतनुरियमितस्ततश्च चित्रे
शिक्ष्यसे कयं खलु प्रसरत्
मुरलभरखितपनगविलासिनी
शिखामगिरितोऽरुणस्तिलकयत्यं सूतिर्दुग्धसमुद्रतो भगवतः
शीतांशुपिसोदरः फणभृतां 24 सैरन्ध्री करकष्टकणसर
श्यामां श्यामलिमानमानयत भोः ६१ / सौधादुद्विजते त्यजन्युपवनं वेष्टि
श्रियः प्रसूते विपदो रुगद्धि
४ स्मरशरधिनिकाश कर्णपाशं
स्वकण्ठकाण्डात् मुशोऽवतार्य १०३
सद्यश्चन्दनपङ्कपिच्छिलमिव
स्वप्नः किमेप किमु
स्वस्ति श्रीमन्त्रिपुयां नुहिनकर ११७
सपदि सखीमिर्निभृतं
सा कापि स्वप्नविधी याच
सा दुग्धमुग्धमधुरच्छवि
२. हरन्ति हृदयानि यस्लूबाशीतला ९६
साम्यं सम्मति सेवते विचारलं ११ । हाोऽयं केरललीविहसितशुचिभिः ।
स
॥श्रीः॥
विद्धशालभजिका
हिन्दीव्याख्योपेता
प्रथमोऽङ्कः
कुलगुरुरवलानां केलि-दीक्षा-प्रदाने
परममुहृदनको रोहिणी-वल्लभस्य ।
अपि कुमुम-पत्कदेवदेवस्य जेता
जयति मुरतलीलानाटिका-सूत्रधारः ॥ १॥
अपि च-
दृशा दग्धं मनसि जीवयन्ति दशैव याः।
विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुवे वाम-लोचनाः ॥ २ ॥
बियों को रति-क्रीडा का मन्त्र देने में उनके कुलक्रमागत गुरु, रोहिणी-
वल्लभ चन्द्रमा के परम मित्र, कुसुम-शरों से देवदेव शंकर जी को भी जीतने
वाले और संभोग-लीलारूसी नाटिका के सूत्रधार कामदेव जी सर्वश्रेष्ठ हैं ॥१॥
और मी-
(शङ्कर जी के द्वारा ) दृष्टि से जला दिये गये काम को (अरनी) दृष्टि से
हो (पुनः) जो जीवित कर देती हैं, (इस प्रकार ) शंकर जी को परास्त कर
देने वाली उन परम मुन्दरियों की मैं स्तुति करता हूँ ॥२॥
विद्धशालभञ्जिका (पुनः समाधाय) गोनासाविनियोजितायतजरत्साय बद्धीपधिः कण्ठस्थाय विपाय वीर्यमहते पाणी मणीन विभ्रती। मर्तुर्भूतगणाय गोत्रजरतीनिर्दिष्टमन्वाक्षरा रक्षत्वद्रिसुता विवाहसमये ह्रीता च भीता च वः ॥३॥ नान्द्यन्ते सूत्रधारः-(नेपथ्याभिमुखमवलोक्य ) न जाने का पुनरद्य श्री- युवराजदेवस्य परिपदाज्ञा १ नेपथ्ये गोयते- कुन्दलदाऐ विमुक्क-मअरन्दरसाए वि चञ्चरोअओ। पणअप्परूढ-पेम्मभरभञ्जन-काअरभावभीअओ॥४॥ (कुन्दलवायां विमुक्तमकरन्दरसायामपि चचरीककः। प्रणयप्ररूटप्रेममरभञ्जनकातरभावभीरकः ॥ ४॥) तरुणी तरट्टिभ णि पिङ विभ चारुपसूणदिहिरं । रक्सइ णभइ धुणइ परिरम्भइ चुम्यइ चूदाट्टों॥५॥ (पुनः समाहित होकर) विवाह के समय (वर शंकर जी को भयंकर उपकरणों से युक्त देखकर) लजाई और डरी हुई पार्वती जी, जिन्होंने शंकर जी के वाहन बैल के नथुनों में (नकेल के रूप में) लगाये गये दीर्घकाय पुराने साँप का प्रतीकार करने के लिए ओपधि बाँध ली, (शिव जी के) कण्ठ में स्थित विप के प्रतीकारार्थ हाथ में मणियाँ धारण कर ली तथा भूतगण के निवारणार्थ जिन्हें बुल की पूदी स्त्रियों ने मन्त्राभर सिखा दिया, आप लोगों (दर्शको अथवा पाटकों) की रक्षा करें ॥३॥ नान्दी समाप्त होने पर सूत्रधार-(नेपथ्य की ओर देखकर ) में नहीं जानता कि आज भी युवराजदेव की सभा की क्या आशा है? नेपथ्य में गाया जा रहा है- कुन्दलता के मकरन्द रस को त्याग देने पर भी प्रणय-प्रेमाधिक्य के भन्न होने पी शंका से सशंकित भ्रमर, स्फुरली की भाँति समृद, मुन्दर पुप्परूपी (तरुणी कुरुधियमिव शनैरेष चारुप्रसूनकदृष्टिम् । रक्षति नयति महते परिरमते चुम्बति चूतयष्टिम् ॥ ५ ॥) सूत्रधारः (आकण्यं) अये । यायावरेण दौहिक्निा कविराजशेखरेण विरचिताया विद्ध-शालभञ्जिका-नामनाटिकाया वस्तूपक्षेपो गीयते । (विभाव्य ) तन्मन्ये तदभिनये श्रीयुवराजदेवस्य परिपदाज्ञा। वदहमपि मन्त्रिणो भागुरायणस्य प्रतीकवृत्या शिष्यैर्विहितचारुनान्नोऽन्तेवासिनो हरदासस्य भूमिका सम्पादयामि । (आकाशे) सखे सोमदत्त !किमात्य ? तदकालजलदस्य प्रणप्तुस्तस्य गुण-गणः किमिति न वर्ण्यते ? तव शृणु- किमु परमपरैः परोपकारव्यसननिर्गुणितेर्गुणैरमुष्य । रघुकुलतिलको महेन्द्रपालः सकलकलानिलयः स यस्य शिष्यः ॥६॥ आकर्णय च गोष्टीगरिष्ठस्य कृष्णशङ्करवर्मणो वाचः- दृष्टिवाली रसाल की शाखा को धीरे से जाकर अपनाता है, आदर करता है, हृदय से लगाता है और चूमता है ॥ ४-५ ।। सूत्रधार-(सुनकर ) अये ! यायावर में उत्पन्न दुहिक (दुर्दुक ) के पुत्र कविराजशेखर-विरचित विद्धशालमतिका का वस्तूपक्षेप (संक्षेप में नाटक का सम्पूर्ण वृत्तान्त ) गाया जा रहा है । (समझ कर ) तो मैं यह समझता हूँ कि उसका अभिनय करने के लिए श्री युवराज देव की समा की आज्ञा है। तो मैं भी मन्त्री भागुरायण, शिष्यों ने जिनका प्रतीकात्मक नाम चारु रक्खा है-के शिय (चारायण) हरदास की भूमिका (अभिनय ) का सम्मा- दन करूँ। (आकाश) में सखे सोमदत्त ! क्या कहते हो? अकालजलद के प्रपौत्र - ( राजशेखर) का गुण-वर्णन क्यों नहीं करते ? उसी विषय में सुनो- रघुकुलतिलक, सल्लालाओं के आगार, महेन्द्रपाल जिनके शिष्य हैं, परोपकार के व्यसनी इन ( राजशेखर ) के प्रकृष्ट गुणों से बड़कर और क्या है ॥ ६ ॥ गोष्ठी-गरिष्ठ (विद्वत्-सभा में सर्व-श्रेष्ठ) कृष्णशंकर वमा के वचनों को विद्धशालभन्जिका पातुं श्रोत्ररसायनं रचयितुं वाचः सवां सम्मता व्युत्पचि परमामवाप्नुमवधि लब्धं रसस्रोतसः । भोक्तुं स्वादुफलं च जीवितरोद्यस्ति ते कौनुकं तद् भ्रातः! शृणु राजोखरकवेः सूतीः मुधास्यन्दनीः ।। ७ ।। (निनान्तः) इति प्रस्तावना (ततः प्रविशति हरदारः) हरदार:-(सशिरःकम्मम् ) अहह ! प्रज्ञाप्रकर्षः सर्वेपानुपरि यसति। उदुम्- श्रियः प्रस्ते विपदो रुगद्धि यशांति दुबै मलिनं प्रनाष्टि। संस्कारदशौद्धयेन परं पुनीते शुद्धा हि बुद्धिः किल कामधेनुः ॥ ८॥ तदिदं चाम्मद्गुरोश्चरितेयु परनुपलभ्यते । तथा हि- लार्टन्द्रश्चन्द्रवर्मा नरपतितिलकः कल्पिता तेन पुत्री निप्पुगेकपुत्रः कथितमपि तथा मन्त्रिणे तस्य चारः। नुनो-पदि तुम वर्णो के लिए रसायन पीना, सजन-सम्मत वचनों छोरना, परम विशिष्ट ज्ञान को प्राप्त करना, रस-सोत की पथराष्टा को पाना (कहाँ तक पहुँचना), कंपनी के मधुर फल का आत्तादन करना चाहते हो तो भाई ! राजदोखर कदि का अमृत-वभिगो मुक्तियों को दुनो ! ७ ॥ (रंग मद से चला गया) दाठि प्रस्तावना! (तदनन्दर हरदास प्रविष्ट होता है) हरदास-(शिर माते हुर) अइह ! प्रष्ट दुद्धि बने उत्तम है। यहा गया है-मम्न मदों को उत्तन्न करता है, विरतिरों का अवरोध करती है, यश-यानि कराती है, बर को क्निष्ट करती है और संस्कारों को शुद्ध कर परन पवित्र करती है। (इस प्रार) शुद्ध बुद्धि निवप ही कामधेनु है ॥ ८ ॥ यह हमारे गुरु के चन्तिों में पूर्ण रूप से मिलता है। दया-लाट प्रदेश के अधिपठि नृपतिश्रेष्ठ चन्द्रमा के एक पुत्री देवा हुई। निपुत्र होने के कारण उसके दूतो ने मन्त्री के पुत्रोतति की सूचना दी। उस पुत्री को पुत्रदेश में 1 तस्मात् पुत्रावकल्पच्छलत इह महाराजसन्दर्शनार्थ तेनाद्यानायितासौ निरुपघि दधता साधु पाइगुण्यचक्षुः ॥९॥ (आगो.) अयेचारायण ! किमात्य ? अन्तेरिकासहस्सपरिवारस्स महाराअस्स किं तीए विगा पिसूरदित्ति? ( अन्तःपुरिकासवपरिवारस्य महाराजस्व किं तया विना विसंतति ।) ६ प्रति मा मैवम् । अत्र किंचन मंत्रबीजमन्ति, तन् कार्यसिद्धा- वारिभविष्यति। (नेपथ्ये) पच्चूसमुहपडियुद्धस्स सुप्पभादं देवस्स। संपदं खु- (प्रलूपनुखप्रविबुद्धस्य सुप्रभातं देवत्य । सांप्रतं खलु)- माणो जाण ण खण्डिदो ससि अरुक्कैरेण वित्यारिणा हुंकाराणअपंचमस्स वि चिरं-जासु हिदा कुंठिदाः । पच्चूसाणिअदोलणेग ललगा मोत्तण माणगगहं चूडाचुंविदयल्लग्गचटणा वन्ति ताः संपदम् ॥ १०॥ (मानो यासां न खण्डितः शशिकरोल्करेण विस्तारिणा हुङ्काराः नवपञ्चमत्यापि चिरं या स्थिताः कुण्ठिताः। सम्राट् ( विद्याधर मल के संदर्शनार्थ बड़े सफल ढंग से राजनीति के पटगुणरूपी नेत्र रखने वाले उन्होंने (मागुरायण ने ) यहाँ मैंगवा लिया ॥ ९ ॥ (आकाश में ) भरे चारायण ! क्या कह रहे हो ? महाराज के रनिवास में हवारों रानियाँ है । उस ( कन्या) के विना उनको क्या दुःख ? उनके प्रति ऐमा मत कहो । इसमें कोई रहस्य है जो कार्य-सिद्धि के अनन्तर प्रकट होगा। (नेपथ्य में ) तड़के सुख से जगे हुए देव को प्रमात मुखकर हो। इस समय- जिन ( मानिनी) त्रियों का मान चन्द्रमा की (उद्दोपक) किरणों से सण्डित नहीं हुआ, जिन पर कोकिल की हुड्वार कुण्ठित रही-कुछ प्रभाव न डाल सकी, उनका प्रातःवेला के पायु-संचार से मान-मन हो गया और अब -राजनीत के छः गुण निम्न है-सन्धि, विग्रह, यान (चढ़ाई), भामन (विश्राम ), धामार और संश्रय ।।
विद्धशालभत्रिका प्रत्यूषानिलदोलनेन ललना मुक्त्वा नु मानग्रह चूडाचुंबित वल्लभान चरणा वर्तन्ते ताः सांप्रतम् ॥ १० ॥) (पुनस्तत्रैव ) भो भो बंदि-विंदारआ मंतिविणिम्मिदमहाराअवास- घरपेरंतवासी महमलओ तुझे भणदि को पिअ कालो विबुद्धस्स विनाहरमल्लदेवस्स विवुधस्स I ता कत्तो पभादभोभावलि ण गायत्त । (भो भो वन्दिवृन्दारकाः, मन्त्रिविनिर्मापितमहाराजवासगृहपर्यन्ववासी महामल्लको युष्मान् मणति क इव कालो विद्याधरमलदेवस्य विबुघस्य, तत् कस्मात् प्रभातभोगावलि न गायथ!) (तत्रैव)- जय जयोजयिनीमुजङ्ग ! सुप्रभातं भवतः 1 सम्पति हि- द्विॉग्नि पुराणमौक्तिकमणिच्छायैः स्थितं तारकै- ज्योत्स्नापानभरालसेन वपुपा मुनाचकोराङ्गनाः। (मान छोड देने के कारण) उनके मस्तक प्रियतमों के चरण चूम रहे है-- उन्होंने मान त्याग कर प्रियतमों के आगे आत्मसमर्पण कर दिया ॥ १०॥ (पुनः वहीं) हे हे बन्दी जनो! मन्त्री द्वारा बनवाये गये महाराज के वासगृह के पास ही रहने वाले महामल्लक तुम लोगों से कह रहे हैं--महापण्डित विद्याधरमल्ल देव को जगे अधिक समय हो गया। क्यो तुम लोग प्रभातविषयक गान नहीं गाते हो। (वहीं) हे उज्जयिनी के स्वामी ! प्रभात आप को मंगलकारी हो । इस समय- पुराने मोती और मणियों की सौ कान्ति बाले दो-तीन तारे आकाश में स्थित है (दिखाई दे रहे हैं), कोरिया चन्द्रिका को छककर पाने के कारण शरीर के अलसा जाने से सो गई। रसयुक्त मधु के उत्ते की उवि वाला चन्द्रमा अस्ताचल पर अस्त को प्राप्त हो गया । प्राची दिशा विडाट- यातोऽस्ताचलमस्तमुद्रसमधुच्छत्रच्छविश्चन्द्रमाः प्राची वालविडाललोचनरुचां जाता च पात्रं ककुप् ॥ ११ ।। अपि च- मिन्दानः सुन्दरीणां पतिपु रुपमयं हर्म्यपारावतेभ्यो वाचालत्वं ददानः कवयित्पु गुणं प्रातिभं सन्दधानः । प्रातस्त्यस्तूर्यनादः स्थगयति गगनं मांसलः पांसुतल्पा- दस्वल्पादुत्थितानां नरवरकरिणांशृंखलाशिञ्जितेन ।। १२ ।। हरदास:--महत्येव प्रभाते प्रबुद्धो देव इति मंत्रि-मंत्र प्रभाव एवैपः । यतः- कारुभिः कारितं तेन कृत्रिमं स्वप्नहेतवे । सुपिरस्तम्भसञ्चारं नृपतेर्वासमन्दिरम् ।। १३ ।। तदहमपि सुपिरस्तम्भप्रवेशसंचारापसारं वासगृहनिर्मितवतां तथा- यालक के लोचनों की कान्ति को प्रात हुई-बिडाल-बालक के नेत्रों के रंग की हो गई ॥ ११॥ और भी- तुरही अथवा मृदङ्ग का यह प्रातःकालोन गंभीर स्वर सुन्दरियों के पति- विषयक क्रोध को विदीर्ण करता, महल के कपोतों को वाचालता देता, कवियों में प्रतिभासम्बन्धी गुणों को युक्त करता-उनकी काव्य-प्रतिमा को उद्दीप्त करता हुआ, धूल-शयन से उठे, राजा के, हाथियों की शृङ्खला की खनखनाहट से गगन-मण्डल को भर दे रहा है।॥ १२ ॥ हरदास स-बड़े ही तड़के महाराज जग गये, यह मंत्री के मंत्र का ही प्रभाव है। क्योंकि उस (मंत्री) महाराज के वास-मन्दिर को शिल्पियों द्वाय छिद्रों से युक्त स्तम्भों कारण (वायु, पनि आदि का) सञ्चार काला बनवाया है ॥ १३ ।। तो मैं भी छिद्रों से युक्त स्तम्भों के कारण जिसमें (वायु, ध्वनि आदि का) प्रवेश, संचार और अपसार होता है, ऐसे वास-गृह का जिन्होंने निर्माण .
८ -- विशालमलिका विधां रत्नेश्चतुष्किकां च करिप्यतां शिल्पिनां मन्त्रिसमादिष्टं दापयितुं महाभाण्डागारं प्रति यास्यामि । ( इति निकान्ता)। इति विष्कम्मकः (ततः प्रविशति मुसोस्थितः सोत्कण्टो राजा द्वारावस्थितो विदूषकश्च) राजा-(साङ्गमदमुत्याय पति-) तद्वक्त्रं यदि मुद्रिता शनि-कथा हा हेम ? सा चेद् द्युति- स्तशक्षुर्यदि हारितं कुवलयैस्तच्चत् स्मितं का सुधा । धिफन्दर्पधनुर्बु चौ च यदि ते किं वा बहु महे . यत् सत्यं पुनरुक्त वस्तुविरसः सर्गक्रमो वेधसः ॥ १४ ॥ विदूपक:-( उपत्य ) यड्दु भवं । (वर्षतां भवान् ।) किया और रत्नों से उसी प्रकार की चनुरिकका' का निर्माण किया है, उन शिल्पियों को मंत्री द्वारा आदिष्ट (धन) दिलाने महामाण्डागार को जाऊँग । (ऐसा कहकर रंगमञ्च से चला गया ।) इति विष्फम्मक (तदनन्तर सोकर उटा हुआ शोकान्वित राजा और दारास्थित विदूषक रंगमच पर आते हैं।) राजा-(अगों को एंटता हुआ उठकर कहता है)-यदि उसका मुख (संसार में ) है, तो चन्द्रमा का वर्णन समाप्त हुआ अर्थात् उसके मुख के सामने चन्द्रमा की शोभा व्यर्थ है। इसकी शरीर-कान्ति की तुलना में मुवर्ण निष्फल है। उसकी भौहों के सामने कामदेव का धनुष क्या है ? अधिक क्या कहें---सचमुच अनावश्यक पालन् इन वस्तुओं का पुनर्निमाण करने से विधाता का सृष्टिक्रम व्यर्थ सा लगता है ।। १४ ॥ विदूषक-(निकट जाकर) आप फलफूल। १-अनुक्किा~चार सम्मों पर टिका हुआ कमरा अपया पुष्करिणी (गटार) 65/18 राजा- राजा-(तदेव पठति) विदूषकः--अहो ! अपुव्वो कोवि पाभादिओ अजूझयणविही पिअ- वसरसम्स । (अहो ! अपूर्वः कोऽपि प्राभातिकोऽध्ययनविधिः प्रियवयस्यस्य । ) -( तथैव)। विदूषकः-अहो अस्स हिअअक्खेयो ता किं गु खु एदं । (विचिन्त्य ) भोदु अणुबन्धिरसं । गहु अणुप्पीडिओ सहआरपिट्ठ-गंठो रस-सव्यम्स मुश्चदि । (पुरतः स्थित्या ) परिणामफुट्टि विअ दाडिमफलं फुट्टणभूइड वहदि मे हिअआकोदूहलेण, ता जधापत् युथं आचक्खं-तो कन- रहस्सेण संभावेदु मं पिअवअस्सो। (अहो अस्य हृदया क्षेपः। तस्मात् किं नु खल्वेतत् । भवतु अनुभन्स्यामि अनुबन्धं करिष्यामि । न खलु अनुत्पीडितः सहकारपृष्ठप्रन्थिः रस-सर्वस्वं मुञ्चति । परिणाम स्फुटितमिव दाडिमी फलं स्फुटनभूयिष्ठं वर्तते मे हृदयं कौतूहलेन, तस्मात्, यथाप्रस्तुतं आचाणः कार्यरहस्येन समावयतु मां प्रिय वयस्यः।) राजा-( तदभिमुखमवलोक्य ) अये चारायण ! सखे! कथं न कथ- -यामि, लघूमसुहृत्सञ्चारितरहस्यं हि चेतः संविभक्तचिन्ताभारमिय विप्यति। -(उसो श्लोक को पढ़ता है।) विदूषक-अहो ! प्रिय सखा का प्रामातिक पाठ का दंग कुछ अपूर्व सा है । राजा-(उसी प्रकार पढ़ता है।) विदूषक-अहो ! इनका दृश्य कैसा विक्षिप्त सा है ! तो क्या बात है । (सोचकर ) यच्छा, सम्बन्ध स्थापित करूँ जिससे प्रस्तुत का कथन करता हुआ प्रिय सखा मुझे रहस्य से परिचित कराये। आम की पृष्ठ ग्रन्थि ( टेंपी) बिना दबाए रस नहीं निकालती। कौतूहल से मेरा हृदय पकने पर फट जाने वाले अनार के समान फटा जा रहा है। राजा--(उसकी ओर देखकर ) अये चारायण ! सखे ! क्यों न कहूँगा ! मित्र से रहस्य प्रकट कर देने से चिन्ता-भार चॅट सा जाता है और इस प्रकार मन हल्का हो जाता है।
१० विद्धशालभलिका विदूषकः-अवहिदोसि (अयहितोऽस्मि) राजा~जाने स्वप्नविधौ ममाय-युलकोत्सेक्यं पुरस्तादभूत् प्रत्यूये परिवेपमण्डलमिय ज्योत्स्नासपलं महः । तस्यान्तर्नखनिम्तुपीकृतशरमन्द्रप्रभैरङ्गके- दृष्टा काव्ययला बलात् कृतवती सा मन्मथ मन्मथम् ।। १५ ।। विदूषकः-भोः मुठु क्वु तुमं महिलालंपडो जादो जा सा नए णम्भदामजपुत्तिण्णा दिहा कुवलअमाला गाम जाय तगदं कि पि अणुसंघमि दाव एसो अवरो गंडरस उपरि फुडि उभिदो। हुं तदो तदी। (भोः सुष्टु खलु त्वं महिला लंपटो जातः । या सा त्वया नर्मदा मजनोरीणां दृष्टा कुवलयमाला नाम यावतद्गवं किमप्यनुसन्दधामि तावदेपोऊपर गण्डस्योपरि स्फोटिकोइँदः । हुम् उतस्ततः।) राजा-तता आलिखितामिव चतः फलकतलेऽस्मिन् विकल्पवर्तिकया । वाला स्मरचित्रगतां विलोक्य जातोऽस्मि तद्वन्दी ।। १६ । (पुनन्तद्वक्त्रमित्यादि पठति) विदूषक-मस्थिरचित्त हुआ। राजा-मुझे भली मोति शान है-आज भोर के समय स्थान में मण्डलाकृति तथा चन्द्रिका से प्रतिद्वन्दिता करने वालों दीति मेरे सामने प्रकट हुई। उसये अन्दर नखों से साफ किये गये शरद् के चन्द्रमा की प्रभा के समान कमनीय अंग वाली अक्ला दिखाई पड़ी, जिससे बलपूर्वक मन्मथ (कामदेव) को सचमुच मन्मथ ( मेरी बुद्धि को ना कर देने वाला) कर दिया ॥ १५ ॥ विदूषक-अच्छा, तुम स्त्री-लपट हो गये । जो तुमने नर्मदा में स्नान करने निकली कुबल यमाला (स्त्री) देखी, उसके विपय में जब तक कुछ अनुसन्धान फरता तक या दूसरी आपत्ति । हूँ! इसके बाद । राजा-इसके पाट (फामदेव चित्रकार ने) मेरे इस मन रूपी चित्रपट पर विकल्प की लिफा से उसे अंकित कर दिया । फामदेव (चित्रकार) को चित्रगना उन याला को देखकर मैं यब उसका बन्टी बन गया हूँ ॥ १६ ॥ (पुनः उसी उपयुक लोक को पढ़ता है।)
प्रथमोऽङ्कः विदूषकः-तदो (ततः) राना--शृणु श्रवणामृतम् , गण्ड्पय मधु, पिव नयनामृतम् । हारोऽयं केरलसीविहसितशुचिभिः पक्तिभिमौक्तिकानां सद्यः पाण्मासिकानां मम मदिरदृशा दत्तचन्द्रोदयश्रीः । सोत्कण्ठं कण्ठदेशाझटिति कुचतटादो नमो-मन्मथाये- त्यस्तो यन्मध्यरत्नं छुरयति ककुभः कौकुमोभिःप्रभामिः ॥ १७ ।। विदूषकः--( यज्ञोपवीतं परिमृत्य) सुक्खकुसरज्जुकसदारस्स में वम्हणस्स वअणेग सञ्चसिविणत्तणं दे भोदु । (स्वगतम् ) अहो दासीए पुत्त ! सिविणइंदजालिअ ! जाणासि महा-मदीणं वि मदिविवभमं कादं (प्रकाशम् ) उदो। (शुष्ककुयरज्जुकदारस्य मम ब्राह्मणस्य वचनेन सत्यस्वप्नत्वं ते भवतु । अहो दास्याः पुत्र ! स्वप्नेन्द्रजालिक ! जानासि महामती- नामनि मतिविभ्रम कत्तुंम् ततः।) राजा-ततश्च। विदूषक-इसके बाद। राजा-कानों के लिए अमृत (मधुर) सुनो, मधु का आचमन करो, नयनामृत अभी पके मोतियों का यह हार केरल प्रदेश की स्त्री के हास सो दवेत लाड़ियों से जिसकी चन्द्रोदय को सो शोभा को मेरे मदिर नेत्रों ने ग्रहण किया, (नायिका द्वारा) 'ओ३म् नमो मन्मयाय-' ऐसा पड़कर उत्कण्ठापूर्वक, शीघ्रता से कुच के कार ले ( हटाकर ) कण्ठदेश से (निकालकर) डाल दिया गया, जिसका मंचन कुंकुम की प्रमा से दिशाओं को छुरित कर रहा है ॥१७॥ विदूषक-(यज्ञोपवीत सर्य कर ) कुश को रस्सो को तरह कर्कया पत्नी वाले मुझ वाझग के वचन से तुम्हारा स्वप्न सत्य हो । (स्वगत) अहो दासोपुत्र ! इन्द्रजालिक स्वम! तू बड़े-बड़े बुद्धिमानों को मो विभ्रम में डालता है। (प्रकाश) इसके बाद। राबा-इसके बाद विद्धशालभलिका कथय किमिह वाले ! का त्वमित्युल्लपंता- झटिति किल दुकूलस्याश्चले धारयामि । अगमदथ निकेतात् काप्यसौ सारयन्ती नव-कुवलयमालामांसलेईष्टिपातेः ।। १८॥ विदूषकः-अघ एकपल्लंकगदाए देवीए कि पडियण्णं.? (थयैकपयंक- गतया देव्या कि प्रतिपन्नम् !) अत्रान्तरे ललितहारलतानितम्ब संवाहनस्खलितवेगतरङ्गिवाही। देवी व्यपास्य शयनं धृतमानतन्तु- रन्तःपुरं गतवतो सह सौविदल्लैः ॥ १९ ॥ विदूषकः-अहो ! दे अणागरिअत्तणं कित्ति तुए पुरदो भवीस णाणुगोदा देवी केचिरं या चन्दे पसादिदकरे अविसट्टकंदोट्ठा पीलु- प्पलिणी चिट्ठदि । (अहो ते अनागरिकत्वं किमिति त्येया. पुरतो भूत्वा नानुतीता देवी ? क्रियचिरं वा चन्द्र प्रसादितकरे अविस्पष्टोत्सला नीलोत्पन्टिनी । विष्ठति ।) थाले ! यहो, यहाँ क्यों, तू कौन है ? ऐसा कहते हुए मैं शीघ्र ही उसका पलाञ्चल पकड़ता हूँ । ( इतने में ) कुवलयाला मांसल दृष्टिपात से निर्वल फरती हुई घर से निकली ॥ १८ ॥ विदूषक --उसी शय्या पर देवी भी तो थी, उन्होंने क्या किया ? राजा-इस बीच में जयन पर ललित हार की लडिया के रहने के कारण देवी का गमन-वेग बाधित हो जाता था, अतएवं कमित शरीर वह शम्या त्याग करके मान धारण कर अन्तःपुर के अनुचरों के साथ अन्तःपुर में चली गई ॥१९॥ विदूषक--आपकी अनागरिकता भी कैसी है ! आपने सामने जाकर देवों को प्रसन्न क्यों नहीं किया १ चन्द्रमा के फरो (किरणों, हाथों ) के फैलाने पर नीलोत्पलिनी (कुमुटो का चालाय)कर वफ थविकसितमुद रहेगा। ::
प्रथमोऽङ्क.. १३ राजा-(सखेदस्मिता ) तदनुध्यानपरतन्त्रचेतसा धारयितुं न पारिता किं पुनरनुनेतुम् ।. विदूषकः- सच्चं एव्य एवं किदं गड़े दिहे मुंडिदे उवविहो पइ मुंडिदोत्ति । (सत्यमेव एतत्कृतम्-नटे दृष्टे मुण्डिते उपविष्टः पतिर्मु- डित इति ।) राजा-(सखेदस्मितम् ) भगवत्याशे ! सत्यम् प्रतिहतासि । ननु विचारय चिरम्- क पातळ्या ज्योत्स्ना भृतभुवनगर्भाऽपि तृपिते- मृणालो-तन्तुभ्यः सिचयरचना कुत्र - भवतु । या पार्यायो वत वकुलदाम्नां परिमल: कथं स्वप्नः साक्षात् कुवलयशं कल्पयतु ताम् ।। २० ॥ ( स्मृतिमभिनीय हृदयदेवमवलोक्य च ) "स्वप्नः किमेष किरें संविदियं तु साक्षान- ज्ञान किमेतदुभयात्मकमन्यदेव । राजा-(खेद और मुस्कराहट के साथ उस ( वन में देखी गई. मुन्दरी) के अनुचिन्तन में मैं उसे ( देवी को) पकड़ मी नहीं सका, पिर अनुनय करने की क्या बात । विदूषक-नट को मुण्डित देखकर पति भी मुड़ाकर वैडा, इस (लोकोक्ति) को तुमने सच कर दिया। गजा-(सेट और स्मित के साय) हे भगवति आशे! सचमुच नुन कमी विनष्ट नहीं होती। देर तक सोचो- मुक्न के अन्दर पैली चाँदनी को प्यासे फहाँ पी पाते हैं ? कमल-नाल के तन्तुओं से वन-रचना कहाँ हो सकती है ? मौलसिरी पुष्पों को गन्ध कहाँ नापी २. तौलो वा सस्ती है ? स्वप्न साक्षात् (सत्य ) कैसे हो सकता है ! कमलों के समान नेत्र वाली उस मुन्दरी की आप कल्पना कीजिए ॥ २० ॥ (स्मृति का अभिनय कर तया हृदय को देखकर ) क्या यह स्वप्न है ? अथवा साक्षात् सत्ल प्रति है ? अथवा क्या एक दूसरा ही उमगात्मक (सत्यासत्य-मिश्रित) ज्ञान है ! जो वह चञ्चल और - - विशालभजिका यद् दृश्यते न खलु सा तरलायताली कण्ठप्रदेशमधिरोहति चैप हारः॥२१॥ विपकः-मण्णे णिशापिगद्धेण पियहारेण विपरोसि । (मन्त्र निशा-पिनद्धन निजहारेण विमलयोऽति 1) राजा-(मदनामभिनीय) बाणान् संहर मुञ्च कार्मुरलतां सत्यं तव त्र्यम्बकः के नामात्र वयं शिरीपकटिकाकल्पं चदीचं मनः । तत् कारुण्यपरिप्रहात् कुरु दयामस्मिन् विधेये जने वामिन् ! मन्मय ! तादृशं पुनरपि स्वप्नाद्भुतं दर्शय ॥२॥ विदूषका-एसो सिविणअलदेहि मोदएहि गामं उवणिमंतेसि । ता एहि गदुअ देवी पसाह्य । वरं तछालोपनदो वित्तिरोण ग दिअइं- तरिदो मोरो । (एप स्वमर धेमादकै प्रामन् उपनिमन्त्रपते। तस्मादेहि देवी प्रसादयाः । बरं वकालोपनतस्विचिरः, न पुनर्दिवसान्तरितो मयूरः।) बड़े बड़े नेत्रों वाली सुन्दरी दीख नहीं पडती और यह दार नेरे कन्यदेश में स्थित है ।।२१। विदूषक-मैं समझता हूँ कि रात में पहने हुए अपने ही हार नारा नुन उलेगर हो। रादा-(कामावेश को प्रफट कर) बानों को स्टोर लो, अनुप त्याग टो। वर शिव जी नुन्हाय लक्ष्य बन मुझे हैं, वो हमारी, जिसका मन शिष अलिगा की मौजि (कोमल) है, या गगना! तो दयावान होने के नाते इस सेवक पर दया करो। है न्यामिन् मन्मय ! वैसा ही अद्भुत सन पुनः दिसाओ ॥ २२ ॥ विदूपर-पर तो समलम्य नोदकों से (इसे स्वाने के लिर) गाँव भर को बुलावा दे रहे हो। तो आओ, इन दोनों चलकर देवी को प्रसन्न करें। न नी नगद न देह व्यार।
प्रथमोऽङ्कः राजा यदभिरुचितं भवते। विदूषकः--पणजपणमंतसामंतसहस्सअं अत्यागमंडवमग्गम् उज्झोभ इमिणा खिडकिआ दुवारेण पमोअउजाणं पविसिम गच्छह्मा । [तथा कुरुतः] (प्रणयप्रणमत्सामन्तसहस्रकमात्यानमण्डपमार्गमुन्झित्वा अनेन गवानद्वारेण प्रमोदोद्यानं प्रविश्य गच्छायः1) (नेपथ्ये) सुखाय वसन्तावतारो भवतु देवस्य । संप्रति हि- गर्भग्रन्यिपु वीरुधां मुमनसो मध्येऽङ्कुरं पल्लवा वाञ्छामात्रपरिग्रहः पिकवधूकण्ठोदरे पञ्चमः । वस्मात् त्रीणि जगन्ति जिष्णु दिवसेंद्विवैमनोजन्मनो देवस्यापि चिरोज्झितं यदि भवेदभ्यासवश्यं धनुः ।। २३ ॥ सपदि सखीभिर्निभृतं विरहवतीलातुमत्र भज्यन्ते । सहकारमञ्जरीणां शिखोद्गत ग्रन्ययः प्रथमे ॥२४॥ राजा-अये ! सुरभेरम्मः । सैवेयं मन्मथसैन्यसामग्री । राजा-जो आपको पसन्द हो। विदूषक-विनय एवं श्रद्धा से प्रणाम करते हुए सहस्रों सामन्त हैं, अतः दरबारवाले मार्ग को छोड़कर इस गवाश-द्वार से प्रमोदोद्यान में प्रवेशकर हमदोनों चलें। (नेपथ्य में ) देव को वसन्त का आगमन मुखकर हो । इम समय- लताओं की गर्भन्थियों में पुष्पों के मध्य में संकुर और पल्लव एवं कोकिलवधू के कष्ठ के अन्दर पंचम स्वर लगभग उत्पन्न हो गया है, केवल इच्छामात्र चाहिए। मनोज देव का चिरकाल से परित्यक्त तानों जगत् को जीतने वाला घनुष मी कदाचित् दो-तीन दिन में अन्यास-वश्य हो जाय- अभ्यास से काम देने लगे ॥ २३ ॥ सखियाँ तत्काल गुप्त-रीति से विरहिणियों की रक्षा करने के लिए आन- मञ्जरियों के अग्र-माग में निकला ग्रन्थियों को सर्वप्रथम उपयोग में लाती हैं ॥ २४ ॥ राजा-अये ! सुरभि का आरम्म ! वही कामदेव को सैन्य-सामग्री है।
ur विद्धशालभलिका विपकः-चंदिवअणमुव्यमागसिमुभायो उअवणदीसंवत्योअवि- त्यारो सुरहि समयारंभो । ता किं प वणिजइ । (बन्दिवचनामामायि- भावः उपवनहरपनानस्तोकविस्तारः मुरमिसमपारम्मःला कि न पाते।) राजा-तमात्र साम्यं सम्प्रति सेयते विचफिलं पाण्मासिकौक्तिक- बाहोकोरदनच्छदारुणतरैः परशोकोऽचितः। भृङ्गीलंपितकोटिकिशुकमिदं किंचिद्धि पृन्तायते माशिष्ट कुलेश्च पाटलितरोरन्येव काचिल्लिपिः ।। २५ ।। (विचिन्य) सा कापिरवतविधी दृष्टा च मधुश्च यन् समायातः । तदिदं मम लोढगधोरनुपानं तादुग्धेन ॥२६॥ विदूषकः-(परिकामितकेन) कलमकरउकरपंडरेसुं सिंदुवारमंजरीपुंजेर्नु विदूषक-वन्दी जनों के वचनों से जिसका शिशु-माय नुना जा रहा है, उपवन में जिसका थोड़ा सा विस्तार दिखाई पड़ रहा है, (उसी ) वसन्त के समर का आरम्भ है। तो क्यों न वर्णन किया जाय । राजा-तो इसके बाद यहाँ- इस समय विचारिल (एक प्रकार की मल्लिका या चमेली) पुष पर मोतियों से समता कर रहा है । बाटोनी (वाहलोक [इटस देश की स्त्री) के ओटों की मौति अत्यन्त अस्ग पत्तों से अशोक वृक्ष नम्र हो गए है। यह पारा पुष्प, जिसको सर्वोत्कृष्टता भगो द्वारा ( उसके पास न आम्र) तिरस्कृत की गई. कुछ-कुछ वृन्तापमान (वृन्तों से युक्तः) हो रहा है मजीठ की तरह लाल परियों से पालिझुम (पाडर या पाटला)को एक अपूर्व शोभा है ॥२५॥ (तोचकर) उधर ) रूम में मैंने उम मुन्टरी को देखा और (घर) बसन्त जो आ गया, यह मधु पने के बाद गर्म दूध का पीना हो गया ॥ २६ ॥ विपक-(धूनकर) फलन (धान्त विशेष) के मात के. टेर सा श्वेत सिन्दुवार (सँभाल या . प्रथमोऽङ्कः तकालकप्पितधिअमंजिट्टेसुं असोअथवएसुं, निजिद्-मंजिट्ठमसूरमणहरेसुं, माहवीकुसुमेसुं, दधिसरिच्छेसुं णोमालिआमुअलेसुं, दरावत्तिददुद्ध- मुद्धसं विचइल उपकुलपुप्फेमुं, णीसेसपसवसंपदं वजीअ उवमाणेसुं. सदि मे दिट्ठी। (कलमकरोत्करपाण्डरेणु सिन्दुवारमलरीपुओघु। तल्काल- । कल्पितवृतमञ्जिष्टेषु अशोकस्तवकेषु, निर्जितमञ्जिष्ठमसूरमनोहरेषु माघवीकुसुमेधु, दधिसदृशेषु नवमल्लिकामुकुलेषु, दरावर्तितदुग्धमुग्धेषु विचकिलोकुलपुष्पेषु, निःशेषप्रसवसंपट वर्जयित्वा उपमानेषु सजति मे दृष्टिः। राजा-अत्र हि किलोचितोपमानाभिनिवेशिनी ते जिह्वा । विदूषकः-(अग्रतो निर्दिश्य) रंगगणं लदा-णञ्चकोणं, वाहिआलीमल- आणिलतुरंगस्स, वारित्याणं महमवारणस्स, संकेदसदणं णीसेस- कुसुमाणं, पीऊसवरिसं हिअअस्स पमदुजाणं । ता इमं निव्वण- अंतो इदो एदु पिअवअस्सो। (रंगागणं लतानर्तकीनां, वाहिरालीमलयानिल- तुरङ्गस्य, वारिस्थानं मन्मथमहावारणस्य, संकेतसदनं निश्शेषकुसुमानां, पीयूपवर्ष हृदयस्य प्रमोदोद्यानम् । तस्मादिदं निर्वर्णयन्नित एतु प्रियवयस्यः।) निर्गुण्डी) के मंजरी-पुंजो, तत्काल तैयार किये गए घृत सा ईषद्क्त अशोक के गुच्छो, लाल रंग को मात करने वाले मसूर से मनोहर वासन्ती के पुष्पो, दधि सी श्वेत नवमल्लिका की कलियों, (श्वेतता में) शंख और दूध को भ्रमित और मुग्ध बना देने वाले विचकिल (एक प्रकार की मल्लिका ) के खिले हुए पुष्पों के विषय में सम्पूर्ण कुसुमसौन्दर्य एवं समृद्धि को त्याग कर केवल उपमानों पर मेरी दृष्टि जाती है। राजा-तुम्हारी जिह्वा सचमुच उचित उपमानों में अभिनिवेश करती है- उचित उपमान कहती है। विदूषक-लता रूपिणी नर्तकियों की रंगभूमि, मलयानिलरूपी तुरङ्ग की वाहिरालो (दौड़ने का मैदान ), मन्मथरूपी मतवाले हाथी का (जल-क्रीडार्थ) जल-कुण्ड, सभी कुसुमों का संकेत स्थान ( परस्पर मिलने का स्थान), हृदय को आनन्द देने वाला (यह) प्रमोदोद्यान है । अतः इसे मलीमाँति देखते हुए प्रिय सखा इधर आयें। २वि० १८ विद्धशालमखिका राजा-(पवनस्पमिभिनीय) ये दोलालिकारा मनसि मृगहशां मान तन्तुच्छिदो ये सद्यः शृङ्गारदीक्षाव्यतिकरगुरवो ये च लोकत्रयेऽपि । ते कण्ठे लोलयन्तः परभृठययसां पञ्चमं रागराजम् वान्ति स्वैरं समीराः स्मरविजयमहासाक्षिणो दाक्षिणात्याः ॥२७॥ अपि च- सुरतभरखिन्नपन्नगविलासिनीपानकेलिजर्जरितः । पुनरपि विरहिश्वासैमलयमरन्मांसलो भवति ।। २८ ।। विदूपक-एक्वं एवं लंकातोरणमालिआतरलिणो माणोसहं 'सिंघली संघाणं दविडीण वम्महमहालासैकणहायओ। कण्णाडीकुरलालितंडवअरो लाटीण लीलागुरू उम्मत्तो महरविटिदमणो चेत्ताणिलो वढदि ॥२९॥ राजा-(पवन-स्पर्श का अभिनय कर ) दोला-केलि (शूला-झूलने की भीडा) का सम्पादन करने वाला, मृगनयनियों मनोगत मान-तन्तु को तोड़ने वाला, तीनों लोक में प्रेम दोधा के व्यतिकरों (अडचनों ) का (निवारक ) गुरु, पिकों के कप्ठ में रागराज पंचम को गति प्रदान करने वाला एवं कामदेव की विजय का महासाधी दक्षिणानिल स्वच्छन्द वह रहा है।॥ २७ ॥ और भी संभोगाविरेक के कारण भान्त सर्पिणी के द्वारा (भान्ति-निवारणार्थ देर वक) पान किये जाने से धोण हुआ मलयानिल विरहोजनों के (टी) साँसों से पुनः हृष्ट-पुष्ट हो रहा है ॥ २८ ॥ विदूपफ-लंका के बहिद्वार पर स्थित मालाओं को हिलाने वाला, सिहली फामिनियों का मानौपच (मानमन करने के लिए औपघ-स्वरूप), द्रविडी युवतियों के फामकृत्य फा नचापक ( संचालक एवं प्रेरक) कांटी प्रथमोऽङ्कः (लकातोरणमालिकातरलिनो मानौषधं सिंहली. संघानां द्रविडीनां मन्मथमहालात्यैकन पकः । कणांटीकुरलालिताण्डवकरो लाटीनां लीलागुरु रुन्मत्ती महाराष्ट्रीवर्धितमनाश्चैत्रानिलो वर्धते ॥ २९ ॥) (संस्कृतमाश्रित्य) इह हि नववसन्ते मञ्जरीपुञ्जरेणु- रणधवलदेहारदहेलं चरन्ति । तरलमलिसमूहा हारिहुंकारिकण्ठा बहुलपरिमलाली सुन्दरं सिन्दुघारम् ॥ ३०॥ राजा-(किञ्चिद्विहस्य) सखे ! संस्कृतेऽपि प्रगल्भसे । विदूषकः-तुमं वि अमारिसजगजोग्गे पाऽदमग्गे पिपडिदोसि । ता एहि फलिहसिलामंदिरं महामंतिकारिंद केलिकेलासं पेखिदुं गच्छा । (इति परिकामतः) (त्वमपि अस्मादृयजनयोग्ये प्राकृतमार्गे निपतितोऽसि । वस्मादेहि स्फटिकशिलामदिरं महामंत्रिकारितं केलिकैलासं प्रेक्षितुं गच्छावः। कहि उण कोची-कारसुन्दरो सद्दो क पुनः क्रौञ्ची- केकारसुन्दरः शब्दः।) कुरलियों को ताण्डव सिखाने वाला, लाये ललनाओं का लीलागुरु एवं महाराष्ट्री महिलाओं के मन को बढ़ाने वाला उन्मत्त चैत्रानिल बढ़ रहा है ।। २९ ।। इस नव वसन्त में मंजरियों के पराग के लेप से धवलदेह, मोहक और हुंकारयुक्त कण्ठ वाले अलि-समूह सुन्दर एवं अत्यन्त सुगन्धमय सिन्दुवार की ओर जा रहे हैं ॥ ३० ॥ राजा-(कुछ हँसकर) सखे ! नुम संस्कृत में भी निपुण हो । विदूषक--तुम भी तो हम ऐसे लोगों के योग्य प्राकृत भाषा के मार्ग पर नितित हो। तो आओ महामन्त्री के वनवाये स्फटिक-शिलामन्दिर-केलि- कैलास को देखने चलें । यह क्रौञ्ची-वडार सुन्दर शब्द कहाँ।
२० - विद्धशालभरिका रादा-(स्नाफाउदनुसारेणोक्लोव) उपप्राकारानं पहिशु नवने सच मना- गानाकाशे कोऽयं गलिठहरिणः शोचकिरणः । सनावद्ध-मार्तरुपवन-चकोरैरनुतः किरयोजनामच्छा नवलवलिपाकानपिनोम् ॥ ३१॥ विदूपक-पहि सो (६) राजा-अपमयम् (सपिलानक्लोक्य) क्यं न दृश्यते, कि पुनरिदम् । (विवर्त्य) पन्न शिञ्जिवनितो रदाना-भगोनां चट्टाससौरभ-बटादलयो वलन्ते । यद्रोतयश्चलदलङ्कृतयश्व टोला- दोलाविलासतरलस्ता मुखेन्दुः ।। ३२॥ राजा-(नुनता हुआ और उसके अनुसार जर को घोर देखकर) (विदूपक को सम्बोधित कर ) वनिक चहारदातारी के कार बाटे हारी। ठनिक सोची यह कौन सा (अपूर्व) चन्द्रमा है, दिसी स्थिति आनाथ में नहीं है और न जिसके मह में ना हो है, (सन्द्रिमा का पान करने के लिर) प्रास रोक कर सरन के चकोर दिसनी थोर आहट है, हो स्वच्छ निर्नर ज्योत्स्ना जिया रहा है॥३१॥ विदूपर यह कहाँ है? राधा पद, यह देखो। (पिरमपपूर्वक देखकर) दब दो नहीं दिखाई देता है, दो रि यह क्या है ? (सोचार) इस करपनी की भगियों की बीमपुर इनार हो रही है, वात की नगद के दल से मौरे को साइट होते हा रहे हैं, जो ये गत (सुनाई पड़ रहे हैं), सरकार से हिल दुट रहे हैं, तो अनव पद (निनी सुन्दरी का) मुद्धचन्द्र है को ले के आगे-पीछे थाने-बाने से तरल (कमी निकट, मी दूर) दिखाई देता है। १२॥
प्रथमोऽङ्कः २१ विदूषकः-किण्णु क्खु एदं । सचकं तुए जाणिदं जदो हिंदोलिआ- जुअलसिहराई इदो दोसंति । (किन्नु खल्वेतत् ? सत्यं त्वया शातं यतो हिन्दोलिकायुगलशिखरे इतो दृश्यते ।) राजा-(पुनदृष्ट्वा ) सखे! अयमसायाश्चर्यश्चन्द्रमाः । विदूषकः-णिरणुक्कोसोक्कण्ठलोअणेहिं अह्महिं चन्दो खे लक्सी. अदि । (निरनुक्रोशोत्कण्ठलोचनैरस्माभिश्चन्द्रः खे लक्ष्यते ।) राना-(निपुणं निरूप्य ) सखे ! दिष्ट्या वर्धसे, स्वप्नदृष्टजनमुखपद्म- संवादिनी लावण्यलक्ष्मीः। विदूषकः-आः कीदिसी सा (आः कीदृशी सा) राजा–याशी परिपाकपाण्डुराणां शरकाण्डानाम् । विदूषकः-ननु करिकलभदन्तच्छेदेसु वि सा अस्थि ज्जेव । [विचिन्त्य] चिरविरहिअहिन्दोलिआसद्दत्तणेण जाणिज्जाद अवतिण्णा सा हिन्दो- लिआए । ता एहि अगतो गच्छ्ह्य। [इति परिक्रामतः] (ननु करिकलभ- दन्तच्छेदेष्वपि साऽस्त्येव । चिरविरहितहिन्दोलिकाशब्दत्वेन ज्ञायतेऽवतीर्णा सा हिन्दोलिकातः । तस्मादेहि अग्रतो गच्छायः।) विदूषक-यह क्यों कर सम्भव है ? तुमेन ठीक-ठीक जान लिया क्योंकि हिंडोले के दोनों सिरे यहाँ से दिखाई पड़ रहे हैं। राजा-(पुनः देखकर ) सखे ! यह चंन्द्रमा तो आश्चर्यजनक है। विदूषक-भली भाँति खूब अाकर उत्कण्ठ ,लोचनों से हम चन्द्रमा को आकाश में देखें। राजा-(सम्यक् निरूपण कर ) सहे! माग्य से तुम बढ़ रहे हो (म्हारी प्रसन्नता का विषय है। ) यह सौन्दयलक्ष्मी स्वप्न में देखी हुई सुन्दरी के मुख कमल की शोभा से बिलकुल मिलती-जुलती दिखाई पड़ती है। विदूषक-अरे वह कैसी है ? राजा-पके हुए सरकण्डों के समान गौर वर्ण विदूषक-युवक-हाथी के दाँतों में भी वह ( गोराई ) होती है । हिंडोले का शन्द अब बन्द हो गया, जान पड़ता है कि यह हिंडोले से उतर गई। तो आयो आगो चले। .
२२ विद्धशालमलिका एवं तं केलि केलासं । ता उचसप्पटु पिसवअस्सो। [तथा कुरुतः] ( एतत फेलिकैलासम्, तत्मादुपसर्पत प्रियवयस्यः।) राजा-उद्दण्डहिण्डोरपिण्डपरिपाण्डुरेण महसाऽतिकेलासमेवेदम् । विदूषकः-पिअ अस इदो दाव आलिखिदफलिहावभभवभित्ति- चित्तकम्मम्मि णिवेसोअदु दिट्ठी । एस दाव देवो देवीए समं वासगहि- णीवेसी आलिहिंदो। एसा वि तंदुलकरंडवाहिणी णाअपल्ली । एसा वि चामरग्गादिणी पभंजणिआ । एसो वि जलकमंडलुओ णाम वामणी । एसो वि मंदुरामक्कटो टप्परफण्णो णाम | (प्रियवयत्येतत्वावद् आलिखि तस्फटिकगर्मभवनभित्तिचित्रकर्मगि निवेश्यतां दृष्टिः। एप तावद्देवो देव्या सनं यासकाभिनिवेची आलिखितः । एषापि ताम्बूलकरण्डवाहिनी नागवल्ली, एपारि चामरग्राहिणी प्रभञ्जनिका, एषोऽपि जलकमण्डलुको नाम वामनः, एषोऽपि मन्दुरामर्कटप्परको नाम ।) राबा-सखे ! त्वमेपोऽभिलिखितः । विदूषकः-(सक्रोधम् ) णाहं जाणिदो आलिहिटुं । वम्हणी जागादि जादिसोह, सा मां भदि तुमं पच्चक्खो कामदेवो त्ति । ( नाहं शातुं आलिखितं, माह्मणी नानाति याहशोऽहम् । सा मां मणति त्वं प्रत्यक्षः काम- देव इति ।) यह फेलिकैलास है, तो प्रिय सखा धीरे-धीरे चलें। (वैसा करते हैं) राजा-घनीभूत समुद्र फेन से अत्यन्त उज्वल थामा से यह वास्तविक कैलास को माव कर रहा है। विदूषक-प्रिय वयस्य ! इधर स्फटिक से बनी हुई अन्तर्रह की दीवारों पर बनाये गये चित्रों पर तो दृष्टि डालो। यह आप हैं आपका चित्र है, जिसमें आप देवी के साय शयन-गृह में अभिनिविष्ट दिखाये गए हैं। यह पानदान लिए रहनेवाली नागवल्ली है, यह चैंबर डुलाने वाली प्रभंजनिश है। यह मल- फमण्डलुक वामन है । यह मन्दुरामकट टप्परकर्ण है। रात्रा--सखे। तुम यह चित्रित हो । विदूषक--(सक्रोध) यद मेरा चित्र नहीं गाव होता । माझगो (मेरी खी) मानवी है-जैसा मैं हूँ। वह मुझसे कहती है कि तुम साठात् कामदेव हो ।
१३
प्रथमोऽङ्कः
राजा-अए किमुपवने शुको वदति ।
विदूषकः-किं विअ ? (किमिव १)
राजा-अस्ति भवान् देवः, किं पुनर्मुरिटिः ।
विदूषकः--को दुजणवअणाणं कण्णं देइ । (अहल्या निर्दिछन् ) एसा
उण सोदासमुदयेग उवहसन्ती देवी अपुवा कावि आलिहिदा। (को
दुर्जन-वचनानां फर्ण दाति । एषा पुनः शोमासमुदयेनोपहसन्ती देवीमपूर्वा
कापि आलिखिता।)
राजा-इयमपूर्वव किं पुनरस्माकं न पुनरनङ्गस्य । (सम्यग् विलोक्य )
सैवेयमस्मन्मनासारङ्गशशिलेखा । अहो रूपसंपदेतस्याः-
चनुर्मेचकमम्बुजं विजयते वक्तस्य मित्रं शशी
भ्रसूत्रस्य सनाभिमन्मथधनुर्लावण्यपण्यं वपुः ।
रेखा कापि रदच्छदे च सुतनोर्गाने च तत् कामिनी-
मेनां, वर्णयिता स्मरो यदि भवेद्वन्ध्यमभ्यस्यति ॥ ३३ ॥
राजा-अरे क्या उपवन में तोता बोलता है ? (अर्थात् तुम असत्य और
निरर्थक बकते हो)।
विदूषक-क्यों ?
राजा-आप हैं तो भृङ्गारिटि क्या है ?
विदूषक-कौन दुष्टों की बातों पर ध्यान दे ? यह कोई अपूर्व मुन्दरी
चित्रित है, जो शोमाधिक्य से देवी को भी लजित कर रही है।
राजा-यह अपूर्व ही है, न इससे हमाग, न कामदेव का कुछ लाम ।
(मली माँति देखकर ) यह तो वही है (उसी का चित्र है) जो हमारे मन
रूपी मृग की चन्द्र-रेखा है। अहो ! कैसा उत्कृष्ट रूप है। इसके श्यामनेत्र
नील कमल को पराजित कर रहे हैं, चन्द्रमा इसके मुख का और कामदेव का
घनुप मौहों का मित्र है। शरीर रूप का बाजार (आगार) है। सुन्दरी के
मोठ पर अपूर्व (मुस्कान) की रेखा है। कामदेव यदि नैपुण्य का कुछ दिन
अभ्यास करे तो कदाचित् इस सुन्दरी का वर्णन करने में समर्थ हो सके ॥ ३३ ॥
विशालमञ्चिका विदूषकः-(स्वगतम्) का उग एसा देवो-परिवारे। (विचिन्त) भोदु, कोदूहलेग देवी ओल्लागदं णिअमादुलभावुझं मिअंकमन्नानं वारंवारेण विरइदमहिलासं कारेदि । तं च मुणि अण्णाअपरमत्यहि चित्त-करहिं तपा नेत्र चित्ते आलिहिद ति उक्टमि । ता विलं फोलइस्सं । भमदु दाव पिअवअसो। ( का पुनेरपा देवी परिपारे । मचतु, कौतूहलेन देवी ओल्लागतं निजमातुलमाकं मृगाइमाणं पारंवारं विरचित महिलावेशं कारयति । ताच हात्वाजातररमादिचत्रकरैस्तथैव चित्र यानिद्धि- वेति तर्कयामि । तस्मान दिलं सोयिष्यामि । मन्तु वापत् प्रियवयत्यः।) राजा- यथाह प्रियययस्य:- कन्वेति सूचयति वैप विशेष एप यन्नीलचोलकवती लिखिताऽत्र चित्रे । पाणिमहान् प्रभृति तु प्रमदाजनस्य नीचीनिवेशमुभगः परिघानमार्गः ॥ ३४ ॥ (विमृश्य) भहो वपुःत्रीलिखितुर्जनस्य स्वाकारसंवादि यदन चित्रम् । इदं च पौरन्ध्रमम फर्म रेखानिवेशोत्र यदेशवारः ॥३३॥ विदूपक-(अरने मन में) देवी के परिवार में यह कौन हो सकती है ? अच्छा, देवी ओल्लागत अपने मामा के लड़के मृगांकरमा को बार बार स्त्री का वेष धारण कराती रहती है। उसी को स्त्री समझ कर, सच बात को बिना खाने चित्रकारों ने उसका उसी रूप में चित्रण कर दिया-रो समदा में ऐसा आता है। दो में रहत्योत्पाटन नहीं करूंगा। मिय सखा इसी प्रकार प्रम में पड़ा रहे । (सष्ट कहता है ) पन्या से यह पन्या नादम पड़ती है। गजा-चैना प्रिय सखा कह रहे हैं (वही है ) इसका विशेष वेष ही पता रहा है कि यह फन्या है क्योंकि चित्र में नीले वर्ग को चोली पहिने हुए चित्रित की गई है । पाणि-ग्रहण के बाद से तो त्रियों के पहिनने का रंग नीवी की सजावट से मुन्दर हो जाता है-वे नीवी के बन्धन पर विशेष ध्यान रखने टगती हैं ॥३४॥ (सोचार) अहो ! पैसा शरीर-सौन्दर्य है। यह चित्र तो ऐसा बन पड़ा है कि मादन होता है कि चित्रकार ने अपना ही रूप चित्रित कर दिया है। मैं समझता हूँ-- । .
प्रथमोऽङ्कः (सम्यग् विभाव्य) तदियं मकरध्वजवैजयन्ती काऽपि स्वयमेव स्वं लिखितवतीति निणीयते । विदूषकः-सच्चं एदं, जदो गरिठजणगोट्ठीसु इत्थं करिआ सुणीअदि । जादिसो चित्तअरो वादिसी चित्तअम्मरुअसोहा, जादिसो कई तादिसी कवबन्धछाअ त्ति । (सत्यमेतत् , यतो गरिष्ठजनगोष्ठीवित्यं कारिका श्रूयते । यादृशचित्रकरस्तादृशी चित्रकर्मरूपशोभा, यादृशः कविताशी काव्य-बन्धच्छायेति।) राजा-युज्यते, आकृतिमनुगृहन्ति गुणाः । अपि च सखे ! चारायण ! क्रमपरिणतरेखामांसलैरङ्गभागे- लघुरपि लिखितेयं लक्ष्यते पूर्णमूर्तिः । अयमपि सुकुमारः सात्त्विकानां निवेश- ३चतुरममृणमुग्धं भावमाविष्करोति ।। ३६ ॥ - यह काम किसी मुगृहिणी का है। उसका इतना अधिक अभ्यास है कि रेखाओं को केवल एक बार ही खींच देने से काम पूरा हो गया-दुबारा उसे ठीक करने के लिए रेखायें नहीं खींचनी पड़ी ॥ ३५॥ (भलीभाँति सोचकर ) तो यह कोई कामदेव पताका अयात् परम मुन्दरी है, जिसने स्वयं ही अपने को चित्रित किया है-इसी निर्णय पर पहुँचता हूँ। विदूषक-यह बात बिलकुल सच है। विद्वानों की गोष्ठियों में ऐसा मुना जाता है कि जो जैसा चित्रकार वैसा ही उसका चित्र, जैसा कवि पैसा ही उसका काव्या राजा-ठीक है, गुण निस्सन्देह आकृति के अनुरूप होते हैं। और सखे चारायण ! सभी अंग क्रम से परिणत रेखाओं से मांसल हैं, जिससे लधुरूप में चित्रित भी पूर्ण मूर्ति दिखाई पड़ती है। सात्तिक मावों के सुन्दर संनिवेश से मनोश एवं निग्ध मुग्धमाव (सीघापन ) सष्ट प्रकट हो रहा है ।। ३६ ॥
२६ विद्धशालमलिका विदूषकः-इदो देवी मज्जनवदिअरे घरे सपरिषारा आलिहिदा। (इतो देवी मज्जनव्यतिकरे गृहे सपरियारालिखिता।) गजा-इदमेव रूपरत्नं सम्माययावत्तावत् । विदूषकः-इद्दावि सा अत्यि जन्य । (इहाऽरि ताऽल्पे ) राजा-( आत्मगतम् ) एकं चक्षुरनेकन सा । (विदूपर्फ प्रति) क्वासी? विदूषकः--इअमिअं ( इयमियम् ) राजा--(विलोक्य सोत्कण्ठम् ) नोत्पलानि – शशी च मृणालिकाश्च रम्भादलश्च कमलानि च निर्मितानि । नूनं स एव मृगशावहशोऽपि वेधाः संचित्क्रमो यदयमेकत्तया चकास्ति ।। ३७ ॥ विदूषकः-( स्तम्भे शालभजिकां विलोक्य) इअंपि सच्चं जेव। (इसमपि सत्येव ।) विदूपक-इधर देखिये, स्नानागार में देवी परिजन-समेत चित्रित की गई है। राजा--हम दोनों पहले इसी रूप-रत्न (जिसका निर्देश पहले किया बा चुका है, मो देवी के सौन्दर्य को भी मात कर रहा है) पर विचार करें। विदूषक-यहाँ मी वर है। राजा-(अपने मन में) मेरी अकेलो दृष्टि, और वर अनेक जगह है। (विदूषक से) फहौ है यह ! विदूषक-यद, पह। राजा-देखकर उत्कण्ठापूर्वक । जिस विधाता ने नीलोत्पल, चन्द्रमा, मृगाटिका, कदलो-पत्र और फमलों को रचा है, उसी ने इस मृगनयनी का भी निमांग किया है तभी तो उस विधाता का उक्त सभी वस्तुओं के रचने का सारा अनुभव इकट्ठे ही यहाँ इस रमणी में झलक र ॥ ७ ॥ विदूषक-(खम्मे पर मूर्ति देखकर ) यह भी ठीक टोक है राजा- । प्रयमोऽङ्कः -इयमपि सास्मद्विलोचनचकोरचन्द्रिका। (विलोक्य सोत्कण्ठम्) सा दुग्धमुग्धमधुरच्छविरगयष्टि- रते लोचने तरुणकैतकपत्रदीर्थे । कम्योविडम्बनकरश्च स एव कण्ठः सैवेयमिन्दुवदना मदनायुधं वा ।। ३८ ॥ ( सवितर्कम् ) न स्वप्नानुभवस्य कश्चिदपरः सब्रह्मचारी मम स्यात्संकल्पकृतश्चकास्ति मनसः कस्यैव रेखाक्रमः । तन्मन्ये क्वचिदस्त्यसौ कुवलयच्छायामुपा चक्षुपा यत्सादृश्यपरिग्रहादिह दृशौ दीर्घ समावासिते ।। ३९ ॥ (विभाव्य ) भवतु, पुनर्योग्यस्थानविन्यासमासादयतु स्वप्नहारः, संचरतु शालभजिकारूपाया अप्येतस्याः कण्ठमूलम् , अलंकरोतु चालविचकिलवल्ली कोरकनिकुरम्ब इति । (तथा करोतु) राजा-यह भी वही, हमारे नेत्ररूपी चकोरों की चन्द्रिका है। (देखकर उत्कण्ठापूर्वक)। दूध से भी बड़कर स्निग्ध शोभा वाला यही छरहरा अङ्ग है, नवीन केतकी- पत्र की भाँति दीर्घ वही नेत्र हैं, शंख को लजित करने वाला वही कण्ठ है, यह वही चन्द्रमुखी वा मदनान है (जिसे देखने से कामपीडा होती है । ) ॥३८॥ (सवितर्क) स्वप्न में मैंने जो अनुभव किया है, उसके समान और कोई अनुभव नहीं हो सकता है। किसके मन के संकल्मों से बनाया हुआ यह रेखाओं का क्रम शोभित हो सकता है। कुवलयों की क्रान्ति को चुराने वाले नेत्रों के द्वारा जिसके सादृश्य का ग्रहण करके ये आँखें दीर्घ एवं उसके सदृश हो गई हैं, मैं तो मानता हूँ कि वह है कहीं पर अवश्य । (सोच-समझकर ) अच्छा तो यह स्वप्नहार योग्य स्थान पर रख दिया पाय। मूर्विरूपा इस ( सुन्दरी) के कण्ठमूल को, विचकिल नवलता को कला- वृन्द की माँति, अलंकृत करें।
विद्धशालमक्षिका
विपाइदो वि चित्तगदा स जेव। (तेल्लाउन् ) निकपति-
विचमालाहिं विपलब्दादि । अघं उग पञ्चक्यो पुतिमा चन्दो।
(इतोनि चित्राता व । मो नृगाहप्रतिविम्वनालाभिमिटयोऽलि। बने
पुनः मला: पूनिनाचन्द्रः ।।
राजा-क्व पुनरसावत्मन्नयनामृत्यतिः।
विदूपर इयनियन् । या हरिणकखण्डपंटरेहि तिरिच्छेहि
दिहिच्छडाडोहि विफुरेदि दिन्नुहाई, पागिसंचटमा विच्छुरेद
फेलिपल्लवाई, चरणचालन विरएदि पंकरसंहासनाउलाई
भमरजालाई । (इपभिपन् । या हरितासहपान्डस्तिमिदृष्टिच्छन क्या-
क्कियति दिमुखानि, पानिपटनेन विन्धुरपति पहलिपल्टयानि,
चरणचाल्नेन रिचपति पदण्डात्माकुलानि अमर-बालानि ।)
राजाभवदासिता सत्यस्यानतंत्र संहत्ता । (दिलीप) सेवेचं
सजीवनीपधिर्मकरध्वजन्य विशल्यारणीपधिर्मे हृदयोभेदत्य ।
( विमान्य
मात्रानतितमण्डनश्रु वदनं किंचित्प्रगल्भ शो
न्ताको दनिवेशितस्तननुगे मध्य दरितानि च ।
विदूपक-इधर भी यही चित्रित है। बरे चन्द्रमन्टल दागने घोसे में
पड़ गया, वास्तव में यह प्रत्यक्ष पूर्णिमा का चन्द्र है।
राजा नहीं है यह हमारे नेत्रों की अनुवातिका ।
विपर-पद, यह । दो चन्द्रसम्र की मोवि वेद एवं निट तिरछे नेत्र
के पानी के दिशाओं को चमत्व कर रही है, पानि-संघटन कोक के
पहयों को विद्युरिन पर रही है तथा जिस चरण-संचालन के नौरों को दन्ट
की सदा हो रहा है।
राजा-आर ने का पहले माया, वास्तव में स्म रुप
( देखकर) यह वही कामदेव की संयनीयपि है, ३रे दृटर के पाप को
विशल्य (कारदिव) करने वाला योपधि है।
(सोचकर)
उनके नेत्र युछ धृष्ट एवं दशरपट में लनी योड़ा पोड़ा उभारा
है। उसका कटिमाग धग है, निवादपट स्यूल है। उस मृग नपनी के सुन्दर
प्रथमोऽङ्कः भत्या यजघनं धनं च कलया प्रत्यगणोदशः सत्यंकार इव स्मरैकसुदा तद् यौवनेनार्पितः ॥४॥ विदूषकः--उल्लसिदभूलदेण उदंगुलिकरकमलेण च अमुणा संहा- पेण किं पि कुणंतो एसा चिट्ठदि । (उल्लसितमूलतेन उदहलोककरकमलेन चामुना संत्यानेन किमरि कुर्वत्येया तिति ।) राजा-यद् भूलते तरलिते यदुदगुलोकः पाणिः पुरो यदपि चक्षुरलग्नलक्ष्यम् । उन्मुद्रिताघरदलं च यदास्यमत्या- म्तकार्यकर्मणि निपक्तमवैमि चेतः॥४१ विदूषकः-एवं एदं जदो पुरदो इमाए अद्धलिहिदा अक्खरावली चिट्ठदि । ( एवमेतत् यतः पुरतोऽस्या अलिखिता अरावली तिष्ठति ।) राजा-याचयति- विधत्ते सोल्लेख कतरदिह नाझं तरुणिमा। (विमृश्य) अहो ! गाहन्यम् । अहो ! शिखरिणीपादः। अहो ! शरीर को मानो कामदेव के अनन्यमित्र यौवन ने सत्यवार (काम को पूरा करने के लिए जमानत के रूप में पेशगी दी हुई रक्म ) के रूप में अर्पित किया ॥४०॥ विदूषक-इसकी मोहें उल्लसित हैं, गतिशील कर-कमलों की उँगुलियाँ ऊपर उठी है । ऐसी स्थिति में यह कुछ करती हुई मालूम होती है। राजा-मैं समझता हूँ इसका मन किसी काम के करने में तीन है क्योंकि इसकी मौहें चञ्चल हैं, हाय की उँगुलियाँ ऊपर की ओर उठी हैं, नेत्र किसी लक्ष्य पर लगा नहीं है (अर्थात् सामने की ओर न देखकर नीचे की ओर देख रही है) अवर-दल खिला हुआ है ।। ४१ ॥ विदूषक-ऐसा ही है, क्योंकि इसके सामने आधा लिखा वाक्य है । राजा-बाँचता है-- तारुण्य किस बा को नुन्दर नहीं बना देता है। (सोचकर) महो! कैसी गम्भीरता है, कैसा सुन्दर शिखरिणी का चरण ३० विद्धशालमलिका सूक्तियुक्ता वाचः । अहो ! हृद्या वैदर्भी रीतिः। अहो ! माधुर्य पर्यानन्। अहो निप्पमादः प्रसादः । विदूषकाता उचिदशाले अभिसरीअदु सुन्दरी पिजदु पाक- लिसंपुडेहिं पुण्णिमाचंदो, पूरिज्जंतु कण्णकुहराई मुहासिदरसायोहिं पञ्चाबीअदु रहमुत्थंभिदहत्यो मअणपट्टावओ। (तस्मादचिवाले मितिपतां सुन्दरी । पीपता नपनाञ्जलिसम्पुटैः पूर्णिमाचन्द्रः । पूर्वन्तां कहानि सुभापितरसायनैः । नवंठा रहत्योत्तंभितहस्तो मदननापकः।) राजा-(पदान्तरे स्थित्वा, चतुर्दिशनपलोपत्र) अहो ! दयिताद्वैतं वर्तते। तथाहि- मुतनुरियमितस्ततश्च चित्रे गुणगुरुरतं च शालभजियम् । स्थितमिव सुतनोर्वपुचतुर्धा स्मरशरतापरलं विभज्य सोहम् ।।४।। वदेहि, समुपसत्य सुभाषितेन प्रवणे कृतार्थयायः । न खलु व्यापार- मन्तरेण करकलितापि मुक्तिचिमुवति मौक्तिकानि इति । (उभौ परिकामतः) विदूषकः-(पुरतः सरन् भीत्या आसोटं नारपित्ता) भो मोसर ओसर, भूदंतरं क्यु कि पि एर्द, वा इमिणा पडिकुविदेवीभूलदाभंगकुटिग है, पैसो सूक्ति युक्त वाणी है। अहो ! कितनी मनोहर पैदाँ रीति हैं । महो! पांत माधुर्य है। अहो ! बैता विशुद्ध प्रसाद गुग है। विदूषक-तो उचित अवसर पर सुन्दरी के निकट चलिये । नेत्रों से पूर्णिमा चन्द्र का पान कीदिए । फर्णहरों को सुमापित रसायनों से पूर्ण कीदिए । रहत्य से उचंमिनदत्त मदन नतांपक को नचाइये। राजा--(एक पद की दूरी पर सड़ा होकर, चारो ओर देखकर) दो सुगल मुन्दरियाँ उपस्थित हैं। पर यह मुन्दरी और उधर चित्र में गुनगरिमा पूर्ण यह मूर्ति, मानों कामदेव के दाग-धन्य संarप को अलग-अलग पेंट कर सहने के लिए इस नुन्दरी या शरीर चार प्रकार में हो गया है ॥ ४२ ॥ वो आओ, निकट चलकर मधुर वचन से कर्मों को कृतार्थ करें। दिना उयोग के हस्तगत सीप मी मोतियों को बाहर नहीं निकाल्ती । (दोनों पूमते हैं) विदूषकहो, हो। यह तो कोई भूत है, तो मैं ऋद्ध हुई देवी का माहों रामा प्रथमोऽङ्कः डकट्ठण तडित् ताडयिस्सं ता पेक्स मे पुरिस मारम् । (मो अपसरापसर भूतान्तरं खद्ध किमप्येतत् । तत्मादनेन परिकुपितदेवीभ्रलतामनकुटिलेन टण्डका- प्ठेन वडिति ताडयिष्यामि तत् पश्य मे पुरुषकारम् ।) तर्हि मालतीमुकुलैर्दुकूलं कल्पयिष्यसि । विदूषकः :-ता किं णु क्लु एदं ( तस्मात् किन्नु खल्वेतत्) राजा-ससे! तर्कयामि स्फटिकभित्तेः परतः स्थितया स्वच्छभावा- दितः सुव्यक्तयाऽनया भवितव्यम् । तदेहि, केलिकैलासपश्चिमेनैनां सम्भावयामः ( तथा कुरुतः) विदूषकः-तुरिदतरमवक्कन्ता सा, जदो असमंजसा इदो देवीवास- भवणाहिमुही पअपंती दीसइ। (वरिततरमपक्रान्ता सा, यतोऽसमजसा इतो देवीयासमवनाभिमुखी पदंपतिश्यते ।) राजा-हृदय ! स्वस्ति भयते । एनामनुपर्तता स्मर्तव्या वयम् । (नेपथ्ये ) जय जय त्रिलिङ्गाधिपते ! सुखाय मध्यन्दिनं भवतु भवतः । सम्प्रति हि- के समान टेढ़े इस इण्डे से इसे 'तड़' से पीढूँगा । मेरा पौरुष देखो। राजा-उस अवसर पर मालती की कलियों से यन्त्र बनाओगे-मालती कुञ्ज में घुसकर छिप बाओगे। विदूषक-तो फिर यह क्या है ? राजा-सखे ! मैं सोचता हूँ कि स्फाटिक की दीवाल के दूसरी ओर खड़ी मुन्दरी दीवार के स्वच्छ होने से इधर सुम्यक हो रही है। तो आओ केलि- कैलास के पीछे से इसका परिचय प्राप्त करें। (वैसा करते हैं) विदूषक-वह अभी अभी मग गई क्योंकि देवी के वास-मवन को थोर अन्पष्ट पद-चिह्न दिखाई देते हैं। राजा-मित्र !आरका कल्याण हो। इस सुन्दरी का अनुगमन करते हमें याद रखियेगा। (नेपथ्य में ) त्रिटिङ्गाधिपति की जर हो । टोपहर की वेला आप के लिए मुखकर हो । इस समय- ३२ विद्धशालभञ्जिका धत्ते पालता दलेप्सुरुपरि रख कर्णतालं द्विपः शप्पस्तम्बरसानियच्छति शिखो मध्येशिखण्डं शिरः। मिथ्यालीढमृणालकोटिरभसाद दंष्ट्राङ्कुरं शूकरो मध्याहे महिपञ्च पाञ्छति निजच्छार्य महाफर्दभम् ।।४।। भपिच विशन्तीनां स्नातुं जपनविनिवेशैमंगशां यदम्भः संप्रा प्रमदवनवाप्यास्तटभुवम् । गभीरे तन्नाभोऽहरपरिणाहायनि सरत् कुहूकारस्फारं रचयति च नादं भ्रमति च ॥४४|| विदूषकः- भो,देवोए भवणंगदुअमजझगसंज्ञणिअत्तिभविस्ता पत्ति सरसोअदु । (भोः, देवाःभवनं गत्वा मध्याहसन्थ्यां निवर्त्य तत्याः प्रतिभावान्।) इति धीबालकविरविराजराजशेखरविरचितायां विशाल- मझिशस्यनाटिकायो प्रथमोठः। पभलता के दलने का इच्छुक हाथी दोपहर की गर्मी से व्याकुल हो यरने कार अपने बड़े बड़े कानों को चला रहा है, घासों के रसास्वादन को त्यागकर मपूर अपने सिर को अपने पंखों के अन्दर हिना रहा है। सुअर ने कमल की सद को सोद खोद कर साना बन्द कर दिया है और भैसा अपने शरीर पर टेन करने के लिए गहरे कीचड़ की इच्छा कर रहा है ॥ ४३ ।। और भी लान के निमिच प्रवेश करती हुई मृगनयनियरों के चयन प्रदेश तक पर में जाने पर प्रमद-वन की वालो का जल पहले वो घक्के से तट-भूमि की ओर चला गया। तदनन्तर उन मृगनपनियों की गम्भीरनाभि में वेग पुसवा हुआ उच स्वरित 'कुहू बनि करता और चशर काटने लगता है ॥ विदूषक-मोः, महारानी के मान में घटकर मध्याहकालीन सम्योपासन कर उस मुन्दरी का वृत्तान्त जाने । मयम सह की हिन्दी व्याख्या समास * अथ द्वितीयोऽङ्क. (ततः प्रविशतः सम्मुखीने चेट्यौ)। एका-(परिक्रम्य इतरामञ्चले विधार्य) हला तरंगिए ! हिअअ-पदिदिठ- दराअक्सरावि लक्खीअसि । जदो संमुहागदं पि मं अणालविय थिदासि । (हला तरगिके, हृदयप्रतिष्ठितराजाक्षरेव लक्ष्यसे । यतः सम्मुखगता- मपि मामनालय स्थितासि ।) द्वितीया-(समालिङ्गय) सहि कुरंगिए ! मा कुप्प, गौरी मे कुप्पदु, जइतं मए दिट्ठासि अण्णहिअअत्तणेण । ( सखि कुरंगिके ! मा कुप्य, गौरी मे कुप्यतु यदि त्वं मया दृष्टासि अन्यहृदयत्वेन । कुरङ्गिका-सहि ! कोदिसं अण्णहिअअत्तणं । ( सखि ! कीदृशमन्य. हृदयत्वम् १) तरङ्गिका-तादिसं, जादिसेण तुह वि पुरदो मंतअंतीए वि उक्कंपदि विअ मे हिअ। (तादृशं, यादृशेन तवापि, पुरतो मन्त्रयमाणाया अपि उत्कम्मत इव मे हृदयम् ) 65118/3-1433 (इसके बाद दो दासियों एक दूसरे के आमने-सामने प्रवेश करती हैं) एक (घूमकर दूसरी का अञ्चल पकड़कर) हे वरंगिके ! मालूम होता है कि तुम्हारे हृदय में राजा को मूर्ति प्रतिष्ठित है, जिसके ध्यान में नुम लीन हो। इसीलिए यद्यपि मैं सामने आई, तथापि तुमने बात-चीत नहीं की। दूसरी-सखि कुरंगिके ? नाराज न हो! मुझ पर देवी जी कोप करें यदि मैने तुमको अन्यमनस्क भाव से देखा हो । कुरङ्गिका सखि अन्यमनस्कता कैसी होती है ? तरङ्गिका-वैसी, वैसे तुम्हारे मी सामने गुप्त बातों को कहते हुए मेरा हृदय कारता सा है। ३ वि० ३४ विद्धशालभचिका कुर०-हिअअणिव्विसेसम्मि जो आसंकंती कोदूहलं मं पुच्छादि। (हृदयनिर्विशेपेऽपि बने आशङ्कमानां कौतूहलं मां प्रच्छ्यति ।) तर०-सहा वहा भोदु ण पच्छादइरसं, णहि सिणेहो जुत्ताजुत्तमनु धेदि। (यया तथा मक्तु न प्रच्छादपियानि । न हि स्नेहो युझावुक- मनुरुणद्धि) कुर०-अदो ज्जेन्च मे आसंघो कथं विष सहकारलहीए कलकण्टी कुंठिदप्पंणआ होदि । (अत एव मे आरडा कमिव सहकारपट्यां कान्छी कुठेतप्रणया मवति ।) तर ---एज्यं तथा वि भणीअदि मुदतनंरक्खणं क्लु फन्जसिद्धिए कारणं । (एवं तयापि भग्यसे, श्रुतमंत्ररक्षणं खटु कार्यसिझे कारणम् ) कुर०-मा एवं भण, कधं विअ जीअंतादो किकलासादो सिरसुवर्ण पावीअदि । (मैवं भण, कथमिव जोक्तः ककलासाच्छिरः सुवर्ण प्राप्यते ।) वर०-सुणादु प्पिभसही । अस्थि एत्य कुंठलेमुं चंडमहासेणो णान तस्स णिराज्जपरिभट्टस्स इह आगदस्स दुहिआ कुवलयमाला पाम णम्मदामजणुत्तिण्णा देवदिहा हिअ च से पविट्टा । वांप कुरङ्गिका-अभिन्न हृदय पर भी शङ्का करती हुई मुझको कौतूहल पूछने के लिए प्रेरित करता है। तरणिका-जैसा भी हो, मैं नहीं छिपाऊँगी। लेह उचित और अनुचित का लिहाज नहीं करता। कुरङ्गिका-मेरी यह आशहा है-सहकार की डाली से कोयल का प्रार मन्द कैसे हो सकता है। तरणिका-अच्छा, मैं तुमसे कहती हूँ--मुनी बातों को गुत रखने से ही कार्य की सिद्धि होती है। कुरङ्गिका-ऐसा मत कहो-गिरगिट के पीते बी उसका नुनहरा हिर पैसे कोई पा सकता है। वरणिका-वियसखि ! सुनो-कुन्तल देश में चन्हमहासेन नामक गया है। यह राज्य-परिभ्रष्ट यहाँ आया है। उसकी कन्या दुपस्यमाला ननंदा में स्नान करके निकली ही थी कि महाराज ने उसे देखा और वह उनके हृदय में राआ, द्वितीयोऽङ्कः ३५ पडिच्छिदवदी देवी णिअमादुलभावुकरस मिअंकवम्मरस किदे । तण्णि- मित्तं अ विवाहोअरणाई सजीकार्दु पेसिदह्मि । तग्गदमणए मए ण तुमं लक्विदासि । (शृणोतु प्रियसखी ) अस्त्यत्र कुन्तले चण्डमहासेनो नाम राजा तत्य निजराज्यारिभ्रष्टस्य इहागतत्य दुहिता कुवलयमाला नाम नर्मदामज्जनो. तीर्णा देवदृष्टा हृदयञ्चास्य प्रविष्य । ताञ्च प्रतीष्टवती, देवी निजमातुलभावुकस्य मृगाङ्गवर्मणः कृते । तन्निमित्तञ्च विवाहोपकरणानि सम्जीकतु प्रेषितास्मि । तद्गतमनसा मया त्वं न लक्षितासि ।) कुर० -अहो देवीए विदद्धत्तणं एवं किल किदे सवत्तीलाभो परि हृदो भोदि, चंदयम्ममादुलस्स सिणेहो वि दंसिदो भोदि । (अहो देव्या विदग्धत्वं, एवं किल कृते सपत्नीलाभः परिहृतो भवति, चन्द्रवर्मणो मातुः लेहोऽपि दर्शितो भवति ।) तर०—तुम उण कहिं पत्यिदासि । (त्वं पुनः क्व प्रस्थितासि ।) कुर०–अज्ज देवीए अलिअविवाहेण विडंविटुं आणत्तो अज्जचारा- अणो । तद्विवाहसामग्गी संपादेहूँ उण अहं पेसिदाम्हि । ता एहि दुवे वि अहो जधासमीहिअकञ्जसिद्धीए गच्छर । [इति निष्क्रान्ते ] (अद्य देव्या अलीकविवाहेन विडम्बयितुमाउत आर्यचारायणः, तद्विवाहसामग्री समायी हुई है। महारानी जी उस (कुवलयमाला) को अपने मामा के पुत्र भृगाड़वा के लिए चाहती हैं। उसी के निमित्त विवाह-सामग्री तैयार करने के लिए मैं भेजी गई हूँ। उनके कार्य में मेरा मन लगा था, इसी से तुम्हारी ओर ध्यान नहीं गया। कुरङ्गिका-महारानी का मी कैसा चातुर्य है। ऐसा करने से एक सौत के आने की आशंका भी दूर हो जायेगी और उधर चन्द्रवर्मा की माता का - लेह भी दर्शित होगा। तरङ्गिका-तुम कहाँ जा रही हो ? कुरङ्गिका-आज महारानी जी मिथ्या-विवाह से आर्य-चारायण की विडम्बना करना चाहती हैं। उसी विवाह की सामग्री तैयार करने के लिए
ततः
३६
विद्धशालभचिका
संपादयितुं पुनरहे प्रेषितास्मि । तस्मादेवि द्वे अपि आवां यथासमीहितकार्यसिद्ध
गच्छावः।)
इति प्रवेशकः
(ततः प्रविशति तोकण्ठो राजा विशेषविभूपितो विदूपकथ)
राजा-(मदनाक्तमभिनीय)
तस्मिन् पश्वशरे स्मरे भगवता भर्गेण भस्मीकृते
जानाम्यक्षयसायकं कमलभूः कामान्तरं निर्ममे ।
यस्यामीभिरितस्ततश्च विशिखैरापुलमग्नात्मभि-
र्जातं मे विदलत्कदम्यमुकुलस्पष्टोपमानं वपुः॥१॥
( सन्तापमभिनीय)
विलीयेन्दुःसाक्षादमृतरसवापी यदि भवेत्
कलकस्तत्रत्यो यदि च विकचेन्दीवरवनम् ।
स्नानक्रीडाजनितजहभावरवयवैः
कदाचिन्मुञ्चयं मदन-शिखिपीडापरिभवम् ।। २।।
मैं भेजी गई हूँ। तो आवो अपने-अपने काम को पूरा करने के लिए
दोनों चलें।
इति प्रवेशक
(उत्कण्ठित राजा और विशेष सुसजित विदूपक रंगमञ्च पर आते हैं)
राजा-( कामावेश को प्रकट करता हुआ)
मालूम होता है-पाँच बाण याले कामदेवको जब शंकर मगवान् ने मस्म
कर दिया तो ब्रह्मा ने एक दूसरे ही अक्षय बाणों वाले कामदेव की रचना
की है, जिसके बाण हर तरफ से मेरे शरीर में पुझमाग तक गहरे घुस गये हैं और
मेय शरीर कदम्ब की सिलती हुई कलियों के उपमान-भाव को प्राप्त हो गया ॥१॥
(सन्ताप या अभिनय कर)
यदि चन्द्रमा गल कर साचात् अमृत रस की वापली हो बाप और
उसका फलक (चिह्न) फमल-वन के रूप में विकसित हो पाय और उसमें
स्नान करने से मेरे अङ्ग शीतल हो, तर कदाचित् कामदेव के बाणों की पोहा
दूर हो सके ॥ २॥
द्वितीयोऽङ्कः अपि चं, सखे चारायण! मन्द्रादरः कुसुमपत्रिषु पेलवेषु नूनं विमति मदनः पवनास्लमद्य । द्वारप्रकाण्डसरलाः कयमन्यथाऽमी श्वासाः प्रनर्तितदुकूलदशाः सरन्ति ॥ ३ ॥ तत् पुल्लातिमुक्तलतालाञ्छनस्य तुपारपुञ्जनाम्नः कदलीगृहस्य मार्गमादिश। विदूषकः-(संज्ञया निर्दिशति) राजा-कयमनुग्गा मौनमुद्रा ? विदूषकः (भूमावश्वरागि लिखति) राजा-अष्टादशलिपिविदो वयं न त्वदीयाक्षरग्रहणे विचक्षणाः । विदूषकः-(दन्तैर्जिबामम) भो ! दिक्खिदः क्यु अहं मजणे चिट्ठामि । (दीक्षितः सल्लह मौने तिष्ठानि ।) और भी, नित्र चापया! मालम होता है कामदेव अब कोमल कुनुम-दारों का तिरस्कार कर पवन का अत्त्र धारण करने लगा है। इसीलिए मेरी साँस नाता से स्कन्धपर्यन्त इतनी सीधी लम्बी निकल रही हैं, जिनसे शरीर के वस्त्र चञ्चल हो रहे हैं ॥ ३ ॥ फूली हुई माधवीलता जिसका पहिचान का चिह्न है, दुपारपुज नामक कदलीरह का मार्ग बताओ। विदूषक-(सङ्केत से बताता है) राजा-कैसी यह मौनमुद्रा है जो टूट नहीं रही है। विदूषक-(भूमि पर अक्षर लिखता है) रावा-इन अठारह लिनियाँ जानते हैं परन्तु तुम्हारे अशरों को पढ़ने विदूषक--(दाँतों दले बीम दवाकर) अरे मैं दक्षिा ग्रहण कर चुका हूँ, अतः मौन धारण किये हूँ।
विद्धशालमञ्जिका
राजा--किमिति ?
विदूषकः-देवी मं संपदं परिणाइरसदि। ( देवी मां साम्वं परिकार
यिष्यति ।)
राजा-तामेव चिरन्तनवाहाणीम् ।
विदूषकः-णहि णहि । (नहि नदि)
राजा-अन्या का?
विदूपका-ओअल्लागदरस मिअंकवम्मरस पुरोहिदरस दुहिदा क्नु
एसा । (ओयलागवस्य मृगाहवर्मणः पुरोहितस्य दुहिता खल्वेपा।)
राजा-किनामधेयः पुरोहितः ?
विदूषकः-सस-सिंगो, घरिणी इमरस मिअतिहिआ, भविस्सपरिणी
अ मे सदुहिदा अंघरमाला णाम । ( राय-Zङ्ग, रहिण्यस्य मृगतृप्तिका
भविष्यद्गृहिणी च मे तदुहिता अम्बरमाला नाम ।)
राजा- (स्वगतम् ) मन्ये देवी उपहसितुमेनमिच्छति । तमोपमा-
स्महे । वर्धतां परिहास-लता।
राजा-यह क्यों?
विदूपक-आन महागनी नी मेरा विवाद करायेगी ।
राजा-उसी पुरानी बााणी से ।
विदूपक--नहीं, नहीं।
राजा-फिर यह फोन है।
विदूषक-यह ओयहा से आये हुए मृगाकया के पुरोहित की कन्या है।
राजा-पुरोहित का क्या नाम है ?
विद्रूपक-रायरंग और उनकी पत्नी मृगतृप्तिका और उसरी फन्या का
नाम अम्बर-माला है, जो मेरी गृहिणी होने जा रही है।
राजा--(अपने मन में) मैं समझता हूँ महारानी जो इनका मत्राक
करना चाहती हैं, वो मैं चुप रहूँ और यह परिहास की टता बढ़ती रहे।
। द्वितीयोऽङ्कः (वतः प्रविशति चेटो) (परिक्रम्य पुरतोऽजोक्य) फर्घ एस देवो चाराअणवझगेण समं कोदूहुलयरस्स तुसारपुञ्जस संजवणसप्णिहिदो वट्टदि । ता विण्णवेमि देवीसंदिह । (उपत्य) जअदु जअदु भट्टा । देवी विण्यवेदि, चाराअणो मए दुदोआं परिणाइदुमाणत्तो ता तुन्हेहिं चाराअणमित्तकेहिं होदव्वं । एदं च कोदूहलवलं कदं कदलीपलं पविसदु देयो । देवी सपरिअणा इदो जेव वट्टदि। [ इति प्रवेशं नाटयति ] ( कयमेष देवचारायणवाझऐन समं कौतूहल. गृइल्म नुधारपुद्धत्य सञ्जवनसनिहितो वर्तते ! तस्मात् विशापयामि देवी-सन्दिष्टम् । जानु जयतु मी । देवी विज्ञापयति, चारापगो मया द्वितीयां परिणायदितुम् मासनः। तद् युमाभिश्चारायगमित्रकैर्भवितव्यम् । एतच्च कौतूहलगृहं प्रविशतु देवः। देवी सपरिजना इत एव वर्तते।) (ततः प्रविशति देवी कृववधूटी-वेपश्चेो विमवतश्च परिवारः)। देवी-हला मेहले ! अत्तमो जामादुअस्त कुगमु मुहावलोअगं (हला मेखले ! आत्मनो चामातृस्य कुरु मुसावलोकनम् ।) ... (इसके बाई, दाप्सी रंगमञ्च पर आती है) (घुनकर सामने की ओर देखकर) चारापन ब्राह्मण के साय कालगृह दुपारपुञ्ज के चतुःशालके सन्निकट महाराज जी यह कैसे उपस्थित है, की महारानी का सन्देश बता दूं। स्वामी की जय हो ! महारानी जी कह रही हैं कि कान में चारायण का दूसरा विवाह करने जा रही हूँ, आप चारायण के मित्र रूप में केसर पर उपस्थित रहें और यह कलीगृह ही कौन्लगृह बनाया गया है। इसमें महाराज जी चहें, परिजनों सनेत महारानी भी पड़ी हैं। (इस प्रकार गना से प्रवेश करने का अभिनय कराती है।) (इसके बाद महारानी जी, वधू-वेष में दास एवं सामग्रीसमेत सेवकवृन्द) देवी-अरे मेखले! अपने बामाता का मुख देख ।
विद्धशालभातिका मेखला-(तथा विधाय शिरसि चामाय) अज्ज चाराअण ! उवरिधेनु रत्तंसुअं कुणसु तारामेलणं ! (आर्य चारायग! उपरि धेहि रकांशु कुरु तारामेलनम्) विदूषकः-(तया करोति) देवी-मेहले ! तुरिदं देवावेमु भामरीओ, जैग पलिदे हुवहे लाअंजलीओ मुंचेदि । (मेखले ! त्वरित टापय भ्रामयः पेन प्रज्वलिते हुतरहे लाजाञ्जलिं मुन्नति ।) विदूपकः-(वथा कृत्वा ) अयि दुदीअवह्मगि घुवं सत्तरिसिमण्डलं च पेक्स । (अयि द्वितीयवाझणि, घुर्व सप्तर्षिमण्डलं च पश्य । ) चेटः-(विलोक्य) दिधुओ दिसत्तरिसिमंडलो अ संबुत्तोलि । ( दृष्टधुवो दृष्टसप्तर्षिमण्डलाच संवृत्तोऽस्मि ।) विदूपक:-अयि मुद्धे ? दिदृधुभा दिसत्तरिसिमंडला अहं त्ति भग। (अयि मुग्धे ! दृप्मुवा दृष्टसतमिण्टला च अहमिति भण।) (चेट-विदूषको पुनः पुनस्तथाऽभिटधतः) चेटः-अज चारामण ! देवीदासो टममओ क्तु अहं कहं परिणा- आणि । ण मुणीअदि दीवंतरे वि एसा यत्या पुरिसो परिसं परिणदि मेखला-(वैसा कर और गिर सूंघकर) आर्य चारापग! डरर लाल चस्व रक्खो । तारा-मेलन (परस्सरावलोकन ) करो। विदूषक (वैसा करता है) देयों-मेखले ! मोक्र बल्टी इलाओ, जिनते दर प्रीत यग्नि में साजावलि छोड़े। विदूपक-(वैसा करके ) अपि मेरो द्वितीय ब्राहगि ! ध्रुव और सतषि- मण्डल को देखो। टात-(देखकर) में भुव तथा ततषि-मन्डल को देख चुका । विदूपक-अरी मोदी ! मैं ध्रुव तया सतषिमण्डल देख चुकी-ऐना कहो। (दास और विपक पार वार वही अपना अपना याक्य दोहराते हैं।) दास-आर्य चारायण ! में महारानी जी का दास हमक हूँ, वैसे विवाह फ। किसी दौर में भी ऐसी भाव नहीं होती कि पुरुष का पुरुष से अपया नी का द्वितीयोऽद्धः इथिआ वा इत्यिअं। अंबरमाला उण अंबरमाला जेव । (आर्य चारायण देवीदासो डमरुकः खल्वहं कथं परिणयानि । न च दीपान्तरेऽपि एषा वार्ता श्रूयते यत् पुरुषः पुरुषं परिणयति स्त्री वा त्रियम् । अम्बरमाला पुनरम्बरमालय) विदूषकः-आः दासीए सुद्दे ! पुराणकुट्टिणि ! मगरदादे ! भमरटेण्टे ! टेण्टाकराले ! कोसवढिणि ! रच्छालोट्टणि ! त्रुडिदसंघलिदे ! परपुत्त- विहाविणि! विसमकत्तरि ! वञ्चिदह्मि तुए, ता रक्खिअस्स अत्ताणं । (आ दास्याः मुते ! पुराणकुट्टिनि ! मकरदंष्ट्र! भ्रमरटेण्टे ! टेप्टाकराले ! कोशवधिनि ! रथ्याटुण्ठिनि ! त्रुटितसंघटिते ! परपुत्रविद्रावणि ! विषमकर्षि! वञ्चितोऽसि त्वया, तस्माद्रक्षाऽऽत्मानम् ।) [ सर्वे हसन्ति] विदूषकः-(अपक्रामति) राजा-देवि ! विलक्षः क्रुद्धश्चारायणः कुवलयवीथीं प्रतिगतः । अस्माभिरपि गन्तव्यम् । तत् केनचिन् कर्पूरद्वोपादागतेन नरेन्द्रण सिद्धौपधैर्माधवीलतामण्डपो माञ्जिष्ठस्तकालङ्कृतः कृतस्तचरं श्री से विवाह होता हो। अम्बरमाला तो अम्बरमाला ही ( अम्बरमाला- आकाश कुसुम) विदूषक-भरी दासी की पुत्री ! पुरानी कुटनी, मगर केसे दाँतों वाली, भ्रमर की तरह इधर-उधर घूमने वाली, झगड़ालू, दूसरों के धन से कोश बढ़ाने वाली, सुरा-पानादि से सड़क पर लोटने वाली, दुश्चरित्रों के साथ रहने बाली, दूसरों के पुत्रों को भ्रष्ट करने वाली, विपरीत कर्म करने वाली! तुमने मुझे उला है, तो तू अपने को बचा। ( सत्र हँसते हैं) विदूपक-(चला जाता है।) राजा-देवि ! लत्रित चारायण टु हो कुवलयवीथी की तरफ चला गया। हमें भी जाना चाहिए । कपूर द्वीप से आये हुए एक वैद्य ने सिद्ध औषधियों से माधवीलता-मण्डल को मजीठ रंग के लाल फूलों के गुच्छों से अलङ्कत कर दिया -- ४२ विद्धशालभलिका चरितमवलोकयितुं प्रियवयस्यमावर्जयितुं च गच्छामः । त्वं मुनस्वदद्भुतं प्रदोपे द्रक्ष्यसि। देवी-कुरंगिए ! देवतादुदीअरस अजपुत्तरस पासवत्तिणी होहि । (कुरंगिके! देववाद्वितीयस्याऽर्यपुत्रस्य पार्विनी भव ।) इति सपरिवारा निष्क्रान्ता। कुर०-(परिभामितकेन ) इदो अन्न चाराअणो मालदीगुन्नन्तरे वन्दी विअ मुहमेत्तणिलुक्को चिठ्ठाद । (इत आर्यचारायगो माटवी- गुल्नान्तरे बन्दीव मुखमात्रनिल कस्तिष्ठति ।) যা- -तदानयैनन् । कुर०-(किञ्चिदुपसृत्य) भो ! अम्बरनालावल्लह देवो बाहरदि [इत्पञ्चले कर्पति ] ( भो अम्मरमालावल्लभ ! देवो व्याहरति ।) विदूषकः--आः दुदासि । भविस्सकुट्टिणि ! तुमं पि में अहससि, ता अमुणा तुह्मदेसजणगणकुटिलेण दण्डकट्टण सीसं वत्ति वाडइस्स। (आ दुष्टटासि ! भविष्यत् कुहिनि ! त्वमपि मामुसहसति, उरमादमुना सुमद्देश- मनमनःकुटिलेन दण्डकाष्ठेन गोर्यन्ताडिति वाडयिष्यामि ।) है। हम इस अदृष्टपूर्व कर्म का अवलोकन करने तथा प्रियमित्र को रोकने जा रहे हैं और तुम उस अद्भुत काम को सायंकाल के समय देखना । देवी--कुरनिके ! आर्यपुत्र अोले हैं, तू इनके सार रह । (ऐसा आदेश देकर परिजनों सहित चली गई) कुरशिका-(घूमने का अभिनय कर) मालती कुंद के अन्दर बन्टी की भाति जिनका मुखमाघ दिखाई पड़ रहा है, मार्य चारापग पर हैं। राजा-उनको ले था। कुनिका तिर भारत) हे अम्बरमाला के पालम ! महाराज दुला रहे हैं। विदूषक-अरे दुष्ट टासि ! कुटिनि ! त् भी मेरा उपहास करती है। तो तुम्हारे देश के लोगों के मन की भाति दे इस हाडे से तुम्हारे शिर को "" से पहूँगा।
द्वितीयोऽङ्कः
४३
राजा-कुरङ्गिके ! देवीमनुवर्तत्व, तत्परिवारे क्रुद्धश्वारायणः ।
कुर०--निकान्ना परिवामितकेन)
विदूषकः--पिअवअरसविणोदत्यं महामन्तिकारिदा रअणवदी
णाम पुरदो चक्किआ। कि उण ताए वि एसा अधिदेवद व्य ।
(प्रियवपापविनोदायं महामन्त्रिकारिता रत्नवती नाम पुरतश्चनुष्किना । कि
पुनलत्यामप्येऽषिदेवर)
राजा-(विलोक्य स्वगतम् ) हृदय ! दिष्ट्या वर्षसे स्वप्नदृष्टजनप्रत्य-
क्षदर्शनेन । (तं प्रदि) सते चारायण ! सैवेयम् अस्मन्मनःशिवण्डि
ताण्डवयित्री वर्षालक्ष्मीः। इदमन्यत्ते कथयामि, पुराणप्रजापतिनिर्मा-
पमेया। यतः-
चन्द्रो जहः कदलिकाण्डमकाण्डशीत-
मिन्दीवराणि च विमूत्रितविभ्रमाणि ।
चेनाक्रियन्त मुतनोः स कथं विधाता
किं चन्द्रिका क्वचिदगीतरुचिः प्रसूते ? ॥४॥
राजा-कुरनिके! महारानी के पास जा, चारायण उनके परिजनों पर
कुरङ्गिा (घूम कर चली गई)
विधा-आपके विनोदार्य महामंत्री के सामने यह रत्नरती नामक चौकी
बनवाई गई है, उस पर मो यह अधिदेवता सी है।
राजा-(देखकर अपने मन में ) हृदय ! स्वम में देखे हुए जन का प्रत्यक्ष
दर्शन कर मान्य से नुन बढ़ रहे हो । (चारायण से)
यह वही हमारे मन-मयूर को नचाने वाली वर्षा की ग्रोभा है। तुम से यह
और कहता हूँ यह किसी पुराने (महानुमती ) या की रचना है । क्योंकि
जिसने चन्द्रमा को बढ़, काली-स्तम्भ को अनुपयुक्त अवसर पर मी शीतल
रहने वाला एवं इन्दीवर को वित्रि (अकमद्ध) और शिम (शलता
रहित) बनाया, वह इस मुन्दरी का निर्माता कैसे हो सकता है। क्या कहीं सूर्य
चन्द्रिका उत्पन्न कर सकता है ? ॥ ४ ॥
यद्धशालमलिका अपि चास्याः खलु लक्ष्यामि तामिव वयोऽयस्यामलंकुरते, यन्यां दिवानिशभिनयाल्पविकल्पगवमानसा विष्टदि । नयाहि- उत्तालालकमसनानि परीभारेषु शिक्षारसो दन्तानां परिकर्मनीषि-नहनं भ्रूलात्ययोगग्रहः । तिर्यगलोचनचेष्टितानि वचसा छेमोक्तिसंक्रान्तकः स्त्रीणां म्लायति शैशवे प्रतिफलं कोऽप्येष केलिक्रमः ॥५॥ विदूषकः--( आकारमाक्लप सोपहासन्) भो एहि इदो भवोन देवीए सआसं गच्छलि । (मो एहि दवो भूला देव्याः सायं गच्चारः।) यजा-सखे ' पश्यामस्तायन् । विदूपका-किं तुनं गण्ठियधिरो विभ ठाणे यास वा गुड्चीदंटो व्य भवं इधजेब दाधरो भोदु । अहं उग देवीए सआसं गच्छसि । (किं त्वं प्रन्यिबधिर इव स्थाने स्खलति । वल्लाद गुइचोंदण्ड एव भवानिदेव दाटघरो भवतु । अहं पुनर्देव्याः सकाशं गच्छामि ।) और मैं देखता हूँ (कि) इसको आयु उस कथा को अलंकृत कर रही है, जिसमें दिन-रात मन में नये-नये नकलकिल आ करते हैं। जैसे-- चञ्चल अलकों को रोकना (चञ्चल अलकों को हापों से टोक करते रहना ), चोरी [यने की कला सीखने में आनन्द पाना, दाँतों को (उचित साधनों से) स्वच्छ और मोहक बनाना, नायो कर बाँधना, भूनन को रीतियों का मान पास करना, तिरछे नेत्रों से हार-माय प्रकट करना और अन्तरगर्मित वचन बोलना-ये सब गुण (युवावस्था में) उनमें (विनों में) समारतः आ जाते हैं। शैशवावस्या चीतवे श्रीवते वियों का प्रतिक्षा यह एक अपूर्व केलिमान रहता है। विदूषक-(आकार [मन के भाव ] नमझ कर उपहापूर्वक) थाओ, घर से होकर महारानी के पास चले। राजा-मित्र ! पहले इसे देख तो लें। विदूषक- क्या तुम मन्यि-धिर मा स्थान पर गिरते हो, वो आर गुरिच- दष्ट की तरह यहीं बसे रहो । मैं तो महारानी के पास बाता हूँ। 1
द्वितीयोऽङ्कः
सर्व सम्भाव्यते त्वयि ! किं मधु कक्षायति ?
विदूषकः-(विदस्य पुरोऽत्रलोक्य च) भो उपफालसमुप्फालनाई
करेहि लग्गा । (मो उत्सालसमुत्फालनानि करयोर्लग्नानि।)
राजा-(विहस्य) कन्दुकेन क्रीडति । तथा हि-
भमन्दमणिनूपुरक्वणनचारुचारिक्रम,
झण्जझणितिमेखलं स्खलिततारहारच्छटम् ।
इदं तरलकमावलिविशेषवाचालितं,
मनो हरति सुभ्रवः किमपि कन्दुकक्रीडितम् ।।६।।
विदूषकः-एवं एदं ( एवमेतत् )
चंचलचलणचण्डचारकमचलिदचेलों
अविरलवेणिवेल्लिदभल्लवलनधुदवअसिदमल्लिों।
सोहइ घणरणतरसणामणिकिंकिणी चर्थ
चंदमुहीए रअणरंगंगणे गेंदुअटितांडवं ॥७॥
(चञ्चलचरणचण्डचारक्रमचलितचेलकं
अविरलोणिवेल्लितभल्लवलनघुनविकसितमल्लिकम् ।
शोभते धनरणद्रशनामणिशिङ्किणोचयं
चन्द्रमुख्या रसरङ्गाङ्गणे कन्दुककेलिताण्डवम् ॥७॥)
राजा-तुम्हारे लिए सब कुछ सम्भव है । क्या मधु तुम्हें कसैला लगता है ?
विदूषक-हिंसकर और सामने देखकर) अरे !दायों का उछाल-कूद हो रहा है।
राजा-(हँसकर) गेंद खेल रही है। जैसे-
हे सुभ्र ! मणिमय नपरों की अमन्द पनि से पैरों की गति सुन्दर लग रही
है, करधनी की क्षुद्र घष्टिकाओं से झन झन ध्वनि निकल रही है, कण्ठ प्रदेश में
मुक्ताहार लटका हुआ हिल रहा है एवं चंचल कंकणों से विशेष ध्यान निकल
रही है, इस प्रकार की नुम्हारी कन्दुक्क्रीडा मन को हर लेती है ॥ ६ ॥
विदूषक-(ऐसा ही है)
चञ्चल चरणों को तेजी से आगे रखने से वस्त्र चञ्चल हो रहे हैं, वेणी के
बारबार लुढ़कने एवं हिलते रहने से उसमें गुवे मल्लिका के पुष्प नीचे गिर रहे हैं
एवं करधनी की विडिणी अत्यन्त शब्द कर रही है। रत्न-टित रंगभूमि के प्रांगणमें
चन्द्रमुखी की इस प्रकार की कन्दुक-क्रीडा अत्यन्त सुन्दर लग रही है ॥ ७ ॥
विद्धशालभस्त्रिका राना- अस्याः स्वेदाम्युपिन्दुच्युततिलकतया व्यक्तवक्वेन्दुकान्ते- वारंवारेण वेगाहणननटनालिवाचालितायाः। तत्पावोत्पात-तानोन्नतविनतशास्ताडनोचाललीला- लालित्याच्छन्दिताः स्मः प्रतिपदमघुना फन्दुकक्रीडितेन ॥८॥ (भूयो विमान) अहह ! महता वैगेन वर्तते । तया हि- चेलाञ्चलेन पलहारलवाप्रकाण्डैवेणीगुणेन च बलाद्वलयीकतेन हेलाहितभ्रमरकभ्रमिमण्डलीभिश्चक्रनयं रचयतीच चिरं नवभ्रः ।।।। (पुननिरूप) स्मरदारधिनिकाशं कर्णपाशं कृशागी रयविगलिनतालोपत्रताटङ्कमेकम् । वहति हृदयचोरं कुङ्कुमन्यासगौर चलयिवमिव नालं लोचनेन्दीपरत्व ॥ १० ॥ राजा-पसीने की बूंदों से मिल का तिलक धुल जाने से त्वष्ट मुलचन्द्र- कान्ति बाली, वारवार वेग से गेंद मारने की नृत्यकेलि में स्फूति युक्त एवं गेंद के नीचे गिरने और ऊपर उठने के तान के अनुसार नांचे उपर पाते हुए नेत्रों वाली इस मुन्दरी के गेंद मारने और उछालने की ललित लीला के कारण इस फन्दुककोटा से इस समय पग-पग पर हम हर्पित हो रहे हैं।॥८॥ (पुनः सोचकर ) अह ! हे वेग से गेंद खेल रही है। यस्त्रावल, चञ्चलहार को उत्कृष्ट लड़ियों एवं बरपूर्वक वेष्टित वेगसूत्र से कुम्हार फे चाक को विरस्कृत करने वाले गोलाकार चर काटने पर शुक्री भीहवाली सुन्दरी तीन वृत्त सा बनाती है ॥९॥ (पुनः सम्यक् अवलोकन कर) कामदेव के तरक्स के साय, वेग.के. पारल्य, हीरे नाले, समय से भिन्टि फनपण याला, कुम लगाने से गौर तपा नेत्र-कमल का तय हुआ नात सा, इस दुप्ले-पतले शरीर वालो नुन्दरी का अनुपम का दृदय को चुप देता है ।।१०॥
द्वितीयोऽङ्कः विदूषकः--भोः, विरदा गेंदुअखेलगादो (भोः, विरता कन्दुकीटनात् ।) राजान केवलं विरता सस्त्री, किनु करतलत्यस्तपागिपद्मा सप्र- त्यभिज्ञनिवारमानवलोक्यति च । पश्य- वस्त्रश्रोजितलत्रितेन्दुवदिदं कृत्वा करे कन्दुकं क्रीडाकौतुकमिश्रभावमनया त्र्यत्रं यहन्त्याननम् । भृङ्गाप्रामकृष्टकेतकदलस्पर्धावतीनां दृशां दीर्घापानिरीक्षणेकमुदामेपोऽस्मि पात्रोकृतः ।। ११ ।। विदूषकः-भो एहि अणुसरा सुंदरी । भोदु पेम्मदुट्टोटी। पोजदु दिट्टीए पीऊसगंड्सो। दिनदु ममणस्स हत्यावलंबो, पअट्टटु पंचमहुंकारा- हिचारो । भोदु विकटदुवभरो परिवारवग्गो । अच्चिनदु ममरध्वजसं चिचिमाइचिन्ताबाउलदार कंठहिदजोविदो चाराअणबह्मणो । (मो एहि अनुसरावः मुन्दरीम् । मवतु प्रेमसापल्लम् । पीतां दृष्ट्या पत्यूपग-पम् । दीयता मदनत्य हस्तावलम्बा, प्रवर्ततां पञ्चमहुड्डायभिचारः। मवतु विक्टदुर्भरः परिवारवर्गः। अर्ग्यतां मकरध्वजसन्धिविग्रहचिन्तान्याकुलतया कप्ठस्थितजीवितरचा- रायगवासः।) विदूषक परे ! गेंद खेलना बन्द कर दिया । राजा-केवल खेउना ही नहीं बन्द कर दिया, किन्तु येली पर होली प्रत्यमिता (स्मृति की सहायता से उत्पन्न अन), पूर्वक हमें देश है। देखो- मुल की शोमा से पराजित अतएर कन्दुक को हायपर रख, क्रीडा और कौतुहल के मिश्रित भाव वाल मुम्ब को विराटेदा किये इस सुन्दरी ने, मौरों को बलात् आकृष्ट करने वाले केतकपत्र सयां करने वाले तथा कनखियों से देखने में अत्यन्त निपुण अपने नेत्रों का हमें पात्र बनाया ॥११॥ विपक-आवो। मुन्दरी का अनुसरण करें। प्रेम साल हो । दृष्टि से अमृत रत पियो ] आमदेव को झया सहारा दो। कोयल की पुकार शुरू होने दो। आश्रितजन अत्यन्त टुमर हो काम सम्बन्धी सन्धिविग्रह की चिन्ता व्याकुल होने के कारण कटगत ग्राण चारायण ब्राह्मण की अर्चना करो।.
४८ विद्धशालभलिका (परिक्रम्य सोपानावतरणं नाटयतः) विदूषकः-अदेवं देवउलं, अणक्खरो लेहो, जदो ण दीसदिसा। (अदेवं देवकुल, अनक्षरो लेखः, यतो न दृश्यते सा ।) राजा दृष्टा हरिश्चन्द्रपुरीय नष्टा च । विदूषकः---एहि णि उणं णिरूपा 1 सा कहिं पि अभ्यंतरिदा चिट्टदि। (चतुर्दिशमवलोकितनाटिवकेन) राजा-(सविपादं भुवमवलोक्प) इयं चरणकुकुमच्छुरितकुट्टिमा मेदिनी निवेदयति कन्दुकव्यतिकरं कुरगीदशः। महो किमिदमद्भुतं न च कृशोदरी दृश्यते भवत्ववगतं स्मरः सृजति मोहमायामि माम् ॥१२॥ (सन्तोपमभिनीय समन्तादवलोक्य च) शिखामणिरितोऽस्तिलकयत्यं मेदिनी- मितो गलितगुम्फारलवेणिवान्ताः मान । (दोनों घूमकर सीढ़ियों से उतरने का अभिनय करते हैं) विद्रूपक-देवकुल बिना देय का, लेख बिना अक्षर पा को वह दिखाई नहीं पड़ती है। राजा हरिश्चन्द्र को पुरी की तरह दिखाई दी और गायब हो गई। विदूषके -(चारों तरफ देखने का अभिनय करता है) राजा-(विपाटसहित भूमि को ओर देखकर ) मृगनयनी के चरणों के कुकुम से लिस फीवाली यह भूमि उसके कन्दुः व्यसन को सूचित कर रही है, किन्तु कैसा आर्य है पद कृयोदरी दिखाई नहीं पढ़ रही है। अच्छा, जान गया, कामदेव यह मोह माया किया करता है ।। १२॥ (सन्तोप का अभिनय कर और चारों ओर देखकर ) उसकी लाल चूडामणि इधर गिरी हुई है, नो पृप्वी को अलकृत कर रही है। बन्धन के शिथिल हो जाने के कारण चञ्चल वेणी से छूट कर माटा - द्वितीयोऽ इतछुरितमन्तरा श्रुटितहारमुकाफल- रित: श्रवणपाशतस्वलजपत्रमास्ते च्युतम् ।। विदूषकः मुटु क्खु सण्णिावेस सिलिटं नालबत्तं । (मुट खलु सन्निवेश- हिनष्टं वालपत्रम् | [आदाय प्रसार्य च] कथं अस्सराइ ? अहो पिया अस्स जइ कालकवरिओसि ता पट । (कपमक्षराणि ? अंहो प्रियवयस्य, यतः कालावरिकोऽसि तस्मात् पठ।) राजा-( वाचयति) विधत्ते सोल्लेखं कतरदिह माझं तणिमा तथापिप्रागल्भ्यं किमपि चतुरंलोचनयुगे। (विभाज्य) अये, द्विपदीयं न पुनरत्रापि चतुष्पदी । विदूषकः-भोः गंडआ विज उद्धजाणुओ फेच्चिरं चिहिस्सामो । ता एहि मत्तवारणोपरि उवविसी । भोग काविबोदवानुको कियविरं स्यास्यायः । तस्मादेहि मच्यारणोपरि यतया कुरुतः । इधर कर्णवाय इधर गिरी है । निकटस्थ भूमाँग टूटे हार के मोराने देना से तालीपत्र गिरा हुआ है। विदूपर--सन्निवेश में किये बालवि है । (लेकर थौर गरी अरे इसमें तो अक्षर लिखे हैं। प्रियमित्र, तुमशिान हो, पड़ो। राबा--(बाँचता है) वैसे तो यौवन किस अङ्ग को हुन्टर नहीं कर देता अपांत् मभी अगों में नितार पैदा कर देता है, किन्तु नेत्रों में एक विशेष प्रगल्भता (चंचलता) 7 उत्पन्न कर देता है। (सोचकर ) मो इसमें दो ही पद नहीं, चार पर हैं। विदूषक-अरे गड़े की तरह उबड़ (घुरने के बल ) कर तक बैठे रहेंगे। आयो मत्तवारण ( मारी) के ऊपर थे। (दोनो वैसा करते हैं) वि ५० विद्धशालभलिका (नेपथ्ये) यत्तालोदलपाकपाण्डुवदनं यद् दुर्दिनं नेत्रयो- यत्प्रेट्दोलितकेलिपङ्कजदलं यासाः प्रसर्पन्ति च । गौरी क्रुप्यतु वर्तते यदि न तेतत् कोऽपि चित्ते युवा धिग धिक् त्वां सह पांसुखेलनसखो लोकेऽपि यनिहवः ॥क्षा विदूषकः-(चमत्कृत्य) मोः सिहावंधं मे करेहि, अमाणुसो वागी सुणीअदि । (भोः शिखाबन्ध में कुरु, अमानुषो वागी श्रूयते ।) -भित्त्यन्तरितः कश्चिदभिधत्ते । विदूपकः-तदो वक्खाणेहि मे । (तस्माद् व्याख्याहि मे।) राजा-काचित् क्वचिदनुरक्ता लज्जावती च वयस्यया भिन्नरहस्या क्रियते । नेपथ्ये (साक्वम्भम् ) सहीओ! कि एत्य अलिभं संभावेध ? (सख्यः किमत्र अलोकं सम्भावयय !) (नेपथ्य में) तुम्हारा मुख पके तालोपत्र को माँति को पीला हो गया है, नेत्रों ने भामुओं की जो हड़ोगी रहती है, सास लम्बी 1 रही है, हाय में रिप कं.डा-कमल की पंखुड़ियाँ वेग से दिल रही है, वो अपाय नुम्हारे मन में कोई युवक यसा हुआ है। यदि ऐसा न हो तो पार्वती थी का कोप मुझ पर हो । धूल में 'साय साप खेलने पाटो यचरन की सखियों से भी तुम जो दुराव छिपाय रखती हो तुम्हें विकार है ॥ १४ ॥ विपक-(चौंककर) अरे मेरी शिखा बाँधो। कोई देवो यानी सुनाई पटती है। राना-दीपाल की आड़ ने कोई चोल रहा है। विदूषक-मुझने समझाकर कहो। राजाको (स्त्री) किसी पुरूप में अनुरल किन्तु बनाती है, अनः उनकी सखा उससे रहस्य प्रकट कराने के लिए प्रयल कर रही है। (नेपथ्य में)-(स्तन्य वाणी में) सखियो ! क्यों तुम लोग मिष्या कल्पना करती हो !
द्वितीयोऽङ्कः ५१ राजा-वयस्य ध्रुतम् । विदूषकः- ही हो भोः, एदे क्खु पंडिदा अलिअविभप्पेहिं फललुद्धा विअ मकलामूलमलहंता पल्लवग्गाहिणो होन्ति, मुक्खा उण फणसवण- गालआ विभ मूलमणेसंता फलं पावइ,ता सुगोदु, महं जेव्य वक्ताण- इरसं । ण क्खु एवं सामण्जणवअणं, किंतु तुम जेव्व उवालम्भीअसि । ण क्खु मिअलंछगमुझीय अण्णेग ससिकंतपुत्तलिआ पद्ध-णिज्झरा पम्झरइ । (हो ही मोः, एते खलु पण्डिता अलीकविकल्पैः फललुब्धा इव मर्का- मूलमलभमानाः पल्लवप्राहिणो मवन्ति, मूर्खः पुनः पनमबनपालक इव मूल- मन्विष्यन् फलं प्राप्नोति । तत्माच्छृणोतु, अहमेव ब्याख्यास्यामि । न खल्वेतत् सामान्यजनवचनं किन्तु त्वमेवोपालग्यसे । न खलु मृगलाञ्छनम् उज्झित्वाऽन्येन शशिकान्तपुत्रिका बनिश प्रहष्यति ।) बा-तदिदं तर्क, अनाकरे पद्मरागरत्नम् । (पुनर्नेपध्ये) कह दे तक्खगं फुडिसिप्पिसंपुडमुक्कमोतिअच्छाआ। थक्कं तु मुमुहि अगंजणाणं णभणाणं वाहकणा ॥१५॥ (कयं तक्षणफुटितरान्ति कुल्लाया। स्तोत्रक्रियता सुमुखि अनजनयो विकणाः ।।१५।।) राजा-मित्र ! तुमने सुना। विदूषक-ही हो अरे ये पंडित लोग मिथ्या विकल्पों से फलम बन्दरो को भौति मूल न प्राप्त कर पल्लय ग्रहण करते हैं और मूर्ख कटहल के पी के • माली की तरह मूल का अन्वेषण करता फल प्राप्त करता है। तो सुनो। मैं ही। व्याख्या करूँगा । यह सामान्यजन के लिए नहीं कहा गया है किन्तु तुम्हारी हा शिकायत की जा रही है । चन्द्रकान्त का पुतलो चन्द्रमा के अतिरिक्त दूसरे से जल-प्रसाव करती नहीं प्रसन्न होती। राजा-वो मैं यह समझता हूँ कि बिना खान के लाल रत्न निकला। (पुनः नेम्य में) तत् काल सीपी के खुले सम्पुट से निकले मोतियों के समान तुम्हारे अनु विन्दु क्यों (लिर रहे है ) ? हे सुन्दार ! इन्हें बन्द करो ॥१५॥ ते विद्धशालभजिका सक्किसिहि कहं वसु पसरन्तपारदरसच्छित्तचर.च्छा। न कदलीए परिपंडुरत्तणं डिंभहरिणच्छि ॥१॥ (शिक्षसे कथं खटु प्रतरत्गग्दरससिक्तकाञ्चनच्छायम् । तनु कटल्याः परिपाण्डुरत्वं डिमहरिणाशि ॥१६॥ कहं तु तुए तरलिजंति केलिपंकेरहम्गखलगेण । णीसासा हिअहारलट्टिनंठाणापरिमामा ।।२७॥ (क्यन्नु तया ज्ञायन्ते केलिपईरहामस्तलनेन । निश्वामा: स्पितहारयप्टिसस्थानपरिमाणाः ॥ १७ ॥) निविटकण्टफिदकंचुभत्तणं पुरइ पुगो देहदायलन् । बदन पुग हरिणकविवदीपं कह णु होइ ।। १८॥ (निविडकण्टकितकञ्चुकत्वं स्फुरति पुनर्देहटौर्बल्यन् । वदनं पुनई रिपबिम्बटीनं पर्य न भवति ॥ १८ ॥) अइ तुह विनाहरमलदअदंसपेश फुडमागदा भंगोओ । पा विगा चंदं सेहालिआए घिअनि कुमुमाई । १९ ।। (अमितब विद्याधरमल देव दर्शनेन सुटमागदा मनमः। न विना चन्द्रं फाटिकाया विक मन्ठ दुगुमानि ॥ १९॥) विदूषकः-सिविणदहा हिंदोलियाचितसंचारिदासालभंजिअत्तने परिषदा गेदुगलिपी व्यवंश्यअणा सञ्चा अजेय एसा नुरे अश्विना मृगवावरनन ! पाग के रस से सिक्त नुवर्ण की सी छिटनी शान्ति पाटेवरर को बदली को पीतिमा क्रॉ सिखा रही ॥१६॥ तुम्हारे नि:श्वास (कर में स्थित ) हाकमलके यसमाग पर से होते हुए हार की लाहियों तक पहुँच रहै हैं-इठने टीर्घ निःश्वानों का दुन्हे अनुमान क्यों नहीं हो रहा है?॥ १७ ॥ नुहारे मन्नुस पुलकों से करित है एवं तुम्हारे शरीर ; दोनल का प्रत्फुटन हो रहा है । तुम्हारा मुख चन्द्र-विम सा टोन क्यों हो रहा है।॥ १८ ॥ विद्याधरमल देव के दर्शन से तुम्हारे समी वाने तुम्हारी चालें तर पत हो गई। चन्द्रमा विना साली के पुत्र नहीं लियते ॥ १९॥ विदूषक-वन में दिखाई टी, सटे के चित्र में मिली, शाटमणिका में रूप में पति दुई, मॅट सेटने लगो, कार चना का लनी, सचमुच दुमने . द्वितीयोऽङ्कः तुह चित्तं अक्खीवदि। (स्वमष्टा हिन्दोटिकाचित्रसंचारिताद्यालभज़िकात्वेन परिणता क्न्दुकखेलिनी काम्यबन्धश्चना सत्यैव एपा वया आशिना तब चित- माधिरति ।) (नेपथ्ये ) सहि मिअंकालि ! संपदंमए णिसगगत्यए दीएहोदव्यं । ( सखि मृगाकावलि ! साम्प्रतं मया निसर्गत्थया दूत्या भवितव्यम् ।) रामा-सैवेयमस्मन्मनसि मन्मथेनेदानोमुत्कीर्यते मृगावावलोति पञ्चाक्षरी। (नेपथ्ये) रइदा मए तुहावत्यागिवेदणत्यं महाराअस्स पुरदो पष्णिजा दुवे सिलोआ, ते पियसहीर मुशीअटु । (रचिती मया तवायत्या निवेदनायं महाराजस्य पुरतः पठनीयो दो दलोको, ती प्रियसखी शृणोतु ।) (संस्कृतमाश्रित्य) चन्द्र चन्दनकर्दमेन लिग्वितं यन्मार्टि दष्टाघरा कामः पुष्पहारः क्लेिति मुमनोवर्ग लुनीते च यन् । वन्द्यं निन्दति यच्च मन्मथममी भक्त्वाऽग्रहस्ताङ्गुली न्तत् कामं मुभग ! त्यया यरतनुर्वातुलना लम्भिता ॥२०॥ इसे आकृष्ट किया है और यह तुम्हारे चित्त को आकंट फेर रहीहै । ( नेपथ्य में) सन्ति मृगावावलि ! अब मै तुम्हारी सामादिक सच्ची दूती हूँगी। राजा-'मृगाङ्कावली' के वही । पाँच अक्षर मेरे मन में खोट खोद कर अङ्कित कर रहा है। (नेपथ्य में ) तुम्हारी अवस्या बेताने के निमित्त महाराज के सामने पढ़े जाने योग्य मैंने दो इलोकों की रचना की है, उन्हें प्रिय सखी मुनो। (संस्कृत में) (चन्द्रमा उसे वार देता है, अतः बदला लेने के लिए आकाशत्य साक्षात् चन्द्रमा को न पकड़ सकने के कारण) चन्दन के रस से चन्द्रमा की आकृति : बनाकर दाँतों से अवरोष्ठ काय्ती (क्रुद्ध हो) उसे विनष्ट करती है। पुष्प कामदेव के बाण हैं, अतः समी प्रकार के पुष्पों को तोड़कर विनष्ट करती है। अंगुलियाँ फोड़ फोड़कर वन्दनीय कामदेव को बुरा-भला (गाली) सुनाती है। हे सुमग ! तुमने अपनी इच्छाभर उस सुन्दरी को उन्मादावस्या की इस सीमा तक पात करा दिया है।॥ २०॥ 1 .
विद्धशालभलिका अपि च। तापोऽम्भः प्रतिम्पचः प्रचयवान वाप्पः प्रमालाश्चितः श्वासाः प्रेतितहारयष्टिलतिकाः पाण्डिन्नि मग्नं वपुः किं वाऽन्यत् कथयामि रात्रिमखिला त्वन्मार्गवातायन हरतच्छत्रनिवारितेन्दुमहसवत्याः स्थितिवर्तते ।। २ ।। विदूषकः-अहं उण जाणे अगुष्पविसीम चलिहम् । अहो, इह सुर- चाफिआसण्णा केवि वझरक्ससा जापंति । भूअपिसाचावासट्टाना संझा सणिहिदा यदि, ता एहि गच्छल । (अहं पुनजाने अनुपवित चलितुम् । अहो, इह शून्यचतुष्किासन्नाः केपि ब्रह्मराक्षसा बन्ति । नव- विद्याचावासस्थाना सध्या सनिहिता वर्तते । तस्मादेहि गच्छाः।) राजा-यथाह भवान् ( इति उमाक्ववरण नाटयतः) (नेपथ्ये सुसाय सायन्तनी सन्ध्या भवतु देवस्य । सम्प्रति हि- निर्यद्वासरजीवपिण्टकरणं विभ्रन् फवोगान् करान আখ্রিষ্ট रविविम्बमम्वरतलादस्ताचलं चुम्बति । और भा उसके शरीर का ताप समुद्र को भी तत कर , पाला है। नेत्रों ने ऑस् उमड़कर नाले की भाँति प्रवाहित होता है। उसके दोकात हार की लड़ियों को दोलित करते हैं। शरीर अत्यन्त पोला पट गया है । अथवा और क्या कहूँ, हाय के छत्र ने ही चन्द्रमा को किरणों को बचाती हुई (दर्शनार्य) तुन्हारे मार्ग के समीर झरोखे से लगी सारी रात बैठी रहती है ॥२१॥ पिदूपक-मैं समतता हूँ कि अब दरवाजे से प्रवेश पर चला जाय। यहाँ निर्जन चौकी के पास कुछ प्रयास चोल रहे हैं । सन्मा, जो भूत-पिशाचों का आवास स्थान है, सन्निकर है । तो आओ चलें। यदा-ता आप का कहना--(ऐसा ही हो)[टोनों उतरने का अभिनय करते हैं (मेरम्प में ) तापनि सम्मा महाराज के लिए मुखकर हो । इस समन बाते दिनली दवा मिन्टभूत एवं कुछ कुछ गर्म किरणों को धारण करता महंठ रंग का हाल दर्दनन्डल आकाशवल से अत्ताचल को प्रात हो द्वितीयोऽङ्कः किञ्च स्तोकतमाकलापकलनाश्यामायमानं मनाग धूमश्यामपुराणचित्ररचनारूपं जगजायते ॥२२॥ अपि च सैरन्धीकरकृष्टकङ्कणतरत्तारवनिः सञ्चर दूतीसूचितसन्धिविग्रहविधिः सोल्लासलीलाचयः । वारस्त्रीगणसनयमानशयनः सन्नद्धपुष्पायुधः श्रीखण्डद्रवधौतसोधतलको रम्यः क्षणो वर्तते ॥ २३ ॥ राजा-सन्ध्यामुपासितुं देवोभवनमेव गच्छावः । (इति निष्क्रान्तौ।) इति विशालमझिकायां द्वितीयोऽङ्कः . रहा है। कुछ कुछ अन्धकार आ जाने से थोड़ा थोड़ा श्यामायमान नगत धूम से काले पड़ गए पुराने चित्र सा प्रतीत हो रहा है ॥२२॥ और भी (कहीं अभिसार के निमित्त) दासी द्वारा (लवावती नायिका का) हाय पकड़ कर सींचने से कङ्कण की ऊँची ध्वनि हो रही है। (कहीं ) दूती (नायिका को) सन्धि-विग्रह की विधि बता रही है । ( कहीं प्रेमो और प्रेयसी का) उल्लास- पूर्वक क्रोडा, केलि एवं विलास का क्रम चल रहा है । वेश्यायें अपनी अपनी सेज दिला रही हैं, कामदेव (धनुष-बाण सहित ) तैयार हो रहा है एवं महलों की सतह स्वेत चन्दन के रस से धो दी गई है। इस प्रकार यह सन्ध्या का समय रमणीय हो रहा है ॥ २३ ॥ राजा-सन्थ्योपासन के निमित्त महारानी के भवन में चलें। (ऐसा कहकर रंगमञ्च से चले गए।) द्वितीय अङ्क की 'कला' हिन्दी व्याख्या समात । ।
अथ तृतीयोऽङ्कः (ततः प्रविश्चति चेटी) चेटो--(परिक्रम्य) को चित्र कालो पट्टदि पिअतही विअक्सगाए दिट्टाए । कण्ठामरेण अस्ससीअरकरविरं विअ करिदंतमुमलं फु ट्रणभुइटै चदि मे हिझाता कहि णु क्तु तां दक्विन्तं ? (पुरोऽवलोल) वधं एपा पियसही किंपि चिंतअन्ती इदो एब्च आअच्छदि। (क इव बालो यतते प्रियसख्या विचक्षणाया हटायाः। उत्कष्टामरेण अलवरकरंचि- मिव करिदन्तमुसलं स्फुटन भूपिष्ट पत्तते मे हृदयम् । तस्मात् छ नु खलु टां द्रश्यानि? क्यमेपा प्रियसखी किरि चिन्तान्ती दत एव आगच्छति!) (ततः प्रविशति ययानिर्टिष्टा द्वितीया चेटी) द्वि० चैदी-(स्वगतम् ) अहो मंतिणो पहु-कने गिरदिसआ भत्ती । ( अहो मन्त्रिणः प्रभुकायें नितिशा भक्तिः।) प्रथमा-कधं महामाअधेअजणकन्नसिद्धी विअ चितिदोवगदा पिस मही। (स्वगतम्) तापच्छा भविअ अणाई से पोडिस्स। (क्यं महामागयजन कार्यसिद्धिरिव चिन्तितोपनता विपसखो ! तत्पश्चात् भूत्या नाने अस्याः पोटपिप्यामि ।) (इसके अनन्तर टासी रंगमञ्च पर आती है) टास (घूमकर) प्रियसखो विचक्षगा का दर्शन पाये बहुत समय हो गया । अत्यन्त उत्कण्ठा से मेरा हृदय पटा सा जा रहा है। तो देय का उसका दर्शन होगा ? अरे ! वैसे यह प्रियमखा कुछ सोचती घर ही आ रही है ? (इसके बाद यथानिर्दिष्ट दूसरी रासी रंगमञ्च पर आठी है) दूसरी दासी-(अपने मन में ) यहो! स्वामी के कार्य में मन्धों को कितनी बाधेक मक्ति है। पहली (मन में) महान् व्यक्ति की कार्यसिद्धि की भौति चिन्तन करते ही ने प्रियमावी आ गई! वोइसके पीछे धाकर इसके नेत्रों को (होलियों से) आच्छादित करूँ। !
तृतीयोऽङ्कः द्वितीया-पिअसहीए सुलक्षणाए करपफंसो। (प्रियमुख्याः सुलश. पायाः करस्पर्शः।) [प्रकाशम् ] सहि सुलक्खणे! जाणिदासि ता मुंच पाअणाई । ( सखि सुलक्षणे ! ज्ञावासि, तन्मुञ्च नयने ।) मुलक्षणा-( नयने परित्यज्य सप्रणयकोपम् ) हला विअखणे! एत्तहमेते वि सलिलप्सित्तक्षणगुणगंठिगाटे वि सिणेहे फधं उभिण्गसिहाखंजरी. टपकखिगो विअ अदसणा यदृसि ? ता एसा दे कुम्पामि । (हला विचक्षणे, एतावन्मात्रेऽपि सलिलसिक्तशणगुणग्रंथि गाटेऽपि कथमुद्मिनशिखा खञ्जरीटपक्षिणीव अदर्शना वतसे । तस्मादेपा ते कुप्यामि ।) विचक्षणा-(मप्रश्रयम् )-सहि मुलक्खणे! मा कुप्प, महामंति- भागुराअपिओओ एत्य अवरजझदि ण उण अहं । (सखि सुलक्षणे मा कुप्य ! महामन्त्रिमागुरायणनियोगोऽत्र अपराध्यति न पुनरहन् ।) मुलक्षणा-(सोपहासम्) को तुह्माहितो अणगो छगुण्णअविसये. यहइ । (को युप्मत्तोऽन्यः पाडगुण्यविषये विद्यते !) विच०-अलारिसजणजोगं महिला छगुण्णदंसणत्तणं कम्बु एदं । अत्मादृशजनयोग्यं महिलापाडगुण्यदर्शनचं खल्वेतत् ।) दूसरी–प्रिय सखी सुलश्चगा के हाथ का पर्श है। (जोर से ) सति मुच्क्षणे ! मैंने तुम्हें बान लिया, तो मेरे नेत्रों को छोड़ दो (आँख पर से हथेली को हटा लो) सुरक्षणा-अरी विचक्षणे ! जल से भीगी सन की रस्सी को गाँठ की माँति इतनी अधिक घनिष्ठता होने पर भी उभिन्न शिक्षा (जिसके सिर पर फैलगी उत्पन्न हो गई हो) खंजन पक्षो की तरह दिखाई नहीं पड़ती हो । (अतएव) मैं तुमसे अप्रसन्न हूँ। विचक्षणा-(नम्रतापूर्वक ) सखि सुलक्षणे ! क्रोध न करो। इसमें महा- मन्त्री मागुपयण के आदेश का अपराध है, मेरा नहीं। मुलचणा-(हँसी के साय) राजनीति के छः गुणों में तुम्हारे सिवा और कौन है? विचक्षणा-बलुतः हम ऐसे लोगों को महिलाओं के छः गुण जानना चाहिए।
विद्धशालभचिका सुल-महिला छगुण्णएण जइ महिलाअणस्स अदंसणं ता अझा- रिसीओ कीति दीसन्ति । (महिलापाडगुण्येन यदि महिलाजनस्यादर्शनं न्द् अस्मादृश्यः विमिति दृश्यन्ते ।) विच०-कह कीदिसं दे महिला छगुण्णों? (फयय कीदृशन्ते महिला पाहगुप्यम् ।) सुल०--तुम भण दाव उग अहं भणिसं, पठमं सहआरमंजरी वभिन्नइ पच्छातु कलकण्ठीमुद्दे सिठिलेदि । (वं मण तावत् पुनरहं मणिष्यामि प्रथम सहकारमञ्जरी उद्भिद्यते, पश्चात्तु कलकण्ठी मुद्रां शिथिलयति।) विचः-ता मुणु, अहमेअदा भअवदा भागुराअणेग सयहुमाणं भणिदा, विअक्खणे अह्माणं राअरहस्से तुए साहनं कादव्वंति । (तस्मात् शृणु ! अहमेकदा भगवता भागुण्यणेन सबगुमानं मणिता, विचक्षणे : अस्माकं राजमहस्ये वया साहाय्यं कर्त्तव्यमिति 1) मुल०-अहो दे मदिविवो दाणि मंतिणा वि एवं संभावीअसि । अहया का वण्णणा यकुलावलीगंधभारग्गोति । तदो तदो। (यही ते मतिविभवः यदिटानी मन्त्रिणाऽप्येवं संभाव्यसे। अयवा का वर्णना चकुलावली. गन्यमारोद्गारेति । ततस्ततः ।) मुलधणा-यदि महिला होकर महिलाओं के छः गुण न जाना तो हम क्योंकर देखी नौय (आवश्यक समझी जाय) विच०-बताओ, तुममें महिलाओं के पडगुग किस प्रकार के हैं ! मुल०-पहले तुम कहो, फिर मैं कहूँगी। पहले आमों में मजरी निक्लवी है, तदनन्तर कोयल अपना मान तोड़ती है-बोलती है। विच-सो मुनो ! एक दिन श्रीमान् मागुण्यग ने अत्यन्त आदरपूर्वक मुझसे कहा-विचक्षणे ! राजा के एक गोपनीय कार्य में तुझे मेरी सहायता करनी है। मुल०-अहो ! तुम्हारा फैसा बुद्धिवमव है कि आजकल मन्त्री से भी नुम इतना सम्मान पार्ती हो । अथवा बकुलावलो (मौलसिरी वृक्ष ) अविशय गन्ध बिखेर रही है-ऐसी प्रशंसा करना निरर्थक है (क्योंकि वह तो प्रत्यार ही है। हाँ इसके बाद क्या हुआ!
तृतीयोऽङ्कः विव०-विणवणदाए मए तत्ति पडियगं ! कधिद अ मे तेण, जघा, एसोजो मिअंकवम्मासा मिअंकावलीतं परिणीय सिरि-उबरायेण चकवत्तिणा होदव्वं, ता तुए ननु कदाचिद् मवणभित्तिसंचारे वासघरे एसा वासिदव्या, जेण देवस्स सिविणआयगमो होदि कन्जं तराई देहरदासो कघइरसदि, एदस्सिं महाराअकचरहस्से तुमं तीए पिभ-सही राअकजसजत्ति अन्भत्थीअसि । ण हु सोयाणवंतिमंतरेण वलहो समारोहो। तदो मए हरदासकधिदकनाणुसारेण सा मुबोसद्ध भणिदा, अइ सहि मिअंकावलि ! इह वासघरे मकरदओ ओदरदितं अहिं लूणकंठविहारकुमुमदामेण सो तुए अचिदथ्यो, जेण दे ता दिसोभत्ता होदित्ति, तए वि नह अन्भुवअदं किदंझ । पुणो हिंदोलएदेसिदा केटि- केलासवासघरफलिहभित्तिमु अत्तणो चित्तं लेहाविदा, फलिहभित्तिए परदो दंसिदा, तदणुवादिपीसालभंजिआ गिम्माविदा, रणवदोए चक्किआए गहडुएण खेलाविदा, खंमगभसंचारे तं तं भणाविदा ममाविदा । ( विनंतोपनतया मया तयेति प्रविपन्नम् । कयितं च मे तेन यथा एप यो मृगाडवा सा मृगाढावली, तां परिणीय श्रीयुवराजेन चक्रवतिना भवितव्यं, तत्मात् त्वया ननु कदाचिद्भवनमित्तिसञ्चारे वासगृहे एपा वासयितव्या, येन देवत्य स्वभावगमो भवति, कार्यान्तराणि ते हरदासः कथयिष्यति । एतस्मिन् महाराजकार्यरहस्ये लं तस्याः प्रियसस्त्री राजकार्यसनेति अध्यय॑ते । न खलु सोगनपंतिमन्तरेण भटमीसमारोहः । ततो मया हरदासकायतकार्यानुसारेण सा मुविसन्धं मगिता, अपि सन्ति मृगाढावलि ! इह वासगृहे मकरध्वजोऽवतरति, विच०-विनीत भाव से मैंने हाँ कर ली। उन्होंने मुझसे कहा--यह जो मृगाढवमा है, वह मृगाबावली नामक स्त्री है। उसके साय विवाह कर श्री युवराज, चक्रवर्ती हो बॉयगे। तो तुम किसी समय भवन मित्ति-सञ्चार वासगृह उसे रखना जिससे स्वामी स्वप्न में उसे देखें । अन्य कार्य तुमको हरदास बताये- गा। महाराज के इस गोपनीय कार्य में तुम मृगाकापलो की प्रियसखी बनो और राजा का काम बनाने के लिए तैयार रहो-यही तुमसे प्रार्थना है। विश्वास उत्पन्न कर मैंने मृगाढावी से कहा-अयि सखि मृगाढावलि ! इस वासगृह में ६२ विद्धशालभलिका तश तस्मिन् दृष्ट्वा पाठस्थितहारकुमुमदाम्ना स त्वाचितन्यः, ऐन ते वाहयो भर्ता भवतीति । तथापि तयाऽम्युरगतं कृतञ्च । पुनदालायां दर्शिता, केटिकैलात- वासगृहसटिकभित्ति आत्मनश्चित्रं लेग्विवा, साटिकभित्तेः परतो दर्शिता, तदनु- वाटिनी शालभजिम निमापिता, रनरत्याशकिकायां कन्दुकेन खेलिता। स्तम्भगर्भमचारे तनद्भणिता भ्रामिवा च) मुल०--अधनं विविविलासेहि पेक्खंतेपा महारापण फि पटियां। ( अप तां विविधविलासैः पश्यता महागजेन किं प्रतिपन्नम् ।) विच०-जं केलि अरिणी चाटुको चलिदो अरण्यकरी पडियज- म्सदि। नदी नागपोफुल्लगुच्छविच्छुरिददविडसामलगोगंडविसदामु मुद्धजामिणी असमंजसं विपलवदि तं जधा । (यत् फेलिकरिणचाटु ऋने चलतोऽप्यारी प्रतिपत्त्यते । ततस्तल्गप्रोत्फुलगुच्छविच्छुरितद्रविड- न्यामलानीगण्ड विशदान शुद्धयामिनी असमञ्जसं विप्रलपति । तद् यथा ।) कामदेव प्रकट होते हैं। उनका दान पाने पर अपना कण्ठशित हार चढ़ा कर उनकी अर्चना करना-~-जिससे उन्हीं ऐसा तुम्हें पति मिले । उसने मी यद्गीकार कर लिया और वैसा ही किस। फिर झूले पर सामी को अपना दर्शन दिया, देलियास नामक यासह की सटिकमय टीवालों पर अपना चित्र चित्रित कराया । (तदनन्तर ) साटिक को टीशल की आड़ में दर्शन दिया । अपने रूप से सर्वथा मिलती-जुलती बालमनिका (मूर्ति) निर्मित कराई । ग्लागली को चौकी पर उसने कन्दुककोड़ा की। स्लम्मगर्भसंचार गृह में तत्तद् कहलाई गई और घुमाई गई। गुन्ना-इसके अनन्तर अनेक प्रकार के विलास (हाय-भार) करती देखकर महाराज ने क्या किया? विच०--क्रीडाहस्तिनी की चाटुकारिता में पड़ा हुआ वन्यहस्ती जो करेगा। इसके बाद पूर्ण विकसित दुटों के गुच्छों से दंस द्रदि देश की सौपनी सुन्दरी के कपोलों के समान उत्रन स्वच्छ रातों में महाराज असङ्गत प्रदान करने लगे। जैसे- तृतीयोऽङ्कः (संस्कृतमाभित्य) श्यामां श्यामलिमानमानयत भोः सान्द्रमपी-कूर्चकै. मन्त्रं तन्वनुन प्रयुज्य हरत श्ववोत्पलाना रुचम् । चन्द्रं चूर्गयत क्षगान कणशः कृत्वा शिलापट्टके येन द्रष्टुमहं क्षमे दहा दिशस्तद्वक्त्रमुद्राहिताः ॥ १॥ मुल०-तीए उस का अवत्या वददि । (वस्या पुनः काऽजरमा वर्तते १) विच०--(संस्कृतमेवादिष) सौघादुद्धिजने त्यजत्युपवनं द्वेष्टि प्रभामैन्दवी- मारान् घम्यति चित्रकेलिसदसी वेशं विषं मन्यते । आस्ते केवलमन्जिनीकिसलयप्रस्तारशय्यानले संकल्पोपनमत्तदाकृति-रमायत्तेन चित्तेन सा ॥२॥ संपदं तुमं कहेहि कीदिसं ते महिलाठग्गुणं (साम्प्रतं त्वं क्षय कीदृशन्ते महिलापाडगुप्यम् ) (संस्कृद ने ) अरे गाड़ी कालिख पुक तून्निन्त्र से कलाइयो रत को और अधिक काली बना दो अथवा तन्त्र-मन्त्र का प्रयोग कर चित न हो मनोइरता को दूर कर दो। क्षण मर में चन्द्रमा को गिला पर पेटत कर महेन्डेकड़े कर पीस डालो, जिससे मैं दसो दिशाओं को उस मुन्दरी श्रीः मुले मुद्रा त शक्ति देख स॥१॥ मुन्शणा-उत्त (मृगाद्दावली ) को क्या देशा है ? विचक्षणा-(संस्कृत में) महल में रहने से उद्विग्न हो जाती है, उपवन के मी छोड़ देता है, चन्द्रमा की प्रमा से द्वेष करती है, चित्रलि नामक वासरह से भी बहुत दुःखी होती है, पत्रान्वन को विष सा स्मशती है। केवल कल्पनाओं से युक तथा उस ( महाराज के रूप के धान में मग्नचित पदक प्रालिली .. ननून, कोमल पत्ते की शय्या पर पड़ी रहती है ।॥ २॥ अब तुम्हारा स्त्रियोचित पडगुण कैना है ? बताओ।
. विद्धशालभञ्जिका सुर--सुणु जादिसं । एक्कदाहं महाराएण सपसादं संदिट्टा, जया, तुए णिभिण्णरहरमा देवी कादवत्ति। (शृणु यादृशम् । एकदा अई महाराजेन सप्रसादं सन्टिष्टा, यया न त्वया निर्भिनिरहस्या देवी कर्तव्येति ।) विच०-किं विस तं । ( किमिव तत् ।) सुल०-जहा, अलिअविवाहविटक्यो चाराअणो देवी धारोइ पदारिदुमिच्छदि । ता दिणाव सागसमए तरुणवगराइनीरंधअंधारे केसरतमसिहरं आरहिअ पमदुजाणमझगामिणी मेहला तए सागुणासिौ भणिदव्या, जहा अयि मेहले ! इह देसाहपुण्णिमा पओसे एव तुए मरिदव्यंति । भणिदा अस। (यथा अलीकविवाहविलक्षवारायणो देवी धात्रेयी प्रवारयितुमिच्छति । तव दिनावतानतमये वस्गवनराजिनरन्मान्धकारे केसरतरुशिखरमारुह्य प्रमदोद्यानमध्यगामिनी मेखला त्वा सानुनासिक भगि- तब्या। यथा, अपि मेखले ! इह वैशाखपूर्णिमा-प्रदोप एव त्वया मर्तव्यमिति । भणिवा च सा। विच०-उदो उदो । ( ततस्ततः।) सुल-तदो तीए सन्झसवसविदए पहं वि तत्त हविभ कवि डालसंपुडाए भणिई, भअयांद असरोििण दिव्ये याणि ! मं अनुकंप. मुन्द्र०--जैसा है मुनी। एक बार महाराज ने मुझसे प्रसन्न होकर कहा के देवा को रहस्य का पता न चरने पाये। विच०-महाराज ने तुम्हें क्या बताया ! मुल-मिथ्या विवाह से अप्रसन्न चारायण देवी की धात्री की सड़की को इलना चाहता है। तो तुम सायंकाल के समय तरण-यन के घने अंधकार में मीलसरी वृक्ष के शिसर पर चढ़कर प्रमदोद्यान के अन्दर हाती मेखला में ननुनासिक स्वर में कहना-"मेखले ! इसी वैशाख की पूर्णिमा को शाम को ही तू मर जापर्ग:"। और ऐमा मैंने उससे कहा । विच०-इसके बाद। मुल०-य मय-यय कम्पित उसने किसी तरह वहाँ रुककर दोनों हाथ जोड़कर कहा-है मागवति अशरीरिमि दिन्ये वाणि! मुझ पर अनुकमा करता तृतीयोऽङ्कः ६३ तीए जघा मरणं तुए जाणिदं जीविदं वि मे जाग । (ततस्तया साध्वस- वश्वेपितया कथमिव तत्र भूत्वा कृतनिविहानलिमम्पुटया मणितं, मगति अवसरिपि दिन्ये वागि, मामनुकमयन्त्या यया मरणं लपा ज्ञातं गोवितमरि मे जानीहि ।) विचा-तदो तदो। (ततस्ततः ।) सुल०-तत्य मए एव्वं पित, जइ गंधवअविअक्सगं बझणं गुरुणा अवगासकारण अहिणदिन पाएमु पती जंपन्तरमग्गदुवारण मञ्चरसि तदो दे जीवितावलंबोत्ति । (तत्र मया भगिनन् , यदि गन्धर्व- वेदविचक्षणं ब्राझणं गुरुगाऽचनासत्कारेणाभिनन्द पादयोः पतन्ती बहान्तरमार्ग- द्वारेग सञ्चरते ततस्ते बीत्रिवावलम्ब इति।) विच–अहो दे विअक्वगत्तणं। जदो मुणियो वि एवं मुमरति, पादाहिंतो बझमा पवित्तति सव्वं। (विभाज्य) अहो कवडपाउस- कइत्तणं यत्मानम्म । तदो? (अहो ते वैशभ्यम् । यतो मुनयोऽप्येवं स्मरन्ति पादेन्यो ब्राह्मणाः पवित्रयन्ति सर्वम् । अहो कपटनाटककविलं प्रामागत्य ।) मुला-तदो तं मुणि मेहलाए अम्मुझलझलाई उन्यमन्तीए महाराअपुरदो एन्य मणिदा देवी। देवेश वि देबो मष्णु अवहरतेग चारायणचरिदं अणिव्वहतेण भमिदं, जह मुंदरि ! मा सण्या होदि, गंधव्ववेभविभक्वणो वह्मणो साहीणो एव । ता कित्ति अन्मुकणकरं- नुमने जिस प्रकार मेरी मृत्यु जान लिया, मेरा जोवन मो बानो-अयात् मेरे जोवन का मी उराय बताओ। विवर-इसके बाद। सुर-तब मैंने कहा- यदि महती पूजा-अर्चना से गन्धर्व वेद के शाता ब्राह्मण को प्रसन्न कर-चरणों पर गिरती हुई बाँवों के बीच के मार्ग से निकल जाओ तो तुम्हारा जीवन रह जायगा। विच०--तुम्हारा मो कैसा नैपुण्य है ! मुनि लोग भी स्मरण करते हैं कि ब्राझग पैरों से पवित्र करते हैं। (सोचकर) अहो ! ब्राझग ने मी कैसा काट नाटक रचा! मुला-इसके बाद आँसुओं की झलझलाइट से अपने हर्ष को सुव्यक्त ६४ विद्धशालभचिका बिअविचारा घट्टसित्ति संहाविदा देवी। देवोए वि अजा सा पुण्णिमेत्ति पूआसकारं सज्जीकार्दु पेसिदहि । (ततस्तच्छ्रुत्वा मेखलयाऽध्रुझलसलान्मु- द्यमन्त्या महाराजपुरत एव भणिता देशे । देवेनापि देवी-मन्युमपहरता चारापग- चरितं च निर्वहता भणितं, यथा, सुन्दरि, मा सन्ना भय, गन्धर्ववेदविचानो माहाणः स्वाधीन एव । तस्मात् किमिति अश्रुकणकरम्बितविम्बाधरा वर्तस हात संस्थापिता देवी । देव्यापि अद्य सा पूर्णिमेति पूजासत्कारं सन्नीकर्तुं प्रेषितारिख ।) विच०–ता एहि जवाणिदिट्टमणुचिहरसा। [इति निकान्ते।] (तरमादेहि ययानिर्दिष्टम् अनुष्ठास्यायः।) इति प्रवेशकः (ततः प्रविशति विरहोत्कण्ठितो राजा स्नानशुचिविदूषकश्च ). राजा—(अनुध्याननाटितान) क्रमसरसितकण्ठ प्रक्रमोल्लासितोर- म्नलिनचलिरेखामूत्रसर्वाङ्गमस्याः । करती हुई मेखला ने महाराज के सामने ही महारानी बी से सब बातें कही। महाराज ने मी महारानी का मोघ दूर करते हुए एवं चारायण के चरित का निर्वाह करते हुए रक्षा-मन्दरि ! दुःसा मत हो। गन्धर्ष पेट का Tar माण तो अपने अधीन ही है। तो क्या अपने विम्ब-फल (पके कुंदरू) के समान लाल अधर को आँखों से. गिरते अनु कण से संयुक्त करती हो। इस प्रकार महाराज ने महारानी को आश्वासन दिया। तो आज यही पूर्णिमा है अतएक महारानी ने पूजा सामग्री तैयार करने के लिए मुझे मंजा है। विच-तो आओ निर्देशानुमार हम अपना काम कर । (दोनों निगल गई।) (प्रवेशक समाप्त हुआ) (इसके बाद विरह से उत्कष्ठित राजा और स्नान किए हुए विपक) राषा-(ध्यान का अभिनय कर) मुशे देखने की इच्छुक उस नन्दरी के समस्त यङ्गों का में मोत्कृष्ट स्मरण करता है। मुझे देयते समय उसने कम से पहले गर्टन सीधी की (उसका ) उरः प्रदेश ऊँचा हो गया एवं तिरेखा-सूत्र भी तररित हो गया।
। तृतीयोऽ: स्थितमतिचिरमुच्चैरप्रपादागुलौमिः करकलितसस्वीकंमादिदृक्षोःस्मरामि ।।३।। विदूषकः मा समाधानभंग मे कुग, देवोपुरदो मेहला जीवइदव्या । (स्वगतम् ) भइ दुट्टदासि ! दोसिणि बुद्धो चाराअणो पीडइस्सदि । (मा समाघानमनं मे कुरु । देवीपुरतो मेसला बीययिठव्या । अयि दुष्टदासि, दौरिगि, क्रुद्धश्चारायणः पंडयिष्यति ।) राजा-(वचनमाकर्ण्य तदेव पुनः पठति) विदूषकः-मा पुगो पुनो मुमर, संदावदाइणो क्खु एसा । (मा पुनः पुनः स्मर, सन्तापदायिनी सल्वेषा।) राजा-किमात्य सन्तापकारिणीति ? तथाहि पञ्चमकाकलीकलगीतयः कर्ण कलुपयन्ति, मुधाम्यन्दिनी चन्द्रमूर्तिश्चपो तापयत्ति, चन्दन- रसनिप्यन्दस्तनुं दहति ? विदूषकः-मो धक्का मए किदं, तुमं जेव्य सव्वदो सारं उचिगसि । हंसो जेन्य जलेहिं दुद्धमुद्रेदि । किं जमणामि, भए अझअविना विअ तुए विसुरिदा देयो। ( मोः, चोद्यं मया कृतम् , त्वमेव सर्वस्मात् हाथ से सखों को पकड़े एवं पैरों के सेवा के बल उझकर यह बड़ी स्थिरता से मुझे देखने लगी ।। ३ ।। विदूषक--मेरा ध्यान मङ्ग मत को 1 मुझे महारानी के सामने 'मेखला" को जीवन प्रदान करना है। अयि दुष्टदासि ! 'रागिनि ! कुद तुम्हें परेशान करेगा। राजा-(उनके वचन को सुनकर पुनः उत्तौ इटोक को पड़ता है। विदूषक-बार २ उसी का स्मरण मत करो। वह अत्यधिक सन्म प्रदान करने वाली है। राजा-क्यों सन्तारमारिणी कहते हो? क्या कोयल का पञ्चमतर-पूर्ण गान कानों को कलुषित करता है कानों को अच्छा नहीं लगता है, क्या अमृत बरसाने वाले चन्द्रमा का रूप नेत्रों को तत करता है १ का चन्दन रस का ले शरीर को जाता है? विपक-अरे मैं दो मजाक कर रहा-या । तुम्ही तत्व-चान करना मानते ५वि० विद्धशालमक्षिका सारम् उचिनोपि । हंत एव नदेम्मो दुन्धनुरिति । किं पुनर्मणानि, मया अप्प यनविधव लया विस्मृता देवी।) राजा-आ शैशवात् प्रसनप्रणया देवी कथं विस्मयते ? किन्तु देच्या निधायोरसि वामपादं यत् सुन्दरीभिःप्रसभेन भुतम् । कृतं मनोरिक्थमहो द्विधा बतया विभज्य स्मरशासनेन ॥ ४॥ विदू.- अकमा हिदोलदोलिदं विदेचितंगमागमाहि ण विरमदि। (अरमादोलान्टोलितमिव त्वश्चित गमागमान्या न विरमति ।) राजा-एक्नेतत् । यतः- नो मालतोदामपिमर्दयोग्य प्रेम नव्यं सहतेऽन्तरायम् । म्लानापि मोच्या न हि फेसरसग देवी न खण्डा प्रणया कश्चित् ॥५॥ वि०-भोः, कि एदेपा दक्षिण्णवण्णोवण्णासेण? पुराणपत्तमणि फालिअ णो पल्लओ समुल्लसदि । न अ तरुणगंठिवण्णअदलीक- चलगन्ट दो गंधहरिणो मदणकेदारियाए अहिरमदि । (भोः किम् एनेन, हो । हम ही नल से दूध अलग करवा है। अग मैं कहता हूँ मेरो पड़ी दिया को मौति महारानी को तुमने क्यों भुला दिया ! राजा-शव काल से ही पदे हुए प्रेमवाली देवी कैचे भुलाई बासस्टी देवों के दृश्य पर चानों पैर रख उस मुन्दरीने कामदेव के आदेश से मेरे मनरूती मंचिका घटकारा पर दो भाग कर दिया !!४!! विदूषर अग्मात् गले पर चढ़ा हुआ सा तुन्दारा चिच संकल्प विकल से विराम नहीं लेता। राजा-ऐमा दी है। क्योंदि-- मालती की माला मसरने योग्य नहीं। नूतन प्रेम व्ययधान नहीं हर पाता । म्हान होते हुए भी मौलसिरी श्री माला छोडते नहीं बनती। महारानी नसे किसी प्रकार भी प्रेम तोडा नहीं जा सरवा है ॥५॥ विदूषक-इन चातुर्यपूर्ण वचनों से क्या! बिना पुराना पत्ता नष्ट किर है। किन्तु - तृतीयोऽङ्कः ६७ दाक्षिष्यवाँपन्यासेन, पुराणपत्रमविदार्य न पल्लवं समुल्लसति, न च वरणग्रन्थि- पान्डलीकवलनटुब्धो गन्धहरिणो मदनदारिकापाम् अमिरमते । राजा-सखे ! निरर्गलबागसि । यदनाशकनीयं तदाशङ्कसे । वि०कि मम परफेरआए चिन्ताए । ता भणीअसि, मा समा- • धानभंग मे कुण, देवीए पुरदो मेहला जीवइदव्यत्ति । (कि मम परकीय. या चिन्तया । तस्मात् मासे, मा समाधानमहं मे कुरु । देयाः पुरतो मेखला नीवासितव्येति ।। (चनः प्रविशति देवी, प्रयता च मेखला, विभवत परिवार:) देवी-हला मुलखणे । अपि संपिाहिदो अंतेउरदुवारवट्टी अजउत्ता. चाराअगो अ। (हला मुलगे ! अपि सन्निहिदोऽन्तःपुरद्वारपती मता चाग- याच।) मुरक्षमा-ग अण्णहा देवीए विण्णवीअदि ? (नान्यथा देश विज्ञाप्यते ) देवः-ला देहि मे मग । (तस्माद्देहि मे मार्गन् ।) पल्लव नहीं निकलता है, नवीन अन्यिार्ग (गाँ हर दूब) के अकुरों के खाने का लोभी कत्रीनृग घरे को क्यारी में नहीं रमता। राजा-नुम निरर्गल बातें करते हो। जिसकी घड़ा नहीं करनी चाहिए- उसी की गवा करते हो। विदूषक-मुझे परायी चिन्ता से क्या ! इसीलिए तुम से कहता हूँ कि मेरा प्यान मङ्ग मत करो। महारानो के सामने 'मेखला को मुझे जीवन प्रदान करना है। ( तदनन्तर देवी, प्रदत [ इन्द्रियों को दमन किये हुए सावधान ] मेखला तया अपने पद के अनुसार परिजन) देवी-सुलक्षणे! क्या स्वामी और चारायण अन्तःपुर के द्वार के पास या गये। मुक्षा-देवी से असत्य नहीं कहा जाता । देवी-तो मार्गनिर्देशन करो।
૬૮ विद्धशालभचिका सुल०-एदु एदु देवी। (इति परिकामति) अन्तेउरदुवार एकत्र भट्टा वदि, ता उत्सप्पदु देवी । (एतु एतु देवी, अन्तःपुरद्वार एव भवा वर्तते, तस्मादुरतर्पतु देवी।) देवी०-(उपसृत्य ) जेदु अग्नउत्तो। (बस्तु आर्यपुत्रः।) राजा-इत आस्यताम् । देवी-(उपदिश्य विदूषक प्रति ) अजरारामण ! देसु मे धत्तेइमा- भिक्खां जोचावेसु मेहलों। (आर्य चारायण ! देहि मे धात्रेयिकामिक्षां, जीवय मेखलाम् ।) विदू-~एस सोहि । ( एप सञोऽस्मि ।) मेखला--(मालिक) अन्न पाराअण ! अजयो तुमं महायलणे सरणं पढिवजदि। (आर्य चागयण ! अयं जनस्त्वां महाबाहणं शरम प्रतिपद्यते ।) [ इति पादी शिरस्यारोपयति । ] (नेपथ्ये ) कर्हि सा दुट्ठदासी, एदे अह्मे कालपुरिसा सिसलाहि पाविआ। (फ सा दुष्टदासी, एते वयं पार पुरषाः शृङ्खलाभिः प्रासाः।) वि.---(भत्ता बहुविध दण्डकाष्टमुद्यग्य) अहिं अहं पिगलिआ- वल्लहो गन्धव्यवेअविअखणो रक्तको चिहामि । तहिं को कालो के. कालपुरिसा का वा कालसिंपला । (यत्राहं पिनलिकावल्लभो गन्धर्ववेद- सुरक्षा-आइये ! आइये ! स्वामी अन्तःपुर के द्वार पर ही हैं, तो देवी जी चनें। देवं--(निकट जाकर) आर्यपुत्र को बर हो । रादा-दघर बैठिये। देव-आर्य चगण! पायी-पुत्री की मुझे मोख टो। इसे जिल्लाभो । विदूष-पद में चार हूँ। मेरला-(हाय बोडर ) अयं चारापन ! यह उन आर महानाहग की। गरण में है । (ऐमा यह उसके चरणों को सिर पर रख देती है।) [नरप में वह दुष्टदासी यहाँ है । ये हम काल-पुरर सना रिये आ गए हैं। विदूष:-(उटकर लाठी वानर ) वहाँ मैं सिगारिका का स्वामी और तृतीयोऽङ्कः विश्वग्ने रशस्लिामि तत्रः काला,के या कालपुरुषाः, का वा कालगृहला) [इति बहुविध वल्गति ।] मेला-(पादयोरन्तरे प्रविशन्ती ) भो ! परित्तामसुं मं। (मोः, परिवारस माम् ।) विदू-(उचगांयन्नवार्य) भो पेक्स विलासिणीवझरहाहिरुलं अत्तमो प्पिसवमत्स। (किञ्चिदुचः) भो मोः पेक्वयमे वझगत्तणं जेग बलाखलायिदसिखला पगहा काल-पुरिमा । (मोः पय विलासिनी- अमरथाविरुदम् आलनः प्रिसत्यम् । मो मोः, परस्त मे ब्राझयं यत् खटाखलावित शृङ्खलाः प्रनष्टाः कालपुरुषाः।) मेखला-मो जोविदसि । (मो बवितास्मि) विदू-(सालोट विहत्य) आः दासीए मुद्दे ! अटोअविवाह- विडम्बिदो क्कुद्धो चाराअगो दे पडिकिदिवसिहो । ता संपदं एत्तिअमेतं आमंसे दीहमभागकंकणा मोटु मे वागी । (आ दास्याः मुने ! अली कविवाहेन विद्वन्दितः क्रुश्शारायगः ते प्रतिकृतिसितः । तस्मात् साम्प्रतमेता- वन्नात्रमारावे दोयममग्नङ्कमा मातु मे ब्राह्मणः।) गन्धर्ववेद का विद्वान रक्षक हूँ, वहाँ काल क्या है ? कालपुरुष स्या है! काल- जला क्या है ? (इस तरह बहुविध बस्ता है।) मेखा-(उसके पैरों के बीच प्रवेश करती हुई) मरे मुझे बचाओ। विदूषक-(बोरसे गाता हुआ, रोककर) बरे (मित्र !) (इस ) वेसारूपी ब्रझरय पर चढ़े अपने मित्र को देखो। (कुछ जोर से ) मेरा ब्रासनत्व देखो! खनखनादी शृङ्खना वाले कालपुरुष माग गये। मेखला-अरे! मैं जीवन पा गई। विदूषक-(अट्टहास के साय हनकर) अरे. दासी-पुत्रि ! मिथ्या-विवाह तिरसव क्रुद्ध चारापा ने बदला ले लिया। तो इस समय इतनी ही अमिलापा करता हूँ कि मेरी ब्राझी चिर सौमाग्यवती हो।
विद्धशालभञ्चिका देवी-अनउत्त! जुत्तं ण असरिसं णम्म, जंदारें दे पिआसिणि- हभूमी मेहला एवं चिडवीअदि 1 ( आर्यपुत्र ! युक्तं न, अशं नर्म, पोटे. दानीन्ते प्रियास्नेहभूमिमखलैवं विडम्च्यते ।) विदू०-भोदि जुत्तं " असरिसं गम्म, सं दाणी महाराअपिभव- अरसो तह विडंविदा । (भवति, युक्तं न असहनं नर्म, यटिदानी महाराजधिप- वयस्यस्तथा विडम्मितः ।) देवी 10-अजउत्त-संबंधिओ ति तुए सह वधरं किटं । (आर्यपुत्र- सम्बन्धिक इति त्वया सह चोयं कृतम् । ) विदू०-भोदि संबंधिणी ति तए सह मए पडिवकर किर्द । (भवति, सम्बन्धिीति तया सद मया प्रतिचौधे कृतम् ।) मेखला-देवि, प सहीअदि एस उत्तरेहि पराजेढुं महाराओ एदन्त गुरुः । कैअइकुसुमवासिदम्स खदिरस्स अण्णो गंधुग्गारो। ( देवि ! न शम्पते एप उत्तरेः पयजेतुं, महाराज एतस्य गुरुः। केतकीकुलमवासितस्त्र खदिरस्पान्यो गन्धोद्गारः।) देवी-आर्यपुत्र ! यह तो उचित नहीं है, यह दिल्लगी अच्छा नहीं है, को इस प्रकार अभी तुम्हारी प्रिया की स्नेह-पात्र मेखला अपमानित की गई। विदूपर-श्रीमति ! यह उचित नहीं, यह दिल्लगी अच्छी नहीं, जो अभी अभी महाराज का नियमित उस तरह अपमानित किया गया । देवी-तुम आर्यपुत्रते सम्पन्ध (मैत्री) रखते हो, अतः मैंने उसके साय बदले में मजाक किया। विदूपक-अंमती जी! यह आपकी सम्बन्धिनी है (स्लेट-पात्र है ) अतः मैंने उसके साथ पाले में मजाक किया। मेखला-देवी ! यह उत्तरों से पराजित नहीं हो सकता 1 महाराज इसके गुरु हैं। वेवकी के पुमों से नुवासित मदिर (सैर) की एफ विचित ही गन्ध होती है।
तृतीयोऽ ७१ (देवी कोपनाटितकेन सपरिवारा निकान्ता) विदू-(पार्चमवलोक्य) भो संपदं गिन्नक्सिनं महु पिवासामो। (मोः साम्यत निर्मक्षिकं मधु पास्यामः।) राजा-अतिविलशा देवी, यतो मदती गता। विदू०-रुददु रददु, किं से मोतिआओ गलिम्मति । ता इदो उन्नागाहिमुहं एदु पिअवअस्सो। [इति परिक्रामतः । ] (रोदिनु, रोदितु, किम् अस्या मौक्तिकानि गलिष्यन्ति । तस्माटित उद्याना मिनुलन् एनु प्रियवयस्सः।) विदू-मो मह कण्ठट्टाविदपाणी मसिणणिवेसिदपादमुदं संचर। जदो वलालिरणिम्मिदं व, तेलभत्रिदकनलपुंजसंजणिदं य, ई. दणीलचुग्णसंभूदं व, सिदिकण्ठकण्ठसमुत्यिदं च, गाराअणतणुयिगिग्गलं व, मिअंककलंकणिग्गदिदं व, कुवलअयणपरिकप्पिडं व, करिफरटव- डदाणप्पट्टिदं ष, तिमिरचकवालं अणभिण्णादसमविसमं अणिमिद- सामधवलं, अपरिच्छिग्गलहुदीई अधिगददिअहत्तिमा अ भुवण गभंग करेइ । (मो., मम कण्ठस्थापितमागिनवगनिवेशितवादमुद्रं समर । यतो बहलालिकुलनिर्मितमिव तैरमतिकबलपुञ्जनजनितमित्र इन्द्रनीरचूर्ण- संभूतमिव शितिकण्ठकण्ठसमुत्थितमिव नारायणतनुविनिर्गतमिव, मृगाकालनिर्ग- ( देवी क्रोध का अभिनय करती परिजन समेत चली गई) विदूषक (बगल की ओर देखकर ) मोः (अरे) हम अत्र एकान्त में (जहाँ एक मक्ती तक भी न हो) मधु रियगे। राजा-देवी अत्यन्त क्रुद्ध हैं क्योंकि रोती हुई गई हैं। विदूषक-रोयें और रोयें। क्या इनके मोती गल जायगे, तो प्रियमित्र उद्यान की ओर आयें। अरे ! मेरे गले में हाथ डालकर घीमे-धीमे संभालकर पैर रखते हुए चलो क्योंकि अन्धकार इतना बढ़ गया है कि मानो असंख्य मारों के समुदाय से इसका निमांग हुआ है अथवा तेल से मुने काबल-पुञ्ज से उत्पन्न हुआ है, अपवा चमकीले मरकत मगियों के चूर्ग से प्रकट हुआ है अथवा शिवजी के कष्ट से उत्पन्न हुआ है, अथवा विष्णु भगवान के शरीर से निकला हुआ है - ।
विशालभक्षिका स्तिमिव, कुवलयवनपरिकल्पितमिव, करिकरटतदानप्रवर्तितमिव तिमिरचक्रवालम् অনারবৰিণামু অবিহিরামঘৰল অবিভিন্নীঘ নথি- दिवसरात्रिभागच भुवनगांगनं करोति।) राजा-एवमेतत् । तनु लग्ना इव क्कुभः मायलयं चरणचारमात्रमिव वियदपि चालकदनं मुष्टिमाझं वमः कुरुते ॥ ६॥ (विचितर्कयामि) उत्तंसः केकिपिच्छैमरकतवलयश्यामले दो प्रकाण्डे हारः सान्देन्द्रनीलमंगमदरचितो यपत्रपत्रप्रपश्चः । नोलाजैः दोखरश्रीरसितवसनता चेत्यभीकाभिसारे संप्रत्येक्षणाना तिमिरभरसखी पर्वते वेप-रेखा ॥ ७॥ . . अथवा चन्द्रमा के कलङ्क से बिल कर प्रवाहित हुआ है, अपना नं.ले कमल- बन ने रचा गरा है अपवा हाथियों के गण्डस्थल के बहे मदजल से बनाया गया है। इम अन्धकार से मंसार का आन्तरिक माग इतनी बुरी तरह आच्छा- दित है कि नम एव विषम भूमि का ज्ञान नहीं हो रहा है, काले यार इवेट का निश्चय न हो पा रहा है, छोटे और बड़े में मंद नहीं मालूम पड़ रहा है और टिन है या रात इसका पता नहीं चलता । राजा-मटी है, ऐमा ही है। अन्धकार ने दिशाओं को शरीर से लगा दिया है (दिशाओं का ज्ञान नहीं होता, मादम होता है कि सिमिट कर वे शरीर के पास हो आ गई है।) इस प्रकार पृर्व माल को एक पग भर का सा कर दिया है। आकाश को भी मुटी से ग्रहण करने योग्य (अत्यन्त लघु) बना दिया है।॥६॥ निर्मयतापूर्वक अभिसार की इस वेश में मर की पूंछों का कर्णफूल, मरक्तमगि के कंकणों से शामल मुज-टण्ड, गहरे रंग के इन्द्रनील मणियों का हार, क्लूरी के. रम से लिप्त मुख मण्डल, शिर पर नीलकमलों को धारण की गई मला, नीले पख का धारण करना यादि-मृगनयनियों की यह वेष-रचना मानो प्रगाद विनिर की सखी (प्रिया ) है-उसके अत्यन्त अनुकूल है।10॥
अपि च
तृतीयोऽङ्कः
७३
( नेपथ्ये)
कट्टिददुद्धमुद्धकरतरलिअजलगिहिसलिलसंचओ
तिहुवगभवणविच्छुरणच्छसुहारसधवल कुच्चओ।
चंदो मअगल्लिपल्लवगमहो सहि सरिसजोहो
पूर्वदिसामुहम्मि उम्मिलड चन्दणपङ्ककलिलोय ललिओसा
(क्वयितदुग्धमुग्यकरतरलितजलनिधिसलिलसञ्चय
त्रिभुवनभवनविच्छुरणाच्छमुबारसयबलकूर्चाः ।
चन्द्रो मदनवल्लीपल्लवनमहो सखि सदृशज्योत्स्नः
पूर्वदिशामुखे उन्मीलति चन्दनाङ्कलिल इव ललितः ॥ ८॥)
जगाणंदो चंदो लसइ मलिगीहोइ गलिगी
दिसप्पन्ते तारा रअणिमिरिहाग दिसि दिसि ।
रहंगा तत्तंगा विरह-सिहिमा दद्धचिहिना
इमे दुक्खस्कता ससिकरकिलंता विहडिदा ।।९।।
(जनानन्दश्चन्द्रो लमति मरिन भवति नलिनी
विसर्पन्ति तारा रजनीश्रीहाग दिशि दिशि।
रथाङ्गास्तताना विरहशितिना दग्यविधिना
इम दुःखाकान्ताः शशिफरक्लान्ता विघटिताः ॥ ९॥)
(नेपथ्य में)
कुछ कुछ बिलोये हुए दूध की माँति स्वच्छ करों (किरणों, हायों) से
समुद्र की जल-राशि को चंचल कर देने वाला, त्रिभुवन भवन को पोतने के लिए
स्वच्छ सुधारस (अमृत, चूने का घोल) को श्वेत कूची वाला, काम लता को
पल्लवित करने वाला, ज्योत्स्ना को साथी सा बनाए हुए, पूर्व दिशा के मुख पर
चन्दन-रस की राशि सा ललित चन्द्रमा उदित हो रहा है।॥ ८॥
और भी
लोगों को आनन्द देने वाला चन्द्रमा शोभायमान है, कमलिनी मलिन हो
रही है, रजनी के शृङ्गारार्य मुक्कामाला रूप तारा-गग प्रत्येक दिशा में बहुत
घारे घरे चल (हिल) रहे हैं। दुर्दैववश वियुक्त, विरहाग्नि से तप्त शरीर,
दुःखाकाल से कम पी चन्द्रमा के कों, (.किरणें हायों, दपा बलान
हो रहे हैं।॥ ९॥
७४ विद्धशालभतिका (पुनर्नेरध्ये) ये पूर्व चवचित्रहदो ये कैतकारच्छद- छायासाम्यभूनो मृगालतिकालावण्यमाजोऽत्र थे। व धासम्युविन्विनःक्षामयो ये वारहारप्रिय- स्तेऽमी स्फाटिक्दण्डडन्वरजितो जाताः मुघांझोः कराः ॥१०॥ अपिच सद्यश्चन्दनपपिच्छिलनिय ब्योमाङ्ग कल्पयन् पदयरावरकान्तदन्तमुसलच्छेदोपमेयाकृतिः। उद्गच्छत्ययमन्छौक्तिक्ललाप्रालयलन्दरै कान्तानां न्नरलेसवाचनलाईटिपदीपः शमी ॥ ११॥ विदू. -एसा कलमट्टी पाम देवीए पट्टाअरिणो, ताए चमगादी सुणि चंदोदयहोआवली कपूरचंडपामधेयो देवत्व नागपो अहिलं- देदि मिअंकुनोवलच्छि वग्गिढुं, ता नन विच्छुरदि तुंडरंडूः अहं पि वणिरसं सिगोलआहिालिदो जोगहापडिआरतो समीकुगइ पक्सत्तरखरवलकं पह-पलर दिमिर-फजटए । (पा लकान्दी नान देया नाटयकारिणी, तसा बदनान्ता चन्द्रोदपमोगावलि रचन्डनाम- (पुनः नेम में) चन्द्रमा की किरन को पहले फेठन्त्री के किसय के समान सौन्दर्य धारण फ्रने गों, छ ही देर बार पपना के लापन को प्राप्त हो गई। पुनः जह प्रवाह को गोमा का अनुसरण करने लगी। मन भर में शोमा नुवादार पनि हो गई, अब वे बढ़ते २ टिक नगि से निर्मित दृष्ट की गोमा को मात करने लगों ॥१०॥ और भी तवाल आकाश नडलको चन्दन-पद से चिकना एवं मिनटन पाता बनाता, वान्त ऐरावत के रपट टाँठों के सह सा, प्रेमियों के कान-पत्र को पढ़ने के लिए कामदेव दाय अर्पित टोपकमा चन्द्रमा मोटों की सहा के समान लम्बी किरणों सहित उटित हो रहा है ॥११॥ विदूपक--यह ! लक्ष्मी नानक, महारानी दो नाट्यकारिनी के मुख से
राजा-
...-
तृतीयोऽङ्कः
धेयो देवस्य मागधोऽभिनन्दति मृगाङ्कोद्योतलक्ष्मी वर्णयितुम् । तस्मान्मम विच्छु-
रति तुण्डकडूः अहमपि वर्णयिष्यामि । शशिगोलकाभिगलितो ज्योत्स्नाघटिका
रसः समीकुरुते नक्षत्राक्षरखलयं नमःफलके तिमिरकनलके ।)
-सखे ! नाद्यापि शैशवोक्तरनिरिच्यसे।
विदू०-कि विअ मकडो यग्विाणं करणिजं पुच्छ । तरूणुत्तीहि
वण्णइरसं । (किमिव मटो वरिष्ठानां करणीयं पृच्छति । तरुणोक्तिभिर्ण-
विष्यामि 1)
अकंकणमकुंडलं घरणिमंडलीभूषणं
अकुंकुममचन्दनं दसदिसावहूमण्डनम् ।
असोसणममोहणं मअरलंछणस्याउहं
मिअंककिरणावली णहत्याम्म लक्खीअदि ।। १२ ।।
(अङ्कणमकुण्डलं धरणिमण्डलीभूषणं
अकुङ्कुममचन्दनं दशदिशावधूमण्डनम् ।
अशोषणममोदनं मकरलान्छनस्यायुधं
मृगाङ्ककिरणावली नमस्तले लक्ष्यते ॥ १२॥
चन्द्रोदय वर्णन सुनकर कर्पूरचण्ड नामक महाराज का मागध चन्द्रोद्योत के
वर्णन का अभिनन्दन कर रहा है। इसलिए मेरे मुख में खुजलाहट हो रही है,
मैं भी वर्णन करूँगा । चन्द्र-मण्डल से निकली हुई ज्योत्स्ना रूपी गगरी का रस
अन्धकार से काले आकाश पट्ट पर नक्षत्रों की वर्णमाला बना रहा है।
राजा-मित्र ! बचपन में जैसी रचना किया करते थे, उनसे आगे अब भी
नहीं बढ़ पाए हो।
विदूषक-क्या बनर बड़ों से, क्या करना है ? यह पूँछता है । अच्छा,
। युवावस्था की उक्तियों से वर्णन करूँगा।
विना कङ्कण और कुण्डल के ही पृथ्वी-मण्डल को सुशोभित बनाने वाली,
विना कुङ्कुम और चन्दन के ही टशो दिशाओं को सजाने वाली, बिना शोषण
'आरै माहेन के मा कामदेव का अस्त्र-भूत ये चन्द्रनकरण आकाश-मण्डल में
दिखाई पड़ने लगी ॥ १२॥
विद्धशालमक्षिका राज्ञा-समन्तादोका मटनाकृतमभिनय) भगवन् यामिनीनाथ ! पन्तवायं विरद्धो विधिः ? मूतिर्दु धसमुद्रतो भगवतः श्रीकौस्तुभी सोदरी महादं कुमुदाकरेपु फिरणाः पीयूपधाराकिरः । स्पर्धा ते बदनाम्बुगदशां तत् स्थाणुचूडामणे ! हो चन्द्र ! कथं निषिश्चसि मयि ब्यालामुचो वेदनाः ॥१३] (चतुर्दिशमवलोक्य) यन्नद्राविनफैनकोदरदलस्रोतःभियं विभ्रती येयं मौक्तिकदामगुम्फनविधेर्योग्याच्छवि गभून् । उन्सेक्या कलसीमिरलिपुटे ह्या मृगाठाकुरैः पातव्या च शगिन्यमुग्धविभवे सा पन्द्रिका वर्तते ॥ १४ ॥ (विभाव्य ) वैमल्यमेव या शशलामणो माहाजने माणसन्देहहेनुः । वैषम्यमेव था विपं विषयस्य । राजा- चारों ओर देखकर, कामावेश प्रकट कर ) भगवन् यामिनी-नाय! तुम्हारा यह कैमा विषद कार्य है ! धीर सागर से आपका जन्म हुआ है, लक्ष्मी और फौलुम तुम्हारे सगे यहिन और भाई है, कुमुद-वृन्द से आपकी मंत्री है, किरणे अमृत बरसाने वाली है एवं मृगनपनियों के मुरस-कमलों से तुम्हारी सी है हे शिब वो के चूडामणि चन्द्र ! तो फिर क्यों मुझे संतापारी घेदना देते हो। १३ ॥ (चारों ओर देखकर) नियम से पिलाये हुए कवक के भीतरी पत्ते के बलप्रसाद की घोमा धारण करती हुई को चोदनी शोम हो मोतियों की मान्य में गूंथने योग्प मुन्दर छवि वाली हो गई यो, वह चाँदनी चन्द्रमा के और अधिक बद बाने पर गगरी से छिड़कने योग्य, अञ्जलिपुटों से ग्रहण करने योग्य और कमल के पी से पाने योग्य हो गई || १४॥ (सोचकर) चन्द्रमा को विमला ही मेरेमान-सन्देह का कारण है। विष की विषमता हा विष है।
तृतीयोऽङ्कः (चतुर्दिशमवलोक्य साभ्यर्थनम् ) अयि पियत चकोराः कृत्स्नमुन्नाम्य कण्ठान् क्रमकवलन चश्चञ्चश्वचन्द्रिकाम्मः । विरहविधुरिताना जीवितत्राणहेतो- भवति हरिणलक्ष्मा येन तेजोदरिद्रः ।। १५ ।। (पुरोऽवलोक्य) सैवेयं मृगाङ्कावली विदूल-भो मिअंकायली जेब एसा । ण हु एकचन्दस्स एत्तिअमेत्तो कतिवित्थारो। (मो मृगावावल्येवया । न खल्वेकस्य चन्द्रस्य एतायन्मात्रः कान्ति-विस्तारः।) राजा-ततः कदलीलतान्तरितादेव शृणुवस्ताबदस्या विश्वम्भजल्पि- तानि । आतृप्ति पिवेतां श्रवसी रमायनम् । ( तथा कुरुतः ।) (ततः प्रविशति यथानिर्दिष्टा मृगाडावला विचक्षणा च ) मृगावावली-(अनुध्याननाटितकेन तदेव "चन्द्रं चन्दनकर्दमेन लिखि- तमि"त्यादि पठति ।) (चारों ओर देखकर ललकारते हुए) विरहिजनों के जवन रक्षा के हेतु, अरे चकोरो! तुम कण्ट को ऊँचा कर, कम से निगलने के लिए चोचों को फैगकर चन्द्र-किरणों को सम्पूर्णतः पी लो जिससे यह चन्द्रमा तेजहीन हो जाय ॥ १५ ॥ (सामने देखकर ) अरे यह तो मृगाकावली आ गई। विदूषक-हाँ, यह मृगाढ = चन्द्रमा + अवली = पक्ति, चन्दों का समूह ) ही है। अकेले एक चन्द्रमा में इतनी चमक नहीं हो सकती। राजा-तो कदल कुछ में छिपकर हम तुम इतनी प्रेमविषयक वातां सुन, करसायन रिय। (वैमा करते हैं) (इम बाट ययानिर्दिष्ट मृगावावली और विचक्षणा रंगमञ्च पर आती हैं) मृगावाचली-(स्मरण का अभिनय कर) वही 'चन्द्र चन्दनकर्टमेन लिखितम्' इत्यादि श्लोक पढ़ती है। .
विद्धशालभलिका गजा—( सखेदम् ) अहो मदनमन्त्राभराणि सुभाषितवचनान्यस्याः । विदू०-अहं उग जाणे णिसिदायो मअणहत्यमल्लीमओ। (यह “पुनर्जने निशिता मदनहस्तमल्लप: ।) राजा- कण्टे मात्तिकमालिकाः स्तनतटे कापूरमच्छं रजः सान्द्रं चन्दनमगचे वलयिता. पाणी मृणालीलताः। कन्वो नक्तमियं चकान्ति शुचिनी चौनांशुके विभ्रती शीतांशोधिदेवतेव गलता व्योनाप्रमारोहतः ।। १६॥ विदू-भो सच्चं चंदाधिदेवतेश्च सा गलिदा । जदो लंगरलेग भअलंछगस्य इमाए अइरपरिषतमिणालदलमलिणं व मंडलमञ्झं निझा- अदि । (भोः सत्य चन्द्राधिदेवतेव सा गलिता । यतो लान्छनच्छलेन मृगय. छनस्य अनया अचिरपरित्यक्तं मृणालदलमलिनमिव मण्डलमध्वं निध्यायते ।) राजा-सखे ! मासलेऽपि चन्द्रिकाद्योते व्यतिरिच्यत एवास्याः स्मरजन्मा पाण्डिमा । दिभात्यत एव वा शहशुक्तियुक्ताऽपि मुक्तावली। राधा- खेदपूर्वक ) इसके मुभाषित पचन काममन्त्र हैं। विदूषक-मैं तो समाता हूँ कि कामदेव के हाय के चोसे किए गए भाले हैं। राधा-कण्ठ में मोतियों की मालाय, स्तनों के दारों ओर किनारे किनारे कपूर का उज्ज्वल लेप, शरीर पर चन्दन का गादा लेप, दोनों हार्यों में टिपये हुई कमल लता, उत्तम रेशमी वस्त्रों को धारण किए हुए यह मुन्दरी, रात में, नमो-मण्डल में ऊपर चढ़ते हुए चन्द्रमा से निकली अधिष्ठात्री देवी सी चमक रही है ॥१६॥ विपर-हों, सचमुच चन्द्रमण्डल से पृथा हुई यह अधिदेवता ही है क्योंकि इसके द्वारा परित्यक चन्द्रमण्ट वा मध्य भाग यमलदल सा मलिन, • यालक्ष के रूप में दिखाई दे रहा है। राजा-मित्र ! चन्द्रिश के इन समद प्रकाश में मी काम-जन्य सय पीलापन स्पष्ट भिन्न दिखाई दे रहा है। शंख पी सोपियों से युक्त मुकाबन्दी • पहचान ली जाती है-उसको कान्ति अलग प्रस्ट रहती है।
, तृतीयोऽङ्कः तथाहि- नसदलितहरिद्रापन्थिगौरे गरीरे स्फुरितविरहजन्मा कोऽप्ययं पाण्डुभावः। वलयति सति यस्मिन सार्धमावर्य हेम्ना रजतमिव कृशाङग्याः कल्पितान्यङ्गकानि ।। १७ ॥ विदू०-पारअरसविरं विअ सुवणं से लावणं । कमकंतगोर- तणेग आकि विअ अंगं आपांडुभावेण । (पारदरसचुम्बितमिव सुवर्णमस्या लावण्यम् । क्रमकान्तगौरत्वेन आकृष्टमिवाङ्गमापाण्डुमावेन ।) मृगाकारली हो हिअअ, अणेहि दिट्टो सो, तुम उत्तम्मसि त्ति अञ्चरि। मूले पउलपट्टीए सुरागडूससेओ कुसुमेसु मइरागंधुग्गारो- त्ति । (हो हृदय, नयनाम्यां दृष्टः सः, त्वम् उचाम्पसीत्याचर्यम् । मूले वकु- लयट्याः सुरागडूपतेः, कुमुमेषु मदिरागन्धोद्गार इति ।) विदू-किवा कारणम् ? राजा-(सकरणम् ) इदं हि कारणां, दलबाननङ्गोऽस्याम् । इयं हि स्वेन हृदयेन कलहायते । जैसे–नखों से काटी हुई हल्दी की गाँउ के समान गोरे शरीर पर विरह जन्य पीतिमा का रंग प्रकर्ष को प्रात हो रहा है। मानो इस सुन्दरी के अङ्ग, मोने के माय चाँदी को मथकर-एक में मिलाकर-(उसके) मिश्रण से रचे गए हैं ।। १७ ॥ विदूषक-इसका सौन्दर्य पारा-रस-मिश्रित सुवर्ण सा है। सुन्दर ओर गौर होने से अल्ल पीलेपन ने इसके अङ्गको आकृष्ट सा कर लिया है। मृगावाब-अरे हृदय ! उसे देखा तो नेत्रों ने और विकल्प हो रहे हो । नुन--यह आश्चर्य है। शराब से तो सींचा जाय मौलसिरी का मूल और मदिरा की उग्र गन्ध आये फूलों में। विदूषक क्या बात है? राजा--(करुणापूर्वक ) बात यह है-इसमें काम प्रबल हो रहा है। यह याने हृदय से ही कलह कर रही है। N ८० राजा- विशालभक्षिका मृगाढावली अइ कापूरसलाआसिसिरविजाहरमल ! तुमं पि तपसि ? कहिं मे पिन्बुदि । जब चन्दन हुअवहं पीसंददि को एत्य पडीमारो। (यपि, वाल्यकालदिद्याधरमत ! वारे वारिसने निवृतिः १ यदि चन्द्रमगि नयहं निष्यन्दयचे, कोऽत्र प्रदोकारः।) नमो मह्यं मृगाढवायलाचनुरोपालम्भपात्रीहताय ! मृगाडाक्टी-सहि ! सामणगामयामो भरिअ ममगो एजारिस करेदि ? ता बहूने रिसे मनुममा वाणा। (सखि ! सामान्मनुमानो भूत्वा मदनः कथमेताहगं करोति । तस्मादयोऽल विदोपडनमा बापा) राजा-सलिलमपि दति हिमानी । मुमुममप्यपि स्वभाववाना मदनम्तपश्वशरी। विदू०-भोपिअवअन्न, परिमारतिसकरपुत्तलिमा विष खोलने ओझरन्ती कंण दुप्णेदि, किंग मिलाणमरवरुदलीय मुसंधानवाह परिक्सामा वि इयं ग्मनिजा। किं अ कोरण्डकुमुममालामिलाअमाना सुठु ग्तु रक्तत्तण दंसेदि । (भोः प्रिवरपस्य. पांचत्रिशरापुनलिकेव धने धणे अपचीयमाना के न दुनोति । किं पुनर्लानमारकन्दलीय मुगन्धिः विरह- मृगाहावली-हे कर्पूर की शाम को मौति शउट विद्याधामन ! तुम मी संताप ( दुःख, वार ) दे रहे हो वो मुझे यहाँ चेन मिलेगा ! यदि चन्द्रमा हो अग्नि बरताने सगा वो फिर इसका कसा इटाज । राजा-मृगाहाली के चातुर्मपूर्ण उपालम्भ के पात्र नझे नमस्कार है। (मैं धन्य हो गया ।) मृगावावली-सम्धि ! यदि कामदेव के साग साधारण एटों के हैं, टो फिर वह इतना दुःसह दुम क्यों देता है। अपर इसके पान विशेष प्रकार के फूलों के है। राजा-डल से दना वा दराता है। कामदेव के हाथ में फूलों के ने बाग स्वभाव के प्रतिपून होते हैं अपांत् कठोर होते हैं। विपक-प्रिय मित्र ! ओले की मोनि प्रविश्य घटती हुई की राठ किसको वदित नहीं करती र नरक (टौना) की नई कोरल नुरक्षा हुई भी !
तृतीयोऽङ्कः ८२ परिक्षामाऽपीयं रमणीया। किं च कोरण्डकुसुममाला म्लायन्ती सुन्छु खलु रक्तत्वं दर्शयति ।) मृगावावलो-किं करेदि सहि ! दुवभेजा पेमदुद्दोलो। (सखेदम् ) सहि ! णिरणुक्कोसो क्खु सो, विरलो वा परदुक्खदुक्खिदो जणो, त्योआ वा पंचमहुंकारोम्मुक्ककुसुमुप्पीडविडविणो । (सप्रश्रयम् ) अयि तुहिअणेकधाणुक मम्मह ! मिअंकचूडामणिपरिक्खिदतिक्सत्तणेहिं सरेहिं महिलाअणं पहरन्तो ण लनसि ? जाणामि जदि तस्सिं पि अणे एवं एव्व आरभडोपचंडो होसि । (किं करोमि सखि, दुर्भद्या प्रेमदुर्दोली । सखि ! निरनुकोशः खलु स: विरलो वा परदुःखदुःखितो जनः, स्तोका वा पञ्चमहुङ्कारोन्मुक्तकुसुमोत्पीडविपिनः । अयि त्रिभुवनैकधानुष्क, मन्मय, मृगाडचूडामणिपरीक्षिततीक्ष्णत्वैः शरैमहिलाजनं प्रहरन्न लजसे । जानामि पदि तस्मिनपि जन एवमेवारमटीप्रचण्डो भवसि ।) राजा सुतनु, मुतरामारभटोप्रपञ्चः। विदू०--(उच्चैर्हसिया) अणंगस्स आरभडित्ति महाहासकर मे। (अनङ्गत्यारमटीतिमहाहासकरं मे ।) सुगन्धित रहती है और कोरण्ड का कुमुममाला मुरझायी हुई भी अपनी लाली प्रकट करती है। मृगावावलो-क्या करूँ सखि ! प्रेम की दुर्दोली दुर्भद्य होती है । ( सखेद) सखि ! वे बहुत ही निष्करण है। दूसरे के दुःख से दुःखी होने वाला कोई विरला ही होता है। ऐसे वृक्ष योड़े ही होते हैं जिनके पुष्प कोयल द्वारा दलित होने से बच जाय । त्रिभुवन में सबसे बड़े धनुर्धारी कामदेव ! अपने वाणों की तीक्ष्मता को आजमाइश शंकर जी पर तो कर ही चुके थे, अब ऐसे तीखे बाणों का प्रहार एक अबला पर करते हुए तुम्हें लना नहीं आती ! तुझे सन तर, जब इसी प्रकार साहस और दुरी से उस (विद्याघरमल्ल) मी प्रचण्ड होते। राजा-मुन्दरि ! (कामदेव के ) अत्यधिक साहस हैं। विदूषक-( जोर से हंसकर) अनङ्ग (जिसके शरीर ही नहीं) का साहत ! इस पर मुझे बड़ी हसी आती है। ६ विक ।
विद्धशालमञ्जिका राजा-किमिदं यदुच्चैईसप्ति, नैवं त्रासय । मृगादावली-विअसणे! अणसञ्चारो विस। ता कदलीयंमन्व- रिदे भविम जापोमो कि एवं ति। [वथा कुरतः] (विचक्ष ! बन- सञ्चार इव, तस्मात् कदलोत्तम्मान्तरिते भूला ज्ञात्वावः किमेतदिति ।) विदू-एहि पविसह्म [ इवि परिक्रामितकेन ] (एहि प्रविशाकः ।) राबा- -(शिशिरोपचारसामग्रीमालोक्य नाट्येनादाय च) मृणालमेवद्वलयोकृतं तया तदीय एकोऽव्यवसपल्लवः। इदं च तस्याः कदलोदलांशुक यदत्र संक्रान्त इव स्मरज्वरः ॥ २८॥ वदनया तदुपभुक्तमुक्तया शीतवर्गसामप्रयात्मानं निर्वापयामि । (तथा करोसुरविशति च । विदूषकोऽपि ययोचितनुरविशति ।) राबा-(संतापमभिनीय) अहह अपर्यालोचितमाचरितम् । यतः- राजा-यह क्या, जोर से हँसते हो, इस प्रकार उसे हराओ मत । मृगावावलो-विचक्षणे! यहाँ मनुष्य को आहट मालूम होती है। दो केले के सम्मे की आड़ में छिपकर ज्ञात करें-क्या बात है। (दोनों का फरती है) विदूपक-आयो अन्दर पुन । ( टोनी घूमते हैं।) पना-(धीवलता प्रदान करने वाली सामग्रियों को देखकर अभिनय- पूर्वक लेकर) यह कमल-नाल है जिसे उसने पेय था, यह पल्लव है जिसका उसने फर्गभूपण बनाया था। यह कटली-पत्र का (सबसे नीचे पहना गा) पर है जो गर्म है, इसलिए मादन होता है उस सुन्दरी का काम-चर अगले इसमें समान्त हो गया है।॥ १८ ॥ तो उसके द्वारा उपयोग करके छोड़ी हुई शीतलता प्रदान करने पाही मामग्री से अपने को पुरस्कृत कम-से उपयोग में ला(वैसा करता है और बैटवा है, विदूषक मी उचित स्थान पर बैठ जाता है) राजा-(संतार का अभिनय फर) अहर! मैंने दिना सोचे-ममझे दिल सामग्रियों को धारण किया। स्योंकि- , व्यजनमरुतः तृतीयोऽङ्कः शीतांशुर्विपसोदरः फणभृतां लालास्पदं चन्दनं हारः क्षारपयोभवः प्रियसुहृत् पङ्केरहं भास्वतः । इत्येषां किमिवास्तु वस्तु मदनज्योतिर्विचाताय यद् बाह्याकारपरिग्रहेण तु वयं तत्त्वत्यजो वञ्चिताः ।। १९ ।। } विचक्षणा-सहि मिअंकावलि ! फलिदं मे दूइत्तणेण । ज महाराओ वि एआरिसं अवत्यन्तरं उन्वहदि। ( सखि मृगाढावलि ! फलितं मे दूतीत्वेन यन्महाराजोऽपि एतादृशमवस्यान्तरमुद्हति ।) राजा-(सन्तापमभिनीय) वासश्रेणीमिमामुपचिन्यते मलयजरजो धारावाप्पं प्रपञ्चयितुं प्रभुः। कुसुमशयनं कामाखाणां करोति सहायतां द्विगुणगरिमा मारोन्माथः कथं नु विरंस्यति ।। २० ।। 0-अए, मुद्दासणाहो लेहो विअ । (थए, मुद्रासनायो लेख इव ।) राजा-न केवलं लेखः, स्मरसन्धिविग्रहसम्बन्धश्च । तथाहि पश्य- चन्द्रमा तो विष का सहोदर है, चन्दन सो के लार (थूक ) का आवास स्थान है, (मोतियों का) हार खारे जल से उत्पन्न हुआ है, कमल सूर्यका मित्र है, (तो फिर ये सब संताप-नाश कैसे करं)। हम मदन-सताप को नष्ट करने के लिए इन्हें धारण कर वास्तव में तत्व से अनभिज्ञ धोखा खागये ॥१९॥ विचक्षणा--सखि ! मृगाकावलि ! मेरा दूती-कार्य साल हो गया, महाराज भी ऐसी अवस्था को प्राप्त हो रहे हैं। राजा--(सन्ताप का अभिनय कर) पंखे की वायु श्वासों को और, बढ़ाती है, चन्दन का लेप आँसुओं की ओर वृद्धि करता है। फूलों की शय्या कामदेव के अत्रों की सहायता करती है। इस प्रकार तो काम पीडा दूनी होती जा रही है, वह शान्त क्यों कर होगी ॥ २० ॥ विदूषक-अरे ! मुहर लगा हुआ लेख सा ( यहाँ) है । राना-केवल लेख ही नहीं, कामदेव के सन्धि-विग्रहको सम्बन्ध है । देखो- विद्धशालमश्विका तालीदलं यदकठोरतरं यत्र मुद्रास्तनापनचन्दनपश्मृतिः । यद् बन्धन विसरतातनुतन्तुभिश्च कस्यादिचप गलितस्तदनगलेयः॥२१॥ विदू० -ता एव्वं एसो, सणिहिदपरिच्चाए कारण भपिदन्छ । (वस्मादेवमेप, सनिहितपरित्यागे कारणं भागवन्य) राजा-(विदूपर्क कण्ठेऽवधार्य) विदूरवसुधैव रत्नशलाकामू:मयाची. वृत्तिरेव रसनिप्यन्दभूमिः, तदुपरि नाम दर्शय । (विदूषकः दया करोति ।) राजा-(वाचयति ) निष्कृपस्य, पराक्याः । विदू०-उम्मुदिअ देसइरसं । ( दया कृत्वा ) भो, मरअणं रअणकर- डअं, अगक्सरो लेहो । (उन्मुद्रय दर्शयिष्यामि । भो, अरत्न रत्नकरप्टकम्, अनक्षरो लेखः।) राजा-कामं करणगम्भीरः प्रयोगः फल्लोलयति मानसन् । यह अत्यन्त कोमल तालोपत्र है, वनों में लगे चन्दनरम की इस पर मुद्रा (मुहर ) लगी है। यह कोमल कमल-तन्तुओंचे धा है। इसजे सष्ट है कि यह किसी (नायिका) का काम-पत्र गिर गया है ॥२१॥ विदूपर-हाँ है तो ऐसा ही, दाँ समोर में हो इसके गिराने का कारण वहिए। राजा-(विदूषक के गले में यौह अलर) पिटूर (पर्वत)ी भूमि में ही ग्न पैदा होता है, तुम्हारी बातों से ही रन-पाय माहित होती है। कर नान (पता) तो दिसाओ। (विदूषर देता फरदा है) रामा-चोचता है-अमागिनी के उस निष्ठुर को- ट्रिपर-सोनकर दिखाऊँ (पना करके) बरे ! रत्नों को सन्दूक रत्नशून्य है। पत्र, विना अक्षरों का है। रावा-यह कवा और गम्भीर प्रयोग हृदय को अत्यन्त तरगिव कर ८५ -तृतीयोऽङ्कः (विचिन्त) अये, तालोदलसंपुटम् अन्विष्य, किश्चिन्मन्त्रगुप्तये, तत्र शङ्कमानया सूचितं स्यात् । विः-(तया कृत्वावलोक्य सहर्षम् ) अहो दे बुद्धिविहवो। कि नगं गिअङ्कलंकगरस रोहिणीवल्लहोत्ति। (यहो ते बुद्धिविभवः । किंवर्णनं लाञ्चनत्य रोहिणीवल्लम इति ।) राजा- -विसंप्ठुलं वाचति- वियत्ते सोल्ले कतरदिह नाङ्गं तरुगिमा तथापि प्रागल्भ्यं किमपि चतुरं लोचनयुगे । यदादत्ते ग्यादखिलमपि भावव्यतिकरम् (विचिन्त्य) पाणिप्रेवगतो विशोशिरसः स्वेदाम्बुरुग्णश्रिय- स्ता इत्याकृतिलेशतो मनसि नः किश्चिप्रतीतिं गताः । रहा है । (सोचकर ) अये ! ताल-पत्र का सपुट (लिफाफा) दो खोजो। सम्भव है उसमें शंकालु दृदय वालो के द्वारा कोई रदल्य सूचित किया गया हो। पिक-( वैसा करके, देखकर सहर्ष) यहो! तुम्हारी बुद्धि कैसी विल- धन है । मृगलाञ्छन ( चन्द्रमा) का क्या वर्णन यह तो रोहिणवल्लभ है । राजा-(चंचलतापूर्वक पढ़ता है) यौवन किस अङ्ग को विशेष सुन्दर नहीं कर देता अर्थात् समी अंगों को नन्दर कर देता है । तयारि यौवन नेत्रों में एक विशेष प्रकार का नैपुष्य एवं मगमता उत्पन्न कर देता है । इसी में वे किसी को फेवल देखकर ही उसके हद्गव समन्त मावों को जान लेते हैं। (सोचकर) लेत की अमर-पंनियों का शिरो-माग हाय काँग्ने के कारण विशीर्म हो गा है-बिगड़ गया है, पसीने की बूंदों से उनका सौन्दर्य नष्ट हो गया है- दस प्रकार अक्षरों का आकार विगड़ जाने से वे लेशमात्र कुछ ही प्रतीत होते विद्धशालभत्रिका वैचित्त्यान् पुनरुच्लान्छनमृतः कण्ठ येन वाच्येन वा । व्याक्षेत्र कथयन्ति पक्ष्मदृशो लेखाक्षरणयः ।। २२।। विदू०-किं उज्वेलदि केलिकदलीए करिशुण्डादंडावेडो? वा एहि अणुसरह्म । (किमुदल्लति टिकदल्या करिमुन्डादम्डावेष्टः। तत्मादेहि अनुसरावः।) राजा-इदनुभयमनन्यगामि, यन्मगावानुवर्तनं रत्नाकरस्य, मम हृदयानुवर्वनं च भवतः। विदू०-(अडल्या निर्दिछन् ) इदो माधवीलदामण्डवं गदा । जदो मअरद्धअपसिद्धि व्व परिंडोली दीसदि । ता णित्रुगं अग्गतो भविभ णिरुवा । (इतो माधवीलतामण्डपं गता । यतो मकरध्वजातिविरिष पदपंटि- ईश्पते । तस्मानिपुगममतो भूत्वा निरूपपापः ।) (व्या दुरतः) मृगात्रावली-(लतान्तरे चन्द्रिकात्मभिनीय संस्कृतमाश्रित्य) है। अन्यमनस्कता के कारण उनमें पुनरक्ष टोप भी हैं। लेख की ये अक्षर पंक्तियाँ इस प्रकार उस पनल (नुन्दर परीनी वाले) नेत्रोंवाली मुन्टर के च्याप को स्पष्टरूपेण बदला रही हैं।॥ २२ ॥ विदूपक-क्या केलि-बदली में हाथी के गुट-दष्ट की मावि भानुशन लशित हो रहा है ! तो आमो! पीछा करें। राजा-ये दो अन्यगामी नहीं-समुद्र चन्द्रमा का और आप मेरे हृदप फा अनुवर्तन करते हैं। विपक--(अंगुली ने निर्देश करता हुआ) घर से मालदा के मण्डप में गई है क्योंकि कामदेव की प्रसिदि सी पद-पकि दिखाई पड़ रही है। तो आगे होकर मली मोति निरूपण करें। (दोनों पैसा करते हैं) मृगाकापलीता की आड़ में चादनी ये. सका मिनर कर) संस्कृत में- तृतीयोऽङ्कः प्रियविरहमहोप्मामर्मरामङ्गरेखा- मयि हवक हिमांशो! मा स्पृश क्रोडयाऽपि । इह हि तव लुठन्तः प्लोपपोडां भजन्ते दरजरठमृणालीकाण्डमुग्धा मयूखाः॥२३ ।। (इति द्विस्त्रिरभिधाय रोदिति ।) राजा-(विदूषकं प्रवि) सखे कारय चक्षुपी पारणाम् । यतः- अन्तस्तारातरलितजलाः स्तोकमुत्पीडभाजः पक्ष्माप्रेषु प्रसवपृपतः कीर्णधाराः क्रमेण । चित्तावत निजगरिमतः सम्यगासूत्रयन्तो निर्यान्त्यस्याः कुवलयहशो बाप्पवारां प्रवाहाः ।। २४ ॥ अपि च- मुक्त्वाऽनङ्गः कुसुविशिखान् पश्चकणीकृताप्रान् मन्ये मुग्यां प्रहरति हठात्पत्रिणा वारुणेन । रे अघम चन्द्र ! प्रिय की विरहाग्नि से सन्तत मेरे दुर्बल शरीर का सर्श विनोदायं भी मत कर । किञ्चित् पके हुए कमलिनी-दण्ड के ममान (गौर एवं शंतल ) तेरी किरणें मेरे शरीर पर पड़कर उष्णता को प्राप्त हो रही हैं ॥ २३ ॥ (ऐसा दो-तीन वार कहकर रोती है ) राजा (विदूषक से मित्र ! नेत्रों को पारण कराओ-इनकी रूप-दर्शन को पिसा शान्त करो क्योंकि- नील-कमल के समान नेत्रों वाली इस मुन्दरी के आँसू पहले पुतलियों से वरल-माव को प्राप्त हुए, क्रमशः थोड़ा सा दबाव पड़ने से बरौनियों के अग्र- माग पर यूँदों के रूप में फैल गए । तदनन्तर परस्पर गुंथ कर एक धारा में परिवर्तित हो गए और अब अपनी गुस्ता से (सुन्दरी की) आन्तरिक पंडा को सम्यक् प्रकार से प्रकट करते हुए प्रवाह के रूप में बाहर निकल रहे हैं।॥ २४ ॥ योर मी- मालूम होता है कामदेव अपने तरकस में रक्खे हुए पाँचो कुसुम-शरों को स्याग कर इस वैचारी मोली-माली अबला पर वरुणास्त्र से प्रहार कर रहा ८८ विद्धशालभश्चिका वारां पूराः कथमितरथा रफारनेत्रप्रणाली वस्त्रोद्वान्तत्रिवलिविपिने सारिणीसाम्यमेति ॥ २५॥ (विदूपर्क हत्ते गृहीत्लोपसत्य सानुरागप्रश्रयम् ) यस्य कृते वहसि रजा मुदितमृणालानि गात्राणि । यस्य कृते सोऽपि तथा तदखण्डितशासनो मदनः।।२६॥ मृगातावली-(सप्रणयं ससानसञ्च तमवलोक्य) किं एसो अगंगो ? परपुरिसो, असिप्पिसंपुडा या मोत्तिम उण्पत्ति । कि च चूदलट्टिअ व्व सहआरोभूता, राशि व्य कण्णआत्तणं उपगदा एदस दसणेग महग्पीकिदा मे तणु पडिमादि । (तं प्रति) सहि, एसो सो राआ विज्जाहरमल्लो जो सिरिसरस्सइणं पलहो मअण- मुन्दरीए अ । जस्स वल्लहाओ सिरीसरस्सइमअणमुन्दरिओ। (किमेपो- अनङ्गः, परपुरुषः, अशुक्तिसम्पुटा वा मौक्तिकोत्सत्तिः । पिञ्च, चूतयष्टिरिव सहकारीभूता, रागिरिव कन्यकात्यमुपगता, एतत्य दर्शनेन महायांकृता मे तनुः प्रतिभाति । सखि, एप स राजा विद्याधरमला, य: श्रीसरस्वत्योपलभो मदन- मुन्दर्याश्च । यस्य वल्लभाः श्रीसरस्वतीमदनसुन्दर्यः।) है, नहीं तो और कैसे टोर्च नेत्रों से प्रवाहित यह अशु-प्रकार क्रमशः मुन्न पर से बहता हुआ अन्त में त्रिदली के विपिन में पहुंचकर लघु नदी की समता मात कर रहा है।॥ २५ ॥ (विदूपक का हाथ पकडकर, निफ्ट जाकर सानुराग एवं नन्नतापूर्वक ) जिसके लिए मनस्ताप से तुम अपने शरीर को मसले हुए वमल सा कर रही हो, यह मी उसी अवस्था को प्राप्त हो रहा है। पामदेव का शामन खण्डित नहीं होता--उसका प्रभाव टोनों तरफ बरावर ही पड़ता है ।। २६ ।। गावापनी-(प्रीति तथा भय के साथ उसे देख फर) क्या यह पर पुरुष फामदेव तो नहीं है ! बिना संपा-फे मोतिनों की उत्पत्ति । मंजरियों से मुगन्धित एवं शोमित आम की टहनी सी, मन्या भाव को मात ( कन्या) राशि सी मेरो शरीर-यष्टि यो इस (विद्याधरमल) के दर्शन ने बहुमूल्य बना टिया-ऐसा प्रतीत होता है। सखि ! क्या ये गजा विद्याधरमल है, जो लटमी, सरस्वती और रति के. पलभ है और लक्ष्मी, सर. स्वती वयां रति जिनकी पलमा है।
तृतीयोऽङ्कः विचक्षणा-आम्। - राजा--विचक्षणे, नन्वेवं वक्तव्यं भवति, यो मृगाकावली-वल्लभो यस्य मृगाकारलीवल्लभेति । (तां प्रत्यञ्जलिं बया) तरङ्गसदृशोऽगने पत्तु चित्रमिन्दीवरं रफुटीकुरु रदच्छदं भजतु विद्रुमः श्वेतताम् । क्षणं वपुरपावृणु पृशनु काञ्चनं कालिका- मुदञ्चय मुखं मनाग्भवतु च द्विचन्दं नमः ॥२७॥ मृगाढावली-(स्वगतम् ) भअवदि मअंकमंडणे जामिणि ! सजामा होहि । (मगवति मृगाङ्कमण्डने यामिनि ! स्यामा भव ।) -सखे ! न हारविरहमहत्येपा । न चित्रशिखण्डिदाम्ना विना चकास्त्युदीचो। (इति कष्ठादयतार्य नायिकाकण्ठे हारं विधत्ते । राजा- विचक्षणा-हों। गजा-विचक्षणे! ऐमा कहना चाहिए जो मृगांकावलो का बल्लभ है यौर मृगांकावली जितकी वल्लभा है । (उसने हाय बोड़कर) हे मुन्दरी ! (जग दृष्टि-पात तो करो) तुम्हारी दृष्टि की तंरग भूमि में नोले-कमल का अधःपात हो। योठ तो खोलो, ताकि ( उसकी लालो के सामने) नंगा सफेद सा लगे। जरा शरीर पर से दन्त्र हटा दो, ताकि ( उसके गौर वर्ण के सामने) सुवर्ण भी काला लगे! जरा मुख ऊपर तो रो ताकि आकाश दो चन्द्रमा वाला हो जाय ॥ २७ ।। मृगावावनी-(स्वगत) हे भगवती चन्द्रशोभने रात्रि देवि ' तुम और लम्बी हो जाओ। राबा-सखे ! यह मुन्दरी हार से विरहित होने योग्य नहीं है। उत्तर दिशा सप्तर्षिमण्डल के बिना घोमित नहीं लगती। (ऐसा कहकर कष्ठ प्रदेश से उतार कर हार नायिका के कण्ठ प्रदेश में हाल देता है।) :
विद्धशालभञ्जिका विदू-उचिदसमागमो क्यु एसो कण्ठं रब्जेदि । जं दाणी णित्तलमुत्ताहलमालालङ्करणो सुन्दरीअणो वोत्तिविभूसणो विअ सुकद- वाणीवन्धो। (उचितसमागमः खल्वेप कण्ठं रञ्जयति । यदिदानी निस्तलमुता- पलमालालंकरणः सुन्टरीजनो वकोतिविभूषण व सुकविवाणीबन्धः ।) (नेपथ्ये) चालिजंतु लदामंडवपहुदीणी बिलासट्टाणाई, ताणिजन्तु कडकिआ दुआराइं, णिविद्धजन्तु अगलाओ, चिन्तु सहाणिअट्ठाणं वाहिरदा जामइल्ला सोविदल्ला । एसा वारविलासिणीजणगहिदहत्यवि त्यारिजण- विणोदिअदिवसा सिद्धणरेंददिण्णोसधविजिभित्र मंजित्थयम- सदसहस्सालंकिदं माहवीमंडवं दम इच्छा देवी । (योध्यन्वान् लतामण्डपप्रभृतीनि विलासस्थानानि, सदस्यन्तां गवाक्षद्वाराणि, निवप्यन्ताम् अर्गलानि, तिष्ठन्तु ययानिजस्थानं चहियामपन्तः सोविदला। एपा वारविला- सिनीजनगृहीतहस्तविस्तारिजनविनोदिवदिवसा सिसनरेन्द्रदत्तोपधिविजम्भिवमाजि- प्रस्तषशतसहसालकृतं माधवीमण्डपं द्रष्टुमिच्छति देवी।) विचक्षणा-(सत्रासम् ) भट्टा विसजीअदु प्पिअसही। (भतः, विसज्यतां प्रियसखी।).. विदूषक-या उचित समागम कण्ठ को सुशोभित कर रहा है। चल मुनाहार ही स्त्रियों का अलवार है। मुकविजन के काव्य का विभूषण वक्रोक्ति है। (नेपथ्य में) लता-मण्डप आदि विशाल स्थानों को गुड, स्वच्छ एवं ठीक कर लो। झरोखों के द्वार बन्द कर दो, सिम्फनी लगा दो। अन्तःपुर के सेवक, बो पहरे पर हों, बाहर अपने अपने उचित स्थान पर खड़े रहें । सखियों के साथ दिन व्यतीत कर महारानी जी, जिसका हाय पारदनिताएँ पकड़े हुए है-- सिद्ध वैद्यों को दी गई ओपधि से उत्पन्न मीट रंग लाल सैकड़ो सहसों पुषी के गुच्छों से अलंकृत माधवीमण्डप को देखना चाहती हैं। विचक्षणा-(मय के साथ ) स्वामिन् ! प्रिय सखी को बाने दीजिए।
Ratuwal
तृतीयोऽङ्कः
राजा-अभ्यर्थये हृदयं यदि प्रार्थनाभन न करोति ।
विदू०-तुरिदं विसज्जोअदु, अण्णधा सउन्ता विअ पञ्जरणिवद्धा
भविरसामो । (वरितं विसुज्यतां, अन्यथा शकुन्ता इव पञ्जरनिबद्धा
भविष्यामः।)
(इति यथायथं परिझम्य निष्कान्ताः सर्वे)
इति विशालमनिकायां तृतीयोऽङ्कः
राजा दृदय से प्रर्थना कर रहा हूँ, यदि वह प्रार्थना भङ्ग न करें।
विदूषक-शीघ्र जाने दीजिए, नहीं तो हम लोग पक्षी की भाँति पिंजड़े
मेंध जायगे।
( सब क्रमशः घूमकर निकल गए )
इपि तृतीय अंह समय
अथ चतुर्थोऽङ्कः (नेपथ्ये) मुप्रभातं देवस्य केयूरयर्पम्य । सम्प्रति हि- बजत्यपरवारिधि रजतपिण्डपाण्डः शशी नमन्ति जलयुयुद्युतिसपङ्क्तयस्तारकाः। कुरण्टकविपाण्डुरं दधति धाम दीपाडुरा- इचकोरनयनाराणा भवति दिक् च सौत्रामणी ॥ १ ॥ ( ततः प्रविशति विदूषकः मुता ब्राह्मणी च) विदूपक:-भो पुक्खरमाले उहहि संग्झा वन्दितुं। अदिफन्ता रअणी। मुण णरेन्द्रवन्दिणो कपूरचंडस्स पभादभोआवलिं । (विमृश्य) कहं देवी गरिदृगोहीणिदजागरणक्लिन्ता मुत्ता यहाणी ? अन्जवि ण णि मुंचेदि । ता पडियालेमि । जदो मुत्तो ण पडियोधिव्य त्ति बह्मगा भणति । (भोः पुष्करमाले, उत्तिठ संघां वंदितुम् । अतिझान्ता रजनी, Aणु नरेन्द्रबन्दिनः कर्पूरचण्डस्य भोगावलीम् । पथं देवीगरिष्टगोधीजनितजागरण- क्लान्ता सुप्ता ब्राह्मणी अद्यापि न निद्रां मुञ्चति । तस्मात् प्रतिशलयानि । यतः नुनी न प्रतियोधितव्य इति वाणा भणन्ति ।) (नेपन में) देव फेयूरवर्ष को प्रभात नवकर हो । इस समय-चोटी के गोले के समान गौरवर्ण चन्द्रमा पश्चिम समुद्र को जा रहा है, पनियर तारा-गण पानी के बुलबुले की भाति झुक रहे है-अस्त को प्राप्त हो रहे हैं। घरों के दीपक की ली दुरजपुष्प की भाँति विशेष उज्ज्वल हो रही है एवं पूर्वनिया चकोगें के नेत्रों की भौति लाल हो रही है।॥१॥ (इसके बाद विदूषक प्रवेश करता है और ब्राहाणी सोई हुई है) विदूपक-अरे पुष्करमाले ! सन्चा-यन्दन के लिए हो । रात पोत गई। गजा के बन्दी कपूरचण्ड का प्रभात-वर्णन मुनो । अरे क्यों ! महारानी की गोष्ट में लायकासतिभाहणाबमानहाद्रिात्यागरहाद वाटेदरा' प्रतीक्षा यक्यों कि सोये व्यक्ति को नहीं लगाना चाहिए---ऐमा ब्राह्मण कहते है।
"चतुर्योः ब्राझनी-( उपनायमाना) विणतो विभक्खणामुद्देण देवीए मटा । जइ ओअल्लागदरस मिअङ्कयन्मन्स वहिणी मिअढावली णामसि- मिहेन भादुभं दटुं आअदा। सन्दिपञ्चमे मादुलचंदवम्मणा मादुलागीए हारलदाए अ। जया, एसा दे पहिगी मिअंकावली देवग्ग गगएहि कहिदचवत्तिपरिणीभावा, सा तुए उचिदं वरं लंभइदच्यात्ति । तदो देवी देवं विण्गवेदि, ण तुम्हाहितो अग्गो वरो एदाए जोग्गो । जड़ो पोन्मराममणी एव्य एमावलि अलंकरेदि । ता परिणे अन्नत्तो । पा बत्तयो सिरी अण्णहत्ये संरुमयिदव्या होदि । अ एवं आसंफिदवं किंति देवी अवगो सापत्तगेग पअदि त्ति । जदो महाउलप्पसूदानं भत्तुमो स्पिन एव्य अप्पमो पिति । किं च, पुणो परिणाविदो एव्य मए थनउत्तो। तं जया, मअपाहिव मुदं अणंगलेहं, मालवणरेंददुहिमर रमणापदि प्पिअसर्ग अ, पांचालराजतण विलासवदि, अवंतीसरमुर्द केनिवदि, कलावदि अ, जालंघरेसकुमारिलीलावदि, केरलराअपुत्ति पत्तहं च ता मन चिअपदोसे विआह-लगोत्ति उणो उसो भणिदेण महाराएग तहत्ति पडियणं । तामेहल-वुत्ततं पडिकादं अलोमयिवाहेण विडंबीअटु मा । कुविदत्त मै भत्तुणो उत्तरं इंसिअरं हुषिरसाद, (चिनो विचमानुसेन देव्या भा। यथा ओभल्लागतस्य मृगाइवनगो मगिनी मृगाहावटी नाम स्नेहेन धातु द्रष्टुमागदा। सन्दिष्टश्च मे मातुलेन चन्द्रवर्मगा मादुनान्या हारवा च । यया ते भगिनी मृगाहावली दैवज्ञगः कपिन-चक्रवर्ति यहिणीभाषा, स त्वयोचितं बरं लम्मथितन्येति । तत्माद्देवी देव विमति न दुभत्तोऽन्यो र एतत्ला योन्यः । यतः परागमणिरेवैकापली ब्राक्ष:--(सोते में बड़बड़ाती हुई ) महारानी ने विचक्षणा के द्वार स्वामी को सूचित किया है कि ओलागत मृगवर्मा की बहिन गडावली लेहाय भाई को देखने आई है और मेरे चन्द्रमा तया मामी हालता ने सन्देश दिया है कि इस दुम्हारी दिन माहावली के विषय में ज्योतिच्चिों ने कहा है पर चक्रवती को पनी होगी, अवादन किसी योग्य वर से इत्तका विवाह करा दो। अतः महारानी ने कदारान से कहा है कि तुम्हारे अतिरिक दूसरा वर इसके योग्य नहीं है । क्योंकि मामा विद्धशालमतिका मलहरोति । तस्मात् परिणयत्वार्यपुत्रः। नाऽऽमानः श्रोरन्यहते संक्रामयितव्या भवति। न चैतदाराद्वितन्यं फिमिति देव्यात्मनः सापल्येन प्रवर्तत इति । यतो महाकुलप्रयूतानां मर्तुः प्रियम् एकाऽत्मनः प्रियमिति । किच पुनः परिणापित एव ममार्यपुत्रः । तद् यथा, मगधाधिपसुवामनङ्गलेखाम्, मालपनेन्द्रदुहितरं रत्नावती प्रियदर्शनाच, पाञ्चालराजतनयां क्लिासरतीम् , अवन्तीदवरसुवा देलीमती फलावतीञ्च, जालन्धरेश्वरकुमारों लीलावती, फेरलगनपुत्री पत्रलेखाच वरमादवि प्रदोपे विवाह-लग्नमिति पुनः पुनर्भणितेन महाराजेन त्येति प्रविपन्नन् । तस्मान्मे. खलावृत्तान्त प्रतिकर्तुमलीकविवाहेन विडम्ब्यता मता, कृपितस्य ने मनुत्तरन् इंपत्करं मविष्यति ।) विदू०--(विहस्य ) सइ धम्म अधम्मो जइरसदि। जाणिसं जो एत्य विविव्वो। (विचिन्त्य) ता चिरं पामइव्वा जुण्णमञ्जरी दुद्धति कजिअं । कुबलअमालाए च्ण महाविलंबणं जं महिला महिलाए परिणेदव्या । (उर्वमवलोक्य ) महदी वेलां यदि, ता रहावेमि बह्मणि, उहि देवी तुम बाहरदि। (यदि धर्ममधमा जेष्यति । शास्यामि यो.त्र विडम्बयितव्यः । तरमाचिराय पाययितव्या जीर्णमाबारी दुग्धमिति शाञ्जिनम् । परागमणि ही एकावली हार को अलंकृत करता है। अतः आर्यपुत्र इमसे विवाह कर लें। अपनी लानी दूसरे के हाथ में नहीं डालना चाहिए और इसके सौत होने से देवी के मन में क्या प्रतिक्रिया होगी-ऐसी हा आप न करें। क्योकि उच्चकुल में उत्पन्न स्त्री का अपने पति का प्रिय हो अपना प्रिय होता है । और में आर्यपुत्र का विवाह अन्य स्त्रियों से करा ही चुरी हूँ-जैसे मगर- नरेश की कन्या अनङ्गलेखा, मालवाधिर की कन्या रत्नापली और प्रिय. दशिंका, पाचालराज की पुत्री विलासबती, अग्न्वीधर की मुता फेलिनती और फ्लापत', जालन्धरेश्वर की कुमारी लालायी एवं केरल राज की पुत्री पत्र- टेखा (के साथ 1) तो आज ही सायंकाल विवाद को लग्न है। इस प्रकार बार-बार कहने से महाराज स्वीकृति दे दी। वो मेखलावाली घटना का बदला देने लिए मिथ्या-विवाद द्वारा स्वामी को धोखा दिया बाप-बे कुरित होकर कुछ नहीं कर सरेंगे। विदूषक (हसकर ) यदि धर्म को अधर्म चौत सकेगा। देम्यूगा दिमको
चतुर्थोऽङ्कः
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कुवलममालायाः पुनर्महाविडम्बनं यन्महिला महिलया परिणेतन्या । महती वेला
वर्तते, तस्मादुत्यापयामि ब्राह्मणीम् । उतिष्ठ, देवी वां व्याहरति । )
ब्राह्मणी-(विबोधनाटितकेनोल्याय) अए उच्छूरघट्टदि । (तं विलोक्य)
हंहो मिसिव्हिा-जामादुअ ! तुम परमेसरपस्सवही होहि । अहं
ब्ण देवी अणुसरिस्सं । [इति परिक्रम्य निष्क्रान्तौ (अए, उत्सूरं वर्तते । भो
मृगतृष्णिकाजामातस्त्वं परमेश्वरपार्श्ववती मवाहं देवी मनुसरिप्यामि ।)
(प्रवेशकः)
(ततः प्रविशति राजा विदूषकश्च)
राजा-(मदनसंतापयोः पीडामभिनीय ) सखे! संप्रति शैशवादपक्रामति
ग्रीष्मसमयः।
रजनिचरमयामेबादिशन्ती रतेच्छा
किमपि कठिनयन्ती नारिकेलीफलाम्भः ।
अपि परिणमयित्री राजरम्भाफलानां
दिनपरिणतिभोग्या वर्तते ग्रीष्म-लक्ष्मीः ॥२॥
विडम्बना होती है। बुड्ढी चिल्ली को दूध के बहाने छाछ पिलाना है।
कुवलयमाला की तो और विडम्बना होगी, अब स्त्री का स्त्री से विवाह होगा।
बहुत देर हो रही है, तो ब्राह्मणी को उठाऊँ। (उठो, तुम्हें महारानी जी बुन्न
रही है।
ब्राझणी-(जागने का अभिनय कर,उठकर) अरे! सन्ध्या हो गई। हे मृगतृष्णिका
के दामाद ! तुम महाराज के पास चलो और मैं महारानी के पास चल रही हूँ।
(प्रवेशक)
( इसके बाद राजा और विद्रूपक आते हैं)
राजा-(काम और संताप की पीडा का अभिनय कर) सखे! इस
समय ग्रीष्मकाल अपने शैशव को त्याग कर जवानी की ओर जा रहा है ।
यह ग्रोप्म काल रात्रि के पिछले पहर में सुरत-नीडा की प्रेरणा देता है,
नारिकेल फल के नल को (मुखाकर) कठोर बना देता है एवं कदली-फली
को पाता है। ग्रीष्म लक्ष्मी सायंकाल उपभोग योग्य होती है--सायंकाल
मोम का आनन्द उठाना चाहिए ॥२॥
विद्धशालभलिका
अपि च।
जला संत्र्यानं पिसकिसलयः फेलिबलयाः
शिरीपैरत्तंसा विचक्लिमबी हाररचना ।
सुचावेगाक्षी मलयजरसारच तनवो
विना तन्वं नन्त्रं रविरनगमृत्युलपविधिः ॥३॥
विदूषकः-एवंएदं । अमारिसजगत्स सलाअस्त उदुपाओ वहइ धन्नो।
(एषनेतत् । अन्माहराइनल खलाशपत उहुमायो पते पर)
यजा-(निःसर विहल)ललाटंतपस्तपनो नसंपचाय पचिपांसवः।
तमूर्यपश्या राजदाराः । अपि च--
हरन्ति हृदयानि यच्छ्रवणशीतला घेणवो
यदकितकरविता शिशिरवारिणा वारणी।
भवन्ति च हिमावहाः स्तनभुवो यदेपोशां
सुचेरपरि संस्थिवो रविपतेः प्रसादो गुरु॥४॥
घर भी-
ये सब ग्राम में बिना तन्त्र-मन्त्र के कामदेव को यमर बनाने के लिए
मुन्दरिन के साधन है---जा से आई एवं गंदल स्त्रों से शरीर को कान्छा-
दिव परना, कमल-नाल के माडा-कंग, चिरं,प.पुनों के मन विचरित
पुमो फेहार एवं चन्दन रस से आई शरीर ॥ ३ ॥
विपक-हाँ ऐसा ही है। इन ऐसे पानी को धर्म बहुभार है ।
गा--(सहन न करता हुआ हसकर ) तनाये को दबा रहा है-
बाल तीन हो रहा है, मार्ग कोट पाों को हुलता रही है, तो (ऐनै समन
मैं ) रनिकास पी रानिया, जिन्हें सूदा दर्शन दुर्टम होता है, (स्विनी नुस-
टापक होती है ) भार भी-
गनों को मधुर सगने वाला दरद दृदय को हर लेता है, पास
संन्न-जल-मिशिव पारी (गंदरदा प्रदान मरती है) एवं मृगनानियों
का स्तन-प्रदेश गोतलता प्रदान करता है। इस प्रीम ऋतु पर सूर्य की बड़ी
कला है॥४॥
. चतुर्थोऽङ्कः एवं च सखे ! संशृणुमः- मूलं वालधि-वीरुधां सुरभयो जातीतरूणां त्वचः साराश्चन्दनशारिखना किसलयान्यााण्यशोकन्य च । शेरीपी कुमुमोतिः परिणमन्मोचश्च सोऽयं गणो गोमेजोमहरः पुग फिल हे दग्याय पञ्चेपवे ॥२॥ (निःसहताममिनीय) मयि शिशिरतरोपचारयोग्यं द्वितयमिदं युगपन्न सह्यमेव । जरठितरविदोधिनिश्च कालो दयित-जनेन समं च विप्रयोगः ॥६॥ (नेपथ्ये) दोलालआहिकुंचनसरलंगुलिदोहराहिं चरणाहिं अपहारिजइ वलइअकरजुअलंचिमणेउराहरणम् , करजुअलनिविडपोडिदपेरंतविणिग्ग अंचलचडुलप्पा छोडिनइ सरभससहीपडिक्सिआ चिअ कणअकंचुलिआ (मगि) खचिदोअरसिठिलयणर्फचुअत्यइथणभराहितो अवणिजइ उद्ध- और हे मित्र ! हम ऐसा सुनते हैं- बालधि लताओं का मूल, जातीवृक्ष की सुगन्धमय छाल, चन्दन वृक्ष का सार, अशोक वृक्ष की नयी कोपल, शिरीप वृक्ष के कुमुम, पता हुआ केला- इन मत्र गर्मी दूर करने वालो वलुओं को (शंकर जी द्वारा । मन किये गए आनदेव को प्राचीन काल में ग्रीष्म ने प्रदान किया था ॥५॥ (असह्यता का अभिनय कर ) प्रचण्ड सूर्य की किरण और प्रियजन का वियोग-इन दोनों को शीतल अचार सामग्री की अपेक्षा होती है, मुझे एक ही समय में ये दोनों सर्वथा बस्य हैं ।। ६॥ (नेपथ्य में ) हिंडोले के समान चक्रगति से झूलते हुए एवं सीधी बिगुलियों के कारण दो प्रतीत होने वाले चरणों से, दोनों हाथों को वलयाकार बनाकर नूपुर उतारे जा रहे हैं। दोनों हायों के लगातार पीड़न से एक ओर सरके हुए अञ्चलरूपो आत्मावालो त कञ्चुकी खोली जा रही है। मणियों के खाँचत अन्तरमाग वाले शिथिल स्तनञ्चक से टँके हुए स्तनों से हाथ ऊपर ७ पिस - .
९८ विद्धशालभञ्जिका करम्गकट्टणुव्विलं परिलम् । उभअकरपलइअंगुलोपरिगहणमुक्करटु- सट्टाणो रद्धारिजइ थण-मण्डलाहि दरांदोलिओ हारो। परिपाडिसनुग- मिअभुजलों परप्फर करग्गेहि कट्टिलाइ कमसिठिलसंकाउभाओ पञ्च. पाकडओ । कमसो सरंत संजमणदिलं आमूलचुम्बिआणअम्बो उरजइ पहपरिपाडितरलिओ एसोचिरपासो । सर्गलनतरलंगुलिविवरंचिअगि-. म्मुक्कडिलविणिवेतो काणिज्जइ उजद्दलाभुअचअगन्मि अलमागं जिउरंयो। फरकमलकापट्टगुलियसिहल्लिहिअतबलिसरिया पट्टो. रिज्जइ पुगगत्तमंगलन्स क्लाहि णिअंबंसुओं। पुडमोवतिप्यपिअ-राणिसं. पुमंपिडिआसु धारासु दरदन्तसमूहपहारामु हत्थं नच्छिन्नइ एत्य दह मणी हरइ वारविलासिणीणं दइअसहिदाणं गिरावरखसोभग्गससगो मजणारंभो । ( दोलालवाभिकुचनारलाइलिटीघांञ्चरणादपदार्यते । वलक्विझर- युगलाञ्चितनपुराभरणम् । करयुगलनित्रिहपीडितपर्यन्तविनिर्गताचलचटुलाला मुथ्यते सरमससखीमतीशिव कनफकधुलिका )।(मणि) खचिवोदशिथिलतन- कंचुरथगितत्तनभरादपनीयते ऊर्घराप्रकर्षगाव्यत्यत्तमुचरीयन् । उभयरपट- पितागुलिपरिग्रहणमुक्तकण्ठसंस्थानः उद्धार्यते स्वनमण्डलाद् दरान्दोलितो हारः। परिपाटिसमुन्नमिवभुजदतं परत्वरं कराः कृष्यने कमशिथिलतायभावः सावन फटकः । क्रमशः सरत्संयमनकुटिलमाम्ल विवनिवम्बो विकीर्यते । (नस) परिपाटि- - करके खींचार मत्यन्त उत्तरीय हटाया जा रहा है। टोनों हाथों को ठगाकार अँगुलियों द्वारा कण्ठस्थान को छोड देने वाले एवं किञ्चित् आन्दोलित हार, स्तन मण्डल से ऊपर उठाया जा रहा है। परिपाटी (कं उतारने का दंग) से भुजाओं को उन्नमित करते हुए परस्पर दोनों हाथों से मयः पीडा-मात्र को फम करने वाला काञ्चन-कटक (नोने का पंगन) उतारा जा रहा है। फमशः बन्धन ढीला होने से मूल-पर्यन्त नितम्रदेश को छूने वाला कुटिल पेश, नो नम्व-चिहों को अंगियों पर लहरा रहा था, अब विकण किया जा रहा है। सरल और चन्चल अगुलियों के विरों में आए हुए निर्मुच एवं अहिल विन्यास याला अलकों का समूह कान्तिमान् और मुन्दर मुग पर मुरमाया । रहा है। करकमलों की निगुलि के नतों के शिखरों से चिहित निपली बार चतुर्योऽङ्कः तरलित एष चिकुरपायः। सरलिवतरलांगुलि-विवराञ्चितनिर्मुक्तकुटिलविनिवेशः समक्रियते बदलामृतददने अलकानां निकुरवः । फरकमलनिगुन्टिनखशि- म्वरोलिखितत्रियलिसक्यिगदम् उन्नुच्यते पुनक्त गाय दगनितम्बांशुकम् । प्रयमावतीर्णप्रिमाणितपुरसडितानु धारानु दरदत्तनमूहमहारानु हलोचने क्षणा- छन् । इह तथा मनो हराते वारविवासिनीना दरितसहितानां प्राप्मापराहसौभा. मोदनो मन्जनात्मः।) राजा-(समानर्य) एवमेवैनन् । इह विचकिलचापे नन्दवन् पाटलान्त्रं, त्रिभुवनजयलीलालालसः कौतुकेन । दिवसगननलिम्नायिनीनां वधूना- मविवसति ननोभूर्भानिसादङ्गभङ्गम् ॥७॥ विदूषः-भो मुगाडि दाय, अन्तरिदो पिअकहामु अदिकन्तपओस. बुत्तन्तो। जदो सिविणअसणदिअहादो पहुदि देवी पुगो पुगो पमञ्जदि। तणुसंवेग पिङ्गलिआ वि यहाणी दिणे दिणे मंतेइ । ( भोः शृगु वापर , बार में स्थित नितम्बांशुक यापूर्वक पुनमंगल के लिए हठात् खोला जा रहा है। पहले उतरे हुए प्रिंस के पानितंपुट से पीडित एवं सामूहिकरूप से बिनमें किञ्चित् प्रहार किया गया था, ऐसी धाराओं में थोड़ी देर के लिए हार अस्ति किया जा रहा है। यहाँ पर प्रियतमों के साथ रहने वाली वार- विजनिनिषों के समान की सूचना देने वाला ग्रीष्मापराइमञ्जन मन को मोह रहा है। रावा (सुनकर) ऐका हो है। 7 विनोदार्थ विचकिल पुन के घनुप पर पाटलपुभ का वाण चढ़ाकर त्रिभुवन जीतने को क्रीडा करने का इच्छुक कामदेव, ग्रीष्मऋतु की आसन्न न्यावेग में जलक्रीडा करने वाले युवतियों के मानस से निकल कर, उनके अर-अङ्ग में निवास करता है॥७॥ विदूषक-अरे मुनो तो-प्रियजनों की ही चर्चा में गत सायंकाल का १०० विद्धशालमक्षिका अन्तरितः प्रिपन्यानु अतिकान्तप्रदोषवृत्तान्तः यतः तप्नदर्शनक्लिात् प्रति देवी पुनः पुनः प्रसन्मति । तदनुमन्यन रिङ्गालकारि ब्राह्मणी दिने दिने मन्त्रपचे।) राजा-युभ्यते । यदरिष्ठमधिरूढा कारवल्ली-वल्लरी पिमुख्यने क्टु क्रवं प्रति न कापि महवी वार्ता । पिन्तु- तारान्तः पुरवान विचपि शशी भी नेत्रपात्रोतः प्रोत्वस्ययनं कृतो न च मया वैश्मिरः पञ्चमः। न्यायाः स्मरता दृशौ तत इतस्ते साचि सञ्चारिते नो पोतन्न सविभ्रम प्रणयिनीगङ्पधारं मधु ।। ८ ॥ विदूल-एदो चि कामिगो उम्मता विज में पडिभासन्ति । जदो सच्चं दाव सुन्दरीन थन-णिरीत्खनगमणादिहिं शिवि विभरिजन्ति । ता कहेदु, किं एवं? (एतेऽपि शामिन उन्नचा इव ने प्रविकासन्ते। पटः सत्यं तावत् तुन्दयां स्वन निरीक्षणगमनादिभिः किनारे विक्रियन्ते । टस्मात् क्यपतु, किमेठत् !) वृत्तान्त मुनाना ही भूल गया । वप्नदर्शन के दिन से हो महारानी बहुत सजती हैं। उनके अनुबन्ध चे पिलिका मारुनी भी प्रतिदिन मन्त्रा । देता है। राजा-उचित हो है। एक तो करेला दूसरे नीम पर चहा, ठो निर उत्तकी पहुआर का क्या पहना । कोई महत्वपूर्ण वाव नहीं है किन्तु- उस नुन्दरी के इधर-उधर तिरछे चलाये गए नेत्रों को स्मरण करते हुए मैंने आसराय में दारा (पनी ) युक्त चन्द्रमा को नेत्रों से नहीं देता, योगा का मधुर पञ्चन स्वर कानों से नहीं सुना तथा हाव-भावयुक्त ललना के हाथों से मदिए। नहीं पी॥८॥ दिदूपर ये धामीजन भी मुझे पागल से प्रठत होते हैं, दो नन्दरिक के शरीर, दृष्टिपात तथा चाल आदि देसकर बुर विकृत हो जाते हैं। दो । बताओ यह क्या है? -- चतुर्थोऽङ्कः १०१ राजा-किमत्र मां पृच्छसि तत्रभवन्तं रतिपर्ति पृच्छ- यत् पश्यन्नि झटित्यपाङ्गसरगिद्रोगीजुषा चक्षुषा वल्गन्ति क्रममितोमयभुवं यन्नाम वामभ्रुवः भाषन्ते च यदुतिभिः स्तवक्तिं वैदग्थ्यमुद्रामभि- म्नद्देवस्य रसायनं रस विधि मन्ये मनोजन्मनः ।।९।। विदूषकः-भो ताए उन अनतीगा अस्थि कविवत्ता ? (मोत्तताः पुनरदतनी ना-त्ति कापि वावा ?) 1-ससे! अतिक्रयते । यतो गतन्याहुः सायं समये विचझगा सत्यमेतदवस्यां निवेदितवती। विदूषकः कदरहिं अक्सरेहिं ? ( कतरैरशः१) राजा- डोलालोलाः श्वसितमलश्चनुपी निर्झराभे वस्याः सुष्यत्तगरमुमन पाण्डरा गण्डभित्तिः । तद्गात्रागां मुहुरिह कियद् ब्रमहे दुर्वलत्वं वामने प्रनिपबुदिता चन्द्ररेखाऽव्यवन्वी ॥१०॥ राजा इस विषय में मुझसे क्या पूछते हो, गीलासुदेव जी से पूछो । कृटिन माँ वाली सुन्दरियाँ तिरछे नेत्रों में जो देखती है, भाओं को हचानी जो चढती है, चातुर्व पूर्ण उल्यिों से जो मधुर चन बलिनी है। समझता हूँ, यह सत्र कामदेव जों के लिए प्रति-वियापक रतापन है। विदूष-अरे, उस सुन्दरी के समन्ध में अज को कोई नई खबर है। राजा-उत्ते, है, कहता हूँ। गत दिवस को मारने को मिलने उनी यह सही अवस्या बताई। विदूषक-शिन अक्षरों में? राजा-मुनो- उतको टोय साँस हिंडोले की तरह लम्बी आवी-जाती है, नेत्र निर की भाँति बल बहा रहे हैं एवं उसके कपोल सूखते हुए तगर के पुत्र को माँति पीले हो गते हैं। उसका शरीर कितना दुर्बल हो गया है क्या कहूं, उसके सामने दो मनिष्ट्र की परेशानी मेटे से उरी है". ५०. :- १०२ विशालमचिका विदूषकः-सदो तदो ? ( ततस्ततः ?) বন্ধ नागलिरधिरोहतु पूगं रात्रिरेणाटिलरेन समेनु । त्वामसौ बजतु किन्नरफन्टी फार्मुकं बहतु त्रिमनः॥ ११ ॥ विदूषकः-विअस्वभावभगाहो जाणीअदि पाणिपीडा पुरदो पाविओ- अप्पा। विच्चगावचनात् सापते पानिमीडनाद पुरतःप्रारित आला।) रावा- स च चतुप्पदीपर्यवसिवः लोकः प्राकृतीतः । विदूषकः-ता पसाद कदुअ पटटु पिअवअन्सो । (तस्मात् प्रसादं कृत्वा पटनु प्रितमत्वः।) राजा पटति) विधत्ते सोल्टेखं कनदिह नांगं तरणिमा तथापि प्रागल्भ्यं किमपि चदुरं लोचनयुगे । विद्रुपक-उसके बाद? राजा- उनकेबाद पद विनर के समान मधुर वट वाली तुम्हें बोनात दो बाप से समझिये केसे पान की वेल तारी के वृक्ष पर चढ़ जाय, रात्रि चन्द्रमा से युन्न हो बल अपवा कामदेव अपना विजनी धनुष धारण कर ले ।॥ ११ ॥ विदूषक-विचक्षणा के रहने से तो मान होता है कि पानिप्रदान के पहले ही उसने आत्मसमर्पण कर दिया। राजा--उसने एक चार-पटों का श्लोक उपहार स्वरूपा है। विदूषक-तो कृपा कर प्रिय मित्र पढ़ें। राजा-पढ़ता है) यो तो युवावस्था दित मन को विशेष सौन्दर्यपूर्ण नहीं कर देखें, तर नेत्रों में एक अपूर्व चानुपूर्ण प्रगल्भधा टा दी है। नरें। से जिते देखा गया-दन्याट उसके मनोगत स्नत्त मार्यों को समर चतुथोऽङ्कः १०३ यदादत्ते दृश्यादखिलमपि भावव्यतिकरं मनोवृत्तिं द्रष्टुः प्रथयति च दृश्यं प्रतिजनम् ।। १२ ॥ फिच- स्वकण्ठकाण्डात् सुशोऽवतार्य, स्वप्नेऽर्पितो यो मम कन्धरायाम् । पुनर्मया तत् कुचसीम्नि मुक्ती, हारः स तु प्राभृतमद्य जातः॥ १३ ।। विदूषकः-भो किं चि रहम्सं पुच्छीअसि। (मोः किचिद्रहस्यं पृच्छ्यसे।) राजा-क्यते । विदूषकः-मिअंकावली कुवलअमालागं किं अंतरं? (मृगाकावली. कुवलयमालयोः किमन्तरम् ?) राजा-आस्ताम् , पर-कलत्रं हि सा वर्तते । विदूषकः-मो पत्थिव, अणभिण्णोऽहम् । जेण उण सालभजा अद्धमज्जेति भगिदा। ता कहेसु केत्तिों अंतरं मिअंकावली-कुवलअ- देते हैं और जिसने देखा-उसको भी मनोवृत्ति को देखे गये मनुष्य से ये बता देते हैं। इस प्रकार दोनों (द्रष्टा और दृश्य ) को परस्पर एक दूसरे को अपने- अग्ने हृदगढ मार्यो को गुतरूप से बतलाने में ये नेत्र बड़े सहायक होते हैं ॥१२॥ और सुनयना ने अपने कण्ठ से उतार कर जो हार मेरे गले में स्वप्न में अर्जित किया था, मैंने उसे पुनः ओ उसके कुचप्रदेश पर डाल दिया-वह उस सनन मेरी तरफ से मेंटवरूप हो गया ॥१३॥ विदूषक-कुछ रहत्य की बात पूँछता हूँ। राजा-कहूँगा। विदूषक-मृगावावलो और कुवलयमाला में क्या अन्तर है ? गजा-रहने टो, वह (कुवलयमाला) परायो स्त्री है । विदूषक-राजन् ! साले की स्त्री अपनी आधी स्त्री कही गई है, क्या मैं
नाटा ? (मो. सा!ि नान्दन्ननःसमापन
नागला कलार ९२, किनान्वरं मी)
राजा-पारदरंगांशावलीलपनाल्यो।
विदूपत्रः-भो पुगो भनिग नि नन्दिं होद (मोन्मीले कि
भागमति)
हि प्रान्तरे कम, जरदरं पतामगुरनारयोः
विपनः बदरंडागादि । ( नर ।)
राजा-तान्यते-
साटोचपनडररचना निनः मुन्टची
पूर्वा रबन्दी दिनतिं रचनानन्या नुदानगेन् ।
ते रिलात तदने देवन्द केसोनुश
पाच्या किन्तु नितान्दनिवजनहारनामोदयः ॥१४!!
इतना नहीं बना सो बामो भगाचो और कमल में लिकना
अनर ई
राजा-जिवना मन्दर नगरी (चन्द्रना) और नामा
विपर-उने को तोहरा कर पहना का कहनाका!
गुन-तो दूनय शाहरण देवर करता है. जिना अन्तर पर और
बगर में होता है।
विपक-अच्छी तरह जानता हूँ।
राजा-ना-
भयो (चायादेश को रन) चा के न सोरे कोबादी है दर्द
बुन्बी (अन्वन्देशकको) को मौविमोचते गाती है। दो
(नार्य) रनों से मार दी है और इन्ले (चन्दन) मंदि।
इस प्रकार रोनों कान को मोटा है, किन्तु चोको सनत मगर को
पत्र देनेपाल मष्टाना है !
। चतुर्थोऽङ्कः सखे, पुनर्निरूपय, तदनुपपनामव, तामेमां यदुतास्मान् देवी परिणाययिष्यति । विदूषकः-- क्खु दिट्टे अणुववणं णाम । (पुरो दर्शयन् ) संबंधिणी- चेटोओ दीसंदि आअच्छंतीओ। (न खलु दृष्टे अनुपपन्नं नाम । सम्बन्धि- नीचेभ्यो दृश्यते आगच्छन्त्यः।) राजा-का पुनस्ते सम्बन्धिनी? विदूषकः देवी। राजा--(विहस्य ) तदेहि चित्रशालिकामधितिष्ठावः (तथा तिएतः) (ततः प्रविशन्ति नेपथ्यपटलकहस्तश्चेट्यः । सर्वाः परिक्रामिवकेन) एका-हला कुरंगिके ! कहि उण महाराओ पेरिखदव्यो। (हला कुरंगिके ! क्य पुनर्महाराजः प्रेक्षितव्यः ।) द्वितीया--सहि, तरंगिए जहिं आसण्ण-वियाहकोहलहलहल'फु. रिदो जणो दीसइ । (सखि तरंगिके, यात्राऽऽसन्नविवाहकौतूहलहल-हल- स्फुरितो जनो दृश्यते।) सखे ! देवी उसी सुन्दरी के साथ मेरा जो विवाह करेंगी-अभी तक यह हुआ नहीं, पता लगाओ-क्या बात है। विदूपक-(सामने की ओर दिखाता हुआ) सम्बन्धिनी और दासियों आती हुई दिखाई दे रही हैं। राजा-तुम्हारी सम्बन्धिनी कौन ? विदूषक-महारानी जी। राजा-तो आओ हम तुम चित्रशाला में बैठे। ( दोनों वहाँ बैटते हैं) (इसके बाद हाथ में शृंगार-सामग्री की टोकरी लिए दासियों रंगमञ्च पर आती हैं)। (सभी घूमने का अभिनय कर) एक--कुरंगिने ! महाराज कहाँ मिलेंगे ? दूसरी--जहाँ ऐसा आदमी दिखाई देता हो, जिसके हृदय में विवाह निकट होने से कौतुहलवश हड़कम्प मची हो ।
विद्धशालक्षिका अन्या-अइ मुलक्षणे किं विअ टक्सणं मन्तीअदि । जदो सहस्ताणं पाणि गाहिदस्त को विअ कोहलहलहलओ। (अइ मुलाने! किमिव लक्षणं मन्यते । यवः सहसाणां पाणि आदिवस व कौतूहल-हल- अपरा-पिअवअने, विअखणासि कि गु क्यु अगमिण्णात्ति पंदापचरिआणे दागी नवं नवं फोऊलं कामि जगे । (प्रियपत्ये । विचमाति, किन्नु खल्वनभिज्ञाति फन्टर्पचरितानान् ? यदिदानी नवं नवं की कामिजने ।) विचक्षणा-(पुरतोऽवलोक्य ) एस भट्टा पंडरपरिक्सामो पाहपूर्णिय- माचन्दो विअ सगिच्चगणुगओ अजचाराअगदुदिओ चित्तसालादु. पादहसे दोसइ । (एष भवा पाडुरपरिधामः प्रभावनिमाचन्द्र इव धनेच- रानुगत आर्यचारपणदितीयश्चित्रगलादारोदेशे दृश्पते ।) कुर०-( उपत्य) जेदु भट्टा । देवी विग्गवेदि, आमण्णं विवाह- लग्नं । ता इमं वियाइणेवच्छमंगलं करिअअविट्ठोअदु विवाहचक्किया। (जन्तु मतां । देवा विज्ञापयति, आसन्नं विवाहटग्नं तस्मादिदं विवाहपद- मंगलं कृत्वाऽपिष्टीयतां विवाह-चतुष्किका ।) अवा-अरी मुलक्षणे ! यह कौन सा लक्षण वदा रही है। जिसने हजारों के साथ विवाह किया, उसे कोहलपय क्या हड़कम होगी। थपरा--प्रिय सखि ! नाम से वो दुन विचना हो किन्तु कामदेव के चरित्रों को हिल नहीं जानती हो । अरे, ऐवे अवसर पर कामी पुश्प में ना नया कीन्द होता है। विचक्षणा-(सामने देखकर )पीले और दुल सानो वो, शनैश्चर सहित प्रभात कालीन पूर्णिमा के चन्द्र के समान, आर्य चायपण के साथ चित्रशाला के. द्वार पर दिखाई पड़ रहे हैं। पुरहिका-(निकट जाकर )लामी की बर हो! महारानी जी छह रही है-विवाह-टग्न निकट है, तो आर विशद के उमप या शुम वस्त्राभूपा पारम पर विवाह की चीपर बै। 1 चतुर्थोऽङ्कः १०७ राजा-चयाह देवो, शान्तम् , यदादिशति देवी । विदू०-(आत्मानं निर्दिय) संबंधिजगाणुरूपं भुजं किं पि कि ? (सम्बन्धिबनानुरूपं भोज्यं किमनि कृतम् !) का:-अरं दइन्सामो। (अरं दरियामहे ।) विदू-कि विभ तं । (किमिव तत् ।) कुर-जंकलित दोहले लाइ। जंवा भअवन् तिणभयो । सीसे समुन्यइ । (मत् कडेलितदोहदे लभते, यद्दा भगवात्रिनयनः शी स्वति ।) विदू-(दण्डकाप्रमुयम्य ) दासीओ महाअपिअवअस्सं पिंगलभा बह्मणों सिमुत्तगवल्लहपंडिअं सिसुअदिण्गविजं चाराअगवमर्श अहिक्खिवध | ता इमिणा तुझारिसचंडीअचित्तकुडिलेग दंडकहण मुगजगजुगुच्छिाई वमपाई करितं । (दात्यः, महाराजप्रियवयत्वं पिङ्गलिकाबाझशिशुत्वबल्लमपण्डितं शिशुस्टत्तविधं चारायणब्राह्मणमधिचिपय । वनामुना युष्मायचेननचित्तकुरिलेन दण्डकाप्ठेन मुजगजनगुप्सितानि वदनानि करिष्यानि।) राजा-बैसा देवी जी कह रही हैं--धान्दम्-(अरे नहीं ) जैता देवी का भादेश है। विदूषक (याने को निर्दिष्टकार) सम्बन्धीजनों के अनुरूप कुछ भोजन मीनार किया है? उभी दानियाँ-अर (पहिये की नामि और नेमि के बीच की लकड़ी) देगा । विदूषक-यह क्या ? कुरङ्गिका--अशोक वृक्ष जो दोहद के समय पाता है (अयांत् चरणाघात) । क्या मगवान शंकर बिसको शिर पर धारण करते हैं (अर्घचन्द्र अर्यात् गला पट कर निकाल देना) विदूषकदासियो ! जो महायज का प्रिय मित्र, सिंगलिका ब्राझगी का बच- पन ने ही प्रेमी पण्डित और जिसने बच्चों को विद्या दी, उस चारायण ब्राह्मग का दन तिरस्कार कर रही हो। तो तुम्हारी ऐसी दासियों के चित्र की भाँति कृरिल (है) इस डण्डे से तुम लोगों का मुंह कुचल दूंगा। ।
१०८ विद्धशालभलिका तर-मरिसेदु मरिसेदु अज्ञो। संबंधिओत्ति देवीविलातिगोओ वक्कर करेन्ति । (मर्पयतु मर्षयतार्थः । सम्बन्धिक इति देवीविलासिन्पाचोचं- कुर्वन्ति ।) अन्या-अलं वक्करेण, दुव्यासो अज्जचाराअणो। (अलं चोयेन, - दुर्वासा आईचारायणः।) दिदू०-(विहत्य) संपदं एव्य मुबासो हुविरसदि । ता विवाहमहूसवें करेा । मुलक्खणे हारट्टिए फलअहि वसन्तलए लगिए कामकेलि हारकेलि मिअंकप्पदे रहंगि सामलंगि यस्लार्याल पहुणो अवसर विभ- पखणं कर फेण-चंधेग विरगध विआहदिक्वं । (सांतमेव सुवासा भविष्यति । वत्माद् विवाहमहोत्सवं कुर्मः । मुटणे, हारयटिके, फलकन्टि, वतन्तलते, लवशिके, कामकेलि, हारफेलि, मृगाक्प्रमे, रथानि, श्यामलागि, कुलावलि, प्रमोरक्तरविचक्षणं कर कंवगन्धेन विरचयत विवाह-टोशाम् ।) (सर्वा उपसृत्य रत्नवास:क्कमकुममादिकमुपनयन्ति) राजा-नाट्यन पग्धित्ते । विडूपरः( उदवशिष्टेन समालम्भनादिनात्मानं मण्डपति ।) परमिकां आर्य क्षमा करें, क्षमा करें । थार सम्बन्धी हैं, इसलिए महारानी को टासि हसी कर रही हैं। अन्या-हसी बन्द करो, आर्य चागयण दुर्वासा हैं (१-दुांता की तरह क्रोधी, २-बुरे वस्त्रों वाला) विदूपर-(हमकर ) अभी दी सुवासा (सुन्दर पत्रों वाला) हो जायेगा । तो आओ हम लोग विवादोत्सव करें। मुलक्षणे ! हारयष्टिके ! फलकास्टि! वसन्तलते ! लवशिके ! कामशेलि ! हारवेलि! मृगांक्यमे ! रथाङ्गि! श्याम- लागि ! वकुलापलि ! स्वामी के यसर विचक्षण हाय को पग-पन्धन नुशोभित कर विवाहार्य दीक्षित करो। (सब दातियाँ पात बाकर रन, वस्त्र, महण एवं कुमुम आदि रखती है) गडा-(अभिनर के साय धारण करता है।) विदूषक-(या के उपयोग से बचा लेपनादि सामग्रो ने अपना माइन फरता है।) ।
चतुर्थोऽङ्कः १८९ विच०-भोदिओ कि बिलम्वेण, आरन्भरमणिज्जाई कल्लागाई होन्ति । ता एत्य गाएध णच्चध । ( भवत्यः किं विटवेन, आरम्भरमणीयानि रल्यापानि भवन्ति, तस्मादन गायत नृत्यत ।) विदू०-भो एदाणं मझे अहं वि गाइरस पच्चिस अ । (मो एतासां मध्ये अहमपि गास्यामि नतियामि च ।) राजा-यदभिरुचितं भवते । (विदूषकेण सह सयो नृत्यन्ति गायन्ति च) ( नेपथ्ये) हंहो सुलक्षणामिस्साओ, किं विलंवेण, आणेध महाराअं सपरि- वारा देवी संपत्ता उजेब । (अहो मुलक्षणामिश्राः, किं विलंबेन, आनयत महाराजम् , सपरिवारा देवी संप्राप्तव । ) वर:-इदो इदो एटु महाराओ। [ सर्वे परिक्रामन्ति ] (इत इत एतु महाराजः (ततः प्रविशति ययानिर्दिष्टा देवी, कृत्याय मृगाहावली [ कुवलय- माला चढ़ महाविद्यालय . विचक्षणा–नुम लोग देर क्यों कर रही हो, शुभं शनि कुर्यात् । लोग गाओ, नाचो। विदूषक-मित्र ! इनके बीच में भी गाऊँगा, नाचूँगा। राजा-जो आपको अच्छा लगे। (विदूषक के साथ सब नाचती-गाती हैं ) (नेपथ्य में) अरे मुलश्चगा आदि चेटियो! क्यों देर कर रही हो । महाराज को ले आओ । अनुचर-अनुचरियों समेत महारानी आ ही रही हैं। तरनिका-महाराज इधर, इधर आयें। (सव घूमते हैं।) (इसके बाद ययनिर्दिष्टा देवी वयून्येश में भूगाइऔर पापमारम) ११० विद्यालभञ्जिका देवो-( अवार्य ) यच्छे कुबलअमाले, पेच्छ अत्तयो भट्टियो सिलिटुं महिलावसं । (पत्ते कुपलपमाले! पताअननो मनुः दिन महि- लावेपन् । ) [मुक्लयमाला उन्मुखी हसति ] राना--(स्वगतम्) दिवस इयास्मि सताप. सेन्दुवंदनेन रात्रिवच्चेपा । इदपि चान्तररचितं रक्ताशुकमाययोः सन्ध्या ।। १५ ।। देवी--अजउत्त, जगपालीअदु मुहं न्स, उदु भवणगभ चंदो। ( आर्यपुत्र ! उद्घाय्य मुखमस्याः उदेतु भरनगर्ने चन्द्रः।) राजा-(उपविदा तथा कृला स्वगतम्) नयनच्छलेन मुतनोर्यदनजिनाशिनि फुले विभोर्वाधान् । नासानालनिवद्धं स्फुटितमिवेन्दोवरं द्वधा ।। १६ ।। देवी-वत्से मिशवलि, गुण तारामेटअं, वित्यारअ कुवलय. संथरं । (क्ले मृगाकावलि ! कुरु तारामेलनम् , विस्तारय कुवलयसंस्तरन् । देवी-(विकर ) परसे कुपलयमा ! अपने पति द्वारा गृहात महिला- वेप देसी । (कुदलयमाला टसरी ओर मुख करके हँसदी है) राजा-(स्वगत) तापयुक्त दिन-सा हूँ और यह मुख के कारण चन्द्रयुक्त रात्रि की भाँति है। हम दोनों के चोच यह लाल वस्त्र सन्ध्या की मौति है ।। ३५॥ देवी-आर्यपुत्र ! इतका मुख खोटो, भयन के भीनुर चन्द्रमा अदित हो जाना गजा-(बैटवर पंडा करके स्वगत) (इम मुन्टरी 2) मुख से पराजित चन्द्रमा में, कुलानु (चन्द्रमा ) के (इस पराजय ) व्यापात के कारण, नेत्र के बहाने मानो नासारूपी नाल से जुड़े हुए दो नंले फमल विन्ति हो गये हैं॥ १६ ॥ देवी-दसे मृगाहापाले ! तारामेलन करो, पमल (नेत्रों ) को पायो ।
चतुर्थोऽङ्कः
१११
मृगां-(लनावशादितत्ततश्चक्षुषी निधाय चिरभूमिवलोकयति )।
राजा-(विलोक्य स्वगतम्)-
भवनभुवि सूजन्तम्तारहारावतारं
दिशि दिशि विकिरन्तः केतकानां कुरम्यम् ।
वियति विरचयन्तश्चन्द्रिकां मुग्धमुग्धां
वत नयननिपाताः मुभ्रुवो विभ्रमन्ति ॥ १७ ॥
विदूषकः-(जनान्तिकेन) एसा सा कुबलअमाला तुमं तिरिच्छेहि
अच्छीहिं पिबदिव । ( एपा सा कुवलयमाला त्वां तिर्यगभिरश्चिभिः
पिवतीव ।)
राजा-एवमेतत्-
प्रणालीदीर्घस्य प्रतिकलमपाङ्गस्य सुहदः
कटाक्षत्र्याक्षेपाः शिशुशफरफालप्रतिभुवः।
दधानाः सर्वस्वं कुसुमधनुपोऽस्मान् प्रति सखे !
नवं नेत्राद्वैतं कुवलयदृशः संदधति च ॥ १८ ॥
मृगावावली-(लवावा इधर-उघर आँखें घुमाकर देर तक कार की
ओर देखती है।)
राजा-(देखकर स्वगत)
भवनभूमि पर मुक्ताहार का सृजन करते, प्रत्येक दिशा में केतकी पुष्प-
राशि विखेरते एवं आकाश में गौर मनोहारिणी चन्द्रिका विरचित करते हुए
इस मुन्दरी के नेत्र धूम रहे हैं--प्रीति द्योतक हाव-भाव कर रहे हैं ॥ १७ ॥
विदूषक-(अनान्तिक से ) कुवलयमाला तुमको विरछे नेत्रों से पी-सी
राजाहों ऐसा ही है-
नीले कमल के समान नेत्रबाली इस मुन्दरी के नालो को माँति सम्वे
आग के मित्र कटाक्षों के व्याक्षर शतरी मछली के बच्ची के समान है।
इसके नवीन नेत्र अनुपम हैं। ये कया, कानदेव के सर्वस्व नवीन अनुपम
नेत्र को (वाग की भौति) धारण कर, हमें लक्ष्य बनाकर सन्धान कर रहे
हैं ॥ १८॥
११२ विद्धशालभलिका किं पुनः परफलामेपा। विदूषकः-लेहातत्तिए तुद् एव्य एमा । (रेखा-क्या तया!) देवी-( जनान्तिक कुवलयमाला प्रति) पेच्छ अत्तणो भत्तारं अन्न- उत्तेण परिणिजनाणं । (प्रकाशं) संपदं भामरीओ कुगउ महाराओ, दिजंदु अजपनलिदे हुदवहम्मि लाजाओ। (पश्याऽऽत्मनो मतारम् आर्यपुत्रण परिणीयमानम् 1 साप्रतं भ्रामरोः करोतु महाराजः, दीयन्तामाव- प्रज्वलिते हुतवहे लाजाः।) राना-( परिणीयोपविश्वति)। प्रतिहारी-(प्रविन ) देव, देवीमादुलन्स चन्दवम्मरस पहाणदृदेण सह अनभाउराअणो दुवारे चिट्ठदि । (देव ! देवीमातुलस्य चन्द्रवर्मनः प्रधानदृतेन सहाऽर्यमागुण्यणो द्वारे विष्ठति ।) राजा-(देव्या मुखमवलोकयति) देवी-अविलंविदं पविसदु । ( अविलम्बितं प्रविशतु ।) प्रतिहारी-( निष्फान्तः) किन्तु यह तो पराई स्त्री है। विदूपर-रेखा को शक्ति से भाग्यबल ते तुम्हारी ही यह है । देवी-(कुवलयमाला से फुसफुसा कर) आर्यपुत्र द्वारा परिणीयमान अपने पति को देखो । ( उच्चत्वर से ) अब महाराज मौयरें डालें, घृत से प्रन्य- लित अग्नि में लाया (खोले ) डाले। राजा-(विवाह करके बेटता है) प्रतिहारी-(प्रवेश करके) देव! महारानी के मामा चन्द्रवर्मा के प्रधान दूत के साथ आर्य भागुरायण द्वार पर सहे हैं। राजा-(महारानी का मुख देखता है 1) देवी-यविलम्ब अन्दर भायें । प्रविहारी-(चय गया) ११३ चतुर्थोऽङ्कः (ततः प्रविशते भागुरायगो दूतश्च ) उभौ-जयतु जयतु त्रिलिङ्गाधिपो देवः । भागु-इचो लाटाधिपतेर्दूतः। -उपविश! निवेद्यतामपि कुशलं चन्द्रवर्मण' ? दूत:- देवानुग्रहण देवी-कुशलं मातुलाणीए हारलदाए? (कुशलं मानुगन्या हार- स्वायाः १) दूतः-अथ किम् ? देवी-अवि मुमेरदि मे गुरुजणो । (अपि स्मरति मे गुरुजनः।) दूतः-आत्मापि विस्मयते ? ( देवी प्रति ) मातुलपुत्रजन्मना दिष्ट्या वर्षसे । (सर्वे हर्ष नाटयन्ति ) संदिष्टं चास्मत्म्वामिना- निसुनुना प्राक् परिकल्पिताऽभून्मया मुगाकालिरेफपुत्रः । पुनावकापच्छलनोऽथ सेयमानायिता वः सचिवोममेन ।। १९ ।। (इसके बाद मागुरायण और दूत प्रविष्ट होते हैं) दोनों-त्रिलिङ्गाधिप देव की जय हो । मागु०-इधर ये लायाधिपति के दूत हैं। राजा-बैठो, चन्द्रवर्मा का कुशल क्षेम बताओ। -आपके अनुग्रह से 'सम्यक् कुशल है। देवी-मामी हारलता कुशल से हैं ? दूत-दौ ! मेरे गुरुजन मुझे स्मरण करते हैं? दूत-क्या अपने को भी भूला जावा है ? ( देवी के प्रति ) मामा के पुत्र जन्म के लिए तुम्हें बधाई है । (सभी हर्ष का अभिनय करते हैं) हमारे स्वामी ने सन्देश दिया है- पहले पुत्र-दीन होने से मैंने मृगाङ्कायलो को पुत्र प्रसिद्ध थिा, और तुम्हारे सचित्र पुत्र वेश में ही उसे यहाँ तुम्हारे पास ले आये }} १९ ।। देवी--क्या ८वि ११४ विद्धशालभचिका जातः सम्प्रति मे कुलकतिलकः पुत्रस्तदेपा त्वया भव्या कान्तिमती कलामु पुशला केलि प्रिया नोतिभूः । देवज्ञोदितचक्रवर्तिगृहिणोभावा मृगाढावली देया कस्यचिदिन्दुमुन्दरयशःपूनस्य पृथ्वीपतेः ॥२०॥ भागु०-(स्वगतम् ) फलितं नो नीतिपादपलतया धिया। विदू०-(हस्तमुद्यग्य ) भो दिण्या परिणादाअएसा। किंण पेक्खसि- पोहसहिदरतसुत्तकंकणं पिअवअस्सस्स मिअंकावलीए अ, मण्डदं दीक्खिदं वर्ग इथिों अ। [ सर्वे विस्मयन्ते ] (भो दत्ता परिणीता चैया। किन पश्यामि प्रकोष्ठसस्थितरक्तसूत्रकंत्रणं प्रियवयस्यस्य मृगांकावल्याश्च । मण्डितं दीक्षितं वरं स्त्रियश्च ।) देवी-(जनान्तिकम् ) पेक्ख देव-दुम्विलसिदाई । जं मए कैलिक- मेण अलिभं परिकप्पिदं तं मच्चत्तणेग परिणई। भोदु एव्यं दाव । (प्रकाशम् ) मादुलसन्देसमंतरेण चि मए परिणाविदा एश्व एमा। (पश्य देय-दुर्विलसितानि । यन्मया केलिकमेणालोकं परिकल्लितं तत् सत्यन्वेन परिपतम् । भवत्वेवं तावत् । मातुलसन्देशमन्तरेणानि मया परिणायितवया।) अब मेरे एक कुल-तिलक पुत्र हो गया, अतः तुम इस मुन्दरी, कलाकुरा, पेलि-प्रिया, नीतिशा मृगाढावली का विवाद चन्द्र के समान उज्ज्वल यश से पवित्र किसी राजा के साय कर दो। इसके विषय में देयशों ने यह बताया है कि यह चक्रवर्ती की गृहिणी होगी ॥२०॥ भागु०-(स्वगत) हमारी नीति पृच पर आरूद बुद्धि-लता फलवती विदूषक (क्षय उठाकर ) अरे यह दे दी गई और विवाहित भी हो गई । क्या प्रियमित्र की और मृगावादलो की कलाई में बच लाल ढोरे के पकग, और सजाये-सँवारे एवं दीक्षित वर-वधू को देख नहीं रहे हो? देवी-(फुसफुमाकर ) देव का नटखटपना तो देखो। जो विनोटार्थ झूट-मूट किया, उसे उमने सत्यरूप में परिणत कर दिया । अच्छा ऐमा ही सही। मामा के सन्देश के बिना भी मैंने इसका विवाह कर ही दिया।
चतुर्थोऽङ्कः दूतः-देवि,भवाशीना बुद्धयो यहच्छयापिप्रवृत्ताः कार्यमनुरुन्धानाः परिणमन्ति । विदू.--(अनान्तिकेन ) मो, देवी एव्य पुरो ववसिदा । (भो देव्येव पुरी व्यवसिता।) गजा-तथैव । अनुगुणं हि दैवं सर्वस्मै स्वस्ति करोति । देवी-(जनान्तिकेन) हला अझे कजवाहिरिल्लीओ, एदाणं उण साणुबंधाणं रसपपंचो। (हला, वयं कार्यवाह्याः, एतयोः पुनः सानुबन्धयो रसमपश्चः।) मेखला-जधा एव्य देवीए महानुभावत्तणं अंगीकिदं तह एव्य णिव्याहं करीअदु । कि गदे सलिले सेतु-बंधेण ? कि वा वुत्ते विआहे णवत्त-परिक्खाए ? (यथैव देव्या महानुभावत्वमङ्गीकृतं तथैव निर्वाहः क्रियताम् । किं गते सलिले सेतुबन्धेन । किं वा वृत्ते विवाहे नक्षत्रपरीक्षया ?) विदू.--अंहो अमञ्चचूडामणे, अहिणवचाणक्क, भअयं भाउराएण, एसा वि कुबलअमाला पिभवआसरस एव्य, उदो महामुणिमो एवं भणंति-(अंहो अमात्यचूडामणे ! अभिनवचाणक्य ! भगवन् भागुरायण ! एघापि कुवलयमाला वयस्यत्यैव । यतो महामुनय एवं भणन्ति) दूत-देवि ! आप ऐसी देवी की बुद्धि अपनी मनमानी मा प्रवृत्त होकर परिणामतः अनुकूल सिद्ध होती है। विदूषक-( फुसफुसाकर ) अरे देवी पहले ही तत्पर हो गई। राजा-ौं, ऐसा ही है । अनुकूल दैव सबका कल्याण करता है । देवी-(फुसफुसाकर ) अरे, हम तो केवल कार्य के साधन है, इसमें वास्तव में अविच्छिन्न एवम् परस्पर अनुबद्ध इनका प्रेम-विस्तार मुख्य है। मेखला-महारानी ने जैसे महानुभावता अङ्गीकार किया है, वैसे ही इसका निर्वाह भी करें। पानी के न रहने पर पुल बाँधना व्यर्थ है अथवा विवाह हो जाने पर नक्षत्र देखना बेकार है । विदूषक हे अमात्यशिरोमणे! अभिनव चाणक्य ! भगवन् भागुरायण ! यह कुवलयमाला भी मित्र की ही है। क्योंकि महामुनि लोग कहते हैं- ।
विद्धशालभचिका मज्जा दासो अपुत्तो अणिद्धणा सअला विते। जंटे समभिगच्छन्ति जरस दे तस्स तं घणं ॥२१॥ (भायां टासद पुत्रवनिधनाः सकला अपि ते । चं ते तमभिगच्छन्ति यस्य ते तत्य वद्धनम् ॥ २१ ॥) दूतः-अहो ! स्मृति-वेशद्यं नर्मसचिवस्य चारायगस्य । भागु- यथाह चारायणः । किन्चनेनैव कङ्कगादिना देयो परिणाय- चन्येनागपि । विदू.--जह समत्येदि महामच्चो। ( यथा समर्थयते महामात्यः ।) (कुवलयमालाया हस्तं गृहीत्या राजहस्ते विनिवेश्य ) एसा सालभज्जा अद्वभजत्ति बुझदि भवदो उग सअल-भज्जा संवुत्ता । [ तवे इसन्ति ।] (एा सालभाषां अर्धभाति युध्यते, भवतः पुनः तकलभायां संचा।) देवी-(सदिलझं स्मयते) विदूर-( चेटी: प्रति ) मोदीओ! णच्चध, गायध अदं पि नभिगमं गाइन्सं । उदो विआहे संपदं संवृत्तं । [ तथा कुर्वन्ति ] ( भयत्वो नृल्पव गायत, अहमपि नतिप्याभि गास्यामि च, यतो विवाह सांप्रतं संवृत्तम् ) भार्या, दास और पुत्र ये सब देचारे निर्धन जिसके पास जाते हैं और जिसके हो जाते हैं, उसके वे घन होते हैं ॥ २१ ॥ दूत-अहो, झोडा सचिव नागपन फी स्मरण शक्ति को स्वच्छता मागु०-~चारायण टीक ही कह रहे हैं, क्यों न इसी बहन आदि से देवी कुवलयमाला को भी ब्याह दें। विपक-(बुवलयमाला का हाथ पकड़कर राजा के हाय पर रखकर ) यह साले की पत्नी आपी मायां समझी जाती है और आपकी तो यह पूर्ण मार्या हो गई। देवी-(विस्मय एवं लतापूर्वक मुस्कयती है ) विदूषक-(दासियों से ) आप टोग गाइये, नाचिये । मैं भी गाऊँगा और नाचूँगा क्योंकि विवाह अब सम्पन्न हो गया ।
चतुर्थोऽङ्कः ११७ मृगां--(अवार्य सहर्षम् ) कुवलअमाले ! परिरमसु मं, कलत्तं मविम सवत्ती संवुत्ता । (कुबलपमाले ! परिरंगस्व मां, कल्नं भूत्वा सपत्नी संवृत्ता।) मागु०--(दक्षिणाशिसन्दं सूचयित्वा जनान्तिकेन ) न जाने किं पुनर्हप- कारणम् । (प्रविश्य) प्रतिहारी-देव ! वच्छावि ! सेगावदिशो आअदो कुरंगओ लेहहत्यओ दुआरे चिट्टइ । ( देव ! वत्साधिर ! सेनापतेरागतः कुरंगको लेखहत्तो द्वारे तिष्ठति।) मागुरु-प्रवेश्यताम् । प्रतिहारी-तथा। (निष्कान्ता) ततः प्रविशति कुरङ्गकः। (प्रणम्य) जेदु भट्टा । (जयतु भता)- (लेखं पश्चिपति ।) मागु०-(गृहीत्वा वाचयति) स्वस्ति श्रीमत्रिपुयां तुहिन-कर सुनावीचिवाचालिनायां देवं केयूरवर्ष विनयनतशिराः सर्वसेनाधिनाथः । मृगाङ्कावली (दाँककर सहर्ष) कुवलयमाले ! मुझे हृदय से लगाओ, पनी होकर अब सपन्नी हो गई। मागु०-(दाहिनी आँख का फड़कना सूचित कर फुसफुसाते हुए) न वाने अब दूसरा हर्ष का कौन सा कारण होगा। प्रतिहारी-(प्रवेश कर ) हे वत्साधिर देव ! सेनापति के पास से आया हुआ कुरंगक हाय में पत्र लिए द्वार पर खड़ा है । मागु०-अन्दर ले आओ प्रविहारी-बहुत अच्छा (निकल गया ) (इसके बाद कुरंगक मञ्च पर आता है ) ( प्रणाम करके) स्वामी की जय हो । (पत्र देता है) मागु-पत्र लेकर बाँचता है। नर्मदा नदी के लहरों से प्रविम्वनित त्रिपुरी नगरी में केयूरवर्ष महाराज को मापति श्री वत्स वात्सगुल्मि विनयपूर्वक गोश झुकाकर मुरज बनों को ११८ विद्धशालभक्षिका श्रीवत्सो वात्सगुल्मिमुरजजनवधूलोचनरर्यमाने पादद्वन्द्वारचिन्द प्रणमति रचयत्नञ्जलिं मूनि भक्त्या ।। २२ ॥ श्रेयोऽन्यत्कार्य च लिख्यते-भलचुरिकुले कतिलकस्य प्रसादेन, भागुरायणस्य मतिशयेन मादृशां च पदातिलयानामादेशनिर्वहणेन सचीप्रतीच्युदीचीदिग्विलग्नेन सर्व एव राजानश्रण्डवृत्तयो दण्डोपननाः स्थिताः, फेवलमवाची क्षिति-पतयो दृप्यन्ति स्म । तत्रापि विनिवेद्यते । तत्युल्यापहृतराज्यः कुन्तलाधिपतिरपालो नाम देवं शरणमागतो देवदिशाच तं पुरस्कृत्य वयं पपोप्णी-परिसरे समावासिताः । तत्र च--- कार्णाटो युद्धनाट्ये चतुरतरमतिः सिंहलः सिंहकर्मा, पाण्ड्यश्वण्डासियटिमलयनरपतिः कामुकप्रौढयाहुः । आन्ध्रो नीरन्ध्रसारः समरभुवि परः कुन्तल: कुन्तशाली, किं चान्यन कोकणाद्या अपि नरपतयः संयताः संघत्तिम् ।।२३।। अत्रान्तरे तैः सहाम्मदीयानामपि महान् मरम्मः प्रवृत्तः । राजा-समरभुवि निसर्गोटा पर कण्टकाः । वधूटियों के लोचनों से अर्चित होने वाले दोनों चरण कमलों में सिर पर अञ्जलि बाँधकर भक्तिपूर्वक, प्रणाम करता है ।॥ २२ ॥ यहाँ पर कुशल है और कार्य लिखा जा रहा है कल्टनुरि कुल के विरक महाराज की कृपा से, भागुरायण को बुद्धि की विशइता से एवं मुरा जैसे भकिञ्चन पदातियों के आदेश-पालन से पूर्व, पश्चिम और उत्तर दिशाओं में रहने वाले सभी दुराचारी राजा दण्डित किए गए। केवल दक्षिण दिशा के. राजा अभी गर्वित हैं। उनके बारे में भी निवेदन कर रहा हूँ-कुन्तलाविपति रीरपाल आपकी शरण में आया। उसका राज्य महत कर लिया गया है। आपकी आशा से उसको आगे करके हम पर्याप्णी के तट पर रहे। वौँ युद्ध के नाटक में चनुरमति याला फांट देश का राजा, सिंहल का राजा सिंहकमां, पाड्य का राजा, प्रचण्ड तलवार याला मलय देशाविपनि ये कार्नुक विधा में निपुण हैं। आन्ध्र देश बडा हो बलशाली है, कुन्त से युन. उन्तन पृथ्वी में अद्वितीय है । कोकण आदि देश के राजा भी एक दूमरे से मिल गए. ।। २३ ।। इसी बीच में उन सयों के साथ हमारे सैनिकों का महान् सं हुआ। राजा-स्वभाव में ही घोर समरभूमि के वक हैं।
चतुर्थोऽ भागु०--वाचयति तत्र च- प्रेयान मे दन्तिदन्तप्रवसदमुरयं वल्लभो मे विपक्षः कुन्तप्रोतोऽपि योऽयं सरति मम सचिस्ताण्डवीयः कबन्धः । अत्रास्मत्प्रेमवद्धभृकुटिमुखमिदं यस्य लूनेऽपि कण्ठे युद्धे देवागनानामिति वर-वरणे न श्रुताः केन वाचः ॥ २४ ॥ किं च बहुना तान्विजित्यास्माभिः स्वराज्ये वीरपालोऽभिषिक्तः शेपः कुरंगकमुखाँदेवावरगन्तव्यः । कुरं०-देव पट्टए घट्टस्स वि मे मुहे अस्थि ण वाणी । ( देव, पट्टके टत्यापि मे मुखेऽस्ति न वाणी।) राजा-लेखमुखा एव लेखवाहा भवन्ति । भागु० -तदधुना आ गंगापातपूतप्लुतनलिनतलात्पूर्वतस्ताम्रपा पृतादा दाक्षिणात्यात् तुहिनकरसुता वल्लभादा प्रतीचः । नृत्यञ्चण्डीशशुण्डाच्युतविबुधनदोनन्दितादा च देवः क्षीराम्भोधेन्दीचः खलचुरितिलको वर्तते चक्रवर्ती ॥ २५ ॥ भागु०-~-पड़ता है। और वहाँ कुन्त से गुंथा हुआ होने पर भी जो कबन्ध मेरी रुचि के अनुसार ताण्डव कर रहा है, कण्ठ के कट जाने पर भी हमारे प्रेम से जिसने अपनी भौंहों को टेढ़ा कर रखा है, इस प्रकार ऐसा शत्रु हमारा प्रिय है जिसका प्राण हमारे हाथियों के दाँतों से निकल गया है। इस प्रकार वरण करने के लिए आयी हुई अप्सराओं का वातालाप किसने सुना है ॥ २४ ॥ और अधिक क्या, उनको जीतकर स्वराज्य में हमारे द्वारा बीरपाल का भिषेक किया गया है और शेष कुरंगक के मुख से सुनिये । कुरंगक-पट्ट पर रगड़ने पर भी मेरे मुख से बात नहीं निकल सकती। राजा- पत्र ही होता है। भागु०--तो इस समय पश्चिम में गंगा जी के उद्गम से लेकर पूर्व में ताम्रपणां तक, पवित्र दक्षिण प्रदेश से पश्चिमो समुद्र तक और शंकर जी को जयाओं से गिरी हुई गंगा जी के द्वारा अभिनन्दित उत्तरी क्षीरमागर तक कलचुरितिल हो चक्रवती सम्माट हैं ॥ २५ ॥ -वाहक का १२० विद्धशालभलिका (राजानं प्रति अलि बता ) किं ते भूयः प्रियमुपहरामि । राजा-अतः परमपि प्रियमस्ति? देवीकोपकपायितं न गमिता लब्धा मृगातावली प्राग्गृढापि मयाद्य सा कुलपतेः पुत्री च पाणौ कृता । युप्मनीति-वलेन तस्य च महासेनापतेर्विक्रमः संजाता मम चक्रवर्ति पदयो किन्नाम यन् प्रार्थये ॥२६ ।। तथापीदमस्तु (भरतवाक्यं यामाङ्गं पृथुलस्तनस्तवकितं यावद्भवानीपते- लक्ष्मीकण्ठपरिमहव्यसनिता यावर दोष्णां हरेः । यावच प्रतिमाप्रसारणविधिव्यग्री करी ब्रह्मणः स्यामुः धूनियुक्तिलेहामधुरास्तावत् सतां सूक्तयः ।। २७ ।। ( इति निष्कान्ताः सर्वे) इति श्रीमद्गालकविकविराजराजशेसरविरचिनायां विदमासमझिकानाटिकायां चतुर्थी नाटिका च ममातिमगात् । (राजा के पति हाथ जोड़कर ) आरको पुनः रा प्रिय उपहार हूँ! राजा-इससे भी दटकर कोई प्रिय है ! रानी कोप से विकृत नहीं हुई और मृगाढावली मिल गई। पहले से विशहित कुलपति भी वह पुत्री हाथ में कर ली गई है। तुम्हारी नोति-करते और सेनापति के विनाम से मुझे चक्रवती की पदवी मिली। थर पर कौन सी वस्तु है, जिसकी प्रार्थना करूँ ॥ २६ ॥ फिर भी यह हो । (भरत वाक्य) जत तक शिव जी पा कामान पीन स्तनों से स्तरित है, भगरान विष्णु की भुजाओं में लक्ष्मी के आलिंगन का उद्योग है, ब्रह्मा के दोनो हाय अपनी प्रतिमा के प्रसार के लिए व्यग्र है, तब तक कानों को सीग में चाटने योग्य सजनों की मधुर सूनियाँ अमर रहें.।। २७ ॥ ( सभी चले जाते हैं।) भमासधाऽयं प्रन्यः । Sear का प्राण है। नाटिका विद्धशालभलिका- परिशिष्टम् पात्रालोचन १.विद्याधरमल्ल नाटिका के विधानानुकूल सम्राट् विद्याधरमह इस नाटिका का धीरललित नायक है। इसमें तयाविध नायक के सभी गुण विद्यमान हैं । यथा- यह अन्यन्त ही भंगारी है। मृगाकाबली के प्रति आसन्ति रखते मी वह पहली रानी के प्रति अपने व्यवहार में कोई अन्ता नहीं आने देता । इसका स्वभाव अन्यन्त मृदु है एवं यह मतादि में अडराग रसता है। भागुरायण मंत्री के ऊपर राज्य-भार छोड़ देने से राज्य की चिन मक रहता है। विद्याधरमल के प्रेम में जो उन्नादकता है वह जगहोम्स पति आस्वाद्य है। २. रिपक नायक का मित्र चारायण (विदूपक में इसका मुख्य कार्य विनोद-दान ही है । यह अपने रूप एवं भाषण आदि द्वारा हास्य की अभिव्यक्ति करता है। यह राजा के साथ मी मजाक करने में नहीं चूकता । ब्राह्मण जाति का होने से यह स्वभावतः पेटू एवं मधुरप्रिय है । इसे अपने मान-अपनान का मी सदैव ध्यान रहता है। बदला लेने की भावना मी इसमें पर्याप्त मात्रा में है। 'मेखला' द्वारा मिथ्या विवाह की घटना ने अपमानित होने पर यह बड़ी ही बुद्धिमत्ता में उसके साथ बदला चुकाता है । ३. मृगाङ्कावली भृगाडकावली इस नाटिका की नायिका है। यह अनुपम सौन्दर्य से युक्त है। नायक प्रथम दर्शन में हो इसके प्रति अनुरक हो जाता है । यह भी नायक जो ,९वि० १२२ विद्धशालभञ्जिका को अपनी और आर्पित करने में कोई कोर-कसर नहीं उठा रखती। इसीलिए हो इसने गले पर नायक को अपना दर्शन दिया, कैलिकैलास नामक वासगृह को स्पटिकमय दीवालों पर अपना तथा अपने रूप से सर्वथा मिलती-जुलता शालमक्षिका का चित्र चित्रित कराया। ४. विचक्षणा विचक्षणा एक चतुर दासी है, यह सदा नायक-नायिका के हित-अहित का ध्यान रखती है । इस पर सव विश्वास रपते हैं। इसीलिए विद्याधर का मंत्री भागुरायण आदरपूर्वक इससे राजा के गोपनीय कार्य के करने में सहायता की याचना करता है। राजा के गोपनीय कार्य को सम्पादित करने के लिए ही यह मृगाइबायली की प्रियससी बन जाती है तथा राजा का काम बनाने के लिए तैयार रहती है भार इस कार्य में उसे पूर्ण सफलता मी मिलती है।
टिप्पणी ( नोट्स) प्रथम अङ्क १-विद्धशालभञ्जिका (पृ.१) इस नाटिका के रचयिता द्वारा नाटिका का नाम ' विशालमक्षिका रा गया है। नाटिका के कथानक में उसके रचयिताने कलिकैलास नामक वामगृह के स्फटिकमय सम्भे में नायिका की शालमक्षिका (मूर्ति)जो विद्धा (छेनी मे गोद-सोद कर बनाई गई है- की योजना की है और नायक, नायिका की इस मूर्ति को पहिचान कर उसे हार पहिनाता है। इस स्थल से नायक का प्रेम-प्रमार और आगे बढ़ता ही जाता है अतः नाटिका के नामकरण का उपयुक्त आधार ठसी शालमक्षिका (मूर्ति) को रचयिता ने समझा और नाटिका को उपर्युक्त (विशालमञ्जिका ) संज्ञा प्रदान की। २-अङ्क (पृ.१)-धनञ्जय के मतानुसार अड़क में नायक के चरित का प्रत्यक्षरूप से निबन्धन होता है एवम् इसमें विन्दु नामक अर्थ प्रकृति की प्राति होती है। अंक में नाटकीय अर्थ को सम्पादित किया जाता है तथा यह रस का आश्रय भी होता है । प्रत्यक्षनेतृचरितो विन्दुव्याप्तिपुरस्कृतः। भको नानाप्रकारार्थसंविधानरसाश्रयः ।। अंक का शाब्दिक अर्थ है--गोद, क्रोड एवम् उत्सग आदि । बिन्दु, नायक के व्यापार तथा रसादि से अधिष्टित यह उनके लिए उत्सङ्ग अथवा गोद का सा काम करता है अतः इसे अंक कहा जाता है। रंगप्रवेशेसाशनिर्दिश्यमाननायकव्यापारो विन्दूपक्षेपार्थपरिमितोऽनेकप्रयोजन- सविधान-रसाधिकरण उत्मङ्ग इवाङ्कः। ३-सूत्रधार (पृ.१)-मारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार नान्दी पाठ के अनन्तर खेले जाने वाले नाटक की प्रस्तावना सुनाने घाला, नाटक ।
१२४ विद्धशालभलिका अमिनय करने वाले नर-वर्ग का प्रधान नेता, नाटय के मारे सूब का कार्य- सज्ञालन करने वाला एवं नाट्यशाला का व्यवस्थापक सूत्रधार कहा जाता है। ४---सुधा (पृ.४)-'मुष्टु धीयते पीयते अर्यते नुवा' सुधा की उत्पत्ति समुद्र-मन्थन से हुई थी। विष्णुपुराग में इसका प्रसंग आया है। ५-कामधेनुः (पृ.४) मानधेनु वर्ग की गाय है जो मब काम- नाओं को पूरी करने वाली मानी जाती है। 'न केवलानां पयसां प्रसूतिः अवेहि मां कामदुहां प्रसन्नाम्' (रघुबंश) यह भी ममुद्र-गन्दन से निकली थी। ६-पड्गुणाः (पृ. ५)-राजनीति के ः गुण माने गये है.सन्धि, विग्रह, यान (बटाई ), भासन (विभाग), इंधीमाव और संप्रय । - मन्त्रबीजम् (पृ.५)-किसी मन्त्र का प्रथमाक्षर मन्त्रोत कहा जाता है। इने मूलमन्त्र मी कहते हैं। मन्त्र की सिद्धि और उसकी सफलता इसी पर निर्भर होती है। ८-विप्कन्भक (पृ.८)-'यिक-नाति अनुसन्धानेन वृत्तमुपटन्म- यतीति विम्भकः।' स्मृति के द्वारा कयामान को पुष्ट दनाने वाला विष्का म्भक है। इसमें उन्हीं बातों का समावेश किया जाता है जिनकी नाटक के अड़कों में दिलाया नहीं जा सकना । विष्कमक के दो भेद हैं-गुट पर्व मंकीर्ग। शुद्धविफामक में सनी मध्यम पात्र होते हैं और वे ममी पान मंस्कृत योरते हैं मंकी विष्फम्मक में अधम पान नी रहते हैं। ९. शृगार (पृष्ठ १८)-'पृङ्गार' शब्द की रचना 'ग' तथा 'आर' इन दो शब्दों के योग में हुई है । 'ग' का अभिप्राय है --काम का उदेक एवं 'आर' शब्द गायक है । भावार्य विश्वनाथ के अनुसार कानदेय के भेद को 'कार' रहते हैं। समस्त रमों में शुमार रम अत्यन्त कमीय है। यह रमराज की मंशा में अनिहित किया गया है। क्योंकि इसका आनन्द प्रयक महदय एवं अमहदय, पनि सा.सजा...मो.न.मामापरिकहनाप माद के सभी प्राणियों में है।
परिशिष्टम् १२५. १०. मदनायुधम् (पृष्ठ २७)-मदन कामदेव का नाम है । ये परम- रूपवान् माने गये हैं। पुराणों में इनके आयुध निम्न बताये गये हैं- अरविन्दमशोकञ्च चूतञ्च नवमालिका । नीलोत्पलञ्च पञ्चैते पञ्चदाणस्यमायकाः ॥ उपर्युक्त पाँच आयुध पुष्प जति के हैं। गुण-कर्म से मदन के आयुध निम्न हैं- उन्मादनस्तारनश्च शोषणः स्तम्भनस्तथा। संमोहनश्च कामस्य पञ्च बाणाः प्रकीर्तिताः॥ द्वितीय अङ्क ११. चेटी (पृष्ठ ३३)-बेटी का अर्थ है-दामी विशेष । जो रहस्य को छिपा सकने में समर्थ, देश एवं काल आदि को समझने वाली तथा अहंकार और चपलतारहित होती है। 'गुप्ता दक्षा मृदुस्थिराः। "गुप्ता रहस्यधारगममर्या । दक्षा देशकालसममादिविद.। मृद्वयोज्नहं कुताः । स्थिराश्चापलजिता ।' १२. प्रवेशकः (पृष्ठ ३६) विष्फम्मक की मी वात प्रवेशक' में पायी जातो हैं । केवल इतना ही अन्तर है कि इसमें अधम पात्रों का ही प्रयोग होता है जो प्राकृत बोलते हैं और यह दो अंकों के बीच में ही पाया जाता है । १३, ब्रुव १४. एवं सप्तर्षिमण्डल (पृष्ठ ४०)-ध्रुव उत्तानपाद राजा के पुत्र ये। अपनी सौतेली माँ मुरचि से अपमानित होकर ये तपस्या के लिए बन चले गये और एक वृक्ष के नीचे बैठकर ईश्वर का ध्यान करने लगे। बीच-बीच में अनेक विन्न पड़े किन्तु ध्रुव को कोई वाधा विचलित न कर सकी। समी परीक्षाओं में ध्रुव सफल हो गये। इनकी मी अभिलाषाएँ पूरी होग अपनी मनोकामना पूर्ण होने के पश्चात् ध्रुव पुनः माता के पास लौटे और अन्त में राज्य के उत्तराधिकारी मी बने । आकाश में उत्तर की ओर एक छोटा सा तारा टिमटिमाता हुआ दिखाई देता है। यह वारा अपना स्थान कमी नहीं ददलता । पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से ।
विद्धशासमतिका टीक पर साकार ने यह वारा इसलिए माल है कि ध्रुव माती प्रदिशा पर सरल थे। मत दिनों का नाम नि-भिन्न अन्धों में निल-निल पाया जाता है। महा- मारत (१२, ३३५.२९ ) के अनुसार मरीचि, अत्रि, अजिरम, पुन्दस्व, पुरह. कनु तथा वरिष्ठ महर है। विवाह के म.६ दर-कन्या को भूव तथा स्तपिजडल दिलाये जाने की प्रथा है। मनवतः इस चार वर-न्या पाररिक प्रेन को स्थिर पदं चर दनाए रखने की प्रेरणा का करें-रही इस च्या उद्देदर निहित है। १५. हरिणाङ्क ( पृष्ट ५२)-हितीर र स्टोक १८ में चन्द्रना ३ लिए हरिशब्द का प्रयोग किया गया है। ममतः यह शब्द चन्द्र भण्डार काले घने की ओर संकेत करता है क्योंकि यह धन्दा हिरन के समान आकार वाले एक चनुप्पीय पशु की आकृति का है तथा पूर्णचन्द्र में स्ट रूप से राष्टिगोचर होढा है । उन्ना के लिए शासक' एवं 'एमा' शब्द का भी प्रयोग इसी प्रकार है। तृतीय अङ्ग - १६. दादिशा (पृष्ट ७५) पूर्व, दक्षिन, पशिन और उत्तर ये चार मुस्य दिमाएँ है। पूर्व और दक्षिण के बीच का कोना ‘माग्नच, दक्षिन और पदिचम के दीच का कोना त्य', परिजन और उनर के दोच का कोना 'वायव्य', उत्तर और पूर्व के दौच का कोना 'शान' में चार यदिशा, है। इनके अतिरिक, अगं (र ) और अधः (नीचे) पे दो दिगा, और माना जाती हैं। इस प्रकार कुल दश दिशा हुई। चतुर्थ अङ्क १७. दोहर (पृष्ट १-४)निगी की इन्टा या अनिला को दोहद कहते हैं। कविसमय के म विमिन वृक्षों के विकसित होने के रिप चिनिज विधान है। वे ही टन वृक्षों के दोहद कहलाते हैं। यथा-सुन्दरी में हने से निपट, पान की पीक दालने में नीलगिरी, सान मारने में अशोक, देखने में तिलक, गाने से आम एवं नाचने में कचनार फूलता है।'
। परिशिष्टम् १२७ १८. जनान्तिक (पृष्ठ ११२) नाटक में आपस में बात करने की एक मुद्रा, कर-संक्त से एक व्यक्ति को बुलाकर धीरे-धीरे बात करना 'जनान्तिक है। १९. दक्षिणाक्षिस्पन्द (पृष्ठ ११७ )-पुरषों के लिए दायें अङ्ग तथा स्त्रियों के लिए बायें अङ्ग का स्पन्दन शकुन माना जाता है। इसके द्वारा प्रिय- प्राप्ति का अनुमान किया जाता है। 'नेत्रे नेत्रप्रियाः प्राताः । पुनश्च अगस्फुरण के विषय में वसन्तराजीय में लिखा है- पुंसां सदा दक्षिणदेहमागे सीणां तु वामावयवे प्रजातः । म्पन्दः फलानि प्रदिशत्यवश्य निहन्त्यनुनाविपर्ययेण । २०. भरतवाक्य (पृष्ठ १२०) नाटक का आशीर्वादात्मक अन्तिम गान 'मरतवाक्य' कहा जाता है। रूपक के अन्त में इसको रचना अवश्य करनी चाहिए। २१. लक्ष्मी (पृष्ठ १२०)-कमल को विकसित पखुड़ियों पर आसीन लक्ष्मी समुद्र मन्थन से निकली थीं। ये धन की देवी हैं। इनकी उत्पत्ति का वर्णन विष्णुपुराण तथा महाभारत में मिलता है। तदनुसार लक्ष्मी ने भगवान् विष्णु का वरण किया और उन्हें अपना पति बनाया।
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विद्धशालभलिका
सुभापितानि
'अनुगुणं हि देवं सर्वस्मयस्ति करोति ।'
'भाकृतिमनुगृह्णन्ति गुणाः।
'कथमिव सहकारयट्यां कलकण्ठी कुंटितपणया मवति ।'
'कथमिव जीवतः सकलासारिहरः सुवणं प्राप्यते ।'
'किंगते मलिले सेतुबन्धेन ? किंवा वृत्ते विवाह नक्षत्रपरीक्षया ?'
'म लु अनुत्पीडितः सहकारपृष्टपन्धिः रस-सर्वस्वं मुदि।'
'प्रेम नम्यं सहतेऽन्त रायम् ।'
'न खलु मृगलाञ्चनम् उम्झिन्वाऽन्येन राशिकान्तपुनिकायद्धनितंरा
प्रहष्यति ।'
'म विना चन्द्रं सोफालिकाया विकसन्ति कुसुमानि ।'
'म हि स्नेहो युन्हायुक्तमनुरुणद्धि ।'
'यदरिटमधिरूढा कारवल्ली-बहरी किमुच्यते कटुका प्रति ।'
'लेखमुसा एव लेसबाहा भवन्ति ।'
'वरं तत्कालोपनतस्तिचिरः, न पुनर्दिवसान्तरितो मयूरः।'
'शुदा हि युद्धिः किल कामधेनुः।'
'श्रुतमन्यसंरक्षणं सलु कार्यमिः पारगम् ।'
परिशिष्टम् १२९ नाटकीया विषयाः म्वगतम् प्रकाराम् शत्तिन् इनान्तिकम् आकाशक्तिः नेयम् नाटिका 'स्वगतं स्वहृदि स्थितम्। 'प्रकाशं ज्ञाप्यमन्येषाम् । 'परावृत्य रहस्याल्याऽन्यस्मै तदसवारितम्। 'त्रितासन्तरोऽन्यन, जल्पो यस्तजनान्तिकम् । 'भाकामोनिः स्वयम्प्रश्न-प्रत्युत्तरमपात्रकम्'। 'नानां वेपररिग्रहस्थानम्। 'चतुरका बहुस्नीका, नृपेशा स्त्री-महीफला । कल्प्यायर्या कैशिकी मुख्या, . - नान्दो - x X 'प्रेमादों वर्तनेऽन्यस्यां, नेता मुख्यामिशङ्कितः । देवी दशारा मुग्धा, समयमा द्वयोः पुनः' ।। “अवस्यायाः समाप्तिर्वा छेदो वा कार्ययोगतः। अङ्कः सविन्दुदंश्यार्थः चतुर्यामो मुहर्नतः' । 'देव-भूप-सभा-मन-मुख्यानां मगलामिया । नित्या रूपमुखे नान्दी, पदः पमिरयादभिः' । 'नाट्योपरगादीनि सूत्रमित्यमिधीयते । सूत्रं धारयते यस्तु सूत्रधारः स उच्यते ॥ 'विषक नरीमाः, प्रस्तुताक्षपिमाषणम् । सूत्रधारस्य वोक्त-स्पष्टोक्तयत् तदामुखम् ॥ 'विष्कन्नात्यनुसन्धानेन वृतमुष्टम्मयतीति विधम्मकः' । 'अप्रत्यक्षान् मर्यान्सामाजिरहदये प्रवेशयतीति प्रदेशकः'। 'त्यागी कृती कुलीनः सुधीशे रूपयौवनोत्साही। दशोऽनुरनलोकतनोवैदग्यशालबाबेता' । प्रस्तावना विनम्मक - -
१३०
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दीजन्
बिन्दुः
कार्यन्
विद्धशालभक्षिका
'विदूपको हास्यनिमित्तं भवति।
'स्वस्पोदिष्टः फल प्रान्तः, हेतु प्ररोहणात्।
"हतोदऽनुसन्धानं, यहूनां विन्दुराफलाई'।
'साध्य योजसहकारी कार्यम्'।
'भारम्म-यव-माप्न्याशा-नियताप्ति-फलागमाः।
नेतुने प्रधाने स्युः, पञ्चावस्था ध्रुव क्रमा॥
'मुसं प्रतिमुन्वं गर्मान-निर्वहणान्यमी ।
सन्धयो मुल्यवृत्तांशाः, पसावस्थाऽनुगाः प्रमान्' ।
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पञ्चावस्थाः
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पञ्चसन्धयः
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पात्र-परिचय
:
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पुरुष-पात्र
.. मत्राट् विद्याधरमल्ल उज्जयिनी का स्वामीनाटक-नायक
२. मुत्रधार
: नाटकाभिनयावन्यक .
३. चारायम
विदूषक, रारा का मित्र
राजा के मंत्री भागुराग का मित्र
मामुरायम
: मम्राट विद्यापरमल का मंत्री
सम्राट् विद्याधरमल्ल का पत्र-वाहक
: लाटाधिपति के दो दून
स्त्री-पात्र
राजा की प्रथम पत्नी
२. मुगाकावडी
: लाटप्रदेश के अधिपनि चन्द्रवर्मा की पुत्री :
नाविका
: कुन्तलदेश के राजा चाइमहामन की कन्या
: देवी की धात्री को कन्या
: विदुषक की पली
६. कुरद्धिका
: देवी की बेटी
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7
:
९. विचममा
: देवी की बेटी : मृगाद्वारली को लिए ससी