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Mool Ramayana

Ramnathlal · 2009/10

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* श्रीकैलोसपतये नमः श्रीमूलरामायणम्। कि 1322 موسیقی -- me सुमनोपाह'साहित्यभूषण श्रीरामनाथ- लालकृतभाषानुवादालंकृतम्। भार्गवपुस्तकालयाध्यक्षण स्वकीये भार्गवभूषणयंत्रालये मुद्रयित्वाप्रकाशितञ्च । सं० १९६६

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श्रीगणेशाय नमः।
*मूल रामायणम् ॥
* भापाटीकासहितम्
(१)
जयति रघुवंशतिलकः कौशल्याहृदयनन्दनोरामः।
दशवदननिधनकारी दाशरथिःपुंडरीकाक्षः ॥
टीका-रघुवंश के तिलक, कौशल्या के हृदय को आनन्द
देनेवाले, रावण का नाश करनेवाले दशरथ के पुत्र कमलसमान
नेत्रवाले भगवान रामचन्द्र की जय हो ।
.
(२)
कूजंतं रामरामेति मधुरं मधुराक्षरम् ।
थारुह्य कविताशाखां वन्दे वाल्मीकिकोकिलम् ॥
टो०-कवितारूपी डाली पर बैठकर मधुर स्वर में राम राम
(जैसे मधुर शब्द ) बोलनेवाले वाल्मीकिरूप कोकिल को
नमस्कार करता हूँ।

[४]
मूलरामायणम्
(३)
वाल्मीकेमुनिसिंहस्य कवितावनचारिणः-
शृण्वन् रामकथानादं को न याति परांगतिम्
टी०- कवितारूपों वनमें भ्रमण करनेवाले
(मुनि) सिंह के रामकथारूपी नाद (हुंकार ) सुनकर
न पावे ऐसा कौन है ? ( कोई नहीं)।
न
(४)
.
यः पिवन्सततं रामचरिताऽमृतसागरमः।।
अतृप्तस्तं मुनिं वन्दे प्राचेतसमकल्मषम् ॥
घो-जो सदैव रामचरितरूपी अमृत के सोगर को पीते.
भी कभी तृप्त न हुये, ऐसे पापरहित वाल्मीकि मुनि के
बन्दना करती हूँ।
(५)
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् ।
रामायणमहामालारलं दैऽनिलात्मजम् ॥
टी०-जिसने समुद्र को गौ के खुर और राक्षसों को मेटा

भापाटीका सहितम् [५]
के समान कर दिखाया, उस रामाय गरूपी महामाला के श्रेष्ठ रत्न
( वायुपुत्र ) हनुमानजी को मैं वन्दना करता हूँ।
(६)
यंजनीनन्दनं वीरंजानकीशोकनाशनम् ।
कपीशमनहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम् ।
टी०-अंजनीनन्दन, सीताजी का शोक दूर करनेवाले.
पन्दरोंके स्वामी. अक्षयकुमार को मारनेवाले, तथा सम्पूर्ण
लंकापुरी को भयभीत कर देनेवाले वीर हनुमान जी को मेर
नमस्कार है।
(७)
उल्लंध्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोक
वह्नि जनकात्मजायाः । श्रादाय तेनैव ददाह
लां नमामि तं प्रांजलिरांजनेयम् ॥
टी-जिसने कौतुकपूर्वक समुद्र के जलको लाँधकर
सीताजी की शोकरूपी अग्नि ले, उसी से लका को जलाया उस
अननिपुत्र हनुमान्जीको मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ।
(८)
मनोजवं मारुततुल्यवेगंजितेन्द्रियं बुद्धिमता
.

* मूलरामायणम् वरिष्ठम् । वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शिरसा नमामि ॥ टी-मन और मारुत (हवा) के समान वेगवान्, जिते न्द्रियः बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वायुपुत्र वानरों की मण्डली में श्रेष्ट भगवान् राम के दृत श्री हनुमानजी को मैं सिर झुकाकर प्रणाम करता हूँ। (६) श्रीराघवं दशरथात्मजमप्रमेयं सीतापति रघुकुलान्वयरत्नदीपम् । आजानुबाहुमरविन्द- दलायतादं रामं निशाचरविनाशकरं नमामि । टी-श्रीराघव, दशरथ के पुत्रा अपमेय, सीतापति रघुकुलके रत्न- दीप, आजानुबाहु 'अरविन्द दल के समान आयत चतुवाले निश चारों के नाशक भगवान् श्रीरामचन्द्र को मेरा नमस्कार है। (१०) -- वेदवेद्य परे पुसि जाते दशरथात्मजे। वेदप्राचेतसादासीत् साक्षादामायणात्मना ।। टी-वेद से जाने जावे, ऐसे परब्रश, दशरथ के पुत्ररूपमें

भापाटोका सहितम् [७]
उत्पन्न हुए, तर सोचात् उन वेदों कोही बाल्मीकि महाराज ने
रामायण के रूपमें श्लोकवद्ध किया।
(११)
शृण्वन् रामायणं भक्त्या यः पाद पदमेव वा।
म याति ब्रह्मण स्थानं ब्रह्मणा पूज्यते सदा॥
टो-जो भक्तिपूर्वक रामायण के किसी श्लोक का एक
चरण भी सुन लेता है वह माझ लोक को जाता है और सदैव
नया की भांति उसकी पूजा होती है।
(१२)
यः कर्णाञ्जलिसंपुटरहरहः सम्यक् पिवत्यादरा
द्राल्मीकेवंदनारविंदगलितं रामायणाख्यं मधु ।
जन्मव्याधिजराविपत्तिमरणौरत्यंतसोपद्रवं, संसार
स विहाय गच्छति पुमान् विष्णोः पदं शाश्वतम् ।
टी०-जो मनुष्य ध्यान से कान लगाकर प्रतिदिन श्रीवाल्मी-
कि मुनिके मुखरूपो कमल से निकलते हुये रामायणरूपीमधु (शहद)
को भली भाँति होता है,वह जन्म व्याधि जरा मरण इत्यादि अनेका
नेक उपद्रवों और दुःखों से पूर्ण इस संसार को छोड़ कर विष्णु
के शाश्वतपद को प्राप्त होता है।

[८] मूलरामायणम् - .(१३) तदुपगतमाससन्धियोग सममधुरप्रणतार्थ- वाक्यबद्धस् । रघुवरचरितं मुनिप्रणीतं दशशिर सश्च वधं निशामयध्वम् । टी-जिसमें समास, सन्धि इत्यादि का भली भांति संयोग है और जो नम्र, मधुर एवं सम अर्थवाले वाक्यों से पूर्ण है । बाल्मी कि मुनिप्रणीच ऐसे रामचरित और रावण वधको ध्यान पूर्वक सुनो। ... (१४) यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृतमस्त कांजलिम् । वाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुति नमतराक्षसांतकम् ॥ टी-जहाँ जहाँ रामभजन होता है वहाँ वहाँ हाथ जोड़े. प्रेमाश्र पूर्ण नेत्र किये हुये, राक्षसों का अन्त करनेवाले हनुमानजी उपस्थित रहते हैं ऐसे रामभक्त हनुमान को नमस्कार करो। (१५) वाल्मीकिगिरिसंभूता रामसागरगामिनी। पुनातु भुवनं पुण्या. रामायणमहानदी ।।

a भापाटीका सहितम् . [६] टी०-वाल्मीकिरूपी पर्व तसे उत्पन्न होकर रामरूपी सागर की ओर जानेवाली रामायण रूपी पवित्र महानदो (गङ्गा) त्रिभुवन को पवित्र करती है। [१६] जितं भगवता तेन हरिणा लोकधारिणा । अजेन विश्वरूपेण निरणेन गुणात्मना । टी-जगत को धारण करनेवाले जन्मरहित, विश्वरूप निगुण एवं गुणात्मा हरि भगवान् ने सब जीतलिया है। [१७] यामिपीकृतमार्तगडं गोष्पदीकृतवारिधिम् । तृणीकृतदशीग्रवमाञ्जनेयं नमाम्यहम् ।। टी-सूर्य को निगलनेवाले, समुद्रको . गोप दके समान कर देनेवाले, रावयाको तृण के समान बना देनेवाले, अंजनिपुत्र महावीर को नमस्कार है। (१८) आंजनेयमतिपाटलाननं कांचनादिकम- .

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मूलरामायणम् -
नीयविग्रहम् । पारिजाततरुमूलवासिनं भावया-
मि पवमाननंदनम् ॥
टी-कांचन पर्वत के समान (वर्णयुक्त) कमनीय (सुन्दर)
शरीरवाले, पारिजातवृक्षके मूल में निवास करनेवाले, पाट लानन,
प्रांजनेय का ध्यान करता हूँ।
(१९)
श्लोकसारससंकीर्णे सर्शकल्लोलसंकुलम् ।
काण्डग्राहमहामीनं वन्दे रामायणार्णवम् ॥
टी०- श्लोकरूपी सारसों से संकीर्ण सर्ग [ कोव्य में अध्याय
वा परिच्छेद की जगह प्रायः सर्ग शब्द व्यवहृत होता है ] रूपी
कल्लोल से युक्त, काण्डरूपी ग्राह और बड़ी मछलियों से भरे हुये
रोमायण रूपी समुद्र की वन्दना करता हूं।
(२.)
रामं रामानुज सीतां भरतं भरतानुजम् ।
सुग्रीवं वायुसूनुं च प्रणमामि पुनः पुनः॥
टी-श्रीराम, लक्ष्मण, सीता, भरत, शत्रुघ्न, सुग्रीव और
हनुमान को बारम्बार प्रणाम करता हूं।
इति कुशलवयोम गलस्तवं पठित्वा मूलरामायणं पठेत् ।
.

भापाटोका सहितम् [११]
अथ मूलरामायणप्रारम्भः।
(१)
तपःस्वाध्यायनिरतं तपस्वी वाखिदां वरम्
नारदं परिपप्रच्छ वाल्मीकिमुनिपुंगवम् ॥
रोल-तप और स्वाध्याय में निरत, बुद्धिमानों श्रेष्ठ,
तपस्वी नारद से मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकि पूछते हैं।
(२)
कोन्वस्मिन् सांप्रतं लोके गुणवान् कश्च
वीर्यवान् ।।धर्मज्ञश्च कृतज्ञश्च सत्यवाक्यो दृव्रतः।।
टी०-इस समय इस लोक में गुणवान्, वीर्यवान्, धर्मज्ञ,
अपने व्रत में दृढ़ और सत्यवादी कौन है !
(३)
चारित्रेण च को युक्तः सर्व भूतेषु को हितः।
विद्वान् कः कः समर्थश्च कश्चैकः प्रियदर्शनः ॥
.

[१२] न मूलरामायणाम
टी-चरित्र सम्पन्न कौन है ? कौन समस्त संसार का
हित करनेवाला है ! विद्वान्, समर्थ और जिसको दर्शन सबके
लिये सुखदायी है वह कौन है ?
(४)
मात्मवान् को जितक्रोधो द्युतिमान कोऽनसूयकः।
कस्य विभ्यति देवाश्च जातरोपस्य संयुगे ॥
-प्रात्मवान, क्रोध को जय करनेवाला ते जस्व
ईर्ष्या, द्वेष हीन और युद्धमें ऋद्ध होने पर देवता भी जिससे डरें,
ऐसा कौन है !
(५)
एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं पर कौतूहलं हि मे।
महर्षे त्वं समर्थोऽसि ज्ञातुमेवं विधं नरम् ॥
टी-इन बातों को जानने की मुझे बड़ी इच्छा और
उत्कण्ठा है । हे महार्षे ! आप ऐसे मनुष्य को जानने में समर्थ हैं ।
(६)
श्रुत्वा चैतत् त्रिलोकज्ञो वाल्मीकेार- दो वचः।

भाषाटोका सहितम् . [१३] श्रूयतामिति चामंत्र्य प्रहृष्टो वाक्य मब्रवीत् ॥ टी०-वाल्मीकि मुनि को यह बात सुन, त्रिलोक. ज्ञानी नारद ने ' सुनिये ऐसा कहकर कहना आरंभ किया। (७) बहवो दुर्लभाश्चैव ये वया कीर्तिता यणाः । मुनिर्वक्ष्याम्यहं बुद्धया तैर्युक्तः श्रूयतां नरः ॥ ये टी०-हे मुनि | आपने जिन गुणों के सम्बन्ध में पूछा है, वे संसार में बहुत दुर्लभ हैं तथापि उन गुणों से युक्त नर की बात विचार कर कहता हूँ सुनो। . (८) इक्ष्वाकुवंशप्रभवो रामो नाम जनैः श्रुतः। नियतात्मा महावीर्यो द्युतिमान् धृतिमान् वशी। टो-इक्ष्वाकु वंशमें उत्पन्न रामही ऐसे पुरुष हैं जो जन- श्रुत ( संसार, प्रसिद्ध ) नियतात्मा, वीर्यवान्, धैर्ववान् और जितेन्द्रिय हैं।

[१४]
मुलरामायणम् -
(६)
बुद्धिमान् नीतिवार वाग्मी श्रीमान् शत्रुनिवर्हणः।
विपुलांसो महाबाहु-कंबुग्रीवो महाहनुः ॥
टी-वह राम बुद्धिमान, नीतिवान्, पंडित, श्रीमान,
शत्रओं को नाश करनेवाले चौड़े स्कंध एवं बड़ी भुजावाले बड़ी
टुडडी औ शंख के समान सुन्दर गर्दनवाले हैं।
(१०)
महोरस्को महेष्वासो गुढजनुररिंदमः।
आजानुबाहुः सुशिराः सुलललाटः सुविक्रमः ॥
टी०-वे विस्तीर्ण हृदय, प्रचण्ड धनुषयुक्त, गृहजत्रु
शत्रुविनाशी, आजानुबाहु [ जानु, पैर और जंघेके जोड़ तक
जिसकी भुजाएँ लम्बो हों] पराक्रमी एवं सुन्दर मस्तक तथा दीर्घ
ललाटवाले हैं।
(११)
.
समः समविभक्तांगः स्निग्धवर्णः प्रतापवान् ।
पीनवना विशालाक्षो लक्ष्मीवाञ्छुभलक्षणः ॥

भापाटीका सहितम् - [१५]
टी०--उनके सब अङ्ग जैसे होने चाहिये, वैसे ही हैं,
उनका वर्ण चिकना है । वे श्रीसम्पन्न शुभलक्षणों से युक्त तथा
प्रतापी है, उनकी आँखें बड़ी बड़ी एवं छाती पुष्ट तथा चौड़ी हैं ।
(१२)
च
धर्मज्ञः सत्यसंधश्व प्रजानां च हितेः रतः ।
यशस्वी ज्ञानसम्पन्नः शुचिर्वश्यः समाधिमान् ।।
टी०-वे धर्मज्ञ, सत्यवादी, प्रजा के हित में संलग्न,
यशस्त्री, ज्ञानी, पवित्र, समाधिमान और ('अपने नम्र स्वभाव के
कारण शीम ) वश में हो जानेवाले हैं।
--
-'
-
(१३)
प्रजापतिसमः श्रीमान् धाता रिपुनिषूदनः ।
रक्षिता जोवलोकस्य धर्मस्य परिरक्षिता ॥
टो०-प्रजापति के समान ऐश्वर्य-सम्पन्न धोता (सृष्टि
की रचना और पालन करनेवाली, शक्ति ) शत्रु-विनाशकारी,
जीबों के रक्षक तथा धर्म की रक्षा करनेवाले हैं।
. (१४)
.
रक्षिता स्वस्य धर्मस्य स्वजनस्य च रक्षिता।

[१६] मूलरामायणम्
वेदवेदांगतत्वज्ञो धनुर्वेदे च निष्ठितः ।।
टी-(वह) अपने ( क्षात्र ) धर्म की मर्यादा का पालन
करनेवाला, स्वजनों ( भक्तों तथा कुटुम्मियों ) को रक्षा करनेवाला,
वेद वेदांग के तत्त्वों में पारगामी तथा धनुर्विद्या में पूर्ण पंडित हैं।
-
1
.
(१५)
सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः स्मृतिमा प्रतिभानवान् ।
सर्वलोकप्रियः साधुरदीनात्मा विवक्षणः ।।
टी०-वह सम्पूर्ण शास्त्रों के अर्थ और तत्व का
ज्ञानी, स्मृतिमान्, प्रतिभाशाली, सबका प्रिय, साधु, अदीनात्मा
जिसको आत्मा दीन ( कमजोर न हो ) और पण्डित हो ।
[१६]
.
सर्वदाभिगतः सद्भिः समुद्र इव सिंधुभिः ।
'आर्यः सर्वसमश्चैव सदैव प्रियदर्शनः ।।
टी–जैसे नदियों से समुद्र संयुक्त रहता है, वैसे ही
[ वह ] आर्य और समदर्शी है तथा उसका दर्शन सबको :
सुखकारी है।

भापाटोका सहितम् [१७.]
(१७)
स च सर्वगुणोपेतः कौशल्याऽऽनंदवर्द्धनः ।
समुद्र इव गांभीर्य धैर्येण हिमवानिव ।।
टी०-वह सर्वगुण युक्त, कौशल्या के आनन्द को बढ़ाने
वाला, समुद्र तुल्य गंभीर और धीरता में हिमालय के समान है।
(१८)
विष्णुना सदृशो वीर्य सोमवप्रियदर्शनः ।
कालाग्निसदृशः क्रोधे क्षमया पृथिवीसमः ॥
टो०-चन्द्रमा के समान सबको उसका दर्शन प्रिय है । वह
वीर्य एवं वल में विष्णु के सहश, कालाग्नि के समान क्रोधी तथ
पृथ्वी के समान नमाशाली है।
(१६)
धनदेन समस्त्यागे सत्ये धर्म इवापरा.!
तमेव गुणसम्पन्नं . रामं सत्यपराक्रमम् ॥
टो०-दान में कुवेर, संत्य में दूसरा धर्मरान इन गुणों से
युक्त ( जगत् में ) सत्य पराकम राम है।
(२०, २१, २२,
ज्येष्ठं श्रेष्ठगुणयुक्तः प्रियं दशरथः सुतम् ।

[१८] मूलरामायणम्
प्रकृतीनां हितैर्युक्तं प्रकृतिप्रिय काम्यया ।।
यौवराज्येन संयोक्तु मैच्छलीत्या महीपतिः ।
तस्याऽभिषेकंसंभारान् दृष्ट्वाभाथिकैकयी ।।
पूर्वं दत्तवरा देवी वरमेनमयाचत ।
विवासनं च रामस्य भरतस्याभिपेचनम् ॥
थी-सब पुत्रों में बड़े, प्रकृति के हित में लीन, प्रजाप्रिय
राम को राजा दशरथ ने, प्रजा के हित के लिये युवराज बनाने का
विचार किया । राम ने अभिषेक की तैयारी देख, पूर्वकाल में
[ राजा से ] वर पाई हुई दशरथ की प्यारी रानी कैकेयी ने उनसे
राम के निर्वासन और भरत के राज्याभिषेक का वरदान माँगा।
(२३)
स सत्यवचनाद्राजा धर्मपाशेन
संयुतः।
विवासयामास सुतं रामं दशरथः प्रियम् ॥
टी०-सत्य वचन से धर्म बन्धन में बंधे हुए राजा ने अपने
प्रिय पुत्र राम को निर्वासित किया।
(२४)
सः जगाम वनं वीरः' प्रतिज्ञामनुपालयन् ।

-
4. भापाटीका सहितम् [१६]
पितुर्वचननिर्देशात् कैकेय्याः प्रिय कारणात् ॥
टील-उस पार रामने कई की गलाई तथा प्रतिज्ञा का
बालम मारने के लिये पिना की थाना मान वन को प्रस्थान किया।
(२५)
तं वजन्तं प्रियो भ्राता लक्ष्मगाऽनुजगाम है ।
स्नेहादिनयसम्पन्नः सुमित्रानन्दवर्द्धनः ॥
टी.स्नेह और विनव सम्पन्न, सुमित्रा को आनन्द बढ़ा-
नयाले. प्यारे भाई लमण ने भी भाई को बन जाते देख, स्नेह वश
उनका अनुगमन किया।
(२६-२७)
प्रातरं दयितो भ्रातुः सौमात्रमनुदर्शयन्
रामस्य दयिता भार्या नित्यं प्राणसमाहिता ॥
जनकस्य कुले जाता देवमायेव निर्मिता
सर्वलक्षण सम्पन्ना
वधूः॥
टो०-वह लक्ष्मण भाई को प्रिय और अपना भ्रातृत्व प्रदर्श
न करने वाला था । राम की भार्या सदैव जिनके 'प्राण समान
थी। वह जनककुलोत्पन्न, देवमायानिर्मित, सब लक्षणों से-सम्पन्न
नारियो में उत्तम वधू थी.।
नारीणामुतमा

[२०]
मूलरामायणम्
(१)
सीताप्यनुगता रामं शशिनं रोहिणी यथा ।
पौरैरनुगतो दूर
पित्रा दशरथेन च ॥
टी०-सीता ने भी राम का अनुगमन उसी प्रकार किया,
जैसे रोहिणी चन्द्रमा का अनुगमन करती है । पुरवासी लोगों तथा
पिता दशरथने भी राम का थोड़ी दूर तक साथ दिया ।
(२६)
शृंगवेरपुरे सूतं गंगाकूले व्यसञ्जयत् ।
गृहमासाद्य धर्मात्मा निषादाधिपति प्रियम् ॥
टी०-शृंगवेरपुर में गंगा के किनारे पहुचकर राम ने सारथी
को बिदा किया और निषादों के राजा, धर्मात्मा एवं पिय गुहराज
से मिले।
(३०, ३१)
गहेन सहितो रामो लक्ष्मणेन च सीतया।
ते वनेन वनं गत्वा नदीस्तीा बहूदकाः ॥३०॥

To भापाटोका सहितम् [२१] चित्रकूटमनुप्राप्य भरद्वाजस्य शासनात् । रम्यमावसथं कृत्वा रममाणा वने त्रयः ॥ ३१ ॥ टो०-गुह, लक्ष्मण और सीता के साथ राम वन के बाद वन तथा बड़ी बड़ी नदियों को पार कर भरद्वाज की आज्ञा से चित्रकूट में सुन्दर निवासस्थान बना, वन में रमण करन लगे । देवगंधर्वसंकाशास्तत्र ते न्यवसन् न्यवसन् सुखम् । चित्रकूटं गते रामे पुत्रशोकातुरस्तदा ॥ राजा दशरथः स्वर्ग जगाय विलपन सुतम् । गते तु तस्मिन्भरतो तस्मिन्भरतो वसिष्ठप्रमुखैदिजः ॥ नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महावलः । संजगाम वनं वनं वीरो रामपादप्रसादकः॥ टी०-इस प्रकार देव, गंधर्व आदि के समान वे तीनों वहाँ रहने लगे। उधर राम के चित्रकूट जाते ही पुत्र के वियोग से शोका- तुर हो विलाप करते हुए राजा दशरथ स्वर्ग को गये । उनके देहा- चंसान के पश्चात् वसिष्ठादि मुख्य मुख्य ब्राह्मणों ने राज्य ग्रहण करने के लिये भरत से अनुरोध किया। महावीर भरत ने राज्य के

.
।
[२२१ मूलरामायणम् -
प्रति अनिच्छा प्रगट करके रामचरण का प्रसाद पाने के लिये वन
को प्रस्थान किया।
(३५, ३६, ३७)
गत्वा तु स महात्मानं रामं सत्यपराक्रमम् !
अयाचद्भातरं राममार्यभावपुरस्कृतः ॥
त्वमेव राजा धर्मज्ञ इति रामं वचोऽब्रवीत् ।
रामोऽपि परमोदारः सुमुखः सुमहायशाः ।।
न चैच्छत् पितुरादेशाद्राज्यं रामो महाबलः ।
पादुके चास्य राज्याय न्यासं दत्वा पुनः पुनः॥
टी-भरत ने आर्य भाव को दृष्टिपथ में रख कर पराक्रमी
रामचन्द्रजी से याचना की कि हे धर्मज्ञ ! आपही वस्तुतः राजा हैं।
तब परमोदार सुमुख, महायस्वी रामचन्द्र ने पिता की आज्ञा पालन
करना अपना धर्म समझ राज्य से अनिच्छा प्रगट की और भरत :
को बहुत कुछ नीचा ऊंचा समझाकर राज्य के लिये अपनी पादुका
[ खड़ाऊँ ] देदी।
(३८)
निवर्तयामास. : ततो . भरतं भरताग्रजः ।
सकाममनवाप्यैव
रामपादावुपस्पृशन् ॥

भाषाटीका सहितम् [२३]
टी०-राम ने भरत को लौटने की आज्ञा दी, तब अपनी
कामना को सफल न देख भरत ने राम के चरणों को स्पर्श करके
विदा ली।
(३६,१०)
नन्दिग्रामेऽकरो राज्यं
रामागमनकांक्षया।
गते तु भरते श्रीमान् सत्यसंधी जितेन्द्रियः ।।
रामस्तु पुनरालक्ष्य नागरस्य जनस्य च ।
तत्रागमनमेकायो दण्डकान् प्रविवेरा ह ।।
टीराम के आगमन की आकांक्षा से पूर्ण भरत नन्दि ग्राम
में निवास कर राज्य करने लगे। उनके चलेजाने के बाद सत्य संघ,
श्रीमान एवं जितेन्द्रिय रामचन्द्र ने वहाँ नगरवासियों का आगमन
देख, दण्डकारण्य में प्रवेश किया।
(४१)
प्रविश्य तु महाररायं रामो राजीवलोचनः ।
विराधं राक्षसं हत्वा शरभंगं ददर्श ह॥
टी०-राजीवलोचन राम ने महारण्य में प्रवेश कर विरोधराक्षस
का वध किया एवं शर भंग ऋषि को देखा ।

[२४] मूलरामायणम् *
(४२,१३
: सुतीक्ष्णं वाष्यगस्त्यं त्र अगस्त्यभ्रातरं तथा ।
'अगस्त्यवचनांच्चैव
जग्राहे
शरासनम् ॥
खड्गं च परमप्रीतस्तुणी वाजव्यमायको ।
वसतस्तस्य रामस्य बने बनवरः मह ।।
टो०-वहाँ सुतीक्षण, अगस्य, एवं अगस्य के भाई इत्यादि
के दर्शन हुये। अगस्त्य की आन से सन ने इन्द्र धनुन, तज्ञवार,
तरकस और का कारण किये और वनचरों के साथ रहने लगे।
'४४,१५)
ऋषयोऽभ्यागमन्सर्वे
वधागासुररनताम् ।
स तेषां प्रतिशुश्राव रानसानां ता बने ।
प्रतिज्ञातश्च रामेण वधः संयति रक्षमाम् ।
ऋाणामग्निकल्पनां दण्डकारण्य वासिनाम् ।।
दो०-कहाँ सम्पूर्ण ऋषि, राक्षसों के बद के लिए अनु-
रोव करने को रामचन्द्र के पास आये तब रानने, इण्डकारण्य
निवासी अग्नि के समान तेजस्वी ऋषियों के सामने गुलों का
व्य करने की प्रतिज्ञा की।

भाषाटोका सहित 4 (४६) तेन तत्रैव वसता जनस्थानविधासिनी ।। विरूपिता. शूर्पणखा राक्षसी काम रुपिणी । टी०- रामने, बहाँ रहने वाली, कामरूपिणी, राक्षसी शर्य- रणखा को विरूपिणी कर दिया। - (१७,४८,४५, ५०,५१,५२,) 1 ततः - शूर्पणखावाक्यादुद्युक्तान् सर्वराक्षसान् । खरं त्रिशिरसं चैव दूषणं चैव राक्षसम् ॥ निजघान रणे रामस्तेषां चैव पदानुगान् । वने. तस्मिन्निवसता जनस्थान निवासिनाम् ॥ राक्षसान्निह तान्यासन् सहस्राणि चतुर्दश। ततो ज्ञातिवधं श्रुत्वा रावणः क्रोधमूर्च्छितः ॥ सहायं वरयामास मारीचं नाम राक्षसम् । वार्यमाणः सुवहुशो मारीचेन स रावणः ॥ न विराधो. बलवता क्षमो रावमा अनाहत्य तु तदाक्यं रावणः कालचोदितः। .

[२६] मूलरामायणाम्
जगाम सह मारीचस्तस्याश्रम पदं तदा।
तेन मायाविना दूरमपवाह्य नृपात्मजौ।।
टी०-इसके बाद, शर्पणखा द्वारा प्ररित खर त्रिशिरा और
दुषणादि राक्षसों को सेना सहित मारा तथा जनस्थान निवासी
चौदह हजार राक्षसों का वध किया । अपनी जाति का इस प्रकार'
नाश होते हुए सुनकर रावण क्रोध से मूच्छित हो गया और
सहा-
यता के लिए मारीच नामक राक्षस को बुलाया । उसने - अनेक
प्रकार से समझाकर कहा कि हे रावण ! बलवान के साथ विरोध
करना उचित नहीं है, तथागि कालप्रेरित रावण ने उसकी बात न
मानी और उसके साथ राम के आश्रम के निकट गया। वहाँ जाकर
वह मायावी मारीच वहाँ आकर रोजादशरथके पुत्र राम और लक्ष्मण
को दूर ले गया।
(५३, ५४)
जहार भार्या रामस्य गृधं हत्वा जटायुषम्।
गृधंच निहतं दृष्ट्वा हृतां श्रुत्वा च मैथिलीम् ॥
राघवः · शोक संतप्तो विललापाकुलेन्द्रियः ।
ततस्तेनैव - शोकेन - गृन दग्ध्वा जटायुषम् ।।

भाषाटीका सहितम् [२७] टी०-उधर रावण जटायु नामक गिद्ध को मार कर राम- चन्द्र की पत्नी को हर ले गयो गिद्ध को मरा हुआ देख एवं सोता का हरण सुन । कर शोक से संतप्त हो राम विलाप करने लगा पश्चात् उसी शोच में जटायु को जलाकर परम पद दिया। मार्गमाणो वने सीतां राक्षसं संददर्श ह। कवंधं नाम रूपेण विकृतं घोरदर्शनम् ॥ टी०-सीता को वन में हूँढ़ते हुये महा भयंकर विचित्र रूपवाले कबंध नामक राक्षस को देखा। (५६) तं निहत्य महाबाहुर्ददाह स्वर्गतश्च सः। स चास्य कथयामास शवरी धर्मचारिणोम् ॥ टी०-महाबाहु राम ने उसे मार कर जला दिया। वह राक्षस स्वर्ग को गया और उसीने धर्मचारिणी शवरी का हाल कहा। (४७) श्रमणां धर्मनिपुणामभिगच्छेति राघवः। सो भ्यगच्छन् महातेजः शवरीं शत्रुसुदनः ।। टी०-उसने कहा कि हे रावण १ वह धर्मनिपुण और श्रमित

[२८] - मूलरामायणम् -
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है, उसके पास जाइये तब महातेजस्वी, शत्र विनाशकारी राम शबरी
के पास गया ।
शवर्या पूजितः सम्यग्रामो दशरथात्मजः।
पंपातीरे हनुमता संगतौ वानरेण ह ।।
(४८)
टी०-वहाँ शवरी द्वारा भली प्रकार आहत हुये दशरथा-
स्मन राम पंपातोर में हनुमान बंदर से मिले ।
(५६)
-
हनुमद्भवनाच्चैव सुग्रीवेण
समागतः।
सुग्रीवाय च तत्सर्वं शंसद्रामो महाबलः ॥
टी-हनुमान के कहने से सुग्रीव से मिले और उस से
महाबली रामचन्द्रजी ने अपना हाल कहा।
(६०,६१
आदितस्तद्यथावृत्त सीतायाश्च विशेषतः।
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम्
ततो वानरराजेन वैरानुकथनं
वैरानुकथनं प्रति ॥

भापाटीका सहितम् -
[२६]
टी-उन्होंने प्रारंभ में अपना सब वृतान्त कहा और
सीता हरण का हाल विशेष रूपसे वर्णन किया । सब हाल सुन,
सुग्रीव ने भी प्रसन्नचित्त से अग्नि को साक्षी देकर मित्रता की
तदनन्तर वानरराज सुग्रीव ने वालि के साथ अपने पैर का हाल
कहना आरंग किया।
(६२)
रामायावेदितं सर्व प्रणयाद् दुःखितेन च ।
प्रतिज्ञातं व रामेण तदा वालिवधं प्रति ।।
टी०- परम दुखी सुग्रीव ने बड़ी नम्रता पूर्वक राम से अपना
सब हाल कहा । तब राम ने वालि को मारने की प्रतिज्ञा की।
(६३)
वालिनश्च वलं तत्र कथयामास वानरः ।
सुग्रीवः शंकितश्चासीनित्यं वीर्येण राघवे ।।
टी०-तब सुग्रीव ने वालि के बल का वर्णन किया और
उसे सन्देह ही रहा कि यह वालि को कैसे मार सकेंगे।

[३०] मूलरामायणम् (६४) राघव प्रत्ययार्थं तु दुदुभेः कायमुत्तमम् । दर्शयामास सुग्रीवो महापर्वतसन्निभम् ॥ टो०-राम के प्रत्ययार्थ पर्वत के समान दुदुमि राक्षस का शरीर सुग्रीव ने दिखाया | उत्स्मयित्वा महाबाहुः प्रेक्ष्य चास्थि महाबलः । पादांगुष्ठेन चिक्षेप सपूर्ण दशयोजनम् ।। टी.---आजानुबाहु राम ने, मुसकराते हुये, उस महा बल- वान् राक्षस की हड्डी को पैर के अँगूठे से उठा दश योजन पर फेंक दिया। (३) विभेद च पुनस्तालान् सप्तकेन महेषुणा । गिरि, रसातलं चैव जनयन् प्रत्ययं तदा ॥

.
भापाटीका सहितम्
रील-और एक ही बाण से सात ताल के वृक्षा,
पर्वत एवं रसातल को भेद कर मुमीय के हृदय में दृढ़ विश्वास
उस पर दिया कि हम बालि को मारने में पूर्ण रूप से समर्थ हैं
(६७)
ततः प्रीतमनास्तेन विश्वस्तः स महाकपिः।
किष्कियां राम महितो जगाम व यहां तदा ॥
टी०-उस पराक्रम को देख, विश्वास करके सुग्रीव बड़ी
प्रसनताले रानक साथ किष्किन्धा नामक गुफा क द्वार पर गया ।
(६८)
ततोऽगर्जद्धरिवरः सुग्रीवो' हेमपिंगलः ।
तेन नादेन महता निर्जगाम हरीश्वरः ॥
टी-वहां जाकर सुवर्ण समान पीतवर्णवाले, वानर
अंप्ठ मुत्रीय ने गजना किया ! उस भयंकर गर्जन को सुनकर
बन्दरों का राजा वालि किष्किंधा से निकल आया।
[६६] .
ग्रतुमान्य
तदा
तारां
सुग्रीवेण
Dine

A मूलरामायणम्
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समागतः । निजघान च तत्रैव शरेणै-
केन राघवः॥
टी-तोरा की बात न मान, उसका अनादर करके
वालि, सुग्रीव के साथ युद्ध करने आया, किन्तु एकही बाण
से उसे राम ने मार डाला।
-
(७०
ततः सुग्रीववचनाद्धत्वा
वालिनमाहवे।
सुग्रीवमेव तद्राज्ये राघवः प्रत्यपादयत् ॥
टो०-बालि की मृत्युके पश्चात्, वचनवद्ध होने के कारण
रामने वह राज्य सुग्रीव को ही दिया।
-
(७१)
स च सर्वान् समानीय वानरान् वानरर्षभः ।।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृशुर्जनकात्मजाम् ॥
टी-कपिराज सुग्रीव ने, दशो दिशाओं में वन्दरों को
सीता का पता लगाने के लिए भेजा।

३
भापाटोका सहितम् [३३]
(७२)
ततो गृध्रस्य वचनात्संपातेर्हनुमान् बली।
शतयोजनविस्तीर्ण पुप्लुवे लवणार्णवम् ।।
टोल-पानि गिल में पता पाकर महाबलवान् हनुमान
सो पाजन तक विस्तृत सारे समुद्र को लांघ गये ।
(७)
तत्र लंका समासाद्य पुरी रावणपालिताम् ।
ददर्श सीतां ध्यायन्तीमशोकवनिकागताम् ॥
टी०-हनुमान ने रावण द्वारा रनित लंका में जाकर अशोक
वन में राम का ध्यान करती हुई सीता देखा।
(७१-७५)
निवेदयित्वाऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं विनिवेद्य च ।
समाश्वास्य व वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ।।
पंचसेनाग्रगान हवा
सप्तमंत्रिसुतानपि ।
शूरमदं च निप्पिष्य ग्रहणं . समुपागमत् ।।
टी.-सीना से राम का सम्पूर्णसमाचार एवं. प्रवृत्ति
कही बार सीताको आश्वासन देकर रणमें पांच सेनापतियां, सात मंत्री
पुत्री एवं परमशार अक्षयकुमार को मार स्वयं भी पकड़ा गये ।।

.
[३४] मूलरामायणम् -
(७६, ७७)
अस्त्रणोन्मुक्तमात्मानं ज्ञात्वा पैतामहादरात् ।
मर्दयत्राक्षसान्वीरो मंत्रिणस्तान् यदृच्छया ॥
ततो दग्धा पुरी लंकामृते सीतां च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः॥ :
टी-फिर श्रेष्ठ ब्रह्मपाश से अपने को मुक्त देख, इच्छा
नुसार मंत्रियों एवं बड़े बड़े राक्षसों को डराया । इसके पश्चात,
सीता के निवासस्थान के अतिरिक्त निःशेष लंका को जलाकर,
सीता जी का वृत्तान्त कहने के लिए लौटे ।
(७८)
सोऽभिगम्य महात्मानं कृत्वा रामं प्रदक्षिणम् ।
न्यवेदयदमेयात्मा - दृष्टा सीतेति तत्वतः ॥
टीo-महात्मा राम के पास जा उनकी प्रदक्षिणा करके
अतुल बलशाली हनुमान ने सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया।
(७६)
ततःसुग्रीवसहितो ग्रता तीरं महोदधेः।
समुद्रं क्षोभयामास
क्षोभयामास शरैरादित्यसन्निभैः ।।
टी.--तब राम, सुग्रीव सहित समुद्र तटपर गये और सूर्य
समान तेजवाले बाणों से समुद्र को डराया !

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भाषाटोका सहितम् । [३५]
(20)
दर्शयामास चात्मनं समुद्रः सरितांपतिः ।
समुद्रवचनाच्चैव
नलः सेतुमकारयत् ॥
रोल-नदियों को स्वामी समुद्र हाथ जोड़ कर सामने आया
तब उसके कहने से नल द्वारा राम ने पुल तैयार कराया ।
(१)
तेन गवा पुरीं लंकां हत्वा रावणमाहवे।
रामसीतामनुप्राप्य परां
परां 'ब्रीडामुपागमत् ।।
टी0-उस सेतुसे लंका में जा, रावण को मार सीता को
पाकर राम लज्जित से हुये।
(२)
तामुवाच ततो रामः परुषं जनसंसदि ।
अमृष्यमाणा सा सीता विवेश ज्वलनं सती ॥
टी-सामने सभा में सीताको कटु वचन कहे जिसके सहना
करने में असमर्थ हो परमसती सीता ने अग्नि में प्रवेश किया है।
(८३-८४)
ततोग्निवचनात्सीतां ज्ञावा विगतकल्मषाम् ।

. [३६] मूलरामायणम् - कर्मणा तेन महता त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ सदेवर्षिगणं तुष्टं राघवस्य महात्मनः । बभौ रामः संग्रहष्टः पूजितः सर्वदैवतैः । टी-तब अग्नि के वचन से सीता जी को निप्पाप समझा। राम के इस कर्मसे चराचर, देव ऋपि सब प्रसन्न हुए एवं प्रसन्न- हृदय राम देवताओं से पूजित होकर सुशोभित हुये । (८५) अभिषिच्य च लंकायां राक्षसेन्द्रं विभीषणम् । कृतकृत्यस्तदा रामो विज्वरः प्रमुमोद ह ॥ टी०-लका में राक्षस श्रेष्ठ विभीषण को राजतिलक देकर संताप से मुक्त हो कृतकृत्यएवं आनन्दित हुये। (८६) देवताभ्यो वरं प्राप्य समुत्थाप्य च वानरान् । अयोध्यां प्रस्थितो रामःपुष्पकेण सुहृद्वृतः ॥ टी०-देवताओं से वर पा, वानरों तथा प्रियजनों के साथ पुष्पकविमान से अयोध्या को प्रस्थान किया । (८७) अरद्वाजा मं गत्वा · रामः सत्यपराक्रमः भरतस्यान्तिके रामो : हनुमन्तं व्यसर्जयत् ।। च

[३७]
क
भाषाटामा सहितम् ।
रोल-तात्याराभान रागने गरद्वाज के आश्रम पर पहुँच
कर हनुमान को भरत के पास भेजा।
(८८)
पुनराख्यायिका जल्यन् सुग्रीवसहितस्तदा ।
पुप्पकं तत्समामा नन्दिग्रामं ययों तदा ।।
टी०-पुनः आपस में बातचीत करते हुये, सुग्रीव के साथ
पुरक विमान पर बैठकर नन्दिनाम को गये।
(८६)
नन्दिग्रामे जटां हित्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।
रामः सीतामनुप्राप्य राज्यं पुनरवाप्तवान् ॥
टो-नन्दिग्राम में, भाइयों के साथ, जटा को त्याग,
निष्पाप रामने सीता को पाकर पुनः राज्य ग्रहण किया ।
(१०,११)
प्रहृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टः सुधार्मिकः ।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिन्नभयवर्जितः ॥
न पुत्रमरणं केचिद् द्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यति पतिव्रताः॥
टो०-उस राज्य में लोग हृष्ट, पुष्ट, सन्तुष्ट, सुखी,धार्मिक,
नहात'ची नोरोग और दुर्भिक्षादि भय वर्जित हैं। पिता के सामने
--

. [३८] मूलरामायणम् । वहाँ पुत्रकी मृत्यु नहीं होती । स्त्रियाँ सौभाग्यवती एवं पतिव्रता हैं। (१२, १३) न चामिजं भयं किंचिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः। न वातजं भयं किचिन्नापि ज्वरकृतं तथा ॥ न चापि क्षुद्धयं तत्र न तस्करभयं तथा । नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥ टी०-वहाँ न तो अग्नि का भय, न जल में डूबने का भय, न वायुसम्बन्धी किसी तरह का भय, न ज्वरादि का भय, न पेट की चिन्ता, और न चोर का भय है। नगर और राष्ट्र सब धनधान्यपूर्ण है। (१४-१५-१६) नित्यं प्रमुदिताः सर्वे यथा कृतयुगे तथा । अश्वमेधशतैरिष्ट्वा तथा बहुसुवर्णकः ॥ गवां कोट्ययुतं दत्वा विद्वद्भ्यो विधिपूर्वकम् । असंख्येयं धनं दत्वा ब्राह्मणेभ्यो महायशाः ॥ राजवंशाञ्छतगणान् स्थापयिष्यति राघवः ।। चातुर्वर्यच लोकेस्मिन्स्वे स्खे धर्मे नियोक्ष्यति ।। टो०-सत्र, सदैव सतयुग की भाँति सुखी हैं और सौ अश्व- मेध यज्ञ कर सुवर्ण युक्त कोटि गौओं को विधिपूर्वक विद्वानों .

भापाटीका सहितम् . [३६]
तथा धपद्रव्य नामणों को देकर, राम हजारों राजाओं के वंश
को स्थापित करेंगे और चारों याण की अन २ धर्मसे युक्त करेंगे।
(२७)
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि
रामो राज्यमुपासिता ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।।
टो-ग्यारह हजार वर्षतक राज्य कर राम ब्रह्मलोक को
जायेंगे।
(10)
इदं पवित्रं पापघ्नं पुरायं वेदैश्च संमितम् ।
यः पठेदामचरितं सर्वपापैः प्रमुच्यते ।।
टी० --यह पवित्र, पापनाशक, पुण्यकारी और वेदतुल्य राम
चरित के। जो पड़ेगा, यह सब पापों से मुक्त होजायगा ।
(२९)
एतदाख्यानमायुष्यं पठन् रामायणं नरः।
सुपुत्रपौत्रः सगणः प्रेस स्वर्गे महीयते ॥
टी-रोमचरितसम्बन्धी यह कथा आयुका बढ़ाने वाली
है । इसके पढ़ने से मनुष्य पुत्र-पौत्रों से सुशेमित होता है और
मरने के बाद स्वर्गवा जाता है।
(१००)
पठन् द्विजो वागृषभत्रमीयात्स्यात् क्षत्रियो भूमि

[४० पतित्वमोयात् । वणिजनः पुरायफलवमीयाजन श्व शुदोपि महत्मीयात् ॥ टो०-इसका पढ़ने से ब्राह्मण विद्वान होता है क्षत्रिय भूमि का स्वामी होता है, वैश्य व्यापार में सफल होता है तथा शुद्र का महत्त्व बढ़ जाता है। (१०१) चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ टी. -रामचरित शतकोटि विस्तीण है और उसका एक एक अक्षर पुरुषों के पाप को नाश करनेवाला है । (१०२) रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः॥ टी-रघुनाथ अनाथनाथ, सीतापति रामचन्द्र को नमस्कार है इति मूलरामायणन् । इति श्रीमद्रामायणे घाल्मीकीये आदि- काव्ये बालकाण्डे नारदोक्तरामायण- .. संक्षेपो नाम :प्रथमः सग। पं० रामतेजशास्त्रिणा संशोधितम् । 1. बाबू काशाप्रसाद भार्गव र भागवभूषण प्रेस. काशी में मैटित ।

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KAILANMora- ଅଟକା ग यह गन्थ जिसे भारतवासी ही नहीं, अपितु योरप और अमेरिका आदि देशों के निवासी भी बड़े आदर की दृष्टि से देखते । संसार की उच्च श्रेणी फी भाषाओं में शायद ही कोई ऐसी भाषा हो जिसमें इस पवित्र ग्रन्थ का अनुवाद न हुआ हो। कहते हैं समस्त उपनिषदै गौ स्वरूप हैं, भगवान् कृष्ण ग्वाला हैं, 'अर्जुन बछड़ा हैं और गीता का ज्ञान रूपी अमृत दुग्ध है, जिसे उत्तम बुद्धि रखनेवाले सज्जनगण पान करते हैं । भवसागर से पार उतरने के लिये सबसे बढ़कर और कोई उत्तम नोका नहीं है यह सब गन्यों का शिरोमणि है। हमारे यंत्रालय में यह पवित्र ग्रन्थ अनेक प्रकार से छापा गया है। नीचे लिखे हुए गन्थों गैसे, जो आपको पसंद हो मँगाकर पढ़िये। श्रीमद्भगवद्गीता पञ्चरतन श्रीमद्भगवद्गीता गु०मा० ०1) पड़ा भा० टोग्लेज २॥) श्रीमद्भगवद्गीता ६४ पेजी श्रीमद्भगवद्गीता पञ्चरतन गुटका जिलद ग्लेज) गु० भा० टी० १) श्रीमद्भगवद्गीतावलभाषामे) श्रीमद्भगवद्गीता गुटका श्रीमद्भगवद्गीता श्रीमहात्मा सादा मा० टी० ) तिलक निर्मित ५11) पुस्तक मिलने का पता-भार्गव पुस्तकालय गायधार, बनारस सिटो।

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Mool Ramayana

Author
Ramnathlal
Title
Mool Ramayana
File name
Mool Ramayana
Text
OCR done
Citation
1929
Published
2009/10
Publisher
Bhargav Bhushan Press
Language
Sanskrit
Pages
44
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik granth
DLI number
345549
Barcode
99999990233885.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
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