Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Sharavak Vanita Bodhini

Jain,jay Dayal Mal · 2011/01

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000000000000000cococococococ0000000000 - श्रावक-बनिता-बोधिनी अर्थात् गृहस्थ-जैन-नियोंके कर्तव्य-कर्मका संक्षिप्त विवरण 1. Green लेखक- जयदयालमल्ल जैन बीकानेर, (राजपुताना.) जैन ग्रन्थालय. 'मरचट भैरोदान सेठिया प्रकाशक- . भा. दि. जै. महिला-परिपद ऑफिस जुबिलीवाग, तारदेव-बम्बई P00000000000000000000000000 वारान्द ०४४६ । विक्रमात १९७७ । - चतुर्थावृत्ति, १ अगस्त १९२० ईसवा ६ मूल्य लागत मात्र 1००००००००००००००००००००००००००००००००००००००

मुद्रक-रा चिंतामण सखाराम देवळे, मुबई वैभव प्रेस,
संढर्ट रोड, गिरगाव-मुबई
प्रकाशक-मगनव्हेन, मत्रिणी भा० दि० जै० महिला परिषद
जुविलीवाग, तारदेव-बम्बई ।
.
-

चेतावनी --- (श्रीमती प० चदाबाईजी आरा) जागोरी जैन बहिनो, कुछ तो भला कमाओ। मानुप जनमको पाके, मत व्यर्थ ही गमाओ॥१॥ चौरासी पार करके, आई कही ये बारी। माग्योसे मिल गया है, सार्थक इसे बनाओ ॥ २ ॥ कुछ पापके उदयसे, नारीका जन्म पाया । उसको समाज-हितकर, सव भातिसे बनाओ ॥३॥ प्राचीन जैनियोका, साहस घटाया तुमने । इस उच्च जातिको तुम, नीचा न कर दिखाओ ॥ ४ ॥ किस नींद सो रही हो, निज धनको सो रही हो। ससारकी सरॉमें, मत ज्ञान-धन लुटाओ ॥५॥ माता पिता कुटुम्बी, सम्वन्धी लोग जितने। भरतारसे भी विनती कर जोडके सुनाओ॥६॥ विद्या दो हमको माता, शिक्षा दो हमको भाई। विन ज्ञान हमको मूर्खा, मत जानकर चनाओ ॥७॥ निज स्वार्थमें कमीका, कुछ डर न दिलमे करना। कन्या भी होवे विदुपी, यह रयाल दिलमे लाओ ॥ ८ ॥ धर्मज्ञ विदुपी रोकर, हम भी करेगी सेवा । ससार-यात्री पदको, जलदी सफल बनाओ ॥९॥ इस भाति विनती करके, चेतोरी जैन बहिनो। होवे सफल मनोरथ, जिनचाणी शरण आओ॥१०॥ ,

२० रु० श्राविकाश्रम वम्बई
उपर्युक्त नामकी सस्था आज लगभग ११ वर्षसे जैन-स्त्री
समाजकी, और विशेषत विधवा-ससारकी जैसी कुछ सेवा कर
रही है वह सब पर प्रकट है। वर्तमानमें ५० छात्राएं हैं। हिन्दी,
सस्कृत, गुजराती, मराठी और अंग्रेजी भाषाके स्कूली विषयों के
सिवाय सीना-पिरौना और धर्मविषय सिखाकर, स्त्रियोंके जीवनको
पवित्र और उपयोगमय बना देना ही इसका मुख्योद्देश है।
समर्थ वाइयोंसे १०) मासिक भोजनखर्च और असमयाँको वैसे
ही (विना खर्च लिए) भरती किया जाता है । समाजसे प्रार्थना
है कि, वह इसको चलानेमें हर प्रकारसे मदद दे । इसका स्थायी
फड १ लाख कर देनेकी बड़ी आवश्यकता है । अभी तक
५७०००) हो गया है । मासिक खर्च ७०० रु है। विशेष
नियम आदि नियमावली मगाकर देखने चाहिए ।
-
व्यवस्थापिका-
र. रु श्राविकाश्रम, जुविलीवाग
तारदेव बम्बई।

विज्ञापन ।
हमारे यहा नीचे लिखी त्री-उपयोगी पुस्तकें भी मिलती हैं।
३) अर्थप्रकाशिका ।
1) श्राविका सुबोध (गुजराती)।
1) सौभाग्य रत्नमाला ।
॥ उपदेश रत्नमाला ।
1) ऐतिहासिक जैन स्त्रिया ।
(यह पुस्तक हिन्दीके अतिरिक्त मराठी भाषामें भी है।)
1) चम्पा ।
श्राविका सुबोध स्तवनावली ।
इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रकारकी धार्मिक और स्त्री-
उपयोगी, तथा सर्व साधारणोपयोगी पुस्तकें भी हमारे यहाँ
मिल सकती हैं।
पता--
मैनेजर, महिला-ग्रंथ-रत्न-भंडार,
जुविलीवाग-तारदेव
चम्बई।

नये संस्करणकी भूमिका पाठक और पाठिकाओ, आनसे ६ वर्ष पहिले प्रस्तुत पुस्तकका तृतीय सस्करण मेरे स्वर्गीय पिता श्रीमान् सेठ माणिकचन्द हीराचन्दजीने प्रकाशित करवाया था । बहुत समय हो चुका जब ही उस सम्करणकी सारी पुस्तकें विक चुकी थीं। विज्ञ पाठक पाठिकाओंकी प्रेरणासे और भारतवाय-दिगम्बर- जैन-महिला-परिषदकी ओरसे मैं इसकी चतुर्थावृत्ति प्रकाशित करवाती है। जिसके सम्बन्धमे मुझे दो प्रार्थनाए करनी हैं; पहिली तो यह कि, हमार चेष्टा करने और बिलकुल लागत मात्र दाम रखनेपर मी मूल्य कहीं पहिलेसे दुगुना हो गया है, इसके लिये समयकी महार्यता ही उत्तरदायी है, मैं नहीं । दूसरी, इतनी उता- वली करनेपर भी भाषा यथासाध्य शुद्ध करवा दी गई है । निसे पाठक पाठिकागण पढकर ही जान सकेंगे । अनावश्यक समझकर इसकी पहिली भूमिका निकाल दी है । कहीं कहीं आवश्यक जानकर टीका-टिप्पणी भी कर दी गई पर बहुत कम । आशा है, कि ये थोडेसे परिवर्तन जो पाठक पाठिकाओंकी इच्छानुकूल ही किये गए है; पसन्द पड़ेंगे । पुस्तकके अनेक विचाराशोंसे मै सहमत नहीं, कई अनेक सज्जनाने-पी-उन-विचाराशीको निकाल देकर पुस्तक प्रकाशित (२) करवानेकी सम्मति दी थी, परन्तु ऐसा करना लेखकके विचारोंकी हत्या करना समझकर ऐसा नहीं किया गया । जब तक किसी अन्य सुयोग्य लेखककी कोई उत्तम पुस्तक हमें प्रकाशित करनेको प्राण नहीं होती, तब तक आप लोग इससे सम्तोप करें। समव है कि माषा शुद्ध होते समय भावोंमें मी शायद कहीं अन्तर आ गया हो, पर जान बूझकर ऐसा कोई अन्तर डाला नहीं गया है। भूमिका पूर्ण करनेके पहिले जैन-धर्मभूपण श्रीमान ब्रह्मचारी शीतलप्रसादजीको उनकी अमूल्य सम्मतियों के लिए और खुरई- सिमलासा, जिला सागर निवासी श्रीयुत भगवन्त गणपति गोइलीयजीको उनकी भाषाशाद्ध, प्रेसकापी और प्रूफ सशोधनादिके लिए धन्यवाद देती हुई आमार मानती हू । अन्तमें मैं इतनी प्रार्थना और करती हूँ कि मरसक चेष्टा करने पर भी यदि कोई भूलें रह गई हों तो, पाठक-पाठिकागण उन्हें क्षमा करें । तथा मुझे उनसे सूचित करें । ताकि अगले सस्करणमें वे शुद्ध कर दी जाएँ। र रु. श्राविकाश्रम, जुबिलीबाग, तारदेव बम्बई, द्वि० श्रावण कृष्णा द्वीतिया वीराब्द २४४६ समानसेविका, मगनव्हेन माणिकचद।

अनुक्रमणिका
१
प्रथम प्रकरण-स्त्रीपर्याय
द्वितीय प्रकरण-स्त्रीशिक्षा
तृतीय प्रकरण-स्त्रियोंकी नित्यचर्या
४७
चतुर्थ प्रकरण-~ऋतुक्रियाविचार.
पंचम प्रकरण-मिथ्यात्वनिषेध
पष्ठ प्रकरण-विधवाओंका कर्तव्यकर्म
सप्तम प्रकरण-सूतकनिर्णय
११७
नोट--इसके अतिरिक्त प्रत्येक प्रकरणके अतर्गत बहुतसी
ऐसी ऐसी बातें भी लिखी गई है, जो स्त्रियोंके लिये अत्यन्तः
उपयोगी और ग्रहण करनेयोग्य है।

नगरचंद भैरॉदान सेटिया
अन ग्रन्थालय
बीकानेर, (गजपुताना)
श्री वीतरागाय नमः।
श्रावक वनिता वोधिनी।
प्रथम प्रकरण
स्त्री पर्याय
दोप रहित गुण गण सहित, चौबीसी जिनराज,
मन वच तनकर नमत हो, सिद्ध होनके काज ।
प्रणमू श्रीगुरुके चरण, जे निमथ सज्ञान,
पुनि बन्दौ जिन वर्मको, मिश्या-लम-हर-भान ।
काल दोपके हेतुसे, मति गति भइ अति हीन,
श्रद्धा ज्ञानाचरण तप, दिन दिन होत मलीन ।
उत्तम ज्ञातिन मध्ध लसि, क्यिा अधिक निकृष्ट,
श्रावक वनिता बोधिनी, लिख सवन हित इष्ट ।
इस संसारके सारे जीव मुखका लाभ और दुःखका
नाश चाहते हैं । ऐमा कोई भी जीर नहीं जो दुःखसे

श्रावक वनिता बोधिनी... डरकर सुख की इच्छा न करता हो; परन्तु वे मायः सारे ही जीव सुख प्राप्त करने और दुख दूर करनेका ठीक ठीक कारण न जानने तथा विरुद्धाचरणसे नाना भॉतिक शारी- रिक और मानसिक दुःखोंसे दुखी हो रहे हैं । फिर शास्त्रोंमें कहे हुए नर्क आदिके घोर दुःखोंकी तो याद करनेसे ही कलेजा कॉप उठता है । सचमुच यदि विचार करके देखा जाय तो धर्म धर्म चिल्लानेवाले सब जीव धर्मके स्वरूपको ही नहीं जानते, जिससे अंधोंकी नाँई भटकते और अनेकों दुःखोंसे टकरावे है, इसी कारण श्रीगुरुने अपनी बुद्धिसे धर्मका उपदेश देकर सचे सुखकी प्राप्तिका उपाय बताया है । उसीके अनुसार यहाँ पर कुछ लिखा जाता है, आशा है हमारे भाई और वहिने इस पर ध्यान देंगी। आत्माके स्वभावको धर्म कहते हैं । इस धर्मको जानकर इसमें आचरण करनेसे ही दुःखका नाश होकर सचा स्वाधीन सुख मिलता है, इसे सब बुद्धिमान निर्विवाद स्वी- कार करते है । सारांश यह कि विना धर्मके सुसकी प्राप्ति होना असंभव है। आत्माका स्वभाव-धर्म (रागद्वेष रहित देखना, जानना) अनादि कालसे हिंसा, असत्य, चोरी, कुशील और तृष्णा आदि पाप-कर्मरूप मत्ति के कारण मलिन-राग द्वेप-रूप- " स्त्री पर्याय। , हो रहा है, इसलिए उसे शुद्ध करने का-पाप जोड अहिंसा, सत्य, अचार्य, ब्रह्मचर्य और सन्तोपरूप मवर्तनेका उपदेश हमारे आचार्योंने जहां तहां दिया है, तथा आत्माके वर्मको पातनेवाले पांच पापोके त्यागको धर्म कहा है। क्योंकि अहिं- सादि धर्मोके धारण करनेसे ही हम संसारके दुःवोंसे छुट, निजानन्द और परमात्म दशाको प्राप्त हो सच्चे सुखी हो सकते हैं । रत्नकरण्डबावकाचारमें कहा है कि:-धर्म वही है जो नर्क, पशु आदि कुगतियोंके असह्य और निकृष्ट दुःखोंसे निकाल स्वर्ग मोक्षके उत्कृष्ट सुखोंको प्राप्त करावे । इसके सिवा आत्माके स्वभावको छोड वास्तविक और सचा धर्म और कुछ है ही नहीं। इसी आत्माके स्वभावकी प्राप्ति कर लेना यथार्थ धर्म-पालन है। जिन उपायोंके करनेसे यह जीवात्मा अनादिके कर्म-रोगसे निवृत्त होकर राग-द्वेप- रूप अशुद्धवाको छोड शुद्ध परमात्मा हो, उन्हीं उपायों- कारणों का नाम व्यवहार धर्म है । इसीके अनुसार आच- रण करना ही हमारा परम पुरुषार्थ है । इसी लिए यहा पर व्यवहार धर्मका वर्णन किया जाता है, क्योकि यही व्यवहार धर्म निश्चय धर्मकी उत्पत्तिका कारण है। इन्द्रियोंकी लम्पटता द्वारा उत्पन्न हुए पंच पापोंकी प्रवृत्ति तथा क्रोधादि चारों कपायोंकी उत्पत्तिको रोकनेवाला यह व्यवहार धर्म ही है जो मुनित्रत तथा श्रावक नतके भेदसे

श्रावक वनिता बोधिनी।
पालन किया जाता है । मुनि धर्म चारित्र रूपमें १३ प्रका--
रका है-पच महाव्रत, पंच समिति, और तीन गुप्ति । पुनः
श्रावकवत द्वादश भेद रूप है-पच अणुव्रत, तीन गुणवत
और चार शिक्षा व्रत । ग्यारह प्रतिमारूप भी श्रावक
धर्म है । इस स्थान पर श्रावक तथा मुनिव्रतका व्याख्यान
करनेसे पुस्तक बहुत बढ़नेके सिवाय इट प्रयोजनकी हानि
होना संभव है। इसलिये इस विपयको यही समाप्त कर आगे
चलते है । जिनको इसका पूरा ब्यौरा मालूम करना हो वे
मूलाचार, पुरुषार्थसिद्धयुपाय, स्वामिकार्तिकेयानुमेक्षा तथा
अन्य आचारशास्त्रोंसे ज्ञात करें।
निश्चय रहे कि जो पुरुप श्रावक-व्रतकी ११ प्रतिमा-
ओका भली भांति पालन नहीं कर सकता वह मुनिव्रत
धारण करने योग्य कदापि नहीं है । इसी प्रकार श्रावक
व्रत पालनेकी योग्यता तभी हो सकती है जब पहिले
मिथ्यात्व, अन्याय, और अभक्ष्यका त्याग किया जाय ।
जो स्त्री व पुरुप इन महान पापोंको सेवन करता हुआ
भी
अपनेको व्रती श्रावक कहता है वह मानो अक्षर-शत्रु पुरुषको
पंडित बताता है । अतएव जो स्त्री व पुरुप सचे सुसको
चाहते है, उनको ये तीनों दोप सर्वथा त्यागने योग्य है ।
"
१ फुदेवादिका पूजना। • सप्त व्यसन मेगन करना । ३ अरपूर गुण नहीं
* मद्यादियका भक्षण का।।

स्त्री पर्याय ।
.
वर्तमान कालमें गृहस्थाश्रमकी अवस्थाको देख खेदपूर्वक
कहना पड़ता है कि इस विकराल पंचम कालके पापमय
समयमे, यह तीनों दोप, जैन जातिम दिन पर दिन बढते
ही चले जा रहे है। और ग्रहस्थोंका क्रियाकाण्ड इतना
विगडता चला जा रहा है कि जिसका वर्णन करते " आपन
जांघ उघारिये आपहि मरिये लाज" की कहावत चरितार्थ
होती है। यही कारण है कि आज कल मुनियोंका सद्भाव
तो दूर रहा पतिमाधारी त्यागी संयमी पुरुपोका मिलना
भी दुस्तर प्रतीत होता है । शास्त्रों के पढनेसे ज्ञात होता
"है कि प्राचीन समयमें मुनिगण स्थान स्थान पर घूम उपदेश
देते थे, जिससे धर्मकी प्रभावना और उन्नति होती थी। उस
समयके क्रियाकाड ज्ञाता गृहस्थोके यहां उन्हें शुद्ध आहार
मिलता था । गृहस्थ लोग जानते थे कि साधु संयमीको
आहार कराए बिना स्वतः आहार करना गृहस्थ धर्मके
“विरुद्ध है । इसी लिए वे भोजन करनेके पहिले द्वारापेक्षण
(माशुक जलसे भरा हुआ पात्र हाथमें ले द्वारपर खडे हो
सुपात्र अतिथिकी राह देखना) करते और जय किसी
-सुपात्र सनन या साधुको आहार दान दे लेते तो अपना
अहोभाग्य समझते थे । यदि किसी सुयोग्य श्रावक या
साधुको भोजन देनेका संयोग न आता तो अपने भाग्यको

आवक वनिता बोधिनी। बहुत ही कोसते और साधुओंके भोजनका समय निकल जाने पर आप भोजन करते थे । उन्हें यह भले प्रकार विदित था कि गृहस्थका घर पट्कर्मोंकी आरंभी हिंसाके कारण स्मशानतुल्य है, और विना अतिथि संविभागके. कदापि सफल और शुद्ध नहीं हो सकता है । वर्तमानमें जैनियोंकी खानपानक्रिया इतनी विगड गई है कि यदि कर्मयोगसे थोडा भी संयमधारी क्रिया- काडी भोजन करनेवाला किसीके घर आ जावे तो उसके भोजन योग्य सामग्रीका मिलना कठिन हो जाता है । यदि सामग्री भी मिल जाय तो क्रियापूर्वक रसोई बनानेवालोंकी न्यूनता कैसे पूरी हो। इस अवस्थामें यदि दो चार कर्म- कांडी साधर्मी सज्जन किसी स्थान पर पहुंच जायें तो उन्हें शुद्ध भोजन कैसे मिले ? यही बडी कठिनाई है। ऐसे ही अनेक दोपोंसे इस निकृष्ट कालमें साधुव्रत धारण करना कठिन हो गया है । कोई क्षुल्लक ऐलकके व्रत धारण करनेका साहस नहीं करता (खेद) । त्यागी महान पुरुपोंके अभार होनेसे जैन जातिसे उपदेश उठ गया, जिससे मिथ्यात्व, अन्याय और अभक्ष्यका जोर बढ गया। जो पुरुप संसार और शरीरके भोगोंसे ममत्व घटाना चाहते है वे शुद्ध खान पानकी योजना न देख घरहीमें रहके श्रावक व्रत पालकर संतोप करते हैं। क्योंकि धर्मात्मा--

स्त्री पर्याय ।
७
ओंको राग द्वेष मेटनेवाली, सुबुद्धिको उत्पन्न करनेवाली
शुद्ध क्रिया और आहार विधिकी भी आवश्यकता है। मलिन
धुद्धि होने और धर्ममें अरुचि होनेका एक कारण शुद्धा-
चरणकी हीनता है । निर्धनता व मूर्खता होनेका एक
कारण विकृत भोजन है । दुःख रोग आदिकी वृद्धि भी
खानपानकी भ्रष्टतासे होती है ऐसा जान जैनी मात्रको
क्रियाकांड और खानपान पर लक्ष्य देना चाहिये और
हीनताएं दूर करना चाहिए । परन्तु समयका प्रवाह और
उसकी आवश्यकताएं भी हमे भूलना न चाहिए ।
रसोई आदिकी क्रिया स्त्रियों के आधीन है यदि स्त्रियां
शिक्षिता हो तो रसोई अवश्य ही शुद्ध तैयार हो । तब उन्हें
कोई अशुद्धाचरणका उलहना कैसे दे ? अशिक्षिता स्त्रियां
अकेला खान पान ही क्या, गृहस्थीका प्रत्येक कार्य अवि-
चारपूर्वक करती हैं । एक तो वे मूर्ख और उतावली हुआ
ही करती है फिर यदि अशिक्षिता भी हाँ तो कहना ही
क्या ? वे गृहस्थीका प्रत्येक कार्य चकी, चूल्हा, आडना,
चुहारना, पानी छानना और ओखली-आदिको-ठीक ठीक
विधिपूर्वक नहीं करती, शुद्धता और दयाका भी विशेष
विचार नहीं रखती । इसमें उन अफेलीका दोष नहीं है,
पुरुपोकी मूर्खता तो उनसे भी घटकर है । पुरुपोंने
स्त्रियों को सतानोत्पत्ति करनेवाली मशीन समझ रक्सा है।

आवक वनिता वोधिनी ।
उन्हें सोचना चाहिये कि स्त्रियां उनके गृह-संसार रचनेमें
विश्वकर्मा है, वे तो केवल बाहरसे द्रव्य कमा ला देनेवाले
हैं। स्त्रियां जैसा शुद्ध अशुद्ध रांधना रांध देती हैं पुरुप
उसे ही वडी मौजसे खा पी कर संतुष्ट होते है फिर
स्त्रियोंको क्या पडी है जो नाना प्रकारसे शोध वीनकर
धीरता और सावधानीसे रसोई बनायें, तथा और और
कार्य भी सावधानी और शुद्धतापूर्वक करें ? कभी कभी तो
ऐसा देखा जाता है कि स्त्रियां तो शुद्ध आचारयुक्त होती
है और अपने रसोई आदि कार्योको इस प्रकार करती
है, जिसमें हिंसादिक दोप टलें और संयम सधे ।क्योंकि या
तो वे इसे शास्त्रों में पढ़ कर जान लेती है या विद्वानोंके
उपदेशोंमें सुन लेती हैं, और विचारती है कि यदि हम
प्रमाद और अज्ञानतासे हिंसादिक पंच पाप उपार्जन
करेंगी तो इसका कहुआ फल हमें ही भोगना पडेगा।
पति तो घरके काम देखने आते नहीं, जो कुछ पाप होगा
इमारे सिर होगा। इसलिये वे कर्मकांडकी बडी ही अनुकूलता
रखती है-चूल्हे चोकेकी शुद्धता, शरीर वस्त्रादिक की
पवित्रता, रसोईकी सामग्रीको मर्यादा तथा वर्तनादिकी
स्वच्छताका ध्यान रख भोजन तैयार करती है; परन्तु
पुरुषोंका आचार ऐसा भ्रष्ट हो रहा है कि जूता पहिने,
बाजारके कपडोंसे, दुकान पर या चौकेके वाहिर ही, अथवा
,

स्त्री पर्याय।
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हलवाईजीकी दुकानपर ही, शुद्ध अशुद्ध मिठाई या दूसरी
सामग्री, बड़े प्रेमसे उदर-देवकी भेंट करते हैं । फिर भी
ऐसी स्त्रियां समाजमें हजार पीछे दो चार ही होगी जो
शास्त्रानुकूल भोजन वना खिला सकती हों । इसी लिये
अपनी बहिनोंसे प्रार्थना है कि वे अपनी जिम्मेदारीके
कामोंको भले प्रकारसे करें, और अपने पतियोंको भी
उनसे (भले कामोंसे-चौके चूल्हेकी वातोंसे') प्रेम कराएं।
क्योंकि चूल्हा चक्की और ओखली आदिके कार्योंमे प्रमाद
या असावधानी करनेका पाप स्त्रियोंके सिर होता है।
यह
तो सभी जानते हैं कि पुण्यका फल मुख और
'पापका फल दुख है । पापोंसे इस जीवनमें ही नाना कष्ट
भोगना पडते है । फिर भविष्यमें नारकी या तिर्यच होना
पडता है, जिनमें नाना प्रकार के असह्य कष्ट भोगना होते हैं।
शास्त्रोंका कथन है कि प्रथम तो स्वीसी पर्याय ही निन्य है
जो कुत्सित कर्मोंके उदयसे प्राप्त होती है, जिसने पूर्व जन्ममें
मिथ्यात्व सेवन (कुगुरु कुदेव और कुधर्मका आराधन
किया हो,) अभक्ष्य भक्षण या रात्रिभोजन किया हो, अन
छाना पानी पिया हो, या तीव्र मायाचार किया हो, अथवा
इन्हीं जैसे खोटे खोटे कर्म-समूह उपार्जन करनेसे स्त्री पर्याय
भास होती है । परन्तु पुरुपोंको जन्म देनेवाली खिर्या, महावीर,
अकलंक जैसे पुरुप रत्न उत्पन्न करनेवाली स्त्रियां, वे ही

श्रावक वनिता बोधिनी।
निंद्य पर्याय स्त्रिया, अपना कर्तव्य पालन करके, आत्म
कल्याण करने के साथ ही साथ, संसारके साम्हने अपना
आदर्श रख गई है।
हरिवंश पुराणसे जाना जाता है कि जब नेमिनाथ
भगवान अपने विवाहकाळमे वारातसहित ससुराल जा रहे
थे तब एक वाडेमें बहुतसे पशुओंको घिरे हुए देखकर
सारथीसे उनके घेरे जानेका कारण पूछा । सारथीने बताया
कि वारातमें आये हुए अनेक मांसाहारी राजाओंके भोजनार्थ
ही यह रोके गये है। सारथीका उत्तर और पशुओंका क्रन्दन
सुन भगवानने अवधिज्ञानके द्वारा कृष्णका प्रपंच जाना
और तब सोचने लगे-धिकार है इस वेश्या सी चंचल राज
लक्ष्मीको और इन रोगसे भोगोंको, जिनके कारण महान
पुरुप भी निर्भय हो पापकार्यों में दत्त चित्त हो जाते है।
फिर विवाह कृत्योंको जैसेके तैसे छोड, कंकण आदिको
तोड मरोड, गिरनार पर्वत पर जा, द्वादशानुप्रेक्षाका चिन्तवन
करने लगे। जब राजुलको (सजा उग्रसेनकी पुत्री और
श्रीनेमिकी अर्द्ध परिणीता पत्नीको) यह खबर मिली जो
कि अब तक नेमि जैसे सुयोग्य पतिकी प्राप्तिपर, हर्षके मारे
विह्वल हो रही थीं, बडी ही खेद खिन्न हुई। और कहने लगी,
हाय ! क्षणभरमें यह क्या का क्या हो गया भगवन ! हायरे
काँके विचित्र चरित्र, बलिहारी तेरी। एक तो स्त्री पर्याय
पाई, फिर यह ठीक विवाहहीके समय पतिवियोग ! और सो

स्त्री पर्याय । --- , भी थोडे समयको नहीं, जीवन पर्यन्तको । अब क्यों न ऐसा उपाय करूं, जिससे इस संसारके इंद्रजालसे-इन मीठे मीठे विपहरे प्रलोभनोंसे छूट जाऊं, संसारके जन्ममरणसे छुटकारा पाऊं । यह विचारते ही उन्होने अर्यिकाके व्रत धारण किए और कालावधि पर समाधि-मरण कर सोल- इवें स्वर्गमें अच्युतेन्द्र हुई। जो स्त्रिया श्रावक कुल, जैन धर्म और सर प्रकारकी सामग्री पा करके भी अपना कल्याण नही करती, किन्तु नित्य सांसारिक रगडो झगडोंमे ही आनंद मनाया करती है, वे मानों अमृत छोड निप पाती है। उनके लिए 'खांड भरे भुस खात है' की कहावत चरितार्थ होती है । जिस प्रकार मूर्ख मनुष्य काग उडानेके लिए चिंतामणि रत्नको कंकर समझ फेंक देता है और फिर दुखी होता है, ऐसे ही जो स्त्रियां कूल, धर्म आदि सारी सामग्री पाकर भी अपना हित नहीं करतीं-उसका दुरुपयोग करती हैं वे उम मूर्ख मनुष्य जैसी दुखी होती है। क्योंकि उक्त सामग्रीका दुरुपयोग नमें ले जानेवाला है, जहाँ छेदन भेदन, मारन ताडन आदि नाना कष्ट सहना होते हैं, जिनका केवल स्मरण करनेसे ही रोंगटे खडे हो जाते हैं और छाती धडकने लगती है । इमारी चहिनोंको उचित है कि वे शास्त्रोंका पठन मनन करें। सुगुरु सुदेव और सुधर्मसे अटूट प्रीति जोडे। जिसमें उनका श्रावक वनिता बोधिनी। जाति और धर्म, तीनोंका कल्याण कर सकती है । जिस प्रकार कच्ची मिट्टीसे मनोवांछित वर्तन बन सकता है उसी प्रकार बालकोंके कोमल हृदय छुटपनमें मनमाने सांचेमें ढल सकते हैं, और उनके स्वभावका ढालना माताकी बुद्धि- मत्ता भरी शिक्षा पर अवलंबित है । बच्चोंका अधिक समय माताके पास ही बीतता है। माताके स्वभाव, माताके धर्म- फर्म, माताकी वातचीत, माताकी इच्छाएं आदि आदि बच्चेपर वह प्रभाव डालती हैं जो हजारों गुरुओंकी शिक्षाएं भी नहीं डाल सकती । पिताकी शिक्षा भी काम करती है पर बहुत थोडा। गुरु वेचारेको बच्चा उस समय मिलता है जब उसमें उसके भावी जीवनकी भलाइया और बुराइयाँ जड पकड लेती हैं । माताकी शिक्षाएं बच्चेपरसे उसके जीवनभर अपना प्रभाव नहीं हटातीं। नैपोलियनकी माताने उसे अपनी इच्छासे ही ऐसा अदम्य वीर बनाया था। शिवाजीकी माताने अपनी ही शिक्षासे शिवाजीको इस योग्य बनाया था कि वे एक साधारण जागीरदारसे महा- राजा कहलाए । अकेले शिवाजी या नैपोलियन ही की बात नहीं है, सैकडों और हजारों उदाहरण ऐसे हैं, कि जिनमें माताने अपनी इच्छानुसार ही अपनी सन्ततिको बना दिया है। सारांश यह कि शूर-क्रूर, विद्वान-मूर्ख जैसा भी माता चाहे अपनी सन्ततिको घड सकती है

है रे ससुरालमें जाकर तिरस्कृत और दुखी होती हैं। कारण
यह कि एक तो काम करने का अभ्यास न होनेसे वह बोझ
सा प्रतीत होता है-आलस्य आता है, दूसरे काम सीखा हुआ
न होनेसे रिगड विगड जाता है । तर तिरस्कार आदि
है, कि जब हम ये काम करना ही नहीं पडते अथवा करना ही
पडेंगे तर फिर इनके सीखने की आवश्यकता क्या'
ताहिए कि लक्ष्मी चंचला ई-नादलकी परछाई
स्त्री शिक्षा।
विद्याके सिवाय लडकियोंको गृहस्थीके कामघामाकी
शक्षा वडी ही जरूरी है, और यह शिक्षा माताएं पडी ही
सरलता पूर्वक दे सकती है, तथा चतुर माताएं देती भी
है। ऐसा न समझना चाहिए कि गृहस्थीके कामधामकी
शिक्षाकी क्या आवश्यकता है । वे तो अपनेआप आते रहते
है। यह बात नहीं है । अपनेआप आते रहने में भी यदि
किसी सुव्यवस्थित पद्धतिसे सिखलाया जाता रहे तो बडा
ही अच्छा हो । क्योंकि अनसिसुए किसी भी कार्यको
तनिमें विगाड वैठते हैं । व्यावहारिक कार्योंको सावधानी-
पूर्वक पापोंसे बचाते हुए करते जाना भी एक कठिन कार्य
है और इसलिए उसकी शिक्षा अत्यन्त आवश्यक
जो लडकियां छुटपनमें रसोई आदि गृहकार्य नहीं सीखती
है
कर
म
सहना पड़ता है।
कई घनिकों की बहू बेटियां सोचती होगी, और सोच सक
दिन

८ श्रावक वनिता बाधिना। AnnnnnnAmARAN MAvv H H आज है और कल नहीं है। दुर्भाग्य न करे कि उन्हें ऐसा दिन देखना पडे । पर लोगोंको ऐसे दिन देखने जरूर पडे है। क्या आश्चर्य कि उन्हें भी इस दुःखपूर्ण भाग्य चक्रमे पडना पडे, फिर उस समय वे क्या करेंगी ? जिसने निठल्ला वैठना सीसा हो उसकी इस सकटमय अवस्थामें क्या दशा होगी ? या तो भूखों मरना पडेगा या भीख मांगनी पड़ेगी। इसी लिये हमारा कहना है, कि खूब पढो और खूब गृह- स्थीके काम-वाम सीखो। हमारे कहनेका कुछ यह आशय नहीं है कि धनिक होने पर भी तुम्ही मजदूरके माफिक काम करती फिरो और नौकर चाकर मत रक्खो । परंतु जैसी तुम्हारी अवस्था हो वैसा काम करो। पर काम कर. नेका अभ्यास हमेशा रक्खो । यदि पुण्यकर्मके उदयसे संपत्ति पाई है, तो नौकर चाकरोसे यत्नाचारपूर्वक काम लो; उन पर अच्छी देखरेख रक्खो । अपने अवकाशके समयको स्वाध्याय या लिखने पढनेमे लगाओ। जो स्त्री आप कुछ काम नहीं करती और न करनेकी उत्तम रीति जानती है वह नौकर चाफरोंसे भी भले प्रकार काम नहीं ले सकती । नोकरचाकरों से बहुत कम ऐसे होंगे जो अपने मनसे पूरा और अच्छा काम करें। उन पर देस- रेख रखने की वडी आवश्यकता है । जो स्त्रियां रसोईकी क्रिया में निपुण है वे कुटुम्बियोंकी प्रकृति, देश और कालके ।

स्त्री शिक्षा ।
१९
,
अनुसार सदा शुद्ध रसोई करती है, जिससे कुटुम्बके लोग
सदा निरोगी और सुखी रहते हैं । जो स्त्रियां पाकक्रियामें
प्रवीण है-प्रत्येक व्यंजन नियमानुसार बनाना जानती है
वे मानों भोजन नहीं, एक पुष्टकारी औपाधि खिलाकर
कुटुम्बका पोपण करती है। इसी लिये भोजनके सबसे
कवियोंने स्त्रियोंको माता तककी उपमा दे डाली है । सच
है, गुण ही सर्वत्र पूजा जाता है।
माता पिताका कर्तव्य, पुत्रियोंको लिखना पढना सिखा-
कर, अथवा खाना बनाना सिखा कर ही पूर्ण नहीं हो जाता,
किन्तु उन्हें शिल्प, हस्तकला आदिके सिखाने की भी बडी
आवश्यकता है । जिन स्त्रियोंको सीना पिरौना तथा कसीदा
आदि काढ़ना आता है, वे मन माना कपडा तैयार करके
आप पहिनतीं और अपने कुटुम्चियोंको पहिनाती है ।
प्रत्येक स्त्रीको अँगरखा, पायजामा, कुरता, कोट, चोगा,
घाघरा, चोली आदि कपडोंकी काट छाट, सीना व कसीदा
काढना, वेलबूटे बनाना, इजार बन्द गूंथना, गुलूवन्द, मोजा
बनाना और गोसरू मोडना आदि कार्य अवश्यमेव सीख
लेने चाहिये । वचपनसे इन शिल्पकायोंका अभ्यास
हो जानेसे आगे वहुत लाभ और सुसकी प्राप्ति हो सकती
१ मूतमें पोत मूगा आदि पिरोकर जाली पखा बनाना। • कारीगरी।

आवक वनिता बोधिनी।
,
है । जो स्त्रिया अज्ञानता वश शिल्पकारी नहीं सीखती उन्हें
वक्त पड़ने पर पिसाई, पानी भराई व कताई करके बडी
कठिनाईसे अपना जीवन, निर्वाह करना पड़ता है। प्रत्येक
स्त्री हस्तकलाके काम सीख कर रुपय डेढ़ रुपय रोजका
काम कर सकती और अपनी गृहस्थीकी गुजर आनन्द पूर्वक
चला सकती है । इसलिये द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके
अनुसार सब काम सीख लेना चाहिए ताकि वक्त पड़ने पर
कोई काम रुका न रहे और पराधीनता न भोगनी पडे ।
जो सुशीला और भाग्यवती कन्याएं, बाल्यावस्थामें
खेल कूद छोड़, अपने करने योग्य कामोंका अभ्यास करती
है, उनके भविष्य-सुसमें कुछ कमी नहीं । अवकाश
मिलते ही वे किसी न किसी काममें लग जाती है । काममें
लगे रहने के कारण उनका शरीर फुर्तीला और नीरोग
बना रहता है।
कन्याओंको लडकोंकी भाति ही नहीं, किन्तु उनसे बहुत
ज्यादा, अपने माता पितादि गुरुजनोंकी आज्ञा पालना
चाहिए । जो पुरुष, लाड़ चावमें पड़कर लड़कियोंको मूर्ख
रहने देते है-उन्हे पढ़ाते लिखाते नहीं, केवल खेलने देते
है, वे तो जो कष्ट उठाते हैं सो उठाते ही है, पर उन वाल
वोंके लिए मानो जन्म भरको दुख बांध देते हैं । अर्थात्

स्त्री शिक्षा।
.
मूर्ख, ढीठ, और खिलाडी लडकिया, जीवन भर कभी सुखी
नहीं हो सकतीं। कन्याओंको उचित है कि वे अपने माता-
पिता, सास-ससुर, पति आदि गुरुजनोंकी आज्ञामें चलें-
उनकी इच्छाके विरुद्ध कोई काम न करें और उन कामोंसे
सदा दूर रहें, जिनसे उनकी तथा गुरुजनोंकी निन्दा हो ।
प्यारी कन्याओ, तुम कभी बुरे आचरणवाली, हठीली,
झगडालू, आलसी और खराब प्रकृतिकी लडकियों के साथ
हेल मेल, (खेल-कूद, वात-चीत) तथा और भी किसी
प्रकारका ससर्ग मत करो क्योंकि इससे बुद्धि विगड जाती
है। नीतिमें कहा है कि:-
सगति कीजे साधुकी, हरे और की व्याध
सगति तजिए नीचकी आठों पहर उपाधि
इसी लिये नीतिमें गुणवानकी संगति करना श्रे
कहा गया है
जाड्यधियो हरति सिंचति वाचि सत्य।
मानोन्नति दिशति पापमपाकरोति ।।
चेत प्रसादयति दिक्षु तनोति कीर्ति
सत्सगति कथ किं न करोति पुसाम्॥
अर्थ-जिस सत्सगतिके प्रतापसे बुद्धिकी जडता
हो जाती है, सत्य भापणमें रुचि होती है, सन्मान की
होती है, पाप दूर होकर चित्त प्रसन्न रहता है, और
-

२२
आवक वनिता बोधिनी।
दिशाओंमें सुकीर्ति फैलती है । तिस सत्संगकी महिमा कहा
तक कही जाय । अतएव पुत्रियोंको चाहिये कि प्रातःकाल
उठे, फिर स्नानादि क्रियाओंसे निश्चिन्त हो देवदर्शन,
स्वाध्याय आदिमे संलग्न होवें, पीछे रसोई आदि करें।
अवकाश मिलने पर सुशील बहू बेटियोंमें बैठ, वार्तालापका
टॅग और चतुराईके काम सीखनेमें समय वितावें । जो
स्त्रिया अथवा लड़कियाँ कुसंगतिमे पड़ जाती है, उनको
पीछे बहुत कडुवे फल भोगने पड़ते हैं । जहा कहीं कुसं-
गनिका प्रभाव पड़ा और स्त्रियां निर्लज्ज हुई । फिर उन्हें,
क्या कुटुम्बियों और क्या सम्बन्धियों, सभीकी दुतकार
सहनी पड़ती है। किसी प्रकार कुत्ते विल्लियों जैसा कष्टमय
तथा निरादर पूर्ण जीवन बिताती हैं।
प्यारी भगिनियो ! तुम अपने हानि लाभका विचार
सदैव किया करो । नित्य अपने आगे पीछेकी बातें सोचा
करो। विचार करो कि तुम्हारे जीवनका उद्देश्य क्या
है ? कभी बुरी संगतिमे मत पडो, और ग्रहस्थीके छोटे बडे
सभी कामोंका अभ्यास करती रहो, जिससे तुम्हें कभी शोक
करनेका मौका न आए।
ऊपर कही हुई वातोके सिवाय बालिकाओंको बालकोंकी
ही भांति धर्म-शिक्षण देना आवश्यक है । उन्हें बचपनसे
ही मातृभाषा समझनेके साथ ही साथ पंच नमस्कार मत्र,

स्त्री शिक्षा।
२३
दर्शन, मगल, पूजन और पद-विनती आदि अनेक पाठ
तथा लौकिक नीतिकी शिक्षा देनी उचित है, जिसके अनु-
सार चलकर वे दोनों कुलोंकी कीर्ति फैलावे--किसी
प्रकारके कुमार्गमें पग न बढावें ।
लोकोक्ति है कि पुत्री पराये घरका धन हे अर्थात्
कन्याका पालन-पोषण तो माता पिता करते हैं परन्तु
विवाह होजाने पर उसे कुललक्ष्मी बन कर ससुरालमें
रहना पडता है। और यह ठीक भी है। ससुरालमें ऐसा
वर्ताव करना चाहिए कि, जिससे माता-पिता आदि पीहर
वालोकी प्रशंसा हो । जबतक पुत्रीका विवाह नहीं होता,
माता पिता उसके अधिकारी है, किन्तु भांवर पडते ही
पति और पतिके माता-पिता, उस बहू नाम धारिणी
कन्याके अधिकारी हो जाते हैं । माता पिता या भाई
आदिका कर्तव्य है, कि वे किसी योग्य, सुन्दर, सर्वावयव,
बलवान, विद्वान, कुलीन और समुचित वयवाले वरके ही
साथ कन्याका सम्बन्ध करें । पूर्ख, वृद्ध, बाल, रोगी,
व्यसनी अथवा नपुसक आदि वरों के साथ कन्याका सम्बन्ध
कर देनेवाले व्यक्तियोंकासा अधर्मी नर-पशु दूसरा नहीं है ।
फिर चाहे यह विरुद्ध सम्बन्ध, पैसेके लालचसे किया जाय
अथवा किसी दूसरे कारणसे ।
जो निर्णोध बच्ची तुन्हे अपना जानती है, तुम्हारी

२४
श्रावक वनिता बोधिनी
।
आज्ञाओंका पालन करती है, प्रत्येक कष्टमें तुमसे आश्वासन
और सहायता-पूर्ण सहायता पानेकी आशा रखती है;
तुम पर अपना सारा विश्वास रखती है; हाय ! क्या
वही भोली भाली बच्ची तुम्हारे ही द्वारा दुःखसागरमें ढकेल
दी जायगी? अयोग्य पतिके गले वाघ दी जायगी'
हाय हाय ! यदि ऐसा हुआ तो कहना होगा कि तुममें
मनुष्यत्व नहीं; तुम मनुष्यवर्गमें रहने योग्य नहीं । जाओ,
जंगलमें जाओ और सिंह भालुओंके साथ रहो । मनुष्य
कहलानेका तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।
थोडे विचारकी बात है कि एक ऐसा आत्मा जो
तुम्हारे ही जैसा सुखाभिलापी है-तुम्हारे ही जैसा दुःखोंको
देख भागता है-एक ऐसी व्यक्ति जो तुम्हें पिता, माता,
भाई आदि स्वर्गीय शब्दोंसे सबोधित करती है जो
तुम्हारी ही प्रतिकृति है; जो तुम्हारे ही कलेजेका टुकड़ा
है; उसे ही हे भाइयो और हे भगिनियो । हे नृशंस माता
पिताओ। एक बूढ़ेके गले मदने पर, तुम पर आसमान
नहीं फट पडता ! एक रोगी या नपुसकके
समय तुम पर बिजली नहीं आगिरती ! एक
Ja
मूर्खकी जीवन संगिनी व
धिकार है इस लोमको
દોનવા
-
4
लज्जा न
इन पंप
टुकडोंको, और धिक्कार

स्त्री शिक्षा । -- जातिके नेताओ । अपनी जीभको वशमें करो; लड्डुओका मोह छोडो और इस गुडियोंके खेलको इस बकरियोंकी विक्रीको बन्द करो । बहुत हुआ, ज्यादा पाप न कमा ओ। कन्याए तुम्हारे ही जैसी सैनी जीव हैं, उनको हृदय है । उन्हें सुख दुखका ज्ञान होता है । उन्हें आह होती है । और आहमें अचूक असर होता है । तुलसीदासजीने एक स्थानमे कहा है- तुलसी हाय गरीवकी, कबहु न निष्फल जाय । मुए चामकी आह ते, लौह भस्म है जाय । खूब स्मरण रक्खो, कि किसी दूसरेको कप्टमें डालके तुम कभी सुखी नहीं हो सकते। तुम ऊपरसे मुसी चाहे भले ही दिसो, पर तुम्हारा हृदय दुखाग्निमें निरन्तर जलता रहेगा कभी शान्त न होगा। योग्य पार्मिक रीतिसे व्याही हुई वधू-संज्ञक-कन्या अपने पतिकी अनुगामिनी होकर रहे । मास-ससुर, जेठ-जेठानी और देवर-देवरानी आदिसे प्रेम और नम्र- तासे वर्ताव करे । आवश्यक सेवा सम्हाल भी करे | सबकी उचित लाज भी रखे जो आवश्यक है+। कभी कारण +इस लाज शब्दका पाठक पाठिकाए यह अर्थ न निकालें कि मवा हापका घूघट निकालना, दिन रात घरके अंधेरे कोनेमें धंधे रहना, किसीसे तुल्कर पात चीत न करना, भौर ऐसे ही ऐसे अनेकों अनध करके या होक्षयको शिकार हो जाना और या क्सिी दूसरी भापत्ति में फंस जाना। --मगांधक।

२४
श्रावक वनिता बोधिनी ।
RAAN Mommawww
आज्ञाओंका पालन करती है, प्रत्येक कष्टमें तुमसे आश्वासन
और सहायता-पूर्ण सहायता पानेकी आशा रखती है;
तुम पर अपना सारा विश्वास रखती है; हाय ! क्या
वही भोली भाली बची तुम्हारे ही द्वारा दुःखसागरमें ढकेल
दी जायगी ? अयोग्य पत्तिके गले बांध दी जायगी'
हाय हाय ! यदि ऐसा हुआ तो कहना होगा कि तुममें
मनुष्यत्व नहीं, तुम मनुष्यवर्गमें रहने योग्य नहीं । जाओ,
जंगलमें जाओ और सिंह भालुओंके साथ रहो। मनुष्य
कहलानेका तुम्हें कोई अधिकार नहीं है।
थोडे विचारकी बात है कि एक ऐसा आत्मा जो
तुम्हारे ही जैसा सुखाभिलापी है-तुम्हारे ही जैसा दुःखोंको
देख भागता है-एक ऐसी व्यक्ति जो तुम्हें पिता, माता,
भाई आदि स्वर्गीय शब्दोंसे सबोधित करती है; जो
तुम्हारी ही प्रतिकृति है; जो तुम्हारे ही कलेजेका टुकड़ा
है, उसे ही हे भाइयो और हे भगिनियो । हे नृशस माता
पिताओ! एक बूढ़ेके गले मढने पर, तुम पर आसमान
नहीं फट पडता । एक रोगी या नपुंसकके हाथ सौपते
समय तुम पर विजली नहीं आगिरती ! एक अयोग्य या
मूर्खकी जीवन सगिनी बनाने में तुम्हें लज्जा नहीं आती ?
धिकार है इस लोभको धिक्कार है इन चंचल चांदीके
दुकडोंको; और धिक्कार है इस पैसेसे होनेवाले सुखको;

हो जाना और या किमी दूमरी थापनि ५२ जाना। उचित लाज भी रखे जो आवश्यक है। कभी कारण +ग लाज शशका पाठक पाठिका यह भयं न निकालें कि सवा हायका घुपट निकालना, दिन रात परके अपर लोनने येथे रहना, थात चीस न करना, और ऐसे ही ऐमे अनेकों अनपरदे या तो क्षयकी निकर स्त्री शिक्षा । २५ क्सिीमे जाति के नेताओ ! अपनी जीभको वशमे करो; लड्डुओंका मोह छोडो और इस गुडियोंके खेलको इस बकरियोंकी विक्रीको बन्द करो । बहुत हुआ, ज्यादा पाप न कमा ओ। कन्याए तुम्हारे ही जैसी सैनी जीव हैं, उनको हृदय है । उन्हें सुख दुखका ज्ञान होता है । उन्हें आह होती हैं। और आहमें अचूक असर होता है । तुलसीदासजीने एक स्थानमे कहा है:- तुलसी हाय गरीबकी, कबहु न निष्फल जाय । मुए चामकी आह ते, लौह भस्म है जाय ॥ खूब स्मरण रक्खो, कि किसी दूसरेको कमें डालके तुम कभी सुखी नहीं हो सकते। तुम ऊपरसे मुखी चाहे भले ही दिखो, पर तुम्हारा हृदय दुखानिमें निरन्तर जलता रहेगा कभी शान्त न होगा। योग्य धार्मिक रीतिसे व्याही हुई वधू-संज्ञक-कन्या अपने पतिकी अनुगामिनी होकर रहे । मास-ससुर, जेठ-जेठानी और देवर-देवरानी आदिसे प्रेम और नम्र- तासे वर्ताव करे । आवश्यक सेवा सम्हाल भी करे । सबकी

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श्रावक वनिता बोधिनी।
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होने परभी कलह न करे । यदि अनुचित वर्ताव भी हो
तो उसे शान्तिसे सहन करे। और अपनी चतुराई, नम्रता
या व्यवहार कुशलतासे उस कलहके कारणको ही मिटादे।
यह थोडासा गृह-कलह क्या क्या खेल दिखलाता है सो
हमारे शास्त्रोंमें ख्व वर्णित है । जिस घरमें लडाई झगडे
हुआ करते हैं, वहासे सारी ऋद्धि सिद्धियां चल बसती
है-तुलसीदासजीने एक स्थानमें कहा है “जहा सुमति
तह सम्पति नाना, जहां कुमति तहे विपति निदाना ॥"
इसके सैकड़ों दृष्टान्त प्रत्यक्ष देखनेमें आते है विशेष कहनेकी
आवश्यकता नहीं है।
स्त्रियोंका पातिव्रत धर्म पालन करना पहिला और सर्व
श्रेष्ठ कर्तव्य है । पतिव्रता स्त्रियोकी कीर्तिसे ही आज तक
भारत, नैतिक आदर्शमें सबसे आगे है । जैसे मोतीका
पानी-आव-के कारण मूल्य है वैसे ही स्त्रीका पातिवतके
धर्मरूपी पानीके कारण मूल्य है । यद्यपि सती पतिव्रताओंको
अपने इस उज्वल धर्मकी, इस अनोखे रत्नकी, रक्षाके निमित्त
बड़े बड़े कष्ट सहना पड़े है, पर धन्य है उन देवियोंको कि,
जिनने सर सहा, पर अपने पातिव्रत धर्मको न छोडा ।
सीताने अपने इसी धर्मकी रक्षाके लिए कठिन बनमें जाना
स्वीकार किया; रावणके बन्दीगृहके कष्टोंको भी कुछ न
और अन्तमें उसी पातिव्रत-धर्मकी परीक्षा निमित्त

स्त्री शिक्षा ।
२७
-RAMA
अनिकुंडमें प्रवेश किया । पर वाहरे शीलधर्म । तूभी
क्या वस्तु है। कि देवोंने उस अग्निको सरोवर वनाके
सीतादेवीका यश, चिरकाल के लिए ध्रुव कर दिया । क्या
सीता जैसी सतियों, संसारमें पुनः पैदा हो सकती है "
क्या वर्तमान कालकी स्त्रियोंमेंसे कोई अपनी छाती पर हाथ
रखके यह कह सकती है, कि यदि कर्मयोगसे उसपर सीता
ही जैसी विपचि पड़े तो वह अपने शील धर्म पर आच
न आने देगी? मैना सुन्दरी जैसी परम पतिव्रता स्त्री
सराहने योग्य है, जिसने अपने कोही पति श्रीपाल और
उनके ७०० अंग-रक्षक योद्धाओंका अपने मनोयोग और
अपनी अमतिम सेवा सुश्रूपासे कुष्ट रोग दूर किया था। सती
अंजनाने भी २२ वर्ष तक अपने पति द्वारा घोर तिरस्कार
और कष्ट पाया, पर अपना स्नेह और धर्म जहा का तहा
अटल रक्सा । अन्तमें अपनी इस कठिन तपस्याका फल
पतिप्रेमके रूपमें पाया था।
कुलवती नामक एक सीने पतिकी आज्ञासे अपना
सारा जेवर पिताके यहाँ रख दिया और अनेक कष्टदायक
सुदूर विदेशमें अपने पतिके साथ चली गई। आज
तो कुछ विचित्र ही अवस्था है । स्त्रिया सब कुछ छोड
सकती हैं पर जेवर नहीं छोड़ सकती । अनेक स्त्रिया तो
अपने पतियोंको गहनोके हेतु ऐसा तग करती है कि

३० श्रावक वनिता बोधिनी। हो जाते है। ऐसा विचार कर व्यभिचारको दूरसे ही छोडो और शील-व्रतको तनमनसे निरतिचार पालो जिससे तुम सांसारिक सुखोंके अतिरिक्त मोक्ष सुखकी अधिकारिणी होओ। शीलगुणके साथ ही साथ त्रियोंको शान्त स्वभावी और विनयी होना आवश्यक है । बुद्धिमती स्त्री वही है जो अपने सुस्वभावके कारण सारे कुटुम्पको मिय होती है, सबसे प्रिय वचन वोलती तथा सवका आदर करती हैं; किसीके कटु बचन सुननेपर भी क्रोध नहीं करती और सदा काल हँसमुख रहती है । जिससे उसकी ही नहीं किन्तु उसके माता पिताकी भी प्रशंसा होती है । कोई कोई कर्क- शाएं अपने कुटुम्बसे तथा पतिसे सदा नागज रहती है, कभी भी प्रेमसे नहीं वोलती । यदि बोले भी तो शेरनीकी तरह खानेको दौड़ती है; परन्तु अन्य जनोसे बड़े प्रेमसे बोलती हैं, ये लक्षण कुलटा स्त्रियोंके हैं। कोई कोई स्त्रिया तो ऐसी जड चुद्धि होती है, कि घरकी देवरानी, जिठानी, सास और ननद आदिसे और बांधती, बोलती तक नहीं, पर दूसरी अयोग्य स्त्रियोंसे वडाही संबंध रखती है, ऐसी स्त्रियोंकी गृहस्थी शीघ्र ही वरवाद हो जाती है और वे जन्म भर दुग्ख भोगती है । उन्हें चाहिए कि ससुरको पिताके और सासको माताके समान समझें । तथा अन्य कुटुम्बी जनोको

स्त्री शिक्षा ।
यथोचित आदर, स्नेह और विनयकी दृष्टिसे देखे । सबसे
प्यारसे गोलें और उनकी उचित आज्ञाओंको, भूलकर
भी न टालें। स्त्रियोंको विचारनेकी बात है कि हमारे
पतिके बचपनसे ही सास ससुर यह बात विचार कर
सुश होते हैं, कि बहू आकर घरका सब काम सम्हालेगी
और हमारी सेवा करेगी। इसी हेत उन्होंने तन, मन और
धन संबंधी नाना कष्ट भोगकर भी तुम्हारे पतिकी
सेवा की है। उन्हें यही आशा थी कि ये हमारे बुढापेमें काम
आवेंगे, अब उनकी गिरती अवस्थामें उनकी सेवा करनेका-
उनको की हुई सेवाके प्रति फल देनेका-अपने कर्तव्य
पालनेका-अवसर आया है । तुम्हारा सौभाग्य है, फि सास
ससुर आदि गुरुजनोंके कारण तुम्हारी गृहस्थी मुशो-
मित हो रही है । सदा हर्ष पूर्वक उनकी सेवा करो, जिससे
उनका मन किंचितभी दुखी न होने पावे । तुमको इतना
तो विचारना चाहिए कि तुम्हारे सास ससुर अपने लड़केको
अर्थात तुम्हारे पतिको पालनपोपण करके हृष्ट पुष्ट और
पढ़ा पढा करके गुणवान न करते तो आज तुम अपने
पतिका ऐसा सुख कहाँसे भोगतीं ऐसे ही अनेक कारण
है, जिनसे सास ससुरका तुम्हारे ऊपर वढा उपकार है।
जो स्त्रियां ऐसे परमोपकारको भूल जाती हैं, और उनकी
सेवा टहल नहीं करतीं वे दुष्टाए कृतम और निन्दनीय हैं।

श्रावक वनिता बोधिनी।
.
जो खिया अपने दुष्ट स्वभावके कारण गुरुजनोंकी सेवा
नहीं करती, वृद्धावस्थामें उनका निरादर करती, कठोर
वचन कहती-गालियां देती-दुतकारती-अति परिश्रमका काम
लेती-पेटभर खानेको नहीं देती, और जो देती भी तो रूखा
मुखा और बुरामला-अथवा रुपये-पैसे, कपडे-लते आदिसे
तंग करती है, वे मूर्खाए द होनेपर, अपनी बहूवेटियो द्वारा
ठीक इसी तरह कष्ठित और तिरस्कृत होती है । संभवतः
निस्सन्तान होती, और एक न एक आधिव्याधिके पाले
पडी ही रहती है । अतएर प्रत्येक बहूवेटीको ऐसा बर्ताव
करना चाहिए, जिससे कुटुम्बकी सुख सम्पत्ति वढे । घरमें
जैसी कुछ रूढि चल जाती है फिर घरके छोटे बडे सब
उसीके अनुसार चलने लगते है । इस विषयमें एक छोटीसी
कथा इस प्रकार है, कि कंचनपुरनामक नगरमे एक कुटुम्ब
रहता था। जिसमें सेठ धनपाल, सुभद्रा सेठानी, वसुपाल
पुत्र और अविनीता नामक पुत्र वधू थी । एक समय
सेठ धनपालने, अपनी अति वृद्धावस्था जानकर, घरका
सब कारोबार अपने पुत्र बसुपालको सौंप दिया; और
आप शेप आयु निराकुलतासे धर्म व्यानपूर्वक व्यतीत
करनेको उद्यत हुए । थोडे दिन व्यतीत होते ही पुत्र वधु
अविनीता अपने पतिको सर्वस्वका स्वामी समझ अभिमानमें
आ गई और मूर्खतासे सास ससुरका तिरस्कार करने लगी।

स्त्री शिक्षा। ३३ - उन्हें रसोईमेंका बचाखुचा रूखा सूखा भोजन देने लगी सो भी मिट्टीके ठीकरों में और तनिक सा | उतनेसे भोज- नमे उनका पेट भरेगा कि भूखे रहेंगे, इसकी उसे चिन्ता नहीं थी । उनके पहिनने, ओढने और विछानेको भी फटे पुराने कपड़े दे, नाना प्रकारके तिरस्कारपूर्ण वचन कहे, इस प्रकार वेचारे सेठ सेठानी अति दुखी हो गए। वसुपाल भी माता पिताकी कभी सुधि न ले क्योंकि वह पक्का स्त्री-भक्त था । देखो तो ससारका स्वार्थ, कि जिन माता पिताने जन्म दिया, वचपनसे पालापोपा और पढा लिखाकर योग्य बनाया, उन्होंके लिए यह व्यवहार, उन्हींकी यह दशा, खेद । कितने ही पूज्य पुरुपौकी इसी प्रकार पत्नी-सेवक कुपूतों द्वारा अवमानना हो चुकी है, हो रही है और होगी। सेठ वेचारेने तो शान्तिमय जीवन विताना चाहा था, पर यह सारे संसारकी अशान्ति मानो उसपर टूट आई । भाग्यसे चमुपालको पुन-प्राप्ति हुई । पुत्रका नाम रक्खा गया गुणपाल । गुणपाल जर वडा हुआ तो श्रीनगरफे सेठ जिनदासकी पुत्री विनयसुन्दरीके साथ विवाहा गया। सेठ जिनदास बडे धर्मज्ञ और अनेक शास्त्रोके मर्मज्ञ थे। उन्दोने अपनी पुत्री विनय सुन्दरीको लौकिक और धार्मिक दोनों प्रकारकी शिक्षाए भली भाति दिलाई थी, जिससे उसके गुण अन्य पुत्र पुत्रियोंके लिए ३

३४
आवक वनिता बोधिनी।
,
उपमा देने योग्य हो गए थे । जब यह विनयसुन्दरी, पतिके
घर आई, तो अपनी सास अविनीताका चरित्र देख दग
हो गई । परन्तु करे क्या, प्रथम तो सासूकी विनयका
ध्यान, दूसरे नवागता होनेके कारण प्रत्येक वातके कहने में
संकोच । परन्तु उसे अपने अजिया ससुर ( पतिके
दादा) और अजिया सास (पतिकी दादी) का दुख
देख कर चैन न पड़े । वह और सभी बातोंसे चित्त हटा
कर सदैव इस बातके विचारमें दत्तचित्त रहने लगी, कि
किस उपायसे इनका दुख दूर करूं । पढी लिखी और
विद्वान तो वह थी ही, एक युक्ति उसने निकाल ही ली ।
अर्थात् वे ठीकरे जो उन दृद्ध दुखियाओंके भोजन कर
लेनेपर फेक दिए जाते थे, जोड़ जोड़ कर घरके एक
कोनेमे रखने लगी । एक दिवस अविनीताने उन घडोके
टुकड़ोंको इकट्ठा देख विनयसुन्दरीसे पूछा-ये तूने क्यों
इकडे किये हैं ' उसने विनयपूर्वक उत्तर दिया कि सासूजी !
अपने कुलकी रीति तो करनी ही पड़ेगी; उसीकी ये तैयारी
है । आप और ससुरजी भी कभी बूढे होंगे तब रूखा
सूखा भोजन परोसने के लिए इन ठीकरोंकी जरूरत पड़ेगी।
इसी लिए इन्हें एकत्र कर रही ह । सुनकर अपिनी-
ताकी आखें खुल गई । उसने उसी घडीसे सास ससुरके
खान पान और पहिनने ओढनेका उत्तम प्रबन्ध कर दिया,

स्त्री शिक्षा। na vran - 4 nema AVv NA न और अपने पति को भी उनकी सेवा करनेके लिए उत्सा- हित किया । फिर तो सेठ सेठानी धर्ममें तत्पर हुए । ये मव करतूतें विनयसुन्दरीके सद्गुणोंकी थीं, जिनके कारण कुटुम्समे उत्पन्न हुआ एक महाकुलक्षण शान्त हो गया। सेठ सेनानीने सन्तुष्ट होकर विनयसुन्दरीको लौकिक पार- लौकिक सुखोंकी मासिके लिए आशीर्वाद दिया। स्त्रीको अपने पतिकी आज्ञाकारिणी और उसके सुख दुखकी साथिन होना योग्य है क्योंकि पतिके सुखी रहनेसे ही स्त्रीका जीवन सफल है । जिस प्रकार प्राणियों के शरी- रका मूलभूत जीव है, उसी प्रकार स्त्रीका मूलभूत पति है । पत्तिके विना स्वीका जीवन वृथा है । इस हेतु पतिको सदैव प्रसन्न रखना स्त्रीका कर्तव्य है । स्त्रीको कभी भी पतिकी आज्ञा भंग नहीं करनी चाहिए । सदेव उसके योग्य-सत्कार और विनयका ध्यान रखना चाहिए। कभी भी पतिसे बडे स्वरमें नहीं बोलना चाहिए । पतिके आसनसे ऊँचे आसन पर भी कमी न बैठना चाहिए । पति के नाराज होनेपर स्त्रीको शान्ति धारण करनी चाहिए। क्योंकि स्त्रीके शान्त न रहने- पर कलह बहुत बढ जाता है । जब पतिका कोष ठंडा पड जाय तर नम्रतापूर्वक ठीक ठीक बात समझाये। यदि अपना अपराध निकले तो पतिसे क्षमा मांगे । जव पति दो चार मनुष्योंके पास बैठ, पातचीत करता हो, तो किसी वस्तु के

३४
आवक वनिता बोधिनी।
उपमा देने योग्य हो गए थे । जब यह विनयसुन्दरी, पतिके
घर आई, तो अपनी सास अविनीताका चरित्र देख दंग
हो गई । परन्तु करे क्या, प्रथम तो सासूकी विनयका
ध्यान, दूसरे नवागता होनेके कारण प्रत्येक वातके कहने में
संकोच । परन्तु उसे अपने अजिया ससुर ( पतिके
दादा) और अजिया सास (पतिकी दादी) का दुख
देख कर चैन न पड़े । वह और सभी वातोंसे चित्त हटा
कर सदैव इस चातके विचारमें दत्तचित्त रहने लगी, कि
किस उपायसे इनका दुख दूर करूं । पढी लिखी और
विद्वान तो वह थी ही, एक युक्ति उसने निकाल ही ली ।
अर्थात् वे ठीकरे जो उन वृद्ध दुखियाओंके भोजन कर
लेनेपर फेंक दिए जाते थे, जोड़ जोड़ कर घरके एक
कोनेमें रखने लगी । एक दिवस अविनीताने उन घडोंके
टुकड़ोंको इकट्ठा देख विनयसुन्दरीसे पूछा-ये तूने क्यों
इकडे किये हैं ' उसने विनयपूर्वक उत्तर दिया कि सासूजी !
अपने कुलकी रीति तो करनी ही पड़ेगी, उसीकी ये तैयारी
है । आप और ससुरजी भी कभी बूढे होंगे तब रूखा
सूखा भोजन परोसने के लिए इन ठीकरोंकी जरूरत पड़ेगी।
इसी लिए इन्हें एकत्र कर रही हूं । सुनकर अविनी-
ताकी आखें खुल गई । उसने उसी घडीस सास ससुरके
खान पान और पहिनने ओढनेका उत्तम प्रबन्ध कर दिया,

स्त्री शिक्षा। ३५ Pim प लार अपने पतिको भी उनकी सेवा करनेके लिए उत्सा- हित किया । फिर तो सेठ सेठानी धर्ममें तत्पर हुए । ये सब करतूतें विनयसुन्दरीके सहणोंकी थी, जिनके कारण अदुम्समे उत्पन्न हुआ एक महाकुलक्षण शान्त हो गया। सेठ सेसनाने सन्तुष्ट होकर पिनयसुन्दरीको लाफिक पार- लौकिक सुरोंकी.माप्तिके लिए आशीर्वाद दिया। स्त्रीको अपने पतिकी आज्ञाकारिणी और उसके सुख दुवकी साथिन होना योग्य है क्योंकि पतिके मुखी रहनेमे ही स्त्रीका जीवन सफल है । जिस प्रकार प्राणियोंके शरी- रका मूलभूत जीव है, उसी प्रकार स्वीका मूलभूत पति है। पतिके बिना स्त्रीका जीवन वृथा है । इस हेतु पतिको सदैव प्रसन्न रखना स्त्रीका कर्तव्य है । स्त्रीको कभी भी पतिकी आज्ञा भग नहीं करनी चाहिए । सदैव उसके योग्य-सत्कार और विनयका ध्यान रखना चाहिए। कभी भी पतिसे कडे स्वरमें नहीं बोलना चाहिए । पतिके आसनसे ऊँचे आसन पर भी कभी न पैठना चाहिए । पति के नाराज होनेपर स्त्रीको शान्ति धारण करनी चाहिए। क्योंकि स्त्रीके शान्त न रहने- पर कलह बहुत बढ जाता है । जब पतिका क्रोध ठंडा पड जाय तर नम्रतापूर्वक ठीक ठीक बात समझाये। यदि अपना अपराध निकले तो पतिसे क्षमा मांगे । जब पति दो चार मनुष्यों के पास बैठ, बातचीत करता हो, तो किसी वस्तु के .

- श्रावक वनिता बोधिनी। " लानेकी वात न कहे, न कहलावे। यदि किसी वस्तु की आव। श्यकता हो तो उचित समयमें अच्छे ढंगसे कहे और प्रत्येक व्यवहार ऐसी नम्रता और सुशीलतासे करे कि पतिका चित्त प्रसन्न और सन्तुष्ट रहे । यदि घरमें सुयोग्य गृहणी हो तो पति वाहिरसे कैसा ही खेदखिन्न आवे, घरमें आते ही प्रसन्न हो जायगा । कोई मुर्ख स्त्रिया पतिके भोजन करते समय अपने गहनोंका प्रस्ताव छेडता है, कोई किसी वस्त्र वनवाने के लिये कहती है, अथवा देवरानी-जेठानीकी घी-तेल, और अनाजकी तथा न जाने कहा कहाकी जिक्र छेड़ती हैं कि, जिससे पति भरपेट खा भी नहीं सकता। या तो उस समय बिलकुल मौन रहना चाहिए अथवा कोई धार्मिक या व्यावहारिक कथा छेडनी चाहिए। पर खूब स्मरण रहे, कि उस कथामें शोक, दुःख, चिन्ता घृणा आदि बिलकुल न हो, किन्तु प्रेम, धर्म, नीति, किंचित हास्य आदिकी मात्रा हो । साराश यह कि भोजन करते कराते समय पति पत्नी खूब प्रसन्न रहें । जो स्त्री अपने पतिके सुखमें सुखी, और दुःखमें दुखी होती है-उसे माणाधिक समझ सेवामें तत्पर रहती है वही कुल- लक्ष्मी है-पही सती पतिव्रता है। यदि पतिको व्यापारमें हानि हुई हो या कोई दैवी आपत्ति आई हो, तो स्त्री अपने वस्त्राभूषणोंका मोह छोड़ दे और यदि उनसे पतिको कीर्ति रहती हो तो रक्खे-इज्जत बचावे। अपने घरकी बात भूल- , ,

स्त्री शिक्षा
३७
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कर भी वाहिर न कहे । घरमेंसे न देने योग्य ऐसी कोई
बीज किसीको न दे अथवा न बेचे, जिसपर पति आदि
कुटुम्बियोंके रुष्ट होने की संभावना हो । सदा अपने गृहस्थी-
सम्बन्धी हानि लाभका विचार रक्खे । क्योंकि पति कैसा
को कमाऊ क्यों न हो, यदि त्रियां घरको सम्हाल के न
बलावे तो बढती नहीं हो सकती । प्रत्येक स्त्रीका कर्तव्य
कि खर्च बड़ी ही सावधानी और चतुराईसे करे; सदैव
समुचित वचत करती रहे । यदि दुर्भाग्यसे किसी स्त्रीको
व्यसनी, आलसी, और अधर्मी आदि पति मिले तो उसे येन
केन प्रकारेण सुमार्ग पर लावे; परलोक व धर्ममें रुचि उत्पन्न
कराने का उपाय करे । फिसीको धर्म मार्गपर लगा देना
बड़े ही पुण्यका कार्य है, और फिर लगानेवालेमें भी इतनी
योग्यता होनी चाहिए । गरज यह कि, स्त्रियोंको वचपनसे
ही ज्ञान संपादन कर रखना चाहिए ताकि समय समय
पर उसकी सहायतासे कठिनाइयों पर विजय पाती रहें।
स्त्रियोंको साधारण-जितनी कि उन्हें आवश्यक है-
वैद्यक-विद्या सीखनेकी भी वडी आवश्यकता है । यदि इस
विषयकी शिक्षा लियोने नहीं पाई है तो अपने कर्तव्यामसे
एक सबसे बडा कर्तव्यपालन-सच्ची माता होना, बालबन्नोंकी
रोग चर्या और औषधि आदि करना नहीं कर
सकनी और अपना भी रोगोंसे बचाव नहीं कर सनी ।

३८
आवक वनिता बोधिनी।
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।
इसी लिए इस स्थान पर कुछ ध्यान देने योग्य बाते
लिखी जाती है।
(१) गर्मी-शरीरमें अधिक तापके लगनेसे हृदय मुख
जाता है, जिससे मूर्खता, और दुर्वलता आदि नाना रोग
उत्पन्न हो जाते हैं । इसलिये वाल वच्चोका और अपना भी
गर्मीसे बचाव करना चाहिए।
(२) सरदी-ज्वर, वात, शरीरमे दर्द, पेटमें पीड़ा
इत्यादि रोग सर्दीक दोषसे होते है । उष्ण-देशके रहने
वालोंको बहुधा अधिक सरदी हो जाया करती है । इसका
कारण यह है, कि वे गर्मीसे व्याकुल हो असमयमें ही
शरीरको ठंड लगा देते है । अधिक परिश्रम करके आने
पर शीघ्र ही कपड़े उतार डालना, अथवा जल पी लेना,
ओस पडनेकी जगह सोना, सोते समय अधिक ठंड लगने
देना, वर्षाकालमें शरीरको हवा लगने देना, ठंडमें कपड़ोंका
कम पहिनना, शीत ऋतुमें ठंडे जलमे बहुत देर तक नहाते
रहना, आदि बातोंसे सरदी हो जाया करती है । कभी कभी
इस सरदीसे ही प्राणघातक रोग हो जाते है अतएव इससे
वचावका सदा व्यान रखना चाहिए।
(३) पीनेका जल-जीवन धारण करनेकैलिये जल
एक मुख्य पदार्थ है वहती हुई नदी, और अधिक तर गहरे
कुओका पानी साफ होता है। जलको सदा छान कर पीना

स्त्री शिक्षा।
३९
'
चाहिए, जिससे कूड़ा-कचरा और जीव-जन्तु आदि पीनेमें
न आवें । जलके पात्रोंको सदा ढके रक्खो । पाखानेसे
आकर कभी पानी मत पियो । भोजन करते समय भी
अपनी तासीरके अनुसार पानी पीना चाहिए, जिससे कि
पाचनक्रिया अच्छी हो । निराहार पानी पीने, खडे खड़े
पानी पीने, धूपमेसे आकर एकदम पानी पी लेने आदिसे
तिल्ली-(प्लीहा) बढ़ जानेका डर रहता है और दूसरे संघातक
रोग भी हो जानेका भय रहता है । इसलिए पानीकी
अशुद्धता, और दुरुपयोगसे बचना चाहिए।
(४) भोजन-यह मनुष्यके जीवनका आधार है अतः
इस पर विशेष ध्यान देनेकी आवश्यकता है । भोजनका
स्थान साफ हो, छतमें कीड़े मकोड़ोंसे बचावके लिए एक
कपड़ा वधा हो, प्रकाश और वायुके लिए पूरा पूरा प्रबंध
हो । सामग्री ऋतुके अनुसार और ताजी हो । भोजन
करने के पीछे ही नहा लेना मंदाग्निका रोग उत्पन्न करता है ।
भोजन करते ही काममें लग जाना भी कुछ हानिकारक है ।
भोजन के पीछे किंचित विश्राम लेनादाय-बॉयें करवटसे लेटना
चाहिए। परन्तु यद्द विश्राम पन्द्रह वीस मिनिटसे अधिक न
हो, अथवा नींदके रूपमें भी न हो । फिर परिश्रममें लगना
चाहिए। कथा, और चासी भोजन करनेसे पाचनशक्ति घटती
और उदररोग पैदा होते है, पुद्धि भी न्यून होती है ।
,

४० श्रावक वनिता बोधिनी। भोजन उतना ही बनाना चाहिए, जितना आवश्यक हो और वासी न बचे। (५) वायु-प्रत्येक मकानमें वायु और प्रकाशका पूरा प्रबंध हो । पाखाना, सोने और खानेके घरसे दूर हो तथा उसके झाडने आदिका पूरा प्रबंध हो । गोगाला भी हमारे सोनेके घरसे जुदी हो । सोनेके घरमें ज्यादा और व्यर्थ- का सामान नहीं रहना चाहिए । घरके आस पास कोई ऐसी मैली नाली या गली-कूचा न होना चाहिए जो मैला रहता हो । मकान प्रति दिन पूरा पूरा झाडापूंका जाना चाहिए । खिड़कियोंका भी यथोचित प्रबन्ध हो । (६) निद्रा-दिनभरके परिश्रमकी थकावटको दूर करने के लिए विश्राम लेना आवश्यक है और यह वात निद्रासे भली भांति पूर्ण हो जाती है । यथोचित निद्रा आनेसे बहुतसे रोग नहीं होने पाते। रातमें बहुत जागने या भली भाति निद्रा न लेनेसे शरीर अकड़ने लगता है, देह टूटती और आलस्य आता है, तथा काम करनेमें भी जी नहीं लगता । योग्य रीतिसे निद्रा लेना जरूरी है। सीले स्थानमें अथवा विना कुछ ओढे सोना हानिकारक है। पौ फटनेके पहिले ही शय्या त्याग देना आरोग्यमद है। (७) व्यायाम याने कसरत-अंगमत्यंगोंको चलाये विना शरीरमें फुर्ती नहीं आती । बचोंको भी भले प्रकार -- म्री शिक्षा। mat. कुदकने और खेलने देना चाहिए; यही उनका व्यायाम है। दिनरात उन्हें गोदीमें लिए रहना जान बूझकर बीमार बनाना है । स्त्रियों को पुरुषोंकी नाई दड पेलना और बैठके लगाना आवश्यक नहीं है, घरका झाडना बुहारना, पानी भरना, कपडे छाटना (धोना), पीसना आदि ही उनका व्यायाम है । जो स्त्रिया घरके इन कामोंके करनेसे वंचित रहती हैं वे ही प्रायः अधिक रोगी हुआ करती है, और थोड़े समय जीती है । कामधाम करनेवाली स्त्रियां नीरोग रहती है, इसलिये उन्हें इस जीवनमें सुख मिलता है; पर- लोकको भी नीरोग रहने के कारण वे सुखकी कमाई कर सकती हैं। कुछ साधारण और शीघ्र शीघ्र हो जानेवाले रोग और उनकी औषधियां भी जान लेना स्त्रियों को जरूरी है। बचपनमें बच्चोंको दॉत, ज्वर और खांसी आदि हो जाया करती हैं तथा यदि उपाय न किया जाय तो एक बडे रोग बदल जाती हैं। मूर्ख माताएं भूत-प्रेत या नजर आदिके भ्रममें पद, कभी कभी अपने बच्चोंसे ही हाथ धो बैठती है। कुछ रोगोंकी पहिचान और उनकी ओपधियां नीचे लिखी जाती है। सांसको पहिचान-जब सास लेते समय वालककी नाकसे सुर जल्दी जल्टी चलकर फैलता हो तो जान लो ४२ श्रावक वनिता बोधिनी । कि इसकी छातीमें दर्द है। छातीमें दर्द होनेसे आंखें पथराने लगती है, सांस लेनेमें पीडा होती और पेट फूल जाता है । होठ पीले पड़ जाते तथा मुंह लाल और सफेद पड़ जाता है । ऐसी अवस्थामें घबराना नहीं चाहिए, किन्तु योग्य वैद्य, डाक्टर या हकीमसे इलाज कराना चाहिए । आंखोकी पहिचान-जब शरीरकी हालत अच्छी होती है तो आँख साफ रहती है । जब त्योरी वदले या आंख मैली रहे तो जानना चाहिए कि बच्चेके सिरमें, बीमारी होनेवाली है। नींदका न आना-जब वालकको ठीक ठीक नींद न आवे, तब जानना चाहिए कि उसका स्वास्थ्य विगड़ा हुआ है । इसी प्रकार जब वालक मामूलीसे ज्यादह रोवे तो जानना चाहिए कि बालक बीमार पड़नेवाला है। खॉसी-चालकको जब सरदी होती है तब वह वार चार खॉसता है और उसकी आवाज बैठ जाती है । खांस- नेसे कभी कभी पसली भी चल निकलती है । माता या चेचक-बच्चोंको चेचक निकलनेके पहिले टीका लगवाना याने गोदवाना आवश्यक है *। - * हाथ पर चीरा लगवाना । इस विषयमें अनेक विशेषज्ञोंका मत है कि टीका कदापि लाभदायक नहीं है । उलटी हानिकी सभावना ही लाभसे कई गुनी भधिक है। मशोधक!

स्त्री शिक्षा।
४३
- -
जो लोग लाह-प्यार या मूर्खतासे टीका नहीं लगवाते
वे पीछे पछताते हैं। माता निकलनेके दो तीन दिन पहिलेसे
ज्वर आता है, दिलपर घबराहट और वेहोशी होती है,
तीसरे दिन वदन लाल पड़ जाता और माथेपर ग्वसखस
जैसे छोटे छोटे दाने (फुन्सियां) दिखाई देते है। यह
दशा उस चेचककी है जो टीका लगानेके भी पीछे सभी
कमी निकलती है। यदि रीका न लगा हो तो चेचक बढ़े
जोरसे निकलती है। मूर्ख स्त्रिया इसका मूल कारण तो
जानती नहीं समझती है कि यह शीतला देवीका कोप है,
और इसलिए शीतला देवीकी पूजा-अर्चा किया करती
है, जिससे कोई लाभ नहीं होता । माताकी बीमारी, बोंमें
माताके पेटकी गर्मीसे होती है। माताके पेटकी गर्मी ही
कारण पाकर इस विकारके रूपमें निकलती है। इसीलिये
इसका नाम 'माताकी वीमारी' पड़ा है। तर और शीतल
भोजनादि देनेसे शीघ्र और सरलता पूर्वक यह विकार
निकल जाता है-गान्त हो जाता है । बुद्धिमान स्त्रिया
देवियोंके मठों में नहीं दौड़ी फिरती; किन्तु समझ बूझकर
इलाज करती है, और रोग शीघही आराम कर लेती हैं।
यदि चालककी ढूंठी (टुंडी-नामि)पा जाय तो दीवेका
(दीपकका) तेल लगावे या हल्दी, लोध ( पसारियोंके यहां
मिलनेवाली एक औषधि ) और नीमके फूल, बारीक पीस-~

आवक वनिता बोधिनी । NA AAA कर लेप करे । यदि वालक दूध न पीता हो, तो पहिले यह जानना आवश्यक है कि किस पीडासे दूध पीना बन्द हुआ है ? जिस अंग पर बालक बार वार हाथ फेरता हो, उसी स्थान पर दर्द समझकर शीघ्रही, उसका योग्य इलाज करना चाहिए । यदि हॅसली चल गई हो तो दाईको बुलाकर मलवा देनेसे आराम हो जाती है। यदि कागला वढ गया हो तो चूल्हेकी राख और काली मिरच पीसकर, अंगुली पर लगा, चतुराईके साथ उसे दवा देवे । कभी कभी बालककी आँखे गमी, सर्दी या दांत निक- लनेके सबव दुखने लगती है; तव रसोत (पंसारियोंके यहां मिलनेवाली एक औषधि ) पानीमें घिसकर आख पर लेप करे । आखके भीतर भी एक बूंद डाले । संभवतः तो इसी दवाईसे बालककी ऑखे अच्छी हो जायेंगी । अथवा पीली मिट्टीकी टिकियाँ बनाकर घड़ेपर रख दे, और रातको सोते समय आंख पर बांध दे । इस गीतसे ऑखोंका दुखना शीघ्र आराम हो जाता है । यदि वालकको खासी हो जाय तो सोते वक्त उसके मुंहमें अनारका छिलका दवा दे, अथवा भूभलमें सिके हुए-भुने हुए-बहेड़ेके छिलकेका चूर्ण वालकको चटावे । यदि वालकको पेशारके साथ खून आता हो तो पाषाण भेद और साटा पानीमें पीसकर पिलावे । यदि दस्तमें

स्त्री शिक्षा।
आँच आती हो तो वायविडंग, पीपल, अजमोद, कुडकुडेके
बीज और सफेट जीग पानी में पीस मिश्री मिलाकर पीनेको
दे। यदि ऑव खूनके साथ आती हो तो कचो पकी सौंफ
पीसे और उसमें कच्ची खांड मिलाकर चूरणकी भाति खाने-
को दे । अथवा साठका मुरब्बा खिलावे । यदि बालकको
ज्वर आता हो तो ऐसी दवा देनी चाहिए, जिससे कुछ
दस्त होकर पेटका विकार निकल जावे ।
दाँतोंको सहज रीतिसे निकालनेका यह उपाय है कि
धावडेके फूल और पीपलको आवलेके रसमें मिलाकर बचे के
ममूडों पर मले । यदि पेशाब वन्द हो गई हो तो टेसूके
(पलाश-छेपला) फूलोको बालकके पेडू पर लेप कर दे। जहा
तक होसके बालकों को जल्दी पचनेवाला ताजा भोजन देना
चाहिए। जिससे ये निरोग रहे । यदि कोई रोगभी हो
जाय तो धीरता पूर्वक आपही व किसी अच्छे वैद्य द्वारा
दवाई करे । क्योंकि मूर्खता यश अधीर होने और धूर्त
दोगियोंके मंत्र जत्रों में पडनेसे हानिके सिवा कुछ भी लाभ
नहीं है। इस लिए प्रत्येक पातकी वास्तविकता जाननेके
लिए सदैव अच्छी अच्छी पुस्तकें पढती रहनी चाहिए।
इससे सासारिक सुखोंके सिवाय पारमार्थिक सुखोंकी भी
प्राप्ति होती है। यहा मसगवश यह मातभी कह देना योग्य
है कि कोई खिया दिना आगा पीछा सोचे ही दो-दो

आवक वनिता बोधिनी।
।
चार-चार वर्षकी अवषितक व्रत आदि करनेकी प्रतिज्ञा
कर लेती हैं। ऐसी ही अवस्थामें यदि गर्भ रह जाता है
तो गर्भको इन व्रत उपवासोंसे बड़ा ही कष्ट होता है।
बेचारी बडे धर्म-संकटमें पड़ जाती हैं-प्रतिज्ञा भी तोड़
नहीं सकतीं और गर्भका कष्ट भी देख नहीं सकती।
उत्साहके वशवर्ती हो हमें कोई प्रतिज्ञा नहीं करनी चाहिए।
द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव, संहनन व शक्ति देखकर ही कोई
प्रतिज्ञा करो । कुछ मेरा यह कहना नहीं है कि व्रत
उपवास करो ही मत । नहीं, करो; पर भले प्रकार आगा
पछिा सोचकर ।

स्त्रियोंकी नित्यचा।
तृतीय प्रकरण
स्त्रियोंकी नित्यचर्या
दोहा-गृही श्राविकाकी किया, चहिए यत्नाचार।
ताको वर्णन करत कछु, निरखि श्रावकाचार ।।
जल छानन, तजि निशि-असन, श्रावक चिन्ह जु तीन ।
प्रति दिन दर्शन जो करे सो जैनी परवीन ॥
खियोंको उचित है कि सूर्योदयकै पूर्व शय्यासे उठ, पच
'परमेष्ठीका स्मरण करें । विस्तरोंको समाल यथास्थान
रख मलमूत्र आदि बाधाओंसे निश्चिन्त हो । अनेक
आलसी स्त्रिया दिन चढे उठती, और विस्तरोंको ज्याके
त्यों छोड़कर और और काम धधोंमें लग जाती हैं । यह
बड़ी अज्ञानता है। स्त्रियोंको पतिसे पीछे सोना और उससे
पहिले उठना चाहिए। गांव के बाहर दीर्घराधाको जाना आरो-
ग्यपद और अहिंसाका कार्य है । दीर्घशंकाको कपडे बदल
फर जाना चाहिए। क्योंकि अपविन हाथों व अपवित्र स्थानके
स्पर्श हो जानेका भय रहता है । शौचादिकका पानी छना
हुआ होना चाहिए । जो धर्वन शौच करनेमा हो उसे
अन्य कामों में, प्रयोग न लायें । शौचके निमित्त जितना

आवक वनिता बोधिनी - पानी आवश्यक हो उतना ही लेना चाहिए । बहुतसे लोग जलकाय-जीवोंकी हिंसाके ख्यालसे पानी थोड़ा लेते है। कि, जिससे अपवित्रता ज्योंकी त्यों बनी रहती है । ध्यान रखनेकी बात है कि, गृहस्थके लिए स्थावर कायकी हिंसामा सर्वथा त्याग करना अशक्य है । परन्तु इसका मतलब कुछ यह नहीं है कि, व्यर्थ ही स्थावर कायिक जीवोंकी हिंसा की जाय । शौचके अन्तमें अवोस्थानको जलके सिवाय प्राशुक और शुद्ध मिट्टी अथवा भस्मसे धोकर शुद्ध करना भी अच्छा है। इसी प्रकार लघुशंकाके पीछे इन्द्री व हाथ- पाव योना आवश्यक है। शौचिक-क्रियासे निपट कर घरको कोमल बुहारीसे बुहारना चाहिए । जितने भी जीव वुहारने पर निकले एक सुरक्षित स्थानमें रख दिए जायें । खजूरकी कांटेदार चुहारी छोटे छोटे जीवोंका बहुत ही संहार करती है, यातो उससे बुहारा ही न जावे, और जो बुहारा भी जावे, तो उसकी एक एक पत्तीको फाडकर चार चार छ। छ: भाग कर दिए जायें जिससे बुहारी कोमल हो जावे । उरई अथवा अम्बाड़ीकी बुहारी वडी ही भली होती है । पश्चात् और भी जो ऐसे काम हो उन्हें दया धर्मका ख्याल करते हुए पूरे करके, छने हुए प्रामाणिक शुद्ध-जलसे स्नान करे । बहुतसे मनुष्य और स्त्रियां विषयसेवन, लघुशंका और दीर्घ

स्त्रियोंकी नित्यंचा ।
--
शंकाके पीछे स्नान और दन्तधापन नहीं करती यह कितनी
मलिनताकी बात है । हो यह जरूर है, कि इन कामों में
अनउने पानीका उपयोग न करना चाहिये । जल छाननेकी
आज्ञा दूसरे धर्ममि भी पाई जाती है । *
इस प्रकार पवित्र हो अपनी योग्यतानुसार मोटा या
पतला, महँगा या सस्ता, स्वदेशी कपडा जो कि शुद्ध और
साफ हो, पहिनकर माशुक द्रव्य-लसंग, बादाम, चॉरल आदि-
लेकर जिन मन्दिर जावे । जिस ग्राममें जिन मन्दिर नहीं
उसमें जैनियोंको वास करना उचित नहीं । यदि याना
या देशाटन के समय दर्शन न मिले तो अशुभका उदय
विचार एकरस छोड़ भोजन करे । पर जो ग्राममें जिन मदि-
रके होते हुए दर्शन पूजन आदि नहीं करतीं वे अनुचित
करती है । प्रत्येक व्यक्तिको भोजनोके पहिले भगवानके
दर्शन और आत्मचिन्तन करनेकी आवश्यकता है । मन्दि-
रको जाते समय कीड़ी, मकोडी, मल, मूत्र आदिको बचाता
हुआ चले । जिससे जीवों की रक्षाके साथ साथ अपनी
रक्षा और पवित्रता रहे । चमटेके जूते पहिन मंदिरको जाना
बुरा है । अच्छा हो, यदि उस समय जूते पहिने ही न
.
*
दृष्टिपूत न्यसेत्पाद, वस्त्रपूत पिवैजल ।
सत्यपूत वदेद्वाक्य, मन पूत समाचरेत् ।।
सवत्सरेण यत्पाप, कुरुते मास्यधिक ।
एकाहेल तदामोति, अपृतजलसग्रही।
(स्मृति)

श्रावक वनिता बोधिनी।
जाएँ; और जो पहिने भी जाएँ तो कपड़ेके । मंदिरमें भवे-
करनेके पहिले जूतोंको ( यदि पहिने हो) उतार, पैरोंक
जलसे
खूब
धोना उचित है । फिर सब भकारकी उद्धतत
और संकल्प विकल्प छोद, जयजिनेन्द्र शब्द करती हु
मतिमाजीके सन्मुख जावे और जयनिस्सहि, जयनिस्सहि,
जयनिस्साहिका उच्चारण कर श्रीजीको तीन बार नमस्कार
करे | जयनिस्सहि ३ के उच्चारणका कारण ऐसा बताया
है कि, यदि कोई देव उस समय दर्शनको आया हो तो
एक ओर हटजाए; तुम्हारा व उसका काम अविच्छिन्न
रूपसे होता रहे-किसीको बाधा न हो।
श्रीजीके सम्मुख खड़ी हो, विचारे " मैं आत्म स्वरूपके
चतानेवाले जिनेन्द्रका दर्शन कर रही हूं। इन्होंने किस प्रकार
कष्ट सहन किये हैं ! कैसे कैसे काँपर विजय पाई है !
कब वह दिन आयगा जब मैं ठीक उसी मार्गपर चलने
लगूंगी जिस पर जिनेन्द्र गए है । मै कैसे कैसे पाप कर
रही हूं, भूल रही हूं, भटक रही हूं, पराएको अपना समझ
रही हु, और स्वमको सच्चा मान रही हूं।
फिर कोई सुन्दर पद, जो तुम्हे तुम्हारी वास्तविकताकी
ओर ले जाय, कहो। और भावोंकी निर्मलतासहित स्तोत्र
पढती, मस्तक नवाती, द्रव्य, क्षेत्र, काल भावके अनुसार
एक द्रव्य या अष्ट-द्रव्यसे भगवानकी भक्तिपूर्वक पूजन

लियोंकी नित्यचर्या । wwwwwwwwwww -~ vv ~-~ vụ Vy Vuvuthựụ करो। फिर भगवानकी तीन प्रदक्षिणा* (भगवानकी दहिनी ओरसे प्रदक्षिणा की जाती है) देवे । प्रदक्षिणा देते हुए प्रत्येक दिशामें तीन आवर्त और एक शिरोनति करे और पश्चात् यह पाठ पढे। श्लोका-दर्शन देव देवस्य, दर्शन पाप नाशनम् । दर्शन स्वर्गसोपान, दर्शन मोक्षसाधनम् ॥ १॥ अर्थ-देवोफे देवका दर्शन पापोंका नाश करनेगला, स्वर्गकी सीढ़ी और मोक्षका साधन है । दर्शनेन जिनेन्दाणा, साधूना चन्दनेन च । न चिर तिष्ठते पाप, छिद्रहस्ते यथोदकम् ॥ २॥ अर्थ-श्री जिनेन्द्रके दर्शन करनेसे और साधुओंकी चन्दना करनेसे पाप बहुत दिनोंतक नहीं ठहरने । जैसे छिद्रवाले हाथमे पानी नहीं उहरता । वीतरागमुख दृष्टा, पद्मरागसमप्रभम् । नैकजन्म कृत पाप, दर्शनेन विनश्याति ॥३॥ पद्मरागके समान शोभित श्री वीतराग भगवानका मुख देखकर अनेक जन्मोंके किये हुए पाप नाश हो जाते हैं। * प्रदक्षिणा देते हुए हाथ जोडे रहना चाहिए। १जोडे हुए हाथ घुमानेसे आवर्त कहते हैं । २ जोडे हुए हाथोपर मस्तक झुका कर रखनेको शिरोनति कहते हैं।

५२ आवक वनिता बोधिनी। दर्शन जिनसूर्यस्य ससारध्वान्तनाशनम् । बोधन चित्तपद्मस्य समस्तार्थप्रकाशनम् ॥४॥ सूर्यके समान श्री जिनेन्द्र के दर्शनसे सांसारिक अंधकार नाश होता है । चित्त रूपी कमल फूलता है और सर्व पदार्थ प्रकाशमें आते है अर्थात् ज्ञात होते है। दर्शन जिनचद्रस्य सद्धर्मामृत वर्पणम् । जन्मदाहविनाशाय, वर्धन सुसवारिधे ॥ ५॥ चन्द्रमाके समान श्री जिनेन्द्र देवका दर्शन करनेसे सत्य- धर्मामृतकी वर्षा होती है । जन्म जन्मकी दाह ठंडी होती और सुख समुद्रकी वृद्धि होती है । जीवादितत्वप्रतिपादकाय सम्यक्त्वमुख्याष्टगुणार्णवाय । प्रशातरूपाय दिगम्बराय, देवाधिदेवाय नमो जिनाय ॥६॥ जो जीवादि सात तत्त्वोंको बतानेवाले सम्यक्त्व आदि. आठ गुणोंके समुद्र, शान्त तथा दिगम्बर रूप हैं; उन देवा- धिदेव श्री जिनेन्द्र भगवानको नमस्कार हो । चिदानदैकरूपाय, जिनाय परमात्मने । परमात्मप्रकाशाय, नित्य सिद्धात्मने नम ॥७॥ जो ज्ञानानंदरूप है; अष्ट कमको जीतनेवाले है, परमा त्मस्वरूप है तथा परमतत्व परमात्माके प्रकाश करनेवाले है उन सिद्धात्माको नित्य नमस्कार हो । अन्यथा मरण नास्ति, त्यमेव शरण मम । तस्माद कापण्यभावेन, रक्ष रक्ष जिनेश्वर ॥८॥ .

स्त्रियोंकी नित्यचर्या । हे जिनेश्वर आपही मुझे शरणमें रखनेवाले हो और कोई शरणम रखने योग्य नहीं है । इसलिये करुणा करके आप ( संसारके पतनसे ) रक्षा कीजिए। नहि त्राता नहि त्राता, नहि त्राता जगत्रये । वीतरागात्परो देवो, न भूतो न भविष्यति ॥ ९॥ तीन लोकमे अपना कोई रक्षक नहीं है !, रक्षक नहीं है!! रक्षक नहीं है। !! यदि कोई है, तो हे वीतराग देव आपही है । क्यों कि आपके समान न तो कोई देव आजतक हुआ और न होगा। जिने भाक्तिर्जिने भक्तिर्जिने भक्तिर्दिने दिने । सदा मेऽस्तु सदामेऽस्तु सदामेऽस्तु भरेभवे ॥१० मैं यह आकाक्षा करता हू कि जिनेन्द्र भगवानमें मेरी भक्ति दिन दिन होती जावे और प्रत्येक भवमें सदा चनी रहे। जिनधर्मविनिर्मुक्तो, मा भवेच्चक्रवर्त्यपि । स्यान्चेटोपि दरिद्रोपि, जिनधर्मानुवासित ॥ ११ ॥ जिन धर्म रहित चक्रवर्ती भी अच्छा नहीं । जिन धर्मका धारी होकर पराया दास तथा दरिद्री होना ही अच्छा है। जन्म जन्म कृत पाप, जन्मकोटिमुपार्जित । जन्ममृत्युजरातङ्क, हन्यते जिनदर्शनात् ॥ १२ ॥ -पर-हाय कुन मृत्य-हुए-भावागमनसे स्टे हुए-जिनेन्द्रमगयान-प्राय की- या पार्थना पूरी करने के नही...--- -सशोधक।

श्रावक वनिता बोधिनी।
MYAM
KAN
जिनेन्द्रके दर्शनमे करोड़ों जन्मके किए हुए पाप तथा
जन्म जरा मृत्युरूपी तीन रोग अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं।
इस प्रकार मन लगाकर दर्शन पाठ पढ़े । फिर
एक तरफ, जहाँसे भगवानकी मुद्रा अच्छी तरह दीखे,
खड़े होकर स्थिर चित्त हो पंचकल्याणक, तथा ध्यान
मुद्राका बार वार स्मरण करे और भक्तिभावसे भगवानके
गुणगावे “कि हे त्रैलोक्यनाथ! हे सर्वज्ञ वीतराग ।
हे देवाधिदेव ! हे अनन्नचतुष्टय मंडित अर्हत भगवान !
तुम्हारी जय हो । धन्य है तुम्हारी ध्यानमग्न मुद्रा और धन्य
है तुम्हारा पवित्र नाम । तुम तरण तारण, अधम उधारण
हो । संसार-समुद्रके पार करने वाले हो । तुम्हें मेरा नम.
स्कार हो । इंद्र इत्यादिसे सेव्य तुम्हारे गुण भला कौन
कह सकता है।
इतना कहने के पीछे यह या ऐसी ही कोई दूसरी
स्तुति पढे:-
स्तुति-
प्रभु पतित पावन हो अपायन, चरण आयो शरणजी।
यो विरद आप निहार स्वामी, मेट जामन मरण जी॥१॥
तुम ना पिछान्यो अन्य मान्यो, देव विविध प्रकार जी।
या बुद्धि सेती निज न जान्यो, भ्रम गिन्यो हितकार जी ॥ २॥
भव विकट वनमे कर्म बैरी, ज्ञान वन मेरे हों।
तब इष्ट भूलो भ्रष्ट हो, नष्ट गति धरतो फिर्यो ॥३॥

त्रियोंकी नित्यचर्या। M धनि घडी अरु धनि दिवस यो हो, धनि जनम मेरो भयो । अब भाग मेरो उदय आयो दरश प्रभुको लख लयो॥४॥ छवि चीतरागी नममुद्रा, दृष्टि नासा पै धरें। वसु प्रातिहार्य अनन्त गुणयुत, कोटि रवि-द्युतिको हरे ।। ५॥ अब मिटो तिमिर मिथ्यात मेरो, उदय रवि आतम भयो । मोहर्प उर ऐसो भयो मनु रक चिन्तामणि लयो ॥६॥ मैं हाथ जोडि नवाय मस्तक, वीनऊ तुम चरण जी । परमोत्कृष्ट त्रिलोकपति जिन, सुनहु तारन तरन जी ॥ ७॥ जांचू नहीं सुरवास परि नरराज पुनिजन साथ जी। बुध जाँचह तुम भक्ति भव भव, दीजिए शिवनाथजी ॥८॥ इस भांति स्तुतिकर तीन आवर्त, एक शिरोनति और अष्टांग नमस्कार पूर्वक दण्डवत परे । फिर नीचेका श्लोक बोलते हुए गधोदक-चरणोदक-हृदय, नेत्र और मस्तकमे लगाये। श्लोक-निर्मल निर्मलीकरण पवित्र पापनाशन । जिनचरणोदक बन्दे, अपकर्म विनाशक । सारठा-जिन तन परम पवित्त परसमई जगशुचि करन । सो धारा मम नित्त, पाप हरौ पावन करी ।। गधोदक लगा अपना सौभाग्य समझे । परन्तु लेते समय इस पातका ध्यान रखे कि गंधोदक एक या दो अंगु- लियोंसे ही लिया जाय, जिससे वह जमीन पर न गिरने पावे । और अशुद्ध हायसे न लिया जाय । गन्धोदकके पास

श्रावक वनिता बोधिनी।
जलका एक कटोरा अवश्य रक्खा जाय, जिससे गंधोदक
लेने के बाद अंगुलिया धो ली जाये । इतना कार्य कर
केनेके पीछे अवकाशके अनुसार एकाग्रचित्त करके जाप्य,
सामायिक और स्वाध्याय आदि करे । स्वाध्याय धर्मका
मूल और शान्ति देनेवाला है । ध्यानमें जो आनन्द
है वह किसी भी सांसारिक वासना या पदार्थमें नहीं
। शास्त्रों-पुस्तकोंके विषयमे एक लेखकने लिखा
है वे ( शास्त्र ) हमें बिना कुछ वेतन लिये पढाते हैं । विना
क्रोध किये और भूलों पर विना दंड दिये हमे सिखाते
है। रात दिन जब चाहे तब हमें पढ़ानेको तैयार रहते है।
हमारी मूर्खतापर वे न तो हॅसते है और न चार जनोंमें
हमारी दिल्लगी उडाते है। फिर भला बताओ, शास्त्रों जैसे
गुरु और पुस्तकालयों जैसे स्कूल क्या और होंगे जो
मनुष्य धर्मको जानना चाहें; वे निर्दोष और सर्वज्ञ वीतराग
कथित धर्मका अवलोकन करें । स्वाध्याय सब तोंका मूल
एक श्रेष्ठ सत्कर्म है।
मंदिरमें विस्था-घरसम्पन्धी चर्चा, लेन देन, हंसी,
झगडा आदि-नहीं करना चाहिए क्योकि धर्म स्थानोंमें
ऐसा करनेसे विशेष पाप वध होता है।
श्रावकाचार आदि आवारग्रंथों में जहाँ तहाँ ८४
आच्छादनोंका वर्णन किया गया है । धर्मायतनमें जाकर
१

स्त्रियांकी नित्यचर्या।
५७
उनका लगाना उचित नहीं है। मंदिरमें सबसे मैत्रीभाव
रक्से । अपने दुर्भावासे उस काल बिलकुल छुट्टीपा जावे ।
+वालबच्चों को शुद्ध-मलमूत्रादिसे निश्चिन्त-कराके ले जावे ।
और मंदिर में भी इस बातका ख्याल रखे कि बच्चे
किसी प्रकार की अपवित्रता या दूसरोके धर्म-साधनमें
कोई विघ्न न करने पावें।
धर्म साधनसे निपटकर स्त्रीको गृहस्थीके कामोंमें लगना
चाहिये क्यों कि पुरुपके लिये धर्म साधन और आजी-
विका ये दो मुख्य कार्य हैं। और स्त्रीके लिये धर्मसाधन
गृहव्यवस्था और सन्तानपालन मुस्य कर्म है।
स्त्रियों को रसोई शुद्ध बनानी चाहिये । रसोई चनाते
समय नीचे लिखी बातोपर ध्यान देना चाहिए।
चौकेकी क्रिया-पवित्र भोजन होनेसे मन और घुद्धि
पवित्र होती है नथा अच्छे कायोंकी और लगती है उन्हीं
के हृदयमें धर्म ठहरता है जो मन, वचन और तनसे धर्मा-
चरण करते है । धर्माचरणों के लिये आवश्यक है कि हम
अपना खान पान शुद्ध रक्खें-चौफे चूल्हे पर खूब
+ चोंके ५वपके हो जानेपर मदिरमे ले जाकर भगवान नमस्कार
करावे । छोटा दर्शन और णमोकार मन्त्र सितावे । अजान अवस्थामें बहुत
अटपनमें लेजाना ठीक नहीं है।
* मला यहत्तर मनुजकी तिनमें दो सरदार ।
एक जीव भाजीविका, एक जीप उद्धार ॥ (कोई नीतिकार)
सशोधक।

आवक वनिता बोधिनी।
ध्यान दें। जल, रसोईकी वर्तनादि सामग्री, ईधन और
रसोईका स्थान इन चारों पर ध्यान देना चौका,
कहलाता है।
जल-कुऑ, तालाब, नदी आदि पवित्र जलस्थानोंसे
भली भाति छानकर लाया जाये, छाननेका वस्त्र उज्वल, गाढ़ा
३६ ४ २४ अंगुल हो । इस छन्नेको दुहरा करके छानना
चाहिए । यदि बर्तनोंका मुंह वडा हो, तो उसी परिमाणसे
छन्नेको भी वडा रखना चाहिए । (प्रत्येक अवस्थामें दुहरा
करने परभी छन्ना वर्तनके मुंहसे तीन गुना हो ) सदा
पवित्र और मॅजे हुए वर्तनों में धीरेधीरे पानी छाना जावे ।
अनछने पानीकी एक बूंद भी व्यर्थ न गिरे और छने
हुए जलमें भी वह न मिलने पावे । अपने हाथसे पानी
भरकर लाना सर्वोत्तम है। यदि ऐसा न हो सके तो मदिरा,
मासके त्यागी किसी उच्चकुलके विश्वस्त व्यक्तिसे भराना
उचित है। पानी छाननेके बाद जीवानी-बिलछानी-उस
जलस्थानमें ही यत्न पूर्वक क्षेपण करना कराना चाहिये,
जिसमेंसे कि पानी लाया गया हो । यदि पानी कुऍसे लाया
गया हो तो जीवानी कडीदार लोटेसे डाली जाय, जिससे
वह वीचहीमें न रहकर पानीतक पहुंच जाय । जो लोग
जीवानी को यत्नपूर्वक उसी जलस्थानमें क्षेपण नही करते,
जिसमेंसे कि जल भरा हो तो इससे जल छाननेका उद्देश्य
अधूरा ही रह जाता है-उन जल जीवों की रक्षा नहीं होती।

स्त्रियोंकी नित्यचर्या ।
५९
.
छने जलमें लौंग, हर. और लकडीकी राख आदि
द्रव्य शास्त्रोक्त प्रमाणसे डाल देने पर उसके रस, गंध, वर्ण और
स्पर्श आदि बदल जाते है, तथा जल कायके जीव चय जाते हैं,
और उसकी उत्पत्ति नहीं होती। इस भांति शुद्ध (मासुक)
हुए जलकी मर्यादा २ प्रहरकी है। साधारण गर्म जलकी
४ महरकी, और उवाले हुए याने अधनके समान गर्म किये
जलकी मर्यादा ८ महरकी है। मासुफ जल मर्यादाके
भीतर ही उपयोगमें लाया जा सकता है। मर्यादाके पश्चात
वह किसी भी कामका नहीं रहता।
दुःखकी बात है कि जैनियोंमें जल छाननेकी विधिका
आजकाल प्रायः लोपसा हो गया है पानी छाननेके लिए
पतला, पुरानी धोवीका टुकड़ा, जाति बिरादरीके भयसे
रखते है, जिसमेंसे छोटे बड़े सभी जीच, बराबर निकलते
जाते है । भला इस दोंगसे क्या लाम है ' अनदना पानी
पानेसे अदयाके दोपके सिवाय शरीरमें अनेक रोग भी घर
कर लेते हैं, यही कारण है, कि संसारके सभी विद्वान क्या
जैन और क्या अजैन, और क्या डाक्टर, वैद्य, हकीम, वैज्ञानिक
आदि पानीको छानकर पीनेकी सम्मति देते हैं। हमारे
भारतीय वैद्यक शास्त्र तो न जाने कबसे पानी छानकर
पनिकी आज्ञा देते चले आये हैं। लोकोक्ति है कि जल तो
पीजे छानके गुरुको कीजे जानके" यह उक्ति भी हमें छानके

श्रावक वनिता बोधिनी ।
1000
-
ध्यान दें। जल, रसोईकी वर्तनादि सामग्री, ईधन और
रसोईका स्थान इन चारों पर ध्यान देना चौका
कहलाता है।
जल-कुआँ, तालाब, नदी आदि पवित्र जलस्थानोंसे
भली भांति छानकर लाया जाये, छाननेका वस्त्र उज्वल, गाढा
३६ ४ २४ अंगुल हो । इस छन्नेको दुहरा करके छानना
चाहिए । यदि वर्तनोंका मुंह वडा हो, तो उसी परिमाणसे
छन्नेको भी वडा रखना चाहिए । (प्रत्येक अवस्थामें दुहरा
करने परभी छन्ना वर्तनके मुंहसे तीन गुना हो) सदा
पवित्र और मॅजे हुए वर्तनोंमें धीरेधीरे पानी छाना जावे ।
अनछने पानीकी एक बूंद भी व्यर्थ न गिरे और छने
हुए जलमें भी वह न मिलने पावे । अपने हाथसे पानी
भरकर लाना सर्वोत्तम है। यदि ऐसा न हो सके तो मदिरा,
मासके त्यागी किसी उच्चकुलके विश्वस्त व्यक्तिसे भराना
उचित है । पानी छाननेके वाद जीवानी-विलछानी-उस
जलस्थानमें ही यत्न पूर्वक क्षेपण करना कराना चाहिये,
जिससे कि पानी लाया गया हो । यदि पानी कुऍसे लाया
गया हो तो जीवानी कडीदार लोटेसे डाली जाय, जिससे
वह बीचहीमें न रहकर पानीतक पहुंच जाय । जो लोग
जीवानी को यत्नपूर्वक उसी जलस्थानमें क्षेपण नहीं करते,
जिसमें से कि जल भरा हो तो इससे जल छाननेका उद्देश्य
अधूरा ही रह जाता है-उन जल जीवोंकी रक्षा नहीं होती।

स्त्रियोंकी नित्यचर्या ।
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"
से निकाल डालना चाहिए। कितने ही लोग अनाजको
योकर खाते है, यह बात भी बहुत अच्छी है, परन्तु छने
हुए पानीसे ही धोना चाहिए । बहुतसी स्त्रिया दाल चावल
आदिको बहुत पहिलेसे चीन रखती है, और रसोईके
समय तनिक भी नहीं शोधती । विचारती है कि शुधे
शुधाए तो रखे है । पर यह उनकी बडी भूल है । उस
समय भी जरूर शोधना चाहिए।
आटेकी मर्यादा शीतकालमें ७ दिन, गरमीमें ५ दिन
और बरसातमें ३ दिनकी है। इसके पीछे जीवो की उत्पत्ति
हो जाती है । प्रायः प्रत्येक सामान ताजा लाकर ढका
रखना चाहिए । वकालमै प्रत्येक वस्तुको बडी सावधा-
नीसे रखना चाहिए, क्योंकि इस ऋतुमें जीवोंकी उत्पत्ति
बहुत अधिक होती है। शक्कर, घी आदि मिष्ट और
चिकण पदार्थोंको तो सभी ऋतुओमें सावधानीसे रखने
की आवश्यकता होती है । क्योकि ऐसी वस्तुओमें थोडीसी
भी भूल होने पर या तो बाहरसे अनेकों जीव आजाते है।
या स्वय इन वस्तुओंमें ही उत्पन्न हो जाते है ।
वर्षाक्तुमे जहांतक होसके भोजनकी बहुत थोड़ी सामग्री
रक्खी जावे।
ग्रीष्मकालमें स्त्रिया बहुतसी (दस दस पांच पांच
सीमी (सिमयां-विया) तोडकर रखती है

श्रावक वनिता बोधिनी।
जल पीनेको हो पुष्टि दिखाती है। यूरोपियन जातिया
यद्यपि अहिंसाका विचार नहीं रखती, तो भी स्वास्थ्यके
विचारसे पानीको अनेक तरहसे साफ करके पीती है।
पानीके छाननेका काम स्त्रियोंकी थोडीसी सावधानीसे
अच्छी तरहसे होता रहसकता है । सदैव घरमें दो तीन
छन्ने रखना चाहिए । पुराने छन्नोंसे पानी घरावर छानते
ही रहना ठीक नहीं । उन्हें अलग कर देना चाहिए । सबसे
अच्छी बात तो यह है, कि जलस्थानसे ही पानी छानकर
लाया जाये, और फिर जिस समय पीनेकी इच्छा हो ।
छानकर पिया जाता रहे | शाम सुवह सब पानी छानकर एक
चौडे वरतनमें जीवानी एकत्र करे । तथा यत्नाचार पूर्वक
उसे जलस्थानमे पहुंचावे । स्मरण रहे, पानी उबालकर
और पीछे ठंडा करक पीनेसे शरीरकी नीरोगता बढती
है। यही प्राशुक जल पीनेका लाभ है।
भोजनसामग्री-अन्न अपींध ( बिना घुना ) होना
चाहिए । उसका साफ करना और पीसना उजेलमे होना
चाहिए । पीसते समय
चक्कीको, कूटते समय ओखलीको
और इसी भांति दूसरे दूसरे पदार्थीको पीसने कूटनेके पहिले
भली भांति देख लो, साफ करलो । उनमें कोई जीव न रह
जाय । चफी आदिसे आटा आदि निकाललेने पर भी उसमें
आटे वगैरहका कुछ अंश लगाही रह जाता है उसे कोमल बुहारी-

खियोंकी नित्यचा।
से निकाल डालना चाहिए। कितने ही लोग अनाजको
धोकर खाते है, यह बात भी बहुत अच्छी है; परन्तु छने
हुए पानीसे ही धोना चाहिए । बहुतसी स्त्रिया दाल चावल
आदिको बहुत पहिलेसे बीन रखती है, और रसोईके
समय तनिक भी नहीं शोधती । विचारती है कि शुधे
शुधाए तो रखे है । पर यह उनकी बड़ी भूल है । उस
समय भी जरूर शोधना चाहिए।
आटेकी मर्यादा शीतकालमें ७ दिन, गरमीमें ५ दिन
और बरसातमें ३ दिनकी है। इसके पीछे जीवोंकी उत्पत्ति
हो जाती है । प्रायः प्रत्येक सामान ताजा लाकर ढका
रखना चाहिए । वर्षाकालमे प्रत्येक वस्तुको बडी सावधा-
नीसे रखना चाहिए, क्योंकि इस ऋतुमें जीवोंकी उत्पत्ति
बहुत अधिक होती है। शक्कर, घी आदि मिष्ट और
चिक्कण पदार्थों को तो सभी ऋतुओमें सावधानीसे रखने
की आवश्यकता होती है। क्योकि ऐसी वस्तुओमें थोडीसी
भी भूल होने पर या तो पाइरसे अनेकों जीव आजाते हैं।
या स्वयं इन वस्तुओंमें ही उत्पन्न हो जाते है ।
वक्तुमें जहांतक होसके भोजनकी बहुत थोडी सामग्री
रक्खी जाये।
ग्रीष्मकालमें स्त्रिया बहुतसी ( दस दस पांच पांच सेर)
सीमी (सिमैया-विया) तोडकर रखती है बरसात लगते

६२
श्रावक वनिता बोधिनी ।
ही उनमें इल्लियां लग जाती है। यही हाल मर्यादासे बाहरके
पापड अथाने (अचार) बडियों आदिका है परन्तु लोग वही
वर्षाका आचार आदि बड़े मजे खाते हैं। कभी उन्हें सावधानी
पूर्वक देखने दिखानेकी चेष्टा भी नहीं करते। हलवाईके यहांकी
मिठाई-बाजारू मिठाई-भी त्रसजीवोंका सत ही है। उनके
यहां भला क्रियासे बनाने वाला और सावधानीसे रखने-
वाला कौन बैठा है ? ऐसे ही अनेक कारणोंसे तो जैन
जातिमें अनेक मारक रोग फैल गए है । इन अभक्ष्योंको
हमें शीघ्र ही छोड़ना चाहिए ।
पुनः खानेके पदार्थोंमें आलू, रतालू शकरकंद पुष्प विदल
आदि २२ अभक्ष्य * और पांच उदंवर याने वड़, पीपल,
ऊमर, कठूमर, पाकर फल तथा ३ मकार याने मद्य, मांस
और मधुको त्रस राशि समझ करके कभी भूल कर भी नहीं
खाना चाहिए।
रसोई बनाने के पहिले सर्व भोज्य पदार्थ लेकर शोधे
वया ठीक अन्दाज करके फिर रसोई वनावे । प्रथम ही
२२ अभक्ष्यों के नाम-१ गन २ द्विदल (छाछ दही या को दूधके साथ
दुफादिया (दिवल) माज खाना ३ बहुबीज फल
४ ओला ५ राशिमोजन
६ कन्दमूल ७ मांस ८ मधु ९ मदिरा १० मिट्टी ११ मारन
१० विष १३
भचार ( अथाना) १४ पीपल फल १५ पड़फल १६ उदवरफ्ल १५ कम्मर
फल १८ पाकर फल १९ अजान फल २० तुच्छ फल २१ तुषार (बर्फ)
२२ चारित ररा।

त्रियोंकी नित्यचा । " चौकमें जल लेजाके रक्खे और उसे मासुक फरले क्योंकि कच्चे जलकी मर्यादा पौन घंटेकी है, और रसोई में २ या ३ घंटेमें लगते हैं। सारांश यह कि, पानी प्राशुक किये बिना काम नहीं चल सकता । आटा गूनफर-माडकर- शुद्ध स्वच्छ गीले कपड़ेसे डॉक दे । आटा गूनते समय हाथकी अगूठियां आदि उतार देना चाहिए । फिर अपनी योग्यतानुसार सरस स्वच्छ भोजन बनावे । रसोईको कभी विना लॅकी न रखे । क्योंकि या तो भाफसे अथवा वैसे ही कई कारणोंसे मरकर जीव रसोई में गिर जायेंगे। भोजन सदैव खूब देख भाल और पसि पीसके करना चाहिए । रात्रिमें भोजन बनाना खाना बुरा है । रात्रिभोजनके विरुद्ध मार्क- ण्डेयपुराणमें एक जगह लिखा है:- अस्तगते दिवानाथे, तोय रुधिरमुच्यते, अन माससम मोक्त मार्कंडेन महर्पिणा, रक्तीभवति तोयानी अनानि पिशितानि च, रानो भोजनसतस्य ग्रासे तन्मासभक्षण, भावार्थ यह है फि, रात्रिभोजन मांसभक्षणके, और रात्रि- जलपान, रक्तपानके समान है। रसोई तैयार करके फिसी संयमी धर्मात्मा पुरपको (जो उस समय भाग्यसे प्राप्त हो जावे) भोजन करावे, यदि न हो तो अपने ही घरके जेठे योग्य पुरुपको भोजन -

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श्रावक वनिता बोधिनी।
ही उनमें इल्लिया लग जाती है। यही हाल मर्यादासे वाहरके
पापड अथाने (अचार) बडियों आदिका है परन्तु लोग वही
वर्षोंका आचार आदि बड़े मजेमें खाते हैं। कभी उन्हें सावधानी
पूर्वक देखने दिखाने की चेष्टा भी नहीं करते। हलवाईके यहाँकी
मिठाई-बाजारू मिठाई-भी त्रसजीवोंका सत ही है। उनके
यहाँ भला क्रियासे बनाने वाला और सावधानीसे रखने-
वाला कौन बैठा है ? ऐसे ही अनेक कारणोंसे तो जैन
जातिमें अनेक मारक रोग फैल गए है। इन अभक्ष्योंको
हमें शीघ्र ही छोड़ना चाहिए।
पुनः खानेके पदार्थोंमें आलू, रतालू शकरकंद पुष्प विदल
आदि २२ अभक्ष्य * और पांच उदंवर याने बड़, पीपल,
ऊमर, कठूमर, पाकर फल तथा ३ मकार याने मद्य,
मांस
और मधुको त्रस राशि समझ करके कभी भूल कर भी नहीं
खाना चाहिए।
रसोई बनानेके पहिले सर्व भोज्य पदार्थ लेकर शोधे
तथा ठीक अन्दाज करके फिर रसोई वनावे । प्रथम ही
२२ अभक्योंके नाम-१ बैंगन २ द्विदल (छाछ दही या क्चे दूधके साथ
दुफाडिया (दिद्वल) अनाज खाना ३ वहुचीज फल
४ ओला ५ रात्रिभोजन
“६ कन्दमूल ७ मांम ८ मधु ९ मदिरा १० मिट्टी ११ मासन १२ विप १३
अचार (अथाना) १४ पीपल फल १५ वहफल १६ उदवरफल १७ कमर
‘फल १८ पाकर फल १९ अजान फल २० तुच्छ फल २१ तुपार (बर्फ)
२२चरित रम।

स्त्रियोकी नित्यचर्या ।
३५
पानीके वरावर, २ घडी की (पौन घंटेकी ) है। माशुक
(गर्म) किये हुए दूधमे जामन देनेसे बने हुए दहीकी मर्यादा
८ प्रहर की है। दही जमानेका सर्वोत्तम उपाय यह है कि,
कल्दार रुपयेको सामान्य रीतिसे गर्म करके माशुक दूधमें
डाल देनेसे ४ प्रहरके भीतर उमदा दही जम जाता है।
इनके सिवाय अन्य पदार्थों की मर्यादा जाननेकी इच्छा
हो तो, क्रियाकोपसे जानना चाहिए । स्मरण रखना
चाहिए कि, मर्यादाके पश्चात प्रत्येक पदार्थमें बस जीवोंकी
उत्पत्ति हो जाती है। विना औटाए हुए दही अथवा
छांछके साथ, द्विदल (विदल) अन्न खानेसे अनेक दोप
उत्पन्न होते है । विगडे हुए स्वादवाले पदार्थ खानेसे
स्वास्थ्य बिगड जाता है । इसीलिए हमारे आचाोंने हमें
ताजा और शुद्ध भोजन - करनेकी आज्ञा दी है। जिससे
कि हम मोटे-ताजे और नीरोग रहें तथा लौकिक और धार्मिक
कार्यों को भलीभांति साधित कर सके।
वर्तन--पवित्र राखसे अच्छी तरह मॅजे हुए हों। शूद्र,
गाय, भैंस, कुत्ते या विल्ली के छुए हुए न हो । पाखानेको
लिये जानेवाले लौटेंसे यदि अच्छे वर्तन छजाएँ या
शूद्रादिने उनसे खाया पिया हो, तो वर्तनोंको अग्निमें
डालकर शुद्ध कर लेना चाहिए । हां, यह बात ठीक है कि
यदि खाते पीते समय कुत्ता विल्ली आदि आनाएँ, तो उनें
"

श्रावक वनिता बोधिनी।
करावे और हर्ष माने । आजकल के समयमें तो अत्यंत दुखित
भुखित और हीनांग दो एक व्यक्तियोंको भोजन कराना
ही, बड़े कल्याणका कारण है । धन्य है वे व्यक्ति, जो
प्रति दिन इसी प्रकार दूसरोको भोजन कराके भोजन
करते है । पुरुपोंके भोजनोपरान्त स्त्रियां भोजन करें।
भोजनके पीछे ही वर्तन साफ कर डालना और चौका
लगा डालना चाहिए जूठे वर्तन अधिक देरतक पड़े रहने-
से उनमें घस जीवोंकी उत्पत्ति हो जाती है । भिनभिनाती
हुई मक्खिया उस जूठे पानी में (धोवनमें ) गिरती-मरती
है, जिससे हिसाका दोप लगता है। अथवा अपवित्र कुत्ते,
विल्ली उन्हें चाटकर अपवित्र कर देते है ।
ल्डू, वावर घेवर, वृन्दी, खारी सेव आदि पकी रसोई
की मर्यादा, जिनमें पानीका अंश थोडा होता है, ८ प्रहरकी
है । पुआ, पुड़ी, भजिया आदिकी मर्यादा अधिक जल
होने के कारण ४ महर की है। खाटा, कढी, खिचडी आदि
कची रसोईकी मर्यादा २ प्रहरकी है। जिस रसोई में पानी
न पडा हो जैसे मगद आदिकी मर्यादा आटेके घरावर
जानो । दूध दुहकर तत्काल छानकै ' औंटा रखनेसे
शुद्ध रहता है । इस दूधकी मर्यादा ८ प्रहरकी है गर्म पानी
डालकर तैयार की हुई छाँछकी मर्यादा ४ प्रहरकी है ।
कचे पानीसे बनाये हुए महे (डॉछ ) की मर्यादा कचे
.
।

नियोकी नित्यचा।
पानीके वरापर, २ घडी की (पौन घटेकी ) है। माशुक
(गर्म) किये हुए दूधमें जामन देनेसे बने हुए दहीकी मर्यादा
८ प्रहर की है । दही जमानेका सर्वोत्तम उपाय यह है कि,
कल्दार रुपयेको सामान्य सतिसे गर्म करके प्राशुक धमें
डाल देनेसे ४ महरके भीतर उमदा दही जम जाता है।
इनके सिवाय अन्य पदार्थोंकी मर्यादा जाननेकी इच्छा
हो तो, क्रियाकोपसे जानना चाहिए । स्मरण रखना
चाहिए कि, मर्यादाके पश्चात प्रत्येक पदार्थमें त्रस जीवोंकी
उत्पचि हो जाती है। बिना औटाए हुए दही अथवा
छांछके साथ, द्विदल (विदल) अन्न खानेसे अनेक दोप
उत्पन्न होते है । विगडे हुए स्वादवाले पदार्थ खानेसे
स्वास्थ्य विगड जाता है। इसीलिए हमारे आचार्योंने हमें
ताजा और शुद्ध भोजन करनेकी आज्ञा दी है, जिससे
कि इम मोटे-ताजे और नीरोग रहें तथा लौकिक और धार्मिक
कार्योंको भलीभाति साधित कर सके।
वर्तन-पवित्र राखसे अच्छी तरह मॅजे हुए हौ । शूद्र,
गाय, भैंस, कुत्ते या विल्लीके छुए हुए न हों । पाखानेको
लिये जानेवाले लोटेसे यदि अच्छे बर्तन जाएँ या
शुद्रादिने उनमेंसे खाया पिया हो, तो वर्तनीको अग्नि
डालकर शुद्ध कर लेना चाहिए । हां, यह बात ठीक है कि
यदि खाते पीते समय कुत्ता विल्ली आदि आनाएँ, तो उन्हें

६४
आवक वनिता बोधिनी।
करावे और हर्ष माने । आजकलके समयमें तो अत्यंत दुखित
भुखित और हीनाग दो एक व्यक्तियोंको भोजन कराना
ही, बड़े कल्याणका कारण है । धन्य है वे व्यक्ति, जो
प्रति दिन इसी प्रकार दूसरोंको भोजन कराके भोजन
करते हैं । पुरुपोंके भोजनोपरान्त स्त्रिया भोजन करें।
भोजनके पीछे ही वर्तन साफ कर डालना और चौका
लगा डालना चाहिए जूठे वर्तन अधिक देरतक पडे रहने-
से उनमें त्रस जीवोंकी उत्पत्ति हो जाती है । भिनभिनाती
हुई मक्खिया उस जूठे पानीमें (धोवनमें ) गिरती-मरती
हैं, जिससे हिंसाका दोप लगता है। अथवा अपवित्र कुत्ते,
विल्ली उन्हें चाटकर अपवित्र कर देते हैं ।
लड्डू, वावर घेपर, बून्दी, खारी सेव आदि पकी रसोई
की मर्यादा, जिनमें पानीका अंश थोडा होता है, ८ प्रहरकी
है । पुआ, पुड़ी, भजिया आदिकी मर्यादा अधिक जल
होने के कारण ४ प्रहर की है। खाटा, कढी, खिचडी आदि
कची रसोईकी मर्यादा २ प्रहरकी है । जिस रसोई में पानी
न पडा हो जैसे मगद आदिकी मर्यादा आटेके वगवर
जानो । दूध दुहकर तत्काल छानके औंटा रखनेसे
शुद्ध रहता है । इस दूधकी मर्यादा ८ प्रहरकी है गर्म पानी
डालकर तैयार की हुई छाँछकी मर्यादा ४ प्रहरकी है ।
कच्चे पानीसे बनाये हुए मटे ( छॉछ) की मर्यादा फचे

स्त्रियोकी नित्यचर्या।
६७
जितनी पवित्रता रक्खी जायगी, परिणाम-भाव-उतने ही
पवित्र होंगे और इससे शरीर और मन उतना ही पुष्ट
तथा सुस्थ (अच्छा ) रहेगा। अनेक घरोंमें चौका न
लगाया जाकर पानी छिडक दिया जाता है, अनेक घरोंमें
एक ओर रसोई बना करती है और दूसरी ओर राख आदि
कूड़ा करकट लगा रहता है । यह बडा ही घृणास्पद म्लेच्छ
व्यवहार है। ऐसा न करना चाहिए । चौका जिस कपडेसे
लगाया जाय उसे नित्य ही निचोडकर सुखा डालना
चाहिए । बहुतेरी स्त्रिया उसे वैसाका वैसा मिट्टी पानीमें भीगा
रख देती हैं जिससे उसमें बहुतसे कीड़े पड जाते है ।
अगले दिन उसी कपडेसे ( पोतेसे) फिर चौका लगा
दिया जाता है, और वे जीव वेचारे परलोक सिधारते हैं।
गोवरसे चौका लगाना ठीक नहीं है, क्योंकि गोवरका
चौका देरसे सूखता है । और दूसरे, उसमें कीड़े पड़नेकी
संभावना रहती है। इस तरह यत्नाचारसे चौका लगा, स्नान
कर, शुद्ध स्वच्छ वस्त्र पहिने । फिर रसोईका सामान शोध
चौकसे रसोई बनावे । पुरुष भी हाथ पांव घो स्वच्छ
वस्त्र पहिन भोजनके निमित्त चौके जावें । यदि चौके
बिना नहाये धोए और बिना स्वच्छ कपडे पहिने चला
गया जावे तो शुद्धों और हममें अन्तरही क्या रहे।
स्वच्छता-पवित्रता-हर जगह अच्छी और लाभप्रद है।
गृहस्थी यदि धनवान भी हो, तो भी कुटुम्बके भोजन
"

आवक वनिता बोधिनी
।
दया पूर्वक कुछ भोजन डाल देना चाहिए । बाजारू दुकानों
पर वाजारू मिठाई खाना-जूते चढ़ाए भोजन या मिठाई पा
जाना-कांच और चीनीके वर्तनोंमें जूठे इत्यादिका कोई
दोप न समझना वडाही हानिकर है । कमसे कम अपनी
आरोग्यता चाहनेवालोंको तो अवश्य ही इन बातोंसे
बचना चाहिए।
चौका-रसोईका स्थान अर्थात चौका ऐसे स्थानमें
हो जहां कि कूकर, विल्ली आदि प्रवेश न कर सकें, और
कीडी मकोडी न ठहर सकें, तथा जाला न बना सकें।
जहाँकी धरती सूखी हो, और हर ऋतु सूखी रह सके । जहाँ
भली भांति प्रकाश आता हो। रसोईके स्थानकी जहां सीमा
बँधी हो । ऊपर चंदोवा इस प्रकार बंधा हो, जिससे ऊपरसे
जीव जन्तु और कूडा करकट न गिरने पावे । [चंदोबा,
चकी, उखली, घिनौची (पनिडा) आदि आदि स्थानों
पर भी रखना आवश्यक है ] चौकेको नित्य कोमल
बुहारीसे बुहारके तथा देखभालके, चूल्हेकी राख निकालके,
मिट्टी मिले माशुक जलसे पोतना उचित है। चौका रातको
न लगाया जाय, क्योंकि उससे अनेक प्राणियोंका नाश
होना संभव है | चौका आवश्य लगाना चाहिए । अर्थात्
आशय यह कि, भोजनसामग्री, भोजनस्थान आदिमें
१ऐसी वुहारियां यम्बईमें चार चार छ छ मानेको मच्छी मिल जाती है
जोकि मुना जाता है कि टिकाऊ भी होती है ।
-सशोधक।

त्रियोकी नित्यचा।
नहाने पौनेका पानी ऐसे स्थानमें डाला जाना चाहिए
तथा पेशाव भी ऐसे स्थानों की जानी चाहिए जहां जल्दी
सूख जाय । क्योंकि किसी भी जगह बहुत गीलापन होनेसे
कीडे उत्पन्न हो जाते, दुर्गन्धि फैलती तथा नाना प्रकारके
रोग उत्पन्न होने लगते है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और
चनस्पति इन पांच स्थावरोंकी रक्षाके लिए आवश्यकतासे
अधिक इनका व्यर्थ उपयोग मत करो। ऐसा कि वेकाम पानी
डाल दिया जाय; या व्यर्थ धरती खोदी जाय; अथवा यों
थी. इधर उधर आग जलाई जाय; झाड़, फूल, फल आदि
तोड़े जायें, बिना किसी उपयोगके दिया जलाया जाय;
ये
अथवा इनही जैसे कृत्य अनर्थ-दंड-पापके मूल हैं । और
गृहस्थका मुख्य धर्म यही है फि आवश्यकतानुकूल ही
स्थावर काय काममें लावे । त्रस कायकी संकल्पी हिंसाफो
छोड़े और भी हिंसा अर्थात् व्यापार-धधेः संबन्धी हिंसामें
यत्नाचार पूर्वक काम करे । जो इससे विपरीत चलते हैं
वे निस्सन्तान होते हैं, रोगी और दुखी होते हैं। हिंसाके
कडुए फल भुगतते है । हमें धर्मनीति पर चलना
चाहिए जिससे हिंसा टले, दयाधर्म पले, शरीर और
कुटुम्मकी रक्षा हो तथा लौकिक और पारलौकिक सुखों-
की प्राप्ति हो।

६८
आवक वनिता बोधिनी।
रसोई घरकी स्त्रियोंसे ही बनवानी चाहिए । क्योंकि
रसोई बनानेवालेके चित्त में प्रेम व भक्तिभाव होना चाहिये
जो नौकरोंमें होना संभव नहीं है । स्वयं रसोई बनाई
जाय तभी चौकेकी शुद्धता रह सकती है। रसोई बनाना
त्रियोंका एक व्यायाम भी है।
ईधन-अवीध और निर्जन्तु सूखी लकड़ीका हो । कोमल
बुहारी या कपड़ेसे यदि वह एक वार साफ कर लिया जावे
-पोंछ लिया जावे-तो अहिंसा धर्मकी अत्यधिक पालना हो ।
खास करके बरसातमें, ईधनमें असंख्य जीव हो जाते है,
इसलिये बरसातमें तो बहुतही सावधानी करके ईधन
जलाना चाहिए। अच्छा हो यदि कोयला ही जलाया जावे,
उसीसे रसोई वनाई जावे । गोवरके कंडे (छैने ) जलाना
तो जैनियोंको सर्वथा अनुचित हैं। क्योंकि इनके बनानेमें
ही हजारों कीडॉका सत्यानाश हो जाता है।
इसी तरह गृहस्थीके अन्य अन्य कार्य भी बहुत विचार
पूर्वक करना चाहिये । सिर साफ करनेके पीछे जो जूं
आदि निकलती है, उन्हें मारना न चाहिये, फिन्तु, बाहर
किसी घनी छायावाले स्थानमें सावधानी पूर्वक रख देना
चाहिये । ऐसा ही व्यवहार अन्नमे निकले हुए जन्तुओंके
साथ करना चाहिये । उन्हें भी कुछ अन्नके साथ किसी
पात्रमें रखके छायायुक्त स्थानमें रख दे।
।

स्त्रियोकी नित्यचा।
RAM~ ~~-
नहाने धोनेका पानी ऐसे स्थानमें डाला जाना चाहिए
तथा पेशाव भी ऐसे स्थानमें की जानी चाहिए जहां जल्दी
सूख जाय । क्योंकि किसी भी जगह बहुत गीलापन होनेसे
कीड़े उत्पन्न हो जाते, दुर्गन्धि फैलती तथा नाना प्रकारके
रोग उत्पन्न होने लगते है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और
चनस्पति इन पांच स्थावरोंकी रक्षाके लिए आवश्यकतासे
अधिक इनका व्यर्थ उपयोग मत करो।ऐसा कि वेकाम पानी
डाल दिया जाय; या व्यर्थ धरती खोदी जाय; अथवा यों
ही इधर उधर आग जलाई जाय; झाड़, फूल, फल आदि
तोड़े जायें, विना किसी उपयोगके दिया जलाया जाय; ये
अयवा इनही जैसे कृत्य अनर्थ-दंड-पापके मूल हैं । और
गृहस्थका मुख्य धर्म यही है कि आवश्यकतानुकूल ही
स्थावर काय काममें लावे । त्रस कायकी संकल्पी हिंसाको
छोड़े, और भी हिंसा अर्थात् व्यापार-धधे सबन्धी हिंसामें
यत्नाचार पूर्वक काम करे । जो इससे विपरीत चलते है
वे निस्सन्तान होते है, रोगी और दुखी होते हैं। हिंसाके
कडए फल भुगतते है । हमें धर्मनीति पर चलना
चाहिए जिससे हिंसा टले, दयाधर्म पले, शरीर और
कुटुम्बकी रक्षा हो तथा लौकिक और पारलौकिक सुखों-
की प्राप्ति हो।

आवक वनिता वोचिनी। MKA चतुर्थ प्रकरण ऋतुक्रिया-विचार जो नारी ऋतुक्रियामें, वरते सविधि सयान । ताके वर सन्तान है, सुख-यश-बुद्धि निधान । स्त्रियोंके उदरमें एक डिंव-कोप रहता है, जिसकी चर्म- स्थलीके रक्तसे मतिमास अडेके समान एक छोटा पदार्थ उत्पन्न होता है । क्रमानुसार महीना पूर्ण होने पर यह अंडा फटकर गर्भस्थलीके ऊपर नाभिसे जा मिलता है; और रक्तादि, मत्र-मार्ग द्वारा बाहर निकल आता है। इस प्रकार किसीके दो तीन दिन और किसीके पांच सात दिनतक निकलता रहता है, ऐसी क्रिया युक्त स्त्रीको पुष्पवती या रजस्वला फहते हैं। मासिक धर्म होनेका नियम ३ दिनका है इससे कम या अधिक, रोगके कारण होता है। इन दिनों में स्त्री अस्पर्य कही गई है। इन दिनों उसे ग्रहस्थीके प्रत्येक कार्यसे अलग रहना चाहिये । किसी भी वस्तु और बाल बच्चेको न छुए । एकान्तमें एक जगह धैठे । कितने अफ- सोसकी बात है कि आजकल रजस्वला स्त्रियां पानी भरना, पीसना, वर्तन मलना आदि अनेक काम करती है। पर यह वैद्यक शास्त्रके विरुद्ध है । वैद्यकशास्त्र बतलाता

अतुक्रिया-पिचार।
.
है कि मासिक धर्मके समय स्त्रीको सुस्य और शांत भावसे
रहना चाहिये, किसीका भी मुँह नहीं देखना चाहिए क्योंकि
विचारों, घटनाओं और दृश्यों का प्रभाव आगे होनेवाली
सन्तान पर अभीसे पड़ चलता है। पापियोंकी छाया पड़
जाने, अथवा चित्त चलायमान होजानेसे भावी सन्तान
पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसी सम्बधमें एक मनोहर
कहानी नीचे लिखी जाती है।
एक ग्राममें ४ अंधे रहते थे। चे चारों ही गुणवान
और आपसमें मित्र थे । उनने विचारा कि 'गांवका जोगी
अन्य गांवका सिद्ध' हो न हो, चलो अपन चारो, कहीं
बाहर चले, जिसमें आजीविका चले और गुण विख्यात
हो । उनमेंसे पहिला रत्नपरीक्षक, दूसरा अश्वपरीक्षक,
तीसरा स्त्री परीक्षक, और चौथा पुरुष परीक्षक था। उन
चारोने चल दिया और एक बड़ी राजधानीमें पहुंचे।
वहाँके राजासे मिल कर आजीविका-माप्तिकी प्रार्थना की।
राजाने पूछा कि परदेशी सूरदासो। तुममें से प्रत्येकमें क्या
क्या गुण हैं सो वताओ । प्रत्येकके अपना अपना गुण
निवेदन करने पर राजाने उनसे प्रत्येकको १ सेर आटा,
१ छटाक दाल, १ तोला घी और ११ तोला नमक प्रति
दिन दिए जानेकी आज्ञा दे दी । चारों मूरदास खाते पति
आनन्दं करते, वहीं राजधानीमें रहने लगे।।

૨
श्रावक वनिता बोधिनी।
संयोगसे एक दिन एक जौहरी बहुतसे जवाहिर लेकर
राजधानीमें आया। तब राजाने रत्नोंकी परीक्षा करानेके
लिए, उस रत्नपरीक्षक सूरदासको बुलाकर कुछ अच्छे रत्न
ले देनेको कहा । उस सूरदासने कुछ चोखे-उत्तम-रत्न ढूंढ
कर राजाको दिये और कहा कि ये चोखे हैं। यदि ये खोटे
होगे तो इन्हें घनकी चोट दिलवाकर देख लीजिये, फूट
जायँगे । असली-पके-रत्न होंगे तो कभी भी फूटनेके नहीं।
मूरदासके कहे अनुसार रत्नोंकी परीक्षा की गई और वे
चोखे-पक्के-रत्न सिद्ध हुए । तब राजाने उस रत्नपरीक्षक
सूरदासको बहुतसा पुरस्कार दिया और घीकी मात्रा
वढवा दी।
इसी प्रकार एक बार एक अच्छा पुष्ट और सुन्दर
घोड़ा, राजाने अश्व परीक्षक सरदासको सौपा और परीक्षा
करनेको कहा । सूरदासने घोडेके अंगोपाङ्ग टटोल कर
कहा, राजन ! इस सब सुलक्षणोंवाले घोडेमें, एक यह
कुलक्षण है कि, जल में प्रवेश करते ही यह बैठ जायगा। राजाने
परीक्षाकी । सचमुच जलमें घुसते ही घोडा वैठ गया।
परीक्षा कर चुकने पर राजाने सूरदाससे पूछा कि तुमने
घोडेका यह दोप कैसे जान लिया? तब सरदासने कहा
कि, जिस तरह वैद्य नाडी टटोळकर रोग जान लेते हैं, उसी
तरह इसके अंग और नाडियां टटोल कर मैंने इसका यह
दोप जाना । वात यह है कि, इसके पेटमें मुझे एक ऐसी

ऋतुक्रिया-विचार।
A
नस मिली, जो अपने प्रमाणसे बहुत मोटी थी, और तब
मैंने सोचते विचारते पता लगाया कि, इस घोडे की माने
भैसका दूध पिया है, जिसकी गर्मीका अंश इस घोडेके
अंगमें भी है । राजाने पहिले सूरदासकी तरह इसे भी
पुरस्कार आदि दिए।
एक दिन राजाने तीसरे स्त्रीपरीक्षक सूरदासको बुलाकर
कहा कि, आज तुम महलोंमें जाकर मेरी रानीकी परीक्षा करो
और बिलकुल सच सच हाल मुझसे आकर फहो । पश्चात्
राजाने रानीको खवर करवाई कि, थोडी ही देरमें एक
सूरदासजी तुम्हारे महलमें आनेवाले हैं, सो तुम सावधानीसे
इनका आदर-सत्कार करना । रानीने खबर पाते ही
अपना सूख शृंगार किया । और ऐसा शृंगार किया कि
जिससे चढकर हो न सके । शृंगार करके शय्यापर बैठती
ही जाती थी कि सूरदासजी आ पहुंचे । रानी हाथमें कुछ
भेट ले खाँसती खेखारती हुई, जल्दी जल्दी धमधमाती
द्वार तक पहुँची । सूरदास इन ऊपरी बातोंहीसे उसकी
परीक्षा करके राजाके पास लौट गया और राजाके पूछने
पर कहा---अपराध क्षमा हो, आपकी रानी फिसी ओछे
घर की बेटी जान पडती है यदि उनकी माता क्षत्राणी है
तो परपुरुपरता है, जो पिता क्षत्रिय है, तो यह ।
नीच मां की बेटी हैं । सुनते ही राजाने सूरदासको तो

७२
आवक वनिता बोधिनी ।
संयोगसे एक दिन एक जौहरी बहुतसे जवाहिर लेकर
राजधानीमें आया। तब राजाने रत्नोंकी परीक्षा कराने के
लिए, उस रत्नपरीक्षक सूरदासको बुलाकर कुछ अच्छे रत्न
ले देनेको कहा । उस सूरदासने कुछ चोखे-उत्तम-रत्न ढूंढ
कर राजाको दिये और कहा कि ये चोखे है । यदि ये खोटे
होंगे तो इन्हें घनकी चोट दिलवाकर देस लीजिये, फूट
जायेंगे । असली-पक्के-रत्न होंगे तो कभी भी फूटनेके नहीं।
सूरदासके कहे अनुसार रत्नोंकी परीक्षा की गई और वे
चोखे-पके-रत्न सिद्ध हुए । तब राजाने उस रत्नपरीक्षक
सूरदासको बहुतसा पुरस्कार दिया और घीकी मात्रा
बढवा दी।
इसी प्रकार एक बार एक अच्छा पुष्ट और सुन्दर
घोडा, राजाने अश्व परीक्षक सूरदासको सौपा और परीक्षा
करनेको कहा । सरदासने घोडेके अंगोपाङ्ग टटोल कर
कहा, राजन ! इस सव सुलक्षणोंवाले घोडेमें, एक यह
कुलक्षण है कि, जलमें प्रवेश करते ही यह बैठ जायगा। राजाने
परीक्षाकी । सचमुच जलमें फंसते ही घोडा बैठ गया ।
परीक्षा कर चुकने पर राजाने सूरदाससे पूछा कि तुमने
घोडेका यह दोप कैसे जान लिया? तव सरदासने कहा
कि, जिस तरह वैद्य नाडी टटोलकर रोग जान लेते हैं, उसी
तरह इसके अंग और नाडियां टटोल कर मैंने इसका यह
दोप जाना । वात यह है कि, इसके पेटमें मुझे एक ऐसी

अतुक्रिया-विचार ।
७३
AM
नस मिली, जो अपने ममाणसे बहुत मोटी थी, और तब
मैंने सोचते विचारते पता लगाया कि, इस घोडेकी माने
भैसका दूध पिया है, जिसकी गर्मीका अंश इस घोडेके
अंगमें भी है ! राजाने पहिले सूरदासकी तरह इसे भी
पुरस्कार आदि दिए।
एक दिन राजाने तीसरे स्त्रीपरीक्षक सूरदासको धुलाकर
कहा कि, आज तुम महलोंमें जाकर मेरी रानीकी परीक्षा करो
और बिलकुल सच सच हाल मुझसे आकर फहो । पश्चात्
राजाने रानीको खवर करवाई कि, थोड़ी ही देरमें एक
सूरदासजी तुम्हारे महलमें आनेवाले हैं, सो तुम सावधानीसे
इनका आदर-सत्कार करना । रानीने खबर पाते ही
अपना खूब शृंगार किया । और ऐसा शृंगार किया कि
जिससे घटकर हो न सके । शृंगार करके शय्यापर बैठती
ही जाती थी कि सूरदासजी आ पहुंचे । बानी हाथमें कुछ
भेट ले खॉसती खखारती हुई, जल्दी जल्दी धमधमाती
द्वार तक पहुँची । सूरदास इन ऊपरी वाताहीसे उसकी
परीक्षा करके राजाके पास लौट गया और राजाके पूछने
पर कहा- अपराध क्षमा हो, आपकी रानी किसी ओछे
घर की बेटी जान पड़ती हैं यदि उनकी माता क्षत्राणी है
तो परपुरुपरता है, जो पिता क्षत्रिय है, तो यह किसी
नीच मां की बेटी हैं । सुनते ही राजाने सूरदासको तो घर

७४
आवक वनिता बोधिनी।
ANNA
AA
AN
जानेकी आज्ञा दी और आप शीघ्र ही रानीके पास पहुंचे।
घड़ी खिन्नतासे बैठे । रानीने पूछा, महाराज ! उदास कैसे ?
राजाने कहा, मैं जो बात पूछता हूं उसे विलकुल सच
सच वताना, कुछ छुपाना मत । किसी भांतिका डर मत
खाना । क्योंकि उसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं है। पूछना यह
है कि, तुम किसकी पुत्री हो ? अपने माता पिताका वास्तविक
परिचय दो।रानीने राजाके चरणों पर गिरके कहा, महाराज!
मै बॉदीकी रूखसे हूं । चाहे मारिये, चाहे पालिये । आपके
साथ व्याह होने का कारण यह है कि, जिस कन्यासे आपकी
मॅगनी हुई थी, वह ठीक विवाहके समय मर गई। तव इस
मृत्युकी वातको छिपाकर मरे साथ आपकी शादी कर दी
गई। राजाने सुना, और दरवारमें आया । सूरदासको
बुलाकर पूछा कि सूरदास तुमने कैसे जाना कि मेरी
रानीके जाति-वंशमें कोई अन्तर है । सूरदास बोला-
महाराज आदमीकी योग्यता-हैसियत-दो बातोंसे जानी
जाती है । एक तो वोलनेसे, और दूसरे शरीरकी क्रियासे
अर्थात् चळने, फिरने, उठने और बैठनेसे तथा वस्त्राभूषण
आदि ठाटबाटसे । सो ही किसी कविने कहा है कि "भले बुरे
सब एकसे, जोलों बोलत नाहि" और "वडे बडाईना
तजें, बड़ो न बोले बोल॥" मैने भी रानीकी परीक्षा घोलने
और चलने फिरनेसे की है। जो वडे घरकी बेटियां है; जिन्हें
मायके (पीहर ) और ससुरालकी शरम है; माता पिताकी
।

कातुक्रिया-विचार । और सास ससुरकी प्रतिष्ठाका ध्यान है, तथा जो अपयश और पापोंसे डरती है; वे चलने फिरने बैठने उठने आदिमे मर्यादामा उल्लघन नहीं करती है । छिछलापन-उथलापन- नीचताका द्योतक है। कुटिला खियाके विपयमें कहा:- १-अपने पिताके वासमे, जह तह फिरें भतिमन्द ज्यो, डोलती घर घर फिरे, विन हेतुही स्वच्छन्द त्यों, २---जह होय मेला तथा कौतुक, देसनेको जावहीं, पर पुरुप बैठे होय बहुते, होय तह ठाडी सही, ३-बटु भ्रमन पसद विदेश जाको, एकली जहँ तह फिरें, व्यभिचारिणी जे नारि कुटिला, प्रीति तिन हुते करे, ४-नाहि लाज काहूकी करें, निज पति निरावर जासु के, वे नारि कुलटा पापिनी ये जान लक्षण तास के, ५-क्षण मांहि रोवें ओ हँसे, उन्मत्त मदमे नित रहें, नहिं होय तोपित भोगस्, नित कामकी बाधा दर्द, ६.-चलती मटकती चाल आतुर, स्वाद जिन्हाका चंद, ऐसी कुनारी स्वत नाशे जययाल जैनी करें, हे राजन् ! कुलवन्ती भार्या छुपाने योग्य अंगोंको सदा छुपाये रखती है। नीची दृष्टि करके चलती है। किसीसे भी, चाहे जैसा संभाषण नहीं करने लगती है । कुटुम्ब भरसे प्रीति, और जीव मात्र पर करुणा भाव रखती है। दुसित मुखितका दुख दूर करती है। धर्मात्मा जीवोंसे श्रावस वनिता वोधिनी । पवित्र प्रेम रखती है । देव, धर्म और सच्चे गुरुकी भक्ति + करती है । देवदर्शन, स्वाध्याय आदि धर्मकार्यों में अनु- रक्त रहती है। प्रत्येक सामान स्वच्छ सुव्यवस्थित रखती और प्रत्येक काम पूरा करती है । मकान भी बिलकुल स्वच्छ और सजीला रखती है । रसोई सुस्वादु और शुद्धता पूर्वक करती है । ऐसी कुलवन्ती भार्या होनेसे घर स्वर्ग बन जाता है। थोडीसी भी आयसे [आमदनीसे ] ऐसी गृहस्थीका निर्वाह बडे सुचारु रूपमें बड़े अच्छे डेंगसे होता जाता है । और लोग कहते हैं कि यह स्त्री कैसी सती लक्ष्मी है । यही गृहस्थी सुखी है। बहुतेरी श्रीमतियां ऐसी होती हैं कि, जहां उन्होंने गृह- स्थीमें पैर रखा कि गृहस्थी तीन तेरह हुई । जहां तहां सामान विखरा पड़ा रहता है; मकान मैला होता है। प्रत्येक काममें अधूरापन रहता है और प्रत्येक बातमें अव्यवस्था ( ढील पोल ) होती है । उनकी मूर्खतासे घरमें फूट और नानामकारके रोग फैलते है । ( मैलापन और चुरी रसोई तथा चित्तकी अस्वस्थता ही रोगके कारण हैं।) जहां आलसी, दरिद्र और मूर्ख-स्त्रियां हुई वहां शोक, दुःख । 1 + माक्तिका आशय बाटुकारी या अध श्रद्धासे नहीं हैं। -संशोधक।

स्तुक्रिया-विचार । और अकीर्तिका घर ही समझिए । ऐसी स्त्रियोंकी सन्तति भी इन्हीं जैसे कुलक्षणोंसे भूपित होती है । बुद्धि, विद्या, धर्म, कर्म, सत्य, शील और संयम आदिसे तो वह विल- कुल कोरी होती है । हो, सप्त व्यसनोंमेंसे कोई एक अथवा अनेक व्यसन, रोग, और अनेक कुलक्षण अवश्य ही उसमें जन्म सिद्ध होते हैं । वह अल्पायु होती है । सो महाराज, घबराइये नहीं । इन्हीं सब बातों पर और बहुत कुछ अनुभव पर यह स्वीपरीक्षा निर्भर है, और इसी तरह मैने भी परीक्षाकी है । क्षमा कीजिए | * राजाने इसे भी पुरस्कार दिया और घीकी मात्रा बढवा दी । राजाके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ और उसने चौथे सूरदासको बुलवाकर कहा- मूरदास ! तुमने कहा था कि तुम पुरुष-परीक्षा अच्छी जानते हो। अच्छा, निस्संकोच हो मेरी सची परीक्षा करो । सूरदासने कहा-महाराज यदि आप पीछे 'क्यों और कैसे करना चाहें, तब तो क्षमा कीजिए, मुझसे परीक्षा न करवाइये । और यदि जितना कहू उतने ही पर सन्तोप कर लेना चाहे, तो आज ही क्या करू, मैने बहुत पहिलेमे आपफी परीक्षा कर रक्सी है, सो सुनिए। * स्त्रियां गुणों, शरीर गठन, स्वभाव और रूप आदिके भेदसे चार प्रकारकी बताई जाती है १ पद्मिनी, २ चिनिनी, ३ शसिनी, ४ हस्तिनी । इनकी अच्छाईका क्रम भी यही है ।

७८
श्रावक वनिता बोधिनी।
"
राजाने इस यातको स्वीकार करके कहा कि अच्छा कहो ।
तब मूरदासने कहा, महाराज ! आपकी आज्ञानुसार निवेदन
है कि, आपका स्वभाव वैश्यों-बनियों का सा है। सारी सभा-
समेत राजा वडा ही चकित हुआ । राजा विचारवान या ।
सोचने लगा, क्या मेरी माता दुराचारिणी है ? सच है,
अनि, जल, नदी, सर्प, सिंह, स्त्री, ज्वारी, चोर और जार
आदि कुटिल स्वभाववालोंका विश्वास क्या ? इसीलिए
तो किसी कविने कहा है:-
तीनो ही त्रिलोक बीच, जेती है वनस्पती,
लेखनी सम्हारे ताकी, करके तुरतजू ।
तीनो ही त्रिलोक बीच, जेते है समुद्र द्वीप,
पर्वतकी स्याही कर, आनके भरतजू ।
तीनां ही त्रिलोक वीच, परी है जो जेती भूमि,
ताहीके सम्हार आछे, पत्र ले करत ।
शारदा सहस्र कर करके लियत सदा,
कामिनी रित्र तोऊ, लिखे न परतजू ॥+
राजा इसी भांति सोचता विचारता सभासे उठ गया
और राजमाताके पास पहुंचा । बडी नम्रतासे कहने लगा
+ मनहर कवित्त । ये यचन अधम स्त्रियोंको ही लगते हैं । वैसे तो बिया
जगज्जननी है ! ससारकी शांति है । गभीरता और स्थार्थ त्यागका मादर्श हैं।
और भनेक यातोंमें-गुणोंमें-तो मनुष्योंसे भी बढी चढी हैं । अजना और सीता
आदिका चरित्र पढ देखो।
-सशोधका

अतुक्रिया-विचार । ७९ कि, मॉ! भवितव्य बलवान है । बडे बडे देव, चक्रवर्ती आदि उसके चक्रमें आ जाते है । इसी भाँति यदि तुम भी आ गई हो, तो कोई चिन्ता नहीं । सत्य कहना, कि मेरे स्वभाव क्षत्रियोचित उदारतादि गुण क्यों नहीं है । माताने कहा कि पुन, वात यह है कि, एक दिन मैं छतपर बैंठी वैठी अपना शृंगार कर रही थी । उसी समय कल्याण- राय सेठ अपने छत पर बैठा बैठा एक सुन्दर रागनी गा रहा था । अकस्मात् दोनोंने दोनोको देखा, और अवसर पा दुर्भावनाने जन्म लिया । ठीक उसी रातको तुम्हारे पितासे मैं गर्भवती हुई । सो और तो कुछ नहीं है, केवल उस दुर्भावनासे ही तुमपर यह प्रभाव पडा है । क्योंकि ठीक उसी दिन में मासिक धर्मसे निश्चिन्त हुई थी । पुत्र ! तुम विश्वास करो । म किये हुए पापोंको छुपाकर घोर अपराधिनी नहीं हुआ चाहती । जो वात थी मैंने स्पष्ट कह दी है। राजा वहासे दरवारमें आया । चारों सूरदासोंका अच्छा वेतन बांधकर सभामें रक्खा । सोचना चाहिए कि, माताके विचारोंका और विशेष कर ऋतुकालके विचारोंका सन्तति पर फितना असर पड़ता है । कि कहां तो रणशूर, तपशूर और दान शूर क्षत्रियका पुत्र और कहां क्षुद्रहृदय, अनु. दार और स्वार्थी वणिकोका सा स्वभाव ? "

८०
श्रावक वनिता बोधिनी।
नातुकालमें कैसी सावधानी रखनी चाहिए, सो संक्षेपमें
नीचे लिखी जाती है।
ऋतुस्राव होना प्राकृतिक नियम है, और वह स्त्रियोंको
हर महीने हुआ करता है । कभी कभी यह कुछ जल्दी
और कभी कुछ देरीसे भी होता है, परन्तु जब नियमित
रूपसे यह कुछ अधिक कम दिनोंमें ( अर्थात् पन्द्रह दिन
या वीस दिनमें ) अथवा अधिक ऊंचे दिनोंमें ( अर्थात्
डेढ डेढ़ दो दो महीने या इससे भी ज्यादा दिनोंमें ) आने
लगे तब समझना चाहिये, कि यह किसी रोगसे विकृत हो
गया है । और इसकी किसी योग्य चिकित्सकसे चिकित्सा
करानी चाहिए।
किसी रोग आदिके कारणसे यदि १८ दिनके पहिले
रजो दर्शन हो तो उसकी शुद्धि स्नान मात्रसे हो जाती है ।
और यदि १८ दिनक पीछे हो तो उसका पूरा अशौच
मानना चाहिए।
रजोवती स्त्रीको किसी भी प्रकारको कुचेष्टा और नदीमें
स्नान करना सर्वथा वर्ण्य है । ( न करना चाहिए।
जब स्त्रीको जान पडे कि रजोदर्शनसे मेरे कपड़े अशुद्ध
हो गए हैं, तो उसी समयसे किसी वस्तुको न छुए । यदि
भोजन करते -समय रजोदर्शन हो, तो भोजन छोडकर
स्नान करे, पश्चात् भोजन करे । जो ऐसी अवस्थामें यदि
-

ऋतुक्रिया-विचार । - बच्चेको किसी वस्तु के स्पर्श करानेकी जरूरत हो तो बचेको म्नान कराले। एकान्त स्थानमें रहे और आत्म चिन्तवन करे । अपनी अवस्थाको विचारे, और देश जाति तथा धर्मकी उन्नतिक उपाय सोचे * । शय्यापर शयन न करे, किन्तु चटाई पर सो वे । यदि चटाई पर न सो सके तो ऐसे कपडों पर सोचे जो नित्य धोये या धुलाए जाकर शुद्ध किये जा सके। गरिध-भोजन और पान इलायची आदि मसाले भक्षण न करे । शृंगार न करे । ऑखोंमें सुरमा न ऑजे- न लगावे । गान न गावे । हँसी मसखरी न करे । मन्दिरमें न जावे । पतिसे भी बातचीत या हँसी न करे । ऐसे समयमें यदि कोई मूर्ख पति काम-सेवन करे तो उसे सुजाक गर्मी आदि भयानक रोग हो जानेकी अत्यधिक संभावना है । वैद्यकके सिद्धान्तोंके अनुसार, इस समयके काम- सेवनसे, एक तो गर्भ रह नहीं सकता, और यदि कथंचित रह जाय तो बुद्धिहीन, दुष्ट, हीनाग ( अपूर्णाग ), और कुमार्ग-निय सन्तान होती है । ऋतुमती स्त्रीके स्पर्शसे बहुत ज्यादा बचना चाहिए । उसकी परछाई मानमे, ताजे वने और बनते हुए पापड बड़ियां और अचार बिगड जाते हैं। • महापुरुषोंकी जीवनिया, सती महिलाओं चरिन, सुदर गृहस्थोपयोगी निदीप उपन्यास और भिन्न भिन्न विषयोंकी पुस्तकें पढना भी में बहुत उप- योगी समझता हूँ। -सशोधक। - ६ श्रावक वनिता बोधिनी। रक्तस्राव जिस दिनसे आरंभ हुआ हो उसके चौथे दिन (अर्धरात्रिके पीछे आरंभ हुआ हो तो दूसरे दिनसे शुमार करना चाहिए ) स्नान कर शुद्ध हो गृहस्थीसंबंधी कार्य कर सकती है । शृंगार आदि भी आज कर सकती है । पाचे रोज नहा धोकर भगवानकी पूजन, शास्त्र स्वाध्याय, और रसोई आदि भी कर सकती है । जो स्त्री इस प्रकार नियम पूर्वक आचरण करती है, वह यदि पहिले दिन गर्भवती हो जाय (ऋतु स्नानके पश्चात् ) तो सुन्दर, सौभाग्यशालिनी, सुलक्षणा और धर्मात्मा सन्ततिको जन्म दे । यदि दूसरे दिन गर्भवती हो तो, किसी सुयोग्य प्रतापयुक्त सन्ततिको जन्म दे । और इसी तरह तीसरे और चौथे दिन आदिमें गर्भ धारण करने पर भी योग्य सन्तान होती है । परन्तु ऐसा हो कैसे ? हमारी जातिमें तो कूट कूटकर अज्ञान भर गया है । जिसके फलस्वरूप हमारी जाति निकृष्ट, निर्बल और मूर्ख होती जा रही है । किया क्या जाय । लोग शास्त्रोंकी सोनहरी * बातें भूल गए हैं । सच्चे हितैपियोंकी उपदेश पूर्ण बातों पर ध्यान नहीं देते । जाति और धर्मके उदय चाहनेवाले उपदेशों और भवोध- कोंकी दिल्लगी उड़ाते है । उन्हें अपमानित करते हैं । अख- * उन्हीं बातोकी और मकेत है जो शास्त्रसम्मत होनेपर भी हम नहीं मानने-उनके अनुसार नहीं चलते। -सशोधक।

स्तुक्रिया विचार।
८३
mAANA
बार-जटों-से प्रेम नहीं है, फिर किस रास्तेसे ये सुमार्ग
पर आयेंगे सो भगवान जाने । भला, उपर्युक्त कार्यवाहीसे
किस तरह हमें धर्म-अधर्म, कर्तव्य, न्याय-अन्याय और योग्य
अयोग्यको पहिचान हो । कुछ विद्वानों की दशा तो ऊपर लिखे
जैसी हुई । अब रहे स्वार्थ और अपना उल्लू सीधा करने-
चाले मतलव गांठनेवाले वे गुणवान् , जिनकी समाजमें कुछ
चलती है । सो यदि, वें स्वार्थी है तो, न्यायका उपदेश नहीं
कर सकते-सुसम्मति नहीं दे सकते, क्योंकि इससे उनके इष्ट
कार्यमें विघ्न पड सकता है । रहे श्रीमान् सज्जन गण, सो
प्रति शत दो एकको छोडके शेप निद्या-शत्र और धनके
मदसे उन्मत्त है । उन्हें मनुष्य जीवनके उपयोग और
कर्तव्यका ध्यान ही नहीं है । धर्मकी वास्तविकताको वे
वैचारे जानते ही नहीं हैं । अब हे इवती हुई समाज
नौकाके निरवलम्ब आरोहियो-सवारो। हे भाई बहिनो!
किसीका आश्रय न ताको; अपने शास्त्रोंका खूब बारीकीसे
पठन और मनन करो, खूब विद्योपार्जन करो वास्तविक
धर्म पहिचानो, कर्तव्य और अफर्तव्यकी परिभाषा सीखो
पुण्य पापकी पहिचान करो, अकर्तव्य और पापको छोडो;
कर्तव्य और पुण्यसे प्रेम करो, जिससे तुम्हारा कल्याण
हो । स्मरण रक्खो, तुम अपने पुरे भले भाग्य के बनाने,
वाले आप हो ।
.

८४
आवक वनिता बोधिनी।
Awar
पंचम प्रकरण
मिथ्यात्त्व-निषेध
कुगुरु कुदेव कुधम औ, अग्रहीत मिथ्यात ।
सेवन कर जग-जन-दुसी, भोग तीव्र असात ॥
तुमने क्या कभी विचार किया है, कि जीव, पुद्गल
आदि पट द्रव्य और जीव, अजीव, आस्रव आदि सात तत्वों
का स्वरूप क्या है ? और इनका श्रद्धान करनेसे क्या होता
है ? क्या कभी सोचा है, कि मै कौन हूं ? कहासे आई ?
मेरा इन कुटुम्बियोसे सबंध होनेका कारण क्या है ? इस पर्य्या-
यके पीछे मुझे कहा जाना होगा ? मेरे साथ कौन कौनसी
सामग्री जाएगी ? मैं रात दिन जो कुछ अच्छा गुराकरती
हूं इसका फल क्या होगा' परलोक क्या है ' तुमने कभी
इन वातोंको नहीं सोचा, और इसी लिए अंधोंकी नाई
मनमाने मार्ग पर चल रही हो । तुम्हें आवश्यक है कि,
सुगुरु, सुदेव और सुधर्मका समागम करो । निस्वार्थी
विद्वानोंके व्याख्यान सुनो । तव तुम्हें मालूम हो जायगा
कि आत्मा किस तरह अपने आपको भूलरहा है। शरीरमे

मिथ्यात्व विषेध। ww M प्यार कर रहा है, और उसीके लिए-उसीके भरण- पोपण और रक्षाके निमित्त-मनुष्य, तिर्यंच और नर्क पर्या- योंमें भ्रमण करता है; पुण्यपाप उपार्जन करता है। और उसके अनुसार सुख दुस उठाता है। कोई भी देवी देवना, या परमेश्वर उसे रोकनेमें असमर्थ है । अर्थात् प्रत्येक आत्मा अपनी भलाई और बुराई करनेमें स्वतंत्र है, उसके मागमे उसके सिवाय कोई दूसरा कांटे नहीं घिखरा सकता-रोडे नहीं अटका सकता। इसलिये हमें मिथ्या कल्पनाओंको छोड देना चाहिए और गृहस्थके धार्मिक पटकमा दत्त 'चित्त रहना चाहिए । कर्तव्य पालनेवाले ही पुण्य उपार्जन करते है । और पुण्यवान ही सुख भोगते हैं। परन्तु जो कोई भी अपना हित भूलता है, श्रावक कुल, जिनधर्म और सत्य उपदेशके समागममें या धर्ममें संलग्न नहीं होता, वह अपनी इस अज्ञानतासे अन्तमें दुःख उठाता है। बहुतसी 'स्त्रियां सती, दुर्गा, सय्यद आदिकी पूजा करती है। पीपल बड आदिको किसी फलकी आशासे सींचती है। गोबर या मिट्टीके देवता बना पूजती है; भीतों पर भी देवता- ओंके चित्र निकाल उनकी पूजन-अर्चन करती है, सूर्य चन्द्रमाको अर्घ्य देती है। दिवालीको लक्ष्मी-रुपये, अशर्फी आदि-की पूजा करती है। एकादशी अथवा चौदशको देव उठावनी करती हैं। पूर्णिमाको गंगामें स्नान करती है। , ,

आवक वनिता बोधिनी।
गौर पूजती और महादेवको जल चढाती हैं; शिवरात्रि और
ग्रहणका व्रत करती है, अनेक पीर, फकीर और साधुओको
पूजती है; और इस तरह धर्म छोडती, पैसा बरबाद
करतीं, और अपने अमूल्य सतीत्वका भी वलिदान
कर देती है।
उन्हें सोचना चाहिए कि संसारमें सब जीव अपने
किए कर्मोंका फल भोगते हे । इन्द्र, जिनेन्द्र, और कोई
भी देवदेवी उसमें थोडा भी अन्तर नहीं ला सकते । सचे
देव, शास्त्र और गुरुको माननेसे चित्त निर्मल होता है।
रागद्वेष घटता है। जिससे पुण्यके साथ सुसकी प्राप्ति होती
है । परन्तु रागी द्वेपी देव और गुरु तथा असर्वज्ञ भापित
धर्मक समागमसे कपाएँ बढती है, और पापका वन्ध होता
है, और पापके वन्धसे दुःस्व होता है। कभी कभी स्त्रियोके
निर्बल हृदयोंमें भयका भूत और व्यभिचारका ब्रह्म-दैत्य
घुस पैठता है, सो कभी कभी तो वास्तवमें कोई भूत
पिशाच आ सताता है, [वेचारोंका भक्तों पर ही जोर
चलता है ] और नहीं तो ये केवल बहाने मात्र होते है।
कहनेका सारांश यह कि, जैन सरीखी उत्तम जातिम,
श्रावक सरीखे उत्तम कुलमें जन्म लेकर, सर्वोत्कृष्ट,
दोपरहित और सर्वगुण संपन्न जिनेन्द्र के उपासक बनकर
हम क्यों ऐरो गरोंको दृढते फिरते हैं ? यह तो वही हुआ
सर्व

मिथ्यात्व-निषेध।
कि अपने हीरेका कुछ भी मूल्य न करते हुए दूसरोंके
कांच लेनेको दौडा जाय। उन्हें सोचना समझना चाहिए।
और जैन धर्मके द्वारा अपना कल्याण करना चाहिए।
दूसरोंकी देखा देसी हमें गड्डेमें न गिरना चाहिए; कुगुरु,
कुदेव और कुधर्मकी पूजा अर्चासे बचना चाहिए । थोड़ा वि-
चार करना चाहिए कि, जैनधर्म और अन्य धोके सिद्धान्तों में
कितना और कैसा अन्तर है। कहा जैन धर्म तो मोक्षका
साधक, और अन्य धर्म मोक्षके वाधक, अर्थात संसारके
साधक- । यह जीप बिना पूरी चीतरागताके कदापि निष्फर्म
याने मुक्त नहीं हो सकता; और उस वीतरागता प्राप्त
करनेका साधन संसारमें एक जैनधर्म ही है, जिसमें
मानी वीतरागता कूट कूटकर भरी गई है । भूधरदासजीने
अपने जन शतक, एक जगह कहा है।
कैसे कर केतकी कनेर एक कही जाय,
आक दूध गाय दूध अन्तर घनेर है।
पीरी होत रीरी पेन रीस कर कचन की,
कहा काकवाणी का कोयलकी टेर है।।
* जीव जयता शुभाशुभ कमोको करता है तय तक नियमसे उसका जन्म
मरण होता रहता है, इसीको ससार कहते हैं । परन्तु जब यह जीव वर्मरहित
हो शुद्ध अवस्थाको प्राप्त हो जाता है, तर मुक्त कहलाता है । दूसरे मतोमें
बहुधा स्वर्गको ही मोक्ष माना है अथवा मोक्षका स्वरूप यथा नहीं कहा है।
इसलिए वे धर्म, सधे मोक्ष य उसके कारणोंसे भी अनजान है, और इसीलिए
मान्य नहीं है।

८८
श्रावक वनिता बोधिनी।
-
कहा भानु-तेज भारो कहा आगिया विचारो,
पूनाको उजारो कहा मावस-अंधेर है।
पक्ष छोर पारसी निहार नैन नीके कर,
जैन वैन और वैन इतनो ही फेर है॥
सम्पूर्ण शास्त्र यही कहते है कि, विष खाना, अग्निमें
जलना, जलमें ड्व मरना आदि अज्ञानताके कार्य तो एक
ही जन्ममें दुःख देनेवाले हैं (१) परन्तु आत्मस्वरूपके भुलाने-
वाले, अकर्तव्यके करानेवाले, ज्ञानशून्य जगतके ठगनेवाले
कुगुरु आदिका पूजन-वंदन अनेक जन्मके, जन्म मरणका
कारण होता है । उपदेश सिद्धान्त रत्नमालामें कहा है
सप्पो इक्वं मरण, कुगुरु अणता देइ मरणाई ।
तो वर सप्पो गहिय, मा कुगुरु सेवण भद्द ॥
अर्थात् सर्पके काटनेसे तो एक ही बार मरण होता है,
पर कुगुरुके सेवनसे अनन्त जन्ममरण होते है । इसलिए
हे भद्र सज्जनो! सापका ग्रहण करना तो भला, परन्तु
कुगुरुका सेवन सर्वथा त्याज्य है ।
जो स्त्रियां, पुत्र, सम्पदा और सुख आदिकी इच्छासे
ढोंगियोंको पूजती मानती है, वे उनके द्वारा ठगाई जाती हैं,
व्यभिचारिणी बनाई जाती है। शास्त्रोमें कहा है:-
जह कुब्वेस्सा रत्तो, मुसिजमाणोवि मस्मये हरिस ।
तह मिच्छवेस मुहिया, गय पिण मुणन्ति धम्म णिह ॥

मिथ्यात-निषेध । ८९ , अर्थ-जैसे कोई वेदयासक्त पुरुष धनादिक ठगाता हुआ भी हर्ष मानता है, वैसे ही मिथ्यात्व भानसे उगाए हुए जीप, अपनी वर्म-निधिके नाश होनेका कुछ भी विचार नहीं करते है। जो स्त्री-पुरुष मन्दिरको नहीं जाते, सुचित्त हा दर्शन नहीं करते, शास्त्र नहीं सुनते, और विद्वान पडितो द्वारा कभी तत्वोंके स्वरूपका निर्णय कर, कर्तव्य और अकर्तव्य स्थिर नहीं करते, भला उनका विश्वास एक जगह कैसे स्थिर रह सकता है, वे कभी तो उन्हें नमस्कार करते, कभी इनकी पूजा करते, कभी अमुक- जीको नारियल चढाते, और कभी तमुफजीके यहा भडारा कराते है । जैसे सडा नारियल या सोटा पैसा अनेक घरोंमें चक्कर लगाता फिरता है नसे ही उन स्त्री पुरुपोका माथा, अनेक देव देरियोंके आगे फुटता फिरता है। धर्म परीक्षामें कहा है:-- छप्पय-सर्व देव नितनमे, सर्व भिक्षुक गुरु माने, सर्व शास्त्र नित पढे, धरम अधरम नहिं जाने, सर्व विरत वितकरे, सर्व तीरथ फिर आये, परब्रह्मको छोड, अन्य मारगको ध्यावे, इस प्रकार जो नर रहे, इसी भाति शोभा लहे। आश्चर्य ! पत्र वेश्या तनो, कहो पिता कासो कहे ।। ,

८८
श्रावक वनिता बोधिनी।
कहा भानु-तेज भारो कहा आगिया विचारो,
पूनोको उजारो कहा मावस-अँधेर है।
पक्ष छोर पारखी निहार नैन नीके कर,
जैन वैन और वैन इतनो ही फेर है॥
सम्पूर्ण शास्त्र यही कहते हैं कि, विष खाना, अग्निमें
जलना, जलमें डूब मरना आदि अज्ञानताके कार्य तो एक
ही जन्ममें दुःख देनेवाले है (१) परन्तु आत्मस्वरूपके भुलाने-
वाले, अकर्तव्यके करानेवाले, ज्ञानशून्य जगतके ठगनेवाले
कुगुरु आदिका पूजन-वंदन अनेक जन्मके, जन्म मरणका
कारण होता है । उपदेश सिद्धान्त रत्नमालामें कहा है
सप्पो इक्क मरण, कुगुरु अणता देइ मरणाई।
तो वर सप्पो गहिय, मा कुगुरु
सेवणं भद्द ॥
अर्थात् सर्पके काटनेसे तो एक ही बार मरण होता है,
पर कुगुरुके सेवनसे अनन्त जन्ममरण होते है। इसलिए
हे भद्र सज्जनो ! सापका ग्रहण करना तो भला, परन्तु
कुगुरुका सेवन सर्वथा त्याज्य है ।
जो स्त्रियां, पुत्र, सम्पदा और सुख आदिकी इच्छासे
ढोंगियोंको पूजती मानती हैं, वे उनके द्वारा उगाई जाती है,
व्यभिचारिणी बनाई जाती है। शास्त्रोमें कहा है:-
जर कुब्वेस्सा रत्तो, मुसिज्जमाणोवि मस्मये दरिस ।
तर मिच्छरेस मुहिया, गय पिण मुणन्ति धम्म णिह ।।
.

मिथ्यात्त्व-निषेध। - तो हिन्दू धर्म परसे उनकी श्रद्धा उठ जायगी । और मुसलमान सुजाखे इस तरह हैं कि, अपने इए, सिपाय एक खुदाके, दूसरेको मानने पूजनेका विचार स्वममें भी नहीं करते । वे साफ साफ कहते हे "जिसके ईमानमें फर्क है उसके वापमें फर्क है"। इन बातोंसे जाना जाता है कि जैनी लोग हाथमें दीपक लिए हुए जान बूझकर कुऍमें गिरते है । जैनियोंकी स्त्रियोंमें यह खूब देखा जाता है कि, उन्हें जैसे ही कोई पीडा हुई कि, फौरन ओझा और जोगि- योकी पुकार हुई। वे लोग भी, कोई तो पितरोंकी कुनट, कोई भूत प्रेत या चुडैलका लगना, और कोई शनैश्वर आदिका प्रकोप बताते हैं, और मन माना लूटते खसोटते है। भोली स्त्रियांभी पाखड़ियोंके पाखडमें आ जाती है। और शीतला, भैरूं, महादेव आदिको नाना प्रकारसे पूजती, बदमाशोको माल खिलाती और उनसे बिगडती है । अंडे चढवाती, दूसरोसे वलिदान करपाती, कबरस्तानोंकी मानता मानती और ताजियोंको रेवडी चढाती है। तावीज बॅध- । • इस लोकोक्तिका कारण वह नहीं जान पडता, जो लेपक महागायने बताया है । वह समय गया जय लोग ऐसा कहते थे। भारतका पुन उदय होनेवाला है । लोग धार्मिक-द्वेप बिलकुल भूलते जा रहे हैं। परतु अनुदार जैन जाति अपनी ही दूमरी दूसरी जातियोंम दुर्व्यवहार करती है, धार्मिक स्वतत्रता छीनती है, मन्दिरमें नहीं आने देतो, दर्शन पूजा आदि नहीं करने देती, फिर येचारे हिन्दुओंको तो पूछना कौन है । उदाहरणके लिए दसा अमवालों और दसा परवारों पर होता हुआ दुर्व्यवहार देखिये। -सशोधक।

९०
श्रावक वनिता बोधिनी।
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.
अजैन लोग जैनियोंकी दिल्लगी उडाते है और कहते है
कि जैनी, देवी देवताओंकी कितनी निन्दा करते है परन्तु
छिपे छिपे किस तरह पूजन-अर्चन आदि करते हैं
कैसे निलज और दंभी है। इतना सुनते रहने पर भी, जैनी
अपने आचरणोंको नहीं सुधारते ।
जैनियोंके घरोंमें स्त्रियोंकी इतनी चलती है कि उनके
साम्हने पुरुप मानों गुलाम ही है । कहावत है “जैनी अंधे
हिन्दूकाने, मुसलमान सुजाखे" और वात भी ठीक है-
अपने शास्त्रों द्वारा सुदेव, कुदेव, सुगुरु, कुगुरुका स्वरूप
सुनने समझने पर भी खोटे मार्ग पर चलते है। इसी लिए
जैनी अंधे हैं । हिन्दूकाने यों है कि, विना समझे, लकीरके
फकीर बने सर देवोंको मानते पूजते है, केवल जैन धर्मसे
दूर जाते है। अपने ही शास्त्रोंमें लिखे हुए ऋपभावतारकी
भी निन्दा करते हुए कहते है " हस्तिना पीड्यमानोपि
न गच्छेज्जैन मन्दिरम् " अर्थात् हाथीके पैरके नीचे दव
कर मर जाना भला, पर जैन मन्दिरमें जाना अच्छा नहीं ।
उनके ऐसा कहनेका यही प्रयोजन है कि अगर लोग जैन
मन्दिर में जाकर प्रत्येक मर्मको अच्छी तरह समझ जायेंगे
* यह कहावत सिवाय इस पुस्तक न तो कहीं परनेमें भाई है और न
सुननेमें ही । पर यहां इसका जो भावार्य है वह अच्छा है।
-सशोधक।

मिथ्यात्व-निषेध। ९१ -- A-AM तो हिन्दू धर्म परसे उनकी श्रद्धा उठ जायगी । और मुसलमान सुजाखे इस तरह है कि, अपने इष्ट, सिवाय एक खुदाके, दूसरेको मानने पूजनेका विचार स्वममें भी नहीं करते । वे साफ साफ कहते है " जिसके ईमानमें फर्क है उसके बापमें फर्क है" । इन बातोंसे जाना जाता है कि जैनी लोग हाथमें दीपक लिए हुए जान बूझकर कुऍमें गिरते है । जैनियोंकी स्त्रियों में यह खूब देखा जाता है कि, उन्हें जैसे ही कोई पीडा हुई कि, फौरन ओझा और जोगि- योंकी पुकार हुई । वे लोग भी, कोई तो पितरोंकी कुनट, कोई भूत मेत या चुडैलका लगना, और कोई शनैश्चर आदिका प्रकोप पताते हैं और मन माना लुटते खसोटते है। भोली स्त्रियांभी पाखंडियोंके पाखडमें आ जाती हैं। और शीतला, भैरूं, महादेव आदिको नाना मकारसे पूजती, बदमाशोंको माल सिलाती और उनसे विगडती है । अंडे चढवाती, दूसरोंसे बलिदान करवाती, कबरस्तानों की मानता मानती और ताजियोंको रेवडी चढाती है। तावीज वॅध- * इस लोकोतिका कारण वह नहीं जान पड़ता, जो लेवक महाशयने बताया है । वह समय गया जब लोग ऐसा कहते थे । भारतका पुन उदय होनेवाला है। लोग धार्मिक-द्वेप विलकुल मूलते जा रहे हैं। परन्तु अनुदार जैन जाति अपनी ही दूसरी दूसरी जातियोंमे दुर्व्यवहार करती है, धार्मिक स्वतनता छीनती है, मन्दिर में नहीं आने देता दर्शन पूजन आदि नहीं करने देती, फिर बेचारे हिन्दुओंको तो पूछता कौन है । उदाहरण के लिए दमा अप्रबालो और दसा परवारों पर होता हुआ दुर्व्यवहार देखिये । -सशोधक।

९२ श्रावक वनिता बोधिनी। , वाती, भभूतखाती, और न जाने क्या क्या गंडे डोरे कर- वाया करती है । गनीमत थी, यदि वे इससे सुखी भी होती, पर ऐसा होता नहीं है । इस तुच्छ भ्रमजालमें पड़कर वे केवल दुखी ही और होती हैं। यदि जराभी विचार- शक्तिको काममें लावे तो स्वयं सोच सकती हैं कि, ये तुच्छ देव, गुरु जब स्वयं ही दुखी है, तो दूसरोंके दुखको क्या दूर करेंगे । और फिर " होनहार होके रहे " सुख दुख कर्मानुसार होते है । उसमें अन्तर डालनेमें कोई भी समर्थ नहीं है। हिन्दुओंके यहां एक कहावत कही जाती है और वह यह है:- देवी दुरगा, सेढ शीतला, सब मिल हरिपै आय । बोली हरि ! सब तुमको पूजे, अब हम कैसे खायें ॥ तब हरिजी झट यो उठ बोले, भूमण्डलमे जाओ। जिसघर मेरो नाम नहीं है, उसको लूटो साओ ॥ जिससे मालम होता है कि हिन्दूलोग भी और खासकर समझदार हिन्दू लोग इन्हें-देवी देवताओंको नहीं मानते जानते। कोई जैन धर्म तत्वको न समझनेवाली स्त्री यहा कह सकती है कि, हम वालवच्चेवाले आदमी यदि ऐसा न करें तो चल नहीं सकता । हम ऋपि मुनि तो है ही नहीं, जो सव त्याग कर बैठ जायें । वाल वचोका साथ है, यदि दुर्गा और

मिश्याव-निपेय।
९३
www ~~ 4wwvrvin www.
शीतला आदिको न मानें तो उनकी-बालबच्चोकी-रक्षा कौन
करे। उनसे मैं पूछता हूं कि, देव देवियोंके पुजारियोंकी-उन
स्त्री पुरुपोंकी जिनकी नाक देवी देवताओंके आगे नमस्कार
करते करते रगड गई है-पिस गई है, सतति (वालबच्चे ) क्यों
मर जाती है ? माता शीतलाके पूजनेवाले-घडी ही भक्ति
करनेवाले-स्त्री पुरुपोंके वालपचे माताकी ही वीमारीमें
क्यो मर जाते है ? क्या शीतला उनकी रक्षा नही कर सकती?
(हा वास्तवमें ही नहीं कर सकती। ) तो फिर पूजा पाठ
किस लिए ? अच्छा अब दूसरी तरहसे सोचो । अंग्रेज,
मुसलमान और दूसरे दूसरे वे मनुष्य जो देवी देवता-
ओंको नहीं मानते, नहीं पूजते, उलटी उनकी निन्दा और
अविनय करते हैं, उनकी सन्तान क्यों भली चगी रहती है।
शीतलाके रोगसे अच्छी क्यों हो जाती हैं। सबकी सर मर ही
क्यों नहीं जाती। क्योंकि देवी तो उन पर नाराजही होगी।
मेरी भोली और मूर्ख वहिनो, जो कुछ भी अच्छा या
बुरा होता है सर अपने भाग्यसे, सर अपने शुभ या
अशुभ कर्मफे फळसे । कोई देवी देवता, पीर पैगम्बर,
कोई क्षेत्र पाल या कोई तीर्थकर, तुम्हारे भाग्यको बदल
नहीं सकता। अपने कर्मोंका बुरामला फल तुन्हें देसना
ही होगा, भोगना ही होगा। उसको कोई भी टाल नहीं
सकता । प्राकृत पिङ्गल सून २ परिच्छेद १०२ में कहा है:-

९२ श्रावक वनिता बोधिनी। , वाती, भभूतखाती, और न जाने क्या क्या गंडे होर कर- वाया करती है । गनीमत थी, यदि वे इससे सुखी भी होती, पर ऐसा होता नही है । इस तुच्छ भ्रमजालमें पड़कर वे केवल दुखी ही और होती है। यदि जराभी विचार- शक्तिको काममें लावे तो स्वयं सोच सकती है कि, ये तुच्छ देव, गुरु जब स्वयं ही दुखी है, तो दूसरों के दुखको क्या दूर करेंगे । और फिर " होनहार होके रहे " सुख दुख कर्मानुसार होते है । उसमें अन्तर डाळनेमे कोई भी समर्थ नहीं है। हिन्दुओंके यहां एक कहावत कही जाती है और वह यह है:- देवी दुग्गा, सेढ शीतला, सव मिल हरिपै आय । बोली हरि | सब तुमको पूजे, अब हम कैसे सायें । तब हरिजी झट यों उठ वोले, भूमण्डलमे जाओ। जिसपर मेरो नाम नहीं है, उसको लूटो साओ॥ जिससे मालम होता है कि हिन्दूलोग भी और खासकर समझदार हिन्दू लोग इन्हें-देवी देवताओंको नहीं मानते जानते। कोई जैन धर्म तत्वको न समझनेवाली स्त्री यहा कह सकती है कि, हम बालबच्चेवाले आदमी यदि ऐसा न करें तो चल नहीं सकता। हम ऋपि मुनि तो है ही नहीं, जो सब त्याग कर बैठ जायें । बाल बचोका साथ है, यदि दुर्गा और

मिथ्यात्व-निपेच।
९३
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शीतला आदिको न मानें तो उनकी-बालवच्चाकी-रक्षा कौन
करे। उनसे में पूछता हूं कि, देव देवियों के पुजारियोंकी-उन
स्त्री पुरुपोंकी जिनकी नाक देवी देवताओं के आगे नमस्कार
करते करते रगड़ गई है-पिस गई है, सतति (वालबच्चे ) क्यों
मर जाती है ? माता शीतलाके पूजनेवाले-बडी ही भक्ति
करनेवाले-स्त्री पुरुपोंके वालबच्चे माताकी ही बीमारी में
क्यों मर जाते है ? क्या शीतला उनकी रक्षा नहीं कर सकती?
(हा वास्तवमें ही नहीं कर सकती। ) तो फिर पूजा पाठ
किस लिए ? अच्छा अब दूसरी तरहसे सोचो । अंग्रेज,
मुसलमान और दूसरे दूसरे वे मनुष्य जो देवी देवता-
ओंको नहीं मानते, नहीं पूजते, उलटी उनकी निन्दा और
अविनय करते हैं, उनकी सन्तान क्यों भली चंगी रहती है।
शीतलाके रोगसे अच्छी क्यों हो जाती है। सरकी सब मर ही
क्यों नहीं जाती। क्योंकि देवी तो उन पर नाराजही होगी।
मेरी भोली और मूर्ख वहिनो, जो कुछ भी अच्छा या
चुरा होता हे सर अपने भाग्यसे, सब अपने शुभ या
अशुभ कर्मके फलसे । कोई देवी देवता, पीर पैगम्बर,
कोई क्षेत्र पाल या कोई तीर्थकर, तुम्हारे भाग्यको बदल
नहीं सकता । अपने कर्मोंका पुराभला फल तुम्हें देखना
ही होगा, भोगना ही होगा। उसको कोई भी टाल नहीं
सकता । प्राकृत पिहल सूत्र २ परिच्छेद १०२ में कहा है-

श्रावक वनिता बोधिनी । Ash NAM numawrnama पाण्डव वसहि जन्म करीजे । सपअ अजिम धम्मक दीजे ॥ साउजुहिटिर सकट पाआ। दैविक ललिअ केण मिटाआ ॥ अर्थ-पाडव वंशमें जन्म लेनेवाले, उत्तम सम्पदा और धर्मके धारण करनेवाले युधिष्ठिर सरीखे महाराज भी जव संकटको प्राप्त हुए, तो कहिए भाग्यको कौन मेट सकता है ? स्वामि कार्तिकेयानुप्रेक्षामें कहा है:- आडख्खयेण मरण, आउ दाऊण सक्कदे कोवि । तमा देविन्दो विय, मरणाउ ण रक्सदे कोवि ॥१॥ अर्थ-आयु कर्मके क्षय होनेसे मरण होता है । आयु- कर्म देनेको कोई समर्थ नहीं है । इसी कारण देवपति इन्द्र भी किसीको मृत्युसे नहीं बचा सकता । और भी देखिए, भगवान आदिनाथ, प्रथमतीर्थकर, कर्म भूमिके प्रवर्तक ब्रह्मा, भरत चक्रवर्तीके पिता और इन्द्रादि देवोंके पूज्य थे । वे भी अन्तराय कर्मके प्रवल उद- यसे छः महीने तक निराहार विहार करते रहे । परम पुरुपो- त्तम भगवान रामचंद्रको वनवास और सरला सीताको वियोग प्राप्त हुआ। इसी प्रकार नवम नारायण श्रीकृष्णकी उत्पत्तिके समय न तो किसीने गाया, और न मृत्यु समय किसीने रुदन ही किया । इन दृष्टान्तोंसे जान पडता है

मिथ्याव-निषेध ।
९५
कि जैसे अच्छे और बुरे कर्म किए जाते है, उनके अच्छे
या बुरे फल स्वयमेव मिलते ही है | जो स्त्रिया इतना जान
कर भी योग्य उपाय नहीं करतीं वे दीपक हाथमें लेते हुए
कुऍमें गिरती है । कैसी मूर्खताभरी बातें हैं, कि बच्चोंको
शीतला निकलने पर इलाज तो करती नहीं, करती क्या
है ? माता-दुर्गाके गीत गाती है, उन्हे पूजती है। पूभापूरी
ले और माथेपर अंगीठी रख माताकै मठमें, उसे मनाने
जाती हैं, दण्डवत करते करते मठ तक दौडती हैं । उन्हीं
अपनी मूर्ख बहिनोके लिए, माताकी बीमारीकी उत्पत्ति
संक्षिप्तमें लिखता हूं। आशा है, वे अपनी अज्ञानता और
कुदेवादिका पूजन-भजन छोड़ेंगी।
प्रकट हो कि माताके पेटकी गर्मीका कुछ अंश सन्तानमें
आ जाता है। वही विकार ऋतु, खान पान, या और कोई
ऐसा ही कारण पाकर वालकके शरीरमेंसे चेचकके दानों
-फुन्सियो द्वारा बाहिर निकलता है, जिसे लोग चेचक,
भवानी, माता, और शीतला आदि कई नामोंसे पुकारते
है । यह केवल शारीरिक विकार है । किसी देव देवीका कोप
नहीं है । इसके लिए लोग टीकाको अच्छा उपाय बताते
है। कभी कभी टीकेकी सामग्री अच्छी न होनेसे जितना
फायदा होना चाहिए, उतना नहीं होता । अर्थात टीका
लगने पर भी माताकी बीमारी कभी कभी निकल ही पाती है।

श्रावक वनिता बोधिनी। -- , इस बीमारीमें पहिले दो तीन दिन ज्वर आता है। फिर सिरसे फुन्सियोंका निकलना आरंभ होता है और थोडे दिनोंमें सारे बदन पर फुन्सिया हो जाती है । जब इस तरह चेचक निकलनेका हाल मालूम हो, तो घरमें कोई पकान न बनाना चाहिए । रोगीकी माताके सिवाय दूसरी रजस्वला स्त्रियोंकी दृष्टिसे उसे-माताके रोगीको पचाना चाहिए । सर्द- ठंडी-चीजे अधिक तर न खिलानी चाहिए, किन्तु तर भोजन उसे देना चाहिए और सफाई के साथ रखना चाहिए । माताके गीत गा गा करके अपने पुत्रको हाथसे न खोना चाहिए, या अंधा, वहरा आदि न बनाना चाहिए । देखा गया है, कि इन दिनों बहुतेरी स्त्रियां इसलिए मन्दिर नहीं जाती कि, कहीं जिनेन्द्र के दर्शन करनेसे मातादेवी रुष्ट न हो जायें। चलो अच्छा हुआ । यों ही दर्शन करने, जाप्य देने और स्वाध्यायकी इच्छा नहीं थी अब उसके लिए मूर्खता पूर्ण पूरा कारण ( कहने सुननेमें) मिल गया । सच है "विनाश काले विपरीत बुद्धिः” अर्थात् जब चुरे दिन आते है तर बुद्धि भी भ्रष्ट हो जाती है । सारांश यह कि यदि वे ही भोली स्त्रियां मन्दिर जाएं; शास्त्र स्वाध्याय करें और विद्वा- नोंके व्याख्यान सुने तो ऐसी मूर्खताओंमे न पडें । क्योंकि कर्तव्य अकर्तव्यका ज्ञान उन्हें उन्ही वातासे, शास्त्र स्वाध्याय और धर्मोपदेशसे-हो जाएं । वे अपना भला और बुरा समझने लगें। कोई वाई प्रश्न कर सकती है कि, कुगुरु, कुधर्म " मिथ्यात्व-निषेध। ९७ और कुशास्त्रसे यदि कुछ नहीं होता तो फिर क्यों इतने मनुष्य उन्हें मानते है । इसका उत्तर यह है कि, वहुतसे आदमी यदि शराब पीते हैं, तो कुछ शरावका पीना अच्छा नहीं समझा जा सकता । अथवा यदि बहुतसे आदमी चोरी करते हैं, तो चोरी का करना अच्छा नहीं समझा जा सकता। कुदेवादिककी पूजन आदिका इसलिए विरोध है कि, उनकी पूजनसे राग द्वेप आदि दुर्भावोंकी वृद्धि होती है, जिससे पाप कर्मका वन्ध होता है, जो दुःखका कारण है । पर सुगुरु, सुदेव और सुधर्मकी पूजा-पन्दनासे विपय-कपाय घटकर परिणाम निर्मल होते हैं । जिससे पुण्य कर्मके बंधसे इष्ट सामग्रीका समागम होता है। वालकोंके अज्ञानी, दुर्बुद्धि और अनाचारी होनेका एक कारण कुसंस्कार भी है । जो स्त्रियां नीच, व्यभिचारी और जगतके उगनेवालोंके फन्दमें पड़ती है, वे अपना धर्म, कर्म, शील और श्रद्धान रूपी धन गमा बैठती हैं । आज- कल साधु, फकीर, भट्टारक और ऐसे ही और श्रद्धा-भक्ति- भाजन व्यक्ति महा अवगुणोकी ग्वानि हो रहे हैं-महा बने हुए होते हैं-स्त्रियोंको चाहिए, कि स्वममे भी इन लोगोंके पास न जावें । ये पाखडी और ठग लोग-ये रंगे लडैए-ये गलाभक्त जान बूझकर स्त्रियोंको निगाडते हैं। ये लोग धर्मात्माओं सरीखे नाम और वेश रखके खून माल खाते और मजा उडाते है । ये इन्द्रियों और मनको वश , ७

९८
श्रावक वनिता वोधिनी।
।
करना तो दूर रहा, उलटे व्यभिचारके साज सजते है । और
धर्मकी ओटसे चोट खेलते हैं । टट्टीकी आड़में शिकार
करते हैं । धर्मयुद्धि और सच्ची स्त्रियोंके साम्हने इनकी दाल
नहीं गलती । जव समाजका यह हाल है, तो क्यों न सारे
दुर्गुणोंसे युक्त सन्तान होवे । परन्तु उन धर्ममाण सच्ची
स्त्रियोंकी सन्तान पुण्यके प्रसादसे सुशील, वलवान, गुणवान
और विद्वान होती है । धर्मके प्रभावसे ऐसी स्त्रियोंकी
सन्ततिको रोग पीड़ा आदि भी नहीं होती, और जो होती
भी है तो शीघ्र ही शान्त हो जाती है । पुरुपोको चाहिए
कि ऐसे ढोंगी मायावी लोगोंके पास, अपनी स्त्रियोको
बहिन बेटियोंको जानेसे वचावें ।
धर्मात्माकी तो परछाई मात्रसे दूसरोंके विन, कष्ट,
रोग
और शोक दूर हो जाते हैं । धर्मकी महिमा अचिन्त्य है ।
पद्मपुराणमें परम शीलवती श्रीविशल्याकी कथा लिखी है
कि, उसके पूर्व जन्मके जप, तप और शीलके प्रभावसे उसके
स्नानोदकके-स्नान किए हुए पानीके-स्पर्शसे देशमें फैला
हुआ मरी रोग शान्त हो गया। उसीसे लक्ष्मणकी शक्ति
और घायल सैनिकों के घाव-कष्ट दूर हो गए । घाव भर
गए । यह सव सम्यग्दर्शनका ही प्रभाव है। और सच भी
है, जिस सम्यग्दर्शनके प्रभावसे मोक्ष रूपी अक्षय सम्पदा
माप्त हो जाती है; जन्म मरण जैसा अद्वितीय प्रवल रोग

मिथ्यात्त्व-निषेध। ९९ हो जाता है; तो साधारण शारीरिक रोगोंका कहना ही क्या है ? इतनी सी बात ही क्या है ? इस प्रकार संसारमें भटकानेवाले मिथ्यात्वको छोड़, अहंत देव, निग्रंथ गुरु और दयामयी धर्मको सेवन कर पटद्रव्य, सप्त तत्त्व, नव पदार्थका स्वरूप जानो। आत्माके सच्चे धर्मका श्रद्धान कर सच्चा सुख पाओ। मनुष्य-जीवनका यही लाभ है। समयकी आवश्यकताके अनुसार स्त्रियोको कुछ और भी शिक्षाएँ यहाँ लिखी जाती हैं । आशा है, स्त्रियां ध्यान देंगी। विद्याके अभाव और कुसंगतिके प्रभावसे जैन स्त्रियां भी व्याह और पुत्र-जन्मके समय ऐसे बुरे गीत-सीठने- निर्लजगालियां-गाती हैं, जो उच्च जैनकुलके सर्वथा विरुद्ध है। सोचो तो कि, जहां अपने माता पिता, सास श्वसुर आदि गुरुजन, वेटा बेटी और जातिके जेठे नरनारी आदि यैठे हों वहां गालिया गाफर, उन फूहड, कर्णकटु, सद्भाव- भंजक और क्षुद्रता-व्यजक शन्दोंकी धारा वरसा कर, खियां क्या लाभ सोचती है? उन्हें कुछ लाज नहीं आती' जिन शब्दोंके कहनेमें वेश्याए भी शरमाती है, उनके कहने में भले घरकी वह वेदियाँ, और तो और, भरे बाजारमें, सभी वरहके जेठे चढे स्त्री-पुरुपोंके साम्हने, कुछ भी संकोच न

श्रावक वनिता बोधिनी।
।
करें, यह कितने गजवकी बात है । बड़ी प्रसन्न हो होकर
मुआचरणी स्त्रियोंको गालियां देना-लांछन लगाना-व्यभि-
चारिणी कहना, कितने दुःखकी बात है । यह केवल उन
स्त्रियों या उनके पतियोंकी अज्ञानता है । इन निर्लज्जता
भरे फहड गीतोके गानेका यही कारण मालूम होता है कि,
आंखोंकी लाज या शरमको दूर करना, और शीलवान
होते हुए भी ऐसे गायन गाकर अपने व्यभिचारपनेकी
डौड़ी (ढिंढोरा) पीटना । जिस प्रकार कोई कुट्टनी (दूती)
दो चार वेश्याओंको साथ विठाकर, व्यभिचार-सेवनके
भावसे, बुरे शब्दों द्वारा, आनेजानेवाले पुरुपोको लुभाती
है । उसी प्रकार एक बड़ी निर्लज्ज गानेवाली वृद्धाके निकट,
वहुतसी युवा स्त्रिया बैठकर, बुरे बुरे गीतों द्वारा अपना
व्यभिचारपन प्रकट करती हैं । और छोटी छोटी पुत्रियोके
कोमल हृदयों पर अपनी इन बातोंसे बहुत बुरा प्रभाव
डालती है । विवाह सरीखे पवित्र कार्यों में तो, इसका पूरा
पूरा मौका मिलता है । फेरेके दिन पुरुष तो वरको साथ
ले कन्या-पक्षके यहां फेरे फिराने चले जाते है, और यहाँ
अवसर पाकर स्त्रियां, अपनी कौटुम्बिक सहेलियों और
नीच जातिकी स्त्रियोंके साथ इकही हो, एक सुन्दर युपतीको
पुरुपके वेपमें करके, उसका एक दूसरी स्त्रीसे काल्पनिक
सम्बन्ध जोडती हैं। अथवा कभी कभी यह संबंध नहीं भी
जोड़ती। केवल एक स्त्रीको धारा बना देती है, और उसके
,

मिथ्याश्व निषेध । AMAVA . साथ मनमानी कुचेष्टा करती हुई, अटूट और लबालवं शृगारके गीत गाती हुई, तथा ढोल वजाती हुई सारे बाजारमें फिरती हैं। इस कृत्यको देख और सुनकर लज्जाको भी लना आती है।* धिक्कार है ऐसे लोगोंको, जो इन कृत्योंसे-इन घृणास्पद कार्योंसे-अपनी स्त्रियोंको नहीं रोकते। क्या कोई कह सकता है कि, ऐसे जाति, धर्म और लोक विरुद्ध कार्य करनेवाली स्त्रियां शीलवती रह सकती है ? कदापि नहीं । उनमें किसी न किसी व्यभिचारका अंश तो जरूर होगा। अथवा यों कहिए कि, उनकी मूर्खता' ही उन पर ये दोप आरोपित करवाती है । गीत गाओ । उनकी मनाई नहीं है । पर ऐसे गीत गाओ जो देश जाति और धर्मके कल्याणका मार्ग वतायें, स्त्री-पुरुपोंको बुरे मार्गापरसे खींचकर अच्छे मार्गापर चलायें; और माथ ही उनके चित्तको भी प्रसन्न रखे। ब्याहके समय बहुतेरी स्त्रियां अज्ञानता और अन्ध- परम्पराकी नीतिसे अथवा अन्य मतावलम्बियोंकी देखा देखी, देवी दिहाड़ी, चक्की, चूल्दा, देहली, गणेश, कुम्हारका चाफ और गधे आदिको पूजती और साथ साथ निर्लज्ज गीत गाकर समझती है कि इन बातोंसे व्याह निर्विघ्न समाप्त होता है । यह उनका वडा भ्रम है । भला मूर्खता पूर्ण और * यह रीति सार्वदेशिक नहीं है । और तो और, लेखकके प्रदेशके पडोसी मध्यप्रदेशके जैनियों में यह पाया बनानेकी प्रथा नहीं है । हाँ, पूहह गीत जहर गाए जाते है । पर अब ये भी बहुत कम । ---सशोधक १.२ आवक वनिता बोधिनी। अकार्योंसे कोई कब सफलता पा सका है। जो धर्मात्मा और बुद्धिमान है, वे जन्मसे मरण तकके सम्पूर्ण संस्कार शास्त्रानुकूल करके पुण्य-बंध करते है । जिससे अपने आप विघ्न आते ही नहीं। वे विवाहादिक संस्कारोंको भी शास्त्रानु- कूल ही करते है। वर्तमानमें विवाह सम्बन्धी जो नेग या प्रथाएँ बुरी समझी जाती है उनकी वास्तविकताकी ओर दृष्टि देकर देखा जाय, तो जान पड़ता है कि सुरीतियां ही धीरे धीरे इस रूपमें आ गई है, जिन्हें अब हम बुरी और हानिकारक निगाहसे देसने लगे है । अगवानी ( आतिश बाजी) शब्द हमें स्पष्ट बताता है कि, वर-पक्षकी वारातके आनेपर पेशवाई करना स्वागत करना-ही अग- वानी है। आश्चर्य नहीं कि, इस स्वागतकी प्रथामें कभी आतिशबाजी भी चलाई जाती रही हो। सो और आदर- सत्कार तो गया । रही ये मुंह झुलसा देनेवाली और रुपयोका धुआँ उडा देनेवाली आतिश वाजी । और क्या जाने किसी मन चले रईसजादेने ही, शायद इस हत्याकारिणी प्रथाको जन्म दिया हो । समयके फेरसे न जाने कितनी अच्छी प्रथाएं अतीतके गर्भमें समा गई; और उनके बदले कितनी ही नष्ट भ्रष्ट प्रथाए उन्हीं पूर्व प्रथाओंके बचे सुचे ईटरोड़ेसे तैयार हो गई। अथवा अनेकों नई प्रथाए उत्पन्न हो गई । उन्हीं से अनेकों के नाम भी अपभ्रंश हो गए। किसी किसी देशमें विवाहके पूर्व कुम्हारके चकेकी पूजनकी जाती है; क्या जाने शायद इसका प्रयोजन सिद्ध-चक्र- ,

मिथ्यात्व-निषेध ।
यंत्रकी स्थापना हो! इसी यंत्रको भॉवर-फेरा के पूर्व
विवाह मण्डपमें लानेका नाम गणाचना-विनायकी-है। और
भी कई क्रियाएँ ऐसी है जो (अर्थका अनर्थ ) हो गई है।
यदि उनके विषयमे छान चीनकी जावे तो वे कोई अच्छी
प्रथाएँ (आरंभमें ) निकलेंगी। चतुर व्यक्तियोंको चाहिए
कि वे प्रत्येक कार्यका यथार्थ-वास्तविक स्वरूप ही जानकर
ठीक रीतिसे व्यवहार करें । विवाह आदिमें भोजन वगैरह
शुद्ध सामग्री तैयार कराने, और पानी छाननेका पूरा
यत्न रखना चाहिए जिससे उत्तम जातिका आचार विचार
नष्ट न होने पावे । विवाहमें कभी भी कुप्रत्तियों के बढाने-
वाले, अनर्थ-दडरूप, लज्जा-जनक, लोक-निय, भंड-गीत
भूलकर भी न गाए जाएँ । ऐसे गीतोंसे शीलमे दूपण
लगता है । लोग निन्दा करते है कि, ये उच्च जातिकी
निर्लन स्त्रियां गली गली कैमी निंद्य गालियाँ बक रही
है और अपनी जाति तथा धर्मको लाञ्छन लगा रही है।
जो बुद्धिमान स्त्रिया अपने लोक परलोक सुधारा चाहती
है, वे ये भंडगीत गाना और अन्य मिथ्यात्त्व-सेवन कुछ
भी निंद्य कार्य नहीं करतीं। शुभ कियाएँ करती हैं, और
सुन्दर बोधप्रद और धार्मिक गीत गाकर पुण्य लाभ लेती
है, जिससे उनका, उनके कुलका और उनके धर्मका यश,
जगतमें फैलता है।*
* यप जगह एकसी मूर्खताए नहीं है । उनमें भेद है। परन्तु अश
शीघ्रतासे उठती जाती है।
-सशोधक।

श्रावक वनिता वोधिनी।
अष्ठम प्रकरण ।
---
विधवाओंका कर्तव्य-कर्म ।
नरभव, यौवन, धान्य धन, अरु विवेक विज्ञान ।
पाय धर्म सेवन करहु, काटहु कर्म सुजान ।।
जो कदाच दुख आ परै, तो न करहु कछु सोग ।
पूरव करनी जिमि करी, धरि धीरज फल भोग ॥
धर्म-कर्ममे अटल रहु, कटें पूर्व कृत पाप ।
पुण्यकर्म नूतन बंधें, सुख पावे नित आप ॥
इस पुस्तकमें स्त्रियोंके योग्य और तो प्रायः सब कुछ
(शायद लेखककी धारणाके अनुसार ) लिखा जा चुका
है। केवल थोडासा यही उपदेश देना शेष रह गया है
कि कदाचित पाप-कर्मके उदयसे कोई स्त्री विधवा हो
गई हो, तो उसे अपना शेषजीवन किसमकार व्यतीत
करना चाहिए।
प्रकट रहे कि विवाह होने पर पुत्रकी संज्ञा पति, और
पुत्रीकी संज्ञा स्त्री हो जाती है वे दोनों नियमानुसार जीवन
भरके लिए एक सूत्र में बंध जाते है । वे दोनों यदि बुद्धि-
मान हैं, योग्य हैं, तो लौकिक और पारलौकिक दोनो
प्रकारके सुखोंके पात्र होते हैं । इस जीवनमें ये केवल

विधवाओंका कर्तव्य-कर्म ।
१०५
HARRAN
अपने कुटुम्बका ही नहीं, वरन अपनी जाति और देश
तकका हित साधन करते हैं । इसलिए दम्पतिको अपने
और पराए हितके लिए विद्वानोंके सिखापनों पर चलना
चाहिए, और उत्तम शिक्षाओंका प्रचार अपनी सन्तानमें
करना चाहिए ताकिचे धर्म और नीतिके मार्ग पर चलनेमे
अग्रसर हो । प्रत्येक गृहस्थीमें उसकी आय (आदमनी)
से थोडा खर्च होना आवश्यक है । अर्थात् जहातक हो सके
आयका आधा भाग कुटुम्ब-निर्वाहमें और चौथाई भाग पुण्य-दान
आदि परोपकारके कार्योंमें व्यय कर शेषकी वचत रक्खे ।
क्योंकि बचा हुआ द्रव्य अकस्मात् आए हुए मौकों पर
व्याह शादी और रोग आदिके समय घडा काम देता है।
कहां, कैसा, और कितना खर्च करना, और कहां न करना,
यह वात प्रत्येक स्त्री पुरुपको सीखनी चाहिए । बचत
करनका प्रत्येक उपाय सीखना और उसका उपयोग करते
रहना यह एक सुन्दर कला है।
इससे अच्छे प्रकार खर्च चलाते हुए भी बचतकी जा
सकती है। यह सच है कि, घरकी पूनीसे ही बरकत होनी
और मोकेकी गरज सरती है। यदि वचत न रक्खी जाय तो
वक्त वक्त पर दूसरेके द्वारपर जाफर रुपया मागना पडता
है, जिससे प्रथम तो अपना अभर (भीतरी यात) सुलता और
दूसरे आँखें कुछ नीची पडती है । आधा-सीधा व्याज देना
।

श्रावक वनिता वोधिनी। पड़ता है और रुपया कर्ज पर उठाना पड़ता है । जिसकी चिन्तामें रात दिन पड़े रहते और किसी भी तरह-पापकर्म द्वारा भी-रुपये कमानेकी फिकर पड़ती है । कर्जदार आद- मीकी साख प्रायः वाजारसे उठ जाती है और उसे लोग उधार देनेमें संकोच करते हैं । विरादरी, पुरा-पड़ोस, अथवा गांव-परगांवके जो लोग तुम्हारी फिजूल खचोंके समय वाह वाह करते थे, वही फिर ऑख उठाकर नहीं देखते कि कही कर्ज न मॉगने लगे " देख लेते है तो कतराके निकल जाते हैं । वात जो आपड़ती है तो वातको वनाते हैं।" फिरतो यही हाल होता है । बाप दादोंतककी प्रतिष्ठा धूलमे मिल जाती है और कभी कभी तो यह कर्नकी पोटली नाती पोतों तक जाती है। इसीलिए नीतिमे कहा है कि “ तेते पांव पसारिए जेती लाम्बी सौर" जो व्यक्ति इस नीति पर ध्यान देकर तदनुसार चलते हैं वे सुखी होते है। और जो नहीं चलते वे मौके पर कर्ज रूपी चक्कर में पड़ते है, और अपने जीवनको घोर दुख-मय बनाते हैं । ब्याह शादीके समय, अथवा गीके समय झूठी वाहवाही लूटनेके लिए हजारों रुपया वरवाद-व्यर्थ वरवाद- कर देते हैं। घरमें न होने पर कर्ज लेकर खर्च करते हैं, और फिर जन्मभर शोक और नालिश कुरकीके दुःख उठाते हैं। इसी शोक तथा दुःखसे जर्जरित होकर अकालहीमें कालके गालमें समा जाते हैं। इसी फिजूल खर्चीके कारण जैन जाति

विधवाओंका कर्तव्य-कर्म।
१०७
Panown
कंगाल हो रही है । कुछ उंगलियों पर गिनने योग्य खाते पीते
व्यक्तियोंको छोड़कर अधिकांश जैन जाति रोटियोंको तरस
रही है। उनके दुःख मय जीवनकी कल्पना करते ही विचार
होता है कि आज एक व्यापारी श्रीमान् जातिके अविकाश
पूत, पेटकी ज्वालामें किस तरह जल रहे है । अतएव प्रत्येक
स्त्री पुरुषको इस शिक्षा पर ध्यान देकर प्रामाणिक खर्च
करना चाहिए, और एक चौथाई आय प्रति मास बचाते
रहना चाहिए । दम्पतिको धर्म और नीतिके अनुसार
चलते हुए अपना ग्रहस्थाश्रम चलाना चाहिए ।
यदि कोई स्त्री विधवा हो जाय तो अपने वय-पाप्त
पुत्रोंके आधीन रहे, और उन्हींकी आज्ञानुसार चले । यदि
कुटुम्समें कोई पालन पोपण करनेवाला न हो तो उसे चाहिए
कि अपने कुल और जातिके योग्य न्याय पूर्वक उद्योग करके
अपना उदर विवाह करे और सतोष करके धर्मम
संलग्न रहे।
देखा जाता है कि कोई कोई स्त्रियां विधवा हो जाने पर
महीनों, रोया करती हैं। माथा पीटती और छाती कूटती
है, पर यह सब व्यर्थ है । उनका चिल्लाना सुनता कौन है ?
और फिर इस दुखको दूर कर ही कौन सकता है।
रोना तो मानो केबल मूर्खता दशाना है । बहुत जगह
पुरुप और त्रिया फेरेको आती है, और मृत-व्यक्तिका

श्रावक वनिता बोधिनी ।
है
गुणानुवाद करके उस वेचारीको और रुलाती हैं। जिससे
उसे तीव्र आर्त परिणामों द्वारा नर्क-आयुका वन्ध होता है ।*
विधवा स्त्रीका बाहर न निकलना ही किसी तरह अच्छा
। परन्तु कारण-वश उसे निकलना ही पड़ता है। जैसे
मन्दिर आदिको । उसे विचारना चाहिए कि पूजन, अर्चन,
दर्शन और शास्त्र-पठन-मनन ही तो पाप और दुःखके
दूर करनेवाले हैं । फिर मूल्के कहनेमें लगकर दर्शन
आदि करने को न जाना क्या सयानपन है ? खाने-पीने,
लैन-दैन आदि सांसारिक काम तो छूट ही नहीं सकते-होते
ही हैं । परन्तु धर्मके लिए कोई प्रेरणा करनेवाला नहीं
है । यदि तुम उसे भुला दो तो भले भुलादो । पर
धर्मको भुलाकर तुम अपना दुःख दूर नहीं कर सकतीं,
"प्रत्युत वढाती ही हो।
राजा राणा क्षत्रपति हथियनके असवार,
मरना सबको एक दिन, अपनी अपनी वार, १
दल बल देवी देवता मात पिता परिवार,
मरती विरियाँ जीवको कोइ न राखन हार,
आप अकेला अबतरे, मरे अकेला होय,
यों कवही इस जीवका, साथी सगान कोय,
जगवासी वूमैं सदा, मोहनीदके जोर.
सरवस लूटे सुधि नहीं, कर्म चोर चहु ओर,
* पडित भूधर दासजीकी निम्नावित कविता पर विधवा स्त्रियोंको खूब विचार
करना चाहिये-संशोधक ।
.
४

विधवाओंका कर्तव्य-कर्म P- -- . , अनेकों विधवाएँ कुसंगतिमे पडकर अथवा अपना पुरा वातावरण देखकर, अपने धर्मको भूल जाती है-सत्य से डिग जाती हैं। जिससे वे अपने दोनों कुलोका नाम डुवाती है । और पुनर्लन-विधवा-विवाह-करके जन्म जन्मको वैपव्यका वीज चोती है । अथवा गुप्त व्यभिचार करती है, भ्रूण हत्याएं करती हैं अथवा कभी कभी वाल- हत्यातक कर डालती है । तब लोग इनकी ओर अँगुली दिखा दिखाकर कहते हैं कि, यह अमुककी बहू बेटी है, इसने भ्रूण हत्या आदिकी है । ऐसी कुटिलाए अनेक सुन्दर' भडकीले वस्त्राभूषण पहिनतीं और तरह तरह के तर पदार्थ और मिष्टान्न खाती हैं। जिससे कामेच्छा वडती है । नाना भांतिके श्रगार-ससे चुहचुहात गान गाती है और बड़े मजे और शौकसे वह घृणित कार्य करती है जो कलमसे नहीं लिखा जा सकता । नतीजा इसका यह होता है कि, अगले जन्ममें इस पापक दंड भोगने के सिवाय यदि स्त्री देह मिली तो पुनः युवावस्थामें ही विधवा होना पड़ता है। जो अच्छे घरोंकी बहू बेटिया हैं वे ऐसे दुष्कर्म नहीं करतीं, और न ऐसी स्त्रियोंका साथ करती हैं। वे वडे ही धैर्यसे इस कर्म-फलको-इस पति वियोगके दुःखको-सहती हैं। और सहना ही चाहिए । कर्म फलका उदय अमिट है । प्राणी पंच पापोंमे लिप्त होते या लिप्त रहते हुए तो इसका कुछ खयाल नहीं करता

११०
श्रावक वनिता बोधिनी।
-
पर जिस समय उनका उदय आता है-इष्टका वियोग और
अनिष्टका सयोग होता है-तो हाय हाय करता है ।
परन्तु इस हाय हायसे दुख घटनेका नहीं, उलटा बढ़ता
है। उसे तो-कर्म फल को तो-संतोप और प्रसन्नताके
साथ भोग लेनेमें ही सार है । उस समय सोचना चाहिए
कि पाप कर्मका उदय मेटने को कोई समर्थ नहीं है । अजना
जैसी सती पूर्व पापके उदयसे २२ वर्पतक पतिकी अवहेलना-
तिरस्कार-सहती रही; कुटुम्बियोंने ही व्यर्थका कलंक
लगायाँ; गर्भावस्थामें ही पहाड और जंगल जंगल भटकना
पड़ा । अनेक कष्ट सहे । सीता जैसी पतिव्रताको झूठा कलक
लगाया गया; उसे पतिकी ही आज्ञासे नगरसे निकल वनमें
जाना पडा, और इस पर भी दुःखका अन्त न आया,
अपने शीलकी परीक्षा देनेको अग्नि-कुंडमें प्रवेश करना
पडा । अनेक महान व्यक्तियां पापके उदयसे राजासे
रंक और शूरसे कूर होगई तो हम सरीखोंकी बात ही क्या
है ' विचारना चाहिए कि, कदाचित मैने पूर्वभवमे जिने-
न्द्रके प्रतिविम्बका अनादर किया होगा, अविनय किया
होगा; जिनमन्दिर या चैत्यालयके उपकरण चुराए होंगे;
निर्माल्य भक्षण किया होगा; अशुद्धिकी अवस्थामें माननीय
पूज्य-पुरुपों या ऋपियोंको भोजन कराया होगा; उसी
अवस्थामें शास्त्र छुए होंगे व मन्दिर गई हूंगी, मन्दिरमें
अशुद्ध द्रव्य चढ़ाया होगा; जिन-मन्दिरमें प्रमाद, मूर्खता

विधवाओंका कर्तव्य-फर्म। AN A या कोई कुचेष्टाफी होगी, मुनिदानमें अन्तराय डाला होगा, सच्चे धर्मात्माओंकी झूठी निन्दाकी होगी, झूठी चुगली खाई होगी; किसीको झूठ कलंक लगाया होगा; मिथ्यात्व सेवन किया होगा; हिंसाफे कार्य किए होंगे, जेठे पुरुषोंका-मान- नीय पुरुपोंका-अपमान किया होगा, अभक्ष्य भक्षण किया होगा प्रतिज्ञा भंग की होगी, आशय यह कि, अनेक प्रकारमे पाप कमाया होगा, तभी तो यह पतिवियोगमा दुःसह दुःख सहना पड रहा है। अब मेरा यही कर्तव्य है कि, धैर्य धारण करके इस विपत्तिको बिना किसी संकल्प विकल्पके भोगू । और आगेके लिए सावधानीसे धर्ममें तत्पर होऊ । यदि धर्ममें तत्पर न होऊगी तो न जाने आगे मेरी क्या दुर्गति होगी-न जाने कैसे दुस भोगने होंगे। अब तो मैं चर्मकी शरण हूं, क्यों कि वही दुःखसे पार करनेवाला और भव भवमें सुख देनेवाला है। ऐसा ही विचारकरे । अशातिकी ओर अपने विचा- रोको न दुलने देवे । दान, उत, तप, नियम, पूजन और वायाय पूर्वक अपनी आयु पूर्ण करे । सांसारिक विप- से-पचेन्द्रियोंके विपयोसे-दूर रहे । अपनी इन्द्रियों और नको वश करे । स्त्रीको शृगार करना सधवा होने परही भा देता है। विधवाका श्रृंगार धर्म-विरुद्ध, लोक-निंय र शीलका घातक है । विधवा अयोग्य वस्त्राभूषण "ण न करे । सघवाओं जैसे चटकदार कपड़े और गहने

११२
श्रावक बनिता बोधिनी ।
"
,
न पहिने । अंजन आदि न लगावे । पान, इलायची और
केसर आदि पुष्ट और कामोद्दीपक मसाले न खावे । माथे
पर तिलक-विन्दी-रोरी-न लगावे । वालो या कपड़ोंमें तैल
या इत्र न लगावे । दूध, दही, घृत, मोदक आदि गरिष्ट
और पुष्टिकारक भोजन अधिक परिणाममें न खावे ।
क्योंकि इससे इन्द्रियां प्रबल होकर अपने अपने विपयोंकी
ओर खींचती हैं । यदि ये अथवा ऐसेही और पदार्थ
विलकुल न खाए जावे तो अच्छा है । किसी स्त्री या पुरुषसे
हँसी तमाशे और कौतूहल आदि क्रिया न करे । नाटक,
सिनेमा, स्वांग, रहस, भांडोंके कौतुक और मेलों तमाशोंमें
न जावे । बुरे गीत न गावे और बुरे वार्तालाप न सुने ।
सधवाओंके सधवापनके चिन्होंकी-अलंकार आदिकी-इच्छा
न करे । नीचेकी कविताको सोचे समझे।
दुस औ सुखके वीचम, पछतावे क्यों कूर।
माशा बढे न तिल घटै, जो कुछ लिसा अंकूर ॥
पूरव भोग न चिन्तवै, आगम वांछा नाहिं ।
वर्तमान वर्ते सदा, सो सुखिया जगमाँहि ॥
एकासन, उपवास, नीरस भोजन, वेला, तेला (समयको
टाळकर खाना ) आदि तपोंके द्वारा इन्द्रियोंके वेगको रोके-
उन्हें कुश करे । पूजा, दान, स्वाध्याय, पठन पाठन और
धर्म-ध्यान आदि शुभ कार्योंमें अपना समय लगावे ।
जिससे पुण्य-बंध हो और दुःखकी कुछ शान्ति हो । मतलव
-

जीवन
अनेक
यदि

श्रावक वनिता बोधिनी। अज्ञान और कष्ट शीघ्र ही मिटा डाल सकती हैं । वे स्त्रियां धन्य हैं, जो विधवा होनेपर इस प्रकार अपने और पराए हितमें तत्पर हो जाती है । बहिनो, यह स्त्री-पर्याय और जैन कुल तुम्हें किसी भाग्यसे मिला है। इस समयका एक भी क्षण तुम्हें व्यर्थ न खोना चाहिए। यदि दुर्भाग्यसे विधवा हो गई हो, तो भी अपने परिणामोंको सम्हालके रक्खो । धर्म ध्यानमें अपना समय बिताओ। यह पर्याय, समुद्र के किनारे लगनेकी है । यदि इस समय तुम भूल गई-चूक गई-तो ठिकाने लगना मुश्किल है । उठते-बैठते, खाते- पीते, चलते-फिरते और प्रत्येक काम करते या न करते समय यह न भूलो कि हम मनुष्य है और हमारा काम धीरे धीरे कर्मोंके जंजालसे छटना है। मनुष्य पर्यायके विपयमें एक कविने कहा है- जाकों इन्द्र चाहें अहमेन्द्रसे उमाहे जासो, जीव मुक्ति जाय, भवमलको वहावे है। ऐसो नर जन्म पाय खोयो विप विपै खाय, जैसे काँच सॉटे मूढ माणिक गमावे है । माया नदी चूड भीजा, काय बलतेज छीजा, आया पन तीजा अब कहा वन आवे है। तातें निज शीश ढोलें, नीचे नैन किए डोले, कहा वढ बोलें वृद्ध बदन दुराचै है ॥ १ ॥ जोई क्षण कटै सो तो आयुमें अवश्य घटे, बूद चूद बीते जैसे अजलिको जल है। - -

विधवाओंका कर्तव्य-कर्म
११५
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देह नित क्षीण होत नैन तेज हीन होत,
यौवन मलीन होत क्षीण होत बल है।
आवै जरा नेरी तकै अतक अहेरी आवे,
परमो नजीक जात नरभौ निफल है।
मिलके मिलापी जन, पूछत कुशल मेरी,
ऐसी दुर्दशामे मित्र काहेकी कुगल है ॥ २ ॥
काहू घर पुत्र जायो काइके वियोग आयो,
कट्ट राग रग कहू रोया रोय करी है।
जहा भानु ऊगत उछाह गीत गान देखे,
साझ समै ताही थान हाय हाय परी है।
ऐसी जग रीतिको न देस भयभीत होत,
हा हा नर मूढ तेरी मति कौन हरी है
मानुप जनम पाय, सोवत बिहाय जाय,
खोवत करोरनकी एक एक घरी है॥३॥
देखो भर यौवनमें पुत्रको वियोग भयो,
तैसेही निहारी निज नारी कालमगमे।
जे जे पुण्यवान जीव दीसत है जग माहि,
रक भये फिरें तिन्हें पनहीं न पगमें।
एते पै अभाग, धन जीतबसे धरै राग,
होय ना विराग जानै रहगो अलगमे ।
आखिन बिलोके अध सुस्सेकी अंधेरी करे,
ऐसे राज-रोगको इलाज कहा जगमे ॥४॥

११६ श्रावक वनिता बोधिनी । Muhur- ऐसी हम संसारी जीवोंकी भ्रम-धुद्धि और अज्ञान-दशा देख श्रीगुरु करुणा करके इस प्रकार समझाते हैं:- जौलो देह तेरी काहू रोगने न घेरी जौलों, जरा नाहि नेरी जासों पराधीन पर है। जौ लों जम नामा वैरी देय न दमामा तौ लो, माने आन रामा बुधि जाय न बिगर है । तौलो मित्र मेरे । निज कारज सभार लेरे,, पौरुप थकैगो फिर पीछे कहा कर है अहो आग आये जब झोपडी जरन लागे, कूपके खुदाप कहो कहा काज सर है ॥५॥ इसलिए हे जाति-सुधारक भाइयो और बहिनो, ऐसा यत्न करो जिससे समाजकी ये विधवाएं अपने निस्सार जीव- नको उपयोगी जीवन बना डालें । मनुष्य या स्त्री जन्मका कर्तव्य समझे । मिथ्यात्व और प्रमाद छोड धर्ममें तत्पर होवें। और अपना अगला जन्म मंगल-मय बनावें। यदि वे अभी आत्म-कल्याण न करेंगी तो पीछे पछताना होगा और दुःखमे पडना होगा। मानुप तन श्रावक कुलदि, पावो दुर्लभ फेर । यह अवसर मत चूकियो सद्गुरु भाषे टेर ।। -

सूतक निर्णय।
--
सप्तम प्रकरण
सूतक निर्णय
भवेत ।।
सूतक वृद्धिहानिभ्या, दिनानि दश द्वादशे ।
प्रसूतिस्थान मासैक, दिनानि पच गोत्रिपाम् ॥
अर्थ-जन्मका सूतक १० दिनका और मृत्युका १२
दिनका होता है । प्रसूति स्थानको १ माह और गोत्रके
मनुष्यको ५ दिनका सूतक होता है ।
प्रवजिते मृतेकाले देशान्तरे मृतेरणे।
सन्यासे मरणे चैव,
दिनक
सूतक
अर्थ-जो गृह त्यागी दीक्षित विदेशवासी, या संन्यासी
मरे अथवा जिसने संग्राममें प्राण छोडा हो तो इनका १
दिनका भूतक मानना चाहिए (यदि अपने कुलका हो तो ।)
यदि अपने कुलका कोई विदेश मरा हो और १२ दिन पीछे
खवर मिले तो १ दिनका सूतक मानना चाहिए । यदि १२
दिनके पहिले खबर मिले तो १२ दिन पूरे होनेमें जितने
दिन बाकी रहे हों उतने ही दिनका सूतक माने ।
पतुर्थ दश रात्रि स्यात्, पात्रि पुसि पचमे ।
पछे चतुराशुद्धि, सप्तमे च दिन त्रयं ।
अष्टमे पुस्यहोरात्रि, नवमे प्रहरद्वय ।
दशमे स्नानमान स्यात्, एतदानस्य सूतकम् ॥

श्रावक वनिता बोधिनी । m INvru- ऐसी हम संसारी जीवोंकी भ्रम-बुद्धि और अज्ञान-दशा देख श्रीगुरु करुणा करके इस प्रकार समझाते हैं:- जौलो देह तेरी काह रोगने न घेरी जौलों, जरा नाहिं नेरी जासो पराधीन पर है। जौ लो जम नामा वैरी देय न दमामा तौ लो, माने आन रामा बुधि जाय न विगर है। तौलो मित्र मेरे निज कारज सभार रे, पौरुष थकैगो फिर पीछे कहा कर है अहो आग आये जव झोपडी जरन लागे, कूपके खुदाए कहो कहा काज सर है ॥ ५॥ इसलिए हे जाति-सुधारक भाइयो और वहिनो, ऐसा यत्न करो जिससे समाजकी ये विधवाएं अपने निस्सार जीव- नको उपयोगी जीवन बना डाले । मनुष्य या स्त्री जन्मका कर्तव्य समझें । मिथ्यात्व और प्रमाद छोड धर्ममें तत्पर होवें। और अपना अगला जन्म मंगल-मय बनावें। यदि वे अभी आत्म-कल्याण न करेंगी तो पीछे पछताना होगा और दुःखमें पडना होगा। मानुप तन श्रावक कुलहि, पावो दुर्लभ फेर । यह अवसर मत चूकियो सहरु भा टेर।

सूतक निर्णय।
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सप्तम प्रकरण
सूतक निर्णय
,
सूतक वृद्धिहानिभ्या, दिनानि दश द्वादशे।
प्रसूतिस्थान मासैक, दिनानि पच गोत्रिणाम् ॥
अर्थ-जन्मका सूतक १० दिनका और मृत्युका १२
दिनका होता है । प्रसूति स्थानको १ माद और गोत्रके
मनुप्यको ५ दिनका सूतक होता है।
प्रवजिते मृतेकाले देशान्तरे मृतेरणे ।
सन्यासे मरणे चैव, दिनेक सूतक भवेत ।
अर्थ-जो गृह त्यागी दीक्षित विदेशवासी, या संन्यासी
मरे अथवा जिसने संग्राममें प्राण छोडा हो तो इनका १
दिनका सूतक मानना चाहिए (यदि अपने कुलका हो तो।)
यदि अपने कुलका कोई विदेशमें मरा हो और १२ दिन पीछे
खबर मिले तो १ दिनका सूतक मानना चाहिए । यदि १२
दिनके पहिले खबर मिले तो १२ दिन पूरे होनेमें जितने
दिन चाकी रहे हों उतने ही दिनका सूतक माने ।
चतुर्थे दश रात्रि स्यात्, षड्रात्रि पुसि पचमे ।
पठे चतुराशुद्धि, सप्तमे च दिन त्रय ॥
अष्टमे पुस्यहोरात्रि, नवमे प्रहरद्वय ।
दशमे स्नानमात्र स्यात्, एतगोत्रस्य सूतकम् ॥

श्रावक वनिता बोधिनी।
अर्थ-तीन पीढी तक १२ दिन, चौथी पीढ़ीमें १०
दिन, पाँचवीं पीढ़ीमें ६ दिन, छठवीं पीढीमें ४ दिन,
सातवीं पीढीमें ३ दिन, आठवीं पीढ़ीमें १ दिन-रात्रि,
नवमी पीढीमें २ प्रहर और दशवीं पीढीमें केवल स्नान
न करने तक मूतक जानना चाहिए।
यदि गर्ने विपत्तिः स्यात् श्रवणां चापि योपिता।
यावन्मासस्थितो गर्भ, स्तावद्दिनानि सूतकम् ।।
अर्ध-स्त्रीका गर्भ पतन हो तो जितने मासका गर्म हो
उतने दिनका सूतक मानना चाहिए।
पुत्रादि सूतक जाते, गते द्वादशके दिने ।
जिनाभिषेकपूज्याभ्यां पात्र दानेन शुद्ध्यति ।
अर्थ-पुत्रोत्पत्ति आदिके सूतकसे १२ दिन उपरान्त
भगवानका अभिषेक, पूजन तथा पात्र-दान करनेके पीछे
शुद्धि होती है । ( यहां सूतक शब्दसे जन्म, मरण दोनोंके
सूतक समझना चाहिए। ) कभी कभी जन्मका १० दिनका
और मरणका १२ दिनका सूतक माना जाता है ।
अश्वाच, महिपी, बेटी, गौ प्रसूता गृहागणे ।
सूतकं दिनमेक स्यात्, गृह बाह्ये न सूतकं ॥
अर्थ-घोड़ी, भैंस, दासी, 'गौ आदि जो अपने घरके
आंगनमें (घरके भीतर ) जनें, तो १ दिनका मृतक होता
है, जो गृह चाहिर जने तो मृतक नहीं ।
सतीना सूतक हत्या पाप पण्मासकं भवेत् ।
अन्या सामान्य हत्याना, यथा-पाप प्रकाशयेत् ॥

सूतक निर्णय । - अर्थ-अपनेको अग्निमें जला लेवे, ऐसी सती होनेका पाप (सूतक ?) ६ मासका होता है । और हत्याओंका पाप (मृतक ?) भी यथा योग्य जानना चाहिए। दासी दासस्तथा कन्या, जायते म्रियते यदि । त्रिरात्रि सूतक ज्ञेय, गृहमध्ये तु दूपणम् ॥ अर्थ-जो दासी, दास तथा कन्या जन्मे या मरे, तो ३ रात्रिका सूतक है । यदि गृहके वाहिर हो तो सूतक नहीं होता है । ( यहा मृत्युकी मुख्यता वश ३ दिनका सूतक कहा है।) महिप्या पक्षक क्षीर, गोक्षीर च दशो दिन । अष्टमे दिवसे जाया, क्षीर, शुद्ध न चान्यथा ॥ अर्थ-जनने के बाद भैसका दूध १५ दिनमें, गायका द्ध १० दिनमें और बकरीका दूध ८ दिनमै खाने योग्य शुद्ध होता है। श्लोक-जात दन्त शिशोनशि, पित्रोदशाह सूतक । गर्भस्राचे तथा पाते, विनष्टे तु दिनत्रय ॥ अर्थ-जिस पुत्रके दाँत आगये हों उसके मरणका मृतक १० दिनका, और गर्भस्राव तथा गर्भपात और विनाश- का सूतक ३ दिनका है। त्रिपक्षे शुन्यते सूती, दिने पच रजस्वला । परपुरुप रता नारी, यावजीचे न शुद्धति ॥ अर्थ--जिस स्त्रीके बाल बचा हुआ हो वह डेढ महीनेमें, और रजस्वला ५ दिनमें शुद्ध होती है। परन्तु व्यभिचारिणी स्त्री कभी शुद्ध नहीं होती। सदा अशुद्ध-अस्पद्यं रहती है ।

१२० आवक वनिता वोधिनी। APAN w A MAA AAMAA- AAG करि सन्यास मरे जो कोय । अथवा रणमे जूझो होय । देशान्तरमे छोडे प्राण । वालक तीन दिवस लौ जान ॥ एक दिवस हो इनको सोग । आगे और सुनो भविलोग ॥ प्रौढा बालक दासी दास । अरु पुत्री सूतक इमि भास ।। दिवस तीन लौ को बखान । इनकी मर्यादा इमि जान॥ भावार्थ-८ वर्ष तकके वालकका ३ दिनका मृतक जानो । देशपद्धति-रूढि-से इसमें कितने ही मतभेद है। इसलिए देश-पद्धति-रूदिसे इसका पालन करना चाहिए । ग्रन्थकर्ताका परिचय कवित्त-दिल्ली सेती पश्चिम ठाम, बसे है गन्नौर गाम, ताको वासी जयदयाल जैनी इक जानिये। धर्महीसे राखे प्रीति, गहै नहीं दूजी रीति, अग्रवाल गोयलगोत्र, मद बुद्वि मानिए। श्रावक धरमसार तामें लख हीना चार, कीन्हो यो विचार नारी धर्मजु बरखानिये । लखि मोहि ज्ञानहीन, क्षमो गुणीजन प्रवीण, कीजिए सुधार अरु भूल चूक छानिए ॥ १॥ दोहा-लाला गगा विष्णुसुत, राम नाथ वर माल । तसु सुत दर परसादमल, ता सुत यह जय दयाल ॥२॥ विक्रमाब्द उन्नीश शत, ठावन ऊपर जान । पौष शुक्ल दोयज तिथी, धनराशी परमान ॥३॥ पुस्तक पूरण है करी, क्षमियो चूक सुजान । पढो सुनो औ आचरौ, तो पाओ सुसथान ॥४॥ - . इति । शान्ति शान्ति शान्ति शुद्धिपत्र. प अशुद्ध चोके सहायता-पूर्ण २४ २९ शुद्ध चौके सहदयता-पूर्ण पाल्तु लिरा पालश पढ़ा ११ Pre ५७ ५ दू करना कराना ६३ आचार घटे में देना भपित सो दे वित जाएँ आर दू करनी करानी अचार घटे देनी दुषित सोचे नित २१ २० जाए और अहम १०४ पष्ट १०७ २० दगाना पठ दरशाना ३ पठा

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Sharavak Vanita Bodhini

Author
Jain,jay Dayal Mal
Title
Sharavak Vanita Bodhini
File name
Sharavak Vanita Bodhini
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2011/01
Publisher
Mahila Parisad Office Jhubilibaag Bombay
Language
Sanskrit
Pages
144
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546440
Barcode
4990010024915.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
cvFVPfZmqXL
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