Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shri Pakshiksutram-sharmansutradi Sangrah(sanskritanuwad Sahit)
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श्री पादिकसूत्र-श्रमणसूत्रादि संग्रह. ( संस्कृतानुवाद सहित गुजराती भाषान्तर) 2 वपगच्छना पूज्यपाद प्रातःस्मरणीय गुरुपीजी महाराज श्री यालेब्रह्मवारी शांतमूर्ति शिवश्रीजीना महाराजना सुशिष्या तिलकश्रीजीना उपदेशथी सरलता वखारवाळा शीलाल डाह्याभाइनी आर्थिक सहायथी छुपावी प्रसिद्ध करनार पारेख मेमसुखलाल जानरचद बुकसेलर शराफ बजार-भावनगर. विक्रम संवत् १९९० श्री मानद प्रीन्टींग प्रेस-मावनगर कीमत रु १-०-० पौर सवत् २४६० प्रस्तावना. सर्व कोइ विद्वान साधुवर्गना जाणवामा ज के के प्रथम भने चरम तीर्थकरना तीर्थना साधुनोने जे दश ..कारनो भाचेलक्यादिक कल्प गणधरादिके कहेलो छे ते नियमित रीते ज आचरखानो छे, परंतु यावीश तीर्थकरना साधुओनी जैम अनियमित नथी; तेथी करीने ज वर्तमान तीर्थना मुनिओ स्थितकल्पिक कद्देवाय छे. जो के आ आचेलक्यादिक सर्वे कल्पो सामान्य रीते कहीए तो त्रीजा औषधनी जेवा ज छे, तो पण प्रतिक्रमणनो कन्प विशेपे करीने त्रीजा औपध जेवो छ भने तेथी करीने छल्ला तीर्थकरना शासनमा गणधर महाराजाओए अनगारधर्मनुं वर्णन करती बसते " सप्रतिक्रमणो धर्मः " " प्रतिक्रमण सहित ज धर्म छे" एम स्पष्ट रीते कहेलुं ले. तेम ज जेओ प्रतिक्रमण करता नथी अथवा जेओने प्रतिक्रमण करवानी रुचि नथी तेवा श्रमणामासो श्रीमान् वीरस्वामीना शासननी बहार ज छे एम पण स्पष्ट कहेलुं छे. केटलाक तत्व जाण्या विना ज कहे छ के-"प्रतिक्रमण तो प्रमत्त साधुओने माटे ज छे, अप्रमत्तने माटे नथी." तेमणे एटलुं तो समजवू ज जोइए के अप्रमत्तभाव तो मात्र सूक्ष्म अंतर्मुहूर्त सुधी ज रहे छे, ते कोइ निरंतर रहेतो नथी. बाकीनो सर्व काळ प्रमत्तभाव ज होय छे, तेथी सर्व कोइने प्रतिक्रमण करई उचित छे; कारण के सर्व पाव- श्यको मात्मानी शुद्धि करनारा कहां थे. भा प्रतिक्रमण पांच प्रकारनां कलां छ- देवमिक १, रात्रिक २, पाक्षिक ३, चातुर्मासिक ४ अने सांवत्सरिक ५, तेमां जिनशासनने अनुसरनारा सर्व माधु.
मो सर्व सावधयोगधी निवृत्त थयेला होय छे, तेथी करीने तेमनी मन, वचन अने कायानी धृत्तियो अत्यत विशुद्ध होय थे, तो पण मनामोग अने प्रमादविगेरेने लीधे निषेध करेल कार्य करवार्थी तथा करवा योग्य कहेल कार्य नहीं करवाथी मूलगुण अने उत्तरगुणामा जे काइ वादर के सूक्ष्म अतिचार उत्पन थाय तेनी शुद्धिने माटे हमेशा दिवसने छेडे अने रागिने छेडे (सांज-सवार ) साधु श्रावकादि पतिक्रमण करे छे तेमा दिवसने छेडे जे प्रतिक्रमण करवामां थावे छे तेने देवसिक अने रात्रिने छेडे जे करवामां पाये छ तेने रात्रिक प्रतिक्रमण कहेवामा आवे छे. ते उपरांत पक्षने अते, चातुर्मासने अते भने सवत्सर (वर्ष) ने अते जे विशेष विस्तारथी प्रतिक्रमण करवामां आवे छे ते अनुक्रमे पाक्षिक, चातुर्मासिक अने सावत्सरिक प्रतिक्रमण कहेवाय छे. अहीं कोइने शंका थाय के-हमेशा दैवसिक अने रात्रिक प्रतिक्रमण करवाथी दिवस तथा रात्रिमा थयेला अतिचारोनी शुद्धि थ्या ज करे छे, तो पछी पाक्षिक विगेरे प्रतिक्रमणो करवानी शी जरुर छ ? तेनो जवाय ए के के जेम कोह माणस तेल, आवळा अने जळ विगरेवडे शरीरने दररोज शुद्ध करे ये तो पण पर्वदिवसे तेने विशेष शोमाववा माटे धूप, सुगधी विलेपन, श्रेष्ठ वस्त्र अने किंमती अलंकारविगैरे धारण करे छे, तेज प्रमाणे मुनिमो विगैरे पण हमेशा प्रतिक्रमण करवायडे पारिनरूपी शरीरने शुद्ध करे छे तो पण विशेष शुद्धिने माटे पाक्षिकादि- कने विषे विशेष प्रतिक्रमण करवावडे उत्तरीकरण करे छे. कड्यु छ के- "जह गेह पइदिवसं-पि सोहियं तर वि पक्षसंघीसु । सोहिजइ सविसेस, एच इहयं पिनायव्य ॥१॥" "जेम घरने हमेशा समार्जनी विगेरेथी शुद्ध करवामा आवे छे तो पण पखवाडीए तेने विशेष करीने साफ कराय ॥२॥ छे, तेम अहीं पाधिकादिक प्रतिक्रमण माटे पण जाणवू. वळी हमेशना प्रतिक्रमणमां कदाच अनाभोगादिके करीने सूक्ष्म अथवा चादर अतिचार विसरी जवायो होय अथवा स्मरणमा आल्या छतां पण भय, लज्जादिकने लीधे गुरुनी समक्ष तेनुं प्रतिक्रमण कयं न होय अथवा कयां छत्तो पण मंद परिणामने लीधे तेनुं सम्यक् प्रकारे प्रतिक्रमण थयुं न होय, आवा कारणथी साधुओ पाचिकादिकमां ते ते अतिचारोनुं स्मरण करी अधिक संवेगने पामी तेनुं सम्यक् प्रतिक्रमण करे थे अथवा तो कदाच अविचार न लाग्या होय तो पण पाक्षिकादिकमां वीजा वैद्यना औषधनी जेम विशेष प्रतिक्रमण करवू योग्य छे. त्रण नकारना औपच या प्रमाणे-'क्षितिप्रतिष्ठित नगरमां जितशत्रु नामे राजा हतो. तेने सेंकडो मनोरथोबडे अने घणा प्रकारनी मानताभोवडे धारिणी नामनी पट्टराणीथी एक पुत्र थयो. ते कुमार राजाने प्रागा करतां पण वधारे प्रिय आ मारा पुत्रने भविष्यमा कदाच कांहक रोग थशे, माटे ते नहीं थना देवा सारु आगळथी ज तेनो उपाय करा, के जेथी रोगनो संभव ज न थाय." एम धारी राजाए वैद्योने वोलाबी को के-' मारा पुत्रने एवी दवा करो के जेथी कदापि रोगनो संभव ज न थाय.' तेस्रोए कह्यु के-"बहु सारं. ए प्रमाणे कर.' 'राजाए पूछयु के-"त्यारे तमे कहो के तमारी पासे केवी केवी औषधनी क्रिया छे ? " त्यारे एक वैध बोल्यो के-" मारी पासे एवं भोपध छे के जो कोइ पण रोग होय तो तेनो तत्काळ नाश करे छे; परंतु रोग विना जो खावामां आवे तो ते नवो रोग उत्पन्न करे छे." बीजा वैये कछु के-" माझं औषध आपवाथी रोग होय तो तेनो नाश करे के अने रोग न होय तो कोइ पण दोष के गुण करतुं इतो, तेथी। -- नथी." पछी त्रीजाए कयु के-" मारु औषध वापरखाथी जो तेने रोग होय तो ते नष्ट करे छे अने रोग न होय तो वेना शरीरना बळ, वीर्य, रूप भने यौवन विगेरेने वृद्धि पमाडे छे तथा आवता रोगने भटकावे छे." ते सांभळी राजाए त्रीजा वैद्यनु भौषध कयु. एन रीते मा प्रतिक्रमण पण जो अतिचारादिक दोप होय तो तेनी शुद्धि करे के अने जो दोष न होय तो चारित्ररूपी शरीरने अत्यत शुद्ध-उज्ज्वल करे छे मा उपरथी ए सिद्ध थयु के अतिचार हो अथवा न हो तो पण पाधि- कादिक प्रतिक्रमण अवश्य करवा योग्य छे. पाक्षिक विगेरे सर्व प्रतिक्रमणना पत्रो प्राये जिनेश्वरमापित होवाथी गणधरोए ज रचेला छे, एम ते सूत्रोनी भाषा- उपरपी स्पष्ट जणाइ आवे छे; कारण के गणधररचित आगमोने विषे जेवी भाषा मने शैली के तेवी ज आ सूत्रोनी पण के. मा पाक्षिकसूत्रमा प्रथम श्रण गाथामो मगळने माटे करेली के तेमा पण वीजी गाथामा "इम गुणरयणसायर" विगेरे शब्दोवडे या पाच महाव्रतादिक गुणोरूपी रत्नोना समुद्रने भाराधी जेयो संसारने तरी गया के तेलोने मगळरूप करी पण आराधना करवा सन्मुस थयो छु. एम कही पांच महावतादिकनी आराधनारूप अभिधेय पण बताव्यु छ भने त्रीजी गाथामा नवपदनु मगळ कर्य छे, छेवट चोथी गाथामा पांच महानतनी उच्चारणा करवा माटे सावधान थवानु कापु छ पछी पुत्रनो पारम करवां प्रथम महाव्रतनी उच्चारणा ते शु एम शिष्यनो प्रश्न लइ तेना जवावमा महाव्रतनी उच्चारणा पांच प्रकारनी छे अने रात्रिभोजनविरमण प्रवने साथे गणतो छ प्रकारनी थे. एम कही ते छए बोनां नाम मात्र प्राप्यो छे. त्यारपछी प्राणातिपातविरमण नामना पहेला महाब्रवनु स्वरूप कहे ॥३॥ शरु कयुं छे. प्राणातिपात (जीवहिंसा ) ना द्रव्यादिक चार मेदो व्याख्यासहित बताव्या . पछी केवळीए कहेला चारित्रधर्मने वावीश विशेषणो पापी श्रावो धर्म पाम्या पहेला अज्ञानादिक चार कारणोपडे अने धर्म पाम्या पली अग्यार कारणोवडे जे प्राणातिपात त्रिविधे त्रिविधे थयो होय तेनी निंदा-गर्दा करी अतीत, वर्तमान भने अनागत ए त्रण काळ आश्री अनुक्रमे निंदा, संवर अने प्रत्याख्यान कह्यु . एटले के अतीत काळे जे कोइ पाप को होय तेनी निंदा ज थइ शके छ, वर्तमान काळे पाप करवानो संयोग श्रावे ते वखत ते करतां अटकी जq ए रीते तेनो संवर थइ शके छे अने अनागत काळे एटले हवे पछी हुं पाप नहीं करूं एयु प्रत्याख्यान थइ शके छे. त्यारपची अनागत प्रत्याख्या- नने अरिहंतादिक पांचनी साक्षीए स्वीकार करवानुं कयु छे. आ रीते पञ्चक्खाण करवाथी साधु सर्व काळे, सर्च स्थाने अने सर्व अवस्थाए निरंतर संगमी ज होय छे एग चतावी छेक्ट प्राणातिपातविरमण व्रतनी स्तुति करी छे, तेमां पा व्रत लेवाथी पोताने तथा पर जीवोने केटलो गुण थाय छे ? ते वताची छेवट पोताने ए व्रत मोक्ष प्रापनार थाय छ एम कहुं छे. भा व्रत आराधवाथी आत्माने थता गुणो अने विराघवाथी थता दोपो जे जे वतावेला चे ते सामान्य विचार करतां पण सर्वे मध्यस्थ जनोनुं चित्त अवश्य स्वीकार करे एचा ले, ए वात स्पष्ट जगाइ आवे छे. अंते गुरुनी आशाथी व्रतनो स्वीकार करवायूँ कहेल ले. एटले सर्व कार्यमा गुरुनी आज्ञा ज मुख्य छ भने तेनी भाज्ञा विना करेली क्रिया निष्फळ छे एवो जैन सिद्धांतनो चोकस निर्णय सूचभ्यो छे. प्रथम महाव्रत पछी अनुक्रमे चीजें, त्रीजें, चायुं, पांचसं भने छठं रात्रिभोजनविरमण व्रत अनुक्रमे आपेल छे.
तेनां सूत्रोना आज्ञावा घणे मागे प्रथम महाव्रतने मळता ज के एक सरखी शैलीथी ज आ छए व्रतो आपेला के दरेक महाव्रतने छेडे अर्थमा व्रतनी आराधनानु अने विराधनानु शुभाशुभ फल तथा ते ते व्रतना मांगा विगैरे पाप्या छे. छए अतोनो पृथक् पृथक् स्वीकार कर्या पछी छए तो एकी साथे अगीकार करवानु का छे. कोइ पण व्रत के नियम लीघो रोमा भनाभोग के प्रमादविगेरे कारणथी अतिचार लागवानो संभव छ तेथी छए व्रतोनो स्वीकार कर्या पछी एक एक गाथाए करीने छए व्रतोना अतिचारो कहा छे. पछी छए व्रतोने अतिचाररहित पाळवार्नु अनुक्रमे छ गाथावडे का छे. त्यारपछी वीजी छ गाथामा पण वीजी री ते ज बात कही छे अने सातमी गाथामा पांचे व्रतो भेळा कह्यांचे त्यारपछी प्रेवीश गाथाओ आपीछे तेमा एक, बे, ऋग्ण, चार एवी रीते अनुक्रमे एक एकनी वृद्धि करता दश सुधी अशुभ स्थानो वर्जचानु अने शुम स्थानो अंगीकार करवान का छे रयारपछी महाव्रतना विशेषणोद्वारा तेने पाळवा, फळ बता- पीने महाव्रतोनी उचारणा समाप्त करी छे थने मगळने माटे श्रासनोपकारी होवाथी श्रीमहावीरस्वामीने नमस्कार कर्यों के त्यारपछी जेम महावतोनो उच्चार कर्मनो क्षय करनार थे ते बरीते सूत्रनु कीर्तन पण कर्मनो क्षय करनार थे तेथी श्रुतकीर्तनमा प्रथम छ श्रावश्यकना नाम, तेनी सद्दहणा विगेरे अने पछी तेना अतिचारोनी थालोचना प्रतिक्रमण विगेरे का छे. त्यारपछी आवश्यक सिवायना २८ उत्कालिक भने ३६ कालिक श्रुतना पण नाम, तेनी सद्दहणा अने तेना पाराधन-अनाराधनथी लागता दोपोनी श्रालोचना विगेरे का छे त्यारपछी अगप्रविष्ट द्वादशांगी पण ते ज रीते कही छे. त्यारपछी श्रुतमान मापनार भाचार्यने नमस्कार करवापूर्वक पोताना प्रमादनु मिथ्यादुष्कृत दइने छेवटे श्रुत-
॥४॥
देवतानी स्तुति करवापूर्वक पाक्षिकस्बनी समाप्ति करी थे. त्यारपछी खामणानो अधिकार आपी पाक्षिक चार खामणा
साप्यां छे. त्यारपछी आहारना सुडताळीश दोषो पताव्या छे.
त्यारपछी श्रमणसूत्र के जे पगामसज्झायना नामथी पण ओळखाय के ते अति उपयोगी होचाथी पाक्षिकसूत्रनी
साथे भापवामां आव्युं छे. तेमा प्रथम नवकारमंत्र मणी, करेमि मंते कही, अरिहंतादिक चार मंगळ, चार लोकोत्तम
अने चार शरण अंगीकार करी दिवससंबंधी अतिचारनुं प्रतिक्रमण, ईपिथिकर्नु प्रतिक्रमण अने पछी प्रकागशय्या,
निकामशल्या विगेरेनुं प्रतिक्रमण देखाउथु छे. पछी गोचरीना अने स्वाध्यायना अतिचारोनुं प्रतिक्रमण कर्यु छे. त्यार-
पछी संक्षेपथी भने विस्तारथी अतिचारो गणावी एटले के एक प्रकारे असंयम, वे प्रकारना बंधन, त्रण प्रकारना दंड,
गुप्ति, शल्य, गौरव विगैरे, चार प्रकारना कपाय, संज्ञा, विकथा विगेरे, ए रीते अनुक्रमे एक एकनी वृद्धि करी तेत्रीश
माशावनाओ सुधीना अतिचारोनुं प्रतिक्रमण कयु के. आ गधा भेदो बहु ज समजवा नेवा छे. पछी चोवीश तीर्थंकरोने
नमस्कार करी जिनप्रवचनने अनेक विशेषणो आपी तेनी स्तुति करी छ, पछी संयम, ब्रह्मचर्य विगेरे उपादेयनो स्वीकार
अने असंयम, भब्रह्मचर्य विगैरे हेयनो त्याग करवा कयुं थे. छेनटे अढी द्वीपमा वर्तता सर्व साधुओने वंदना करी तथा
सर्व जीवोने मित्रभावथी समावी श्रमणसूत्रनी समाति करी छे. पछी उपयोगी होताथी चोवीश मांडला आप्पा छे.
मा पाविकमूत्र तथा श्रमणसूत्र टीका, अवचूरी भने भाषांतरो-सहित जूदी जूदी संस्थामो तरफथी अनेक शैलीमा
छपावी बहार पाडवामां आवेला छे, परंतु तेना प्राथमिक मभ्यासी साधु-साध्वीभो अल्प प्रयासे अने भन्प सहायथी आ
॥४॥
सूत्रो शन्दार्थसहित कठे करी शके एवो शुद्ध गुजराती भाषामा लखायेलो टबो के पाळावबोध छपायल के लखेल प्रतरूपे जोवामा आध्यो नथी भने आवा समयमा वेवा साधननी खास जरुर छ एम जाणी गुरुणीजी श्री गुलावधीजीनी शिष्या साध्वीजी श्री लामश्रीए श्री जैन धर्म प्रसारक सभाना शास्त्री जेठालाल हरिमाई पासे पोतानी रुबरु बेसाडी अत्यंत सतथी आ काम कराव्यु छे. तेमा मूळ सूत्रपाठ प्रायः श्रेष्ठी श्री देवचद्र लालभाइ जैन पुस्तकोदारनी सस्था तरफथी छपा- येल सरिश्रीयशोदेवप्रणीत विवरण ( मोटी टीका) वाळा श्री पाक्षिकसत्रने आधारे लखवामां आव्यो छे, छतां क्वचित लखेली जूनी प्रतमा तथा परपराधी चालता आवता साधु-साध्वीमोना मुखपाठमा काइक तफावत जणायो छे ते पण ते ते स्थळे टिप्पणी रूपे अथवा मूळ स्थळे कौंसमा वतान्यो छे, अथवा छापेल प्रतनो पाठ काँसमा के टिप्पणीमा बताग्यो छे सामान्य सस्कृतना अभ्यासीनोने सूत्रभाषाना ज्ञानसाथे सहेलाइथी अर्थ याद रहे वेटला माटे टीका तथा भवचूरिने अनुसारे मूळसूचनी ज नीचे सस्कृत छाया मूकवामां आवी छे अने तेनी नीचे शुद्ध गुजराती भाषामां मूळसूत्रनु एक एक पद लइ नौ शब्दार्थ लख्यो छे मां अन्वय प्रमाणे वाक्यार्थ करवामां अभ्यासीमोने सरळता थवा सारु प्रायः अन्वय प्रमाणे मूळनां पदो लीधा छे, अने कोइ ठेकाणे लावा वाक्यथी थती अभ्यासीश्रोनी गुचवण दूर करवा माटे खडान्वय पण राख्यो छे आ पाचिकम्पनी मोटी टीकामां मूळनो अर्थ घणो विस्तारथी विद्वचामरेलो प्राप्यो छे ते सर्व अत्यत उपयोगी थे, परतु मा कार्य प्राथमिक अभ्यासीनो माटे करेलु होपाथी सक्षेपमा भने आपणामां चाली प्रावती सहेली तथा सांकेतिक भाषामा तेनो शब्दार्थ बहुधा करवामा भान्यो के अने तेमा खास जाणवा जेवी हकीकत टीकाने आधारे बनता प्रयासे संक्षिप्त करीने लखी छे. ते पण मूलना शब्दार्थमा गुचवण नहीं भाववानी खातर प्रायः मूळनो शब्दार्थ लखाइ गया पछी आपवामां आवी छे. कोइ ठेकाणे टीकामां ये रीते व्याख्या करी होय तो तेमाथी सचे- पना हेतुथी एक व्याख्या पण करवामां आवी थे जेमके आठमा पानाना पहेला पृष्ठमा मूळनो पाठ जे "सचेसिं पाणाणं सब्वेसि भूमाणं " विगैरे चारे पदोनो एक ज अर्थ लख्यो भने बीजो अर्थ पण टीकामा " पाण एटले विकलेंद्रिय, भूत एटले वनस्पतिकाय, जीव एटले पंचेंद्रिग भने सत्त्व एटले नाकीना चार स्थावरो कक्षा छे" ते अमे लख्या नथी विगरे. प्रथम या कार्य मात्र एक पाक्षिकसूत्र माटे ज करवानो विचार हतो, परंतु ते समय यत्र विराजमान प्रवर्तक महाराज श्री कांतिविजयजी महाराजनी प्रेरणाथी सानीजी श्री लामश्रीजीए श्रमणसून, काम पण भवचूरिने माघारे तेवा ज क्रमथी तैयार कराव्यु. आ बने कार्यमा प्रवर्तकजी महाराजना मुख्य शिष्य मुनिवर चतुरविजयजी तथा प्रशिष्य मुनिवर पुण्यविजयजीए सारी मदद पापी छे, तो पण समारी पूछवा विगैरेनी सामीने लीघे अथवा ग्रुफ तपासवामा श्रयेला प्रमा- दादिकने लीघे जे काइ अशुद्धि रही गइ होय ते सुधारी लेनी अने अगोने तेनी सूचना आपवी के जेथी बीजी श्रावृत्ति वखते तेनापर लच रहे. अनुक्रमणिका. १ श्रीपाक्षिकसत्र. १ ३ पाहारना ४७ दोष. ५३ २ पाक्षिक सामणा ४. ४ श्रीश्रमणसूत्र. ... . --- woman---- निवेदन. पाचिकसूत्र ए अति आवश्यकनु अने अगत्यनुं सूत्र छे. दरेक नवदीचित साधु या साध्वीने तेनी पहेली तके जरुर पडे छे. साघुजीवननी श्रेष्ठता भने मर्यादा तेमा सूचवधामा भावी के जो तेमा उपदेशायेला भाचारने अनुरुप वर्तन करवामां आवे तो साधु भगर साध्वी पोताना मानव-जीवननी सार्थकता करी शके के जैन साहित्यना अपूर्व ज्ञान-मडा- रने माटे भाजे चे मत नथी. सारा सारा विद्वानो भने तात्विकोए पण तेनी मुक्तकठे प्रशसा करी छ भने तेने पोताना हृदयमा स्थान आप्यु छे. जैन साहित्यसामग्रीमा पावा अनेकविध विधि-विधानाने सूचवता रत्लो पड्यां के वेना प्रकाशन- बडे ज्ञान-दाननो न्हावो लेवो ए न्यायोपार्जित द्रव्यनी साची सार्थकता छे. आ सूत्र पहेलवहेला श्री जैन धर्म प्रसारक मगाए छपाची बहार पाडथु छे. त्यारपछी तेनी भावृत्ति मूळजीमाइ झवेरचदे की छे, कारण के भावा उपयोगी अने अत्युत्तम सूननी सतत मागणी रहे ते सहज अने स्वाभाविक छे. जैन पर्गना साध्वीसमुदायमा पूज्य गुरुणीश्री लामश्रीजी वयोवृध्धा साथे चारित्रवृद्धा पण छे. तेमनु अनुपम चारित्र अनुकर- णीय भने प्रशस्य छे. तेमना दीर्घ चारित्रपर्यायमा तेमणे घणा साध्वीरत्नो प्रगटाच्या छे. एवाज एक श्रमणी-रत्न ते पूज्य गुरुणीश्री पालब्रह्मचारी शिवश्रीजी महाराजना शिष्या तिलकधीजी छे. तेश्रो पण शांतस्वभावी, सरल भने सौम्य प्रकतियाळा के तेमनी मागवती दीक्षा जेम लोपा समयनी के तेम मनो शास्त्राभ्यास पय उडो छे. तेमणे प्रत्यारसुधीमा पोतानी शक्ति ज्ञान-दानमा भने परोपकारमा सर्ची छे. वेमनी चारित्रनी विशुद्धिथी अनेक मक्तो तेमना प्रत्ये पाकर्पाइने तेमना चरणमा पोवानुं शिर झुकावे छे.
-- मा सूत्रनी सतत मागणीनो ख्याल तेमने आवतो ते तरफ तेमणे द्रष्टि पहोंचाडी अने ते पाचवा माटे सुरतना शा चुनीलाल डाहामाइनी आर्थिक सहायथी ते कार्य करवानुं मने सुमत करवामां आव्यु. शेठ कुंवरजीभाइ पाणंदजी अत्यारे जैनसमाजथी अजाण्या नथी. तेमनी शासनसेवा तेमना जीवननो परिचय कराववाने बस छे. ए सेवाभावी पुरुषने ज्ञान-सेवानी तालावेली लागेली के शने सेना मूर्तिमंत स्वरूप तरीके श्री जैन धर्म प्रसारक सभा मौजुद छे. दीर्घदृष्टिथी अने अनुभवजन्य बुद्धिथी तेमणे ज्ञान-प्रकाश फेलावनामा सारो रा लीपो छे. उपर्युक्त सूत्र या संस्था सरफथी पहेला बहार पडधु हतुं अने ते फरविार छपावनानी मागणी करवामां प्रावता ते मागणी वेमणे स्वीकारी एटलं ज नहीं पण ग्रुफ सुधारी भापवा माटे पण श्रम लीधो के से माटे हुँ तेमनो प्राणी अने आमारी . मारो ध्येय सस्ती कीमते सुंदर प्रकाशनो बहार पाडी जैन जनवाना करकमळमां घरवानो छे. मावा साहित्यना प्रकाश- नथी कमाणी करवानो उद्देश नथी अने वेवा लालचचाळा विचारोथी हुँ दूर रहेवा मागुं हुं. केटलाक पुस्तको प्रकाशन माटे पसंद करी राख्या छे, परंतु सहायताना अभावे प्रकाशन करी शकतो नथी. सहायता प्राप्त थये ते जैनसमाज समक्ष प्रगट करवामां भावशे. मनसुखलाल नागरचंद पारेख.
गुजराती
पाधिकरत्र
संस्कतानु
भाषांतर
बाद सहित
॥ २ ॥
वेरमणं ५। सव्वाभो राइभोयणामो वेरमणं ॥६॥
(तद्यथा-सर्वस्मात् प्राणातिपातात् विरमण १। सर्वस्मात् मृषावादात् विरमण २ । सर्वस्मात् भ.
दत्तावानात् विरमण ३ । सर्वस्मात् मैथुनात् विरमणं ४ । सर्वस्मात् परिग्रहात् विरमण ५। सर्वस्मात्
रात्रिभोजनात् विरमण ॥६॥)
(त जहा) ते मा प्रमाणे-( सव्वाभो ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (पाणाइवायाभो) प्राणातिपात थकी
एटले जीवहिंसा थकी (वेरमण ) विरमवु-निवर्तवु-पाछु फरवु १ ( सव्वाभो) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (मूसा-
वायाभो ) मृपावाद थकी एटले जूदु बोलवा थकी (वेरमण) विरमवु २. ( सच्चाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना
(अदिन्नादाणामओ) अदचादान थकी एटले चोरी करवा थकी (वेरमणं) विरमवु ३. ( सव्वाभो) सर्व प्रकारे अथवा
सर्व प्रकारना ( मेहुणाओ) मैथुन थकी ( वेरमण ) विरमवु. ४. ( सध्याभो ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (परिग्ग-
हाम्रो) धनधान्यादिक वास अने रागद्वैपरूपी अभ्यतर परिग्रह थकी (वेरमण) विरमवु. ५. ( सन्वामो) सर्व प्रकारे
सर्व प्रकारना (राइमोयणाओ) रात्रिभोजन थकी (वेरमण ) विरमधु. ६
सू०--तत्थ खलु पढमे भंते महव्वए पारणाइवायाभो वेरमण, सव्वं भंते पाणाइवायं पञ्च-
कामि, से सुहमं वा वायर वा तस वा थावरं वा नेव सयं पाणे अइवाएजा, नेवन्नहिं पाणे अइ-
अथवा
॥ २॥
गुजराती
संस्कृतानुः
भाषांतर
वाद सहित
पाक्षिकसत्रजेय इमं गुणरयण-सायरमविराहिऊण तिषणसंसारा। ते मंगलं करित्ता, अहमवि आराहणाभिमुहो॥२॥
( ये च इमं गुणरत्नसागरमविराध्य तीर्णसंसाराः। तान् मङ्गलं कृत्वा अहमपि आराधनाभिमुखः ॥२॥
(जे य) वळी जे महामुनिश्रो (इम) श्रा (गुणरयणसायरं) पंच महाव्रतादिक गुणोरूपी रत्नोना समुद्रने (अचिराहिऊण)
नहि विराधीन एटले अखंड रीते पाळीने (तिपणसंसारा) संसाररूपी सागरने तरी गया छे (ते) ते महामुनिओने (मंगल)
मंगळरूप ( करित्ता) करीने (अहमवि) हुँ पण (बाराहणामिमहो ) मोक्षमार्गनी आराधना करवामां सन्मुख थयो छु. २.
मम मंगलमरिहंता, सिद्धा साहू सुयं च धम्मो अ। खंती गुत्ती मुत्ती, अज्जवया मद्दवं चेव ॥३॥
( मम मङ्गलम् अर्हन्तः सिद्धाः साधवः श्रुतं च धर्मः चक्षान्तिः गुप्तिः मुक्ति आर्जवतामार्दवं चैव ॥३॥)
(भरिहंता)-चौत्रीश अतिशयो सहित तथा आठ कर्म रहित एवा श्री अरिहंत प्रभु, तथा (सिद्धा) सिद्धो, तथा
( साहू ) साधुओ, तथा उपलक्षणथी सर्व प्राचार्यो भने उपाध्यायो, तथा (सुयं च) श्रुतज्ञान, तथा (धम्मो अ)
अहिंसादिक धर्म, तथा ( खंती) क्षमा एटले क्रोधनो त्याग, तथा (गुत्ती) गुप्ति एटले सलीनता, तथा (मुत्ती) मुक्ति एटले
निर्लोभता, तथा ( अजवया) आर्जवता एटले सरलता-मायानो त्याग, तथा ( मदचं ) मार्दव एटले माननो त्याग-निर-
भिमानीपणुं, (चेव) निवे, पानव पदो ( मम) मारा प्रत्ये ( मंगलं ) मंगळ करनार थामो. ३.
लोगम्मि संजयाज, करिति परमरिसिदेसिअमुआरं। अहमवि उवठिोतं, महत्वयउच्चारणं काउं॥४॥
(लोके संयता यां कुर्वन्ति परमर्पिदेशिताम् उदाराम् । अहमपि उपस्थितः तां महावतोचारणां कर्तुम् ॥) (लोगम्मि ) तिळ लोक्ने विषे ( सजया) सयमधारी मुनियो ( परमरिसिदेसिध) परम ऋषि जे तीर्थंकरो भने गणघरो ओए कहेला तथा (उभार ) उदार एटले प्रधान एवा (ब)जे पचमहावना उच्चार तेने ( करिति ) करे छे, (त) ते (महब्चयउच्चारण) महाव्रतोना उच्चारने ( काउ) करवा माटे ( अहमवि) हु पण ( उवटिओ) उद्यमवत थयो छु ४, सूत्रं-से किंतमहव्वयउच्चारणा ? महव्वयउच्चारणा । पंचविहा पन्नता राइभोअणवेरमणकट्टा ॥५॥ (अथ किं तत् महावतोचारणा ? महावतोचारणा । पञ्चविधा प्रज्ञप्ता रात्रिभोजनविरमणपष्ठा ॥५॥) अहीं शिष्य प्रश्न करे छे-हे गुरुमहाराज ! (से) हवे (1) वे (महब्बयउच्चारणा) महाव्रतोनो उबार (किं) शु वस्तु के ? अर्थात् तैना केटला प्रकार के ' गुरुमहाराज उत्तर प्रापे छ के-हे शिष्य ! (महन्वयउच्चारणा ) महावदोनो उच्चार ( पचविहा) पांच प्रकारे (पाचा) कयो छ, तथा (राइमोश्रणवरमणकठा) रात्रिभोजनथी जे विरम ए छठो छ हवे पचमहानत भने छठे रात्रिभोजनविरमणत्रत कहे छ- सू०-तं जहा-सव्वाओ पाणाइवायाओ वेरमणं १ । सव्वाओ मूसावायाओ वेरमणं २ । सव्वाओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं ३ । सव्वाओ मेहुणाओ वेरमणं ४ । सव्वाओ परिग्गहाओ १ का २ सा' इति वा सस्कार
पाक्षिक सत्र
संस्कतानु-
गुजरावी
भाषांवर
-
बाद सहित
॥ २ ॥
वेरमणं ५। सव्वामओ राइभोयणामो वेरमणं ॥६॥
(तद्यथा-सर्वस्मात् प्राणातिपातात् विरमणं १ । सर्वस्मात् मृषावादात् विरमणं २ । सर्वस्मात् अ-
दत्तादानात् विरमणं ३ । सर्वस्मात् मैथुनात् विरमणं ४ । सर्वस्मात् परिग्रहात् विरमणं ५। सर्वस्मात्
रात्रिभोजनात् विरमणं ॥ ६॥)
(तं जहा ) ते भा प्रमाणे-(सवामो) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (पाणाइचायामो) प्राणातिपात थकी
एटले जीवहिंसा थकी ( वेरमणं ) विरमवू-निवर्तवू-पाछु फरवू १. ( सन्वामी ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना ( मूसा-
वायाभो ). मृपावाद थकी एटले जूढुं बोलवा थकी ( वेरमणं) विरमवू २. ( सवाओ) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना
(अदिनादाणाओ) प्रदत्तादान थकी एटले चोरी करवा थकी (वेरमणं) विरम. ३. ( सव्वाभो ) सर्व प्रकारे अथवा
सर्व प्रकारना ( मेहुणाओ) मैथुन थकी ( वेरमणं ) विरमधू. ४. ( सव्वाभो) सर्व प्रकारे अथवा सर्व प्रकारना (परिग्ग-
हाओ ) धनधान्यादिक बाह्य अने रागद्वेपरूपी अभ्यंतर परिग्रह थकी ( वेरमणं) विरमवु. ५. ( सव्वामो) सर्व प्रकारे
अथवा सर्व प्रकारना (राइमोयणाभो) रात्रिभोजन थकी (वेरमणं) विरम. ६.
सू०--तत्थ खलु पढमे भंते महव्वए पाणाइवायामओ वेरमणं, सव्वं भंते पाणाइवायं पच्च-
कामि, से सुहम वा वायरं वा तसं वा थावरं वा नेव सयं पाणे अइवाएज्जा, नेवन्नेहि पाणे अइ-
॥ २ ॥
वायाविज्जा, पाणे अइवायते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावज्जीवाए तिविहं तिविहेण मणेणं वायाए कारणं न करेमि, न कारवेमि, करंत पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥ (तत्र खलु प्रथमे भदन्त महाव्रते प्राणातिपातात् विरमण, सर्व भवन्त प्राणातिपातं प्रत्याख्यामि, अथ (तद्यथा) सूक्ष्म वा चादरं वा त्रसं वा स्थावर वा नैष स्वय प्राणान् प्रतिपातयामि, नैवान्यैः प्राणान् अतिपातयामि, प्राणान् प्रतिपातयतोऽपि अन्यान्न समनुजानामि, यावज्जीव त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्य न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गर्हामि प्रात्मान व्युत्सृजामि ॥) (तत्थ) तिहां (खलु) निशे (मते) हे भगवत (पढमे ) पहेला (महन्वए) महावतने विषे (पायाइवायाभो) प्राणाविपात थकी (वरमय) विरमय्. एम भगवते का छे तेथी ( भैते ) हे भगवन् (सव पाणाइवाय) सर्व प्राणाति- पातने एटले जीवोना विनाशने (पञ्चरकामि) हु वर्जु छु. (से) ते जीवो पा प्रमाणे जाणवा-(सुहम वा) सूक्ष्म एटले जे जीयो चर्मचनुची देखाय नहीं ते ( वायर वा ) अथवा बादर एटले जे जीवो चर्मचतुथी देखाय ते (तस वा) त्रस एटले जेमो टाद तडकाधी त्रास पामे अने हालीचाली शके ते (थावर वा) स्थावर एटले जे हालीचालीन शके एवा पाधिक सूत्र संस्कृतानु- बाद सहित गुजराती भाषांवर ॥ ३ ॥ पृथ्वीकाय, अप्काय, तेजस्काय, वायु काय अने वनस्पतिकाय. (पाणे) पा उपर कहेला चार प्रकारना जीवोने (सयं) हुँ पोते (नेव भइवाएजा ) नहीं ज विनाश करूं, तथा (पाणे) ते जीवोने (अन्नेहिं ) बीजा पासे (नेव अइवायाविजा) नहीं ज चिनाश करावं, तथा (पाणे) ते जीवोने (अइवायंते वि ) विनाश करना एवा पण (अन्ने) बीजाओने (न समणु- जाणामि ) अनुमोदना न करूं-सारा न जाणुं. क्या सुधी ? तो के (जावजीवाए) जावजीव सुधी एटले हुँ जीबुं त्यांसुवी. (तिविहं) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे (वायाए) वाणीवडे (कारणं) कायावडे (न करेमि) हिंसा नहीं करूं (न कारवेमि ) नहीं करावु (करंतं पि अभं) हिंसा करता एवा पण वीजाने (न समणुजाणामि) नहीं अनुमोदना करूं. (तस्स) ते हिंसा संबंधी पापने (मंते) हे भगवन् (पडिकमामि) हुँ पडिक छु एटले तेनाथी पायो फरूं छु, (निंदामि) आत्मानी साक्षीए ते पापने निंदु छु, (गरिहामि) गुरुनी समक्ष गर्दा करूं छु. (अप्पाणं वोसिरामि ) तेवा पापकारी मारा आत्माने वोसराg छु एटले विविध प्रकारे तजुं छु. सू०-से पाणाइवाए चउविहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वओ खित्तओ कालओ भावो । दव्वओ णं पाणाइवाए छसु जीवनिकाएसु, खेत्तमओ णं पाणाइवाए सव्वलोए, कालोणं पाणाइवाए दिया वा रामो वा, भावो णं पाणाइवाए रागेण वा दोसेण वा ॥ (स प्राणातिपातः चतुर्विधः प्रजप्तः, तद्यथा-द्रव्यता क्षेत्रतः कालतः भावतः । द्रव्यतः णं प्राणा- । %E ॥
तिपातः पट्सु जीवनिकायेषु, क्षेत्रतः णं प्राणातिपातः सर्वलोके, कालता ण प्राणातिपात दिवा वा रात्री वा, भावत: एमाणातिपातः रागेण वा द्वेषेण वा ॥) (से) ते (पाणाइवाए) प्राणातिपात एटले जीवनो विनाश ( चउचिहे) चार प्रकारवाळो (पन्नते) श्री वीतरागे कयो छे. (व जहा) ते चार प्रकार या प्रमाणे-(दव्वो) द्रव्यथी एटले द्रव्यने आश्रीने (खित्तो) क्षेत्रथी एटले चैत्रना प्रधानपणाने श्राश्रीने (कालो) काळथी एटले काळने आश्रीने तथा (भावग्रो) भावथी एटले भावने आश्रीने. तेमा (दव्यमो ण) द्रव्यने आश्रीने ( पाणाइवाए) प्राणातिपात ते के जे (सु) पृथ्वीकाय १, अपकाय २, तेजस्काय ३, वायुकाय ४, वनस्पतिकाय ५ अने त्रसकाय ६ए छए (जीवनिकाएस) जीवोनी निकायने विपे थाय छ, तथा (खित्तोण) घेत्रने श्राश्री (पाणाइवाए) जीवहिंसा ते के जे (सव्वलोए) चौद राजप्रमाण सर्व लोकने विषेथाय थे तथा (कालोण) काळने प्राधीने (पाणाइवाए) प्राणातिपात ते के जे (दिया वा राम्रो वा) दिनसने विषे अने रात्रिने विषे थाय छे. तथा (मावो ण) मारने आश्रीने (पाणाइवाए) प्राणातिपात ते के जे (रागेण वा दोसेण वा) रागे करीने तथा द्वषे करीने थाय के प्रमाणे प्राणातिपातना मेदो कहा. हवे तेज प्राणातिपात थतीतकाळे एटले धर्म पाम्या पहेलो करायेल होय तेनी विशेष निंदा करवा माटे कहे थे- सू०-जमए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्से अहिंसालक्खणस्ससच्चाहिट्ठियस्सै विणनमूलस्स ज पि य मए इति वा
'पाक्षिकपत्र
संस्कृतानु-
वाद सहित
॥ ४ ॥
गुजरावी
भाषांतर
खतिप्पहाणसं अहिरन्नसोवन्नियस्स उवसमपभवस्सं नववंभचेरगुत्तसं अपयमाणसं भिक्खा-
वित्तिअस्स कुक्खीसंबलस्स निरग्गिसरणस्से संपक्खालियस्सै चत्तदोसस्से गुणगाहियस्स निम्विया-
रस्स निवित्तीलक्खणसँ पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्सै अविसंवाइयस्सै संसारपारगामि-
अस्सै निव्वाणगमणवज्जवसाणफलस्सै, पुव्विं अमयाएं असवणयाएं अबोहिए अणभिगमेणं,
अभिगमेण वा पमाएंणं रागदोसपडिबद्धयाऐ बालयाएं मोहयाएँ मंदयाएँ किड्याएं तिगारवगरुयाए
चउक्कासाओवगएँणं पंचिंदिओवंसट्टेणं पडुपन्नभारियाँए सायासोक्खमणुपालयतेणं इहं वा भवे
अन्नेसु वा भवग्गहणेसु पाणाइवाओ को वा काराविमो वा कीरंतो वा परेहि समणुन्नाओ तं
निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं ॥
(यो मया अस्य धर्मस्य केवलिप्रज्ञप्तस्य अहिंसालक्षणस्य सत्याधिष्ठितस्य विनयमूलस्यं क्षान्तिप्रधानस्य
अहिरण्यसौवर्णिकस्य उपशमप्रभवस्य नवब्रह्मचर्यगुप्तस्य अपचमानस्र्य भिक्षावृत्तिकस्य कुक्षिशम्बलस्यै
निरग्निशरणस्य संप्रक्षालिकस्य त्यक्तदोष(द्वेष)स्य गुणग्राहिकस्यै निर्विकारस्य निर्वृत्तिलक्षणस्य पञ्चमहाव्रत-
युक्तस्य असन्निधिसंचयस्य अविसंवादिनः संसारपारिगामिकस्य निर्वाणगमनपर्यवसानफलस्य, पूर्वम् अ-
॥ ४ ॥
ज्ञानता अश्रवणतो अयोध्या मनमिगमेन', अभिगमेन वा प्रमादेन रागद्वेषप्रतिवद्धतयों बालतों मोहता मन्दतयों कीरता त्रिगौरवगुरुक्तयां चतु कपायोपगते पश्चेन्द्रियोपवशातेने प्रत्युत्पन्नभारि- त सातसुषमनुपालयती, इह षा भवे अन्येषु या भयग्रहणेषु प्राणातिपाता कृतो वा कारितो वा कि- पमाणो या परैः समनुज्ञात, त निन्दामि गहामि निषिध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन) (ज) जे-प्राणातिपात (मए) में (इम्मस्स धम्मस्स) मा बावीश विशेषणवाळो धर्म पाम्पानी (पुलि) पहेला एटले धर्म भगिकार कर्या पहेला अज्ञानादिक चार कारणोए फरीने तथा धर्म मगीकार कर्या पछी प्रमादादिक भग्यार कारणोए करीने को होय तेने छ निंदु छु. ए प्रमाणे भा सूत्रनो समय के... एदे प्रथम धर्मना यापीश विशेपणोनो पर्थ मा प्रमाणे- धर्म को ? (केवलिपपनस ) केरळी भगवते प्ररुपेलो एटले उपदेश करेलो १, तथा (महिंसालरकर्णस्स ) महिंसा एटलें प्रागीनु रपण ते जछे लघण जेनु एवो २, तया (मबाहिद्वियस्स) सत्य वचनबडे माश्रित करायेलो एटले व्यास ३, तया ( विषयमूलस्स) विनय छ मूल कारण जेनु पटले विनयधी उत्पमाथियेलो १, वथा (खतिप्पहायस) क्षमा के प्रधान जेमो एपो ५, तथा (पहिरनमौषत्रियस्स) नधी हिरण्य एटले रूपु भने सुवर्ण एटले सुपर्णना अलकार विगेरे जैमा म(द उपलक्षणधी सर्व परिग्रह सहित एवो ६, तथा ( उहसमपभवरस ) उपशम एटले इद्रिय भने नोइद्रिय (मन) नो अप, तेनायी उत्पचिजनी एवो ७, तपा (नवमरगुचर्स ) नव प्रकारनी ब्रह्मचर्यनी गुप्तिथी गुप्त (सहित) एको, .
पारिक सूत्र संस्कृतानु- সানী भाषांतर चाद सहित तथा (अपयमाणस) नथी पचन क्रिया जेमा एवो एटले के पचनादिक आरंभ रहित ९, तेथी करीने ज (भिरकावित्तिप्रस) भिक्षावडे आजीविका के जेमा एवो १०. तथा (कुरिकसंबलस) कुक्षि एटले उदरने विपे ज शंबल एटले भातुंचे जेमा अर्थात् जेमां कुक्षिनी बहार काइ पण खापानुं राखी शकातुं नथी एवो ११, तथा (निरग्गिसरगगेस्स) शीतादिकने दूर करवा माटे नथी अग्गिनुं शरण लेवातुं जेमा एवो १२, तथा ( संपरकालियस ) कर्मरूपी फळने सम्यक् प्रकारे पखाळनार एटले शुद्ध करनार एवो १३, तथा (चत्तदोसस) त्याग कर्या के मिथ्यात्व अज्ञान विगैरे दोपो जेणे एवो अथवा त्याग कर्यो छे द्वेप जेमा एवो १४, एज कारण माटे ( गुणगाहियरस ) गुणोने ग्रहण करवाना स्वभाववाळो १५, तथा (निनियारस) गयो छे-नाश पाम्यो छे विकार एटले कामनो उन्माद जेमाथी एवो १६, तथा (निवित्तिलरकणस) निवृत्ति एटले सर्व सावधयोगनी विरति छे लक्षण ( स्वरूप ) जेनुं एवो १७, तथा (पंचमहत्वयजुत्तस्स) पांच महाव्रतोए करीने युक्त एवो १८, तथा ( असंनिहिसंचयस्से ) साधुए पोतानी पासे कांड पण ( मोदक, उदक, खजुर, हरडे विगेरे) पदार्थोनो संचय राखी शकातो नथी जेमां एवो १९, तथा (अविसंवाइयस्सै) विसंवाद रहित एटले जेमा कोइ पण प्रकारनो हठ कदाग्रह विगेरे विसंवाद नथी एवो, अथवा साची युक्तिथी जेनो बाध थतो नथी एवो २०, तथा (संसारपारगामिअस्स) जे संसार रूपी समुद्रनो पार पमाडनार छै एवो २१, तथा (निन्नाणगमणपजयसाणफलस्से) मोक्षनी प्राप्ति रूपी छेन्टु छे फल जेनुं एवो अर्थात् मा धर्म स्वर्गादिकनुं सुख पापी छेवट मोक्षरूप फळने आपनार छे. २२. धर्म अंगीकार कर्या पहेला जे अज्ञानतादिक चार कारणोए करीने प्राणातिपातनो संभव छे ते चार कारणो पतावे छे.-- (अण्डयाए) अज्ञानपणाए करीने १, तथा (मसवर्णयाए) सद्गुरुना मुसथी नहीं सांभळपावडे करीने २, अथवा सामच्या छतां पण ( अवाहिए ) अबोधवडे करीने एटले यथार्थपणे धर्मनु स्वरूप न जाणवा वडे करीने ३, अथवा व्यव- हारथी श्रवण अने बोध छतों पण (श्रणभिगमेणं ) सम्यक्पणे धर्मने नहीं अगीकार करवा वडे करीने ४,जे प्राणातिपात मारा वडे करायो होय तेनो त्याग करु छु एम सबध जाणवो. (अभिगमेण वा ) अथवा धर्म अगीकार कर्या छतां पण अग्यार कारणोचडे प्राणातिपातनो समव छ, वे अग्यार कारणो कहे छे-(पमाएंण) मद्य विषयादिक प्रमादे करीने १, तथा (रागदोसपडिबद्धयाएं ) राग भने द्वैपना प्रतिवध- बडे एटले व्याकुळतावडे करीने २, तथा (बालयाए) बाळकपणावडे एटले अज्ञानपणाए करीने ३, तथा (मोहयाए) मोह एटले चित्तनी व्याकुळता अथवा मोहनीय कर्मनु प्राधीनपणु तेणे करीने ४, वथा (मदयाएँ) मदपणाए करीने एटले कायानी जडताए करीने अर्थात् आळसुपणाए करीने ५, तथा (किड्डयाए) द्यूतादिक क्रीडा करवावडे करीने ६, तथा (तिगा- सगरुयाएं) ऋद्धिगारच, रसगारव अने सातागारव ए ऋण गारवे करीने थयेली जे गुरुता एटले भारेपणु ते वडे करीने ७, तथा (चउकसानाचगएण) क्रोध, मान, माया अने लोम ए चार कषायना उदयने वश थवा वडे करीने ४, तथा (पचिं- दिभोवसट्टैण) स्पर्शनादिक पांच इद्रियोना यशवीपणाथी प्राप्त थयेलु जे मात्रेध्यान ते वडे करीने ९, तथा (पडुपनमा- रियाए ) उत्पन्न थयेलो जे मनो मार तेणे करीने अर्थात् कर्मना गुरुपणाए करीने १०, तथा (सायासोरकमणुपालयवेण) सातावेदनीय कर्मना उदयथी उत्पन्न थयेलु जे सुख तेने मोगववामां आसक्त थवा वडे करीने ११ पाधिक सूत्र संस्कृवानु- गुजराती भाषांतर चाद सहित आ उपर कहेला चार भने अग्यार कारणोने लीघे (इहं वा भवे ) मा भवने विपे अथवा (अनेस वा भवग्गहणेसु) वीजा एटले आ भवथी पहेलाना भवोने विपे ( पाणाइवामो) जे प्राणातिपात (को वा) में कर्यो होय अथवा ( कारा- विओ वा) वीजा पासे कराव्यो होय, अथवा ( कीरंतो परेहिं ) बीजाए करातो थको (समणुन्नाओ ) में अनुमोद्यो होय एटले सारो कहो होय (तं ) तेवा प्राणातिपातने (निंदामि ) हुं मारा मात्मानी साक्षीए निंदु छु, (गरिहामि) गुरुनी समय गहों करूं छु. (तिविहं) करवू, कराववं, अनुमोदq एम त्रण प्रकारना प्राणातिपातने (तिविहेण) व्रण प्रकारे एटले (मणेणं) मनवडे (वायाए ) वाचावडे तथा (काएणं ) कायावडे निंदु-गहुँ छु. हवे त्रण काल संबंधी प्राणातिपातनी विरतिने प्रतिपादन करता सता कहे छे:- सू०--अईयं निंदामि, पडुपन्नं संवरेमि, अणागयं पच्चरकामि सव्वं पाणाइवायं ॥ (अतीतं निन्दामि, प्रत्युत्पन्नं संवृणोमि, अनागतं प्रत्याख्यामि, सर्व प्राणातिपातम् ) (अईय) भतीतकाळे-भूतकाळे करेला (सव्यं ) सूक्ष्म तथा स्थूळ सर्वं (पागाइवार्य) प्राणातिपातने ( निंदामि) हुँ निंदु छु, ( पडुप्पन्नं ) वर्तमानकाळे संभवता-थता सर्व प्राणातिपातने ( संवरेमि ) हुं संवरुं छु-निवारं छु, (अणागयं) भनागत एटले भविष्य काळ संबंधी सर्व प्राणातिपातने ( पचरकामि) पचख्खु छु-निपेधुं छ. मा उपर कहेला भनागत प्रत्याख्यानने विशेष प्रकारे कहे छे-- । सू०-जावजीवाए अणिसिओ हं नेव सयं पाणे अइवाएजा, नेवन्नेहि पाणे भइवायावेजा, पाणे भइवायते वि अन्ने न समणुजाणिजा ॥ (यावज्जीयम् अनिश्रितोऽह नैव स्वय प्राणान् अतिपातयामि, नैवान्यैः प्राणान् प्रतिपातयामि, प्रा. णान् अतिपातयतः अपि अन्यान् न समनुजानामि ।) (भणिस्सिओ) भनिश्रित एटले आलोक तथा परलोकनी प्रशसारहित एवो (इ) हु (जावजीवाए) जावजीव सुधी ( सय) पोते (पाणे ) प्राणोनो (नेव) नहीं ज (भइवाएजा ) विनाश करु. ( अन्नेहिं ) वीजा पासे (पाणे) प्राणोनो (नेव ) नहीं ज (अइवायावेजा ) विनाश करावु. (पाणे ) प्राणोनो (अहवायते वि) विनाश करता एका पण (भन्ने ) वीजामोने (न समणुजाणिजा) हु सारा नहीं मानु. कोनी साक्षीए हु मा पञ्चक्खाण करुं छुएशका उपर अरिहतादिक पाचनी साक्षी बताये थे- सू०-तं जहा-अरिहतसरिकअंसिद्धसरिकरसाहसकिनं३देवसरिकम ४ अप्पसरिक।५। (तद्यथा-अर्हत्साक्षिकं १ सिद्धसाक्षिकं २ साधुसाक्षिक ३ दैवसाक्षिक ४ आत्मसाक्षिकम् ५) (व जहा) ते मा प्रमाणे-(भरिहतसरिकम) अरिहवनी सावीए १, तथा (सिद्धसरिकन) पदर भेदना जे
गुजराती
भाषांतर
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु
सिद्धो तेमनी साक्षीए २, तथा ( साहूसरिक) साधु एटले महामुनिश्रो तथा उपलक्षणथी आचार्य अने उपाध्याय तेमनी
साक्षीए ३, तथा ( देवसरिक) समकितदृष्टि जे भुवनपति आदिक देवो तेमनी साक्षीए ४, तथा (अप्पसरिक) विर-
तिना परिणामवाळो जे मारो पोतानो आत्मा तेनी साक्षीए ५ हूं आ पञ्चक्खाण करुं छु.
अहीं कोइ शंका करे के-पोते अने साक्षी ए बन्ने प्रत्यक्ष होय तो ज आ लोकमां साक्षीनो व्यवहार करी शकाय छे.
अहीं तो सिद्ध भगवान् अतींद्रिय होवाथी तेमनी साक्षी शी रीते कहेवाय ? तेनो जवाव ए के के-पञ्चक्खाण करनारनी मति
श्रुतज्ञानथी वासित थएली होवाथी ते तेना स्वरूपने जाणे छे, तेथी तेने भावनी कल्पनाए करीने ते सिद्धो प्रत्यक्ष जेवा ज छे
तेथी तेभोनी साक्षी कही शकाय छे. तेथी आक्षेत्र अने अन्य क्षेत्रमा वर्तता तीर्थंकरो अने मुक्तिमा रहेला सिद्धो केवळज्ञान-
रूपी चक्षुवडे पञ्चक्खाण करनारना पच्चवखाणने जोइ ज रह्या छे, तेमज भुवनपति आदिक देवो जिनचैत्य विगेरेना अधि-
ठायक होवाथी अथवा ति लोकमा विचरता देवो चैत्यवंदनादिक करवा आवेला होवाथी समीपे होय के अथवा पोताने
स्थाने रह्या छतां पण कथंचित् द्वीप समुद्रो प्रत्ये अवधिज्ञाननो प्रयोग करता होय छे तेथी तेओ पण साची थइ शके थे.
आ प्रमाणे पञ्चक्खाण करवाथी शुं थाय छे ते कहे छे-
सू०-एवं भवइ भिरकू वा भिक्खुणी वा संजयविरयपडिहयपच्चरकायपावकम्मे दिआ वा
राओ वा एगो वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा ॥
बाद सहित
॥ ७॥
॥ ७ ॥
(एव भवति भिनु वा भिक्षुकी वा संयतविरतप्रतिहतप्रत्याख्यातपापकर्मा दिवा वा रात्री वा एको वा पर्पगतो वा सुप्तो वा जाग्रत् वा ॥) (एव) ए प्रमाणे एटले पूर्वे कह्या प्रमाणे प्रत्याख्यान करवाथी (भिक्खू वा) साधु अथवा (भिक्खुणी वा) साधी (दिना वा) दिवसे अथवा ( रामो या ) राने, ( एगो वा) एकला होय अथवा ( परिसागो वा ) पर्पदामां-साधु के साध्वीना समुदायमा रहेल होय, (सुत्ते वा ) सुता होय अथवा ( जागरमाणे वा) जागता होय तो पण ते (सजय) सतर प्रकारना सयमसहित होय छे, तथा (विरय) विविध प्रकारे बार प्रकारना तपने विषे रक्त-तत्पर होय छे, तथा (पडिय) स्थितिनी हानि करवाथी प्रथिनो भेद करीने विनाश पमाड्यु छ अने (पच्चरकाय) हेतुना अमावथी फरी नहीं वधवावडे दर कर्यु छ ( पावकम्मे ) ज्ञानावरणीयादिक पापकर्म जेणे एवो थाय छे. अर्थात् प्राणाविपातनु प्रत्याख्यान करनार साधु तथा साध्वी निस्तर सयमवाळा, पिरतिवाला अने पापकर्मरहित थाय छे. प्राणातिपावनी विरविनी ज स्तुति करे छे- सू०-एस खलु पाणाइवायस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सब्वेसिं पाणाण सव्वेसिं भूयाणं सव्वेसि जीवाणं सव्वेसि सत्ताण अदुकणयाए असोयणयाए मजूरणयाए अतिप्पण्याए अपीडणयाए अपरियावणयाए अणोदवणयाए, महत्थे महागुणे 'पाधिक सूत्र संस्कृतानु- गुजराती भाषांतर ति क वाद सहित ॥ ८ ॥ महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे, दुरकरकयाए कम्मरकयाए मोरयाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए उवसंपजित्ताणं विहरामि॥ (इदं खलु माणातिपातात् विरमणं हितं सुखं क्षमं निःश्रेयसिकम् आनुगामिकं पारगामिकं सर्वेषां प्राणानां सर्वेषां भूतानां सर्वेषां जीवानां सर्वेषां सत्त्वानाम् अदुःखनतया अशोचनतया अजूरणतया अते- पनतया अपीडनतया अपरितापनतया अनद्रावणतया, महार्थं महागुणं महानुभावम् महापुरुषानुचीर्णम् परमर्षिदेशितं प्रशस्तं, तत् दुःखक्षयाय कर्मक्षयाय मोक्षाय बोधिलाभाय संसारोत्तारणाय इति कृत्वा उपसंपद्य विहरामि) (एस) आ ( खलु ) निश्चे ( पाणाइवायस्स ) प्राणातिपातथकी (वेरमणं ) जे चिरमवू ते (हिए) पथ्य भोजननी जेम हित एटले कल्याणने करनारुं छे, तथा ( सुहे) तरस्याने शीतळ जळपाननी जेम सुख करनारं छे, तथा ( खमे) युक्त-उचित स्वरूपवाडं छे, तथा (निस्सेसिए) मोचनुं कारण होवाधी निःश्रेयसरूप छ, तथा (पाणुगामिए) आनुगामिक एटले उत्तरोत्तर भवोमा सुखनो अनुबंध करनारुं छे. तथा (पारगामिए) संसारनो पार पमाडनार छे. भा व्रत एवा प्रकारनुं केम छ १ तेना उत्तरमा कहे छे के ( सम्वेसि पाणाणं ) सर्व पंचेंद्रिय प्राणीमोने (सव्वेसिं भूयाणं) सर्व भूत-एकेंद्रियोने (सव्वेसि जीवाणं) सर्व जीवोने एटले देव, नारकी, उत्तम नर भने भसंख्य वर्षना आयुष्यवाळा नरतियंचोने तथा (सन्बेसि सत्ताणं) सर्व सत्चोने एटले सोपक्रम आयुष्यवाळा नरतियचो भने विकलेंद्रियोने (भदुरकणयाए) दुःख नहीं उत्पन्न करवा- वडे करीने, तथा (असोयणयाए ) शोक नहीं उत्पन्न करवावडे करीने, तथा (भजूरणयाए) शरीरनु जीर्णपणु नहीं करवा- वडे करीने, तथा ( भतिपणयाए) परसेवो, लाळ अने अश्रु उत्पन्न थाय ते कारण नहीं करवावडे करीने, तथा (अपी- डणयाए) पादादिकना सकोच-विकोचथी पीडा नहीं उत्पन्न करवावडे करीने तथा (अपरियावणयाए) चोतरफथी शरीरनो सवाप नहीं करवावडे करीने, तथा (प्रणोदवणयाए) त्रास अथवा मारवु नहीं करवावडे करीने मा त हित मादिकने करनारु छे. वळी या प्राणातिपातविरमणव्रत ( महत्थे ) मोटा अर्थवाल के एटले तेनु स्वरूप अने फळ विगेरे मोटु छे, वधा ( महागुणे ) सर्व महाव्रतोना समग्र गुणोनो आधाररूप होवाथी मोटा गुणवाल छ, तथा ( महाणुमावे) स्वर्ग भने मोक्षादिक भापनार होवाथी मोटा अनुमाव-माहात्म्यवाल छ, तथा ( महापुरिसाणुचिन्ने ) तीर्थंकर गणधर विगेरे महापुरुषोए पाचरेलु एटले सेवेलु छे, तथा (परमरिसिदेसिए) तीर्थकरादिक महर्षिमओए देशित एटले भव्यप्राणीना उप- कारने माटे कहेलु छ, तथा (पसत्थे) भत्यत प्रशस्त छे-शुभ छे. भावा प्रकारनु ते प्राणातिपातविरमणव्रत के तेथी करीने ते व्रत (दुरकरकयाए) शरीर भने मनसवधी दु:खोनो क्षय करवा माटे, तथा ( कम्मरकयाए) ज्ञानावरणीयादिक कर्मोना चय करवा माटे, तथा (मोरकयाए ) मोक्ष मेळववा माटे तथा (बोहिलामाए ) जन्मावरमा पण समकितनी प्राप्ति थाय तेटला माटे, तथा (ससारुत्तारणाए) ससारसमुद्रनो पार पामवा माटे-मारे थशे (ति कट्ट) एम करीने एटले एवा हेतुथी व्रतने (उवसपजिचाण) भगीकार करीने (विहरामि) हुँ मासकम्पादिकना विहारवडे वर्तु छु-विचरु छु. हवे मा प्रथम प्रवनी समाप्ति करे थे-
गुजराती
भाषांतर
पाधिकसूत्र
सू० पढमे भंते महव्वए उवट्टिओमि सव्वाभो पाणाइवायाओ वेरमणं ॥
(प्रथमे भदन्त महाव्रते उपस्थितोऽस्मि (ततः ) सर्वस्मात् प्राणातिपातात् विरमणम् ।)
( भंते ) हे भगवन् ! ( पढमे ) पहेला ( महन्वए) महाव्रतने विषे ( उवहिमोमि ) हुं उपस्थित थयो छु-प्राप्त थयो
छु, तेथी ( सव्वाओ) सर्व (पाणाइवायाओ) प्राणातिपात थकी (वेरमणं ) मारे भाजथी विरमण-निवृत्ति छे.
भहीं भंते एटले हे भगवंत एवं गुरुर्नु आमंत्रण श्रा व्रतना आरंभमां, मध्यमां अने अंतमा भालुं छे तेनो हेतु ए छे
के गुरुने पूछथा विना एटले एमनी आज्ञा लीधा विना काइ पण कार्य करवू नहीं अने कर्या पछी " आपनी आज्ञा प्रमाणे
में कयु छ" एम गुरुने निवेदन कर. आ रीते करवाथी ज ते व्रत आराध्युं कहेवाय छे. आ व्रतनी आराधना नहीं कर-
नारने नरकगति, अम्पायु, घणा रोगो तथा कुरूपपणुं विगेरे प्राप्त थाय छे.
पहेला महाव्रतना भांगा ३६ मा प्रमाणे थाय छे-सूक्ष्म, बादर, त्रस अने स्थावर ए चारने मन, वचन अने काया ए
त्रण जोगे गुणीए त्यारे वार थाय, तेने करवू, करावईं अने अनुमोदQ ए त्रणगुणा करीए त्यारे कुल छत्रीश थाय छे.
॥ इति प्रथमं महाव्रतम् ॥
संस्कृतानु-
बाद सहित
%3D
॥ ९ ॥
॥ अथ द्वितीयं महाव्रतम् ॥ सू०-अहावरे दोच्चे भंते महव्वए मुसावायाओ वेरमण, सव्व भंते मुसावायं पच्चकामि, से कोहा वा लोहा वा भया वा हासा वा नेव सय मुसं वएजा, नेवन्नेहि मुस वायावेजा मुसं वयंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं न करेमि न कार- वेमि करतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामिनिंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ।। (अथापरस्मिन द्वितीये भदन्त महाव्रते मृपावादात् विरमण, सर्व भदन्त मृपावादं प्रत्याख्यामि, अथ (तद्यथा) मोघाद्वा लोभावा भयाद्वा हास्याद्वा नैव स्वय मृपा वदामि, नैवान्यैः मृपा यादयामि मृपा वदतोऽपि अन्यान् न समनुजानामि, यावल्लीव त्रिविध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्य न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गोमि आत्मान व्युत्मजामि) (भह ) हवे पहेला महाव्रतनी पछी ( मते ) हे भगवन् ! (अपरे) अन्य (दोचे) वीजा ( महव्यए) महाव्रतने विषे (मसाधायामो) मृपावाद यकी (वेरमणं) सर्वथा विरमवु-निवर्तषु एम भगवते का छे, वेधी (मते) हे भगवन् ! (सबं)
गुजराती
पारिक सूत्र
संस्कृतानु-
भाषांतर
चाद सहित
॥१०॥
-
समग्र ( मुसावायं ) मृपावादने (पच्चरकामि) हुं पञ्चख्खं छं-निषेधुं छु, (से) ते आ प्रमाणे-(कोहा ) क्रोधथी (लोहा वा)
लोमथी-पहेलो भने छेल्लो कषाय कहेल होवाथी वच्चेना बे पण जाणी लेवा तेथी करीने मानथी, मायाथी, ( भया चा)
भयथी, ( हासा वा ) हास्यथी तथा रागथी, द्वेपथी, कलहथी, अभ्याख्यानादिकी (सयं ) हुं पोते ( मुसं ) मृषा (नेव)
नहीं ज ( वएजा) बोलुं. ( अमेहि ) बीजा पासे ( मुसं) मृपा (नेव ) नहीं ज ( वायावेजा) बोलावू. (वयंते वि) मृषा
बोलता एवा पण ( भन्ने) बीजाओने (न समणुजाणामि ) सारा नहीं जा[-अनुमोदना नहीं करूं. केवी रीते ? ( जाव-
ज्जीवाए ) जावजीव सुधी (तिविहं ) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने एटले (मणेणं) मनवडे ( वायाए) वचनवडे
( कारणं ) कायावडे ( न करोमि ) मृपावादने नहीं करूं, (न कारवेमि) नहीं करावं. (करंतं पि अन्न) मृपावाद करता-
बोलता एवा पण बीजाने ( न समणुजाणामि ) नहीं अनुमोदना करूं. (तस्स) ते मृपावादसंबंधी पापने (भंते) हे भगवन् !
(पडिकमामि ) हुं पडिकj छु. (निंदामि ) आत्मानी साक्षीए निंदु छु. ( गरिहामि ) गुरुनी समक्ष गर्दा करं कुं.
(अप्पाणं वोसिरामि ) तेवा पापकारी मारा श्रात्माने वोसिरा, छ-विविध प्रकारे तजुं छु.
सू०-से मुसावाए चउव्विहे पन्नत्ते, तं जहा-दवओ खित्तो कालो भावओ। दवभो
णं मुसावाए सव्वदव्वेसु, खित्तओ णं मुसावाए लोए वा अलोए वा, कालो णं मुसावाए दिया
वा राओ वा, भावओ णं मुलावाए रागेण वा दोसेण वा ॥
॥१०॥
(स मृपावादः चतुर्विधः प्रज्ञप्तः, तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालता भावतः। द्रव्यतः णं मृपावादः सर्वेद्रव्येषु, क्षेत्रतःण मृपावादः लोके वा अलोके वा, कालता ण मृपावादा दिवा वा रात्रौ वा, भावतः ण मृपावाद. रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते पूर्व जणावेल (मुसाबाए) मृपावाद (चउबिहे ) चार प्रकारे (पमत्ते) कह्यो छे ( त जहा) ते पा प्रमाणे- (दमओ) द्रव्यथी-द्रव्यने भाश्रीने (खिचओ) क्षेनी-चेत्रने आधीने (कालो) काळथी-काळने आश्रीने भने (भावमओ ) भावधी-मावने आश्रीने, तेमा (दग्नयो ण) द्रव्यने आश्रीने ( मुसावाए ) मृपावाद ( सम्पदव्येसु ) धर्मा- स्तिकाय अधर्मास्तिकायादिक सर्व द्रन्यने विषे-ते सबधी अन्यथा प्ररूपणा करवाथी थाय छे. (खित्तमो ण) क्षेत्रने भाश्रीने (मुसावाए ) मृपावाद (लोए वा ) लोकने विषे अथवा (अलोए वा) अलोकने विपे बोलाय छे, (कालो ण) काळने आश्रीने ( मसालाए) मृपावाद (दिया चा ) दिवसने विषे अथवा (रामो वा) रात्रिने विषे मोलाय छे भने (भावो ण) भावने पाश्रीने (मुसावाए ) मृपावाद (रागेण वा) माया अने लोभरूप रागवडे बोलाय के एटले के पोते ग्लान नहीं छत्ता हुग्लान छु, सप नहीं छतां मारे अनुक वस्तुनो खप छ, अथवा भिक्षाटन करवामां आळस आववाथी मारा पग दुःखे छ विगेरे मायावडे मृपावाद बोलाय छे तथा लोमथी एटले सारा अन्ननो लाम थवाथी बीजा एषणीय मत प्रांत आहारने आ अनेपणीय चे एम कहेबाय छे अथवा (दोसेण वा) कोष भने मान स्वरूपवाळा द्वेषपडे मृपावाद बोलाय छे. एटले के क्रोधी अन्यने ' तु दाग छ' एम कहे अने मानथी पोते बहुश्रुत नहीं छतो 'हु बहुश्रुत छु' एम बोले. भहीं उपल- .
पाधिक सूत्र संस्कवानु- गुजराती भाषांतर बाद सहित ॥ ११ ॥ r घणथी भयवडे तथा हास्य विगेरेवडे पण मृपावाद बोलाय छे एम जाणी लेवू. ते मा प्रमाणे-काइक अकार्य करीने पछी प्रायश्चित्तना भयने लीधे ' में कयु नथी' एम बोले. ए ज रीते कोइनी हांसी करवा विगेरेमां पण असत्य बोले. अहीं द्रव्य अने मावथी चार मांगा थइ शके छे. ते मा प्रमाणे-कोई द्रव्यथी मृपावाद बोले पण भावथी न बोले १, कोइ मावथी बोले पण द्रव्यथी न बोले २, कोइ भावथी अने द्रव्यथी बन्नेथी मृपावाद बोले ३, अने कोइ द्रव्यथी अने भावथी बन्नेयी मृपावाद न बोले ४. उदाहरण-कोड हिंसक व्याधे कोइ पुरुपने वनमा पूछथु के-" अहींथी मृगोने जतां तें जोया छे ?" ते सांभळी दयाना परिणामथी ते जोया छतां 'नथी जोया' एम कहे. या द्रव्यथी मृपावाद कहेवाय छ १. कोइ पुरुष असत्य बोलवाना परिणामवाळो छतां बोलती वखते सहसात्कारथी सत्य बोली गयो, पण तेने मावथी ते मृपावाद लाग्युं २. कोइ पुरुप हुं असत्य बोलीश एवो विचार करी बोलती. वखते पण असत्य बोले, तेने द्रव्य अने भाव ए बन्नेथी मृपा- वाद लागे छ ३. चोथो भांगो शून्य ज छे केमके तेमां द्रव्यथी ने मावथी मृपावाद न चोलवानी वान छे. सू०-जंमए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालरकणस्स सच्चाहिट्ठिअस्स विणयमूलस्स खंतिप्पहाणस्स अहिरणसोवनिअस्स उवसमपभवस्स नववंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्स भिकावित्ति- अस्स कुकीसंवलस्स निरग्गिसरणस्स संपखालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निविरस्स निवित्तीलकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइस्स संसारपारगामिअस्स नि.
व्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स पुचि अन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेणं वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुआए चउक्क- साओवगएण पचिदिओक्सट्टेणं पडुप्पन्नभारियाए सायासोखमणुपालयतेणं इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु मुसावाओ भासियो वा भामाविओ वा भासिज्जंतो वा परेहिं समणुन्नाओ तं निंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेणं मणेण वायाए काएणं । अईअं निंदामि पडुप्पन्नं संवरेमि अणागय पञ्चकामि सव्वं मुसावाय । जावज्जीवाए अणिस्सिो हं नेव सय मुसं वएज्जा, नेवन्नेहि मुसं वायावेजा, मुस वयते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा । तं जहा-अरिहतसकिन्त्र सिद्धसकिनं साहुसरिका देवसरिकअं अप्पसरिकअं । एव भवइ भिकू वा भिकुणी वा संजयविरयपडिहयप- चरकायपावकम्मे दिशा वा राओ वा एगो वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु मुसावायस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सम्बेसि भूआण सव्वेसि जीवाण सव्वेसिं सत्ताणं अदुकणयाए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए
पाक्षिक सूत्र
संस्कृतानुः
गुजराती
भाषांतर
जाद सहित
॥ १२॥
अपीडणयाए अपरिश्रावणयाए अणोद्दवणयाए, महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने
परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुककयाए कम्मरकयाए मोकाए वोहिलाभाए संसारुत्तारणयाए त्ति
कटु उवसंपजित्ताणं विहरामि । दोचे भंते महव्वए उवढिओमि सव्वाओ मुसावायाओ वेरमणं ।।
(एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत.)
श्रा सर्व सूत्रनो अर्थ पूर्वनी जेम जाणवो. विशेष ए के के प्राणातिपातने ठेकाणे मृपावाद शब्द कहेवो. आ व्रतनी
आराधना जे न करे ते परमवे जिह्वाना छेदने पामे तथा अविश्वास्य अने मूंगो थाय. बीजा व्रतना भांगा ३६ या प्रमाणे
छे-क्रोध, लोभ, भय अने हास्यने त्रण योगे गुणवायी बार थाय, तेने त्रण करणे गुणीए त्यारे छत्रीश थाय.
॥ इति द्वितीय महाव्रतम् ॥
॥ अथ तृतीयं महानतम् ॥
सू०---अहावरे तच्चे भंते महत्वए. अदिन्नादाणाओ वेरमणं, सव्वं भंते अदिनादाणं पञ्च-
कामि । से गामे वा नगरे वा भरन्ने वा भप्पं वा बहुं वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंतं वा अचित्त-
॥ १२॥
मंत वा नेव सयं भदिन्नं गिहिज्जा, नेवन्नहिं भदिन्नं गिलावेज्जा, अदिन्नं गिर्हते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविह तिविहेण मणेणं वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करतं पि अन्नं न समाजाणामि तस्स भते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाण वोसिरामि ।। ( अथापरस्मिन् तृतीये भदन्त महावते अदत्तादानाद्विरमणं, सर्व भदन्त श्रदत्तादानं प्रत्याख्यामि । अथ (तयथा)-ग्रामे वा नगरे वा अरण्ये वा अल्प वा बहु वा अणु वा स्थूल वा चित्तवद्वा अचित्तवद्वा नैव स्वयमदत्त गृह्णामि, नैवान्यैः प्रदत्त ग्राहयामि, अदत्त गृहणतोऽपि अन्यान्न समनुजानामि, यावजीव विविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमप्यन्य न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गहामि आत्मानं व्युत्सृजामि) (श्रह) हवे (मते ) हे भगवन् ! ( अवरे ) अन्य ( तच्चे ) श्रीजा' (महव्वए) महाव्रतने विपे (अदिन्नादाणामो) अदचादानथकी, (वेरमण ) सर्वथा विरमयु, एम मगवते का छे, तेथी ( मते) हे भगवन् ! (सब) समय (अदिना दाण ) प्रदत्तादानने (पक्षकामि) हु निषेधु छु (से) ते मा प्रमाणे-(गामे वा) गामने विपे अथवा (नगरे वा) नगरने विपे, अथवा (भरने वा ) अरण्यने विषे, (अप्प वा ) मून्यथी थप, अथवा (बहु पा) मूल्यथी बहु-बहु मूल्य- वाळी, अथवा (अणु वा) प्रमाणथी नानी वस्तु अथवा (धूल का) प्रमाणथी मोटी वस्तु ते वळी (चित्तमत वा) सचित्त
प
पाधिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भापान्तर.
बाद सहित
॥१३॥
होय, अथवा (अचित्तमंतं वा ) अचित्त होय, तेवी (अदिनं ) श्रदत्त वस्तुने ( सयं ) ते (व) नहीं ज (गिहिज्जा)
ग्रहण करुं, (अन्नेहि ) बीजा पासे (भार्दिन) अदत्त वस्तुने (नेव ) नहीं ज (गिबहादेजा ) ग्रहण कर. (अदिन)
अदत्त वस्तुने (गिण्हते वि) ग्रहण करता एचा पण ( अने) वीजाओने (न समणुजाणामि ) सारा नहीं जा'-अनु.
मोदना नहीं करूं. केवी रीते १ ( जावज्जीवाए ) जावज्जीव सुधी (तिविहं) त्रिविधने (तिविहेगा ) त्रिविधे करीने एटले
(मणेणं ) मनवडे, (वायाए ) वचनवडे, (कारणं ) कायावडे (न करेमि) अदत्तनुं ग्रहण नहीं करूं, (न कारवेमि)
नहीं करावं, ( करतं पि ) करता एवा पण (अनं) वीजाने ( समणुजाणामि) अनुमोदना नहीं करूं. ( तस्स ) ते अद-
तादान संबंधी पापने ( भैते ) हे भगवन् ! ( पडिकमामि ) हुं निषेध करुं छं, (निंदामि ) श्रान्मानी साक्षीए निछु,
(गरिहामि ) गुरुनी समक्ष गहीं करूं छु, ( अप्पाणं ) तेवा पापकारी मारा आत्माने (वोसिरामि ) वोसिरा, छु-विविध
प्रकारे तजुं छु.
सू०-से अदिन्नादाणे चउविहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वओ खित्तो कालो भावनो। दव्वओ
णं अदिन्नादाणे गहणधारणिज्जेसु दव्वेसु, खित्तमो णं अदिन्नादाणे गामे वा नगरे वा अरन्ने वा,
कालओ णं अदिनादाणे दिआ वा राओ वा, भावओ णं अदिन्नादाणे रागेण वा दोसेण वा ॥
(तत् अदत्तादानं चतुर्विध प्रज्ञप्तं तथधा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालता भावतः । द्रव्यतः णं भवत्तादानं
-
॥ १३॥
ग्रहणधारणीयेषु द्रव्येषु, क्षेत्रतः णं अवत्तादान प्रामे वा नगरे वा अरण्ये वा, कालतः णं अदत्तादानं दिवा वा रात्रौ वा, भावताएं अदत्तादानं रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते (भदिभादाणे ) अदत्तादान (चउबिहे) चार प्रकारे (पनवे) का छे (त जहा) ते मा प्रमाणे-(दबमो) द्रव्यथी, (खित्तमो) क्षेत्रथी, ( कालो) काळथी भने (मावभो) मावथी. तेमा (दव्यत्रो ण) द्रव्यने पाश्रीने (भदिना- दाणे) अदत्तादान ( महणधारणिज्जेसु) ग्रहण करी शकाय भने धारण करी शकाय एवा (दव्येसु) द्रव्यो-पदार्थोने विषे थइ शके छ अर्थात् धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय विगैरे द्रव्यो ग्रहण के धारण करी शकाता नथी तेथी सर्व द्रव्यने विषे एम का नथी (खिचनो ण) क्षेत्रने आश्रीने (अदिभादाणे) अदत्तादान (गामे वा) गामने विपे, अथवा (नगरे वा) नगरने विष, अथवा (भरने वा) अरण्यने विपे थह शके छे. (कालयोणं) काळने आश्रीने (अदिनादाणे) अद- चादान (दिमा वा) दिवसे अथवा ( रामो वा ) रात्रिए समवे के. (मावो णं) मावने श्राश्रीने (अदिन्नादाणे) अदत्ता- दान (रागेण वा ) माया अने लोमरूप रागथी मथवा ( दोसेण वा ) क्रोध अने मानरूप द्वेषथी थइ शके छे. तेमा धूर्त जनो मायावडे मदत्तने ग्रहण करे , लोभवडे वणिक अने चोर विगैरे ग्रहण करे छ, क्रोधवडे राजादिक ग्रहण करे छे अने मानवडे भमिमानी पुरुषो श्रदत्तनु ग्रहण करी शके छ तेमज लोम विना अदत्तादान समचतु नथी वेथी माया विगेरेमो पण लोम तो रहेलो ज के एम जाणवू नहीं द्रव्य तथा भावने आश्रीन चतुर्मगी या प्रमाणे थाय छ-कोइ द्रव्यथी अदत्त ग्रहण करे पण माक्थी न करे. जेम रागद्वेपरहित कोइ साधु कोइपण प्रकारे अनुज्ञा लीधा विना तृणप्रमुखने ग्रहण करे, तेने
'पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर.
वाद सहित
॥१४॥
HAR
द्रव्यथी अदत्तादान लागे छ पण भावधी लागतुं नथी १. कोइ भावी प्रदत्त ग्रहण करे पण द्रव्यथी न करे. जेम हुं पारकी
वस्तु हरण करुं एवो अध्यवसाय छतां पण कोइ माणस ते वस्तु लइ शके नहीं, तेने भावथी अदत्तादान लागे छे पण
द्रव्यथी लागतुं नथी २. कोइ द्रव्यथी अने भावथी बन्ने प्रकारे ग्रहण करे छे. जेम हुं परवस्तु ग्रहण करुं एवा अध्यवसायथी
ते पर वस्तु ग्रहण करे तेवा मनुष्यने द्रव्य अने भाव वन्नेथी अदत्तादान लागे छे ३. कोइ द्रव्यथी तेमज भावथी पण ग्रहण
न करे. भा चोथो मांगो शून्य छे. ४.
सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालकणस्त सच्चाहिठिअस्स विणयमूलस्स
खंतिप्पहाणरस अहिरन्नसोवन्निअस्स उवसमपभवस्स नववंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्त भिरकावित्ति
अस्स कुकीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपरकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निव्विारस्स
निवित्तिलकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइयस्त संसारपारगामिअस्स नि-
व्वाणगमणपज्जवसायफलस्स पुवि अन्नाणयाए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेण वा
पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुमाए चउक्कसाओवग-
पण पंचिंदिओवसटेणं पडुपन्नभारियाए सायासोकमणुपालयंतेणं इहं वा भवे भन्नेसु वा भवग्गहणेसु
॥१४॥
मदिनादाणं गहिम वा, गाहाविध वा घेप्पंतं वा परेहि समणुन्नाय, तनिंदामि गरिहामि तिविहं तिविहेण मणेणं वायाए कारण, मईम निंदामि, पडुप्पन्नं सवरेमि, अणागय पच्चकामि सव्वं अदिन्नादाणं जावज्जीवाए अणिस्सिओ ह, नेव सय अदिन्न गिण्हेज्जा, नेवन्नेहि अदिन्न गिण्हाविज्जा, अदिन्न गिण्हिते वि भन्ने न समणुजाणिज्जा, तं जहा-अरिहंतसरिक सिद्धसरिक साहुसलियं देवसस्किअं अप्पसखिम । एव भवइ भिस्कू वा भिस्कुणि वा सजयविरयपडिहयपञ्चखायपावक- म्मे दिमा वा रामओ वा एगो वा परिसागो वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु अदिन्नादा- णस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए प्राणुगामिए पारगामिएसव्वेसिं पाणाणं सव्वेसिं भूआणं सव्वेसिं जीवाणं सव्वेसिं सत्ताण भदुरकणयाए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपी- डणयाए अपरिआवणयाए अणुद्दवणयाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिपणे परमरिसिदेसिए पसत्थे त दुककयाए कम्मरकयाए मोरकाए वोहिलाभाए संसारुत्तारणाए ति कटु उवसपजित्ताण विहरामि तच्चे भते महव्वए उवट्ठिभोमि सव्वामओ अदिन्नादाणाओ वेरमणं ॥
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भापांतर.
वाद सहित
(एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत्)
आ सर्व सूत्रनो अर्थ पूर्वनी जेम जाणवो. विशेष ए के प्राणातिपातने बदले अदत्तादान कहेवू. जे माणस आ व्रतनी
आराधना न करे तेने वध, बंधन, दारिय, थापणनो नाश विगेरे दोपो ( हानिभो ) पाय छे. वीजा व्रतना भांगा ८१
आ प्रमाणे-गाम, नगर, भरण्य, अन्प, बहु, अणु, स्थूल, सचित्त, भचित्त ए नवपदने त्रय जोगे गुणवाथी २७ थाय
तेने त्रण करणे गुणवाथी ८१ थाय छे. ॥ इति तृतीयं महावतम् ।
॥ अथ चतुथ महानतम् ॥
सू-अहावरे चउत्थे भंते महव्वए मेहुणाओ वेरमणं । सव्वं भंते मेहुणं पच्चरकानि, से
दिव्वं वा माणुसं वा तिरिरकजोणिअं वा नेव सयं मेहुणं सेविज्जा, नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविजा, मे-
हुणं सेवंते वि अन्ने न समणुजाणामि, जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए काएणं न
करेमि, न कारवेमि, करतं पि अन्नं न समणुजाणामि, तस्स भंते पडिकमामि निंदामि गरिहामि
अप्पाणं वोसिरामि ॥
॥ १५॥
(अधापरस्मिन् चतुर्थे भदन्त महावते मैथुनात् विरमणं, सर्व भदन्त मैथुनं प्रत्याख्यामि । अथ (तद्यथा)- दिव्प वा मानुष वा तैर्यग्योनं वा नैव स्वय मैथुन सेवे, नैवान्यैः मैथुनं सेवयामि, मैथुन सेवमानानपि अन्यान् न समनुजानामि, यावज्जीव त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वचसा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्य न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिक्रमामि निन्दामि गर्हामि आत्मान व्युत्सृजामि) (अह) हवे (मते ) हे भगवन् !(अवरे) अन्य (चउत्ये) चोथा ( महबए ) महाबवने विषे ( मेहुणाओ) मैथुन- थकी (रमण ) सर्वथा विरम एम भगवते का छे, तेथी ( मते ) हे भगवन् ! ( सच ) समग्र ( मेहुण ) मैथुनने (पञ्च कामि) हु निषेधु छु. (से) ते या प्रमाणे-(दिव्व वा) देव सबधी, अथवा (माणुस वा) मनुष्य सबधी, अथवा (तिरिस्कजोणिम वा ) तिर्यचयोनि सबधी ( मेहुण ) मैथुनने ( सय ) हु पोते (नेव) नहीं ज ( सेविजा) सेतू, (अहिं) बीजा पास ( मेहुण ) मैयुनने (नेव ) नहीं ज (सेवाविजा ) सेवरावु, ( मेहुण ) मैथुनने ( सेवते वि) सेवता एवा पण (अन्ने) वीजामोने (न समणुजाणामि ) अनुमोदना नहीं पापु केवी रीते ? (जावजीवाए) जावजीव सुधी (तिविह) त्रिविधने (तिविहेय) त्रिविधे करीने एटले (मणेण ) मनवडे ( वायाए ) वचनवडे, ( कारण । कायावडे, (न करेमि) मैघुनने नहीं करू, (न कारवेमि) नहीं करायु, (करत पि अन्न) करता एवा पण वीजाने (न समणुजाणामि) अनुमोदना नहीं आपु. (तस्स) ते भैथुन समधी पापने (मते) हे भगवन् ! (पडिकमामि) हु निषेधु छु, (निंदामि) आत्मानी साक्षीए निंदु छु, (गरिहामि) गुरुनी समक्ष गर्दा करु छु अने (अप्पाण वोसिरामि) देवा पापकारी मारापात्माने वोसिरावु छु-वजु छु.
गुजराती पाचिकसूत्र संस्कृतानु- भापान्तर. वाद सहित ॥ सू०-से मेहुणे चउबिहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वओ खित्तो कालो भावओ । दवओ णं मेहुणे रूवेसु वा रूवसहगएसु वा । खित्तो णं मेहुणे उडलोए अहोलोए वा तिरिअलोए वा। कालओ णं मेहुणे दिआ वा राओ वा । भावओ रणं रागेण वा दोसेण वा । (तत् मैथुनं चतुर्विधं प्रज्ञप्तं, तद्यथा द्रव्यतः क्षेत्रतः कालतः भावतः । द्रव्यतः एं मैथुनं रूपेषु वा रूपसहगतेषु वा । क्षेत्रतः णं मैथुनम् ऊर्ध्वलोके वा अधोलोके वा तिर्यग्लोके वा । कालतः णं मैथुनं दिया वा रात्री वा | भावतः णं मैथुनं रागेण वा द्वेषेण वा ) (से) ते ( मेहुणे ) मैथुन ( चउबिहे ) चार प्रकारे ( पनत्ते ) कायं छे. (तं जहा) ते आप्रमाणे--(दव्यओ) द्रव्यथी, (खित्तमो) क्षेत्रयी, ( कालओ) काळथी भने ( भावो) मावी. तेमा ( दवओ णं ) द्रव्यने पाश्रीने ( मेहुणे) भैथुन (रूयेसु वा) चित्रामण आदिक निर्जीव रूपोने विषे अथवा (रूबसहगएसु वा) रूपनी साथे रहेला मनुष्यादिक सजी- बने विषे संभवे छे. (खित्तमो णं) क्षेत्रने भाश्रीने ( मेहुणे ) मैथुन (उडलोए वा) ऊर्ध्वलोकमां एटले मेरुना वनखंडमां तथा सौधर्म विगेरे देवलोकमा अथवा (अहोलोए पा) अधोलोकमा एटले अधोग्राम-कुबडीविजय तथा मननपतिना भवन विगेरेमा, अथवा (तिरिअलोए वा) द्वीप, समुद्र, पर्वत विगरे तिलोकमा संमने थे. (कालओ णं) काळने भाश्रीने (मेहुणे) मैथुन (दिमा वा रामो वा) दिवसे अथवा रात्रे संभवे के. (मावभो णं ) मावने आश्रीने ( मेहुणे ) मैथुन ( रागेण वा ) माया अने लोभरूप रागवडे अथवा (दोसेण वा) क्रोध भने मानरूप द्वेषवडे समवे छे. भहीं पण द्रष्यथी अने भावथी मैथुननी चतुर्मगी थइ शके छे, तेमा कोइ द्रव्यधी मैथुन सेवे अने मावथी न सेवे जेमके राग-द्वेषरहित कोइ स्त्रीने वळात्कारे कोइ पुरुष सेवे तो ते स्त्रीए द्रव्यथी मैथुन सेन्यु अने मावथी न सेव्यु. १ कोई भावथी मैथुन सेवे पण द्रव्यथी न सेवे जेमके कोइने मैथुन सेववाना परिणाम थया पण तेनी प्राप्ति थइ नहीं तेने भावथी सेवन थयु अने द्रव्यथी न थयु, २. कोई भाव अने द्रव्य बन्नेथी मैथुन सेवे छे. ३. तथा कोई द्रव्य अने भाव पमेयी सेवता नथी. आ चोथो भग शून्य छ सू०-जं मए इमरस धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालकणस्स सच्चाहिछिअस्स विणयमूल- स्स खतिप्पहाणस्स अहिरपणसोवन्नि अस्स उवसमपभवस्त नववभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्स भिरकावित्तिअस्स कुकीसवलस्स निरग्गिसरणस्त सपकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निविवारस्स निवित्तिलकणस्स पचमहव्वयजुत्तस्स असनिहिसंचयस्स अविसंवाइस्स संसारपार- गामिअस्स निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स पुचि अन्नाणयाए असवण्याए अबोहिए अणभिगमेणं अभिगमेण वा पमाएण रागदोसपडिबद्धयाए वालयाए मोहयाए मदयाए किड्डयाए तिगारवगरुमाए
पार्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषान्तर.
वाद सहित
॥१७॥
चउक्साओवगएणं पंचिंदिओवसट्टेणं पडुप्पन्नभारिआए सायासोरकमणुपालयंतेणं इह वा भवे अन्नेसु
वा भवग्गहणेसु मेहुणं सेविअंवा सेवाविरं वासेविजतं वा परेहि समणुन्नायं तं निंदामि गरिहामि
तिविहं तिविहेणं मणेणं वायाए कारणं। अईशं निंदामि पडुप्पएणं संवरेमि काणागयं पञ्चकामि सव्वं
मेहुणं । जावजीवाए अणिस्सिओ हं नेव सयं मेहुणं सेविजा, नेवन्नेहिं मेहुणं सेवाविज्जा, मेहुणं सेवंते
वि अन्ने न समणुजाणामि । तं जहा-अरिहंतसस्किअं सिद्धसरिकअं साहुसरिकों देवसरिकों
अप्पसरिकअं । एवं भवइ भिस्कू वा भिकुणी वा संजयविरयपडिहयपच्चरकायपावकम्मे दिआ वा
रामो वा एगो वा परिसागओवा सुत्ते वा जागरमाणे वा। एस खलु मेहुणस्स वेरमणे हिए सुहे
खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सव्वेसिं भूआणं सव्वेसिं जीवाणं सव्वेसिं
सत्ताणं अदुखणयाए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडण्याए अपरिआवणयाए
अणुदवणयाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुकरक-
याए कम्मस्कयाए मोरकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणयाए त्ति कटु उवसंपजित्ताणं विहरामि ।
4
॥१७॥
चउत्थे भते महव्वए उवट्ठिओमि सव्वाओ मेहुणामओ वेरमणं ॥ (एतत्सूत्रसस्कारः पूर्ववत्) या सर्व सूत्रनो अर्थ पूर्वनी जेम जाणवो विशेष ए छ जे प्राणातिपातने ठेकाणे मैथुन कहेवु मैथुन सेवनारने भा मषमा तेमज परभवमा वध, बंधन, अपयश, नपुसकत्व, वाझीयापणु अने विधवापणु वगेरे दोषो प्राप्त थाय छे. भा व्रतना २७ मांगा था प्रमाणे-देव, मनुष्य भने विर्यचसवधी मैथुन ए प्रण पदने त्रण जोगे गुणता ९ थाय तेने प्रण करणे गुणवाथी २७ थाय छे. ॥ इति चतुर्थं महाव्रतम् ॥ ॥ अथ पञ्चमं महाव्रतम् ॥ सू०-अहावरे पंचमे भते महव्वए परिग्गहायो वेरमणं, सव्वं भंते परिग्गहं पच्चरकामि, से अप्पं वा बहु वा अणुं वा थूलं वा चित्तमंत वा अचित्तमतं वा, नेव सयं परिग्गह परिगिण्हेजा, नेवन्नेहिं परिग्गह परिगिण्हाविज्जा, परिग्गहं परिगिण्हते वि अन्ने न समणुजाणामि जावजीवाए तिविहं तिविहेणं मणेण वायाए कारणं न करेमि न कारवेमि, करतं पि अन्नं न समणुजाणामि तस्स भते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पारण वोसिरामि ।।
गुजराती
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
मापान्तर.
वाद सहित
॥१८॥
अथापरस्मिन् पञ्चमे भदन्त महाव्रते परिग्रहाद्विरमणं, सर्व भदन्त परिग्रहं प्रत्याख्यामि, अथ
(तद्यथा) अल्पं वा वहुं वा अणु वा स्थूल वा चित्तवद्वा अचित्तवद्वा नैव स्वयं परिग्रहं परिगृङ्गापि,
नैवान्यैः परिग्रहं परिग्राहयामि, परिग्रहं परिगृहणतोऽपि अन्यान्न समनुजानामि यावजीवं त्रिविधं त्रिवि-
धेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त
प्रतिक्रमामि निन्दामि गर्हामि आत्मानं व्युत्मृजामि )
(अह) हवे ( भंते ) हे भगवन् ! ( अवरे ) अन्य (पंचमे ) पांचमा ( महब्बए ) महाव्रतने विषे (परिग्गहाओ)
परिग्रहथकी (वेरमणं) सर्वथा विरमद् एम भगवंते को छे, तेथी ( भंते) हे भगवन् ! ( सव्वं ) समग्र (परिग्गह) परि-
ग्रहने (पञ्चरकामि) हुं निषेधुं छु. (से) ते आ पमाणे-(भप्पं वा ) मूल्यथी भल्प, अथवा (बहुं वा) मूल्यथी बहु-
मून्यवाळा, अथवा (अणुं वा) प्रमाणथी नाना, अथवा (थूलं वा) प्रमाणथी मोटा, ते वळी (चित्तमंतं वा) सचित्त
होय, अथवा ( अचित्तमंतं वा ) भचित्त होय, तेवा (परिग्गह) धनधान्यादिक परिग्रहने ( सयं ) हुं पोते (नेव) नहीं ज
(परिगिण्डेजा ) ग्रहण करूं, (अहिं ) बीजा पासे ( परिग्गरं ) परिग्रहने (नेव ) नहीं ज ( परिगिहाविजा ) ग्रहण
करावं, (परिग्गहं ) परिग्रहने (परिगिण्हते वि) ग्रहण करता एवा पण ( अन्ने) बीजाओने (न समणुजाणामि ) अनु-
मोदना नहीं करूं. केवी रीते ? (जावजीवाए) जावजीव मधी (तिविह) त्रिविधने (तिविहेणं) त्रिविधे करीने, एटले (मणेणं)
मनवडे, (वायाए ) वचनवडे, ( कारणं ) कायापडे, ( न करेमि ) परिग्रहने ग्रहण नहीं करूं, (न कारवेमि) नहीं करा,
॥१८॥
(करत पि) करता एवा पण ( भने) बीजाने (न समणुजाणामि ) अनुमोदना नहीं करु. ( वस्स) ते परिग्रह संबंधी पापने (भवे) हे मगवन् ! (पडिकमामि ) हुनिषेधु छु, (निंदामि ) भात्मसाचीए निंदु छु, ( गरिहामि) गुरुसमच गर्दा करु छु भने (अप्पाण) तेवा पापकारी मारा आत्माने ( वोसिरामि ) वोसरावु छु-विविध प्रकारे तजु छु. सू०-से परिगहे चउबिहे पन्न, त जहा-दव्वओ खित्तमो कालो भावओ। दवमो ण परिग्गहे सचित्ताचित्तमीसेसु दम्बेसु, खित्तमओ णं परिग्गहे लोए वा अलोए वा, कालओ णं परिग्गहे दिआ वा राओ वा, भावो ण परिगहे अपग्वे वा महग्घे वा रागेण वा दोसेण वा ।। (स परिग्रहः चतुर्विधा मज्ञप्त तद्यथा-द्रव्यतः क्षेत्रतः कालता भावतः। द्रव्यत णं परिग्रहः सचित्ताचित्तमिश्रेषु द्रव्येषु, नेवतःण परिग्रहः लोके वा अलोके वा, कालता णं परिग्रहः दिवा वा रात्री वा, भावतःणं परिग्रहः अल्पार्थे वा महाचे वा रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते (परिग्गहे ) परिग्रह (चउबिहे ) चार प्रकारनो (पबत्ते) कयो छे. ( त जहा ते पा प्रमाणे-दिव्वमओ) द्रव्यथी, (खित्तमो) क्षेत्री, (कालभो ) कालथी मने (भावो) मावधी तेमा ( दवभो णं) द्रष्पथी (परिगहे) परिग्रह (सचित्ता चित्तमीसेस) सचिच, अचिच अने मिश्र एवा ( दबे ) आकाशादिक धर्माधर्मादिक सर्वे द्रव्योने विषे थह शके छे. एटले के गाम, घर, भांगणुं विगैरे प्रदेशमा ममता, करवाथी आकाशनो परिग्रह थाय छ, गति करवाना
पाधिकमात्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर,
पाद सहित
॥ १९ ॥
प्रदेशमा ममता करवाथी धर्मास्तिकायनो परिग्रह थाय के, कोइ पण स्थानमा चेस, सूई विगेरे उपर ममता करवाथी
अधर्मास्तिकाय द्रव्यनो परिग्रह थाय छे, माता, पिता, स्त्री विगैरे उपर ममता करवायी जीवपरिग्रह थाय छ, हिरण्य-
सुवर्णादिक उपर ममता करवाथी अजीव एटले पुद्गल द्रव्यनो परिग्रह थाय छे, तथा शीतकाळ, उष्णकाळ अने वर्षाकाळ
अथवा छए ऋतुमाथी कोइ पण ऋतु उपर मूर्छा करवाथी काळद्रव्यनो परिग्रह थाय छे. (खित्तओ णं) क्षेत्री (परिग्गहे)
परिग्रह ( लोए वा) लोकने विपे अथवा ( अलोए वा ) अलोकने विष थइ शके छे. ( कालभो णं) काळथी (परिग्गहे)
परिग्रह (दिमा वा) दिवसे अथवा ( रामो चा ) राने थइ शके छे. (भावमओ णं ) भावथी ( परिग्गहे) परिग्रह (अप्प-
ग्धे वा) अन्प मूल्यवाळी वस्तु उपर अथवा ( महग्घे ) घणा मूल्यवाळी वस्तु उपर थइ शके छ, अथवा (रागेण वा)
रागवडे अथवा ( दोसेण वा ) बीजा उपरना द्वेषवडे थइ शके छे. अहीं पण द्रव्य तथा भावने आश्री चतुर्भगी थाय छे
ते आ प्रमाणे-कोइ द्रव्यथी परिग्रह धारण करे छे पण मावथी नथी करता, जेमके रागद्वेपरहित कोइ साधु द्रव्यथी उप-
गरण धारण करे पण तेना पर मूर्छा नहीं होवाथी भावथी परिग्रहधारी नथी. १. कोइ भावथी परिग्रह धारण करे पण
द्रव्यथी न करे, जेमके कोइने अमुक वस्तु पर मूर्छा छ 'पण तेने तेनी प्राप्ति न थाय तो तेने भावथी परिग्रह के पगा
द्रव्यथी नथी. २. कोइने द्रव्यथी अने भावी पण परिग्रह होय छे, जेमके कोइने कोइ वस्तुपर मूछी होय अने ते वस्तु
तेने 'प्राप्त थाय तो तेने द्रव्यथी भने भावी परिग्रह होय छे. ३. द्रव्यथी पण परिग्रह न होय अने भावथी पण परिग्रह
न होय ए चोथो मंग शुन्य छे.
॥ १९ ॥
सू०--जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अहिंसालकणस्स सञ्चाहिटिअस्स विणयमू- लस्स खंतिप्पहाणस्स महिरपणसोवन्निमस्स उवसमपभवस्स नवबंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्स भि. स्कावित्तिअस्स कुखीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिमस्स नि- विवारस्स निवित्तिलकणस्स पचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसंचयस्स अविसंवाइस्स संसारपार- गामिअस्स निव्वाणगमणपज्जवसाणफलस्स पुवि अन्नाणयाए असवणयाए अवोहिए अणभि- गमेणं, अभिगमेण वा पमाएणं रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए ति- गारवगरुमाए चउक्कसाओवगएणं पचिंदिओवसट्टेणं पडुप्पन्नभारियाए सायासोरकमणुपालयंतेणं इह वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु परिग्गहो गहिओ वा गाहाविओ वा धिप्पतो वा परेंहि सम- गुन्नाओ तं निंदामि गरिहामि तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारण। अईअ निंदामि पडुप्प- गणं सवरेमि अण्णागय पञ्चकामि सव्वं परिग्गहं । जावज्जीवाए अणिस्सिो हं नेव सय परिग्गहं परिगिण्हेजा, नेवन्नेहिं परिग्गहं परिगण्हावेज्जा, परिग्गह परिगिण्हते वि अन्ने न समणुजाणिज्जा । त जहा-मरिहतसरिका सिद्धसकिअं साहुसरिका देवसस्किम अप्पसरिकअं। एव भवइ भिकू
पाक्षिकसत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांवर
वाद सहित
॥ २०॥
वा भिकुणी वा संजयविरयपडिहयपच्चरकायपावकम्मे दिआ वा राओ वा एगो वा परिसागओ
वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु परिग्गहस्स वेरमणे हिए सुहे खमे निस्ससिए आणुगा.
मिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सव्वेसि भूआणं सव्वेसि जीवाणं सव्वेसि सत्ताणं अदुकण-
याए असोअणयाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अपरिआवणयाए अणुद्दवणयाए
महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुककयाए कम्मरक-
याए मोकाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणयाए त्ति कटु उवसंपजित्ताणं विहरामि । पंचमे भंते
महव्वए उवढिओमि सव्वाओ परिग्गहाओ वेरमणं ॥
(एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत् )
पा सर्व सूत्रनो अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो. मात्र प्राणातिपातने ठेकाणे परिग्रह शब्द कहेवो. परिग्रह धारण करनारने
वध, बंधन, मारण, दुःखीपणुं अने नरकगति विगेरे दोषो प्राप्त थाय छे. पांचमा व्रतना ५४ मांगा मा प्रमाणे थाय छ-
अम्प, बहु, अणु, स्थूळ, सचित्त भने अचित्त ए छ पदने त्रण जोगे गुणतां १८ थाय, तेनेत्रण करणे गुणवाथी ५४ थाय छे.
॥ इति पञ्चमं महाव्रतम् ॥
-
॥२०॥
। अथ पष्ठं व्रतम्। सू०-महावरे छट्टे भते वए राईभोप्रणाओ वेरमणं, सव्वं भंते राईभोअणं पञ्चकामि, से असणं वा पाण वा खाइमं वा साइम वा, नेव सयं राइ मुंजेज्जा, नेवन्नेहिं राई भुंजावेज्जा, राई मुंजते वि अन्ने नसमणुजाणामि, जावजीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारण न करेमि न कारवेमि करत पि अन्नं न समाजाणामि, तस्स भते पडिकमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि॥ (अथापरस्मिन् पछे भदन्त व्रते रात्रिभोजनात् विरमण, सर्व भदन्त रात्रिभोजन प्रत्याख्यामि, अथ (तद्यथा)-अशन वा पान वा खाद्य षा स्वाद्य वा, नैव स्वय रात्रौ भुजे, नैवान्यै रात्री भोजयामि, रात्री मुखानानपि अन्यान्न समनुजानामि, यावज्जीव त्रिविधं त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि, न कारयामि, कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिकमामि निन्दामि गहामि आत्मान व्युत्सृजामि) (मह) हवे ( मते ) हे भगवन् ! (अवरे) अन्य ( बढे) छट्ठा (वए) व्रतने विपे ( राईमोअणायो) रात्रिभोजन- थकी (वेरमय) विरस छु. वे सानिमोजन चार रीते-रात्रिए ग्रहण करी राने ज खाय १, रात्रे ग्रहण करी दिवसे
पाक्षिकसत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर.
बाद सहित
॥ २१॥
खाय २, दिवसे ग्रहण करी रात्रे खाय ३ भने दिवसे ग्रहण करी दिवसे खाय ४.* मामांनो छेल्लो चोथो प्रकार शुद्ध छे.
पहेलाना प्रण प्रकार रात्रिभोजनमा गणाय छे. भावी रीतना रात्रिभोजनथकी (वेरमणं ) सर्वथा विरमवू एम भगवंते कह्यु
छ, तेथी ( मैते ) हे भगवन् ! ( सवं ) सर्वथा (राईमोमणं) रात्रिभोजनने (पञ्चस्कामि) हुं निषेधुं छु. (से) ते आ
प्रमाणे-(असणं वा) भात, दाळ विगेरे अशन अथवा ( पाणं वा) पाणी विगैरे सर्च जातना पान अथवा (खाइमं वा)
खर्जूर विगेरे खाद्य अथवा ( साइमं वा) तांबूलादिक स्वाद्य पदार्थोनुं (सयं) हुं पोते (राई) रात्रे (नेव) नहीं ज (भुंजेजा)
भोजन करूं, (अग्नेहिं ) बीजाने (राई) रात्रे (नेव) नहीं ज (मुंजावेजा) भोजन करा, (राई) रात्रे (मुंजते वि)
जमता एवा पण ( अने) वीजाओने (न समणुजाणामि ) अनुमोदना नहीं करूं. केवी रीते ? (जावजीचाए ) जाव-
जीव सुधी (तिविहं ) त्रिविधने (तिविहेणं ) त्रिविधे करीने एटले ( मणेणं ) मनवडे, ( वायाए ) वचनवडे, (काएणं )
कायावडे (न करेमि ) भोजन नहीं करूं, (न कारवेमि ) वीजाने भोजन नहीं करावु, ( करत पि ) भोजन करता एवा
पण ( भन्नं ) बीजाने (न समणुजाणामि) अनुमोदना नहीं करूं. ( तस्स ) ते रात्रिभोजन संबंधी पापने (भंते) हे भगवन् !
(पडिकमामि ) हुं निषेधुं छु, (निंदामि ) आत्मसाचीए निंदु छु, ( गरिहामि ) गुरु समच गर्दा करुं छं अने (अप्पाणं)
तेवा पापकारी मारा भात्माने ( वोसिरामि) विविध प्रकारे तनुं छं.
सू-से राईभोअणे चउविहे पन्नत्ते, तं जहा-दव्वओ खित्तओ कालो भावओ। दव-
* आमां मध्यमा रात्रि व्यतिक्रमावीने बीजे दिवसे खाय तो भा भांगो संभवे छे; परंतु ते दरेक पदार्थ माटे संभवतो नथी.
॥२१॥
ओ णं राईभोगणे असणे वा पाणे वा खाइमे वा साइमे वा, खित्तमो णं राईभोभणे समयखित्ते, कालमओ णं राईभोषणे दिया वा राओ वा, भावभोणं राईभोगणे तित्ते वा कडुए वा कसाए वा अबिले वा महरे वा लवणे वा रागेण वा दोसेण वा। (तत् रात्रिभोजनं चतुर्विधं प्रज्ञप्त, तद्यथा-द्रव्यता क्षेत्रतः कालत' भावतः। द्रव्यतः णं रात्रिभो- जनम् अशने वा पाने वा खाघे वा स्वाये वा, क्षेत्रतःण रात्रिभोजन समयक्षेत्रे, कालतःण रात्रिभोजन दिवा वा रात्री वा, भावतः ण रात्रिभोजनं तिक्ते वा कटुके वा कषायेवा अम्ले वा मधुरे वा लवणे वा रागेण वा द्वेषेण वा) (से) ते (राईमोमणे ) रात्रिभोजन (चउन्बिहे ) चार प्रकारे (पनत्ते ) कहेलु छ (त जहा) ते या प्रमाणे- (दव्यत्रो ) द्रव्यथी, (सित्तो) क्षेत्रधी, (कालो ) कालथी अने (मावो) मावी, तेमा (दयो ण) द्रव्यथी (राई- भोषणे ) रात्रिभोजन (असणे चा ) अशनने विपे अथवा (पाणे वा) पानने विपे अथवा (साइमे वा) खाद्यने विषे अथवा (साइमे वा) स्वायने विपे समवे छे. (खित्तो ण) क्षेत्रथी (राईभोषणे ) रात्रिभोजन (समयखित्ते ) समय क्षेत्र जे अढी द्वीप अने वे समुद्र तेने विष समवे छे ( कालो ण) काळथी (राईमोमणे ) रात्रिभोजन (दिश्रा वा) दिवसे अथवा ( राम्रो वा ) राने थइ शके छ (मावो ण ) मावथी (राईभोगणे ) रात्रिभोजन (तित्ते वा ) लीबडो
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर
वाद सहित
॥ २२ ॥
विगेरे कडवा पदार्थने विष, अथवा ( कडुए वा ) श्रादु विगेरे तीखा पदार्थने विष, अथवा ( कसाए वा) वाल विगैरे
कपायला-तूरा पदार्थने विपे, अथवा (अंबिले वा ) छाश विगेरे खाटा पदार्थने विष, अथवा ( महुरे वा ) दूध विगेरे
मधुर पदार्थने विपे, अथवा ( लवणे वा ) लवण विगेरे खारा पदार्थने विपे संभवे छे. ते पण (रागेण वा) रागवडे करीने
अथवा ( दोसेण वा) द्वेषवडे करीने संभवे छे. अहीं पण द्रव्य अने भाव पाश्री चार भंग थइ शके छे, ते आ प्रमाणे-
कोइ द्रव्यथी रात्रिभोजन करे पण मावथी न करे, जेमके राग-द्वेप विना कोइ माणस सूर्य नहीं उग्या छतां उग्यो मानीने
अथवा सूर्य भस्त थया छतां अस्त थयो नथी एम मानीने रात्रिभोजन करे अथवा तो समळ कारणने लइने रात्रिभोजन
करे तेने द्रव्यथी रात्रिभोजननो दोप लागे छे, पण तेवा अध्यवसाय नहीं होवाथी भाव आश्री दोष लागतो नथी. १. कोइ
भावथी रात्रिभोजन करे पण द्रव्यथी न करे, जेमके हुँ रात्रिए जमीश ए प्रमाणे अध्यवसाय करे पण रात्रिए तेने भोजन
मळे नहीं, तेने भावथी रात्रिभोजन थयुं पण द्रव्यथी न थy. २. कोइ द्रव्यथी अने भावथी पण रात्रिभोजन करे, जेमके
कोइ रात्रे जमवानो विचार करी रात्रे ज जमे तेने द्रव्यथी अने भावथी रात्रिभोजननो दोप लागे छे. ३. कोइ द्रव्यथी अने
भावथी पण रात्रिभोजन न करे, ए चोथो मंग शून्य छे.
सू०-जं मए इमस्स धम्मस्स केवलिपन्नत्तस्त अहिंसालकणस्स सञ्चाहिद्विमस्स विणयमू-
लस्स खंतिप्पहाणस्स अहिरण्णसोवनिअस्स उवसमपभवस्स नवबंभचेरगुत्तस्स अपयमाणस्त भिका-
॥२२॥
वित्तिमस्स कुकीसंबलस्स निरग्गिसरणस्स संपकालिअस्स चत्तदोसस्स गुणग्गाहिअस्स निव्विा- रस्स निम्वित्तिलकणस्स पंचमहव्वयजुत्तस्स असंनिहिसचयस्स अविसंवाईअस्स संसारपारगामिअस्स निव्वाणगमणपजवसाणफलस्स पुब्बिं अन्नाण्याए असवणयाए अबोहिए अणभिगमेण अभिगमेण वा पमाएण रागदोसपडिबद्धयाए बालयाए मोहयाए मंदयाए किड्डयाए तिगारवगरुआए चउक्कसा- ओवगएण पचिदिओवसट्टेणं पडुप्पन्नभारियाए सायासोखमणुपालयतेणं इहं वा भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु राईभोअण भुत्तं वा भुंजाविस वा मुंजत वा परेहि समणुन्नायं त निंदामि गरिहामि तिविह तिविहेणं मणेण वायाए कापणं । अईअनिंदामि पडुप्पणं संवरेमि अणागय पच्चस्लामि सव्वं राईभोअण।जावज्जीवाए अणिस्सिो हं नेव सय राईभोअणं भुंजेजा, नेवन्नेहिं राईभोअणं भुंजावेज्जा, राईभोअणं भुजते विअन्नेन समणुजाणिज्जा । त जहा-अरिहतसरिकअ सिद्धसरितअंसाहुसरिता देवसरिकम अप्पसरिकअं । एव भवइ भिस्कू वा भिकुणी वा संजयविरयपडिहयपञ्चसायपावकम्मे दिआ वा रामओ वा एगो वा परिसागओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा । एस खलु राईभोअणस्स पाधिकसूत्र गुजराती भाषांतर संस्कृतानुः चाद सहित ॥२३॥ । वेरमणे हिए सुहे खमे निस्सेसिए आणुगामिए पारगामिए सव्वेसिं पाणाणं सवेसिं भूआणं सव्वेसि जीवाणं सवोर्स सत्ताणं अदुखणयाए असोयणाए अजूरणयाए अतिप्पणयाए अपीडणयाए अप- रियावणयाए अणुद्दवणयाए महत्थे महागुणे महाणुभावे महापुरिसाणुचिन्ने परमरिसिदेसिए पसत्थे तं दुस्करकयाए कम्मरकयाए मोरकाए वोहिलाभाए संसारुत्तारणाए त्ति कटु उपसंपजिन्ताणं विहरामि छठे भंते वए उवट्ठिोमि सव्वाओ राईभोअण्णाओ वेरमणं ।। एतत्सूत्रसंस्कारः पूर्ववत्) श्रा सर्व सूत्रनो अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो. विशेप ए के प्राणातिपातने ठेकाणे रात्रिभोजन कहे. या व्रत पांच महा- व्रतोनी साथे कह्यं तेनुं कारण ए छे के पहेला तीर्थकरना तीर्थना साधुओ ऋजुजड होग के अने चरम तीर्थकरना नीर्थना साधु वक्रजड होय छे तेमने आ व्रत मूळगुणमा जाणवानुं थे तथा मध्यम वावीश तीर्थकरना तीर्थना साधुओ अजुनाज्ञ होवाथी तेमनी अपेक्षाए उत्तरगुणमां जाणवानुं छे. रात्रिभोजन करनारने कीडी, पतंग विगैरेनी हिंसानो दोप लागे छे. आ छठा व्रतना मांगा ३६ आ रीते थाय छ-मशन, पान, खाद्य अने स्वाधने व्रण जोगे गुणतां चार थाय, तेने त्रण करशे गुणतां छत्रीश थाय. छ व्रतोना मळीने २७० भांगा थाय छे. ॥ इति पष्ठं व्रतम् ॥ REE । ॥२३॥ - ।
हवे सर्व प्रतानो स्वीकार एक साथे कहे छे- सु०-इन्चेइयाइं पंचमहव्वयाई राईभोगणवेरमणलट्ठाइ अत्तहिट्ठाए उवसंपजित्ताण विहरामि ॥ ( इत्येतानि पञ्च महाव्रतानि रात्रिभोजनविरमणषष्ठानि आत्महितार्थाय उवसपद्य विहरामि) (इचेइयाइ) आ पूर्वे कहेला (राईमोमणवरमयबट्ठाइ) रात्रिभोजनविरमण के छह जेमा एवा (पच महव्वयाइ) पांच महाप्रतीने ( प्रचहिभट्ठाए) श्रात्माने हितकारक जे मोक्ष वेने भर्थे ( उवसपजित्ताण) अगीकार करीने (विहरामि) हु विचरु छु एटले सुसाधुना विहारवडे वतुं छु, कारण के विहारने अमावे अगीकार करेला व्रतोनो पण अमावनो प्रसग भावे छे-समवे छे. हवे अनुक्रमे महानवोना अतिचारो वतावे छे.- अप्पसत्था ये जे जोगा, परिणामा च दारुणा । पाणाइवायरस वेरमणे, एस वुत्ते अइकमे ॥१॥ (अप्रशस्ताश्च ये योगा, परिणामाश्च दारुणाः। प्राणातिपातस्य विरमणे, एष उक्त अतिक्रमः ॥१॥) (अप्पसत्था ये ) हिंसाना हेतुरूप होवाथी भप्रशस्त एवा (जे)ले (जोगा) यतना विना चालवु-बोलबु विगेरे योगो-व्यापारो थे, तथा ( दारुणा) भयकर एवा (परिणामा य)जे प्राणीनो घात करवाना अध्यवसायो छ, (एस) ते lil पाक्षिकसूत्र संस्कृतानु- गुजराती भाषांवर वाद सहित ॥२४॥ श्रा (पाणाइवायरस ) प्राणातिपातना (रमणे ) विरमणने विपे (अइक्कमे ) अतिक्रम-अतिचार (वुत्ते ) भगवते कहा छे. आ प्रमाणे जाणीने तेवा योग अने अध्यवसायनो त्याग करवो. ? हवे बीजा व्रतने आधी कहे थे- तिव्वरागा य जा भासा, तिव्वदोसा तहेव य । मुसावायस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइकमे ॥ २ ॥ (तीवरागा च या भाषा, तीवद्वेषा तथैव च । मृपावादस्य विरमणे, एष उक्तः अतिक्रमः ॥२॥) (तिव्वरागा य ) तीन रागवाळी (तहेव य) तेमन (तिव्वदोसा) तीव्र द्वेषवाळी (जा) जे (भासा) भाषा गोलवामां आवे, (एस ) ते आ (मुसावायस्स) मृपावादनी (वेरमणे ) निरतिने विपे ( अइकमे ) अतिक्रम-देशथी भंग अथवा सर्वथी भंग (वुत्ते ) जिनेश्वरोए कह्यो छे, एम धारी तेनो त्याग करवो. २ हवे त्रीजा व्रतने आश्री कहे छे.- उग्गहं च अजाइत्ता, अविदिहो य उग्गहे । अदिण्णादाणस्स बेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥३॥ ( अवग्रहं च अयाचित्वा, अविदत्ते च अवग्रहे । अदत्तादानस्य चिरमणे, एष उक्तः अतिक्रमः ॥३॥) ( उग्गहं च ) अवग्रहने-उपाश्रयने (अजाइत्ता ) याचना कर्या विना-सामीनी आज्ञा लीधा विना तेमा जे रहे, तथा ( भविदिण्णे य ) अवग्रहना स्वामीए नहीं आपेला (उग्गहे) अत्रग्रहने विष एटले भवग्रहनी मर्यादामा जे कांड चेष्टा ॥२४॥ MA करवी. (एस) ते भा (भदिग्णादायस्स ) अदचादाननी (वेरमणे) विरतिने विषे (महकमे ) प्रतिक्रम-अतिचार (बुचे) कहोछे ३ हवे चोथा,प्रतने आश्री कहे के- सद्दारूवारसागंधा-फासाणं पवियारणे । मेहुणस्स वेरमणे, एस वुत्ते भइक्कमे ॥ ४॥ (शब्दरूपरसगन्धस्पर्शानां प्रविचारणा । मैथुनस्य विरमणे, एप उक्तः अतिक्रम ॥४॥) ( सद्दा) वेणु, वीणा, स्त्रीना गीत विगेरे शन्दो, (रूवा ) स्त्री आदिकना मनोहर रूपो, ( रसा) मधुरादिक रसो, (गधा ) पुष्पनी माळा, चदन विगेरे गधो तथा (फासाण) कोमळ तळाइ, स्त्री आदिकना कोमळ स्पर्शो ए पांचे विपयोनी जे ( पवियारणे ) रागधी सेवा (एस) ते आ (मेहुणस्स.) मैथुननी (वेरमणे) विरतिने विपे (यइक्कमे) अतिक्रम-अविचार (वुत्ते ) कयो छे. ४ हवे पाचमा परिमनतने आधी फहे थे- इच्छा मुच्छा. य गेही य, कखा, लोभे य दारुणे । परिग्गहस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइक्कमे ॥ ५॥ (इच्छा मूर्छा च गृद्धिश्च, काइक्षा लोभश्च दारुणः । परिग्रहस्य विरमणे, एप उक्त प्रतिममः ॥५॥) (इच्छा) नहीं प्राप्त थयेला कोइ पण पदार्थनी प्रार्थना, तथा (मुच्छा य) नाश पामेला पदार्थनी मूळ-शोक करवो
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु
गुजराती
भाषांतर.
बाद सहित
॥२५॥
-
ते, तथा ( गेही य ) विद्यमान पदार्थ उपर श्रासक्ति, तथा ( कंखा) नहीं प्राप्त थयेला विविध पदार्थनी भाकांक्षारूप जे
( दारुणे) तीव्र (लोभे य ) लोम (एस ) ते भा ( परिग्गहस्स) परिग्रहनी (वेरमणे) विरतिने चिपे (भइकमे)
अतिक्रम ( वुत्ते ) तीर्थकरोए कहेलो छ, तेथी तेनो त्याग करवो. ५
हवे छट्ठा व्रतने आश्री कहे छे.-
अइमत्ते य आहारे, सूरखित्तम्मि संकिए । राईभोयणस्स वेरमणे, एस वुत्ते अइकमे ॥६॥
( अतिमात्रश्च श्राहारः, सूरक्षेत्रे शङ्कित्ते । रात्रिभोजनस्य विरमणे, एष उक्तः अतिक्रमः ॥ ६॥)
(प्रइमत्ते य ) प्रमाणथी अधिक एटले जे श्राहारनो रात्रे ओडकार भावे एवो जे (पाहार ) आहार को होय, तथा
( सूरखित्तम्मि ) सूर्यन क्षेत्र-उदय अने अरतवाळं आकाशक्षेत्र जे ते (संकिए) सूर्य उग्यो के के नहीं ? अथवा सूर्य अस्त
पाम्यो के के नहीं ? ए प्रमाणे शंकित एटले शंकाचालं थये सते जे आहार करवो (एस) ते आ (राईभोयणस्स) रात्रिभो-
जननी (वेरमणे ) विरतिने विषे ( अइक्कमे ) अतिचार (बुत्ते ) कह्यो छे माटे तेवो आहार वर्जवो. ६
था प्रमाणे महाव्रतोना अतिचार कह्या, हवे ते ज व्रतो जे प्रकारे भविचाररहित पाळेलां थाय ते कहे छे.-
दसणनाणचरित्ते, अविराहित्ता ठिमो समणधम्मे।पढमं वयमणुरके, विरयामो पाणाइवायाओ।१।
(दर्शनज्ञानचरित्राणि, अविराध्य स्थितः श्रमणधर्मे। प्रथमं व्रतमनुरक्षामि, विरतोऽस्मि प्राणातिपातात् १)
॥२५॥
(दसणनाणचरित्ते) समकितदर्शन, मतिज्ञानादिक ज्ञान भने सामायिकादिक चारित्रने (भविराहिचा) नहीं विरा- धीने एटले परिपालन करीने ( समणधम्मे) साधुना धर्मने विपे (ठिमो) रहो एवो हु ते (पढम ) पहेला (वयं) अतनु (अणुरके ) रक्षण करु छु एटले अतिचाररहित पालन करूं छु. (पाणाइवायाओ) प्राणातिपाव-जीवहिंसा- थकी (विरयामो) हु विरम्यो छु. १. दसणनाणचरित्ते, अविरहित्ता ठिो समणधम्मे । बीयं वयमणुरके, विरयामो मुसावायाओ। दसणनाणचरित्ते, अविराहिता ठिमो समणधम्मे । तइय वयमणुरके, विरयामोअदिन्नादाणाओ।३। दसणनाणचरित्ते, अविराहिता ठिओ समणधम्मे । चउत्थ वयमणुरके, विरयामो मेहुणाओ।४। दसणनाणचरित्ते, अविराहित्य ठिो समणधम्मे । पचम वयमणुरके, विरयामो परिग्गहाओ।५। दसणनाणचरित्ते, अविराहित्ता ठिो समणधम्मे । छठ वयमणुरके, विरयामो राईभोयणाओ।६। (अस्य गाथापञ्चकस्य संस्कारः पूर्ववत्) या पाचे गाथानो अर्थ पहेली गाथा प्रमाणे जाणवो विशेष ए के पहेला व्रतने ठेकाणे अनुक्रमे चीजु, श्रीजु, चोथु, पांचमु अने छछु व्रत कहेवु, तथा प्राणातिपातने ठेकाणे अनुक्रमे मृषावाद, अदत्तादान, मैथुन, परिग्रह अने रात्रिभोजनथी विरमवानु कहेचु.२-३-४-५-६
I HAI.
'पाक्षिकसत्र
संस्कृतानु
गुजराती
भाषांवर
बाद सहित
॥ २६॥
हवे बीजी रीते पण महाव्रतोतुं रक्षण कहे छे.-
आलयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे। पढमं वयमणुरके, विरयामो पाणाइवायामो।१॥
(बालयविहारसमितो, युक्तो गुप्तः स्थितः श्रमणधर्मे । प्रथमं व्रतमनुरक्षामि, विरतोऽस्मि प्राणातिपातात् १)
(श्रालय ) समग्र दोष रहित उपाश्रयने सेवनारो, (विहार ) शास्त्रमा कक्षा प्रमाणे विहार करतो. ( समिओ) र्या
आदिक पांच समितिए सहित, ( जुत्तो ) युक्त एटले अचेलपणुं, अस्नान, पृथ्वीपर शयन करवू, दातण न करवू, मस्तक-
दाढी-मूछ मुंडावत्रा नहीं, भिक्षा मागवी तथा क्षुधा, पिपासा, शीत, श्रातप विगेरे परीसहो सहन करवा अने गुरुकुळमां
वसवू ए विगेरे साधुना गुणोथी युक्त-सहित, (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त-सहित तथा (समणधम्मे) चांति आदिक साधुना
दशप्रकारना धर्ममा (ठिओ ) रह्यो एको हुँ (पढमं) पहेला (वयं) व्रतनुं (अणुररके ) रक्षण करुं छं-(पाणाइवायात्रो)
प्राणातिपातथकी (विरयामो) हुँ विरम्यो छु. १.
आलयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओ सभणधम्मे। वीयं वयमणुरके, विरयामो मुसावायाओ ।।
आलयविहारसमिओ,जुत्तो गुत्तो ठिओ समणधम्मे। तइयं वयमणुरके, विरयामो अदिन्नादाणाओ।३॥
आलयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तोठिओ समणधम्मे । चउत्थं वयमणुरके, विरयामो परिग्गहाओ।४।
आलयविहारसमियो, जुत्तो गुत्तो ठिमो समणधम्मे। पंचमं वयमणुरके, विरयामो परिग्गहाभो ।५॥
|॥२६॥
आलयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिमो समणधम्मे। छठं वयमणुरके, विरयामो राईभोयणामो।। (अस्य गाथापनकस्य संस्कारः पूर्ववत् ) भा पांचे गाधानो अर्थ पहेली गायानी जेम जाणवो विशेष ए के पहेला बनने ठेकाणे अनुक्रमे वीजु, जीजु, चोथु, पाचमु अने छई बत कहेवु, तथा प्राणातिपातने ठेकाणे मृषावाद, अदचादान, मैथुन, परिग्रह अने रात्रिभोजनथी विरमवानु कहेवु २-३-४-५-६. इवे पाचे महानतो मादे भेलु कहे छे- आलयविहारसमिओ, जुत्तो गुत्तो ठिओसमणधम्मे।तिविहेण अप्पमत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥७॥ (श्रालयविहारसमितो, युक्तो गुप्ता स्थितः श्रमणधर्मे । त्रिविधेन अप्रमत्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥७॥) (श्रालय ) समग्र दोषरहित उपाश्रयने सेवनार, (विहार) शास्त्रमा कहा प्रमाणे विहार करनार, ( समिमो) पाच समितिसहित, ( जुत्तो) अचेलपणु भादिक गुणोवडे युक्त, (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त तथा ( समणधम्मे ) साधुना धर्मने विपे (ठिो) रह्यो एचो हु (तिविहेण ) मन, वचन अने कायारूप ण प्रकारना करणे करीने (अप्पमत्तो) प्रमाद- रहित-सावधानपणे रह्यो थको (पच) पाचे (महन्वए) महाव्रतोनु (रकामि) पालन करु छु.७. इवे एकथी पारमीने अनुक्रमे एक एकनी वृद्धि करता दश अशुभ स्थानकोनु वर्जवु भने दश शुभ स्थानो अगीकार करवा ए द्वारवडे फरीन महाप्रतोना रक्षणने ज फहेछ-
पाधिकरत्र
संस्कवानु-
गुजराती
भाषांतर
बाद सहित
॥ २७॥
सावज्जजोगमेगं, मिच्छत्तं एगमेव अन्नाणं । परिवजंतो गुत्तो, रस्कामि महव्वए पंच॥१॥
( सावधयोगमेकं, मिथ्यात्वमेकमेवं अज्ञानम् । परिवर्जयन् गुप्तो, रक्षामि महावतानि पञ्च ॥१॥)
( सावजजोगमेगं ) एक एवा सावध योगने-पापव्यापारने, तथा (मिच्छत्तं एगं) एक एवा मिथ्यात्वने-देव, गुरु,
धर्मसंबंधी मनना विपरीत अध्यवसायने, तथा (एव अन्नाणं) ए ज प्रमाणे एटले एक एवा अज्ञानने एटले विपरीत ज्ञानने
( परिवजंतो) वर्जतो एवो भने ( गुसो ) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (पंच ) पांच (महव्वए) महाव्रतोतुं ( ररकामि)
रक्षण करुं छु. १.
अणवज्जजोगमेगं, सम्मत्तं एगमेव नाणं तु । उवसंपन्नो जुत्तो, ररकामि महव्वए पंच ॥२॥
(अनवद्ययोगमेकं, सम्यक्त्वमेकमेवं ज्ञानं तु । उवसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥२॥)
(अणवजजोगमेगं ) एक एवा अनवद्य योगने एटले पापरहित व्यापारने, तथा ( सम्मत्तं एग) एक एवा समकितने,
तथा ( एव नाणं तु ) ए ज प्रमाणे एक एवा ज्ञानने पण ( उपसंपभो ) प्राप्त थयेलो अने (जुत्तो) साधुना गुणोपडे
युक्त एवो हुँ (रकामि महन्वए पंच) पांच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. २.
दो चेव रागदोसे, दुन्नि भ झाणाई अझरुद्दाई । परिवज्जतो गुत्तो, रकामि महत्वए पंच ॥ ३ ॥
(द्वावेव रागद्वेपो, द्वे च ध्याने आरौिद्रे । परिवर्जयन गुप्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ ३ ॥)
॥ २७॥
(दो चैव ) चे एवा ज ( रागदोसे ) राग भने द्वेपने, तथा (दुभि अ) बे एवा (भट्टरुद्दाई) मार्त भने रौद्र नामना (शाणाइ ) ध्यानोने (परिवतो ) वर्जतो एवो भने (गुतो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हु (रकामि महव्वए पच) पांच महाव्रतोनु रक्षण करु छु ३ दुविह चरित्तधम्म, दुन्नि अ झाणाइ धम्मसुक्काइ । उवसंपन्नो जुत्तो, ररकामि महव्वए पच ॥४॥ (द्विविध चारित्रधर्म, द्वे च ध्याने धर्मशुक्ले । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ ४ ॥) (दुविद ) वे प्रकारना एटले देश भने सर्व एवा घे भेदना ( चरित्तधम्म) चारित्रधर्मने, ( दुन्नि श्र) तथा वे प्रका रना (धम्मसुकाइ ) धर्म भने शुक्ल नामना ( झाणाइ ) ध्यानौने (उपसपनो) पामेलो भने( जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हु (रकामि महब्बए पच ) पांच महाव्रतोनु रक्षण करु छु ४. किण्हा नीला काऊ, तिपिण अलेसाउ अप्पसत्थाओ। परिवजतो गुत्तो, रकामि महव्वए पच ॥५॥ (कृष्णा नीलां कापोती, तिम्रश्च लेश्या अप्रशस्ताः। परिवर्जयन् गुप्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥५॥) (किण्हा ) कृष्णलेश्या, (नीला ) नीललेश्या, (काऊ) कापोतलेश्या (विधि अ) ए त्रण (अप्पसस्थानो) भप्रशस्त एटले क्लिष्ट कर्मना वधनी हेतुरूप होवाथी असुदर एवी (लेसाउ) लेश्याश्रोने (परिवजतो) वर्जतो भने (गुत्तो) अगा गुप्तिवडे गुप्त एवो हु (रकामि महवए पच) पांच महाव्रतोनु रक्षण करुं छु. ५.
गुजराती
भाषांतर
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
तेऊ पम्हा सुक्का, तिाही अ लेसाउ सुप्पसत्थामओ। उपसंपन्नो जुत्तो, रस्कामि महव्वए पंच ॥६॥
(तेजसी पद्मां शुक्ला, तिस्रश्च लेश्याः सुप्रशस्ताः । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥६॥)
( तेऊ ) तेजोलेश्या, (पम्हा) पद्मलेश्या अने ( सुका ) शुक्ललेश्या (तिणि अ) ए त्रण ( सुप्पसत्थाओ) सुप्रशस्त
एटले शुभ कर्मना बंधनी हेतुरूप होवाथी सुंदर एवी (लेसाउ) लेश्याओने ( उपसंपन्नो) पामेलो अने (जुत्तो ) साधुगुणे
युक्त एचो ( ररकामि महव्वए पंच) पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छु. ६.
मणसा मणसच्चविऊ, वायासच्चेण करणसच्चेण । तिविहेण वि सच्चविऊ, रकामि महव्वए पंच॥७॥
(मनसा मनासत्यविद्वान्, वाक्सत्येन करणसत्येन। त्रिविधेनापि सत्यविद्वान् , रक्षामि महावतानि पञ्च॥७॥)
(मणसचविऊ ) मननुं सत्य एटले अकुशळ मननो निरोध अने कुशळ मननी प्रवृत्ति, ते रूप मनसंयमने जाणनार
एवो हुँ ( मणसा ) शुभ स्वभावरूप चित्तवडे करीने १, तथा ( वायासचण ) वाणी सत्य एटले कुशळ ( सत्य ) वचन
बोलवू अने अकुशळ ( असत्य ) वचन न बोलवू ते रूप वाणीना संयमवडे करीने २, तथा ( करणसच्चेण ) क्रियासत्य
एटले कार्य सते उपयोगी गमन-श्रागमन कर अने कार्य न होय त्यारे हाथ-पग विगेरे अवयवोने हलाववा नहीं एवा
कायसंयमवडे करीने ३ (रक्खामि महन्वए पंच) हुं पांच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छं. आत्रण भांगा होवाथी द्विक (बे) संयो-
गीया बीजा त्रण भांगा पण सूचन काँ छ एम जाणवू, ते मा प्रमाणे--मनोवाक्सत्ये करीने एटले मन अने वाणीना
वाद सहित
॥ २८॥
॥२८॥
सयमवडे करीने १, तथा मन:कायसत्ये करीने एटले मन अने कायाना सयमबडे करीने २, तथा वाक्कायसत्ये करीने एटले वाणी अने कायाना सयमवडे करीने ३ हु पाच महाव्रतोनु रक्षण करु छु. तथा (तिविहेण वि) मन, वचन भने कायारूप त्रण प्रकारना करणे करीने पण ( सच्चविऊ ) सत्यने-सयमने जाणनार एटले शुद्ध संयमनु पालन करनार हु पच महाव्रतोनु रक्षण करु छु. भा त्रिक सयोगीयो एक मांगो थयो, तेथी ते सर्व मळी सात प्रकारना सयमे करीने हु पच महाव्रतोनु रक्षण करु छु, एम जाणवु. चत्तारि दुहसिज्जा, चउरो सन्ना तहा कसाया य । परिवजंतो गुत्तो, रकामि महव्वए पच ॥८॥ (चतस्रो दुःखशय्याः, चतस्रः सज्ञाः तथा कषायाश्च । परिवर्जयन् गुप्तो, रक्षामि महावतानि पञ्च ॥ ८॥ (चत्तारि ) चार ( दुहसिजा ) दुख आपनारी शय्याने, तथा (चउरो) चार (सबा) सज्ञाने, (तहा) तथा (कसाया य) चार कपायने ( परिवतो) वर्जतो एवो भने (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हु (रकामि महबए पच ) पांच महाव- तोनु रक्षण करु छु नहीं चार दुःखशय्या कही ते या प्रमाणे-जिनेश्वरना मतनी सहहणा न करवी ते १, कामभोगनी वांचा करवी ते २, परना लाभनी वांछा करवी एटले वीजा कोइने जे काह लाभ थयो होय तेवो लाभ पोताने थवानु वाछे ते ३ अने स्नाननी वाला एटले हाथ, पग के मुख धोनु अथवा श्राखे शरीरे स्नान करवु तेनी इच्छा करवी ते ४. चार सबा मा प्रमाणे-आहारसज्ञा १, भयसज्ञा २, मैथुनसज्ञा ३ अने परिग्रहसज्ञा ४. चार कपाय-चार चार प्रकारना क्रोध, मान, माया भने लोम. ८.
गुजराती
पाधिकसत्र
सस्कृतानु-
भाषांतर.
बाद सहित
॥ २९ ॥
चत्तारि य सुहसिज्जा, चउव्विहं संवरं समाहिं च । उवसंपन्नो जुत्तो, रस्खामि महव्वए पंच ॥९॥
( चतस्रो सुखशय्याः, चतुर्विधं संवरं समाधि च । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ ९॥)
( चत्तारि य ) चार ( सुहसिज्जा) सुख आपनारी शय्याने, तथा ( चउब्बिई ) चार प्रकारना ( संवरं ) संवरने, तथा
( समाहिं च ) चार प्रकारनी समाधिने ( उवसंपनो) पामेलो अने (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हुँ (ररकामि महन्बए पंच)
पांच महाव्रतोतुं रक्षण करूं छु. अहीं चार सुखशय्या आ प्रमाणे छे.-जिनेश्वरना मतनी सदहणा करवी ते १, कामभो-
गनी वांछा न करवी ते २, स्वलाभ संतोष एटले पोताने जे कांइ मळे तेनाथी संतोप राखयो ते ३ अने अस्नाननी वांछा
एटले हाथ, पग के मुख घोचानी अथवा शरीरे स्नान करवानी इच्छा न करवी ते. ४. चार संवर ा प्रमाणे-मनसंवर
एटले भकुशळमा ( पापकार्यमा ) प्रवर्तता मननो निरोध करवो भने कुशळमा (पुण्यकार्यमां) प्रवर्तीवयु ए मनसंवर १,
ए ज रीते वचनसंबर २ अने कायसंवर ३ जाणवा, तथा उपकरण संवर एटले महामन्यवाळा वखनो डाने सुवर्णादिकनो
त्याग करवो अथवा वस्त्रपंचक, पुस्तकपंचक, तृणपंचक भने चर्मपंचकनो त्याग करवो ते ४. तथा चार समाधि आ
प्रमाणे-ज्ञानसमाधि १, दर्शनसमाधि २, चारित्रसमाधि ३ श्रने तपसमाधि ४. ९.
पंचेव य कामगुणे, पंचेव य अण्हवे महादोसे । परिवजतो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥१०॥
(पञ्चैव च कामगुणान् , पञ्चैव च भावान् महादोषान् | परिवर्जयन गुप्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥१०॥
।॥ २९ ॥
(पचेव य) शन्द, रूप, रस, गध भने स्पर्श ए पांच ( कामगुणे ) काममोगोने, तथा (पचेव य) प्राणाविपात,
मृपावाद, भदचादान, मैथुन अने परिग्रह ए पांच (महादोसे ) महादोपने करनारा (अण्हवे ) माश्रवोने (परिवज्जतो)
वर्जतो एवो भने ( गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हु (रकामि महब्बए पच ) पांच महाव्रतोनु रक्षण करु छु. १
पंचिंदियसवरणं, तहेव पचविहमेव सज्झायं । उवसंपन्नो जुत्तो, रखामि महव्वए पंच ॥ ११ ॥
(पश्चेन्द्रियसवरण, तथैव पञ्चविधमेव स्वाध्यायम् । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ ११ ॥)
(पचिंदियसवरण) श्रोत्रादिक पांच इद्रियोना सवरने एटले इष्टवस्तुपर रागथी भने अनिष्ट वस्तुपर द्वेपथी प्रवर्तती
इद्रियोने स्थवा माटे ते सवरने (तहेव ) म ज (पचविहमेव) वाचना, पृच्छना, परिवर्तना, अनुप्रेक्षा अने धर्मकथा ए पांच
रना ( सज्झाय ) स्वाध्यायने ( उवसपनो) पामेलो अने ( जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हु (रकामि महव्वए पच ) पंच
महावतोनु रक्षण करु छु. अहीं वाचना एटले भणवु ते १, मण्या पछी शका उत्पन्न थाय त्यारे गुरुने पूछतु ते पृच्छना २,
पूछीने शकारहित थया छतां पड़ीथी भूली न जवाय तेने माटे फरी फरी सून गणवु ते परिवर्तना ३, सूत्रनी जेम अर्थ पण
भूली न जवाय तेने माटे अर्थनु वारवार चितवन करवु ते अनुप्रेक्षा ४ तथा या प्रमाणे श्रुत भण्या पछी श्रुतधर्मनी कथा
एटले व्याख्या करवी दे धर्मक्था ५भा पांच प्रकारको स्वाध्याय कहेवाय छे. ११.
बज्जीवनिकायवहं, छप्पि य भासाउ अप्पसस्थाउ । परिवज्जतो गुत्तो, रस्कामि महव्वए पच ॥१२॥
गुजराती भापांतर पाक्षिक सूत्र संस्कृतानु- वाद सहित ॥३०॥ (पजीवनिकायपधं, पडपि च भाषा अप्रशस्ताः । परिवर्जयन गुप्तो, रक्षामि महाप्रतानि पञ्च ॥ १२॥) (छजीवनिकायवहं ) पृथ्वीकाय, भपकाय, तेजस्काय, वायुकाय, वनस्पतिकाय अने त्रसकाय ए छ प्रकारनी जीवनि- कायना वधने, तथा (छप्पि य ) छ प्रकारनी (अप्पसत्थाउ) अप्रशस्त एटले भारे कर्मना बंधनी हेतुभूत होवाथी असुंदर एची ( मासाउ ) भाषामोने (परिवजंतो) वर्जतो एवो अने (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एको हुँ ( रक्खामि महब्बए पंच) पंच महावतोर्नु रक्षण करुं छु. अहीं छ प्रकारनी अप्रशस्तभाषा आप्रमाणे छे-अलीक वचन १, हीलित वचन २, खिसित वचन ३, परुष वचन ४, गार्हस्थ्य वचन ५ अने व्यवशमिताधिकरणोदीरण ( कलह उदीरण ) वचन ६. तेमां कोइने दिवसे प्रचला निद्रा प्रावती होय तेने कोई पूछे के-" तने दिवसे केम प्रचला निद्रा आवे छे ? " तेना उत्तरमा ते कहे के-"ना, मने प्रचला निद्रा आवती नथी." प्रा अलीक वचन कहेवाय छे. १. सामान्य साधुने हे गणि! हे वाचक ! एम ईयाथी से कहे ते हीलित वचन कहेवाय छे. २. कोइना हलकी जातिना जन्म अने कर्म विगेरे उघाडी करता ते खिसित वचन कहेवाय छे. ३. हे दुष्ट शिष्य ! एवं जे कठोर वचन कहे ते परुपवचन कहेवाय छे. ४. हे पुत्र ! हे माणेज! ए रीते गृहस्थीना संबंधयी बोलाय ते गार्हस्थ्य वचन कहेनाय छे ५ तथा शांत थयेला अधिकरण-फलहनी उदीरणानुं वचन बोलवु ते व्यवशमिताधिकरणोदीरा वचन एटले कलह उदीरण वचन कहेवाय छे. ६. १२. छविहमभितरयं, बझं पि य छविहं तवोकम्मं । उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महत्वए पंच ॥१३॥ (पश्विधमभ्यन्तरकं पायमपि च पविध तपाकर्म । उपसंपनो युक्तो, रचामि महायतानि पन ॥ १३ ॥) ॥३०॥ - (इमिर) प्रकारना (प्रमिवरय) मम्मतर, (पमं पिय) या पाप पण (अम्बिा) प्रकारना (कोकम्म) पाने (उपमो) पामेलो तया (जुचो) साधुगुणे पुन एकोहु (रक्खामि महम्बए पन)पच महायतोनु रपण कर ९. भीममतर तपनाच प्रकार मा प्रमाणे हे प्रापधित १, पिनप २, येयाप ३, स्वाध्याय ४, ध्यान ५ भने उत्सर्ग ६ प्रकारको मार समाप्रमा-मनशन १, ऊनोदरी२, पचिसक्षेप ३, रसत्याग ४, कायरलेश५ भने संलीनता ६.१३. सत्त य भयठाणाइ, सत्तविह चेव नाणविन्भंग । परिवजतो गुत्तो, रस्कामि महन्वए पंच ॥ १४ ॥ (मान भयस्थानानि, सापि घेच ज्ञानयिभग । परिवर्जयन् गुप्तो, रचामि महाव्रतानि पञ्च ॥ १४॥) (माय) तथा सात (मपठाणा) मपना स्पानकोने, क्या (सत्तविह घर) सात प्रकारनाज (नागभिग) विमग- भानने (परिवतो ) पर्वतो वपा (गुचो) मय गुप्तिर गुप्त एवो हु (रस्कामि महपए पच) पर महामवोनु रपण करु छु. भी माय मग भा प्रमाणे -मालोक मप १, परलोक भय २, पादान मग ३, अकस्मात् मय ४, वेदना भय ५, मरण भप ६ भने भरकीर्ति भय ७. पिगगगन एटो मिलासमाहित प्राधिशान. वेना सात मकार मा प्रमाणे एक दिशि तोम्याण्टले दिनार दिशामो भने ऊ तया यो ए छ दिशामांधी एक दिशाए लोकनु पान एटले जाणाचु ते. पानी पनि दिशाए लोकोचीकार नहीं करसाधी मा विमगलान काप छ १. पोर दिशि लोकमान पटले को एक दिसा पिना पीजीपाच दिशार लोका जाय ते. महीं पण एक दिशाए लोक नहीं मानपाधी विमग कशाय 2 २. फिपार जीप एटचे जीवमात्र प्रापातिपातादित किया न करे थे ते जोरामा मारे छ भने ते क्रियानु कारण जे फर्म
गुजराती
भाषांतर.
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
बाद सहित
॥३१॥
(ज्ञानावरणादिक) ते जोवामा आवतुं नथी, तेथी जीवने मात्र क्रियानुं ज भावरण छ, कर्मनु आवरण नथी, एम जे मानवू
ते. भही क्रिया ज देखाय ले माटे ते मानवी भने कर्म देखातुंनी माटे ते न मानवुए विमंगज्ञान छे. ३. मृदग्ग जीव (तनुमय
जीव) एटले भवनपत्यादिक देवो पोताना शरीरनी अवगाहनाना क्षेत्रनी अंदर रहेला तथा बहार रहेला पुद्गळोने ग्रहण करी
वैक्रिय शरीर रचे छ तेजोड सर्व कोइ जीवनुं शरीर पोताना अवगाहक्षेत्रना चाहा तथा आभ्यंतर पुद्गळोथी ज रचायेलचे,
एमजे मानव॒ते विमंगज्ञान छेकेमके तेवू शरीर तो मात्र मनुष्य अने तियेचनुं (औदारिक)ज छे, देवादिक- नथी. ४. अमुदग्ग
जीव (अतनुमय जीव) एटले देवोनुं वैक्रिय शरीर बाह्य अने भाभ्यंतर पुद्गळोने ग्रहण कर्या विनाज रचायेखें जोवामां आवे छे,
तेथी सर्व कोइ जीवनुं शरीर बाह्य आभ्यंतर पुद्गळोथी रचायेलुं नथी एम जे मानवू ते विभंग छे. ५. रूपी जीव एटले
वैक्रिय शरीरवाळा देवोने जोइ सर्व कोइ जीव रूपी ज छ एम जे मानवं ते विभंग छे. ६. सर्व जीव एटले वायुथी पुद्गळोने
पण हालताचालता जोइ सर्व कोइ पण वस्तु जीव ज छ कोइ पण अजीव ज नहीं एम जे मानधुं ते विभंग चे. १४.
पिंडेसणपाणेसण-उग्गहसत्तिक्कया महज्झयणा । उवसंपन्नो जुत्तो, ररकामि महव्वए पंच ॥१५॥
(पिण्डैषणापानैषणा-ऽवग्रहसप्तकका महाध्ययनानि । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महावतानि पञ्च ॥ १५॥)
(पिंडेसण ) सात पिंडेपणा, तथा (पाणेसण) सात पानपणा, तथा (उग्गह) सात प्रकारना अवग्रह तथा (सत्तिकया)
सात सप्लैकका, तथा ( महज्मयणा ) सात महाध्ययनो-मा सर्वने ( उवगंपमो) पामेलो अने ( जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो
१ अर्थात् उत्तरवैक्रिय, २ भर्यात् भववैक्रिय.
॥३१॥
हु ( रक्खामि महब्बए पंच ) पच महाव्रतोनु रक्षण करु छु भहीं सात पिंडैपणा आ प्रमाणे छ-प्रससह-असमृष्ट एटले हाथ तथा पात्र खरडाय नहीं तेवु अन्न १, संसह-समृष्ट एटले हाथ तथा पात्र खरडाय तेवु अन्न २, उद्धड-उधृत एटले तपेली विगेरेमाथी काढीने भापे ते, तेमा हाथ खरडाय अने पात्र न खरडाय अथवा पात्र खरडाय अने हाथ न खरडाय एवी रीते अन्न आपे ते उद्धृत एपणा कहेवाय छ ३, अप्पलेपिया-अन्पलेप एटले लेपरहित चणा विगेरे लेता चोथी एपणा थाय छे ४, उग्गहिया-अवगृहीत एटले भोजन समये गृहस्थीए वाटका विगेरेमा नाखेलु अन्न ग्रहण करतां पांचमी एपणा कहेवाय छे ५, पग्गहिया-प्रगृहीत एटले भोजन समये पीरसवा माटे अथवा पोताने खावा माटे हाथमा जे अन्न लीधु होय ते ग्रहण करवाथी छट्ठी प्रगृहीत एपणा कहेवाय छे ६, उज्झियधम्मा-उज्झितधर्म एटले नांसी देवायोग्य, ने अनने कोइ मनुष्यादिक लेवाने इच्छतो न होय तेषु अथवा नांखी देता अर्धं वाकी रह्नु होय तेवु अन्न ग्रहण करतां सातमी एपणा थाय छे. ७. पाननी एषणा पण एज प्रमाणे सात प्रकारनी जाणवी. सात प्रकारनो अवग्रह-उपाश्रय आप्रमाणे छे-जहा. चिंतिय-यथाचिंतित एटले मारे अमुक प्रकारनो उपाश्रय ग्रहण करवो, ते सिवाय वीजो लेवो नहीं एम विचारी तेवोज ग्रहण करे ते. १ सपरिग्गह-स्वपरावग्रह एटले हु बीजा साधुनो माटे उपाश्रय मागीश अने वीजाए ग्रहण करेला उपाश्रयमा हु रहीश एम विचारी तेवो ज ग्रहण करे ते.२ सउग्गह-स्वावग्रह एटले हु बीजाने माटे उपाश्रय मागीश, परंतु वीजाए ग्रहण को हशे तो तेमां नहीं रहु एम विचारी ते ज प्रमाणे करे ते. ३. परुग्गह-पराक्ग्रह एटले हु वीजा माटे उपाश्रय नहीं मागु, पण बीजाए ग्रहण कर्यो हशे तेमा ज रहीश एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ४ सइगुवग्गह-स्वकीयावग्रह एटले
गुजराती
भापान्तर
पाधिकसूत्र
संस्कृतानु-
वाद सहित
॥३२॥
हुं मारे माटे ज उपाश्रय मागीश, पण बीजा माटे नहीं मागुं एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ५. सागारिसंथारुग्गह---
सागारिकसंस्तारकावग्रह एटले हुँ जेनो उपाश्रय ग्रहण करीश तेनी ज सादडी विगेरे संथारा माटे लइश, ते नहीं मळे
तो उत्कटुक आसने अथवा बेठो बेठो ज रानि निर्गमन करीश, एम विचारी ते प्रमाणे करे ते. ६. मासंघाडिउग्गह-यथासंघ-
टितावग्रह एटले उपर कडा प्रमाणे जजेनो उपाश्रय तेनोज संथारो लेगो, परंतु ते पाक प्रमाणवाळो होग तोज, एम विचारी
ते प्रमाणे करे ते. ७. तथा सात सप्तकका भाप्रमाणे-स्थान सप्तकात १, नैपेधिकी सप्तकक (नैपेषिकी एटले स्वाध्यायभूमि) २,
उच्चारप्रश्रवणविधि सप्तकक ३, शन्द सप्सैका ४, रूप सप्त तक ५, परिक्रिया रातैका ६ भने भन्योन्यक्रिया सप्तकक
७. आ नामना सात अध्ययनो पाचारांगना वीजा श्रुतस्कंधा नीजी चूलिकारूप ले. ते अध्ययनो सर्व मळीने सात जसे
तो पण तेमना तेवो न नामो होवाथी ते दरेक अध्ययन सप्लैकक कहेवाय छे, तथा सात महाध्ययनो सुगडांग-सूचकतांगना
चीजा श्रुतस्कंधमा छे. ते पहेला श्रुतस्कंधना अध्ययनो करतो मोटो छे, तेथी ते महाध्यगनो कादेवाय रे. तेगनां नाग भा
प्रमाणे छे.-पुंडरीक १, क्रियास्थान २, पाहारपरिक्षा ३, प्रत्याख्यानक्रिया, अनाचारभुत ५, मादककुमारीग ६
अने नालंदीय ७. १५.
भट्ट य मयठाणाई, म य कम्माई तेर्सि बंधं च । परिवजतो गुत्तो, रस्कामि महव्वए पंच ॥१६॥
(भष्टौ च मदस्थानानि, अष्टौ च कर्माणि तेषां पन्नं च । परिवर्जगन् गुप्तो, रचामि महायतानि पत्र ॥१६॥)
(भठ य ) भाठ ( मयठाणाई ) मदनों स्थानोने, (य) भने (भा) माठ (कम्माई ) कोने (1) भने (तेसिं) ते
॥३२॥
आठ कर्मोना (घ) यधने एटले नवा कर्मना ग्रहराने ( परिवजतो) वर्जतो एवो तथा (गुसो) त्रण गुप्तिए गुप्त एवो हु (रक्खामि महब्बए पच ) पच महाव्रतोनु रक्षण करु छु अहीं आठ मदनां स्थानो पा प्रमाणे छे-जाति १, कुळ २, वळ ३, रूप ४, तप ५, श्वर्य ६, श्रुत ७ अने लाम ८. आठ कर्म भा प्रमाणे-ज्ञानावरणीय १, दर्शनावरणीय २, वेदनीय ३, मोहनीय ४, आयुष्य ५, नाम ६, गोत्र ७ अने अतराय ८. १६. अट्ठ य पवयणमाया, दिट्ठा अट्ठविहनिट्ठियटेहिं । उवसंपन्नो जुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ १७॥ (अष्टौ च प्रवचनमातरः, दृष्टा अष्टविधनिष्ठिताथैः । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ १७ ॥) (य) तथा वळी ( अट्ठ) माठ (पवयणमाया ) प्रवचननी माताओ ( अट्ठविहनिट्ठियटेहिं ) आठ प्रकारना ज्ञानाव- रणादिक अर्थो-पदार्थों-कों जेनां क्षय पाम्यां छे एवा तीर्थकरोए (दिवा) जोयेली छे, ते प्रवचननी माताओने (उव- सपनो) पामेलो तथा ( जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हु (रकामि महगए पच) पंच महाव्रतोनु रक्षण करु छु. अहीं आठ प्रवचनमाताश्रो मा प्रमाणे छे-ईर्यासमिति १, भाषासमिति २, एपणासमिति ३, आदानमांडमात्रनिक्षेपणासमिति ४, उच्चारप्रश्रवणखेलसिंघानजल्लपारिष्ठापनिकासमिति ५, मनोगुप्ति ६, वाग्गुप्ति ७ भने कायगुप्ति ८ १७. नव पावनियाणाइ, संसारत्था य नवविहा जीवा । परिवज्जतो गुत्तो, रखामि महव्वए पंच ॥१८॥ (नवं पापनिदानानि, ससारस्थाश्च नवविधा जीवाः । परिवर्जयन् गुप्तो, रक्षामि महाव्रतानि पश्च ॥१८॥)
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु
गुजराती
भाषांतर.
बाद सहित
॥३३॥
(नव ) नव प्रकारना ( पावनियाणाई ) पापना नियाणाभो, (य) अने (संमारत्था) संसारमा रहेला (नवविहा)
नवं अकारना (जीवा ) जीवो, तेमने (परिवसंतो) वर्जतो एवो तथा (गुत्तो ) जय गुप्तिए गुप्त एवो हुँ (रक्खामि महन्वए
पंच ) पंच महाव्रतोनी रक्षा करुं छु. महीं नव नियाणामो भा प्रमाणे छे-कोइ साधु के साधी निया' करे के साक्षात् देव
के देवलोक कोणे दीठा छ ? पा राजाओ ज देव के तेथी जो मारा तप अनुष्ठानचें फळ होय तो आवता मवा हुं राजा
थउं-आई निया' करी ते देवलोकमां जाय अने त्याथी च्यवीने राजा थाय छे; पण तेने ते भवमा समकितनी प्राप्ति शती
नथी. १. ए ज प्रमाणे श्रेष्ठी एटले हुं श्रेष्ठीना कुळमां उत्पन्न थर्ड एवं नियागुं करी देवलोकमा जइ त्यांधी च्यवी श्रेष्ठीना
कुळमां उत्पन्न थाय, तेने पण बोधि दुर्लम छे. २. सी एटले पुरुपने घणो व्यवसाय होय छे. वळी संग्राम विगेरे तेने करवा
पडे छे, तेथी स्त्री थउं तो सारं एबुं नियाकरी देवलोकमांजह त्यांथी च्यनी स्त्रीनो भव पामे, वेने पण बोधि दुर्लभ छे. ३.
पुरुष एटले स्त्री तो सर्वथा पराधीन होय छे भने पुरुप सर्व कार्य करवामां समर्थ छे, तेथी हुँ पुरुष थाउं एवं नियागुं करी
ते प्रमाणे थाय तेने पण बोधि दुर्लभ छ. ४. परप्रविचार एटले आ मूत्र-विटाथी भरेला मनुष्णोना भोगो वीभत्म छे,
परंतु देवतामो वीजा देव के देवीने मोगवे छे अथवा पोताने ज देव देवीरूपे चिकुर्वीने भोगवे छे ते सुंदर चे माटे ते मळे तो
ठीक एम निया| करी ते प्रमाणे पामे, तेने पण बोधि दुर्लम ले. ५. स्वप्रनिनार एटले मनुष्यना मोगो तो अशुभ छे तथा
जे देवो वीजा देव के देवीने भोगवता नथी पण पोते ज पोताने देव देवीरूपे निकुर्वीने मोगवे छे ते सुंदर छे तेथी ते मेळ
एम निया| करी ते प्रमाणे उत्तम देव थाय, ते त्यांची व्यवी मनुष्यमवमा धर्म सांभळे, पण तेमां तेने श्रद्धा थाय नहीं;
॥ ३३ ॥
तेथी ते तापस विगेरे था स्त्रीना कामभोगनी मूर्छावाको रही मरीने किन्विषी देव थाय त्यांची व्यवी वारंवार मुंगो, बहेरो थाय, परतु तेने बोधि दुर्लभ छ. ६ अप्रविचार एटले कोइ साधु अथवा साधी मनुष्य अने देवना मोगथी निर्वेद पानी नियाणु करे के ज्यो मैथुनना भोग नधी त्यां हु उत्पन्न थउ, एवुनियाणु करी ते प्रमाणे ते उत्तम देवलोकमा जाय. त्यांची च्यवी मनुष्य थाय, ते सुलभवोघि थाय, पण विरति न पामे. ७. श्रा उग्रादि कुळना पुनो श्रावकना नतो अगीकार करी साधुओनी भक्ति करे छ, हु पण तेवो थउ, एवु नियाणु करी ते प्रमाणे थाय ते चार प्रकारना श्रावकधर्मने अंगीकार करे पण यविधर्म पामे नहीं ८. जो हु दरिद्र कुळमा उत्पन्न थाउ तो मारो आत्मा सुखे करीने चारित्र पामे, ए, नियाणु करी ते प्रमाणे थाय ते यतिधर्मने अगीकार करे, पण ते भवा सिद्धि पामे नहीं ९ तेथी काइ पण नियाणु न कर ए ज श्रेष्ठ के नव प्रकारना ससारी जीवो आ प्रमाणे छे-पृथ्वीकाय १, अपकाय २, तेजस्काय ३, वायुकाय ४, वनस्पतिकाय ५, दींद्रिय ६, त्रीन्द्रिय ७, चतुरिंद्रिय ८ अने पचेंद्रिय ९. १८. नववभचेरगुत्तो, दुनवविह वंभचेरपरिसुद्धं । उवसपन्नो जुत्तो, रस्कामि महब्वए पंच ॥ १९ ॥ (नवव्रह्मचर्य गुप्तो, द्विनवविधं ब्रह्मचर्यपरिशुद्धम् । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥ १९ ॥) ( नववमचेरगुत्तो) नव ब्रह्मचर्यनी गुप्तिवडे गुप्त एवो भने (दुनवविह ) ये वार नव एटले अढार प्रकारना (चमचेरपरिसुद्ध) शुद्ध ब्रह्मचर्यने ( उवसपनो) पामेलो एवो अने ( जुत्तो) साधुगुणे सहित एवो हु (रक्खामि महन्वए पच ) पच महाव्रतोनु रक्षण करु छु. अहीं नव ब्रह्मचर्यनी गुप्ति मा प्रमाणे-~-वसहि-वसति एटले स्त्री, पशु,
गुजराती
भाषान्तर.
पाधिकसूत्र | पंडकरहित स्थानमा रहेg ते १. कह-कथा एटले स्त्रीनी कथा न करवी अथवा एकली स्त्रीओनी पासे धर्मकथा पण न करवी
संस्कृतानु ते. २. निसिजा-निपद्या एटले स्त्रीनी साथे एक प्रासन पर न बेसवू, तथा स्त्री वेठी होय ते भासन उपर तेना उठ्या पची
बाद सहित पण वे घडी सुधी न बेसबुं ते. ३. इंदिय-इंद्रिय एटले स्त्रीना नेत्रादिक भवयवो जोवा नहीं ते. ४ कुर्खितर-कुड्यंतर
एटले भीतने प्रांतरे रहीने स्त्रीना कामभोगादिकना शब्द सांभळया नहीं ते. ५. पुन्चकीलिय-पूर्वक्रीडित एटले स्त्री
॥३४॥
साथे पूर्वे जे क्रीडा करी होय तेने संभारवी नहीं ते. ६. पणीय-प्रणीतमोजन एटले घृतादिकी नीतरतो अति स्निग्ध
भाहार न करवो ते. ७. अइमायाहार-भतिमात्राहार एटले मात्रा (प्रमाण ) थी अधिक आहार न करवो ते. ८ तथा
विभूसणा-विभूपणा एटले शरीरनी विभूपा ( शोभा ) न करवी ते. ९. 'अढार प्रकारनुं ब्रह्मचर्य आ प्रमाणे-औदारिक
अने वैक्रिय मैथुनने मन, वचन, काया करी करवू, कराचवू अने अनुमोदधुं नहीं ते. १९.
उवघायं च दसविहं, असंवरं तह य संकिलेसं च । परिवजंतो गुत्तो, रखामि महव्वए पंच ॥२०॥
( उपघातं च दशविधम-संवरं तथा च संक्लेशं च । परिवर्जयन् गुप्तो, रचामि महाव्रतानि पन ॥२०॥)
(च) भने ( दसचिई ) दश प्रकारना ( उनघायं ) उपघातने, ( तह य ) तेम ज (असंवरं) दश प्रकारना असंवरने,
( संकिलेसं च ) तथा दश प्रकारना संरलेशने (परिवजंतो) वर्जतो एवो 'पने (गुत्तो) त्रण गुप्तिए गुप्त एनो हूँ ( रक्खामि
महब्बए पंच ) पंच महावतोनुं रक्षण करुं छ. यही दश प्रकारना उपधात मा प्रमागो-पहेलो उद्गम उपघात, ते 'माधा-
कर्मादिक दोपथी उत्पन्न थाय के. १. बीजो उत्पादन उपघात, ते धात्री सादिक दोपोथी उत्पम थाय छे. २. बीजो एपणा
॥ ३४॥
उपयात, ते शकितादिक मेदयी उत्सम थाय छ ३. चौथो परिकर्म उपघात, ते वन-पात्रादिकने समारवाथी उत्पम चाय के ४. पापमो परिहरग्ध उपपात, ते प्रमाणरहित भयवा अकल्प्य एवा उपकरणनो उपभोग करवामी उत्पम थाय छे. बडो शान उपपाव, ते श्रुतझाननी भपेचाए भकाळे स्वाध्यायादिक करवाधी याय के ६. सावमो दर्शन उपघात, बिनपचनमा शमादि करणाधी धाय छे ७. माठमो चारित्र उपघात, ते पाच समितिनो भग विगेरे करवाथी थाय छे.. नयमो मप्रीतिक उपघात, ते भप्रीतिवढे विनयादिकनो उपघात थाय छे ९ तथा दशमो सरक्षण उपघात, ते शरीरा- दिक उपर मूळ करपायी परिग्रहनी विरतिनो उपपात थाय थे. १० दश प्रकारनो असवर पा प्रमाणे-इष्ट विषयमा रागधी भने अनिष्ट विषयमा द्वेषपी प्रवर्तती थोत्र इद्रियनो सवर न करवो ते श्रोत्रंद्रिय प्रसार कहेवाय छे १. तेज प्रमाणे बसु इंद्रिय अमरर २, सायद्रिय भसवर ३, रसनेंद्रिय भसवर ४ भने स्पर्शनेंद्रिय असवर पण जाणवा १, अकुशळ ए मन, वचन अने कायानो सवर न फरयो ते मन मसवर ६, वचन असवर ७ भने काय असंचर ८ जाणवा. उपकरण प्रमपर एटले प्रमाणरहित अथवा अन्य वस्त्रादिक उपकरण प्रहण करवां वे ९ तथा सूचि भसवर-शरीरने उपपात करनारा सूनी-सोय भने कुशना भप्रमाग विगैरेनो प्रसवर एटले तेमने न गोपपवा वे साचिकुशाग्र भसंबर कहेवाय छे १० तथा दश प्रकारको सनेश पटले असमाधि मा प्रमाणे ई-वखादिक उपधिसधी जे सक्लेश उपधिसनेश कोवाय थे. १. उपाश्रयसबधी जे सलेश चे उपायसनेश कहेवाय छे. २ कपायोवडे अथवा कायोरूपी जे सक्नेश वे कायसवेश. ३. मक्तपानसंबंधी जे सधेश ते भक्तपानसक्नेश. ४ मनने विपे अथवा मननो जे सक्नेश ते मनसझेश. ५.
. पाधिकसूत्र संस्कृतानु- गुजराती भाषान्तर वादसहित ॥ ३५॥ तेज प्रमाणे वचनसंक्लेश ६, कायसंकेल ७, मानसंकेश, दर्शनसंक्लेश ९ अने चारित्रसंक्लेश जाणवा. १०-२ सच्चसमाहिट्ठाणे, दस चेव दसाओ समणधम्मं च । उवसंपन्नो जुत्तो, रस्वामि महव्वए पंच ॥२१॥ ( सत्यसमाधिस्थानानि, दश चैव दशाः श्रमणधर्म च । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च ॥२१॥) (दश) दश प्रकारना ( सच ) सत्यने, तथा ( समाहिठाणे ) दश प्रकारना समाधिनां स्थानोने (चेव ) निथे, तथा (दसाओ) दश प्रकारना दशाश्रुतस्कंधोने, तथा ( समणधम्मं च ) दश प्रकारना साधुधर्मने (उपसंपन्नो) पामेलो एवो भने (जुत्तो) साधुगुणे युक्त एवो हूं ( रक्खामि महन्वए पंच ) पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं छं. भही दश प्रकारना सत्य या प्रमाणे छ.-जनपदसत्य-कोइ देशमा पाणीने पय कहे के, कोइ देशमा नीर कहे थे,कोइ देशमा उदक कहे थे इत्यादि सर्व सत्य मानवु ते जनपदसत्य. १. संमतसत्य-कुमुद, कुवलय, कमळ, अरविंद ए विगेरे सर्व जातिना कमळो पंकमां उत्पन्न थाय छे तो पण सर्व बाळगोपाळने भरविंद जातिर्नु कमळ ज पंकज (पंकथी उत्पन्न थयेखें ) नामयी संमत छे ते संमतसत्य. २. स्थापनासत्य-मूर्तिमा भरिहंत विगैरेनी स्थापना कराय छे ते स्थापनासत्य. ३. नामसत्य-कुळनी वृद्धि करतो न होय तो पण कोइर्नु नाम कुळवर्धन होय ते नामसत्ग. ४. रूपसत्य-जेम कोइ पाखंडी माणस साधुनुं लिंग धारण करे तो ते पण साधु कहेवाय ले ते रूपसस्य. ५. प्रतीत्यसत्य-एटले कोइनी अपेचाए सत्य होय ते, जेमके टचली पांगळीनी अपेक्षाए भनामिका मोटीछे, ते मध्यमानी अपेक्षाए नानी छतां मोटी कहेवाय ते प्रतीत्यसत्य. ६. व्यवहारसत्य एटले पर्वत बळतो नथी, तेमा रहेलुं यास बळे छे तो पण पर्वत बळे छे एम कद्देवाय छे ते व्यवहारसत्य. ७.
मावसत्य एटले जेमा श्वेत आदि कोइ पण वर्ण अधिक होय तेने आश्रीने एक वर्णवाल कहे ते. जेमके गलीना शरीरपर पांचे वर्णनो सभव छे तो पण श्वेतवर्ण अधिक होवाथी घोळी वगली कहेवाय छे ते मावसत्य. ८. योगसत्य एटले सधने लइने सत्य जेमके दडना योगथी माणस पण दडी कहेवाय छे, छत्रना सबंधथी माणस पण छत्री (छत्रवाळो) कहेवाय छे ते योगसत्य ९ वथा उपमासत्य एटले उपमाए करीने सत्य, मोटा विशाळ तळावने आ तळाव समुद्र जैतु विशाळ छे एम कहेवाय छे ते उपमासत्य १०. समाधिना दश स्थानो आ प्रमाणे-स्त्री, पशु अने पडक ( नपुसक) ना सबधवाळा शयन, श्राशन, उपाश्रय विगेरे स्थानोने साधु सेवे नहीं. १. मुनि केवळ स्त्रीमोनी पासे धर्मकथादिक न करे, अथवा स्त्रीना रूप विगैरेनी कथा न करे. २ पनि प्रणीत-धृतादिकना टीपा पडता मोजननो आहार न करे. ३. मोजन के पाणीनो अधिक आहार न करे. स्त्रीनी साथे पूर्षे जे काइ क्रीडा विगेरे करेल होय तेने समारेनहीं ५ स्त्रीनी साथे एक प्रासनपर न बेसे, तेना उठ्या पछी पण चे घडी सुधी ते स्थाने न वेसे ६. स्त्रीना मनोहर अवयवोने जुए नहीं ७ शब्दानुपाती एटले पोताना के परना मनोहर शब्द उपर प्रीतिवाळो न थाय, रूपानुपाती एटले पोताना के परना सुदर रूप उपर प्रीतिवाळो न थाय, तथा गधानुपाती एटले पोताना के परनी सुगध उपर प्रीतिवाळो न थाय. ८. श्लोकानुपाती एटले यशकीर्तिमां प्रीतिवानो न थाय ९ मुनि माता-सुखमा प्रीतिवाळो-आसक्त न थाय १०, दश दशाश्रुतस्कध मा प्रमाणे-कर्मविपाक दशा १, उपासक दशा २, मतकृत दशा ३, अनुत्तरोपपातिक दशा ४,
(61
पाक्षिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषान्तर
बाद सहित
प्राचार दशा ५, प्रश्नव्याकरण दशा ६, बंध दशा ७, द्विगृद्धि दशा ८, दीर्घ दशा ९ तथा संक्षेपिक दशा. १०. श्रा
प्रमाणे दशाश्रुतस्कंध छेदसूत्रमा दश अधिकार छे.
दश प्रकारना यतिधर्म या प्रमाणे.-नाति १, मार्दव २, आर्जव ३, मुक्ति-निर्लोभता ४, तप ५, संयम ६, सत्य ७,
शौच ८, अकिंचनता-परिग्रहरहितपणुं ९ अने ब्रह्मचर्य १०. २१.
आसायणं च सव्वं, तिगुणं एकारसं विवज्जतो। उवसंपन्नो गुत्तो, रकामि महव्वए पंच ॥ २२ ॥
(पाशातनां च सर्वां, त्रिगुणमेकादशं विवर्जयन् । उपसंपन्नो युक्तो, रक्षामि महावतानि पश्च ॥ २२ ॥)
(च) अने बळी ( सव्वं ) मर्व-सामान्ये करीने समग्र एवा अथवा ( तिगुण ) नो गुणीए एना (एफारसं ) अग्यार
एटले अग्यारने त्रणे गुणतां तेत्रीश थाय तेटली (पासागणं) भाशातनाओने (निनअंतो) वर्डतो एवो तथा (उवसंपनी)
अनाशातनाने पामेलो एवो तथा (जुत्तो) साधुगुगो सहित एनो हुँ (रक्खामि महगए पंच) पंच महाव्रतोतुं रक्षण करुं हुं.
अही तेत्रीश आशातना भा प्रमाणे छे.-अरिहंतनी पाशातना एटले तीर्थकरो छ ज नहीं, होय तो ते जाणता छता
शामाटे भोग भोगवे छे? अथवा विरति लीधा छतां देवादिके करेला समवसरणने शामाटे भोगवे के ? इत्यादि १. सिद्धनी
माशातना-सिद्धो छ ज नहीं, होय तो पण तेश्रो चेष्टारहित होवाथी शु कामना छ ? इत्यादि. २. आचार्यनी भाशातना-
आभाचार्य नानी वयनो छे, मकुलीन छे, दुर्बुद्धि छे, गरीब छे इत्यादि. ३. एज प्रमाणे उपाध्यायनी आशातना ४. साधुनी
* परिवर्जतो गुत्तो, इति पाठः बहुषु प्रतिपु साधुसाध्त्रीमुखेषु प दृश्यते.
-ad
ruM
॥३६॥
पाशातना-मा साधु सिद्धांतने जाणता नथी,क्रोधी छ, उतावळा चाले छे, गाळा भार के इत्यादि. ५. साम्बीनी भाशावना- आ साध्वी कजीयाली छ, घणी उपधि राखे छे विगैरे ६ भावकनी आशावना-मनुष्य जन्म पामीने तथा जिनधर्म जा. खीने पण मा श्रावको दीक्षा लेता नथी, तो पण ते लोकमा केमधन्य कहेवाय छे? इत्यादि ७ एज प्रमाणे श्राविकानी भा- शावना.८. देवोनी आशातना-देवो निरतर काममोगमा ज आसक्त के, विरविरहित , चेष्टारहित छ, तेश्रो समर्थ छतां पण तीर्थनी उमवि करता नथी इत्यादि ९. देवीनी आशातना पण एज प्रमाणे १०. इहलोक श्राशावना-मनुष्यने भा मनुष्यलोक इहलोक कहेवाय के देनी असत्प्ररूपया करवी वे आशातना छे ११. परलोकनी भाशातना-मनुष्यने नारक, विर्यच भने देव ए परलोक के वेनी असत्प्ररूपणा करवी ते पाशावना छे. १२ केवळीप्रणीत धर्मनी आशावना केवळीए श्रुत अने चारित्र एम चे प्रकारे धर्म रच्यो छे तेनी आशातना, एटले पा श्रुत प्राकत मापामा के, ते कोणे रच्यु छ ? ते कोण जाणे छ ? तथा मां दान देवात नथी एवा चारित्रधर्मधी शुफळ छ ? इत्यादि. १३. सर्ग, मृत्यु अने पाताळरूप पाखा लोकनी भाशातना असत्प्ररूपणा करवायी थाय , जेमके सात द्वीप भने सात समुद्र एटलोज लोक के इत्यादि. १४ सर्व सम्पनी भाशावना तेनी विपरीत प्ररूपणा करवाधी धाय छे. १५ काळनी आशावना-काळ छे ज नहीं, अथवा मा विश्व ज काळनी परिणति छे इत्यादि. १६ श्रुवनी पाशातना तेमां कह्याधी विपरीत प्ररूपणा करवाथी थाय छे १७ श्रुतदेवतानी पाशावना-युवदेवता छ ज नहीं, होय तो पण ते काह तीर्थनी उन्नति करता नथी इत्यादि १८ वाचनाचा- र्यनी भाशावना-प्रा वाचनाचार्य वीजाना सुखदुःखने जाणता ज नी, कारण के ते वारवार वांदणां अपाचे इत्यादि.
पाधिकसूत्र संस्कृतानु- गुजराती भाषांतर. बाद सहित ॥३७॥ १९. हवे बाकीनी चौद माशातनामो सूत्रना विषयवाळी कहे थे--व्याविद्धाक्षर एटले विपरीत अपरो बोलवा ते. २०. व्यत्यानेडित-परस्पर संबंध विना छूटा छूटा अथवा सेळमेळ अचरो बोलवा ते. २१. हीनावर-ओछा अक्षर बोलवा ते. २२. अत्यचर--अधिक प्रचर बोलवा ते. २३. पदहीन-पद भोछु बोलवू ते. २४. विनयहीन-उचित विनय कर्या विना बोलवू ते. २५. घोपहीन-उदात्त, अनुदात्त विगेरे स्वररहित बोलवू ते. २६. योगहीन-जोग वह्या विना मग ते. २७. सुग्छुदत्त-शिष्यनी शक्ति उपरांत तेने वधारे भणावधं ते. २८. दुष्ठुप्रतीच्छित-शिष्य कलुप मनधी मणे ते. २९. भकाळस्वाध्याय-अकाळे मणवं ते. ३०. काळमस्वाध्याय-मणवाने काळे न भगवू ते. ३१. अस्वाभ्यायिकस्वाध्याय- असज्ज्ञायने वखते अथवा भसन्मायने दिवसे मणवं ते. ३२. स्वाध्यायिकमस्वाभ्याय-सन्मायने वसते अथवा सज्मायने दिवसे न भगा ते. ३३. अथवा तो गुरुना विषयवाळी तेत्रीश भाशावनामो थाय छे ते मा प्रमाणे-कारणविना गुरुनी भागळ चालवं. १. गुरुनी पडखे चालवू. २. गुरुनी भति समीपे चालवू. ३. ए जरीते सन्मुख उभा रहे. ४. परसे उमा रहे. ५. भति समीपे उमा रहे. ६. ए ज रीते सन्मुख स. ७. पडखे बेस... मति समीपे बेस. ९.मा नव प्रकारे करे ते पाशा- तना समजवी. बहीरविचारभूमिथी भावीने गुरुनी पहेला चल करे-हाथ-पग धोवे. १०. बहीरविचारभूमियी भावीने गुरुनी पहेला गमनागमननी मालोचना करे. भा ने प्रकारे करे पाशावना लागे. ११. रात्रे अथवा सबारे गुरु बोलावे त्यारे शिम्प जागता बता बोले नहीं तो भाशावना लागे. १२. गुरु कोइनी साये का भालापसंलाप करवाना होय तेनी ar पहेलोज पोते (शिम्प) तेना साथे मालापसंलाप करे तो भाशातना लागे. १३ भशनादिकलाषीने प्रथम मीजा साधु पासे मालोचना की पछी गुरु पासे मालोचना करे तो प्राशावना लागे १४. भशनादिक लायीने प्रथम बीजा साधुने देखाडी पछी गुरुने देखाडे वो माशावना लागे १५. भशनादिक लावी प्रथम वीजा साधुभोने निमत्रण करी पबीगुरुने निमन्त्रण करे तो भाशावना लागे. १६. गुरुने पूछया विना बीजा साधुओने तेमनी इच्छा प्रमाणे प्रशनादिक भापे तो आशावना लागे. १७. गुरुनी साथे प्रशनादिक खातो सतो पोते सारो सारो भाहार ग्रहण करे तो भाशातनालागे १९. दिवसे गुरुए बोलान्या छता जवाब न भापे तो आशातना लागे. १९. गुरु प्रत्ये मोटा शब्दथी कठोर वचन बोले तो आशातना लागे. २० गुरु बोलावे त्यारे पोते जे ठेकाणे वेठो होय त्या चेठा बेठा ज जवान प्रापे तो प्राशावना लागे. २१ गुरु बोलावे त्यारे शु छे ? एम जवाब मापे तो आशावना लागे. २२. गुरुने दुकारे बोलावे तो आशातना लागे. २३. गुरु कहे के-'आ ग्लान साधुनी वैयावध केम करतो नथी ' त्यारे पोते सामो कहे के 'तमे केम करता नथी ? एम बोलवाथी भाशावना लागे. २४. गुरु धर्मकथा कहेता होय ते वखते पोतानु मन सारु न रहे (अनुमोदना न करे) तो भाशातना लागे. २५. गुरु सूत्रादिकनु व्याख्यान करे त्यारे ' वमने सामरतुं नथी, मानो अर्थ तो आवो के.' एम बोलवाथी भाशातना लागे. २६. गुरु कथा कहेता होय, तेने छेदी पोते वचे गोलवा मांडे तो माशातना लागे. २७ गुरु देशना देता होय ते वखते 'भिधादिकनो भवसर थयो छे' एम कही गुरुनी पर्षदानो मग करे तो भाशातना लागे २८. गुरुनी पर्षदा मेठी होय तेज वखते बे-त्रण वार वेनी तेज कथा पोते कया करे वो आशावना लागे. २९. गुरुनी शय्या सस्तारकने पगवटे संघटो करी मिथ्यादुम्कृत मापे नहीं
गुजराती
भाषांतर.
'पाधिकसूत्र
संस्कृतानु
.
SANSAR
बाद सहित
तो माशातना लागे. ३०. गुरुंनी.शय्यामां के संथारामा बेसवादिकथी आशातना लागे. ३१. गुरु करतां पोतानुं भासन
उंचं राखवाथी भाशावना लागे. ३२. गुरुनी समान भासन राखवाथी पण आशातना लागे. ३३. आ आशातनाओ
दशाश्रुतस्कंधमां कही छे. २२.
एवं तिदंडविरो, तिगरणसुद्धो तिसल्लनीसल्लो।तिविहेण पडिकतो, रकामि महव्वए पंच ॥२३॥
(एवं त्रिदंडविरता, त्रिकरणशुद्धः त्रिशल्यनिःशल्यः। त्रिविधेन प्रतिक्रान्तः, रक्षामि महाव्रतानि पञ्च॥२३॥)
(एवं) ए ज प्रमाणे (तिदंडविरो) मन, वचन अने काया ए त्रण दंडी विराम पामेलो, तथा (तिगरणसुद्धो)
मन विगेरे त्रण करणे करीने शुद्ध थयेलो, तथा (तिसल्लनीसल्लों) मायाशल्य, निदानशन्य अने मिथ्यात्वशन्य ए त्रण
शल्यवडे शल्यरहित थयेलो, तथा (तिविहेण) त्रण प्रकारना करणे करीने एटले मन, वचन, कायाए करीने (पडिकंतो)
पडिकमेलो एटले सर्व अतिचारोथी निवृत्ति पामेलो एवो हुँ ( रकामि महब्बए पंच ) पंच महाव्रतोनुं रक्षण करुं छु. २३.
हवे महाव्रतोना उच्चारने समाप्त करता छता कहे छे.-
इच्चेयं महव्वयउच्चारणं थिरत्तं सल्लुद्धरणं धिइवलयं ववसाओ साहणट्ठो पावनिवारणं निका-
यणा भावविसोही पडागाहरणं निज्जुहणाऽऽराहणा गुणाणं. संवरजोगो पसस्थज्झाणोवउत्तया
जुत्तया य नाणे परमट्ठो उत्तमट्ठो, एस खलु तित्थंकरोहिं रइरागदोसमहणोहिं देसिओ पवयणस्स
॥३८॥
॥३८॥
सारो, छज्जीवनिकायसंजमं उवएसिभ तेल्लोक्कसक्कयं ठाणं अब्भुवगया ॥ ( इत्येतत् महाव्रतोचारणं स्थिरत्व शत्योद्धरण धृतियलक (द) व्यवसाया साधनार्थः पापनिवारण निकाचना भावविशोधिः पताकाहरण निर्यहणा भाराधना गुणानां संवरयोगा प्रशस्तध्यानोपयुक्तता युक्तता च ज्ञानेन परमार्थ. उत्तमा:, एतत् खलु तीर्थङ्करैः रतिरागद्वेषमथनः देशिता प्रवचनस्य सारः (ते च ) षड्जीवनिकायसयम उपदिश्य त्रैलोक्यसत्कृत स्थानम् अभ्युपगताः।) (इय) ए रीते आ ( महव्वयउच्चारण ) पच महाव्रतोनु उच्चारण करेलु थे, तेनाथी शो गुण थाय ? अथवा ते उच्चारण के छ ? ते उपर कहे छ के-( थिरच ) महावतोने विषे ज अथवा धर्मने विषे स्थिरपणुं थाय के, तथा (सन्लु- दूरण) शन्यनो उद्धार-नाश करनार छ, तथा (धिइबलय ) धृति एटले चित्तनी समाधि, तेनुं बळ भापनार छ, तमा (यवसायो ) दुष्कर कार्य करवानो अध्यवसाय करनार छ, तथा (साहणट्ठी ) साधकतम पदार्थ एटले मोघ अर्थने साधवानो उपाय छ, तथा ( पावनिवारण) पापनु निवारण करनार छ, तथा (निकायणा) निकाचना जेवी निकाचना एटले व्रतोनो स्वीकार करवामा भत्यत दृढ निवधन छ, तथा ( भावविसोही) मावने एटले श्रात्माना परिणामने अत्यंत शुद्ध करनार छे, वथा (पडागाहरण ) चारित्रनी भाराधनारूप पताकाने ग्रहण करनार छ, तथा (निज्जुहणा) आत्मारूपी नगरमाथी कर्मरूपी शत्रुने काढी मूकनार के, तथा (भाराहणा गुणाणं ) मुक्तिना साधनरूप गुणोनी भाराधना करनार के, तथा (सवरजोगो) नवा कर्मना आगमननो निरोध करनार जे संवर तेनो योग एटले व्यापार करनार थे, तेथी (पसत्थ-
पाधिकरत्र
संस्कृवानु-
गुजराती
भाषांतर
बाद सहित
॥३९॥
झाणोवउत्तया) प्रशस्त एवा धर्मध्यान भने शुक्रध्याननो उपयोग करनार-जोडनार के, तथा (जुत्तया य नाणे) ज्ञानवडे
करीने युक्तता एटले सहित करनार छ अर्थात् ज्ञानवडे सद्बोधने उत्पम करनार छ, तथा (परमट्ठो) परमार्थरूप छे एटले
अकृत्रिम पदार्थरूप छ, तथा (उत्तमट्ठो) उत्तम पदार्थरूप छे, कारण के मोच साधवामां आमहावतो सर्वोत्तम छे. वळी (एस)
मा महावतोनो उच्चार (खलु) निश्चे (रइरागदोसमहणेहि) रति एटले चारित्रमोहनीयकर्मना उदयथी उत्पम थतो भानंद,
राग एटले ममता भने द्वेष एटले महंकार तेमने मथन करनारा एवा (तित्थंकरहिं) तीर्थकरोए (पवयणस्स सारो) प्रव-
बनना साररूप करो छ, तथा ते तीर्थकरो (छजीवनिकायसंजर्म) पृथिव्यादिक छ जीवनिकायना रक्षणरूप संयमनो तथा
उपलक्षणथी मृपावादादिकना परिहाररूप संयमनो मध्य प्राणीमोने ( उवएसियं) उपदेश मापीने तथा उपलक्षणथी
पोते पण ते प्रकारे संयम पाळीने (तेबोकसकयं ) प्रण लोकना जीवोए सत्कार करेला एटले पूजेला ( ठाणं) स्थानने
अर्थात् मोवस्थानने (मन्वगया) पामेला छे. भाम कहेवाथी पण महाव्रतो भत्यंत ग्रहण करवा लायक छ एम सूचवे छे.
हवे मा महायतोना कीर्तननी समाप्तिमा मंगळने माटे भासमोपकारी होवायी विशेष करीने श्री महावीरस्वामीनी स्तुति करे छे.-:
नमो त्थु ते सिद्ध बुद्ध मुत्त नीरय निस्संग माणमूरण गुणरयणसागरमणंतमप्पमेय, नमो
त्यु ते महइ महावीर वदमाण सामिस्स, नमो त्यु ते भरहमो, नमो रथु ते भगवभो ति कटु ।।
( नमोऽस्तु ते सिद्ध बुद्ध मुक्त नीरज निःसङ्ग मानमूरण गुणरत्नसागर अनन्त अप्रमेय, नमोऽस्तु ते
॥ १९॥
महति (कृतमते) महावीर वर्षमानस्वामी (इति कृत्वा), नमोऽस्तु तेहन (इति कृत्वा) नमोऽस्तु ते भगवान् इति कृत्वा ।) ( नमो त्यु ते) वमने नमस्कार हो. दमे कवा छो ? ते उपर भगवानना संगोषनवाळा विशेषणो भापे के-(सिद्ध) हे सिद्ध ! (बुद्ध) हे युद्ध। एटले केवळज्ञानपरे समान वस्तुतस्वने जाणनार ! (मुच) हे पूर्वे बांधला सर्व कर्मोथी मुक्त! (नीरय ) हे नवा धाता कर्मरहित ! मपया हे उत्सुकतारहित ! ( निस्सग ) हे पुत्र, स्त्री, पन विगेरे सर्व संगरहित ! ( मायमरण ) हे सर्व माननो-गर्वनो नाश करनार ! (गुणस्यणसागर) हे गुणरूपी रत्नना सागर ! (अणत) हे अनंतमानस्वरूप ! (मप्पमेय) हे अप्रमेय एटले छद्मस्थना शानी न जाणी शकाय तेवा! कारण के शरीररहित एकता जीवनु स्वरूप बमस्थो जाणी शकता नथी. तथा (नमो त्यु ते ) तमने नमस्कार हो. वमे केवा छो? तेना समो- धन प्रापे छे-(महा) महानने विपे एटले मोचने विषे करी छ मति जेणे एवा (महावीर) हे महावीर ! एटले रागादिक शत्रु उपर पराक्रम करनार एटले तेनो विजय करनार अथवा विशेष करीने मोचप्रत्ये जनार अथवा भन्यप्राणीमोने मोचमा मोकलनार, अथवा कर्मनी नाश करनार! या सर्व अर्थ महावीर शन्दना थाय छे. कयु छ के-"कर्मनु विदारण करे थे, तपवडे विराजे छ-शोमे छ भने तपना वीर्यवडे युक्त छ, तेथी ते वीर कहेवाय छे." तथा (बद्धमाण) हे वर्धमान ! एटले माता-पिताए पोताना कुळ भने समृद्धिनी वृद्धिना हेतुरूप होपाथी जेनु वर्धमान नाम कर्यु छ एवा! शा माटे तमने नमस्कार होते को छ के-(सामिस्स ) तमे स्वामी-प्रस छो ए हेतु माटे, वथा (नमो त्थु ते भरहभो) अशोकादिक पाठ महाप्राविहार्य-
गुजरावी
भाषांतर
पाधिकपत्र
संस्कृतानु-
बाद सहित
-
॥ ४०॥
F
रूप पूजाने लायक होवाथी तमे अर्हन् छो ए हेतु माटे तमने नमस्कार हो, तथा (नमो त्थु ते भगवभो ति कट्ट) तमे
भगवान छो 'ति कट्ट' एटले एम करीने-ए हेतु माटे अथवा 'तिकट्ट' एटले त्रण वार तमने नमस्कार हो. अहीं समग्र ऐश्वर्य,
रूप, यश, लक्ष्मी, धर्म अने प्रयत्न ए छ भग शब्दना अर्थ थाय छे, ते भग जेने छे ते भगवान कहेवाय छे.
जेम महाव्रतोनो उच्चार कर्मनो क्षय करनार छ तेम श्रुतनुं कीर्तन पण कर्मनो क्षय करनार छे, माटे महाव्रतोतुं
कीर्तन समाप्त करवापूर्वक श्रुतनुं कीर्तन करवा माटे कहे छ:-
एसा खलु महव्वयउच्चारणा कया, इच्छामो सुत्तकित्तणं काउं॥
(एषा खलु महाव्रतोचारणा कृता, इच्छामः श्रुतकीर्तनां कर्तुम् ॥)
(एसा) आ (खलु ) निश्चे (महव्वयउच्चारणा ) महाव्रतोतुं उच्चारण (कया) कर्यु. हवे ( सुत्तकित्तणं) श्रुतनुं
कीर्तन ( काउं) करवा माटे ( इच्छामो ) अमे इच्छीए छीए.
अहीं श्रुत संक्षेपे करीने वे प्रकारचें कह्यु छे-अंगप्रविष्ट अने अंगबाह्य. तेमां चे पग, बे जंघा, बे ऊरु, एक पृष्ठ, एक
उदर, बे बाहु, एक ग्रीवा अने एक मस्तक-श्रा प्रमाणे श्रुतरूपी पुरुषना बार अंगमा रहेलुं जे श्रुत ते अंगप्रविष्टश्रुत
कहेवाय छे, ते आ प्रमाणे-आचारांग भने सूत्रकृतांग (सुगडांग) ए प्रवचनरूपी पुरुषना बे पगरूप छ, स्थानांग अने
समवायांग एबे जंघारूप छे विगेरे. अथवा गणधरोए जे श्रुत रच्यु अंगप्रविष्ट भने जे श्रुत स्थविरोए रच्युं ते भंग-
बाय कहेवाय छे. तेमा अंगप्रविष्ट जे श्रुत ते नियत छे एटले अवश्य छे भने जे अंगनाह्य श्रुत छे ते भनियत छे. हवे ते
॥४०॥
भगवास भुत पण वे प्रकारनु छ- आवश्यक भने मावस्यकथी नीजु तेमा आवश्यक ध्रुवमा मन्प कहेका बेनु छे तेथी प्रथम तेने कहेवा माटे तेना उपदेशकने नमस्कार करवापूर्वक सूत्र कहे छे.- नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइयं छविहमावस्सयं भगवंतं ॥ (नमा तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्य , यः इदं वाचितं षड्विधमावश्यकं भगवत्) (सिं) ते (समासमणाण) क्षमादिक गुणवाळा महातपस्वी गुरुमहाराज अथवा तीर्थकर गणघरादिकने (नमो) नमस्कार थाओ, के (जेहिं ) जे धमाश्रमणोए (भगवत ) अतिशयादिक गुणपाल (इम) श्रा (छविहं ) छ प्रकारनु (श्रावस्सयं) आवश्यक (पाइय) अमारी पासे यांच्यु अमने सभळाव्यु-अमने प्राप्यु अथवा नार्थपणे रच्यु के. ते भाषश्यकना छ प्रकार बताये छ- तं जहा-सामाइय चउवीसत्थो वंदणयं पडिकमण काउस्सग्गो पञ्चरकाणं, सव्वेहिं पि एयम्मि छबिहे आवस्सए भगवंते ससुत्ते सअत्थे सगथे सनिज्जुत्तिए ससंगहणिए जे गुणा वा भावा वा अरहतेहिं भगवतेहिं पत्नत्ता वा परुविया वा, ते भावे सद्दहामो पत्तियामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो ॥ (तद्यथा-सामायिक चतुर्विशतिस्तवः वन्दनकं प्रतिक्रमणं कायोत्सर्गः प्रत्याख्यान, सर्वस्मिन्नपि
पाधिकपत्र
संस्कृतानु-
गुजरावी
भाषांतर
बाद सहित
एतस्मिन् षड्विधे भावश्यके भगवति ससूत्रे सार्थे सग्रन्थे सनियुक्तिके ससंग्रहणिके ये गुणा वा भावा
वा अहंद्भिः भगवद्भिः प्रज्ञप्ता वा प्ररूपिता वा, तान् भावान् श्रद्दध्महे प्रतिपद्यामहे रोचयामः स्पृशामः
पालयामः अनुपालयामः ॥)
(तं जहा ) ते छ प्रकार आ प्रमाणे छे-(सामाइयं ) सामायिक १, ( चउवीसत्थो) चतुर्विशतिस्तव २, (वंदणयं)
वंदनक ३, (पडिकमणं ) प्रतिक्रमण ४, (काउस्सग्गो) कायोत्सर्ग ५ तथा (पञ्चरकाणं ) प्रत्याख्यान ६. ( सन्वेहिं पि)
सर्व एवा पण (एयम्मि) आ (छविह) छ प्रकारना (भावस्सए) आवश्यकने विषे, केवा भावश्यकने विषे?
(भगवंते) समग्र ऐश्वर्यचाळा, (ससुत्ते) सूत्रसहित, (सअत्थे) अर्थसहित, (सगंथे) सूत्र भने अर्थ ए बनेसहित,
(सनिज्जुत्तिए) नियुक्तिसहित, (ससंगहणिए) संग्रहणीसहित एवा ा छ प्रकारना आवश्यकने विषे (जे) जे कोइ
(गुणा वा) गुणो एटले विरति तथा जिनेश्वरना गुणोनु कीर्तन ए आदि धर्मो, भथवा ( मावा वा) चायोपशमादिक
भावो अथवा जीवादिक भावो-पदार्थों ( भरहंतेहिं ) देवादिकनी करेली पूजाने योग्य एवा, तथा ( भगवतेहिं ) समग्र ऐश-
यादिवाळा जिनेश्वरोए (पन्नत्ता वा) सामान्य रीते कह्या छ अथवा (परूविया वा) विशेषे करीने कह्या छे, (ते भावे)
ते भावोने (सदहामो) 'पा एम ज छे' ए रीते सामान्यपणे भमे श्रद्धा करीए बीए, (पत्तियामो) प्रीतिथी अंगीकार
करीए बीए, (रोएमो) भत्यंत अभिलाषाथी रुचिवाळा करीए बीए-रुचावीए छीए, (फासेमो) सेववावडे स्पर्श करीए
बीए, (पालेमो) वारंवार पाळीए बीए, तथा (भणुपालेमो) जावजीच पाळीए छीए.
-
॥४१॥
ते भावे सइहंतेहिं पत्तियतेहिं रोयतेहिं फासतेहिं पालतेहिं अणुपालतेहिं अंतोपरकस्स जं वाइय पढिय परियहियं पुच्छिय भणपहियं अणुपालियं तं दुस्करकयाए कम्मकयाए मोख्याए घोहिलाभाए ससारुत्तारणाए ति कटु उवसंपज्जित्ता णं विहरामि ॥ (तान् भावान् श्रद्दधानः प्रतिपद्यमानैः रोचयनिः स्पृशशिः पालयद्भिः अनुपालयद्भिः अन्तःपक्षस्य यत् वाचित पठित परिवर्तितं पृष्टम् अनुप्रेचितम् अनुपालित तत् दुःखक्ष्याय कर्मचयाय मोक्षाय योधि- लाभाय संसारोत्तारणाय इति कृत्वा उपसपद्य विहरामः ॥) (ते मावे ) ते मावोने ( सहहतेहि ) 'मा भाम ज छ' एवी रीते सामान्यपणे श्रद्धा करता, (पत्तियतेहि)प्रीतिथी भगी- कार फरता, (रोयतेहिं ) अत्यत ममिलापाए करीने सेवन करवामां सन्मुख थइने रुचावता, (फासतेहिं ) सेववावडे म्पर्श करता, ( पालनेहि) वारंवार पालन करता तेथी ( अगुपालतेहिं ) जावजीव पालन करता एवा अमोए (भंतोपरकस्स) पखवाडीया मध्ये (ज)जे काय (वाइय) वांच्यु होय एटले बीजाने प्राप्यु होय, मणाव्यु होय, (पढिय) पोते भण्युं होय, (परियट्टिय) परावर्तन कर्यु होय एटले सूत्रथी गण्युं होय, (पुच्छिय) पछ्यु होय एटले प्रथम मणेला सूत्रादिकमा शका थये छते प्रश्न कयों होय, (अणुपेहिय) भर्थ भूली जवाना भयथी विचार्य होय-मनन कर्यु होप, तेथी (भणुपालिय) भा सर्व प्रकारवडे पाब्यु होय एटले शुद्ध अनुष्ठान कर्यु होय (ते) ते सर्व (दुरकरकपाए) शरीर भने मनसंबंधी दुःखना
पाक्षिकसून
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर
वाद सहित
॥४२॥
चयने माटे, (कम्मरकयाए) ज्ञानावरणीयादिक कर्मना विनाशने माटे, (मोरकयाए) मोक्षने माटे, (बोहिलाभाए) बोधिना
लाभने माटे एटले परभवमा सद्धर्मनी प्राप्ति माटे, ( संसारुत्तारणाए ) संसारनो पार पामवा माटे अमारे थशे (ति कट्ट)
एम करीने एटले ए हेतुथी (उपसंपज्जित्ता णं) ते सर्व अंगीकार करीने (विहरामि) अमे विचरीए छीए एटले मासकल्पा-
दिक साधुना विहारवडे वर्तीए बीए. तथा-
अंतोपरकस्स जं न वाइयं न पढियं न परियट्टियं न पुच्छियं नाणुपेहियं नाणुपालियं संते बले ||
संते वीरिए संते पुरिसकारपरकमे, तस्स आलोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्देमो वि-
सोहेमो अकरणयाए अब्भुटेमो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवज्जामो, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥
( अन्तःपक्षस्य यत् न वाचितं न पठितं न परिवर्तितं न पृष्टं नानुप्रेक्षितं नानुपालितं सति बले
सति वीर्ये सति पुरुषकारपराक्रमे, तत् अालोचयामा प्रतिक्रमामः निन्दामः गहामः व्यतिवर्तयामा
(वित्रोट्यामः विकुट्यामः चा) विशोधयामः अकरणतयाऽभ्युत्तिष्ठामः यथार्ह तपाकर्म प्रायश्चित्तं
प्रतिपद्यामहे, तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥)
(अंतोपक्खस्स ) पखवाडीयानी मध्ये अमे (ज) जे (न वाइयं ) न वांच्युं होय एटले बीजाने आप्युं न होय, (न
पढियं ) पोते भण्यु न होय, (न परियट्टियं ) परावर्तन कयुं न होय एटले गण्युं न होय, (न पुच्छियं ) शंका थये छते
॥४२॥
पूज्यु न होय, (नाणुपहिय) विचार्य न होय एटले भूली जवाना मयथी चितवन कर्यु न होय तथा (नाणुपालिय) पाब्यु न होय-अनुष्ठान कयुं न होय. शु छता पा सर्व न कयुं होय ? (सते बले) शरीरसंबधी बळ छता, (सते चीरिए) आत्मानु वीर्य बता तथा (सते पुरिसकारपरकमे ) पुरुषपणाना अभिमानरूप पराक्रम छतां पण भमे जे वांच्यु विगैरे न होय (वस्स) ते सर्वने अमे (आलोएमो) आलोचीए बीए एटले गुरुने निवेदन करीए बीए, (पडिकमामो) प्रतिक्रमण फरीए छीए-पाछा फरीए छोए, (निंदामो) आत्मसाक्षीए निंदीए छीए, (गरिहामो) गुरुनी समक्ष गर्दा करीए छीए; (विउट्टेमो) वाचनादिकना अनुवघनो विच्छेद-नाश करीए छीए, (विसोहेमो) शोधीए छीए एटले दोपरूपी पकथी मलिन थयेला आत्माने निर्मळ करीए बीए, (अकरणयाए) फरीथी तेम नहीं करवावडे करीने (अन्भुढेमो)उद्यमवत थहए बीए, तथा (अहारिह) अपराधने उचित एवा (वोकम्म) नीवि, विगय आदिक तप करवारूप (पायच्छित्त) प्रायश्चित्तने (पडिबजामो) अमे अंगीकार करीए बीए, तथा (तस्स ) ते अवाचन, अपठन विगेरे दोपना (दुक्कड) दुष्कतने-पापने (मिच्छामि ) अमे मिथ्या करीए छीए-मिथ्यादुष्कृत आपीए छीए श्रा प्रमाणे आवश्यकथुत का हवे आवश्यक सिवाय वीजा श्रुतसरधी कहेवानो अवसर छे. ते श्रुत पण वे प्रकारनु छ-कालिक भने उत्कालिक. तेमा जे श्रुत असज्झाय न होय तो दिवस भने रात्रिनी पहेली अने छल्ली ए वे पोरसीमा ज भणाय ते श्रुत काळे-काळवेळाए नीपजेलु होवाथी कालिफ कहेवाय छ, तथा जे श्रुत काळमेळा थने पांच प्रकारना असज्झाय सिवाय सर्व वखते भणाय छे ते उत्कालिक कहेवाय छे. तेमा प्रथम उत्कालिक श्रुत कहे छे.-
गुजराती
भाषांतर
पाषिकसूत्र
संस्कृतानु-
बाद सहित
॥४३॥
नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइयं अंगबाहिरं उक्कालियं भगवंतं तं जहा-दसवेआलियं
कप्पिाकप्पिअंचुल्लकप्पसुझं महाकप्पसुअंओवाइअंरायप्पसेणिअंजीवाभिगमो पावणा महापरण-
वणा नंदी अणुओगदाराइं दोवंदत्थो तंदुलवेआलिअं चंदाविज्झयं पमायप्पमायं पोरिसिमंडलं मंड-
लप्पवेसो गणिविज्जा विज्जाचरणविणिच्छओ झाणविभत्ती मरणविभत्ती आयविसोही (चरणविसोही
मरणविसोही) सलेहणासुझं वीरायसुअं विहारकप्पो चरणविही आउरपञ्चकाणं महापच्चखाणं ॥
(नमस्तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः, यः इदं वाचितम् अङ्गवाह्यम् उत्कालिकं भगवत् । तद्यथा-दशवैका-
लिकं कल्प्याकल्प्यं तुल्लकल्पश्रुतं महाकल्पश्रुतम् श्रीपपातिकं राजप्रश्नीयं जीवाभिगमः प्रज्ञापना महा-
प्रज्ञापना नन्दी अनुयोगद्वाराणि देवेन्द्रस्तवः तंड(दु)लवैचारिकं चन्द्राध्यकं प्रमादाप्रमादं पौरुपीमण्डलं
मण्डलप्रवेश: गणिविद्या विद्याचरणविनिश्चयः ध्यान विभक्तिः मरणविभक्तिः आत्मविशुद्धि:-शोधिः
(चरणविशोधिः मरणविशोधिः) संलेखनाश्रुतं वीतरागश्रुतं विहारकल्पः चरणविधिः आतुरप्रत्याख्यानं
महाप्रत्याख्यानम् ॥)
१ एतदध्ययनद्वयपाठः क्वचित् दृश्यते ।
॥४३॥
(नमो देहि समासमहासं) ते चमाश्रमगोने एटले स्त्रार्थने मापनारा गुरुभोने नमस्कार थाम्मे, के (जे) जे- भाए (इम) मा (अंगमाहिर) भगवास (उकालिम) उत्कालिक एवं भने ( भगवत) मोटा मर्परूप समृदिवाल थुत (पाप) ममोने भाप्यु 2. ( त जहा) ते उत्कालिक श्रुत आ प्रमाणे थे.-(दसवेमालिभ) दशकालिक १, (कप्पि- भा:प्पिम) साप्पाप्य २, (चुनकप्पसुभ) हुन (नानु) कन्पश्रुत ३, (महाकप्पसुम) महाकन्पश्रुत ४, (पोवाइम) भोपपातिक ५, (रायप्पसेणि) रापपसेपी-राजप्रश्नीय ६, (जीवामिगमो) जीवामिगम ७, (पण्णवणा)प्रजापना ८- (महापापावया) महाप्रथापना ९, (नदी) नदी १०,(मणुभोगदाराइ) मनुयोगद्वार ११, (देविंदत्यमो) देवेंद्रस्तव १२, (दुलनेमालिभ) तलवैचारिक १३, (चदाविलय) चद्रावैध्यक १४, (पमायप्पमाय) प्रमादाप्रमाद १५, (पोरिमि. मरल) पौरुषीमढळ १६, (मटलप्पवेसो) मंडळप्रवेश १७, (गणिविज्ञा) गणिपिया १८, (विआचरणविणिच्छयो)विद्या परमविनियप, १९ (झाणपिमची) ध्यानविमति २०, (मरणविमती) मरणविमति २१, (मायविसोही) यात्मवि- यदि २२, (सलेहयासुम) सलेखनाचत २३, (बीमरायमुभ) वीतरागश्रुव २४, (विहारकप्पो) विहारकम्प २५, (परवविदि) परयविधि २६, (आउरपचक्खाण) मातुरप्रत्याख्यान २७ तथा (महापचक्याण) महाप्रत्याख्यान २८- मा प्रमाये मा २८ मध्ययनो का, ते उपलक्षण होवाची माटला ज के एम नी पीजों पण छे एम जाणवु. सव्वेहिं पि एयम्मि अंगवाहिरे उक्कालिए भगवते ससुत्ते समस्थेसगंथे सनिज्जुत्तिए ससंगह-
पाषिकसूत्र
संस्कृतानु-
गुजरावी
भाषांवर
बाद सहित
॥४४॥
णिए जे गुणा वा भावा वा अरहंतेहिं भगवतेहिं पण्णत्ता वा परूविमा वा ते भावे सदहामो पत्ति-
श्रामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो। ते भावे सद्दहतेहिं पत्तिअंतेहिं रोअंतेहिं फासंतेहिं
पालतेहिं अणुपालंतेहिं अंतोपक्खस्स जं वाइअं पढिरं परियट्टि पुच्छिअं अणुपेहि अणुपालिअं
तं दुकरकयाए कम्मरकयाए मोख्याए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए त्ति कटु उवसंपजित्ता णं विह-
रामि । अंतोपरकस्स जं न वाइन पढिन परियट्टिन पुच्छि नाणुपहिरं नाणुपालिअं संते
बले संते वीरिए संते पुरिसकारपरकमे, तस्स आलोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्देमो
विसोहेमो अकरणयाए अब्भुढेमोअहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवज्जामो तस्त मिच्छामि दुक्कडं।
(एतत्सूत्रस्य संस्कारः पूर्ववत् ज्ञेयः)
श्रा सूत्रनो अर्थ प्रथम आवी गयो छे ते प्रमाणे जाणवो.
आ प्रमाणे उत्कालिकश्रुत कयुं. हवे कालिकश्रुत कहे छे.
नमो तेसिं खमासमणाणं, जेहिं इमं वाइअं अंगवाहिरं कालिमं भगवंतं । तं जहा-उत्तरज्झ-
यणाई दसाओ कप्पो ववहारो इसिमासिआई निसीहं महानिसीहं जंबुद्दीवपन्नत्ती सूरपन्नत्ती चंद-
॥४४॥
पन्नती दीवसागरपन्नत्ती खुड्डियाविमाणपविभत्ती महल्लियाविमाणपविभत्ती अंगचूलियाए वग्ग- चूलिआए विवाहचूलिमाए अरुणोववाए वरुणोववाए गरुलोववाए धरणोववाए वेसमणाववाए वेलधरोववाए देविंदोववाए उट्ठाणसुए समुट्ठाणसुए नागपरिआवलिआण निरयावलिमाणं कप्पि- माण कप्पवडिंसयाणं पुप्फिमाण पुष्फचूलिआण (वैपिहआण) वण्हिदसाणं आसीविसभावणाणं दिट्ठीविसभावणाणं चारण (सुमिण)भावणाणं महासुमिणभावणाणं तेअग(ग्गि)निसग्गाणं ॥ (नमस्तेभ्य क्षमाश्रमणेभ्यः, यैः इदंवाचितम् अङ्गवाह्य कालिकं भगवत्। तद्यथा-उत्तराध्ययनानि दशा कल्प'व्यवहारः ऋपिभाषितानि निशीथं महानिशीथं जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिः सूरमज्ञप्तिः चन्द्रप्रज्ञप्तिः द्वीपसागर- प्रज्ञप्तिः क्षुल्लकाविमानप्रविभक्तिः महतीविमानप्रविभक्तिः अङ्गलिका वर्गचूलिका विवाहचूलिका अरुणोप- पात:वरुणोपपातःगरुडोपपात धरणोपपात वैश्रमणोपपातःवेलन्धरोपपाता देवेन्द्रोपपातः उत्थानश्रुतस- मुत्थानश्रुत नागपरिज्ञावलिकाः निरयावलिकाः कल्पिका:कल्पावतसिकाः पुष्पिताः पुष्पलिका(वृष्णिका) वृष्णिदशा:आशीविषभावनाः दृष्टिविषभावनाः चारण (स्वम) भावनाः महास्वमभावना तैजसनिसर्गाः।।) (वेसि) ते (खमासमणाण) समाश्रमणोने (नमो) नमस्कार थाभो, के (जेहिं) जेओए (इम) श्रा (भगवाहिरं) १ आ पद मोटी टीकामा तथा प्रवचूरिमा नथी, मूळमा तेमज अर्थमा पण नथी, वेमज छत्रीशनी गणत्रीमां पण नथी गुजराती भाषांवर. पाधिकसूत्र संस्कृतानु- भंगवास (भगवंत) अतिशयादिक गुणवालं (कालिमं) कालिकश्रुत (वाइअं) अमने भाप्यं छे. (तं जहा) ते आ प्रमा- उत्तरल्झयणाई) उत्तराध्ययन १, (दसाओ) दशाश्रुतस्कंध २, (कप्पो) पृहत्कल्प ३, (ववहारो) व्यवहार ४, (इसिभासिमाई) ऋषिभापित, ५ (निसीई) निशीथ ६, (महानिसीह) महानिशीथ ७, (जंबुद्दीवपन्नची) जंबूद्वीपप्रज्ञप्ति ८, (सूरपन्नत्ती) सरप्रज्ञप्ति ९, (चंदपन्नत्ती) चंद्रप्रज्ञप्ति १०, (दीवसागरपन्नत्ती) द्वीपसागरप्रज्ञप्ति ११, (खुडिमाविमाणपवि- मत्ती) क्षुद्रकाविमानप्रविमक्ति १२, ( महनियाविमाणपविमती) महतीविमानप्रविभक्ति १३, (अंगचूलिआए) अंगचूलि- का १४, (वग्गचूलिआए) वर्गचूलिका १५, (विवाहचूलिभाए) विवाहचूलिका १६, (अरुणोववाए) अरुणोपपात १७, (वरुणो- ववाए) वरुणोपपात १८, (गरुलोववाए) गरुडोपपात १९, (घरणोववाए) धरणोपपात २०, (वेसमणोववाए) वैश्रमणोपपात २१, (वेलंधरोववाए) वेलंधरोपपात २२, (देविंदोववाए) देवेंद्रोपपात २३, (उद्याणसुए) उत्थानश्रुत २४, (समुट्ठाणसुए) समु- त्थानश्रुत २५, (नागपरिपावलिमाणं) नागपरिज्ञावलिका २६, (निरयावलिआण) निरयावलिको (कप्पिमाण) कपिका २७, (कप्पवासियाण) कन्पावतंसक २८, (पुष्फिमाणं) पुष्पिता २९, (पुप्फचूलियाणं) पुपचूलिका ३०, (वहिदसाणं) वृष्णिदशा ३१, (आसीविसमावणाणं) आशीविषभावना ३२, (दिट्ठीविसमावणाणं) दृष्टिविषमावना ३३, (चारणमा- पणाणं) चारणभावना ३४, (महासुमिणमावणाणं) महास्वप्नमावना ३५, तथा (तेअगनिसगाणं) तैजसनिसर्ग ३६-मा अनीश अध्ययनो पण उपलषय जागावा; कारण के श्री अपमदेवस्वामीना वखतमा चोराशी हजार प्रकीर्यको हता, १. हवे पछीना पांच नाम मा निरयावलिकाना विभागरूप ज के. वाद सहित ॥४५॥ an मम्पम बावीश वीर्थकरोना वखतमा संख्यावा हजार प्रकीर्यको हता, एटले के बेना जेटला शिम्यो वेटला प्रकीर्णको होय छे, तथा श्रीवर्धमानस्वामीना वखतमा चौद हजार प्रकीर्णको (प्रकीर्णसूत्रो)हता. सव्वेहिं पि एयम्मि अंगबाहिरे कालिए भगवंते ससुत्ते सअत्थे सगये सनिज्जुत्तिए ससंगह- थिए जे गुणा वा भावा वा अरहतेहिं भगवंतेहिं पन्नत्ता वा परूविमा वा ते भावे सद्दहामो पत्ति- आमो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो । ते भावे सद्दहंतेहिं पचिप्रतेहिं रोयंतेहिं फासंतेहि पालतेहि अणुयालतेहिं अतोपरकस्स जंवाइय पढिपरियट्टिन पुच्छियं अणुपेहि अणुपालिअं, तं दुककयाए कम्मरूयाए मोकयाए बोहिलाभाए संसारुत्तारणाए ति कडु उवसंपज्जिता णं विह- रामि। अंतोपस्कस्स ज न वाइन पढिनं न परियहि न पुच्छिा नाणुपेहि नाणुपालि संते बले संते वीरिए संते पुरिसकारपरक्कमे तस्स आलोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्देमो विसोहेमो अकरण्याए भन्मुट्ठमोअहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवजामो तस्स मिच्छामि दुक्कड (एतस्यापि सूत्रस्य संस्कारः पूर्ववत्।।) मा सर्व स्त्रना अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो.
पाधिकरत्र
संस्कृतानु.
गुजराती
भाषांवर
बाद सहित
॥४६॥
मा प्रमाणे कालिकश्रुत कमु. हवे भंगप्रविष्ट श्रुतने कहे छे.
नमो तेसिं खमासमणाणं, जोहिं इमं वाइअं दुवालसंगं गणिपिडगं भगवंतं। तं जहा-मायारो
सूयगडो ठाणं समवाओ विवाहपन्नची नायाधम्मकहामो उवासगदसाओ अंतगडदसाओ अणुत्त-
रोववाइअदसाओ पाहावागरणं विवागसुयं दिट्ठिवाओ॥
(नमस्तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः, यैः इदं वाचितं द्वादशाङ्गं गणिपिटकं भगवत् । तद्यथा-आधारः सूत्र-
कृतं स्थानं समवायः विवाहप्रज्ञप्तिः ज्ञाताधर्मकथा उपासकदशाः अन्तकृतदशाः अनुत्तरोपपातिकदशाः
प्रश्नव्याकरणं विपाकश्रुतं दृष्टिवादः ॥)
(तेसिं) ते (समासमणाणं) चमाश्रमणने (नमो) नमस्कार थामो, के (जेहिं) जेमोए (इम) आ ( गणि-
पिडगं) गणिपिटक-गणि एटले गणधरो, तेभोना कहेला अर्थना साररूप-उत्तम भाजनरूप ( भगवंत) अतिशयादिक
गुणयुक्त (दुवालसंग) द्वादशांग-बार भंग (वाइभ) अमने आपेल छे. (तं जहा) ते आ प्रमाणे-(भायारो) आचा-
रांग १, (सूयगडो) सूत्रकतांग २, (ठाणं) स्थानांग ३, ( समवायो) समवायांग ४, (विवाहपमत्ती ) विवाहप्रज्ञप्ति
-भगवती ५, (नायाधम्मकहाभो ) ज्ञाताधर्मकथा ६, ( उवासगदसाभो ) उपासकदशा ७, (भंवगडदसामो ) अंतकत-
दशा ८, (अणुत्तरोववाइमदसाओ) भनुत्तरोपपातिकदशा ९, (पहावागरणं) प्रश्नव्याकरण १०, (विवागसुयं) विपाक-
॥४६॥
भूत ११, (दिद्विचामओ) दृष्टिवाद १२. सव्वेहि पि एयम्मि दुवालसंगे गणिपिडगे भगवते समुत्ते समत्थे सगंथे सन्निज्जुत्तिए ससंग- हणिए जे गुणा वा भावा वा अरहतेहिं भगवतेहिं पन्नत्ता वा परूविया वा, ते भावे सदहामो पत्तियामो रोएमो फासेमो पालेमो अणुपालेमो, ते भावे सद्दहंतेहिं पत्तिअंतेहिं रोयंतेहिं फासंतेहि पालतेहिं अणुपालंतेहिं अंतोपरकस्स जं वाइअं पढि परियट्टिनं पुच्छिअं अणुपेहि अणुपालिअं, तं दुकरकयाए कम्मरकयाए मोकयाए वोहिलाभाए संसारुत्तारणाए त्ति कटु उवसंपज्जित्ता णं विहरामि । अंतोपरकस्स जं न वाइमं न पढिअ न परियहिअ न पुच्छिनं नाणुपेहि नाणुपा- लिनं संते वले सते वीरिए सते पुरिसकारपरक्कमे तस्स आलोएमो पडिकमामो निंदामो गरिहामो विउद्देमो विसोहेमो अकरणयाए अब्भुटेमो अहारिहं तवोकम्मं पायच्छित्तं पडिवजामो तस्स मिच्छामि दुकडं ॥ (अस्यापि सूत्रस्य संस्कारः पूर्ववत् ) मा सूत्रनो पण अर्थ प्रथमनी जेम जाणवो. हवे श्रुवज्ञान प्रापनार आचार्यने नमस्कार करवा माटे तथा पोताना प्रमादनु मिथ्यादुष्कृत देवा माटे कहे थे
पाधिकरत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
माषांतर
बाद सहित
॥४७॥
नमो तसिं खमासमणाणं,जेहिं इमं वाइयं दुवालसंगंगणिपिडगंभगवंतं । (तं जहा) सम्मं कारणं
फासंति पालंति पूति तीरंति किति सम्म प्राणायाराहति। अहंच नाराहेमि तस्स मिच्छामि दुक्कड।
(नमस्तेभ्यः क्षमाश्रमणेभ्यः, यैः इदं वाचितं द्वादशाङ्गं गणिपिटकं भगवत्। (ये चेदं ) सम्यक्
कायेन स्पृशन्ति पालयन्ति पूरयन्ति तीरयन्ति कीर्तयन्ति सम्यगाज्ञया आराधयन्ति । अहं च नाराध-
यामि, तस्मिन् मिथ्या मे दुष्कृतम् )
(तेसि ) ते (खमासमणाणं) चमाश्रमणोने एटले क्षमादि गुणोबडे शोभित एवा गुरुभोने (नमो) नमस्कार हो,
के (जेहिं ) जे धमाश्रमणोए (इमं) श्रा (गणिपिडगं) गणि एटले आचार्य तेनी पिटक एटले रत्नादिकनी पेंटी जेबी
पेटी अर्थात् सर्व भर्थना सारभूत एवं अने (मगवंत ) समग्न अश्वर्यादिक अतिशयोवालं (दुवालसंगं) द्वादशांगश्रुत
(वाइयं) अमने आप्युं छे एटले सूत्र अने अर्थवडे रच्यु छ तेमने नमस्कार हो, तथा जे क्षमाश्रमणो आ द्वादशांगश्रुतने
(सम्म) सम्यक् प्रकारे (कारण) कायावडे एटले केवळ मनवडे ज नहीं कायाए करीने पण (फासंति) फरसे छे एटले
ग्रहण करवाने वखते विधिपूर्वक ग्रहण करे छे, (पालंति ) वारंवार अभ्यास करवानडे रक्षय करे छे, (पूरंति ) परिपूर्ण
करे छे, (तीरंति ) भून्या विना जन्मना पारने पमाडे छे, (किति ) सारी रीते कीर्तन करे छे तथा (सम्मं ) सम्यक्
१ मा पद छापेली प्रसोमा नथी, अर्यसंगत पण नथी. साधु-साध्वीमोना मुख पाठे छे.
॥४७॥
प्रकारे (भावार) मा कहेली भानावडे (माराहनि) मारापना करे थे. (महंप) मने (नारादमि ) वेनी जे कारभारामना करतो नधी पटले प्रमादयी पाळतो नधी-ते प्रमाणे पर्वतो नची (तस्म) ते नहीं भाराषवादी थपेलु (मे) माई (कर) दुष्कत (मिच्छा) मिथ्या हो भर्यात् अनाराधनाममधी थयेला अपराधनी हु माफी मागु छ से भा पापिकासगी गमाति विपे सुवरेपवानी स्तुति करे - मुभदेवया भगवई, नाणावरणीयकम्मसघायं । तेसिं खरेउ सयय, जेसिं सुयसायरे भत्ती ॥१॥ (शुतयेरता भगवती, ज्ञानापरणीयकर्मसण्यातम् । तेपा पयतु सततं, येपां श्रुतसागरे भक्तिः॥१॥) (मगाई) पूण पी (गुमदेवया ) युतदेवता-धुतनी अधिष्ठाता देवी (तेसिं) तेभोना (नायानरमीयरम्ममघा) पानारगीपकर्मना मदने (मयय) निरवर (राउ) पपावो एटले नाश करो के (जेमि) जेमाने (सुयसायरे) शुलुम्पी सागरोपि ( गती) मक्ति एटले बहुमान भने पिनय के भी कोई शका करे के-श्रुतम्पी देवनानी मा स्तुति करपी योग्य थे, परतु थुतनी भधिष्ठापक देवता तो व्यंत- रादिक होय, ते कार फर्मनो घय करमामा मम नधी माटे वेनी स्तुति शा माटे करवी १ मा शकानु ममाधान ए छे के-भुवना मधिष्ठापक देशवामा रदेनु शुम प्रणिधान पण तेगा स्मरण करनारना कर्मनो आय करवामां कारगरूप थाप छ, एम गायमा कहेलु . ॥ इति श्रीपाचिकसूत्रम् ।।
पावित्र
संस्कृवानु-
गुजरावी
भाषांवर
वाद सहित
॥४८॥
हवे खामणा कहे छे.
इच्छामि खमासमणो अब्भुट्टिओमि अभितरपरिकयं खामेडं। पन्नरसण्हं दिवसाणं पन्नर-
सण्हं राईणं जं किंचि अपत्तियं परपत्तियं भत्ते पाणे विणए वेयावच्चे आलावे संलावे उच्चासणे
समासणे अंतरभासाए उवरिभासाए जं किंचि मज्झ विणयपरिहीणं सुहुमं वा वायरं वा तुम्भे
जाणह, अहं न याणामि, तस्स मिच्छा मि दुकडं ।
(इच्छामि क्षमाश्रमण ! अभ्युत्थितोऽस्मि अभ्यन्तरपाक्षिकं क्षमयितुम् । पञ्चदशानां दिवसानां पञ्च-
दशानां रात्रीणां यत्किञ्चित् अप्रीतिकं प्रकृष्टमप्रीतिकं ( परप्रत्ययं वा) भक्ते पाने विनये वैयाकृत्ये
आलापे संलापे उच्चासने समासने अन्तरभाषायाम् उपरिभापायां यत्किञ्चित् मम विनयपरिहीनं सूक्ष्म
वा बादरं वा यूयं जानीध, अहं न जानामि, तस्मिन् मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥)
(खमासमणो) हे क्षमाश्रमण-हे गुरु ! (अमितरपरिकयं) पखवाडीयाने विषे उत्पन्न थयेला अपराधने (खामेउ)
धमाववान (इच्छामि) ई इच्छु छु. केवळ इच्छु छु एटलं ज नहीं पण (अन्मुहिमोमि) हुँ उभो थयो छु एटले समाववानो
मारंभ करूं छु. ते मा प्रमाणे-(पमरसण्हं ) पंदर (दिवसाणं) दिवसो मध्ये तथा (पन्नरसह) पंदर (राईणं) रात्रिमो
॥४८॥
मम्मे (न किंचि) जे काइ सामान्यथी के विशेषधी तमारे विषे (भपचिय) अप्रीति करनालं, तथा (परपचिय) भत्यत भनीति करनारु अथवा परप्रत्यय एटले परना हेतुवाल के पोताना हेतुवाल अप्रीति करनारु माराथी थयु होय ते मारु दुष्कत मिथ्या थामो. तेमा तमारा (मत्ते) भोजनने विपे, (पाणे) पाणीने विपे, (विणए) विनयने विषे, (वेयावने) औषध विगेरेना वैयावच्चने विषे, (मालावे ) भालापने विष एटले तमारी साथे एक वार बोलवाने विषे, (संलावे )वारवार परस्सर वात करवाने विषे, (उच्चासणे) तमाराथी उचा प्रामनपर सबाने विपे, (समासणे) तमारी समान श्रासने येसवाने विषे, (भतरमासाए) तमारा भाषणनी वचमा बोलवाने विपे, (उवरिमासाए) तमारा चोली रह्या पछी तमारा करतां वधारे पोलवाने विप (ज किंचि) जे काह सामान्यपणे के विशेषपणे (मझ) मारु (सुहुम वा) सूक्ष्म (वायर वा) अथवा नादर (विणयपरिहीणं) विनयरहित अनुचितपणु थयु होय ते (तुम्मे) तमे (जाणह) जाणो छो, (अह न याणामि) हु जाणतो नथी (तस्स ) ते अपराधने विपे (मि दुकड) मारु दुष्कत (मिच्छा) मिथ्या थामो-हु आपने ते मारा पापनु मिथ्या दुम्कत यापु छु-खमाबु छु. ॥ अहमवि खामेमि तुन्भे॥ (महमपि चमयामि त्वाम् ) उपर प्रमाणे समापवाना प्रारममा आचार्य कहे के-(अहमषि) हु पण (तुम्मे ) तने (खाममि) खमा छु.
गुजराती
मापांतर
पाषिकसत्र
संस्कृतानु
बाद सहित
॥४९॥
हवे पाक्षिक खामणा ४ कहे छे.
१ इच्छामि खमासमणो पियं च मे जं भे हट्ठाणं तुट्ठाणं अप्पायंकाणं अभग्गजोगाणं सु-
सीलाणं सुव्वयाणं सायरियउवज्झायाणं नाणेणं दंसणेणं चरित्तेणं तवसा अप्पाणं भावमाणाणं
बहुसुभेण भे दिवसो पोसहो परको वइकतो, अन्नो य भे कल्लाणेणं पज्जुवडिओ, सिरसा मणला
मत्थएण वंदामि।
(इच्छामि क्षमाश्रमण ! प्रियं च मे यत् भवतां हृष्टानां तुष्टानाम् अल्पातकानाम् अभग्नयोगानां
सुशीलानां सुव्रतानां साचार्योपाध्यायानां ज्ञानेन दर्शनेन चारित्रेण तपसाऽऽत्मानं भावयतां बहुशुभेन
भगवन्तः ! दिवसः पौपधः पक्षो व्यतिक्रान्तः, अन्यश्च भवतां कल्याणेन (युक्तः) पर्युपस्थितः, शिरसा
मनसा मरतकेन वन्दे)
शिष्य कहे छ-(खमासमणो) हे क्षमाश्रमण गुरुजी ! (इच्छामि ) हूं इच्छु छु एटले प्रागळ हुँ जे कहं छु ते
इच्छापूर्वक कहुं छु. (च) वळी (मे) मने (पियं) प्रिय पण छे. कोइ वस्तु प्रिय नहीं छतां पण कारणने
लीधे इच्छवामां आवे छे, तेथी भही इच्छा भने प्रीति बने कहेवा माटे प्रिय पण के एम का. शुं इच्छु छु भने शुं प्रिय
छ ? ते कहे छ के-(जं) जे (मे) तमारो, तमे केवा छो ? (हट्ठाणं) हर्ष पामेला एटले रोगरहित होवाथी हर्षित
career
॥४९॥
थयेला तथा (तद्वाण) संतुष्ट थयेला तथा (अपायकाणं) अम्प शब्द अमाववाचक होवाथी तत्काळ नाश करनारा असाध्य रोगरहित अथवा सामान्य रीते नीरोगी अथवा सर्वथा प्रकारे रोगरहितपणानो सभव होतो नथी तेथी अल्प रोगवाळा तथा (अमग्गजोगाण) नथी भग्न थया सयमना योग-मन, वचन, कायाना-योग जेना एवा तथा 'सुगीलागा) सारा शीलवाळा तथा (सुचयाण) सारा-अतिचाररहित व्रतमाळा (सायरियउवज्झायाण) आचार्य भने उपाध्यायसहित एवा तथा (नाणेय ) ज्ञानवडे, (दसणेण) दर्शनवडे-समवितवडे, (चरित्तेण) चारिरडे अने (तवसा) तपनडे (अप्पाण) पोताना भात्माने (मावेमाणाण) भावना करता एवा तमारो (पोसहो) पौपधरूप एटले पर्वरूप (दिामो) दिवस अने (परको) अर्ध मासरूप पक्ष (बहुसुभेश) घणा सुसे करीने (मे) हे भगवत ! (वइकदो) व्यतीत धयो ये-नीती गयो , (य) अने (मे) तमारो (अन्नो) जो पक्ष (कल्लाण) कल्याणे करीने सहित (पज्जुट्टियो) प्राप्त थयो छे. पा प्रमाणे मगळवचन कहीने शिष्य गुरुने पंदना करे थे, तेथी करीने (मिरसा) मस्तकवडे तथा (मणसा) मनवडे उपलक्षण थी वचनवडे पण (मत्थएण वदामि) हु आपने वदना कर छु नहीं मस्थएण वदामि ए समग्र पदनो चदना करु छु एवो अर्थ सूत्रोमा घणे ठेकाणे रूढ छ, तेथी पुनरुक्त दोष नथी । तुब्भेहि सम ति ॥ (युष्माभि सममिति) गुरु कहे के-(तुम्मेहि सम ति) तमारी साथे ए सर्व सिद्ध थयु छे.
पाधिकसूत्र
संस्कृतानु-
बाद सहित
॥५०॥
गुजरावी
भाषांवर
२ इच्छामि खमासमणो पुट्विं चेइयाइं वंदित्ता नमंसित्ता तुब्भण्डं पायमूले विहरमाणेणं जे
केइ बहुदेवसिया साहुणो दिट्ठा समाणा वा वसमाणा वा गामाणुगाम दूइज्जमाणा वा राइणिया
संपुच्छंति, ओमरायणिया वंदति, अजया वंदंति, अजिआओ वंदंति, सावया वंदति, सावियामो
वंदंति, अहं पि निस्सल्लो निक्कसाओ त्ति कटु सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ॥ अहमवि वंदावेमि
चेइयाइं॥
(इच्छामि क्षमाश्रमण ! पूर्व चैत्यानि वन्दित्वा नत्वा युष्माकं पादमूले विहरता (मया) ये केचन
बहुदैवसिकाः साधवो दृष्टाः समाना वा वसमाना वा ग्रामानुग्रामंद्रवन्तो वा रात्निकाः संपृच्छन्ति, अवम-
रात्निका वन्दन्ते, आर्या वन्दन्ते, आर्यिका वन्दन्ते, श्रावका वन्दन्ते, श्राविका वन्दन्ते, अहमपि निःश-
ल्यो नि:कपाय इति कृत्वा शिरसा मनसा मस्तकेन वन्दे ॥ अहमपि वन्दापयामि (वन्दयामि) चैत्यानि)
(खमासमणो) हे क्षमाश्रमण ! (इच्छामि ) चैत्यवंदापन भने साधुवंदापन मापने निवेदन करवा माटे हुँइच्छु छु
के-(पुन्धि ) पूर्वे-विहार करवाना काळ पहेलां (चेहयाई ) जिनेश्वरोनी प्रतिमामाने (बंदित्ता) गुणनी स्तुति करवावडे
वांदीने, (नमंसिचा) कायावडे नमस्कार करीने, क्या ? (तुन्मण्डं) तमारा (पायमूले) चरणनी समीपे चांदीने पछी
(निहरमाणेणं) एक गामधी चीजे गाम विहार करता एवा में (जे केइ) जे कोइ (बहुदेवसिया) घणा दिवसना दीघा-
॥ ५० ॥
पयार्यवाळा (साहुभो) साधुमो (दिवा) जोया होय, ते साधु केवा ? (समाणा वा) जंघारळ चीण थवाथी पदवास- पणाए करीने भाश्रय करेला क्षेत्रनी बहार नहीं विचरनारा अथवा (वसमाणा वा) ऋतुबद्ध काळे मासकल्पी विहार कर- नारा अने वर्षाकाळे एक स्थळे चातुर्मास करनारा ए ज कारण माटे (गामाणुगाम) एक गामधी बीजे गाम (इलमाणा वा) विहार करवा अथवा गामने विषे एक राति रहेता अने नगरने विपे पांच रात्रि वसता मा सर्वनी मध्ये (राइणिया) रात्निक एटले ज्ञानादिक भावरत्नना व्यापारी दीक्षापर्याय माटे एवा प्राचार्यों में बांधा थका (सपुच्छति) आपना शरीर कुशलादिकनी वार्ता पूछे छे, (ओमरायणिया) आपथी दीचापर्याये नाना एवा प्राचार्यों (वदति) आपने वांदे छ भने कुशलादिक तो पूछे जछे (मजया वदति) सामान्य साधुनो वांदे के, (अजिमाओ वदति ) साध्वीमो वांदे छे, (सा- क्या वदति ) श्रापको वादे छे, (सावियाभो वदति ) श्राविकामो वादे छ (अह पि) हु पण (निस्सालो) मायादिक शन्यरहित थयो छु तथा (निकसामो) कपायरहित थयो छु (त्ति कटु) एम करीने-ए कारण माटे (सिरसा) मस्तकवडे (मणसा) मनवडे ( मत्थएण वदामि) वदना करु छु, तथा (अहमति) हु पण (वदामि चेइयाइ ) तमोने चैत्यो वदावु छु एटले भमुक अमुक नगरादिकमा में जे चैत्योने तमारे माटे वांया के तेने तमो पण वांदो. मा प्रमाणे शिष्य कहे त्यारे गुरु या प्रमाणे घोले- ॥ मत्थपण वदामि अहं पि तेसिं ति॥ (मस्तकेन वन्दे अहमपि तानिति) पाषिकसूत्र संस्कृतानु- बाद सहित गुजराती भाषांतर ॥५१॥ ( अहं पि ' हुं पण ( तेसिं ) तेमने-ते चैत्यादिकने ( मत्थएण वंदामि ) मस्तस्थी वांदु छं. ३ इच्छामि खमासमणो अब्भुट्टिओमि (उवट्टिओमि) तुब्भण्डं संतियं अहाकप्पं वा वत्थं वा पडिग्गहं वा कंबलं वा पायपुंछणं वा रयहरणं वा अस्कर वा पयं वा गाहं वा सिलोगं वा सिलोगढ़ वा अटुं वा हेउं वा पासिणं वा वागरणं वा तुब्भोहिं चियत्तेणं दिन्नं मए अविणएण पडिच्छियं तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ति॥ (इच्छामि क्षमाश्रमण ! उपस्थितोऽस्मि युष्माकं सत्कं यथाकल्पं वा वस्त्रं वा प्रतिग्रहं वा कंचलं वा पादप्रोञ्छनं वा रजोहरणं वा अक्षरं वा पदं वा गाथां वा श्लोकं वा श्लोकाधं वाऽर्थं वा हेतुं वा प्रश्नं वा व्याकरणं वा युष्माभिः प्रीत्या दत्तं मयाऽविनयेन प्रतीक्षितं, तस्य ( तत्र ) मिथ्या मे दुष्कृतमिति) (खमासमणो ) हे क्षमाश्रमण ! ( इच्छामि ) हुं इच्छु छं. (उचट्ठिोमि) हुं मारा आत्माने निवेदन करवा माटे प्राप्त थयो छु-तत्पर थयो छ. ते ए. के-( तुम्भण्ह संतियं ) तमारा संबंधी एटले जे मारा परिमोगमा श्रावतुं ते या सर्व तमाएं (अहाकप्पं वा) कल्पे तेवू-स्थविरकन्पने उचित एवं (वत्थं वा ) वस्त्र, अथवा (पडिग्गई वा) पात्र, अथवा ( कंधलं वा) कांवल, अथवा (पायपुंछणं वा ) पादपोंछन, अथवा ( रयहरणं वा ) रजोहरण, अथवा ( अरकरं वा ) अक्षर, अथवा ( पयं वा ) पद, अथवा ( गाई वा ) गाथा, अथवा (सिलोगं वा) श्लोक, अथवा (सिलोगदं वा ) अर्ध श्लोक, अथवा (महूँ या ) अर्थ, भयवा (हेउ वा ) हेत, अथवा (पसिण वा) प्रश्न, अथवा ( वागरण वा) उत्तर-या सर्व वस्तु (तुम्मेदि) वमोए (चियत्तेण) प्रीतिवडे (दिन) मने भापी छ, परतु (मए) में (अविणएण) अविनयवडे (पडिन्छिय ) जे ग्रहण करी छ, (तस्स ) मा (मि) मारु दुक्कड ) दुष्कृत (मिच्छा) मिथ्या थारो अर्थात् या वस्तुओ भरिनयथी लेता मने जे पाप लाग्यु होय ते मारुं पाप मिथ्या थामो-ते पापनु हु मिथ्यादुष्कृत प्रापु छु भा प्रमाणे शिष्य कहे त्यारे आचार्य बोले- ॥ आयरियसंतियं ति ॥ ( आचार्यसत्कमिति) (आयरियमतिय ति) या सर्व पूर्वाचार्यसबंधी छे अर्थात् मारु काइ नथी भा प्रमाणेनु वचन महकारनो त्याग करवा माटे तथा गुरुने विपे भक्ति जणाववा माटे के हवे शिक्षा भपायेला शिष्यो ते अनुमहने बहुमानता समा भा प्रमाणे कहे थे- ४ इच्छामि खमासमणो अहमपुवाई कयाई च मे किइकम्माइ आयारमंतरे विणयमंतरे सेहिमो सेहाविओ सगहिमओ उवग्गहिओ सारिओ वारिओ चोइमो पडिचोइओ चियत्ता मे पडिचोयणा अन्मुट्ठिओऽहं (उवट्ठिोऽहं) तुब्भण्ह तवतेयसिरीए इमामो चाउरंतसंसारकंताराश्रो
पातिकमत्र
संस्कृतानुः
बाद सहित
॥५२॥
गुजराती
भाषांवर.
नित्थरिस्सामि त्ति कटु सिरसा मणसा मत्थएण वंदामि ॥
(इच्छामि क्षमाश्रमण ! अहमपूर्वाणि कृतानि च मया कृतिकर्माणि आचारान्तरे विनयान्तरे
शिक्षितः ( सेधितो वा) शिक्षापितः ( सेधापितो वा ) सगृहीता उपगृहीतः सारितो वारितः चोदितः
प्रतिचोदितः प्रीता मे प्रतिचोदना उपस्थितोऽहं युष्माकं तपस्तेजःश्रिया इतः चातुरन्तसंसारकान्तारात्
संहृत्य निस्तरिष्यामि इति कृत्वा शिरसा मनसा मस्तकेन वन्दे)
(खमासमणो ) हे क्षमाश्रमण ! ( अहं ) हुँ ( अपुयाई ) अपूर्व एटले अनागत काळसंबंधी वैयावृत्यादि कतिकर्मो
करवा माटे ( इच्छामि ) इच्छु छु, (च) अने वळी ( मे ) में (कयाई) पूर्वकाळे करेला जे भापना ( किइकम्माई) वैया-
वृत्यादि कृतिकर्मो ते प्रत्ये (आयारमंतरे ) कोइक ज्ञानादिक आचारने विषे तेनो तरो-व्यवधान पाडे छते अथवा
ज्ञानादिक क्रिया नहीं करे छते, तथा (विणयमंतरे ) आसन आपq ए विगेरे कोइक विनयने विपे तेनो आंतरो पाडे छते
अथवा विनयनी क्रिया नहीं करे बते, (सेहिमओ) गुरुए पोते ज मने शिक्षा भापी होय अथवा भाचार भने विनयने विषे
मने कुशळ कर्यो होय, तथा ( सेहाविमो ) उपाध्यायादिक पासे मने शिचा अपावी होय अथवा भाचार अने विनयने विपे
मने कुशळ कराव्यो होय, तथा ( संगहियो) मने शिष्यपणे ग्रहण कर्यों होय एटले आश्रय भाप्यो होय, तथा ( उव-
ग्गहिओ) ज्ञानादिक भने वस्त्रादिकवडे मने आश्रय प्राप्यो होय, तथा ( सारिमो) मने हितमा प्रवर्ताग्यो होय अथवा
कार्य संभारी आप्युं होय, तथा (वारिभो) अहितथी निवार्यों होय, तथा ( चोइमो) संयमयोगमा स्खलना पामे बते
॥५२॥
मा प्रमाणे तमारे करवु उचित नथी एवा वचनवडे मने प्रेरणा करी होय, तथा (पडिचोइनो) तेवी ज रीते वारवार प्रेरणा करी होय (मे पडिचोयणा) आ प्रमाणे मने जे वारवार प्रेरणा करी होय तथा उपलक्षणथी शिवादिक करेल होय ते मने (चियचा) प्रीतिकारी थे परतु मप्रीतिकारक नथी, वथा (उवडिभोऽह) प्रेरणा करेला भानु सपादन करवा हु उद्यमक्त थयो छु, तथा (तुमण्ह) तमारी (तवतेयसिरीए) तपना तेजनी एटले तपप्रमावनी लक्ष्मीए करीने (इमानो) मा प्रत्यक्ष एवा ( चाउरतससारकतारामओ) नरकादि गतिना मैदे करीने चार अत-सीमा (विभाग). वाळा ससाररूप अरण्यथी ( साहहु ) फपाय, इद्रियो भने योगादिकवडे निस्तार पामेला प्रात्माने सक्षेपीने-सकोचीने (नित्थरिस्सामि ) हु निस्तार पामीश-श्रोळगी जइश, (ति क१) एम करीने-ए हेतु माटे (सिरसा) मस्वकवडे ( मत्थएण वदामि) हु आपने वादु छु अर्थात् मन-वचन-कायावडे वादु छु. ते सामळी भाचार्य कहे छे- ॥ नित्थारगपारगा होह ॥ (निस्तारकपारगा भवत) (नित्यारग) ससारसमुद्धी प्राणीमोने निस्तारनार अथवा प्रतिज्ञाना निस्वारनार अने (पारगा) ससारसमुद्रने तीरे जनारा (होह) तमे घामो. मा प्रमाणे गुरुनु भाशीर्वचन के. ॥ इति चामणाविधिः॥
संस्कृतानुः
बाद सहित
गुजराती
भाषांक
अथ आहारना ४७ दोष.
सोलस १६ उग्गमदोसा, सोलस १६ उप्पायणा य दोसा य ।
एस १० एसणा य दोसा, गासेसण ५ मिलिय सगयाला ॥ १
(षोडश उद्गमदोषाः, षोडश उत्पादनाश्च (या) दोषाश्च ।
दश एषणाश्च दोषा, ग्रासैषणामिलिताः सप्तचत्वारिंशत् ॥ १॥)
साधु-साध्वीने माहारपाणी वहोरतां ( सोलस ) सोळ ( उग्गमदोसा ) उद्गमना दोषो एटले भाहार उत्पन्न थती
वखतना श्रावकथी उत्पन्न थता दोपो लागे छे, तथा (सोलस ) सोळ ( उप्पायणा य ) उत्पादनाना एटले वहोरती वखते
साधुथी उत्पन्न थता (दोसा य ) दोपो लागे छे, तथा ( दस ) दश ( एसणा य ) एषणाना साधु अने श्रावक ए पन्नेथी
उत्पन्न थता (दोसा) दोषो लागे छे, तथा (गासेसणमिलिय ) भाहार करती वखते ग्रासैपणाना-मांडलीना पांच दोषो
लागे छे, ते मळीने ( सगयाला) कुल सुडतालीश दोषो थाय छे.
प्रथम उद्गमना सोळ दोषो कहे छे.
माहाकम्मुद्देसिय, पूईकैम्मे य मीसजाए य । ठवर्णा पाहुडियाएं, पाओयर-कीय-पोमिचे॥२॥
परिभाहिए अभिहडु-भिन्ने मालोहडे य मच्छिज्जेभिणिसिटुंझोयरए, सोलस पिंडुग्गमे दासा ॥३॥ (भाषाकोहिणिकप्रतिकर्माणि च मिजात च । स्थापना माभूतिका, प्रादुष्करक्रीतमामित्यानि ॥२॥ परिवर्तितम पाहृतोद्भिन्ने" मालापहृतं च भाच्छिद्यम् । अनिसृष्टमध्यवपूरक, पोडश पिण्टोद्गमा दोषाः ॥३) (भाहासम्म) भाषाकर्मदोष-साधुने निमिचे एटले साधुने मनमा धारण करी सचित्त वस्तुने भचिच करे अथवा भपित्त वस्तु रधि से १. (उद्देसिय) भौशिकदोप-पूर्वे तैयार करेला मात लाडु भादिक मुनिने उद्देशीने एटले मनमा धारीने दही, गोळ मादिकधी मिश्र करी स्वादिष्ट करे ते २. (पूईकम्मे य ) प्रतिकर्मदोप-शुद्ध भाहार आधाकी पाहा- रमा नांसी मिश्र करवो अथवा भाषाकमी माहारथी सरडायेली कडछी विगैरेवडे शुद्ध भाहार यहोरावको ते ३. (मीम. जाए य) मिश्रजातिदोप-जे माहार पोवाने माटे तथा साधुने माटे प्रथमधी ज सकन्य करीने पनाववो ते ४. (उवणा) स्थापनादोप-माधुने माटे चीरप्रमुस जूदा करी पोताना वासणमा राखी मुका ते ५ (पाहुडियाए) प्राभृतिकादोप- विवाहादिक भाववानो पिलर होय छता साधुने गाममा रहेला जाणी ते लाम लेवा माटे वहेला करवा अथवा विवाइनो समय नवीक उता साधुनी राह जोरा माटे विलय करतो ते ६. (पाभोयर) प्रादुष्करणदोष-अंधकारमा रहेली वस्तु दीवा मादिकवडे मधवा भीत दूर करवावडे प्रकाशित करीने भापती ते ७. (कीय) फ्रीतदोप-साधुने माटे वेचाती लानीने कोई वस्तु तेमने आपली ते ८ (पामिचे) प्रामित्यदोप-साधुने माटे उधारे लइ आनी ते वस्तु तेमने आपची ते ९. (परिमट्टिए) परावर्तितदोप-साधुने माटे पोतानी वस्तु चीनानी वस्तु साधे बदलाची तेनी वस्तु साधुन आपली गुजराती पाक्षिकसूत्र संस्कृतानु- वाद सहित भाषांतर. ॥ ५४॥ ते १०. (अभिहड) अभ्याहृतदोप-आहारादिक सन्मुख लावी साधुने आपे ते ११. (उन्भिने) उभिन्नदोष-कुडला विगेरेमाथी घी विगेरे काढवा माटे तेना मुख उपरथी माटी विगेरे दूर करी अथवा कपाट, ताल्लु विगेरे उघाडी तेमांथी ते काढी साधुने वहोरावq ते १२. (मालोहडे य) मालापहृतदोष-मेडी, भोयरा के शीका उपरथी उतारी साधुने वहोरा- वq ते १३. (अच्छिज्जे ) आच्छिद्यदोष-पोते बळवान होवाथी बाजानी वस्तु झुंटीने-आंचकीने साधुने प्रापवी ते १४. (अणिसिटुं) अनिसृष्टदोष-जेना एकथी वधारे स्वामी होय एवा आहारने ते सर्वमांथी कोइ एक जण वीजानी रजा विना साधुने वहोरावे ते १५. (भज्झोयरए) अध्यवपूरकदोप-साधुनुं आगमन सांभळी पोताने माटे रंधाता अन्नमां बीजु वधारे नांखी ते रसोइमां वधारो करे ते १६. (सोलस) आ सोळ (पिंडुग्गमे) पिंडोद्गमना (दोसा) दोषो छे. आ सोळ दोषो दातारथी उत्पन्न थाय छे. • हवे साधुथी उत्पन्न थता उत्पादनाना सोळ दोषो कहे छे.- धाईदूईनिमित्ते, आँजीववणीवगे तिगिच्छाय य । कोहे माणे माया, लोभे अहवंति दस एए ॥४॥ पुदिपच्छासंथव, विजामते अ चुमजोगे य । उप्पायणाइ दोसा, सोलसमे मूलकम्मे य ॥५॥ (धात्रीदूतीनिमित्तानि, श्राजीववनीपंको चिकित्साच। क्रोधःमानः माया, लोभ च भवन्ति दश एते ॥४॥ पूर्वपश्चात्संस्तवा, विधामन्त्री च चूर्णयोगी च । उत्पादनाया दोषाः, षोडश मूलकर्म च ॥५॥) १३ १४ । ५४॥
(धाई) बालकने धवरावनार, स्नान करावनार, भलकार पहेराबनार, रमाडनारमने खोलामा बेसाडनार-मा पांच जातनी धात्री माता कहेवाय छे, तेमाथी कोइ पण कर्म साधु मिवाने माटे करे ते धात्रीपिंडदोष १. (इ) वीनी जेम मिषाने माटे सदेशो लावे अथवा लइ जाय ते दूतीपिंडदोष २ (निमिचे) मिक्षाने माटे भूत, भविष्य भने वर्तमानकाळ- सनंधी लामालामरूप निमिच कहीने भिक्षा ग्रहण करवाथी निमित्तपिंडदोष ३. (भाजीव) मिक्षाने माटे पोतानी जाति, कुळ, गच्छ, कर्म, शिल्प विगेरेना वखाण करवाथी मुनिने लागे ते आजीवपिंडदोष ४. (वणीवगे) ब्रामण, श्रमण विगेरेना भक्तोपासेथी श्राहार लेवानी इच्छाथी हु पण तेनो भक्त छु एम कही आहार ग्रहण करे ते वनीपकपिंडदोष ५. (विगिच्छा य ) वैद्यनी जेम औषध पापी अथवा बवावी थाहार ग्रहण करवाथी लागे ते चिकित्सापिंडदोष ६. (कोहे) विद्या अने तप विगेरेनो प्रभाव बतावी, राजानु मान्यपणु देखाडी अथवा क्रोधनु फळ देखाडी भिक्षा ग्रहण करवाथी क्रोधपिंडदोष ७. (माणे) पोतानी लम्धिनी प्रशसाथी अथवा वीजाए उत्साह आपवाथी भथवा कोइए अपमान करवाथी हुसारो भाहार लावी आपु एम अहकार करी श्रावकने विडवना करी आहार लावे ते मानपिंडदोष ८. (माया) विविध प्रकारना वेप अने गापा विगेरे पदली आहार लावे ते मायापिंडदोष ९ (लोमे थ) भविलोमधी आहार माटे अटन करे ते लोमपिंडदोष १०. ( हवति दस एए) आ रीते दश दोप लागे छ, तथा (पुब्धिपच्छासथव ) पुब्धि एटले दाता- रना मावापनो भथवा पच्छा एटले दातारना सासुससरानो सभव एटले परिचय जणावी-मोळखाण काढी मिता ग्रहण करे ते पूर्वपश्चात्सस्तवपिंडदोप ११. (विजा) विद्यानो उपयोग करी मिझा लेपाथी विद्यापिंडदोष १२. (मते म) मननो
माहारना
४७ दोष
॥५५॥
गुजराती
भाषांतर
प्रयोग करी भिक्षा ले ते मंत्रपिंडदोष १३. (चुण्ण ) नेत्रांजन भादि चूर्णनो उपयोग करी भिक्षा लेवाथी चूर्णपिंडदोष
१४. (जोगे य') पादलेप आदि योगनो उपयोग करी भिक्षा ग्रहण करवाथी योगपिंडदोष १५ (य) तथा (सोलसमे)
सोळमो (मूलकम्मे ) गर्भनुं स्तंभन, गर्भनुं धारण, गर्भपात, रक्षाबंधन विगेरे कर्म करी भिक्षा लेवाथी मूलकमपिंडदोप
१६. ( उपायणाइ दोषा) आ सर्वे उत्पादनाना दोषो छे. आ दोपो साधुथी उत्पन्न थाय छे.
हवे गृहस्थी अने साधु ए बन्नेथी उत्पन्न थता एषणाना दश दोपो बतावे छे-
संकियमखियनिरिकत्त-पिहियसाहरियदायगुम्मिस्से। अपरिणयलित्तछड्डिय, एसणदोसा दस हवंति।६।
(शक्षितम्रक्षितनिक्षिप्त-पिहितसंहतदायकोन्मिाः। अंपरिणतलिप्तछर्दिता, एषणादोपा दश भवन्ति ॥६:१)
(संकिय) दातार अथवा साधुने आहार देतां अथवा लेता साधाकर्मादिक कोइ पण दोपनी शंका थाय तो तेने शंकित
दोप लागे छ १. ( मरिकय ) पृथ्व्यादि सचित्त अथवा मध आदिक निंद्य के पोते निषेध करेला अचित्त पदार्थथी
मिश्रित थयेलो पिंड देतां अथवा ग्रहण करता प्रक्षित दोष लागे छे २. (निरिकत्त) पृथ्वीकाय आदि छकायउपर स्थापन
करेलो भचित्त पिंड पण देतां अथवा लेतां निक्षिप्त दोप लागे छ ३. (पिडिय) फळ आदि सचित्त वस्तुथी ढांकेली वस्तु
देतां अथवा लेती पिहित दोष लागे छे ४. (साहरिय) देवाना पात्रमा रहेली काइक वीजी वस्तुने सचित्त एवा पृथ्वी श्रा-
दिकउपर मूकी ते पात्रवडे देतां अथवा लेता संहृत दोष लागे छ ५. (दायग) बाल, वृद्ध, नपुंसक, धुजतो, अंध, मदोन्मत्त,
॥ ५५॥
हाथ-पगविनानो, चेडीमा नांखेलो, पादुकाउपर चडेलो, खांसीवाळो, खांडनार, पीसनार, भुजनार, कापनार, पीजनार, दळनार, फाडनार, तोडनार विगेरे छकायविराधक तेम ज गर्मिणी, तेडेला छोकरावाळी तथा धावता बाळकवाळी स्त्री के भावा पासेथी भाहार लेता दायक दोष लागे छे ६. (उम्मिस्से) सचित्त धान्यना कपथी मिश्रित साकर विगेरे वस्तु देता अथवा लेता उन्मिश्र दोष लागे छे ७ (अपरिणय) अचिचपणाने पाम्या विनानी वस्तु देतां अथवा लेता अपरिणत दोष लागे छे ८ (लिच) प्रकल्प्य वस्तुथी लेवायला पात्र के हस्तवडे देता अथवा लेतां लिप्त दोष लागे छे ९. (छड्डिय) पृथ्वीपर घी आदिना टीपा पडता होय एवी रीते देतां अथवा लेता छर्दित दोष लागे छ कारण के तेवी रीते करता त्यां रहेला भने वीजा भागतुक जीयोनी पण मधुविंदुना उदाहरणनी जेम विराधना थाय छ १० (एसणदोसा दस हवंति) मा दश एपणाना दोपो छे. हषे प्रासपणाना एटले आहार वापरती वखवना पाच दोपो कहे थे- संजोयणापमाणे, इंगाले धूम कारणे पढमा । वसहिवहिरतरे वा, रसहेऊ दव्वसजोगा ॥७॥ (संयोजनाप्रमाणो, इगौलो धूर्मोऽकारणी प्रथमा। वसतियहिरन्तरे वा, रसहेतोव्यसंयोगात् ।। ७॥) (सजायणा) सयोजना नामनो (पढमा) पहेलो दोप ते (रसहेऊ ) सारो स्वाद करवाना हेतुथी (वसहिवहिरतरे वा) वसति ( उपाश्रय ) नी बहार अथवा अदर प्राचीने (दव्वसजोगा) माडा विगैरेनी साथे घी-खांड विगेरे द्रव्य-पदार्थनी 'माहारना ४७ दोष ॥५६॥ गुजराती मापांवर संयोग करवाथी थाय छे १. ( पमाणे ) जेटलो आहार करवाथी धीरज, वळ, संयम तथा मन, वचन अने कायाना यो- गने बाधा न आवे तेटलो आहार करवो जोइए, तेथी वधारे आहार करे तो प्रमाणातिरिक्तता दोप लागे छे २. (इंगाले ) स्वादिष्ट अन्नना अथवा तेना दातारना वखाण करतो आहार करे तो ते साधु रागरूप अग्निथी चारित्ररूप काष्ठोने अंगारारूप करे छे तेथी ते भंगारदोष कहेवाय छे ३. (धूम ) अन्ननी के तेना देनारनी निंदा करतो भोजन करे तो ते चारित्ररूप काष्ठने बाळी धूमाडारूप करे छे तेथी ते धूमदोप कहेवाय छे ४. (अकारणे ) कारण विना भोजन करे तो कारणाभाव नामनो दोष लागे छे. महीं भोजन करवाना छ कारणो कयां छे, ते आ प्रमाणे- क्षुधावेदना सहन न थइ शके तो भाहार करवो १, भाचार्य, बाळ, वृद्ध अने ग्लान आदिकनी वैयावच करवाना कारणे आहार करवो २, ईर्यासमितिनी शुद्धि माटे माहार करवो ३, संयमर्नु पालन करवा माटे आहार करचो ४, जीवि- तव्यनी रक्षा करवा माटे माहार करवो ५ तथा धर्मध्यानने स्थिर करवा माटे आहार करवो ६. आ छ कारणोने माटे भाहार करवानी जरुर छे. ते सिवाय आहार करे तो भकारणदोष लागे छे. श्रा पांच माहार करती वसतना दोपो छे. कुल मळीने ४७ दोष थाय छे. ॥ इति ४७ भिक्षादोपाः॥
॥ अथ श्री श्रमणासूत्रम् ।। नमो अरिहंताणं० ॥ करेमि भंते सामाइझं, सव्वं सावज जोगं पञ्चकामि, जावज्जीवाए तिविह तिविहेण मणेण वायाए कारणं न करोमि न कारवेमि करतं पि भन्न न समणुजाणामि, तस्स भते पडिक्कमामि निंदामि गरिहामि अप्पाणं वोसिरामि ॥१॥ (नमोऽर्हदयः ॥ करोमि भदन्त सामायिक, सर्व सावधं योग प्रत्याख्यामि, यावज्जीवया विविध त्रिविधेन मनसा वाचा कायेन न करोमि न कारयामि कुर्वन्तमपि अन्यं न समनुजानामि, तस्य भदन्त प्रतिकमामि निंदामि गर्हामि आत्मानं व्युत्मजामि ।। १॥) ( नमो अरिहवाणं० ) महतोने नमस्कार थामो ए रीते बाकीनो नवकार मन जाणी लेवो (मते) हे भगवन् । (सामा- इय) सामायिकने (करेमि) हु करु छु. ( सन्च ) सर्व (सावन जोग) सावद्ययोगने-पापव्यापारने (पञ्चरकामि) हु पञ्च छु-निपेघ छु (जावजीवाए) जावजीवसुधी (विविह) मन-वचन-कायाना व्यापाररूप त्रण प्रकारने (तिविहेण) करयु, करावयु अने अनुमोदनु एत्रणे प्रकारे करीने (मणेण) मनवडे, (वायाए ) वाणीवडे, (कारण) कायावडे (न करेमि) सावधव्यापारने नहीं करु, (न कारवेमि) नहीं करावु, (करतं पि अन्न) करता एवा पण बीजाने (न समणुजाणामि) सारो नहीं जाणु एटले अनुमोदना नहीं आपु. ( मते) हे भगवन् ! (तस्स ) ते सावधयोगथी ( पडिकमामि ) हुँ पालो भमयसूत्र संस्कृतानुः बाद सहित ॥५७॥ गुजरावी भाषांतर फरूं छु, ( निंदामि ) आत्मसाचीए निंदु छु, ( गरिहामि ) गुरुनी समक्ष गर्दा करूं छु, (अप्पाणं ) सावद्यकर्म कर- नारा मारा प्रात्माने ( वोसिरामि ) हुं वोसरा, छं एटले तनुं छु. १. चत्तांरि मंगलं, अरिहंता मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलिपन्नत्तो धम्मो मंगलं ॥ २॥ (चत्वारो मङ्गलम्, अर्हन्तो मङ्गलम्, सिद्धा मङ्गलम्, साधचो मङ्गलम्, केवलिप्रज्ञप्तो धर्मो मङ्गलम् ।। २॥) ( चत्तारि ) चार पदार्थो ( मंगलं ) मंगळरूप छे. ते ज कहे छे.-(अरिहंता) अर्हतो (मंगलं) मंगळरूप छे, (सिद्धा) सिद्धो ( मंगलं ) मंगळरूप छ, ( साहू मंगलं ) साधुओ मंगळरूप छ, तथा ( केवलिपन्नत्तो ) केवळी भगवंते प्ररूपेलो- कहेलो ( धम्मो) श्रुत भने चारित्ररूप धर्म ( मंगलं ) मंगळरूप छे. २ चत्तारिलोगुत्तमा, अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगुत्तमा, साहू लोयुत्तमा, केवलिपन्नत्तो धम्मो लोगुत्तमो॥३॥ (चत्वारो लोकोत्तमाः, अर्हन्तो लोकोत्तमाः, सिद्धा लोकोत्तमाः, साधवो लोकोत्तमाः, केवलिमज्ञप्तो धर्मो लोकोत्तमः ॥३॥) (चत्तारि) चार पदार्थों ( लोगुत्तमा) लोकोत्तम एटले लोकमां उचम छे. ते ज कहे छे-(अरिहंता) अहतो (लो- गुत्तमा ) लोकोत्तम छे, (मिद्धा ) सिद्ध भगवानो (लोगुत्तमा ) लोकोत्तम छ, ( साहू ) मुनिमहाराजाभो (लोगुत्तमा) लोकोत्तम छे, तथा ( केवलिपमतो) केवळी भगवंते प्ररूपेलो (धम्मो ) धर्म ( लोगुत्तमो) लोकोत्तम छे. ३. ।। ५७॥
चत्तारि सरणं पवजामि, मरिहते सरणं पवजामि, सिद्धे सरणं पवजामि, साहूसरणं पवज्जामि,
केवलिपन्नत्तं धम्म सरण पवजामि ॥४॥
(पतुरः शरण प्रपये, अर्हतः शरणं प्रपये, सिद्धान् शरणं प्रपद्ये, साधून शरण प्रपद्ये, केवलिप्रज्ञप्तं
धर्म शरण मपये ॥४॥)
(चसारि ) चारनु ( सरण ) सरण (पवजामि) हु अगीकार करु छु, ते ज कहे छ-(अरिहते) अरिहतोनु (सरण)
शरण ( पक्जामि) हु स्त्रीकारु छु, (सिद्धे सरण पवजामि ) हु सिद्धोनु शरण स्वीकारु छु, ( साहू सरण पवजामि) हु
साधुमोनु शरण स्वीकारु छु तथा (केवलिपनत्त धम्म सरण पवजामि) केवलीमगवते प्ररूपेला धर्मनु हु शरण स्वीकारु छु. ४.
इच्छामि पडिक्कमिड जो मे देवसिओ अइआरो को काइओ वाइओ माणसिओ उस्सुत्तो
उम्मग्गो अकप्पो अकरणिज्जो दुज्झाओ दुविचिंतिओ अण्णायारो अणिच्छियव्यो असमणपाउग्गो
नाणे दंसणे चरिते सुए सामाइप, तिण्हं गुत्तीणं, चउण्ह कसायाणं, पंचण्ह महव्वयाणं, छण्हं जी-
वनिकायाणं, सत्तण्ह पिडेसणाण, अटुण्डं पवयणमाऊणं, नवण्हं वभचेरगुत्तीण, दसविहे समण-
धम्मे समणाणं जोगाणं, ज खडिअ जं विराहिलं तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥ ५॥
गुजराती
भाषांवर
संस्कृतानु
बाद सहित
॥ ५८॥
(इच्छामि प्रतिक्रमितुं यो मया दैवसिकोऽतिचारः कृतः कायिको वाचिको मानसिकः उत्सूत्र उन्मार्गः
अकल्प्योऽकरणीयो दुातो दुर्विचिन्तितोऽनाचारोऽनेष्टव्योऽश्रमणप्रायोग्यः ज्ञाने दर्शने चारित्रे श्रुते
सामायिके, तिसृणां गुप्तीनां, चतुर्णा कषायाणां, पञ्चानां महावतानां, पण्णांजीवनिकायानां, सप्तानां पि-
ण्डैषणानामष्टानां प्रवचनमातृणां, नवानां ब्रह्मचर्यगुप्तीनां, दशविधे अमणधर्म श्रमणानां योगानां, यत्
खण्डितं यद्विराधितं तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ ५॥)
( इच्छामि पडिकमिउं) हुँ प्रतिक्रमण करवाने-पाछो फरवाने इच्छु छु. ( जो ) जे ( मे ) में ( देवसिमो) दिवस-
संबंधी ( भइआरो) अतिचार (कओ) कर्यो होय, केवो ? ( काइमो) कायासंबंधी. (वाइओ) वागीसंबंधी, (माण-
सिमो) मनसंबंधी, ( उस्सुत्तो) उत्यत्र संबंधी एटले सूत्रमा नहीं कहेलो, एज कारण माटे (उम्मग्गो) उन्मार्गसंबंधी,
एज कारण माटे (भकप्पो ) चरण-करणरूप कल्प जे भाचार तेनाथी रहित. एज कारण माटे (भकरणिजो) नहीं
करवा लायक, (दुज्झामो ) दुर्ध्यान करेलो, ( दुन्विचिंतिओ) दुष्ट रीते विचारेलो, ( प्रणायारो ) साधुने नहीं भाचरवा
लायक, (भणिच्छियचो) नहीं इच्छ्वालायक तथा (असमणपाउग्गो) साधुने नहीं लायक एवो अतिचार लाग्यो होय
क्यों ? ( नाणे ) ज्ञानने विषे, (दसणे ) दर्शनने विपे, (चरित्ते) चारित्रने विपे, (सुए ) श्रुतने विगे तथा ( सामाइए)
सामायिकने विषे जे भतिचार लाग्यो होय, तेम ज (तिण्हं गुत्तीणं ) त्रण गुप्तिसंबंधी, (चउण्हं कसायाणं ) चार कपाय-
संबंधी ( पञ्चणं महव्वया) पांच महाव्रतसंबंधी, (छहं जीवनिकायार्थ) छजीवनिकायसंबंधी, ( सत्तण्हं पिंडे-
॥५४॥
सणास्थ ) सात प्रकारनी पिंडैपणासंबधी (अट्ठण्ह पवपणमाउण) माठ प्रवचनमातासमधी, (नवण्ह बमचेरगुत्तीण
नव प्रकारे ब्रह्मचर्यनी गुप्तिसवधी, ( दसविहे समणधम्मे ) दश प्रकारना साधुधर्मसंबधी ( समणाण जोगाण) ए सर्व
साधुमोना योगोने मध्ये (ज) जे कांह (खडिय) देशथी भाग्यु होय तथा (ज) जे काह (विराहिल ) सर्व प्रकारे
मांग्यु होय (तस्स ) ते अतिचारसरधी (मि) मारु (दुकड ) पाप (मिच्छा) मिथ्या एटले फोगट थाओ. ५.
इच्छामि पडिकमिउ इरियावहियाए विराहणाए० जाव तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥ ६॥
(इच्छामि प्रतिक्रमितु ई-पथिकाया विराधनायां यावत् तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥६॥)
(इच्छामि पडिक्कमिउ ) हु प्रतिक्रमवाने इच्छु छु (इरियावहियाए ) ईर्यापथिकीसबधी (विराहणाए) विराधनाने
विपे जे अतिचार लाग्यो होप (नहीं इरियावही आसा बोलवा ) पछी ( तस्स ) ते अविचारसवधी (मि) मारु (दुक्कड)
पाप (मिच्छा) मिथ्या थामो
इच्छामि पडिक्कमिड पगामसिजाए निगामसिज्जाए संथाराउवट्टणाए परियहणाए आउंटणाए
पसारणाए छप्पईसघट्टणाए कूइए ककराईए छीए जंभाइए आमोसे ससरस्कामोसे आउलमाउ
लाए सोअणवत्तिाए इत्थीविप्परिआसिआए दिट्ठीविप्परिमासिआए मणविपरिआसिमाए पाण-
भोअणविप्परियासिआए जो मे देवसिओ अईआरो को तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥७॥
भमणसूत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर
बाद सहित
॥ ५९॥
( इच्छामि प्रतिक्रमितुं प्रकामशय्यया निकामशय्यया संस्तारकोद्वर्तनया परिवर्तनया आकुञ्चनया
प्रसारणया षट्पदीसंघटनया कूजिते कर्करायिते क्षुते जृम्भिते श्राम सरजस्कामर्षे अाकुलाकुलया स्वाम-
त्ययया स्त्रीविपर्यासिक्या दृष्टिविपर्यासिक्या मनोविपर्यासिक्या पानभोजनविपर्यासिक्या यो मया देव-
सिकोऽतिचारः कृतः तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ ७॥)
( इच्छामि पडिक्कमि) हुं ते अतिचारोथी प्रतिक्रमवाने-पाछो करवाने इच्छु छु. ले अतिचारो क्या ? ते कहे छे-
( पगामसिजाए ) प्रकाम एटले अत्यंत अर्थात् रात्रिना चार पहोरसुधी सुवावडे करीने अथवा विहारना अमी दिवसे
पण सुवावडे करीने अथवा अधिक उपकरणवाळा संथारावडे करीने, तथा (निगामसिजाए ) हमेशा ते ज प्रकामशय्याए
करीने, तथा ( संथाराउवट्टयाए ) संथाराने विष डावा पासाथी जमणे पासे फरवावडे करीने, तथा ( परियणाए)
जमणा पासाथी डावे पासे फरवावडे करीने, तथा ( पाउंटणाए) हाथ-पग विगेरे अंग संकोचवावडे करीने, तथा ( पसार-
णाए) अंग प्रसारवावडे करीने, या सर्व क्रियामो पुंज्या विना करवाथी अतिचार लागे छे तथा (छप्पईसंघटणाए ) जू
विगेरेने प्रविधिथी संघट्ट-स्पर्श करवावडे करीने जे अतिचार लाग्यो होय, तथा ( कूइए ) उघाडे मुखे खांसी करे सते,
तथा ( ककराईए) कचकच शब्द करती शय्या सते, तथा (बीए) उघाडे मुखे छींक साधे सते, तथा (जंभाइए )
उघाडे मुखे बगासु खाधे सते, तथा ( भामोसे ) अविधिए पुंज्या विना भूमि विगेरेनो हाथवडे स्पर्श करे सते, तथा ( स.
सरकामोसे ) रजवाळी पृथ्वी विगेरेने पुंज्या विना स्पर्श करे सते जे अतिचार लाग्यो होय, तथा सुता थका (सोश्रणव-
॥ ५९॥
चिपाए) स्वमना निमित्तवाळी (आउलमाउलाए) माकुळव्याकुळताए करीने एटले स्त्री आदिकना भोगे भने विवाह तथा युद्धादिकनी सामग्रीना स्पर्शथी उत्पम थयेली भाकुळव्याकुळताए करीने जे अतिचार लाग्या होय, तथा (इत्याविपरियासिाए ) बीना विपर्यासथी एटले (स्वमादिका) मैथुन सेववाथी उत्पन्न थयेली, तथा (दि- ट्ठीविपरियासिमाए) दृष्टिना विपर्यासपी एटले स्त्री विगेरेने रागदृष्टिए जोवाथी उत्पन्न थयेली, तथा (मणविपरिआसिभाए) मनना विपर्यासथी एटले सीने देखी मननो विकार थवाथी उत्पम थयेली, तथा (पाणमोअणविपरिश्रासिमाए ) पान भने मोजननो विपर्यास एटले रात्रिए पानभोजन करवानी इच्छाथी उत्पन्न थयेली आकुळव्याकुळतावडे करीने (जो) जे (मे ) में ( देवसियो) दिवस सवधी ( भइमारो) प्रतिचार (को) को होय (वस्म) तेनु (दुकड) दुष्कत- पाप (मे) मारे (मिच्छा) मिथ्या थारो-ते अतिचारसबधी मारुं पाप मिथ्या यात्रो. ७. हवे गोचरीना अतिचारो कहे के पडिकमामि गोचरचरिआए भिकायरिआए उग्घाडकवाडउग्घाडणाए साणावच्छादारासंघट्ट- णाए मंडीपाहुडियाए बलिपाहुडियाए ठवणापाहुडियाए सकिए सहसागारिए अणेसणाए (पारणेस णाए) पाणभोअणाए वीअभोणाए हरिअभोणाए पच्छाकम्मिाए पुरेकम्मिमाए अदिट्ठहडाए १ मा पद फेटलाफ मूळ प्रथोमा लभ्य छ परतु पूर्व टीकाकारे वथा घालावयोधकार श्रीज्ञानविमलसूरीश्वरे या पदनी व्याख्या करी थी
श्रमणभत्र
संस्कृतानु-
गुजराती
भाषांतर
वाद सहित
॥६०।।
दगसंसट्ठहडाए रयसंसट्ठहडाए पारिसाडणिआए पारिद्वावणिआए ओहासणभिरकाए जं उग्गमेणं
उपायणेसणाए अपरिसुद्धं पडिग्गहिअं परिभुत्तं वाजं न परिट्ठवि तस्स मिच्छा मि दुकडं ॥८॥
(प्रतिकमामि गोचरचर्यायां भिक्षाचर्यायामुघाटकपाटोघाटनया श्ववत्सदारकसंघद्दनया मण्डी-
प्राभृतिकया यलिप्राभृतिकया स्थापनामाभृतिकया शङ्किते सहसाकारिकेऽनेपणया (पानैषणया) प्राणिभो-
जनया वीजभोजनया हरितभोजनया पश्चात्कर्मिकया पुरस्कर्मिकयाऽदृष्टाहृतया उदकसंसृष्टाहृतया रजःसं-
सृष्टाहृतया पारिसाटनिक्या (पारिशातनिक्या) पारिष्ठापनिक्या श्रोहासनभिक्षया यत् उद्गमेन उत्पादन-
पणयाऽपरिशुद्ध प्रतिगृहीतं परिभुक्तं वा यन्न परिष्ठापितं तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ ८ ॥)
( गोचरचरिआए ) गायना चरवानी जेवी जे चर्या-फरवू ते गोचरचर्या तेने विषे तथा ((मिरकायरिआए) भिक्षा-
चर्याने विषे मने जे अतिचार लाग्यो होय तेने ( पडिकमामि ) हुँ पडिकमु छु-आलोवू छं. गोचरीमा अतिचार शी रीते
थाय ? ते उपर कहे छे-( उग्घाडकवाडउग्घाडणाए ) काइक ढोकला कमाउने पुंज्या विना उघाडवावडे करीने, तथा
(साणावच्छादारासंघट्टणाए ) कुतरो, वाछरडो अने बाळकना संघहाए करीने, तथा ( मंडीपाहुडियाए ) ढांकणी के बीजा
पात्रमा प्रथम भात विगैरे काढीने जे अपाय ते मंडीप्राभृतिका कहेवाय छे ते वडे करीने, तथा (बलिपाहुडिमाए ) चारे
दिशामा अथवा भनिमा प्रथम पळिदान नांसीने पछी जे मिक्षा मापे ते बलिप्राभृतिका कन्पे नहीं तेथी तेवडे करीने, तथा
है ॥६॥
(ठवमापाडिमाए) भिक्षुकोने माटे जुदी स्थापन करी राखेली भिक्षा कन्पे नहीं छतां ते लेवावडे करीने, तथा (सकिए) भाषाकर्मादिकनी शकावाळी भिषा ग्रहण करवावडे करीने, वथा (सहसागारिए) सहसात्कारे-उतावळे अकल्पनीय लेवावडे करीने थयेली जे (भोसणाए ) अनेपणा तेवडे करीने, तथा (पाणमोमयाए) जे मोजनमा लेता के देवां प्राणीमोनी वि- राधना थाय एवी भिक्षावडे करीने, तथा (धीमभोषणाए) जे मोजनमा वीजनी विराधना थाय एवी मिधावडे करीने, तथा ( हरिप्रमोमणाए )जे मोजनमा हरित तृण (लीला तण) नो सघट्टो थतो होय एवी मिक्षा लेवावडे करीने, तथा (पच्छाकम्मिमाए) भिक्षा माया पछी काचा जळवडे वहोरावनारे हाथ विगेरे घोवाथी पश्चात्कर्म लागे छे एवी क्रिया जे भिषा लेता लागे तेवडे करीने, तथा (पुरेकम्मिमाए ) भिक्षा प्राप्या पहेला हाथ विगैरे धौवे ते पुरस्कर्म कहेवाय के वी मिधावडे करीने, तथा (अहिडाए) घरनी अदर रहेली वस्तु जोया विना प्राणी होय ते लेवावडे करीने, तथा (दग- ससहडाए) जळना स्पर्शवाळी भाणेली भिक्षा लेवावडे करीने, तथा (स्यससट्ठहडाए ) रजना स्पर्शवाळी आणेली मिक्षा लेबापडे करीने, तथा ( पारिसाइणिपाए ) मनना कणीया अथवा घी विगेरेना विंदु पडता होय एवी भिक्षा लेवापडे करीने, वथा (पारिहापणियाए ) देवाना पात्रमा अकल्प्य वस्तु रहेली होय ते काढी नांखीने ते पात्रवडे जे भिक्षा मापे ते लेवावडे करीने, तथा (मोहासणभिरकाए) कोइ पण वस्तु मागीने लेवी ते श्रोहासण कद्देवाय छ, एवी भिषा लेवावडे करीने तथा (ज) जे काइ यस्तु (उग्गमेण) भाषाकर्मादिक उद्गमना दोपे करीने तथा (उप्पायणेसणाए) धात्री आदि उत्पा- दनाना दोपे करीने वथा शकितादि एपणाना दोषे करीने (अपरिसुद्ध) अशुद्ध थयेली होय ते ( परिग्गहिम) में ग्रहण अमवस्त्र संस्कृतानु- गुजराती भाषांतर वाद सहित है करी होय (परिमुत्तं वा) अथवा खाधी-वापरी होय तथा (जं न परिद्वविध) जे वस्तु परठवा योग्य होय छतां न परठवी (वापरी) होय तेक्डे जे भतिचार उत्पम थया (तस्स मिच्छामि दुकडं) ते अतिचारसंबंधी मारुं दुष्कृत-पाप मिथ्या थाओ.८. पडिकमामि चाउक्कालं सज्झायस्स अकरणयाए, उभओकालं भंडोवगरणस्स अप्पडिलेहणाए दुप्पडिलेहणाए अप्पमज्जणाए दुप्पमजणाए अइक्कमे वइक्कमे अइयारे अणायारे जो मे देवसिओ अइमारो को तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥९॥ ( प्रतिक्रमामि चतु:कालं स्वाध्यायस्य अकरणेन, उभयकालं भाण्डोपकरणस्याप्रतिलेखनया, दुःप्र- तिलेखनयाऽप्रमार्जनया दुम्ममार्जनयाऽतिक्रमे व्यतिक्रमेऽतिचारेऽनाचारे यो मया दैवसिकोऽतिचारः कृत- स्तस्य मिथ्या मे दुष्कृतम् ॥ ९॥) (पडिकमामि) ९ ते अतिचारने पडिकमुं छु. क्या अतिचार ? (चाउकालं ) चार काळ एटले दिवसना पहेला भने रात्रिना छेल्ला चे एम चार पहोरने विषे ( सज्झायस्स ) स्वाध्याय करवो जोइए ते सूत्र पौरुषीने विपे (मकरणयाए ) नहीं करवावडे करीने जे अतिचार लाग्या होय, तथा (उमओ कालं ) बे काळ एटले दिवसनी पहेली तथा छेल्ली पोरसीने विषे (मंडोवगरणस्स) वस्त्र-पात्रादिक मांडोपकरणनी (अप्पडिलेहणाए) पडिलेहणा नहीं करवावडे करीने एटले मूळथी ज दृष्टिवडे नहीं जोवावडे करीने, तथा ( दुप्पडिलेहणाए ) दुष्प्रतिलेखनावडे करीने एटले सारी रीते नहीं जोवाए करीने, तथा (अप्पमजवार) रजौहरणादिकथी प्रमार्जन नहीं करवावडे करीने, तथा (दुप्पमअणाए) दुष्प्रमार्जनवडे करीने एटले विधि- रहित जेम देम प्रोछु-वधतुं प्रमार्जन करवावडे करीने में जे अतिचार कर्या होय, तथा (महकमे) अतिक्रमने विषे, (वइकमे) व्यतिक्रमने विपे, (अइबारे ) अविचारने विषे अने ( प्रणायारे) अनाचारने विषे (जो) जे (मे) में (देवसियो) दिवस- सबधी ( इमारो) अतिचार (कमो) कर्या होय ( तस्स मिच्छा मि दुक्कड ) ते अतिचारसबधी मारु दुष्कृत मिथ्या थाप्रो. अहीं अतिक्रम विगेरेनु स्वरूप मा प्रमाणे जाणवु-आधाकर्मादिक दोपवाळा आहारमाटे निमत्रण करे सते ते लेवानी इच्छा जणाववाथी भतिक्रम थाय छे, लेवा जता व्यतिक्रम थाय छे, लीधे सते अतिचार थाय के अने भोजनने माटे हाथमा कवळ प्रहण करे सते अनाचार थाय छे ९. (आ प्रमाणे दरेक बाबतमा अतिक्रमादिकनो अर्थ समजत्रो). मा भतिचार सक्षेपथी एक प्रकारे छ भने विस्तारथी अनेक प्रकारे छे, तेमा एक प्रकारची मारमीने केटलाक प्रकारो कहे थे. पडिकमामि एगविहे असंजमे ॥ १०॥ (प्रतिक्रमामि एगविधेऽसंयमे ॥१०॥) ( एगविहे ) एक प्रकारना (असंजमे) अविरतिरूप असयमने विषे (पडिकमामि ) हु पडिकमु छु-पाछो फरु छु, अर्थात् एक प्रकारना असयमने विष में जे अतिचार कर्या होय ते संबंधी मारु दुष्कृत मिथ्या थाो. पा रीते सर्व ठेकाणे जाणवु १०.
श्रमयपत्र
संस्कृतानु
पाद सहित
गुजरावी
भाषांवर
॥६२॥
पडिक्कमामि दोहिं बंधणेहिं रागबंधणेणं दोसबंधणेणं । पडिकमामि तिहिं दंडेहिं मणदंडेणं
वयदंडेणं कायदंडेणं । पडिकमामि तिहिं गुत्तीहि मणगुत्तीए वयगुत्तीए कायगुत्तीए । पडिकमामि
तिहिं सल्लेहिं मायासल्लेणं नियाणसल्लेणं मिच्छादसणसल्लेणं । पडिकमामि तिहिं गारवेहि इड्डीगार-
वेणं रसगारवेणं सायागारवणं ॥ ११ ॥
(प्रतिक्रमामि द्वाभ्यां बन्धनाभ्यां रागवन्धनेन द्वेषयन्धनेन । प्रतिक्रमामि त्रिभिदण्डः मनोदण्डेन
वाग्दण्डेन कायदण्डेन । प्रतिक्रमामि तिमृभिप्तिभिः मनोगुप्त्या वागगुप्त्या कायगुप्त्या। प्रतिक्रमामि
त्रिभिः शल्यैः मायाशल्येन निदानशल्येन मिथ्यादर्शनशल्येन । प्रतिकमामि विभिगौरवैः ऋद्धिगौरवेण
रसगौरवेण सातगौरवण ॥ ११ ॥)
( पडिकमामि ) कहेचाशे एवा अतिचारने हुँ पडिकमु छं. ते भतिचारने ज बतावे के.-(दोहिं बंधणेहि ) चे बंधन-
वडे करीने जे भतिचार लाग्या होय, ते वे बंधन कहे के-( रागवंधणेणं) रागना बंधनवडे करीने, तथा (दोसबंधणेणं)
द्वेपना बंधनवडे करीने तथा ( पडिकमामि ) हुं पडिकमं छु ( तिहिं दंडेहिं ) प्रण दंडवडे करीने एटले के ( मणदंडेणं )
मनदंडवडे करीने, ( वयदंडेणं ) वचनदंडवडे करीने अने ( कायदंडेणं ) कायदंडवडे करीने जे अतिचार थया होयः तथा
(पडिक्कमामि ) ई पडिक{ छु ( तिहिं गुत्तीहिं ) त्रण गुसिवडे करीने एटले (मणगुत्तीए) मनगुप्तिवडे करीने, (वयगुत्तीए)
॥१२॥
वचनगुप्तिवडे करीने मने ( कायगुत्तीए ) कायगुप्तिवडे करीने (ते प्रमाणे गुस न रहेवाथी) जे अतिचार थया होय; तथा (पडिकमामि) हु पहिक्म छु (विहिं सनेहि ) त्रण शन्यवहे करीने एटले ( मायामश्रेण ) मायाशन्यवडे करीने, (नियाण- सम्प्रेण ) निदानशन्यवडे करीने अने (मिच्छादसयसनेण ) मिथ्यादर्शनशल्यवडे करीने जे अतिचार कर्या होय; तथा (पडिकमामि) हु पडिकम छु (विहिं गारवेहि ) प्रण गारववडे करीने एटले (ड्डीगारवेणं) ऋद्धिगारवे करीने, ( रसगार- वेण) रसगारवे करीने भने (सायागारपेण ) सातागारवे करीने मारावडे जे भतिचार कराया होय ते अतिचारसबधी मारु दुम्कत मिथ्या थायो. ११ पडिकमामि तिहि विराहणाहिं नाणविराहणाए दसणविराहणाए चरित्तविराहणाए । पडिक- मामि चाहिं कसाएहि कोहकसाएणं माणकसाएणं मायाकसाएणं लोहकसारणं । पडिकमामि चउहि सणाहि आहारसपाए भयसलाए मेहुणसमाए परिग्गहसमाए । पडिकमामि चउर्हि वि- कहाहि इथिकहार भत्तकहाए देसकहाए रायकहाए । पडिकमामि चडहिं झाणेहिं अट्टेणं झाणेणं रुदेण झाणेण धम्मेणं झाणेण सुकेणं झाणेण ॥ १२ ॥ (प्रतिक मामि तिमभिर्विराधनाभिः ज्ञानविराधनया दर्शनचिराधनया चारित्रविराधनया। प्रतिक-
गुजराती
भाषांतर
भमणसूत्र
संस्कृवानु
बाद सहित
॥ ६३ ।।
मामि चतुर्भिः कषायैः क्रोधकषायेण मानकषायेण मायाकषायेण लोभकषायेण । प्रतिक्रमामि चतुसृभिः
संज्ञाभिः आहारसंज्ञया भयसंज्ञया मैथुनसंज्ञया परिग्रहसंज्ञया । प्रतिक्रमामि चतमृभिः विकथाभिः स्त्री-
कथया भक्तकथया देशकथया राजकथया। प्रतिक्रमामि चतुर्भिानः आर्तेन ध्यानेन रौद्रेण ध्यानेन
धर्येण ध्यानेन शुक्लेन ध्यानेन ॥ १२ ॥)
(पडिकमामि ) हुं पडिकमुं छं (तिहिं विराहणाहिं ) पण विराधनाए करीने एटले (नाणविराहणाए) ज्ञाननी वि-
राधनाए करीने, (दसणविराहणाए ) दर्शन एटले समकितनी विराधनाए करीने अने ( चरित्तविराहणाए) चारित्रनी चि-
राधनाए करीने जे अतिचार मने लाग्या होय; तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमु छु ( चउहिं कसाएहिं ) चार कपायवडे
करीने एटले ( कोहकसाएणं ) क्रोध कपायवडे करीने, ( माणकसाएणं) मान कपायवडे करीने, (मायाकसाएणं) माया
कपायवडे करीने भने ( लोहकसाएणं ) लोभ कपायवडे करीने जे मने अतिचार लाग्या होय; तथा (परिकमामि) हुँ
पडिकमु छ (चउहि सणार्षि) चार संज्ञावडे करीने एटले (पाहारमणाए) माहारसंज्ञावडे करीने, (भयसणाए)
भयसंज्ञावडे करीने, ( मेहुणसणाए ) मैथुनसंज्ञावडे करीने अने ( परिग्गहसपाए ) परिग्रहसंज्ञावडे करीने जे मने अतिचार
लाग्या होय; तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमु छ ( चउहि विकहाहिं ) चार विकथावडे करीने एटले (इत्थिकहाए )
स्त्रीकथावडे करीने, ( भत्ततहाए ) भोजननी कथावडे करीने, (देसकहाए ) देशनी कथावडे करीने अने ( राजकहाए)
राज्यनी कथा करवावडे करीने मने जे अतिचार लाग्या होय तथा (पडिकमामि) हुँ पडिक, छु (चउहि झाणेहिं )
॥ ६३॥
चार ध्यानवडे करीने एटले (भट्टैण झाणेण ) मार्तध्यान करवावडे करीने, (रुदेणं झाणेण ) रौद्रध्यान ध्यावावडे करीने, (धम्मेण गाणेण) धर्मध्यान नहीं ध्यावावडे करीने अने (मुक्केण झाणेण) शुक्रध्यान नहीं घ्यावावडे परीने जे अतिचार माराधी कराया होय ते अतिचारमधी मारु दुष्कृत मिथ्या थाभो. १२ पडिक्कमामि पचहि किरियाहिं काइयाए अहिगरणियाए पाउसिमाए पारितावणिमाए पाणा- इवायकिरिमाए ।। १३ ।। (प्रतिक्रमामि पञ्चभिः क्रियाभि कायिक्या अधिकरणिक्या माद्वेषिक्या पारितापनिक्या प्राणाति- पातक्रियया ॥ १३ १) (पडिकमामि ) पडिकमु छु (पंचहि किरिबाहिं ) पांच प्रकारनी क्रिया करवावडे करीने एटले (काइयाए) कायाथी थती गमनादिक क्रिया करवायडे परीने, (अहिगरणियाए) खड्गादि शस्त्ररूप अधिकरणथी थती क्रिया करवावडे करीने, ( पाउसिभाए) जीव अने अजीवउपर द्वेषरूप क्रिया करवावडे करीने, (पारितावशिमाए) पोताने अथवा परने सताप उपजावनारी क्रिया करवावडे करीने तथा (पाणाइवायकिरिभाए) प्राणातिपात-जीवहिंसारूप क्रिया करवावडे करीने माराथी जे अतिचार थया होय ते अतिचारसरधी मार दुष्कृत मिथ्या धामो १३ पडिकमामि पचर्हि कामगुणेहिं सद्देण रूवेणं रसेणं गंधेणं फासेणं । पडिकमामि पचहि मह-
-
गुजराती
भाषांतर.
धमणवत्र
संस्कृतानु
व्वएहिं पाणाइवायाओ वेरमणं मुसावायाओ वेरमणं अदिन्नादाणाओ वेरमणं मेहुणाओ वेरमणं
परिग्गहाओ वेरमणं । पडिकमामि पंचहिं समिईहिं इरियासमिईए भासासमिईए एसणासमिईए
आयाणभंडमत्तनिखेवणासमिईए उच्चारपासवणखेलजल्लसिंघाणपारिट्ठावणिआसमिईए ॥ १४ ॥
(प्रतिक्रमामि पञ्चभिः कामगुणैः शब्देन रूपेण रसेन गन्धेन स्पर्शेन । प्रतिक्रमामि पञ्चभिर्महाव्रतैः
प्राणातिपाताद्विरमणं मृषावादाद्विरमणमदत्तादानाद्विरमणं मैथुनाद्विरमणं परिग्रहाद्विरमण। प्रतिक्रमामि
पञ्चभिः समितिभिः ईसिमित्या भाषासमित्या एषणासमित्या भाण्डमात्रादाननिक्षेपणासमित्या
उच्चारप्रस्रवणखेलजल्लसिंघाणपारिष्ठापनिकासमित्या ॥१४॥)
(पडिक्कमामि ) हुँ पडिक, छु. (पंचहि कामगुणेहिं ) पांच प्रकारना शब्दादिक कामरूपी गुणोवडे एटले (सदेणं)
शब्दवडे करीने, (रूवेणं ) रूपवडे करीने, ( रसेणं ) रसवडे करीने, (गंधेणं ) गंधवडे करीने तथा ( फासेणं ) स्पर्शवडे
करीने आ पांचे इंद्रियोना विषयोए करीने निषिद्ध आचरण विगेरे करवाथी मने जे अतिचार लाग्या होय; तथा (पडि-
कमामि ) हुं पडिकलं छु (पंचहिं महव्वएहिं ) पांच महाव्रतोए करीने एटले (पाणाइवायाओ वेरमणं) प्राणातिपातथी
एटले जीवहिंसाथी विरम-निवर्त, (मुसावायाभो चरमणं) मृपावादी विरमवू, (अदिनादाणामो वेरमणं) भदत्तादान
( चोरी )थी विरमयु, ( मेहुणाभो वेरमणं ) मैथुनथी विरमवू अने (परिग्गहाओ वेरमणं) परिग्रहथी विरम. आ पांच
बाद सहित
॥४॥
॥६४॥
महाबतीने विषे कांह निषिद्ध माचरण करवायी मने जे भविचार लाग्या होय, तथा ( पडिकमामि) हु पडिसम छ (पचहि समिईहि ) पांच समितिए करीने एटले (इरियासमिईए ) ईयर्यासमितिए करीने, ( मासासमिईए) भाषासमिमितिए करीने, (एसणासमिईए) एपणाममितिए करीने, (आयाणभडमत्तनिस्केवणासमिईए ) मांडमान-पात्रादिनुं ग्रहण तथा मुकर्बु ए सबधी समितिए करीने तथा (उच्चारपासवणखेलजलसिंघाणपारिट्ठावणिभासमिईए) वडीनीति, लघुनीति, खेल-श्लेष्म, जल-शरीरनो मेल भने सिंघासा-नासिकानो मेल विगेरे परउववानी समितिए करीने-मा पांचे समिति पाळवामी प्रमादा- दिकने लीधे जे काइ माराथी अतिचार थया होय ते भतिचारसबधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थाो. १४ पडिक्कमामि छहिं जीवनिकाएहिं पुढविकारणं भाउकाएणं तेउकाएणं वाउकाएणं वणस्सइ- कारणं तसकारण । पडिक्कमामि छहिं लेसाहिं किन्हलेसाए नीललेसाए काउलेसाए तेउलेसाए पउमलेसाए सुक्कलेसाए । पडिकमामि सत्तहिं भयट्ठाणेहि ॥ १५॥ (प्रतिक्रमामि पद्भिः जीवनिकायैः पृथ्वीकायेन अप्कायेन तेजस्कायेन वायुकायेन वनस्पतिकायेन पसकायेन । प्रतिकमामि पड्मिा लेश्याभि कृष्णलेझ्यया नीललेश्यया कापोतलेश्यया तेजोलेश्पया पद्मले- श्यया शुक्ललेश्यया । प्रतिक्रमामि सप्तभिर्भयस्थानैः ॥ १५॥) (पडिकमामि) हु पडिकमु छु(बहिं जीवनिकाएहि ) छ जीवनिकाये करीने एटले (पुढविकारण) पृथ्वीकाये करीने, गुजराती भाषांवर भमरासूत्र संस्कृतानु- बाद सहित. ॥६५॥ (आउकाएणं) अप्काये करीने, (तेउकाएणं) तेजस्काये करीने, (वाउकारणं) वायुकाये करीने, ( वणस्सइकाएणं) पनस्पतिकाये करीने भने ( तसकाएणं ) त्रसकाये करीने अर्थात् आ छकायना संबंधां प्रतिषिद्ध आचरण करवाथी- ते जीवोने कीलामणा विगेरे उपजाववाथी मने जे भतिचार लाग्या होय; तथा (पडिकमामि ) हुं पडिकमुं (हिं ले साहिं ) छ लेश्यावडे करीने एटले (किन्हलेसाए ) कृष्णलेश्याए करीने, (नीललेसाए) नीललेश्याए करीने, ( काउ. लेसाए ) कापोतलेश्याए करीने, ( तेउलेसाए ) तेजोलेश्याए करीने, (पउमलेसाए) पद्मलेश्याए करीने अने (सुक्कलेसाए) शुक्लेश्याए करीने, आमां पहेली त्रण लेश्यानुं आचरण करवाए करीने अने छेल्ली प्रण लेश्यानुं आचरण नहीं करवाए करीने जे मने अतिचार लाग्या होय; तथा ( पडिक्कमामि ) हुँ पडिकमु छ ( सत्तहिं मयट्ठाणेहिं ) सात भयनां स्थानोबडे करीने माराथी जे काइ अतिचार थया होय ते भतिचारसंबंधी मारं दुष्कृत मिथ्या थामो. ते सात मय आ प्रमाणे-भालोक भय, परलोक भय, प्रादान भय, अकस्मात् भय, मरण भय, अकीर्ति-अपयश भय अने आजीविका भय. १५. भट्टहिं मयट्ठाणेहिं । नवहि वंभचेरगुत्तीहि । दसविहे समणधम्मे ॥ १६ ॥ (अष्टभिर्मदस्थानः । नवभिर्ब्रह्मचर्यगुप्तिभिः । दशविघे श्रमणधर्मे ॥ १६ ॥) (भट्ठहिं मयट्ठाणेहि ) आठ मदनां स्थानवडे करीने जे भतिचार लाग्या होय ते संबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या था एम सर्वत्र जाणवू. मदना भाठ प्रकार भा प्रमाणे-जातिमद, कुळमद, रूपमद, चळमद, लाभमद, श्रुतमद, तपमद भने ऐश्वर्यमद; तथा (नवहिं बंभचेरगुत्तीहिं) नव प्रकारनी ब्रह्मचर्यनी गुप्ति पाळवामा प्रमादथी जे भतिचार लाग्या होय,ते नव प्रकारनी ।। ६५॥
असपर्यगुप्ति प्राप्रमाणे-त्री, पशु भने नपुमकवाळी वसति न सेववी १ एकली स्त्रीसाये अथवा खीसंबधी कथा न करवी २. सीनी साथे एक भासने बेस नहीं अथवा स्त्री ज्या वेठी होय ते स्थाने थे षडी थया पहेला वेसवं नहीं ३. स्त्रीमोना अवयवो जोवा नहीं ४, मांतने भावरे रहेली स्त्रीना मोहकारक शब्दो सामळवा नहीं ५. चीनी साथे पूर्व जे क्रीडादिक कयु होय ते समारवु नहीं ६. प्रणीत भोजन-स्निग्ध आहार करवो नहीं ७ अत्यंत भाहार करवो नहीं ८ तथा शरीरनी विभूषा करवी नहीं ९, तथा ( दसविहे समणधम्मे ) दश प्रकारना साधुधर्ममा जे काह पतिचार लाग्या होय. दश प्रकार शा प्रमाणे-शांति (धमा ), मार्दव (मृता-निरभिमानता), मार्जव (सरलता), मुक्ति ( निर्लोमता ), तप, संयम, सत्य, शौच (प्रचौर्य ), अपरिग्रह भने ब्रह्मचर्य. १६ एगारसहिं उवासगपडिमाहिं ॥ १७॥ (एकादशाभा उपासकमतिमाभः ॥१७॥) (एगारसहि उवासगपडिमादि) भग्यार उपासकनी-श्रावकनी प्रतिमावडे करीने एटले ते प्रतिमा आधी कहेवा-कारववामा फेरफार थवाथी कांड पण अतिचार लाग्या होय. ते प्रतिमा श्राप्रमाणे-पहेली समकित प्रतिमा-तेमाएक मास सुधी अतिचार- रहित समकित पाळे १. बीजी व्रतप्रतिमा-तमा ये मास पहेली प्रतिमामा कहा उपरांत अतिचाररहित बार व्रतोनु पालन करे २. श्रीजी सामायिक प्रतिमा-तमा पूर्व कहेली क्रियासहित प्रण मास सुधी वझे काळ निरतिचार सामायिकसहित प्रतिक्रमण करे ३. चोथी पौषधप्रतिमा-तेमा पूर्वनी क्रियामहित चार मास सुधी चार पर्योने विषे एटले वे आठम अने के श्रमणसूत्र संस्कृतानु गुजराती भाषांतर वाद सहित ॥६६॥ चौदशे निरतिचार पौषध करे ४. पांचमी प्रतिमा नामनी प्रतिमा-तेमां पूर्वोक्त क्रियासहित पांच मास सुधी पौषपने दिवसे रात्रे दोपरहित कायोत्सर्ग करे, पांच मास सुधी स्नान न करे, रात्रे चतुर्विध आहारनो त्याग करे, दिवसे ब्रह्मचर्य पाळे अने रात्रिए मैथुननो परिमाण करे, पण पौपध होय त्यारे तो रात्रिए पण सर्वथा ब्रह्मचर्य पाळे ने कायोत्सर्ग करे ५. छठी ब्रह्मचर्य प्रतिमा-तेमां पूर्वोक्त क्रियासहित छ माससुधी रात्रि-दिवस निरतिचार ब्रह्मचर्य पाळे अने कच्छ धारण करे ६. सातमी सचित्तवर्जन प्रतिमा-तेमा पूर्वोक्त क्रियासहित सात माससुधी सचित्त आहारनो त्याग करे ७. माठमी भारंभ- वर्जन प्रतिमा-तेमां पूर्वोक्त क्रियासहित आठ माससुधी पोते कांह पण प्रारंभ-समारंभ करे नहीं ८. नवमी प्रेग्यवर्जन प्रतिमा-तेमा पूर्वोक्त क्रियासहित नव माससुधी बीजापासे पण आरंभ करावे नहीं ९. दशमी उद्दिष्टवर्जन प्रतिमा-तेमा पूर्वनी क्रियासहित दश माससुधी पोताने उद्देशीने करेलो आहारादिक ग्रहण न करे १०. अग्यारमी साधुभूत साधु जेवी प्रतिमा-तेमा पूर्वोक्त क्रियासहित भग्यार माससुधी मस्तके मुंडित थइ अथवा लोच करी श्रमणनी जेम विचरे, रजोहरण भने पात्र राखे अने पोतानी जातिमा विचरी भिक्षा मार्गाने खाय ११. (भा बधी श्रावकपणानी उत्कृष्ट करणी छे अने तेमा भागळनी प्रतिमामां पाछली बधी तो साथे राखबानी ज छे.) १७. बारसहि भिस्कुपडिमाहि ॥ १८ ॥ (द्वादशभिभिक्षुप्रतिमाभिः ॥ १८॥) (वारसहिं भिक्खुपडिमादि) भिजुनी-साधुनी बार प्रतिमा भाश्री कांह अतिचार थया होय, ते प्रतिमा मा प्रमाणे-पहेली प्रतिमा एक मासनी, मां अलेप भोजन ग्रहण करे अने आहारपाणीनी एक दत्ती प्रहण करे, बीजी चे मासनी, तेमांचे दत्ती ए रीते वर्ता सातमी सात मासनी, तेमा सात दत्ती ग्रहण करे. पाठमी सात अहोरागिनी, तेमा चौविहार उपवास फरे, गामनी बहार कायोत्सर्ग करे, उचानादिक भासने रही उपसर्गो सहन करे नवमी सात अहोराचिनी, तेमा उत्कटिका- सने अथवा दहासने रहे, चोविहार उपवास करे भने गाम बहार कायोत्सर्ग करी उपसर्ग सहन करे. दशमी सात अहोरा- विनी, तेमा पूर्वोक्त क्रियासहित गोदोहिकासने रहे अग्यारमी प्रतिमा एक अहोरात्रिनी, तेमा चोविहार छठ करे, गाम बहार कायोत्सर्ग करी उपसर्ग सहन करे पारमी प्रतिमामां चोविहार अट्ठम करी एक रापि ईपत्यागमारा शिला तरफ एकाग्र दृष्टि राखी कायोत्सर्ग करी उपसर्ग सहन करे.भा गधी प्रतिमामा अतिचाररहित प्रवृत्ति करवानी होय छे भा प्रतिमाउपर अदा न रासवी विगेरे पाश्री भतिचार लागे (१८) तेरसहि किरिपाठाणेहिं ॥ १९ ॥ (त्रयोदशभिः क्रियास्थानः ॥ १९॥) क्रियाना तेर स्थानको आश्री जे काइ अतिचार लाग्यो होय, ते स्थानको था प्रमाणे----अर्थक्रिया-प्रयोजन छते क्रिया करे ते १. अनर्थक्रिया-प्रयोजनविना क्रिया करे ते २ हिंसाकिया-आणे मारा स्वजनने मार्यो, हमणा मने मारे थे, भविष्यकाळे मारशे एम धारीने प्रवृत्ति करता जे क्रिया लागे ते ३ अकस्मातक्रिया-बीजाने मारतां वचमा चीजो मराय ते ४. दृष्टिविपर्यासक्रिया-मित्रने शत्रु मानपाथी भने शत्रुने मित्र मानवाथी जे क्रिया लागे ते ५. मृपाक्रिया- १२
गुजराती
भाषान्तर.
अमसासूत्र
संस्कृतानुः
वादसहित
॥ ६७॥
असत्य बोलवू ते ६. अदत्तादानक्रिया-प्रदत्तादान लेबु ते ७. पोतार्नु कोइ वाकुं बोलतुं न होय छतां मनमा शंका
राखीने दुभाय ते अध्यात्मिकीक्रिया ८. अभिमानथी बीजानी हीलना करता मानक्रिया ९. थोडो अपराध छतां वधारे दंड
आपे ते अमित्रक्रिया १०. कपटथी अन्यने छेतरवो ते मायाक्रिया ११. अत्यंत तृष्णा वधारवी ते लोभक्रिया अथवा
कामनो अर्थी पोतार्नु रक्षण करतो वीजाने इणे ते लोभक्रिया १२ तथा साधुने मार्गे चालतां जे तागे ते ईर्यापथिकी-
क्रिया कहेवाय छ १३. (१९)
चउद्दसहिं भूयगामेहिं । पन्नरसहि परमाहम्मिएहिं । सोलसहिं गाहासोलसएहिं । सत्तर-
सविहे असंजमे ॥२०॥
(चतुर्दशभिः भूतग्रामैः । पञ्चदशभिः परमाधार्मिकैः। षोडशभिः गाथाषोडशकैः । सप्तदशविधेऽसंयमे ॥२०॥)
( चउद्दसहिं भूयगामेहिं ) चौद प्रकारना भूतग्राम एटले प्राणी समुदाय तेने आश्री जे कांह अतिचार लाग्यो होय,
तथा ( पारसहिं परमाहम्मिएहिं ) पंदर परमाधार्मिकने शाश्री एटले तेमना पापनी अनुमोदना विगैरे करवाथी जे काइ
अतिचार लाग्यो होय, तथा ( सोलसहिं गाहासोलसएहिं ) सूयगडांगसूत्रना सोळ गाथाअध्ययने करीने एटले तेनो पाठ-
भभ्यास नहिं करवाथी जे अतिचार लाग्यो होय, तथा (सत्तरसविहे असंजमें) सत्तर प्रकारना असंजमने आश्रीने जे अतिचार
लाग्यो होय. अहीं चौद भूतग्राम भा प्रमाणे छे-सूक्ष्म एकेंद्रिय १, बादर एकेंद्रिय २, द्वींद्रिय ३, बींद्रिय ४, चतुरिंद्रिय ५,
॥६७॥
सझि पचेंद्रिय ६ भने असज्ञि पचेंद्रिय ७, ए सात पर्याप्ता तथा सात अपर्याप्ता मळी चौद थाय छै अथवा चौद गुण- स्थानके वर्तता जीवो चौद प्रकारे जाणवा. पदर परमाधार्मिकना नाम ,भा प्रमाणे-अव १, अपरीष २, शाम ३, सरल ४, रुद्र ५, उपरुद्र ६, काल ७, महाकाल ८, प्रसिपन ९, धनु १०, कुम ११, वालुक १२, वेतरणी १३, खरस्वर (घोष) १४ तथा महाघोप १५. सोळ गाथाध्ययनना नाम-स्वसमयपरसमयज्ञ १, वैतालिक २, उपसर्गपरिज्ञा ३, स्त्रीपरिज्ञा ४, नरकविभक्ति ५, वीरस्तव ६, कशीलभाषाज्ञा ७, वीतरजा ८, धर्ममार्ग ९, समाधि १०, समवसरण ११, पाहतहा १२, ग्रंथाध्ययन १३, सयममार्ग १४, मार्गाध्ययन १५ अने गाथाध्ययन १६. सत्तर प्रकारनो असयम मा प्रमाणे-पृथ्वीकाय असयम १, अप्काय असयम २, वेजस्काय असयम ३, वायुकाय असयम ४, वनस्पतिकाय भसयम ५, द्वींद्रिय भसयम ६, त्रींद्रिय प्रसयम ७, चतुरिंद्रिय असयम ८, पचेंद्रिय असयम ९, अजीव असंयम (पुस्तकादिकनो सघट्ट करवो विगेरे) १०, प्रेचा भसयम ११, उपेक्षा असयम १२, प्रमार्जना असयम १३, पारिष्ठापनिका असंयम १४, मन प्रसयम १५, वचन भसयम १६ अने काय असयम १७. (२०) अट्ठारसविहे अबभे । इगुणवीसाए नायज्झयणेहिं । वीसाए असमाहिट्ठाणेहिं ॥ २१ ॥ (अष्टादशविधेब्रह्मणि । एकोनविंशत्या ज्ञाताध्ययनैः । विंशत्याऽसमाधिस्थानः ॥ २१ ॥) (अट्ठारसविहे अवमे) अढार प्रकारना मनाना सेवनादिकने विषे, (इगुणवीसाए नायज्झयणेहिं) ओगणीश ज्ञाता- स्त्रना अध्ययनो पाठ-अभ्यास न करवावडे करीने, तथा (वीसाए असमाहिट्ठाणेहि ) वीश असमाधिना स्थानको सेववा-
श्रमणसूत्र
संस्कृतानु-
गुजरावी
भाषांतर
बाद सहित
॥६८॥
-
वडे करीने ज अतिचार लाग्यो होय. अढार प्रकारे अब्रह्म-मैथुन आ प्रमाणे-दिव्य अने औदारिकने मन, वचन अने
कायाए गुणतां छ भेद थाय, तेने करवू, करावईं अने अनुमोदg ए त्रणे गुणतां पढार भेद थाय छे. ओगणीश ज्ञाता-
सूत्रना अध्ययनो आ छ.-उत्क्षिप्त १, संघाड २, अंड ३, कूर्म ४, सेलक ५, तुंव ६, रोहिणी ७, मल्लिनाथ ८, माकंदी
९, चंद्रमा १०, दावद्रव ११, उदक १२, मंडूक १३, तेतलीपुत्र १४, नंदीफळ १५, अपरकंका १६, आकीर्णक १७,
सुसुमार १८ अने पुंडरीक १९. वीश असमाधिना स्थान आ छे. उतावळु चालवू १, अप्रमार्जित एटले अशपुंजे स्थाने
बेसबुं २, दुष्प्रमार्जित एटले सारी रीते नहीं पुंजेला स्थाने बेस ३, मोटो उपाश्रय होवाथी वीजा पण साधुओ आये तेनी
साथे कलह उत्पन्न थाय ते ४, आसन, पीठ, फलक विगैरे वधारे राखवां ते अथवा शेषकाळे पण पीठफलकादिक
पोतानी निश्राए राखवा ते ५, रत्नाधिक गुणवंतनी सायं बोले ६, ज्ञानवृद्धादिकनो उपघात करे ७, प्राणीनो उपधात करे
८, वारंवार कोप करे २, निरंतर क्रोधी रहे १०, पाछळथी अवर्णवाद बोले ११, क्षणे क्षणे नियवाळी भाषा बोले के
आ एम ज छ १२, अधिकरणनी उदीरणा करे १३, अकाळे स्वाध्याय करे १४, अस्थंडिल भूमिथी स्थंडिलभूमिमा जाने
पगर्नु प्रमार्जन न करे, रजवाळा हाथे भिक्षा ग्रहण करे अथवा अशुद्ध पृथीपर से के सुवे १५, विकाळे पण मोटा शब्द-
वडे बोले अथवा गृहस्थनी भाषा बोले १६, जेनी तेनी साथे कलह करे १७, झंझाकारी थाय एटले गच्छनो भेद करे १८,
घणुं भोजन करे, सवारथी सांज सुधी मोकळे मोढे खाय, अथवा प्रमादादिकथी देवद्व्यादिक खाय १९ तथा अनपणा-
समितिनो त्याग न करे २०, मा सर्व पोताने अने परने असमाधिना कारणरूप होवाथी असमाधिरूप छे. (२१)
॥१८॥
इकवीसाए सबलेहि ॥ २२ ॥ (एकविशत्या शयलैः ॥ २२॥) एकवीश शबळे करीने जे अतिचार, लाग्यो होय. शवल एटले चारित्रने कलुष करवाना हेतु. ते एकवीश मा प्रमाणे -हस्तकम कर ते १ सालवन मैथुन सेवे एटले अतिक्रम, व्यतिक्रम अने अतिचारखडे मैथुन सेवे २. सालंबन रात्रि- भोजन करे एटले रात्रे ग्रहण करेलु दिवसे खाय अने दिवसे ग्रहण करेलु राने खाय ३. भाषाकर्म भोजन करे अथवा हमेशा वे-प्रण वार खाय ४ राजपिंड ग्रहण करे ५. वेचातो लीधेलो पिंड ग्रहण करे ६. प्रामित्य दोषवाळो एटले उधारे लीघेलो आहार ले ७, सामो आणेलो पिंड ले ८ आच्छेद्य एटले कोइनु मांचकीने ले ९. पचरूखाण करेली वस्तु ले १० छ मासनी अदर एक गच्छथी वीजा गच्छमा जाय ११. एक मासमा प्रण वार नदी विगेरे जळाशयो उतरे १२ एक मासमा त्रण वार मात्रस्थान सेवे एटले मायाकपट करे १३ जाणी जोइने पृथ्व्यादिक जीवने हणे १४. जाणीने मृपावाद बोले १५. जाणीने अदचादान ले १६. प्रशुद्ध पृथ्वीउपर भासन विगैरे करे १७. आकुट्टिवडे मूळ, फळ विगेरे खाय १८. एक वरसमा दश चार उदक लेप करे एटले पात्रमा पाणीनो लेप रही जाय १९. एक वरसमा दश वार मावस्थान सेने एटले मायाकपट करे २० तथा काचा पाणीवान हाथे प्रापेलु भोजन विगेरे ग्रहण करे २१. मा सर्वे चारित्रने शबल एटले मलिन करे के (२२)
भमसूत्र
संस्कृतानु
गुजराती
भाषांतर.
बाद सहित
॥६९॥
बावीसाए परीसहहि ॥ २३ ॥
(द्वाविंशत्या परीपहः ॥ २३ ॥)
वावीश परीपहो न सहेवावडे करीने जे अतिचार लाग्यो होय. बावीश परीपदो भा थे-सुधा परीपह १,
पिपासा परीपह २, शीत परीपह ३, उष्ण परीपह ४, दंशमशक परीपह ५, अचेल परीपह ६, अरतिरति परीपह ७, स्त्री
परीपह ८, चर्या परीपह ९, निपधा परीपह १०, शग्या परीपह ११, आक्रोश परीपह १२, वध परीपह १३, याचना
परीपह १४, भलाम परीपह १५, रोग परीपह १६, तुणस्पर्श परीपद १७, मल परीपह १८, सत्कार परीषद १९, प्रज्ञा
परीपह २०, अज्ञान परीपह २१ भने सम्यक्त्व परीपह २२. (२३)
तेवीसाए सूअगडज्झयणेहिं । चउवीसाए देवेहिं । पणनीसाए भावणाहिं । छन्वीसाए
दसाकप्पववहाराणं उद्देसणकालेणं । सत्तावीसाए अणगारगुणेहिं ॥ २४ ।।
(अयोविंशत्या सूत्रकृताध्ययनैः । चतुर्विंशत्या देवैः । पञ्चविंशत्या भावनाभिः | पद्विशत्या
दशाकल्पव्यवहाराणामुदेशनकालैः । सप्तविंशत्याऽनगारगुणैः ॥ २४ ॥)
१ भरिइंतेहिं इति पाठांतरं. २ अर्हन्द्रिः इति वा पाठः ।
marwan-
॥ १९॥
तिवीसाए भगहमायोहि) सुयगडांमनों ग्रेवीश अध्ययनोए करीने (तनी विरुद्ध प्ररूपणादिकधी), तथा (चउवीसाए देवहि) चोवीश देवोए करीने (तेनी भाशातना विगैरे करवाधी) अथवा (मरिहतेहिं) एवो पाठ होय तो चोवीश अरिहते करीने (तेमनी भाशावना विगैरे करवाी), तथा (पणवीसाए मावणादि) पांच महाव्रतनी पचीश भावनाए करीने (भावना नहीं भाववाची), तथा (छब्बीसाए दसाकप्पववहाराण उद्देसणकालेण) दशाश्रुतस्कधनां दश अध्ययन, कल्प-जीतकल्पना छ भने व्यवहारना दश मळी छवीश अध्ययनोना छवीश उद्देशाना काळे करीने (तेनी विरुद्ध प्ररूपणादिके करीने), तथा (सचावीसाए भणगारगुणेहिं ) साधुना सतावीश गुणे करीने (तेमा दोष लगाडवा विगेरेथी) जे अतिचार लाग्यो होय. अहीं पुहरीक १, क्रियास्थानक २, आहारपरिज्ञा ३, पञ्चक्साणक्रिया ४, अनगारमार्ग ५, आर्द्रकुमार ६, नालदक ७ भने वाकीना सोळ प्रथम कया छे ते मळी कुल २३ अध्ययनो सुयगडांगसूत्रना छे. चोवीश देवो भाप्रमाणे-भवनपति दश प्रकारना, व्यतर पाठ प्रकारना, ज्योतिष्क पांच प्रकारना तथा एक प्रकारना वैमानिक मळी २४ प्रकारना देवो थाय थे अने चोवीश वीर्थंकरो वर्तमान चोवीशीना जाणवा. पचीश भावना-दरेक महाव्रतनी पांच पांच भावना होवाथी पांच महाबतनी पचीश थाय छे. तेमा पहेला प्राणा- तिपातविरमण व्रतनी-र्यासमितिसवधी १, भादाननिक्षेपणासमितिसवधी २, पपणासमितिसरी ३, सयमने विपे अदुष्ट मन प्रयतोववासबधी ४ तथा अदुष्ट वचन प्रवर्ताववा सम्धी ५-ए पांच भावना के वीजा महाव्रतनी-हास्य १, लोम २, मय ३ अने क्रोधनो परित्याग करवा सरधी ४ तथा असत्यना पचक्खाण छ माटे विचारीने बोलवासवधी ५-
गुजरावी
अमणसूत्र
संस्कृतानु-
भाषान्तर
बाद सहित
-
॥ ७० ॥
ए पांच भावना छे. त्रीजा महाव्रतनी-उपाश्रयना स्वामी पासे पोते ज अवग्रहनी याचना करे १, तृणादिकनी बीजाने अनुज्ञा
आपची होय तो उपाश्रय देनारना कहेवाथी आपे २, आहारपाणीनो, शयननो अने बेसवा विगेरेनो अवग्रह स्पष्ट रीते
अनुज्ञा लइने वापरे ३, गुरुनी अथवा बीजानी अनुज्ञा लइने पोते आहारपाणी वापरे ४ तथा साधर्मिक साधुओने माटे
पण अवग्रहनी याचना करी पोते स्थानादिक करे ५-ए पांचे प्रकारमा तत्पर रहेवारूप पांच भावनाओ छे. चोथा व्रतनी-
प्रमाणथी वधारे अथवा स्निग्ध आहार न करे १, शरीरे विभूषा न करे २, स्त्रीने तथा तेना अवयवोने न जुए अथवा
पूर्वनी क्रीडा न संभारे ३, स्त्री, पशु, पंडकवाळी वसतिमा न रहे ४ तथा स्त्रीओसाथे अथवा स्त्रीसंबंधी कथा न करे
५-ए पांच प्रकारमा सावधान रहेवासंबंधी पांच भावनाओ छे. पांचमा महाव्रतनी-शब्द, रूप, रस, गंध अने स्पर्श ए
पांच विषयो मनोज्ञ जोइ राग न करवो अने अमनोज्ञ जोइ द्वेष न करवो ए पांच भावनाओ छे. अथवा बीजी रीते पण
पचीश भावनाओ ग्रंथांतरमा कहेली छे ते आ प्रमाणे-अनित्य १, अशरण २, संसार ३, एकत्व ४, अन्यत्व ५, अशु-
चित्व ६, आश्रच ७, संवर ८, निर्जरा ९, लोकस्वरूप १०, बोधि ११ तथा धर्मभावना १२ ए बार अने मैत्री १, प्रमोद
२, कारुण्य ३ अने माध्यस्थ्य ४ ए चार मळी १६, तेमा आठ दृष्टि मित्रा, तारा विगेरे मेळववाथी २४ अने पचीशमी
प्रवचननिःशंकिनी एटले प्रवचनने विषे शंका न करवी ते.
२६ अध्ययनो उपर गणावेला छे. हवे साधुना सतावीश गुणो मा प्रमाणे छे-रात्रिभोजनसहित छ महाव्रतो ६,
पांच इंद्रियोनो जय ११, भावशुद्धि १२, प्रत्युपेचयादिकनी शुद्धि १३, चमा १४, लोभनो त्याग १५, अशुम एवा मन,
॥ ७०॥
बचन भने कायानो निरोध १८, छकायनी रक्षा २४, सयमयोगनी रचा २५, शीतादि परीपह सहेवा वे २६ तथा मरण- पर्यत उपसर्गो सहन करवा ते २७ (२४) अट्ठावीसाए मायारप्पकप्पेहिं । इगुणतीसाए पावसुअप्पसंगेहिं ॥ २५ ॥ (अष्टाविंशत्याऽऽचारमकल्पैः । एकोनशिता पापश्रुतप्रसङ्गैः ॥ २५ ॥) अट्ठावीश आचारप्रकल्पे करीने एटले आचारांगना मध्ययनौए करीने तेने विरुद्ध प्ररूपवा विगेरेथी जे भविचार लाग्यो होय, तथा भोगणत्रीश पापभुतना प्रसगे फरीने ते प्ररूपवा विगैरेथी जे अतिचार लाग्यो होय भाचारप्रकल्पना २८ अध्ययनो मा प्रमाणे-शस्त्रपरिक्षा १, लोकविजय २, शीतोष्णीय ३, सम्यक्त्व ४, लोकसार ५, धूताध्ययन ६, महापरिक्षा ७, विमोच ८, उपधानश्रुत ९, पिंडैपणा १०, शय्या ११, ईर्या १२, मापा १३, वस्त्रैपणा १४, पापणा १५, भवग्रहप्रतिमा १६, सप्तैकसप्ततिका १७, ठाणसप्ततिका १८, निसीहिसप्तैकका १९, उच्चारपासवणसप्तकका २०, रूपसौकका २१, शन्दसप्तकका २२, भन्योन्यक्रिया २३, भावनाध्ययन २४, विमुक्ति २५, उपधात २६, अनुप- घात २७ अने भारुहणा २८ भामांना छेल्ला रण अध्ययनो निशीथनां छे ओगणनीश पापश्रुत एटले पापशास्त्रो भा प्रमाणे छे-वेमा आठ प्रकारना निमित्तशास्त्र आवे छे ते आ प्रमाणे-दिव्य-व्यतरना अट्टहासादिकना विषयवाल १, उत्पात-रुधिरपृष्टि विगैरेना विषयवाल्लु २, अतरिच-पहभेद, उन्कापात विगेरे विषयवाल्ल३, मौम-भूमिकप विगेरे विषयवाल्लु
गुजराती
भाषान्तर.
-
भमयसूत्र
संस्कृतानु
४, अंग-अंग फरक विगेरे विषयवारों ५, स्वर-स्वरना विषयवालं ६, व्यंजन-शरीरउपरना मस, तल विगेरे विषयवार्छ
७ अने लक्षण-लांछन तथा रेखा विगेरेना विषयवाळं ८ आ आठ प्रकारना निमित्तांगउपर सूत्र, वृत्ति अने वार्तिक ए
त्रण त्रण होवाथी २४ थाय छ, तथा गंधर्व २५, नाट्य २६, वास्तुविद्या २७, धनुर्वेद २८ अने श्रायुर्विद्या २९ आ प्रमाणे
२९ पापशास्त्र थाय छे. (२५)
तीसाए मोहणीयठाणेहिं ॥ २६ ॥
(त्रिंशता मोहनीयस्थानः ॥ २६ ॥)
त्रीश प्रकारनां मोहनीयनां स्थानो सेववावडे करीने जे काइ अतिचार लाग्यो होय. ते त्रीश.स्थानो आ प्रमाणे छे.-
कोइ मनुष्यने पाणीमा नांखी मारे १, मुख विगेरे ढांकी श्वासनो रोध करी मारे २, मस्तकपर वाधरी विगेरे बांधीने मारे ३,
मयूरबंध विगेरेथी बांधीने मारे ४, घणा लोकना स्वामी एवा राजाने मारे ५, घणा लोकना आधारभूत श्रेष्ठी विगेरेने मारे
६, पोते साजो छतां साधारण मांदा पडेलानुऔषधादिक न करे ७, साधुने ज्ञानादिक मार्गथी भ्रष्ट करे ८, तीर्थकरना
अवर्णवाद बोले ९, प्राचार्यादिकना अवर्णवाद बोले १०, आहार-विगेरेवडे प्राचार्यादिकनी भक्ति न करे ११, ज्योतिष
विगेरे अधिकरणो उत्पन्न करे १२, तीर्थनो भेद करी विराधक बने १३, वशीकरणादिक करे १४, दीक्षा लइने पण काम-
१ पक्षी विगेरेनो स्वर अथवा पोताना कंठनो स्वर अथवा नासिकानो स्वर,
बाद सहित
॥ ७१॥
1
॥७१॥
योगनी इच्छा राखे १५, हु बहुभुत छु अथवा तपस्वी छ एम वारवार बोले अथवा दमथी मौन धारण करे १६, गाम, घर विगेरे सळगावे १७, पोते अकृत्य करीने बीजापर तेनो आरोप मूके १८, मायाकपट करे १९, अशुम मनवाळो रहे २०, निरतर कलह कर्या करे २१, विश्वासघात करे २२, विश्वासु मित्रादिकनी स्त्रीप्रत्ये गमन करे २३, पोते कुमार नहीं छवां हु कुमार छु.एम कहे २४, अब्रह्मचारी छता हु ब्रह्मचारी छ एम बोले २५, जेने भात्रीने धनादिक पाम्या होय तेना ज धनादिकनो लोम करे २६ तथा तेने ज विधकारी थाय २७, सेनापति, मत्री विगैरेनो घात करे २८, देवादिकने नहीं देखता छा हु जोउ छु एम बोले २९ अने देवनो अवर्णवाद बोले ३०. (२६) इगतीसाए सिद्धाइगुणेहिं । वत्तीसाए जोगसंगहेहिं ॥ २७ ॥ (एकत्रिंशता सिद्धादिगुणैः । द्वात्रिंशता योगसग्रहः ॥२७॥) सिद्धादिकना एकत्रीश गुणोनी विपरीत प्ररूपणादिके करीने अने वत्रीश योगसंबंधी सग्रहमा प्रमादादिके करीने जे अतिचार लाग्यो होय सिद्धना आदि गुण एटले एकी वखते उत्पन्न थनारा गुण एकनीश छे वे भा प्रमाणे-पांच सस्थान, पांच वर्ण, वे गध, पाच रस, माठ स्पर्श, ऋण वेद, आ अठात्रीशनो प्रभाव तद्रूप २८ गुण तथा कायरहित २९, सग- रहित ३० भने जन्मरहित ३१. अथवा ज्ञानावरणनी प्रकृति ५, दर्शनावरणनी ९, वेदनीयनी २, मोहनीयनी (दर्शन- मोहनी,ने चारित्रमोहनी) २, भायुकर्मनी ४, नामकर्मनी (शुम ने अशुम) २, गोत्रकर्मनी २ अने अतरायनी ५,
অম্বষমুম্ব
गुजराती
भाषांतर.
संस्कृतानु
वाद सहित
॥७२॥
मा आठ कर्मनी ३१ प्रकृतिना* चयरूप एकत्रीश गुण जाणवा.
योग एटले मन, वचन, कायाना शुभ योग तेना बत्रीश प्रकारनो संग्रह आ प्रमाणे ई-शिष्ये आचार्यपासे सम्यक्
प्रकारे आलोचना लेवी १, आचार्ये आलोचना भापी होय ते बीजापासे प्रकाशवी नहीं २, आपत्ति आने तो पण धर्ममा दृढ
रहेवू ३, इहलोक परलोकना फळनी इच्छारहित क्रियानुष्ठान करवू ४, ग्रहणा अने प्रासेवना बन्ने शिक्षा सेववी ५. शरीरने
साफ न करवू ६, तप करी वीजाने न जणाववो ७, लोभनो त्याग करवो ८, परीपहादिकनो जय करचो ९, आर्जवता राखवी-
कुटिलपणानो त्याग करवो १०, संयमव्रतने विषे निर्मळता-अतिचाररहितपणुं राखg ११, समकितनी शुद्धि करवी १२,
चितनी समाधि राखवी १३, आचारने विपे सावधान रहेवू १४, विनयमां तत्परपणुं राखq १५, वृत्तिमा तत्पर रहेवु १६,
संवेगमा तत्पर रहेg १७, मायारहित वर्तवू १८, सारी रीते सर्व विधि करवी १९, संवर करवी २०, प्रात्मदोपनो त्याग
करवो २१, सर्व कामथी विरक्त थq २२, मूळगुणसंबंधी पञ्चक्खाण करवू २३, उत्तरगुणसंबंधी पचक्खाण करवा
२४, द्रव्यथी अने भावथी कायोत्सर्ग करवो २५, प्रमादनो त्याग करवो २६ क्षणे क्षणे दश प्रकारनी सामाचारी पाळवी
२७, ध्यानसंवृतपणुं एटले आतरौद्रध्याननो त्याग करवो तथा धर्म अने शुक्लध्याननो आदर करवो २८, मरणांतिक
परीपह सहन करवा २९, ज्ञपरिज्ञा अने प्रत्याख्यानपरिज्ञानु पालन करचु ३०, दोष लागे तो प्रायश्चित्त करवू तथा मरण
* आमां मोहनीयनी वे छे ते अठावीश थवाथी (२६) वधे, ने नामकर्मनी बे के तेनी (१०३) थवाथी (१०१) वधे, फुल
( १२७) वधवाथी आठ कर्मनी १५८ उत्तरप्रकृति याय.
॥७२॥
सूत्रकार कहे थे- समये भाराधना करवी ३२. ( आ चत्रीश प्रकारमा सावधानता न रही होय ते.) (२७). तित्तीसाए आसायणाए ॥ २८ ॥ (त्रयस्त्रिशता आशातनाभिः | २८) वेत्रीश प्राशावना करवावडे करीने जे भतिचार लाग्यो होय अहीं गुरुसबंधी वेत्रीश भाशातनाओ पाक्षिकसूत्रमा कही गया थीए ते जाणवी. (२८) अथषा वीजी रीते अरिहयादिकनी तेत्रीश आशावना थाय के ते अरिहंताणं आसायणाए, सिद्धाणं आसायणाए, आयरिआणं आसायणाए, उवज्झायाणं आसायणाए, साहूण आसायणाय; साहुणीण आसायणाए, सावयाणं आसायणाए, सावियाण आसायणाए, देवाणं पासायणाए, देवीण आसायणाए, इहलोगस्स आसायणाए, परलोगस्स आसायणाए, केवलिपन्नत्तस्स धम्मस्स आसायणाए, सदेवमणुासुरस्स लोगस्स आसायणाए, सव्वपाणभूअजीवसत्ताणं आसायणाए, कालस्स आसायणाए, सुअस्स आसायणाए, सुयदेवयाए आसायणाए, वायणारिअस्स सायणाए, ज वाइछ, बच्चामेलिअ, हीणकर, अञ्चरकर,
गुजराती
भाषान्तर
श्रमणसूत्र
संस्कृतानु-
बादसहित
॥७३॥
पयहीणं, विणयहीणं, जोगहीणं, घोसहीणं, सुगुदिन्नं, दुझुपडिच्छिअं, अकाले कओ सज्झाओ, काले
नको सज्झामो, असज्झाइए सज्झाइगं, सज्झाइए न सज्झाइअं, तस्स मिच्छा मि दुक्कडं ॥२९॥
(अर्हतामाशातनया, सिद्धानामाशातन या, आचार्याणामाशातनया, उपाध्यायानामाशातनया, साधू.
नामाशातनया, साध्वीनामाशातनया, श्रावकाणामाशातनया, श्राविकाणामाशातनया, देवानामाशात-
नया, देवीनामाशातनया, इहलोकस्याशातनया, परलोकस्याशातनया, केवलिप्रज्ञप्तस्य धर्मस्याशातनया,
सदेवमनुजासुरस्य लोकस्याशातनया, सर्वमाणभूतजीवसत्त्वानामाशातनया, कालस्याशातनया, श्रुतस्या-
शातनया, श्रुतदेवताया आशातनया, वाचनाचार्यस्याशातनया, यत् व्याविद्धं, व्यत्यानेडितं, हीनाक्षरम् ,
अत्यक्षरं, पदहीनं, विनयहीनं, योगहीनं, घोपहीनं, सुष्ठुदत्तं, दुष्ठुमतीच्छितम्, अकाले कृतः स्वा-
ध्यायः, काले न कृतः स्वाध्यायः, अस्वाध्यायिक स्वाध्यायितं, स्वाध्यायिके न स्वाध्यायितं, तस्य मिथ्या
मे दुष्कृतम् ॥ २९ ॥)
(अरिहंताखं भासायणाए) मरिहंतोनी पाशातनाए करीने १, (सिद्धाणं भासायणाए) सिद्धोनी भाशातनाए
करीने २, (पायरियाणं आसायणाए ) भाचार्योनी भाशावनाए करीने ३. ( उवज्झायाणं आसायणाए ) उपाध्यायोनी
माशातनाए करीने ४, ( साहूणं मासायणाए ) साधुप्रोनी भाशातनाए करीने ५, (साहुणीणं भासायणाए) साध्वीमानी
1
॥७३॥
भाशावनाए करीने ६, ( सावयाणं भासायणाए) श्रावकोनी भाशातनाए करीने ७, (सावियाण प्रासायणाए) श्राविकामोनी भाशातनाए करीने ८, (देवाण पासायणाए ) देवोनी आशावनाए करीने ९, (देवीण पासायणाए) देवीमोनी आशातनाए करीने १०, (इहलोगस्स भासायणाए ) मालोकनी भाशासनाए करीने ११, (परलोगस्स भासा. पणाए) परलोकनी भाशातनाए करीने १२, (केवलिपात्तस्स धम्मस्स आसायणाए ) केवळीए प्ररूपला धर्मनी माशा- सनाए करीने १३, ( सदेवमणुभासुरस्स ) देव, मनुष्य अने असुरसहित एवा ( लोगस्स) त्रण लोकनी (आसायणाए) आशातनाए करीने १४, ( सन्वपाणभूमजीवसत्ताणं भासायणाए ) सर्वे प्राण-दींद्रियादिक, भूत-वनस्पतिकाय, जीव- पचेंद्रिय अने सव-पाकीना एकेंद्रियो ए सर्वनी भाशातनाए करीने १५, ( कालस्स आसायणाए) काळनी माशातनाए करीने १६, (सुमस्स मासायणाए) भुतज्ञाननी भाशातनाए करीने १७, (सुयदेवयाए आसायणाए) श्रुतदेवतानी पाशातनाए करीने १८, ( वायणारिभस्स भासायणाए) वाचनाचार्यनी भाशातनाए करीने १९, (ज वाइद्ध ) जे ध्याविद्ध एदले उतावळे बोल अथवा रत्नमाळा विगैरेनी जेम विपरीत कहेवु, तेथी जे अतिचार लाग्यो होय २०, (वचामलिम) बीजा मालावा मेळवीने बोल २१, ( होणकर) हीन भवर बोलवा २२, (अश्चरकर) वधारे अक्षर वोलवा २३, ( पयहीण) एक रे पदे करीने हीन बोलवु २४, (विणयहीण) विनय विना मणवु २५, (जोगहाण) जोग पद्मा विना मणवु २६, (घोसहीण ) उदात्तादि घोपरहित मणवु २७, ( सुमुदिन ) गुरुए सारी रीते एटले शक्ति- ना प्रमाणमा दीधु एटले मणाव्यु २८, ( दृट्वपडिीच्छय ) शिष्ये दुष्ट हृदयथी ग्रहण कर्यु २९, (प्रकाले कमओ सज्झामो)
गुजराती
भापांचर
अमणसूत्र
संस्कृतानु
बाद सहित
॥ ७४ ॥
अकाले स्वाध्याय को ३०, (काले न कमो सज्झा प्रो) काळे स्वाध्याय न कर्यो ३१, (असज्झाइए सज्झाइअं) अपज्झाय
छते स्वाध्याय कर्यो ३२, तथा (सज्झाइए न सज्झाइ) सज्झाय तां स्वाध्याय न कर्यो ३३ आ तेत्रीशा' आशात-
नाथी जे कोइ अतिचार थयो होय ( तस्स मिच्छा मि दुकडं ) ते प्रातेवारसंबंधी मारुं दुष्कृत मिथ्या थाओ.
दश प्रकारनी आकाशनी असज्झाय आ प्रमाणे छे.-उल्कापात १, दिग्दाह २, वीजळी ३, गर्जना ४, व्यंतरादि
देवकृत मोटी गर्जना ५, संध्याप्रभा-शुदि एकमने रोज कदाचित् चंद्रनी भने संध्यानी बन्ने प्रभा एकठी थती होय ६,
आकाशमा अग्निदाह जेबो उद्योत देखातो होय ७, धुंवाड पडती होय ८, हिम विगेरे पडतुं होय ९ तथा रजोवृष्टि थती
होय १०. आमांनो कोइ पण उपद्रव होय तो ते दिवसे राज्झाय थाय नहीं. ( वर्षावातुमा एटले पानी नक्षत्रथी आरंभी
स्वाती नक्षत्र सुभी वीजळी, गर्जना भने वादळां थतां होय तथा नक्षत्र, तारामो देखाता न होय तो पण असज्झाय नथी.)
चैत्र तथा आश्विन मासमा शुदि पांचमथी आरंभी वदि एकम सुधी चार दिवसनी अप्सज्झाय के कोइ ग्रंथमा भादरवा वदि
एकमनी पण असज्झाय कही छे. चोमासानी चौदसे मध्यान्ह काळथी प्रारंभी पडवाना अंत सुधी अढी दिवसनी असज्झाय
छ. ( ते दिवसे पाक्षिकसूत्र कहेवामा असज्झाग नथी.) त्रण चोमासा पैकी अपाढ तथा कार्तिक चोमासानी चौदशना
मध्यान्हथी पडवाना अंत सुधी अढी दिवसनी असज्झाय छे अने फाल्गुन चोमासामा होळी प्रगट करे त्यारथी रज उडी रहे
त्यांसुधी असज्झाय छे. दीवाळीने दिवसे प्रभातकाळे लोको सुपडा विगेरे वगाडे ले ने अळश काढे छे ते वखते असज्झाय
छे. वळी दश प्रकारनी औदारिक शरीरनी असज्झाय आ प्रमाणे छे.-अस्थि १, मांस २, रुधिर ३ तथा मूत्र पुरीपादिक
॥ ७४॥
भवि पदार्थ समीपमा पठ्यो होय तो अमझाय ४, चद्र के सूर्यनु ग्रहण जेटलो वखत रहे वेटलो वखत असज्झाय; पण जोते थेराएलोज मस्त पामे तो फरी तेनो उदय थाय त्यांसुधी असज्झाय छे राजा, प्रधान, सेनापति, गामनो नायक विगेरेनु मरण जे दिनमे थाय ते दिवसे मसज्झाय ६. राजाओगें परस्पर पद्ध थत होय तो वेटला दिवस प्रसञ्झाय ७ पुरुष, स्त्री के मन्नादिकनु युद्ध थत होय तो तेटलो वखत असहाय ८ खीने भात प्राप्त थाय त्यारथी पारमीने चोवीश प्रहर सुधी असहाय ९. मनुष्यादिकनु शरीर तथा पशु-पक्षी विगेरेनु कलेवर, दांत, अस्थि विगेरे सो हाथ सुघीमा अथवा जघन्यथा माठ हाथ सुधीमा पत्थु होय चो तेने दूर लइ जद परठ नहीं त्यांसुधी असज्झाय छे १० तथा शरीर ज्यांसुधी भीत्र होय त्यासुधी मसहाय छे. निगेरे असज्झायनो विचार विस्तारथी भावश्यकनियुक्तिमा तथा निशीथसूत्रना भोगणीशमा उद्देशामा पाप्यो के त्यांची जाणी लेयो यहीं अरिहत्तथी भारमीने देवी सुधीना जे दश पदो के तेमनो श्रवणवाद बोलवाथी भाशातना लागे छे. १०.आलोक भने परलोकनी मसत्प्ररूपणा करवाथी भाशातना लागे थे १२. प्राकृत भाषामा आशुत बधु रचेलं छे इत्यादि अवर्णवाद पोलबाथी थुतनी आशातना लागे छ १३ देव, मनुष्प भने असुरसहित प्रण लोकनी असत्प्ररूपणा करवाथी आशावना लागे छ. १५. प्राण विगैरेनी हिंसादिकथी भाशातनालागे छे. १५ काळनी भसत्प्ररूपणा करवाथी पाशातना लागे छे. १६. जो भान मोक्षनु कारण छ तो तेने मणवानो काळ के भकाळ शो छ ? निरंतर शामाटे न मणाय १ एम कहेतु ने शुवनी माशानना छे. १७ श्रुतदेवताना अवर्णवाद विगेरेपी भाशातना थाय जे. १८ वाचनाचार्यना पण अव.
गुजराती
भाषान्तर
भमयसूत्र
संस्कृतानु-
बाद सहित
॥७५॥
र्णवाद विगेरेथी आशातना थाय छे. १९. त्यारपछी सून भणवू अने भणाव ते संबंधी चौद आशातना लिखी छे
ते स्पष्ट ज छे. ३३. (२९).
णमो चउवीसाए तित्थयराणं उसभादिमहावीरपज्जवसाणाणं । इणमेव निग्गंथं पावयणं सच्चं
अणुत्तरं ॥ ३० ॥
(नमश्चतुर्विशत्यै तीर्थकरेभ्य ऋषभादिमहावीरपर्यवसानेभ्यः। इदमेव नैर्ग्रन्थं प्रावचनं सत्यमनुत्तरम् ॥३०॥
(उसमादिमहावीरपज्जवसाणाणं) ऋषभस्वामीथी आरंभी महावीरस्वामी पर्यंत ( चउचीसाए ) चोवीश (तित्थयराणं)
तीर्थंकरोने (णमो) नमस्कार थामो. ( इमामेव ) आज (निग्गंथं ) निर्गथमंबंधी (पावयणं) द्वादशांगीरूप प्रवचन
( सच्चं) सत्य छ एटले सत्पुरुपने हितकारक छे. ( अणुत्तरं ) मा प्रनचनथी पीजु कोइ उत्तम प्रवचन नथी. तेने ९ सद्दहुं
छ एम भागळ कहेशे. (३०) वळी ते प्रवचन के छ ? ते कहे छे.
केवलियं पंडिपुन्नं नेआउयं संसुद्धं सल्लगत्तणं ॥ ३१ ॥ सिद्धिमग्गं मुत्तिमग्गं निजाणमग्गं
निव्वाणमग्गं अवितहमविसंधि सव्वदुरुपहीणमग्गं ॥ ३२॥
( कैवलिकं प्रतिपूर्ण नैयायिक संशुद्धं शल्यकर्त्तनम् ॥ ३१ ॥ सिद्धिमार्ग मुक्तिमार्ग निर्यानमार्ग
निर्वाणमार्गमवितथमविसन्धि सर्वदुःखमहीणमार्गम् ॥ ३२ ॥)
॥७५ ॥
(केवलिय) केवळ-अद्वितीय एटले एना जेवु बीजु कोइ नथी एव ते छे अथवा ते केवळीए प्ररूपेलु के, तथा (पडिएम) परिपूर्ण एटले मोपने प्राप्त करनारा गुणोए करीने मरेलु के, तथा (नेत्राउयं) न्यायवडे युक्त , तथा ( ससुद्ध) समस्त प्रकारे शुद्ध एटले कलकरहित छ, तथा (सलगत्तणे ) ससारना हेतुरूप मायाशज्यादिक शन्योने कापनार छ ३१ तथा (सिद्धिमग्ग) सिदिना एटले हितार्थनी प्राप्तिना मार्गरूप छे, तथा (मुत्तिमगं) कर्मवयरूप मुक्तिना मार्गरूप छ, तथा (निजाणमग्ग) निरुपम यान एटले सिद्धशिला तेना मार्गरूप छ, तथा (निन्वाणमग्ग.) निर्वाण एटले प्रात्यविक सुख तेना मार्गरूप छ, तथा (भवितह) सत्य छे, तथा (अविसधि) महाविदेहादिकमा निरतर होचाची विच्छेदरहित छ. तथा (सन्चदुरुपहीणमग्ग) सर्व दुखिने चोय करनार मार्ग छे । एटले मोक्षनो मार्ग छे तेवा प्रवचनने हु साहु छु (३२). इत्थं ठिमा जीवा सिझति बुझंति मुच्चंति परिनिव्वायति सव्वदुरकाणमंतं करति ।। ३३ ॥ (अत्र स्थिता जीवा सिध्यन्ति बुध्यन्ते मुच्यन्ते परिनिर्वान्ति सर्वदुःखानामन्त कुर्वन्ति ॥ ३३॥) (इस्थ ) या निग्रंथसंबंधी प्रवचनने विषे (ठिा ) रहेला (जीवा) जीवो (सिझति) भणिमादिक सिद्धिोने पामे छे, तथा (तुझंति ) वोध पामे के एटले केवळी थाय छ, तथा (समति) कर्मथी मूकाय छे, तथा (परिनिन्वायति ) मर्व प्रकारे सुखी थाय छ, तथा ( सम्बदुस्काणं मत करति!) सर्व दुःखोनो मत-विनाश करे छे (३२). त धम्म सहहामि पत्तिमामि रोएमि फासेमिपालेमि भणुपालमितं धम्मंसदहतो पत्तिमंतो भमासूत्र संस्कृतानु- रोअंतो फासतो पालितो आणुपालितो तस्त धम्मस्स केवलिपनन्तस्स अब्भुविओशिवाराहरुमाए, विरोमि विराहणाए, असंजमं परिआणामि, संजमं उघसंपज्जामि, अबभं परित्राणामि, बंभ उवसंप- गुजराती भापतिर बाद सहित जामि ॥ ३४॥ ॥ ७६॥ (तं धर्म श्रद्दधे प्रतिपय रोचयामि स्पृशामि पालयामि अनुपालयामि। तं धर्म अद्दधानः प्रतिपद्यमानः रोचयन् स्पृशन् पालगन् अनुपालयन् तस्य धर्मस्य केवलिमज्ञप्तस्याभ्युत्थितोऽस्मि आराधनायां, चिरत्तोऽस्मि विराधनायाम्, असंयमं परिजानामि, संयमुपसंपये, अनाम परिजानामि, नम उपसंपद्ये ॥ ३४ ॥) (तं धम्म ) ते निग्रंथलक्षण भर्मने (सदहामि ) ई सहई छु, ( पत्तियामि ) अंगीकार करुं छु, ( रोएमि) रुचा छु, ( फासेमि ) फरसुं छु-सेवु छु, ( पालेमि ) पालं छु अने ( अणुपालेमि ) निरंतर पालं छ. वळी (तं मम्म) ते धर्मने ( सदहंतो ) सहहतो थको, (पत्तिशंतो) अंगीकार करतो थको, ( रोअंतो) रुनावतो थको, (फासंतो) फरसतो थको, ( पालितो) पाळतो थको तथा (अणुपालितो) निरंतर पाळतो थको (ता) ते (केवलिपात्तस्स ) केवळीए प्ररूपला ( धम्मस्स ) धर्मनी ( अन्धुष्टिोमि आराहणाए ) आराधनाने लिपे हुँ उद्यमवंत थयो छं. ( विरशोगि विराहणाए ) विरा- धनाथी विराम पाम्यो छु एटले निवृत्त थयो छ- (असंजमं परिआणामि ) असंयमने ज्ञपरिझाए जाणीने प्रत्याख्यानपरि- झाए पचक् छ, ( संजमं उपसंपामि ) संयमने अंगीकार करुं छु. ( बाभं परिमाणामि ) आबनाने-मैथुनने निषेधुं लु भने (बम उपसपामि ) ब्रह्मचर्यने अगीकार करु छु. (३४). अकप्प परिमाणामि, कप्प उपसंपज्जामि, अन्नाणं परिणामि, नाणं उवसंपज्जामि, अकिरि परिआणामि, किरिम उवसपज्जामि, मिच्छत्त, परिआणामि, समत्तं उवसंपजामि, अवोहिं परिआ- णामि, बोहिं उबसपज्जामि, अमग्ग परिआणामि, मग्ग उवसंपज्जामि,जंसंभरामि, जंच न संभरामि, जं पडिकमामि, जं च न पडिकमामि, तस्स सव्वस्स देवसिअस्स अइआरस्स पडिकमामि ॥३५ ।। (अकल्प परिजानामि, कल्पमुपसंपद्ये, अज्ञानं परिजानामि, ज्ञानमुपसपये, अफ्रियां परिजानामि, क्रियामुपसंपद्ये, मिथ्यात्वं परिजानायि, सम्यक्त्वमुपसपद्ये. अयोधि परिजानामि, योधिमुपसपो, अमार्ग परिजानामि, मार्गमुपसपद्ये, यत् स्मरामि, यञ्च न स्मरामि, यत् प्रतिक्रमामि, यच न प्रतिक्रमामि, तस्य सर्वस्य दैवसिफस्यातिचारस्य प्रतिक्रमामि ॥ ३५॥) (अकप्प परिमारणामि ) साधुने नहि कल्पे तेवा माहारादिकने हुँ पञ्चपखु छु, ( कप्पं उक्सपजामि ) जे कल्पे वेने हु अगीकार करु छु, ( अन्नाश परिमाणामि ) अज्ञानने पञ्चख्खु छु, ( नाण उवसपजामि ) ज्ञानने अंगीकार करु छु. (अकि- रिम परिमाणामि ) अक्रियाने एटले नास्तिकवादने हु पञ्चख्खु छु, (किरिन उक्सपजामि) क्रियाने एटले सम्यग्वादने हु अगीकार करु छु, (मिच्छत परित्राणामि ) मिथ्यात्वने हु पञ्चख्खु छु, ( सम्मत्त उपसंपजामि) समकितने हुअगीकार
गुजराती
भमयसूत्र
संस्कृतानु-
भाषान्तर
बाद सहित
॥ ७७॥
करुं छु, ( अमोहिं परिमाणामि ) अबोधिने एटले मिथ्यात्वना कार्यने हुं पचख्खुं छु, (बोहिं उवसंपन्जामि) बोधिने एटले
समकितना कार्यने हुं अंगीकार कर छु, (अमग्गं परिआणामि.) मिथ्यात्वादिक अमार्गने हुँ पञ्चख्खुं छु, ( मग्गं
उपसंपजामि ) सम्यक्त्वादि मार्गने हुं अंगीकार करुं छु, ( संभरामि.) जे काइ मने सांभरे थे, (जं च न संभरामि)
अने जे अनुपयोगादिकने लीधेमने सांभरतुं नथी, तथा ( जं पडिकमामि ) जाणेलुं एबुं जे कांई पउिकमुं हुं, (जं च
न पडिकमामि ) अने अजाण्यु ए, जे काह हु पडिकमी शकतो नथी, (तस्स सम्बस्स) ते सर्व (देवसिमस्स)
दिवससंबंधी ( अाभारस्स ) अतिचारने (परिकमामि ) हुँ पडिकमु छु-ते अतिचारथी हुँ निवत छ. (३५).
समणो हं संजयविरयपडिहयपञ्चस्कायपावकम्मो भनियाणो दिविसंपन्नो मायामोसविवजिन्नो
भट्ठाइजेसु दीवसमुद्देसु पन्नरससु कम्मभूमीसु जावंत केवि साहू रयहरणगुच्छपडिग्गहधारा
पंचमहव्वयधारा अट्ठारससहस्ससीलंगधारा अकयायारचरित्ता ते सव्वे सिरसा मासा मत्थएण
वंदामि ॥ ३६-३७.॥
(अमणोऽहं संयतविरतपतिहतप्रत्याख्यातपापकोऽनिवानो दृष्टिसंपनो मायामृषाविवजकः
अर्घतृतीयेषु द्वीपसमुद्रेषु पञ्चदरासु कर्मभूमिषु ये केऽपि साधवो रजोहरणगोच्छप्रतिग्रहधारिणः
-
AN
॥ ७७॥
पञ्चमहाव्रतधारिणोऽष्टादशसहस्रशीलागधारिणोऽक्षताचारचारित्रास्तान् सर्वान् शिरसा मनसा मस्तकेन वन्दे ।। ३६-३७॥) (समशो) भमण छु, ( सजम ) सजमवाळो, (विश्य ) विरविवाळो, (पडिहयपच्चरकायपावकम्मो) हमणां नहीं करवावडे हण्यु के भतीत काळनी निंदाए करीने तथा भविष्यमा नहीं करवानी धारणाए करीने पञ्चायु के पापकर्म जेणे एको हु छ, (मनियागो) नियाणाशीत छु, ( दिविसपनो ) सम्यग्दर्शनवडे युक्त छु, तथा (मायामोसविवजिमो) माया युक्त मृषावादी रहित थयो छु, तेथी करीने (अट्ठाइजेसु दीवसरदेस ) अढीद्वीप अने वे समुद्रने विषे तथा (पनरसस) कम्मभूमीसु) पदर कर्मभूमिने विषे-पांच भरत, पाच ऐरवत अने पांच महाविदेहने विषे (जावत के वि साहूँ) जे कोई साधुश्रो रहेला छे, केवा ? (रयहरणगुच्छपडिग्गहधारा) रजोहरण, गोच्छक अने प्रतिग्रहने धारण करनारा तथा ( पचमहन्वयधारा ) पांच महावतोने धारणा करनारा, तथा (भट्ठारससहस्ससीलगधारा) अढार हजार शीलांगने धारण करनारा, तथा (भक्खयायारचरिता) अक्षत-परिपूर्ण भाचाररूपी चारित्रवाळा छे, (ते सम्वे।) ते सर्व साधुभोने (सिरसा) मस्तकवडे, (मणसा) मनवडे तथा कायावडे (मस्थएण वदामि) हु चांदु छु. (३६-३७). आ प्रमाणे साधुबोने वादी हवे सर्व जीवोनी ज्ञामणा तया मैत्रीभावने कहे थे- खाममि सबजीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे । मित्ती मे सवभूएसु, वेरं मज्झ न केणई ॥१॥ -
गुजराती
भाषांवर
দখল
संस्कृतानु
वाद सहित
(क्षमयामि सर्वान् जीवान् , सर्वे जीवाः क्षमयन्तु माम् । मैत्री में सर्वभूतेषु, वैरं मम न केनापि ॥१॥ )
( खामेमि सव्वजीवे ) हुं सर्व जीवोने खमा छु. ( सब्चे जीवा खमंतुं मे ) सर्व जीवो मने-मारा प्रत्ये खमो,
( मित्ती मे सव्वभूएसु ) सर्व प्राणीओने विषे मारे मैत्री-मित्रभाव छे तथा (वेरै मज्झ न केणई ) मारे कोइनी
साथे वैर नथी. १.
एवमहं आलोइस, निदिअ गरहिम दुगंछिअंसम्मतिविहेण पडिकतो, वंदामिजिणे चउव्वीसं ॥ २॥
(एवमहमालोच्य, निन्दित्वा गहयित्वा दुर्गछिकं सम्यक् त्रिविधेन प्रतिक्रामन् , वन्दे जिनान् चतुर्विंशतिम्।२।)
( एवं ) आ प्रमाणे एटले उपर कही गया ते रीते ( अहं ) हुँ ( दुगंछिअं) दुगंछित एवा पापकर्मने ( सम्म) सारी
रीते (आलोइअ) आलोचीने, तथा (निंदिअ) आत्मसाक्षीए निंदीने, तथा (गरहिअ) गुरुनी साचीए गर्दा करीने (तिविहेण)
मन, वचन अने काया व्रण प्रकारे करीने (पडिकतो) प्रतिक्रमण करतो थको (जिणे चउबीमं ) चोवीश जिनेश्वरोने
( वंदामि) वांदुछु. २.
॥ ७८॥
॥ इति श्रमणसूत्रं समाप्तम् ॥
॥७॥