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Dusri Azadi

Vijay · 2011/03

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दूसरी आज़ादी

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માળા
રામના
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दूसरी आज़ादी

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इस पुस्तक के बारे में इतिहाम का चक्र कायदे मे चलना तो यो चाहिए था कि राजनीतिक आजादी के बाद आपिक व सामाजिक आजादी का सपना साकार होता, लेकिन राजनीतिक आजादी के याद निहित स्वायं के लोग सत्ता के आम-पाग गोलबन्द होते गए। यथास्थितिवाद और उनके निहित स्वार्थ का रिश्ता धोरे-धीरे अटूट होता चला गया। तया परिवर्तनवादी पोपणाओ और नारों का लक्ष्य यया. म्थितिवाद की रक्षा करना-मान बना रह गया ।धीरे-धीरे स्वातंत्र्यपूर्व की चेतना युश गई। तेजस्वी, सेवाभावी और कर्मठ लोग सत्तालोलुप, स्वार्थी और कैरियरिस्ट राजनेताओ द्वारा किनारे फेंक दिए गए । समाज-जीवन के आर्थिक, राजनीतिक, मामाजिक, शैक्षणिक और सास्कृतिक क्षेत्र में जड़ता को जकड़न व्याप्त हो गई। इसी पृष्ठभूमि में लोकनायक श्री जयप्रकाश ने समप्र प्राति का दर्शन दिया। तरुणाई परिवर्तन का परचम लेकर लोक-सघर्ष के रास्ते पर यद चली। पपा. स्थितिवाद के अजय दुगं टूटने पो आ गए। इस पृष्ठभूमि में यथास्थितिवाद के रक्षक संयुक्त मोर्चे ने श्रीमती गाधी के नेतृत्व में आपातस्थिति लगाकर लायो मेताओ, कार्यकर्तामो और मधपं मे लगे लोगों को जेलो में बन्द कर नागरिक स्वतंत्रताओं का हनन कर डाला। पारिवारिक तानाशाही अपने नग्न रूप में सामने आई। नतीजा यह हुआ कि हमे आजादी की लड़ाई एक दूसरे रूप में फिर से लड़नी पड़ी। लोकनायक श्री जयप्रकाश के नेतृत्व, लाखो कार्यकताओ के त्याग र बलि- दान और देश के निरक्षर से निरसार समाज की सुशिक्षित पेतना के कारण तानाशाही पराजित हुई । उसमे वाबू जगजीवनरामजी का योगदान भी उल्लेखनीय है। यह सही है कि सामान्य जन, बुद्धिजीवी और गैर-काग्रेसी विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओ को भीषण यातनाए भुगतनी पड़ी लेकिन मुझे लगता है कि इतने महान परियतंन के लिए चुकाया गया यह मूल्य अधिक नही था। इस विराद 1 'परिवर्तन की यह सामान्य कीमत?"निश्चय ही अपने देश के समाज-जीवन में कोई तर्कातीत तर्क (Super logic) कार्यरत रहा है। देश के प्रतिभाशाली लेखकों की ओर मैं इस आशा से देखा करता हूं कि वे इस 'सुपरलॉजिक' की चीरफाड़ अपनी लेखनी से करें। लेखनी राजनीति की मुखापेक्षीन हो, साहित्यकार राजनीति के कृपाकांक्षी न बनें, पत्रकार निर्भीक टीका-टिप्पणी करने के काम में किसी 'कमजोरी' या संकोच को कारण न बनने दें तभी इस युगान्तरकारी परिवर्तन की महत् संभावनाओं को साकार रूप दिया जा सकता है। वरना आप जानते हैं कि राज- नेता किस मिट्टी के बने होते हैं, कुर्सी उन्हें कैसे कैदी बना देती है, वाह-वाह के नारे क्रमश: कैसे ढोंगी होते जाते है, न्यस्त स्वार्थो की घेरावन्दी कितनी ताकत- वर होती जाती है। श्री रामकुमार भ्रमर से मेरी भेंट पहली बार प्रिय श्री दीनानाथ (संपादक 'पांचजन्य') के यहां १६७०-७१ में हुई थी। वातचीत के दौरान मैंने पाया था कि भ्रमर स्वतंत्रचेता लेखक हैं और उस ममय में जवकि अधिकतर बुद्धि- जीवी सत्ता की कृपाकांक्षा से सत्य की प्राप्ति के लिए होने वाले संपर्य का स्वर दवाए हुए थे, भ्रमर काफी स्पष्टवादी लगे। बाद में उनकी कई कृतियां मेरे देखने-पढ़ने में आई और मुझे अच्छा लगा कि वे देश-समाज के प्रति जागरूक और सर्तक रहकर सोचते-लिखते हैं। यह हो सकता है कि 'दूसरी आजादी' में श्री रामकुमार भ्रमर के विश्लेपण से मैं कहीं, किसी-किसी जगह सहमत न होऊं, लेकिन मोटे तौर पर इस पुस्तक को पढ़ने के दौरान मैं श्री भ्रमर के दृष्टिकोण से समानुभूति महसूस करता हूं। मुझे लगता है कि किसी भी देश का साहित्यकार उस देश के समाज, संस्कृति और विचारों का इतिहासलेखन ही नहीं करता, भविष्य-द्रप्टा भी होता है। वह गुण-दोपों का विवेचन करता है और सत्य का सनातन प्रहरी होता है । शाश्वत मानवीय मूल्यों का रखवाला भी। पिछले तीस वर्षों के ही नहीं, बल्कि इस सम्पूर्ण शताब्दी के इतिहास में आपातस्थिति के ये २० महीने अनहोनी घटनाओं से इतने लदे-बदे रहे हैं और इसने भारत के सामान्य जीवन और सोच-समझ में इतना युगान्तरकारी परि- वर्तन किया है कि साहित्य, इतिहास, दर्शन और समाजशास्त्र के अनमोल ग्रन्थों की क्रान्तिकारी लहर पैदा हो सकती है। मुझे विश्वास है कि इस दृष्टि से अमरजी की तरह अन्य स्वतंत्रचेता लेखक भी रचनाएं देंगे। ७ अप्रैल,१६७७ -नाना देशमुख नई दिल्ली लेखकीय २६ जून, १६७५ ! एक ऐमा दिन, जब म्वतंत्रता येः मूरज पर गुलामी पी यानिय पोत दी गई। किनने की यह गुम्नाग्यो 'हमारे अपनों ने और अपनो के दिएप में ज्यादा तकलीफदेह कुछ नहीं होता। सारे देश ने यह दर्द भोगा है और लोकनायक जयप्रकागजी के नेतृत्व में अहिंसात्मक शिष्ट प्रान्ति से इसका उपचार भी कर लिया है, किन्तु यह फमय कभी नहीं जाएगी और इतिहास पा एक पटु म्मरण बनी रहेगी। जयप्रकाशजी के बिहार-आन्दोलन ने स्वतव्रता के बाद पहली बार प्रजातन की जाट मे धीमे-धीमे देश को ग्रग रहे राजन को चेतावनी दी थी और दम चेतावनी तया पूर्ण अहिमात्मक आन्दोलन ने युवा शक्ति को मंगठित रूप में गौरतंत्र की रक्षा के लिए मन्नद किया या परिणाम हुआ राजतन का मुखौटा उलट जाना और उसके निनात व्यक्तिवादी घिनौने रूप का उजागर होना । यह रूपया-इमरजेंगी। इम इमरजेंमी ने भारतीय इतिहास को कुछ नार दिए, नये अथं दिए। इमरजेंसी में लाचार देश की गरीबी और जन-शान्ति को नाम दिया गया-- अनुशासन । मानमिक और वैचारिक हत्याओ को प्रचारित किया गया-प्रमामन। निर्माण के नाम पर व्याप्त नगे भ्रष्टाचार का अर्थ हो गया-मता । म्यूरोमी कहनाई-म्यवस्था । तानाशाही का अयं हुआ- सोकतन। युमियों के मोह का नाम हुआ देश का आपातकाल | प्रमों की यह नई और दुराद परिभाषा जून १६७५ मे लागू हुई और इस परिभाषा को मनवाने का प्रम चला पूरे । वीरा माह। मुझे एक घटना याद आती है, वडी माधारण-मी घटना है, किन्तु लगता है 'कि योग माही को भयानक उत्पीडन-भरी गुलामी को भूमिका में यह घटना आज अचानक महत्त्वपूर्ण हो उठी है। लगता है जैसे उम ममप के आने के पूर्व ही 1 परिवर्तन की यह सामान्य कीमत?"निश्चय ही अपने देश के समाज-जीवन में कोई तकातीत तर्क (Super logic) कार्यरत रहा है। देश के प्रतिभाशाली लेखकों की ओर मैं इस आशा से देखा करता हूं कि वे इस 'सुपरलॉजिक' की चीरफाड़ अपनी लेखनी से करें। लेखनी राजनीति की मुखापेक्षीन हो, साहित्यकार राजनीति के कृपाकांक्षी न बनें, पत्रकार निर्भीक टीका-टिप्पणी करने के काम में किसी कमजोरी' या संकोच को कारण न बनने दें तभी इस युगान्तरकारी परिवर्तन की महत् संभावनाओं को साकार रूप दिया जा सकता है । वरना आप जानते हैं कि राज- नेता किस मिट्टी के बने होते हैं, कुर्सी उन्हें कैसे कैदी बना देती है, वाह-वाह के नारे क्रमशः कैसे ढोंगी होते जाते हैं, न्यस्त स्वार्थों की घेराबन्दी कितनी ताकत- वर होती जाती है। श्री रामकुमार भ्रमर से मेरी भेंट पहली बार प्रिय श्री दीनानाथ (संपादक 'पांचजन्य') के यहां १९७०-७१ में हुई थी। बातचीत के दौरान मैंने पाया था कि भ्रमर स्वतंत्रचेता लेखक हैं और उस समय में जबकि अधिकतर बुद्धि- जीवी सत्ता की कृपाकांक्षा से सत्य की प्राप्ति के लिए होने वाले संपर्प का स्वर दवाए हुए थे, भ्रमर काफी स्पष्टवादी लगे। बाद में उनकी कई कृतियां मेरे देखने-पढ़ने में आई और मुझे अच्छा लगा कि वे देश-समाज के प्रति जागरूक और सर्तक रहकर सोचते-लिखते हैं। यह हो सकता है कि 'दूसरी आजादी में श्री रामकुमार भ्रमर के विश्लेषण से मैं कहीं, किसी-किसी जगह सहमत न होऊं, लेकिन मोटे तौर पर इस पुस्तक को पढ़ने के दौरान में श्री भ्रमर के दृष्टिकोण से समानुभूति महसूस करता हूं। 5. मुझे लगता है कि किसी भी देश का साहित्यकार उस देश के समाज, संस्कृति और विचारों का इतिहासलेखन ही नहीं करता, भविष्य-द्रष्टा भी होता है। वह गुण-दोषों का विवेचन करता है और सत्य का सनातन प्रहरी होता है । शाश्वत मानवीय मूल्यों का रखवाला भी। पिछले तीस वर्षों के ही नहीं, बल्कि इस सम्पूर्ण शताब्दी के इतिहास में आपातस्थिति के ये २० महीने अनहोनी घटनाओं से इतने लदे-बदे रहे हैं और इसने भारत के सामान्य जीवन और सोच-समझ में इतना युगान्तरकारी परि- वर्तन किया है कि साहित्य, इतिहास, दर्शन और समाजशास्त्र के अनमोल ग्रन्थों की क्रान्तिकारी लहर पैदा हो सकती है। मुझे विश्वास है कि इस दृष्टि से भ्रमरजी की तरह अन्य स्वतंत्रचेता लेखक भी रचनाएं देंगे। ७ अप्रैल,१६७ -नाना देशमुख नई दिल्ली लेखकीय ! २६ जून, १९७५ ! एक ऐसा दिन, जब स्वतंत्रता के मूरज पर गुलानी को कालिग पोत दी गई। किसने की यह गुस्ताखो हमारे अपनों ने और अपनों के दिए ददं में ज्यादा तकलीफदेह कुछ नहीं होता। सारे देश ने यह दई मोना है और लोकनायक जयप्रकाशजी के नेतृत्व मे अहिंसात्मक शिष्ट प्रान्ति ने इन उपचार भी कर लिया है, किन्तु यह कसक कभी नहीं जाएगी और इतिहासका एक पटु स्मरण बनी रहेगी। जयप्रकाशजी के बिहार-आन्दोलन ने स्वतव्रता के बाद पहली बार जान की आड मे धीमे-धीमे देश को प्रम रहे राजनंन की चेतावनी दी पी * चेतावनी तथा पूर्ण अहिंमात्मक आन्दोलन ने युवा शक्ति को मंगठिट, गोग्नत्र की रक्षा के लिए मन्नद किया या । परिणाम हुआ गजलन का मुदः उनट जाना और उसके नितात व्यक्तिवादी घिनौने रूप का उजागर इन। यह रूपया-इमरजेंसी। इम इमरजेंसी ने भारतीय इतिहास को कुछ नारे दिए, न म इमरजेगो में लाचार देश की गरीबी और जन-शान्ति को नाम दिमा अनुशामन । मानसिक और वंचारिक हत्याओ को प्रचारित किया गया निर्माण के नाम पर व्याप्त नंगे भ्रष्टाचार का अर्थ हो गया-मना वरलाई व्यवस्था। तानाशाही का अर्थ हुआ-लोकतन्न । बुटिनद्र का नाम हुआ देश का आपातकाल | शब्दो की यह नई और दुम्द : जून १६७५ में लागू हुई और इस परिभाषा को मनवाने का मन का बीस माह। मुझे एक घटना याद आती है, बडी साधारण-सी घटना है, किन्तु र 'कि वीम माही की भयानक उत्पीडन-भरो गुलामो को भूमिका मे यह घटनाकार अचानक महत्त्वपूर्ण हो उठी है। लगता है जैसे उस समय के आने है १० बहुत हद तक यह संकेत मिलने लगा था कि सत्ता का राजतंत्री मुखौटा किसी भी स्तर पर उतरकर कुर्सी-रक्षा प्रारंभ कर देगा। दो-चार राजनीतिक मित्रों से चर्चा भी की थी कि संभवतः इन्दिरा-शासन उस स्तर पर आ सकता है, किन्तु उन मिनों का विचार था कि वैसा नहीं होगा। १९७५ प्रारंभ या' ७४ के अंत की बात है, मुझे ग्वालियर में विद्यार्थी परिपद् के संभागीय सम्मेलन का उद्घाटन करने के लिए बुलाया गया। जयप्रकाशजी का आन्दोलन काफी कुछ जोर पकड़ चुका था और सारे देश में ही युवा-शक्ति जाग्रत् हो चुकी थी। उसी दौर की बात है । विद्यार्थी परिपद् के युवक दोस्तों से अपनी भाषणनुमा बातचीत में मैंने कहा कि सत्य और लोकतंत्र के लिए सन्नद्ध होकर सभीको जयप्रकाश बाबू के आन्दोलन का अंश बनना चाहिए और अपनी क्रियात्मक शक्ति को पूर्ण अनुशासन, निष्ठा और अहिंसा-. स्मक ढंग से आन्दोलन में जोड़कर सत्ता परिवर्तन की मांग करनी चाहिए। सहज भाव से मन की बातें कहकर मैं घर चला आया। लगभग एक घण्टे बाद ही एक उच्चाधिकारी (जिलास्तर) का बुलावा आ पहुंचा। यह सज्जन मेरी पुस्तकों के पाठक भी थे और उनसे मेरे खासे पारिवारिक सम्बन्ध भी थे। जब वहां पहुंचा तो देखा वे काफी गंभीर हैं। वे बोले कि बैठू । चाय का आर्डर देकर कुछ सोचते हुए उन्होंने वात शुरू की, "सुना है, आप अभी-अभी विद्यार्थी परिषद् के फंक्शन में गए थे ?" गया तो था।" मैं बोला, पर चकित हुआ। यह तो कोई कारण नहीं ... हुआ बुलावे का? सोच ही रहा था कि उनका दूसरा प्रश्न आ गिरा, · खबर है कि आपने वहां लड़कों को भड़काया है ?" मैं हैरान । पूछा, "भड़काया है ? वह किस तरह ?" "यही कि जयप्रकाशजी के आन्दोलन में हिस्सा लो, तोड़फोड़ करो, कधम मचाओ.." मुझे झल्लाहट आ गई, "किसीने आपको गलत-सलत बतलाया है। मैंने तो सिर्फ यह कहा था फि लोकतंत्र के लिए अहिंसात्मक आन्दोलन में भाग लेना चाहिए ! "और यह सभीका लोकतंत्रीय अधिकार है। आप विलकुल उलटी वात कर रहे हैं !" वह सहज हुए, "देखिए रामकुमारजी, आप हैं लेखक । इस शहर में आपको रहना है । मुना है कि जल्दी ही आप अपनी फिल्म की शूटिंग भी यहीं- - ? - नहीं करनेवाले हैं, आपको उगमे शासन को सहायना भी पाहिएगी और अगर आपका यही एटीट्यूड रहा तो.." "तो आप मुझे वोर करेंगे"यही ना?" मैंने निढकर रहा। "नहीं, ऐगी यात नहीं है यह बोलते-बोलते कुछ हिनके, "अमन मे में - मिमी फिम्म की गुरापात नहीं चाहता"" "आप लोकतन्त्री नागरिक अधिकार को गुराफात बह रहे हैं ?..." मैं पवादा ही झुमला गया। महमा मैंने गवाल दिया, "मच कहिए मिस्टर"यह बाप कह रहे हैं या आपकी नौकरी मेरा मतलब है-पुरमी?" यह निराग स्वर में बोले, "क्या पहें भाई करना पड़ता है।" तो इस 'करना पडता है' को लाचारी ने प्रमश. फैल रहे राजतन को दमनकारी शक्तिया दे दो। यहां उक्त घटना का ययान-मात्र इस कारण पर रहा है कि लोकमती किन पो कुचलने के लिए इमरजेंमी से पूर्व भी पूरी शक्ति नगाई जा रही पी, किन्तु जब जन समतोप को इस चुर्ण दमन-चक्र में नहीं दवाया जा गया तो देश के आपातकाल का बहाना लेकर एक भयावह गुलामी ही जनता पर थोप दी गई। रातोरात लायों गिरफ्तारिया दुई। शीर्षस्थ जन- नेता जेलों में पहुंचा दिए गए। उन्हें फप्ट दिया गया। प्रेम मेंगरभिप से मत्प का गला घोंट डाला गया। कई धान, सामाजिक कार्यकर्ता, विचारशील अधिकारी, पत्रकार, संगर-कलाकार अनजानी जगहो पर या तो कंद कर दिए गए या फिर नजरबन्द हो गए। और फूहड ढग में प्रचार परके जन-माधारण को यह बात समझाने की कोशिश को जाने लगी कि यह सय देहित में हो . इमरजेंमी की आड मंगविधान में ४२वा मशोधन करके उगवी मूल आत्मा का हनन कर डाला गया। यह सब कमे, क्यों, विमको मूल, गरारत अथवा लापारी में होता रहा यह विश्पण वाद की बात है, पर यह मव हुआ। भारत में ग्रिटिश राज की गुलामी फे याद प्रजातव और ममाजवाद का बुरखा ओढकर जिम भारतीय साम्राज्यवाद का प्रारम हमा, उगकी कहानी किमी उपन्यान में कम रोचकः, गेमांचक और मार्मिक नहीं है बोर 'दूमरी आजादी' इसका लेपा-जोगा है। दमन और गुलामी के पीस माहो का यह इतिहास मभवनः उस मयको नही बटोर पाएगा, जितना कुछ हुआ है, पर मैंने कोशिश की है कि इसमें कम- वार वह मव आए, जिम मानमिक, शारीरिक और मसाविक रूप में मेरे देगर १२ । आदमी ने झेला है। इस पुस्तक में विभिन्न घटनाएं, संस्मरण और लोगों के इन्टरव्यू संकलित हैं। इसमें बहुत-से वे पान भी हैं, जिन्होंने मुगल सम्राटों के सूबेदारों की तरह राज्यों में व्यवहार किया, वे लोग भी हैं, जिन्होंने अपने स्वार्थों के समझौते करके जयचन्दों की तरह अपनों से अपनों को ही गुलाम बनवाने की प्रक्रिया में भाग लिया, वे नगर-सेठ भी हैं, जिन्होंने व्यावसायिक स्वार्थो के लिए मानव-धर्म बेचने में भी लज्जा महसूस नहीं की। वे बुद्धिजीवी कलाकार, लेखक, पत्रकार भी हैं जिन्हें कोई भी देश राष्ट्रीय नैतिकता और मानव-अधिकारों की जन्मपत्रियां रचने का अधिकार देता है, और जिनकी बुद्धि से पीढ़ियां अपने अन्धेरे दूर करती हैं। यह पुस्तक एक हिसाव है, एक शीशा, जो हम सभीको अपने-अपने चेहरे दिखाने की कोशिश करती है। आपातकाल की सबसे बड़ी देन है..-अपनी और दूसरों की पहचान । अपने गुण-दोषों का लेखा-जोखा करना। यह पहचान किसी अगली गुलामी से बचाएगी, पर शर्त यही है कि हम अंग्रेजों के बाद दूसरी गुलामी की गिरफ्त में गौसे आए, कौन लाया, किन कमजोरियों के कारण यह सव हुआ-~-उसे समझें। और अगर यह पुस्तक मेरे किसी एक भी पाठक को अपनी पहचान करवा सकी, " तो मेरा श्रम सफल होगा। असल में हर इतिहास, सही-गलत, गुण-दोप समझने का एक संदर्भ-ग्रंथ होता है । इस पुस्तक को इसी ढंग से लिया जाना चाहिए। ५३/१४, रामजम रोट, रोलबाग नई दिल्ली-११०००५ --रामकुमार भ्रमर आपति-काल के नाम से थोपी गई और मुधारवाद के नाम में प्रचारित की गई गुलामी के समय की यात करने में पूर्व राजनीतिक मूल्यों की वान फरना अनिवार्य है। राजनीति शब्द को लेकर एक भ्राति मायद भारत ही नहीं, सारी दुनिया में फैली हुई है। यह कि अंग्रेजी वहावत-'ऐवरी थिग इन फेयर इन लय एण्ड यार' की तरह राजनीति में भी नैतिक मूल्यों का कोई ययन नहीं है । विभिन्न देशों के अपने माम्कृतिक मूल्यों के अनुमार हो सकता है कि इस तरह की बात उनके अपने यहां मही हो, पर भारत में ऐमा नहीं "है । भारतीय संस्कृति और अंघों ने अपने-आपको कभी इतना गीमित, गकुचित और कंजूम नहीं बनाया कि वह केवल भौगोलिक सामारेयाओ पी चीज बनकर रह जाएं। समूची भारतीय संस्कृति और प्रयो ने अपनी रचना शाश्वत मानवीय मूल्यों के आधार पर की है, तब मुझे नहीं लगता कि भारतीय राज- नीति नैतिक मूल्यों मे यरी हो सकती है। जगा कि होता रहा है, समय-समय पर भारत के सामाजिक, नैतिक, मानवीय मूल्यों को नष्ट-भ्रष्ट करने वाले विचारक, प्रशासक या हमलायर बाहर से आए, किन्तु भारत ने ऐसे लोगो को या तो अपनी बुनियादी नैतिकता और शक्ति मे उपाड़ फेंका अथवा उन्हे अपने ही अनत में आत्मसात् कर लिया। ऐसे मंत्रान्तिकालों में समय-समय पर इस देश में विचारक, नेता, विद्वान और गंत पैदा हुए, जिन्होंने मूल्यों के विपराव को समेटा और बिगडे हुए को पुनः मवारा। भारतीय राजनीति के आकाश मे महात्मा गाधी का उदय ऐसे ही मंत्रान्ति- काल में हुआ था और उन्होंने मास के माध्यम से राजनीति को भी मानवीय और नैतिक आधार दिया था। इस तरह काग्रेस-जिसने ब्रिटिश सामाग्रवार को संकड़ों साल पुरानी जड़ें योद डाली-मूलत. संघातिक और मानवीय मूल्यों १४:: दूसरी आज़ादी - का राजनीतिक दल रहा। उस समय कांग्रेस का एकमात्र लक्ष्य था-अंग्रेजों से देश को मुक्त कराना। मुक्ति के इस जबरदस्त संघर्ष और अहिंसात्मक आंदोलन का आधार भी नैतिक मूल्य ही थे। मानवीय मूल्यों की राजनीति श्री। निःसन्देह कांग्रेस की उस समय की राजनीति के मूल में मानवतावाद पहले था। किन्तु वैसी स्थिति स्वतंत्रता के बाद नहीं रही। कांग्रेस गांधींजी के प्रभाव से क्रमश: मुक्त होती गई। यह बहस की बात है कि गांधीजी ने स्वयं कांग्रेस को मुक्त किया अथवा कांग्रेस ने ही उन्हें अपने-आपसे मुक्त कर दिया, पर इतना सच है कि देश की आज़ादी के फौरन बाद ही कांग्रेस का अस्तित्व ज्यादा प्रभावशाली हो गया था और उसे नैतिक, सैद्धांतिक और मानवीय मूल्य देने वाले मंत का कम । इस कमी को बहुत-से लोगों ने गांधी की कमजोरी माना है, और बहुत-से लोगों ने गांधी की विरक्ति । वहरहाल यह सच है कि कांग्रेस अब वह संस्था नहीं रह गई थी, जिसका लक्ष्य विदेशी से लड़कर मुक्ति पाना था, बल्कि कांग्रेस का लक्ष्य हो गया था भारतीय राज- नीति में येन-केन प्रकारेण सत्तारूढ़ रहना। सत्तावाद की इस राजनीति ने क्रमश: एक पवित्र संस्था के भीतर से उन मूल्यों को तोड़ना-मरोड़ना या दरकिनार करना प्रारंभ कर दिया, जो किसी भी लक्ष्य तक पहुंचने के लिए नैतिक रूप से मवसे कारगर और ईमानदार तरीके हो सकते थे श्री जवाहरलाल नेहरू ने कांग्रेस में प्रभाव की राजनीतिक विरासत महात्माजी से पाई थी, किन्तु गांधी और नेहरू दोनों में वैयक्तिक अंतर था--अपनी तरह के राजनीतिज्ञ होने का । एक ओर गांधीजी एकदम सैद्धांतिक और मूल्यवादी राजनीति के विचारक थे, दूसरी ओर नेहरूजी उस तरह की सैद्धांतिक और मूल्य-बंधनों की राजनीति में अपने-आपको वंधित नहीं पाते थे। वैयक्तिमा विश्लेपण किया जाए तो संभवत: इसका कारण था, गांधी और नेहरू का अपना-अपना सामाजिक परिवेश। एक ओर गांधी यदि नितांत भारतीय संस्कारिता और समाज की देन थे, दूसरी ओर नेहरू पूर्णत: पाश्चात्य संस्कारिता और सामाजिकता में पले-बढ़े थे। इस तरह कांग्रेस में दूसरे प्रभाव- शाली व्यक्ति का उदय इतना ताकतवर हुआ कि धीमे-धीमे कांग्रेस उन मानवीय मूल्यों से अजान ही हटती चली गई, जिन्हें कभी गांधी ने कांग्रेस में स्थापित किया था। स्वतंत्रता के बाद की मांग्रेस, एक नई कांग्रेस थी, जो निश्चित रूप से गांधीवादी कही जाती थी, किन्तु थी नहीं। यह कांग्रेस का संक्रमणकाल था। ।

दूमरी आशादी ::१५ एक महान गम्था, जो बंग्रेडो को दामता में देश की मुक्ति का पूरा संघर्ष-युग अपने माय बटोरे हए थी, अचानक ही स्वतंत्रता के पश्चात् भीतरी तौर पर मघर्षगील हो गई। टीक है कि यायेम म्वतंत्र भारत को सत्ता मामाने हुए पी, सिन्नु भीतर ही भीतर वह जर्जर होने लगी थी। कारण या-मस्या के भीतर ही दो विनारों वागंप । एक और नेहरू स्वयं और जनरे हामी, उनकी तरह मानने वाले थे, दूगरी और नितान्त गांधीवादी यया या राजेन्द्रप्रसाद, श्री मोरारजी भाई, जगजीवनराम, याचा कृपलानी आदि थे। सास के विघटन की कहानी मामान्यत. व्यक्तियों के विघटन और स्वार्षों के कारण टकराव की कहानी कही जाती रही है. हो सकता है कि याद में ऐसा हुआ हो, किन्तु म्वतंत्रता के तुरन्त बाद जिम तरह धीमे-धीमे कायम विघटन की और यह रही थी, तब यमी कोई बात नहीं थी। मूल यात थी मोचने-समझने के तरीकों की लड़ाई। मूल्यों का संघर्ष । "एक और जवाहरलाल नेहरू का पल्पनाशील समाजवाद और जन्मशील मंस्कारों में सोचना था, दूसरी ओर वे लोग थे, जो गाधीवाद के नितात भारतीय अनुपायी थे । किन्तु काप्रेम मम्था की गहरी जड़ों, पूर्वज नेताओं के आदर्शवाद और अनुगामन को दृढता ने बहुत सम्बे अर्मे तक भीतर ही भीतर मुनगते हुए इस विद्रोह को जनता के मामने सम्बे समय तक उजागर नहीं होने दिया। हालाकि बढ़त मे ऐमे मोग भी थे, जो धीमे-धीमे अपने-आपको काग्रेम की मनावादी शतरज से परे हटा से गए। ऐसे लोगों को राजनीतिक मम्बार मिला था गाधी मे। वे गिद्धात और गजनीतिक मूल्यों को शतं पर ममतोने नहीं कर मरने पे । जिस शालीन दग मे ये लोग अलग हुए, वह अपने-आपमें राजनीतिक मूल्यवाद का उदाहरण है। राजपि पुरषोत्तमदाम टडन, आचार्य कृपलानी, या जयप्रकाश नारायण, डॉक्टर राममनोहर लोहिया आदि अनेक तपम्बी थे, जिन्होंने सस्था पर दोष न मदकर मम्पूर्ण अनुगामन और मम्कारिता के साप अपने-आपको अलग कर लिया। यह ममय वह पा, जब बाग धीमे-धीमे प्पषितवार की ओर घट रही थी। और इस व्यक्तिवाद को यदवा दे रहे थे, ये मोग, जिनमें नेहरू की राजनीतिक विचारधारा के ममयंक कम थे, किंतु मेहर प्रभावी व्यक्तित्व को चाटुकारिता मे यराव करने वाले पादा थे। परिणामत. एक महान लोकतंत्रवारी और नैतिक मूल्यों मे यना-यहा राज- नीतिक दल काग्रेस क्रमश व्यक्तिवारी होता गया। होते-होते यह दन एक ऐमी फौज बनकर रह गया, जो किसी राजा के लिए राग्य बनाए रखती है, मिमके ।

१६ :: दूसरी आज़ादी दरवारी हां में हां मिलाते हैं और कानून, विचार, सिद्धांत, कला सभी कुछ राजा की इच्छानुकूल चलते हैं। कांग्रेस में व्यक्तिवाद का आरंभ यह विलकुल नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस में व्यक्तिवाद का जन्म केवल नेहरूजी से ही हुआ । संभवतः कांग्रेस में व्यक्तिवाद का आरंभ महात्मा गांधी के साथ ही हो गया था। उसकी हल्की-सी झलक उस समय मिली थी, जब नेताजी सुभास बोस ने कांग्रेस छोड़ी और दूसरी साफ झलक उस समय मिली, जव स्वतंत्र भारत के प्रधानमंत्री पद हेतु कांग्रेस दल में बहुमत सरदार वल्लभभाई पटेल के पक्ष में गया और महात्मा गांधी ने ज़िद करके नेहरूजी को प्रधानमंत्री पद पर लाने की इच्छा व्यक्त की। पर वह समय केवल व्यक्ति- वादी तानाशाही का नहीं, व्यक्तिवादी नैतिकता का भी था। उस नैतिकता का जिसकी बुनियाद में स्वयं महात्माजी ने ही सत्य, अहिंसा के शाश्वत नैतिक मूल्य की स्थापना की थी। यही कारण था कि उन्होंने अपना व्यक्तिवाद किसी राजनीतिक झूठ या शतरंजी चाल के बगैर स्पष्टत: सरदार पटेल के सामने प्रस्तुत किया। चूंकि सारे दल में नैतिक और परम्परागत मूल्यों के प्रति आस्था थी, अत: सहज भाव से सरदार ने अपने 'बुजुर्ग नेता' की वैयक्तित इच्छा को आदर दिया। पर वाद में व्यक्तिवाद से नैतिकता के समझौते और साफगोई की ईमानदारी वाली यह स्थिति नहीं रही। इसके बाद कांग्रेस में बढ़ता व्यक्तिवाद मूल्यों को कुचलता हुआ केवल निरंकुशवाद वनने लगा। राजनीति के नाम पर में वही पुतर्की और मूल्यहीन कहावत लागू होने लगी ऐवरी थिंग इज़ फेयर...' 'सब कुछ सही है ! ...' और यह हुआ कांग्रेस की मूल व्यक्तिवादी राज- नीति का आदर्श । इस व्यक्तिवाद ने अपनी राजनीतिक मोहरेबाजी प्रारंभ की पहले चुनाव से ही। १६५७ के चुनावों में मुझे याद है, कांग्रेस का चुनाव चिह्न चिह्न या दल न होकर केवल गांधी ही हो गया था। दीवारें गांधी से रंगी हुई थी। हर शासकीय कार्यालय में गांधी की तसवीरें लटकी हुई थीं । हर भापण, हर प्रचार-पन्न गांधी का नाम लेता था, हर सिनेमाघर में गांधी की तसवीर वाली स्लाइड दिखाकर 'कांग्रेस को वोट दो' कहा जाता था। हर नेता कांग्रेसी टोपी लगाकर 'गांधी की जै', 'जै हिन्द !'."या 'महात्मा गांधी जिन्दावाद' के नारे उछालकर सभा का प्रारंभ और अंत करता था। --- 1 दूगरी यारादी :: १७ और मजेदार बात यह थी कि गांधी मे गांधी की उपस्थिति में ही पाग पर को गरम चुती यो गाधीवाद के नाम पर वायेगमाराम मे चुनावी मुसा भर रही थी और गाधी तथा गाधीवार यमनियत में पायेग से हजारों मीन दूर रह गए पे। पर राजनीति का मिसात-गय मही है ! ... इगलिए गाधी के नाम पर कांग्रेग को जिताने जाना भी मही था। मुझे एक कहावत याद आती है और लगता है कि पोई भी महापुरुष राजनीति में एर गुडवित बनकर रह जाता है। कई बार इन गुपिल पर मब कुछ पता है। मिद्धान्तों में हटाहमा दल भी और मिसान्तों मे हवा हवा व्यक्ति भी... कहायत की घटना है- एक प्राहक कार यनानेवाली रिमी वडी फर्म में पहने और मोम में पहुंचकर उन्होंने इच्छा व्यक्त की कि उन्हें कार को ट्रायल दी जाए। तुरन्त पवम्या हुई। फर्म का ड्राइवर उन्हें कार में बिठानकर करीब बीस मिनी. मीटर से गया, तभी अचानक कार वन्द हो गई। द्वापर मीट मे उतरा, बाहर जाकर उमने बोनट गोला और फिर उगे बन्द कर निराश भाव में अपनी जगह आ बेटा। माथे पर हाय रया और उप । ग्राहक ने परेगान होकर पूछा, 'पयों भाई, क्या बात हुई ? कार पो बन्द हो गई?" ड्राइवर ने गहरी गाम मी। वोला, "क्या बताऊ माह्य । कार में जिन तो है ही नहीं !" इंजिन नहीं है ?" आश्चयं में ग्राहक चिल्लाया, "तय यह कार यहा तक मंगे दौड़ी पली आई?" ड्राइवर ने जवाब दिया, "यह तो कम्पनी पो गुटविल है माहब तो पहले आम चुनाव में काम और गाधी के बीच भी यही हुआ। गाधीजी जग तपम्बी राजनीतिम यो गुडविल, दल में नैतिक मूल्यों और बादों का पनन हो जाने के बावजूद, दल को चुनाव में भारी बहुमत की और पीच ले गई। पानी पाम ने मय पुछमही है के मिसात पर मता में समाए रहना तय किया । इस मिसात के तहत यहत कुमा। चूकि जन-गाधारण प्रजा. नवीय पवम्या का प्रारंभिक दौर जेल रहा था, अन यही मुविधा के माय कांग्रेग की मत्तावादी राजनीति और उमरे भीतर रामनिवार पनपता रहा। इम पतिवार का बहुत मुष्प्रभाव जवाहरलालजी में आया था और उम मारे दौर में, जर पनिजी प्रधानमंत्री थे, श्रीमती इन्दिरा गाधी छाया मी तरह उनो गाय रहा करती थी। इन्दिराजी पर अमन ग व्यक्तिवाद ने ।

१८:: दूसरी आजादी , असर किया, अपने पिता के प्रभाव और व्यक्तित्व के कारण । एक तरह से जव यह कहा जाता है और बहुत-से लेखकों ने स्वीकारा भी है कि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने सम्पूर्ण राजनीतिक विचार और योग्यता अपने पिता से शिष्य रूप में प्राप्त की, तब यह नहीं भूला जाना चाहिए कि इन्दिराजी अगर अपने पिता से राजनीतिक सूझ-बूझ पा रही थीं, तो बहुत हद तक वे जाने-अनजाने उस वैयक्तिकता को भी उभार रही थीं, जिसे उनके नीतिज्ञ पिता ने कांग्रेस पर हावी कर रखा था (या अनायास हो गई थी?) ! बहरहाल यह निश्चित था कि जवाहरलालजी के व्यक्तित्व से इन्दिराजी ने राजनीति कम और व्यक्ति- वाद ज्यादा सीखा, जिसका दुष्परिणाम जून १६७५ से भारत में जारी किए गए आपातकाल और उससे पूर्व उनके प्रधानमंत्रित्व में पूरी कांग्रेस संस्था और देश ने भोगा। इस व्यक्तिवाद को ज्यादातर बढ़ावा कांग्रेस में ही पहुंचे उन लोगों से मिला, जो 'नये' के नाम पर नारेबाजियां किया करते थे और जिन्होंने कांग्रेस का वह संघर्पशील रूप निश्चय ही नहीं देखा था, जो स्वतंत्रता से पूर्व रहा था। स्पष्ट शब्दों में यदि यह कहा जाए कि कांग्रेस के भीतर 'नये खून' के नाम से अचानक जो पीढ़ी आने लगी थी, वह अवसरवादी और स्वार्थ-लिप्त ज्यादा थी, वनिस्वत देश के लिए कुछ करने वाले लोगों के। इन्दिराजी के भीतर बैठे राजनीतिज्ञ ने दूरदर्शिता से इस तरह के लोगों को खूब अच्छी तरह समझा और शायद उसी समय निर्णय कर लिया कि यही लोग हैं, जो आगे उनके काम आ सकते हैं । श्रीमती गांधी ने किस तरह, ऐसे लोगों को काम में लिया-~बाद में जिक्र आएगा। कांग्रेस के भीतर नेहरूजी के समय से पनपी व्यक्तिवादी राजनीति की चर्चा करते हुए वयोवृद्ध लेखक और हिन्दी पत्रकार श्री कन्हैयालाल मिथ प्रभामार की इन्दिराजी को लेकर वर्णित एक घटना की चर्चा करना चाहुंगा। यह घटना हालांकि प्रभाकरजी की तीन पत्रकारीय बुद्धि ने राजनीतिक आदर्श बना ली है, किन्तु विना घुमाव-फिराव के यदि इस घटना पर ध्यान दिया जाए तो सहज समझ में आ जाता है कि नेहरू-परिवार ने किस 'मुग़लिया ढंग से हिन्दुस्तान के तस्त पर कब्जा किए रहने की व्यक्तिवादी राजनीति सली थी। श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकार ने 'नया जीवन' के 'इंदिरा गांधी' अंक में लिया है: जो लोग अन्दरूनी खबर रखते हैं, उनका कहना है कि जवाहरलालजी दुमरी आजादी ::१६ - मी धीमारी (१९६४ में; जब उन्हें पशापात हुमा तव-भ्रमर)को देगते हुए मुरारजी भाई देसाई के पाम यह सन्देगा भेजा गया था कि वे इन्दिराजी को प्रधानमत्री और अपने को उप-प्रधानमत्री यनाकर गामन का नेतृत्व स्वीकार करें तो जवाहरलालजी को स्वागपत्र देने के लिए तैयार किया जा मरता है। दमपर मुरारजी भाई या उत्तर था कि जवाहरलालजी रयागपत्र दे६, और गंगद-गदस्यों को अपने नेता का चुनाव करने दें। पुनाव इन्दिराजी के पक्ष में रहा तो मैं उनके गाय काम करूंगा और मेरे पक्ष में रहा तो ये मेरे माप काम मर नंगी।..." प्रकट है कि कांग्रेग मे भीतर वैटा नेहरू-परिवार का व्यक्तिवाद उगी समय में हम राजनीतिक पटपट में जुट गया था कि किस तरह इन्दिराजी को जवाहरलालजी को विरामती कुर्मी पर पहुंचा दिया जाए। श्री प्रभाकर का यन (धाहे जिम वकीली घुमाव-फिराव से लिया गया हो) यह प्रकट कर जाता है कि नेहम्जीको उपस्थिति में ही, श्रीमती गाधी प्रधानमंत्री बनने का जोड़-तोड़ प्रारंभ हो चुका पा। यदि यो मुरारजी भाई देसाई ने उग गमय यह उत्तर दिया कि काम के ममद-मदम्यों यो प्रजातातिक पद्धति से अपने नये नेता का चुनाव करने दिया जाए तो इसमे कौन-मी गैरवाजिय बात थी ? श्री देगाई का उत्तर प्रजातात्रिक व्यवम्पा की दृष्टि से एक्दम नहीं था। अप. क्षम्प मे श्री देगाई ने अपने उत्तर में यह भी कह दिया था कि मानवीय व्ययम्या में विगी पद के लिए दो व्यक्ति भी यो हो सकते हैं, फिर बहुमत जिगे पुनना चाहेनने। प्रभाकरजी ने आगे लिया है कि "मुरारजी के इस बडवे उत्तर के कारण ही जवाहरलालजी ने अपने उत्तराधिकारी रूप में श्री लालबहादुर शास्त्री को मुन लिया था।" यह दलीत अपने आपमे और भी ज्यादा हाम्यास्पद है। भला मिगी प्रजातन में ऐमा फैन हो सकता है कि एक चुना हुया प्रतिनिधि अपने पारधारिम पा चुनाव भी करने लगे 'यदि यह कहा जाता कि नेहरूजी ने अपनी मगि मा अपनी राय (जो उनकी निजी धी- वांग्रेग यायंगमिति के एक सदस्य प. नात-भर) गाम्बीजी के पक्ष में बनाई थी तो स्यादा बेहतर होना । २७ मई, १९६४ यो श्री जवाहरलालजी की मृा के बाद पायेग दल ने गर्वसम्मति मे यो गाम्बी को नेता पुना और वे प्रधानमन्त्री हए। श्री पानी मामपूर्ण राजनीतिक जीवन आशंवाद का उदाहरण रहा था। बाद में भी रहा। वे राजनीतिक अवस्य थे, रिन्नु उनको राजनीनि मानवीय मूल्यों की २०:: दूसरी आज़ादी - भारतीय राजनीति थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में श्रीमती गांधी को सूचना व प्रसारण मन्त्री बनाया था। जवकि प्रभाकरजी लिखते हैं- ... इन्दिराजी का व्यक्तित्व अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व की दृष्टि से लालबहादुरजी से बड़ा था-प्रसिद्धि में भी और सम्पर्क में भी, इसीलिए लालबहादुरजी ने इन्दिराजी का नाम विदेश मंत्री के रूप में चुना, पर इन्दिराजी ने साफ इन्कार कर दिया।"लालवहादुरजी की व्यवहारनिपुणता को ही इसका श्रेय है कि उन्होंने केन्द्रीय सूचना मंत्री बनना स्वीकार कर लिया।" मुझे स्मरण है, जव श्री शास्त्री ने स्नेह और आदरसहित श्रीमती गांधी को अपने मंत्रिमंडल में लिए जाने की घोषणा की, तव वुद्धिजीवी और सामान्य वर्ग में यही कहा गया था कि शास्त्रीजी आदर्श व्यक्ति हैं और उन्होंने स्वर्गीय जवाहरलालजी की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ही एक संवेदनात्मक कदम उठाया है। यह कितनी ओछी बात है कि श्री प्रभाकर जैसे सुलझे हुए और बुजुर्ग बुद्धिजीवी स्वर्गीय शास्त्री की योग्यता, सम्पर्क और प्रसिद्धि का इन्दिराजी के साथ 'छोटा-बड़ा' शब्दों में तुलनात्मक अध्ययन करने लगें। इस तरह के लखन-उदाहरण सामन्ती इतिहास की चीज़ हो सकते हैं, प्रजातंत्रीय व्यवस्था के निश्चित ही नहीं। कुल मिलाकर यह कि नेहरू-परिवार की व्यक्तिवादी परम्परा को यदि स्वतंत्रता के बाद घुस आए कांग्रेस के अवसरवादी या मुखौटाधारी राजनीतिज्ञों ने बढ़ावा दिया तो दूसरी ओर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस स्थिति को बुद्धिजीवी वर्ग ने भी कम वढ़ावा नहीं दिया। व्यक्तिवाद का उमड़ता-घुमड़ता चेहरा यदि श्रीमती गांधी के प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के 'बाद अपने ज्यादा स्पष्ट रूप में सामने आना शुरू हुआ तो उससे भी ज्यादा स्पष्ट रूप में बुद्धिजीवियों ने अपने 'भाट-रूप' पेश करने शुरू किए। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों से मुक्ति के बावजूद देश धीमे-धीमे एक परिवार-विरोप की सल्तनत के रूप में ढलने लगा। वौद्धिक दासता का जितना घिनौना रूप आपातकाल के दौरान देखने को मिला है, संभवतः ब्रिटिश राज में भी वैसा नहीं देखा गया था। एक ओर यदि यह स्थिति थी, तो दूसरी ओर समझदार 'शासक-परिवार' ने विरोध या सत्य को कुचलने की विभिन्न पद्धतियां अपनाई। मजेदार बात यह थी कि इन पद्धतियों पर बड़ी सुविधा से जनतंत्र का बुरका उड़ाया हुआ .

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२०:: दूसरी आजादी - । - भारतीय राजनीति थी। यही कारण था कि उन्होंने अपने मंत्रिमंडल में श्रीमती गांधी को सूचना व प्रसारण मंत्री बनाया था। जवकि प्रभाकरजी लिखते हैं- ...."इन्दिराजी का व्यक्तित्व अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व की दृष्टि से लालवहादुरजी से वड़ा था-प्रसिद्धि में भी और सम्पर्क में भी, इसीलिए लालबहादुरजी ने इन्दिराजी का नाम विदेश मंत्री के रूप में चुना, पर इन्दिराजी ने साफ इन्कार कर दिया। लालवहादुरजी की व्यवहारनिपुणता को ही इसका श्रेय है कि उन्होंने केन्द्रीय सूचना मंत्री बनना स्वीकार कर लिया।" मुझे स्मरण है, जब श्री शास्त्री ने स्नेह और आदरसहित श्रीमती गांधी को अपने मंत्रिमंडल में लिए जाने की घोषणा की, तव बुद्धिजीवी और सामान्य वर्ग में यही कहा गया था कि शास्त्रीजी आदर्श व्यक्ति हैं और उन्होंने स्वर्गीय जवाहरलालजी की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ही एक संवेदनात्मक कदम उठाया है। यह कितनी ओछी बात है कि श्री प्रभाकर जैसे सुलझे हुए और बुजुर्ग बुद्धिजीवी स्वर्गीय शास्त्री की योग्यता, सम्पर्क और प्रसिद्धि का इन्दिराजी के साथ 'छोटा-बड़ा' शब्दों में तुलनात्मक अध्ययन करने लगे। इस तरह के लेखन-उदाहरण सामन्ती इतिहास की चीज़ हो सकते हैं, प्रजातंत्रीय व्यवस्था के निश्चित ही नहीं। कुल मिलाकर यह कि नेहरू-परिवार की व्यक्तिवादी परम्परा को यदि स्वतंत्रता के बाद घुस आए कांग्रेस के अवसरवादी या मुखौटाधारी राजनीतिज्ञों ने बढ़ावा दिया तो दूसरी ओर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इस स्थिति को बुद्धिजीवी वर्ग ने भी कम बढ़ावा नहीं दिया। व्यक्तिवाद का उमड़ता-घुमड़ता चेहरा यदि श्रीमती गांधी के प्रधानमंत्री पद पर पहुंचने के वाद अपने ज्यादा स्पष्ट रूप में सामने आना शुरू हुआ तो उससे भी ज्यादा स्पष्ट रूप में बुद्धिजीवियों ने अपने 'भाट-रूप' पेश करने शुरू किए। परिणाम यह हुआ कि अंग्रेजों से मुक्ति के बावजूद देश धीमे-धीमे एक परिवार-विशेप की सल्तनत के रूप में ढलने लगा। बौद्धिक दासता का जितना घिनौना रूप आपातकाल के दौरान देखने को मिला है, संभवतः ब्रिटिश राज में भी वैसा नहीं देखा गया था। एक ओर यदि यह स्थिति थी, तो दूसरी ओर समझदार 'शासक-परिवार' ने विरोध या सत्य को कुचलने की विभिन्न पद्धतियां अपनाई। मजेदार बात यह थी कि इन पद्धतियों पर बड़ी सुविधा से जनतंत्र का बुरका उढ़ाया हुआ - था और सहजता के साथ सत्य को झूठ मै ढालने की कोशिश की जा रही थी। स्वर्गीय नेहरूजी के समय में विरोध का गला घोंटने की राजनीतिक पद्धति बहुत 'शालीन' थी। रेडियो, टेलिविज़न और समाचारपन्न सरकारी मुट्ठी मे थे तथा कई लोग विभिन्न ढंग से पुरस्कृत और सम्मानित किए जा रहे थे। कला-साहित्य का राजाश्रय दिए जाने की 'शालीन राजनीति' के हथियार से बड़ी मुविधा के साथ भौतिक आकर्षणों की ओर झुकनेवाले बुद्धिजीवियो के आलोचनात्मक दात भौथरे कर दिए जाते थे। जिन समाचारपत्रो मे गलत के प्रति विद्रोह प्रकट किया जाता था, उनके सरकारी विज्ञापन वन्द कर दिए जाते थे या उन्हें 'साम्प्रदायिक', 'रूढिवादी' अथवा 'प्रतिक्रियावादी' कह दिया जाता था ! देश का सारा प्रचार-तंत्र सरकार के हाथ में था ही और सरकार एक सम्राट् की थी, अतः बड़ी आसानी से किसी भी दल, व्यक्ति-विशेष या बुद्धिजीवी पर जो लांछन लगाना चाहते, लगा दिया जाता। यही नहीं, कांग्रेस दल मे ही अगर इस पारिवारिक साम्राज्यवाद या नीतियो का विरोध होता तो ऐसे लोगों को किसी न किसी रूप में जन-सामान्य के सामने गलत तरह प्रचारित किया जाने लगता। किसीको अमरीकी एजेण्ट, किसीको सी० आई०ए० एजेण्ट, किसीको साम्प्रदायिक, किसीको किसी राष्ट्रनेता का हत्यारा या किसीको देशद्रोही कहा जाने लगता। इस प्रचार-राजनीति में हथियार बनते थे वे लोग, जो किसी भी देश की पीढिया बनाते हैं और जिन्हे बुद्धिजीवी कहा जाता है। साम्राज्य पनप रहा था। इस साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वर उठानेवाले लोगों को क्रमश सस्था से 'छांटा जा रहा था। ऐसे प्रचारक बुद्धिजीवियों का एक उदाहरण दू । प्रसिद्ध पत्रकार, फिल्म- कार श्री ख्वाजा अहमद अब्बास की एक पुस्तक इन्दिराजी के प्रधानमत्री बनने के बाद प्रकाशित हुई थी, 'इन्दिरा गाधी . रिटर्न आफ दि रेड रोज' और उसके फौरन बाद ही उन्हीकी एक और पुस्तक प्रकाशित हुई 'इन्दिरा गांधी: सफलता के दस वर्ष'। दोनो ही पुस्तकें इन्दिराजी के प्रति काफी समर्पित भाव से' लिखी गई थी, किन्तु अब्बास साहब का स्वतत्रचेता मन कही न कही इस 'दुविधा से भारी था कि वे उतना कुछ समर्पण कर रहे है, जितना सभवत. उन्हे (उनके भीतर बैठे निर्णायक और ईमानदार बुद्धिजीवी को) नही करना चाहिए था। यही कारण हुआ कि श्री अब्बास ने इन्दिराजी पर लिखी अपनी दूसरी पुस्तक की भूमिका मे दवे शब्दो मे यह सफाई दी कि "आज तक मुझपर २२:: दूसरो आज़ादी किसीने यह आरोप नहीं लगाया है कि मैं सत्ता पर प्रतिष्ठित लोगों का खुशा- मदी हूं!" मैं समझ नहीं पाता हूं कि अगर श्री अब्बास वैसा नहीं करते रहे थे, तब इस सफाई की क्या आवश्यकता थी? इमरजेंसी के दौरान 'भाट-भाव के लेखन और पत्रकारिता' को जितना प्रोत्साहन मिला, स्वतंत्रता (?) के गत तीस वर्षों में नहीं मिला। और यह भी कि इस समय में जिस सीमा तक भारतीय बुद्धिजीवी ने 'मानसिक आत्म-समर्पण' किया, उस सीमा तक सोचना भी कष्टकर है। यह कहानी आगे कहीं कही जाएगी। फिलहाल कांग्रेसी राजनीति के भीतर जनमे भयानक व्यक्तिवादी साम्राज्यवाद के उत्कर्प की कहानी सुनिए। श्रीमती गांधी : प्रधानमंत्री श्री गुलजारीलाल नन्दा ११ जनवरी, १९६६ को दूसरा वार कार्यकारी प्रधानमंत्री चुने गए। इस वार दल में नेता पद के लिए कई नाम उभरे थे-- यथा श्री मुरारजी भाई, श्री यशवंतराव चव्हाण, और स्वयं श्री नन्दा। कभी- कभार जन-साधारण में एस० के० पाटिल का नाम भी उठता, पर कुछ ही दिनों में यह स्पष्ट हो गया था कि असली टसल श्री मुरारजी भाई से ही होगी। विरोध में जो भी खड़ा हो । कांग्रेस की वैचारिक फूट और सामन्ती संघर्ष के इस संक्रमण-काल में देश किस व्यक्ति के हाथ जाएगा लोगों में चर्चा होती, अटकलें लगाई जातीं। सूचना मंत्री रहने के दौरान श्रीमती गांधी ने अपने व्यक्तित्व को बड़ी सतर्कता के साथ इस रूप में नहीं उभरने दिया था कि वे दिग्गजों' की कोटि में गिनी जाकर विवादास्पद वन जाएं, बल्कि उन्होंने बड़ी समझदारी से अपने-आपको अत्यंत सरल, शांत और मृदु महिला के रूप में उभारा था। यही नहीं, उन्होंने अपने-आपको एक भारतीय महिला के सम्पूर्ण आदर्शों की प्रतीक भी बनाया था। जबकि दिग्गजों' की स्थिति अलग थी। - १.न्दिरानी उन दिनों जब किसी अर्ध-विकसित नगर-गांव की सभा में भाषण दिया करती पी तब विशेष रूप से पल्लू सिर पर लिया करती थीं, जबकि सामान्यतः वैसा नहीं होता था। मुझे स्मरण है कि उन्होंन जन-साधारण को सांस्कृतिक संवेदना को भी गाहे-बगाहे यहे विशिष्ट भारतीय धरातल पर अपने पक्ष में उभारा। इसका उदाहरण है उनका इलाहाबाद में यह महना कि मैं आपकी बेटी हूं जवकि कश्मीर में सुना गया था कि वह दूसरी आजादी ::२३ राजनीतिक जुझार के दौर में वे परस्पर साथ रहकर भी प्रतिद्वंद्वी भाव से जन- सामान्य के सामने स्पष्ट थे। उन्होंने एक-दूसरे के बारे मे दवे-मुदे ढग से जनता के बीच आलोचना करके अपने-आपको अजाने ही उजागर भी कर डाला था। स्वर्गीय नेहरू ने अपने समय मे ही मुरारजी भाई को जबरदस्त व्यक्तित्व की तरह उभरते देखा था और उसी समय से मुरारजी को लेकर जनता के बीच एक खास तरह का प्रचार-तंत्र कार्य करने लगा था। इस प्रचार-तन ने उन्हे नितान्त गाधीवादी और घोर प्रजातात्रिक होते हुए भी एक 'डिक्टेटर' या 'जिद्दी राजनीतिज्ञ के रूप मे उभार दिया था। लोगों के बीच उनके व्यक्तित्व के प्रति शंकाएं और भय पैदा कर दिए गए थे। इस स्थिति का लाभ श्रीमती इन्दिरा गाधी को बहुत मिला। बहुत हद तक इसका कारण श्री मुरारजी भाई का समझौतावादी राजनीतिज्ञ न होना भी था। इसके बावजूद मुरारजी अपने-आपमे इतने प्रभावशाली थे कि नेहरू के बाद अपने सभी साथियो की तुलना में जनता के बीच वे ही चर्चित थे। सहज था कि मुरारजी भाई के विरोध में वैयक्तिक रूप से हर दिग्गज महसूस कर रहा था कि वह टिक नहीं पाएगा । यह भी कि मुरारजी के दवंग व्यक्तित्व की कल्पना उनके दिग्गज' साथियो यथा, कामराज, अतुल्य घोष, चव्हाण आदि सभी को थी और ये सभी किसी न किसी स्तर पर महसूस कर रहे थे कि मुरारजी यदि प्रधानमत्री बने तो उनका (दिग्गजों का) अपना प्रभाव कम हो जाएगा। तब क्या करे ?... १० जनवरी को, जिस दिन शास्त्रीजी को हार्ट अटैक हुआ और उनकी मृत्यु हुई उसी दिन से दल के नेता पद को लेकर दिल्ली मे जबरदस्त दौड़धूप और उलट-फेर चलती रही। 'दिग्गज' चिन्तित थे, उनमे से मुरारजी के सामने कोई नहीं ठहरेगा, तब किसे लाया जाए? विकल्प रूप में बार-बार एक चेहरा आ जाता श्रीमती इन्दिरा गाधी । इस चेहरे के साथ राजनीतिक गुडविल भी थी और देखने-भालने और अब तक के व्यवहार से लग रहा था जैसे इस निविवाद चेहरे को अच्छी तरह काम में लिया जा सकता है । उस मूलत. तो कश्मीरी ही हैं और रायबरेली में उन्होंने जनता को बतलाया कि वह रायबरेली की बहू हैं । क्या यह सब इसलिए नहीं था कि क्षेत्रीय स्तर पर निर्मल हृदय भारतीयो को सवेदना जगाकर सहानुभूति पा ली जाए। जबकि उपर्युक्त वातो से देश के लिए, जनता के सामने कौन-सा रचनात्मक और क्रातिकारी कदम रखा जाता था।

२४ :: दूसरी आजादी क्षण दिग्गज' यह कल्पना भी नहीं कर सके थे कि अपने-आपको निविवाद और चमत्कारी ढंग से शांत' बनाए रखना भी एक राजनीति हो सकती है। यह संकेत दिग्गजों को उस समय भी नहीं मिला, जब धीमे से मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री और राजनीति के धाकड़ खिलाड़ी श्री द्वारिकाप्रसाद मिश्र ने श्री मुरारजी भाई के विरुद्ध श्रीमती गांधी का नाम प्रस्तावित किया। यही नहीं, उन्होंने यह सूचना भी दी कि श्रीमती गांधी खुल्लमखुल्ला ढंग से दलीय चुनाव के मैदान में उतर सकती हैं। यही हुआ। १६ जनवरी, १९६६ को दलीय चुनाव के मैदान में श्रीमती इन्दिरा गांधी, मुरारजी के विरुद्ध उतरी और उन्होंने संसदीय दल में बहुमत से मुरारजी को हरा दिया। दिग्गजों ने समझा कि उनकी राजनीति सफल हुई जवकि वास्तव में श्रीमती गांधी की विजय उनकी अपनी राजनीतिक विजय थी और दिग्गजों की राजनीतिक पराजय । सत्ता में आते ही प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने प्रचार-तंत्र का वही 'शालीन' प्रयोग प्रारंभ किया जो कभी उनके पिता जवाहरलालजी ने किया था। परिणाम हुआ, दलगत स्थिति किनारे हो गई, दल की लोकतंत्री कार्यपद्धति प्रमशः समाप्त या क्षीण होने लगी और श्रीमती इन्दिरा गांधी एक खास तरह जन-साधारण के सामने अपने-आपको घोर समाजवादी, लोकतंत्री और जन- हितपी रूप मे उभारने लगीं। यही कारण हुआ कि कांग्रेस में श्रीमती गांधी के एक वर्षीय सत्ता-काल के भीतर ही वैचारिक बलवा शुरू हो गया। यह बलवा पहले प्रधानमंत्री के सामने समझायश के रूप में आया, फिर धीमे-धीमे जनता के सामने भी उभरने लगा। प्रचारतंत्र का कमाल यह था कि दल के वृद्ध 'दिग्गजों को खास तरह के पूंजीवादी गुर्गे' के रूप में सामान्य लोगों के सामने लाया जा रहा था। जैसा कि मैंने पूर्व में लिखा, श्रीमती गांधी बहुत पहले उस 'नये सून' को पहचान चुकी थीं, जो केवल अवसरवादी और स्वार्थ-लिप्त था। सत्ताधारी होने के पश्चात् इन्दिराजी इस नये खून' को बढ़ावा देती रही थी और प्रचार-तंत्र के माध्यम से जनता के सामने उन्हें क्रांतिकारी होने का तमगा पहनाती रही थीं। इस तरह लोकतंत्रीय संस्था में धीमे-धीमे प्रचार के स्लो प्वायजनिंग' ने इन्दिराजी का बहुमत बनाया, व्यक्तिवाद को जड़ें स्थायी की। दुर्वपं राजनीतिज्ञ संबंधी कामराज, निजलिंगप्पा, मुरारजी भाई आदि अव भी उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर विश्वास किए चले जा रहे थे, जो महात्मा गांधी ने कांसेत को सौंपी थी। कुल मिलाकर यह कि एमा और 'एवरी थिंग दूसरी आजादी :: २५ इज फेयर' की नैतिक बंधनों से मुक्त राजनीति थी, दूसरी ओर नितात 'भारतीय मूल्यों वाली गांधीवादी लोकतंत्रात्मक राजनीति थी, जो पल-पल इम विश्वास को सहेजे हुए चल रही थी कि जनता-जनार्दन से श्रेष्ठ निर्णायक कोई नहीं है और सत्य परखने के लिए जनता के पास समुचित शक्ति है। इस सारे दौर को शायद श्रीमती गांधी काग्रेस मे व्यक्तिवादी ढंग से पूरी तरह कैश न भी करवा पाती, किन्तु राजनीतिक चेतना के नाम पर संभवतः उतनी फातिकारी वैचारिक धरती उस समय तक देशवासियो को नहीं मिली थी। दूसरी ओर देश के औसत समाचारपन्न और बुद्धिजीवी अपने-आपको शासकीय सुविधाओं के लिए एक तरह से गिरवी रखे हुए थे। तब कौन बचा था जो वैचारिक चेतना फैला सकता? विरोधी दलो की स्थिति और भी गई. बीती थी। स्वतंत्रता के बाद निरंतर चले प्रचार-तत्र ने विरोधियों को साम्प्रदायिक और सी० आई० ए० के एजेण्ट प्रचारित कर रखा था। सत्ता में अपने-आपको स्थापित किए रहने के मोह ने एक ओर श्रीमती गांधी को कांग्रेस में फूट पैदा करने की प्रेरणा दी तो दूसरी ओर उन्होंने हौले से भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से हाथ मिला लिए। वही कम्यूनिस्ट पार्टी, जिसने कभी अंग्रेजों से स्वतन्त्रता के लिए संघर्ष के समय सारे देश से गद्दारी की थी। वह कम्यूनिस्ट पार्टी, जिसके राजनीतिक दर्शन-दाता और सिद्धांत- जनक ने इस आदर्श को गढा है कि अपने-आपको मजबूत करने या सत्ता पर पहुचने का सबसे आसान तरीका है, किसी भी देश में अराजकता पैदा कर डालना या फिर उस देश के सामाजिक, सास्कृतिक, राजनीतिक जीवन में अस्थिरता ला देना । ऐसे सक्रातिकाल में माक्र्सवाद को सुविधा से कब्जा करने के अवसर मिलते है। और १९६६-६७ मे भारतीय प्रजातन्त्र उसी दौर से गुजर रहा था। श्रीमती गाधी के व्यक्तिवादी साम्राज्यवाद ने काग्रेस को अपने ही भीतर हिला डाला था। जो दिग्गज कभी उन्हें अपने दल की सर्वेसर्वा बनाकर ले आए थे, वही अपनी गोटी की मार झेल रहे थे । लोकतात्रिक मूल्यो से सस्था क्रमश रिक्त हो रही थी। विरोधी दल वदनाम किए जा चुके थे। देश आर्थिक और सामाजिक सकट में था। कम्यूनिस्ट पार्टी ने सही अवसर जानकर अपनी "महान क्रांति' की योजना बना रखी थी। यह क्राति थी, विगडते को ज्यादा बिगाड़ डालने की। इस क्राति के अनुसार महान सस्था में पड़ी दरार को ज्यादा चौडा कर डालना था। यहा तक कि काग्रेस मस्था ही चकनाचूर २६ :: दूसरी आज़ादी हो जाए। मुझे स्मरण है कि उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के शीर्पस नेता खुलेआम जन-मंच पर आकर इन्दिराजी का समर्थन करने लगे थे। यही नहीं, उन्होंने सबसे पहले नारा दिया-'इन्दिरा के हाथ मज़बूत करो!' इसी समय में १६६७ का चुनाव आया । गरीवी हटाने और देश को बनाने की ऐसी-ऐसी सब्ज़वागी तसवीरें जनता के सामने दिखाई गई थीं कि लोग काल्पनिक सुन्व के संसार में खोए जा रहे थे। यह भी कहा जा रहा था कि यह सब इन्दिराजी केवल इसलिए नहीं कर पा रही है, क्योंकि कांग्रेस में ऐसे बूढ़े लोग हैं, जिनकी राजनीतिक बुद्धि कुंठित हो चुकी है और जो भ्रष्टाचारी हैं अथवा अमेरिकी साम्राज्यवाद के गुर्गे हैं। ऐसे लोग देश में गरीबी बढ़ा रहे हैं और अमीरों को ज्यादा अमीर होने की सुविधाएं दिए जा रहे हैं। इस हवाई प्रचार को वल दे रहे थे वहुत-से बुद्धिजीवी, जिन्होंने भविष्य की कुछ आशाएं बटोर रखी थीं। किसीने यह कि जो श्रेष्ठ 'भाट' सिद्ध होगा, उसे या तो पुरस्काररूप में कोई 'श्री' मिल जाएगी, या फिर राज्यसभा की सदस्यता। यदि यह सव न भी मिल पाया तो इतना निश्चित ही है कि वे किसी सरकारी ऋण-योजना का ही लाभ उठा लेंगे। बहुत-से छुटभइए समाचारपत्र में शुरू हो गए थे, जिनकी संख्या हजारों में थी और ये सभी पन परम सेवा भाव से इस प्रचार-तंत्र के पुर्जे बने हुए थे। मुझे ऐसे कई समाचारपत्रों का स्मरण है, जिन्हें निकलने के फौरन बाद ही विभिन्न प्रान्तों के विज्ञापन मिलने लगे थे, ताकि वे दीर्घजीवी हों। इसके विपरीत, मुझे यह भी स्मरण है कि उन समाचारपत्नों की हालत बुरी तरह खस्ता हो चुकी थी, जो इस व्यक्तिवाद ना विरोध करते रहे थे या जो विरोधी दलों की बात को महत्त्व देकर काशित किया करते थे। कई पत्रों को तो इस सीमा तक दवाया गया था कि का प्रकाशन ही वन्द हो जाए। यह नीति नई नहीं थी। श्री नेहरू के समय की ही थी । अन्तर इतना था स्वतंत्र विचारों का गला घोंट देने की पद्धति उतनी क्रूर नेहरूजी के समयः ही थी, जितनी कि श्रीमती इन्दिरा गांधी के सत्तारूढ़ होने के बाद धीमे- होती गई। व्यक्तिवादी और साम्राज्यशील स्वभाव का ही अंग था यह । वाहरल ल नेहरू से लेकर श्रीमती इन्दिरा (नेहरू) गांधी के सत्ताकाल Pा सारा समय यदि इस ढंग से देखा जाए तो यह सहज ही भी समझा जा है कि वाप-बेटी में किस अनुपात तक व्यक्तिवाद समाया हुआ था। श्री जातंत्रीय स्वर के प्रति उतने निर्मम नहीं हुए थे, जितनी श्रीमती गांधी दूसरी आजादी :: २७. हुई । क्या यह इस बात का प्रमाण नहीं है कि श्रीमती गांधी एकदम व्यक्ति. वादी या 'राजा' स्वभाव की थी? फरवरी १६६७ के चुनाव मे श्रीमती इन्दिरा गांधी ने प्रचार-तंत्र को वैसाखी लगाकर देश मै तूफानी दौरे किए और व्यक्तिशः श्रीमती गांधी को इन चुनावी दौरों का लाभ भी मिला। चुनाव परिणाम आए। पिछले (१९६२ के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को ३८१ स्थान मिले थे, जबकि इस बार केवल २८२ स्थान प्राप्त किए जा सके थे। पिछले चुनाव में भारतीय जनसंख्या के ७० प्रतिशत मत कांग्रेस के पक्ष में गए थे, जब कि इस बार यानी १६६७ में कांग्रेस को केवल ५५ प्रतिशत मिल सके थे। ठीक है कि काग्रेस ने केन्द्र में बहुमत वटोर लिया था, किन्तु यह भी सिद्ध हो चुका था कि श्रीमती इन्दिरा गांधी के व्यक्तिवाद का विरोध जन-मानस में भी है। इस सबके बावजूद श्रीमती गाधी निजी तौर पर लाभ में रही थी। काग्रेस जैसी गहरी जड़ो की संस्था को उखाड़ते हुए उन्होने सौदा किया था इस चुनाव में, अपने विरोधी दिग्गजों को समाप्त करने का। भले ही इस सौदे ने काग्रेस के व्यापक प्रभाव से भारतीय मतदाता की २७.७ करोड सख्या खो दी हो। दिल्ली में शासकीय स्तर पर इस विजय के ढिढोरे पोटे गए। व्यक्तिसत्ता के हामियो और चाटुकारों ने खुशियों को दीवाली मनाई। पीली पनकारिता से भरे समाचार- पनो ने बड़े जोर-शोर से श्रीमती गाधी के चित्र प्रकाशित किए । यही नहीं, इस अवसर पर कवियो ने कविताए लिखी, रगकमियो ने नाटक किए। लेखकों ने इन्दिराजी पर पुस्तकें लिखनी शुरू कर डाली। किन्तु उस समय ऐसे तथाकथित लोगो ने कल्पना भी नहीं की थी कि वे भारतीय लोकतत्र में इन्दिरा गाधी को स्थापित नहीं कर रहे है, बल्कि राजतंत्र की बुनियाद डाल रहे हैं । १२ मार्च, १९६७ ! श्रीमती इन्दिरा गाधी पुन प्रधानमंत्री चुन ली गई। कांग्रेस कार्यसमिति मे कुछ हद तक -मुदा विरोध भी हुआ। ससदीय दल मे चल-चख भी रही, किन्तु श्रीमती गाधी 'अवसरवादियों' की कृपा से पुन. सत्तारूढ हो गई। इस स्थिति और श्रीमती गाधी के पुन. चुने जाने को 'नया जीवन' में ये टिप्पणी लिखकर श्री प्रभाकर ने अपनी तरह व्यक्त किया। मजेदार बात यह है कि श्री प्रभाकर की यह टिप्पणी अपने-आपमे श्रीमती इन्दिरा गाधी के उस २८ :: दूसरी आजादी । व्यक्तित्व को उजागर करती है, जो पूर्णतः सामन्ती है। उद्धृत करता हूं : " इस अवसर पर श्रीमती इन्दिरा गांधी ने परिपक्व राजनीतिज्ञता का परिचय दिया और अपनी पैतृक साहसिकता का भी। राजनीतिज्ञता का इस बात में कि कांग्रेस अध्यक्ष श्री कामराज इस वार मुरारजी के पक्ष में थे, पर वे यह जानते थे कि बहुमत श्रीमती इन्दिरा गांधी के साथ है। इन्दिराजी ने आरम्भ में मुरारजी भाई को उप-प्रधानमंत्री मानने से जोरदार इनकार करके उनका उत्साह तोड़ा, बाद में पार्टी की इच्छा के माध्यम से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। साफ-साफ कह भी दिया कि मंत्रिमंडल के निर्माण में मैं स्वतंत्र हूं। इनमें उप-प्रधानमन्त्री का कोई हाथ नहीं होगा। इस प्रकार कामराज इस हद तक टूट गए कि मंत्रिमंडल के निर्माण में इन्दिराजी ने उनसे सलाह तक नहीं ली। और सुवह ६ वजे उन्हें अपने वंगले पर बुलाकर मंत्रिमंडल के सदस्यों की सूची दिखा दी और वे 'ठीक ही है। कहकर लौट आए । इन्दिराजी के हाथ में कुंजी यह थी कि मुरारजी भाई के साथ हो जाने से सदस्य उनके साथ सौदेवाज़ी करने की स्थिति से वंचित हो गए थे। अब उनसे रूठकर या ऐंठकर वे कहां जा सकते थे? किसके नाम पर उन्हें धौंस दे सकते थे? इस प्रकार उन्होंने अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया, यह उनकी बड़ी सफलता थी। इस सफलता का उन्होंने मंत्रिमंडल के निर्माण में साहस के साथ उपयोग किया। इन्दिराजी का दूसरा साहसिक निर्णय था राष्ट्रपति पद के लिए डॉक्टर ज़ाकिर हुसेन को खड़ा करना । कामराज डॉक्टर राधाकृष्णन को ही दोहराना चाहते थे । उनको मुख्य दलील यह थी कि विरोधी पार्टियां भी इससे असहमत नहीं होंगी और चुनाव नहीं लड़ना पड़ेगा। कामराज पराजय की मनोवृत्ति से ग्रसित थे पर इन्दिराजी पोजीशन लेने की मनोवृत्ति में रहीं। स्पष्ट है कि चौथे आम चुनाव में पछाड़ खाई पार्टी की नेता होकर भी वे हार मानने को तैयार नहीं थीं। इतिहास के देवता पार्टी को पुनः मजबूत बनाने के लिए उनके अगलं दांव-पेंचों की ओर उत्सुकता से देख रहे हैं। यह उत्सुकता पैदा कर मफना वर्तमान परिस्थितियों में इन्दिराजी की एक बहुत बड़ी सफलता है। टिप्पणी के अनुसार, जहां यह लिखा गया है कि श्रीमती गांधी ने मुरारजी 'भाई को उप-प्रधानमंत्री मानने से जोरदार इनकार करके उनका (कामराज *नया जीवन', मई १६६७ (राजनीतिक टिप्पणी) - दूसरी आजादी :. २६ का) उत्साह तोड़ा, बाद में पार्टी की इच्छा के माध्यम से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया-क्या यह बात अपने-आपमे इन्दिराजी की इस राजनीति को उजागर नहीं करती कि उन्होंने जानबूझकर अध्यक्ष और पार्टी की इच्छा की अवहेलना करके पार्टी और अध्यक्ष को अपने-आपसे गौण सिद्ध करने की 'नैतिक राजनीति' का उदाहरण दिया था? एक मोर यदि यह पहलू है तो दूसरी और यह भी कि श्री प्रभाकर ने एक जगह लिखा है कि बहुमत इन्दिराजी के पक्ष में था, जबकि दूसरी ओर वै यह भी लिखते हैं कि इन्दिराजी ने "पार्टी की इच्छा के माध्यम से प्रस्ताव स्वीकार कर लिया?" क्या यह वात अपने आपमें परस्पर- विरोधी नहीं है ? टिप्पणी के दूसरे परे में लिखा गया है-"मंत्रिमंडल के निर्माण में इन्दिराजी ने उनसे (कामराज से) सलाह तक नही ली।" विचित्र वात है ! संसदीय दल का नेता निश्चित ही महत्त्वपूर्ण होता है, किन्तु वह इतना महत्त्वपूर्ण हो जाए कि अपने कार्यकलाप में दल के अध्यक्ष की सलाह तक न ले—यह कौन-सा लोकतात्रिक आदर्श है? इसी टिप्पणी में आगे दूसरे पैरे मे लिखा गया है-"."इस प्रकार उन्होंने (श्रीमती गाधी ने) अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया। यह उनकी बड़ी सफलता थी।" निस्सन्देह सफलता थी, किन्तु लोकतानिक नहीं, राजशाही की सफलता। व्यक्तिवादी मनोवृत्ति का उदाहरण । टिप्पणी के तीसरे पैरे मे लिखा है-"कामराज डॉक्टर राधाकृष्णन को (राष्ट्रपति पद के लिए) दोहराना चाहते थे। उनकी दलील यह थी कि विरोधी पार्टियां भी इससे असहमत नहीं होंगी और चुनाव नहीं लड़ना पड़ेगा " जवकि इन्दिराजी ने राष्ट्रपतिपद के लिए डॉक्टर जाकिर हुसेन का नाम रखा था । क्या यह कथन सावित नहीं करता कि येन केन प्रकारेण श्रीमती गांधी अपने-आपको एक प्रजातानिक दल पर हावी कर लेना चाहती थी ? वे कांग्रेस अध्यक्ष और पार्टी के बड़े नेताओ को भी गिनने के लिए तैयार न थी। भले ही इस 'न गिनने की कोशिश में राष्ट्रपति पद को लेकर चुनावबाजी की स्थिति आए । कामराजजी के उस प्रस्ताव मे कि डॉक्टर राधाकृष्णन एक ऐसा नाम है जिसपर विरोधी दल भी एतराज नहीं करेंगे, कौन-सी अलोकतानिजर या प्रतिक्रियावाद था?

३० :: दूसरी आजादी उपर्युक्त टिप्पणी और तत्कालीन राजनीतिक स्थिति को उद्धरित करने के पीछे मेरा केवल यह आशय है कि सत्ता में आते ही श्रीमती इन्दिरा गांधी का सारा रुख नितांत व्यक्तिवादी हो गया था और कांग्रेस एक तरह से लोकतंत्रीय संस्था नहीं, किसी एक व्यक्ति की एकाधिकारी 'फर्म' बनकर रह गई थी। इन हालात का परिणाम यह हुआ कि एक बार कांग्रेस पुन: उसी विघटन के कगार पर आ खड़ी हुई, जो स्वतंत्रता के तुरंत बाद धीमे से प्रकट हुआ था। यह धीमापन उस समय मालूम नहीं पड़ा था, किन्तु इस वार का विघटन स्पष्टतः जनता के सामने होना था। कांग्रेस के बुजुर्ग नेता भी यह चाहते थे कि लोगों को मालूम हो कि वे गलत से विद्रोह कर रहे हैं। संस्था में फैल रहे एकाधिकारवाद से वस्त हैं और उन मूल्यों के लिए लड़ना चाहते हैं, जिन्हें कभी कांग्रेस में गांधी, लाजपतराय और बाल गंगाधर तिलक ने मंजोया था। पर ऐसे नेता भूल गए थे कि स्वतंत्रता-पूर्व की स्थिति और आज की स्थिति में बहुत अंतर था। स्वतंत्रता-पूर्व का समय था, जब कांग्रेस नेताओं ने जन- साधारण में चेतना सहज तरह से इसलिए फैला ली थी कि वे विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने का आन्दोलन चला रहे थे, किन्तु अव अपने ही देश में, अपने ही आदमी की उस सत्ता को उखाड़ फेंकने या उसके विरोध में जनमत बनाने की बात थी, जो अपनी बुनियाद में जवाहरलाल नेहरू जैसा नाम लिए हुए था, जिसपर कांग्रेस की मोहर लगी हुई थी और जिसने प्रचार के बड़े साधनों द्वारा अपने-आपको संस्था से कहीं ऊंचा बना रखा था । पर बुजुर्ग नेता यह स्थिति नहीं समझ सके और यदि समझी भी तो उस गहराई के साथ नहीं, जिस गहराई के साथ इस स्थिति को श्रीमती इन्दिरा गांधी समझ चुकी थीं और अपनी रणनीति भी तय कर चुकी थीं। यही नहीं, श्रीमती इन्दिरा गांधी के दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने जाने के बावजूद पुराने नेता अपनी और उनकी स्थिति का ठीक तरह जायज़ा नहीं ले पाए । जवकि उसी समय पल-पल यह स्पप्ट होने लगा था कि हर दृष्टि से श्रीमती गांधी संस्था से ऊंची हो गई हैं और उनका व्यक्तित्व बहुमत पर उसी तरह हावी होने लगा है जैसे किसी राजा का सारे राज्य पर हो जाता है। - दूसरी आज़ादी :.३१ काग्रेस के कुछ बुजुर्ग ('बूढे' नहीं) नेताओ ने उस समय ऐसे वक्तव्य भी दिए. जिनमे जनता को यह बतलाने की कोशिश की गई थी कि श्रीमती गाधी क्रमश समाजवाद का नारा लगाकर राजवाद की ओर बढ़ रही है, हालाकि श्रीमती गाधी अपने राउवाद को दवाए हुए बार-बार कभी रेडियो, कभी टेलि- विजन और कभी जन-मन्त्र से 'एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध भाषण दिया करती थीं। एक वार इसपर तत्कालीन काग्रेसाध्यक्ष श्री निजलिंगप्पा ने कहा था कि "महत्वपूर्ण है कार्य करना और देश को आगे ले जाना । एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध चीखने-शोर मचाने से कुछ लाभ नहीं होने वाला है। श्री निजलिंगप्पा का यह कथन 'करनी और कथनी' में भेद-दर्शन की बात भी किन्तु इस आदर्शवादी नीति का इन्दिरा-शासन मे कोई महत्त्व नही रहा था। उल्टे एक दूरदेश पत्रकार स्वाजा अहमद अब्बास ने श्री निर्जागर के उक्त कथन को अपनी तरह उपयोग करके उन्हीके विरुद्ध प्रमादि । दिया।

३२:: दूसरी आज़ादी की गूंज थी, इन्दिरा गांधी को अंतिम रूप से विश्वास दिला दिया कि कांग्रेस की इन दो प्रवृत्तियों में अव कोई समझौता नहीं हो सकता..." श्री अब्बास के पत्रकारीय करिश्मे की सराहना करने का जी होता है। किसी स्थिति-विशेप के साथ वक्तव्य के कुछ अंश या शब्दों का अपनी तरह अर्थ निकालने को करिश्मा ही माना जाना चाहिए । एक तरह से उपर्युक्त लेखन में श्री अब्बास ने निजलिंगप्पा और मुरारजी भाई को बड़ी सुविधा से निजी उद्योग के एकाधिकारवाद का समर्थक प्रकट कर दिया, जब कि उसी बात का अर्थ कुछ और था। वह निस्सन्देह नहीं, जो निकाला गया। एक तरह से कांग्रेस के भीतर उठे व्यक्तिवादी और लोकतंत्री संघर्ष को, कम्यूनिस्ट पत्रों, प्रचारकों और इन्दिराजी के शासन-तंत्र ने बड़ी सुविधा से जनता के सामने जो नया रूप दिया वह था-समाजवादी और पूंजीवादी गुटों का संघर्ष ! जबकि सच में यह संघर्ष हो रहा था इन्दिराजी के एकाधिकारवाद और कांग्रेस के लोकतंत्रवाद में । पर प्रचार-तंत्र की ताकत बहुत होती है। वही हिटलरी पद्धति । हिटलर का युद्ध-प्रचार अधिकारी गोयवल्स कहा करता था-"एक झूठ को हज़ार बार दोहरामो तो वह सच वन जाता है..." उसी ढंग से कांग्रेस के पुराने नेताओं यथा कामराज, निजलिंगप्पा, मुरारजी भाई आदि के वारे यह झूठ कि वे पूंजीवादी शक्तियों के प्रतिनिधि हैं, इतनी वार कहा, लिखा, फैलाया और सुनाया गया कि जनता में उनके प्रति खासी भ्रांति फैल गई। विशेषकर श्री मुरारजी भाई के बारे में। यों भी श्री मुरारजी भाई स्वर्गीय श्री जवाहरलालजी के समय से ही प्रधानमंत्री पद के सबसे ताकतवर उत्तराधिकारी थे। उनके बारे में इसी तरह का योजनावद्ध प्रचार नेहरूजी के समय से ही चलता रहा था, इन्दिराजी ने उस प्रचार को लाख गुना कर दिया। और उसका लाभ उन्हें (इन्दिराजी को) वाद में वहुत मिला। प्रचार के दम पर देश की सत्ता हथियाए रखने की प्रवृत्ति ने अपने रंग दिखलाने शुरू कर दिए थे। जनता को नये-नये सम्मोहन-स्वप्न दिखाए जा रहे थे और केवल कथनी चल रही थी। मीटिंगें, भाषण, पोस्टर सभी कुछ सिर्फ नये-नये नारों और चमत्कारों से भरे सुनहरे लोक जनता को दिखाते रहते। काम करने वाले लोग इस स्थिति को सह नहीं पा रहे थे। परिणाम हुआ दरार बढ़ते जाना। यह दरार इतनी बड़ी कि विस्फोट की सीमा पर जा व्हरी । इस सीमा को श्रीमती गांधी ने उस समय अन्तिम बार कुरेदा जव अचानक श्री मुरारजी भाई से वित्त विभाग अपने हाथ में ले लिया और दू-२ - ।

- दूसरी आजादी ::३३ समाचारपत्रों द्वारा जनता को एक वक्तव्य में खबर दी गई कि विभागो की अदला-बदली प्रधानमंत्री का अधिकार है, हालाकि ऐसा करते हुए भी श्री मुरारजी भाई उप-प्रधानमंत्री बने रहेगे तथा उनका मान-सम्मान पूरी तरह सुरक्षित रहेगा। श्री मुरारजी भाई ही नहीं, देश के तमाम सुलझे हुए व्यक्तियो को यह निरंकुश एकाधिकारवाद और राजनीतिक अशिष्टता बुरी लगी। परिणाम हुआ श्री देसाई का मंत्रिमंडल से तुरन्त त्यागपत्र और इस त्यागपत्न के बाद कांग्रेस के विघटन का स्पष्ट संकेत। श्री प्रभाकर ने इस त्यागपन पर 'नया जीवन' में अपनी प्रतिक्रिया इस तरह व्यक्त की है-"श्री मुरारजी भाई ने राजनीति छोड़कर भावुकता की वैसाखी सभाल ली।" जबकि श्री देसाई ने भी लाचार होकर वही रास्ता अपनाया था जो बहुत पहले काग्रेस मे कभी आचार्य कृपलानी, राजर्षि टडन या बाद में बाबू राजेन्द्रप्रसाद ने अपनाया था । पर बहुत देर हो चुकी थी। प्रचार के नुकीले दांतो ने सत्य को जगह-जगह से काट डाला था। इसके बावजूद गांधीवादी मुरारजी भाई ने वही किया जो कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति और नैतिक मूल्यों का हामी नीतिज्ञ कर सकता था। श्रीमती गाधी ने मुरारजी के हटते ही तुरत एक प्रचारात्मक पत्ता फेंका- १४ प्रमुख भारतीय बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके । राष्ट्रीयकरण की इस घोषणा के साथ पुन सम्ञवागो की लाखो क्यारिया हिन्दुस्तान की गरीबी के सामने फेंक दी गई। इस तरह यह सिद्ध कर दिया गया कि मुरारजी भाई और उनके साथी ही थे, जिनके कारण इन्दिराजी गरीबों के लिए कुछ नहीं कर पाई थी। इस स्थिति का राजनीतिक वर्णन करते हुए श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर लिखते है-"इन्दिराजी प्रगतिशील शासक के रूप मे अपने आकार से कई फुट लम्बी हो गई और मुरारजी देसाई और उनके साथी प्रतिक्रियावाद के प्रेतो के हुलिया में सामने आ गए।" यदि आज के सदर्भ मे देखा जाए, तो स्थिति कुछ और ही नजर आती है। उपर्युक्त शब्द पढते हुए मुझे लगता है कि इन्दिरा शासन के शक्तिशाली प्रचार-तन्त्र ने (आश्चर्यजनक रूप से ही सही, पर सच मे) गहरी पैठ के पत्र- कारों को भी कम प्रभावित नहीं किया था। अगर ऐसा न होता तो सभवत प्रभाकरजी मुरारजी प्रभृत्ति राजनीतिज्ञो के बारे मे उस प्रचारात्मक फेम मे न सोचते, जिसमें सोचते हुए लगते हैं। मुरारजी या उसी तरह कांग्रेसजनों के बारे में बहुत जल्दवाजी से सोचना बहुत गलत हुआ, यह आज के पुराने ३२ :: दूसरी आज़ादी - की गूंज थी, इन्दिरा गांधी को अंतिम रूप से विश्वास दिला दिया कि कांग्रेस की इन दो प्रवृत्तियों में अव कोई समझौता नहीं हो सकता" श्री अब्बास के पत्रकारीय करिश्मे की सराहना करने का जी होता है। किसी स्थिति-विशेप के साथ वक्तव्य के कुछ अंश या शब्दों का अपनी तरह अर्थ निकालने को करिश्मा ही माना जाना चाहिए । एक तरह से उपर्युक्त लेखन में श्री अव्वास ने निजलिंगप्पा और मुरारजी भाई को बड़ी सुविधा से निजी उद्योग के एकाधिकारवाद का समर्थक प्रकट कर दिया, जब कि उसी बात का अर्थ कुछ और था। वह निस्सन्देह नहीं, जो निकाला गया। एक तरह से कांग्रेस के भीतर उठे व्यक्तिवादी और लोकतंत्री संघर्ष को, कम्यूनिस्ट पत्रों, प्रचारकों और इन्दिराजी के शासन-तंत्र ने बड़ी सुविधा से जनता के सामने जो नया रूप दिया वह था-समाजवादी और पूंजीवादी गुटों का संघर्ष! जबकि सच में यह संघर्प हो रहा था इन्दिराजी के एकाधिकारवाद और कांग्रेस के लोकतंत्रवाद में । पर प्रचार-तंत्र की ताकत बहुत होती है । वही हिटलरी पद्धति । हिटलर का युद्ध-प्रचार अधिकारी गोयवल्स कहा करता था-"एक झूठ को हज़ार वार दोहराओ तो वह सच वन जाता है..." उसी ढंग से कांग्रेस के पुराने नेताओं यथा कामराज, निजलिंगप्पा, मुरारजी भाई आदि के बारे यह झूठ कि वे पूंजीवादी शक्तियों के प्रतिनिधि हैं, इतनी वार कहा, लिखा, फैलाया और सुनाया गया कि जनता में उनके प्रति खासी भ्रांति फैल गई। विशेषकर श्री मुरारजी भाई के बारे में। यों भी श्री मुरारजी भाई स्वर्गीय श्री जवाहरलालजी के समय से ही प्रधानमंत्री पद के सबसे ताकतवर उत्तराधिकारी थे। उनके बारे में इसी तरह का योजनाबद्ध प्रचार नेहरूजी के समय से ही चलता रहा था, इन्दिराजी ने उस प्रचार को लाख गुना कर दिया। और उसका लाभ उन्हें (इन्दिराजी को) बाद में बहुत मिला। प्रचार के दम पर देश की सत्ता हथियाए रखने की प्रवृत्ति ने अपने रंग दिखलाने शुरू कर दिए थे । जनता को नये-नये सम्मोहन-स्वप्न दिखाए जा रहे थे और केवल कथनी चल रही थी। मीटिंगें, भापग, पोस्टर सभी कुछ सिर्फ नये-नये नारों और चमत्कारों से भरे सुनहरे लोक जनता को दिखाते रहते । काम करने वाले लोग इस स्थिति को सह नहीं पा रहे थे। परिणाम हुआ दरार बढ़ते जाना। यह दरार इतनी बढ़ी कि विस्फोट की सीमा पर जा व्हरी । इस सीमा को श्रीमती गांधी ने उस समय अन्तिम बार कुरेदा जब बचानक श्री मुरारजी भाई से वित्त विभाग अपने हाथ में ले लिया और । । - ।

दूसरी आजादी :: ३३ समाचारपत्रों द्वारा जनता को एक वक्तव्य में खबर दी गई कि विभागों की अदला-बदली प्रधानमंत्री का अधिकार है, हालाकि ऐसा करते भी श्री मुरारजी भाई उप-प्रधानमंत्री बने रहेगे तथा उनका मान-सम्मान पूरी तरह मुरक्षित रहेगा। श्री मुरारजी भाई ही नहीं, देश के तमाम सुलझे हुए यक्तियों को यह निरंकुश एकाधिकारवाद और राजनीतिक अशिष्टता बुरी लगी। परिणाम हुआ श्री देसाई का मंत्रिमंडल से तुरन्त त्यागपन्न और इस त्यागपन्न के बाद कांग्रेस के विघटन का स्पष्ट संकेत। श्री प्रभाकर ने इम त्यागपन्न पर 'नया जीवन' में अपनी प्रतिक्रिया इस तरह व्यक्त की है-"श्री मुरारजी भाई ने राजनीति छोड़कर भावुकता की वैसाखी मंभाल ली।" जबकि श्री देसाई ने भी लाचार होकर वही रास्ता उपनाया था जो बहुत पहले कांग्रेस में कमी आचार्य कृपलानी, राजपि टंडन या बाद में बाबू राजेन्द्रप्रसाद ने अपनाया था । पर बहुत देर हो चुकी थी। प्रचार के नुकीले दांतों ने सत्य को जगह-जगह से काट डाला था। इसके बावजूद गाधीवादी मुरारजी भाई ने वही किया जो कोई भी स्वाभिमानी व्यक्ति और नैतिक मूल्यों का हामी नीतिज्ञ कर सकता था। श्रीमती गांधी ने मुरारजी के हटते ही तुरत एक प्रचारात्मक पत्ता फेंका- १४ प्रमुख भारतीय बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके। राष्ट्रीयकरण की इस घोषणा के साथ पुन सब्जबागों की लाखों क्यारिया हिन्दुस्तान की गरीबी के सामने फेंक दी गई। इस तरह यह सिद्ध कर दिया गया कि मुरारजी भाई और उनके साथी ही थे, जिनके कारण इन्दिराजी गरीवो के लिए कुछ नहीं कर पाई थी। इस स्थिति का राजनीतिक वर्णन करते हुए थी कन्हैयालाल मिथ प्रभाकर लिखते है-"इन्दिराजी प्रगतिशील शासक के रूप में अपने आकार से कई फुट लम्बी हो गई और मुरारजी देसाई और उनके साथी प्रतिक्रियावाद के प्रेतों के हुलिया में सामने आ गए।" यदि आज के संदर्भ में देखा जाए, तो स्थिति कुछ और ही नज़र आती है। उपर्युक्त शब्द पढ़ते हुए मुझे लगता है कि इन्दिरा शासन के शक्तिशाली प्रचार-नंत्र ने (आश्चर्यजनक रूप से ही सही, पर सच में) गहरी पैठ के पत्र- कारो को भी कम प्रभावित नहीं किया था। अगर ऐसा न होता तो सभवत प्रभाकरजी मुरारजी प्रभृत्ति राजनीतिज्ञों के बारे मे उस प्रचारात्मक फ्रेम मे न सोचते, जिसमे सोचते हुए लगते है। मुरारजी या उसी तरह के पुराने कांग्रेसजनों के बारे में बहुत जल्दवाजी से सोचना बहुत गलत हुआ, यह आज ३४ :: दूसरी आजादी करोड़ों लोगों के सामने प्रकट हो चुका है। मुरारजी घोर गांधीवादी हैं और मेरा खयाल है कि उप-प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना गांधीजी के उस वाक्य पर ही आधारित था, जिसमें वह कहते हैं----"मेरी मृत्यु के बाद यदि अहिंसा (सत्य) का नाश हो जाए तो मान लेना चाहिए कि मुझमें अहिंसा (सत्य) थी ही नहीं।" यदि वापू एक अन्य स्थान पर बापू ने अहिंसा को सत्य का पर्याय ही माना है। तो के उपर्युक्त कथन के आधार पर माना जाए कि मुरारजी भाई ने सत्य या अहिंसा के नाम पर त्यागपत्र दिया था और वह थोड़े-से समय के लिए गलत तरह प्रचारित कर लिया गया तो इससे उसका सत्य तो नहीं मरा । आज जब आपातकाल अपनी ही मौत मर चुका है, तब वह सत्य सामने है। और यह भी कि जिस पद को ठोकर मारकर उन्होंने अपने सत्य की रक्षा की थी, उससे बड़ा पद जनता ने उन्हें असत्य के हाथों से छीनकर सौंप दिया है । कांग्रेसी शीशमहल : पहली दरार श्रीमती गांधी ने समझ लिया था कि अव निष्कंटक राज्य उनके हाथ में है। इसका पहला राजनीतिक चमत्कार उन्होंने उस समय दिखाया जब डॉक्टर जाकिर हुसेन की मृत्यु के बाद उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार श्री संजीव रेड्डी से अचानक अपना समर्थन वापस ले लिया और श्री वी० बी० गिरि के लिए समर्थन की घोपणा की। एक नया नारा भारतीय राजनीति के आकाश पर गूंजा-~~'आत्मा की आवाज़ !' इस नारे के तहत श्रीमती गांधी की सुविधा- जीवी राजनीति ने कांग्रेस संस्था का अनुशासन पहली बार खुल्लमखुल्ला ढंग से तोड़ दिया। यह कहकर कि कांग्रेस दल के सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में स्वतंत्र रूप से मतदान कर सकते हैं । इस अनुशासन-तोड़ करिश्मे के परिणाम स्वरूप---श्री संजीव रेड्डी, जो कांग्रेस के अपने उम्मीदवार थे, पराजित हुए स्वतंत्र उम्मीदवार श्री वी० वी० गिरि ने राष्ट्रपति-चुनाव जीता तथ पदारूढ़ हुए। इस दरार ने भारतीय कांग्रेस को टुकड़े-टुकड़े कर डाला। कांग्रेस के नाम पड़ गए। एक थी कांग्रेस, जिसकी सत्ता थी और जिसमें अध्यक्ष १.बापू (पृ० ३२-३३), लेयक-श्री घनश्यामदास विड़ला दूसरो आज्ञादी ::३५ 1 नम्माता था बाबू जगजीवन राम ने । (सामान्यतः इसे कांग्रेस न कहकर जन- मामान्य में 'इन्दिराजी की काप्रेस' कहा जाता था) जवकि दिग्गजों ने जिस कांग्रेसको सम्भाल लिया था, उसे कहा जाता था-संगठन कांग्रेस । तत्कालीन नंसद में इन्दिरा-कांग्रेस के मदम्य ये २२०, जवकि संगठन कांग्रेस के ६५ सदस्य थे। दोनों को चुनाव आयोग ने अलग-अलग चुनाव-चिह्न भी प्रदत्त कर दिए थे। कांग्रेस की इस दरार को इन्दिराजी के पक्ष की योर से एक श्रेयपूर्ण कार्य का जामा पहनाया गया और प्रचारित किया गया कि वस्तुस्थिति में गिरि की विजय और कांग्रेस बौर मंगठन कांग्रेस वन जाना, कांग्रेस का शुद्धीकरण होना है। इस तरह पूंजीवादी ताकतों पर समाजवादी ताकतों को विजय हुई है। विशेप रूप से इस क्रान्तिकारी (2) विचार का सर्वाधिक प्रचार कर रहे ये भारतीय कम्यूनिस्ट, जो अपरोक्ष रूप से एक महान राजनीतिक दल को लगभग 'फिसड्डी' बना चुके थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और श्री वी० वी० गिरि को चुनाव-विजय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए श्री प्रभाकर और अब्बास दोनों एक ही बात लिखते हैं। यह मजेदार इत्तफाक है कि दोनों ने ही अलग-अलग मौकों पर टैक्सी- वालों और कुलियों को नाचते हुए देखा या । श्री प्रभाकर ने गिरि की जीत पर यह नाच देखा था जवकि श्री अब्बास ने वैक राष्ट्रीयकरण पर। बाद में इमरजेंसी के दौरान जो नाच हुआ, उसका बयान मेरे पढ़ने में उस दौरान नहीं आया। वह नाच किन्ही दो आदमियो ने नही, सारे देश ने देखा था और उस नृत्य नाटिका का वर्णन करना ही इस पुस्तक का मूल उद्देश्य है। द्वारे-द्वारे, हसीन नारे करोड़ों लोगो को बतलाया गया कि करोड़ों लोग खुश हैं। कारण है- सत्तारुढ दल से उस भीड़ का छंट जाना, जो 'प्रगतिशील' और 'सुधारवादी' नीतियों के आड़े आकर 'क्रांतिकारी प्रधानमनी' को कुछ करने नहीं दे रहे थे। दिल्ली की छाती पर देश के कोने-कोने से 'चलो दिल्ली घुमाए' कहकर १. यह याने-आपमें एक हास्यासर किन्नु दुखद बात यी कि एक महान सस्था किसो व्यस्ति-विशेष का 'जेबी ट्रांजिस्टर' बन जाए।

३४ :: दूसरी आजादी करोड़ों लोगों के सामने प्रकट हो चुका है। मुरारजी घोर गांधीवादी हैं और मेरा खयाल है कि उप-प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र देना गांधीजी के उस वाक्य पर ही आधारित था, जिसमें वह कहते हैं----"मेरी मृत्यु के बाद यदि अहिंसा (सत्य) का नाश हो जाए तो मान लेना चाहिए कि मुझमें अहिंसा (सत्य) थी ही नहीं।" एक अन्य स्थान पर वापू ने अहिंसा को सत्य का पर्याय ही माना है। तो यदि वापू के उपर्युक्त कथन के आधार पर माना जाए कि मुरारजी भाई ने सत्य या अहिंसा के नाम पर त्यागपत्र दिया था और वह थोड़े-से समय के लिए गलत तरह प्रचारित कर लिया गया तो इससे उसका सत्य तो नहीं मरा । आज जब आपातकाल अपनी ही मौत मर चुका है, तब वह सत्य सामने है। और यह भी कि जिस पद को ठोकर मारकर उन्होंने अपने सत्य की रक्षा की थी, उससे बड़ा पद जनता ने उन्हें असत्य के हाथों से छीनकर सौंप दिया है। कांग्रेसी शीशमहल : पहली दरार श्रीमती गांधी ने समझ लिया था कि अब निष्कंटक राज्य उनके हाथ में है । इसका पहला राजनीतिक चमत्कार उन्होंने उस समय दिखाया जब डॉक्टर जाकिर हुसेन की मृत्यु के बाद उन्होंने कांग्रेस के उम्मीदवार श्री संजीव रेड्डी से अचानक अपना समर्थन वापस ले लिया और श्री वी० वी० गिरि के लिए समर्थन की घोषणा की । एक नया नारा भारतीय राजनीति के आकाश पर गूजा-~~-'आत्मा की आवाज़ !' इस नारे के तहत श्रीमती गांधी की सुविधा- जीवी राजनीति ने कांग्रेस संस्था का अनुशासन पहली बार खुल्लमखुल्ला ढंग से तोड़ दिया। यह कहकर कि कांग्रेस दल के सदस्य राष्ट्रपति के चुनाव में स्वतंत्र रूप से मतदान कर सकते हैं । इस अनुशासन-तोड़ करिश्मे के परिणाम- स्वरूप-~-श्री संजीव रेड्डी, जो कांग्रेस के अपने उम्मीदवार थे, पराजित हुए। स्वतंत्र उम्मीदवार श्री वी० वी० गिरि ने राष्ट्रपति-चुनाव जीता तथा इस दरार ने भारतीय कांग्रेस को टुकड़े-टुकड़े कर डाला । कांग्रेस के दो नाम पड़ गए । एक थी कांग्रेस, जिसकी सत्ता थी और जिसमें अध्यक्ष पद १.यापू (१०३२-३३), तेवक-श्री घनश्यामदास बिड़ला दूसरी आजादी ::३५ सम्भाला था बाबू जगजीवन राम ने। (सामान्यतः इसे कांग्रेस न कहकर जन- सामान्य में 'इन्दिराजी की काग्रेस' कहा जाता था) जबकि दिग्गजों ने जिस कांग्रेस को सम्भाल लिया था, उसे कहा जाता था-संगठन कांग्रेस । तत्कालीन संसद में इन्दिरा-काग्रेस के सदस्य थे २२०, जबकि संगठन कांग्रेस के ६५ सदस्य थे। दोनो को चुनाव आयोग ने अलग-अलग चुनाव चिह्न भी प्रदत्त कर दिए थे। कांग्रेस की इस दरार को इन्दिराजी के पक्ष की ओर से एक श्रेयपूर्ण कार्य का जामा पहनाया गया और प्रचारित किया गया कि वस्तुस्थिति में गिरि की विजय और काग्रेस और संगठन कांग्रेस बन जाना, काग्रेस का शुद्धीकरण होना है। इस तरह पूंजीवादी ताकतों पर समाजवादी ताकतो की विजय हुई है। विशेष रूप से इस क्रान्तिकारी (?) विचार का सर्वाधिक प्रचार कर रहे थे भारतीय कम्यूनिस्ट, जो अपरोक्ष रूप से एक महान राजनीतिक दल को लगभग 'फिसड्डी' बना चुके थे। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और श्री वी० वी० गिरि को चुनाव-विजय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए श्री प्रभाकर और अब्बास दोनों एक ही बात लिखते हैं। यह मजेदार इत्तफाक है कि दोनों ने ही अलग-अलग मौकों पर टैक्सी- वालों और कुतियों को नाचते हुए देखा था। श्री प्रभाकर ने गिरि की जीत पर यह नाच देखा था जबकि श्री अब्बास ने बैंक राष्ट्रीयकरण पर। बाद में इमरजेंसी के दौरान जो नाच हुआ, उसका वयान मेरे पढ़ने मे उस दौरान नहीं या। वह नाच किन्ही दो आदमियो ने नही, सारे देश ने देखा था और उस नृत्य-नाटिका का वर्णन करना ही इस पुस्तक का मूल उद्देश्य है । द्वारे-द्वारे. हसीन नारे करोड़ों लोगों को बतलाया गया कि करोड़ो लोग खुश हैं। कारण है- सत्तारुढ दल से उस भीड का छंट जाना, जो 'प्रगतिशील' और 'सुधारवादी' नीतियो के आड़े आकर 'क्रांतिकारी प्रधानमन्त्री' को कुछ करने नहीं दे रहे थे। दिल्ली की छाती पर देश के कोने-कोने से 'चलो दिल्ली घुमाएं' कहकर १. यह अपने-आपमे एक हास्यास्पद किन्तु इयर बात पो कि एक महान सस्था किस व्यक्ति विशेष का 'जंबो ट्रानिस्टर' बन जाए।

३६ :: दूसरी आजादी चार-छह महीने के बाद लाखों लोग ले आए जाते। इन लोगों का काम होता केवल यह कि भीड़ बनकर राजधानी में चीखने लगे.---'इन्दिरा गांधी जिन्दावाद !' 'पूंजीवादियों के ऐजेण्टों का नाश हो!' इत्यादि। फिर यह भीड़ राजधानी में जहां-तहां विखर जाती। अजनबी, परेशान, विस्मित चेहरों की सहमी हुई भीड़ । कौतुक-भरी निगाहों से राजधानी की सड़कें देखते, लालकिला घूमते और चांदनी चौक की सैर करते हुए भोले-भाले लोग अपने- अपने घरों को रवाना हो लेते। राष्ट्रीयकरण की नीति निस्सन्देह ही अच्छी नीति थी, किन्तु कोई भी नीति उस समय उपयोगी हो पाती है, जब उसके क्रियान्वय पर योजनाबद्ध और बहुमुखी विचार किया जाए। वैसा न होकर हुआ यह था कि एक अच्छी नीति का हसीन नारे के अर्थ में उपयोग किया गया था। और लचर ढंग से लागू करने की घोषणा कर दी गई थी। ताकि सामान्य जन और भोला-भाला नागरिक समझे कि सुधारवादी प्रगतिशीलता लागू हो गई है । (इसलिए कि रोड़े छंट गए है।) मुझे स्मरण है, राष्ट्रीयकरण का अध्यादेश लागू होने के बाद सीधी- सादी एक हवा माहौल में उछली थी कि बैंक अपने हो गए हैं और अव देश के किसी भी व्यक्ति को अपना काम बढ़ाने, नया रोज़गार शुरू करने या और- और योजनाओं के लिए पैसा मिलने में कोई कठिनाई नहीं रह जाएगी। सब खुश थे पर कुछ समझदार लोग परेशान । उन्हें लग रहा था कि जिस जल्दबाजी में यह सब किया गया है, वह राष्ट्रीयकरण के नाम से सत्ताधारी दल और श्रीमती गांधी का जनता के लिए राजीकरण ज्यादा है और उससे भी ज्यादा है अपने वैचारिक विरोधियों को खास तरह बदनाम करने को गुचेष्टा । यदि ऐसा न होता तो वेसवरी के साथ इस घोषणा की कोई तुक ही नहीं थी। बेसवरी का इससे बड़ा उदाहरण और सुबूत क्या हो सकता है कि ख्वाजा साहब लिखते हैं.--"उन्होंने यह साहसिक कदम अपनी निजी प्रेरणा से हो उठाया था, यद्यपि वित्त मन्त्रालय के अधिकारी और रिज़र्व बैंक के गवर्नर विरोध करते और उन्हें निरुत्साहित करते रहते। उन्होंने अपने विचारों से सहानुभूति रखने वाले कुछ चुने हुए अफसरों और (या सरकारी सामन्तों? -अमर) की सलाह से यह काम किया। एक विशेष कमरा उन्हें दे दिया * इन्दिरा गांधी : सफलता के दस वर्ष (पृ० ४८-४६), ले०-मन्यास + दूसरी आजादी ::३७ गया, जहा वैठकर उन्होंने बैंकों के राष्ट्रीयकरण से सम्बन्धित अध्यादेश को तैयार किया। सारी कार्रवाई इतनी तेजी से और इतने गुप्त रूप से पूरी की गई कि एक वरिष्ठ कैविनेट मन्त्री को तेजी के साथ यह कहते सुना गया कि "प्रधानमंत्री को वित्त विभाग लिए हुए तीन दिन बीत चुके हैं लेकिन अभी तक राष्ट्रीयकरण नहीं किया गया। एक घण्टे के भीतर ही मन्त्रिमंडल को एक आपत्कालीन बैठक के लिए उस मन्त्री को बुला लिया गया था। इसपर प्रधानमंत्री ने वैकिंग कम्पनियो के (व्यवसायों के अधिग्रहण और हस्तातरण) अध्यादेश १९६६ पर अपने सभी सहयोगियों का एकमत समर्थन प्राप्त कर लिया।" यह विवरण अपरोक्ष रूप से ही सही, किन्तु इस स्थिति को किसी न किसी रूप में प्रकट करता है कि एक गभीर काम को भी किस उतावली मे इसलिए किया गया था, ताकि वह एक खूबसूरत और लुभावने नारे का काम दे। यह नारा पर्याप्त काम दे भी गया। अयोजनाबद्ध कार्य के कारण बैंकों को और जन-सामान्य को वाद मे कितनी उलझन हुई, यह बतलाने की बात नहीं है। एक अच्छी योजना थी, जो सही तरह लागू की जाने पर तुरन्त उपयोगी हो सकती थी परन्तु उसके लिए अनुकूल हालात पैदा करने आवश्यक थे। पर हुआ यह कि जल्दबाजी के कारण वही योजना खंड-खंड रूप मे बरसी में ठीक-ठिकाने आ पाई। नारेबाजी का यह तंव कब तक चलेगा? इस पहलू पर विचार करने की समस्या उस समय यी ही नहीं, समस्या थी अपने-आपको काक्रीटी पुख्तापन देने को । भले ही इस पुख्तापन के लिए 'गरीबी हटाने' के नाम पर सीधे-सादे नागरिकों को दिमागी तौर से छला जाए। यह छल लम्बा चला। इतना लम्बा कि खुद इन्दिराजी को भी कम आश्चर्य नहीं हुआ होगा। एक जोरदार नारे की उछाल से उन्होने जरूर समझ लिया था कि लोगो की मासूमियत को बड़ी आसानी से भुनाया जा सकता है । कितना, कहा, कैसे- कैसे मनाया गया यह बयान क्रमशः आएगा। राजनीति हो या सामाजिक क्षेत्र, हर जगह आदर्शवाद से भरे प्रवचन अपना एक आलकारिक जायका रखते हैं। और इस जायके को इन्दिरा-शासन के दौरान जनता ने खूब चटखारे ले-लेकर महसूस किया है। बाद मे बदहज़मी से दुखी भी हुई है। श्रीमती गाधी के विभिन्न अवसरो पर विभिन्न लोगों से कहे गए कुछ शब्द मुझे याद आते हैं और आज जब मैं यहां अश-रूप में उन्हें उद्धृत कर रहा हूं, तव श्रीमती गांधी की सराहना करना चाहता हूं कि ।

३८: दूसरी आजादी देश के लोगों की एक खास नस 'भोलापन' खुव समझदारी से पकड़ी थी। अत्यंत मार्मिक शब्दों के साथ इस नस को होले से दवाकर वोट दुह लेने का कमाल निस्सन्देह ही विलक्षण था। .."ऐसी नीतियों का निश्चित निर्धारण आवश्यक है, जो गरीबों और जरूरतमन्दों की हित-चिन्ता के साथ अपने-आपको संतुलित स्थिति में जोड़ें। -इन्दिरा गांधी (बजट प्रस्तुतीकरण, १६७०) ... देश में क्रांतिकारी कार्यक्रम विधि-सम्मत ढंग से लागू करने के लिए तत्पर होना होगा..."---इन्दिरा गांधी (एक भापण, १६६६) ""हम जनता के जीवन को स्वतंत्र-फल से समृद्ध-सम्पन्न करके उसे घर, और जीवन की सम्पूर्ण सुख-सुविधाएं देने में समर्थ हैं- इतिहास को यह वतलाना होगा।"---इन्दिरा गांधी (एक भापण) "जनता की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए."."--इन्दिरा गांधी (एक पत्रकार से भेंट, ५ नवंबर, १९६६) मगर ये चाकलेटी बातें किसपर असर कर रही थीं ? उस बड़े वर्ग पर, जिसके मन में गांधी और कांग्रेस के प्रति श्रद्धा थी और जो श्रीमती इन्दिरा गांधी को उसी क्रम में देखता था, जबकि एक बड़ा वर्ग था जो यह कर रहा था कि हर रोज़ जनता की जीभ पर चाशनी फैलानेवाली इन बातों के बावजूद सक्रिय रूप में कुछ भी नहीं हो पा रहा है। "कुछ भी नहीं हो रहा है' इस बात को विरोधी भी किरंतर दोहरा रहे थे, किन्तु उनकी साधनहीनता, आर्थिक लाचारी और शासकीय प्रचार-तंत्र की शक्ति ने उन्हें अपनी बात कह पाने या समझा पाने के सारे अवसर नहीं दिए थे । परिणाम हो रहा था, निरंतर इन्दिरावाद का फैलते जाना । वाद और वायदों की इस आंधी के दौरान ही चुनाव आया। १६७१! २७ दिसम्बर, १९७० को तत्कालीन राष्ट्रपति श्री वी० वी० गिरि ने लोकसभा भंग करने और मध्यावधि चुनाव कराए जाने का आदेश प्रसारित किया। इससे पूर्व ही श्रीमती इन्दिरा गांधी के पक्ष से इस सिलसिले में प्रचार होने लगा था कि इस चुनाव का मूल कारण है जनता से सम्पूर्ण समर्थन प्राप्त करना, ताकि पूर्ण शक्ति, विश्वास और जन-समर्थन के साथ नई नीतियों मो लागू करने के प्रांतिकारी कदम श्रीमती गांधी उठा सकें। इस टिप्पणी के साथ ही यह भी कहा जा रहा था फि विरोधियों के कुतर्को और बेहूदा भी महसूस - - , दूसरी बाजादी : ३६ ढंग के विरोध के कारण ही श्रीमती गांधी सही तरह कार्य नही कर पा रही हैं। इसके विपरीत विरोधी दलों के विभिन्न नेताओं ने राजनीतिक हालात पर वारीकी से गौर कर यह नतीजा निकाला था कि इन्दिराजी प्रजातानिक दल की वैसाखी लगाकर क्रमश तानाशाही की स्थिति तक पहुंचना चाहती है और इस तानाशाही को जन-स्वीकृति की मोहर से देश में लागू किया जाएगा। अनेक शीर्षस्थ नेताओ के तत्कालीन भापण-अश इस वात के गवाह है कि लगभग सभी नेता श्रीमती माधी की राजनीतिक विचारधारा और व्यक्तिवाद को भली तरह समझ चुके थे। तपस्वी, कर्मठ और शात स्वभाव राजनीतिज्ञ आचार्य कृपलानी ने उसी समय कह दिया था-"इन्दिरा गाधी को जिताना एक तरह से देश को तानाशाही की ओर धकेलना है । आज जिस अराजकता की वाढ में देश उलझ गया है, वह इन्दिरा गाधी की ही देन है।" श्री अटल विहारी वाजपेयी ने एक भाषण में जनता से अपील की थी कि वे उस समय के महागठबंधन (सगठन कांग्रेस, जनसंघ, सोशलिस्ट पार्टी और भारतीय क्रांति दल) को जिताएं ताकि लोकतंत्र जीवित रह सके। तथाकथित नई कांग्रेस को जिताने का मतलब होगा एक महान लोकतात्रिक देश से लोकतन की जड खोद डालना। श्री बाजपेयी ने विश्वास प्रकट किया था कि जनता भी उस तरह समझ पा रही होगी, जिस तरह देश के औसत पुराने और सुलझे हुए राजनीतिज्ञ स्थिति की जटिलता समझ पा रहे है । पर आचार्य कृपलानी, कामराज, अतुल्य घोप, अटल विहारी वाजपेयी, मधु लिमये, राजनारायण और जॉर्ज फर्नाडिस जैसे राजनीतिज्ञ यह अन्तर नहीं कर सके थे कि जिस वारीको, दूरदर्शिता और गंभीरता से वे इन्दिरा-शासन के भविष्य की तसवीर देख रहे हैं, भारत का सीधा, सरल, लोकतन्त्री मतदाता उस तरह नहीं देख पा रहा है। एक और कारण था-मतदाता के सामने फैला विशाल और असीमित सरकारी प्रचार-तत्र के अतिरिक्त काग्रेस का अपना शक्तिशाली आर्थिक तंत्र-जो सही स्थिति न तो उसे समझने का अवसर दे रहा था और न ही विरोधी दलो की बात सुन-समझ पाने की स्थितिया रहने दे रहा था। इस सबके अलावा थे, चाटुकार पत्रकार, लेखक (बुद्धिजीवी ? ) जो टिप्पणिया लिखकर, नये-नये नारो की सर्जना करके या पुस्तके लिखकर निरतर - ४० :: दूसरी आजादी उस शक्ति को बढ़ावा दे रहे थे, जो आगे चलकर उन्हींकी जवान वन्द करने वाली थी, उन्हींकी नाक में नकेल डालने वाली थी और उन्हींके ज्ञान (अज्ञान) पर उन्हींको ज्ञानदान करनेवाली थी। इस सबके साथ थी भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी की दोगली राजनीति, जिस राजनीति ने हमेशा ही देश में अस्थायित्व और अराजकता के निर्माण की धरती पैदा की थी। स्वतंत्रता-आन्दोलन में वह साम्राज्यवादी ब्रिटिश शक्ति की पक्षधर रही तो दूसरी और कांग्रेस में उसने गांधीवाद का मुखोटा ओढ़कर अपने आदमी धंमाने और गड़बड़ी फैलाकर अनुशासनहीनता का वातावरण बनाने का रोल अदा किया। देश में राजनीतिक गड़बड़ी फैलाने की दूरदर्शी निगाह ने ही कम्यूनिस्टों को उस समय श्रीमती इन्दिरा गांधी के साथ किया था। लोकतंत्री नेताओं की तरह कम्यूनिस्ट नेता भी अच्छी तरह समझ चुके थे कि श्रीमती गांधी अन्ततोगत्वा उसी राह पर जाने वाली हैं, जिस राह पर कभी हिटलर जर्मनी में आया था किन्तु यह राह निश्चित रूप से जन- अमनोप की जनक होनेवाली है और असंतोप की आपाधापी ही 'कम्यूनिस्टिक काति' की जमीन वनती है । जमीन बनाने के लिए उन्होंने इन्दिरा गांधी के समर्थन में वह-वह दौड़ें लगाई कि अचरज होता था। लगता था जैसे इन्दिरा गांधी और उनकी पॉकेट-ट्रांजिस्टर कांग्रेस को जिताने की जितनी चिन्ता कम्यूनिस्टों को है, शायद कांग्रेसियों को भी उतनी नहीं है। जिस शान्तिवाद की वात व्यक्तिरूप में उछालते हुए लोग कांग्रेस में मसीहा बन गए, वह भारतीय जन-मानस और संस्कृति में ही व्याप्त है। धैर्य, } संयम और विश्वास के शाश्वत नैतिक मूल्यों पर भारतीय हमेशा ही खड़ा रहा है। कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद जितनी नारेबाजी की, उस नारेबाजी और राजनीतिक दांवपेंच में उलझे हुए भारतीय मतदाता ने एक बार फिर श्रीमती गांधी और उनके दल को महागठबंधन के विरुद्ध भारी मतों से जिताया। श्रीमती गांधी की विजय पर तीव्र बुद्धि (?) पत्रकारों ने भारी-भारी टिप्पणियां और संपादकीय लिखकर कहा कि यह विजय जन-विजय है। सचमुच यह अचरज की बात है कि उतने अनुभवी और समझदार कहे जानेवाले पत्रकार और गजनीति-समीक्षक यह कैसे भूल गए कि तानाशाही भी लोकतंत्र का रूप धरकर बाती रही है--विश्व-इतिहास गवाह है । क्या इसका कारण यह था कि ऐसे पत्रकार जानते नहीं थे कि इन्दिराजी का व्यक्तिवादी रूप क्या है और उनके - दूसरी आजादी ::४१ स्वभाव में किस अंश का ज्यादा जोर है ? मैं नहीं मान सकता कि नही जानते थे। सच यह है कि जानते-समझते हुए भी वे इस सबका समर्थन कर रहे थे. 'राजकीय कृपा के लोभ मे। यह कि ऐसे लोग जानते थे कि उनका हथ क्या होगा? या यह कि व्यक्तिवादी स्वभाव को समझ लेने के पश्चात् सुख-साधनों के मोह ने उन्हें चुपचाप एक गलत स्थिति को समर्थित करते रहने के लिए वाध्य किया था? और जो बाध्य नही हुए थे या जो अपने धर्म के प्रति मुस्तैद थे, बाद में हुए उनके हश्र ने बहुत-सो के मुहों पर ताले डाल दिए थे। इसका बड़ा उदाहरण रहे श्री वर्गीस (हिन्दुस्तान टाइम्स के सपादक), जिन्हे सच बोलने की बहुत कुछ सजा भोगनी पडी। लोकसभा मे और बाहर वर्गीस की सेवा-मुक्ति को लेकर विवाद उठा था जिसपर श्रीमती गाधी ने एक वक्तव्य देकर कहा था कि वर्गीस की सेवा-मुक्ति के बारे में उन्हें कुछ नहीं मालूम। थी वर्गीस हिन्दुस्तान टाइम्स लि. के अधिकारी थे और बाहरी तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि प्रधानमन्त्री या किसी मनी से उनका क्या सम्बध वनता था कि उन्हें निकाला जाए या रखा जाए.–पर इस तरह सोचते हुए यह कैसे भूला जा सकता है कि सत्ता-शक्ति के कुछ अदृश्य हाथ होते है, और इन हाथों की सीमा अनत है। इस अनत की शक्ति आपातकाल के दौरान देश मे खूब देखी गई है। । मार्च १९७१ के नया जीवन' मे सम्पादक ने लिखा- यह जीत है श्रीमती इन्दिरा गाधी के प्रति जनता की सहज चेतना से भरे विश्वास की । और इस शानदार जन-समर्थन और जीत का लाभ क्या उठाया गया? 'जनता की सहज चेतना से भरे विश्वास' के प्रति उस जनता को क्या भोगना पडा?."अश रूप मे वही, जो कभी एडाल्फ हिटलर के समय जर्मनी की धरती ने भोगा था ! पर वह विवरण वाद मे, पहले व्यक्तिवाद और फिर तानाशाही के क्रमश. जमते परों की सक्षिप्त कहानी का सिलसिला। " १९७१ के चुनाव मे जितने हसीन नारे उछले थे, यथा- स्थायित्व, साम्प्र- दायिकता से रक्षा, पूंजीवादी एजेण्टों से बचाव, लोकतन्त्र की स्थापना, अराधना आदि उनसे कहीं ज्यादा नारे देश के आसमान पर इन्दिराजी के बहुमत से विजयी होकर आने के बाद उछलने शुरू हुए। नारो पर देश को चलाने की यह तरकीब नई नहीं थी। यह तरकीब विरासत में मिली हुई थी। और यह समझ ४२:: दूसरी आज़ादी भी कि आसमान का मौसम देखकर कब कौन-सा नारा पतंग की तरह उड़ाने से जनता की मांखें ऊपर ही टंगी रह जाती हैं। १६७१ के चुनाव के बाद सत्तारूढ़ कांग्रेस दल की फिज़ा पूर्वापेक्षा कई हजार गुना बढ़ा दी गई थी। यह फिज़ा 'जनता के लिए जनता की वात' के अर्थों में बनाई गई थी। फूहड़ और उथली शब्दवाज़ी से उन गणमान्य नेताओं, यहां तक कि लोकतंत्री दलों के नाम उछाले जाने लगे थे, जिनका देश के स्वतंत्रता-संघर्ष में एक ऊंचा स्थान था। श्री प्रभाकर ने अपना एक संस्मरण लिखते हुए कुछ-कुछ इसी तरह की बात स्वयं भी की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक में वयान किया है कि उनके कुछ मित्रों ने १६७१ के चुनाव के दौरान जव उन्हें यह समाचार दिया कि जनसंघ, संगठन कांग्रेस, वी० के० डी० और सोशलिस्ट पार्टी गठबंधन करके इन्दिरा जी और उनकी कांग्रेस के विरुद्ध चुनाव लड़ रहे हैं तो उन्होंने (श्री प्रभाकर ने) फरमाया--"यारो, चार कोढ़न मिल जाएं तो क्या एक नूरजहां बन जाती है ?' ऐसी ही नारेबाजी इन्दिराजी के मंच से भी होती थी। इसकी स्वीकारोक्ति करते हुए ख्वाजा अहमद अब्बास लिखते हैं—'अधिकतर लोग समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के इन्दिरा गांधी के मंच से दिए गए वेगशील नारों से आकर्पित हुए थे.." नारेबाजी पर सत्ता में जिए जाने के इस सिद्धांत के नये न होने की बात मैंने शुरू में की थी। यह नारेबाजी नेहरूजी से शुरू हुई थी और कांग्रेस में - इसका इतिहास काफी पुराना है । उदाहरण के रूप में डॉ० राममनोहर लोहिया ने नेहरू सरकार पर आरोप लगाया था "सबसे पहला आरोप मैं इस सरकार के खिलाफ यह लगाना चाहता हूं कि यह अज्ञान के आधार पर वांझ और परिणामहीन लफ्फाज़ी तथा शब्दजोश के ऊपर अपना कामकाजा चल रही - यही नहीं, इसी भाषण में डॉ० लोहिया ने आगे कहा था-"प्रधानमंत्री साहब वामपंथी कहते हैं अपने को, शायद दिखाऊ वामपंथी हैं। उनके मुंह में वामपंथ और समाजवाद रहता है, लेकिन उनके हाथों में पूंजीवाद भी नहीं, सामन्तवाद रहता है ! १.२१ अगस्त, १९६३ को लोकसभा में हॉ० लोहिया का भापण, जो कांग्रेस के विरुद्ध पहले अविश्वास प्रस्ताव पर दिया गया।

दूसरी बाजादी :: ४३ जाहिर है और जैसा कि मैं पूर्व मे लिख चुका हूं, यह विरासती सामन्तवाद १९७१ के चुनाव में जबरदस्त लोकमत पाकर उस वावलेपन पर आ पहुंचा जिसे सम्पूर्ण तानाशाही कहा जाता है और इस तरह की प्रवृत्ति को बढावा दे रहे थे वे लोग, जिनकी अंगुलियों में ईश्वर ने कलम इसलिए सौंपी है कि वे मानवीय मूल्यों की रक्षा करें। मानव के जन्मसिद्ध अधिकार स्वातत्य के रखवाले बनें" एक उदाहरण है-~श्री कन्हैयालाल मिथ प्रभाकर का यह लिखना--- ""युग का तकाजा है कि इस कल्पना की पूर्ति के लिए श्रीमती इन्दिरा गांधी फ्रांस के जनरल दिगाल जैसा रूप लें और हरेक देशभक्त अपने-अपने स्थान पर अपने अपने कर्तव्य का पालन करे।" केन्द्र की सम्पूर्ण शक्ति हाथ में ले लेने के बावजूद थीमती गाधी यह निरंतर महसूस कर रही थी कि उस समय तक अपना चक्र' ठीक तरह नहीं घूम सकेगा, जब तक कि राज्यो को लोट-पलटकर उनमे अपने भादमियो को न बैठा दिया जाए। सहज ही था यह । जब जो मुगल सम्राट आया करता था. वह साम्राज्य को अपनी तरह चालित करने के लिए सूवेदार बदल दिया करता था। यही हुआ'७१ के वाद । एक ओर केन्द्र-स्तर पर सूबेदार, हवलदार बदले गए, दूसरी ओर राज्य स्तर पर नायकों मे परिवर्तन करना आवश्यक हो गया। यही कारण था कि ५ मार्च, १९७२ मे देश के सोलह राज्यों और दो केन्द्र- प्रशासित क्षेत्रों में मतदान आरंभ हुआ । देश एक बार फिर 'जले विया नारों' की चाशनी से भीग गया। जनता की चेतना से भरे. विश्वास ने पुन रगत दिखलाई और संविद सरकारों को बड़ी सुविधा से गिरा लिया गया। अब अपने सूबेदार थे, अपने जमादार । राज-काज आरंभ हुआ। इस सारे दौर में श्रीमती इन्दिरा गाधी को अधिनायकवाद की ओर बढ़ने के लिए भारतीय पत्रकार निरंतर उत्साहित कर रहे थे। एक ओर बहुत-में कम्यूनिस्ट लेखक और पार्टी के सदस्य-लेखक थे, जिनके सोच माक्र्मवाद की फेम मे वधे-वधाए निकलते थे, दूसरी ओर तथाकथित गाधीवादी काग्रेमी भी जो परोक्ष और अपरोक्ष रूप से इन्दिराजी के उनेजित व्यक्तिवाद की अधिनायकवाद मे बदलने के लिए उत्साहित कर रहे थे। इस सन्दर्भ में प्रभाकरजी १. नमा जीवन, मार्च, १९७४ - ४४ :: दूसरी आजादी की एक टिप्पणी, जिसका उल्लेख उन्होंने स्वयं ही बड़े गौरव के साथ किया है, देता हूं: ""अधकचरा संविधान आपके रास्ते में बाधक है। तव भी कोई वात नहीं । प्रजातन्त्र अपनी रक्षा के लिए आपको जनरल दिगाल की तरह प्रजातन्त्री अधिनायक के अधिकार देने को सहर्प तैयार है।" अधिनायकवाद के साथ प्रजातन्त्र ! कितनी हास्यास्पद स्थिति है ! ऐसे ही जैसे कहा जाए कि हम किसी मदांध को यह अधिकार देते हैं कि यह अपना महान धर्म लाठी के जोर पर संसार में फैला दे। और कोन दे रहा था यह अधिकार ? प्रभाकरजी ? हां, शायद सिर्फ प्रभाकरजी । इस देश में इस तरह के कितने सिर्फ' रहे होंगे? पर इस तरह के जितने 'गिने-चुने सिर्फ' थे, उनके पास अपनी बात कहने-सुनाने के साधन थे, परिचय थे। परिणाम हुआ एक गलत रास्ते पर जाते राहगीर का और गलत हो जाना। वह राहगीर, जो मंच से कह कुछ रहा था और जीवन में कर कुछ रहा था। वह राहगीर, जो रास्ते को सही बतलाते हुए अपने साथ-साथ चलने वाले लोगों को भी गलत रास्ते चलाता चला गया। बेहद मजेदार बात यह थी कि १९७१ में शासनारूढ़ होते ही श्रीमती इन्दिरा गांधी व्यक्तिवादी न रहकर अधिनायकवादी हो गई। 'जन-अदालत' के नाम पर उन्होंने सत्तारोहण किया था, उसी जन-अदालत में चुनाव के दौरान कभी उन्होंने विरोधी दलों पर आरोप लगाए थे-एक बार बोली थीं, "आज मैं संघ के नेताओं से पूछना चाहूंगी कि उनमें से कितने ऐसे अत्याचारों को सहते हैं और उनका मुकाबला करने का दावा करते हैं। मैं उनसे पूछना चाहूंगी कि उनमें से कितनों ने, खतरे खेलने की बात छोड़िए, आजादी के भी नारे लगाए हैं ? उनमें से कितनों ने अपनी गलियों में, और अपने घरों में आजादी के झंडे ऊंचे किए हैं ?" और उसी जन-अदालत का गला उन्होंने आपातकाल के दौरान घोंट दिया। उसी जन-अदालत का जिसने उन्हें 'छत्रपति' बनाया था। आपातकाल के वीस माह उस रूंधे हुए संघर्ष को तकलीफदेह कहानी हैं, जिसे तानाशाहो के पंजों से 'मुक्ति के लिए जनता ने किया। वही जन-अदालत थी, जिसने उन वीस माहों में भूल-सुधार किया और श्रीमती गांधी ने अपनी मोहक भाषा और पूर्वजों के त्याग के नाम पर जिन .

दूसरा भागापा.. - करोडो लोगों के दिमाग मे विरोधियो के प्रति विचिन-सा कल्पित भय समो दिया था, उन्हे स्वीकार किया। प्रगतिशील कार्यक्रम लागू करने की पुकार लगाकर श्रीमती गाधी ने १६७१ के चुनावों में जिस जन-अदालत के द्वारा अपने को जबरदस्त समर्थन मे स्थापित किया था, बाद में उसी जन-अदालत को शक्ति और सार्वभौमिकता का मजाक उड़ना शुरू हुआ। भारतीय संविधान के अनुमार जनता को जो लोकतान्त्रिक अधिकार प्राप्त थे, उनका हनन किया गया और इसकी बुनियाद पडी, ४ अगस्त के उस दिन जव ३८४ मतों के भारी बहुमत से मविधान का २४वा मशोधन संसद में स्वीकार लिया गया। इस मंशोधन के अनुसार अव संसद को यह अधिकार प्राप्त हो गया था कि वह संविधान के किमी भी हिस्से को बदल सकती है । हैरानी और दुःख की बात यह है कि इस मंशोधन विधेयक को सदन में स्वीकृति के लिए पेश करते हुए प्रधानमंत्री श्रीमती गाधी ने उत्साहित स्वर में कहा कि यह विधेयक लोकतन और समाजवाद की दिशा में एक कालिकारी और महान कदम कैसी विरोधाभास की स्थिति थो? धीमती गाधी ने १६७१ का अपना चुनाव प्रचार करते हुए लोकतन्त्र, जनता, जन-अदालत और मानवीय मूल्यों की दुहाई दी थी, उन्ही श्रीमती गाधी ने वडे गौरव के साथ सविधान में अपने अधिनायकवाद की रक्षा के लिए जी चाहे परिवर्तन करने को एक औपचारिक स्वीकृति ली। मुझे याद आता है, अगस्त माह में जव तानाशाही को स्पष्ट युनि- याद पड़ी, तब चाटुकार लेखक, कवि, पत्रकार यह कहते नहीं अधा रहे थे कि अब देश में क्राति का समय याया है। अब तक हम जिस सविधान पर खडे थे, वह प्रतिक्रियावादी किस्म का था। पर कुछ लोग थे, जिन्होंने आगामी खतरे को खूब भाप लिया। वे समझ चुके थे कि सर्वशक्तिसम्पन्न बनने की दिशा में यह पहला कदम है। ऐसे लोगो, पत्रकारों और नेताओं ने तत्काल वक्तव्य देकर इस मंशोधन को गलत भी बतलाया था। उन यागामी खतरो का भी सकेत किया था, जिन्हें बाद में जन- मानस ने भोगा, पर इससे पहले कि सामान्य लोग स्थिति को समझ सके, श्रीमती गाधी ने एक जबरदस्त स्टंट फेंककर लोगों का ध्यान उस और से हटा लिया। ठीक ४ दिन बाद ही ( अगस्त, १९७१ को) मंसद में पुनः एक संशोधन विधेयक प्रस्तुत हुआ। इसके अनुसार भूतपूर्व गासको के विशेपा- धिकार समाप्त किए जाने थे।

. ४६ :" दूसरी आज़ादी सचमुच तुरुप चाल को इस राजनीति की में बार-बार सराहना करना चाहूंगा। भोलेभाले करोड़ों लोगों को राजाओं के प्रिवीपर्स और विशेषाधिकार- समाप्ति के इस २६वें संशोधन विधेयक की खुशी में याद ही नहीं रहा था कि उससे पहले, सिर्फ चार दिन पहले, श्रीमती गांधी ने २४वें विधेयक के द्वारा एक अफलातूनी ताकत भी हासिल कर ली है। विरोधी चिल्लाए, गलत के प्रति विरोध की कुछ आवाजें जनता में से भी उठी, किन्तु शासकीय प्रोपेगेण्डे के सामने वे नक्कारखाने में तूती की आवाज़ सिद्ध हुई। हो सकता था कि कुछ गुनगुनी आवाज जनता तक पहुंचती, किन्तु फौरन वाद, यानी 8 अगस्त १९७१ को ही राजधानी दिल्ली में किराये के लाखों लोग लाकर एक जन-रैली निकाली गई और कहा गया कि इन्दिराजी के फ्रांतिकारी कामों के समर्थन में भारतीय जनता हर्प व्यक्त करने राजधानी में आई है। अजीब बात यह थी कि इस रैली में, जिसमें लगभग आठ लाख व्यक्ति बतलाए गए थे, ज्यादातर लोग वे थे, जो दूर-दराज़ गांवों से दिल्ली-दर्शन करने आए थे। ऐसे कुछ लोगों से मेरी भी भेट हुई थी, क्योंकि वे मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले के एक गांव से आए हुए थे और मुझसे मिलने इसलिए आए थे कि उनके गांव में मेरी रिश्तेदारी है। ऐसे ही एक महाशय मेरे पास आकर बहुत खेदपूर्वक बतलाने लगे थे कि हम तो खाना, भता और दिल्ली घूमने के चक्कर में चले आए, पर यहां आकर मालूम हुआ है कि खाने-पीने का कोई ठिकाना नहीं है। यही नहीं, वे इस बात से भी चिन्तित थे कि क्या मालूम यहां से वापसी के लिए वह ट्रक उपलब्ध हो सकेगा या नहीं, जो उन्हें ढोकर ग्वालियर से ले आया था। रैली में हुई भीड़ के दर्शन भने स्वयं किए थे। शाम को पांच बजे अंसारी रोड भी एक गली में, जिसके पिछवाड़े की ओर राजघाट रोड है, लाखों की संख्या में पर्दानशीन औरतें, मदं और बच्चे भेड़ों के गल्लों की शक्लों में घूमते नजर आ रहे थे। ये लोग सिरों पर समान की पोटलियां या हाथों में थैले लिए हुए बदहवास दीखते थे। बतलाया गया था कि ये सभी महान विचारों के समर्थक है, और श्रीमती गांधी के क्रांतिकारी दृष्टिकोण और कार्यक्रमों का समर्थन करने के लिए दूर-दराज से आए हुए हैं। जवकि सच यह था कि उन्हें चरका देकर दिल्ली शहर में दो लाया गया था और अब वे एक महानगर की अजनबी गहराइयों और माहौल में घबराए हुए उन वाहनों को तलाश कर रहे - - ।

दूसरी आजादी: ४७ थे, जो उन्हे रामलीला मैदान मे एकजुट बनाकर शहर के जिस हिस्से मे जगह मिली, जा दुबके थे। इस रैली मे नारों को और हसीन बनाया गया। वही पुराना नारा, जो १६७१ से पहले के चुनाव में भी उठा या-गरीबी हटाने का नारा। इस वार बदल गया था । अब उसके कवित्वपूर्ण शब्द आमसभा की छाती पर लटके हुए थे--'गरीबी हटाएगे, समाजवाद लाएंगे।' जन-क्रांति की पहली चिनगारी इमरजेंसी के दौरान और उसके पूर्व ऐसी पुस्तको की एक बाढ मिलती है, जिनके हर सर्जक ने श्रीमती गांधी के कार्यकलापों की प्रसशा करते हुए उन्हे निरतर अधिनायकवाद की ओर बढाया और हर ऐसे लेखक ने एक-दूसरे से आगे बढकर श्रीमती गाधी के लिए वफादारी के वायदे किए। सबसे दिलचस्प चात यह थी ऐसा हर कृतिकार अपने को उसी ढग से घोर समाजवादी और लोकतान्त्रिक सिद्ध करने में लगा हुआ था, जिस तरह श्रीमती गाधी प्रशासन मे नारे फैलाती रही थी। और जिस तरह इन नारों के अनुसार भारत का हर विरोधी दल साम्प्रदायिक, तानाशाह या पूजीपतियों का गुर्गा वना हुआ था, उसी तरह इन टिप्पणीकारो या लेखको के लिए वह था। सोशलिस्ट पार्टी, जनसघ, सगठन काग्रेस, भारतीय क्राति दल, माक्र्सवादी कम्यूनिस्ट दल और कई दल एकभाव से इन्ही परिभाषाओ मे प्रचारित किए जा रहे थे और एकमात्र दल बचा था, श्रीमती गाधी का कांग्रेस दल जो समाजवाद, धर्म-निरपेक्षता, अहिंसा, शान्ति, जाति और प्रगतिशीलता में ओतप्रोत था। क्या यह वात अपने-आपमे कम विस्मयजनक है कि देश की आवादी के अस्सी प्रतिशत में बटे दल गलत थे और केवल बीस प्रतिशत को बटोरकर बना ली गई भीड़ काग्रेस सही थी? १६७१ के लोकसभा चुनावों तक हर चुनाव में नये-नये नारे चलन थे, वायदे फिकते रहे थे । 'गरीबी हटाई जाती रही थी, कुमियां रही बाई रही थी, किन्तु श्रीमती गाधी और उनके मायी निरतर यह महन्ना थे कि अव जनता में व्याप्त अंसतोप, भूखमरी और वैकारी काम ढपली के राग से नहीं गाया-वजाया जा सकता, जिनसे यव तक मान्सर जाता रहा है । तब क्या किया जाए ?

४८:: दूसरी आजादी तब एकमात्र चारा था, सुशासन की स्थापना करके भ्रष्टाचार, भाई- भतीजावाद, नौकरशाही, बढ़ते पूंजीवाद और सामाजिक विषमताओं से जनता को छुटकारा दिलाना । पर यह छुटकारा कौन दिलाएगा, किस तरह दिलाएगा? जिन अवसरवादियों की भीड़ लेकर श्रीमती गांधी ने सत्तातंत्र हथिया लिया है, वे तो निहित स्वार्थोवाले हैं। स्वयं श्रीमती गांधी जो कुछ करती आई है, वह केवल कुर्सी के मोह में हुआ है तब इस जन-असंतोप को कैसे थामा जाए? जन-असंतोप को थामने के लिए अव नारे वोदे सिद्ध होने लगे थे। भूखे, नंगे लोगों को रोटी की जगह नारे नहीं खिलाए जा सकते थे। लम्बी जवानी और अपनी उम्र के खूबसूरत दिनों को वेचकर जिस शिक्षा की युवकों ने प्राप्ति की थी, उन्हें आदर्श की बोदी वातों से नहीं समझाया जा सकता था। और इस सबके अतिरिक्त इन्दिरा-शासन के पास कोई भी कार्यक्रम नहीं था। जो कार्य- क्रम था, वह सत्ता पाते ही पूरा हो चुका था। इसके बाद सवाल पैदा हुआ सत्ता पर जमे रहने का। पर कैसे जमे रहें ? "यानी कार्यक्रम रहा कुर्सी पर जमे रहने का। विरोधी दल तूती की आवाज़ से ही सही, किन्तु निरंतर जन-साधारण को जतला रहे थे कि यह सव इस कारण है, क्योंकि वे एक आदर्शहीन और नकली शासन में जी रहे हैं। उन्हें विश्वास था कि एक दिन उनकी कमजोर आवाज़ जनता तक पहुंचेगी ज़रूर! "और वह हुआ। गुजरात की उसी धरती पर हुआ, जिसपर कभी गांधी की अहिंसा ने जन्म लिया था और शांतिपूर्ण तरीके से देश में स्वतंत्रता की लड़ाई सम्भाली थी। गुजरात आन्दोलन को सामान्यतः पत्रकारों और राजनीतिक समीक्षकों ने एक प्रांतीय और क्षेत्रीय आन्दोलन कह दिया है। बहुत-से राजाश्रयी लेखकों ने उसे महज विरोधी दलों द्वारा भड़काया गया एक हिंसात्मक, उन और असामा. जिक तत्वों का आन्दोलन बतलाया है, किन्तु मुझे लगता है कि गुजरात का छान-आन्दोलन वस्तुत: आजादी की दूसरी लड़ाई का पहला शंखनाद था, जिसकी गूंज सबसे पहले पूरे देश में सुनी गई और जिसका प्रभाव बाद में विहार से एक विशाल विस्फोट के रूप में हुआ। एक पत्रकार ने लिखा है कि "गुजरात आन्दोलन दुनिया का सबसे बेतुका आन्दोलन था, जिसमें अवयस्क मताधिकार द्वारा मांग की गई थी कि विधान सभाओं को तोड़ दो।" मूल सत्य को विसराकर एक कोई तर्क ढूंढ लेना-(और - री आजादी ::५१ ५.: दूसरी आजाद तकं भी ऐसा जो सचमुच तक हो)और फिर जवाब रोजगारी, ही है। क्या अवयस्क मताधिकार द्वारा विधा 2ठीक चाहिए? पत्रकार महोदय क्या कहेंगे? इस वहस मे जन लन की विशिष्ट बातें बतलाना चाहूंगा । जव उक देश की सत्ता अगर वेदम सिद्ध हो चुकी थी तो देश लडखडाया हुआ था। भ्रष्टाचार, जमाखोरी, काल और गरीबी व आर्थिक असमानता चरम पर पशुपारपाावसास्थिति में छानो ने अपने शासन-कर्ताओं से माग की कि यदि वे शासन सम्भाल नहीं सकते, तो उन्हें त्यागपन्न देना चाहिए । यही नहीं, जव कुर्सी-चिपकू काग्रेस नेता नहीं माने तब वाध्य होकर छावों ने आन्दोलन प्रारंभ किया, सभाएं की, घेराव करके विधान सभा-सदस्यों से माग की कि वे कुर्मी छोड दें और नये लोग चुने जाए। विरोधी दल स्वय भी देश की हालत से त्रस्त हो चुके थे। इससे पहले कि जनता उनसे माग करती, उन्होने स्वयं ही विधान सभा से त्यागपन्न दे दिए। पर कांग्रेसी ? " लम्बी-लम्बी लागतें लगाकर हासिल की गई कुसियों को कैसे छोडा जाए ? वे हाई कमान का मुंह देखने लगे। इस भाव से कि आप आदेश करें तो हम पदत्याग करें, क्योकि हमे तो सबसे पहले आपने काग्रेस टिकिट के लिए चुना था, जनता तो वाद को चीज़ है । और हाई कमान चुप । जनता को माग, नई पीढी को आवाज और प्रात में फैली भयानक भुखमरी के बावजूद चुप ! छात्र-आदोलन जोर पकड़ता गया। निरीह लोग गोलियों से भून डाले गए। पढे-लिखे बेरोजगार जवानो को जेलों में ठूस दिया गया। परिणाम हुआ एक शान्तिपूर्ण आन्दोलन का 'काति' के रूप में बदल जाना। अव एक ओर कांग्रेसी शासन की राइफलें थी, दूसरी ओर निहत्यी जनता के निरीह चेहरे, पर ये चेहरे अनंत थे और राइफलें गिनती की। हिंसक मशीन और निहत्थे मनुष्य के इस युद्ध को देश के विरोधी नेता सह नही सके । उन्होने खुले दिल से जन- आन्दोलन का समर्थन किया। लोकनायक जयप्रकाश पहली बार स्पष्टत काग्रेस शासन के विरोध मे आए और उन्होंने कहा कि अहिंसक आन्दोलनो के प्रति हिंसात्मक रख लेना काग्रेस की गाधीवादी परम्परा के अनुकूल नहीं है । जन-आन्दोलन को कुचलना जनतन्त्रीय पद्धति के विपरीत है । जो जनता स्वच्छ प्रशासन की माग कर रही है उसके साथ जयप्रकाश हैं । परिणाम हुआ जन- आन्दोलन और ज़ोर पकड़ गया। इधर श्री मुरारजी ।

४८ :: दूसरी आजादी गया। . तव एकर भ कर दिया। इन्दिरा-शासन को घुटने टेकने पड़े। गुजरात में भतीजावार जीत हुई। विधान सभा भंग करके राष्ट्रपति शासन लागू कर को छ दिन गुजरात के आन्दोलन की सफलता ने सारे देश के सुलगते असन्तोप को सहसा विस्फोटक बना दिया। देश की नई पीढ़ी जाग गई और उसने एक बार फिर उसी इन्कलाव को अपनाया जो दुःशासन को दूर करने के लिए किसी भी लोकतांत्रिक देश में अपनाया जा सकता था। गुजरात के छात्र-आन्दोलन को लेकर श्री कन्हैयालाल मिश्र प्रभाकर अपनी पत्रिका 'नया जीवन' के 'इन्दिरा अंक' में लिखते हैं---..."दुर्भाग्यवश विरोधी दलों ने इसे अपनी जीत समझा और सोचा कि जो सत्ता हम चुनावों में जीत- कर नहीं पा सके, वह विधान सभा को तोड़कर पा सकेंगे। विहार भी मंत्रि- मंडलों की अदला-बदली से अव्यवस्थित हो रहा था। बस, विरोधी दल बिहार की विधान सभा को तोड़ने पर पिल पड़े।" क्या वेहतरीन और वारीक राजनीतिक दृष्टि है ! एक ओर प्रभाकरजी लिखते हैं कि विरोधी दल विहार को विधान सभा तोड़ने पर पिल पड़े और दूसरी ओर यह भी फरमा रहे हैं कि "विहार भी मंत्रिमंडलों को अदला-बदली से अस्तव्यस्त हो रहा था।" एकदम विरोधाभास ! वही मसल हुई कि नाच न जाने आंगन टेढ़ा । जब बिहार अस्त-व्यस्त हो ही रहा था और वहां एक वेदी की सरकार चल रही थी तो अगर उस हालत में कोई जन-आन्दोलन उठा या विरोधी दलों ने नई और स्थायी सरकार के लिए व्यवस्था की मांग रखी तो कौन-सा अपराध किया? एक अव्यवस्थित सरकार और मंत्रिमंडलीय उलटफेर के दौरान किसी शासन-तंत्र की क्या दशा हो सकती है ? यह समझाने या समझने के लिए माथापच्ची करने या किसी ज्ञानकेन्द्र में जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। सहज ही यह समझा जा सकता है कि कोढ़ में अगर खाज ही लग जाए तो क्या होगा? भ्रष्टाचार, गरीवी और असमानता के अभिपाप में डूवे देश को जो भी नाममान को शासन-व्यवस्था मिली हुई हो, अगर वह भी ढिलमिल हो जाए, रोज़ मंत्री ड्वें-उबरें तो प्रशासन और देश का क्या हाल हो सकता है ? वहीं हो रहा था विहार में विहार के जन-आन्दोलन में वे बुनियादी मांगें उठाई गई, जो केवल । दूसरी आजादी ::५१ बिहार को ही नही, सारे देश की थीं। भ्रष्टाचार, बढ़ती कीमतें, बेरोजगारी, निकम्मी शिक्षा-पद्धति · आदि। इन प्रश्नो को कौन नकार सकता था? ठीक है कि बहुत-से विरोधी दल इस आन्दोलन के साथ थे, हमेशा रहे, किन्तु उन सभी ने एकमत होकर इस अहिंसक आन्दोलन या क्राति का नेतृत्व करने के लिए जय वाबू से निवेदन किया। यह सहज था। उन दिनों और उसके कुछ पूर्व जयप्रकाशजी के वक्तव्य आए थे, जिनमें उन्होंने देश की करुण दशा के प्रति अपनी चिन्ता व्यक्त की थी। उसी तरह, जिस तरह देश के बहुत-से तपस्वी नेता चिन्तित थे। आन्दोलन को एक ऐसा नेतृत्व चाहिए था, जो दल- गत राजनीति से ऊपर उठा हुआ हो, जिसके विगत मे महान क्रातिकारी का प्रेरणापूर्ण इतिहास हो और जिसका तन-मन देश की आत्मा मे रचा-बसा हो। और वह व्यक्तित्व जयप्रकाशजी के पास था। यदि सहज भाव से उनका नाम आने पर सभी दलों ने अपने छोटे-छोटे दायरो से हटकर एकमत होकर उनकी सत्ता और नेतृत्व स्वीकार किया तो इसपर कांग्रेसियों और काग्रेस समर्थक लेखक-पत्रकारो के बौखला जाने की क्या बात थी? सुरेश राम ने एक लेख मे लिखा है-"युवा पीढी ने जयप्रकाश से प्रार्थना की कि वह उनका नेतृत्व करें। उन्होने नौजवानो से कहा कि आपको शान्ति और अहिंसा के रास्ते पर चलना होगा और नि.स्वार्थ भाव से देश की सेवा में लगना होगा । वे राजी थे। इसपर जयप्रकाश ने बागडोर अपने हाथ मे ले ली।"* सच थी उक्त स्थिति, किन्तु बौखलाए हुए काग्रेसनिष्ठ (या इन्दिरा- निष्ठ) लेखक काग्रेस और इन्दिरा गाधी से कही ज्यादा बौखला उठे । क्या इसलिए कि इन्दिराजी की तरह वे भी इस महान आन्दोलन की चपेट में आकर उजागर होने लगे थे? मुझे एक शब्द याद आता है-लेंगवोट । बंगला शब्द है। एक विशालाकार नाव के साथ आठ-दस नावें जुड़ी रहती है और जब विशाल नाव डूवती है तो उससे जुड़ी हुई नावे भी डूब जाती है। जयप्रकाश के महान आन्दोलन के तूफान ने इन्दिरा शासन और उसके बहुत-से लेगबोट मंत्रियों, अधिकारियों, लेखको व पत्रकारों को उसी तरह थपेड़े देने शुरू कर दिए, परिणाम हुआ विशाल नाव के डुबने से पूर्व इन लैंगबोटों का उलट-पुलट हो *पातिक सरिता (अक ५२७) ५२:: दूसरी आजादी जाना । असन्तुलित होकर इन लेंगवोटों ने जो जल-नृत्य किया, उसका वर्णन कहीं और करूंगा। और विशाल नाव ? वह भी कम उछालें नहीं ले रही थी। इस तरह क्रांति का आरंभ और दमन का सिलसिला शुरू हुआ, जिसकी कहानी खत्म हुई.-१६७७ के आम चुनावों में । पर यह कहानी का प्रारंभ है । विहार आंदोलन में बोखलाहट किस कदर बढ़ी, इसका प्रमाण है श्री जयप्रकाश नारायण के बारे में बहुत-से समाचारपत्रों और पुस्तकों में वह लिया जाना, जो उन्होंने कभी नहीं कहा। मुझे स्मरण है कि जयप्रकाशजी के आदोलन को लेकर एक ओर भारी जन-चर्चा थी, दूसरी ओर सुलझे हुए बुद्धिजीवी निरंतर उनके आंदोलन का समर्थन कर रहे थे। विभिन्न प्रादेशिक भाषाओं के पत्र-पत्रिकाओं ने जन-चेतना के लिए आंदोलन की समग्र पृष्ठभूमि जतलाते हुए बार-बार जन-मानस को तैयार किया था कि वह 'समग्र क्रांति' के इस अहिंसात्मक आंदोलन का अंग बने और देश को एक नई व्यवस्था देने के लिए आगे आएं । हिन्दी में 'धर्मयुग' के सम्पादक डॉ० धर्मवीर भारती ने बिहार आंदोलन की पृष्ठभूमि और उसके निरंतर बढ़ते रूप को लेखों और चित्रों के माध्यम से जनता तक पहुंचाया। और भी बहुत-से हिन्दी-अंग्रेजी दैनिक, साप्ताहिक पत्न थे जो इस काम में आगे आए थे। जिन मूल प्रश्नों को लेकर आंदोलन का श्रीगणेश हुआ था, उन्हें स्वीकारते हुए भी बहुत-से लोग वैयक्तिक स्प से श्रीमती गांधी के प्रति वफादारी निबाहने में लगे हुए थे। मुझे ऐसे बहुत से लोगों की विरोधी बातें स्मरण हो आई हैं : थी ग्वाजा अहमद अव्यास ने अपनी पुस्तक * में लिखा है.---"भारत में दरअस्ल अन्न की कमी नहीं है। इस मानव-निर्मित कमी की ज़िम्मेदारी नांगारशाही द्वारा अन्न के अकुशल वितरण पर है। वह अन्न निगम के गोदामों में हजारों टन गेहूं और चावल सड़ने देती है । और पास ही लोग भूख से मरते रहते हैं। लेकिन इस पागलपन में एक पद्धति दीख पड़ती है क्योंकि उनके इस गोलमाल से अनाज के जमाखोरों, व्यापारियों और मुनाफाखोरों को भारी लाभ पहुंचाता है।" इसी पुस्तक में एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं-"जनता की फटिनाइयां इतनी बढ़ गई है कि उन्हें सहा नहीं जा सकता। सिर्फ दो साल । “इन्दिरा गांधी : सफलता को दस वर्ष (पृ.१७६-१८०) । दूसरी बाजादी ::५३ पहले उन्होंने जनता मे जो ऊंची आशाएं जगाई थी, उनके कारण निराशा और सन्ताप को अनुभूति और भी प्रखर वन उठी है।" एक अन्य स्थान पर इन्ही लेखक महोदय ने 'भारतीय स्थिति के (किन्ही ?) मित्रतापूर्ण आलोचक' को राय को व्यक्त करने की मजबूरी बतलाते हुए लिखा है-"एक ईमानदार आदमी के लिए भारत मे शाति के साथ रहना असंभव बन चुका है । बच्चों के दूध के डिब्बे की खरीद से लेकर कलिज मे प्रवेश लेने तक, हर बात में कालावाजारी के तरीके इतने आम वन चुके है कि वे उसे बेईमान बनाकर ही छोड़ते हैं..." श्री अब्बास ने चेतावनी दी थी कि यदि श्रीमती गाधी इन सारे हालात पर ध्यान नहीं देती और प्रशासन पर सुव्यवस्था का अकुश नही लगाती, तव 'वह उनके लिए खतरनाक होगा।' एक ओर देश की विपम स्थितियों और प्रशासनिक असफलताओं को अब्बास स्वीकार रहे थे, दूसरी ओर व्यक्तिपूजा में भी लगे हुए । यह सब लिख देने के बाद श्री अब्बास-जो उन्हीके अनुसार श्रीमती गाधी के शुभ- चिन्तक और मित्र हैं-उन्हे यह सुझाव भी देते है . "अन्न को लेकर हुए दंगे, राशन की दुकानो की लूट, बढती हुई कीमतों के विरुद्ध उग्र प्रदर्शन, खतरनाक सामाजिक अशांति के चिह्न मात्र हैं। मज़ाक की ही बात है कि प्रगतिशील नारों का इस्तेमाल करके प्रतिक्रियावादी और अधानुगामी अपनी शक्तिमो को पहले से ही एकत्र करते रहे हैं और आदोलन को बढाते रहे है।" एक अन्य स्थान पर वे लिखते हैं-"यदि इन्दिरा गाधी अपने शुभ- चिन्तको की चेतावनियो को नही सुनती तो शीघ्र ही उन्हें उनके और भारत के मोर्चाबन्द शन्नुओ की चोटो को झेलना पडेगा, क्योकि एक पुरानी कहावत है कि मित्र सिर्फ चेतावनी देता है.- शत्रु चोट करता है !" क्या हो जायकेदार कलमवयानी है। देश के आर्थिक, सामाजिक, राज- नीतिक ढाचे की हर दरार स्वीकारते हुए उस दरार के प्रति इकलाव लाने वाले विरोधियो को अब्बास साहब वडी सुविधा से 'उनका' (इन्दिराजी का) और 'भारत का' शत्रु बतला रहे हैं । अशाति की सम्पूर्ण सत्ता स्वीकारते हुए उसे 'चिह्न मान' बतलाना भी क्या कम बडा मजाक है ? यही स्थिति है, वहुत-से 'शुचितक पत्रकारों' की । यदि जयप्रकाशजी के आदोलन में अहिंसात्मक रैलियां और प्रदर्शनो के द्वारा श्रीमती गांधी और - ५४ :: दूसरी आजादी उनकी सरकार से स्वतंत्रता के बुनियादी अधिकारों और देश की बिगड़ी हुई आर्थिक स्थितियों को सुधारकर सुशासन की मांग की जा रही थी तव समझ में नहीं आता कि इसमें भारत के प्रति कौन-सी शत्रुता थी ? पर लेखन की 'जी-हुजूरी पद्धति' बड़े वेहूदा और कुताकिक ढंग से श्रीमती गांधी का जय-जयकार करने में लगी रही, जवकि स्वतंत्रचेता बुद्धिजीवी, निरंतर 'समग्र क्रांति' से सहमति प्रकट करते रहे। चूंकि जयप्रकाशजी का आंदोलन सत्य की बुनियाद पर खड़ा था और छिछोरे राजनीतिक स्वार्थों से ऊंचा था अतः सहज भाव से जन-मानस में गहरे व्याप्त होता गया। श्रीमती गांधी ने अपने अधिनायक स्वभाव के तहत आंदोलन के बारे में कहा-"गुजरात में जो कुछ हुआ, वह दूसरी बात थी। बिहार की विधान- सभा को किसी भी हालत में भंग नहीं किया जाएगा!" संभवत: उस समय तक श्रीमती गांधी का खयाल था कि यह आंदोलन बिहार विधान सभा को गिराने के लिए ही है । यह भी अदूरदर्शितापूर्ण या मोछे राजनीतिक विचार की बात थी। आंदोलन जिस ज़मीन पर खड़ा था, वह जमीन केवल विहार की नहीं थी। वह समान रूप से सारे देश की जमीन थी। देश की बुनियादी जरूरतों और सुधारों की जमीन थी। जबकि जयप्रकाशजी वार-बार यह कहते रहे थे कि यह मात्र किसी प्रदेश की सत्ता अथवा समस्या का आंदोलन नहीं है । ५ जून, १९७४ को पटना में जिस शाम विशाल जन-रैली हुई, उसमें जय वाबू ने स्पष्टतः घोपणा कर दी थी--"यह आंदोलन रुकेगा नहीं। यह समग्र क्रांति का आंदोलन है और इसका उद्देश्य केवल किसी विधान सभा का विघटन नहीं है, बल्कि यह तो एक महान रास्ते की पहली मंज़िल है।" सही था। जिन प्रश्नों पर बिहार-आंदोलन प्रारंभ हुआ, वे मात्र विहार के प्रश्न नहीं थे। वे समूने देश के थे। वे बिहार-आंदोलन से पूर्व गुजरात की जन-क्रांति के भी रहे थे। क्या यह छोटी-सी बात नहीं समझी जा सकती थी पि भूख सिर्फ बिहार की नहीं है, सारे देश की है। बेरोज़गार, लाचार लोगों की छटपटाहट किसी प्रदेश के दायरे में नहीं बंधी है, सारे देश की आग बन रही है। प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और मुनाफाखोरी देश के एक टुकड़े- भर में नहीं है, समूचे देश में है। तव श्रीमती गांधी जैसे राजनीतिन उसे मात्र विहार बांदोलन कहें-- समग्न मांगों की रूपरेखा में-हास्यास्पद है। गुजरात को विधान सभा भंग हुई थी। जन-क्रांति सफल रही। मुद्दे वही 1 दूसरी आजादी :: ५५ थे, जो बाद में विहार में विस्फोट के कारण बने, फिर सारे देश में 1 तब श्रीमती गाधी का यह कहना कि 'गुजरात में जो कुछ हुआ, वह दूसरी बात यो' समझ में नहीं आता। उसके बाद अगली घोषणा-"बिहार को विधान सभा को किसी भी हालत मे भंग नहीं किया जाएगा।" राजहठ नहीं, तब क्या था? निस्सन्देह यह हपूर्ण घोषणा श्रीमती गांधो के अधिनायकवादी स्वभाव का ही संग थी। ५ जून, १९८४ के जिस जुलूस या रैली का जिक्र मैंने ऊपर किया है उसमें 'इन्दिरा ब्रिगेड' ने गोली चलाई थी।' किन्तु श्री प्रभाकर अपनी पत्रिका में इस तरह के सत्यो को दरकिनार करते हुए कहते है-""साफ-साफ अपनी बात कहूं कि वे (आंदोलनकारी) समझ गए कि हुल्लड़शाही आदोलन से वे इन्दिराजी को नहीं हटा सकते, इसके लिए हिंसात्मक रूप लेना चाहिए।" इम आदोलन में जनसंघ भी शरीक या और हर दल की तरह उसके कार्यकर्ता भी समर्पण-भाव से जयबाबू को अनुशासनबद्ध शातिपूर्ण काति मे भाग ले रहे थे, किन्तु बदनाम करने वाली भाषा का उपयोग करते हुए श्रीमती गाधी ने एक जन-सभा में कहा-"ये संघी चीखते-चिल्लाते हैं, जलाते है और अल्पमत जनता को मारते हैं !" जबकि स्थिति का मच इस तरह था- पटना में - अप्रैल को आदोलनकारियों ने एक मौन जुलूस निकाला था। इस जुलूस में केवल मांगों के बैनर लेकर लोग निकले। इसी तरह के प्रदर्शन अन्य स्थानों पर भी आयोजित हुए और फिर वे सिलसिले से होने लगे। इम आदोलन का न दल था, न नाम। यह केवल जन-आदोलन था और इसमे सभी विरोधी दलों के लोग तथा बड़ी मात्रा में जनता मौजूद थी। स्वयं प्रभाकरजी ने स्वीकार किया है कि जयप्रकाशजी ने नेतृत्व सम्भालते आरभ बहुत उत्तम ढंग से किया। उन्होने अहिंसा को आदोलन की अनिवार शतं बताते हुए उसे क्षेत्रों में बाटा था। स्पष्टत उन्होंने एक जनसभा में घोषित कर दिया था-"समग्र क्राति का यह आदोलन दल-विहीन राज १.५ जून, १९७४ को जब पटना में एक उलम निम्न रहा था तो टरे ब्रिगेड की तरफ से उसपर मोची चलाई गई। मुरेच राम, सरिता ५६ :: दूसरी आजादी - का प्रतीक होगा।" श्री प्रभाकर लिखते हैं-"आंदोलन को रैलियों के रूप में चौराह पर ला पटका !" भापा और शब्द कितने ही व्यंग्यात्मक क्यों न हों, यह तो स्पष्ट है ही कि जयबाबू का आंदोलन पूर्णत: अहिंसात्मक था, जवकि सब कुछ मानते-जानते हुए इस आंदोलन का प्रचार शासकीय और राजकृपा के समर्पणवादी पत्र- कारीय स्तर पर हिंसात्मक कहकर किया जा रहा था। जितना झूठ और वेबुनियादी प्रचार गत पांच वरसों में भारत में हुआ, उतना संसार के किसी भी देश में, इतने अल्पकाल में नहीं हुआ। मराठी की मुप्रसिद्ध लेखिका दुर्गा भागवत कहती हैं- "मगर सबसे बड़ा अफसोस यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो हिन्दी के अधिकांश लेखक सरकार के चापलूस हो गए। जवकि हिन्दी प्रदेश की जनता ने खुलकर इस महान संघर्ष में सबसे बड़ा योगदान दिया। जव जनता इस संघर्ष में जुटी थी, तब हिन्दी लेखक सरकारी प्रचार का अंग वनकर उसकी टांग खींच रहा था। यह नुनी-सुनाई नहीं, आंखों देखी वात है । कुछ वरिष्ठ लेखकों और संपादकों ने सरकारी दमन का पक्ष लिया। उसका प्रचार किया और जनता के साथ धोखा किया।" सरकार और सरकारी लेखक प्रचार कर रहे थे कि जयप्रकाशजी का आंदोलन हुल्लड़वाजी से पूर्ण हिंसात्मक आंदोलन है, जवकि उस दौरान जो घट रहा था, वह एकदम विपरीत था। गया में शात प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर पुलिस ने भयानक गोलीवारी की । इस गोलीवारी के परिणामस्वरूप दस लोगों ने जान से हाथ धोए और संकड़ों हताहत हुए। पर पिळू लेखक कह रहे थे कि प्रदर्शनकारियों ने हिंसात्मक रूप ले लिया था। गया में जो लोग मरे, उनमें एक भी पुलिसमैन नहीं था। मृतक सीधे-सादे नागरिक थे-- कुछ किसान और कुछ मजदूर । किन्तु सूठे प्रचार-तंत्र की शक्ति के सामने घटनास्थलों से हजारों-लाखों मील दूर उस भोले देशवासी को कौन बतला सकेगा कि गोलियां प्रदर्शनकारियों के पास नहीं होती, होती है सत्ता के पास। और वे दसों आदमी गोलियों से मरे थे। किन्तु इस दमन ने चेतना को ज्यादा तीन किया। पटना में ही एक और १. श्रीमती दुर्गा भागवत के विचार, १० वप्रल, १९७७----धर्मयुग दूसरी आजादी ::५७ बड़ा जुलूस निकला। इसमें हजारों बंडल थे और इन वंडलो में गांव-गाव से जनता के दस्तखत जुटाए गए थे कि शासन-व्यवस्था मे परिवर्तन आवश्यक है। कहते है, यह जुलूस छह मील लम्या और पूर्णतः अनुशासनवद्ध था। जयवावू स्वयं नेतृत्व कर रहे थे। पर जैसाकि श्रीमती दुर्गा भागवत ने कहा है, हिन्दी के लेखक जन- आंदोलन से गद्दारी कर रहे थे। कुछ लोग राज्यसभा में पहुंचने का चक्कर चता रहे थे और कुछ लोग अपने अखवारों या ऐसे ही किसी छोटे-मोटे कारोबार के निहित स्वार्थ में लिप्त होकर ऊलजलूल बातें कह और लिख रहे थे। आंदोलन के मूल मुद्दो को जन-साधारण तक न पहुचाकर वे व्यक्तिगत रूप में श्री जयप्रकाश नारायण पर कीचड उछालने में लगे हुए थे। कुछ लोग टूट पड़े थे जनसंघ पर, और विलकुल उसी भाषा मे, जिस भाषा में, काग्रेसी प्रचार-तंत्र या व्यक्तिगत रूप से श्रीमती गाधी वोलती रही थी, आरोप लगाने लगे थे। आदोलन के सत्य-रूप को तोड-मरोड़कर जनता के सामने पेश कर रहे थे। विशेष रूप से कम्यूनिस्ट और कम्यूनिस्ट लेखक इस पडयव मे शरीक रहे। उस सारे दौर में उनके विचार, प्रचार तथा लेखन-मभापण का हर 'अंश देश और जनता के साथ विश्वासघात की एक तकलीफदेह स्मृति है। बुद्धिजीवियो का एक पूरा दल ही सगठित रूप में एकत्र होकर वह भापा और आरोप बोलने लगा, जो उसके अपने दिमाग या बुद्धि के नहीं थे, बल्कि काग्रेसी नेताओ की बुद्धि की राजनीतिक उगलन थे। व्यक्तिगत रूप में जयप्रकाशजी, मुरारजी भाई, कृपलानीजी, अटलबिहारी वाजपेयी आदि पर जो कीचड़ उछाला गया, वह उसी भापा और शब्दो में था, जिस भापा और शब्दो के साथ काग्रेमी सत्ताधारी वोलते रहे थे। ऐसे कुछ उदाहरण है : मंसद सदस्य कृष्णकात को २५ जुलाई, १९७५ को काग्रेस की महासचिव श्रीमती चन्द्रशेखर ने एक पत्र लिखा था और अखिल भारतीय काग्रेस कार्य समिति के उस प्रस्ताव को याद दिलाई थी, जिसमे काग्रेस जनो को हिदायत दी गई थी कि श्री जयप्रकाश नारायण का समन क्राति दर्शन और आंदोलन फासिस्टो का ममूबा है और सारे देश में इसका विरोध किया जाना चाहिए। इसी स्वर मे हजार कदम आगे बोलते हुए श्री प्रभाकर ने लिखा—'जो लोग सारे देश मे हुल्लड मचाकर और कुछ नेताओ की हत्या करके प्रजातंत्री हुकूमत की जगह फासिस्ट डिक्टेटरी कायम करने की सब तैयारियां पूरी कर ५६:: दूसरी आजादी का प्रतीक होगा।" श्री प्रभाकर लिखते हैं.-"आंदोलन को रैलियों के रूप में चौराहे पर ला पटका !" भापा और शब्द कितने ही व्यंग्यात्मक क्यों न हों, यह तो स्पष्ट है ही कि जयबाबू का आंदोलन पूर्णतः अहिंसात्मक था, जबकि सब कुछ मानते-जानते हुए इस आंदोलन का प्रचार शासकीय और राजकृपा के समर्पणवादी पन्न- कारीय स्तर पर हिंसात्मक कहकर किया जा रहा था। जितना झूठ और वेबुनियादी प्रचार गत पांच वरसों में भारत में हुआ, उतना संसार के किसी भी देश में, इतने अल्पकाल में नहीं हुआ। मराठी की सुप्रसिद्ध लेखिका दुर्गा भागवत कहती हैं..-"मगर सबसे बड़ा अफमोस यह है कि कुछ अपवादों को छोड़ दें, तो हिन्दी के अधिकांश लेखक मरकार के चापलूस हो गए। जवकि हिन्दी प्रदेश की जनता ने खुलकर इस महान संघर्ष में सबसे बड़ा योगदान दिया। जब जनता इस संघर्ष में जुटी थी, तब हिन्दी लेखक सरकारी प्रचार का अंग वनकर उसकी टांग खींच रहा था। यह मुनी-सुनाई नहीं, आंखों देखी बात है । कुछ वरिष्ठ लेखकों और संपादकों ने सरकारी दमन का पक्ष लिया। उसका प्रचार किया और जनता के साथ धोखा किया।" सरकार और सरकारी लेखक प्रचार कर रहे थे कि जयप्रकाशजी का आंदोलन हुल्लडबाजी से पूर्ण हिंसात्मक आंदोलन है, जबकि उस दौरान जो घट रहा था, वह एकदम विपरीत था। गया में शांत प्रदर्शनकारियों की भीड़ पर पुलिस ने भयानक गोलीबारी की । इस गोलीबारी के परिणामस्वरूप दस लोगों ने जान से हाथ धोए और मैकड़ों हताहत हुए। पर पिठ्ठ लेखक कह रहे थे कि प्रदर्शनकारियों ने हिसात्मक रूप ले लिया था। गया में जो लोग मरे, उनमें एक भी पुलिसमैन नहीं था। मृतक सीधे-सादे नागरिक थे -- कुछ किसान और कुछ मजदूर । किन्तु झूठे प्रचार-तंत्र की शक्ति के सामने घटनास्थलों से हजारों-लाखों मील दूर बैठे उस भोले देशवासी को कोन वतला सकेगा कि गोलियां प्रदर्शनकारियों के पास नहीं होती, होती है सत्ता के पास । और वे दसों आदमी गोलियों से , मरे थे। किन्तु इस दमन ने चेतना को ज्यादा तीन किया। पटना में ही एक और १. श्रीमती दुर्गा भागवत के विचार, १० अप्रैल, १९७७-~-धर्मयुग दूसरी आजादी :: ५७ वडा जुलूस निकला । इसमे हजारो बंडल थे और इन वडलों में गांव-गाव से जनता के दस्तखत जुटाए गए थे कि शासन-व्यवस्था मे परिवर्तन आवश्यक है। कहते हैं, यह जुलूस छह मील लम्बा और पूर्णतः अनुशासनबद्ध था। जयवाबू स्वयं नेतृत्व कर रहे थे। पर जैसाकि श्रीमती दुर्गा भागवत ने कहा है, हिन्दी के लेखक जन- आदोलन से गद्दारी कर रहे थे। कुछ लोग राज्यसभा में पहुंचने का चक्कर चला रहे थे और कुछ लोग अपने अखबारों या ऐसे ही किसी छोटे-मोटे कारोवार के निहित स्वार्थ में लिप्त होकर ऊलजलूल वातें कह और लिख रहे थे। आंदोलन के मूल मुद्दो को जन-साधारण तक न पहुचाकर वे व्यक्तिगत रूप में श्री जयप्रकाश नारायण पर कीचड़ उछालने में लगे हुए थे। कुछ लोग टूट पडे थे जनसघ पर, और विलकुल उमी भाषा में, जिस भाषा मे, काग्रेसी प्रचार-तन या व्यक्तिगत रूप से श्रीमती गाधी बोलती रही थी, आरोप लगाने लगे थे। आदोलन के सत्य-रूप को तोड-मरोड़कर जनता के सामने पेश कर रहे थे । विशेष रूप से कम्यूनिस्ट और कम्यूनिस्ट लेखक इस पडयन में शरीक रहे। उस सारे दौर में उनके विचार, प्रचार तथा लेखन-सभापण का हर अंश देश और जनता के साथ विश्वासघात की एक तकलीफदेह स्मृति है। वुद्धिजीवियो का एक पूरा दल ही मगठित रूप में एकत्र होकर वह भापा और आरोप बोलने लगा, जो उसके अपने दिमाग या बुद्धि के नहीं थे, बल्कि काग्रेसी नेताओ की बुद्धि की राजनीतिक उगलन थे। व्यक्तिगत रूप में जयप्रकाशजी, मुरारजी भाई, कृपलानीजी, अटलबिहारी वाजपेयी आदि पर जो कीचड़ उछाला गया, वह उसी भाषा और शब्दो मे था, जिस भाषा और शब्दों के साथ कांग्रेमी सत्ताधारी वोलते रहे थे। ऐसे कुछ उदाहरण हैं . मंमद सदस्य कृष्णकांत को २५ जुलाई, १९७५ को काग्रेस की महासचिव श्रीमती चन्द्रशेखर ने एक पत्र लिखा था और अखिल भारतीय काग्रेस कार्य समिति के उस प्रस्ताव की याद दिलाई थी, जिसमे काग्रेस जनो को हिदायत दी गई थी कि श्री जयप्रकाश नारायण का समग्र क्राति दर्शन और आंदोलन फासिस्टो का ममूबा है और सारे देश में इसका विरोध किया जाना चाहिए। इमी स्वर में हजार कदम आगे बोलते हुए श्री प्रभाकर ने लिखा-जो लोग सारे देश मे हल्लड मचाकर और कुछ नेताओ की हत्या करके प्रजातंत्री हुकूमत की जगह फासिस्ट डिक्टेटरी कायम करने को सब तैयारिय कर ५८:: दूसरी आजादी चुके थे इमर्जेंसी ने पहले ही कदम पर उनकी आजादी छीन ली है।" कांग्रेसी नेताओं ने सी० आई० ए० का खासा होआ उन दिनों खड़ा कर रखा था। यह होआ एक राजरीतिक चक्र के रूप में उपयोग किया जाना था और इस होवे को उन्होंने धीमे-धीमे जयप्रकाशजी के आंदोलन से जोड़ना शुरू पर दिया। इस होवे को श्री प्रभाकर ने स्पष्टत: सी० आई० ए. नाम न देकर शिष्ट ढंग से उपयोग कर लिया। लिखते हैं.-.-"आंदोलन के भीतर घुसे विदेशी एजेण्ट अपने हिसा-जाल को गरम करते जा रहे थे।" एक ओर यह स्थिति थी, दूसरी ओर उन पत्र-पत्रिकाओं की कमी नहीं थी जो श्रीमती गांधी का एक वक्तव्य आते ही बिलकुल उसी भाव से सम्पादकीय टिप्पणियां लिखकर आंदोलन का उसी तरह विवेचन करने लगते थे। इस जबरदस्त हवा का परिणाम यह हुमा था कि बहुत-से सुलझे हुए लोगों को, जो आंदोलन के समर्थन में बोलते थे और देश में एक रचनात्मक परिवर्तन तथा सामाजिक-राजनीतिक क्रांति की बात करते थे, निरंतर गलत समझा और बतलाया जाने लगा। कई बार यह समझाते हुए अजीब-अजीव तक ऐसे लोगों से सुनने को मिला करते । मुझे याद है, एक दिन में सुप्रसिद्ध फिल्म निर्देशक श्री वासु भट्टाचार्य के यहां बैठा हुआ था। यहां-वहां की बातें चल रही थीं कि बिहार-आंदोलन की चर्चा निकल आई। वासु इस बात को मानने को तैयार नहीं थे कि यह जन-आंदोलन है और उसके मूल में सामाजिया- आर्थिक विषमताओं के सुलझाव का प्रश्न है, बल्कि उनका विचार था यह महज राजनीतिक आंदोलन है और इस आंदोलन का मतलब सत्ता से श्रीमती गांधी या कि कांग्रेस को ही उखाड़ फेंकना है। जब वहस हो गई और काफी लम्बी चल चुकी तब अचानक वासु ने अपने सामने पड़ा हुआ 'धर्मयुग' का अंग उठाकर मेरी ओर उछाल दिया, वोले, "देखो इसे और बतलाओ कि इन चेहरों पर कोई प्रांति का भाव नज़र आता है ?" में हेरान हुआ, “पया मतलव ?" "मतलव यह किये जो आंदोलनकारियों के रंगीन और लंक एण्ड हाइट निव छपे है, इनमें देखो गौर से चेहरे देखो और फिर बतलाओ कि इनमें से एक भी प्रांतिकारी नजर आता है ?" "तब यह गया है ? क्या फोटो नकली हैं ? डॉ० भारती ने अपने ड्राइंग- मग में माल इकट्ठा करके विचवा लिए हैं ?" मैंने व्यंग्य से यहा । वानु सरत नाराज हो बोले, "तुम वेकार वहस मत करो, इन लोगों को - .

. दूसरी आजादी :: ५९ देखो। ये सब निश्चिन्त, हंसते हुए नजर आ रहे हैं- इनके चेहरों पर क्रांति कहां है ?" सहसा वह सहज हुए। कहा, "यह सब राजनीतिक छल-प्रपंच है। जन-क्रांति-व्रांति कुछ नहीं ! विचित्र तर्क था और इस तर्क के उत्तर में अपने-आपको विचित्र बनाना मुझे स्वीकार न था। हंसकर चुप हो गया। तो, यह एक मिसाल है । क्रोध, आवेश और प्रचार की शक्ति के कारण बेहद सुलझे हुए वुद्धिजीवी भी भटक रहे थे। वे चित्रों में क्रांति ढूढ रहे थे और भावों से यह समझना चाहते थे कि महंगाई, भुखमरी, बैंकारी और भ्रष्टाचार है भी या नहीं। इस विचार-प्रचार की आंधी में भी यह नहीं सोचा जा रहा था कि आदोलन वे करते है, जिनमे विरोध की शक्ति और मादा होता है। बहरहाल वे फोटो-मुख-जिनके चेहरे पर वासु भट्टाचार्य को क्राति नहीं दिख रही थी--क्राति कर रहे थे और काग्रेसी सत्तावाद को लाठियां और गोलिया भी सह रहे थे। वे सीधे-सादे आदमी थे, ऐक्टर नहीं थे, इसलिए ऐक्टिग न करके केवल क्रांति ही कर पा रहे थे। इस जन-आन्दोलन के प्रति घोर मानवतावादी संत विनोबा भावे का रुख अजीव था। लोग उस समय वडे हैरान हुए थे, जब आचार्य विनोबा भावे ने गलत के प्रति विरोध को केवल 'ऊधम' शब्द से सम्बोधित कर डाला। यही नहीं, उन्होंने सर्वसेवा सघ से प्रकाशित एक पुस्तिका मे जयप्रकाशजी के मान्दोलन को एक तरह से वेतुका बतलाते हुए कहा कि शिक्षा पद्धति के दोप, महंगाई, मूल्यवृद्धि और इसी तरह के दोप आन्दोलन से कैसे मिटेंगे। यह तर्क भी अपने-आपमे विचिन्न था। क्या आन्दोलन से दोप मिटते है दोष मिटाने की शक्ति जिनके पास थी, उन्हें यह आन्दोलन चेतावनी दे रहा था कि तुम इसे मिटाओ। यदि नहीं मिटा सकते तव कुसियां छोड दो। विनोबाजी अपने विचार व्यक्त करते हुए काग्रेस के भ्रष्ट शासन के प्रति अजीव- से सम्मोहित दीख रहे थे। यही कारण था कि जव विनोबाजी को पटना (जून १६७४) में निकले जय वाबू के जुलस पर इन्दिरा बिग्रेड द्वारा गोली चलाए जाने की घटना की सूचना दी गई और पूछा गया कि उनकी क्या राय है, तब उन्होंने कहा--"पटना में जो कुछ भला-बुरा हुआ, वह सब भगवान को समर्पण।" क्या मतलब हुआ ? यह सवाद किसी और तरह ही सही, पर अनायास 2 ! - " - ६० :: दुरारी आजादी महाभारत के उस कांड की याद दिला देता है जब युधिष्ठिर जैसे सत्यव्रती भी कतराकर कह बैठे थे-'अश्वत्थामा हतो नरो वा कुंजरो वा'। गांधीजी गोवाद सारे देश ने धर्म, सत्य और न्याय के लिए सदा विनोबाजी की ओर देखा है और वही विनोवाजी सत्य और असत्य के बीच से शब्द बचा- गार निकल गए ! यही नहीं, उन्होंने आन्दोलन के प्रति टुकड़ों-टुकड़ों में विचित तर्क-विचार प्रस्तुत किए। निस्सन्देह जयप्रकाशजी को विनोबाजी के इन विचारों और अनबूझ बदलाय पर दुग हुआ होगा, किन्तु प्रांतिधर्मी यों नहीं थका करते । सुरेणा राम ने विनोबाजी के इस बदलाव के लिए स्पष्टत: लिखा है--विनोवाजी कांग्रेस सरकार से टनकर लेना नहीं चाहते थे !" मुल मिलाकर यह कि विनोबाजी जन-आन्दोलन के कभी समर्थक नहीं रहे. उल्टे (आगे नहीं लिया जाएगा) उन्होंने अनेक बार इमर्जेन्सी के दौरान इन्दिराजी की तानाशाही को बड़े शालीन ढंग से और चुने हुए शब्द देकर समथित ही कर दिया। आन्दोलन के प्रति विनोबाजी के समर्थन की बात करते हुए स्वयं जयप्रकाशजी ने अपनी जेल-टायरी में लिखा है-"मैंने अपने विचार सरोया रांघ के माध्यम से कुछ चुने हुए लोगों और विनोबाजी के सामने रसे, लफिन न तो विनोबाजी मेरे विचारों से सहमत हुए, न मैं उनके विचारों से ।'' यह कोई नई बात नहीं थी। प्रांति और संघर्ष में महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों के समर्थन, अरामर्थन की स्थितियां सदा ही आती रही है, पर किसी भी मांति के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण होता है जन-रामर्थन, जो जय बाबू के साथ था और वही उनकी शक्ति थी । इस शापित से ही वे भ्रष्ट शासन-तंत्र को चेतावनी दे रहे थे, गंप कर रहे थे। आन्दोलन निरंतर तेज होता जा रहा था और उसकी तेजी के साथ-साथ कांग्रेस सरकार की लगडाहट-योगलाहट बढ़ती जा रही थी। बिहार सरकार को ऐरी पेन्द्रीय संकेत मिले थे कि आन्दोलन को सम्पूर्ण शगित से दवा दिया जाए, जबकि सरकारी तोर पर बार-बार प्रचार किया जा रहा था कि 1. "I put forward my own arguments, which will be found in the account of our conversation circulated by the Sarva Seva Sangh among a few sclected persons. Howcycr Vinobaji was not persuaded, nor was 1." Prison Diary-1975 by Jaiprakash Narain, Page 17 न " दूसरी आजादी :: ६१ जयप्रकाशजी का आन्दोलन प्रतिक्रियावादी शक्तियो का पड़यंत्र है। किन्तु आन्दोलन किसी व्यक्ति या दलीय राजनीति के छोटे स्वार्यों पर नहीं टिका था, जिसे प्रचार के बल पर कुचल दिया जाता या दमन से दवा दिया जाता। जयप्रकाशजी का आन्दोलन जन-आन्दोलन था। जैसे-जैसे शासकीय कुप्रचार में तेजी आती गई, वैसे-वैसे वह जगल की आग की तरह बढ़ता-फैलता चला गया। असन्तुलित होकर कांग्रेस पक्ष के एक समझदार (?) नेता ने कहा- "जयप्रकाश पागल हो गए हैं । वे देश में आग लगा रहे हैं ! और जय बाबू का उत्तर था--"आग तो लगी हुई है, किन्तु नजर नहीं आ रही है । तुम्हारी कुसियों के नीचे आग मुलग रही है । पर यह आग सुलगाई किसने थी? जयप्रकाशजी के आन्दोलन ने? नहीं ! बल्कि काग्रेस में व्याप्त भ्रष्टाचार, भाई-भतीजेवाद और सत्ता के दुरुपयोग से जनता को तस्त करते रहने के कई बरसो ने। जयप्रकाश का आन्दोलन मात्र न्याय की एक पुकार था, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति-विशेप को सत्ता उलटने या किसी संस्था को नुकसान पहुंचाने का नहीं या, दल्कि उसके शुद्धीकरण का था। सत्य की प्राप्ति का था। घुटते-पिमते भारतवासी को माधो जैसे एक जन- नेता की आवश्यकता थी और उसने जयप्रकाशजी को टूट लिया था। कुल मिलाकर यह कि बेहूदा प्रचार के वावजूद असत्य अपने-आपको जीवित नहीं रख पा रहा था। आन्दोलन गाव-गाव में फैल गया था, उसने विहार की सीमाएं पार करके धीमे-धीमे उत्तरप्रदेश को भी अपनी लपेट में लेना शुरू कर दिया था। ४ नवम्बर को पटना में आन्दोलनकारियों पर काग्रेसी शासन की पुलिम ने जबरदस्त लाठी-प्रहार किया। अधुगंम छोडी गई और भारी मख्या मे आन्दो- लनकारी हताहत हुए। पटना की सड़कों और गलियों में निहत्य आन्दोलन- कारियो के घायल, कराहते हुए शरीर पड़े रहे, किन्तु आन्दोलन थमा नहीं। जयप्रकाशजी पर भी लाठीप्रहार हुआ। उनके साथ ये नानाजी देशमुख । जब जयप्रकाशजी लाठी-प्रहार से चोट खाकर गिर पड़े तो नानाजी उनके गिरे हुए शरीर पर ओट की तरह लेट गए और कई लाठिया सही। एक प्रत्यक्षदर्शी ने मुझे बतलाया था कि यदि उस पल नानाजी वहा न होते तो शायद हम एक और गाधी को खो बैठते। मुझे उसी क्षण लाला लाजपतरायजी का स्मरण हो आया था, जिन्होंने र ब्रिटिश शासन की लाठियो के प्रहार सहे थे और बाद में कहा था कि उनके ६२ :: दूसरी आज़ादी .. शरीर पर जितनी चोटें आई हैं, उतनी चोटें ब्रिटिश शासन ने अपने-आपको पहुंचाई है जयप्रकाशजी पर हुआ लाठी-प्रहार कांग्रेसी शासन का स्वयं पर लाठी- प्रहार था। इस घटना की पूरे देश के लोकतंत्री जन-मानस में जबरदस्त प्रति- क्रिया हुई। विद्वानों और कर्मनिष्ठ पत्रकार-लेखकों ने समझ लिया कि अव इन्दिरा-शासन की समाप्ति के दिन आ पहुंचे हैं । इस अमानवीय अत्याचार पर कई प्रमुख पत्रों ने टिप्पणियां लिखकर शासन की इस अदूरदर्शितापूर्ण और दमनकारी प्रवृत्ति की निंदा की। जयप्रकाशजी ने दुख के साथ कहा--"अंग्रेजी राज में भी ऐसी क्रूरता नहीं देखी गई। अपने लम्बे, पचास वर्षीय राजनीतिक जीवन में मैंने ऐसी वर्वरता कभी नहीं देखी।" लोकतंत्र की आड़ में बैठे राजतंत्र से अव जन-मानस की घृणा चरम पर पहुंच चुकी थी। किन्तु विनाश काले विपरीत बुद्धिः। शासन की दमनकारी और अप्रजातांत्रिक कार्यवाहियों में तनिक अन्तर नहीं आया। काश ! ... इन्दिराजी उस क्षण समसकर सावधान हुई होती कि यह दमन और गोलीबारी एक दिन एक महान संस्था और उनके अपने अधिनायकवाद का अंत कर देगी। जयप्रकाशजी पर हुआ लाठी-प्रहार उसी दिन सौ साल पुरानी कांग्रेस के संस्था- गत ढांचे को जगह-जगह से तोड़ चुका था। जयप्रकाशजी ने अगले दिन, यानी ५ नवम्बर को पटना-बन्द और फिर ६ नवम्बर को बिहार-चन्द का आह्वान किया। लोकनायक का आदेश जनता ने सिर झुकाकर मान्य किया। उन दिनों के जन-रोप और बन्द की सफलता की कल्पना इसरो की जा सकती है कि पटना में एक व्यापारी को अपने ट्रक से माल उतारने के लिए मजदूर तक नहीं मिले थे। विहार आन्दोलन के दौरान कुछेक बुद्धिजीवो अत्यंत सनिय रूप में सामने आए । उपन्यासकार श्री फणीश्वरनाथ 'रेणु' ने अपनी अस्वस्थता की परवाह न कर विभिन्न जुलूसों में भाग लिया और प्रदर्शनों में लाठियां सहीं। उन्हें गिरफ्तार भी किया गया। सरकार की दमन- नीति के विरोध में उन्होंने राजअलंकरण त्यागा और जेल में यातनाएं सहीं । १. बिटिग राज में जब साइमन कमीशन का आगमन हुआ तब लाला लाजपतराय शान्तिपूर्ण इंग से उसमे वापसाट में प्रदसन कर रहे थे और वहीं उनपर लाठी प्रहार हुआ था। भारत के कान्तिकारी, मन्मथनाय गुप्त (१० १३) दूसरी आजादी :: ६३ नागार्जुन ने चौराहे-चौराहे ऋतिकारी कविताएं सुनाई और अलख जगाया। । आन्दोलन तीव्र से तीव्रतर होता गया। पर इन्दिरा-शासन और उसके ढोलची निरंतर बान्दोलन को बदनाम करने के लिए अजीबोगरीव प्रचार में जुटे हुए थे। इस प्रचार का घृणित रूप उस समय मामने आया, जब रेल मंत्री श्री ललितनारायण मिथ को बिहार में हत्या हो गई। श्री मिश्र की हत्या एक सुनियोजित पड्यंत्र का परिणाम थी, किन्तु राज- नीतिक स्तर पर इस हत्या और जयप्रकाशजी के आन्दोलन को जोडने का कुप्रचार आरंभ हो गया। कहां से, किस तरह, किसने इसे प्रारंभ किया, तय नही है पर मुझे अच्छी तरह याद है कि छोटे से छोटा काग्रेस कार्यकर्ता बेहूदा ढंग से मिथजी के हत्याकाड को आन्दोलन से जोड़ता फिरता था। ऐसे कई लोगों के मुंह से मैंने कुतर्कों के साथ इस घटना को सुना है । सत्य की खोज पुलिस करे और न्याय न्यायालय दे, इसके पहले ही इस प्रचार में घटना को इस तरह उभारा जाने लगा, जैसे जो-जो साहेबान उसका वयान कर रहे हैं, वे आन्दो- लन और हत्याकाड, दोनों, से बेहद करीबी हैं । यही नही, प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गाधी जैसी जिम्मेदार पद पर बैठी महिला कह बैठी-"सब जानते हैं कि जयप्रकाशजी का असली निशाना कौन है ? ललित वायू की हत्या एक बड़े निशाने का पूर्वाभ्यास है! मगर खोखले प्रचार से न तो व्यक्ति जीते है, न मस्थाएं खडी रहती हैं। अमत्य बहुत दिनो सत्य को छिपाए नही रख सकता। अन्धेरे में सूरज को निगलने की ताकत नहीं होती। मिश्रजी की हत्या और आन्दोलन को जोड़ने का छिछोरा प्रचार भी जल्दी ही उजागर हो गया। थीमती गांधी की इस तरह की बातो के गैरजिम्मेदाराना ढंग पर स्वय जयप्रकाशजी ने लिखा है-"मैं समझ चुका हूं कि इस तरह की व्ययं बातो पर न तो भारत का कोई व्यक्ति विश्वास कर सकता है और न ही कोई तोक- तांत्रिक देश उन्हे मान सकता है।" एक ओर जयप्रकाशजी योथी वातो को परवाह नहीं कर रहे थे, दूसरी ओर 'नया जीवन के सम्पादकजो टिप्पणी लिखकर जय बाबू के बारे मे उल्टा 1. "I am convinced that Diether the people of India nor of the western democracies will ever be persueded to swallow her lips." Prson Diary by Jaiprakasb Narain, pane 21 ६४ :: दूसरी आजादी और अन्धा आरोप कर रहे थे.-"जिस विचारक के विचारों में विद्वानों के मन की विसंगति दूर करने की क्षमता थी, हताशा में वह विसंगतियों के ढेर लगा रहा है। श्रीमती इन्दिरा गांधी और श्री जय बाबू के नेतृत्व और व्यक्तित्व में क्या तुलना ? एक घोर संकट के समय देश का नेतृत्व कर रही है और दूसरा चुनाव की तैयारी के लिए जनता के पास न जाकर चुनी हुई विधान सभा को तोड़ने की शोव्देवाजी कर रहा है।" इन्दिराजी के जिस संवाद को मैंने पूर्व में लिखा है और उसके बाद जयप्रकाशजी की जेल-डायरी का जो उद्धरण दिया है, उससे पाठक सहज अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि इन्दिराजी और जय वाबू-~दोनों में से हताशा का शिकार कौन था? उथली शोदेबाज़ी कौन कर रहा था? नेतृत्व और व्यक्तित्व किसके पास था ? कुर्सी के पास कौन था और जनता के पास कौन था ? ""और संणदक 'नया जीवन' जनता से पास थे या कुर्सी के पास थे ? जनवरी १९७५ तक आन्दोलन इतना तीन हो चुका था कि देश-भर में हर प्रान्त के मुख्यमंत्री को केन्द्र सरकार से विशेष सतर्कता बरतने की हिदायतें देते हुए कठोरता से दमन कर डालने को कहा गया था। पुलिस के विशेप दस्ते बिहार और कई जगहों पर भेजकर दमन कार्यवाही तेज़ कर दी गई थी। मार्च १६७५ में सात विरोधी दलों के नेताओं के साथ जयप्रकाशजी के नेतृत्व में दिल्ली में विशाल जुलूस आयोजित हुआ। कई किलोमीटर लम्बे इस जुलूस ने राजधानी के विभिन्न मार्गों से होते हुए संसद भवन तक याना की और राज्यसभाध्यक्ष श्री बी० डी० जत्ती एवं लोकसभा के अध्यक्ष ढिल्लों के सामने एक मांगपत्र प्रस्तुत करते हुए उसपर तुरंत कार्रवाई के लिए कहा। इस मांगपत्र में बहुत-सी बातें कही गई थीं और वे क्षेत्रीय स्तर की नहीं थीं, बल्कि देशव्यापी समस्याओं की ओर तुरंत ध्यान देने की थीं। कुछ महत्त्वपूर्ण मुद्दे थे: ० भूमिसुधार किया जाए ताकि भूमिहीन लोगों को भूमि मिल सके और ग्राम-विकास हो सके। ० आधिक असमानता की खाई पाटी जाए। ० महंगाई पर काबू किया जाए। राष्ट्रीय आय की दर के अनुपात में मूल्य हों। ० विहार विधान सभा और मंत्रिमंडल को भंग करके नये चुनाव कराए जाएं।

सुरक्षा की दूसरी आजादी :: ६५ ० जीवन के लिए मजदूरों को आवश्यकताओं को देखते हुए न्यूनतम मजदूरी मिले। ० शासकीय व्यय में कटौती की जाए । भ्रष्टाचार दूर हो। ० चुनावों में निष्पक्षता लाई जाए । जनतांत्रिक अधिकारों की जाए। और समाज के कमजोर वर्ग को उसकी आर्थिक ज़रूरतें पूरी करने के सारे साधन जुटाए जाएं। ० कृषि के विकास की ओर विशेष ध्यान दिया जाए ताकि ग्रामो की अर्थ- - व्यवस्था का समुचित विकास हो सके। ० राजनीतिक और आर्थिक सत्ता का विकेन्द्रीकरण हो। ० शिक्षा-पद्धति में सुधार किया जाए। और भी अनेक महत्त्वपूर्ण मागें थी, जिनसे देश को एक सही व्यवस्था और सामाजिक आर्थिक विकास तथा स्थायित्व मिलना था। जनता की मांगें 'जनता के प्रतिनिधियो' तक पहुचाई गई, पर कुछ नहीं हुआ। शान्तिपूर्ण आन्दोलन चलता रहा। जनता की मागों की ओर क्यों ध्यान नहीं दिया गया ? क्या इसलिए कि सरकार वेखवर यो? या इसलिए कि सरकार को लगता था कि चे समस्याएं, जो मांगपत्र में उठाई गई थी, देश में नहीं हैं ? नहीं। कांग्रेसी शासन सत्य से जानकार था, किन्तु राजनीति और कुर्सी से विलग होकर सोचने-समझने की उनकी शक्ति ही जाती रही थी। यदि शक्ति होती तो देश के सामने न तो आज की विषम परिस्थितिया खड़ी होती और न जयप्रकाशजी को एक वार फिर आजादी की लड़ाई लडनी पड़ती। इन्दिरा-सरकार ने जिस संकुचित भाव से देश की राजनीतिक स्थिति को देखा था, उसी मकुचित भाव से जयप्रकाशजी के आन्दोलन को देखती रही। यही कारण था कि बार-बार जन-मंच से श्रीमती गांधी आन्दोलन के विरुद्ध बोलते हुए कहती रही कि यह सब उन्हें उखाडने और अपदस्थ करने तया सत्ता मे पहुंचने के लिए किया जा रहा है। जवकि सच या यह कि आन्दोलन का नजरिया उतना छोटा नहीं था, जितना श्रीमती गाधी का या। आन्दोलन का नजरिया था देश की बुनियादी समस्याओ को सुलझाने के लिए लापरवाह काग्रेम शासन को ध्यान दिलाना और न ध्यान देने की स्थिति में उससे मांग करना कि निष्क्रिय नेतृत्व को देश को आवश्यकता नहीं है, मत. उन्हे पद-त्याग कर पुन जनता अदालत में विश्वास पाने के लिए माना चाहिए।

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दूसरी आजादी :: ६७ निश्चित रूप से मेरी राय है कि इस तरह के लेखन और चापलूसी से भरी बातों ने श्रीमती गाधी के अधिनायकवादी स्वभाव को ज्यादा से ज्यादा बढ़ाया। अपनी डांवाडोत राजनीतिक स्थिति और जनता के जन-जन में व्याप्त विरोधी विचारो को देखते हुए ही उन्होने एक खतरनाक किन्तु भयावह निर्णय कर कर डाला। यह निर्णय था-आपातकाल ! "इमर्जेसी!... . 'नया जीवन के टिप्पणीकार ने लिखा है-"हाईकोर्ट के फैसले ने, इसमें शक नहीं, इन्दिराजी को वैसे ही शकझोर दिया, जैसे १६६२ में चीन के आक्र- मण ने जवाहरलालजी को और इस झकझोर से गुजरती इन्दिराजी सही-गलत का भेद न करके किसी भी तरह अपनी सत्ता बचाए रखने पर तुल गई। उनको हठमिता पर वे सव हैरान थे, जो गाधीजी के सत्य-अहिंसा पर विश्वास करते रहे थे और जो अव तक मानते आए थे कि इन्दिराजी काग्रेस के महान आदर्शों को विरासत सम्भाले रहेगी। इसके बावजूद कि काग्रेस दल मे बहुत-से जनतनधादियों की निष्ठा खत्म होती जा रही थी (यह निष्ठा जयप्रकाशजी के आन्दोलन के दौरान श्रीमती गाधी को अधिनायकवादी मनोवृत्ति के कारण फ्यादा टूटी थी) भीतरी तौर पर काग्रेस मे भी विद्रोह पनप रहा था। सर्वश्री चन्द्रशेखर, मोहन धारिया, कृष्णकात और रामधन जिन्हे युवा तुर्क कहा जाता था और जो कभी श्रीमती गाधी पर अपना समूचा विश्वास करके कि वे जनता को रक्षक सिद्ध होंगी और समाजवादी नीतियो को देश में लागू करने के लिए अगुआ बनेंगी, जबर- दस्त समर्थन देते रहे थे, दबा-दवा विरोध प्रकट कर रहे थे। इन नेताओ में काम करने की लतक थी, उन्हे काग्रेस के मूल जनवाद की पहचान भी थी और वे जनतन में पूरा विश्वास रखते थे, पर अब महसूस करने लगे थे कि इन्दिरा गांधी क्रमश तानाशाही की ओर बढ़ रही है। इसको स्पष्ट झलक उस समय मिली थी, जब श्री कृष्णकात ने ११ मई, १९७५ को 'धर्मयुग' के लिए विशेष रूप से दी गई एक भेंट-वार्ता मे काग्रेस-सदस्यो को जिद से बाज आने तथा राष्ट्रहित में श्री जयप्रकाश नारायण से वार्ता करके समस्या का शांतिपूर्ण हल निकालने की बात की । उन्होने आर्थिक पहलुओ पर जयप्रकाशजी से बातचीत करने के लिए विशेष बल दिया था। प्रकटतः कांग्रेसी स्वयं अनुभव करने लगे थे कि श्रीमती गाघी गलत रास्ते पर जा रही हैं । किन्तु श्रीमती गाधी ने जन-आन्दोलन को अपनी प्रनिता का ६८ :: दूसरी आजादी प्रश्न बना लिया, राष्ट्र मे हिताहित का विचार न करते हुए अपने अधिनायका- पादी स्वभाव को ज्यादा तेज़ बनाना जारी रखा। कांग्रेस की जनतंत्रीय व्यवस्था गोयल एका व्यक्ति का रोल बनकर रह गई। रामलीला मैदान में २५ जून, १९७५ को एक विशाल सभा हुई, जिसमें श्रीनारायण ने जनता को संबोधित किया। इस सभा में जयप्रकाशजी ने प्रधान- मंत्री से मांग गी कि न्यायालय और कांग्रेस महान सिद्धांतों का आदर करते हुए श्रीमती गांधी को चाहिए कि वे त्यागपत्र दे दें। यदि वे ऐसा नहीं करती तब जनता को बाध्य होकर राजधानी में प्रदर्शन करने पड़ेंगे। और ऐसे ही शान्तिपूर्ण प्रदान सारे प्रदेशों में उस समय तक किए जाते रहेंगे, जब तक कि श्रीमती गांधी त्यागपत्र नहीं देतीं। जय बाबू ने गापण में यह भी कहा कि राजधानी में ये प्रदर्शन सात दिनों तक पलते रहेंगे। राभा में नारे लगाए गए और जनता ने एगामत होकर जय बाबू की मांग का समर्थन किया। - काली, लंबी रात - २५ जून की रात शुरु हुई । १२ बजे के बाद २६ जून का दिन भी रात में जनग ले रहा था। एक रात सत्ता के दिमाग में छाई हुई थी जो अचानक सारे देश पर बरस पड़ी और जिसने आने वाले कालों दिन काले फर डाले ! यह रात थी-आपातकाल की घोषणा ! सारे देश में यह रात पुलिस की रोज गतिविधियों और सत्ता के गिरंगुशवाद से भर उठी । २५-२६ जून की रात को दो बजे श्री जयप्रकाश नारायण गिरफ्तार कर लिए गए। श्री मुरारजी भाई और अन्य सभी प्रमुख नेताओं को जेलों में पहुंचाया गया। ये नेता पाहां, फिरा जगह ले जाए गए थे---पिसीको सूचना तक नहीं दी गई। प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने देश के नाम एक भाषण में कहा कि आपातकाल इसलिए लगाया जा रहा है, पयोंकि देश की आंतरिक स्थिरता गतरं में पर गई । विदेशी शक्तियों से संचालित लोग इन गड़बड़ियों के पारण । कानून और व्यवस्था विगढ़ चुकी है और इरा अराजकता में असा- माजिक तत्त्व हावी हो रहे है । उन(श्रीमती गांधी गो) सामने पराको अतिरिक्त और कोई विकल्प नहीं रह गया गा कि ये सरती के साथ अराजकता पर काबू करें और असामाजिक तत्वों को गुचन डालें।

दूसरी आजादी :: ६६ कौन थे ये असामाजिक तत्त्व ? जयप्रकाश नारायण ? मुरारजी भाई ? अटल बिहारी वाजपेयी? अशोक मेहता ? चन्द्रशेखर ?... उत्तर नही है ! इतिहास कहता रहेगा कि इस आपातकाल रूपी काली घिनौनी रात से शुरू हुई तानाशाही के पास कोई कारण नहीं था। सिर्फ झूठे और वेबुनियाद थारोपों से भरे प्रचार के अतिरिक्त ! सच के मुंह पर ताला डाल दिया गया। अखवारों पर सेंसर, जन-सभाकों और जन-प्रदर्शनो पर रोक, गिरफ्तारी का कारण जानने पर रोक । आपात- काल!...किसका आपातकाल ? देश का? नही, कुछ कुसियों का! जो सत्य-अहिंसा की शक्ति के सामने लड़खड़ा गई थी। जिनके पैरो मे भ्रष्टाचार, अन्याय और वर्वरता का धुन लग चुका था। प्रचार-तत्र ने आश्चर्यजनक रूप से तेजी पकडी। एक गलत कार्रवाई के प्रति सारे देश के जन-मानस मे आक्रोश और घृणा की लहर थी। क्या व्यक्ति- स्वातंत्र्य, मूल मानव-अधिकारों और न्याय की हत्या कर देने का नाम जनतंत्र है ? यह एक नई परिभाषा थी, जो आपातकाल के रूप में, उस संस्था का नेतृत्व कर रही थी, जिसने उक्त सारे नारे लेकर ब्रिटिश शासन की गुलामी के विरुद्ध कभी इन्कलाब किया था । क्या ये वही काग्रेसी है ? क्या वह वही सत्ता है ? क्या इन्हे ही हमने अपनी रक्षा के लिए देश के आसन सौंपे थे? नहीं | देशवासी ठगे गए आपातकाल के नाम से सारे देश मे तानाशाही की स्थापना हुई। करोडों लोग चुपचाप, निराश, थको निगाहों से विस्मय और आतंक के साथ अमानवीय अत्याचार देख-सह रहे थे । न कोई नियम था, न कानून, न व्यवस्था, न व्यक्ति- भेद । जो कुछ था, वह सिर्फ एक-श्रीमती इन्दिरा गाधी ! तानाशाही आएगी-पिछले कई यरसों से कई नेता कहते रहे थे । जनसंघ ने १६७० के आम चुनावों में निरन्तर दोहराया था कि श्रीमती गाधी के भीतर तानाशाह बैठा हुआ है, जो हिटलर और मुसोलिनी मे या। उस क्षण कांग्रेस-मंच से जन-स्तर पर और शासकीय स्तर पर निरतर प्रचार किया जाता रहा था कि विरोधी दल देश के लिए कोई कार्यक्रम लेकर नहीं लड़ रहे हैं, बल्कि उन्हें श्रीमती इन्दिरा गांधी से व्यक्तिगत डाह है और इसीलिए उन्होंने नारा दिया है-'इन्दिरा हटाओ।' श्रीमती गांधी ने उस अवसर पर अनेक चुनाव-सभाओं को सम्बोधित ७० :: दूसरी आजादी करते हुए कहा था-''संघ ने मुझे हिटलर और मुसोलिनी का संयुक्त रूप बतलाया है, पर सच यह है कि भारत में हिटलर के उत्तराधिकारी वही हैं !" इस आपातकाल ने सावित कर दिया-क्या है सच ! लाख-लाख मुंहों से जनसंघ-नेताओं के लिए किए गए कुप्रचार ने जन-सामान्य को बरगलाया, किन्तु आपातकाल ने सच सामने उजागर कर डाला । कौन था तानाशाह मुझे याद है, एक वार श्रीमती गांधी ने अटल विहारी वाजपेयी से चिढ़कर, व्यक्तिगत रूप से क्रोधावेश से ऊल-जलूल वोलते हुए कह दिया था-"अटलजी लोकसभा में हाथ उठा-उठाकर इस तरह बोलते हैं, जैसे हिटलर हैं !" इसपर श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक आमसभा में चुटकी ली। कहा-"इन्दिराजी कहती हैं कि मैं हाथ उठा-उठाकर बोलता हूं। मगर मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि है कोई ऐसा आदमी, जो टांग उठाकर वोलता हो?" बहरहाल यह वात हुई राजनीतिक चुटकियों की, किन्तु चुटकी अर्थहीन नहीं होती। अक्सर उसमें भविष्य के सत्य की कोई तेजस्वी किरण छिपी रहती है । इन्दिराजी ने अपने शासन काल में जनसंघ को लेकर जिस तरह, जितनी बार हिटलर का नाम और तानाशाही शब्द दोहराया था, वह निश्चित रूप से उनके अनजाने ही उनके मन में कहीं न कहीं समाया हुआ था और जयप्रकाशजी के आन्दोलन से बौखला-धवराकर वह विचार एक विस्फोट की तरह उवलकर साकार रूप में सबके सामने आ गया। मनोवैज्ञानिक सत्य है कि अनजाने ही आदमी उस सबको बोलता रहता है, जो उसके अन्तर्मन में कहीं न कहीं बैठा होता है । इन्दिराजी का वार-वार । जनसंघ के नाम पर 'हिटलर ! हिटलर !' चीखते रहना, उनके अन्तर्मन में बैठे हुए हिटलर के कारण ही होता था। और यह हिटलर उवल आया था। उसके पास गोयवल्स किस्म के कई प्रचारमंत्री थे और आइखमैन किस्म के कई खतरनाक हत्यारे थे। जनता के बीच एक ओर रेडियो, टेलोविज़न, गूंगे कर दिए गए; अखवार और अनुदान-सम्मान प्राप्त कलाकार आपातकाल का गुणगान कर रहे थे और 'देश को बचा लिया' के गीत गुनगुना रहे थे, दूसरी ओर कुछ लोग थे जो लम्बी- लम्बी पोधियां या वाक्यांश लिखकर समर्थन का गाना गा रहे थे। व्यक्तिगत रूप से इन्दिराजी का गुणगान भी कर रहे थे। श्री रवाजा बहमद अव्यास ने लिखा है.---"पिछले वर्ष उन्होंने जिस आपात- स्थिति की घोषणा की, उसने जादू-सा कर दिया। जाने कितनों को उन्होंने जेल दूमरो बाजादी ::७१ के सीखचों के अन्दर कर दिया। उन लोगों को, जिन्हे बहुत पहले ही जेल में होना चाहिए था!" जो भूत बातों से नहीं मानते थे, उनको बड़ी निर्ममता के साथ लातो से ठीक कर दिया। इस प्रकार उन्होने साबित कर दिखाया है कि पूरे मंत्रिमंडल में अकेली वे ही 'मर्द' हैं !" एक और स्थान पर इसी पुस्तक मे इन्दिराजी को घोर लोकतन्त्रवादी सिद्ध करते हुए अब्बास कहते हैं--"किसी जनतंत्रीय नेता के व्यक्तित्व का आकलन करने के लिए दस वर्षों की अवधि पर्याप्त होती है । श्रीमती गांधी के प्रमंग में तुलना कर पाना एक कठिन कार्य है, क्योंकि सबसे पहले तो उनकी तुलना उनके यशस्वी और नेकदिल पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू से की जा सकती है। दोनों ही समाजवादी और राजनीतिशास्त्री (स्टेट्समन) रहे है, लेकिन जबकि पिता एक आदर्शवादी थे, साहस और सज्जनता के सागर थे, वेटी यथार्थ को धरा पर खड़ी रहनेवाली, कर्म में अग्नि में तपा फौलाद है । उनको कानूनी अदालतों ने पंगु बना रखा था। बहुत-से क्रातिकारी सुधार जो वे करना चाहती थी इसलिए नहीं कर पाई कि या तो उनको उनके उन वरिष्ठ सम- कालीनों ने काट दिया था, जिनसे वे घिरी रहती थी, या उनकी राह मे अदालतें आ जाती थी, जो संविधान का अर्थ निकालती थीं।" आपातकाल के समर्थन मे सम्पादक 'नया जीवन' लिखते है- 'पिछले दस वों में विरोधी दलो के नेताओ ने रात-दिन परिथम किया था। कृपालु प्रधान- मंत्री ने उन सबको आरामगाहो मे भेज दिया और उनके लिए भोजनादि की उत्तम व्यवस्था कर दी। जैसे शरीर का मोटापा होता है, वैसे ही अक्ल का भी मोटापा होता है। वह इन नेताओ को भी हो गया था कि मारे देश की जनता हमारे साथ है, पर इनको गिरफ्तारियो पर शहर और प्रदेश तो क्या रोते, इनके मुहल्लेवालो तक ने उस दिन ताश की चौकडी मे हड़ताल नहीं की। इमजेंसी की उपयुक्तता के लिए और किस जाच-पड़ताल की ज़रूरत है ?" ऐसे कई थे हमारे देश के पत्रकार, जो श्रीमती इन्दिरा गांधी के अधि- नायकवाद में उनसे भी चार हाथ आगे जाकर 'धन्य-धन्य' की पुकारें लगा रहे थे और दमन के क्रूर दौर में सामाजिक-राजनीतिक जीवन के साथ 'ताश की चौकड़ी पर बैठे हुए थे। श्रीमती इन्दिरा गाधी तानाशाही स्थापित कर देंगी, यह अगर विरोधी कहते रहे थे तो काग्रेस में भी बहुतो ने आशका व्यक्त की थी। 'धर्मयुग' को दी गई एक भेंट में युवा तुर्क रामधन ने बहुत पहले स्पष्टत. कह दिया था कि - ७२ :: दूसरी आजादी - - श्रीमती गांधी आपातकाल की घोषणा करके तानाशाही लाएंगी। २५ जून, १९७५ की शाम को 'धर्मयुग' के उदयन शर्मा ने कृष्णकांत से भेंट की थी। कृष्णकांत बोले थे-'तानाशाही की संभावना है !' और कांग्रेस की दशा क्या हो चुकी थी ! ऐसे, जैसे भेड़ों का एक गल्ला है, जिसे अकेला गड़रिया जी चाहे जिस दशा में हांक सकता है। तब क्या वह कांग्रेस वची थी? यदि सचमुच कांग्रेस संस्था में सिद्धांत और सिद्धांतवादी कांग्रेसजन शेप रहे होते तो जयप्रकाशजी को यह न लिखना पड़ता : कोन है, जिसे सच्चा कांग्रेसी कहा जाएगा? क्यों बहुत दवी-दवी बातें करते हैं ? इससे जाहिर होता है कि बहुत कम, या नाममात्र के लिए सच्चे कांग्रेसी वचे हैं। चन्द्रशेखर और रामधन की गिरफ्तारी के बाद जो सच्चे कांग्रेसी बचे थे, उनके पास विद्रोह करने का पर्याप्त साहस नहीं था। और युवा तुर्को की अदला-बदली और उनकी गिरफ्तारी के बाद, जो भी दूसरे कांग्रेसी वचे थे, वे केवल स्वयंसेवी और 'जी-हुजूरी' करने वाले यानी 'यस मैन' थे। केवल जय बाबू ने ही नहीं, वहुत पहले अनेक कांग्रेसियों ने भी यह स्वीकार कर लिया था कि कांग्रेस नाम से जो दल सत्ता पर सवार है, वह कांग्रेस नहीं है। कृष्णकांत ने तो बड़ी बुलन्दी से इस सत्य को स्वीकार किया था । जव आपातकाल की घोषणा हुई, तब उन्होंने उसका विरोध किया और उसे एक तरह से अप्रजातांत्रिक बतलाया । इसपर कांग्रेस की महासचिव श्रीमती चन्द्रशेखर ने उन्हें एक पत्र लिखा और उस पन का उत्तर ४८ घण्टे के भीतर- भीतर देने का निर्देश किया। कारण था, कृष्णकांत द्वारा संसद में स्पष्ट रूप से अपने मौलिक विचार प्रकट करना । जिनके अनुसार आपातकाल की घोपणा को उन्होंने गलत ठहराया था। कृष्णकांत और अन्य युवा तर्को से दल के भीतर . " 1."Why have they meekly submitted ? It seems that there are in reality very few truc Congressmen." "And after the arrest of Chandra Shekhar and Ramdhan and the excommunication of the other young turks, these truc congressmen also have not courage enough to rebel. Most of the others have no ideological convictions and are pure self-seckers and Jee-huzurs (yes-men)." Prison Diary by Jaiprakash Narain, page 14 दूसरी आजादी::७३ निरतर वढते जाते अधिनायकवाद को लेकर पहले ही खीचातानी चल रही थी। अधिनायकवाद के परिणामस्वरूप ही उन्हे कांग्रेस अध्यक्ष, सभी कांग्रेस समितियों की सदस्यता और प्राथमिक सदस्यता से निलम्बित कर चुके थे, किन्तु संसद में उनके जोरदार विरोध के बाद निश्चित किया गया था कि कृष्णकांत को दल से ही निकाल बाहर किया जाए। अपने-आपमें मजेदार और अत्यत हास्यास्पद बात यह है कि ये सारी कार्रवाई उस व्यक्ति के इशारे पर हो रही थी जो कभी स्वयं ही 'आत्मा की आवाज़' का नारा देकर संस्था में धीमे-धीमे अधिनायकवादी सत्ता अपनाता गया। यदि कृष्णकांत ने संस्था के लोकतंत्री रूप और वैचारिक विरोघ की स्वतंत्रता के आधार पर एक गलत काम का विरोध किया तो यह अपराध था या एक ईमानदार और सच्चे कांग्रेसी का सत्य ? यही कारण था कि कृष्णकांत ने श्रीमती चन्द्रशेखर के पन्न का उत्तर देते हुए निर्भीकता से लिखा: ..."कांग्रेस में मिली-जुली विचारधाराओ का शुरू से ही प्रतिनिधित्व होता रहा है । इसने कभी बन्द दरवाजों वाली नीति नहीं अपनाई और न ही सर्व- सत्तात्मक दलों की तरह कार्य किया।" आगे उन्होंने स्पष्ट शब्दों में दल के भीतर समा गए अधिनायकवादी रुख और देश पर लादे जा रहे फासिरम को चुनौती दी थी, "आपने अपने पत्र में 'धर्मयुग' के इण्टरव्यू को बात उठाई है। जैसा कि आप जानती है, चाहे वह वाम की हो या दक्षिण की, मैं हर प्रकार की अधिनायकवादी विचारधारा के खिलाफ हू मेरा अतीत और मेरी गतिविधिया खुली किताव हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी भी फासिस्ट या अन्य किसी अधिनायकवादी नीति को मेरे समर्थन देने का प्रश्न ही नहीं उठता।" इस सारे सन्दर्भ के साथ, बाद मे, जब तानाशाही की पराजय हुई और लोकतंत्र ने पुन देश को सही नेतृत्व दिया, तव 'धर्मयुग' को दिए एक इंटरव्यू मे कृष्णकात ने कहा-"यह काग्रेस, काग्रेस नही रही । यह तो वो सस्था नहीं है, जिसने आजादी की लड़ाई लड़ी थी। जिसके लिए मेरा पूरा परिवार जेल गया था-डडे खाए थे । यह मुर्दा काग्रेस है। यदि अग्रेजो के जमाने में यह काग्रेस और कांग्रेसी होते तो अग्रेजो से मिल जाते और देश को वेव खाते।"" राजस्थान से जनता पार्टी के नेता और हाल में चुनकर आए संसद सदस्य श्री भैरोसिंह शेखावत ने एक मुलाकात मे मुझे बतलाया था कि आपातकाल . १. धर्मयुग (२४ अप्रैल, १६७७ में प्रकाशित टिप्पणी के आधार पर) - - ७४ :: दूसरी बाजादी लगाने के लिए जितने भी तथाकथित कारण इन्दिरा-शासन ने जनता के सामने बतलाए थे, उनमें से एक भी सच नहीं था। सच तो यह था कि सत्ता डग- मगाने लगी थी और उसपर स्थायी रहने के लिए अकारण ही कारण ढूंढ लिए गए थे। श्री शेखावत से जब मैंने यह पूछा कि क्या श्रीमती गांधी की सत्ता जयप्रकाशजी के आंदोलन के कारण हिल गई थी? "हां।" श्री शेखावत ने उत्तर दिया, 'पर आपातकाल लागू करने का कारण केवल आंदोलन नहीं था, और बहुत कुछ थे। सबसे बड़ा कारण था, उनके अपने दल में ही भीतरी तौर पर आंदोलन के सत्यों को स्वीकार लिया जाना। श्रीमती गांधी महसूस कर रही थीं कि दल में दवा-घुटा ही सही, पर असंतोप है।" "पर यह विरोध उभर तो नहीं सका ?" मेरा प्रश्न था। "इससे पहले कि ठीक तरह उभर पाए, उन्होंने आंदोलन को कुचलने के लिए तानाशाही स्थापित कर दी।" "क्या आपको आशंका थी कि श्रीमती गांधी ऐसी अप्रजातांत्रिक रुख अपना सकती हैं ?" "वेशक !" शेखावतजी का उत्तर था, "यह समझने के लिए श्रीमती गांधी के शासन वाले पिछले कई साल हम लोगों के सामने थे।" किन्तु महान अहिंसक क्रांति के जनक लोकनायक जयप्रकाशजी को उस समय तक विश्वास नहीं था कि इन्दिरा गांधी वैसा अलोकतांत्रिक कदम उठा .. सकती हैं। क्या इसलिए कि जय बाबू एक राजनीतिज्ञ से ज्यादा विचारक और प्रांतदर्शी हैं ? या यह कि जयप्रकाशजी के राजनीतिक संस्कारों में सत्तालिप्सा की वैसी घिनौनी कल्पना ही नहीं हो सकती थी ? या इसलिए कि जयप्रकाशजी ने-जिन्होंने स्वयं अनेक बार यह स्वीकार लिया था कि अधिनायकवाद है, पर वह इस सीमा तक जा सकता है. कल्पना नहीं की थी ? जय बाबू ने अपनी जेल-डायरी में २१ जुलाई, १९७५ को आश्चर्य, अविश्वास और दुख प्रकट करते हुए लिखा-"मेरा विश्वास गलत हो गया कि किसी जनतंत्र में किसी शांतिपूर्ण और जनतांत्रिक आंदोलन को कुचलने के लिए कोई प्रधानमंत्री तमाम सामान्य और असामान्य कानूनों का उपयोग फरक जनतंत्र को ही खत्म कर डालेगा। मेरा यह विश्वास भी गलत हो गया कि कोई प्रधानमंत्री यदि ऐसे तरीके अपनाए तो, उसके वरिष्ठतम साथी और ।

दूसरी आजादी:: ७५ उसका दल, जिसको उच्चतम जनतानिक परम्पराएं है, उसे ऐसा करने की स्वीकृति देंगे, किन्तु वह सब हुआ जो अविश्वसनीय है !" इस तरह जय बाबू का अविश्वसनीय, बहुतों का विश्वसनीय तथा चाटुकार नेताओं और बुद्धिजीवियों का प्रशसनीय घट गया था। २६ जून, १९७५ की लम्बी काली रात के प्रारंभ के साथ ही देश के समाचार-विचार क्षेत्र मे अंधेरा कर दिया गया। यह किसी भी तानाशाही का सवसे तीखा और खतरनाक प्रारंभ होता है, जब लोगों का सोचना-समझना बन्द कर दिया जाए और देशहित के नाम पर हर शासकीय कदम के पहलुओं को केवल एक नजरिये से, जो कि सत्ताधारी का नजरिया होता है, दिखलाया जाने लगे। भारत रक्षा अधिनियम के तहत युद्धकाल के लिए सेंसर के अधिकार धारा ४८ के अनुसार भारत सरकार को मिले थे। उस समय बंगला देश का युद्ध (सन् १९७१) चल रहा था। पर धारा ४८ के अन्तर्गत मिले इस अधिकार का उपयोग आपातकाल में किया जाने लगा। इसपर सोचने की आवश्यकता नहीं समझी गई कि उक्त अधिकार किस स्थिति में उपयोग किए जाने चाहिए । वे आवाजें घोंट डाली गई थी, या घोटी जा रही थी, जो पूछ सकती थी। इस तरह जनता को वह बतलाया जाने लगा, जिसे श्रीमती गाधी की तानाशाही बतलाना चाहती थी और वह सब गुम हो गया जो देश मे घट रहा था। समाचारपनो को सूचना प्रसारण मन्त्रालय के अधिकारी फोन पर क्या छपना है, क्या नही-ये सूचनाएं प्रसारित करने लगे । इनमे औसत समाचार वे होते थे, जिनका संबंध व्यक्तिगत रूप से सत्ताधारियों या तानाशाही के । 1. "I went wrong in assuming that a Prime Minister in a democracy would use all the normal and abnormal laws to defeat a peaceful democratic movement, but would not destroy democracy itself and substitute for it a totalitarian system. I could not believe that even if the Prime Minister wanted to do it, her senior colleagues and her party, which bas had such high democratic tradition, would permit it. But the unbelievalde has happened." Prison Diary by Jaiprakash Narain, Page 11 ७६ :: दूसरी माज़ादी समर्थकों से था। उन सभी समाचारों पर पाबन्दी थी जो तानाशाही के विरोधी हो सकते थे या उसके बारे में विचार प्रस्तुत कर सकते थे। यहां तक कि किसी भी किस्म की ज्यादती को प्रकाशित नहीं किया जा सकता था। यदि ऐसा किया जाता तो समाचारपत्र के संपादक और प्रकाशक को जांसुका (मीसा) में गिरफ्तार कर जेल में डाला जा सकता था तथा अखबार के दफ्तर पर ताला लगाया जा सकता था। मुझे स्मरण है कि आपातकाल की घोपणा के बाद दिल्ली और देश के विभिन्न नगरों से प्रकाशित होने वाले अनेक समाचारपत्रों ने अपने सम्पादकीय के स्थान पर ब्लकवॉर्डर लगाकर खाली जगह छोड़ दी थी। यह एक तरह का मौन और शिष्ट विरोध था कि जनतंत्र और विचार प्रकटी- करण के मूल मानव-अधिकार की हत्या की जा रही है और वे उसका विरोध करते हैं । दिल्ली के एक पत्र ने तो ऐसी खाली जगह पर मोटे-मोटे टाइप में छापा था---'हमारी आवाज़ छीन ली गई है।' निरंकुश तानाशाही के इस घिनौने चक्र का संचालन श्रीमती गांधी के अत्यन्त विश्वसनीय साथी श्री विद्याचरण शुक्ल कर रहे थे और उन्होंने कितनी वफादारी और ईमानदारी' के साथ अपना यह कर्म-धर्म निवाहा, इसी पुस्तक में कहीं आगे पढ़ने को मिलेगा। और यह कार्रवाई उस दिमाग से निकली थी जो कभी चीख-चीखकर लोकतंत्र, प्रेस-स्वतंत्रता और मुक्त समाज की दुहाई दिया करता था। कितना दोहरा चेहरा? कितना झूठ और कितना सत्य ? पाठक स्वयं ही निष्कर्ष निकाल सकते हैं। स्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी पुस्तक' में विवरण दिया है : "विरोधी दलों के इस आरोप का जिक्र करते हुए कि इन्दिरा गांधी लोक- तंत्र को नष्ट कर रही हैं, उन्होंने कहा कि इन्दिरा गांधी उन्हें (विरोधी दलों को-भ्रमर) यह मौका दे रही हैं कि वे जनता के मत यदि ले सके तो लोक- तांत्रिक ढंग से चुनकर आएं। क्या इसका मतलव लोकतन्त्र का अन्त होता है ? तब वे अखवार वालों की ओर मुड़ीं। वे वहां बड़ी संख्या में मौजूद थे। इन्दिराजो ने कहा कि माप जानते हैं कि कौन इन्दिरा गांधी के पक्ष में लिख रहा है और कौन उसके विरुद्ध लिख रहा है । क्या हम मापको यहां आने से १. इन्दिरा गांधी : सफलता के दस वर्ष (प० ७६-७७) दूसरी माजादी ::७७ और जो साप चाहे वह लिखने से रोकते हैं ? तानाशाही विरोधी अखवारों का गला घोटने से शुरू होती है। मैं जानना चाहूंगी कि क्या किन्ही अखबारों को दबोचा गया है ?" और आपातकाल में क्या हो रहा था ? देशहित के नाम पर किसका गला घोंटा गया था? इन्दिराजी हमेशा दुहाई देती रही और कहती रही कि "तानाशाही विरोधी अखबारों का गला घोंटने से शुरू होती है ।" और क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि उन्होने वह स्वयं किया ? और जिस स्तर पर किया-वह उदाहरणस्वरूप प्रस्तुत करता हूं। गत दिनों जनता पार्टी के केन्द्रीय कार्यालय ने एक प्रेस विज्ञप्ति निकालकर उन समाचारों की सूची दी थी, जिन्हे देशहित ( ? ) में आपातकाल के दौरान सेंसर द्वारा निर्देशित किया गया था कि वे किस तरह छपें या न छपें । ० अभिनेत्री नरगिस पर विशेष कृपालुता दिखाते हुए २८ मई, १९७६ को सेंसर ने अखबारों को हुक्म दिया कि दुकान से सामान चुराने के आरोप में नरगिस की गिरफ्तारी के बारे में लन्दन को समाचार-सूचना प्रकाशित न की जाए। ० १६ जुलाई १६७६ को श्री जयप्रकाश नारायण की गतिविधियो के बारे में समाचार प्रकाशित करने पर रोक लगाते हुए बतलाया गया कि कानून व व्यवस्था के हित मे ऐसा किया जाना चाहिए । ० आध्रप्रदेश न्यायालय के एक न्यायाधीश के स्थानांतरण का समाचार प्रकाशित न किया जाए। निर्देश-८ जून, १९७६ । ० श्री जेठमलानी, जो इण्डियन बार कौंसिल के अध्यक्ष है और उस समय अमेरिका मे थे, उनके बारे में, ६ सितम्बर, ७६ को आदेश हुआ कि उनसे सम्बन्धित कोई समाचार न छापा जाए। यदि छापा जाए तो सेंसर को दिपला लिया जाए। ०१६ दिसम्बर, १९७६ को अखबारों को निर्देश मिला कि काग्रेस पार्टी के भीतरी झगड़ों और युवक काग्रेस तथा अखिल भारतीय कांग्रेस के बीच के झगड़ों को किसी भी रूप मे प्रकाशित न किया जाए। ०२ जून, १९७६ को उद्योगपति डी० पी० गोयनका के बारे में कोई भी समाचार न छापने का निर्देश । ०१ अप्रैल, १९७६ को निर्देश हुए कि परिवार नियोजन-सम्बन्धी किसी ७८ :: दूसरी आजादी M भी किस्म का आलोचनात्मक समाचार, यहां तक कि संपादक के नाम पन्न भो, प्रकाशित न किया जाए। ० तुर्कमान गेट पर हुए वर्वर अत्याचारों को लेकर २१ अप्रैल, १९७६ को सेंसर आदेश हुआ कि वही विवरण प्रकाशित हों, जो सरकार दे। यहां तक कि शीर्पक भी वही जाए जो सेंसर से पास हो । ० २८ अप्रैल, १६७६ के सेंसर आदेश के अनुसार उस समारोह का कोई भी चित्र या समाचार प्रकाशित नहीं किया जाना था, जिसमें से श्री संजय गांधी उठकर चले गए थे। ० जूनियर वकीलों ने दिल्ली उच्च न्यायालय तक जुलूस ले जाकर प्रदर्शन किया था। इस प्रदर्शन के समाचार प्रकाशन पर २६ मार्च, १९७६ को रोक लगाई गई। ० १० अगस्त, १९७६ को आदेश दिए गए कि सुब्रह्मण्यस्वामी के बारे में कोई समाचार प्रकाशित न किया जाए। 0 १५ मार्च, १६७६ को सेंसर ने गुजरात में राष्ट्रपति शासन लागू किए जाने के सम्बन्ध में किसी भी तरह की रपट, टिप्पणी या समाचार के प्रकाशन पर प्रतिवन्ध लगा दिया। यदि कुछ छापा जाना है, तो पहले सेंसर कराया जाए। ० २६ फरवरी, १६७६ को तमिलनाडु में राष्ट्रपति-शासन लागू किए जाने के आदेश पर श्री करुणानिधि द्वारा दिल्ली और मद्रास के उच्च न्यायालयों में दायर की गई याचिकाओं का समाचार प्रकाशित न किया जाना निर्देशित हुना। ० श्री तुलमोहनराम के मुकदमे को रिपोर्ट छापने से पहले सेंसर कराई जाए-निर्देश दिनांक : ३ फरवरी, १९७६ । सितम्बर, १९७५ से दिसम्बर, १९७५ तक जो सेंसर आदेश हुए, उनमें से कुछ हैं: ० दिल्ली की झुग्गी-झोंपड़ियों को तहस-नहस कर दिए जाने के सम्बन्ध में कोई भी समाचार, चित्र, टिप्पणी, रपट प्रकाशित करने के पूर्व सेंसर को बतलाई जाए। ० बोनस को लेकर जो सांकेतिक हड़ताले हुई, उनके समाचार प्रकाशित न किए जाएं। - . दूसरी आचादी :: ७६ ० छह मूत्री कार्यक्रम के बारे मे राष्ट्रपति के आदेश पर किसी भी किस्म की टिप्पणी किए जाने पर रोक । ० आसुका (मोसा) में नजरबन्द किए गए व्यक्तियों द्वारा अपने मुला- कातियो पर रोक लगाने को लेकर हुए सरकारी आदेश पर दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया निर्णय प्रकाशित न किया जाए। ० वावू जयप्रकाश नारायण की दम्बई-याना का समाचार सेंसर किया जाए तया उनका चिन्न प्रकाशित न किया जाए। ० तिहाड़ जेल में हुई घटनाओं के बारे में कोई भी समाचार प्रकाशित न किया जाए। ० बम्बई अपील केस पर न्यायाधीश खन्ना का निर्णय प्रकाशित न किया जाए। ये कुछ उदाहरण थे सेंसर द्वारा तथाकथित 'देशहित' में रोके गए समाचारों के। आपातकाल की घोषणा के फौरन बाद इन्दिराजी स्वय और उनके विशिष्ट साथी यया वसीलाल, ओम मेहता, विद्याचरण शुक्ल, जिनके पास क्रमश: सरकार के सभी महत्त्वपूर्ण विभाग-रक्षा, गृह और सूचना प्रसारण मनालय थे, निरंतर एकस्वर होकर इस प्रचार में लग गए थे कि केवल देश को ही नहीं, देश के मूर्धन्य सत्ताधारी नेताओ को खतरा बढ गया था। कहा जा रहा था कि जयप्रकाशजी के आदोलन को विदेशी शक्तिया चला रही थी, इसलिए आपातकाल लागू करना अनिवार्य हो चुका था। श्रीमती गाधी ने यहां तक कह डाला कि इस आदोलन का मकसद सरकार का कामकाज ठप्प कर डालना था । एक व्यक्ति (जयप्रकाशजी) असैनिक कर्मचारियों और सेना में विद्रोह भडकाने की कोशिश कर रहा था। इम कुप्रचार का खडन कोन करता? जिनके पास जवाब थे और जिनके पास सच था, वे जेलो मे थे या कालकोठरियो मे भयानक नारकीय यत्रणाएं देकर सताए जा रहे थे। स्वयं जयप्रकाशजी ने इस बेबुनियाद और दुसह प्रचार को लेकर चंडीगढ़ से प्रधानमन्त्री श्रीमती इन्दिरा गाधी को पत्र लिखा। खेद और दुख की बात यह थी कि उस अधेरी काली रात के रहस्यकाड में इस पन्न को भी श्रीमती गांधी पचा गई। बाद में यह पत्न जनता पार्टी ने अखबारों को प्रकाशनार्य वितरित किया। यह पन विभिन्न भारतीय भाषाओं के समाचारपत्रों में प्रकाशित हुआ ८० :: दूसरी आजादी था और इसका प्रत्येक शब्द एक अहिंसावादी आंदोलनकारी की व्यथा से पूर्ण ही नहीं है, उन तकों से भरा हुआ है, जिनका उत्तर इन्दिराजी के पास था ही नहीं। यहां उस पन को संक्षेप में उधृत कर रहा हूं: प्रिय प्रधानमंत्री, मैं आपके भापणों और भेंट-बार्ताओं के वृत्तांत पढ़कर अवाक रह गया हूं। यही एक बात कि आपको अपने कार्यों का औचित्य सिद्ध करने के लिए प्रतिदिन कुछ न कुछ कहना पड़ रहा है, आपके मन का चोर प्रकट कर देती है। अखबारों का और सब प्रकार की असहमति का मुंह बन्द कर आलोचना या खंडन के भय से मुक्त होकर आप असत्य और मनगढंत बातें कहे चली जा रही हैं। आपके आलाप की टेक, जैसा मैं समझ पाया हूं, यह है कि (क सरकार को ठप्प कर देने की योजना थी, (ख) एक व्यक्ति असैनिक कर्म- चारियों और सैनिकों में विद्रोह फैलाने का प्रयत्ल कर रहा था। चूंकि इस आक्षेप का पान मैं ही हूं, इसलिए वात साफ हो जाने दीजिए। हो सकता है कि आपको इसमें कोई दिलचस्पी न हो क्योंकि आप जितना असत्य बोलती और तथ्यों की तोड़-मरोड़ करती हैं, वह सब जान- शकर और इच्छा से करती है। पर कम से कम सत्य दर्जतो हो जाएगा। सरकार को ठप्प करने की कोई योजना नहीं थी और यह बात आप भी जानती है । तथ्य ये है- भारत के सब राज्यों में बिहार ही था, जहां कोई जन-आंदोलन हो रहा था। वह फैल रहा था और गांवों में गहरे पैठता जा रहा था यदि आपने जनता सरकार के कार्यक्रम को देखा हो तो आपने पाया होगा कि बहुलांग में यह रचनात्मक था जैसे सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को नियमित करना, प्रशासन के निचले स्तरों पर भ्रष्टाचार रोकना, भूमि- गुधार कानून लागू करना, समझौते और पंचाट के चिरप्रचलित तरीके से विवाद निपटाना, हरिजनों को न्याय दिलाना और तिलक और दहेज जैसी सामाजिक कुरीतियों को दूर करना मादि । इस सबमें ऐसा कुछ नहीं है कि जिसे किसी तरह भी विध्वंसक कहा जा सके"नगर-क्षेत्रों में आंदोलन की तेजी के दिनों में युछ दिन के लिए धरना योर पिकेटिंग द्वारा सरकारी - १. अंग-अनुवाद, 'दिनमान' से सागार । दूसरी आजादी ::५१ कार्यालयो का काम रोकने का प्रयल किया गया। पटना मे जव भी विधान सभा की बैठक होती, सदस्यों को त्यागपत्र देने के लिए समझाने के और भीतर जाने से रोकने के शांतिमय प्रयत्न होते। ये मव कार्यक्रम सिविल नाफरमानी के सोचे-समझे कार्यक्रम थे। और राज्य-भर में हजारों आदमियो-औरतों ने इसमें गिरफ्तारियां दी थी। यदि यही सब बिहार सरकार को ठप्प करने का प्रयत्न है तो कहना होगा कि यह उसी तरह का प्रयत्न था, जैसाकि ब्रितानी सरकार को ठप्प करने के लिए आजादी की लड़ाई के दिनो मे असहयोग और सत्याग्रह द्वारा किया गया था।"आपका एक अत्यत प्रिय प्रश्न है कि निर्वाचित सरकारों और निर्वाचित विधानमडलो को हटने के लिए कहने का किसीको क्या अधिकार है ? पर इसका उत्तर न जाने कितनी बार सुविख्यात संविधान- विदों और अन्य योग्य व्यक्तियो द्वारा दिया जा चुका है। उत्तर यह है कि किसी लोकतंत्र में निर्वाचित सरकार यदि भ्रष्ट हो जाए और कुशासन करती रहे तो उससे त्यागपत्र मांगने का अधिकार जनता के पास अवश्य होता है। और यदि कोई विधानमडल हो जो ऐसी सरकार को समर्थन देता ही चला जाए तो उस विधानमडल को भी हटाना होगा ताकि जनता अपने बेहतर प्रतिनिधि चुन सके। बिहार सरकार को विद्यार्थियो की मागो पर बातचीत से निबटारा करने का अवसर था परन्तु उसने मघर्ष अर्थात् वेमिसाल दमन का तरीका बेहतर समझा। ऐसा ही उत्तरप्रदेश सरकार ने भी किया। अगर दोनों सरकारो ने बातचीत का रास्ता छोड़ न दिया होता तो कोई आदोलन ही न हुआ होता। मैं यह पहेली वूझने की कोशिश करता रहा है कि इन सरकारो ने अक्लमंदी क्यों नहीं दिखाई और इस नतीजे पर पहुचा है कि उनकी सबसे बडी वाघा थी भ्रष्टाचार। किसी न किसी वजह से ये सरकार अपने भीतर, विशेष रूप से सर्वोच्च स्तर पर, मन्त्रिस्तर पर ही, भ्रष्टाचार को दूर करने में असमर्थ रही हैं। और आंदोलन मुख्यतया भ्रष्टाचार के ही विरुद्ध था। विशेष करके मरकार और प्रशासन भ्रष्टाचार थे। प्रिय प्रधानमन्त्री, सरकार ठप्प करने की कोई योजना नही थी, थी तो आपकी अपील पर सर्वोच्च न्यालालय का फैसला आने तक के लिए, एक साधारण निरीह और अल्पकालिक सत्याग्रह को योजना थी। कुछ चुने हुए लोग आपके मकान के सामने या नजदीक मे इस माग के समर्थन में सत्या- . - २२:: दूसरी आज़ादी .. ग्रह करते कि आप अपनी अपील पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आने . तक के लिए प्रधानमंत्री का पद छोड़ दें, इसमें विध्वंसक या खतरनाक कोई भी चीज़ मुझे नहीं दिखाई देती । "लोकतंत्र में नागरिक को यह दीखने पर कि सुनवाई या सुधार के सव रास्ते बन्द हो गए हैं, सिविल नाफरमानी का जन्मसिद्ध अधिकार रहता है।" और अखबारों की आज़ादी का क्यों दमन किया गया है ? इसलिए नहीं कि भारतीय अखबार गैरजिम्मेदार, वेईमान या सरकार-विरोधी थे; वास्तव में आजादी मिली रहने पर अखबारों ने जितनी ज़िम्मेदारी, ईमानदारी और न्याय का परिचय भारत में दिया है, उतना कहीं और नहीं मिला; असलियत यह है कि उनके खिलाफ आपका गुस्सा, आपके त्यागपत्र के सवाल पर पैदा हुआ था। क्योंकि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद कुछ अखबारों ने जो लिखा था, वह आपको विलकुल बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसा छपा है कि आपने कहा कि लोकतंत्र राष्ट्र से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है। श्रीमती प्रधानमंत्री, क्या आप अपने को बहुत बड़ा नहीं समझ रही हैं जो ऐसा कहती हैं ? राष्ट्र की चिन्ता करने वाला व्यक्ति एक आप ही नहीं हैं। जिन्हें आपने नजरबन्द या गिरफ्तार किया है, उनमें से अनेक है, जिन्होंने राष्ट्र के लिए आपके मुकाबले कहीं ज्यादा कुछ किया है । और उनमें से हर एक आप ही की तरह देशभक्त है। इसलिए कृपा करके हमें राष्ट्र के सम्बन्ध में उपदेश देकर हमारे जख्मों पर नमक न छिड़किए। यही नहीं, आपके इस विकल्प की धारणा ही गलत है। लोकतंत्र और राष्ट्र के बीच में एक ही चीज़ चुनी जा सकती है, ऐसा नहीं है। यह राष्ट्र के हित के लिए ही था कि भारतीय जनता ने अपनी संविधान-सभा में २६ नवम्बर, १६४६ को घोषित किया था कि हम भारत के जन भारत को एक प्रभुसत्तासम्पन्न लोकतंत्रीय गणराज्य बनाने का दृढ़ निश्चय करके अपने को यह संविधान देते हैं। मैंने यह सब साफ-साफ विना कुछ छिपाए लिखा है, ऐसा न तो मैंने गुस्से में किया है, न मापसे वहस में पार पाने के लिए। मैंने तो आपके नामने उस नग्न सत्य को रख दिया है जिसको आप ढकने या तोड़ने- मरोड़ने की कोशिश करती हैं। यह अप्रिय कर्तव्य कर चुकने पर चलते-चलते दो शब्द सलाह के भी ।

दूसरी बाजादी :: ८३ कहना चाहता हूं। आप जानती हैं कि मैं वृद्ध हो चुका हूं। अपने जीवन में मुझे जो करना था, कर चुका । और प्रभा के गुजर जाने के बाद अब न मेरा कुछ है, और न मुझे किमी व्यक्ति के लिए जीते रहने की इच्छा ही है। मैंने विद्यालय से निकलने के बाद अपना सारा जीवन देश को ही दिया है और वदते में कुछ मागा नहीं। इसलिए मैं आपके राज में एक कैदी की हैसियत से मर कर भी सन्तुष्ट रहूंगा। क्या आप मेरे जैसे एक व्यक्ति की सलाह मानेंगी? मेहरवानी करके उस नीव को मत उजाड़िए, जिसे आपके महान पिता सहित अन्य राष्ट्र- निर्माताओं ने डाला है। आपने जो रास्ता पकड़ा है उसपर चलकर सिवाय कलह और क्लेश के कुछ हासिल न होगा "वह जनता, जिसने ब्रितानी साम्राज्यवाद से मोर्वा लिया, और उसे नीचा दिखाया, सर्वसत्ता की ग्लानि और कुत्सा हमेशा-हमेशा बर्दाश्त नहीं करती रहेगी। आपने देश में भटकाव की वात की है, पर क्या उसकी वजह विरोधी दल या मैं था? भटकाव की वजह थी निर्णय, दिशा और प्रपल का अभाव । आप उसी वक्त स्फूर्ति और मुस्तैदी दिखाती हैं, जब आपकी निजी हैमियत पर कोई आच आ रही आपको दीखती है। एक बार उधर से निश्चिन्त हो जाने पर फिर भटकाव शुरू हो जाता है। प्रिय इन्दिराजी, कृपया अपने को राष्ट्र न समझने लगिए। आप अमर नहीं हैं, भारत है। आपने प्रतिपक्ष पर और मुझपर हर तरह की दुष्टता का अभियोग लगाया है, पर मैं आपको विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि यदि आप सही काम करें, उदाहरण के लिए अपने २० सूत्रो कार्यक्रम चलाएं, मबिस्तर पर भ्रष्टाचार मिटाएं, चुनाव-सम्बन्धी मुधार करें, प्रतिपक्ष को विश्वासपात्र बनाए और उसकी सलाह सुनें तो आपको हममे से हर एक का हार्दिक सहयोग मिलेगा। इसके लिए आपको लोकतन्त्र को ध्वस्त करने की जरूरत नहीं है। अगला कदम आपके हाथ में है और आप ही को फैमला करना है। इन शब्दो के साथ मैं आपसे विदा लेता है। ईश्वर भापकी रक्षा करे! -जयप्रकाश लोकनायक का यह पत्र ऐसा सच था, जिसे एक बार पढ़कर प्रधानमनी श्रीमती गांधी दूसरी बार उसका सामना नहीं कर सकी होंगी। और चूकि सामना नहीं कर सकी होगी, अत. उत्तर देने का साहस ही कहा से बाता?

८४ :: दूसरी आजादी , पर इन्दिराजी को, उनके हर कदम पर उनके चापलूस साथी तथा समा- चारपन्न बतलाते रहे थे कि वे अपार संयमी, धैर्यशील और साहसी है और ये संयम, धैर्य व साहस-सारे गुण आपातकाल में खूब दीख रहे थे। यों इस साहस के कई नमूने आपातकाल से पूर्व भी सामने आने लगे थे। अपने विरोधी को सह न पाने पर वे जिस लोकतांत्रिक पद्धति (?) के धैर्य का प्रदर्शन करती रही थीं, उसका वर्णन प्रशस्ति-भाव से अव्वास ने अपनी पुस्तक में किया है.---"थोड़े ही दिनों में उन्होंने अपनी इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प से बता दिया है कि वे क्या हैं। उन्होंने उन धुरंधरों को धकेलकर बाहर कर दिया। कइयों को तो उन्होंने विभिन्न कारणों से जेल के दरवाजे भी दिखा दिए। कई लोगों को उन्होंने कम महत्त्व की जगहों पर विठा दिया, जैसे कि किसी मामूली।से राज्य का राज्यपाल बनाना।" जो लोग इससे पूर्व इस तरह की बातें करते रहे थे कि इन्दिराजी घोर प्रजातांत्रिक हैं, उनके पास अब्बास के उपर्युक्त कथन का क्या उत्तर है ? क्या लोकतांत्रिकता यही होती है कि सत्य से कतराया जाए? या जय बाबू के पन्न में लिखे अनुसार आप जितना असत्य बोलतों और तथ्यों की तोड़-मरोड़ करती हैं वह सब जानबूझकर करती हैं, लोकतांत्रिक है, ?या लोकतांत्रिकता यह है कि फइयों को विभिन्न कारणों से जेल के दरवाजे दिखा दिए जाएं ? क्या यह भी लोकतांत्रिकता ही है कि गलत लोगों के प्रति राजनीतिक ममत्व दिखाया जाए? भिवानी (हरियाणा) से बंसीलाल को चुनाव में हराकर विजई हुई श्रीमती चन्द्रावती ने 'दिनमान' के महेश्वरदयालु गंगवार को बतलाया था, "चन्द्रावती जब हरियाणा में ही चौधरी बंसीलाल के मंत्रिमंडल में उपमंत्री थीं, तब रिवासा कांड हुआ। इसमें मुख्यमंत्री बंसीलाल का पुन था। किन्तु बंसीलाल के पुन की रक्षा के लिए पुलिस ने जो अमानवीय आचरण किया, उसे लेकर चन्द्रावती ने युना विद्रोह कर दिया। यही नहीं, उन्होंने इस सिलसिले में प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी से भी भेंट की और उन्हें सत्य से अवगत फराया, किन्तु चन्द्रावतीजी पाहती हैं-'प्रधानमंत्री ने मेरी बात तो सुनी, किन्तु उसपर कोई ध्यान नहीं दिया।" १. इन्दिरा गांधी : मफलसा ने दम वपं, पृ० १०३ २. दिनमान, ३.१ अप्रैल, १९७७ दूसरी आजादी::८५ ये राजनीतिक ममत्व भी क्या लोकतंत्र की परम्परा थी? राजनीतिक ममता के बहुत-से उदाहरण है और इसी पुस्तक मे किसी अन्य जगह आएंगे, किंतु यहा बात करता हू उस व्यक्तित्व की, जिसे वहुत-से लोग आज भी यों कहकर उथले ढग से टाल जाते है, कि श्रीमती गाधी का दोष नही था। दोप था उन लोगो का, जो चाटुकार भाव से उन्हें बरगलाते रहते थे या उन्हे अंधेरे में रखते थे या उनकी आड मे ज्यादतिया करके उन्हें नीचा दिखा रहे थे। यदि ऐसे लोगों के उपर्युक्त तर्क सही है, तव में ही क्या, कोई भी यह बात नहीं मानेगा कि वह व्यक्ति जो 'बरगलाने मे' आ जाता हो, वह व्यक्ति जिमे चाटुकार प्रभावित कर लेते हों, वह व्यक्ति, जिसे अपनी छाह तले क्या कुछ हो रहा है, इसकी जानकारी ही न हो—निस्सदेह रूप से उसे उस सर्वोच्च पाक्ति का मालिक नहीं होना चाहिए, जो लोकतव में करोडों आदमियों का विश्वास पाकर मिल जाती है । यदि यह सब था तव भी दोपी श्रीमती गाधी ही ठहरती हैं। किन्तु मैं नही मानता कि श्रीमती गाधी गैर जानकार थी। बल्कि मैं यह मानता हूं-श्रीमती गांधी समझ चुकी थी कि सविधान को निरतर कमजोर करते जाने से एक दिन ऐसी सार्वभौम सत्ता उनके (काग्रेस के नही) हाथ आ चुकेगी, जब वे सुविधा के साथ दमन-चक्र चलाकर करोडो आवाज़ो को एकदम चुप कर देंगी। और वह सब आपातकाल मे शुरू हो चुका था। सम्पूर्ण शक्ति के साथ। जिन विशिष्ट व्यक्तियो की 'एकदम निजी समिति' मे इस कदम को जनतान्त्रिक ठहराते हुए आगे ले जाने का राजनीतिक दांव खेला गया होगा-~-उनकी भी प्रसशा की जानी चाहिए। सम्पूर्ण योजना को उन्होंने बड़े सलीके से प्रारभ किया। श्रीमती गाधी और उनके विश्वस्त साथी यह अच्छी तरह जानते थे कि इस देश के उस सामान्य जन को, जो एक-दो नारो से ही सब्जबागो मे धूमने लगता है, बडी सुविधा के साय कुछ दिखाकर भटकाया । जा सकता है और उस भटकाव के दौरान उसकी चेतनहीनता का लाभ उठाते हुए कही ज्यादा सुविधा के साथ उसे गूगा भी बनाया जा सकता है। इमी योजनान्तर्गत बड़े पैमाने पर प्रचार-तत्र सक्रिय हुआ। मीटिंगें ली जाने लगी। टेलिविज़न पर विशेष कार्यक्रम तैयार होने लगे । रेडियो खास किस्म के गीत गुनगुनाने लगा और जगह-जगह बैनर लगे नजर आने लगे। गावो से लेकर हर सरकारी और निजी कार्यालय में पोस्टरो की वाढ दीखने लगी। लगता था कि हिन्दुस्तान एक नई किस्म के चुनाव प्रचार मे जीने लगा !

८६ :: दूसरी आजादी । । है। ऐसा शक्तिशाली प्रचार, जिसे किसी भी चुनाव में नहीं देखा गया था। सारे देश में अपने लोगों के अपने लोग और उनके अपने लोग' छोटी-छोटी मीटिंगें करके प्रस्ताव पास करने लगे-'हम श्रीमती गांधी के महान क्रांतिकारी कार्यक्रम के साथ हैं और आपातकाल का स्वागत करते हैं !' लगभग हर शहर से समाचार-पत्रों में यह स्वागत नज़र आने लगा। ऐसे ही जैसे झूमरी तलैया से फरमायश की जाती है। क्या यह कम हास्यास्पद स्थिति है कि किसी देश में आपातकालीन स्थिति का स्वागत किया जाए ? प्रचार-तन्त्र चलता रहा । इस तरह कि इस तंत्र के दौर में कहां क्या हो रहा है, लोगों को ठीक तरह मालूम ही नहीं हो सका। अचानक खबरें वरसनी शुरू हुई। सनसनीखेज़ और रोमांचक । ये खबरें थीं-हाजी मस्तान, वखिया, यूसुफ पटेल आदि तस्करों की गिरफ्तारियों की। देश गद्गद हो गया। इसे कहते हैं क्रांतिकारी काम । सारे गलत लोग वन्द कर दिए गए है। पर इस गलत को सही करने की आड़ में निजी स्वार्थ की कितनी खिचड़ी पकती रही, लोगों को मालूम ही नहीं हो पा रहा था। ये खबरें जनता तक पहुंचा रहे थे वे लोग, जो भूमिगत हो चुके थे। भूमिगत आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और कुछ लोगों ने कितना काम किया, इसका वर्णन किसी और जगह करूंगा। गलत को सही किए जाने का ही नाम 'आपातकाल है । इस प्रचार के अन्तर्गत जो काम दिखाया गया, वह था नाजायज कब्जे हटाना, परिवार नियोजन कार्यक्रम को सख्ती से लागू करना, मुनाफाखोरी वन्द करना और कृपि-सुधार कार्यक्रम को तेज़ करना इस सबसे गरीबी हटनेवाली थी, अमन- चैन आने वाला था और देश आगे बढ़ने वाला था। सचमुच उस समय लोगों को यही लगा था। यह तो कुछ दिनों बाद मालूम हुआ कि इस सारे दौर का मतलब है-तानाशाही ! .. हिटलर और मुसोलिनी के बारे में बहुत सुना था इस देश ने, पढ़ा भी था"पर अनुभव हुमा उस दौर में, कहते हैं जिसे विनोवा बाबा ने कहा- 'अनुशासन-पर्व'। 'अनुशासन-पर्व' या 'दुःशासन-पर्व' ? वसों, स्पूटरों, ट्रेनों, सरकारी आफिसों और नेशनल हाईवे पर सारे देश में विरारे पड़े होटलों और सरायों में वीस सूत्री कार्यक्रम के इश्तहार लगे हुए दूसरी आजादी ::५७ थे। कही कागज़ की शक्ल में, कही वानिश से लिखे हुए और कही गेरू या खड़िया से अंकित। ये सूत्र श्रीमती गांधी ने दिए थे और सारे देश में इस तरह लागू किए जा रहे थे। आपातकाल से पहले लागू क्यो नही किए जा सके ? एक प्रश्न दिमाग में कौंधता । पर इमर्जेंसी का नियम था कि सवाल दिमाग मे ही कौंधता, वुझता, झुलखाता रहना चाहिए, इसलिए सवाल सिर्फ कोधता ही रहा। पर यह सवाल सिर्फ सामान्य व्यक्ति के दिमाग में कौंधा हो, ऐसा नही है । उनके दिमाग में भी कौंधता था, जो ये सूत्र लागू करने चले थे, जिन्होंने बोर्ड बनवाए थे, बैनर लगवाए थे, नारे लिखवाए थे। कारण था, अपनी ही अन्तरात्मा की ताडना । और खुद ही यहा-वहा सफाई देते घूमते कि ये मूत्र थे तो पहले ही, पर सविधान गलत था और देश गलत लोगो के वहुमत के हाथो मे था, अत लागू नहीं किए जा सके थे। पर आज देश 'सही के हाय' मे आ गया था और सविधान सही किया जा रहा था, वचा-खुचा और किया जाना था अतः अब ये मूत्र लागू हो रहे थे। अचानक पता लगा कि आसमान मे एक सितारा और था, जिसका नाम इससे पहले दुनिया वालो को मालूम नहीं था। ठीक उसी टोन मे, जिस तरह 'नेपच्यून' नाम का सितारा आकाश मे है, यह किसी वैज्ञानिक ने काफी देर वाद पता लगाया था। मगर हिन्दुस्तान के इस राजनीतिक सितारे का पता किसी विशेष वैज्ञानिक ने लगाया या खुदवखुद सितारा ही चीखने लगा कि 'देखो रे भाई, मैं सितारा हूं, मुझे देखो'-मालूम नहीं। इतना सच है कि सितारा उग आया था। नाम भी पता लगा था जनता को-सजय माधी। अब इस 'अनुशासन पर्व' मे अनुशासित ढग से सितारे के गुणो की परख शुरू हुई। परख कर रहे थे राज्यों के मुख्यमत्री; यथा, सर्वथी श्यामाचरण (चारण) शुक्ल (मध्यप्रदेश), नारायणदत्त तिवारी (उत्तरप्रदेश), ज्ञानी जैल (जेल) सिंह (पजाब) आदि । इन राजनीतिक-वैज्ञानिकों के प्रधान थे- देवकान्त बरुआ, काग्रेस के अध्यक्ष । परंप मे बहुत-सी बातें पता लगी थी देश को। यह कि सजय गाधी युवा नेता हैं । यह कि सजय गांधी क्रांतदर्शी हैं । यह कि संजय गाधी (इलस्ट्रेटेड वीकली के अनुसार) "मैन आफ इयर' हैं । यह कि सजय गाधी मे अपूर्व मंगठन-शक्ति है और यह कि मजय गाधी श्रीमती गाधी के अनुसार काग्रेस की मदद के लिए आए है और मोहम्मद यूनुस फरमा रहे थे कि संजय गाधी ८८:: दूसरी आजादी । इस लिए राजनीति में आए हैं, क्योंकि वे कहते हैं कि विरोधियों ने उनपर आरोप लगा-लगाकर उन्हें बुरी तरह तंग कर डाला था और इस कारण उनकी माताजी श्रीमती गांधी को बार-बार जवाब देना पड़ता था !' तो इस तरह आए भारतीय राजनीति में नये नक्षत्र । और जब नक्षत्र आए तो अपने साथ कुछ चकाचौंध लाना भी जरूरी था। वे ले आए.-~चार सूत्र । और ये चार सूत्र भी वीस के साथ दौड़ लगाने लगे। कभी वीस आगे, कभी चार आगे, कभी चार आगे, कभी बीस आगे... तो इस तरह भारत के आपातकाल की राजनीतिक आकाशगंगा शुरू हुई। होते-होते यह होने लगा कि हर सुबह अखवार उठाओ तो एक और संजय गांधी का तेजस्वी' चित्र देखो और 'ओजस्वी' भापण पढ़ो और दूसरी ओर देखो कि श्रीमती गांधी ने देश को क्या सन्देश दिया है या 'असामाजिक तत्वों के बारे में जनता को क्या बतलाया है। बीच का इण्ट्रो लगा होता श्री देवकांत बरुआ का जो कह रहे थे कि 'इन्दिरा इज़ इण्डिया एण्ड इण्डिया इज इन्दिरा' (इन्दिरा भारत है और भारत इन्दिरा है)। यह होती पैंसठ करोड़ आदमियों के बहुभापा-भापी देश और देशवासियों की खबरें। राज्यों से समाचार यह थे कि जिला विलासपुर में नसबन्दी अभियान जोरों पर हैं य लखनऊ में वीस सूत्री कार्यक्रम से क्रांति हो गई है। टेलिविज़न का बटन ऑन कीजिए। म्यूज़िक पर एक भड़ाके के साथ यावाज निकल रही होती है ~~-'दो पर सब करो, देश का संकट हरो।' यह थ देश का आपातकाल ! पर नहीं, देश का आपातकाल तो वह था जो न अखबारों में था, और *देखने की इजाजत थी आपातकाल था तुर्कमान गेट पर ! आपातकाल था उन झुग्गियों पर, जिनमें दिल्ली, वम्बई, कलकत्ता, नागपुर, और ऐसे ही महा- नगरों में करोड़ों लोग सिर्फ जी पाने के लिए संघर्ष कर रहे थे."या जेलों में दमन सह रहे निरपराध दम तोड़ रहे थे... वह था आपातकाल ! और वही था विनोबाजी का अनुशासन-पर्व ! और वही था देश का लोकतंत्र, जिसे इन्दिराजी ने कृपापूर्वक दिया था और वही था सत्य-अहिंसा से लदी-बदी कांग्रेस का धर्म, जिसके तहत देश जैसे-तैसे जी रहा था। १. जिज़ (अंग्रेजी) में मोहम्मद यूनुस का लेश, पृ०८ दूसरी आजादी :: ८६ प्रेस मेंसरशिप एक ऐमा हथियार था, जिमने उन्लीम माहों तक सव का गला दुरी तरह दवाए रखा । यही कारण था कि आपातकाल के दौरान पटी घटनाए, जिनमे बहुत-मे वेगुनाहों की हत्याओं और अन्य कानून से प्राप्त सत्ता के कारण मैकड़ो वरवादियों के किस्से थे, लोगो तक नही पहुच सके। दूसरी आजादी के तुरंत बाद ये किस्से सामने आने शुरू हुए, कुछेक उन लोगो को गरदनों के भीतर ही घुटे रह गए थे, जो दमन के कारण गलत प्रशासकों और पुलिस के क्रूर अत्याचार के पजो मे फसी हुई थी। २२ जून, १९७६ को बुलडोजरों का एक काफिला गुडगाव रोड पर देखा गया। काफिले के लोग वडे उत्साहपूर्वक चले जा रहे थे। थोड़ी ही देर बाद ये बुलडोजर मारुति कम्पनी के रास्ते की ओर वसे समालखा गाव में जा पहुंचे। यह छोटा-सा गरीव गाव धीमे-धीमे श्रम की शक्ति पर प्रगति कर रहा था और प्रगति के दौर में उसकी अधविकसित स्थिति के कारण पचीसो घर और दुकानें कुछ कच्चे और कुछ पक्के थे । वुलडोजरो का उत्साही काफिला देखने के लिए उत्सुक ग्रामीण स्त्री-पुरुष और बच्चे बाहर आ गए थे। दैत्याकार वुलडोजरों के भीमगर्जन ने भी उन्हे चौंकाया और विस्मित किया था, पर उन्हें नहीं मालूम था कि थोड़ी ही देर बाद उनका विस्मय करण मदन मे बदल जाएगा। कुछ लोग, जिनमें अधिकारी और साधारण कर्मचारी थे, वाहनो से उतरे और रौवीली चाल मे यहा-वहा पहुचकर इलाके का निरीक्षण करने लगे। ग्रामीण हैरानी से उन्हे देघ रहे थे कि वे वहा क्या कुछ करने वाले हैं । मुख्य मार्ग में सभालपा गाव की ओर दृष्टिपात करते हुए अधिकारियो ने अपना कार्यक्षेत्र निश्चित किया। थोड़ी ही देर में आदेश हुए कि मारति कम्पनी की और रास्ते में पड़ने वाला मारा इलाका, जिसपर फसले और कहीं-कही ट्यूब वेल भी लगे थे, साफ कर दिया जाए। ग्रामीणो ने हक्के-बक्के रहकर आदेश सुना और उसके तुरत वाद कातर स्वर में अधिकारियों से प्रार्थना की कि आखिर कारण क्या है? उनकी फसलें थोर मेत किस लिए तबाह किए जा रहे है। ग्रामीण धीमते रहे और बात की बात मे बुलडोजरो ने हरी-भरी फसलों वाले खेत तबाह करके समतल धरती बना डाली। स्त्रिया-पुष्प रोते-चीराते रहे, किन्तु कोई मुननेवाला नहीं था। यही नहीं, बुलडोजरो ने बहुत मी कच्ची. एक्की दुकानो और मानो को धराशायी कर दिया। एक मकान में पुलिरामन. की विधवा विमलादेवी अपने छोटे-छोटे पाच वच्चो के साय दिन काट- ।

-१० :: दूसरी आज़ादी - । वह बच्चों को लिए हुए चीखती-गिड़गिड़ाती रही कि उसके घर को न तोड़ा जाए किन्तु वे सब उच्चस्तरीय आदेशों से बहरे बने हुए थे । यह मकान विमलादेवी ने कर्जा लेकर वनवाया था। किसानों ने ट्यूबवेल भी कर्जे पर लग- वाए हुए थे, पर अब सब कुछ व्यर्थ हो चुका था। सरकारी सूचना दी गई कि अब यहां 'ट्रांसपोर्ट नगर' बनेगा। क्यों? इसका कोई उत्तर नहीं था, सिवाय इसके कि 'ऊपर से हुक्म' हुआ है। बुलडोजरों से सफाई करने का आदेश तत्कालीन निगमायुक्त वहादुरराम टमटा ने दिया था और 'नवभारत टाइम्स' के अनुसार टमटाजी को यह हुक्म श्री संजय गांधी ने दिया था। और श्री संजय गांधी के दिमाग से यह हुबम क्यों निकला था ? इसका पता 'नवभारत टाइम्स' के संवाददाता ने यह लगाया कि मारुति कम्पनी की ओर जाते हुए संजयजी को इस अर्ध-विकसित ग्राम की कुरूपता नहीं रचती थी और उनका 'मूड' खराब हो जाता था, अत: उन्होंने निश्चय किया कि सौन्दर्य के लिए गांव को ही मिटा दिया जाए। उस धरती पर ७० दुकानें बन रहीं हैं। करीनेदार और खूबसूरत । कहते हैं कि ये दुकानें युवक कांग्रेस के कार्यकर्ताओं के लिए बनाई जा रही थीं। पुलिसमैन की लाचार विधवा श्रीमती विमला आज भी अपने पांच बच्चों को ज्यों-त्यों करके एक झुग्गी में पाल रही है। ग्रामीण अपनी समतल की गई १३० बीघा धरती देखकर आठ-आठ आंसू रोते रहते हैं। ट्यूबवेल खामोश पढ़े है। दूसरा गुधार (?) बुलडोजरों ने दिल्ली के कश्मीरी गेट क्षेत्र में किया । इग जगह गत २६ वर्षों से एक पुराना विद्यालय विद्या भवन' स्पाल चल रहा था। इस स्कूल में ३० से अधिक कर्मचारी थे और सात सौ से अधिक बच्चे शिक्षा पाते थे। अचानक २६ अप्रैल, १९७६ को इस विद्यालय के प्रवन्धमाः श्री गर्ग ने (जो जनगंध सीट पर निगम पार्षद भी रह चुके थे) देगा कि ३०० पुलिसमनों ने स्कूल की इमारत को घेर लिया है। उनके साथ सेना का एक बुलटोजर भी था । कारण कुछ भी न बतलाते हुए अध्यापकों से कहा गया कि ये स्माल के बाहर आ जाएं। अध्यापक बहुत गिड़गिड़ाए, प्रार्थना की कि यह उनकी रोजी ही नहीं है, बल्लि शिक्षा-दान का मन्दिर भी है। एक तरह से १. गयमारग टाइम (दिल्ली संस्करण), १६ अप्रैल, १९७७ - दूसरी आजादी ::६१ तीर्थ ही है, पर कोई बात न सुनी गई। थोड़ी ही देर में सरकारी सेवक स्कूल के भीतर-वाहर समा गए । फर्नीचर, पंखे और सारा सामान तोड़-फोड डाला गया । बुलडोजर ने दैत्यगर्जना की और स्कूल की इमारत के २५ कमरे धराशायी कर डाले । पढनेवाले बच्चो का भविष्य क्या हुआ होगा? और वे अध्यापक तथा अन्य कर्मचारी, जिनको स्कूल के कारण रोजी चलती थी, कहते हैं कि आज तक भटक रहे हैं। गत दिनो स्कूल के व्यवस्थापक श्री गर्ग ने समाचारपत्रो के सवाददाताओं से अपनी यह दुखगाथा सुनाई तब उनको अखि छलछला आई थी। उनका कहना था कि उन्हें मिली सूचना के अनुसार यह सारी कार्रवाई श्री राजय गाधी के हुक्म पर हुई थी। पर क्यो हुई थी, इसका कारण उनकी समझ में नहीं आ रहा था। मुझे लगता है कि न समझ पाने का कारण नहीं होना चाहिए । क्या कारणहीन व्यवस्था को समझ लेना ही काफी नहीं है ? १६ अप्रैल, १९७६ को तुर्कमान गेट पर जो भयानक गोलीकाड हुआ, और उसमे जिस तरह निरीह स्त्री-पुरुषो और बच्चों की जान गई, उसका स्मरण-भर रोंगटे खड़े कर देने वाला है । तत्कालीन गृह उपमन्त्री श्री मोहसिन ने इस घटना के बारे में बतलाया था कि तुर्कमान गेट की घटनाओ और गोलीकाड का कारण प्रतिवन्धित सस्थाए थी। उन्होंने कहा था कि वहां जो कुछ शासकीय कार्य चल रहा था, वह पूर्वनिश्चित योजना के अनुसार था और उस कार्य में जव 'असामाजिक तत्त्वो' ने (श्री मोहसिन के अनुसार) गड़बड़ी फैलाई और हिंसात्मक हरकतें की, तब लाचार होकर पुलिस को कारंवाई करनी पड़ी। क्या था पूर्वनिश्चित शासकीय कार्यक्रम' विवरण देता है । इस सघन इलाके में रहनेवालों की दशा सुधारने के लिए सन् १९३० में महात्मा गाधी ने और बाद में श्री जवाहरलाल नेहरू ने इस क्षेत्र के लिए पुननिर्माण योजना बनवाई थी। इस योजना को नाम दिया गया था- दिल्ली गेट, अजमेरी गेट स्लीम बाद में सन् १९६२ में मास्टर प्लान बना और इस क्षेत्र के विकास का विशेष प्रावधान हुआ। इस प्लान के तहत धीमे-धीमे कार्य चल रहा था। अनेक परिवारों को पुनर्वास-मुविधाए भी दी जा रही थी, किन्तु आपातकाल के दौरान एकदम मब कुछ सुधारने के लिए रात मे मूरज उगाने का वह बाश्चर्यजनक चमत्कार किया गया कि कई लोगों ने अपनी जान से हाथ धोए और मकड़ों परिवार वेपरवार हो गए।

६२ :: दूसरी आजादी - श्री मोहसिन के अनुसार लोगों की भलाई का यह महान कार्यक्रम जब चला तो १३ अप्रैल, से १८ अप्रैल, १६७६ तक कई परिवारों को जहां-तहां रहने-सहने की गुविधाएं देते हुए वहां से हटाया गया किन्तु १६ अप्रैल को 'अमामाजिक तत्त्वों द्वारा गड़बड़ी किए जाने के कारण गोली चली और ६ व्यक्ति मारे गाए तथा कुछ घायल हुए। (और जो गायब हो गए ?) श्री संजय गांधी और बेगम रुखसाना सुलताना (जो अपने को संजयजी की निजी सचिव कहती थी) ने भी इस इलाके का दौरा किया। कहा जाता है कि श्री गांधी ने उन तक गुहार करनेवाले लोगों को आश्वासन भी दिया कि उनके मकान नहीं देंगे, किन्नु कार्रवाई चलती रही। बुलडोजरों के शोर से इलाका थरथराता रहा और मकान अर्राकर धरती पर बिछते रहे। परिणाम हुआ महिलाओं और पुरुषों का लाचार और शान्त आन्दोलन । उन्होंने बुलडोजरों के आगे लेटकर चोयना-पुकारना शुरू किया कि यदि उन्हें इसी तरह उजाड़ना है तो ये नहीं जीना चाहते। बतलाया जाता है कि पुनर्वास के नाम पर बहुत-से परिवारों को दिल्ली के दूर कोने-कोतरों में पहुंचाया जा रहा था। इस व्यवस्था में एक ही परिवार के विभिन्न लोगों को जव भिन्न-भिन्न जगह रखा जाने लगा, तब उन्होंने मांग की कि उन्हें एक जगह रखा जाए। यह भी कि उन्हें शहर से उतनी दूर क्यों काटा जा रहा है ? पर जब सुनवाई नहीं हुई तब वे धरना देने लगे। नाराज अधिकारियों ने हुक्म दिया कि यदि ये लोग नहीं मानते तो इनके । ऊपर से बुलडोजर निकाल दिए जाएं, पर काम न रोका जाए ! श्री मोहसिन ने कहा था कि गर्द की गुरुआत 'असामाजिक तत्त्वों' ने की, पर उसी इलाके की महिला पाया बेगम के उग तक का जवाब मोहसिन के पास क्या है कि औरते अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर को बुलडोजरों के सामने लेट गई थीं। गया ये वो डागड़ा कारने पहुंचे थे? वे स्त्रियां और बच्चे असामाजिक तत्त्व थे, जिनसे प्रशासनिक व्यवस्था को खतरा था? दोपहर दो बजे पुलिस ननिय हुई। स्त्रियों, पुरुषों और बच्चों को घनीटते, दुत्कारते, पीटते और बाल पकड़कर गींचते हुए यहां-वहां उछाला- पटका जाने लगा। पुलिसवाले घरों में घुस गए और बरतन सामान बाहर फैला दिया गा तोटफोड़ डाला । बुलडोजरों की संख्या १४ थी। ये बुलडोजर गशिप हो चुके थे और अंधाधुध मकान गिराए जा रहे थे। अनेक स्त्रियों को उन घरों भीतर पहुंचकर बालों से घसीटते हुए वाहर लाया गया और .

दूसरी आजादी :.६३ उनके गहने नोच लिए गए । ये गहने कहा गए, इसका अब तक पता नहीं है। बहुत-सी औरतें वेइज्जत हुई । बिजली-पानी की लाइनें पहले ही काट दी गई थी। उजडे हुए बहुत-से लोग बाहर मैदान में पड़े रो रहे थे। कुछ लोग घबराकर समर्पण कर बैठे कि 'आपकी मरजी ही पूरी करेंगे साहब, पर थोडी मोहलत दीजिए।' जवाब मिला-- मौत भी कभी मोहलत देती है ?' हंसी, व्यंग्य और क्रूर आनंद लेते हुए पुलिस वाले इस सारी स्थिति से मनोरंजन कर रहे थे। अनेक स्त्रियों के कपड़े फट गए थे और वे लगभग नग्न हुई जा रही थी। अब्दुल रजाक इस सारी आपाधापी मे अपनी बच्चो को बचाने-योजने के लिए भाग रहा था कि उसी बदहवासी की हालत में एक गोली आई और उसकी बांह चीर गई। घबराया हुआ अब्दुल लड़खड़ाकर निकलने लगा कि तभी दूसरी गोली ने उसकी कमर को भेद डाला ! अब्दुल गिर पड़ा। बाद मे अस्पताल में उसकी जान बच गई। अब्दुल रजाक ने अपने गोलियों के घाव, जो अब घिनौनी तानाशाही के स्मरण बनकर निशान स्प मे उसके जिस्म पर मौजूद है, पत्रकारों को दिखताए।' फारुखा बेगम कहती हैं कि औरतों की वेइज्जती की गई और मरदो को इस बुरी तरह मारा गया कि उसके ही नहीं, दसियों लोगों के देखते-देखते कई के सिर वही खुल गए। पून से सरोवार लोगो को खीच-खीचकर गाडियों में डाला गया और न जाने कहां ले जाया गया । यही नहीं, इन फारुखा बेगम के अनु- सार बहुत-सी औरतो को उनके छोटे-छोटे बच्चों के साथ चिलचिलाती धूप मे बिठा दिया गया और पहरा लगा दिया गया। ये पहरे वाले पानी तक नहीं देते १. "तुकंमान गैट पर गोली चलने के बाद ४५ दिन का कप लगा दिया गया । औरतो को बैहरबत किया गया । पुरुषो पर अमानुपिक अत्याचार किए गए। सजय गाधी से कपy उठाने की प्रार्थना की गई तो उन्होने जवाब दिया-इन लोगो को कड़ा सबक मिलना चाहिए। मैंने इस सिलसिले में कई बार तत्कालीन प्रधानमनी इन्दिराजी से मिलने की कोशिश की, पर मुझे वक्त नहीं दिया गया। अन्त में मैंने एक पत्र में सारे हालात लियार उन्हे मूचित किया। नतीजा यह हुआ कि मुझे परिवार नियोजन की विरोधी घोषित कर दिया गया । मैं स्वर्गीय राष्ट्रपति श्री फखरुद्दीन अली अहमद माहब ने मिनी पर उन्होंने यही बहा कि वे इस मामले मे लाचार और असहाय हैं।" (श्रीमती मुन्दा जोशी का पन, जो उन्होने काग्रेस अध्यक्ष श्री डी के दरजा को लिखा) १४:: दूसरी आजादी - थे। फाम्खा ने गिरफ्तार औरतों की संख्या पचास-साठ बतलाई, और दिल्ली गांगायटी के सम्पादक सईद खां के अनुसार मरनेवाले लगभग २५ है। श्री मोहसिन ने घटना शुरु होने का समय १ बजे बतलाया है। उनका. कहना है कि दोपहर १ बजे से 'फजल-ए-इलाही' मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के बाद अगला गुरू हुआ था। नसिंग होम की ओर से पथराव हुआ। बाद में पुलिस को लाठी-गोली और अश्रुगैस का सहारा लेना पड़ा। उन्होंने इस सारे कांड में गिरफ्तार व्यक्तियों की गंख्या ४५३ वतलाई थी। चुलदांजरी ने पूरी रात काम किया और कई कच्ची-पक्की इमारतें ध्वस्त कर टालीं। इस दौरान तमाम सामान भी चकनाचूर हो गया। पर हत्याएं ? उनमे बच्चों से भी परहेज़ नहीं बरता गया। इस अमानवीय क्रूरता के परिणाम- स्वरूप जहीनहीन नामक व्यक्ति के दो बच्चे मारे गए। उसके साले की मौत भी हुई, जो सिर्फ २३ वर्ष का था और जिसका विवाह हुए कुल दस महीने हुए थे। जहीरुद्दीन का साला, जहीगद्दीन के बच्चों को बचाने के लिए दौड़ रहा था। यह सारा विवरण 'नवभारत टाइम्स' में क्षितीन्द्रमोहन श्रीवास्तव ने लिया था। इससे कहीं ज्यादा विस्तृत विवरण 'इण्डियन ऐक्सप्रेस' के दिल्ली गम्करण में प्रकाशित हुआ। 'अनुशासन-पर्व' की ये कुछ वानगियां हैं। वे, जो जीना-मरना सिखा रही धी और जिसके लिए प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी ने (हाल के चुनाव के दौरान बिहार में दो दिवसीय दौरे पर एक भापण में कहा था-"जनता को स्वयं इस चात या फैसला करना होगा कि क्या वे कांग्रेस के मूलभूत सिद्धान्तों व अदर्शी (लोकतंत्र, समाजवाद, और धर्मनिरपेक्षता) को बनाए रखना चाहते हैं, या उनको जो अनुशासनहीनता, दांगा-फसाद और तोड़-फोड़ में विश्वास करते हैं, उनको लाना चाहते हैं ? किसी चीज़ को बिगाड़ना तो बहुत आसान होता है, लेकिन बनाना बहुत मुश्किल होता है।' तुर्गमान गेट पर जो कुछ हुमा क्या वह बनाया जा रहा था ? वह, जो विद्याभवन स्माल में घटा, निर्माण था? और वह जो संजयजी का मूड बरकरार रखने के लिए गुड़गांव रोड के उस छोटे से गांव में घटा-निर्माण था? ६ दिसम्बर, १९७५ को हिन्दू ऐज्युकेशन सोसायटी द्वारा संचालित तीन स्पनों में जो घटना घटी, क्या यह भी देश की प्रगति के लिए था? सोसायटी द्वारा - - । दूसरो आजादी ::६५ मंचालित उक्त तीनों स्कूलो के सैकड़ो वच्चों और शिक्षकों को पुलिस के जवर- दम्त हमले ने अकचका दिया था। उस दिन अचानक ही तीनों स्कूलों में पुलिस घुस पड़ी और पढ़ते हुए बच्चों को खीच-गोधकर बाहर निकाल दिया गया था। सोसायटी के पदाधिकारी मागेगम शर्मा के अनुसार कई बच्चों को पुलिम ने बुरी तरह पीटा तथा शिक्षको को गिरफ्तार कर लिया। लगभग मवा मो अध्यापक वेकार कर दिए गए बोर बच्चो को शिक्षा अस्त-व्यस्त कर डाली गई। घहुत खोज के बाद कारण सुना गया था कि इस सोसायटी के अध्यक्ष चूकि भूतपूर्व महापौर लाला हसराज गुप्त हैं, अत इसे यह दमन महना पड़ा है। किन्तु लालाजी से काग्रेस की तानाशाही को क्या शिकायत है, यह मालूम नहीं हो सका। आपातकाल के नाम पर देश की प्रगति का जो दोंग प्रचारित किया जा रहा था, क्या वह सब यही था ? अपने विरोधी विचारवालों को तहस-नहस कर डालने के अधे तानाशाही स्याल में यह भी नहीं सोचा गया कि एक स्कूल से हजारो परिवारों का भविष्य जुड़ा रहता है। उन परिवारो से देश का भविष्य जुडा रहता है और चूकि यह देश है इसलिए काग्रेस या किसी भी दल का अस्तित्व है। श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक सार्वजनिक सभा में राजनीतिक वदियो के साथ हुए आपातकात के अशिष्ट व्यवहार का उदाहरण देते हुए बतलाया था कि ग्वालियर की राजमाता विजयाराजे सिन्धिया के साथ क्या बर्ताव हुआ। श्री वाजपेयी के उक्त भाषण के कुछ अंश यहा प्रस्तुत कर रहा हूं--- "भारतीय जनमंघ में शामिल होने के कारण तया श्री जयप्रकाश नारायण के समग्र क्राति के संघर्ष में भाग लेने के कारण राजमाता श्रीमती विजयाराजे सिन्धिया को महल से निकलकर जेल में जाना पड़ा। और जेल में उनके साथ क्या व्यवहार किया गया, सुनेंगे तो रोगटे खड़े हो जाएंगे। राजनीतिक पुरुष वादियों के लिए पृथक वार्ड होता है, किन्तु राजनीतिक महिलामो के लिए कोई पृथक वार्ड नहीं है । चोरी, जेबकतरी, हत्या और वेश्यावृत्ति के अपराध मे पकड़ी गई औरतो के साथ उन्हें महीनो जेल में रखा गया।" श्री वाजपेयी ने बतलाया था कि वे तिहाड़ जेल (दिल्ली) कई बार गए और उनकी कोठरी के सामने से गुजरे। यी वाजपेयी ने वहा की स्थिति का १. दैनिक युगधर्म (नागपुर), १३ मार्च, १९७७ - । ६६ :: दूसरी आजादी वर्णन करते हुए कहा कि जहां राजमाता रखी गई थीं, उसके सामने सुअरों का वाड़ा था। चौबीसों घंटे इतनी गंदगी रहती थी कि नाक पर बिना कपड़ा रखे हुए वहां से गुजरना तक मुश्किल होता था। तानाशाही के विरुद्ध संघर्ष करनेवाले राजनीतिज्ञों की यह दशा थी और ऐसे भी कई उदाहरण है, जब ताड़ना-प्रताड़ना देकर अकारण ही निरपराध लोगों को मौत के मुंह में धकेल दिया गया या एक तरह से उनकी हत्या ही कर डाली गई। जॉर्ज फर्नाडिस के एक परिचित परिवार को केवल इसी कारण जबरदस्त मरणान्तक कप्ट झेलने पड़े क्योंकि उक्त परिवार के लोग जॉर्ज के मित्र थे । और जॉर्ज तानाशाही के विरुद्ध बगावत का एक नाम था। बड़ौदा डायनामाइठ कांड में जॉर्ज को उलझाया गया। जैसे ही आपात- काल की घोपणा हुई, सभी विरोधी नेताओं की पकड़-धकड़ में जॉर्ज की खोज भी की जाने लगी। जॉर्ज फर्नाडिस अपने मित्रों, शुभचिन्तकों और जन- सहयोग से भूमिगत हो गए। क्योंकि आपातकाल के दमन ने इन्दिरा-शासन को अलोकप्रिय बना दिया था अत: पुलिस सिरतोड़ कोशिश के बावजूद जॉर्ज को नहीं पा रही थी। जैसाकि तानाशाही या सामन्तवाद में हमेशा से होता रहा है, जॉर्ज के शुभचिन्तकों और मित्रों को डराया, धमकाया जाने लगा या उनका दमन प्रारंभ हुआ। इसी सिलसिले में कन्नड़ फिल्म अभिनेत्री स्नेहलता रेड्डी के यहां पुलिसवाले जा पहुंचे। स्नेहलता रेड्डी सोशलिस्ट पार्टी से पुराना सम्बन्ध भी रखती थीं। म्नेहलता रेड्डी और उसके परिवार पर आपातकाल के प्रारंभ से ही दमन-चत्र प्रारंभ हो चुका था। उनकी बेटी नंदना को अनेक बार पुलिस ने तंग किया और पूछताछ की। नंदना की गतिविधियों पर भी इस तरह नज़र रखी जाने लगी, जैसे नंदना बहुत खतरनाक अपराधी हो। २७ अप्रैल को स्नेहलता रेड्डी और उनके पति श्री पट्टाभिरामा रेड्डी रात के समय बंगलौर से मद्राग गाए थे। उनकी अनुपस्थिति में पुलिस घर पहुंची और उनके बेटे कोणार्क को जगाकर पूछा गया कि उसके माता-पिता कहां है ? जब कोणार्क ने बतलाया कि वे बाहर गए है तो पुलिस वाले उसे तंग करते हुए पुलिस थाने । १. स्नेहलता रेमी कन्नड़ फिल्म 'सस्कार' में चन्द्रि पी अपनी भमिका के लिए अपूर्व प्रमा नजिन कर मुसी पी। इस फिला पर निर्माण उसके पति पट्टाभिरामा ली ने ही किया था।

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दूसरी आजादी : १०५ ले गए और इधर घर पर सारा सामान उलट-पुलट करते हुए व्ययं धाना. तलाशी करते रहे। परिवारजनों और यहां तक कि नौकरों को भी वेदन्तिहा तग किया गया । उधर स्नेहलता और उसके पति बार-बार अपने घर मंगलोर को फोन मिलाकर परिवारजनो से सम्पर्क साधने की चेष्टा कर रहे थे, किन्तु फोन काट दिया गया था। लाचार होकर उन्होंने पड़ोसी के यहा फोन किया, जहा से मालूम हुआ कि कोणार्क को पुलिस ने पकड़ लिया है और उस समय तक छोड़ा नहीं है। घबराए हुए रेड्डी दम्पति कार से बंगलौर आए। पर वगलौर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया । वे रात-भर कालंटन हाउस में बैठे रहै । कोणार्क की कोई सूचना उन्हें नहीं जा रही थी। बाद में उन्हें अलग- अलग ले जाकर फर्नाडिम के बारे में कटपटाग सवालात किए जाने लगे। घबराई हुई विह्वल स्नेहलता ने कह दिया कि 'यह सब कुछ बतला देगी यदि उसके पति और बच्चे को घर जाने दिया जाए।' इसपर पति और वच्चा तो छोड़ दिए गए किन्तु स्नेहलता को मीमा में बन्द कर दिया गया । अब दिन-दिन- भर उसे 'जो मालूम है बतलाने के लिए दवाव डाला जाने लगा। मच यह था कि वह कुछ भी नही जानती थी। उसने बतलाया कि मैं कुछ नही जानती। इसपर भयानक यनणाए दी जाने लगी। स्नेहलता को कालकोठरी में हाल दिया गया और 'सी' क्लास मिली। परिणाम हुआ उमका बीमार हो जाना । स्नेहलता को दमा पहले से ही था, किन्तु ठीक तरह इलाज और व्यवस्था न मिल पाने के कारण दौरा पड़ गया। कहते है कि इस दौरे में डॉक्टर ने जेलवालो को हिदायत दी थी कि उसे तुरन्त अस्पताल भेजा जाना चाहिए, क्योकि वह मानसिक घुटन के कारण दिल की मरीज भी बन चुकी है, पर उपेझा कर दी गई। बाद में परिवारजनों के बहुत कुछ कहने-सुनने पर स्नेहलता को एक माह के लिए पैरोल पर रिहा किया गया, तथा दिल का दौरा पड़ने से स्नेहलता का अन्त हो गया। प्रखर विचारों वाली एक अभिनेत्री को देश ने यो दिया। जॉर्ज फर्नाडिस के बडे भाई श्री लारेंस फर्नाडिस की पहानी भी कम ददं- नाक नहीं है । लारेंस एक सीधे-सरल आदमी है और एक छापाम्राना चलाते हैं। १ मई, १९७६ को लारेंस के घर पर दस्तकें हुई। उन्होंने दैया कि कुछ लोग सादा कपड़ों में खड़े हुए है। इन लोगो ने बतलाया कि उन्हें थाने बुलाया गया है। लारेंस ने ज्यादा 'ना-नुच' नही की, क्योकि वे जानते थे कि पुलिस का दमनचक्र इस दौर मे कितना अमानुपिक हो चुका है। उन्होंने सोचा कि पाने में जो कुछ भी पूछा जाएगा, उसका समाधानकारक उत्तर देकर लारस - १०६ :: दूसरी आजादी । चले आएंगे। वे थाने पहुंचे, किन्तु कहते हैं कि उनसे विना कोई सवाल किए ही एकदम मारपीट शुरु कर दी गई। उन्हें नंगा कर दिया गया और वेत वरसाए जाने लगे। हर वार पूछा जाता कि वे वतलाएं जॉर्ज फर्नाडिस कहां हैं ? किन्तु लारेंस बेचारे क्या बतलाते ? लारेंस को बेदर्दी से मारा गया। बीच में उन्हें चलती ट्रेन से नीचे फेंक देने के भी प्रस्ताव आए, किन्तु भाग्यवश ये प्रस्ताव पास नहीं हो सके और लारेंस की सांसें ज्यों-त्यों करके चलती रहीं। लारेंस को जिस थाने में पूछताछ के लिए ले जाया गया था, उसके पास वाले कमरे से उन्होंने स्त्री-स्वर में एक दर्दनाक चीख सुनी थी। बाद में उन्हें मालूम हुआ कि वह चीख स्नेहलता रेड्डी की थी, जो उन्हींकी तरह केवल जॉर्ज के बारे में पूछताछ करने के लिए अत्याचार सह रही थी। बाद में लारेंस के बाल-दाढ़ी मुड़ाकर और घायल स्थिति पर औपचारिक इलाज करके दंगलौर से १५० किलोमीटर दूर किसी नगर में मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया और औपचारिक वयान हुए। लारेंस को इतनी बुरी तरह पीटा गया था कि उनके शरीर पर अनेक जगह प्लास्टर चढ चुका था। उस यंत्रणाकाल के दौरान कई बार लारेंस ने पुलिसवालों से प्रार्थना भी की थी कि उनके शरीर- कप्ट अब इतने असह्य हो चुके हैं कि उन्हें गोली मार दी जाए ! किन्तु लारेंस जीवित रह गए। इस तरह के अमानुपिक अत्याचारों से कितने लोग मरे होंगे। कितने लोगों ने तानाशाही के उन अंधेरे उन्नीस माहों में अपनी सांसें तोड़ दी होंगी--- गिनती नहीं है। हाल में एक व्यक्तव्य देकर कुछ नेताओं ने दिल्ली के उन मीसा बन्दियों की रहस्यमय मृत्युओं पर जांच की मांग की है, जो जेल में दम तोड़ बैठे। ये तीनों थे.-सर्वश्री बैजनाथ कपिल, तिलकराज नरूला, और मोहनलाल जाटव । श्री कपिल और नल्ला जनसंघ के कार्यकर्ता थे, जबकि मोहनलाल भारतीय लोक दल के। बहुत-से नाम हैं, जो अब क्रमशः सामने आ रहे हैं, किन्तु कितने नाम होंगे जो कभी सामने नहीं आ पाएंगे और जिन्होंने अपनी सांसें देकर तानाशाही की जड़ों में मट्ठा डाला था। उपर्युक्त उदाहरणों के बाद भी पिछले दिनों जब मैंने श्रीमती गांधी के एक भाषण-अंग को दिनमान' में पढ़ा तो मुझे हैरानी होने लगी थी कि क्या इन सबको घटा देने के बाद कोई व्यक्ति इस तरह की बातें कर सकता है ? श्रीमती गांधी ने चुनाव के दौरान किसी सभा में कहा-"मैं सेविका के .

दूमरी आयादी :: १०७ रूप में जनता का महयोग मागने आई हूं, जिससे समाजवाद और लोस्तन्त्र की प्रतिष्ठा की जा सके। मेरी पार्टी अपनी उपलग्थियों के आधार पर दोबारा चुने जाने के लिए आपके सम्मुप आई है। इसमें शक नहीं है कि हमने अनेक चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना किया है." आपातकाल के नाम से देश को मानसिक रूप मे पंगु बनाने वाले लोग अगर लोकतन्त्र शब्द का उच्चारण करें तो कैसा लगता है ? किन उपलब्धियों के आधार पर काग्रेस भारतीय मतदाता से वोट माग रही थी? और किन लोगो के लिए? क्या उनके लिए जिनके बारे में 'टाइम्स ऑफ इण्डिया ने १३ अप्रैल, १६७७ के अपने सम्पादकीय में लिखा है : "भूतपूर्व स्पीकर थी बलिराम भगत ने कहा कि विहार काग्रेस अध्यक्ष श्री सीताराम केसरी और मुख्यमनी की ढिलाई के कारण ये चुनाव में हार गए। इसपर केसरी ने उत्तर दिया कि वलिराम भगत इमलिए हारे हैं क्योंकि उन्हें स्वातंत्र्य-सग्राम मे विना जैल जाए ताम्रपन्न हथिया लिया था और मतदाता उनकी यह हरकत नापसन्द करते थे । डा० रामसुभग सिंह ने भी कहा कि मतदाताओं को यह मालूम हो गया था कि बलिराम भगत ने दिल्ली में तीन मकान बनवा लिए हैं।" आपातकाल को लेकर सरकारी स्तर पर और व्यक्तिगत रूप में श्रीमती गाधी चुनाव में और उससे पूर्व चरावर कहती रही थी कि इस दौरान देश ने अभूतपूर्व उपलब्धिया प्राप्त की है । इन उपलब्धियों में यह विशेष रूप से बतलामा जाता था कि महंगाई कम हो गई है और लोगों को जरूरत की मभी चीजें, जो कि आपातकाल से पूर्व अक्सर मुनाफाखोर लोग बाजार से गायय कर दिया करते थे, उपलब्ध है। यदि आकड़ों को देखा जाए तो यह प्रचार भी व्यर्थ सावित होता है । आपातकाल के प्रारम में कीमती पर असर पड़ा था, किन्तु कुछ ही माहो वाद वै उसी गति से बेकाबू होने लगी थी, जिस गति में पहले रही थी। यही नहीं मैंने मामान्यत. दुकानदारो को उपेक्षा के साथ यह कहते भी मुना था कि 'हो गया, जितना होना था, अब आग कुछ नहीं होगा।' जाहिर था कि जिस भय की बुनियाद पर श्रीमती गाधी मुधार को व्यवहार रूप में लाना चाहती थी, वह कमश प्रभावहीन होता जा रहा या। हा, यदि भय या तो उन लोगों में जो मुक्त विचार रखते थे और जो इस निश्चित्त नतीजे तक पर चुके थे कि आपातकाल महज सता को बचाए रखने और सोप- तबीय स्वरो को कुचल डालने का एक राजनीतिक कुचक्र है-पोहे ही दिनों १०८:: दूसरी आजादी में लोगों ने यह भी समझ लिया था कि अव एक तानाशाही में जीते जाना ही उनकी नियति है। ऐसी तानाशाही जो पारिवारिक रूप से वाद में श्री संजय गांधी के हाथ पहुंचने वाली है। संसार के किसी भी देश के इतिहास में उसके राजनीतिक आकाश पर संजय गांधी की तरह उगनेवाले सितारे का प्रमाण नहीं मिलता। यह प्रमाण कोवल भारत ने ही दिया । बल्कि यों कहा जाना ज्यादा उचित होगा कि यह प्रमाण भारतीय जनमानस ने नहीं, उस तानाशाही ने दिया, जिसकी सुरक्षा में गैरजिम्मेदार व्यक्ति, ज्यादा गैरजिम्मेदारी और धांधली में पनपे । सामान्यतः वहुत-से लोगों के मुंह मैंने एक तर्क यह सुना है कि श्रीमती गांधी पूरी तरह से अंधेरे में रखी जा रही थीं और उन्हें मालूम ही नहीं था कि उनकी आड़ में संजय गांधी या उनके लेफ्टिनेंट क्या कुछ कर रहे हैं। इस तरह के तर्क देनेवालों के लिए चुनाव के बाद ब्लिट्ज़' के दिल्ली व्यूरो से ए० राघवन द्वारा लिखे गए निम्न शब्द काफी हैं : "प्रधानमंत्री को सबसे ज्यादा शर्मनाक हार खानी पड़ी। इसका मुख्य कारण यह है कि वह अपने उदंड वेटे के प्रति गहरी ममता संजोये रहीं और उसने जो कुछ हरकतें की, उन्होंने चुनाव-अभियान के आखिरी दिनों में उनका न तो विरोध किया और न ही उससे अपना नाता तोड़ा ।" ... दक्षिण में जहां संजय अपना दुष्ट प्रभाव नहीं डाल सके या इसके लिए उन्हें समय नहीं मिला वहां चुनाव में शासक पार्टी को अपूर्व विजय प्राप्त ".""श्रीमती गांधी अपने बेटे के भौतिक और राजनीतिक दुराचारों से घनिष्ठ रूप से परिचित थीं । हमें ऐसे बीसियों मित्रों और शुभचिन्तकों का पता है, जिन्होंने उनसे इस भयानक स्थिति में दखल देने की प्रार्थना की थी, लेकिन उन्हें वेगसी के साथ टाल दिया गया । इन्दिराजी की शह से संजय के पाप और भी बढ़कर गांधी और नेहरू को कांग्रेस को ले डूबे । 'ब्लिट्ज' का उपर्युक्त कथन मैने विशेष रूप से इस कारण उद्धृत किया है, क्योंकि नेहरू परिवार के प्रति लिट्ज़' के मन में भी कम ममता नहीं रही है, पर एक स्थिति ऐसी आई जव ब्लिट्ज़ को सचाई की विपली कड़वाहट लाचारी में उगलनी पड़ी और जैसे ही चुनाव-घोषणा हुई, वैसे ही आपातकाल १. निट्ज, मान २६, १९७७ दूसरी आजादी::१०६ और जन-मानस के उखडाव को लेकर उसने लिखना आरंभ कर दिया। आश्चर्यजनक किन्तु दु.सद सत्य यह है कि चुनाव में अपनी तानाशाही वी जबरदस्त पराजय के बावजूद श्रीमती इन्दिरा गाधी ने मंजय गाधी को लेकर कहा कि संजय पर दोप मढना व्यर्थ है। मैंने पूर्व मे आयिक उपलब्धियो या कुल देश के ही हर क्षेत्र की सामाजिक, सास्कृतिक, उपलब्धियों की बात की है. जिन्हें लेकर चुनाव में ढोल पीटा जाता रहा था कि बोट काग्रेस को ही मिलने चाहिए क्योकि देश ने बड़ी तरक्की की है । तरक्की किम तरह हुई, कसी हुई इसका लेखा-जोखा करते हुए 'ब्लिट्ज' ने लिपा-"इमर्जेंसी की घोषणा के दो दिन बाद ही प्रधानमंत्री ने अपने पहले ब्राडकास्ट में व्यवसायियों को अभयदान दे दिया। तव मे माधिक क्षेत्र में सरकार ने बडे व्यवसायियों को शक्तिशाली बनाकर उनकी आत्रामक शक्ति को बढाया ही। दूसरी तरफ अधिकारियो ने अनिवार्य बचत योजना, वोनम में कटौती आदि के जरिये मजदूरी और कर्मचारियों पर आक्रमण किया। "" और जैसे-जैसे इमर्जेंसी का वक्त गुजरता गया, उसका आयिक प्रगति का दावा खत्म हो गया और वह दरअसल दमन का हथियार बन गई। तमाम व्यक्तिगत स्वततताओ का दमन कर दिया गया ।" किन्तु इस दमन-चक्र में कुछ लोगों के हाथों में असीम शक्ति जा पहुंची यी। वे हाथ, जो राजनीतिक स्तर पर काग्रेस दल के नहीं, एक तरह से श्रीमती गाधी और सजय के निजी हाथ थे । इन हापों के जरिये ठीक हिटलरी पति से तानाशाही का चक्र चलता रहा था। सर्वयी वसोलाल, ओम मेहता, विद्याचरण शुक्ल के पास ऐसे विभाग थे, जिनके माध्यम से किसी भी देश का शासन-तन चलता है । इन उप-तानाशाहो ने उन्नीस माहों के भीतर आश्चर्य- जनक और अविश्वसनीय राजनीतिक करिश्मे किए। इमर्जेंसी के दौरान फिल्म उद्योग के साथ मूचना और प्रसारण मनालय कैसी-कैसी नाटकीय हरकतें करता रहा, इसका विवरण देते हुए ऑल इण्डिया फिल्म प्रोड्यूसर्स कौंसिल के अध्यक्ष जी० पी० सिप्पी ने एक वक्तव्य में ढेरों भारोप लगाए और प्रमाण दिए। श्री सिप्पी ने सेंसरशिप को व्यवसाय और कला के लिए 'दमघोट' नीति बतलाते हुए कहा था कि जब-जब फिल्म-निर्माताओं ने मेंसरशिप में दौल की माग की, तब-तब उन्हें और मादा तेज कैची या सामना करना पड़ा। यही नहीं, कई निर्माताओं को तो कुछ लोगों की "" .

११२:: दूसरी आजादी - पोंकि उनके व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन के बीच इतनी रहस्यपूर्ण वातें, घटनाएं या पोलें होती है कि जिनके भय से वे किसी भी पल मुक्त नहीं रह पाते । इस स्थिति का लाभ आपातकाल में सरकार ने खूब उठाया। इसका मजेदार उदाहरण है चुनाव के दौरान दैनिक समाचार पत्रों में पूरे-पूरे पृष्ठ के वे विज्ञापन, जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर श्री सुनीलदत्त और नरगिस दत्त ने दिया। पिछले पृष्ठों पर मैंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से अखवारों को दिए गए निर्देशों में जिन समाचारों का उल्लेख किया है, उनमें नरगिस-सम्बन्धी एक समाचार है। क्या यह माना जाना चाहिए कि चुनाव के दौरान उस समाचार को रोके जाने के बदले में कांग्रेस पक्ष का समर्थन करते हुए ऐसे विज्ञापन दिए जा रहे थे? इसके बावजूद फिल्म उद्योग के कुछ लोग जिस बुलन्दी और निर्भयता के साथ तानाशाही के विरुद्ध जन-मंच पर आए, उसकी सराहना करनी चाहिए। स्वतंत्रता के तीस बरसों में फिल्म उद्योग में यह एक क्रांति ही थी कि पहली बार उद्योग के कुछ लोग जन-मंच पर आकर सत्ता के विरोध में अपनी ईमानदार आवाज बुलन्द करें। खास तौर से उन स्थितियों में, जिनमें कि भारतीय फिल्म उद्योग सिर्फ रहस्यों की सुरंग बना हुआ है और उद्योगवालों को इनकमटैक्स, काले रुपये और उसी तरह के काले किस्सों के बीच किसी न किसी स्तर पर गुंथे रहना होता है। तानाशाही में कला और कलाकार को किस तरह हत्या की जाती है, इसका प्रमाण सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के उस निर्देश से मिल सकता है, - जिनके अनुसार कलाकारों के व्यक्तिगत कला-जीवन को भी मुक्त नहीं रहने दिया गया था। एक आदेश के अनुसार उनपर पाबन्दी लगा दी गई थी कि वे स्वतंत्र रूप से दिए जाने वाले किसी भी संस्था के पुरस्कार को न लें, न किसी ऐसे समारोह में जाएं। इस पावन्दी में आपातकाल के दौरान कौन-सा देशहित किया जा रहा था ? एक ओर श्री शुक्ल और उनका सूचना प्रसारण मंत्रालय फिल्म उद्योग में 1. "Shri Shukla was a curse on the Film Industry. Hc bchaved like a dictator. Disobeying his orders, was just likc a deathknell! He boosted non-entity Sanjay Gandhi in press, over radio and T.V. He imposed upon several film personalitics to participate in Sanjay Gandhi's rallies and Youth Congress programmes." (Film Information, 26 March, 1977) दूसरी आजादी::११३ निजी तानाशाही चलाए हुए थे, दूसरी ओर वे साहित्य और रंगमंच पर भी खासी दालन्दाजी कर रहे थे। जन-मच से होने वाले भापण ही नहीं, मागतिक कार्यक्रमी पर भी जवरदस्त पाबन्दी थी। इस पावन्दी के परिणामस्वरूप केवल वे कार्यक्रम हो पा रहे थे, जिनमे किमीन किमी रूप में तानाशाही या प्रचार किया जा सकता था। कलात्मकता लगभग नष्ट हो चुकी थी और विचार का मूल मानवीय स्तर ही समाप्त हो गया था। १९७४ में मैंने एक तीन अंकी नाटक लिया या विकल्प'। पाइलिपि को अन्तिम रूप देते-देते २६ जून को आपातकात प्रारभ हो गया। इस नाटक का पथ्य था आज की राजनीति में विखराव और दिशाहीनता की स्थिति । विरोधी और सत्ताधारी दोनों के ही भटकाव पर व्यग करते हुए मैंने जतलाया था कि बार-बार यह प्रचार करना कि देश के हालात खराव है झूठ है, सच तो यह है कि व्यक्ति के हालात पराब है । और दम खराबी का कारण देश नहीं, बल्कि हम है जो नैतिक मूल्यों को बिसरा बैठे है । इस नाटक के मचन और प्रकाशन दोनों ही केवल इस कारण खटाई में पड़ गए. क्योंकि इसमें राजनीतिक चरित्र या एक तरह से सत्ताधारियो के ढोग उजागर हुए थे, उसी तरह जिम तरह मामाजिक जीवन के अन्य ढोगियों के मुखौटे बतलाए गए थे। विमी दल- विशेप या विचार-विशेप का प्रचार न होते हुए भी नाटक कुछ मरकारी लोगो की राय में 'खतरनाक' करार दे दिया गया था। सुप्रसिद्ध नाट्य निर्देशक-लेखक और मेरे मित्र बजमोहन शाह को भी इग आपातकाल उर्फ तानाशाही का एक पट्टा अनुभव हुआ। ग्वालियर की एक नाट्य गस्था उनका 'युदमन' नामक नाटक उन्ही के निर्देशन में अभिनीति करने जा रही थी, किन्तु मेंसर आडे आ गई। चूकि नाटक भी पूरी तैयारी हो चुकी थी । लम्बी रिहमले की जा चुकी थी। हाल युक हो चुका था, अत. मंयोजक मस्या सासा धन व्यय कर चुकी थी। मैंसर ने जय उसपर कलम चलाई तो कुल नाटक का रूप ही विचित्र ढग से प्रभावहीन होकर रह गया। नाटक या फय्य था- युद्ध का विरोध और युद्धवादियो के अमानवीय हपकहो को उजागर करना। वहरहाल यह हुई आपातकाल को कलात्मक उपलधिया (')। एक १. विप' वा प्राशन, सरस्वती विहा' २१ दयानन्द मार्ग, हरिपागम, नई दिल्ली ११०००२, से हुआ है।

११४:: दूसरी आजादी .. उपलब्धि हुई वयोवृद्ध लेखक गुरुदत्त को। बहुत पहले उनका एक उपन्या 'मधु' प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास में उन्होंने चुनावी भ्रष्टाचार के वर्णन किया था। अचानक एक सुबह मुझे मालूम हुआ कि गुल्दत्तजी को मीस में बन्द कर दिया गया है। कारण? वह उपन्यास, जो उन्होंने बहुत पहले लिखा था। जीवन के सन्ध्याकाल में बैठे वृद्ध लेखक के साथ हुए इस बात पर मुझे ही नहीं, सभी बुद्धिजीवियों और कलाकारों को गहरी वेदना हुई उसने भी आगे बढ़कर यह समाचार मिला कि उक्त उपन्यास के प्रकाशक से एक लाख रुपया नकद की जमानत मागी गई है, ताकि आगे कभी वे उन तरह की (जिसमें कांग्रेसी भ्रष्टाचार की चर्चा हो) पुस्तक प्रकाशित करने का 'दुस्साहस' न करें। भयानक मानसिक यंत्रणा से भरे उस तानाशाही समय को लेकर काई लोगों से जब यह सुनने को मिलता है कि दुप्काल को दुःस्वप्न की तरह भुला दिया जाए तो तकलीफ ज्यादा गहरी हो उठती है । आथिक या भौतिक हानि को आदमी एक बार भुलाने की कोशिश कर सकता है, किन्तु समूचे मानस को अकझोर डालनेवाली कटु स्मृति उतनी सहजता से नहीं भुलाई जा सकती। अन्धेरगर्दी और अनवूम तानाशाही के समय में ही चुनावों को लेकर अटक- बाजियां शुरू हो गई थी कि अब संभवत: श्रीमती इन्दिरा गांधी चुनाव करवाएंगी । लाखों लोगों ने फुसफुसाहटों के बीच हैरत जाहिर की थी कि इन्दिराजी चुनाव करवाने की भूल कर सकती है ? मैं 'भूल' शब्द का जान- बूझकर उपयोग कर रहा हूं, क्योंकि मैं उस सामन्तवर्ग में नहीं था, जो जनता से हजारों मील दूर गलतफहमी में जी रहा था कि देश ने उपलब्धियों के ढेर कर लिए हैं; विरोध का गला दबाया चुका है और चारों दिशाओं में आनंद ही आनंद हो रहा है । मैं जनता के उस वर्ग में जी रहा था, जो उस अटकल- दौर में ही यह अच्छी तरह समझ सकता था, उन लाखों लोगों की तरह, जिन्होंने तानाशाही का भयावह आतंक देखा-भोगा था। लोग चुप थे और इन्दिराजी के संस्थाई मूवेदार समझ रहे थे कि लोग खुश हैं । लोग घुटे हुए थे । और १. 'मधु' का लापग्रेरी संस्करण राजपाल एण्ट सन्ज दिल्ली से प्रकाशित हुआ था, पोरेट संस्करण के प्रकाशक हैं-हिन्द पॉकेट बुक्स प्रा. लिमिटिट, दिल्ली-३२ ।

दूमरी आजादी :: ११५ और काग्रेस का म्याल था कि सब कुछ पा जाने के आनन्दातिरेय में उनके गले रंधे हए हैं। लोग वेचन थे और इन्दिराजी समल रही थी कि लोग वोट देना चाहते है । वयक्तिक स्तर पर जिन राजनेतानों वो आपातकाल की अमाप माक्ति से जेलों में यन्द कर रखा गया था, उन्हें मेकर ममझा जा रहा था कि जनता को उनमे लगाव नहीं है। कई लोगो को इमी तरह समझा जा - रहा था। चुनाव होंगे यह सुरमुरी राजधानी से मंभवत दिगम्बर, १९७६ में उठी और इस मुरमुरी को लेकर दबी-मुदी फुसफुसाहटें फैल गई। क्या श्रीमती गांधी नहीं जानती हैं कि चुनावी का मतलब होगा, काग्रेम का सफाया या जबरदस्त पराजय' या श्रीमती इन्दिरा गाधी यह ममता रही है कि लोगों ने तानाशाही तंत्र को स्वीकृति दे दी है ? या फिर इन्दिराजी अपने बेटे की मनमानियो मे परेशान होकर 'इस पार उम पार' का पल खेलना चाहती हैं या भीतरी तौर पर देश में गडबड शुरू हो गई है ? या अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर विदेशों में श्रीमती गाधी के लोकतनीय बुवाले तानाशाह रूप को पसन्द नही किया जा रहा है ? या श्री सुब्रह्मण्य स्वामी, श्रीमती लला फर्नाडिम और केदारनाथ मानी जमे विरोधी लोगों के विदेश पहुच जाने के कारण श्रीमती गांधी के तानाशाही तंत्र के कारण उनको बदनामी हुई है ? या फिर देश की समस्याएं भीतरी तौर पर जटिल हो गई है ? और या काग्रेस में भीतरी तोर पर गड़बह होने लगी है ? अथवा राष्ट्रीय स्वमेवक नघ के भूमिगत आन्दोलन ने तानाशाही को खोखला कर दिया है ? ये विभिन्न अनुमान, तर्क और कारण थे, जिन्हें लेकर चुनायो पर अटकलें नगाई जा रही थी। चुनाव होगे इस मुरमुरी के माय ही एक निश्चित राय गावों तक में मुनी गई थी कि श्रीमती गाधी ऐमी भूल करफ अपने-आपको उलझन में डालना नहीं चाहेगी, इसलिए चुनाव नहीं होंगे। विरोधी नेतामो को जेलो की कालकोटरियो में ही मडा-मडाकर मार दाना जाएगा। चुनार की खबर और अटवालवाजियों ने इतना जोर पकहा कि जनवरी, १९७७ प्रारभ होते-होते गृहमती श्री ओम मेहता ने एक वक्तव्य देकर देन को सूचना दी कि चुनावों को लेकर वेकार ही अनुमान लगाए जा रहे है। निकट भविष्य में ऐसी कोई स्थिति नहीं है । राजनीतिक पर्यवेक्षक चक्ति हो गए । विशेषकर इसलिए क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर गिरती भारत के काग्रेमी ११६ :: दूसरी आज़ादी शासन की प्रतिष्ठा देखते हुए पर्यवेक्षकों ने यही निष्कर्ष निकाला था कि बदनामी से उबरने के लिए श्रीमती गांधी चुनाव करवाएंगी। पर्यवेक्षकों ने और भी बहुत-से अनुमान प्रस्तुत किए थे और देश की आंतरिक स्थिति, कांग्रेस की भीतरी तौर पर दलगत स्थिति और निरंकुश जनता की ऊव इसी नतीजे पर पहुंचा रही थी कि श्रीमती गांधी अब चुनावों का आसरा लेंगी। थोड़े समय से कई नजरबन्द नेताओं की रिहाई और उनमें से कुछ के साथ हुई गुप्त वार्ता, चुनाव कमीशन को दिए गए सतर्कता-संकेत और कमीशन का कुछ सक्रिय होना, तथा कांग्रेस नेताओं के वक्तव्य, सभी कुछ से यह अनुमान लगाना कठिन नहीं रहा था कि श्रीमती गांधी संभवतः चुनाव करवाने का निर्णय ले चुकी हैं। पर ओम मेहता के वक्तव्य ने इन सारी अटकलों को मटियामेट कर दिया था। किन्तु श्रीमती गांची चुनाव क्यों करवाएंगी? क्या केवल अन्तर्राष्ट्रीय नर पर गिरती प्रतिष्ठा के कारण ? निश्चय ही ऐसा नहीं था। कम से कम निर्फ यही कारण नहीं था। मुझे लगता था कि यदि श्रीमती गांधी चुनाव का निर्णय लेती है तो केवल उपर्युक्त कारण से नहीं, बल्कि इस तरह की 'रिस्क' वे केवल इस लिए उठानेवाली होंगी क्योंकि अन्दरूनी तौर पर प्रशासनिक हालत खस्ता होने लगी हैं। मापातकाल के दौरान बड़ी-बड़ी उपलब्धियों का प्रचार करते भी अन्ततोगत्वा शासकीय स्तर पर यह स्वीकार लिया गया था कि कीमतें बढ़ने लगी हैं और कीमतें बढ़ने का कारण कपास, तेल या तिलहन की कमी न होकर उनकी सट्टेबाजी और कालाबाजारी है। इस सट्टेबाज़ी और कालाबाजारी और को बढावा कौन दे रहा था ? तानाशाही के दौर में पनपे अपने लोग और उनके अपने लोग। नौकरशाही और भ्रष्टाचार कई गुना बढ़ चुका था और इस सवपर काबू पाना सरकार के लिए ही कठिन होने लगा था। मजदूरों में बोनस के मामले को लेकर असंतोप बढ़ता जा रहा था तथा मिल-मालिक तालाबन्दी करने में जुट गए थे। भीतरी तौर पर कांग्रेस दल में ही आपातकाल हटाने की मांग उठने लगी थी और श्रीमती गांधी संभवतः महतूस कर रही थीं कि लोकतंत्र-कम-तानाशाही का यह डबल रोल बहुत लम्बा नहीं चलाया जा सकता। पुछ लोगों का अनुमान है कि श्रीमती गांधी मूलत: इस कारण परेशान थीं फि संजयवाद के उत्कर्ष ने कांग्रेस दल के भीतर खासा विद्रोह पैदा कर दिया दूमरी आजादी :: ११७ या। पुराने और तीये काग्रेसो श्रीमती गांधी की सत्ता और तानामाही में तो ज्यो-स्यो करके समझौता किए चले जा रहे थे, किन्तु उनमें से श्यादातर मंजय की राजनीतिक खुदाई को नही सह पा रहे थे। इस स्थिति को बहुत दिनों तक इन्दिराजी ने भीतरी वार्ताएं करके दवाए-हिपाए रया था, किन्तु बाद में वैमा कर पाना असभव हो चुका था तथा नन्दिनी सतपयी और उसके बाद मिदायं शंकर राय-विवाद ने काले दही की ये हाडी चौराहे पर ला फोड़ी थी। बहरहाल देशवाशियो ने अविश्वसनीय ढग से १९७७ को १८ जनवरी को रात में प्रधानमत्री श्रीमती गाधी का अप्रत्याशित सन्देश सुना, जिममे उन्हनि मार्च माह मे लोकमभा चुनाव कराए जाने की घोषणा की। इसी दिन थीमती गाधीने यह मूचना भी दी कि आपात स्थिति में ढील दी जा रही है, ताकि मान्य राजनीतिक दल चुनाव गतिविधियों में हिस्सा ले सके। अगले ही दिन दो प्रमुख नेताओं की रिहाई के समाचार जनता ने समाचार पत्रों में पढ़े। येथे सर्वधी मोरारजी देसाई और लालकृष्ण अडवानी। श्रीमती गाधी की उपर्युक्त घोषणा ने दर्व-रधे स्वरों को बोलने की स्वीकृति दी, हालाकि शंका, भय और आतंक से वस्त चेहरे उस समम भी परेशान दीखते थे, क्योकि आपात स्थिति में थोड़ी ढील' जिम्म या धुमावदार शब्द उन्हें सहज नहीं होने दे रहा था। इसके बावजूद महमूम किया जा रहा था कि अंधेरी लम्बी सुरग में अनायास ही कोई रोशनी की किरण उग आई है। लोकतंत्र या तानाशाही : चुनाव २३ जनवरी को जनता पार्टी के निर्माण की घोषणा हुई। इस पार्टी के तहत सगठन काग्रेस, जनगंध, भारतीय क्राति दल और सोशलिस्ट पार्टी एपन्न हो गए थे। उन्होंने एक सडा, एक निशान, एक विचार का निर्णय लिया था और घोपणा की थी कि उपर्युक्त चारो ही दलो ने जनता पार्टी में विलय का निश्चय कर लिया है। यह एक सनसनीखेज और तीयो पयर यो, जिम कारण मतदाता गभीर होकर इन सभी दलों के बारे में सोचने लगा था। वह पुरा पा कि इस राजनीतिक ध्रुवीकरण ने देश को राजनीति को एक निश्चित और स्थायी दिशा दी है, जब वह काग्रेस के विरल्प रूप में जनता पार्टी के बारे में सोच सकता था। 1 ११८:: दूसरी आजादी इस संदर्भ में विशेष उल्लेखनीय है लोकनायक जयप्रकाश नारायण का वह वक्तव्य, जिसे उन्होंने चुनाव-घोपणा पर हर्प व्यक्त करते हुए दिया था। । श्री नारायण ने कहा था कि विरोधी दल यदि एक होकर अपने-आपको एक- दूसरे में विलीन कर लेने पर तैयार होते हैं तब वे उनका चुनाव प्रचार करने को भी तैयार हैं। इसके साथ-साथ श्री नारायण ने स्पष्ट कर दिया था कि यदि वे ऐसा न करके अपनी-अपनी ढफली, अपना-अपना राग' ही अलापते रहेंगे, तव श्री नारायण चुनाव से अलग रहने के लिए बाध्य होंगे। इस घोपणा का सभी विरोधी दलों पर प्रभाव हुआ। सभी दल गत उन्नीस माहों के दमन-चक्र में यह पूरी तरह अनुभव कर चुके थे कि उन्हें यदि लोकतंत्र और अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो बिखराव की स्थिति त्याग कर एक होना पड़ेगा और उस निश्चित विचार के साथ जुड़ना होगा जो जयप्रकाश वाबू ने दिया है और जिसके अनुसार समग्र क्रांति का जन्म हुआ है। इसके साथ ही व्यक्तिगत स्तर पर अनेक विरोधी नेता महसूस करने लगे थे कि जनता उन्हें व्यक्ति-रूप में नहीं, विचारधारा के रूप में स्वीकार करने को तैयार है और यदि ऐसा नहीं होता तो किसी भी पल जनता ही उन्हें कचरे के ढेर फेंक सकती है। यही कारण है कि आम चुनाव में विजय के बाद जब जनता पार्टी के नेता श्री रामधन से धर्मयुग के उदयन शर्मा ने प्रश्न किया कि, "जनता पार्टी के अन्दर भी कुछ लोगों ने सत्ता-संघर्प का अजीबोगरीव खेल दिखाया। क्या इन प्रवृत्तियों पर काबू पाकर जनता पार्टी एकजुट रह सकेगी?" श्री रामधन ने उत्तर दिया, "जनता पार्टी एकजुट रहेगी. क्योंकि उसे एकजुट रहना पड़ेगा। जनता का दवाव इतना है कि वह पार्टी में दरार डालने वाले का राजनीतिक अस्तित्व भी खत्म कर देगी।" प्रकट है कि एक स्थिति यह भी थी। इस तरह लोकनायक के समग्र क्रांति 'दर्शन, देश की राजनीतिक चेतना, और जनमानस की अपेक्षाओं ने बिखरे हुए दलों को इस निश्चित विचार तक पहुंचाया कि ध्रुवीकरण का मार्ग ही देश और उनके अपने लिए श्रेयस्कर है। इस तरह स्वतंत्रता के तीस वर्षों बाद एक जबरदस्त राजनीतिक शक्ति भारत में तैयार हुई। इस शक्ति के सामने कांग्रेस को बाद, वेबुनियाद और गलत प्रचार ने घुटने टेक दिए । जनता पार्टी की घोषणा ने कांग्रेसी इन्दिरा खेमे में हड़बड़ी फैला दी। इस हड़बड़ी के बहुत-से कारण थे। एक बड़ा कारण था-आपातकाल में हुमा अत्याचार जोर तानाशाही बंधेरे का अनुभव, दूसरा उससे भी बड़ा कारण या . - दूगरी आबादी: ११६ एक न्यायिक तकं कि विरोधी दलों को चुनाव के लिए ममय बहुत कम दिया गया था। सहज ही था कि जन-साधारण ने एक निश्चित निष्पापं यह निकाला कि ऐसा जानबूझकर किया गया है, क्योंकि श्रीमती गाधी चाहती हैं कि विरोधी दलों को जनता तक अपनी बात पहुंचाने का अवसर ही न मिले। साधनहीन तो ये हैं ही। सहज था कि जनता को सहानुभूति इन सतागत बेईमानी के कारण जनता पार्टी की ओर जाए। तिसपर सबसे बड़ी बात थी राजनीतिक प्रवीकरण। इस बड़े काम ने देश को एक स्पष्ट नतीजा दे दिया था कि विरोधियों के पास निश्चित विचार और लक्ष्य है जिसने उन्हें एकमत करके तानाशाही के विरुद्ध खड़ा कर दिया है। उससे भी बड़ी युनियाद जनता पार्टी के पास थी, उसके नेताओ पर चलाया गया क्रूर दमन चक्र । इन भारी बातों के वाद घोषणा के तुरत वाद, लगभग दो सप्ताह के भीतर ही इन्दिराजी और काप्रेम इन स्थितियो की गभीरता को पूरी तरह भाप गए। जनता पार्टी और कानेम दोनो दलों के नेताओ द्वारा जन-मच पर यही जाने वाली बातों ने ही सिद्ध करना शुरू कर दिया था कि काग्रेस और श्रीमती गांधी का व्यक्तिगत प्रभाव किस लिजलिजी हालत में जा पहुंचा है। जयप्रकाशजी ने सबसे पहले एक वक्तव्य देकर जनता पार्टी के चुनाव- अभियान का प्रारभ किया और कहा कि यह चुनाव देश का निर्णायक चुनाव है और इसमें यह फैसला होने वाला है कि देश तानाशाही को चुनता है अथवा सोकतन्त्र को। मैं समझता हूं कि यह सम्पूर्ण चुनाव उपर्युक्त दोपक्तियों को बुनियाद पर ही हुआ और जनता ने मत भी इसी आधार पर दिए। देश मे धीमे-धीमे राजनीतिक चेतना और गोया हुआ विन्याम जाग रहा था। बार-बार विरोधी नेताभो को अपनी सभाओं में बहना होता था कि मतदाता भयमुक्त होकर मतदान करें। चनायो नारो मे पादा पोष्टर विरोधी दल की ओर से इस आशय के लगाए गए थे कि भय को निरालकर वोट हैं। एन चुनाव में विरोधी दल को एक बहुत बड़ी परेशानी यह आ रही थी कि आपातकाल के तानाशाही युग ने सामान्य जन को बुरी तरह भयभीत कर रया या। मतदान से पूर्व उसकी चेतना और बिखरे हुए विश्वास को बटोरना विरोधी दलो के लिए अत्यावश्यक हो गया था। घोषणा-पत्रो के दोरी में भी सिद्धातत: काग्रेस और जनता पार्टी को वातों पर मतदाता ने ज्यादा विचार किया। यह यो काग्रेसका यह पहना -- १२० :: दूसरी आजादी पिछले आमचुनाव की तरह ही इस बार भी विरोधियों ने खिचड़ी बनकर कांग्रेस को हराने का संकल्प उठाया है, और जनता को यह निर्णय करना है कि वह विभिन्न दलों से मिलकर बनी जनता पार्टी को वोट दे या कि कांग्रेस नाम की एक जमात को। श्रीमती गांधी अपने हर भाषण में दोहरा रही थी कि केन्द्र में स्थाई सरकार के लिए केवल कांग्रेस ही है, जिसे वोट मिलना चाहिए। देश के राजनीतिक स्थायित्व के लिए यह आवश्यक है और मतदाता को इसी आधार पर निर्णय लेना है, जबकि विरोधी दल का सबसे बड़ा नारा था. 'लोकतंत्र या तानाशाही-~मतदाता चुन लें कि क्या सही है, क्या गलत !' और मतदाता शांत भाव से दोनों ही पक्षों की बातें सुन रहा था। यह अपने-आप में विचित्र वात थी कि राजनीतिक दलों को जबरदस्त गहमागहमी के बावजूद मतदाता एकदम प्रतिक्रियाहीन बना हुआ था। हां, राजनीतिक स्तर पर दोनों ही ओर अपनी-अपनी तरह अटकलें लगाई जा रही थीं। जैसा कि पिछले हर भारतीय चुनाव में होता रहा था, मतदाता को लेकर निरंतर एक गलतफहमी राजनीतिक स्तर पर यह रही कि जिसका प्रचार जोरदार होगा और जो 'अपनी जोरदार हवा फैला सकेगा' वोट उसीको जाएंगे। हालांकि चुनाव के नतीजों ने बाद में यह राजनीतिक गलतफहमी बुरी तरह धो डाली कि 'मतदाता बुद्धि पर नहीं, प्रचार पर चलता है। प्रतिक्रिया का पहला चमत्कार उस समय हुआ, जब दिल्ली में रामलीला मैदान में जनता पार्टी की एक आमसभा हुई, किन्तु उससे पहले एक ऐसा राजनीतिक उलटफेर हुआ, जिसने कांग्रेस पक्ष को बुरी तरह लड़खड़ा दिया। यह उलटफेर था सर्वश्री जगजीवन राम, हेमवतीनन्दन बहुगुणा, नन्दिनी सतपथी आदि कांग्रेसी नेताओं का कांग्रेस-त्याग। इस त्याग का कारण था दल में आंतरिक रूप से लोकतंत्र की हत्या करना। स्पष्टतः यह तानाशाही के विरुद्ध लोकतंत्र की बगावत थी। बहुत-सी राजनीतिक उखाड़-पछाड़ और अटकलें लगनी शुरू हुई। यह कि श्री जगजीवन राम ने उस समय वैसा क्यों नहीं किया, जबकि देश पर आपात स्थिति के नाम से तानाशाही थोपी गई थी और बर्बर दमन तथा अत्या- चार चल रहे थे? श्रीमती गांधी ने बाबूजी के त्यागपत्र पर आश्चर्य और दुख प्रकट करते हुए कहा कि उन्हें जगजीवनराम से ऐसी आशा नहीं थी। यह भी कि त्यागपत्र देने के कुछ देर पूर्व श्री जगजीवनराम श्रीमती गांधी के पास बैठे - - दूगरी आजादी :: १२१ हुए देर तक बातें करते रहे थे और उस समय उन्होंने, उन्हें ऐमा कोई मौत नहीं दिया था। श्री जगजीवनराम ने इन मारे सवालों बोर राजनीतिक कुरेदनों का उत्तर वही साफगोई से यह कहकर दे दिया कि आपातस्थिति जारी करने के पूर्व मंत्रिमंडल में उनमे बिलकुल सलाह नही ली गई पी। वे कभी इस तानाशाही के समर्थक नहीं रहे और स्पष्ट शब्दों में राजनीतिक रूप में मौका देश रहे थे कि कब उन्हें इस सबसे अलग हो जाना है। आठ-दम दिन की गरमागरमी के बाद यह विवाद ठंडा हो गया और एक नई किस्म या भविष्य उभर आया, जिसके अनुमार काग्रेस को म्यिति एकदम दावाडोल हो चुकी थी और देशी. विदेशी ममो राजनीतिक ममीक्षक इस नतीजे पर पहुंच चुके थे कि यह चुनाव बहुत 'काटे का होगा और इसमें काम की पराजय नहीं हुई तो हालत यन्ना हो जाने की पूरी आशका है। रामलीला मैदान में एक विशाल बाम-सभा में भी मजय गाधी मापन करनेवाले थे। शहर में दम आगय की घोपणा करते हुए काग्रेग की ओर से पोस्टर भी लगाए जा चुके थे, प्रचार भी चल रहा था, पर अचानक एक परि- वनंन हुआ। उस बाम सभा में श्रीमती गाधी ने भाषण दिया और मजय गायब हो गए। यह घटना बहुत छोटी-मी थी, विन्तु दसगे मुलझ हा लोगो को यह समझने में तनिक भी दिक्कत नहीं हुई कि काग्रेस का बुराव अभियान ही नही, विश्वास भी लडखडा उठा है और भीतरी तौर पर श्रीमती माघी तथा उनका दल निरतर यह महसूम करने लगे हैं कि उनकी हालत गराय है। जब कि उसी मैदान में दूसरे दिन जनता पार्टी को आमसभा ने चुनाव के राजनीतिक भविष्य का आसार दिखाना प्रारभ कर दिया। म आमनमा में दस लाख से ज्यादा लोग पहुंचे और उन्होंने अत्यत शान्तिपूर्वक विभिन्न नेताजी के भाषण सुने । लोरनायक यी जयप्रकाश नारायण के अतिरिक्त इम ममा में सवयी मुरारजी देसाई, जगजीवनराम, अटलबिहारी वाजपेयी, हेमवतीनन्दन बदगुणा आदि अनेक नेता उपस्थित थे। सभवत, दोनो ही पक्षोभी और मे अब तक प्रतिक्रियाहीन बने रहे भारतीय मतदाता की यह मौन प्रतिक्रिया पी, निमने प्रकट करना प्रारंभ कर दिया था कि मतदाता जनता पार्टी के माप है। सबसे बड़ी बात थी, इस आममभा मे श्रोताओं द्वारा विरोधियों को चनार सहने के लिए धन दिया जाना। जब मच से यह अपील की गई हमारे पास चुनाव लड़ने के लिए पंसा नहीं है, अत. हम आपसे वोट भी पाहते है .

१२२:: दूसरी आज़ादी . और नोट भी चाहते है तब कहते हैं कि लोगों ने रुपये और रेजगारी की शक्ल में जितना बना, पैसा दिया। लगभग १ लाख तीस हजार रुपया इस आमसभा में जनता ने जनता पार्टी को दिया। यह एक विलक्षण घटना थी और इस घटना के कारण तानाशाही के अस्वीकार की मौन घोषणा मतदाता ने कर दी थी। अचानक कांग्रेस की रणनीति में आश्चर्यजनक बदलाव आया। निस्सन्देह ही यह बदलाव चुनाव का रुख देखकर हुआ था। ऐसे प्रमाण हैं कि भीतरी तौर पर कांग्रेस मे टिकट को लेकर कांग्रेस के पूर्व-इतिहास की ही तरह 'मारामारी' चल रही थी। मंजय गांधी की युवा कांग्रेस युवाशक्ति' के नाम पर बड़ी संख्या में टिकटों की मांग कर रही थी, जबकि बहुत-से पुराने बुजुर्ग नेताओं का विरोध भी किया जा रहा था। प्रारंभ की चुनावी शतरंज और श्रीमती इन्दिरा गांधी का व्यक्तिगत रुख, दोनों ही इस मामले में युवा कांग्रेस की ओर झुकाव प्रकट करते रहे थे। जिस तरह एक वर्ष में युवाशक्ति के नाम पर मंजयवाद पनपा था, और जिस तरह सत्ता की गुप्त सहायता उसके उत्कर्ष में महायक रही थी, उससे भी प्रकट होता था कि इस चुनाव के कांग्रेस टिकट संजयवादियों की जेब में श्यादा जाएंगे । यही आसार थे, जिनके आधार पर युवक कांग्रेस की अध्यक्षा श्रीमती अम्बिका सोनी ने 'दिनमान' को दी एक भेट में यह पूछे जाने पर कि "युवा कांग्रेस ने कितने स्थानों की मांग की है और विभिन्न प्रदेशों, विशेषकर दिल्ली से आपके कितने उम्मीदवार खड़े होंगे ?" कहा था--- "ठीक नंख्या का तो पता नहीं, लेकिन उम्मीद है कि हमें काफी टिकट मिलेंगे। दिल्ली में हम कम से कम तीन-चार उम्मीदवारों को खड़ा करना चाहेंगे।" पर श्री जगजीवनराम, बहुगुणा और सतपथी के अलग होते ही, जिस तरह दल से लोग निकलने लगे, उसने श्रीमती गांधी और वरुआजी को यह सोचने के लिए बाध्य कर दिया कि उन्हें 'टिकट-प्रसादम्' की नीति पर पुनर्विचार करना होगा। इस पुनर्विचार का परिणाम था, युवा कांग्रेस के 'डिक्टेशन' का नई रणनीति के साथ ही हवा में उड़ जाना। अब नई रणनीति के अनुसार कांग्रेस के उपेक्षित वूड़ों की कद्र शुरू हुई। इस कद्रदानी का एक कारण और भी था। यह सोचा जाने लगा था कि हर बूढ़े कांग्रेसी का १. दिनमान, ६-१२ फरवरी, ७७ . दूसरी बाजादी :: १२३ अपने इलाके में निजी प्रभाव है और अब कांग्रेम को अपनी गुडविल में स्वादा व्यक्तियों की गुहविल पर लहना होगा। परिणामत: कुछ रापसानो को त्यागपत्र दिलवाफर चुनावी मैदान में उतारा गया, कुछ यूगों को मरस्लोगों लिया गया। हालाकि चुनायी राजनीति का एक टटपुजिया हथकण्डा पाप्रेम ने गोहाटी अधिवेशन में भी शुरू कर लिया था, जिसके अनुसार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को पुन. दुलराया जाने लगा था। यह दुलार इन माडे वन पर काम आया (क्तिना आया यह तो चुनाव-मविष्य ने गामने रिया) पर काग्रेन में तुरत कम्युनिस्ट पार्टी के साथ चुनावी-गटजोड कर लिया। इस मौके पर कम्युनिस्ट पार्टी भूल गई कि थोड़ी देर पहले ही उसके अनुसार पान में मी० आई० ए० ऐजेण्ट घुम हुए थे और काग्रेस भी भूल गई कि अवाय में उसने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का मत्य बगाना या कि स्वाधीनता-आन्दोलन में उन्होंने गद्दारी की थी। ये तोको और न मोरने ठौर" वाली यहानी गजं यह कि काग्रेसी मेमे ये हतामा का दौर शुरू हो गया, जबकि विरोधी जोरशोर और लगन मे जनमत का प्यार अजित करते जा रहे थे। बहुत कुछ कारण काप्रेम के घोषणा-पत्र का खोखलापन भी था, जिममै पूर्व-उपलब्धियों का स्मरण दिलाते हुए आर्थिक विकास का आश्वासन दिया गया था। यहा गया था कि काग्रेस पूर्व-निर्णय के अनुमार गरीबी हटाने, विषमता मिटाने और न्याय ममाप्त करने के लिए कृत-मरल्प है। मुम्मरण आता है कि घोषणापन्न की ये बातें या शरद-विशेप पहकर मैं और मेरे तीन-चार मित्र देर तक मते रहे थे। हंसने का कारण था--अन्याय मिटाने, गरीवी मिटाने और पूर्व-उपलब्धिया गिनवाने वाला ब्योरा"क्योकि वोते हुए १६ माही ने हर इम शब्द के विरद काम करके जतला दिया था कि कागज पर जितनी बागानी में मद लिये जा सकते हैं, उममे वही स्वादा मामानी से इन सब पर पुनाई भी यी जा सकती है। हतागा का दौर ही था जो काग्रेमी नेताओं से मजलून याने कलवाने लगा। उत्तेजना. उखड़ाव और आवेश में श्रीमती गाशी में विरोधी दल पर बेतुफै आरोप करने शुरू कर दिए । टीक उसी भाषा जिस भापा मेनगे पूर्व । १. एक मारगीय रहावत, विसा अर्थ है-दो सापारों समझोडा, निमें अन्दर। नहीं समोता नहीं हो सका।

१२४ :: दूसरी आजादी श्री जयप्रकाश नारायण के अहिंसात्मक आन्दोलन से घबराकर वह कह बैठी थीं.--"श्री मिश्र की हत्या एक बडे निशाने का पूर्वाभ्यास है!" इस बार चुनाव सभाओं में वे कहने लगी थीं-"मुजीबुर्रहमान और उनके परिवार के सदस्यों के साथ क्या-क्या जुल्म नहीं हुए, क्या विरोधियों की नीयत इस देश में वही सब करने की है ? और यदि है तो उन्हें यह बात खुलकर करनी चाहिए ! इस तरह की बेबुनियाद बातें वर्दाश्त नहीं की जा सकती!" अपरोक्ष रूप से श्रीमती गांधी एक तरह से यही प्रचार करने लगी थीं कि विरोधी उनकी हत्या करना चाहते हैं ! इस उथले ढंग की वेसिर-पैर वाली वाले लोगों की संवेदनात्मक सहानुभूति जगाने के इरादे से कही जा रही थीं। परन्तु उलटा ही असर हुआ। विशेप रूप से उस स्थिति में जब विरोधी दलों के नेता उन्नीस महीने तक भयानक यंत्रणाएं भोगकर जेलों से निकले थे और उनके कई कार्यकर्ता अपनी जान खो बैठे थे। यह ऐसे ही था जैसे भेड़िया आया', 'भड़िया आया' का शोर मचाया जाए। यही नहीं, उन्होंने कहा कि जनता पार्टी को लोकतंत्र में कोई आस्था नहीं है। उसमें साम्प्रदायिक और तोड़फोड़ करने वाले तत्त्व हैं। मगर ये सारी बातें करते हुए श्रीमती गांधी यह भूल गई थीं कि १६७१ के चुनाव की तरह अब भूठे प्रचार का जादू काम नहीं करने वाला है और यह भी कि यह प्रयास करने के बाद उन्नीस महीनों की तानाशाही में भारतीय मतदाता यह तमाशा भी देख चुका था कि दमन, हिंसा, आतंक और अन्याय में किसका विश्वास है । कुल मिलाकर यह कि इस बार कांग्रेस के पास अपने विरोधी को काटने के लिए न कोई तर्फ रह गया था, न कोई कारण और न ही कोई प्रमाण । इसके विपरीत विरोधियों के पास कहने के लिए बहुत कुछ था और जनता को समझाने के लिए बहुत कुछथा। श्रीमती गांधी ने २८ फरवरी को बिहार में अपनी चुनाव-सभा में कहा- "आज जो लोग हमार तानाशाह होने का आरोप लगा रहे हैं, वे एकदम झूठी और वेबुनियाद बातें कर रहे हैं। यदि यह बात सच होती तो भाज चुनाव नहीं होते। चुनाव करवाने का मतलब ही है कि लोकतंत्र में हमारी भास्या है।" किन्तु श्रीमती गांधी इस सत्य को कैसे नकार सकती है कि हर तानागाही की बुनियाद लोकतंत्रीय विश्वास को लेकर ही पड़ती है। जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ हिटलर का पर्मनी की सत्ता में आगमन एक लोकतंत्रीय पद्धति से ही हा था। उसने सत्तारूढ़ होते ही क्रमशः तानाशाही व्यक्तित्व उजागर किया ।

दूमरी आवादी : १२५ और उसपर जनता की स्वीकृति-मोहर लगवाने के लिए लौरतन पाआरम्पर बनाए रखा। यही नहीं, हिटलर ने क्रमश: १९३४, १६३६, १६३. और १६३६ मे आमचुनाव करवाकर अपनी तानाशाही सत्ता को लोरतवीर सरकार का जामा पहनाए रखकर जन-स्वीरति प्राप्त की थी। इन ऐतिहासिक सत्य के बाद श्रीमती इन्दिरा गाधी या तक एकदम बोदा साबित हो जाता है कि वह तानाशाह नहीं है। काग्रेस प्रारभ से ही सत्ता में रही थी अत. प्रचार-पक्ष की दृष्टि से उसके पाम गर्वाधिक साधन थे। ये साधन पिछने चुनावों में हमेशा ही कारगर मिड हुए थे । शक्तिशाली आर्थिक बुनियादवाली इस गंस्था के साथ प्रचार की ये सभी मुविधाए उपलब्ध थी, जो दूसरे दलों के पास कभी भी नही रही थी। पर इस चुनाव में प्रचार की साधनहीनता के बावजूद जनता पार्टी का जितना जोर देया गया, उतना पिछले चुनावों में काग्रेसो प्रचार और मत्तामकिन के यावजूद नहीं देखा गया । चुनाव के नतीजो ने भी यह साबित कर दिया कि अव जन-धेतना प्रचार के आधार पर निर्णायक थुद्धि नहीं यनाती। गणेश मत्री ने अपने एक लेख में लिखा-"१९७७ के पनाय-परिणामो ने कम से कम हिन्दी भाषा-भाषी क्षेत्रो में एक बात और म्पष्ट की है । यह कि सिर्फ प्रचार के बूते पर लोगो का मन नहीं जीता जा सकता।" गत चुनावो में प्रचार के दल-बूते पर बहुत-मे राष्ट्रनेताओं की तगवीर घुधली करने की कोशिश की गई थी और कुछ हद तक सफल भी रही थी, किन्तु इस बार वह स्थिति नहीं रही। मनी ने इसी लेप में आगे लिखा- "पूरी आपात स्थिति के दौरान लोकनायक जयप्रकाश नारायण, सबंधी जाज फर्नाडिस, अटल बिहारी वाजपेयी और अन्य प्रमुख विरोधी नेतामा के विरुद्ध एकतरफा धुआधार प्रचार हुआ, पर आपात स्थिति में दील मिलते ही यह स्पष्ट हो गया कि सारे प्रचार से लोकनायक जयप्रकाश नाराया तथा उनके अन्य मह्योगियो-नेताओं को प्रतिभा धुघली नहीं हुई है, वग्नुत यह पहले से अधिक उज्ज्वल हो गई है।" पहा यह उदाहरण दे देना भी आवश्यक है कि व्यक्तिन र राज- नेताओं को किम तरह इन्दिरा सरकार के चापलूस लोग बदनाम करने में संगे हुए थे। नया जीवन में टिप्पणी करते हुए उसके सम्पादक ने निगा-"गाक. १. धर्मयुग, ३ अर्बम, १९७७ १२८ : दूसरी आजादी । दिया है कि क्या जनता पार्टी तथा कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी के पास कोई रचनात्मक कार्यक्रम भी है या उनके अस्तित्व का आधार केवल विरोध है ! यदि जनता पार्टी का आधार केवल विरोध है तो वह विरोध की बेंचों पर ही क्या बुरी है ? उसे सत्ता में क्यों भेजा जाए ? वास्तविकता यह है कि सत्ता की अपनी शत होती हैं, जिनसे कांग्रेस पार्टी ज्यादा अच्छी तरह परिचित है।" यही दिनमान' (२७ मार्च-२ अप्रैल का अंक) सम्पादकीय में प्रकाशित करता है.-"१६ महीने के दमन के विरुद्ध जनता ने दलों को एक होने और कांग्रेस का विकल्प देने को बाध्य किया। वे एक हुए क्योंकि उन्होंने वक्त का तपाज़ा पहचाना..." मुझे लगता है कि सामान्य जन और तीव्र घटनाभेदी दृष्टि की पत्रकारिता में यही अन्तर है कि अगर जनता १६ महीने के दमनचक्र में 'बयत का तगाजा' पहवानी तो 'दिनमान' ने सिर्फ मार्च महीने भर में (यानी २७ फरवरी और २७ मार्च के बीच) 'वक्त का तकाज़ा' पहचान लिया। 'वयत के तकाजे' की पहचान का कमाल यह है कि वही 'दिनमान', जिसके अनुसार २७ फरवरी के अंक तक कहने के लिए ये शब्द थे- "सत्ता की अपनी शर्त होती हैं, जिनसे कांग्रेस पार्टी अच्छी तरह परिचित है या कि जनता पार्टी और कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी का कार्यक्रम निषेधात्मक है अचानक बदलकर ३ अप्रैल के अंक में नियमानुसार हो गए-आजादी के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि देश को 'लोकशाही' को लोकसत्ता में सही प्रतिनिधित्व मिला है । या जनता पार्टी के विशाल समूह में निश्चित ही ऐसा माननेवालों को कभी नहीं है, जो कहते हैं कि लोकशाही को स्थापना के लिए निहित स्वार्थों से लड़ाई फी सच्ची शुरआत अब हुई है। यह सचमुच एक तकलीफदेह सच है कि औसत हिन्दी समाचारपत्र 'वक्त के तकाजे' के अनुमार लियते-छपते रहे। इस प्रांतिकारी लड़ाई को, जिसे आज प्रांति के रूप में होल वजा-बजाकर वही लोग गुना रहे हैं, कभी इसीको फोबल अराजकता और देशघाती पड्यंत्र निरूपित करते रहे थे। यह एक कड़वा सन है कि कांति के गौरवशाली इतिहास में स्वर्गीय गणेशशंकर विद्यार्थी, मागनलाल चतुर्वेदी या रवीन्द्रनाथ ठाकुर जैसा कोई भी नाम नहीं है। इसका सेहरा बुद्धिजीवी के सिर नहीं, बल्कि उस तथाकथित अशिक्षित' के सिर है, जिन बुद्धिवाद के थोचे दपं में हमेशा ही उपेक्षित किया जाता रहा है । यही नहीं, इस मांति ने यह भी सिद्ध कर दिया है कि निरक्षर होने का मतलब अशिक्षित होना नहीं होता। शिक्षा किताबों से नहीं, सिद्धांतों, विचारों और - दूसरी मावानी:: १२९ मस्कारो से मिलती है। और इसो कठोर यपायं की देन था यह माहौल जिगे इन्दिराजी और उनकी काग्रेस चुनाव में खेल रही थी। इस चुनाव ने यहुतों के नेहरे उजागर किए। विशेपकर भारतीय कम्प निम्ट पार्टी का यह चेहरा जिसपर कहावत लाग होती है-मुंह मे राम यगल में एरो। इम पार्टी ने अपने घोषणा-पत्र में बड़ी दोहरी वाते की और मुझे लगता है कि उनके दोहरेपन को इन बातों मे ही यूर अच्छी तरह समझा जा सकता है और शायद चुनाव में समझा भी गया। मम्युनिस्ट पार्टी ने दावा किया कि उसने सदा हो नकारात्मक प्रवृत्तियों का विरोध किया है। मुझे खूब याद है कि आपातकाल लागू करने बाद भारतीय कम्युनिस्ट ही थे, जो आगे बढकर कह रहे थे- -पही सही है। यही होना चाहिए था। दल ने प्रजातान्त्रिक शक्तियों के विरुद्ध विभिन्न कानूनों के उपयोग भगा विरोध किया, यह भी घोषणा-पत्र में कहा गया था, जबकि यही दल था जिमने मविधान में मशोधन ही नहीं, उममे आगे वरकर सम्पूर्ण गविधान को हो समाप्त करके 'नव रचना' का नारा लगाया था। पोपणा-पत्र ने जनता को मूचना दी कि अनेक राज्यों में उसके मायकर्ता जेलों में पड़े है। यह बहुत बड़ा झट था। सच तो यह है कि थोमतो गाधी की तानाशाही कम्युनिस्ट पार्टी के कन्धो पर चढ़कर ही मारे देश में घूम रही थी। अपने कन्धो यो भना काग्रेस से काट सकती थी और जब गजय गाधी ने यह गलती को तो तुरन्त 'यवन का तकाजा' समझकर काग्रेग ने चुनाव-अवसर पर उसे सम्भाल लिया हालाकि यह दोस्ती भी काम को कम महगी नही पटी। काम और कम्युनिस्टों मे मीटो का बटवारा बडी स्टा-राटी के यार हुआ और जिम तरह हुआ, वह भी अपने आपमे विचित्र या। चुनाय के दिनो, मैं मध्य. प्रदेश के उत्तरी क्षेत्र के वहन-मे गावो-शहरो में रहा और मैंने काग्रेग-वम्युनिष्ट- दोस्ती का चमत्कार-दर्शन भी किया। ग्वालियर पी लोकसभा सीट पर ममाजवादी और गरीबपरम्त काग्रेग ने इटक के एक नेता को (जिन्हें बिरलाजी का भरपूर म्नेह-सहयोग प्राण बताया जाता है) अपना उम्मीदवार यनाया था। चूकि उक्त काग्रेमी उम्मीदवार मजदूर नेता था. अत कम्युनिष्टो ने तुरत अपना उम्मीदवार अट्टा दिया । जय मैंने यह जानकारी की कि ऐमा यों हुआ है और दोस्ती' में यह किम तरह मा न्याय है तो एक मनिट ने यतलाया, यह तो हमारे अन्तिस्य या प्रश्न है, माहा! मेवर यूनियन में हम लोग वाम को समर्थन देने लगे तो हम होय गर १३० :: दूसरी बाज़ादी मेरा प्रश्न था, "क्या इसपर कांग्रेस पक्ष से एतराज नहीं हुआ ?" "हमा होगा, पर यह हमारा फैसला था!" "मगर सोचिए, आप लोग आपस में एक-दूसरे के वोट काट लेंगे तो जनता पार्टी का उम्मीदवार जीत जाएगा!" "जीत जाए !" उपेक्षा से वह कम्युनिस्ट वोला, "कम से कम लेवर यूनि- यन में तो एक असर रहेगा कि साहब कम्युनिस्ट अलग हैं, कांग्रेस अलग हैं। भगर कांग्रेस को अपना उम्मीदवार जिताना था तब यूनियन के आदमी को टिकट न देती।" "पर यह तो बिल्लीवाली मसल हुई।" मैंने कहा, "खाए नहीं तो लुढ़का - “यही समझ लीजिए !" उन्होंने उत्तर दिया और चलते हो गए। तो यह थे तानाशाही के कन्धे, जिनपर केवल मीठे वायदों, ऊपरी वक्तव्यों और दोस्ती के इजहारों का मक्खन लगा हुआ था जिसपर सवार होकर हर कदम के साथ कांग्रेस फिसलती रही थी। पर इस चुनाव में कन्धे रोल तो अदा कर रहे थे, किन्तु अर्थी के लिए। चुनाव-वातावरण में जैसे-जैसे तेजी आती गई और कांग्रेस ने महसूस किया कि १९७१ को "इन्दिरा गांधी (आंधी) अब काम नहीं कर पा रही है, तब छोटे से बड़े नेताओं तक ने हल्की और सस्ती भाषा में ओछे आरोप लगाने शुरू कर दिए। इसका मतलब यह विलकुल नहीं है कि ओछी बातों का उपयोग जनता पार्टी या और दलों की ओर से नहीं हुआ, किन्तु यहां में केवल यही कहना चाहता हूं कि हल्के स्तर पर अगर हल्की बात होती है तो वह इसलिए क्षम्य है क्योंकि उस तरह की बात करनेवाला एक महत्त्वहीन या नामहीन आदमी होता है। किन्तु जब इस तरह की वात अखिल भारतीय नेता स्तर पर होती है तो निस्सन्देह ही एक बुरी बात है। उत्तेजित और बौखलाए हुए बंसीलाल ने तो यहां तक कह डाला कि जगजीवनराम दो फोड़ी का आदमी है। उत्तर में जगजीवनरामजी ने भिवानी (हरियाणा) पहुंचकर एक जनसभा में कहा- श्री बंसीलाल कहते है कि जगजीवनराम दो कौड़ी के आदमी हैं, सो मैं उनके चुनाय-क्षेत्र में यह देखने जा रहा हूं कि बंसीलाल कितने करोड़ के आदमी है। कुछ-कुछ इसी तरह की बातें लोकनायक जयप्रकाश नारायण, मुरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी आदि के बारे में कांग्रेस के बड़े नेता जनता के बीच करते रहे, परिणाम हुआ लोगों पर यह असर कि अब कांग्रेस जैसी पुरानी । ।

दूसरी माजादी :: ११ और आदर्शवादी मस्या अपना विगत भूलकर हिलरपन पर तर आई है। जय कि विरोधी नेता पूर्णत. मयत थे । मुझे दिल्ली में हुई 'बोट क्लब' की एक आमसभा में दिया गया थी अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण याद है, जिसमें उन्होंने अपनी सभा से कुछ देर पहले ही ममाप्त हुई श्रीमती माधी मी आम. समा के बारे में यह सुनकर कि लोगो ने हल्लड़वाजी को पी. जनता को फटकारा। उन्होंने कहा कि यदि आप कांप्रेस को सभा को सुनना नहीं चाहते. तब उन सभाओं में आपको नहीं जाना चाहिए। अगर पदि भाप जाते हैं. सन मापको उस सभा में विघ्न नहीं डालना चाहिए। मागे ऐसी कोई बात हुई तो मैं अनसन फहंगा । श्री वाजपेयी ने अपरोक्ष रप से यह भी चेतावनी दी कि विरोधी के लिए जनता का ऐमा उत्तेजनापूर्ण ममर्थन एक स्थिति पर आपर उन्हींको (विरोधियों को) बदनाम करने लगता है. जिनका समर्थन करनेवाला है।थी वाजपेयी ने जिस तरह लोगो को लताड शिलाकर मही नागरिक सम्म पालन के लिए कहा, उम सयको सुनते हुए भी श्रोता मात बैठे रहे। उन्हें भूल का महमाम भी हुआ होगा. किन्तु वाजपेयीजी को मात और मिष्ट सलाह के प्रति सम्पूर्ण आम्या और विश्वास रखते हुए मैं यह कहना चाहगा कि ऐमी स्थितिया लोक्तव मे पैदा करने का दोषी कोन है ' यदि लोग हल्लहवाजी करते हैं. वैचारिक विरोध को व्यक्तिगत विरोध बनाकर टोरा-टिपनी प्रारम करते हैं तो इन संस्कारो का दाता कौन होता है। मुझे लगता है कि जब जन- मच पर पडे होकर नेता ही हल्की बातें करते है, तब उस तरह की हली प्रतिक्रिया को कैसे रोका जा सकता है। जनता से पहरे ग कटु सत्य को नेताओं द्वारा पहचाना और ममझा जाना जरूरी है। प्रचार की इस स्थिति का एक पहलू और पा--जिम्मेदार लोगों द्वारा गैरजिम्मेदाराना वातें करना। मतदाता का रण देगर वोयनाहट मदन तरह की बातें काग्रेसपक्ष मे श्यादा हो रही थी और वातावरण को उनरे अपने हो विन्द बनाती जा रही थीं। काग्रेस अध्यक्ष श्री देवकान्त वात्रा ने चीन में घोषणा कर डाली कि वाम मसदीय दल दी नेता श्रीमती गाधी ही होगी। इस घोषणा ने न मिफं श्रीमती गाधी के व्यक्तित्व को चोट पहचाई, लि एक तरह में गवाही ही दे डाली कि काग्रेस मस्या भीतर में उमी तरह सी ताना- माही मेल रही है. जैसी कुछ दिनों पहले देगल चुका है। मामामत उग समय लोगों को इस वक्तव्य पर मजाहिया टिपणी करते मुना-देगा। युट लोग कहते थे कि किसी लोकतानिक दन का अध्यक्ष बिना पनाय दम, ऐसे १३२:: दूसरी आजादी ! । घोषणा कैसे कर सकता है, और कुछ लोग कहते थे कि बरुआजी एक अस्तित्व- होन अध्यक्ष है, जो श्रीमती गांधी को पाठपुतली बने हुए हैं। उनका तर्क था कि यदि ऐगा न होता तो श्री बरुआ यह गयों कहते-मैं जब भी कोई निर्णय लेता हू तो श्रीमती गांधी को सलाह पर ही लेता हूं ! यह वहस की बात है कि श्री देवकांत बगा किन शब्दों में और किरा तरह बात करना या कहना चाहते धे और वह किग तरह लोगों तक पहुंची, पर इतना सच है कि बड़े-बड़े नेता आयेण में यह बोलते रहे, जिसे बोलने की आवश्यकता नहीं थी। और जैसाफि होता है, ज्यादा बोलना, पयादा खतरनाक है, कांग्रेसियों के साथ हुआ। तिस पर का गाई नेता जनता से हाथ जोड़कर माफीनामा भी पेश करने लगे कि इमरजेंसी में जो गलतियां और ज्यादतियां हुई हैं, उनके लिए उन्हें क्षमा कर दिया जाए इस तरह के माफीनामों और हाथजुदाई ने मतदाता के सामने उनको निश्चित तौर पर अपराधी साबित कर दिया। विरोधी मंच से कांग्रेस को लेकर जब-जब जितना कुछ कहा गया था, वह प्रमाणित हो गया। सरकारी स्तर पर यह घोषणाएं भी हुई कि आपातकाल में जो-जो ज्यादतियां हुई हैं, उनकी जांच सी जाएगी तथा दोपी व्यत्तियों को दंडित किया जाएगा! लोगों के गोचने का रण बदला। एक नया तर्क उनके दिमाग में आया कि उन्हें राजनीतिक रिश्वत दी जा रही है और उनसे किसी तरह वोट हथियाने का प्रयत्न हो रहा है। कुछ लोग तनं करते सुने जाते थे कि कांग्रेस सरकार ने हमने पहनेग तरह का वातव्य क्यों नहीं दिया ? ग तरह के आश्वासन जनसभाओं में स्वयं श्रीमती गांधी ने ही नहीं, कई काग्रेस नेताओं ने दिए और यह प्रमाणित हो गया कि ज्यादतियां हुई हैं। जनता के जिस बड़े वर्ग से 'गेसर' को ताकत के कारण ज्यादतियां छिपी हुई थी, उगने उन्हीं लोगों के मुह यह स्वीकार सुना कि ज्यादतियां हुई हैं। तव भवनेश्वर की आमराभा में श्रीमती गांधी का यह कहना कि विपक्ष ठ बोलता है.....एगादम बेतुका हो गया। श्री गंजय गांधी ने बेहद हलो और बचकाना शब्दों का प्रयोग करते हुए मुलतानपुर की एक आमसभा में माह डाला कि जनता पार्टी एक ऐसा रथ है, जिरी पार धोरे नहीं, बलि चार गधे खींच रहे हैं और बहुत-सी छोटी-मोटी पार्टियां उनसे बोड़ों की तरह निपटी हुई हैं। इस टिप्पणी का परिणाम हुआ गंभीर और शिष्ट लोगों के दिमाग में एक माशंका का आ जाना कि कांग्रेस ने जिग रूप में संजय गांधी को उठाया है और एक तरह से वादशाहत के उत्तरा- - दूमरी आजादी: १३३ धिकारी या शहजादा' बना रखा है क्या इमी तरह की जन्दावनी में का नेतृत्व करेंग! आश्चर्य और दुख को बात है कि काप्रेम संस्था में बैठे तीम साला राजनीतिक करियरवाले लोग चुपचाप यह मय मुनते रहे, किन्नु धिमीने हिम्मत न की कि मंजयजी को इस तरह की भाषा का प्रयोग परने मे रोक। स्थिति यहा तक पहुची कि वे लोग. जो कभी मंजय गाधी को उटाए-उटाए एम रहे थे और 'वाह मरकार' 'जी गरीवपरवर' पहने थे, इस कोशिग में लग गए कि मजयजी को चुनाव-यात्रा में वही उनका चुनाव म्टेशन न बा जाए । यही कारण था कि चुनाव के बाद एक बड़े काग्रेसी नेता ने कहा कि मजप गाधी के दौरों ने भी हर उस इलाके में काग्रेस उम्मीदवार का प्रभाव पराय पिपा, जहां-जहा वह जाते रहे । वमीलाल की भी यही स्थिति थी। उम्र, पर, कामं मभीको भूलकर वह आमसभाओं में ऐमी उत्तेजित और अमन्तुलित भाग पा उपयोग कर रहे थे कि मतदाता भडक जाता था। हरियाणा के एक बड़े नेता ने फरमाया-"एक केन्द्रीय नेता हरियाणा में जव-जव पहुंचे, तब-तब मायनी उम्मीदवार के दस हजार बोट कम हो गए।" १३ अप्रैल के टाइम्म आफ इण्डिया' ने लिया--"हरियाणा के मुख्यमन्त्री श्री बनारमोदास गुप्त ने कहा कि केंद्रीय नेता की माग थी कि उनकी हर गमा में कम से कम एक लारा श्रोता होने चाहिए। इन श्रोताओ को एकत्र करने की कोगिरा में हमे कई लोगों को नाराज करना पडा । जिनमें पुलिमयाले, गरकारी अफ. मर और ठेकेदार थे। उनकी गाडिया काग्रेस दल के लिए उपयोग करनी पड़ी।" राजा-महाराजाओ को लेकर पाप्रेस पिछले दम सालो मे गोर मनानी रही थी कि उनके प्रिवीपमं गलत है और ममाजवाद में सामन्तवाद पी पोई गुजादश नही है। सामन्त जननेता नहीं होता, पिलु देगा गया कि इन मनाय में बहुत मे काग्रेस टिक्टि उन राजा-महाराजाओ को ही गए है या फिर उन्हें स्वतन प्रत्याशी के रूप में कांग्रेस पार्टी समर्थन दे रही है। रोवानरेश मानंण्ड सिंह, ग्वालियर के महाराजा माधवराव मिन्धिया, महाराजा देव, माई नाम लोगो के मामने थे। एक महाराजा के चुनाव-शेत्र में तो मैंने देगा किसाग और इन्दिराजी के अधिनायकवाद की विरोधी नहर पाकर महाराजा ने पाम समर्थित होते हुए भी जनता के मामने गिडगिडाना शुरू कर दिया कि मही नहीं कांग्रेस से उनका कोई लेना-देना नहीं है । सच तो यह है कि कांग्रेस उनान धाहने पर भी जबरदस्ती उनका समंथन कर रही है ! हम तरह पीम्पिनियों के कारण भी काग्रेस को भद्द हुई।

१३४ :: दूगरी आजादी श्री मुरारजी देसाई ने ब्लिट्ज़' के सम्पादक आर० के० करंजिया को एक भेंट देते हुए कहा था.---"अगर हमारी खिचड़ी है तो उनका खिचड़ा है !" यह श्री देसाई ने उस समय कहा था जब करंजिया ने उन्हें बतलाया कि श्रीमती इन्दिरा गांधी ने जनता पार्टी को लेकर कहा है.-..."नई सरकार खिचड़ी सरकार होगी!" उपर्युक्त दोनों ही बातें सामान्य व्यक्ति के लिए सहज भाव में मुन या पढ़कर टाल देने वाली है कि ऐसी टीकाटिप्पणी तो परस्पर चलती ही रहती है. किन्तु गभीरतापूर्वक सोचा जाए तो मुरारजी भाई का सहज भाव से काम को खिचड़ा कह देना, काफी गंभीर अर्थ रखता है। खीज, अल्लाहट, उपाय की बेचैनी और उत्तेजना में कांग्रेस ने इस चुनाव के दौरान जो कुछ तालमेल बनाया यह विचिन्न था। जैसे भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी से चुनावी ममजीता, राजाओं को टिकिट या समर्थन, फिल्म अभिनेताओं के नाच- गान, भाषण, मनोरंजन, हिन्दू धर्मगुरुओं का इन्दिराजी के लिए समर्थन-विज्ञा- पन, जनता में माफीनामे, ऊलजलूल वक्तव्यबाजी, बेहूदा उदाहरण, कांग्रेस की विजय न होने पर विदेशी आक्रमण के खतरे बताना, विरोधी दलों के हजारों कार्यकर्ताओं को देर तक जेलों में डाले रखना और अपने आपको देश की राजनीतिमा स्थिरता का अबोला वारिस घोपित किए जाना ऐसी बातें थीं; जिनके कारण किमी वार स्पष्ट नहीं हो सका कि कांग्रेस का रूप क्या है या किन लक्ष्यों को लेकर वह देश को सुशासन देगी? लोकतंत्र जीवित रख पाने का तो प्रश्न ही नहीं बचा था, क्योंकि गत १६ महीनों में कांग्रेस कितनी लोक- तंत्रवादी रह गई है, इसका प्रमाण जनता को खूब मिल चुका था। एसी बीच एक नई बात और हुई। श्रीमती गांधी ने एक चुनाव-सभा में भाषण करते हुए अपनी और अपने परिवार की देश-सेवाओं का वर्णन करना गुरु पार दिया। उन्होंने कहा -'इस परिवार के सभी लोग जनता के सेवक है। शायद ही ऐमा कोई परिवार हो, जिसने देश को इतना दिया हो..केवल जनसेवा के ही रूप में नहीं, भौतिक दृष्टि से भी। तमाम लोग मंत्री बने हैं, लेकिन शायद में ही ऐसी है, जिसने राष्ट्र को अपना मकान तक समपित किया है । अव मेरा कोई निजी मकान नहीं है। मेरे दोनों पुत्र ठोस काम में दिल- पापी लेते है । मेरे पति भी इसी तरह के थे।" लोग हैरान हो गए। क्या अब राजनीतिक मुद्दों और संस्था के कार्यक्रम को परे पर केवल इस आधार पर श्रीमती गांधी वोट मांग रही हैं कि उनके परिवार ने और उन्होंने देश के लिए उतना किया है, जितना किसीने 1 ।

दूगरी आगादी :: १३५ नही किया ! एक बात तो यही गही नहीं थी कि नहर परिवार ने रिनना रिया, उतना किसीने नहीं किया। इस तरह श्रीमती गाधी ने "शायद ही ऐमा कोई परियार हो, जिसने देश को इतना दिया हो" पहार एक्माप हजारों पातिकारियों और देशभक्तो मे किए घर पर पानी फेर दिया और स्वर्गीय जवाहरलाल नेहरू के यश को भी हल्ला कर दिया। गुलमे हा लोगों ने श्रीमती गाधी जमी उच्चपदस्थ नेता के मुह में इतनी हल्की बात को पमन्द नहीं किया। निस्मन्देह भारतीय मतदाता को यह बतलाने की भावस्परता नहीं थी कि नेहरू परिवार ने देश के लिए क्या कुछ किया है। वेचनी में इन्दिराजी यहा तक कह गई कि वे चाहनी नो पनाद मी और टाल मकती थी, किन्तु उन्होंने आमचुनाव कराकर यह माषित कर दिया है. कि उन्हें लोक्तान पर विश्वास है । बार-बार दिया गया यह भी 'एक अनावश्यक यवनव्व था। क्या एक लोकतनवादी को यह प्रमाणित करने के लिए कि यह लोतववादी है. प्रमाण प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है ? कुल मिलाकर श्रीमती गाधी और उनकी काग्रेग का मारा चुनाव प्रचार या तो विरोधियो पर जय इ-पावड किम्म के आरोप रहे या अपनी सफाई देते रहना-भर रह गया । चुनाव-घोषणा को लेकर श्रीमती गाधी ने अपने लोग्नववाद की जो दुहाई दी, उसे जनता पार्टी के नेता श्री चन्दशेगर ने एक उनर में सार कर दिया। श्री चन्द्रशेयर ने यहा.--... "चुनाव कराना जनता पर मिमी तरह वा पहमान करना नहीं है, बल्कि वोट देना तो भारतीय मतदाता का अधिकार है, जिसे उसने महात्मा गाधी के नेतृत्व में एक लम्बी लड़ाई के बाद प्राप्त किया है । भारतीय जनता अपना यह अधिकार कभी नहीं छोड मरती।" काग्रेग ने वोट-प्राप्ति के लिए क्या कुछ हरकार्ड नहीं अपनाए, मत्ता का दुरपयोग नहीं किया, इसका एक और उदाहरण देता है। इन उदा. हरण का यह मतलव निश्चित ही नहीं है कि में जनता को रियायत देने का विरोध कर रहा हूं, बल्कि मेरा उन अभिप्राय यह है कि प्रिमीयाम गमय पर, पाम तरह पोपित की गई रियायते, रियायन न होरर उपरार के रूप में उपयोग जाने लगती है। हालाकि पनाय ने यह भी गिर दिया कि अब किसी भी किस्म की रिश्वत' मतदातापी गमाको बरगलाने की स्थिति में नहीं रही है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, उत्तरप्रदेश और बिहार की मरमारों ने पुनाव/ दौरान जनता के लिए कुछ रियायतें या विशेष मुविधाए पोपित की। पिम तरह १३६ :: दुसरी आजादी मध्य प्रदेश सरकार ने प्रदेश लोकसेवा आयोग के गैर सरकारी सदस्यों की पेंशन रकम २५० रुपये से बढ़ाकर ५०० रुपये कर दी, जब कि यह पेंशन सन् १९७५ के जुलाई मास से लागू की गई। आदिवासियों को उनके अपने घरों में महुआ मादि मादक वस्तुएं जमा करने की सुविधा दे दी गई। हेड क्लर्कों का वेतनक्रम १६५-३३० से बढ़ाकर २२० से ३७५ कर दिया गया और यह क्रम लागू हुआ जनवरी १९७७ से। अतिरिक्त जिला और सेशन जजों का नया वेतनक्रम निर्धारित हुआ, जिसके अनुसार यह क्रम जनवरी १६७२ से लागू हुआ। वेतन-क्रम है.--.६५० से १४५० रुपये । इस निर्णय के अन्तर्गत इस वेतन-क्रम का लाभ उन सिविल जजो पर भी लागू होता है जो पदोन्नति पाकर अतिरिक्त और जिला सेशन जज बन चुके हैं। स्वाधीनता-संग्नाम के सेनानियों के १८ वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क चिकित्सा सेवा की सुविधा दी गई। पहले यह सुविधा केवल उन्हीं सेनानियों की पत्नी, माता-पिता या आश्रितों को प्राप्त थी, जिनकी मासिक आय ३५० रुपये से कम थी। नये निर्णयानुसार आय-सीमा का बन्धन तोड़ दिया गया था। पोहा या मुरमुरा बनाने के धान से 'क्रय-कर' समाप्त कर दिया गया। राजस्थान के मुख्यमंत्री ने एक घोषणा के तहत कोटा के ३०००० मकान मालिकों को ३० लाख रुपये के टैक्स की माफी दी। उत्तरप्रदेश मे असिंचित कृपि भूमि पर प्रति हेक्टेयर लगान का दर १२ गपये ५० पैसे से २५ रुपये तक था. जिसे नये आदेश में घटाकर आधा कर दिया गया। इसी तरह की विशेष सुविधा सिचित भूमि पर भी दी गई। ऐसी भूमि के मालिकों को मौजूदा लगान की जगह अव आधी दर पर लगान देना था। राज्य सरकार को लगान से प्रति वर्ष ४२ करोड़ रुपये मिलते थे। उक्त घोपणा उत्तरप्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री ने १६ फरवरी, १९७७ को लखनऊ में की थी। बिहार सरकार ने अपने एक निर्णय में कहा कि राज्य कर्मचारियों को १ मार्च से प्रतिमाह ८ रुपये ४० पैसे चिकित्सा भत्ता मिला करेगा। ८० हजार चतुर्थ श्रेणो कर्मचारियों की पदोन्नति का रास्ता खोल दिया गया। माध्यमिक स्कूलों के अध्यापकों को सन् १९७४ में हुई हड़ताल के दौरान दूगरी आशादी::१६५ मा वेतन दिया जाना तय हुआ । इस निर्णय के अनुसार शिक्षा मान को आदेश हुए कि उक्त राशि का भुगतान १ मार्च तक कर दिया जाना है। विजली पर मे : पैसे प्रति यूनिट का अतिरिक्त कर-भार उठा लिया गया। किसानों से कर्ज की वसूली का समय ३१ मार्च में यद्वारर ३० जून र दिया गया। इस अवधि का व्याज न लेना भी घोषित हुमा । १ मार्च, १९७७ में राज्य सरकार पर ५० लायका मतिरिक्त पर- भार लेते हुए निर्णय हुआ कि यू० डी० सी० एल० डी० सी० तथा विभिन्न अंणियों के टाइपिम्टो, स्टेनो टाइपिस्टो आदि को एक ही धेषी में परते हुए एक वेतन-कम रखा जाए। १ जनवरी, १९७७ से बिहार में ५०० रुपये वेतन पाने वाले वो १२ रुपये प्रतिमाह और १२५० रुपये वेतन पाने वाले को ३६ प्रतिमाह अतिरिक्त महगाई भता प्रदान किया गया। उपर्युक्त सभी निर्णय बिहार सरकार ने फरवरी के अन्तिम सप्ताह में लिए। दिल्ली नगर निगम ने फरवरी के पहले मप्ताह में मुनिर्णय लिए, जिनके अनुसार कुछ शर्तों के तहत जून १६७५ से पहली बनी अधिकृत वस्तियों को अधिकृत कर दिया गया। तागा, रेटा, पररारा पर ३६ रपये को जगह केवल १६ रपये कर निश्चित हुआ। सालाना १०० रुपमै सविस चागं में भी उन्हें मुक्त घोषित किया गया। पुछ राहते बैलगाडी, भंसागाडी, बोर ठेलेवालों के लिए भी दी गई। गचं यह कि फरवरी और मार्च के भीतर-भीतर जनता को मुविधाओं या रियायतों के टुकडे फेरकर 'पटाने की कोशिश यो गई, पर ऐसा करने गमय कांग्रेस भूल गई कि उसने तानाशाही में जनता को पर्याप्त शिक्षित कर दिया है और वह प्रलोभनो पर अधिकार-शक्ति मा दान परतेवाली नहीं है। हदवन्दीहीन नसबन्दी 'नवभारत टाइम्म' के ७ जनवरी, १९७ के अक में मैंने एक समाचार पड़ा था। मालूम नहीं, इस हवत कालम में रागित करमपामारी जनन १४० :: दूसरी आजादी और दचाच पड़ा तो किसी भी तरह निर्धारित समय में निर्धारित कोटा पूरा कर लेने की जल्दी हुई। इस जल्दी में यह कार्यक्रम लोगों को मानसिक तौर पर शिक्षित करके उससे लाभ उठाने का कार्यक्रम न रहकर आतंक, भय, और जोर-जबरदस्ती से सम्पन्न कर लेने का कार्यक्रम बन गया। अजीबोगरीव घटनाएं होने लगी और विना उसके दुष्परिणाम सोचे हुए अधिकारी निरंतर लक्ष्य पूरा करते गए। कुछ घटनाएं बयान करता हूं। एक शिक्षिका से मेरी भेंट हुई। विधवा युवती थी यह । इस युवती को आदेश दिया गया था कि कैसे भी २ केस लाकर दे। वह समझ नहीं पा रही थी कि कैसे ला सकेगी? साधारण पढ़ी-लिखी और गाव में काम करनेवाली पुराने खयालों की युवती और जिस वातावरण से उसे दो फेस' लाकर देने थे, वह भी एकदम पुरातनपंथी। बोली, "मेरी समज में नहीं आ रहा है भाई साहब, किसीसे क्या कहूं? कैसे समझाऊं ? मैं उस तरह की बात कह नहीं सकूगी। कहूंगी तो न सिर्फ मेरा मजाक उड़ेगा, बल्कि हो सकता है गांव में मेरा विरोध ही शुरू हो जाए। मेरी तो यह हालत है कि घर जाऊं तो कुआं, उधर जाऊं तो खाई।" "तुम अपने अधिकारियों को क्यों नहीं बतलाती अपनी लानारी ?" "उन्हें भी क्या बतलाऊं ? वह वेचारे तो ऊपर के हुक्म' से लाचार हैं।" निराश स्वर में युवती ने उत्तर दिया था, "लगता है यह न करवा सकी तो ममपेठ हो जाऊगी। हमारे यहां कई टीचरों का बुरा हाल हुआ है। किसी- को तनख्वाह रुकी पड़ी है, किसीका इन्यो मेंट।" " मालूम नहीं उसका क्या हुआ होगा। एक और महाशय मिले । पुश थे, "साहब, मैं तो कन्फर्म हो गया ! मेरे नायवाले सब धरे हुए है।" "वह नीरो ? तुम तो अभी एक महीना हुए नौकरी में लगे थे ?" मुझे आश्चर्य हुआ था। पास तौर से इसलिए कि मुझे मालूम था, उससे पहले के आदमी भस्थायी । "नि पूरे चार मेरा दिए साहय !" ? - "यह नसे?" "देगिा साहय ।" उसने बतलाया, "हमारे बड़े साहब बोले थे कि अगर तुम चार कम ला दोगे तो फन्फर्मेशन कर देंगे। मैंने चार केस दे दिए।" "मगर लोग तो परेशान है, तुम्हें चार केस मिल कैसे गए ?"

दूसरी आजारी::११ "अरे, अपने घर में ही चार वेस हो गए मार !" जमने यतलासा, "ार तो मेरे बाबा, दूसरे पिताजी, तीसरे चाचाजो और पौर मेरे एक मोमाजी।" मैं आसमान में गिरा । मुझे मालूम था रिग व्यक्ति मे. याया भाम में कम सतर साल के होंगे। पिता भी पचास से कर रहे होंगे। एक उसके पापा ही थे, जो इस हालत में होंगे, जिनको नसवन्दी का कोई मतलव हो मैंने पूछा, "तुम्हारे मौमाजी को क्या उमर होगी ?" "यही कोई साठ-बामठ होगी माहब।" उगने पर होते हा वतनाया, "रंडुए है। उसके लिए क्या था। नसयन्दी करो तो भला, न करो तो ना! मैंने जाकर पाव पकड़ लिए कि मोसा, बचा लो और वग, उन्होंने क्या लिया!" एक अन्य महाशय से भेंट हुई। इनका मुग अलग विस्म या पा। योगे, "साहब , हमे तो मरकारी हुकम हुआ कि तुम्हारे पार बच्चे है, नमवन्दी करा ली । हमने ऐमा रोल सेला कि साप भी मर जाए, लाठी भी न टूटे। "सो कैसे? इन महाशय ने फुसफुमाकर बतलाया, "हमने तो माहय सौ रपये परप किए और आठ दिन की छुट्टी मनाई, फिर हाक्टर गे मर्टीफिरेट से लिया कि अपना काम तमाम करवा लिया है। ये सर्टीफिट सरकार में पेश कर दिया और बरा! " हसे । वहा, "चौलिए, कैसी रही? और जनाव 'क' बडे दुणे मिले। इनका दुब यह पा कि इनके छोटे भाई की, जिसकी शादी दो माल हुए हुई थी और कोई बच्चा न पा, निम वालों ने जवरदस्ती पकडकर नसबन्दी करवा दी थी। बोले, "मरजी, हम तो दोही भाई हैं। मेरे कोई बच्चा नहीं है, एक छोटे पर ही उम्मीद थी कि धुलदीपक उसके जरिये आएगा, समान गे कि हमारा ही बच्चा है. पर बाहरी सरकार "तू ने न जीने का घोडा, न मरने का ! मुनकर मुझे भी बहुत कष्ट हुआ। कहा, "आपको गिरात परती चाहिए।" "किसमे?" वह रआसे हो गए. "किसने शिकायत करेंगे मादर कौन सुनेगा? अंधेर नगरी मे कौन मुनेगा? स्यादा गोर किया तो मोगा में भीतर पले जाएगे।" ग्वालियर के पास है एक गाव पनिहार । अच्छी-गामी माघारी । पहा पाना हुआ तो गांव वालों में मेरी कार के पहुंचते ही भगदा मघ गई। औरत - १४४ :: दूसरी आजादी । - फोममर्थन देंगे।" गृहपति ने हंसकर उत्तर दिया, "ज़रूर । पर एक शर्त है साहब !" "फरमाइए ?" आप सब अपनी नसबन्दी का सर्टीफिकेट दिखाइए, फिर हम कांग्रेस को वोट देंगे।" अब कांग्रेस कार्यकर्ताओं का यह हाल कि उत्तर नहीं। चुपचाप उठकर पले आए। कुछेक ऐसी घटनाएं भी हुई जब वैचारे कार्यकर्ताओं को सरकार की ज्यादतियों के प्रतिक्रियास्वरूप न सिर्फ अपमान, वल्कि थप्पड़ खाने खाने पड़े। कारण या किसी ऐसे गांव में जा पहुंचना जहां परिवार-नियोजन के नाम पर ज्यादतियां हुई थीं। ऐसी जगह कांग्रेस के नाम-भर से ग्रामीणों ने उत्तेजित होकर प्रचार-कार्यकर्ताओं को घेर लिया और गाली-गुत्ते, लानत-मलामत करके वापस भेज दिया। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के कुछ हिस्सों में तो यहां तक सुना गया कि तानाशाही सरकारी संस्था के कार्यकर्ताओं ने गांवों में जाना बन्द कर दिया और अपने उम्मीदवार को बतलाते रहे कि 'उसकी पोजीशन बहुत अच्छी है !' इस तरह के कई लोगों ने मुझे बतलाया था कि क्या करें साहब ! इस सरकार ने हमें किसी जगह मुंह दिखाने काबिल नहीं छोड़ा। किस मुंह से वोट मांगा जा सकता है ? किस तर्क से बात की जा सकती है ? जो-जो अमानवीय कार्य हुए और निरंतर होते ही रहे, उनके बाद लोगों को क्या विश्वास दिलाया जा सकता है ? तो इस तरह विश्वासहीन स्थिति बनाने के बाद भी कांग्रेस पक्ष का यह झूठा प्रचार चल रहा था कि देश और जनता ने आपातकाल में महान् उप- लब्धियां की हैं। माफीनामे भी हो रहे थे। प्रलोभन भी दिए जा रहे थे । अनाप-शनाप पना भी व्यय किया जा रहा था। येन केन प्रकारण वोट-प्राप्ति के इस कांग्रेस महाभियान को सीधा-सरल मतदाता चकित भाव से ठिठका हुआ देख रहा था और उसकी निश्चित राय बनती जा रही थी कि अब वह सूट की लपेट में नहीं आएगा ! घर कांग्रेसी सेमे में आंकड़ों के हिसाब-किताय चल रहे थे और यह हिसाब-किताब निश्चित रूप से जतलाने लगा था कि कांग्रेस पराजय के द्वार पर आ पड़ी हुई है। आमचुनावों में अब तक कांग्रेस की विजय का फारण रहा था प्रतिपक्ष का विभिन्न अंडों, विभिन्न नामों में अलग-अलग दल दूगरी भाडादरी::१४५ बना रहना और यही कारण था कि काग्रेग हर चुनाव में प्रतिपक्षी दलों में वटे हुए वोटों के कारण सुविधा के साथ जीतती रही थी हालांकि मेरिगी भी चुनाव में ४० प्रतिशत में अधिक मत नहीं मिले थे। १६७१२ दिरा गाधी (आधी) चुनाव में भी वह कुल ४२ प्रतिशत मत प्राप्त कर गयी थी। इस बार चूकि शक्तिशाली विरोधी दल एक मडा, एक नीति, एक पोपन-पत्र और एक विल पर जनता पार्टी के रूप में उदय हो गए थे, अतः स्पष्ट ममता था कि 'फूट से राज्य बनाए रखने का युग बीत गया है। चुनाव आयोग के मुख्य आयुक्त श्री टी. स्वामिनाथन की मतांता और जनतंत्रीय आस्था ने बडी योग्यता और न्याय के साथ चुनाव व्यवस्था की पो और प्रतिपक्ष उनमें पूरी तरह सन्तुष्ट था। ही नही, प्रतिपक्ष के अनेक नेताओं ने उनमें पूरी तरह से आम्या और विश्वास व्यक्त करते हुए जनननवाद में पता दर्शाई थी। प्रतिपक्ष के मात, धंयंपूर्ण और लोकतन्त्रीय विधारा ने जनमन में उसके प्रति ज्यादा विश्वास पैदा किया था। उनके व्यवहारका मन्तुलन भी एक वडीसीमा जन-विश्वास को जीतने में सफल हो रहा था। टीम इसके विपरीत काम नेताओ का आचरण मतदाता के रहे-सहे विश्वास की डिगाता जा रहा था। यह विश्वास उस समय एकदम हिग गया, जब युधेर नेताओं ने अपने गलत- सलत काम करने शुरू कर दिए और वे मव जन-गाधारण के सामने उजागर होने लगे। जैसे-जैसे चुनाव-ममय करीय आता जा रहा था, पास उम्मीदवार योयताहट में साम दाम दड भेद' हर तरह में अपने उभरे हए प्रतिनीगो मिटाने की कोशिश में जुट गए थे। रायपुर में जनता पार्टी के उम्मीदवार थी पुरषोत्तमलाल कौशिकी सोकप्रियता और बढ्ने प्रभाव को देंगकर मध्य प्रदेश ही नही, रेन्द्र तामापी चिन्ता देखी जा रही थी। भरण था महाकौगल के छत्रपति मामी का एक विसकते जाना। विद्याचरण शुक्ल को लगने लगा था कि उनकी अपनी स्टेट' ही उनो हाय से नियती जा रही है। परिणाम हुआ वहवामी में होगा की तरह अपनो मता-शक्ति का दुरपयोग। मार्च को १८-१९ तारीप वो रात के समय दो पिनौनी पटनाए पड़ी। कुछ लोगो ने श्री कौशिक को घेर कर लोहे की हमे उनपर हमला कर दिया। उसी रात कम्यनिस्ट विधायक मुधीर मुग्री पर पार में प्रारा। जमे-नमे दोनो को जाने वच मकी। हालाकि बौगिर और मुय मी गहरी १४६ : दूसरी आजादी चोटें आई। इस घिनौने कृत्य पर रायपुर ही नहीं, आसपास के सारे इलाके में तीव्र प्रतिक्रिया हुई। दैनिक युगधर्म' और दैनिक 'नवभारत' ने इस हमले का विस्तृत समाचार प्रकाशित किया और जनता तक पूरा विवरण पहुंचाने की कोशिश की। पाहते है कि श्री शुक्ल ने तुरंत उच्चस्तरीय आदेश किए कि ये दोनों ही समाचारपत्र जनता तक नहीं पहुचने चाहिए। परिणामत: अतिरिक्त जिलाधीश ने तुरंत अखबारों के व्यवस्था विभाग को हुक्म किया कि अखबार वाहर नहीं जाएंगे। चूंकि इस हुक्म में कुछ देर हो गई थी अतः अखवारों के बंडन जहां-तहां रवाना हो चुके थे। दैनिक 'युगधर्म' की हजारों प्रतियां जब्त कर ली गई और कुछेक बंडल जो यहां-वहां भेजे जा चुके थे, स्टेशनों पर उतरवा लिए गए। नवभारत' के भी कई बंडल रेलगाड़ियों से उतरवाए गए। और समाचारपत्रों को एक नया आदेश मिला कि खवर छापी जाए, किन्तु इतने मामूली ढंग से कि जनता को मालूम न हो सके कि मामला किस कदर गंभीर है। इस निरंकुशता का यह व्यवहार नया नहीं था, उस आपातकाल का स्वभाव ही था, जिसके अन्तर्गत बढ़े तानाशाह के नीचे उप-तानाशाह पनपते रहे थे। कौशिक की लोकप्रियता इतनी जबरदस्त है कि समाचार को बहुत दवाने, अखवारों को हर तरह से दमन करने के बावजूद जनता तक असलियत पहुंच गई और इस असलियत के साथ ही यह कहानी भी कि किस तरह असलियत को छुपाने के लिए मामले को रफा-दफा करने की कोशिश की गई थी। 'न दलील. न वकील, न अपील' यह एक छोटा-सा नारा था, जिसका जनका कौन-सा दल है, मैं नहीं जानता, किन्तु इन तीन शब्दों में तानाशाही का जो चिव है, वह चित्र चुनाव के दिन तक नहीं हटा था। दलील देने वाली हर आवाज बन्द थी। अपील करनेवाले गले दवा दिए गए थे। ब्लिट्ज' (२ अप्रैल, १६७७) लिखता है.-.-''मध्यप्रदेश में कम से कम ५०० अखबार बंद कर दिए गए। मंगरशिप की आड़ में न केवल अधिकारियों ने अखबारों को बंद कर दिया, बल्कि मंकड़ों जिलास्तरीय पत्रकारों और एजेप्टों को जेल के अन्दर पहुंचा दिया। परगोन जैसे आदिवासी जिले में कम से कम एक दजन गंवाददाताओं या ऐजेण्टों को जेल में डाल दिया गया।" कुल ५४२ स्थानों के लिए चुनाव हो रहे थे, जिनपर फुल प्रत्याशियों की संख्या २,४३१ थी। पुल स्थानों को मतदाता ३१,८३,४२,६०२ थे।

- दूसरी बासो::१४३. इनमे से मिक्किम और अरमाचल प्रदेश में कांग्रेग प्रत्यानी निविगंध निर्वाचित हो गए थे। मन् १९७१ मे कुल स्थान ५२० थे जवनि प्रत्याशियों को मंगवा यो। १६७१ बोर १६७७ के चुनावों में एक अलर और मटपा। पानी लोकममा के चुनावों में, यानी १६७१ में केवल ३६ मीटों पर नीमा पर हुआ या, किन्तु इस वार १६३ म्यानों पर कांग्रेम और जनता पार्टी के उम्मीदवारी में सीधा मधपं था। १६७१ के चुनाव में कांग्रेग को ३५२ म्यान मिले थे और उसका जबरदस्त बहुमत मामने आया था। प्रान्नपार पान- सदस्यों की माया इस प्रकार थी: कुल स्थान अम्मीदवार कांप्रेम असम १४ २६ प्रान्त ४० आध्र प्रदेश उत्तर प्रदेश १५ ६ २६ १६५ उडीमा कर्नाटक २८ करल २० गुजरात ૨૬ जम्मू-कश्मीर तमिलनाडु ३६ पजाब पश्चिम बंगाल ४२ बिहार मध्यप्रदेश ४० महाराष्ट्र राजस्थान २५ हरियाणा हिमाचल ४ नागाह मणिपुर २ अण्डमान निकोबार गोवा दमन दीव २ ४० १ २ २ २ १४८ :: दूसरी आज़ादी १ १० १ १ ३ चण्डीगढ़ दादरा नगरहवेली १ दिल्ली पांडिचेरी १ चुनावों में निरंतर खराब स्थिति होते जाने के कारण जन-साधारण में एक सहज प्रतिक्रिया यह होने लगी थी कि कहीं श्रीमती इन्दिरा गांधी चुनाव स्थगित करते हुए पुनः तानाशाही हथियार का उपयोग न करने लगें। यह वहम जनता ही नहीं, नेताओं में भी खासा फैला हुआ था। इसके बावजूद वे पूर्णतः धैर्य और आत्मविश्वास के साथ जन-अदालत में न्याय के लिए खड़े हुए थे। और जन-अदालत ने जव न्याय देना शुरू किया तो उन सभी को कटघरे में खड़ा कर दिया, जिन्होंने उसपर दमन, अन्याय और अत्याचार में हिटलरशाही को भी लजा दिया था। हालांकि चुनाव प्रारंभ होने के कुछ समय पूर्व से ही चौंकाने वाली घटनाओं के समाचार जनता पर उछले थे। इनमें एक विशेष समाचार था श्री संजय गांधी की जीप पर गोली चालन । इसी तरह की कई वातें सुनने-पड़ने में आई थीं । जैसाकि हमेशा होता है, चुनावों में मतदाता की संवेदना और भावनाओं को उभारफर भी वोट हासिल किए जाते हैं, इस चुनाव में भी कोशिश की गयी, किन्तु तानाशाही ने उसे इतना व्यावहारिक और यथार्थवादी बना दिया था कि इस तरह की बातें उसपर तनिक भी असर नहीं ' डाल सकी और इसके परिणाम थे चुनाव-नतीजे जिन्होंने एक ही बार में गांधीवाद का चेहरा लगाए हुए हिटलरवाद को चकनाचूर कर डाला था। श्रीमती गांधी को निश्चय ही उस दिन अहसास हुआ होगा कि नासूर को पट्टियों में छिपाए रगने से काम नहीं चलता। उसका इलाज होता है आपरेशन । कांग्रेस के जिस्म पर भ्रष्टाचार, झूठ, कपट, भाई-भतीजावाद और अत्याचार के जितने नासूर थे, अगर उन्हें समय रहते संस्था के जिम्मेदार लोगों ने काट फेंका होता तो वह दयनीय स्थिति न होती, जिसमें गनार के बाद कांग्रेस को जनता ने पहुंचा दिया था। उस दिन, जव जनता पार्टी के स्पष्ट बहुमत की घोषणा हुई होगी, निश्चय ही कांग्रेसियों को लोकनायक जयप्रकाश नारायण को ये शब्द याद आए होंगे, जब उन्होंने बार- दूगरी भागात : १६ थार चेतावनी दी थी कि दमन और गलत पारंवादयां एक न एक नि भार सभी के लिए क्लेशकारक बनेंगी। कामराज को लेकर कभी कांग्रेस ने यह झूटा प्रचार प्रारंभ कर दिया वह अत समय में काग्रेस में शामिल होना चाहते थे, ताफि दक्षिण भारत में योट हपियाए जा सके, उम गमय कामराज ने भी यहा था-"मैं रहता कि गिरफ्तार नेताओ को छोड़ दिया जाए देश अधिनायकवारमी मोर पर रहा है। अगर देश में अधिनायकशाही आती है तो देश टुकड़े-ट्यहोर गार में पर जाएगा!"" वृद्ध और बीमार कामराज ने चेतावनी में केयम इतना ही परा पाकि 'गिरपतार नेताओं को छोड़ दिया जाए क्योंकि देश अपिनायकवार कोमोर बढ़ रहा है पर विस्तरे पर लेटे हुए वयोवर नेता को मालूम नही पारि अधिनायकवाद पर जा पहुचा था । यदि श्री कामराज बीमार न होते तो कौन जाने उन्हें भी जेल के सीखचे ही देयने पडते ? यो अन्धी तानाशाही के दौर में मानसिक और शारीरिक हायाभो करो मामले नई जनतनी सरकार की स्थापना के बाद सामने आए (और पता आते जा रहे हैं ) किन्तु कुछेक हालात मुझे अपने उन विरोधी नेता मियों में उसी समय सुनने को मिल चुके थे, जब आपातकास साग पा। दिमाया. १E में किसी कार्यवश में अपने गृह-नगर ग्वालियर पहुपा सर मुझे मामामा कि वहां के सुप्रसिद्ध नेता और विधायक यो शीतलासहाय बेस से रिहो गए हैं। आश्चर्य हुआ था मुझे। पूछा, "शीतलाराहाय रिहा सेल । बतलाने वाले को इमगे पयादा मूचना नहीं थी। योगा •ोना जानता हूं साव, कि शीतलासहायजी नगर मे देगे जा रो।" मैंने जीततासहायजी से सम्पपं साधा। भेट तय हुई. Rm यातें करते रहे । शीतलासहायजी ने पतलाया, "मीमार हो गया था । सरकार ने सोचा पुछ दिन शहरी वापानी पिना रिया आए. भरा पE के लिए परोल पर छोडा है।" मुझे मत्तोप हुआ। गीतलाजी के बारे में गूपमा देने वागे ।म परेशानी में डाल दिया था- रिहा' गारपहार। पीml. १. नवस दक्षिण भारता एक मात्र । १५० :: दूसरी आजादो सहाय को। मैत्री स्तर पर भी, नेता के स्तर पर भी । सत्य के लिए छात्र- जीवन से संघर्षरत रहे शीतलासहाय की डिक्शनरी में बौद्धिक और मानसिक स्तर पर किसी भी किस्म का समझौता' शब्द कभी नहीं रहा है। कांग्रेसी सरकार के लिए वह मध्यप्रदेश में हमेशा ही विरोधी के नाते सरदर्द रहे थे, ऐने आदमी को रिहा कर दिया जाए और वह भी तानाशाही मेंभला कैसे गंभव है ? सन्तुष्ट हुआ कि शीतलासहाय रिहा नहीं हुए हैं, बल्कि रिहाई का धोखा मह रहे है । वात-बात में शीतलासहाय ने उस समय भी मुझे बहुत कुछ बतलाया था कि तानाशाही कितने नकाव ओढ़े हुए चल रही है। बोले, "जब भोपाल में मुझे जेल में रखा गया तब चिकित्सा-सुविधा नहीं के बराबर थी। यानी यह हालत हुई कि मैं और कई लोग बीमार हैं, पर सरकारी डॉक्टर अपनी उपस्थिति जतलाने के लिए जेल में आता है और बहुत कहने, निवेदन करने के बावजूद ऊपरवाले हिस्से में बैठकर जेल अधिकारियों से गप्पें करते रहने के बाद वापस चला जाता है। दवा के नाम पर हमलोग सिर्फ बढ़ती वीमारी झेलते रहते हैं।" "आपने जेल-अधिकारियों को डपटकर नहीं कहा?" शीतला हंते, "कमाल करते हो रामकुमार, मैं तानाशाही का कैदी और डपटकर कहता? बीमारी ने १४ महीने में बुरी तरह तोड़ रखा था, सिर्फ निवेदन ही कर पाने की स्थिति थी। भोजन के नाम पर जैसा भी जो दे दिया जाए. खाने की लाचारी थी। न खाओ तो उनकी बला से। बस, बार-बार, रोज-बरोज़ प्रार्थना किया करता कि भाई मेरी तबीयत तो देखो, इलाज तो करवाओ, किन्तु वह डॉक्टर आश्वासन देता कि अभी आता हूं और ऊपर जा वैठता।" 'इस तरह की उपेक्षा कब तक चली?" "जब तक जेल में रहा, फिर एक दिन जांच हुई और अचानक डॉक्टर ने रिपोर्ट दी या न जाने भीतरी तौर पर क्या हुआ कि मुझे पैरोल पर रिहा कर दिया गया। अव यहां आकर हॉस्पिटल के काम में जुट गया हूं। समय पूरा होते ही फिर वहीं पहुंच जाऊंगा, जहां से माया हूं।" शीतलाजी के स्वर की भीतरी तड़प महसूस कर पा रहा था मैं। ज्यादा ज़िम नहीं बढ़ाया। सिर्फ सोचता ही रह गया था। ये तानाशाही जन-नेताओं और समाज-सेवियों की हत्या करके कितने दिन सांसें ले पाएगी? शीतलासहाय २ जुलाई, १६७५ को गिरफ्तार किए गए थे। वर्वर तानाशाही ने शीतला- ? ।

दूगरी आजादी : १५१ महाय को जेल में डालकर अपना विरोधी नेता ही गिरफ्तार नहीं रिया पा, वल्लि उन हजारों-लाखो लोगों की मामें भी घोट डाली थी जो उस विमान कंगर हॉम्पिटल से जुड़ी हुई थी, जिसे अकेले गीतलामहाप राप्रपरन मूतं प देने जा रहा है। ग्वालियर में बन रहे करोडो को लागन के कमर असतारशी युनिसार शोतलामहाय ने ही डाली है और वह अब तक केवल मलिए पात्र नहीं हो सका, क्योकि शीतलासहाय को विरोधी विचारधारा के पारण सानामाही ने सोपचों में वन्द कर दिया था। परिणामस्वरूप करोडो की सागत से बन रहा अस्पताल लम्बे ममय नक अधूरा पड़ा रहा। उमा वाम बन्द हो गया। पेरोल पर छूटने के बाद भीतलासहाय ने दिन-रात जुटकर उग बाम को सपूर्णता देनी प्रारंभ की। यह एक उदाहरण है तानाशाही और उमका हथियार बनी अफगरगाही के अमानवीय कृत्यों को। इसी वर्वर तानाशाही के पर चुनाव में उराड चुके थे। बहते है कि जिन दिनी इन खूनी पंजो का उखडाव गुरू हुआ, देश में एक यबर मुनी जाने लगी थी कि श्रीमती गाधी अपने को बता देयकर वही मागंस-नों का सहारा न ले बैठे ! यह केवल जन-चचा नहीं थी। चुनाव के यार रहम्पोन- घाटन भी हुआ कि इस तरह का भीतरी गोलमाल चना पा। श्री हेमवती. नदन बहुगुणा ने बम्बई में हुई एक आमसभा में कहा कि जिस दिन वह पर याबू जगजीवनराम और नन्दिनी सतपथी आदि ने काग्रेस से त्यागपत्र दिया, उसी दिन जनता पार्टी के जनरल मेटरी श्री लालकृष्ण अडवानी उनके पास पहुचे । बोले, “चुनाव तो एक तरह में पाम हो चुका है और नतीजा स्पष्टत. सामने दीय रहा है, लेकिन आप क्या मोचते है कि इन्दिरा गांधी चुपचाप बैठी रहंगी ? कही सता-शक्ति का सहारा लार वह मार्गसन्नों लाग न कर दें।" इसपर बहुगुणा ने सभा को बतलाया कि उन्होंने उत्तर दिश था, "चिन्ता मत कीजिए बडवानीजी, इन्दिराजी जिम प्रसन में निकली है. उमीपदान मे में भी निकला हूं क्या श्री अडवानी की आशका (या उन्हें गुप्त रूप में मित्रो सपना) गलत थी? ठीक है कि इन्दिराजी कोशिश करके भी वैसा कर नही पाया कि हो नहीं सका, पर यह इरादा या। इस इरादे का उद्घाटन मैसाचुसेट्स भी इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नॉलाजी के भूतपूर्व शिक्षक और राजनीतिक समोसा थी । यह ॥

१५२ :: दूसरी आजादी रॉबर्ट मनोक ने किया। उन्होंने पत्रिका में प्रकाशित करवाए अपने एक लेख में कहा कि श्रीमती गांधी और उनकी सरकार ने अपनी अन्तिम सांसें लेते हुए बार-बार संविधान को रद्द करने तथा चुनाव रद्द करते हुए मार्शल-लों लागू करने की कोशिश की थीं। श्री मनोक ने लेख में लिखा कि श्रीमती गांधी ने यह कोशिशें अपनी ओर से की, किन्तु उनकी कोशिश पूरी न होने देने में कुछ ऐसे लोग वाधक बने, जो यह अच्छी तरह समझ पा रहे थे कि तानाशाही के कारण वे और उनकी संस्था जितना कुछ खो चुके हैं, उससे ज्यादा खोने की भूल उन्हें नहीं करनी चाहिए। इनमें सबसे पहले व्यक्ति थे स्वर्गीय राष्ट्रपति श्री फखरुद्दीन अली अहमद । श्री मनोक के अनुसार श्रीमती गांधी ने श्री अहमद से कहा था कि वे आपातकाल में राष्ट्रपति के विशेषाधिकारों का प्रयोग करके संविधान के कुछ हिस्सों को निष्क्रिय कर दें तथा उनकी यानी श्रीमती गांधी की समस्या हल करें, किन्तु श्री अहमद तैयार नहीं हुए। श्री मनोक ने लेख में आगे कहा है कि इसपर इन्दिराजी रुष्ट हो गई। उन्होंने आवेश-भरे शब्दों में श्री अहमद से वहस की। दूसरे दिन श्री अहमद को दिल का दौरा पड़ा और उनका निधन हो गया। श्री राबर्ट को यह जानकारियां किन सूत्रों के आधार पर मिली थीं, इसका लेख में कहीं उल्लेख नहीं है किन्तु उन्होंने अनेक रहस्यपूर्ण तथ्यों को उजागर किया है। उक्त लेख में वह आगे लिखते हैं कि श्रीमती गांधी ने राष्ट्रपति की ओर से निराश होकर इस सम्बन्ध में जनरल टी० एन० रैना से सम्पर्क साधा और कहा कि कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में इस आधार पर सेना लगा देनी चाहिए क्योंकि उन क्षेत्रों में जन-अशान्ति का भय है। कहते हैं कि श्री रैना ने ऐसा फरने ने स्पष्ट इनकार कर दिया। इसपर मंत्रिमंडल ने जनरल रैना को वैसा करने का आदेश प्रसारित कर दिया। श्री रैना ने सेना को इधर-उधर भेज तो दिया, किन्तु इसमे श्रीमती गांधी के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकी। रॉबर्ट मनोक ने लेख में यह भी लिखा है कि विधि मंत्री श्री गोखले इस दौर में संविधान के द्वारा कोई ऐसा कानूनी मुद्दा ढूंढने में व्यस्त रहे थे कि जिसे आधार बनाकर चुनाव स्थगित कराए जा सकें। कुल मिलाकर यह कि निराश स्थिति में श्रीमती गांधी और उनकी सरकार निरंतर यह कोशिश करती रहीं कि किसी भी तरह सत्ता पर स्थापित रहे। १. द नेगर (विदेशी पतिका) ॥ दूसरी बाजारी::१५५ इससे भी ज्यादा रोमाचक सत्य यह है और जमारि तानागाही के दौर में मंगा होता है, इन्दिराजी को तानाशाही के पुरज भी पूरे यंत्र की क्रिया निगरानी कर रहे थे। इन पुरजों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण थे बंगोलान । पोररी बनीलाल ने किम मफाई के माय पूरे शासन-तंत्र पर अपना जाभूमी पर चला रमा था, इसका उद्घाटन करते हुए 'नवभारत टाइम्म की आवाज पुनार के बाद खुली। 'भूतपूर्व रक्षामंत्री श्री यमीलाल के जो कारनामे मामने आ रहे हैं. उनमें एक भयकर कारनामा यह है कि हरियाणा तया उन क्षेत्रों में जहा दना प्रभाव था, मत्रियो, विधायको. वरिप अधिकारियों तथा बधापारियों ममी को मतत निगरानी के लिए खुफिया जामून नियुक्त थे जो उनके परिवार तक की गतिविधियों पर हर वक्त नजर रखते थे। "इममे भी भयानक बात यह है कि युफिया जासूम थी बमीनान के nि. धियों के यहा चोरी-डकैती मे लेकर रानं चलते मारपीट तक कराने के लिए आजाद थे । हरियाणा के एक भूतपूर्व मन्त्री के निजी सहायर ने आज बनाया किमी. आई.डी. के आदेश पर ममत्री द्वारा लिवाए गए हर पत्र की एक अतिरिक्त प्रति टाइप करके मी० आई० डी०को देनी पानी भी। " यमीलाल ने कुछ लोग इस कार्य के लिए भी लगा रगे कि जो भी मोग प्रधानमत्री से मिलें, उनकी बातचीत का विवरण थी रमीलान को दुत मिर जाए। 'हरियाणा में निर्वाचित गग्य ममा के दो सदस्य जो वनीलाम के 'गुट ही थे, एक बार शिष्टाचार के नाते श्रीमती गारी में मिलने गए थे। वही साउथ एवेन्यू स्थित अपने फ्लंटो में पहुंचे, उन्हें बगीलान कामह मन्देश रया हुआ मिला, कि तुरत चडीगढ आकर मनमे मिलो। वैचारे जय श्री बालान से मिले तो बुरी तरह हार पड़ी कि बिना मेरी इमारत के आप यहा गए कम! श्री यंसीलाल ने जो गफिया जामूम इन काम पर सगाए थे, उनां पाग वायरलेस मे मज्जित कार तया जाय तो पी ही, उन्हें जितना पाई धन यचं करने की भी छूट पी। "इनमे में ही एक जीप श्री मंजय गांधी की गाडी माप मानि तर 44 . भारत टाइम्स (नई दिल्ली), ४ मई, 1800 १५४ :: दूसरी आजादी आती-जाती थी। इसी कार्य पर प्रतिवर्प दो लाख रुपया खर्च होता था। हरियाणा के कालेजों तथा विश्वविद्यालयों के छात्रों की गतिविधियों पर वरावर नजर रखी जाती थी और यदि कोई अवांछित पाया गया तो उसे हटा दिया जाता था। जो प्राध्यापक 'सुपर आका' के विरुद्ध एक-आध शब्द भी भूलचूक से वोल जाते थे, वे तबादले के नाम पर एक स्थान से दूसरे स्थान को जाने के लिए मजबूर थे। " इतना ही नहीं, श्री बंसीलाल को गृह मंत्रालय के खुफिया विभाग पर भरोसा नहीं था, अतः उन्होंने अपना खुफिया विभाग अलग से स्थापित कर लिया था। एक बार जब उनके पुत्र सुरेन्द्रसिंह के बारे में खुफिया विभाग ने विरोधी रिपोर्ट दी तब नाराज होकर उन्होंने खुफिया विभाग की भी निगरानी करानी शुरू करा दी। रिवासा कांड की सही रिपोर्ट देने के लिए भिवानी के खुफिया पुलिस- इन्स्पेक्टर को दंडित होना पड़ा। सुरेन्द्रसिंह के विरोधी श्री भंवरसिंह की दादी की हत्या के लिए जिम्मेदार उप-अधीक्षक को पदोन्नत करके अधीक्षक बना दिया गया। इसी केस के प्रसंग में भिवानी के एक खुफिया अधिकारी को गिरफ्तार कराया गया और उसकी पत्नी को अपमानित किया गया। " पोस्टमास्टरों को आदेश थे कि वे पत्रकारों की निजी डाक को खोलकर उसकी जांच करें। सन्देहास्पद पनों को पहुंचने ही नहीं दिया जाता था । " जब कुछ डाक अधिकारी इस आदेश का पालन न करते पाए गए तो उन्हें मुअत्तिल कर दिया गया। तब के संचार मंत्री ने जब उनकी सेवाएं वहाल कर दी तब उन्हें उसकी कीमत मंत्रिपद से चुकानी पड़ी। वंसीलाल की गलत गतिविधियों में सहायक न बनने के कारण श्री पोसवाल, श्री हरिद्वारीलाल, श्री खुर्शीद अहमद तथा श्रीमती चन्द्रावती को भारी कीमत चुकानी पड़ी। बहरलाल चुनाव शुरू हुआ और चार दिनों बाद ही झूठ के पांव बुरी तरह उखड़ गए । जनता के शान्त विद्रोह ने तानाशाही को उठाकर कचरे के ढेर पर फेंक दिया। निम्न आंकड़ों से अनुमान लगाया जा सकता है कि अहिंसात्मक शिप्ट क्रांति ने संसार के सबसे बड़े प्रजातंत्र में किस तरह सत्ता-परिवर्तन किया। २३ मार्च, १९७७ को चुनाव आंकड़े और देश का भविष्य निर्णीत हुआ-- ७ दूगरी आगी: १५५ इस दिन सुबह तक ५४२ सीटों में गे ५३६ मोटों के चुनाव परिणाम मा चुके थे। कुल स्थान चुनाव परिणाम जनता पार्टी सी. एफ. डी. कम्युनिस्ट (माक्सवादी) २२ काग्रेस कम्युनिस्ट पार्टी आफ इण्डिया अन्ना डी० एम० के. डी० एम० के. अकाली दल अन्य २० निर्दलीम (जिन्ह अन्य के अन्तर्गत गिना गया है उनम फारवर्ड नाव, रिपजिग्न पार्टी ऑफ इण्डिया, मुस्लिम लीग, केरल काग्रेस, यूनाइटेड मोटिर फेंट: नागालैंड, हिल स्टेट पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ मेघालय, महाराष्ट्रवादी गोमातक पार्टी आदि विभिन्न दल है।) अगले चौबीस घण्ट में सम्पूर्ण चुनाव-मविष्य सामने पा, रिन्नु इगी पूर्व ही भारत का राजनीतिक भविष्य निश्चित हो चुका था और भारतीय मतदाता ने बहुमत से तानाशाही को अस्वीकार कर दिया था। इस माता ने परि श्रीमती गाधी को सिर-आयो उठाकर अपना विश्वाम गोपा पातो इसीने उनके अधिनायकवादी षड्यन्त्र को अमफल करते हुए ऐसी पराजपदी पी, जिसने सदियो के इतिहास पर खडी एक महान मेम्या को ही लगभग पोस्ट कर ८ C दिया था। स्वयं श्रीमती गाधी रायबरेली में जनता पार्टी के राजनाराजग मे ५५ हजार में अधिक मतो से पराजित हुई। केन्द्रीय मंत्रिमंडल के ३ मित्र मनियों ने भयावह पराजय का मुह देगा। मबंधी बमीनाल, मंगयी. विद्याचरण शुक्ल, एच. के. एल. भगत जैसे लोग धराणामी हो गए। ममार ने विस्मय से देखा कि जिस देश के मतदाता को उन्होंने माही मग और गा की थी, उसने मोरप्रति १५६ :: दूसरी आजादी विश्वास और निष्ठा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है, जिससे पीढ़ियां सबक लेती रहें। अमरीकी राष्ट्रपति श्री जिमी कार्टर ने प्रजातंत्र के प्रति विश्वास और मास्था दिखाने पर भारत की प्रशंसा की और कहा कि भारतीय चुनाव शेप विश्व के लिए प्रेरणा-स्रोत है। लोकतंत्र और तानाशाही के इस महान और शान्त युद्ध में लोकतंत्र की विजय पर सारे संसार के प्रमुख पत्रों ने जो टिप्पणियां कीं, वे भी इस बात की प्रमाण है कि श्रीमती गांधी के विश्वव्यापी शासकीय प्रचार के बावजूद समस्त संमार जानता था कि वे तानाशाह हैं। दो लंदन टाइम्स ने एक लम्बी टिप्पणी प्रकाशित करते हुए लिखा-'नेहरू वंश का शासन-काल समाप्त हो गया। मंजय गांधी के एकदम उभर आने से नेहरू वंश के सत्तारूढ़ रहने का खतरा बढ़ गया था । इस चुनाव ने सावित कर दिया है कि भारतीय मतदाता संसदीय प्रणाली में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं चाहता है और वह यह भी नहीं सह सकता कि समाचारपत्रों पर सेंसर लगाकर सत्य का गला घोंटा जाए विना मुकदमा चलाए किसीको भी जेल में डाल दिया जाए। आस्ट्रेलिया से प्रकाशित होने वाले सिडनी मानिग हेराल्ड ने लिखा--"इस महान मतदान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय जन लम्बे समय से चले आ रहे कांग्रेस प्रशासन से ऊब चुका था और उसे श्रीमती इन्दिरा गांधी की तानाशाही नीतियां तथा दमन-चक्र विलकुल पसन्द नहीं थे।" इसी पन ने टिप्पणी में विश्वास व्यक्त किया था कि हो सकता है नई सरकार के स्थायित्व में दिक्कतें आएं, पर मतदाता को तानाशाही स्वीकार नहीं है। आस्ट्रेलिया के ही अन्य पन्न ने लिखा-"यह भारत के आम आदमी की विजय है और विश्व- भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्थायी आश्वासन भी है।" मेलबोन एज ने कहा कि भारतीय चुनावों से यह पता चलता है कि वहां की जनता में लोकतंत्र के लिए अगाध प्रेम है और वहां का भविप्य प्रजातंत्र ही है। केन्या के स्टैण्डर्ड ने एक टिप्पणी में लिखा-"अनेक राजनीतिक उतार- चढ़ावों के बावजूद भारत के मतदाता ने लोकतंत्र को ही अन्तिम लक्ष्य माना। प्रकट है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हैं।" गाजियन के अनुसार भारतीय जनता ने एक बड़ा दांव लगाया है। इस शांति को राजनीतिक भूकम्प की संज्ञा देते हुए गाजियन' ने स्वीकार किया कि दूसरी बाजादी: १७ भारतीय मतदाता ने इस चुनाव के द्वारा यह पूरी तरह माबित कर दिया रि तानाशाही पयादा नहीं चल सकती। और यह भी कि जनता कामात आपोन उसकी धज्जिया उडा डालता है। रेली टेलिग्राफ की एक टिप्पणी में इम चुनाव को एयः पनत गमर और युग का अन्त निरूपित किया गया। कहा गया कि गत सारानाम्यति को निरकुशता और श्रीमती गाधी के ग्यारह वर्षों के सत्ताराल और मास के सीन वों के राज्य को जनमत ने समाप्त कर दिया। भयावह पराजय के करीब पहुंचते ही २० मार्च को श्रीमती इन्दिरा गाधी ने मत्रिमडल को आपात बैठक बुलाई। एक प्रमुख हिन्दी गमापारपा अनुमार इस बैठक का कारण 'भावी कदम' पर विचार करना पा। यही समाचारपत्र आगे मूचना देता है कि यह जानकारी करने की बहुत कोशिश की गई कि इस बैठक में प्रधानमत्री के इस्तीफे पर विचार हो रहा है या नहीं- किन्तु पता नही चल मका। यह बैठक घण्टों चलती रही। भीतरी तौर पर दम बैठक में काफी छीटाकसी हुई यताते हैं । ११ वर्ष ५६ दिन, तानानाही के बीम माह गरीर है, सत्तारुढ रहने के बाद, लाचारी यो हालत में योमती गाधी ने २२ मार्च को सुबह १० बजे अपने मनिमडल पो अध्यक्षता करने के याद राष्ट्रपति-भवन पहचकर कार्यवाहक राष्ट्रपति श्री वासणा दानणा माती को अपना त्यागपत्र प्रस्तुत कर दिया। २० माह लम्बी भयावह कालरानि समाप्त हुई। सुबह साथ, रात के चेहरे २६ मार्च को देश की नई आजादी पर दूसरी मरगर बनी। १४ मंत्रियो के शपथ-ग्रहण के साथ पहले गरवाग्रेसी प्रधानमन्त्री श्री मुरारजी माई दंगाई ने देश की बागडोर मभाली । यह एक नई मुबह यो, नई आगामी और उमगो मे भरो मुबह, किन्तु इस मुबह के साथ ही रात के कितने अंधेरे में अपने- आपको बदल कर इस रोशनी में छुपा तिया-निश्चित परी शिम और विचार को वात है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि अवसरवादी और निहित म्वार्यों वाले लोग, गिरगिट की तरह रण बदलते हैं। और इन दिनों ने हर समप देश को नुकमान पहचापा है। इस गुदह के साप ही यह सब होना शुरू हमा, जिस क्षण तामह पुखर १५६ :: दूसरी बाजादी विश्वास और निष्ठा का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत कर दिया है, जिससे पीढ़ियां सबक लेती रहें। अमरीकी राष्ट्रपति श्री जिमी कार्टर ने प्रजातंत्र के प्रति विश्वास और आस्था दिखाने पर भारत की प्रशंसा की और कहा कि भारतीय चुनाव शेप विश्व के लिए प्रेरणा-स्रोत हैं। लोकतंत्र और तानाशाही के इस महान और शान्त युद्ध में लोकतंत्र की विजय पर सारे संसार के प्रमुख पनों ने जो टिप्पणियां कीं, वे भी इस बात की प्रमाण हैं कि श्रीमती गांधी के विश्वव्यापी शासकीय प्रचार के बावजूद समस्त संमार जानता था कि वे तानाशाह है। दी लंदन टाइम्स ने एक लम्बी टिप्पणी प्रकाशित करते हुए लिखा-~"नेहरू वंश का शासन-काल समाप्त हो गया। मंजय गांधी के एकदम उभर आने से नेहरू वंगा के सत्तारूढ़ रहने का खतरा बढ़ गया था । इस चुनाव ने साबित कर दिया है कि भारतीय मतदाता संसदीय प्रणाली में किसी तरह का कोई परिवर्तन नहीं चाहता है और वह यह भी नहीं मह सकता कि समाचारपत्रों पर सेंसर लगाकर सत्य का गला घोंटा जाए या विना मुफदमा चलाए किसीको भी जेल में डाल दिया जाए । आस्ट्रेलिया से प्रकाशित होने वाले सिडनी मानिग हेराल्ड ने लिखा--"इस महान मतदान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारतीय जन लम्बे समय से चले आ रहे कांग्रेस प्रशासन से ऊब चुका था और उसे श्रीमती इन्दिरा गांधी की तानाशाही नीतियां तथा दमन-चक्र विलकुल पसन्द नहीं थे।" इसी पन ने टिप्पणी में विश्वास व्यक्त किया था कि हो सकता है नई सरकार के स्थायित्व में दिक्कतें आएं, पर मतदाता को तानाशाही स्वीकार नहीं है। आस्ट्रेलिया के ही अन्य पन्न ने लिखा--"यह भारत के आम आदमी की विजय है और विश्व- भर में लोकतांत्रिक व्यवस्था का स्थायी आश्वासन भी है।" मेलबोर्न एज ने कहा कि भारतीय चुनावों से यह पता चलता है कि वहां की जनता में लोकतन्त्र के लिए अगाध प्रेम है और वहां का भविष्य प्रजातंत्र ही है। केन्या के स्टेण्डर ने एक टिप्पणी में लिखा--"अनेक राजनीतिक उतार- चढ़ावों के बावजूद भारत के मतदाता ने लोकतंत्र को ही अन्तिम लक्ष्य माना। प्रकट है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी है।" गाजियन के अनुसार भारतीय जनता ने एक बड़ा दांव लगाया है। इस शांति को राजनीतिक भूकम्प की संज्ञा देते हुए 'गार्जियन' ने स्वीकार किया कि दूसरी बाजादी : १५७ भारतीय मतदाता ने इस चुनाव के द्वारा यह पूरी तरह मावित कर दिया रि- तानागाही ज्यादा नहीं चल मस्ती। और यह भी कि जनता का मांत आयोग उमरी धज्जियां उड़ा डालता है। रेपोटेलियाफ की एक टिप्पणी में इस चुनाव को एक गलत समय और युग का अन्त निरूपित किया गया। कहा गया कि गत बापातस्थिति की निरपुगता और श्रीमती गांधी के ग्यारह वर्षों के सताकाल बोर काप्रेस के तीन वों के राज्य को जनमत ने ममाप्त कर दिया। भयावह पराजय के करीब पहुंचते ही २० मार्च को श्रीमती इन्दिरा गांधी ने मंत्रिमडल की आपात बैठक बुलाई। एक प्रमुख हिन्दी ममाचारपत्र के अनुमार दम बैठक का कारण ‘भावी कदम' पर विचार करना था। यही समाचारपत्र मागे मूचना देता है कि यह जानकारी करने की यहत कोगिय को गई किन बैठक में प्रधानमंत्री के इस्तीफे पर विचार हो रहा है या नहीं- किन्नु पता नहीं चल सका। यह बैठक घण्टों चलती रही। भीतरी तौर पर इस बैठक में काफी छोटाकली हुई बताते हैं । ११ वर्ष ५६ दिन, जिसमे तानागाही के बीम माह गरीक है, सत्तारुढ रहने के बाद, लाचारी की हालत में श्रीमती गांधी ने २२ मार्च को मुबह १० बजे अपने मत्रिमडल को अध्यक्षता करने के बाद राष्ट्रपति-भवन पहुंचकर कार्यवाहक राष्ट्रपति श्री वासप्पा दानप्पा उत्ती को अपना त्यागपत्र प्रस्तुत कर दिया। २० माह सम्बी भयावह कालरात्रि ममाप्त हुई। सुबह के साथ, रात के चेहरे २६ मार्च को देश की नई आजादी पर दूमरी मरकार बनी। १४ मत्रियो शपथ-ग्रहण के माय पहले गैरकाग्रेमी प्रधानमंत्री श्री मुरारजी भाई देसाई ने देश की बागडोर मभाली। यह एक नई मुबह यो, नई आगाओं और उमगो मे भरी मुबह, विन्नु इम मुबह के माय ही रात के कितने अधेरे धब्बों ने अपने- आपको बदल कर इन रोगनी में छुपा लिया-निश्चित रूप मे विश्लेषण और विचार की बात है। यह एक ऐतिहासिक मत्य है कि अवमरवादी और निहित स्वायों वाले लोग, गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं । और इन गिरगिटो ने हर समय देश को नुक्मान पढ़पाया है । इम गुबह के साथ ही यह सब होना शुरू हुआ, जिस क्षण तक यह पुस्तक १५८ :: दूसरी आजादी प्रेस में जा रही है, उस क्षण तक गिरगिट रंग बदल रहे हैं। जाने कितने लेखक, कलाकार, राजनीतिज्ञ, अभिनेता, संपादक और अधिकारी मैंने रंग बदलते हुए देखे हैं--वे ही, जो कभी तानाशाही के हाथों में चाकू-छुरों की तरह रहकर जनता के शरीर, आत्मा और विश्वास पर प्रहार करते रहे थे। चूंकि उस समय तक जनता पार्टी की विधिवत् स्थापना नहीं हुई थी, और उसमें जनसंघ, संगठन कांग्रेस, भारतीय क्रांति दल और समाजवादी पार्टी एकजुट थे, अतः यह कहते भी मैंने वहुतों को नुना कि उन्होंने अमुक दल के साथ रहकर मौन सेवा की या फिर अमुक दल के विचारों से वे जुड़े हुए थे अथवा जयप्रकाशजी की क्रांति के प्रति मौन समर्पण किए हुए थे। बहुत हैरानी की गत यह थी इन्हीं लोगों को मैंने कभी टेलिविजन और रेडियो पर आपातकालीन स्थिति तथा श्रीमती गांधी का समर्थन करते देखा था और कभी सम्पादकीय टिप्पणियां लिखकर, या मंच मे भाषण करते हुए अथवा नाटक करके आपातकाल रूपी जन-क्रांति के समर्थन का गीत गाते पाया था। २३ या २४ अप्रैल को मुझे रसकलश' नामक एक संस्था द्वारा 'आपात- कालीन स्थितियां और साहित्यकार' विषय पर चर्चागोष्ठी में बुलाया गया। इन गोष्ठी के संयोजक थे सर्वश्री राजेन्द्र अवस्थी, मनोहरश्याम जोशी और लक्ष्मीनारायण लाल । जब यह निमंत्रण कार्ड मुझे मिला तो चकित भाव से कुछ क्षण में उसे देखता ही रह गया था । मुझे लगा था कि एक बार फिर वही मिलमिला गुरू हो गया है, जो कभी आपातकाल में था। यह कि जो जितने जोर में आपातकाल का समर्थन करेगा उतने ज़ोर से सरकारी नज़र' में आ । जाएगा। इन बार रुख बदलकर अन्तर यह होना था कि जो जितने ज़ोर से आपातकाल का विरोध करेगा, उतने ज़ोर से सरकार की नज़र में आ जाएगा। मैने निश्चय किया था कि इस तरह की 'भड़ती गोष्ठी' में मैं भाग नहीं लूंगा। बाद में इन गोष्ठी के क्रांतिकारी समाचार (?) मुझे सुदर्शन चोपड़ा से सुनने को मिले । बतलाया गया कि इस गोष्ठी में लेखकों में खासी तू-तू मैं-मैं हुई और चर्चा का विषय आपातकालीन स्थितियां और साहित्यकार न रहकर आपात- फालीन भतियां और साहित्यकार हो गया। इस चर्चा के अनुसार कुछ आयोजकों पर कुछ साहित्यकारों ने यह आरोप लगाया कि आज वे आपात- कालीन तानाशाही म्य की आलोचना कर रहे हैं, किन्तु उस समय उनका महान मांतिकारी और स्वतंत्रचेता सम्पादक-लेखक कहां गायब हो गया था, जब वे ढोल बजा-बजाकर उस सबका समर्थन कर रहे थे। श्री रमेश गौड़ ने आश्चर्य दुसरो यात किया कि मंयोजकों में हाल सम्मी नागर वह उन लोगो में से हैं, जिन्होंने आपातकार सरे कीगमन प्राति के प्रति विश्वास व्यक्त रिजातमालकिन इसपर डॉ० लाल ने कहा कि उन्हें मालूम ही नहीं है कार्ड में केमे छपा है । तुरत राजेन्द्र अवस्थी ने पीरमर का नाम उनमे (लाल से) वातचीत के बाद ही प्रारंव- कार यह गोष्ठी एक तरह से परस्पर छीछालेदर को गोदामा मैंने इस तरह के भी समाचार सुने-पढे हैं कि लेबरों करके तानाशाही के विरद अपने क्रांतिकारी विचार (2) नई सरकार रीसमा में यह पुल वाधे है। कुछ नस्यार नो मन्यागें कुछ अदमरवादी लोग एक-दो इन्ससानो दाई निरमाकर नौर पर निहित स्वार्थ पूरे करने में जुट गए है। रविका जिक्र मैंने किया, उस तरह की मंगनीगंटिश दियालने में लगे हुए हैं. रिकता नगरम' किस्म की मस्थाएं दनी में प्रदल ने 'धर्मयुग' मे वक्तव्य र म भयारा धाम पहा, परेशान होकर सारे निरागिन कराया और वार-चार. पाच गंदगावी गन्दी या प्रयोग करके कहा कि न्य भाट किनार र अधिकाश को चापना दम. मम बगर ने कुछ नाम गिनाए हैं-मबंधी बन्द . दंग, रंग, मत्यत्रत सिन्हा, सुन्द बन्दै रिमाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, हि पारबादमी भी चुनकर नहीं 57 और.मादश में उनका सदरही जा सकती है कि गगनही है ?" हामी ने जितने नाम - : Trt, it.

१६० :: दूसरी आजादी मतदाताओं की संख्या का तोला-दो तोला भी नहीं निकलता। इस सत्य को हिन्दी लेखक स्वयं जानते हैं। श्री अमृतराय बीच में कहते हैं यह कहा होता कि अधिकांश लेखक मौन रहे कारण बतलाया है कि मैं समझता हूं कि इस चीच भी काफी कुछ लिखा गया है, प्रतिवन्धों के रहते छप नहीं सकता था,. इसलिए नहीं छपा। आगे कहते हैं : अव धीरे-धीरे सामने आएगा। क्या फिर भी हिन्दी के अधिकांश लेखक चापलूस हैं ? एक तरफ अमृतरायजी कह गए हैं कि अधिकांश लेखक मौन रहे, दूसरी तरफ कहते हैं कि इस बीच काफी कुछ लिखा गया, तीसरी ओर बतलाते हैं कि अब धीरे-धीरे सामने आएगा। ये बातें बहुत समझ में आने वाली तो नहीं हैं। आ भी जाएं तो मानी जानेवाली नहीं हैं और आपातकाल के बाद जिस तरह इन सम्पादकीय टिप्पणियों के साथ कविताएं, लेख, कहानियां छप रहे हैं कि यह अमुक कवि या लेखक साहब की आपातकालीन मनस्थिति थी, उससे लगता है कि जयप्रकाशजी की समग्र क्रांति हिन्दी लेखक अब कर रहा है। यह कहकर भी हिन्दी लेखक बच नहीं सकता कि उसने मौन धारण कर लिया। क्यों किया? अगर वह सचमुच इन्कलावी था, सच का पहरुआ था तो उसने चौराहे-चौराहे नागार्जुन की तरह कविताएं क्यों नहीं सुनाई ? कोई कुछ छापने को तैयार न था, सेंसर के भय के कारण, तो उसने स्वयं क्यों नहीं कहा, सुनाया दुग्न तो यह है कि अब वह मुखौटा बदलकर कागजी विद्रोह कर रहा है। इस तरह शहीदी मिलने से तो रही। अमृतरायजी के इस पत्र का उत्तर देते इनी अंक में श्रीमती भागवत का पत्र भी 'धर्मयुग' ने छापा है। इस पत्र में बड़े शालीन ढंग से वह कहती है -"अमृतजी ने जो जानकारी हमें इमरजेंसी के दौरान हिन्दी लेखकों के बारे में दी है, उसके बारे में पूरी तरह मेरा जानना तो दूर की बात है, यहां के अधिकांश हिन्दी लेखकों और पत्रकारों को भी उसकी जानकारी नहीं थी।" लगता है अब अमृतरायजी को दूसरा पत्र लिखना पड़ेगा क्योंकि श्रीमती भागवत कभी प्रहार कर देती हैं, कभी चिऊंटी ले लेती हैं। यह सिलसिला यत्म होना चाहिए । अच्छा तो यह है कि हिन्दी लेखक- पत्रकार स्वीकार लें, कि उनका मौन भी ठीक नहीं था, बशर्ते कि सचमुच मौन था। 'तोला-दो तोला श्रेय ही सही' इस भाव से शहीदी न बटोरें। यों ? १. धर्मयुग, १५ मई, १९७७ दूसरी आशादी::१६१ - भी प्राति तोल, माशे-रत्ती से नहीं होती। अगर होती, तो कभी भी हो गई होती। यहां मैं एक और हिन्दी लेखक की ईमानदार कलमवयानी लियना पाहगा और इस सराहना-प्रशंसा के साय लिखना चाहूंगा कि अधिकांश में न सही कुछ में इतना आत्मवल अवश्य है कि वे सत्य को स्वीकार लें: शरद जोशी ने एक टिप्पणीनुमा लेख मे लिया है-"श्रीमती दुर्गा भागवत का यह कहना गलत है कि आपातकाल मे हिन्दी लेखक सरकार के पापलूरा हो गए। हम पहले से थे। हिन्दी के अधिकाश लेखक सरकारी. अघं सरकारी या मरवारी महायता प्राप्त मस्था में नौकरी करते हैं अथवा प्रत्यक्ष रूप से लाभान्वित होते है अत. चापलूमी उनके सेवाधर्म का अग है। आपातकाल में इमी काम में प्रगति हुई है।" शरद जोशी ने आगे लिखा है---"वे (हिन्दी लेखकः--भ्रमर) हमेशा उच्च सत्ताधारियों की साजिशो के वकील रहे है । वे आम आदमी की तलाण के नारे लगाते है. पर इस चुनाव में आम आदमी ने जब अपना मत व्यक्त किया तो वे उपस्थित होने पर भी पहचानने से इन्कार करते हैं। हिन्दी गाहित्य माजिशो का एक लम्बा सिलसिला है । श्रीमती भागवत परेशान न हो।' आपानकाल और लेखकीय मन्दर्भ की बात चली है तो यहा लोगों को चर्चा करना चाहूगा, जिन्हे अमृतराय अपने लेख में गिनाना भूल गार। क्या इसलिए कि ऐसे लोगों ने न तो हिन्दी या अंग्रेजी में अपना सेग्रकीय या पत्रकारीय नाम चेहरा उजागर करवाने के लिए कोई आदोलन पलाया है, न हो किनी तरह का दोग-धतूरा करके हिन्दी भाषा की टेकेदारी की है ? पे नाम है मवंश्री बालेश्वर प्रमाद, दीनानाथ मिश्र, भानुप्रताप शुक्ल चोर देवप्रयाग भाटिया । दीनानाथ जी मिय पर विभिन्न मारोप थे । गयगे या आरोप था कि पाचजन्य' के मम्पादन के दौरान और बाद में वह जनता की तानागाही के विरुद्ध भडकाने को गुम्तानी कर रहे थे। उन्हें दो बार गिरफ्तार. दिया गया और दिल्ली के तिहाड़ जेल में रखा गया । जलाई, १९७५ मे लगा. तार कार महीने तक मिश्रजी अण्डरग्राउण्ड रहे और दम बीच उन्हान त्राति. मम्बन्धी माहिर प्रकामित करवाकर घर-घर पढ़वाया तथा जनवाणी' नामक एर पन्द्र का मुनादन आपातकाल के यन्न तक किया। जिन दिनों गिनी अन्दाजपे, उन दिनों मुझे पता चला था कि वह अनेक विदेगी पत्रकारों तमा भूमिगत कातिकारियों को भी गुजम्प मे आयोजित किया करते थे। इसी तरह यो भानुप्रताप शुक्र गतिकारी माहित्य की प्रामन-वितरण कुछ ऐगे १६२ :: दूसरी माजादी । . व्यवस्था किया करते थे। श्री शुक्ल राजस्थान, पंजाब और हरियाणा में भूमि- गत छान आन्दोलन का भी आयोजन करते रहे थे। श्री वेदप्रकाश भाटिया भी भूमिगत साहित्य के सम्पादन-प्रकाशन का कार्य देख रहे थे। उन्होंने उस दौरान 'सत्य समाचार' नामक एक पन का सम्पादन भी किया। बालेश्वरजी न मालूम तानाशाही की किस भूल के कारण छूटे रह गए थे और तानाशाही को जात नहीं था कि उनका सम्पर्क निरन्तर सभीसे रहा । 'भारतीय साहित्य परिपद्' को केवल दिल्ली कार्यसमिति की बैठक के १८ सदस्यों में से १४ आन्दोलन के दौरान जेल में रहे, जबकि ४ सदस्य अपनी नौकरी से मुअत्तिल पड़े रहे। अपने पत्र में श्री अमृतराय के पास सही तरह गिना पाने के लिए हिन्दी पत्रकारों-लेखकों के नाम नहीं थे, अतः उनकी सूची उपर्युक्त नामों से बढ़ा रहा हूं। ताकि सम्पादक के नाम अगला कोई पत्र लिखने में उन्हें सुविधा हो दूसरी आजादी ने यदि एक ओर कांग्रेस को वौखला दिया था तो दूसरी भोर उन मुखौटाधारियों को भी गहरी चोट पहुंची थी जो अवसरवाद में देश की जनता से गद्दारी करते रहे थे। सत्ताशक्ति और तानाशाही के अन्त का परिणाम तुरन्त ही कांग्रेस में देखा जाने लगा। जिस तरह कार्यसमिति की बैठकों में परस्पर दोपारोपण हुए, लोगों का रख-निकाल चला, पत्रों में वक्तव्य- वाजी प्रारम्भ हुई, श्रीमती गांधी ने कुछ दिनों तक 'संन्यास' लिए रहने को नाटकीय घोपणा की, फिर कांग्रेसाध्यक्ष पद को लेकर मतदानबाजी हुई, उसने यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया कि पराजय का एक थपेड़ा भी कांग्रेस नहीं सह पाई है। क्या वह वहीं कांग्रेस है, जो ब्रिटिश साम्राज्यवाद की लाठियों, गोलियों से टूटना तो दूर, लड़खड़ाती तक नहीं रही थी। अचरज से सारी दुनिया देख रही थी। क्या यह वही कांग्रेस है, जिसने संघर्ष की लम्बी मिसाल कायम की थी? यह कांग्रेस वह नहीं ची ! कांग्रेस के नाम से जिस दल रूपी सत्तासमुद्र में ज्वार आया था, उसने मर्यादा और अनुसाशन के सारे कूल-किनारे तोड़ डाले धे । यही नहीं, वेहद हल्के और अमर्यादित शब्दों में कांग्रेस के दिग्गज एक-दूसरे पर नारोप-प्रत्यारोप करने में लग गए थे। क्या इसलिए कि सत्ता-समझौता ही उन्हें एक किए हुए था? क्या इसलिए कि जनता के शिप्ट इन्कलाब ने उनके स्वाघों के सारे महल धराशायी कर दिए थे? क्या इसलिए कि सत्ता विसकः जाने के कारण अचानक ही उनके कारनामों का वहीखाता जो दो .

दूमरी आजादी :: १६३ नम्बर का या और जिसे अब तक जनता में नहीं रखा गया था—सामने आने पोहो गया था? आजाद देश को नई सरकार जब तानाशाही के दाग मिटाने में व्यस्त थी, तब कांग्रेस दल परस्पर बारोप करने में जुटा हुआ था। आपातकाल में अकारण ही प्रतिवन्धित कर दिए गए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ जैसे संगठनों से प्रतिवन्ध उठाया गया। देश-भर की जेलों में बिना आरोप, मुकदमा चलाए गिरफ्तार कर लिए गए नागरिकों को रिहाई शुरू हुई। 'आंसुका' में लगभग माढे तीन हजार व्यक्ति जेलों में पड़े हुए थे, उन्हें छोड़ा गया, प्रेस सेंसरशिप गत्म की गई ताकि लोकतन्त्र सत्य रूप में चल सके। इधर काम कार्यसमिति की बैठक में कांग्रेस की पराजय पर जव विचार- विमर्श हुआ, तब वे कई सदस्य, जो श्रीमती गाधी के सत्ताकाल मे खामोश बैठे रहते थे. अचानक उबलकर सत्य वखानने लगे। इस कार्यममिति में हरियाणा के यो वंसीलाल के सम्बन्ध मे खासी चखच रही। अनेक सदस्यों ने विचार पान किए और अन्त में एक प्रस्ताव के जरिये श्री बंसीलाल को छह वर्ष के लिए पार्टी, उसकी ममम्त समितियो और काग्रेस की सदस्यता से निष्कासित कर दिया गया। श्री मजय गाधी, विद्याचरण शुक्ल और आम मेहता को लेकर भी आलोचना हुई, किन्तु श्री गाधी के बारे में इसलिए विचार नहीं किया जा मका क्योंकि उन्होंने पहले ही दल की सदस्यता मे त्यागपत्र दे दिया था, जबकि श्री विद्याचरण शुक्ल के सम्बन्ध में निर्णय किया गया कि उन्हे मना के दुरपयोग के आरोप मे प्रताडित किया जाना चाहिए। ओम मेहता के सम्बन्ध में विचार-विमर्श नहीं हुआ। कांग्रेस : आत्मपरीक्षण की राजनीति निस्मन्देह यह मवमे दुखद सत्य है कि जबरदस्त पराजय के बावजूद काग्रेम नापी भारत के पिछले मत्तारुढ दल के मोचने-समझने में तनिक भी अन्तर नहीं आया और निरन्तर यह दोहराया जाता रहा कि काग्रेम इसी लिए नही हारी कि उमको नीतियां गलत थी, बल्कि उनके क्रियान्वयन में दोप था। जब पास के उच्चस्तरीय नेताओं के मुह से 'नीतियों' को वात सुनता हू तो नगता है कि वे अपने साथ ही नहीं, मारे देश की उस जनता के साथ, जिसने पिनीनी तानाशाही का दमनचक्र क्षेला या,क्रूर मजाक कर रहे हैं। क्या ताना- १६.४:: दुगरी आजादी मामा नागनीति ? गया विना गुगादगे पलाए अकारण ही लाखों लोगों मी जेल में राष्ट्रालालना नीति ? गगा पिरोपी पक्ष को तादित, अपमानित गरी परतापूर्वक दगा गारवा नीति ? निजी स्वार्थी ग राजमहल बनाना और ग्राम लोगों को अपने लिए जग-धन और राताशगित मा उपयोग गारमा नीतिगत ? पर अपगोरा कांग्रेस महासमिति अधिवेशन में जयकि मांगोहार मारणों पर साफणित पाला विचार' गल रहा था, अनेक नेता का स थे कि बात उस तरह नहीं है, जिस तरह रामसी जा गी, धागा धात उग तरा है, जिस तरह वह (यानी नेता) रागमा गः और यदि श्री गशवन्तराग पहाणने नुलन्दी सायरा सत्य को नीकारा गिरोगगी पराजय अपनी नीतियों और परम्पराओं रोहटने गे. मारवाह गार देगना होगा कि भविष्य में हम अपने शिशांतों को नगुन," गो गरी ओर श्रीगती गांधी ने पहा जियांग्रेसियों को हार से निगश नही होना चाहिए गोंकि हम गा गमाव कि भारत नियनिर्वाण की जो गुहा आधार शिला हमने रगी, उसे किसी लिए भी सोमना आगानी ग गयरी परे तीसरी ओर कांग्रेस गी गीतरी गुटबापी और छिछोरी राजनीतिमा प्रवर्णन भी हो रहा था। जिरा, पुनावों की भयायः हार गी ताण मनस्थिति में महाधिवेशन मे पोरान हर भाषण में गुटबाजी, अधिकार प्रति और काग्य होरी रो। चटग गेः प्रारम्भ में ही हंगामा हो गगा। शोर, पी-पुकार समा योगलास्ट से भरे वातावरण में गुछ नेता रागग की पुकार परता गान, गनगी गौरवशाली परम्परा बनाए रया और बड़ोंगी बारा मग का उपदेश से। कारोग आग पनाम : लिए जिरा सीमा सका हलो आरोप-प्रत्यारोप प. श्रीमती गांधी और पारा गिशिप पुराने लोगों तक को पलती रहीं, ये जीगती र भारती गि गांग ना सतारवा समाप्त होते ही शायद मादातर गांगी रामाजिउनका "राम गुरमीत गगा !' जिन दिनों सी गगे में गह उपाइ-पछा पल रही थी और अब तक बन रही 1) मी दिनों नगालोकतांति दल सम्पूर्ण निष्ठा और विश्वास मे गायणगो रगामी प्रभागा घोगी लगभग सम्पूर्णता पा पुगा था। पहली मई, १९७७ को जनता पार्टी प्रथम महाधिवेशन में जगसंघ, संगठन कांग्रेस, दूसरी आजादी::१६५ भारतीय प्रातिदल,सोशलिस्ट पार्टी और कांग्रेस फार डेमोक्रेसी ने अपने-आपको 'जनता पार्टी में विलीन करते हुए अपना-अपना पृथक् अस्तित्व समाप्त कर लिया। उन्होंने सर्वसम्मति से युवा नेता श्री चन्द्रशेखर को अपना अध्यक्ष चुना। जनता पार्टी को लोकतांत्रिक नीतियों तथा कार्यक्रमों का विवरण देते हुए विद्रोही युवा नेता चन्द्रशेखर ने जनता को विश्वास दिलाया कि पार्टी देश में मामाजिक व आर्थिक परिवर्तन का अस्त्र बनेगी। जनता पार्टी के कई लोगों से बातचीत में मैंने महसूस किया कि वे कांग्रेस में चुनाव के उपरान्त हो रही गुटबन्दी और छीछालेदर से न सिर्फ दुखी हैं, बल्कि निराश हुए हैं। एक नेता ने तो यहां तक कहा कि "कांग्रेस दल भीतरी सौर पर कुछ गुमटिया बनकर रह गया है और ये गुमटियां न केवल दल के अपने लिए घातक हैं, बल्कि देश के लिए भी घातक हैं, क्योंकि हम लोग (जनता पार्टी - भ्रमर) काग्रेस से एक वहिया विरोधी दल की आशा करते थे, ताकि उसके विचारों से भी प्रशासन लाभान्वित हो। इसके विपरीत हम लोग देख रहे हैं कि काप्रेस केवल एक-दूसरे को टाग खीचने का अखाड़ा वन गया है।" एक और तरह लगभग यही बात जनता पार्टी के अध्यक्ष श्री चन्द्रशेखर से उस अनुरोध में भी दीखती है, जो उन्होंने कांग्रेस दल से किया। ४ मई को उन्होंने कहा-कांग्रेस को चाहिए कि वह अपनी गलतियां स्वीकार करे और जनसेवा की दृष्टि से लोकतांत्रिक मंगठन के रुप में राष्ट्रीय राजनीति में भाग ले । काग्रेस कार्यकर्ताओं के अनुसार उनकी पार्टी में 'आत्म-परीक्षण' हो रहा है, लेकिन उसका वास्तविक प्रमाण कहीं देखने को नहीं मिलता। कुछ व्यक्ति और प्रभावशाली व्यक्ति पुराने ढंग की राजनीति में ही व्यस्त हैं। इस बात मामी कोई संकेत नहीं है कि उन्हें अपने किए-कराए पर पश्चात्ताप हो रहा है. यदि उन्होंने अपना यही रस जारी रखा तो वह देश और पार्टी के लिए- जिसका कि देश को प्रतिविम्ब प्रगति में योगदान कम नही होगा- अच्छा नहीं होगा।" १ गुमटिया : बा-गावह धरती में वहां-तहां तिरे हुए छोटे-छोटे टोने, जो न मिर्फ भी दोरते हैं, बल्कि मनुपयोगी भी होते हैं। गुमटियों पानो बेतरतीर धरती पर पमा नहीं हो सकती।

१६६ :: दूसरी आज़ादी : दूसरी आजादी : कुछ रखतरे तानाशाही की वर्वरता का देश ने खूब जायका ले लिया है। कभी-कभी लगता है कि एक पहलू से यह अच्छा ही हुआ है। ऐसा न होता तो संभवतः हम उस अधकचरेपन में ही 'शुभ' की कल्पना-स्वप्न संजोए रहते, जिस कल्पना- स्वप्न में हमने पिछले तीस वरसों में पूरी एक पीढ़ी गंवा दी। शायद सत्ता पर बैठे लोग नारों से हमें ठगते रहते और मानसिक-आर्थिक शोषण की प्रक्रिया उसी तरह चलती जाती। हमने एक नई चेतना और नये विश्वास को पाया है। भारतीय जनमानस ने जवरदस्त बहुमत देकर एक बार पुनः लोकतंत्र को पुनर्जीवित कर दिया है, किन्तु कई वार 'शुभ' भी अन्धविश्वास बन जाता है। जैसाकि वयोवद्ध जननेता आचार्य कृपलानी ने जनता पार्टी के विशाल बहुमत में आने के बाद हुई आम सभा में कहा था कि "राजनेता सामान्य मनुष्य होता है और उसमें वे सारी कमजोरियां होती हैं, जो एक मनुष्य में होती हैं, अतः उसपर अंकुश रहना चाहिए। उसे अन्धविश्वास सौंपकर 'देवता' वनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।" एक यथार्थवादी विश्लेपण है । १६७१ के आमचुनाव में लगभग यही विश्वास देकर श्रीमती गांधी और उनकी कांग्रेस को भारतीय मतदाता ने विजयश्री दी थी, पर जब यही विश्वास अन्धविश्वास में बदल गया तो यह विजयश्री अंध सत्ताशक्ति के आधार पर तानाशाही में परिवर्तित हो गई। पिछले ३० वर्षों के कांग्रेस-काल में यदि जनता ने कांग्रेस के प्रति 'केवल विश्वास' रखा होता, उसे अंधविश्वास न बनने दिया होता, तो इन्दिराजी अपने व्यक्तिवाद को तानाशाही की ओर न ले जा पातीं और न ही वस्त भारतीय जन-मन को आजादी की दूसरी लड़ाई लड़नी पड़ती। श्रीमती गांधी का सत्ताकाल, विशेप रूप से आपातकाल, एक शिक्षा है भारतीय लोकतंत्र और जनमानस के लिए---अगर उससे इतिहास रूप में जानकर सीखा-समझा जा सका तो कहीं ज्यादा अच्छा होगा। सहज मानवीय कमजोरियों के लिए मात्र दोप देते रहने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कहीं ज्यादा अच्छा होगा, गाहे-बगाहे उन कमजोरियों की ओर अपनों का और अपना ध्यान दिलाते रहना। मतदान करके ही मतदाता अपनी ज़िम्मेदारी से मुक्त नहीं हो जाता, बल्कि उसपर एक बड़ी जिम्मेदारी होती है, यह देखना कि उसके मतदान से विजयी हुआ उसका - दूसरी आजादी :: १६७ प्रनिनिधि, या प्रतिनिधि दल क्या कर रहा है। यह ऐसी ही सामान्य प्रक्रिया है, जमे परिवार के मुखिया को परिवार-जनों का सहयोग-सलाह और अंकुश समय पर मिलते रहना । एक परिवार से लेकर सम्पूर्ण राष्ट्र तक यह सहज प्रक्रिया चलती है । इस प्रक्रिया का अंग बने रहना न केवल परिवार, समाज मर पर अनिवार्य है, बल्कि लोकतंत्र की सुरक्षा को पहली शर्त है।

Dusri Azadi

Author
Vijay
Title
Dusri Azadi
File name
Dusri Azadi
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Xxxxxxxxxxxxxx
Language
Sanskrit
Pages
172
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
History
DLI number
552118
Barcode
4990010032843.00
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