Sanmati Library, Jaipur

Jain Sahitya Samsodhak Vol - I

Muni, Jinvijay · 2009/11

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विषय-मुचि। मुस्ट अवश्य पढिए । ... जैन साहित्य संशोधक समाजकी तरफ शीत्र (हिन्दी लेख विभाग) हो एक जन प्राति संस्कत नन्धमाला निकले जनन्द व्याकरण और आचार्य देवनन्दौ । बाली है जिसमें जैन साहित्य उत्तमोत्तम, प्राची. लेखक-श्रीयंत पं. नाथूरामजी प्रेमी, संग- न और अन्य दुलभ अन्य प्रकट किया जायने द-जनहितयों इन ग्रन्याम जग आगमनत्र, नियुनि, जाग. भार बृत्ति न्याय, व्याकरण, काव्या कोप, साहित्य अं. २ गन्धहरित महाभाष्यको खोज-ले श्रीयत. लंकार, चरित्र. पुराण, प्रबन्ध इत्यादि सत्र प्रकार- बाब जुगल किशोरजी मुख्तार ....८८-६ के ग्रंथ रहगे। ये सब या नडे पद्धनिने जन ओर तीर्थयात्रा के लिये निकलनबाले संघाका वर्णन', अजेन विद्वानों द्वारा संपादित हो कर छपन। सम्पादकीय जैन साहित्यके देखने को मिति:लोकान दिन सलमेरक बंटवाक संघका वर्णन पर दिन बहती जा रही है पर एक ना अभी तक सम्पादकीय : .... ........ १०७-2 १०-१२ उत्तम प्रकारसे जन ग्रन्थ हो ही नहीं है, और जो शोकसमाचार जैल वैसे करे हैं उनकी प्राप्ति नी सब साधारणक (डॉ. सतीशचन्द्र विद्याभूषण ... ११३ लिये दुःसाध्य हो नहीं परत अराध्य हो रही है। लिग अनेक विद्वानांक मानह से (२) मो० सी: वी. राजवाडे (लो बाल गंगाधर तिलक यह काम करनका विचार किया है। चिन परिचय जो लजन इस ग्रन्थमालक करायी. वाह-वन- ना चाहेंगे उन्हें सय ग्रन्थ पानी नितंस याने र ( गुजराती लेख विभाग) ल्यम दिये जायेंगे। स्थायो ग्राहक बनने के लिये सोमप्रभाचार्य विचित झुमारपाल प्रतिबोधः अपया प्रथम प्रवेश फांके लिये भेजना चाहिां सम्पादकीय) ग्रंथ ज्या ज्यों छपने जायंग त्या त्याची पी. करक भेज जायेंगे। डॉ हर्मन जकाचीनी जैनलोनी प्रस्तावना अनुवादक-शाह · अन्यालाल चतुरमाई. कागज, साइन, छपाई, सफाई त्यादि ची. ए. (जैन.सा.सं, कार्यालय तरकशी काम उत्तम प्रकारका होगा। विशेष हाल जानने लिय जारी पत्रद्वारा डिंग साहित्य-लमालोचन. धिनपालजल भविष्यदत्तकथा ...... पत्रव्यवहार करनेका पता:-- १२)नरीश्वर चने लबाद त्य १३.) तत्वावविशंसापान्तर १०. मुंबई युनिवलिटीम एम ए क्लासन जन साहित्य संशोधक कार्यालय, अंधमागधी कोन.. पंजावं युनिवर्सिटीना नलाहित्य १४ भारत जैन विद्यालय २२५ -- गृनालीरी. टिप्पनिका नाम प्राचीन जनजन्धन्त्री Shri

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PA - - का आसार-प्रदर्शन, 39 आ निवन्यसंग्रहान्मक पहनी प्रथम अंशगया ज्येष्ठ मासमां प्रकट थयो हनी ४ म- हिना पछी आज आवाजी अंकवाचकाना हाथमा समपंचामां आवे छ. या प्रयान्न मन था संस्थाना स्थापक अन पनना सपादक मुनिश्रीना एक मात्र साहित्यप्रेय सनत अध्यवसायना फळ स्वस्य छ. जैन समाजमां आवा प्रज्ञारना उच्च कोरिना साहित्य समजनार के नेमां रस लेनार गगया गांच्या पुन्योज हावाशे, आ कार्यमा समाज नरफी सहज उणु माटुं उत्तेजन मळी जशे एवी आशा थी तो, आ ( कायना) प्रारंभ करवामां धान्या जन हता. परंतु, जेथे चार नही लग्जनोए, आ कार्यमा प्रारंभिक मदन पायवानुं विश्वन्न वचन पृज्य मुनिराज श्रीजिनविजयीन भान्युं हनुं नमनाज विश्वास उपराधार राखीने पानी शरूमान करवामां आची हती. परंतु प्रथम अंकना मुद्रणकाल दरम्यान ज ते स्नेही सज्जनो तरफयी सविशेष उदालीन वृत्तिना अनुभव भयो अन तेथी मुनिश्राप आदिम नेत अनिम पवा रूपमा गत अंकन प्रकट करावानी व्यवस्था करी. पण, जन साहित्यना सद्भाग्ये, नेज अरनामां, मुंबई निवासी उदारचिन साहित्यप्रिय श्रीयुत भाई श्रीहरगोविंददास रामजीए, अमुक चर्या पर्यन, निरपेक्षमा आ कार्यमा लोल्लास संपूर्ण आर्थि- कि सहायता आपत्रानी असाधारण इच्छा प्रकट करी, आ कार्यन म्यवाधिन कप चालू राग्नवा माटे उन मुनिधीने सादर आग्रह कर्यो, प, माईश्रीनी आवी अचिन्य सहायता-निरपेक्ष उदारनाना योग्य जाजे आ यांजी अंक अमे बाचकोन अर्पण करीए छोए अन भविष्यमा पण हवं यथासमय करता रहा. श्रीयुत भाई श्रीहरगोविंददासजी पोतानी आत्री मोटी प्रशंसनीय उदारताना कारणे आ समाज अने पत्रना एक मोटा "संरक्षक" बन्या छ, पटलुंज नहीं, परंतु तेमनी आ उदार- ताप जैन साहित्यना अभ्याली अने रसिक जना उपर अनुपम उपकार कयों छ. अम अमारी आ संस्था तरफयी तेमज जैन साहित्य संशोधकना सकल मुन बारको नरफी भाई श्री हरगोविंददास रामलीन प पायतमाटे अंनाकारण पूर्वक अनेकानेक धन्यवाद आपीए डीए भने तेमना हाथै आवां अनेकानेक मुहन्यो धाओ एन सदा इच्छीए छीप. नथास्तु. वळी, जे जे सद्गृहस्थाए या संस्थाना पेडत, वाईस पेटन. सहायक के लाईफ मेंबर विगर थई प्रस्तुत कार्यमा उतार आर्थिक सहायता मापी छ अथवा आप्या करे , तेमने पण हार्दिक धन्यवाद आपवामां आवे छ भने आ नीचे नमनां शुभ नामी आदरपूर्वक प्रकट करवामां आवे के. पढ़न. श्रीयुन हीरालाल अमृतलाल माह. बी. ए. मुंबई. वाईस पेटन. श्रीयुत केशवलाल ग्रेनचंद मंदी. बी. ए. एल. एल. बी. वकील-अमदावाद. 3333 - सहायक श्रीयुत मनसुखलाल रवजीभाई मेहता. मुंबई. शेठ कांतिलाल गलभाई हाथीभाई, पूना. शेशवलाल मणीलाल शाह, पूना. रोट बाबूलाल नालचंद भगवानदास झवेरी, पूना. लाईफमेवर. श्रीयुत बाबू राजकुमार सिंहजी बद्रीदासजी. कलकत्ता. श्रीयुत बाबू पूरण चंदजी नाहार. एम्. ए. एल एल् बी. कलकत्ता, शेठ लालभाई कल्याणभाई झवेरी, वडोदरा (मुंबई). शेठ नरोत्तमदास भाणजी, मुंबई. शेट दामोदरदाल, त्रिभुवनदास भाणजी, मयई. . शेठ त्रिभुवनदास माणजी जैन कन्याशाला, भावनगर. शेट केशवजीभाई माणेकचंद, मुंबई. शेट देवकरणभाई मूळजीमाई, मुंबई. शेठ गुलायचंद देवचंद, मुंबई. श्रीयुत मोतीचंद गिरधरलाल कापडिया बी. ए. एल एल. सी. सोलीलीटर, मुंबई श्रीयुत केशरी चंदजी भंडारी, इंदौर. शाह अमृतलाल एण्ड भगवानदास कुं. मुंबई. शाह चंदुलाल वीरचंद कृष्णाजी, पूना. शाह धनजीभाई घखतचंद साणंदवाळा, हाल पूना. शाह बाळुभाई शामचंद, तळेगाम (ढमढेरे). शाह चुनिलाल झवेरचंद, मुंबई. शाह भोगीलाल चुनिलाल, सोलापूरबजार, पूना कैप, - तथा दानवीर उदारात्मा शेठ परमानंददास रतनजी (निवासस्थान घाटकोपर, मुंबई.) तरफी मुनिराज श्रीजिनविजयजी म. नी साहित्यसेवास्वरूप सत्प्रवृत्तिमा प्रारंभ थीज जे उदार सहायता मळ्या करे छे, ते माटे, तेओ शेठनीनु पण आ स्थळे अन्तःकरणपू. चक अभिनन्दन करवामां आवे के आशा छे के आवाज रीते वीजा पण सद्गृहस्थो यथाशक्ति पोतानी उदारता प्रतावी जैन धर्मना आ गौरव प्रकाशक पुण्य कार्यमा सहायक थशे. एज विनंती. निवेदक- जैन सा. सं. समाजना कार्यवाहको. J 400- व्यवस्थापकतुं निवेदन:---प्रेस विगैरेनी हाडमारीओने लीधे वाचकोने जो नियमित समय उपर जैन साहित्य संशोधक न गळे तो ते विषयमा धैर्य रखवानी जरूर छे. आजकाल छपामणीनुं काम केटलु बधुं त्रासदायक थई पडथु छ, ते, जेने एवावतनो थोडो घणो अनुभव थयो होय तेज समजी शके तेम २. नियत समय उपर प्रकट करवानी वनती कोशीस अमारा तरफथी करवामां आवे छेज. किंबहुना?

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जैन साहित्य संशोधक
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पार्श्वनाथ जैन मंदिर, फरहेला, मेवास।

॥ अहम् ।। नमोऽस्तु श्रमणाय भगवते महावीराय । जैन साहि त्य संशो धक पुरिसा! सचमेव लमभिजाणाहि । सश्चस्साणाए उवहिए मेहावी मारं तरह ।' 'जे एगं जाणइ से सम्बं जाणइ जे सव्वं जाणह से एग जाण ।' 'दिट्ट, सुयं, मयं, विण्णायं जं एत्थ परिकहिजइ ।' -निर्गन्धप्रवचन-आचारांगसूत्र । V N.v. भाग १] हिन्दी लेख विभाग [ अंक २ जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी। [लेखक-श्रीयुत पं. नाथूरामजी प्रेमी, सम्पादक जैनहितैषी । ] जैनेन्द्र । थी और इसके सुबूतमें उन्होंने कल्पसूत्रकी समय- सुन्दरकृत टीका, और लक्ष्मीवल्लभकृत उपदेशमा. इन्द्रश्चन्द्रः काशरुत्स्नापिशलीशाकटायनाः । लाकरणिकाका यह उल्लेख पेश किया था कि पाणिन्यमरजैनेन्द्रा जयन्त्यष्टौ च शान्दिका: जिनदेव महावीर जिस समय ८ वर्ष के थे उस -त्रातुपाठ। समय इन्द्रने उनसे शब्दलक्षणसंबंधी कुछ प्रश्न मुग्धबोधकर्ता पं० बोपदेवने उक्त श्लोकम किये और उनके उत्तररूप यह व्याकरण बतलाया जिन आठ वैयाकरणों के नामोंका उल्लेख किया है, गया, इसलिये इसका नाम जैनेन्द्र पड़ा।- उनमें एक 'जैनेन्द्र' भी हैं। ये जैनेन्द्र अथवा जनंद्र यदिन्द्राय जिनेन्द्रेण कौमारोप निरूपितम् । व्याकरणके कर्ता कौन थे इस विषयमें इतिहासज्ञोंमें ऐन्द्र जैनेन्द्रमिति तत्माहुः सब्दानुशासनम् ।। कुछ समय तक बड़ा विवाद चला था । डॉ० किल श्वेताम्बरसम्प्रदायके और भी कई ग्रन्थोंमें इस हानने इसे जिनदेव अथवा भगवान महावीरद्वारा इन्द्र के लिए कहा गया सिद्ध करनेका प्रयत्न किया 1 इंडियन एण्टिक्वेरी जिल्द १०, पृ० २५ ।

ट ..MAA 4. 40. Ante . -RANA. +4.A.. देव जैन साहित्य संशोधक [भाग १ प्रकारके उल्लेख मिलते हैं। कल्पसूत्रकी विनयविजय 'ऐन्द्र' नामसे प्रकट किया । अर्थात् इन्द्र के लिये कृत सुवाधिकाटीकाम लिखा है:- जो व्याकरण कहा गया, उसका नाम 'ऐन्द्र हुआ। [शक्रः] यत्र भगवान् तिष्ठति तत्रं पण्डितगह समा प्राचीन कालमें इन्द्रनामक आचार्यका बनाया जगाम । अगत्य च पण्डितयोग्ये आसने भगवन्तं उपवेश्य हुआ एक संस्कृत व्याकरण थी। इसका उल्लेख पण्डितमनोगतान् सन्देहान् पप्रच्छ, श्रीवारोऽपि वालोऽये अनेक ग्रन्थोमें मिलता है। ऊपर दियहुए बोपदेव किं वक्ष्यतीत्युत्कर्णेषु सकललोकेषु सर्वाणि उत्तराणि ददौ, के श्लोकमें भी उसका नाम दर्ज है । हरिवंशपुराणके ततो जैनेन्द्रव्याकरण ' अज्ञे ! यतः- कर्तीने देवनन्दिको ‘इन्द्रचंद्रार्कजैनद्रव्यापिन्या- सक्का य तस्समक्खं भगवंतं आसणे निवेसित्ती । करणेक्षिणः' विशेषण दिया है। शब्दार्णवचंद्रिकाकी सहस्स लक्षणं पुन्छ वागरणं अवयवा इंदं ॥ ताडपत्रवाली प्रतिम, जो १३ वीं शताब्दिके लगभ- अर्थात् भगवानको मातापिताने पाठशालामै गकी लिखी हुई मालूम होती है, " इन्द्रश्चन्द्र: गुरुके पास पढनेके लिए भेजा है, यह जानकर शकटतनयः " आदि श्लोकमै इन्द्के व्याकरणका इन्द्र स्वर्गसे आया और पण्डितके घर, जहां भग- उल्लेख है। बहुत समय हुआ यह नष्ट होगया है। वान थे वहीं, गया। उसने भगवानको पण्डितके जव यह उपलब्ध ही नहीं नहीं है तव आसनपर बिठा दिया और पण्डितकं मनमें जो इसके विषयमें कुछ कहनेकी आवश्यकता जो सन्देह थे, उन सबको पूछा। जब सब लोक यह 'प्रतीत नहीं होती । यद्यपि आजकलके समयमें इल सुनने के लिए उत्कर्ण हो रहे थे कि देखें यह बालक बातपर कोई भी विद्वान् विश्वास नहीं कर सकता क्या उत्तर देता है; भगवान वीरने सव प्रश्नोंके है कि भगवान महावीरने भी कोई व्याकरण बनाया उत्तर दे दिये, तब जैनेंद्र व्याकरण' बना। होगा और वह भी मागधी या प्राकृतका नहीं, किन्तु परंतु इस प्रसंगके वे सब उल्लेख अपेक्षाकृत ब्राह्मणोंकी खाल भाषासंस्कृतका-तो भी यह निस्ल अर्वाचीन ही हैं जिनमें भगवानके उत्तररूप इस न्देह है कि वह व्याकरण जैनेन्द्र ' तो नहीं था। व्याकरणका नाम 'जैनेन्द्र' बतलाया है। प्राचीन यदि बनाया भी होगा तो वह 'ऐन्द्र ही होगा। उल्लेखों में इसका नाम जैनेन्द्रकी जगह 'ऐन्द्र' क्यों कि हरिभद्रलार और हेमचंद्रसरि उसीका प्रकट किया गया है। जैसा कि आवश्यकसूत्रकी उल्लेख करते हैं जैनेन्द्रका नहीं। जान पड़ता है, हारिभद्रीयवृत्तिके विनयविजय और लक्ष्मीवल्लभने पीछेले 'ऐन्द्र' शकश्च तत्समक्ष लेखाचार्यसमक्षं भगवन्तं तीर्थकरं को ही 'जैनेन्द्र बना डाला है। उनके समयमें भी आसने निवेदय शब्दम्य लक्षणं पृच्छति । भगवतः ऐन्द्र ' अप्राप्य था, इसलिए उन्होंने प्राप्य 'जैनेंद्र' व्याकरणं अभ्यधायि । व्याक्रियन्ते लौकिम्सामयिकाः को ही भगवान महावीरकी कृति बतलाना विशेष शब्दाः अनेन इति व्याकरणं शब्दशास्त्रम् । तदवयवा: केचन सुखकर और लाभप्रद सोचा होगा। उपाध्यायेन गृहीताः, ततव ऐन्द्रं व्याकरण संजातम् । इसी प्रकार सुप्रसिद्ध आचार्य हेमचन्द्र अपने विक्रमकी आठवीं शताब्दिके और हेमचन्द्रसूरि यह कहनेकी आवश्यकता नहीं कि हरिभद्रसार योगशास्त्रके प्रथम प्रकाशम लिखते हैं। तेरवी शताब्दिके विद्वान् हैं जिन्होंने पेन्द्र की मातापितृभ्यामन्ययुः प्रारब्धेऽध्यापनोत्सवे । भगवानका व्याकरण बतलाया है; परंतु जैनेन्द्र सा: सर्वतस्य शिष्यत्रमितीन्द्रस्नमुपास्थित ॥५६!! उपान्यायासने तस्मिन्यासवेनापवेशितः। 1 डॉ० ए० सी० वर्नलने इन्द्रव्याकरणके विषयमें चीनी प्रणम्य प्रार्थितः स्वामी शदनारायण जगो॥५४॥ तितीय और भारतीय साहित्यमें जो जो उल्लेख मिलते वं भगवतन्द्राय प्रो रन्दानुशासनम् । है उनको संग्रह करके 'ओन दि ऐन्द्रस्कूल ऑफ संस्कृत का यागेन न त्या लोके चन्द्रयितीरितम् ॥ १८ ॥ ग्रामेरियन्स' नामकी एक यदी पुस्तक लिखा है। इसके अनुसार भगवानने इन्द्रक लियं जो • "तेन प्रणटमेन्द्रं तदस्मव्याकरणं गुवि शब्दानुशालग कहा,उपाध्यायने असे सुनवारलोकमें --क्यारित्सागर, तरंग ४ ॥ पृष्ट १८२ में- 7 -- अंक २] ... -A....... .... हुए हैं। . जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी ६५ को भगवत्मणात बतलानेवाले विनयविजय और हमारा अनुमान है कि डॉ० कीलहानके हायमें लक्ष्मीवल्लभ विक्रमकी अठारहवीं शताब्दिमें यह 'भगवद्वाग्वादिनी' की प्रति अवश्य पड़ी होगी और इसीकी कृपाले प्रेरित होकर उन्होंने अपना विनयविजयजीके इस उल्लखने बडा काम किया पूर्वोक्त लेख लिखा होगा। उनके लेखमें जोश्लोकादि कि भगवत्प्रणीत व्याकरणका नाम 'जैनेन्द्र ' है। प्रमाणस्वरूप दिये गये हैं वे सब इसीपरसे लिये यह निश्चय है कि भगवत्प्रणीत व्याकरणको गये जान पड़ते हैं। अस्तु । जैनेन्द्र' लिखते समय उनका लक्ष्य इस डॉ० कीलहानके इस भ्रमको सबसे पहले प्रो० देवनन्दि या पूज्यपादकृत 'जैनेन्द्र ' पर ही रहा पाठकने दूर किया था और अब तो जैनेंद्र व्याकर- होगा; परन्तु जान पड़ता है कि वे इस विषयमें उक्त णकी यहुत प्रसिद्धि हो चुकी है। उसकी या उसके उल्लंखके सिवाय और कुछ प्रयत्न नहीं कर सके। परिशोधित-परिवर्तित संस्करणकी कई टीकायें भी यह काम बाकी ही पड़ा रहा कि वह जैनेन्द्र व्याक- छप चुकी हैं। इस लिए अब सभी विद्वान् इस विष- रण लोगोंके समक्ष उपस्थित कर दिया जाय और यमे सहमत हो गये हैं कि जैनेन्द्र व्याकरण किसी भक्तजन अपने भगवानकी व्याकरणक्षता देखकर तीर्थकर या भगवानका नहीं किन्तु अन्य चैयाक- गद्गद हो जायँ । खुशीकी बात है कि उनके कुछ रणोंके समान ही एक विद्वानका बनाया हुआ है ही समय बाद वि० सं० १७९७ में एक श्वेताम्बर और उनका नाम देवनन्दि या पूज्यपाद था। विद्वान ने इस कार्यको पूरा कर डाला-साक्षात देवनन्दि अथवा पूज्यपाद । महावीर देवका बनाया हुआ व्याकरण तैयार कर श्रीगृद्धपिच्छमुनिपस्य बलाकापच्छः दिया और उसका दूसरा नाम भगवद्वाग्वा- शिष्योऽजनिष्ट भुवनत्रयवर्तिकीर्तिः । दिनी' रख्खा! चारित्रचञ्चुरखिलावनिपालमौलि- इस भगवद्वाग्वादिनी की सबसे पहली प्रतिके मालाशिलीमुखविराजितपादपद्मः ।। १ ॥ दर्शन करनेका सौभाग्य हमें पूनेके भाण्डार- एवं महाचार्यपरम्परायां कर रिसर्च इन्स्टिट्यूटमें प्राप्त हुआ । यह तक्षक स्यात्कारमुदादिकततत्वदीपः । नगरमें रत्नपि नामक लेखकद्वारा वि० सं० १७९७ भद्रः समन्ताद्गुणतो गणोशः में लिखी गई थी। इसकी पत्रसंख्या ३०, और समन्तभद्रोऽजनि वादिसिंहः ॥२॥ लोकसंख्या ८०० है । प्रत्येक पत्रमें ११ पंक्तियां, ततः- और प्रत्येक पंक्तिमें ४० अक्षर हैं । प्रति बहुत शुद्ध यो देवनन्दिप्रथमाभिधानो है । जैनेन्द्रका सूत्रपाठ मात्र है-और वह सूत्रपाठ बुद्धया महत्या स जिनेंद्रशुद्धिः। है जिसपर शब्दार्णवचन्द्रिका टीका लिखी गई है। श्रीपुज्यपादोऽजनि देवताभि- इस वाग्वादिनीके आविष्कारक अच्छे वैय्याकरण यत्पूजितं पादयुग यदीयम् ॥ ३॥ दिखते हैं उन्होंने शक्तिभर इस बातको सिद्ध कर जैनेन्द्रं निजशब्दमागमतुलं सर्वार्थसिद्धिः पररा नेका प्रयत्न किया है कि इसके कर्ता साक्षात् महा सिद्धान्ते निपुणत्वमुद्धकविता जैनाभिषेकावकः । वीर भगवान हैं। दिगम्बरी देवनन्दीका बनाया छन्दः सूक्ष्माधियं समाधिशतकं स्वास्थ्यं यदाय विदा- हुआ यह कभी नहीं हो सकता । उनकी सव युक्ति माख्यातीह स पूज्यपादमुनिपः पूज्यो मुनीनां गणैः॥४॥* याँ हमने इस ग्रन्थके परिचयमें-जो परिशिष्टमें दिया इस अवतरणके तीसरे श्लोकका अभिप्राय यह गया है-उद्धृत करदी हैं । उन सव पर विचार है कि उनका पहला नाम देवनन्दि था, बुद्धिकी करनेकी यहाँ आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। इस * ये श्लोक श्रायुक्त पं. कलापा भरमापा निटवेने सर्वार्थ- लेखको पूरा पढलेने पर पाठकोंको वे सब युक्ति- सिद्धिकी भूमिकामें उध्दृत किये हैं। पर यह नहीं सूचित याँ स्वयं ही सारहीन प्रतीत होने लगेगी। किया है कि ये कहाँके हैं।

६६ जैन साहित्य संशोधक [ भाग ... . MA Mr. . .. Ans. .FRAM लब्ध होते हैं: - महत्ताके कारण वे जिनेन्द्रबृद्धि कहलाये. और अनेक लेखकोंने उन्हें केवल देवनन्दि नामसे देवोंने उनके चरणोंकी पूजा की इस कराण उनका और केवल पूज्यपाद नामसे स्मरण किया है और दोनों नामोसे उन्हें वैयाकरण माना हैं। आचार्य नाम पूज्यपाद हुआ। श्रवणबेल्गोल के नं० १०८ के मंगराज कविकृत शुभचन्द्र पाण्डवपुराणमें लिखते हैं- शिलालेखमें जो शकसंवत् १३६५ [वि० सं० पूज्यपादः सदापूज्यपादः पूज्यैः पुनातु माम् । १५०० ] का लिखा हुआ है, नीचे लिखे श्लोक उप व्याकरणार्णवो येन तीर्णो विस्तीणसद्गुणः ।। महाकवि धनंजय अपनी नाममालामें पूज्य- • श्रीपूज्यपादोद्धृतधर्मराग्य- पादको लक्षणग्रन्थ (व्याकरण) का कर्ता स्ततः सुराधीश्वरपूज्यपादः। मानते हैं: यदीयवैदुष्यगुणामिदानी प्रमाणमकलंकस्य पूज्पादस्य लक्षणम् । वदन्ति शास्त्राणि तदुध्दृतानि ॥ ५ ॥ धनंजयकवेः काव्यं रत्नत्रयमपश्चिमम् ॥२०॥ धृतविश्ववुद्धिरयमत्रयोगिभिः श्रवणबेलगोल • के ४७ नंवरके शिलालेखमें रुतकृत्यभावमनुविभ्रदुच्चकैः । श्रीमेधचन्द्र विद्यदेवकी स्तुतिमें नीचे लिखा हु- जिनवद्वभूव यदनाचापहृत्स आ श्लोक दिया है:- जिनेन्द्रवुद्धिरित साधुवणितः ॥ १६ ॥ सिद्धान्ते जिनवीरसेनसदृशः शास्त्राब्जिनीभास्करः, श्रीपूज्यपादमुनिरप्रतिमोपधार्द्ध- पट्तप्वकलंकदेवविवुधः साक्षादयं भूनले । जर्जीयाद्विदेहजिनदर्शनपूतगात्रः । सर्वव्याकरणे विपश्चिदधिपः श्रीपूज्यपादः स्वयं, यत्पादधीतजलसंस्पर्शनप्रभावात् विद्योत्तममेषचन्द्रमुनिपो वादीभपञ्चानमः ॥ कालायसं किल तदा कन कीचकार ॥१७॥ इसमें मेघचन्द्रको पूज्यपादके समान व्याकरण- इन श्लोकोसे भी उनके पूज्यपाद और जिनेंद्र का ज्ञाता बतलाया है । इलले पूज्यपादका वैया. बुद्धि नाम प्रकट होते हैं। करण होना सिद्ध है। ये मेघचन्द्र आचारसारके नन्दिसंघकी पट्टावलीके नीचे लिखे हुए श्लोक- कर्ता वीरनन्दि सिद्धान्तचक्रवर्तिके गुरु थे और से भी देवनन्दिका दूसरा नाम पूज्यपाद था, यह इनका स्वर्गवास शक संवत् १०३७ ( वि० सं० स्पष्ट होता है। ११७२) में हुआ था। यशःकीर्तिशोनन्दी देवनन्दी महामतिः। अनगारधर्मामृतटीकाकी प्रशन्तिम-जो वि. श्रीपूज्यपादापराख्यो गुणनन्दी गुणाकरः ।। सं० १३०० में लिखी गई है-पण्डित आशाधर- इनका संक्षिप्त नाम 'देव' भी था। आचार्य जीने लिखा है कि मैंने जैन न्याय और जैनेन्द्र व्या- जिनसेन, वादिराजसूरि, और पुन्नाटसंघीय जिन- करण शास्त्र पण्डित महावीरसे धारा नगरीमें सेनने इन्हें इसी संक्षिप्त नामसे स्मरण किया है-- पढे-" धारायामपठन्जिनप्रामति-वाक्शास्त्रे महा- कवीनां तीर्थरुदेवः किंतरां तत्र वर्ण्यते । वीरतः।" और 'जिनप्रमितिवाक्शाने' की टीका विदुषां वाड्मलध्यसि तार्थ यस्य वचोमयम् ॥ ५२॥ में लिखा है-“ जैनेन्द्र प्रमाणशास्त्रं जैनेन्द्रव्याक- -आदिपुराण प्रथम पर्व । रणं च । " इससे यह निश्चय होता है कि आशा- अचिन्त्यमहिमा देवः सोऽभिवंद्यो हितैषिगा । धरके समय में जैनेन्द्र व्याकरणका पठन-पाठन शब्दाश्च येन सिद्धयन्ति साधुवं प्रतिलंभिताः ॥ १८ होता था । सागार और अनगार धर्मामृतटीकामें --पार्श्वनाथचरित प्रथम सर्ग। कई जगह प्रमाणरूपमें व्याकरणके सूत्र दिये हैं इन्द्र चन्द्रार्कजैनेन्द्रव्यापि(डि)व्याकरणक्षिणः । और वे इसी देवनन्दिकृत जैनेन्द्रव्याकरण- देवस्य देववन्यस्य न वंदते गिरः कथम् ॥३१ -हरिवंशपुराण। कर्नाटक देशमें वृत्तविलास नामके एक जैन । . - अंक २] ६७ .. ..... ...... जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी कवि हो गये हैं. उन्होंने अमितगतिकृत धर्म इनके सिवाय विक्रमकी आठवीं शताब्दिके बाद परीक्षाके आधारसे वि० सं० १२१७ के लगभग कनडी भाषामें जितने काव्य ग्रन्थ लिखे गये है, धर्मपरीक्षा' नामका ग्रन्थ कनडी भाषामें लिखा प्रायः उन सभीके प्रारंभिक श्लोकीम पूज्यपादकी है । इस अन्धकी प्रशस्ति पूज्यपाद आचार्यकी प्रशंसा की गई है। वडी प्रशंसा लिखी है और वे जैनेन्द्रव्याकरण इन सब उल्लेखोसे यह बात अच्छी तरह स्पष्ट के रचयिता थे, इस यातका स्पष्ट उल्लेख किया है। हो जाती है कि पूज्यपाद एक बहुत ही प्रसिद्ध ग्रंथ- साथ ही उनकी अन्यान्य रचनाओंका भी परिचय कार हो गये हैं और देवनन्दि उनका ही दुसरा दिया है:-- नाम था । साथ ही वे सुप्रसिद्ध जैनेन्द्र व्याकरणके भरदि जैनन्द्रं भासुरं-एनल ओरेदं पाणिनीयक्के टीकुंब. कर्ता थे । इस बातको इतना विस्तारसे लिखनेकी रेदं तत्त्यार्थमं टिप्पणदिन अरिपिदं यंत्र-मंत्रादिशात्रोक्तकरमं । आवश्यकता इसी कारण हुई कि बहुत लोग पूज्य- भूरक्षणार्थे विधिसि जसमुं ताळिददं विश्वविद्याभरणं पाद और देवनन्दि को जुदा जुदा मानते थे और गव्यालियाराधितपदकमलं पूज्यपादं वतीन्द्रम् ॥ कोई कोई पूज्यपादको देवनन्दिका विशेषण ही इसका अभिप्राय यह है कि व्रतीन्द्र पूज्यपादने- समझ बैठे थे। जिनके चरणकमलोंकी अनेक भव्य आराधना जैनेन्द्रकी प्रत्येक हस्तलिखित प्रतिके प्रारंभ करते थे और जो विश्वभरकी विद्याओंके श्रृंगार नीच लिखा श्लोक मिलता है:- थे-- प्रकाशमान जनेन्द्र व्याकरणकी रचना की, लक्ष्मीरात्यन्तिकी यस्य निरवद्याऽवभासते । पाणिनि व्याकरणकी टीका लिखी, टिप्पणद्वारा देवनन्दितपूजेशं नमस्तस्मै स्वयंभुवे ।। (सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थसूत्रटीका) तत्त्वा इसमें ग्रन्थकाने 'देवनन्दितपूजेशं' पदमें जो र्थका अर्थावबोधन किया और पृथ्वीकी रक्षाके कि भगवानका विशेषण है, अपना नाम भी प्रगट लिप. यंत्रमंत्रादि शास्त्रकी रचना की। कर दिया है । संस्कृत प्राकृत ग्रन्थोंके मंगलाचर- आचार्य शुभचन्द्रने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ज्ञाना- णाम यह पद्धति अनेक विद्वानोंने स्वीकार की है। र्णवके प्रारंभमें देवनन्दिकी प्रशंसा करते हुए, इससे स्वयं ग्रन्थकर्ताके वचनोंसे भी जैनेन्द्रके लिखा हैः कर्ता देवनन्दि ' ठहरते हैं । अपाकुर्वन्ति यद्वाच: कायवाक्चित्तसंभवम् । ॐ गणरत्न महोदधिके कर्ता वर्धमान (श्वेताम्ब- फलकमङिनानां सोऽयं देवनन्दी नमस्यते ।। अर्थात् जिनकी वाणी देह धारियांक शरीर, १ देखो हिस्ट्री आफ दि कनडी लिटरेचर । वचन और मन सम्बन्धी मलको मिटा देती है, उन *१ देखिए नतिवाक्यामृतके मंगलाचरणमें सोमदेव देवनन्दीको मैं नमस्कार करता है। इस श्लोको कहते हैं- " सोमं सोमसमाकारं सोमाभं सोमसंभयम् । देवनन्दिकी वाणीकी जो विशेषता यतलाई है, वह विचार योग्य है। हमारी समझमें देवनन्दिके तीन सोमदेवं मुनि नत्वा नातिवाक्यामृतं वे ॥ प्रन्याको लक्ष्य करके यह प्रशंसा की गई है। शरी- २ आचार्य अनन्तर्यि लघीयस्त्रयकी वृत्ति के प्रारंभमें रके मेलको नाश करने के लिए उनका वैद्यकशास्त्र, कहते हैं- " जिनाशिं मुनि चन्द्रमकलंक पुनः पुनः । वचनका मैल (दोप) मिटाने के लिए जैनेन्द्र व्या- अनन्तवार्यभानौमि स्याद्वादन्यायनायकम् ॥" करण और मनका मैल दूर करनेके लिए समाधि. ३ भावसंग्रहमें देवसेनसरि मंगलाचरण करते हैं:- तंत्र है। अतएव इससे भी मालूम होता है कि पणमिय सुरसेणणुयं मुणिगणहरवंदियं महावीर . वचनदोपको दूर करनेवाली उनकी कोई रचना वोच्छामि भावसंगहमिणमो भव्वपोह। अवश्य है और वह जैनेन्द्र व्याकरण ही हो सक शालातुरीयशकटाशजचन्द्रगाोम- ती है। दिग्वलभर्तृहरिवामनभोजमुख्याः। . - 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जैन साहित्य संशोधक [ भाग 1 ......... .... की हैं। र ) और हैम शब्दानुशासनके लघुन्यास बनाने ठके ढंग का है, वर्तमानदृष्टिसे यह कुछ अपूर्णसा वाले कनकप्रभ भी जैनेन्द्र व्याकरणके कर्ताका जान पड़ता है और इसी लिए महावृत्ति में बहुतसे नाम देवनन्दि ही बतलाने हैं। अतः हम समझते हैं वार्तिक तथा उपसंख्यान आदि बना कर उसकी कि अब इस विषय में किसी प्रकारका कोई सन्देह पूर्णता की गई दिखलाई देती है, जबकि दूसरा बाकी नहीं रह जाता है कि यह व्याकरण देवनन्दि पाछ प्रायः पूर्णला जान पड़ता है और इसी कारण या पूज्यपादका बनाया हुआ है। उलकी टीकाओंमें वार्तिक आदि नहीं दिखलाई प्रथम जैन व्याकरण । देते । दोनों पाठों में बहुतसी संज्ञायें भी भिन्न प्रकार जहाँ तक हम जानते हैं, जैनोंका सबले पहला संस्थत व्याकरण यही है। अभी तक इसके पहलेका इन भिन्नताआके होते हुए भी दोनों पाठों में कोई भी व्याकरण प्रन्थ उपलब्ध नहीं हुआ है। समानता भी कम नहीं है । दोनोंके अधिकांश सूत्र समान हैं, दोनोंके प्रारंभका मंगलाचरण बिलकुल शाकटायन, सिद्धहेमशब्दानुशासन आदि सब व्याकरण इससे पीछेके बने हुए हैं । इस ग्रन्धकी एक ही है और दोनोंके कर्ताओंका नाम भी देवन- सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके सून बहुत न्दि या पूज्यपाद लिखा हुआ मिलता है। ही संक्षिप्त है । 'अर्धमात्रालाघवं पुत्रोत्सवं मन्यन्ते असली सूत्रपाठ। च्याकरण: इस प्रवादकी सचाई इसके सूत्रोपर अब प्रश्न यह है कि इन दोनोमेसे स्वयं देवन- हटि डालनेसे बहुत अच्छी तरह स्पष्ट होती है। न्दि या पूज्यपादका बनाया हुआ असली सुअपाठ संज्ञाकृत लाघवको भी इसमें स्वीकार किया है। कौनसा है। सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञ प्रो० के० पी० जवाकि पाणिनीयमें संज्ञाकृत लाधव ग्रहण नहीं कि- पाठकका कथन है कि दूसरा पाट जिसपर सोम- या है। इसकी प्रशंसा जैनेंद्रप्रक्रियामें लिखा है। देवकी शब्दार्णवचन्द्रिका लिखी गई है-वास्तविक नमः श्रीपूज्यपादाय लक्षणं यदुपक्रम् । पाठ है। हमारे दिगम्बर सम्प्रदायके विद्वानोंमें यदेवात्र तदन्यत्र यन्नानास्ति न तत् क्वचित् ।। श्रीयुक्त पं० पन्नालालजी वाकलीवाल और उनके संस्करण भेद । अनुयायी पं० श्रीलालजी व्याकरणशास्त्री भी इसी जैनेंद्र व्याकरणका मूल सूत्रपाठ दो प्रकारका मतको माननेवाले हैं। इसके विरुद्ध न्यायतीर्थ उपलब्ध है-एक तो वह जिसपर आचार्य अभय, और न्याशास्त्री पं० वंशीधरजी दूसरे पाठको वा- नन्दिकी 'महावृत्ति' तथा श्रुतकीर्तिकृत 'पंचवस्तु' स्तविक मानते हैं, जिसपर कि अभयनन्दिकी दृत्ति नाम की प्रक्रिया है और दूसरा वह जिसपर सोम- लिखी गई है । यद्यपि इन दोनोंही पक्षके विद्वानों- देव सूरिकृत शब्दार्णवचन्द्रिका' और गुणनन्दि- की ओरसे अभीतक कोई ऐसे पुष्ट प्रमाण उपस्थित कृत 'जैनेन्द्रप्राक्रिया' है। पहले प्रकारके पाठ में नहीं किये गये हैं जिनसे इस प्रश्नका अच्छी तरह लगभग ३००० और दूसरे में लगभग ३७०० सूत्र निर्णय हो जाय; परन्तु हमको पं. बंशीधरजीका है, अर्थात् एकसे दूसरे में कोई ७०० सूत्र अधिक मत ठीक मालूम होता है और पाठक यह जानकर हैं ! और जो ३००० सूत्र हैं वे भी दोनोमे एकसे प्रसन्न होंगे कि हमें इस मतको करीब करीब नि- नहीं हैं। अर्थात् दूसरे सूत्रपाठमें पहले सूत्रपाठक भ्रान्त मान लेनेके अनेक पुष्ट प्रमाण मिल गये हैं। सेकडो सूत्र परिवर्तित और परिवर्धित भी किये इन प्रमाणों के आधारले हम इस सिद्धान्तपर गये हैं। पहले प्रकारका सूत्रपाट पाणिनीय सूत्रपा- पहुंचे हैं कि आचार्य देवनन्दि या पूज्यपादका ब- १ यह जैनेन्द्रप्रक्रिया गुणनन्दिरुत है या नहीं, इसमें अपनी महावृत्ति लिखी है। यह सूत्रपाठ उस सम- नाया हुआ सूत्रपाठ वही है जिसपर अभयनान्दिने हमें बहुत कुछ सन्देह है। आगे चलकर इस विषयका यंतक तो ठीक समझा जाता रहा जब तक पाल्य- खुलासा किया गया है। कीर्तिका शाकटायन व्याकरण नहीं बनाथा| शाय- 4 अंक २] +w. ~..ru ....-~~nwrwwwmuz.m...... जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी ६९ द शाकटायनको भी जनेन्द्र के होते हुए एक जुदा इसका आशय यह है कि गुणनन्दिने जिसके व्याकरण बनानेकी आवश्यकता इसी लिए मालूम शरीरको विस्तृत किया है, उस शब्दार्णवको जा- पड़ी होगी कि जैनेन्द्र अपूर्ण था, और बिना वार्तिः ननेकी इच्छा रखनेवालोंके लिए तथा आश्रय लेने- को और उपसंख्यानों भादिके काम नहीं चल सक- वालोंके लिए यह प्रकिया साक्षात् नावके लमान ता था । परन्तु जब शाकटायन जैसा सर्वांगपूर्ण काम देगी। इसमें 'शब्दार्णव' को 'गुणनन्दि व्याकरण बन चुका, तव जैनेन्द्रव्याकरणके भक्तोंको तानितवपुः ' विशेषण दिया है, वह विशेष ध्यान उसकी त्रुटियां विशेष खटकने लगी और उनसे देने योग्य है। इससे साफ समझमें आता है कि आचार्य गुणनन्दिने उसे सर्वांगपूर्ण बनानेका प्रय. गुणनन्दिके जिस व्याकरणपर ये दोनों टीकायें--- ल किया। इस प्रयत्नका फल ही यह दूसरा सूत्र- शब्दार्णव चन्द्रिका और जैनेन्द्रप्रकिया-लिखी गई पाट है जिसपर सोमदेवकी शब्दार्णवचन्द्रिका हैं उसका नाम 'शब्दार्णव ' है और वह मूल रची गयी है । इस सूत्रपाठको बारीकीके साथ (अलली) जैनेन्द्र व्याकरणकं संक्षिप्त शरीरको देखनेसे मालूम पड़ता है कि गुणनन्दिके समय तक तानित या विस्तृत करके बनाया गया है। व्याकरणसिद्ध जितने प्रयोग होने लगे थे उन शब्दार्णवचन्द्रिकाके प्रारंभका मंगलाचरण भी सबके सूत्र उसमें मौजूद हैं और इसलिए उसके इस विषयमें ध्यान देने योग्य है:-- टीकाकाराको वार्तिक आदि बनानेके झंझटोंमें नहीं श्रीपूज्यपादममलं गुणनन्दिदेवं पड़ना पड़ा है। अभयनन्दिकी महावृत्तिके ऐसे सोमामरव्रतिपपृजितपादयुग्मम् बीलों वार्तिक हैं जिनके इस पाटमें सूत्रही बना सिद्धं समुन्नतपदं वृपमं जिनेन्द्र दिये गये हैं। नीचे लिखे प्रमाणोंसे हमारे इन सब तच्छन्दलक्षणमहं विनमामि वीरम् ॥ विचारोंकी पुष्टि होती है:- इसमें प्रत्यकर्ताने भगवान् महावीरके विशेषण- १-शब्दार्णवचन्द्रिकाके अन्तमें नीचे लिखा रूपमै क्रमसे पूज्यपादका, गुणनन्दिका और आपना हुआ लोक देखिए- (सोमामर या सोमदेवका) उल्लेख किया है श्रीसोमदेवयतिनिमितिवादकानि और इसमें वे निस्सन्देह यही ध्वनित करते हैं यानाः प्रतीतगुणनन्दितशब्दयाघौं । कि मुख्य व्याकरणके कर्ता पूज्यपाद हैं, उसको सोऽयं सताममलचेतसि विस्फुरन्ती विस्तृत करनेवाले गुणनन्दि हैं और फिर उसकी वृत्तिः सदानतपदा परिवर्तिपोष्ट !! टीका करनेवाले सोमदेव (स्वयं) हैं। यदि यह इसमें सुप्रसिद्ध गुणनन्दि आचार्यके शब्दवाधि चन्द्रिका टीका पूज्यपादकृत ग्रन्यकी ही होती, तो या शब्दार्णवम प्रवेश करनेके लिए सोमदेवकृत मंगलाचरणमें गुणनन्दिका नाम लानेकी कोई वृत्तिको नौका के समान बतलाया है । इससे यह आवश्यकता नहीं थी। गुणनन्दि उनकी गुरुपर- जान पडता है कि आचार्य गुणनन्दिके बनाये हुए रम्परामें भी नहीं है, जो उनका उल्लेख करना व्याकरणं ग्रन्थकी यह टीका है और उसका नाम आवश्यक ही होता । अतः यह सिद्ध है कि चन्द्रि- शब्दार्णव है । ल टीकाका 'शब्दार्णवचन्द्रिका' का और प्रक्रिया दोनोंके ही कर्ता यह लमझते थे कि नाम भी तभी अन्धर्थक होता है, जब मूल सूत्र · हमारी टीकाय असली जैनेन्द्रपर नहीं किन्तु उसके अन्धका नाम शब्दार्णव हो । हमारे इस अनुमानकी 'गुणनन्दितानितवपु' शब्दार्णवपर बनी हैं। पुष्टि जैनेन्द्रप्रक्रिया नीचे लिखे अन्तिम श्लोकसे २-शब्दार्णव चन्द्रिका और जैनेन्द्रप्रक्रिया इन और भी अच्छी तरहसे होती है:-- दोनों ही टीकाओं में 'एकशेष ' प्रकरण है; परन्तु सत्संधि दयते समासमभितः स्यातार्थनामोनतं, अभयनन्दिकृत 'महावृत्ति' वाल सूत्रपाठमें एक निर्जातं बहुतांदतं कम [कृत]मिहाख्यातं यशम्शालिना(न)म् । सपा श्रीगुणनन्दितानितवपुः शब्दार्गवै निर्णय, , हमारा अनुमान है कि इस प्रक्रियाका भी नाम शब्दा. नावत्याअयतां विविक्षुमनसा मागत्स्वनं प्रक्रिया ।। व प्रक्रिया ' होगा, जैनेन्द्र प्रक्रिया नहीं । - .

no....... .v.AAI - ६० जैन साहित्य संशोधक [भाग १ शेपको अनावश्यक बतलाया है " स्वाभाविक- होगा; कुछ भी हो, पर यह पूरा सूत्र 'दृश्यतेऽन्य. वादभिधानस्यैकशेपानारम्भः । ( १-१.९९) तोपि' ही है और यह अभयनन्दिवाले सूत्रपाठके और इसी लिए देवनन्दि या पूज्यपादका व्याकरण अ०४ पा०७ का ७५ वा सूत्र है । परन्तु शब्दार्ण- अनेकशेष' कहलाता है । चन्द्रिका टीकाके ववाले पाठमें न तो यह सूत्र ही है और न इसके कर्ता स्वयं ही " आदावुपज्ञापक्रमम् " (१-४.११४) प्रतिपायका विधानकर्ता कोई और ही सूत्र है। सूत्रकी टीका उदाहरण देते हैं कि देवो. अतः यह सिद्ध है कि पूज्यपादका असली सूत्रपा- पनमनेकशेपव्याकरणम् " यह उदाहरण अभयन- उवही है जिसमें उक्त मत्र मौजूद है। न्दिकृत महावृत्तिमें भी दिया गया है। इससे सिद्ध ४-भट्टाकलंकदेवने तत्वार्थराजवार्तिकमे आये है कि शव्दार्णवचन्द्रिकाके कर्ता भी उस व्याक- परोक्ष (अ० १ सू० ११ ) की व्याख्यामें " सर्वादि रणको देवोपज्ञ या देवनन्दिकृत मानते हैं, जो अ- सर्वनाम ।" (१-१-३५ ) सूत्रका उल्लेख किया नेकशेप है, अर्थात् जिसमें एकशेप' प्रकरण है, इसी तरह पण्डित आशायरने अनगारधर्माम- नहीं है । और ऐसा व्याकरण वही है जिसकी टीका तटीका (अ. ७ श्लो० २४ में “ स्तोके प्रतिना" अभयनन्दिने की है। (१-३.३७) और “भार्थे " (१-४-१४) इन आचार्य विद्यानन्दि अपने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक दो सूत्रोंको उद्धृत किया है और ये तीनों ही सूत्र (पृष्ठ २६५) में ' नेगमसंग्रह-' आदि सूत्रकी जैनेन्द्र के अभयनन्दिवृत्तिवाले सूत्रपाठमें ही मिल- व्याख्या करते हुए लिखते हैं-"नयश्च नयौ च न- ते हैं । शब्दार्णववाले पाठमें इनका अस्ति- थाश्च नया इत्येकशेषस्य स्वाभाविकल्याभिधाने दर्श- त्व ही नहीं है । अतः अकलंकदेव और पं० आशा- नात् केपांचित्तथा वचनोपलस्भाञ्च नाविरुद्धयते ।" घर इलो असयनन्दिवाले पाटको ही माननेवाले थे। इसमें स्वाभाविकताके कारण एकशेष की अना- अकलंकदेव वि० की नौवीं शताब्दिके और आशा- वश्यकता प्रतिपादित है और यह अनावश्यकता धर १३ वीं शताब्दिके विद्वान् है । जैनेन्द्रके वास्तविक सूत्रपाठमें ही उपलब्ध होती ५-० श्रीलालजी शास्त्रीने शब्दार्णवचन्द्रिकाकी है । " स्वाभाविकत्वादभिधानस्यैकशेपानारम्भः भूमिकामें लिखा है कि आचार्य पूज्यपादने स्वनि- (१-१-९९) यह सूत्र शब्दार्णववाले पाटमें नहीं है, मित 'सर्वार्थसिद्धि' में 'प्रमाणनयैरधिगमः अतः विद्यानन्द भी इसी शुत्रबाले जैनेन्द्रपाठको (अ० १ सू०६) की टीकामै यह वाक्य दिया है- माननेवाले थे । पाठकोको यह स्मरण रखना चाहिए कि उपलब्ध व्याकरणों में अनेकशेप व्याक- दोषः । अभ्यर्हितत्वात्प्रमागस्य तत्पूर्वनिपातः । नयशब्दस्याल्पाच्तरत्वात्पूर्वनिपातःप्राप्नोति नैष- रण केवल देवनन्दिकृत ही है, दूसरा नहीं। और अभयनन्दिवाले पाठमें इस विषयका प्रतिपा- ३-'सर्वार्थसिद्धि' तत्त्वार्थ सूत्रकी सुप्रसिद्ध दन करनेवाला कोई सूत्र नहीं है । केवल अभय- टीका है । इसके कर्ता स्वयं पूज्यपाद या देवनन्दि नन्दिका 'अभ्यहितं पूर्व निपतति' वार्तिक है। हैं जिनका कि बनाया हुआ प्रस्तुत जैनेन्द्र व्याकर- यदि. अभयनन्दिवाला सूत्रपाठ ठीक होता तो ण है । इस टीकामें अध्याय५ सूत्र २४ की व्याख्या . उसमें इस विषयका प्रतिपादक सूत्र अवश्य होता करते हुए वे लिखते हैं वे लिखते हैं- 'अन्यतोऽपि' इति तलि जो कि नहीं है । पर शब्दार्णवाले पाठमें "अर्य कृते सर्वतः । " इसी सूचकी व्याख्या करते हुए (१-३--११५) ऐसा सूत्र है जो इसी विषयको राजार्तिककार लिखते हैं-' 'दृश्यतेऽन्यतो- प्रतिपादित करता है। इसलिए यही सूत्रपाट देव- पीति' तसि कृते सर्वेषु भवेपु सर्वत इति भवति ।" नान्दछत है । बस, पं० श्रीलालजीकी सबसे जान पडता है या तो सर्वार्थसिद्धिकारने इस बडी दलील यही है जिससे च शब्दाववाले सूत्रको संक्षेप करके लिखा होगा, या लेखकों तथा पाठको असली सिद्ध करना चाहते हैं। इसके छपानेवालान प्रारंभका 'इश्यते' शब्द छोड दिया सिवाय वे और कोई उल्लेख योग्य प्रमाण अपने अंक २] 4.. .. ... ~~. m4mwww सुन लीजिप- - - लक्ष्यकर उक्त - अनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी ७ पक्षम नहीं दे सके हैं। अब इसपर हमारा निवेदन प्रन्योंके भी प्रमाण देते हैं। और भी एक प्रमाण लीजिए- अल्पान्तरम्" [२-२-३४] यह सून पाणि सर्वार्थसिद्धि अ०७ सूत्र १६ की व्याख्या निका है और इसके ऊपर कात्यायनका “ अभ्य- लिखा है-“शास्त्रेऽपि 'अश्ववृपयोमथुनेच्छाया- हितं च" वार्तिक तथा पतंजलिका "अभ्यहित पर्व मि' त्येवमादिपु तदेव गृह्यते ।" यह पाणिनिके निपतति" भाष्य है। इससे मालूम होता है कि ७.१-५५ सूत्रपर कात्यायनका पहला वार्तिक है। पूज्यपादने अपनी सर्वार्थसिद्धिटीकाके इस यहां " अश्ववृषयोमथुनेच्छायाम् " इतने शब्द हैं स्थलमें पाणिनि और पतंजलिके हा सूत्र तथा और इन्हींको सर्वार्थसिद्धिकारन लिया है। यहां भाष्यको विधान किया कात्यायनके वार्तिकको उन्होंने 'शास्त्र' शब्दसे है। अगं इस पर यह प्रश्न होगा कि व्यक्त किया है। जब सर्वार्थसिद्धिकार स्वयं एक व्याकरण सर्वार्थसिद्धि अ०५ सूत्र ४ की व्याख्याने 'नित्य' कती है, तय उन्होंने पाणिनिका और उसके भाष्य- शब्दको सिद्ध करनेके लिए, पूज्यपाद स्वामी का आश्रय क्यों लिया? हमारी समझमें इसका लिरवते हैं: " नेः ध्रुवे त्यः इति निष्पां- उत्तर यह है कि पज्यपाद स्वामी यद्यपि सर्वार्थ दितत्वात् ।" परन्तु जैनेन्द्र में नित्य : सिद्धिकी रचनाके समय अपना व्याकरण तो बना को सिद्ध करनेवाला कोई मूल सूत्र नहीं है, इस चुके होंगे परन्तु उस समय उनके व्याकरणने विशेष लिए अभयनन्दिने अपनी वृत्तिम " येस्तुद प्रसिद्धि लाभ नहीं की होगी और इस कारण स्वयं (३-२-८१ ) सूत्रकी व्याख्यामें " नेर्भुवः इति वक्त उनके ही हृदयमें उसकी इतनी प्रमाणता नहीं होगी व्यम् । यह वार्तिक बनाया है और नियतं सर्व- कि वे अन्य प्रसिद्ध व्याकरणों तथा उनके वार्तिकी काल भवं नित्यं ' इस तरह स्पष्ट किया है । जैने- और भाप्योको सर्वथा भुला देव-या उनका आश्रय दमै 'त्य' प्रत्यय ही नहीं है, इसके बदले 'य। नहीं लेवें । कुछ भी हो परंतु यह तो निश्चय है कि प्रत्यय है। इससे मालूम होता है कि सर्वार्थसिद्धि- उन्होंने अपनी सर्वार्थसिद्धिमअन्य वैयाकरणोंक भी कारने स्वनिर्मित व्याकरणको लक्ष्यमै रखकर पूर्वो- मत दिये हैं। इस विषय में हम एक और प्रमाण क्त बात नहीं कहीं है। अन्य व्याकरणों प्रमाण उपस्थित करते हैं जो बहुत ही पुष्ट और स्पष्ट है- भो वे देते थे और यह प्रमाण भी उसी तरह सर्वार्थसिद्धि अ० ४ सूत्र २२ की व्याख्या का है। लिखा है-यथाहुः कृतायां तपरकरणे मध्यम परन्तु इससे पाठकोंको यह न समझ लेना विलम्बितयोरुपसंख्यानामति ।" इसकी अन्य पुरु- चाहिए कि सर्वार्थसिद्धि प्रन्धकर्ताने अपने जैने- पकी 'आदुः' किया ही कह रही हैं कि प्रन्यकर्ता यहां न्द्रसूत्रों का कही उपयोग ही नहीं किया है । नहीं, किसी अन्य पुरुषका वचन दे रहे हैं। अब पतं- कुछ स्थानोंमें उन्होंने अपने निजके सूत्र भी दिये जलिका महाभाप्य देखिए । उसमें १-२-२ के ५ वें हैं। जसे पांचवे अध्यायके पहले सूत्रके व्याख्यानमें पातिकके भाप्यम विलकुल यही वाक्य दिया लिग्वा है " 'विशेषणं विशष्येण' इति वृत्तिः।" हुआ है-एक अक्षरका भी हेरफेर नहीं है । इससे यह जनेन्द्रका १-३-५२ वां सूत्र है । यह सूत्र शब्दा- स्पष्ट है कि सर्वार्थसिद्धिके की अन्य व्याकरण णवत्रान्द्रका (१.३.४८) वाले पाठमें भी है। इन सब प्रमाणोंसे यह बात अच्छी तरह सिद्ध १ तत्वार्थरानवातिकमें इसी प्रमाणनयरधिगमः' हो जाती है कि जैनेन्द्रका असली सूत्रपाट वही है सूत्रकी व्याख्या, पतंजलि का यह भाष्य ज्यों का त्यों जिसपर अभयनन्दिकृत वृत्ति है; शब्दार्णवचन्द्रि- यक्षरशः दिया है । अभयनन्दिका भी यही वार्तिक है। २ राजवार्तिक और घोकयासिकमें भी यह वाक्य उदृत १ तत्त्वार्थराजवातिकम भी है." शास्त्रेऽपि अश्नवृषयो. किया गया है। मैंधुनेच्छायामित्येवमादौ तदेव कमाख्यायते । ३ जैन साहित्य लंशोधक माग:१ ....AAFNP ...... ... --- AAA. । . कायाला पाठ असली सूत्रपाठको संशोधित और इसमें जैनेन्द्र शब्दाराम या जैनेन्द्र व्याकरणको परिवर्धित करके बनाया गया है और उसका. यह महलकी उपमा दी गई है। वह मूलसूत्ररूप स्तम्भों- संस्करण संभवतः गणनन्दि आचार्यकृत है। पर खड़ा किया गया है, न्याखरूप उसकी रत्नमय अब एक प्रश्न यह रह जाता है कि जय गुणनान्द भूमि है, वृत्तिरूप उसके किवाड़ हैं, भाष्यरूप ने मूल ग्रंथम इतना परिवर्तन और संशोधन शय्यातल है, और टीकारूप उसके माल या में- किया था, तब उस परिवर्तित ग्रन्धका नाम जैनेन्द्र जिल है। यह पंचयस्तु टीका उसकी सोपान श्रेणी ही क्यों रख्खा ? इसके उत्तर निवेदन है कि एक है। इसके द्वारा उक्त महल पर आरोहण किया तो शब्दार्णवचन्द्रिका और जैनेन्द्रप्रक्रिया पूर्वो- जासकता है । इससे मालूम होता है कि पंचवस्तुके लिखित श्लोकॉले गुणनन्दिके व्याकरणका नाम कर्ताके समय में इस व्याकरणपर न्याल, २ वृत्ति, जैनेन्द्र नहीं किन्तु 'शब्दार्णव ' मालूम होता ३भाग्य और ४ टीका, इतने व्याख्या अन्य मौजूद थे। है। संभव है कि लेखकोंके भ्रमसे इन टीकाग्रंथों में इनमेंसे श्रीलवृत्तिया वृत्ति तो यह अभयनन्दिकी महा जैनेन्द्र नाम शामिल हो गया हो। दूसरा यदि वृत्ति ही होगी, ऐसा जान पड़ता है। शेष तीन टीकार्य जैनेन्द्र' नाम भी हो, तो ऐसा कुछ अनुचित अभी तक उपलब्ध नहीं हुई हैं। हमारा अनुमान भी नहीं है । क्यों कि गुणनन्दिने जो प्रयत्न किया है कि इनमेंसे एक टीकाग्रन्थ चाहे वह न्यास हो है, वह अपना एक स्वतंत्र ग्रंथ बनानकी इच्छासे या भाष्य हो, स्वयं पूज्यपादस्वामीका बनाया हुआ नहीं किन्तु पूर्वनिर्मित जैनन्द्रको सर्यागपूर्ण होगा। क्यों कि वे केवल सूत्रग्रन्थ ही बनाकर रह बनानेकी सदिच्छास किया है और इसी लिए गये होंगे, यह बात समझ नहीं आती। अपनी उन्होंने जैनेन्द्र के आधेसे अधिक सूत्र ज्यों के त्यों मानी हुई अतिशय सूक्ष्म संज्ञाओं और परिभाषा- रहने दिये हैं तथा संगलाचरण आदि भी उसका ओंका स्पष्टीकरण करनेके लिए उन्हें कोई टीका, 'ज्यों का यों रख्खा है। हमारा विश्वास कि वृत्ति या न्यास अवश्य बनाना पड़ा होगा, जिस गुणनन्दि इस संशोधित और परिवर्तित सूत्र- तरह शाकटायनने अपने व्याकरणपर असोधवृति पाठको ही तैयार करके न रहे गये होंगे, उन्होंने नामकी स्वोपहा टीका यनाई है। इसपर कोई वृत्ति या टीका ग्रंथ भी अवश्य लिखा आचार्य विद्यानन्दने अष्टसहस्री (पृष्ठ १३२) में होगा, जो अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है । सना 'प्यखे कर्मण्युपसंख्यानात् का ' यह वचन उध्दृत तन जैन ग्रंथमालामें जो जैनेन्द्र-प्रक्रिया छपी है, किया है। यह किसी व्याकरण अन्धका दार्तिक वह जैसा कि हम आगे सिद्ध करेंगे गुणनन्दिको है; परन्तु पाणिनिके किसी भी वार्तिकमें यह नहीं चताई छुई नहीं है। मिलता। असयनन्दिकी महावृत्तिमें अपश्य ही जैनेन्द्रकी डोकायें। "न्याने कर्मणि का वक्तव्या" [४-१-३८] इस पूज्यपादस्वामीकृत असली जैनेन्द्रकी इस सभ्य प्रकारका वार्तिक है, परन्तु हमारा सयाल है कि तक केवल तीन ही टीकायें उपलब्ध है- अभयन- अमयनन्दिकी वृत्ति विद्यानन्दले पीछेकी बनी हुई दिकृत महावृत्ति , २ भार्यश्रुतकीर्तिकी ‘पंच- है, इस लिए विद्यानन्दन यह वार्तिक अभयनन्दिको वस्तु-प्रक्रिया,' और ३ बुधमहात्रन्द्रहत 'लघु वृत्तिते नहीं किन्तु अन्य ही किती ले लिया जैनेन्द्र । परन्तु इनके खिवाय इसकी और भी कई होगा और आश्चर्य नहीं जो वह स्वयं पूज्यपादकृत टीकार्य होनी चाहिए ! पंचवस्तुके अन्तम नीचे टीकानन्य हो । सुनते हैं, जैनेन्द्रका न्यास कर्ना- लिखा हुआ एकश्लोक है:- टक मानके जैन पुस्तक भण्डारोंम है । उसके प्राप्त सूत्रस्तम्भसमुध्दृतं प्रत्रिलन्न्न्यासोररत्नक्षिति, करनेकी बहुत आवश्यकता है। उससे इस व्याक. श्रीमदत्तिकपाटपुट्युत भाध्यौषशय्यातलम् । दीकामालमिवासन जैनेनशम्दागर्म, रणसम्बन्धी अनेक संशयोका निराकरण हो असद पृथपंत्रवनुमानिदं भोपानगा इनात् ।। सायगा। - बैंक २] - जनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी आगे हम उपलब्ध टीफा अन्धाका परिचय दे. हैं । हमारा अनुमान है कि चन्द्रप्रभकाव्यों की महाकवि धीरनन्दिनं जिन अभयनन्दिको अपना १-महावृत्ति । इसकी एक प्रति पुनके भा- गुरु बतलाया है, ये वे ही अभयनन्दि होंगे । आचा- ण्डारकर रिसर्च इन्स्टिट्यूटमें मौजूद है । इसकी ये नेमिचन्द्रन भी गोम्मटसार-कर्मकाण्डकी ४३६वीं लोकसंख्या १३००० के लगभग है। इसके प्रारं- गाथाम इनका उल्लेख किया है । अतएव इनका भये ३६४ पन एक लेखकके लिखे हुए और समय विक्रमकी ग्यारहवीं शताब्दिक पूर्वार्धक शेप ७४ पत्र, चन सुदी २ सं० १९३३ को किसी लगभग निश्चित होता है । जैनेन्द्रकी उपलब्ध टीका- इलरे लेखकके लिखे हुए हैं । प्रतिके दोनों ही ओमें यही टीका सबसे प्राचीन मालूम होती है। भाग जयपुर के लिखे हुए मालूम होते हैं। कई प्रो० एल० के० बेलवलकरने अभयनन्दिका समय स्थानों में कुछ पंक्तियाँ छूटी हुई है। इसका प्रारंभ ई० सन् १३००-१३५० के लगभग मालूम नहीं इसतरह हुआ है:- किन प्रमाणोंसे निश्चित किया है। औ नमः । श्रीमत्सर्वज्ञवीतरागतद्वचनतदनुसारिगुरुभ्यो नमः । २-पंचवस्तु । भांडारकर रिसर्च इन्स्टिट्यूटमें देवदेवं जिनं नत्वा सर्वसत्वाभयप्रदम् । इसकी दो प्रतियाँ मौजूद हैं, जिनमें एक ३००-४०० शब्दशानस्य सूत्राणां महावृत्तिपिच्यते ॥ १ ॥ वर्ष पहलेकी लिम्वी हुई है और बहुत शुद्ध है। यदलक्षणमसुव्रजपारमन्ये- पनसंख्या ९१ है। इस पर लेखकका नाम और रव्यमुत्तामभिधानविधी दी। प्रति लिखनका समय आदि नहीं है । इसके अन्तमें तत्सर्वोकहदयप्रियघावास्य- फेवल इतमा लिखा हुआ है- व्यक्तीकरोत्यभयनन्दिमुनिः समस्तम् ॥ २॥ " तिरियं देवनंद्याचार्यस्य परवादिमथनस्थ ॥छा ॥ रिष्टचारपरिपालनार्थमादाविष्टदेवतानमस्कारलक्षणं मंग- शुभं भवतु लेखकपाठकयोः ॥ श्रीसंघस्य ॥" लमिदमाहाचार्यः। दूसरी' प्रति रत्नकरण्डश्रावकाचारवचनिका और अन्तम कोई प्रशस्ति आदि न देकर सिर्फ आदि अनेक भाषामन्याके रचयिता सुप्रसिद्ध प. इतना ही लिखा है- ण्डित सदासुखजीक हाथकी लिखी हुई है और " इत्यभयनन्दिविरचितायां जैनेन्द्रव्याकरणमहावृत्तौ संवत् १९९० की लिखी हुई है । इसके अन्तमें प्रति- पंचमाध्यायस्य चतुर्थः पादः समाप्तः । समाप्तवायं पंच- लेखकने आपना परिचय इसतरह दिया है:- मोऽध्यायः ।" अब्दे नभश्चन्द्रनिधिस्थिरांक शुद्धे सहय॑म(१) युक्चतुवा॑म् । इससे मालूम होता है कि इस महावृत्तिके कर्ता सत्प्रक्रियावन्धनिवन्धनेयं सद्वस्तुवृत्तीरदनात्समाप्ता (१) । अभयनन्दि मुनि हैं। उन्हेंनि न तो अपनी गुरुपर- श्रीमन्नराणामधिपेशराज्ञि श्रीरामसिहे विलसत्यलेखि । म्पराका ही परिचय दिया है और न प्रन्यरचना- श्रीमयुधेनेह सदासुखेन श्रीयुक्कतेलालनिजात्मयुद्धथै ॥ का समय ही दिया है, इससे निश्चयपूर्वक यह नहीं शाब्दीयशास्त्रं पठितं न यस्तैः स्वदेहसंपालनभारवद्भिः। कहा जा सकता कि वे कब हुए हैं । परन्तु उन्होंने किं दर्शनीय कथनीयमेतद् वृथांगसंघावपलापवद्भिः॥ सुन ३-२-५५ की टीका एक जगह उदाहरण दिया यह प्रति भी प्रायः शुद्ध है। है-“ तत्वार्थवार्तिकमधीयते । यह टीका प्रक्रियावद्ध टीका है और बड़े अच्छे होता है कि भट्टाकलंकदेवसे याद अर्थात् वि० * वीरनन्दि और अभयनन्दिका समय बाननेके लिए की नौवीं शताधिके वाद-और पंचवस्तुके पूर्वो. देखो त्रिलोकसार प्रन्थकी मेरी लिखी भूमिका । ल्लिखित श्लोकमै इसी वृत्तिका उल्लेख जान पड़ता १ नं. १०५९ सन १८८७-९१ की रिपोर्ट। २ नं. है, इस लिए आर्य श्रुतकीर्तिके अर्थात् विक्रमकी ५९० सन १८७५-७६ की रिपोर्ट । ३ इस प्रग्यको एक घारहवीं शताब्दिके पहले-फिसी समयमें वे हुए प्रति परतादगढ (मालवा ) के पुराने दि. जैनमन्दिरके भं. ३ नं. ५९० A और B सन १८७५-७६ की रिपोर्ट। डारमें भी है। देखो जैनमित्र ता०२६ अगस्त १९१५ । " इससे मालूम जैन साहित्य संशोधक [ भाग M -- 14.... AA गया है- दंगसे लिखी गई है। इसकी श्लोफसंख्या ३३०० अधूरी प्रति परतायगढ़ (मालवा ) के पुराने दि. के लगभग है। प्रारंभक विद्यार्थियोंके लिए घडी जैनमन्दिरमै है । उसमें इस तरह प्रारंभ किया उपयोगी है। इसका प्रारंभ इसप्रकार किया है- ओं नमः श्रीशान्तिनाथाय । महावृत्ति शुभत्सकलबुधपूज्या सृखकरी, जगतीत्रतयनाथाय नमो जन्मप्रमायिने । विलोक्योधद्ज्ञानप्रभुविभयनन्दीप्रवहिताम्। नयप्रमाणवामश्मिध्वस्तध्वान्ताय शान्तये ॥१॥ अनेकः सच्छन्दै भ्रमविगतकैः संहदभूता (?) प्रत्याहारस्यादाविष्टदेव स्तुतिपचनं मंगलार्थमुपात्तम् । प्रकुर्वेऽहं तनुमतिमहाचन्द्रविबुधः (१) ॥ आगे चलकर पांचवें पन्नमें इस प्रकार लिखा है- इससे मालूम होता है कि यह अभयनन्दी वृत्तिके माम-वैर-वर्ण-कर-चरणादीनां संधीनां बहूनां संभवत्वात् आधारसे लिखी गई है। पण्डित महाचन्द्रजी वि- संशयाना शिष्या संपृच्छति स्म-कस्सन्धिरिति । क्रमकी इसी बीसवीं शताब्दिके अन्धकर्ता है। संज्ञास्वरप्रकृतिहल्जपिसर्गजन्मा इन्होंने संस्कृत, प्राकृत और सापामें कई ग्रन्थ संधिस्तु पंचक इनाथमिहाहुरन्ये । सत्र स्वरप्रतिहल्जविकल्पतोऽस्मि- ४-जैनेन्द्रप्रक्रिया इसे न्यायतार्थ न्यायशास्त्री संधि विधा कथयति श्रुतकीर्तिरार्यः ।। पं० अंशीधरजीने अभी हाल ही लिखी है। इसका इस ग्रन्थके आदि-अन्तम कहीं भी इसके कर्ताका अभी फेवल पूर्वार्ध ही छपकर प्रकाशित हुआ है। नाम नहीं है। केवल इसी जगह यह नाम आया है शब्दार्णवकी टीकायें। और इससे मालूम होता है कि पंचवस्तु के रचयि- ता आर्य श्रुतकीर्ति हैं। जैनेन्द्र सूत्रपाठके संशोधित परिवर्धित संस्कर- फनडी भाषाके चन्द्रप्रभचरित नामक ग्रन्थके णका भाम-जैसा कि पहले लिखा जा चुका कर्मा अग्गल कविने श्रुतकीर्तिको अपना गुरु बत- शब्दार्णव है । इसके कर्ता आचार्य गुणनन्दि हैं। लाया है-" इति परमपुरुनाथकुलभूभृत्लमुभूतप्रव- यह बहुत संभव है कि सूत्रपाठके सिवाय उन्होंने चनसरित्सरिनाथ-श्रुतकीर्तिविद्यचक्रवर्तिपदप- उसकी कोई टीका या वृत्ति भी बनाई होगी जो कि भनिधानदीपर्वात श्रीमदग्गलदेवविरचिते चन्द्रप्रभ-. अभीतक उपलब्ध नहीं हुई है। चरिते--' इत्यादि । और यह चरित शक संवत् गुणनन्दि नामके कई आचार्य हो गये हैं । उन- १०११ (वि० सं० ११४६ ) में वनकर समाप्त हुआ मैसे एक शक संवत् ३८८ (वि० सं० ५२३ ) मे है । अतएव पंचवस्तुको भी अभयनन्दि महावृत्ति- पूज्यपादसे भी पहलेके हैं। दूसरे गुणनन्दि का के कुछ ही पीछे की-विक्रमकी बारहवीं शताब्दि उल्लेख श्रवणबेलगोलके ४२, ४३ और ४७ वें नम्ब- के प्रारंभ की-रचना समझना चाहिये । नन्दिसंघ- रके शिलालेखोंमें मिलता है। ये बलाकपिच्छक की गुर्वावलीमें श्रुतकीर्तिको वैयाकरण भास्कर शिष्य और गृध्रापिच्छके प्रशिष्य थे। तर्क, व्याकर- लिखा है-- ण और साहित्य शाखके बहुत बड़े विद्वान थे। * विद्यः श्रुतकीाख्यो वैयाकरणभास्करः । " इनके ३०० शास्त्रपारंगत शिष्य थे और उनमें. ये नन्दिसंघ, देशीयगण और पुस्तकगच्छके मा. ७२ शिष्य सिद्धान्तशास्त्री ७२ शिष्य सिद्धान्तशाली थे । आदि पंपके गुह चार्य थे । श्रुतकीर्ति नामके और भी कई आचार्य देवेन्द्र भी इन्हीं के शिष्य थे। अनेक प्रस्थकारोने हो गये हैं। इन्हें कई काव्योंका का पतलाया है; परन्तु अभी. ३--लघुजैनेन्द्र । इसकी एक प्रति अंकलेश्वर १ देखो जैनमिन्न ता० २६ अगस्त १९१५ । (भरोच ) के दिगम्बर जैनमन्दिरमें है और दूसरी २ मर्कराका ताम्रपत्र, इंख्यिन एण्टिक्वेरी, जिल्द १, पृष्ठ 5 देसो प्रो. पिटरीनकी दूसरी रिपोर्ट सन १८८४, ३६३-६५ । तथा एपिग्राफिक्का कर्नाटका-जिल्द -जिल्द १, का पदला लेना प पृष्ठ १६४।

अंक ५ ..A Au MAN 1 " जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी तक इनका कोई काव्य नहीं मिला है। फर्नाटक विद्यके गुरु थे । संभव है कि शब्दार्णपके फर्ता कविचरितके कर्ताने इनका समय वि० संवत् ये ही हो । ९५७ निश्चय किया है। क्यों कि इनके शिष्य देवे शब्दार्णवकी इस समय दो टीकाय उपलब्ध है द्रके शिष्य आदि पंपका जन्म वि० सं० ९५९ में और दोनों ही सनातन जैन ग्रन्थमालामें आप हुआ था और उसने ३९ वर्षको अवस्थामै अपने चुकी हैं-१ शब्दार्णवचन्द्रिका, और २ शब्दा- सुप्रसिद्ध कनडी काव्य भारतचम्पू और आदिपु. र्णवप्रक्रिया। राण निर्माण किये हैं। हमारा अनुमान है कि येही १-शब्दार्णवचन्द्रिका । इसकी एक बहुत ही गुणनन्दि शब्दार्णवके कर्ता होंगे। श्रवण बेलगोलके प्राचीन और अतिशय जीर्ण प्रति भाण्डारकर रि- ४७ शिलालेखमें इनके सम्बन्धमे नीचे लिखे सर्च इन्स्टिट्यूटमें मौजूद है। यह ताडपत्रपर नागरी लोक मिलते हैं:- लिपि है। इसके आदि-अन्तके पत्र प्रायः नष्ट श्रीगृध्रपिच्छमुनिपस्य बलाकोपच्छः हो गये हैं। इसमें छपी हुई प्रतिमें जो गद्य प्रशस्ति शिष्योऽनिष्ट रत्नत्रयवर्तिकीर्तिः । है,वह नहीं है । और अन्तमें एक श्लोक है जो मारित्रकाचुराखिलावनिपालमौलि- आधा पढ़ा जाता है-"मंगलमस्तु।.......इन्द्रश्चंद्र- मालाशिलीमुखविराजितपादपद्मः ॥ ६ ॥ शकटतनयः पाणिनिः पूज्यपादो यन्मोवाचापिश- तच्छिप्यो गुणनन्दिपण्डितयति: चारित्रचक्रेश्वरः । लिरमरः काशशक्ति.......शब्दपारायणस्यति । तन्यारणादिशास्त्रनिपुणः साहित्यविद्यापतिः ॥ ७ इसके कर्ता श्रीसोमदेव मुनि हैं। ये शिलाहार मिथ्यात्वादिमदान्धसिन्धुरघटासंघातकण्ठौरवो। घशके राजा भोजदेव [द्वितीय ] के समयमें हुए भल्याम्भोजीदवाकगे विजयतां कन्दर्पदपापहः ।।८ है और अर्जुरिका नामक ग्रामके त्रिभुवनतिलक तच्छिम्यात्रिशतं विवेकनिधयः शास्त्राब्धिपारंगताः मामक जैनमन्दिरमें-जो किमहामण्डलेश्वर गंड- तेपू कष्टममा द्विसप्ततिमिताः सिद्धान्तशास्त्रार्थकाः॥९ रादित्यदेवका बनवाया हुआ था-उन्होंने इसे व्याख्याने पटवो विचित्रचरिताः तेषु प्रसिद्धो मुनिः । शक संवत् ११२७ [ वि० सं० १२६२ ] में पनाया नानानूननयप्रमाणनिपुणो देवेन्द्रसैद्धान्तिकः ॥ १. है। यह प्राम इस समय आज नामसे प्रसिद्ध है चन्द्रप्रभचरित महाकाव्यके की वीरनन्दिका और कोल्हापुर राज्यमें है । चादीभवनांकुश समय शक संवत ९०० के लगभग निश्चित होता श्रीविशालक्षार्ति पण्डितदेवके वैयावृत्यले हस है । क्यों कि वादिराजसूरिने अपने पार्श्वनाथकाव्यमै ग्रन्थको रचना हुई है। उनका स्मरण किया है। और धीरनन्दीकी गुरु. "श्रीसौमदेवयतिनिर्मितिमादधाति परम्परा इस प्रकार है-१ श्रीगुपनन्दि, २ विवुध- या नौः प्रतीतगुणनंदितशब्दवा । गुणनन्दि, ३ अभयनन्दि और धीरनन्दि। यदि पहले नं. २५ सन १८८०-८८ की रिपोट। गुणनन्दि और पोरनन्दिके बीच हम ७८ वर्षका २ ये विशालकीर्ति वे ही मालूम होते हैं जिनका उल्लेख अन्तरमान लें, तो पहले गुणनन्दिका समय वही पं० आशाघरने अपने अनगारधर्मामृतको प्रशस्तिकी टीकामें शक संवत् ८२२ या वि० सं०९५७ के लगभग आ यादी विशालकीर्ति' के नामसे किया है और वि. जायगा। इससे यह निश्चय होता है कि वारनन्दिः को उन्होंने न्यायशास्त्रमें पारंगत किया था। पं० आशा- . की गुरुपरम्पराके प्रथम गुणनन्दि और आदिपंपके पर वि० सं० १९४९ के लगभग धारामें आये थे और वि० गुरु देवेन्द्र के गुरु गुणनन्दि एक ही होंगे और जैसा सं० १३०० तक उनके अस्तित्वका पता लगता है। कि हम पहले लिख चुके हैं येही शब्दार्णवके फर्ता (देखो ममिर्मित विद्वद्रस्नमालामें 'पण्डित प्रवर आशाधर शार्षलख ) अतः सोमदेवका वैयावृत्य करनेवाले विशाल- गुणनन्दि नामके एक और आचार्य शक संवत् कांति दूसरे नहीं हो सकते १० आशापरके पाससे पढर ही १०३७ [वि० सं० ११७२ ] में हुए हैं जो मेघचन्द्र वे दक्षिणक और चले आये होंगे। .

७६ जैन साहित्य संशोधक भीग, [ NA MAAI A.PAJAA - " सेयं सताममलचेतसि विस्फुरती को शब्दार्णव व्याकरणका कर्ता ही प्रकट कियां त्तिः सदा नुतपदा परिवर्तिषीष्ट ।। गया है। स्वस्ति श्रीकोल्हापूरदेशांतर्वार्जुरिकामदास्थानयुधिष्टि अय देखना चाहिए कि ये मेघचन्द्र और नांग- रावतारमहामण्डलेश्वरगंडरादित्यवेवनिमापितत्रिभुवनतिलक-- चन्द्र आदि कौन थे और कब हुए है। जिनालये श्रीमत्परमपरमठिमीनोमिनाथश्रीपादपद्माराधनयन ये मेघचन्द्र आचारसारके कर्ता वीरनन्दि सि. वादीसवांकुशश्रीषिशालकोतिपहितदेववैयावृत्यतःश्रीमच्छि -. द्धान्त चक्रवर्तीके गुरु ही मालूम होते हैं। ये अडे लाहारकुलकमलमातंडतेजःपुंजराजाधिराजपरमेश्वरपरमभट्टा भारी विद्वान् थे । इन्हें सिद्धान्तज्ञतामे जिनसेन रकाधिमचक्रवर्तिश्रीवीरभोजदेवविजयराज्ये शकवकसह-. और बीरसेनके सहश, न्यायमें अकलंकके जैक्शतसमर्विशति ११२७ तमकोधन संवत्सरे ११२७ तमक्रोधन संवत्सरे स्वस्ति समान और व्याकरणमे साक्षात् पूज्यपाद सदृश समस्तानयद्यविद्याचकचक्रवत्तिश्रीपूज्यपादानुरकचेतसा श्री-- यतलाया है । श्रवणबेलगोलके नं० ४७,५० और मत्वोनदेवमुनीश्वरेण विरचितेयं शब्दार्णवचन्द्रिका नाम ५२ नम्बरके शिलालेखोंसे मालूम होता है कि इन- वृनिरिति । इति श्रीपूज्यपादस्त तजैनेन्द्रमहाव्याकरण का स्वर्गवास शक संवत् १०३७ (वि० सं० १९७२) सम्पूर्णम् । में और उनके शुभचन्द्रदेव नामक शिष्यका स्वर्ग- यशस्तिलकचम्पूके कर्ता सुप्रसिद्ध सामदेव- बाल शक संवत् १०६८ (वि० सं० १२०३ ) में हुआ सूरि इनसे पहले हुए हैं । क्यों कि उनका उक्त चम्पू था। तथा उनके दूसरे शिष्य प्रभाचन्द्रदेवने शक शक लंघन ८८१ [वि. १०१६ ] में समाप्त हुआ सं० १०४१ (वि० सं० १९७६ ) में एक महापूजाप्र- था । अतएव उनसे और इनसे कोई सम्बन्ध नहीं तिष्ठा कराई थी। जब सोमदेवने शब्दार्णवचन्द्रि- है, यह स्पष्ट है। का मेघचन्द्रक प्रशिष्य हरिचन्द्र के लिए शक सं० इस अन्धके मंगलाचरणमें नीचे लिखे दो श्लोक ११२७ (वि० सं० १२६२ ) में बनाई थी, तब मेध- दिये हैं:- चन्द्रका समय वि० सं० १९७२ के लगभग माना श्रीपूज्यपादममलं गुणनन्दिदेवं जा सकता है। सोमामरव्रतिपपूजितपादयुग्मम् । नागचन्द्र नामके दो विद्वान् हो गये हैं, एक सिद्धं समुन्नत रदं वृषमं जिनेन्द्र पपरामायणके कर्ता नागचन्द्र जिनका दूसरा नाम सच्छन्दलक्षणमहं विनमामि वारम् ॥१॥ अभिनव पंप था, और दूसरे लब्धिसारटीकाके कर्ता श्रीमूलसंघजलजप्रतिबोधमानो- नागचन्द्र । पहले गृहस्थ थे और दूसरे मुनि । मधेन्दुदीक्षितभुजंगसुधाकरस्य । अभिनव पंपके गुरुका नाम बालचन्द्र था जो मेघच- राधान्ततोयनिषिवृद्धिकरस्य वृत्ति न्द्र के लहाध्यायी थे, और दूसरे स्वयं बालचन्द्रके रेभे हरीदुगतये वरदीक्षिताय ॥२॥ शिष्य थे । इन दूसरे नागचन्द्र के शिष्य हरिचन्द्र- इनमें से पहले श्लोकमें पूज्यपाद, गुणनन्दि और के लिए यह वृत्ति बनाई गई है। इन्हें जो 'राधान्त सोमदेव ये विशेषण धीर भगवानको दिये हैं। तोयानिधिबृद्धिकर 'विशेषण दिया है उससे मा- दूसरे श्लोक में कहा है कि यह टीका मूलसंधीय लूम होता है, कि ये सिद्धान्तचक्रवर्ती या सिद्धा- मेवभन्दके शिष्य नागचन्द्र ( भुजंगसुधाकर और न्त शास्त्रोके ज्ञाता या टीकाकार होंगे। उनके शिष्य हरिचन्द्र यतिके लिए बनाई जाती है। २-शब्दार्णवप्रक्रिया । यह जैनेन्द्र प्रक्रियाके गुणनन्दिकी प्रशंसा चुरादि धातुपाठके अन्तम नामसे छपी है। परन्तु हमारा अनुमान है कि इस- मी एक पद्यमें की गई है जिसका अन्तिम बरम १ मेघचन्द्र के विषयमें विशेष जानने के लिए देखो भानि.. कचन्द्र प्रन्यमालाके ' आचारसार' की भूमिका शब्दब्रह्मा स जीयाद् गुणनिधिगुणनंदिव्रतीशस्सुसौख्यः । अर्थात् इसमें शपब्रह्मा विशेषण देकर गुणनन्दि- शिलालेछ । २ देखो, 'इन्स्क्रिप्शन्स एट श्रदणवेगोल ' का ४७ वाँ यह है:- अंक २] जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी ७७ ~~ ~~~ -~-~~- ~~~-~~-r. का नाम शब्दार्णव-प्रक्रिया ही होगा। हमें इसकी तीसरे पद्यमें भट्टारकशिरोमणि श्रुतकीर्ति दे- कोई हस्तलिखित प्रति नहीं मिल सकी । जिस वकी प्रशंसा करता हुआ कवि कहता है कि वे तरह अभयनन्दिकी वृत्तिके बाद उसीके आधारसे मेरे मनरूप मानससरोवरम राजहंसके समान चिर- प्रक्रियारूप पंचवस्तु टीका बनी है, उसी प्रकार काल तक विराजमान रहे । इसमें भी ग्रन्थकर्ता सोमदेवकी शब्दार्णव-चन्द्रिकाके बाद उसीके आपना नाम प्रकट नहीं करते हैं परन्तु अनुमानसे आधारसे यह प्रक्रिया बनी है। प्रकाशकोंने इसके ऐसा जान पडता है कि वे श्रुतकीर्तिदेवके कोई कर्ताका नाम गुणनन्दि प्रकट किया है। परन्तु आन शिष्य होंगे और संभवतः उन श्रुतकीर्तिके नहीं पडता है इसके अन्तिम श्लोकों में गुणनन्दिका नाम जो पंचवस्तुके कर्ता हैं। ये श्रुतकीर्ति पंचवस्तुके देखकर ही भ्रमवश इसके कतीका नाम गुणनन्दि कर्ताले पृथक् जान पड़ते हैं । क्योंकि इन्हें प्रक्रि- समझ लिया गया है । घे श्लोक नीचे दिये याके कीने 'कविपति ' बतलाया है, व्याकरण जाते हैं:- नहीं । ये वे ही श्रुतकीर्ति मालूम होते हैं जिनका :: सत्संधि दधते.समासमभितः ख्याताधनामोनतं समय प्रो० पाठकने शक संवत् १०४५ या वि० सं० निर्घातं बहुतद्धितं कृतमिहाख्यातं यशःशालिनम् । १९८० बतलायो है । श्रवणयेल्गोलके जैनगुरुओंने सैपा श्रीगुणनन्दितानितवपुः शब्दार्णवं निर्णय 'चारुकीर्ति पंडिताचार्य ' का पद शक संवत् नावत्याश्रयतां विविक्षुमनसां साक्षात्स्वयं प्रक्रिया ॥१॥ १०३९ के बाद धारण किया है और पहले चार- दुरितमदेभनिशुंभकुम्भस्थलमेदनक्षमोमनखैः । कीर्ति इन्हीं श्रुतकीतिके पुत्र थे। अवणबेलगोलके राजन्मृगाधिराजो गुणनन्दी भुवि चिरं जीयात्।। २ १०८ वे शिलालेखमें इनका जिकर है और इनकी : सन्मानें सकलसुखप्रियकरे संज्ञापित सहने बहुत ही प्रशंसा की गई है। लिखा है- प्रा(दि)ग्वासस्सुचरित्रवानमलकः कांतो विवेकी प्रियः । तत्र सर्वशरीरिरक्षाकृतमतिर्विजितेन्द्रियः। सोयं यः श्रुतकीर्तिदेवयतिपो भट्टारकोत्तसको सिद्धशासनवर्द्धन्प्रतिलब्धकीर्तिकलापकः ॥ २२ ॥ रंरम्यान्मम मानसे कविपतिः सद्राजहंसश्विरम् ॥ विश्रुतश्रुतकीर्तिभट्टारकयतिस्समजायत । इनमेंसे पहले पद्यका आशय पहले लिखा जा प्रस्फुरद्वचनामृतांशुविनाशिताखिलहत्तमाः ॥२३॥ चुका है । उससे यह स्पष्ट होता है कि गुणनन्दिके प्रक्रियाके कर्ताने इन्हें भट्टारकोत्तंस और शुल- शब्दार्णवके लिए यह प्रक्रिया नावके समान है। कीर्तिदेवयतिप लिखा है और इस लेखमें भी भट्टा. और दूसरे पयमें कहा है कि सिंहके समान गुणन- रफयति लिखा है। अतः ये दोनों एक मालूम होते न्दि पृथ्वीपर सदा जयवन्त रहे । मालूम नहीं, हैं । आश्चर्य नहीं जो इनके पुत्र और शिष्य चारु- इन पोसे इस प्रक्रियाका फर्तृत्व गुणनन्दिको कीर्ति पण्डिताचार्य ही इस प्रक्रियाके की हो। कैसे प्राप्त होता है। यदि इसके कर्ता स्वयं गुणन- समय-निर्णय। न्दी होते तो वे स्वयं ही अपने लिए यह कैसे कहते १) शाकटायन व्याकरण और उसकी अमोघवृ. कि वे गुणनन्दि सदा जयवन्त रहे । इनसे तो तिनामकी टीका दोनों ही के कर्ता शाकटायन नाम- साफ प्रकट होता है कि गुणनन्दि प्रन्थकर्तासे के आचार्य है, इस वातको प्रो. के. वी. पाटकने कोई पृथक् ही व्यक्ति है जिसे वह श्रद्धास्पद सम- अनेक प्रमाण देकर सिद्ध किया है और उन्होंने झता है । अर्थात् यह निस्संदेह है कि इसके कत: यह भी बतलाया है कि अमोववृत्ति राष्ट्रकूट राजा गुणनन्दिके अतिरिक्त कोई दूसरे ही हैं। १ देखो 'सिस्टम्च आफ संस्रुत प्रामर' पृष्ठ ६७ ॥ १ छपी हुई प्रतिके अन्तमें " इति प्रक्रियावतारे २ देखा, मेरा लिखा 'कर्नाटक जैन कवि' पृष्ठ २० । ३ देखो, कृद्विधिः पाठः समाप्तः। समाप्तेय प्रक्रिया । इस तरह बैनसिद्धान्तभास्कर, किरण २-३, पृष्ठ ॥८॥ छपा है । इससे भी इसका नाम जैनेन्द्र प्रकिया . नहीं ४ देखो, इंडियन एण्टिक्वेरी, जिल्द ४३, पृष्ठ २.५-१२ में प्रो० पाठकका लेख। . जान पडदा । - [भाम - ७८ जैन साहित्य संशोधक अमोघ वर्षके समय में उसीके नामसे बनाई गई लिङ्गस्य लक्ष्म ही समस्य विशेपयुक्त. है। इससे यह सिद्ध होता है कि शाकडायन व्या मुकं मया परिमित विदशा इहायर्याः ॥ ३१ ॥ करण (सुन) अमोघवर्षके लमयम अथवा उससे इससे भी सिद्ध होता है कि पि००८५० के कुछ पहले पनाया गया होगा। अमोघवर्षने शक लगभग जैनेन्द्र प्रख्यात व्याकरणों में गिना जाता संवत् ७३७ से ८००तक (वि० सं० ८७२ से १३५ था। अतएव यह इस समयसे भी पहलेका बना तक) राज्य किया है। अतः यदि हम शाकटायन हुभा होना चाहिए। सूत्रोंके बननेका समय वि० सं० ८५० के लगभग ३) हरिवंशपुराण शक संवत् ७०५ (वि० सं० मान लें, तो वह वास्तविकता के निकट ही रहेगा। ८४०)-का बना हुआ है। इस समय यह समान शाकटायन व्याकरणको बारीकीके साथ देखने हुआ है। उस समय दक्षिणमें राष्ट्रकूट राजा कृष्णं से मालूम होता है कि वह जैनेन्द्रसे पीछे बना (शुभतुंग या साहसतुंग) का पुत्र श्रीवल्लभ (गोवि. हुआ है । क्यों कि उसके अनेक सूत्र जैनेन्द्रका न्दराज द्वितीय) राज्य करता था। इस राजाने शक अनुकरण करके रचे गये हैं । उदाहरणके लिए ६९७ ते ७०५ नक [वि० ८३२ से ८४०] तक राज्य जैनेन्द्र के " वस्तेढ " (४-२-१५४), " शिलाया- किया है। इस हरिवंशपुराणमें पूज्यपाद या देवन. तुः, (४-१-१५५) ८.४१-२०९)आदि न्दिकी प्रशंसा इस प्रकार की गई है। सूत्रोंको शाकटायनने थोडा बहुत फेरफार करके मई)द्रचन्द्रार्कजैनेन्द्रव्यापि (डि)व्याकरणक्षिणः । अश्वा ज्योंकायों ले लिया है । जैनेन्द्रका एक सूत्र देवस्य देववन्यस्य न वदते गिरः कथम् ॥ ३१॥ है.-"टिंदादिः (१-१.५१) शाकटायनने इसे यह यात निस्सन्देह होकर कही जा सकती है कि ज्यों का त्यों रख कर अपना पहले अध्याय, पहले जैनेन्द्रव्याकरणके कर्ता देवनन्दि वि. सं ८०० से पादका ५३ वा सूत्र बना लिया है। इस सूत्रको भी पहलेके हैं। लक्ष्य करके भट्टाकलंकदेय अपने राजवार्तिकं (१. ४) उपर बतलाया चुका है कि तत्वार्थराज. ५.१, पृष्ठ ३७ ) में लिखते हैं- "क्वचिदवयवे टि- वार्तिकमे जैनेन्द्र व्याकरणके एक सूत्रका हवाला वादिरिति । " और भट्टाकलंकदेव शाकटायन तथा दिया गया है । इसी तरह "सर्वादिः सर्वनाम अमोघवर्षसे पहले राष्ट्रकूट राजा साहसतुंगके [१.१-३५] सूत्र भी जैतेन्द्रका है, और उसका समयमें हुए हैं, अत एव यह निश्चय है कि अक- उल्लेख राजवार्तिक अध्याय सूत्र ११ की व्याख्याने लंकदेवने जो 'टिदादि ' सूत्रका प्रमाण दिया है, किया गया है। इससे सिद्ध है कि जैनेन्द्र व्याकरण वह जैनेन्द्र के खूबको ही लक्ष्य करके दिया है, शाक- राजवार्तिकसे पहलेका बना हुआ है। राजवार्तिक- टायनके सूत्रको लक्ष्य करके नहीं । इससे यह के कर्ता अकलंकदेव राष्ट्रकूट राजा साहसतुंग- सिद्ध हुआ कि शाकटायन जैनेन्द्रले पछिका बना जिसका दूसरा नाम शुभतुंग और कृष्ण भी है- हुआ है । अर्थात् जैनेन्द्र वि० सं० ८५० से भी पहले की सभामै गये थे, इसका उल्लेख श्रवणबेलगोलकी बन चुका था। मल्लिषणप्रशस्तिमें किया गया है। और साहसतुंग वामनप्रणीत लिङ्गानुशासन नामका एक ने शक संवत् ६७५ से ६९७ [वि० सं० ८१० से अन्य अभी हाल ही गायकवाड ओरियंटल सारी- ८३२] तक राज्य किया है। यदि राजवार्तिकको जमें प्रकाशित हुआ है। इसका कर्ता पं० वामन हम इस राजाके ही समयका बना हुआ माने, राष्ट्रष्ट राजा जगतुंग या गोविन्द तृतीयके समय तो भी जैनेन्द्र वि. स. ८०० से पहलेका अंना हुआ में हुआ है और इस राजाने शक १६ ते ७३६ सिद्ध होता है । (वि०८५१-८७१) तक राज्य किया है । यह प्रस्थ का नीचे लिखे पद्यमें जनेन्द्रका उल्लेख करता है. १ देव देवन्दिका ही संक्षिप्त नाम है । शब्दार्णवनि- ध्याडिप्रणतिमय वारत्वं सचान्द्र कामें 1-४-११४ सूत्रकी व्याख्या लिया है.-" देवोप- बैनेन्द्रलक्षणगतं विवि तान्यत् । स्पनेकशेषन्यालरसम् ।" " अंक २] जैनेन्द्र पाकरण और आचार्य देवनन्दी .... ~ -- -- उक्त प्रमाणासे यह तो निश्चय हो गया कि तबतक हमे देवनन्दिको कुन्दकुन्द्राम्नाय और जैनेन्द्रक कर्ता विक्रम सं० ८०० से पहले हुए देशीयगणक आचार्य बदननन्दिका शिष्य या प्र. हैं । परंतु यह निश्चय नहीं हुआ कि कितने शिष्य माननेमें कोई दोष नहीं दिखता । उनका पहले हुए हैं। इसके लिए आगेके प्रमाण देखिए। समय विक्रमकी छठी शताब्दिका प्रारंभ भी प्रायः ५-मर्करा (कुर्ग) में एक बहुत ही प्राचीन ताम्र- निश्चित समझना चाहिए। पत्र' मिला है । यह शक संवत् १८८ (वि०सं०५२३) ६- इस समयकी पुष्टिमें एक और भी अच्छा का लिखा हुआ है। उस समय गंगवंशीय राजा प्रमाण मिलता है। वि० सं०९९० में बने हुए 'द. विनीत राज्य करता था। अविनीत राजाका ना- निसार 'नामक प्राकृत अन्यमें लिखा है कि पूज्य- म भी इस लेखमें है। इसमें कुन्दकुन्दान्यय और पादके शिष्य वजनन्दिन त्रि० सं० ५२६ में दक्षिण देशीयगणके मुनियोंकी परम्परा इस प्रकार दी हुई मथुरा या मदुरामें द्राविडसंघकी स्थापना की:-- गुणचन्द्र--अभयनन्दि-शीलभद्र-शाननन्दि- मिरिपुज्जपादमीसी दाविडमंत्रस्स कारगो दुनो। गुपनन्दि और वदननन्दि । पूर्वोक्त अविनीत राजा- के णामण वनणंदी पाहुडवेदी महासन्या ।। बाद उसका पुत्रदुविनीत गजा हुआ है । हिस्ट्री पंचसए छब्बीसे विक्कमरायम्स मरणपत्तस्स । माफ कनडी लिटरेचर नामक अंगरेजी ग्रन्थ और कर्नाटककविचरित्र" नामक कनड़ी ग्रन्यके अनु. दविखणमहराजादो दाविडमयो महामोहो । सार इस राजाका राज्यकाल ई० संन १८२ से १५१२ इससे भी पूज्यपादका समय वही छठी शता. (वि०५३९-६९) तक है। यह कनहीं मापा ब्दिका प्रारंभ निश्चित होता है। कवि था। भारत्रिके किरातार्जुनीय काव्यकं १५ प्रो० पाठकके प्रमाण। सनकी फनडी टीका इसने लिखी है। कर्नाटक- फविचरित्रक कर्ता लिखते हैं कि यह राजा पूज्य. सुप्रसिद्ध इतिहासज्ञप०काशीनाथ बापूजी पाठक- ने अपने शाकटायन व्याकरणसम्बन्धी लेख्नेम पाद् यतीन्द्रका शिश्य था । अतः पूज्यपादको हमें विक्रमकी छठी शताद्रिके प्रारंभका ग्रन्थकर्ता मा-नन्द्र के समयका मानो अन्तिम निर्णय हो गया। प्रमाण ऐसे दिये हैं जिनसे ऐसा भाल होता हैं कि नना चाहिए । मर्कराके उक्त ताम्रपनले भी ग्रह इन प्रमाणाको भी हम अपने पाठकोंके सम्मुख पात पुष्ट होती है। वि० संवत् ५५३ में अविनीत उपस्थित करदेना चाहते हैं। परन्तु साथ ही यह राजा था। इसके १६ वर्ष प्रात वि० सं० ५६५, में भी कह देना चाहते हैं कि ये प्रमाण जिस नीवार उसका पुन दुविनीत राजा हुआ होगा, अतएव उ. खड़े किये गये हैं, उसमें कुछ भी दम नहीं है। जैसा सका जो राज्यकाल बतलाया गया है, वह अवश्य कि हम पहले सिद्ध कर चुके हैं जैनेन्द्रका असली ठीक होगा। और जिन बदननन्दिके समय उक्त ताम्रपत्र लिखा गया है, संभवतः उन्हींको शिष्य सूत्रपाठ वही है जिसपर अभयनन्दिकी महावृत्ति परम्परामें बल्कि उन्होंक शिष्य याशिष्यजनके रची गई है। परन्तु पाठक महोदयन जितने प्रमाण दिये हैं, वे सब शब्दार्णवचन्द्रिकाके सूत्रपाठको कर्ता देवनन्दि या पूज्यपाद होंगे । क्यों कि ताम्रपत्र असली जैनेन्द्रसूत्र मानकर दिये हैं। इस कारण की मुनिपरम्परामें नन्यन्त नाम ही अधिक है, और वे तबतक ग्राह्य नहीं हो सकते जबतक कि पुष्ट इनका भी नाम नन्यन्त है। इतना ही नहीं बलिक प्रमाणास यह सिद्ध नहीं कर दिया जाय कि शब्दा- इनके शिष्य बननन्दिका नाम भी नन्यन्त है । अतः चन्द्रिकाका पाट ही टीक है और इसके विरुद्धमें जबतक कोई प्रमाण इसका विरोधी न मिले, दिये हुए हमारे प्रमाणोंका पूरा पग खण्डन न कर १ इंडियन एण्टिक्वेरी, जिल्द १, पृष्ट ३६३-६५ और दिया जाय ! एपिग्राफिका कर्नाटिका, जिल्द 1 का पहला लेन । २ आर, नरसिंहाचार्य, रम. ए. झन । दला इंडियन पष्टिक्री जिन्द ४३, पृष्ट २०५-१२ ॥ ।

जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ - १-जैनेन्द्रका एक सूत्र है-"हस्तादेवेनुद्यस्ते "शरद्वन्छुनकरणाग्निशर्मकृष्णदीद् मृगुवत्सवमिष्ठवृवगण- यचे.' [:-३-३६] । इल सुनके मनुलार 'चि' ब्राह्मणायायणे ' २-४-३६ । का 'चाय' हो जाता है, उस अवस्थामें जब कि इस सूत्रकी अमोघवृत्ती हाथले ग्रहण करने योग्य हो, उत उपसगके बाद न आनिशर्मायणो वार्षगण्यः । अग्निशमिरन्यः। हो और चोरी करके न लिया गया हो। जैसे 'पुष्प इस तरह व्याख्या की है। प्रचायः । हस्तादेय न होनस पुष्पप्रचय, उत् उपसर्ग इन चुनोसे यह बात मालूम होती है कि पाणि. होनेसे 'पुप्पांचय' और चोरी होनेले 'पुप्पप्रचय' निमें 'वार्षगण्य ' शब्द सिद्ध नहीं किया गया है होता है। इस सत्र में उत् उपसर्गके बात जो 'चाय' जब कि जैनेन्द्र में किया गया है। वार्षगण्य सांख्य होनेका निषेध किया गया है, वह पाणिनिमें,+ कारिकाके कत्ता ईश्वरकृष्णका दूसरा नाम है और उसमें बानिकम और भाष्य भी नहीं है। परन्तु सुप्रसिद्ध चीनी विद्वान् डा० टक्कुसुके मतानुसार पाणिनिकी काशिकावृत्तिम ३-३-४० सूत्रके व्या- ईश्वरकृष्ण वि० सं० ५०७ के लगभग विद्यमान थे। ख्यानमें हैं-" उच्चयस्य प्रतिषधी वक्तव्यः।" इस- इससे निश्चय हुआ कि जैनेन्द्रव्याकरण ईश्वरकृष्ण- सेलिद्ध होता है कि काशिकाके की वामन और के वाद-वि० सं०५८७ के वाद और काशिकासे जयादित्यने इसे जैनेन्द्रपरसे ही लिया है और पहले-वि० सं० १७ से पहले किसी समय जयादित्यकी मृत्यु वि० सं० ७१७ में हो चुकी थी बना है। ऐसा चिनी यात्री इन्सिगने अपने यानाविवरणम ३-जैनेन्द्रका और एक सूत्र है--" गुरुदयाद् लिखा है । अतः जैनेन्द्रव्याकरण वि० सं० ७१७ भायुक्तेऽद्वे" (३-२-२५)। शाकटायनने भी इसे ले भी पहलेका बना हुआ होना चाहिए । अपना २-४-२२४ वां सूत्र बना लिया है । हेमच- २-पाणिनि व्याकरणमें नीचे लिखा हुआ एक न्द्रने थोडाला परिवर्तन करके "उदितगुरो - द्युक्तेऽन्दे' (६-२-२५) बनाया है । इस सूत्रम द्वादश- सग्द छुनकदीद् भृगुवत्माप्रायणेपु । वर्षात्मक वार्हस्पत्य संवत्सरपद्धतिका उल्लेख किया इसके स्थानमें जैनेन्द्रका सूत्र इस प्रकार है- १ इस संवत्सरकी उत्पत्ति वृहस्पतिकी गति परते हुई है, इस कारण इसे वार्हस्पत्य संवत्सर कहते हैं । जिस समय शरच्छनकद ग्निशमगरणात् नृगुवत्सामायणवृष- यह मालूम हुआ कि नक्षत्रमण्डलमेसे वृहस्पतिकी एक गगन लगवासिष्ठ।" ३-१-१३४ | प्रदक्षिणा लगभग १२ वर्षम शेती है, उसी समय इस संव- इसीका अनुकरणकारी सूत्र शाकटायनमें इस त्सरको उत्पत्ति हुई हांगी, ऐसा जान पड़ता है । जिस तरह- सूर्यकी एक प्रदक्षिणाके कालको एक सौर वर्ष और उसके १२ वें भागको मास कहते हैं, उसी तरह इस पद्धतिमें गुरुके १ इन प्रमाणामे जहाँ जहाँ जैनेन्द्रका उल्लेख हो, वहाँ वहाँ प्रदक्षिणा कालको एक गुरुवर्ष और उसके लगभग १२ व शब्दार्णव-चन्द्रिकाका मृत्रपट समझना चाहिए। सूत्रोंके गुरुमास कहते थे । खुर्थसानिध्यके कारण गुरु वर्षमें नम्मर भी उनके अनुसार दिय गये हैं। कुछ दिन अस्त रहकर जिस नक्षत्रमें उदय होता है, उसी * 'हस्तादेय' हस्तेनादानेऽनुदि वाचि चिनो वन भवत्य. नक्षत्र के नाम गुरुवपके मासोंके नाम रखे जाते थे । ये तेयं । सुपाचायः । हस्तादेय इति किं : पु:यंप्रदयं गुरुके माय वस्तुतः सैर वषाके नाम हैं, इस कारण इन्हें करोति तरुणिग्नरे । अनुद्रीति किं ? फलाञ्चयः । अस्तय चत्र संवत्सर, वैशाख संवत्सर आदि कहते थे । इस पद्धति- इति किं ? फलप्रनयं करोति चौर्यण (शब्दार्णव-चन्द्रिका को अच्छी तरह समझनेके लिए स्त्रीय पं० शंकर यालकृष्ण दीक्षितसा भारतीय ज्योतिःशास्त्राचा इतिहास" और : पाणिनिमा मूत्र इस प्रकार है "इस्तादान चरस्तये" डॉ० पलाटके 'गुप्त इनिप्शन्म' में इन्हीं दीक्षित महाग- (2-2-.) यता अँगरेजी निबन्ध पहना चाहिए। सूत्र है ४-१-१०२ । तरह का है:- भागको -- संक २] जनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी . .... ..... ... गया है। यह पद्धति प्राचीन गुप्त और कदम्यवंशी जनेन्द्रोक्त अन्य आचार्य । राजाओंके समय नक प्रचलित थी, इसके पाणिनि आदि वैयाकरणोंने जिस तरह अपनेसे कई प्रमाण पाये गये हैं। प्राचीन गुनांके शक सं. पहलेके वैयाकरणोंके नामांका उलंग्ख किया है उसी वत् ३५७ ४५० [ वि० सं० १५० से ५८५] तक तरह जैनेन्द्रसूत्रोंमें भी नीचे लिख आचार्योंका तक के पाँच ताम्रपत्र पाये गये हैं। उनमें चैत्रादि उल्लेख मिलता है:- संवत्सरीका उपयोग किया गया है और इन्हीं गुप्तांके समकालीन कदम्बवंशी राजा मृगेशवाफे ताम्रपत्र में -गद् भूतवले । ३.४.८३ | भी पोप संवत्सरका उल्लेख है । इससे मालूम होता २-गुणे श्रीदत्तस्यास्त्रियाम । १-४-३४ । ३-रुपिमृजां यशोभद्रस्य । २-१-९९ । है कि इस बृहस्पति संवत्सरका सबसे पहले उल्लं- ४-रात्रेः कतिप्रभाचन्द्रस्य । ५-३-१८ । ख करनेवाले जैनेन्द्रव्याकरणक कत्ती है और इस. ५-वत्तेः सिद्धसेनस्य । ५-१-७॥ लिए जैनेन्द्रको रचना' का समय ईस्वी सनकी ६-चतुष्टयं समन्तभद्रस्य । ' -४-१५० | पाँचवी शताब्दिके उत्तरार्ध (विक्रमकी छठी शता- दीका पूर्वार्ध) के लगभग होना चाहिए । यह तो जहां तक हम जानते हैं, उक्त छहाँ आचार्य ग्रन्थका तो हो गये हैं, परन्तु उन्होंने कोई व्या. पहले ही बताया जा चुका है कि जनेन्द्रकी रचना ईश्वरकृष्णके पहले अर्थात वि० सं० ५०७ के करण ग्रन्थ भी बनाये होंगे, ऐसा विश्वास नहीं पहले नहीं हो सकती, क्यों कि उसमें वागण्यका होता । जान पडता है, पूर्वक्ति आचार्योंके ग्रन्थों में जो उल्लेख है। जुदा जुदा प्रकारके शब्दप्रयोग पाये जाते होंगे उन्हीं को व्याकरणसिद्ध करने के लिए ये सब पाटक महाशयने इन प्रमाणोंमें 'हस्तादेग्रेनु- सूत्र रचे गये हैं । इन आचामिसे जिन जिनके शरद्वच्छनकद ग्निशमकृष्णरणात्, प्रन्थ उपलब्ध है, उनके शब्दप्रयोगांकी बारीकी- भृगुवत्लामायणपगणब्राह्मणवासिष्टे' और 'गुरू- के साथ जांच करनेसे इस वातका निर्णय हो दयाद् भायुक्तेन्दे' सूत्र दिये हैं, परन्तु ये तीनों ही सकता है । आशा है कि जैन समाजकै पण्डित जैनेन्द्रके असली सूत्रपाठमें इन रूपोमें नहीं हैं, गण इस विषयमें परिश्रम करनेकी कृपा करेंगे । अतएव इनसे जनेन्द्रका समय किसी तरह भी नि- १ भूतबलि । इनका परिचय इन्द्रनन्दिकृत श्चित नहीं हो सकता है श्रुतावतार कथाम दिया गया है । भगवान महा- हाँ, यदि जैनेन्द्रको कोई स्वयं देवनन्दिकृत वृत्ति वीरके निर्वाणके १८३ वर्ष बाद तक अंगशानकी उपलब्ध हो जाय, जिसके कि होनेका हमने अनु- प्रवृत्ति रही। इसके बाद विनयधर, श्रीदत्त, शिव- मान किया है. और उसमें इन सूत्रांक विषयको दत्त, और अहंदत्त नामके चार आरातीय मुनि हुए प्रतिपादन करनेवाले बार्तिक आदि मिल जायं-मि- जिन्हें अंग और पूर्वके अंशांका ज्ञान था । इनके ल जानेकी संभावना भी बहुत है - तो अवश्य वाद अहवलि और माधनन्दि आचार्य हुए । इन्हें ही पाठक महाशयके ये प्रमाण न ही उपयोगी उन अंशोंक भी कुछ अंश झान रहा। इनके बाद सिद्ध होंगे। धरसेन आचार्य हुए । इन्होंने भूतबलि और पुप्पद- पाठक महाशयके इन प्रमाणोंके ठीक न होने न्त नामक दो मुनियोंको विधिपूर्वक अध्ययन कराया पर भी दर्शनसारके और मर्कराके ताम्रपत्रके प्रमा- और इन दोनोंने महाकर्मप्रकृतिप्राभृत या पट्खण्ड ण। यह बात लगभग निश्चित ही है कि नामक शास्त्रकी रचना की । यह प्रन्थ ३६ हजार जैनेन्द्र विक्रमकी छठी शताब्दीके प्रारंभ की श्लोक प्रमाण है। इसके प्रारंभका कुछ भाग पृष्प- रचना है। १ संभवतः यह ग्रन्थ मुढविद्री ( मंगलोर) के जैनभ. ण्डारमं मौजूद है। यस्तय चः', ८२ जैन साहित्य संशोध.. [ भाग १ b. .. -- दन्त आचार्यका और शेष भूतबालिका बनाया हुआ विदुषणांपु संसन्स यस्य नामापि कीर्तितस् । है। वीरनिर्वाणसंवत् ६८३ के बाद पूर्वोक्त सय आचार्य निखर्वयति तद् यशोभद्रः स पातु नः ॥ ४६ . क्रमसे हुए, या अक्रमसे; और उनके बीच में कितना इनके विषयमें और कोई उल्लेख नहीं मिला और कितना समय लगा, यह जाननेका कोई भी साधन न यही मालूम हुआ कि इनके बनाये हुए कौन नहीं है । यदि हम इनके बीचका समय २५० वर्ष कौन ग्रन्थ है। आदिपुराणके उक्त लोकसे तो वे मान ले तो भूतबलिका समय वीरनिर्वाण संवत् ९३३ तार्किक ही जान पड़ते हैं। (शक संवत् ३२८ वि० सं० ४६३ ) के लगभग ४ प्रमाचन्द्र । आदिपुराणमें न्याय कुमुदचन्द्रो. निश्चित होता है । और इस हिसावले वे पूज्यपाद दयफे कर्ता जिन प्रभाचन्द्रका स्मरण किया है, स्वामांसे कुछ ही पहले हुए हैं, ऐला अनुमान उनसे ये पृथा और पहलेके मालूम होते हैं । होता है। क्यों कि चन्द्रोदयके कर्ता अकलकाभट्टके समय में २ श्रीदत्त । विक्रमकी ९ वी शताब्दिके सुप्रसिद्ध हुए हैं, इसलिए उनका जिक्र जैनेन्द्र में नहीं हो लेखक विद्यानन्दने अपने तत्त्वार्थलोकवार्तिकमें सकता। मालूम नहीं, ये प्रभाचन्द्र किस ग्रन्थके श्रीदत्तके 'जल्पनिर्णय' नामक ग्रन्थका उल्लेख कर्ता हैं और कब हुए हैं। किया हैः- ५ सिद्धसेन । ये सिद्धसेन दिवाकरके नामले द्विप्रकार जगौ जल्पं तत्त्व-प्रातिभगोचरम् | प्रसिद्ध हैं । ये बड़े भारी तार्किक हुप हैं। स्वर्गीय त्रिषष्टेवादिना जता श्रीदत्तो जल्पनिर्णये ॥ डा० सतीशचन्द्र विद्याभूषणका खयाल था कि वि- इससे मालूम होता है कि ये ६३ वादियोंके क्रमकी सभाके 'क्षपणक ' नामक रत्न यही थे। जीतनेवाले बड़े भारी तार्किक थे । आदिपुराणक आदिपुराणमें इनका कवि, और प्रवादिगजकेसरी कर्ता जिनसेनमारने भी इनका स्मरण किया है कहकर और हरिवंशपुराणमें सूक्तियोंका कर्ता क- और इन्हें वादिगजोंका प्रभेदन करने के लिए सिंह हकर स्मरण किया है। न्यायावतार, सम्मतितर्क, बतलाया है:- कल्याणमन्दिरस्तोत्र और २० द्वानिशिकायें (स्तु. श्रीदत्ताय नमस्तस्मै तपः श्रादीप्तमूर्तये । तियां) इनकी उपलब्ध हैं । यदि विक्रमका समय कण्ठीरवायितं येन प्रवादीमप्रभेदने ॥ ४५ ईसाकी छठी शताब्दी माना जाय-जैसा किप्रोमो- क्षमूलर आदिका मत है-तो सिद्धसेन इसी समय. वीरनिर्वाण संवत् ६८३ के बाद जो ४ आरातीय में हप है और लगभग यही समय जैनेन्द्र के वन- मुनि हुए हैं, उनमें भी एक का नाम श्रीदत्त है। नेका है। * उनका समय वीरनिर्वाण सं० ७०० ( शक सं० ६ समन्तभद्र । दिगम्बर सम्प्रदायके ये बहुत- ९५-वि० सं० २३० ) के लगभग होता है। यह भी संभव है कि आरातीय श्रीदत्त दूसरे हो और जल्प कारीन इनका उल्लेख किया है। ये बड़े भारी ता- प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं। बीसौ दिगम्बर ग्रन्थ- निर्णयके कर्ता दूसरे । तथा इन्हीं दूसरेका उल्लेख और कवि थे। इनका गृहस्थावस्थाका नाम जैनेन्द्र में किया गया हो। वर्म था । ये फणिमण्डल (?) के उरगपुर-नरेशके यशोभद्र । आदिपुराणमें संभवतः इन्हीं यशोभद्रका स्मरण करते हुए कहा है- * सिद्धसेन ईश्वांकी ६ ठी शताब्दीसे बहुत पहले हो गगे है। क्यों कि विक्रमकी ५ वीं शताब्दीमें हो जाने वाले १ त्रैलोक्यसारके कर्ता 'नेमिचन्द्र ' ने और हरिवंश- आचार्य मलवादीने सिद्धसेनके सम्मतितर्क ऊपर टीका पुराणके कतीने वार निर्वाणस ६०५ वर्ष याद शककाल लिखी थी । हमारे विचारसे सिद्धसेन विक्रमको प्रथम शना- माना है। उन्हींकी गणनाके अनुसार हमने यहाँ शक संवत् ब्दिमें हुए हैं। दिया है। संपादक-जै.सा.सं. । - अंक २] ८३ in-~~~~~~~~-~-~- ~~ -~~~- -~-~~-~~~~~~~~~~r.in आय- जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी पुत्र थे। इनके बनाये हुए देवागम (आप्तमीमांसा), सा प्रन्थ है और सुन्दर उपदेशपूर्ण है। ५० आशा- युक्त्यनुशासन, वृहत्स्वयंभूस्तोत्र, जिन शतक धरने इसपर एक संस्कृत निबन्ध लिखा है। और रत्नकरण्ड श्रावकाचार: ग्रन्थ छप चुके हैं। इनके सिवाय कहा जाता है कि इनके बनाये हरिवंशपुराणमें इनके एक 'जीवसिद्धि' नामक हुए और भी कई ग्रन्थ हैं। सर्वार्थसिद्धिकी भूमिका ग्रन्धका उल्लेख मिलता है। पट्खण्डसूत्रोंके पहले श्रीयुत पं० कलापानिटने लिखा है कि चिकित्सा- पांच खण्डोंपर भी इनकी बनाई हुई ४८ हजार शास्त्रपर भी पूज्यपादस्वामीके दो ग्रन्थ उपलब्ध होते श्लोक प्रमाण संस्कृत टीकाका उल्लेख मिला है। हैं, जिनमें से एक चिकित्साका और दूसरे में औषधी आवश्यकसूत्रकी मलयगिरिकृत टीकाम तथा धान्योंका गुणनिरूपण है । परन्तु पण्डितश्री स्तुितिकारोऽप्याह ' कहकर इनके स्वयंभू स्तोत्रका महाशयने न तो उक्त ग्रन्थोका नाम ही लिखा है एक पद्य उद्धृत किया है। इससे मालूम होता है कि और न यही लिखनेकी कृपा की है कि वे कहाँ उप. ये सिद्धसेनसे भी पहले के ग्रन्धकता है। क्योंकि लब्ध हैं । शुभचन्द्राचार्यकृत ज्ञानार्णवके नीचे सिद्धसेन भी स्तुतिकारके नामसे प्रसिद्ध लिखे श्लोकके 'काय' शब्दसे भी यह बात अभी तक इन दोनों ही आचार्योका समय निर्मात ध्वनित होती है कि पूज्यपादस्वामीका कोई चि. नहीं हुआ है। कित्सा ग्रन्थ है :- अपार्धन्ति यद्वाचः क.यवाञ्चित्तसंभवम् । पूज्यपादके अन्य ग्रन्थ । कलङ्कम गिनां सोय देवनन्दी नमस्यते ।। जैनेन्द्र के सिवाय पूज्यपादस्वामीके बनाये हुए पूनेके भाण्डारकर रिसर्च इन्टिट्यूटमें 'पूज्य- अबतक केवल तीन ही ग्रन्थ उपलब्ध हुए हैं और पादकृत वैयक' नामका एक ग्रन्थ है । यह आधानि- 'ये तीनों ही छप चुके हैं:- क कनडीमें लिखा हुआ कनडी भाषाका ग्रन्थ है। १-सर्वार्थसिद्धि, । दिगम्बर सम्प्रदायमै आचार्य और न यही मालूम होता है कि यह उनका बना. पर इसमें न तो कहीं पूज्यपादका उल्लेख है उमास्वातिकृत तत्त्वार्थसूत्रकी यह सबसे पहली या हुआ होगा। टीका है। अन्य सय टीकायें इसके बादकी हैं विजयनगरके हरिहरराजाके समयमें एक मंग- और वे सब इसको आगे रख कर लिखी राज नामका कनडी कवि हुआ है । वि० सं० गई है। १४१६ के लगभग उसका अस्तित्व काल है। २-समाधितंत्र । इसमें लगभग १०० श्लोक हैं, स्थावर विर्षोंकी प्रक्रिया और चिकित्सापर उस- इस लिए इसे समाधिशतक भी कहते हैं । अध्या- ने खगेन्द्रमणिदर्पण नामका एक ग्रन्थ लिखा है। त्मका बहुत ही गंभीर और तात्त्विक ग्रन्थ है । इस इसमें वह आपको पूज्यपादको शिष्य बतलाता है पर कई संस्कृत टीकाय लिखी गई हैं। और यह भी लिखता है कि यह ग्रन्थ पूज्यपादके ३-इष्टोपदेश। यह केवल ५१श्लोकप्रमाण छोटा. वैद्यक ग्रन्थसे संगृहीत है । इससे मालूम होता है कि पूज्यपाद नामके एक विद्वान् विक्रमकी तेरहवीं १ लेखक महाशयके इस कथनमें कि, समन्तभद्र सिद्धसेनसे शताब्दिमें भी हो गये हैं और लोग भ्रमवश उन्हीं- वैद्यक ग्रन्थको जैनेन्द्र के कर्ताका ही बनाया हुआ भी पहले हुए है, कोई प्रमाण नहीं है । हमारे विचारसे सिद्धसेन समन्तभद्रके पुरोगामी है। इस विषय के विशेष समझकर उल्लेख कर दिया करते हैं। विचार जानने के लिये, इस पत्रके प्रथम अंक्रमें प्रकाशित वृत्तविलास कविकी कनडी धर्मपरीक्षाका जो 'सिद्धसेन दिवाकर और स्वामी समन्तभद्र' शीर्षक हमा- SE और भी उल्लेख है, एक पाणिनिव्याक- पद्य पहले उद्धृत किया जा चुका हैं उसमें दो प्र. रा लेख देखना चाहिए। संपादक-जै. सा.सं. : १ नं. १०६६, सन् १८८७.९१ की रिपोर्ट। - . , जैन साहित्य संशोधक [ भाग v. 44... . रणको टीकाका और दूसरा यंत्रमंत्रविषयक सत्यताकी जरा भी परवा न करनेवाले और शानका । पूज्यपादद्वारा पाणिनिकी रीकाकालिखा लाम्प्रदायिकताके मोहमें बहनेवाले लेखक किस- जाना असंभव नहीं है; परन्तु साथ ही वृत्तविलास तरह तिलका ताड बनाते हैं। को पूज्यपादके जिनेन्द्रबुद्धि नामसे भी यह भ्रम हो इस चरितको चन्द्रग्य नामक कविन दुःषम गया हो तो आश्चर्य नहीं। क्यों कि पाणिनिकी कालके परिधावी संवत्सरकी आश्विन शुक्ल५, शुक्र- काशिका वृत्तिपर जो न्यास है उसके कताका भी वार. तुलालग्नमें समाप्त किया है । यह ऋवि कर्ना- नाम 'जिनेन्द्रबुद्धि हैं। इस नामलाम्यसे यह समझ क देशके मलयनगरकी ब्राह्मणगली' का रहने लिया जा सकता है कि पूज्यपादने भी पाणिनिकी वाला था। वत्सगोत्री और सूर्यवंशी ब्राह्मण वम्मणाके टीका लिखी है । न्यासकार 'जिनेन्द्रबुद्धि' चास्त- दो पुत्र हुए सातप्पा हुब्ध ब्रह्मरस और विजयप्पा । वमें बौद्धभिक्षु थे और वे अपने नामके साथ 'श्री विजयप्पाके ब्रह्मरस और ब्रह्मरस के देवप्पा हुआ। बोधिसत्त्वदेशीयाचार्य ' इस बौद्ध एदीको लगाते इसी देवप्पाकी कुसुमम्मा नामक पुत्रीले कवि च- है। पूज्यपादके कनडी चरित लेखकने लिखा न्द्रय्य का जन्म हुआ था। है कि पाणिनि पूज्यपादके मामा थे और पाणिनिक चरितका लारांश यह हैः अधूरे अन्धको उन्होंने ही पूर्ण किया था; "कर्नाटक दशके 'कोले' नामक ग्रामके माधव- परन्तु इस समय ऐसी बातोपर विश्वास नहीं भट्ट नामक ब्राह्मण और श्रीदेवी ब्राह्मणीले पूज्य किया जा सकता। 'जैनामिषक ' नामक एक और अन्धका जि- पादका जन्म हुआ । ज्योतिषियोंने बालकको त्रिलो- कपड्य बतलाया, इस कारण उसका नाम पूज्यपाद जैनेन्द्र निजशन्दभागमतुलं आदि श्लो- रक्सा गया। माधवभट्टने अपनी स्त्रीके कहनेसे को किया गया है । यह लोक उपर पृष्ट ६५ में दिया जैनधर्म स्वीकार करलिया। भट्टजीके सालेकानाम जा चुका है। जहां तक हमारा खयाल है जैनाभि- पाणिनि था, उसे भी उन्होंने जैनी बननेको कहा, षेक और यंत्रमंत्रविषयक प्रन्थ भी अन्य किसी परन्तु प्रतिष्टाके खयालले.वह जैनी न होकर मुडी- पूज्यपादके बनाये हुए होंगे और भ्रमसे इनके गुंडग्राममें वैष्णव संन्यासी हो गया। पूज्यपादकी समझ लिये गये होंगे। कमलिनी नामक छोटी बहिन हुई, यह गुणभट्टको कनडी पूज्यपादचरितमें पूज्यपादके बनाये हुए व्याही गई । गुण भट्टको उससे नागार्जुन नामक अहमतिष्ठालक्षण और शान्त्यष्टक नाम स्तोत्रका पुत्र हुआ। भी जिकर है। पूज्यपादने एक बगीचे में एक सांपके मुंहमें फंसे पूज्यपाद-चरित। हुए मेंडकको देखा । इससे उन्हें वैराग्य हो गया अन्य बडे बडे आचायाँके समान पूज्यपादके और वे जैन साधु बन गये । जीवनसम्बन्धी घटनाओस भी हम अपरिचित पाणिनि अपना व्याकरण रच रहे थे । वह पूरा हैं। उनके जाननेका कोई साधन भी नहीं है। लि. न होने पाया था कि उन्होंने अपना मरणकाल वाय इसके कि वे एक समर्थ आचार्य थे और निकट आया जान लिया। इससे उन्होंने पूज्यपाद हमारे उपकारके लिए अनेक अन्य वनाकर रख ले जाकर कहा कि इसे आप पूरा कर दीजिए। गये हैं, उनका कोई इतिहास नहीं है। आगे हम उन्होंने पूरा करना स्वीकार कर लिया। एक कनड़ी भाषाके पूज्यपाद-चरितका सारांश पाणिनि दुर्थानवश मरकर सर्प हुए। एक बार देते हैं, जिससे उन लोगोंका मनोरंजन अवश्य उसने पूज्यपादको देखकर फूत्कार किया, इसपर होगा, जो अपने प्रत्येक महापुरुपका जीवनचरित- पूज्यपादन कहा, विश्वास रक्खो, मैं तुम्हारे व्या- चाहे वह कैसा ही हो-पढ़ने के लिए उत्कंठित रहते करणको पूरा कर दृगा। इसके बाद उन्होंने पाणि है। विद्यान पाठदा इससे यह समझा सकेंगे कि नि व्याकरणको पूरा कर दिया।

अंक २] ...A- . - जैनेन्द्र व्याकरण और आचार्य देवनन्दी ८५ इसके पहले वे जैनेन्द्र व्याकरण, अहत्प्रतिष्टाल• यह लेख शायद ही इस रूपमें पाठकोंके सम्मुख क्षण, और वैद्यक ज्योतिप आदिक कई ग्रन्थ रच उपस्थित हो सकता। चुके थे। पना-भाद्रकृष्ण ६ सं०१९७७ विक्रमीय गुंणभट्टके मर जानेसे नागार्जुन अतिशय दरिद्री हो गया। पूज्यपादने उसे पन्नावतीका एक मंत्र परिशिष्ट । दिया और सिद्ध करनेकी विधि बतला दी। पद्मा- ‘वतीने नागार्जुनके निकट प्रकट होकर उसे सिद्ध- [ भगवद्वाग्वादिनीका विशेप परिचय ] रसकी वनस्पति बतला दी। इसके प्रारंभमें पहले 'लक्ष्मीरात्यन्तिको यस्य इस सिद्धरसले नागार्जुन सोना बनाने लगा। . आदि प्रसिद्ध मंगलाचरणका श्लोक लिखा गया उसके गर्वका परिहार करने के लिए पूज्यपादने एक और उसकी जगह यह श्लोक और उत्थानिका था। परन्तु पीछेसे उसपर हरताल फेर दी गई है मामूली वनस्पतिसे कई बडे सिद्धरस बना दिया । नागार्जुन जब पर्वतोंकों सुवर्णमय बनाने लगा, तब लिख दी गई है- ओ नमः पार्थाय। धरणेन्द्र-पद्मावतीने उसे रोका और जिनालय बनानेको कहा । तदनुसार उसने एक जिनालय त्वरितमहिमदूतामंत्रितेनाद्भुतात्मा, बनवाया और पार्श्वनाथकी प्रतिमा स्थापित की। त्रिपममपि मघोना पृच्छता शब्दशास्त्रम् । पूज्यपाद पैरों में गगनगामी लेप लगाकर विदेह- श्रुतमदरिपुरासीद् वादिवृन्दापणीनां परमपदपटुर्यः स श्रिये वीरदेवः ।। क्षेत्रको जाया करते थे। उस समय उनके शिष्य अष्टवार्षिकोऽपि तथाविधभक्ताभ्यर्थनाप्रणुनः स भगवा. वजनन्दिने अपने साथियोंसे झगडा करके द्राविड निदं प्राह-सिद्धिरनेकान्तात् । १-१-१॥ संघकी स्थापना की। इसके बाद सूत्रपाठ शुरू हो गया है। पहले प- नागार्जुन अनेक मंत्र तंत्र तथा रसादि सिद्ध करके के ऊपर मार्जिनमें एक टिप्पणी इस प्रकार दी है बहुत ही प्रसिद्ध हो गया । एकबार दो सुन्दरी. जिसमें पाणिनि आदि व्याकरणोंको अप्रामाणिक स्त्रियां आई जी गाने नाचने में कुशल थीं । नागार्जु- उहराया है। न उनपर मोहित हो गया । वे वही रहने लगी और प्रमाणपदव्यामुपेक्षणीयानि पाणिन्यादिप्रतिसूत्राणि एक दिन अवसर पाकर उसे मारकर और उसकी स्यात्कारवादिनदूरत्वात्सरिव्राजकादिभापिनवत् । अप्रमाणा- रसगुटिका लेकर चलती बनी। निच कपोलकल्पनामलिनानि हीनमातृकत्यात्तद्वदेव । पृज्यपाद मुनि बहुत समयतक योगाभ्यास करते इसके बाद प्रत्येक पादके अन्त में और आदिम रहे । फिर एक देवके विमानमें बैठकर उन्होंने इस प्रकार लिखा है जिससे इस सूत्रपाठके भग; अनेराती की यात्रा की । मार्गम एक जगह उन- चपणीत होने में कोई सन्देह वाकी न रह जाय- की दृष्टि नष्ट हो गई थी, सो उन्होंने एक शान्त्यष्ट ." इति भगवद्वाग्वादिन्यां प्रथमाध्यायस्य द्वितीयः पादः। क बनाकर ज्यों की त्या कर ली। इसके बाद उन्होंने ऑनमः पाइर्वाय । स भगवानिदं प्राह । अपने प्राममें आकर समाधिपूर्वक मरण किया।" सर्वत्र ‘नमः पार्थाय' लिखना भी हेतुपूर्वक है। इस लेखक लिखनेमें हमें श्रद्धेय मुनि जिनवि- जब ग्रन्थकर्ता स्वयं महावीर भगवान् हैं तब उनके जयजी और पं० बेहचरदास जीवराजजीसे बहुत प्रत्यम उनसे पहले के तीर्थकर पार्श्वनाथको ही नमः अधिक सहायता मिली है। इस लिए. हम उक्त स्कार किया जा सकता है । देन्निए, कितनी दूरत- दोनों सजनांके प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। कका विचार किया गया है। मुनिमहोदयकी कृपासे हमको जो इस लेख सम्ब- आगे अध्याय २ पाद के ' सहवहचल्यापतेरिः' म्धी सामग्री प्राप्त हुई है, यह याद न मिलती तो (६४) सूत्रपर नि प्रकार टिप्पणी दी है और इससे .

" । ८६ जैन साहित्य संशोधक [भाग १ सिद्ध किया है कि यदि यह व्याकरण भगवत्कृत इसी तरह ४-३७ (वेतेः सिद्धसेनस्य ) सूत्र न हो तो फिर सिद्धहमके अमुक सूत्रकी उत्पत्ति पर लिखा है- नहीं बैठ सकती!- "वेतेः सिद्धसनस्य, चतुष्टयं ममंतभद्रस्य प्रक्षेप'ऽर्वाच्यता " इदं शब्दानुशासनं भगकर्तृकमेव भवति । 'उबद्द- स्फुटत्वात् , रात्रंः प्रभाचन्द्रस्य वदिति वोटिकनिमिरोप. ल्यापतोरावरूजनमेः किलिंदचवत्-सासहिवाबहिचा- लक्षणे । चालपापति, सहिचकिदधिजहिनीति सिद्धहेमजुत्रस्या अन्तम ५-४-६५ (श छोम) सूनपर एक टि- न्यथानुपपत्तेः । सर्ववर्मपाणिन्योन्तु 'आहवापयालोपिना प्पणी दी है जिसमें पाणिनि आदि वैयाकरणोंकी अ. विच १, आगमहनजनः किकिनी लिट् चेति ।।" सर्वज्ञता सिद्ध की गई है- इसके बाद ३२.२२ सूत्रपर इस प्रकार टिप्प प्रयोगाशातना मामृदनादिसिद्धा हि प्रयोगाः । ज्ञानिना णी दी है- "कथं न छ: प्रारभन्तेदादि । क्षेत्रादिनियापि शिक्षाविशेषाः। न केवलं ने प्रकादयंते न तु नियंत इ.ते । अतएव शहोटीति पाणिनीयसूत्रं वर्गप्रथमेभ्यः शकारः स्वरयवरपरः शका इछ. कुमारभन्दः प्राच्यानामाश्विन मासवान् । कारं नवेति सर्ववर्मक ककालाएक सत्रानुसारि। अतएव पाणि- मैथुनं तु मियतंत्रे वात्रक मधुसपियः । न्यादयोऽसर्वज्ञा इति सिद्ध । अतएव तेषां तत्वत आप्तत्यामा- इत्यायन्यथानुपपत्तरिति टिकतिनिरोपरक्षणम् । इसके बाद ३-४-४२ सूत्र (स्तेयाहस्य ) पर फिर वदति सिद्धिः । नभ्यः प्रभृतिनिसने निर्जरसमुंग्या यदि यु- क्षिरत मस्कारणव मारुतमारते न तु सारस्वतवाग्देव्या । एक टिप्पणी हैं। देखिए- इदं शब्दानुशासनं भगवत्कर्तृकमेव भवति । अर्हत. शक्लोटिप्रमः सूत्रस्तच्छश्रुप्रभृति दादर्शी कालापाचुपजीवी स्तोन्त च १. महाय हा २, साखेशणग्द्ताद्यः ३, स्तनान- पाणिनि राजिनत्वं प्रति नान्यतः । लुकू वे ४, ति चिद्धनसूत्रान्यथानुपप: । पाणिन्यादी जहां सूत्रपाठ समाप्त होता है, वहां लिखा है:- स्वाहत्यसन्दं प्रति सूत्राभावात् । कयं सरस्वतीकंठाभरणे इल्याल्यद्भगवानहन्त्वेन्द्रस्त मदं वहन् । तदाप्तिः ? ऐन्द्रानुसागदहतशब्दतश्रति पश्य । वाश्विक्त्राजचन्द्र लमंदिराभिमुखोऽभवत् ।। फिर३-१-४० सूत्र (रानः प्रभाचन्द्रस्य । पर एक टिप्पणी है। इसमें योरिका या दिगम्यरियाँ. आगे ग्रन्ध प्रशस्ति देखिए- सकलकलाकौशलपेशलशीलशालिनं पा. का सत्कार किया गया है. याय पार्वपाश्र्वाय । स्वन्ति तन्प्रयचनमुधासमुद्रलहरीस्नायि- "इदं शब्दानुशासनं भगवाकर्तृकमेव भवति संत्र प्रभाच. यो महामुनिभ्यः । परिस्मान बजनेन्द्रं नाम महाव्याकरणं । वस्य सूत्रस्य प्रक्षेपता स्फुरत्वात् । अतो वोटिकसिमिर.प लक्षणे- तदिदं यत्स्वयं श्रीवरिप्रभुमघोने पृच्छते प्रकाशयांचकार । सपा- देवनन्दिमतां मोहः प्रशंपरजमोरि चत् । दलक्षव्याख्यानकपरमतमदांधकारापहारपरममिति । नमः चिराय भवता राप्रभारदस्य जीव्यता ।। श्रीमवर परमेश्वर पादप्रमादविशदस्याद्वादनयसमुपासनगुणको- पंचत्तरः कः स्वानासीः प्रमेंदो नग्न यस्य यः(१)! टिमकोटिकगणाविर्भूतचिद्विभूति विमलमदचांदकुलविलवृहत्त- विस्मयो रमयः शिट्या न त चेवनन्दिनामीत ।। पोनिगमनिर्गतनागपुरीयस्वच्छगच्छसमुत्थमुत्सविपार्श्वचंद्रशा- विक्रमातुखयुगाब्दे ४०६ देवनन्दी, ततो गुणनोंद-कुमा- खासुखारुतसुरुतिवररामेंदूपाध्यायचाचरणारविंदरजोराजी- नंदि-लोकचंद्रानंतर भनिरयुगाब्द प्रथमः प्रभावं इनि मधुकरानुकरवाचकपदवीपवित्रिताक्षयचंद्रवरणेभ्यः ससुधी बौटिके।" रक्तचंद्रम् । श्रीवारात २२६७ विक्रमपानु सं. १७९५ १ यह बोटिकमततिमिरोपलक्षण' नानका कोई अन्य नपाविन्याय लिखितं चिरं नंद्यान !" फाल्गुनभित्रयोदशीभीम तक्षकाल्यपरस्थन रत्नर्षिगा दर्श- है और संभवतः इसी वाग्वादिनांके कताका बनाया हुआ होगा। इसका पता लगानेकी वही जरुरत है । इससे दि. ग्रन्धक पहले पत्रकी खाली पीठसर भी कुछ गम्बर और त्रेतावर सम्प्रदायसन्धी मने बातों पर टिप्पणियां हैं और उनमें अधिकांश वे ही हैं जो प्रकाश पडेगा। उपर दी जा चुकी हैं। शेष इस प्रकार "ओं नमः अंक २] जैनेन्द्र ब्याकरण और आचार्य देवनन्दी ८७ .. आं नमः पाश्वाय। अनेन्द्रमन्द्रतः सिद्धहमतो जयहमवत् । प्रत्यंत दूरत्वान्नान्यतामेतुमर्हति । क इंद्रधंद्रः काशिरुस्नापिशली शाकटायनः । पाणिन्यमरजिनंद्रा जयंत्यष्टा हिं शाब्दिकाः ।। इति ? चतुर्थी तद्धितानु लक्षणात् । यदिदाय जिनद्रण कोमारेपि निरूपितं। ऐद्र जैनेंद्रमिति तत्पाहुः शब्दानुशासनं । यदावश्यकनियुक्ति:- अह तं अम्मापिअरो जाणित्ता अहियअहवास तु । कयको अलंकारं लेहायरिअस्स उवणिति ।। सको अ तस्समक्खं भयवंतं आसणे निवेसित्ता। सद्द-सलक्ख पुच्छे वागरणं अवयवा इंदं ।। इति ॥ तदवयवाः केचन उपाध्यायेन गृहीताः । ततश्चन्द्र व्याकरण संजातमिात हरिभद्रः । यत्तु देवनंदियोटिकं पूज्यपाद इतांच्छंतस्तद्गुरुकाः पूज्यपादस्य कक्षण। द्विमंधानकवेः काव्यं रत्नत्रयमपश्चिमम् । इति धनंजयके पात्तदयुक्तं । नेति चेत्कथं जैनद्रमिति । द्वादश- स्वरमध्यामति चेन्न । इतरोपपदस्यामागत् । जनकुमारसभव. वद्गतिरिति चेन्न । कुमारवद्रिं प्रति नेपाभावात् थारीतिकतत- द्वितभावाच्च । तहि लक्ष्मीरात्यंतिको यस्य निरवद्यावभासने । देवनंदितपूने नमस्तस्मै स्वयंभुवे । का गतिरिति चेत् । लक्ष्मीरात्यंतिकीपद्यमुपझेशस्य किंतरी । ऐद्रत्वयकि तत्वार्थ मोक्षमार्गस्ग पद्यवत् ॥' मियादयश्चत्प्रथमं यदि हैमेत्वपेक्ष्यते । कालापकादिन तथा पट्दैन्द्र महते कृतिः ॥ पूर्वत्र । मिप वस् मम् १ सिप् थस् थ २ तिप तस् झि ३ इडू वहि महि १ थस् आथां ध्वं २ त आताम् झङ् १ इति। आख्यातरीति प्रति देवराजे मिव्वस्मसो यः पितः रादितोदाः । जीवं प्रपन्नाहममात्थ विश्व तत्त्वादिम स्वां मतिमात्मनाथ ॥' तहि सिद्धसेनादिविशेषापि दुर्निवार इति चेन्न । जातामात्रोपि चिद्वाय प्रत्यात्मशरों सि यः । जनता का वराकीयं परात्मन् वीर तत्पुर ॥ इति चौटिकमततिमिरोपलक्षणस्य तुर्येवकाशे। इंद्रजिने- द्रो प्रन्युत्तरिणौ यदतो डे- टातद्धिततस्त्वमासमिविड्ढोरेयम- वैद्रं जैनेंद्र व्याकरणानां । सिद्धिमनेकांतादिच्छों भाxकxपाई त्यतथारीते हेमांगीकृतवर्मन्प्रक्षेपार्यविजेयचिरंजीया इति प्रसन्न चंद्रोत्पले (1)। १ इसके आगे ४-३-७ सूत्रको टिप्पणी जैसा ही लिखा है और फिर १-४-४० सूत्रको टिप्पणीके 'देवनन्दिमता' आदि दो श्लोक दिये हैं। २ इसके आगे ५-४-६५ सूत्रकी टिप्पणी दी है। -- जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ MAmrur . गंधहस्तिमहाभाप्यकी खोज और आप्तमीमांसा ( देवागम) की स्वतंत्रता । - [ लेखक - श्रीयुत बाबू जूगलकिशोरजी, मख्नार ! ) . कहा जाता है कि भगवान् श्रीसमन्तभद्राचार्यने हुआ था कि एना लायब्रेरीकी किती सूची परसे तत्वार्थसूत्र पर 'गंधहस्ति महाभाग्य नामके आस्ट्रिया देशक एक नगरकी लायब्रेरी में उक्त ग्रं. एक महान् ग्रंथकी रचना की थी, जिसकी श्लोक- थके अस्तित्वका पता चलता है। साथ ही, उसकी संख्याका परिमाण ८४ हजार है । यह ग्रंथ भारतके कापी करनेके लिय दो एक विद्वानोंको वहाँ भेजने किसी भी प्रसिद्ध मंडारने नहीं पाया जाता। वि. और खर्चक लिये कुछ चंदा एकत्र करनका प्रस्ताव द्वानोंकी इच्छा इस ग्रंथराजको देखनेके लिये बड़ी भी उपस्थित किया गया था । हम नहीं कह सकत ही प्रबल है । बम्बईके सुप्रसिद्ध सेठ श्रीमान् मा- कि ग्रंथके अस्तित्वका यह समाचार कहाँ तक णिकचंद हीराचदजी जे. पी. ने इस ग्रंथरत्नका सत्य है और इस वातका यथोचित निर्णय करनेके दर्शन मात्र करानेवालेके वास्ते ५०० रुपयेका न- लिये अभी तक क्या क्या प्रयत्न किया गया है। कद पारितोपिक भी निकाला था। परंतु खेद है परंतु इतना जरूर कहेंगे कि बहुतसे भंडारोकी कि कोई भी उनकी इस इच्छाको पूरा नहीं कर सूचियाँ भनेक स्थानों पर भ्रमपूर्ण पाई जाती हैं। सका और वे अपनी इस महती इच्छाको हृदयमें पूना लायनेरीकी ही सूत्री में सिद्धसेन दिवाकरके रखे हुए ही इस संसारसे कुच कर गये। निः- नामसे 'वादिगजगंधहस्तिन् ' नामके, एक महान् सन्देह जैनाचार्यों में स्वामी समन्तभद्रका आसन ग्रंथ का उल्लेख मिलता है जो यथार्थ नहीं है। वहाँ बहुन ही ऊँचा है । वे एक बडे ही अपूर्व और अ. इस नामका कोई ग्रंथ नहीं । यह नाम किसी दूसरे द्वितीय प्रतिभाशाली आचार्य हो गये हैं। उनका ही ग्रंथके स्थान पर गलतीस दर्ज हो गया है। शासन महावीर भगवानके शासनके तुल्य समझा ऐसी हालतमें केवल सचीके आधार पर आस्ट्रिया जाता है और उनकी आतमीमांसादिक कृतियोंको जैसे सुदूरदेशकी यात्राके लिये कुछ विद्वानोंका देखकर बडे बडे चादी विद्वान् चकित होते हैं। निकलना और भारी खर्च उठाना युक्तियुक्त प्रतीत ऐसी हालतम आचार्य महाराजकी इस महती कृ- नहीं होता । बेहतर तरीका, इसके लिये, यह हो तिके लिये जिसका मंगलाचरण ही आप्तमीमांसा सकता है कि वहाँके किसी प्रसिद्ध फोटोग्राफरके (देवागम ) कहा जाता है, यदि विद्वान् लोग उत्कं- द्वारा उक्त ग्रंथके आचंतके १०-२० पत्रीका फोटो ठिन और लालायित हो तो इसमें कुछ भी, आश्चर्य पहले मँगाया जाय और उन परसे यदि यह निर्णय और अस्वाभाविकता नहीं है । और यही कारण है हो जाय कि वास्तवमें यह ग्रंथ वही महाभाष्य कि अभी तक इस ग्रंथरल्नकी खोजका प्रयन्न जारी झंथ है तो फिर उसके शेष पत्रोंका भी फोटोआदि है और अब विदेशों में भी उसकी तलाश की जा मंगा लिया जाय । अस्तु । ग्रंयके वहाँ अस्तित्व वि. राहि है । हालमें कछ समाचारपत्रों द्वारा यह प्रकट षयमें अभी तक हमारा कोई विश्वास नहीं है। ।

संक 1 -- गम्घहस्तिमहामायकी खोज ८१ आस्ट्रियाके एक प्रसिद्ध नगरकी प्रसिद्ध लायब्रेरी है और 'देवागम' स्तोत्र उसका अदिम मगठ:- में उक्त ग्रंथ मौजूद हो और हर्मन जैकोबी जैसे चरण है। इन सब बानाकी उपलब्धि कहाँसे होती ग्वोजी विद्वानोको उसका पता नक न लगे, यह है-कौन प्राचीन आचार्यक्रे किम ग्रंथम इन मत्र बात कुछ समझ नहीं आती। हम इस ग्रंथके. बानाका पता चलता है ? यह दृम बात है कि विपयम यह बात भी बहुत ग्वटकती है कि 'आप्न कि 'आप्त आजकलक अच्छ अच्छे विद्वान-न सिर्फ जन मीमांसा ' अर्थात् 'देवागम ' शास्त्रको, जो कुल विद्वान बलिक सतीशचंद्र विद्याभव ग, भारती जने १४ लोकपरिमाण ह. इसका मंगलाचरण बनला अजैन बिहान भी-अपने अपने ग्रंथों नया लेंग्याम या जाता है । देवागम भारत के प्रायः सभी प्रसिद्ध इन सब बातोंका उल्लग्य करने हए व जाते हैं। मंडारोम पाया जाता है। उस पर अनेक टीका, परंतु ये सब उलंग्य एक दृसंरकी दयादग्यी हैं प- टिप्पण और भाप्य भी उपलब्ध हैं। अकलंकदेव- राक्षास उनका कोई सम्बन्ध नहीं और न वे जाँच की 'अशती' और विद्यानंद स्वार्माको अष्ट- नोल कर लिय गय हैं । इसी प्रकार के कछ उल्लंग्य सहत्री' उसीके भाग्य और महाभाष्य हैं। जिस पिछले भाषापंडिनांक भी पाये जाते हैं। टन मत्र ग्रंथका मंगलाचरण ही इतने महत्त्वको लिये हुए हो आधुनिक उल्लग्नास इस विषयका काई टोक निर्ण- वह शेष सपूर्ण ग्रंथ कितना महत्त्वशाली होगा य नहीं हो सकता । और न हम उन्हें पनी हालन- और विद्वानाने उसका कितना अधिक संग्रह किया में बिना किसी हनुकं प्रमाणकोटिम रात्र सम्न हैं। होगा. इसके बतलानेकी जमरत नहीं हैं। विन पा- हमारी रायम इन सब बाताके निर्णयार्य-विकल्पों- ठक सहजहीम इसका अनुमान कर सकते हैं। प- के समाधानार्थ अंतरंग खोजकी बहुत बड़ी जम्- रंतु तो भी ऐसे महान ग्रंथका भारतके किसी भं- रत है। हम सबसे पहले-विदशाम जानेस भी प- डारम अस्तित्व न होना, उसके शेष अंशॉपर टी- हल-अपने घरके साहित्यका गहरा टटोलना होगा; का-टिप्पणका मिलना तो दूर रहा उनके नामांकी तब कहीं हम यथार्थ निर्णय पर पहुँच सकेंगे। कहीं च तक न होना, यह सब कुछ कम आश्च- अस्नु | यमे डालनेवाली बात नहीं हैं। और इनपरस तरह इस विषय में हमने आजतक जो कुछ ग्वाज की तरहके विकला उत्पन्न होते है। यह खयाल पैदा है और उसके द्वाग हमें जो कुछ मालूम हो सका होता है कि क्या समन्तभद्रने गंधहस्तिमहाभाष्य' है उस हम अपने पाठकों के विचारार्थ और यथार्थ नामका कोई ग्रंथ बनाया ही नहीं और उनकी आ- निर्णयकी सहायतार्थ नीचे प्रकट करते हैं: नमीमांसा (देवागम) एक स्वतंत्र ग्रंथ है? यदि १-उमास्त्रानिक तत्त्वार्थमृत्रपर सवार्थसिद्धि, बनाया तो क्या वह पूग न हो सका और आतमी- राजवार्तिक. श्लोकवार्निक और शुनसागर्ग नामकी मांसा नक ही बनकर रह गया? यदि पूरा हो गया जो टीकाएँ उपलब्ध हैं उनम. जहाँ नक हमारे दे- था नो क्या फिर वन कर समान होते ही किसी खनमें आया कहीं भी 'गंधहस्ति महाभाप्य कारण विशपसे वह नष्ट हो गया ? यदि नष्ट नहीं नामोल्लग्न नहीं है और न इसी बानका कोई उल्लंग्स हुआ तो क्या फिर प्रचलित सिद्धांनांक विरुद्ध उ. पाया जाता है कि समन्तभने उक्त तत्त्वार्थसूत्रपर समें कुछ ऐसी बात थी जिनके कारण बादक - भाष्य लिया है।समन्नमद्रका अस्तित्वकाल इन सब चाया वासकर भट्टारकोंको उसे लुप्त करनकी ज- टीकाओं बननेस पहले माना जाता है। यदि इन रूरत पड़ी अथवा यादको उसके नष्ट हो जानका टीकाक रचयिता पूज्यपाद, अकलंक दव, विद्या- कोई दुसरा ही कारण हैं? इन सब विकल्पांको नन्द और श्रुनसागरके समयोम समन्तभद्रका उसी छोडकर अभी तक हमें यह भी मालूम नहीं हुआ सूत्रपर ऐसा कोई महत्त्वशाली भाप्य विद्यमान कि. १ समन्तभद्रने ‘गंधहस्तिमहाभाप्य' नामका होता तो उक्त टीकाकार किसी न किसी रूपमें इस कोई ग्रंथ बनाया है, २ वह उमास्यानिक तत्त्वार्थ वातको मूचित जरूर करने, ऐसा हृदय कहता है। सत्रका भाप्य है, ३ उसकी श्लोकसंख्या ८४ हजार परंतु उनके टीकाग्रन्यासे ऐसा कोई सूचना नहीं . का -- ...... जैन साहित्य संशोधक [ माग १ पाई जाती । प्रत्युत, श्रुतसागरसूरिने अपने अध्य "ब्रह्मनेमिदत्तने थाराधना कथाकोशमें सम- यन विषयक अयवा टीकाके आधार-विपयक जिन न्तभद्रकी एक कथा दी हैं परंतु उसमें उनके किसी प्रधान ग्रन्थों का उल्लेख अपनी टीकाकी संधियोंमें भी गन्धहस्तिमहाभाप्यके नामकी कोई उपलब्धि किया है उनमें साफ तौरस श्लोकवार्तिक और नहीं होती। सर्वार्थसिद्धिका ही नाम पाया जाता है. गन्धहस्ति ६- संस्कृत प्राकृतके और भी बहुतसे उपलब्ध महाभाष्यका नहीं। यदि ऐसा महान् ग्रन्थ उन्हें ग्रन्थ जो देखनम आये और जिनमें किसी न किसी उपलब्ध होता तो कोई वजह नहीं थी कि वे उस. रूपसे समन्तभद्रका स्मरण किया गया है उनमें का भी साथमै नामल्लेख न करते । भी हमें स्पष्टरुपले कहीं गन्धहस्ति महाभाष्यका २-आप्तमीमांसा ( देवागम ) पर, जिसे गन्ध- नाम नहीं मिला । और दुसरे अनेक विद्वानाले जो हस्तिमहाभाष्यका मंगलाचरण कहा जाता है, इस इस विषयमै दयाफ्त किया गया तो यही उत्तर समय तीन संस्कृत टीकाएँ उपलब्ध हैं। एक 'वसु- मिला कि गन्धहस्ति महाभाग्यका नाम किसी प्रा- नन्दिवृत्ति,'दूसरी अष्टशती'औरतीसग'अष्टसहनी' चीन ग्रन्थमें हमारे देखनेमें नहीं आया, अथवा हमें इनमेसे किसी भी टीका गन्धहस्ति महाभाप्यका कुछ याद नहीं है। कोई नाम नहीं है, और न यही कहीं सूचित किया ७-न्य नाममें 'महाभाप्य' शन्दसे यह है कि यह आप्तमीमांसा ग्रन्थ गन्धइस्ति महाभा- सूचित होता है कि इस ग्रन्थसे पहले भी तत्त्वार्थ- भाष्यका मंगलाचरण अथवा उसका प्राथमिक सूत्रपर कोई भाप्य विद्यमान था जिसकी अपेक्षा अंश है। किसी दूसरे ग्रन्थका एक अंश होनेको इसे 'महाभाष्य ' संज्ञा दी गई है। परंतु दिगम्बर हालतमे ऐसी सूचनाका किया जाना बहुत कुछ साहित्यसे इस बातका कहीं कोई पता नहीं चलता स्वाभाविक था। कि समन्तभद्रसे पहले भी तत्त्वार्थसूत्र पर कोई ३-श्रीइन्द्रनन्दि आचार्यके बनाये हुए 'श्रुता- माय विद्यमान था। रही श्वेताम्बर साहित्यकी वतार ' ग्रन्थमें भी समन्तभद्रके साथ, जहाँ कर्मः वात, सोश्वेताम्बर भई इस वातको मानते ही हैं प्राभृतपर उनकी ४८ हजार श्लोकपरिमाण एक कि उनका मौजूदा 'तत्त्वार्थाधिगम भाप्य' स्वयं सुन्दर संस्कृत टीकाका उल्लेख किया गया है वहाँ खाका बनाया हुआ है। परंतु उनकी इस गन्धहस्ति महाभाष्यका कोई नाम नहीं है। बल्कि मान्यताको स्वीकार करने के लिये अभी हम तैय्यार इतना प्रकट किया गया है कि वे दूसरे सिद्धान्त प्रन्य ( कयाय प्राभूत ) पर टीका लिखना चाहते नहीं हैं । उनका यह ग्रन्थ अभी विवादग्रस्त हैं। थे परंतु उनके एक सधी साधुने द्रव्यादिशुद्धि- उसके विषयमे हमें बहुत कुछ कहने लुननेकी जरू- कर प्रयत्नोंके अभावसे उन्हें वैसा करनेसे रोक बने हुए भाष्योंकी अपेक्ष बहुत बड़ा होने के कारण दिया। बहुत संभव है कि इसके बाद उनके द्वारा उसपीछेसे महाभाप्य संज्ञा दी गई है तो यह मा- कोई बड़ा ग्रन्थ न लिखा गया हो। ४-श्रवणबेल्गुलके जितने शिलालेखोंमें समन्त- नना पड़ेगा कि उसका असली नाम 'गन्धहस्ति भद्रका नाम आया है उनमेंस किसी भी आचार्य भाप्य' अथवा 'गन्धहात्त' ऐसा कुछ था ! महोदयंक नामके साथ 'रघहस्ति महाभाप्य का ८-ऊपर जिन ग्रन्थादिकोका उल्लेख किया गया उल्लख नहीं है । और न यही लिखा मिलता है कि है उनमें कहीं यह भी जिकर नहीं है कि समन्त- उन्होंने नत्त्वार्थसूत्र पर कोई टीका लिखी है। हाँ, भद्रने ८४ हजार श्लोकपारमाणका कोई अन्य रचा उनके शिष्य शिवकोटि आचार्यके सम्बन्ध में इतना है और इस लिये गन्धहस्ति महाभाग्यका जो परि कयन जरूर पाया जाता है कि उन्होंने तत्त्वार्थ- माण ८४ हजार कहा जाता है उसकी इस संख्याकी सूत्रको अलंकृत किया, अर्थात् उसपर टीका लिखी भी किसी प्राचीन साहित्यसे उपलब्धि नहीं होती। (देखा शिला लेल नं० १०५) ९-जव उमास्वातिके तत्त्वार्थसूत्रपर ८४ हजार क] .... .. ................... --....." गन्धहस्तिमहाभाध्यकी ग्वोज श्लोकपरिमाण एक महत्त्वशाली भान्य पहलेसे इतीयमाप्तमीमांसा विहिता हितमिच्छताम् । मौजद था तब यह बात समझमें नहीं आती कि सम्यग्मियोपदेशार्थविरोपप्रतिपत्तये ।। सार्थसिद्धि, राजवार्तिक और लोकवार्तिकके यह कारिका जिस ढंग और जिस शैलीसे लि- बननेकी जरुरत ही क्यों पैदा हुई 1 यदि यह कहा खी गई हैं, और इसमें जो कुछ कथन किया जाय किये ग्रन्ध गन्धहस्ति महामाप्यका सार गया ह उससे आतमीमांसाके एक विलकुल स्व लंकर संक्षेपचिवाले शिष्योंक वास्तं बनाये गये नन्त्र प्रन्य हानेकी बहुत ज्यादह सम्भावना पाई हैं तो यह बात भी कुछ बनती हुई मालूम नहीं जाती है। इस कारिकाको देते हुए बसुनन्दी आ. होती; क्यों किसी हालतमै श्रीपूज्यपाद, अकलं- चार्य अपनी टीकाम इस 'शास्त्रार्थीपसंहार- कदेव और विद्यानन्द स्वामी अपने अपने प्रन्याम कारिका' लिखत है, साथ ही इस कारिकाकी इस प्रकारका कोई उल्लम्म जसर करत जैसा कि टीकाक अन्तम ग्रंथकर्ता भी समंतभद्रका नाम आम तौर पर दूसरे आचार्याने किया है, जिन्होंने 'कृतकृत्यः नियूंढतत्त्वप्रतिज्ञः' इत्यादि विशे- अपने प्रन्याको दुसरे अन्योंके आधारपर. अथवा पोंके साथ देते हैं, जिससे मालम होता है कि उनका सार लेकर बनाया है। परंतु चूं कि इनमें इस कारिकाके साथ ग्राथकी समाप्ति हो गई, ऐसा कोई उल्लग्न नहीं है, इस लिंय यसर्वार्थसिद्धि ग्रंथके अन्तर्गत किसी ग्लास विषयकी नहीं। आदि ग्रन्थ गन्धहस्तिमहाभाप्यके आधारपर अथवा विद्यानंदस्वामी अष्टसहत्रीम, इस कारिकाके उसका सार लेकर बनाये गये हैं ऐसा माननको डाग 'प्रारब्धनिर्वहण '-(प्रारंभ किये हुए जी नहीं चाहना । इसके सिवाय अकलंकदेव और कार्यकी परिसमानि) आदिको सूचित करत विद्यानन्दकं भाप्य वार्तिकके ढंगले लिग्वं गये हैं। हुप टीकामें लिखते हैं- वे 'वार्तिक' कहलाते भी हैं। और वार्तिकॉम उक्त, " इति देवागमाठ्ये स्वोक्तपरिच्छेद शास्त्रं...! अनुक्क, दुरुक्त, तीनों प्रकारके अाकी विचारणा अत्र शवपरिसमाप्ती"...... और अभिव्यक्ति हा करती है, जिससे उनका इन शब्दोस भी प्रायः यही ध्वनित होता है परिमाण पहले भाप्यास प्रायः कुछ बढ़ जाता है। कि देवा मशान्न जो कि बातमीमांसाके शुरुमें जैस कि सर्वार्थसिद्धिस राजबार्तिकका और. राज- 'देवागम' शब्द होनसे उसीका दूसरा नाम हैं, वार्तिकस श्लोकवार्तिकका परिमाण बढा हुआ है। एक स्वतंत्र ग्रंथ है और उसकी समाप्ति इस ऐसी हालनमं यदि समन्तभद्रका ८४ हजार श्लोक कारिकाके साथ ही हो जाती है। श्रतः वह किसी संख्यावाला भाष्य पहलेस मौजद था तो अकलंक दुसरे ग्रंथका आदिम अंश अथवा मंगलाचरण देव और विद्यानन्दके वार्तिकोंका परिमाण उससे मालूम नहीं होता। जरूर कुछ बढ जाना चाहिये था। परन्तु बढना ११--अकलंकदेव अपनी अष्टशतीके आरंभम तो दुर रहा, वह उलटा उससे कई गुणा घट रहा लिखते हैं है। दोनों वार्तिकॉकी लोकसंख्याका परिमाण क्र. "येनाचार्यसमन्तभद्रगतिना तस्मै नमः संततम् । मशः १६और २० हजारसे अधिक नहीं ।ऐसी हाल- रुत्वा विवियत स्तयो भगवता देवागमस्तत्ततिः " ॥२२॥ तम कमसेकम अकलंक देव और विद्यानन्दके सम- वसुनन्दी आचार्य अपनी देवागमवृत्तिक यमें गन्धहस्ति महाभाग्यका अस्तित्त्व स्वीकार अन्तम सूचित करत हैं "श्रीसमंतभद्राचार्यस्य... करनेके लिये तो और भी हृदय नय्यार नहीं देवागमान्यायाः कृत संक्षेपभूतं विचरणं कृतम्...." होता। कर्नाटकदेशस्थ हुमचा जि० शिमोगाके १०-जिस आप्तमीमांसा (देवागम स्तोत्र ) को एक शिलालेखम निन्न आशयका उल्लेख * मि. गन्यदस्ति महाभाष्यका मंगलाचरण बतलाया *दनों जैनस्तिषी भाग ९, ९, पृष्ठ ४४५. जाता है उसकी आन्तिम कारिका इस प्रकार है- -- लता है:- ཙྩོ ཝiཝེཝཔ ཙྪསིཙྪ་ • जाए तो t. ས པསྶ བྱེ ཝ : ཨེia:ཝཱ་ཎ སྶ བ* : ལ… ཏ་ ཨཱ་ པཉྩf ཨཱg པཎསཱ ཙཡ་ཝཱ i པt : -:;ཝཀྵ: པཎ། རྨཙེ ཙེ ཎr ཡེ དེ ཨབྷཱཝ གནས་ པེ་ ང་ ༤ཝཔ དེ ༔ ཨགུ་པ… gi : ཝཱ་ ཙ་ ༤: 4ཎ: པཎ༌ཊོབྦས 3 ལྕེ ཏུམས ས ་ རྟེན པ • ཡཔཉྩ། བཏུས ཉྩཙས དེ33ཙནྟ་ཎནྡ་ tt : ! ༑ ཕམསཱིནཱནྟནྟནམུམྨཝེཝབྷིལ པ ཨུ་ཧོ༔ ༔ ན པུསྶསྐྱེ : it : } ནས ་པ ་ ཡྻ ལསྣ སྐྱེས ལྕེཎསཱཙཙཱ་ག་ཝེ་ པས་ སོ་ སྣངོས་ ས་ •• པད༌ས: ཝཱ་ཎ'' : ་ཏ't: rt – རེ ཎསrtམྨེ མཁན་པོ སླrཝཔrit༑ ཀོཝr ༤ :: པས པཱན་ trཎ “ ཝཱ t ཙt ༽ཡེ ཨུབྷ ཎ ཎཙ- grསr ལུ་ ཡ ག པས༑ ཨུཏཱ ཡྻེནུསཝ་མཱསྶ ཙནྡ - པནྟ: པའི་ ;སྶ “ སྶཡཱའི སྣཙ• པ ་ ཙང༌s:fཙེ fགེ་ལས' * ཙrs Ta sẽ ti vi SG khi thi HT- ལཱཎས ་པོ ཡ ཎ ཙཙེ ༌སམྨནྟེ བྱཱརཔསཾ ས་ལཱ ཙ ཚ ས་ ཎ ལཔཉྩེ་ r:༣ གrarr ཡུལཝ༌མ ;ལས ས མཱཎསr- ༑དེ་སྶཝནྟཙཎསཱཙ སུཔས་ མསྶ ཨཱ དྷཱ་ བཙrrསྶ ། ཝཔས། ཨ ཨཱ ངt ཙྩ \ fནསནོཝ མཎ། སེtr༑ པན ཎསཱr * ཨུ་ པཎཱ། ཨ ཀཀྐ '] སྔཙིབrངསྶཾ ཨཱ ཨཱ ཙཱཉྩེས། འགྱུར་བ ཙམཱནྟགསྨཨཱཧཱ: cཙ སr- ༔ པ ལེ་ པནྟབྷ ཝུའུ་ཎ ཙ བཀནཱནཾ གདེ ཙམྨེཡོ ཝ terསྨཔཱt :r མསྶཾ ཝ མཱ ཙེ '' སྤྱི སྶ འུ་* ཆུའིur ངཝཱ ཙིཏྟཾ ན ཨཱ་ strt Effདེ, སྐྱེ བཙྩཾ དུཏྟཀ་ ཙག་ iའི་ཀེ ཚཝ་དྷཱབ་ སྐྱེ་ ཙ པཀོ བྦེས ཝཨཱ༑ ཨཙཱརེསཨཱ' it r བྷཱ ཙྪཱ དེ་ཡནྟ ་ པོ སཝ་ སོ་་ ཝ ན པའི པཎ ཚེ… ལམ པ༌ མཝཡཱ ཡྻོ ཙྩ བྷཱུསྶ ཝ ཎ སུ་ ་་ བྷ ཎ བ༔ ter'' ''མུདྡྷཱཡོg, ཡེཝ ཙམ་ཀནྡརཱཎས ས པ ཙྪཨུ, ཙཛུམསྶཏྟཾ ཀཎ-དེནཙ པཱ༌ ༑ ༑སྙེ པཎ་ ''༌པེ༔ སྣོssry པཎ''t::ར༔ ༔ t པས ཧཱལ་ པས པ སུམོ་ ༧ ཙནོ པགསྦྱོར་ སྶ in:ས་ཨུཏྟབས་་་ e;, ཙ པ༌ ནམ། ཎཡ fཔས༔ ཡt l སྔ༌ཎཅུད༌st tཎཙམc; 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AM. जैन साहित्य संशोधक [ भाग शास्त्रीन भी उनकी इस बातको पास कर दिया है- है। और इसलिये प्रायः उन सबकी जाँच अनेक मागा अर्थात्, पुस्तकपर अपने द्वारा संशोधन किये जा. और अनेक पहलुओंसे होनी चाहिये । हरएक नेकी मुंहर लगाकर इस बातकी रजिस्टरी कर दी वातकी असलियतको खोज निकालनेके लिये गहरे है कि उक्त वाक्य गंधहास्तिमहाभाष्यका ही वाक्य अनुसंधानकी जरूरत है। तभी कुछ यथार्थ निर्णय है। परन्तु वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह वाक्य हो सकता है। राजवार्तिक भाष्यका वाक्य है। राजवार्तिकमें १५-ऊपर श्रुतावतारके आधारपर यह प्रकट 'अवग्रहावायधारणा' इस सूत्रपर जो १० वा किया गया है कि समन्तभद्रने 'कर्मप्रामृत' सि- वार्तिक दिया है उसीके भाष्यका यह एक वाक्य द्धान्तपर ४८ हजार श्लोक परिमाण एक सुन्दर है। इस वाक्यसे पहले जो वाक्य, यद्राजवा- संस्कृत टीका लिखी थी। यह टीका 'चूडामणि तिक शब्दोंके साथ. न्यायदीपिकाकी ऊपरकी नामकी एक कनडी टीकाके वाद, प्रायः उसे देख- पंक्तियों में उद्धृत पाया जाता है वह उक्त सूत्रका कर लिखी गई है। चूडामाणिकी श्लोकसंख्याका ९ वाँ वार्तिक है । दूसरे शब्दों में यों समझना चा- परिमाण ८३ हजार दिया है और वह उस कर्म- हिये कि ग्रन्थकर्ताने पहले राजवार्तिक भाष्यका प्राभृत तथा साथ ही,कपायप्राभृत नामक दोनों एक वार्तिक और फिर एक वार्तिकका भाष्यांश सिद्धान्तों पर लिखी गई थी। भट्टाकलंकदेवने, उद्धृत किया है, जिसको हमारे दोनों पंडित अपने कर्नाटक शब्दानुशासनमें इस चूडामाण- महाशयोने नहीं समझा और न समझनेकी कोशिश टीकाको 'तत्त्वार्थ महाशास्त्रकी व्याख्या' (तत्त्वा- ' की । उनके सामने मूल ग्रन्थम 'गन्धहस्ति महा- थमहाशास्त्रव्याख्यानस्य* ' चूडामण्यभिधानस्य साध्य ' ऐसा कोई नाम नहीं था और यह हम महाशास्त्रस्य...उपलभ्यमानत्वात् ।) लिखा है, बखूबी जानते है कि उन्होंने गन्धहस्ति महाभाष्य- जिसका आशय यह होता है कि कर्मप्राभूतादि का कभी दर्शन तक नहीं किया, जो उस परसे प्रन्थ भी तत्त्वार्थशास्त्र' कहलाते हैं और इसलिये जाँच करके ही ऐसे अर्थका किया जाना किसी कर्मप्राभृतपर लिखी हुई समन्तभद्रकी उक्ते टीका- प्रकारसे संभव समझ लिया जाता, तो भी उन्होंने भी तत्त्वार्थमहाशास्त्रको टीका कहलाती होगी। भाष्य ' का अर्थ 'गन्धहस्ति महाभाष्य ' करके चूँकि उमास्वातिका तत्त्वार्थसूत्र भी 'तत्त्वार्थशास्त्र' एक विद्वानके वाक्यको दूसरे विद्वानका बतला अथवा 'तत्त्वार्थमहाशास्त्र' कहलाता है, इसलिये दिया । यह प्रचलित प्रवादकी धुन नहीं तो और सम्भव है कि इस नामसाम्यकी वजहसे 'कर्म- क्या है ? इसी तरह एक दूसरी जगह भी तब्राण्यं' प्राभूत ' के टीकाकार श्रीसमन्तभद्रखामी किसी पदका अर्थ-"ऐसा ही गन्धहस्ति महाभाष्यमें समय उमास्वातिके तत्वार्थसूत्रके टीकाकार समझ भी कहा है-' किया गया है। इस उदाहरणसे लिये गये हों और इसी गलतीके कारण पीछेसे पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि प्रचलित प्रवादको अनेक प्रकारकी कल्पनाएँ उत्पन्न होकर उनका धुनमें कितना अर्थका अनर्थ हो जाया करना है वर्तमानरूप बनगया हो । यह भी सम्भव है, कि और उसके द्वारा उत्तरोत्तर संसारमें कितना भ्रम प्रबल और प्रखर तार्किक विद्वान होनेके कारण तथा मिथ्याभाव फैल जाना संभव है। शास्त्रों में 'गन्धहस्ति' यह समन्तभद्रका उपनाम अथवा प्रचलित प्रवादोसे अभिभूत ऐसे ही कुछ महाश- बिरुद रहा हो और इसके कारण ही उनकी उक्त योंकी कृपाले अथवा अनेक दन्तकथाओके किसी सिद्धांतटीकाका नाम गन्धहस्तिमहाभाष्य प्रसिद्ध न किसी रूपमै लिपिवद्ध हो जानेके कारण ही वहः तसे ऐतिहासिक तत्त्व आजकल चक्करमें पड़े * यहाँ अन्धका परिमाण ९६ हजार लोक दिया है जि- हए सकी बावत राइस साहवन, अपनी इंस्क्रिपन्स एट् श्रवण- * देखो राजवार्तिक, सनातनमन्धमाला कलकत्तका कलकत्तका बेलगोल ' नमक पुस्तकम, लिखा है कि इसमें ११ छपा हुआ। हजार श्लोक प्रन्यके संक्षिप्तसार अथवा सूचीके शामिल हैं। .

अंक २] ....... ............ . ...-. . मान्धहस्तिमहाभाष्यको खोज ९५ हो गया हो अथवा उनके शिष्य शिवकोटिने जो किसी सूचीके आधार पर एक पंडित महाशय ने, तत्त्वार्थसूत्रकी टीका लिखी है उसी परसे इस समाजके पत्रोंमें, जो इस प्रकारका समाचार विषयमें उनके नामकी प्रसिद्धि हो गई हो। कुछ प्रकाशित कराया था कि, गंधहस्तिमहाभाष्य भी हो, यथार्थ वस्तुस्थितिको खोज निकालनेकी आस्ट्रिया देशके अमुक नगरकी लायब्रेरी- बहुत बड़ी जरूरत है. जिसके लिये विद्वानोंको प्र. में मौजूद है और इसलिये वहाँ जाकर उसकी यत्न करना चाहिये । अस्तु । कापी लानेके लिये कुछ विद्वानोंकी योजना होनी गन्धहस्तिमहाभाष्य और आप्तमीमांसाके सम्ब- चाहिये, वह बिलकुल उनका भ्रम और बेसमझीका न्धमे हम अपने इन अनुसंधानों और विचा. परिणाम था । उन्हें सूची देखना ही नहीं आया । रॉको विद्वानोंके सामन रखते हुए उनसे अत्यन्त सूचीम, जो किसी रिपोर्ट के अन्तर्गत है, आस्ट्रि- नम्रताके साथ निवेदन करते कि वे इन पर याके विद्वान् डाक्टर चुल्हरने कुछ ऐसे प्रसिद्ध यड़ी शांतिके साथ गहरा विचार करनेकी कृपा जैनग्रंथोंके नाम, उनके कर्ताओंके नाम सहित प्रकट करें और उसके बाद हमें अपने विचारोंसे मूचित किये थे जो उपलब्ध हैं, तथा जो उपलब्ध नहीं करके कृतार्थ बनाएँ । यदि हमारा कोई अनुसंधान हैं किन्तु उनके नाम सुने जाते हैं । समंतभद्रका अथवा विचार उन्हें ठीक प्रतीत न हो तो हमें गंधहस्तिमहाभार' भी अनुपलब्ध ग्रंथों में था युक्तिपूर्वक उससे सूचित किया जाय। साथ ही, जिसका नाम सुनकर ही उन्होंने उसे अपनी जिन विद्वानोंको किसी प्राचीन साहित्यसे गन्ध- सूत्री में दाखिल किया था। उसके सम्बन्धमें यह हस्तिमहाभाप्यके नामादिक चारों बातोमले किसी कहीं प्रकट नहीं किया गया कि वह अमुक लाय- भी यातकी कुछ उपलब्धि हुई हो, वे हम पर उसके बेरोम मौजूद है । पंडितजीने इस सूवीमें गंधहस्ति. प्रकट करनेकी उदारता दिखलाएं, जिससे हम अ- महाभाष्यका नाम देख कर ही, बिना कुछ सोचे पने विचारोंम यथोचित फेरफार करने के लिये समझे, आस्ट्रिया देशके एक नगरकी लायनेरीमें समर्थ हो सके, अथवा उसकी सहायतासे किसी उसके अस्तित्वका निश्चय कर दिया और उसे दूसरे नवीन अनुसंधानको प्रस्तुत कर सके। सर्व साधारण पर प्रकट कर दिया ! यह कितनी आशा है, विज्ञ पाठक हमारे इस समुचित भूलकी बात है ! हमें अपने पंडितजीकी इस कार- मिवेदनपर ध्यान देनकी अवश्य कृपा करेंगे, वाई पर बहुत खेद होता है जिसके कारण समा. और इस तरह एक ऐतिहासिक तत्त्वक निर्णय जको व्यर्थ ही एक प्रकारके चक्करमें पड़ने और करने में सहोद्योगिताका परिचय देंगे। चंदा एकत्र करने-कराने आदिका कष्ट उठाना पड़ा। अन्तम हम अपने पाठकों पर इतना और प्रकट आशा है पंडितजी, जिनका नाम यहाँ देनेकी हम किये देते हैं कि इस लेखका कुछ भाग लिखे जा- कोई जरूरत नहीं समझते, आगामीसे ऐसी मोटी नेके बाद हमें अपने मित्र श्रीयुत मुनि जिनविज भूल न करनेका ध्यान रखेंगे। यजी आदिके द्वारा यह मालूम करके बहुत अफ. सोस हुआ कि डेक्कन कालिज पूना लायब्रेरीकी (जैन हितैषी, भाग १४, अंक 4 में उद्धृत । ) .

९६ जैन साहित्य संशोधक [भाग ...... N ..." तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले संघोंका वर्णन | वपुः पवित्रीकुरु तीर्थयात्रया चित्तं पवित्रीकुरु धर्मवाञ्छया । वित्तं पवित्रीकुरु पात्रदानतः कुलं पवित्रीकुरु सच्चरित्रैः ।। ---उपदेशतरंगिणी। + जैन धर्मके औपदेशिक ग्रन्थसमूहमें, जैनगृहस्थों और स्पर्शन करनेसे भावुक मनुष्यके भद्र हृदयम (श्रावकों ) के लिये जिन जिन धर्मकृत्योंका वि- भव्यता प्रकट होती है और मनकी मलिनता अन्त. धान किया गया है उनमें तीर्थयात्रा करने का भी रित होती है यह मानवस्वभाव सिद्ध बात है। केवल, एक विधान है। मुख्य कर जिन स्थानोंमें तीर्थकर प्रकृतिकी सुन्दरताको, स्थलकी विशुद्धताको और आदि पूज्य माने जाने वाले जैनधर्मके महापुरुषोंका वातावरणको निःशब्दताको देख कर ही संस्कारी जन्म, दीक्षा, केवल या निर्वाण आदि पवित्र कार्य- हृदयवाले मनुष्यके मनमें सात्त्विकभाव प्रकट होने जिसे जैन संप्रदायमें कल्याणक' कहते हैं- हुआ हो लगते हैं, तो फिर यदि उस स्थानकेसाथ किसी स्वा. उन्हें तीर्थस्थान कहते हैं । परन्तु किसी अन्य वि- भिमत लोकोत्तर महापुरुषकी जीवनघटनाका कोई शिष्ट घटनाके कारण या स्थलविशेषकी पवित्र- स्मृतिसंबन्ध जुड़ा हुआ होतब तो कहना ही क्या। ताके कारण और स्थान भी ऐसे तीर्थस्थान माने जो शांति ओर जो सात्त्विकता मनुष्योंको अन्य जाते हैं । समेतशिखर, राजगृह, पावापुरी, खण्डः उपाधिनस्त स्थानों में सेंकडों लेखोंके वाचनेसे गिरि आदि स्थल पूर्वमें तक्षशिला, कांगडा, अहि. और सेंकडे। ही व्याख्यानोंके सुननेसे प्राप्त नहीं च्छत्र, हस्तिनापुर आदि उत्तरमें, शत्रुजय, गिर- हो सकती, वह ऐले शुद्ध, पवित्र और पूज्य स्था- नार, आबू. तारंगा आदि पश्चिममें; और श्रीपर्वत, नमें एक दिन जाकर रहनेसै प्राप्त हो सकती है। श्रवणवलगोला, मुडबद्री, कुलपाक आदि दक्षिणमें ऐसा अनेक महापुरुषोंका अनुभव है । श्रमण भग- जैनियोंके प्रसिद्ध तीर्थस्थान हैं। तीर्थस्थानोंके वान् श्रीमहावीर और गौतम बुद्ध जो वर्षांतक मानने पूजनेकी यह प्रथा केवल जैनधर्म ही में निर्जन वनोंमें घूमते रहे उसका कारण केवल यही प्रचलित है यह बात नहीं है । संसारके प्रायः सभी शांतिलाभ करना था, और इसी प्रवृत्तिद्वारा उन्हो- प्राचीन और प्रसिद्ध धर्मोंमें ऐसे तीर्थस्थान माने ने अपनी मुक्ति प्राप्त की थी । संसारके महापुरुषों और पूजे जाते हैं । ब्राह्मणोंमें हरिद्वार, सोमनाथ, के अनुभूत इस सिद्धान्तको लक्ष्यमें लेकर धर्मप्रव- रामेश्वर, जगन्नाथ इत्यादि ; बौद्धोंमें कपिलवस्तु, कोने तीर्थयात्राकी प्रथा प्रचलित की है और मृगदाव, बोधिगया, कुशीनार इत्यादिः क्रिश्चियनोंमें उसके अनुसार अति प्राचीन कालसे संसारके जेरुसलेम: और मुसलमानोंमें मक्का मदीना आदि उपर्युक्त सभी धर्मोंके आस्तिक अनुयायी अपने स्थान सैकडों ही वर्षांसे तीर्थस्थानके रूपमें जग- अपने तीर्थस्थानों में अनेक प्रकारके कष्ट उठाकर विख्यात हैं। क्या मूर्तिपूजा माननेवाले और क्या नहीं माननेवाले-क्या ईश्वरवादी और क्या अनी भी, अधिक नहीं तो केवल एकवार, दर्शन मात्र श्वरवादी इस विषय में सभी एकमत रखते हुए करनेके लिये ही जाते रहे हैं, अथवा जानेकी दिखाई देते हैं। अभिलाषा रखते रहे हैं । जैनधर्मोपदेशकोंने महापुरगंके चरणस्पर्शसे पचिंधित भूमिका दर्शन भी अपने तीथाके दर्शन स्पर्शन करनेका उपदेश ...

अंक २] तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले संघोंका वर्णन ९७ -~ -~-4-~~ ...--v से किया है और तदनुसार जैन समाजमें प्रवृत्ति भी रके नियम करने चाहिएं-दिनमें एक ही दफह चली आ रही है। भोजन करना चाहिए, रास्ते पैदल चलना चा- पुराणे जमानेमें, आज कल के समान, मुसाफरी हिए, खाली जमीन पर सोना चाहिए, सचित्त करने के लिये रेलय बारह जैसे साधनों की सुविः वस्तु खानी न चाहिए, ब्रह्मचर्यका पालन करना धा न होनेस, तथा मार्गमें अनेक प्रकारके कष्टोंके चाहिए, इत्यादि । इस प्रकार यात्राके लिये नियं- आनेको बहुत कुछ संभावना रहनेस, उस समय मादि स्वीकार कर फिर राजाके पास जावे और के बडे बडे श्रीमान लोक भी अकेले-टुकेले घरसे उसे यथायोग्य भेंट दे कर संघ निकालनेकी इजा- वहार निकल कर दूरके देशोंमें जानेकी हिम्मत जत लेवे। फिर यात्रामें साथ ले चलनेके लिये कम रखते थे। तो फिर साधारण और गरीववर्गक युक्तिपूर्वक मंदिर बनवावे। अनन्तर, अपने स्वज लोगोंके लिये तो कहना ही क्या । इस लिये उस नाको और साधर्मिभाईयोंको संघम आनेके लिये समय प्रायः लोग बहुतसो संख्यामें एकत्र हो कर तीर्थयात्राके लिये निकला करते थे। यात्रियों १ जिस संघमें इस प्रकार के नियमोका पालन करते हुए इस समूहको संघ कहा करते हैं। पिछले जमानेमें, संघपति और अन्यान्य यात्री चलते हैं उस संघको 'पट री जैनसमाजमेंसे जुदा जुदा तीर्थीकी • यात्राके पालक ' (गुजराती-छ री प.लतो) संघ कहते हैं । 'परी' लिये जुदा जुदा देशामसे मतलब उन छ नियमोंका है जिनमें अन्तम 'री' अक्षर जुदा देशांमसे प्रतिवर्ष प्रायः सैकडों ही ऐसे छोटे बडे संघ निकला करते थे, आता है। यथा- और अब तक भी सालमें दो चार निकलते रहते एकाहारी, दर्शनधारी, यात्रासु भूशयनकारी, हैं। बहुत करके इन संघोके निकालनेमें कोई एक सच्चित्तपरिहारी, पादचारी, ब्रह्मचारी, च । श्राद्धविधि. पृ. १६४. श्रीमान् भावुक अग्रणी होता है और वह अपनी औरसे हजारों लाखों रुपये खर्च कर सकती हजा- एकाहारी भूमिसंस्तारकारी रों यात्रियोंके तीर्थदर्शनकी अभिलापाको पूर्ण कर- पद्भ्यां चारी शुद्धसम्यक्त्वधारी। नेमें सहायक बनता है । ऐसे संघं निकालनवाले. यात्राकाले सर्वसञ्चित्तहारी को समाजकी और से 'संघपति' की पदवी मि. पुण्यात्मा स्याद् ब्रह्मचारी विवेकी । -उपदेशतरंगिणी, पृ २४३. लती है और वह फिर सदा समाजमें अग्रणी माना जाता है। २ प्राचीन समयमें राजाज्ञाके सिवा ऐसे संघ वगैरह संघके निकालनेकी क्या विधि है-वह किस निकल नहीं सकते थे तथा उनको एक राज्यमेंसे दूसरे तरहसे निकाला जाता है और उसके निकालनेवा- राज्यमें जाने आने नहीं दिये जाते थे। इस लिये संघ निका- लेको क्या क्या करना चाहिए-इसके विपयम श्राद्ध- लनेवालेको प्रथम राजाके पास जाकर उसके आगे रूप- विधिनामक ग्रन्थमें निम्न प्रकारका वर्णन दिया है। योकी खूब भेंट कर उसे खुश करना पड़ता था और उसके संघ निकालनेवाले पुरुपको सबसे प्रथम, अभी- पाससे संघ निकालनेका परवाना ( मुसलमानी शब्द फर- ट तीर्थकी यात्रा पूर्ण न हो तब तक, निन्न प्रका- मान ) लेना पड़ता था। प्रमाणके लिये देखो मेरा लिखा हुआ शत्रंजय तीर्थोद्धार प्रबन्ध, पृ० ५६.७; , जैन जातियों में बहुतसे कुटुम्बाको जो संघवी-संघइ- तथा सोमसौभाग्यकाव्य, प, १४०-४१॥ -सिंघी-सिंगई अादि अटक है वह इसी संघपति ' पद्वी का ३ ये मन्दिर सोना, चांदि, आदि धातुओंक तथा हस्ति- अपभ्रष्ट रूप है। दन्त, चन्दन अथवा अन्य प्रकारके उत्तम काष्ठके बनाये २ यह ग्रंथ तपागच्छके आचार्य ग्लशेखर सूरिका वना- जाते थे। ये एक प्रकारके सिंहासन समान अथवा रथके या हुआ है । इसकी रचना विक्रम संवत् १५०६ में हुई है। जैसे होते थे। इनको मनुष्य उठाते अथवा रथकी तरह घोडे भावनगरकी आत्मानंद जैन सभाने इसे छपकर प्रकट या पैल खींचते थे। संघके प्रमाणमें ऐसे एक या अनेक किया है ! मंदिर संघके साथ रहते थे। - A. ra...ww. १ . AAAAA.... MARAN - ९८ जैन साहित्य संशोधक [ भाग आदरपूर्वक आमंत्रण भेजे । भक्तिपूर्वक गुरुमहारा- आनेवालोमेसे यथायोग्य किसीको महाधर, किसी- जको भी निमंत्रण करे । गांव में जीवहिंसा बन्ध को अग्रेसर, किसीको पृष्ठरक्षक और किसीको संघा. करानेके लिये अमारिपटह बजवावे । मंदिरोंमें ध्यक्षक आदि पद देकर तदनुकूल कार्यविभाग नि. महापूजादि महोत्सव मनावे । फिर, जो जो यत करे । संघके चलने-ठहरने आदिके सब संकेत मनुष्य संघमें साथ आनेकी इच्छा प्रदर्शित करें यात्रियों को जाहिर करे-अर्थात् अमुक प्रकारकी उनमेंसे जिनके पास भत्ता न हो उन्हें भत्ता देवे, सूचना मिलने पर यात्रियोंको ठहर जाना चाहिए, वाहन न हो उन्हें वाहन दवे, तथा जो बिल्कुल अमुक प्रकारकी सूचना मिलने पर चलना चाहिए, निराधार हो उन्हें मीठे बचनोंसे आश्वासन दे कर अमुक प्रकारकी सूचना मिलने पर एकत्र होना जिस वस्तुकी जरूरत हो उसको पर्ति करे । और चाहिए: इत्यादि सब बाते संघजनोंको स्पष्ट सम- इस प्रकार गांव में ढंढोरा पिटाकर सहायतादान झा देनी चाहिएं । रास्ते संघपतिको सबकी पूर्वक निरुत्साह मनवालोंको भी यात्राके लिये उत्ता संभाल रखनी चाहिए । कहीं किसीकी गाडी वगै- हित करे गातेम यात्रियोंके ठहरनेके लिये, पडावोंमें रह तूट जाय या और किसी प्रकारकी कठिनाई काम आने लायक छोटे बड़े ऐसे अनेक डेरे, तंबू, आ जाय तो उसे हर प्रकारसे सहायता देनी चाहिए। रावटी, चांदनी आदि तेयार करवावे। भोजनकी सामग्री के लिए कडाह. परांत, हंडे आदि भाजन और शहर आवे उनके मंदिरों में स्नात्र-महोत्सव इस प्रकार प्रयाण करते हुए मार्गमें जितने गांव और पानीके संग्रहके लिये बडी बडी जोठियां, करावे तथा उन पर महाध्वज चढावे। सब मंदि. टांकियां आदि दर्तन बनवावे । मनुष्यों के बैठनेके कबाजे-गाजेके साथ जाकर दर्शन करे। जहां लिये तथा सामान भरनेके लिये गाडी, सहेज- वाल, रथ, म्याना, पालखी, बैल (पोठ), घोडा कहीपर कोई मंदिर वगैरह जीर्ण-शीर्ण हालतमै दि. आदि सब प्रकारके वाहनोंका संग्रह करे । संघी खाई दे तो उसके उद्धार आदिका खयाल रक्खे। रक्षाके लिये अच्छे अच्छे बहादुर और शूर सुभटो- दर्शन हो तब सुवर्ण, रत्न या मोतियोंसे उसे बधा- जब दूरसे अभीष्ट तीर्थ-स्थलके ( पर्वतादिके ) को (सिपाहियोंको ) बुलावे और उन्हें अब वे और यात्रियोंको लद्द आदि बांटकर तथा भोजन शस्त्रादि देकर उनका सन्मान करे । तथा गीत, नृत्य और वाद्यविषयक सामग्रीको भी सामे करा कर साधर्मिवात्सल्य करे । यथोचित दान रक्खे-अर्थात् गान और नृत्य करनेवाले भोजको- बरके साथ स्वयं प्रवेशोत्सव करे और दूसरोंसे देवे । फिर जब तीर्थस्थल पर पहुंचे तो बडे आडं- गंधाको और बाजे बजानेवाले बजवश्योंको भी संघके साथ रक्खे । इस प्रकार सब तरहको तयारी करावे । इस तरह तीर्थस्थानमें प्रवेश करके, प्रथ- कर अच्छे मुहूर्तमें शुभ शकुनोंके साथ प्रस्थान विधिपूर्वक स्नात्र करे । इसके बाद, माला पहरना, म हर्षपूजा, फिर अटोपचार पूजा, और तदनंतर मंगल करे । प्रस्थान करनके अवसर पर, सकल समुदायको-संघके साथ चलनेवाले तथा गावमें घृतधारा देना, पहरामनी रखना, नवांग जिनपूजा बसनेवाले सभी सार्मिभाइयोको-एकत्र उत्तम करना, पुष्पगृह और कदलीगृह बनवा कर महा. प्रकारके भोजन कराकर, ताम्बूल आदि मुखवास पूजा रचना, बहुमूल्य वस्त्रादिकी बनाई हुई महा- देकर, तथा पंचांग वस्त्रादि पहरा कर सत्कृत करे। गीत और नृत्यादिसे उत्सब मनाना, तीर्थनिमित्त ध्वजा बहाना. रात्रिजागरण करना, नानाप्रकारके तदनन्तर. सुप्रतिष्ठ, धर्मिष्ठ, पूज्य और भाग्यवान् उपवासादिक तपस्या करना, लक्ष या कोटि परि- मनुष्योंके हाथसे 'संघाधिपत्य' कातिलक करावे। मित चावल आदि-आदि शब्दसे सुपारी, लविंग, स्वयं संघकी महापूजा करे और इस प्रकार दूस- एलायची, नालियर इत्यादि समझने चाहिए- रॉके पाससे भी ‘संघाधिपत्य ' का तिलक करावे। चढाना, २१, ५२, ७२ या १०८ संख्यामें फल आदि यह सब काम हो चकने पर फिर संघके साथ भेंट धरना, भक्ष्य ऐसे सब प्रकारके भोज्य पदाथों - अंक २] . . ~... .. - तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले संघोका वर्णन ९९ से भरे हुए थालोका रखना, रेशम आदि मूल्यवान् जो कैदी थे उन्हें बन्धन मुक्त किये और सकल वस्नके बने हुए चंदुए, अंगढंछन, दीप, तैल, धौती, संघकी पूजाका महामहोत्सव किया । संघके प्रया- चन्दन, केसर, पचंगेरी, कलश, धूपदान, आर- णसमयमें सबसे आगे राजाका देवालय चलता ती, आभरण, प्रदीप, चामर, शृंगार, थाल, कच्चोल, था। यह देवालय सुवर्ण और रत्नोंसे जड़ा हुआ घंटा, झल्लरी, पटह आदि विविध वाद्य; इत्यादि था और राज्यके पट्टहस्तिकी पीठ पर स्थापित प्रकारकी मंदिरमें काम आनेवाली सब चीजोंका किया हुआ था। इसमें सुवर्णकी बनी हुई जिनमू- दान करना; इत्यादि प्रकारके जो तीर्थ कृत्य हैं उन्हें र्ति स्थापित थी। राजाके इस मुख्य देवालयके विधिपूर्वक पूर्ण करे । इसके बाद तीर्थस्थान पर पीछे पीछे क्रमसे ७२ सामंतोंके, २४ मंदिर कोई छोटी बडी देवकुलिका करावे । सूत्रधारादि- बनवानेवाले बाहड मंत्री और उसके साथ अन्य क कारीगरोंका सत्कार करे । तीर्थका कोई हिस्सा मंत्रियोंके, तथा १८०० बडे बडे व्यापारियोंके देवा- नष्ट-भ्रष्ट होनेकी अवस्थामें हो तो उसे ठीक करवा लय चलते थे । इन सब देवालयों पर श्वेतातपत्र देवे । तीर्थकी रक्षा करनेवालोका बहुमान करे। रक्खे हुए थे और अंदर मुवर्ण और मोतियोंसे जडे तीर्थके निर्वाहले लिये कोई जमीन आदिका स्थायी हुए छत्र-चामरादि शोभ रहे थे ।.....इस संघमें दान करे। साधर्मिवात्सल्य करे । गुरुओं और कुमारपाल राजा मुख्य संघपति था और उसके संघजनोंको पहरामणी दे कर भक्तिभाव प्रकट करे साथ ७२ सामंत, वाहड ( वाग्भट ) आदि मंत्री, और भोजक, संवक, गंधर्व, आदि जैन याचक जन राजमान्य नागसेठका पुत्र सेट आभड, पड्भापाक- हो उन्हें उचित दान वितरण करे । इत्यादि। विचक्रवर्ती श्रीपाल और उसका पुत्र दानवीर इस प्रकार संघ ले जानेवालेके लिये कविश्रेष्ठ सिद्धपाल, कपर्दी भंडारी, प्रहलादन- मुख्य मुग्न्य कृन्य वतलाये गये हैं। पुर (पालनपुर ) का संस्थापक राणा प्रहलाद, ९९ प्राचीन समयमें, जैन इतिहासमें प्रसिद्ध ऐसे लाख सुवर्णाधिपति सेठ छाडाक, राजदौहित्रिक प्रायः सभी जैन राजा-महाराजाओने और सेठं- प्रतापमल्ल, अठारह सौ व्यवहारी, हेमचंद्रसूरि साहुकारोंने इस प्रकारके बडे बडे संघ निकाल आदि अनेक आचार्य, अनेक गांवों और नगरोसे और उनमें लाखों करोडो रुपये खर्च किये थे । आए हुए करोंडो मनुष्य, छहों दर्शनोंके अनुयायी, उदाहरणके लिये ऐसे दो चार प्रसिद्ध संघोंका ११ लाख घोडे, ११ सौ हाथी, १८ लाख पैदल सि- यहां पर उल्लेख करना उचित मालूम देता है। पाही और अनेक याचक जन थे। राजा हमेशा पैदल चलता था और सो भी नंगे पैरोंसे । हेमचन्द्र गुजरातके परमार्हत राजा कुमारपाल चौलुक्य- सूरिने उसे वाहन पर बैठजानेका अथवा तो पैरोमें ने सौराष्ट्रके गिरनार और शत्रुजयादि तीर्थीकी जूने वगैरह पहर लेनेके लिये आग्रह भी किया तो यात्राके लिये बड़ा भारी संघ निकाला था। उसके भी उसने वैसा नहीं किया। राजाके इस व्रतको बारेमें जिनमण्डन गणीने ( संवत् १४९२ ) अपने देख कर और भी सैकडौं संघजन उसी तरह चलने कुमारपाल प्रबन्ध ' नामक ग्रंथमें जो उल्लेख किया लगे। संघके साथ समुदाय बहुत बडा होनेसे कहीं है, उसका सार यहां पर दिया जाता है- लोकोकोरास्ते में कष्ट न हो इसलिये वह हमेशा पांच हेमचन्द्राचार्यके मुखसे तीर्थ यात्रासे होनेवा- कोसकी मंजल करता था।जगह जगह लड्डू नालिय- ला पुण्यलाभ सुन कर कुमारपालने भी तीर्थयात्रा करनेका मनोरथ किया और तत्काल सब सा रआदिकी प्रभावना किये जाता था। जितने जितने एकत्र कर शुद्ध मुहूर्तमें यात्राके लिये प्रस्थान जिनमंदिर आते थे उन सब पर सुवर्ण और मोति- किया । प्रस्थान करते समय उसने प्रथम, शहरक योसे जडी हुइ ध्वजाये चढाता जाता था और मंदि- सभी चैत्यों ( मंदिरों ) में अशान्हिक उत्सव मना रमेकी प्रत्येक मूर्तिके लिये सोनेका छत्र और चाम- या। गांवमें अमारिपटह बजवाया । कैदखानाम रादि दान किये जाता था । गांवों और शहरोंके जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ १०० सभी मनुष्योंको भोजन करवाता था। सामने आने. बधाया । इस प्रकार उस दिन प्रथम तीर्थदर्शनके वाले राजाओं तथा सेठ-साहुकारोंको यथायोग्य सव कृत्य करके दूसरे दिन संघने उपवासका पहरामणी देता था। प्रतिदिन संघर्म, सामंत, मंत्री पारणा किया और तदर्थ उत्सव मनाया गया। सेठ आदि सभी संघजनोंको एकत्र कर स्नात्र महो. तीसरे दिन संघ प्रयाण करके शत्रुजयकी तलह- त्सव मनाता था । प्रत्येक गांव और नगरमें साध- टीमें पहुंचा । वहां पर पादलिप्तपुर (पालीताना) र्मिक भाइयोंको अन्न, वस्त्र और प्रच्छन्न धन देकर सा- में राजाने पहले ही पार्श्वनाथका मन्दिर बनवा धर्मिकवात्सल्य करता था। प्रतिदिन भोजन करने- रक्खा था, जिस पर उस समय सुवर्णनिर्मित कलश के समय असमर्थ श्रावकोंको तथा दूसरे भूखे दण्ड और ध्वज आदिका आरोपण कर विधिपू प्यासे गरीब गुरबोंको अपने हाथसे भोजन करा. वक स्त्रात्र महोत्सव कराया। उसके बाद अपनी कर फिर स्वयंभोजन करता था । हमेशा त्रिकाल दाहिनी वाजमें हेमन्द्रसूरिको साथ लेकर, सा. जिनपूजा, उभयकाल प्रतिक्रमण तथा पर्वके (अष्टः मंत, मंत्री, सेठ, साहुकार इत्यादि सबके साथ मी और चतुर्दशी आदि के ) दिन पीपध ब्रतादि शत्रुजय पर चढने लगा। मार्गमें जितने वृक्ष आते करता था जितने याचकजन आते थे उनको इ- थे उन सब पर वस्त्रखण्ड चढवाता हुआ और च्छित दान देकर संतुष्ट करता था । इस प्रकार प्रत्येक स्थान पर सुवर्ण, पुष्प. चंदन इत्यादिसे प्रयाण करता हुआ वह धंधूका मगरमें पहुंचा जो पूजन करता हुआ, मरुदेवा नामक शिखर उपर हेमचन्द्राचार्यका जन्मस्थान था । इस नगरमें पहुंचा। वहांपर जगन्माता स्वरूप.मरुदेवाकी, तथा उसने पहले ही ५७ हाथ ऊंचा झोलिकाविहार शान्तिनाथ और कपर्दि यक्षादिककी पूजा-अर्चा नामक मंदिर बनवाया था जिस पर ध्वजा चढाई कर प्रथम प्रतोली ( पोल) पर पहुंचा। वहां पर तथा स्नात्र महोत्सव कराया । वहांसे वह क्रमशः अनेक वाचक जन खडे थे जिनको यथायोग्य दान प्रयाण करता हुआ, प्राचीन वलभी शहरके मैदा- देकर आगे बढा और युगादिदेव आदिनाथके नमें पहुंचा । इस जगह दो सुंदर पहाडियां हैं जि- मुख्य मन्दिरका द्वार दिखाई देते ही सवासेर नकी चोटी पर दो मन्दिर बनवाये और उनमेंसे प्रमाण मोतियांसे उसे बधाया। तदनन्तर मन्दिर- एकमें ऋषभदेवकी और दूसरे में पार्श्वनाथकी को तीन प्रदक्षिणा कर गर्भागारमें गया और वहां मूर्ति प्रतिष्ठित की । वहांसे चल कर वह संघ उस पर युगादि देवकी प्रशमरसपरिपूर्ण भव्य मूर्तिके जगह पहुंचा जहांसे शत्रुजय पर्वतका स्पष्ट दर्शन दर्शन कर परम उल्लसित हुआ और नौ लाख सव- हो सकता था । उस दिन संघने वहीं पडाव किया णके मूल्यवाले नौ हार चढा कर उस मूर्तिकी और राजाने सकल संघके साथ शत्रुजयको नवांग पूजा की। तदनन्तर संघपतिके लिये जो दण्डवत् नमस्कार करके पञ्चाङ्ग प्रणाम किया। जो तीर्थ कृत्य बतलाये गये हैं उन सबका उसने उस दिन तीर्थदर्शन निमित्त उपवास किया गया यथाविधि पालन किया । इत्यादि । और सोने चांदिके फुलोसे और मोतियोंसे शत्रु- जयकं वधाया गया । कुकुर और चंदनादिसे पाठक कुमारपालकी यात्राके इस वर्णनका ऊपर अष्टमंगलका आलेखन किया गया और उनपर पहले दिये गये श्राद्धविधिके संघवर्णनके साथ अनेक प्रकार के नैवेद्यासे भरे हुए थाल रक्खे गये निकालने का जो वर्णन अन्धकारोंने दिया है वह मिलान करेंगे तो मालूम हो जायगा कि संघके वहां पर फिर पूजा पढाई गई, आचार्यका व्याख्या- केवल वर्णनमात्र ही नहीं है परंतु उसके अनुसार न सुना गया और रात्रिजागरणका उत्सव मनाया यथार्थ आचरण भी होता रहा है । और यह आच- गया। राजराणी भूपल देवी, राजपुत्री लीलू कुमारी रण उस पुराणे जमाने ही में होता था सो भी और अन्य सब सामंत वगैरहकी लिऑने भी सो- बात नहीं है। वर्तमानमें भी ऐसे संघ निकालने- तेके थालोम मोती और अक्षत भरकर पर्वतको वाले यथाशक्ति और यथासाधन उक्त विधिका अंक २] तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले संघोंका वर्णन 44A पालन करते रहते हैं। इस प्रकारके छोटे बडे दो महामंत्री वस्तुपालने १२ वार संघ निकाल कर चार संघोंके देखनेका तथा उनके साथ जा कर शQजयकी यात्रायें की थीं। जिनमें सं. १२८५ में यात्रा करनेका इस लेखकको भी सौभाग्य प्राप्त जो यात्रा की उसके साथमै २४ तो हाथीदांतके हुआ है जिनमें इस वर्णनका बहुत कुछ प्रत्यक्ष बने हुए और १२० चंदन आदि लकडीके बने अनुभव भी मिला है । अस्तु । हुए मंदिर थे । ४५ सौ गाडियां, २८ लीवाहिनियां, कहते हैं, इसी तरह पहले गोपगिरि ( गवालि. ७०० सुखासन, ५०० पालखियां, ७० आचार्य, २ यर) के आम नामक राजाने बप्पभाट्टिसूरिक' उप• हजार श्वेताम्बर यति, ११ सौ दिगम्बर भट्टार- देशले शत्रुजयकी यात्राके लिये एक संघ निकाला कादि, १९०० श्रीकरी, ४ हजार घोडे,२ हजार ऊंट, था जिसमें १ लाख पौष्टिक, १ लाख घोडे, ७०० और सात लाख मनुष्य थे। हाथी, २० हजार ऊंट,३ लाख प्यादे और २०हजार वस्तुपालकी इस अनुपम तीर्थयात्राका वर्णन, श्रावक-कुटुंब थे। (देखो रत्नमन्दिर गणिरचित उसके समकालीन और सुहृद ऐसे बडे बडे कवि- उपदेशतरंगिणी, पृ० २४८) योने बहुत विस्तृत और भव्य रीतिसे किया हैं। विक्रमकी १४ वीं शताब्दीमै थारापद्र नगरेमें उदाहरणके लिये गुर्जरेश्वर पुरोहित सोमेश्वर आभू नामक एक श्रीमालशातीय बहुत बंडा श्रावक महाकवि रचित कीर्तिकौमुदी नामक काव्यके हो गया है । इसको 'पश्चिममण्डलिक' की पदवी कुछ पद्य यहां पर उद्धृत कर दिये जाते हैं: मिली थी। इसने शत्रुजयकी यात्राके लिये जो चिकीर्पिता श्रीसचिवेन तीर्थ- संघ निकाला उसमें ७०० तो मंदिर और १०५० यात्राऽथ सोऽयं शरदाऽऽसमेतः । जिन मूर्तियां थी! अन्य समुदाय इस प्रकार था:- महात्मनामीहितकासिद्धी ४ हजार गाडियां, ५ हजार घोडे, २२ सौ ऊंट, विधिविध हि सदानुकूल्यम् ॥ १ ९० सुखासन' ९९ श्रीकरी, ७ प्रपा, पानीसे भरी पाययवन्तः पथि योग्ययुग्याः हुई मशके उठा कर चलनेवाले बैल और३०भैसे, सोपानहः सोदकभाजनाश्च । १०० भोजन बनानेके बडे बडे कडाह, १०० हल. श्रीवस्तुपालन समं जनौधाः वाई, १०० रसोय, २०० माली, १०० तंबोली, १३६ प्रयाणकाय प्रवगा बभूवुः॥४ हाट, १४ लुहार, और १६ सुतार थे । ३६ आचार्य आकारितस्तेन रुतादरेण थे । सब मिलकर १२ करोडका उसके संघम दूगदपि श्राद्धजनः समेतः। खर्च हुआ था। ययुस्तदीयानि पुनर्यशासि दिगन्नरेभ्योऽपि दिगन्नराणि ॥ ५ १ वप्पभट्टारिका स्वर्गवास संवत् ८९५ में हुआ था। समं समप्रैरपि बन्धुवर्ग भामराजके लिये देखो मेरा शत्रुजय तीर्थोदार प्रवन्ध, पृ. निसर्गबन्धुर्विवुधवजस्य । ४२ की टिप्पणी। शुभे मुहूर्तऽथ शुभैनिमित्त- २ पुराने जमानेमें बनजारे लोग जिन बैलों पर माल लद मन्त्री स्वनाथानुमतः प्रतस्थे ॥ ६ कर आते जातेथे उनको पौष्ठिक कहते थे । गुजरातीमें स्यैस्तुरंगे: करभैर्महो उसे पाठ कहते हैं । मनुष्य चेलों पर स्वारी करते थे। १ उपदेशतरंगिणी, पृ. २४५. ३ यह प्राचीन प्रसिद्ध नगर पालनपुर एजन्सामं आया २ देखो, सोमेश्वररत्रित कार्तिकौमुदी, सर्ग ९, ठक्कुर हुआ है। आजकल इसे थराद कहते हैं। अरिसिंह रचित सुकृतसंकीर्तनकाव्य, सग ५; यानचंद्रसरि ४ देखो, उपदेशतरंगिणी, पृ० १४५, तथा सुकातसागर रचित वसंतविलारा महाकाव्य, सग १०-११-१२-१३; कीन्य, पृष्ठ ५६ । और उदयप्रभसरिकृत धर्माभ्युदगमहाकाव्य, वर्ग १५, इत्यादि । भी इन ०२ जैन साहित्य संशोधक [ माग जग्मुस्तदा केऽपि कथंचनापि । मन्त्रीश्वरे धर्मधाधुरीणे तस्मिन् विशधाम भरस्तु तेषाम् ॥ १० न वाहनं यस्य स तस्य वाहनं नासीद्धनं यस्य स तस्य वित्तम् । न चीवरं यस्य स तस्य वस्त्रं कल्पद्रुकम्पः प्रददौ पृथिव्याम् ॥ ११ भुङ्क्त स्म सप्वपि भुक्तवत्स शेते स्म सुप्तेषु स यात्रिकपु । प्रवुध्यते स्म प्रथमं तदित्य संघप्रभुत्वत्रतमाचचार ॥ १२ प्रभुतभाज्यानि बहूदकानि सुगोरसान्युन्मदमानवानि । तस्यातिद्गेऽपि पथि प्रयाणा. न्युद्यानलीलासहशान्यभूवन् ।। १३ याप्रसंगेषु जगाम येयु पुरेषु पै.रोच्छ्रिततोरणेषु । तेपामधीशैः सविशपमेय संमान्यमान: सममानयत्तान् ॥ १४ अन्यर्थमानः पर्थिकरनेकै- वस्तुन्यनेकान्यपि वस्तुपालः । तेभ्यः प्रभूतानि पथि प्रयच्छ- बाहं करोति स्म न कुप्यति स्म ।। १५ पुरश्च पृष्ठेऽपि च पार्थयोध परिस्फुरन्तः खरहेतिहस्ताः । यात्राजनं वर्मीन तस्य शश्व. दश्वादिरूढाः सुभटा ररक्षुः ।। १८ समुद्धृतैर्जीर्णजिनेन्द्रहम्य- नवैः सरोभिश्च सरोजरभ्यः । प्रस्थानमार्गः सचिवस्य सोऽभू- दजानतामप्युपलक्षणीयः ।। १९ यावन्ति विम्वानि जिनेश्वराणां श्वेताम्बराणां च कदम्बकानि । मार्गेपु तेश मुपिताप्रितातिः पूजां स निर्वर्त्य ततः प्रतस्थे ।। २० स पंचपैनिविषयप्रपञ्च- प्रयाणकैः प्रीणितभव्यलोकः । घराघरं धर्मधुरंधरधी- शचुंजयं शत्रुजयी जगाम || २३. -कीर्तिकौमुदी, सर्ग । इन श्लोकोंका भावार्थ यह है कि-शरत्कालके आने पर मंत्री वस्तुपालने तीर्थयात्राके लिये तै- यारी की। उसके साथ गांवके अन्यान्य लोक भी भत्ता, वाहन, जलादिके वर्तन इत्यादि मार्गमे आ- वश्यक ऐसी सब चीजे ले ले कर तैयार हुए। मं- त्रीने दूर दूर देशों भावकोंको भी संघमें आनेके लिये आदर पूर्वक आमंत्रण किया था इससे वे भी सब लोक आ पहुंचे। इस प्रकार सब लोगोंक तै- यार हो जाने पर, अपने कुटुंबी, सगे, सन्वन्धी, स्नेही इत्यादि सब जनोंके साथ, राजाकी आशापू- वक, मंत्रीने शुभ मुहूर्तमें प्रयाण किया। यात्रियों- मेंसे कोई रथोपर, कोई घौडॉपर, कोई ऊंटॉपर, कोई बैलोपर, इस तरह जुदा जुदा वाहनों पर स. वार होकर चलते थे, पर उन सबका भार मंत्रीके शिरपर था। साथ चलनेवाले यात्रियोंमसे जिसके पास वाहन नहीं था उसको वाहन देकर, जिसके पास धन नहीं था उसको धन देकर और जिसके पास वस्त्र नहीं था उसे वस्त्र देकर मंत्रीने उस स- भय साक्षात् कल्पवृक्षके समान आचरण किया था। संघमें सब मनुष्योंके भोजन कर लेनेपर मं. त्री भोजन करता था,सबके सोजाने बाद सोताथा और सबके ऊउनेके पहले ऊठता था इस प्रकार संघकी संपूर्ण प्रतिपालना करता था। यात्रियोको हमेशा उत्तम प्रकारका भोजन कराया जाता था, मीठा पानी पिलाया जाता था और दूध-दहीं आ- दिगोरस खिलाया जाता था। इस कारण वह वि- पम मार्गकी मुसाफरी भी लोगोंको उद्यानलीलाके जैसी आनंददायक हो गई थी। जिन जिन गांवो- नगरों में वह संघ पहुंचता था वे सब गांव-नगर वहाँके निवासियोंकी ओरसे ध्वजा-तोरणादिस खूब सजाये जाते थे और वहांके अधिकारी वगैरह सब जन आदरपूर्वक उस संघकी पेशवाई में आते थे। स्थान स्थानमें अनेक याचक जन आकर मं- त्रीके पास अनेक प्रकारकी याचना करते थे और वह सबको यथायोग्य दान देकर संतुष्ट करता था- परंतु इस विषयमें न कभी वह अहंकार ही. प्र. A अंक २] तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले संघांका वर्णन १०३ PAPARAN र्शित करता था और न तिरस्कार ही। बास्तम चलता हुया वह संघ आगे, पीछे और अगल-ब. गलम, अर्थात् चारों ओर, हायाम शल लिग्रे हुए घोडे सवारोले संरक्षित रहता था। मार्गम जितने भी जीर्ण-शीर्ण मन्दिर और तालाव आदिजलाशय मिलते थे उन सबको ठीक-ठाक या नवीन बन- वाता हुआ वह संघ चला जाता था। इस कारण उस रास्तसे निकलकर जानेवाले अज्ञात जनोंको भी चिरकाल तक उस संबक प्रयाणका परिचय मिलता रहता था। इसी तरह रास्तमै जितने मन्दिर आते और उनमें जितनी जिनमूर्ति- यां होती थी उन सबकी पूजा-अर्चा करवाई जाती थी। एवं रीत्या प्रयाण करता हुआ यांतर और बाहा दोनों प्रकारके शत्रुओं ऊपर जय प्राप्त कर नेवाला वह महामंत्री ५-६ ही दिनमें शत्रुजय पर्वतपर पहुंच गया था । इत्यादि। विक्रमकी १५ वीं शताब्दीके अन्तिम भागम, सं० गुणराज नामका एक प्रसिद्ध धनिक श्रावक हो गया है जो कर्णावतीका निवासी था। उसने शत्रुजय, गिरनार, आयू, राणकपूर, मांडव, ईडर- गढ आदि मुजरात, काठियावाड, मेवाड,मारवाड, मालवा, बागड इत्यादि देशांक प्रसिद्ध प्रसिद्ध ती. थोकी या निमित्त बहुत बड़ा संघ निकाला था। इल संघ मुख्य आचार्य तपागच्छके सोमस्टुंदर सूरि थे। जन्हीके उपदेशसे यह संघ निकला था। इस संघका विस्तृत वर्णन सोमसौभाग्य नामक काव्यके ८व सर्गम किया हुआ है। काव्यका व- नानेवाला कवि प्रतिष्टासोम स्वयं सोमसुंदर सुरि- का हस्तदीक्षित शिष्य था। इल लिए उसका यह वर्णन प्रायः आंखों देखा कहा जा सकता है। जिज्ञासु पाटकोंको ता इस बारेमें खुद उक्त का. व्य ही को पढना चाहिए। परंतु कुछ नमूना दिखा- नेके लिये उसके थोडेसे पद्य यहांपर भी दिये जाते हैं:- दीगलिकापर्व समाययों मुदा सामाग्यदानप्रतिभूनिर्म भुवि । श्रांतधियात्राकृतये रुती तदा महाद्यमं निमितवान् महेभ्यराट् ।। सन्नीनियन्ते स्म मनोरयः समं रथा महेभ्यः स्वगृहप्वयोमयाः। सुखासनप्रोऽरसिंहविटरा- दीट गरिटं भुवि विधापितम् ॥ परःसहवाचतुरास्तुरंगमा आत्ता उदात्ता हृदयंगमाः पुनः। द्रव्येथ्रियन्ते स्म मया महोमया अग्रेसरा वेगभृतां व सराः ।। महिम्मदश्रीयुतपातसाहिराट् सत्याभूतप्रीतमना मनीषिणम् । दिव्यांवरर्य किल पर्यधापयत् कवादिमुन्यः मह भूरिभिजनेः ॥ समार्पयद् द्वारगति निजां च तं वाचं नफेरीप्रमुखं नृपोचितम् । पर महान् मुभटान् महोद्भटान् प्रोन्मादिनस्तानमितांश्च सादिनः ।। श्रीतीर्थयात्रास्फुरमाणमीकितं ददौ सदनित्यकरं च यस्य तत् । म मार्गणपाणिगणस्य कामितं संपूरयन् श्रीगुणराजसवराट् ।। भव्ये मुहत पभावभाषितः संघान्वितः मौत्रपुराच्चचाल सः। कुंभः शुभाम्मोभरितोऽस्य संमुखी- यभूव मार्गे सुघवाशिरस्थितः ॥ इति प्रकृष्टः शकुन: नमातिगैः संमृक्तित्वोज्वलमंगलोदयः। श्रीवीरमग्राम इति प्रसिद्धिमृत्. पुरं ययौ श्रीगुणराजसाधुराट् ।। तस्मिन्मिलन्ति स्म पुरे नरेश्वरो- धुरा नराः पुण्यपराश्रतुर्दिशाम् । प्रबर्दने स्मानयसंघ उच्चक- दिनदिने वाद्विरिवेन्दुदर्शने ॥ देवालयाः श्रीनिलया दशाऽतशाः सौवणदण्डध्वजकुम्भशामिताः । चमकताशेषजगत्त्रया स्फुा. चित्रविचित्रवरशिल्यिकल्पितः ।। जनन्द्रयियः सहिता महोच्छिता- स्तुय शोः सुभगंभविष्णवः ।

१०४ wwwwww Arr.w.www.www WVuur- . जैन साहित्य संशोधक [भाग १ mune स्थाधिरूढा दृडवन्धवन्धुराः कि संप्रतिभूपतिरेप शासन पथि प्रचेलुः त्रिदशाचलाचलाll विभासयन् जैनमखण्डशासनः । तत्पृष्टतः शिष्टगरिष्ठशेखरः कुमारपालः किमु निर्मितामित- खरांशुभास्वद् द्युतिसन्ततिस्ततः । प्रभावनः पावनपुण्यभावनः ।। पुराच्चचालाचलकन्दरावली. किं वस्तुपालोऽत्र मनोरथान् पृथून् वधिः प्रकुर्वन् प्रतिशब्दमण्डिताः ।। कृतार्थयत्नार्थजनस्य शस्यधीः । श्रीश्रीकरीशोभितपृष्टयो लसत्- इत्थं सृजन्नुहसम्हमंगिनां सुखासनक्षमापतिवाहनस्थिताः । धंधकके संघपतिः समागमत् ॥ साम्यं दधाना निवि विडोजसो इन श्लोकोका तात्पर्य यह है कि--जब हर्षके महेभ्यराजस्तदनु प्रतस्थिरे ।। साम्राज्यका दान करनेवाला ऐसा दीपालिका पर्व तरंगरंगत्तुरगानिसलरः आया तव-अर्थात् चातुर्मासकी समाप्तिके समय खरैश्चलत्स्यन्दनचक्रमण्डलैः। पर---गुणराज सेठने तीर्थयात्राके लिये खूब जबरद- भृशं समुत्खातमिलारजोऽगितः स्त तैयारी करनी शुरू की। उसके साथ और भी प्राच्छादयत्तापन विम्बमम्बरे ॥ बडे बडे धनिक लोक मनोरथोके साथ ही अपने तदाभुजप्रोत्कटसद्भटावली- अपने घरों में रथी वगैरहको सजाने लगे। तथा सु- हक्कानिनादैयराजिहषितैः। खासन, सिंहासन आदि जुदा जुदा तरहके वाहन भेरी-नफेरी स्वरनायिकास्वरः बनाने लगे । हजारों ही ऊंची जातिके घोडे तैयार शृगालवत्कालकलिननाश सः॥ किये जाने लगे तथा खच्चर और ऊंट सामानले श्रीसंघसत्को शकमरोत्कटे- लदे जाने लगे। निपीडितो मनि स शेपपन्नगः । यों तैयारी कर वह चतुर सेट अनेक प्रकारकी कष्टेन पातालतले स्थितस्तदा बहुमूल्य भेंट लेकर अपना राजकर्ता जो अहम्मद कुलापलाचलुरलं च भारिताः ।। बादशाह था उसके पास गया और वे भेटे उसके सुखासन-स्यन्दन-राजवाहन- सामने रख कर उसको खूब खुश किया। श्रीवाहिनीनां वरवाजिनां नृणाम् । बादशाहने भी बदलेमें, अपने कयाहि (?) आदि कश्चिद्विपश्चिद् गुणराजसंघराट् सहचारियोंके साथ, गुणराज सेठको आदरपूर्वक संघेन संख्यामकरोनरोत्तमः॥ किंमती सरपाव देकर उसका उचित सन्मान श्रीमन्महीराजगजौ गजोधुरः किया। इसके उपरांत वादशाहने सेठको संघमें ले कालूश्च वालाहय ईश्वरः रुती। जानेके लिये अपना निजका जो वादशाही खेमा था श्रीवाचसूनोस्तनया नयान्विताः वह समर्पण किया और नफेरी आदिशाही बाजे भी पंचेपुलपाधिकरूपसम्पदः॥ --कि जो खास राजाओंहीके आगे बजाये जा सकते पंचाप्यमी पंचमुखाभविक्रमाः है-बजानेके लिये देकर सेठका बहुमान किया। क्रमाजनम्रक्षितिपा भटान्विताः। इंधक रक्षाके लिये हजारा ही प्यादे और घोडे- पश्चात्पुरस्ताच्च सृजन्ति यत्नतः सवार सिपाही भी वादशाहने उसके साथ भेजे। श्रीसंघरक्षा पथि सत्पथस्थिताः ॥ इस प्रकार यात्राके लिये शाही फरमान लेकर, पुरे पुरे श्रीमलिकाश्च राणकाः सोपायना सम्मुखमागताः समे। सकल समुदायके साथ, भव्य मुहूर्तमें, याचकगण. को इच्छित दान देते हुए, शुभ शकुनपूर्वक गुण- चक्रुः प्रणामं गुणराजनामभृत् । राज सेठने अपने नगरसे प्रस्थान किया। संवेशिलुभूतला.ममौलयः ॥ कर्णावतीले रवाना होकर संघ वीरमगांव प अंक २] तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले संघोंका वर्णन १०५ - -~~~-~-~~-~~........... vvvvvvvvvvv NM चढता गया। चलते थे, हुंचा जहां चारों दिशाओमेसे असंख्य मनुष्य आ व्यवस्था रखते थे और सुभटॉक साथ इनमेसे आफर उस संघमें शामिल हुए। फिर शुक्लपक्षके कोई संघके आगे, कोई पीछे और कोई अगल- चंद्रकी तरह दिन प्रतिदिन वह समुदाय इस प्र. बगल में चलता था। इनका पराक्रम और तेज इत- कार अन्यान्य स्थानोंसे आनेवाले जनसमूहसे खूब नाथा कि राजा और राणा भी आकर इनके पैरोंमें पडते थे। संघमें सबसे आगे रथारूढ देवालय (मन्दिर) जिस जिस गांव और नगरमें सं० गुणराजका जो खूब ऊंचे होकर सोनेके कलश और वह संघ पहुंचता था वहां के मलिक और राणक ध्वजा दंडादिसे अलंकृत थे, कुशल कारीगरोंकी की आदि सब अधिकारी लोक भेटें ले लेकर संघके हुई अनेक प्रकारको चित्र विचित्र रचनाओंके कारण सामने आते थे और जमीनपर सिर टेककर उसको देखनेवालेको चमत्कृत बनाते थे और जिनके अंदर प्रणाम करते थे। भव्य आकृतिवाली जिन प्रतिमायें सुशोभित थीं। गुणराज सेठके इस महान् संघको देखकर लो. देवालयोंके पीछे पीछे, सूर्यके समान तेजस्वी कोंके मनमें, पुराणे प्रन्यों में वर्णन किये हुए संप्र- ऐसा गुणराज सेठ चलता था जिसके आगे वज- तिराजा, कुमारपालराजा और महामंत्री वस्तुपाल नेवाले बाजोंके प्रतिध्वनिसे रास्तेमें आनेवाले बडे आदिके संघोंका स्मरण हो आता था और क्षणभर बडे पहाड शद्वायमान हो जाते थे। संघपतिके उनको यही भास हो जाता था कि क्या यह राजा पीछे पीछे, संघर्मके अन्यान्य बडे बडे धनाढय संप्रति, या कुमारपाल, अथवा मंत्री वस्तुपाल ही लोक चलते थे जो राजाओंके उचित ऐसे सुखा- तो संघ लेकर नहीं आ रहा है ? इस प्रकार महान सनोंमें बैठे हुए थे और जिनकी अगल-बगलमें ठाठके साथ घलता हुआ गुणराजका वह संघ नोकर लोक अवदागिरीयां लेकर चलते थे। अन्य क्रमसे धुंधुका शहरम पहुंचा । इत्यादि । वाकीके सेंकडों ही लोक घोडे जुड़े हुए रथों में बैठे खरतर गच्छके महोपाध्याय जयसामके उपदे हुए चलते थे कि, जिन रथोंके घोडॉकी खुरियोंसे शसे सिंधके फरीदपुर नगरसे, वि. सं. १४८४ में, तथा पहियोंसे उडती हुई धूलके कारण सारा पंजाबके प्रसिद्ध प्राचीन स्थान कांगडेके जैन मंदि- आकाश ढंकसा जाता था। रॉकी यानाके लिये जो संघ निकला था उसका सुभटोंके हुंकारोंसे, घोडोंकी हिनहिनाटोंसे बहुत ही मनोरंजक वर्णन, हमारी संपादन की हुई और भेरी नफेरी आदि बाजोंके घोर शब्दसे, देख- विज्ञप्ति-निवेणी नामक पुस्तकमें किया हुआ है, जि- नेवालेको मानों यह प्रतीत होता था कि कलिकाल समेका कुछ भाग प्रकृतोपयोगी होनेसे यहां पर अब इस जगत्मसे नष्ट हो गया है और फिर सत्- दिया जाता है । युगका संचार हो रहा है। उस संघके साथ इतनी "संघको चलते समय बहुत अच्छे और अनुकूल गाडियां थीं कि जिनके भारसे दवर ही मानो शकुन हुए । फरीदपुरसे थोड़ी ही दूरी पर विपा- शेषनाग पातालमें चला गया है और कुलाचल सा (व्यासा) नदी थी । उसके किनारोंपर, जहां कम्पित हो रहे हैं । संघके साथ इतने रथ, सुखा- जाम्बु, कदम्ब, नीम्ब, खजूर आदि वृक्षोंकी गहरी सन, पालखियां, घोडे और मनुष्य आदि थे कि घटा जमी हुई थी और नदाके कल्लोलोंसे ऊठी हुई जिनकी संख्या कोई बडा विद्वान् भी नहीं कर ठंडी वायु मन्द मन्द गीतसे चली अतिी थी, ऐसे चांदिके जैसे चमकिले रेतीके मैदान में संघने अपने संघपति गुणराज सेटके महीराज, गजराज, प्रयाणका पहला पडाव किया । दूसरे दिन नदीको कालू, वाला और ईश्वर नामके पांच पुत्र थे, जो पार करके जालंधरकी ओर संघने प्रस्थान किया। सिंहके समान पराक्रमी और कामके समान रूप- संघमें सबसे आगे सिपाही चलते थे जो मार्गमें वान थे। ये पांचों पुत्र संघकी रक्षासंबंधी सारी रक्षणके निमित्त लिये गये थे। उनमेसे किसीके सकता था।

"AANA norrhorno.4AAAAAAM ANNA nnnnnnnnnnA minina MAA । १०६ जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ हाथमें तलवार थी तो किसीके हाथमे खड्ग था। दिया। इसे सुनकर संघके होल उड गये। सवादि- कोई धनुष्य लेकर चलता था तो कोई जब- ङ्मूढ हो गये। यात्रीलोक दिल में बडे धवराये और रदस्त लट्ठ उठाये हुआ था। इस प्रकार सबसे अब क्या किया जाय इसकी फिक्रमें निश्चेष्टसे होर- आगे उछलते, कूदते और गर्जते हुए सिपाही चले है। किलो प्रकार हाँस संभालकर और परमात्माका जाते थे। उनके पीछे बड़ी तेजी के साथ चलने- ध्यान धर संघ पीछा लौटा और विपाशा के तटका पाले ऐसे बडे बड़े बैल चलते थे जिन पर सब आश्रय लिया । नावों में बैठ कर जल्दी से उस को प्रकारका मार्गोपयोगी सामान भरा हुआ था। पार किया और कुंगुद नाम के घाट में हो कर उनके बाद संघके लोक चलते थे जो कितने एक मध्य, जांगल, जालन्धर और काश्मीर इन चार गाडी घोडो आदि वाहनों पर बैठे हुए थे और कई देशोंकी सीमाके मध्य में रहे हुए हरियाणा नामके एक देव-गुरु-भक्ति निमित्त पैदल ही चलते थे। स्थान में पहुंचा । इस स्थलको निरूपद्रव जान कितने ही धर्मी जन तो साधुओंकी समान नंगे ही कर वहां पर पडाव डाला। वहीं पर, कानुक यक्षके पैर मुसाफरी करते थे। इस प्रकार आविच्छिन मंदिर के नजदीक, शुचि और धान्यप्रधान स्थान प्रयाण करता हुआ और रास्तेमें आनेवाले गाँवों में, चैत्र सुदि एकादशी के रोज सर्वोत्तम समय में, को लांघता हुआ संघ निश्चिन्दीपुर के पास के सै- नाना प्रकार के वाद्योंके बजने पर और भाट-चार- दानम, सरोवर के किनारे आ कर ठहरा । सघके णों के, बिरुदावली बोलने पर, सब संघने इकट्ठा आनेकी खवर सारे गाँवमें फैली और मनुष्योंके हो कर, साधुश्रेष्ट सोमा को, उसके निषेध करनेपर झंडके झूड उसे देखनेके लिये आने लगे। गाँव भी, संघाधिपतिका पद दिया । मल्लिकवाहनके सं० का मालिक जो सुरत्राण (सुल्तान) करके था वह मागटके पौत्र और सा० देवा के पुन उद्धर को भी अपने दिवान के साथ एक ऊंचे घोडे पर चढ महाधर पद दिया गया। सा० नीवा, सा० रूपा कर आया, और जन्मभरमें कभी नहीं देखे हुए ऐसे और सा० भोजा को भी महाधर पद से अलंकृत साधुओंको देखकर उसे बडा विस्मय हुआ। किया गया। सैल्लहस्त्य का विरुद बुच्चासगोत्रीय उपाध्यायजीने उसे रोचक धमोपदेश सुनाया, साजिनदत्त को समर्पण किया गया । इस प्रकार जिसे सुन कर नगरके लोकोंके साथ वह बड़ा वहां पर पद्वीदान करने के साथ उन उन मनुष्योंने खुश हुआ और साधुओंकी स्तुति कर उसने सादर संघ की, भोजन-वस्त्र-आभूपणादि विविध व- प्रणाम किया। बादमें संघपति सोसाका सम्मान स्तुओं द्वारा भक्ति और पूजा कर याचक लोकों कर अपने स्थान पर गया । संघ वहां से प्रयाण को भी खूब दान दिया । संघके इस कार्यको देख कर क्रमसे तलपाटक पहुंचा। वहां पर गुरुओंको कर मानों खुश हुआ हुआ और उल के गुणों का वन्दन करने के लिये देवपालपुरका श्रावकसमुदा- गान करने के लिये ही मानो गर्जना करता हुआ य आया और अपने गाँव में आनेके लिये संघको दूसरे दिन खूब जोर से मेघ वर्षने लगा। बेर बेर अत्याग्रह करने लगा। उन लोको को किसी तरह जितने बडे बडे ओले बादल में से गिरने लगे और समझा-बुझाकर संघने वहां से आगे प्रयाण किया झाडो तथा झुपडीओं को उखाड कर फेंक देनेवाला और विपाशा (व्यासा) नदीके किनारे किनारे प्रचण्ड पवन चलने लगा। इस जलवृष्टिके कारण होता हुआ क्रमसे मध्य देशसे पहुंचा। जगह जग- संघ को वहां पर पाँच दिन तक पड़ाव रखना ह ठहरता हुआ संघ इस देश को पार कर रहा था, पडा। ६ दिन सवेरे ही वहां से कूच की। सपा- कि इतनेमें एक दिन, एक तरफसे पोषरेश यशो- दलक्षपर्वत की तंग घाटियों को लांघता हुआ, स- रथके सैन्यका और दूसरी ओरसे शकन्दर के धन झाडियों को पार करता हुआ, नाना प्रकारके सैन्यका, “ भगो, दोडो, यह फौज आई, वह फौज पावताय प्रदेशों को आश्चर्य की दृष्टि से देखता आई,"इस प्रकारका चारों तरफेस कोलाहल सुनाई हुशा और पहाडी मनुष्योंके आचार-विचारोंका अंक २] जेसलमेर पटवा संघका वर्णन १०७ PRArr... AARC MAPAN अनुभव करता हुआ संघ फिर विपाशाके तट पर आचार्य श्रीजिनेश्वरसूरिकी प्रतिष्ठित की हुई शा- धहुंचा । उसे सुखपूर्वक ऊतर कर, अनेक बडे बडे न्तिजिनकी प्रतिमा का दर्शन किया। तीन चार गाँवोंके बीच होता हुमा, और तत्तद गाँवों के लोको प्रदक्षिणा दे कर, नाना प्रकारके स्तुति-स्तोत्रों और स्वामियों को मिलता हुआ, क्रम से पाताल- द्वारा अत्यंत आनन्दपूर्वक प्रभुकी पर्युपासना की। गंगा के तट ऊपर पहुंचा। उसे भी निरायास पार इस प्रकार संवत् १४८४ वर्षके ज्येष्ठ मुदि पंचमी. कर क्रम से आगे बढत हुए और पहाडा की चो- के दिन, अपनी चिरकाल की दर्शनोत्कण्ठाको टियों को पैरा नीचे कुचलते हुए संघ ने दूरसे पूर्ण कर फरीदपुरका संघ कृतकृत्य हुआ । शान्ति- सोनके कलशवाले प्रासादीको पंक्तिवाला नग- लिन के दर्शन कर संघ फिर नरेन्द्र रूपचन्द्र के रकोह, कि जिसका दूसरा नाम मुर्शमपुर है, देखा। बनाये हुए मंदिर में गया और उल में विराजित उसे देख कर संघ-जनाने तीर्थक प्रथम-दर्शन- सुवर्णमय श्रीमहावीरजिन पिवको पूर्ववत् चन्द. से उत्पन्न होने वाले आनंदानुसार, दान धर्मादि न-नमन कर, देवल के दिखाये हुप. मार्गसे युगा- सुकृत्यों द्वारा अपनी तीर्थभक्ति प्रकट की । नगर- दिजिनके तीसरे मंदिर में गया । इस मंदिर में भी कोट्टकं नीचे घाणगंगा नदी बहती हैं जिसे ऊतर उसी तरह परमात्माकी उपासना-स्तवना कर कर संघ गाँवम जानकी तैयारी कर रहा था कि निज जन्म को सफल किया। इतने में उसका आगमन सुन कर गाँवका जैनस (विज्ञातिविबोण, प्रस्तावना, पृ०३७-३९) मुदाय, सुन्दर वस्त्राभूषण पहन कर, स्वागत इस प्रकार और भी यनेक ग्रन्याम अनेक संघों- करने के लिये सामने आया । अनेक प्रकारके वादि का वर्णन मिलता है । इस लेखमें हमारा उद्देश त्रों और जयजयारवाँके प्रचंड घोपपूर्वक महान सारे संघोंका इतिहास लिखनेका नहीं है, परंतु उत्सव के साथ, नगर में प्रवेश किया। सहर के संघ किस तरहसे निकाले जाते हैं उसका स्वरूप प्रसिद्ध प्रसिद्ध मुहल्ली और बाजाराम घूमता हुआ बतलानेका है। इस लिये नमूनेके तौर इतने वर्णन संघ, साधु क्षीमसिंहके बनाये हुए शान्तिनाथ- देकर इस विषयको समाप्त किया जाता है । संघी. देव के मंदिर के सिंहद्वार पर पहुंचा। 'निसीही का क्रमवार इतिहास हम कमी भविष्यमें लिखना निसीही नमो जिणाणं' इस वाक्य को तीन बार चाहते हैं । बोलता हुआ जिनालयमें जो कर, खरतरगच्छक जेसलमेरके पटवोंके संघका वर्णन । ऊपर हमने 'तीर्थयात्राके लिये निकलनेवाले सं- ज्या कि त्या नकल दी जाती है । इस लेख की एक घाँका वर्णन ' दिया है । इस प्रकारका पक वडा कापी प्रवर्तक श्रीकान्तिविजयजी महाराजके शास्त्र- भारी संघ गत शताब्दीके अंतम, मारवाडके ले- संग्रहमसे मिली है; जो उन्होंने किसी मारवाडी सलमेर नगर में रहनेवाले पटवा नामले प्रसिद्ध लहियक पास लिखवाई है और दूसरी नकल,घडी. कुटुंबबाले ओसवालाने निकाला था। इस संघका दाके राजकीय पुस्तकालयके संस्कृत विभागक वर्णन, उसी कुटुंबका बनाया हुआ, जैसलमेरके पास अमरसागर नामक स्थानमें जो जैन मंदिर है सद्गत अध्यक्ष श्रीयुत चिमनलाल डाह्याभाई उसमें एक शिला पर, उसी समयका लिखा हुआ दलाल एम. ए. के पाससे मिली है जो उन्होंने मेरे हैं । यह शिलालन मारवाडी भाषा और देवना- लिये जेसलमेरके किसी यतिके पाससे लिख मंग- गरी लिपिम लिखा गया है। नीचे इस लेखकी वाई थी।

१०८ जैन साहित्य संशोधक [ माग -.vwww.h- || ओं नमः ॥ । दूहा। रिषभादिक चउवीस जिन पुण्डरीक गणधार । मन वच काया एक कर प्रणमु वारंवार ॥ १ विघन हरण संपतिकरण श्रीजिनदत्तसुरिंद । कुशल करण कुशलेश गुरु वन्दु खरतर इंद ॥ २ जाके नाम प्रभावतै प्रगटे जय २ कार । सानियकारी परम गुरु सदा रहो निरधार ।। ३ संवत् १८९१ रा मिति प्राषाढ मुदि ५ दिने श्रीजेसलमेरु नगरे महाराजाधिराज महारावलजी श्री १०८ श्रीगजसिंघजी राणाक्त श्रीरूपनी बापजी विजयराज्ये वृइत्खरतर भट्टारकगच्छे जंगमयुगप्रधान भट्टारक श्रीजिनहपरिमिः पट्टप्रमाकर जं । यु । म । श्री १०८ श्री जिनमहेन्द्रसूरि उपदेशात् श्रीवाफणागोत्रे देवराजनी तत्पुत्र गुमानचंदजी- भार्या जेतां । तापुत्र ५-(१) वहादरमल्लजी--भार्या चतुरां । (२) सवाईरामनी-- भार्या जीवां । (३) मगनीरामजी-भार्या परतापां। ( ४ ) जोरावरमल्लजी-मार्या चोथां । (५) प्रतापचंदजी-भार्या मानां । एवं वहादरमल्लजी तत्पुत्र (१) दांनमल्लनी (२) सवाईरामजी तत्पुत्र सामसिंघ, माणकचंद । सामसिंहपुत्र रतनलाल । ( ३.) मगनीरामजी तत्पुत्र बभूतसिंघजी । तर न २ पूनमचंद दीपचंद । (४) जोरावरमलजी तत्पुत्र २ सुरतांनमल चंनणमल । सुरतानमल पुत्र २ गंमीरचंद्र इंद्रचंद्र । (५) प्रताप चंदनी पुत्र ३ हिमतराम-नेठमल-नथमल । हिमतरामपुत्र जीवण । जेठमल पूत्र मूलो । गुमानचंदजी पुच्यां २ झबू-बीजू । सवाई रामजी पुच्यां ३ सिरदारी-सिणगारी-जानुडी । मगनीरामजी तत्पुयां २ हरकवर-हस्तू । सपरिवार सहितेन सिद्धाचलनारी संघ काढयो। निणरी विगत- नेशलमेर उदेपुर कोटेसु कुंकुमपच्या सर्व देसावरांमे दीनी । च्यार २ जमण कीया नालेर दीया पछै संघ पाली मेलो हूबो । उठे नीमण ४ कीया । संघतिलक करायो । मिति महासुदि १३ दिने भ । श्रीजिनमहेन्द्रसूरिजी श्रीचतुर्विधसंघसमक्ष दीयो। पछे संघ प्रयाण कीयो । मार्गमें देशना सुणतां पूजा पडिकमणादि करतां साते क्षेत्रोंमें द्रव्य लगावतां नायगा २ सामेला होतां रथजात्रा प्रमुख महोच्छव करतां । श्रीपंचतीर्थीनी वांभणवाडजी आबूजी जीरावलेनी तारंगेजी संखेश्वरजी पंचासरजी गिरनारजी तथा मारगमाहे सहरांरा गामारा सर्व देहरा जुहारया । इणमांत सर्व ठीकाणे मंदिर २ दीठ चढापो कीयो । मुगट कुंडल हार कंठी भुजबंध कडा श्रीफळ नगदी चंद्रवा पुठीया इत्यादिक मोटा तीर्थमाथे चढापो घणो हुवो। गहणो सर्व जडाउ हो सर्व ठिकाणे लांहण जामण कीया सहसावनरा पगयीया कराया ! उठेसु सात कोष ठरे-गामसु श्रीसिद्धगिरीजी मोत्यांसुं बधायने पाठी- ताणें बड़ा हगामसुं गाजावाजतां तलेटीरो मंदिर जुहार डेरा दाखल हुवा । दुजे दिन मिती अंक २] १०९ wwwAMANA , . जैसलमेरके पटवोंके संघका वर्णन .......... वेशाख सुदी १४ दिने शांतिक पुष्टिक हुतां श्रीसिद्धगिरीजी पर्वतपर चढ्या, श्रीमुलना- यक चोमुखोजी खरतरवशीरा त्था दुजी वश्या सर्व जुहारी मास सवा रया। उठे चढापो घणो हुवो । अढाइ लाख जात्री भेला हुवा । पुरव, मारवाड़, मेवाड़, गुजरात, ढुंढाड़, हाडोती, कछभुज, मालवो, दक्षण, सिंध, पंजाब प्रमुख देशारा । उठे लांण रू०१ सेर १ मिश्री घर दीठ दीवी जीमण ५ संघव्यां मोटा कीया जीमण १ बाई बीजु कीयो ओर जीमण पण घणा हुवा । श्रीचोमुखाजीरे वारणे आलामे गोमुख यक्ष चक्रेश्वरीरी प्रतिष्ठा करायनें पधराइ चोमुखाजीरो सिखर सुधरायो एक नवो मंदिर करावण वास्ते नींव भराई । जुना मंदिरांरा जीर्णोद्धार कराया जन्म सफल कीयो । गुरुमाक्त इंण मुजब कीवी । इग्यारे श्री- पूज्यजी था २१०० साधु साध्वी प्रमुख चौरासी गछोरा । तिहां, प्रथम स्वगछरा श्रीपूज्य- जीरी भक्ति साचवी । हजार ५ रो नगद माल दीयो दूजो खरच भर दीयो पछे अनुक्रमें सारा दुजा श्रीपुजारी साधु साध्वीयारी भक्ति साचवी । आहार पांणी गाड़ीयारो भाडो तंबु चीवरो ठांणे दीठ रू ४१ दीया नगद । दुशाला वालांने दुशाला दीया । सेवग ५०० हा। जिणांने जणे दीठ रू० २१ दीया । रोटी खरच अलग । पहरणारा मोजा मोषध खरची सारूं रुपीया चाहीज्या जिणाने दीया। पछे । मा श्रीजिनमहेंद्रसुरिजी पासे सिंघव्यां ३१ संघमाला पहरी जिणमें माला २ गुमास्ते सालगराम महेश्वरीने पहराइ । पछे बडा आडंबरसु तलेटीरो मंदिर जुहार डेरां दाखिल हुवा । जाचक्रांने दान दीनो । पछे जीमण कीयो । साधर्म्यानें सिरपाव दीया । राजा डरे आयो । जिणनें हाथी सिरपावमें दीयो । दुजा मार्गमें राजवी नबाब प्रमुख आया डेरे, जिणाने, राजमुजब सिरपाव दीया । श्रीमुलनायकजीरे मंडाररे ताला ३ गुजरातीयारा था सु चोथो तालो संघव्यां आपरो दियो । सदावर्त सरू हैईज । ईसा २ मोटा काम करचा पछे संघ कुशलक्षेमसु अनुक्रमें राधणपुर आयो । जठे अंगरेज श्रीगोडीजीरा दर्शण करणने आयो। उठे पाणी नही थो सं गेबाउ नदी नीसरी । श्रीगोडीजीने हाथारे होदे विराजमान कर संघने दरशण दिन ७ इकलग करायो चढापेरा सादा तीन लाख रूपीया माया सवा महीनो रया, जीमण घणा हुवा । श्रीगोडीजीरे विराजणने बडो चोतडो पक्को करायो ऊपर छतरी बणाई । घणो द्रव्य खच्यों बडो जश आयो अक्षत नाम कीयो । साथे गुमास्तो महेश्वरी शालग- रांम हो जिणनें जैनरा शिवरा सर्व तीर्थ कराया। पछे अनुक्रमें संघ पाली आयो । जीमण १ करने दानमलजी कोटे गया पछे भाइ ४ जेसलमेर माया । डेरा दरवाजे बाहर कीया पछे सामलो बडा ठाठलं हुवो । श्रीरावलजी सामा पधाया। हाथीरे होदे, संघ- व्याने श्रीरावलजी आपरे पुठे बेषाणने सारा शहिरमें हुय देहरा जुहार ऊपाश्रये आय हवेल्या दाखल हुवा । पछे सर्व महेश्वरी वगैरे छत्तीस पानने लुगायां समेत पांच पकवान- सुं जीमाया । ब्राह्मणाने जणे दीठ रू० १ दक्षणारो दीयो पछे श्रीराउलजी जनांने सहित संघव्यारे हवेली पधाया। रूपीयांसुं चोतरो कीयो । सिरपेच कंठी मोत्यांकी कडा जडाउ दुशाला नगदी हाथी घोडा पालखी निजर कीया । पाछा श्रीरावलजी इण मुजव हीज शिरपाव दीयो। एक लोद्रवोजी गाम तांबापन्नां पट्टे दीयो इतो इजारो कीयो।

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जैन साहित्य संशोधक
[ भाग १
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आगे पिण इणारी हवेली-उदेपुर राणाजी, कोटेरा महारावजी, बीकानेररा किषनगढरा
बुंदीरा राजाजी इन्दोररा हुलकरजी प्रमुख सर्व देशांरा राजवी जनांने समेत इणारे घरे
पघाय देणो लेणों हजारांरो कीयो। दिल्लिो पातसाहरी अंगरेजारे पातसाहरी दीयोडी
सेठ पदवी हे सो विक्षातही ज है । पछे संघरी लाहण न्यातमें दीवी पुतली १
सोनेकी वाली १ मीश्री सेर १ घर दीठ दीवी। जीमण कीया पछे सेरमें ठावाठावाने
सीरपाव दीया । यढमहिला मंदिरां लोद्रवे ऊपाश्रये बडो चढापो कीयो इण मुजवही ज
उत्स्यपुर कोटे देणो लेणो कीयो । संघमें देहरासररो स्थ हो जणरा इक्कावन सो लागा।
गडा सोनें रूपेरा २ जिणरा दश हजार लागा मंदिरा सोने रूपेरी वासणारा १५
हजार लागा। दुजा फुटकर सराजांमरा लाख १ रू. लागा ।
हवे संघमें जावतो हो निणरी वीगत-तोफां ४, पलटनरा लोग ४०००, अशवार
१५००, नगारे नी साण समेत । उपुर राणाजीरा असवार ५०० नगारे निसाणे समेत ।
कोटेरा महारावजीरा अशवार १०० नगारे नीसाण समेत । जोधपुररे राजाजीरा अस-
वार ५० नगारे नींसाण समेत । पायदल १०० जेसलमेररा रावलजीरा, असवार २००
टुकरे नबाबरा, असवार ४०० फुटकर असवार २०० घरु ओर अंगरेजी जावतो, चपडा-
सी तिलंगा सोनेरी रूपेरी घोटेवाला जायगा २ परवानां बोलावा एवं पालख्या ७ हाथी
४ म्याना ५१ रथ १००, गाड्यां ४००, उंठ १५००, इतरातो संवव्यारा धरु । संघरी,
गाड्या उंठ प्रमुख न्यारा, सर्व खरचरा, २३०००००, तेवीसलाख रू. लागा ॥
इति संघरी संक्षेप प्रशस्ती लिखी।
ओर-पण ठीकाणे २ धर्मरा काम करया सो संक्षपे लिखीये छै-श्री धुलेवेनीरे
वारणे नोचत खांनो करायो गहणो चढायो, लाख १ लागा ।.मक्षीजीरे मंदिररो जीर्णोद्धार
करायो । उदेपुरमें मंदिर, दादासाहिबरी छतरी, धर्मशाला कराइ । कोटेमें मंदिर धर्मशाला
दादासाहिवी छतरी कराइ । जेसलमेरमें अमरसागरमें वाग करायो जिणमें मंदिर करायो
जयवंतोरो उपाश्रय करायो लोवेमें धर्मशाला कराइ, गढमाथे जमी मंदिरके लिये लीवी
बीकानेरमें दादासाहिवरी छतरी कराई इत्यादिक ठीकाणे २ धर्मरा आहीठाण कराया
श्रीपुज्यजीरा चोमासा जायगा २ कराया पुस्तकांरा भंडार कराया भगवतिजी प्रमुख सुण्या
प्रश्न दीठ २ मोती धन्या । कोटामें दोय लाख रूप्यादेकर बंदीखानो छोड़ायो वीज
पांचम भाठम इग्यारस चउदशरा उजमणा कीना इत्यादिक काम घरमरा कीया ओर कर
रयाहे । इत्यलम्॥
सवइयो ३१ सो-
शोमनीक जे साणमें बाफणा गुमानचंद ताके सुत पांच पांडव समान हे ।
संपदामें अचल वुद्धिमें प्रबल रावराणाही मानें जाकी कान है।
देवगुरु धर्मरागी पुन्यवंत वडभागी जगत सहु वात मानें प्रमान हे ।
देशहु विदेशमाह कीरत प्रकाश कीयो सेठ सउ हेठ कवि कर्त बखानहै ॥ १ ॥

अफ 21 जैसलमेरके पटयों के संघका वर्णन १११: ....... ....... .............Arrahna. - दुहा- अठारसे छन्चुवे जेठमास सुदि दोय । लेख लिख्यो अति चुप भवियण वांचो जाय ॥ १ ॥ सकल सुरि शिर मुगटमणि श्रीजिनमहेंद्रसुरिंद । चरणकमल तिनके सदा सेवे मिवियण बंद ॥ २ ॥ कीनो आग्रहथ की जेसलमेरु चोमास । संघ सहु भक्ति करे चढते चित्त उल्लास ॥ ३ ॥ ताकी आज्ञा पाय करि धरि दिलमें आणंद । ज्युं थी त्युं रचना रची मुनि केसरीचंद ॥ ५ ॥ भुलो जो परमादमें अक्षर घ टही बाघ । लिखत खटे आइ हुवे, सो खमीयो अपराध ॥ ५ ॥ ।। इति प्रशस्ति सम्पूर्णम् ।। के निकालनेवालेके वंशज आज भी इस कुटुंबने संवत् १९२८ में, जैसलमेर में जो माजूद ह और मालवाके रतलाम चगैरह शहराम एक बडा भारी प्रतिष्ठामहोत्सव किया था उसका उनकी बडी बडी दुकान चलती हैं । इस संघके लेख भी उपर्युक्त लेखवाले मंदिरमें लगा हुआ है। जैसा बडा संघ, इसके बाद जैन समाजमसें फिर यह लेख कुछ संस्कृत और कुछ मारवाडी भाषामें कोई नहीं निकला और शायद अब कोई निकाले है। संग्रहकी दृष्टिसे इस लेखको भी यहांपर प्रकट वैसी आशा भी नहीं है। कर दिया जाता है। " स्वस्ति श्रीविक्रमादित्यराज्यात् सम्बत् १९२८ शालीवाहनकृत शाके १७९३ प्रवर्तमाने मासोत्तममासे माघमासे धवलंपक्षे त्रयोदश्यां तिथौ गुरुवासरे महाराजाधिराज महारावलजी श्री श्री १००८ श्री वैरीशालजी विजयराज्ये श्रीमज्जेसलमेरुवास्तव्य ओस- वंशे वाफना गोत्रीय संघवी सेठ गुमानचंदजी तत्पुत्र प्रतापचन्द्रजी तत्पुत्र हिमतरामजी जेठमलजी नथमलजी सागरमलजी उमेदमलजी तत्परिवार मूलचंद सगतमल केसरीमल रिपभदास मांगीदास भगवानदास भीखचंद चिंतामणदास लुणकिरण मनालाल कन्नैयालाल सपरिवार- युतेन आत्मपरकल्याणार्थ श्रीसम् क्त्योद्दीपनार्थं च श्री जेसलमेरुनगरसत्क अमरसागरसमीपव- तिनि समीचीनाSSरामस्थाने श्रीरिपभदेवजिनमंदिरं नवीन कारापितं तत्र श्री आदिनाथ विवं प्राचीन बृहत्खरतरगणनाथेन प्रतिष्ठितं तत् श्रीजिनमहेन्द्रसूरि पदपंकजसेविना वृह- रखरतरगणाधीश्वरेण चतुर्विधसंघसहितेन श्रीजिनमुक्तसूरीणां विधिपूर्वमहता महोत्सवेन शो- भनल ने श्री.मूलनायकत्से स्थापित । पुनः अनेक विधानामजनशिलाका कारिता । पुनर्दुतीयभुमिपासादे स्वप्रतिष्ठित श्री पार्श्वनाथवि मुलनायकस्थापितं पुनींश विहरमान प्रतिष्ठा कृतं मंदिरस्य दक्षिणपाधैं दादासाहित्र कुशलसूरि गुरुमूर्ति स्थापनकृता । तथाच जिनदत्तसूरि कुशलसूरि चरणपादुका पुनरपि श्रीनिनहर्पसूरि महेन्द्रसूरि चरणपादुका स्थापिता। माई साईरामजीके घरका आया । रतलामसुं चि० सोभागमल चांदमल सौभाग्यमलकी माजी वगेरे आया । उदेपुरसुं चि० सिरदारमल तथा इणारी माजी वगेरे आया । ओर .

जैन साहित्य संशोधक [भाग १ nervuvons wwww पण घणे देशावरांसु संघ आयो । स्वामीवच्छल प्रमुखकरी ३ श्रीसंघकी भक्ति करी । त्था पांच शिप्याने श्रीपूज्यजी म्हाराजके हांथसें दीक्षा देराइ । दिन १५ तक बडो ठाठ उछत्र नित्य नवीन पूजा प्रभावना हुइ । श्रीदरबार साहिब पधाया । तोफांका फेर हुवा । सेठांके पगमें सोनो वासीयो। फेर श्रीसंघसमेत जैसलमेर आया: उजमणा प्रमुख कीना । श्री- पूज्यजी महाराजकी पधरावणी २ कीनी जिणमें हजारा रुसीयांको माल असबाब भेट कीनो । उपाध्याय दंगरे ठावा ठावा ठाणानें रोकडा शालजोडी इत्यादि यथायोग्य दीना। उपाध्याय साहिबचंदजी गणि । पं. । प्र.। मेरजी गणि पं. प्र. अमरचंदजी गणि प्रमुख ठाणा ४१ था । ठाणे दीठ रू. १० दश रोकडा थांन प्रत्येके दीना । परगच्छय यति- यांको सतकार अछीतरे कीनो । श्रीसरकारकी पधरामणी कीनी । घोडा लवाजमो नजर कीनो । मुसद्दी वगेरे सर्वनें यथायोग्य शिरोपाव दीना ।। श्रीजिनभद्रसूरि शाखायां पं. प्र. श्रीमयाचंदजी गणि तशिष्य पं. सरूपचंदजी मुनि जेसलमेरु आदेशिना इयं प्रशस्ति रचिता । शिलावट विरामके हाथलु श्रीमंदिरजी वणिया जिणके परिवारने सोनेकी कंठियां स्था कडीकी जोड़ियां मंदील डुट्टा थान वगेरे शिरसाव दीना ।। श्रीमंदिरके मूल गुंभारेमें आसेपासे दक्षणकी तर्फ परतापचंदजीकी खडी मूर्ति छ । उत्तरकी परतापचंदजीकी भार्याकी खड़ी मूरती छ । निजमंदिरके सामने पूर्वकी तर्फ पश्चिममुखी चोतरो कराय जिण ऊपर परतापचन्दजीकी त्था भार्यासहित सपरिवार सही- तकी मुरतीयां स्थापित किनी । सम्वत् १९४५ मिति मार्गसिर सुदी २ वार बुध । दशकत सगतमल जेठमलाणी वाफनाका । शुमं । दुहा-अष्टकर्म वन दाहके भये सिद्धजिनचंद । ता सम जो अप्पा गिणे ताकुं वंदे चंद ॥ फर्मरोग ओपघसमी ज्यानसुधारस वृष्टि । शिवसुख अमृत वेलडी जय जय सम्यक्दृष्टि ।। एहीज सद्गुरु सीख छे एहीज शिवपुर माग । लेजो निज ग्यानादि गुण करजो परगुण भाग । भेद ग्यान श्रवण भयो समरस निरमलनीर । अन्तर घोबी जातमा धोवे निजगुण चीर ॥ कर दुःख अंगुरी नेनदुःख तन दुःख सहज समान । लिख्यो जात है कठणसु शठ मानत माशान ॥ ॥ इत्यलम् ॥ - अंक २] शोक समाचार ------------ ....... .. ........... --- -~-~-~~~- ~~ शोक समाचार । पालीमापा और बौद्ध साहित्यके प्रधानाध्यापक महाशय रीज डेडिके पास भेजे गये थे । इन परीक्षक महाशयने सतीश चन्द्रजीक वे परीक्षापत्र जैन साहित्य संशोधकके पाठकोंको यह समा- पढकर कलकत्ता युनिवर्सिटीके रजीस्ट्रारको लि- चार देते हुए हमें वडा दुःख होता है कि, कलकत्ता खाता कि-इनका पाली भापाका ज्ञान सर्वोत्तम नगरके प्रसिद्ध विद्वान् महामहोपाध्याय डॉ.सतीश- दुर्जेका है । इसके बाद आपको वहांसे बदली हुई चन्द्र विद्याभूषणजीका गत तारीख २५ अप्रैलको और फिर आप प्रेसीडेन्सी कालेजके सिनियर प्रो- असमयहीमें स्वर्गवास हो गया । विद्याभूपणजी फेसर बनाये गये। भारतवर्षके नामी विद्वानामसे एक थे। आप अंग्रे- सन् १९०५ में जब वौद्ध तीथाकी यात्रा करनेके जी भापाके तो आचार्य (एम्. ६) थे ही, साथमैं लिये घी-सी-लामा हिन्दुस्थानमें आये तब भार- संस्कृत. प्राकृत, पाली, तिव्यती आदि भाषाओंके तसरकारने आपको लामा महोदयके साथ घूम भी उत्तम ज्ञाता थे। ब्राह्मण, बौद्ध और जैन धर्मके कर उन्हें भारतके बौद्ध तीर्थोका ऐतिहासिक मह- दर्शन शास्त्रों में आपकी उल्लेख योग्य गति थी और त्व समझानका काम दिया । आपने यह काम इत- पुरातत्त्व शास्त्रके आप अच्छे पण्डित थे। आप नी उत्तमताके साथ किया कि जिससे लामा महा- स्वभावके बडे सरल और हृदयसे परे निष्पक्षपात शयने सुप होकर, प्रेमोपहारके रूपमें आपको एक थे। ज्ञानार्जन करना ही आपका परम ध्येय था। रेशमी चादर-जिसे वे लोग खाताग' करते आपका विद्याव्यासंग आश्चर्यजनक था। अंग्रेजीकी हैं-लमर्पित की । आपकी इस प्रकारको सब वि. एम्. ए. परीक्षा पास करनेके पहले ही संस्कृत भा- पयोमें निपुणता देखकर भारत सरकारने आपको पामें आपने इतनी व्युत्पत्ति कर ली थी कि जिससे महामहोपाध्यायको उत्तम पाण्डित्य और सम्मान- नवद्वीप-विबुध-जन-सभाने प्रसन्न होकर आपको सूचक पद्वी प्रदान की। विद्याभूषण' की पट्टी प्रदान की थी । एम्. ए.पास इसी अरसेम आपने 'मिडिवल स्कूल आफ दि करनेके बाद कुछ काल तक आप कृष्णनगर काले इन्डियन लॉजिक' नामक जैन न्याय और बौद्ध जमें संस्कृतके प्रोफेसर रहे । इसी समयके मध्यमें न्यायके इतिहास विषयकी प्रसिद्ध पुस्तक आपने काव्य और न्यायशास्त्रका अभ्यास भी लिखी जिसके कारण कलकत्ता युनिवर्सिटीने आ- आगे बढाया; और साथमै तिब्बती भाषाका ज्ञान पको 'डाक्टर आफ फिलासफी'की प्रधान उपा- भी संपादन किया । आपकी इस योग्यताको देख- घिसे सम्मानित किया। कर वंगालकी सरकारने आपको तिव्यती भापका सन् १९०९ में, बंगाल सरकारने आपको बौद्ध अनुवादक नियन किया.और साथमें उसका एक धर्मका सविशेष प्रत्यक्ष ज्ञान संपादन करनेके शब्दकोप बनानेका काम दिया। यह काम आपने लिये लंका भेजा । वहां पर, सुमंगल स्थविर-जो बडी योग्यताके साथ समात किया। इससे सरका- लंकाके प्रधान बौद्ध स्थविर और कोलंबोके वियो- रने आपको फिर कलकत्ता-संस्कृतकालेजके अ. दय कालेजके अध्यक्ष थे-के पास उस विषयका ध्यापकके पदपर नियुक्त किया। वहां आपने तलस्पर्शी ज्ञान संपादन किया। वहांसे फिर आप अध्यापकी करते हुए पाली भाषाके अध्ययनका बनारस पहुंचे और वहां पर न्याय आदि दर्शन प्रारंभ किया और सन् १९०१ में उसकी एम्. ए. शास्त्रोम उत्तीर्णता प्राप्त की। की परीक्षा देकर उसमें प्रथम श्रेणिमें प्रथम नम्बर फिर १९१० में आप कलकत्ता संस्कृत कालेजके प्राप्त किया। आपके इन परीक्षापत्रोंकी जांच कर प्रधानाध्यापक बनाये गये और तबसे आखिर तक नेवाला उस समयमै भारतमें वैसा कोई विद्वान् आप इसी पद पर प्रतिष्टित रहे। इसके सिवाय, नहीं था इस लिये चे पत्र लन्दनविश्वविद्यालयके साहित्य और शिक्षा विषयक अने सभा-सोसाटि- जैन साहित्य संशोध [ भाग योके आप अध्यक्ष और सदस्य आदि समय समय छपकर प्रकाशित हो जाय तो तुरन्त उसकी एक पर नियुक्त किये गये थे। प्रति आपके पास भेज दी जाय, कि, जिससे आप कलकत्ते, शास्त्रविशारद जैनाचाय विजयधर्म- आपनी जैन न्यायके इतिहास विषयक उपर्युक्त सूरिजीस आपकी मुलाखात हो गई थी जिससे पुस्तककी दूसरी आवृत्तिमें, जो वर्तमानमें छप रही आपको जैनसाहित्यसे भी बहुत कुछ परिचय है, हरिभद्र सूरिके समयवाला -ल्लेख टीक सं. मिल गया था। आप उक्त जैनाचार्यजीके बडे शोधित कर दिया जा सके। परन्तु खेद है कि, प्रशंसक थे और उनकी प्रेरणासे आपने कलकत्ता- हमारे उस.निवन्धके प्रकाशित होनेके पहले ही, विश्वविद्यालयके पठनक्रमम जैनसाहित्यको भी गत २५ अप्रैलको आप इस क्षणभंगुर संसारको कुछ स्थान दिलाया था । जैन न्यायके इतिहास छोडकर स्वर्गमें जा बसे । विषयक उपर्युक्त पुस्तकके सिवाय जैनसाहित्यक थापकी इस अकालमृत्युसे भारतवर्षके विद्या- प्रथम तर्क ग्रन्थ न्यायावतारका आपने अंग्रेजी में व्यसनी विद्वानोमसे एक बडी भारी व्याचि अदृश्य अनुवाद भी किया है। भारतके दर्शन शास्त्रोके हो गई और जैन साहित्यका एक प्रतिष्ठित और इतिहासम आपको वडारसथा और इस लिये इस प्रामाणिक पण्डित लुप्त हो गया ! विषयमै आपने अंग्रेजी और आपनी मातृभापा [२] बंगलामें अनेक छोटे बडे निवन्ध लिखे हैं । हमें इन पंक्तियोंके लिखते हुए अत्यन्त दुःख होता जैन साहित्यविषयक आपका प्रेम देख जैन स- है कि, इस पत्र के प्रथम अंकमें, जिन प्रो० सी. माजने भी आपका यथोचित गौरव किया था। वी. राजवाडेका जैनधर्मका अध्ययन' शीर्षक लेख सन् १९९३ में बनारसमें जो अखिल भारतीय प्रकट हुया है और जिनका संक्षिप्त परिचय हमने दिगम्बर जैन महासभाका अधिवेशन हुआ था उसी अंकके 'सम्पादकीयविचार' वाले एक नोट- उसके आप अध्यक्ष बनाये गये थे और सभाने में दिया है, वे आज इस संसारमें नहीं है । गत ८ आपको जैनसिद्धान्त महोदधि की उपाधि समर्पित मईको नाशिकमै जहां, पर आरोग्यप्राप्तिके लिये पि. कर सत्कृत किया था । इसके अगले वर्ष जव छले कुछ महिनीले आय विश्रान्ति ले रहे थे, आपका जोधपुर में जैनसाहित्य सम्मेलन हुआ तब भी आप शरीरपात हो गया।जैन साहित्यसंशोधकके गतांकमें उसके सभापति नियत किये गये थे। प्रकाशित उक्त लेख और हमारे नोटको आप देख गतवर्ष जव यहां पर (पूनेमें ) प्रथम प्राच्यवि- भी नहीं पाये । यह किसको कल्पना थी कि इस द्यापरिषद्' हुई थी तब आप यहां पर भी आये थे प्रस्तुत अंकम हमें अपने पाठकोंको आपका कोई और परिपके पालीभाषा और बौद्धसाहित्य विषय- विशिष्ट लेख भेंट करने के बदले आपकी मृत्युके क विभागके अध्यक्ष बनाये गये थे। उस समय लिये दुःखोद्गार भेंट करने पड़ेंगे। कालस्य कुटिला हमारी भी आपसे भेंट हुई थी और परिपदमें जब गतिः । 'हरिभद्रसूरिका समय निर्णय विषयक हमारा लेख राजवाडेजी वडे बुद्धिशाली और एक होनहार पढा गया तव खास तौरसे उसे सुनने के लिये आप विद्वान् थे । आपको ग्रेज्युएट हुए अभी पूरे १० वर्ष यहां पर उपस्थित हुए थे। हरिभद्रसूरिके समयके भी नहीं हुए थे। सन् १९१२ में यहां (पूना) के विषयमे आपका और हमारा मतभेद था । इसलिये फर्ग्युसन कालेजमें अध्ययन समाप्त कर आपने इस विषयमें खास चर्चा करनेके लिये. उक्त परि- वी. एस्. सी.की डिग्री प्राप्त की और १९१४ में पदकी समाप्तिके दिन आप उत्कंठापूर्वक हमारे पाली और अंग्रेजीकी एम्. ए. परीक्षा पास की। स्थानपरं भी आये थे; और बहुतसी बातचीत कर इसके बाद तुरन्त ही आप बरोडा कालेजमें पाली बडे प्रसन्न हुए थे। चलते समय आप हमसे और अंग्रेजीके प्रोफेसर नियुक्त दृए। वहां आपने आग्रह कर गये थे कि, जब हमारा उक्त निवन्य अपने अध्यापन कार्यके सिवाय पालीसाहित्यके अंक २] शोक समाचार ११५ va................... .." ...----.. G vs vvvvvvvv www. प्रकाशनका कार्य भी शुरू किया। आपकी यह बडी आपके पास नाशिक भेजे, तब आप अधिक उत्कट इच्छा थी कि समन पाली साहित्य देव- अस्वस्थ होनेके कार। आपके सम्बन्धियोंने उन नागरी लिपिमें छपाकर प्रकट किया, जाय, ताकि ग्रन्थोंका आपसे जिकर न करके ज्यों के त्यो एक जिससे भारतवासी, जो आज पिछले डेढ हजार किनारे रख दिये । पीछेसे जब आपको उसकी वर्षसे इस अनन्यतुल्य साहित्यका परिचय भुले खवर लगी तब आप बहुत अधीर हो उठे और हुए हैं -पुनः परिचय प्राप्त कर सकें और उसके विना उन ग्रन्थोके दर्शन किये और पन्ने उलट-पुलट द्वारा सम्यक सम्बुद्ध भगवान् गौतम बुद्धके अमूल्य किये आपको चेन नहीं पडा। उन अन्योको देखते उपदेशोका आस्वादन कर सकें। इससे आपने ही आपने हमको, वैसी अस्वस्थतामें भी एक पत्र सबसे पहले 'हत्थवनगल्लविहारवंस' नामकी एक लिखा और पुस्तकोंकी प्राप्तिक लिये प्रसन्नता प्रटक छोटीसी पाली पुस्तिका छपाई और उसके बाद 'म- की। इसीका नाम सञ्चा विद्याव्यासंग है। झिमनिकायका एक भाग प्रमटकिया। इसी बीचमें आपने विविध परिशिष्ट और उपयुक्त टिप्पणियोंके ले जाकर भारतवर्षके एक तेजस्वी विद्वत्ता- क्रूर कालने इस प्रकार असमयहीमें आपको साथ 'दीर्घनिकाय' का समग्र अनुवाद भी अपनी रकको उदित होने के पहले ही अस्तंगत कर दिया । मातृभाषा मराठी में किया। इसका-एक भाग बडौदा आपकी अमर आत्माको अक्षय शांति मिले यही राज्यकी औरसे प्रकाशित होनेवाली ग्रन्थमालामै हमारी आपके लिये आन्तिम प्रार्थना है। प्रकट भी हो चुका है। आप शीघ्र ही, अपने सहा- ध्यायी और सहकारी प्रो. बापट(फर्ग्युसनकालेज, [३] पूना) और प्रोः भागवत (सेंट झेवियर कालेज गत जुलाई मासिकी अंतिमरात्रि भारतवर्षके बम्बई)के संयुक्त परिश्रमसे प्रसिद्ध बौद्धग्रन्थ विसुः इतिहासमै वडी दुःख और खेदजनक रानि मानी द्धिमग्गकी एक सर्वोत्तम देवनागरी आवृत्ति प्रकट जायगी । क्यों कि उस कालरात्रिके दुःखोत्पादक करनेकी तैयारी कर रहे थे। अधम वातावरणने भारतके द्वितीय प्रतापवान् और प्रकाशपूर्ण प्रदीपको सदाके लिये निर्वाणाव- आयका विद्याव्यासंग बडा उत्कट था । अंग्रेजीके स्थामें पहुंचा दिया। हमये शब्द अपने लोकमान्य आप आचार्य थे ही, साथमें आप जर्मन और फ्रेंच बाल गंगाधर तिलक महोदयको मृत्युको लक्ष्य कर भाषाओंका भी अपेक्षित ज्ञान रखते थे। भारतीय कह रहे हैं। लोकमान्यका अधिक परिचय देनेकी भाषाओं में संस्कृत, पाली, प्राकृत जैसी प्राचीन और कोई आवश्यकता नहीं क्यों कि भारतमें ऐसा कोई शास्त्रीय भाषाओंका यथेष्ट अध्ययन कर आपने अभागा प्राणि नहीं है जो लोकमान्यको थोडा बहुत बंगाली, गुजराती, हिन्दी जैसी वर्तमान देशभापा' नहीं जानता हो । और वाकी यो आपका पूर्ण प. ऑमें भी आवश्यकीय प्रवेश कर लिया था। रिचय देनेकी शक्ति भी किसमें है। चाहे जितना जबसे आपका हमारे साथ परिचय हुआ तबसे भी लंबा परिचय लिखा जाय तो भी वह हमेशा जैनसाहित्यका विशिष्ट अध्ययन करनेकी भी आपकी अपूर्ण ही रहेगा। तीव्रलालसा होगई थीनिसाहित्यसंशोधकके लिये आपमें जिन अनेकानेक उत्तमोत्तम शक्तियोंने आपने जैन और बौद्ध साहित्य विषयक तुलनात्मक आकर निवास किया था, उनमसे एक एक शक्ति लेखमालाके लिखनेका सोत्साह स्वीकार किया ही मनुष्यको संसारमें पूज्य और मान्य बना सक- था। जैन-ग्रन्थोके प्राप्त करनेको आप कितनी उ. ती है, तो फिर ऐसी अनेक शक्तियोंके केन्द्रभूत कट आकांक्षा-रखते थे इसका परिचय तो पाठ बने हुए आपके महान व्यक्तित्वकी पूज्यता और कोको हमने गतांको जो नोट दिया है उससे मिल मान्यताका तो माप ही कैसे किया जाय । आप सकेगा । भावनगरसे हमारे एक सज्जन (श्रीयुत क्या नहीं थे ? आप प्रकाण्ड प्रतिभाशाली थे, उ. हीरालाल अमृतलाल शाह ) ने कुछ जैन ग्रन्थ जब त्वष्टं सदाचारी थे, परम परोपकारी थे, अगाध जैन साहित्य संशोधक [भाग १ ANA . ANAmrohnANAA.ANANA.. ^^^^^har ...Arr. A - वाली । धैर्यवान् थे, आदर्श कर्तव्यवान् थे, असाधारण तिलक महाशयके इस सिद्धान्तकी, जर्मनीके ज्ञानवान थे, महान देशभक्त थे, अनुपम लोकप्रि. विद्वान् डॉ. जेकोबीके सिद्धान्तसे अचिन्त्य समान- य थे, सर्वोत्तम राष्ट्रसूत्रधार थे, गंभीर राजनीतिज्ञ ता हो गई थी। क्यों कि डॉ. जेकोबी भी अपनी थे, संपूर्ण स्वार्थत्यागी थे, निष्काम कर्मयोगी थे, स्वतंत्र गवेषणाद्वारा वेदोंका रचना समय लगभग धुरंधर लाहित्य लेची थे, उत्तम लेखक और नि. वही स्थिर कर सके जो तिलक महाशयने किया। पुण वक्ता थे; लब कुछ थे और संपूर्ण रीतिले श्रे। इससे पुरा तत्त्वज्ञोंमें आज यह सिद्धान्त तिलक- जैन साहित्य संशोधकके कार्य क्षेत्रकी विशि- जेकोबी (Tilak-Jacobi theory) के संयुक्त प्रताको लक्ष्य कर, हम यहां पर आपकी अनेकानेक नामले व्यवहत होने लगा है। शक्तियोंमेसे केवल उस एकही शक्तिका संक्षिप्त उ ऐसा ही अनुसन्धानात्मक दूसरा ग्रन्थ आपका ल्लेख करते हैं जिसके कारण आप संसारमें एक 'वेदोंमें आर्योंका उत्तर ध्रुवनिवास ( The Arct- श्रेष्ठ विद्वान् माने गये । वह शक्ति आपकी अत्यंत is Home in the Vedas ) ' है । यह ग्रन्थ सन् सूक्ष्म संशोधक बुद्धि-गहन गवेषणाशक्ति थी। आप- १८९७ में जब आपको दूसरी वार कारागृहवास की इस संशोधक बुद्धिका जर्मनी, इंग्लैंड और मिलाथा तब लिखा गया था। वेद, ब्राह्मण आदिसं. अमेरिकाके विद्वानों तकने गौरव किया है । विद्वा. स्कृत ग्रंथ, पारसियोंके जिन्द-अवेस्ता ग्रन्थ और नोंको आपकी इस शक्तिका प्रथम परिचय सत् पश्चिमीय विद्वानों ने लिखे हुए भूगर्भविद्या सम्ब- १८९२ में मिला था। उस वर्ष लण्डन नगरमें होने• न्धी नवीन प्रन्थोंका सक्ष्म अध्ययन और मनन प्राच्य विदोंकी आंतरराष्ट्रीय परिषद् कर आपने इस ग्रन्थकी रचना की है । इस ग्रन्थमें (The International Congress of Orienta• आपने वेद, ब्राह्मण, पुराण, अवेस्ता इत्यादि शा- list.) में वेदोंकी प्राचीनताके विषयमें आपने एक स्त्रोके अनेकानेक प्रमाण देकर, यह प्रतिपादित गहन गवेषणा और अत्यन्त अनुसन्धानपूर्ण किया है कि वेदकालीन आर्य लोग उत्तर ध्रुवके मौलिक निबन्ध भेजा था जो फिर अगले वर्ष प्रदेशमें निवास करते थे । कारागृहमें बैठे बैठे, इस (सन् १८९३) ओरायन (ORION)' के नामसे प्रन्थ लिखने के लिये अपेक्षित साधनोंके अध्य- पुस्तकरूपमें प्रकाशित किया गया था। इसपुस्तकमै थन-मनकी अनुमति सरकारने आपको प्रो. मेक्ष- आपने ज्योतिष शास्त्र के नियमानुसार नक्षत्रोंकी गति मुलरके अनुरोधसे दी थी। पीछेले उन्हीं प्रोफेसर ऊपरसे यह बतलाया है कि, ऋग्वेदमें जो 'ओरा- महोदयके विशेष परिश्रम और प्रयत्नले सरकारने यन= आग्राहायण नक्षत्र संबंधी ऋचाय मिलती आपको असमय ही में बन्धनमुक्त भी कर दिया था। हैं उनसे उनका रचना समय कमसे कम ई. स.से कारागृहमसे निकले बाद आपने उक्त प्रो. को एक ४००० वर्ष पूर्व होना सिद्ध होता है । आपकी इस कृतज्ञतापूर्ण पत्र लिखा जिसमें अपने किये हुए गवेषणाको पढ कर प्रो. मेक्षमुलर, विटनी, देबर, इस नवीन अनुसन्धानका कितनाएक उपयुक्त सार बुल्हर और व्लुमफील्ड जैसे प्रख्यात संशोधक भी लिख भेजा । इस सारको पढ कर प्रोफे- विद्वानोने आपकी शोधक वृद्धिकी उत्तम प्रशंसा सर महाशयने तिलक महोदयको लिखा था कि की थी। डॉ. ब्लूमफील्डने तो आपकी इस गवेष- कितनीएक वैदिक ऋचाओंका अर्थ आपके णाको “ विज्ञान और संस्कृतके जगत्में एक हल- बतलाए मुताबिक ठीक हो सकता है;परंतु कदाचित् चल मचादेनेवाली घटना " वतलाई थी और क- उनके आधारपरसे निकाला हुआ सिद्धान्त भूस्तर हा था कि "निस्सन्देह, इस पुस्तकसे साहित्य शास्त्र के सिद्धान्तके साथ मेल नहीं खायगा, ऐसी संसारके आगामी वर्प, खूब सनसनी फैल जाय- मुझे शंका है।" खेद है कि तिलक महाशयके इस गी। इल वर्ष, इतिहासको तिलककी खोजके फल-प्रन्थके प्रकाशित होनेके पहले ही-यह ग्रंथ सत् को अपनाने ही में सारा समय लगा देना होगा।' १९०३ में प्रकाशित हुआ-प्रो. मेक्षमुलरका देहान्त 818 अंक २] शांकसमाचार ११७ होगया, जिससे उनके अधिकारयुक्त अभिप्रायसे लिखा, जो आज भारत के प्रत्येक धर्मजिज्ञासु थापका यह ग्रन्थ वञ्चित रहा । परंतु, दूसर विवा- जनके परम विराजमान हो रहा है तथा प्रत्येक नाने आपकी इस कृतिका भी खूब लत्कार किया। विद्वान् और विद्यार्थीके लिये एक अत्यावश्यक बोस्टन विश्वविद्यालयके यध्यक्ष डॉ. वारिनने इस पाठ्य ग्रंथ बन रहा है । इस प्रन्यमें आपने अपने पुस्तक विषयमें कहा था कि " इन्डो-इरानी वि. जीवनके समग्र विचार स्रोतोंको एकत्र कर शाल द्वानोंने जितनी पुस्तके इस विषयपर आजतक रूप महासरोवरके रूपमें बद्ध कर दिया है । पूर्वीय लिखी हैं उन सबमें यह पुस्तक अधिक निश्चया- और पाश्चात्य तत्त्वज्ञानकी सभी मुख्य मुख्य विचार- त्मक हैं । जो कोई स्वर्गीय मि. नील की 'देव रात्रि श्रेणियाँका गंभीर मन्धन कर आपने इस अमूल्य ( The night of Gods )' का और इस पुस्तक- ग्रन्थरत्नको प्रकट किया है। आपके नामको अजरा- का पारायण कर लेगा वह संभवतः फिर कसी मर बनानेवाला केवल यही एक अन्धरत्न प- यह न पूंछेगा कि आयोंका आदिम निवासस्थान याप्त है। कहां है।" आपको जब सन् १९०८ में तीसरी बार जेलया. आपके देह विलयसे संसारका एक श्रेष्ट और त्राका हुक्म हुथा तब मंडालेके एकान्तवासमें बैठ प्रखर ज्योतिःपूर्ण ज्ञानस्वरूप महानक्षत्र अस्त कर मापने वह गीतारहस्य अथवा कर्मयोगशास्त्र हो गया।

११८ जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ A. .. । चित्र-परिचय। कुंभमेर ' हैं । दूसरा स्तंभ यह जैन कीर्तिस्तंभ है। 'कुंभमेरु' की अपेक्षा यह जैन कीर्तिस्तंभ बहुत प्राचीन है और पुरातत्त्वज्ञाने १२ वीं या १२ १-गत अंकमें जो दर्शनीय चित्र दिये गये हैं वीं शताब्दीमें इसके बननेका अनुमान किया है। उनमें पहला रंगीन चित्र पावापुरीके जलमंदिरका यह किसी दिगम्बर जैनका बनाया हुआ है। क्यों- है । पावापुरी पटना जिलेकी सुवे विहार तहसील. कि इसमें जो जिनमूर्तिमा लगी हुई हैं वे दिग- का एक छोटासा गांव है। जैन समाजकी मान्यता स्वर हैं। अनुसार श्रमण भगवान् श्रीमहावीर देवकी निर्वाण यह स्तंभ ८० फीट ऊंया है । समुद्रकी सतहसे भूमि यही पावापुरी है । इस लिये जैनियोंका यह इसकी ऊंचाई १९०० फीट और नीचेकी जमीनसे एक परम पवित्र तीर्थस्थल है। इस गांवके पास ६०० फीट है । यह किलेकी सबसे ऊंची भूमिपर एक कमलसरोवर नामका अच्छा तालाय है । इस बना हुआ होनेसे इसका शिखर किले के सभी . तालाबमें हमेशा असंख्य कमलपन खिले रहते हैं मकानोसे ऊंचा दिखाई देता है । इसके शिखरका इसलिये इसका नाम भी कमलसरोवर पड गया जीर्णोद्धार हाल हीमें-दस बारह वर्ष पहले-सर- है। इस सरोवरके मध्यमें एक भव्य मंदिर चना कारने वडा खर्च करके करवाया है। सारे हिंदु- हुआ है, जिसमें संगमर्मरके बन हुए भावान् म- स्थानमें जैनियों का यही एक मात्र महत्त्वका पुरात- हावीर स्वामीके पूजनीय चरणोंकी स्थापना की न कीर्तिस्तंभ मौजूद है। इसका समत्र ऐतिहासिक हुई है। मंदिर बडा खुबसूरत और दर्शनीय है। वर्णन आगेके किसी अंकमें, एक स्वतंत्र लेख द्वारा भावुक मनुष्योंके हृदयमें वहां पर जानसे बड़ी पाठकोंको सुनायेंगे। भक्ति उत्पन्न होती है और कुछ काल तक वहां पर चित्रमें जो दो जुदा जुदा ब्लाक हैं उनमें दाहि. वैठ कर ध्यान धरनेसे अपूर्व शान्ति प्राप्त होती है। नी तरफवाला ब्लाक स्तंभकी उस अवस्थाका द. इसी मंदिरका वह सुन्दर चित्र है। चित्र में र्शन करा रहा है जब उसके शिखरका जीर्णोद्धार दिर, सरोवर, आसपासके किनारों पर लगे हुए नहीं किया गया था। वाई तरफका दृश्य जीणों- वृक्ष, इत्यादि सभीका मनोहर दृश्य दिखाई दे रहा द्धारके अनन्तरका है। है। आरा निवासी उत्साही जैन युवक श्रीयुत कु ३-इस अंकमे करहेडाके पार्श्वनाथ जैन मंदि- मार देवेंद्र प्रसादजीने अपनी ओरसेही वह चित्र रका चित्र दिया जाता है । यह गांव उदयपुर [ मे- जैनसाहित्यसंशोधकके पाठकोंको भेंट किया है। चाड ] राज्यमें आया हुआ है और चितोड-उदय. तदर्थ आप साधुवादके पात्र हैं। पुर रेल्वे लाईनके बीच पड़ता है। गांव बिल्कुल २-गतांकका दूसरा हाफटोन चित्र, भारत प्र. छोटासा मामुली है। गांवसे वहार, कुछ फासले सिद्ध वीरभूमि चितोड नारीके समीपमें रहा हुआ पर यह मन्दिर बना हुआ है । मन्दिर ५२ जिनालय इतिहास प्रसिद्ध चितोडगढ (किल्ला ) मैके एक है और वडा भव्य है । मन्दिर में पार्श्वनाथ तीर्थकर अति प्राचीन जैन कीर्तिस्तंभ ( Jain Tower.) की मनोहर मुर्ति प्रतिष्ठित है। ..पुराने लेखों में इस का है। चितोडके किलेमें दो कीर्तिस्तंभ जिनमें गांवका नाम 'करहेटक ' ऐसा लिखा हुआ मिल. एक जो अधिक ऊंचा और विशेष प्रलिद्ध है वह ता है । यह मन्दिर १४ वीं शताब्दीके लगभगका १५ वीं शताब्दी में सुप्रसिद्ध राणा कुंभा द्वारा ब- बना हुआ अनुमान किया जाता है। ऐतिहासिक नाया गया है और इससे उसका असली नाम वर्णन फिर कभी दिया जायगा। . NAR

जन माहित्य मंशोधक
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महामहोपाध्याय डॉ. सतीशचंद्र विद्याभूपण, एम. ए. पी. एच डी।

जैन साहित्य संशोधक
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स्वर्गीय श्रीमान् बाल गंगाधर तिलक ।

नमोत्थु ण समणस्स भगवो महावीरस्स। जैन सा हि त्य संशोधक MARA hAAAAAA.. 1-44-4AAAAAPPAN.. भाग १] गुजराती लेख विभाग [अंक २ AARAANAANm सोमप्रभाचार्य विरचित कुमारपाल प्रतिबोध । (अन्य परिचय ) [घडोदराना विद्याविलासी नृपति श्रीसयाजीराव गायकवाड सरकार तरफथी, ‘गायकवासस् ओरिएन्टल सीरीझ' नामे ५-६ वर्षथी एक अन्थमाला प्रकट थवा लागी छ जेनी अंदर संस्हंत, प्राकृत, अपभ्रंश आदिभापामओमा लखापला प्राचीन अने दुर्लभ्य प्रन्यो प्रकाशित थाय छे. ए ग्रन्थमालाना मूल उत्पादक अने मुख्य संपादक स्वर्गस्थ विद्वान् श्रावक श्रीयुत चिमनलाल डाह्याभाई दलाले पाटण अने जेसलमेर (राजपूताना ) नौ जूना जैन पुस्तक भंडारोनुं सूक्ष्म निरीक्षण करी माथी केटलाक उत्तम अने अलभ्य-दुर्लभ्य जैन ग्रंथो, उक्त सीरीझमां प्रकट करवा माटे खास चुटी काढ्या इता. ए ग्रंथोमां सोमप्रभाचार्यरचित कुमारपाल प्रतियोध नामनो पण एक प्राकृत भाषामय मोटो ग्रंथ छ जेनु संपादन कार्य स्वर्गस्थ भाई दलाले घणा आग्रहपूर्वक मने सोप्यु हतुं. ए ग्रंथ हवे छपाईने तैयार थयो छ. एनी प्रस्तावना जे मारा तरफथी लखवामां आवी छे, ते जैन साहित्य संशोधकना पाचक्रोने खास वांचंचा लायक होवाथी, अत्र प्रकट करवामां आवे छे. मूल पुस्तकमां आ प्रस्तावनानो इंग्रेजी अनुवाद तथा संस्कृतसार आपवामां आन्यो छ.-मुनि जिनविजय।] स्तुमस्त्रिसन्ध्यं प्रभुहेमसूरेग्नन्यतुल्यामुपदेशशक्तिम् । अतीन्द्रियज्ञानविवर्जितोऽपि यः क्षोणिभर्तुय॑धित प्रबोधम् ।। सत्त्वानुकम्पा न महीभुजां स्यादित्येप क्लुप्तो वितथः प्रवादः । जिनेन्द्रधर्म प्रतिपच येन, श्लाघ्यः स केषां न कुमारपालः ॥ -सोमप्रभाचार्य। गुजरातना चौलुक्यवंशना प्रसिद्ध नृपति कुमारपालने जैनाचार्य हेमचंद्रसुरिए समय समय उपर जे रीते जैनधर्मना सिद्धान्तोनी, विविधकथा-आख्यानो द्वारा बोध आप्यो हतो, अने ते घोधनुं श्रवण ५६ जैन साहित्य संशोधक माग १ marwww.. NAwrnmr.uovir Arrrrrrr. NAMhArunrem.out.. करी जे रीते कुमारपाले जैनधर्मनो संपूर्ण स्वीकार को हतो तेनुं सामान्य वर्णन आ ग्रंथमा आपवामां आव्यु छे. ग्रंथकारे आ ग्रंथनुं नाम 'जिनधर्म-प्रतिबोध' ए, राख्यु छ',. परंतु, ग्रन्थना अंते, पुष्पिकालेखमा कुमारपाल-प्रतिवोध ' एवं नाम लखेल मळवाथी, तेम ज ग्रंथगत विषयनो नाममाजना निर्देशथी पण वाचकोने ख्याल आवी शके तेवा हेतुथी; में आ पुस्तक उपर ए ज नाम अंकित कर, वधारे उचित धार्य छे. आ ग्रंथनी प्रस्तुत आवृत्ति, गुजरातनी प्राचीन राजधानी पाटण शहेर (जे वर्तमानमा बडोदरा- राज्यना कडीप्रांतमा एक साधारण तालुकातुं स्थान भोगवे छे) मांना जैन पुस्तक भांडागारमांधी मळी आवेला ताडपत्रात्मक पुस्तक उपरथी तैयार करवामां आवी छे. ए ताडपत्रना एकंदर २५५ पानां छे. प्रत्येक पार्नु २ फीट ७ इंच लांबुं अने मात्र २ इंच पहोळु छ, ए पानाना प्रत्येक पृष्ठ (एक याजु) उपर प्रणथी पांच पंक्तिओ, काळी शाहीथी देवनागरी लिपिमा लखेली छे. दरेक पंक्तिमां लगभग १४० थी १५० जेटला अक्षरो आवेला छे. प्रत्येक पंक्ति त्रण विभागोमां व्हेंचाएली छे, अने दरेक विभागनी वच्चे एक एक इंच जेटली खाली जग्या राखवामां आवी छे. ए खाली राखेली जन्यामां, आखा पुस्तकनां वधां पानांओ भेगां बांधी लेवा माटे एक छिद्र पाडी तेमा संलग्न दोरी परोवेली छे. आ पुस्तक संवत् १४५८ मां खंभातमां लखाएलु छे. आ समय पछी लखाएलु वीजु कोई ताडपत्र जैन भंडारोमां मारा जोवामां आन्युं नथी. आ उपरथी हुँ एम अनुमान करूं छु के, गुजरातमां-अने साधारण रीते पश्चिम अने उत्तर हिंदुस्थानमां पण-ताडपत्र उपर पुस्तक लखवाना इतिहासमां आ पुस्तक सौथी अंतिम स्थान भोगवे छ. जैनोनां ऐतिहासिक साधमो उपरथी जणाय छे के ईसवीनी १४ भी शताब्दिना प्रारंभमां ज ताड- पत्रो उपर ग्रंथो लखवानो वहीवर कमी थवा मांच्यो हतो भने ताडपत्रोनुं स्थान कागळोए लेवा मांडयुं हतु. ते वखत दरम्यान पाटण, खंभात, जेसलमेर (राजपूताना ) आदि-जैन पुस्तक भांडागारो माटे प्रसिद्ध थुएला-जूना शहेरोमां ताडपत्र उपर लखेला जे विशाल पुस्तकसंग्रहो हता ते वधाना एकी लाथे अने घाणी झडपथी कागळो उपर उताराओ थवा लाग्या हता. वर्तमानमा कागळ उपर लखेलां जूनामां जूनां जे पुस्तको उपलब्ध थाय छे, ते वधां तेज वखतनां लखेलां छे. तेम ज ताडपत्र उपर अर्वाचीनमा अर्वाचीन जे पुस्तको छे ते पण तेज वखतनां छे. ते पछी लखेलां ताडपत्रो मळतां नथी. आ उपरथी एम मानी शकाय के ए प्रदेशोमा कागळनो प्रवेश तेज बखते थएलो होवो जोईए. प्रकृत ताडपत्रना लेखन काळमां ताडपत्र उपर लखवानो प्रचार बहु ज विरल थई गएलो होवो जोईए. अने लहिआओ ताडपत्र उपर लखवाना अभ्यास अने शाहीनी बनावट विगेरेनी कळाने भली जवानी तैयारीमा होवा जोईए. कारण के प्रकृत ताडपत्रं उपरतुं लखाण जूनां ताडपत्रो करतां घणा ज हलका प्रकारचं दृष्टिगोचर थाय छे. १२ मा १३ मा सैकानां ताडपत्रोनी लिपि जेटली सुंदर अने शाही जेटली उत्तम होय छे तेटली आमां देखाती नथी. आ ताडपत्रनी शाही घणी ज फीकी अने अनेक स्थळेथी तो ते अत्यार आगमच खरी पडी-भुसाई गई छे. कोई कोई पृष्ठमां तो पंक्तिओनी पंक्तिओ तेवी रीते अदृश्य थई गई छे अने तेना लीधे लखाण वांच, पण बहु कठण थई पडे छे. त्यारे आना करतां २००- ३०० वर्ष जूनां ताडपत्रोनी शाही जोईए छीए तो आजे पण तेवीनी तेची चळकती अने काळी देखाई आवे छे. जूनां ताडपत्रोनी जेटली लेखन-शुद्धि पण आ पुस्तकमां जळवाएली जणाती नथी. आनुं कारण एछे के प्राचीनकाळमां लहिंआओ साधारण रीते संस्कृत-प्राकृत भापान सामान्य ज्ञान धरावनारा थता हता. तेम ज घणाक विद्वानो ते वखते जाते ज पुस्तको लखता हता. तेथी ते वखतनां पुस्तकोमा साधारण रीते अशुद्धिओ बहु अल्प प्रमाणमां मळी आवे छे. परंतु प्रकृत ताडपत्रना लेखनसमयमां, ताडपत्रो उपस्थी कागलो उपर ग्रंथो उतराववानुं काम घणा विशाल प्रमाणमां शरू थपलं होवाथी, तेटला कामने पहोंची वळे एटला, भापाज्ञानसंपन्न लहिआमोना अभावने लीधे, मात्र, अक्षराकृति सम. १ जिणधम्मपडिबोहे समथिओ पढमपत्यावो । पृष्ठ ११५.. --जिनधर्मप्रतिवोधः क्लप्तोऽयं गुर्जरेंद्र पुरे । पृ. ४१०.

अंक २] कुमारपाल-प्रतिवोध परिचय ५७ MARINAMM.WA.............WiaWNwARAN Mr.. 10...." ....... A.. जवा पुरतुं शान धरावनारा अने मक्षिकास्थाने मक्षिका चितरनारा लहिआओ पासथी ए कार्य कराववामां आयतुं हतु. तेथी जना ग्रंथोनी नकलो करता. ए बखते लहिआओना हाथे घणी अशुद्धिओ ते ग्रंथोमा दाखल थई गई हती. माज कारणने लईने कुमारपाल प्रतिवोधना प्रकृत आदर्शमां पण लेखन-अशुद्धिओ घणा मोटा प्रमाणमां प्रविष्ट थई गएली जीवाय छे. आ पुस्तकनी नकल करनार कायस्थ पेतार्नु भाषाज्ञान के हशे तेनुं अनुमान, पुस्तकना अंतमां तेणे जे संवत् विगेरेना उल्लेख धाळो पुष्पिकालेख लख्यो छे, ते उपरथी थई शके तेम छे. उल्लिखित ताडपत्र लिवाय एक वीलु पण ताडपत्र प्रस्तुत ग्रंथतुं मने मळ्युं छे, जे पाटणना संघ- वीना पाडाना नामे ओळखाता पुस्तकभंडारनी मालिकीनुं छे. ए ताडपत्र, उक्त ताडपत्र करतां खास जून अने विशेष शुद्धरीते लखाएलुं छे. परंतु ए घणुंज अपूर्ण--खंडित छे. एमां ५१ थी ते ३०५ नंबर सुधीनां पानां छ. आ ग्रंथना चतुर्थ प्रस्तावमा देशावकासिक व्रतोपरि जे पवनंजयनी कथा आपेली. छे तेना मध्यभागथी ज ए ताडपत्र खंडित थई गयुं छे. एनी साईझ २७"+२" लांबी-पहोळी छे. प्रत्येक पृष्टमा ३ थी ५ लाइनो आवेली छे, अने दरेक लाइनमा १०५ थी १२० सुधी अक्षरो लखेला छे. आवी रीत प्रस्तुत पुस्तकनो अखंड एवो एक ज उपर्युक्त आदर्श मने मळवाथी (अने ज्यां. सुधी हुं जाणी शक्यो छु, बीजो संपूर्ण प्राचीन आदर्श अन्यत्र फ्याये छे पण नाह) अने ते पण विशेष अशुद्ध होवाथी, आ ग्रंथना संशोधननुं काम मारा माटे घणु ज कटण थई पडयुं हतुं. सोमप्रभाचार्य ग्रंथकार सोमप्रभाचार्य एक सुप्रसिद्ध अने सुज्ञात जैन विद्वान् छे. तेमणे प्रस्तुत ग्रंथ विक्रम संव- व १२४१ मां, एटले कुमारपाल राजाना मृत्यु पछी मात्र ११ वर्षे बनाव्यो हतो. आ उपरथी तेओ राजा कुमारपाल अने आचार्य हेमचंद्रना समकालीन हता ए स्वतः सिद्ध छे. तेमणे आ ग्रंथ, नेमिनागना पुत्र श्रेष्ठी अभयकुमारना हरिश्चंद्रादि पुत्र अने श्रीदेवी आदि पुत्रिमओनी प्रीत्यर्थे, प्राग्वाटजातीय कविचक्रवर्ती श्री-श्रीपालना पुत्र का सिद्धपालनी वसति (जैन मंदिर या जैन उपाश्रय ) मां रहीने रच्यो छे तथा खुद हेमचंद्राचार्यना महेन्द्रमुनि', वर्धमानं अने गुणचंद्र नामे विद्वान् शिष्योए तेने अथथी ते इति सुधी सांभळ्यो छे. अभयकुमार श्रेष्ठी, आ ज ग्रंथमा जणान्या प्रमाणे, कुमारपाल राजाए अनाथ अने असमर्थ जनोना भरण पोपण माटे खोलेला सत्रागार थादि धर्मादाय खाताओनो उपरी हतो. (जुओ पृष्ठ २१९-२०). कविचक्रवर्ती श्री-श्रीपाल गुजरातनो एक सर्वश्रेष्ठ कवि अने सिद्धराज जयसिंहनो घणो मानीतो तेम ज स्वीकृत भ्राता हतो. तेनो पुत्र सिद्धपाल पण उत्तम कोटिनो कवि होई कुमारपाल राजा- नो प्रीतिपात्र अने श्रद्धेय सुहृद् हतो. आ कविकुलना संबंधमां में अन्यत्र सविस्तर लख्युं छे, (-जुओ द्रौपदी स्वयंवर नामे सिद्धपाल पुत्र कवि विजयपाल रचित नाटकनी मारी प्रस्तावना.) तेथी अही पुन- रावृत्ति करतो नथी. श्रीपाल कवि, सोमप्रभाचार्यना पूर्वाचार्य देवसूरिनो चरणोपासक हतो तेथी एक- वि-कुटुंबनो, तेमना शिष्यसमुदाय उपर सविशेप अनुराग होय तथा ते साधु-समूहनो पण ए कुटुम्य उपर विशेष आदरभाव होय ते स्वाभाविक छे. सोमप्रभाचार्यना गुरुओ तथा अन्य साधुओ अणहि- लपुरमा घj करीने ए कविकुटुंबना मकानोमांज निवास करता हता. सोमप्रभाचार्ये पोतानो बीजो बृहद्ग्रंथ नामे सुमतिनाथचरित्र पण ए कुटुंयनी वसतिमां ज वसीने वनाव्यो हतो. , आ महेन्द्रमुनिए हेमचंद्राचार्यरचित अनेकार्थनामसंग्रह नामक कोप उपर अनेकार्थकैरवाकरकौमुदी नामे टीका लखी छ,-जुओ, पीटर्सन रिपोर्ट १, पृ. ५१. २ वर्धमानगणिए कुमारविहारप्रशस्ति बनावी छे.-जुओ, पीटर्सन रिपोर्ट ३, पृ. ३१६. ३ गुणचन्द्रगणिए, प्रबन्धशतकर्तृ महाकवि रामचन्द्रने नाट्यदर्पण नामक ग्रन्थ लखवामा.सहायता करी हती.

जैन साहित्य संशोधक [भाग १ , MaM ....-- vvvv -~-~~-~~~-~.. ... कुमारपाल प्रतियोधनी प्रशस्ति तथा बीजा ग्रंथोक्त उल्लेखो उपरथी सोमप्रभाचार्यनी गुरुपरंपरा- दिनो वंशवृक्ष नीचे प्रमाणे थाय छ:- सर्वदेवसूरि -- यशोभद्र नेमिचंद्र . T मुनिचंद्र १ मानदेव अजितदेव चादीदेवसरि आनंदसूरि . T विजयसिंह रत्नप्रभ" ५ .६ भद्रेश्वर गुणचंद्र पूर्णदेव महेश्वर जयप्रभ - 1 . हेमचंद्र सोमप्रम मणिरत्न रामचंद्र रामचंद्र जयप्रभ । जगच्चंद्र रामभद्र० जयमंगल । सोमचंद्र १ उपदेशपद, अनेकान्तजयपताका, ललितविस्तरा, योगपिंदु आदि हरिभद्राचार्यरचित ग्रंथो उपर टीका-टिप्पणा- दिना प्रसिद्ध लेखक २ स्याद्वादरत्नाकर नामक महान् जैनतर्कयन्यना प्रणता. ३. धर्मसागरगणिए पोतानी पट्टावलीमां आ विजयसिंहने, वालचंद्ररचित विवेकमञ्जरीवृत्तिना संशोधक ('श्रीवि- जयसिंहसूरि:--विवेकमञ्जरीशुद्धिरुत् ।') लख्या छ परंतु ते भूल छे. ते वृत्तिना संशोधक मा विजयसिंह नथी, परंतु नागेंद्र गच्छना विजयसेनसूरि छे. जुओ पीटर्सननो ३ जो रीपोर्ट पृ. १०३. आ विजयसिंहनो एक शिलालेख आरासणना जैनमंदिरमाथी मळी आव्यो छे, जे संवत् १२०६ नी सालनो छे. जुओ मारुं प्राचीन जैनलेखसंग्रह नामर्नु पुस्तक, लेख नंवर २८९. ४. रत्नप्रमे रत्नाकरावतारिका नामे सुज्ञात तर्कप्रन्थ बनान्यो छे, उपदेशमालावृत्ति आदि बीजा पण एमना फेटलाक प्रसिद्ध ग्रंथो उपलब्ध छे. ५. भद्रेश्वरे वादी देवसूरिने स्याद्वादरत्नाकर ग्रंथ रचवामां मुख्य सहायता करी हती. तथा पोताना गुरुना अवसान पछी तेमनी गादीना मुख्य आचार्य ए पातेज नीमाया हता. ६. गुणचंद्रे हैमविनमनामे व्याकरणविषयक एक लघु ग्रंथ वनाव्यो छे., ५. जालोरना एक शिलालेखमां आ बन्ने गुरु-शिष्यनो उल्लेख करेलो छ. ८. सुधाटेकरी (मारवाड ) उपर आवेली चाबिगदेवनी प्रशस्तिना कता.. ९ वृत्तरत्नाकरनी धृत्तिकरनार, १० प्रचुरोहिणेय नाटकना रचनार, अंक २] 7 ----- -... ~~~-~~-~- www.www.ww-~- . १ कुमारपाल प्रतिवधि परिचय आ वंशवृक्षमां आपेली व्यक्तियो जैनसाहित्य अने जैनइतिहासमां सुप्रसिद्ध छ. ए साधुओमां- ना केटलाक तो घणा मोटा ग्रंथकारो छे अने तेमनी वनावेली अनेक कृतिओ आजे पणं जैनसाहित्यनी शोभा वधारी रही छे. आ उपरथी प्रस्तुत ग्रंथकारनो समुदाय केटलो वधो विद्वान् , प्रतिष्टित, अने साहित्योपासक हतो तेनो ख्याल आची शके छे. सोमप्रभाचार्यना एक गुरुभ्राता नामे हेमचंद्रे नाभेयने- मि नामर्नु द्विसंधान काव्य धनाव्यु छ जेनुं संशोधन खुद कविचक्रवर्ती श्रीपाले कयु हतं.' सोमन- भाचार्यनी गादी उपर सुप्रसिद्ध जगश्चंद्रसूरि आव्या हता जेयो तपागच्छन्ना नामे ओळखाता सुवि- स्तृत साथसमुदायना मूळ पुरुष मनाय छे. पट्टावलिओ प्रमाणे, सोमप्रभाचार्यनो महावीरनी पट्ट परंपरामां ४३ मो नंबर छे. सोमप्रभाचार्यना विद्यमान ग्रंथो कुमारपाल प्रतिरोध सिवाय सोमप्रभाचार्यना वीजा प्रण ग्रंथो उपलब्ध थाय छे. जेमां एक तो सुमतिनाथचरित्रछे.ए ग्रंथमांजैनधर्मना पांचमा तिर्थकर सुमतिनाथनुं चरित्र वर्णवामां आव्युं छे. तेचरित्र पण कुमारपाल प्रतिवोधनी माफक मुख्य करीने प्राकृत भापामांजरचेलुं छे अन तेमांपण जैनधर्मना सिद्ध- न्तोनोबोध आपती पुराणकथायो कल्पित छे. तेनी लोकसंख्या लगभग साडा नव हजार उपर छे. पाटणना जैन भंडारोमा ए चरित्रना हस्तलेखो मारा जोवामां आव्या छै बीजो ग्रंथ सूक्तिमुक्तावली नामे प्रसिद्ध १०० पद्यवाळो एक प्रकीर्ण प्रबंध छ. ए प्रबंधनुं प्रथम पद्य 'सिन्दुरप्रकर' एवा वाक्यथी शरू थतुं १ काव्यनी अंतनी प्रशस्तिना केटलाक मोको नीचे प्रमाणे के-- भक्तः श्रीमुनिचंद्रसूरिमुगुरोः श्रीमानदेवस्य च श्रीमान् सोऽजितदेवसूरिरभवत् पतर्कदुग्धाम्बुषिः । सद्यः संस्कृतगद्यपद्यलहरीपूरेण यस्य प्रभाऽऽक्षिप्ता वादिपरंपरा तृणतुलां धत्ते स्म दूरीकता ।। धीमानभूद् विजयसारिरमुष्य शिप्यो यन x x स्मरस्थ शरान् गृहीत्वा । क्लप्तं चतुर्भिरनघं शरयन्तममे विश्वं तदेकविशिखेन वशं च निन्ये ।। श्रीहेमचन्द्ररिर्वभूव शिष्यस्तथापरस्तस्य । भवहतये तेन रुतो द्विसंधानप्रवन्धोऽयम् ॥ एकाइनिप्पन्नमहाप्रबन्धः श्रीसिद्धराजप्रतिपन्नबन्धुः । श्रीपालनामा कविचक्रवर्ती सुधारिमं शोधितवान् प्रवन्धम् ।। २ ए चरित्रनी अंतनी प्रशस्ति पण घणा अंश कुमारपाल-प्रतियोघना जेवी ज छे, अने ते नीचे प्रमाणे छ। चन्द्रार्की गुरुवृद्धनमसः कर्णावतंसौ क्षित(यों धर्मरथस्य सर्वजगतस्तस्वावलोके दशौ । निवांगावस्यस्य तोरणमहासम्भावभूतामुभावेकः श्रीमुनिचन्द्रमुरिरपरः श्रीमानदेवप्रभुः ॥ शिग्यन्नयोरजितदेव इति प्रसिद्धः सूरिः समग्रगुणरत्ननिर्विभूव । प्रीति यदनिकमले मुनिभृगाजिरास्वादितश्रुतरसा तरसा ववन्ध ।। श्रीदेवरिप्रमुखा बभूवुरन्येऽपि तलादपयाजहंसाः। चेपामवाधारचितस्थितीनो नालीकमैत्रीमुदमाततान !! विशारदशिरोमणे रजितदेवस्प्रिभोविनयनिलकोऽभवद् विजयसिंहत्रिगुरुः । जगत्त्रयविजेतृभिर्विमलशीलवावृतं व्यभेदि न कदाचन स्मरशरैर्यदीय मनः ॥ गुरोस्तस्य पदाम्भोजप्रसादान्मन्दधारपि श्रीमान् सोमप्रभाचार्यश्चरित्रं मुमतेय॑धात् ।। प्राग्वाटान्वयसागरेन्दुरसमप्रज्ञः कृतज्ञः क्षमी वाग्मी सूक्तिसुधानिधानमजनि श्रीपालनामा पुमान् । यं लोकोत्तरकाव्यरजितमतिः साहित्यविद्यारति: श्रीसिद्धाधिपतिः कवीन्द्र इति च भ्रातेति च व्याहरत् ।। सूनुस्तस्य कुमारपालनृपतिप्रीतः पदं धीमतामुत्तंसः कविचक्रमस्तकमणिः श्रीसिद्धपालोऽभवत् । यं व्यालोक्य परोपकारकरुणासौजन्यसत्यक्षमादाक्षिण्यैः कलितं कलौ कृतयुगारम्भो जनो मन्यते ।। तस्य पौषधशालायां पुरेऽणहिलपाटके । निष्प्रत्यूहमिदं प्रोक्तं परायान्तं (?) ....॥ अनाभोगात् किञ्चित् किमपि भतिवकल्यवशतः किमप्यौत्सुक्येन स्मृतिविरहदोषेण किमपि । मयोत्सूत्र शास्त्रे यदिह किमपि प्रोकमखिलं क्षमन्तां धामन्तस्तदसमदयापूर्णहृदयाः ।। x ६० जैन साहित्य संशोधक [भाग १ avennannnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnn होवाथी ते 'सिंदुरप्रकर' ना नामे; तथा सोमप्रभाचार्य रचित होई तेमां एकदर १०० पद्योनो संग्रह होवाथी सोमशतक' ना नामे पण धणीक वखते लखाय-ओळखाय छे. ए प्रबंध जैनसमाजमा घणोज प्रसिद्ध छे अने अनेक स्त्रीपुरुषोना मुखे कंठस्थ होय छे. ए प्रबंध भर्तृहरिना नीतिशतकनी शैलिमा लखाएलो छ; अने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शील, सौजन्य आदि विषयो उपर संक्षिप्त परंतु हृदयंगमरीते तेमां विवेचन करेलुं छे. एनी रचना बटुज सरल, सरस अने सुबोध छे. एमांनां केटलाक पद्यो आ प्रस्तुत ग्रंथमां-कुमारपाल प्रतियोधमां पण अथित थएलां नजरे पडे छे. श्रीजो ग्रंथ 'शतार्थ काव्य' नामे छे. ए ग्रंथ सोमप्रभाचार्यना संस्कृत भाषाज्ञानविषयक अनुत्तर पांडित्यने प्रकट करे. छे. ए ग्रंथ मात्र एक वसंततिलका छंद रूपे छ, जेना जुदा जुदा लो अर्थों करवा- मां आव्या छे. आ कृतिना लीधे विद्वानो तरफथी तेमने शतार्थिकनु खास पांडित्यसूचक उपनाम प्राप्त थयुं हतुं अने तेथी पाछळना घणाक ग्रंथकारो तेमने ए उपनाम साथे ज उल्लेखे छे. ए एक वृत्ता- मक ग्रंथना भिन्न भिन्न सो अर्थों तेमणे जाते ज टीका करीने बताया छे. टीकाना प्रारंभमां पांच श्लोको लखी स्वविवक्षित लोए अर्थोनी अनुक्रमणिका आपी छे. प्रारंभमांजैनधर्मना २४ तीर्थकरोना अर्थो लखी; पञ्चे ब्रह्मा, नारद, विष्णु आदि वैदिक देवो विगेरेना अर्थो पण आलेख्या छे. अने छेवटे पोताना समकालीन एवा, वादी देवसूरि अने हेमचंद्राचार्य जेवा जैनधर्मना महान् धर्मगुरुओना; जयसिंह देव, कुमारपाल, अजयदेव अने मूलराज जेवा गुजरातना क्रमिक ४ चौलुक्य राजाओना, कवि सिद्धपाल जेवा सर्वश्रेष्ठ नागरिकना; अने अजितदेव तथा विजयसिंह नामे पोताना बंने गुरुओना अर्थों पण अवतार्या छे. सवात स्वकीय अर्थ पण बेसार्यो छे अने समाप्तिमां कोई शिष्यना मुखेथी आत्मप्रशंसापर एवी पांच पद्योवाळी संक्षिप्त प्रशस्ति पण कहेवरावी छे. आप्रशस्तिमां जणाव्या प्रमाणे सोमप्रभ गृहस्थावस्थामां प्राग्वाट (पोरवाड) जातिना वैश्य हता. तमना पितानु नाम सर्वदेव, अने पितामह नाम जिनदेव हतुं. जिनदेव कोईक राजानो मंत्री हतो अने ते पोताना समयमां बहु प्रतिष्टित पुरुष हतो. सोमप्रभ कुमारावस्थामां ज जैनदीक्षा लई लीधी हती, अने तीव्रबुद्धिना प्रभावे समस्त शास्त्रोनो तलस्पर्शी अभ्यास करी आचार्यपदवी प्राप्त करी हती. तेमनी तर्कशास्त्रमा अद्भुत पटुता हती, काव्यविषयमा घणी त्वरितता हती अने व्याख्यान आपवामां बहु कुमारपालप्रतिबोध साथे उक्तानुसार सोमप्रभाचार्यनी वर्तमानमा ४ कृतिओ उपलब्ध थाय छे. आ कृतिमओमां कालानुक्रमथी प्रथम कृति तेमनी सुमतिनाथ चरित्र अने वीजी सूक्तिमुक्तावली होय तेम जणाय छे. बृहटिप्पनिका नामे एक प्राचीन जैनग्रंथसूचिमा सुमतिनाथचरिननी रचना कुमारपालना राज्यमा थई हती एवो उल्लेख करेलो छे. शतार्थवृत्तनी वृत्तिना अंते पण ते चरित्रनुं नाम आवेलं होवा- थी, ते वृत्तिनी पहेलां एनी रचना थई हती एम तो स्वतासिद्ध थाय छे. शतार्थवृत्तनी रचना ई०स० १९७७ थी ११७९ नी बच्चे थई होय, पम मानी शकाय. कारणके एनी अंदर अजयदेवनी पछी गुजरात- नी गादिए आवेला मूळराजनो उल्लेख छे. आ मूळराज इतिहासमां बाळ मूळराजना नामे प्रसिद्ध छे. अने तेणे मात्र बेज वर्प-ई. स. १९७७ थी १९७९ सुधी-राज्य कर्यु हतुं. कुमारपाल प्रतिबोध तेमनी छेल्ली कृति होय तेम लागे छे. १ जुओ-पृष्ठ १४५, १९१. ४२२ इत्यादि उपर आपेला संस्कृत पद्यो. २ मूळ वृत्त आ प्रमाणे छ:- कल्याणसार सवितानहरेक्षमोह । कान्तारवारणसमानजयाद्यदेव । धर्मार्थकामदमहोदयवीरधार। सोमप्रभावपरमागमसिद्धसूरे ॥ ३ ' सोमप्रभो मुनिपतिविदितः शतार्थी ।' मुनिसुंदरसूरिफत गुर्वावली । ततः शताधिकः ख्यातः श्रीसोमप्रभत्रिराट् ।' -गुणरत्नसरिकृत क्रियारत्नसमुच्चय । कुशलता हती. - अं२] www कुमारपाल प्रतिवोध परिचय ६५ आ कृतिओ सिवाय चीजी पण तेमनी कोई कृति होय तेम अनुमान थाय छे. कारण के शतार्थ वृत्तनी वृत्तिमा कुमारपाल राजा संबंधी अर्थ करतां " यदयोचाम" करीने चे पद्यो टांक्यां छे जे उप- लन्ध कृतिमोमा मळी आवतांनी कुमारपाल प्रतियोधनी रचना ग्रंथकार मुख्यकरीने प्राकृतभापामां करी छ. छेवटना प्रस्तावमा केटलीक कथाओ संस्कृतमां आपी छे. तथा थोडोक भाग अपभ्रंश भापामां पण गुंथेलो छे. आ उपरथी लेखक प्राकृत, संस्कृत अने अपभ्रंश एमत्रणे भापाओना पांडत हता ते स्पष्ट जणाई आवे छे. ग्रंथनी रचना बहुज सरल अने भाया तहन सादी-आडंबर विनानी छे. कर्ता जोके, जेम उपर बताववामां आव्युं छे, एक उत्तम कोटिना विद्वान अने ग्रंथकार छे. परंतु तेमनी विद्वत्तानी कोई विशिष्टता आपणने आ ग्रंथमां मळी आवती नथी. कुमारपाल प्रबंधना कर्ता जिनमंडनगाणए पोताना प्रबंधमां अनेक स्थळे, आ ग्रंथमांना ऐतिहासिक भागनां अवतरणो टांक्यां छे. अने जयासह सूरिए पोताना संस्कृत कुमारपालचरित्रमा आ ग्रंथनी रचना शैलीनु आवाद अनुकरण कर्य छे. ते उपरथी जणाई आवे छे के पाछळना ग्रंथकारो प्रस्तुत ग्रंथ. थी सारी पेठे अवगत होवा जाईए, कुमारपालमतियोधिनी ऐतिहासिक उपयोगिता था ग्रंथतुं महत् परिमाण अने रचना-समय तरफ दृष्टि करता,इतिहास रसिक जिज्ञासुओने, मा ग्रंथमाथी कुमारपाल अने हेमचंद्राचार्यना जीवनवृत्तान्त संबंधी अशात अने अन्यत्र अनुपलब्ध एवी नवी नची वायतो जाणवानी विशेप जिज्ञासा रहे, ए स्वाभाविक छ. अने हूँ पण प्रथम एचीज लालसाथी आ ग्रंथना संपादन-भारने वहन करवा सानंद तत्पर थयो हतो. परंतु ग्रंथ सायंत अवलोकन कर्या पछी मारे उदास मने जणाव पड़े छ के तेवी कोई नवीन वावत, आ आटला मोटा ग्रंथमाथी मळी आवीं नथी, एटलं ज नहीं परंतु प्रभावकचरित्रांतर्गत हेमचंद्रप्रवंध, प्रबंधचिन्तामणिगत कुमारपालप्रथंधादि वा, प्रस्तुत ग्रंथ करतां संक्षित अने कालकृत अर्वाचीन ग्रंथोमां जेटली हकीकत, उक्क बने व्यक्तिओना संबंधमा मळी आवे छे; ते करतां पण घणी ज अल्प हकीकत आ ग्रंथमा आलेखेली छे. याथी ऐतिहा- सिक दृष्टिए तो आपणने आ ग्रंथनी कोई पण प्रकारली विशेष उपयोगिता जणाती नथी, एम जो कहीए तो ते अयुक्त नथी. अलवत प्राकृत भापाना साहित्य-प्रकाशननी अपेक्षाए आनी उपयोगिता अवश्य स्वीकारवा लायक छ. कारण के एक तो प्राकृतसाहित्य अत्यारसु मां घणाज अल्प प्रमाणमा प्रकाशित थयुं छे, अने वीर्छ हवे मुंबई युनिवर्सिटीए पोताना पठनक्रममा पालीभापानी माफक प्राकृतमापाने पण खास स्थान आपलं होवाथी ए भाषाना साहित्यना प्रकटीकरणनी धणीज आवश्यकता प्रतीत थई रही छे. तेवा प्रसंग प्राकृत भापाना आ एक महान ग्रंथ प्रकाशन ए भापाना अभ्यासिओने अवश्य आव- कार दायक थई पडशे एमां संशय नथी. * ए बे पयो नीचे प्रमाणे छे:- चैलुक्येन्द्रेण चेत्ये फुचकलशनिकरवन्धुराः सिन्धुरस्त्रीस्कन्धारूढा विधातुं जिनजननमहे सूतिकर्मप्रपञ्चम् । पट्पनाशत्समीरप्रमुखनिजानिजाचारचातुर्यास्फुर्जन्माणिक्यहेमाभरणकवाचिताधाकरे दिक्कुमार्यः ।। द्वात्रिंशनिदशाधिपा नृपगृहात् चैत्से द्विपाध्यासिताः कल्याणाभरणाभिरामवपुषः कल्याणकाद्युत्सवे । घात्रं कर्तुममर्त्यशैलशिरारी स्वर्गादिवाभ्याययुस्तन्मध्ये च कुमारपालनृपतिर्भजेऽच्युतेन्द्रश्रियम् ॥ १ जुओ मुनि श्रीचतुरविजयजी संपादित कुमारपालप्रबंध-पृ. १०, १७,५८, ८०, ९०, ९४, ९५, ९, १०६, १०७, १११इत्यादि.

६२ जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ monninnnnwwnnnAEAAANAAnnnnnnnA 1.MANAN *N. .AAAA . उक्तरीते आ ग्रंथमा ऐतिहासिक वृत्तान्त विशेष न मळवाथी अलवत आपणने असंतोष थाय ए स्वाभाविक छे, परंतु ते विषयमां ग्रंथकार कोई पण प्रकारना उपालंभने पात्र नथी. कारण के ग्रंथना प्रार- भमांज ते पोते हेमचंद्र अने कुमारपालनी समग्र जीवन-वार्ता लखवाना उद्देश्यनो स्पष्ट अस्वीकार करे छ. आग्रंथ लखवामा लेखकनो उद्देश्य, कुमारपालादिनो इतिहास लखवानो नथी. परंतु ते व्यक्तिओने लक्षीने धर्मोपदेश आपतो एक कथा-ग्रंथ गुंथवानो छे. तेभो लखे छेके-" यद्यपि कुमारपाल अने हेमचं- द्राचार्य, जीवन चरित्र बीजी रीतिए. पण घणुंए मनोहर छे.तोपण हुआ प्रथमांजैन धर्मनाप्रतियोध संबंधे जकाईक कहेवा ईच्छु छु. शं अनेक प्रकारनी खाद्य वस्तुओथी भरपूर रसवतीमांथी पोतानी इच्छानु. सार मात्र कोई एक वस्तुनु ज भक्षण करनार पुरुष कोईनी निन्दाने पात्र थई शके छ ? " अस्तु. कुमारपाल भतिवोधनो ऐतिहासिक सार आ संपूर्ण प्रथमा जेटलो भाग इतिहास साथे संबंध धरावे छे ते पाचकोना सौकर्थि "कुमारपालं प्रतिबोध-संक्षेप" एघा शिरोलेख नीचे परिशिष्ट रूपे जदो आप्यो छे. ए परिशिष्टात्मक ग्रंथभाग यांची. जपाथी आखा ग्रंथनो संकलित सार स्पष्टीते समजाई जशे. संक्षिप्त ऐतिहासिकसार आ प्रमाणे छ।--- अणहिलपुर पाटणमां, प्रथम चौलुक्यकुलमृगांक एवो मूल नामे राजा थयो. तेना पछी चामुंडराजे अने तेना पछी 'जगज्ज्ञपण ' एवं उपनाम प्राप्त करनार वल्लभराज थयो. तेना पछी अनुक्रमे दुर्लभ- राज, भीमराज, कर्णदेव अने जयसिंहदेव राजा थयो. पूर्वे थई गएला भीमदेवनो क्षेमराज करीने एक पुत्र हतो, तेनो पुत्र देवप्रसाद, तेनो पुत्र त्रिभुवनपाल अने तेनो पुत्र कुमारपाल थयो. ए कुमार पाल बहु शूर, वीर, धीर, त्यागी, दक्ष अने परोपकारादि गुणवाळो हतो. तेथी जयसिंहदेवर्नु मृत्यु थया पछी प्रधानपुरुषोए परस्पर विचार करीने तेनी गादी उपर कुमारपालने बेसार्यों. तेणे चारे दिशा- ओमां चतुरंग सैन्य साथे दिग्विजय करी प्रजाने संतोषकारक थाय तेवी रीत राज्यनुं पालन करवा मांडयु. एक दिवसे तेणे केटलाक विद्वान अने वृद्ध ब्राह्मणोने पोतानी पासे बोलावीने कहा के-'जेना आचरणथी मनुष्य जन्मनु सार्थक थाय तेवो सत्य धर्म मार्ग बतावो.' ब्राह्मणोए वेदादिशास्त्र विहित यज्ञयाग स्वरूप धर्म बताव्यो. परंतु ते धर्ममा पशु-प्राणी आदिनो वध विहित होवाथी तेवो हिंसामय धर्म राजाने रुच्यो नहीं. ते मनमा विचार करवा लाग्यो के-'जो प्राणिओनो वध करवाथी पण मनुष्य- ने धर्म प्राप्ति थती होय तो पछी अधर्म कयुं कर्तव्य करवाथी थाय छे ? शुं ब्राह्मणो धर्मनुं सत्य.स्वरू- पज जाणता नथी? अथवा तो जाणता छता पण मारी विप्रतारणा करे छ?' आवी रीते आ संबंधी ते विशेष चिंतन करवा लाग्यो अने तेना योगे रात्रिना समये ते निद्रा पण पूरी प्राप्त करी शकतो नहीं एक समये बाहड नामना अमात्ये आवीने राजाने नमन कर्यु अने कां के-'राजन् ! तमने जो धर्माधर्म. ना स्वरूपने जाणवानी जिज्ञासा होय तो हुँ कहुं ते सांभळो.' एम कही बाहड मंत्रीए जैनाचार्य हेमचंद्र सूरिनो संक्षिप्त परिचय आप्यो. मंत्रिए जणाव्यु के-पूर्वे, पूर्णतल्लनामना गच्छमां श्रीदत्तसूरि नामे एक आचार्य थई गया. तेओ परिभ्रमण करता एक वखते वागडदेशना' रयणपुर ' नामना गाममां गया. त्यां ते वसते यशोभद्र करीने एक राजा राज्य करतो हतो. ते श्रीदत्तसूरिपासे आची हमेशां धर्मबोध सांभळवा लाग्यो. दत्तहि त्यां केटलोक समय रही अन्यत्र चाल्या गया. पाछळथी ते राजाने संसार उपर विरक्ति थई आवी अने तेथी ते बधो राज्यमार छोडी दत्तसूरिपाले दीक्षा लेवा निकळी पडयो. सूरिते समये * जइ वि चरियं इमाणं मणोहरं त्यि बहुयमनं पि । तहवि जिणधम्म-पडिवाहे-बंधुरं कि 'पि पेमि ।। बहु भक्ख-जुयाइ वि रसवईए मञ्झाओ किंचि भुंजतो । निय-इच्छा-अणुरूवं पुरिसो कि होइ वयणिज्जो ॥ . - अंक २] ..... ~~.. AAM.--.-.-4AAA AAAA AA कुमारपालं प्रतिबोध परिचय ६३ 'डिडुआणापुर' मां रहेता हता तेथी राजा त्यां गयो. तेनी पासे एक बहुमूल्य मुक्ताहार हतो. तेने वैचा तेना द्रव्यथी त्यां एक 'चरचीसजिणालय ' नामे मोहं जैनमंदिर बंधाव्युं अने पछी साधु- पणुं लई दत्तसूरिनो शिष्य थयो. साधुवत लईने तेणे अनेक प्रकारनां तपश्चरणो कर्या अने ऊंडो शास्त्राभ्यास करी यशोभद्रसूरि नामे आचार्यपद प्राप्त कर्यु. आचार्य थया पछी तेमणे लोकोने धर्मोपदेश आपवा जुदा जुदा स्थळोमां परिभ्रमण को, ज्यारे वृद्धावस्थाना योगे शरीर बहु शिथिल अने क्षीणप्राय थयुं त्यारे उज्जयंत (गिरनार ) तीर्थ उपर जई तेमणे अनशनवत अंगीकार कर्यु अने समाधिपूर्वक स्वर्गस्थ थया. तेमना शिष्य प्रद्युम्नसूरि करीने थया जेमणे 'ठाणयपगरण (स्थान- प्रकरण)' नामें ग्रंथ बनाव्यो. तेमना शिष्य गुणलेनस्टूरि अने तेमना शिष्य देवचंद्रसूरि थया. देव- चंद्रसूरिए प्रद्युम्नसरिरचित 'टाणवपगरण' उपर टीका वनाची छे. तथा 'शांन्तिजिनचरित्र' लख्यु छे. ए देवचंद्रसूरि फरता फरता एक वखते धंधुका नामे गाममां गया. त्यां चच्च अने चाहिणी नामे मोढ जातीय वणिग्दंपतीनो चंगदेव नामे एक प्रतिभावान् बालक तेमनी पासे आवघा लाग्यो अने निरन्तर तेमनो धर्मवोध सांभाळवा लाग्यो. तेमना उपदेशी प्रबुद्ध थई बालक चंगदेव तेमनो शिष्य थवा तैयार थयो, अने तेमनी साथैज ते रहेवा-फरवा लाग्यो. फरता फरता देवचंद्रसूरि खंभातमा आव्या, अने त्यां, ते बालकना मामा नामे नेमि द्वारा चच्च अने चाहिणीने समजावी-युझावी, तेने दीक्षा आपी अने चंगदेवना बदले सोमचंद्र नाम स्थाप्यु. अलौकिक बुद्धिशाली बालक साधु सोमचंद्र थोडाज समयमां सकळ शास्त्रोनो अभ्यास करी समर्थ विद्वान् थयो अने गुरुए तेनी पूर्ण योग्यता जोई हेमचंद्र एवा नवीन नामनी साथै तेने आचार्यपद प्रदान कर्यु. हेमचंद्राचार्यनी विद्वत्ताश्री मुग्धथई सिद्ध- राज जयसिंह देव तेमना उपर बहु भक्तिभाव धरावतो हतो, अने ट्रेक शास्त्रीय बांबतना तेमनी पासे खुलासा मेळवी संतुष्ट थते हतो. तेमना उपदेशथी सिद्धराजनी जैनधर्म उपर प्रीति थई हती, अने तेना उपलक्ष्यमा नेणे 'रायविहार ' नामे एक जैनमंदिर पाटणमां, अने सिद्धविहार' नामे एक मंदिर सिद्धपुरमा अंधाव्युं हतुं. सिद्धराजना कथनथी हेमचंद्राचार्य 'सिद्धहमच्याफरण' नामे सर्वांगपूर्ण शब्दशास्त्र बनायुं हतुं. हेमचंद्रचार्यनो अमृतोपम उपदेश लांभळ्या विना सिद्धराजने जरा पण चैन पडतुं न हतुं. आवी रीते. हेमचंद्रसूरिनो परिचय आपी अमात्य बाहडे कुमारपाल राजाने कछु के-'महाराज तमने पण जो धर्मना यथार्थ स्वरूपने जाणवानी इच्छा होय तो भक्तिपूर्वक ए आचार्यनी पासे जई, ए संबंधमां पृच्छा करो.' मंत्रीतुं आ कथन सांभळी राजा हमेशां हेमचंद्राचार्य पासे जई धर्मबोध सांभळवा लाग्यो. आचार्यजीए प्रथम तो विविध दृष्टांतो अने आख्यानो द्वारा राजाने यथावसर प्राणिहिंसा, यूतरम- ण, मांसभक्षण, मद्यपान, वेश्यागमन अने धनापहरण इत्यादि दुराचरणोथी मनुष्य अन मनुष्यसमाजनी केवी अधोगति थाय छे, ते वारंवार समजावी, तेनी पासेथी, आखा राज्यमां तेषां दुराचरणोनो, राजाज्ञाना रूपमा सर्वथा निषेध कराव्यो. तदनंतर, तेमणे कुमारपालन जैनधर्मप्रतिपादित देव, गुरु- अने धर्म तत्त्वनो विशिष्ट वोध आपवा मांड्यो. सद्देव, सद्गुरु, अने सद्धर्मनी उपासनाथी आत्मानी केवी प्रगति थाय छे अने असदेव, गुरु, अने धर्मनी उपासनाथी केची अवगति थाय छे, तेनी, विविध कथानको द्वारा स्पष्ट समजण आपवा मांडी. सरिना ए बोधथी कुमारपालनी जैनधर्म तरफ प्रीति वधती गई अने क्रमे क्रमे ते ए धर्म उपर अधिकाधिक अनुरक्त थतो गयो. जैनधर्म उपरना पोताना अनुरागना १ अंथकार सोमप्रभाचार्य आ ठेकाणे जणावे ? के-ते 'चउवीसजिणालय' मंदिर आजे पण त्यां ( हिंडुआणा पुरंमा) विद्यमान छे.

[भाग, १० NANrno M nAm AMRAVM Anem unaannnnnnnn mnon00AMARNANAMAAN.MAA - जैन साहित्य संशोधकः ६४ उपलक्ष्यमांप्रथम तो तेणे ठेकाणे ठेकाणे जैन मंदिरो बंधाववा मांडयां.सौथीप्रथम तेणे पाटणमां, श्रीमा- लवंशीय मंत्री उदयनना पुन मंत्री बाहड अने वायडवंशीय गर्गसेठना पुत्रो नामे सर्वदेव अने सांबसे- ठनी देखरेख नीचे 'कुमारविहार' नामे चतुर्विंशति जिनालय युक्त महान अने भव्य जैनमंदिर बंधाव्युं. ए विहारना मुख्य मंदिरमां, स्फटिकनिर्मित पार्श्वनाथ तीर्थकरनी मनोहर मूर्ति प्रतिष्ठित करी; तेनी आजुबाजुना बीजा २४ जिनालयोमा सुवर्ण, रजत अने पित्तल आदि धातुओनी बनेली जुदा जुदा तीर्थकरोनी प्रतिमाओ स्थापन करवामां आवी. तेना पछी कुमारपाले 'त्रिभुवनविहार' नामे अत्युन अने अतिभव्य मंदिर बंधाव्यु. ए मंदिर ७२ जिनालयोथी परिवेष्टित हतुं. एनो विशाल आमलसार अने ते उपरना कलशो सुवर्णमय बनाववामां आव्या हता. मूळ मंदिरमां नीलरत्ननिर्मित महत्प्रमाण एवी नोमिनाथ तीर्थकरनी प्रतिमा, अने आसपालना ७२ जिनालयोमां, भूत, भविष्य अने वर्तमानकालना एम ७२ तीर्थकरोनी पित्तलमय प्रतिमाओ प्रतिष्ठित करवामां आवी. ए सिवाय, २४ तीर्थकरना, २४ जुदां जुदां मंदिरो, तेसज 'निविहार' प्रमुख बीजा पण घणा विहारो तेणे एकला पाटण शहरमांज कराव्या हता. पाटण सिवाय बीजां नगरो अने गामालां तेणे जे मंदिरो बंधाव्यां छेतेनी तो संख्या पण कोई जाणतो नथी. ए मंदिरोमां, जसदेवना पुत्र दंडाधिप अभयनी देखरेख नीचे तारंगापर्वत उपर बंधावेलुं अजितनाथन महान मंदिर खास उल्लेख करवा योग्य छे. आची रीते मात्र जिनमंदिरो बंधावीने जनसारपाल पोतानी जैनधर्म प्रत्येनी श्रद्धा बताची अटकी गयो न होतो; परंतु एक परम श्रद्धालु श्रावकनी माफक ते हमेशां जिनमदिरमा जई जिनमूर्तिनी भाव- पूर्वक पूजा पण करतो हतो अने जैनधर्मनो महिमा प्रकट करवा माटे अपाहिनका महोत्सव विगेरे जैन उत्सवो पण घणा ठाठथी उजवतो हतो. ए महोत्सवो प्रतिवर्ष, चैत्र अने आश्विन मासना शुक्ल पक्षना छेल्ला आठ दिवसोमां, पाटणना मुख्य अने प्रसिद्ध मंदिर नामे 'कुमारविहार' मां करवामां आवता हता. महोत्सवनी समाप्तिना दिवसे-एटले चैत्र अने आश्विन मासनी पूर्णिमाना दिवसे-सांजना बखते, रथयात्रानो वरघोडो निकळतो. हाथिए जोडेला रथनी अंदर पार्श्वनाथनी मूर्ति स्थापयामां आवती. रथ प्रथम 'कुमारविहार' मांथी निकळतो अने अनेक सामंत, मंत्री, व्यापारी आदिना समूहथी विटळाएलो ते राजमंदिरमा जतो. त्यां राजा जाते वस्त्र अने आभूषणोथी रथस्थ प्रतिमानी पूजा करतो. अन्य जनो ते वखते विविधभावव्यंजक अने स्तवनासूचक नृत्य अने गानादि करता. ते रात्रिए रथने त्यां (राजमंदिरमा) ज राखवामां आवतो अने बीजे दिवसे, सवारना वखते, सिंहद्वार यहार, तेना माटे खास उभा करेला मंडपमा लई जवामां आवतो. राजा पण त्या साथे जतो, अने समाळ जनसमूहनी समक्ष, रथस्थ जिनप्रतिमानी लौथी प्रथम स्वयमेव आरती उतारतो. पूजा विगेरे सघळी क्रिया थई रह्या वाद रथ पाछो नगरमा आववा निकळतो. नगरना बधा राजमार्गोमा परिभ्र. मण करतो करतो अने ठेकाणे ठेकाणे बांधेला मंडपो नीचे उभो रहेतो रहेतो, घणा आडंबरपूर्वक रथ पाछो पोताना स्थानके पहोचतो. आवी रीते कुमारपाल जाते जैनधर्मनो महिमा करतो अने पोताना ताबामांना बीजा मांडलिक राजाओ पासे पण तेवी रीत करावतो. तेना हुकमथी बधा मांडलिक राजाओए पोतपोताना नगरोमां कुमारविहारो बंधाव्या हता, अने तेमनी अंदर आवा महोत्सवो पण हमेशां करता-करावता हता. एक दिवसे कुमारविहारमा बेसीने कुमारपाल हेमचंद्राचार्य पासे धर्मोपदेश सांभळतो हतो ते वखते केटलाक विदेशी धनाढ्य जैन यात्रिओए आवीने आचार्यने अने राजाने प्रणाम कर्याः ते यात्रिओ सौराष्ट्र (काठियावाड ) देशमां आवेलां जैन तीर्थोनी यात्रा करवा निकळ्या हता; अने रस्तामा पाटण शहर आक्याथी, त्यांना मंदिरोनी यात्रा करवा तथा आचार्य हेमचंद्र अने राजा कुमारपाल जेवा अंक २] कुमारपाल प्रतियोघ परिचय ...... ....... -.-.-. . .... जैनधर्मना महान् पुल्योनां दर्शन करवा तेथो त्यां रोकाया हता. ते यात्रिओने जोईने कुमारपालना मनमां पण तीर्थयात्रा करवानी इच्छा थई, अने हेमचंद्राचार्यने पूछी यात्रानी तैयारी करवा मांडी. ज्योतिपिए बतावला शुभ मुहूर्तमां, हेमचंद्रसूरिना प्रमुखपणानीचे तेणे पोताना चतुरंग सैन्य अने चतु- विध संघ-साधु, साध्वी, आवक, श्राविका रूप जैन जनसमूह-साथे सौराष्ट्र देश तरफ प्रयाण कयु. मार्गमा प्रावतां ग्राम अने नगरोनां जिनमंदिरोनी पूजा-उपासना करता कुमारपालना ए महान संघ रैवन (गिरनार ) पर्वतनी नीचे आवेला गिरिनगर (जुनागढ ) नी पासे जई पडाव नांख्यो. गिरनार पर्वतनो चढाव बहु, विषम होवाथी (ते वखते उपर चढवा माटे पगथि बांधलांन होतां ) राजा उपर चढी नहीं शक्यो, तेथी प्रधान पुरुपोना हाथे पूजा आदिनी सामग्री मोकली दई पोतानी अशक्तता माटे खेद करतो ते त्यां नीचेज बेसी रहो. बाकी वीजा बधा यात्रिओ पर्वत उपर गयां अने जिनपूजा आदि तीर्थकृत्य करी यथावसरे पाछा नीचे आव्या. त्याथी ए संघ शधुंजय तीर्थनी यात्रा करवा गयो. त्यां बधा यात्रिओनी लाथे राजा पण पर्वत उपर चढयो अने तीर्थनायक अपभदे- वनी भक्तिपूर्वक पूजा-सेवा करी आनंदित थयो. शर्बुजयना ए पवित्र जिनमंदिरनो जीर्णोद्धार कुमार- पालनी आज्ञाथी वाइड मंत्रिए थोडा ज समय पहेला कराव्या हतो, तेथी ते मंदिर जोई राजा बहु खुशी थयो. आवी रीत गिरनार अने शकुंजय नामना सौराष्ट्रना बंने प्रसिद्ध जैनतीर्थोनी टाट साथै यात्रा करी राजा पाछो पोतानी राजधानीमा आव्यो. गिरनार पर्वतना चढावनी विषमताना कारणे राजा ते उपर जे चढी नहीं शक्यो हतो अने तेना लीधे तीर्थपति नेमिनाथनी जे पूजा-अर्चा करी नहीं शक्यो हतो, तेथी तेने बटु खेद थयां करतो हसो. एक दिवसे पोतानी राजसभामा प्रसंगोपात वात निकळतां राजाए पूछयु के गिरनार उपर लोकोने चढवा माटे सुगम एवो रस्तो बंधावी आपे एवो कोई पुरुप छे? ते वखते कविचक्रवर्ती श्री श्रीपा- लना पुत्र कवि सिद्धपाले ते कार्य माटे गणिगना पुत्र आननुं नाम सूचव्युं. राजाए कविनी सूच- नानुसार आनन सौराष्ट्रनो दंडनायक (सुयेदार ) नीमी गिरनार मोकल्यो अने त्यां पर्वत उपर पग- थिनां बांधवानो हुकम कर्यो. तदनंतर, कुमारपाले अनाथ अने असमर्थ श्रावक आदि जनोना भरण पोपण अर्थे एक सत्रागार बंधाव्यो जेनी अंदर विविध जातनां भोजनो अने वस्त्रादि तेना अर्थिओने आपवामां आवतां हता. तेमज ते सत्रागारनी पासेज एक पौपधशाला बंधावी के जेनी अंदर रहीने धर्मार्थी जनो धर्मध्यान करता पोतार्नु जीवन शांतरीते व्यतीत करी शके. सत्रागार अने पौपधशालानो कारभार चलाववा माटे श्रीमालवंशीय नेमिनागना पुत्र श्रेष्ठी अभय इमारती योजना करी हती. ते श्रेष्टी बहुज सत्यवत, दया- शील, सरलस्वभाव अने परोपकारपरायण हतो. तेनी आवा पुण्यदायक कार्य उपर थएली योग्य नियु- किने जोई कवि सिद्धपोल राजानी योग्य प्रशंसा करी हती. त्यार याद आचार्य हेमचंद्र कुमारपालने श्रावक धर्ममा पालवा योग्य १२ व्रतोनो विस्तार साथै बोध कर्यो. प्राचीन कालमा आनंद अने कामदेवादि परम जैन गृहस्थोए जे रीते आवकधर्मनुं पालन कर्य हतुं, तथा प्रत्यक्षमा पण, खुद पाटण निवासी छड्डुम नामना महान् धनाढ्य श्रावके जे रीते पो- तानी पासे श्रावकना १२ व्रतोनो स्वीकार कर्यो हतो, तेनां उदाहरणो आपी हेमचंद्रमारिए कुमारपालनी श्रावक-धर्म-अंगीकरण तरफ सुलाचि उत्पन्न करी. राजाए तेमना बोधानुसार एक राजाने शोमे तेषी राते श्रावकवतनो श्रद्धा पूर्वक स्वीकार को. अने भावी रीते अंते कुमारपाले जैनधर्मनो पूर्ण स्वी- कार करी ते एक परमाहत जैन राजा थयो. जैन थया पछी कुमारपालनी निस्यनी दिनचर्या आ प्रमाणे वताववामां आवी छे:-ते प्रति दिवस जैन साहित्य संशोधक [भाग १ -~-~- प्रातःकालमा व्हेलो उठतो अने लौथी प्रथम, जैनधर्ममां सुप्रसिद्ध पवा पंचनमस्कारमंत्रनु स्मरण करतो. त्यार वाद पोताना इष्ट देव-गुरु ध्यान करतो. पछी कायशुद्धि विगेरे करी, राजमदिरमांज आवेला जिनमदिरमा जई जिनप्रतिमानी पुष्प, नैवेद्य विगरथी पूजा करी पंचांग प्रणिपात करतो; तथा यथा- शक्ति नमोकारसी विगेरे तपनु प्रत्यारयान करतो हतो. त्यार बाद, अवलर थए, हाथीना होदे बेसी, अनेक सामंत, मंत्री आदि लाश कुमार विहार ' मां जतो, अने त्यां अष्टमकारी पूजा करी भावपूर्वक प्रभुप्रार्थना करतो. त्यांथी पछी ते हेमचंद्राचार्य पास जतो अने चंदन, कपूर तथा सुवर्णकमलदियी तेमनी चरणपूजा करतो हतो. तदनंतर तेमनी आगळ सोने धर्मोपदेश सांभळतो अने उपदेशनी समाप्ति थए, यथाशक्ति काईक तपस्यानु प्रत्याख्यान करी लगभग मध्याह्न समये पाछो राजभुवनमा आवतो हतो. राजमंदिरमा आची याचक विगेरे लोकोने उचित वृत्ति वितरण करी, पुनः नैवेद्य विगेरेना थाळो भरी गृहत्यनी पूजा करतो भने पछी पोते पवित्र भोजननु लेवन करतो हतो. भोजन कर्या बाद ते सभामांजईने बेसत्तो अनेत्यांजदा जुदाविद्वानो साथै धर्मशास्त्र अने तत्त्वविचा- रनी वातो करतो तथा तेमनी पालथी सांभळतो. आ विद्वानोमा कवि सिद्धपाल मुख्य हतो. ते हमेशा राजानी आगळ विविध प्रकारनी कथावार्ताओ करी तेना मनने शांत अने संतुष्ट राखतो हतो. दिवसना चतुर्थ प्रहरमा ( एटले लगभग ण वाग्या पछी ) कुमारपाल राजसभामां सिंहासन उपर जईने बेसतो, अने त्यां आगळ लामंत, मंत्री, मांडलिक अने सेठ साकार आदि राजकीय अने प्रजावर्गीय पुरुपो साथे राज्यकारभार संबंधी विचार-विनिमय चलावतो. तथा लोकोनी विज्ञप्निो (फर्यादोसांभळतो अने तेनो उचित निकाल करतो. राजानो धर्म के एम जाणी क्यारे क्यारे, मल्लवि- गैरेनी कुस्तीओं के हाथी विगैरेनी साटमारी जेवी रमतो पण थलिममने ते जोतो हतो. आवी रीत राज्यकार्य का पछी, जो अष्टमी या चतुर्दशीनो दिवस न होय तो, वे घडी दिवस रहेते सायंकालनु भोजन करतो-अष्टमी अने चतुर्दशीना दिवसे ते एकल वार भोजन लेतोहतो. भोजन- कर्या बाद पुष्प आदिथी गृहचैत्यनी सायंकालिकी पूजा करतो अने बारवधूओ पासे आरती-मंग- लादि करावतो. त्यार वाद रात्रिना केटलाक लमय सुधी, चारण थने गायक आदि जनो तेनी आगळ वेलीने जे गुणगान तथा गायन-वादन आदि करता ते सांभळतो अने ज्यारे निद्रानो समय थतो त्यारे मनमां वैराग्य अने ब्रह्मचर्यना विचारोतुं चिंतन करतो शय्याधीन थतो हतो. ते जैनधर्मप्रसिद्ध नमस्कारमंत्र सतत स्मरण करतो रहेतो हता. ए मंत्र उपर तेनी बहुज श्रद्धा हती. ते कह्यां करतो हता के, जे कार्यों, विपुल सैन्य साथै दिग्याना करती बखते पण माराथी सिद्ध न होता थयां, तथा जे शत्रुओ मारी जातनी चदाईथी पण वश न होता थया, ते कार्यों आ नमस्कार मंत्रना प्रभावी विना यत्ने सिद्ध थाय छे; तथा ते शत्रुओ अंबड जेवा वणिर दंडेशोथी पण वश थई रह्या छे. अत्यारे, आ नमस्कार मंत्रना प्रभावथी मारा राज्यमा कोई पण स्वचक के परचक्रनो भय नथी तेमज बुर्भिक्षादिनु पण क्याए नाम सुधां संभळातुं नथी. इत्यादि. आची रीत आ ग्रंथमां, संक्षेपमा कुमारपालना जैन धार्मिक जीवननो सार आयत्रामां आव्यो छे. कुमारपाल अने तत्कालीन अन्यान्य प्रसिद्ध पुरुषो, के मनो उल्लेख प्रसंगोपात्त आ ग्रंथमा करवामां आन्यो छे, तेमना संबंधमां विशेष हकीकतो प्रभावकचरित्र, प्रबंधचिन्तामाणि, जयसिंहसूरिकृत कुमार पालचरित्र, चारित्रहुंदर रचित-कुमारपालचरित्र, जिनमंडन कृत-कुमारपालप्रबंध; इत्यादि प्राचीन ग्रंथोमा; तेमज फार्वतकृत रामाला अने बॉम्गेझेटीअर आदि अर्वाचीन ऐतिहासिकं ग्रंथोमां यथाज्ञात प्रकट थपलीज छे, तेथी से संबंधमां अहीं काई लाई लखटुं अनुपयुक्त के. यद्यपि उक्तरीते आ ग्रंथमा एतिहासिक वृत्तांत बहुज अल्पप्रमाणमा मापयामां आन्यो छे तो पण २] ..... कुमारपाल प्रतियोध परिचय जे याप्यु छे ते संपूर्ण विश्वस्त अने प्रामाणिक छ, एम आपणे स्पष्ट कबुल कर जोईए, कारण के ग्रंथकार खुद कुमारपालना समकालीनज नहीं परंतु तेना अंतरंग जीवनी सविशेष परिचित पण हता, एम आपणे उपर याला तमना परिचयधी निश्चित रूपे समजी शकीए छीप, कुमारपालना धार्मिक जीवनना संबंधमां तेना समकालीन एवा व्रण लेखकाना लखेलां वर्णनो मळी आवे छे. एलेग्सकोमा एक तो खुद तना धर्मगुरु आचार्य हेमचंद्र पातेज छे. तेमणे कुमारपाल चरित्र (प्राकृतव्याश्रय) मा भने महावीरचरित्रमा तेना संबंधमां केटलुक संक्षिप्त वर्णन वाप्युं छे. कुमार- पालचरित्रमा आरलं वर्णन अने प्रस्तुत ग्रंथमां आपलं वर्णन-तेमांए. खाल करीने तेनी दिनचर्या संबंधी वर्णन तो-तारवणी करतां लगमग अर्थशः संपूर्ण मळतु आवं छ. बीजो लंग्नक कवि यशपाल जेणे कुमारपालना आध्यात्मिक जीवनने अनुलक्षीने मोहराजपराजय नामर्नु नाटक रच्यु छ. आ कवि पोताने अजयदेव चक्रवर्ती ( के जे कुमारपालनो उत्तराधिकारी हतो) नो चरणसेवी बतावे छे. तेथी ए पण कुमारपालनो समकालीन ज हतो, ए अर्थान् सिद्ध छे. 'मोहराजपराजय ' मां, कुमारपाले पोताना राज्यमांधी प्राणिहिंसा, मांसभक्षण, सुतरमण, वेश्यागमन आदि पाप व्यसनोनो जे सर्वथा बहिष्कार कराव्या हतो तेनुं घj मनोहर बने हृदयंगम वर्णन करेल छे. त्रीजा लेखक भा प्रस्तुतग्रंथ प्रणेता सोम- प्रभाचार्य छे. या त्रणे लेखको जबाबदार अने प्रमाणभूत होवाथी तेमना कथनमां कोई पण प्रकारना संदेहने अवकाश नथी.आ लंग्यकोना चाकस कथन उपरथी जणाय छे के कुमारपाल एक परमधार्मिक जैन राजा हतो. जैन धर्म उपर तेनी पूर्ण श्रद्धा हती अने ए धर्मप्रतिपादित आचार-विचारोतुं पालन करवा तेणे संपूर्ण कोशीश करी हती; जैन धर्मनो प्रसार करवा तेणे बनता प्रयन्नो कर्या हता; अने तेनो प्रभाव स्थापना नेणे पोताने तन्मय वनाव्या हती. ते स्वभावथी सरल अने विचारथी उदार हतो. जैन धर्म उपर तेनो पूर्ण अनुराग होवा छतां पण अन्यधर्मा उपर नेणे क्यारे पण पोताना अभाव प्रकट को न हतो. एक प्रजापालक राजा तरीके ते दरेक धर्म उपर समान भावेजआदर राखतोहतो. ते जाते सदाचारी भने सदगुणानुरागी हतो. वेना राज्यथी लोको पूर्ण सुम्बी अने संतुष्ट हता. इत्यलम्. कुमारपाल प्रतिबोधनी थतनी प्रशस्ति नीच प्रमाणे छ.- सूर्याचन्द्रमसी कुतर्कतमसः कणावतंसी क्षितधु- धर्मरथस्य सर्वजगतस्तत्वावलोके दशौ । निर्वाणावसथस्य तारणमहास्तम्भावभूतामुभावेकः श्रीमुनिचन्द्रमरित्परः श्रीमानदेवप्रमुः।। तयात्रभुवाजितदेवमूरिः शिष्यो बृहद्रच्छनभःशशाङ्कः जिनेन्द्रधर्माभ्युनिधिः प्रपेदे घनोदकः स्फूर्तिमतीव यस्मात्॥ श्रीदवारप्रमुखा बभूवुरन्येऽपि नत्पादपयाजहंसाः । येषामवाधाराचैतास्थितांनां नालीकमैत्री मुदमाततान || विशारदशिरोमणेरजितदेवसूररम्नमाम्बुजमधुव्रतो विजयसिंहरिःप्रभुः । मिनोपकरणक्रियाचिरनियवासी च चिरन्तनमुनिव्रतः व्यधित दुःयमायामपि । तत्पपूर्वादिसहस्राष्ट्रिमः सोमप्रभाचार्य इति प्रसिद्धः । श्रीहेमरेश्च कुमारपालदेवस्य चेदं न्यगदचरित्रम् ।। मुकविरिति न कीति नार्थलाभ न पूजामहमभिलपमाणः प्रावृतं वक्तुमेतत् । किमुत रुतमुभाभ्यां दुष्करं दुःपमायां जिनमतमतुलं तत्कीर्तनापुण्यमिच्छु: ।। धर्मे निर्यलतामवाप्नुमतुला श्रीहेमचन्द्रप्रभो भक्ति व्यजितुमद्धता भणितिपु मुटुं परामौचितीम् । ओतुं चित्ररुयाश्रमत्कृतिमत: काव्य च लोकोत्तरं कर्तुं कामयसे यदि स्फुटगुणं तद्ग्रन्धमतं शृणु ॥ प्राग्वाटान्वयसागरेन्दुरसमप्रमः रुततः क्षमा वाग्मी सक्तियुधानिधानमजान श्रीपालनामा पुमान् । यं लोकोत्तरकाव्यरजिनमतिः साहित्यविद्यारतिः श्रीसिद्धाधिपतिः फान्द्र इति च प्रातति च व्याहरन् ।। पुत्रस्तस्य कुमारपालनृपतिप्रीतेः पदं धीमतामुत्तंसः कविचक्रमस्तकमणिः श्रीसिद्धपालोऽभवन् । क्लमं तद्वसताविदं किमपि यच्चायुक्तमुक्तं मया तयुध्माभिरिहोच्यतामिति वुधा का प्राचालिः प्रार्थये ।।

जैन साहित्य संशोधक [ भाग । W wimro ~ ANA..... MAN Ph हेमरिपदपङ्कजहंसैः श्रीमहेन्द्रमुनिपैः श्रुतमेतत् । वर्द्धमान गुणचन्द्र:गणिभ्यां साकमाकलितशास्त्ररहस्यैः ॥ यावनिहताखिलसन्तमसो नभसि चकास्तो रविचन्द्रमसौ । तावत्-हेमकुमारचरित्रं साधुजनो वाचयत्तु पवित्रम् ॥ विमलमतिसुधाचिर्नेमिनागाड्गजन्माऽभवदभयकुमारः श्रावकः श्रेष्ठिमुख्यः । अथ निजकरपा प्राप्तधर्मार्थपद्मा विजितपदकपद्मा तस्य पयोति पत्नी ।। तत्पुत्रा गुणिनोऽभवन् भुवि हरिश्चन्द्रादयो विश्रुताः श्रीदेवीप्रमुखाश्च धीधपणापात्राणि तत्पुत्रिकाः । तप्रीत्यर्थमिदं व्यधायि तदुपरागच्छष्टात्मभि ( ? )-भूयिष्टानि च पुस्तकानि सोऽलेखयत् । शशिजलधिसूर्यवर्षे शुचिमासे रविदिने सिताष्टम्याम् । जिनधर्मप्रतिबोधः क्लप्तोऽयं गुजरेन्द्रपुरे ।। प्रस्तावपञ्चकेऽप्यत्राष्टौ सहस्राण्यनुष्टुभाम् । एकेकाक्षरसंख्यातान्यधिकान्यष्टभिः शतैः ।। संवत् १४५८ वर्षे द्वितीयभाद्रपदशदि ४ तिया शुक्रदिने श्रीस्तंभतीर्थे बृहद्ध ( वृद्ध ) पौषधशालायां भद'• श्रीजय- तिलकसुरीणां उपदेशेन श्रीकुमारपालप्रतिवोधपुस्तकं लिखितमिदं ॥ कायस्थ ज्ञातीयमहं मंडलिकमुत पेनालिखितं । चिरं नंदतु ।। छ । उ० श्रीजयप्रभगणिसप्य ( शिष्य ) उ• श्रीजयमंदिरगणि सभ्य (शिष्य ) भट्टा० श्रीकल्याणरत्नसुरिगुरुभ्यो नमः पं० व (वि) द्यारत्नगणि। सोमप्रभाचार्य रचित शतार्थवृत्तकाव्यनी टीकाना प्रारंभमां नीचे प्रमाणे ५ श्लोको आपवामां आ- व्या छे जेसां १०० अर्थोनी अनुक्रमणिका आपवामां आवी छे. अत्र स्तुताश्चतुर्विंशतिजिनाः सिद्ध-सूर्य उगाध्यायाः । मुनि-पुण्डरीक-गौतम-सुधर्म-पञ्चव्रती-समया। श्रुतदेवी-पुरुषार्थाः विधि-नारद-देव-विष्णु-चलभद्राः । श्रीः प्रद्युम्नश्चक्र शङ्ख-शिव-गिरिसुता-स्कन्दाः ॥ हेरम्बः कैलाशो प्रह-देिमाला जयन्त-घन-मदिराः । कनका-ऽब्धि-सिंह-हय-करि-सरोज-भुजगाः शुकोऽरण्यम्।। मानसरो--ऽस्त्र-वैद्या-ऽनिलसुत-पत्नी-महा-गुरुचतुष्कम् । जयसिंह-कुमारनृपाः जयदेवो मुलराजश्च ।। श्रीसिद्धपालकवि रजितदेवरि-गुरुर्विजयसिंहः । तच्छिप्यः सोमप्रभसूरिश्च शतार्धवृत्तकविः ।। शतार्थवृत्तनी वृत्तिना अंतमा सोमप्रभाचार्यना पिताविगेरेना उल्लेखवाला जे लोको आप्या छे तेनीचे प्रमाणे छ.- म एव शिष्यः स्वरुतैः कवित्वैर्गुरोगरिन्ना जितकाञ्चनाद्रेः । गृहस्थभावा-ऽन्वयकर्तिनेन व्यनक्ति भक्ति पुनस्क्तमेताम् ।। प्राग्वाटान्वयनीरराशिरजनीजानिर्जिना परः संजातो जिनदेव इत्यभिधया चूडामणिमन्त्रिणाम् । यस्यौदार्य-विवेक विक्रम दया दाक्षिण्य-पुण्यैर्गुणैः। साम्यं लब्धुमहर्निश जगदपि विलक्ष्यन्न विश्राम्यति ।। तस्याऽऽत्मजः सुजनमण्डलमौलिरत्नमुज्जृम्भितेन्द्रियजयोऽजान सर्वदेवः । एकस्थसर्वगुणनिर्मितकौतुकेन धात्रा रुतोऽयमिति यः प्रथितः पृथिव्याम् ।। सूनुस्तस्य प्रथमकमलादर्पण: पुण्यकामः कौमारेऽपि स्मरमदजयी जैनदीक्षा प्रपन्नः । विश्वेस्याऽपि श्रुतजलनिधेः पारमासाद्य जज्ञे श्रीमान् सोमप्रभ इति लसत्कीतिराचार्यवर्यः ।। यो गृणाति समश्रुतं वहति यस्तोद्भुतं पाटवं काव्यं यस्त्वरितं करोति तनुते यः पावनी देशनाम् । योऽयनान् सुमतेश्चरित्र + + भट्टाः सूक्तिपंइियतपरां श्रीसोमप्रभसूरिरेष वृत्ते शतार्थे व्यघान् ।।

डॉ. हर्मन जैकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना (प्रथम भाग.) [ अनुवादक-शाह अंवालाल चतुरभाई, बी. ए.] [प्रथम अंकमां डॉ. हर्मन कोयीनी कल्पसूत्रनी प्रस्तावनानो अनुवाद आपचामा आन्यो छे. आज आ नीचे, 'पूर्वना पवित्र पुस्तको ( Sacred Books of the Fast )' नामनी सुप्रसिद्ध ग्रंथमालामा 'जैन सूत्रो' नामे तमनां जे ये पुस्तको प्रसिद्ध थयां छे, तेमाना पहेली पुस्तकनी (नं. २२) प्रस्तावनानी अनुवाद उपस्थित करवामां आवे छे. ए पुस्तकमा आचारांग अने कल्पसूत्र, एम वे जैन सूत्रोनाभापांतरी प्रकट करवामां आव्यां छ.-संपादक.] जैन धर्मनी उत्पत्ति तथा उत्क्रांतिना संबंधमां आगमो) परस्पर विरुद्ध कथनोथी भरेला होत विवेचन करती वम्वत, केटलापक विद्वानो हजी अथवा तो तेमा आवेली तारीखोथीपरस्पर विरोधी पण, जे शंकाशील कथन कर रीतसर समजी अनुमानो उभां थतां होत तो आवां साधनोना रहा छ, ते या विषयमा समग्र प्रश्ननी वर्तमान परि- आधारे उत्पन्न थपला वधा सिद्धान्तोने शंकाशी: स्थिति जोतां बिलकुल योग्य होय तेम जणातुंनी. लमने जोवानुं आपणा माटे न्याय्य गणात. परंतु कारण के हवे जैन धर्मर्नु साहित्य मोटा प्रमाणमा अनसाहित्य स्वरूप आ वावतमा बौद्ध साहित्यथी उपलब्ध थपलु छ भने तेथी जे फोर्ट विद्वानने ए पण बहुज अल्पयंशे जूटु पडे छे, खास करीने धर्मना प्राचीन इतिहासनां साधनोने संगृहीत कर- उत्तरीय बौद्ध साहित्यथी. तो पछी शा माटे, पानी इच्छा होय तेने तेमाथी तेवां पुष्कळ साधनो आटला बचा लेखको, जनसाहित्यमाथी मळी मळी शके तेम छे. अने बळी आ साधनो पण आवती ते धर्मनी उत्पत्ति अने स्थितिथी, भिन्न एवां नथी के जेथी,तेमां आपणन अश्रद्धा राखवान प्रकारनां अनुमानो करता हशे, आनुं कारण स्पष्ट कारण मळे. आपण जाणीए छीए के जैनोना छे, अने ते युरोपीय विद्वानोए जैनधर्म अने बौद्ध- पवित्र पुस्तको- अर्थात् आगमो-प्राचीन छे.- धर्ममां परस्पर वास्तविक अगर आभासात्मक जे जेने आपणे संस्कृत काळ साहित्य ( Classical साम्य खोळी काढ\ छ, तेज छ. ए विद्वानोन एवं }iterature ) कहीए. छोए, ते करतां स्पष्ट रीते मानवु छ के आ बन्ने धर्मोमां जे भाटलं यधुं साम्य वधारे प्राचीन है. ए आगमोनी प्राचीनताना संबं- दृष्टिगोचर थाय छे तेथी, ते परस्पर स्वतंत्र धमां कहे जाईए के तेमांना घणाक ग्रंथो, उत्त- नहीं होचा जोईए, परंतु एक बीजामाथी उत्पन्न थ- रीय यौद्धोना सौथी प्राचीन ग्रंथोनी साथे तुलना- एला अथवा तो एक बीजानी शाखा रूपे प्रवर्तला मां आवी शके वा छे. हवे चौद्धोना ए ग्रंथी जो होचा जोईए. आ प्रकारना, कारण उपरथी करात- बुद्ध अने बौद्धधर्मनो इतिहास तैयार करवामां कार्यना अनुमानात्मक अभिप्रायथी, घणा विवे- साचां साधनरूप स्वीकारायां छे तो तेज कोटिनां चको-समालोचकोनी दृष्टि कलुपित थएली छे, जैनोनां पवित्र पुस्तको तेमना इतिहासनां प्रामा- अने अत्यारे पण तेम थती जोवामां आवे छे. आप- णिक साधन तरीके शा माटे न स्वीकारी शकाय, छीनां पृष्ठोमा हुँ ए मिथ्याम्रांतिने दूर करवानो ते समजी शफातुं नथी. जो या ग्रंथी ( जैन प्रयत्न करीश अने जैनागमो जे खरेखरी प्रामाणि ७० जैन साहित्य संशोधक . [ भाग १ Awin-v....canal wwwra.snne mmaNNN .nnnnnnnnn ... ..... VON- कता अने प्रतिष्ठाने पात्र छे ते पुरवार करी मापीश. कोना इष्टिकागृहमां उतर्या हता. आ. स्थाननी आपणे आपणी चर्चानो प्रारंभ महावार विषयक नजीकमांज अम्बापाली वेश्यानुं अम्बपालिवन ऊहापोहथी करीशु के जेओ जैनधर्मना संस्थापक, नामर्नु उद्यान हतुं, जें तेणे बुद्ध अने तेमना संघने निदान तेना अंतिम तीर्थकर हता. अहीं मारे समर्पित कयें हतं. त्यांथी तेओ वेसाली गया, अने. जणाची देवं जोईए के, महावीर एक अर्वाचीन सं. त्यां लिच्छविओना सेनापतिने, जे निग्रंथो प्रदाय द्वारा उभी करेलो अथवा कल्पी लीधेलो नो एक श्रावक हतो, ' पोताना धर्मनी अनु- मात्र सांकेतिक पुरुष छे, के जे संप्रदाय पोताना यायी बनाव्यो. आ उपरथी बौद्धोनु कोटिग्गाम कल्पित संस्थापकना मिथ्याकाल पछी घणी शता- अने जैनोनु कुण्डग्गाम ए बन्ने एकज होय तेम ब्दिओ बाद उत्पन्न थयो हतो, ए जोतना भ्रमने दूर घणुंज संभवत लागे छे.नामना साम्य उपरांत बा. करवा माटे पुरतुं साहित्य मळी चूक्युं छे. तिकोनो उल्लेख के जे ज्ञातिको स्पष्टरूपेमहावीरनी श्वेतांबर तेमज दिगंबर-ए बने जैन संप्रदायो जन्मजातिवाळा ज्ञात क्षत्रियो जछे-तथा साह' जणावे छे के महावीरं कुण्डपुर अथवा कुण्डनामना नामना जैननो उल्लेख पण एकज बाबत तरफ राजा सिद्धार्थना पुत्र हता. जैनोनी एवी मान्यता अंगुली निर्देश करें.छ... छे के आ कुण्डग्राम ते एक मोर्ट नगर हतुं तथा आ उपरथी घणु करीने कुण्डग्गाम ए विदेहनी सिद्धार्थ ते एक त्यांनी प्रतापी राजा हतो. परंतु राजधानी वेसालीनुं एक मात्र परुंज हतुं. आ अनु- कपिलवस्तुं अने शुद्धोदनना संबंधी बौद्धोना मानने, सूत्रकृताग १, ३' मा महावीरने में 'वेंसा- कथननी माफक, जैनोनुं पण आखरी वस्तुस्थितिनुं अर्थना विषयमा टीकाकारो तथा अर्वाचीन भाषांतरकारोनी अतिशयोक्ति द्वारा कराएल. एक मिथ्या क. गेरसमजुती थई होयं तेम लागे छे. महापरिनिवान सुत्तना थन छ कुण्डग्रामने आचारांगसूत्रमा एक सनिवेश भाषान्तरमा (S. B. E. Vol.. XI ) राइझ डेविड्झ, तरीके जंगावेलुं छे के जैनो अर्थ टीकाकारे 'या- पृ. २४ नो नोटमां, आ प्रमाणे लख छः- प्रथम 'नादिक त्रिओं अथवा सार्थवाहोर्नु विश्रामस्थान' एम शब्द वे वार बहुवचनमा वपरायो छे'परंतु त्यार पछी करेलो छ. आ उपरथी जणाय , के ते (कुण्ड- नीजी वार- तीजी वार-एंटले छेल्ला अवान्तर वाक्यमा ते एक वच- ग्राम) एक नजीव॑ स्थान हशे. तेना संबंधमा मात्र मां वपरायो छे. आनो खुलासो बुद्धघोष आम करे छे-'ए एटलोज संप्रदाय मळी आव के ते विदेहमा नामना जलाशयना काठी उपर. एज नामनां वे गामड़ा आवेलं हतुं (आचारांग सूत्र २,.१५६. १७.) बौद्ध हता. ' परंतु मारा धारवा प्रमाणे बहुवचनमा प्रयुक्त एले तेमज जैन ग्रंथोमा प्रसँगे प्रसंगे मळी आवता नातिका शब्द तो क्षत्रियोनो वाचक छे, अने एकवचनी उल्लेखो उपरथी महावीरनी जन्मभूमिना स्थाननो आपणे योग्य निर्णय करी शकीए तेम छीए.. बौ. सुत्तमा प्रथम स्थान निर्देश वखते, तथा महाग ६, ३:: शब्द 'गिञ्जकावसथ' D. विशेषण, छे, जे महापरिनिम्बान छौना महावग्गसूत्रमा आपणे वांचिए छीए के बुद्ध ५ मां, आवे छे. आधी महापरिनियानमा जे जे स्थळे ज्यारे कोटिग्गाममा वसता हता त्यारे तेमने, ते नादिक शब्द एकवचनान्त होय त्या त्यां तेना,' गिजका 'स्थाननी पांसे आवेली वैशालीनामे राजधानी- मांथों लिच्छविओ तथा अम्बापाली नामनी वेश्या वसथ' विशेष्यने अध्याहृत मानवू जोईए. मारा मत प्रमाणे मळवा आवी हती. कोटिंग्गामथीं बुद्ध ज्यां जा- कप खरू छ. मि. राष्ट्झ डेविड्झे पण भाषान्तरंनी अनुक्र 'नादिक' ए रूप खोटं छे अने. महापरिनिब्बान- 'आतिक' तिको रहेता हती त्यांगया हता, अने त्यां तेओजाति- मणिकामा नादिक ए पटना पासे छे.' एम जे. जणाव्यूं 3 जुओ ऑडनबर्गनी आवृत्ति. पृ. २३१, २३२; 'स्पष्ट जणाय छ के आं स्थान तथा कोटरंगाम ए वन्ने स्थलो छे ते भलभरेलुं छे. कारण के महावग्गनी कथा उपरथी भाषांतर( बांजो भाग ) पृ. १०४. Sacred Books of वेसालिनी नजीकमा हता. tho-East, Vol. XVII. 1 जुओं - वेबर, Indischo Siudien, XVI, २ जे सूत्रमा आतिका शब्द आवेलोछे ते सूत्रंना 2.262..

भक २] ५१ . ..... ,000.. AM -GARAAN ...100 AAPANAVA-000-00- .. डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना लिए 'एटले वैशालिक एवं नाम आपलं छ, तेथी शकाय छे आम कहेवानुं कारण ए छे के, ते पण पुष्टि मळे छे. ते स्थळे, टीकाकारे आ शब्दनी पोताना लग्न संबंधना लीधे मोटा मोटा माणसो मर्थ थे भिन्न भिन्न रीतिए समजाव्यो छे अने वीजे साथे संबंध धरावतो हतो, तेवा उल्लेखो मळी आवे एक स्थळे त्रीजो अर्थ पण आपली छे. आ प्रमाणे छे. तेनी स्त्री त्रिशला ते वैशालीना राजा चेटकनी मळी आवतो अर्थविरोध, एम सावीत करे छे के बहेन हती. अने आ विदेहना राजवंशमा उत्पन्न शालिकनो खरो अर्थ शो करयो ते संबंधी स्पष्ट थवाथीज ते वैदेही अगर विदेहदत्तां कहेवाती हती. संप्रदाय नहीं मळी आग्यो हशे; अने तेथी, अर्वा मारा यत्किचिन् जाणवा प्रमाणे बौद्ध ग्रंथोमां चीन जैन विद्वानोनां कृत्रिम अर्थवोधनो तरफ वैशालीना राजा चटकनो उल्लेख थएलो नथी. पं. यापणे दुर्लक्ष आपवं उचित छे. वैशालिक शब्दनो रंतु ते ग्रंथोमां एवी हकीकत तो वांचवामां आवे स्पष्टार्थ 'वैशाली निवासी' एवो थाय छ अने छ के वैशालीन राज्यशासन एक अमीर मंडळने कुण्डग्राम वैशालीतुं पर होवाथी महावीरनुं ते नाम सोपवामां आव्युं हतुं अने ते मंडळनो अध्यक्ष एक वास्तविक गणी शकाय छे-जेम टनहामग्रीननो राजा हतो. राज्यमा अन्य सत्ताधारी तरीके मात्र रहेवाशी लण्डनर (Lonrloner) तरीके ओळखाय एक राजप्रतिनिधि (Viceroy) अने बीजो सेनापति छ तेम. ज्यारे आ प्रमाणे कुण्डग्राम वैशालीन एक हतो. लिच्छविओना आ अजायची भरेला राज्यतं. पलं मात्र हतुं, त्यारे एपण स्पयज छ के ते गामनी बनी झांसी जैन ग्रंथोमा पण आपणने थई शके छे. राजा पण वधारेमा बधारे एक नानो सरदारज निरयावली सूत्रमा एक वर्णन छे के ज्यारे चम्पाना होचो जोईए. जो के जैनो पोताना अनुरागावि- राजा कृणिक उर्फे अजातशत्रुए चेटक राजा क्यने लईने, सिद्धार्थपक खरेखर प्रबळ राजा हतो उपर मोटी सेना लई हुमलो करवानी तैयारी करी, एम कल्पी तेनी राजलक्ष्मीनो घणांज देदीप्यमान त्यारे चेटक राजाए काशी, कोशल, लिच्छविओ अने आदर्शभूत वर्णोमां चितार आपे छे खरा; परंतु अने मल्लकिमोना १८ संयुक्त राजाओंने एकत्र तेमनां वर्णनामांथी अलंकारोना आमरणो उतारी करी, तेमने पूछथु के तमारो अभिप्राय कूणिकनी लीधां पछी ए सत्य सहेलाईथी प्रकट थई जाय छे मागणीमोने पूरी करवानो छे के तेनी साथे युद्ध के सिद्धार्थ एक मोटो राजा नहीं पण मात्र अमीर करवानो छ ? आ सिवाय एक एवो पण उल्लेख हतो. अन ते आ प्रमाणेः-सिद्धार्थने अनेक स्थळे मळी आवे छे के, महावीरना निर्वाण वखते, आ मात्र क्षत्रियज कहेलो छ, तथा तेनी पत्नी जेनुं नाम १८ राजाओए ते प्रसंगनी यादगारी माटे एक त्रिशला हतुं, तेने पण हमेशा क्षत्रियाणी तरीकेज उत्सव उजवधानो ठराच कर्यो हतो. परंतु, आ वर्णवेली छे. ज्यां सुधी मने स्मरण छे, तेने देवी ठेकाणे चेटकनो, के जेन ए सर्वे राजाओनो महा. तरीफ क्यांप लखी नथी. तेमज ज्ञात्रिक क्षत्रियो राजा तरीके बतायवामां आवे छ तेनी, पृथक् पण दरेक स्थळे तेभो सिद्धार्थना समान पदवाळा नामनिर्देश थपली नथी. आधी संमवित छे के चटक होय तेत्री रीत वर्णवामां आव्यां छे नहीं के तेना (सिद्धार्थना) सामंतो अगर तावेदारो तरीके. आ १ जुआ कल्पसूत्रनी मारी आवृत्ति, पृ. ११३. अही हकीकतो उपरथी एम मालुम पड़े छ, के सिद्धार्थ चेटकन महावीरना मामा तरीके जणावेली छ. राजा न हती, तेम ते पोतानी जातिनी नेता पण न कल्पसूत्र, जिनचरित्र, ११०; आचारांग २, हतो; परंतु, पूर्वीय देशोमांना जमीनदारो अने तेमां १५, ६ १५. पण खास करीने देशना प्रतिष्ठित उमरावो जेटली : Turnour in the Journal of the Royal सत्ता भोगवे छे तंटली सत्ता धरावनारो ते एक Asiatic Socicty of Bengal, VII, p. 992. क्षत्रिय हतो. छत्तां पण ते तेनी साथेना अन्य सर y Ed. Warren, p. 27. दारो करतां बधारे लागवगवानो हतो, एम कहीं ५ जुओ कल्पमृत्र, जिनचरित्रा. २ जुओ ७२ जैन साहित्य संशोधक [भाग. पण अन्य अढार संयुक्त राजाओ जेवो मात्र एक महावीर तथा बुद्ध-बन्नेए प्रकटरीते पोतपोताना भागीदार राजा हतो अने तेलना जेटलीज ते कुटुम्बनी सहायता अने लागवगनो उपयोग कर्यो सत्ता घरावतो हतो. तथा, ते उपरांत तेनी सत्ता हतो. तेमना बीजा प्रतिस्पर्धिोनी अपेक्षाए तेमनो वैशालीना राज्यशासनथीनियन्त्रित हती. आधी आ- अधिक उत्कर्ष थवामा केटलेक अंश देशना प्रति- पणे समजी शकीए छीप के प्रथम तो चेटकनो प्र- ठित कुटुम्बो साथे तेमनो जे विशिष्ट संयंध इतो, भावए कोई विशेष नहीं हतो,अने बीजं तेनोपण उप- ते पण एक मुख्य कारण छे. योगमात्र बौद्धोना प्रतिस्पर्धी पवा जैनोना पक्षमांज पोताना मातृपक्षद्वारा महावीर, मगधना राजवं- भयो हतो; तेथी बौद्धोए तेनो उल्लेख को नहीं शसाथे पण सगपण धरावता हता; कारण के होवो जोईए. जैनोए तेनी स्मृति कायम राखी, तेनुं चेटकनी चेल्लनो नामनी पुत्रीन लग्न, राजगृहमां कारण ए छे के, ते एक तो पोताना तीर्थकर महा. वसता, मगधना राजा सेणिय-बिम्भिसारं अथवा वीरनो मामो थतो हतो अने बीजं ए धर्मनो ते बिम्बिसारनी साथै थएलु हतुं. जैनो अने बौद्धो आश्रयदाता पण हतो. आ चेटक राजानी लागः बन्नेए आ राजानी, महावीर अने बुद्धना मित्र तथा वगने लईनेज वैशाली जैन धर्म: एक संरक्षण आश्रयदाता तरीके स्तुति करी छे. परंतु सेणियनो स्थान बन्युं हतु अने तेथीज बौद्धोए तेने पाषंडी- पुत्र कूणिक अथवा तो बौद्धोना कहेवा प्रमाणे ओना एक मठ तरीके जणाव्युं छे. अजातशत्रु-जे वैदेही राणी चेल्लनाना पेटे अव- महावीरना कौटुम्बिक संबंधन आ निरूपण तयों हतो, तेणे पोताना राज्यना प्रारंभकाळमां करवामां मारो हेतु काई कुतुहलरूप नथी, जो बौद्धो तरफ कांई पण सहानुभूति बतावी न हती; तेम होत तो तो हुं आ स्थळे ते संबंधी सघळी परंतु ज्यारे बुद्धना निर्वाणना आठ वर्ष बाकी रयां ऐतिहासिक हकीकत-पछी ते गमे तेटली नजीवी हतां त्यारे ते बुद्धनो आश्रयदाता बन्यो हतो. ते होत, भेगी करत. परंतु कौटुम्बिक संबंध विषयक वखते पण ते सद्भावपूर्वक बुद्धधर्मानुयायी थयो आ माहीती अपवातुं खास कारण ए छे के ते द्वारा हतो तेम तो आपणे मानी शकता नयी. कारण ए आपणे महावीरनी सफळतानी प्रामिन रहस्य शोधी छे के जे माणस खल्लीरीते पोताना पितार्नु खून. शकीए छोए. महावीर तथा बुद्ध ए बन्ने कृष्णसंबंधी दंतकथा- बौद्धो चलनाने वैदेहाना नामे ओळखे छे. तिवेटना बुद्ध चरि- १ जुओ, वारननी निरयावली सूचनी आवृत्ति पृ. २२. ओमा वर्णवेला यादवो जेवा तथा वर्तमानकालीन मा तेनु नाम श्रीभद्रा आपेलं छे के जे आपणने चेटकनी रजपूतो जेवा एक जातना जागीरदार सामंत मी सुभद्राना नाम स्मरण करावे छे. See Sehiefn. मंडळगां जन्म्या हता. आवी जातना जागीरदार 97T-HESTAÍ Nigitaler ÅTT ETOTI Ahga alo de St. Petersburg, lome IV, p. 253. er in Me'moires de l'Acade'mi'e Impe'ri- अने चिरस्मरणीय होय छे', आपणे स्पष्ट जाणीए छीए के युद्ध मुख्यत्वे करीने २ घणुं करीने ते मात्र सेणिय अथवा श्रेणिकना नामेज अमीर वर्गनेज पोतानो उपदेश आपता हता ते ओळखाय छे; तेनुं पूरूं नाम दशाश्रुतस्कन्धमा आपेलुं छे जैनो पण प्रारंभमां ब्राह्मणो करतां क्षत्रियोने ऊंचा जुओ वेवर, Ind. Stud. XVI, p. 469. मानता हता. पोताना मार्गनो प्रसार करवामां, ३ आ बन्ने नामो एकज व्यक्तिवाचक होय तेम लागे छे. कारण के बौद्ध अने जैन ग्रंथकारोना कथनानुसार ते उदा. १ जैनो महावीरना सगाओनां नामो तथा गोत्रो जणा- यिन् अथवा उदयभद्दक-जे जैन अने ब्राह्मण ग्रंथोमा ववामाज मात्र चोकस जणाय छे. तेओ तेमना संबंधी वीजें जणान्या प्रमाणे पाटलिपुत्रनो वसावनार हतो तेनो-पित कई विशप लखता नथी. कल्पसत्र, जिनचरित्रो १०९, इतो. २ जमो कल्पसूत्र, जिनचरित्रो $ १७ अने १८, ४ बौद्धो पण ए हकीकतवाळी विस्तारयुक्त कथा भापे अंफ.२ ७३ डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रीनी प्रस्तावना फरनारो होय तथा मातामह साथै लडाई लडनारो युद्ध कर्यु हतुं आ राजा महावीरनो मामो होवाथी होय तेवो माणस अध्यात्मशानने माटे बहु उत्सुक अने तेथी जैनोनो संरक्षक होवाथी, एना उपर पने ते असंभवत लागे छे. धर्मपरिवर्तन करवामां करेली चढाईना परिणामे जैनोनी सहानुभूतीने ते तेनो वास्तविक शो उद्देश हशे ते आपणे सहे. खोई वेठो हतो. आधी पछी तेणे जैनोना प्रतिस्पर्धी लाईथी अनुमान करी शकाए छीए. तेनो उद्देश्य बौद्धोना पक्षमांभळवानो निश्चय.को हतो; के जे बीजो कोई नहीं पण जेम तेना पिताए पोताना बौद्धोने पोताना पिताना मित्रो होवाना सबवे प्रथम राज्यमा (मगधमां) अंगदेशनो उमेरो कर्यो हतो तेणे त्रास पण आप्यो हतो. तेम तेने पोताना तायाना मुलकोमा विदेहन उमे आपणे जाणीए छीए के अजातशत्रु एक तो वैशा- रवानो हतो. आ कारणथी तेणे प्रथम विवेहनी लीने जीतवामां सफळ थयो हतो तथा पाजु तेणे वृजि जातिने तावे करवानाटे-काढी मुकवा माटे नन्दो अने मौर्योना साम्राज्यनो पायो नांख्यो हतो. नहीं-पाटलिप्राममा एक किल्लो बंधाव्यो हतो अने आवी रीते मगधसाम्राज्यनी सरहद वधवाथी जैन भाखरे पोताना मातामह वैशालीना राजा साथै अने वौद्ध ए वन्ने धर्मो माटे एक नवं क्षेत्र खुल्लु थयु हतुं अने तेथी तरतज तेओते क्षेत्र उपर प्रसरी के जुभो, Kern, Der Buddhismus und sein गया हता. ज्यारे बीजा केटलाक संप्रदायो मात्र Geschichte in Indien, I, p. 2-19 [p. 195 ol स्थानिक अने अचिरस्थायी महत्त्वज प्राप्त करी the original],भने तेज प्रमाणे जैनोए पण निरयावलीमा अटकी गया हता; त्यारे ए बन्ने धर्मो आटली मोटी एं हकीक्त आपली है. सफलता मेळववा समर्थ . थई शक्या हता तेनुं १ जुओ उपर. मुख्य कारण बीजु कोई नहीं पण आमंगलकर २ महापरिनिव्वान सुप्त १. २६. अने महावग्ग ६, २५, राजनैतिक संयोगज हतो. नांचे कोएकमां महावीर-अथवा तो अत्यारे आपणे तेमने जैनोना तीर्थकर तरीके नहीं संबोधता होवाधी, कहे जोईए के वर्धमान या शातपुत्रे-ना सगाओनो पारस्परिक संबन्ध चताववामां आवे छे. सुपार्थ सिद्धार्थ चेटक त्रिशला उर्फे विदेहदत्ता सुभद्रा वैशालीनो राजा सुदर्शना बिम्बिसार चेल्लना नंदिवर्धन वर्धमान ( ) स्त्री यशोदा कूणिक उर्फे अजातशत्रु पुत्री अनोज्जा जमालि साथे परणी उदायिन पाटलिपुत्रनो क्सापनार, पुत्री शेपवती अही मारो इरादोमहावीरनुं संपूर्ण जीवन-चरित्र १ पालि तथा प्रारुतमा नातपुत्त. वौद्धो तेमने निग- आपवानो नथी परंतु मात्र केटलीक एवी विगतो ण्ठनातपुत्त अर्थात् निर्ग्रन्थज्ञ तृपुत्र कहे छे.

जैन साहित्य संशोधक [भाग १ ............ .. ..har...... ...Amol .... - शकाय. । एकत्रित करवानो छ, के जे द्वारा ते एक स्वतंत्र दीना लगभग सधळा चातुर्मासो तेमणे ए प्रदेशो ऐतिहासिक पुरुष तरीके तथा घणीक महत्त्वनी मां आवेलां नगरोमांजगाळ्या हती. केटलीक वखते. बाबतोमा बुद्धी ते एक भिन्न पुरुषरूपे सिद्ध करी आ देशोनी पश्चिममा श्रावस्ती सुधी अने उत्तरमा हिमालयनी तळेटी लगी पण तेओ पोतार्नु परिभ्र. वर्धमान पोताना पितानी माफक एक काश्यप मण लंबावताहता.तेमना जे मुख्य ११ शिष्यो गण- (कश्यप गोत्रना) हता. वळी तेओ, पोताना मातापि- धरो तरीके ओळखाय छे अने जेमनां नामो कल्प- ताना मरणसुधी तथा तेनी पछी पण पोताना मो- सूत्रनी स्थविरावली (६१) मां आपेला छे ते टा भाई नंदिवर्धनने पैतृकसंस्थाननो उत्तरा- श्वेताम्बर तेसज दिगम्बर नामना बन्ने जैन संप्रदा. धिकारी बनतां सुधी, गृहस्थावस्थामा रह्या हता. योने समान मान्य छे. आ बावतो उपरांत, महा- त्यार बाद अठावीश वर्षनी उमरे, सर्वे सत्ताधारी- वीरना जीवनसंबंधी जे हकीकतो जैन सूत्रोमां.. ओनी अनुमती लई तेमणे दीक्षा ग्रहण करी हती. मळी आवेछे ते उपर; तेमज मक्खलिपुत्र गोसा- रोमन केथोलिक देशोमां जेवी रीते नाना पुत्रोनी लनी साथे चालेली तेमनी स्पर्धा अने तेमां थए- महत्त्वाकांक्षानुं क्षेत्र देवालय बन्यु हतुं तेवीज रीते ला तेमना विजय वाळी हकीकत उपर, अने अंते.. हिंदुस्थानना नाना पुत्रोनुं ध्यान आध्यात्मिक तेमना निर्वाण स्थान तरीके जे पापा नामनी नानी प्रवृत्तिए खेच्यु हतुं. नगरी प्रसिद्ध थपली छे ते बावत उपर आपणे वि- संसार छोड्यो पछी महावीरे बार वर्ष सुधी चार करवानी जरूरत छे. आ बधी बायतो उपर तपस्वी जीवनं गाळ्युं हतुं अने ते दरम्यान तेमणे विचार करवामां आपणे मात्र जैनोनीज परंपराओ रांढा नामना देशनी जंगली जातीमां पण परिः उपर आधार राखवानो छे, एम नथी.. आमांनी प्रमण कर्यु हतुं. तेमना आ जीवननुं प्रथम वर्ष पूरे केटलीक बाबतोना संबंधमां. बौद्ध ग्रंथोमांथी पण थयां बाद तेओ अचेलक थया हता. आवी रीते उल्लेखो मळी आवे छ. तेथी ते प्रमाणोने पण लक्ष्य- सिद्धिसाधन अर्थे वारवर्ष पर्यंत करेला आत्मदम- मां राखवानी जरूरत छे बौद्ध ग्रंथोमां महावीरने नने अंते वर्धमानने केवळज्ञान उत्पन्न थयुं हतं. तेमना सुप्रसिद्ध नाम 'नातपुत्त ' थी उल्लेखेला छे त्यार बाद तेओ सर्वज्ञ तीर्थकर तरीके ओल अने तेमने निग्गण्ठो (जैन यतिओ) ना नायक खावा लाग्या अने ते उपरांत जिन, महावीर विगैरे. तरीके तथा बुद्धना एक प्रतिस्पर्धी तरीके जणावे. ना विरुदोथी पण संबोधावा लाग्या के जे. ला छे. ए ग्रंथोमा तेमना विषयमा जो कोई भूल शाक्यमुनिने पण लगाडवामां आवे छे. जींदगीनां थएली होय तो ते फक्त तेमना गोत्रना संबंधमां छेल्लां त्रीश वर्षों तेमणे पोताना धर्मनो उपदेश छे. तेमना गोत्रनुं नाम, बौद्ध ग्रंथोमा अग्निवैश्याय- आपवामां तथा यतिमार्गनी व्यवस्था करवामां न आपेलं छे, जे वास्तविकमां महावीरना सुधर्म गाळ्या हतां. आ कार्यमां, आपणे उपर जोई गया नामे शिष्यनुं गोत्र हतुं. बौद्ध ग्रंथकारोए भूलथी तेम, तेमने, विदेह मगध, अने अंगदेशना चेटक, अथवा भ्रांतिथी शिष्यना गोत्रने गुरुनुं गोत्र लख्यु श्रेणिक अने कूणिक नामना राजाओ के जेमनी छे. महावीरनिर्वाण बाद तेमना गणधरोमांथी मात्र साथे तेओ पोताना मातृपक्षद्वारा सगपणनो संबंध आ सुधर्म गणधर ज एकला विद्यमान रह्या हता धरावता हता, तेमना तरफथी खास सहायता तेमज पुष्टि मळी हती. ए देशमां आवेलां नगरोमों १ जुओ कल्पसूत्र, जिनचरित्रो, ६ १२२; चम्पा, ३; तेओए पोतानी आध्यात्मिक जीवनना कारक- वैशाली, १२; मिथिला, ६; राजगृह, १४; भद्रिका, २६ आलभिका, १; पणितभूमि, १; श्रावस्ती, 3; पापा, १, १ तेमना जीवनना आ विभागना संबंधमां लखाएलु पणितभूमि, श्रावस्ती अने कदाच आलभिका आ त्रण शि- एक प्रकरण आचारांग सूत्रमा आवेलुं छे. जुलो वाय उपरनां सघळां स्थळो, उपर निर्दिष्ट थएल वण राज्योनी सरहदोनी अंदरज आवेलां. हता. १ आचारांग (१,८).

अंक २) डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना AL. अने तेओ तेमना पछी युगप्रधान बन्या हता.महा- पत्नीनुं नाम यशोदा हतुं अने बुद्धनी पत्नीनुं नाम वीर बुद्धना समकालीन हता, अने तेथी, विम्बिसार, यशोधरा हतुं. आ यन्ने नामो लगभग सरखां तेना अभयकुमार अने अजातशत्रुनामे पुत्रो, ज छे. महावीरना मोटाभाईनु नाम नन्दिवर्धन लिच्छविओ अने मल्लो, तथा मक्खलिपुत्र गोसा- 'हतुं अने बुद्धना ओरमान भाईनुं नाम नन्द हतुं. ल आदिः ते बन्नेना समकालीन पुरुपो पण एकज बुद्धनुं कुमारावस्थानुं नाम सिद्धार्थ हतुं अने महा- हता. कारण के आ नामो बन्ने धर्मनां पुस्तकोमा वीरना पितानुं नाम पण तेज हतुं. परंतु आ जातना आपणने मळी आवे छे. आपणे उपर जे ऊहापोह नामसादृश्यथी जो कोई पण बावत सिद्ध थती करी गया छोए ते उपरथी सिद्ध थयुं छे के वैशा- होय तो ते एटलीज छे के क्षत्रिय जातिमा जेम लीमा महावीरना अनुयायिओ घणीज मोटी सं- हमेशां चपराय छे तेम ते वखते पण आवा प्रका. ख्यामा रहेता हता, तेवा उल्लेखो बौद्ध पिटकोमाथी, रनां नामो मोटा प्रमाणमां वपरातां हशे.' वळी मळी आवे छे. आ बाजु जैनग्रंथोमांथी पण एवां बीजी पण एक बाबत छे, के आ बन्ने क्षत्रियोण पा- प्रमाणो मळी आवे छे के महावीरनुं जन्म स्थान वैशा. ताना संप्रदायो ब्राह्मण सत्ताना विरोधीरूपे अथ. लीना समीपमांज हतुं तथा ते राजधानीना मुख्य वा तेना तिरस्काररूपे जो स्थाप्या होय तो तेमा अधिष्ठाता साथे तेमनो खास संबंध हतो. आ वन्ने पण काई असंभव जेयूँ नथी. कारण के हं आगळ हकीकतोने परस्पर मळवता ते एक वीजी साथे उपर जणावीश ते प्रमाणे ब्राह्मणो जेमने 'वेषधा- सुसंगत थई रहे छ एम स्पष्ट जणाई आवे छे. आ रिओ' (untruc ) कहे तेवा त्यागीथवानो क्षत्रि- उपरांत बौद्धोए जणावेला निगण्ठोना केटलाक यो माटे घणो वधारे संभव हतो. सिद्धान्तो. दाखला तरीके किरियावाद अने बुद्ध अने महावीरना जीवननो भेद बताववा पाणीमां जीव होवानी मान्यता विगेरे-जैनग्रंथोमा माटे हवे आपणे, ते बन्ने पुरुपोना जीवननी मुख्य पण तेबाज रूपमा मळी आवे छे अने अंते, नातपु. मुख्य वीनाओने साथै साथे मूकी विचार करीए. त्तना निर्वाणना स्थळ तरीके, बौद्ध ग्रंथोमा बुद्धनो जन्म कपिलवस्तुमा थयो हतो अने महावीर जणाबेली पापापुरी पण जैन ग्रंथोना उल्लेखानुसार वैशालीनी पासे आवेला एक गाममा जन्म्या हता. यथार्थ ठरे छे. ज्यारे वुद्धनी माता तेमना जन्म पछी तरतज मरण पामी हती त्यारे महावीरना मातापिता महावीरनी महावीरना जीवननी आ रूपरेखाने बुद्धना जी- धननी रूपरेखा साथे सरखावता, एमां एक पण पितानी हयातीमां अने तेमनी मरजी विरुद्ध त्यागी पुख्त उमर थतां सुधी विद्यमान हता. बुद्ध पोताना एवी.बावत नथी जणाई आवती के जेना विषयमां बन्या हता, परंतु महावीरे पोताना मातापितानुं पवी शंका उत्पन्न थई शके के ए यावत बुद्धना अ- नुकरणं रूपे पाछळथी उपजावी काढवामां आवी लई दीक्षा स्वीकारी हती. बुद्ध छ वर्प सुधी तप- मरण थया पछी पण अधिकारी पुरुषोनी संमति हशे. आम होवा छतां पण आ बन्ने महापुरुषोना र्याकरी हती अने महावीरे बार वर्ष लगी करी जीवनमा जे केटलुक साधारण सादृश्य जोवामा हता. बुद्धे तपश्चर्यामां बीतेला पोताना कालने पाछ- आवे छे तेनुं कारण तो बन्नेनुं त्यागी जीवन छे. एवां थी वृथा ( फोगट ) गएलो मान्यो हतो तथा जीवनोमा केटलीक साधारण समानताओ मळी पोतानाध्येयनी प्राप्तिमा आवी जातनी तपश्चर्यानी आवे ते घणुंज स्वाभाविक छे. अने आची समानता का उपयोगिता नथी, एम पण जाहेर कर्यु हतुं. एक प्राचीन हिंदु करतां अर्वाचीन युरोपीय इति: परंतु महावीरे पोतानी तपश्चर्याने ध्येयप्राप्तिमाटे हासवेत्ताने घणी महत्त्ववाळी बाबत भासे तेमां अत्यावश्यक मानी हती, एटलुज नहीं परंतु तीर्थ- पण आश्चर्य पामवा जेवू नथी. महावीरनां केरलाक सगांनां नामो पण बुद्धना सगांनां नामो साथै 9. See Petersburg Dictionary, ss, vv. समानता धराये छ. उदाहरण तरीके-महावीरनी २. तपश्चर्यामां गळाएलां आ बार वो, हमेशां, सिद्धत्य- .

उa जैन साहित्य संशोधक [भाग कर थया पछी पण तेमणे तेवी केटलीक तपस्या- पूर्वक वृद्धनो अस्वीकार कयों छे. अने एम कर- आर्नु अनुसरण चालु राख्यं हवं. मक्खलिपुत्र वामां तेमने कारण मात्र सांप्रदायिक विरोधज गोसाल जेटली मोटी विरुद्धता महावीरना संबंध- छे. आ सिद्धान्तनी सत्यताना प्रमाण तरीके, आ मां धरावे छ तेटली बुद्धना संबंधमां धरावतो बन्ने संप्रदायोना संस्थापकोनी कथाओमा जे मह- जोवामा आवतो नथी. जैनधर्ममा प्रथम मतभेद त्वनी सशतामो उपलब्ध थाय छे, ते रजु करीश- उत्पन्न करनार जमालिनु नाम युद्धना विरोधिओनी काय तेम छे. नामावलीमा आवतुं नथी. बुद्धना सघळा शिष्योनां प्रो. वेबरनी आ मुख्य दलील के जेना उपर ते. नः महावीरना शिप्योथी जूदा प्रकारनां छे. आ मनो आखो सिद्धान्त उभी थएलो छे, तेनुं नित- भिः तान उदाहरणोमा उपसंहार तरीके अंतिम करण मारा धारवा प्रमाण, उपरनी चर्चाथी संपूर्ण उदाहरण ए पण आपी शकाय छे के बुद्ध ज्यारे रोते थई जाय छे. आ सिद्धान्तने तो संभावनानी शुसिनगरमां निर्वाण पाम्या हता, त्यारे महावीर कोटिमां पण स्थान आपत्रा माटे घणा मजबुतप्रमाणो- निश्चितरूपे युद्धनी पहेलां, अने पापामां निर्वाण नोआवश्यकता रहेछे.सामान्यरीते एमजोवामां या- पाम्या हता. वेछे के दरेक विरोधी संप्रदाय पोताना संस्थापकना महावीरना जीवन संबंधमां अहीं सुधी करेली उपदेशो अने सिद्धन्ताने शुद्ध अने प्रामाणिक रीते चर्चा दरन्यान जे जे हकीकतो वाचको समक्ष मू. समजाववानोदावो करतो होय छे परंतु व्यारे कोई कवानां ावी छे, तेना आधारे, जैनधर्मनी उत्पत्ति संप्रदाय पोताना मुख्यधर्मना मूळ संस्थापकना बौद्धधर्मन आश्रित है, अथवा नहीं, ते प्रश्ननुं सहे- सिवाय अन्यपुरुषने प्रमाणरूप मानतो थाय छे, लाईयी निराकरण करी शकाशे. जो के घणा खरा त्यारे ते या तो कोई एक अन्य विद्यमान संप्रदायनो विधानो एटली वावतनो तो अस्वीकार नथी करता स्वीकार करे अथवा तोते एकनवोजसंप्रदाय प्रव- के युद्ध अने महावीर ए बन्ने भिन्न भिन्न व्यक्तिओ तीव छे. आविचारानुसार चालु चर्चामांआवेमांनो नहती; परंतु, तेओ, ते उपरथी उपरोक्त प्रशननुं वधु जो प्रथम पक्ष स्वीकारीए तो आपणे एमज मानQ निराकरण धई जनुं होय तेम स्वीकारवा तैयार पडशे के जैनधर्म कोई पण रूपमा बौद्धधर्मनी पूर्वे नधी. प्रो. वेबर जैनोना आगनो ' उपरना पोता- अवश्य हयाती धरावतोज हतो. अने जो बीजो ना विद्वत्ता भरेला निबंधमा लखे छे के-जैनो पक्ष स्वीकारीशं तो आपणे आम कल्पना करवी नात्र बौद्धधर्मना एक सौथी जूना संप्रदायरूपे छे.' पडशे के, बुद्धना विचारोथी विमनस्क थएला, आ अने वळी जणावे छ के 'मारा मत प्रमाणे शाक्य- जैन बनेला वौद्धोए पोताना मूळ शास्त्रोमांथी बु- मुनि बुद्धी मिन्न एवा एक महापुरुष-के जेनो द्धना एकाद विरोधीने. शोधी काढी तेमां पोताना बौद्ध ग्रंथोमां बुद्धना एक समकालीन विरोधी त- पाखंडी सिद्धान्तोनुं आरोपण कयु हतुं. परंतु रोके उल्लेख करवामां आव्यो छे-ते द्वारा जैनध- आ पद्धतिनुं वीजा कोई बौद्ध संप्रदाये अनु- मनी स्थापना थई हती, एवाअर्थवाळी परंपरागत करण कयु होय तेम अद्यापि जणायु मान्यताथी पण मारा सिद्धान्तेने वाघ आवतो. नथी. चर्चानी खातर क्षणभर आपणे मानी नधी. परंतु आ वावत, मने तो आथी उलटुं. एम लईए के, जे जातनो आरोप ए लोको उपर सूचवती होय तेम जणाय छे के जैनोए इरादा मूकवामां आवे छे, वास्तविकमा तेमणे तेमज कर्य नी प्राप्ति मारे अत्यावश्यक मनाता हतां, अने प्रत्यारे पण हतुं, तो मानg पडशे के तेमने आ कार्य घणीज जे कोई साधु, सांसारिक जीवननो त्याग करी कोई एक दक्षतापूर्वक कर्यु हशे तेम करवामां तेमने पोताना वर्ग या नोदनी अमिलाया घरावतो होय छे, तेने माटे पण प्राचीन धर्मग्रंथोमा केटलेक ठेकाणे मळी आवता ना चार वर्षना तपयरपर्नु विधान करेलुं छे. निगण्ठो' अने 'नातपुत्त संबंधी केटलांक उल्ले- १. Indische Studien, ITI,210. खोनो उपयोग करी, तेमां फेरफारो करवा अंक २j डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना .............AR- पडया हो; केटलीक नवी हकीकतो उपजा- धर्म वीजा विरुदानो प्रयोग वधारे पसंद करे छे. घी काढवी पडी हश; अने तेम करी तेमणे पोताना उदाहरण तरीके, साधारण रीने व्यारे वृद्ध, सथा- विरोधियोना जेवाज सर्वने प्रामाणिक लागे तेवाले गत, सुगत अने संयुद्ध प्रा विशेपणो शाश्यमुनिने सो यनान्या हो. परंतु आ बधी अयुक्त कल्पनाओ हमेशां लगाडवामां आवेलां होय छे, त्यारे महा. छ. महावीरना संबंधमां तथा तत्कालीन परिस्थिति वीर माटे तेमनो प्रयोगं क्वचित् ज थपलो होय अने लोकोना विषयमा उपलब्ध थती जैन तेमज छे. वर्धमाननां विरुदो तरीके वीर अने महावीर याँद्ध परंपराभो, परस्पर जे थाटली सुंदररीते म- शब्दनो ज हमेशां प्रयोग करवामां आव्यो छे. मा नती होई, एक पीजीने सुधारनारी अने पूर्ण कर- करतां पण अधिक भेद सूचक एक विशेषण तीर्थ- नारी देखाय छ, त बधी बावतोनो खरो खुलासो कर छ. आ शब्दनो अर्थ जैन ग्रंथोमां 'धर्मप्रवर्त- अमे वतावली उपर्युक रीतेज भई शके छ, अने ते क' एवो थाय छे. परंतु यौद्ध ग्रंथोमां ते शब्द पा- मात्र एज के प बन्ने धर्मानी परंपराओ, मुख्यरीते खंडीमतना संस्थापकना अर्थमां वपरापलो छ. एक वीजाथी स्वतंत्र छ भने जे वसते ए परंपराओ- या प्रमाणे, आ बन्ने संप्रदायोए उक्त विशेषगसं. नु स्वरूप निश्चित थयुं हतुं ते यखते मनातां ऐति- प्रहमांथी अमुक अमुक विशेषणोने जे खास रीते हासिक सत्योज तमा नोधाएला छे. पसंद करीलीधेलांजोवामां आवे छेते उपस्थी पात्त. हवे आपणे, जैनधर्मना विषयमां लखनारा वि- विकमां आपणने कयुं अनुमान करवानुं कारण मळे छानोने, ए धर्म अने बौद्धधर्म बच्चे जणाई थावेला छे? शुं आपणे एम मानई के जैनोए भा शब्दो सादृश्योनो विचार करीए के जेसाक्ष्योए ए विधा- योद्धो पासथी लीया छ ? ९एम नथी मानी शक- नोना, आ बन्ने धमांना पारस्परिक संबंध विषयक तो. कारण ए छे के जो आ शन्दो एक वखत अमु. अभिप्राय उपर घणी मोटी यंसर करीछे. क विरुदरूपेज नक्की थई चुक्या होय अथवा तेनी प्रो. लेसने, ए बन्ने धोनी एकरूपताना हेतुमा व्युत्पत्ति उपरथी निकलता अर्थ करतां कोई खास चार मुद्दामो रख करेला छ भने ते द्वारा तेमणे अर्थमा रूढ थई गया होय तो ते शब्दोनो या तो जैनधर्म ए बौद्ध धर्मनी एक शाग्या छ एम सावीत तेज रोते स्वीकार थई शके अगर तो अस्वीकार थई करवानी प्रयत्न कयों छे. अहीं आपणे ते चारे' शके. परंतु जे शब्द एक वखत अमुक खास अर्थ: मुहामोनो अनुक्रमे विचार करी. सूचक वनी गयो होय, तेने, बौद्धो पालेधी लेनारा प्रो. लेसननी पहेली दलील पछे के बन्ने धर्माना जैनोए, फरी तेना असल अर्थमां बापर्यो हतो एम प्रवर्तकोने जिन, अहंत, महावीर, सर्वज्ञ, सुगत, मानवू तद्दन अशक्य छे. आ यावतनो स्वाभाविक तथागत, सिद्ध, शुद्ध, संवृद्ध, परिनिवृत, मुक्त खुलासा तो एज थई शक के दरेक कालमां अमुक इत्यादि प्रकारनां एकज सरखां विरुदो या विशे. मानसूचक विशेषणो तथा नामो प्रचलित होय छे पणो लगाडेला जोवामां आवे छे. तेथी मूळमां ते अने ते विशिष्ट गुणधारी पुरुषोने लगाडवामां आवे बन्ने एकज हावा जोईए, इत्यादि. ले. आवां विशेषणो तथा गुणवाचक नामी त बलते आ यथा शब्दो अल्प या अधिक प्रमाणमां बन पण प्रचलित हतां. आ शब्दोनोवधासंप्रदायानेला धर्माना ग्रंथीमां जोवामां आवे छे, एमां संशय नथी. मूळ अर्थमा, विशेषणरूपे प्रयोग करता हता. आ परंतु तेमाप खास ध्यान खंचवा लायक तफावत शब्दामांना केटलाक शब्दीने, तेमा रहेली अर्थ रहेलो छ; अने ते एछ के जिन भने कदाचित् श्रमण शक्ति अनुसार यधा संप्रदायोए पोताना धर्मप्रव. ए वे शब्दो याद करतांख्यारे एक धर्म अमुक विरुदो-तको माटे पसंद कर्या हता अने ,आ पसंदीमां नोविशेष उपयोग करे सारे तेनो प्रतिस्पर्धा(बीजो) तो शब्दनी अर्थशक्ति तरफ तो जोताज हता, १. Indische Alterthumskunde Iy. p. परंतु साथे साथे तेश्रो ए बावत तरफ पण जोता हता के कया शब्दने पोताना कया प्रतिस्पर्धी मत- 763 scg.

७८ जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ घाळाओए तेमनी सर्वोत्कृष्ट व्याक्त माटे पसंद कर्यो धर्मप्रवर्तकोने देवरूपे मानता-पूजना होवा छे. उदाहरण तरीके, तीर्थकरशब्दनो व्युत्पत्त्यर्थ जोईए. आथी निश्चितरूपे एम केम कहीं शकाय के धर्मनो स्थापनार पटले धर्मप्रवर्तक एवो थाय छे. जैनोए पोतानी आ वायत विषयक आचार-विचारी अने तदनुसार जैन तथा अन्य संप्रदायोए तेज बौद्धो पालथीन लीधा हता पण वीजा पासेथी अर्थमां तेनो प्रयोग करेलो छे; परंतु बौद्धोए तेने ते नहीं ? आधी विरुद्ध एम तो कहेवाने कारण छे के अर्थमां न वापरतां प्रतिस्पर्धी या पाखंडी मतना बुद्धना उपदेशमां एवं काई पण तत्त्व जोवामां आ. आचार्यना अर्थमां वापर्यो छे, अने तेम करी तेमणे, वतुं नथी जेथी तेमना अनुयायियोने वुद्धना मंदि- जेओ ते शब्दने मानसूचक अर्थमां वापरता हता रो बांधवा माटे अगर तेमनी मूर्ति स्थापित तेमना तरफ पोतानो द्वेप व्यक्त को छे. आवी रीते करवा माटे प्रोत्साहन मळी शक तेमना उपदेशो- धीजा दाखलामां, बुद्ध शब्द सामान्य रीते, मुक्त मां एवी तो घणीक बाबतो अवश्य नजरे पडे छे अर्थात् बंधरहित थएला आत्माना अर्थमां वपराय के जे आवा प्रकारनी भक्ति-पूजा-अर्चानी छे: अने एज अर्थमा जैन ग्रंथोमां ते शब्दनो प्रयोग (अर्थात् मूर्ति पूजानी) पद्धति तरफ विरुद्धता थतो अद्यापि दृष्टिगोचर थाय छे. परंतु बौद्ध ग्रं- बतावती होय छे. परंतु जैनाना विषयमा आवू काई धोमांए शब्द खास तेमना धर्मप्रवर्तकना विरुद कारण वताची शकाय तेम नथी. तेओ जो पोता- रूपे रूढ़ थएलो छे. आ हकीकत उपरथी ए अनुमा- ना तीर्थकर महावीरने देवस्वरूपे पूजे तो तेमां ते. न सहज थई शके छ के जे समयमा बौद्धोनी सां- ओ पोताना सिद्धान्त विरुद्ध वर्तन करे छे, एम प्रदायिक परिभाषा निर्णीत थई ते वखते तेओ कही शकाय तेम नथी. खरी रीते आ विषयमा प्रकटझपे जैनोना प्रतिपक्षियो लेखाता होवा जो- मारु पोतानुं स्वतंत्र मान, तो एवं छे के ईए. आधी उलटुं, एटले जैनोए जे वखते पोतानी असली बौद्धधर्म या जैनधर्मने मूर्तिपूजा साथे परिभाषा स्थिर करी ते वखते तेओ बौद्धोना प्रति- कांइ संबंध नहीं होवो जोईए.कारण के मूर्तिपूजानी पक्षीरूपे प्रसिद्ध नहीं थएला होवा जोईए. उत्पत्ति निन्धो द्वारा नहीं पण गृहस्थो द्वारा थए- बुद्धधर्मनी पूर्वकालिकताना पक्षमा, प्रो. लेसनबी- ली छे. तेनी उत्पत्तिनुं कारण पण ए लागे छे के जी दलील एरजु करेछे के, ए वन्नेधर्मोमांमृत्युशील ज्यारे भारतना धर्मविषयक विकासक्रममा भाक्त मनुष्योनी अर्थात् मनुष्यरूप धर्मप्रवर्तकोनी देव एक मोक्षना मुख्य साधन तरीके मनावा लागी तरीके उपासना करवामां आवे छ, तथा तेमनी त्यारे लोकोने पोताना प्राचीन अणघड (जंगली) मूर्तिओने मंदिरोमां पूजवामां आवे छे, इत्यादि. देवी-देवताओनी प्रचलित पूजाथी असंतोष रहेवा चौद्धधम अने जैनधर्म सिवाय एवो अन्य कोई लाग्यो अने तेथी तेमणे केटलाक उच्च प्रतिना पण संप्रदाय, के जेनो संस्थापक, महावीर अन उपास्योनी पूजा करवानी प्रथा शरु करी. खरी बुद्धनी माफक, पोताने सर्वज्ञ अने सर्वथा कृतकृत्य वस्तुस्थिति आवी होवाधी चैत्यस्थापन तथा मूर्ति- कहेबनावतो हतो,आपणी प्रत्यक्ष जाणमा आची पूजामा बौद्धोने पुरोगामी अने जैनोने तमना अनु. शके तेटला समय सुधी टंकी शक्यो नथी. तेथी कर्ताओ न मानतां, मारा विचार प्रमाणे, आ बन्ने आपणने ए वन्ने धमों सिवाय आ वायतनुं बातु संप्रदायोए स्वतंत्र रीतेज हिंदु लोकोना धार्मिक प्रत्यक्ष उदाहरण मळी शके तेम नथी. तो पण, विकासना शाश्वत अने अनिवार्य प्रभावने वशथई यीजा जुना संप्रदायोना विषयमां आपणने जे काई आ प्रथा स्वीकारी हती, एम मानवू जोईए. ज्ञान मळेलं छे ते उपरथी एम अनुमान करी शका आ वन्ने संप्रदायो वच्चेनी समानतानी त्रीजी य छ के घणा भागे ते सघळा संप्रदायो, अने तेम दलील, ए वन्नेमा सरखी रीते मळी आवता अहिं. नहीं तो छेवटे तेमांना केटलाक तो अवश्यमेव, साना सिद्धान्त विषयनी छे. आ दलीलनी चर्चा दौद्धो भने जैनोनी माफक पोताना तीर्थकरो- भागळ उपर करवामां आवशे तेथी अही९ प्रो. - अक २]] ....A. . - डॉ. हर्मन जेकोधीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना ७९ लेसननी चोथी दलील उपर आचं छु. ते दलील ए बौद्ध भिक्षुना दश शीलो नीचे मुजब छ:- छे के बौद्धो तेमज जैनो वन्ने जगतना इतिहासतुं १ हुं प्राणीनी हिंसा न करवातुं व्रत लडं छु. परिमाण बतावामां एटली मोटी काळसंख्याओ २ ई चोरी न करवानुं बत लउं छ: घापरे छे के जे समर्थमां समर्थ कल्पनाशक्तिने ३ हुं अब्रह्म-अपवित्रताथी विरमवातुं व्रत लउंछु. पण आंजी नाखे छे अने त्रस्त करी दे छे. इत्यादि. ४ हुं असत्य न बोलवानुं व्रत लउँ छं. अलबत, ए वात तो खरी छे के आ विषयमा ५ हुं प्रगति अने सदाचारनुं प्रतिबन्धक एy जैनो वौद्धोने पण पाछळ पाडी दे छे. परंतु, आ मद्यपान न करवानुं व्रत लडं छ. प्रकारनी कालगणनामां जैनो मात्र बौद्धोनेज मळता दहुं निपिद्ध काले भोजन न करवानुंबत लउंछु. आवे छे एम काई कही शकाय नहीं. ब्राह्मणोनां ७ हुं नृत्य, गान, संगीत अने नाटकाधी विरक पण आ बाबतमां तेवांज वर्णनो आपणने मळी थवानु नत लडं छु. आवे छे. जैनांनी कालगणनात्मक पद्धतिनां परि ८ हुं हार, सुंगंधी लेपन तथा अलंकारो न वाप- माणो, ब्राह्मणों तेमज बौद्धो वनथी सरखी रीते रवानुं ब्रत लउं . जुदां पडे छे. जैनोना उत्सर्पिणी अने अवसर्पिणी ९ हुँ ऊंची अगर पहोळी पथारीनो उपयोग नहीं रूप कालचकनी तथा ते दरेकना छ छ आराओनी करवातुं व्रत लउंटुं. कल्पना जेटले अंशे वौद्धोना चार महाकल्पो तथा १. हुं सुवर्ण तथा चांदीनो परिग्रह न करवान ८० नाना कल्पो के जे विश्वना सथी थता सर्ग व्रत अंगीकार करुं छु. अनं प्रलयरूपी नाटकना अंको तथा दृश्यो जेया आ उपरांत बौद्धधर्ममा अष्टांग शीलो ( अटुंग- लागे छे, तेमनी-कल्पनाथी भिन्न छे, तेटलेज अंशे सील ) मानेलां छे. तेमांनां पहेलां पांच दरेक ते ब्राह्मणोनी युगो अने कल्पोनी कल्पनाथी पण बौद्ध आचरवानां छ; परंतु छेल्लो त्रण खास करीने भिन्न छे. मारो एवो मत छ के बौद्धोनी कल्पना धर्मिष्ठ गृहस्थीने तो अवश्य पाळवा माटे भला. ते ब्राह्मणोनी युगपद्धतिर्नु संस्कारित रूप छे अने मण करेली छ. ए अष्टांग शील आ प्रमाणे छो- जैनांना उत्सर्पिणी अने अवसर्पिणारूप कालचक्रनी १. हिंसा न करवी. कल्पना ब्रह्माना दिवस अने रात्रिनी कल्पनाने २. चोरी न करवी. आधारे उत्पन्न थएली के ३. असत्य भाषण न करवं. प्रो. लेसननी त्रीजी दलीलनी चर्चा उपर मुल- ४. मद्यपान न कर. ५ ब्रह्मचर्य पाळg -( अधर्म्य एवी परलीसंग तवी राखबार्नु कारण एटलुज हतुं के ते दलील न करवो.) आहंसाना सिद्धान्त विषयक होवाथी तेने, ए अन्ने ६. समयविरुद्ध रात्रिए भोजन न करचुं. धोना अभ्य नीतिविषयक विचारी साथै धधारे ७. हार, चंदन आदे सुगंधी पदार्थो धारण सारी रीते चर्चवानी आवश्यकता छ. प्रो. घेवरे न करधा. जैनोना पंचमहावतो अने बौद्धोना पांच मुख्य पापो ८. जमीन उपर मात्र सादडी पाथरीने सूधु, अन शीलोनी बच्चे खास निकटवर्ती संबंध बताव्यो बौद्धानां पांच व्रतो, नीचे आपेलां जैनयतिओनां छ; अने प्रो. विन्डिशें (Windisch) जैनोना पांच महावतो साथे लगभग मळतां आवे छे:- पंच महाव्रतोनी, बौद्धोनां दश शीलो (दससील) १. अहिंसा-प्राणीनी हिंसा न करवी. साथे सरखामणी करी छ. २. सूनृत-जूढुं न बोलq. ३. अस्तेय-नहीं आपेलुं न लेवू. १. Fragment der Bhagavati, II, pp. 9. Rhys Davids, Buddhism, p. 160. २. Z. D. M. G.XXVIII, p. 222, notc. २. Rhys Davids, Buddhism, pg. 139. , - . 175, 185.

जैन साहित्य संशोधक [ भाग . V.. ४. ब्रह्मचर्य-स्त्रीसंयोगथी विरमg. लीधा होगां जोईए: नहीं के बौद्धो पासेथी. एम ५. अपरिग्रह-दुनियादारीनी चीजोमां आसक्ति मानवानुं बोजु एण एक कारण छ, अने ते ए के, न करवी. खास करीने ममत्वभावनो त्याग बौद्धोए सत्यवतने यी स्थान न आपतां प्रीखं करवो. अगर चोथु स्थान आप्यु छ, भने तेम करी तेमणे जैनोनुं पांचमुं व्रत, बौद्धोना पांचमा शील करतां व्रतोना पुरातन कपने बदल्यो छे. वळी, जैनो पधारे व्यापक छे. परंतु वाकीनां व्रतो. लहेज क्रम- बौद्धो करतां घणाज प्राचीन अने अधिक प्रतिष्टितं भेद सिवाय (जेमके वौद्धोना नं. ५-४) सरखांज एवा ब्राह्मणोना संन्यासाचरणने सूकी बौद्धोना छे. आ बन्ने धर्मोनां व्रतोनी कच्चेनुं सास्य खरे- आचरणर्नु अनुकरण करे ए मानवू पण असंभवित खर एटलं मधु अद्भुत छ, के सामान्य रीते एम लागे छे. सहजे अनुमान थई जाय छे के, आ बेमांथी एक आ स्थळे जगाव, जोईए के, आत्रणे धोमां धर्मभाळाए बीजा धर्ममाथी पोतानां व्रतो लोधां पांचमुं व्रत, पोतपोताना आचारने खास अनुल- होवां जोईए. परंतु तेम छतां पण ए प्रश्न तो क्षीने बनाववामां आव्युं छे. जेम के ब्राह्मण सन्या- उभोज रहे छे के असलमा आ व्रतो जैनोए बौद्धो सिन पांच, त्याग (उदारता ) व्रत एवं छे के जैन पासेथी लीधेलां के बौद्धोए जैनो पासेथी? वास्त- विक रीते विचार करतां जणाय छे, के आ बावतमा विकरीज ते तेमना माटे विहित थई शके ते अगर बौद्ध भिक्षुना आचारो तरफ जोता, स्वाभा- जैनो अथवा बौद्धो-ए वेमाथी कोई पण एक संप्र- लागतुं नथी. महावीरनी पूर्वे जैनधर्ममां चार दाय मौलिकतानो दावो करी शके तेम नथी. कारण महाव्रतो पाळवामां आवतां हता; अने हालतुं चोथु के आ बन्ने धर्माए प्राचीन ब्राह्मण धर्मना संन्या- ते वखते पांचमा व्रतमा अन्तर्गत थतुं हतुं. सिओनां जे पांच व्रतो हतां तेनोज स्वीकार करेलो परंतु महावीरे फरीथी आ चार व्रतनां पांच बत छे. ब्राह्मण संन्यासिनां पांच व्रतो नीचे प्रमाणे छ:- बनाव्या हतां बीजी तरफ चौद्धो पण पांच शीलो १. हिंसा. भाने छे. ते उपरथी एम जणाय छे के पूर्व आ पां- चनी संख्याने खास रीते पवित्र सानत्रामा आ- वती हती. ४. ब्रह्मचर्य, उपर्युक्त चर्चाना परिणामे आपणे ए स्पष्ट सम- अने पांच गौण व्रतो :- जी शकीए छीए के जैनो तथा बौद्धोना भिक्षुसंप्र. ६. क्रोध न करतो. दायनो मूळ आदर्श कोण हतो? ए आदर्श ब्राह्मण ७. गुरुनी आज्ञामा रहेपं. धर्सनो संन्यासी-संप्रदाय हतो अने एमाथीज ते- ८. अनौद्धृत्य. ओए पोत पोताना यतिजीवन माटे घणाक महत्वना आचारी तथा नियमो लीधा हता. आ प्रकार १०. आहारशुद्धि मारुं अनुमान कांई खास नवीन नथी. प्रो. मेक्स' संन्यासिनां उपर्युक्त पांच मोटा व्रतोमानां पहे- मूलरे अत्यार आगमच पोताना Hibber. Lect- लां चार व्रतो जैन भिक्षुनां चार ब्रतोने मळतां के अने तेज प्रमाणे प्रो. बद्दलरे, पोताना बौधायन ures (पृ. ३५१) मां एवो विचार प्रदर्शित कियाँ आवे छे. अने क्रम पण एकजसरखो छे.आथी संभ- वित छे के जैनोए पोतानां ब्रतो ब्राह्मणो पासेथी बौद्ध धर्मना इतिहास ( History of Buddhism १ बौधायन २, १०, १८, जुओ, बुल्हरनो अनुवाद in India) मां पण तेवोज अभिप्राय आपेलो छ. Sacred Books of the Last, Vol. TV हवे हुँ जैन साधुन जीवन केटले अंशे ब्राह्मणधर्म- पृ. २७५. ना संन्यासी-जीवनना अनुकारणरूपे छे ते बताववा २. सत्य, ३. अस्तेय. ५. त्याग. ९. शौच, अह२] डॉ. हर्मन कोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना माटे गौतम अने बौधायन धर्मसूत्रमा' आपेला महावीर गाममा एक रात अने नगरमां पांचरातर्थ संन्यासीना नियमोने जैन यतिओना नियमो साथे वधारे क्यारे पण रह्या न हता. सरखाची वतावा इच्छं छु. घणीखरी बापत'भः ११. 'तेणे मोडेथी (लोकोप भोजन करी लीधा बौद्धो पण एज नियमोने अनुमरे ले तथापि तेनी पछी ). भिक्षा मा जर्बु जोईए. तथा वीजी वार पण यथावसरे संक्षेपमा सूचना करवामां आवशे जब न जाईए.' जैन साधुओ सधारे अगर बपोरे ११. 'संन्यासीए कोई पण प्रकारनो संग्रह भिक्षा अर्थे भ्रमण कर छ. तेम करवामां कदाच करवो जोईप नहीं. (गौतम धर्ममत्र ) जैन तेमनो उद्देश पोताना प्रतिस्पर्धी भिक्षओना समा- तेमज बौद्ध भिक्षुओने पण एची कोई पण वस्तु गमना प्रसंगने दुर राखवानो हश. खास कराने तो राखयानो निषेध करवामां आव्यो छे के जेना माटे तेओ दिवसमा एकज वार भिक्षा माटे जाय छे. तेने । आ वस्तु मारी छ' एम कहेवोनो प्र. परंतु एकथी वधारे उपवास करला साधुन दिव- संग आवे.-शुओ जैनोनुं पांचk (अपरिग्रह ) प्रत. समां ये बखत पण जवानी छट आपेली छ. जैन भिक्षु वस्न, पात्र, रजोहरण आदि जे केटली- १६. '(मिष्टान्न माटे) सवें लिप्साआनो नेण क वस्तुओ पोतानी पासे हमेशा राखे छ तेने पण त्याग करयो जोईए.' आज बायत जनोना पांचमा तेओ पोतानी मिल्कतरूप राखता नथी. परंतु महाव्रतना चोथा पेटा वाक्यमां पण विहित कर- फक्त धर्मक्रियाना आचरण माटे आवश्यक साध- वामां आवेली छ त उपरांत, भिक्षामां ग्रहण अने नो (धर्मापकरणो) मानी तेना स्वीकार करे छे अग्रहणनी बावतना ज नियमो छ त उपरथी पण १२. 'ब्रह्मचर्य (नु तेणे पालन करचु जोईए)' आज आशय तारवी काय छे. वोधायननी माफक जैनोतुं पण आ चौथे महाव्रत १७. 'तेणे पोतानी वाणी, दृष्टि ( अने) कमों छ. धौद्धो एने पांचमुं व्रत माने छे. उपर अंकुश राखयो जाईए.' आ बाबत जैनोनी १३. 'वर्षाऋतु दरम्यान तेणे एकज स्थळे त्रण गुतिओ, अर्थात् मन, वाणी,अने कायानां संय- वास करवा जोईए 3 आ सूत्र उपरनी पोतानी मननी साथे लगभग एक भाव धारण करे छे. टिप्पणीमां बुलर लखे छ के:-'आ नियम उपरथी १८. 'तेणे नग्नताने ढांकचा खातर वस्त्र पहेरचे. पम सूचित थाय छे के बौद्धो तथा जमाना वस्सो वस्त्रोना संबंधमां जैनौना नियमो आटला बधा (वीवास) पण ब्राह्मणोना ( था उतना ) अनुक- सादा नथी; ते पोताना यतिने नग्न रहवा माटे रणरूपे के. छूट आपे छ तेमज एक, बे तथा त्रण सुधी वस्त्रो १४. मात्र भिक्षा लेवाने अर्थज तेणे गाममां वापरवानी पण छूट आपे छे. परंतु सशक्त अने प्रवेश करचो जोहए. ' आ बाबतमा जैनो आटला युवान साधुने नियमपूर्वक एकज वस्त्र चापरवानुं चधा सख्त नथी. तेओ साधुने गाम अगर नगरमां विधान करेलं छे. महावीर तो नग्नज रह्या हता; सुवानी पण छूट आप छे. तथापि घणा लांबा वखत अने तेथी बने तेटलं तेमतुं अनुकरण करवामां सुधी रहवानो तो तेमने पण निषेधज करेलो के. १ कल्पसूत्र, जिनचरित्र, ६ ११९, १ जुओ, वुहलरनुं भापानर, Sacred Books of २ बौधायन, २, ६, १२, २२. the East, Vol. II, pp. 191, 192. अहीं आपेला ३ कल्पसूत्र सामाचारी, २०, अंको गीतमना त्रीजा अध्यायना सूत्रोने अनुसरीने छ ४ आचारांग सूत्र, २, १५, ५, ६ १५. बौधायननां तेने मळतां सूत्रो टिप्पणीमा सूचवेली छे. ५ कल्पसूत्र, जिनचरित्र ११८. २ सरखावो, बौधायन २, ६, ११, १६. ६ पौधायन, ]. C. ६ १६. ४. ३. वौधायन २, ६, ११, २०. ७ आचारांग सूत्र २,५,, ४. आचारांग सूत्र २, २, २, ६ ६. “ कल्पसूत्र, जिनचरित्र $ ११७, १,१.

जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ M. .. १ छूट हती. - नत्पर एवा जिनकल्पी साधुओ पण नग्नज रहेता २२. ' तेणे या तो शिर मुंडावयु जोईए. अगर हता. एम छता, तेयोने पण नन्नता ढांकवानी एक शिखा मात्र राखवी जोदए.' जैनोग आ नियमने सुधारी पोताना साधुओ माटे मात्र १९. 'केटलाक ( एम जणावे छ के तेणे )आखं मस्तक मुंडाववानाज विधि करेलो छे. बौधा- वन धोईने (पहेर जाईप).' बांधायनमा यननी' अनुसार संन्यासी बनती वखते ब्राह्मणे जणाव्यु छ के, 'तेणे वनन पीत-रक्त वर्णधी रंगीन पोताना माथाना, दाढीना तथा शरीरना वाळ पहेर जोईए.' आ नियम जैनौना करतां चौद्धाना कढाववा जोईप तथा नख पण उतराववा जोईए.' नियम साथ वधारे मळतो आवे छ. कारण के जैनो पण दीक्षा लती वखते वाळ कपाववाना आ जैन यांताने तो वस्त्राने धावानो अगर रंगवानो भाचारनु अवश्य पालन करे छे अने आयोज निषेध करेला छ.तमणे तो जे स्थितिमा जे वस्त्र 'मुंड बनीने (अगर पोताना वाळ उखेडी नाखीने) मळ्युं होय तेज स्थितिमां तेने पहेरबानु छ. तेम अगार छोडी अनगार स्थितिमा प्रवेश को.' छता पण कहे जोईए के जैनो ब्राह्मणोना ए आवा उल्लेख सर्वत्र थपलो छ. नियमना--के जेनो भावार्थ मात्र एटलोज छ के २३. 'तेण चीजोनो नाश नहीं करवो जोईप.' संन्यासिओनो वेश बनी शक तेटलो सादो अने पांचनार आचारांगना बीजा स्कंधना घणा सूत्रोमां क्षुद्र होवो जोईए, तेना-मूळआशयन पराकाष्टानी जोई शकश के अंड, जीव, वीज. अंकुरादिने हानि सीमाए घसडी गया छे. जैनो पोताना आचारनी न थई जाय, ते माटे जैन मिलने केटलो वो. कठोरताना विषयमां ब्राह्मण प्रतिस्पर्धियोने पाछळ सावचेत रहेवानी भलामण करवामां आवी छे. पाडी देवामां एक प्रकारनुं गौरव समजता होय एम जणाय छे के जैनोएउपर्युक्त नियमने बनस्प- तेम देखाय छे. थने तेथी तेओ मलिनता अने ति भने प्राणिवर्गना सघळा सूक्ष्मजीवोने लागु कुत्सितताने यतिजीवन- परम भूषणे मानवानी पडे तेवो एक व्यापक नियम बनाव्यो छे. भूल करे छे. आर्थी विरुद्ध बौद्धो हमेशां पाताना २४. तेणे सघळा) जीवो प्रत्ये उदासीनता आचारने जेम बने तेम मानव-समाजना बंधारणने राखवा जोईए, पछीते जीवो गमे तो तेमा प्रति अनुकूल बनाववा प्रयत्नशील रह्या छे. मायालुपणुं धरावता होय के क्रूरपणुं. २०. 'तेणे वृक्षो अथवा छोडवाओना भागोने २५. 'तेणे ऐहिक अगर पारलौकिक कल्याण- लेवा नहीं. परंतु जो ते (पोतानी मेले ) जुदा थई माटे कोई पण प्रवृत्ति करवी जोईए नहीं.' . गया होय तो ते लेवामां बाघ नथी. जैनोनो पण छल्ला ये नियमो तो जैनोना कोई पण आगम- तेवोज नियम छे; परंतु तेओ आथी पण आगल मांधी अक्षरशः वतावी शफाय तेवा छे. कारण वधीने पोताना यतिओ माटे फक्त तद्दन अचित्त ते जैनधर्मना तत्त्वना मूलभूत छे. महावीरे आ वनस्पति अने फळ इत्यादिनेज भिक्षामा लेबानी नियमोन यथार्थरीते परिपालन कर्यु हतुं. आना छूट आपे छै. प्रमाणमां नीचेना उल्लेखो बस थशेः 'तमना (महा- २१. वर्षाऋतु सिवाय तेणे (एकज) गाममां बेरात वीरना) शरीर उपर चार मास करतो आधिक रहे नहीं. 'आपणे उपर' जोई गया छीप, तेम समय पर्यंत अनेक प्रकारनाप्राणिओनो ठठ जान्यो महावीरे तो आज नियम प.ळ्यो हतो. पछी अन्य हतो; तेओ, ते उपर हरता फरता हता अने विविध साधुओए गमे ते रोते तेनुं आचरण कर्यु होय. क्लेशो आपता हता.' 'तेमणे हमेशां त्रिगुप्तिपूर्वक १ आचारांग सूत्र १,७, तृण,शीत, अग्नि,माखी,मशक आदिथी जनित अनेक २L.C.२१. ३ आचारांग सूत्र २, ५, २, १, अने १, ५, ५, २. १ बौधायन, २, १०, १७, १०. ४ सरसावो, आचारांग सूत्र. २, २, २, .. २ 'मुंटे भवेत्ता अगाराओ अणगारियं पव्वहए ५ माघागंग २, १, ५, ६, भने । मुं अध्ययन, ३ आचारांग सूत्र ,.८, १, २, ७, १. .

२] डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन मूत्रोनी प्रस्तावना V प्रकारनां कोसहन कर्याहता.''तेमण देव, मनुष्य ग्रंथोमां पण मळी आवे छ एम आपणे अही जणा. अने तियच जनित अनेक अनुकल तेमज प्रतिकृल वी शकीयु. बनायी लगतार्थी सहन कर्या, खस्या नया अनुभ ब्राह्मण संन्यासिजीवननां उपकरणों तरीक व्या हुता' इत्यादि. जनयतिना संबंधमां पम पण दण्डो (यष्टिकाओ), रज्जु, पाणी गाळयामा वारंवार फहवामां आवे छे के त पांताना आध्या चन्न ग्वंड, जलपान अने भिक्षापात्र छ. जैन साधु- त्मिक जीवननी चरम अवस्थामा मरण या जीवित औ पण दण्डा राखे छ-अत्यार तो अवश्य राख छ. ए वनमा निराकानी होय छे.' परंतु बौद्धो तरफ दृष्टि करना. पिटकामां एवो एक बौधायने आपला वीजा फेटलाक नियमो पण पण उल्लेग्य मारा जीवामां आयो नयी के मां जैनोना आचारो साथै घणाज मळता आवे छ. जे- यएिका राखया माट स्पष्ट विधान करवामां आव्यु मक:-तण वचन, विचार अने कर्म पत्रणं प्रका- हाय. रनां कष्टदायक साधना द्वारा कोई पण सर्जित जैन साधुओं पण ब्राह्मण संन्यासिसानी माफ- जीवनी हिंसा करवी जोर्डग नहीं.'' आ नियम जै- क भिक्षापात्र अने तने बांधवानी एक दोरी तथा जल- नोना प्रथम महाबत ( बुओ उपर) नु एक स्पष्टी. पान राख छ; पाणी गळवा माटे वनखंड अन करण मात्रा कप्रदायक साधनाने ' जना रजाहरण आ वे वस्तुओ रायबा संबंधी उल्लेख तो शस्त्र कहे छ. आनी पहेला ज आपण करी आन्या छीए. जैन 'तेणे शौचादि कर्म माटे अपेक्षित जळने गळवा साधुनुं जो कोई पण एवं खास उपकरण होय के सार वन्न राबडं जोदए 'तेणे ( आवश्यक ) शो. जे अन्य संन्यासिओपासे नहीं देखातुं होय, ते ते चादि ( कुवा अगर तळावमांधी ) काढेला अने मनी एक मात्र मुखबस्तिका (मुहपत्ती) छ. आ गळेला पाणीथी करवां जीईए.' आ नियमानुं जैन वधी हकीकत उपरथी जणाशे के जैनोनां घणां खरां साधुश्रो यथार्थ पालन करे छे. तेओ पाणी गळ उपकरणो, तेमना माटे आदर्शरूप बनेला एवा ब्राह्म- वा माटे ग्वाग्न वन्न राखे छ टीकाकार गोविन्द, ण संन्यासिनो अगर भिक्षुओनां जेबांज छे. आ पवित्र, पटल पाणी गळवाना वखंडनी थर्थ 'नेणे तेज अन्न लेबु जोईए के जे बिना माग्ये 'मार्ग उपरथी संतुओंने दृर करवा माटे राखेलो मलेलं होय, जेना संबंधमां पहेलां कोई व्यवस्था कश जातना तणनो एक गुच्छ,' एम करे छे. थपली म होय, जे अकस्मात्ज मळी गडुं होय, गोविन्दना बतावेलो आ अर्थ जो यथार्थ होय अने अने जे फक्त पोताना जीवितने टकाचवा पूरतुं तेना प्रमाणमा जो काई साची अने प्राचीन परंपरा ज होय."3 रहेली हाय-अने ते मारा मानवा प्रमाणे तो अवश्य जैनधर्मना 'भिक्षाचर्याना नियमो' पांचवाथी होवाज जाईए--तो जैन साधुओ मार्गमा चालती सइ जणाई आव तेम छ, के, ब्राह्मण संन्यासिनी वन्नने वच्चे आवता नया सती बबन नीचे आव- माटे अन्नग्रहण करवा संबंधी से जातना नियमोन- ता जीवजंतुओने दुर करवा माटे जे रजोहरण अ- बौधायने उपर प्रमाणे विधान कर्यु छ, तेज प्रका. थवा पादपोच्छन राखे छ, तनुं प्रतिरूप ब्राह्मण रना नियमो प्रमाणे मळला आहारने जैनोय पण शुद्ध अने प्राध' मान्यो छे. बौछो भा विषयमा १. आचागंग सूत्र १,८,३,१. आटला वधा सख्त नथी. तेओ तो खास करीने २ कल्पमूत्र, जिनचरित्र, १५, अंतिमभाग, ३. उदाहरण तरीके कल्पसूत्र सामाचारी ५१. , बौधायन २, १०, १५, ११. ४. बौधायन २, ६, ११, २३. २. जो के भिक्षापात्र उपरांत साधुने जलपात्र राखवानी ५. आचारांग सूत्र, पृ १, नोट २. पण छूट प्रापेली छे सरी तथापि एकज पात्र रास अधि- बौधायन २, ६, ११, २३. क उत्कृष्ट मनाय छे. जुओ प्रो. बुल्हरनु भापतिर पृ. २६ •, टिप्पण. ३. यौधायन ३, १०. १६, १३. - ६.

जैन साहित्य संशोधक [भाग १ ... . A. तेमना माटेज तैयार करवामां आवेला भोजनना बौद्ध धर्मनी उत्पत्तिनी पूर्वे थई गया छे. कारण आसंगण सुद्धांनो स्वीकार करे छे. के, प्रो. बुलहरना मत प्रमाणे आपस्तम्ब सूत्रनी ब्राह्मण संन्यासी अने जैन यति माटे विहित करे- रचनानो काळ मोडामा मोडो ई. ल. पूर्वे पांचमी ला नियमोनी जे तुलना आपणे उपर करी छे, ते अगर चोथी शताब्दीमा मृकयो जोईए. उपरथी ए स्पष्ट जणाय छे के जैनोना नियमो ते ते आपस्तम्बनी पूर्वे थएलो छे. अने डॉ. ब्राह्मणोनी नकल मात्र छे. परंतु अहीं ए प्रश्न थाय बुल्हरनार कहेवा प्रमाणे ते बन्ने बच्चेना छ के 'निबंध 'ए सीधी रोते (साक्षात् ) ज वोर्नु अंतर दशकथी नहीं परंतु शतकथी संन्यासीनी नकल छ के परंपरापूर्वक ? केम के मापवा जेटलं छे. गौतम ए बौधायनथी पण एवो पण तर्क थई शके तेम छे के ब्राह्मण संन्या- पूर्वकालीन छ. आ हिसावे गौतम, अने घणुं करीने सिनी प्रथम बौद्धोए नकल करी हशे अने बुद्धभि- बौधायन पण, बौद्धधर्मनी उत्पत्तिनी पूर्वे थई झुनी, पाछळयी निथोप. परंतु हुँ जेस उपर गएला निश्चित थाय छे. हवे उपर वर्णवेला ब्राह्मण सूचची गया छु तेम ओ तर्क प्रमाणशून्य छे. कारण संन्यासमार्गना सघळा नियमो तो खास गौतम के वधारे प्राचीन अने प्रमाणभूत आदर्शने छोडी, द्वाराज बांधवामां आवेला छे तेथी ते मार्गन वी- जैनो अल्म प्रतिष्ठित अने नकली एवा पोताना प्रति- धोनी नकलरूपे मानधो ए प्रत्यक्ष भूल छे. धारो के स्पर्धी बौद्धोर्नु अनुकरण करे ६ असंभवित छ. उक्त धर्मशास्त्रोनी रचनाना समयना विषयमा आधी एज कहेदु वधारे योग्य जणाय छे के तेमणे प्रो. वुल्हरे करेलु कथन कदाचित् खोटरे; तो मीधी रोनेज ब्राह्मणोनुं अनुकरण कर्यु हतुं. आ एण ते धर्मशास्त्रो वौइधर्मनी उत्पत्ति पछी सैका- मुख्य दलील उपरांत, प्रस्तुत प्रश्न विरुद्ध बीजी ओ वीत्सां वाद रचायां हता, एम तो कोई पण रीते पण ए एक दलील छ के--उपर जणान्या प्रमाणे सिद्ध करी शकाय तेम छेज नहीं. तथापि मानो सेकेटलाक ब्राह्मण आचारोनु ज्यारे जैनोए अनु- के, कदाचित तेम पण सिद्ध करी शकाय-जो के करण कयु छ त्यारे बौद्धोए तेम कर्यु जणातुं नथी तेम थर्बु तो सर्वथा असंभावितज छेतो पण आ तेथी एम सावीत धाय छ के बौद्धो जैनोना आद- स्मृतिकार ब्राह्मणो पोते जेमने आधुनिक कालमा शस्त विल्कुल हता नहीं. उत्पन्न भएला मानता होय तथा जेमने मिथ्यामति- नहीं एक पलो पण वितर्क उठवानो संभव रहे ओ मानी तिरस्कारता होय तेवा बौद्धो पासथी हे नामाग संन्यासीज जैन निर्यथ अथवा बौद्ध मोटा प्रमाणमा पोताना आचार-नियमो ग्रहण करे, भिक्षुनी नकलकणे केम न होय ? परंतु आ वितर्क ते सर्वधा अशक्य वावत छे. तेमज नास्तिको पा- तदन प्रगाणाविरुद्ध छे. संन्यासमार्ग ब्राह्मणोनो सेथी पोते लीधेला नियमोने ब्राह्मणो एटला बंधा आश्रम व्यवस्थातुं एक खास अंग छे. अने आ पविन मान ए पण नहीं मानवा जेवी यावत छे. आश्रम व्यवस्थाने कदाचित् ब्राह्मण धर्म जेटली परंतु, आधी उलटे. बौद्धोएज ब्राह्मणोना नियमोन प्राचीन न मानीए तो पण जैन तथा बौद्ध धर्मथी अनुकरण कर्यु हत, एम मानई युधियुक्त अने तो नेने अवश्य प्राचीन मानवी पडे तेम छे. वळी प्रमाणसंगत लागे छे. कारण के ब्राह्मणानी घुद्धि- ब्राह्मण संन्यासिओ ज्यारे आखा भारतवर्षमा प्रस. विषयक अने नीतिविपयक उत्कृष्टताने माटे चौद्धो रेला हता, त्यारे बौद्धो तेमना संपनी स्थापना हमेशा ऊंचो अभिप्राय घराबता अने ते बदल बहु- शया पछी, निदान प्रधमनी वे शताब्दीमोमां तो, मान करता हता. एज कारण छ के जैनो तेमज तेओ मात्र देशना एक अमुक भाग जेवा संकुचित बौद्धोए ब्राह्मण ए शब्दने एक मानसूचक विरुद प्रदेशमांज रहता हता. तेथी पाखा देशमा संन्या- सिओ माटे नेओ आदर्शभूत बन्या होय एम मानवं introdnction, P. XL III. १. Sacred Lars of the Aryas, part I, सर्वथा प्रमाण शून्य छे. त्रीजी वावत वळी ए छे २. J.. c. p. XII. के प्राण धर्मशास्त्रना कर्ता गौतम निश्चितरूपे ३ L. c. p. -19.

ॐक २] ...M. AA 4-4HAAR 10.44. AA.A4.. डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रीनी प्रस्तावना तरीके स्वीकारेलो छ, अने प्राह्मणेतर जातिना पुरु बीजी वाजुए जोतां ब्राह्मण संन्यासिओ प. पोने माटेपण तेमणे तेनो प्रयोग करेलो छे. पोताना जेवाज परम आस्तिक ब्राह्मणेतर जातीय आ स्थळे जणावई जोईए के जनो तेमज बौद्धो- संन्यासिओने स्वसमान उच्च कोटिना न होता नो भिक्षमार्ग,ब्राह्मणोना संन्यासमार्गना अनुकरण- मानता. कारण के पाछळना समयमां एवो मत रूप होवा छता, ते मूळमां तथा मुख्यरीते क्षत्रियो प्रचलित थएलो स्पष्ट देखाय छे के ब्राह्मण सिवाय माटेज योजाएलो हतो. प्रो. ओल्डनबर्गना दर्शाः अन्य कोई वर्णने चतुर्थ आश्रमनो अधिकार हतो व्या मुजव बुद्धे प्रथम पंक्तिमां उमराव अने अमीर नहीं. आ भतना प्रमाणमां, प्रो. बुल्हरना जणाववा लोकोनेज स्थान आप्यु हतुं'. कारण के, पनारसमा प्रमाणे, मनुनी ६, ९७ मो श्लोक बताववामां आवे थापेला पोताना प्रथम उपदेशमां, बुद्ध पोताना धर्म- छे. परंतु, भिन्न भिन्न टीकाकारोना अभिप्राया ना संबंधमां का हतुं के ' यस्सत्थाय कुलपुत्ता तरफ दृष्टिपात करता, आ श्लोकना अर्थना संभ- सम्मदेव अगारस्मा अनगारियं पध्वजन्ति - धमा यधा टीकाकारो एक मत थता जगाता नथी. तेथी आ विवादग्रस्त उल्लेखने बाजुए मूकीए तो जेने माटे कुलीन जातिना पुत्रो घर छोडीने अनगा- रता स्वीकारे छ.२ थर्बु जोईए. विशपमा, आ न म पण एक जनने छाजे तेवु छे; जैनो पण ब्राह्मणो करतां क्षत्रियोने उच्चकोटिना ब्राह्मणने छाजे तेवू नथी. तेथी मारु तो एम चोकस मानवु थाय मानता हता, ए बावत, महावीरना गर्भसंक्रमना छे के ऋषभदत्त ए फक्त जैनाए देवानंदाना वीजा पति तरी- संबंधमां जे एक आश्चर्यभरेली पुराण कथा प्रसिद्ध के एक कल्पी काढेलो पुरुष छे. आपणे जाणीए छोए छे ते उपरथी साधीत थाय छे. ते दंतकथा एवी छे के सिद्धार्थ पोताना विशला साधेना लगद्वारा अनेक ऊंची के-महावीरनो गर्भ देवानंदा ब्राह्मणांनी कुक्षिमाथी पदवीवाळा भने मोटा प्रभाववाला पुरुषो साथे संबंध धरा- त्रिशला क्षत्रियाणीनी कुक्षिमा फेरबवामां आव्यो क्तो हतो. तेथी कदाचित एवो विचार तेन उत्पन्न थयो हतो. भने तेम करवानुं कारण मात्र एटलुज वताव. होय, तो ते संभवित छे के महावीरने त्रिशलाना सपनासुत वामां आव्यु छ के ब्राह्मणी अगर अन्य कोई नीच तरीके प्रसिद्ध करवाने वदले औरस पुत्र तरीके जो जाहेर जातिनी स्त्रीला उदरथी तीर्थकरनो जन्म थई करवानां अवि ता वारे लाभदायक वायत वनशे, कारण के शके नहीं. तेम करवायी, महावीर त्रिशलानां प्रभावशाली सगांओना १ Buddha, soin Leben, skc., p. 157 sec. आश्रयनो हकदार बनी शकशे. आ दंतकथा लोकोमा विश्वा. २. महावग्ग १,६,१२. सपात्र पण घणजि सहेलाथी मनाई गई हशे. कारण के ३. दिगंबरी आ दंतकथाने युक्तिशून्य कही, एनो अस्थी. महावीर तीर्थकर तरीके प्रसिद्धिमा आव्या तेनी पहेलां घणां कार करे छे. परंतु श्येतायरो तेने दृढतापूर्वक साची जणावे वर्षो अगाउ तेमना मातापिता गुजरी गयां हता. छे. आ दंतकथा आचारांग तथा कल्पसूत्र आदि घणा वस्तुस्थिति लोकोनी स्मृतिमाथी सर्वथा लुप्त नहीं थई होय ग्रंथामां मळी आवे छे, तेथी तेनी प्राचीनतम्मा तो आपणने तेथी पाछनथी गर्मसंक्रमनी आ कधा उपजानी काढवामां शंका रहेती नथी. परंतु ए कोई स्पष्ट समजातुं नयी के कया भावी हशे. आ कल्पनाना मूळ उत्पादक जैनो नथी. तेमणे कारणधी आ युक्तिशून्य दंतकथा उत्पन्न थई लोकमां प्रचार तो मात्र देवकांनी कुक्षिमाथी रोहिणींनी कुक्षिमा थरला पामी हशे ? आ अंधकारप्रस्त प्रश्न उपर मने जो अभिप्राय रुष्णना गर्भसंक्रमनी पौराणिक कथानुं स्पष्ट रीते अनुकरण आपवानी छुट होय तो, माई तो एवं मानवू छे के सिद्धा- कयु छे. आ उपरथी एम पण जणाय.छे के जैनधर्मना विका धने बाह्मणी देवानंदा-जे महावीरनी साची माता हती सनी प्रथमनी सदीओमा रुष्णनी उपासना लोकप्रिय थई ते-अने क्षत्रियाणी त्रिशला एम चे स्त्रीभो हती. पहेली स्त्रीना रही हती. कारण के जैनोए पोताना बावीशमा तीर्थकर अरि- पति तरीके बताश्वामां आवतुं ऋषभदत्तनुं नाम धणु प्राचीन टनेमि जे एक प्रसिद्ध यादव हता, तेमनुं चरित्र लखवामां होय तेम लागतुं नधी. कारण के जो ते प्राचीन होय तो तेनु केटलाक फेरफार सिवाय कृष्णर्नु आखं जीवन यथार्थ रीते प्रारून रूप ' उसमदन 'थवाने यदले प्रागः 'उसभदिन' एवं आलेखी दीधुं छे. परंतु खरी ?

८६ जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ ...... wh worm overno.tvc... पण एटलं तो स्पष्ट देखाय छे के पाछळना समयमां पण कर्यो हशे. आ विगर उपरथी ए कल्पना ए विचार तो खास रूढ बनी गयो हतो के चारे सहज करी शकाय तेवी छ के आ मार्ग स्वीकार- आश्रमनो अधिकारी एक मात्र ब्राह्मण वर्णज होई नार तेज पुरुषो हता जेओ एक प्रकारना पृथग्भूत शके छे. क्षत्रियो माटे त्रण, वैश्यो माटे बे अने अने ब्राह्मणेतर संन्यासिओ मनाता हता. आ रीते शूद्र माटे फक्त एकज आश्रमनो अधिकार जणाव. प्रस्तुत विवेचन उपरथी एक तो आपणे ए बापत वामां आव्यो छे' जोई शकीए छीए के जैन अने बौद्ध जेवा विरोधी आ लघळी हकीकतो उपरथी ए विचार तो संप्रदायोना मतभेदनुं बीज चतुर्थ आश्रमनी सं- निश्चित लागे छे, के प्राचीन काळा पण ब्राह्मणेतर स्थामा रहेलं हतुं. अने बीजं ए पण आपणे जोई संन्यासिओ,ब्राह्मणसंन्यासिओथी एक जुदाजवर्गना शकीए छीए के मतान्तर धारिओए चतुर्थ आश्र- तथा पृथग्भूत मनाता हता. अने तेथी आपणने एम मर्नु अनुसरण कर्यु हतुं. आ उपरथी आपणे मानवू मानवानुं कारण मळे छे के ब्राह्मणेतर संन्यासिओनी पडे छे के जैनधर्म अने बुद्धधर्म ए ब्राह्मणधर्ममाथी आ प्रकारनी अवस्थाने लईने एवा संप्रदायोनो उत्पन्न थएला एक आकस्मिक सुधारा स्वरूप मतो जन्म थयो हतो के जेमणे ब्राह्मणधर्म सामे पोतानो नधी परंतु लांबा वखतथी चालता आवता एक प्रकट विरोध जाहेर को हतो. आवाज कारणने धार्मिक आन्दोलनना क्रमिक परिणाम स्वरूप छे. लईने वेशधारिओ-पाखंडिओ उत्पन्न थया हता आपणे उपर जोई गया तेम, जैनोनी तमना छेल्ला एवो भाव वशिष्ठना कथन उपरथी पण तारवी तीर्थकर संबंधी परंपरांगत कथाओ; अथवा जैन शकाय छे. त्यां एम जणावेलुं छे के केटलाक सं- साधुओ माटे विहित करवामां आवेला आचारो; न्यासिओए धार्मिक क्रियाओ (विधिओ) करवी आर ते धर्मना श्रद्धालु गृहस्थो माटे योजाएली छोडी दीधी हती अने वळी केटलाके तो आथी पण धार्मिक क्रियाओ उपरथी एवं कांई पण सिद्ध थतुं आगळ वधी वेदमंत्रोच्चारण पण छोडी दीधुं हतुं. नथी के जेथी आपणने एम मानवानुं कारण मळे आ प्रकारे क्रियामार्गर्ने उल्लंघन करनाराओने उहे. के जैनधर्म ए बौद्धधर्ममाथी निकळ्यो हतो. ए शीने वशिष्टमां नीचे प्रमाणेनुं कथन करेलु छे, के उपरांत बन्ने धर्मोना मुख्य सिद्धान्तोमां पण पर- 'भले कोई मनुष्य सघळी धार्मिक विधिओर्नु अनु- स्पर एटलो बधो भेद रहेलो छ के जेथी आ बन्ने ठान छोडी दे परंतु वेदमंत्रोच्चारण तो तेणे कदा- धर्मोनुं मूळ उत्पत्ति स्थान एक हशे एम पण मानी पिन छोडवू जोईए. कारण के वेदनी उपेक्षा कर शकाय तेम नथी. बुद्धे निर्वाणनी अवस्थाना संव- वाथी शूद्र थवाय छे. तेटला माटे तेणे तेम करवू धमां गमे तेम विचार्यु अगर उपदेश्यु होय-अर्थात् नहीं. ' आटला बधा भारपूर्वक करेला प्रतिबंध . ते अवस्थाने या तो सर्वथा अभावात्मक यतावी उपरथी सहज अनुमान थाय छे के आयु. क्रिया- 'होय के पछी तेने एक अगस्य अने अचिन्त्य सत्ता- एक वखते खरेलर बंध थयुंज पाळी कल्पी होय; परंतु एटलं तो तष्ठान निःसंदेह हशे. वळी आ उपरथी जो आपणे छे के तेमणे ब्राह्मणधर्मना आत्मवादनो, के जे एटलं अनुमान फरी शकता होईए के केटलाक वादमा विश्वदेवतावादिओ तथा अणुवादिओना संन्यासिओए आवी रीते वेदोच्चारण-वेदाभ्यास . मत प्रमाणे आत्मा स्वतंत्र अने नित्य मानवामां करवो पण छोडीदीधो हशे, तो आपणे तेवं अनुमान आव्यो छे तेनो, स्पष्ट विरोध कयों हता. अने ते पण करी शकीर, के बीजाओए, वेदने ईश्वरप्रणीत विरोधज ए बौद्धधर्मनी एक खास विशिष्टता तथा स्वतःप्रमाणभूत तरीके मानवानो इनकार छे. परंतु आ विषयनो ज्यारे जैनोनो सिद्धान्त तपासीए छोए तो, ते संपूर्णरीते ब्राह्मणमतने मळतो १. Maxmuller, Phe Hibbert Lectures, आवे छे. जे भेद छे ते मात्र एटलोज छ के जैनो ज्यारे आत्माने मर्यादित आकाशव्यापी माने छे; २ Chupter X, 4. Buller's 'Translation, त्यारे सांख्य, न्याय अमे वैशेषिक दर्शन जेवा प्रा- . p. 343.

अंक २] PRA.. डॉ. हर्मन जेकोयीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना २७ ह्मण संप्रदायो आत्माने सर्व विश्वव्यापी माने छेः जन्ममा जीवात्माने भोगवां पडे छ ते; तेमज वळी, जेवी रीने बौद्धोनो असंख्य उपविभागात्मक संपूर्ण जान अने उत्तमचारित्र-के जेथी मनुष्य पञ्चस्कन्ध्रवाद जनाना अध्यात्मशास्त्रमा बिलकुल भवचक्रपरिभ्रमणनो अन्त लावी शके छे ते जणातो नी. तेवी रीने नोनो अनिविस्तृत चेत- इत्यादि सिद्धान्तो लई शकीए. बीजो पण जैनी नवाद (Illumoistic theory ) जेवा सिद्धान्त अने बौद्धोनो एक समान विचार छ, जेनी अनु- पण बौद्धाना तत्त्वज्ञानमा दृष्टिगोचर श्रतो नधी. सार एम मानवामां आवे छे के अनादि काळथी जैनोनो एसिद्धान्त तेमना संपूर्ण तत्त्वज्ञान अने तीर्थंकरो अने बुद्धो एकज प्रकारना सिद्धान्तो प्रक- आचारशास्त्रमा आतमोत थएलो जोवामां आंव पता भाज्या छ नथा नष्ट थना धर्मन पुनर्जीवित छ भने ए सिद्धान्तानुसार प्राणी अन वनस्पति उप- करता आल्या छे. ए विचार पण ब्राह्मणोना विष्ण- रान्त पृथ्वी, जल, तेज अने वायुजवां तत्त्वानां मूक्ष्म- ना अवतारोवाळा विचार साथै मळतो आवे छ. मांसूक्ष्म अणुयो सुडांने चेतनायुक्त मानवामां आवं परंतु, ते उपरांत, जन अने यौद्ध ए पन्ने धर्मना एक छ. भारतवर्षना सघळा तत्त्वमानिआए सर्वशता अत्यावश्यक प्रयोजनरूपे पण या विचारनी मधीनी माननी जदी जुदी तरतमताओ-पायरीओ उत्पत्ति थपली समजाय छ. कारण प. छ के बुद्ध ने एक अति महत्त्वना विषय मान्यो छे. तदनुसार अगर महावीरे जे काई प्रतिपादन कर्यु हतुं तेने जैनो पण आविषयमा पोनानी एक स्वतंत्र मत तमना अनुयायिआ सत्य-एकमात्र सत्य मानता धरावे छे. अने प. विषयनी तेमनी परिभाषा पण हता. हवे आ सत्यने पण ब्राह्मणांना वंदनी माफक मालग अन बौद्धोथी नहन जुदाज प्रकारनी छे ते. अनादि काळथीज अस्तित्व धरावतुं मानवू जोईए. ओप मानना नीचे प्रमाणना पांच प्रकारी मानेला कारण के जो एम न मानवामां आवे तो प्रश्न थशे छ:-- (१) मति-सम्यग अवरोध(२) श्रुत-मति के गं आ सत्य तीर्थकरोनाअवतारनी पूर्वे व्यतीत वाद थपलं स्पष्ट मानः (३) अवधि-एक जासन थई गएला अनंत काळ सुधी मात्र अशातज रहथु अतीन्द्रिय मान; (४) मनः पर्याय-परकीय विचा हतुं ? आ प्रश्नना उत्तरमा दरेक'श्रद्धालु जन अगर रोन विशद मान; (५) केवल-सर्वोत्कृष्ट प्रकारचें बौद्ध एमज फहशे के नहीं एम बनवू तो तहन अथवा संपूर्ण मान. जैनानी आ एक मौलिक आ. अशक्य छे. ते तो एमज कहेशे के आ सत्यधर्मनी ध्यात्मिक सिद्धान्त छ, भने ए. सिद्धान्त तीर्थक. उपदेश भिन्न भिन्न काळमां उत्पन्न"थएला एवो रोनां चरित्रो लखती बखते लेखकांना मगजमा असंख्य नीर्थकरो तथा बुद्धी द्वारा हमेशां अपातो हमेशां प्रधान पणे रमी रहे छे. आ प्रकारनो सि- आयो छ अने भविष्यमां पण तेषी जरीते अपातो बान्त योग्रन्योमा बीलकुल जोपामां आवती नथी. रहेश. आ प्रमाणे भूतकालमा भनेक धर्मप्रवर्तको एसिवाय बन संप्रदायांना मुख्य सिद्धान्तो वो थई गयानो ‘आ पन्ने धमनिी विचार-सिद्धान्त नीजा पण एवा घणा भेदो बताधी शफाय तेम छे. न्यायशास्त्रानुसार एक अत्यावश्यक प्रयोजनरूपे छे. परंतु ते बधा- वर्णन वाचतां कदाच वाच चली जनाना आ विचार-सिद्धान्तने प्रमाणशु: कने कंटाळो आप तेवा भयथी अमे आटलेथीज न्य ठरावी शकाय तेम पण नथी. कारण के बौद्ध विरमाए छीए. ग्रंथोमा काई पणस्थळे निग्रंथोने एक नवीन उत्पन्न जैनोना जे केटलाक सिद्धान्तो बौद्ध सिमान्तो थरला संप्रदाय तरीके अथवा तो नातपुत्तने तेना साथे मळता आवे छे ते तो ब्राह्मणधर्ममां पण संस्थापक तरीके वर्णवामां आव्या नथी. तेथी समान छ-उदाहरण तरीके पुनर्जन्मनो सिद्धान्त युद्धंना समयमां निग्रंथोनो संप्रदाय, ते प्रायः एक अर्थात् मरण पछी परीथी जन्म धारण करवो ते प्राचीन संप्रदायज मनातो हतो, एम सिद्ध थाय कर्मनो सिद्धान्त अर्थात् पूर्वकृत कर्मोना धर्मा- छ. तेमज नातपुत्त ते, वर्ण करीने पार्श्व नामे वे- धर्मरूपी परिणामो था भवमां अगर आगामी घीशमा तीर्थकर द्वारा स्थापित थपला जैन धर्मना जैन साहित्य संशोधक [भाग १ VA एक मात्र सुधारक समझाता हता. परंतु आमां त्र ग्रंथो, छेक ई०स० नी पांचमी शदीमा-एट- आश्चर्य उत्पन्न करवावाळी बाबत ए छे के जैनो लेके ए संप्रदायनी स्थापना थया पछी लगभग एक तेमज बौद्धो बन्ने वर्तमान युगना धर्मप्रवर्तकोनी हजार जेटलां को व्यतीत थयां बाद, लखाएला संख्या लगभग सरखीज माने छे.-एटलेके जैनो होवाथी तेना आधार कोई पण सवळ अनुमानकरी २४ तीर्थंकरों माने छ भने बौद्धो २५ बुद्धो माने छे. शकवाना संबंधमां ते मोटी शंका धरावे छे. जैन- आ मान्यताना विषयमा हुए वातनी ना नथी पाडी धर्मना संबंधमां तनो एयो अभिप्राय छे के ए संप्र- शकतो, के, आमां एक संप्रदायनी वीजा संप्रदाय दायना, ते प्राचीन काळधी लई पुस्तको लखाता उपर असर नहीं थई होय. परंतु हूं एटलुं तो दृढ़ता. सुधीना समय सुधीना, स्वसंवेदित अने सतत पूर्वक कही शकुं हुं के आ बन्नेमांना कयाधर्मे प्रथ- एवा अस्तित्वनो-अर्थात् तेना खास खास सिद्धा म आ मान्यता शोधी काढी हती; अगर तो सौथो तो भने नाधोनी निरंतर परंपरानो-हजी सुधी प्रथम कोणे ब्राह्मणो पालथी तेनो स्वीकार को निर्णयात्मक रीते निकाल थयो नयी. वळी ते ज-. हतो; तेनो निर्णय करवो कठण छे. कारणके यौद्धो- णावे छ के 'वणी शदीभोधी तो जैनो, तेमना मां जेम, बुद्ध-निर्वाण पछीनी प्रारंभनी ज शताब्दि- जेवा वीजा अनेक संन्यासिवर्गों के जे फक्त अप्र- ओमां पञ्चीस बुद्धोनी उपासना दाखल थई हती, सिद्ध अने अस्थिररूप पोतानं जीवन गाळता हता तेम चोवीश तीर्थकरोनी मान्यता पण, महावीर तेमोथी सिन्नरूपे ओळखायाज न होता. तेथी मि. निर्वाण याद अणुं करीने वीजी ज शताब्दिमां जुदा बार्थना अभिप्राय मुजय जैनोनी सांप्रदायिक परंप- पडेला दिगम्बर तथा श्वेताम्बर ए वन्ने संप्रदायोने रामोते मात्र चौद्ध परंपराओना अनुकरणरूपे, सरखी रीते मान्य होवाथी, ते पण तेटली ज जुनी तेमणे पोतानां अस्पष्ट अने आनिश्चित स्मरणोमांधी छे. परंतु आ प्रस्न, निराकरण करवं ते अहीं काई उपजावी काली छे. महत्खनो विषय नथी. कारण के पूर्वकृत विवेचन मि. यार्थनो आ मत एवा अनुमान उपर स्थिर द्वारा जे निर्णयो उपर आपणे आन्या छोए ते उपर थएलो मालुम पड़े के के जैनो पोता, पवित्र ज्ञान तेनी विलकुल असर थती नथी. ते निर्णयो एज छे एक पेदिथी बीजी पहिने आपवामां घणाज वेदर- के-(१) जैनधर्म, ए बौद्धधर्मी तहन स्वतंत्र कार रहा हता; अने तेम रहेवामां कारण ए छे के रोते उत्पन्न थएलो एक प्राचीन धर्म छे; तेनो वि- ते घणी शदीमो सुधी मात्र एक नानो अने अनु- कास पण तेटलीज स्वतंत्र रीते थएलो के; तेमज पयोगी संप्रदाय हतो. मि. घार्थनी आ दलीलमा तेमां बौद्ध धर्ममांथी विशेष काई लेवामां आव्यु हुं कोई प्रकारनुं वजन जोई शकतो नथी. ई अही नथी. तथा (२) जैनो तेमज चौद्धो ए वन्नेना तस्व. ए प्रश्न पूछ टुं के-जे धर्म पोताना थोडाक अनु- ज्ञान, आचार, नीतिशास्त्र, भने जगदुत्पत्तिशास्त्रन यायिओ बडे एक मोटा प्रदेश उपर पथरापलो मूळ ब्राह्मणो-खास करीने संन्यासिओने आ- होय ते धर्म पोताना मौलिक सिद्धान्तो अन परंप- भारी छ. रामोने वधारे सुरक्षित राखी शके छ, के धर्मने अत्यार सुधीनी आपणी सघळी वर्ची जनोना एक मोरा जनलमूहनी धार्मिक जरूरीआतो पूरी पवित्र ग्रंथोमांथी उपलब्ध थती परंपरागत कथा- पाडवानी होय छे ते ! आयेमांनी कई वावत वधारे ओनी प्रामाणिकता उपर ज चालेली छे. परंतु एक संभवित छ? जो के एकंदररीतेआ प्रकारनी हेत्वा- अतिशय विशाल ज्ञानवाळा अने कुशल विचारक भासात्मक तर्कपद्धतिथी आवा प्रश्ननो निर्णय विद्वाने ए प्रामाणिकताना संबंधमा जशंका करेली थवो तो अशक्य ज छे. उपर्युक्त के पक्षोना प्रथम छे. ए विद्वान् ते मी.वार्थ (Barth) छे. ते पोताना पक्षमा याहुदी तथा पारसीमो उदाहरण रजुकरी Rerue de II Histoire des Religions,Vol. शकाय छे अने वीजा पक्षमा रोमनकथोलिक धर्म- III, p. 90. मां नातपुत्त नामनी एक ऐतिहासिक नो दाखलो आपी शकाय छे. परंतु जैनो संबंधी व्यक्किनो स्वीकार करे छे खरो, परंतु जैनोना पवि- प्रस्तुत प्रदनना वादविवादनो निर्णय करवामां भावी अंक 1 डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना. ... v -- PuM ~ -~~ .... ) जातना सामान्य सिद्धान्तो उपर आधार राखवानी नयी कहतो के आवी गुर्वावलीओ पाछ- काई आवश्यकतानथी कारण के तेओने ( जैनाने) लथी पण जोडी कढानी नथी के अपूर्ण पट्टा- पोताना सिद्धान्तोनुं एटलु बधं स्पष्ट ज्ञान हत के वलीयाने पूर्ण, पटले हिंदुयाना शब्दमां कहीए तो तभोर घणीज नजीवी पावतमा मतभेद धरावनार 'पक्की' बनावी शकाती नथी. कारण के दरेक सं- पुरुषोने पण निववरूप जाहर करी, पोताना श्रद्धा- प्रदायने, पोतानो संप्रदाय एक प्रतिष्ठित आप्तपुरुष- लुभाना विशाल समुदायमाथी तेमने जूदा फरी थी प्रामाणिकरीते उतरी थावेलो छ, एम वतावया दीधा हता. आ कथननी सत्यताना प्रमाण तरीके खातर पातानी गुरुपरंपराना नामा उपजावी काढ- डॉ. ल्यूमने (Dr Le :monn) प्रकट करेली श्वेता- घानी स्वाभाविक रीतज जरूर पडे छ. परंतु कल्प- म्घर. संप्रदायनी सात निन्हवो विषनी परंपरा' छे. सूत्रमा एक,स्थविर,गणोअने शाखाओनी विस्त. तथा दिगम्बरो, जे श्वेताम्बरोथी महावीर निर्वाण त नामावली आपली छ तेने कल्पी काढवामांजैनोने पछी प्रायः बीजी अथवा त्रीजी शाब्दिमां, जुदा कोई पण प्रकार प्रयोजन होय तेम हुं मानी शकतो पच्या हता, तेथी कांई तेमना प्रतिस्पर्धिमओ (श्वेता नथी. कल्पसूत्रमा जेटली विगतो आपेली छ-तेटली म्बरो) थी तात्विक सिद्धान्तोमा मोटो मतभेद पण धिंगतोनुं ज्ञान त्यार पछीना जैनोने र न हतुं. धरायता नथी छतां पण आचाराधिपयक तेमना तेम तेथी अधिक जाणवाना तओए क्यारे डोळ केटलाक भिन्न नियमान लीधे, श्वेताम्बरोए तेमने पण कर्यो न हता. गुरुपरंपरानो नाँधयोग्य यधोव्य. पामंडियोना नामे वगाव्या छे. वहार लाववा माटे कल्पसूत्रमा आपेली संक्षिप्त आ सघळी हकीकता उपरथी या बाबत स्पष्ट स्थविरावली पर्याप्तन हती. तेम छतां पग तेमा रीते सिद्ध थाय छ के जैन आगमी [ हालतुं स्व- आवली विस्तृत स्थविरावली के जेमां पण फेट- रूप] नकी थयां पहेलो पण जैनधर्म एवा अन्यव- लांक तो एकलां नामोज जावामां आवे छे-ते एया. स्थित अथवा अनिर्दिष्ट स्वरूपमा विद्यमान न हतो, वत स्पष्टरीत जणाव छ के जैनो पोताना प्राचीन के जेथी, तेनाथी अत्यंत भिन्न एवा अन्यधर्मा (द. धर्माचार्या-स्थायरानी यादगिरी राखवामां फैटलो र्शनो) ना सिद्धान्तो द्वारा तेनुं असल स्वरूप परि- यधा रस धरायता हता. ते स्थविरावलीमा थाले- वर्तित अगर कलुपित थयुं हतं; एम मानवाने आप खेला युगो तथा धनावोनी यथार्थ माहीती तेना णने कारण मळे. परंतु आथी विरुद्ध उपर्युक्त प्र. पछी थोडीक ज शदीओमां नष्ट थई गई हती. माणों एम तो सिद्ध करी आपे छे खगं के तेमनी परंतु, मात्र आटलं सिद्ध करी बताववाथी के सूक्ष्ममा सूक्ष्म मान्यता पण सुनिश्चित स्वरूपवाळी जैनो तेमना आगमोनुं स्वरूप नको थया पहेला हती. पण पोताना धर्म तथा संप्रदायने सतत चालु रा. जेवी रीते जैनांना धार्मिकसिद्धान्तोनी घाबतो खवा माटे, तेम ज अन्यदर्शनीय सिद्धान्तोना सं. आ रूपे सिद्ध थई शके छ तेवीज रीते तेमनी ऐति- मिश्रणयोगे उत्पन्न थती भ्रष्टताथी तेन वचावी सुर- हासिक परंपराविषयक बावतो पण सिद्ध थई शके क्षित राखचा माटे योग्य गुणसंपन्न हता; आपणे तेवी छ. वंशपरंपराधी चालती आवती जे विविध भाविषयमां कृतकार्य थई शाता नथी. आपणे ए गच्छोनी विस्तारयुक्त गुर्वावली मळी आवे छे पण बतावी देव जबरन छ के तेश्रोमा जे जे वात्रत तथा जैन आगमग्रंथोमा जे स्थविरावलीमा उपल- करी शकवा सामर्थ्य रतुं ते सघळू तेमणे संपूर्ण- ब्ध थाय छे ते स्पष्ट बताची आपे छ के जैनो पो. रीते कयें हतुं. आ चर्चा उपरथी आपणे स्वाभा. ताना धर्मनो इतिहास राखवामां फेटलो बधो विकरीत ज वर्तमान जनसाहित्यना कालनी चर्चा एम कांड चोकस भावी जईए छीए. आविषयमां जो आपणे 9 See Indische Studien, XVI. आटलं सिद्ध करी शकीए के जैन साहित्य अथवा @ See Dr. Klatt, Ind. Ant. Val.XI. तो छवटे ते पैकी जे केटलाक सौथी प्राचीन ग्रंथो रस घरावता हता. उपर wowwwwwwwwwwwwwwwwwww. जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ छे, ते जैन पुस्तकारोहणना समयथी. घणी शदीओ घणी.मोटी संख्या तैयार कराववी पडी हशे. हवे पहेलो रचापला हता, तो ते द्वारा आपणे जैनोना देवर्धिगणीए सिद्धान्तने पुस्तकारूढ कराव्यो (अंतिम) तीर्थकर अने प्राचीनमा प्राचीन ग्रंथो ए एवो जे. लेखी संप्रदाय मळे छे तेनो भावार्थ प्रायः पन्ने, वधेना गाळाने, जो के सर्वथा दूर नहीं करी उपर प्रमाणेनोग होवो जोईप कारण के ए तो शकीए तो पण घणे अंशे अल्प करी आपवा समर्थ भाग्ये ज मानी शकाय तेवं छे के तेनी पहेलां जैन थई शकीशं... साधुओ जे कांई कंठस्थ करता हशे तेने सर्वथा सर्वसंमत संप्रदायनी.अनुसार जैनसिद्धान्त वल नज लखता होय. ब्राह्मणो वेदवें अध्ययन कराव. भिनी सभामा देवर्धिगणीना अध्यक्षपणा नाचे, नि- वामां.लिखित पुस्तकोनो उपयोग करता नथी छतां श्चित करवामां आव्यो हतो. आ बनाव वीर निर्वाण पण तेमनी पाले तेवां पुस्तको तो जरूर जोवामां पछी. ५८० ( अथवा ९९३ ) मा वर्षे एटले. इ० स० आवे छे. तेओं (ब्राह्मणो) आ पुस्तकोने खानगी ४५४ ( अगर ४६७ ) मां' बन्यो हतो, एम कल्पसूत्र उपयोग माटे एटले के गुरुनी स्मरणशकिने मदत [.३ १४८.] उपरथी जणाय छे. संप्रदाय एवो छे.के करवा माटे राखे छे. मारू दृढ मानवु छ के जैनो ज्यारे देवधिगणीए सिद्धान्तने नष्ट थई जवाना.जो. पण आज पद्धतिने अनुसरता हशे. बरके तेओ खममा जोयो त्यारे तेमणे.तेने पुस्तकाधिकढ..करा. ब्राह्मणोथी पण वधारे आ पद्धतिनुं अनुसरण कर- व्यो, तेनी पहेला, आचार्यो .क्षुल्लकोने सिद्धान्त ता हशे, केमके ब्राह्मणोनी माफक तेओ -एवं शीखवती बख़ने लिखित.ग्रंथोना बिलकुल उपयोग . मानवू तो.हतुं ज नहीं के लिखित पुस्तको अविश्व- करता न होता. देवर्धिगणीना समय पछी ज लिखि- स्य छे. तेओ तो मात्र जे एक प्रचलित रिवाज त पुस्तकोनो उपयोग शरू थयो. आ हकीकत तहन हतो, के आगमनुं शान. मौखिकरीते ज एक पेढी- साची छे. कारण के प्राचीन समयमां..पुस्तकोनो द्वारा बीजी पेढीने अपाचुं जोईए, तेने लईने ज लि- बिलकुल उपयोग थतो न हतो एम आपणने बीजी खित ग्रंथोनो विशेष उपयोग करवामां संकोचाता हकीकतो उपरथी पण जणाई.आवे छे. ब्राह्मणो..तो हता. हुं अहीं एम प्रतिपादन करवा इच्छतो नथी लिखित पुस्तक करतां पोतानी स्मरणशक्ति - उपर के जैनोना पवित्र आगमो असलथी ज छुटा वाया ज विशेष आधार राखता हता. अने निःसंदेहरीते पण आवी रीते, पुस्तकोमा लखेला ज हता. अने जैनोए तेमज बौद्धोए तेमनी अ आ प्रथा, एमन कहेवार्नु खास कारण बीजू काई नहीं, परंतु अनुकरण कर्यु हतुं. परंतु अत्यारे जैनयतिभो -पो- बौद्ध भिक्षुओ, पासे लिखित पुस्तको न.हतां एम ताना शिष्योने शास्त्र शीखवती वखते लिखित जे कहेवाय छ तेज छे. बौद्ध भिक्षुओ पासे आवां पुस्तकोनो उपयोग अवश्य करे छे.. आ उपरथी पुस्तको नहतां तेना प्रमाण तरीके एयु कहेवामां आपणे मानवं पडे छ के शिक्षण पद्धतिमा.थएलो आवे छे के तेसतां सूत्रोमां, ज्यारे प्रत्येक जंगमवस्तु आ फेरफार देवर्धिगणीने आभारी छ, एम बताव थी लईने नानामां नानी अने क्षुद्रमा क्षुद्र..एवी नारो वृद्ध संप्रदाय तहन साचो छ, कारण के आ घरंमां वापरवा लायक वासणो जेवी चीजोनो पण बनाव बहुज महत्त्वनो.होवाथी भुली शकाय तेम कोई ने कोई रीतिए उल्लेख थपलो अवश्य जडे छे" नथी. प्रत्येक आचार्यने अथवा तो छेवटे प्रत्येक त्यारे लिखित पुस्तकनो क्या.ए पण बिलकुल उल्लेख उपाश्रयने आ पवित्र आगमोनी नकलों पूरी पाडवा थएलो जोवामां आवतो नथी. आ कथन, मारा मा- माटे देवर्धिगणीने सिद्धान्तना पुस्तकोनी, खरेखर नवा प्रमाणे, ज्यां सुधी जैन यतिओ, भ्रमणशील १. संभवित न लातुं होवा छतां ए शक्य. छे.के सिद्धा- पडे तेवु छे. परंतु ज्यारथी तेओ पोताना ताबाना जीवन गुजारता हता त्यां सुधी तेमने प्रण लागु न्तनिर्णयना समय आ करता ६० वर्ष पछी एटले .ई. स. ५१४ (अधवा ५२७ ) होवो जोईए. जुओ कल्पसूत्र, उपो 9. Sacred Books of the East, Vol.XIII द्घात पृ. १५ Introduction, p, XXXIII, अंक २] डॉ. हर्मन जेकोधीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना ९ 4... 14.-nn.. ... h . अथवा पोताना माटे बनावेला उपाश्रयामा रहेवा वृत्तिमा स्वीकारी लीधा होय. पण तेटला उपरथी लाग्या त्यारथी तेओ पोतानां हस्तलिखित पुस्तको आपणे कोई प्रकारनु सवळ अनुमान काढी शकीए पण अत्यारना माफक,.राखवा लाग्या हता. नहीं. हुं म्लेच्छ- अथवा अनार्य जातिओनी' जे . आ दृष्टिए जोता, देवर्धिगणीनो जैन आगमसा- यादीओ ए.सूत्रोमां मळी आवे छे ते उपर वधारे हित्यसाथेनो संबंध, साधारणरीते जेम मनाय छ, वजन मूकी शकतो नथी. तेमज साते निहनवो, के तेनाथी कोई विलक्षण प्रकारनो होय तेम. जणाय जेमांनो छेल्लो वीरनिर्वाण पछी ५८४ वर्षे थयों छ. तेमणे वस्तुतः तेमनी पहेला अस्तित्वधरावता हतो, तेना उल्लेख उपरथी पण काई अनुमान काढी हस्तलिखित ग्रंथांने सिद्धान्तना आकारमा गोठवी शकाय नहीं. आवा प्रकारनी विगतोना संबं- दीधा हता. अने तेम करती वसते जे जे सूत्रो- धमां जो एम मानवामां आवे के जे आचार्यो आगमोना, हस्तलिखित ग्रंथो उपलब्ध थया न हो- पोतानी शिष्यपरंपराने पेढी दरपेढीए लिखित या ता, ते सघळा तेमणे विद्वान् धर्माचार्योना मुखेथी कथित रूपे सिद्धान्तपाठ सोपता गया हता, ते. लखी लीधा हुता. ओए ते (विगतो) ने सिद्धान्तनी टीका-टिप्पणी वळी, भावी राते धार्मिक शिक्षणपद्धतिमा दाख- रूपे अगर तो मूळ सुद्धांमां पण दाखल करी दीधी ल थरला आ नवा फेरफारने लीधे पुस्तको एक हती तो तेमां काई अस्वाभाविकता जेवू नथी. परंतु अत्यावश्यक साधनरूप थई पडेलां होवाथी प्रत्येक सिद्धान्तमा एक महत्त्ववाली वावत ए जणाय छे उपाश्रयने ए आगमग्रंथोनी नकलो पूरी पाडवा माटे के तेमां कोई पण स्थळे ग्रीक लोकोना खगो- तेनी घणी नकलो कराववामां भावी हशे. आ रीते ळशास्त्रनी गंध सरखी जोवामां आवती नथी. जोतां देवर्धिगणांनी सिद्धान्तनी आवृत्ति ते, तेमनी कारण के जैन ज्योतिषशास्त्र ते, वास्तविकमां, एक पहेलां अस्तित्व धरावता पवित्र सिद्धान्तग्रंथोनोल. अर्थरहित अने अभ्रद्धेय कल्पना मात्र छे. तेथी आ- गभग प्राचीन ज आकारमा निर्णीत करेलो एक नवी पणे एम अनुमान करी शकीए छीए छ के जैन पाठ मात्र छे. आ थावृत्तिकारे, संभव छे के, प्राचीन ज्योतिपशास्त्रकारोने ग्रीक जातिना खगोळ शासनी सिद्धान्तमां कोईक कोईक उमेरा कर्या हशे. परंतु स्हेज पण माहीती होत तो तेयु असम्बद्ध तेओ आटला उपरथी संपूर्ण सिद्धान्त नबो बनाववामां जरूर न लखत. हिन्दुस्थानमा प्रीसनुं आ शास्त्र आव्यो छे एमतो खरेखर नज.कही शकाय. आ - ई.स. नी श्रीजी अगर चोथी शताद्विमा दाखल थयु तिम आवृत्तिमा निर्णीत थपला पाठनी पूर्वेनो सिद्धां हतुं एम मनाय छे आ उपरथी आपणे ए रहस्य त पाट पण केवळ यतिओनी स्मरणशक्तिना आधारे काढी. शकीए छीए के जैनोना पवित्र आगमो ते जलखवामां आवता पाठ जेवोअव्यवस्थित न हतो समयनी पहेला रचायां हतां. परंतु ते पाट हस्तलिखित प्रतिओ साथे मेळवे. जैन आगमोनी-रचनाना समयानर्णयमाटे वीर्जु लो हतो. प्रमाण ते तेनी भाषा विषयक छः परंतु, कमनसीये आटलं विवेचन कर्या याद हवे आपणे: जैनोना हजी सुधी ए प्रश्ननुं स्पष्ट निराकरण थयु नथी के पवित्र आगमानी रचनानो . समविषयक विचार जैनागमो, जे भाषामा · अत्यारे आपणने उपल- करीए. संपूर्ण आगमशास्त्र प्रथम तीर्थकरतुं. ज ध्ध थाय छे ते ज तेनी मूळभाषा प्ररूपलं छै ए जातना जैनोना विचारनु- तो निरा- १ अनार्य जातिओमानो 'आरष फरण करवा .खातरज हुं अहीं सूचन करूं छु. सिद्धान्तना मुख्य ग्रंथोनो समय नको. करवा माटे धारपा प्रमाणे, कदाच . ' मारय ' वाचक - वने, परंतु मारा आरणे आना करतां वधारे सारां प्रमाणो-पुरावाओ मानवा प्रमाणे ते शब्द ' सामिलो ' नो वाचक ले. कारण के एकत्र.करवा जोईए छूटक अने असंबद्ध सूत्राः तामिलोनी भाषाने द्रविडीयन लोको कहे छे. अरवमु लारको गमे त्यारे आगमग्रंथोमां दाखल थई: गया २. See Veber Indische Studien, XVI, होय तथा देवर्धिगणीए पण भले तेने पोतानी आ. P. 237. शब्द ते, वेयरना ९२ जैन साहित्य संशोधक [भाग १ ........... अर्थात् जे भाषामां सौथी प्रथम 'तेनी संक- रणमा साहाय्यभूत वनेली बधी हस्तलिखित प्रति- लता धई हती तेज भाषामा अत्यारे आपणने उप. ओमां जे जे भिन्न भिन्न लेखनपद्धतिओ मळी आ. लन्ध थाय छ, के पाछळधी, पेढी दरपेढीए ते ते चती हती ते बधी प्रामाणिक मानवामां आवी हती. फाळनी रूढ ( प्रचलित ) भाषानुसार तेमा उच्चा- बने तेथी ते सबळी पद्धतिओने ए सूत्रनी नकलो- रण-परिवर्तन थता थतां छेक देवर्धिगणीना मां साचवी राखवामां आवी हती. आविचार जो नवीन संस्करण बसतनी चालू सापाना उच्चारण युक्तियुक्त जणातो होय तो, थापणे, सौथी प्राचीन पर्यतती भापायी मिश्रित थएला आजे मळे छ? अने रूढिवाहिकृत लेखनपद्धतिने आगमरचनाना आबे विकल्पोमांनो मगे तो बीजो ज विकल्प स्वी. आदि समयनी अथवा तो तेना निकट समयनी करणीय लागे छे. कारण के ए भागमोनी प्राचीन उच्चारसूचक मानी शकीए. अने सौथी अर्वाचीन भावाने चालु भापानी रूढिमा फेरववानो वहीवट लेखनशैलीने सिद्धान्तना अंतिम संस्करणना स. ठेठ देवर्धिगणी सुधी चालु रहो हतो. अने अते मयनी अगर तेनी नजीकना समयनी उच्चारदर्श देवर्धिगणीना संस्करण जते वहीवनी अंत आण्यो कमानी शकीए. वळी साथी प्राचीनरूपमा उप. हनो. एम मानवाने आपणने कारणो मळे छ. जैन लब्ध थती जैन प्राकृत भाषाने, पाली तथा हाल, प्राकृत भापामां स्वरूपलंगत वर्णविन्यासनो जे सेतुबन्ध विगैरेनी ( पाछला समयनी ) प्राकृत अभाव दृष्टिगोचर थाय छे तेनु कारण, जे लोकभा- साथे जो आपणे सरखावीशुं तो आपणने स्पष्ट ज. पामा ( Vernacular Language ) ते पवित्र णाशे के जैन प्राकृत ए पाछळनी प्राकृत करतां पा: आगमो हमेशा उच्चाराई रह्या हता, ते भापामां लोने वधारे मळती आवे छे. आ उपरथी आपणे निरंतर थतुं रहेलु क्रमिक परिवर्तन ज छे. जैन. एवा निर्णय उपर आवी शकीप. छीप के कालगण- सूत्रोनी लघळी प्रतिओमां एक शब्द एकज रीते नानी दृष्टिए पण जैनोना आगमो, त्यार पछीना लखेलो जोवामां आवतो नथी. आ वर्णविन्यास. समयमा थएला प्राकृत ग्रंथकारोना ग्रंथो करतां विषयक विभिन्नताना मुख्य कारणोमांनुं एक कार- दक्षिणना यौद्धसूत्रो [गा रचना समय ] साथे ण तो वे स्वरो वचे आवता असंयुक्त व्यंजननो प्रक- वधारे समीपता धरावे छे. तिभाव (तदवस्थ राखवारूप ), लोप, के मृदूकर परंतु, मापणे जैन आगमोनी रचनाना समयनी ण थवारूप छ; अने बीडूं कारण वे संयुक्त व्यंज- मर्यादा, तेमां प्रयोजाएला छंदोनी मददी, बाथी नोनी पूर्वेना ए अने ओ ने तदवस्थ एटले कायम पण वधारे निश्चितरते आंकी शकीए तेम छोए. हुं राजवारूप अथवा तेने क्रमथीइ अने उ ना रूपमा परिवर्तित करवा ( लघूकरण ) रूप छे ए तो अ. १. कोई अहीं एवी दलील कर्या करे छ के आवी शक्य ज छ के एकज शब्दना एकज समयमा एक- आप एटले रूठिब हैरुत लेखनपद्धतिना अस्तित्वनुं कारण थी वधारे शुद्ध गणावा लायक उच्चारो होई शके. मात्र संग्रुत मापानी असर छे. परंतु जैनोनुं प्रारुत-मषानुं उदाहरण तरीके-भूत, भूयः उद्ग, उदय अने उअय; ज्ञान हमेशा एटलुं वधू संगीन रत्यु हतुं के जेथी तेमने पो. लोभ,लोहे इत्यादि.आपणे आप्रकारनी जदी जुदीले ताना आगमोने समजवा माटे संस्कृतनी सहायता लेवी ज वन पद्धतिओने ऐतिहालिक लेखनपद्धतिमा मान. पढती नहोती के जेथी तेनी तेना उपर असर पडे. परंतु वी जोईए. एटले के देवर्धिगणीवाळासिद्धान्तसंस्क- आधी उलटुं, जैनोना संस्कृत ग्रंथोनी प्रतिओमा प्राकृत शब्दो जेवा लखेला घणा शब्दो मळी आवे छे. उपर प्रमाणे १ १ एन नथी कतो के कोई पण शब्दना एक काळमां मानतां पण केलीक जोडणीभओ तो एवी मळी आवे छे. के वे पो ज न होई शके बचे रूपोवाळा घणाए शब्दो जेने संस्कृतीकरणनी दृष्टिए पण समजावी शकाय तेम नथीः- यया हो. परंतु प्रायः प्रत्येक शब्दना बन्ने त्रण त्रण सुपो उ त. दारयने बदले मळतुं दारग एवं रूप लईए. आश: एक साथे प्रचलित रहेवानी वावतमा मने जरूर शंका व्दनुं संस्कृत प्रतिरूप 'दारक' थायछे परंतु 'दारग' एई रहे छ. थतुं नथी. ।

अंक २] डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना ......... ...... . .... .... . M ~ownA..MANA 2.vvvvvwww. आचारांग अने सूत्रकृतांग सूचना प्रथम स्कंधोने, • उपरथी एम सिद्ध थतुं होय तेम जणाय छे के सिद्धान्तना सौथी प्राचीन भाग तरीके मानुं . आ प्रकारना अर्वाचीन ग्रंथोनी रचनाना समय अने मारा था अनुमानना प्रमाण तरीके हु आ के पूर्वे जैनोनी साहित्य विषयक अभिरुचि निश्चित ग्रंथोनी (स्कंधोनी ) शैली यताबीश. सूमकतांग सू- थएली हती. आ सघळी बावतो उपरथी आपणे जनुं आखं प्रथम अध्ययन, चैतालीय वृत्तमां रचा- एवो निर्णय फरी शकीए छीए के, जैनोना लौथी एलुं छे. आ वृत्त धम्मपद आदि दक्षिणना अन्य प्राचीन साहित्यनी समयमर्यादा पाली साहित्य बौद्ध ग्रंथोमां पण चपराएलो जोवामां आवे छे. अने ललितविस्तराए उभयना रचनाकालनी बच्चे परंतु पालीसूत्रोनां पयोमा प्रयोजाएलो चैतालीय निश्चित थाय छे. पाली पिटकोनुं पुस्तकाधिरोहण वृत्त, त, सूत्रकृतांग सूचना पद्योमा मळी आवता (अर्थात् पुस्तकरूपे लखाण ) वहगामणि जेणे ई. घेतालीय वृत्तनी दृष्टिए जोतां, वृत्तना विकास क्र- स. पूर्वे ८८ वर्षे पोतार्नु राज्यशासन शरू कर्यु हतुं मना प्राचीन स्वरूपनो द्योतक छे. या वावतमा हुँ तेना समयमां थयुं हतु.जो के आ लमयथी केटली- यही वधारे न लखतां, थोडाज समयमा जर्मन फशदीमो पूर्वे पण ते पिटको अस्तित्व तो धरावतां ओरियन्टल सोसाइटीना जर्नलमां, 'वेदनी पछीना हतां ज. आ विपयनी चर्चा करतां छेवटे प्रो.मेक्स- कालना छंदो'('Post-Vedic Jetres ') ए मूलरे नीचे प्रमाणेना विचारो जणान्या छ 'ते. मथाळा नीचे प्रकट थनारा मारा लेखमां विस्तृतरी- टला माटे,मारा विचार प्रमाणे, अत्यारे तो आपणे ते चर्चवा इच्छु छु. संस्कृत साहित्यना सामान्य घौद्ध सूत्रोना अर्वाचीनमा अर्वाचीन रचना-समय घेतालीय [वृत्तना ] श्लोको, के जेमांना केटलाक तरीके ई. स. पूर्व ३७७ मा वर्णने, निर्णीत फरी, ललितविस्तरामा पण मळी आवे छे, तेनी साये संतोष मानवो जोईए,-के जे समये द्वितीय संगि- मुकाबलो करी जोता, सूत्रकृतांगनो वैतालीय वृत्त ति मळी हती.' त्यार बाद पण ए पाली सूत्रोमां तथी वधारे प्राचीन रूपनो जणाय छे. चळी ए उमेरा तथा फेरफारो थया होय ए असंभावित बाबत पण अहीं लक्ष्यमालवा लायक छे के प्राची- नथी. परंतु आपणी प्रस्तुत दलील धम्मपदना कोई न पालीसाहित्यमा आर्यावृत्तमां गुंथेलां पयो मळी एकाद फकराके भागने आधारे उभी थपली न होई, भावतां नी धम्मपदमा तो ते सर्वथा नी ज. तेमा तथा अन्य पालीग्रंथोमा मली आवता वि- तेम अन्य बौद्ध ग्रंथोमां पण तेवां पद्यो मारा जोधा- विध छंदो उपरथी तारवी कढाता छंदःशास्त्रना मां आन्या नथी. परंतु, आचारांग अने सूचकृतांग नियमोना पाया उपर स्थापित करवामां आवे. सूत्रोमां तो एक एक संपूर्ण अध्ययन आर्यावृत्तमां ली छे. तेथी, ए ग्रंथोमां दाखल थएला उमेरा या लखेळ मळी आवे छे. आ आर्यावृत्त,, सामान्य फेरफारोथी, अमारा ए निर्णयने-के समस्त जैन [रोते ओळखाता] आर्या वृत्तथी स्पष्ट रीतेप्राचीन सिद्धान्त लाहिस्य ई. स. पूर्वे चौथी शताब्दि वाद तथा तेनो जनक स्वरूप देखाय छे. सामान्य आ- रचाएलु छे,-तेने कोई पण प्रकारनी हानि पहोंची यावृत्त ते, सिद्धान्तना वधारे अर्वाचीन भागोमां, शफती नथी. तथा प्राकृत अने संस्कृत भाषाना ब्राह्मण आपणे उपर जोई गया के जैनसिद्धान्तनो सौथी ग्रंथोमां अने ललितविस्तरादि जेवा उत्तरना बौद्ध प्राचीन विभाग ललितविस्तारानी गाथाओथी ग्रंथोमां पण नजरे पडे के प्राचीन जैनग्रंथोमां अधिक जूनो छे. आ ग्रंथ ( ललितविस्तर) ना प्रयोजाएलो त्रिष्टुभ् छंद पण पाली ग्रंथोमां मळी विषयमा एवं कहेवाय छे के तेनो ई. स. ६५ मां आवता ते छंद करतां अर्वाचीन रूपनो अने ललि- चीनी भाषामा अनुवाद थयो हतो. आ उपरथी तविस्तरामांना करतां प्राचीनरूपनो छे. अंते, ल- घर्तमान जैन साहित्यनी उत्पत्तिनो समय ई. स. लितविस्तरादि ग्रंथोमा जोवामां आवता आलिवा- यना वीजा अनेक प्रकारना कृत्रिम वृत्ती-जेमांनो 9 Sacred Books of the East., Vol. X, एक पण वृत्त जैनसिद्धान्तमां जडी आवतो नथी- p. XXXII. .

जैन साहित्य संशोधक [भाग १ .NANA.. RA ....Ar" गणाय. नी शरमात पहेलां मानवो ओईए. वळी दक्षिण हुना नामथी आगळ नहीं चलावतां, तेमना समका- अने उत्तरना पद्यात्मक बौद्ध ग्रंथोनी छन्द अने भा- ‘लीन स्थविर संभूति- विजयना नामथी आगळ पाशली विषयक विशिष्टताओनामात्रीनवन पद्यात्म. लंबावे छे. ए उपरधी एम फलित थाय के के फ जैन सिद्धान्तोमा मळी आवता अल्प या आधि- पाटलिपुत्रना संघे एकत्र करेला अंगी मात्र वतां कांश साम्यद्वारा, आपणे जो, आवे सीमाओं व घरोनालिशान्तो मनाया हशे, पण आरसी जैन यावल प्रस्तुत विवादास्पद समयना कालविषयक लमाजना नहीं. आत्री वस्तुस्थिति होवाधी, आप अंतरनो विचार करीए छोए तो जैन साहित्यनी णे सिद्धांत रचनाना कालने जो युगप्रधान श्रीन्य. शरमातनो समय, उत्तरना यौद्ध साहित्यना लमय लमतना समयमा एटले ई. ल. पूर्व त्रीजी शता- करतां पाली साहित्यना समयनी अधिक समीप द्विना प्रथम भागमा स्थिर करीए तो ते खोटुं नहीं करे छे. वळी या प्रकारना अनुमानने वताम्बर संप्रदा- आपणी उपरोक्त तथालनुं परिणाम जो प्रामाणि- यनी एक परंपरागत ज्याद्वारा समर्थन पण मळे फताने पात्र यनतुं शेय, अने ते बनज जोईए है. परंपरा एवी के जे बस्ते भद्रबाहु युगप्रधान कारण के तेना वाधक प्रमाणोनो अभाव छ-तो हता ते बनते वार वर्षनी एक दार्थ दुष्काळ पड्या वर्तमान जैन साहित्यनी उत्पत्तिनो समम ई. स. हतो. ते दुष्काळना अंते पाटलीपुत्रमा तंत्र भेगो पर्ने लगभग ३०० वर्ष पहेला अथवा म धर्मनी या हतो अन तेणे सघळां अंगो एकत्र कर्या हता. उत्पत्ति पडी लगभग ये शनाद्वी पहेलां मूकी आ भगवाहुना अवसाननी तारीख तान्परोना शकाय नहीं परंतु या उपरथी एम तो. खास कोई कयन मनाणे वीर पडी १७० वर्षे डे, अने दिगन्य- मानी लेवानी जहर नयीज के जैनो पासे पोताना रोना कयन प्रमाणे ते १६२ व ३. आ उपरथी अंतिम तीर्थंकर अने सिद्धान्तरचनाना मा समय तेओ चंद्रगुप्त के जेवनान्धरोना उल्लेखानुसार वी. वयेना अन्तरालमां, एक अनिश्चित अने असंक- नि. पछी १५५ मा वर्षे गादीए याव्यो हतो, तेना लिन धार्मिक तथा पौराणिक परंपरा उपरांत खास समयमा श्या इता. प्रो. मलमूलरे चन्द्रगुप्मनो आधार राखवा योग्य वधारे सुदृढ धर्मसाहित्य लमय ई स. पूर्व ३१५-२६४ जणावले छे तथा बेलः हतुं ज नहीं. कारग के एम जो मानवामां आवे तो सार्ड (westergiard) भने केन (Kera) वधारे पहजैन परंपरानी विश्वसनीयताना विषयमा जे संभावित तत त समय ई.स. पूर्वे :२० जगावे हैं. विरोधदर्शक प्रमाणो मी. साथै रड करेलां हे आ वन्ने व जे अल्प नफावत के महत्वनो नथी. वास्तविकमां पाया विनानां है एम कही शकाय लगभग आ हिलाव जैन सिद्धान्तनों रचना-लमय नहीं. तथापि एक यात्रतं अहीं ध्यानमा लेवा ६. स. पूर्वे चायी शदीना अंतमां अगर तो त्रीजी लायक छः बने ते एछ के भवेताम्बरा अने दिन शहीनी शरमातमां आवे छे. साये लाये ए.पण स्रोए बन्नेनुं एम कहेवं छे के अंगोतिबायपहेलांना लश्यना राखवायूँ के के उपरोक संप्रदाय-परंपरा- नो भावार्य ए ई के पाटलिपुत्रना संब, भदवा- कालमां तेनायी पण वधारे प्राचीन एव चांद पुर्वो हुनी लाहाय्य सिवाय ज अगीनार अंगो एकठा हता. अने ते पूर्वानं झान क्रमयी नष्टं यतुं शतुं कर्या हता. नद्रवाईने दिगन्यरो अने. ध्वताम्बरो अंत सर्वथा नष्ट थई गयु हतु. कन्ने सखी रीत पोताना मात्रार्य माने तेम तांबताम्बरो पोजाना स्थविरोनी बादीने भद्रबा- भाप्रमाण: चौद पूर्वो ए दृष्टिबाद नामना यारमा चौद पूर्वाना विषयमा श्वेताम्बरानी मान्यता १ पशि २.५.. अंगमां समाएला हतां अने ते महावीर निर्माण २. Gesshitienis rar tes Buddhisme पड़ी-१००० वर्ष व्यतीत यया पहला नए यया हतां. in Indie, i,R.266 acte. सो के आ कयन प्रमाणे चौद पूर्वी तो सर्वथा नष्ट अंक २] AAAAAAAAAAAAA AMAPANIANAA. ...AAAA. .... MARINAAGMAANAM डॉ. हर्मन जेकोबीनी जैन सूत्रोनी प्रस्तावना. ૨, थई गया,छे, तो पण दृष्टिवाद अने तेमां अंतर्गत रीए छोए त्यारे निःसंदेहरीते प्रतीत थाय छ के, थएलां चीद पूर्वाना विषयोनी विस्तृत सूचि अद्या. जे समये पाटलीपुत्रना संघे अंगसाहित्य एकत्र वधि समवायांग नामना चोथा अंगमा तथा नन्दी- कर्यु हतुं, तेज समयथी पूर्वोतुं शान व्याच्छिन्न थतुं सूत्रमा आपली जोवामां आवे छे.' आ दृष्टिवाद- चाल्युं हतुं, एवी जे हकिकत कहेवाय छ, ते तद्दन मायावेलां पूर्वी ते:खास मूळ पूर्वोज हतां के, जेम वास्तविक छे. उदाहरण तरीके भद्रबाहु पछी चौ- ९ मार्नु, छु, तेना साररूप हता. तेनो आपणे नि• माथी दाज पूर्वोनुं शान अवशिष्ट रह्यं हतु, ए→ श्चय करी शकता. नथी. गमे तेम हो. परंतु तेमां ने फेथन छे ते आपी शकाय छे. समाएला विपयोना संबंधमा एक घणी विस्तृत आ उपरथी खात्री थशे के चौद पूर्वविषयक प्रच- परंपरा तो अवश्य जोवामां आवे छे. लित परंपरानो अमे जे एवो खुलासो करेलो छे के खरेखर आपणे, कोई पण नष्ट थई गएला एवा अ- पूर्वोते सौंथी प्राचीन सिद्धान्तग्रंथो हता, अने तेना ति प्राचीन ग्रंथ या ग्रंथसमूहना विषयमा मळी पछी तेनं स्थान एक नवा सिद्धान्ते लीधुं हतुं, ते आवती परंपराने साची मानी लेवामां धणीज युक्तिसंगत छे. परंतु आटलो खुलासो आग्या वाद सावधानी रखवानी जरूर छे. कारण यांवा आ प्रश्न उभो थाय छ के भावी रोते प्राचीनसि- प्रकारती प्राचीन परंपरा, वणीक वसते केटलाक द्धान्तनो त्याग करवामां तथा नया सिद्धान्तनुं नि. ग्रंथकारोद्वारा पोताना सिद्धान्तोनी प्रामाणिकताना रूपण करवामां शुं प्रयोजन उपस्थित थयुं हशे? पूरावा रूपे कल्पी काढ्यामां आधी होय छे. परंतु आविषयमा मात्र कल्पना सिवाय अन्य कोई गति प्रस्तुत वावतमा, पूर्वाना विषयमा मळी आवती नथी. अने तदनुसार मारो स्वतंत्र अभिप्राय आ आटली बधी सामान्य अने प्राचीन परंपरानी स- प्रमाणे छ:-आपणे जाणीए छीए के दृष्टिवाद ना-. त्यताना विषयमा शंका करवाने आपणने कोई मना बारमा अंगमां चौद पूर्वी आवेलां हतां तथा ने कारण जणातुं नथी. कारण के अंगोनी प्रामाणिक- पूर्वोमा मुख्यत्वे करीने दृष्टिओनें एटले जैन अने. ता ते काई पूर्वाने लईने मानवामां आवती नथी. जैनेतर दर्शनोना तात्त्विक विचारो-आभिप्रायोजें अंगो तो जगत्ना निर्माणना समकालीन ( एटले वर्णन करेलु हत, आ उपरथी आपणे एम कल्पी अनादि ज) मनाय छे. तेथी जो पूर्वी संबंधी आ शकीए छोए के तेमां महावीर अने तेमना प्रतिस्पर्धी परंपराने मात्र एक कूटलेख रूपेज मानीए तो तेनो धर्मसंस्थापकोनी वच्चे थएला वादोनुं वर्णन आवे- काई पण अर्थ थई शके नहीं. परंतु तेने जो सत्य- लं हशे. मारा आ अनुमानना समर्थनमा प्रत्येक रूपे मानी लईए तो, जैनसाहित्यका विकासविषः पूर्वना नामना अंते जे 'प्रवाद' ए शब्द सूकवामा यक आपणा विचारो साथे ते बरावर बंधयेसती आव्यो छे ते आपी शकाय छे. आ उपरांत ए पण आधी जाय छे. 'पूर्व ' ए नामज ए. वातनी पूरेपूरी एक बात ध्यानमा राखवानी छ, के महावीर कोई साक्षी आपे छे के तेनुं स्थान पाछळथी बीजा एक एक नवा धर्मना संस्थापक न हता, परंतु, जेम में नवा सिद्धान्ते ली, हतुं, अर्थात् पर्वनो अर्थ पहेलानुं सिद्ध करेलं छे, तेओ एक प्राचीन धर्मना सुधारक एवो थाय छे. अने आ दृष्टिए ज्यारे आपणे विचा. मात्रज हता. तेथी पण ए घणुंज संभवित छे के १ See Weher, Indische Studien, XVI महावीरने पोताना प्रतिप्रक्षिओना अभिप्रायोजें मजबुतरीते खंडन करवं पडयुं हशे; अने जाते २. पूर्व ' शब्दनों अर्थ जैनाचार्योए नीचे मुजव सम- स्वीकारेला अगर सुधारेला एवा पोताना सिद्धा- जावेलो छ-तथिकरे पोतेज प्रथम पोताना गणधर नामे न्तोनु घणुंज समर्थन करवं पङ्ग्यं हशे आम कहे- प्रसिद्ध शिष्योने पूर्वान ज्ञान आप्यु इतुं. त्यार पछी गणघ. रेए भंगोनी रचना करी. आ कथन, पहेलाज तीर्थकरे अंगो वानुं कारण ए छे के प्रत्येक धर्मसंस्थापकने यथा- प्ररुपेला छे एवा आग्रह साथै जेटले अंशे ऐक्य धरावतुं थमा पोताना नवा सिद्धान्तोनुं प्रतिपादन करवा नथी, तेटलं अंशे ते खरेवर मृत्य गर्भित लेलावा योग्य है. पूरतो ज प्रयत्न करवानी आवश्यकता रहे छे. तेने p. 341.

९६ जैन साहित्य संशोधक [ भाग १ एक सुधारकना जेटलो प्रवादी बनी जवाना जोख. असंभवित लागे छे. बाजी ए पण बाबत लक्ष्यमा मने उपाडवानी अवश्यकता रहेती नथी. हवे वखत राखवा योग्य छ के जैन धर्ममांचे संप्रदायो थया जतां ज्यारे महावीरना ते प्रतिस्पर्धिओ आ जगत- पछी तेना तत्त्वज्ञानमां वीलकुल फेरफार थयो न माथी अदृश्य थई गया हता, तथा तेओ द्वारा स्था. होतो अर्थात् ते तद्दन स्थिरज रत्युं हतुं. आर्नु पित थएला संप्रदायो पण नामशेप थई गया हता, प्रमाण मात्र एज छ के आ बन्ने संप्रदायोना तत्त्व- त्यारे महावीरना ए प्रवादो, के जे तेमना गणध- ज्ञानमां कोई विशेष उल्लेखयोग्य भेद नजरे पडतो रोएं स्मरणमा राख्या हता तथा तेओ द्वारा पाछ- नथी. आचारशास्ना विपयमां अलबत आ बन्ने ळनी शिष्यपरंपराने पण जे सोपवामां आव्या संप्रदायोमा केटलाक भिन्न भिन्न विचारो जोवामां हता, ते पाछळना लोकोमा महत्त्ववाळा न मनाया आवे छे, परंतु, अत्यारे पण ज्यारे श्वेताम्बरोमां होय ए स्वाभाविक छे. ए कोण कही शके एम छ लांवा समयथी, तेमना वर्तमान सिद्धान्तसमूहमा के जे एक जमानामां आ प्रकारना दार्शनिकोना विहित थपला घणाक आचारोनुं पालन बंध थंएलं तत्त्वज्ञान विषयक विविध प्रवादो अने कलहो होवा छतापण तेओ तेनातरफउपेक्षा धरावतानथी व्यावहारिक उपयोगितावाळा जणाया होय तेज प्र. त्यारे तेवाज कारणने लईने ते वखते अस्तित्व वादो अने कलहो, सर्वथा परिवर्तित थएला एवा भोगवता एका तेमना पूर्वात्मक सिद्धान्तसमूह- अन्य जमानामां पण तेवाज उपयोगी सिद्धान्तो ना विषयमा श्वेतास्वरोए तेटला बधा आवेशमा तरीके भनाई शके ? आ ज विचारानुसार, नवा आवी जई पोताना पूर्व साहित्यनो सर्वथा त्याग. जमानाना जैनसमाजने पोतानी सामायिक परिः सुधां करी नांख्यो हतो एम मानवू युक्तिसंगत. स्थितिने अनुकूल आवे तेवा एक नवा सिद्धान्तनी जणातुं नथी. आ उपरांत नवा सिद्धान्तनो जे सम- जरूर जणाई हशे अने तेने परिणामे, माकं मान य आपणे उपर निर्णीत को छे, ते समय पछी पण छे के, नवा सिद्धान्तनी रचना अने जूना सिद्धा- लांवा वखन सुधी पूर्वो विद्यमान हतां एम मानवा-. न्तनी (पूर्वोना ज्ञाननी / उपेक्षा थवा पामी हशे. मां आवे छ परंतु, आखरे ज्यारे पूर्वाना प्रवादमय प्रो. वेवर' दृष्टिवाद अंगने नष्ट थवामां एबुं कारण साहित्य करतां नवा सिद्धान्तबारा जैन तत्त्वो जणावे छ के श्वेताम्बर समाज ज्यारे एक समये वधारे स्पष्टीते प्रकाशित थता देखावा लाग्यां अने एवी अवस्थाए आवी पहोंच्यो हतो के जे वखते पधारे व्यवस्थासर लोको समक्ष सूकावा लाग्यां तेने पोताना (प्रचलित ) विचारो अने ते ग्रन्थमा त्यारे पूर्वो स्वभाविक रीते ज, नहीं के तेमनी (राष्टिवादमा ) आलेखित विचारोनी बच्चे अत्यंत वुद्धिपूर्वक कराएली उपेक्षाने लीधे, अदृष्ट थयां अनुपेक्षणीय अंतर स्पष्ट देखावा लाग्यु, त्यारे ए हता. चौद पूर्वोवाळु दृष्टिवाद अंग उपेक्षाने पात्र थयुं हतुं. परंतु, प्रो. वेबरनी आ कल्पनानी विरुद्ध, श्वेता- आपणी प्रस्तुत चर्चा जे आ स्थळे समाप्त थाय म्बरोनी माफक दिगम्बरो पण, पोताना पूर्वी अने छे ते उपरथा, हुं धालं छु के, आटली बायतो ते उपरांत अंगो सुद्धांने व्युच्छिन्न थएलांजणावंता प्रकटरीते 'लद्ध थएली के जैनधर्मनी उत्क्रांति होवाथी, हुं तेमना मतने मळतो थई शकतो नथी. (प्रगति) कोई पण समये कोईपण अत्यंत असो.. तेमज निर्वाणनी तुरतज पछीनी वे शताब्दिमां जैन धारण एवा बनावोथी, जबरदस्त अटकाव पामेली समाज एटली वधी झडपथी प्रगति करी लोधी नथी. वीज़ ए के आपणे मा उत्क्रांतिनी शरुआतनी होय के जेधी ते समाजना बन्ने मुख्य संप्रदायाने अवस्था उपरांत तेनी सधळी विविध अवस्थाओनो पोताना पूर्व सिद्धान्तनो त्याग करवा जेटली आव- पत्तो मेळवा शकीए छीए, अनेत्री~ ए के जैनधर्म ए श्यकता जणाई होय, एम पण मानी वेसबुं तद्दन निर्विवादरीत स्वतंत्र मनाता एवा कोई पण धर्मनी माफक स्वतंत्ररीते उत्पन्न थएलो छे-परंतु कोई १. Indische Studien, IVI. p. 248. अन्य धर्म अन खास करीने वौद्धधर्मनी शाखा रूपे अक २] साहित्य-समालोच ............................. www.v..-~- -vvvvv.uu.. --------~~~~uvvv बिलकुल प्रवतेलो नथी. आ विपयनी विशेप विग क लेखी साधनोरूपे स्वीकारवाना विषय- तोना संशोधननु कार्य भावि शोधखोळ उपर निर्भ- मां, अत्यार सुधी जे केटलाक विद्वानोना मनमा र छे तेम छतां मने आशा छ के, हुं जैनधर्मनी स्व- तंत्रताना संबंधां तथा सेना पवित्रग्रथं (आगमो) अमुक संदेहो स्थान पामी रह्या छे, तेने दूर करवा ने, ते धर्मना प्राचीन इतिहासने कर करवामां सफळ थयो छु. साहित्य---समालोचन, अने भा- भविष्यदत्त कथा जैन समाजमां जाणीती छे अने धनपालकृत भविष्यदत्त कथा. संस्कृत प्राकृतमां बनेली ए नामनी बीजी पण घणी [डॉ. हर्मन जेकोवी द्वारा संपादित अने जर्म- कथाओ उपलब्ध थाय छे कथानी वस्तुमां शान पंच- नीमा प्रकाशित.] मीन माहात्म्य वर्णवामां आव्यु छे. धनपालनी आ प्रख्यात जर्मन विद्वान् डॉ. हर्मन जेकोवानुं नाम कथानुं संपादन करवामाटे डॉ. जेकोबीए जे परि- एक जैन स्कॉलर तरीके जगप्रसिद्ध श्रम उठाव्यो छे ते तेमा रहेली वस्तुनी दृष्टिए नार्ह जैनधर्म अने जैन साहित्यनो घणो ऊंडो अभ्यास अपभ्रंश भाषामां थएली छे. अपभ्रंशभापा ए भार- परंतु तेनी भापानी दृष्टिप छे. आ कथानी रचना कयों छे. जैन धर्मना केटलाए संस्कृत-प्राकृत तवर्षनी हिन्दी गुजराती आदि प्रचलित मुख्य भा- ग्रंथोनुं तेमणे संशोधन अने संपादन कर्यु छे. तेमज केटलाएनुं जर्मन अने इंग्रेजी भाषामां भापां- पाओनी अनंतर जननी छे. मूळ संस्कृतमांधी प्रा. तर कर्यु छे. जैन धर्म, जैन इतिहास अने जैन सा- अपभ्रंशमाथी आजनी देशभापाओ अवतरी; एकुंभा- कृत निकळी, प्राकृतमाथी अपभ्रंश जन्मी अने अने हित्य उपर तेमणे अनेक लेखो लख्या छे, पणो आप्यां छे. आजे अमे, आ नीचे, डॉ. साहेये हेमचंद्रसूरिए पोताना सिद्धहेम व्याकरणना आठ- षाशास्त्र, कथन छे. अपभ्रंश भाषानुं व्याकरण तो संपादन करेला एक जैन पुस्तक संक्षिप्त परिचय आपवा इच्छीए छीए जे हमणांज प्रकट थयु छे. मा अध्यायना चोथा पादमा विस्तृत रीते आपलं ए पुस्तक नाम भविष्यदत्त कथा ('भावस्स- खबर न होती मळी के, केटलाक छूटा छवाया दो- छे परंतु भाषाशास्त्रिओने आज सुधीमा ए वातनी यत्त कहा ' ) छे अने ते धनपाल नामे एक वणिक् हाओ के तेवाज वीजा पद्यो सिवाय ए भापामां र- विद्वाननु बनावेलुं छे. धनपाल नामे प्रसिद्ध जैन चाएला अखंड ग्रंथो पण जैनोना जूना पुस्तक ब्राह्मण पंडित, जे विक्रमनी ११ मीं शताव्दीमां, भंडारोमां पड्या पड्या उड्या करे छे ! सन् १९१४ संस्कृतसाहित्यप्रसिद्ध नृपति भोजना समयमां नी सालमां ज्यारे डॉ. जेकोबी हिंदुस्थाननी मुला- थई गयो छे अने जेणे तिलकमंजरी नामे एक श्रेष्ठ खाते आव्या त्यारे तेमणे ए संबंधमां केटलीक जैन आख्यायिका बनावी छे, तेनाथी आ धनपाल पूछ-परछ करी, जेना परिणामे अमदावाद निवा- भिन्न समजवो जोईए. ते धनपाल जाते ब्राह्मण हतो सो साहित्यरसिक श्रावक भाई श्रीकेशवलाल प्रेम- अने था धनपाल धक्कडवंशीय वैश्य जातिनो छे. चंद मोदीना प्रयत्नथी प्रस्तुत कथानी एक प्रति एना पितानुं नाम महेश्वर अने माता नाम धनश्री हतुं. ए उपरांत, ए क्यांनी वतनी हतो अने क्यारे तेमना जोवामां आवी. डॉ. जेकोबी ए ग्रंथ जोई बहु थई गयो, ते जणायुं नथी. एनी कृतिनी भापा उप- खुशी थया अने तुरत ते आखा पुस्तकनो फोटो- स्थी जे अनुमान थाय छे ते प्रमाणे ए विक्रमनी प्राफ पडावी लई पोतानी साथे जर्मनी लई गया. १२ मी अगर १३ मी शताब्दी थयो होवो जोईए. पाछळथी तेमणे ए ग्रंथनी वीजी प्रतो मेळववामाटे जैन साहित्य संशोधक [भग १ .. .00 ..1 -~ ." पण प्रयत्न कयों अने तेना लीधे पाटणना भंडारमां- जे जर्मन भापामां लखवामां आन्यां छे, ते इंग्रेजीमां थी तेनी एक जुनी प्रति कढावी प्रवर्तक श्रीकांति- लखायां होन तो वधारे ठीक थात. कारण के भार- विजयजीए डॉ. जेकोबी तरफ मोकली आपी. परंतु तना अभ्यासियोमां जर्मन भाषा जाणनार विरल ज कमनसीवे तेज बरसासां जर्मनीए इंग्लांड साये होय छे. तेथी बधा जिज्ञासु अभ्यासियो एनो यथेष्ट महायुद्ध जाहेर कयों, तेथी ते प्रति डॉ. जेकोबीने लाभ नाह मेळची शके. बीजं, मुळ ग्रन्थ जे रोम- न मळतां थोडा माहिना पछी पाछी पाटण आवी. न लिपिमा छापवामां आव्यो छ ते पण भारतीयो. डॉ साहेबने युद्धना कारणे पीजी प्रत मळवानी नी हटिए निरुपयोगी जेवो ज छ. भारत वर्पना आशा रही नहि अने युद्धनी समाप्ति सुधी वाट मोटा मोटा स्कॉलरोसुधांने रोमनलिपिमाछापेलासं- जोईने तेमनाथी देशी शकाय नहि, तेथीतेमणे एक स्कृत-प्राकृत ग्रंथो वांचता घणो परिश्रम पहे छे मात्र ते फोटोग्राफना आधारे ज महान् परिश्रम ता पछी लाधारण आभ्यासिमोना माटे तो कहे, उठावी आ ग्रंथनी प्रस्तुत आवृत्ति, लढाई जणुं परंतु ए विषयमां तो अमने संतोपराखवार्नु दरम्यान ज ( सन् १९१८ मां ) प्रकट करी छ भने कारण छ के वडोदरा राज्य तरफ़थी प्रकट थती तेम करी तेमणे सापाशालिओ माटे एक नवीन वि- गाइकवाड ओरिएन्टल सीरीजमां पण ए ग्रंथ छ- पयना उपयोगी अध्ययननुं महाद्वार खुल्लु कयु छे. पाय छ जेनी लिपी देवनागरी (यालयोध) जछे, ए समन पुस्तकमां डेमी ४ पेजी जैवी पहोळी जो कोई पण विद्वानू आ पुस्तकनी बहुतथ्यपूर्ण साईझना एकंदर ३२० लगभग पानां छे, जेमांप्रा. प्रस्तावनानो इंनजीमां के देश भापामा जो अनुवाद रंमना १०० पानां प्रस्तावना अने विचरणमां (जे करी-करावी आपे तो भाषाशास्त्रनी हटिए यह जर्मन भापासां लखाएलां के) रोकाएलां छे. विव- मोटो लाभ थवानो संभव छे. रणमा प्रथम ग्रंथ, कर्ता, ग्रन्थगत वस्तु आदिनो परिचय आपवामां आन्यो छे अने पछी, लंबाणथी अपभ्रंश भाषा, तेनो इतिहास, तेनो विकास, तेनुं २ व्याकरण, तेनुं छन्दशास्त्र, अन्यान्य भाषाओ साथे सूरीश्वर अने सम्राट. रहेलो तेनो संबंध, साहित्यमा मळेलं तेने स्थान, इत्यादि अनेक प्रकारना ज्ञातव्य विषयो, घणी ऊंडी [कर्ता मुनिराज विद्याविजय. प्रकाशक, यशो. शोधखोळ साथे, चर्चवामां आव्या छे. विजय जैन ग्रंथमाला, भावनगर. पृष्टसंख्या, २१- विवरण पछी मूळ ग्रंथ आप्यो छे जेणे १२० पृष्ठ ४१७. पाकुं हुं. किं. २०२-८-०] रोक्यो छे ग्रंथ रोमन लिपिसां मुद्रित करवामां जैन समाज तरफथी, आधुनिक गुजराती भाषा- आन्यो छे. अन्यान्ते, ग्रन्थमां आवेला वधा शब्दोनो मां, बे चार मुनिओ अगर श्रावकोना हाथे लखा. कोप आप्यों के अने ते साये दरेक शब्दनो संस्कृत एलां नानां मोटा ५-१० पुस्तको प्रकट थयां छे, ते प्रतिशब्द पण आप्यो छे. सौमां मुनिराज विद्याविजयानुं लखेलूं 'सूरीश्वर पोताना देशमां बाली रहेला महात् युद्धना भ- अने सम्राट् ' नामर्नु पुस्तक प्रथम स्थान भोगवे यंकर अशांतिकाळमां पण जगत्ने एक तद्दन नवीन छ, एम कहेवामां जराए अतिशयोक्ति जणाती नथी. विषय उपयोगी ज्ञान आपवा माटे, आटली वृद्धा- मुनिजीनी आ कृतिए केवळ जैन साहित्यमां ज वस्थामा उठावेला अथान परिश्रम निमित्ते, विद्ध- नहिं परंतु समन गुजराती साहित्यमां-खास करी- समाज तरफथी डॉ. जोवी खरेखर बहु बहु ध. ने ऐतिहासिक पुस्तकोमां-एक उपयोगी उमेरो न्यवादने पात्र है. कार्यों छे, एम कहेतां आमने आनंद थाय छे. आ अमुल्य पुस्तकना विषयमा अमने वे वात जगद्गुरु हीरविजयसरिए सुगल सम्राट अकव- यदुखटके छः-एक तो पनी प्रस्तावना नेमज्ञ विवरण रना बादशाही दरवारमा जई, धर्मजिज्ञासु कहे अंक २] साहित्य समालोचन N....... अथवा राज्यनीतिकुशल कहो-गमे ते कहो परंतु ते सुधां करी नथी. युरोपना विद्वानो तो विदेशी असाधारण व्यक्तित्ववाळा बादशाहने जे रीते ए होवाथी कदाच ए बाबातमा ओछा उपालंभने पात्र त्यागी जैनाचार्य पोताना धर्मनो प्रभावोत्पादक होई शके परंतु भारतना पुरातत्त्वज्ञोनी ए विषयक बोध आप्यो हतो, अनेते चोधने सांभळी जे रीते उपेक्षा तो खरेखर अक्षम्य जगणी शकाय. युरोप- ते द्याल बादशाह जैनधर्म प्रति पोतानी सविशेष ना केटलाक विद्वानोने अकवरनी विविध भने पर- प्रीति प्रकट करी हती, तनो संक्षिप्त पण सारभूत स्पर विरुद्ध एवी जीवनवार्ताओमा क्रिश्चियन ध. इंतिहास अमे अमारा कृपारसकोप नामना पुस्त- भनी असरना स्वप्न आवां लाग्यां अने तेमनां स्व- कनी लांबी प्रस्तावनामां (जे हिन्दी भापामां लखा• प्रस्मरणोने अमारा देशबंधु विद्वानो यथार्थरूपे पण एली छ) आज श्री ४-५ वर्ष अगाउ आप्यो हतो. मानवा अने कहचा लाग्या; परंतु कोईना मनमा ए ते प्रस्तावना लखती वखते ज अमारा मनमां एवो विचार नथी आव्यो के जनोना सैकडी लेखोमां संकल्प थयो हतो के प्रसंग मळे, हीरविजयमरि- अकबरनी जे आटली वधी प्रशंसा करवामां आवी ना जीवन संबन्धमां मळी आवतां सघळां साथ छे तेनुं शं कारण छे, एतरफ पण जरा हष्टि तो नौने एकत्र करी, ते उपरथी एक सविस्तर जीवन नांखी जोईए. अमारा लोकोनी आवीज अनुकरण. चरित्र ए महान् जैनयतिनुं अवश्य तैयार कर प्रियता प्रमादशीलताने जोईने परदेशी विद्वानो जोईग, प्रस्तुत पुस्तक जोईने अमने आनंद थाय छ जे अमने मौलिकताशून्य अने गंभीरविचारविही- के अमारोप शुभ संकरप, अमारा एक योग्य मुनि- ननी कुत्सित उपाधिोधी संबोध्या करे. तेमां बंधना साथै उत्तमरीते पूर्ण थयो छे. केटलेक अंशे सत्य अवश्य छ, एम अनिच्छाए हीरविजयसुगिनुं आसन जग धर्मगुरुयोमा मानवानी फरज पडे छे. एक उच्च स्थान भोगवे छे. अकार जेवा महाबु अकयरना प्रधान मंत्री शेख अबल-फजले द्विवान्. व्यवहारचतुर, गूढहृदयी, सूक्ष्मदर्शी आईन-ए-अकबरीमां अकवरना साम्राज्यमांनी अने राजनीतिकुशल सम्राट्ना अंतःकरणमा, तेना प्रधान प्रधान व्यक्तिओनी जे लांबी टीप आपी छे, देश, जाति, धर्म, स्वभाव, यने ध्येयथी तद्दन तेमां, प्रथम अणिमां गणावेला सर्व श्रेष्ठ मनुष्योमा विरुद्ध संस्कारवाळा धर्मगुरुनो विरातिप्रबोधक हीरविजय सूरिनु पण नाम दर्ज छ; तेमज पांचमी धर्मयोध अनायासे उच्चस्थान मेळवे ए एक जग- श्रेणिना मनुष्योनी नामावलीमा ए सूरिना प्रधान त्ना इतिहासमां आश्चर्यजनक नोध गणाची शिष्य विजयसेनहरि अने भानुचंद्र उपाध्यायनां जोईय. नामो-पण आपेलां छे. परंतु आजथी दश वर्ष ए प्रतापी सम्राट्ना,तेनी आसपासनीसमग्र परि- पहेलां कोई पण देशी के विदेशी विद्वाने अबुल स्थितिथी बने तेना खास आनुवंशिक जीवन-संस्का. फजले नोंधेला सर्व श्रेष्ठ मनुष्योमांना एक पवा-ए रोयी विरुद्ध जता अनेक विचारो अने आचारो हीरविजयनरि, तेमज पांचमां धर्गमां आपेला विज- भिन्न भिन्न इतिहासकारोए अनेक स्थळे नोध्या छे, यसेनसूरि अने भानुचंद्र नामना पुरुषो कोण छे परंतु ते आचार-विचारोनें यथार्थ कारण कोई पण अने शा कारणथी तेमना नामो आईन-ए-अक- लेखके स्पष्टरीत आपलं न होबाथी आधुनिक इति- बरी जेवा महात् ग्रंथमां नोंधवामां आव्यां छे तेनी हासशोए-खास करीने युरोपीय इतिहासझोए-ए तपास करवा माटे परिश्रम कोन हतो.'हीरविजय विषयमा अनेक तर्क-वितकों चलाच्या छे अने हजी सूरि' ए नाम फारसीमां कोई जुदा प्रकारली जोड. ए चलाव्ये जाय छे. पण कहतां खेद थाय छ के, णीथी लखवामां आव्यु हशे तेथी आईन-ए-अक- जैन साहित्यमां, ए विपयनो खरो खुलासो आपना. बरीना इंग्रेजी अनुवाद कर्ता मी. व्लॉकमेने ते नाम रा असंख्य पुरावाभो विद्यमान होवा छतां, कोई इंग्रेजीमा 'हरिजीमूर ( Harigi Sur) आवी रीतनी पण घिद्वाने आज सुधीमा ए पुरावाओनी तपास जोडणी करीने आप्युं छे. मी. ब्लॉकमेने आईन-ए.

१०० जन साहित्य संशोधक [भाग १ -- .............www.www.www.v.n. ~~~-~- -.. Awrv -~~~~~~~~~~ अकबरीमा आपली नामोनी उक्त लांबी टोपमांनी प्रेमी विद्वाने, हीरविजयसूरिने केटलेक अशे उचित घणीक व्यक्तिओनी, बीजा बीजा इतिहासो उपरथी स्थान आपी, ए. बावतमा इतिहासवेत्ताओथी थती पण ओळखाण आपवा बावत महेनत लीधी छे; आवती मोटी भलनु काईक संशोधन कर्यु छे. परंतु 'हरिजीसूर' नाम माटे तेणे कोई पण नोध सूरीश्वर अने सम्रामा मुनिराज विद्याविजय- करी नथी. जीए एज विपय अनेक ऐतिहासिक प्रमाणोना आईन-ए-अकवरीमांनुं आ नाम लुप्रसिद्ध आधारे संपूर्णरीते आलेख्यो छे अने सम्राट जैनाचार्य हीरविजयसूरिनु छ, एवं ज्ञान कराववातुं अकबरना इतिहासमां जगद्गुरु हीरविजयसूरि मान अमारा सद्गत स्नेही श्रीयुत चिमनलाल के महत्त्वनुं स्थान धरावे छे ते सारी पेठे समजा. डाह्याभाई दलाल, एम्. ए. ने घटे छे. तेमणे बना- न्युं छे. पुस्तकने प्रामाणिक बनाववामाटे मुनिजीए रसथी निकळता जैनशासन' नामक एक साम, यथेष्ट संभाळ लीची छे. परिशिष्टमां जे केटलाक यिक पत्रना, वीर संवत् २४३९ ना दीवाळीना कारली फरमानो आप्या छे, ते आज सुधीमा जा- खाल अंकमा 'हरिविजयसूरि अथवा अकवरना णमा नहिं आवेला एवा छे अने तेथी पुस्तकनी दरबरमां जैनो' ( HIRA VIJAYASURT महत्तामा उपयोगी उमेरो थयो छे. हीरविजयसूरि, or THE JAIN AS AT COURT OF अकबर अने अबुल फजल विगेरेनां चित्रोथी पुस्त- AKBAR ) एवा मथाळा नीचे, '0' एवी संक्षि- कनी शोभा वार आकर्षक बनी छे. परंतु, हीर प्त सही लाथे, एक प्रामाणिक लेख इंग्रेजीमां विजयसूरीनी जे मूर्ति चित्र आप्यं छे ते तेढुं सुन्दर प्रकट करान्यो हतो.' ते लेखमांज भाई श्रीदलाले अने आल्हादक नथी, तेथी कोई बीजी वधारे सुन्द- सौथी प्रथम पुरातत्वज्ञोने ए अज्ञात वावतनी राकृति मूर्तिन चित्र मेळववामां आव्यु होत तो माहीती आपी हती के आईन-ए-अकबरीमा जे वधारे ठीक लागत ! 'हरिजीसूर' एवं नाम मळी आवे छे ते नाम अंते, आq उपयोगी, प्रामाणिक अने मूल्यवान बीजा कोई नथी पण जैन समाज अने जैन इति. पुस्तक लखवा माटे मुनिराज विद्याविजयजीनुं पुनः हासमां प्रसिद्ध एवा आचार्य हरिविजयसूरिनु ज एकवार अभिनंदन करी अमे अमारं वक्तव्य समा- छे. अने तेनी लाथे तेमणे संक्षेपमा हरीविजयसूरि प्त करीए छीए अने रेक जैन अने जैनेतर विद्वान् अने अकवरना समागमनो सप्रमाण इतिहास ने एक वार आ पुस्तक अवश्य जोई जवानी सास पण आलेखी बताव्यो हतो. भलामण करीए छोए. भाई श्रीदलालनो ए मौलिक आविष्कार वांचीने ज प्रसिद्ध पुरातत्त्वज्ञ मि. विलेन्टए. स्मीथ साहेवे 'अकवरना जैन गुरुयो' (THE JAIN TEACHERS OF AKBAR) ए नामनो तत्त्वार्थ परिशिष्ट मल अने भाषांतर. एक महत्त्वनो इंग्रेजी निबन्ध 'भांडारकर स्मारक निबन्ध संग्रह ' ( R. G. Bhandarkar Comme- रानंद सूरीश्वरजी,-भाषांतर कर्ता मुनी (?) मा- ['मूल कर्ता आगमोद्धारक आचार्य श्रीसागmoration Volume ) मा प्रकाशित कराव्यो नसागरजी. प्रसिद्धकर्ता मास्तर उमेदचंद रायचंद, हतो, अने तेमां अकवरना जीवनमां हीरविजयसूः मु. अमदाबाद. मूल्य ज्ञानाभ्यास.' पृ.१८-१४८,] रिए भजवेलो भाग संक्षिप्त परंतु स्पष्ट रीते वता- चवामां आव्यो हतो. तेवीज रीते पोताना 'अकबर' ग्रंथ के के जैना अध्ययनथी जिज्ञासु मनुष्य संक्षे- समन जैन साहित्यर्मा एक तत्त्वार्थसूत्र ज एवो नामना प्रसिद्ध पुस्तकमां पण ए साचा इतिहासः पमा जैन धर्मनुं संपूर्ण स्वरूप समजी शफे छे. ए १ ए लेख पाछन्थी, वडोदराथी प्रकट थता ' लाईवरी ग्रंथ जैन धर्मना श्वेतांबर अने दिगंबर-बन्ने संप्रदा. मेसेलेनी' नामना त्रैमासिकमां पण प्रकाशित थयो हतो. योने समानभावे पूज्य अने मान्य छे. अलवत्, बन्ने ३ संक] साहित्य समालोचन १०१ ....... ....... -... ..... संप्रदायांना सूत्रपाठमां कटलोक पाउ-भद्र अवश्य आ परिशिष्टात्मक सूत्रोनी संख्या १३० जेटली रहेलो छ, परंतु तेथी तनी पूज्यतामां कोई पण छ भने ए सूत्रोमा घणा भांगे खगोल भने भूगो- प्रकारनी भेद नधी. ए सत्र पर बन्ने संप्रदायांना लना विषयनीज पूर्ति करवामां भावी हैं. जैन समर्थ पूर्वाचार्याप भाग्य टीका आदि अनेक व्या- मान्यता प्रमाणेना खगोल अने भगोलनुं वर्णन केट- ख्यान करेला छ अन तेनो सर्वत्र प्रचार पण छ. लाक सूत्रप्रन्यो सिवाय मुख्य करीने क्षेत्रसमास एज सूचना परिशिष्टरूपे लमालांचित पुस्तकनी अंने संग्रहणी नामना प्रकरण ग्रंथोमा विस्तृतरीते रचना करवामां आवी छ. वास्तविकमां, नस्यार्थ- वर्णवामां आचल ले. ग्रंथों पधारे विस्तृत होवाथी सूचनी रचनामां एत्री कोई ग्यास न्यूनता नधी के संक्षेपमां तनुं झान करावधामा मा परिशिष्टनी जेथी तेनी पूर्ति करवा माटे परिशिष्ट बनावबानी रचना लागरानंदरिए करी छ, एम भाषांतरकार आवश्यकता प्रतीत थाय. अने कदाच तवी आव. जणाचे छे. परिशिष्टकार आचार्य, आ विषयक जैन श्यकता जणाय ती पण ते कार्य पूर्ण अनुरुप तो साहित्यना शब्द-शरीरना समर्थ माता के एमां वीजा उमास्वाती न थई शके. बीजाए तेवी संशय नथी. ए विषयमा तेमना जेटलं सूक्ष्म ज्ञान प्रयत्न करतो ते अमारा लघुमत प्रमाणे तो एक प्र- भाग्यंज बीजा कोई मुनि घराबता हशे. परंतु कार अनधिकारचेष्टा जर्बुज गणाय. पूर्वना महान् तेमनी आ प्रस्तुत कृति अमने तो अनुपयुक्त अने महान् चाप केटलाक शास्त्रांनी प्रति माटे एवा असंबद्ध जैवी लागेछ कारण के एक तो आ परिशि- केटलाक प्रयत्नो कर्या छ ग्यरा परंतु ते वार्तिक के gai आपला सूत्रांनी रचनामां कोई पण क्रम गोठ- भाग्यना नपमा छ, मूत्रना नपमांतो नहिं ज. अस्तु. वामां मान्यो नथी, अने बीजं सूत्रोनी संकलना मूल तत्वार्थशाननी सूत्र-संख्या श्वेताम्बरोना पण लियार्थ भरेली छ. जो आवा प्रकारना परि- पाठ प्रमाणे ३४४ छ अंन दिगम्बरोना पाट प्रमाणे शिष्टनी तेमने खास आवश्यकता ज जगाई हती ३५७ छे. जो के आम संन्यानी दृष्टिए जोता बन्ने तो जातं नवीन सूत्रकार श्रवानी आकांक्षा करतां संप्रदायांना पाठमा मात्र ११ ज सत्रानी फेर जणाय जूना प्रन्योमाथी नेवां सूत्रो टी काही संग्रहकार परंतु वास्तविकमां तेम नयी कारण के श्वेताम्बरी. थवानी इच्छा वधारे प्रशंसनीय गणाई होत. य सूत्रपाठमांना कंटलांए सूत्री दिगम्बरीय सूत्रः तन्वाथ सूत्रकारनी ज कृतिरूपं मनाता जंयुद्धीपस- पाठमां नथी अन तेवीजरीत दिगम्बरीय सूत्रपाठ मास नामना ग्रंथमांधी आ परिशिष्ट पूर्णरीते संग्रही ना केटलांए सूत्री श्वेताम्बरयि मूत्र पाटमा नथी. शकाय तम छे. तमज दिगम्बर संग्रदायना सुप्र- त्रीजा अध्यायमां ज्यां जंबुद्धोपनु भौगोलिक वर्णन सिद्ध ग्रंथरत्न तत्त्वार्थराजवार्तिकमां आ जातनां यावेलु छ त्यां एक साथै श्वेताम्बरांय पार करत, एकथी एक उत्तम अने मत्युपयोगी चार्तिको दिगम्बरीय पाटमा २०-२१ सूत्री सर्वथा बधारे भरेला छे, तेमाथी पण जो आ विपयनां चार्तिको छ. सर्वथा वधार एटला माटे के ते सूत्रोमां आपलं उदृत करवां होय तो धणी सारी रीते करी शकाय घर्णन श्वेताम्यरीय पाटयां बिल्कुल नथी. श्वेताम्ब. तेम छे. प्रस्तुत परिशिष्टमांए पण केटलांक सूत्रों रीय सृन पाटना समर्थ टीकाकार आचार्य हरिभद्रे तादिगम्बरीय सूत्र पाठमांधीज-शब्दी उलट पालय दिगम्बरीय पाठना ए आधिक्य मार्ट टीका पण करीन जमनां तेम-लीघेला अमारा जोशमां पात्रे करी छ भने जगान्यु छ के आ खुत्रो पाछी छ. तेथी तम न करतांना तेज शब्दोमा जोते कोईए बनावी लीया छ अने सूत्रकारना संक्षेप क- सूना राख्या होत तो, आमा जे क्लिप्पार्थता नजरे रणात्मक अभिप्रायनी दृष्टिए तनुं अस्तित्व अयुक्त पडे लेतन पडत. ले. याश्चर्य छे केले जातनां सूत्रोने हरिभद्रसरि- सूत्रकारनी अपेक्षाए, अयुक्त जणाचे तेज सातनां मुनि मानसागरजी- करेलु भावान्तर बहुज नवां सूत्रो रची तत्त्वार्थना परिशिष्टम्पे सागरानंदः साधारण प्रतिनु छ अने केटलेक टेकाणे तो उलटो सृरि प्रकट करावं छ. अर्थ-विपर्यास करावं तेत्रो छ, उदाहरण तरीके AAAAA Awtar.nawr AJAN - सत्र छे.- - १०२ जैन साहित्य संशोधक [ भाग एक दाखलो आपीशं. पांचमां पानामां नीचे प्रमाणे तेथी ए विषयना अभ्यासीने सहेलाईथी अर्थशान थई शके तेम छे. 'उध्द्वताश्चक्रिहरियुगाइजिनयतिदेश- आह प्रसंगी एक जरा कडवी पण हितकर सम्यक्त्वदन्तः। वात सूचक्वानुं मन थई आवे छे के-सागरानंद- आ सूत्रनी रचनामां जे खामीछे तेनो तो अमे अ- जमानामां आवा अनावश्यक अने अनुपयोगी का सूरि जेवा विद्वान अने प्रतिभाशाली मुनिए आजना हिं निर्देश ज करवा इच्छता नथी.भापान्तरना विप- मोमां कालक्षेप करो उचित नथी. समय घणो यमा ज अमारे थोडुक कहेवू छे. आ सूत्रनो शब्दा- बदलाई गयो छ. सर्वसाधारणनी आभिरुचि कोई र्थ अने विशेषार्थ नीचे प्रमाणे करवामां आन्यो छे. जुदा जविपयोना अभ्यास तरफ वधती जाय छे. शब्दार्थ-अनुक्रमे पहेली नारकी आदीथी विद्वानोना अध्ययन-मनन- साहित्य क्षेत्र भिन्नज नोकळेला चक्रवर्ती, बलदेव अने वासुदेव, आरिहंत प्रकार थई र छ. नवीन वातावरणमां उछरती केवली, सर्वविरति, देशविरति अने सम्यक्त्व अने केळवणी पामती प्रजानो आवी जातना लूखा, वाळा थाय छे. नीरस, अनुपयुक्त, जूना विषयो तरफ अभिरुचि वि०-पहेली नारकीची नीकळेलो चक्रवर्ती वधे के श्रद्धा वेसे तेम बिल्कुल नथी. वर्तमान थाय, वीजी नारकीथी नीकळेलो जीव वासुदेव समयमा प्रत्यक्ष प्रमाणथी निश्चित धएला खगोल अथवा बलदेव थाय. बीजी वालुका प्रभाथी नीक- अने भूगोलना सिद्धान्तो आगळ जगत्ना रेक ळेलो जीव तीर्थकर थाय.' इत्यादि. धर्मना ए विषयना जूना विचारो निस्तेज अने आ शब्दार्थ अने विशेपार्थनी वाक्यरचनाथी अर्थहीन सावित थया छ, अने प्रत्येक धर्मना यहु- तो वचकने एवोज अर्थाक्योध थाय के पहेली श्रुत विद्वान् ते विचारोने अधिकांश कल्पना-प्रसूत नरकमांथी निकळेलो प्राणी चक्रवर्तीज थाय, बी. माने छे. जीमाथी निकलेलो वासुदेव अगर वलदेवज थाय. तत्त्वार्थसूत्र में जाते कॉलेजियनों तेमन ग्रेज्युएट- त्रीजीमांधी निकळेलो तीर्थकर ज थाय. इत्यादि । डवलनेज्युएट जेवा उच्च शिक्षण पामेला अनेक परंतु यथार्थनां परिशिष्टकारनो खुदनो कहबानो जैन-अजैन अभ्यासियोने तुलनात्मक पद्धतिए भावार्थ एस नहिं हशे, कारण के तम होय तोते पण शीखव्युं अगर वंचाव्युं छे तेमां आवतो तद्दन असंगत गणाय. आ विषयमा शास्त्रकारोनो खगोल-भूगोल विषयक भाग केवळ विनोदनी अभिप्राय तो एत्रो छे के नरकमांधी निकलेलो खातर समजावतां पण भने घणो संकोच थतो जीव जो चक्रवर्ती पद प्राप्त करवाने योग्य होय तो हतो अने शीखनार तेवा एके एक सूत्र उपर साद- ते फक्त पहेली नरकमाथी ज निकळेलो होय है. र उपहास व्यक्त करता हता, जो के हुँ केटलेक वासुदेव अगर वलदेव पदनी प्राप्ति पहेली अन वी- अंशे तेनुं समाधान अमुक पद्धतिए करी शकतो. जी एम यन्ने नरकमांथी निकळेला जीवोने होई परंतु यथार्थ समर्थन तो माराथी कोई पण प्रमा- शके छे अने तेवीज रीते तीर्थकर पदनी प्राप्ति पहे- णी न ज थई शकतुं. मने घणाक विद्वानोए तो ली, बीजी अने त्रीजी नरकलुधीमाथी निकळेला आवी खास सूचनाओ करी छे के तत्त्वार्थसूत्रमाथी प्राणियोने थई शके छे. इत्यादि. आवी रीते वीजां आ विपयने लगतो विभाग काढी नांखी तेने पण घणां स्थल अर्थ-करणमां भूलो थयेली नजरे संक्षिप्त वनावधानी अवश्यकता छे के जेथी नवी- पडे छे. आमा छे के बीजी आवृत्तिमां न शिक्षितोने विपयनी गंध सुधां न आवे अने आ संबंधमां उचित लक्ष्य आपवामां आवशे. बाकी तेथी तेमना मन, आपणा पूर्वाचार्योनी वीजी एकंदर रीते परिशिष्टमा ए विषयनो सारो संग्रह अननुपमेय कृतियोनी प्रामाणिकताना संबंधमा थयो के अने साथे जे थाकृतियो विगेरे आपी छे कोई पण प्रकारना कुतकों किंवा सन्देहो उत्पन्न अंक २] साहित्य समालोचन १०३ ". ... .... ~~~ - थवा न पामे. त्यारे वीजी बाजू सागरानंदसूरि (1) Buhler. -Indian Sect of जेवा एक सारा विद्वान् आ विपयना परिशिष्टो the Jainas, translated by रचवामां महत्त्व समजी रह्या छ । जैन विद्वानोनुं J. Burgess. Lazsc & Co., कर्तव्य छे के तेओ जगत्मा प्रसार पामती भिन्न London. भिन्न ज्ञान शाखाओगें विशाल अध्ययन करी, तत्त्व- (2) Weber. Sacred Literature शान, इतिहास अने साहित्य जेवा गंभीर विपयो of Jainas. उपर वधारे प्रकाश पाडे अने तेम करी जैन धर्मन (3) Warren.--Jainism. गौरव प्रकाशित करे. आ विपयमां अमारे जैन 3. Jaina Philosophy:- विद्वानोने वणुक कहेवान छे जे यथावसरे कहेवामां Pravachanasara of Kundakunda, आवशे. आजे तो फक्त सूचनारूपे आ ये शब्दो With the Baudha, Sankhya and लख्या के आशा छ के नम्र अने प्रेमभावे लखा. Arhata Darsana, from Sarvadarsa- पला आवाक्योनो सरल ज अर्थ करवामां आवशे nasamgraba ( Anandasrama Series) अने भविष्या सागरानंद सूरिनी कोई आदर्श कृ. 4. Translation from and into Ardha-- तिनी स्मरणीय समालोचना करवानो उत्तम अव Magadhi. सर अमने प्राप्त थशे. ई. स. १९२२ ना वर्षमां. मुंबई युनिवर्सिटीनो एम्. ए. क्लासनो 1. आवश्यक सूत्र पूर्वार्ध, हरिभद्रसूरिनी टीका- अर्धमागधीना कोर्स. साथे, आगमोदय समितिए छपावेलं. 2. उपर प्रमाणे. गत अङ्कमां, मुंबई युनिवर्सिटीए पोताना अभ्या 3. Jaina Philosophy:-- सक्रममां आ वर्षथी जे अर्धमागधी (अथवा तो Syadvadamanjari of Mallisena, प्राकृत ) भापाने दाखल करी छे तेनो बी. ए. सुधी with Baudha, etc. Darsanas as नो कोर्स आपी देवामां आव्यो छे. स्थळाभावने in 1921. लीधे एम्. ए. नो कोर्स आपवो रही गयो हतो ते 4. Translation from and into Ardha- आ नीचे आपवामां आवे छे. Magadhi. ई. स. १९२१ ना वर्पमां. ए सिवाय वी. ए. क्लासना ऐच्छिक विषयमांजे 1. उत्तराध्ययनसूत्र-संस्कृत टीका साथे, एक पेपर जैन साहित्यनो राखेलो छ तेमां नीचे 2. (a) Comparative Philology- प्रमाणेनां पुस्तको पाठ्यपुस्तको तरीके नियुक्त (1) Relation between Sanskrit करेला छे. and Prakrit and between the Prakrits themsclvcs, १९२०. १. आचारांग सूत्र (मूळ मात्र ). in Bhandarkar's २. हेमचन्द्राचार्यरचित त्रिषष्टिशलाका पुरुष- \Vilson Philological Le- चरित्र, पर्व १० (महावीर चरित्र ) माना ctures. सर्ग१-८. 2)General Principles, as in Gube's Introduction to १९२१-१९२२. Comparative Philology. १. प्रवचनसार दीपिका साथे. (h History of Jain Literature --- २. वीजामा उपर प्रमाणेज. as - (2 जैन साहित्य संशोधक [भाग १ १०४ पंजाव-युनिवर्सिटिमें जैन साहित्यको स्थान | आप स्वयं भी प्राकृत के अद्वितीय विद्वान हैं, आर जैन साहित्यसे हार्दिक प्रम रखते हैं। बंबई और कलकत्ता युनिसिटिमें तो आज कई वर्ष चूंकि पंजाबमें संस्कृत पढनेवाले जैन विद्यार्थी हुए जैन साहित्यको कितनाएक स्थान मिल चुका है । परंतु. बिरले हैं, इस लिये अन्य धर्मी विद्यार्थीयों को जैन पंजाव-युनिवर्सिीटमें अभीतक उसे किञ्चित् भी अवकाश साहित्य की और लाने के लिये एक वजीफा नहीं मिला था। उसमें कारण केवल पंजावके जैन भाईयों- ( Scholarship ) की आवश्यकता है जिस को की अनभिज्ञता और उपेक्षा ही है। पंजावके जैनिय में स्थायी रूप देने के लिके रु० १०००० चाहिए। मामूली शिक्षाका भी बडा भारी अभाव है तो फिर ऊंची जो महाशय इस खाते में दान देना चाहे वे इसी कक्षाकी शिक्षाके वारेमें तो कहना ही वया । यही सवव है पत्र द्वारा सूचना देवें ताकि रुपया शाघ्र यूनिवर्सि- कि आजतक पंजावमें, अन्य धर्माय सेंकडों ही ग्रेज्युएट टिमें भेजने का प्रबन्ध किया जावे।" संस्कृत के पारंगत विद्वान् हो गये हैं परंतु जैनियोमें वैसा एक रकलिशिपके लिये जो सूचना बनारसी दासजीने इस निवे- भी मनुष्य नहीं था। हमें यह जान कर प्रसन्नता हो रही है दनमें की है उसकी तरफ हम प्रत्येक विचारशील और उदा- कि पंजावके जैन समाजकी इस न्यून ताकी पूर्ति करनेवाला रचित्त भाईका लक्ष्य खींचना चाहते हैं । खास कर पंजाबी एक पुरुप तैयार हो गया है और वह है लुधियाना निवासी जैन भाईयोंको इस विषयमें पूरा खयाल करना चाहिए और श्रीयुत लाला बनारसी दास जैन । वनारसी दासजीने एम्. अपना कर्तव्य बजाना चाहिए । ए. तककी ऊंची शिक्षा प्राप्त की है और संस्कृत-प्रारुतका अच्छा ज्ञान प्राप्त किया है। आपका एक इंग्रजी लेख जै. सा. अशुद्ध-संशोधन. सं. के प्रथम अंकमे प्रकाशित हो चुका है। आप लाहोरके गया अंकमां प्रकट थएला श्रीयुत हीरालाल ओरिएन्टल कालेजमें प्रोफेसर हैं। आपने हालहीमें बहुत अमृतलाल शाहना “ हरिभद्रसूरिनो समयनिर्णय " कुछ परिश्रम करके पंजाव युनिवर्सिटिकी एम्. ए. की परी. शीर्षक लेखमां भ्रमथी एक-बे ठेकाणे अशुद्ध पाठ क्षामें जैन साहित्यको उचित स्थान दिलाया है और उसके छपाई गयो छे, तो ते नीचे प्रमाणे सुधारी वांच- शुभ समाचार जैन साहित्य संशोधकमें प्रकट करने के लिये वानी भलामण करवामां आवे छे. भेजे हैं जो आपहीके शब्दोंमें नीचे प्रकट किये जाते हैं:- पृष्ठ ४१, कालम २, पंक्ति १३-१४ मां नीचे प्रमाणे "बडे हर्प की बात है कि पंजाब युनिवर्सिटिने पाठ छे:- अपनी (संस्कृत की) सब से उच्च परीक्षा अर्थात् आ ५९८ ने वर्तमान गणतरीए गणाता गुप्त एम० ए० ( AI. A.) में जैन फिलॉसफी तथा सा- संवत् तरीके....' हित्य को भी स्थान दे दिया है। इस वर्प निम्न तेना बदले नीचे प्रमाणे वांचवू- लिखित ग्रन्थ नियत हुए हैं:- आ ५९८ ने मारी गणतरी मुजबना मूळ १ स्याद्वाद मञ्जरी (संपूर्ण)। गुप्त संवत् तरीके....' २ सूत्रकृतांग (प्रथम के ६ अध्ययन)। तेवीज रीते, तेनी नीचे पंक्ति २४ मां नीचेप्रमाणे ३ उत्तराध्ययन (प्रथम के दस अध्ययन)। जैन साहित्यका संक्षिप्त इतिहास (अंग्रेजी)। गुप्त संवत् ५९८....सिद्धर्षिए श्रीचन्द्रकेवली चरित्र रच्य. इसके लिये सारी जैन समाजको श्रीयुत ए० तेने नाँचे प्रमाणे सुधारी यांचq- सी० वूलनर ( Captain A. C. Woolner )- लाहोर के ओरिएन्टल कालेज के प्रिंसीपाल-को गुप्त-संवत् ५९८....सिद्धर्षिए (श्रीचंद्रकेवली धन्यवाद देना चाहिये जो कि इस देशमें जैन चरित्रमा जणाच्या मुजब ) ग्रन्थ रचना करी.' साहित्य के प्रचार का वडा प्रयत्न कर रहे हैं। पाठ छ- ४ बृहट्टिप्पनिकानामप्राचीनजैनग्रंथसूची . एकादशाङ्गानि । १. श्रीआचारांगसूत्रं श्रीसुधर्मस्वामिरुतम्-२५२५ । (१) नियुक्तिः श्रीमद्रयाहुरुता ग्रन्थामम् ४५०, गाथा ३६२ । (२) चूर्णिः ८३००। (३) वृत्तिः शीलाचाीया ९३३ वार्षिका, १२००० । २. श्रीसूत्ररुतांगसूत्रम् - २१००। (१) नियुक्तिः २६५, गाथा २०८ । (२) चूर्णिः १००००। (३) वृत्तिः शीलाचार्येण कृता, १२८५० । ३. श्रीस्थानांगसूत्रम्-३६०० । (१) वृत्तिः श्रीअभयदेवैः ११२० वर्षे रुता,१४२५०। ४. श्रीसमवायांगसूत्रम्-१६६७ । (१) वृत्तिः ११२० वर्षे अभयदेवीया, ३५७४ । ५. भगवतीसूत्रम्-एकचत्वारिंशत्-शतकमयम् १५७५२ । (.) चूर्णिः ३११४ । (२) अवचूर्णि: पत्तपचित्कोशेऽस्ति । (३) वृत्तिः ११२८ वर्षे अभयदेवसूरिकृता १८६१६ । ६. ज्ञानधर्मकथासूत्रमू-५४०० । (१) वृत्तिः ११२० वर्षे रुता ३८०० । ५. श्रीउपासकदशासूत्रम्-८१२ । '. श्रीअन्तरुद्दशासूत्रम्--८९९ । ९. श्रीअनुत्तरौपपातिकदशासूत्रम् ---१९२ । (१) उपासक-अन्तकृत्-अनुत्तगैपपातिकवृत्ति:- १३००। १०. श्रीप्रश्नव्याकरणसूत्रम्-१२५६ । (१) वृत्तिः ४६००। ११. श्रीविषाकसूत्रम्-१२१६ । (१) वृत्तिः ९००। एकादशांगीसूत्रसंख्या ३५३३९ । वृत्तिसंख्या ७४७९० । द्वादशोपाङ्गानि । १२. उववाइयसूत्रम्-११६७ ॥ (१) वृत्तिः ३१२५ अभयदेवीया । १३. राजप्रश्नीयसूत्रम-२०७९, २१२० । (१) वृत्तिर्मलयगिरीया ३७००। १४. जीवाभिगमसूत्रम्-४७०० । (१) चूर्णिः-१५००। (२) वृत्तिारिभद्री प्रदेशवृत्तिनाम्नी ११९२ । (३) वृत्तिर्मलयगिरीया १४००० । १५. प्रज्ञापनासूत्रम्-पत्रिंशस्पदमयम् - ७७८७ ॥ (१) लघुवृत्तिारिभद्री~-३७२० । (२) वृत्तिर्मलयगिरीया-१६०००, १४५०० (१)। (३) प्रज्ञापनातृतीयपदसंग्रहणी श्रीअभयदेवमूरिरुता गाथा १३३ । तदवचूरिश्र-४३० । १६. श्रीचन्द्रप्रज्ञाप्तसूत्रम्-२०५४ । (१) वृत्तिमलगिरीया ९५०० । १७. श्रीसूर्यप्रज्ञप्तसूत्रम्-२२९६ । (१) वृत्तिमलयगिरीया ९.०० । १८. जम्बूद्वीपप्रज्ञप्तिसूत्रम् -४४५४ । (१) चूर्णिः १८७९ । (२) वृत्तिर्मलयगिरीया ९५०० । १९-२३. निरयावलिका-कल्पावतंसिक-पुष्पिता-पुष्पधु. लिका-दशा-(५) सूत्राणि-११०९ ।

जैन साहित्य संशोधक-परिशिष्ट [भाग १ २ AHMAANAA A ---- (१) निरयावीलकादीनां पंचानां वृत्तिः, १२२८ वर्षे । ( २३ ) चैत्यवन्दनाविचारो ग.धापन्धेन सूत्रव्याख्या- रूपः। आवश्यक-मूल-च्छेद-सूत्र-वृत्त्यादीनि । (२४) चैत्यवन्दन कप्रत्याख्यानभाध्याणि त्रीण तपा. २४. मूलावश्यकसूत्रसामायिकादीनि, पड् अध्ययनानि-१०० श्रीदेवेन्द्रसूरिकतानि, गाथा ६३, ४१, ४८ । प्रमाणानि । (२५) चैत्यवन्दनामाष्यवृत्तिः संघाचारनाम्नी तपा- (१) साधुप्रतिक्रमणसूत्रं तु १३० । श्रीधर्मघोषसरिकृता ८५०० । (२) ललितविस्तरा चैत्यवन्दनावृत्तिहरिभद्री १२७० । ( २६ ) वालावपोधा चत्यवन्दनावृत्तिः खरतरतरुणप्रभ. (३) ललितविस्तराटिप्पनई देवसूरिगुरुमुनिचन्द्रीयम् सूरिभिः १३३५ वर्षे कृता ७०००। १४००। (२७) साधुप्रतिक्रपणादिषावधावश्यकसूत्रवृत्तिः नेमि- (४) चैत्य-साधुवन्दन-श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रवृत्तिः ९५६ साधुना ११२३ वर्षे रुता १५५० । वर्षे पार्श्वण कृता २००० प्रमाणा। (२८) पंचपरमेष्ठिविवरण प्रारुतगाथामयं ववन्तरक- (५) ईर्यापथिकी-चैत्यवन्दनासत्र-इन्दनकानि । थन् ११६८ ६र्षे मातिसागरम् गाथा २५० । (६) ई-० १५० चैत्य. ८४० बन्द ७२७ चूर्ण ( २९) आवश्यकनियुक्तिः ३१००, २५५० । यः १३७४ वर्षे यशोदेवकृताः । (३. ) आवश्यकचूणि: १६६००, १८४७४ । (७) प्रत्याख्यानस्वरूपं यशोदेवकृतम् गाथ-३६० । (३१) आवश्यकवृहद्वृत्तिहरिभद्रो २२००० । ) प्रत्याख्यानवृत्तिः-५५० । ( ३२ ) तहिपनकं मलधारि-हेमचन्द्रीयम् ४६४० ! (९) चैत्यवन्दनादिसूत्र-साधु-श्राद्धतिक्रमणसूत्रपदप. (३३) आवश्यकवृत्तिमलयगिरी या १८०००। यमंजर्यः-अकलंकदेवस्रीयाः । ( ३४ ) लघुवृत्तिःश्रीतिलकीया १२९६ रुता१२३२५। (१०) श्राद्धसामायिक-तिक्रमणसूत्रव्याख्याप्रकरणम्- (३५) आवश्यकावचूरिः प० २२६ । ११०३ वर्षे जैनदेवम् गाथा २९३ श्लोक ३६५। (३६) विशेषावश्यकसूत्रं श्रोजिनभद्रगणिरुतम् ४०००। (११) चैत्यवन्दनामहाभाष्यं श्रीशान्तीयम्, मूत्रव्या (३७) वृहद्वृत्तिभळधारि-हेमचन्द्रीया २८०००। ख्याचरणादिवाच्यम्-'महामहपणमंत' (३) वृत्तिर्मलयगिरीया ९००० नास्ति। इत्यादिपदम् गाथा ९२२॥ ( ३९ ) जीर्णा वृत्तिः १४०००, पत्तनं विना नास्ति । (१२) चैत्यवन्दनाभाध्यवृत्तिः । २५. औषनियुक्तिसूत्रम् ११६४ । ( १३ ) पडावश्यकं चैत्यवन्दनादिसर्वसूत्रव्याख्यारूपम् (१) चूर्णिनास्ति। तपाश्रीदेवेन्द्रसुरिरुतम् २०२० । (3) मध्यम् ३००० नास्ति । (१४) चैत्यवन्दनादिवृत्तिः कुलप्रदीपः २४५८ । (३) वृत्तिोणीया ६८२५ ॥ (१५) चैत्यवन्दना-वन्दनक-प्रत्याख्यानवृत्तयः श्रीतिल. (४) वृत्तमलयगिरीया सूत्रमित्रा ८८५० नास्ति । कीया: ५५० । २६. दशकालिकसूत्रम् ७००। (१६) श्राद्धप्रतिक्रमणसूत्रलघुवृत्तिः श्रीतिलकीया ३०० (१) नियुक्तिः गाथा ४४५, ५५२ ! (१७) साधुप्ररिक्रमणसूत्रवृत्तिः श्रीतिलकीया २९६ । (२) चूर्णिः ७०००, ७९७० । (१८) चैत्यवन्दनाटीका हरिभद्रीया ४८२ । (३) वृहद्वृत्तिहरिभद्री ७५५० । १९) साधुप्रतिक्रमणसूत्रवृत्तिः आवश्यकबृहद्वृत्तिगता । (४) वृत्तिः श्रीतिलकीया नेमिचरित्री ७.०० । (२०) साधुप्रतिक्रमणसूत्रवृत्तिः १३६४ वर्षे जैनप्रभी (५) लघु-वृद्धृत्युद्धाररूपा मुमतिसुरीया २६० । २७. पाक्षिकसूत्रम् ३००। (२१) श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रचूर्णिः ११८३ वर्षे विजय (१) वृत्तिः यशोदेवरुत्ता ११८० वर्षे २७०० । २८. पिण्डनियुक्तिसूत्रम् ७०८ । (२३) श्रावकप्रतिक्रमणसूत्रवृत्तिः ३२२२ वर्षे श्रीचं. (१) वृत्तिास्ति ४०००। (२) लघुवृत्तिराद्या, तवाद्यानि १३५० हारिभद्राणि, . 4 ५४८। सिंहीया ४५९० । द्रीना १९५० अंक 1 प्राचीन जैन ग्रंथसूची ३ .4... -'"""" दानि001 1 . , - - अपानि तु १४५. देवानाशिघ्यवीराचार्यश-: (५) यंदविपधिनिः १३६४ वर्ष जैनप्रभा । ३८. महानिशीपमूत्रं लघु-मध्यम-वृहद्वाचनम् ३५००, (3) निर्मलगाया मिश्रा ५५० । ४.००, ४९४८॥ २०. उनमध्ययनं पदिश्ययनमय मुत्रम १००० । १२. पंचऋपनं ११३३॥ (1) युधिनः .., गायः ६. ॥ (1) नियुक्तिनास्ति। (१) नावानिबननक्षमता ५०.००, ५०५० ! ()माप्यं संघदामराणिकृतम् गाथा १९७४,३०३५॥ (2) नः १११९ वर्षे देवाप्यमानानबीनमि (३) चूर्णि: ३०००, ३१३६ । चन्द्रगया मधुना १४...1 ४०. जीतकरमूर जिनभद्रीयम् गाथा १०५। (४) अन्यावार्थीया बृहदानः नृत्रीमा ८:०० । (१) भाष्यम् ३१०५ नास्ति। ३०. निगीयमन्त्र दिशामा ८१२, १५ । (२) चर्णिः सिमेनीया १०००। (1)टनाप्यम ३२०० । (३) चूर्णिटिप्यनकं भृगु० गु. ३ विना न । २)मान्यन ०.01 (४) नि: १३३४ वर्षे श्रीतिलकीया १८०० । (निय-णि नृव-माध्यामि २८००० । (५) जीतकरयविवरणं संक्षनगमानकारूपम् 'मिरि- (४) निगमणिविगो देशव्यन्या ११७३ च पार्थ वीरजि नमि' इति ५४३॥ देवनिकता 1800 नास्ति। (६) अजीतनास्य नूत्र-वृत्ती श्रीतिलकीय गाथा ५) निमितमोईनः ११७ बर्षे श्रीचन्द्री ३० वृनि० ११५॥ (७) यतिजातकपत्य श्रीमानप्रभसूरीयत्र वृत्तिः सा- ३. काविशेषतः ३१.४८ ! धुरत्नमूरीया ५७०० १२. कप: १२३०.1 (८) पादीतकरूपस्य दपाधीधर्मघोषनरीयस्य वृतिः ३३. प्रवृत्तिः नृत्रमाभ्यगर्मा. आद्यानि ४६०० मलयगि- श्रीमापतितकसूरीया २६०० न । सेवाणिः, मेरा दु १२ वर्ष नपाक्षेमानीया । ४१. नन्दं मूत्रम् ७०० । (१) नि: ७३१ वर्ष कृता, स्तम्भतार्थ विना नास्ति। ३१. व्यवहारसुत्रं दृशोदशकममा (१) लघुवृत्तिनास्ति २३०० प्रमाणा । (१)माया ४०। (३) नन्दीबृहृवृत्तिर्मलयगिरीया ७७३२॥ (३) ऋषिः १२०० (४) प्पिन श्रीचन्द्रीयमायावृत्तिसत्तम् २१००। (३) व्यवहारवृतिः नृत्र मायगर्भा मलयागीया : ४२. अनुयांगद्वारतूत्रम गाथा १६०४ ॥ २३६५,३१६२५॥ (५)णिजिनदामनक्षत्तरीया २२६५। ३५. कन्यवृवं गड्-मशनयम १७३। (३) लघुवृत्तिनास्ति। (1) मान्यन १२०००१ ३) हवृत्तिर्मलधारिहेमचन्द्रीया ५८०० । २)भायम ७६... ४३. आनुरप्रत्याख्यानम गाथा ८४-१३४॥ (३) विशेषणिः १६.०६ (१) भानुरप्रत्याध्यान्वृत्तिराञ्चलिकमुवनतुंगतारिकता १६, दृशानमन्त्रनु दन व्यवन नयम २१०६, १९२५॥ ६३ ध्यानकनामगर्मा ४२० । () नियुक्तिः १:४, २२० । ४४. महामत्याध्यानन्दम् १४३। () चूर्गिः ४३३१॥ ४५. देवेन्द्रस्तषः गाया ३०३। ३१. पर्युष गाकान्त्रम् १९१६॥ ४६. तंदुलविचारिकम् ४००। (१) नियुक्नि: गाथा ६८। ४७. यस्तारकः गाया १२१ २) चर्णि: ७०० । १८. मतपरिता ११॥ (३) कल्यानम्वतटिप्पन दिनयचन्द्ररिकतम १५८ ४९. आराधनापताका, १०७८ वर्ष चारमााचार्यरुता ९९॥ (४) कम्पटिशनकं पृथ्वीचन्द्रीयम् ६४०1 ५०, गणिविद्या गाथा ८५।

जैन साहित्य संशोधक-परिशिष्ट [ भाग १ 10 -- . ... अंगविद्या पटिअध्यामिका ९००० । .. पञ्चानिकायसंग्रहःऽभवतनयस्य वृत्तिः, अन्नचन्द्र- ५२. सरजम गाथा १४ ॥ नृरीया देव [पत्तन] चिन्न न ! (1) उसरजनः आञ्चलिकनुबनगरीया ८०० : ' ७४. प्रवचनमान्य वृत्ति, अमृतचन्द्रसूरीया देव० विना न । ५३. दूपमापात: गाया २२३ लोकाः २८० ! ७५. पासून प्रान्तमूल नत्राभि २१० । ५४. ज्योतिष्ककृति: मन्त्रा मल्यगिरीया स. १८५० (१) निश्च हारिभद्र ८८० ॥ ६. पनवस्नुकसूत्रं हारिभद्रम्, १६९४ । ५५. मरणसमाधिः गथा ५६ । {.) पवन्नुटीका हारिभद्री, ५०५० । ६. नीबोंद्वारः गाथा १९३३। ७७. पन्नासकानि १९, शारिभागि, १९८४ । ५७. निग्रान्तकुन-कुनी सूत्रम् १२०, त्रुतिः ८५० । (१) पाशवृत्तिः १९, नवागअभयदेवः ११२४ द सता, ४८। ५८. निरपवनक्तिः २०० नास्ति ! ५९. चन्द्रवेदकन १४४! (२) आयात्रामा ७२ वर्षे यसोदेवीया ६०. अजीवकारः गाथा ४र । अभावाच्या,३१००। ७८. शेकसूत्र हारिभद्रं, ३३ । गच्छाचारः गाथा ३८ २.वारस्तवः गाथा ४३ । (१) पोडशकवृतिः, १५०० आगमेतर-चरणकरणानुयोगाग्रिन्याः । : ३९. ३२ अश्वृतिः १०८० वर्षे अन्दरी, ३३७४ । ८०.धर्मनाक के हारिभद्रे २७३, २५६ । ६३. वंदवाडयमवाटनपदारवाचकवन १०००। ८६ धर्म वन्दतिमनिचन्द्रा, ३००० । ३४. यसुदेवहिडिवीचन्डन्हं अराचार्य ६६०० ! ६५. वनुदवमध्यनलाई ससंग्रहणीनं ९०००। ८२. चं.गहिन्दुसूत्रं हारिन, ५२० । ६६. पिनापिनानि ४१८ ! (१) योगन्वृित्तिः ३६२० । १७. उग्ट-मुल-निगोद-बन्ध-पतिमिलानयो रहिरि- ८३. प्रशमरतिवृतिः १८५ व हरिभद्रीया, १८००। बिन्त.रिताः। ८१. नवभगकादि-विचार-गाथादितिर्विजयदेवमूरि- ६८. तत्वार्थसूत्रं लोनावात २२५ । ना, १५॥ (,) भाष्य वृतिरूपं। ८५. दर्शनसत्तरी हरिमद्रो, गाथा, १२० । (३) टोच भास्वनिशिम्यसिद्धनेर्नया भयपन्याख्या- ८६. जीवसमामवृत्ति धारिदमन्द्रीया, ६६२७ । ८५. गवतन्नगायानां देवगुप्त यानां नाभ्यस्त नत्राम- ना १८२८२, २२२०२। (सन्चार्थनवृत्तिः दिगम्बरी देव० विना नाति । भयदेव यस्य वृन्तिः १६७४ वर्षे चोदेवी, २४०० । ६९ धावप्रप्तिसूत्रं मावात ४०० । एलविई सम्मई' इत्यादि सम्यक्त्व (१)तिइरिभत्री २३३॥ निः, १०५ ७०. विशेषनवतासूत्रं जिननक्षमात्रमहनं गाया ४३८ । ८९. शिरमारप्रकरणं प्रवचनकितं सोपयोगि, बहुमह (3.) विपन-ननन्ति । गया, ८९५॥ ११ प्रश्ननमागेम : ७६ वारस्य नमिचन्द्र बोस १०. पचय संदोहः ..... (१) पवयन संदोहवृत्तिः .... १) निः २०४० नितस्त्रार्मा, २७६ द्वारा, ११४२ ९.विद्विषनामिकासूत्र-जो तपानीदेवेन्द्रसूराये-७१० ९२. योनिगमत वातान् ६० भरटेनम् । व स्ट्रिमनकिता १८५०,:::.! १३. विविधिमून जन्मल्टमन--गायो-१.३ । (२)विषमपदमा भृगु. दिनान । (१) ः १७५ वर होदेवी-२८०० । (धर्मप्रमानितशि, समका.... दक्षिा लीला- 1 १०५.० प्रचार अतः १९८० वष औरन्द्ररिया ४.०० *. मनसायका अमृतमन्द्रमा गति देद -प्रसार अनुकृतिः १५ वर्ष यशोदेवी-२८०० ! ति: १८० इलीया ४४०८ ॥ - ८८. गाथा- : re- । .

अंक 21 ..-.-N ..---.-- ..... . प्राचीन जैनग्रंथसूची ९४. कर्मप्रकृतिसूत्रम्-गाथ -४७५ । कवृत्तयः ५ मूत्रका तपानोदयन्द्रतरीयाः, १८८२, (१) टीका मलयगिरीया तसूत्रा-८००० । १३०, ९८५, २८००, ४२४०। ( २ ) वेदनादि ८ करणवाच्या चूर्ण:-७००० । ११४. सत्तचूिनिस्ति । (३) कर्मप्रतिनिटिप्नकं मुनिचन्द्रो गम् १९२० ।। १६५ सत्तरीका प्रारुता आनन्द्रमणिमहत्तरीया २३००, ९५. पञ्चसंग्रहस्य शतक-सप्ततिका-कपायप्राभृत-सत्कर्म २२२८॥ कर्मप्रति-संग्रहात्मकस्य वृत्तिः सूत्रकारचन्द्रापिः ११६ सत्तरिपिनकम, खरतरामदेवगणिकृतम्, गाथ, रुता, पत्तनं विना न (१) पञ्वसंग्रवृत्तिमलयगिरीया ११७. सत्तगटीका मलयगिरीया....... । ९६ दपकसंग्रहवृत्तिमलयदीपकम् ( ? ), प्राक् नुल्य देंग ११८. सत्तरीमध्यं नास्ति । म्बाम्, भृ० दे० विना न। ११९. बृहत्संग्रहणीचं जिनभद्रगःणकृतम्, गाथा, ५३० । ९७. बृहृत्कमीवशकवृत्तिः परमानन्दरुता-९६० । (१) बृहत्संग्रवर्णावृत्तिः । १३९वर्ग शा.लभद्री २८००- ९८. वृहत्कर्मविपाकाटिप्पनकम्-उदयप्रभसूरीयम् ४२० । २५...1 ९९. बृहकर्मस्तववृत्तिः श्रीगोविन्दाचार्यरुता १०.९ (२) बृहत्संग्रहणावृत्तिालयागरी ५००० । १०९०॥ (३) लघुग्रहणीवृत्तिः, 'नाम अरिहंताई ' ति, १०.. बृहत्कर्मस्तवटिप्पनं वृत्तिरूपम् उदयप्रभसूर्गयम् मलधारिदेवभद्रीया ३५००। २९२ । १२०. बृहक्षेत्रसमामवृत्तिालयगिरी ७८८७ ॥ १०१ बृद्वन्धस्वामित्ववृत्तिः ११५२ वर्ष हरिभद्रीया- | १२१. बृहक्षेत्रमासवृत्तिः सिद्धिगया .११९२, वर्ष, ५६.। ३०००। १०२. वस्तुविचारसाराख्रवृहत्पडशीतिकस्य जनवहभस्य १२२. बृहक्षेत्रसमासवृत्तिः, १९३३ वर्ष देवभद्र या १०००, वृत्तिः प्रारुता रामदेवी ६०५ । स्तम्भने । १०३. आगमिकवस्तुविचारसाराऽपरनामकस्य जिनवल्लभी- १२३. बृहक्षेत्रसमासलधुवृत्तिनास्ति । यस्य बृहत्पडशीतिकस्य वृत्तिर्मालयागिरी २१४० । १२४. लघुक्षेत्रसमासवृत्तिहरिभद्रपुरीया ५११ । १०४. बृहदातकवृत्तिर्मलधारि-हेमचन्द्रीया ३४४० । १२५ क्षेत्रसम ससूत्रं संस्कृतमान्हिाचतुष्टयरूपम् उमा- १०५. जिनवल्लभायस्य सार्धशतकस्य सूक्ष्मार्थविचारमारा. स्वातिवाचकरुतम्.......! पराग्यस्य वृतिः १९७२ वर्ष हरिभया ८५० ! (१) वृत्तिः, २०६०। १०६ सुक्ष्मार्थविचारसारापरनामक-जिनवल्लभ'यसार्धशतक- १२६. जम्बूद्वीपसंपदणी वृत्तिः १५.० । त्तिः ११७१ वर्ष धनेश्वरीया ३७०० । १२७. वीतरागस्तवा ......२० । १०७. शतकचूर्णिः २३८०। (१) वृत्तिः प्रमानन्दी २१२५ । १०८. शतकटिप्पनकम्-उदयप्रभसूरीयम् ९.७४ । १२८, शोभनस्तुनयः ९६। १०९, आगमिक वस्तुविचारसारस्य ' वृहत्पशीतिक (१) वृतिः पं० धनपाल रुता, ९५० । इति प्रसिद्ध नाम्ना जनवल्लभस्य वृत्तिः-यशोदेवीभद्र- ११९. धनपालए वाशिका । मुरीया (?)-१६३०॥ (१) धनपालपञ्चाशिमावृत्तिः प्रभानन्दमूरीया ६४०, ११०. मूक्ष्मार्थविचारसाराऽपसख्यसार्धशतकवृत्तः टिप्पन १३०. 'निम्मलनहे दि ' इति पीरस्तवस्य पं. धनपालत. कम् १४००। १११. सूक्ष्मार्थविचार राख्यसार्धशतक.तः प्रारुता। स्य वृत्तिः मुराचार्यरुता २२५ ॥ ११२. आगमिकवरतुविचारसाराम्ख्यपरशीतिकवृत्तिः ११७३ | १३१. भक्तामरपदीपिका भृगुपुरं विना नास्ति । वर्षे हरिभद्रपुरीया ८५०१ १३२. भक्तामरस्तवनिः गुणाकराचायः १४२६ या ११३. नध्यकर्मविपाकवृत्ति-नव्यकर्मस्तवृत्ति - नव्यवन्ध कता, १९७२। स्वामित्वाऽत्रचूर्णि-नव्यपातिक निनव्यशत- १३३. 'जनेन गेन' स्तुनिवृत्तिः ३०५॥ ११.. ।

६ जैन साहित्य संशोधन-परिशिष्ट [ मार. १६८. नेन्द्रनो' इलाकरन नुदयः ९६ १४. शुईनकादि ३ तल्या समता:, नि: अडच्या ! १३८, मंदी दिनम्नतरशतः बतायात- 1. चत्राशन ५.८, बुर्थिगन ४, अश्वन २८ द्रवाच्यः३५०३१ नुनमः, इलाकामा ४, वयं यथा , देवेन्द्रनि- १५.अभयमाहा, अलितावन, आधुनियने- समजेना, मिटा ५६, देवनमा- ३८१, श्रीमत, इसदिन्तवनानि मोम- जयलः, पालिकाः, पद्धनं विना न ! दिलीपनि ११००-७०-६०-~-२०-२ ६५.७, नवनामानि काव्यानि ४२ प्राकृतानि ! १५८. विवेकदिलानो जिन्वतमविक्षता वालासात्मनः १३. दिनान्निताना, भोगविन्टा .. १५९, मोनातिः सोमदेवमूरिकता । १३५.अजनतान्तिलाले देवः दिन न १६.. ११७ पदयमयी आऋलिकालीन १२९४ १३. मतिमतः २५० } व नोन्द्रम्हाच मता ५४५० ११. जिनमनि-नाइन-वा- जा लिन निजी बैंककसितमनिसानामतगंधर- भव-नाहिर-मल्लङ्गिम-मलापतः १३६ कमी हरिन्द्रीयम् हृदयम् भान भावलिकोनिश्चित - . ३४०. उपसर-मालवृनं ० दृतः ३० ३. १६६. भावसामनरें वाहनावित इतपदीई- नरहरः इति । देवपतन दिन पश्यम्। मंत्र इत्यादि वृन्दप्रवृतिः ३८८ ॥ १६६.अ.मामात्रवृत्तिर्देवगुतावावा १२० १४२. बावन्तवृतिः। १६४, प्रवचनयाक्षिकादि २५ अधिकारप्रतिवद्रा आतापक्षाः ४. पिताः २ हासिकः ५-1 १४४३ वर्षे कुलमण्डनीयाः । ,, गाभवाम्यवदि. १६. पानावार ७०० । बन्नुबाउमा ६. समाचारी विनर नलवारिदेवयमसुरीया । ४५. १४ गिन्तवाः २४, ८,८ मायाः, व्यानाः ३९. 52. नमारी सुबोया वनुष्ठानांचा पदरशिधर-- कामालाविया ! चन्द्रमा १४-१९२७ : ४. दुसन्य तक आमांगता :२५, १८. सभावारी भनेकविधा गटांगया। हा विनिमः, अत्रकर-गुम्न-बान-पद- १६९. श्यानत्त देवरिकतम् । इः परिच्छेदः, दुव्यानि १०० दुतिः १०. उपदेशमालातिः उना कम बजयसिंह- निकता ९:३। १४३, मन्ना-नुवा कृतिन मुले जनमत १४. उपदेशनालतिः प्रिनय हेयोपदिशदिन। इत्यादि २४ निः२४, बुद्धयः दिगन्न १९२, देयोपादयेलादिच नाहि क्यानजिता ई० बन्द्रमा १५४९ अनेकदा मनवमर्षद ५.००, १५.०० १५. मनालाका १२९९ व दमनी गन्ना ६.४५.गायनाममात्र आवलिन । १९२७४, समुत्रा-1९४६ ५. दमनन गया । १४. दीपमालवृत्ति गलभी ० १२३८ वर्षे ३.मादक ३.४। अत्रा ११५०, असुन ११८२९.1 २.दक्षिक उपदेशनालानमनःनिया ३.८६ युगमाद: :: १४६. पदमनालावृति योगदत्यादिका निराकर प्रयता कमल!

अंक २] प्राचीन जैनग्रंथसूची . N १७७. पुष्पमालावृत्तिमल्धारि-सूत्ररुत्-हमचन्द्रः ११७५ / २०१. नवपदवृत्तिः कुलचन्द्रादिकता १०४३ वार्षिकी वर्ष रुता १३८६८॥ २६०० । १७८. धर्मोपदेशमालावृत्तिः ११९० वर्षे मुनिदे गया २०२. नवपदवृत्तिः ११६५ वर्षे यशोदेवोपाध्यायरुता ६८.०॥ १७९. धर्मोपदेशमा लघुवृत्तिः ९१५ वर्षे जयसिंहीया । २०३. अभिनवनवपदवृत्तिः ११८२ वर्षे सूत्र कारदेवेन्द्रीया १८०. धर्मो देशमालाविवरणं स्तम्भय विना न | ९०००। १८१.भवभावनात्तः, सूत्रकृन्-मलधारी-हेमचन्द्रीया ११७० प १३०००। २०४. भगवतीद्वादशशतकंगततृतीयउद्देशसत्कजयन्तीप्रश्नोत्त- १०२, दिनरुत्य वृत्तिः तपाश्रीदेवेन्द्रीया १२८२० । रसंग्रहप्रकरणस्य मानतुंगीयस्य घृत्तिजयन्तिचरित्र- १८३. धर्मरत्नवृत्तिः तपाश्रीदेवेन्द्रीया श्राद्ध २१ गुणादि- वाच्या प्रारुतमूला १२६० वर्षे मालयप्रभी ६६०० २०५. ठणवृत्तिहमसूरिगुरुदेवचन्द्रीया, तत्सुत्रं प्रद्युम्नसूरु- वाच्या ९७००.९६.२ । १८४. हितोपदेशमालावृत्तिः सूत्रकार-प्रभानन्द-भ्रत पं० तम् १३००० ( वृत्तिमानम् )। २०६. धर्मोपदेशप्रकरणं प्रातमूलं-बहुकथासंग्रह १३०५ परमानन्दीया १३०४ वर्षे ९५०० । वर्ष यशोदवीयम् ८३३२ । १८५. सम्यवत्ववृत्तिः सूत्रकार चन्द्रप्रभसूरि-संतानीय-श्री. तिलकीया १२७७ यार्पिकी ८०००। २०७. पवज्जाविहाणवृत्तिः १३३८ वर्षे प्रद्युम्नीया ४५०० । १८६. सम्यक्त्व वृत्तिः प्रारुतकथागर्भा १२००० । २०८. पवनाविहाणवृत्तिः जैनप्रभा २४८ । २०९. धर्मावधिप्रकरणवृत्तिः जयसिंहसूरिकृता १११४२ । १८७. दर्शनशुदिवृत्तिदेवभद्रसूरिहना ३०००। १८८. दर्शनशुद्धिः संदेहविपौषधीनानी गया २६२ । २१०. धर्मविधिप्रकरणवृत्तिः १२९६ वर्षे उदयसिंहाचा या ५५२०॥ १८९. माणुस्सविते । ति विवेकमन्जरीवृत्तिः १२२३ वर्षे अकलङ्कदेशीया। २११. ऋपिमण्डलस्तयः संस्कृते मेस्तुंगसूरिकत: कारिका ७०। १९०, विवेकमन्नर वृत्तिलिचन्द्री ८०००। १९१. उपदेशकन्दलीवृत्तिर्यालचन्द्री ७६०० । २१२. ' इसिमंडल' इत्याद्यऋषिमण्डलस्तवः गाथा २७१। .१९२. शालोपदेशमालावृत्तिः १२९४ वर्ष रुद्रपालीयश्र सं.म. २१३. ' इसिमंडल ' इति ऋपिटलवृतिः.४६१४ । तिल कीया। २१४. ' भत्तिभर' इति ऋषिमण्डलसूत्रम् २० । १९३. योगशास्त्र १२ प्रकाशवृत्तिहमी १२००-१२३०० । (१) अस्य वृत्तिः आंचलिकभुवनतुंगीया । १९४. योगेशाम्र केवल ४ प्रकाशवृत्तिः २१५.गौतमपृच्छावृत्तिः खरतर श्रीतिलकोपाध्यायझता५६००। १९५. उपदेशपदसूत्रं हारिभद्रम् १०४० । १) उपदेशपद वृत्तिः ११७४ वर्ष मनिचन्द्री सूत्र- कथानुयोगग्रंथाः। गर्मिता १५५००। २१६. कथाकोशसूत्रम् गाथा २३९ । १९६, संवेगरंगशाला ११७५ वर्षे नोगाऽमयदेववृन्दभ्रातृ- (१) कथाकोशवृत्तिः ११०८ वर्षे जैनेश्वरी ६००० । जिनचन्द्रीया १००५३ । २१७. कथामणिकोशवृत्तिनमचन्द्रकत ४१ अधिकारसूत्र- १९७. वन्दनकुलकवृत्तिः श्रीजिनकुशलपूरिकता ४३५० व्याख्यारूपा ११९० वर्षे आनंदवी। पावात्र न (?)। १९८. विषयविनिग्रहकु. वृत्तिः १३३७ वर्षे मालचन्दी २१८. शीलभावनावृत्तिः १२२९ वर्षे रविप्रभी ९५७० । २.९. कथारत्नकोशः सम्यक्त्वादि ५० अधिकारः ११५८ १०००८ स्तम्भतीर्थ विना न । १९९. नवपदवृत्तिदेवगुप्ताचार्गादिभिः १०७३ वर्षे रुता वर्षे देवभद्रसूर्गयः १२३०० । २२०, धर्माख्यानककोशवृत्तिः प्राकृतबहुकथामयी पत्तनं घि. २००, नवपदवृत्तिः १०७३ वर्षे जिनचन्द्रागण्यायेः रुता- २२१०। २२१. दानोपदेशमालावृत्तिः पत्राणि ७१ । २१७०।

जैन साहित्य संशोधक-पाशिष्ट [ भाग १ - PAP- ...AnnrAnne... २२२. ग्रइनात्तरमालावृत्तिः १४२९ वर्षे देवेन्द्रसूररुता। २४९. विमलचरितं सं० न । २२३. उपदेशचिन्तामणिः १४३६ वर्षे आंचलिकज गशेखर- २५०. विमलचरितं प्रा०न । सूरिकता १२०९३ । २५१. अनंतचरितम् प्रा० गाथावद्ध १२१६ वर्षे श्रीनेमिचन्द्र- २२४. श्रीआदिनाथचरित्रं प्रारुतम्, जयसिंहदेवराज्ये११६० सुरीयम् गाथाः १२००० । वर्षे वर्धमान सूरिरचितम्, ११०००, १२००० । २५२, धर्मचरितं सं० नेमिचंद्रीयं न । २२५. श्रीआदिनाथचारित्रं संस्कृतं संप्रति न । २५३. धर्मवीरत प्रा.न। २२६. श्रीअजितचरितं सं० न । २५४. शांतिचरितं सं० १३३२ वर्षे मौनिदेवम् ४८८५ । २२७. श्रीश्रीजतचरितं प्रारुतं न । २५५. शांतिचरितं सं० माणिक्यसूरीयम् ५५७४ । २२८. श्रीमवर... न । २५६. शांतिचरितं सं• पौर्ण-अजितप्रभसूरिभिः १३१७ वर्ष २२९. अभिनन्दनर० सं० न । रुतम् ४९१।। २३०. मीभनन्दनच० प्रा० न । २५७. शांतिचरितं प्रा० गद्यपद्यमयम् ११६० वर्षे श्रीहेमगू. २३१. मुमतिचरित सं० न । रिगुरुदेवचन्द्रसूरीयम् १२१.० । २३२. सुमतिचरितं प्रा० मुख्यं सेःमग्रभीयं कुमारपालराज्ये २५८. श्रीशांतिचरित सं० श्रीमणिभद्रसूरिणा १४०२ वर्षे रुतम् ९६२१ रुतम् ६२७२। २३३. पद्मप्रभचरित्रं प्रारुन। २५९. कुंथुचरितं सं० विबुधप्रभसरिरुतम् ५५५५ । २३४. सुपचचरतं संस्कृतं न । २६०. कुंथुचरितं प्रा० न । २३५, सुपार्श्वचरितं ११९९ वर्षे लक्ष्मणगणिरुतम् गाथा २६१. अरचरितं प्रा० न । ८७०० श्लोकाः १०१३८-१०९८८ । २६२. अरचरित सं० न । २३६. चन्द्रप्रभनरितम्, सं० १३०२ वर्षे सार्वनन्दम् | १६३. मल्लिचरित प्रा० ११७५ वर्षे जैनेश्वरम् ५५५५ । ६१४१ । २६४. मल्लिचरितं सं० श्रीविनयचन्द्रीयम् । २३७. चंद्रप्रभचरितं सं० प्रा० १२६४ वप देवेंद्रीयम् १२६४ वर्षे देवेंद्रीयम् । २६५. मल्लिचरितं बहुप्रारुतं हरिभद्रीयं कुमारपालराज्ये रु. ५३२५॥ तं गाथाकाध्यमयं ग्रन्धानम् ९०००। २३८. चंद्रप्रमचरितं प्र'. याशोदेवम् ६४०० । २६६. मुनिमुवतचरितं सं. पौर्ण मुनिरत्नमरिरुत २० स्था। २३९. चंद्रप्रभचरितं ग्रा० श्रीकुमारपालराज्ये हारिभद्रम् नककथाकलितम् ५१८५ । ८०३२। २६७. मुनिसुव्रतचरितं प्रा. ११९३ वर्षे चंद्रमूरिरइयं गाथा २४०. सुधिधिचरित प्रा० न । १.९९४। २४१. सुविधिचरितं सं०न। २६८. मुनिसुव्रतचरितं बहुकथानकं ९ भवं विनयचंद्रपुरी- २४२. शीतलचरितं सं.न। यम् ४५५२ । २४३, शीतलचर प्रा०न । २६९. नामचरितं सं. न । २४४. श्रेयांसचरितं सं. १३३२ वर्ष मानतुंगाचायः स्तम्, २७०. नमिचरितं प्रा.न। ५१२४. स्तम्गतीर्थ दिना न । २७१. नेमिचरितं प्रा. १२१६ वर्षे हरिभद्राचार्यः कृतम् २४५. श्रेयांचरितं प्रा. देवभद्रीयम् ११०००, स्तम्भतीर्थ २७२. नेमिचरितं प्रा. भवभावनावृत्त्यन्तर्गतमन्तरंगवक्तव्य. २४६. श्रेयसचरितं प्रा. जयसिंहदेवराज्ये हरिभद्राचार्य तामिश्रम् ५१०२। रुतम्. गाथा ६५८४, स्तम्भतीर्थ रिना न । २७३. नेमिचरितं प्रा. गद्यपद्यमयं १२३३ वर्षे देवतरिशिप्य. २४५. पानुभूख्यचरित सं० ११९९ पर्ने वर्धनानाचार्यकृतम् रत्नप्रभोयम् १२६..! २७४. पार्थचरितम् सं. सर्वानंदतरिरुतम् । २४४. बागुपूज्यचरितं प्रा० नत्रभन, हेमर्यादिशाधितम् ८००० स्तम्भतार्थ विना न । प्रत्यन्तरे १३२२ व। विना न ।

बैंक २] ९ RAM. Aw...........www......wowww.www.www.wrarowse प्राचीन जैनग्रंथसूची २७५. पार्श्वचरितं सं. १२१८ वर्षे भावदेवरिकृतम् ६७७४ द् अनागमिकाथै ३३००। ६४०.1 २९८. ११ मणधरचरित्रं सं. खरतर देवमत्युपाप्यायीयं २७६. पाश्वचरितं सं. माणिक्यचन्द्रसूरिहंत १२७६ वर्ष ६५००॥ ५२७८॥ २९९. हरिवंशचरितं सं० नेम्यादियवृत्तवाच्यमाद्यन्तरहितं २७७, पार्थचरितं मा० ११६५ वर्ष नांग-अभयदेवप्रथमशि- लोकाः ९०..॥ प्यदेवमद्राचार्यः कृतम् ९.०० । ३००. हरिवंशचीरतं सं० पन्दिरकविकृतं पुराणभाषानिवद्धं २७८, पाश्वचरितं प्रा० दशमवत्राच्य गाथा २५६४ ग्रंथा. नेम्यादिवृत्तवाच्यं ९००.1 प्रम् १२०० ॥ ३०१, पद्मचारी प्रा. वारान् ५३० वर्षेषु गतेपु विमस्ट- २७९. महावीरचरितं सं० न। सुरिभिः कृतं मुख्येवराग्यग्स १०५५० । २८०, वीरचरित्रं प्रा. ११३९ वर्षे गुणचन्द्रगणिरुतम् ३०२. सीताचरितं प्रा० ३१०० | १२...॥ ३०३. मीताचरित धर्माऽवमंशात्रगतं प्रारुनं ३४... २८१. वीरचरित्रं प्रा० ११३९ वर्षे नेमिचंतरिकतम्१२००० ३०४. प्रत्येकवुचरितं १२६१ वर्षे श्रीतिलकीय ६०५० । २८२. वारचरित्रं मा० ११३९ वर्षे नेमिचंद्रतरितं २८१०-३०५, जम्यूस्वामिचरितं प्रा० ८२ (१) वर्षे गाथा १६४ ! २४००॥ ३०६, जम्वृस्वामिचरितं प्रा. संध्यादियन्धे १०१६ वर्षे १० २०३. महापुरूपचार मु. प्रा. शलाकापुष्पवृत्तवाच्यं ९२५. मागरदन्तेन रुतं २६.० । वर्षे शीलाचार्यः रुतम् १००..। १)तस्य टिप्नं ११००। २४. महापुरुषचरित्रं प्रा० ६३ शलाकापुरुपवृत्तवाध्यं आन- ३०७. पृथ्वीचन्द्रचरितं प्रा० मुख्य गायादिमयं ११७५ वर्षे रुतम् गाथा ८७९०, श्लोकाः १.०५० । शान्तिरिभिः कृतं ७५०० २८५, कथावलीप्रथमपरिच्छेदः, प्रा० मु. २४ जिन-१२ १) पृथ्वी टिप्परं १९२६ वर्षे कानकचन्द्रं ११०० चक्रयादिहरिभवरिपर्यंतसत्पुरुषचरित्रवाच्यो भाद्रे २) पृथ्वी० चरित्रसंकेतो विषमपदव्याख्यावपो रल- पुर: १३८०.1 प्रभसूरुितः ५९५ । २८६. प्रिपष्टिः श्रीअपमादि ६३ महापुरुषवृत्तप्रतिबद्धा भी. ३०८. अमरादित्यचरित्रं प्रा० मूल हारिभद्रं गाथा ..... हेमसूरीया संपूर्णा । ३०९, ममरादित्यचरित्रं सं० १३२४ वर्षे प्रद्युम्नायं ४८७४] २८७. त्रिपष्टीयं श्रीआदिचरितं केवलं ५०००। ३१५. पाण्दवत्ररित्रं स० मलधारि देवप्रभसूरीयं ९८८४ ॥ २८८, त्रिषष्टीयं रामायणं पृथक् ३५१४। ३११. प्रभावकचरितं सं० क्लस्वामिप्रमुखप्रभावानार्यवृत्त. २७९. त्रिपष्टीय नेमिचरित ४९६५ । वाच्यं १३३४ वर्षे प्रामाचन्द्रं ५७७४ । १९. त्रिपष्टीयं पार्थचरित १६०० । ३१२. फुमारपालप्रतियोधः यहुपा० सतथिसोमप्रभसूरिभिः २९१, त्रिपष्टीय महावीरचरित ३४९३ प्रत्यन्तरे ५१६१ १२४१ वर्षे रुतः ८४०० । देवगिरि। ३१३. कुमारपालप्रतिवोधः सं० १५७५ । २९२. परिशिष्टपर्व अम्बषमुखाऽऽयरक्षितान्तपुमपवाच्यं ! ३१४. मुनिपत्तिचरित्र प्रा० ११७२ वर्षे हारिभद्रीय गाथा ३४६०॥ ३४४लो. ८.५। २९३. त्रिपटिगट नलचरित्रं ११७७ 1 ११५. मुनिपतिचरित्रं सं० १००५ वर्षे जपूनागमुनिकृतं २९४. पद्मानन्दमहाकाय २४ जिनकृत्तपं पं०अमरचन्द्र ३२०० टट्ट० २७०० । कविकृतं १८ बर्गरूप ८१९१ । ३१६. महीपालचरित्रं स्तम्मतीध विना न 1 २९५. श्रीपार्च 1. गणघरचरित्राणि प्रा० मुख्यानि ४३५० ३१७. उपमितभवप्रपञ्चोहारः सं० देवसरिफतः २३७० । २९६. अममजिनस्य भाविमचरित्रं मुनिरत्नप्रिमिः १२५२ ३१८. उपमितमभवमपञ्चासारसमुच्चयां वार्धमानः १४६० । ३१९, उपमितसारोद्वारः सं १३९वर्षे श्राचन्द्रशिध्यदेव- १९७. पृण्टरीकचरित्रं मं० १३५२ वर्षे कामभ, दांच न्द्रसूरीयः ५७३०॥ - वर्ष रुतम् ।

१० जैन साहित्य संशोधक-परिशिष्ट [भाग १ ~~~~~~~~~u wa.w.w.ww.www.wu पेताः ३२०. कुवलयमाला प्रा. मु. ४३५ वर्षे उद्योतनसूरीया सुरीयः १५ कथः। १३०००। ३४९. धन्यशालिभद्रचरित्रं पूर्णभद्रगणिना १२८५ वर्षे कृतं ३२१. कुवलयमाला सं० रत्नप्रभसूरया ३८९५ । श्लोका:-१४६० ३२२. भुवनसुन्दरीचरित्रं प्रा० गाथाबद्धं नाइनकुलाविन ३५०, स्थूलभद्रचारित्रं तपाजयानन्दग्रुितं श्लोकाः ६८४॥ यसिंहाचार्यः ९७५ वर्षे रुतं गाथा ८९११ । ३५१. पञ्चाख्यानकं पूर्णभद्राचार्यः १२५५ शोधितम् ३२३. हरिविक्रमचरित्रं सं० आगमिकजपतिलकसूरीय । ४६००। ३२४. सुलसाचा त्रं सं० आगमिकजयनिलकसुरीयं । ३५२. प्रद्युम्नचरित्रं शाम्गचरिनं १०७० । ३२५ मलयसुन्दरी कथा सं. आगमिक त्यतिलवाया ३५३. प्रबन्धचूडामणिमस्तुगसूरयः ३५०४ । २४३.। ३५४. २४ प्रबन्धाः ८४ कथाच राजशेखरसूरीयाः । ३२६. मलयसुन्दरी कथा प्रा. न । ३५५. लीलावतीकथा भूपणभट्टसुतरुताऽऽधरस मेनिता च ३२७. मनारमाचरित्रं प्रा. मु. गाथामयं च १५४० वर्षे परसमयगता गाथा:-१४३९ । श्रीअभयदेवसूरीशिष्य -वर्धमानसूरीयं १५... । ३५६. कथापुस्तिका अनेकविधकथाभिरनिर्दिशनामिकाभिह- ३२८. सप्तक्षेत्रीनामकथा ११७८ पर्षे गुणाकरीया ५२०० । ३२९, मुदर्शनाचरित्र प्रा० तपाश्रीदेवेंद्रीय गाथा ४.५२ । ३५७. फयापुस्तिका विविधाः । ३३०. मृगावतीचरित्रं मलधारि देवप्रभसूरीयं १८७३ । न्याय-तर्कग्रन्थाः १३१. सुरसुन्दरीकथा १६ परिच्छेदा धनेश्वरमुनिरुता संवत् ३५८. सम्मतिसूत्रं सिद्धसेनदिवाकररुतम् गा० १७० । १०९५ वर्षे गाथा ४०००। (१) सम्मतिवृत्तिमा गार्दिकता-७०० ! ३३२. वृहत्पूजाष्टकं रत्नचूडकथयांकितम् । (२) सम्मतिवृत्तिः काण्डत्रयोपेता प्रद्युम्नशिष्यअभय- ३३. रत्नचूहकथा पूजाफलवाच्या नेमप्रभाचा या ३५००। देवाया २५०००1 ३३४. पूनाष्टककथा प्रा० १०६०। (३) सम्मतिवृत्तिरन्यकर्तृका । १३५. पूजाष्टककथा सं० न । ३५९. प्रमाणकालिकाख्यवार्तिकसूत्र-वृत्ती शान्त्याचार्याये,०० १३६. विजयचन्द्रवलिकथा पूजाष्टककथागर्भा ६०, वृ० २८७३। ११२७ वर्षे चन्द्रप्रभसूरीया ४७०० गाथा ३९१०1३६०.नयचक्रवालवृत्तिमलवादीयद्वादशारनयचक्रतुम्बस्त्रन्या. ३३७. विजयचन्द्रवलिकयारहितास्तद्गताः पूनाष्टककथा: ख्यारूपा ससूत्रा १८००० । ३६१ अनेकान्तजयपताकासूत्रं हारिभद्रं सदसदादि ४ धि- ३३८. कौमुदीकथा जैनरुता १६०० । कारं-३६००-३५००। ३३९. पञ्चमी तथा दशकथानकात्मिका प्रा० महेश्वरसूरीया | ३६२ अनेकान्त० वृत्ति रिभद्री ८२५०.! २०.४॥ (१) तट्टिप्पनकं मौनिचन्द्रम् २००० । ३४०. नर्मदासुन्दरीकथा १७०० । ३६३. स्याद्वादरत्नाकरसूत्रं ८ परिच्छेद पादिदेवसूरि- २४.. जयसुन्दरीकथा प्रा० न। ३४२. सर्वांगसुन्दरीकथा प्रा० २६७५ । ३६४, स्याद्वादरत्नाकर आछणिया वादिश्रीदेवसूरिरुतः ३४३. ऋषिदत्ताचरित्र प्रा० न। ३६०००, प्रथमखण्डं विना । ३४४. कुसुमसारकथा नेमिचंद्राचायः १०९९ वर्षे रुता गा- (१) रत्नाकरावतारिकाऽऽख्या तल्लपटीका रत्नप्रभीया ५०००। ३४५. दमयन्ती कथा २, ५० (1) (२) तटिप्पन के न । १४६. सौभाग्यसुन्दरी कथा। ३६५. न्यायावतारसूत्र सिद्धसेनीयम् .! ३४७. जिनदत्तकथा १२००। (१) तदृत्तिहारिभद्री च, सू० ३२, वृत्तिः २०७३ । १४८. कथारत्नसागरः १५ तरंगात्मको मलधारिनरचन्द्र (२) न्यायावतारवृत्तिः सिद्धव्याख्यानिकरुता । भा. भा.। रुतम् । था १७००।

अंक २] प्राचीन जैन ग्रंथसूची 1 ~~ -~~-~vww d ३६६. आप्तमीमांसालंकारनामाऽहस्रोतों विद्यानन्द- | ३९२. भाप्तपरीक्षावृत्तिस्तत्त्वार्थसूत्राद्यश्लोकव्याख्यारूपा । सूीयः ८०००। ३९३. पनपरीक्षा च पत्रवाक्यप्रकारव्याख्या । ३६७. प्रमाणमीमांसासूत्र-वृत्ती हेमसूगये मु०........। | ३९४. प्रमेयकमलमार्तण्डो दिगम्बरोयप्रभाचन्द्रीयः ३६८. अनेकान्तवादप्रवेशो हारिभद्रः-७००-७३० । ११...1 १६९. सर्वज्ञसिद्धिप्रकरणं हारिभद्रम् ३००। ३९५. अध्यात्मतरगिणीटीका दिगम्वरीयतकरूपा । ३७०. द्रव्यालंकारस्ती पं० रामचन्द्रगुणचन्द्र रुतः ४००।३९६. हेतु विन्दुटीका तरूपा। ३७१. प्रमाणसंग्रहप्रकरणं ९ प्रस्तावं जैनं ७१२ । ३९७. प्रमाणवार्तिकाऽऽद्यपरिच्छेदसूत्र पौद्धीयम्, ३.१२. प्रमेयरत्नकोशः सर्वज्ञसियादि २३ वादस्थल: चन्द्र (१.)त्तिश्च आद्यपत्र. २-३ रहिता। प्रभसूरीयः १६८०॥ ३९८, तर्कभापा टाका बौद्धमतवाच्या यालाववोध ३ परि- ३७३. पइदर्शन दिङ्मात्र विचारः। च्छेदा ८४०। ३७४. पड्दर्शनसमुच्चयसूत्र-वृत्ती, सूत्र-८६, वृ. १२५२। ३९९ न्यायविन्दुसूत्रं बौद्धमतवाच्यम् । ३७५. परिणामिवस्तुव्यवस्थापनं १८०। (१) तट्टीका च धर्मोनराचार्यस्ता सू. टी.१४.1 ३७६, बोटिकनिषेधो वस्त्रव्यवस्थापनरूपः । ४००. न्यायप्रवेशकटीका च हारिभद्री स. टी. ५९७ ॥ ३७७. सर्वावममाभावाद्यभन्यनिरासवादस्थलानि ४,-३१०। ४०१. न्यायप्रदेश कटिप्पन ११६९ वर्षे श्रीचन्द्रीयम् । ३७६, केवलिभुक्ति-स्त्रीमुक्तिप्रकरणं शब्दानुशासनसत्- ४०२. तस्यसंग्रहः मरुतश्विगदिनिरासवाच्यो बौद्ध:- शाकटायनरुतं, तत्संग्रहश्लोकाश्च ९४, प्रत्यन्तरे९० । ३७९. हारिभद्रो नन्दिवृत्त्यायनमस्कारसयद्धसर्वज्ञव्यवस्था- ४०३. न्यायकुसुमाञ्जलितकः ५०४६ मितः । पनावादः। ४०४. न्यायतर्कसूत्रं (१) भाण्य, (२)वार्तिक, ३८०. सर्वज्ञव्यवस्थापनावादो योऽपि सोऽपि बहुरल्पो वा (३)तात्पर्यटीका, (४) तत्परिशुद्धि, ३८१. अपशब्दनिराकरणं २१५ । (५)न्यायालंकारपीच, (६) पञ्चप्रस्थानन्यायतकोणि ३८२, भेदाभेदाधनेकान्तव्यवस्थापन च-२००। (क्रमश:)-अक्षपाद-वात्स्यायन-भारद्वाज-वाचस्पति-उदयन. ३८३. स्याद्वादमजरी मल्लिपेणाचार्यः १३४९ वर्षे कृता श्रीकण्ट-अभयतिलकोपाध्यायरुतानि पडपि ३०००। ५३०००। ३८४. समन्तभद्रुत-श्रीवर्धमानस्तोत्रवृत्तिविषमार्थाः । ४०५. न्यायकलिकाटीका नैयायिकीय १६ पदार्थतत्ववा- ३८५. अपौरुपेयवेदनिराकरणम् । च्या. ४०५॥ ३८६. प्रत्यक्षानुमानाधिकप्रमाणनिराकरणं च यशोदेय- ४०६. सारसंग्रहो नेयायिकीय १६ पदार्थवाच्यः। साधुरुतम् । ५०७. न्यायभूपणसूत्रं न्यायसारापरनामकं ४०० ) आद्यं तु निवर्गपरिहारेण । मपी० पत्राणि ११, प्रत्य- (१)न्यायसारटीका जायसिंही २९००। न्तरे प. १४ ॥ २) न्यायसारटीका न्यायसारविचाराख्या। ३८७ श्वेताम्बरदर्शनसिद्धिः, प..१९ । (३)न्यायसार रात्रिका। ३८८. लोकतत्त्वनिर्णयो हारिभद्रः-१७० । ४०८, मतमनोहरग्रन्थगतहेतुसाष्यगताशेपविशेषनिरूपणसूत्र- ३८९, न्यायकुमुदचन्द्रसूत्र-वृत्ती दिगम्वरीय कलङ्कदेव-भ. ध्याख्यारूप ७४०। मादेन्द्ररूते सु. वृ. १६०००। ३९०, प्रमेयरत्नमाला परीक्षामुखलघुवृत्तिरपरनानी, तसूत्र | ४०९. पट्पदार्थपवेशप्रकरणं वैशेषिकीयं-९५० । ४१० भास्करभूषणः पृष्टयादिवाच्यः । च-वृ. १५६७, सू. १४.। ३९१, न्यायविनिश्चयवृत्तिः-अनन्तवीर्यरुता दैगम्बरी । ४१, किरणावली। ४१२. न्यायतन्त्रटीका व्याख्याखण्डम् । * कवर्ग-चवर्ग-टवर्ग-इति वर्गत्रयगतव्यञ्जनानि परि-४१३. किरणावलीटिप्पनके द्रव्यपदार्थः २३७३ । हत्यान्यैर्व्यञ्जनरेतत् प्रकरणं रचितम् । ४१४. कन्दली-किरणावल्योः सूतम् ७७७॥

हभाग १२ जैन साहित्य संशोधक-पशिष्ठ A 06 ५.००! ४५.. मान्दका श्रीधरे. १०४८ हा वै- १३३. मनपारायनन्। ४३८. नो दिने ३२५०! म. मन्दादिपद पं. नाचन्द्र २५०० ! ४३९. मन्यायनि: १५ ४१..अन्दरका १३८५ र सदस्य ४.० ममम.टा १८०1 मनाममाढावृत्तिः । काम प्रभुमोरेमनरे. ४८. न्यायलिवनी। १२. यनि-, ........! 2. हैमानेकाजाममालानु प १६२५१ १२. श्वाइसरई मनिपुरोग्य मा श्रीलम. (हेमनेकार्थनामनाला व्यारा स्वरकाषा, ९.. स्वर-जनमे नामाउन्त- ४९.दहनामिविया जनकावा महन्द्रदीका ६.६६०॥ ४२. नन्न्इन्दताझे डोदेले परिच्छेदाः ४, ...मदेशनाममात्रम् । (:) हेदनमारका रनावकी-इति नाली मिर- • जनस्पतिनन्दनः गोटकनन्निद्धा-३१३०-३५०० व्याकरण-कोश-अन्याः । ४ रमाइदिवसापर हैनसंबदम् । ४४४. हैमवतनन-वृत्ती पं. गुन्चन्द्रभन्दै मू. २१.. ११001 ४९४ हमादि ३. लानुर...! ४५. करमनुइयोऽविकारत्रमालक, इशस्वृदिया 1) हम्चनु पदमारमा हैनन्दनावृष्टि १२८० वर्षे प्रमभूनिकृतः प्रायनिमः हेमन्मृतिः, एवम् १८:.. ४४६. मुटव्यावर नज्यनिरिकतम् । २01-1-1-1-1-1-.--१२-२३ ४४३. कात्रानान नामचनुशाबाटकवृति:- पदे : महाविनान! ४.कन्या:-.::न! ४४८, कानन्त्रन्नुभयन्का-टिजनदाता दगम्हविधान व्याया। ४२. नाम:-...! ५४९. कलादाइरेटौनिगमम्मदा २.३६ ! ४२९. मदरो ठन्वारः कान्म: २८ पाद- ४.० किम्बुमिन नस-नाभन्। १५. कन्नन्दः २१.०, ८०.. ५... मशिनपदव्यर! ४५२. बादलराम त्रिलोचनदवीयन् । ५३.१-दृव देवनुकसान:-- इंटिस ४३. कलाकारों न्यास भाव याबद् ४१..मदद रिः २४८ ४.५. हरि दिन। हरेन्द्र मेहता २० बिट्रेः लाकर मट- १५. निमारमनःसनो वृद्धिदरमहा- . नरचन्दनना नोवामा ४५६, करनादितिः पाद पस्क। ४३. नुक-फर-दरनिः.. -दर लघुतिः... ".. प.य. ४५. पायालागसपनं ३।। ५३. नयन इन्लाई १ नम्-. . ४५८. मेरलनाडामा दिदर रनपाल- रू-३ रन्दन दुन्द जिवामा महिण्यम् । १३. मनुष्य का २२:३! बाद निकायस्वदसम्हारिकार५१ ४३६, नरक ३६८. ! ४६. हिन्मुन्नाः ५०० . .. का अंक] प्राचीन जैनबंधसूची . ~~~~ -~~~~~ १६१. कातन्नोत्तरं विद्यानन्दापरनामकं समासप्रकरण | ४८८, काव्यप्रकाशविकाशः ...। यावन् विद्यानन्दसू० रू. व्या० । ४८९. काव्यप्रकाशावर्णिः १२५० । ४६२. लिङ्गानुशासनममरहतं अमरकोशसंबद्धकाण्डवये ४९०, काव्यप्रदीपिका सूत्र-वृत्तिगर्भा पाहदेवरुता ...। १४७० । ४९१, काव्यानुशासननामालंकारचूडामणिवृत्तिः श्रीहेम- ४६३. लिङ्गानुशासन ३४ आर्यामितं वामनकृतं ३४! सुरीया 6 अध्याया २८००-४२०० प्रत्यन्तरे । ४६४. अमरकोशशेषः । ४९२, अलङ्कारचुडामणिवृत्तिविवेको हेमसूरीयः ४०००। ४६५. अमरकोशटिपनकम् । ४९३. दण्डयकार:...1 ५६६. स्यादिसमुच्चयः १० अमरकविकृतः । ४९४. अलंकारमहोदघिटीका मलधा. नरेन्द्रप्रमाया १२८- ४६७. त्यादिसमुच्चय: अमरकविकृतः। वर्षे रुता ४५..1 ४६८. लौकिकत्यादिप्रक्रिया सर्वधरहा। ४९५. कविशिक्षा नाम काव्यकल्पलता सु. ५००। ४६९. सारस्वतव्याकरणं १२२० । (१) सूत्रवृत्तिः पं० अमरकविरुता वृ० ३३५७ । ४७०. सारस्वत टेपनकं १२.० । ४९६. वाग्भटाल्डारवृत्तिः ६०० । ४७५. सारस्वतव्याकरणप्रक्रिया । ४९७. रुद्रटारकारः ६ अध्याय:। ४७२. गणरत्नमहोदधिः ६० वर्धमानेन ११९७ वर्षे कृतः । ४९५. कविशिक्षा अप्पभट्टशिष्यविनयचन्द्ररुता। ४७३. शाकटायनव्याख्या पयः। ४९९, अलझारसर्वस्व राजाकोरुचकरुतं १६००। ४७४. शब्दप्रभेदानुयायिनाममाला महेश्वरकांवरुता। ५००. काव्यकल्पलतापरिमलः, पं० अमरकविरुतः। १७५. काशिकावृत्तिः पाणिनिरुता । (2) ५०१. श्रीभोजराजसताऽलङ्कारस्य वृत्तिः पदप्रकाशनानी । ४७६. व्याकरणरत्नकोशः पाणि लघुत्रु.॥ माजकृता काव्यधन्धादिवाच्या......। ४७७. रूपावतारकसंक्षिप्तव्याकरण पाणिनीयसंप्रदात्मकं | ५०२. चन्द्रालोकालङ्कारः पं. अमरकविरुतकाव्याम्नाय: समासान् यावत् । गद्यपद्य काव्यग्रन्थाः। छन्दः-साहित्यग्रन्थाः। ५०३. श्रद्वपाश्रय महाकाव्यं श्रीहेमसूरीयं २० संगै संस्कृत ४७८. हलायुवच्छवृत्तिर्भटहलायुधरुता ॥२३३ । २०२८-३०२॥ ४७९, छन्दप्रदीपो विप्ररुतः ५०.। ५०४. द्वथाश्रयकाव्यपाद २८ वृत्तिः, १३१२ वर्षे खरतर- ४८०. वृत्तरत्नाकरो महकेदारकृतः १५० ! अभयतिलकीया १७५७४ । (१) तवृत्तिः श्रीकण्ठरुता ॥२०॥ ५०५. प्रारुतद्वयाश्रयसूत्रं है ९५० । ४८१. जयदेवच्छन्दःशास्त्रवृत्तेः टिप्पनकं श्रीचन्दसूर. ५०६. प्रास्तद्वयाश्रयपाद ४ वृत्तिः. खरतरपूर्णकलशीया रुतम्। १३०७ वर्षे कृता ४२३०॥ ४४२. नन्दिनान्यत्रारुतछन्दोवृत्तिः श्रीदेवाचायशिष्यप्रकरण-५०७. धर्माभ्युदयकाव्यं वस्तुपालचरित्रवाच्यं, उदयपीय सु (शत ?) कारिरत्नचन्द्रगणिकृता। ५२००-५०४०॥ ४४३. छन्दोऽनुशासनाऽपरनामकच्छन्दश्चुभमणिवृत्तिमसू- ५०८. श्रीशालय काव्यं शालिमचरित्रवाच्यं पं० धर्मकुमार- रिकता ४१००-२९९९ । कृतं १३३४ वर्षे १२२४॥ ५८४, गाथारत्नकोशी गाथालक्षणादिवाच्यः ७३ । ५.९. श्रीधर्मनाथमहाकाव्यं २१ वर्ग दिगम्बरीयकाच्यादि- ४८५. काव्यप्रकाशसूत्र-वृत्ती १० उल्लासे सू. १४१ वृ. बन्धकांव-हरिचन्द्रकृतम् । १७३० । ५१०. श्रीनेमिचरित्रं महाकाव्यं संस्कृतं गद्य-पद्यमयं बहु. ४०६. जयन्तीदीपिका जयन्तपुरोधःकृता ४.३० । चण्डितं १०९० वर्ष भोजराजराज्ये सूराचार्यरुतम् । ४८५. काव्यप्रकाशसंकेतः १२१६ वर्षे माणिक्यचन्द्रीयः ५११ श्रीनेमिमहाकाव्यटिप्पनकं १४०० । ३२४४ ॥ ५१२. श्रीन मिनिवाणक.व्यं वाग्भटकृतं १५ सर्ग १३६० । प०२०।

जैन साहित्य संशोधक-पारीशष्ट [ भाग! -.. -~-~~-~-~~- ~~rnwvanww.moniwwwvv ५१३. नेमिनकाव्यं विक्रमकृतम् । ५१४. कुहिनीमतकाव्य सं० दामोदरकत १२९ । ५१५. विक्रमांकाभ्युदयकाध्यम् । ५१६. बालभारतं ४३ सर्ग 'अमरकविकृतं परसमयवाच्य ६७७४ । ५१७. अभिनन्दकाव्यं रामचरित्र वा ३६ सर्गम् । ४.८. सोमपालविलासकाव्यम् । ५१९. जल्हणझविरुतकाव्यम् १०००। ५२०. नरनारायणनन्दकाव्य मन्त्रिवस्तुपालकतं १६०० । ५२१. तिलकमन्जरीकथा, धनपालसता चम्पूरूपा वर्णन. सारा1 ( (3) तिलकमञ्जशीटप्पन शान्त्याचायीयं १२००। ५२२ तिलकमन्जरीसारोद्धारो लघुधनपालकृतः-१२०० । ५२३. कादम्बरीकथा वाणकविरुता पुलिंद्रकृतसंधाना । ५२४. सौभाग्यमंजरी कथा सं० गद्यपद्यमयी, परतीर्थ पं० म. हेद्ररुता ३१.०। ५२५. वासवदत्तकथा सुबंधुकविरुता । १) वासवदत्ता टोका नारायणकविरुता। ५२६, चम्पूकथा ७ उल्लासा निविक्रमभरुता दमयन्तीक- थाऽपरनाम्नी २५००। (१) चम्पूकथादिटिप्पन चण्डपालरुतं १९०० । ५२७. शातवाहनरुतगाथासप्तशती......! (१) टीका भुवनपाल कृता ४५०० । २) शात. गाथावृत्तिः,श्रीआजडेन रुता। ३)शात. गाथायीत्तः, जल्हणदेवरुता । ५२८. रघुकाव्यं २० सर्ग १५७२ । ५२९. माघकाव्यं २० सर्ग २७०० । (.)माघकाव्यटीका वल्लभदेवरुता १२००० । ५३०. सुमारसंभवकाव्यं ४ सर्ग ६१५ काव्यानि । (1) कुमारसंभवकाव्यवृत्तिदिगम्बरीयधर्मकीर्तिकता। ५६१. मेघदूतकाव्यम् । (1) मेघदूतवृत्तिः। ५३२. किरातकाव्यं १८ गगे भारविविना व कृतम् । (१) किरातकालस्य भारवीयस्य वृत्तिः प्रकाशवर्षः रुता। (२) किरातार्जुनीयकाव्यटीका लोकानन्दकता। ५३३. गौरवधकार्य गाथाः ११६८। ५३४. नैषधमहाकाव्यं श्रीहर्पकविरुतं २२ सर्ग काव्यानि ४००९। (१) नैषधटीका चाण्डवी। (२) नेपघटीका गादाधरी। (३) नैपधीटीका विद्याधरी। ५३५. दशरूपालोकम् । ५३६. भारतशास्त्रम्। ५३७. धनुर्विद्या च। नाटकानि । ५३८. रघुविलासनाटकं पं० रामचंद्ररुतम् । ५३९. नलविलासनाटकं पं. रामचन्द्ररुतम् । ५४०, चाणाक्यनाटकम् । ५४१. मोहपगजयनाटक मन्त्रियशः पालरुतं श्रीकुमारपा- बनृपप्रतिबद्धं पायोऽन्तरङ्गवाच्यं १३२० । ५४२ मानमुद्राभजननाटकं सनत्कुमारचक्रि-विलासवती- संवन्धप्रतिबद्धं देवचन्द्रगणिरुतं १८०० । ५४३. प्रबुद्धरौहिणेयं रामचन्द्रीय १००० । ५४४. मुद्रितकुमदचन्द्रनाटकं यशश्चन्द्ररुतं ५३५ । ५४५ प्रबोधचन्द्रोदयनाटकं १०१०। ५४६. दूतांगनाटकम् । ५४४. शृंगारतिलकनाटकम् । ५४८. मुगरिनाटकम् । (१) मुरारिटिप्पनक देवप्रभसूरिस्तं ७५..। (२) मुरारिटिप्पनकं मल. नरचन्द्रसूरीयं २३५० । ५४९. अनयराघवनाटकम् । ५५०. मुद्राराक्षसनाटकं चन्द्रगुप्त-चाणाक्यसंघद्ध विशाखदेव- रुतं। ५५१. सुरुतमण्डनं वस्तुपालसंबद्धम् । ५५१. राघवाभ्युदयनाटकं पं. रामचन्द्र रु १० अंकम् । ५५२. चन्द्रलखाविजयनाटकम् । ५५३. विक्रमविशीनाटकं कालिदासरुतं ५० ! ५५४. कर्पूरमंजरी नाटकम् । ५५५. रत्नावलीनाटिका हर्षदेवकृता ७३३ । ५५६. वनमालानाटिका पं. अमरचन्द्रकृता। ज्योतिः-शकुन-योगाम्नाय-मन्त्र-कल्प-सा- मुद्रिक-शास्त्राणि। ५५७. आयज्ञानतिलकसून-वृत्ती वोसिरिरुते सू. गा. ४५॥ ५५८. आयसद्भाव: ५९५ । वृत्तिः १६०० ।

संक] प्राचीन जैनग्रंथसूची '".R.A...APN-CHrvr. wrAAAA.....AAAAAA.. Amr.Are.....AMARANA ५५९. करपवंतः (?). ५९०, स्तज्ञानं पासावलीविशेष लो. २१५॥ ५६०. प्रइनव्याकरण ज्योतिर्वृत्तिः । ५९१: मातृकाकेवली ५० ५६. चूडामणियन्यः २३०० । ५९२. देवतादि ११ द्वारैः कालज्ञानम् । ५६९. चूडामणिसारग्रन्यः४१ प्रकरणो रक्ष्मणमाकृतः६७२ ५९३. प्रारुतं पिपालिकाज्ञानम् । ५६३. निशती धीधराया। ५९४ नाडीसंचारज्ञानं च। ५६४, गणितशास्त्रम् । ५९५. सिद्धाज्ञापद्धतिः । ५६५. चन्द्रन्मिीलनचूडामणिसारशास्त्रम् । ५९६. नायपुस्तिका योगिनामाम्नायग्रन्थसत्ता हरीनेखलाज. ५६६.ज्ञानमन्जरी नाश्चर्यक्रराजनसिद्धयादियोगादिवाच्या, खेलवाडि मा- ५६५. वस्तुसार १, ज्योतिषसार २, द्रव्यपरीक्षा ३, रत्न हुयारुता, गाथा १३९७ । परीक्षा ४, त्रांशी तवृत्तयः ६ प्रन्थाः १३७२ वर्षे ५९७ अर्घकाण्डं दुर्गदेवायं अ० १०-१४७ ॥ 8. फेकृताः। ५९८. मन्त्रमहोदधिः प्रा. दिगम्बर श्रीदुर्गर्दवस्तः, मं. ५६८. गणिततिलकग्रन्यवृत्तिः सिंहतिलकसूराया। गा. ३६। ५६९. प्रदनप्रकाशो नरचन्द्रमरिकृतः २० प्रकाराः ३६. । ५९९. भैरवपद्मावतीकल्पः श्रीमलिग्रेगरिकतः ४०० । ५७०. नरपतिजयचर्या एकाशीतिकादि ८४ का। ६००, रुद्राक्षकल्पः ७५ ५७१. नरपतिजयवर्या गतग्रहा। ६०१. बेतार्ककल्यः। ५७२. नयनपूर्वापानतिथिविवरण करणशेखावृत्तिनामकं ६०२, कामरूपपत्राशिका निमित्ताच्या तवृत्तिः सू. वृ. ८८ १९.। गा. (391 ५७३. वागहीसंहिता सूध-वृत्ती-४०००। ६०३. वसन्तराजो लावशर्मणः २३५० ॥ ५५४. भाद्रपाहवी संहिता सूत्रम्......। ६०४. शकुनसारोद्धारो माणिक्यसूरीयः १३३८ वार्षिक: ५७५, सारावलीज्योतिकं २५०.1 ५०८॥ ५५६. ज्ञानदर्पणज्योतिप्कं त्रैलोक्यप्रकाशं हेमप्रमसूरिशतं ६०५. शनशास्त्रं प्रारुतं वार्तामयं . १४ ११४१ 1 ६०६. सामुद्रिकम् ६७॥ ५७७, भुवनदीपकः पाप्रमः १६७ ॥ प्रकीर्णकग्रन्थाः। (१) वृत्तिः सिंहतिलकोया १५०० । ६०७. श्रीशान्तिनाथचरितं दिगम्बरीयं गा. २१९६। ५७८, रनकोशज्योतिकम् । ६०८. यशोधरचरितं दिगम्बरीयम् । ५७९. रत्नमालाज्योतिः। ६.९. यशोधर काव्यपीजका। ५८०. परिसंवत्सरादिदेवगन्धा अनेकविधा इह अनिदिए- ६१०. प्रतिक्रमणटीकासूत्रं दिगम्मरीयम् । नामकाः। ६. आनन्दसमुच्चयः। ५८१. हर्पप्रकाशज्योतिप्कं हर्षदेवगणिरुतम् । ६१२. अध्यात्मशानं बहुप्रकरणमयम् । ५८९. चन्द्रार्कमहसारज्योतिष्कम् । ६१३. पातञ्जलियोगशास्त्रवृत्तिः सूत्रयुता श्रीभोजराज- ५.३. आशाधरीयपद्धतिः, यन्त्राणि च । ५०४. बृहज्जातकं २५ अध्यायरूपं वराहमिहिरीयम् ४०० । ६१४. आत्माववोधो मला..देवप्रभसूरिरुतः ५५० ॥ ५८५, श्रीधरीयजातकपद्धतिटीका । ६१५. ज्ञानार्णवोऽध्यात्मवाच्यः श्रीशुभचन्द्रसूरीयः हेमयोग- ५८६. पट्पञ्चाशिकावृत्तिः सप्ताध्याया ५५० । शामतुल्यवाच्यो व वैराग्यः ४०००। ५८७, प्रश्नज्ञानपद्धतिः महोपलझता १८० ६१६ ज्ञानदीपिका पिण्डस्थादिध्यानवाच्या। ५८४. विद्वजनवटमाख्यप्रश्नज्ञानं १९ अध्याय श्रीमोजी- ६१७ तत्त्वार्थसाराख्यं मोक्षशालं अमृतचन्द्रसूरीयम् । ६१८. संवेगट्ठमकन्दली विमलाचाशता, कारिका ५२ ॥ ५८९, पुस्तकेन्द्रग्रन्या गा. ११५! ६१९, ज्ञानार्णवशुद्धोपयोगसूत्रम् । रुता। यम्।

२६ torrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrrs' bhan.anir... in । जैन साहित्य संशोधक-परिशिष्ट भागः । moreninamaniami namamanna ६२०, ज्ञानाङ्कुशः का. २८1 ६३९. सुमाञ्जस्यादिवाच्या समुद्राचार्यरुता:२५० ६२१. योगकल्पद्रुमः। ६४०. ग्रहदोषज्ञानाध्यायः (..), ६२२. अमृतादित दोषशान्तिक जैन (२)... ६२३. विरूपाक्षयोगशतं गा. १०१, अ. ६१ लौकिक (३) ६२४, साम्यशतं विजयासहीयं १०४.। त्रयमपि सिंडतिलकसरिकतं त्रयाणां अथांगम् १२४ ६२५. शमभावशतं अन्तरकथावाच्यं श्रीधर्मघोपरिक संख्या पल ५। तम् १०२। ६४१:मालोचनाविधान-आलोचनपदसंग्रहादयोऽने के संग्रह। ६२६. गीता भारते भीष्मपर्वगता ७६ | ६४२. सूकरत्नाकर-सुभाषितसमुद्रप्रमुखाः सुभाषितप्रन्या ६२७. धर्मपरीक्षा परसमयाऽसंबद्धतावाच्या दिगम्बरीयाs. अनेकविधाः सर्वे धर्मकुमारीयाः मितगतिरुता। ६४३. शुभावली। ६२८. वजसूत्री विप्रजात्यादिनिरासवाच्यां । ६४४. दानादिप्रकरणं सं. सूराचार्य स्तं सतावस काम्यादि ६२९, भविष्योत्तरोद्धारः परसमयवहुम्वरूपवाच्यो जनत: बन्धं प.३४ । परसमयज्ञानाय। ६४५. सुधाकलशाख्यसुभाषितकोशः रामचन्द्र क्षत ६३०. द्विजवदनदपेटा विप्रजात्यदिनिराकरणवांच्या । पन्न.:....।' ६३३. वनस्पतिसत्तरी (१) श्रीमुनिचन्द्रसूरि - ६४६. दीपालीकापः १.४४- 1 ६३२: पाक्षिकसत्तरी (२) कृता. (प्रत्येक) ६४७. दीपोत्सवकल्पः, सं. १३८९: वर्षे ,विनयचंन्द्रकृतः ६३३. अगुलविचारा (३) २७४। ६३४. सम्यक्त्वस्वरूपं जिनचन्द्रगणिरुतं, मा. १०४। ६४८. दृष्टान्तशतं १०४.....: ६३५. जिनंप्रतिष्ठा। ६४९. तत्वबिन्दुः ७१. ६३६. यतिप्रतिष्ठास्थापनस्थलं जिनदेवसूरिकृतं, ११८५ वर्षे, ६५० योधप्रदीपिका ५२ । प.२६ । ६५. सिन्दूरप्रकरः ९८ : ६३७. श्रीशान्तिवनलीया पर्वपक्षिका लपविध्यादिवाध्या' ६५२. इष्टोपदेशः ५: । ६३८. श्रीशीलाचार्यांया धूमावल्यादिवृत्तिः । ६५३. सर्वेऽपि सूक्तकंपाः अन्धामम् ३८५ गा.'७० . " ..

. JanA हरिभद्राचार्यस्य समयनिर्णयः। न - - त्मक दृष्टि से लिखे हुए लख भी इसमें रहते हैं और ये बडी ही निष्पक्षता और उदारताले लिग्ने जाते " सुप्रसिद्ध महान् तस्यानाचार्य हरिभद्रसूरिना है। यह सब संप्रदायोंको समधिसे देखता है। समयनिर्णय संबंधी जे संस्थत नियन्ध्र मुनिराज जनप्रन्योंकी समालोचनायें भी इसमें रहती हैं । श्रीजिनविजयजीय. पूनामां,मरापल 'प्रथम प्राच्य वि. प्रत्येक जैनीको इसका प्रहक होना चाहिए। वार्षिक या पण्डिन परिषद्' भागळवांच्यो हताने जुदापेम्फ- मूल्य दो रुपया । ग्राहक वर्ष के प्रारंभ और मध्यसे लेटमय छपाईने प्रकट करवामां आव्यो छे. निवन्ध बनाये जाते हैं। वर्ष दिवालीसे शुरू होता है। सरल भाषामा लखाएलो होई अनेक अपूर्व पनि माणिकचन्द-दिगम्बर जैनग्रन्थमाला। हासिक मुद्दाओथी भरपूर छ. संस्कृत भाषा जाण नार दरेक विद्वानने अवश्य वांचया लायक छ.कि इसमें दिगम्बर सम्प्रदायक संस्कृत और प्राकृत मात्र ४ आना. घाटेज खर्च जू१. भापाक प्रन्थ प्रकाशित होते हैं और सब ग्रन्थ समराइच्चकहा। सिर्फ लागतके मूल्यपर. येचे जाते हैं। स्वर्गीय दानवीर सेट माणिकचन्द हीराचन्द ज० पी० के आटमा संकाना प्रग्यात महात्मा याकिनी मह- स्मारकम यह निकलती है। अब तक इसमें नीचे जरासून श्रीहरिभद्रसारण, प्रशमरसपरिपूर्ण आ लिखे १५ अन्य निकल चुके हैं। प्रत्येक लायब्रेरी में काथा-धनी रचना करी छ. आना जोटाना बीजों इनका एक एक सेट मँगाकर रखना चाहिए। अंध मळयो दुर्लभ छे. मूळ ग्रंथ प्राकृनमा छे. पण १ लघीयत्रयादिसंग्रह, भट्टाकलंककृत मू० अमे मूळ माथे तेनो संस्टत अनुवाद पण छपान्यो २. आ पुस्तक मुंबईनी युनिवर्सिटीप. पोताना पाव्य २ सागारधर्मामृत सटीक, पं० माशाधरकृत । पुस्तकोमा पण दाम्पल कर्यु छ. भा ग्रंथमा समरा विक्रान्तकौरवीय नाटक, हस्तिमल्लकृत दिस्य राजाना कुल दवभवोनी वाती छे, तेमांना ४ पवनाथचरित, वादिराजकृत । त्रण भत्री अमोद प्रकट कयों छे. मृल्य म०-२-८-० मथिला कल्याण नाटक, हस्तिमलात ६ आराधनासार सटीक, देवसेनकृत 1-11 आ काव्य रत्नचन्द्र उपाध्याये रचेल छ. श्री. ७ जिनदत्तचरित्र, गुणभद्रकृत 1-11 रस्न वन्द्र प्रसिद्ध श्रीहरिविजयमरिनी संततिमांना ८ प्रद्युम्नचरित्र, महासेनकृत. एक पंदित रत्न छे. शान्य घणुंज सरस अने सरल ९ चारित्रसार, चमिण्डरायकृत छ, तेमा संस्थत भाया द्वारा कृष्णना पुत्र प्रद्युम्ननी, रनमय वाती वर्णववामा भावेल छ. मु०-२,००० १० प्रमाण-निर्णय, विद्यानन्दकृत जैन साहित्य संशोधक कार्यालय. ११ आचारसार, वीरनन्दीकृत पोस्ट खर्च जहुँ । टे. भारत जन विद्यालय, फर्म्यु- १२ त्रिलोकसार सटीक, नेमिचन्द्रकृत समजबु सन कॉलेलरोड, पूनासिटी. १३ तत्वानुशासनादिसंग्रह, जैन-हितैषी । १४ मनगारधर्मामृत सटीक, आशाधारकृत १ रु. हिन्दीका सुप्रसिद्ध मासिक पत्र । इसमें दिग- १५ युक्त्यनुशासन सटीक मूल समन्तभद्र म्बर और श्वेताम्बर दोनों संप्रदायोंके विद्वानोंक मिलनेका पत्ता- लेख रहा करते हैं। ऐतिहासिक लेखोंके लिए यह मैनेजर जन अन्यरत्नाकर कार्यालय, बास नौरसे प्रसिद्ध है। अब तक इसमें अनेक महत्वके लंग्य निकाल चुके हैं। जैनधर्मपर तुलना- हीरावाग, पो०गिरगांव, बंबई। ३ . ५ । प्रद्युम्नचारित्रम्। 11 A . . - M m ३ रु. . ।

जैन जागति जैन जागृति जैन जागति (पाक्षिक पत्र:) सम्पादक-मुनिराज श्रीजिनविजयजी . . तसं त्राहा .. डोनमें नालो.? जैन समाजनी वरी हालत. उपर पर सारा सारा लेखो अने विचारों जाणचा इच्छो छो? जैन धर्मनी उन्नति थाय हमेशां आव्या करशे छो दुकाणमा कहीय. तो जैन संघमा केळवणी जो आप्रश्नाना उत्तर एम आपवानी विषयक, व्यापारविषयक राष्ट्रविषयक समाज मंजा हाय तो तो आजे ज. एक काई लग्बी जैन विषयक अने' धर्मविषयक दरेक प्रकारनी जा साप्रति नामना. पाक्षिक पत्रना नाहक लीस्टमा गति उम्पन्न करवा माटेग पत्र प्रामद्ध करवाया योनान नाम दाखल करावी. यो. ::: आवे छे: भारतवपना नवीन उदयना सेता वर्षे एटले 'पत्रना आदर्श माने विशेष लेख नका, छे मावती कार्तिक शंदी प्रतिपदाना, दिवस-या कारण के मह वाचको पटला उपर यों जाने पोनों प्रथम अंक प्रकटे अशे अने पछी हमेशा बाबतमा विचारी शेकशे के गर्ने सम्पादन कार्य: दर प्रतिप्रदाना दिवस त-प्रेकट थतुं रहशेः स्वयं मुनिराज श्रीजिनविजयजी महाराजना जैन समाजन उत्तम अने साम वाचन आपका हस्तक यश. बहुना? मौर, नेमज दरेक सामाजिक अने धार्मिक प्र. पत्रनी भाषा मुख्य करीने गुजरती रहो. नोना पक्षपातशन्य विद्वत्तापूर्ण अन युक्तिसंगत परंतु लिपि देवनागरी (बालवात्र) रहे। खुलाला आपयां माटे आ. पत्र अंक्रट करचीमा पजाब, राजपुताना अने पूर्वदेशना भाईओं पण आवे छे. एमां बोधकारका मार्गदर्शक उत्साह- सरलताथी तना लाभ लाई शकश प्रेरक संचि उत्पादक अने आनंद दायक पत्रन चार्षिक लवाजम. टपाल खर्च सार्थे लेखों आवशे..जैन समाजनी वर्तमान परिस्थि- शारु (अड़ी रूपिया) राखामा आवशेः प्रा- निओं, उपर प्रामाणिक विचारो दर्शाचवामा महको.पुरती ज नकलो. कादवामा विशे. तेथी 'जीवन कांगहना आ भयंकर संक्रांतिकाल ग्राहक थवा इमनारते, तुरतमांजः एक माँ आपणे व्यावहारिकवर्नन के होवू जोईपलखी तवी-सूचना करी देवा विनंती के जडवादना आ प्रचंड तोफानो लमयमा आप पंत्र व्यवहार नाना शिर नामे करवों धार्मिक आचरण कबु धेचु जोईए : अने स्वा. यवस्थापक न्यता आउ,खल युगमा आपणुं सामाजिक बंधारण के बनई जोईए.?.५ प्रश्नो उपर आ जन जागृति कार्यालय एनमा उमदा, ऊहापोह करवामां आवशे. सामा C/भारत जैन विद्यालय जिक भने धार्मिक विषयो उपरांत; नतिक, वैज्ञा; निक, ऐतिहासिक साहित्यिक आदि विषयों, Publishe-Becharmasjivaraj Pandit, Jain : Sahitya: Sanshoulhnka Sini Fergusson College Rond; Poont City :Printer Vásmau Bhaurao Kolate Hanumn Piggs Sadlaşhiv; 300 Pooul: City पूना सिटी RAMPUR

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Jain Sahitya Samsodhak Vol - I

Author
Muni, Jinvijay
Title
Jain Sahitya Samsodhak Vol - I
File name
Jain Sahitya Samsodhak Vol - I
Text
OCR done
Published
2009/11
Publisher
Poona, Jain Sahitya Samshodhak Samaj
Language
Sanskrit
Pages
134
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain Sahitya Samsodhak
DLI number
344441
Barcode
99999990234306.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
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d4raoCiyHj9
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