Shri Jain Swetamber Khartargacch Sangh, Jaipur
Shrimad Rajchandra Aur Bhakta Ratna
Front matter
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श्रीमद
और
भरतरत्न
क पर प्रशासक
प्रेमचद ग्यजीभाई कोठारी
MARNA
आपापक
टॉफ्टर जगदीश जैन
एमपीसी
R
प्रकाशकः
प्रेमचंद रवजीभाई कोठारी
नवनीत नगर, ब्लॉक नं. ९,
महात्मा गाँधी रोड, घाटकोपर,
बम्बई - ७७
.आश्चर्यकारक बात तो यह है कि इस कलिकाल ने,
थोड़े ही समय में, परमार्थ को घेर कर, अनर्थ को ही परमार्थ
बना डाला है..."
-श्रीमद् राजचन्द्र
प्रथम संस्करण :
१९६७
मुद्रक:
श्री. दीनानाथ पां. देशपांडे
श्रीपाद प्रिंटिंग प्रेस,
१२, सदाशिव स्ट्रीट, बम्बई - ४
मूल्य : ३=०० रुपया
धीमद् राजचन्द्र
और
भक्तरल
विपय-सुची
पृष्ठ
-
!
अनुवादक की ओर से
प्रकाशक का नम्र निवेदन
सत्य मुक्ति मार्ग (सक्षिप्त रूपरेसा)
मध्यात्म युग -प्रवर्तक श्रीमद् राजचन्द्र
निष्काम करुणामूर्ति श्रीमद् लघुराज स्वामी (प्रभुधी)
सायला के सन्त श्री सोभागभाई
सत्यामिलापी थी जूठाभाई
सत् आज्ञाकारी सेवक श्री अम्यालालभाई
श्री सोभाग्य तत्त्व गीता
छह पद का पत्र
१०१ रत्न कणिकाए (श्रीमद् राजचन्द्र वचनामृत से)
योधपचन (श्रीमद् लघुराज स्वामी के उपदेशामृत से)
.
७१
७५
७६
अध्यात्म युग प्रवर्तक
श्रीमद् राज चन्द्र
अनन्त काल में भटका, न मिला सद्गुरु सन्न.
पंचम काल में प्रभु मिले. राज नाम भगवन्त ।
शुद्ध सन्त चरण न, मागं प्रेम प्रसाद,
दया करके दीजिए, हरि रस अमृत स्वाद ।
वाणी वर्णन न कर सके, सद्गुरु का स्वरूप.
बुद्धि वल पहुँचे नहीं, उपमा रहित अनूप ।
प्रथम पूरण प्रेम से, चंदू सद्गुरु चरण,
ताप टले संसार का, मिटे जन्म औ मरण।
6 જળહળ જયોતિ સ્વરૂપ તુ કેવળ કૃપાનિધાન
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क अनुवादक की ओर से सन्तों की परम्परा हमारे देश में बहुत पुरानी है। उत्तर भारत, बगाल, गुजरात, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में समय-समय पर सन्त-महन्तों ने जन्म धारण कर अपने मानवतावादी उपदेशों से जनसमूह को कल्याणमार्ग की ओर प्रेरित किया है। इनमें कबीर, मीरा, सुन्दरदास, सहजानन्द, नरसी मेहता, अखा, दयाराम, छोटम, ज्ञानेश्वर, रामदास आदि कितने ही सन्तों का उल्लेख श्रीमद् राजचन्द्र ने मुमुक्षुओं को लिखे हुए अपने पत्रों में अत्यन्त श्रद्धापूर्वक किया है । श्रीमद् राजचन्द्र का जन्म सन् १९२४ में काठियावाड के अन्तर्गत मोरवी राज्य के वाणिया नामक गाव में हुआ था । लघुवय से ही उन्हें अपूर्व तत्वज्ञान की प्राप्ति हुई थी। स्मरण-शक्ति उनकी अद्भुत थी जिससे कि कोई भी बात एक बार देखने या सुनने से उनके हृदयपटल पर अकित हो जाती थी। शतामधान के प्रयोग दिखाकर उन्होंने कितने ही लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया था । लेकिन इन सब बातों से भी अधिक महत्वपूर्ण थी उनकी आत्मज्ञान प्राप्त करने की जूझ-अन्तर्मुखी होकर निज स्वरूप का साक्षात्कार करने की अनुपम लगन । गृहस्थाश्रम में उन्होंने प्रवेश किया था और हीरे-जवाहरात के वे अत्यन्त कुशल व्यापारी थे, फिर भी लौकिक महत्वाकाक्षाओं से वे सदा दूर रहे । दुनिया में रहकर भी दुनियाकी मान-प्रतिष्ठा को उन्होंने स्वीकार नहीं किया, निष्काम भावना से ही वे अपने लौकिक कर्तव्यों का पालन करते गये। श्रीमद् का कहना था कि दुनिया में झूठ, फरेब, अहकार और पाखण्ड की अति हो गयी है । इन सब प्रवृत्तियों को देखकर उनका निश्ठल हृदय करुणा से आई हो उठता । जितना दुख वरठी भोंकने से होता है, उससे भी कई गुना अधिक दुख उन्हें सांसारिक विषमता को देखकर होता ।
श्रीमद् राजचन्द्र दुनिया का कल्याण करने आये थे, उसे सन्मार्ग दिखाने आये थे, किन्तु पहले अपना कल्याण तो कर लें ? यही अन्तर्द्वन्द्व उनके मन में चला करता था। जैनधर्म के आग्रह से मोक्ष मानना उन्होने छोड दिया था। वैराग्य और उपशम की ओर उनकी प्रवृत्ति दिन-पर-दिन बढती जाती थी। केवल आत्मधर्म को ही वे समस्त धर्मो का मूल स्वीकार करते थे । धर्म को उन्होने एक अत्यंत गूढ वस्तु कहा है, जो किसी वाड़े में रहकर नहीं, बल्कि अंतसंशोधन से प्राप्त होती है । उनका कहना था कि सांसारिक प्रपंचों में रचे-पचे जीव कितनी ही बार उपयोग चूक जाने से किसी को प्रसन्न करने अथवा किसी के द्वारा प्रसन्न किये जाने में, अथवा अपने मन की निर्बलता के कारण किसी के समीप पहुँचकर मंद हो जाने में अपने जीवन की सफलता समझते है, लेकिन उनकी यह भूल है। यह हमारा दुर्भाग्य ही समझना चाहिए कि श्रीमद् राजचन्द्र जैसा अलौकिक महापुरुप केवल ३४ वर्ष की अवस्था में इस संसार को छोड़कर चल बसा, और हम वहीं-के-वहीं रह गये। 'श्रीमद् राजचन्द्र अने भक्तरत्नो' पुस्तक का अनुवाद पाठको के सामने प्रस्तुत है । मेरे जैसे बहुधंधी व्यक्ति से इस अनुवाद को पूर्ण करा लेने का श्रेय मूल पुस्तक के लेखक और श्रीमद् राजचन्द्र के परम भक्त, परम जिज्ञासु श्री प्रेमचन्द रखजीभाई को है । मैं किन शब्दो मे उनके प्रति आभार व्यक्त करूं ? आशा है, हिन्दी के पाठक लाभान्वित होंगे। १ अप्रैल, १९६७ -जगदीशचंद्र जैन ૨ . प्रकाशक का नम्र निवेदन महादेव्या कुक्षिरत्न, शब्दजितवरात्मजम् । राजचन्द्रमह वन्दे तत्वलोचनदायकम् । काल निरवधि है। इसका न आदि है, न अन्त । ऐसे अनन्त काल से जीव जन्म मरण के फेर में पटा हुआ है | पुनरपि जनन, पुनरपि मरण | उसमें किसी सत्पुण्य के योग से ही मनुष्यजन्म मिलता है । पुण्य कर्म के समुच्चय से मनुष्य अवतार मिला, समझो तो सुरुभ मुक्ति का द्वार मिला। ना समझो तो चहु दिस घोर घोर अधकार । अटके बिन भटका करो, भावे नहीं कहीं पार । ऐसी मनुष्य देह मिल जाने पर भी कुलधर्म के अनुसार जीव धर्म मत से प्रवृत्ति करता है, अर्थात् लौकिक रूढि के अनुसार यह धर्म की आराधना करता है और अन्त में धर्माचरण करने का सन्तोष अनुभव करता हुआ जान पडता है, लेकिन परितोष नहीं होता। वह बन्धन-मुक्त नहीं हो सकता ।' जन्म मरण से रहित होने की अनुभूति उसे नहीं होती। जन्म-मरण रहित होना' अर्थात् मुक्ति, मोक्ष ब्राह्मी-दशा उसे जो भी कहो, उस परम पद की प्राप्ति का कारण राग, द्वेप, मोह, अज्ञान आदि की शून्यता है । इन सबसे रहित दशा प्राप्त होने पर आत्मा को निजस्वरूप का भान होता है, परमात्म भार की झाँकी मिलती है। समस्त कमों का नाश होने पर आत्मा धाल हस के समान शुभ्र पिरज निर्मल आकाश मडर में खैर विहार करती है। न उसे दिशा का वचन है और न काल का। आत्मा को शुद्ध परमात्म-स्वरूप का अनुमन होता है। मुक्ति का परम पद प्राप्त होता है और जीवन सफर हो जाता है । राग, द्वेप, अज्ञान, यह मुरय कर्म की प्रथि, निवृत्ति होय जिससे, यही मोक्ष का पथ । १ जीर को जर सत्पुण्य का उदय होता है, तभी ऐसा अर्व अवसर प्राप्त होता है। उसी समय उसे आत्मानुभपी अलौकिक सत्पुरुप का योग मिलता है। १ राग, देप, अशन- मुख्य कर्म नी प्रय, पाय यति बेदयी, तेज मोशनो पथ। श्रीमद् राजचन्द्र (आतमसिद्धि १००) ३ रूप जन्म, जरा, मरण आदि का नाश करने वाला आत्मज्ञान जिसमें रहता है, उस पुरुप का आश्रय ही जीव के जन्म, जरा मरण आदि का नाश कर सकता है, क्योंकि वही यथासंभव उपाय है।" --श्रीमद् राजचन्द्र अनादि काल से जीव की दृष्टि बाह्यमुखी होने, और चर्मचक्षु के विषय केवल जड विनाशी द्रव्य को ही देख सकने के कारण, सत्पुरुप को पहचानने अथवा उसकी अंतरंग दशा को देखने का सौभाग्य उसे प्राप्त नहीं हो सकता। उसे देखने के लिए अन्तर्चक्षु- अन्तर्मुखी प्रवृत्ति प्रकट होनी चाहिए। जिससे अजरामर अविनाशी आत्मा का स्वरूप जाना जा सके। "विना 'नयन' पावे नहीं, विना नयन की बात -श्रीमद् गजचन्द्र बत्ती विन, तेल बिन, सूत्र बिन जो जलता है अचल झलके सदा अननल दीपक, नेत्र विन निरखना, विन परखना, बिन जिह्वा के सरस रस पीना....... यह स्थिति कहां से प्राप्त हो? अंतर्चक्षु की प्राप्ति के लिए सर्वोत्तम उपाय सत्पुरुप के दर्शन-समागम और सद्बोध के श्रवण, मनन और चिन्तन से उसकी आराधना कर, अपूर्व प्रेमपूर्वक श्रद्धाभक्ति से उसकी आज्ञा का पालन कर, और विनाशी समस्त जड द्रव्यों के प्रति मोह-ममत्व का रंग नष्ट कर, वैराग्य के वल से, अन्तसंशोधन द्वारा, आत्मदृष्टि होने पर अन्तर्चक्षु खुलते हैं । और तभी अविनाशी शुद्ध आत्मस्वरूप के अनुभव करने का अपूर्व प्रसंग प्राप्त होता है । हृदय नयण निहाले जगधणी महिमा मेरू समान....."जिनेश्वर । -श्री आनंदघनजी १ बत्ती विण, तेल विण, सूत्र विण जो वळी अचळ झलके सदा अननल दीवो, नेत्र विण निरखवो, रूप विण परखवो वण निहाए रस सरस पीवो.. नरसिंह मेहता है -- . " १ रेकिन ससार-सेवन में जीव का जो मोह-ममत्व रहता है और फिर भी वह खरूप-दर्शन की अपेक्षा रसे तो वह आमाश-कुसुम की भांति है। अखा के शब्दों में कह सकते हैं- शरा सींगों का जहाज बनाया, मृगतृष्णा में जा कर तिरा, दो बध्या सुत जहाज चढे, आकाश पुष्प सुगध भरे यह असमय जैसी पात। सचमुच यह व्यर्थ ही का गोरगुल है धुआँ पकड़ने का निरर्थक प्रयास है । कारण कि ज्ञानदशा का प्रतिपक्षी है मोह, और अभी तक इससे छुटकारा नहीं मिला । जितने अश में यह क्षीण हो जाता है, उतने ही अश में ज्ञानदशा प्रकट होती है (मोह) चन्द्रमा की कला से शून्य अमावस की रात्रि, (ज्ञान) पूर्णमासी के दिन सोलह कलाओं से शोभा को प्राप्त अमृत की वर्षा करने वाले चन्द्रराज 'श्रीमद् राजचन्द्र ने . कहा है- " २ " " मोहमाय जहा नाश हो अथवा होय प्रशांत, यह कहिप ज्ञानी दशा, पाकी कहिए प्रान्त । " सबसे पहले मोह से मोह अवश्य तोडना चाहिये" -श्री पद्मनदी आचार्य श्री जिन वीतराग देव का मूल मार्ग, मानर मात्र के लिए कल्याणकारी है-इसमें धर्म, गच्छ, मत-मतान्तर, सघ-सम्प्रदाय, जाति, लिंग अथवा वेश के लिए स्थान नहीं । यह जीव-गात्र के पिए उपयोगी है। गरठ मत की जो कल्पना, यह नहीं सद्व्यवहार, मान नहीं निज रूप का, यह निक्षय नहीं सार। १ मुसासिंगनु यहागज क्र्यु, मृगतृष्णामा जाने तयु वज्ञायत ये यहागे चड्या, वपुष्प बसाणा मर्या ना जेवी यात था। २ मोहमाव क्षयहोय यां, अपया होय प्रशान्त, ते कदीए शानीदया, बासी पहीए भ्रान्त । ३ गन्छ मत नी वे पल्पना, ते नहीं सद्व्यवहार, मान नहीं निज रूपनु, ते निधय नहीं सार । -श्रीमद् राजचन्द्र, आत्ममिति, १३९, १३३ ३ 4
अंतर में परमात्म-स्वरुप सद्गुरु भगवान श्रीमद् राजचन्द्र देव के प्रति, तथा उनके इन
महान् भाग्यशाली भक्तों के प्रति प्रेम से उछलती हुई तरंगों के कारण ही यह साहस
किया है । सुज्ञ वाचक, यदि कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा....
डॉ. जगदीशचन्द्र जैन ने समय का अभाव होते हुए भी, मेरा नम्र अनुरोध स्वीकार
कर, सरस और प्रवाहमय भाषा में जो हिन्दी अनुवाद करने की कृपा की है, उसके लिये
मै अत्यन्त आभारी हूँ।
जिससे जन-साधारण को विशेष रूप से ज्ञान की उपलब्धि हो सके, इसलिए इस
पुस्तक का मूल्य भी कम ही रक्खा है ।
नवनीत नगर, ब्लॉक नं. ९,
महात्मा गांधी रोड, घाटकोपर, बम्बई-७७
कार्तिक पूर्णिमा, सं. २०२२
संत सेवक,
प्रेमचन्द रवजीभाई कोठारी
.
८
सत्य मुक्ति मार्ग
(सक्षिप्त रूपरेसा)
चार गतियों में परिभ्रमण करते-करते जीव के शुम पुण्य के सचय से अमोल
मनुष्य देह प्राप्त होता है । जन्म-मरण से मुक्त होने का जो योग देवगति में भी देवों
को दुर्लभ है, यह मनुष्य भर में जीव के सत् पुण्य योग से सत्धर्म के कारण सुलभ
होता है। ऐसी मनुष्य देह के अनन्त बार प्राप्त होने पर भी, जन्म-मरण से मुक्त होने
के लिए अथक पुस्पार्थ करने पर भी, अभी तक जीन को जन्म मरण से छुटकारा नहीं मिला।
पहु पुण्य के पुज से, शुम देह मानव का मिला।
तो मी मरे भय चक्र का, आटा नहीं कोई टला । १
-
.
पुनरपि जननम् पुनरपि मरणम्
पुनरपि जननीजठरे शयनम् ।
-थी शंकराचार्य
देह प्राप्त होने पर मनुष्य जिस कुल में जीव जन्म देता है, उस कुलधर्म के
अनुसार यह धर्मकार्य करता है। धर्मकार्य करने से पुण्य की प्राप्ति के कारण, जगत् का
सोपरि सुग्व प्राप्त होने की अभिलापापूर्वक, लोकिक दृष्टि से, प्राणि-मात्र धर्म करने के
लिए प्रेरित होता है । उसी को यह सत्धर्म मानता है। सत्धर्म का फल मुक्ति होता है ।
सत्धर्म का स्वरूप क्या है। पूर्वकाल के महात्माओं ने भी धर्म के सम्बन्ध में
निगया है-
धरम धरम फरता सब जग फिर, धरम का म जाने हो मर्म जिनेसर
धरम जिनेसर घरण गदा पिर, कोई न पाधे दो फर्म जिनेसर
-धी आनदघनजी
१ या पुण्योरा पुन थी तुम देह मायनो मळयो,
तो ये अरे! माचरनो, ओटो नहि एकके टळयो ।
-धीमद् राजचन्द्र मोउमाग, अमूल्य तल विचार ६७
६
4 वस्तु प्रबलता न हो, तथा वह कल्याण की याचना करे और कल्याण की बातें करे, तो यह निश्चय ही सत्पुरुप को ठगने जैसा है। यद्यपि सत्पुरुप तो आकांक्षा रहित है, इसलिए ठगे जाने की संभावना नहीं। फिर भी इस प्रकार से प्रवृत्ति करनेवाला जीव अपराधी होता है। इस बात पर वारम्बार तुम्हें तथा तुम्हारे समागम की इच्छा करनेवाले मुमुक्षुओं को ध्यान देना चाहिए। यह बात कठिन हैं, इसलिए इसका होना संभव नहीं, यह कल्पना मुमुक्षु के लिए अहितकारी है और उसका त्याग देना ही योग्य है ।' -श्रीमद् राजचन्द्र (पत्र नं. ४९६ ) असत्य, अनीति, अन्याय और अप्रामाणिकता से सत्धर्म में प्रवेश नहीं किया जा सकेगा। व्यवहार सत्य के बिना परमार्थ सत्य (शुद्ध आत्मस्वरूप ) कहा से प्रकट हो सकता है ? के स्वभाव को धर्म कहा गया है।" -श्रीमद् राजचन्द्र सत्पुरुष के उपदेश का रहस्य यही है कि धर्म ही वस्तु का शुद्ध स्वभाव (आत्मा का शुद्ध स्वभाव ) है । " वह बाह्य दृष्टि से लौकिक दृष्टि से--अनन्त बार धर्म करने पर भी प्राप्त नहीं हुआ । इसलिये जो वस्तु बाह्य दृष्टि से प्राप्त होने वाली नहीं है, ऐसा अन्तर में विश्वास होने से, वह जीव अन्तर मे 'मे कौन हूं' इस सत्य स्वरूप को अपनी आत्मा में खोजने के लिए प्रेरित होता है। अथक पुरुषार्थ से अपने ( देह से भिन्न ) अस्तित्व का भी विश्वास होता है और आत्मोन्नति के मार्ग को अवरुद्ध करने वाले दोप भी दृष्टिगोचर होते हैं (निज दोप दर्शन)। अनादिकाल से आत्मा को प्रिय लगने वाले अज्ञानयुक्त दोपों, मान, पूजा, ख्याति, सत्कार, अहंभाव, मोह-ममता, मिथ्यात्व, कपाय, राग-द्वेप इत्यादि-को पहचाने बिना, और उन्हें अपनी उन्नति मे विघ्नकारक समझे विना, उन दोपों के दूर करने का प्रयत्न किस प्रकार हो सकता है ? "मैं तो दोप अनन्त का, भाजन हूँ करुणाल ।" हुं तो दोघ अनंतनुं, भाजन छु करुणाळ । -श्रीमद् राजचन्द्र ૧૨ - .
अपने दोपों को अन्तरग से पहिचान कर उन्हें दूर किये बिना गुणों का प्रकट होना कैसे समर है ? जगत् को सुन्दर दिखाने के लिए अनन्त बार प्रयत्न किया, लेकिन उससे सुन्दर नहीं हुआ। क्योंकि परिभ्रमण और परिभ्रमण के हेतु अभी प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। यदि आत्मा का एक भी भर श्रेष्ठ हो जाय, और वह उस प्रकार व्यतीत किया जा सके तो अनन्त भर की कसर निकल जाय-यह बात में लघुत्व भाव से समझा हूँ और ऐसा करने में ही मेरी प्रवृत्ति है। इस महावयन से रहित होने में जो-जो सावन और पदार्थ श्रेष्ठ लगें, उन्हें ग्रहण करना, यही मान्यता है । तो फिर उसके लिए जगत् की अनुकूलता या प्रतिकूलता क्या देखना ? यह चाहे जो बोले, लेकिन यदि आत्मा वधन से रहित होती हो, समाधि की दशा प्राप्त करती हो, तो वैसा कर लेना । इससे यश अपयश से सदा के लिए रहित हुआ जा सकेगा जैसे बने वैसे निर्मोही होकर मुक्त दशा की इच्छा करना जगत् के समस्त दर्शनों की-मतों की-श्रद्धा को भूल जाना । जेन-सम्बन्धी सब विचारों को भूल जाना, केवल सत्पुरुषों के अद्भुत योगस्फुरित चरित्र में ही उपयोग को प्रेरित करना उपयोग ही साधना है मै किसी गच्छ में नहीं, केवल आत्मा में हैं, यह भूलना नहीं।" -श्रीमद् राजचन्द्र आनादिकाल स बाह्य दृष्टि से-लौकिक दृष्टि से-किए हुए धर्म में त्याग, वैराग्य, सयम, यम, नियम, जप, तप, पनवास और हठयोग आदि साधनों के अनेक बार करने पर भी, वे सब हमें वरन मुक्त क्यों न करा सके। दुर्यल देह भार मास उपवासी जो है माया रग रे, तो भी गर्म भनत होगे बोले दूजा अग रे। १ श्री यशोपिजयजी ने भी कहा है- कष्ट करो मयम धरो, गारो निज देद, झान दशा दिन जीव को नहीं दुख का छेद । १ दुर्बल देह ने माम उपवासी, जो उ माया गरे, तो पण गर्भ अनता रेशे, योले बीजू अगरे । -श्रीमद् राजचन्द्र ૧૨ .
माया और अज्ञान आदि को लेकर जीव को जो जन्म-मरण के फेर में परिभ्रमण करना पड़ता है, वह मोह, माया और अज्ञान किसका बना हुआ है ? कहाँ से उत्पन्न हुआ है ? उसका नाश कौन करेगा और यह नाश कब होगा ? इत्यादि प्रश्न जीव को आत्ममंथन के द्वारा समझ में आते है कि उसने इस भाँतिजाल को स्वयं उत्पन्न किया है, और स्वयं ही सत् को समझने के बाद उसे नष्ट कर सकेगा ! अन्तर्दृष्टिवाले जीव को अन्तसंशोधन में 'मैं' का सत्यस्वरूप ( स्व तथा पर ), जड़ और चेतन का भेद--उसका गुणधर्म-दृष्टिगोचर होता है, और उस भेदज्ञान के बल से जीव मुक्ति के मार्ग में अग्रसर होता है । श्री जिन वीतराग देव का मूल मार्ग बाह्याभ्यन्तर त्याग, वैराग्य और संयम द्वारा निर्मित है, अंतर्दृष्टिवाले जीव का तप, त्याग, वैराग्य, और संयम अंतर्दृष्टि का ही बना - होता है। इच्छानिरोधः तपः -श्री उमास्वामी आचार्य अर्थात् इच्छा को रोकना ही तप है । आत्म परिणाम से जितना अन्य पदार्थ का तादात्म्य अध्यास दूर होता है, उसे श्री जिन ने त्याग कहा है।" गृह, कुटुंब आदि भावों के संबंध में अनासक्त बुद्धि होना ही वैराग्य है ।" "हे आर्य, द्रव्यानुयोग का फल समस्त भावों से विराम पाना ही संयम है । उस इस पुरुष के वचन को अपने अन्तःकरण से तू कभी भी शिथिल नहीं करेगा। अधिक क्या ? यही समाधि का रहस्य है । समस्त दुखों से मुक्त होने का यही अनन्य उपाय है ।" -श्रीमद् राजचन्द्र यदि जीव को सत्पुरुप के बोध के अन्तसंशोधन में, विचार दशा के बल से, देह की-संसार की-असारता समझ में आ जाये; उसके जन्म जरा-मरणादि दुःख, मोह माया और ममत्व के प्रज्वलित.भाव, तथा राग-द्वेप क्लेश आदि बंधन के स्थानक-अर्थात हर तरह से संसार केवल दुख-रूप और असातामय है, ऐसा यदि अन्तर में भासने लगे, और अपने आपका एकाकीपन-निराधारपन दिखाई देने लगे, संसारमें-जड़ में-सुख प्राप्त करने की भ्रांति दूर हो जाय, तभी पर में ( अन्य में ) अपनेपन की मान्यताएं कम हो सकती हैं। १६ , , "तेरे दोप तुझे बधन है-यह सन्त की पहली शिक्षा है। तेरा दोप इतना ही है कि तू अन्य को अपना मानता है और अपने को भूल जाता है।" "हे जीप, तू भ्रम में है, तुझे हित की बात कहता है। अतरग में सुख है, बाहर खोजने से वह नहीं मिलेगा। अन्तरग का सुख अन्तरगकी सम श्रेणी में है, उसमें स्थिति होने के लिए बाह्य पदार्थों का विस्मरण कर, आश्चर्य को भूल जा। -श्रीमद् राजचद्र जैसे-जैसे पर में ( अन्य में ) प्रीति घटती जाती है, अपना निराधारपना खटकता जाता है (भव का भय भासित होता जाता है), वैसे-वैसे प्रभु के प्रति, उसकी प्राप्ति के कारणों के प्रति, प्रीति दृढ होती जाती है, तथा ससार और उसके सेवन के प्रति नीरसता, निरक्त मान, उदासीनता और वैराग्य की भावना अन्तरग में प्रकट होती जाती है । वैराग्य ही भनत सुख की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक है।" -श्रीमद् राजचन्द्र भेदज्ञान के बल से 'ख' और 'पर' (जड़-चेतन ) का भेद बहुत गाढा होने के वाद, जड के प्रति भानों में जब रसहीनता आ जाती है, तभी सत् पुरुष के अन्तरग का आशय समझ में आता है। " मैं देहादि स्वरूप नहीं, और देह स्त्री, पुत्र आदि कोई भी मेरा नहीं । मैं शुद्ध चैतन्य स्वरूप अविनाशी आत्मा हूँ। इस प्रकार आत्मभावना करते हुए राग-द्वेष का क्षय होता है, जैसे भी हो, राग-द्वेष-रहित होना ही मेरा धर्म है।" -श्रीमद् राजचन्द्र उपर्युक्त स्थिति होने के लिए अन्तरग दशावाले जीन की समझ में आता है कि यह सारा खेल भाव और उपयोग का है । जो उपयोग मोह, राग-द्वेप और अज्ञान के भानों से अशुद्ध (मलिन ) होता है, अत्यन्त चचल हो उठता है, वही उपयोग समय-समय पर, घर में ही विश्रान्ति प्राप्त कर, अशुद्धता के कारण, कर्म-बधन करता है । यह चाल अनादि से चली आती है, और समय-समय पर जीन मलिनतायुक्त उपयोग को लेकर अखड भाव से कर्मवध को बाधे ही चला जाता है। इस अशुद्धता-मलिनता को दूर करना अत्यन्त . . १७ आवश्यक है । अलौकिक दृष्टियुक्त दशावाले जीव को ही अन्तसंशोधन में गहरे उतर कर में - आता है १ " में आता who यह रहस्य समझ राग द्वेप अज्ञान यह, मुख्य कर्म की ग्रंथि, होय निवृत्ति जिससे, वही मोक्ष का पंथ । ....उपयोग को शुद्ध करने के लिए इस संसार के संकल्प-विकल्प को भूल जाना । ....लौकिक और अलौकिक दृष्टि में बड़ा अंतर है | लौकिक दृष्टि में व्यवहार की मुख्यता है और अलौकिक दृष्टि में परमार्थ की। हम और तुम ही यदि लौकिक दृष्टि से आचरण करने लगें तो फिर अलौकिक दृष्टि से कौन करेगा।" -श्रीमद् राजचन्द्र उपयोग की मलिनता-अशुद्धता-दूर करने के इच्छुक जीव को समझ कि वैसा करने में उसमें बाधक संसार के इन बंधनों को दूर किये बिना छुटकारा नहीं । (१) लोक सम्बन्धी बंधन, (२) खजन कुटुंब आदि बंधन, (३) देहाभिमान रूप बंधन, (४) संकल्प-विकल्प रूप बंधन ।" -श्रीमद् राजचन्द्र तथा अंतरंग में....मन के मनोवेगी घोड़ों को संसार में दौड़ने से रोकना, वचन विलास से खेलते हुए संसार के खेलों को कम करना, तथा शरीर की कम-से-कम आवश्यकताओं का निर्वाह करना.... पुरुषार्थ किये बिना छुटकारा नहीं, ऐसा समझ में आता है । बंधन सहित मुक्त भी कैसे हो सकता है ? जीव ने संसार में जो मोहजाल फैला रखा है, उसे समेटने की तीव्रता जागृत होती है; और जहां जहां से वह मोह के बंधन में बंधा हुआ है, वहां-वहां से वह पीछे राग द्वेप अज्ञान ए, मुख्य कर्म नी ग्रन्थ, थाय निवृत्ति जेद थी, तेज मोक्ष नो पन्थ ॥" -श्रीमद् राजचन्द्र १ १८
,
लौटता है, और इसके लिए उसका (ज्ञानी की आज्ञानुसार ) अन्तरग पुरुषार्थ निरन्तर
जागृत रहना चाहिए।
उपजे मोह विक्प से समस्त यह समार,
अन्तर्मुख अवलोक ते, विलय होत नहीं देर । १
यदि इच्छा परमार्थ की, करो सत्य पुरपार्थ
भवस्थिति भादि नाम ले, छेदो नहीं मारमार्थ । २
जिस-जिस प्रकार से आत्मा आत्मभाव को प्राप्त करे, वे सब प्रकार धर्म के हैं-
आत्मा जिस प्रकार से अन्यमार को प्राप्त करे, वह प्रकार अन्य रूप है धर्म
रूप नहीं |"
-श्रीमद् गजचन्द्र
आत्मार्थी जीव का पुस्पार्थ केवल ससार को सुन्दर दिखाने अथवा उससे
प्रशसा प्राप्त करने के लिए कभी हो ही नहीं सकता।
काम एक मारमार्थ का, दूना नहीं मन रोग।" ३
किन्तु केरल अनत काल से अपनी आत्मा की अनन्त शक्तिया-जो आवरण को
प्राप्त हो गयी हैं, अथवा जिनके कारण जीव अपने वीतराग स्वरूप में समाये हुए सुख,
शान्ति और आनन्द को भोगने अथवा अनुभव करने से वचित ही रहा है-उन आवरणों
को दूर करने के लिए अन्तरग का पुरुषार्थ निरन्तर जागृत ही रहता है । जब तक हृदय
आद्र नहीं होता, अखियाँ ( हृदय नयन ), प्रभु के दर्शन की प्यासी नहीं बनती, उसी में
छटपटाने नहीं लगती, तब तक अन्तरग का अधकार कैसे
दूर
हो?
१ उपजे मोह विकल्प थी समस्त आ ससार,
अन्तर्मुख अवलोक्ता विल्य थता नहिवार ।
२ जो इच्छो परमार्थ तो, क्रो सत्य पुरुषार्थ,
भवस्थिति आदि नाम लइ छेदो नही आत्मार्थ ।
३ काम एक आत्मार्थनु बीजो नहिं मनरोग।
-श्रीमद् राजचन्द्र
૧૯
S
आश्चर्य | जीव अपनी ही आत्मिक सम्पत्ति का स्वयं ही उपभोग नहीं कर सकता।
दीर्घकाल के सतत अन्तरंग जागृतियुक्त पुरुषार्थ से
वह क्रमानुसार कभी सत्पुरुप की
कृपा से, दीनबंधु की कृपादृष्टि से, और सत् पुण्योदय
से, उपयोग की अशुद्धता-मलिनता-दूर कर, शुद्ध होता है,
और तव उसे अपनी आत्मा के
निज खरूप का भान होता है (निर्मल स्वानुभव प्रकाश-सम्यक्दर्शन )।
"चेतन यदि निज भान में कर्ता माप स्वभाव,
वर्ते नहीं निज भान में, कर्ता कर्मप्रभाव ।" १
समस्त पर द्रव्यों में एक क्षण के लिए भी उपयोग न लगे, ऐसी दशा का
जीव यदि सेवन करे तो केवलज्ञान उत्पन्न हो जाय ।
-श्रीमद् राजचन्द्र
आत्मा को आत्मा के ( अपने को अपना) स्वरूप का भान हो तो उसकी दृष्टि में
संसार कैसा दिखाई दे ?
नींद में सोते हुए मनुष्य को जैसे स्वप्न आता है, और उस स्वप्न को वह सच्चा
मानता है-स्वप्न में उपयोग किये हुए समस्त भोगों-सुख-दुख इत्यादि को वह सत्य
समझता है, और जब वह जाग जाता है तब क्या होता है ? उस समय वह स्वप्न मिथ्या
भासित होता है-स्वप्न में उपभोग किये हुए समस्त भोग-सुख-दुख-मिथ्या भासित होते
है । इसी प्रकार मोह निद्रा से जागृत हुए ज्ञानी को ( आत्मानुभवी को ) यह संसार
स्वप्न के समान असत्य, मिथ्या और नाशवान प्रतीत होता है।
सकल जगत् उच्छिष्टवत् अथवा स्वप्न समान
वह कहिए ज्ञानी दशा, वाकी वाचा ज्ञान ।" २
१ चेतन जो निजभानमा, कर्ता आप स्वभाव,
वर्ते नहि निजभानमां, कर्ता कर्म-प्रभाव ।
२ सकळ जगत ते अठवत, अथवा स्वप्न समान,
ते कहीए ज्ञानी दशा, वाकी वाचा ज्ञान ।
-श्रीमद् राजचन्द्र
२०
जाग देखू तो जगत् दीखे नहीं, नींद में अटपटा भोग भासे" -नरसिंह मेहता स्वप्न सकल ससार है, स्वप्ना तीनों लोक, सुदर जाग्यो स्वप्न तें, तब सब जान्यो फोक ।" -श्री सुदरदास , "श्री तीर्थकर आदि ने पुन पुन जीर को उपदेश दिया है, लेकिन फिर भी जीव दिशामूढ़ ही रहना चाहता है-इसका कोई उपाय नहीं । फिर-फिर से ठोक बजाकर कहा गया है कि यह जीव यदि इसी बात को समझ ले तो सहज मोक्ष हो जाय, नहीं तो अनन्त उपायों से भी मोक्ष नहीं। और यह समझना भी कुछ कठिन नहीं, क्योंकि जीव का जो सहज स्वरूप है, केवल उसे ही समझाना है। वह कोई किसी दूसरे के खरूप को समझने की बात नहीं कि कभी कोई उसे छिपा ले अथवा न बताये, और इससे वह समझ में न आये । अपने से अपने आपका गुप्त रहना कैसे सभर है । लेकिन स्वप्न दशा में जैसे असम्भाव्य अपनी मृत्यु को भी जीव देखता है, वैसे ही अज्ञान दशा रूप स्वप्नरूप योग से यह जीव पर द्रव्य के साथ अपनापन मान रहा है | और यह मान्यता ही ससार है, यही अज्ञान है, नरक आदि गति का हेतु भी यही है। यही जन्म है, यही मरण है, यही देह है, देह का विकार है, यही पिता है, यही शत्रु है और यही मित्र आदि भाव कल्पना का हेतु है, और उससे निवृत्ति हो जाना ही सहज मोक्ष है। इसी निवृत्ति के लिए सत्सग और सत्पुस्प आदि साधन बताए गये हैं, और यदि इन साधनों का जीव, अपने पुरुषार्थ को छिपाये बिना, आचरण करे तो ही यह सिद्ध है। अधिक क्या कहें । यदि इतनी ही सक्षिप्त बात जीव में परिणमन को प्राप्त कर सके तो समस्त व्रत, यम, नियम, जप, यात्रा, भक्ति और शास्त्र ज्ञान आदि से छुटकारा हो जाये, इसमें कोई भी सशय नहीं । यही प्रार्थना है ।" -श्रीमद् राजचन्द्र (पन न ५३७) उस आत्मानुभवी ज्ञानी का ससार के प्रति कैसा भाव होता है ? जो कांचन को कीचड जानता है, राज-सिंहासन को नीचा स्थान समझता है, किसी से मित्रता करने को मरण मानता है, बडप्पन को जमीन लीपने का गोवर . २१ M समझता है, कीमिया वगैरह जोग को जहर समझता है, सिद्धि वगैरह ऐश्वर्य को असाता मानता है, संसार में प्रतिष्ठा पाने आदि की हविस को अनर्थ समझता है, पौद्गलिक छवि औदारिक आदि शरीर को राख समझता है, जगत् के भोग-विलास को जंजाल समझता है, गृहवास को भाला समझता है, कुटुम्ब के कार्य को काल समझता है, लोक-लाज बढाने की इच्छा को मुँह की लार समझता है, कीर्ति की इच्छा को नाक का मैल समझता है, और पुण्य के उदय को विष्टा मानता है-ऐसी जिसकी रीत हो, बनारसीदास उसकी बन्दना करते हैं।" -श्रीमद् राजचन्द्र (पत्र नं. ७८१) यह है आत्मानुभवी ज्ञानियो के अन्तरंग का रहस्य ! ....लोकसंज्ञा जिसके जीवन का ध्रुव काँटा है, वह जीवन चाहे जैसी श्रीमन्ताई, सत्ता, अथवा कुटुम्ब-परिवार याला क्यों न हो, तो भी वह दुख का ही कारण है। आत्म-शांति जिसके जीवन का ध्रुव काँटा है, वह जीवन चाहे एकाकी, निर्धन, और निर्वस्त्र ही क्यों न हो, परम समाधि का स्थान है । धर्म में लौकिक बड़प्पन, मान और महत्व की इच्छा रखना, धर्मद्रोह रूप है। आत्मपरिणाम की स्वस्थता को श्री तीर्थंकर ने 'समाधि' कहा है।" " आत्मपरिणाम की अस्वस्थता को श्री तीर्थंकर ने 'असमाधि' कहा है |" आत्मपरिणाम की सहज स्वरूप परिणति होने को श्री तीर्थंकर ने 'धर्म' कहा है।" " आत्मपरिणाम की किसी भी चंचल परिणति को श्री तीर्थंकर ने 'कर्म' कहा है।" -श्रीमद् राजचन्द्र प्रकाशक २२ KINAR
श्रीमदराजचन् ।
जन्म शताब्दी
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ALBK अध्यात्म युग प्रवर्तक
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૨૦૨૪
जन्म शताब्दी
श्रीमदराजच
२०२४
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मध्यारम युग-प्रवर्वक
श्रीमद् राज चन्द्र
595
तत् सत्
सत्य, शाश्वत सनातन और अपरावित है। स्थान और
समय में परिवर्तन हो जाने पर भी इसमें परिवर्तन नहीं होता।
अनादिकाल से लेकर अनन्तकाल तक जो अपने उसी रूप में रहे,
यह सत्य है-आत्मा है। ऐसे परम मत्य को पाकर, इसके शान
कीयोति को निरन्तर असड प्रज्वलित रखते हुए, अनेक महान्
पुरुषों ने ससार का कल्याण करने के हेतु, अपना योगदान दिया
है। प्रत्येक महापुरुप अथवा सन्त-महात्मा ने स्वय अनुभव किये
हुए सत्य को ही प्रकाशित किया है, उसी का उपदेश दिया है।
तथा काल के प्रवाह में अनेक वर्ष बीत जाने पर भी यह शाश्रत
मनातन परम सत्य आज भी अबाधित है । उमे समझनेके लिए
और उसकी परीक्षा करने के लिए हृदय में आध्यात्मिक चक्षु,
तथा मुमुक्षुता की यावश्यक्ता हे। सब प्रकार की मोहासति से
विरक्त हो मेरल मोक्ष के लिए ही प्रयत्न करने को
मुमुक्षुता, तथा
अनन्य प्रेमभार से मोक्ष मार्ग में प्रत्येक क्षण प्रवृत्त रहने को
तीन मुमुसुना रहते ह"~श्रीमद् गजचन्द्र ।
'यहुरत्ना मुधरा' इस उक्ति को मानो भारत भूमि
मपूर्णनया साकार कर रही है, इसीलिए अमरय महापुरुपों,
माधु-सतों और महात्माओं ने भारतवर की इस भूमि पर जन्म
लिया है। और उममें भी मोगष्ट्र वी पुण्यभूमि के विशाल उदर
"
१
श्रीमदराज
२०२४
आत्म शताब्दी
16
G IAN 500 जन्म शताब्दी UP में से कितने ही सन्त, युग प्रवर्तक और नरपुंगव इस संसार को प्राप्त हुए हैं, जिन्होंने अपने जीवन में अनेकों का कल्याण किया तथा अपने अनुयायियों को जीवन के उपयोगी सन्देश सुनाया। कोई भी धर्म अथवा सम्प्रदाय जब-जब शुरू हुआ है, तब- तब उस समय की परिस्थिति के अनुसार जो-जो गंभीर प्रश्न समाज के सामने आते हैं, उन सब का हल इसमें रहता है। इतना ही नहीं, किन्तु आध्यात्मिक जीवन के मार्ग की समझ भी इससे प्राप्त होती है। परन्तु समय के प्रवाह के साथ उसका प्ररूपण स्थूल वन जाता है, तथा उसमें मतभेद, वाद-विवाद अथवा वितण्डा का प्रवेश होने से उसका ह्रास हो जाता है । इस वीच में ह्रास कारणभूत अज्ञान आवरण को दूर हटाकर फिर से सत्य की ज्योति को फैलानेवाला कोई नरपुंगव यदि इस संसार को मिल सके तो उसका पुनरुद्धार हो सकता है और उसका पल्लवित होना संभव है। भगवान् महावीर के निर्वाण के पश्चात् इसी प्रकार सद्धर्म की हानि प्रारंभ हुई। सव ने अपने-अपने विभिन्न कथनों को आधार मानकर, धर्म की आराधना की जिससे विभिन्न मत, गच्छ और सम्प्रदायों का प्रादुर्भाव हुआ। परिणाम यह हुआ कि वीतराग के पवित्र और प्रभावशाली शासन पर अज्ञान-रूपी अंधकार का आवरण छा गया। तथा मानव-मात्र के लिए-जीव- मात्र के लिए-कल्याणकारी और हितप्रद तथा अनेकांत और स्याद्वाद शैली से तर्क संगत वीतराग दर्शन अत्यन्त गौण वनकर श्रीमदराजचन्द २०२४ के के Im रह गया। २ G । onlin जन्म शताटदी परन्तु भारतवर्ष में जर-जर धर्म गौण हुआ है और अधर्म में वृद्धि हुई है, तर-तव परमात्मा की कृपा के प्रतीक म्वरूप, इस भूमि के पामर जीवों के उद्धार और उनके अज्ञान-अधकार में से, मद्धर्म की ज्योति के प्रकाश की ओर दौर जाने के लिए, किसी- न-किसी नरपुगव का प्रादुर्भाव होता आया है। इतिहास इसका माक्षी है । इस प्रकार वीतराग दर्शन के गौण भाव को प्राप्त हो जाने पर, भगवान् महावीर द्वारा उपदिष्ट मुक्ति-मार्ग का दिग्य मन्देश सुनाने के लिए, सौभाग्यशाली सौगष्ट्र की भूमि की गोद में, क्रीडा करते हुए गलक की भाति सुदर, यवाणिया यन्दरगाह में, देवनाई माता की कोस में, पूर्वजन्म के सयोग से, योगी के समान एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। विक्रम संवत् १९२४ कार्तिक सुदी पूर्णमासी के दिन, पूर्णचन्द्र के समान प्रभावशाली इम नरपुगव का आविर्भाव हुआ। जिन शासन का ज्योतिवर होना जिसके भाग्य में लिखा था, ऐसे शान-रूपी सूर्य के समान तेजस्वी इस गलफ का नाम 'रायचन्द्र' रखा गया। 'आह ! फेमी धन्य घही और सा धन्य दिवस'-ऐसा समझने के लिये प्रेरणादायक उनका जीवन था। आज हम प्रेम, भक्ति और आदर की भावनापूर्वक जिन्हें अपने हृदय-फमर में उच्च आसन पर पिठाते हैं, ऐसे श्रीमद् राजचन्द्र ने इस चणि फुल में जन्म लिया उनके पिताजी का नाम या रबजीभाई। के लक्षण पालने में दिखाई पड़ जाते है', यह पहायत श्रीमद् के गल्यकाल के प्रसगों पर टिपात करने मे सत्य सिद्ध दो जाती । चपन से ही भविष्य के इस महान् फर्मयोगी गारमा या व्यक्तिन्य रडा अद्भुत था । यात छोटी उम्र से ही ये श्रीमदराजवन २०२४ . Dow roo 'पुष info PAS 5 जन्म शताब्दी अत्यन्त बुद्धिशाली और वाक्-कुशल थे। किसी विषय के ग्रहण करने की उनकी असाधारण शक्ति, तेजखी बुद्धि की प्रतिभा, तथा अद्भुत स्मरण-शक्ति के कारण, ऐसा लगता था मानो साक्षात् सरस्वती देवी ने ही उनका वरण कर लिया है। उनकी आश्चर्यकारी शक्तियों का प्रभाव पांच वर्ष की सुकुमार अवस्था से ही ज्ञात होने लगा था । पाठशाला की सारी शिक्षा, केवल दो वर्ष में ही उन्होंने समाप्त कर ली थी। ववाणिया के गृहस्थ अमीचंद की मृत्यु और उनका अग्नि संस्कार देखकर, केवल सात वर्ष की अवस्था में होनेवाले उनके हृदय-मंथन में से नवनीत-रूपी जातिस्मरण ज्ञान का आविर्भाव हुआ। तथा अनेक पूर्वजन्मों के संस्कारों की सहायता से, बहुत छोटी-सी अवस्था में ज्ञान हो जाने पर, उनकी प्रज्ञा जाग उठी । आठ वर्ष की सुकोमल अवस्था रामायण और महाभारत जैसे महान् ग्रन्थों का अवलोकन कर उन्हें काव्य रूप में गूंथने की असाधारण प्रतिभा भी उनमें थी। ग्यारह वर्ष की अवस्था में तो किसी प्रौढ़ परिपक्व प्रज्ञाशाली लेखक की भाँति वे चिन्तन और मनन की परिपक्वता के द्योतक लेख लिखा करते थे। ये लेख 'बुद्धि प्रकाश' जैसे शिष्ट और श्रेष्ट सामायिक पत्रों में प्रकाशित होते। इस प्रकार कुमार अवस्था से ही कागज-कलम के साथ मित्रता कर वे अपने बान और बुद्धि का प्रकाश फैलाने लगे और 'कवि' के रूप में प्रसिद्ध हो गये। यदि संस्कार की दृष्टि से विचार करें तो हिन्दू धर्म के आधारस्तम्भ जैन और वैष्णव धर्म के संस्कार श्रीमद् में बाल्यावस्था से ही मौजूद थे। जैनधर्म की अनुयायी माता और श्रीमद्राजवन्न ૨૦૨૬ G में Co0 - JA O mita तेजस्वी पुत्र R वैष्णव-धर्म के अनुयायी पिता के समस्त गुणों का समन्वय इस में हुआ था। बाल्यावस्था में भजन और कीर्तन के प्रति अनुराग होने के कारण उन्होंने षठी भी वधवाई थी । परन्तु प्रारंभिक अवस्था होने के कारण ये बातें कब तक टिकी रह सकती थीं बारह वर्ष की अवस्था में जैनधर्मानुयायी सजनों के परिचय से उन्होंने जैनशास्त्रों तथा प्रतिक्रमणसूत्र का स्वाध्याय किया। तया फौरन ही, जेसे चातक को मेघ के प्रति और चकोर को चन्द्रमा के प्रति आकर्षण होता है, वैसे ही ऊगामी आत्मा से सम्पन्न श्रीमद् को क्षमा-भावना और अहिंसा की भिसि पर आधारित जैनधर्म के प्रति आकर्षण हुआ । चोदह वर्ष की अवस्था में तो सस्कृत और प्राकृत के गूढ़ और गभीर अन्यों के तत्व- चिन्तन को आत्मसात् करके उन्हें इजम भी कर लिया। श्रीमद् की प्रतिभा का केवल वाचन-अध्ययन तक ही सीमित न रहना स्वाभाविक या। इसके उपरान्त चिन्तन-मनन करके, उसमें से जो नरनीत-रूपी सार निफलता, उसका जनहिताय''जनसुखाय' के लिए चे उपयोग करते । सोलह वर्ष की अवस्था में, केवल तीन दिन के अन्दर, उन्होंने तत्वज्ञान के दृष्टान्तों से परिपूर्ण मोक्षमाला' नाम के अद्भुत ग्रन्थ की रचना की। इसके ज्ञान-रूपी नवनीत से आनन्दित होकर विद्वान् लोग भी इसे अपनी श्रद्धाजलियाँ अर्पित करते थे। श्रीमद् ने उसमें लिखा ह- 'मुक्ति अर्थात् संसार के दुखों से मुक्त होना। अन्त में शान, दर्शन आदि अनुपम यस्तुओं को प्राप्त करना-जिसमें परम सुख और परमानद का अपह निवास है, जन्म-मरण-फी विडम्यना 00 . ५ M श्रीमदराजचन्द ૨૦૨૪ जन्म शताब्दी HAR G G का अभाव है; शोक और दुख का नाश है...और इसी कारण वीतराग के वचनों में अनुराग करना उचित है। निदान इससे विषय-रूपी विप का जन्म नहीं होता। परिणाम में यही मुक्ति का कारण है। इस वीतराग सर्वज्ञ के वचन को विवेक वुद्धि से श्रवण, मनन और निदिध्यासन करके, हे मानव ! तू अपनी आत्मा को उज्ज्वल कर।" सचमुच मुक्ति का कितना मार्मिक अनुपम दर्शन है ! प्रेम, वात्सल्य, तादात्म्य, समभाव इत्यादि गुण श्रीमद् के अन्दर, स्वाभाविक रूप में, बाल्यावस्था से ही मौजूद थे। सव को प्रिय लगने वाले वे मृदु वचन बोलते थे। उनकी वाणी में, दूसरों के हृदय को डोलायमान करने वाला और वशीकरण माधुर्य विद्यमान था। उनके प्रतिभाशाली मुख पर आन्तरिक आत्मानन्द का प्रतिविम्ब उनके व्यक्तित्व को अपूर्व तेजस्वी बनाता था। एक के बाद एक वर्ष बीतते जा रहे थे । श्रीमद् की शक्तियों का आध्यात्मिक विकास होता जा रहा था। उनका ज्ञान और बुद्धि का प्रकाश विस्तृत होता जाता था। इस समय उन्नीस वर्ष की अवस्था में उन्होने शतावधान के अद्भुत प्रयोग किये । इससे जन-समुदाय को अलौकिक रत्न के प्रकाश की झाँकी मिली। वम्बई की जनता इन प्रयोगों को देखकर आश्चर्य से मुग्ध हो गयी और उसने श्रीमद् राजचन्द्र को 'साक्षात् सरस्वती' की उपाधि 500 2500 4600 प्रदान की। यह सब होने पर भी कीर्ति श्रथवा लक्ष्मी की उपासना राजचन्द्र का लक्ष्य नहीं था। इस समय की कवि रायचन्द्र की भावना को यदि गाँधीजी के शब्दों में कहा जाय तो वह विल्कुल ही भिन्न थी । जीवन-मुक्त दशा प्राप्त करने की ही उनकी तीव्र ६ श्रीमदराजचन्द्र जन्य शताब्दी Conta जन्मशताब्दी इच्छा थी। उनके पास चल कर माई हुई कीर्ति, मान, महत्ता, रयाति, आदर अथवा पूजा-प्रतिष्ठा के प्रलोभन उन्हें चश कर सके । तथा लौकिक सिद्धि प्रदान करनेवाले जन-सामान्य का सम्पर्क कम करके उन्होंने अलौकिक एकान्त आत्महित सिद्ध करने की प्रवृत्ति में आचरण करना ही इष्ट समझा। परन्तु 'हरि का मार्ग तो शूरों का मार्ग है' इस उक्ति के अनुसार, उनकी अध्यात्म प्रवृत्ति भी सरल मार्ग से ही आगे वदे तो फिर उनका इसमें कौनसा बढप्पन श्रीमद् ने जनसम्पर्क से दूर हटकर आत्महित में लीन रहने को ही इष्ट समझा। उन्नीस वर्ष की अवस्था में उदय कर्म के अनुसार, डाक्टर प्राणजीवनदास के भाई पोपटलाल की पुत्री शरकवाई के साथ उनका विवाह हुआ। उदय कर्म तो तीर्थकरों तफ को भोगना पडता है। श्रीमद् के अन्त करण में प्रवल वैराग्य दशा यी और व्यावहारिक जीवन में चे गृहस्थाश्रम में रह रहे ये-ऐसी अवस्था में उनकी अत्र परीक्षा शुरू हो गयी । परन्तु जैसे सोने को अग्नि में तपाने से उसमें शुद्धता का अश अधिक आ जाता है, उसी प्रकार श्रीमद् की वैराग्य अवस्था गृहस्थाश्रम में रहकर भी बढती दी गयी। आत्मजागृति उनकी अपूर्व थी। कोई भी बाह्य कारण उनकी आन्तरिक शक्ति को चलायमान करने के लिए समर्थ नहीं था। उनका मन तो इसी में रमा था। सकल जगत् उच्छिएवत् अथवा स्वम समान । यह कहिये ज्ञानी दशा, चाकी वाचा-ज्ञान ॥"१ १ सफळ जगत् ते ऐठवत् , अथवा स्वप्न समान । ते कहीए शानी दशा, नाकी वाचा-ज्ञान -श्रीमद् राजचन्द्र श्रीमदराजय ROO 2600 . ७ 00 इस आत्मदशा की, मुमुक्षुता के अन्तर्चक्षु के सिवाय अन्य किसी प्रकार से परीक्षा करना मुश्किल था । फिर भी मानो अपूर्व कर्म-योग के दृष्टान्त को पूर्ण करना हो, इस प्रकार संसार के जंजालों का त्याग कर, मनुप्यों की वस्ती से दूर, उन के सम्पर्क से हटकर, हिमालय के किसी शिखर पर, अथवा किसी गुफा में आत्मसाधन करने की शक्ति होने पर भी, उन्होंने केवल आत्महित को ही मुख्य मान, संसार में रहते हुए, संसारी जीवों के कल्याण के उज्ज्वल दैदीप्यमान मार्ग का उपदेश दिया। उनके अन्तर में तो- यद्यपि वैराग्य की अवस्था तो ऐसी हो गई है कि आत्मा में, प्रायः घर अथवा वन का भेद नहीं रहा। " --श्रीमद् राजचन्द्र गृहस्थ-जीवन में और अपने व्यापार-व्यवसाय में सारे काम करते हुए भी, सारे कामों को सम्पूर्णतया सफलतापूर्वक करते हुए भी, इन सब का महत्व उनके जीवन में केवल आपद्धर्म के अथवा उदयकर्म-फल के रूप में ही स्वीकृत था; प्रमुख रूप से तो अध्यात्म-ज्योति का प्रकाश ही अन्तरंग में विद्यमान था। चम्बई में रेवाशंकर जगजीवन की पेढी में साझी रहकर, उन्होंने हीरे-जवाहरात के व्यापार में एक सच्चे झवेरी के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त की । चाहे जितना बड़ा नुकसान सहन करने का मौका आया हो तो भी उन्होंने सचाई या ईमानदारी नहीं छोड़ी, तथा व्यवहार में भी प्रतिकूल संयोग उपस्थित होने पर हमेशा धर्म को सुरक्षित रखा । इस प्रकार लौकिक जीवन में संलग्न रहने पर भी, इस सन्त के अन्तरंग में तो अध्यात्म की ज्योति ही प्रज्वलित रहती । उनके हृदय के अन्दर वाह्य लौकिक कर्तव्यों को 50 रूप में go 600 SONG शुभ श्रीमदराजवन ૨૦૨૪ जन्म शताब्दी ७ anta ७०० . प्रवेश न मिलता। गृहस्थ जीवन में गृहस्थ रूप से और व्यवसाय में व्यापारी रूप से काम करते रहने पर भी उनकी मात्मा सतत जागृत रहती। उनका आत्म-चिन्तन सदा चालू ही रहता। फलस्वरूप उनकी नोट-बुक और डायरी में उनकी इसी अन्तरग जागृति के दर्शन होते हैं। वाह्य पुरुषार्थ में लगे रहने पर भी आत्मजागृति से प्रकट शान-ज्योति के प्रकाश से अन्तर्मुख हुई जीवनमुक्त दशा प्राप्त करने के लिए, उनका अन्तरंग पुरुपार्थ सतत चालू ही रहता। परिणामस्वरूप उनकी अन्तर्दशा कुछ और ही हो गयी थी। श्रीमद्-ने कहा है- "-महात्मा पुरुषों ने उसे चाहे जिस-नाम से, चाहे जिस आकार से एक 'सत्' को ही प्रकाशित किया है, उसी का ज्ञान प्राप्त करना योग्य है, उसी की प्रतीति करना उचित है। वही अनुभव-खरूप है, और उसकी ही अत्यन्त प्रेमपूर्वक उपासना करना चाहिए । उस 'परम सत्' की ही हम अनन्य प्रेमपूर्वक अविच्छिन्न रूप से भक्ति करना चाहते हैं । उस 'परम सत्' को ही चाहे 'परम ज्ञान 'कहो, चाहे 'परम प्रेम' कहो, चाहे उसे 'सत्-चित्-आनन्द वरूप' कहो, चाहे उसे 'आत्मा' कहो, चाहे उसे 'सर्वारमा' कहो, चाहे उसे एक कहो, चाहे अनेक कहो, चाहे उसे एकरूप कहो, चाहे सर्व-रूप कहो, लेकिन वह सत् केवल सत् ही है, और वही इन विविध रूपों द्वारा कहे जाने योग्य है । जो कहा जाता है, वह सय यही है, और कुछ नहीं- ऐसा यह परम तत्व, पुरुषोत्तम हरि, सिद्ध, ईश्वर, निरंजन, अलस, परब्रह्म, परमात्मा, परमेश्वर, और भगवान् आदि अनंत नामों से कहा जाता है।" -श्रीमद् राजचन्द्र CoA 500 ६ श्रीमदराजचन्द्र ૨૦૨૪ जन्म शताब्दी M G या za 9 o0 जन्म शताब्दी कितना स्पष्ट और निर्मल विवेचन है यह ! सत् स्वरूप के सम्बन्ध में कितनी गहरी समझ है! चाहे उसे किसी नाम से किसी रूप से कहो, मूल वस्तु तो वही-की-वही हैं । घाट घटित फिर नामरूप जुदा अंत में हेम का हेम ही है।-१ इसी प्रकार अपने साथी सायला-निवासी श्री सौभाग भाई के पत्र का उत्तर देते हुए उन्होंने अपनी दशा का वर्णन किया है- "-एक पुराण पुरुप और पुराण पुरुप की प्रेम-सम्पत्ति के विना हमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता। हमें किसी भी पदार्थ में विल्कुल भी रुचि नहीं रही। कुछ भी प्राप्त करने की इच्छा हमें नहीं होती । व्यवहार किस प्रकार चल रहा है, इसका भी भान नहीं । संसार किस स्थिति में है, इसका भी स्मरण नहीं रहता। शत्रु और मित्र में कोई भेदभाव नहीं रहा । कौन शत्रु है और कौन मित्र, इसकी भी खबर नहीं रहती । हम देहधारी हैं या और कुछ, इसे याद करने पर भी मुश्किल से ही जान पाते हैं......हरि इच्छा का क्रम जैसे चलाता है, वैसे चलते चले जाते हैं। हृदय प्रायः शून्य-जैसा हो गया है । पाँचों इंद्रियां शून्य भाव से ही प्रवृत्ति करती है-आदि पुरुप के प्रति अखंड प्रेम के सिवाय मोक्ष आदि अन्य पदार्थों की भी इच्छा का नाश हो गया है। इतना सव होने पर भी जैसी चाहिए, वैसी उदासीनता नहीं आ पाई है-ऐसा समझते हैं। अखंड प्रेम का नशा जैसा प्रवाहित होना चाहिए, वैसा प्रवाहित नहीं होता-इतनी अधिक उदासीनता आने पर भी व्यापार करते हैं, लेते-देते हैं। लिखते हैं, पढ़ते हैं, १ घाट घडिया पछी नाम रूप जूजवा यंते तो हेमनुं हेम होये । -नरसिंह मेहता १० श्रीमदराजय २०२४ 20ES Co0 G online . 600 श्रीमदराजचन्द्र जन्म शताब्दी देसभाल करते हैं, खेद प्राप्त करते हैं, और हँसते भी हैं | जिसका कोई ठिकाना नहीं, ऐसी हमारी दशा हो गई है, और उसका कारण केवल यही है कि जब तक हरि की सुखद इच्छा को नहीं माना तब तक यह सेद मिटनेवाला नहीं सिद्धान्त का ज्ञान हमारे हृदय में आवरित रूप से मौजूद है । यदि हरि की इच्छा प्रकट होने देने की होगी तो वह प्रकट होगा। हमारा देश हरि है, जाति हरि हे, काल हरि है, देह हरि है, रूप हरि है, नाम हरि है, दिशा हरि है, सब कुछ हरि ही हरि है, और फिर भी हम कारयार में लगे हुए हैं, यह इसी की इच्छा का कारण है ।" -श्रीमद् राजचन्द्र कितना असीम हरिमय जीवन ! एक पुगण पुरुप और से परम भक्तिपूर्वक जिसे देह और देहसेवन की (सम्पूर्ण ) विस्मृति हो गयी थी। जिसका हाड-मास और मज्जा हरि के नाद से व्याप्त या, जिसके रोम-रोम में से केवल हरिनाम का ही स्वर सुनाई देता था। इतना ही नहीं, इस कारण प्राप्त करने योग्य मोक्ष आदि के सम्बन्ध में इच्छा का अभाव भी उनकी निर्मोह वृत्ति का ही सूचक है । यह दशा उनके प्रत्यक्ष वीतराग स्वरूप की एक झापी प्रस्तुत करती है। देह रहे जिनकी दशा रहती देहातीत उस ज्ञानी के चरण में वंदन हो अगणीत" १ १ देह छता जेनी दशा चर्ते देहातात ते शानी ना चरणमा हो वदन अगणीत -श्रीमद् राजचन्द्र ૧૧ ૨૦૨૪ के प्रति असड प्रेम-भावना स्वरूप onlo 100 DRIBE १ जन्म शताब्दी तेईस-चौवीस वर्ष की अवस्था में उनकी अध्यात्म म-प्रतिभा का चन्द्र सम्पूर्ण कला को प्राप्त हो गया। अध्यात्म-वीर इस महात्मा के सतत जागृत आत्ममंथन के नवनीत रूप में अपूर्व सिद्धि प्राप्त हुई । फिर भी उनमें गर्व अथवा अहंमन्यता की छाया तक नहीं थी। उसके स्थान पर शुद्ध सम्यक् दर्शन और निर्मल स्वानुभव का प्रकाश होने पर अपूर्व अध्यात्म दशा प्रकट हुई; आत्मा शीतल और धन्य हो गई। अनादिकाल से खोये हुए इस रत्न-निजस्वरूप-की प्राप्ति होने पर सहजानन्द और सहजभाव के साथ अपनी इस अनुभवदशा का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है- " उन्नीस सौ सैंतालीस में समकित शुद्ध प्रकाश्यो रे, थुत अनुभव वधती दशा निजस्वरूप अवमास्योरे।" और, मानो उनके जीवन का कार्य भी निश्चित हो गया- यथाहेतु जो चित्त का सत्य धर्म का उद्धार रे, होगा अवश्य इस देह से, ऐसा हुआ निर्धार रे ।" २ केवलज्ञान का मार्ग मिल जाने पर इस स्वानुभवी ने प्रवल पुरुषार्थ को स्वीकार किया। युग-युग में प्रकट होनेवाले तथा युगप्रवर्तक और युग- विधायक महान् व्यक्ति पूर्व संस्कार के जोर से स्वयं ही परस्पर आ मिलते हैं। इसी तरह धर्म की दैदीप्यमान ज्योति के प्रकाश "ओगणीससे ने सुडतालीसे समकित शुद्ध प्रकाश्यु रे, श्रुत अनुभव वधती दशा, निजस्वरूप अवभास्युं रे।" यथा हेतु जे चित्तनो, सत्य धर्मनो उद्धार रे, थशे अवश्य आ देहथी, अम थयो निर्धार रे ।"-श्रीमद् राजचन्द्र ૧૨ श्रीमदराजय २०२४ G Opass ₹600 29 Hamala १ । २ 2000 ००० only . जन्म शताटदी को प्रज्वलित करनेवाले श्रीमद्नी और युग-कार्य की ज्योति जलाने वाले पूज्य गाधीजी-इन दोनों का निमित्त-घश मिलाप हुआ। दोनों का परिचय यदा, और कुछ प्रश्नों की छानबीन करते हुए दोनों में पत्रव्यवहार भी हुआ । फलस्वरूप जीव-मुक्त दशा में रमने वाले इस ज्ञानी की प्रतिभा के प्रकाश का प्रभाव गाधीजी के जीवन के निर्माण में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ। गाधीजी श्रीमद् राजचन्द्र पर मुग्ध हो गये और उनके मन पर उनका गहरा असर हुमा । वे एक महान् पुरुष है तथा उनके लेख और उनका जीवन तत्वज्ञान के रस से भरपूर है-ऐसा उन्हें भाभास हुमा । गाघीजी लिखते है- 'ऐसा अपूर्व अवसर कर आयेगा' (अपूर्व अवसर एवो फ्यारे आवशे) उनके इस फाव्य की पंक्तियों में जो चैराग्य उलक रहा है, उसे मैंने उनके साथ अपने दो चपों के गाढ़ परिचय में, प्रत्येक क्षण में, उनमें देखा है। उनके लेखों की असाधारणता यह है कि उन्होंने जो स्वय अनुभव किया है, यही लिखा है। उसमें कहीं भी कृत्रिमता नहीं। दूसरों को प्रभावित करने के लिए एक पक्ति भी उन्होंने कभी लिखी हो, यह मैने नहीं देखा। उनके लेखों में सत् नितर रहा है, इसका मुझे हमेशा आभास हुआ है । जिसे आत्मा के लेश को दूर करना है, जो अपने कर्तव्य को जानने के लिए उत्सुफ है, उसे धीमद् के लेखों में यहुत कुछ मिलेगा, ऐसा मेरा विश्वास है। फिर चाहे वह हिन्दू हो या अन्य किसी धर्म का अनुयायी । खाते, पीते, सोते या को भी किया फरते समय, वैराग्य तो उनके मन में रहता हो। कमी पिसी समय इस ससार के किसी भी धैभव को लेकर उनके मन में मोह एमा हो, यह मैने नहीं देखा। १३ श्रीमदराजय ૨૦૨૪ OSS .
श्रीमदराजचन्द्र जन्म शताब्दी S मा00 में कोटि-कोटि वन्दन समर्पित करने की इच्छा होना स्वाभाविक है। जगत् के समस्त जीवों के प्रति समभाव रखनेवाले श्रीमद् ने एक पत्र में लिखा है- "जैसी दृष्टि इस आत्मा के प्रति है, वैसी दृष्टि जगत् की समस्त आत्माओं के प्रति है। जैसा स्नेह इस आत्मा के प्रति है, वैसा स्नेह समस्त आत्माओं के प्रति है; जैसी सहजानंद स्थिति इस आत्मा की चाहते हैं, वैसी ही अन्य समस्त श्रात्माओं की भी चाहते हैं । जो कुछ इस आत्मा के लिए चाहते हैं, वह सव समस्त आत्माओं के लिए चाहते हैं। जैसा भाव इस देह के प्रति रखते हैं, वैसा ही समस्त देहों के प्रति रखते हैं। जैसा आचरण समस्त देहों के प्रति रखते हैं, वैसा ही इस देह के प्रति रखते हैं। इस देह में विशेष वुद्धि और अन्य देहों में विषम वुद्धि प्रायः कभी भी नहीं हो सकती।" -श्रीमद् राजचन्द्र इस प्रकार उनका अन्तरंग राग-द्वेप से दूर केवल समस्त प्रकार के समभाव से छलकता था। उन्हें सहज प्राप्त (ज्ञानियों की) समभावना के परिणाम स्वरूप, युग-पुरुष गांधीजी, अथवा शत्रु- मित्र, अथवा अपने प्रति समान भाव था । संसार में सम्पत्ति बढ़ाने के लिए समय-समय पर लोग हमेशा पुरुषार्थ में संलग्न रहते हैं, इसी प्रकार श्रीमद् आध्यात्मिक सम्पत्ति में वृद्धि करने के लिए, वर्ष में कुछ महीने अवकाश पाकर, गुजरात आदि के जंगलों में और ईडर के पहाड़ों में ध्यान के लिए चले जाते। वहां अनेक आध्यात्मिक जिज्ञासु और १६ RA २०२४ 000 onlia . जन्म शतादी मुमुसुओं को उनके सरसग का लाभ मिलता । उनको अध्यात्म जागृति और आन्तरिक दशा ऐसी थी, जिसका बाहर से पता नहीं ला सकता था। जनक विदेही अथवा महाराजा भरत चक्रवर्ती जैसी उनकी दशा थी । जैसे राजा जनक राज्य-मार को यहन करते हुए भी विदेही थे, और जैसे महाराजा भरत चक्रवर्ती पद और छह खण्ड का साम्राज्य भोगने पर भी, अन्तरंग शान और वैराग्य के कारण अपनी आत्मदशा का सन्तुलन रसते थे, उसी प्रकार थीमद् राजचन्द्र ससार के भार को वहन कर, हीरे-जवाहरात के व्यापारी होते हुए भी, आत्मदशा का सन्तुलन रखते थे। संवत् १९५२ में, केवल अट्ठाइस वर्ष की अवस्था में, लिखे गये एक पत्र में उनकी एफ सहज झाँफी दिसाई पड़ती है- जिसे मोक्ष को छोडकर किसी भी यस्तु की इच्छा या अभिलापा न थी, तथा अपने अखण्ड स्वरूप में रमण करते हुए मोक्ष की इच्छा भी जिसकी निवृत्त हो गयी है, उसे हे नाथ! तू सन्तुष्ट होकर भी और क्या देनेवाला था?" "हे कृपालु ! तेरे अभेद स्वरूप में ही मेरा नियास है । यहा फिर लेने-देने की शझट से हम छूट गये हैं और यही हमारा परम आनन्द है।" कल्याण के मार्ग को और परमार्थ के स्वरूप को यथार्थ रूप से न समझने पाले अपानी जीय, अपनी बुद्धि की कल्पना से मोक्ष-मार्ग की कल्पना कर, अनेक प्रकार के उपायों का आचरण करते हुए भी, मोक्ष प्राप्त करने के यदले संसार में परिभ्रमण परते है, यह देख, अकारण ही हमारा करणाई एदय रुदन करने रगता है। १७ श्रीमदराजवा २०२४ " Foo D " le 500 जन्म शताब्दी "वर्तमान में विद्यमान महावीर को भूलकर भूतकाल के भ्रमण में महावीर को खोजने के लिए भटकते हुए जीवों को श्री महावीर का दर्शन कहाँ से हो सकता है?" "हे दुपसकाल के अभागे प्राणियों भूतकाल की भ्रमणा छोड़ वर्तमान में विद्यमान महावीर की शरण में आओ, इसी में तुम्हारा कल्याण है।" "संसार के ताप से त्रस्त और कर्म बंधन से मुक्त होने की इच्छा करनेवाले परमार्थ के प्रेमी जिज्ञासु जीवों की विविध संताप-अग्नि को शांत करने के लिए हम अमृत के सागर है ।" मुमुक्षु जीवों का कल्याण करने के लिए हम कल्पवृक्ष ही हैं। अधिक क्या कहें ? इस विपम काल में परम शांति के धाम हम दूसरे राम अथवा श्री महावीर ही हैं । क्योंकि हम परमात्म- स्वरूप हो गये हैं। इस आन्तरिक अनुभव के बारे में, परामात्मपने की मान्यता के अभिमान से नहीं लिखा । किन्तु कर्म के बंधन से दुखी संसार के जीवों के प्रति करुणा भाव होने से, उनके कल्याण करने तथा उनके उद्धार करने की अकारण करुणा ही हृदय की यह वात लिखने के लिए प्रेरित करती है।" -श्रीमद् राजचन्द्र (वचनामृत पत्र नं. ६८०) मैं ब्रह्म हूँ, मैं सत्वरूप हूँ या परमात्म-खरूप हूँ, ये उद्गार वास्तव में स्पष्ट तादात्म्य और अपूर्व अद्वैत सिद्धि के सूचक हैं । ये कुछ अहंभाव से प्रेरित नहीं, करुणा से प्रेरित हैं; और ये संसार के हित के लिए हैं, यह भी स्पष्ट है। ज्ञानी की कितनी करुणामय भावना! श्रीमदराजय ૨૦૨૪ - 00 १ १८ Online है - . अट्ठाइस वर्ष की अवस्था में, सौराष्ट्र के सायला नामक गाव के रहनेवाले भक्त शिरोमणि श्री सौभाग्यभाई की प्रार्थना से प्रेरित हो, विक्रम संवत् १९५२ की शरद पूर्णिमा के अगले दिन, नडियाद में, याहर मे धूमकर आने के बाद, सन्ध्या के समय, उन्होंने केवल डेढ घटे के अन्दर, १४२ गाथाओं में समस्त शारों के तत्वज्ञान के निष्कर्षमए 'श्री आत्मसिद्धि शास्त्र' नामक अमर काव्य की सरल भाषा में रचना की। विन्दु में सिन्धु और गागर में सागर रूप इस कान्य में यात्मा के अस्तित्व से लेकर निर्वाण तक समस्त पदों की विचारधारामों का स्थाद्वाद शेली में प्ररूपण किया है। इसमें उनके आत्मज्ञान के मयन में से उद्भूत प्रश्नों और उनके तार्किक समाधान को, म्वाभाविक रूप में, दृदयस्पर्शी शैली में लिखा गया है। इस प्रकार उनके आत्मानुभव के निष्कर्षरुप इस काय की रचना से, आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं को शाश्वत मार्ग के दर्शनसम्प अपूर्व भेंट प्राप्त हुई। ससार के भव्य जीवों को इस भयसागर से पार उतरने के लिए ध्रुव तारे की भाँति दीपदड प्राप्त हुआ। इस अमर काव्य के अमृत बिन्दुओं पर ध्यान दीजिए- जाति येप का भेद नहीं, काया मार्ग जो होय साधे पा मुक्ति लद्दे, इसमें भेद न कोय । १ गच्छ मत की जो कल्पना यह नहीं, सद्व्यवहार मान नहीं निज रूप का यह निश्चय नदी सार२ १ शति-पेर नो मे नहि, परो मार्ग हो होय, धे ते मुधिरे, एमां भेद न फोय। २ गमतनी जे कसाना, ते नहि गन्दगार। भान नहि नियम, निधप दि मार। -श्रीमद् राजचन्म १६ ५०० - श्रीमदराजयः २०२४ जन्म शतादी G Do AN . Oos - राग, द्वेप, अज्ञान यह मुख्य कर्म की ग्रंथि । होय निवृत्ति जिससे वही मोक्ष का पंथ । ३ इस प्रकार व्यापार आदि की उपाधि के कारण, पूर्व प्रारब्धोदय के अंतराय रूप होने पर भी, इस प्राप्त हुई आत्मरमणता रूप स्वाभाविक समाधिमय आत्मदशा के आह्वाद में, अखंड निरन्तर रहने के लक्ष्य से (निर्विकल्प समाधि), इस अध्यात्म-वीर का अन्तरंग, पुरुषार्थ के प्रवाह में सतत प्रवाहित होने लगा। वेदान्त की दृष्टि से 'कैवल्य दशा' और जैन की दृष्टि से 'केवल लगभग भूमिका' उन्होंने प्राप्त की । श्रीमद् अपने सम्बन्ध में लिखे हुए एक नोट में कहते हैं- "हे जिन वीतराग! तुम्हे अत्यन्त भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। तुमने इस पामर के प्रति अनन्त-अनन्त उपकार किया है।" "हे कुंदकुंद आदि आचार्यो! तुम्हारे वचन भी निज वरूप की खोज करने में इस पामर को परम उपकारक हुए हैं, इसलिए मैं तुम्हें अतिशय भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। "हे श्री सोभाग! तेरे सत्समागम के अनुग्रह से आत्मदशा का स्मरण हुआ, इसके लिए मैं तुझे नमस्कार करता हूँ।" "अहो! सर्वोत्कृष्ट शान्त रसमय सन्मार्ग! अहो! उस सर्वोत्कृष्ट शान्त रस-प्रधान मार्ग के मूल सर्वज्ञ देव !" ३ रागद्वेष अज्ञान ए, मुख्य कर्मनी ग्रंथ, थाय निर्वृत्ति जेह थी ते ज मोक्ष नो पंथ । -श्रीमद् राजचन्द्र Co0 296 २० श्रीमदराजचन्द्र २०२४ जन्म शताब्दी arta G जन्म शताटदाभ अहो ! उस सर्वोत्कृष्ट शान्त रस फी सुप्रतीति करानेवाले परम कृपालु सद्गुरुदेव! इस विश्व में सर्वकाल तुम जयरत रहो, जयवत रहो! -धीमद् राजचन्द्र इस ससार में कितने ही सन्त, महात्मा और तीर्थफरों ने आत्मज्ञान को प्राप्त कर निर्वाण पद को पाया। किन्तु श्रीमद् ने वणि वेश में, गृहस्थी में रहते हुए, इस पद की प्राप्ति के लिए अद्भुत सतत अन्तर्-जागृति रखकर, जो भगीरथ प्रयत्न किया, उसकी कल्पना-मात्र भी हमारी शक्ति के बाहर है। आसपास लहर मारती हुई अपार जलराशि और नीचे जमी मलिन पंक के यीच में भी, जिस प्रकार कमल निर्मल और जल से अलिप्त रहता है, उसी प्रकार इस ससार में जल-कमल की भाँति रहने के लिए इस सन्त को कितनी जागृति और कितना पुरुषार्थ करना पटा होगा! संग-प्रसग और आधि-व्याधि से भरपूर इस ससार-रूपी फाजल की कोठटी में रहकर भी, प्रयल धैराग्य से आत्मा की अखड ज्योति को, स्फटिकमणि के समान शुद्ध रखा, और इस निर्मल ज्योति फो काजल का एक अंश मात्र भी स्पर्श न कर सका, अथवा उसकी शुद्धता का अंश मात्र भी कम न हो सका । परन् मग्नि में तपे हुए सोने की भाँति उनमें शुद्धता का अश उत्तरोत्तर पढ़ता ही गया। इसके पीछे कितना भगीरथ प्रयत्न होगा! कितना आत्म-मथन होगा! कैसा अडिग मनोरल और सयम रदा होगा! कितने पूर्वजन्मों के संस्कार का प्रसाद होगा! यह विचार फर कल्पना भी स्तभित हो जाती है, विचारों का प्रयाए या जाता है। श्रीमद् यणिक येश में, गृहस्थी में याछ जीयन ૨૧ 'श्रीमद्राजवन २०२४ 600 ala ee O साथ-साथ 5 500 2500 बिताते हुए, अंतरंग से, वीतराग निर्ग्रन्थ भाव से निर्लेप रहकर, सद्धर्म के उद्धारक बने, यही इनकी अपूर्व विशिष्टता है । यही तो पंचम-काल का आश्चर्य है। महात्माओं की सत्प्राप्ति के लिए, अंतरंग में पराकाष्ठा को प्राप्त आकुलता, अधीरता और वेदना-इनका सामान्यतया दृष्टिगोचर होना असंभव है। इन्हें तो वही अनुभव कर सकता है जो राम क वाण' से घायल हुआ हो। श्रीमद् ने परमार्थ वृत्ति को मुख्य रूप से आजीवन सुरक्षित रखा । उसके उनकी परोपकार वृत्ति भी उतनी ही प्रवल थी। संवत् १९५६ में परमार्थ मार्ग के प्रचार के लिए श्रीमद् ने 'परम श्रुत प्रभावक मंडल' संस्था की स्थापना की। इस संस्था की देखभाल महात्मा गाँधी की अध्यक्षता में, स्वर्गीय रेवाशंकर के सुपुर्द की गयी थी। उनकी चिर स्मृति के रूप में यह संस्था आज भी बम्बई में, अगास आश्रम के संचालन द्वारा परमार्थ मार्ग के प्रकाशन का प्रचार-कार्य कर रही है। जीवन के पिछले वर्षों में श्रीमद् की शारीरिक दशा अत्यन्त कमजोर हो गयी थी। इससे माटुंगा, शिव, नवसारी, तीथल, घढवाण आदि स्थानों में उन्हें रहना पड़ा। अन्त में वे राजकोट रहने लगे। डाक्टरों ने ज्यादा बातचीत करने की मनाई की थी। इसी प्रकार यदि पत्र लिखाना हो तो वे केवल एक-दो पंक्तियों में ही लिखा देते। संवत् १९५७ चैत्र सुदी २, शुक्रवार को लिखे हुए एक पत्र में वे लिखते हैं- : . "ॐ अनन्त शान्तमूर्ति चन्द्रप्रभु स्वामी को नमोनमः । वेदनीय को तथारूप उदयमान रूप से वेदन करने में क्या हर्प और क्या शोक? ॐ शान्ति....... 00 AN man २२ G श्रीमदराजच २०२४ जन्य शताब्दी onts
उनकी सेवा में उनके भ्राता मनसुख भाई और रेवाशंकर
भाई, डा प्राणजीवनदास, धाराभाई, नवलचन्दभाई आदि
उपस्थित रहते थे। एक बार प्रसगवश श्रीमद् ने यातचीत करते
हुए सहज रूप से धारशीभाई से कहा-"हमारी मौजूदगी में
चार पुरुषों ने आत्मज्ञान प्राप्त किया है। वे हे श्री जूठामाई,
थी सोभागभाई, श्री अवालाल भाई और श्री लल्लुजीमुनि
(प्रभुधी)।
श्रीमद् राजचन्द्र जैसे उत्तम नरपुंगव की दीर्घायु काल को
सभवत अनुकूल नहीं हुई। क्योंकि यदि परमार्थ की अपंड
वर्णमत होती रहे, सद्धर्म का प्रवर्तन होता रहे तो फिर दुपम
कलिकाल कैसे कहा जाये केवल ३४ वर्ष की अल्प अवस्था में,
संवत् १९५७, चेत्र वदी ५ मंगलवार के दिन, विरल विदेही,
वीतराग विभूति सपन्न विश्व का यह ज्योतिर्धर, सम्पूर्ण शुद्धि में,
आत्मस्वरूप में समाधिस्थ हो इस लीला को समेट, राजकोट में
अमरपद को प्राप्त हुआ।
पूर्णचन्द्र की भॉति अमृतसुधा की वर्षा करते हुए, इस
झानचन्द्र का उदय शीतलता देनेवाली हेमन्त ऋतु हुआ था,
और सचमुच ! यह क्तिना विचित्र सयोग था कि उसका अस्त
भीपण ज्याला और आग बरसाने वाले चैन महीने में हुआ!
इस ज्ञानावतार थीमद् राजचन्द्र के कृपा-प्रसाद को प्राप्त
कर, उनके द्वारा प्रदर्शित सनातन चीतराग मोक्ष-मार्ग की
उपासना करनेवाले, अनेक सत् साधफों में अत्यन्त सौभाग्यशाली
श्रीमद् लघुराज स्वामी, श्री सोभागभाई, श्री जूठाभाई और
थी अंबालाल भाई-ये चारों महानुभाव, श्रीमद् से आत्मशान-रूप
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श्रीमदराज
२०२४
जन्म शताब्दी
500 अमोल ज्ञान का उत्तराधिकार प्राप्त कर, धन्य हुए (इनका आध्यात्मिक संक्षिप्त जीवन अगले प्रकरणों में दिया गया है)। श्रीमद् की नश्वर देह अब हमारे बीच नहीं है। परन्तु उनकी अनश्वर देह ज्वलन्त ज्ञान की ज्योति के रूप में, अनन्त काल तक हमारे मार्गदर्शन के लिए जाज्वल्यमान हो रही है। विविध जिज्ञासुओं के प्रतिवोध के लिए, उनके द्वारा लिखित, अद्भुत ज्ञान के प्रकाशक अमूल्य ज्ञान-साहित्य 'श्रीमद् गजचन्द्र' नामक ग्रन्थ में प्रकाशित है, वह आज भी अनेक जिज्ञासुओं की ज्ञानपिपासा शान्त करने के लिए, अनेक रूप से उपकारक है। अनेक शास्त्रों के पठन से भी जो लाभ मिलना मुश्किल है, वह इस एक ही महाशास्त्र के शान्तिपूर्वक पठन, मनन और स्वाध्याय द्वारा जिज्ञासु लोग सरलता से प्राप्त कर, अपने आपको धन्य मान रहे हैं। तथा परमार्थ-रूप-अमृत-पान के पिपासुओं के लिए, श्रीमद् गजचन्द्र आश्रम, अगास जैसी संस्था, तथा ववाणिया, वडवा, खंभात, नार, काविठा, बोरसद, उत्तरसंडा, ईडर, धामण, आहोर (मारवाड़), आदि स्थानों के मुमुक्षु श्रीमद् द्वारा प्रदर्शित परमार्थ के मार्ग में प्रगति करने के लिए, श्रीमद् को, निप्काम करुणा के अथाह आभार से नतमस्तक हो, निरन्तर भक्ति- भावपूर्वक श्रद्धांजलि समर्पित कर रहे हैं। आधुनिक काल में, जीवन में, जीवन-व्यवहार के प्रत्येक कार्य में, भौतिक समृद्धि की बढ़ोतरी ही सर्वोच्च ध्येय हो गया है, और इसी की आज संसार में भगवान के रूप में पूजा होती है। सत् , सत्पुरुप, सत्संग, सद्वोध और सत् पुरुषार्थ के प्रति लोगों का दुर्लक्ष हो गया है। ऐसे इस कलिकाल में इस महापुरुप के दर्शन अत्यन्त दुर्लभ जान पड़ते हैं। और ये दर्शन हमें अनायास 00 ₹600 . २४ 200 श्रीमदराजय ૨૦૨૪ अन्य शताब्दी ००० oria
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ही मिल गये, इसलिए हम यहुत भाग्यशाली हैं। आज श्रीमद् का
देहधारी रूप हमारे धीच नहीं, परन्तु उनकी अविनाशी उज्ज्वल
आत्म-ज्योति अपड-रूप से प्रकाशित होती हुई हमें प्रकाश
पहुँचाती है। उनके आध्यात्मिक साहित्य के स्मरण रूप पुष्प
कभी भी नहीं मुरझायेंगे।
इस दुपमफाल में सत् जिज्ञासुओं को परमार्थ की प्राप्ति में
श्रीमद् राजचन्द्र का आध्यात्मिक जीवन सत् मार्गदर्शक, और
प्रेरणा-रूप बनकर चिरस्मरणीय रहेगा।
पाठक ! इस महापुरुप के जीवन-चरित्र का दिग्दर्शन कर,
उसके वचनामृत, पत्र और कान्यरस का आस्वादन कर, उसके
यताये हुए मार्ग से आत्मोन्नति साधकर, और जीवन को सार्थक
यनाफर, नतमस्तक हो, भक्ति-भायपूर्वक हम श्रीमद् को श्रद्धाजलि
समर्पित करते ह।
अगणित अगणित दन हो
क
१५००
तत् सत्
श्रीमदराजचन्द्र
२०२४
जन्म
शताटदी
and
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परिपूर्ण ज्ञान से, परिपूर्ण ध्यान- से,
परिपूर्ण चारित्र, बोधित्व दान से,
विरागी महाशांत मूर्ति तुम्हारी
प्रार्थना राजप्रभु ले लो हमारी ।
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श्रीमदराजय
२०२४
राजचन्द्र
जन्म
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श्रीमतलधुरामास्वामि
निष्काम करुणामूर्ति
जन्मशतादी
श्रीमदराजवा
२०२४
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" जन्मशताटदी निष्काम फरणामूर्ति श्रीमद् लघुराज रवामी (प्रभु श्री) पूर्व जन्म के सस्कार से, प्रथम दृष्टि से ही " हम अनादिकाल से परिभ्रमण कर रहे हैं, इसलिए हमारी सभाल करो" (आत्मा की पहचान फराओ), इस प्रकार विनय भक्तिपूर्वक प्रार्थना करके, श्रीमद् राजचन्द्र को (उम्र, वर्ष २२) तीन बार सायाग दण्डवत् नमस्कार करनेवाले, स्थानकवासी सम्प्रदाय के, सभात सघाड़े के अगुमा, मुनिश्री लयुगज स्वामी (उम्र, वर्ष ३६) थे। इस समय, फाल के गर्भ में स्थित सत्वीज का एक ऐसा अगर फूटा कि जिसके फलस्वरूप आज श्रीसत्य सनातन वीतराग मार्ग की अत्यन्त सरल और सुगम म्प से आगधना कर, अनेक जीव आत्मकल्याण कर रहे हैं। परम तत्वश अध्यात्म-मूर्ति थीमद् राजचन्द्र से आत्म प्रतीति प्राप्त फर-उसी में नाचरण पर, परमात्म दर्शन को प्राप्त, थीमद् के उदय में स्थित पीनराग मार्ग के अन्तरग रम्य को गुरुरूपा से (राजसपा से), अटोरिक दृष्टि द्वारा उपल ध फर, मोक्षार्थी भव्य जीरों को अपनी सहज फरणा द्वारा सोध घृष्टि से आत्महित के प्रति प्रेरिल पर, दुर्लभ मनुष्य-भर की सफलना फराने में सोटाए उपकारी ऐसे श्रीमद् लघुराज स्वामी को (प्रमुथी को) अगणित पदन! अगणित बदन!' अनादिकार से जीव परमार्थ मार्ग की अपनी पल्पना पुदि से गधना कर रहा है। उसमें सत्यगट म्यरुप के प्रकाश मानी फा सोग महार माग्योदय से प्राप्त होता है। हमें इस पचम पाल में ऐसा भमाय योग मिरा । परन्तु यदि धीमद् राजचन्द्र पो यणिम् श्रीमदराजचन्द्र २०२४ OpN 5 वेश में, वीतराग स्वरूप में, पहचानने का हमें अवसर मिला होता तो उसमें हमें पूर्णतया असफलता ही मिलती। कारण कि ज्ञानी को पहचानने के लिए अलौकिक आत्मदृष्टि-अन्तर्चक्षु-की अत्यन्त आवश्यकता है। इस विनाशी चरम चक्षु के द्वारा ज्ञान (शानी) अप्राप्य ही रहता है। ऐसे इस दुर्लभ योग को सुलभ बनाकर, श्रीमद् को वीतराग स्वरूप में, जगत् के पहचानने में महान् निमित्त- स्वरूप करुणामूर्ति श्री लधुराज स्वामी हैं। यदि ऐसा संयोग प्राप्त न होता तो किसी अज्ञानी वालक को दिये हुए अनमोल रत्न की भाँति ही हमारी दशा होती। परन्तु करुणामूर्ति 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना रखने वाले श्री लघुराज स्वामी ने अपनी सहज करुणा दृष्टि से, हमें इस अनमोल रत्न की (श्रीमद् राजचन्द्र की ) अगाध-असीम- तेजस्विता का परिचय कराया। ज्ञानी को पहचानने में सहायक श्री लघुराज स्वामी मुमुक्षुओं के महान उपकारी हैं और उनकी बलिहारी है। इस विरल विभूति से सप्पन्न श्री लघुराज स्वामी का जन्म भाल देश के वटामण गांव में, संवत् १९१०, आसो वदी १ के दिन, वैष्णव सम्प्रदायी भावसार सुखी कुटुम्ब में हुआ था। इनके पिता का नाम कृष्णदास गोपालजी और माता का कसली वा था । इनका नाम लल्लूभाई रखा गया। जव थोड़ा-बहुत लिखना-पढ़ना आ गया तो उन्होंने पाठशाला छोड़ दी (युवावस्था में उनका दो बार विवाह हुआ)। खंभात के स्थानकवासी सम्प्रदाय के साधुओं का उस गांव में वार-चार आना-जाना लगा रहता था। इसलिए उनके सम्पर्क से उस कुटुम्व में स्थानकवासी जैनधर्म के प्रति श्रद्धा हो गयी। सत्ताइस वर्ष की अवस्था में उन्हें पीलिया हो गया। अनेक 4600 २८ 200000 श्रीमदराजचन्द्र जन्म शताब्दी २०२४ Q0 G ala उपवार फरने पर भी रोग पढ़ता ही गया और उनका शरीर अत्यन्त क्षीण हो गया। हम समय उनमें धार्मिक सस्कार जागृत हुए और उन्होंने सकल्प किया, "यदि रोग शान्त हो जाय तो में दीक्षा ले लूगा ।" रोग शान्त हो जाने पर उन्होंने दीक्षा के लिए तैयारी की, परन्तु उनकी माता ने सन्तान हो जाने के याद ही दीक्षा ग्रहण करने की अनुमति दी। कुछ समय बाद पुत्र का जन्म हुआ। और जब वह एक महीने का हो गया, तर उन्होंने अपने भतीजे ऐनफरणजी के माथ, समत् १९४०, जेठ रदी ३, मगलवार के दिन, यहुन धूमधाम के साथ, पमान में मुनि श्री हरराचन्दजी से टीक्षा ग्रहण की। इस अरमर पर देवकरणजी को श्री लल्लूजी स्वामी का शिष्य घोषित किया गया। दीक्षा लेने के पश्चात् उन्होंने उग्न नपश्चर्या की, तथा विदेशी और विनयी होने के कारण अपने गुरु तथा अन्य माधुओं के घे मिय हो गये। किन्तु जिम मात्मशाति को प्राप्त परने का उन्होंने विचार किया था, यह प्रयल पुरागर्थ करने पर भी प्राप्त नहीं हुई। एफ पार लल्टूजी म्यामी के गुग थी हरवचन्दजी महाराज भगवतीसूध का व्याप्यान कर रहे थे। उस समय अन्य के किमी अध्याय में इस विषय की चर्चा आई कि भरस्थिति परिपक्व एए बिना पिसी को मोक्ष नहीं होता। इस सम्बन्ध में धी लल्टूजी स्वामी को शका हुई कि भय स्थिति परिपक्य होने पर यदि मोक्ष होता हो, नो फिर साधुत्व और फायफ्लेश आदि मियाए परने की क्या आवश्यकता है। इस सपा के समाधान के रिप पटुन-से रोगों के माय उन्होंने चर्चा की, लेवीन सतोरजनफ उत्तर नहीं मिला। इस पीर में एक मुमुनु माई थी अम्यागर रचन्द पपील ने धीरन्यूजी म्पामी से कहा कि ऐसे-ऐसे प्रश्न तो क्या, मनेर जैन २६ श्रीमदराजचन्द्र ૨૦૨૪ जन्म रातादी onli 5000 90 . आगम हस्तामलकवत् हैं एक ऐसे पुरुप है श्रीमद् राजचन्द्र,-जो हाल ही में खंभात आनेवाले हैं । यह सुनकर उनके मन में श्रीमद् के दर्शन करने की तीव्र भावना जाग उठी और उन्होंने श्री अम्वालाल भाई से अनुरोध किया कि वे श्रीमद् को उपाश्रय में ले आयें । संवत् १९४६ के चातुर्मास में, श्रीमद् खंभात पधारे । उपाश्रय में श्री लल्लूजी स्वामी को उनके प्रथम दर्शन हुए। प्रथम दर्शन में ही गृहस्थ-वेश धारण करनेवाले श्रीमद् को ( आत्मा की निर्मलता के कारण) परम योगी मानकर, मुनिवेशी लघुराज स्वामी ने तीन बार दण्डवत् नमस्कार कर, सम्यवत्व प्राप्त करने की अभिलापा प्रकट की। श्रीमद् ने श्री लल्लूजी स्वामी के दायें पैर का अंगठा देखकर श्री अम्वालालभाई से कहा, “श्री लल्लूजी पूर्वजन्म के संस्कारी पुरुप हैं।" 00 5 tota श्रीमद् खंभात में लगभग एक सप्ताह रहे। वहां प्रतिदिन मुनिश्री अम्वालालभाई के घर जाकर, एकान्त में श्रीमद् राजचन्द्र के दर्शन करते, और उनका सद्बोध प्राप्त करते । फलस्वरूप उन्होंने श्रीमद् को अपने अन्तरंग में सद्गुरु के रूप में धारण किया और श्री अम्वालालभाई की मार्फत, श्रीमद् के साथ पत्र-व्यवहार कर सत्वोध प्राप्त किया, कारण कि मुनिवेश में श्रीमद् के साथ सम्पर्क करना बहुत मुश्किल था। इस प्रकार, प्राप्त किये हुए सत्वोध का विचार जैसे-जैसे वढ़ता गया, वैसे-वैसे उनके मन में श्रीमद् के दर्शन-समागम की आतुरता बढ़ती गई। इस समय दीक्षा-गुरु की आज्ञा प्राप्त कर, उन्होंने संवत् १९४९ का चौमासा श्री देवकरणजी के साथ, वम्व में, चिंचपोकली के उपाश्रय में किया। वम्बई आने के बाद श्रीमद के दर्शन-समागम के लिए जव वे उनकी पेढी (दुकान) पर गये तो ज श्रीमदराजय २०२४ भोन्य शताब्दी G onlin श्रीमद् ने प्रश्न किया, "इस अनार्य जैसे देश में तुमने चातुर्मास क्यों रिया ? मुनि को अनार्य जैसे देश में विचरण करने की आशा थोटीही टी गई है?" यह सुनकर मुनिश्री ने उत्तर दिया, "आपके दर्शन-समागम की भावना से ही यहा चातुर्मास किया है। मुनिथी प्रतिदिन धीमद् के दर्शन-समागम के लिए उनकी पेढी (दुकान) पर जाते और एकान्त में दर्शन-समागम का लाभ माप्न फर रनार्य होते । इस प्रकार, यम्बई का चातुर्मास पूग कर, सरन् १९५० और १९५१ के चातुर्मास मुनिधी ने सूरत में किये। सूग्न में श्री लघुराज स्वामी को दस-ग्यारह महीने से गुसार आया परना या। फिमी दया से फायदा न होता। बीमारी यदने लगी तो उन्होंने श्रीमद् को पत्र लिखकर प्रार्थना की, " हे नाथ, पर इस देव का कोई भरोसा नहीं, और यदि सम्यक्य धारण किये रिना प्राण छूट गये तो मेरा मनुष्य-भव ही व्यर्थ चला जायेगा। इसलिए रपा करके सम्यक्त्व प्रदान करें।" पत्र के उत्तर में श्रीमद्ने अनन्त एपापूर्वक छह पद का पत्र लिसा । साथ ही यह भी लिया फि शरीर छटने का भय फग्ना योग्य नहीं। आत्मा की पहचान करने के लिए उन्होंने 'मात्मा है', 'आत्मा नित्य है', 'मात्मा फर्ता है', 'आमा मोरना है', 'मोक्ष', और 'उस मोय का उपाय है '-दम प्रकार मात्ममान अयग सम्यक्त्व की प्राप्ति के लिए छह पदों पा अपूर्व पचनों द्वारा निरूपण लिया। इस पत्र के विषय में धी रघुगज न्यामी ने कहा है, "यह पत्र एमारी भनेक रिपरीन मान्यतागों को दूर करता है। न इसने हमें इटिया रदने दिया, न तया में रहने दिया, पर न येदान्त की और दी गुम्ने डिगा फिमी भी मत-मतानर पी गोर न ले जापर पेर पर धरन्थिन गया । यह पफचम रारपूर्ण पत्र। या ३॥ 50 200 , श्रीमदराजपा २०२५ जन्म शताटदी 5 600 000 जन्म शताब्दी एक ऐसा आश्चर्यकारी पत्र है कि यदि जीव में योग्यता हो तो उस में सम्यक्त्व प्राप्ति का विचार उत्पन्न हो सकता है। संवत् १९५२ का चातुर्मास श्री लघुराज स्वामी ने खंभात में किया। इस बीच में मुनिश्री के दीक्षा-गुरु श्री हरखचंद महाराज काल-धर्म को प्राप्त हुए। श्रीमद् राजचन्द्र के समागम से श्री लल्लूजी की श्रद्धा पलट गयी। वे एक गृहस्थ को गुरु मानने लगे हैं, आदि बातें साधु और श्रावकों की मंडली में फैलने लगीं। इससे उनके प्रति जनसमुदाय का प्रेम कम हो गया । लेकिन इन सब वातों की परवाह किये विना मुनिश्री गुम-भक्ति में लीन रहते । श्री लघुराज त्वामी के समागम के कारण, मुनि देवकरणजी के साथ अन्य पांच मुनियों के मन में भी श्रीमद् राजचन्द्र के प्रति प्रेम जागृत हुआ । और इस प्रकार श्री मोहनलालजी, श्री चतुरलालजी, श्री लक्ष्मीचंदजी, श्री बेलशीराव और श्री नरसिंहराव-ये सातों मुनि श्रीमद् के प्रति श्रद्धा-भक्ति तथा प्रेम रखने लगे और उनसे सद्धर्म की प्राप्ति होगी ऐसा भाव मन में लाने लगे। संवत् १९५२ में श्रीमद् राळज से बडवा (खंभात के पास) पधारे । समस्त मुनि उनके दर्शन-समागम के लिए आये और श्रीमद् को नमस्कार करके बैठ गये। श्री लघुराज स्वामी को विरह वेदना असह्य हो रही थी और उसका कारण था उनका मुनिवेश । उन्होंने कहा, " हे नाथ, आप रात-दिन मुझे अपने चरण-कमलों में आश्रय दें। इस मुंहपत्ति की मुझे जरूरत नहीं।" यह कहकर उन्होंने मुंहपत्ति उतार कर श्रीमद् के सामने रख दी और उनकी आंखों से आंसुओं की धारा वहने लगी। गद्गद् होकर वे कहने लगे, “ मुझसे समागम का वियोग सहन नहीं होता।" इस विरहाग्नि की ज्वाला देखकर भक्तवत्सल भगवान् का कोमल हृदय भी द्रवित हो गया। ३२ श्रीमदराजचन्द्र २०२४ Dog Cop O0 orlta , टा , 00 केवल सद्गुरु अहा ! सत् समागम के लिए कैमी वेदना! (इस हार्दिक भाव का कोई प्रेमयुक्त भक्ति-परिपूर्ण हृदय ही अनुभव कर सकता है)। श्रीमद् ने मुनि देवकरणजी से कहा, "इस मुहपत्ति को श्री लल्लूजी को दे दो और अभी इसे रसो। इसी वर्ष श्रीमद् ने, नडियाद में लिखे हुए " श्री आत्मसिद्धि शान" को, एकान्त में मनन करने के लिए श्रीमद् लघुराज स्वामी के पास भिजवाया । इस सम्बन्ध में मुनिश्री ने लिखा है, " उसे पढते हुए और किसी गाथा को पढ़ते हुए मेरी मात्मा में आनन्द हिलोरें लेने लगता, और मुझे लगता कि एक-एक पद अपूर्व माहात्म्य से परिपूर्ण है " 'आत्मसिद्धि' का ही खाध्याय और मनन निरन्तर रहता, आत्मोल्लास होता और कुछ अच्छा न लगता। दूसरी बातों पर तुच्छ भाव रहता। और उसी के भाव का माहात्म्य आत्मा में भासित होता।" सवत् १९५४ में श्रीमद् लघुराज स्वामी ने यसो में चातुर्मास किया। यहा उन्हें एक महीने तक श्रीमद् राजचन्द्र के समागम का अपूर्व लाभ मिला जिससे आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। दूसरे मुनियों के सम्बन्ध में भी श्रीमद् ने सिफारिश की तथा मुमुक्षुओं फो आत्म-कल्याण का मार्ग प्रदर्शित करने के लिए मुनिभी से कहा । देवकरणजी मुनि को, खेड़े में, श्रीमद् राजचन्द्र का समागम तेईस दिन तक रहा। उसका वर्णन करते हुए श्री लघुराज स्वामी को एक पत्र में वे लिखते हैं- सद्गुरु की परिपूर्ण प्रतीति हुई, अत्यन्त निश्चय हुआ। रोमाच हो उठा। सत्पुरुप की प्रतीति का निश्चय रोम-रोम में व्याप्त हो गया। वृत्ति आज्ञावश हो गई आपने जैसा कहा था, ३३ S श्रीमदराजचन्द्र जन्म शताब्दी २०२४ 1100 BAM LAVR E वैसा ही हुआ। फल पक गया, रस चख लिया। शान्त हो गये। आज्ञानुवर्ती हमेशा शांत रहते हैं। सत्य पुरुष के चरणों में मोक्ष प्रत्यक्ष दिखायी देता है...हम केवल आहार के समय ही अपना समय व्यर्थ गंवाते हैं, वाकी तो सद्गुरु की सेवा में काल व्यतीत होता है...सर्वोपरि उपदेश में ऐसा लगा करता है कि शरीर को कृश करके, अन्तरंग तत्व की खोज कर, कलेवर को फेंककर चले जाओ...कृपालुदेव ने पूर्ण कृपा की है।" अहा! समागम का कितना अद्भुत फल ! चातुर्मास समाप्त होने पर सातों मुनि नडियाद में एकत्र हुए। अल्प आहार और अल्प निद्रा आदि नियमों का पालन कर, दिन का अधिकांश समय पठन, मनन, भक्ति ध्यान आदि में व्यतीत होता। खेड़ा तथा वसो में जो श्रीमद् का समागम हुआ, उस समय के बोध का स्मरण कर परस्पर विचारों का आदान-प्रदान होता। संवत् १९५५ में सातों मुनियों को ईडर के पहाड़ पर श्रीमद् के दर्शन का अपूर्व लाभ मिला | श्रीमद् को ईडर के निर्जन पहाड़, गुफाएं, श्मशान-भुमि और जंगल आदि स्थान आत्मसिद्धि के लिए अनुकूल प्रतीत हुए । इस क्षेत्र का प्रभाव ही वैराग्य की वृद्धि के लिए प्रेरणादायक था। वृत्तियों के शांत होने पर, उदासीन और असंगता के नीरव वातावरण की सृष्टि होती। श्रीमद् ईडर के नीरव पहाड़ों में कांटे-कंकड़, झाड़,-झंखाड़ और नुकीले पत्थरों को लांघते हुए शरीर की परवाह न करते और आत्मप्रयोग में लीन रहते । 'द्रव्यसंग्रह' की गाथाओं का पाठ करते हुए, एक ही लय से उन्हें ऊंचे स्वर से पढ़ते । फिर ध्यान में समाधिस्त हो जाते। उस समय की उनकी वीतराग स्वरूप दशा देखकर, मुनिगण भी अपूर्व शान्ति का अनुभव करते । इनकी PAK gar 600 O PA श्रीमदराजय २०२४ अन्य शताब्दी A onlin श्रीमदराजचन्द्र आत्मा में जो उत्कृष्ट भाव की श्रेणी प्रकट होती, यह वचनों द्वारा व्यक्त नहीं की जा सकती। सय मुनियों ने गुरु की आज्ञा पाकर, ईडर के पहाडों पर यने हुए श्वेताम्मर और दिगम्बर मदिरों में चीतराग मूर्तियों के पहली बार दर्शन किये। इससे उनके मन में अपूर्व उल्लास पैदा हुआ। पहाड़ पर बने हुए दिगम्बर मुनियों के समाधि-स्थान, स्मरण-स्तूप, स्मशान, कुड और गुफा आदि स्थानों का निरीक्षण किया। ईडर के पहाड़ों में कल्पवृक्ष की भाति आन वृक्ष के नीचे, मातों मुनियों के साथ, कृपालुदेव एक शिला पर विराजे । मुनियों के समीप 'द्रव्यसग्रह' का पाठ किया। उस समय साधु समुदाय की अद्भुत चेराग्य दशा के कारण, मुनियों की आत्मा में, सद्गुरु की भक्ति का अपूर्व उल्लास पैदा हुआ। इस प्रकार की तीव वैराग्य दशा को प्राप्त मुनि देवकरणजी पहने लगे, "अव हमें गाव में जाने की क्या आवश्यकता है? लेकिन क्या करें ? पेट पालना है।" कृपालु देव ने कहा "मुनियों का पेट ससार के कल्याण के लिए होता है। यदि मुनियों के पेट न होता, तो चे गावों में न जाकर, पहाड की गुफा में रहते हुए, केवल चीतराग भाव से जगल में विचरण करते । लेकिन इससे संसार का कल्याण न हो पाता, इस कारण मुनियों का पेट ससार के कल्याण के लिए है। इंडर में, एक बार कृपालुदेव विशाल शिला पर विराज रहे ये। वे 'उत्तराध्ययनसून' की गाथा का इतने अलौकिक दिव्य म्वर से पाठ कर रहे थे कि यह स्थर धन में चारों ओर फैल जाता | गाथा का पाठ करने के पश्चात् , उसफा भावार्थ वे मुनियों फो सममाते । ग्रन्थ को पूरा सुनने के पाद, इस अपूर्व ममागम ३५ ૨૦૨૪ आत्म शताटदी " G o 5 000 mom की मादकता में मुनि देवकरणजी कह उठे," अब तक परम गुरु के जितने भी समागम हुए, उनमें यह समागम सर्वोत्कृष्ट है । जैसे मंदिर के शिखर पर कलश चढ़ाते हैं, उसी प्रकार यह प्रसंग परम कल्याणकारी सर्वोत्कृष्ट मान्य हुआ। ईडर में सातों मुनियों को कृपालुदेव का सत्संग अपूर्व था। मुनिगण ईडर के आसपास छोटे-छोटे गांवों में विहार करते; वहां पहाड़, जंगल आदि निर्जन वन का त्यागीयों के अनुकूल क्षेत्रों में ध्यान आदि की भावनापूर्वक विचरण करते । श्रीमद् लघुराज स्वामी दो-अढ़ाई महीने, ईडर के आसपास के क्षेत्रों में विचरण करते रहे। संवत् १९५५ का चातुर्मास उन्होंने नडियाद में किया। बम्बई में श्री लघुराज स्वामी के चातुर्मास होने के बाद, श्रीमद् के साथ उनका परिचय तथा पत्र-व्यवहार बढ़ा जिससे सद्गुरु के प्रति उनका प्रेम और भक्ति छिपाये न छिपी। परिणाम यह हुआ कि लोगों में तथा साधुओं में इस बात की चर्चा होने लगी। यह चर्चा सुनकर संघाड़े के साधु खंभात में इकट्ठे हुए तथा उन्होंने लघुराज आदि मुनियों को खंभात के संघाड़े से वहिप्कृत कर दिया। इस सम्बन्ध में श्री अम्बालाल भाई ने एक पत्र में लिखा है- ऐसे लौकिक उदय से मन में संकोच भाव न रखते हुए महामुनि आनन्दपूर्वक विचार करते हैं-असत् संग दूर होगा। समस्त संसार का ममत्व त्याग दिया था, उसमें इस प्रलापी संघाड़े के कारण कुछ संलग्नता रह गई थी, वह भी सहज भाव से छूट गई । यह परम कृपा श्री सद्गुरु की ही है। अब तो हे जीव ! तेरा गच्छ, तेरा मत, और तेरा संघाड़ा बहुत बड़ा हो गया-इतना . ३६ श्रीमदराजचन्द्र २०२४ 000 शन्स शताब्दी ola 000 500 जन्म शताब्दी यहा जितना चौदह राज लोक । पढ्दर्शन पर समभाव और मैत्री रख कर निर्ममत्व भाव से, वीतराग भाव से, आत्मसाधन का अतिशय अवकाश प्राप्त हुआ दो-चार महीने मुनियों का समागम करते रहने के लिए श्रीमद् ने मुमुक्षु-वर्ग से अनुरोध किया था । इसलिए मुमुक्ष लोग मुनियों के दर्शन-समागम के लिए उनके पास जाते और पत्र- व्यवहार द्वारा लाभ उठाते । उसके बाद वीरमगाम, अहमदागद, नरोडा आदि स्थानों में मुनियों को श्रीमद् के समागम का लाभ मिला। सघाडे से अलग हो जाने के बाद, स्थानकवासी वेश में होने के कारण, स्थानकवासियों के सम्पर्क से दूर रहने के लिए, श्री लल्लूजी खामी ने सवत् १९५६ का चातुर्मास 'सोजिना' में किया । कर्म की कितनी विचित्रता हे कि जिन मुनियों को समाज ने सघाडे के बाहर कर दिया था, उन्हीं मुनियों का श्रीमद् के साथ सवत् १९५७ में, अहमदागद में समागम हुआ । यहा 'ज्ञानाच' और 'स्वामी कार्तिकेयानुप्रेक्षा' नामक दो उच्च कोटि के हस्तलिखित दिगम्मर अन्य जो श्रीमद् के पास थे, उन्हें उन्होंने अपनी मातुश्री देवमाता तथा पत्नी झपकथा के हाथ, श्री लघुराज स्वामी तथा देवकरणजी मुनियों को भेट भिजवाई । देवकरणजी ने श्रीमद् से प्रश्न किया-"आपका शरीर एकदम इतना कृश कैसे हो गया श्रीमद् ने उत्तर दिया-"हम शरीर के सामने पडे है।" दूसरे दिन श्री लघुराज स्वामी और देवकरणजी को आगाखा के गले में बुलाकर श्रीमद् ने अपनी आत्मदशा के सम्बन्ध में बातचीत की-"अप केवल वीतरागता के सिवाय श्रीमदराजचन्द ૨૦૨૪ " VI ne S हमें कोई वेदना नहीं। हममें और वीतराग में कोई भेद नहीं समझना।" दोनों मुनियों को इस बात का विश्वास था, परन्तु श्रीमद् के मुख से यह सुनकर उनके हृदय में परम उल्लास हुआ। संवत् १९५७ में, राजकोट में, चैत्र वदी ५ के दिन, जय श्रीमद् राजचन्द्र का देहोत्सर्ग हुआ तो उस समय श्रीमद् लघुराज स्वामी काविठा में थे। एकान्त जंगल में रहने का अभ्यास था। उस दिन उनका उपवास था। पारणा के समय जब वे गांव में आये तो श्रीमद् के देहोत्सर्ग का समाचार सुनकर फौरन ही जंगल में वापिस लौट गये । विरह-वेदना का वह दिन उन्होंने भोजन-पान के विना, एकान्त जंगल में, भक्ति-भजनपूर्वक बिताया। उन्हें बहुत ही आघात पहुँचा । धर्म के महान् अवलम्बन तथा पोपणदाता कल्पवृक्ष के समान श्रीमद् सद्गुरु भगवान् का वियोग उन्हें अत्यन्त असह्य हो उठा। संवत् १९५७ का चातुर्मास श्री लघुराज स्वामी ने बसो में किया था। श्रीमद् की मौजूदगी में, श्रीमद् जहाँ होते, उनके समागम की भावना से प्रेरित हो, श्री लघुराज स्वामी उन्हीं स्थानों में विहार करते और उनके समागम का लाभ उठाते। परन्तु अब वैसा प्रवल कारण न रहा, उन्हें जंगल और पहाड़ प्रिय थे, इसलिए एकांत में विशेष रूप से आत्म-साधन के लिए वे जंगलों और पहाड़ों में विचरने लगे। समाज में भी कितने ही साधु और श्रावक विमुख भाव से, सन्मार्ग के साधक इन मुनियों के प्रति विपम दृष्टि रखते। उन्हें भोजन-पान, वसति, और वस्त्र आदि हर तरह की मुश्किलें खड़ी करने में चे जरा भी कमी न करते । तथा उन्हें उन्मार्गगामी कहकर उनके विरुद्ध प्रचार किया करते । 009 ३८ 00 श्रीमदराजचा जन्म शताब्दी २०२४ ontta PG , . अब दूसरी मोर देखिए। मुनिश्री जहाँ-जहाँ विचरण करते, वहाँ श्रद्धालु जीवों के प्रगल पुण्य के स्वाभाविक उदय से अनेक प्रकार से उनके माहात्म्य का आभास मिलता। परम वीतरागी राजप्रभु की कृपा से रात्रि-दिवस वे राज स्वरूप में रमण करते तथा निर्भय होकर विचरण करते। देह का ममत्व छोट देने के कारण, आत्मानंद में अमते, पारमार्थिक दृष्टि से भव्य जीवों पर निस्पृह फरणा दिखाते, तथा अद्भुत आत्मदशापूर्वक अनेकानेक भव्य जनों को सद्धर्म के रंग में रगते । संवत् १९६३-६४ में नार के मुमुक्षु रणछोड भाई (जिनके पिता मुनि लक्ष्मीचंदजी मुनि लघुराज स्वामी के साथ संघाटे से पहिप्पत कर दिये गये थे) ने तन-मन और धन से, सय तरह से, अन्त समय तक, श्रीमद् लघुराज स्वामी के चरणों की सेवा की थी। इसी प्रकार संवत् १९६६ में मारवाड़ के रत्नराज स्वामी ने भी श्रीमद् लघुराज स्वामी की सेवा में पहुत-सा समय व्यतीत किया। श्रीमद् के देदोत्सर्ग के याद, श्रीमद् लघुराज स्वामी ने धरमपुर, परमाला, घोरनदी, नरोडा, राणकपुर, पालणपुर, जूनागढ़, धुधुफा, भावनगर, समात, घटामण, इंडर, घडाली, खेगलू, तारंगा, यसो, फेणाव, पोरसद, पालिताणा, घडया, नदियाद, उमरेठ, यगसरा, राजकोट, नार, काविठा, सीमरडा, तारापुर, और सदेशर, मादि स्थानों में विचरण किया। कितने ही स्थानों में पहाद और जगलों में विचरण करते हुए, मीलों ने उन्हें घेर कर उपसर्ग पिया। क्तिने ही विषम एटियालों ने मुनियों की निन्दा का काम हाथ में लिया, तथा ३६ य श्रीमदराजचन्हें ૨૦૨૪ जन्म शताटदी पर जन्म शताब्दी जिससे मुनिधी के प्रति तिरस्कार की भावना पैदा हो ऐसी चर्चाओं में वे अपना महत्व समझने लगे। फिर भी मुनिश्री शान्तिपूर्वक समस्त उपसर्गों को सहन करते । क्योंकि मुनिश्री को श्रीमद् राजचन्द्र ने कहा था कि वणिको तुम्हारा गुरु बनना चाहेंगे! कर्म की गति भी विचित्र थी। एक के बाद एक दुख के अवसर आने लगे। इधर परम कृपालु देव श्रीमद् राजचन्द्र जैसे शिरोमणि पुरुष का वियोग हो गया, जीवन-भर के साथी मुनि देवकरणजी चल वसे, सत्-संगनिष्ठ अम्बालालभाई का आश्रय भी न रहा. और उधर वृद्धावस्था के कारण उत्तरोत्तर बढ़ती हुई वीमारियों के कारण उनका खुदका शरीर क्षीण हो रहा था और पैर में वायु की तकलीफ बढ़ती जा रही थी। इस प्रकार चारों ओर से दुख और कष्ट से घिरे हुए आरे के महामुनि" श्रीमद् लघुराज स्वामी ने निश्चय किया की जो परिपह आये, उसपर विजय प्राप्त करना ही निर्ग्रन्थ मार्ग है। परमकृपालु देव श्रीमद् राजचन्द्र ने मुनिश्री से कहा था, "हे मुनि, यह दुपम काल है, इसलिए जड़भरत जैसे होकर विचरण करना; ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त होगी उसे प्रगट न करना! इस काल के जीव पके खरबूजे की भाँति है, जो कठोरता सहन नहीं कर सकते। इसलिए लघुता धारण कर कल्याण मूर्ति बनो तो तुम्हारे द्वारा अनेक जीवों का कल्याण होगा।" इस शिक्षा को अन्तरंग में धारण कर, आत्मदशा को गुप्त रख कर, शांत भाव से सहनशीलता की मूर्ति वन, मुनिश्री, जड़भरत की भाँति रहते हुए विचरण करने लगे, और चिन्तन करने लगे कि हरि इच्छा से जो हो; सो ठीक; हम द्रष्टा वनकर देखा करेंगे। उनकी इच्छा किसी एकान्त स्थान में निस्संग भाव से रहने की थी। श्रीमदराजच २०२४ BE "चौथे Co0 ४० COM onla G IN 500 जन्म शतादी संवत् १९७२ में जूनागढ से मुनिधी एक मुमुक्षु को पत्र लिखते हैं- "गुर के प्रताप से यहा सुससाता है बहुत दिनों से एकान्त निवृत्ति प्राप्त करने की अभिलापा थी। गुर के प्रताप से वह योग आ गया है यहा किसी अद्भुत विचार और आत्मिक सुख का अनुभव होता है, उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। अनन्त शक्तिया है, सिद्धिया हैं, पूर्व भव भी जानने में आता है, आनन्द-ही-आनन्द है। एक ही श्रद्धा से कहा अथवा लिसा नहीं जा सकता, आपके चित्त में शान्ति होने के लिये यह लिखा गया है। और किसी से कहने की आवश्यकता नहीं। शान्ति, शान्ति, शान्ति " मुनिश्री ने स्थानकासी वेश छोड दिया था। ओघा की जगह वे मोरपीछी रजते और मुहपत्ती उन्होंने निकाल दी थी। मोरपीछी कम उपाधि और विशेष यत्ला का साधन पनी थी। कभी-कभी अनेक स्थानों के श्रद्धालु मुमुक्षु मुनिधी के दर्शन- समागम के लिए आते और भक्ति भजन का लाभ उठाते । घडवा में मुनिधी के साथ कितने ही मुमुक्षु समुद्र किनारे जाते । मुनिश्री हाथ मेमोरपीछी ओर कमर में केवल एक कोपीन धारण कर समुद्र की रेत में भक्ति-भजन में सारी रात गुजार देते। इस प्रकार पूरे उन्नीस दिन आख चन्द किये बिना, मुनिधी रात-दिन भक्ति-भाव में लीन रहे । इस अपूर्व भक्ति-भाव से अनेक जीवों को अपूर्व लाम मिला। इसी प्रकार सीमरडा में प!पण पर्व के समय भक्ति-भाव में लीन रहते हुए, प्रभुथी को, कोई परम उल्हास होने से अपूर्व परम आनन्दमय भक्ति का अवसर प्राप्त हुआ। इन सब बातों की खुमारी अनेक जीरों को बहुत समय तक स्मरण रही। इस फरणामूर्ति ने बहुत-से जीनो को सत्पुरुष के सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया। इस ४१ श्रीमद्राजवन्द ૨૦૨૪ 00 ल । 5 on जन्म शताब्दी OVE अगम भक्ति के अपूर्व लाभ से कृपालुदेव ने मुमुक्षुओं को जो वाक्य लिखे थे, वे ये हैं- गुप्त चमत्कार सृष्टि के लक्ष्य में नहीं है। सत्पुरुप का योगवल जगत का कल्याण करे।" उन्होंने इन दोनों वातों का प्रत्यक्ष अनुभव किया था। दुपम काल में, प्रत्यक्ष सत्पुरुप के समीप भक्ति-भाव का ऐसा योग, जीव को किसी पूर्व पुण्य से ही मिलता है तथा जीव को सहज ही परम उल्लास भाव प्रकट होकर अपूर्व लाभ का कारण बनता है। 09 मुमुक्षुओं की प्रवल परमार्थ पिपासा प्रकट हुई देखकर, श्री लघुराज स्वामी उन्हें ज्ञान और भक्ति-रस का पान कराते जिससे परम कृपालु देव द्वारा प्रबोधित सनातन जिन वीतराग मार्ग की प्रभावना होने लगी। अपूर्व आत्मानंद के आनंद का आस्वादन करते हुए, वैराग्य, प्रेम, और भक्ति की साक्षात् मूर्ति के समान, भव्यजनों के के लिए, करुणामूर्ति परोपकारशील, सन्त-शिरोमणि इस महात्मा (लघुराज स्वामी) के दर्शन-समागम की इच्छा करते हुए, अनेकानेक भव्यजन, आत्म-कल्याण की सिद्धि के लिए, अत्यंत उत्साह से उनके समीप आने लगे। श्री लघुराज स्वामी की अद्भुत ज्ञान-दशा और उनके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व से प्रभावित, संसार के दुःखरूपी दावानल से तप्त जीव उनके सन्निकट आत्म कल्याण करने लगे। उनकी इच्छा थी कि यदि यह महात्मा किसी स्थान पर स्थिरतापूर्वक किसी आश्रम के रूप में, परम शान्ति और सत्संग का धाम बन सके तो धर्म के इच्छुक हजारों जीवों को अभीष्ट सिद्धी हो । श्रीमदराजवन्त २०२४ DEAM RAY उद्धार 50 ४२ G otte G सवत् १९७६, कार्तिक पूर्णिमा से लगाकर आठ दिन तक, सन्देशर गाव में (अगास के पास), श्रीमद् लघुराज खामी के समीप अनेक गावों से आये हुए हजारों भाई-बहन मुमुक्षुओं ने मिलकर, अपूर्व, परम उल्लास भाषपूर्वक श्रीमद् राजचन्द्र के जन्मदिन का महोत्सव मनाया । सदेशर गाव के पूज्यश्री जीजीभाई कुवरदास ने श्रीमद् लघुराज स्वामी की स्थिरता के लिए, आश्रम बनाने के निमित्त, परम उल्लास-भाव से, बारह बीघा खेत अर्पित कर दिया। उस समय सब भाई-बहनों ने मिलकर सत्रह हजार रुपये इकट्ठे किये । इस प्रकार सय की परम इच्छा से 'श्री सनातन जैनधर्म श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम अगास' की स्थापना हुई। परमार्थ पुण्योदय का प्रभात शुरू हुआ। परिपह और उपसर्ग वाले इस पंचमकाल में श्रीमद् के घोध को से हृदयगम करने की इच्छा करते हुए मुनिश्री, प्राय विफट जंगलों में बिहार फरते, जिससे ये 'वनवासी मुनि' के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे अय समस्त मुमुक्षु भाइयों की प्रवल इच्छा से, अनेक जीवों के कल्याण का कारण जान, इस आश्रम के अधिष्ठाता बने । चरोत्तर में असग अध्यात्म सात्विक वातावरण पैदा कर, उसमें प्राणार्पण कर, चरोत्तर के आश्रम को प्राणवान बनाया। यह माश्रम इन प्रत्यक्ष आत्मानुभवी महिमाशाली सत्पुरुप के योग से इस पृथ्वी पर तीर्थ शिरोमणि यना। इस आश्रम में ज्ञानी अथवा अज्ञानी, गृहस्थ अथवा त्यागी, राजा अथवा रंक-सभी को अपनी-अपनी भूमिकानुसार प्रभुश्री के दर्शन-समागम और भक्ति-भजन का लाभ मिला। उन्होंने सर को परम कृपालु देव धीमद् राजचन्द्र प्रमु के प्रति थद्धावान पनाया। सत्य-एक आत्मा' की सिंहगर्जना होने ४३ समभाव .00 श्रीमदराजचा २०२४ दा 5 सव में 600 लगी। श्रद्धालुओं को सत्पुरुप के प्रत्यक्ष योग का अद्भुत सामर्थ्य और माहात्म्य देखने को मिला । बहुत-सों को इस प्रत्यक्ष क्षमाशील प्रेम-मूर्ति के रोम-रोम में-से राज नाम के स्वर की झंकार सुनाई देने लगी। अनेकों को अत्यन्त दुर्लभ मनुष्य भव की सार्थकता समझ में आई । वहुत-सों को आजीवन ब्रह्मचर्य व्रत की महिमा का ज्ञान हुआ। इस प्रकार इस प्रत्यक्ष ज्ञानी के दर्शन से, सत्संग से और उनके सबोध के प्रताप से, अपूर्व उल्लसित भक्ति-रस के लाभ से, अनेक जीव सद्धर्म के रंग में रंगे जाने के कारण सन्मार्ग के सम्मुख हुए । प्रभुश्री आत्मदृष्टि से आत्मा का दर्शन करते और सव को 'प्रभु' कहकर सम्बोधित करते । इस प्रेम-मूर्ति में सब को-छोटे-से वालक से लगाकर वृद्ध, स्त्री-पुरुष तक को-एक ऐसी श्रद्धा उत्पन्न होती की प्रभु हमारे हैं, और वे प्रेमपूर्वक उनको 'प्रभुश्री' कहकर बुलाते । प्रभुश्री ने आश्रम में कुल चौदह चातुर्मास व्यतीत किये। प्रभुश्री की छत्रछाया में आश्रम में श्रीमद् राजचन्द्र गुरु-मंदिर, श्वेताम्बर-दिगम्बर मंदिर, व्याख्यान मंदिर, पुस्तकालय आदि की स्थापना हुई। अनेक गांवों से आये हुए मुमुक्षुओं ने आश्रम में कमरे, बंगले और धर्मशालाएं आदि वनवाई। संवत् १९८१ में, वांधणी गांव के श्री गोवर्धनदास कालिदास पटेल (ब्रह्मचारीजी) ने प्रभुश्री की सेवा में अपना सारा जीवन अर्पित कर दिया। प्रभुश्री आत्म-दशा को गुप्त रख, ऋद्धि-सिद्धि को अप्रकट रखते हुए, समझ में न पाये ऐसे राजस्वरूप में रात्रि-दिवस रमण करते हुए, जड़भरत के समान विचरण करने लगे। इस 000 ४४ श्रीमदराजच ૨૦૨૪ जन्म शताब्दी er12
जन्म शताब्दी
करुणामूर्ति ने आश्रम तथा अन्य स्थानों में, अपने अन्तर्शन चक्षु
द्वारा कतिपय भाग्यशाली मुमुक्षुओं के जीवन के अन्त समय में
उपस्थित रह, उन्हें समाधि-मरण के प्रति उन्मुख कर, उनके
मनुप्य जीवन को सफल किया।
अहो! अहो!! सत्पुरुषों का उपकार!
संवत् १९८९ में, मुनिदेव श्री मोहनलाल श्री महाराज
प्रभुश्री की छत्रछाया में समाधिस्त हुए ।
प्रभुश्री ने सनावद, पूना, अहमदाबाद, अधेरी (वम्बई),
याहुरलिजी, भडौच, सूरत, नार, नवसारी, धामण, बढवाण, केप,
वाकानेर, मोरवी, यवाणिया, आबू, आहोर, सिद्धपुर, और
नासिफ आदि स्थानों में विचरण किया। कितने ही स्थानों पर
प्रभुश्री की छत्रछाया में परम कृपालु देव श्रीमद् राजचन्द्र के
चित्रपटों की स्थापना हुई। प्रभुश्री जहाँ-जहाँ विचरण करते,
वहाँ-वहाँ जिज्ञासुओं को धर्म-लाभ होता। इस प्रकार अनेक
जीवों के लिए कल्याण-मूर्ति चन, श्रीमद् राजवन्द्र की भाशा में
तन्मय भाव से समस्त जीवन बिता, श्रीमद् राजचन्द्र आश्रम
अगास के सम्पूर्ण प्राणदाता, मुक्तिमदिर का शिलारोपण सम्पन्न
कर, सन्त-शिरोमणि श्रीमद् लघुराम स्वामी (प्रभुश्री)
संवत् १९९२, वैशाख सुदी ८ को, रात के आठ बजकर दस मिनट
पर, ८२ वर्ष की अवस्था में, आथम में निज रूप में समाधिस्त हो,
इस नाशवान देह को त्याग, परमपद की भोर प्रयाण किया।
अगणित बदन हो इस करुणामूर्ति को!
श्रीमद् राजचन्द्र ने अपने एक पत्र में लिखा है-
"ॐ परम कृपालु मुनिवर के चरण-कमल में परम
भक्तिपूर्वक सविनय नमस्कार!"-(श्रीमद् राजचन्द्र, पन न ८७५)
श्रीमद्राजचन
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प्रकाश्या जिस गुरुराज ने
सनातन मार्ग मुक्तिका
दिया सन्मार्ग वह हमको
अहो ! उपकार प्रभुश्री का!
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सायला के सन्त *
आमदराजचन्द्र
जन्म शताटदी।
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) - २०० जन्म शताब्दी सायला के सन्त श्री सो भाग भाई "परमार्थ के अखड निश्चयी, निष्कामस्वरूप ( के पारम्गर स्मरणस्वरूप, मुमुक्षुजनों द्वारा अनन्य प्रेमपूर्वक सेवा करने योग्य, परम सरल, और शान्त मूर्ति श्री सुभाग्य के प्रति "हे श्री सोभाग, तेरे सत् समागम के अनुग्रह से आत्मदशा का स्मरण हुआ । इसलिए तुझे नमस्कार करता हूँ।" -श्रीमद् राजचन्द्र इन शब्दों द्वारा जिनके सम्बन्ध में श्रीमद् राजचन्द्र ने उल्लेख किया है, ये हैं सायला के सन्त श्री सोभागभाई । सोभागभाई का जन्म सवत् १८८० में हुआ था। उनके पिता सेठ लल्लूभाई जव मारवाड गये, तो वे वहां से ज्ञान-प्राप्ति के हेतु, 'जीजशान' किसी योग्य पात्र को दिखाने के लिए लाये थे। पिताजी की आज्ञा पाकर, काठियावाढ-भर में प्रसिद्ध 'कवि रायचन्द भाई' को उसे देने के लिए, सवत् १९४६ में सोभाग भाई मोरवी में श्रीमद् से मिलने गये। उनके आने के पहले ही अपने निर्मल ज्ञानसे श्रीमद् को उनके आने का पता लग गया। सोभागभाई को जो कुछ उन्हें कहना था, उसे एक कागज के पुर्जे पर लिखकर गद्दी के पास रख दिया। और जैसे भगवान महावीर ने गौतम स्वामी को, पहली भेंट होने पर नाम लेकर बुलाया था, उसी प्रकार जर सोभागभाई आये तो श्रीमद् ने कहा, "आमओ सोभागभाई, इस गद्दी के पास रखे हुए कागज के पुर्जे को खोल श्रीभद्राजधान ૨૦૨૪ 005 ०० ४७ Kril ज 000 जन्म शताब्दी कर पढ़ो।" उसे पढ़कर सोभागभाई के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। इस प्रकार पहले दर्शन से ही सोभागभाई को श्रीमद् राजचन्द्र के प्रति ऐसी अपूर्व श्रद्धा हो गयी कि चे अलौकिक ज्ञानप्राप्त कोई महापुरुष हैं। श्रीमद् को उन्होंने तीन यार नमस्कार किया। सोभागभाई श्रीमद् से उम्र में ४४ वर्ष बढ़े थे। प्रथम समागम में उनके बीच अन्तरंग एकता प्रकट हुई। इस भेंट के बाद सोभागभाई सायला चले गये । थोड़े दिनों बाद उनके पिताजी का देहान्त हो गया और कुटुम्ब के पालन-पोपण का भार इनके सिर पर आ पड़ा। इस प्रकार की कठिनाइयों के सम्बन्ध में उन्होंने श्रीमद् को पत्र लिखे । संवत् १९४६ में श्रीमद् अपने पत्र में उन्हें लिखते हैं, "ईश्वर पर विश्वास रखना, एक सुखदाई मार्ग है। जिसका उसपर दृढ़ विश्वास होता है, वह दुखी नहीं होता; अथवा दुखी हो भी तो दुख का अनुभव नहीं करता। उल्टे, उसे दुख सुख-रूप हो जाता है...। संसार में के जैसा शुभ-अशुभ उदय आये, परन्तु उसमें अपने को राग-द्वेप का संकल्प नहीं करना चाहिए।" इस प्रकार के सोभागभाई को निस्संकोच, विस्तारपूर्वक और सहृदयतापूर्वक लिखे हुए पत्रों की बड़ी संख्या है। इन पत्रों में श्रीमद् ने अपने अनुभव की अद्भुत अन्तर्दशा का वर्णन भी किया है। तथा सोभागभाई को भी उपाधि से दूर रख, आत्मा सम्बन्धी अनेक प्रश्न उठाकर, उनके के लिए पठन और विचार के लिए अनुप्राणित किया है । संवत् १९४६ में सोभागभाई को मोरवी, ववाणिया और सायला में श्रीमद् का समागम हुआ था। श्रीमदराजयन् प्रारब्ध अनुसार चाहे gov 400 5 समाधान AS ४८ २०२४ G O online 11 " ०० जन्म शताटदी। थी डुगरसी गोसलिया सोभागभाई के खास मिन थे। पहले सोभागभाई उनपर ज्ञानी जैसी श्रद्धा रखते थे, लेकिन श्रीमद् राजचन्द्र के सम्पर्क में थाने के बाद, सच्चे शानी की पहिचान हो जाने पर, उन्होंने थीमद् की शरण ली और गोसलिया को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित किया । संवत् १९४७ के आरम्भ में सोभागभाई के कुछ पत्रों का उत्तर देते हुए श्रीमद् ने लिखा है, परमपूज्य, केरलवीज सम्पन्न सर्वोत्तम उपकारी श्री सोभागभाई, भगवान् को परिपूर्ण और सर्वगुण सम्पन्न कहा जाता है, फिर भी उसमें कुछ फम अपलक्षण नहीं हैं। चित्र-विचित्र करना ही उसकी लीला है। अधिक क्या कहें!" "यापसे विज्ञप्ति है कि वृद्ध से युवा होना और इस अलप वार्ता के अग्रसर का अग्रसर होना।" "जीवनमुक्त सौभाग्यमूर्ति सोभागभाई भक्ति और सत्संग विदेश चले गये हैं काल भी दुपम है दु पम को कम करने के लिप आशीर्वाद दो और फिर-फिर सतयुग का सरण होता है । आप जानते हो कि इस काल में मनुष्य का मन मायानी सम्पत्ति की ओर जाता है। कोई चिरला ही निर्वाण-मार्ग की दृढ़ इच्छा रखनेवाला देसने में आता है, अथवा किसी-किमी को यह इच्छा सत्पुरुष के चरणों की सेरा से प्राप्त होती है।" यारम्यार कहते हो, दर्शन की यहुत आतुरता है, परन्तु पंचम काल महावीर भगवान ने कहा है, फलियुग भगवान व्यास ने कहा है, फिर यह एक साथ कैसे रहने दे सकता है?" ". आपकी सर्वोत्तम प्रशा को हम नमसार करते हैं। फरिसाल में परमात्मा को यदि किन्हीं भक्तिमान पुरुषों पर प्रसन्न श्रीमदराजप ૨૦૨૪ " COM ४१ EW ॐ श्रीमदराजयन्द जन्म शताब्दी R श्रीमद् वारम्बार सोभागभाई को आत्मार्थ में दृढ़ कराते और इसी की चर्चा में उन्हें लगाते । फलस्वरूप, केवलज्ञान जैसे अनेक महत्वपूर्ण प्रश्न पूछकर, उनके सम्बध में विचार करने के लिए वे कहते। संवत् १९५०, भादो महीने में सायला से श्री सोभागभाई लिखते हैं, " ..हमारा मन किसी ऋद्धि-सिद्धि को ज्ञान नहीं मानता। हमारी तो आपके समागम में रहने और शानचेतना में रमण करने की ही इच्छा है । " संवत् १९५१-५२ में श्रीमद् जव खंभात और काविठा पधारे तय श्री सोभागभाई तथा श्री डुंगरशी गोसलिया दोनों को श्रीमद् के दर्शन का लाभ प्राप्त हुआ। संवत् १९५२ में सायला से श्री सोभागभाई श्रीमद् को लिखते हैं, "आप तो संसार में रहते हुए भी वीतराग है लेकिन संसार के जीवों के कल्याण के लिए जैसा उचित समझे वैसा अभी थोड़े समय में विचार हो सके तो अच्छा...लोग केवलज्ञान का अर्थ आजकल रूढ़ि अनुसार करते हैं, वह हमें ठीक नहीं लगताः इसका दूसरा ही अर्थ होना चाहिए।" श्री सोभागभाई आत्मज्ञान संबंधी अनेक प्रश्नों के सारभूत. श्रीमद् के हृदय में स्थित, परमार्थ मार्ग के अन्तरंग रहस्य-रूप स्व' और 'पर' के श्रेयार्थ को जानने के कारण भाग्यशाली बने । यदि किसी मुमुक्षु को श्रीमद् से कुछ कहना होता तो वे वयोवृद्ध श्री सोभागभाई द्वारा ही कहलवाते; और वे दयालु होने के कारण सहजभाव से प्रत्येक मुमुक्षु की बात श्रीमद् के सामने प्रस्तुत करते । 'श्री आत्मसिद्धि शास्त्र' लिखने की प्रेरणा भी श्रीमद् को श्री सोभागभाई द्वारा ही प्राप्त हुई थी। उन्होंने ही अनुरोध किया था कि आत्मा सम्बन्धी छह पदों के गद्य में होने के 600 ५२ त 11 online , जन्म शताब्दी कारण, उन्हें कण्ठस्थ करना मुश्किल है, इसलिए यदि उनका भावार्थ पद्य में लिखा जा सके तो उससे मुमुक्षुओं का परम उपकार हो सकता है। यह प्रार्थना एक ऐसे पुरुप द्वारा और पसे समय पर की गई कि अनेक जन्मों के अज्ञान-रूपी अधकार को दूर करनेवाले, समस्त धर्मशास्त्रों के निचोड-स्वरूप, और इस पृथ्वी के अमृत के समान अमर काव्य 'आत्मसिद्धि शास्त्र' को श्रीमद् ने नडियाद में, केवल डेढ घटे के भीतर, १४२ गाथाओं में, सरल भाषा में लिखकर, आत्मज्ञान के जिज्ञासुओं को एक अमूल्य भेंट प्रदान की। 'आत्मसिद्धि शास्त्र' की एक प्रति श्रीमद् ने सोभागभाई के मनन के लिए भी भेजी थी। संवत् १९५३, कार्तिक महीने में सायला से श्री सोभागभाई श्रीमद् को लिखते है, "जान पडता है कि 'आत्मसिद्धि शास्त्र' १४ पूर्वी का सार है । मैं तथा गोसलिया हमेशा इसका स्वाध्याय करते हैं । वडा आनन्द आता हे। अब दूसरे किसी अन्थ की आवश्यकता नहीं रही पाच महीने से मुझे बुखार आता है, ऐसी दालत में यदि आपने 'आत्मसिद्धि शास्त्र'न भेजा होता तो अप नक इस देह का टिकना ही मुश्किल था। यह ग्रन्थ पढकर मानन्द होता है, इससे जी रहा है।" श्रीमद् के दृदय के पारसी मित्र श्री सोभागभाई की अतिम तैयारी के समय, श्रीमद ने सवत् १९५३, येसाख महीने में, दस दिन तक, सायला में अपने अपूर्व समागम का लाभ प्रदान कर उनकी आत्मा को उत्कृष्ट पुरुषार्थ के लिए प्रेरित किया। उस समय सोभागभाई की शारीरिफ दशा यहुत नरम रहने पर भी, श्रीमद् श्रीमदराजचन्द ૨૦૨૪ 200 . Onli SIS के मजन्म शताब्दी उन्हें अपने साथ, अपने पूर्वजन्म की स्मरण भूमि ईडर में ले गये और वहाँ उन्हें दस दिन अपने साथ रखा । उसके बाद सोभागभाई सायला लौट गये । फलस्वरूप सत्पुरुष के सम्पर्क से मनुष्य जीवन को अमूल्य रूप से सार्थक बनाने के कारण वे अत्यन्त भाग्यशाली बने । श्रीमद् ने श्री अम्बालालभाई को भी श्री सोभागभाई अखंड आत्मपुरुषार्थ में प्रबल प्रेरणा प्रदान कर समाधिमरण में सहायक होने के लिए सायला जाने की आज्ञा दी। संवत् १९५३, ज्येष्ठ सुदी १४, रविवार को, सायला से लिखे अपने पत्र में श्री सोभागभाई श्रीमद् को लिखते हैं, “ यह आखिरी पत्र लिख रहा हूं। ...ज्येष्ट बदी ९, बुधवार के दिन. मृत्यु होने वाली है, इसका पहले से ही आभास हो गया था । ज्येष्ठ सुदी तक * तो वह नहीं हुई। लेकिन मन को आभास होने वाली कोई बात गलत नहीं होनी चाहिए। फिर भी, वह तिथि गुजर चुकी है । ज्येष्ठ वदी ९ को बुधवार है । प्रायः उस दिन मृत्यु होगी। ...अब आप इस पामर सेवक पर पूर्ण रूप से कृपादृष्टि रखें । तथा देह और आत्मा भिन्न-भिन्न हैं; देह जड़ है, आत्मा चेतन है। चेतन का भाग प्रत्यक्ष रूप से भिन्न समझ में नहीं आता था: लेकिन आठ दिन से, आपकी कृपा से अनुभव में आने के कारण, दोनों दो टूक दिखाई देने लगे हैं। तथा रात-दिन आपकी कृपा से चैतन्य और देह के भेद को समझना सहज हो गया है। ... विना पढ़े और विना शास्त्रों के पठन-पठन के, थोड़े समय मे ही * गुजराती पंचांग के अनुमार, प्रत्येक महीना मुद्री से शुरू होता है और उसके वाट वटी आती है। -अनुवादक श्रीमदराजयन्त २०२४ Does ५४ COOO ontta . श्रीमदराजचन्द्र जन्म शताटदी मापके उपदेश से अर्थ का स्पष्टीकरण हो गया है। जो वात २५ वर्ष में भी समझ में न आ सकी, वह आपकी कृपा से थोड़े समय में ही भा गयी है। मुझसे आपके प्रति यदि कोई भविनय अथवा अभक्ति हुई हो तो क्षमा मांगता है। आप वडे कृपालु है, इसलिए जैसे आप है, वैसी दृष्टि सेवक पर भी रखें।" इसके उत्तर में श्रीमद् ने सोभागभाई को आत्मजागृति का वर्णन किया। फिर तदनुसार आत्मजागृति रहने के सम्बन्ध में श्री सोभागभाई ने श्रीमद् को लिखा । अपने अतिम पत्र में श्रीमद् लिखते हैं, "सय जीवों के प्रति, सब भावों के प्रति, अखड एकरस, वीतराग दशा रखना ही समस्त ज्ञान का फल है । आत्मा शुद्ध चैतन्य, जन्ममरण-रहित और निस्सग स्वरूप है। इसी में समस्त ज्ञान समा जाता है। उसकी प्रतीति में समस्त सम्यक् दर्शन आ जाता है। आत्मा का निस्सग स्वभाव दशा रहना, सम्यक् चारित्र, उत्कृष्ट सयम और वीतराग दशा है जिसके पूर्णता को पहुंचने पर, समस्त दुखों का नाश हो जाता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं, तनिक भी सन्देह नहीं। यही प्रार्थना है।" त्रिलोक के तीन सर्वोत्कृष्ट रत्नों की कितनी अमूल्य भेंट! मृत्यु के समय श्री सोमागभाई केवलज्ञान प्रकट होने के लिए अत्यन्त तीव्र, असष्ट पुरपार्थ में सलग्न रहे । ऐसे उत्कृष्ट पुरुषार्थपूर्वक, अपूर्व समाधि में, सवत् १९५३, ज्येष्ठ यदी १०, गुरुवार को प्रात दस बजकर, पचास मिनिट पर, ७३ वर्ष की अवस्था में, सायला में, श्री सोभागभाई का देहावसान हुमा । इस सम्बन्ध में श्रीमद् लिखते है, "आर्य श्री सोमागमाई फे ज्येष्ठ यदी १०, गुरुवार को प्रात दस बजकर, पचास मिनिट २०२४ 400 KAR Mara ५५ onlo
पर देहावसान होने का समाचार पढ़कर बहुत खेद हुआ जैसे-
जैसे उनके असाधारण गुणों की ओर दृष्टि जाती है, वैसे-वैसे
अधिकाधिक खेद होता है।...श्री सोभाग ने इस प्रकार देह का
त्याग करते हुए महान मुनियों को भी दुर्लभ ऐसी निःसंगतापूर्वक,
निज उपयोगमय दशा रखते हुए अपना अपूर्व हित किया है-इसमें
संशय नहीं। ...इस क्षेत्र में, इस काल में श्री सोभाग जैसे पुरुप
विरलो ही होंगे-यह बारम्बार भासित होता है। ...श्री सोभाग
मुमुक्षुओं द्वारा विस्मरण करने योग्य नहीं है। ...श्री सोभाग की
सरलता, उनका परमार्थ सम्बन्धी निश्चय और मुमुक्षुओं के प्रति
उनका उपकारी भाव आदि गुणों का घारम्बार विचार करना
चाहिए...आर्य सोभाग की अन्तरंग दशा और देह-मुक्त समय
की दशा की, हे मुनियों! तुम्हें वारम्बार अनुप्रेक्षा करनी चाहिए।
श्री सोभाग को नमस्कार !
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-श्रीमद् राजचन्द्र
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जन्म शताब्दी
मत्याभिलाषी
श्री जूठा भाई
"अरेरे! इस काल में ऐसे धर्मात्मा का छोटा-सा जीवन
होना, यह कुछ बहुत आश्चर्य की बात नहीं है । इस काल में ऐसी
पवित्र आत्मा रह ही कहाँ सकती है। दूसरे सगी-साथियों का
ऐसा भाग्य ही कहा कि उन्हें ऐसी पवित्र आत्मा के दर्शन का
लाभ अधिक समय तक मिले ? मोक्षमार्ग प्रदान करने वाला
सम्यक्त्व जिसके अन्तरग में प्रकाशित हुआ था, ऐसे पवित्र
आत्मा जुटाभाई को नमस्कार हो, नमस्कार हो!"
-श्रीमद् राजचन्द्र
इस प्रकार जिनके सम्बन्ध में श्रीमद् राजचन्द्र ने उल्लेख
किया है, घे महाभाग्यशाली, मुमुक्षुओं में श्रेष्ठ, अहमदाबाद के
निवासी श्री जूठाभाई थे। श्री जूठाभाई का जन्म संवत् १९२३,
कार्तिक सुदी २ के दिन हुआ था। उनके पिताजी का नाम
उजमशीभाई और माता का जमनावाई था। उनकी पत्नी का नाम
उगरीन था । (श्री जूठाभाई शाह मल्लांचद जयचद के पौत्र थे)
वे साधारण पढे-लिखे थे। सवत् १९४४ में, अहमदाबाद में,
श्री जूठाभाई को श्रीमद् गजचन्द्र के प्रथम दर्शन-समागम का
लाभ प्राप्त हुआ। श्री जूठाभाई के बडे भाई श्री जैशिंगभाई को
उस समय पता चला कि श्रीमद् एक विद्वान महापुरुष है।
श्री जैशिंगभाई को व्यापार के कारण यार-बार बाहर जाना पड़ता
या जिससे उन्हें कम समय मिलता। इस कारण उन्होंने अपने
छोटे भाई धी जूठाभाई को श्रीमद् की सेवा में नियुक्त कर दिया।
श्रीमदराजच
२०२४
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- -- - - 1600 श्रीमद् को श्री जूठाभाई की मरण-तिथि का दो महीने पहले ही पता लग गया था और इस बात को उन्होंने नोट करके रखा था। श्री जूठाभाई के अंतरंग में, श्रीमद् के थोड़े समय के सम्पर्क तथा उनके उपदेश के प्रताप से, मोक्षमार्ग प्रदान करने वाले सम्यक्त्व का प्रकाश हुआ। संवत् १९४६, आषाढ़ सुदी ९ के दिन श्री जूठाभाई केवल २३ वर्ष की अवस्था में समाधिस्थ हो, इस क्षणिक जीवन को त्याग कर चले गये । उनकी मृत्यु के समाचार पाकर श्रीमद् ने लिखा- ..इस पावन आत्मा के गुणों का क्या स्मरण करूँ ? जहाँ विस्मृति को अवकाश नहीं है, वहाँ स्मृति का होना कैसे माना जाये ? देहधारी के रूप में इसका लौकिक नाम ही सत्य था। यह आत्म-दशा के रूप में सच्चा वैराग्य था। उसकी मिथ्या वासना अत्यन्त क्षीण हो गयी थी, वीतराग के प्रति उसका परम राग था, संसार के प्रति उसका परम जुगुप्साभाव था, और उसके अंतरंग में भक्ति की प्रधानता सदा प्रकाशमान रहती थी। सम्यक् भावपूर्वक वेदनीय कर्म का वेदन करने की जिसमें अद्भुत क्षमता थी, जिसके अन्तरंग में मोहनीय कर्म की प्रवलता अत्यन्त शून्य हो गयी थी, और जिसमें मुमुक्षु-भाव उत्तम प्रकार से दैदीप्यमान हो उठा था-ऐसे इस जूठाभाई की पवित्र आत्मा आज जगत् के इस भाग को छोड़कर चली गयी। अपने संगी-साथियों से वह मुक्त हो गई। धर्म के पूर्ण आह्लाद में आयु अचानक ही पूर्ण हो गई...।" श्रीमद् राजचन्द्र 4600 gos ६० 200 MS श्रीमद्राजचन्द्र ૨૦૨૪ जन्म G शताब्दी onlin
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सत् आज्ञाकारी सेवक
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०० जन्म शताब्दी सत् माजाकारी सेवक श्री अम्बा ला ल भाई सवत् १९४६ में, खभात स्थानकवासी सघ के सघवी लालचद वसतचद नामक वकील के दत्तक-पुत्र श्री अम्बालालभाई, अपने मित्र श्री छोटालालभाई और श्री त्रिभोवनभाई के साथ, किसी विवाह के अवसर पर अहमदाबाद गये थे। वहाँ श्री जूठाभाई उजमशीभाई से उनकी भेंट हुई। श्री जूठाभाई से उन्हें पता लगा कि श्रीमद् राजचन्द्र नामक किसी आत्मज्ञानी पुरप के साथ उनका परिचय है, और उनके उपदेश से कल्याण होने की सभावना है। श्री जूठाभाई ने श्रीमद् राजचन्द्र के लिखे हुए पत्रों को श्री अम्बालालभाई को दिखाया। तथा श्रीमद् की आशा प्राप्त कर उन्होंने श्री अम्बालालभाई को उनसे मिलने जाने के लिए कहा। श्री अम्बालालभाई सभात आये, और श्रीमद् की अनुमति पाने के लिए उन्होंने उनसे पत्र व्यवहार शुरू किया । उनके कुछ पत्र पाने के बाद श्रीमद् ने उन्हें नम्बई आने की स्वीकृति दी। श्री अम्बालालभाई बम्बई आये ओर श्रीमद् के प्रथम दर्शन ममागम का लाभ मिला। श्री अम्बालालभाई ने श्रीमद् को खंभात आने के लिप आमनित किया। सरत् १९४६ में श्रीमद् अपने पत्र में लिखते हैं, अहो! अनन्त भव के पर्यटन में किसी सत्पुरुष के प्रताप से इस दशा को प्राप्त ऐसे इम देहधारी को तुम चाहते हो और उससे धर्म की इन्छा करते हो, लेकिन वह तो अभी भी किमी आश्चर्यकारक उपाधि में पड़ा "तुम्हे जो उसके प्रति इतनी अधिक श्रद्धा रहती है, श्रीमदराजय ૨૦૨૪ 007 100 onth.
5 जन्म शताब्दी क्या उसका कोई मूल कारण ध्यान में है ? कहीं इसके ऊपर की हुई श्रद्धा और उसके द्वारा प्रतिपादित धर्म अनुभव करने पर अनर्थकारक तो न लगने लगेगा ? अर्थात् उसे अभी पूरी तरह से कसौटी पर कसना और इसके लिए वह राजी है...।" " ...तीर्थकर देव ने राग करने का निषेध किया है। अर्थात् जब तक राग है, तब तक मोक्ष नहीं। तो फिर इस पुरुष के प्रति राग करना तुम सबको कहाँ तक कल्याणकारी हो सकेगा?" संवत् १९४६, आसो महीने में, श्रीमद् श्री अम्बालालभाई के घर खंभात आये । श्री अम्बालालभाई श्रीमद् से २ वर्ष छोटे थे । वे पूर्वजन्म के संस्कारी, उत्तम क्षयोपशम से युक्त, सेवाभावी और एकनिष्ट भक्ति-भावी थे। संवत् १९४६ के समागम के बाद उनका जीवन श्रीमद्रूप ही हो गया। उनका पत्र-व्यवहार निरन्तर चलता रहता। संवत् १९४७ में श्रीमद् एक पत्र में लिखते हैं, जो कुछ है, वह 'सत्' ही है। वह सरल है, सुगम है और सर्वत्र उसकी प्राप्ति हो सकती है। किन्तु जिसे भ्रांति रूप आवरणतम छाया हुआ है, उसे उसकी कैसे प्राप्ति हो? अंधकार के हम कितने ही भेद क्यों न करें, लेकिन उनमें कोई ऐसा भेद नहीं हो सकता जिसे प्रकाश-रूप कहा जा सके। इसी प्रकार जो आवरणतम से घिरा है, ऐसे प्राणी की कोई भी कल्पना 'सत्' नहीं मालूम होती, और 'सत्' के पास भी नहीं आ सकती, ...इसलिए जिसने उसे प्राप्त करने का दृढ़ निश्चय किया है, 'वह स्वयं कुछ भी नहीं जानता ऐसा पहले उसे दृढ़ निश्चय पूर्वक विचार करना चाहिए और फिर सत् की प्राप्ति के लिए ज्ञानी की शरण जाना चाहिए । इससे अवश्य ही मार्ग की प्राप्ति होगी।" ६२ २०२४ 'सत्' 00 4600 AHदाजचन्द्र ON onlin के द्वारा " जन्म शताब्दी इस प्रकार, श्रीमद् की आशानुसार उन्होंने आजीवना आचरण कर अपने मनुष्य- -जीवन को सार्थक बनाया। वे हर बात को श्रीमद् से पूछते और फिर उनकी आशानुसार चलते । सवत् १९४७ में श्रीमद् एक पत्र में लिखते है, " जवा तक भक्ति का परम स्वरूप समझ में नहीं आता और उसकी प्राप्ति नहीं होती, तव तक भक्ति का आचरण करने से अकाल और अशुचि दोष होता है। अकाल और अशुचि का महान् विस्तार है, फिर भी सक्षेप में लिखा है। पकान्त प्रभात का प्रथम प्रहर सेव्य भक्ति के योग्य समय है। स्वरूप-चिन्तन भक्ति तो सभी कालों में सेय है । व्यवस्थित मन समस्त शुचि का कारण है । याह्य मल आदि से रह्नि शरीर और शुद्ध स्पष्ट वाणी को ही शुचि कहते हैं । श्रीमद् जय चरोतर पधारे, तो अम्बालालभाई उनके साथ रहते हुए उनकी सारी व्यवस्था करते । श्रीमद् की ही नहीं, यल्कि वहाँ जो ओर भी मुमुक्षु आते, उनकी भी वे तन-मन-धन से सेवा करते । श्रीमद् जो उपदेश देते, उसे आठ दिन बाद भी वे अक्षरश लिख सकते थे। उनकी इस धारणाशक्ति की श्रीमद् ने प्रशंसा की थी। सवत् १९४९ में श्रीमद् अपने पत्र में लिखते हैं, " इस आत्मा को पूर्व में अननकाल व्यतीत करने पर भी जान न पाये । इससे मालूम होता है कि जानने का यह कार्य सबसे विफट है, अथवा उसे जानने का तथारूप योग मिलना परम दुर्लभ है। ऐसा होने पर भी जिस रूप में यह स्वयं है, उस रूप का निरन्तर विस्मरण चला आता है। यह यात अनेकानेक प्रकार से विचार करने योग्य है, और उसका उपाय भी अनेक प्रकार से विचारणीय है।" सरत् १९५२ में श्रीमद् ने काविठा, राळज, पडया, खमान, आनन्द, नादिया इत्यादि स्थानों में जो उपदेश दिये, वे 'उपदेश श्रीमद्रराजचन्द्र २०२४ Goo O 600 000 90 100 सत्पुरुष के Haram 5 OOR जन्म शताब्दी छाया' नाम से श्रीमद् राजचन्द्र के वचनामृत में प्रकाशित हुए हैं। श्री अम्वालालभाई की डायरी में से ही ये लिखे गये है। संवत् १९५० में श्रीमद् अपने पत्र में लिखते हैं, मिलने पर, 'यह सत्पुरुप है' यह जानने के बाद, सत्पुरुष को जानने के पहले, जो यह आत्मा पांच इंद्रिय सम्बन्धी विषयों में आसक्त रहती थी, वैसी अव नहीं रहती, और अनुक्रम से जिससे वह आसक्ति-भाव शिथिल हो जाय, ऐसे वैराग्य को प्राप्त करती है। अथवा सत्पुरुष का संयोग होने के बाद आत्मनान कुछ दुर्लभ नहीं रह जाता। फिर भी जब तक सत्पुरुष में, उसके वचनों में और उसके वचनों के आशय में, प्रीति-भक्ति न हो, तब तक जीव में आत्म-विचार का भी उदय नहीं होता। तथा जीव को सत्पुरुष का संयोग मिला है, यह वात ठीक-ठीक उसे भासित हुई है. यह कहना भी कठिन है...। संवत् १९५१ में श्रीमद् एक पत्र में लिखते हैं, "श्री तीर्थकर आदि ने पुनः पुनः जीवों को उपदेश दिया है, लेकिन फिर भी जीव दिशामूढ़ ही रहना चाहता है इसका कोई उपाय नहीं। फिर-फिर से ठोक-वजाकर कहा गया है कि जीव यदि इसी एक बात को समझ ले तो सहज मोक्ष हो जाये, नहीं तो अनन्त उपायों से भी मोक्ष नहीं। और यह समझना भी कुछ कठिन नहीं है। क्योंकि जीव का जो सहज स्वरूप है, केवल उसे ही समझना है । वह कोई किसी दूसरे के स्वरूप को समझने की बात नहीं कि कभी वह उसे छिपा ले, अथवा न बताये और इससे वह समझ में न आये । अपने आपको गुप्त रखना कैसे संभव है ? लेकिन स्वप्न दशा में जैसे असंभाव्य अपनी मृत्यु को भी जीव देखता है, वैसे ही अज्ञानदशारूप स्वप्नरूप योग से यह जीव पर द्रव्य को अपना मान रहा है। और यह मान्यता ही संसार है; श्रीमद्राजच ૨૦૨૪ " 2600 G ता 5 onta . आमदाजधान जन्म शताब्दी यही अज्ञान है, नरक आदि गति का हेतु भी यही है। यही जन्म है, यही मरण है, यही देह है, देह का विकार है। यही पुत्र है, यही पिता है, यही शत्रु है और यही मित्र आदि भावों की कल्पना का हेतु है। और उससे निवृत्ति हो जाना ही सहज मोक्ष है। इसी निवृत्ति के लिए सत्सग और सत्पुरप आदि साधन यताये गये हैं, और यदि इन साधनों में जीव, अपने पुरुषार्थ को छिपाये पिना आचरण करे, तो ही वह सिद्ध है। अधिक क्या कहें? यदि इतनी ही सक्षिप्त यात जीव में परिणमन को प्राप्त कर सके तो समस्त व्रत, यम, नियम, जप, यात्रा, भक्ति, शास्त्र, ज्ञान आदि सर प्राप्त कर लिया इसमें कोई भी सन्देह नहीं।" सरत् १९.०, आसो यदी १ के दिन, सध्या समय, श्रीमद् ने घूमकर आने के बाद 'आत्मसिद्धि' लिखना आरभ किया। धागप्रवाह रूप में उन्होंने टेढ से दो घटे के भीतर १४२ गाथाए पूरी कर डालीं। इस समय श्री अभ्यालालभाई एक तरफ दीपस्तभ की भाति हाथ में दीपक ले खड़े रहे, और इस ज्ञानरूपी गगा के अवतरण को ध्यान से देखते रहे। इसकी चार नकल की गयीं और श्रीमद् ने उन्हें योग्य व्यकियों को मेजने के लिए श्री अम्बालालभाई से कहा। जहाँ भी श्रीमद् के पत्र थे, वहाँ से उन्हें मगाकर श्रीमद् की आज्ञा से, श्री अम्बालालभाई ने उनकी नकल करने का काम शुरू किया । अम्बालालभाई इन पत्रों की नकल करते और श्रीमद् जिस किसी मुमुक्षु को मेजने के लिए कहते, उसे भेज देते। इसके बाद थीमद् संस्कृत, मागधी, हिन्दी और गुजराती की आवश्यक पुस्तकों की नकल करने के लिए श्री अम्यालालभाई के पास मेजते और वे नदनुसार उन पुस्तकों की नकल करके थीमद् की आज्ञानुसार ६५ ૨૦૨૪ 600 - 000 0 OR 00 जन्म शताब्दी मुमुक्षुओं को पढ़ने के लिए भेज देते। मतलव यह है कि श्री अम्बालालभाई एक अत्यन्त कार्य-कुशल आज्ञाकारी और आत्मस्वरूप का लक्ष्य रखने वाले व्यक्ति थे। श्रीमद् अनेक कठिनाइयों के बीच थोड़े समय में जो धर्म की प्रभावना कर सके, उसमें श्री अम्वालालभाई का बड़ा हाथ था । संवत् १९५५ में ईडर के पहाड़ पर श्रीमद् ने मुनियों को सम्बोधित कर कहा था, " हे मुनियो, जीव की वृत्ति तीव्रता के कारण भी नरम पड़ जाती है। अम्वालालभाई की वृत्ति और दशा प्रथम भक्ति और वैराग्य आदि कारणों से उच्च होने के कारण, उन्हें इतनी लब्धि प्रकट हो गई थी कि हम जो कभी ३-४ घंटे उपदेश देते और उसे दूसरे या तीसरे दिन लिखकर लाने के लिए कहते तो उस उपदेश को श्री अम्बालालभाई सम्पूर्ण रूप से हमारे ही शब्दों में लिखकर ले आते। अभी हाल में प्रमाद और लोभ आदि के कारण वृत्ति शिथिल; हो गई है और उसमें यह दोप दिखाई देगा, इस वात को हम बारह महीने पहले से ही जानते थे। श्री लघुराज स्वामी को यह सुनकर खेद हुआ। उन्होंने श्रीमद से पूछा, क्या यह वृत्ति इसी प्रकार से रहेगी ? " श्रीमद् ने उत्तर दिया, “मुनि, खेद खिन्न न होना । जैसे नदी के प्रवाह में वहता हुआ पत्ता रास्ते में किसी झाड़ी के आ जाने से थोड़ी देर के लिए अटक जाता है, लेकिन फिर से नदी.के प्रवाह में वहकर उस झाड़ी से अलग होकर महासमुद्र में जा मिलता है, उसी.प्रकार उस वृत्ति का प्रमाद हमारे द्वारा दूर होगा और वे परम पद को प्राप्त करेंगे...।" अहा !:महापुरुषों की कितनी अद्भुत करुणा है! संवत् १९५७ में श्रीमद् जव अपनी मातुश्री और पत्नी के साथ अहमदाबाद, आगाखां के बंगले में पधारे तो उस समय मुनिगण ६६ श्रीमदराजचन्द्र ૨૦૨૪ 600 COOO R S onta " जन्म शताब्दी सरसपुर के उपाश्रय में विराजते थे। रात्रि के १२ बजे के बाद श्री अम्बालालभाईको मुनियों के पास जाने की आज्ञा हुई और अकेले जाकर उन्होंने उनसे बातचीत की। आज मुझपर परम-गुरु ने अपूर्व कृपा की है। मेरे प्रमाद को आज उन्होंने नष्ट कर दिया है। जागृति उत्पन्न करा-कर मूल मार्ग के सम्बन्ध में व्यवहार और परमार्थ-दोनों का स्वरूप उन्होंने आज एक अलौकिक रूप से मुझे समझाया। परमार्थ की पुष्टि करने वाले सद्व्यवहार का स्वरूप भी समझाकर कहा," इस प्रकार प्रात काल तक वार्तालाप करने के पश्चात् श्री अम्यालालभाई श्रीमद् के पास लौट गये । सनत् १९५७, माघ-फाल्गुन महीने में श्री अम्बालालभाई चढवाण में श्रीमद् की सेवा में एक महीने तक रहे। श्रीमद् ने जब उन्हें जाने की आज्ञा दी तो उसे शिरोधार्य करके वे खभात चले गये । संवत् १९५७, चैत्र वदी ५, मगलवार के दिन राजकोट में श्रीमद् राजवन्द्रजी के देहावसान का समाचार सुनकर श्री अम्बालालभाई को अत्यन्त आघात और शोक हुआ। समाचार सुनते ही रो पड़े। आइए, इस अत्यन्त शोकतप्त भक्त-हृदय को अन्तर्चक्षुओं से देखें । वे लिखते हैं- जैसे किमी विशाल अरण्य में अत्यन्त सुन्दर और शान्ति देने वाला कोई वृक्ष हो, इस वृक्ष पर निशक, शात और कोमल भाव से सुर्ख और आनन्दपूर्वक पक्षी चहचहाते हों, और यदि वह वृक्ष अचानक ही जगल की आग से प्रज्वलित हो उठे तो उस समय उस वृक्ष के कारण आनन्द प्राप्त करने वाले पक्षियों का क्या हाल होगा? क्या उन्हें क्षणभर के लिए भी शान्ति मिल सकेगी? अहाहा उस ममय के दुस का वर्णन करने के लिए बडे-बडे कविराज भी असमर्थ श्रीमदराजवळ ૨૦૨૪ हैं; उसी प्रकार का अपार दुख इस घोर अटवी में इस पामर जीव को देकर, हे प्रभो, आप कहाँ चले गये?" "हे भारत भूमि! क्या देह होने पर भी विदेह रूप से विचरण करते हुए प्रभु का भार तुझसे सहन न हो सका ? यदि ऐसी ही बात थी तो तुझे इस पामर का भार पहले ही हल्का कर देना चाहिए था। वह तो व्यर्थ ही तेरी पृथ्वी के ऊपर बोझ बना ? हुआ है...।" Poaran "हे महाविकराल काल, तुझे जरा भी दया न आई ? छप्पनिया के महादुप्काल के समय तूने लाखों की बलि ले ली, फिर भी तेरी तृप्ति न हुई ! और यदि तेरी तृप्ति न हो सकी थी तो फिर पहले इसी देह को तुझे अपना भक्ष्य बनाना चाहिए था । तृने तो परम शान्त प्रभु का जन्म-जन्मांतर का वियोग करा दिया! यदि तुझे अपनी निर्दयता और कठोरता ही दिखानी थी तो उसे मेरे लिए दिखाना चाहिए था! तू यह हँसता हुआ मेरे सामने यह क्या देख रहा है? 000 500 " हे शासन देवी, इस समय काल के सामने तुम्हारी शक्ति कहाँ चली गई ? प्रभु तो तुम्हारे शासनोन्नति की सेवा करने में सबसे आगे रहे। तुम तो मन-वचन-काय से नमस्कार कर उसकी सेवा में उपस्थित रहती थी, फिर इस समय तुम क्यों ऐसी सुख की नींद सो गई कि जव महाकाल ने अपना काम प्रारंभ किया तो तुम्हारे मन में कोई विचार तक नहीं उठा? "हे प्रभु! तुम्हारे विना अब हम किसके पास जायें और कहाँ जाकर फरियाद करें ? जव तुम्ही इतने निर्दय बन गये तो फिर दूसरा और कौन दया-भाव दिखला सकता है ? हे प्रभु, तुम्हारी परम कृपा, ..." द OR oad श्रीमद्राजवन्त ૨૦૨૪ जन्म शताब्दी onta जन्म शताटदी अनन्त दया, करुणामय हृदय, कोमल वाणी, चित्त आकर्षक शक्ति, वैराग्य की तीव्रता बोध बीज की अपूर्वता, परमार्थ लीला, अपार शान्ति, निष्काम करुणा, निस्वार्थ उपदेश, सत्संग की अपूर्वता, इत्यादि आपके उत्तमोत्तम गुणों का मैं क्या स्मरण करूं? विद्वान् कवियों और राजेंद्र देव भी आपके गुणों का स्तवन करने में असमर्थ है, फिर इस लेखनी में थोडी भी सामर्थ्य कहाँ से आये ? आपके परमोत्कृष्ट गुणों का स्मरण करने से अपने शुद्ध अन्त करण से मन-वचन-काय पूर्वक में आपके पवित्र चरण- कमलों की वन्दना करता है। आपका योगवल और आपके द्वारा प्रकाशित वचन और आपका दिया हुआ बोधीज मेरा रक्षण करे यही सदा अभिलापा है । आपने हमेशा के लिए पियोग की यह स्मरणमाला प्रदान की है, उसे अब मैं विस्मृत न करूँ। "खेद, खेद और खेद-इसके सिवाय और कुछ भी नहीं सूझता। रात और दिन रो-रोकर विताता है। कुछ भी सूझता नहीं।" अहा! यह विरह-वेदना तो ऐसी है मानों राम का याण लगा हो। सरत् १०४८ में श्रीमद् लघुराज स्वामी ने दक्षिण हिन्दुस्तान में करमाला गाव में चौमासा व्यतीत किया। श्री अम्यालालभाई मुनिश्री के दर्शन समागम के लिए करमाला गये। मुनिश्री के साथ चे पत्रव्यवहार करते रहे। मुनिश्री ने संवत् १९६० का चौमासा घधुका में बिताया। वहाँ श्री अम्यालालभाई तथा अन्य मुमुक्षु, पyषण के लिए इकट्ठे हुए और उन्होंने लगभग १५ दिन भक्ति भजन में व्यतीत किये । उसके याद मुनिश्री खंमात पधारे । श्रीमदराजवी ૨૦૨૪ " AlU
564
जन्म शताब्दी
वहाँ श्री अम्बालोलभाई का समागम हुआ। लेकिन खंभात में
प्लेग फैला हुआ था, इसलिए दोनों ने विचार किया कि थोड़े दिन
के लिए वटामण जाकर, श्रीमद् राजचंद्र के समागम से जो वोध
मिला है, उसके सम्बन्ध में विचार-विनिमय करें। तदनुसार
मुनिश्री वटामण गये । वहाँ श्री अम्बालालभाई का समाचार मिला
कि वे अमुक दिन वहाँ पहुंचेंगे...अन्त में प्लेग हो जाने के कारण
श्री अम्बालालभाई अन्य दो मुमुक्षुओं के साथ, समाधिपूर्वक,
संवत् १९६३, चैत्र वदी १२ के दिन खंभात में, केवल ३० वर्ष की
अवस्था में परलोक सिधार गये।
श्री अम्बालालभाई का जीवन हमें सत्पुरुष की सच्ची सेवा
और उनकी आज्ञा में रहने के लिए प्रेरित करता है।
धन्य है, इस काल में ऐसे आज्ञाकारी भक्तजनों को।
श्रीमद्राजचा
२०२४
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७०
G
onta
श्रीमद् राजचन्द्राय नम
तत् सत्
श्री सद्गुरु चरणाम्याम् नमः
श्री सौभाग्य तत्व गीता
सद्गुरु कृपा से गाइये गिल भक्त, गुरु महिमा सदा,
सौभाग्य गीता से बढ़े आनन्दरूपी सम्पदा,
थी 'सायला' पुर में रहे 'सौभाग्य' भक्त शिरोमणी,
हो मुक्ति वैभव लाभ यह इच्छा रहे मन में यनी ॥१॥
.
अगणित भवों के पुण्य से, गुरुराज के दर्शन हुए,
करके विनम्र प्रणाम, उनके अंग सब पुलकित हुए,
ज्यों वीर प्रभु से प्रश्न करते थे, सतत गौतम गणी,
ज्यों पीर अर्जुन प्रश्नपश श्रीकृष्ण से गीता धनी ॥२॥
धीरामने निजगुरु पसिष्ठ कपीश को पूछा यथा
सौभाग्य ने अध्यात्म योगी 'राज' को पूछा तथा
हे! हे!! त्रिलोकीनाथ, हमको मुक्तिपथ यतलाइये
तन और चेतन एकता की भ्राति दूर कराइये ॥ ३ ॥
जो शान्त मन करता प्रहण इन राज गुरु फी यात को
अझान-रात यिता यही देसे विमल सुप्रभात को
तौला उन्होंने मार्ग को निज शान से इस काल में,
लेके शरण मानव परम, आधर्ययुत हैं हाल में, ॥ ४ ॥
जड़ और चेतन योग से यह जग अनादि अनन्त है, पहचान अपना रूप तू, सौभाग्य शोभावन्त है अमरत्वदायक आत्मसिद्धि में विशद विस्तार है। जो मानता इस बात को उसका निकट उद्धार है ॥५॥ की पूर्व में आराधना श्री वीर जिन भगवान की, पा मुक्ति का शुभ मंत्र गुरु ने वृद्धि की निजज्ञान की, घर जन्म दिव्य ‘ववाणिया' में कर्म वे हरते हुए, सद्धर्म का उद्धार कर उपदेश शुभ करते हुए ॥६॥ थी चित्तमें निन्थता, वाहर वणिक का वेश था, रहकर उसी में दे दिया जो सन्त का उपदेश था, आन्तरदशा प्रभु की जगत को सर्वथा अज्ञात थी, इस जौहरी के वेश में कोई अलोकिक बात थी॥ ७ ॥ वम्बई नगर में रह न केवल रत्न का व्यापार है जाना नहीं जगने उन्हें, शुद्धात्म का आधार है; निज आत्म परिणति के लिये गुरुराज वन में भी रहे, उपसर्ग, कष्ट अनेक वनके क्षोभविन सुख से सहे ॥ ८॥ मिलता रहा सत्संग का शुभलाभ मानव वृन्द को कर दूर शंकायें प्रगट करते रहे सुख चन्द्र को, अनुभव सहित उनने बताया, ज्ञान सअर्थ को, बम्बई निवासी मुग्ध थे अवलोक कर सामर्थ को ॥ १॥ वयवृद्ध मैंने जब लखा श्री राज ज्ञान समृद्ध को तव शीघ्र स्वीकृत कर लिया, सन्मुक्ति मार्ग विशुद्ध को परिपूर्ण करने भक्त इच्छा, स्वर्ग का अमृत दिया वह नर अमर जग में हुआ पान निर्भय हो किया ॥ १० ॥ ७२
भक्ति का
सत्यामिलापी भाई जुठा को यता सद्धर्म को
उपदेश में समझा दिया अनुपम जिनागम मर्म को,
निजभक्त अभ्यालाल को, दे दान सम्यग्ज्ञान का,
हटवा दिया था आवरण, तत्काल मिथ्याज्ञान का ॥११॥
श्रद्धालु मुनि लघुराजने जिस काल जाना आपको,
चन्दन किया विधि युक्त, तज संकोच के सन्ताप को,
तज मोह और ममत्व मनका आपको अपना लिया,
तन, मन, वचन सर्वस्व ही गुरु को समर्पण कर दिया ॥ १२॥
लघुराज को यतला दिया सत्ममं श्रद्धा,
सत्सग में सवको पिलाया शान-रस निज शक्ति का,
गुरुराज की वचनावली अध्यात्म प्रेरक ही रही
सन्मुक्ति का उपदेश उसमें आज भी दिखता सही ॥ १३ ॥
इंडर में गुरु ने यतलाया पूर्वजन्म अपना सुस्थान,
भाग्यवान् सय यने साधुगण करके शान भक्तिरस पान
राजनगर में श्री लघुमुनि को, समझाया निज दिव्य स्वरूप,
निज भक्तों को शीघ्र यताया, कर्म भेद का भेद अनूप ॥ १४ ॥
शान दशा की अद्भुत लीला राजगुरु की देसी सर्व,
उतर गया क्षणभर में मेरा, साधुपना का सारा गर्व,
उनकी आत्मदशा को फसे समझे याह्य दृष्टि ससार
मदा तीन पैराग्य चित्त रहे निरन्तर आत्म विचार, ॥१५॥
प्रमु सर्प व्यापक शायक है निराकार, निर्मल, निर्दोप,
म्पय ज्योति है विश्वप्रकाशक, अविनाशी, अनुपम गुण कोष,
म्पय परमात्मरूप है मुक्तिरूप है, शुद्ध स्वरूप
सस्य और आनन्द मूर्ति है, पतितोद्धारफ, गुण के फूप ॥ १६ ॥
ज्ञानदायिनी आत्मसिद्धि तो अमर रहेगी तीनों काल, स्मरण राज भक्तों का करके होगा मानव हृदय विशाल वीर और श्रीराम तुल्य ही किया कार्य हो निज में लीन, सफल किया है सन्त सुजीवन करके महामोहको क्षीण ॥१७॥ कलियुग के केवली कहलाये, वर्तमान के अनुपम वीर, प्राप्त किया है मुक्ति मार्ग को वन्दन बार बार गंभीर संवत् उन्नीससौ सत्तावन कृष्ण पंचमी चैत्र राजकोट में मंगल के दिन, छोड़ दिया निज देह निवास ॥१८॥ सुमास गुरु और गुरु-भक्तों के गुण गाने की इच्छा सद्भक्ति, क्या मैं करूँ प्रशंसा उनकी, तुच्छ लेखनी में क्या शक्ति ? फिर भी भाव विवश लिख डाला, मिला मुझे इससे आनन्द, भक्ति, प्रेम से गुरु को भजते, मिट जाते सारे दुख द्वन्द ॥१९॥ लेखक-प्रकाशक पद्यानुवादक :-पं. गुणभद्र जैन कविरत्न ७४
meanihariram
A
और अन्नालाल,
लघुराज, श्री माभाग्य, जूठाभाई
चारों ने पाया 'राजयोग' मे आत्मज्ञान रसात जो,
पाई कृपा, मत्पात्रता, पुरुषार्थ प्रेम अनन्य औ,
पनी सपर श्रेयस्कर, ममाधि श्रेष्ठ पाई धन्य थे।
+
.
- . par फल, मिश्री खाने से मिश्री का फल, अग्नि के स्पर्श करने से अग्नि-स्पर्श का फल, हिम के स्पर्श करने से हिम-स्पर्श का फल मिले बिना नहीं रहता, उसी तरह कपाय आदि अथवा अकषाय आदि जिस किसी परिणाम से भी आत्मा प्रवृत्ति करती है, उसका फल भी मिलना योग्य ही है, और वह मिलता है । उस क्रिया का कर्ता होने से आत्मा भोक्ता है । पाँचवाँ पद : ' मोक्षपद है ' जिस अनुपचरित व्यवहार से जीव के कर्म का कर्तृत्व निरूपण किया और कर्तृत्व होने से भोक्तृत्व निरूपण किया, वह कर्म दूर भी अवश्य होता है; क्योकि प्रत्यक्ष कषाय आदि की तीव्रता होने पर भी उसके अनभ्यास से-अपरिचय से-उसके उपशम करने से,-उसकी मंदता दिखाई देती है-वह क्षीण होने योग्य मालूम होता है-क्षीण हो सकता है। उस सब बंध-भाव के क्षीण हो सकने योग्य होने से उस से रहित जो शुद्ध आत्म स्वभाव है, वह रूप मोक्ष पद छठा पद : 'उस मोक्ष का उपाय है । ' यदि क्वचित् ऐसा हो कि हमेशा को का बंध ही वन्ध हुआ करे, तो उसकी निवृत्ति कभी भी नहीं हो सकती । परन्तु कर्मबन्ध से विपरीत स्वभाववाले ज्ञान, दर्शन, समाधि, वैराग्य, भक्ति आदि साधन प्रत्यक्ष है, जिस साधन के बल से कर्म-बन्ध शिथिल होता है-उपशम होता है-क्षीण होता है; इसलिये वे ज्ञान, दर्शन, संयम आदि मोक्ष-पद के उपाय है। श्री ज्ञानी पुरुपो द्वारा सम्यग्दर्शन के मुख्य निवासभूत कहे हुए इन छह पदों को यहाँ संक्षेप में कहा है। समीप मुक्तिगामी जीव को स्वाभाविक विचार में ये पद सप्रमाण -परम निश्चयरूप जानने योग्य है, उसकी आत्मा में उनका सम्पूर्ण रूप से विस्तार सहित विवेक होना योग्य है। ये छह पद संदेह रहित हैं, ऐसा परम पुरुष निरूपण किया है। इन छह पदों का विवेक जीव को निजस्वरूप समझने के लिए कहा है। अनादि स्वप्न-दशा के कारण उत्पन्न हुए जीव के अहंभाव-ममत्वभाव को दूर करने के लिए ज्ञानी पुरुषों ने इन छह पदों की देशना प्रकाशित की है । एक केवल अपना ही स्वरूप उस स्वमदशा से रहित है, यदि जीव ऐसा विचार करे तो वह सहज मात्र मे जागृत होकर सम्यग्दर्शन को प्राप्त हो, सम्यग्दर्शन को प्राप्त होकर निज स्वभावरूप मोक्ष ५ ने ७६ 24 a " . को प्राप्त करे । उसे किसी पिनाशी, अशुद्ध और अन्यभार में हर्ष, गोक और सयोग उत्पन्न न हो, उस विचार से निजस्वरूप में ही निरन्तर शुद्धता, सम्पूर्णता, अविनाशीपना, अत्यन्त आनन्दपना उसके अनुभव में आता है। समस्त विभाव पर्यायों में केवल अपने ही अध्यास से एकता हुई है, उससे अपनी सर्वथा भिन्नता ही है, यह उसे स्पष्ट-प्रत्यक्ष-अत्यन्त प्रत्यक्ष-अपरोक्ष अनुभव होता है । विनागी अथवा अन्य पदार्थ के सयोग में उसे इष्ट अनिष्ट मात्र प्राप्त नहीं होता | जन्म, जरा, मरण, रोग आदि की बाधा रहित, सम्पूर्ण माहात्म्य के स्थान ऐसे निजस्वरूप को जानकर अनुभव करके यह कृतार्थ होता ह । जिन जिन पुरषों को इन छह पदों के प्रमाणभूत ऐसे परम पुस्प के पचन से आत्मा का निश्चय हुआ है, उन सर पुरुषों ने सर्व स्वरूप को पा लिया है। वे आधि, व्याधि, उपाधि और सनसग से रहित हो गये हैं, होते हैं, और भविष्य में भी वैसे ही होंगे। जिन सत्पुरुषों ने जन्म, जरा और मरण का नाश करनेवाला, निज खरूप में सहज- अम्यान होने का उपदेश दिया है, उन सत्पुरुषों को अत्यन्त भक्ति से नमस्कार है। उनकी निम्फारण करुणा से नित्य प्रति निरन्तर स्तरन करने से भी आत्म-स्वभाव प्रगटित होता है । ऐसे मब सत्पुरुष और उनके चरणारविन्द सदा ही हृदय में स्थापित रहो। जिसके वचन अगीकार करने पर, छह पदों से सिद्ध ऐसा आत्मस्वरूप सहज में ही प्रगटित होता है, जिस आत्म-स्वरूप के प्रगट होने से सर्वकाल में जीव सम्पूर्ण आनन्द को प्राप्त होकर निर्भय हो जाता है, उस वचन के कहनेवाले ऐसे सपुरप के गुणों की न्यारया करने की हममें असामर्थ्य ही है। क्योंकि जिसका कोई भी प्रत्युपकार नहीं हो सकता ऐमे परमात्मभार को, उसने किसी भी इच्छा के निना, केवल निष्कारण करणा से ही प्रदान किया है । तया ऐसा होने पर भी जिसने दूसरे जीव को यह मेरा शिष्य है अपरा मेरी भक्ति करने वाला है, इमलिये मेरा है।' इस तरह कभी भी नहीं नया-रेमे म पुरुष को अयत भक्ति से फिर फिर से नमस्कार हो। . जिन सापुरुषों ने जो सद्गुरु की भक्ति निग्पण की है, वह भक्ति केवल गिष्य के कल्याण के लिये ही कही है। जिस मक्ति के प्राप्त होने से सद्गुरु को आत्मा की चेष्टा में वृत्ति रहे, अपूर्व गुण दृष्टिगोचर होकर अन्य स्वच्छंद दूर हो, और सहज में आत्म-बोध हो, यह समझकर जिसने भक्ति का निरूपण किया है, उस भक्ति को और उन सत्पुरुषों को फिर फिर से त्रिकाल नमस्कार हो ! यद्यपि कभी प्रगटरूप से वर्तमान में केवलज्ञान की उत्पत्ति नहीं हुई, परन्तु जिसके वचन के विचार योग से केवलज्ञान शक्तिरूप से मौजूद है, यह स्पष्ट जान लिया है-इस प्रकार श्रद्धारूप से केवलज्ञान हुआ है विचार-दशा से केवलज्ञान हुआ है- इच्छा-दशा से केवलज्ञान हुआ है-मुख्य नय के हेतु से केवलज्ञान रहता है जिसके संयोग से जीव सर्व अव्याबाध सुख के प्रगट करनेवाले उस केवलज्ञान को, सहज मात्र मे पाने के योग्य हुआ है, उस सत्पुरुष के उपकार को सर्वोत्कृष्ट भक्ति से नमस्कार हो! नमस्कार हो!! -श्रीमद् राजचन्द्र (यह छह पद का पत्र है। देखें पृष्ठ ३१ पंक्ति १५ के सन्दर्भ में) " हजारों उपदेश वचन और उक्तियां सुनने की अपेक्षा, उनमें से थोड़े वचनों का विचार करना भी विशेष कल्याणकारी है। पठन की अपेक्षा मनन की ओर विशेष ध्यान देना । छह खंड का भोक्ता राजपाट छोड़कर चला गया और मैं अल्प व्यवहार में ही बड़प्पन और अहंकार मान कर बैठा हूँ-ऐसा विचार क्यों नहीं आता ? इंद्रियाँ तुमपर विजय प्राप्त करें और उसमे तुम सुख समझो, उसकी अपेक्षा तुम उनके ऊपर विजय प्राप्त करने में ही सुख, आनन्द और परम पद प्राप्त करोगे । कलिकाल ने मनुष्य को स्वार्थपरायण और मोह के वश कर दिया है। जिसका हृदय शुद्ध सन्त के द्वारा निर्दिष्ट मार्ग से चलता है, वह धन्य है । सत्संग के अभाव से चढ़ी हुई आत्मश्रेणी का प्रायः पतन हो जाता है । -श्रीमद् राजचन्द्र ७८ रत्न कणिका से) ARTHAKRKAR-S (श्रीमद् राजचन्द्र वचनामृत तू चाहे जिस धर्म को मानता हो, उसका मुझे पक्षपात नहीं। कहने का तात्पर्य केरल इतना ही है कि जिस राह से ससार-मल का नाश होता हो, उस भक्ति, उस धर्म और उस सदाचार का तू सेवन करना । MO मैं किसी गच्छ में नहीं, आत्मा में है-यह नहीं भूलना । जैसे भी हो, राग-द्वेपरहित होना-यही मेरा धर्म है। मैं देह आदि स्वरूप नहीं है तथा देह, स्त्री और पुत्र आदि कोई भी मेरा नहीं हैं । मैं शुद्ध चैतन्यस्वरूप और अविनाशी आत्मा हूँ। ऐसी आत्म- भावना करने से राग-द्वेप का क्षय होता है। - यदि तू समझदार वाल्क हो तो विधा और आज्ञा की ओर दृष्टि कर M यदि तू युवा हो तो उद्यम और ब्रह्मचर्य की ओर दृष्टि कर । E- यदि तू वृद्ध हो तो मृत्यु की ओर दृष्टि करके आज के दिन में प्रवेश करना th यदि तू स्त्री हो तो अपने पति के प्रति अपनी धर्मकरणी को याद कर । यदि कोई दोष हुआ हो तो उसकी क्षमा माग और अपने कुटुव की ओर दृष्टि कर । ७ तू राजा हो अथवा रका कोई भी हो, परन्तु इस विचार को मनमें रखकर सदाचार को और प्रवृत्त होना कि इस शरीर के पुद्गल को पोडे समय के लिए फेल साढे तीन हाय जमीन की आवश्यकता होगी। ॐ मूल वस्तु का नान, जो देह-मदिर का निवासी शाश्वत पदार्य है, उसे जान । .
. 600 अनन्त काल से जीव को असत् वासना का अभ्यास पड़ा हुआ है । उसमें एकदम सत् सम्बन्धी संस्कार स्थित नहीं रहते । जैसे मलिन दर्पण में जैसे चाहिए वैसे प्रतिबिम्ब के दर्शन नहीं हो सकते; वैसे ही असत् वासना से युक्त मन मे सत् सम्बन्धी संस्कार, जैसे चाहिए वैसे, प्रतिबिम्बित नहीं होते। 600 परिभ्रमण करता हुआ जीव अनादिकाल से अब तक भी अपूर्व को प्राप्त नहीं कर सका। जो कुछ उसने प्राप्त किया है, वह सब पूर्व से ही चला आता है। यह चौदह राज लोक मायामय अग्नि से प्रज्वलित है । इस माया में जीव की बुद्धि रची-पची पड़ी है, और इससे जीव भी त्रिविध तापाग्नि से जला करता है। उसके लिए परम कारुण्य मूर्ति का उपदेश ही परम शीतल जल है। जो मुमुक्षु जीव गृहस्थ व्यवहार में आचरण करता हो, उसे तो अखंड नीति का मूल पहले आत्मा में ही स्थापित करना चाहिए, अन्यथा उपदेश आदि सब निष्फल है। मुमुक्षुता' वह है कि सब प्रकार की मोहासक्ति से विरक्त होकर केवल मोक्ष के लिए प्रयत्न करना । 'तीव्र मुमुक्षुता' उसे कहते है कि मोक्ष मार्ग मे प्रत्येक क्षण अनन्य प्रेमपूर्वक आचरण करना। 600 जिस कुल में जन्म हुआ है और जिसके सहवास मे जीव रहता आया है, वहाँ अज्ञानी जीव ममत्व करता है और उसी मे डूबा रहता है । 600 वर्तमान काल दुःषमकाल है | मनुष्य का मन भी दुःषम ही देखने में आता है । प्रायः परमार्थ से शुष्क अन्तःकरण वाले जीव परमार्थ का दिखावा करके अपनी इच्छानुसार आचरण करते है । -- ८० 09 यह लोक त्रिविध ताप से व्याकुल है। यह जीव ऐसा दीन है कि मृगजल के लिए दौडता हुआ अपनी तृपा को छिपाना चाहता है। अज्ञान के कारण निजरूप का विस्मरण हो जाने से वह भयकर परिभ्रमण में पड गया है। 2 सब जीव दु ख की निवृत्ति चाहते हैं तथा दु ख की निवृत्ति, दुख पैदा करने वाले राग-द्वेप और अज्ञान आदि की निवृत्ति हुए बिना सभव नहीं। M कल्याण-मार्ग और परमार्थ-खरूप को भलिभाति न समझने वाले अज्ञानी जीन अपनी मति-कल्पना से मोक्ष-मार्ग की कल्पना कर, विविध उपायों का अवलबन लेकर आचरण करते हुए भी, मोक्ष पाने के बदले, ससार में परिभ्रमण करते हैं । यह देखकर निष्कारण ही करुणाशील हमारा हृदय रो पडता है। . ॐ जगत् की दृष्टि से जीव ने पदार्थ का ज्ञान प्राप्त किया है, ज्ञानी की दृष्टि से नहीं। जिस जीव ने ज्ञानी दृष्टि से ज्ञान प्राप्त किया है, उस जीन को सम्यक् दर्शन प्राप्त होता है । 00 लोकदृष्टि का जब तक जीव वमन नहीं कर देता और उसके प्रति उसकी अन्तत्ति छूट नहीं जाती, तब तक ज्ञानी की दृष्टि का वास्तविक माहात्म्य ध्यान में नहीं आ सकता-इसमें सन्देह नहीं । 00 ज्ञानी की आज्ञा का आराधन वही कर सकता है जो एकनिष्ठापूर्वक, तन- मन-धन से आसक्ति का त्याग कर उसकी भक्ति में लग जाय । M समस्त क्लेषों और समस्त दुखों से छूटने का उपाय केवल आत्मज्ञान है। विचार के बिना आत्मज्ञान नहीं होता तथा असत्सग और असत् प्रसग से जीर की विचार-शक्ति नहीं चलती, इसमें जरा भी सन्देह नहीं। ८
ज्ञानियों द्वारा कल्पित सचमुच यह कलिकाल ही है । जनसमुदाय की
वृत्तियाँ विषय, कपाय आदि के कारण विषमता को प्राप्त हो गयी हैं।
इसकी वलवत्ता प्रत्यक्ष है।
विषय के कारण जिसकी इंद्रियाँ पीड़ित हैं, उसे शीतल आत्मसुख और
आत्मतत्व कहाँ से प्रतीति हो?
600 देह की तू जितनी चिन्ता रखता है, उससे अनन्त गुनी चिन्ता आत्मा
की रख; कारण कि अनन्त भव को एक भव में दूर करना है ।
समर्थ पुरुप कल्याण का स्वरूप चिल्ला-चिल्ला कर कह गये हैं, किन्तु
किसी विरले को ही वह ठीक-ठीक समझ में आया है ।
हजारों उपदेशवचनों को श्रवण करने की अपेक्षा थोड़े से वचनों पर
विचार करना विशेष कल्याणकारी है।
-
में
भगवान् को सर्व समर्पण किये बिना, इस काल में जीव का देहाभिमान
नष्ट होना संभव नहीं।
600 कोई भी जीव परमार्थ की इच्छा करे और साथ ही व्यावहारिक संग में
भी आसक्त रहे और फिर परमार्थ की प्राप्ती हो जाये-यह किसी काल
भी संभव नहीं।
लौकिक और अलौकिक दृष्टि में बड़ा अंतर है । लौकिक दृष्टि में व्यवहार
की मुख्यता है और अलौकिक दृष्टि में परमार्थ की ।
ala संसार को सुंदर दिखाने के लिए मुमुक्षु कुछ नहीं करता, किन्तु जो सुंदर
है, वही आचरण करता है ।
show
हे जीव, तू भ्रम में है, तुझे हित की बात कहता हूँ | अन्तरंग में सुख
बाहर खोजने से वह नहीं मिलेगा। अन्तरंग का सुख अन्तरंग की
८२
M
. . समश्रेणी में है, उसमें स्थिति होने के लिए बाह्य पदार्थों का विस्मरण कर, आश्चर्य को भूल जा। 00 अनित्य पदार्थ के प्रति मोह-बुद्धि होने के कारण आत्मा का अस्तित्व, नित्यत्व, और अव्याबाध समावि सुख मान में नहीं आता। " जो प्राणी ज्योतिष सम्बन्धी प्रश्न का उत्तर पाकर आनदित होते है, मोह के आधीन हैं, और उन्हें परमार्थ का पात्र होना दुर्लभ है । माया सम्बन्धी सुख की सब प्रकार की इच्छा को जब भी हो, छोडे बिना छुटकारा होनेवाला नहीं है । इसलिए जब से इस बाक्य का श्रवण किया तभी से उस क्रम का अभ्यास करना योग्य है-ऐसा समझना चाहिए। 2 चाहे जिस क्रिया, जप, तप और शास्त्रों का पठन करने के बाद भी एक ही कार्य सिद्ध करना है और वह यह कि ससार को भूल जाना और सत् के चरणों का आश्रय लेना। . 800 अनादि काल के परिभ्रमण में अनन्त बार शास्त्र का श्रवण, अनन्त बार विद्या का अभ्यास, अनन्त बार जिन-दीक्षा और अनन्त बार आचार्यपद प्राप्त हुआ है, केरल 'सत्' ही नहीं मिला, 'सत्' का ही श्रवण नहीं किया, 'सत्' की ही श्रद्धा नहीं की, और यदि यह मिल जाये इसे श्रवण कर लिया जाये और इस पर श्रद्धा की जाये तो ही मुक्त होने की भणकार आत्मा से निकलेगी। " - . 'सत्' सत् ही है, यह सरल है, सुगम है, सर्वत्र उसकी प्राप्ति होती है, परन्तु 'सत्' को बतानेवाला 'सत्' चाहिए। M महात्माओं ने चाहे जिस नाम से और चाहे जिस आकार से, एक 'सत्' का ही प्रकाश किया है । उसी का ज्ञान करना चाहिए, उसी की प्रतीति - क करनी चाहिए, वही अनुभव-रूप है, और उसी को परम प्रेमपूर्वक भजना चाहिए। जो देह है, वह आत्मा नहीं; जो आत्मा है, वह देह नहीं। जैसे घड़े का द्रष्टा घड़े से भिन्न रहता है, उसी प्रकार देह का द्रष्टा आत्मा देह से भिन्न है, अर्थात् वह देह नहीं । 600 ऐसे एक ही पदार्थ का परिचय करना योग्य है कि जिसमे अनन्त प्रकार का परिचय निवृत्त हो जाता है । वह कौनसा ? और किस प्रकार ? इसका विचार मुमुक्षु किया करते है । 600 इस क्षणभंगुर संसार में सत्पुरुष का समागम ही अमोल और अनुपम लाभ है। 600 धर्म बहुत गुप्त वस्तु है, बाहर खोजने से वह नहीं मिलता । अपूर्व अन्तर के संशोधन से ही उसकी प्राप्ति होती है। वह अंतसंशोधन किसी भाग्यशाली सद्गुरु के अनुग्रह से ही प्राप्त होता है । 600 सद्गुरु के उपदेश के बिना और जीव की सत्पात्रता के बिना, ऐसा होना रुक गया है। उसे पा कर, संसार के ताप से तप्त आत्मा को शीतल करना ही कृतकृत्यता है । Gon कर्म जड़ वस्तु । जिस-जिस आत्मा का इस जड़ साथ, जितनी- जितनी आत्मबुद्धि से सम्पर्क होता है, उतनी-उतनी आत्मा को जड़ता अर्थात् अबोधता की प्राप्ति होती है-ऐसा अनुभव होता है । 600 सांसारिक सुख की स्पृहा में जैसे-जैसे खेद होता है, वैसे वैसे ज्ञानी का मार्ग स्पष्ट सिद्ध होता है । गुप्त चमत्कार सृष्टि के लक्ष्य मे नहीं। सत्पुरुष का योगबल जगत् का कल्याण करे । 600 समझ में आये बिना आगम अनर्थकारक हो जाते हैं। सत्संग के बिना ध्यान तरंग रूप हो जाता है । सन्त के बिना अंत की बात में अंत की है के .
प्राप्ति नहीं होती। लोकसज्ञा से लोक के अग्रभाग में नहीं पहुँचा जाता । लोकल्याग के बिना वैराग्य का यथायोग्य प्राप्त करना दुर्लभ है । जीर को परिभ्रमण करते-करते अनन्त काल बीत गया, फिर भी उसकी निवृत्ति क्यों नहीं होती ? ओर वह क्या करने से हो सकती है । इस पाक्य में अनेक अर्थ समाविष्ट हैं। उसका विचार किये बिना अथवा दृढ विश्वासपूर्वक झुरे ( मनन ) बिना, मार्ग के अश का अल्प भान भी नहीं होता । दूसरे समस्त विकल्पों को दूर कर, एक इसी उपर्युक्त सत्पुरुषों के वचनामृत का बारम्बार विचार करना । &00 जीप यदि पर-पढार्य में निजबुद्धि करे तो यह परिभ्रमण दशा को प्राप्त करता है । और यदि निज में निजबुद्धि पैदा हो तो परिभ्रमण दशा दूर हो जाती है। . & क्रिया कर्म है, उपयोग धर्म है, परिणाम बध है, भ्रम मिथ्यात्व है, ब्रह्म आत्मा है और शफा शल्य है । शोक को स्मरण नहीं करना, यही उत्तम वस्तु ज्ञानियों ने मुझे दी है। ४ दृढ़ निश्चय करना कि बाहर जाने वाली वृत्तियों को क्षय कर अन्तवृत्ति रखना, यही ज्ञानियों की आज्ञा है । सर प्रकार की क्रिया, योग, जप, तप और शेष बातों का लक्ष्य ऐसा रखना कि आत्मा को छुड़ाने के लिए ही सब कुछ है, आत्मा के लिए नहीं। जिससे बधन हो ( क्रिया से लगाकर समस्त योग आदि तक) उन सन बातों का त्याग करना ही उचित है। (iv आग्भ और परिग्रह की इच्छापूर्वक प्रसग हो तो वह आत्मलाभ का विशेष घातक है, तथा बारम्बार अस्थिर, और अप्रशस्त परिणाम का हेतु है इसमें संशय नहीं।
NA d . - जीव को अंतकाल में यम दुखदायी न लगता हो, किन्तु हमें तो संग दुखदायी लगता है। 000 हाल में तो 'सत् ' अप्रकट दिखाई देता है । भिन्न-भिन्न चेष्टाओं द्वारा वह हाल में प्रकट जैसा मानने में आता है (जैसे योग आदि साधन, आत्मा का ध्यान, शुष्क वेदान्त से अध्यात्म का चिन्तन आदि द्वारा ), पर वह वैसा नहीं है। 600 'इस जीव को यह देह ' ऐसा, भेद जो भास्यो नहीं, पचखाण किया तब भी, मोक्षार्थ वह भाख्या नहीं । १ 600 अनादिकाल से महाशत्रु रूप रागद्वेष और मोह के बंधन में बंधा हुआ जीव अपने संबंध में विचार नहीं कर सकता । 009 यथावत् वस्तुस्वरूप को जानने के सम्बन्ध में प्रवेश होने के वास्ते जीव के लिए वैराग्य और उपशम को साधन कहा गया है । 600 जगत् जैसा है, वैसा तत्वज्ञान की दृष्टि से देखो....संसार के ताप से अत्यन्त तप्त इस आत्मा को शीतल करना ही कृतकृत्यता cho पाव रखने में पाप है, देखने में जहर है, और सिर पर मृत्यु नाच रही है-यह विचार कर आज के दिवस में प्रवेश कर । 600 हे जीव, इस क्लेश रूप संसार से विराम कर, विराम कर | कुछ विचार प्रमाद छोड़कर जागृत हो, जागृत हो । अन्यथा रत्न-चिंतामणि के समान यह महष्य देह निष्फल हो जायेगा। जिसे लगी है, उसे ही लगी है। और उसी ने जानी है । वही पी पी' (पियु) पुकारता है। इस ब्राह्मी वेदना को कैसे कहा जाये ? जहाँ कि वाणी का भी प्रवेश नहीं । अधिक क्या कहें ? जिसे है १ आजीव ने आ देह" एवो, भेट जो भास्यो नहीं, पचखाण कीधा त्यां सुधी, मोक्षार्थ ते भाख्यां नहीं। ५६
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600 परिभ्रमण हुआ सो हुआ, अब यदि उसका प्रत्याख्यान कर लें तो ? वह किया जा सकता है....एक बार यदि समाधिमरण हो जाये तो सदा के लिए असमाधिमरण दूर हो जायेगा। । 600 उपयोग को शुद्ध करने के लिए, इस जगत् के संकल्प-विकल्प को भूल जाना। 600 संग के संयोग से यह जीव सहज स्थिति को भूल गया है। संग की निवृत्ति से सहज स्वरूप का अपरोक्ष भान प्रकट होता है। 600 सहज स्वरूप से जीव रहित नहीं है, फिर भी उस सहज स्वरूप का भान मात्र जीव को नहीं । उसका होना ही सहज स्वरूप स्थिति है। 600 यह परम तत्व है, इसका मुझे हमेशा निश्चय रहे । यह यथार्थ स्वरूप मे प्रकाश करे, और जन्म-मरण आदि बंधन से अत्यन्त निवृत्ति हो! निवृत्ति हो !! मेरे हृदय जिन्हे तीनो कालों मे देह आदि से अपना कोई भी सम्बन्ध न था, ऐसी असंग दशा जिन्होंने पैदा की, उन भगवान रूप सत्पुरुषों को नमस्कार हो। 600 देह से भिन्न स्वपर प्रकाशक परम ज्योति स्वरूप यह आत्मा है; उसमें निमग्न होओ। हे आर्यजनो, अन्तर्मुख होकर, स्थिर होकर, उस आत्मा में ही रहो तो अनंत अपार आनंद का अनुभव करोगे । जिन सत्पुरुषों ने जन्म, जरा, और मरण का नाश करनेवाले स्वरूप में सहज अवस्थित होने का उपदेश दिया है, उन सत्पुरुषों को अत्यन्त भक्ति भाव से नमस्कार है। उनकी निष्कारण करुणा का नित्य निरन्तर स्तवन करने से भी आत्मस्वभाव प्रकट होता है ।
हम देहधारी है। ऐसा स्मरण करने पर मुश्किल से ही जान पाते हैं- परमानन्द रूप हरि को एक क्षण के लिए भी विस्मरण न करना, यही हमारी सर्व कृति, वृत्ति और लेख का उद्देश्य है। देह जीव एक भासता है अज्ञान से, किया की प्रवृत्ति भी उससे वैसी होती है ॥ १ ॥ जीव की उत्पत्ति औ रोग शोक दुख मृत्यु देह का स्वभाव जीव पद में जनाता है ॥ २॥ ऐसा जो अनादि रूप का मिथ्यात्वभाव, ज्ञानी के वचन से दूर हो जाता है ॥ ३ ॥ मैं कौन है ? कहाँ से हुआ ? क्या स्वरूप है मेरा खरा किसके सम्बन्ध में लगा है यह ? रकवू या कि परिहरूँ ॥ ४ ॥ खान मृत्र औ मलकी रोग जरा का निवासघाम, काया ऐसी गिनकर, मान छोडकर औ कर सार्थक इसको ॥ ५॥ सब साधन बधन हुए रहा न कोई उपाय, सत् साधन समझा नहीं, फिर बधन क्यों जाय ॥६॥ 2 १ देह जीव एकरूपे मासे छे अजान बडे, मियानी प्रवृत्ति पण तेथी तेम थाय थे। २ जीवनी उत्पत्ति अने रोग, शोक, दुग्म, मृत्यु, देह नो स्वभाव जीव परमा जणाय । ३ एवो जे अनादि एकरूप नो मिथ्यात्वभाव, जानिना वचन वडे दूर थई जाय छ । ४ हु कोण छ क्याथी थयो । शु स्वरूप छे मारू सरू ? कोना सबधे वळगणा १ राखु के ए परिहरू' ५ खाण मूळ ने मळनी, रोग जरानु निवासनु धाम, काया एवी गणी ने, मान त्यजीने पर सार्थक आम | ६ सहु साधन बधन यया, रह्यो न कोई उपाय, सत् साधन समन्यो नहीं, त्या बघन शु जाय?
BA राग द्वेष अज्ञान यह, मुख्य कर्म की प्रन्थि, होय निवृत्ति जिससे, वही मोक्ष का पंथ ॥ २१ ॥ मोह भाव जहाँ नाश हो, अथवा होत प्रशान्त, वह कहिये ज्ञानी दशा, बाकी कहिये भ्रान्त ॥ २२ ॥ सकल जगत उच्छिष्टवत् , अथवा स्वप्न समान, वह कहिये ज्ञानी दशा, वाकी वाचा ज्ञान ॥ २३ ॥ ज्ञान ध्यान वैराग्यमय, उत्तम जहाँ विचार, जो भावे शुभ भावना, वह उतरे भव पार ।। २४ ॥ जब जान्यो निज रूप को, तब जान्यो सब लोक, नहिं जान्यो निज रूपको, सब जान्यो सो फोक ॥ २५ ॥ देह रहे जिसकी दशा, रहती देहातीत, उस ज्ञानी के चरण में, बन्दन हो अगणीत ॥ २६ ॥ २१ रागद्वेष अज्ञान ए, मुख्य कर्मनी ग्रंथ, याय निवृत्ति जेहथी तेज मोक्ष नो पंथ । २२ मोहभाव क्षय होय ज्या, अथवा होय प्रशांत, ते कहीए ज्ञानी दशा, वाकी कहीए भ्रात । २३ सकळ जगत् ते ऐंठवत् , अथवा स्वप्न समान, ते कहीए ज्ञानी दशा, बाकी वाचाज्ञान । २४ ज्ञान, ध्यान, वैराग्यमय, उत्तम जहां विचार, ए भावे शुभ भावना, ते उतरे भव पार । २५ जब जान्यो निज रूप को, तब जान्यो सब लोक, नहीं जान्यो निनरूप को, सब जान्यो सो फोक । २६ देह छतां जेनी दशा, बर्ते देहातीत । ते ज्ञानीना चरणमां, दो ! वंदन अगणीत || १२ 14 श्रीमद् लघुराज स्वामी के उपदेश वचन (श्रीमद् लघुराज स्वामी के उपदेशामृत से) • मोहनिद्रा में समस्त ससार सोया पडा है । उसको उपदेश बोधरूप लकडी मारकर ज्ञानी को तुम्हें जगाना है, अब अधिक सोने नहीं देना है। तुम आत्मा हो । ज्ञानी ने जगह-जगह आत्मा के दर्शन किये हैं। वैसी शुद्ध आत्मा मेरी है, वह मैं हूँ, और कुछ मैं नहीं है, और कुछ मेरा नहीं है- ऐसा विश्वास पैदा करा दो । आत्मा का माहात्म्य समझ में नहीं आया, इससे आत्मदर्शन की दृष्टि नहीं होती। सत्सग के उपदेश पर जैसे ध्यान दोगे, वैसे-वैसे समझ पैदा होगी । समझ आने से दृष्टि फिरेगी । ® परन्तु कमी किस बात की है ? पूर्व कर्म और पुस्पार्थ की । Mp धर्म नहीं समझा, और पहचान न हुई तो मनुष्य होकर भी पशु है। m मनुष्य मर को दुर्लभ कहा है। यदि वह सोच ले तो थोडे ही समय में मोक्ष मिल जाये-सर्व सुख की प्राप्ति हो जाये । लेकिन फिर भी यह जीव स्वच्छद भार से अप इच्छापूर्वक और अपनी समझ से जो आचरण करता है, वह इस जीव को महादुर्गति का-दुख का कारण होगा । उस समय कौन छुडाने के लिए समर्थ हो सकेगा ? फिर से ऐमा योग कहाँ मिलेगा ? यदि चिंतामणि के समान यह असर नष्ट हो गया तो फिर पृथ्वी, जल और निगोद में अनत काल भ्रमण करना पडेगा । उस पर दया करने का यह अवसर है या नहीं? यदि जीर श्रद्धा रखकर अपने हित-अपने कल्याण के लिए सचेत न हो तो फिर उसका परिणाम खोटा ही हो। & सब कुछ छोडना होगा। जहाँ-जहाँ मेरा-मेरा किया है, यहाँ से उठ जाना होगा। मेरी एक आत्मा है, उसके सिवाय जगत् के पदायों में से एक परमाणु भी मेरा नहीं। VBARBAATMAL ३ 600 ज्ञानी को कमी किस बात की ? वह सम्यकत्व देता है, मोक्ष देता है; किन्तु सब जीव का ही दोष है । HD ज्ञानी पुरुष के वचनों में दृष्टि-अन्तर्दृष्टि-न रखते हुये इस जीव ने लौकिक दृष्टि के कारण सब सामान्य कर डाला है, इससे आत्मभाव का स्फुरण नहीं होता । सत्संग अमूल्य लाभ है, उसे मनुष्य भव में प्राप्त करना योग्य है । सत्संग की आवश्यकता है, इससे मनुष्य भव में सम्यकत्व का अपूर्व लाभ मिलता है-इस सम्बन्ध में जीव ने अनन्त काल से विचार नहीं किया। तथा 'मै ऐसा करता हूँ, ऐसा करूँ' इस प्रकार का अहं और ममत्व भाव जीव को रहता है । यदि वह असावधानी करेगा तो बार-बार पश्चाताप होगा। सावधान रहना चाहिये। अधिक क्या कहें ? मेरे पड़ोस में कौन है ? शरीर । उसका और मेरा कोई सम्बन्ध नहीं । वह मुझसे भिन्न है। 600 यह जीव अनादि काल से अपनी मति कल्पना से धर्म मानकर, धर्म की आराधना करने का प्रयत्न करता है । इससे वह मूल धर्म को नहीं पा सका । मिथ्या मोह के कारण अनंत संसार में अनंतानंत जीव परिभ्रमण करते है । वह जीव की स्वच्छन्द कल्पना है | जिनागम में वर्णन की हुई इस भूल को ज्ञानी पुरुष देखकर, विचार कर और उसे दूर कर, अपने निज स्वरूप मूलधर्म सम्यग्दर्शन-ज्ञान और चारित्र में स्वयं परिणमन करता है । यही कर्तव्य है। जो जो जन्मा है, उसका किसी-न-किसी निमित्त से मरण अवश्यंभावी है। महान अतिशय के धारक श्री तीर्थकर भी नाशमान देह को अविनाशी नहीं बना सके । तो फिर आयु का उपभोग करते हुए, आने वाली मृत्यु को और कौन रोक सकता है ? ....देर या सबेर हमें भी इस मृत्युकी कसौटी को पार करना है। ६६ 24 महान् पुरुषों ने आयु की अतिम घडी को ही मृत्यु नहीं कहा। किन्तु प्रत्येक क्षण में आयुकी डोर घटती जाती है | अमुक अमुक क्षण जो विभाष में गया, वह मृत्यु ही है। विभाव परिणति जिसकी रुकी नहीं, उसे ज्ञानी पुरुषों ने चलता-फिरता मुर्दा ही कहा है । जितना समय खभाव दशा में व्यतीत होता है, ज्ञानियों ने उसे जीवन कहा है । बाकी का समय तो जीव मरने में ही व्यतीत करता है। इस हिसाब से अपने जीवन की जो घात चल रही है, उसी का खेद करना है । । स्वय &00 समभाव रखकर बाधे हुए कमों को भोगने से ही छुटकारा बाधा हुआ कर्म अपने आपको ही भोगना पडता है। यदि वैसा कर्म अच्छा न लगता हो तो ऐसी चिन्ता रखनी चाहिए जिससे कि वैसे कर्म का बध न हो । अर्थात् राग-द्वेप छोडकर समभावपूर्वक उस कर्म को मोग लेना चाहिए जिससे कि नया कर्म न बवे । 000 यदि समझमें आ जाये तो सहज है | छोडे गिना छुटकारा नहीं । अन्त में देह को भी छोडना ही पडेगा | इसलिए इस बात की ओर कुछ ध्यान देना चाहिये । वास्तव में सचेत होने की जरूरत है। इस अवसर को हाथ से खोना योग्य नहीं। माया और मोह के कारण सब अनिष्ट हो जाता है। इस ससार में मोह जैसी और कोई खराब वस्तु नहीं। सबसे बड़ा शत्रु मोह है । एक सद्गुरू ही उससे छुटकारा दिला सकता है । उसे याद करो । तू दूसरी वस्तु में तल्लीन रहता है, और जहाँ कर्तव्य है वहाँ प्रेम नहीं। यदि राग करना है तो सत्पुस्प पर करना चाहिये । तू उसके वचन ग्रहण नहीं करता । अनादि काल से जीर विषय-कपाय और भोग-विलास में पडा हैं। सारा ससार त्रिविध ताप से जला करता है । यदि दृष्टि हटाओ तो ताला खुल जाये ।
Rig कृपाल देव का वचन है कि जीव को सत्संग ही मोक्ष का परम साधन है। उपदेश और सत्संग के समान संसार से पार उतरने का और कोई साधन नहीं । सत्संग के कारण तियेच गति के जीवो को भी सत्पुरुष के बोध से देवगति पाकर सम्यकत्व पाकर मोक्ष मिला है। ऐसी कथाएँ शास्त्र में आती हैं। इसलिये जीवन में सत्संग. अत्यन्त आवश्यक है। उससे सम्यकत्व मिलता है और मोक्ष की भी प्राप्ति होती है। सत्संग की प्राप्ति होने पर भी जीव को उस सत्संग की पहचान नहीं हुई। उसका विचार जीव ने किया नहीं। विचार करके निश्चय किया नहीं कि यही आत्मा है। श्रवण करके जीव ने उन वचनों का परिणामन नहीं किया । अन्यथा फल प्राप्त हुये बिना न रहता | कमी केवल योग्यता की है। सबका स्नान और सूतक करके मरण-भोज करके चले जाओ । मृत्यु से निश्चिन्त हो जाओ। 600 सत्पुरुष का योगबल जगत् का कल्याण करे | शुद्धि पत्रक पृष्ठ पंक्ति अशुद्ध गुद्ध पिन ૧૦ १४ १ १० ११ 11 १३ विन बने है चाह्याभ्यन्तर जिससे दूजा घाट घडिया अवभास्यो रे चाह्याभ्यन्तर जिसके दूना घाट पडिया अपमास्योरे १२ १० ૧ર ૧૨ ४ ૧૩ जी-मुक्त जीवन मुक्त १६ २० श्रात्माओं राम कमाण सम्पन्न सम्यवन्च २८ ३० १५ ६ ३ ૧૩ ३० वम्ब में आत्माओं राम के वाण सम्पन्न सम्यकत्व बम्बई में वेलशीरस नरसिंहग्स सत्समागम गया है ३० ३० १३ वेरगीराम नरसिंहराव समागम ३ १० मर मे सय में २४ श्री मोहनलाल श्री ममाधिस्त सनावट धान प्राप्त का पठन-पठन रिलो ३० वर्ष रसात २० श्री मोहनलाल जी समाधिस्थ सनावाद मान प्राप्ति का पठन-पाठन चिरले ३७ वर्ष रसाल ये मनुप्य ७० चित्र में ૧૬ २४ मह्प्य २० ६० ६॥ २४ चचनेन वचनने
पोतरताच्छीय जान मन्दिर, जयपुर
"रे! आत्म तारो!
आत्म तारो!
शीघ्र इसे पहचानो
सब आत्माओं में सम दृष्टि रक्खो
इस वचन को मन में धारो।
"देह से भिन्न स्व पर का प्रकाशक
परमज्योति स्वरूप यह आत्मा,
उसमें निमग्न होओ ।
हे आर्यजनो, अंतमुख होकर, स्थिर होकर, उसी आत्मा में रहो तो
अनंत अपार आनंद का अनुभव होगा।"
-श्रीमद् राजचन्द्र
30-04-
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श्रीमद् सद्गुरवे नमो नम अहो ! अहो ! श्री सद्गुरु करुणासिंधु अपार । अहो । अहो । इस पामर पर प्रभु ने किया उपकार । १ क्या प्रभु के चरणों धरूँ? आत्मा से सब हीन, वह ( आत्मा को) तो प्रभु ने ही दिया, मैं रहूँ चरणागेन । २ यह देहादि आज से रहे प्रभु आधीन, दास दास मैं दास हूँ उस प्रभु का दीन | ३ षट् स्थानक* समझायकर भिन्न बताया आप, म्यान से तलवार जैसे, यह उपकार अमाप ! ४ जो स्वरूप समझे बिना, पाया दुख अनत, समझाया वे पद नमूं श्री सद्गुरु भगवत ! ५ परम पुरुष प्रभु सद्गुरु, परमज्ञान सुखधाम, जिसने निज का मान दिया, उसको सदा प्रणाम । ६ देह रहे जिसकी दशा रहती देहातीत । उस ज्ञानी के चरण में वदन हो अगणीत | ७ आत्मा है, वह नित्य है, कर्ता है, भोता है, मोक्ष है और मोक्ष का उपाय है- यह छह स्थानक कहे गये हैं।' १ अहो । अहो श्री सद्गुरु, करुणार्मिधु अपार, आ पामर पर प्रभु कर्यो, भहो । अहो । उपकार । • सुप्रभु चरण क्ने धरू, आत्माथी सो हीन, ते तो प्रभुए आपियो, वर्तु चरणाधीन । ३ आ देहाटि आज थी वों प्रभु आधीन, दास दास हु दाम छु, तेह प्रमुनो दीन । ४ पट् स्थानक समजावीने, भिन यतान्यो आप, म्यान यकी तरवारवत् , ए उपकार अमाए । . जेद स्वरूप समज्या विना पाम्यो दुस अनत, समजाव्यु ते पद नमु, भी सद्गुरु मगवत । ६ परमपुरुष प्रभु सद्गुरु, परमशान सुरधाम, देगे आप्यु मान निज, तेने सटा प्रगाम । ७ देर छता जेनी दशा, वर्ते देशातीत, ते शनीना परशमा हो यदन अगणीत ।
-- प्रणिपात स्तुति हे परमकृपालु देव ! जन्म, जरा, मरणादि सब दुखों के अत्यन्त क्षय करनेवाले ऐसे वीतराग पुरुप का मूलमार्ग आप श्रीमद् ने अनन्त कृपा करके मुझे दिया, इस अनन्त उपकार के प्रत्युपकार का बदला 'चुकाने के लिये मैं सर्वथा असमर्थ हूँ; जबकि आप श्रीमद् कुछ भी ग्रहण करने में सर्वथा निस्पृह है; जिससे मै मन, वचन और काया की एकाग्रता से आपके चरणारविन्द नमस्कार करता हूँ। आपकी परम भक्ति और वीतराग पुरुप के मूलधर्म की उपासना मेरे हृदयमें भवपर्यंत अखण्ड रुपसे जागृत रहे, इतना ही चाहता वह सफल होओ! Onco ॐ शांतिः शांतिः शांतिः -
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