Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )

Jain Tarka Bhasa

Sukhlalji Sanghavi · 2010/08

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Front matter

म्घर्गवामी माधुचम्ति श्रीमान दालचन्दजी सिंघी
जन्म
वि.सं. १९२१, मार्ग यदि ६
स्वर्गवास
वि.सं. १९८४, पोप सुदि ३

सिंघी जैन ग्रन्थमाला
CeenC::अष्टम(c)मणि::::::
श्री महावीर दि जैन वाचनालया
श्री महावीरजी
मलिक नान
विषय
ANDRITSINCHI
वाडाहातामझामकाज
महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिरचिता
जैन तर्क भाषा

सिंघी जैन जैन ग्रन्थमाला जन भागमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कथात्मक-इत्यादि विविधविषयगुम्फित प्रामारा, संस्कृत, अपभ्रंश, प्राचीनगर, राजस्थानी भादि भाषानियन्द्र बहु उपयुक्त पुरातनवायाय तथा नवीन संशोधनात्मक साहित्यप्रकाशिनी जैन ग्रन्थावलि । कलकत्तानिवासी स्वर्गस्थ श्रीमद् डालचन्दजी सिंघी की पुण्यस्मृतिनिगित्त तत्सुपुत्र श्रीमान् वहादुरसिंहजी सिंघी कर्तृक संस्थापित तथा प्रकाशित R693 G30 सम्पादक तथा सजालक 3678/03 जिनविजय मुनि [ सम्मान्य सभासद-भाण्डारकर प्राच्यविद्या संशोधन मन्दिर पूना, तथा गूजरात साहित्य- सभा अहमदावाद; भूतपूर्वाचार्य--गूजरात पुरातत्त्वमन्दिर अहमदावाद; जैन वाङ्मयाध्यापक विश्वभारती, शान्तिनिकेतन; संस्कृत, प्राकृत, पाली, प्राचीनगूर्जर आदि अनेकानेक ग्रंथ संशोधक-सम्पादक । ) ग्रन्थांक ८ प्राप्तिस्थान व्यवस्थापक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला ९, शान्तिनगर, पाष्टःसायरमती १४८, गरियाहाटसड,पाठ घालीगंज अहमदाबाद कलकत्ता स्थापनाव्द ] सर्वाधिकार संरक्षित वि० सं० १९८६

महोपाध्यायश्रीयशोविजयगणिरचिता
जैन तर्क
तर्क भाषा
[तात्पर्यसंग्रहाख्यवृत्तिसहिता।]
सम्पादक
पण्डित सुखलालजी संघवी
जैनदर्शनाध्यापक-हिन्दू विश्वविद्यालय, बनारस
[ भूतपूर्व-दर्शनशास्त्राध्यापक-गूजरात पुरातत्त्वमन्दिर-अहमदावाद ]
तथा
पण्डित महेन्द्रकुमार न्यायशास्त्री
न्यायतीर्थ, जैनदर्शनाध्यापक-स्याद्वादविद्यालय
पण्डित दलसुख मालवणिया
न्या य तीर्थ,
बनारस
बनारस
प्रकाशन कर्ता
संचालक-सिंघी जैन ग्रन्थमाला
अहमदाबाद-कलकत्ता
विक्रमाव्द १९९४ ]
प्रथमावृत्ति, एकसहस्र प्रति ।
[ १९३८ किष्टाद

SINGHI JAINA SERIES 1 COLLECTION OF CRITICAL EDITIONS OF MOST IMPORTANT CANONICAL, PUILOSOPITICAL II1S7ORICAL LITERARY, NARRATIVE ETC. WORKS OF JAMINA LITERATURE IN PRĀKITA. SANSKRTA, APABHRAISA AND OLD VERNACULAR LANGUAGES, AND STUDIES BY COMPETENT RESEARCH SCHOLARS, FOUNDED AND PUBLISHED SRIMAN BAHĀDUR SINGHJI SINGHỈ OF CALCUTTA IN MEMORY OF HIS LATE FATHER SRI DĀLCHANDJI SINGHÍ. Det GENERAL EDITOR JINA VIJAYA MUNI HONORARY MEMBER OF THE BHANDARKAR ORIENTAL RESEARCH INSTITUTE OF POONA AND GUJRAT SAHITYA SABHA OF AHMEDABAD: FORMERLY PRINCIPAL OF GUJRAT PURATATTVAMANDIR OF AHMEDABAD: EDITOR OF MANY SANSKRTA, PRAKRTA. PALI, APADHRALISA, AND OLD GUJRATI WORKS. NUMBER 8 TO BE HAD FROM VYAYASTHÄPAKA, SINGHI JAINA GRANTHAMĀLĀ ANEKANT-VIHAR 9, SHANTI NAGAR, PO. SABAR MATI, AHMEDABAD, SINGHI SADAN 49, GARIYAHAT ROAD BALLYGUNGE, CALCUTTA Founded 1 All rights reserved :: | 1931. A, D.

JAIN TARKA BHASA
OF
MAHOPADHYAYA SRİ YSOVIJAYA GANI
WITH TĀTPAFYASANGRAHA
BY
Pandit SUKHLALJI SANGHAVI
PROFESSOR OF JAIN PHILOSOPHY, HINDU UNIVERSITY, BENARES:
LATE PROFESSOR OF INDIAN PHILOSOPHY, GUJRĀT
PURATATIVA MANDIR, AHMEDABAD.
Pandit MAHENDRA KUMAR S'ASTRI
Pandit DALSUKH MĀLVANIA
NYAYA TĪRTHA
NYAYA TIRTHA, SYĀDWĀDA JAINA VIDYALAYA,
BENARES
BENARES.
PUBLISHED BY
THE SAÑCHĀLAKA-SINGHI JAINA GRANTHAMĀLĀ
AHMEDABAD-CALCUTTA
V. E. 1994 )
Firsl cdition, One Thousand Copics.
[ 1938 A. D.

RAxxxx xxxxxxxxxxxxx xxxx Xxxxxx Xxxx ॥सिंघीजेनग्रन्थमालासंस्थापकप्रशस्तिः ॥ (ЖХХК अस्ति बझाभिधे देशे सुप्रसिद्धा मनोरमा । मुर्शिदाबाद इत्याख्या पुरी वैभवशालिनी ॥ निवसन्त्यनेके तत्र जैना ऊकेशवंशजाः । धनाव्या नृपसदृशा धर्मकर्मपरायणाः ।। श्रीडालचन्द इत्यासीत् तेप्वेको बहुगाग्यवान् । साधुवत् सचरित्रो यः सिंवीकुलप्रभाकरः ॥ बाल्य एवागतो यो हि कर्तुं व्यापार विस्तृतिम् । कलिकातामहापुर्या धृतधर्मार्थनिश्चयः ।। कुशाग्रया स्वबुद्धयैव साढत्या च सुनिष्ठया। उपाय॑ विपुलां लक्ष्मी जातो कोट्यधिपो हि सः॥ तस्य मन्नुकुमारीति सन्नारीकुलमण्डना । पतिव्रता प्रिया जाता शीलसौभाग्यभूषणा । श्रीवहादुरसिंहाख्यः सद्गुणी सुपुत्रस्तयोः । अस्त्येप सुकृती दानी धर्मप्रियो धियां निधिः ॥ प्राप्ता पुण्यवताऽनेन प्रिया तिलकसुन्दरी । यस्याः सौभाग्यदीपेन प्रदीप्तं यद्गृहाङ्गणम् ।। श्रीमान् राजेन्द्रसिंहोऽस्ति ज्येष्ठपुत्रः सुशिक्षितः । यः सर्वकार्यदक्षत्वात् बाहुर्यस्य हि दक्षिणः ।। नरेन्द्रसिंह इत्याख्यस्तेजस्वी मध्यमः सुतः । सूनुवरेिन्द्रसिंहश्च कनिष्ठः सौम्यदर्शनः ।। सन्ति त्रयोऽपि सत्पुत्रा आप्तभक्तिपरायणाः । विनीताः सरला भन्याः पितुर्मार्गानुगामिनः ।। अन्येऽपि वहवश्चास्य सन्ति स्वसादिवान्धवाः । धनैर्जनैः समृद्धोऽयं ततो राजेब राजते ॥ XXX अन्यच्च- XXXXXX XXS सरस्वत्यां सदासक्तो भूत्वा लक्ष्मीप्रियोऽप्ययम् । तत्राप्येष सदाचारी तच्चित्रं विदुपां खलु ॥ न गर्यो नाप्यहंकारो न विलासो न दुप्कृतिः । दृश्यतेऽस्य गृहे कापि सतां तद् विस्मयास्पदम् ।। भक्तो गुरुजनानां यो विनीतः सज्जनान् प्रति । बन्धुजनेऽनुरक्तोऽस्ति प्रीतः पोप्यगणेप्वपि ।। देश-कालस्थितिज्ञोऽयं विद्या-विज्ञानपूजकः । इतिहासादिसाहित्य-संस्कृति-सत्कलाप्रियः ।। समुन्नत्यै समाजस्य धर्मस्योत्कर्पहेतवे । प्रचारार्थ सुशिक्षाया व्ययत्येष धनं धनम् ।। गत्वा सभा-समित्यादौ भूत्वाऽध्यक्षपदाङ्कितः । दत्त्वा दानं यथायोग्यं प्रोत्साहयति कर्मठान् ॥ एवं धनेन देहेन ज्ञानेन शुभनिष्ठया । करोत्ययं यथाशक्ति सत्कर्माणि सदाशयः ।। अथान्यदा प्रसङ्गेन स्वपितुः स्मृतिहेतवे । कर्तुं किञ्चिद् विशिष्टं यः कार्य मनस्यचिन्तयत् ।। पूज्यः पिता सदैवासीत् सम्यग्-ज्ञानरुचिः परम् । तस्मात्तज्ज्ञानवृद्ध्यर्थं यतनीयं मया वरम् ॥ विचार्येवं स्वयं चित्ते पुनः प्राप्य सुसम्मतिम् । श्रद्धास्पदस्वमित्राणां विदुषां चापि तादृशाम् । जैनज्ञानप्रसारार्थ स्थाने शान्तिनिकेतने । सिंधीपदाकितं जैनज्ञानपीठमतीष्ठिपत् ।। श्रीजिनविजयो विज्ञो तस्याधिष्ठातृसत्पदम् । स्वीकर्तुं प्रार्थितोऽनेन शास्त्रोद्धाराभिलाषिणा ।। अस्य सौजन्य-सौहार्द-स्थैर्योदार्यादिसद्गुणैः । वशीभूयाति मुदा येन स्वीकृतं तत्पदं वरम् ॥ तस्यैव प्रेरणां प्राप्य श्रीसिंघीकुलकेतुना । स्वपितृश्रेयसे चैषा ग्रन्थमाला प्रकाश्यते ।। विद्वज्जनकृताहादा -सच्चिदानन्ददा सदा । चिरं नन्दत्वियं लोके जिनविजयभारती ॥ (ЖЖЖЖЖЯ * XXX

--
भूयांसि ग्रन्थरत्नानि संस्कृत्य पुण्यसञ्चयात् ।
सार्थकाख्यतया ख्यातः श्रीपुण्यविजयो मुनिः ॥
वृद्धतरस्य वृद्धस्य कान्तेश्च चतुरस्य च ।
विजयान्तस्य सेवासु मुदितस्थिरमानसः ॥
कार्यार्थिभ्यः समस्तेभ्यः शास्त्रसंस्कारकर्मसु ।
साहाय्यं ददते तस्मै कृतिरेषा समय॑ते ॥
सुखलालसंघविना

" संकेतानां सूची अनु० टी०-अनुयोगद्वारसूत्रटीका ( देवचन्द लालभाई, सूरत)। अनुयो० स०-अनुयोगद्वारसूत्रम् ( आचा०-भाचारागसूत्रम् (आगमोदयसमिति, सूरत)। आव०नि०-आवश्यकनियुक्तिः (भागमोदयसमिति, सूरत)। तत्यार्थभा--तत्वार्थभाप्यम् (देवचन्द लालभाई, सूरत )। तत्यार्थभा० तृतत्यार्थभाष्यवृत्तिः सिन्दसेनगणिकृता ( )। तरवार्थरा तत्वार्थराजवार्तिकम् (सनातन जैनग्रन्थमाला, काशी)। राजवा० तत्यार्थश्लोकवा०--तत्वार्थश्लोकवार्तिकम् ( गांधी नाथारंग जैनग्रन्थमाला, मुंबई )। नयोपदेशः (भावनगर)। न्यायकु०-न्यायकुसुमाञ्जलिः (चौखम्बा संस्कृत सिरीक्ष, काशी)। न्यायदी-न्यायदीपिका (जैनसिद्धान्तप्रकाशिनी संस्था, कलकत्ता)। न्यायवि० टो-न्यायविन्दुटीका (बिल्लीभोथेका बुद्धिका )। प्रत्यक्षचि०-प्रत्यक्षचिन्तामणिः (कलकत्ता)। प्र. न.-प्रमाणनयतत्वालोकः (विजयधर्मसूरि ग्रन्थमाला, उज्जैन)। प्रमाणवा--प्रमाणवार्तिकम् (अमुद्रितम्-धीराहुलसांकृत्यायनसकम् ) । प्र० मी०-प्रमाणमीमांसा (आर्हतमतप्रभाकर, पूना) परी--परीक्षामुखसूत्रम् (फूलचन्द्रशास्त्री, काशी)। -मुक्तावली। रत्नाकरा-स्याद्वादरत्नाकरावतारिका (यशोविजय जैनग्रन्थमाला, काशी)। लघीय०-लघीयस्त्रयम् (माणिकचन्द ग्रन्थमाला, मुंबई )। लघीय० स्ववि०-लघीयस्त्रयस्वविवृतिः (अमुदिता)। वादन्यायः (पटना)। विशेपा-विशेपावश्यकभाष्यम् ( यशोविजय जैनग्रन्थमाला, काशी)। विशेषा. वृ०-विशेपावश्यकभाप्यवृहवृत्तिः ( )। श्लोकवा-मीमांसारलोकवार्तिकम् (चौखम्बा संस्कृत सिरीझ, काशी)। सन्मति सन्मतितर्कप्रकरणम् (गूजरातपुरातत्त्वमन्दिर; अमदावाद)। सन्मतिटी०-सन्मतितर्कप्रकरणटीका ( । सर्वार्थ सर्वार्थसिद्धिः। सर्वार्थसि० श्या० २०-स्याद्वादरत्नाकरः (आत्तिमतप्रभाकर, पुना)। मुक्ता- " " का.-कारिका गा-गाथा पं०-पङ्क्तिः पृ-पृष्ठम् प्र०-प्रसंज्ञकप्रतिः मु०-मुद्रितप्रतिः मु-टि-मुद्रितप्रतिगत टिप्पणी व०-वसंज्ञकप्रति सं०-संसंज्ञकप्रतिः सम्पा०-सम्पादका wri- जाणिव असा इतः पूर्व सिंघी जैन ग्रन्थमालामें जितने ग्रन्थ प्रकाशित हुए वे मुख्यतया इतिहास विषयक हैं। प्रस्तुत ग्रन्थके प्रकाशनके साथ, ग्रन्थमाला दर्शन विषयक साहित्यके प्रकाशन कार्यका प्रशस्य प्रारम्भ करती है। मालाके मुख्य सम्पादकत्व और सञ्चालकत्वके सम्बन्धसे, यहाँ पर कुछ वक्तव्य प्रकट करना हमारे लिये प्रासंगिक होगा। जैसा कि इस प्रन्थमालाके प्रकाशित सभी ग्रन्थोंके प्रधान मुखपृष्ठ पर इसका कार्य- प्रदेशसूचक उल्लेख अङ्कित किया हुआ है-तदनुसार इसका जैनसाहित्योद्धार विषयक ध्येय तो बहुत विशाल है। मनोरथ तो इसका, जैन-प्रवचनगत 'आगमिक, दार्शनिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक, कथात्मक' इत्यादि सभी विषयके महत्त्वके ग्रन्थोंका, विशिष्टरूपसे संशोधन- सम्पादन कर यथाशक्य उन्हें प्रकाशित करनेका है। परन्तु सबसे पहले अधिक लक्ष्य हमने इतिहास विषयक साहित्यके प्रकाशित करने पर जो दिया है, उसके दो प्रधान कारण हैं। प्रथम तो यह कि-इस विषय पर हमारी, अपने अध्ययनकालके प्रारम्भ ही से कुछ विशेप प्रीति रही और उससे इस विषयमें हमारी कुछ थोड़ी-बहुत गति भी उल्लेख योग्य हुई। इस इतिहासान्वेपणसे हमारी कुछ बौद्धिक सीमा भी विस्तृत हुई और असांप्रदायिक दृष्टि भी विकसित हुई। हमारे स्वानुभवकी यह प्रतीति है कि इस इतिहास विषयक साहित्यके अध्ययन और मननसे जो कुछ तत्त्वावबोध हमें प्राप्त हुआ उससे हमारी बुद्धिकी निरीक्षण और परीक्षण शक्तिमें विशिष्ट प्रगति हुई और भूतकालीन भावोंके स्वरूपको समझनेमें वह यत्किंचित् सम्यग् दृष्टि प्राप्त हुई जो अन्यथा अप्राप्य होती। इस स्वानुभवसे हमारा यह एक दृढ़ मन्तव्य हुआ कि भूतकालीन कोई भी भाव और विचारका यथार्थ अवबोध प्राप्त करने के लिये सर्व-प्रथम तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितिका सम्यग् ज्ञान प्राप्त होना परमावश्यक है। जैन ग्रन्थभण्डारों में इस इतिहासान्वेपणके उपयुक्त बहुत कुछ साहित्यिक सामग्री यत्र तत्र अस्त-व्यस्त रूपमें उपलब्ध होती है, लेकिन उसको परिश्रमपूर्वक संकलित कर, शास्त्रीय पद्धतिसे व्यवस्थित कर, अन्यान्य प्रमाण और उल्लेखादिसे परिष्कृत कर, आलोचनात्मक और ऊहापोहात्मक टीका- टिप्पणीयोंसे विवेचित कर, विद्वद्ग्राह्य और जिज्ञासुजनगम्य रूपमें उसे प्रकाशित करनेका कोई विशिष्ट प्रयत्न अभी तक जैन जनताने नहीं किया। इसलिये इस ग्रन्थमालाके संस्थापक दानशील श्रीमान् वाबू श्रीवहादुर सिंहजी सिंघी-जिनको निजको भी हमारे ही जैसी, इतिहासके विपयमें खूब उत्कट जिज्ञासा है और जो भारतके प्राचीन स्थापत्य, भास्कर्य, चित्र, निष्क एवं पुरातत्त्वके अच्छे मर्मज्ञ हैं और लाखों रूपये व्यय कर जिन्होंने इस विषयकी अनेक वहुमूल्य वस्तुएँ संगृहीत की है-उनका समानशील विद्याव्यासंगपरक सौहार्दपूर्ण परामर्श पाकर, सबसे पहले हमने, जैन साहित्यके इसी ऐतिहासिक अङ्गको प्रकाशित करने का उपक्रम किया।

[२] और दूसरा कारण यह है कि-जैन वाङ्मयका यह विभाग, जैन धर्म और समाजकी दृष्टिसे तो महत्त्वका है ही, लेकिन तदुपरान्त, यह सगुजय भारतवर्ष के सर्वसाधारण प्रजाकीय और राजकीय इतिहासकी दृष्टिसे भी उतना ही महत्त्वका है। जैनधर्मीय साहित्यका यह ऐतिहासिक अन जितना परिपुष्ट हे उतना भारतके अन्य किसी धर्म या सम्प्रदायका नहीं । न ब्राह्मणधर्मीय साहित्यमें इतनी ऐतिहासिक सामग्री उपलब्ध होती है, न बौद्धधर्मीय साहित्यमें । इसलिये जैसा कि हमने ऊपर सूचित किया है, तदनुसार जैन ग्रन्थभण्डारों में जहाँ तहाँ नाशोन्मुख दशामें पड़ी हुई यह ऐतिहासिक साधन-सम्पत्ति जो, यदि समुचित रूपसे संशोधित-सम्पादित होकर प्रकाशित हो जाय, तो इससे जैन धर्मके गौरवकी ख्याति तो होगी ही, साथ में भारतके प्राचीन स्वरूपका विशेष ज्ञान प्राप्त करने में भी उससे विशिष्ट सहायता प्राप्त होगी और तद्द्वारा जैन साहित्यकी राष्ट्रीय प्रतिष्ठा विशेष प्रख्यापित होगी। इन्हीं दो कारणोंसे प्रेरित होकर हमने सबसे पहले इन इतिहास विपयक ग्रन्थोंका प्रकाशन करना प्रारम्भ किया। इसके फलस्वरूप अद्यपर्यन्त, इस विषयके ६-७ ग्रन्थ प्रकाशित हो चुके हैं और प्रायः १०-१२ तैयार हो रहे हैं। अब, प्रस्तुत ग्रन्थके प्रकाशनके साथ, सिंघी जैन ग्रन्थमाला, जैन प्रवचनका विशिष्ट आधारभूत जो दार्शनिक अङ्ग है तद्विपयक साहित्यके प्रकाशनका उपक्रम करती है और इसके द्वारा ध्येय-निर्दिष्ट कार्यप्रदेशके एक विशेष महत्त्वके क्षेत्रमें पदार्पण करती है। जैन साहित्यका यह दार्शनिक विभाग भी, इतिहास-विभागके जितना ही सर्वोपयोगी और आकर्पक महत्त्व रखता है। भारतवर्पकी समुच्चय गंभीर तत्त्वगवेपणाका यह भी एक बहुत बड़ा और महत्त्वका विचारभंडार है। पूर्वकालीन जैन श्रमणोंने आत्मगवेपणा और मोक्षसाधनाके निमित्त जो कठिनसे कठिनतर तपस्या की तथा अगम्यके ध्यानकी और आनन्त्यके ज्ञानकी सिद्धि प्राप्त करने के लिये जो घोर तितिक्षा अनुभूत की-उसके फल स्वरूप उन्हें भी कई ऐसे अमूल्य विचाररत्न प्राप्त हुए जो जगत्के विशिष्ट कल्याणकारक सिद्ध हुए। अहिंसाका वह महान् विचार जो आज जगत्की शांतिका एक सर्व श्रेष्ठ साधन समझा जाने लगा है और जिसकी अप्रतिहत शक्तिके सामने संसारकी सर्व संहारक शक्तियाँ कुण्ठित होती दिखाई देने लगी हैं; जैन दर्शन-शास्त्रका मौलिक तत्त्वविचार है। इस अहिंसाकी जो प्रतिष्ठा जैन दर्शनशास्त्रोंने स्थापित की है वह अन्यत्र अज्ञात है। मुक्तिका अनन्य साधन अहिंसा है और उसकी सिद्धि करना यह जैन दर्शनशास्त्रोंका चरम उद्देश है। इसलिये इस अहिंसाके सिद्धान्तका आकलन यह तो जैन दार्शनिकोंका आदर्श रहा ही, लेकिन साथमें, उन्होंने अन्यान्य दार्शनिक सिद्धान्तों और तात्त्विक विचारोंके चिन्तनसमुद्र में भी खूब गहरे गोते लगाये हैं और उसके अन्तस्तल तक पहुँच कर उसकी गंभीरता और विशा- लताका नाप लेने के लिये पूरा पुरुषार्थ किया है। भारतीय दर्शनशास्त्रका ऐसा कोई विशिष्ट प्रदेश या कोना वानी नहीं है जिसमें जैन विद्वानोंकी विचारधाराने मर्मभेदक प्रवेश न किया हो। महावादी सिद्धसेन दिवाकरसे लेकर न्यायाचार्य महोपाध्याय यशोविजयजीके समय तकके-अर्थात् भारतीय दर्शनशास्त्रके समग्र इतिहासमें दृष्टिगोचर होनेवाली प्रारम्भिक संकलनाके उद्गम कालसे लेकर उसके विकासके अन्तिम पर्व तकके सारे ही सर्जन- ।

36 समयमें-जैन तार्किक भी इस तर्क भूमिके उच्च-नीच और सम-विषम तलोंमें सतत चंक्रमणं करते रहे हैं और अपने समकक्ष ब्राह्मण और बौद्ध मतके दार्शनिकों और तत्त्वचिन्तकोंकी तत्त्वचर्चा में समानरूपसे भाग लेते रहे हैं। बौद्ध और ब्राह्मण पण्डितोंकी तरह जैन पण्डितोंने भी अनेक नये तर्क और विचार उपस्थित किये; अनेक नये सिद्धान्त स्थापित किये। अनेक वादियों के साथ उन्होंने वाद-विवाद किया और अनेक शास्त्रोंका खण्डन-मण्डन किया। जीव, जगत् और कालकी कल्पनाओं के समुद्रमन्थनमें उन्होंने भी अपना पूरा योग दिया। पक्ष-प्रतिपक्षकी विचार भूमिमें ब्राह्मण और बौद्ध तार्किकोंके साथ उन्होंने भी अपने तर्क तुरग खूब वेगके साथ दौड़ाये और अपने साथियोंके साथ बराबर रहने की पूरी कसरत की। इसके फल स्वरूप अनेक उत्तमोत्तम ग्रन्थरत्न निर्मित हुए और उनसे जैन साहित्यकी समृद्धिका शिखर अधिकतर उन्नत हुआ। जैन विद्वानोंने दार्शनिक विचारोंकी मीमांसा करनेवाले अनेकानेक ग्रन्थ बनाये हैं। इनमें कई ग्रन्थ मौलिक सिद्धान्त प्रतिपादन करनेवाले शास्त्र ग्रन्थ हैं, कई दार्शनिक और न्यायशास्त्रकी परिभापाओंका संचय करनेवाले संग्रह ग्रन्थ हैं; कई अनेक मतों और तत्त्वोंका निरूपण करनेवाले समुच्चय ग्रन्थ हैं और कई विशाल विवेचना करनेवाले व्याख्या ग्रन्थ हैं। इन जैन तार्किकोंमेंसे कई विद्वानोंने-खास करके श्वेताम्बर सम्प्रदायानुयायी आचार्योंने- कितने एक बौद्ध और ब्राह्मण शास्त्रोंपर भी, बहुत ही निष्पक्ष दृष्टिपूर्वक, मूल ग्रन्थकारोंके भावोंकी अविकल रक्षा करते हुए, प्रौढ़ पाण्डित्यपूर्ण टीकाएँ की हैं, जो उन ग्रन्थों के अध्येताओंके लिये उत्तम कोटिकी समझी जाती हैं। बौद्ध महातार्किक दिङ्नागके न्याय- प्रवेश सूत्र ऊपर जैनतर्कशिरोमणि हरिभद्र सूरिकी टीका, तथा ब्राह्मण महानैयायिक भासर्वज्ञके न्यायसार नामक प्रतिष्टित शास्त्र पर जैन न्यायविद् जयसिंह सूरिकी व्याख्या इसके प्रांजल उदाहरण हैं। इन जैन दार्शनिक ग्रन्थोंका सूक्ष्मताके साथ अवलोकन करनेसे हमें इस बातका बहुत कुछ ज्ञान हो सकता है कि-भारतमें दार्शनिक विचारोंका, किस क्रमसे विकास और विस्तार हुआ। इन जैन तर्क ग्रन्थों में से, कई एक ऐसे दार्शनिक सिद्धान्तों और विचारोंका भी पता लगता है जो प्रायः पीछेसे विलुप्त हो गये हैं और जिनका उल्लेख अन्य शास्त्रोंमें अप्राप्य है। आजीवक, त्रैराशिक, कापालिक, और कई प्रकारके तापस मत इनके विषयमें जितनी ज्ञातव्य वातें जैन तर्क ग्रन्थों में प्राप्त हो सकती हैं, उतनी अन्य तर्क शास्त्रोंमें नहीं। इन जैन तार्किकोंने चार्वाक मतको भी पड्दर्शनके अन्तर्हित माना और उसको जैन, बौद्ध, सांख्य, न्याय और मीमांसा दर्शनकी समान पंक्तिमें विठाया। उन्होंने कहा, चार्वाक मत भी भारतीय तत्त्वज्ञानरूप विराट् पुरुपका वैसा ही महत्त्वका एक अङ्ग है जैसे अन्यान्य प्रधान मत हैं। जैन ताकिकोंके दार्शनिक विचार परीक्षाप्रधान रहे। किसी आगम विशेपमें कथित होनेसे ही कोई विचार निर्धान्त सिद्ध नहीं हो सकता; और किसी तीर्थंकर या आप्त-विशेपके नामकी छाप लगी रहनेसे ही कोई कथन या वचन अबाधित नहीं माना जा सकता। आगमकी भी परीक्षा होनी चाहिए और आप्त पुरुपकी भी परीक्षा करनी चाहिए। परीक्षा [४] दृष्टि प्रदान - करने पर जो विचार युक्तिसंगत सिद्ध हो उसका स्वीकार करना चाहिए-चाहे फिर बह विचार किसीका क्यों न हो। यह कथन तो तीर्थकर महावीरका किया हुआ है इसलिये इसमें कोई शंका न होनी चाहिए, और यह वचन तो पि कपिलका कहा हुआ है इसलिये इसमें कोई तथ्य नहीं समझना चाहिए-ऐसा पक्षपातपूर्ण विचार-कदाग्रह जैन तार्किकोंकी वष्टि में कुत्सित माना गया है। श्रद्धा-प्रधान उस प्राचीन युगके ये परीक्षाकारक विचार निस्सन्देह महत्त्वका स्थान रखते हैं। जैन तार्किकोंने अपने दार्शनिक मन्तव्योंका केन्द्र स्थान अनेकान्त सिद्धान्त बनाया और 'स्यात्' शब्दाशित वचन भंगीको उसकी स्वरूपबोधक विचार-पद्धति स्थिर कर उस 'स्याद्वाद' को अपना तात्त्विक ध्रुवपद स्थापित किया। इस अनेकान्त सिद्धान्त और स्याद्वाद विचार-पद्धतिने जैन विद्वानोंको तत्त्व-चिन्तन और तर्क-निरूपण करनेमें वह एक विशिष्ट प्रकारकी समन्वय की जिसकी प्राप्तिसे तत्त्वज्ञ पुरुप, राग-द्वेपरूप तिमिरपरिपूर्ण इस तमोमय संसार कान्तारको सरलता पूर्वक पार कर अपने अभीष्ट आनन्द स्थानको अव्या- बाधतया अधिकृत कर सकता है। जीव और जगत्-विषयक अस्तित्व-नास्तित्व नित्यत्व- अनित्यत्व एकत्व-अनेकत्व आदि जो भिन्न भिन्न एवं परस्पर विरोधी सिद्धान्त तत्तत् तत्त्ववेत्ताओं और मत प्रचारकोंने प्रस्थापित किये हैं उनका जैसा सापेक्ष रहस्य इस समन्वय दृष्टिके प्रकाशमें ज्ञात हो सकता है, वह अन्यथा अज्ञेय होगा। इस समन्वय दृष्टिवाला तत्त्वचिन्तक, किसी एक विचार या सिद्धान्तके पक्षमें अभिनिविष्ट न होकर वह सभी प्रकारके विचारों- सिद्धान्तोंका मध्यस्थता पूर्वक अध्ययन और मनन करने के लिये तत्पर रहेगा। उसकी जिज्ञासा बुद्धि किसी पक्षविशेपके प्रस्थापित मत-विचारमें आग्रहवाली न वनकर, निष्पक्ष न्यायाधीशके विचारकी तरह, पक्ष और विपक्षके अभिनिवेशसे तटस्थ रहकर, सत्यान्वेपण करने के लिये उद्यत रहेगी। वह किसी युक्ति विशेपको वहाँपर नहीं खींच ले जायगा, जहां उसकी मति चोंट रही हो, लेकिन वह अपनी मतिको वहाँ ले जायगा, जहां युक्ति अपना स्थान पकड़े वैठी हो। अनेकान्त सिद्धान्तके अनुयायिओंके ये उदार उद्गार हैं। शायद, ऐसे उद्धार अन्य सिद्धान्तोंके अनुगामिओंके साहित्यमें अपरिचिति होंगे। ऊपरकी इन कण्डिकाओंके कथनसे ज्ञात होगा कि, जैन साहित्यका यह दार्शनिक ग्रन्थात्मक अंग भी, समुच्चय भारतीय दर्शन-साहित्यके रङ्ग मण्डपमें कितना महत्त्वका स्थान रखता है। विना जैन तर्कशास्त्रका विशिष्ट आकलन किये, भारतीय तत्त्वज्ञानके इतिहासका अन्वेषण और अवलोकन अपूर्ण ही कहलायगा । जैनेतर विद्वानोंमें, बहुत ही अल्प ऐसे दार्शनिक विद्वान होंगे जो जैन तर्क ग्रन्थोंको कुछ विशिष्ट अध्ययन और मनन करते हो । विद्वानोंका बहुत बड़ा समूह तो यह भी नहीं जानता होगा कि स्यावाद या अनेकान्तवाद क्या चीज है। हजारों ही ब्राह्मण पण्डित तो यह भी ठीक नहीं जानते होंगे कि बौद्ध और जैन दर्शनमें क्या भेद है । जो कोई विद्वान माधवाचार्यका बनाया हुआ सर्वदर्शनसंग्रह नामक ग्रंथका अध्ययन करते हैं उन्हें कुछ थोड़ा बहुत ज्ञान जैन दर्शन के सिद्धान्तोंका होता है । इसके विपरीत जैन विद्वानोंका दार्शनिक ज्ञान ." . 650 [५] विशेप व्यापक होता है। वे कमसे कम न्यायशास्त्रके तो मौलिक ग्रन्थोंका अवश्य परिचय प्राप्त करते हैं; और इसके उपरान्त, जिन कितने एक जैन तर्क ग्रन्थोंका चे अध्ययन-मनन करते हैं, उनमें, थोड़ो बहुत, सव ही दर्शनोंकी चर्चा और आलोचना की हुई होती है । इससे सभी दर्शनोंके मूलभूत सिद्धान्तोंका थोड़ा-बहुत परिचय जैन तर्काभ्यासियोंको जरूर रहा करता है। भारतीय इतिहासके भिन्न-भिन्न युगों और उसके प्रमुख प्रज्ञाशालियोंका जव हम परि- चय करते हैं तब हमें यह एक ऐतिहासिक तथ्य विदित होता है कि जिस तरह जैन विद्वानोंने अन्य दार्शनिक सिद्धान्तोंका अविपर्यासभावसे अवलोकन और सत्यता-पूर्वक समालोचन किया है, वैसे अन्य विद्वानोंने-खासकर ब्राह्मण विद्वानोंने-जैन सिद्धान्तोंके विषयमें नहीं किया । उदाहरणके लिये वर्तमान युगके एक असाधारण महापुरुष गिने जाने लायक स्वामी दयानन्दका उल्लेख किया जा सकता है। स्वामीजीने अपने सत्यार्थप्रकाश नामक सर्वप्रसिद्ध ग्रन्थमें जैन दर्शनके मन्तव्योंके विषयमें जो ऊटपटांग और अंड-बंड बातें लिखी है, वे यद्यपि विचारशील विद्वानोंकी दृष्टि में सर्वथा नगण्य रही हैं; तथापि उनके जैसे युगपुरुषकी कीर्तिको वे अवश्य कलङ्कित करने जैसी हैं और अक्षम्य कोटि में आनेवाली भ्रान्तिकी परिचायक हैं । इसी तरह हम यदि उस पुरातन कालके ब्रह्मवादी अद्वैताचार्य स्वामी शङ्करके ग्रन्थोंका पठन करते हैं तो उनमें भी, स्वामी दयानन्दके जैसी निन्द्यकोटिकी तो नहीं, लेकिन भ्रान्तिमूलक और विपर्यासंसूचक जैनमत-मीमांसा अवश्य दृष्टिगोचर होती है। स्वामी शङ्करा- चार्य ने अपने ब्रह्मसूत्रों के भाष्यमें, अनेकान्तसिद्धान्तका जिन युक्तियों द्वारा खण्डन करनेका प्रयत्न किया है, उन्हें पढ़कर, किसी भी निष्पक्ष विद्वान्को कहना पड़ेगा कि-या तो शङ्काराचार्य अनेकान्त सिद्धान्तसे प्रायः अज्ञान थे या उन्होंने ज्ञानपूर्वक इस सिद्धान्तका विपर्यासभावसे परिचय देनेका असाधु प्रयत्न किया है। यही वात प्रायः अन्यान्य शास्त्रकारों के विपयमें भी कही जा सकती है। इस कथनसे हमारा मतलब सिर्फ इतना ही है कि-ठेठ प्राचीन काल ही से जैन दार्शनिक मन्तव्योंके विषयमें, जैनेतर दार्शनिकोंका ज्ञान बहुत थोड़ा रहा है और स्याद्वाद या अनेकान्त सिद्धान्तका सम्यग् रहस्य क्या है इसके जाननेकी शुद्ध जिज्ञासा बहुत थोड़े विद्वानोंको जागरित हुई है। अस्तु, भूतकालमें चाहे जैसा हुआ हो; परंतु, अव समय बदला है । वह पुरानी मत- असहिष्णुता धीरे-धीरे विदा हो रही है । संसारमें ज्ञान और विज्ञानकी बड़ी अद्भुत और बहुत वेगवाली प्रगति हो रही है । मनुष्य जातिकी जिज्ञासावृत्तिने आज विलकुल नया रूप धारण कर लिया है। एक तरफ़ हजारों विद्वान् भूतकालके अज्ञेय रहस्यों और पदार्थोंको सुविज्ञेय करनेमें आकाश-पातालं एक कर रहे हैं। दूसरी तरफ़ हज़ारों विद्वान् ज्ञात विचारों और सिद्धान्तोंका विशेप व्यापक अवलोकन और परीक्षण कर उनकी सत्य-असत्यता और तात्त्विकताकी मीमांसाके पीछे हाथ धो कर पड़ रहे हैं। भारतीय तत्त्वज्ञान जो कलतक मांत्र ब्राह्मणों और श्रमणोंके मठोंकी ही देवोत्तर सम्पत्ति समझी जाती थी वह आज सारे भूखण्डवासियोंकी सर्वसामान्य सम्पत्ति बन गई है । पृथ्वीके किसी भी कोने में रहने वाला कोई भी रंग या जातिका मनुष्य, यदि चाहे तो आज इस सम्पत्तिका यथेष्ट उपभोग कर ।

w । सकता है । जिनके सात सो पुरुषों तकके पूर्वजोन जिस नामवाद, शून्यवाद या स्याद्वादका कभी नाम भी नहीं सुना था और जिनकी जीभ इन शब्दोंका उचारण करनेमें भी ठीक समर्थ नहीं हो सकती, वे पश्चिमी आर्य, आज इन तत्त्ववादोंके, हम भारतीय आर्योसे अधिकतर पारगामी समझे जाते हैं। ब्रहावादका महत्त्व आज हम किसी काशीनिवासी ब्राह्मण महामहोपाध्यायके वचनोंसे वैसा नहीं समझते जैसा आंग्लद्वीपवासी डाक्टर मॅक्षमुल्लरके शब्दों द्वारा समझते हैं; शून्यवादका रहस्य हम किसी लंकावासी बौद्ध महाथेरके कथनोंसे वेसा नहीं अवगत कर सकते जैसा रूसवासी यहुदी विद्वान डॉ० त्सेरबेटत्स्कीके लेखों द्वारा कर सकते हैं। स्याद्वादका तात्पर्य हम किसी जैनसृरिचक्रचक्रवर्तीकी जिहासे वैसा नहीं सुन सकते जैसा जर्मन पण्डित डॉ० हेरमान याकोबीके व्याख्यानोंमें सुन पाते हैं। यह सब देख- सुनकर हमें मानना और कहना पड़ता है कि अब समय बदला है। जिनके पूर्वजोंने एक दिन यह घोपणा की थी कि-'न वदेद् यावनी भापां प्राणैः कण्ठगतैरपि' उन्हीं ब्राह्मणोंकी सन्तान आज प्राणोंके कण्ठ तक आ जानेपर भी यावनी भापाका पारायण नहीं छोड़ती। और, इसी घोपणाके उत्तरार्द्ध में उन्हीं भूदेवोंने अपनी सन्तानोंके लिये यह भी कह रखा था-'हस्तिना ताड्यमानोऽपि न गच्छेत् जैनमन्दिरम्' वे ही ब्राह्मणपुत्र आज प्रत्येक जैन उपाश्रयमें शूद्रप्राय समझते हुए भी जैन भिक्षुओंकों अहर्निश शास्त्राध्ययन कराते हैं और विशिष्ट दक्षिणा प्राप्त करनेकी लालसासे मनमें महामूर्ख मानते हुए भी किसी को शास्त्रविशारद' और किसीको 'सूरिसम्राट' कहकर उनकी काव्यप्रशस्तियां गाते हैं। अब ब्रह्मविद्या और आहेतप्रवचन केवल मठों और उपाश्रयोंमें बैठकर ही अध्ययन करनेकी वस्तु नहीं रहीं। उनके सम्मानका स्थान अव ब्राह्मण और श्रमण गुरुओंकी गदियाँ नहीं समझी जातीं, लेकिन विश्वविद्यालयोंके व्याख्यान-व्यासपीठ माने जाते हैं। कौनसे विद्यापीठने किस शास्त्रको अपने पाठ्यक्रममें प्रविष्ट किया है, इसपरसे उस शास्त्रका वैशिष्ट्य समझा जाता है और उसके अध्ययन-अध्यापनकी ओर अभ्यासियोंकी जिज्ञासा आकर्पित होती है। अब अध्यापकगण भी-चाहे वह फिर ब्राह्मण हो या चाहे अन्य किसी वर्णका-शूद्र ही क्यों न हो-सभी शास्त्रोंका सहानुभूतिपूर्वक पठन-पाठन करते-कराते हैं और तत्त्वजिज्ञासा पूर्वक उनका चिन्तन-मनन करते हैं। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, तथा कलकत्ता, बम्बई और इलाहाबादकी युनिवर्सिटियोंने अपने अध्ययन विपयोमें अन्यान्य ब्राह्मण शास्त्रोंके साथ जैन शास्त्रोंको भी स्थान दिया है और तदनुसार उन विद्यापीठोंके अधीनस्थ कई महाविद्यालयों में इन शास्त्रोंका पठन-पाठन भी नियतरूपसे हो रहा है । काशी हिन्दू विश्वविद्यालयने तो जैनशास्त्रके अध्यापककी एक स्वतन्त्र गद्दी भी प्रतिष्ठित की है। इस प्रकार, शास्त्रप्रसार निमित्तक इस नवयुगीन नवविधानके कारण, अनेक विद्यार्थी जैन शास्त्रोंका अध्ययन करने लगे हैं और जैन न्यायतीर्थ न्यायविशारद आदि उपाधियोंसे विभूपित होकर विद्योत्तीर्ण होने लगे हैं। जो विद्या और जो ज्ञान पूर्वकालमें बहुत ही कष्ट-साध्य और अति दुर्लभ समझा जाता था वह आज बहुत ही सहज साध्य और सर्वत्र सुलभ जैसा हो गया - .

- ) [ ७ ] है। अब जो किसी खास बातकी आवश्यकता है तो वह है जैन शास्त्रोंके अच्छे शास्त्रीय पद्धतिसे किये गये संशोधन-संपादनपूर्वक उत्तम संस्करणों की। अपने शास्त्रोंका प्रचार करनेकी अभिलापावाले जैन संघके ज्ञानप्रेमी जनोंको लिये यह परम कर्त्तव्य उपस्थित हुआ है, कि अव जैन साहित्यके उन ग्रन्थरत्नोंको, उस तरहसे अलंकृत कर प्रकाशमें लाये जायँ, जिससे अध्ययनाभिलापी विद्यार्थियोंको और अध्यापक जनोंको अपने अध्ययन-अध्यापनमें प्रोत्साहन मिले। जैन प्रवचनकी सच्ची प्रभावना ऐसा ही करनेसे होगी। यद्यपि, इतःपूर्व, जैन समाजके कुछ विद्यानुरागो श्रमण और श्रावक वर्गने, जैन ग्रन्थोंका प्रकाशन कर कितना एक उत्तम एवं प्रशंसनीय कार्य किया है, और अब भी कर रहे हैं; लेकिन उनकी वह कार्यपद्धति, आधुनिक ग्रन्थ सम्पादनकी विद्वन्मान्य पद्धति और विशिष्ट, उपयोगिताकी दृष्टिसे अलंकृत न होनेसे, उनके प्रकाशन कार्यका जितना प्रचार और समादर होना चाहिए, उतना नहीं हो पाता। उनके प्रकाशित वे ग्रन्थ प्रायः लिखित रूपसे मुद्रित रूपमें परिवर्तित मात्र कर दिये हुए होते हैं, इससे विशेष और कोई संस्कार उनपर नहीं किया जाता; और इस कारणसे, उनका जो कुछ उचित महत्त्व है वह विद्वानोंके लक्ष्यमें योग्यरूपसे नहीं आने पाता। यद्यपि हीरेका वास्तविक मूल्याङ्कन उसकी अन्तर्निहित तेजस्विताके आधारपर ही होता रहता है; तथापि सर्वसाधारणकी दृष्टिमें उसके मूल्यकी योग्यता कुशल शिल्पी द्वारा उसपर किये गये मनोरम संस्कार और यथोचित परिवेष्टनादि द्वारा ही सिद्ध होती रहती है। ठीक यही हाल ग्रन्थ रत्नका है। किसी भी ग्रन्थका वास्तविक महत्त्व उसके अन्दर रहे हुए अर्थगौरवके अनुसार ही निर्धारित होता रहता है, तथापि, तद्विद् मर्मज्ञ संपादक द्वारा उसका उचित संस्कार समापन्न होने पर और विषयोपयुक्त उपोद्घात्, टीका, टिप्पणी, तुलना, समीक्षा, सारालेखन, पाठ-भेद, परिशिष्ट, अनुक्रम इत्यादि यथायोग्य परिवेष्टनादि द्वारा अलंकृत होकर प्रकाशित होने पर, सर्व साधारण अभ्यासियोंके लक्ष्यमें उस ग्रन्थकी आ सकता है। सिंघी जैन ग्रन्थमालाका आदर्श इसी प्रकार ग्रन्थोंका संपादन कर प्रकाशित करनेका है। इसका लक्ष्य यह नहीं है कि कितने ग्रन्थ' प्रकाशित किये जायें, लेकिन यह है कि किस प्रकार ग्रन्थ प्रकाशित किये जायँ। संस्कारप्रिय बाबू श्रीवहादुर सिंहजी सिंघीका ऐसा ही उच्च ध्येय है, और उसी ध्येयके अनुरूप, इस ग्रन्थमालाके दार्शनिक अङ्गका यह प्रथम गन्थरत्न, इसके सुमर्मज्ञ बहुश्रुत विद्वान् संपादक द्वारा, इस प्रकार सर्वाङ्ग संस्कृत-परिस्कृत होकर प्रकाशित हो रहा है। इसके सम्पादन और संस्करणके विषयमें विशेष कहनेकी कोई आवश्यकता नहीं है। हाथ कंकणको आरसीकी क्या जरूरत है। जो अभ्यासी हैं और जिनका इस विषयमें अधि- कार है वे इसका महत्त्व स्वयं समझ सकते हैं। अध्यापकवर्य पण्डित श्रीसुखलालजीका जैन दर्शन विपयक अध्ययन, अध्यापन, चिन्तन, अवलोकन, संशोधन, संपादन आदि अनुभव गंभीर, तलस्पर्शी, तुलनामय, मर्मग्राही और स्पष्टावभासी है। पण्डितजीके इस प्रखर अवबोधका जितना दीर्घ परिचय हमको है उतना और किसी को नहीं है। आज प्रायः उपयोगिताका वह महत्त्व, [ ८ ] २० से भी अधिक वर्ष व्यतीत हो गये, हम दोनों अपने ज्ञानमय जीवनकी दृष्टिसे एक पथके पथिक बने हुए हैं और हमारा बाह्य जीवन सहवास और सहचार भी प्रायः एकाधिकरण रहा है। तर्कशास्त्रके जो दो चार शब्द हम जानते हैं वे हमने इन्हींसे पढ़े हैं। अत एव इस विपयके ये हमारे गुरु हैं और हम इनके शिष्य है। इसलिये इनके ज्ञान के विपयमें हमारा अभिप्राय अधिकारयुक्त हम मानते हैं। पण्डितजीके इस दार्शनिक पाण्डित्यका विशिष्टत्व निदर्शक तो, सन्मतिप्रकरण नामक जैन तर्कका सबसे महान् और आकर स्वरूप ग्रन्थका वह संस्करण है जो अहमदाबाद के गूजरात पुरातत्त्व मन्दिर द्वारा प्रकाशित हुआ है। पचीस हजार श्लोक परि- माणवाले उस महाकाय ग्रन्थकी प्रत्येक पङ्क्ति अशुद्धियोंसे भरी पड़ी थी। उसका कोई भी ऐसा पुरातन आदर्श उपलब्ध नहीं है जो इन अशुद्धियोंके पुंजसे प्रभ्रष्ट न हो। चर्मचक्षुविहीन होनेपर भी अनेक आदर्शी के शुद्धाशुद्ध पाठोंका परस्पर मिलान कर, बहुत ही सूक्ष्मताके साथ प्रत्येक पद और प्रत्येक वाक्यकी अर्थसंगति लगाकर, उस महान ग्रन्थका जो पाटोद्वार इन्होंने किया है वह इनकी 'प्रज्ञाचक्षुता'का विस्मयावबोधक प्रमाण है। इसी जैनतर्कभाषा के साथ साथ, सिंघी जैन ग्रन्थमालाके लिये, ऐसा ही आदर्श सम्पा- दनवाला एक उत्तम संस्करण, हेमचन्द्रसूरि रचित प्रमाणमीमांसा नामक तर्क विषयक विशिष्ट ग्रन्थका भी पण्डितजी तैयार कर रहे हैं, जो शीघ्र ही समाप्त प्रायः होगा। तुलनात्मक दृष्टिसे न्यायशास्त्रकी परिभापाका अध्ययन करनेवालोंके लिये 'मीमांसा' का यह संस्करण एक महत्त्वकी पुस्तक होगी। बौद्ध, ब्राह्मण और जैन दर्शनके पारिभापिक शब्दोंकी विशिष्ट तुलनाके साथ उनका ऐतिहासिक क्रम बतलानेवाला जैसा विवेचन इस ग्रन्थके साथ संकलित किया गया है, वैसा संस्कृत या हिन्दीके और किसी ग्रन्थमें किया गया हो ऐसा हमें ज्ञात नहीं है। यद्यपि, इसमें हमारा कोई कर्तृत्व नहीं है, तथापि हमारे लिये यह हार्दिक आह्लादकी बात है कि, हमारी प्रेरणाके वशीभूत होकर, शारीरिक दुर्बलताकी अस्वस्थकर परिस्थितिमें भी, आज तीन चार वर्ष जितने दीर्घ समयसे सतत बौद्धिक परिश्रम उठाकर, पण्डितजीने इन ज्ञानमणियोंको इस प्रकार सुसजित किया और सिंघी जैन ग्रन्थमालाके सूत्र में इन्हें पिरोकर तद्वारा मालाकी प्रतिष्ठामें हमें अपना सहयोग देते हुए 'सहवीर्य करवावहै' वाले महर्पियोंके मन्त्रको चरितार्थ किया । अन्तमें हमारी प्रार्थना है कि-'तेजस्वि नावधीतमस्तु ।' . १ अनेकान्त विहार शांतिनगर, अहमदाबाद जिन विजय परिचय। ग्रन्थकार-प्रस्तुत ग्रन्थ जैनतर्कभाषाके प्रणेता उपाध्याय श्रीमान् यशोविजय हैं । उनके जीवनके बारेमें सत्य, अर्धसत्य अनेक बातें प्रचलित थीं पर जबसे उन्हींके समकालीन गणी का- न्तिविजयजीका बनाया 'सुजशवेली भास' पूरा प्राप्त हुआ, जो बिलकुल विश्वसनीय है, तबसे उनके जीवनकी खरी खरी बातें बिलकुल स्पष्ट हो गईं। वह 'भास' तत्कालीन गुजराती भाषामें पद्यबन्ध है जिसका आधुनिक गुजरातीमें सटिप्पण सार-विवेचन प्रसिद्ध लेखक श्रीयुत मोहन- लाल द० देसाई B. A., LL..B. ने लिखा है । उसके आधारसे यहां उपाध्यायजीका जीवन संक्षेपमें दिया जाता है। उपाध्यायजीका जन्मस्थान गुजरातमें कलोल (बी० बी० एण्ड सी० आई० रेलवे ) के पास 'कनोडु' नामक गाँव है, जो अभी भी मौजूद है। उस गाँवमें नारायण नामका व्यापारी था जिसकी धर्मपत्नी सोभागदे थी। उस दम्पतिके जसवंत और पद्मसिंह दो कुमार थे। कभी अकबरप्रतिबोधक प्रसिद्ध जैनाचार्य हीरविजय सूरिकी शिष्य परंपरामें होनेवाले पण्डितवर्य श्री नयविजय पाटणके समीपवर्ती 'कुंणगेर' नामक गाँवसे बिहार करते हुए उस 'कनोडु' गाँवमें पधारे। उनके प्रतिबोधसे उक्त दोनों कुमार अपने माता-पिताकी सम्मतिसे उनके साथ हो लिए और दोनोंने पाटणमें पं० नयविजयजीके पास ही वि० सं० १६८८ में दीक्षा ली और उसी साल श्रीविजयदेव सूरिके हाथसे उनकी बड़ी दीक्षा भी हुई.। ठीक ज्ञात नहीं कि दीक्षाके समय दोनोंकी उम्र क्या होगी, पर संभवतः वे दस-बारह वर्षसे कम उम्रके न होंगे । दीक्षाके समय 'जसवंत' का 'यशोविजय' और 'पद्मसिंह' का 'पद्मविजय' नाम रखा गया । उसी पद्मविजयको उपाध्यायजी अपनी कृतिके अंतमें सहोदर रूपसे स्मरण करते हैं। सं० १६९९ में 'अहमदाबाद' शहरमें संघ समक्ष पं० यशोविजयजीने आठ अवधान किये । इससे प्रभावित होकर वहाँके एक धनजी सूरा नामक प्रसिद्ध व्यापारीने गुरु श्रीनयविज- यजीको विनति की कि पण्डित यशोविजयजीको काशी जैसे स्थानमें पढ़ा कर दूसरा हेमचन्द्र तैयार कीजिए । उक्त सेठने इसके वास्ते दो हजार चाँदीके दीनार खर्च करना मंजूर किया और हुंडी लिख दी। गुरु नयविजयजी शिष्य यशोविजय आदि सहित काशीमें आए और उन्हें वहाँके प्रसिद्ध किसी भट्टाचार्यके पास न्याय आदि दर्शनोंका तीन वर्षतक दक्षिणा-दान- पूर्वक अभ्यास कराया। काशीमें ही कभी वादमें किसी विद्वान् पर विजय पानेके बाद पं० यशो- विजयजीको 'न्यायविशारद' की पदवी मिली। उन्हें 'न्यायाचार्य' पद भी मिला था ऐसी प्रसिद्धि रही। पर इसका निर्देश 'सुजशवेली भास'में नहीं है । काशीके बाद उन्होंने आगरामें रहकर चार वर्ष तक न्यायशास्त्रका विशेष अभ्यास व चिन्तन किया। इसके बाद वे अहमदाबाद पहुंचे जहाँ उन्होंने औरंगजेबके महोबतखाँ ( २ ) नामक गुजरातके सूवेके समक्ष अठारह अवधान किये। इस विद्वत्ता और कुशलतासे आकृष्ट होकर सभीने पं० यशोविजयजीको ‘उपाध्याय' पदके योग्य समझा । श्री विजयदेव सूरिके शिष्य श्रीविजयप्रभसूरिने उन्हें सं० १७१८ में वाचक-उपाध्याय पद समर्पण किया । वि० सं० १७४३ में डभोई गाँव, जो बड़ौदा स्टेटमें अभी मौजूद है उसमें उपाध्या- यजीका स्वर्गवास हुआ जहाँ उनकी पादुका वि० सं० १७४५ में प्रतिष्ठित की हुई अमी विद्यमान है। उपाध्ययजीके शिष्य परिवारका निर्देश 'सुजशवेली' में तो नहीं है पर उनके तत्त्वविजय, आदि शिष्यप्रशिष्योंका पता अन्य साधनोंसे चलता है जिसके वास्ते 'जैनगूर्जरकविओ' भा० २. पृ० २७ देखिए । उपाध्यायजीके बाह्य जीवनकी स्थूल घटनाओंका जो संक्षिप्त वर्णन ऊपर किया है, उसमें दो घटनाएँ ख़ास मार्केकी हैं जिनके कारण उपाध्यायजीके आन्तरिक जीवनका स्रोत यहाँतक अन्तर्मुख होकर विकसित हुआ कि जिसके बल पर वे भारतीय साहित्यमें और ख़ासकर जैन परम्परामें अमर हो गए। उनमेंसे पहली घटना अभ्यासके वास्ते काशी जानेकी और दूसरी न्याय आदि दर्शनोंका मौलिक अभ्यास करने की है। उपाध्यायजी कितने ही बुद्धि व प्रतिभासम्पन्न क्यों न होते उनके वास्ते गुजरात आदिमें अध्ययनकी सामग्री कितनी ही क्यों न जुटाई जाती, पर इसमें कोई संदेह ही नहीं कि वे अगर काशीमें न आते तो उनका शास्त्रीय व दार्शनिक ज्ञान, जैसा उनके ग्रन्थों में पाया जाता है, संभव न होता। काशीमें आकर भी वे उस समय तक विकसित न्याय- शास्त्र ख़ास करके नवीन न्याय-शास्त्रका पूरे वलसे अध्ययन न करते तो उन्होंने जैन-परम्परा- को और तद्वारा भारतीय साहित्यको जैन विद्वान्की हैसियतसे जो अपूर्व भेंट दी है वह कभी संभव न होती। दसवीं शताब्दीसे नवीन न्यायके विकासके साथ ही समग्र वैदिक दर्शनोंमें ही नहीं बल्कि समग्र वैदिक साहित्यमें सूक्ष्म विश्लेपण और तर्ककी एक नई दिशा प्रारम्भ हुई और उत्तरोत्तर अधिकसे अधिक विचारविकास होता चला जो अभी तक हो ही रहा है। इस नवीनन्यायकृत नव्य युगमें उपाध्यायजीके पहले भी अनेक श्वेताम्बर दिगम्बर विद्वान् हुए जो बुद्धि-प्रतिभासम्पन्न होनेके अलावा जीवन भर शास्त्रयोगी भी रहे फिर भी हम देखते हैं कि उपाध्यायजीके पूर्ववर्ती किसी जैन विद्वान्ने जैन मन्तव्योंका उतना सतर्क दार्शनिक विश्लेपण व प्रतिपादन नहीं किया जितना उपाध्यायजीने किया है । इस अन्तस्का कारण उपाध्यायजीके काशीगमनमें और नव्य- न्यायशास्त्रके गम्भीर अध्ययनमें ही है। नवीनन्यायशास्त्रके अभ्याससे और तन्मूलक सभी तत्कालीन वैदिक दर्शनोंके अभ्याससे उपाध्यायजीका सहज बुद्धि-प्रतिभासंस्कार इतना विक- सित और समृद्ध हुआ कि फिर उसमेंसे अनेक शास्त्रोंका निर्माण होने लगा । उपाध्यायजीके ग्रन्थोंके निर्माणका निश्चित स्थान व समय देना अभी संभव नहीं। फिर भी इतना तो w ( ३ अवश्य ही कहा जा सकता है कि उन्होंने अन्य जैन साधुओंकी तरह मन्दिरनिर्माण, मूर्तिप्रतिष्ठा, संघनिकालना आदि बहिर्मुख धर्मकार्योंमें अपना मनोयोग न लगाकर अपना सारा जीवन जहाँ वे गये और जहाँ वे रहे वहीं एक मात्र शास्त्रोंके चिन्तन तथा नव्य-शास्त्रोंके निर्माण में लगा दिया । उपाध्यायजीकी सब कृतियाँ उपलब्ध नहीं हैं। कुछ तो उपलब्ध हैं पर अधूरी । कुछ विलकुल अनुपलब्ध हैं। फिर भी जो पूर्ण उपलब्ध हैं, वे ही किसी प्रखर बुद्धिशाली और प्रबल पुरुषार्थीके आजीवन अभ्यासके वास्ते पर्याप्त हैं। उनकी लभ्य, अलभ्य और अपूर्ण लभ्य कृतियोंकी अभी तककी यादी अलग दी जाती है जिसके देखने से ही यहां संक्षेपमें किया जानेवाला उन कृतियोंका सामान्य वर्गीकरण व मूल्याङ्कन पाठकोंके ध्यानमें आ सकेगा। उपाध्यायजीकी कृतियाँ संस्कृत, प्राकृत, गुजराती और हिंदी-मारवाड़ी इन चार भाषाओं में गद्यबद्ध, पद्यबद्ध और गद्य-पद्यबद्ध हैं । दार्शनिक ज्ञानका असली व व्यापक ख़ज़ाना संस्कृत भाषामें होनेसे तथा उसके द्वारा ही सकल देशके सभी विद्वानों के निकट अपने विचार उपस्थित करनेका संभव होनेसे उपाध्यायजीने संस्कृतमें तो लिखा ही; पर उन्होंने अपनी जैनपर- म्पराकी मूलभूत प्राकृत भाषाको गौण न समझा । इसीसे उन्होंने प्राकृतमें भी रचनाएँ की । संस्कृत-प्राकृत नहीं जानने वाले और कम जानने वालों तक अपने विचार पहुँचानेके लिए उन्होंने तत्कालीन गुजराती भाषामें भी विविध रचनाएँ की । मौका पाकर कभी उन्होंने हिंदी-मारवाड़ीका भी आश्रय लिया । विषयदृष्टिसे उपाध्यायजीका साहित्य सामान्य रूपसे आगमिक, तार्किक दो प्रकारका होनेपर भी विशेष रूपसे अनेक विषयावलम्बी है । उन्होंने कर्मतत्त्व, आचार, चरित्र आदि अनेक आगमिक विषयों पर आगमिक शैलीसे भी लिखा है; और प्रमाण, प्रमेय, नय, मङ्गल, मुक्ति, आत्मा, योग आदि अनेक तार्किक विषयों पर भी तार्किकशैलीसे ख़ासकर नव्य तार्किकशैलीसे लिखा है। व्याकरण, काव्य, छन्द, अलङ्कार, दर्शन आदि सभी तत्काल प्रसिद्ध शास्त्रीय विषयों पर उन्होंने कुछ न कुछ पर अति महत्त्वका लिखा ही है। शैलीकी दृष्टिसे उनकी कृतियाँ खण्डनात्मक भी हैं, प्रतिपादनात्मक भी हैं और समन्वयात्मक भी। जब वे खण्डन करते हैं तब पूरी गहराई तक पहुँचते हैं । प्रतिपादन उनका सूक्ष्म और विशद है । वे जब योगशास्त्र या गीता आदिके तत्त्वोंका जैनमन्तव्यके साथ समन्वय करते हैं तब उनके गम्भीर चिन्तनका और आध्यात्मिक भावका पता चलता है। उनकी अनेक कृतियाँ किसी अन्यके ग्रन्थकी व्याख्या न होकर मूल, टीका या दोनों रूपसे स्वतन्त्र ही हैं, जब कि अनेक कृतियाँ प्रसिद्ध पूर्वाचार्यों के ग्रन्थोंकी व्याख्यारूप हैं। उपाध्यायजी थे पक्के जैन और श्वेताम्बर । फिर भी विद्या विषयक उनकी दृष्टि इतनी विशाल थी कि वह अपने सम्प्रदाय मात्रमें समा न सकी अतएव उन्होंने पातञ्जल योगसूत्रके ऊपर भी लिखा और अपनी तीव्र समालोचनाकी लक्ष्य-दिगम्बर परम्पराके सूक्ष्म- ) ( ४ प्रज्ञ तार्किकप्रवर विद्यानन्दके कठिनतर अप्टसहस्री नामक ग्रन्थके ऊपर कठिनतम व्याख्या भी लिखी। गुजराती और हिंदी-मारवाड़ीमें लिखी हुई उनकी कृतियोंका थोड़ा बहुत वाचन, पठन व प्रचार पहिले ही से रहा है; परंतु उनकी संस्कृत-प्राकृत कृतियोंके अध्ययन-अध्यापनका नामो- निशान भी उनके जीवन कालसे लेकर ३० वर्ष पहले तक देखनेमें नहीं आता। यही सबब है कि ढाई सौ वर्ष जितने कम और खास उपद्रवोंसे मुक्त इस सुरक्षित समयमें भी उनकी सब कृतियाँ सुरक्षित न रहीं। पठन-पाठन न होनेसे उनकी कृतियोंके ऊपर टीका टिप्पणी लिखे जानेका तो संभव रहा ही नहीं पर उनकी नकलें भी ठीक-ठीक प्रमाणमें होने न पाई। कुछ कृतियाँ तो ऐसी भी मिल रही हैं कि जिनकी सिर्फ एक एक प्रति रही। संभव है ऐसी ही एक-एक नकल वाली अनेक कृतियाँ या तो लुप्त हो गई, या किन्हीं अज्ञात स्थानोंमें तितर बितर हो गई हों । जो कुछ हो पर अब भी उपाध्ययजीका जितना साहित्य लभ्य है उतने मात्रका ठीक-ठीक पूरी तैयारीके साथ अध्ययन किया जाय तो जैन परम्पराके चारों अनुयोग तथा आगमिक, तार्किक कोई विषय अज्ञात न रहेंगे। उदयन और गङ्गेश जैसे मैथिल तार्किक पुझ्योंके द्वारा जो नव्य तर्कशास्त्रका बीजा- रोपण व विकास प्रारम्भ हुआ और जिसका व्यापक प्रभाव व्याकरण, साहित्य, छन्द, विविध- दर्शन और धर्मशास्त्र पर पड़ा और खूब फैला उस विकाससे वञ्चित सिर्फ दो सम्प्रदायका साहित्य रहा । जिनमेंसे बौद्ध साहित्यकी उस त्रुटिकी पूर्तिका तो संभव ही न रहा था क्योंकि बारहवीं तैरहवीं शताब्दीके बाद भारतवर्पमें बौद्ध विद्वानोंकी परम्परा नाम मात्रको भी न रही इसलिए वह त्रुटि उतनी नहीं अखरती जितनी जैन साहित्यकी वह त्रुटि । क्योंकि जैन- सम्प्रदायके सैकड़ों ही नहीं बल्कि हजारों साधनसम्पन्न त्यागी व कुछ गृहस्थ भारतवर्षके प्रायः सभी भागोंमें मौजूद रहे, जिनका मुख्य व जीवनव्यापी ध्येय शास्त्रचिन्तनके सिवाय और कुछ कहा ही नहीं जा सकता । इस जैन साहित्यकी कमीको दूर करने और अकेले हाथसे पूरी तरह दूर करनेका उज्ज्वल व स्थायी यश अगर किसी जैन विद्वानको है तो वह उपाध्याय यशोविजयजीको ही है। ग्रन्थ-प्रस्तुत ग्रन्थके जैनतर्कभापा इस नामकरणका तथा उसे रचनेकी कल्पना उत्पन्न होनेका, उसके विभाग, प्रतिपाद्य विषयका चुनाव आदिका बोधप्रद व मनोरञ्जक इति- हास है जो अवश्य ज्ञातव्य है । जहाँ तक मालूम है इससे पता चलता है कि प्राचीन समयमें तर्कप्रधान दर्शन ग्रन्थोंके- चाहे वे वैदिक हों, बौद्ध हों या जैन हों-नाम 'न्याय'पदयुक्त हुआ करते थे। जैसे कि न्यायसूत्र, न्यायभाष्य, न्यायवार्तिक, न्यायसार, न्यायमञ्जरी, न्यायविन्दु, न्यायमुख, न्याया- वतार आदि । अगर प्रो० ट्यूचीका रखा हुआ 'तर्कशास्त्र' यह नाम असलमें सच्चा ही है या । १. Pre-Dinnag Buddhist Logic गत तर्कशास्त्र' नामक ग्रन्थ ।

( ५ ) प्रमाणसमुच्चयवृत्तिमें निर्दिष्ट 'तर्कशास्त्र' नाम सही है तो उस प्राचीन समयमें पाये जानेवाले न्यायशब्दयुक्त नामोंकी परम्पराका यह एक ही अपवाद है जिसमें कि न्याय शब्दके बदले तर्क शब्द हो। ऐसी परम्पराके होते हुए भी न्याय शब्दके स्थानमें 'तर्क' शब्द लगाकर तर्क- भाषा नाम रखनेवाले और उस नामसे धर्मकीर्तिकृत न्यायविन्दुके पदार्थों पर ही एक प्रकरण लिखनेवाले बौद्ध विद्वान मोक्षाकर हैं, जो व.रहवीं शताब्दीके माने जाते हैं। मोक्षाकरकी इस तर्कभाषा कृतिका प्रभाव वैदिक विद्वान् केशव मिश्र पर पड़ा हुआ जान पड़ता है जिससे उन्होंने वैदिक परम्परानुसारी अक्षपादके न्यायसूत्रका अवलम्बन लेकर अपना तर्कभाषा नामक ग्रन्थ तेरहवीं-चौदहवीं शताब्दीमें रचा। मोक्षाकरका जगत्तल बौद्धविहार केशव मिश्रकी मिथिलासे बहुत दूर न होगा ऐसा जान पड़ता है । उपाध्याय यशोविजयजीने बौद्ध विद्वान्की और वैदिक विद्वान्की दोनों तर्कभाषाओं को देखा तब उनकी भी इच्छा हुई कि एक ऐसी तर्कभाषा लिखी जानी चाहिए, जिसमें जैन मन्तव्योंका वर्णन हो। इसी इच्छासे प्रेरित होकर उन्होंने प्रस्तुत ग्रन्थ रचा और उसका केवल तर्कभाषा यह नाम न रखकर जैनतर्क- भाषा ऐसा नाम रखा। इसमें कोई संदेह नहीं कि उपाध्यायजीकी जैनतर्कभाषा रचनेकी कल्पनाका मूल उक्त दो तर्कभाषाओंके अवलोकनमें है । मोक्षाकरीय तर्कभाषाकी प्राचीन ताड- पत्रीय प्रति पाटणके भण्डारमें है जिससे जान पड़ता है कि मोक्षाकरीय तर्कभाषाका जैन भण्डारमें संग्रह तो उपाध्यायजीके पहिले ही हुआ होगा पर केशवमिश्रीय तर्कभाषाके जैन भण्डारमें संगृहीत होनेके विषयमें कुछ भारपूर्वक कहा नहीं जा सकता । संभव है जैन भण्डारमें उसका संग्रह सबसे पहिले उपाध्यायजीने ही किया हो क्योंकि इसकी भी विविध टीकायुक्त अनेक प्रतियाँ पाटण आदि अनेक स्थानोंके जैन साहित्यसंग्रहमें हैं। मोक्षाकरीय तर्कभाषा तीन परिच्छेदोंमें विभक्त है जैसा कि उसका आधारभूत न्यायविन्दु भी है। केशवमिश्रीय तर्कभाषामें ऐसे परिच्छेद विभाग नहीं हैं। अतएव उपाध्यायजीकी जैनतर्कभाषाके तीन परिच्छेद करनेकी कल्पनाका आधार मोक्षाकरीय तर्कभाषा है ऐसा कहना असंगत न होगा। जैनतर्कभाषाको रचनेकी, उसके नामकरणकी और उसके विभागकी कल्पनाका इतिहास थोड़ा बहुत ज्ञात हुआ। पर अब प्रश्न यह है कि उन्होंने अपने ग्रन्थका जो प्रतिपाद्य विषय चुना और उसे प्रत्येक परिच्छेदमें विभाजित किया उसका आधार कोई उनके सामने था या उन्होंने अपने आप ही विषयकी पसंदगी की और उसका परिच्छेद अनुसार विभाजन भी किया है। इस प्रश्नका उत्तर हमें भट्टारक अकलङ्कके लघीयस्त्रयके अवलोकनसे मिलता है । उनका लघीयस्त्रय जो मूल पद्यबद्ध है और स्वोपज्ञविवरणयुक्त है उसके मुख्य- तया प्रतिपाद्य विषय तीन हैं-प्रमाण, नय और निक्षेप । उन्हीं तीन विषयोंको लेकर न्याय प्रस्थापक अकलङ्कने तीन विभागमें लघीस्त्रयको रचा जो तीन प्रवेशमें विभाजित है। बौद्ध- वैदिक दो तर्कभाषाओंके अनुकरणरूपसे जैनतर्कभाषा बनानेकी उपाध्यायजीकी इच्छा तो हुई थी ही पर उन्हें प्रतिपाद्य विषयकी पसंदगी तथा उसके विभागके वास्ते अकलङ्ककी कृति मिल गई जिससे उनकी ग्रन्थनिर्माणयोजना ठीक बन गई । उपाध्यायजीने देखा - कि लघीयस्त्रयम प्रमाण, नय, और निक्षेपका वर्णन है पर वह प्राचीन होनेसे इस विकसित युगके वास्ते पर्याप्त नहीं है। इसी तरह शायद उन्होंने यह भी सोचा हो कि दिगम्बराचार्यकृत लघीयस्त्रय जैसा, पर नवयुगके अनुकूल विशेपोंसे युक्त श्वेताम्बर परम्पराका मी एक ग्रन्थ होना चाहिए । इसी इच्छा से प्रेरित होकर नामकरण आदिमें मोक्षाकर आदिका अनुसरण करते हुए भी उन्होंने विषयकी पसंदगीमें तथा उसके विभाजनमें जैनाचार्य अकलङ्कका ही अनुसरण किया। उपाध्यायजीके पूर्ववर्ती श्वेताम्बर-दिगम्बर अनेक आचार्योंके तर्क विषयक सूत्र व प्रकरण ग्रन्थ हैं पर अकलङ्कके लघीयस्त्रयके सिवाय ऐसा कोई तर्क विषयक ग्रन्थ नहीं है जिसमें प्रमाण, नय और निक्षेप तीनोंका तार्किक शैलीसे एक साथ निरूपण हो। अतएव उपाध्यायजीकी विपय पसंदगीका आधार लघीयस्त्रय ही है इसमें तनिक भी संदेह नहीं रहता । इसके सिवाय उपाध्यायजीकी प्रस्तुत कृतिमें लघीयस्त्रयके अनेक वाक्य ज्योंके त्यों हैं जो उसके आधारत्वके अनुमानको और भी पुष्ट करते हैं । बाह्यस्वरूपका थोड़ा सा इतिहास जान लेनेके बाद आन्तरिक स्वरूपका भी ऐतिहासिक वर्णन आवश्यक है। जैनतर्कभाषाके विषयनिरूपणके मुख्य आधारभूत दो जैन ग्रन्थ हैं- सटीक विशेषावश्यकभाष्य और सटीक प्रमाणनयतत्त्वालोक । इसी तरह इसके निरूपणमें मुख्यतया आधारभूत दो न्याय ग्रन्थ भी हैं-कुसुमाञ्जलि और चिन्तामणि । इसके अलावा विषय निरूपणमें दिगम्बरीय न्यायदीपिकाका भी थोड़ा सा साक्षात् उपयोग अवश्य हुआ है । जैन- तर्कभापाके नयनिरूपण आदिके साथ लघीयस्त्रय और तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आदिका शब्दशः सादृश्य अधिक होनेसे यह प्रश्न होना स्वाभाविक है कि इसमें लघीयस्त्रय तथा तत्त्वार्थश्लोक- वार्तिकका साक्षात् उपयोग क्यों नहीं मानते, पर इसका जवाब यह है कि उपाध्यायजीने जैन- तर्कभाषाके विषयनिरूपणमें वस्तुतः सटीक प्रमाणनयतत्त्वालोकका तार्किक ग्रन्थ रूपसे साक्षात् उपयोग किया है । लघीयस्त्रय, तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक आदि दिगम्बरीय ग्रन्थोंके आधारसे सटीक प्रमाणनयतत्त्वालोककी रचना की जानेके कारण जैनतर्कभाषाके साथ लघीयस्त्रय और तत्त्वार्थ- श्लोकवार्तिकका शब्दसादृश्य सटीक प्रमाणनयतत्त्वालोकके द्वारा ही आया है, साक्षात् नहीं । मोक्षाकरने धर्मकीर्त्तिके न्याय बिन्दुको आधारभूत रखकर उसके कतिपय सूत्रोंकी व्याख्या- रूपसे थोड़ा बहुत अन्य अन्य शास्त्रार्थीय विषय पूर्ववर्ती बौद्ध ग्रन्थोंमें से लेकर अपनी नाति- संक्षिप्त नातिविस्तृत ऐसी पठनोपयोगी तर्कभापा लिखी। केशव मिश्रने भी अक्षपादके प्रथम सूत्रको आधार रख कर उसके निरूपणमें संक्षेप रूपसे नैयायिकसम्मत सोलह पदार्थ और वैशेपिकसम्मत सात पदार्थोका विवेचन किया। दोनोंने अपने अपने मन्तव्यकी सिद्धि करते हुए तत्कालीन विरोधी मन्तव्योंका भी जहाँ तहाँ खण्डन किया है। उपाध्यायजीने भी इसी सरणीका अवलम्बन करके जैनतर्कभापा रची। उन्होंने मुख्यतया प्रमाणनयतत्त्वालोकके सूत्रों को ही जहाँ संभव है आधार बनाकर उनकी व्याख्या अपने ढंगसे की है। व्याख्या में खास कर पञ्चज्ञाननिरूपणके प्रसङ्गमें सटीक विशेपावश्यकभाष्यका ही अवलम्बन है। बाकीके प्रमाण और नय निरूपणमें प्रमाणनयतत्त्वालोककी व्याख्या-रत्नाकरका अवलम्बन है अथवा यों कहना चाहिए कि पञ्चज्ञान और निक्षेपकी चर्चा तो विशेषावश्यकभाष्य और उसकी वृत्तिका संक्षेप मात्र है और परोक्ष प्रमाणोंकी तथा नयोंकी चर्चा प्रमाणनयतत्त्वालोककी व्याख्या- रत्नाकरका संक्षेप है । उपाध्यायजी जैसे प्राचीन नवीन सकल दर्शनके बहुश्रुत विद्वान्की कृतिमें कितना ही संक्षेप क्यों न हो पर उसमें पूर्वपक्ष या उत्तरपक्ष रूपसे किंवा वस्तुविश्लेषण रूपसे शास्त्रीय विचारोंके अनेक रंग पूरे जानेके कारण यह संक्षिप्त ग्रन्थ भी एक महत्त्वकी कृति बन गया है। वस्तुतः जैनतर्कभाषा यह आगमिक तथा तार्किक पूर्ववर्ती जैन प्रमेयोंका किसी हद तक नव्यन्यायकी परिभाषामें विश्लेषण है तथा उनका एक जगह संग्रह रूपसे संक्षिप्त पर विशद वर्णन मात्र है। प्रमाण और नयकी विचारपरम्परा श्वेताम्बरीय ग्रन्थों में समान है पर निक्षेपोंकी चर्चा- परम्परा उतनी समान नहीं। लघीयस्त्रयमें जो निक्षेपनिरूपण है और उसकी विस्तृत व्याख्या कुमुदचन्द्रमें जो वर्णन है वह विशेषावश्यक भाष्यकी निक्षेप चर्चासे इतना भिन्न अवश्य है जिससे यह कहा जा सके कि तत्त्वमें भेद न होने पर भी निक्षेपोंकी चर्चा दिगम्बर-श्वेताम्बर दोनों परंपरामें किसी अंशमें भिन्नस्वरूपसे पुष्ट हुई, जैसा कि जीवकांड तथा चौथे कर्मग्रन्थके विषयके बारेमें कहा जा सकता है। उपाध्यायजीने जैनतर्कभाषाके बाह्यरूपकी रचनामें लघी- यस्त्रयका अवलम्बन लिया जान पड़ता है, फिर भी उन्होंने अपनी निक्षेप चर्चा तो पूर्णतया विशेषावश्यकभाष्यके आधारसे ही की है। तात्पर्यसंग्रहा वृत्ति-पठनपाठनका प्रचार न होनेके कारण जैनतर्कभाषाके ऊपर पीछेसे भी कोई मूलानुरूप उपयुक्त व्याख्याकी रचना अबतक हुई न थी। पिछले तीन वर्षोंसे यह तर्कभाषा बनारस क्वीन्स कालेजके तथा हिन्दू युनिवर्सिटीके जैन अभ्यासक्रममें रखी गई और इसके अभ्यासी भी तैयार होने लगे। तब इसके स्पष्टीकरणका प्रश्न विशेषरूपसे सामने आया। यों तो पच्चीस वर्ष पहिले जब मेरे मित्र पण्डित भगवानदास-महावीर जैन विद्यालय बंबईके धर्माध्यापकने इस तर्कभाषामेंसे कुछ मुझसे पूछा तभीसे इसकी ओर मेरा ध्यान गया था। इसके बाद भी इसपर थोड़ासा विचार करनेका तथा इसके गूढ़ भावोंको स्पष्ट करनेका जब जब प्रसंग आया तब तब मन में यह होता था कि इसके ऊपर एक अच्छी व्याख्या आवश्यक है । लम्बे समयकी इस भावना को कार्यमें परिणत करनेका अवसर तो इसके पाठ्यक्रममें रखे जानेके बाद ही आया। जैनतर्कभाषाके पुनः छपानेके प्रश्नके साथ ही इसके ऊपर एक व्याख्या लिखनेका भी प्रश्न आया। और अन्तमें निर्णय किया कि इसपर व्याख्या लिखी ही जाय। अनेक मित्रोंकी ख़ास कर पं० श्रीमान् जिनविजयजीकी इच्छा रही कि टीका संस्कृतमें ही लिखना ठीक होगा। इसपर मेरे दोनों मित्र-पं० महेन्द्रकुमार-अध्यापक स्याद्वाद महाविद्यालय, बनारस तथा पं० दलसुख मालवणिया के साथ परामर्श किया कि व्याख्याका स्वरूप कैसा हो । अन्तमें हम तीनोंने टीकाका स्वरूप निश्चित कर तदनुसार ही जैनतर्क भाषाके ऊपर यह वृत्ति लिखी, और इसका नाम तात्पर्यसंग्रहा रखा । नामकी योजना अर्थानुरिणी होनेसे इसके पीछेका भाव बतला देना जरूरी है जिससे अभ्यासी उसका मूल्य व उपयोग समझ सके।

( ८ ) इस वृत्तिकी रचना दो दृप्टिओंसे हुई है-एक संग्रहदृष्टि और दूसरी तात्पर्यदृष्टि । उपाध्यायजीने जहाँ जहाँ विशेपावश्यकभाष्यके तथा प्रमाणनयतत्त्वालोकके पदार्थों को लेकर उनपर उक्त दो ग्रन्थोंकी अतिविस्तृत व्याख्या मलधारिवृत्ति तथा स्याद्वादरत्नाकरका अति संक्षेप करके अपनी चर्चा की है वहाँ उपाध्यायजीकृत संक्षिप्त चर्चाके ऊपर अपनी ओरसे विशेष खुलासा या विशेष चर्चा करना इसकी अपेक्षा ऐसे स्थलोंमें उक्त मलधारिवृत्ति तथा स्याद्वादरत्नाकरमेंसे आवश्यक भागोंका संग्रह करना हमने लाभदायक तथा विशेष उप- युक्त समझा, जिससे उपाध्यायजीकी संक्षिप्त चर्चाओंके मूल स्थानों का ऐतिहासिक दृष्टिसे पता भी चल जाय और वे संक्षिप्त चर्चाएँ उन मूल ग्रन्थोंके उपयुक्त अवतरणों द्वारा विशद भी हो जायँ, इसी आशयसे ऐसे स्थलोंमें अपनी ओरसे खास कुछ न लिख कर आधारभूत ग्रन्थों में से आवश्यक अवतरणोंका संग्रह ही इस वृत्तिमें किया गया है। यही हमारी संग्रहदृष्टि है। इस दृष्टिसे अवतरणोंका संग्रह करते समय यह वस्तु खास ध्यानम रखी है कि अना- वश्यक विस्तार या पुनरुक्ति न हो। अतएव मलधारिवृत्ति और स्याद्वादरत्नाकरमें से अवतरणोंको लेते समय बीच-वीचमें से बहुत-सा भाग छोड़ भी दिया है । पर इस बातकी ओर ध्यान रखनेकी पूरी चेष्टा की है कि उस-उस स्थलमें तर्कभापाका मूल पूर्ण रूपेण स्पष्ट किया जाय । साथ ही अवतरणोंके मूल स्थानोंका पूरा निर्देश भी किया है जिससे विशेप जिज्ञासु उन मूल ग्रन्थोंमें से भी उन चर्चाओंको देख सके । उपाध्यायजी केवल परोपजीवी लेखक नहीं थे । इससे उन्होंने अनेक स्थलों में पूर्ववर्ती जैन ग्रन्थों में प्रतिपादित विषयों पर अपने दार्शनिक एवं नव्यन्याय शास्त्रके अभ्यासका उपयोग करके थोड़ा बहुत नया भी लिखा है। कई जगह तो उनका लेख बहुत संक्षिप्त और दुरूह है। कई जगह संक्षेप न होनेपर भी नव्यन्यायकी परिभाषाके कारण वह अत्यन्त कठिन हो गया है । जैन परंपरामें न्यायशास्त्रका खास करके नव्यन्यायशास्त्रका विशेष अनु- शीलन न होनेसे ऐसे गम्भीर स्थलोंके कारण जैनतर्कभापा जैन परंपरामें उपेक्षित सी हो गई है । यह सोच कर ऐसे दुरूह तथा कठिन स्थलोंका तात्पर्य इस वृत्तिमें बतला देना यह भी हमें उचित जान पड़ा। यही हमारी इस वृत्तिकी रचनाके पीछे तात्पर्यदृष्टि है। इस दृष्टिके अनुसार हमने ऐसे स्थलों में उपाध्यायजीके वक्तव्यका तात्पर्य तो बतलाया ही है पर जहां तक हो सका उनके प्रयुक्त पदों तथा वाक्योंका शब्दार्थ बतलानेकी ओर भी ध्यान रखा है। जिससे मूलग्रन्थ शब्दतः लग जाय और तात्पर्य भी ज्ञात हो जाय । तात्पर्य बतलाते समय कहीं उत्थानिकामें तो कहीं व्याख्यामें ऐतिहासिक दृष्टि रखकर उन ग्रन्थों का सावतरण निर्देश भी कर दिया है जिनका भाव मनमें रखकर उपाध्यायजीके द्वारा लिखे जानेकी हमारी समझ है और जिन ग्रन्थों को देखकर विशेषार्थी उस-उस स्थानकी वातको और स्पष्टताके साथ समझ सके । इस तर्कभाषाका प्रतिपाद्य विषय ही सूक्ष्म है । तिस पर उपाध्यायजीकी सूक्ष्म विवेचना और उनकी यत्रतत्र नव्यन्याय परिभाषा इन सब कारणोंसे मूल तर्कभापा ऐसी सुगम नहीं ( ९.) जैसीकि साधारण अभ्यासी अपेक्षा रखे । संग्रह द्वारा या तात्पर्य वर्णन द्वारा तर्कभाषाको सरल बनाने का कितना ही प्रयत क्यों न किया गया हो, पर ऐसा कभी सम्भव नहीं है कि प्राचीन नवीन न्यायशास्त्रके और इतर दर्शनोंके अमुक निश्चित अभ्यासके सिवाय वह किसी तरह समझनेमें आ सके। मूल ग्रन्थ कठिन हो तो उसकी सरल व्याख्या भी अन्ततो गत्वा कठिन ही रहती है । अतएव इस तात्पर्यसंग्रहा वृत्तिको कोई कठिन समझे तब उसके वास्ते यह ज़रूरी है कि वह जैनतर्कभाषा मूल और इस नव्यवृत्तिको समझनेकी प्राथमिक तैयारी करनेके बाद ही इसे पढ़नेका विचार करे । इस वृत्तिका उक्त दो दृष्टियोंके कारण तात्पर्यसंग्रहा ऐसा नाम रखा है पर इसमें एक विशेषता अवश्य ज्ञातव्य है । वह यह की जहाँ मूलग्रन्थोंमेंसे अवतरणोंके संग्रह ही मुख्यतया हैं वहां भी व्याख्येय भागका तात्पर्य ऐसे संग्रहों के द्वारा स्पष्ट करनेकी दृष्टि रखी गई है और जहां अपनी ओरसे व्याख्या करके व्याख्येय भागका तात्पर्य बतलानेकी प्रधान दृष्टि रखी है वहां भी उस तात्पर्यके आधारभूत जैन जैनेतर ग्रन्थोंका सूचन द्वारा संग्रह करनेका भी ध्यान रखा है। प्रतिओंका परिचय-प्रस्तुत संस्करण तैयार करनेमें चार आदर्शोका उपयोग किया गया है जिनमें तीन लिखित प्रतियां और एक छपी नकल समाविष्ट हैं। छपी नकल तो वही है जो भावनगरस्थ जैनधर्म प्रसारक सभा द्वारा प्रकाशित न्यायाचार्य श्री यशोविजय कृत ग्रन्थमालाके अन्तर्गत (पृ० ११३ से पृ० १३२ ) है । हमने इसका संकेत मुद्रितार्थ सूचक मु० रखा है । मुद्रित प्रति अधिकांश सं० प्रतिसे मिलती है। शेष तीन हस्तलिखित प्रतिओंके प्र० सं० २० ऐसे संकेत हैं। प्र० संज्ञक प्रति प्रवर्तक श्रीमत् कान्तिविजयजीके पुस्तकसंग्रह की है । सं० और व० संज्ञक दो प्रतियां. पाटन- गत संघके पुस्तक संग्रह की हैं। संघका यह संग्रह वखतजीकी शेरीमें मौजूद है । अतएव एक ही संग्रह की दो प्रतिओंमेंसे एकका संकेत सं० और दूसरीका संकेत व० रखा है। उक्त तीन प्रतिओंका परिचय संक्षेपमें क्रमशः इस प्रकार है । प्र०-यह प्रति १७ पत्र परिमाण है । इसकी लम्बाई-चौड़ाई ९॥४४। इञ्च है । प्रत्येक पृष्ठमें १५ पंक्तियां हैं। प्रत्येक पंक्किमें अक्षर संख्या ४९ से ५२ तक है । लिपि सुन्दर है। प्रति किसीके द्वारा संशोधित है और शुद्धप्रायः है। पन्ने चिपक जानेसे अक्षर घिसे हुए हैं फिर भी दुष्पठ नहीं हैं। किनारियोंमें दीमकका असर है । अन्तमें पुष्पिका है- वह इस प्रकार- छ० सम्बत् १७३६ वर्षे आपाढशुदि ८ शनौ दिने लिखित पं० मोहनदास पं० रविवर्द्धनपठनार्थ सं०-यह प्रति संघके भाण्डारगत डिव्या नं० ४० में पोथी नं० ३६ में है जो पोथी 'जैनतर्कभाषादि प्रकरण' इस नामसे अङ्कित है। इस पोथीमें ४० से ५३ तकके पत्रोंमें .

(१०) तर्कभाषा है। इसकी लम्बाई-चौड़ाई १०४४॥ इञ्च है। प्रत्येक पृष्ठ १७ पंक्तियाँ हैं। प्रत्येक पंक्तिगे ४४ से ५५ तक अक्षर संख्या है। संशोधित और टिप्पण युक्त है । पानीसे भीगी हुई होनेपर भी लिपि विगड़ी नहीं है। जीर्णप्राय है। इसके अन्तमें पुप्पिका आदि कुछ नहीं है। व०-यह प्रति संघके भण्डारगत डिव्या नं० २७ पोथी नं० २५ में मौजूद है। इसके २२ पत्र है। जिनमें हर एक पृष्ठमें पंक्ति १५-१५ और प्रत्येक पंक्तिमें ३८-१० अक्षर संख्या है । इसकी लम्बाई-चौड़ाई १०४४॥ ईश्च है । आभारप्रदर्शन–प्रस्तुत संस्करणमें सर्वप्रथम सहायक होनेवाले वयोवृद्ध सम्मानार्ह प्रवर्तक श्रीमत् कान्तिविजयजीके प्रशिप्य श्रद्धेय मुनि श्री पुण्यविजयजी हैं जिन्होंने न केवल लिखित सव प्रतियोंको देकर ही मदद की है बल्कि उन प्रतियोंका मिलान करके पाटान्तर लेने और तत्सम्बन्धी अन्यान्य कार्यमें भी शुरूसे अन्त तक पूरा समय और मनोयोग देकर मदद की है। मैं अपने मित्र पं० दलसुख मालवणियाके साथ ई० स० १९३५ के अप्रैल की ३० तारीखको पाटन इस कार्य निमित्त गया तभी श्रीमान् मुनि पुण्यविजयजीने अपना नियत और आवश्यक कार्य छोड़कर हम लोगोंको प्रस्तुत कार्यमें पूरा योग दिया। इतनी सरलतासे और त्वरासे उनकी मदद न मिलती तो अन्य सब सुविधाएँ होनेपर भी प्रस्तुत संस्करण आसानीसे इस तरह तैयार होने न पाता। अतएव सर्वप्रथम उक्त मुनिश्रीके प्रति कृतज्ञता प्रकट करना मेरा प्राथमिक कर्तव्य है। तत्पश्चात् मैं अपने विद्यागुरु पं० वालकृष्ण मिश्र जो हिन्दू युनिवर्सिटी गत ओरिएण्टल कोलेजके प्रीन्सिपल हैं और जो सर्वतन्त्र स्वतन्त्र हैं, ख़ास न्याय और वेदान्तके मुख्य अध्यापक हैं उनके प्रति सबहुमान कृतज्ञता प्रदर्शित : करता हूँ। यों तो मैं जो कुछ सोचता-बोलता-लिखता हूँ वह सब मेरे उक्त विद्यागुरुका ही अनुग्रह है पर प्रस्तुत तर्कभाषाके संस्करणमें उन्होंने मुझको ख़ास मदद की है । जब इस तर्कभाषाके ऊपर वृत्ति लिखनेका विचार हुवा और उसका तात्पर्य अंश मैंने लिखा तब उस अंशको अपने उक्त विद्यागुरुजीको सुनाने पहुँचा। उन्होंने मेरे लिखित तात्पर्यवाले भागको ध्यानसे सुन लिया और यत्र तत्र परिमार्जन भी सुझाया जिसे मैंने सश्रद्ध स्वीकार कर लिया। इसके अलावा तात्पर्याश लिखते समय भी उन्होंने जब-जब जरूरत हुई तब तब मुझको अनेक बार अपने परामर्शसे प्रोत्साहित और निःशक किया। उनकी सहज उदारता- पूर्ण और सदासुलभ मददके सिवाय मैं इतने निःसंकोचत्व और आत्मविश्वासके साथ स्वतन्त्र भावसे तात्पर्य वर्णन करनेमें कभी समर्थ न होता। अतएव मैं उनका न केवल कृतज्ञ ही हूँ प्रत्युत सदा ऋणी भी हूँ। इस जगह मैं अपने सखा एवं विद्यार्थी जिन्होंने प्रस्तुत पुस्तक छपते समय प्रूफ देखने आदिमें हार्दिक सहयोग किया है उनका भी आभारी हूँ। उनमेंसे पहिले मुनि कृष्णचन्द्रजी हैं जो पञ्जाव पञ्चकूला जैनेन्द्र गुरुकुलके भूतपूर्व अधिष्ठाता हैं और सम्प्रति काशीमें जैन आगम और जैन तर्कके अभ्यासके अलावा आयुर्वेदका भी विशिष्ट अध्ययन करते हैं। उन्होंने अनेक बार अपने वैयाकरणत्व तथा तीक्ष्ण दृष्टिके द्वारा प्रूफ सिंघी जैन ग्रन्थमाला] [जैन तर्कभापा रातरायेदनस्प] मकर सार RANIनियमाला निर्णयामप्पललामालेविनाशिनियनमालमीमामा सिलसिलालेप्रो मसाजना बाल्मायक्रियानिमिया सताने साएनकलादिनानायकवनिताबानमादिताने मानायधी span एई ऐपन्दननत्वादिलनवाईदेशिनाप्रमाणनयनिछमेक्सिकलापाननाम्बईला स्चपख्यवसायिजानेमागविमात्माज्ञानस्यैवस्वरूपमित्यधापरस्तस्मादन्यो लिपवित्र मनाम तारा व्यवस्पतियवास्थितत्वलनिश्चिनोनापेवंशालपरत्यवसायावदनितियाशिवारणाया सवयी मासया जान पदसंशयविपर्यायानभ्यवसायष्तकारणायव्यवसायिपदायरेक्षनुमादिवादिनी मामीसकादानाबादापिलापिनासानायवितवादिनाचमतनिरासायखपारतिस्वस्त . माका पविज्ञाषणमुक्तानउययेवंसम्पगतान मिरयमाणामध्यातनंदकिमन्पतालवी प्रमा व्यमितिावत्सस्पस्चार्घव्यवसितारवतत्फ ल त्वातानादवडमास्वपरव्यवसायिच मनस्यात्साास्यपरव्यवसायित्वात्फ ल स्म. चस्वव्यवसायित्वादितिचशमायाफ लाया:कधिनिदेनतड़पानावात्म् व्य पारस्पमुयायागडियमेवधमारामितिरिका तीनामाष्टतात्मास्यदिपकाशको संघतिनिधिारकारकणक्रियाजन्मायोगा ตุต่าง मतामा मस्टातूलिकादिनिकाधासप्तस्यापितन प्रसपराधकेविताता यहाकारा NRNA ना शक्तिनिमिहात्मनाकरणत्वेननिर्दिष्टानविरुपाकघचानतिलवाल्यामवायहण) लाविमा क्तिलन्दापमा गिराततदापत्रालपायागात्मनाकरागनलाधाकलेपानात वनमा वातानीमोरादावस्सियागमनकरणकलजानाया:पारोक्षप्रत्यक्षत्वान्यामपानाक aciaomi रमतावाचायघतानाक्तिरप्पात्मनिस्चापाययपरिचिानयाधतात्यादतिनोदी HIRIAHaविषयविरिनिसकानेरासकलायलपफलमादारविनियनकन के वसल्वापेमारानुसान विHिARAIनव्यनमिफलपनainaसनिभाने यहाsaysलायRIRRIERERemill मारामारसातापपलनमापरिलमतानाहास्पफलापरमायामालपाटीमोमिनाtaARI लाnaSEPTeamITHIVERetiriविसरमane आद्य पत्र, लिही पप द्वितीय पार्श्व। मापार .. [जैन तर्कभाषा सिंघी जैन ग्रन्थमाला] अमविजय हप्नतर्क, लाका नान्यत्पतयिनानवमितितत्त्वाघटाकासाचनरिहावाधाऽयसंसारिनोवेऽव्यत्वेपिसावा त्वाविराधाएकवसुगतानानामादोनोसावाविनास्तपतियादनातदाहतात्यकारहवाधा सहागानामंचवणायजोत्यागासाकारणायासहचाकनावनंतयेसावोतिकवलसविशिष्टजा वाम्पकयापध्यानावत्वयवहारएवनस्पान्मयादादेवत्वादिविशिष्टजावंषत्ववाहसत्वादिति। के अधिकंनयरहस्यादोविचितमस्मातिः॥ऽतिमहामाहापाध्यायप्रकल्पाणाक्लियगीशिष्यपुरवा यमितयालासविनायगाशिघ्यावतसर्पमित्तथ जातविजयगासनाध्यूपमितमानयविनयरा शिशध्येयमितश्रायविजयसादाहारणों सयोक्तियगशिविसाचोजेनतकुमाषा रचित्र यांनियंपरिनामप्तस्मतत्सविसंत पूर्ण ये जनतर्कताधास्वस्तिश्रामणसघाय सूरिश्रीविजयादिदेवसरायरोवराहमणो । सूरिशास्नियादिसिंहसयाराकासनातन पितात्मवाप्रतिममारननित प्रथमश्रख्यातो पायार्यविताबाउकोविदलेमादेविनोदंतमाश यस्मासनयरयोवजातविजयपानांपरष्टाशयास्त्रानतेसनयानयादिविजयावाचविद्यपदा पावलापस्पवसनयनवितस्यजातःसधासादरतेनन्यायविशारदकितास्तासियामुाद।' शतर्कलाषामिमांसत्याग्मयायन्सएपमानित पायोनिनविश्लोपरमानंदसंपदावामन पर अन्तिम पत्र, द्वितीय पार्श्व । -- ( ११ ) संशोधनमें खास मदद पहुंचाई है । शेप दो व्यक्तियोंमेंसे एक है पञ्जाब गुजरानवाला गुरुकुल का छात्र शांतिलाल जो काशीमे प्राचीन न्याय और जैनागमका अध्ययन करता है। दूसरा है मेवाड छोटी सादडी गोदावत गुरुकुलका छात्र महेन्द्रकुमार जो अभी काशीमें नव्य न्यायका अध्ययन करता है। इन दोनोंने जब चाहा तब निःसंकोचभावसे, क्या लिखनेमें, क्या प्रफ आदि देखने में जहां ज़रूरत हुई उत्साहसे मदद की है। मैं इन तीनोंके हार्दिक सहयोग का कृतज्ञ हूँ। विशिष्ट कृतज्ञता-संस्करणकी तैयारीसे लेकर उसके छप जाने तकमें सहयोगी होने- वाले सभीका आभार प्रदर्शन कर लेनेपर भी एक विशिष्ट आभार प्रकट करना बाकी है और वह है सिंघी सिरीजके प्राण-प्रतिष्ठाता श्रीमान् बाबू बहादुर सिंहजी तथा पण्डित श्रीमान् जिन- विजयजीका । इतिहास विशारद श्रीमान् जिनविजयजी मुझको अनेक वर्ष पहिलेसे प्रसङ्ग प्रसङ्ग पर कहा करते थे कि उपाध्यायजीके पाठ्यग्रन्थोंको टीकाटिप्पणी युक्त सुचारु रूपसे तैयार करो जो इस समय बड़े उपयोगी सिद्ध होंगे। उनका यह परामर्श मुझको अनेक बार प्रेरित करता था पर मैं इसे कार्यरूपमें अभी परिणत कर सका। उनका स्निग्ध और उपयोगी परामर्श प्रथमसे अन्ततक चालू न रहता तो सम्भव है मेरी प्रवृत्ति इस दिशामें न होती। इस कारणसे तथा सिंघी सिरीजमें प्रस्तुत संस्करणको स्थान देना उन्होंने पसन्द किया इस कारणसे मैं श्रीमान् पं० जिनविजयजीका सविशेष कृतज्ञ हूँ। यह कहने की ज़रूरत ही नहीं कि काग़ज़ साईज़ टाईप गेटअप आदिकी आखिरी पसन्दगी योग्यता तथा सिरीजसञ्चालकत्वके नाते उन्हींकी रही और इससे भी मुझको एक आश्वासन ही मिला। श्रीमान् वाबू बहादुरसिंहजी सिंघीके प्रति विशेष कृतज्ञता प्रकाशित करना इसलिए उचित है कि उनकी सर्वांगपूर्ण साहित्य प्रकाशित करनेकी अभिरूचि और तदनुरूप उदारता से ही प्रस्तुत सिंघी सिरीजका जन्म हुआ है जिसमें कि प्रस्तुत पुस्तक प्रकाशित हो रही है । विशिष्ट संस्करण तैयार व प्रकाशित करनेमें उपयोगी सभी बाह्य साधन निःसंकोच भावसे जुटानेकी सिरीजकी साधनसम्पत्ति प्राप्त न होती तो धैर्यपूर्वक इतना शान्तचिन्तन शायद ही सम्भव होता। कार्यका प्रारम्भ, पर्यवसान और विभाजन- ऊपर सूचित किया गया है कि तर्क- भाषाके प्रस्तुत संस्करणका बीजन्यास पाटनमें १९३५ मईके प्रारम्भमें किया गया। वहां प्रतियोंसे पाठान्तर लेनेके साथ ही साथ उनकी शुद्धि-अशुद्धिके तरतम भावानुसार विवेक करके वहीं पाठान्तरोंका पृथक्करण और वर्गीकरण कर दिया गया। तदनन्तर अहमदाबादमें उसी छुट्टीमें पुनः अर्थदृष्टिसे ग्रन्थका चिन्तन कर उन पृथक्कृत और वर्गीकृत पाठान्तरोंको यथायोग्य मूल वाचनामें या नीचे पादटीकामें रख दिया। इसके बाद वह कार्य स्थगित रहा जो फिर ई० स० १९३६ के वर्षाकालमें काशीमें शुरू किया गया। उस वक्त मुख्य काम अवतरणोंके संग्रहका हुआ जिसके अधार पर ई० स० १९३७ के आरम्भमें तर्कभाषाकी वृत्तिके दोनों तात्पर्य और संग्रह अंश तैयार हुए। और उसी समय सारा मैटर प्रेसमें गया + ( १२ ) जो १९३८ के प्रारम्भमें ही क्रमशः छप कर तैयार हो गया। इस तरह इस छोटेसे मूल और वृत्ति ग्रन्थने भी करीब पौनेतीन वर्ष ले लिए। जब कोई छोटा बड़ा काम सम्भूयकारितासे ख़ासकर अनेक व्यक्तियोंके द्वारा सिद्ध करना हो तव उस कार्यके विविध हिस्सोंका विभाग करके व्यक्तिवार बांट लेना जरूरी होता है । इस नियमके अनुसार प्रस्तुत संस्करणका कार्यविभाग हम लोगोंने कर लिया। जिसका परिज्ञान अनेक सम्भूयकारी व्यक्तियोंको उपयोगी होगा। इस दृष्टिसे उस विभाजनका यहां संक्षेपमें वर्णन करना प्रस्तुत होगा। कार्यविभाजनका मूल सिद्धान्त यह है कि जो जिस अंशको अधिक सरलतासे, विशेष पूर्णतासे और विशेष सुचारु रूपसे करनेका अधिकारी हो उसे वह अंश मुख्यतया करनेको सौंपा जाय । दूसरा सिद्धान्त यह भी है कि समूह गत अन्य व्यक्तियाँ भी अपने-अपने अपरिचित अल्पपरिचित या अल्प अभ्यस्त अंशोंको भी दूसरे सहचारियोंके अनुभव व कौशलसे ठीक-ठीक सीख लें और अन्तमें सभी सब अंशोंको परिपूर्णतया सम्पादित करनेके अधिकारी हो जायँ । इन दो सिद्धान्तोंके आधार पर हम तीनोंने अपना-अपना कार्यप्रदेश मुख्यरूपसे स्थिर कर लिया । यों तो किसी एकका कोई ऐसा कार्य न था जिसे दूसरे देखते न हों। पर कार्यविभाग जवाबदेही और मुख्यताकी दृष्टिसे किया गया । मेरे जिम्मे मूल ग्रन्थकी पाठ शुद्धि तथा लिये गए पाठान्तरोंका शुद्धाशुद्धत्वविवेक-ये दो काम रहे। और संगृहीत अवतरणों के आधारसे तथा स्वानुभवसे नई वृत्ति लिखनेका काम भी मेरे जिम्मे रहा । टीका लिखनेमें उपयोगी होनेवाले तथा तुलनामें उपयोगी होनेवाले समग्र अवतरणोंके संग्रहका कार्यभार पं० महेन्द्रकुमारजीके ऊपर रहा । कभी-कभी जरूरतके अनुसार प्रेस प्रूफ और मैटर देखनेका कार्य भी उनके ऊपर आता ही रहा । पर संगृहीत सभी अवतरणोंकी या नवीन लिखित टीकाकी आख़िरी काट छांट करके उसे प्रेस योग्य अन्तिमरूप देनेका तथा अथेतिसमग्र प्रूफोंको देखनेका एवं मूलके नीचे दी हुई तुलना, विषयानुक्रम, परिशिष्ट आदि वाक़ीके सब कामोंका भार पं० दलसुखजीके ऊपर रहा। अन्तमें मैं यह सत्य प्रगट कर देना उचित समझता हूँ कि मेरे दोनों सहृदय सहकारी मित्र अपनी धीर कुशलतासे मेरा उपयोग न करते तो मैं अपनी नितान्त परतन्त्र स्थितिमें कुछ भी करनेमें असमर्थ था । अतएव अगर इस नये संस्करणकी थोड़ी भी उपयोगिता सिद्ध हो तो उसका सर्वांश श्रेय मेरे दोनों सहकारी मित्रोंको है। सुखलाल संघवी ८ " " " महोपाध्याय श्रीमद् यशोविजयविरचित ग्रन्थों की सूची। लभ्य ग्रन्थ ३९ समीकापार्श्वनाथस्तोत्रम् । १ अध्यात्ममतपरीक्षा (स्वोपज्ञटीका) ४० मादिजिनस्तवनम्, विजयप्रभसूरिस्वाध्यायः गोडीपार्श्वनाथस्तोत्रादिः, द्रव्यपर्याययुक्तिः २ अध्यात्मसार: ३ अध्यात्मोपनिषत् इत्यादि। ४ अनेकान्तव्यवस्था अपूर्णलभ्य ग्रन्थ ५ आध्यात्मिकमतदलनम् (स्वोपज्ञटोका) १ अस्पृशद्गतिवादः ६ आराधकविराधकचतुर्भङ्गी ( २ उत्पाद व्यय-ध्रौव्यसिद्धिटीका ७ अष्टसहस्रीविवरणम् ३ कर्मप्रकृतिलघुवृत्तिः ८ उपदेशरहस्यम् ४ कूपदृष्टान्तविशदीकरणम् ९ ऐन्द्रस्तुतिचतुर्विशतिका ( ५ ज्ञानार्णवः सटीकः १० कर्मप्रकृतिटीका ६ तिङन्तान्वयोक्तिः ११ गुरुतत्त्वविनिश्चयः ७ तत्त्वार्थटीका १२ ज्ञानबिन्दुः १३ ज्ञानसारः अलभ्य ग्रन्थ १४ जैनतर्कभाषा १ अध्यात्मोपदेशः १५ देवधर्मपरीक्षा २ अलकारचूडामणिटीका १६ द्वात्रिंशद्वात्रिंशिका ( ३ अनेकान्तप्रवेशः १७ धर्मपरीक्षा ४ आत्मख्यातिः १८ धर्मसंग्रहटिप्पनम् ५ आकरप्रन्थः (? १९ नयप्रदीपः (,) ६ काव्यप्रकाशटीका २० नयोपदेशः ( स्वोपज्ञनयामृततरंगिणी टीका) ७ ज्ञानसारावचूर्णिः २१ नयरहस्यम् ८ छन्दश्चूडामणिः २२ निशाभक्तप्रकरणम् ९ तत्वालोकस्वोपज्ञविवरणम् २३ न्यायखण्डखाद्यम्-वीरस्तवः (स्वोपज्ञटीका) १० त्रिसूध्यालोकः २४ न्यायालोकः ११ द्रव्यालोकस्वोपज्ञविवरणम् २५ परमात्मपञ्चविंशतिका १२ न्यायविन्दुः २६ परमज्योतिपञ्चविंशतिका १३ प्रमाणरहस्यम् २७ पातञ्जलयोगदर्शनविवरणम् १४ मंगलवादः २८ प्रतिमाशतकम् ६५ लताद्वयम् २९ भापारहस्यम् (,) १६ वादमाला ३० मार्गपरिशुद्धिः १७ वादार्णवः ३१ यतिलक्षणसमुच्चयः १८ वादरहस्यम् ३२ योगविंशिकाटीका १९ विधिवादः ३३ वैराग्यकल्पलता २० वेदान्तनिर्णयः ३४ योगदीपिका (पोडशकवृत्तिः) २१ शप्रकरणम् ३५ सामाचारीप्रकरणम् (स्वोपज्ञटीका) २२ सिद्धान्ततर्कपरिष्कारः ३६ स्याद्वादकल्पलता ( शास्त्रवार्तासमुच्चयटीका) २३ सिद्धान्तमकरीटीका ३७ स्तोत्रावलिः २४ स्याद्वादरहस्यम् ३८ संखेश्वरपार्श्वनाथस्तोत्रम् । २५ स्याद्वादमध्नुपा (स्याहमारीटीका) ( " विषयानुक्रमः। पृष्ठम् १-३० ... ... ... ... ... ... २ २ ... ३ ... ३ ... ... ४ ... G G ... ... ... ९ ... ... १२ १२ १३ विषयः जैनतर्कभापा १. प्रमाणपरिच्छेदः १. प्रमाणसामान्यस्य लक्षणनिरूपणम् २. प्रत्यक्षं लक्षयित्वा सांव्यवहारिक-पारमार्थिकत्वाभ्यां तद्विभजनम् ३. सांव्यवहारिकप्रत्यक्षस्य निरूपणम् , मतिश्रुतयोविवेकश्च ४. मतिज्ञानस्य अवमहादिभेदेन चातुर्विध्यप्रकटनम् ५. व्यञ्जनावग्रहस्य चातुर्विध्यप्रदर्शने मनश्चक्षुपोरप्राप्यकारित्वसमर्थनम् ६. अर्थावग्रहस्य निरूपणम् ७. ईहावायधारणानां क्रमशो निरूपणम् ८. श्रुतज्ञानं चतुर्दशधा विभज्य तन्निरूपणम् ९. पारमार्थिकं प्रत्यक्षं विधा विभज्य प्रथममवधेर्निरूपणम् १०. मनःपर्यवज्ञानस्य निरूपणम् ११. केवलज्ञानस्य निरूपणम् १२. परोक्षं लक्षयित्वा पञ्चधा विभज्य च स्मृतेनिरूपणम् १३. प्रत्यभिज्ञानस्य निरूपणम् १४. तर्कस्य निरूपणम् १५. अनुमान द्वेधा विभज्य स्वार्थानुमानस्य लक्षणम् १६. हेतुस्वरूपचर्चा १७. साध्यस्वरूपचर्चा १८. परार्थानुमानस्य प्रतिपादनम् १९. हेतुप्रकाराणामुपदर्शनम् ... २०. हेत्वाभासनिरूपणम् २१. भागमप्रमाणनिरूपणम् २२. सप्तभङ्गीस्वरूपचर्चा २. नयपरिच्छेदः १. नयानां स्वरूपनिरूपणम् २. नयाभासानां निरूपणम् ... ३. निक्षेपपरिच्छेदः 1. नामादिनिःक्षेपनिरूपणम् २. निःक्षेपाणां नयेपु योजना ३. जीवविपये निःक्षेपाः प्रशस्तिः तात्पर्यसंग्रहा वृत्तिः परिशिष्टानि १. जैनतर्कभापागतानां विशेषनाम्नां सूची २. जैनतर्कभापागतानां पारिभाषिकशब्दानां सूची ३. जैनतर्कभापागतानामवतरणानां सूची ४. तात्पर्यसंग्रहवृत्त्यन्तर्गतानां विशेषनाम्नां सूची ५. शुद्धिपत्रकम् १६ :: १८ ... ... २१-२५ ... ... ... २५-२९ ... ... :: २८ ... ... ... ६७-७७ ६७ ६८ ... ...

A . महोपाध्यायश्रीयशोविजयकृता ॥जै न त क मा पा॥ ॥ Reace १. प्रमाणपरिच्छेदः। ऐन्द्रवृन्दनतं नत्वा जिनं तत्त्वार्थदेशिनम् । प्रमाणनयनिक्षेपैस्तर्कभाषां तनोम्यहम् ॥ [१. प्रमाणसामान्यस्य लक्षणनिरूपणम् । ] ६१. तत्र-स्वपरव्यवसायि ज्ञानं प्रमाणम्-स्वम् आत्मा ज्ञानस्यैव स्वरूपमित्य- र्थः, परः तस्मादन्योऽर्थ इति यावत्, तौ व्यवस्यति यथास्थितत्वेन निश्चिनोतीत्ये- 5 वंशीलं स्वपरव्यवसायि । अत्र दर्शनेऽतिव्याप्तिवारणाय ज्ञानपदम्। संशयविपर्ययान- ध्यवसायेषु तद्वारणाय व्यवसायिपदम् । परोक्षवुद्ध्यादिवादिनां मीमांसकादीनाम् , वाद्यार्थापलापिनां ज्ञानाद्यद्वैतवादिनां च मतनिरासाय स्वपरेति स्वरूपविशेषणार्थमुक्तम् । ननु यद्येवं सम्यग्ज्ञानमेव प्रमाणमिष्यते तदा किमन्यत् तत्फलं वाच्यमिति चेत् ; सत्यम् । स्वार्थव्यवसितेरेव तत्फलत्वात् । नन्वेवं प्रमाणे स्वपरव्यवसायित्वं न स्यात् , 10 प्रमाणस्य परव्यवसायित्वात् फलस्य च स्वव्यवसायित्वादिति चेत् ;न%; प्रमाण-फलयोः कथञ्चिदभेदेन तदुपपत्तेः । इत्थं चात्मव्यापाररूपमुपयोगेन्द्रियमेव प्रमाणमिति स्थितम् ; न ह्यव्यापृत आत्मा स्पर्शादिप्रकाशको भवति, निर्व्यापारेण कारकेण क्रियाजननायो- गात् , मसृणतूलिकादिसन्निकण सुपुप्तस्यापि तत्प्रसङ्गाच । ६२. केचित्तु- "ततोऽर्थग्रहणाकारा शक्तिर्ज्ञानमिहात्मनः । करणत्वेन निर्दिष्टा न विरुद्धा कथञ्चन ॥ १॥" [ तत्त्वार्थश्लोकवा० १.१.२२ ] इति-लब्धीन्द्रियमेवार्थग्रहणशक्तिलक्षणं प्रमाणं सङ्गिरन्ते तदपेशलम् ; उपयोगात्मना 15 १-०निःक्षेपै०-५ ०-प्र०सं०१०।२ प्र. न. १. २.१३त्या. र. पृ० ३३-३४।४ स्या. र. पृ० ५० ।

२. जैनतर्कभापा। करणेन लब्धेः फले व्यवधानात् , शक्तीनां परोक्षत्वाभ्युपगमेन करण-फलज्ञानयोः परोक्ष- प्रत्यक्षत्वाभ्युपगमे प्राभाकरमतप्रवेशाच । अथ ज्ञानशक्तिरप्यात्मनि स्वाश्रये परिच्छिन्ने द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षेति न दोप इति चेत् ; न द्रव्यद्वारा प्रत्यक्षत्वेन सुखादिवत् स्वसंवि- दितत्वाव्यवस्थितः, 'ज्ञानेन घटं जानामि' इति करणोल्लेखानुपपत्तेश्च ; न हि कलश- 5 समाकलनवेलायां द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षाणामपि कुशूलकपालादीनामुल्लेखोऽस्तीति । [२. प्रत्यक्षं लक्षयित्वा सांव्यवहारिक-पारमार्थिकत्वाभ्यां तद्विभजनम् । ] ६३. तद् द्विभेदम्-प्रत्यक्षम् , परोक्षं च । अक्षम्-इन्द्रियं प्रतिगतम्-कार्यत्वे- नाश्रितं प्रत्यक्षम् , अथवाऽश्नुते ज्ञानात्मना सर्वार्थान् व्यामोतीत्यौणादिकनिपातनात् अक्षो जीवः तं प्रतिगतं प्रत्यक्षम् । न चैवमवध्यादौ मत्यादौ च प्रत्यक्षव्यपदेशो न 10 स्यादिति वाच्यम् । यतो व्युत्पत्तिनिमित्तमेवैतत् , प्रवृत्तिनिमित्तं तु एकार्थसमवायिनाs- नेनोपलक्षितं स्पष्टतावत्त्वमिति । स्पष्टता चानुमानादिभ्योऽतिरेकेण विशेषप्रकाशनमि- त्यदोपः । अक्षेभ्योऽक्षाद्वा परतो वर्तत इति परोक्षम् , अस्पष्टं ज्ञानमित्यर्थः । ६४. प्रत्यक्षं द्विविधम्-सांव्यवहारिकम् , पारमार्थिकं चेति । समीचीनो बाधा- रहितो व्यवहारः प्रवृत्तिनिवृत्तिलोकाभिलापलक्षणः संव्यवहारः, तत्प्रयोजनकं सांव्यव- 15 हारिकम्-अपारमार्थिकमित्यर्थः, यथा अस्मदादिप्रत्यक्षम् । तद्धीन्द्रियानिन्द्रियग्यवहि- तात्मव्यापारसम्पाद्यत्वात्परमार्थतः परोक्षमेव, धूमात् अग्निज्ञानवद् व्यवधानाविशेषात् । किञ्च, असिद्धानैकान्तिकविरुद्धानुमानाभासवत् संशयविपर्ययानध्यवसायसम्भवात् , सदनुमानयत् सङ्केतस्मरणादिपूर्वकनिश्चयसम्भवाच परमार्थतः परोक्षमेवैतत् । [३. सांव्यवहारिकप्रत्यक्षस्य निरूपणम् , मतिश्रुतयोविवेकश्च । ] . ६५. एतच द्विविधम्-इन्द्रियजम्, अनिन्द्रियजं च । तत्रेन्द्रियजं चक्षुरादि. जनितम् , अनिन्द्रियजं च मनोजन्म । यद्यपीन्द्रियजज्ञानेऽपि मनो व्यापिपर्ति; तथापि तत्रेन्द्रियस्यैवासाधारणकारणत्वाददोपः । द्वयमपीदं मतिश्रुतभेदाद् द्विधा । तत्रेन्द्रिय- मनोनिमित्तं श्रुताननुसारि ज्ञानं मतिज्ञानम् , श्रुतानुसारि च श्रुतज्ञानम् । श्रुतानुसा- रित्वं च-सङ्केतविषयपरोपदेशं श्रुतग्रन्थं वाऽनुसृत्य वाच्यवाचकभावेन संयोज्य 'घटो 25 घट:' इत्याद्यन्तर्जन्या(जैल्पा)कारग्राहित्वम् । नन्वेवमवग्रह एव मतिज्ञानं स्यान्न, स्वीहादयः, तेषां शब्दोल्लेखसहितत्वेन श्रुतत्वप्रसङ्गादिति चेत् ; न; श्रुतनिश्रिताना. मप्यवग्रहादीनां सङ्केतकाले श्रुतानुसारित्वेऽपि व्यवहारकाले तदननुसारित्वात् , अभ्या- सपाटववशेन श्रुतानुसरणमन्तरेणापि विकल्पपरम्परापूर्वकविविधवचनप्रवृत्तिदर्शनात् । अझोपामादौ शब्दाद्यवग्रहणे च श्रुताननुसारित्वान्मतित्वमेव, यस्तु तत्र श्रुतानुसारी 30 प्रत्ययस्तत्र श्रुतत्वमेवेत्यवधेयम् । 20 १ तुलना-प्र, न २. १.। २ तुलना-प्र. न. २. ३.। ३तुलना-प्र. न. २. ४.। ४ तुलना-प्र. न. २. ५.।

- 10 १. प्रमाणपरिच्छेदः । [४. मतिज्ञानस्य अवग्रहादिभेदेन चातुर्विध्यप्रकटनम् ।] $६. मतिज्ञानम्-अवग्रहहापायधारणाभेदाच्चतुर्विधम् । अवकृष्टो ग्रहः-अब- ग्रहः । स द्विविधः-व्यञ्जनावग्रहः, अर्थावग्रहश्च । व्यज्यते प्रकटीक्रियतेऽर्थोऽनेनेति व्यञ्जनम्-कदम्बपुष्पगोलकादिरूपाणामन्तर्निवृत्तीन्द्रियाणां शब्दादिविषयपरिच्छेदहेतु- शक्तिविशेषलक्षणमुपकरणेन्द्रियम् , शब्दादिपरिणतद्रव्यनिकुरुम्बम्, तदुभयसम्बन्धश्च । 5 ततो व्यञ्जनेन व्यञ्जनस्यावग्रहो व्यञ्जनावग्रह इति मध्यमपदलोपी समासः। अथ अज्ञानम् अयं बधिरादीनां श्रोत्रशब्दादिसम्बन्धवत् तत्काले ज्ञानानुपलम्भादिति चेत् ; न; ज्ञानोपादानत्वेन तत्र ज्ञानत्वोपचारात् , अन्तेऽर्थावग्रहरूपज्ञानदर्शनेन तत्कालेऽपि चेष्टाविशेषाद्यनुमेयस्वमज्ञानादितुल्याव्यक्तज्ञानानुमानाद्वा एकतेजोऽवयववत् तस्य तनु- त्वेनानुपलक्षणात् । [५. व्यञ्जनावग्रहस्य चातुर्विध्यप्रदर्शने मनश्चक्षुपोरप्राप्यकारित्वसमर्थनम् । ] ६७. से च नयन-मनोवर्जेन्द्रियभेदाचतुर्धा, नयन-मनसोरप्राप्यकारित्वेन व्य जनावग्रहासिद्धेः, अन्यथा तयोयिकृतानुग्रहोपघातपात्रत्वे जलानलदर्शन-चिन्तनयोः क्लेद-दाहापत्तेः। रवि-चन्द्रायवलोकने चक्षुषोऽनुग्रहोपघातौ दृष्टावेवेति चेत् । न; प्रथ- मावलोकनसमये तददर्शनात् , अनवरतावलोकने च प्राप्तेन रविकिरणादिनोपघातस्या- 15 (स्य), नैसर्गिकसौम्यादिगुणे चन्द्रादौ चावलोकिते उपघाताभावादनुग्रहाभिमानस्योप- पत्तेः । मृतनष्टादिवस्तुचिन्तने, इष्टसङ्गमविभवलाभादिचिन्तने च जायमानौ दौर्बल्योरः- क्षतादि-वदनविकासरोमाञ्चोगमादिलिङ्गकावुपघातानुग्रहौ न मनसः, किन्तु मनस्त्वपरि- णतानिष्टेष्टपुद्गलनिचयरूपद्रव्यमनोऽवष्टम्भेन हृन्निरुद्धवायुभेषजाभ्यामिव जीवस्यैवेति न ताभ्यां मनसः प्राप्यकारित्वसिद्धिः । ननु यदि मनो विषयं प्राप्य न परिच्छिनत्ति तदा 20 कथं प्रसुप्तस्य 'मेवादौ गतं मे मनः' इति प्रत्यय इति चेत् । न मेर्वादौ शरीरस्येव मनसो गमनस्वमस्यासत्यत्वात्, अन्यथा विबुद्धस्य कुसुमपरिमलायध्वजनितपरिश्रमा- धनुग्रहोपघातप्रसङ्गात्। ननु स्वमानुभूतजिनस्नात्रदर्शन-समीहितार्थालाभयोरनुग्रहोपघातौ विवुध(द्ध)स्य सतो दृश्यते एवेति चेत् दृश्येतों स्वमविज्ञानकृतौ तौ, स्वमविज्ञानकृतं क्रि- याफलं तु तृप्त्यादिकं नास्ति, यतो विषयप्राप्तिरूपा प्राप्यकारिता मनसो युज्यतेति ब्रूमः। 25 क्रियाफलमपि स्वप्ने व्यञ्जनविसर्गलक्षणं दृश्यत एवेति चेत् । तत् तीव्राध्यवसायकृतम् , न तु कामिनीनिधुवनक्रियाकृतमिति को दोपः ? ननु स्त्यानर्धिनिद्रोदये गीतादिकं शृण्वतो व्यञ्जनावग्रहो मनसोऽपि भवतीति चेत् । न तदा स्वमाभिमानिनोऽपि श्रव- णाद्यवग्रहेणैवोपपत्तेः । ननु च्यवमानो न जानाति' इत्यादिवचनात् सर्वस्यापि छन- स्थोपयोगस्यासङ्घयसमयमानत्वात् , प्रतिसमयं च मनोद्रव्याणां ग्रहणात् विषयमस- 30 प्राप्तस्यापि मनसो देहादेनिर्गतस्य तस्य च स्वसन्निहितहृदयादिचिन्तनवेलायां कथं २ व्यंजनावग्रहः । ३ आज्ञार्थकं तृतीयपुरुषद्विवचनम्-सम्पा० । ४ "चुइस्यामित्ति जाणइ चुएमित्ति जाणइ चयमाणे न याणेइ सुहुमे णं से काले पन्नत्ते।"-आचा० २.१७६ । ५ देहानिर्ग०-२० । .: १अवग्रहः। ६ तस्य स्व०-प्र०व० ।

4 ४ । - ६ . जैनतर्कभाषा। व्यञ्जनावग्रहो न भवतीति चेत् । शृणु; ग्रहणं हि मनः, न तु ग्राह्यम् । ग्राह्यवस्तुग्रहणे चं व्यञ्जनावग्रहो भवतीति न मनोद्रव्यग्रहणे तदवकाशः; सन्निहितहृदयादिदेशग्रह- वेलायामपि नैतदवकाशः, बाह्यार्थापेक्षयैव प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्वव्यवस्थानाद , क्षयोपशमपाटवेन मनसः प्रथममर्थानुपलब्धिकालासम्भवाद्वा; श्रोत्रादीन्द्रियव्यापार- 5 कालेऽपि मनोव्यापारस्य व्यञ्जनावग्रहोत्तरमेवाभ्युपगमात् , 'मनुतेऽर्थान् मन्यन्तेऽर्थाः अनेनेति वा मनः' इति मनःशब्दस्यान्वर्थत्वात्, अर्थभापणं विना भापाया इव अर्थ- मननं विना मनसोऽप्रवृत्तेः। तदेवं नयनमनसोर्न व्यञ्जनावग्रह इति स्थितम् । [६. अर्थावग्रहस्य निरूपणम् ।] ६८. स्वरूपनामजातिक्रियागुणद्रव्यकल्पनारहितं सामान्यग्रहणम् अर्थावग्रहः । 10 कथं तर्हि 'तेन शब्द इत्यवगृहीतः' इति सूत्रार्थः, तत्र शब्दाद्युल्लेखराहित्याभावादिति येत् ; न; 'शब्दः' इति वक्त्रैव भणनात् , रूपरसादिविशेषव्यावृत्त्यनवधारणपरत्वाद्वा । यदि च 'शब्दोऽयम्' इत्यध्यवसायोऽवग्रहे भवेत् तदा शब्दोल्लेखस्यान्तर्मुहर्तिकत्वादर्था- वग्रहस्यैकसामा(म)यिकत्वं भज्येत । स्यान्मतम्-'शब्दोऽयम्' इति सामान्यविशेषग्रहणम- प्यर्थावग्रह इप्यताम् , तदुत्तरम्-'पायो माधुर्यादयः शङ्खशब्दधर्मा इह, न तु शार्ङ्गधर्माः 15 खरकर्कशत्वादयः' इतीहात्पत्तेः-इति; मैवम् ; अशब्दव्यावृत्त्या विशेषप्रतिभासेनास्या- sपायत्वात् स्तोकग्रहणस्योत्तरोत्तरभेदापेक्षयाऽव्यवस्थितत्वात् । किञ्च, 'शब्दोऽयम्' इति ज्ञान(नं) शब्दगतान्वयधर्मेपु रूपादिव्यावृत्तिपालोचनरूपामीहां विनाऽनुपपन्नम् , सा च नागृहीतेऽर्थे सम्भवतीति तद्ग्रहणं अस्मदभ्युपगतार्थावग्रहकालात् प्राक् प्रति- पत्तव्यम्, स च व्यञ्जनावग्रहकालोऽर्थपरिशून्य इति यत्किञ्चिदेतत् । नन्वनन्तरम्-'क 20 एप शब्दः' इति शब्दत्वावान्तरधर्मविषयकेहानिर्देशात् 'शब्दोऽयम्' इत्याकार एवाव- ग्रहोऽभ्युपेय इति चेत् । न; 'शब्दः शब्दः' इति भापकेणैव भणनात् अर्थावग्रहेऽव्यक्त- शब्दश्रवणस्यैव सूत्रे निर्देशात् , अव्यक्तस्य च सामान्यरूपत्वादनाकारोपयोगरूपस्य चास्य तन्मात्रविषयत्वात् । यदि च व्यञ्जनावग्रह एवाव्यक्तशब्दग्रहणमिप्येत तदा सोऽप्यर्थावग्रहः स्यात् , अर्थस्य ग्रहणात् । ६९. केचित्तु-'सङ्केतादिविकल्पविकलस्य जातमात्रस्य वालस्य सामान्यग्रह- णम् , परिचितविषयस्य त्वाधसमय एवं विशेषज्ञानमित्येतदपेक्षया 'तेन शब्द इत्यव- गृहीतः' इति नानुपपन्नम्'-इत्याहुः; तन्नः एवं हि व्यक्ततरस्य व्यक्तशब्दज्ञानमति- क्रम्यापि सुबहुविशेषग्रहप्रसङ्गात् । न चेष्टापत्तिः; 'न पुनर्जानाति क एप शब्दः' इति सूत्रावयवस्याविशेषेणोक्तत्वात् , प्रकृष्टमतेरपि शब्दं धर्मिणमगृहीत्वोत्तरोत्तरसुबहुधर्म- 30 ग्रहणानुपपत्तेश्च । $१०. अन्ये तु-'आलोचनपूर्वकमर्थावग्रहमाचक्षते, तत्रालोचनमव्यक्तसामा- . 25 १.०ग्रहणे व्य.-सं०।

M , ~ १. प्रमाणपरिच्छेदः। न्यग्राहि, अर्थावग्रहस्त्वितरच्यावृत्तवस्तुस्वरूपग्राहीति न सूत्रानुपपत्तिः'-इति; तदसत् यत आलोचनं व्यञ्जनावग्रहात् पूर्वं स्यात् , पश्चाद्वा, स एव वा ? नाद्यः; अर्थव्यञ्जन- सम्वन्धं विना तदयोगात् । न द्वितीयः; व्यञ्जनावग्रहान्त्यसमयेऽर्थावग्रहस्यैवोत्पादा- दालोचनानवकाशात् । न तृतीयः; व्यञ्जनावग्रहस्यैव नामान्तरकरणात् , तस्य चार्थ- शून्यत्वेनार्थालोचनानुपपत्तेः । किञ्च, आलोचनेनेहां विना झटित्येवार्थावग्रहः कथं 5 जन्यताम् ? युगपचहावग्रही पृथगसङ्खथेयसमयमानौ कथं घटेताम् ? इति विचारणीयम् । नन्ववग्रहेऽपि क्षिप्रेतरादिभेदप्रदर्शनादसङ्खचसमयमानत्वम् , विशेषविषयत्वं चाविरुद्ध- मिति चेत् नः तत्त्वतस्तेषामपाय भेदत्वात् , कारणे कार्योपचारमाश्रित्यावग्रह भेदत्वप्रति- पादनात् , अविशेषविषये विशेषविषयत्वस्यावास्तवत्वात् । ६ ११, अथवा अवग्रहो द्विविधः-नैश्चयिकः, व्यावहारिकश्च । आद्यः सामा- 10 न्यमात्रग्राही, द्वितीयश्च विशेषविषयः तदुत्तरमुत्तरोत्तरधर्माकाहारूपेहाप्रवृत्तेः, अन्यथा अवग्रहं विनेहानुत्थानप्रसङ्गात् अत्रैव क्षिप्रेतरादिभेदसङ्गतिः, अत एव चोपर्युपरि ज्ञान- प्रवृत्तिरूपसन्तानव्यवहार इति द्रष्टव्यम् । [ ७. ईहावायधारणानां क्रमशो निरूपणम्। ] ६१२. अवगृहीतविशेषाकाङ्क्षणम्-ईहा, व्यतिरेकधर्मनिराकरणपरोऽन्वयधर्म- 15 घटनप्रवृत्तो बोध इति यावत्, यथा-'श्रोत्रग्राह्यत्वादिना प्रायोऽनेन शब्देन भवितव्यम्' 'मधुरत्वादिधर्मयुक्तत्वात् शाङ्खादिना' वा इति । न चेयं संशय एव; तस्यैकत्र धर्मिणि विरुद्धनानार्थज्ञानरूपत्वात् , अस्याश्च निश्चयाभिमुखत्वेन विलक्षणत्वात् । १३. ईहितस्य विशेषनिर्णयोऽवायः, यथा-'शब्द एवायम्', 'शाङ्ख एवायम्' इति वा। ६१४. स एव दृढतमावस्थापन्नो धारणा । सा च त्रिविधा-अविच्युतिः, स्मृतिः, वासना च । तत्रैकार्थोपयोगसातत्यानिवृत्तिः अविच्युतिः । तस्यैवार्थोपयोगस्य काला- न्तरे 'तदेव' इत्युल्लेखेन समुन्मीलनं स्मृतिः। अपायाहितः स्मृतिहेतुः संस्कारो वासना। द्वयोरवग्रहयोरवर्ग्रहत्वेन च तिसृणां धारणानां धारणात्वेनोपग्रहान्न विभागव्याघातः । ६१५. केचित्तु-अपनयनमपायः, धरणं च धारणेति व्युत्पत्त्यर्थमात्रानुसारिणः- 25 'असनार्थविशेषव्यतिरेकावधारणमपायः, सद्भूतार्थविशेषावधारणं च धारणा'-इत्याहुः; तन्नः क्वचित्तदन्यव्यतिरेकपरामर्शात्, क्वचिदन्वयधर्मसमनुगमात् , क्वचिच्चोमाभ्यामपि भवतोऽपायस्य निश्चयैकरूपेण भेदाभावात् , अन्यथा स्मृतेराधिक्येन मतेः पञ्चभेद- त्वप्रसङ्गात् । अथ नास्त्येव भवदभिमता धारणेति भेदचतुष्टया(य)व्याघातः; तथाहि- उपयोगोपरमे का नाम धारणा ? उपयोगसातत्यलक्षणा अविच्युतिश्चापायान्नातिरिच्यते । 30 20 ३ प्र. न. २. १०। ४-०रवग्रहत्वन १प्र. मी. १. १. २७ । २ तुलना प्र. न. २.९। तिसृणां च धारणानाम्-इति पाठः सम्यग भाति ।

६ जैनतर्कभापा। . या च घटाधुपयोगोपरमे सङ्ख्येयमसङ्खयेयं वा कालं वासनाऽभ्युपगम्यते, या च तदेव' इतिलक्षणा स्मृतिः सा मत्यंशरूपा धारणा न भवति मत्युपयोगस्य प्रागेवोपरतत्वात् , कालान्तरे जायमानोपयोगेऽप्यन्वयमुख्यां धारणायां स्मृत्यन्तर्भावादिति चेत्, न अपायप्रवृत्त्यनन्तरं क्वचिदन्तर्मुहूत्तं यावदपायधाराप्रवृत्तिदर्शनात् अविच्युतेः, पूर्वापर- 5 दर्शनानुसन्धानस्य 'तदेवेदम्' इति स्मृत्याख्यस्य प्राच्यापायपरिणामस्य, तदाधायक- संस्कारलक्षणाया वासनायाश्च अपायाभ्यधिकत्वात् । ६१६. नन्वविच्युतिस्मृतिलक्षणौ ज्ञानभेदौ गृहीतग्राहित्वान्न प्रमाणम् ; संस्कारश्च किं स्मृतिज्ञानावरणक्षयोपशमो वा, तज्ज्ञानजननशक्तिर्वा, तद्वस्तुविकल्पो वेति त्रयी गतिः ? तत्र-आद्यपक्षद्वयमयुक्तम् ; ज्ञानरूपत्वाभावात् तद्भेदानां चेह विचार्यत्वात् । 10 तृतीयपक्षोऽप्ययुक्त एवः सङ्ख्येयमसङ्खथेयं वा कालं वासनाया इष्टत्वात् , एतावन्तं च कालं वस्तुविकल्पायोगादिति न कापि धारणा घटत इति चेत् ; न; स्पष्टस्पष्टतरस्पष्ट- तमभिन्नधर्मकवासनाजनकत्वेन अन्यान्यवस्तुग्राहित्वादविच्युतेः प्रागननुभूतवस्त्वेक- स्वग्राहित्वाच स्मृतेः अगृहीतग्राहित्वात् , स्मृतिज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमरूपायास्तद्विज्ञान- जननशक्तिरूपायाश्च वासनायाः स्वयमज्ञानरूपत्वेऽपि कारणे कार्योपचारेण ज्ञानभेदा- 15 भिधानाविरोधादिति । १७. एते चावग्रहादयो नोक्रमव्यतिक्रमाभ्यां न्यूनत्वेन चोत्पद्यन्ते, ज्ञेयस्ये. स्थमेव ज्ञानजननस्वाभाव्यात् । क्वचिदभ्यस्तेऽपायमात्रस्य दृढवासने विषये स्मृति- मात्रस्य चोपलक्षणेऽप्युत्पलपत्रशतव्यतिभेद इव सौक्षम्यादवग्रहादिक्रमानुपलक्षणात् । तदेवम् अर्थावग्रहादयो मनइन्द्रियैः पोढा भिद्यमाना व्यञ्जनावग्रहचतुर्मेदैः सहाप्टाविं- 20 शतिर्मतिभेदा भवन्ति । अथवा बहु-बहुविध-क्षिप्रा-ऽनिश्रित-निश्चित-ध्रुवैः सप्रतिपक्षा- दशभिभैदैर्भिन्नानामेतेषां पत्रिंशदधिकानि त्रीणि शतानि भवन्ति । वहादयश्च भेदा विपयापेक्षाः; तथाहि-कश्चित् नानाशब्दसमूहमाकर्णित बहुं जानाति-'एतावन्तोत्र शङ्खशब्दा एतावन्तश्च पटहादिशब्दाः' इति पृथग्भिन्नजातीयं क्षयोपशमविशेषात् परि- च्छिनत्तीत्यर्थः । अन्यस्त्वल्पक्षयोपशमत्वात् तत्समानदेशोऽप्यवहुम् । अपरस्तु क्षयोप- 25 शमवैचित्र्यात् बहुविधम् , एकैकस्यापि शङ्खादिशब्दस्य स्निग्धत्वादिबहुधर्मान्वितत्वेना- प्याकलनात् । परस्त्ववहुविधम् , स्निग्धत्वादिस्वल्पधान्वितत्वेनाकलनात् । अन्यस्तु क्षिप्रम् , शीघ्रमेव परिच्छेदात् । इतरस्त्वक्षिप्रम् , चिरविमर्शेनाकलनात् । परस्त्वनिश्रितम् , लिङ्गं विना स्वरूपत एव परिच्छेदात् । अपरस्तु निश्रितम् , लिङ्गनिश्रयाऽऽकलनात् । [ कश्चित्तु निश्चितम्, विरुद्धधर्मानालिङ्गितत्वेनावगतेः । इतरस्त्वनिश्चितम्, विरुद्धधर्मा- 30 सिततयावगमात् । ] अन्यो ध्रुवम् , बह्वादिरूपेणावगतस्य सर्वदेव तथा बोधात् । अन्य- स्त्वध्रुवम् , कदाचिह्वादिरूपेण कदाचित्ववहादिरूपेणावगमादिति । उक्ता मतिभेदाः। - . १ तुलना-प्र. न. २. १४ । २ बहु जा--प्र० व० । ३-बहु अ०-प्र० ४ अयं पाठः कोष्ठके एव पूर्व मुद्रितः । स च अन्यत्र क्वापि प्रतावसन्नपि औचित्यवशात् तथैवान गृहीतः ।

. १. प्रमाणपरिच्छेदः । [८. श्रुतज्ञानं चतुर्दशधा विभज्य तन्निरूपणम् । ] $ १८. श्रुतभेदा उच्यन्ते-श्रुतम् अक्षर-सज्ञि-सम्यक्-सादि-सपर्यवसित-गमिका- ऽङ्गप्रविष्टभेदैः सप्रतिपक्षश्चतुर्दशविधम् । तत्राक्षरं त्रिविधम्-सञ्ज्ञा-व्यञ्जन-लब्धिभेदात् । सञ्ज्ञाक्षरं बहुविधलिपिभेदम् , व्यञ्जनाक्षरं भाष्यमाणमकारादि-एते चोपचाराच्छुते । लब्ध्यक्षरं तु इन्द्रियमनोनिमित्तः श्रुतोपयोगः, तदावरणक्षयोपशमो वा-एतच परोपदेशं 5 विनापि नासम्भाव्यम् , अनाकलितोपदेशानामपि मुग्धानां गवादीनां च शब्दश्रवणे तदाभिमुख्यदर्शनात् , एकेन्द्रियाणामप्यव्यक्ताक्षरलाभाच्च । अनक्षरश्रुतमुच्छ्वासादि, तस्यापि भावभुतहेतुत्वात् , ततोऽपि 'सशोकोऽयम्' इत्यादिज्ञानाविर्भावात् । अथवा श्रुतोपयुक्तस्य सर्वात्मनैवोपयोगात् सर्वस्यैव व्यापारस्य श्रुतरूपत्वेऽपि अत्रैव शास्त्रज्ञ- लोकप्रसिद्धा रूढिः । समनस्कस्य श्रुतं सज्ञिश्रुतम् । तद्विपरीतमसज्ञिश्रुतम् । 10 सम्यक्श्रुतम् अङ्गानङ्गप्रविष्टम् , लौकिकं तु मिथ्याश्रुतम् । स्वामित्वचिन्तायां तु भजना-सम्यग्दृष्टिपरिगृहीतं मिथ्याश्रुतमपि सम्यक्श्रुतमेव वितथभापित्वादिना यथास्थानं तदर्थविनियोगात् , विपर्ययान्मिथ्यादृष्टिपरिगृहीतं च सम्यक्श्रुतमपि मि. थ्याश्रुतमेवेति । सादि द्रव्यत एकं पुरुषमाश्रित्य, क्षेत्रतश्च भरतैरावते ! कालत उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ, भावतश्च तत्तज्ज्ञापकप्रयत्नादिकम् । अनादि द्रव्यतो नानापुरुषा- 15 नाश्रित्य, क्षेत्रतो महाविदेहान् , कालतो नोउत्सर्पिण्यवसर्पिणीलक्षणम् , भावतश्च सामान्यतः क्षयोपशममिति । एवं सपर्यवसितापर्यवसितभेदावपि भाव्यौ । गमिकं सदृशपाठं प्रायो दृष्टिवादगतम् । अगमिकमसदृशपाठं प्रायः कालिकश्रुतगतम् । अङ्ग प्रविष्टं गणधरकृतम् । अनङ्गप्रविष्टं तु स्थविरकृतमिति । तदेवं सप्रभेदं सांव्यवहारिक मतिश्रुतलक्षणं प्रत्यक्षं निरूपितम् । [९. पारमार्थिकं प्रत्यक्षं त्रिधा विभज्य प्रथममवधर्निरूपणम् । ] ६१९. स्वोत्पत्तावात्मव्यापारमात्रापेक्षं पारमार्थिकम् । तत् त्रिविधम्-अवधि- मनःपर्यय-केवलभेदात् । सकलरूपिद्रव्यविषयकजातीयम् आत्ममात्रापेक्षं ज्ञानमवधि- ज्ञानम् । तच्च पोढा अनुगामि-वर्धमान-प्रतिपातीतरभेदात् । तत्रोत्पत्तिक्षेत्रादन्यत्राप्य- नुवर्तमानमानुगामिकम् , भास्करप्रकाशवत् , यथा भास्करप्रकाशः प्राच्यामाविर्भूतः 25 प्रतीचीमनुसरत्यपि तत्रावकाशमुद्योतयति, तथैतदप्येकत्रोत्पन्नमन्यत्र गच्छतोऽपि पुंसो विषयमवभासयतीति । उत्पत्तिक्षेत्र एव विषयावभासकमनानुगामिकम् , प्रश्नादेशपुरुप- ज्ञानवत् , यथा प्रश्नादेशः क्वचिदेव स्थाने संवादयितुं शक्नोति पृच्छयमानमर्थम् , तथेदमपि अधिकृत एव स्थाने विषयमुद्योतयितुमलमिति । उत्पत्तिक्षेत्रात्क्रमेण विषय- व्याप्तिमवगाहमानं वर्धमानम् , अधरोत्तरारणिनिर्मथनोत्पन्नोपात्तशुष्कोपचीयमानाधीय- 30 मानेन्धनराश्यग्निवत् , यथा अग्निः प्रयत्नादुपजातः सन् पुनरिन्धनलाभाद्विवृद्धिमुपा- -गच्छति एवं परमशुभाध्यवसायलाभादिदमपि पूर्वोत्पन्नं वर्धत इति । उत्पत्तिक्षेत्रापेक्षया 20 १ तुलना-प्र. न. २. १८। २ तुलना-प्र. न. २. २१ ।

८ । जैनतर्कभाषा। क्रमेणाल्पीभवद्विपयं हीयमानम् , परिच्छिन्नेन्धनोपादानसन्तत्यग्निशिखावत्, यथा अपनीतेन्धनाग्निज्वाला परिहीयते तथा इदमपीति । उत्पच्यनन्तरं निर्मूलनश्चरं प्रतिपाति, जलतरङ्गवत् , यथा जलतरङ्ग उत्पन्नमात्र एव निर्मूलं विलीयते तथा इदमपि । आ के- वलप्राप्तेः आ मरणाद्वा अवतिष्ठमानम् अप्रतिपाति, वेदवत् , यथा पुरुपवेदादिरापुरुषा- 5 दिपर्यायं तिष्ठति तथा इदमपीति । [ १०. मनःपर्यवज्ञानस्य निरूपणम् । ] १२०. मनोमात्रसाक्षात्कारि मनःपर्यवज्ञानम् । मनःपर्यायानिदं साक्षात्परिच्छे- तुमलम् , बाह्यानर्थान् पुनस्तदन्यथाऽनुपपत्त्याऽनुमानेनैव परिच्छिनत्तीति द्रष्टव्यम् । तद् द्विविधम् --ऋजुमति-विपुलमतिभेदात् । ऋज्वी सामान्यग्राहिणी मतिः ऋजुमतिः । 10 'सामान्यशब्दोऽत्र विपुलमत्यपेक्षयाऽल्पविशेषपरः, अन्यथा सामान्यमात्रग्राहित्वे मन:- पर्यायदर्शनग्रसङ्गात् । विपुला विशेषग्राहिणी मतिर्विपुलमतिः। तत्र ऋजुमत्या घटा- दिमात्रमनेन चिन्तितमिति ज्ञायते, विपुलमत्या तु पर्यायशतोपेतं तत् परिच्छिद्यत इति । एते च द्वे ज्ञाने विकलविषयत्वाद्विकलप्रत्यक्षे परिभाष्यते । [११. केवलज्ञानस्य निरूपणम् । ] ६२१. निखिलद्रव्यपर्यायसाक्षात्कारि केवलज्ञानम् । अत एवैतत्सकलप्रत्यक्षम् । तच्चावरणक्षयस्य हेतोरैक्या दरहितम् । आवरणं चात्र कर्मेव, स्खविपयेऽप्रवृत्तिमतोऽ. स्मदादिज्ञानस्य सावरणत्वात् , असर्वविपयत्वे व्याप्तिज्ञानाभावप्रसङ्गात् , सावरणत्वा- भावेऽस्पष्टत्वानुपपत्तेश्च | आवरणस्य च कर्मणो विरोधिना सम्यग्दर्शनादिना विना- शात् सियति कैवल्यम् । १२२. 'योगजधर्मानुगृहीतमनोजन्यमेवेदमस्तु' इति केचित् तन्नः धर्मानुगृहीते- नापि मनसा पञ्चेन्द्रियार्थज्ञानवदस्य जनयितुमशक्यत्वात् । ६२३. 'कवलभोजिनः कैवल्यं न घटते' इति दिपटः तन्नआहारपर्यायसा- तवेदनीयोदयादिप्रसूतया कवलभुक्त्या कैवल्याविरोधात् , घातिकर्मणामेव तद्विरोधि- त्वात् । दग्धरज्जुस्थानीयात्तत्तो न तदुत्पत्तिरिति चेत् । नन्वेवं तादृशादायुपो 25 भवोपग्रहोऽपि न स्यात् । किञ्च, औदारिकशरीरस्थितिः कथं कवलभुक्तिं विना भग- वतः स्यात् । अनन्तवीर्यत्वेन तां विना तदुपपत्तौ छद्मस्थावस्थायामप्यपरिमितवलत्व- श्रवणाद् भुक्त्यभावः स्यादित्यन्यत्र विस्तरः । उक्तं प्रत्यक्षम् । [ १२. परोक्षं लक्षयित्वा पञ्चधा विभज्य च स्मृतेर्निरूपणम् । ] २४. अथ परोक्षमुच्यते-अस्पष्टं परोक्षम् । तच्च स्मरण-प्रत्यभिज्ञान-तर्का-ऽनुमाना- 30 ऽऽगमभेदतः पञ्चप्रकारम् । अनुभवमात्रजन्यं ज्ञानं स्मरणम् , यथा तत् तीर्थकरविम्बम् । 15 20 .. १ तुलना-प्र. न. २. २२ । २ तुलना-प्र. न. २. २३ । ३-०लबत्वश्र०-मु०।-०लन०-प्र० ।... ४प्र.न. ३.११५तुलना-प्र. न. ३.२।६तुलना-त्र, न. ३.३-४ ।

९ -- 10 १. प्रमाणपरिच्छेदः । न चेदमप्रमाणम् , प्रत्यक्षादिवत् अविसंवादकत्वात् । अतीततत्तांशे वर्तमानत्वविषय- त्वादप्रमाणमिदमिति चेत् ; न; सर्वत्र विशेषणे विशेष्यकालभानानियमात् । अनुभव- प्रमात्वपारतन्त्र्यादत्राप्रमात्वमिति चेत् , न; अनुमितेरपि व्याप्तिज्ञानादिप्रमात्वपार- तन्त्र्येणाप्रमात्वप्रसङ्गात् । अनुमितेरुत्पत्तौ परापेक्षा, विषयपरिच्छेदे तु खातन्त्र्यमिति चेत्, न; स्मृतेरप्युत्पत्तावेवानुभवसव्यपेक्षत्वात् , स्वविषयपरिच्छेदे तु स्वातन्त्र्यात् । 5 अनुभवविपयीकृतभावावभासिन्याः स्मृतेविषयपरिच्छेदेऽपि न स्वातन्त्र्यमिति चेत् ; तर्हि व्याप्तिज्ञानादिविषयीकृतानर्थान् परिच्छिन्दत्या अनुमितेरपि प्रामाण्यं दूरत एव । नैय- त्येनाऽभात एवार्थोऽनुमित्या विषयीक्रियत इति चेत् तर्हि तत्तयाऽभात एवार्थः स्मृत्या विपयीक्रियत इति तुल्यमिति न किञ्चिदेतत् । [१३. प्रत्यभिज्ञानस्य निरूपणम् । ] ६२५. अनुभवस्मृतिहेतुकं तिर्यगूर्ध्वतासामान्यादिगोचरं सङ्कलनात्मकं ज्ञानं प्रत्य- भिज्ञानम् । यथा 'तजातीय एवायं गोपिण्ड' 'गोसदृशो गवयः' 'स एवायं जिनदत्तः' 'स एवानेनार्थः कथ्यते' 'गोविलक्षणो महिपः' 'इदं तस्माद् दूरम्' 'इदं तस्मात् समी- पम्' 'इदं तस्मात् प्रांशु हस्वं वा' इत्यादि । ६२६. तत्तेदन्तारूपस्पष्टास्पष्टाकारभेदान्नैकं प्रत्यभिज्ञानस्वरूपमस्तीति शाक्यः; 15 तन्न आकारभेदेऽपि चित्रज्ञानवदेकस्य तस्यानुभूयमानत्वात् , स्वसामग्रीप्रभवस्यास्य वस्तुतोऽस्पष्टैकरूपत्वाच, इदन्तोल्लेखस्य प्रत्यभिज्ञानिवन्धनत्वात् । विपयाभावान्ने दमस्तीति चेत् । न; पूर्वापरविवर्तवत्यैकद्रव्यस्य विशिष्टस्यैतद्विपयत्वात् । अत एव 'अगृहीतासंसर्गकमनुभवस्मृतिरूपं ज्ञानद्वयमेवैतद्' इति-निरस्तम् । इत्थं सति विशिष्टज्ञानमात्रोच्छेदापत्तेः। तथापि 'अक्षान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् प्रत्यक्षरूपमेवेदं 20 युक्तम्' इति केचित् तन्नः साक्षादक्षान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वस्यासिद्धेः, प्रत्यभिज्ञान- स्य साक्षात्प्रत्यक्षस्मरणान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वेनानुभूयमानत्वात् , अन्यथा प्रथम- व्यक्तिदर्शनकालेऽप्युत्पत्तिप्रसङ्गात् । ६२७. अथ पुनदर्शने पूर्वदर्शनाहितसंस्कारप्रबोधोत्पन्नस्मृतिसहायमिन्द्रियं प्रत्य- भिज्ञानमुत्पादयतीत्युच्यते; तदनुचितम् । प्रत्यक्षस्य स्मृतिनिरपेक्षत्वात् । अन्यथा 25 पर्वते वह्विज्ञानस्यापि व्याप्तिस्मरणादिसापेक्षमनसैवोपपत्तौ अनुमानस्याप्युच्छेद- प्रसङ्गात् । किश्च, 'प्रत्यभिजानामि' इति विलक्षणप्रतीतेरप्यतिरिक्तमेतत् , एतेन 'विशेष्येन्द्रियसन्निकर्पसत्त्वाद्विशेषणज्ञाने सति विशिष्टप्रत्यक्षरूपमेतदुपपद्यते' इति निरस्तम् ; 'एतत्सदृशः सः' इत्यादौ तदभावात् , स्मृत्यनुभवसङ्कलनक्रमस्यानुभवि- कत्वाचेति दिक् । , 30 ३-० -०रूपज्ञान '०-प्र०॥ १ प्र. न. ३. ५। २ तुलना-प्र. न. ३.६ । २ १. -5 , जैनतर्कभापा। . ६२८. अत्राह भाट्टः-नन्वेकत्वज्ञानं प्रत्यभिज्ञानमस्तु, सादृश्यज्ञानं तूपमानमेव, गवये दृष्टे गवि च स्मृते सति सादृश्यज्ञानस्योपमानत्वात् , तदुक्तम्- "तस्माद्यत् स्मर्यते तत् स्थात् सादृश्येन विशेषितम् । प्रमेयमुपमानस्य सादृश्यं वा तदन्वितम् ॥ १॥ प्रत्यक्षेणावबुद्धेऽपि सादृश्ये गवि च स्मृते । विशिष्टस्यान्यतोऽसिद्धरुपमानप्रमाणता ॥ २॥" [ श्लोकवा० उप० श्लो० ३७-३८ ] इति; तन्नः दृष्टस्य · सादृश्यविशिष्टपिण्डस्य स्मृतस्य च गोः सङ्कलनात्मकस्य 'गोसदृशो गवयः' इति ज्ञानस्य प्रत्यभिज्ञानताऽनतिक्रमात् । अन्यथा 'गोविसदृशो 10 महिपः' इत्यादेरपि सादृश्याविषयत्वेनोपमानातिरेके प्रमाणसङ्ख्याव्याघातग्रसङ्गात् । ६२९. एतेन-'गोसदृशो गवयः' इत्यतिदेशवाफ्यार्थज्ञानकरणकं सादृश्यविशिष्ट- पिण्डदर्शनव्यापारकम् 'अयं गवयशब्दवाच्यः' इति सञ्ज्ञासचिसम्बन्धप्रतिपत्तिरूप- मुपमानम्-इति नैयायिकमतमप्यपहस्तितं भवति । अनुभूतव्यक्तौ गवयपदवाच्यत्वसङ्क- लनात्मकस्यास्य प्रत्यभिज्ञानत्वानतिक्रमात् प्रत्यभिज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमविशेपेण 15 यद्धर्मावच्छेदेनातिदेशवाक्यानूयधर्मदर्शनं तद्धर्मावच्छेदेनैव पदवाच्यत्वपरिच्छेदोपपत्तेः। अत एव "पयोम्वुभेदी हंसः स्यात्" इत्यादिवाक्यार्थज्ञानवतां पयोऽम्बु भेदित्वादि- विशिष्टव्यक्तिदर्शने सति 'अयं हंसपदवाच्यः' इत्यादिप्रतीतिर्जायमानोपपद्यते । यदि च 'अयं गवयपदवाच्यः' इति प्रतीत्यर्थं प्रत्यभिज्ञातिरिक्तं प्रमाणमाश्रीयते तदा आमलकादिदर्शनाहितसंस्कारस्य विल्वादिदर्शनात् 'अतस्तत् सूक्ष्मम्' इत्यादिप्रतीत्यर्थ 20 प्रमाणन्तरमन्वेपणीयं स्यात् । मानसत्वे चासामुपमानस्यापि मानसत्वप्रसङ्गात् । : 'प्रत्यभिजानामि' इति प्रतीत्या प्रत्यभिज्ञानत्वमेवाभ्युपेयमिति दिक् । [१४. तकस्य निरूपणम् । ] ३०. सकलदेशकालाद्यवच्छेदेन साध्यसाधनभावादिविषय ऊहस्तकः, यथा 'यावान् कश्चिद्भूमः स सर्वो वह्नौ सत्येव भवति, वह्नि विना वा न भवति' 'घटशब्द- 25 मात्रं घटस्य वाचकम्' 'घटमात्रं घटशब्दवाच्यम्' इत्यादि । तथाहि-स्वरूपप्रयुक्ताऽव्यभि- चारलक्षणायां व्याप्तौ भ्योदर्शनसहितान्वयव्यतिरेकसहकारेणापि प्रत्यक्षस्य तावद- विषयत्वादेवाप्रवृत्तिः, सुतरां च सकलसाध्यसाधनव्यक्त्युपसंहारेण तद्रह इति साध्य- साधनदर्शनस्मरणप्रत्यभिज्ञानोपजनितस्तर्क एव तत्प्रतीतिमाधातुमलम् । ६३१. अथ स्वव्यापकसाध्यसामानाधिकरण्यलक्षणाया व्याप्तेर्योग्यत्वाद् भूयोदर्श- 30 नव्यभिचारादर्शनसहकृतेनेन्द्रियेण व्याप्तिग्रहोऽस्तु, सकलसाध्यसाधनव्यक्त्युपसंहार- स्यापि सामान्यलक्षणप्रत्यासत्या सम्भवादिति चेत् ; न; 'वर्कयामि' इत्यनुभवसिद्धेन १ तुलना-प्र. न. ३. ७-८ । २-०युकव्यमि०-सं० मु०। ३-०मत्त्यसम्म० -प्र. ३० । ।

१. प्रमाणपरिच्छेदः । ११ तर्केणैव सकलसाध्यसाधनव्यक्त्युपसंहारेण व्याप्तिग्रहोपपत्तौ सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति- कल्पने प्रमाणाभावात् , ऊहं विना ज्ञातेन सामान्येनापि सकलव्यक्त्यनुपस्थितेश्च । वाच्यवाचकभावोऽपि तणैवावगम्यते, तस्यैव सकलशब्दार्थगोचरत्वात् । प्रयोजक- वृद्धोक्तं श्रुत्वा प्रवर्तमानस्य प्रयोज्यवृद्धस्य चेष्टामवलोक्य तत्कारणज्ञानजनकतां शब्दे. ऽवधारयन्तो(यतो)ऽन्त्यावयवश्रवण-पूर्वावयवस्मरणोपजनितवर्णपदवाक्यविपयसङ्कलना- 5 त्मकप्रत्यभिज्ञानवत आवापोद्वापाभ्यां सकलव्यक्त्युपसंहारेण च वाच्यवाचकभाव- प्रतीतिदर्शनादिति । अयं च तर्कः सम्बन्धप्रतीत्यन्तरनिरपेक्ष एव स्वयोग्यतासामर्थ्या- सम्बन्धप्रतीति जनयतीति नानवस्था । $३२. प्रत्यक्षपृष्ठभाविविकल्परूपत्वान्नायं प्रमाणमिति बौद्धाः; तन्न प्रत्यक्षपृष्ठ- भाविनो विकल्पस्यापि प्रत्यक्षगृहीतमात्राध्यवसायित्वेन सर्वोपसंहारेण व्याप्तिग्राहकत्वा- 10 भावात् । तादृशस्य तस्य सामान्यविषयस्याप्यनुमानवत् प्रमाणत्वात् , अवस्तुनिर्भासेऽपि परम्परया पदार्थप्रतिवन्धेन भवतां व्यवहारतः प्रामाण्यप्रसिद्धेः । यस्तु-अग्निधूमव्यतिरि- क्तदेशे प्रथमं धूमस्यानुपलम्भ एकः, तदनन्तरमनेरुपलम्भस्ततो धूमस्येत्युपलम्भद्वयम् , पश्चादग्नेरनुपलम्भोऽनन्तरं धूमस्याप्यनुपलम्भ इति द्वावनुपलम्भाविति प्रत्यक्षानुपलम्भ- पञ्चकाद्वथाप्तिग्रहः-इत्येतेषां सिद्धान्तः, तदुक्तम्- "धूमाधीहिविज्ञानं धूमज्ञानमधीस्तयोः । प्रत्यक्षानुपलम्भाभ्यामिति पञ्चभिरत्वयः॥" इति; स तु मिथ्या; उपलम्भानुपलम्भस्वभावस्य द्विविधस्यापि प्रत्यक्षस्य सन्निहितमात्र- विपयतयाऽविचारकतया च देशादिव्यवहितसमस्तपदार्थगोचरत्वायोगात् । ६३३. यत्तु 'व्याप्यस्याहार्यारोपेण व्यापकस्याहार्यप्रसञ्जनं तर्कः । स च विशेष. 20 दर्शनवद् विरोधिशङ्काकालीनप्रमाणमात्रसहकारी, विरोधिशङ्कानिवर्तकत्वेन तदनुकूल एव वा । न चायं स्वतः प्रमाणम्' इति नैयायिकैरिष्यते; तन्न व्याप्तिग्रहरूपस्य तर्कस्य स्वपरव्यवसायित्वेन स्वतः प्रमाणत्वात् , पराभिमततर्कस्यापि क्वचिदेतद्विचाराङ्गतया, विपर्ययपर्यवसायिन आहार्यशङ्काविघटकतया, स्वातन्त्र्येण शङ्कामात्रविघटकतया वोप- योगात् । इत्थं चाज्ञाननिवर्तकत्वेन तर्कस्य प्रामाण्यं धर्मभूपणोक्तं सत्येव तन्न(तत्र) 25 मिथ्याज्ञानरूपे व्यवच्छेद्ये सङ्गच्छते, ज्ञानाभावनिवृत्तिस्त्वर्थातताव्यवहारनिवन्धन- स्वव्यवसितिपर्यवसितैव सामान्यतः फलमिति द्रष्टव्यम् । 15 १-०ज्ञानवत् भावा-मु० । २-०तया चोपयो०-प्र० १० । .३ धर्मभूषणेन हि लोकवात्ति- कीयवाक्योल्लेखेन स्वमतं समर्थितम्, तथाहि-"तदुक्तं श्लोकवार्तिकभाष्ये-'साध्यसाधनसम्बन्धाज्ञाननिह- त्तिरूपे हि फले साधकतमस्तकः' इति ।" [न्यायदी० पृ० १९]। द्रष्टव्यं चैतत् तत्त्वार्थ-डोक्या० १. १३. ११५-८ वृत्तौ। धर्मभूषणोकं तत्र सत्येव मिथ्याज्ञाने व्यवच्छेद्ये सगच्छते ज्ञानरूपे। ज्ञानाभाव०-१० । ४-०ज्ञानता०-मु० ।

जैनतर्कभाषा। [ १५. अनुमानं द्वेधा विभज्य स्वार्थानुमानस्य लक्षणम् । ] $३४. साधनात्साध्यविज्ञानम्-अनुमानम् । तद् द्विविधं स्वार्थ परार्थं च । तत्र हेतु- ग्रहण-सम्बन्धसरणकारणकं साध्यविज्ञानं स्वार्थम् , यथा गृहीतधूमस्य स्मृतव्यासिकस्य 'पर्वतो वह्निमान्' इति ज्ञानम् । अत्र हेतुग्रहण-सम्बन्धसरणयोः समुदितयोरेव कारण- 5 त्वमवसेयम्, अन्यथा विस्मृताप्रतिपन्नसम्बन्धस्यागृहीतलिङ्गकस्य च कस्यचिदनु- मानोत्पादनसङ्गात् । [१६. हेतुस्वरूपचर्चा 1] ६३५. निश्चितान्यथानुपपत्त्येकलक्षणो हेतुः, न तु विलक्षणकादिः । तथाहि- त्रिलक्षण एव हेतुरिति बौद्धाः। पक्षधर्मत्वाभावेऽसिद्धत्वव्यवच्छेदस्य, सपक्ष एव सत्त्वा- 10 भावे च विरुद्धत्वव्युदासस्य, विपक्षेऽसत्चनियमाभावे चानकान्तिकत्वनिपेवस्थासम्भवे- नानुमित्यप्रतिरोधानुपपत्तेरिति; तन्न; पक्षधर्मत्वाभावेऽपि उदेष्यति शकटं कृत्तिकोद- याद्, उपरि सविता भूमेरालोकवत्त्वाद्, अस्ति नभश्चन्द्रो जलचन्द्रादित्याद्यनुमान- दर्शनात् । न चात्रापि 'कालाकाशादिकं भविष्यच्छकटोदयादिमत् कृत्तिकोदयादिम- चात्' इत्येवं पक्षधर्मत्वोपपत्तिरिति वाच्यम् ; अननुभूयमानधर्मिविषयत्वेनेत्थं पक्षधर्म- 15 त्वोपपादने जगद्धयंपेक्षया काककायेन प्रासादधावल्यस्यापि साधनोपपत्तेः । ६३६. ननु यद्येवं पक्षधर्मताऽनुमितौ नाङ्गं तदा कथं तत्र पक्षभाननियम इति चेत् । क्वचिदन्यथाऽनुपपत्यवच्छेदकतया ग्रहणात् पक्षभानं यथा नभश्चन्द्रास्तित्वं विना जलचन्द्रोऽनुपपन्न इत्यत्र, क्वचिच हेतुग्रहणाधिकरणतया यथा पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वादित्यत्र धूमस्य पर्वते ग्रहणाद्वह्वेरपि तत्र भानमिति । व्याप्तिग्रहवेलायां तु 20 पर्वतस्य सर्वत्रानुवृत्त्यभावेन न ग्रह इति । ६३७. यत्तु अन्तर्व्याप्त्या पक्षीयसाध्यसाधनसम्बन्धग्रहात् पक्षसाध्यसंसर्गभानम् , सदुक्तम्-"पक्षीकृत एव विषये साधनस्य साध्येन व्याप्तिरन्ताप्तिः, अन्यत्र तु बहियाप्तिः" (प्र. न. ३.३८) इति; तन्न अन्तर्व्याच्या हेतोः साध्यप्रत्यायनशक्ती सत्यां वहिप्प्तेरुद्धावनव्यर्थत्वप्रतिपादनेन तस्याः स्वरूपप्रयुक्त(क्ताऽ)व्यभिचारलक्षण- 25 त्वस्य, वहिप्प्तेश्च सहचारमात्रत्वस्य लाभाव, सार्वत्रिक्या व्याप्तेपियभेदमात्रेण भेदस्य दुर्वचत्वात् । न चेदेवं तदान्ताप्तिग्रहकाल एष एवं(काल एव) पक्षसाध्यसंसर्ग- भानादनुमानवैक(फ)ल्यापत्तिः विना पर्वतोवह्निमानित्युद्देश्यप्रतीतिमिति यथातन्त्रं भाव- १ प्र. मी. १. २. ७.। २ तुलना प्र. न. ३.९, । ३ प्र.न, ३. १०.। ४प्र. न. ३. ११- १२ । ५-० भावे वाने०-८०। ६ तत्रान्ता-सं० प्र० मु० । ७ तुलना-प्र. न. ३. ३७ । ८-०काल एव च पक्ष०-१०। "विना पर्वतो वहिमाननित्युद्देश्यप्रतीतिम्" इत्यप्रेतनः पाठः सरतार्थकतया अत्रैव सूपपादः। तथा च-तदान्ताप्तिग्रहकाल एव पर्वतो पहिमानित्युद्दश्यप्रतीति विमा पक्षसाध्यसंसर्गभाना- दनुमानवैफल्यापत्तिरियादिरर्थः सम्पद्यते ।

१. प्रमाणपरिच्छेदः। १३ नीयं सुधीभिः । इत्थं च 'पक्कान्येतानि सहकारफलानि एकशाखाप्रभवत्वाद् उप- युक्तसहकारफलवदित्यादौ बाधितविषये, मूर्योऽयं देवदत्तः तत्पुत्रत्वात् इतरतत्पुत्रवदि- त्यादौ सत्प्रतिपक्षे चातिप्रसङ्गवारणाय अबाधितविषयत्वासत्प्रतिपक्षत्वसहितं प्रागुक्त. रूपनयमादाय पाञ्चरूप्यं हेतुलक्षणम्' इति नैयायिकमतमप्यपास्तम् ; उदेष्यति शकट- मित्यादौ पक्षधर्मत्वस्यैवासिद्धेः, स श्यामः तत्पुत्रत्वादित्यत्र हेत्वाभासेऽपि पाश्चरूप्य- 5 सत्त्वाच, निश्चितान्यथानुपपत्तेरेव सर्वत्र हेतुलक्षणत्वौचित्यात् । [१७. साध्यस्वरूपचर्चा ।] ६३८. ननु हेतुना साध्यमनुमातव्यम् । तत्र किं लक्षणं साध्यमिति चेत् ; उच्यते- अप्रतीतमनिराकृतमभीप्सितं च साध्यम् । शङ्कितविपरीतानध्यवसितवस्तूनां साध्यता- प्रतिपत्यर्थमप्रतीतमिति विशेषणम् । प्रत्यक्षादिविरुद्धस्य साध्यत्वं मा प्रसाङ्क्षीदित्यनि- 10 राकृतग्रहणम् । अनभिमतस्यासाध्यत्वप्रतिपत्तयेऽभीप्सितग्रहणम् । ६३९. कथायां शङ्कितस्यैव साध्यस्य साधनं युक्तमिति कश्चित् ; तन्न; विपर्यस्ता- व्युत्पन्नयोरपि परपक्षदिदृक्षादिना कथायामुपसर्पणसम्भवेन संशयनिरासार्थमिव विपर्य- यानध्यवसायनिरासार्थमपि प्रयोगसम्भवात् , पित्रादेविपर्यस्ताव्युत्पन्नपुत्रादिशिक्षाप्रदान- दर्शनाच्च । न चेदेवं जिगीपुकथायामनुमानप्रयोग एव न स्यात् तस्य साभिमानत्वेन 15 विपर्यस्तत्वात् । ६४०. अनिराकृतमिति विशेषणं वादिप्रतिवाद्युभयापेक्षया, द्वयोः प्रमाणेनाबाधि- तस्य कथायां साध्यत्वात् । अभीप्सितमिति तु वाद्यपेक्षयैव, वक्तुरेव स्वाभिप्रेतार्थ- प्रतिपादनायेच्छासम्भवात् । ततश्च परार्थाश्चक्षुरादय इत्यादौ पारार्थ्यमात्राभिधाने- ऽप्यात्मार्थत्वमेव सायं(मेव साध्यं) सिध्यति । अन्यथा संहतपरार्थत्वेन बौद्धैश्चक्षु- 20 रादीनामभ्युपगौ[त् साधनवैफल्या]दित्यनन्वयादिदोपदुष्टमेतत्साङ्ख्यसाधनमिति वद- न्ति । स्वार्थानुमानावसरेऽपि परार्थानुमानोपयोग्यभिधानम् , परार्थस्य स्वार्थपुरः- सरत्वेनानतिभेदज्ञापनार्थम् । ६४१. व्याप्तिग्रहणसमयापेक्षया साध्यं धर्म एव, अन्यथा तदनुपपत्तेः, आनुमानिक- प्रतिपत्यवसरापेक्षया तु पक्षापरपर्यायस्तद्विशिष्टः प्रसिद्धो धर्मी । इत्थं च स्वार्थानुमा- 25 नस्य त्रीण्यङ्गानि धर्मी साध्यं साधनं च । तत्र साधनं गमकत्वेनाङ्गम् , साध्यं तु १ तुलना-प्र. न. ३. १४-१७ । २-०गमादित्य नन्वय०-५० । भानायं पाठोऽनुसन्धयः-"ततश्च पराश्चक्षुरादय इत्यादौ पारार्थ्यमानाभिधानेऽप्यात्मार्थत्वमेव साध्यस्य प्रसिद्धयति । तद्धीच्या व्याप्तं सायस्य बौद्ध प्रति साध्यमेव । आत्मा हि सायन साधयितुमुरकान्तस्ततोऽसावेव साध्यः । अन्यथा साधनस्य वैफल्यापत्तेः, संहतपरार्थत्वेन बौद्धैश्चक्षुरादीनामुपगमात् । एवं चात्मनः साध्यत्वे देतोरिष्टवि- घातकारितया विशेषविरुद्धत्वं साध्यस्य च दृष्टान्तदोषः साध्यवैफल्यमिति ।"-त्या. र. पृ. ५३८ । ३-०ग्रहसमया०-सं० २० मु० । प्र. न. ३. १७, २० । ४ तुलना-न्यायदो० पृ० १२ ।

१४ - , , जैनतर्कभाषा। गम्यत्वेन, धर्मी पुनः साध्यधर्माधारत्वेन, आधारविशेषनिष्ठतया साध्या (साध्यसिद्धे)- रनुमानप्रयोजनत्वात् । अथवा पक्षो हेतुरित्यङ्गद्वयं स्वार्थानुमाने, साध्यधर्मविशिष्टस्य धर्मिणः पक्षत्वात् इति धर्मधर्मिभेदाभेदविवक्षया पक्षद्वयं द्रष्टव्यम् । ६४२. धर्मिणः प्रसिद्धिश्च क्वचित्प्रमाणात् क्वचिद्विकल्पात् कचित्प्रमाण विकल्पा- 5 भ्याम् । तत्र निश्चितप्रामाण्यकप्रत्यक्षाद्यन्यतमावधृतत्वं प्रमाणप्रसिद्धत्वम् । अनिश्चित- प्रामाण्याप्रामाण्यप्रत्ययगोचरत्वं विकल्पप्रसिद्धत्वम् । तद्वयविषयत्वं प्रमाणविकल्प- प्रसिद्धत्वम् । तत्र प्रमाणसिद्धो धर्मी यथा धूमवत्त्वादग्निमत्त्वे साध्ये पर्वतः, स खलु प्रत्यक्षेणानुभूयते । विकल्पसिद्धो धर्मी यथा सर्वज्ञोऽस्ति सुनिश्चितासम्भवद्वाधकप्रमाण- स्वादित्यस्तित्वे साध्ये सर्वज्ञः, अथवा खरविपाणं नास्तीति नास्तित्वे साध्ये खरवि. 10 पाणम् । अत्र हि सर्वज्ञखरविपाणे अस्तित्वनास्तित्वसिद्धिभ्यां प्राग विकल्पसिद्धे । उभय- सिद्धो धर्मी यथा शब्दः परिणामी कृतकत्वादित्यत्र शब्दः, 'स हि वर्तमान(नः) प्रत्यक्ष- गम्यः, भूतो भविष्यंश्च विकल्पगम्यः, स सर्वोऽपि धर्मीति प्रमाणविकल्पसिद्धो धर्मी । प्रमाणोभयसिद्धयोधर्मिणोः साध्ये कामचारः । विकल्पसिद्धे तु धर्मिणि सत्तासत्तयोरेव साध्यत्वमिति नियमः । तदुक्तम्-"विकल्पसिद्धे तस्मिन् सत्तेतरे साध्ये" 15 [ परी० ३. २३ ] इति । ६४३. अत्र वौद्धः सत्तामात्रस्यानभीप्सितत्वाद्विशिष्टसत्तासाधने वानन्धयाद्विक- ल्पसिद्धे धर्मिणि न सत्ता साध्येत्याह ; तदसत् ; इत्थं सति प्रकृतानुमानस्यापि भङ्ग- प्रसङ्गात् , वह्निमात्रस्यानभीप्सितत्वाद्विशिष्टवते॒श्वानन्वयादिति । अथ तत्र सत्तायां साध्यायां तहेतुः-भावधर्मः, भावाभावधर्मः, अभावधर्मो वा स्यात् ? । आयेऽसिद्धिः, 20 असिद्धसत्ताके भावधर्मासिद्धेः । द्वितीये व्यभिचारः, अस्तित्वाभाववत्यपि वृत्तेः । तृतीये च विरोधाभा(विरोधोऽभा)वधर्मस्य भावे क्वचिदप्यसम्भवात् , तदुक्तम्- "नासिद्धे भावधर्मोऽस्ति व्यभिचार्युभयाश्रयः । धर्मो विरुद्धोऽभावस्य सा सत्ता साध्यते कथम् ? ॥" [ प्रमाणवा० १. १९२] 26 इति चेत् न, इत्थं वहिमद्धर्मत्यादिविकल्पैधूमेन वह्वयनुमानस्याप्युच्छेदापत्तेः । ६४४. विकल्पस्याप्रमाणत्वाद्विकल्पसिद्धो धर्मी नास्त्येवेति नैयायिकः। तस्येत्थंवच- नस्यैवानुपपत्तेस्तूप्णीम्भावापत्तिः, विकल्पसिद्धधर्मिणोऽप्रसिद्धौ तत्प्रतिषेधानुपपत्तेरिति । ६४५. इदं त्ववधेयम्-विकल्पसिद्धस्य धर्मिणो नाखण्डैस्यैव भानमसत्ख्यातिप्रस- झादिति, शब्दादेविशिष्टस्य तस्य [भा]नाभ्युपगमे विशेपणस्य संशयेऽभावनिश्चये वा १ तुलना- प्र. न. ३.२१ । २ अनिश्चितप्रामाण्यप्रत्य०प्र० । ३-०साधने चानन्वया०-मु० । ४ नाखण्डलस्य-सं० । नाखण्डस्यैवामानं-ब० । ५ तस्य भानाभ्यु०-मु० । ६ वा विशिष्टवैशिष्टय. भानानु०-१०।

10. १. प्रमाणपरिच्छेदः । वैशिष्ट्यभाना]नुपपत्तेः विशेषणाचं आहार्यारोपरूपा विकल्पात्मिकैवानुमितिः स्वीकर्त- च्या, देशकालसत्तालक्षणस्यास्तित्वस्य, सकलदेशकालसत्ताऽभावलक्षणस्य च नास्ति- त्वस्य साधनेन परपरिकल्पितविपरीतारोपव्यवच्छेदमात्रस्य फलत्वात् । ४६. वस्तुतस्तु खण्डशः प्रसिद्धपदार्थाऽस्तित्वनास्तित्वसाधनमेवोचितम् । अत एव "असतो नत्थि णिसेहो" विशेषा० गा० १५७४] इत्यादि भाष्यग्रन्थे खरविषाणं 5 नास्तीत्यत्र 'खरे विषाणं नास्ति' इत्येवार्थ उपपादितः। एकान्तनित्यमर्थक्रियासमर्थ न भवति क्रमयोगपद्याभावादित्यत्रापि विशेषावमर्शदशायां क्रमयोगपद्यनिरूपकत्वाभावे- नार्थक्रियानियामकत्वाभावो नित्यत्वादौ सुसाध इति सम्यग्निभालनीयं स्वपरसमय- दत्तदृष्टिभिः । [ १८. परार्थानुमानस्य प्रतिपादनम् । ] ६४७. परार्थं पक्षहेतुवचनात्मकमनुमानमुपचारात् , तेन श्रोतुरनुमानेनार्थवोधनात् । पक्षस्य विवादादेव गम्यमानत्वादप्रयोग इति सौगतः, तन्न; यत्किश्चिद्वचनव्यवहितात् ततो व्युत्पन्नमतेः पक्षप्रतीतावप्यन्यान् प्रत्यवश्यनिर्देश्यत्वात् प्रकृतानुमानवाक्यावय- वान्तरैकवाक्यतापन्नात्ततोऽवगम्यमानस्य पक्षस्याप्रयोगस्य चेष्टत्वात् । अवश्यं चाभ्यु- पगन्तव्यं हेतोः प्रतिनियतधर्मिधर्मताप्रतिपत्त्यर्थमुपसंहारवचनवत् साध्यस्यापि तदर्थं पक्ष- 15 वचनं ताथागतेनापि, अन्यथा समर्थनोपन्यासादेव गम्यमानस्य हेतोरप्यनुपन्यासप्रस- झात् , मन्दमतिप्रतिपत्त्यर्थस्य चोभयत्राविशेषादिति । किञ्च, प्रतिज्ञायाः प्रयोगानर्हत्वे शास्त्रादावय॑सौ न प्रयुज्येत, दृश्यते च प्रयुज्यमानेयं शाक्यशास्त्रेऽपि । परानुग्रहार्थ शास्त्रे. तत्प्रयोगश्च वादेऽपि तुल्यः, विजिगीषूणामपि मन्दमतीनामर्थप्रतिपत्तेस्तत एवोपपत्तेरिति । $ ४८. आगमात्परेणैव ज्ञातस्य वचनं परार्थानुमानम्, यथा बुद्धिरचेतना उत्पत्तिम- स्यात् घटवदिति साङ्ख्यानुमानम् । अत्र हि बुद्धावुत्पत्तिमत्त्वं साङ्ख्याने(ख्येन) नैवाभ्यु- पगम्यते इति तदेतदपेशलम् ; वादिप्रतिवादिनोरागमप्रामाण्यविप्रतिपत्तेः, अन्यथा तत एव साध्यसिद्धिप्रसङ्गात् । परीक्षापूर्वमागमाभ्युपगमेऽपि परीक्षाकाले तद्वाधात् । नन्वेवं भवद्भिरपि कथमापाद्यते परं प्रति यत् सर्वथैकं तत् नानेकर सम्बध्यते, तथा च सामान्य- 25 म्' इति ? । सत्यम् ; एकधर्मोपगते(मे) धर्मान्तरसन्दर्शनमात्रं(त्र)तत्परत्वेनैतदापादनस्य वस्तुनिश्चायकत्वाभावात् , प्रसङ्गविपर्ययरूपस्य मौलहेतोरेव तन्निश्चायकत्वात् , अनेकवृत्ति- त्वव्यापकानेकत्वनिवृत्त्यैव तन्निवृत्तेः मौलहेतुपरिकरत्वेन प्रसङ्गोपन्यासस्यापि न्याव्य- १ विशेषामर्श०-प्र०व० । २ तुलना-प्र: न. ३. २३.। ३-०मानशक्या०-सं० प्र० १.१० प्रती 'वाक्यावय' इत्यादि पाठः प्रथमं लिखितोऽपि पश्चात् 'शक्यावय' इत्यादिरूपेण शोधितो दृश्यते । विवादात् । द्रष्टव्यः-स्या. र. पृ० ५५०। ५ तुलना-प्र. न. ३. २४. ६ प्रतिनियतधर्मिता प्रति०-3.. सं०। ७ तदर्थपक्ष०-सं०। ८-०प्यस्मै न-सं०। ०प्यस्यै न-प्र० । . 20 ४ततः- . १६ जैनतर्कभापा। त्वात् । बुद्धिरचेतनेत्यादौ च प्रसङ्गविपर्यय हेतोर्व्याप्तिसिद्धिनिवन्धनस्य विरुद्धधर्माध्या- सस्य विपक्षबाधकप्रमाणस्यानुपस्थापनात् प्रसङ्गस्याप्यन्याय्यत्वमिति वदन्ति । ४९. हेतुः साध्योपपत्यन्यथानुपपत्तिभ्यां द्विधा प्रयोक्तव्यः, यथा पर्वतो वह्नि- मान् , सत्येव वह्नौ धूमोपपत्तेः असत्यनुपपत्तेर्वा । अनयोरन्यतरप्रयोगेणैव साध्यप्रतिप- 5 तौ द्वितीयप्रयोगस्यैकत्रानुपयोगः । ६५०. पक्षहेतुवचनलक्षणमवयवद्वयमेव च परप्रतिपत्त्यङ्गं न दृष्टान्तादिवचनम् , पक्षहेतुवचनादेव परप्रतिपत्तेः, प्रतिवन्धस्य तर्कत एव निर्णयात्, तत्स्मरणस्यापि पक्षहेतुद- शेनेनैव सिद्धेः, असमर्थितस्य दृष्टान्तादेः प्रतिपत्त्यनङ्गत्वाचत्समर्थनेनैवान्यथासिद्धेश्च ! समर्थनं हि हेतोरसिद्धत्वादिदोपान्निराकृत्य स्वसाध्येनाविनाभावसाधनम्, तत एव 10 च परप्रतीत्युपपत्तौ किमपरप्रयासेनेति ? । ६५१. मन्दमतींस्तु व्युत्पादयितुं दृष्टान्तादिप्रयोगोऽप्युपयुज्यते, तथाहि-यः खलु क्षयोपशमविशेषादेव निर्णीतपक्षो दृष्टान्तस्मार्यप्रतिवन्धग्राहकप्रमाणस्मरणनिपुणो- ऽपरावयवाभ्यूहनसमर्थश्च भवति, तं प्रति हेतुरेव प्रयोज्यः । यस्य तु नाद्यापि पक्ष- निर्णयः, तं प्रति पक्षोऽपि । यस्तु प्रतिवन्धग्राहिणः प्रमाणस्य न स्मरति, तं प्रति 15 दृष्टान्तोऽपि । यस्तु दान्तिके हेतुं योजयितुं न जानीते, तं प्रत्युपनयोऽपि । एवमपि साकाक्षं प्रति च निगमनम् । पक्षादिस्वरूपविप्रतिपत्तिमन्तं प्रति च पक्षशुयोदिकमपीति सोऽयं दशावयवो हेतुः पर्यवस्यति । [१९. हेतुप्रकाराणामुपदर्शनम् ।) ६५२. सं चायं द्विविधः-विधिरूपः प्रतिपेधरूपश्च । 'तत्र विधिरूपो द्विविधः- 20 विधिसाधकः प्रतिपेधसाधकश्च । तत्राद्यः पोटा, तद्यथा-कश्चिद्याप्य एव, यथा शब्दोऽ. नित्यः प्रयत्ननान्तरीयकत्वादिति । यद्यपि व्याप्यो हेतुः सर्व एव, तथापि कार्याद्य- नात्मव्याप्यस्यात् (त्र ) ग्रहणाझेदः, वृक्षः शिंशपाया इत्यादेरप्यत्रैवान्तर्भावः । कश्चि- कार्यरूपः, यथा पर्वतोऽयमग्निमान् धूमवत्वान्यथानुपपत्तेरित्यत्र धूमः, धूमो ह्यग्नेः कार्यभूतः तदभावेऽनुपपद्यमानोऽग्निं गमयति । कश्चित्कारणरूपैः, यथा पृष्टिभविष्यति, 25 विशिष्टमेघान्यथानुपपत्तेरित्यत्र मेघविशेष, स हि वर्पस्य कारणं स्वकार्यभृतं वपं गम- यति । ननु कार्याभावेऽपि सम्भवत् कारणं न कार्यानुमापकम् , अत एव न वह्निर्धमंगम- यतीति चेत् सत्यम् ; यस्मिन्सामर्थ्याप्रतिवन्धः कारणान्तरसाकल्यं च निश्चेतुं शक्यते, तस्यैव कारणस्य कार्यानुमापकत्वात् । कश्चित् पूर्वचरः, यथा उदेप्यति शकटं कृत्तिको- १ तुलना-प्र. न. ३. २९-३१।२ प्र. न. ३. ३२ । ३ तुलना-प्र० न. ३. २८, ३३-३६ । ५ दिगम्बरजैनपरम्परायां पञ्चधा शुदिन दृश्यते । ४ तुलना-प्र. न. ३. ४२ । ६तुलना-प्र. न.३.५४-५५। ७तुलना-प्र० न० ३.६८-६९, ७७ । ८-०व्याप्यः स्यात् प्र० सं०। ९ तुलना-प्र. न. ३. ७८ । १०-तुलना-प्र. न. ३. ७९.। ११ तुलना-प्र. न. ३. ७०.। १२ तुलना प्र. न, ३.८० ।

. १. प्रमाणपरिच्छेदः । दयान्यथानुपपत्तेरित्यत्र कृत्तिकोदयानन्तरं मुहूर्तान्ते नियमेन शकटोदयो जायत इति कृत्तिकोदयः पूर्वचरो हेतुः शकटोदयं गमयति ! कश्चित् उत्तरचरः, यथोदगाद्भरणिः प्राक् , कृत्तिकोदयादित्यत्र कृत्तिकोदयः, कृत्तिकोदयो हि भरण्युदयोत्तरचरस्तं गमय- तीति कालव्यवधानेनानयोः कार्यकारणाभ्यां भेदः । कश्चित् सहचरः, यथा मातुलिङ्ग रूपवद्भवितुमर्हति रसवत्तान्यथानुपपत्तेरित्यत्र रसः, रसो हि नियमेन रूपसहचरितः, 5 तदभावेऽनुपपद्यमानस्तद्गमयति, परस्परस्वरूपपरित्यागोपलम्भ-पौर्वापर्याभावाभ्यां स्व- भावकार्यकारणेभ्योऽस्य भेदः। एतेषूदाहरणेषु भावरूपानेवाग्न्यादीन् साधयन्ति धूमादयो हेतवो भावरूपा एवेति विधिसाधकविधिरूपास्त एवाविरुद्धोपलब्धय इत्युच्यन्ते। ६५३. द्वितीयस्तु निषेधसाधको विरुद्धोपलब्धिनामा । स च स्वभावविरुद्ध- तद्व्याप्याद्युपलब्धिमेदात् सप्तधा । यथा नास्त्येव सर्वथा एकान्तः, अनेकान्त- 10 स्योपलम्भात् । नास्त्यस्य तत्वनिश्चयः, तत्र सन्देहात् । नास्त्यस्य क्रोधोप- शान्तिः, वदनविकारादेः । नास्त्यस्यासत्यं वचः, रागाधकलाङ्कितज्ञानकलितत्वात् । नोद्गमिष्यति मुहूर्तान्ते पुष्यतारा, रोहिण्युद्गमात् । नोदगान्मुहूर्तात्पूर्व मृगशिरः, पूर्वफा(फोल्गुन्युदयात् । नास्त्यस्य मिथ्याज्ञानं, सम्यग्दर्शनादिति । अत्रानेकान्तः प्रतिषेध्यस्यैकान्तस्य स्वभावतो विरुद्धः । तत्रसन्देहश्च प्रतिषेध्यतत्वनिश्चयविरुद्ध- 15 सदनिश्चयव्याप्यः। वदनविकारादिश्च क्रोधोपशमविरुद्धतदनुपशमकार्यम् । रागाद्य- कलङ्कितज्ञानकलितत्वं चासत्यविरुद्धसत्यकारणम् । रोहिण्युद्गमश्च पुण्यतारोद्गमविरुद्ध- मृगशीर्षोदयपूर्वचरः । पूर्वफल्गुन्युदयश्च मृगशीर्षोदयविरुद्धमघोदयोत्तरचरः। सम्यग्- दर्शनं च मिथ्याज्ञानविरुद्धसम्यग्ज्ञानसहचरमिति । ६५४. प्रतिषेधरूपोऽपि हेतुर्द्विविधः-विधिसाधकः प्रतिषेधसाधकश्चेति । आंघो 20 विरुद्धानुपलब्धिनामा विधेयविरुद्धकार्यकारणस्वभावव्यापकसहचरानुपलम्भभेदात्पञ्च- धा । यथा अस्त्यत्र रोगातिशयः, नीरोगव्यापारानुपलब्धेः । विद्यतेऽत्र कष्टम्, इष्टसंयो- गाभावात् । वस्तुजातमनेकान्तात्मकम् , एकान्तस्वभावानुपलम्भात् । अस्त्यत्र च्छाया, औष्ण्यानुपलब्धेः । अस्त्यस्य मिथ्याज्ञानम्, सम्यग्दर्शनानुपलब्धेरिति । ६५५. द्वितीयोऽविरुद्धानुपलब्धिनामी प्रतिपेध्याविरुद्धस्वभावव्यापककार्यकारण- 25 पूर्वचरोत्तरचरसहचरानुपलब्धिभेदात् सप्तधा । यथा नास्त्यत्र भूतले कुम्भः, उपलब्धि- लक्षणप्राप्तस्य तत्स्वभावस्यानुपलम्भात् । नास्त्यत्र पनसः, पादपानुपलब्धेः । नास्त्य- त्राप्रतिहतशक्तिकम् वीजम् , अङ्करानवलोकनात् । न सन्त्यस्य प्रशमप्रभृतयो भावाः, तत्त्वार्थश्रद्धानाभावात् । नोद्गमिष्यति मुहूर्तान्ते स्वातिः, चित्रोदयादर्शनात् । नोद- . १ तुलना-प्र. न. ३. ८१. । २ तुलना-प्र. न. ३. ७१। ३तुलना-प्र. न. ३. ८२ ॥ ४ तुलना-प्र. न. ३. ७६ । ५ तुलना-प्र. न. ३. ८३-९२ । ६ विरुद्धस्वभावव्यापककार्यकारणपूर्व 'चरोत्तरचरसहचरोपलम्मभेदात्सप्तधा । ७ तुलना-प्र० न० ३. ८४, ८५, ८५-९२ । ८ पूर्वाफाल्गु-प्र० । ९ तुलना-प्र. न. ३. १०३-१०९ । १० तुलना-प्र. न. ३.९४-१०२ । ३ १८ . जैनतर्कभापा। गमत्पूर्वभद्रपदा मुहूर्तात्पूर्वम् , उत्तरभद्रपदोद्गमानवगमात् । नास्त्यत्र सम्यग्ज्ञानम् , सम्यग्दर्शनानुपलव्धेरिति । सोऽयमनेकविधोऽन्यथानुपपत्त्येकलक्षणो हेतुरुक्तोऽतोऽन्यो हेत्वाभासः। [२०. हेत्वाभासनिरूपणम् । ] ६५६. स त्रेधा-असिद्धविरुद्धानकान्तिकभेदात् । तत्राप्रतीयमानस्वरूपो हेतुर- 5 सिद्धः । स्वरूपाप्रतीतियाज्ञानात्सन्देहाद्विपर्ययाद्वा । स द्विविधः-उभयासिद्धोऽन्यतरा- सिद्धश्च । आद्यो यथा शब्दः परिणामी चाक्षुपत्वादिति । द्वितीयो यथा अचेतनास्त- रवः, विज्ञानेन्द्रियायुर्निरोधलक्षणमरणरहितत्वात् , अचेतनाः सुखादयः उत्पत्तिमत्त्वा- दिति वा। ६५७, नन्वन्यतरासिद्धो हेत्वाभास एव नास्ति, तथाहि-परेणासिद्ध इत्युद्भाविते 10 यदि वादी न तत्साधकं प्रमाणमाचक्षीत, तदा प्रमाणाभावादुभयोरप्यसिद्धः । अथा- चक्षीत तदा प्रमाणस्यापक्षपातित्वादुभयोरपि सिद्धः। अथ यावन्न परं प्रति प्रमाणेन प्रसाध्यते, तावत्तं प्रत्यसिद्ध इति चेत् ; गौणं तर्यसिद्धत्वम् , न हि रत्नादिपदार्थस्त- त्वतोऽप्रतीयमानस्तावन्तमपि कालं मुख्यतया तदाभासः। किञ्च, अन्यतरासिद्धो यदा हेत्वाभासस्तदा वादी निगृहीतः स्यात्, न च निगृहीतस्य पश्चादनिग्रह इति युक्तम् । 15 नापि हेतुसमर्थनं पश्चाद्युक्तम् , निग्रहान्तत्वाद्वादस्येति । अत्रोच्यते-यदा वादी सम्यग्- घेतुत्वं प्रतिपद्यमानोऽपि तत्समर्थनन्यायविस्मरणादिनिमित्तेन प्रतिवादिनं प्रानिकान् वा प्रतिबोधयितुं न शक्नोति, असिद्धतामपि नानुमन्यते, तदान्यतरासिद्धत्वेनैव निगृ. ह्यते । तथा, स्वयमनभ्युपगतोऽपि परस्य सिद्ध इत्येतावान(इत्येतावतै)वोपन्यस्तो हेतुरन्य- तरासिद्धो निग्रहाधिकरणम् , यथा साङ्ख्यस्य जैनं प्रति 'अचेतनाः सुखादय उत्पत्ति- 20 मत्त्वात् घटवत्' इति । ६५८. साध्यविपरीतव्याप्तो विरुद्धः। यथा अपरिणामी शब्दः कृतकत्वादिति । कृतकत्वं ह्यपरिणामित्वविरुद्धेन परिणामित्वेन व्याप्तमिति । ६५९. यस्यान्यथानुपपत्तिः सन्दिह्यते सोऽनैकान्तिकः । स द्वेधा-निर्णीतविपक्ष- वृत्तिकः सन्दिग्धविपक्षवृत्तिकश्च । आयो यथा नित्यः शब्दः प्रमेयत्वात् । अत्र हि 25 प्रमेयत्वस्य वृत्तिनित्ये व्योमादौ सपक्ष इव विपक्षेऽनित्ये घटादावपि निश्चिता । द्वितीयो यथा अभिमतः सर्वज्ञो न भवति वक्तृत्वादिति । अत्र हि वक्तृत्वं विपक्षे सर्वने संदिग्ध- वृत्तिकम् , सर्वज्ञः किं वक्ताऽऽहोस्विन्नति सन्देहात् । एवं स श्यामो मित्रापुत्रत्वादित्या- द्यप्युदाहार्यम् । ६६०. अकिञ्चित्कराख्यश्चतुर्थोऽपि हेत्वाभासमेदो धर्मभूपणेनोदाहृतो न श्रद्धेयः। ३- इत्येतावामेवोप०-संक। १ तुलना प्र. न. ६.४७ । २तुलना-प्र. न. ६. ४०-५१ । तुलना-प्र. न. ६.५२, ५३॥ ५ तुलना-प्र. न. ६.५४-५७ । .

سر १. प्रमाणपरिच्छेदैः । १९ सिद्धसाधनो बाधितविपयश्चेति द्विविधस्याप्यप्रयोजकाह्वयस्य तस्य प्रतीत-निराकृता- ख्यपक्षाभासभेदानतिरिक्तत्वात् । न च यत्र पक्षदोपस्तत्रावश्यं हेतुदोषोऽपि वाच्यः, दृष्टान्तादिदोपस्याप्यवश्यं वाच्यत्वापत्तेः । एतेन कालात्ययापदिष्टोऽपि प्रत्युक्तो वेदितव्यः। प्रकरणसमोऽपि नातिरिच्यते, तुल्यबलसाध्य-तद्विपर्ययसाधकहेतुद्वयरूपे सत्यस्मिन् प्रकृतसाध्यसाधनयोरन्यथानुपपत्यनिश्चयेऽसिद्ध एवान्तर्भावादिति संक्षेपः। 5 [२१. आगमप्रमाणनिरूपणम् । ] ६६१. आप्तवचनादाविर्भूतमर्थसंवेदनमागमः । न च व्याप्तिग्रहणवलेनार्थप्रति- पादकत्वाद् धूमवदस्यानुमानेऽन्तर्भावः, कूटाकूटकापणनिरूपणप्रवणप्रत्यक्षवदभ्यास- दशायां व्याप्तिग्रहनैरपेक्ष्येणैवास्यार्थबोधकत्वात् । यथास्थितार्थपरिज्ञानपूर्वकहितोपदेश- प्रवण आप्तः । वर्णपदवाक्यात्मकं तद्वचनम् । वर्णोऽकारादिः पौगलिकः । पदं सङ्केत- 10 वत् । अन्योऽन्यापेक्षाणां पदानां समुदायो वाक्यम् । ६६२. तदिदमागमप्रमाणं सर्वत्र विधिप्रतिषेधाभ्यां स्वार्थमभिदधानं सप्तभङ्गीमनु. गच्छति, तथैव परिपूर्णार्थप्रापकत्वलक्षणतात्विकप्रामाण्यनिर्वाहात , क्वचिदेकभङ्गदर्शनेऽपि व्युत्पन्नमतीनामितरभङ्गाक्षेपध्रौव्यात् । यत्र तु घटोऽस्तीत्यादिलोकवाक्ये सप्तभङ्गी- संस्पर्शशून्यता तत्रार्थनापकत्वमात्रेण लोकापेक्षया प्रामाण्येऽपि तत्त्वतो न प्रामाण्यमिति 15 द्रष्टव्यम् । [ २२. सप्तभङ्गीस्वरूपचर्चा । ] ६६३. केयं सप्तभङ्गीति चेदुच्यते - एकत्र वस्तुन्येकैकधर्मपर्यनुयोगवशादविरोधेन व्यस्तयोः समस्तयोश्च विधिनिषेधयोः कल्पनया स्यात्काराङ्कितः सप्तधा वाक्प्रयोगः सप्तभङ्गी । इयं च सप्तभङ्गी वस्तुनि प्रतिपर्यायं सप्तविधधर्माणां सम्भवात् सप्तविध- 20 संशयोत्थापितसप्तविधजिज्ञासामूलसप्तविधप्रश्नानुरोधादुपपद्यते । तत्र स्यादस्त्येव सर्व- मिति प्राधान्येन विधिकल्पनया प्रथमो भङ्गः । स्यात्-कथञ्चित् स्वद्रव्यक्षेत्रकालभावा- पेक्षयेत्यर्थः। अस्ति हि घटादिकं द्रव्यतः पार्थिवादित्वेन, न जलादित्वेन । क्षेत्रतः पाटलिपुत्रकादित्वेन, न कान्यकुब्जादित्वेन । कालतः शैशिरादित्वेन, न वासन्तिका- दित्वेन । भावतः श्यामादित्वेन, न रक्तादित्वेनेति । एवं स्यानास्त्येव सर्वमिति प्राधा- 25 न्येन निषेधकल्पनया द्वितीयः । न चासत्त्वं काल्पनिकम् ; सत्त्ववत् तस्य स्वातन्त्र्येणानुभ- वात् , अन्यथा विपक्षासत्त्वस्य तात्त्विकस्याभावेन हेतोस्वैरूप्यव्याघातप्रसङ्गात् । स्या- दस्त्येव स्यान्नास्त्येवेति प्राधान्येन क्रमिकविधिनिषेधकल्पनया तृतीयः । स्यादवक्तव्य- मेवेति युगपत्प्राधान्येन विधिनिषेधकल्पनया चतुर्थः," एकेन पदेन युगपदुभयोक्तुम- १ प्र. न. ४.१ । २ तुलना-प्र. न. ४. ४ । ३ तुलना-प्र. न. ४. ८, ९ । ४ तुलना-प्र. न.४.१० । ५ तुलना-प्र. न. ४. १३ । ६ प्र. न. ४. १४ । ७ तुलना-प्र. न. ४. ३७-४२१ -तुलना-प्र. न. ४. १५। ९ तुलना-प्र. न.. ४. १६ । १० तुलना-प्र.न. ४, १७ । ११ तुलना-प्र.न. ४. १८ ।

२० जैनतर्कभाषा। चे शक्यत्वात् । शतृशानशौ सदित्यादौ साङ्केतिकपदेनापि क्रमेणार्थद्वयबोधनात् । अन्यतर- स्वादिना कथञ्चिदुभयवोधनेऽपि प्रातिस्विकरूपेणैकपदादुभयबोधस्य ब्रह्मणापि दुरुपपा- दत्वात् । स्यादस्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति विधिकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया च पञ्चमः । स्यान्नास्त्येव स्यादवक्तव्यमेवेति निषेधकल्पनया युगपद्विधिनिषेधकल्पनया 5 च पष्ठः । स्यादस्त्येव स्यान्नात्स्येव स्यादवक्तव्यमेवेति विधिनिषेधकल्पनया युगप- द्विधिनिषेधकल्पनया च सप्तम इति । ६६४. सेयं सप्तभङ्गी प्रतिभङ्ग(झ) सकलादेशस्वभावा विकलादेशस्वभावा तत्र प्रमाणप्रतिपन्नानन्तधर्मात्मकवस्तुनः कालादिभिरभेदवृत्तिप्राधान्यादभेदोपचाराद्वा योगपद्येन प्रतिपादकं वचः सकलादेशः । नयविपयीकृतस्य वस्तुधर्मस्य भेदवृत्तिप्राधा- 10 न्याद्भेदोपचाराद्वा क्रमेणाभिधायकं वाक्यं विकलादेशः । ननु कः क्रमः, किं वा योगद्यम् ? । उच्यते यदास्तित्वादिधर्माणां कालादिभिर्भेदविवक्षा तदैकशब्दस्यानेका- र्थप्रत्यायने शक्त्यभावात् क्रमः । यदा तु तेषामेव धर्माणां कालादिभिरभेदेन वृत्तमा- स्मरूपमुच्यते तदैकेनापि शब्देनैकधर्मप्रत्यायनमुखेन तदात्मकतामापन्नस्यानेकाशेषरूप- स्य वस्तुनः प्रतिपादनसम्भवाद्योगपद्यम् । ६६५. के पुनः कालादयः १ । उच्यते-काल आत्मरूपमर्थः सम्बन्ध उपकारः गुणिदेशः संसर्गः शब्द इत्यष्टौ । तत्र स्याजीवादि वस्त्वस्त्येवेत्यत्र यत्कालमस्तित्वं त्वत् ( तत् )कालाः शेषानन्तधर्मा वस्तुन्येकडेति तेषां कालेनाभेदवृत्तिः। यदेव चास्ति- त्वस्य तद्गुणत्वमात्मरूपं तदेवान्यानन्तगुणानामपीत्यात्मरूपेणाभेदवृत्तिः । य एव चाधारे(रो)ऽर्थो द्रव्याख्योऽस्तित्वस्य स एवान्यपर्यायाणामित्यर्थेनाभेदवृत्तिः । य एव 20 चाविष्वग्भावः सम्बन्धोऽस्तित्वस्य स एवान्येपामिति सम्बन्धेनाभेदवृत्तिः । य एव चोपकारोऽस्तित्वेन स्वानुरक्तत्वकरणं स एवान्यैरपीत्युपकारेणाभेदवृत्तिः । य एव गुणिनः सम्बन्धी देशः क्षेत्रलक्षणोऽस्तित्वस्य स एवान्येपामिति गुणिदेशेनाभेदवृत्तिः । य एव चैकवस्त्वात्मनाऽस्तित्वस्य संसर्गः स एवान्येपामिति संसर्गेणाभेदवृत्तिः । गुणीभूत- भेदादभेदप्रधानात् सम्बन्धाद्विपर्ययेण संसर्गस्य भेदः । य एव चास्तीति शब्दोऽस्ति- 25 त्वधर्मात्मकस्य वस्तुनो वाचकः स एवाशेपानन्तधर्मात्मकस्यापीति शब्देनाभेदवृत्तिः, पर्यायार्थिकनयगुणभावेन द्रव्यार्थिकनयप्राधान्यादुपपद्यते । द्रव्यार्थिकगुणभावेन पर्या- यार्थिकप्राधान्ये तु न गुणानामभेदवृत्तिः सम्भवति, समकालमेकत्र नानागुणानामसम्भ- वात् , सम्भवे वा तदाश्रयस्य भेदप्रसङ्गात् । नानागुणानां सम्बन्धिन आत्मरूपस्य च भिन्नत्वात् , अन्यथा तेषां भेदविरोधाद, स्वाश्रयस्यार्थस्यापि नानात्वात् , अन्यथा 80 नानागुणाश्रयत्वविरोधात् । सम्बन्धस्य च सम्बन्धिभेदेन भेददर्शनात् , नानासम्बन्धि- 15 १-०नचौ-रत्नाकरा० ४. १८१२ प्र.न, ४. १९ । ३ प्र. न. ४. २० । ४ तुलना प्र. न. ४. २१ ।। ५ तुलना प्र. न. ४. ४३ । ६ प्र. न. ४. ४४ । ७ तुलना-प्र. न. ४. ४५। ८ द्रष्टव्या-रत्नाकरा० ४.४४ ॥

- 2678 १. प्रमाणपरिच्छेदः। भिरेकत्रकसम्बन्धाघटनात् । तैः क्रियमाणस्योपकारस्य च प्रतिनियतरूपस्यानेकत्वात अनेकैरुपकारिभिः क्रियमाणस्योपकारस्यैकस्य विरोधात् । गुणिदेशस्य च प्रतिगुणं भेदात् , तदभेदे भिन्नार्थगुणानामपि गुणिदेशाभेदप्रसङ्गात् । संसर्गस्य च प्रतिसंसर्गि भेदात् , तदभेदे संसर्गिभेदविरोधात् । शब्दस्य प्रतिविपयं नानात्वात् , सर्वगुणानामे- कशब्दवाच्यतायां सर्वार्थानामेकशब्दवाच्यतापचेरिति कालादिभिर्मिनात्मनामभेदोप- 5 चारः क्रियते । एवं भेदवृत्तितदुपचारावपि वाच्याविति । पर्यवसितं परोक्षम् । ततश्च निरूपितः प्रमाणपदार्थः । इति महामहोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिष्यमुख्यपण्डितश्रीलाभविजयगणिशिष्यावतं- सपण्डितश्रीजीतविजयगणिसतीर्थ्यपण्डितश्रीनयविजयगणिशिष्येण पण्डितश्रीपद्म- विजयगणिसहोदरेण पण्डितयशोविजयगणिना कृतायां जैनतर्क- भाषायां प्रमाणपरिच्छेदः सम्पूर्णः । , 10 २. नयपरिच्छेदः। [ १. नयानां स्वरूपनिरूपणम् । ] ६१. प्रमाणान्युक्तानि । अथ नया उच्यन्ते । प्रमाणपरिच्छिन्नस्यानन्तधर्मात्म- कस्य वस्तुन एकदेशग्राहिणस्तदितरांशाप्रतिक्षेपिणोऽध्यवसायविशेषा नयाँः । प्रमाणे- 15 कदेशत्वात् तेषां ततो भेदः । यथा हि समुद्रैकदेशो न समुद्रो नाप्यसमुद्रस्तथा नया अपि न प्रमाणं न वाऽप्रमाणमिति । ते च द्विधा - द्रव्यार्थिकपर्यायार्थिकभेदात् । तत्र प्राधान्येन द्रव्यमात्रग्राही द्रव्यार्थिकः। प्राधान्येन पर्यायमात्रग्राही पर्यायार्थिकः । तत्र द्रव्यार्थिकस्त्रिधा नैगमसञ्चहव्यवहारभेदात् । पर्यायार्थिकश्चतुर्धा ऋजुमूत्रशब्दसमभिरू- ढैवंभूतभेदात् । ऋजुसूत्रो द्रव्यार्थिकस्यैव भेद इति तु जिनभद्रगणिक्षमाश्रमणाः । ६२. तत्र सामान्यविशेषाधनेकधर्मोपनयनपरोऽध्यवसायो नैगमः, यथा पर्या. ययोर्द्रव्ययोः पर्यायद्रव्ययोश्च मुख्यामुख्यरूपतया विवक्षणपरः। अत्र सञ्चैतन्यमात्मनीति 20 १ तुलना-प्र. न. ७.१ । २ तुलना-"नाप्रमाणं प्रमाणं वा नयो ज्ञानात्मको मतः। स्यात्प्रमाणैकदेशस्तु सर्वथाप्यविरोधतः ।। नायं वस्तु नवावस्तु वस्त्वंशः कथ्यते यतः। नासमुद्रः समुद्रो वा समुद्रांशो यथोच्यते ॥" तत्वार्यश्लोकवा० १.६.२१,५ । ३ तुलना-प्र. न. ७.५ । ४ तुलना-प्र. न. ७.६। ५ तुलना-प्र. न. ७. २७ । ६ तुलना-प्र. न. ७. ७ । "गुणप्रधानभावेन धर्मयोरेकर्मिणि । विवक्षा नैगमोऽसन्तभेदोक्तिः स्यातदाकृतिः ॥" लघीय० ६.१८ । तत्वार्यदलोकवा० १.३३.२१।

२२ जैनतर्कभाषा। पर्याययोर्मुख्यामुख्यतया विवक्षणम् । अत्र चैतन्याख्यस्य व्यञ्जनपर्यायस्य विशेष्यत्वेन मुख्यत्वात् , सत्त्वाख्यस्य तु विशेषणत्वेनामुख्यत्वात्। प्रवृत्तिनिवृत्तिनिवन्धनार्थक्रिया- कारित्वोपलक्षितो व्यञ्जनपर्यायः। भूतभविष्यत्वसंस्पर्शरहितं वर्तमानकालावच्छिन्नं वस्तु- स्वरूपं चार्थपर्यायः । वस्तु पर्यायवद्रव्यमिति द्रव्ययोर्मुख्यामुख्यतया विवक्षणम्, पर्या- यवद्रव्याख्यस्य धर्मिणो विशेष्यत्वेन प्राधान्यात् , वस्त्वाख्यस्य विशेषणत्वेन गौण- 5 त्वात् । क्षणमेकं सुखी विषयासक्तजीव इति पर्यायद्रव्ययोर्मुख्यामुख्यतया विवक्षणम्, अत्र विषयासक्तजीवाख्यस्य धर्मिणो विशेष्यत्वेन मुख्यत्वात् , सुखलक्षणस्य तु धर्मस्य तद्विशेषणत्वेनामुख्यत्वात् । न चैवं द्रव्यपर्यायाभयावगाहित्वेन नैगमस्य प्रामाण्यप्रसङ्गः, प्राधान्येन तदुभयावगाहिन एव ज्ञानस्य प्रमाणत्वात् । ६३. सामान्यमात्रग्राही परामर्शः सङ्ग्रहः-स द्वेधा, परोऽपरच । तत्रापविशेपे- 10 प्वौदासीन्यं भजमानः शुद्धद्रव्यं सन्मात्रमभिमन्यमानः परः सङ्ग्रहः । यथा विश्वमेकं सदविशेषादिति । द्रव्यत्वादीन्यवान्तरसामान्यानि मन्वानस्त देपु गजनिमीलिकाम- वलम्बमानः पुनरपरसङ्ग्रहः । सङ्ग्रहेण गोचरीकृतानामर्थानां विधिपूर्वकमवहरणं येनाभि सन्धिना क्रियते स व्यवहारः । यथा यत् सत् तद् द्रव्यं पर्यायो वौं । यद् द्रव्यं तज्जीवादि पड्डिधम् । यः पर्यायः स द्विविधः- क्रमभावी सहभावी चेत्यादि । ३४. ऋजु वर्तमानक्षणस्थायिपर्यायमात्रं प्राधान्यतः सूचयन्नभिप्राय ऋजुसूत्रः । यथा सुखविवर्तः सम्प्रत्यस्ति । अत्र हि क्षणस्थायि सुखाख्यं पर्यायमात्रं प्राधान्येन प्रद- यते, तदधिकरणभूतं पुनरात्मद्रव्यं गौणतया नाlत इति । ६५. कोलादिभेदेन ध्वनेरर्थभेदं प्रतिपद्यमानः शब्दः । कालकारकलिङ्गसङ्ख्या- पुरुषोपसर्गाः कालादयः । तत्रै बभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यत्रातीतादिकालभेदेन 20 सुमेरोदप्रतिपत्तिः, करोति क्रियते कुम्भ इत्यादौ कारकभेदेन, तटस्तटी तटमित्यादौ लिङ्गभेदेन, दाराः कलत्रमित्यादौ संख्याभेदेन, यास्यसि त्वम् , यास्यति भवानित्यादौ पुरुपभेदेन, सन्तिष्ठते अवतिष्ठते इत्यादावुपसर्गभेदेन । ६६. पर्यायशब्देषु निरुक्तिभेदेन भिन्नमर्थं समभिरोहन समभिरूढः । शब्दनयो हि पर्यायभेदेऽप्यमेदमभिप्रेति, समभिरूढस्तु पर्यायभेदे भिन्नाननभिमन्यते । 15 ७प्र.न. ७.१५। १ तुलना-प्र. न. ७.८। तत्त्वार्यदलोकवा० १. ३३. ३२, ३३ । २ तुलना-प्र.न. ७.९। तत्त्वार्थ लोकवा० १.३३.३९ । ३ तुलना-प्र. न.७. १० । तत्त्वार्यश्लोकवा० १. ३३. ४३. । ४ तुलना- तत्त्वार्थ लोकवा० १. ३३. २२, २३ । ५ प्र.न. ७. १३ । तुलना-लघीय० ६.१९ । तत्त्वार्थ लोकवा० १.३३. ५१,५५।६ तुलना-प्र. न. ५. १४ । ८ तुलना-प्र. न. ७. १६ । ९प्र. न. ७.१९ । १० प्र. न. ७. २३ । तत्त्वार्थश्लोकवा० १.३३.५८ ॥ ११ तुलना-प्र. न. ७. २४ । १२ तुलना- प्र. न.७.२८, २९ । तत्त्वार्थ लोकवा० १. ३३.६१ । १३ प्र. न. ७, ३२ । तुलना-लघीय० ६. १४ । तत्त्वार्थ लोकवा० १. ३३. ६८-७२ । १४ तुलना प्र. न. ७. ३३ । १५ प्र. न. ७. ३६ । तुलना-तत्त्वार्थ- लोकवा० १.३३. ७६, ७७ ।

, २. नयपरिच्छेदः। २३ अभेदं त्वर्थगतं पर्यायशब्दानामुपेक्षत इति, यथा इन्दनादिन्द्रः, शकनाच्छकः, पूर्दा- रणात्पुरन्दर इत्यादि। ६७. शब्दानां स्वप्रवृत्तिनिमित्तभूतक्रियाविष्टमर्थं वाच्यत्वेनाभ्युपगच्छन्नेवम्भूतः । यथेन्दनमनुभवन्निन्द्रः । समभिरूढनयो हीन्दनादिक्रियायां सत्यामसत्यां च चासवादे- रथस्येन्द्रादिव्यपदेशमभिप्रैति, क्रियोपलक्षितसामान्यस्यैव प्रवृत्तिनिमित्तत्वात् , पशु- 5 विशेषस्य गमनक्रियायां सत्यामसत्यां च गोव्यपदेशवत् , तथारूढेः सद्भावात् । एव- म्भूतः पुनरिन्दनादिक्रियापरिणतमर्थं तत्क्रियाकाले इन्द्रादिव्यपदेशभाजमभिमन्यते । न हि कश्चिदक्रियाशब्दोऽस्यास्ति । गौरव इत्यादिजातिशब्दाभिमतानामपि क्रियाश ब्दत्वात् , गच्छतीति गौः, आशुगामित्वादश्व इति । शुक्लो, नील इति गुणशब्दाभि- मता अपि क्रियाशब्दा एव, शुचीभवनाच्छुक्लो, नीलनान्नील इति । देवदत्तो यज्ञदत्त 10 इति यदृच्छाशब्दाभिमता अपि क्रियाशब्दा एव, देव एनं देयात् , यज्ञ एनं देयादिति । संयोगिद्रव्यर्शब्दाः समवाय(यि)द्रव्यशब्दाश्चाभिमताः क्रियाशब्दा एव दण्डोऽस्या- स्तीति दण्डी, विषाणमस्यास्तीति विषाणीत्यस्तिक्रियाप्रधानत्वात् । पञ्चतयी तु शब्दानां व्यवहारमात्रात्, न तु निश्चयादित्ययं नयः स्वीकुरुते । ६८. एतेष्वाद्याश्चत्वारः प्राधान्येनार्थगोचरत्वादर्थनयाः अन्त्यास्तु त्रयः प्राधा- 15 न्येन शब्दगोचरत्वाच्छब्दनयाः । तथा विशेषग्राहिणोऽर्पितनयाः, सामान्यग्राहिणश्चान- र्पितनयाः। तत्रानर्पितनयमते तुल्यमेव रूपं सर्वेषां सिद्धानां भगवताम् । अर्पितनयमते त्वेकद्विच्यादिसमयसिद्धाः स्वसमानसमयसिद्धैरेव तुल्या इति । तथा, लोकप्रसिद्धार्थानु- वादपरो व्यवहारनयः, यथा पञ्चस्वपि वर्णेषु भ्रमरे सत्सु श्यामो भ्रमर इति व्यपदेशः । तात्त्विकार्थाभ्युपगमपरस्तु निश्चयः, स पुनर्मन्यते पञ्चवर्णो भ्रमरः, चादरस्कन्धत्वेन 20 तच्छरीरस्य पञ्चवर्णपुद्गलैर्निष्पन्नत्वात् , शुक्लादीनां च न्यग्भूतत्वेनानुपलक्षणात् । अथवा एकनयमतार्थग्राही व्यवहारः, सर्वनयमतार्थग्राही च निश्चयः । न चैवं निश्चयस्य प्रमाणत्वेन नयत्वव्याघातः, सर्वनयमतस्यापि स्वार्थस्य तेन प्राधान्याभ्युपगमात् । तथा, ज्ञानमात्रप्राधान्याभ्युपगमपरा ज्ञाननयाः । क्रियामात्रप्राधान्याभ्युपगमपराश्च क्रियानयाः । तत्रर्जुसूत्रादयश्चत्वारो नयाश्चारित्रलक्षणायाः क्रियाया एव प्राधान्यमभ्यु- 25 पगच्छन्ति, तस्या एव मोक्षं प्रत्यव्यवहितकारणत्वात् । नैगमसंग्रहव्यवहारास्तु यद्यपि चारित्रश्रुतसम्यक्त्वानां त्रयाणामपि मोक्षकारणत्वमिच्छन्ति, तथापि व्यस्तानामेव, न तु समस्तानाम्, एतन्मते ज्ञानादित्रयादेव मोक्ष इत्यनियमात् , अन्यथा नयवहानि- प्रसङ्गात् , समुदयवादस्य स्थितपक्षत्वादिति द्रष्टव्यम् । " - . १ तुलना प्र. न. ७.३७ । २ प्र. न. ७. ४०, ४१ । तुलना-तत्त्वार्योक्वा० १. ३३. ७८, ७९ । ३-०स्य च गमन०-प्र. ०।५-०शब्दः स०-सं० । ० शब्दा स०-प्र०। ५ तुलना-प्र. न. ७. ४४ । तत्त्वार्थ लोकवा० १. ३३.८१॥ ६-०नमेषु सत्तु-२० प० ।

२४ जैनतर्कभापा । 15 ६९. कः पुनरत्र बहुविपयो नयः को वाऽल्पविषयः ?, इति चेदुच्यते-सन्मात्र. गोचरात्संग्रहात्तावन्नैगमो बहुविपयो भावाभावभूमिकत्वात् । सद्विशेपप्रकाशकाम्यवहा- रतः संग्रहः समस्तसत्समूहोपदर्शकत्वादहुविषयः । वर्तमानविपयावलम्बिन ऋजुसत्रा- त्कालत्रितयवर्त्यर्थजातावलम्बी व्यवहारो वहुविषयः । कालादिभेदेन भिन्नार्थोपदेशका- 5 च्छब्दात्तद्विपरीतवेदक ऋजुसूत्रो बहुविषयः । न केवलं कालादिभेदेनैवर्जुसूत्रादल्पार्थता शब्दस्य, किन्तु भावघटस्यापि सद्भावासद्भावादिनाऽर्पितस्य स्याद् घटः स्यादघट इत्यादिभङ्गपरिकरितस्य तेनाभ्युपगमात् तस्यर्जुसूत्राद् विशेपिततरत्वोपदेशात् । यद्य- पीदृशसम्पूर्णसप्तभङ्गपरिकरितं वस्तु स्याद्वादिन एव सङ्गिरन्ते, तथापि ऋजुसूत्रकृतैतद- भ्युपगमापेक्षयाऽन्यतरभङ्गेन विशेपितप्रतिपत्तिस्त्रादुष्टेत्यदोष इति वदन्ति । प्रतिपर्याय- 10 शब्दमर्थभेदमभीप्सतः समभिरूढाच्छब्दस्तद्विपया(द्विपर्यया)नुयायित्वादविपयः। प्रति- क्रियं विभिन्नमर्थं प्रतिजानानादेवम्भूतात्समभिरूढः तदन्यथार्थस्थापकत्वाद्रहुविषयः । १०, नयवाक्यमपि स्वविपये प्रवर्तमानं विधिप्रतिपेधाभ्यां सप्तभङ्गीमनुगच्छति, विकलादेशत्वात् , परमेतद्वाक्यस्य प्रमाणवाक्याद्विशेप इति द्रष्टव्यम् । [२. नयाभासानां निरूपणम् । ] ६ ११. अथ नयाभासाः। तत्र द्रव्यमानग्राही पर्यायप्रतिक्षेपी द्रव्यार्थिकाभासः। पर्यायमात्रग्राही द्रव्यप्रतिक्षेपी पर्यायार्थिकामासः धर्मिधर्मादीनामे(मै)कान्तिकपार्थक्या. भिसन्धि गमाभासः, यथा नैयायिकवैशेषिकदर्शनम् । संत्ताऽद्वैतं स्वीकुर्वाणः सकलविशेपा- निराचक्षाणः संग्रहामासः यथाऽखिलान्यद्वैतवादिदर्शनानि सांख्यदर्शनं च । अपार- मार्थिकद्रव्यपर्यायविभागाभिप्रायो व्यवहारामासः, यथा चार्वाकदर्शनम्, चार्वाको हि '20 प्रमाणप्रतिपन्न जीवद्रव्यपर्यायादिनविभागं कल्पनारोपितत्वेनापहतेऽविचारितरमणीय भूतचतुष्टयप्रविभागमात्रं तु स्थूललोकव्यवहारानुयायितया समर्थयत इति । वर्तमान- पर्यायाभ्युपगन्ता सर्वथा द्रव्यापलापी ऋजुसूत्रामासः, यथा ताथागतं मतं । कालादि- भेदेनार्थभेदमेवाभ्युपगच्छन् शब्दाभासः, यथा वभूव भवति भविष्यति सुमेरुरित्यादयः शब्दा भिन्नमेवार्थमभिदधति, भिन्नकालशब्दत्वात्तादृसिद्धान्यशब्दवदिति । पर्याय- 25 धनीनामभिधेयनानात्वमेव कक्षीकुर्वाणः समभिरूढाभासः, यथा इन्द्रः शक्रः पुरन्दर इत्यादयः शब्दा भिन्नाभिधेया एव, भिन्नशब्दत्वात् , करिकुरङ्गशब्दवदिति । क्रिया- १ तुलना-प्र. न. ७. ४६-५२ । सर्वार्थ० १. ३३। तत्त्वार्यश्लोकवा. १. ३३. ८२-८९ । २ तुलना-प्र. न ७.५३. । ३तुलना-प्र. न. ७. ११, १२ । लघीय० स्ववि० ५. ९. तत्त्वार्थ- श्लोकवा० १. ३३.३१, ३४, ३६,३८, ४०, ४२, ४४, ४७ । ४ तुलना-प्र.न. ७. १७, १८, २१, २२ । लघीय. ५. ८। तत्त्वार्यश्लोम्वा० १. ३३. ५२-५४, ५७ । ५ तुलना-प्र. न. ७. २५, २६ । लघीय. ५. १२. । तत्त्वार्थ लोकवा० १. ३३. ६० । ६ स्या. र. पृ० १०५८ । ७ तुलना-अ. न. ७. ३०, ३१ । तत्त्वार्थलोकवा० १.३३. ६२.1 ८ तथागतमतं-सं० मु०। ९ तुलना-प्र. न. ७. ३४, ३५। तत्त्वार्थलो. कवा. १.३३ ८०.१० तुलना-प्र. ज. ५.३८,३९।११ तुलना-प्र. न. ७.४२, . - - ३. निःक्षेपपरिच्छेदः। २५ नाविष्टं वस्तु शब्दवाच्यतया प्रतिक्षिपन्नेवभूताभासः, यथा विशिष्टचेष्टाशून्यं घटाख्यं वस्तु न घटशब्दवाच्यं, घटशब्दप्रवृत्तिनिमित्तभूतकियाशन्यत्वात् , पटवदिति । अर्था- भिधायी शब्दप्रतिक्षेपी अर्थनयाभासः । शब्दाभिधाय्यर्थप्रतिक्षेपी शब्दनयाभासः। अर्पितमभिधानोऽनर्पित प्रतिक्षिपन्नर्पितनयाभासः । अनर्पितमाभिदधदर्पित प्रतिक्षिपन्न- नर्पिताभासः । लोकव्यवहारमभ्युपगम्य तत्त्वप्रतिक्षेपी व्यवहाराभासः । तत्वमभ्युप- 5 गम्य व्यवहारप्रतिक्षेपी निश्चयाभासः। ज्ञानमभ्युपगम्य क्रियाप्रतिक्षेपी ज्ञाननयाभासः। क्रियामभ्युपगम्य ज्ञानप्रतिक्षेपी क्रियानयाभास इति । इति महामहोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिप्यमुख्यपण्डितश्रीलाभविजयगणिशिष्या- वतंसपण्डितश्रीजीतविजयगणिसतीर्थ्यपण्डितश्रीनयविजयगणिशिष्येण पण्डितश्रीपद्मविजयगणिसहोदरेण पण्डितयशोविजयगणिना विरचितायां जैनतर्कभाषायां नयपरिच्छेदः सम्पूर्णः । 10 ३. निक्षेपपरिच्छेदः। [ १. नामादिनिःक्षेपनिरूपणम् । ] ६१. नया निरूपिताः। अथ निःक्षेपा निरूप्यन्ते । प्रकरणादिवशेनाप्रतिपत्या- (त्या)दिव्यवच्छेदकयथास्थानविनियोगाय शब्दार्थरचनाविशेषा निःक्षेपाः । मङ्गलादि- 15 पदार्थनिःक्षेपानाममङ्गलादिविनियोगोपपत्तेश्च निक्षेपाणां फलवत्त्वम् , तदुक्तम्-"अप्र- स्तुतार्धापाकरणात् प्रस्तुतार्थव्याकरणाच निक्षेपः फलवान्” [ लधी० स्ववि० ७. २ ] इति । ते च सामान्यतश्चतुर्धा-नामस्थापनाद्रव्यभावभेदात् । ६२. तत्र प्रकृतार्थनिरपेक्षा नामार्थान्यतरपरिणतिर्नामनिःक्षेपः। यथा सङ्केति- तमात्रेणान्यार्थस्थितेनेन्द्रादिशब्देन वाच्यस्य गोपालदारकस्य शक्रादिपर्यायशब्दानभि- 20 धेया परिणतिरियमेव वा यथान्यत्रावर्तमानेन यदृच्छाप्रवृत्तेन डित्थडवित्थादिशब्देन वाच्या । तत्त्वतोऽर्थनिष्ठा उपचारतः शब्दनिष्ठा च । मेदिनामापेक्षया यावद्रव्यमा- विनी, देवदत्तादिनामापेक्षया चायावद्रव्यभाविनी, यथा वा पुस्तकपत्रचित्रादि- लिखिता वस्त्वभिधानभूतेन्द्रादिवर्णावली । ६३. यत्तु वस्तु तदर्थवियुक्तं तदभिप्रायेण स्थाप्यते चित्रादौ तादृशाकारम् , 25 अक्षादौ च निराकारम् , चित्राद्यपेक्षयेत्वरं नन्दीश्वरचैत्यप्रतिमाद्यपेक्षया च यावत्कथिक स स्थापनानिक्षेपः, यथा जिनप्रतिमा स्थापनाजिनः, यथा चेन्द्रप्रतिमा स्थापनेन्द्रः। $४. भूतस्य भाविनो वा भावस्य कारणं यनिक्षिप्यते स द्रव्यनिःक्षेपः, यथा- १ म. न. ७. ४३ । २-० प्रतिपलवच्छदक०-६० प्रती प्रथमं लिखितं पटयने। ३-०या वा काय. • गा० २६ । ५ तुलना-विशेष गा० २८ । । -प्र०व०। ४ तुलना- -विशेषा P 10 - जैनतर्कभापा। ऽनुभूतेन्द्रपर्यायोऽनुभविष्यमाणेन्द्रपर्यायो वा इन्द्रः, अनुभूतघृताधारत्वपर्यायेऽनुभवि- प्यमाणघृताधारत्वपर्याये च घृतघटव्यपदेशवत्तत्रेन्द्रशब्दव्यपदेशोपपत्तेः । क्वचिदना- धान्येऽपि द्रव्यनिःक्षेपः प्रवर्तते, यथाऽङ्गारमर्दको द्रव्याचार्यः, आचार्यगुणरहितत्वात् अप्रधानाचार्य इत्यर्थः । क्वचिदनुपयोगेऽपि, यथाऽनाभोगेनेहपरलोकाद्याशंसालक्षणे- 5 नाविधिना च भक्त्यापि क्रियमाणा जिनपूजादिक्रिया द्रव्यक्रियैव, अनुपयुक्तक्रियायाः साक्षान्मोक्षाङ्गत्वाभावात् । भक्त्याऽविधिनापि क्रियमाणा सा पारम्पर्येण मोक्षाङ्गत्वा- पेक्षया द्रव्यतामश्नुते, भक्तिगुणेनाविधिदोपस्य निरनुवन्धीकृतत्वादित्याचार्याः । ६५. विवक्षितक्रियानुभूतिविशिष्टं स्वतत्त्वं यन्निक्षिप्यते स भावनिःक्षेपः, यथा इन्दनक्रियापरिणतो भावेन्द्र इति । ६६. नर्नु भाववर्जितानां नामादीनां कः प्रतिविशेपस्त्रिष्वपि वृत्यविशेषात् ?, तथाहि-नाम तावन्नामवति पदार्थे स्थापनायां द्रव्ये चाविशेषेण वर्तते । भावार्थशून्यत्वं स्थापनारूपमपि त्रिष्वपि समानम्, त्रिष्वपि भावस्याभावात् । द्रव्यमपि नामस्थापना. द्रव्येषु वर्तत एव, द्रव्यस्यैव नामस्थापनाकरणात्, द्रव्यस्य द्रव्ये सुतरां वृत्तेश्चेति विरुद्ध- धर्माध्यासाभावान्नैपां भेदो युक्त इति चेत् । न अनेन रूपेण विरुद्धधर्माध्यासाभावेऽपि 15 रूपान्तरेण विरुद्धधर्माध्यासात्त दोपपत्तेः । तथाहि-नामद्रव्याभ्यां स्थापना तावदा- काराभिप्रायवुद्धिक्रियाफलदर्शनाद्भिद्यते, यथा हि स्थापनेन्द्रे लोचनसहस्राद्याकारः, स्थापनाकर्तुश्च सद्भूतेन्द्राभिप्रायो, द्रष्टुश्च तदाकारदर्शनादिन्द्रबुद्धिः, भक्तिपरिणतयु. द्धीनां नमस्करणादिक्रिया, तत्फलं च पुत्रोत्पत्त्यादिकं संवीक्ष्यते, न तथा नामेन्द्र द्रव्येन्द्रे चेति ताभ्यां तस्य भेदः । द्रव्यमपि भावपरिणामिकारणत्वान्नामस्थापनाभ्यां 20 भिद्यते, यथा ह्यनुपयुक्तो वक्ता द्रव्यम्, उपयुक्तत्वकाले उपयोगलक्षणस्य भावस्य कारणं भवति, यथा वा साधुजीवो द्रव्येन्द्रः सद्भावेन्द्ररूपायाः परिणतेः, न तथा नाम- स्थापनेन्द्राविति । नामापि स्थापनाद्रव्याभ्यामुक्तवैधादेव भिद्यत इति । दुग्ध- तक्रादीनां श्वेतत्वादिनाऽमेदेऽपि माधुर्यादिना भेदवन्नामादीनां केनचिद्रूपेणाभेदेऽपि रूपान्तरेण भेद इति स्थितम् । ६७. न भाव एव वस्तु, किं तदर्थशून्यैर्नामादिभिरिति चेत् ;न; नामादीना- मपि वस्तुपर्यायत्वेन सामान्यतो भावत्वानतिक्रमात् , अविशिष्टे इन्द्रवस्तुन्युचरिते नामादिभेदचतुष्टयपरामर्शनात् प्रकरणादिनैव विशेषपर्यवसानात् । भावाङ्गत्वेनैव वा नामादीनामुपयोगः जिननामजिनस्थापनापरिनिर्वृनमुनिदेहदर्शनाद्भावोल्लासानुभवात् । केवलं नामादित्रयं भावोल्लासेनैकान्तिकमनात्यन्तिकं च कारणमिति ऐकान्तिकात्य. . 25 . १ तुलना-विशेपा० गा० ५२। २ तुलना-विशेषा० गा० ५३ । ३ तुलना-विशेपा० गा० ५४ । ४ तुलना-विशेपा० गा० ५५ । ५.०परामर्शदर्शनाद-सं०। ६ तुलना-विशेपा० गा० ५६-५८ ।

३. निःक्षेपपरिच्छेदः। न्तिकस्य भावस्याभ्यहि तत्त्वमनुमन्यन्ते प्रवचनवृद्धाः। एतच्च भिन्नवस्तुगतनामाद्य- पेक्षयोक्तम् । अभिन्नवस्तुगतानां तु नामादीनां भावाविनाभूतत्वादेव वस्तुत्वम् , सर्वस्य वस्तुनः स्वाभिधानस्य नामरूपत्वात्, स्वाकारस्य स्थापनारूपत्वात् , कारणतायाश्च द्रव्यरूपत्वात् , कार्यापन्नस्य च स्वस्य भावरूपत्वात् । यदि च घटनाम घटधर्मो न भवेत्तदा ततस्तत्संप्रत्ययो न स्यात् , तस्य स्वापृथग्भूतसंवन्धनिमित्तकत्वादिति सर्व नामा- 5 स्मकमेष्टव्यम् । साकारं च सर्व मति-शब्द-घटादीनामाकार्रवचात् , नीलाकारसंस्थान- विशेषादीनामाकाराणामनुभवसिद्धत्वात् । द्रव्यात्मकं च सर्व उत्फणविफणकुण्डलिताका. रसमन्वितसर्पवत चिकाररहितस्याविर्भावतिरोभावमात्रपरिणामस्य द्रव्यस्यैव सर्वत्र सर्व- दानुभवात् । भीवात्मकं च सर्वं परापरकार्यक्षणसन्तानात्मकस्यैव तस्यानुभवादिति चतुष्टयात्मकं जगदिति नामादिनयसमुदयवादैः। 10 [ २. निःक्षेपाणां नयेषु योजना।] १८. अथ नामादिनिक्षेपा नयैः सह योज्यन्ते । तत्र नामादित्रयं द्रव्यास्तिक- नयस्यैवाभिमतम् , पर्यायास्तिकनयस्य च भाव एव । आद्यस्य भेदी संग्रहव्यवहारी, नैगमस्य यथाक्रमं सामान्यग्राहिणो विशेषग्राहिणश्च अनयोरेवान्तर्भावात् । ऋजुसूत्रा- दयश्च चत्वारो द्वितीयस्य भेदा इत्याचार्यसिद्धसेनमतानुसारेणाभिहितं जिनभद्रग- 15 णिक्षमाश्रमणपूज्यपादैः- "नामाइतियं दव्वट्टियस्य भावो अपज्जवणयस्स । संगहववहारा पढमगस्स सेसा उ इयरस्स ॥" [५] इत्यादिना विशेषावश्यके । स्वमते तु नमस्कारनिक्षेपविचारस्थले- "भावं चिय सदणया सेसा इच्छन्ति सव्वणिक्खेवे" [ २८४७ ] इति वचसा त्रयोऽपि शब्दनयाः शुद्धत्वाद्भावमेवेच्छन्ति ऋजुसूत्रादयस्तु चत्वा- रश्चतुरोऽपि निक्षेपानिच्छन्ति अविशुद्धत्वादित्युक्तम् । जुसूत्रो नामभाव- निक्षेपावेवेच्छतीत्यन्ये; तत्र( तन्न); ऋजुसूत्रेण द्रव्याभ्युपगमस्य सूत्राभिहि- तत्वात् , पृथक्त्वाभ्युपगमस परं निषेधात् । तथा च सूत्रम्----"उज्जुसुअस्स एगे अणुवउत्ते श्रागमओ एगं दव्वावस्सथं, पुहत्तं नेच्छह ति" [ अनुयो० 25 सू० १४ ] । कथं चाय पिण्डावस्थायां सुवर्णादिद्रव्यमनाकारं भविष्यत्कुण्डलादि- पर्यायलक्षणभावहेतुत्वेनाभ्युगच्छन् विशिष्टेन्द्रायभिलापहेतुभृतां साकारामिन्द्रादिस्था पनां नेच्छेत् ?, न हि दृष्टेऽनुपपन्नं नामेति । किञ्च, इन्द्रादिसञ्ज्ञामात्रं तदर्थरहित- मिन्द्रादिशब्दवाच्यं वा नामेच्छन् अयं भावकारणत्वाविशेषात् कुतो नामस्थापने 20 १-०मन्यन्ते च प्रव०-प्र०।२विशंपा० गा० ५९।३ तुलना-विदोपा०६०।४-०माकारत्वानो- ३०१५ तुलना-विशेपा० गा० ६६-६८१ ६ तुलना-विशेषा० गा० ६९-७११७ तुलना-विशेषा० गा०.४२, ७३ । ८ तुलना-विशेषा० गा० २८४८ । ९व्याभ्युपगतस्व-सं० । १० तुलना-विशेषा० गा० २८४९ ॥

२८ जैनतर्कभापी। नेच्छेत् ? । प्रत्युत सुतरां तदभ्युपगमो न्याय्यः । इन्द्रमूर्तिलक्षणद्रव्य-विशिष्टतदा- काररूपस्थापनयोरिन्द्रपर्यायरूपे भावे तादात्म्यसंवन्धेनावस्थितत्वात्तत्र वाच्यवाचक- भावसंवन्धेन संबद्धानाम्नोऽपेक्षया सन्निहिततरकारणत्वात् । सङ्ग्रहव्यवहारौ स्थापना- वर्जास्त्रीनिक्षेपानिच्छत इति केचितः तन्नानवद्यं यतः संग्रहिकोऽसंग्रहिकोऽनर्पितमेदः परि- 5 पूर्णो वा नैगमस्तावत् स्थापनामिच्छतीत्यवश्यमभ्युपेयम् , सहव्यवहारयोरन्यत्र द्रव्याथिके स्थापनाभ्युपगमावर्जनात् । तत्राद्यपक्षे संग्रहे स्थापनाभ्युपगमप्रसङ्गः, संग्रहनयमतस्य संहिकनैगममताविशेषात् । द्वितीये व्यवहारे तदभ्युपगमप्रसङ्गः, तन्मतस्य व्यवहारमतादविशेषात् । तृतीये च निरपेक्षयोः संग्रहव्यवहारयोः स्थापनाभ्युपगमोपपत्तावपि समुदितयोः संपूर्णनैगमरूपत्वात्तदभ्युपगमस्य दुर्निवारत्वम्, 10 अविभागस्थान्नैगमात्प्रत्येकं तदेकैकभागग्रहणात् । किञ्च, सङ्ग्रहव्यवहारयोर्नंगमान्ती- वात्स्थापनाभ्युपगमलक्षणं तन्मतमपि तत्रान्तर्भूतमेव, उभयधर्मलक्षणस्य विषयस्य प्रत्येकमप्रवेशेऽपि स्थापनालक्षणस्यैकधर्मस्य प्रवेशस्य सूपपादत्वात् , स्थापनासामान्यत- द्विशेषाभ्युपगममात्रेणैव सङ्ग्रहव्यवहारयोर्भेदोपपवेरिति यथागमं भायनीयम् । एतैश्च नामादिनिक्षेपैर्जीवादयः पदार्था निक्षेप्याः । 15 [ ३. जीवविपये निःक्षेपाः।] ६९. तत्र यद्यपि यस्य जीवस्याजीवस्य चा जीव इति नाम क्रियते स नाम- जीवः, देवतादिप्रतिमा च स्थापनाजीवः, औपशमिकादिभावशाली च भावजीव इति जीवविपयं निक्षेपत्रयं सम्भवति, न तु द्रव्यनिक्षेपः । अयं हि तदा सम्भवेत् , यद्यजीवः सन्नायत्यां जीवोऽभविष्यत् , यथाऽदेवः सन्नायत्यां देवो भविष्यत्(न्) द्रव्यदेव 20 इति । न चैतदिष्टं सिद्धान्ते, यतो जीवत्वमनादिनिधनः पारिणामिको भाव इष्यत इति । तथापि गुणपर्यायवियुक्तत्वेन बुद्धया कल्पितोऽनादिपारिणामिकभावयुक्तो द्रव्यजीवः, शून्योऽयं भङ्ग इति यावत् , सतां गुणपर्यायाणां बुद्धयापनयस्य कर्तुम- शक्यत्वात् । न खलु ज्ञानायत्तार्थपरिणतिः, किन्तु अर्थो यथा यथा विपरिणमते तथा तथा ज्ञान प्रादुरस्तीति । न चैवं नामादिचतुष्टयस्य व्यापितामङ्गः, यतः 25 प्रायः सर्वपदार्थेष्वन्येषु तत् सम्भवति । यद्यत्रैकस्मिन्न सम्भवति नैतावता भवत्य- व्यापितेति वृद्धाः । जीवशव्दार्थज्ञस्तत्रानुपयुक्तो द्रव्यजीव इत्यप्याहुः । अपरे तु वद. न्ति-अहमेव मनुष्यजीवो [द्रव्यजीवो]ऽभिधातव्यः उत्तरं देवजीवमप्रादुर्भूतमाश्रित्य अहं हि तस्योत्पित्सोर्दैवजीवस्य कारणं भवामि, यतश्वाहमेव तेन देवजीवभावेन भवि- प्यामि, अतोऽहमधुना द्रव्यजीव इति । एतत्कथितं तैर्भवति-पूर्वः पूर्वो जीवः " १ तुलना-विशेषा० ० गा० २८४७ । २-०ऽसङ्क्राहिको-प्र० व०१३ सद्भाहिके नेग-सं० । ४ तुलना-विशेषा० गा० २८५५। ५५० प्रतो प्रथमलिसितं 'मनुष्यजीवो द्रव्यजीवोऽभि.' इति पाठं परिमार्य 'मनुष्यजीवोऽभि०-' इत्यादि कृतं दृश्यत ।

२९ ३. निःक्षेपपरिच्छेदः। परस्य परस्योत्पित्सोः कारणमिति । अस्मिंश्च पक्षे सिद्ध एव भावजीवो भवति, नान्य इति-एतदपि नानवद्यमिति तत्त्वार्थटीकाकृतः । ६१०. इदं पुनरिहावधेयं-इत्थं संसारिजीवे द्रव्यत्वेऽपि भावत्वाविरोधः, एक- वस्तुगतानां नामादीनां भावाविनाभूतत्वप्रतिपादनात् । तदाह भाष्यकार:- "अहवा वत्थूभिहाणं, नामं ठवणा य जो तयागारो । कारणया से दव्यं, कजावन्नं तयं भावो ॥१॥" [६०] इति । केवलमविशिष्टजीवापेक्षया द्रव्यजीवत्वव्यवहार एव न स्यात् , मनुष्यादेः- वत्वादिविशिष्टजीवं प्रत्येव हेतुत्वादिति अधिकं नयरहस्यादौ विवेचितमस्माभिः ।। 5 10 ॥ इति महामहोपाध्यायश्रीकल्याणविजयगणिशिष्यमुख्यपण्डितश्रीलाभविजयगणिशिष्यावतंस- पण्डितश्रीजीतविजयगणिसतीर्थ्यपण्डितश्रीनयविजयगणिशिष्येण पण्डितश्रीपा- विजयगणिसोदरेण पण्डितयशोविजयगणिना विरचितायां जैनतर्कभापायां निक्षेपपरिच्छेदः संपूर्णः, तत्संपूतौ च संपूर्णेयं जैनतर्कभाषा ।। ॥ स्वस्तिश्रीश्रमणसवाय ।। AR १ तत्त्वार्थ. भा० ३० पृ. ४८।२ पृ० ८४ ।

जैनतर्कभापा 5 सूरिश्रीविजयादिदेवसुगुरोः पट्टाम्बराहमणी, सूरिश्रीविजयादिसिंहसुगुरौ शक्रासनं भेजुषि । तत्सेवाऽप्रतिमप्रसादजनितश्रद्वानशुद्धया कृतः, ग्रन्थोऽयं वितनोतु कोविदकुले मोदं विनोद तथा ॥१॥ यस्यासन् गुरवोऽत्र जीतविजयप्राज्ञाः प्रकृष्टाशयाः, भ्राजन्ते सनया नयादिविजयप्राज्ञाश्च विद्याप्रदाः । प्रेम्णां यस्य च सद्म पद्मविजयो जातः सुधीः सोदरः तेन न्यायविशारदेन रचिता स्तात्तर्कभाषा मुदे ।। २ ।। तर्कभाषामिमां कृत्वा मया यत्पुण्यमर्जितम् । माप्नुयां तेन विपुलां परमानन्दसम्पदम् ॥ ३ ॥ पूर्व न्यायविशारदत्वविरुदं काश्यां प्रदत्तं बुधैः न्यायाचार्यपदं ततः कृतशतग्रन्थस्य यस्यार्पितम् । शिष्यप्रार्थनया नयादिविजयप्राज्ञोत्तमानां शिशुः तत्त्वं किञ्चिदिदं यशोविजय इत्याख्याभृदाख्यातवान् ॥ ४ ॥ 10 १ दृश्यमानादशेषु दृश्यते वृत्तमिदं पृथगकान्धितम् , तेनानुमीयतेऽदो यदन्यप्रकरणादेतर्तृकादुपनीत भवेकेनापि, या प्रकरणग्रन्थत्वेनास्य शिष्यशिक्षानिमित्तकस्वक्रियाज्ञापनाय पूज्यपादेरेवेदं पृथग्न्यस्तं पश्चाद्भवेत्-मु-टि० । व० प्रतौ चतुर्थपद्यं नास्त्येव ।

जैनतर्कभाषायाः ॥तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः॥ न्यायविशारदं नत्वा यशोविजयवाग्मिनम् । तन्यते तर्कभाषाया वृत्तिस्तात्पर्यसङ्ग्रहा ॥ पृ० १. पं० ६. यद्यपि सन्मतिटीकाकृता अभयदेवेन द्वितीयकाण्डप्रथमगाथाव्याख्यायां दुर्शनस्यापि प्रामाण्यं स्पष्टमुक्तम् , यद्यपि च स्वयं ग्रन्थकारेणापि [पृ० ५. पं० १०.] सामान्य- मात्रग्राहिणो नैश्चयिकावग्रहत्वं वदता दर्शनस्य मतिज्ञानोपयोगान्तर्गतत्वेनैव प्रामाण्यं सूचितं 5 भाति तथापि माणिक्यनन्दि-वादिदेवसूरिप्रभृतिभिर्जेनतार्किकैः यत् दर्शनस्य प्रमाणकोटेबहिर्भाव- समर्थनं कृतं तदभिप्रेत्य ग्रन्थकृता अत्र दर्शनस्य प्रमाणालक्ष्यत्वं मन्वानेन 'दर्शने तिव्याप्ति- वारणाय' इत्याद्युक्तम् । पृ० १. पं० ७. 'मीमांसकादीनाम्'-कुमारिलप्रभृतयो हि ज्ञानमात्रस्य परोक्षत्वेन पर- प्रकाश्यत्वं मन्वानाः अर्थप्राकट्याख्येन तत्फलेनैव हेतुना तदनुमितिमङ्गीकुर्वाणाः तस्य स्वप्रका- 10 शत्वं निरस्यन्तीति ते परोक्षवुद्धिवादिनोऽभिधीयन्ते । पृ० १. पं० ८. जैनमते हि सर्वस्यापि ज्ञानस्य स्वपरप्रकाशत्वनियमात् 'स्वपर'इति विशे- पणाऽभावेऽपि स्वपरव्यवसायित्वरूपस्य अर्थस्य सिद्धान्तवलेनैव लाभात् 'स्वपर'इति विशेषणं कस्मात् ?, इत्याशङ्कां निवारयितुमुक्तम्-'स्वरूपविशेषणार्थम्' इत्यादि । तथा च नेदं विशेषणं किञ्चिद्व्यावर्तकतया लक्षणे निवेशितं येन व्यावृत्त्यभावप्रयुक्ता तद्वैयर्थ्याशङ्का स्यात् । किन्तु स्वरूप- 15 मात्रनिदर्शनतात्पर्येणैव तत् तत्र निवेशितम् । न च स्वरूपविशेषणे व्यावृत्तिलाभप्रत्याशा । विशे- प्यस्वरूपविषयकवोधजननरूपं तत्फलं तु अत्रापि निर्वाधमिति नैतस्य विशेषणस्य वैयाशङ्का । पृ० १. पं० ९. 'ननु यद्येवम्'–प्रस्तुतस्य शङ्कासमाधानग्रन्थस्य मूलं स्याहादरलाकरे [ पृ० ५२.] इत्थं दृश्यते- "ज्ञानस्याऽथ प्रमाणत्वे फलत्वं कस्य कथ्यते । स्वार्थसंवित्तिरस्त्येव ननु किन्न विलोक्यते ? ।। स्यात्फलं स्वार्थसंवित्तिर्यदि नाम तदा कथम् । स्वपरव्यवसायित्वं प्रमाणे घटनामियान् ? ।। 20 -....-~ ३२ जैनतर्कभापायाः [पृ० १. पं० ११-- उच्यते- स्यादभेदात् प्रमाणस्य स्वार्थव्यवसितेः फलात् । नैव ते सर्वथा कश्चिद् दूपणक्षण ईक्ष्यते ॥" पृ० १. पं० ११. 'स्वव्यवसायित्वात्'-ननु देवसूरिकृतं 'स्वपर'इत्यादिसूत्रं तदीयां 5 च रत्नाकरव्याख्यामवलम्व्य प्रमाणस्य फलं दर्शयता श्रीमता उपाध्यायेन 'स्वार्थव्यवसितेरेव फलत्वात्' इत्युक्तम्; अस्य च उक्तसूत्र-तदीयव्याख्यानुसारी स्वपरव्यवसितिरेवार्थः फलत्वेन पर्यवस्यति । तथा च अत्रत्यः स्वमात्रव्यवसितेः फलत्वप्रदर्शनपरः आशङ्काग्रन्थः कथं सङ्गच्छेत ?, यतो हि 'स्वपरव्यवसायि' इत्यादिसूत्रव्याख्यायां अग्रेतने च 'स्वपरव्यसितिक्रियारूपाऽज्ञान- निवृत्त्याख्यं फलं तु' इत्यादिसूत्रे [प्र. न. ६. १६] स्वयं देवसूरिणा स्वपरव्यवसितैरेव फलत्वस्य 10 प्रतिपादनात् । किञ्च, प्रमाणफलस्वरूपविषयको जैनतर्कसिद्धान्तोऽपि इदानीं यावन्निर्विवाद स्वपरप्रकाशयोरेव फलत्वं प्रतिपादयन् सर्वत्र दृश्यते इति तं सिद्धान्तमपि प्रस्तुतशङ्काग्रन्थः कथं न बाधेत इति चेत्; अवधेहि; यद्यपि स्वपरव्यवसितेरेव प्रमाणफलत्वं निर्विवादं जैनतर्कसम्मतं तथापि अत्र ग्रन्थकृता विज्ञानवादीयबौद्धपरम्परायां लब्धप्रतिष्ठः स्वमात्रसंवेदनस्य प्रमाण- फलत्वसिद्धान्तः, इदानीं यावत् जैनतर्कपरम्परायां अलब्धप्रतिष्ठोऽपि औचित्यं समीक्ष्य सन्नि- 15 वेशितः । तथा च ग्रन्थकर्तुस्तात्पर्यमत्र इत्थं भाति -- यद्यपि ज्ञानं स्वं परं चोभयं प्रकाशयति तथापि तदीयं स्वमात्रप्रकाशनं फलकोटौ निपतति । स्वमात्रप्रकाशनस्य फलत्वोक्तावपि वस्तुतः ज्ञानात्मकस्वप्रकाशनस्य 'विषयनिरूप्यं हि ज्ञानम् , ज्ञानवित्तिवेद्यो विषयः' [मुक्ता० का० १३६.] इति सिद्धान्तानुसारेण स्वविपयविषयकत्वान्यथानुपपत्त्या परप्रकाशनगर्भितत्वमपि पर्यवस्यति इति परव्यवसितेः अर्थादेव लभ्यत्वेन गौरवादेव स्वपरोभयव्यवसितेः साक्षात् फलत्वेनाभिधानं 20 ग्रन्थकृता नाहतम् । प्रमाणफलयोरभेदपक्षं समाश्रित्य च प्रमाणम्य स्वपरव्यवसायित्वोक्तिः फलस्य च. स्वपरव्यवसितित्वोक्तिः सङ्गमिता । ग्रन्थकर्तुरयमभिप्रायः अग्रेतनेन 'ज्ञानाभावनिवृत्तिस्त्वर्थ- ज्ञातताव्यवहारनिवन्धनस्वव्यवसितिपर्यवसितैव सामान्यतः फलमिति द्रष्टव्यम्' [ पृ० ११. पं० २६ ] इति ग्रन्थेनापि स्फुटीभवति । पृ० १. पं० १६. 'ततोऽर्थ-श्रीमता विद्यानन्देन स्वकीयस्य शक्तिकरणत्वपक्षस्य 25 तात्पर्य प्रस्तुतपद्यव्याख्यायामित्थं प्रकटीकृतम्-"नहि अन्तरङ्गबहिरङ्गार्थग्रहणरूपात्मनो ज्ञान- शक्तिः करणत्वेन कथञ्चिन्निर्दिश्यमाना विरुध्यते, सर्वथा शक्तितद्वतोभ॑दस्य प्रतिहननात् । ननु च ज्ञानशक्तिर्यदि प्रत्यक्षा तदा सकलपदार्थशक्तेः प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात् अनुमेयत्वविरोधः । यदि पुनरप्रत्यक्षा ज्ञानशक्तिस्तदा तस्याः करणज्ञानत्वे प्राभाकरमतसिद्धिः, तत्र करणज्ञानस्य परोक्षत्व- व्यवस्थितेः फलज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वोपगमात् । ततः प्रत्यक्षकरणज्ञानमिच्छतां न तच्छक्तिरूप- 30 मेपितव्यं स्याद्वादिभिः इति चेत् ; तदनुपपन्नम् ; एकान्ततोऽस्मदादि प्रत्यक्षत्वस्य करणज्ञाने अन्यत्र वा वस्तुनि प्रतीतिविरुद्धत्वेनाऽनभ्युपगमात् । द्रव्यार्थतो हि ज्ञान अस्मदादेः प्रत्यक्षम् , प्रतिक्षणपरिणामशक्त्यादिपर्यायार्थतस्तु न प्रत्यक्षम् । तत्र स्वार्थव्यसायात्मकं ज्ञानं स्वसं- .

पृ० २. पं० १५.] तात्पयसङ्ग्रहा वृत्तिः। विदितं फलं प्रमाणाभिन्नं वदतां करणज्ञानं प्रमाणं कथमप्रत्यक्षं नाम ? । न च येनैव रूपेण तत्प- माणं तेनैव फलं येन विरोधः । किं तर्हि ? । साधकतमत्वेन प्रमाणं साध्यत्वेन फलम् । साधक- तमत्वं तु परिच्छेदनशक्तिरिति प्रत्यक्षफलज्ञानात्मकत्वात् प्रत्यक्षं शक्तिरूपेण परोक्षम् । ततः स्यात् प्रत्यक्षं स्यादप्रत्यक्षम् इत्यनेकान्तसिद्धिः । यदा तु प्रमाणाद्भिन्नं फलं हानोपादानोपेक्षाज्ञान- लक्षणं तदा स्वार्थव्यवसायात्मकं करणसाधनं ज्ञानं प्रत्यक्षं सिद्धमेवेति न परमतप्रवेशः तच्छ- 5 क्तेरपि सूक्ष्मायाः परोक्षत्वात् । तदेतेन सर्व कादिकारकत्वेन परिणतं वस्तु कस्यचित् प्रत्यक्षं परोक्षं च कर्नादिशक्तिरूपतयोक्तं प्रत्येयम् । ततो ज्ञानशक्तिरपि च करणत्वेन निर्दिष्टा न स्वागमेन युक्त्या च विरुद्धा इति सूक्तम् ।" -तत्त्वार्थश्लोकवा० पृ० ६०. विद्यानन्दीयं मतं पराकर्तुकामेन श्रीमता देवसूरिणा तदीयपक्षोपन्यासपुरःसरमित्थं निराकरणं कृतम्-"केचित्तु-'ततोऽर्थग्रहणाकारा...' इति परमार्थतो भावेन्द्रियस्यैव अर्थग्रहणशक्तिलक्षणस्य 10 साधकतमतया करणताध्यवसायादिति च ब्रुवाणा लब्धीन्द्रियं प्रमाणं समगिरन्त; तन्न समगस्त; उपयोगात्मना करणेन लब्धेः फले व्यवधानात् , सन्निकर्षादिवदुपचारत एव प्रमाणतोपपत्तेः । अथ नजैनानामेकान्तेन किञ्चित् प्रत्यक्षमप्रत्यक्ष वा, तदिह द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षा ज्ञानशक्तिः पर्या- यार्थतस्तु परोक्षा । अयमर्थः-स्वपरपरिच्छित्तिरूपात् फलात् कथञ्चिदपृथग्भूते आत्मनि परिच्छिन्ने तथाभूता तज्जननशक्तिरपि परिच्छिन्नैवेति । नन्वेवं आत्मवर्तिनामतीतानागतवर्तमानपर्याया- 15 णामशेषाणामपि द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षत्वात् यथा ज्ञानं स्वसंविदितं एवं तेऽपि स्वसंविदिताः किन्न स्युः । किञ्च, यदि द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षत्वात् स्वसंविदिता ज्ञानशक्तिः तदाऽहं घटज्ञानेन घटं जानामि इति करणोल्लेखो न स्यात् । नहि कलशसमाकलनवेलायां द्रव्यार्थतः प्रत्यक्षत्वेऽपि प्रति- क्षणपरिणामिनामतीतानागतानां च कुशूलकपालादीनामुल्लेखोऽस्ति ।" -स्या. र. पृ० ५३. पृ० २. पं० १०. 'यतो व्युत्पत्ति'-"अक्षाश्रितत्वं च व्युत्पत्तिनिमित्तं शब्दस्य, न तु 20 प्रवृत्तिनिमित्तम् । अनेन तु अक्षाश्रितत्वेनैकार्थसमवेतमर्थसाक्षात्कारित्वं लक्ष्यते । तदेव शब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तम् । ततश्च यत्किञ्चिदर्थस्य साक्षात्कारि ज्ञानं तत् प्रत्यक्षमुच्यते । यदि त्वक्षाश्रितत्वमेव प्रवृत्तिनिमित्तं स्यादिन्द्रियज्ञानमेव प्रत्यक्षमुच्येत न मानसादि । यथा गच्छतीति गौरिति गमन- क्रियायां व्युत्पादितोऽपि गोशब्दो गमनक्रियोपलक्षितमेकार्थसमवेतं गोत्वं प्रवृत्तिनिमित्तीकरोति तथा च गच्छत्यगच्छति च गवि गोशब्दः सिद्धो भवति ।" -न्यायवि० टी० १. ३.। स्या. र. 25 पृ० २६०. पृ० २. पं० ११. 'स्पष्टता- "अनुमानाद्यतिरेकेण विशेषप्रतिभासनम् । तद्वैशयं मतं बुद्धेरवैशद्यमतः परम् ।।" -लघीय० १. ४. पृ० २. पं० १५. 'तद्धीन्द्रिया'--"इदमुक्तं भवति-अपौद्भलिकत्वादमूर्ती जीवः पौद्गलि- 30 कत्वात् तु मूर्त्तानि द्रव्येन्द्रियमनांसि, अमूर्ताच्च मूर्त पृथग्भूतम् , ततस्तेभ्यः पौद्गलिकेन्द्रिय-मनो- भ्यो यन्मतिश्रुतलक्षणं ज्ञानमुपजायते तद् धूमादेरग्न्यादि ज्ञानवत् परनिमित्तत्वात् परोक्षम् ।" -विशेषा० ? • वृ० गा० ९०..

. 15 ३४ जैनतभाषायाः [पृ० २. पं० १७- पृ० २. पं० १७. 'किञ्च, असिद्ध'-"प्रयोगः यदिन्द्रियमनोनिमित्तं ज्ञानं तत् परोक्षम् , संशयविपर्ययानध्यवसायानां तत्र सम्भवात्, इन्द्रियमनोनिमित्ताऽसिद्धाऽनैकान्तिकविरुद्धानुमानाभा- सवत् इति प्रथमः प्रयोगः । यदिन्द्रियमनोनिमित्तं ज्ञानं तत् परोक्षम्, तत्र निश्चयसम्भवात् , धूमादेरग्न्यायनुमानवत् इति द्वितीयः । ननु निश्चयसम्भवलक्षणो हेतुः अवध्यादिप्वपि वर्तत 5 इत्यनैकान्तिक इति चेत् ; नैवम् ; अभिप्रायापरिज्ञानात्; सङ्केतस्मरणादिपूर्वको हि निश्चयोऽत्र विवक्षितः; तादृशश्चायं अवध्यादिपु नास्ति ज्ञानविशेषत्वात्तेषाम् इत्यदोपः।-विशेषा० वृ० गा० ९३. पृ० २. पं० २१. 'यद्यपि इन्द्रियज'-"इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि तानि मानसबलाधानसहि- तानि प्राधान्येन निवन्धनमस्य इति इन्द्रियनिवन्धनम् ।" -स्या० र. पृ० ३४४. पृ० २. पं० २३. 'श्रुतानुसारित्वं'-"श्रूयते इति श्रुतं द्रव्यश्रुतरूपं शब्द इत्यर्थः, स च 10 सङ्केतविषयपरोपदेशरूपः श्रुतग्रन्थात्मकश्चेह गृह्यते तदनुसारेणैव यदुत्पद्यते तत् श्रुतज्ञानम् नान्यत् । इदमुक्तं भवति-सङ्केतकालप्रवृत्तं श्रुतग्रन्थसम्बन्धिनं वा घटादिशब्दमनुसृत्य वाच्य- वाचकभावेन संयोज्य 'घटो घटः' इत्यन्तऽर्जल्पाद्याकारमन्तःशब्दोल्लेखान्वितमिन्द्रियादिनिमितं यज्ज्ञानमुदेति तत् श्रुतज्ञानमिति । शेषम् इन्द्रियमनोनिमित्तम् अश्रुतानुसारेण यदवग्रहादिज्ञानं तत् मतिज्ञानम् इत्यर्थः । -विशेषा० वृ० गा० १०० पृ० २. पं० २५. 'नन्वेवम्'-"अत्राह कश्चित्-ननु यदि शब्दोल्लेखसहितं श्रुतज्ञानमिष्यते शेष तु मतिज्ञानं तदा वक्ष्यमाणस्वरूपः अवग्रह एंव मतिज्ञानं स्यात् न पुनः ईहापायादयः तेषां शब्दोल्लेखसहित्वात्, मतिज्ञानभेदत्वेन चैते प्रसिद्धाः, तत्कथं श्रुतज्ञानलक्षणस्य नातिव्याप्तिदोपः ? । अपरञ्च, अङ्गानङ्गप्रविष्टादिपु 'अक्खरसन्नी सम्मं, साईयं खलु सपज्जवसियं च' [आव. नि. १९] इत्यादिपु च श्रुतमेदेषु मतिज्ञानभेदस्वरूपाणामवग्रहेहादीनां सद्भावात् सर्वस्यापि तस्य मति- 20 ज्ञानत्वप्रसङ्गात् मतिज्ञानभेदानां चेहापायादीनां सामिलापत्वेन श्रुतज्ञानत्वप्राप्तेः उभयलक्षणसङ्की- र्णतादोपश्च स्यात् । तदयुक्तम् ; यतो यद्यपीहादयः सामिलापाः तथापि न तेषां श्रुतरूपता, श्रुतानुसारिण एव सामिलापज्ञानस्य श्रुतत्वात् । अथ अवग्रहादयः श्रुतनिश्रिता एव सिद्धान्ते प्रोक्ताः युक्तितोऽपि चेहादिपु शब्दाभिलापः सङ्केतकालाद्याकर्णितशब्दानुसरणमन्तरेण न सङ्ग- च्छते, अतः कथं न तेषां श्रुतानुसारित्वम् ? । तदयुक्तम् ; पूर्व श्रुतपरिकर्मितमतेरेवैते समुपजायन्त 25 इति श्रुतनिश्रिता उच्यन्ते, न पुनर्व्यवहारकाले श्रुतानुसारित्वमेतेप्वस्ति । सङ्केतकालाद्याकर्णित- शब्दपरिकर्मितबुद्धीनां व्यवहारकाले तदनुसरणमन्तरेणापि विकल्पपरम्परापूर्वकविविधवचन- प्रवृत्तिदर्शनात् । न हि पूर्वप्रवृत्तसङ्केताः अधीतश्रुतग्रन्थाश्च व्यवहारकाले प्रतिविकल्पन्ते - एत- च्छब्दवाच्यत्वेनैतत् पूर्व मयाऽवगतम्' इत्येवंरूपं सङ्केतम् , तथा, 'अमुकस्मिन् ग्रन्थे एत- दित्थमभिहितम्' इत्येवं श्रुतग्रन्थं चानुसरन्तो दृश्यन्ते, अभ्यास पाटववशात् तदनुसरणमन्तरेणाप्य- 30 नवरतं विकल्पभाषणप्रवृत्तेः । यत्र तु श्रुतानुसारित्वं तत्र श्रुतरूपताऽस्माभिरपि न निषिध्यते । तस्मात् श्रुतानुसारित्वाभावेन श्रुतत्वाभावादीहापायधारणानां सामस्त्येन मतिज्ञानत्वात् न मति- ज्ञानलक्षणस्याव्याप्तिदोषः, श्रुतरूपतायाश्च श्रुतानुसारिप्वेव साभिलापज्ञानविशेपेषु भावान्न श्रुत- ज्ञानलक्षणस्यातिव्याप्तिकृतो दोषः । अपरं च, अङ्गानङ्गप्रविष्टादिश्रुतमेदेषु . मतिपूर्वमेव श्रुतमिति .

पृ० ३. पं० ८.] तात्पर्यसङ्ग्रहां वृत्तिः । ३५ वक्ष्यमाणवचनात् , प्रथमं शव्दाद्यवग्रहणकाले अवग्रहादयः समुपजायन्ते । एते च अश्रुतानु- सारित्वात् मतिज्ञानम् । यस्तु तेष्वङ्गानङ्गप्रविष्टश्रुतभेदेषु श्रुतानुसारी ज्ञानविशेषः स श्रुतज्ञानम् । ततश्च अङ्गानङ्गप्रविष्टादिश्रुतभेदानां सामस्त्येन मतिज्ञानत्वाभावात् , ईहादिपु च मतिभेदेपु, श्रुता- नुसारित्वाभावेन श्रुतज्ञानत्वासम्भवात् नोभयलक्षणसङ्कीर्णतादोषोप्युपपद्यत इति सर्व सुस्थम् । तस्मादवग्रहापेक्षया अनभिलापत्वात् ईहाद्यपेक्षया तु सामिलापत्वात् साभिलापानभिलापं मतिज्ञा- 5 नम् , अश्रुतानुसारि च, सङ्केतकालप्रवृत्तस्य श्रुतग्रन्थसम्बन्धिनो वा शब्दस्य व्यवहारकाले अन- नुसरणात् । श्रुतज्ञानं तु साभिलापमेव श्रुतानुसार्येव च, सङ्केतकालप्रवृत्तस्य श्रुतग्रन्थसम्बन्धिनो वा श्रुतस्य व्यवहारकाले अवश्यमनुसरणात् इति स्थितम् ।" -विशेषा० वृ० गा० १००. पृ० ३. पं० ३. 'व्यज्यते'-"तत्र कदम्बकुसुमगोलकाऽऽकारमांसखण्डादिरूपाया अन्त- निवृत्तेः शब्दादिविषयपरिच्छेदहेतुः य शक्तिविशेषः, स उपकरणेन्द्रियम्, शब्दादिश्च श्रोत्रा- 10 दीन्द्रियाणां विषयः । आदिशब्दाद् रसगन्धस्पर्शपरिग्रहः तद्भावेन परिणतानि च तानि भाषा- वर्गणादिसम्बन्धीनि द्रव्याणि च शब्दादिपरिणतद्रव्याणि । उपकरणेन्द्रियं च शब्दादिपरिणत- द्रव्याणि च, तेषां परस्परं सम्बन्ध उपकरणेन्द्रियशब्दादिपरिणतद्रव्यसम्बन्धः - एप तावद् व्यञ्जन- मुच्यते । अपरञ्च, इन्द्रियेणापि अर्थस्य व्यज्यमानत्वात् तदपि व्यञ्जनमुच्यते। तथा; शब्दादि- परिणतद्रव्यनिकुरम्बमपि व्यज्यमानत्वात् व्यञ्जनमभिधीयते इति । एवमुपलक्षणव्याख्यानात् 15 त्रितयमपि यथोक्तं व्यञ्जनमवगन्तव्यम् । ततश्च इन्द्रियलक्षणेन व्यञ्जनेन शब्दादिपरिणतद्रव्य- सम्बन्धस्वरूपस्य व्यञ्जनस्यावग्रहो व्यञ्जनावग्रहः, तेनैव व्यञ्जनेन शब्दादिपरिणत- द्रव्यात्मकानां व्यञ्जनानामवग्रहो व्यञ्जनावग्रह इति । उभयत्रापि एकस्य व्यञ्जनशब्दस्य लोपं कृत्वा समासः । -विशेषा० वृ० गा० १९४. पृ० ३. पं० ६. 'अथ अज्ञानम्'-"स व्यञ्जनावग्रहोऽज्ञानं-ज्ञानं न भवति, यथा हि 20 बधिरादीनामुपकरणेन्द्रियस्य शब्दादिविषयद्रव्यैः सह सम्बन्धकाले न किमपि ज्ञानमनुभूयते, अननुभूयमानत्वाच्च तन्नास्ति, तथेहापीति भावः । अत्रोत्तरमाह-यस्य ज्ञानस्यान्ते तज्ज्ञेयवस्तू- पादानात् तत एव ज्ञानमुपजायते तज्ज्ञानं दृष्टम्, यथार्थावग्रहपर्यन्ते तज्ज्ञेयवस्तृपादानत ईहा- सद्भावादर्थावग्रहो ज्ञानम् , जायते च व्यञ्जनावग्रहस्य पर्यन्ते तज्ज्ञेयवस्तूपादानात् तत एवार्थाव- ग्रहज्ञानम्, तस्माद् व्यञ्जनावग्रहो ज्ञानम् ।" -विशेपा० बृ० गा० १९५. पृ० ३. पं० ८. "तदेवं व्यञ्चनावग्रहे यद्यपि ज्ञानं नानुभूयते तथापि ज्ञानकारणत्वादसौ ज्ञानम् , इत्येवं व्यञ्जनावग्रहे ज्ञानाभावमभ्युपगम्योक्तम् । साम्प्रतं ज्ञानाभावोऽपि तत्रासिद्ध एवेति दर्शयन्नाह"-'तत्कालेऽपि'-"तस्य व्यञ्जनसम्बन्धस्य कालेपि तत्रानुपहतेन्द्रियसम्बन्धिनि व्यञ्ज- नावग्रहे ज्ञानमस्ति केवलं एकतेजोऽवयवप्रकाशवत् तनु-अतीवाल्पमितिः अतोऽव्यक्तं स्व- 'संवेदनेनापि न व्यज्यते । बधिरादीनां पुनः स व्यञ्जनावग्रहो ज्ञानं न भवतीत्यनाविप्रति- 30 पत्तिरेव, अव्यक्तस्यापि च ज्ञानस्याभावात् ।" -विशेषा. वृ० गा० १९६. "परः सासूयमाह-ननु कथं ज्ञानम् , अव्यक्तं च इत्युच्यते ?, तम:प्रकाशायभिधानदद विरुद्धत्वाद् नेदं वक्तुं युज्यते इति भावः । अत्रोत्तरम्-सुप्तमत्तमूर्छितादीनां सूक्ष्मबोधवव्यक्त अथवा 25 जैनतर्कभाषायाः [पृ० ३. पं० १२- ज्ञानमुच्यते इति न दोषः । सुप्तादयः स्वयमपि तदात्मीयविज्ञानं नाववुध्यन्ते-न संवेदयन्ति, अतिसूक्ष्मत्वात् ।" -विशेषा० वृ० गा० १९७. "तर्हि तत् तेषामस्तीति एतत् कथं लक्ष्यते ?, इत्याह-सुप्तादयोऽपि हि स्वमायमानाद्यव- स्थायां केचित् किमपि भाषमाणा दृश्यन्ते, शब्दिताश्चौघतो वाचं प्रयच्छन्ति, सङ्कोच-विकोचा- 5 ऽङ्गभङ्ग-जृम्भित-कूजित-कण्डूयनादिचेष्टाश्च कुर्वन्ति, न च तास्ते तदा वेदयन्ते, नापि च प्रबुद्धाः स्मरन्ति । तर्हि कथं तच्चेष्टाभ्यस्तेषां ज्ञानमस्ति इति लक्ष्यते ? । यस्मात्कारणात् ना- ऽमतिपूर्वास्ता वचनादिचेष्टा विद्यन्ते, किन्तु मतिपूर्विका एव, अन्यथा काष्ठादीनामपि तत्प्रसङ्गात्" -विशेपा. वृ० गा० १९८. पृ० ३. पं० १२. 'सच नयन'-"इदमुक्तं भवति-विषयस्य, इन्द्रियस्य च यः परस्परं 10 सम्बन्धः प्रथममुपश्लेषमात्रम् , तद्व्यञ्जनावग्रहस्य विपयः। स च विषयेण सहोपश्लेपः प्राप्यकारि- प्वेव स्पर्शन-रसन-प्राण-श्रोत्रलक्षणेषु चतुरिन्द्रियेषु भवति, न तु नयनमनसोः । अतस्ते वर्ज- यित्वा शेषस्पर्शनादीन्द्रियचतुष्टयभेदाच्चतुर्विध एव, व्यञ्जनावग्रहो भवति । कुतः पुनरेतान्येव प्राप्यकारीणि ?, इत्याह-उपधातश्चानुग्रहश्चोपघातानुग्रहौ तयोर्दर्शनात्- कर्कशकम्बलादिस्पर्शने त्वक्क्षणनाद्युपधातदर्शनात् , चन्दनाङ्गनाहंसतूलादिस्पर्शने तु शैत्याद्यनुग्रह- 15 दर्शनात् । नयनस्य तु निशितकरपत्र-सेल्ल-भल्लादिवीक्षणेऽपि पाटनाद्युपघातानवलोकनात् , चन्दना- गुरुकर्पूराद्यवलोकनेऽपि शैत्याद्यनुग्रहाननुभवात् ; मनसस्तु वढ्यादिचिन्तनेपि दाहाद्युपघातादर्श- नात् , जलचन्दनादिचिन्तायामपि च पिपासोपशमाद्यनुग्रहासम्भवाच ।" -विशेषा० बृ० गा० २०४. पृ० ३.पं० १४. 'रविचन्द्र'-"अथ परो हेतोरसिद्धतामुद्भावयन्नाह - जल-घृत-नीलवसन- वनस्पतीन्दुमण्डलाद्यवलोकनेन नयनस्य परमाश्वासलक्षणोऽनुग्रहः समीक्ष्यते; सूर-सितभित्त्यादि- 20 दर्शने तु जलविगलनादिरूप उपधातः सन्दृश्यते ।" -विशेषा० वृ० २०९. पृ० ३. पं० १४. 'न; प्रथमाव'-"नैतदेवम्-अभिप्रायाऽपरिज्ञानात् , यतः प्रथमत एव विपयपरिच्छेदमात्रकालेऽनुग्रहोपघातशून्यता हेतुत्वेनोक्ता, पश्चात्तु चिरमवलोकयतः प्रतिपत्तुः प्राप्तेन रविकरादिना, चन्द्रमरीचि-नीलादिना वा मूर्तिमता निसर्गत एव केनाप्युपधातकेन, अनुग्राहकेण च विषयेणोपधातानुग्रही भवेतामपि इति ।" -विशेषा. वृ० २११. "नहि वयमेतद् बेमो यदुत चक्षुपः कुतोऽपि वस्तुनः सकाशात् कदाचित् सर्वथैव अनु- ग्रहोपघातौ न भवतः । ततो रविकरादिना दाहाद्यात्मकेन उपघातवस्तुना परिच्छेदानन्तरं पश्चा- चिरमवलोकयतः प्रतिपत्तुः चक्षुः प्राप्य-समासाद्य स्पर्शनेन्द्रियमिव दह्येत तथा यत् स्वरूपेणैव सौम्यं शीतलं शीतरश्मि वा जलवृतचन्द्रादिकं वस्तु तस्मिंश्चिरमवलोकिते उपघातामावादनुग्रह- मिव मन्येत चक्षुः को दोषः ? " -विशेषा० ३० गा० २१०. पृ० ३. पं०.१७. 'मृतनष्ट'-"यः शोकाचतिशयात् देहापचयरूपः, आादिध्यानातिशयाद् हृद्रोगादिस्वरूपश्योपघातः, यश्च पुत्रजन्माद्यमीष्टप्राप्तिचिन्तासमुद्भूतहादिरनुग्रहः, स जीवस्य भव- 25 30 ? '० वृ० गा ०२२४. 15 पृ० ३. पं० २४.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । ३७ न्नपि चिन्त्यमानविषयात् मनसः किल परो मन्यते, तस्य जीवात् कथञ्चिदव्यतिरिक्तत्वात् । ततश्चैवं मनसोऽनुग्रहोपधातयुक्तत्वात् तच्छून्यत्वलक्षणो हेतुरसिद्धः ।" -विशेपाः वृ० गा० २१९. "तदेतत्सर्व परस्याऽसम्बद्धभाषितमिवेति दर्शयन्नाह-मनस्त्वपरिणतानिष्टपुद्गलनिचयरूपं द्रव्यमनः अनिष्टचिन्ताप्रवर्त्तनेन जीवस्य देहदौर्बल्याद्यापत्त्या हृन्निरुद्धवायुवद् उपघातं जनयति, तदेव च शुभपुद्गलपिण्डरूपं तस्यानुकूलचिन्ताजनकत्वेन हर्षाद्यभिनिर्वृत्त्या भेषजवदनुग्रहं विधत्त 5 इति । अतो जीवस्यैतौ अनुग्रहोपघातौ द्रव्यमनः करोति ।” –विशेषा० वृ० गा० २२०. पृ० ३. पं० २०. 'ननु यदि'-"ननु जाग्रदवस्थायां मा भृद् मनसो विषयप्राप्तिः, स्वापा- वस्थायां तु भवत्वसौ अनुभवसिद्धत्वात्, तथाहि 'अमुत्र मेरुशिखरादिगतजिनायतनादौ मदीयं मनोगतम्' इति सुप्तैः स्वप्नेऽनुभूयत एव इत्याशय स्वप्नेऽपि मनसः प्राप्यकारितामपाकर्तुमाह- इह 'मदीयं मनोऽमुत्र गतम्' इत्यादिरूपो यः सुप्तैरुपलभ्यते स्वप्मः, स यथोपलभ्यते न 10 तथारूप एव, तदुपलव्धस्य मनोमेरुगमनादिकस्यार्थस्यासत्यत्वात् । कथम् ? । यथा कदा- चिदात्मीयं मनः स्वप्ने मेर्वादौ गतं कश्चित् पश्यति, तथा कोऽपि शरीरमात्मानमपि नन्दनतरुकुसुमावचयादि कुर्वन्तं तद्गतं पश्यति, न च तत् तथैव, इह स्थितैः सुप्तस्य तस्या- त्रैवं दर्शनात् , द्वयोश्चात्मनोरसम्भवात् , कुसुमपरिमलाद्यध्वजनितपरिश्रमाद्यनुग्रहोपघाताभावाच्च । -विशेषा० पृ० ३. पं० २३. 'ननु स्वप्नानु'-"अत्र विबुद्धस्य सतस्तद्गतानुग्रहोपघातानुपलम्भादि- त्यस्य हेतोरसिद्धतोद्भावनाथ ‘परः प्राह-इह कस्यचित्पुरुषस्य स्वमोपलम्भानन्तरं विबुद्धस्य सतः स्फुटं दृश्यन्ते हर्षविषादादयः । तत्र- 'स्वमे दृष्टो मयाद्य त्रिभुवनमहितः पार्श्वनाथः शिशुत्वे द्वात्रिंशद्भिः सुरेन्द्ररहमहमिकया स्नाप्यमानः सुमेरौ । तस्माद् मत्तोऽपि धन्यं नयनयुगमिदं येन साक्षात् स दृष्टो द्रष्टव्यो यो महीयान् परिहरति भयं देहिनां संस्मृतोऽपि ।' इत्यादिस्वप्नानुभूतसुखरागलिङ्गं हर्षः, तथा- 'प्राकारत्रयतुगतोरणमणिप्रेत्प्रभाव्याहताः नष्टाः कापि रवेः करा द्रुततरं यस्यां प्रचण्डा अपि । तां त्रैलोक्यगुरोः सुरेश्वरवतीमास्थायिकामेदिनी हा ! यावत् प्रविशामि तावदधमा निद्रा क्षयं मे गता ॥ इत्यादिकः स्वप्नानुभूतदुःखद्वेपलिङ्गं विषादः इति विवुद्धस्यानुग्रहोपघातानुपलम्भात् इत्यसिद्धो हेतुः ।" -विशेपा० वृ० गा० २२६. पृ० ३. पं० २४. 'दृश्येताम्' "अत्रोत्तरमाह-स्वमे सुखानुभवादिविषयं विज्ञानं स्वम- 30 विज्ञानं तस्मादुत्पद्यमाना हर्षविषादादयो न विरुद्धयन्ते - न तान् वयं निवारयामः जामइवस्था- विज्ञानहादिवत् , तथाहि-दृश्यन्ते जायदवस्थायां केचित् स्वानुत्प्रेक्षितसुखानुभवादिनानाद 20 25 - 15 ३८ जैनतर्कभाषायाः [पृ० ३. पं० २६- हृष्यन्तः, द्विपन्तो वा, ततश्च दृष्टस्य निषेधुमशक्यत्वात् स्वप्नविज्ञानादपि नैतन्निषेधं ब्रूमः तर्हि किमुच्यते भवद्भिः ? । क्रिया - भोजनादिका तस्याः फलं तृप्त्यादिकं तत्पुनः स्वमविज्ञानाद् नास्त्येव, इति ब्रूमः । यदि ह्येतत् तृप्त्यादिकं भोजनादिक्रियाफलं स्वप्नविज्ञानाद् भवेत् तदा विषयप्राप्तिरूपा प्राप्यकारिता मनसो युज्येत, न चैतदस्ति, तथोपलम्भस्यैवाभावात् ।" 5 -विशेषा० ० गा. २२७. पृ० ३. पं० २६. 'क्रियाफलमपि स्वप्ने'-"क्रियाफलं जाग्रदवस्थायामपि परो दर्शयन्नाह - यत्र व्यञ्जन(शुक्र)विसर्गः तत्र योषित्संगमेनापि भवितव्यम् , यथा वासभवनादौ, तथा च स्वमे, ततो- ऽत्रापि योपित्प्राप्त्या भवितव्यम् इति कथं न प्राप्यकारिता मनसः ? ।" -विशेपा० बृ० गा० २२८. "अथ योपित्संगमे साध्ये व्यञ्जनविसर्गहेतोरनैकान्तिकतामुपदर्शयन्नाह-स्वमे योऽसौ व्यञ्ज- 10 नविसर्गः स तत्प्राप्तिमन्तरेणापि 'तां कामिनीमहं परिषजामि' इत्यादिस्वयमुत्प्रेक्षिततीव्राध्यवसाय- कृतो वेदितव्यः । जाग्रतोपि तीव्रमोहस्य प्रवलवेदोदययुक्तस्य कामिनी स्मरतः दृढं ध्यायतः प्रत्यक्षामिव पश्यतो बुद्ध्या परिपजतः परिभुक्तामिव मन्यमानस्य यत् तीव्राध्यवसानं तस्मात् यथा व्यञ्जनविसर्गो भवति तथा स्वप्नेपि, अन्यथा तत्क्षण एव प्रबुद्धः सन्निहितां प्रियतमामुपलभेत तत्कृतानि च स्वप्नोपलब्धानि नखदन्तपदादीनि पश्येत् न चैवम् ।” --विशेषा० वृ० गा० २२९. पृ० ३. पं० २७. 'ननु स्त्यानधि'-"ननु स्त्यानर्द्धिनिद्रोदये वर्तमानस्य द्विरददन्तोत्पा- टनादिप्रवृत्तस्य स्वप्ने मनसः प्राप्यकारिता तत्पूर्वको व्यञ्जनावग्रहश्च सिद्धयति, तथाहि स तस्या- मवस्थायां 'द्विरददन्तोत्पाटनादिकं सर्वमिदमहं स्वमे पश्यामि' इति मन्यते इत्ययं स्वमः, मनोविकल्प पूर्विकां च दशनाद्युत्पाटन क्रियामसौ करोति इति मनसः प्राप्यकारिता तत्पूर्वकश्च मनसो व्यञ्जनावग्रहो भवत्येव इत्याशङ्याह-स्त्यानगृद्धिनिद्रोदये पुनर्वर्तमानस्य जन्तोः मांस- 20 भक्षण-दशनोत्पाटनादि कुर्वतो गाढनिद्रोदयपरवशीभूतत्वेन स्वममिव मन्यमानस्य स्यात् व्यञ्ज- नावग्रहः, न वयं तत्र निषेद्धारः । सिद्धं तर्हि परस्य समीहितम् ; सिद्धयेत् यदि सा व्यञ्जनावग्रहता मनसो भवेत् । न पुनः सा तस्य । कस्य तर्हि सा ? । सा खलु प्राप्यकारिणां श्रवणरसनघ्राण- स्पर्शनानाम् । इदमुक्तं भवति-स्त्यानर्द्धिनिद्रोदये प्रेक्षणकरङ्गभूम्यादौ गीतादिकं शृण्वतः श्रोत्रेन्द्रियस्य व्यञ्जनावग्रहो भवति ।" -विशेषा० ऋ० गा० २३४. पृ० ३. पं० २९. 'ननु च्यवमानो न जानाति'-"यस्मात् कारणात् 'च्यवमानो न जाना- ति' इत्यादिवचनात् सर्वोपि च्छद्मस्थोपयोगोऽसङ्ख्येयैः समयैर्निर्दिष्टः सिद्धान्ते न तु एकट्यादि- भिः । यस्माचतेषु उपयोगसम्बन्धिपु असङ्ख्येयेपु समयेषु सर्वेष्वपि प्रत्येकमनन्तानि मनोव्याणि मनोवर्गणाभ्यो गृह्णाति जीवः, द्रव्याणि च तत्सम्बन्धो वा प्रागत्रैव भवद्भिर्व्यञ्जनमुक्तम् । तेन कारणेन तत् तादृशं द्रव्यं तत्सम्बन्धो वा व्यञ्जनावग्रह इति युज्यते मनसः । यथाहि-श्रोत्रा- 30 दीन्द्रियेण असङ्ख्येयान् समयान् यावद् गृह्यमाणानि शब्दादिपरिणतद्रव्याणि, तत्सम्बन्धो वा व्यञ्जनावग्रहः तथाऽत्रापि ।" विशेषा० वृ० गा २३७-८ "तदेवं विषयासंप्राप्तावपि भङ्ग्यन्तरेण मनसो व्यञ्जनावग्रहः किल परेण समर्थितः साम्प्रतं विषयसंप्राप्त्यापि तस्य तं समर्थयन्नाह-शरीराद अनिर्गतस्यापि मेर्वाद्यर्थमगतस्यापि स्वस्थान- 25 पृ० ४. पं० ४.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । ३९ स्थितस्यापि स्वकाये स्वकायस्य वा हृदयादिकमतीव सन्निहितत्वादतिसम्बद्धं विचिन्तयतो मनसो योऽसौ ज्ञेयेन स्वकायस्थितहृदयादिना सम्बन्धः तत्प्राप्तिलक्षणः तस्मिन्नपि ज्ञेयसन्धे व्यजना- वग्रहः मनसः" युज्यत एव । -विशेषा० ० वृ० गा० २३९. पृ० ४ पं० १. 'इति चेत् ः शृणु'--"तदेवं प्रकारद्वयेन मनसः परेण व्यञ्जनावग्रहे समर्थिते आचार्यः प्रथमपक्षे तावत् प्रतिविधानमाह-चिन्ताद्रव्यरूपं मनो न ग्राह्यम् , किन्तु गृह्यते अवगम्यते 5 शव्दादिरर्थोऽनेन इति ग्रहणम् अर्थपरिच्छेदे करणम् इत्यर्थः । ग्राह्यं तु मेरुशिखरादिकं मनसः सुप्रतीतमेव अतः कोऽवसरः तस्य करणभृतस्य मनोद्रव्यराशेः व्यञ्जनावग्रहे अधिकृते ? । न कोपि इत्यर्थः । ग्राह्यवस्तुग्रहणे हि व्यञ्जनावग्रहो भवति। न च मनोद्रव्याणि ग्राह्यरूपतया गृह्यन्ते ।" -विशेषा० ० बृ० गा० २४०. “या च मनसः प्राप्यकारिता प्रोक्ता सापि न युक्ताः स्वकायहृदयादिको हि मनसः स्वदेश 10 एव । यच्च यस्मिन् देशेऽवतिष्ठते तत् तेन सम्बद्धमेव भवति कस्तत्र विवादः ? । किं हि नाम तद्- वस्त्वस्ति यदात्मदेशेनाऽसम्बद्धम् ? । एवं हि प्राप्यकारितायामिष्यमाणायां सर्वमपि ज्ञानं प्राप्य- कार्येव, पारिशेष्याद् बाह्यार्थापेक्षयैव प्राप्यकारित्वाप्राप्यकारित्वचिन्ता युक्ता ।" -विशेषा० ० गा० २४१. पृ० ४. पं० ४. 'क्षयोपशमपाटवेन'-"भवतु वा मनसः स्वकीयहृदयादिचिन्तायां 15 प्राप्यकारिता तथापि न तस्य.व्यञ्जनावग्रहसंभवः इति दर्शयन्नाह यस्मात् मनसः प्रथमसमय एव अर्थावग्रहः समुत्पद्यते न तु श्रोत्रादीन्द्रियस्येव प्रथमं व्यञ्जनावग्रहः, तस्य हि क्षयोपशमापाट- वेन प्रथममर्थानुपलब्धिकालसम्भवात् युक्तो व्यञ्जनावग्रहः, मनसस्तु पटुक्षयोपशमत्वात् चक्षुरा- दीन्द्रियस्येव अर्थानुपलम्भकालस्यासंभवेन प्रथममेव अर्थावग्रह एव उपजायते । अत्र प्रयोगः- इह यस्य ज्ञेयसंवन्धे सत्यप्यनुपलब्धिकालो नास्ति न तस्य व्यञ्जनावग्रहो दृष्टः, यथा चक्षुषः, 20 नास्ति चार्थ संबन्धे सत्यनुपलब्धिकालो मनसः, तस्माद् न तस्य व्यञ्जनावग्रहः, यत्र तु अयमभ्युप- गम्यते न तस्य ज्ञेयसंवन्धे सत्यनुपलब्धिकालासंभवः, यथा श्रोत्रस्येति व्यतिरेकः । तस्मादुक्त- प्रकारेण मनसो न व्यञ्जनावग्रहसम्भवः ।" -विशेषा० वृ० गा० २४१. - पृ० ४. पं० ४. 'श्रोत्रादीन्द्रिय ----- "इदमुक्तं भवति-न केवलं मनसः केवलावस्थायां प्रथमम् अर्थावग्रह एव व्यापारः, किन्तु श्रोत्रादीन्द्रियोपयोगकालेपि तथैव, तथाहि-श्रोत्रादीन्द्रि- 25 योपयोगकाले व्याप्रियते मनः केवलमर्थावग्रहादेव आरभ्य, न तु व्यञ्जनावग्रहकाले । अर्थानव- बोधस्वरूपो हि व्यञ्जनावग्रहः तदवबोधकारणमात्रत्वात् तस्य, मनन्तु अर्थावबोधरूपमेव 'मनु- तेऽर्थान् मन्यन्ते अर्था अनेन इति वा मनः' इति सान्वाभिधानाऽभिधेयत्वात् । किञ्च, यदि व्यञ्जनावग्रहकाले मनसो व्यापारः स्यात् तदा तस्यापि व्यन्जनावग्रहसद्धावादष्टाविंशतिभेद- भिन्नता मतेर्विशीर्येत, तस्मात् प्रथमसमयादेव तस्यार्थग्रहणमेप्टव्यम् । यथा हि स्वाभिधेयानर्थान 30 भाषमाणैव भाषा भवति, नान्यथा; यथा च म्वविषयभूतानानवबुध्यमानान्येवावध्यादिज्ञाना- न्यात्मलाभ लभन्ते, अन्यथा तेपामप्रवृत्तिरेव स्यादिति. एवं स्वविषयभूतानर्धान् प्रथमसनयादा- जैनवर्कभाषायाः [पृ० ४. पं०९- रभ्य मन्वानमेव मनो भवति, अन्यथा अवध्यादिवत् तस्य प्रवृत्तिरेव न स्यात् । तस्मात् तस्यानुप- लब्धिकालो नास्ति, तथा च न व्यञ्जनावग्रह इति स्थितम् ।" -विशेषा० ऋ० गा० २४२,२४३. पृ० ४. पं० ९. 'स्वरूप'-"ग्राह्यवस्तुनः सामान्य-विशेषात्मकत्वे सत्यप्यर्थावग्रहण सामान्यरूपमेवार्थ गृह्णाति, न विशेषरूपम् अर्थावग्रहस्यैकसामयिकत्वात् , समयेन च विशेष- 5 ग्रहणायोगादिति । सामान्यार्थश्च कश्चिद् ग्राम-नगर-वन-सेनादिशब्देन निर्देश्योऽपि भवति तद्व्यवच्छेदार्थमाह-स्वरूपनामादिकल्पनारहितम् , आदिशब्दात् जाति-क्रिया-गुण-द्रव्यपरिग्रहः । तत्र रूपरसाद्यर्थानां य आत्मीयचक्षुरादीन्द्रियगम्यः प्रतिनियतः स्वभावः तत् स्वरूपम् । रूप- रसादिकस्तु तदभिधायको ध्वनि म । रूपत्व-रसत्वादिका तु जातिः । प्रीतिकरमिदं रूपं पुष्टि- करोऽयं रसः इत्यादिकस्तु शब्दः क्रियाप्रधानत्वात् क्रिया । कृष्ण-नीलादिकस्तु गुणः । पृथि- 10 व्यादिकं पुनर्द्रव्यम् । एषां स्वरूप-नाम-जात्यादीनां कल्पना अन्तर्जल्पारूपितज्ञानरूपा, तया रहित- मेवार्थमर्थावग्रहेण गृह्णाति जीवः ।" --विशेपा० बृ० गा० २५२. पृ०४.पं० १०. 'कथं तर्हि “यदि स्वरूपनामादिकल्पनारहितोऽर्थोऽर्थावग्रहस्यविषयः इत्ये- वं व्याख्यायते भवद्भिः तर्हि यन्नन्द्यध्ययनसूत्रे (सू० ३६.) प्रोक्तम्-'से जहा नामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणेज्जा तेणं सद्देत्ति उग्गहिए न उण जाणइ के वेस सदाइ त्ति' तदेतत् कथमविरोधेन नीयते ।। 15 अस्मिन्नन्दिसूत्रे अयमर्थः प्रतीयते-यथा तेन प्रतिपत्ता अर्थावग्रहेण शब्दोऽवगृहीतः इति । भव- न्तस्तु शब्दाद्युल्लेखरहितं सर्वथाऽमुं प्रतिपादयन्ति ततः कथं न विरोधः ?" -विशेषा० बृ० गा०२५२. पृ० ४. पं० ११. 'शब्दः' इति'-"अनोत्तरमाह-'शब्दस्तेन अवगृहीतः' इति यदुक्तं तत्र 'शब्दः' इति सूत्रकारः प्रतिपादयति । अथवा शब्दमानं रूपरसादिविशेपव्यावृत्त्या अनवधारि- तत्वात् शब्दतयाऽनिश्चितं गृह्णाति इति एतावतांशेन 'शब्दस्तेन अवगृहीतः' इत्युच्यते न पुनः 20 शब्दबुद्ध्या 'शब्दोऽयम्' इत्यध्यवसायेन तच्छन्दवस्तु तेन अवगृहीतम् , शब्दोल्लेखस्य आन्त- मुहर्तिकत्वात् , अर्थावग्रहस्य तु एकसामयिकत्वादसम्भव एवायमिति भावः । यदि पुनरर्थाव- ग्रहे शब्दनिश्चयः स्यात् तदा अपाय एवासौ स्यात् नत्वावग्रहः निश्चयस्यापायरूपत्वात् ।। -विशेपा. वृ० गा० २५३. पृ० ४. पं० १३. 'स्यान्मतम्'-"ननु प्रथमसमय एव रूपादिव्यपोहेन 'शब्दोऽयम्' 25 इति प्रत्ययोऽर्थावग्रहत्वेन अभ्युपगम्यताम् , शब्दमात्रत्वेन सामान्यत्वात् , उत्तरकालं तु 'प्रायो माधुर्यादयः शङ्खशव्दधर्मा इह घटन्ते, नतु शार्ङ्गधर्माः खरकर्कशत्वादयः' इति विमर्शवुद्धिरीहा, तस्मात् 'शाल एवायं शब्दः' इति तद्विोपस्त्वपायोऽस्तु ।" -विशेपा० ऋ० गा० २५४. पृ० ४ पं० १५ 'मैवम् , अशब्द'-"यस्माद् न रूपादिरयम् , तेभ्यो व्यावृत्तत्वेन गृही- तत्वात् , अतो 'नाऽशब्दोऽयम्' इति निश्चीयते। यदि तु रूपादिभ्योऽपि व्यावृत्तिगृहीता न स्यात् , 30 तदा 'शब्दोऽयम्' इति निश्चियोऽपि न स्यादिति भावः । तस्मात् 'शब्दोऽयं नाऽशब्दः' इति विशेषप्रतिभास एवाऽयम् । तथा च सत्यस्याऽप्यपायप्रसङ्गतोऽवग्रहाभावप्रसङ्ग इति स्थितम् ।। -विशेपा. वृ० गा० २५४. पृ० १. पं० १६. 'स्तोकग्रहणम्'--"अथ परोऽवग्रहापाययोर्विषयविभागं दर्शयन्नाह- पृ० ४. पं० २१.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः। ४१567 इदं शब्दबुद्धिमात्रकं शव्दमात्रस्तोकविशेषावसायित्वात् स्तोकविशेषग्राहकम् , अतोऽपायो - न भवति, किन्तु अवग्रह एवायम् । कः पुनस्तर्हि अपायः ? । 'शाङ्खोऽयं शब्दः' इत्यादि- विशेषणविशिष्टं यज्ज्ञानं तदपायः बृहद्विशेषावसायित्वादिति । हन्त ! यदि यत् यत् स्तोकं तत् तत् नापायः, तर्हि निवृत्ता सांप्रतमपायज्ञानकथा, उत्तरोत्तरार्थग्रहणापेक्षया पूर्वपूर्वार्थ- विशेषावसायस्य स्तोकत्वात् । एवमुत्तरोत्तरविशेपग्राहिणामपि ज्ञानानां तदुत्तरोत्तरभेदापेक्षया 5 स्तोकत्वादपायत्वाभावो भावनीयः ।" -विशेषा० बृ० गा० २५५. पृ० ४. पं०. १६ 'किञ्च शब्दोऽयमिति'-"किञ्च, शब्दगतान्वयधर्मेष रूपादिभ्यो व्यावृत्तौ च गृहीतायां 'शब्द एव' इति निश्चयज्ञानं युज्यते । तद्ग्रहणं च विमर्शमन्तरेण नोपपद्यते, विमर्शश्च ईहा, तस्मादीहामन्तरेण अयुक्तमेव 'शब्द एव' इति निश्चयज्ञानम् । अथ निश्चयकालात् पूर्वमीहित्वा भवतोऽपि 'शब्द एवायम्' इति ज्ञानमभिमतम् ; हन्त ! तहिं 10 निश्चयज्ञानात् पूर्व असावीहा भवद्वचनतोऽपि सिद्धा ।" -विशेषा० बृ० गा० २५७. पृ० ४. पं० १८. 'सा च नागृहीते'-"नन्वीहायाः पूर्वं किं तद् वस्तु प्रमात्रा गृहीतम् , यदीहमानस्य तस्य 'शब्द एवायम्' इति निश्चयज्ञानमुपजायते ? । नहि कश्चिद् वस्तुन्यगृहीते- ऽकस्मात् प्रथमत एवेहां कुरुते ।" -विशेषा० बृ० गा० २५८. "ईहायाः पूर्वं यत् सामान्यं गृह्यते तस्य तावद् ग्रहणकालेन भवितव्यम् । स चास्मद- 15 भ्युपगतसामयिकार्थावग्रहकालरूपो न भवति, अस्मदभ्युपगताङ्गीकारप्रसङ्गात् । किं तर्हि ? । अस्मदभ्युपगतार्थावग्रहात् पूर्वमेव भवदभिप्रायेण तस्य सामान्यस्य ग्रहणकालेन भवितव्यम् , च तस्याऽस्मदभ्युपगतार्थावग्रहस्य व्यञ्जनकाल एव वर्तते । भवत्वेवम् , तथापि तत्र सामान्यार्थ- ग्रहणं भविष्यति इत्याशङ्याह-स च व्यञ्जनकाल: अर्थपरिशून्यः, न हि तत्र सामान्यरूपो विशेषरूपो वा कश्चनाप्यर्थः प्रतिभाति, तदा मनोरहितेन्द्रियमात्रव्यापारात् , तत्र चार्थप्रतिभासाऽ- 20 योगात् । तस्मात् पारिशेण्यात् अस्मदभ्युपगतार्थावग्रह एव सामान्यग्रहणम्, तदनन्तरं चान्वय- व्यतिरेक वर्मपर्यालोचनरूपा ईहा, तदनन्तरं च 'शब्द एवायम्' इति निश्चयज्ञानमपायः ।" -विशेषा० पृ० ४. पं० १९. 'नन्वनन्तरम्'-"न उण जाणइ के वेस सद्देत्ति अस्मिन् नन्दिसूत्रे 'न 'पुनर्जानाति कोप्येष शाखशााद्यन्यतरः शब्दः' इति विशेषस्यैवापरिज्ञानमुक्तम् । शब्दसामान्य- 25 मात्रग्रहणं तु अनुज्ञातमेव । शब्दसामान्ये गृहीत एव तद्विशेषमार्गणम्य युज्यमानत्वात् ।" -विशेषा. वृ० गा० २६०. पृ० ४. पं० २१. 'न; शब्दः शब्दः'-"अत्रोचरमाह-सर्वत्रावग्रहम्वरूपं प्रन्प- यन् 'शब्दः शब्दः' इति प्रज्ञापक एव वदति न तु तत्र ज्ञाने शब्दप्रतिभासोऽन्ति अन्यथा न समयमात्रे अर्थावग्रहकाले 'शब्दः' इति विशेषणं युक्तम्, आन्तर्मुहर्तिकत्वात् शब्दनिश्चयम्य" । 30 -विशेषा० पृ० ४. पं० २१. 'अर्थावग्रहे'-"यदि तव गाढः श्रुतावष्टम्भः तदा तत्राप्येतत् भणिनं यदुत प्रथममव्यक्तस्यैव शब्दोल्लेखरहितम्य शब्दमात्रम्य ग्रहणम् । केनौं पुनः सूत्राश्यानेद- पूर्व '० बृ. गा० २५९. ० वृ० गा० २६१. ६ ४२ पृ० जैनतर्कभाषायाः [ पृ० ४..पं० २३- मुक्तम् ? । नन्द्यध्ययने 'से जहा नामए केइ पुरिसे अव्वत्तं सदं सुणेजत्ति'-अत्र अव्यक्तमिति कोऽर्थः ? । 'शब्दोऽयम्' 'रूपादिवा' इत्यादिना प्रकारेणाव्यक्तमित्यर्थः । न च वक्तव्यम्- शाङ्ख-शार्ङ्गभेदापेक्षया शब्दोल्लेखस्याप्यव्यक्तत्वे घटमाने कुत इदं व्याख्यानं लभ्यते ?, इति; अवग्रहस्यानाकारोपयोगरूपतया सूत्रेऽधीतत्वात् , अनाकारोपयोगस्य च सामान्यमात्रविषयत्वात् , 5 प्रथममेवाऽपायप्रसक्त्याऽवग्रहहाऽभावप्रसङ्ग इत्यायुक्तत्वाच्च ।” –विशेपा० बृ० गा० २६२. पृ० ४. पं० २३. 'यदि च व्यञ्जनावग्रहे'-"ननु यदि व्यञ्जनावग्रहेपि अव्यक्तशब्दग्रहणं भवेत् तदा को दोषः स्यात् ?, इत्याह-यदि च व्यञ्जनावग्रहे असौ अव्यक्तशब्दः प्रतिभासत इत्यभ्यु- पगम्यते तदा व्यञ्जनावग्रहो न प्रामोति, अर्थावग्रह एवासौ अव्यक्तार्थावग्रहणात् । अथ अस्यापि सूत्रे प्रोक्तत्वादस्तित्वं न परिहियते तर्हि द्वयोरप्यविशेषः सोपि अर्थावग्रहः सोपि व्यञ्जनावग्रहः 10 प्राप्नोति ।" -विशेपा. वृ० गा० २६५. ४. पं० २५. 'केचित्तु'-"केचिदेवमाहुः-यदेतत् सर्वविशेषविमुखस्याव्यक्तस्य सामान्यमात्रस्य ग्रहणं तत् शिशोस्तत्क्षणजातमात्रस्य भवति नात्र विप्रतिपत्तिः, असौ सङ्के- तादिविकलोऽपरिचितविषयः । यः परिचितविषयः तस्य आद्यशब्दश्रवणसमय एव विशेषविज्ञानं जायते स्पष्टत्वात् तस्य, ततश्चामुमाश्रित्य 'तेण सद्देत्ति उग्गहिए' इत्यादि यथाश्रुतमेव व्याख्यायते, 15 न कश्चिद्दोषः ।" -विशेपा० वृ० गा० २६८. पृ० ४. पं० २७. 'तन्न, एवं हि'-"अत्रोत्तरमाह-यदि परिचितविषयस्य जन्तोः अव्यक्तशब्दज्ञानमुल्लध्य तस्मिन्नर्थावग्रहैकसमयमात्रे शब्दनिश्चयज्ञानं भवति तदा अन्यस्य कंस्यचित् परिचिततरविषयस्य पटुतरावबोधस्य तस्मिन्नेव समये व्यक्तशब्दज्ञानमप्यतिक्रम्य 'शाङ्खोऽयं शब्दः' इत्यादिसङ्ख्यातीतविशेषग्राहकमपि ज्ञानं भवदभिप्रायेण स्यात् । दृश्यन्ते 20 च पुरुषशक्तीनां तारतम्यविशेपाः । भवत्येव कस्यचित् प्रथमसमयेऽपि सुबहुविशेषग्राहकमपि ज्ञानमिति चेत् ; न; 'न उण जाणइ के वेस सद्दे' इत्यस्य सूत्रावयवस्य अगमकत्वप्रसङ्गात् । विमध्यमशक्तिपुरुषविषयमेतत् सूत्रमिति चेत्, न; अविशेपेण उक्तत्वात् सर्वविशेषविषयत्वस्य च युक्त्यनुपपन्नत्वात् । नहि प्रकृष्टमतेरपि शब्दधर्मिणमगृहीत्वा उत्तरोत्तरबहुसुधर्मग्रहण- संभवोऽस्ति निराधारधर्माणामनुपपत्तेः । -विशेषा० बृ० गा० २६९. पृ० ४. पं० ३१. 'अन्ये तु आलोचना'--"विषयविपयिसन्निपातसमयानन्तरमाद्य- ग्रहणमवग्रहः । विषयविषयिसन्निपाते सति दर्शनं भवति तदनन्तरमर्थस्य ग्रहणमवग्रहः ।" -सर्वार्ध० १. १५. पृ० ५. पं० २. 'यत आलोचनम्। ---"यदेतत् भवदुत्प्रेक्षितं सामान्यग्राहकमालोचनं तत्. व्यञ्जनावग्रहात् पूर्व वा भवेत् , पश्चाद्वा भवेत् , स एव व्यञ्जनावग्रहोऽपि आलोचनं भवेत् ?, 30 इति त्रर्या गतिः । किञ्चातः । " -विशेपा० बृ० गा० २७४. "पूर्वं तत् नास्ति । कुतः ? । अर्थव्यञ्जनसम्बन्धाभावादिति । अर्थः-शब्दादिविषयभावेन परिणतद्रव्यसमूहः, व्यञ्जनं तु श्रोत्रादि, तयोः सम्बन्धः, तम्याभावात् । सति हि अर्थव्यञ्जन- । 25 ? ?

४३ ० वृ० गा० २७४. 5 10 पृ० ५. पं० ७.] तात्पयसङ्ग्रहा वृत्तिः। सम्बन्धे सामान्यार्थालोचनं स्यात् अन्यथा सर्वत्र सर्वदा तद्भावप्रसङ्गात् । व्यञ्जनावग्रहाच पूर्वम् अर्थव्यञ्जनसम्बन्धो नास्ति, तद्भावे च व्यञ्जनावग्रहस्यैव इष्टत्वात् तत्पूर्वकालता न स्यादिति ।" -विशेषा पृ० ५. पं० ३. 'न द्वितीयः' - "द्वितीयविकल्पं शोधयन्नाह-अर्थावग्रहोऽपि यस्मात् व्यञ्जनावग्रहस्यैव चरमसमये भवति तस्मात् पश्चादपि व्यजनावग्रहादालोचनज्ञानं न युक्तम् , निरवकाशत्वात् । नहि व्यञ्जनार्थावग्रहयोरन्तरे कालः समस्ति यत्र तत् त्वदीयमालोचनज्ञानं स्यात्, व्यजनावग्रहचरमसमय एवार्थावग्रहसद्भावात् ।” –विशेषा. वृ० गा० २७५. पृ० ५. पं० ४. 'न तृतीयः'-"पूर्वपश्चात्कालयोनिषिद्धत्वात् पारिशेप्याद् मध्य- कालवर्ती तृतीयविकल्पोपन्यस्तो व्यञ्जनावग्रह एव भवताऽऽलोचनाज्ञानत्वेनाभ्युपगतो भवेत् । एवं च न कश्चिद् दोषः, नाममात्र एव विवादात् ।" -विशेषा. वृ० गा० २७५. पृ० ५. पं० ४. 'तस्य च'-"क्रियतां तर्हि प्रेरकवर्गेण वर्धापनम् , त्वदभिप्रायाविसंवाद- लाभादिति चेत् ; नैवम् ; विकल्पद्वयस्येह सद्भावात् , तथाहि तद्व्यञ्जनावग्रहकालेऽभ्युपगम्य- मानमालोचनम्-किमर्थस्यालोचनम् , व्यञ्जनानां वा ?, इति विकल्पद्वयम् । तत्र प्रथमविकल्पं दूपय- नाह-तत्समालोचनं यदि सामान्यरूपस्य अर्थस्य दर्शनमिप्यते तर्हि न व्यञ्जनावग्रहात्मकं भवति, व्यञ्जनावग्रहस्य व्यञ्जनसम्बन्धमात्ररूपत्वेन अर्थशून्यत्वात् । अथ द्वितीयविकल्पमङ्गीकृत्याह- 15 अथ व्यञ्जनस्य शब्दादिविषयपरिणतद्रव्यसम्बन्धमात्रस्य तत्समालोचनमिष्यते तहिं कथम् आलोचकत्वं तस्य घटते ?, अर्थशून्यस्य व्यञ्जनसम्बन्धमात्रान्वितत्वेन सामान्यार्थालोचकत्वा- नुपपत्तेः ।" विशेषा० वृ० गा० २७६. पृ० ५. पं० ५. 'किञ्च, आलोचनेन'-"भवतु तस्मिन् व्यञ्जनावग्रहे सामान्यं गृहीतम् तथापि कथमनीहिते तस्मिन् अकस्मादेव अर्थावग्रहकाले 'शब्द एपः' इति विशेषज्ञानं युक्तम् ।। 20 'शब्द एव एषः' इत्ययं हि निश्चयः । न चायमीहामन्तरेण झगित्येव युज्यते । अतो नार्थावग्रहे 'शब्दः' इत्यादिविशेषवुद्धियुज्यते ।”-विशेषा० वृ० गा०२७८. पृ० ५. पं० ६. 'युगपञ्च'-"अथ अर्थावग्रहसमये शब्दाद्यवगमेन सहैवेहा भविष्यतीनि मन्यसे; तत्राह-यदिदमर्थावग्रहे विशेषज्ञानं त्वया इप्यते सोऽपायः, स च अवगमम्वभावो निश्च- यस्वरूप इत्यर्थः । या च तत्समकालमीहाऽभ्युपेयते सा तर्कस्वभावा अनिश्चयात्मिका इत्यर्थः । 25 तत एतौ ईहापायौ अनिश्चयेतरस्वभावौ कथमर्थावग्रहे युगपदेव युक्ती, निश्चयानिश्चययोः परम्पर- परिहारेण व्यवस्थितत्वात् । अपरञ्च समयमात्रकालोऽर्थावग्रहः ईहापायो तु प्रत्येकमसळ्येय- समयनिष्पन्नौ कथम् एकस्मिन्नर्थावग्रहसमये स्याताम् अत्यन्तानुपपन्नत्वात् ।” विशेषा० ३० गा० २७९. पृ० ५ पं० ७. 'नन्वयग्रहे'-"क्षिप्रमवगृह्णाति, चिरेणावगृहाति, बहरगृहाति, अबहब- गृह्णाति, बहुविधवगृह्णाति, अवहुविधमवगृह्णाति, एवमनिश्रितम् , निधिवन , अमन्दिावन , 30 सन्दिग्धम् , ध्रुवम् , अध्रुवमवगृह्णाति-इत्यादिना अन्धेनावमहादयः शानान्तरे वादगभिविटोपन- विशेषिताः। ततः क्षिप्रं चिरेण वाऽवगृह्णाति' इति विशेषणान्यथानुपपत्तेनीयत नेकनमय- , . ४४ श्चयः, जैनतर्कभाषायाः [ पृ० ५. पं०८- मात्रमान एवार्थावग्रहः, किन्तु चिरकालिकोऽपि, नहि समयमात्रमानतयैकरूपे तस्मिन् क्षिप्र- चिरग्रहणविशेषणमुपपद्यत इति भावः । तस्मादेतद्विशेषणबलात् असङ्ख्येयसमयमानोऽप्यर्थावग्रहो . युज्यते । तथा, वहूनां श्रोतॄणामविशेषेण प्राप्तिविषयस्थे शङ्खभर्यादिबहुतूर्यनिर्घोषे क्षयोपशमवैचि- ज्यात् कोऽप्यवहु अवगृह्णाति-सामान्यं समुदिततूर्यशब्दमात्रमवगृह्णाति इत्यर्थः । अन्यस्तु वहव- 5 गृह्णाति-शङ्खभेयादितूर्यशब्दान् भिन्नान् बहून् गृह्णातीत्यर्थः । अन्यस्तु स्त्री-पुरुषादिवाद्यत्व-स्निग्ध- मधुरत्वादिवहुविधविशेषविशिष्टत्वेन बहुविधमवगृह्णाति । अपरस्तु अबहुविधविशेषविशिष्टत्वादवहु- विधमवगृह्णाति । अत एतस्माद् बहु-बहुविधाधनेकविकल्पनानात्ववशात् अवग्रहस्य कचित् सामान्यग्रहणम् , कचित्तु विशेषग्रहणम् इत्युभयमप्यविरुद्धम् । अतो यत् सूत्रे 'तेणं सद्देत्ति उग्गहिए' इति वचनात् 'शब्दः' इति विशेषविज्ञानमुपदिष्टम् , तदप्यर्थावग्रहे युज्यत एव इति केचित्" 10 -विशेषा० घृ० गा० २८०. पृ० ५. पं० ८. 'न; तत्वतः' "अत्रोत्तरमाह-बहुवहुविधादिग्राहको हि विशेषावगमो नि- स च सामान्यार्थग्रहणं ईहां च विना न भवति, यश्च तदविनाभावी सोऽपाय एव, कथ- मर्थावग्रह इति भण्यते ? । आह-यदि वहुबहुविवादिग्राहकोऽपाय एव भवति तर्हि कथमन्यत्र अवग्रहादीनामपि बहादिग्रहणमुक्तम् ?; सत्यम् ; किन्तु अपायस्य कारणमवग्रहादयः । कारणे च 15 योग्यतया कार्यस्वरूपमस्ति इति उपचारतस्तेऽपि वहादिग्राहकाः प्रोच्यन्ते इत्यदोपः । यद्येवं तर्हि वयमपि अपायगतं विशेषज्ञानमर्थावग्रहेपि उपचरिष्याम इति । नैतदेवम् ; यतो मुख्याभावे सति प्रयोजने निमित्ते च उपचारः प्रवर्तते। न चैवमुपचारे किञ्चित् 'प्रयोजनमस्ति । तेणं सद्देत्ति उग्ग- हिए' इत्यादिसूत्रस्य यथाश्रुतार्थनिगमनं प्रयोजनमिति चेत् ; न; 'सद्देत्ति भणइ वत्ता' इत्यादिप्रकारेणाअपि तस्य निगमितत्वात् । सामर्थ्यव्याख्यानमिदम् , न यथाश्रुतार्थव्याख्येति 20 चेत् ; तर्हि यद्यपचारेणापि श्रौतोऽर्थः सूत्रस्य व्याख्यायत इति तवाभिप्रायः, तर्हि यथा युज्यत उपचारः तथा कुरु । न चैतत् सामयिकेऽर्थावग्रहेऽसङख्येयसामयिकं विशेषग्रहणं कथमप्युपपद्यते।" -विशेषा. वृ० गा० २८१. पृ० ५. पं० १०. 'अथवा अवग्रहो'--"प्रथमं नैश्चयिके अर्थावग्रहे रूपादिभ्योऽव्याव- तमव्यक्त शब्दादिवस्तुसामान्यं गृहीतं ततः तस्मिन्नीहिते सति 'शब्द एवाऽयम्' इत्यादिनिश्च- 25 यरूपोऽपायो भवति । तदनन्तरं तु 'शब्दोऽयं किं शाङ्खः शार्हो वा इत्यादिशब्दविशेप- विषया पुनरीहा प्रवर्तिप्यते, 'शाङ्क्ष एवायं शब्दः' इत्यादिशब्दविशेषविषयोऽपायश्च यो भवि- प्यति तदपेक्षया 'शब्द एवायम्' इतिनिश्चयः प्रथमोऽपायोऽपि सन्नुपचारादांवग्रहो भण्यते ईहा-पायापेक्षात इति, अनेन चोपचारस्यक निमित्तं सूचितम् । 'शाङ्खोऽयं शब्दः' इत्यायेप्यविशे- पापेक्षया येनाऽसौ सामान्यशब्दरूपं सामान्यं गृह्णाति इति, अनेन तूपचारस्यैव द्वितीयं निमित्त- 30 मावेदितम् , तथाहि-यदनन्तरमीहापायौ प्रवर्तते, यश्च सामान्यं गृहाति सोऽर्थावग्रहः, यथायो नैश्चयिकः, प्रवर्तते च 'शब्द एवायम्' इत्याद्यपायानन्तरमीहापायौ, गृहाति च 'शाङ्खोऽयम्' इत्यादिभाविविशेषापेक्षयाऽयं सामान्यम् । तस्मादर्थावग्रह एप्यविशेषापेक्षया सामान्यं गृहा- तीति उक्तम् । ततस्तदनन्तरं किं भवति ? । ततः सामान्येन शब्दनिश्चयरूपात प्रथमापायादन- ४५ पृ० ५. पं० १५. तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । न्तरम् 'किमयं शब्दः शाङ्खः शाङ्गो वा ; इत्यादिरूपेहा प्रवर्तते । ततस्तद्विशेपस्य-शङ्खप्रभवत्वादेः शब्दविशेषस्य 'शाल एवायम्' इत्यादिरूपेणापायश्च निश्चयरूपो भवति । अयमपि च भूयोन्यत- द्विशेषाकाङ्क्षावतः प्रमातुर्भाविनीमीहामपायं चापेक्ष्य, एप्यविशेषापेक्षया सामान्यालम्बनत्वाचार्था- वग्रह इत्युपर्यते । इयं च सामान्यविशेषापेक्षा तावत् कर्तव्या यावदन्त्यो वस्तुनो विशेषः । यस्माच्च विशेषात् परतो वस्तुनोऽन्ये विशेषा न सम्भवन्ति सोऽन्त्यः, अथवा सम्भवत्स्वपि अन्य- 5 विशेषेषु यतो विशेषात् परतः प्रमातुस्तजिज्ञासा निवर्तते सोऽन्त्यः, तमन्त्यं विशेषं यावद् व्या- वहारिकार्थावग्रहेहापायार्थ सामान्यविशेषापेक्षा कर्तव्या ।” –विशेषा० वृ० गा० २८२-४. "सर्वत्र विषयपरिच्छेदे कर्तव्ये निश्चयतः ईहापायौ भवतः 'ईहा, पुनरपायः, पुनरीहा, पुनरप्यपायः' इत्ययं क्रमेण यावदन्त्यो विशेषः तावदीहापायावेव भवतः, नार्थावग्रहः । किं सर्वत्रैवमेव । नआद्यमव्यक्तं सामान्यमात्रालम्बनमेकं सामयिकं ज्ञानं मुक्त्वाऽन्योहापायौ भवतः। 10 इदं पुनर्नेहा, नाप्यपायः, किन्तु अर्थावग्रह एव । संव्यवहारार्थ व्यावहारिकजनप्रतीत्यपेक्षं पुनः सर्वत्र यो योऽपायः स स उत्तरोत्तरेहाऽपायापेक्षया, एप्यविशेषापेक्षया चोपचारतोऽर्थावग्रहः । एवं च तावद् नेयम् यावत्तारतम्येनोत्तरोत्तरविशेषाकाङ्क्षा प्रवर्तते ।”-विशेषा० बृ० गा० २८.. "लोकेऽपि हि यो विशेषः सोऽपि अपेक्षया सामान्यम् , यत् सामान्यं तदप्यपेक्षया विशेष इति व्यवयिते, तथाहि-शब्द एवायम्' इत्येवमध्यवसितोऽर्थः पूर्वसामान्यापेक्षया विशेषः, 15 'शाहोऽयम्' इत्युत्तरविशेषापेक्षया तु सामान्यम् । अयं चोपर्युपरिज्ञानप्रवृत्तिरूपेण सन्तानेन लोके रूढः सामान्यविशेषव्यवहारः औपचारिकावग्रहे सत्येव घटते नान्यथा तदनभ्युपगमे हि प्रथमापायानन्तरमीहानुत्थानम्, उत्तरविशेषाग्रहणं चाभ्युपगतं भवति । उत्तरविशेषाग्रहणे च प्रथमापायव्यवसितार्थस्य विशेषत्वमेव न सामान्यत्वम् इति पूर्वोक्तरूपो लोकप्रतीतः सामान्य- विशेषव्यवहारः समुच्छियेत । अथ प्रथमापायानन्तरमभ्युपगम्यत ईहोत्थानम् , उत्तरविशेषग्रहणं 20 च; तर्हि सिद्धं तदपेक्षया प्रथमापायव्यवसितार्थस्य सामान्यत्वम् , यश्च सामान्यग्राहकः, यद- नन्तरं च ईहादिप्रवृत्तिः सोऽर्थावग्रहः नैश्चयिकाद्यर्थावग्रहवत् इत्युक्तमेव । इति सिद्धो व्याव- हारिकार्थावग्रहः तत्सिद्धौ च सन्तानप्रवृत्त्याऽन्त्यविशेषं यावत् सिद्धः सामान्यविशेषव्यवहारः ।" -विशेषा० वृ० गा० २८८. पृ० ५. पं० १५. 'अवगृहीत'-"नैश्चयिकावग्रहे यत् सामान्यग्रहणं रूपायव्यावृत्याऽ- 25 व्यक्तवस्तुमात्रग्रहणम् , तथा व्यवहारार्थावग्रहेऽपि यदुत्तरविशेषापेक्षया शब्दादिसामान्यग्रहणम् , तस्मादनन्तरमीहा प्रवर्तते । कथम्भूतेयम् । तत्र विद्यमानम्य गृहीतार्थस्य विशेष विमाद्वारेण मीमांसा । केनोल्लेखेन ? । 'किमिदं वस्तु मया गृहीतम्-शब्दः, अशब्दो वा रूपरसादिरूपः' ।। इदं च निश्चयार्थावग्रहानन्तरभाविन्या ईहायाः स्वरूपम् । अथ व्यवहाराविग्रहानन्तरसम्भविन्याः स्वरूपमाह-शाम-शायोर्मध्ये कोऽयं भवेत् शब्दः शासः शाहों वा' ? इति । ननु कि दादः 30 अशब्दो वा' इत्यादिकं संशयज्ञानमेव कथमीहा भवितुमर्हति !; सत्यम् , किन्तु दिनानंवेद- मिह दर्शितम् , परमार्थतस्तु व्यतिरेकधर्मनिराकरणपरः अन्दयधर्मघटनप्रवृत्तचापायाभिमुख एव बोधः-ईहा द्रष्टव्या ।" -विशेषा० ६० गा० २८९.

४६ न जैनतर्कभाषायाः [पृ० ५.५० १७- पृ० ५. पं० १७. 'नचेयं संशय'-"निर्णयादर्शनात् ईहायां तत्प्रसङ्ग इति चेत् ; न; अर्थादानात् ।” “संशयपूर्वकत्वाच्च ।” –तत्त्वार्थरा० १. १५. ११, १२ । प्र. न. २. ११. पृ० ५. पं० १९. 'ईहितस्य'-"मधुरस्निग्धादिगुणत्वात् शङ्खस्यैवाऽयं शब्दः, शृङ्गस्य इत्यादि यद् विशेषविज्ञानम् , सोऽपायो निश्चयज्ञानरूपः। कुतः ? । पुरोवर्त्यर्थधर्माणामनु- 5 गमभावादस्तित्वनिश्चयसद्भावात् , तत्राविद्यमानार्थधर्माणां तु व्यतिरेकभावात् नास्तित्वनिश्चय- सत्त्वात् । अयं च व्यवहारार्थावग्रहानन्तरभावी अपाय उक्तः, निश्चयावग्रहानन्तरभावी तु श्रोत्र- ग्राह्यत्वादिगुणतः 'शब्द एवायं न रूपादिः' इति ।" -विशेपा० वृ० गा. २९०. पृ० ५. पं० २१. 'स एव दृढ'-"अपायेन निश्चितेऽर्थे तदनन्तरं यावदद्यापि तदर्थोपयो- गसातत्येन वर्तते न तु तस्मान्निवर्त्तते तावत् तदर्थोपयोगादविच्युति म सा धारणायाः प्रथमभेदो 10 भवति । ततः तस्य अर्थोपयोगस्य यदावरणं कर्म तस्य क्षयोपशमेन जीवो युज्यते येन कालान्तरे इन्द्रियव्यापारादिसामग्रीवशात् पुनरपि तदर्थोपयोगः स्मृतिरूपेण समुन्मीलति सा चेयं तदा- वरणक्षयोपशमरूपा वासना नाम द्वितीयस्तद्भेदो भवति । कालान्तरे च वासनावशात् तदर्थस्य इन्द्रियरुपलब्धस्य अथवा तैरनुपलब्धस्यापि मनसि या स्मृतिराविर्भवति सा तृतीयस्तद्भद इति । एवं त्रिभेदा धारणा विज्ञेया ।" -विशेषा. वृ० गा० २९१. 15 पृ० ५. पं० २५. 'केचित्तु अपनयन'-"तत्र विद्यमानात् स्थाण्वादेर्योऽन्यः तत्प्रतियोगी तत्राविद्यमानः पुरुषादिः तद्विशेषाः शिरःकण्डूयनचलनस्पन्दनादयः तेषां पुरोवर्तिनि सद्भूतेऽर्थे अपनयनं निषेधनं तदन्यविशेषापनयनं तदेव तन्मात्रम् अपायमिच्छन्ति केचन अपायनमपनयनम- पाय इति व्युत्पत्त्यर्थविभ्रमितमनस्काः । अवधारणं धारणा इति च व्युत्पत्त्यर्थभ्रमितास्ते धारणां ब्रुवते । किं तत् ?। सद्भूतविशेषावधारणम्-सद्भूतस्तत्र विवक्षितप्रदेशे विद्यमानः स्थाण्वादिरर्थवि- 20 शेषस्तस्य 'स्थाणुरेवायम्' इत्यवधारणम् ।" -विशेषा. वृ० गा० १८५. पृ० ५. पं० २७. 'तन्न'-"तदेतद् दूषयितुमाह-कस्यचित् प्रतिपत्तुः तदन्यव्यतिरेकमात्राद- वगमनं निश्चयो भवति तद्यथा-यतो नेह शिरःकण्डूयनादयः पुरुषधर्मा दृश्यन्ते ततः स्थाणुरेवा- यमिति । कस्यापि सद्भूतसमन्वयतः यथा स्थाणुरेवायं वल्ल्युत्सर्पणवयोनिलयनादिधर्माणामि- हान्वयादिति । कस्यचित् पुनः तदुभयाद् अन्वयव्यतिरेकोभयात् तत्र भूतेऽर्थेऽवगमनं भवेत् ; 25 तद्यथा यस्मात् पुरुषधर्माः शिरःकण्डूयनादयोऽत्र न दृश्यन्ते वल्ल्युत्सर्पणादयस्तु स्थाणुधर्माः समीक्ष्यन्ते तस्मात् स्थाणुरेवायमिति । नचैवमन्वयात् व्यतिरेकात् उभयाद्वा निश्चये जायमाने कश्चिद्दोषः । परव्याख्याने तु वक्ष्यमाणन्यायेन दोपः ।" -विशेषा० वृ० गा० १८६. पृ० ५. पं० २८. 'अन्यथा स्मृतेः'--"यस्माद् व्यतिरेकाद् अन्वयाटुभयाद्वा भूतार्थ- विशेषावधारणं कुर्वतो योऽभ्यवसायः स सर्वोऽपि अपायः न तु सद्भूतार्थविशेषावधारणं धारणा 30 -इति । व्यतिरेकोऽपायः अन्वयस्तु धारणा इत्येवं मतिज्ञानतृतीयमेदस्य अपायस्य भेदे अभ्यु- पगम्यमाने पञ्च भेदा भवन्ति आभिनियोधिकज्ञानस्य । तथाहि-अवग्रहेहापायधारणालक्षणा- श्चत्वारो भेदास्तावत् त्वयैव पूरिताः पञ्चमस्तु मेदः स्मृतिलक्षणः प्रामोति अविच्युतेः स्वसमान- । ? पृ० ६. पं० १६.] तात्पर्यसमहा वृत्तिः । कालभाविन्यपाये अन्तर्भूतत्वात् , वासनायास्तु स्मृत्यन्तर्गतत्वेन विवक्षितत्वात् , स्मृतेरनन्यशरण- त्वात् मतेः पञ्चमो भेदः प्रसज्यते ।" -विशेषा० वृ० गा० १८७. पृ० ५. पं० २९. 'अथ नास्त्येव' "ननु यथैव मया व्याख्यायते व्यतिरेकमुखेन निश्चयोऽपायः, अन्वयमुखेन तु धारणा-इत्येवमेव चतुर्विधा मतियुक्तितो घटते । अन्यथा तु व्याख्यायमाने-अन्वयव्यतिरेकयोर्द्वयोरप्यपायत्वेभ्युपगम्यमाने-अवग्रहेहापायभेदतस्त्रिभेदा मतिभ- 5 वति न पुनश्चतुर्धा, धारणाया अघटमानत्वात् ।" -विशेषा० बृ० गा० १८७. पृ० ५. पं० २९. 'तथाहि उपयोगोपरमे'-"कथं पुनर्धारणाऽभावः ? । इह तावत् निश्चयो- ऽपायमुखेन घटादिके वस्तुनि अवग्रहहापायरूपतया अन्तर्मुहूर्तप्रमाण एव उपयोगो जायते तत्र च अपाये जाते या उपयोगसातत्यलक्षणाऽविच्युतिर्भवताऽभ्युपगम्यते सा अपाय एव अन्तर्भूता इति न ततो व्यतिरिक्ता । या तु तस्मिन् घटाधुपयोगे उपरते सति सङ्ख्येयमसङ्ख्येयं वा कालं 10 वासनाऽभ्युपगम्यते 'इदं तदेव' इतिलक्षणा स्मृतिश्चाङ्गीक्रियते सा मत्यंशरूपा धारणा न भवति मत्युपयोगस्य प्रागेवोपरतत्वात् । कालान्तरे पुनर्जायमानोपयोगेऽपि या अन्वयमुखोपजायमाना- ऽवधारणरूपा धारणा मया इष्यते सा यतोऽपाय एव भवताऽभ्युपगम्यते ततस्तत्रापि नास्ति धृतिः धारणा, तस्मादुपयोगकाले अन्वयमुखावधारणरूपाया धारणायाः त्वयाऽनभ्युपगमात् उपयोगोप- रमे च मत्युपयोगाभावात् तदंशरूपाया धारणायाः अघटमानकत्वात् त्रिधैव भवदभिप्रायेण मतिः 15 प्राप्नोति न चतुर्धा इति पूर्वपक्षाभिप्रायः ।" -विशेपा० बृ० गा० १८८-९. पृ० ६. पं० ३. 'न; अपाय'-"अत्रोत्तरमाह-कालान्तरे या स्मृतिरूपा बुद्धिरुपजायते, नन्विह सा पूर्वप्रवृत्तादपायात् निर्विवादमभ्यधिकैव पूर्वप्रवृत्तापायकाले तस्या अभावात् साम्प्रता- पायस्य तु वस्तुनिश्चयमात्रफलत्वेन पूर्वापरदर्शनानुसन्धानायोगात् । यस्माच्च वासनाविशेषात् पूर्वोपलव्धवस्त्वाहितसंस्कारलक्षणात्-'इदं तदेव' इतिलक्षणा स्मृतिर्भवति सापि वासनापाया- 20 दभ्यधिका इति । या च अपायादनन्तरमविच्युतिः प्रवर्त्तते साऽपि । इदमुक्तं भवति-यस्मिन् समये 'स्थाणुरेवायम्' इत्यादिनिश्चयस्वरूपोऽपायः प्रवृत्तः ततः समयादूर्ध्वमपि 'स्थाणुरेवायं स्थाणुरेवायम्' इति अविच्युत्या या अन्तर्मुहूर्त कचिदपायप्रवृत्तिः सापि अपायाविच्युतिः प्रथमप्रवृत्तापायादभ्यधिका । एवमविच्युति-वासना-स्मृतिरूपा धारणा त्रिधा सिद्धा।" -विदोषा. ० गा० १८८-९.. 25 पृ० ६. पं० ७. 'नवविच्युति'-"नन्वविच्युतिस्मृतिलक्षणौ ज्ञानभेदी गृहीतग्राहि- त्वान्न प्रमाणम् , वासना तु किंरूपा ?, इति वाच्यम् । संस्काररूपेति चेत् ; कोऽयं संस्कार:- स्मृतिज्ञानावरणक्षयोपशमो वा तज्ज्ञानजननशक्तिर्वा, तद्वस्तुविकल्पो वा ?, इति त्रयी गतिः । तत्राद्यपक्षद्वयमयुक्तम् , ज्ञानरूपत्वाभावात् । तृतीयपक्षोप्ययुक्त एव भिन्नधर्मकवासनाजनकल्ला- दप्यविच्युतिप्रवृत्तद्वितीयाद्यपायविषयं वस्तु भिन्नधर्मकमेव, इति कथमविच्युतेहीतग्राहिता ? { 30 स्मृतिरपि पूर्वोचरदर्शनद्वयानधिगतं वस्त्वेकत्वं गृहाना न गृहीतग्राहिणी । सायवनसद्व्येवं वा कालं वासनाया इष्टत्वात् , एतावन्तं च कालं तद्वस्तुविकलायोगात् । तदेवनविभुतिस्मृति- .. ० वृ० गा० १८९. ण्यमुच्यते, , जैनतर्कभाषायाः [पृ. ६. पं० ११- वासनारूपायास्त्रिविधाया अपि धारणाया अघटमानत्वात् त्रिधैव मतिः प्राप्नोति, न चतुर्धा ।" विशेषा पृ० ६. पं० ११. 'न; स्पष्ट-'-"अत्रोच्यते यत् तावत् गृहीतग्राहित्वादविच्युतेरप्रामा- तदयुक्तम् , गृहीतग्राहित्वलक्षणस्य हेतोरसिद्धत्वात् , अन्यकालविशिष्टं हि वस्तु 5 प्रथमप्रवृत्तापायेन गृह्यते, अपरकालविशिष्टं च द्वितीयादिवारा प्रवृत्तापायेन । किञ्च, स्पष्ट- स्पष्टतर-स्पष्टतमवासनापि स्मृतिविज्ञानावरणकर्मक्षयोपशमरूपा तद्विज्ञानजननशक्तिरूपा चेप्यते सा च यद्यपि स्वयं ज्ञानरूपा न भवति तथापि पूर्वप्रवृत्ताविच्युतिलक्षणज्ञानकार्यत्वात् उत्तरकाल- भाविस्मृतिरूपज्ञानकारणत्वाच्च उपचारतो ज्ञानरूपाऽभ्युपगम्यते । तद्वस्तुविकल्पपक्षस्तु अनभ्यु- पगमादेव निरस्तः । तस्मादविच्युति-स्मृति-वासनारूपाया धारणायाः स्थितत्वात् न मतेस्त्रैविध्यम् , 10 किन्तु चतुर्धा सेति स्थितम् ।" -विशेपा० वृ० गा० १८९. पृ० ६. पं० १६. 'एते च अवग्रहा'-"ननु एते अवग्रहादय उत्क्रमेण, व्यतिक्रमेण वा किमिति न भवन्ति, यद्वा ईहादयस्त्रयः, द्वौ, एको वा किं नाभ्युपगम्यन्ते, यावत् सर्वेप्यभ्युप- गम्यन्ते ? । इत्याशङ्कयाह-तत्र पश्चानुपूर्वीभवनमुत्क्रमः अनानुपूर्वीभवनं त्वतिक्रमः, कदाचि- दवग्रहमतिक्रम्येहा, तामप्यतिलच्याऽपायः, तमपि अतिवृत्य धारणेति-एवमनानुपूर्वीरूपोऽतिक्रमः । 15 एताभ्यामुत्क्रम-व्यतिक्रमाभ्यां तावदवग्रहादिभिर्वस्तुस्वरूपं नावगम्यते। तथा एपा मध्ये एक- स्याप्यन्यतरस्य वैकल्ये न वस्तुस्वभावावबोधः, ततः सर्वेप्यमी एटव्याः, न त्वेकः, द्वौ, त्रयो वा 1" -विशेपा० वृ० गा० २९५. "यस्मादवग्रहेणाऽगृहीतं वस्तु नेह्यते ईहाया विचाररूपत्वात् , अगृहीते च वस्तुनि निरा- स्पदत्वेन विचारायोगादिति अनेन कारणेनादाववग्रहं निर्दिश्य पश्चादीहा निर्दिष्टा । न चाऽनी- 20 हितम् अपायविषयतां याति अपायस्य निश्चयरूपत्वात् , निश्चयस्य च विचारपूर्वकत्वात् । एत- दभिप्रायवता चाऽपायस्यादौ ईहा निर्दिष्टेति । न चापायेनानिश्चितम् धारणाविषयीभवति वस्तु धारणाया अर्थावधारणरूपत्वात् , अवधारणस्य च निश्चयमन्तरेणायोगादित्यभिप्रायः । ततश्च धारणादौ अपायः । ततः किम् ? । तेनावग्रहादिक्रमो न्याय्यः नोक्रमाऽतिक्रमौ, यथोक्तन्यायेन वस्त्ववगमाभावप्रसङ्गात् -विशेषा० "ज्ञेयस्यापि शब्दादेः स स्वभावो नास्ति य एतैरवग्रहादिभिरेकादिविकलैरभिन्नैः समकालभा- विभिः उत्क्रमातिक्रमवद्भिश्चावगम्येत किन्तु शब्दादिनेयस्वभावोपि तथैव व्यवस्थितो यथा अमीभिः सर्वेः भिन्नैः असमकालैः उत्क्रमातिक्रमरहितैश्च सम्पूर्णो यथावस्थितश्चावगम्यते अतो ज्ञेयवशेनाप्येते यथोक्तरूपा एव भवन्ति ।" -विशेषा० बृ० गा० २९७ । प्र. न. २. १४-१७. पृ० ६. पं १७. 'क्वचिदभ्यस्ते' "अत्र परः प्राह-अनवरतं दृष्टपूर्व विकल्पिते, भापिते च 30 विपये पुनः कचित् कदाचिदवलोकितेऽवग्रहेहाद्वयमतिक्रम्य प्रथमतोऽप्यपाय एव लक्ष्यते निर्विवा- दमशेषैरपि जन्तुभिः, यथा 'असौ पुरुषः' इति । अन्यत्र पुनः कचित् पूर्वोपलव्ये सुनिश्चिते दृढवासने विषयेऽवग्रहहापायानतिलञ्चय स्मृतिरूपा धारणेव लक्ष्यते, यथा 'इदं तद् वस्तु यद- ।" ० वृ० गा. २९६. 25 ४९ 15 . पृ० ७. पं० ७.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः। स्माभिः पूर्वमुपलब्धम्' इति । तत् कथमुच्यते-उत्क्रमातिक्रमाभ्याम् , एकादिवैकल्ये च न वस्तु- सद्भावाधिगमः ? "-विशेपा० वृ० गा० २९८. "भ्रान्तोऽयमनुभव इति दर्शयन्नाह-यथा तरुणः समर्थपुरुषः पद्मपत्रशतस्य सूच्यादिना वेधं कुर्वाण एवं मन्यते- मया एतानि युगपद् विद्धानि । अथ च प्रतिपत्रं तानि कालभेदेनैव भिद्यन्ते । न चासौ तं कालमतिसौक्ष्म्याद् भेदेनावबुध्यते । एवमत्रापि अवग्रहादिकालस्य अतिसूक्ष्मतया 5 दुर्विभावनीयत्वेन अप्रतिभासः, न पुनरसत्त्वेन । तस्मादुत्पलपत्रशतवेधोदाहरणेन भ्रान्त एवायं प्रथमत एव अपायादिप्रतिभासः । यथा शुष्कशप्कुलीदशने युगपदेव सर्वेन्द्रियविषयाणां उपलब्धिः प्रतिभाति, तथैषोऽपि प्राथम्येनापायादिप्रतिभासः । पञ्चानामपि इन्द्रियविषयाणामुप- लब्धियुगपदेवास्य प्रतिभाति । न चेयं सत्या, इन्द्रियज्ञानानां युगपदुत्पादायोगात् । तथाहि-- मनसा सह संयुक्तमेवेन्द्रियं स्वविषयज्ञानमुत्पादयति, नान्यथा, अन्यमनस्कस्य रूपादिज्ञानानु- 10 पलम्भात् । न च सर्वेन्द्रियैः सह मनो युगपत् संयुज्यते तस्यैकोपयोगरूपत्वात् , एकत्र ज्ञातरि एककालेऽनेकैः संयुज्यमानत्वाऽयोगात् । तस्मात् मनसोऽत्यन्ताऽऽशुसंचारित्वेन कालभेदस्य दुर्लक्षत्वात् युगपत् सर्वेन्द्रियविषयोपलव्विरस्य प्रतिभाति । परमार्थतस्तु अस्यामपि काल- भेदोऽस्त्येव । ततो यथाऽसौ भ्रान्तै!पलक्ष्यते तथाऽवग्रहादिकालेऽपीति प्रकृतम् । तदेवम् अवग्रहादीनां नैकादिवैकल्यम् , नाऽप्युक्त्रमातिक्रमौ इति स्थितम् ।” -विशेषा० वृ० गा० २९९. पृ० ६. पं० १९. 'तदेवम् अर्थावग्रहादयः' -विशेषा० वृ० गा० ३००, ३० १. पृ० ६. पं० २०. 'अथवा बहुबहु'-विशेषा० वृ० गा० ३०७. पृ० ६. पं० २१. 'बहादयश्च भेदाः'-विशेषा० ० गा० ३०८-३१०. पृ० ७. पं० २. 'श्रुतम् अक्षर'-आव० नि० १९. विशेषा० वृ० गा० ४५४. पृ० ७. पं० ३. 'तत्राक्षरं त्रिविधम्'-विशेषा• वृ० गा० ४६४-४६६. पृ० ७. पं० ४. 'एते चोपचाराच्छ्रुते'-"सञ्जाक्षरम् , व्यञ्जनाक्षरं चैते द्वे अपि भाव- श्रुतकारणत्वात् द्रव्यश्रुतम् ।" -विशेषा० वृ० गा० ४६७. पृ० ७. पं० ५. 'एतच्च परोपदेशं विनापि'-"यदपि परोपदेशजत्वमक्षरस्य उच्यते तदपि सञ्ज्ञा-व्यञ्जनाक्षरयोरेवाऽवसेयम् । लध्यक्षरं तु क्षयोपशमेन्द्रियादिनिमित्तमसन्जिनां न विरुध्यते ।" -विशेषा० वृ० गा० ४७५. "यथा वा संज्ञिनामपि परोपदेशाभावेन केपाश्चिदतीवमुग्धप्रकृतीनां पुलीन्दवालगोपाल- गवादीनामसत्यपि नरादिवर्णविशेषविषये विज्ञाने लब्ध्यक्षरं किमपीध्यते, नरादिवर्णोच्चारको तच्छ्रवणात् अभिमुखनिरीक्षणादिदर्शनाच्च । गौरपि हि शवलाबहुलादिशब्देन आकारिता सती स्वनाम जानीते प्रवृत्तिनिवृत्त्यादि च कुर्वती दृश्यते । नचैपां गवादीनां तथाविधः परोपदेवाः समस्ति ।" -विशेषा० ब० गा० ४७६. पृ० ७. पं० ७. 'अनक्षरश्रुत-भावः नि० २०. "इह उच्छुसिताद्यनक्षरश्रुतं द्रव्यश्रुतमात्रनेवावगन्तव्यं शब्दनात्रत्वात् । दादश भावशुनस्य कारणमेव । यच्च कारणं तद् द्रव्यमेव भवतीति भावः । भवति च तथावियोनिननिःस्वति- 20 25 80 ७ - 5 जैनतर्कभाषायाः [पृ० ७. पं०.१०- तादिश्रवणे 'सशोकोऽयम्' इत्यादिज्ञानम् । एवं विशिष्टाभिसन्धिपूर्वकनिष्ठ्यूतकासितक्षुतादि- श्रवणेऽपि आत्मज्ञानादि ज्ञानं वाच्यमिति । अथवा श्रुतज्ञानोपयुक्तस्य आत्मनः सर्वात्मनैवोपयोगात् सर्वोऽपि उच्छसितादिको व्यापारः श्रुतमेवेह प्रतिपत्तव्यम् इति उच्छसितादयः श्रुतं भवन्त्येवेति ।" -विशेषा० बृ. गा० ५०२. पृ० ७. पं० १०. 'सचिश्रुतम्' -विशेषा० बृ० गा० ५०४. "इदमुक्तं भवति-यतः स्मरणचिन्तादिदीर्घकालिकज्ञानसहितः समनस्कपञ्चेन्द्रियः संज्ञी- त्यागमे व्यवहियते, असंज्ञी तु प्रसह्यप्रतिषेधमाश्रित्य यद्यप्येकेन्द्रियादिरपि लभ्यते तथापि समनस्कसंज्ञी तावत् पञ्चेन्द्रिय एव भवति । ततः पर्युदासाश्रयणात् असंश्यपि अमनस्कसंमूर्च्छन- पञ्चेन्द्रिय एव आगमे प्रायो व्यवयिते । तदेवंभूतः संज्ञासंज्ञिव्यवहारो दीर्घकालिकोपदेशेनैव 10 उपपद्यते ।" -विशेपा० बृ० गा० ५१६. पृ० ७. पं० ११. 'सम्यक् -"इह अङ्गप्रविष्टम् आचारादि श्रुतम् , अनङ्गप्रविष्टं तु आवश्यकादि श्रुतम् । एतद् द्वितयमपि स्वामिचिन्तानिरपेक्षं स्वभावेन सम्यक् श्रुतम् । लौकिकं तु भारतादि प्रकृत्या मिथ्याश्रुतम् । स्वामित्वचिन्तायां पुनः लौकिके भारतादौ लोकोत्तरे च आचारादौ भजनाऽवसेया । सम्यग्दृष्टिपरिगृहीतं भारताद्यपि सम्यक् श्रुतं सावधभाषित्व-भवहेतुत्वादियथा- 15 वस्थिततत्त्वस्वरूपवोधतो विषयविभागेन योजनात् । मिथ्यादृष्टिपरिगृहीतं तु आचाराद्यपि अय- थावस्थितबोधतो वैपरीत्येन योजनादिति भावार्थ इति ।" विशेपा० वृ० गा० ५२७. पृ० ७. पं० १४. 'सादि द्रव्यतः'--विशेषा• वृ० गा० ५३८, ५४८. पृ० ७. पं० १४. 'क्षेत्रतश्च'-"क्षेत्रे चिन्त्यमाने भरतैरावतक्षेत्राण्याश्रित्य सम्यक् श्रुतं सादि सनिधनं च भवति । एतेषु हि क्षेत्रेषु प्रथमतीर्थकरकाले तद्भवतीति सादित्वं, चरमतीर्थ- 20 कृतीर्थान्ते तु अवश्यं व्यवच्छिद्यते इति सपर्यवसितत्वमिति । काले तु अधिक्रियमाणे द्वे समे उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यौ समाश्रित्य तत्रैव तेप्वेव भरतैरावतेप्वेतत् सादि सपर्यवसितं भवति; द्वयोरपि समयोः तृतीयारके प्रथमं भावात् सादित्वम् । उत्सपिण्यां चतुर्थस्यादौ, अवसर्पिण्यां तु पञ्चम- स्यान्ते अवश्यं व्यवच्छेदात् सपर्यवसितत्वम् । भावे पुनः विचार्यमाणे प्रज्ञापकं गुरुम् , श्रुतप्रज्ञाप- नीयांश्च अर्थानासाद्य इदं सादि सपर्यवसितं स्यादिति ।" -विशेषा० बृ० गा० ५४६. पृ० ७. पं० १५. 'अनादि द्रव्यतः'-"द्रव्ये-द्रव्यविपये नानापुरुषान् नारकतिर्यङ्मनु- प्यदेवगतान् नानासम्यग्दृष्टिजीवानाश्रित्य श्रुतज्ञानं सम्यक्श्रुतं सततं वर्त्तते । अभूत् भवति भविष्यति च । न तु कदाचिद् व्यवच्छिद्यते । ततस्तानाश्रित्य इदम् अनादि अपर्यवसितं च स्यादिति भावः । क्षेत्रे पुनः पञ्चमहाविदेहलक्षणान् विदेहानङ्गीकृत्य । काले तु यस्तेप्वेव विदेहेषु कालः अनवसपिण्युत्सर्पि- णीरूपः तमाश्रित्य । भावे तु क्षायोपशमिके श्रुतज्ञानं सततं वर्तते अतोऽनादि अपर्यवसितम् । 30 सामान्येन हि महाविदेहेषु उत्सर्पिण्यवसर्पिण्यभावरूपनिजकालविशिष्टेषु द्वादशाङ्गश्रुतं कदापि न व्यवच्छिद्यते तीर्थङ्करगणधरादीनां तेषु सर्वदेव भावात् ।-विशेषा० वृ० गा० ५४८. पृ० ७. पं० १७. 'गमिकम्'-गमा भन्नका गणितादिविशेषाश्च तद्वहुलं तत्सङ्घलं गमिकम् । 25 ० वृ० गा०५४९. ० वृ० गा० ८१४. पृ० ९. पं० १.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः। ५१ अथवा गमाः सदृशपाठाः ते च कारणवशेन यत्र बहवो भवन्ति तद् गमिकम्, तचैवंविधं प्रायः दृष्टिवादे । यत्र प्रायो गाथाश्लोकवेष्टकाद्यसदृशपाठात्मकं तदगमिकम् , तचैवंविधं प्रायः कालिकश्रुतम् ।" विशेषा० पृ० ७. पं० १८. 'अङ्गप्रविष्टम्'-"गणधरकृतं पदत्रयलक्षणतीर्थकरादेशनिप्पन्नम् , ध्रुवं च यच्छ्रुतं तदङ्गप्रविष्टमुच्यते, तच्च द्वादशाङ्गीरूपमेव । यत्पुनः स्थविरकृतं मुत्कलार्थाभिधानं चलं च 5 तद् आवश्यकप्रकीर्णादिश्रुतम् अङ्गबाह्यमिति ।" -विशेषा० बृ० गा० ५५०. पृ० ८. पं० ७. 'मनोमात्र' -विशेषा० वृ० गा० ८१०. पृ० ८. पं० ८. 'वाह्यानर्थान्'-"तेन द्रव्यमनसा प्रकाशितान् बाह्यांश्चिन्तनीयघटादी- ननुमानेन जानाति, यत एव तत्परिणतानि एतानि मनोद्रव्याणि तस्मादेवंविधेनेह चिन्तनीय- वस्तुना भाव्यम् इत्येवं चिन्तनीयवस्तूनि जानाति न साक्षादित्यर्थः । चिन्तको हि मूर्तममूर्त च 10 वस्तु चिन्तयेत् । न च छद्मस्थोऽमूर्त साक्षात् पश्यति । ततो ज्ञायते अनुमानादेव चिन्तनीयं वस्त्ववगच्छति ।" -विशेषा पृ० ८. पं० १५. 'निखिलद्रव्य' -विशेषा० वृ० गा० ८२३. पृ० ८. पं० २२. 'कवलभोजिनः कैवल्यम्'- "जरवाहिदुक्खरहियं आहारणिहारवजियं विमलं । 15 सिंहा(घा)णखेलसेओ णत्थि दुगंछा य दोसो य ॥" बोधप्रामृत-३७. "कवलाभ्यवहारजीविनः केवलिनः इत्येवमादिवचनं केवलिनामवर्णवादः ।" सर्वार्धसि० ६.१३. राजवा०. ६. १३. पृ० ९. पं० १. न्याय-वैशेपिक-साङ्ख्य-योग-मीमांसा-बौद्धादिदर्शनानां स्मृतेरप्रमात्वं जैनदर्शनस्य पुनस्तस्याः प्रमात्वमभिमतम् । अत एव ग्रन्थकारेण अत्र स्मृत्यप्रमात्वसम- 20 र्थनपरां विविधां युक्तिं निरसितुकामेन पूर्व चिन्तामणिकारोपन्यस्ता स्मृत्ययथार्थत्व- समर्थिका युक्तिः समालोचयितुमुपक्रान्ता 'अतीततत्तांशे' इत्यादिना । चिन्तामणिकारो हि-"यहा स घटः इति स्मृतौ तत्ताविशिष्टस्य वर्तमानता भासते ।....तत्र विशेप्यस्य विशेषणम्य वा वर्तमानत्वाभावात् स्मृतिरयथार्थव" [ प्रत्यक्षचि० पृ० ८४५ ] इत्यादिना अन्धेन 'स घटोऽस्ति' इत्यादिस्मृतौ तद्देशकालवर्तित्वरूपतत्ताविशिष्टे विशेप्यभूते घटे तद्देशकालवतित्वल्प तना- 25 विशेषणे वा वर्तमानकालीनास्तित्वावगाहितया तत्र च तथाभूते विशिष्टे विशेषणे वा वर्तमानका- लीनास्तित्वस्य बाधात् स्मृतेरयथार्थत्वं दर्शितवान् । ग्रन्थकारस्तु चिन्तामणिकाराशीकृतं विशेषणे विशेप्यकालभाननियम सार्वत्रिकत्वेन अन- भ्युपगम्य तन्नियमवलेन चिन्तामणिकारसमर्थितं स्नृत्ययथार्थत्वमपाकरोति सर्वत्र विशेषण विशे- प्यकालभानानियमात्' इत्यादिना । तथा च अन्धकारमते 'स घटः इत्यादी अतीवदो 30 वर्तमानकालवर्तित्वस्य भानाभावात् एकस्मिन्नेव घटात्मके धर्मिणि अतीतत्तयाः वर्तमानकाल- ५२ जैनतर्कभाषायाः [पृ० ९. पं०२- वर्तित्वस्य च स्वातन्त्र्येणैव भानात् न स्मृतेरयथार्थत्वम् इति भावः । अत्रेदमाकूतम्- चैत्रो धनवान् वर्तते' इत्यादिस्थलीयशाब्दवोधे चैत्राधिकरणकालवर्तित्वस्य धनांशे, 'भुञ्जाना- श्शेरते' इत्यादिस्थलीयशाब्दवोधे तु भोजनाधिकरणकालवर्तित्वस्य शयनांशे भासमानतया कचित् विधेयांशे उद्देश्यसमानकालीनत्वस्य कचिच्च उद्देश्यतावच्छेदकसमानकालीनत्वस्य 5 भानमिति सार्वत्रिको नियमः चिन्तामणिकारस्याभिप्रेतः । परन्तु 'ब्राह्मणः श्रमणः' इत्यादि- स्थलीयशाव्दवोधे ब्राह्मणत्वांशे श्रमणाधिकरणवर्तमानकालवर्तित्वस्य श्रमणत्वाधिकरणतत्काल- वर्तित्वस्य वा भानाभावात् नोक्तनियमस्य सार्वत्रिकत्वं किन्तु प्रामाणिकप्रतीतिबलात् यत्र यत्र विधेयांशे उद्देश्यकालीनत्वं उद्देश्यतावच्छेदककालीनत्वं वा भासते तत्र तत्रैव उक्तनियमस्य प्रसरो न तु सर्वत्र इति ग्रन्थकाराभिप्रायः । 10 पृ० ९. पं० २. अन्यदीयप्रमात्वनिरपेक्षत्वे सत्येव प्रमात्वस्य प्रमाव्यवहारप्रयोजकतया स्मृतेर्यथार्थत्वेऽपि अनुभवप्रमात्वाधीनप्रमात्वशालितया न प्रमात्वमिति उदयनाचार्यादिभिस्स- मर्थितं (न्यायकु० ४.१) स्मृत्यप्रमात्वं आशङ्कते 'अनुभवप्रमात्वपारतन्त्र्यात्' इत्यादिना । पृ० ९. पं० ३. प्रतिवन्द्या अनुमितेरप्रमात्वापादनेन निराकरोति 'अनुमितेरपि' इत्यादिना । पृ० ९. पं० ७. अनुमित्याः स्मृतेःलक्षण्यमुपपादयितुमाह-'नयत्येन' इति । तथा च 15 अनुमितिकारणीभूते व्याप्तिज्ञाने हेतुज्ञाने वा यः पक्षतावच्छेदकरूपो वा तव्यापकसाध्यप्रति- योगिकसंसर्गरूपो वा अर्थः अवश्यंतया न भासते सोऽपि अनुमितेविषय इति तस्याः स्ववि- पयपरिच्छेदे स्वातन्त्र्यमिति पूर्वपक्षार्थः । पृ० ९. पं० ८. तुल्ययुक्त्या समाधत्ते-'तर्हि' इत्यादिना । तथा च पूर्व अनुभवेन विषयीकृतस्यापि अर्थस्य तत्तया अनवगाहनात् स्मृत्या च अनुभूतस्याऽपि तस्यैव अर्थस्य तत्तया 20 अवगाहनात् तस्या अपि अनुमितिवत् विषयपरिच्छेदे स्वातन्त्र्यमवाधितमेव इति भावः । पृ० ९. पं० १८. प्राभाकरा हि सर्वस्याऽपि ज्ञानस्य यथार्थत्वं मन्यमानाः 'शुक्तौ इदं रजत- म्' इत्यादिप्रसिद्धभ्रमस्थलेऽपि स्मृतिप्रत्यक्षरूपे द्वे ज्ञाने तयोश्च विवेकाख्यातिपरपर्यायं भेदाग्रह कल्पयित्वा सर्वज्ञानयथार्थत्वगोचरं स्वकीयं सिद्धान्तं समर्थयमानाः तुल्ययुक्त्या प्रत्यभिज्ञास्थ- लेऽपि अगृहीतभेदं स्मृतिप्रत्यक्षरूपं ज्ञानद्वयमेव कल्पयन्ति इति तेषामपि कल्पना अत्र निरास्य- 25 त्वेन 'अत एव' इत्यादिना निर्दिष्टा । पृ० ९. पं० १९. यदि च सर्वज्ञानयथार्थत्वसिद्धान्तानुरोधेन भ्रमस्थले प्रत्यभिज्ञास्थले च ज्ञानद्वयमेव अभ्युपगम्यते न किञ्चिदेकं ज्ञानम् , तदा विशिष्टज्ञानस्यापि अनङ्गीकार एव श्रेयान् , सर्वस्यापि हि विशिष्टज्ञानस्य विशेप्यज्ञान-विशेषणज्ञानोभयपूर्वकत्वनियमेन अवश्यक्लप्ततदुभय- ज्ञानेनैव अगृहीतभेदमहिन्ना विशिष्टबुद्ध्युपपादने तदुभयज्ञानव्यतिरिक्तस्य तदुत्तरकालवर्तिनो 30 विशिष्टज्ञानस्य कल्पने गौरवात् इत्यभिप्रायेण प्रामाकरमतं दूपयति-'इत्थं सति' इत्यादिना । पृ० ९. पं० २०. प्रत्यभिज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वमेव न तु तद्यतिरिक्तज्ञानत्वमिति नैयायिक- मतमाशङ्कते 'तथापि अक्षान्वय' इत्यादिना । - पृ० १०. पं० २५. ] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । ५३ पृ० ९. पं० २१. प्रत्यभिज्ञानस्य इन्द्रियसम्बन्धपश्चाद्भावित्वेऽपि न साक्षात् तत्सम्बन्धा- न्वयव्यतिरेकानुविधानं किन्तु साक्षात् प्रत्यक्षस्मरणान्वयव्यतिरेकानुविधानमेव इति प्रत्यभिज्ञानो- त्पत्तौ प्रत्यक्षस्मरणाभ्यां इन्द्रियसंसर्गस्य व्यवहितत्वात् साक्षात् तज्जन्यत्वाभावेन प्रत्यभिज्ञानस्य न प्रत्यक्षत्वं कल्पनाहमित्यभिप्रायेण दूपयति 'तन्न' इत्यादिना । पृ० ९. पं० २६. 'अनुमानस्यापि'-अयं भावः यदि स्मृतिमपेक्ष्य चक्षुरादिवहिरि- 5 न्द्रियं स एवायं घटः' इत्यादिरूपं प्रत्यक्षजातीयमेव प्रत्यभिज्ञानं जनयेत् तदा तुल्ययुक्त्या व्याप्तिस्मृत्यादिसापेक्षमेव अन्तरिन्द्रियं पक्षे साध्यवत्ताज्ञानं प्रत्यक्षजातीयमेव जनयेत् , तथा च प्रत्यभिज्ञानवत् अनुमितेरपि प्रत्यक्षजातीयताप्रसञ्जनेन सिद्धान्तसम्मतस्य अनुमानप्रमाणपार्थ- क्यस्य विच्छेदापत्तिः । पृ० ९. पं० २७. 'स एवायं घटः' इत्यादौ विशेष्यीभूतघटांशे चक्षुरादीन्द्रियसन्नि- 10 कर्पसत्त्वात् तत्तारूपविशेषणविषयकस्मृतिरूपज्ञानबलेन प्रत्यभिज्ञानं विशिष्टविषयकमेव प्रत्यक्ष- जातीयं भवितुमर्हतीति नैयायिकविशेषमतमाशय निराकरोति 'एतेन' इत्यादिना । पृ० ९. पं० २९. 'एतत्सदृश'-'स एवायं घटः' इत्यादौ विशेष्यांशे इन्द्रिय सन्नि- कर्षसत्त्वेऽपि यत्र न पुरोवत्तिनो विशेष्यत्वं यथा 'एतत् सदृशः' इत्यादिस्थले किन्तु तस्य विशेषणत्वं तत्र विशेष्येन्द्रियसन्निकर्षाभावेन विशेषणज्ञानसहकृतविशेष्येन्द्रियसन्निकर्पजन्यत्व- 15 स्यापि दुष्कल्पत्वात् न विशिष्टप्रत्यक्षजातीयत्वं समुचितमिति भावः । पृ० १०. पं० १. ननु क्लप्तप्रत्यक्षप्रमाणान्तर्गतत्वेन प्रत्यभिज्ञायाः प्रामाण्यमभ्युपगच्छ- न्तोऽपि मीमांसक-नैयायिकादयः स्थैर्यरूपमेकत्वमेव तस्याः विषयत्वेन मन्यन्ते न पुनर्जना इव सादृश्य-वैसदृश्य-दूरत्व-समीपत्व-हस्वत्व-दीर्घत्वादिकमपि । ते हि सादृश्यादिप्रमेयप्रतिप- त्यर्थमुपमानादिप्रमाणान्तरमेव प्रत्यभिज्ञाविलक्षणं कल्पयन्ति इति एकत्ववत् सादृश्यवैसदृश्यादेरपि 20 प्रत्यभिज्ञाविषयत्वसमर्थनेन तेषां मतमपासितुं अन्धकारः पूर्व भादृपक्षं उपन्यस्यति 'ननु इत्यादिना । पृ० १०. पं० ११. नैयायिकास्तु मीमांसकवत् नोपमानस्य प्रमेयं सादृश्यादिकं मन्यन्त किन्तु सञ्ज्ञासज्ञिसम्बन्धरूपमेव प्रमेयं तद्विषयत्वेन कल्पयन्ति इति सज्ञासज्ज्ञिसंबन्धम्यापि प्रत्यभिज्ञाविषयत्वसमर्थनेन नैयायिकाभ्युपगतं उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वं निरसितुं तन्मतमुप- न्यस्यति 'एतेन' इत्यादिना । पृ० १०. पं० २०. 'आसाम्'-सूक्ष्मत्व-स्थूलत्व-दूरत्व-समीपत्वादिगोचराणां साल- नात्मिकानां सर्वासां प्रतीतीनामित्यर्थः । पृ० १०. पं० २५. 'स्वरूपप्रयुक्ता'-स्वाभाविकाऽव्यभिचाररूपा च्याप्तिरित्यर्थः ननद- न्यावृत्तित्वरूपोऽव्यभिचारो द्विविधः अनौपाधिकः औपाधिकश्च । धो पहिान्यावृत्तिवन्य उपाध्यकृतत्वेन अनौपाधिकत्वात् स्वाभाविकत्वन् । यही तु धूमदान्यावृत्तिवन्य अन्धन- 50 संयोगरूपोपाधिकृतत्वेन औपाधिकत्वात् न स्वाभाविकत्वन् इति योध्यन् । दानाविकाव्यभिचार- लक्षणैव व्याप्तिरनुमित्यौपयिकीत्यभिप्रायेण उक्तन् ‘स्वरूपप्रयुक्ताव्यभिचारलक्षणायाम् इत्यादि । 25 जैनतर्कभापायाः 10 ५, [पृ० १०. पं० २९- पृ० १०. पं० २९. ननु मा भूत् अव्यभिचारलक्षणा व्याप्तिरयोग्यत्वात् प्रत्यक्षस्य विषयः किन्तु सामानाधिकरण्यरूपायाः व्याप्तेस्तु योग्यत्वात् प्रत्यक्षविषयत्वं सुशकमेव । सामानाधि- करण्यं व्यक्तिविश्रान्ततया तत्तद्वयक्तियोग्यत्वे प्रत्यक्षयोग्यमेव इति तत्तद्वयक्तिग्रहे तत्सामानाधि- करण्यस्यापि सुग्रहत्वम् । सकलसाध्यसाधनोपसंहारेण सामानाधिकरण्यज्ञानस्य लौकिकसन्नि- 5 कर्पजन्यत्वासम्भवेऽपि सामान्यलक्षणाऽलौकिकसन्निकर्पद्वारा सुसम्भवत्वात् तादृशव्याप्तिज्ञानार्थ न प्रमाणान्तरकल्पनमुचितमित्याशयेन नैयायिकः शङ्कते 'अर्थ' इत्यादिना । पृ० ११. पं० २. 'प्रमाणाभावात्'-न्यायनयेऽपि सामान्यलक्षणप्रत्यासत्तिस्वीकारे नैकमत्यम् । तस्याः चिन्तामणिकृता सामान्यलक्षणाग्रन्थे समर्थितायाः दीधितिकृता तत्रैव निष्प्रयोजनत्वोपपादनेन निरस्तत्वात् । पृ० ११, पं० २. 'ऊहं विना-ज्ञायमानसामान्यं सामान्यज्ञानं वा सामान्यलक्षणा' प्रत्यासत्तिः । तथा च सामान्यमपि सकलव्यक्त्युपस्थापकं तदैव स्यात् यदा व्यक्तिसाकल्यं विना अनुपपद्यमानतया तज् ज्ञायेत । तथा च सकलव्यक्त्युपस्थितये सामान्ये व्यक्तिसाकल्या- न्यथानुपपद्यमानताज्ञानमावश्यकम् । सामान्यनिष्ठा तादृश्यनुपपद्यमानता च व्यक्तिसाकल्य- व्याप्तिरूपा । सा च 'यदि सामान्य व्यक्तिसाकल्यव्यभिचारि स्यात् तदा सामान्यमेव न 15 स्यात्' इत्याचूहं विना दुर्ज्ञानेति सकलव्यक्त्युपस्थापनोपयोगिसामान्यज्ञानार्थम् ऊहस्य सामान्य- लक्षणापक्षेऽपि अवश्यस्वीकार्यत्वात् तेनैव सर्वत्र व्याप्तिज्ञानकल्पनं समुचितमिति भावः । पृ० ११. पं० ८. 'नानवस्था'-निरस्तशङ्कव्याप्तिज्ञानजननाय अन्तरोदीयमानां व्यभि- चारशङ्कां निरसितुं अनिष्टापादनं आवश्यकम् । तच्च न व्याप्तिज्ञानं विना सम्भवति इति व्याप्तिज्ञानेऽपि व्याप्तिज्ञानान्तरापेक्षा, तत्रापि तदन्तरापेक्षा एवं क्रमेण एकस्मिन्नेव व्याप्तिज्ञाने 20 कर्तव्येऽनन्तानन्तव्याप्तिज्ञानानामपेक्षणीयतया अनवस्था समापतति इति तन्निरासः योग्यतावलात् ग्रन्थकृता दर्शितः । पृ० ११. पं० ९. निर्विकल्पस्यैव मुख्यं प्रामाण्यं स्वीकुर्वतां बौद्धानां मते विचारा- त्मकस्य तर्कस्य विकल्वरूपत्वेन प्रामाण्यं न सम्भवति इति तेषां मतमाशङ्कते 'प्रत्यक्ष- पृष्ठभाविविकल्प' इत्यादिना । 25 पृ० ११. पं० ९. 'तन्न' इत्यादिना विकल्प्य दूपयति । तथाहि-ननु किं तकस्य विकल्प- रूपतया अप्रामाण्यं प्रत्यक्षपृष्ठभावित्वेन तद्गृहीतमात्रग्राहित्वकृतम् , आहोस्वित् तत्पृष्ठभावि- त्वेऽपि तदगृहीतसामान्यग्राहित्वकृतम् ? । तत्र नाद्यः, प्रत्यक्षगृहीतस्वलक्षणमात्रग्राहित्वेन विकल्पस्य अप्रामाण्येऽपि तस्य सकलोपसंहारेण व्याप्त्यनवगाहितया अस्मदभ्युपगततर्कप्रामा- ण्यक्षतेरभावात् । न द्वितीयः, प्रत्यक्षागृहीतसामान्यविषयकत्वेऽपि प्रत्यक्षपृष्ठभाविनो विकल्पस्य 80 अनुमानवत् प्रामाण्ये बाधाभावात् । बौद्धा अपि अबस्तुभूतसामान्यभासकत्वेन अनुमितेः प्रत्यक्षवत् साक्षात्स्वलक्षणात्मकग्राह्यजन्यवाभावेऽपि तस्याः अतद्वयावृत्तिरूपसामान्यात्मना ज्ञायमानविशेषप्रतिबद्धस्वलक्षणात्मकलिङ्गजन्यतया 'प्रतिबद्धस्वभावस्य तद्धेतुल्ने समं द्वयम्' C ५५ १ पृ० ११. पं० २५. ] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । इत्यादिना प्रामाण्यं समर्थयन्ते । समर्थयन्ते च ते पुनः दृश्यप्राप्ययोरैक्याध्यवसायेन अविसंवाद- बलात् प्रत्यक्षस्य इव अनुमितेरपि प्राप्यानुमेययोरैक्याध्यवसायरूपाविसंवादवलादेव प्रामाण्यम् । एतदेव च तस्याः व्यवहारतः प्रामाण्यं गीयते । तथा च यथा वौद्धमते अनुमानस्य प्रामाण्यं व्यवहारतो न विरुद्धं तथा अस्मन्मते तर्कप्रामाण्यमपि न विरोधास्पदमिति भावः । पृ० ११. पं० ११. 'अवस्तु'-अनुमानस्य वस्तुभूतस्वलक्षणविषयानवगाहित्वेऽपि इत्यर्थः। 5 पृ० ११. पं० १२. 'परम्परया'-अनुमीयमानविषयव्याप्तस्वलक्षणात्मकलिङ्गजन्यत्वात् इत्यर्थः । पृ० ११. पं० २०. तर्कस्य न स्वतः प्रामाण्यं किन्तु प्रमाणसहकारितया प्रमाणानुकूल- तया वा प्रमाणानुग्राहकत्वमेव इति नैयायिकमतमुपन्यस्यति 'यत्तु' इत्यादिना । पृ० ११. पं० २०. 'आहार्यप्रसञ्जनम्'–बाधनिश्चयकालीनेच्छाजन्यं प्रत्यक्षं ज्ञानमा- 10 हार्यज्ञानम् । पर्वते धूमं स्वीकृत्य वहिमाशङ्कमानं प्रति यत् 'यदि वहिन स्यात् तर्हि अत्र धूमोऽपि न स्यात्' इत्यनिष्टापादनम् , तत् व्याप्यस्य आहार्यारोपेण व्यापकस्य आहार्यप्रसञ्जनम् , तत्र वय- भावस्य व्याप्यत्वात् धूमाभावस्य च व्यापकत्वात् । धूमाभावाभावरूपधूमवत्तया निणीते पर्वते वयभावरूपव्याप्यारोपेण धूमाभावरूपव्यापकापादनस्य आहार्यज्ञानरूपत्वं सुस्पष्टमेव । पृ० ११. पं० २०. 'विशेपदर्शनवद्'-यथा स्थाणुर्वा पुरुषो वा इत्यादिसंशयदशायां 15 एकतरकोटिव्याप्यवत्तारूपविशेषदर्शनम् एकतरकोटिविषयके निर्णये जननीये इन्द्रियं सहकरोति, यथा वा तत् अपरकोटिनिवारकमानं तथा तर्कोऽपि प्रमाणं सहकरिप्यति विरोधिशक्षामात्रं वा निवर्त्य प्रमाणानुकूलो भविष्यति इत्यर्थः । पृ० ११. पं० २१. 'विरोधिशङ्का'-तर्कस्य प्रमाणानुग्राहकत्वं द्वेधा सम्भवति विरोधिशङ्काकालीनप्रमाणकार्यकारित्वरूपसहकारित्वेन प्रमाणकार्यप्रतिबन्धकविरोधिशकापसारण- 20 मात्रेण वा । तत्र प्रथमपक्षमपेक्ष्य द्वितीयपक्षानुसरणे लाघवात् उक्तम् 'विरोधिशक्षानिवर्तकत्वेन' इत्यादि । सहकारित्वं हि एकधर्मावच्छिन्नकार्यतानिरूपितकारणतावत्त्वम् यथा-दण्डस्य कुम्भ- कारसहकारित्वम् , तदसमवधानप्रयुक्तफलोपधायकत्वाभाववत् तत्कत्वं वा यथा-उत्तेजकरण्यादेः वहिसहकारित्वम् यथा वा अदृष्टस्य कुम्भकारादिसहकारित्वम् । द्विविधस्यापि प्रमाणसहकारिस्व- स्य तर्के कल्पनमपेक्ष्य विरोधिशानिवर्तकत्वमात्रकल्पने लाघवात् । पृ० ११. पं० २३. 'क्वचिदेतत्-'यत्र व्याप्तिग्रहानन्तरं 'पक्षे हेतुरन्तु साध्यं मास्नु' इति व्यभिचारशङ्का समुल्लसेत् - तत्र 'यदि पर्वते वहिर्न स्यात् तदा धूमोऽपि न स्यात्' इति व्याप्यारोपाहितस्य व्यापकारोपस्य नैयायिकाभिमतस्य तर्कम्य धूमाभावानाववत्या वयभावा- भाववत्त्वरूपविपर्ययसाधनपर्यवसायित्वेन आहार्यशक्षाविघटकतया व्याप्तिनिर्णय एव उपयोगः । यत्र पुनर्याप्तिविचारो न प्रस्तुतः न वा ताशी आहार्यशहा तन्त्र विचारानहल्लेपि 30 स्वातन्त्र्येणैव शक्षामात्रविघटकतया तादृशम्य तर्कस्य उपयोगिवन् इति भावः । पृ० ११. पं० २५. नैयायिकानुरोधेन यदि दाहामात्रविघटकल्या तन्य उपयोगिन् . 25 . 10 ५६ जैनतर्कभापायाः [पृ० ११. पं० २६- जैनेनापि स्वीक्रियेत तर्हि धर्मभूषणेन न्यायदीपिकायां अज्ञाननिवर्तकतया समथितं तर्कस्य प्रामाण्यं कथं सङ्गमनीयमित्याशङ्कामपाकर्तुमाह 'इत्थं च इति । तथा च अज्ञानपदस्य तत्र मिथ्याज्ञान- परत्वेन मिथ्याज्ञाननिवर्तकत्वं तर्कस्य तत्र धर्मभूषणाभिप्रेतत्वेन बोद्धव्यम् इति न कश्चिद्विरोधः । पृ० ११. पं० २६. ननु यदि व्याप्तिविषयकसंशयात्मकमिथ्याज्ञाननिवर्तकतया तर्कस्य 5 प्रामाण्यं समर्थ्यते तर्हि प्रमाणसामान्यफलतया ज्ञानाभावरूपाऽज्ञाननिवृत्तिः जैनाभिप्रेता तर्क- प्रमाणफलत्वेन कथं निर्वहेत् इत्याशङ्कायामाह-'ज्ञानाभावनिवृत्तिः' इत्यादि । तथा च जैनमते ज्ञानमात्रस्य स्वप्रकाशतया तर्कस्यापि स्वप्रकाशत्वेन स्वव्यवसितिपर्यवसायित्वम् । स्वव्यवसितेश्च विषयव्यवसितिगर्भिततया बाह्यविषयज्ञातताव्यवहारप्रयोजकत्वेन विपयाज्ञाननिवृत्तिरूपत्वमिति वस्तुतः स्वव्यवसितैरेव ज्ञानाभावनिवृत्तिरूपतया न तर्कस्यापि अज्ञाननिवृत्तिरूपसामान्यफलानुपपत्तिः। पृ० १२. पं० ४. अनुमितिनिरूपितकारणतायां पक्षद्वयं वर्तते-हेतुग्रहण-संबन्धस्मरणयोर्द्ध- योरेव समुदितयोः कारणत्वमिति एकः पक्षः, नोक्तयोर्द्वयोः कारणत्वं किन्तु तवयजन्यस्य एकस्यैव लिङ्गपरामर्शस्य अनुमितिकारणत्वमित्यपरः पक्षः । अत्र ग्रन्थकृता प्रथमं पक्षमाश्रित्यो- क्तम् 'समुदितयोः' इति । पृ० १२. पं० २१. अन्तर्व्याप्तिरेव अनुमितिप्रयोजिका । अन्तर्व्याप्ती चावश्यमेव, पक्ष- 15 स्यान्तर्भावः । व्याप्तिज्ञानीया धर्मिविषयतैव अनुमितिधर्मिविषयतायां तन्त्रमिति हेतुलक्षणे पक्षधर्मत्वाऽप्रवेशेऽपि अन्तर्व्याप्तिज्ञानवलादेव तज्जन्यानुमितौ पक्षस्यैव धर्मितया भानं न पुनरन्य- थानुपपत्त्यवच्छेदकतया हेतुग्रहणाधिकरणतया वा तस्य भानमित्यभिप्रायेण प्रमाणनयतत्त्वालो- कीयं अन्तर्व्याप्तिबहिर्व्याप्तिलक्षणपरं सूत्रं अवलम्व्य कस्यचिदेकदेशिनो मतमुपन्यस्यति- 'यत्तु' इत्यादिना । पृ० १२. पं० २३. न पक्षान्तर्भावानन्तीवकृतोऽन्तर्व्याप्तिवहिर्याप्त्योर्मेंदः किन्तु स्वरू- पत एव तयोर्भेदः, अन्तर्याप्तेः साध्यशून्यावृत्तित्वरूपत्वात् , पहियाप्तेश्च साध्याधिकरणवृत्तित्व- रूपत्वात् । तथा च अनुमितिप्रयोजकान्ताप्ती पक्षस्याघटकतया न तद्भानवलाद् अनुमिति- विषयता तत्र पक्षे निर्वाहयितुं शक्येति अनुमितौ तद्धाननिर्वाहाय अस्मदुक्तैव क्वचिदन्यथा- नुपपत्त्यवच्छेदकतया इत्यादिरीतिरनुसरणीया । यदि च अन्तर्व्याप्तौ नियमतः पक्षभानं स्यात् 25 तदा अन्तर्व्याप्तिग्रह एव पक्षसाध्यसंसर्गस्य भासितत्वात् किं पृथगनुमित्या ?, इत्याशयेन पूर्वोक्तं एकदेशिमतं निराकरोति 'तन्न' इत्यादिना । पृ० १४ पं० २७. 'ननु विकल्पसिद्धो धर्मी नास्ति' इत्यादिवचनस्य उपपत्त्यसंभवप्रति- पादनेन विकल्पसिद्धधर्म्यनङ्गीकारवतो नैयायिकान्प्रति यत् मौनापत्तिरूपं दूषणं दत्तं तत् जैनमतेऽपि समानम् ; तत्रापि हि 'असतो नस्थि निसेहो' इति भाप्यानुरोधेन असत्ख्यात्यनभ्युपगमात् अभावांशे 30 असतः प्रतियोगिनो विशेषणतया भानाऽसंभवात् 'शशशृगं नास्ति' इत्यादितः विशिष्टविषयक- शाब्दबोधानुपपत्त्या, तादृशवचनव्यवहारस्य असम्भवात् इत्याशङ्कां निराकत्तु ताहशस्थले शान्द- 20 - पृ० १५. पं० ७.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । बोधोपपादनाय अनुमित्युपपादनाय च ग्रन्धकारस्स्वाभिप्रेतां प्रक्रियामादर्शयति 'इदं त्ववधेयम्' इत्यादिना । अयं भावः-विकल्पसिद्धधर्मिस्थलीये शाब्दबोधे अनुमितौ वा विकल्मसिद्धस्य धर्मिणो भाने त्रय एव पक्षाः सम्भवन्ति, तथाहि-तस्य अखण्डस्यैव वा भानम् , विशिष्टरूपतया वा, खण्डशः प्रसिद्धतया वा । तत्र स्वसिद्धान्तविरोधितया प्रथमपक्षो नाङ्गीकर्तुं शक्यते । जैनसिद्धान्ते 5 हि सर्वत्रापि ज्ञाने सत एव भानाभ्युपगमेन असतो भानस्य सर्वथा अनभिमतत्वात् । विकल्प- सिद्धधर्मिणः प्रमाणासिद्धत्वेन अखण्डस्यासत्त्वात् अखण्ड-तद्भानाभ्युपगमे असद्भानस्यावर्जनीयत्व- मेव । द्वितीयपक्षस्तु कथञ्चिदभ्युपगमार्हः । यत्र स्थले 'शशशृङ्गं नास्ति' इत्यादौ 'शृङ्गं शशीयं न वा' इत्यादिन संशयः, न वा 'शृङ्गं शशीयं न' इति वाधनिश्चयस्तत्र अभावांशे शशीयत्वविशेषण- विशिष्टस्य शृङ्गस्य भाने वाधकाभावात् । यत्र च स्थले तादृशः विशेषणसंशयः तादृशो 10 विशेषणवाधनिश्चयो वा तत्र विशिष्टभानासम्भवेऽपि 'शृङ्गे शशीयत्वज्ञानं जायताम्' इतीच्छा- जनितं बाधनिश्चयकालीनमाहार्यज्ञानं सम्भवत्येव । तथा च 'शशशृङ्गं नास्ति' इत्यादिशाब्दबोधे 'एतत् स्थानं शशशृङ्गाभाववत्' इत्याद्यनुमितौ वा अभावांशे प्रतियोगितया भासमाने शृशांशे शशीयत्वविशेषणस्य आहार्यभानोपपत्त्या प्रतिवादिपरिकल्पितविपरीतारोपनिराकरणाय तादृशस्य शब्दस्य तादृश्या वा अनुमितेः सुसम्भवत्वमेव । इत्थं च द्वितीयपक्षस्य उपपाद्यत्वेऽपि तत्र 15 अनुमितेराहार्यात्मकत्वं एकदेशीयाभिमतमेव कल्पनीयमिति तत्पक्षपरित्यागेन सर्वथा निर्दोप- स्तृतीयपक्ष एव आश्रयितुमुचित इति मत्वा ग्रन्थकारेण 'वस्तुतः' [पृ० १५. पं० ४.] इत्या- दिना अन्ते खण्डशः प्रसिद्धपदार्थभानगोचरस्तृतीयपक्ष एव समाश्रितः । तथा च शशशृङ्गं नास्ति' इत्यादौ अभावांशे नाखण्डस्यासतः शशशृङ्गस्य भानम् , न वा शशीयत्ववैशिष्ट्यम्य आहार्यभानं किन्तु प्रसिद्ध एव शृङ्गांशे प्रसिद्धस्यैव शशीयत्वस्य अभावो भासते। तथा च 'एका- 20 न्तनित्यं अर्थक्रियासमर्थ न भवति, क्रमयोगपद्याभावात्' इत्यादिरूपायां जैनम्थापनायां एकान्त- नित्यस्य जैनमते सर्वथाऽसम्भवेऽपि तादृशस्थले अनित्यत्वासमानाधिकरणल्पनित्यत्वन्य खण्डाः प्रसिद्धतया खण्डशः प्रसिद्धतादृशपक्षविपयायाः अर्थक्रियासामर्थ्याभावसाध्यिकायाः नामयोग- पद्यनिरूपकत्वाभावहेतुकायाः 'एकान्तनित्यत्वं अर्थक्रियासामर्थ्यानियामकं क्रमयोगपनिल्यक- स्वाभावात्' इत्याकारिकायाः अनुमितेनिर्वाधसम्भवेन न तादृशी जनस्थापना विरुध्यते । पृ० १४. पं० २९. 'शब्दादे:-शब्दात् , 'आदि पदेन व्याप्तिनानादेः परिग्रहात् व्याप्ति- ज्ञानादेस्सकाशादित्यर्थः । पृ० १५. पं० १. 'विकल्पात्मिकेव'-अनुमितेः शव्दमानानुपातित्वानियमेन रवाना- नुपातिविकल्परूपत्वाभावेऽपि वस्तुशून्यविकल्पसातया विकल्लामिकेन्युम । तथा च वि. कल्पाकारवृत्तिसहशी इत्यर्थः । पृ० १५. पं० ७. 'विशेषावमर्शदशायाम्-अर्थक्रियाताम्थ्यांनावानाध्यत्यावीनतम योगपद्याभावरूपविशेषधर्मनिर्णयरूपपरामर्शददायामित्यर्थः 25 -- जैनतर्कभाषायाः [पृ० १५..पं०८- पृ० १५. पं० ८. 'नित्यत्वादौ'-कूटस्थनित्यत्वस्य जैनमतेऽप्रसिद्धत्वेऽपि अनित्यत्वसमाना- धिकरणनित्यत्वरूपस्य कथञ्चिन्नित्यत्वस्य प्रसिद्धतया तादृशे नित्यत्वे अनित्यत्वसामानाधिकरण्या- भावाऽवच्छेदेन उक्ताभावः सुखेन साधयितुं शक्य इत्यर्थः । पृ० १५. पं० १६. 'समर्थन'-"त्रिविधमेव हि लिङ्गमप्रत्यक्षस्य सिद्धेरङ्गम्-स्वभावः कार्य- 5 मनुपलम्भश्च । तस्य समर्थनं साध्येन व्याप्तिं प्रसाध्य धर्मिणि भावसाधनम् । यथा यत् सत् कृतकं वा तत् सर्वमनित्यं यथा घटादिः सन्कृतको वा शब्द इति । अत्रापि न कश्चित्क्रमनियमः इष्टार्थ- सिद्धरुभयनाविशेषात् । धर्मिणि प्राक् सत्त्वं प्रसाध्य पश्चादपि व्याप्तिः प्रसाध्यत एव यथा सन् शब्दः कृतको वा, यश्चैवं स सर्वोऽनित्यः यथा घटादिरिति ।"_वादन्याय पृ० ३-६. पृ० १५. पं० २१. यद्यपि वादिप्रतिवाद्युभयसम्प्रतिपन्नमेव साधनं वादभूमिकायामुपयुज्यते 10 इति सर्वसम्मता वादमर्यादा, तथापि कश्चित् साङ्ख्यप्रख्यः स्वसिद्धान्तं स्थापयितुं स्वानभिमतमपि किञ्चित् साधनं प्रतिवादीष्टत्वमात्रेण वादकाल एव प्रयोक्तुमिच्छन्नेव तां सर्वसम्मतवादमर्यादामति- क्रम्य स्वाभिप्रायानुकूलमेव परार्थानुमानीयं यत् लक्षणान्तरं प्रणीतवान् तदेवात्र ग्रन्थकारः स्याद्वादरत्नाकर [पृ० ५५१] दिशा निरसितु निर्दिशति 'आगमात् परेणैव' इत्यादिना । 'आगमात्'- आगमानुसारेण, 'परेणैव'-प्रतिवादिनैव, 'ज्ञातस्य'-सम्मतस्य, 'वचनम्'-साधनतया वादकाले 15 वादिना प्रयोग इत्यर्थः । तथा च वादिना प्रतिवादिनि स्वसिद्धान्तप्रत्यायनं साधनसिया सम्पा- दनीयम् । सा च साध्यसिद्धिर्यदि केवलप्रतिवादिन्यपि स्यात् तावतैव वादी कृतार्थो भवेत् इति किम् उभयसिद्धसाधनगवेषणप्रयासेन ?, इति परार्थानुमानीयलक्षणान्तरकारिणः पूर्वपक्षिणः आशयः। पृ० १५. पं० २३. प्रानिर्दिष्टं लक्षणान्तरं निराकरोति 'तदेतदपेशलम्' इत्यादिना । अत्रायं भावः-वादिप्रतिवाद्युभयसिद्धस्यैव साधनस्य परार्थानुमानोपयोगितया न वादिप्रतिवाद्येकतर- 20 सिद्धसाधनेन अनुमानप्रवृत्तिरुचिता । तथा च साधनसिद्धये समाश्रीयमाणः आगमोऽपि वादि- प्रतिवाद्युभयसम्प्रतिपन्नप्रामाण्यक एव परार्थानुमानोपजीव्यः, न तु तदन्यतरमात्रसम्मतप्रामाण्यकः । एवं च न प्रतिवादिमात्राभ्युपगतप्रामाण्यकेन आगमेन साधनमुपन्यस्य अनुमानप्रवर्तनं वादिनो न्याय्यम् । वादी हि प्रतिवाद्यागमं तेन परीक्ष्य स्वीकृतं अपरीक्ष्य वा स्वीकृतं मत्वा तमागममाश्रय- न्ननुमानावसरे साधनमुपन्यस्येत् । न प्रथमः पक्षः, वादिनापि तदागमप्रामाण्यस्य स्वीकरणीयत्वा- 25 पत्तेः । न हि परीक्षितं केनापि प्रामाणिकेन उपेक्षितुं शक्यम् । तथा च प्रतिवाद्यागमानुसारेणैव साधनवत् साध्यकोटेरपि वादिना अवश्याङ्गीकार्यत्वेन तद्विरुद्धसाधनाय अनुमानोपन्यासस्य वैयर्थ्यात् आगमबाधितत्वाच्च । न द्वितीयः, अपरीक्ष्याभ्युपगतस्य प्रामाण्यस्य प्रतिवादिनोऽपि शिथिलमूलतया सन्दिग्धतया च सन्दिग्धप्रामाण्यकतादृशप्रतिवाद्यागमानुसारेण असन्दिग्धसाधनो- पन्यासस्य वादिना कर्तुमशक्यत्वात् । पृ० १५. पं० २३. 'अन्यथा'-विप्रतिपन्नप्रामाण्यकागमाश्रयेण साधनोपन्यासे इत्यर्थः । 'तत एव'-प्रतिवादिमावसम्मतादेव, तदीयादागमात् साध्यसिद्धिप्रसङ्गात्-प्रतिवादिनि स्वकोटे; 30 . पृ० १६. पं० १.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः। स्वागमेनैव निश्चितत्वात् वादिकोटेश्च तेनैव आगमेन बाधितत्वात् संशयरूपपक्षतायाः अभावेन तत्र नानुमितिसम्भव इत्यर्थः । पृ० १५. पं० २४. ननु अनुमानोत्तरकालं तु प्रतिवादिना परीक्ष्य आगमः स्वीकरिप्यते अनुमानकाले पुनः परम्परायातेन अभिनिवेशमात्रेण तेन स्वीकृत इति तदाश्रयेण साधनमुपन्य- स्यन् वादी कथमुपालम्भास्पदं भवेत् ?, इत्याशङ्कायामाह 'परीक्षाकाले तद्वाधात्' इति । तथा 5 च अनुमानावसरे वादिविरोधं सहमानस्य प्रतिवादिनः स्वागमप्रामाण्यं न निश्चितं नाम । एवं च यथा प्रतिवाद्यागमः वादिनोऽनिश्चितप्रामाण्यकस्तथा प्रतिवादिनोप्यनिश्चितप्रामाण्यक इति न तदाश्रयेण साधनोपन्यासः कामपि इष्टसिद्धिं पुष्णातीति भावः । पृ० १५. पं० २७. 'प्रसङ्गविपर्यय'-"प्रसङ्गः खल्वत्र व्यापकविरुद्धोपलब्धिरूपः । अ- नेकव्यक्तिवर्तित्वस्य हि व्यापकमनेकत्वम् , ऐकान्तिकैकरूपस्यानेकव्यक्तिवतित्वविरोधात् । अने- 10 कत्रवृत्तेरनेकत्वं व्यापकं तद्विरुद्धं च सर्वथैक्यं सामान्ये त्वयाऽभ्युपगम्यते ततो नाऽनेकवृत्तित्वं स्यात् , विरोध्यैक्यसद्भावेन व्याप्येन व्यापकस्यानेकत्वस्य निवृत्त्या व्याप्यस्यानेकवृत्तित्वस्याऽवश्यं निवृत्तेः । न च तन्निवृत्तिरभ्युपगतेति लब्धावसरः प्रसङ्गविपर्ययाख्यो विरुद्धव्याप्तोपलब्धिरूपोऽत्र मौलो हेतुः । यथा यदनेकवृत्ति तदनेकम् अनेकवृत्ति च सामान्यमिति । एकत्वस्य हि विरुद्धमनेकत्वं तेन व्याप्तमनेकवृत्तित्वं तस्योपलब्धिरिह । मौलत्वं चास्यैतदपेक्षयैव प्रसङ्गस्योपन्यासात् । न 15 चायमुभयोरपि न सिद्धः । सामान्ये जैनयोगाभ्यां तदभ्युपगमात् । ततोऽयमेव मौलो हेतुरयमेव वस्तुनिश्चायकः ।"-स्या० र० पृ० ५५३-४. पृ० १५. पं० २७. 'अनेकवृत्तित्व'-अनेकवृत्तित्वस्य व्यापकं यदनेकत्वं तस्य या सर्व- थैक्यस्वीकारे सति निवृत्तिः तयैव व्यापकनिवृत्त्या व्याप्यीभूतानेकवृत्तित्वनिवृत्तेः प्रसङ्गः 'यदि सामान्यं सर्वथैकं स्यात् तदा अनेकवृत्ति न स्यात्' इत्यादिरूपो यः क्रियते स एव सामान्ये 20 ऽनेकत्वसाधके अनेकवृत्तित्वरूपे मौलहेतौ 'सामान्यमनेकवृत्ति भवतु मा भूदनेकम्' इत्येवंरूपायाः व्यभिचारशक्षायाः निवर्तकत्वेन तर्कापरपर्यायः परिकरो अभिधीयते एतादृशम्य प्रससाठ्यपरि- करस्य व्यभिचारशङ्काविधूननद्वारा मौलहेतुगतव्याप्तिसिद्धिपर्यवसायिनः उपन्यासस्य सर्वसम्मततया न्याय्यत्वमेव इति भावः। पृ० १६. पं० १. "नन्वेवं प्रसङ्गेऽङ्गीक्रियमाणे बुद्धिरचेतना, उत्पत्तिमत्वादित्ययमपि साह न ख्यापितः प्रसङ्गहेतुर्भविष्यति । तथा हि यदि बुद्धिरुत्पत्तिमती भवहिरभ्युपगम्यते तदानी तव्यापकमचैतन्यमपि तस्याः स्यान्न चैवमतो नोत्पत्तिमत्यपीयम्' रखा. ३० पृ. ५...] इत्याशय समाधत्ते 'बुद्धिरचेतनेत्यादौ च इत्यादिना । "प्रसङ्गविपर्ययहेतोमौलस्य चैतन्याख्यस्य साह्यानां बुद्धावपि प्रतिविद्धवान् नेतन्यम्बका ऽपि नाऽनयोः प्रसङ्ग-तद्विपर्यययोर्गमकत्वं अनेन प्रसझे नात्र प्रमाविश्यवलोनिमिदि- 30 निबन्धनस्य विरुद्धधर्माध्यासस्य विपक्षे बाधकममाणम्यानुरन्थापनात् । चतन्योपनिनत्वयाः- 25 ६० जैनतर्कभाषायाः [पृ० १६. पं० १६- विरोधाभावात् । एवं ह्यचेतनत्वेनोत्पत्तिमत्त्वं व्याप्तं भवेद्यदि चैतन्येन तस्य विरोधः स्यात् नान्यथा । न चैवमिति नैतौ प्रसङ्गतद्विपर्ययौ गमको भवतः ।” स्या० र० पृ० ५५४-५. पृ० १६. पं० १६: 'पक्षशुद्धयादिकमपि'-"तत्र वक्ष्यमाणप्रतीतसाध्यधर्मविशेषणत्वा- दिपक्षदोपपरिहारादिः पक्षशुद्धिः । अभिधास्यमानाऽसिद्धादिहेत्वाभासोद्धरणं हेतुशुद्धिः । प्रति- 5 पादयिष्यमाणसाध्यविकलत्वादिदृष्टान्तदूषणपरिहरणं दृष्टान्तशुद्धिः। उपनयनिगमनयोस्तु शुद्धी प्रमादादन्यथाकृतयोः तयोर्वक्ष्यमाणतत्स्वरूपेण व्यवस्थापके वाक्ये विज्ञेये ।”—स्या० र० पृ० ५६५. पृ० १६. पं० २१. 'तथापि कार्याधनात्म' -स्या० र० पृ० ५९४. पं० २३. पृ० ५९५. पं० ६. पृ० १८. पं०९. 'नन्वन्यतरासिद्धः'-प्रमेयकमलमार्तण्डे [ पृ० १९१] स्याद्वादरलाकरे 10 [पृ० १०१८ ] च अन्यतरासिद्धाख्यहेत्वाभासस्य नास्तित्वाशङ्कायाः-"नन्वेवमपि अस्य असिद्धत्वं गौणमेव स्यादिति चेद् एवमेतत् ; प्रमाणतो हि सिद्धेरभावात् असिद्धोऽसौ न तु स्वरूपतः" इत्यादिना यत् समाधानं कृतं तदपि अत्र पूर्वपक्षतया उपन्यस्य समाधानान्तरं दीयते ग्रन्थकृता । पृ० १८. पं० २९. 'धर्मभूषणेन' -"अप्रयोजको हेतुरकिंचित्करः । स द्विविधः सिद्ध- साधनो बाधितविषयश्च । -न्यायदी० पृ० ३५ । 15 पृ० २०. पं० १. 'शतृशानशौ'--"तौ सदिति शतृशानयोः सङ्केतितसच्छब्दवत् द्वन्द्ववृत्तिपदं तयोः सकृदभिधायकम् इत्यनेनापास्तम् , सदसत्त्वे इत्यादिपदस्य क्रमेण धर्मद्वय- प्रत्यायनसमर्थत्वात् ।” तत्त्वार्थश्लोकवा० पृ० १४०. । पृ० २१. पं० २०. 'जिनभद्र'-विशेषा० वृ० गा० ७५ विशेपा० गा० ७७, २२६२. । पृ० २३. पं० १६. तथा विशेपग्राहिण:'--"अय॑ते विशेष्यते इत्यर्पितो विशेपः 20 तद्वादी नयः अर्पितनयः समयप्रसिद्धो ज्ञेयः। तन्मतं विशेष एवास्ति न सामान्यम् । अनर्पितम- विशेषितं सामान्यमुच्यते तद्वादी नयः अनर्पितनयः । सोऽपि.समयप्रसिद्ध एव बोद्धव्यः । तन्मतं तुं सामान्यमेवास्ति न विशेषः ।" -विशेपा० बृ० गा० ३५८८. पृ० २३. पं० १८. 'तथा लोकप्रसिद्धार्था' -विशेषा० गा० ३५८९ । पृ० २३. पं० २१. 'अथवा एकनय'-"अथवा यत् किमप्येकैकस्यैव नयस्य मतं तद् 25 व्यवहारः प्रतिपद्यते नान्यत् । कुतः ?। यस्मात् सर्वथा सर्वैरपि प्रकारैर्विशिष्टं सर्वनयमतसमूहमयं वस्त्वसौ प्रतिपत्तुं न शक्नोति स्थूलदर्शित्वादिति । विनिश्चयस्तु निश्चयनयः यद् यथाभूतं पर- मार्थतो वस्तु तत् तथैव प्रतिपद्यते इति ।" विशेषा० वृ० गा० ३५९० । पृ० २३. पं० २४. 'तथा, ज्ञानमात्र'---विशेषा० ३० गा० ३५९२ । नयोपदेश का. १२९-१३८. 30 पृ० २३. पं० २५. 'तत्र सूत्रा' -विशेषा० गा० २६२१-२६३२ ।

पृ० २५. पं० १९. ] तात्पर्यसमहा वृत्तिः । ६१ पृ० २३. पं० २९. 'स्थितपक्षत्वात्'-अत्रायं भावः-स्थितपक्षः सिद्धान्तपक्ष इति गीयते । तथा च सिद्धान्तपक्षे ज्ञानादित्रयादेव मोक्ष इति नियमात् ज्ञानादित्रयपर्याप्तैव मोक्षनिरूपित- कारणता शिक्षाऽभ्यासप्रतिभात्रयपर्याप्ता काव्यकारणतेव पर्यवस्यति न तु तृणारणिमणिवत् प्रत्येक- ज्ञानादिविश्रान्ता । । नैगमादिनयानां मते पुनः मोक्षनिरूपितकारणतायाः प्रत्येकं ज्ञानादिपु, वहिकारणतायाः प्रत्येकं 5 तृणारणिमणिप्विव विश्रान्ततया न तेषां स्थितपक्षत्वं सम्यग्दृष्टित्वं वा । अयमेव हि नयवाद- सिद्धान्तवादयो दो यन्नयाः त्रीनपि ज्ञानादीन् मोक्षकारणत्वेन मन्यमाना अपि प्रत्येकस्मिन् न्वात- व्येणैव कारणत्वं कल्पयन्तस्त्रीनपि पृथक् पृथक् मोक्षकारणत्वेन स्थापयन्ति । तन्मते हि ज्ञानमात्र- सेविनाम् , दर्शनमात्रसेविनाम् , चारित्रमात्रसेविनां च तुल्यतया मोक्षाधिकारात् । सिद्धान्तवादस्तु न कुतोऽपि ज्ञानादेरेकैकस्मात् मोक्षलाभमिच्छति किंतु परस्परसहकारिभावापन्नात् तत्त्रयादेव । 10 अत एव व्यस्तकारणतावादी नयः समस्तकारणतावादी च सिद्धान्त इत्यप्यभिधातुं शक्यम् । अत्रार्थे विशेपा० २६३२. गाथानुसन्धेया । पृ० २४. पं० ६. 'किंतु भावघटस्यापि'-"अथवा प्रत्युत्पन्नऋजुसूत्रम्याविशेषित एवं सामान्येन कुम्भोऽभिप्रेतः, शब्दनयस्य तु स एव सद्भावादिभिः विशेषिततरोऽभिमतः इत्येवम- नयोर्मेंदः । तथाहि-स्वपर्यायैः परपर्यायैः उभयपर्यायैश्च सद्भावेन असद्भावेन उभयेन चापितो 15 विशेषितः कुम्भः-कुम्भाकुम्भावक्तव्योभयरूपादिभेदो भवति-सप्तभङ्गी प्रतिपद्यत इत्यर्थः । तदेवं स्याद्वाददृष्टं [ऋजुसूत्राभ्युपगतं] सप्तभेदं घटादिकमर्थं यथाविवक्षमेकेन केनापि भङ्गकेन विशे- षिततरमसौ शब्दनयः प्रतिपद्यते नयत्वात् ऋजुसूत्राद् विशेपिततरवस्तुमाहित्वाच । म्याद्वादिनन्नु संपूर्णसप्तभङ्ग्यात्मकमपि प्रतिपद्यन्त इति ।”-विशेषा० वृ० गा० २२३१-२ पृ० २४. पं० १२. 'नयवाक्यमपि-तत्त्वार्ध-लोकवा० १. ३३. ९१-९५. स्वा० २० ७. ५३. 20 - पृ० २५. पं० १९. 'तत्र प्रकृतार्थ'- "पज्जायाऽणभिधेयं ठिअमण्णत्थे तयत्थनिरवेक्वं । जाइच्छियं च नामं जाव दव्वं च पाएण ||" -विदोषा० मा० २५ "यत् कस्मिंश्चिद् भृतकदारकादौ इन्द्राद्यभिधानं क्रियते, तद् नाम भव्यते । कथंगतं नन् !, इत्याह-पर्यायाणां शक-पुरन्दर-पाकशासन-शतमख-हरिप्रभृतीनां समानार्थवाचकानां ध्वनीनाद 25 अनभिधेयम्-अवाच्यम् , नामवतः पिण्डस्य संबन्धी धोऽयं नान्युपरितः । स हि नामवान भूत- कदारकादिपिण्डः किलैकेन सझेतितमात्रेणेन्द्रादिशब्देनेवाऽभिधीयते न तु दोषः दाल-मुन्दा- पाकशासनादिशब्दैः । अतो नामयुक्तपिण्डगतधमों नान्युपचरितः पीयानभिश्वनिति । पुनरपि कथंभूतं तनाम ?, इत्याह-ठिबनण्णत्यति विवक्षिपद भूकदारक दिविष्ट- दन्यश्वासार्थवाऽन्याों देवाधिपादिः, सद्भावतस्तत्र यत् स्थितन्. मृतककारी मंत्र. ६० ६२. .. जैनतर्कभापायाः [पृ० २६. पं०४- मात्रतयैव वर्ततेा अथवा सद्भावतः स्थितमन्वर्थे अनुगतः संबद्धः परमैश्वर्यादिकोऽर्थो यत्र सो- ऽन्वर्थः शचीपत्यादिः । सद्भावतस्तत्र स्थितं भृतकदारकादौ तर्हि कथं वर्तते ?, इत्याह-तदर्थ- निरपेक्षं तस्येन्द्रादिनाम्नोऽर्थस्तदर्थः परमैश्वर्यादिस्तस्य निरपेक्षं सङ्केतमात्रेणैव तदर्थशून्ये भृत- कदारकादौ वर्तते इति पर्यायानभिधेयम् , स्थितमन्यार्थे, अन्वर्थे वा, तदर्थनिरपेक्षं यत् कचिद् 5 भृतकदारकादौ इन्द्राद्यभिधानं क्रियते तद् नाम, इतीह तात्पर्यार्थः । प्रकारान्तरेणापि नाम्नः स्वरूपमाहः यादृच्छिकं चेति । इदमुक्तं भवति-न केवलमनन्तरो- क्तम् , किन्त्वन्यत्रावर्तमानमपि यदेवमेव यदृच्छया केनचिद् गोपालदारकादेरभिधानं क्रियते, तदपि नाम, यथा डित्थो डवित्थ इत्यादि । इदं चोभयरूपमपि कथंभूतम् ?, इत्याह-यावद् द्रव्यं च प्रायेणेति-यावदेतद्वाच्यं द्रव्यमवतिष्ठते तावदिदं नामाप्यवतिष्ठत इति भावः । किं 10 सर्वमपि ? । न, इत्याह-प्रायेणेति, मेरु-द्वीप-समुद्रादिकं नाम प्रभूतं यावद्र्व्यभावि दृश्यते, किञ्चित्तु अन्यथापि समीक्ष्यते, देवदत्तादिनामवाच्यानां द्रव्याणां विद्यमानानामपि अपरापरनामपरा- वर्तस्य लोके दर्शनात् । सिद्धान्तेऽपि यदुक्तम्-'नामं आवकहियं ति' तत् प्रतिनियतजनपदादिसंज्ञा- मेवाङ्गीकृत्य, यथोत्तराः कुरव इत्यादि । तदेवं प्रकारद्वयेन नाम्नः स्वरूपमत्रोक्तम् । एतच्च तृतीय- प्रकारस्योपलक्षणम् , पुस्तक-पत्र-चित्रादिलिखितस्य वस्त्वभिधानभूतेन्द्रादिवालीमात्रस्याप्यन्यत्र 15 नामत्वेनोक्तत्वादिति । एतच्च सामान्येन नाम्नो लक्षणमुक्तम् ।"..--विशेषा० ऋ० गा० २५. "यद्वस्तुनोऽभिधानं स्थितमन्याथै तदर्थनिरपेक्षम् । पर्यायानभिधेयं च नाम यादृच्छिकं च तथा ॥" अस्या आर्याया व्याख्या अनुयोगद्वारटीकातः [पृ० ११ ] अवसेया । पृ० २६. पं० ४. 'क्वचिदनुपयोगेपि'-"इदमुक्तं भवति-योऽनुपयुक्तो जिनप्रणीतां 20 मङ्गलरूपां प्रत्युपेक्षणादिक्रियां करोति स नोआगमतो ज्ञशरीर-भव्यशरीरातिरिकं द्रव्यमङ्गलम् , उपयोगरूपोऽत्रागमो नास्तीति नोआगमता । ज्ञशरीर-भव्यशरीरयोर्ज्ञानापेक्षा द्रव्यमङ्गलता, अत्र तु क्रियापेक्षा, अतस्तव्यतिरिक्तत्वम् , अनुपयुक्तस्य क्रियाकरणात् तु द्रव्यमङ्गलत्वं भावनीयम् , उप- युक्तस्य तु क्रिया यदि गृह्येत तदा भावमङ्गलतैव स्यादिति भावः ।"--विशेषा० ऋ० गा० ४६. पृ० २६. पं० ८. 'विवक्षित'-- "भावो विवक्षितक्रियाऽनुभूतियुक्तो हि वै समाख्यातः । सर्वज्ञैरिन्द्रादिवदिहेन्दनादिक्रियाऽनुभवात् ॥” इति । "अत्रायमर्थः-भवनं विवक्षितरूपेण परिणमनं भावः, अथवा भवति विवक्षितरूपेण संपद्यत इति भावः । कः पुनरयम् ?, इत्याह-वक्तुर्विवक्षिता इन्दन-ज्वलन-जीवनादिका या क्रिया तस्या अनुभूतिरनुभवनं तया युक्तो विवक्षितक्रियानुभूतियुक्तः, सर्वज्ञैः समाख्यातः । क इव ?, 30 इत्याह-इन्द्रादिवत् स्वर्गाधिपादिवत् , आदिशब्दाज्ज्वलन-जीवादिपरिग्रहः । सोऽपि कथं भावः ?, इत्याह-इन्दनादिक्रियानुभवात् इति, आदिशब्देन ज्वलन-जीवनादिक्रियास्वीकारः, विवक्षितेन्दनादिक्रियान्वितो लोके प्रसिद्धः पारमार्थिकपदार्थो भाव उच्यते।"-विशेषा० वृ० गा०४९, 25 . 5 , ? पृ० २७. पं० १२.] तात्पर्यसङ्ग्रहा वृत्तिः । ६३ पृ० २७. पं० ४. 'यदि च घटनाम'-"अयमभिप्रायः-वस्तुनः स्वरूपं नाम, वत्प्रत्यय- हेतुत्वात् स्वधर्मवत् , इह यद् यस्य प्रत्ययहेतुस्तत् तस्य धर्मः, यथा घटस्य स्वधर्मा रूपादयः, यच्च यस्य धर्मो न भवति न तत् तस्य प्रत्ययहेतुः, यथा घटस्य धर्माः पटस्य, संपद्यते च घटाभिधानाद् घटे संप्रत्ययः, तस्मात् तत् तस्य धर्मः, सिद्धश्च हेतुरावयोः, घटशब्दात् पटादि- व्यवच्छेदेन घट इति प्रतिपत्त्यनुभूतेः ।"--विशेषा० बृ० गा० ६१. पृ० २७. पं० ६. 'साकारं च सर्व'-"मतिस्तावत् ज्ञेयाकारग्रहणपरिणतत्वात् आकारवती, तदनाकारवत्त्वे तु नीलस्येदं संवेदनं न पीतादेः इति नैयत्यं न स्यात् नियामकाभावात् । नीलाद्याकारो हि नियामकः, यदा च स नेष्यते तदा 'नीलग्राहिणी मतिः न पीतादिग्राहिणी' इति कथं व्यव- स्थाप्यते विशेषाभावात् ? । तस्मादाकारवत्येव मतिरभ्युपगन्तव्या । शब्दोपि पौगलिकत्वादा- कारवानेव । घटादिकं वस्तु आकारवत्त्वेन प्रत्यक्षसिद्धमेव । तस्मात् यदस्ति तत् सर्वमाकारमयमेव 10 यत्त्वनाकारं तन्नास्त्येव वन्ध्यापुत्रादिरूपत्वात् तस्य ।"-विशेषा बृ० गा० ६४. पृ० २७. पं० १०, 'चतुष्टया'-"घट-पटादिकं यत् किमपि वस्त्वस्ति लोके तत् सर्व प्रत्येकमेव निश्चितं चतुष्पर्यायम् । न पुनर्यथा नामादिनयाः प्राहुः-यथा केवलनाममयं वा, केवला- काररूपं वा, केवलद्रव्यताश्लिष्टं वा केवलभावात्मकं वा । प्रयोगः-यत्र शब्दार्थबुद्धिपरिणामसद्धा- वः तत् सर्वं चतुप्पर्यायम् । चतुष्पर्यायत्वाभावे शब्दादिपरिणामभावोऽपि न दृष्टः, यथा शशशृङ्गे। 15 तस्माच्छब्दादिपरिणामसद्भावे सर्वत्र चतुष्पर्यायत्वं निश्चितम् इति भावः । इदमुक्तं भवति- अन्योन्यसंवलितनामादिचतुष्टयात्मन्येव वस्तुनि घटादिशब्दस्य तदभिधायकत्वेन परिणतिदृष्टा, अर्थस्यापि पृथुवुध्नोदराकारस्य नामादिचतुष्टयात्मकतयैव परिणामः समुपलब्धः, बुद्धेरपि तदाकार- ग्रहणरूपतया परिणतिस्तदात्मन्येव वस्तुनि अवलोकिता । न चेदं दर्शनं भ्रान्तं बाधकामावान् । नाप्यदृष्टाशङ्कयाऽनिष्टकल्पना युक्तिमती, अतिप्रसङ्गात् । नहि दिनकराऽस्तगयोदयोपलब्धरात्रिन्दि 20 वादिवस्तूनां वाधकसंभावनयाऽन्यथात्वकल्पना संगतिमावहति । न चेहापि दर्शनाऽदर्शने विहा- याऽन्यद् निश्चायकं प्रमाणमुपलभामहे । तस्मादेकत्वपरिणत्यापन्ननागादिभेदेप्येव शब्दादिपरि- णतिदर्शनात् सर्वं चतुप्पर्यायं वस्त्विति स्थितम् ।” -विशेषा, वृ० गा० ७३. पृ० २७. पं० १२. 'तत्र नामादित्रयम्'- "दव्यट्टियनयपयडी सुद्धा संगहपरूवणाविसओ । पडिरूवे पुण वयणत्थनिच्छओ तस्स ववहारो ।।" ममता १. . 'अत्र च संग्रहनयः शुद्धो द्रव्यास्तिकः व्यवहारनयन्तु अशुद्धः इति तात्पयाधः ।" मानिकी "मूलणिमेण पजवणयस्स उज्जुनुयवयणविच्छेदो। तस्स उ सद्दाइआ साहप्पमाहा मुहुमभेया ।। "पर्यायनयस्य प्रकृतिराद्या ऋजुसूत्रः स त्वशुद्धा, शब्दः युद्धा, शुद्धनगमभि: अत्यन्ततः शुद्धा त्वेवंभूत इति । -सन्मतिटी पृ. ३१५ - 25 जैनतर्कभाषायाः [पृ० २७. पं० १४- "नामं ठवणा दविए त्ति एस दव्यट्टियस्स निक्खेवो । भावो उ पजवडिअस्स परूवणा एस परमत्थो॥" सन्मति० १. ६. पृ० २७ पं० १४. "ननु नया नैगमादयः प्रसिद्धाः ततस्तैरेवाऽयं विचारो युज्यते । अथ तेऽत्रैव द्रव्यपर्यायास्तिकनयद्वयेऽन्तर्भवन्ति, तर्जुच्यतां कस्य कस्मिन्नन्तर्भावः ?, इत्याशङ्कयाह" 5 [ विशेषा० गा० ७५.] -'नैगमस्य' इति पृ० २७. पं० २४. 'उज्जुसुअस्स'-"उज्जुसुअस्स इत्यादि-ऋजु अतीतानागतपर- कीयपरिहारेण प्राञ्जलं वस्तु सूत्रयति-अभ्युपगच्छतीति ऋजुसूत्रः । अयं हि वर्तमानकालभाव्ये- व वस्त्वभ्युपगच्छति नातीतं विनष्टत्वात् नाप्यनागतमनुत्पन्नत्वात् । वर्तमानकालभाव्यपि स्वकीय- मेव मन्यते स्वकार्यसाधकत्वात् स्वधनवत्-परकीयं तु नेच्छति स्वकार्याप्रसाधकत्वात् परधनवत् । 10 तस्मादेको देवदत्तादिरनुपयुक्तोऽस्य मते आगमत एक द्रव्यावश्यकमस्ति 'पुहुत्तं नेच्छइ त्ति' अतीतानागतभेदतः परकीयभेदतश्च पृथक्त्वं पार्थक्य नेच्छत्यसौ । किं तर्हि ?, वर्तमानकालीनं स्वगतमेव चाभ्युपैति तच्चैकमेव इति भावः ।" -अनु० टी० सूत्र० १४. पृ० १८. पृ० २७. पं० २६. 'कथं चायं'-"इदमुक्कं भवति-यो ह्यनाकारमपि भावहेतुत्वात् द्रव्य- मिच्छति ऋजुसूत्रः स साकारामपि विशिष्टेन्द्रादिभावहेतुत्वात् स्थापनां किमिति नेच्छेत् ?, 15 इच्छेदेव नात्र संशयः ।" -विशेषा• वृ० गा० २८४९. पृ० २७. पं० २८. 'किञ्च'-"उपपत्त्यन्तरेणापि द्रव्यस्थापनेच्छामस्य साधयन्नाह-ननु ऋजुसूत्रस्तावत् नाम निर्विवादमिच्छति । तच्च नाम इन्द्रादिसामानं वा भवेत् , इन्द्रार्थरहितं वा गोपालदारकादि वस्तु भवेदिति द्वयी गतिः । इदं चोभयरूपमपि नाम भावकारणमिति कृत्वा इच्छन्नसौ ऋजुसूत्रो द्रव्यस्थापने कथं नाम नेच्छेत् ।। भावकारणत्वाविशेषादिति भावः । 20 अथ इन्द्रादिकं नाम भावेऽपि भावेन्द्रेऽपि सन्निहितमस्ति तस्मादिच्छति तहजुसूत्रः । तर्हि जितमस्माभिः अस्य न्यायस्य द्रव्यस्थापनापक्षे सुलभतरत्वात्। तथाहि-द्रव्यस्थापने अपि भावस्य इन्द्रपर्यायस्य आसन्नतरौ हेतू शब्दस्तु तन्नामलक्षणो बाह्यतर इति । एतदुक्तं भवति-इन्द्रमूर्ति- लक्षणं द्रव्यम् , विशिष्टतदाकाररूपा तु स्थापना। एते द्वे अपि इन्द्रपर्यायस्य तादात्म्येनावस्थितत्वात् सन्निहिततरे शब्दस्तु नामलक्षणो वाच्यवाचकभावसम्बन्धमात्रेणैव स्थितत्वात् बाह्यतर इति । 25 अतो भावे सन्निहितत्वात् नामेच्छन्न सूत्रो द्रव्यस्थापने सन्निहिततरत्वात् सुतरामिच्छेदिति । -विशेपा वृ० गा० २८५०-१ पृ० २८. पं० ४. 'तन्नानवद्यम्' "तत् परिहरन्नाह-इह संग्रहिकोऽसंग्रहिकः सर्वो वा नैगम- स्तावद् निर्विवादं स्थापनामिच्छत्येव । तत्र संग्रहिकः संग्रहमतावलम्बी सामान्यवादीत्यर्थः, असं- ग्रहिकस्तु व्यवहारनयमतानुसारी विशेषवादीत्यर्थः, सर्वस्तु समुदितः । ततश्च यदि संग्रहमताव- 30 लम्बी नैगमः स्थापनामिच्छति, तर्हि संग्रहस्तत्समानमतोऽपि तां किं नेच्छति ?, इच्छेदेवेत्यर्थः । अथ यद्यपि सामान्येन सर्वो नैगमः स्थापनामिच्छति तथापि व्याख्यानतो विशेषप्रतिपत्तेरसंग्र- हिकोऽसौ तामिच्छतीति प्रतिपत्तव्यम् , न संग्रहिकः, न ततः संग्रहस्य स्थापनेच्छा निपिध्यते। - ३. निःक्षेपपरिच्छेदः । ६५ तर्हि एकत्र संघित्सतोऽन्यत्र प्रच्यवते, एवं हि सति व्यवहारोऽपि स्थापनां किं नेच्छति ? । कुतः ? । असंग्रहिकनैगमसमानधर्मा व्यवहारनयोऽपि वर्तते, विशेषवादित्वात् । ततश्चपोऽपि स्थापनामिच्छेदेवेति, निपिद्धा चास्यापि त्वया। अथ परिपूणों नैगमः स्थापनामिच्छति न तु संग्रहिकोऽसंग्रहिको वेति भेदवान् , अतस्तदृष्टान्तात् संग्रहव्यवहारयोर्न स्थापनेच्छा साध- यितुम् । अत्रोच्यते-तर्हि नैगमसमानधर्माणौ द्वावपि समुदितौ संग्रहव्यवहारौ युक्तावेव । इदमत्र 5 हृदयम्-तर्हि प्रत्येकं तयोरेकतरनिरपेक्षयोः स्थापनाभ्युपगमो मा भूदिति समुदितयोस्तयोः सम्पूर्णनैगमरूपत्वाद् तदभ्युपगमः केन वार्यते ?, अविभागस्थाद् नैगमात् प्रत्येकं तदेकैकता- ग्रहणात् इति ।"-विशेपा० वृ० गा० २८५२-३. पृ० २८. पं० १०. 'किंच संग्रहव्यवहार'--"इदमुक्तं भवति-यथा विभिन्नयोः संग्र- हव्यवहारयो गमोऽन्तर्भूतः तथा स्थापनाभ्युपगमलक्षणं तन्मतमपि तयोरन्तर्भूतमेव । ततो भिन्नं 10 भेदेन तौ तदिच्छत एव-स्थापनासामान्यं संग्रह इच्छति, स्थापनाविशेषांस्तु व्यवहार इत्येतदेव युक्तम् तदनिच्छा तु सर्वथाऽनयोन युक्तेति ।" विशेषा० बृ० गा० २८५४. पृ० २८. पं० १६. 'तत्र यद्यपि जीवस्य'-"चेतनावतोऽचेतनस्य वा द्रव्यम्य जीव इति नाम क्रियते स नामजीवः, यः काष्ठ-पुस्त-चित्रकर्मा-ऽक्षनिक्षेपादिपु स्थाप्यते जीव इति स स्थापना- जीवः देवताप्रतिकृतिवत् इन्द्रो रुद्रः स्कन्दो विष्णुरिति । द्रव्यजीव इति गुणपर्यायवियुक्तः प्रज्ञा- 15 स्थापितोऽनादिपारिणामिकभावयुक्तो जीव इत्युच्यते। अथवा शून्योऽयं भङ्गः । यस्य हि अजीवस्य सतो भव्य जीवत्वं स्यात् स द्रव्यजीवः स्यात् अनिष्टं चैतत् । भावतो जीवः औपशमिकक्षायिक- क्षायोपशमिकौदयिकपारिणामिकभावयुक्ताः उपयोगलक्षणाः संसारिणो मुक्ताश्च द्विधा वक्ष्यन्ते ।"- -तत्त्वार्थभा० १.५; तत्त्वार्थभा० १० १.५. ९.

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१ . १४; १८. परिशिष्टानि । जैनतर्कभापागतानां विशेषनाम्नां सूची। अङ्ग (आचारादि)२. २९. पूर्वफल्गुनी १७. अङ्गप्रविष्ट ७. ३, ११, १८. पूर्वभद्रपना १८. १. महत वादि दर्शन २४. १८. प्रभाकरमत २.२. बाह्यार्थी पलापिन् १. ८. इन्द्र २३. १3५,७; २४.२५. बौद्ध ११. ९, १२. ९, १३. २०; १४. १६; उत्तरभद्रपदा १८. १. ऐरावत (क्षेत्र) ७. १४. भरणि १७. २, ३. कल्याण विजय २१. ८, २५ ८२६. ९. भरत (क्षेत्र) ७.११. भा१०.१. कान्यकुब्ज १६..२४. भा प्य कार२६. ४. काशी ३०.११. भा प्य ग्रन्थ १५. ५. कृत्तिका १६. २८, १७.१.३. मघा १७. १८. चार्वाक २४. १९. चार्वाक दर्शन २४. १९. महाविदेह (क्षेत्र ) ७. १६. मातुलिङ्ग १७. ४. चित्रा १७. २९. मित्रा १८. २७. जिन १.१; ३. २३. मीमांसक १.७. जिनदत्त ६. १२. जिनभद्र गणिन् २१. २०; २७. १५. मृगशिरस १७. १३. मृगशीर्ष १७ १८. जीत विजय २१. ९; २५. ९:२६. १०; ३०. ५. मेर ३.२१. जैन १७ १९. यज्ञदत्त २३... जेनतभा पा २१. १०; २५. ११;२६. ११, १२. यशोविजयगणिन् २१. १०२५. १०६. 11 ज्ञानाध है त या दिन १.८. ३०.१४. तत्वार्थ टीका २६. २. रोहिणी १७. १३; १७. तभा पा १. २:३०. ८; १. लाभ विजय २१.८:२५.८:२६. ९. ताथा गत १५. १६; २४. २२. वासव २३.४. दिक्पट ८. २२. विजय देव ३०... हटिया द ७. १८. विजय सिंह ३०. २. देवदत्त २३.१०. विशे पाचश्यक २९. १९. धर्म भू पण ११. २५; १८. २९. वैशेषिक २४. १७. नयरहस्य २६.८. शकट १६. २८, १७.१ २. नय विजय २१.९:२५.९:२६.३०;३०.६; १३. शतः २३.२४. २५. नैयायिक १०.१३, ११. २२; १३. ४; १४. २६; शापप६.१५. २४.१७. शाक्यसाख १५.१८. पर विजय २१. ९:२५. १०; २६. १०३०. ७. सास्य १३.२६; १५. २०१८. १२. पनस १७.२५. सारस्पदन २१.६८. परोक्ष बुद्धयादि वादिन् १. ७. लिद से न २७. १५. पाटलिपुत्रक १६.२४. नुमेर २२. १९, २०:२१.२३. पुरन्दर २३. २,२४.२५. सौगत १५ १२. पुप्यतारा १७. १३, १७. स्वाति १७.२९. १. परिशिष्टेणु रथलाहाः पातकाः नासिनः। -- 7/ जैनतर्कभाषागतानाम्- . २. जैनतर्कभापागतानां पारिभाषिकशब्दानां सूची । अकिञ्चित्कर १८. २९. अनुवृत्ति १२. २०. अक्ष (इन्द्रिय)२. ७. 8. २०, २१. अनुसन्धान ६.५. अक्ष (जीव) २.९; अनेकान्तिक ( हेत्वाभास) १८.४, २३ अक्षर (श्रुतज्ञान ) ७. २, ३. अनेकान्तिकत्व १२. १०. अगमिक ७. १८. अन्तर्जल्प २. २५ अजीव २८. १६, १८. अन्तर्मुहूर्त ६. ४. अज्ञान १८. ५. अन्तर्व्याप्ति १२. २१-२३, २६. निवर्तक ११. २५. अन्यतरासिद (हेत्वाभास) १८.५,९,१३,१७,१८, अतिदेशवाक्य १०. ११, १५, अन्यथानुपपत्ति ८.८,१२.८; १७, १३. ६,१६. अध्यवसाय ४. १२, २१. १५, २१. ३, १७. ११८.२, २३, १६. ५. अनक्षर ( श्रुतज्ञान) ७. ७. भन्वय ६. २००२२; १०.२६. अनङ्गप्रविष्ट ७. १३, १९. धर्म ५. १५,२७. अनध्यवसाय १३. १४. अपर (संग्रहनय) २२. ९, १२. अनध्यवसित १३. ९. अपर्यवसित (श्रुतज्ञान) ७. १७. अनन्तधर्मात्मक २०. ८,२१. १४. अपाय ३. २,४. १६,५.८,२३, २५, २०, ३०%; अनन्तवीर्यत्व ८. २६. .६ ४६; १७. अनन्वय १४. १६; १८. अपारमार्थिक २. १५, २४. १८. दोप १३. २१. अप्रतिपातिन् (अवधिज्ञान ). ४. अनभिमत १३. ११. अप्रतीत १३. ९, १०. अनभ्युपगत १८. १८. अप्रधानाचार्य २६. ४. अनर्पितनय २३. १६, १७, अप्रमाणत्व १४, २६; अनर्पिताभास २५. ५. अप्रमात्व 8.३. अनाकारोपयोग४. २२. अप्रयोजक १६... अनादि (श्रुतज्ञान) ७. १५. अप्राप्यकारित्व ३. १२,४. ३. अनादिनिधन २८. २०. अबाधित १३. १७. अनानुगामिक (अवधिज्ञान) ७. २७. अवाधितविपयत्व १३. ३, अनिग्रह १८. १४. अभीप्सित १३. ९, ११, १८१४. १६; १८. अनिन्द्रियज ( सांव्यवहारिक)२. २०, २१. अभेदवृत्ति २०.८,१७-२३, २५, २७. भनिराकृत १३. ९, १०, १७. अभेदोपचार २०.८,२१. ५. अनिश्रित (मतिज्ञान)६. २०. अभ्यस्त ६.१७. अनुगामिन् (अवधिज्ञान ) ७. २४. अर्थ ( कालादिगत)२०. १५; १९, २९. अनुपयुक्त २६. २०. अर्थक्रिया १५.८,२२. २. अनुपयोग २६. ४. अर्थक्रियासमर्थ १५ ६. अनुपलम्भ ११. १३, १४, १७, १८, मर्थनय २३. १५, अनुभव ६.२,६,११,१९, २९, अर्थनयामास २५.३. अनुभूत १०. १३. अनुमान ८.८, २९,६. २६; १२. २, ५, १२,२७,मर्थपर्याय २२. ४. १३. १५; १४. २; १७, २५; १५. ११, १३. भर्थप्रतिपादक १६.७. अर्थमापकत्व १६.१५ १६.८. अनुमिति 8.३, ४,७,८,१२. ११, १६.१५.१; अर्थसंवेदन १६.५. अभ्यहन १६.१३.

. पारिभाषिकशब्दानां सूची। ६९ इन्द्रिय २. ७ अर्थावग्रह ( मतिज्ञान ) ३. ३, ४.९, १२; १७; आन्तर्मुहूर्तिक ४. १२ १८, २१, २४, ३१, ५ १७३, ५, ६. १९. आप्त १६.१०. अर्पितनय २३. १६; १७. आप्तवचन १६.७. अर्पितनयाभास २५ ४. आलोचन ४.३०५.२४, ५. अवक्तव्य १६. २८, २०.३.५. आवरण ७. ५, ८.१६;1८. अवग्रह ( मतिज्ञान ) २. २५, २७, ३. २, ४. १२; सावरणक्षय ८. ६६ २०, ५. ६.८, १०, १२, ६. १५; १८ आवापोहाप ११. ६. अवधि (ज्ञान) २. ९, ७. २२; २३. आहारपर्याप्ति ८. २२. अवयव १६. ६; १३. आहार्यारोप १२. २०; १५. १. अवसर्पिणी ७. १५. आहार्यप्रसञ्जन ११.२०. अवस्तुनिर्भास ११. ११. इदन्तोल्लेख 8. ७. भवहरण २२. १२. इन्द्रस्थापना २७. २७ अवान्तरसामान्य २२.११. ६. १९, ७. ५, ६. २४, २०; अवाय (मतिज्ञान) ५. १९. १०.३०. अविच्युति ५. २१, ३०, ६. ४, ७. इन्द्रियज (सांव्यवहारिक)२.२०. अविरुद्धानुपलब्धि ( हेतु) १७. २५. ईहा २. २६, ३. २, ४. १५; १७, २०: ५.५ अविरुद्वोपलब्धि (हेतु) १७. ८. ६, ११, १२, १५; अविप्वग्भाव २०. २०. उच्छ्वास ७ ७. अविसंवादकत्व ६.१०. उत्कम ६.१६. अव्यक्त ४.२२. उत्तरचर (हेतु) १७. २, ८. अव्यकाक्षर ७. ७. उत्तरचरानुपलब्धि (हेतु) १७.२६ अश्व २३.९. उत्पलपत्रशतन्यतिभेद ६. १८. असंग्रहिक (नैगमनय )२८ ४. उत्सर्पिणी ७. १५ असत्ख्याति १४. २८. उपकरणेन्द्रिय ३. ५. असत्व १६. २६. उपकार ( कालादिगत)२०. १५, २६, २६... असत्प्रतिपक्षत्व १३.३. उपकारिन् २१.२. भसातवेदनीय ८. २२. उपचार ७.४,१५.११. असिद्ध ५४. २२. उपनय १६.६५. असिद्ध (हेत्वाभास) १८. ४, ९, ६०: १२! १६.५ उपपत्ति १६.३. भसिद्धता २८.१७. उपमान (प्रमाण) १०. १२; ; ; १९ भसिद्धत्व १२. ९. १३:२०. असिद्धि १४. १९. उपयोग १. १९, ३.३० ५.३० ६..::; 3. अस्तित्व १५. २. ९,२६.२०. भस्पष्ट २. १२८.२९;६.६५:१७. उपयोगेन्द्रिय १. १२. भागम ८. ३०; १५. २६, २३, २४, १६.७; १२; उपलन्म १९.१३,८. २८.१३ उपसंहारवचन १५. १५. मात्मरूप (कालादिगत) २०. १२; १५; १८, २८. उपसर्ग २२. १९,२२. आत्मन् १. १३. आत्मार्थत्व १३, २० उभयसमन्द (वन)३... सानुगामिक (भवविज्ञान) ७.२५. उभयनित १४.० ३. भानुमानिक १३. २१. उन्मानित (हमानाम) १८.५.

Khar 75/5 जैनतर्फभाषागतानाम्- गौ २३. ९. उल्लेख २. ५. क्रियाशब्द २३ ८६१०-१२ ऊर्ध्वतासामान्य 8. ११. क्रियानय २३. २५, ऊह (प्रमाण) १०, २३, १२.२. क्रियानयाभास २५.७ ऋजु २२. १५. क्षयोपशम ४.४, ६.८, १३, ७. ५; १७, १०. अजुमति ८.९, ११. १४,१६. १२. ऋजुसूत्र (नय ) २१. १९, २०, २२. १५,२३. | क्षिन ( मतिज्ञान) ५.७; १२, ६ २०.. २५, २४. ३,५,७,८, २७. १४, २१-२३. क्षेत्र ७. १४, १६, १६. २२, २३, ऋजुसून्नाभास २४, २२. गजनिमीलिका २२. ११. एकत्वज्ञान १०.१. गणधर ७.१९. एकान्तनित्य १५. ६. गमिक (श्रुत) ७. २; १८. एकार्थसमवायिन् २. १०. गुण २८. २१, २२. एकेन्द्रिय ७. ७. गुण (कल्पना)४. ९. एवम्भूत (नय)२१, २०, २३. ३, ६,२४. ११. गुणशब्द २३. ९. एवम्भूताभास २५.१. गुणिदेश (कालादिगत) २०. १६; २२, २१. औदारिकशरीर ८. २५. २; ३. औपशमिक २८.१७. कथा १३, १२, १३, १८, ग्रहण ४.१,१२. ३, ४. करणोल्लेख २.४. ग्राह्य ४. १. कर्मन् ८. १६, १८, घटनाम २७.४. कारक २२. १८, २०, घातिकर्मन् ८, २३. कारण १७. १७ चक्षुरादिजनित २. २०. कारण ( हेतु) १६. २४ चारित्र २३. २५, २७. कारणत्व १२.४. कारणानुपलब्धि १७. २५. चित्रज्ञान 8. १६. कारणान्तरसाकल्य १६. २७. च्यवमान ३.२९. कार्य (हेतु) १६. २१, २३. छमस्थ ३. २९;८. २६. कार्य १७. १६ जाति (कल्पना)४.९ कार्यानुपलब्धि १७. २५ जातिशब्द २३. ८. कापण ९६.८. जिगीपुकथा १३. १५. जिज्ञासा १६.२१ काल २४.२२ काल (द्रव्यादिगत)७. १४; १६. १६. २२, २४, जिननाम २६. २८ काल (कालादिगत)२०.८, ११, १२, १५, १७, जिनस्थापना २६. २८ २१.५ जीव २. ९; २२. १३, २४. २०; २८. १४; १६; काल (कालकारकादिगत) २२. १८, १९, २४.५, १८; २४; २९. कालात्ययापदिष्ट १६.३ जीयत्व २८.२० कालिकत ७. १८ ज्ञान १.६ केवल (ज्ञान)७. २३, ८.३, १५. ज्ञाननय २३, २४%3 कैवल्य :, १९, २२, २३. ज्ञाननयाभास २५. ६. क्रम २०.१०,१२. तर्क ८.२९, १०. २३, २८; ११. १, ३, ७, २०; क्रममावी २२, १४ २२, २३, २५, १६. ७. क्रमयोगपद्य १५. ७. तिर्यन्सामान्य 8.1 क्रिया (कल्पना) ४.९. विलक्षण १२. ९. .

पारिभाषिकशब्दानां सूची। ७१ त्रैरूप्य १६. २७ नयन ३. १२,४.७. दण्डिन् २३. १३ नयवाक्य २४. १२, दर्शन १.६;६५8. २४; १०.२८. नयाभास २७.१५. दार्शन्तिक १६. १५. नाम (निक्षेप) २५. १८, १९, २६. १०..१३; दृष्ट १०.२. १५; १९, २२, २३, २७-२९, २७.१-३; दृष्टान्त १६. ६:८; ११, १२, १५. १२, २२, २९; २८. ३,२४, २६.४, दृष्टान्तदोप १६.३. नाम ( कल्पना)४. ९. देवजीव २८.२७२८. नामजीव २८.१६; द्रव्य ३. ५, ७. १४, १५, ८. १५, ६. १८ नामात्मक २७ ५. १६. २२, २३, २१. १८, २२, २२. ४,५,७, नामादिनयसमुदयवाद २७. १०. १३; १७, २४. १५, १६, १९, २०, २२; नामादिनिक्षेप २८. १४. २७. ८. नामेन्द्र २६. १८, २५ द्रव्य (निक्षेप)२५. १८; २८, २६ ३; ११-१३; नास्तित्व १५. २ १५; १९, २०, २२, २७ ४, ७; २३; | निःक्षेप (निक्षेप) १. २, २५. २, २५. १४-13 २८.१% 3१८. २७. १२, २२, २८.४; १८. दव्यकल्पना ४.९. निगमन १६.१६. द्रव्यक्रिया २६. ५. निगृहीत १८. १४; गव्यजीव २८. २२, २६, २७, २९. निग्रह १८. १५. द्रव्यजीवत्व २६. ७. निग्रहाधिकरण १८. १९. दव्यत्व २२. ११; २६. ३. निराकृत १६. १. दव्यदेव २८. १९. निरक्ति २२. २३. द्रव्यनिकुरम्म ३. ५. निर्णीतविपक्षवृत्तिक १८. २३. दव्यमन ३.१९. निवृत्तीन्द्रिय ३. ४. द्रव्याचार्य २६. ३. निधय २३. १४; दव्यात्मक २७. ७, निश्चय (नय ) २३. २०; २२. दव्यार्थ २. ३, ५. निश्चयाभास २५. ६. दव्यार्थिक २१. १७-२०; २८. ६; निश्चित (मतिज्ञान)६. २०. द्रव्यार्थिकनय २०. २६. निषेध १६. १९. दव्यार्थिकाभास २४. १५. निषेधकल्पना १६. २६; २८, २९, २०.१-६. दव्यास्तिकनय २७ १२. निषेधसाधक (हेनु) १७. ९. द्रव्येन्द्र २६. १९; २१. नील २३.१०. धर्म १३. २४; १४. ३, १६. २०; २४. ६६. नैगम (नय )२१. १९; २१, २२.७; २३. ::: धर्मिन् १३. २५, २६, १४. १, ३, ४,७,८; २४. २,२७. ११:२८.५, १६. ११-१३, १७, २६-२८, २४.१६. नैगमामास २५. १७. धारणा ३. २, ५. २१, २४ २६; २९, ३०, नैयिक. ५. १०. ६. २, ३ ,. पक्ष १३.२५; १४.२.१५.११.१५ १६.. ध्रुव ( मतिज्ञान) ६. २०. ७२-११% १६; ध्वनि २२.६८. पक्षदोर १९.२. नमस्कारनिक्षेप २७ १९. पक्षधर्मता १२ १. नय १. २,२०. ९, २१.६१-१६; २३. १५२२पक्षधर्म य १२.: :::::१३. ५. २५:२५. १४,२७. १२;

34726 जैनतर्कभापागतानाम्- . पक्षवचन १५. १५. प्रत्यक्ष २. ७,९,१३, ७.२००८.२७%8.१०२०3 पक्षशुद्धि १६. १६. २२, २५; १०.५२६, ११. ९, १०, १४%3 पक्षसाध्यसंसर्ग १२. २१, २६. १७; १८०१४ ५८; १६.८. पक्षीयसाध्यसाधनसम्वन्ध १२. २१. प्रत्यक्षगम्य १४.११. पद १६. १०; ११; २९; २०.१,२; प्रत्यक्षविरुद्ध १३ १०. पदार्थप्रतिवन्ध ११. १२. प्रत्यभिज्ञा. १७; १०. १८. पर (सङ्ग्रहनय)२२. ९, १०. प्रत्यभिज्ञान = २९8 ११% १५२१, २४% परप्रतिपत्ति १६. ६,७; १०. १०.१२८.११.६; परसमय १५.८. प्रत्यभिज्ञानता १०.९. परामर्श २२.९. प्रत्यभिज्ञानत्व १०. १४, २१. परार्थ (अनुमान) १२. २, १३. २२; १५. प्रमाण १. २, ४, ९, १२, ११, १०. १०; १८,२०, ११; २१. ११. २१, २२, १४ ४ १६. १२, २१. ७; परार्थ १३.१९. १४, १७. परिपूर्ण ( नैगम)२८. ४. प्रमाणत्व २२.८० २३. २३. परोक्ष २. ७, १२, १६, १८:८. २९, २१. ६. प्रमाणप्रसिद्धत्व १४.५. पर्याय (शब्द)२२. २३, २४, २३. १; २४ २४. प्रमाणविकल्पप्रसिद्धत्व १५. ६. पर्याय ८. १५; २१. १८; २१, २२, २२. १,४;/ प्रमाणविकल्पसिद्ध १४, १२. ५,७:१३, १४, १६; २४. १५, १६, १९, प्रमाणसिद्ध १४ ७; १३. २०, २२,२८. २१, २२, प्रमाणवाक्य २४ १३. पर्यायार्थिक २०.२६:२१. १७-१९, प्रमाणैकदेशत्व २१. १५. पर्यायार्थिकाभास २४. १६. प्रमात्व ६३. पर्यायास्तिकनय २७. १३. प्रमेय १०.४. पाल्चरूप्य १३.४, ५, प्रयोजकवृद्ध ११. ३. पारमार्थिक (प्रत्यक्ष)२. १३;७. २२. प्रयोज्यवृद्ध ११. ४. पारायं १३. १९. प्रवृत्तिनिमित्त २ १०. पारिणामिक (भाव) २८. २०. प्रन्न १६.२१. पुरुप २२. १९; २२. प्रश्नादेश ७. २७, २८. पुरुपवेद . ४ प्रसङ्गविपर्यय १५. २७ १६.१. पूर्वचर (हेतु) १६. २८; १७. २; १८; प्रसिद्ध १३. २५. पूर्वचरानुपलब्धि १७. २६. प्रसिद्धि १४. ४. पौद्गलिक १६ १०. प्रातिस्विक २०.२. प्रकरणसम (हेत्वाभास) 18.2. प्राप्यकारिता ३.२५. प्रतिज्ञा १५. १७. प्राप्यकारित्व ३. २०७४. ३. प्रतिपत्ति १३. २५; १५. १५,१७,१९,२६.४; ८. प्रामाण्य ११.२५ १६. १३; १५,२२. ७. प्रतिपातिन् (अवधि)७. २४; .. प्रानिक १८.१६. प्रतिवन्ध १६.७; १२; १४. फल ११. २७. प्रतिवादिन् १३, १७, १५.२३, १८. १६; वहिाप्ति १२. २३-२५. प्रतिपेध १६. १२२४. १२. बहु ( मतिज्ञान) ६. २०; २१. प्रतिपेषरूप ( हेतु) १६. १९, १७. २०. बहुविध ( मतिज्ञान) ६.२०. प्रतिपेधसाधक (हेतु) १६. २०; १७.२०. बाधितविषय १३. २; १६. १.. प्रतीत १६.६. बोध ५.१६. २.

पारिभापिकशब्दानां सूची। ७३ भग १६.१३.१४, २२, २०. ७. वर्धमान (अवधि)७.२४, ३०. भजना ७.१२. वस्तु २२.४. भाव ७. १५,१६. २२, २५, २५. १८ ६६.८ वाक्मयोग २६. १९. १०; १२; १९; २०, २५, २७, २७. १;२; | वाक्य १६.११. ४; १३, २०, २२, २९; २६. ४ वाच्यवाचकभाव १२. ३,६,२८.२; भावजीव २८. १७; २६.१. वाद १५. १९; १८. १५. भावत्व २९. ३. वादिन् १३. १७१८; १५.२३, १८. १०; १४; १५; भायश्रुत ७. ८. वासना ५. २२, २३, ६.7;६; १०; १२; १४. भावात्मक २७. ९. विकलाप्रत्यक्ष. १३. भावोलास २६. २०; २९. विकलादेश २०. ७; १०; २१. १३. भापा ४.६. विकल्प ४. २५; ११. ९:३०; १४.४; २५, २६. भूतचतुष्टय २४. २१. विकल्पगम्य १४. १२. भेदविवक्षा २०. ११. विकल्पप्रसिहस्व १४ ६. भेदवृत्ति २०. ९, २१. ६. विकल्पसिद्ध १४.८; १०; १३, १४; १६; २६-२८ भेदोपचार २०. १०; २१. ६. विकल्पात्मिका १५. १. मति (ज्ञान) २. ९, २२, २३, २५, ३. २, ५ २८; विजिगीषु १५. १९. ६.२, २०; ३१; ७. २०. विधि १६. १२; १९; २१. १२. मनस् २. २१, ३. १२, १८, २०-२२, २५, २८; | विधिकल्पना १६. २२; २८, २९, २०. ५-६. ३१, ४. १, ४-७; ६. १९; ७. ५; 2. ७; | विधिरूप (हेतु ) १६. १९; १७.८. २१.६.२६. विधिसाधक (हेतु) १६. २०; १७.८:२०. मनःपर्यय (ज्ञान ) ७. २३; विपक्ष १२. १०. मनःपर्यव (शान) ८. ७. विपक्षबाधकप्रमाण १६.२. मनःपर्याय ८.७. विपक्षासच १६. २७. मनःपर्यायदर्शन ८. १०. विपरीत १३. ९. मनोजन्म २ २१. विपरीतारोप १५.३. मनोजन्य .. २० विपर्यय १३. १३:१८. ५. मनोद्न्य ३.३०; ४. २. विपुलमति =. ९; ११:१२. मानसत्व १०. २०. चिरन्छ १४. २३, १७. १५. मिथ्या (भूत) ७. ११-१३. विरद्ध (हत्यामास) १८.८,२९. मिप्यारष्टि ७. १३. विरहवारणानुपलग्न १७.२९. मोक्ष २३.२६-२८. विरद्धयार्यानुपसन्म १७.२. मौलहेतु १५. २७, २८. विरस्वत्व (२.१०. यरच्छाशब्द २३. ११. दिरधर्माप्यात १६. १२६. १३-१५. योगपच २०. ११, १४. पिरन्प्यापकानुपलम १७.२१. लब्धि (अक्षरधुत) ७.३ विरन्दसहचरान पलम १७.२९. लब्धि (इन्द्रिय ) १. १९.२.६: दिल्जयभागानुपरम १७.६९. लायक्षर ७.५. दिमानुपलब्धि १७... लिझ २२. १८:२६. विरलोपलब्धि १७. ९. विरोध १४.:. पचन १६.१०. पिरोधिमा ११.१. पर्ण १६.१०. दिपर्न २२.६६. १० ौकिक ७.६१.

3618/- जैनतर्कभाषागतानाम् . विशिष्टप्रत्यक्ष ६.२८. शब्दनयाभास २५.३. विशेपदर्शन ११.२०. शव्दाद्युल्लेख ४.१०. विशेपावमर्श १५. ७. शव्दाभास २४.२३. विपाणी २३. १३. शब्दोल्लेख २. २६;४. १२. विसदृश १०.९. शान १५. १८; १९. वेद ८.४. शुक्ल २३.१०. व्यञ्जन (अक्षरश्रुत) ७. ३. शुद्रव्य २२. १०. व्यञ्जन ३. ४, ६,५. २. श्रुत २. २२, २३, ७. २; ९, २०; २३. २७. व्यञ्जनपर्याय २२. १; ३. श्रुतनिश्रित २. २६. व्यञ्जनाक्षर (श्रुत)७. ४. ध्रुताननुसारिन् २. २३. व्यञ्जनावग्रह (मति) ३. ३; ६; १२, २८, ४. १; | श्रुतानुसरण २. २८. २, ५,७; १९,२३; ५.३,४,६.१९. श्रुतानुसारित्व २. २३; २७. व्यतिक्रम ६.१६. श्रुतानुसारिन् २. २३. ध्यतिरेक 8. २०-२२; १०.२६. श्रुतोपयोग ७. ५. व्यतिरेकधर्म ५. १५. श्रोत्र ४. ४,५. १६. व्यभिचार १४. २०. संग्रह (नय) २१. १९, २२. ९, १०, १२, व्यभिचारिन् १४. २२. २३. २६; २४. २,३; २७. १३; २८, ३; व्यवसायिन् १. ७. ५-८,१०,१३. व्यवहार (नय) २१. १९; २२. १३; २३. १९; | संग्रहाभास २४. १८. २२; २६; २४. २, ४, २७. १३; २८. ३, ५ | संग्रहिक (नेगम) २८. ४, ७, ७,८०१०; १३. संपूर्णनेगम २८. ९. व्यवहार २३. १४. संवन्ध १२. ३, ४, व्यवहाराभास २४.१९२५. ५. संबन्ध (कालादिगत) २०. १५, २०; २४; ३०; ध्यापक १०.२९,११.२०. २१.१. व्यापकानुपलब्धि १७. २५. संबन्धिन् २०. ३०. व्याप्ति 8.२६; १०. २६; ३०, ११.१, १०. २२ संयोगिदव्यशब्द २३. १२. १२. १९:२५,१३.२४,१६ १७१८.२१,२२; व्याप्तिग्रह १६. ९. संव्यवहार, २. १४. व्याप्तिग्रहण १६.७. संशय ५. १७; १३. १३, १६.२१. व्याप्तिज्ञान ८. १७.६.३; ७. संसर्ग (कालादिगत) २०. १६; २३, २४, २१.३. संसर्गिन् २१. ३, ४. व्याप्य ११.२०१७. १६. संसारिजीव २६.३. व्याप्य (हेतु) १६. २०; २१. व्याप्योपलब्धि १७.१०. संस्कार ५. २३; ६. ६,७, संस्कारप्रवोध 8.२४. व्यावहारिक ५. १०. संहतपरार्थत्व १३. २०. व्युत्पत्तिनिमित्त २. १०. सकलप्रत्यक्ष. १५. शङ्कामात्रविघटक ११. २४. शहित १३. ९; १३. १२. सकलादेश २०.७, ९. सकलन६.२९ शतृशानश २०.१. शब्द २३.३. सङ्कलनात्मक ६.११; १०.८.१३.११. ५. शब्द (कालादिगत) २०. १६,२४, २५,२१. ४, ५. सङ्ख्या २२. १८, २१. शब्द (नय )२१. १९; २२.१८, २३, २३. १६; | सज्ञा (भक्षरश्रुत) ७. ३, ४. २४. ५,६,१०,२७. २१. सन्नासन्निसम्बन्ध १०. १२. .

पारिभाषिकशब्दानां सूची सन्झिन् (श्रतज्ञान)७. २; १०. साध्यसाधनभाव १०.२३. सत्ताद्वैत २४. १७. सामाप्रतिवन्ध १६. २७. सत्प्रतिपक्ष १३. ३. सामानाधिकरण्य १०.२९. सदृश १०.९; ११. सामान्य १५. २५. सन्दिग्धविपक्षवृत्तिक (हेत्वाभास) १८.२४. सामान्यलक्षणप्रत्यासत्ति १०. ३११२. 1. सन्देह १८.५. सावरणत्व ८.१७. सनिकर्प है.२८. सिद्ध १८. १८; सपक्ष १२.९. सिद्ध (भगवान् ) २३. १७. सपर्यवसित ( श्रुतज्ञान) ७. २; १७. सिद्धसाधन १६... सप्तभङ्ग २४.८. स्त्यानदिनिद्रा ३. २७. सप्तभङ्गी १६. १२; १४; १८,२०,२०.७.२४.१२. स्थविर ७. १९. समनस्क ७. १०. स्थापना २५. १८; २७, २६. ११-१३; १५; १२: समभिरूड (नय) २१. १९:२२.२३, २४, २३. ४. २२; २७. ३; २९; २८. २, ३, ५, ६; १; समभिरूढाभास २४. २५. ११%3; १२; १७: समवायिव्यशब्द २३. १२. स्थापनाजिन २५. २७. समर्थन १५. १६; १६.८९. स्थापनाजीव २८.१७. समर्थनन्याय १८. १६. स्थापनेन्द्र २५. २७, २६. १६; २२. स्थितपक्षत्व २३. २९. समुदयवाद २३. २९. समुदित १२. ४. स्पष्ट ह. १५. सम्यक् ( श्रुतज्ञान ) ७. २; ११-१३. स्पष्टता २ ११. सम्यक्त्व २३. २७. स्मरण. २९; २०६. २२, २६, १०. २८. सम्यग्ज्ञान १.९. ११. ५, १२.३;४; १६. ७. स्मृत २०. ५:८. सम्यग्दर्शन .. १८. स्मृति ५. २९; २३; २८, ६. २, ३; ; ; १३: सम्यग्दृष्टि ७. १२. ५७; ६. ५, ६;८; 13 १९; २४, २५:२२. सहचर (हेतु) १७. ४; १९. स्मृतिज्ञानावरण ६.८; १३. सहचरानुपलब्धि १७. २६. स्पात् १६. २२. सहचार १२. २५. स्यारधार १६.७९ सहभाविन् २२. १४. स्वपरव्यवसादिव ११.२३. सांव्यवहारिक २. १३; १४;७. १९. स्वपरप्ययसाचिन् १.५; १. साकार २७.६. स्वभापविर १७. ९. सादि (भ्रतज्ञान ) ७. २; १४ स्वभावानुपलब्धि १७.२५. सादृश्य १०.३-५, ८; १०; १७. स्वरूप (पल्पना) ४.९. सारयज्ञान १०.१२. स्मरूपामुमताप्रनिसार १०. २५, १२ २४. साधन १०. २७, २८, ३०; ११.१; १२. २; ' स्वरूपदिगपात १.८. २७: २२: १३. १२; २६; १६. ५. सलमामतीति १०.५. साध्य १०.२७, २९, ३०, ११.१ १२ २, ३: संविदिनब २.६. २१-२३, १३. ८, ९: १२, २०: २५,२६; स्पनर १५. ८. १४. 5;७; १; १३-१४ २५. :५:२४: ग्वानुरना पसन २०.. १६.३; ४९८.२१ १६.५५. मिर .... साध्यधर्मविशिष्ट १४.२. : माई (मन) १२.:: १३. साप्यधर्माधार १४..

तात्पर्यसंग्रहवृत्त्यन्तर्गतानाम्- स्वार्थव्यवसिति १. १०. १३, १५, १७, २५; १७. ८० २०; १८.२; हंस १०. १६. १८१६.४, २७; हीयमान (अवधिज्ञान).. १. हेतुदोप १६.२. हेतु १२. २, ४,८,९,१८, २३, १३, ४, ६,८; हेतुसमर्थन १८. १५. १४.२; १५.११,१५,१६; १६. ३. ६, ७; हेत्वाभास १३.५:१८. ३. ९, १४,२९; ३, जैनतर्कभाषागतानामवतरणानां सूची। अप्रस्तुतार्थापाकरणात्-[ लघी० स्ववि० ७. २. J २५. १६ असतो नत्थि णिसहो-[ विशेषा० गा० १५७४ ] १५. ५ अहवा वत्थूभिहाणं-[विशेषा० गा० ६० ] २९. ५ उज्जुसुअस्स एगे-[ अनुयो० सू० १४ ] २७. २४. ततोऽर्थग्रहणाकारातत्त्वार्थश्लोकवा० १. १. २२ ] १. १६. तस्मात् यत् स्मयते तत्स्यात्-लोकवा० उप० ग्लो० ३७-३८] १०. ३ धूमाधीवह्निविज्ञानम्- ११. १६. नामाइतियं दवट्ठियस्स-[विशेपा० गा० ७५ ] २७. १७ नासिद्धे भावधर्मोऽस्ति-प्रमाणवा० १. १९२ ] १४. २२ पक्षीकृत एव विपये-[प्र. न. ३. ३८.] १२. २२ पयोम्बुभेदी हंसः स्यात्- ] १०.१६. भावं चिय संदणया-[विशेषा० गा० २८५७ ] २७. २० विकल्पसिद्धे तस्मिन्-[ परी० ३. २३ ] १४. १४ ४. तात्पर्यसंग्रहवृत्त्यन्तर्गतानां विशेषनाम्नां सूचो। "अभयदेव ३१.३ आचार (अङ्गः) ५०. ११, १५. आवश्यक (सूत्र)५०. १२५१. ६. उदयनाचार्य ५२. ११. उपाध्याय ३२. ५. ऐरावत ५०. १८. कुमारिल ३१. ९. 'चिन्तामणिकार ५१. २१, २२, २८, २९, ५२. ५. . चिन्तामणिकृत् ५४.८. जैन ३३. १३:५१. २०५३. १८३५६. १; ५. जैनतर्क ३२. १०. जैनमत ३१. १२,५६. ३, २८. तात्पर्यसङ्ग्रहा ३१.२. दीधितिकृत् ५४.८. दृष्टिवाद ५१. २. देवसूरि ३२.४, ९:३३. ९. धर्मभूपण ५६. १; ३. नन्दिमुत्र ४०.१५,४१. २४. नन्द्यध्ययन ४२.१. नन्द्यध्ययनसूत्र ४०.१३. नैयायिक ५२.३१,५३. १८,२२, २४, ५४.६; ५५. ९,२८, ३२,५६. २८. नेयायिकविशेप ५३. १२. न्याय ५१.१९. न्यायदीपिका ५६. १. न्यायनय ५४. ७. परोक्षबुद्धिवादिन् ३१. ११. पार्श्वनाथ ३७, १९. प्रकीर्ण ५१. ६. प्रमाणनयतत्वालोक ५६ १७. प्राभाकर ५२.२१. प्रामाकरमत ३२. २०५२. ३०.

विशेषनाम्नां सूची
--बौद्ध ५१. १९, ५४..२२, ३०.
-बौद्धमत ५५. ३.
भरत (क्षेत्र) ५०. १८.
भादृपक्ष ५३.२१.
भारत ५०. १३, १४.
माणिक्यनन्दिन् ३१. ६.
मीमांसक ३१. ९, ५३. १८७२२.
..मीमांसा ५१. १९.
.यशोविजय ३१. १.
योग ५१. १९.
रत्नाकर ३२. ५.
वादिदेवसूरि ३१. ६.
विद्यानन्द ३२. २४, ३३. ९.
वैशेपिक ५१. १९.
सन्मतिटोकाकृत् ३१. ३.
सांख्य ५१. १९.
सामान्यलक्षणा (अन्य) ५४. ८.
सुमेर ३७. २०.
स्याहादरत्नाकर ३१. १८.
स्याहादिन् ३२. ३०.
सुखादिना सुखान्तेन लालान्तेन दिलादिना ।
महेन्द्रेण च संभूय कृतिरेपा समापिता ॥

72ples शुद्धिपत्रम् । अशुद्धम् b पंक्ति पृष्ठम् ३ ३२ व्यजना- ३२ शुद्धम् व्यञ्जना- सम्यम् एते' परिच्छिनत्तीति । -स्थानीयात्ततो प्रमाणान्तर- विलक्षणकादिः' पर्वतो वह्नि- वहिमानित्यु- २४ . . १२ ८ २७ ३० अन्ना- १३ २७ १६ साधने १३ ६ २९ २ सम्यग एते -परिच्छिनत्तीति स्थानीयात्तत्तो प्रमाणन्तर- त्रिलक्षणकादिः पर्वतोवति- वहिमाननित्यु- आना- साधने -राणा पद- चतुर्थः -भूतकिया- लधी० -ल्लासेनैका -भ्युगच्छन् स्थापनाभ्युप दृश्यत [ ६०] फलत्वात् स्वपरव्यसिति- -स्मदादि प्रत्य- रग्न्यादि ज्ञान इत्यन्तर्ज -निमितं २५ २९ २७ २८ -राणामुपद- "चतुर्थः -भूतक्रिया- लघी० -ल्लासेऽनैका- -भ्युपगच्छन् स्थापनानभ्युप- दृश्यते [विशेपा० ६०]. तत्फलत्वात् स्वपरव्यवसिति- -स्मदादिप्रत्य- -रग्न्यादिज्ञान- इत्यन्तर्ज- -निमित्त २९ ३२ ६ - ३२ ३३ ३२ ३५ २४ अभ्यास पाट अभ्यासपाट- २६ व्यञ्चना व्यञ्जना- . २४ उपधातः -पधाता- -पधात- मनोगतम् विकल्प पूर्विका उपधातः -पघाता- -पघात- २ मनो गतम् ३८ विकल्पपूर्विकाः पाटनक्रिया पाटन क्रिया ३९ २ व्यञ्जना- लब्धि ३९ १२ ग्रहस्य वि- ४० ३० २६ व्यजना- लब्धि ग्रहस्यवि- निश्चियो पुलीन्द- २७ शृगं ४९ निश्चयो पुलिन्द २८ शृङ्ग २७ nt

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Jain Tarka Bhasa

Author
Sukhlalji Sanghavi
Title
Jain Tarka Bhasa
File name
Jain Tarka Bhasa
Text
OCR done
Citation
1938
Published
2010/08
Publisher
The Sanchalaka - Jaina Granthamala
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Classification
Literature
DLI number
539610
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99999990070361.00
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