Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Dravya Nav Vichar Sangrah

Shri Pashrv Chand · 2011/07

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श्रीमनागपुरीय वृहनपगमाधिराज युगमारामारी जगमतीधेगदुरापमा
श्रीयुत् परमपूज्य सद्गुरु सट्टाको वातगंजमार्गमा यार !
याप श्रीमान् सेवक जनमनवांछितरफ त मा मो. ग.
पदेष्टा होगात्री भवित्रीधारक (नविजनतारनगर. मानोन ...
जब विधिपरंपरा पद धारक शुरू कियानुदानांनो, यानगगना गमगणाम.
बननातिापवंत, चारित्रपात्रकामति, मतांमाग्नतोनितो. पाने मुल मन.
मानसहंत दोर उग्रायेदार युक भारतमालमा विगेमा
कर्या करोडो. इत्यादि प्रातःस्मरणीय गुणोको नोभा मा.
थाप परमपिफारी गुरुगजना मागुन
महिना
न्य नय विचाराधिकरणसंग्रद नामक परम सानदायमा मामी
बत्यानंद पामुंछं ते बाप संवग कार स्वीकारी राजा जी !

चीर संवत २४३९
विजय राज्ये
धी भ्रा श्री
श्री भ्रातृ भ्रा श्री
श्री भ्रा त चंद भ्रा थी २
श्रीभ्रा च चंद्र चंद भ्रा श्री.'
भी भ्रा व चंद्र मुद्रत भ्रा श्री
श्री भ्रातृ चंदम् रोम् दूत भ्रा श्री
श्री भ्रात चंद्रम् रोश्वरी मद्र, तू भ्रा श्री
श्री भ्रा त चंद मरीश्च र श्वसूद
'भ्रा श्री
श्रीभ्रा चंद मरीभर स र श्वरीम् चं भ्री;
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नमोनमः
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शिवगंज नगरे थानार्य पद समगे मंत १६५ नागान नही "वजराज माज सॉलरो वसी पणा गयो "उपनेन रांगा गीगा। श्रीलातचन्द्र सूरिराजमर्यापर्क 1 जजरस है सने गु निगगिनायम ॥टेर ॥ संसारमेतमुग्मितुं समीदते यदा। मुनि यातुमिमि प्रमोदतम्तदा ॥ श्रीवानुवाद !! प्रवेशमीदसे यदा थियो निवेशने । तदा मनःप्रमारगे ममोदिवाने ।। श्रीवानुमायः ॥३॥ करालकाल एव संनिधौ समागतः । किमीकसे विनम्वर फलं हि रागनः । श्रीमान् ॥३॥ विदायकर्मशास्वमर्मधर्मकर्मणे | पीनुमोदसे यदा तदा गुशर्मगे॥श्रीनानगर श्रीपाचन्दसरिराजवंशदीपकं । मुमुक्तिराजमानिकाचनः ममोपकम् ॥ श्रीवानगम ॥१॥ तपः प्रकर्षनिर्जितोरुपञ्चसायकं । महानिदेशनासुबारसमसमान ॥ श्रीनाग-३० ॥ ३ ॥ नित्यानन्देन रचिता नाईलालेन गापिता । आचार्य बानुगडसादरवाला मुलाने ॥ १॥ नापाटीका । मित्र ! वाठित भयको देनेवाले, गुरु मुनिराज सानार्य श्री जाननाद ही गजमसगो सेवन फर टेर| जो कि तु इस संसारकी छोडना चाहता है, और जो मुक्तिको पाना गादता है तो इसे दे मित्र वांछित अपको देनेपाले ॥१॥ तूं बुझिके घरमें जो प्रवेशको गादी तो मेरे उपरेशमें मन फैला । है मित्र० ॥२॥ यह नयंकर काल पासमेंही पाया हुवा दे, रागसे पा घनित्यसुखको देख रहा है। दे मित्र० ॥३॥ जो कि तूं (सांसारिक) कर्मको छो- र पर्म करने के लिये शासक मर्मको सेना चाहता है तो मुक्तिके लिये हे मित्र० ॥४॥ (श्री सागपागणीप ) श्रीपार्धचन्द्रसूरीश्वरजीके वंशके दीपक, मुक्तिरूप राजधानीके मार्गो सनीप परवारी । दमित्र० ॥५॥ तपके प्रकर्षसे कामको जीतने वाले, व्याख्यानरूप अमृतरसके पा. नगाले ऐ मित्र वांवित प्रर्थको देनेवाले प्राचार्य श्रीवातृचन्द्रजी सूरिराज महाराजको सेवन कर ॥६॥ निपानन्दशर्माले बनाइ गई, और 'नाइलालजीले गाइ गइ, यद आचार्य श्रीमातृचन्दसूरी- घरजी पट्पदी मुखरूप कमलपर रदो ॥१॥ लो.मापनीजीयो जन्म पामेली.श्रीपार्श्वचंगवनी जैन हविसिंघ सरस्वती सन्ना भने सेवक मंगलदास. १ समीपयतीति समीपकस्तं मुकिराजधान्याः सामीप्यदर्शकमिति नायः।

REFEEEEEELERS आ पंचम कालनी अंदर विषय कपायनी लोलुपताने लीये के धन धान्यादिनो लाभ प्रान करवानी धामधूमने लीधे महान पुस्तको (आगमो-सिद्धांतो) ते सांभली विचारी मनन जेटली अवकाश अने समजशक्ति हाथ न होवाथी जैनागमनी अंदग्र्नु रहस्य आपणने प्रान यह शस्त नथी. केमके सागर समान अगाध भावभयौ सूत्रोने ध्यानपूर्वक अवलोफवां गई हानीशूनी वात नथी. महान् भूमंडलमांनी दूर रहेली के आगमनी अगम सूक्ष्म वस्तुओनुं निरीक्षण करखा माटे तो खास उमदा दुनिनीज जरूर पड़े छे. परंतु तेथी दुनिरूप ज्ञानचक्षुओ आपणां सतेज न होवाथी आपण तेवा सुक्ष्म विचारोने अंश मात्र पण जाणवा भाग्यशाली यता नथी. आपणी आ अडवणने ध्यानमा लइ अगाउथी ते श्रुतसमुद्र मंथन करी आपणे समजी शकीए तेवी भापामां आपणा परोपकारी पूर्वाचार्योए पृथक् पृथक् सत्य वा ओनुं रहस्य जाहेरमा आणी सागरने गागरमां समाधी दीधेल छे. जेथी गागरमां समायला सागर सम रहस्यनुं अवकाश S5-05 पूर्ण पगाहन वर्ग शारा बापने शफिमान् यइ शकिये. एज हेतुने अवलंबी आ विविध विषयवि. भूषित प्रथम पारणगुपाने प्रमिद्धमा लायया यत्न आदरेलो छे. मान युलासानी प्रमाणिक चर्चाओ आपणा अल्पमतिवंत अल्पसमयमां समजी शकीए पग पगरयो खपाना संबंधमां पूर्वाचायोंए उठावेलो अपार परिश्रम सफल थवा आपणे ए प्रकरणो भण-ना-सांभलवां के मनन करवां ए अवश्य आपणुं कर्तव्य कर्म समजवु योग्य छे, आवी मान्यताने लीधे आपणी एज फर्ज अदा करवाने माटे आ अमारो प्रथम प्रयास छे, ते तरफ सुलभ दापी आ धरस्वाननी वानगी वासवा तत्पर रहे, अवश्यतुं छे. आपणा पूर्वानारों निप्पेही, निरभिमानी, निलोभी, अप्रमत्त, परोपकारी, अममत्ववादी, तत्व- गोषी, हितनिता, स्वपगेन्नतिकारक, शाम्राज्ञानुगामी, निष्पक्षपाति, सत्यवक्ता, प्रमाणिक अने भाभीर हता. जेपी शंकाने स्थान आश्वानुं कारण नथी के तेमणे टाढा पहोरनां गप्पां जगतजी- पोन वनवा माटे हास्यां हो. तेओनां तो संकः वचनो अक्षरशः मान्य करता योग्य छे. SLES ०१॥

ru "SLUGRESSES-SER. + । साना पाग, करी, वनमां, उपाश्रय, के भयंकर स्थलोमां रही, आपणा उपकार माटे अंगो निर्माण कला के. तेओए पंथ वधारखा, किंवा शिष्य संततीनो इंडो जमावया के गशनी आकांना आदि सारंगग- णताने अवलंबी वाक्यजालमा वाल जीवोने फसाना उद्यम आदरेल न हतो, तो पछी तेवा परोपकारी प्रमाणिक प्रभाविक पुरुषोनां वचनाने स्वार्थीवचनो मानवां ए आपणी भूल नहि तो चीजें शुं गणाय ? एमनां विशुद्ध वचनाने हेयाना उमलकासाप हीरा मोतीची वधावी लेबांज जोइये छ, आपणा मुख्य पूर्वाचार्यजी के जेमनां रखेला प्रकरणी आ पुस्तकनी अंदर विशेष छे ते श्री पार्थचंद्रसूरीश्वरजी महान् प्रभावशाली पुरुष हता अने जनशासनना उत्तमोत्तम उद्योतकारी होवाथी अद्यापि लगण तेमना वचनानुसार चालनार हजारो सेवक विद्यमान छे. तेओ साहेवजी आयुराजनी तलेटीमां आवेला हमीरपुरमा संवत १५३७ नीसालमा जन्म घरी पोखाडवंशी, वेलगशाह पिता अने विमलादेवी माताने महत्तावंत का हता, ते कुसाग्र बुद्धिवंत महत् पुरुपने विद्यातो सुप्रसन्नज हती, -- नगज ने गुलभपोपी ना. जेपी गुगराज श्री साधुरत्न पंडितराजना उपदेशथी बोध पामी मेरत १५४६ नी मालमा फक्त नप वपनी किशोरखयमांज दीक्षा अंगीकार करी कुलनो उलार को हनो. मरुधरना सुरतरु सदृश जनमनपरितपूरक अने पुष्करावर्त मेघसमान हृदयक्षेत्रने रसाल करनार देशनावंत पंडितगज श्रीसाधुरनजीनी कृपाथी नवदीक्षित मुनि शास्त्रोना पारगामी थया भने नेपी हृदयक्षेत्रमांधी तत्वज्ञानांकुर स्फुरायमान या संवत १५५४ नी सालमा उपाध्याय पदना । अधिकारी या. ए ममयमा जनसमुदायनी अंदर शिथिलाचार विशेष वधी पडतां क्रियानुष्टान विधिविपरीत पता करना हता. एधी शिष्टाचारनी प्रवृत्ति करखा त्यागी वैरागी सौभागी महदात्माए गुरुराजनी आता मंपादन करी संवत ९.५६५ नी शालमा क्रियाउद्धार करी शिथिलाचारने धीरे धीरे दूर करवा भगन्धि प्रपन्न आदया. - भ०२ HESHELFERESTLERESEREGA करी, जेथी भक्तजनोनी भावश्रेणीने वृद्धि साथे भेटाडया सर्वानुमतनी ऐस्यता यता पोने मृरिशद अंगीकार करी आचार्यताना गांभीर्य अर्थने शोभाववा लाग्या. प्रमादी बनेला साधुसाची श्रावक- श्राविकाओने सिद्धांतानुसार धर्मोपदेशना तचवडे जाग्रत करी शुद्ध क्रियानुष्ठान भारी बनाया एक सरखो विचार राखी अमलमा आणता भारत भूमिना घणा भागोमां मिथ्यांधकारनो अभाव कयों तेमज महान् सूत्र सिद्धांतोतुं दोहन करी साररुप वालाबोध अने भाराना ग्रंशे तयार करी भव्य जीवोने भवतारक मार्ग खुल्लो मुस्यो. एओ सूरीश्वरजीमा उत्तमोत्तम काव्यशक्ति हती. तेथी संस्कृत, मागधी भाषामा अने प्राकृतमा विविधविषयमां काव्य रची चमत्कृती जाहेरमा लावी पोते आपणा उद्धारक थया. एटलुज नहीं पण भारतवर्पनां दरेक शहेर अने बनता लगे दरेक गामोमा विचरी असंख्य संकटो सहन करी भव्य जीवो हितार्थ जेन ज्ञान डारो तपासी जे जे तत्व प्राप्त थयुं ते ते परोपकार निमित्त जाहेरमा मूकी अनेक जीवोनुं श्रेय कयु. raditainavintri.naman मनार महदामाधीए नेला प्रकरणो पैकी यकिंचित् जे हाथ लाग्यां तेमानां थोडांक पानगारर मिद्धिमा आणवा आ पद द्रव्य घभाव नयविचारादि प्रकरण संग्रह नामक पुस्तक पाट फरखामा आप्यु के, अने एधी मानवाने कारण मले छ के तत्वग्राही पुरुषो तत्वसंग्रही पोतानी सहभारना भर्या ज्ञानमा वृद्धि करी वर्गमां विराजेला तेओ महदात्माश्रीने आत्मानंद अर्पशेज. मा पुस्तामांनां प्रकरणोमां शुं शुं रहस्यो समायेल छे ते जाणवा माटे कहेवानी जरुर छ के नीचे वतावेला प्रारणो तथा स्तवनो, स्तोत्र चैत्य वंदनो, स्तुतिओ सझायादि अंदर सिद्धांतोनुं दोहन करी जैन सिद्धांतोनु केआराधन करवू ते स्पष्ट वतावेल तेना विषयानुं क्रम निचे मुजब छे. १ पद दव्य स्वभाव नय विचार, २ श्री अरनाथजिन स्तवन,३ आवश्यक अक्षर प्रमाण स्वा. प्याप, ४ मोहवल्ली स्वाध्याय, ५ शीलनो रास, ६ पट द्रव्य स्वाध्याय, ७ नेमि राजुल प्रीति, ८ नमि राजुल चारमासी, ९ स्धूलिभदनी सम्झाय, १० स्थूलिभद्रनी सज्झाय,११ श्री सीमंधरस्वामीनुं म्नान, १२ अथ श्री सीमंधरस्वामीनुं स्तवन १३ अधश्री वीरजिणंद आलोयण स्तवन, 1. १४ अथ |माशा श्री शांतिजिन स्तवन, १५ अयश्री नेमिजिन स्तवन, १६ अयश्री आदीयर स्तवन, १७ अयश्री रुपजिन स्तुति, १८ अयश्री पार्थजिन स्तुति, १९ अयश्री महावीगजिन म्नुति, २० अपश्री नेमिजिन स्तुति, २१ अथ श्री शांतिजिन स्तुति, २२ अयश्री नेत्रकुट परिपाटि, २३ अनमी सम्प. कत्व दीपक दोधका, २४ अयश्री श्रोता परीक्षानी सज्झाय, २५ अयश्री ब्रह्मचर्यवत दिएनाशिका, २६ अथश्री वीतरागाष्टक, २७ अयश्री पांसग यंत्र उद्धारमय श्री चोविशजिन स्तोत्र. २८ अपश्री : पार्थनायजिन स्तोत्रम्, २९ अथश्री अनंतनाथजिन स्तवन, ३० श्री चतुरिसतिजिन स्तुति, ३१ श्री जिनेंद्र स्तुति. ३२ श्रीपंचतीर्थ स्तुति, ३३ श्री वीशविहरमानजिन नमस्कार. ३१ श्री जिननाम रक्षास्तोत्रम्, ३५ श्रीरुपमादिजिन स्तुति, ३६ श्रीपार्थजिन स्तोत्रम् , ३७ श्री आदिनापजिन स्त- वन, ३८ श्री मुनिसुव्रतस्वामीनुं स्तवन, ३९ श्रीउपदेश रहस्य सम्झाय, ४. श्री वीसस्थानक ता. नी सन्झाय, ४१ श्री एवंति सुकुमालनां चोदाली, ४२ यावनवमक गर्मित रहनेमिजीनी स- ज्झाय, ४३ श्रावक वारस्वतनीसम्झाय, ४४ सती मुभद्रा सम्झाय १५ श्रीमती अंजनामुंदरीनी

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श्री शांतिजिन स्तवन, १५ अयश्री नेमिजिन स्तवन, १६ अयश्री आदीया लान, ११ अआयी रुपजिन स्तुति, १८ अयश्री पार्थजिन स्तुति, १२, अयश्री महानीगजिन म्नुनि, २० अगभी नेमिजिन स्तुति, २१ अथ श्री शांतिजिन स्तुति, २२ अपक्षी वाट परिपाटि, २३ अयश्री मम्प. क्व दीपक दोधरा, २४ अपश्री श्रोता परीवानी सन्याय, २५ अयश्री ब्रह्मान दिसंचाशिका, २६ अयश्री वीतरागाष्टक, २७ अश्श्री पांसटा मंत्र उद्धारमग श्री गोविशजिन तीन. २० अपश्री पार्श्वनाथजिन स्तोत्रम्, २९ अथश्री अनंतनापजिन स्तवन, ३. श्री नतुमिनितिन मुति, ३१ श्री जिनेंद्र स्तुति. ३२ श्रीपंचतीर्थ स्तुति, ३३ श्री वीशविहरमानजिन नमस्कार. ३१ श्री जिननाम रक्षास्तोत्रम्, ३५ श्रीरूपभादिजिन स्तुति, ३६ श्रीपाश्रजिन स्तोत्रम् , ३७ श्री आदिनायजिन स- वन, ३८ श्री मुनिसुव्रतस्वामीनु स्तवन, ३९ श्रीउपदेश रहस्य सन्माप, ३. श्री वीसस्थानक ता- नी सझाय, ३१ श्री एवंति मुकुमालनां चोहाली, ४२ बावनयमक गर्मित रहनेमिजीनी म. ज्झाय, ४३ श्रावक वारणतनीसम्झाय, १४ सती सुभद्रा सम्झाय ४५ श्री सती अंजनामुंदरीनी १.४॥ HERUSSES सज्झाय. ४६ श्री दशारणभद्रनी सज्झाय, ४७ श्री गुरुगुणनी सज्झाय, ४८ श्री प्रसन्नचंद्र राज- पिनी सज्झाय, ४९ श्री शत्रुजय मंडन आदिनाथ स्तोत्राटक, ५० श्री विषयविकार त्यागनी स. इझाय, ५१ श्री जिनेश्वरदंडक स्तुति, ५२ सासु बहुना झघडानी सज्झाय ५३ श्री वर्द्धमानजिन स्तुति, ५४ अध्यात्मनी सञ्झाय, ५५ श्री वर्तमानचतुर्विसतिजिनेश्वरस्तुति, ५६ शी जिनपालित जिनरक्षित स्वाध्याय, ५७ श्री जीरावला पार्श्वजिन स्तोत्र ५८ श्रावकवत शिक्षानी सम्झाय, ५९ श्री युगादि देव स्तुति, ६० श्री आचारंगसूचना लोकविजायाध्यननी सज्झाय. ६१ अथ श्री शाम्र पूजाष्टकम्, ६२ वेसठ शलाका पुरुपरन स्तवन, ६३ निंदा परिहारनी सज्झाय, ६४ श्रीजीरापल्लि पाटक आदीश्वर जिन स्तुति, ६५ अस्वाध्याय विचार सज्झाय, ६६ प्रीति छत्रीशीनी सज्झाय, ६७ अथ श्री राजर्षि सुकोसलजीनी सज्झाय, ६८ श्री जिन आज्ञानी सज्झाय, ६९ अथ श्री सनंत. कुमारजीनो रासो, ७० श्री वीर प्रभुना अग्यार गणधरनी स्तुति, ७१ श्री गौतम स्वामीनी स्तुति, ७२ श्री फलवधि मंडण पार्श्वजिन स्तवन, ७३ श्री सुमतिनाथ जिन स्तवन, ७४ श्री सीमंधर जि. visites मरा SARSHAN नवर स्तवन, ७५ वर्तमान चोवीश जिन मेत्यवंदनम् , ७९ श्री समेतशिखरजीनु स्तयन, श्री वासुपूज्य जिनराज स्तवन, ७८ श्री पार्श्वनाथ जिनवर स्तवन, ७२ आत्मशिवानी समाग, .. श्री रुषभदत्त ने देवानंदजीनी सग्याय, ८१ श्री मेघकुमार मुनिनी सज्झाय, ८२ रात्रिभोजन नि. वारक सज्झाय, ८३ श्री नंदिपेण मुनिनी सम्झाय. ८४ पाक्षिक प्रतिक्रमणनी स्वाध्याय. ८५ श्री धर्म जिनस्तवन. ८६ श्री पार्थनिन नयन. ८७ श्री महावीर स्वामी स्तवन. ८८ श्री पार्थजिन स्तवन. ८२ श्री विमलजिन वासुपूज्यजिन स्त. वन. ९० श्री शत्रंज्य मंडण आदिजिन स्तवन. ९१ श्री महावीर जिनवर स्तवन. ९२ श्री माम स्तुति प्रारम्भः ९३ श्री पार्श्वनाथवेत्यवंदनम्. ९४ श्री जिनेद्रस्तुतिः ९५ श्रीवास्तव्यस्तुतिः ९६ अथ परमात्मस्तवः ९७ श्री पार्श्वनाथस्तुतिः ९८ श्रीधरणोरगेन्द्रस्तोत्रम. ९९ श्री महावीर गुणस्थानसूचिका विज्ञप्तिः १०० सामान्यनीतिस्लामाला. १०१ श्री सिद्धानलवेल्यवंदनम्. १०२. श्री युगादिदेवचेत्यवंदनम्, १०३ महावीरस्वामि चैत्यवंदनम् १०४ गिरनारमंडन श्री २UFSC --1404 ANSamabi FREGE नेमिनाथ चैत्य वंदनम् . १०५ श्री पार्श्वीजनवैत्यवंदन. १०६ सुभापितव्याख्यानसंग्रह. (१) प्रथम व्याख्यान, (२) व्याख्यान बीजु (धर्मरुपी कामधेनुं वर्णन.) (३) व्याख्यान त्रीजु ( मायामाय संसारचक्रमां बावन अक्षरनी संख्यामां शास्रो निर्माण करेल छे)() व्याख्यान चोथु (शरीरनी अनित्यता दर्शावी छे) (५) व्याख्यान पांचमु (संसारनी असारतानुं वर्णन) (६) व्याख्यान टुं (दश दृष्टांते मनुष्य जन्मनी दुर्लभता वताची छे) (७) व्याख्यान सात, ( मनुष्य जन्मनी उत्तमता बताची छे) (८) व्याख्यान आठK (शोक निवारणार्थे उतपणानासमय अगर शोकवंतनेशांति आपवानुं यताव्युं छे) (९) व्याख्यान नयम (धर्मना चार पापा संबंधी) (१०) व्याख्यान दशमुं ( मनुष्यजन्ममां गृहस्थनी करणी) (११) व्याख्यान अगीआरमुं (मनुष्य जन्ममा गृहस्थने जिनेश्वरे प्रणितधर्म पालन करवाथी सरलता) (१२) व्यापान वारk (श्राव. कनु कृत्य समाध.) १०७ श्री वैराग्यशतक, १०८ श्री जिनेश्वरमार्थना, १०९ अथश्री आदिजिनेंद्रनेत्यपंदन, 14 ११० पंचपरमेष्टिस्तोत्रम्, १११ श्री सिद्धगुणस्तवना, ११२ श्रीगोडी पार्शनायजी-म्नोत्र, ११३ श्री गोडी पार्श्वनाथजी स्तोत्र. ११४ अथ तत्वविचारकर दुहा सोरठा, ११५ श्री धर्मनान जिन न. वन, ११६ श्री पार्थनाथ जिन सवन, ११७ श्री महावीर सामी सवन, ११० उपदेश वत्रीमी, ११९ पुप्पो मारे असत् आप दाताओ ने उत्तर, १२० श्री पार्श्वनाथ जिन मान, १३१ श्री गि. मळजिन वासुपूज्यजिन स्तरन, १२२ श्री जिनेंद्रस्तुति, १२३ आत्महितोपदेश. ( इत्यादि वीजा विषयो छे.) आ प्राचीन पूर्वाचार्य निर्मित्तग्रन्योर्नु अवलोकन करवायी वाक्वर्गने प्रमोद सार प्रतीति मलशे के आपणा ऊपर पूर्वाचार्योनो फेटलो बधो (अगास) उपकार ?!! अने एनो बदलो कोई पण वाली शकीए तेम नथी; तथापि एमना गुंथेला पुष्पगुच्छम्प आ ग्रन्याशनी मुगासनाना भो- गी भ्रमर जो के तत्वरुप मकरंद ग्रहण करी पोतानी आत्मोन्नति करया प्रवर्त थइ ए तो आप कंइक सहतांते पण बदलो वालवावाला गणाइये अने ते पूज्यपादना अमर आरमाने पुण्यना मा.

SIRESORSP-र भीम अनु ए शिपापना अपमहान पुरषोनां करेला पण प्रकरणो सोत्र स्तवनो स्तुतिओ सझायादि मा पुरनामों होगी नेभोनी, अने जंगमयुगप्रवर आचार्य भगवान् श्री भ्रातृचंद्रसूरीश्वरजीनी कृ. पापनादीनो आस्वाद अनुभवी आनंदमान घइ धर्मध्यानमां तत्पर रहिये तो सर्वना श्रमनी सफ- लता जर रहेल! आ प्रथमा कोइ गुफ सुधारवामां, लेखमां समजमा अशुद्धि रही होय तो ते संबंधी हुँ मि. कामिदुरई दइ निदोपतानो संगो थाउहुं, अने इच्छु के-सदा सर्व जैनवीरो आवां रहस्य गर्भित पुस्तको पाट करवामांज तल्लीन रहे एवीज शामनदेवनी प्रेरणा याओ ! शांतिः शांतिः शांतिः सेनत १.६९ वीर नंवत २४३९ महदात्माना चरणांवुजनो मधुप नने. १९१३ पर्युपगाव. मंगलदास. ॥१०६ 4 शुद्धिपत्र. 'पृष्ट पंक्ति पंकि সৎ यखम शु६ अखंक G ए ARRImस्-ि ३ ४ ५014-04-7-26 अशुद शुक्ष दृष्ट विचार विचारो १७ श्रोत्रं श्रोत्रं जीवनो जीवन २३ को UG चारियवरण चारित्रमादनीय धन च्यास्तिक श्यार्थिक त तनाथी तेनायी ५० ५ ५ ५ कडं जोय बार संबंधि चरित्र कीधी जोये चारए संबंध चारित्र कोचो व

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~- पृष्ट पंक्ति अशुभ पृष्ट शुई गुण पंक्ति अशुभ गुम शुद शीसे राग रंगे-सत्यशीले रा- नवि रमे गरंग नव नव रमे H गा, १ परेर वेग नाम् ११२ जग ५ जागी पाधि चिने rya अरेरे वेगे नावम् कस्पाप्य प्रतिमा सातदात्र पत्रिमार घाव चिंते ४ कस्याप्ये ប १ प्रतिचा सातदाता सुकल ता ४ सकस तो आपणो Mainni na ... पानमार १९१३ ५ यापणा

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यशु६ शु६ शुरु पृष्ट २५६ १५६ १५० १५७ ६ १ पंक्ति मगुत १३७ ५ कर १६ए ६ शोगा १२० ३ नर्क ज धनु १०३ सुखदः १५ जणे पुत्रने अनायाथ. ममा तुंपी ४ SAALHESESEASORINE-HERS तुतु पाख ३ ३ १ माट मोगा नर्स उन् सुबह मांगी कुबेर सेना वेश्याए श्रावसोना बा. र त अंगी- कार का भने कुवेरने ज तनु पाखि माटे पुरुषो वेश्या कायो खेललसंधारण १६४ १६५ १६५ १६६ ४ पुरुषा शा कायों उ ५ खेसजन सम गु०प० पक्ति २०४ १ पृष्ट २१ए २२२ २२२ २२५ यशुद जवी मर्ख जयो जप ते मदोन्मत्त प्रोकत गणाप त मदोन्ममत पोकत १० जेवी मूर्ख जेमो २०७ २०१ ६ SasasaraRITRA1-२३973+' यह यह ट १ হইহ ने १० १० - १ २१५ २१५ २१५ or सूत प्रसन्न वीर जाये EEN प्रसन्न वोर जावे २ १० २२६ २३३ वा FAM अनुक्रमणिका. ... .. ... ... फर्मा निषण. १ पहप्प समारनय विचार २ श्री आनापनिन स्तन २ मावश्यक रममाणसापाय ४ मोदराठी भाष ५शीलनो रास ६ परम्प स्वाध्याय ७ अपश्री नेमि राजुल मीनि, ८ नेमि राजुल बारमासी, ९ स्यूलिभदनी सम्झाप १० स्थलभदानी सम्माय १८ २० २२-२१ ... ... ... ... ... ११ श्री गीगामी मान १२ पप श्री मीरामिन पार ११ प्रग श्री जगदपावोगग म्नान १५ मा श्री नांगिनिन गान १५ प्रय श्री नामनिनमान १६ भगधी भाटीगर मान १७ अपश्री कामानिन स्नान १८ मयश्री पाभनिन नुनि १९ प्रपश्री मानीनिन स्तुति २० अयश्री नेमिनिन स्तुनि... १८ .. .. ... ... ... ENTREntr . ...

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जो मारना गाहारीमा
बार गिरनपत्रीनीपानाप ८२
भाारसा बानी मन्त्रा
r. मी पुन: मात्राप
...
...
...
८८
...
32
...
.

R ... ५८ श्रासन मिसानी मात्राम ५. श्रीपाद नति " पानारंगमरना योकरिनारायननी ... .. ... ८७ १८ ... .. ... " findia..kart. विषय ५५ श्रीमती अंगनासंदरनी महार... ४६ श्री दशारणमनी मम्साप ४७ श्री गुरु गुणनी सम्झाग भगनचंद्र रानगिनी सम्मापः भागय मंटन भादिनाय तोपाष्टर ८८ पिपविकार त्यागनी मम्साप ८९ जिनपर दंडक स्तुति ८९ " मागु पहुनी झपानी सम्माय पदमाननिन स्तुति ५४ अध्यात्मनी मरसाय ५५ श्री वर्तमान पतुसिनि निनेश्वर स्तुति ९४ जिनसालिन मिनरपिन साप्पाप " मीरापला पागिन स्तोत्र ... .. ... ६१ अथ श्रीनाग नाटकम् १२.गट का मास्न मान ६ निदा पारनी गाय ६५ श्रीनीरानीमराटक सादरनिन ना" १५ प्राध्याय गार गाना २६ मीनि पचीसीनी मग्माण ३७ प्रय श्री रानति कोमलतीनी मामा ११ १८ प्रीमित मागनी सम्मा २९ मा श्री सननकुमारीनो रामो .. ... ... ... PAR1.299

१
मनुकाम.
..
...
.
मीनिभिन स्तुति
६ भएकी र परिपारी,
३ अपक्षी मायादीपरु दोषणा
१४ अपनी पोना परीक्षानी सम्झाय
२५ मी प्रारमन पंचशिका
२९ अभीपाक
.. पपी पमा उदारपर श्री
परिसीमन मात्र
२४ श्रीवानापग्नि साम्
परी अनामिन सरन
पतुर्विमामिन नुाने
मिनेस्तान
१ नुति
फ्रांक
विषय
ए
१ श्री यीशविरमानजिन नमस्कार
जीननाम रक्षास्तोत्रम्
७२
१५ श्रीपभादि जिन स्तुनि
७३
२६ श्रीपाचीनन स्तोत्रम्
आदिनाथामेन स्तवन
१८ मुनिमुवनस्यामानु स्तवन
३९ श्रीउपदेश रहस्य सम्झाय
३९ अ मेयकुमारनी सम्झाय
४. श्रीधीशस्थानक तपनी मरझाय
एवंति मुकुमालनां घोटालीमा
१२ पारन यमक गर्भितरह नैमिनीनीसम्झाय ८२
१५ श्रारा यार प्रतनी परशाय
८३
४४ गती शुभदा गरमाग
७७
८०
"
...
॥१०॥

RSSEURNE + ... ... ... ८७ ... ... .. " ... " 35 क्रमांक विषय ४५ श्री सती अंजनामुंदरीनी सज्ज्ञाप... ८५ ४६ वी दशारणभनी सम्माप ४७ श्री गुरु गुणनी राज्याय ४८ प्रसमचंद्र रामपिनी सम्झाय ... "युंजय मंडन आदिनाप स्तोत्राटक ८८ विषयविकार त्यागनी सम्हाप जिनेश्वर दंडक स्तुति " सासु पहनी झयहानी राज्झाय ९२ वर्द्धमानजिन स्तुति ५४ अध्यात्मनी सम्झाप ५५ श्री वर्तमान पतुषिसति जिनेश्वर स्तुति ९४ जिनपालित जिनरक्षित स्वाध्याप मीरारला पाषंगिन स्तोत्र क्रमांक विता ५८ धानावन पिसानी मग्नाग ५९. श्री गुगादि दो नति ?? আধাঘনা বিলাসী गझाप ६१ भप श्री गाय पूनाष्टकम् ३२ प्रेठ गलाका पुरुष रत्न स्तन ६३ निंदा परिवारनी मनाप १०३ ६४ श्रीनीरापयिटक गादीपर मन मनाने १०७ ६५ असाध्याय विचार मन्त्राय १०८ ६६ मीनि छधीशीनी सम्माप १०१ ६७ अथ श्री रानपि पुकोसलनीनी सम्माप १११ ६८ श्री जिन मामानी सम्झाय ६९ अथ श्री सनंतकुमारजनो रासो ... ... " ....MISet-15150 ... ... ... ... ९७ मगुफम. ... विषय INUE पान पसारनी ५. तपर्ण) १८०-१८८ (पान ( दश . नारमनी दुषमा नारी) १८८-१९६ (ORINन साग, (पनुप ज. मी रामानी) १९६-१९९ (८) न भाउ (सोक निरा- रारपाना मरप अगर ने नि भाग र. गा) १९९-२०३ (नगर (पना पार पास्पनी करणी) २०५-२१० (११) व्याग्यान भगीभारमुं ( मनुष्य जन्मा हत्पने निनेपर प्रणि- तपर्म पालन करवाथी सरलता) २१०-२१३ (१२) व्यापान पारमुं (भारफर्नु हत्य व्याख्यान संग्रह समास) २१३-२१५ १११ श्री राम्प सनक २१५-२२५ ११२ जीनेश्वर प्रार्थना १११ अप श्री आदिनीनेद्र चैत्यवंदन... २२६ ११४ पंचपरमेष्टि मात्रम् १२७ ११५ श्री मिदगुण स्तवन २२८ गोरी पानापनी-मोत्र २२९ गोरी पानापत्री-लोष २२५ " ... ... ... - ११.) META (मनुष्यमम्मी AND- Nepartim पृथ विषय पृष्ट ... ... ... ... ... २४१ २५२ २४२ ... .. विषय ११८ बप सतविचाररुप दुहासोरठा २३० २१९ श्री घनाय जीन स्नान २१२ १२० पार्थनाय जिन स्तवन २१३ श्री मावीर स्वामी स्तवन १२२ उपदेश धीमी २२५ १२३ पुप्पोमाटे असत् भाप दाताओने उत्तर२१७ १२४ श्री पार्थनाय जिन स्तान निमन जिन वामपूज्य मिन तान २११ १२६ मिनेंद्र स्तुति २३९ कांक १२७ सझाय १२८ अष्ठ प्रवचन माता सझाय १२९ गत चोवीसी स्तवन १५. वीस शिरमान जीन लवन २१ अनागत पतुर्दिसति स्तान १३२ श्री पार्धजीन स्तवन ११३ आत्महितोपदेश ... ... २४४ ... .. Steub8V5Geet२२:09-५ .... ... ... ...

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॥ परम पुरुष मणी-धीप्रान! ॥ अथ श्री पद्रव्य-स्वभाव-नय विचार लिख्यते. ॥ rdika- 4-4-11.. श्री जिनागम वोदित्य, संसारार्णव तारणम् ॥ ममेदे दर्शित पेन, तस्मै श्री गुरवे नमः ॥ १ ॥ १. धर्मास्तिकाय, २. अधर्मास्तिकाय, ३. प्राकाशास्तिकाय, ४. काल, ५. पुद्गलास्ति. काय, ६. जीवास्तिकाय, ए पश्य श्री जिनशासनने विषे कहा, वीजे दर्शने न पामी, ए पम्पनी इत्यजाति तथा पर्याय वादे आदितमा अंत नथी, ए मध्ये कासश्य वर्जीने पांच झपने अस्तिकाप APRILPAPER

११॥
०स०
पदोए. (प्रस्तपः प्रदेशास्तपांकायः समूदः) मस्तिकाय प्रदेशनो जे समूद एटले ढगलो, ते भ-
स्तिकाप वदोए. कापश्यने प्रस्तिकाय न कदीए, जे माटे.कालना प्रदेशनो ठगलो नथी; एक
समप बीजा समपने न मळे, ते माटे वर्तमान समयरूप तेज वस्तुगते कालश्य . अतीत एटले
के विणली गयो, अनागत ते दजी उपन्यो नथी, ते माटे अतीत कास, अनागत काल ते परमार्थे
प्रवस्तु . व्यवहारे अतीत, अनागत काल कल्लीए. एज माटे यागमने विपे असंख्याता समय
मळे प्रापर कदोए. प्रसंख्यात प्रावलीए अंतर्मुहुर्न कहीए. एवं उत्सर्पिणी, अवसर्पिणी, काल-
पा पुसारापनादिक वर्णव्पा . पुनः अनंत पुनसपरावर्त्त गये ते अतीत काल थाय,
मनागत काल प्रनीत काल करतां अनंतगुणो थाय. शा माटे जे समय प्रावली मुहूर्नादिक जाय
ने ते प्रतीत कालमा जळता जाय ठे, तो पण धनागत कालनो अंत नश्री आवतो. खुटतो नश्री
ते मारे मतात कासयी अनागत काल अनंतगुणो करो..जेम अनागत कालनो अंत. नश्री, तेम
मनीन कासनी प्रादि नयी.ए यनिमापे वे प्रतीत तथा अनागत सरखा थाय. इत्याविक सर्व
॥१॥

व्यवहारने अप्रै.कन्धित , परमार्थे वर्तमान समय तेज झाला, ते माटे पालन पोशाना समूदना अनावश्री अस्तिकाय न कहीए. ए पम्कानां नाम कयां.को तेनां सहन कई . ॥ प्रथम धर्मास्तिकायनां लक्षण कहे के.॥ स्वनावे गति परिणामे परिणम्या जे पुमतझय, जीवश्य तनुं जे परेका कारण नियमन व्यापार रहित प्राधाररूप नदासीन कारण ते पास्तिकाय, जेम गमनागमनादि क्रिया पनि, माउलाने जल धापाररूप अपेक्षा कारण ने, तेम धर्मास्तिकाय जीव पुनलने गमनक्रियाने विरे आधाररूप कहो. धर्मास्तिकाय विना जीव पुमत वाली के नदी, जे अगदर्शनी १. नकरण, २. अपदेपण, ३. पाकुंचन, ४. प्रसारण, ५ गमन, ए पांच कर्म माने . १. नन्देपण ते नो नांवो. २. अपकेपण ते देठत नालो. ३. आकुंचन ते संकोचलो. ४. प्रसारण ते विस्तारतो. ५. गमन ते चालतो. ए प्रकारे पांच कर्म मान वेतनमास्तिका मानता नयी, तेने कारण विना गमनादि कार्प न पाप. ते माटे धर्मास्तिकाय अवश्य मानगो. अने oo एस. ( RATE काममा) मल्लिकार मानो जे समूत्र एटाले नगतो ते म. Frmana. पाने काय न दोर, माटे कामना प्रशनो दगलो,नयी, एक *६१३ । समापने न म ने माटे वर्तमान समय तेज बस्नुगते कासश्य रे. मतीत एटने tamil गयो, नायर ने जी उपन्यो नमी, ते माट प्रनीत कास, अनागत काल ते परमायें पदारे प्रोत, नागत कार कलीए. एज माटे यागमने विषयसंख्याता समय गया। सोए. अमरूपात मारलीए अंतर्मुहुन कहीए. एवं उत्सर्पिणी, यवतपिणी, काल. पर भरावाहिक बर्षमा उ. पुनः प्रनंन पुलपरावर्न गये उत यतीत काल पाय, न र FIR दान करता प्रनगुनो वाय. या माटे जे समय यावली मुठ्ठादिक जाय Kान शरम नळना जाप ने, नो परा अनागत कालनो अंन नयी यावतो. खुटतो नयी २R न का नागन काल अनंतगुणो कठो. जेम अनागत कासनो ग्रंत नयी, तेम | निसी.ए अनिवाये वेपनीन तपा मनामन सागवा किसी व्यवहारने अर्को कधित चे, परमार्थ वर्तमान समय तेज कालस्य, ते माटे कारने प्रदेशमा समूदना अनावधी अस्तिकाय न कहीए. ए पम्कयनां नाम कमां. दो तेनां सरण कई ॥ प्रथम धर्मास्तिकापना लण कहे ठे. ॥ स्वताचे गति परिणामे परिणम्पा जे पुनलय, जीवजय तनुं जे अपेका कारण परिगमन व्यापार रहित आधाररूप उदासीन कारण ते धर्मास्तिकाय. जेम गमनागमनादि क्रिया परिणत, माउलाने जल आधाररूप.अपेका कारण , तेम धर्मास्तिकाप जीन पुमलने गमनझियाने विरे आधाररूप कहो. धर्मास्तिकाय विना जीव पुजल चाली शके नही, जे अन्गर्शनी १. नकेपण, २. अपझेपण, ३. श्राकुंचन, ४. प्रसारण, ५ गमन, ए पनि कर्म माने . १. उत्क्षेपण ते उचो नांखयो. २. अपक्षेपण ते देठस नांखयो. ३. माकुंचन ते संकोचतो. ४. प्रसारण ते विस्तारवो. ५. गमन ते चालतो. ए प्रकारे पांच कर्म माने . ते घमास्तिकाप मानता नथी, तेने कारण विना गमनादि कार्य न पाप. ते माटे धर्मास्तिकाय अवश्य मानवो. अने trentntrittendra

Halai . ।
अनिमान !
isit at kat * TIMनमा गनिन विनि.
411 mitra 2017 परीस, मोदराजतोकप्रमाण, राय.
* । ४.३६ २५.२, २३ नमन, पान मादित, पाठ महादिन, गुणयी
tate प न मा. नटसी वस्तु ते अनंत धर्माम्मक,
* ARE मुकर नदी, ना-नम, वर्मा नकापने विरे यासंदयात
य, २५ पर. इन विपर, निधना, प्राणीप, एकमयप', ने
Acem: न पनपनीने रहावे.
॥ हवे अपमान्निकापर्नु सग कह .॥
२६६ र सारा परिदमा जे पुत्र जीवजय नेनो स्थिनिना तु चोदा.
IAS इन इस प्रतिपकर कोर. जेम-बीनने नाद (राने)
1131

amantrinsimplette गया सदाय कारण ने. तेम जीव पुजत पासताने अपमझग जोरानी यिनि गने नी, स्थिति करतां सदाय थाय. अधर्मास्तिकाय झ्यग्री एक, क्षेत्रयी सोकप्रमाग, कालग्री सनात अनंत, नावणी पांचवर्णरहित, वे गंधरहित, पांच रसरवित, याउ परिहित ने. गुणयो यि. तिगुण. ए पण असंख्यात प्रदेशमय अरुपी, प्रक्रिप, मतिज्ञान, श्रुन झानानि विगत्व यादि अनंत धमीत्मक , ॥ हवे आकाशझपर्नु सक्षाण कहे . ॥ सर्व झ्यने जे सर्वदा साधारण सरखो अवकाश मार्गस्थान मारे ते साकागास्तिकाग - दीए. आकाशास्तिकापना वे प्रकार वे. एक लोकाकाश, बीजो अलोकाकादा. धर्म अपमाविक स. दित ते लोकाकाश कदीए. धर्मास्तिकापाविशनो अनाय ते प्रलोकाकाश कहीए. ते असोकाकाश अनंत , सीमा (मर्यादा) रहित वे, एतावता (एटले तेनो छेद ) नयी कोरक एम कदेशे जे, जेम लोकनी पासे प्रलोकनो अवधि , अंत , तेम मागळ परा अंत दशे? तेने कदीए जे लोक लोसा ATRोक मोसानो प्राधि पटे, पण आगळ केवळ अन्नावन मलाका• पपिपणु म पटे, समलानुं शीगहुंजेम कोनो प्रापि न पाप, अने जो नावरूप अंत मानीए तो पपम्प नची, ते मारे प्रसोकामादा अनंत जाणवू. ए आकाश प यवस्थित, अक्रियत्व, Evीप, मापारि विषपामादिक अनंत धर्ममप ले. प्राकामा श्ययी एक, क्षेत्री सोकालोक प्र. माल, कासधी अनादि अनंत; लावधी वर्ग, गंध, रस, स्पारहित; गुणश्री अवकाश गुण; पण प्रत्यर्शन। नेपापिकादिक दानगुण प्राकाम कहे . अाकाशनो गुण शब्दने माने ते ते खोटु. पाम ते पुगतीक के. पिपार्थपणा माटे रुप, रसादिक जेम इंक्षिपग्राह्य ठे, तेम शब्द पण श्रोत्र- सिमाब, ते मारराने प्रत्यक्ष ; ते माटे दादनो पाश्रप आधार नापावर्गणा ठे पण याका. नपी. सादानो गुण अवगाहदानृप ज युक्तिए घटे . इति. ॥ ॥ हर काल पर्नुलक्षण कहे .॥ मनपने पोनरोनाना पपांपने विरे परिमावे ते काल कदीए. शहां कोश्क प्राचार्य एम कहे जे कालने परमाग्री इय नहीं तो शुं सर्व श्यतुं नर्तनासक्षण पर्यापन . ते पांगने विपे अनादि कालिक योपचार करे ते कालरूप कहीए, एटले काल ते शयनो गम, पांग , झपना उपचारे रूप कहीए. सूने काय ते जीवाजोवरूपज करो . ते माटे जुवो क्य केम कदीए ? तेमज जीयानिगमादि सूत्रने विषे कहां ले जे.-(किमयं ते कालोनि पधुगः ? गोगमा! जीया चेव अजीवा चेव. इति) जीव अजीब तेज सूत्रे काल कह्यो; पण जूतो काल य न कह्यो, बोजा प्राचार्य एम क. दे जे, ज्योतिचकने वारे परत्व, पारेपर, पूर्व पक्षात् नयो पुराणो इत्यादिक जे नारे तेनुं अ. पेक्षा कारण, उदासीन कारण मनुष्यलोकमां काल क्ष्य छे. श्री लगवती मूत्रमा पण को जे, ( करणं ते ! दधा पनगा ? गोयमा! उ बधापाना-धम्मठिकाए जाय यह समए) ए वचनने अनुसारे कासश्य निरूपचरित जायचो. ए वे मत देखामया, तेमा प्रथम मत सून संमत . मा. ..."

GESH Hon गमगार पयज मो. नरपारे प प क्यो है. इति तलं. हो पुनास्तिकापर्नु लक्षणा कहे वे. (पुरल गलन भर्माण ) पुगप-नराप घने गळे-सास) श्राप एवो जे धर्मस्वन्नाव ते पुर- THEIR, पुदगलनो परिणमन विनित्र . शुनपणे परिणमे, यशुनपणे परिणमे. सूक्ष्म, बादर, २३१वविकोन, नयपुराण इत्यादिक अनेक प्रकार के. पुद्गलास्तिकाय श्ययी अनंत, क्षेत्रथी पारगज ममाल, शालयो प्रनादि अनंत, लावधी वर्ण, गंध, रस, स्पर्शसहित, गुलामी परिणामन गुण, ति पुगस प. ॥ हवे जीवश्व्यनुं लक्षण कहे ते.॥ जोरप्प सहज चेतनागुण . ते सक्षणेज सर्व अचेतन पश्री जिन ठे, श्रमूर्न अरूपी , नाशुन कर्मनो कर्ना ने मुग्ग वनो नोका , जीवने अने पुद्गलने कीर नीरनी पेरे संबंध उ. ने माटेम्पो . पोतरोताना देव प्रमाणे रे. ए व्यवदारनपथी जीवन स्वरुप का. वसी S8+fres4-4 अशु नपश्री ५३३ नेद, घौवगुणगपा प्रमुख जाणया, निभयनमग्री सि, सम्स कम. मल रहित वे. बळी जीवय केनो ने तो के,-साकारोपयोग, अनाकारोपयोगवान् के. पान दान, प्रण अज्ञान ते साकारोपयोग कदिए. तेमांमतिज्ञान, श्रुतज्ञान ए वे परोक ज्ञान.अक प्रात्मा ते यती पर-अन्य इंघिय पांच घने अर्थ घटादिक पदार्य मकवायी वस्तुनुं ज्ञान प्राय, ते माटे परोक कान कदीए. अवधिज्ञान तथा मनःपर्यवज्ञान ए वे देशमत्यक , केवलज्ञान सर्वप्रत्यक, प्र. क-कहीए प्रात्मा तेने जे अतिश्यज्ञान-पिरहित-इंख्यिविनाज वस्तुने जाणे ते प्रत्यक्ष ज्ञान कदीए. ए श्राप ज्ञान साकारोपयोग कदीए. जाति वस्तुनो नियत प्रहाणरूप विशेष तेणे करी स. दित ते साकारोपयोग. चार दर्शन-तेमा १. चक्नु दर्शन, २. अचाटु दर्शन, ३ प्रति दर्शन, ५ के. वल दर्शन. ए अनाकारोपयोग-पाकार विशेष रदित सामान्यरूप वस्तु, प्रहवं ते मनाकारोपयोग. सामान्य रूप, विशेष रूप सफल झेय वस्तु . क्षेय ते ज्ञानने जारी ते माटे ज्ञान पण सामान्य विशेष रूप . जेम वेगळेग्री साल, तमाल, ताल, चंपक, अशोक प्रमुख वृतनो समुदाय देखाप ATEN । १०० तेची सामान्य मानो मतानि याप रे, पण विदोष यांवो रे अथवा तासज , एयो नि. पपन धाय ते सामान्य रूप नाकारोपयोग दर्शन कहीए. तेज ताल, तमासादिक वृक्ष समुवा. पनी पासे प्राचीने जोदए गए के ए तासज , प्रांवो के, इत्यादिक निधार थाय ने विशेष रूप । साकारोपयोग ज्ञान कदीए. ते बार उपयोगवान् जीवनो सक्षण व्पपदारनपनी कहाो. शुइ नि. अपनपची केवलज्ञान, केवलदर्शन, ए जीयर्नु सकप जाणवू. वळी ए जीवश्य असंख्यात प्रो. १ अनंत ज्ञान, २. अनंत दर्शन, ३. अनंत चारित्र, ४. अनंत वीर्य, ५. अनंत सुख, ३. मक्षपस्थिति, 3. कापिक सम्पत्य, ७. अमूर्न अनवगादन, ए पाठ गुण सिह जीवना ठे. जीवास्तिकाय उपयी १. अनंत, २. क्षेत्रयो लोक प्रमाण, ३. कालश्री अनादि अनंत, ५. नायश्री वर्ण, गंप, रम, सदारहित, ५. गुणथी उपयोग गुण, इति जीवरुप. एटले पश्यनो विचार सं• { रुपयो को. रिलार श्रुत समुश्वी नापणी दो.

naar aanh ॥ हवे झय, गुण, पर्यापर्नु लक्षण कहे . ॥ गुण पर्यायर्नु लाजन-प्राधार स्यानक, जेमा गुण पर्याय रहेगळी जे यतीत. अनागत तया वर्तमानकाळे एक स्वरूप दोय, पागनी परे फरे नहीं, पलटाय नीतेश कदीरमामाग ते ऽज्यरूप जाणवू. विशेष ते गुणपर्यायरूप जाणवू. राहनारी ते गुण कोए. झमनानो (अनुक्रमे) याय ते पर्याप कहीए. इदा शिष्य प्रभ करे जे सपने विषय, पर्याय ये कया , पगायत्री जुदो गुरा देखायो नश्री. जे सूत्रे एक गुण कालो, दिगुण कालो, प्रिगुण कालो, इत्याविक स्या- नके जे गुण दाद कह्यो वे ते संख्यावाची . ते माटे य गुण, पर्याय, ' नाम केम कडेवा. ? गुरु कहे ते के ते नेदनपनी करना करी जुदा देखामया. जेम के, तेलनी धारा-ग्रही तल भने धारा एनिन देखामयां पण तेलथी घारा जुरी नयी, तेम सदनावी ए लकणे करीने गुण पर्याय जुवा कही देखामघा, परा परमार्थश्री लिन नश्री. तेम संज्ञानामग्री जुदा कया. १. क्य नाम, २. गुरानाम, ३. पर्यायनाम, संख्यागपती तेथी नेव. क्याणि पम् (न्य ६) गुरा ०स० अनेक, पर्याय मनेक, वळी सकरायी द इये अनेक पर्यायने पामे, ते इव्य कहीए. एकथी अन्यने निम करे ते गुण कदीए. परिगमन सर्वत्र व्यापी ते पर्याय कहीए. अन्नेव नयनी अपेक्षाए ऽव्य- यो गुणपर्याय जुदो नयी. गुणपर्यायथी जुदो इन्य पदार्थ नासतो नथी, ते माटे दानेद पद स्पासाद तेज अंगीकार करवो. इति तत्त्वम्. एटले इव्य गुण पर्याय संक्षेपथी कह्या. विस्तारथी श्रुत समुयी जाणी सेवा. जिनाझा विरून जे कंश दोय तेनो मिचामि कम्. ॥ हवे नाव विचारनुं लक्षण कहे . ॥ जीव, अजीवने ते ते रूपे परिणमवु ते नाव कहीए. ते नावना उ प्रकार छे. १. औपशमिक नाव, २. क्षायिक नाव, ३.कायोपशमिक नाव, ५. प्रौदयिक नाव, ५. पारिणामिक नाव, प. सानिपातिक नाव, विपाकथी अने प्रवेशश्री नवय नावे कर्मदल ते श्रोपामिक नाव कहीए. जे क- मेछयश्री ययो ते शापिक नाव कदीए. उदय आवे तेनो कय, अनुदयनो-सलामतनो प्रदेशथी बेदनविपाकयी वेदन न हुवे ते क्षायोपामिक कदीए. शुनाशुन्न फर्मद् विपाकग्री लोगवq ते Saney Serest औदपिक कहीए. परिणमq एटले पोतपोताना स्वरुपने अनुना तया गीतगोताना मारामार. हे ते पारिणामिक नाव काहीए. ए पांच नावनो शनार्य कहो. हो नारा पनि नावने सं. योगे पाप, ते माटे उघो नाच पी निरूपण करदो. प्रथम प्रौपशमिकनार कदे ने तेनाये मे १ नपाम सम्यक्त्व, २ उपदाम चारित्र. झायिकन्नारना ना ने. तेमा ज्ञानाचगण, दर्शनावरणकर्मना कपश्री उपन्या ? केवलज्ञान, २ केवलदर्शन, दर्शनमोह कमना कपग्री ३ का. पिक सम्यक्त्व, ४ दान, ५ लान, ६ नोग, 3 उपनोग, G वीर्य, अंतराय कर्मक्षयी ए पांच लब्धि ए क्षापिक चारित्र ते चारित्रावरणकर्मक्षयश्री घाय. ए नर ने दायिकन्नातना कह्या. दवे दापोपशमिक नावना अनार नेद कदे . तेा १ मतिज्ञान, २ श्रुतज्ञान, ३ अनविज्ञान, मनःपर्यवज्ञान, ५ मति प्रज्ञान, ६ श्रुत अज्ञान, 3 विनंगझान, चकुदर्शन, ए अवतु दर्शन, १० अवधि दर्शन, ११ दान, १२ लान, १३ नोग,१५ नुपनोग, १५ वीर्य, १३ कायोपशमिक- सम्यक्त्व, १७ देशविरति, २७ सर्वविरति. ए अनार व क्षायोपशमिक नावना कह्या. त्यां । ज्ञान, प०स० CA पक्षान, पर्शन. ए कानावरण तथा दर्शनावरण कर्मना कयोपदामग्री. दानादिक-पांच लब्धि रापकर्मना हयोपदामग्री. तथा दर्शनमोइनोना कृयोपदामश्री सम्यक्त्य. चारित्रमोहनीना इयोपक्षामधी देशाविरति तथा सर्वविरति नपजे. श्रौदयिकनावना २१ नेद ! अज्ञान, २.अः निरj ( संसारीपणु), ३ मसंयम (अविरतिपणुं), लेश्या उध-कृष्ण, ५ नील, ६ कापोत, आ तेजु पन, ए शुक्ल, काय चार १३. गति चार १७. वेद त्रण २०. मिथ्यात्व ३१. ए. प्रौदपि- कलाना ने कहा. हवे पारिणामिक नावना ३ नेद कदे रे. तेमां । नव्यपगुं, २ अनप- पगुं, ३ जीपj. ए प्रण अनादि पारिशामिकन्नावधी वनें. ए नावना ५३ नेद कह्या. ! दो को सनिपातिकन्नाय तेना औपदामादिक पांच नावने संयोगे २६ नांगा थाय ने ते 1. तेमा १० विक संयोगिया नांगा, १० पिक संयोगिया नांगा, ५ चार संयोगिया नांगा, १-गांन संपोगिपो नांगो. ए प्रमाणे २६ नांगा थया, ते कहे -१ श्रोपामिक दायिक १-२, २. पौरामिक दापोशामिक १.३, ३ प्रौपदामिक ग्रोदपिफ १.३, ४ योपदामिक पारिणामिक १-५ ५ क्षायिक कायोपशमिक २.५, ६ क्षायिक प्रोपिक २.४, ७ कायिक पारिणामिक २.५, ७ कायोपामिक सीदयिक -1, एकायोपशामिक पारिशामिक ३.५, १० प्रीदयिक पारिणामिका-५, ए प्रमाणे दहा कि संयोगिया नांगा कह्या. दवे दश त्रिक संयोगियानांगा कदे . १ श्रीपशामिक, कायिक, कायोपशमिक १.२.३, २ योपामिक, कायिक, प्रोदयिक १-२.४, ३ श्रीपशमिक, हायिक, पारिणामिक १-२.५, ४ पोपश- मिक, कापोपशामिक,योदपिक १.३-४, ५ोपशमिक,झायोपशामिक, पारिणामिक १.३.१, प्रोप- शमिक, श्रीदयिक, पारिणामिक 1-1-4, क्षायिक, झायोपामिक, बौदायिक२.३-४, कापिक, कायोपशमिक, पारिणामिक २-३-५, ए कायिक, पीवपिक, पारिणामिक २-४.५, १०कायोपदा- मिक, औदायिक, पारिणामिक ३.४.५. ए वश त्रिक संयोगिया नांगा कया. ये पांच चतुष्क सं. योगिया नांगा कहे . १ श्रीपशमिक, कापिक, कायोपशमिक, प्रोपिक १-२.३.१,२ श्रीपशमिक, कायिक, कायोपशमिक, पारिणामिक १.२.३.५, ३ प्रौपशमिक, कायिक, औदपिक, पारिणामिक Hind.shantrasadnamarria.rinders... ItAMARH * 40 41-44, 17, 1:10 ۲۹) 71753a 43 34 568,739 - * ته مه 20 دید.هم ۲۴۹ 1frat 33 73.3341 + : : : : : ما بود و هم به پا . 38.4 (3.3.1 32 33 12 35 . :: :: :: :: ه . و . ده ۱۰۰ air # art3 و 32!605 ,3,653 44 43 22 ، 05 م } ; . -araa al 11:33 وہ چت , و تور : * * * * * 48 .3ai n . Try: تم ؛ 3 r م وه ۰ ۰۰ : .aa . nrt ) als و چون من STv.... वत्व, नापपणुं. ए वेत्रिक संयोगिमा नांगा संनयी कहा. चार संगोगिगा नांगा व मनाने. १.३. ५.५ अने २.३.४.५ ए वेतांगा चार गतिना जीवमा संजो. प्रोपदामिनावमा RELFIEगी. पदामिकतावमाश्पिाविक, श्रीदपिक नावग्रीनरकादिक गति; पारिणामिक जावग्री जीवनाहित. ए प्रकारे चतुष्फ संयोगिपा नांगा वे संनये . अने एकसंयोगियो नांगो मनुष्यने उपझम. पणीमा पामीए. ते केवी रीते के कोक क्षायिक सम्पष्टि मनुष्प उपशमणी पशो हुए तेने भोपामिकनावे चारित्र, शापिकनाये सम्पत्य, कायोपामिकता शि, मौपिनाने मनुष्यगति, पारिणामिकनाये जीवत्व जव्यय. ए प्रकारे ग सनिपातिक नारना २३ नांगा प्ररूप्पा, एटले उ जावनी प्ररुपणा जीरने विष फरी. ॥हवे अजीयने विष कहे .॥ त्यां प्रथम घाउ कमने विषे चितये . कानावरपा, दर्शनावरण, अंतराप, एप्रश कमने नि १ शापिक, २दायोपदामिक, ३ पारिणामिक, प्रौदपिक. ए चार नाव दोय. मोदनीय कर्मने 44444 १०० वि पांग जाव पामीए. वेदनीय कर्म, मानखा कर्म, नाम कर्म, गोत्र कर्म, ए चार कर्मने विषे शापिक, प्रादपिक, पारिवामिक; ए प्रण लाव दोप.ए प्रकारे पाठ कर्मने विषे नाय कहा. १ धर्मास्तिकाय, २ अपर्मास्तिकाप, ३ आकाशास्तिकाय, ५ पुमतास्तिकाय, ५ काल; ए पारिणामि. कनारे बने ..धर्म,२ अधर्म, आकाशने विपे गति स्थिति अवकाशदान परिणामे परिण- पाची अनादि पारिणामिक नाव के. कासने पण यावलीयादिक परिणाामे परिणम्पा माटे अनादि पारिवामिक नाय रे. पुल स्कंघ मेरु पर्वतादिकने विपे अनादि पारिणामिक नाव पर्ने . श्रौद- पिक नाप पण पाय एटले कर्मपुल खंघ जीव संबंघे पुजल विपाकनी कर्मप्रकृतिने उदये औ. दारिफारिक जे नोकर्म तेना पुजवने विपे वर्णादिक दोय, माटे अनंत प्रदेशी स्कंध, कर्मवर्गणादि: क पुल, ते सर्व प्रौदपिक नावे दोप, एवी रीते पुल स्कंधने विषे १ पारिणामिकन्नाव, २ प्रौद- पिकतात पण याय. एटले घजीवने विपे पण नाव कहा.

453PM ॥हये सात नपविचार संक्षेपयी क .॥ १ नैगमनय, २ संग्रहनय, ३ परमारनय, ५ जुमूत्र, "शबनय, ६ समनिकन, नृत, ए सात नयनां नाम कयां. ॥ प्रथम नैगमनयन स्वरूप कहे वे ॥ ज्या अनेक प्रकारे सामान्य विशेषरूप विचार कही एक पदार्यनो लाग जाणीए, ते नेगम- नप कहीप. जेम कोश्क पुरूपने को पुरुष प्रयु के ग्रहो पुरुष ! तुं नयां बसे वे ? नेगारे तेणे कह्यु के हुं लोकमां यमुं बुं, एम कदे ने तेने नैगमनपवादी सामान्य विशेषादिक करी पुरे ले के, लोकमा तुं किपा लोकमा वसे 2; लोक बघोलोक के तिर्गलोकमा ? ते नारे तेणे का के, हुँ तिर्गलोकमां वसुं. तेबारे नैगमनयवादी योज्यो के, तिवीलोकमा असंख्याता दीप समुचे, तेमां तु किया झोपमा वसे ? तेवारे तेणे कयु के, हुं जंबुदीपमां वसुंयु. तेबारे गळी नेगमनप. चादी पूने ले के,-'जंबुद्धीपमा जरतादिक अनेक क्षेत्र ने, तेमा तुं किपा क्षेत्रमा वसे ठे? तबारे ते s+919

१०स०
RSISISRF
---
पुरुष कदे ने फे, हुं जरतक्षेत्रमा पमुं. तेवारे वळी नैगमनयवादी पूरे 2 के,- पुरुप! जरत-
क्षेत्रमा भनेक गाम तथा नगरादिक , तेमा तुं क्यां बसे वे ? तेयारे तेणे कयु के, हुं पाटलीपु-
रमा वरांनं. वारे नैगमनयवादी वोल्यो के,-पाटलीपुरमा अनेक ब्राह्मण तथा क्षत्रियादिकनां
पर, नमो तुं पां वसे ? तेबारे ते कदे ने के, हुं देवदत्तने घेर वसुं. तेवारे वळी पूरे
के.-देवदनने घेर अनेक नरमा, साल, चित्रशाला, सत्ता तया गवाहादिक , तेमां तुं कये नेकाणे
बसे? तेबारे तेणे कां के, हुं नरमामां वसुंदु. एम जे एक नाव सामान्य विशेषादिके वोलीए ।
ने नैगमनय जाणवो. वळी नूतनैगम, नावीनैगम, वर्तमाननैगम इत्यानिक अनेक प्रकार नैगम-
नपना . नि नेगमनप विचार.
॥ हवे वीजा संग्रहनयनु स्वरूप कहे ठे.॥
एक दाने करी घणी वस्तुने संग्रहे ते संग्रह कदीए. जेम मार्ग जतां थागळना नागमा वृ.
सारखी देगी गहन स्वरुप जाणी कडु के, प्रागळ वन वे. ए प्रकारे जे सामान्य वचन कडं ते
......
॥१०॥

संग्रहनय कदीए. जे कारणे वनमा नानाप्रकारना जेमके,-पन, खदिर, पलाश, प्रांवो, सीमको, जांबू, ताल, तमाल, नाग, पुनाग, अशोक वृक्षाविका तथा ससला, शीयाळयां, हरिण, रोक, संबर, शुकर, सिंद, चित्रादिक अनेक जीव; नपा नीसनीपाल, अनेक गोकुल, वान, पुस्क. रिणी, सरोवरादिक घणा नाव संग्रह. पण मुख्य वचन एक जे पागल बन ; ते कारणयी संग्रदनय जाणवो. ॥ हवे त्रीजा व्यवहारनयनु स्वरूप कहे ठे.॥ जे सर्व व्यने विशे निश्चयरहित. (निश्चय ते कदीए जे तलाष्ट पुरुष एक पदार्यने विष अनेक अधिकाधिक जाणे) ते ज्या नथी परंतु लोक मप्तिः अर्थ जे घट दयाम , अथवा रक्त के, ए रीते जे प्रगट देखाय ते ग्रहे, पण जगत्मा जे घटपटादिक वस्तु वे ते पांच वर्ण, वे गंध, पांच रस, पाठ स्पर्श ठे एवं न अहे ते व्यवहारनय जाणवो. एनय तामान्य अर्य बोले नदी, जेम घट कहे ते व्यवदारथी वर्ने, लोकमसिह जल आगवाने काजे, वस्त्र पहेरवाने काजे, स्तंन्न धरना ANANE.......... APN-4.

१००
Hut . TERMशने जे, पाकिसमिसकेक टपावार मदेवाय. एध्यय.
दए जाययो.
॥ हरे चोया इजुमूत्र नपर्नु स्वरूप कढ़े .॥
तीत पार ते गपो, अनागत कार ने दजी उपन्यो नी, तेने ग्रहवं ते कुटियनाय. ते
रीज कदेतो सरल बर्नमान कार, नावित नाव तेने मूत्रे ग्रहे ते जुमूत्र कदीप. ए.
हरे ए नए अतीत, मनागत न माने, अने वनमान मान. वर्नमान पण पोताना कालनो प्रर्य माने,
पण परकीय न माने. ए नप पांच ज्ञानमा एक श्रुत शाननेज वांटे. वीजा चार ज्ञानथी मु.
ग्र दृनिए परोपकार- कारण नयी जसा. श्रुत ज्ञान सर्व जीवने हितनुं कारण दे, ते कारण श्री
ए नर नहान बहु बहु करी मेहे, ए शजुमूत्र नप जावो.
॥ हवे पांचमा शब्दनयन स्वरूप कहे ते. ॥
जुमा नपनी मारा एरप वर्तमान कासने प्रदे. तेनारे मांदोमांदेले कपोते कहे.
॥१॥

सूत्रनयवादी सामान्यगत अर्थ प्रदे. पण सींग वचननो नेद कांइ न माने. जेम तट एम कहेतां पुलीग बोलाय, अने तटी एम कहेता स्त्रीलींग शब थाप, तटं एम.कदेतां नपुंपकलींग चाय पण जुसूत्रनय तट ए शब्दनोज अर्थ प्रदे. सींगनो विशेष न ग्रहे. अथवा गुरु एक वचन, गुरवः ए अपुगमन भी बेहु शब्दे गुरु एटलोज अर्ष ग्रहे. पण एक वचन, बहुवचननो विशेष न गणे. भनेको शदना लिंग वचनादिक जेनेद, ते विशेष जुदा जुदा आहे, ते माटे शब्दनय ke sat IIT मारे कार्यसाधक शब्द बोलाय तेने ए माने. जेम शब्दना चार निरूपा An --.--नाय. ए माहे शब्दनयवादी एम कहे के नाम sm. wint by पुण, एमने कम कदाए ? जे जणी जे कार्य ते करी शके नहीं कारणषी पेनाप नदी. माकाश फुलनी परे, जेम फूलनु कार्य ते प्रकाश कुसुमधा न पाय. रोम भही पणा जाणा, एक नाग को ६५.कदीप, शक कहीए, पुरंदर कहीए. इत्यादिक - नो नाम ते जाग दो मळे शर्णनपपिपार फलो. :::

१०स०
॥ हरे का गमनिस्दनपर्नु स्वरूप कई .॥
WRITTAR एम जे नित्र वादे (सास नंदे) प्रर्य निग्रज दोय, घट दाददनो अर्थ
In लिर, पर सादे करो कुन कमोर ते प्रवस्तु कडेवाए, नेम को शिष्प पुरे
के जगरन् !ने शुकडीए ! तेवारे प्रीगुरु ना नाव, अन्य पर्याप शाम कदी देखा ते;
पा के नेदार कदीर, पुरे दर कदी; शचीपति कहीए. वीजा पण इंधनां नाम ले ते कदी
देवार एटर नामांतरे कदी दादनय मते एक लाने. समनिम्यादी इंच, शक, पुरंदर, ए
प्रकारे रिना माने. परम ऐश्वर्य करे ते सदनो प्रपं. शक्तिप्रयान ते शक, पुरंदर शत्रु तेनो
नता को ते पुरंदर, जे सदनो प्रर्य ते दाक पुदिाधी केम मळे, अने दाक पुरंदर एशिदना
रपंथी म मडे, एटले , शक पुग्दर ए एकार्थी केम कदेवाय. एम निन्न अर्थ वर्तमान दाब्द,
ओनिने पाप मी नो नो पाप घट केम न कहीर. त्यादि समनिरूद नयना
प्रहलादप्रामउगाज दयामपावे.
॥१२॥

॥ हवे सातमा एवंनूतनयर्नु स्वरूप कहे . ॥ जेवो शब्दार्थ तेवो निश्चय करी स्यापे, वस्तु जे काले पोतानी अप्रक्रिया करे ते वस्तु कहीए. जेम "राजति शोलते इतिराजा."-उन चामरा विवके शोने से राजा कहीए.ते पर्पदामा वेगं चामर ढलाय तेवारे, परंतु स्नानादिक वेलाए ते अर्थ विना राजा न कहेवाय. एमज कुलवाईन जे कुलने वधारे ते कुलवाईन कहीए. जो ते कुल वघारे नहीं तो ते कुसवाईन केम कदेवाय. एज प्रमाणे रुमो वर्ग ते सुवर्ण, रत्ननो प्रागर ते रत्नाकर सुधानो पाकर ते सुधाकर कदेवाय. एवा अनेक नाव जेयां नाम तेया परिणाम जे पाय ते एवंनूत नयवादी प्रमाण करे. ते एवंचूत नप संक्षेपयी कह्यो. दवे एं सात नय च्यार्षिक, पर्यायार्षिक नयमां अंतर्भूत थाय. प्रश्रमना चार नय जे ? नेगम, २ संप्रद, ३ व्यवहार, ४ जुसूत्र. ते यार्षिक नय कहीए. पागलना प्रण नप शब्द, समानरुढ, एवंनूत ते पर्यायार्षिक नय कहीए. दवे ए सात नपमा जो निश्चय नावनी एक नय प्रमाण करी जे आगमनो यर्थ विचारे ते TES+NEL 24 ! न गोगा मी. * *13:417 मान. Tian ६१ र म ने AT . नगाविसमा ki taiyar : ६२ नही मानुन शाम-मलिन को कर 4:04A नरम बनाममा वारिसनामंगीन पाने ..PR8.६९ % सर दरून रानीदिशानादीगनी पमहानिर्मवजहेच.॥४॥ TIME मा मुमार ही 33 महा मु३०॥ अनारयननी गक मोहारिक मोदन प्रम नुनाव नुविध्यान प्राददाबात मुनि प्यान० नमा न RT 1 मुनि दार. ५ ॥ ति॥ :- सर गुमनासी प्रबहान दर्शन नाग्वि-मानंद माकना पका. FE AFTER मानसीन देवाय ने नशा अनंनापी निपानिपारियन 200 स्वनावी स्वकीय कारकचक परिणामी, ते हमेशां मने याद थाने शानदृष्टिगोचरमोनियमान नासे वे ते मात्र श्रीअरजिननी कृपानोज प्रताप ने. व्यात यने अव्यक्त ए वन मिश्यावी. मादि समस्त जोवने दोय रे ते पैकी व्यक्तमिथ्यात्व पंसिरनेज दोग तेया ते कुदेव कुगुरु अने कुधर्ममा लपलोन-मन श्रर महा मोदरूप मदिरानी केफमा ठगको रहेल होय तेना प्रतापय! ते शुक्ष देव शुः गुरु अने शु६ धर्मने पिठानी शस्तो नयी. पूर्ण मिथ्यात्वव मोहमा म्यायो बीइ-सांख्य जैमिनाय येडशेषिक-गीतमीय-न प्रत्नाकर-मीमांमक या विविध मतनी कम्पनाने खीचे शुध्द देव-गुरु-धर्भ जाणी न शके; पण श्रीमनुना दर्शनम् मिथ्यात्वनो नृल दूर 9 जता निजधर्मनी प्राप्ति पर, तेयो यमल-कर्ममसरहित यखम-झिन न थाय तेयुस्वात्मस्वरूप स्वनाय मात्मिकनाव पनि ध्यानना आदरवाश्री पर गुण नियनना स्वीयगुगनी प्रवचनावमे बिलावर्नु विरमण अने स्वतावनी रमणता अ तेना प्रत्नांचे परिणामन प्रवृत्ति ए वेन एक धर्म वायी दे मनु ! धापना चरणकमलनी सेवना आ वाघमुनि निरंतर निजगुणरागी बनीने पाचरे अर्यात 610

भा०म०
भापमानापानमा माघरदेव ||4।। इति श्रीपरजिन स्तान,
॥अथ यावश्यक अदर प्रमाण स्वाध्याय. ॥
मुल गुण जीरे दीवामण श्री जिनतणी, जे नाखेरे हित कारण विनुयन धणी,
सनुपांगरेप्रावश्यक परयो कहो, साहु माहगीरे श्रावक श्राविका सह्यो ॥गुटकासदिये निरतो करे
नरिपण दिवस निमिधंतराखए, अतिक्रम व्यतिकम थतिवारा ययाशक्ति टालए, जिनवयण वाणि
पिमर पालि पापपंक पम्बालए, नरव्रमण करतां उल्लद साधी प्राण निरति पालए।।१॥चालती॥विधि
दिनारे चार मनति ते क्यों, पावश्यकरे काज न कोई तुज सयां, जिम नोजनरे विविशुं कीधे
जीचीपे, ते चिरे कवितारीवीयात्रुटकाइम जातिविधियुं करो निरतो सूत्र साखे संन्न-
रि. संसार भारनि सर्व दासी जेम पुगे मन रखी, एक खंघ मह अध्ययन तेनां ग्रंयमान विचारीये,
लाधिक पलीम (१२५) टोकनी नूत्री मन धारिये ॥२॥चालती॥ तिह पदेलोरे सामायक समता
गरिने परिदरे पाव नका मनेंवरि, नोन लोकारे अक्षर पणवीस गणो, यत्रीसरे अक्षर श्लोक
॥१८॥

ज मननशो॥णामननणोतसु फल को जियावर मोकना सुन पामिय, मदमान मालोज टाली कर्मयरि शिर नामिये; तसु दोष त्रीस उपागला पनिटालि सावध परिवरि, मन बना दम दम चार काया दोष एम निराकार ॥३॥चालती॥दने वीजोरेनोनीसम्यो जागीर,तमु प्रकररे व पंचावन मागिये; शतश्लोकारे श्रदर एकत्रीत सादिया, फल दसणरे करें विसोधिति सादिया नय पीजो जयण साते लोक अकर 3 सुणो, करें निर्जर नावे देतां राग वंश ते शुक्न गानो; सौना. ग्यवंत सरूप जनने प्रीतिकारी सो हुवे, श्रादेपवयण जिशाण फल ते पद परनन नोगये ॥४॥ ॥ह प्रावदयक परावीस तसु, दोष वत्रीस विचार || टावि दूषण बंदिये, गुरुगुणमणिनंमार ॥५॥ दाल । पमिफमणारे तुरिय जयण उद सूत्र ए, न कचश्चनरे इरियायहीयति मूत्रए; सवि श्लोकारे लिहुनरि थधिक अढार ए, तेप्रकररेसयचनबीसति सान पाश्मघारि अक्षर यरय सूची करे पमिकमणुं सदा, प्रत ठिक ढांके रहित प्राय सबल चारित्र नहु कदा; सावधान पंचय समिति गुप्ति गुपत चरण नवेगलो,श्म कहो नत्राध्ययन गणधर तेहनो फल सांत्नलोचालती॥ कावस्स- २०.r: AHMEAP

२
. .. .. ... . •it:: Patna .., Rajोगको सास दिन
:- दातेदना, गण
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.in ... ... .. ५.६ ६ ६ ६ - नारी :: झापामा मुटम, दिनि ।
REETER:नापी हार का पान ग्राम
.....ने ५ प्रविध ३ विग नगिर 3, "
TESTन नामवनोदमाम चीर गर्ग.पानाम
नमसरसोड दटापमान मनारिणे,
5:173नी नागमोदी ग्राम,
- नवनर , प्रबनना प्रावित या.
• ननदन प्रतिमनटवरनिगानित

ARR633 एम नवियण सददा एम सव मला थया एकुनार पधायाग चितघरा, पदणय युग गुरुपायद तातु साखे कवरो ॥१०॥ चालती ॥ ग्रंथ संख्यारे एकसो उप्पन सादिया,ते श्लोकारे अक्षर एकत्री साहिया वारंवाररे गणना करतां ते सही, लोक एकसारे पंचवीसाधिकते नहीं ॥त्रु०॥ श्रुति जाणी इम एगतोस "लोका यक्षरा गतीतए, ते काढी निरतो धमो करिये एकसो पचवीस ए; अध्ययनि चन यात ग्लोका तेर अकर पंचमें, थव चनदे "लोकात्रीस बीसे करायकर में ॥११॥चालती।। फल एदनारे अध्पपने गुणत्रीसमें, तेद जाख्योरे विस्तरी जिण चच्चीसमें; श्म सनिलीरे उत्तम यावश्यक रमे,मानवनवरे लाघो आलि न निगमेशत्रु०॥निगमे नहीं यति साहु साहणि सावया वली सारिया, भिनवचनरसे जसु चित्त लाग्यो नमे त सुरनाविया; नियुक्ति लघुगुरुवृनिचुर्णी पावश्यकयी तरी,सहाय कीघो श्री समरचंदे सुगुरुमुख घारी करीरशाहो। चार सहस अकर सवे, गणना करो प्रमाण ॥ श्रीपाचचं विनयी कहे, घरज्यो दिये सुजाण ॥ १३ ॥ इतिश्री यावश्यक घर प्रमाण स्वाध्याय.॥ RAS.

भोपानी
मो०भा०
URO0
॥ अथ श्री मोहवल्ली भास. ॥
॥ श्री पाचघं सूरीश्वरजी सद्गुरु योनमः ॥ ढाल वणजारानी ॥ मोद लाग्योरे चरम
जिणेसर वीर, गर्जयास मांदी गा मोद लाग्योरे ॥ मो०॥वत लेवानो नीम, मातपिता
मुज जीवतां मो० ॥ १ ॥ मो० ॥ प्रसनचंद ऋपिराय ॥ काननमें कानसग रह्यो । मो० ॥ मो०॥
सांजली पुत्रनी वात, मोदराय वाणे ग्रह्यो । मो०२॥ मो० ॥ श्री श्रेणीकनो पुत्र, नंदिखेग
सरीखो यति ॥ मो० मो०॥ ते वेश्या घरजाश, वेप मूकी थयो घरमती ॥ मो० ॥ ३ ॥ मो०॥
पाइकुमर ऋषिराय, पंचसे मूकी सुंदरी । मो० ॥ मो० ॥ ते पण नारिपास, वरस चोवीस
पमयो फिरी ॥ मो० ॥४॥ मो० ॥ अरनक अणगार, कामरागते रोलव्यो ॥ मो० ॥ मो० ॥
तिण अवसर एक नारि, घरमांहे घाली नोलव्यो । मो० ॥ ५ ॥ मो० ॥ श्रापाढभूत
मुनिंद, गयो नाटिकघर विहरतो ॥ मो० मो० ॥ दीगे लाडुकाज, नाटकणी रूप फेरतो॥ मो०॥
मो० ॥ ॥ ते मुनिवर ततफाल, भावनापथी घर रह्यो, ॥ मो० मो० ॥ श्री खलितांगकुमार,
॥२०॥

संचाराने जल वह्यो । मो० मो० ॥७॥ संनून अपसणमाहि, वणी फरसश्री चित चल्यो ।मो० मो० ॥ चित्र सरीखा मित्र, तेदने वचने ननिल्यो। मो० ॥८॥ मो० रहनेमि चरम शरीर, राजुल देखी मन पस्यो । मो० ॥ मो० ॥ कोशिक राजने फाज, कपिंजर श्रेणिक जम्यो । मो० ॥९॥ मो०॥ कमकरये नकसान, पुत्र विगामधा लोदयी ॥ मो०॥मो० ॥ श्री सिङनवसूरि, यांसु नख्यां सुत मादयो । मो० ॥ १०॥मो०॥ मपपरदाने रूपे, हएयो सहोदर मणिरणे ॥मो० ॥ मो० ॥ पढम जिणेतरमाय, अंघ टली देखे पथे । मो० ॥ ११ मो० ॥ दीरथ राखण देत, चुत. गीए सुत मारियो । मो० ॥ मो० ॥ मंत्रीसर परपंच, पुरुपरतन नगारीयो । मो० ॥१२॥ मो०॥ हरिना वुटया प्राण, वतन लेइ फिरतो जुरो ॥ मो० ॥ मो० ॥ ब्रह्मदत्त ठेटले काले, कुरुमती मुखे लवतो मुत्रो ॥ मो० ॥ १३ ॥ मो० ॥ सगरतणा सवि पुत्र, साधे गया यममंदिरे ॥ मो०॥ मो० ॥ देवे दीधी सीख, ते यादर विन दृढ करे । मो० ॥ १४ ॥ मो० ॥ अश्मनो ऋषिवाल, फावलीये जन मोदतोमो०||मो०॥ कुमर इलाची पुत्र, नाटकपी मन मोहतो ॥मो०॥१५॥मो०॥ परेस-14302R5RPा

मा
मो० ॥ दाग
६ १६ १ १, RAIEEEने वाली : मो. मो० ॥ की वार, कोगीज चेमारी
viivinattentiजार, टोपूरेनियमोमोसा कमाना पुत्र, पिता
६॥पोnviteमी ॥ नानो सिप, नृट यो परमादिमी मोगामोगा
का जो, माइगुमाकरी.मो.मा बावत नरनदा, कीवा सागमा यति
मोमो राव, नीन काने शिवत्रा ॥ मो० ॥ १९
सम, परम विषप रन रजिये मोमो मृगजो वलिय पतंग, मोन नमर गज गंजिय
• ॥ ३ को मोदनकर, विन दर धीरज मदा, ॥ मो० मो० ॥ ते तो पुरुष प्रधान
एन पाने मी हामी गौतम जंयु मेय, वयरकुमर खिन्नद्रवाती मो०॥मो०॥ ए
को मुनिराजनमनापावे मनमो आगामीभावननयरपरतव,यंत्रण पाम सेवा विमो०॥
'म । समर सम, कई म सार रदो नु । माद लाग्पारे । मो० ॥ २३ ॥
हाम मंग
॥१॥

ए ॥ नमः ॥ अथ श्री शीलनो रास.॥ पहिलुं प्रणाम करूं जिनराय, लागुंजी गोयम गणधर पाय ॥ सुगुरुवाशी बली निरु, नूलो अकर पापजो गय | रास रची\ रसियामणो ॥ जे सुणी शील दीये चिर प्राय !! कोकिल जे कतरव करे, मास यसते ते अंध पसाय ॥१॥ के सील अखंमित सेवज्यो, धर्म यजी अनेक प्रकार ॥ सील समालोजी को नहीं, सूत्र पुराण कुराण विचार | सोल सहु कोइ वर्णवे नाइ सीलतुं नमजो मोति अपार ॥ पररमणी जणणो गिगो, अांख मींची मतकरो अंधार । कालेभी परनवे पदोचयो, डाल देसि तिहां कामविकार ॥ याकही यंत्र न लागशे, तुमे संत्रत उम्पोजी समकित सार ॥ सील संघाती जो मिले, रतनजमित जाणुं सौवनदार ॥ तणु सिणगार सीमामलो, सोल समो नहीं को अाधार ॥ के सील प्रखंमित सेवग्यो। आंचली ॥ सीलना गुण किहां कि मुज नाण, सरसलिलां नहीं कुंजनो ठाए | नुडुपें न अंबुधि को तरे, जो पा मुग पडे अलप विनाण । तो पण सील वखाणशु, दास्य करो मत को सुजाण ॥ बालक वाघ धेरirontr

सीएनी
शीरा०
२२॥
पसारीने, शुं न कहे कहो सायरमाण ॥२॥ के०॥ जेवो चंचल कुंजरकान, वेगे पमे जिम
पाको पान || जेवी चंचल वीजुली, जेवो चंचल सांझनो वान ।। मालपणी जल जेहवो, तेवो
योवनशुं यन्निमान ॥ क्षिण क्षिण जाये छीजतो, विषय में राजो विषसमान ॥ ३ ॥ के ।।
पंमित योलिजे तेदयो बोल, जेहवो जाणिजे एह अमोल ।। जिम तिम बोल न बोलीजे, विषय कडा
किम विर समतोल ॥ श्रचल सिहारथ अंतरो, चिंतव्यो ऽस्क न देश निटोल ।। जो विप नोजन
चारीजे, विषय चित्यां जीव जाये इबोल ॥ ४ ॥ के0 || चोये संघरे दसमेजी अंग, अर्थ कह्यो
ते सुखो मन रंग। धगधी पालस परिहरो, चतुर चतुरविध संघने संग ॥ वाणी जोजनगामिनी,
श्री वीर वखाणिय सील सुचंग ।। सगुण मानस मन मानीमो, ए कहेजो सदा सील अन्नंग
॥ ५॥ के० ॥ ग्रहगणमांदे वमो जिम चंद, फूलमांदे वमो जिम अरविंद ॥ नूखणे मोम नलो
जएयो, मशिदि वैमूर्य जेम अमंद ॥ मेरु महीधर माहे वमो, गजिदिं अरावण जेम गईद ॥
ध्यानद शुकल सरादि जे, धर्म मांदे तिम सील नरिंद ॥ ६॥णा चंदनमाहे गोसीस वखालि,
॥२२॥

"ENGLISH Riarir135 वनदमांदे वो नंदन जाणि ॥ सरितद सीत कमी सदी, साधुमांदे वो जेम थरिदंत ॥ वृकन जंवू सुदंसणा, वस्खद खोम जिसो जसवंत ॥ लसद शुकल सुलक्षणा, ज्ञानमांदे यको केवलज्ञान॥ नानमांदे वमो अत्तय जे दान, यागरे अंधुधि जाणिजे, धर्ममाहे तेम तील प्रधान ॥3॥ के०॥ सगुण माणस तमे सनिलो रास, जो यो जोवन बनद निवास, तां सरखा रहजो सही, पण बने मुग्धने मंमिश्रो पास, चेसे विलासे म नूलग्यो, इण बने दलपति पाये ठेवाप्त, ग्राम्ये अणी किमे नगरो, मोठे थंग करे मुखे दास, ण वने वसी राक्षसी, दृष्टि देखत करे सीलद प्रास ॥ ॥ इण वने चिननी चोरणदारि, कामकटक मोद नायका नारि ॥ लोयण वागद बरसती लहकती वेण तीखी तरवार, लाख चतुर आगे बुटिया, अरदनकादिक याकुमार, संजम धन लीधोरे धूतारि,वर समा विरला दवे. जेणे नतारियस्त्री अहंकार, ते सरिखा तुमे नहीं झुझणदार, नारीनी संगति चारदीवार || ९॥के० यथिर जिसी यठे थालनी वांप, अथिर जिसी होये कायर वाह, अभिर कन्याधन जेहयो, अश्रिर जिप्सो अवे गारनो वेद, अधिर जिसो राजा चलो

शीरा०
मीलनो
॥२॥
अपिर जाणे तिसो नारीनो नेह, प्रायजो आपे जे एहने, हमे तोइ दिखाले ह ॥ १० ॥
फे० ॥ जो पण एदनो नीच प्राचार, जे कहिये परदोप लगार, तोपण सुयणह सीखवू, इपा मुग्धे
मूस्यो अ सर्व संसार, मधुर वचने मत वीससो, विरचत कांश न लावे वार, स्वारथ देखी
प्रतीशतो ॥ नारि विणाते निज जरतार, सूरियत संजारजो, नारीना अवगुणको नहीं पार॥१२॥
के० ॥ अवर सामु जोव सविकार, अवरसुं नोगवे लोग सिंगार. रमणितो अवरने रीझवे, अवरने
चिंतवे चिन ममार, दूपण अवरद शिर दिये, कुम तणी कोठि कपटकार, कलह काजल तणी
कुंपली, एहनो नेह तिसो जितो लिंपणो गर ॥ १२ ॥ के ॥ नारीने चरित न लानेजी अंत,
चंदर देखीने हुए नयभंत, साप प्रोसीसे देश सुवे, मेहेली संघतां ख खहंत, गिरिशिखरे सुखे
संचरे, संकल घाए न किंपिघमंत, पुहपदणीधरणी ढुले, मुगध न ठे असे वहु बुद्धिमंत ॥१३ ॥
के ॥ खिशमाहे रंग बिरंग करत, मरण जीवण खिणमादे दियंत, घारिनो नाय धुजाविपो,
नरकेतुं देवद नारी उसंत, निरखज्यो नेचर पमित्ता, पमयाद पत्रे सदुको पतीनंत, पदिलुद्दी
42.25212254
॥२३॥

आप संवादिज्यो, मतकरो रमणिशुं रामत खंत ॥ १४ ॥ के० ॥ काम करालित लोपेकार, कुल तणे के नमावे गर, जिम मनमाने तिम करे, नंच मी करे नीच पाचार, निरचे तो वाघ पायी चुरी, मुंज राजातयो कीघो संहार, जरतदरी जिम जागज्यो, नेह न कीज्यो नारी उख वातार ॥ १५ ॥ के० ॥ जे तरुणी तजे निजत्नरतार, ते केम चाले अवरनी लार, अंतर सांग्स घामजो, प्रेम देखामे दिन दोय चार, विच गये न रहे घरवार, लाज केदनी कुलटा करे, मरण लगे तब हुइ मनिसाल, स्त्री तणी संगति कोमि कुहाल ।। १६ ॥ के॥ नाम कहे मुहरो सब खोप, विष समो कान तो अयर न कोय, फोमीय नाम जे सियली, नष्णा लागे पर अगनि ज्यु सोय, नाम के यवल त्युं नारीनो, पण इण सरिखो सबल न कोय,साहमा दोइयें तो दारिजे, पूर देतां हां खोम न होय ॥१॥ के०॥ गवरीने रूपे जीत्यो इण ईश, जेय न नामतो केदने सीस, नट जेम तेह नचावियो, राधाना रूपे जीत्यो जराय, विदि चित चालव्यो सारद माय, ताप. सणी सुरपति बन्यो, प्रिन्नुवन जीती लगावीयो पाय, पाप हुइ सहु सामिणी, जिन तणे नामे HARRAann *

शी
शी०रा०
नाग जाप ॥ १७ ॥ के ॥ साच कह्यो तमे ए न दुवे तात, सहजेदी नीच होय नारीनी
जात, वोप यो ते शिर करे, पण एक सनिलजो अम वात, नर प्रत्ये कहे कामिनी, आपणो
दोष न देखेजी कोय, खिया कुलंग्न केम चढे,पुरुष जेद सर्व सुलक्षणा होय, वाजती ताली कीद
वधेि, एकण दाये वजावीने जोय ॥ १५ ॥ के० ॥ सघलीही नारी न चंचल होय, पुरुप सहु
लला मत कहो कोय, सहु सरखी नहि अंगुली, चउ वरणे गुण अवगुण संति, पुरुपदि के पर
खिप रमे, इसी दगी परधर पाय ग्वंता, पगतले मरण न पेख हि, नाइ दाने दीवो कीये कुवे
पता ॥ २० ॥ के० ॥ नारीदि केश्क दोइ सुसील, जे लदे सर्गने शिव तणी लील, सत्य-
नामा शिवासुदरी, चौपदी लक्षणा ने दयमंती ।। चंदनवाल कलावती, मयनरेदा पनमावइ कुंति,
जरायराणी रुकमिणी, नाम लीधे ज्यां पातक जंति ॥ २१ ॥ के ॥ सुरतरु नग्यो अंगणे
कखणी रोपे ते याक धतूर, अमुचि करे मुखवास ते, गंझीने सीतल सुरनि कपूर, दस्ती साटे
खर संप्रदे, रतन चिंतामणी राखिने दूर, काच करे कुमति ग्रहे, विषय सेये जे चोप्रो व्रत चूर;
SESEREE
॥२४॥

॥ २२ ॥ के० कूक मोरह जेम मंकार, सीलवंतां तिति संगते नार, प्राण विनाणद चूकवे, अन्नपाराणी तणुं चरित चितारी, होठ मुदसण किम कियो, नगमे नगमे नहीं निर्मल नारी, सतिय सुनमा सारिखी, जिण तिणसुं लाइस्लेद निवारी, वचन अमारमो अवधारि, तिम करो जिम कियो नेमिकुमारे ॥ २३ ॥ के०॥ कवण ते नेमिजी कवि कहे वात, केम पाख्यो तेणे ब्रह्म विख्यात; सीलवती ते कुण सुंदरी, जो तमे नाखशो एक दिवंत, तो अम सांसवा तणी खंत, मालत अंगे न आणशो सेवस्यां सील सदा फसवंत, ध्यावसुं एकज श्री परिदंत ॥ २५ ॥ के० ॥ नयर सोरीपुरि राजीयो, समुविजय राजा तसु घरनारि, सीलवती राणी शिवादेवी तसु घरे, चतर्या नेमिकुमार, लोकनो नाय दमीतरसार, श्याम शरीरे शोलता, पेदेल संघयण ने पेदेल ठाण, सहस अष्टोनर लक्षण विनाण, रूप गुणे प्रति आगला, जेनी वरती ने त्रिभुवने प्राण ॥२५॥ के । एक दिन कृष्ण करे मन खंति. वंधु विवाह करूं किसि नंति, कवण कन्या परणावीजे, असरिस संग न शोन लहंत,चिंतवतां चिने सांतरे, कुंवरी अठे एक बहु गुरावंत, उग्रसेन घर +25sair

शी०रा०
रपण दीपंत, चीजसीना झमकार ज्यु, रूपे रंजा अने सीले शोनंत, नामे राजेमती राजती
नेमिजी कीजो तेदनो कंत ॥ २६ ॥ के०॥ कृष्णजी सेख पगवणहार, उग्रसेन : प्रत्ये कहे
ने रिनार, कुंरि तुमारे राजीमति, परणशे वंधव नेमिकुमार, ए अछे कामतणो अवतार,.
वचन प्रमारो मानम्पो, ए समो अवर न कोइ नुपाल, वानर कंठे न शोने हार, सारिखे सारिखो
जो मसं, तो जुगतो हुवे जगत प्राचार ॥ २७ ॥ के० ॥ वात सुणत राजा थधिक उचाद,
राजेमनितलो रच्यो विवाद, घर घर नछय अति घणा, घर घर वंधि जे वंदनमाल, घर घर
होप ठे परामसा, घर घर तोरण मंगलचार, कुंचरिने कीजे ने सहु शणगार, उग्रसेन कृप्यने
रिना, बो सह श्रावग्यो नेमिकुमार, कुंवरीना जीवनो जे श्राधार ॥ २८ ॥ के ॥ स्नान
करे जिन गवानार, कोतुक मंगल कीघ शरीर, धान्नरणे अति दीपता, दस्तो पारूढ यया
परगीर, शोरा ने उप सोहामलो, पिंहु पाम्ये चामर ढाले रे धीर, वाजिर बाजे रे गुदिर गन्नीर,
पांग रेन पण, स्वामी शोने जेम मुकुटे हीर ॥ २९ ॥ के० ॥ क्रमे क्रमे याविषा
॥२५॥

पोल घुवार, सहिप सालियां हरख अपार, कुमरिजी योने वधामणी, नेमिजी याच्याहे तोरण वादार, हार दियानोदे यापीने,काइ कहो सखी एपको वात, म्हारो फरके ठे दाहियो गात,नादसुं संग नदीं मिले, एह विना गुण लाच न खात॥३०॥के०॥ तिहां प्रनु पेखियां सारस मोर, तेतर पारेवा चीद चकोर, सुअर संबर हरिणला, कुरलता देखी करत ए सोर, सारदीसुं. स्वामी इम अपो, एहसुं एकको कांइ कियो जोर ॥ ३१ ॥ के० ॥ सारही बोले रे वे कर जोमी, इलिखिणे कोइ न लाये ग्लोम, स्वामी न जाणो मे शुं तमे, गोरवे जिमस्पे यादव कोम, उग्रसेन चिने पाणं नियो, शीश तमारे शोनो मोम ॥ ३२ ॥ के० ॥ स्वामी नणे घिग एद विवाद, जिहां होशे पटला जीरनो दाह, रणे अपराध न को कियो, कांइ विणासिजे एह अनाद, जीवित सहु किंदी बालमो, नेमि नयाणे सरे नीरमवाद, परमुखे दोये विरलो उखी, जीवदया करे यावचनाद ॥ ३३ ।। के० ॥ बोको कांड न पामिय बाट, मीठे न मार्ग बांलण नाट, गामरा गाम न नजामी पापणी पुंठे जके य? नार, महिपते सानपी मारीजे, गलिय उल नपि करे लगार,

शी०रा०
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काइ पिणासिजे ए मिरपार ॥ ३४ ॥ के०॥ तीतर केदने नवि दिये गाल, चिमीय कममी
कोइ परी जाल, गुनद न को कबूतरां, राते हुतो चकवा चित दुःख, संप्रति कोइ न दीसे सुरक,
पार यो का क्षत कारें, परजीव पीतां दोप न सुख्ख ॥ ३५ ॥ के० ॥ मोर लये मधुरो
मुग्वे सार, शकुन रुमो सही सारस नाद, कोयल कोइ न उहव्यो, एतो रूखें वासो वसे गयणे
विदार, प्राथमे प्रादित्य न ले प्रादार, परघरे खात्र न पामे, झूझ न मां लइ हथियार, पंखियाने
केम कीजे प्रदार, ॥ २६ ॥ के० ॥ कदे हरिणी तव हरिणसुं, मारा वासकमां अठे वनद मझार,
पे कुण करति तेदनी सार, पाणीय कोण तिदा पावशे, द्रोचकवल कुण प्रापशे तास;
सीद सादे तिके वीदतां, नासीने प्रावशे कहने पास, मात विना गेरु होय निरास, सासनो हवे
नदी कोइ विसाप्स, ॥ ३७॥ के० ॥ हरण कहे दरिणी सुणो, थांका वालकमा विणाससे
कोप, जो एक देवज वंफ न दोय, देव समे सहुको समो, दैव वांके सदु वंकज जोय, अमृत पीने
प्रिपे विपन होप, मुख पुण्य देव दीपा दुवे, मरण जीपण सहु यापसी सोय, हिये न हारिजे
॥२६॥

PIMinSisiretwear मुधा म रोय ॥१०॥ के० ॥ संघरसुं कदे संवरी, गरन से मारा नवर मझार, अाज पूरा दिन एदने, कंतजी किणी परे एद उवारी, यापणो दोष तो को नहीं, अम्हे सुरां पर मनारि संजारि, संवर चादे रे चिहु दीसे, मुख विसखे प्रोखे प्रांसुघार, प्रिपे कोइ न दीसे राग्यणदार, किणहीने मन करुणा नदी, कंता नेमजी पागल करोने पुकार, वालक माय न मारही, थवसाने स्वामी उवेलदार ॥ ३९ ॥ के०॥ जीव इशी विधि विलयता देख, स्वामी दाहारव करे विशेप, कायर कांइ विणासिजे, ए वप परतख नरकनिवास, जाणीने किम कीजे विषप्रास, परजीव किमे न पाहीजे, पर ख देत किसी सुख प्राश, तिम करूं जिम न हुए एहनो नादा, सारहीने देश सवि अलंकार, रथ पकी कतया नेमिकुमार, फर्म कहो न करे किस्युं, गेमिया वंधन घोमिया जाल, अलय दीघो पसु पंखियां, धन धन जीवदयाप्रतिपाल ॥ ४० ॥ के० गगने कानने जात देइ पासीस, पशु अने पंखिया जय जगदीस, प्रिनुवन पीहर तुं सदी, वली. पार तुन जणणी तणी पाज, पुत्ररतन जिणे जनमियो, स्वामी साध्यां तुमे पारकां काज, ॥ จริหคหน

सी०रा.
देहिये करमतभार ॥ ५० ॥ के०॥ नपलले नीर झरे असराल, जाणके नलस्यो पास
कार, पात प्रिय मिष चये, दिपम्लो सीने सा सलखणी वाल, कारण ए मने बाग्वे, हृदे
यमे रेमिफुमार, विरह वैसनर तनु ददे, तो जिन दाझे जीव प्राधार ॥ ५ ॥ के० ॥ ना.
हने दीये प्रोतमा, स्वामी हुता तुमे दीनदयाल, अमतशी कांह न कीघ संजाल, नाह निःका.
रण तजी, हे ई स्वामीना नरणनी दास, अनिदा राखनी पापणे पास, अवगुण को न में
कीयो, नारि न मलिम्पे एम निरास, वेगे मिसो मुज लील विलास ॥ ५२ ॥ के० ॥ पाठ नवंतर
नेहलो, नामे नव वृया को दीन दोस, तुमविण अवर न वालहो, सपथ करुं ने पीकुंजी कोस,
गाच पिन विसा मानग्यो, ए व नाजस्पे केम असोस, मावली जल विणु किम जिये, विष्णु
माप कमी नहीं गेम ॥५३॥०॥ एक मगे ग्य पाठो वालि, वदनकमल ताहरूं नयणे निहाली,
दरप पुरं हिपमानतो, तमे मत जाली ए जीवन काल, लामली अंचले लागइये, जे तमे श्रापशो
मी मनान, नेदजी अमे करीशुं मही, यमनती कांइय न मंगस्युं पाल ॥५॥०॥ वली वली
11॥२८॥

htra राजलि इम कदे, के सखी में कियो सामिशुं शेद, के फोः स करी तों, के किमि वालद कियो विठोह, के धन चोर्यो परतणो, देखी शकी नदी के परसोद, के कियो गाव सोनागनो, तो जउराय तज्यो मज मोह ॥५५॥ के० ॥ के कियो अबगत नीर सनान, के सखी घोमिया तरुवर पान, के रे बिलूरिय वेलमी, दींचतां उड्यी के तहमाल, के जलमांदि में मंझिया जाल, मज ने कच संतापिया, के दिया किणदीने फूमांज पाल, के मृगपासे पामिया, तो न मिल्यो मज त्रिजग नुपाल ॥५६॥ के०॥ के बने दीप दावानल लाय, के रे बिगहियां वालक माय, के निशिनोजन में कियो, पाप कीधे सखी सुख म जोय, अगनीही कमल न नीपजे, दवे पस्तायो कीधे कि, दोय, बीज सारे फल पामीजे,जपुराय दोप म सायशो को ॥५॥ केला मात कदे दवे कुंवरि म रोय, मालमय कारीपे से मुद घोय, जादयो गयो तो जाण पक्ष, तेद प्रकी चमतो चिने जोय, तुमे वरजो वर वासदो, नेमि विना जग शून्य न होय ॥५॥०॥ वरांस्यां दे मात ए का कहो वात, लोह किहां किदां सोचन घात, खल केम सकन सारिखा, नक्षत्र किदां किदां श्रावित तेज, शीरा - . ममे सेवतो तृपयाजी देव, सोम स्पो सती निरबहे स्वामी पेहेलो सहे केवससार, तोरपनात्र प्रयो गिकुमार, माज सगी जस जगमगे, हवे ए सहु सील तशोरे प्रनाय, राजुल नेमि नमो निज नाय, सीर सरोवरे जीजग्यो, नाइदिने दिने घोगरे थायवे पाउ, रान राखे सहु खेलग्यो, हवे मोर रूमा गयो धर्मनो राम ॥३॥०॥दवे नेमि राजुल परे पालज्यो सील, सीलश्री पामज्यो सासती लील, विपप वैरी जिन वीमसो, हवे खग्वण महासती रूपी राय, कास घणो रूल्या विश्य पसराप, चिन विषे जनि चितवो, हवे विपये विणासियो रावण राण, सीत सीले जल तरिया पागण, सीस ममो सगो को नदी, हवे सीलपी सरप हुए कुसुमकी माल, विप थकी अमृत होय रमाल, सीलपी संकट सपिटले, दवे एक शिक्षा वली सुबहु सुजाण, अविचल राखज्यो अरिहंत प्राण, में कमिने कमि जोड्यो, हवे पाण विनाजि कीजे पत्रकाण, ते तुस खमण सरिखो, हवे भागनो मृन एदजी जाण, जे जिण नाख्यो ते सर्व प्रमाण, जिनवचनेः नहीं अन्यया, हवे आप रोमन करहु प्रज्ञान, जिन प्रतिमा म उयापग्यो, दवे पापणा नायनो एद प्राकार, देखता नपजे दर्प अपार, एणि पूजे जिन पूजियो, ना अंग नवंगे वे एद विचार, परनवे बोषिवीजद दातार, दग्तजीने दिये धारज्यो, तमे प्रहसमे पूजिज्यो एदना पान, पाले म दारग्यो मानव पात, दसह दृष्टांतदिं वोहिलो, अने चिनश्री गंमन्यो विषय कसान, थूलनन जिम प्रोनग्यो जाज, सार वचन हवे हुं कहुं, नाइ पररमणि सवि मानग्यो माउ ॥३५॥ के० ॥ हये नर अमरद सुख पामशे सोय, क्रमे क्रमे सिवि वधूवर होय, कीरति विसे नसे विस्तरे, हवे सुजस पामे सदी ते इद लोय, विविधिदि सीखजिको घरे, हवे ते समो प्रिनुवनमांदे न कोय ॥ ६६ ॥ के० ॥ श्री पूज्य पार्श्वचंपसरि सुपसाय, सीप्त धरी निज निर्मल नाय, नयर जालोरे जागतो, हवे नेमि नमुं नित्य वे कर जोम, विनति एदज विनवू, स्वामी एक कण अम मनश्री म विगेम, सील संगात जी प्रीतमी, इवे ननराध्ययन वावीसमो जोय, वलीय अनेरादी ग्रंथग्री, अरथ प्राज्ञा विना जे को होय, विफल होजो मुज पातक सोय, जिम जिन नांखे तिम सदी, स्वामि रितने उख सहु दरो दूर, वेगे मनोरथ मादारो पूर, पाणसु संजम आपज्यो, हवे विनवे एम श्री विजयदेव 4-0514:"4"

सा
पी०रा०
परि॥ १७ ॥ के० ॥ सूरज ससिदर जिहां थिर थाय, चूलिका मंगण जिहां गिरिराय, सतीयतणो
सत्य पां लगे, श्री जिनशासन जिहां जगमांदे दीप समुह मांद मेदिनि, तिहां रासनणतां दोय
उछाद, सील चिंतामणि सारिखो, मुणे सुणावे जे मन शुरू नाव सहित सील जे घरे, अजर
अमर पद पामे सोप, के सील अखंमित सेवज्यो॥३०॥
।
इति श्रीमन्नागपुरीयवृहनपागचाधिराजयुगमधानश्रीपार्श्वचंसूरीश्वर-अन्तेवासीसुविहित-
सनादार-सितपटाचार्यश्रीविजयदेवसूरिविरचित श्रीशीलरक्षा-
प्रकाशक श्रीनेमिरासः संपूर्णः॥
-23
॥३१॥

॥ अथश्रीपट् व्यस्वाध्यायः ॥ SASARASHARE kinemamritam ॥४॥ (नाभिरायके वार-५ देशी.) सिह नमुं करजोरी, पास नमुं हितकारी; जस सेवे सुरवरवृंद, नर नारी बहु प्यारी. श्रुतदेवी सुपसाय, कोने मति निरमलरी; मया करी मुज माय, दीजे वचन अखलरी. लोकालोक स्वरूप, कठएक कहुंभ विचारी; तामें जीप अजीय, जिनवर वचन सुधारी. पंच अजीव बखान, एकही जीव सुचारी; पंच अरूपी दोय, पुजलरूपी न चारी. तीन य तहां एक, तीन अनंत कदेरी, तामें चेतन एक, पंच मवेत खदेरी. ॥५॥ चार प्रकरता दोय, दो करतार उदेरी सबही लोकस्वरूप, एक अलोक नदेरी. चलन हेतु घरम दोय, दिरही अधर्म लदोरी; पुगल जिन अवकाश, एक प्रकाश सदोरी.॥ कालही वरतन देत, नवही पुराण करेरी; निधे अरु व्यवहार, दोय स्वरूप धरी. ॥ 454EFESEN MSROHRin अयश्रीनेमिराजुलमीति. ने०मी० (रागनगरनोरे सोनीओ. ए देशी.) सुमति जिणेश्वर चीनवु, स्वामी सुमतितणो वातार रे; जे नेमि ने राजुल प्रीतमी, ते कवियण कहे सुविचार रे. श्म राजुल नेमिरों वीनवे, कंता बीनती अवधार रे जे मारे मन तुं वालदो, ते जाणे करतार रे. म. ॥३॥ परणवा काजे नेमजी, प्रन्नु श्राव्या तोरण वार रे; ए जीव गेमचा ते रुमी करी, ते मादरी न करी सार रे.इम. ॥३॥ ए र फेयों जब नेमजी, तव राजुल रमे अपार रे ए मेदयदी पिन पिच करे, दो आंखे प्रांसुधार रे. म. ॥४॥ supeessessesses -- htts)สศครี** ए जीवनजीव श्री नेमजी; ए तुं मुज प्राणाघार रे . ए नेद विलुधी कामनी, तु का गेमे निराधार रे. इम. ॥५॥ ए नेमजी नेद तुमादरो, जेदवो तमके प्रेद रे ए पतंगरंग परें कारमो, ते बदेलो देखामघो वेद रे. म. ॥६॥ ए अष्ट नवंतर पादरी, का नयमे दीघो व्ह रे; एक वांक विना जे परिदरी, ए ते मुज साले देह रे. इम. ॥७॥ ए नेमजी ते मोशुं करी, ए तेहवी न करे कोरे एते कीधी तिम हुं करूं, तो जनमादि दांती होइ रे. इम. ॥८॥ ए नेमजी लालिपालि माने नहीं, सखी नेमजी कठीन कगेर रे; ज्यां बात न माने वालहो, तिदां अवलानु शुं जोर रे. म. ॥॥ ए नेमी मति राजुल कहे, कंता सुख मीग संसार रे; titikN52515IRMANENTS:

ने०मी० ने जोग नजा सा मोगरी, परे से संपमनार रे. इम. ॥ १० ॥ ए समिप गेमी प्रमती नजे, प्राविधिश संसार रे; जे परणी नारी परिहरी, ते मूरख रमे परदार रे. म.॥१॥ एशिवरमणी वेदपा सारीखी, जेने मातंग सेती प्रेमरे; जेणे दरीही म्देज्यो नदी, ए तेशुं रातो नेमि रे. श्म. ॥ १२॥ ए नेह निरने नवि हुवे, श्रीनेमि कदे मुल नार रे ए तोरणपो जब फिर चल्या, हि पीछे किदी पोकार रे.म. ॥१५॥ ए परसी दान देकरी, नेमि सीयो संयम नार २ एगिरि गिरनार चढी करी, प्रनु पाम्या केवल सार रे, इम. ॥ १४ ॥ एरंग गारूपो राजेमती, मंयम सीयो नेमिने हाय रे ९ पित पहिली मुगते गइ, तहां तृगे श्री जगनाथ रे. इम. ।। १५ ।।

ए धन धन राजेमती सती, जिणे पाली अविहम प्रीति रे; - दजी जगमाहे सहु जसनणे, ए उत्तमनी आ रीतिरे. इम. ॥ १६॥ एवीनती नेमें मानी खरी, प2 मिलिया मुगति ममार रे; तिहां सुख अनंतानोगये, ते कदेतां नाचे पार रे, इम. ॥ १७॥ ए संवत सोल नवाणुए, गीत गायो मन उहास रे; एजणे गुणे जे मानवी, नेमि तेहनी पूरे पाश रे. इम. ॥१७॥ सती शिरोमणि राजेमतो, श्रीनेमिजी विन्नुवनराप रे, जसु सुरनर सेवे अहनिशि, मुनि गकुरने सुखदाय रे. इम.॥ १५ ॥ । इतिश्री नेमिराजुल प्रीति.

मपिरा-
ने०मा०
अयश्रीनेमिराजुलवारमासि.
(इडर या आंवलीरे-ए देशी.)
सह गुरु पाय प्रणमी करी रे, गाइश नेमि जिपंद;
शिवादेवीनंदन अति नलो रे, जिणें दीठे परमाणंद-
सखी मेरी, जाय मनावो नेम. हुंतो नेमि विना रहुं केम, मारे नेमिशुं अधिको प्रेम;
सखी मेरी, जाय मनावो नेम. (श्रांकणी.)
यापातो श्राव्ये यके रे, ननहो मेघ अपार;
वीजली मधुके चिहुं दिसें रे, सानरे मुज जरतार. सखी. जाय. ॥२॥
श्रावण मासे सरयमे रे, बरसे वारंवार;
चातुक तो पिन पिन चवे (लवे)रे, किम रदिये निराधार. सखी. जाय. ॥ ३ ॥
नादरचे मासे नली रे, पामे काफी रेल
सरिस्sिesexsess
CARGEE
॥३३॥

धाश हुती मुज कंतनी रे, तेतो गयो अत्र म्हेल. सखी. जाय.॥४॥ पासो थामा फले सही रे, जो यावे जरतार; हुँ तन मन पापीने मिटुं रे, वाधे प्रीति अपार. सखी. जाय. ॥ ५॥ फातिक मात कंतने रे, समरे सोदागिणी नार; इदां विमीया साजन मिले रे, राणी राजुल हरख अपार. सखी. जाय. ॥६॥ मगशिर मनसा माहरी रे, मिलीए नेमि जिणंद, सदज सलूणो व्हालो शामलो रे, जिण दीठे परमाद. सखी. जाय.॥७॥ पार्षे तन सुख पोपीए रे, यतिसे मीठा थाहार; नेमिरों नेद धरी खरो रे, सुख विलसीजे सार. सखी. जाय.॥6॥ माहें मोटी जामनी रे, पौवन सदेरे जाय; नेमि विना रति न ठपजे रे, मुने घमी वरसां तो थाय. सखी. जाय.॥ए॥ | -SAR++STRaefRARSASRRe

-
ने०मा०
मारी
फागुण फागं रमे सहु रे, फर फर वाजे वाय;
अविस गुलाल मे घणो रे, नेमि विना न सुदाय. सखी. जाय. ॥१०॥
वैये चतुर श्रीनेमिनेरे, मिलवा दो मैन;
सातज पहिला सांजरे, मादरे भंग न लागे अन्न. सखी. जाय. ११॥
वैशाखे विरदा तणी, वेदन खमी ने जायें;
वैद्य-विचार क्यों न कपजे, मुजने नेमि मिल्ये सुख पाय. सखी. जाय. ॥ १५ ॥
जवे में जापपुं सदी रे, नेमि न पायो नेटिक
पूरच मीति जाणी करी रे, काइ न मेलि नेटि.
सखी. जाय. ॥ १३॥
सखी साहिव माहराशुं जइ रे, वीनती करो हजार;
राणी राजुलने रमवा नणी रे, तमो गढ गिरनार. सखी. जाय. ॥ १५ ॥
पुरम जपनी प्रोतमी रे, राणी राजुल नार;
--
--
3 ॥१०॥

सखी. जाग. ॥ १५॥ संखी. जाय.।।१२।। नेमिरों नेह धरी खरो रे, जाप मिलि गिरनार. . मन वैरांगे पूरीने रे, लीधो संपम-नार; पिउ पहिली मुगतै गइरे, आवागमन निवार. दिवे मुनि गकुर कहे सांजलो रे, वाविशमा जिनराज; राणी राजुलने राखो कने रे, सारो वांछित काज. इतिश्री नेमि राजुल बारमासी संपूर्ण. सखी. जाय. ॥१२ ।। अथ श्रीयूलीलानीसज्जाप. वीर जिलेसर वीनवी, लागी ते गोयम पाय; गाइश यूलिन राजियो, जिम सुखसंपत्ति पाय- यूलिन साधुनी धन ताहरो अवतार ते पाम्पो भय पार. यूलि. धन. १ पामलिपुरमांदे जलो, राज करे नंदराप; तेदने बुदिनिधान सुंदर, सकमाल मंत्री सवाय, यूलि. २

१००
यो प्रति जाजी, बाजजनु नाम दीन मुनामिनि सुंदरी, महिमा गुणामणिधाम. ३
maatमान, अपनो लिनव ईमः सकमावसुत सोदे नसो, कुल मांदे अवतंस. यूलि. ४
[१६ नगरमेगन नायश, योरपा ते नामें नार; र ते रंना सारिखी, तिणे मोरो सहु संसार. ५
की विना मुमार मुंदर, दीमतो देवकुमारकर देखी कोश्या वीनवे, तुं मुज प्राण आधार. ६
ततु यचन रचना जिपो, श्री अजित कुमार; पछि विषय मुख अनुन्नवे,इंतणे यनुसार, .७
[भा व नाटिक को, ये प्रनिहित मारमामी वार कोको कंचन तणी,विलसे तिदां वर्ष वार
साचि दबने मकमातY,कोप्यो निहां नरगज; दरबार तुं प्रावे मती, मादरे नहीं तुज काज. ५.९
गरियो दि साधे हुतो, मनजी सघली वात; राय रंजवाने कारणे, कीयो पितानो पात. यूलि.१०
सामोधमा जारी करी, राजा दिप सनमान; दिग्पा तुमे सरिया सियो, पान मुज परधान. यू.११
सोने या मरे, वीननी मुली महागज; यमालाइ यूलित, मुंपो सघलो काज. लि.१२
गले मरिता गुणो, तिनवे कुलदेहा? मरियो कदै कोदपा घर,विससे मुग्ण यदोष.यू.१५
॥२८॥

300acarasa कोइयानेश्री धूलिन्नने, तेमी पूरे नरराय; परधान पदवी तुमे लियो, तो मुजने मुग्य थाय. शूलि.१४ धूषित वसतुं इम कहे, संजलो एक विचार; ए राजकाज मेला अवे, ए उरगति दातार. लि.१५ ए माय ताय बंधव वदिन, पुत्र कलत्र परिवार; ए स्वारथ करी संसारमां, मिख्या अनंतिवार. यू.१६ ए तन धन यौवन तेहवो, जेदयो रंग पतंग; म जापी जिन धर्म पावलं, जो मिले सद्गुरुसंग.१३) | इण अवसरे गुरु श्रावीश्रा, श्रीविजयसंनूति अणगार;नत्सव मेघकुमार ज्यु,करी लीधो संयमन्नार. पंच महामत पादरी, पाले संयम श्रीकार; जिनवाणिशं अहनिशि रमे, करे सफल अवतार. थू.१९ श्रीधूलिन चारित्र खित, संनस्यो कोश्या नार; मूरा खाइ घरणी ढली, शोचे मनद मझार. २० शिर केश तोमे अंग मोमे,फामे से कंचुकिचीर; अति रुदन करती इम कहेलागे विरद ख तीर. स्नान अंजन तिलक श्रादि, तजे सोल शिंगार; तंवोस सरस आहार ठमी,रही समरे जरतार.यू.२२ अनुक्रमे पापाढ आथियो, सदगुरु करे सुविचार; चउमासे रहेवा चिहुदिसे, मूक्या चेला पू.२३ पहिलो रह्यो सिंदनी गुफा, वीजो अहीवित पास:त्रीजो रह्यो कप कपर, धूलिनकोदया आपाप्त. SAIRIAGRAroin.

पू०स०
wिभायो भंगणे, हरखि ते कोपा नार; पाप सागी मुनीवरने कदे, प्राज तूगे करतार. २५॥
AT AAI अति विशाला,पाप्या प्रति मुकुमासविषयमुस अनुनयो कापी विरहाख जाल,
पास हे घमे मुनि पपा, संजर कोश्या नार; संसार-मुख राजु नहीं, मत करजो मनोदार.२७
कोपा ते परतुं इम कहे, संन्नसो प्राण प्राधार;पादकुमार नंदिखेण प्यु, पठे सेजो संपमन्नार.यू.२७
पतिल पर इम कहे, ते अंगे विचार: कुंकरीक एकदिन विषयने सुखे, पहुतो नरक मझार.
तल पषन कोरपा यूलवी, प्राधिका कोपी सार;एक राजपुरुष राजा विना,और सहु परिदार.यू.३०
मागमवालि संनसे, करे पोपद पनकाण; साधुगुरु सेवे सदा, पाले श्री जिनाल. यूलि. ३१
पउमासि उत्तयत्रिण प्राविया, जिदा विजयसंनूति प्रणगार वंदतो गुरु इम कदे,आवो पुष्करकार.यू.१५
पिन कोदपा वृावी,प्राप्पो गुरुने पास;ऽकरकार प्रिणवार श्रीगुरु,उन्ना भई कद्देशावास.यू.३३
सिंहगुफा जे माधुहुनी,नमको बोज्यो तिलिवार प्ररएपमांहिं अमे एकला,पचखो रह्यामास चार.यू.३४
परत सास प्रादार करतो,रहेनो कोरपा घरवार नितु नाटारंन जोवतो,तेहने कह्यो शावास.यू.३५
॥२९॥

सदगुरु बलतुं इम कदे,संजलो शिष्य विचार नारि अनि नर घृतकुंज सरिसो,पिपले अंग विचार..१३) थूलिन मेरुगिरि चूलिका,चब्यो न चित्त लगार; दाव लाव गुणिकातलो,नागयो मनद मझार.यू.३५ आदेश यो अमे जोइy, कोश्या अवे जिहां नार;सदगुरु वसतुं इम करे, ते न पले प्राचार. लि.३० गुरु वचन संजली बिहार कीघो,गयो कोश्या घरवार दासीए वीठो धावतो,मोहोलीयोतिणिवार.पू.३०, तसु रूप देखी रंजियो, कोश्या अने तुमे नारदाप्ती कहे मुजामीनो,येगे मद्देल मकार. यूलि.५० मावि कहे कोण्या मेलवो, दासी कदे उखन सवा लाख टका हुये हेमना, तो मल सुनन. ध्रु. ४१ चउमाता मांडे ऋषि चालियो,जइ चीनव्यो महीपाल नेपाल देशी रायेवोधो,रतन चल मुरुमाल.यू.५२ रतनकंबल ऋपि स चाल्यो,याव्यो पालिनी पात; शुकवचन नोले खोसी तेजपि करे निगा. पारे वली नृप जाचियो,प्राप्यो वीजी वार जतन करी ऋषि से चाल्यो,पासी दंड मझार.यूलि. शुक कहे सवा लाख जाए,संनलो नील विचार ऋषि बूंटया दोला फिर्या,कने नहीं कर लगार.यू.४५ लील कहे वोल वापनो,संतलो तमे पिराजए शुक्रवचन साचुं करो,सारो तुमचो काज. यू.४३

"CLES
चलीभद्र
नी
सज्झाया
॥४०॥
रतनकंवल देखामिया, भीले मूक्यो तिणिवार ते पाणी कोश्याने देशननो करे मनोदार. धूलि. || ०स०
कोन्या कहे ऋपि संनलो,हिवे सजु सोल शिंगार स्नान अंजन करूं तां लगी, वेसो घरने वार.यू.५८
रतनकवल अंगखूणोकरी नाख्यो तिणिवार ऋपि देखी कोश्याने कहे, आशुं कयु रे गमार! यू. ४९
कोग्या कहे ऋपि संचलो,सवा लाख एदनो मोल:मूरख ते पांचे गम्यां,ते तो कहिये अमोल. भू.५०
कोच्याए ते ऋषि बूझवी,मोकल्या गुरुनी पास;पंच महाव्रत फरी नचर्या,जनमाहि पाम्यो दास.यू.५१
श्रीथूलिन्नद्र मुनीश्वरें, जिणे बुझवी कोइयानार; सुरनर सहु संग्रव करे, ए मोटा यणगार. यूलि.५२||
शीले ते सवि संकट टले,शीले ते सवि सुख थाय;शीले ते सुर सानिध करे,पातिक दूर पलाय.यू.५३
चोराशी चोवीशी लगे, रदेशे जेहन नाम; अलप नवने अंतरे, सहेशे शिवपुरि ठाम. यूलि.धन.५०
संवत सोल नवाणुए, आगरा नयर मझार; ए नणे गुणे जे मानवी, तेदने सदा सुखकार, यूलि.५५)
वमतपगछ गुरु राजियो, श्रीपाचचंसूरीद; रूपं ते रतिपत्ति दारव्यो, नविजननयनानंद. धूलि. ५६
श्रीसमरचंद्र सूरीश्वरु, पेखतां पातक जाय; तमु श्री रायचंद्र सदगुरु, नामे नयनिधि पाप. थू. पण
॥४०॥

जुगप्रधान गुरु राजिया,श्रीदीरानंदचंद्र नवमापासुशिल्प पत्नरों मुमिगर, सपि मुक्ति पाय. ॥ शूलि० ॥ ५ ॥ इति श्री ग्रूसिनद्र अष्टनामिका प्रबंध समाप्त. : Ht+sht5I4IAARPers अयश्रीयूलिजजीनीसन्काय, (माइ तुंगीपा गिरि शिखरे गोरे ए देशी.) पाटलीपुर वर रायनंदन, मंत्री नतो सकमाल रे; तसु घर लाग्लदे रुपे रंना, सती ने मुकुमाल रे. श्री धूलिल ऋपि नमर जोगी, योगी तत्त्वनो जाग रे; साढी वार कोमि विलसी मी, कोदया नारि सुजाण श्री भूलि.॥२॥ तात मरण मन वैराग्यो, जाग्यो मोहनिधा मी रे; श्री विजयसंनूती गुरुपाति दीका, सेइ घरमशुं प्रीति ममी रे. श्री धूलि. ॥ ३ ॥ manti...RAAMA रे.

थू०स०
श्री यूलि. ॥४॥
॥४॥
श्री यूलि. ॥५॥
कोश संन्नसीसीध संयम, इंखें दाधी अंगरे,
श्री धूसिनई चौमासे आवी, प्रतिवोचे मन रंग रे.
कोश हाव नाव विलास कीघा, दीघा सरंसं आहार
चौमाप्ति संख्या चित्रशाली; दिये हरख अपार रे.
पूरव प्रीते कोश वोघी, शोधी तत्त्व विचार रे;
श्राविका ते सूची कीघो, देइ देशणा सार रे.
सकमालसुते शुक्ष शील पाब्युं, मोड्यो मयण विकारं रे
चौराशी चौवीशी नाम रहशे, ते कदे संडं संसार रे.
संवत सनरतें अभेत्तर. जेठ शुदि तिथि सातम सार रे;
नपर खनाते मुनि नणे गेकुर, पाणी दरख अपार रे.
इतिश्री थूसिना स्वाध्याय.
श्री थूलि. ॥६॥
श्री यूलि. ॥७॥
...
श्री यूलि. ॥८॥

4chu4IS 414irt अय श्रीसिमंधरस्वामीस्तवनं. (उपराध्यपने बोया मोरनी र सर.) श्रीसिमंघर तुमशुं प्रीतमीजी, में कीधी चिन सोग दूरि रह्यां ते नवि विप्तरेजी, नेदलियो बाधेरे साप. ए मनमुने मोमु रे निनजी ते माहरुंजी, जिम चकोर चिन चंग; नामने लीघे रे हियर्छ उखसेजी, पेरुये पेरमाणेद. ए मनपुं. ॥ २॥ अलजोने पाये रे अंगें पति घणुंजी, दूर नसते रे वास; दर्शनी देखामोरे एकवार प्रावीनेजी, पूरो मारा मननी रे पाश. ए मनहुँ. ॥३॥ संदेशा फंदावू रे दिन सास नगमेनी, जो चाले रे कोइ सांय; "विसमीने चाटें रे पंथि कोइ नवि वदेजी, ते जाणे जंगनाय. ए मनमु.॥४॥ मन तनं वचने-रे साजन तु सदोजी, निश्चय ने व्यवदार;

सिom भी जीयन जौषधीरे माही शानदोजी, तुं मुज प्राताधार, ए मनहुँ.॥५॥ साधन तुमारे रे जिनजीवे पणाजी, मुज मनि तुं जगदीश रागी ने फुरागीरे सरीखा सेखयोजी, ते देखी घढे मुज रीदा. ए मन.॥६॥ भाजीने सारे प्रीतकी पाल जी, ते जाणे विदावा रे वीदा; दीप ने तुमारारे रुमा गुण वदपाजी, ते सम निशिदिश. ए मनहुँ ॥ ॥ गुणने तुमाग रे दीमे वे पणाजी, ते कहतां नावे रे पार; दालेमर रिदो रे सदेतां दोदिलोजी, हिने करजो सेवकनी सार. ए मनदं ॥८॥ सुरता मरीसरे जाली मेवियजी, बंक्ति फल दातार; एचिनहुँनै लागे रे तादरा नाम जी, ते रहिये मनारि संभारि. ए मनढुं.॥ ९ ॥ महान लागेरे सपनो शरिमोत्री, माहिव तुंरे मुजाण; नजग मारी रेमि मानो नदीजी, नुमे प्रगे गुणजाण, ए मन९. ॥१०॥ 11४२॥

29sesvgS0-11 ए प्रोत्तमीने कीधी रे गुण तारा सांजलीजी, श्रीगुरुजीनी पास; रंगनर रातो रे गफुर इणिपरे कोजी, दिये दोशे लील गिलास, ए मनईं. ॥११॥ अथ श्रीसिमंधरस्वामी स्तवन, ( राग भैरा.) सुणो सुणो रे सिमंघर सुखदातार, माहरा जीवन प्राणाधार, सुणो. ॥१॥ तुम नाम निरंतर हृदय मकार, मुखें जपतां हुये दरख अपार. सुणो. ॥२॥ तुम बदन पूनमचंशकार, गति जित्या गज रहे यन मझार. मुणो. ॥ ३॥ तुं उपकारी वातारी अपार, तुं उखतरुकप्पण कड़िये कुगर. मुणो. ॥४॥ तुं ज्ञानी पानी परमधार, तुं मनमोहन मदिमानंमार. सुगो. ॥५॥ हुँ निशिदिन समरु वारंवार, गुण कहेतां किमहिन यावे पार. मुणों. ॥६॥ ऋपि ठाकुर एडयो कहे विचार, शियसुख प्रापो म लावो वार. मुशो. ॥3॥ ...........मग Sit-SATARGER:

३३ ॥iri सानोमानान. ॥ ht-HTTER.दिनार तापी, जाम परमार गार प्रांग भूम गुरनुलोमी, रे मनदिन ने गिन सहिये पती॥१॥ RRC TR को, जिमी और मंमारमागर तरे॥ दोर साग्या निके 't ka नाना वम जिन बोन्ये ।। २॥ दोर लागे निके चार परकारना, १६. ने भने !! RE सागपाले बीजिये, प्रयम ते नाम संकण । नौ दोर ते वीप परमार मंग्या ॥ कूदनां गरवता ११. नाम रटोरनीज विहां ॥४॥तिमतां जीवन गिनर नहर र 1 अनुरम पार अधिकतमी, दोर या .......-. ॥ ॥ २ दिन 7 R प्रादादा पामतीपाटो नापी काली नवकरवाली जोय, ग्पानना उपगरण तणीय पाशातना कीधी दोय ॥ जघन्यश्री पुरमह एकासरा यांबिल उपवास, अनुक्रमे एद बालोयण सुगुरु वतावे तास ।। ६ ॥ ए जो खंमित याये थवा किदांदो गमाय, तो चलि नवा करायां दोप सहु मिटि जाय ॥ थापना अपमिलेगा पुरमहनो तप धार, खिरतां एकासण ते गमतां चोय वे पार ॥ ॥ दर्शनना अतिचार तिहां पुरम जघन्प, एकातरा प्रांविल अहम चिहुं न मन ॥ पाशातन गुरु देवनी साहमाशुं अप्रीति, जघन्य एकासगयी बालोयण चढती रीति ॥ ॥ अनंतकाय प्रारंन विनास्पां चोय प्रसि, विति चीरंदी प्रतियां एकासपायो वृदि। बहु विति चोरिंदीय हापां विति चौ उपवास, संकप्पादिक चिहुं विधि गुणा उगुण प्रकाश ।। ए ॥ नदेही कुलियावमा कीमीनगरा नंग, बहु जल नाहयां घोयां दस उपवास प्रसंग ।। वमन विरेचन कमिपातन प्रांधिल इक एक, जीवाणी नोलंता शेय उपवास विवेक ॥१०॥ संकप्पादिक एक पंचेंदि पर दोय, दोय करा आठ दले उपवास पालोयां जोय ॥ बहु पंच उपस खट यठ ने दस बीस, चिहुं प्रकारे चढती पालोयण पर Pal Hit || बीरो सानन ना पीव, दंक पासा प्रांधित दीप ॥ २५ ॥ पाव विण जो पाये, एकारण निम पुरिमा मात्र । गर मुहानि प्रांवित सारो, तिम अहम आधारो ॥२२॥पारागार को राय, द्रत पक्षमा करे सद सा ॥ दो मिठाऊकम वाले, भारोपण तदने शारजाये ॥२॥ प्राजोपपनो प्रति विस्तार, पूरी कदेतां नाये पार ॥ तोपरा सावर नंत सार, निरमल मन करतां निसतार ॥ २०॥ धन्य श्री वीर जिणेसर सामि, जसु मागम बने विष पामो ॥ जीनस्तर वासा अंग आदि, वसीप परंपरा गुरु परसादि ।। २५ ॥ !! रखा। इस जेर घरमी दिन रिमी पार पार पालोपणे, एकंत पूछे गुरु वताये सकत वर ननु जोपन ॥ विधि एद करसो तेइ तरसो घरमवंत तणे धुरै, ए तयन श्री प्रमीद कीयो बनाने पर पुरे ॥३०॥ निश्री वीरजिन प्रासोपण स्तवनं. PPP२५ ॥अथ श्रीशांतिजिनस्तवन ।। फेवण पाताले निवसति नैरने सवा, शुं घणो लाखिये जिलघरे परसदा ॥ नुजगति किणि दुई सयल जगे सुखकरो, केवण परचकना नीम जण नयहरी ॥१॥ फेवण माहो सदा पापणो ये नदी, जोपयो करण संसारे साचो सदी ।। धर्मनी गोरि कहि मूरख शुं ग्रह, जगतना जीवनी नुपमा कुण लहे ॥ २ ॥ धाणियो नमत व्यापारे वं किश्यु, रोपने ऋदिने वृदिया किश्यु ॥ जीवनो घातक जीवनो शुं दणे, जीव उपगारने देते गुरु शुंजणे ।। ३ ।। वितणु सेत्र शुं विष्णु यायुक्ष किशुं, जीवनो यूँद जलमांहि वहुलो किशुं ॥ मुंरतणो वास जे तास शुं नाखिये, खौरनो सार शुं जाणि जगे राखीये ॥४॥ १ नाग, २ गई, । र, ४ रिषि, ५ नग, ६ गल, ७ रिपु, ८ उल, ९ जल, १० लाभ, ११ नीति, १२माण, १३ माना, १४ दिन, १२प, १६ तिमि, १७ नाम, १८ थर, ....२.२.२०१३PRESENT RPURI.

शास्त
यणसई नोपनो मधुर मुर कुण करे, शत्रुने जीपया किशुं एकर सरे ॥
दर तणी परणि कुस घरणि मंमति कदी, एदनो नाव माह्यो कदो को लदो ॥ ५ ॥
जी एकवीस चे वेघदर मंझिये, तेहनो पागलो अक्षर गंमीये ॥
प्रघम प्रक्षरे लहुं नाम जगे जेदनो, तेहने समरणे पापक्षय देहनो ॥ ६ ॥
निर्मल वाणी नविपण जाणी, सेवकनी तमे मने घरो ॥
गधंवर फल समे अदनिशि नमि नमि, लीले नवसापर तरो ।। ७ ॥
॥ इतिश्री शांतिजिनस्तवन संपूर्ण ।।
se
१९ व २० दन, २१.मा.
मा दंगर सदनी पलो भार वापरायी एवंवाय के-"नागरि नगारे छनलाणी मामादि शंतिनाथ बंदउं."
या पापा हम इस मायना एम बनाय छे मारे नागौर नगरे उनलाणी मागादे शाति नाय चंदु.
॥४६॥

॥अथ श्रीनेमिजीन स्तवन । गिरिसुतापति कवण वखाणिये, शशि समान जगे कुण नालिये ॥ कवण मानवना मन मोदए, कॅवण अंगे नवंगे सोहए ॥१॥ कुण कहो जनवदन अलंकरे, विपर्म मारगें कयण ते संचरे ॥ कवण धारे चंद तणी पन्ना, किर्म कही गुरुजनने खलसना ॥२॥ रेसतको रस कया लदे सही, हुँअ जुन विवरे कुण घी मही॥ सुरिय वर्ग विचाले कुण रदे, "जिपहरे बहु शोना कुरा रहे ॥ ३ ॥ कवण कैटन कंस ति निर्जणे, मिति चरणे कवण ते रणझणे ॥ फैयण मल्लिसु जन्म तणी पुरी, कैयण तारे जल करि धरि तरी ॥४॥ १ श्रीकंठ, २ वदन, ३ रमणी, ४ हाटक, ५ नयन, ६ पुरुष, ७ रननी, ८ यरामी, ९ रमना, १० मंयान, ११ सकार, १२ नगर, १३ श्रीपति, १४ नेउर, १५ मिथिला, १३ नारड. .....:"FESENSESEREFerrr-Ur::-.:.

आस्ता
भादीप
रान
॥४९॥
जसु क्षेप मति उपजे, तेदने जवतणी स्थिति घणी नीपजे ॥१५॥ जेय जिनवचनथी जीव
नपरावग, गछ निज रागि ते जालिये सही शग ॥ प्रकरण सूत्र मति एकनी जे करे, रागी निरागी
ते सम पनि मन घरे ॥ १६ ।। माग ऊमाग ए ने मिन ए, तेहने जालिये जिणवर नत्ति ए॥
धन्प जे स्वामिना वचन अंगीकरे, समकित प्रवदणे नवजलनिधि तरे ॥ १७ ॥
॥ ढाल ॥ एक पूव लख पालिय, संयम नवनय टालिय, पालिय साधु समाचारी खरी
ए ॥ वहु जिय मुगति पहुचामिय, टाली कर्मनी आझिय, पागल शिवरमणीसें वर वरी ए ॥१७॥
माघ अंधारी तेरसे, साय मुनिवर दस सदससे, परिवस्या अष्टापद शृंगे जश्ए । उह नपवासे अण
सण, सीधुं जिद नही जर मरण, मनु शरण करिये एक मना सही ए ॥ १५ ॥
कलश ।। प्रन्नु शरण करिये नवजल तरिये दरिये कसमल मन तणो ए, मुज गकुर मितिन
सुरतरु फलीन वुघणानर मुख मंमयो ए ॥ प्रनु तुम गुण सारा प्रतिदि नदारा में मुखे जाए
किम फह्या ए, इम नणे समरचंड पाठक जिनजी नाम मात्र गुण जे सह्या ए ॥ २०॥ संवत
Besari
॥४९॥

सोल संवरे, कातीक मासे एद ॥ यय मनरंगे आपणे, कीधी नही सदंद ।। २१ ॥ इतिश्री बुधवानर मादिश्वर स्तवन संपूर्ण ॥ ॥अंय श्रीऋपत्नजिन स्तुतिः ॥ गीर्वाणमालातिपादपद्मनानेयमातंकिललब्धवर्णाः॥ यूपंनुतश्रीनवनैः समस्तैः पपाप्रणूपन्त अपार सारम्म् ॥ ॥ मयात्रविश्वमता जिनेश नाकर्णितंतेवचनं श्रुतिभ्याम्म् ॥ अमी मतःकर्मगणाः सुपुष्टा महिन्तुमुद्यन्तिवराकमात्रम् ॥२॥ रुपांविधायाशुततश्चतेभ्यः मां मोचयस्वा. तिदेवसेव ॥जगनानन्दकरधनानि नरेन्दसूनोमरुदेवमात ॥ ३ ॥ लयापनोलब्धश्रियास्वकीय मापिवनाशिवमुक्तिलक्ष्मीः। नत्यत्समः कश्चिवजिनेशः सुवर्णवर्णाद्र जितानमार ॥ ४॥ यो नवनोकतांप पायो धात्रीपतीनांमयमोमुनीनाम् ॥ सत्केवलज्ञाननृतो धुरीशः समुशम्नी रिमता.

पावस्तु
पानि
नस्तुति
॥५०॥
दधानः ॥ ५॥ यस्पप्रधानपरमंनिरीक्ष्य वक्रंकुमुदन्धुरयमृगाङ्गम्म् ॥ मन्येविभिनंकिमितिक
धनेश्रियानिर्जितशुःकान्तिः॥६॥ प्रमुदितवदना उन्दः पृथुनधनधरानिशेशाननाः कुचकलशनराः
मुविम्बाघराः॥ नजतिवरजनो सन्नेयुर्वराः प्रमुदितवदनाः स्त्रियस्तंनरम्म् ॥७॥इत्यंश्रीवपनदशंन्नुः
स्तुतःसागर साधुना ददातुनूरिशंदेवः वृपलदमाजिनेश्वरः ॥6॥ इति श्रीऋपन्न जिनस्तुतिः
॥ अथ श्रीपार्श्वजिन स्तुति. ॥
संसारागाध विस्तार पारापारनयंकरात् ॥ मांपाहित्रिदशश्रेणि सेवितानघपत्कज ॥१॥
अश्वसेनोद्नवोदाम वामकामानलंप्रनो ॥ विधेदिशमननामा कर्णनाम्बुधरेणते ॥२॥
रागपादयोऽष्टास्तस्करा मुक्तिवर्मनि ॥ मांप्रयातंप्रमुष्णन्ति ततोरक्षजगत्मनो ॥३॥
उटाष्टकर्मसमिधः प्रदानगवनगाः॥ शुक्लध्यानामिनासिद्धि केवलादपविष्टपं ।' ॥४॥
॥२०॥

G556everseESSESH जयस्वामिनूनवार्म प्रनावात्सागरोयतिः ॥ यतन्नत्परमानन्दमेपुरातः सुखबजम् ॥ ५॥ इति श्रीपार्वजिन स्तुति. ॥अथ श्रीमहावीरजिन स्तुति.॥ श्रीमन्मुक्तिरमाना वीरनापंनुवीतनो। यदिसिध्यगनोरोज वाढालिनमिष्ठत पपंवीक्ष्पपञ्चेषुः सुरस्त्रीतिरपीप्सितम् ॥ सहपानांमाप प्रिलोकविजयीकिमु ॥२॥ जन्मानिषेकसमये प्रेखोलितश्चाधरः ॥ तस्पकिंवपर्यतेवीर्य मानयैरेकजिया पस्यानेकानगुणान्वक्तुं गी:पति शतजिइपा। नशक्नोतिततोमन्दो इंकश्रवक्तुंशस्नुपामा एवंस्तुतःमन्नुर्वीरः सागरेणमुमुक्ष्णा ॥ अनारतस्वन्नक्तेन्यो ददातुपरमंसुखम् ॥ ५॥ ॥ अय श्रीनेमिजिन स्तुति ॥ • श्रीनेमिनाथजविकानजध्यं तमासनीलविमूर्तिघारकम्म् ॥ यदीयपादाब्जरजः ममर्शानरोल. २५-560"BesRDUrette

कस्तु
वासिनि
नस्तुति
०१॥
जन्तेकिसनूरिसौख्यम्म् ॥१॥ यदीयंसद्देशनयाजमोपि सन्नेतनीरागमशोकवृक्षः॥ यश्चेतनावान्
खलुकापधारी किंतस्यवएतनरासुरस्य ॥२॥ नूपालचारु विजयान्वयसूरनूतः राजीमतीस्तन
विशाल विशाखदार ॥ मां पाहिमोदवरटस्पन्नयाङिनेश शेवैयनाकिनरवन्द्यपदारविन्द ।।१३ ॥
श्रीरामकृष्णावपित्वत्पशादादनविष्यतस्तीर्थकरौ विशुःौ । नदारसम्यक्त्वघरोवलिष्टौ मदानुजौगौर
विनीसवीं ॥ ४ ॥ योवीतरागस्तवधर्मनिष्ठः प्रयातिसिदिकिमुचित्रमत्र ।। सुरागयुक्तोपितवक्रमाज
इन्टेनरोतिपरंपदंवै॥५॥ इत्यं श्रीनेमिनाथस्यास्तवंकुर्वन्मुमुकुक । सागरो जनतादेव परमानन्दजं
सुखम् ॥६॥
॥ अथ श्रीशांतिजिन स्तुति.॥
समप्रध्वापरध्वान्त विध्वंसनननोमणे ॥ मुक्तिवामांप्रधानंच शान्तिनाथप्रयछमाम् ॥१॥
विश्वसेनमदिनाथ गोत्रोदधिनिशाकर । अचिरोत्सग संक्रीमातत्परादेतनूपण ॥२॥
पारापतोविवेकश्च त्वयात्रातोदिपेनकात् ॥ मांकयंत्रायसेनत्वं विवेकेतवसेवकम् ॥३॥

॥४॥ ॥२॥ नवपंचतुर्दिक्कु प्रस्थितंवनिरीक्षितुम् ॥ चतुर्मुखो नवज्ञतास्वंचमेनेरुतार्थताम मुमुक्षुवक्तचंस्प शिष्यःसागरसज्ञकः || प्रणात्तिपरब्रह्म नास्तियत्रजरान्नयम्म् ॥५॥ ॥ अथ श्रीचित्रकूटचेत्पपरिपाटि ।। विमल विवेक विचार, ज्ञानकला नंमार; जे गुरु नित दिये ए, तस पय प्रणमिये ए. मोदतिमिर नरपूर, जेद करे गुरु दूर; ते मन शुदि नमी ए, मागि वचन अमी ए. चैत्यप्रवाहि रचीश, त्रिकरण सत्य नमीश; चित्रकूटि अति घणा ए, विंच श्रीजिनता ए. ॥३॥ थश्वसेन नरनाथ, तस सुत वहु जननाय; चैत्य नटे परे ए, देखी नयन रे ए. पार्श्वनाथ जिनचंद, नमिये घरी आनंद; वांवित मुखकरु ए, वंदित सुरवरु ए. (ढाल गदली.) पलियालगण देहरे, दृष्टि निरखता मन हरे, गुण करे सीमंघरजिन बंदतां ए; जिणहर नाणाचालतणे, प्रिन्नुवन जन जसु जस नणे, सुखि घणे श्रीमुनिसुमत वैदिये ए. ॥६॥ ॥४॥ anditicatementrir-.. Prastasisimrikinnanand . चि०५० संपत्ति खरदत्य शारीय, शीतलजिन सुखकारीय, वारीय कुमति नमीजे ते सदा ए; दो चोधरीपद चैत्यघरे, गकुरसी कारित वरे, दर्प घरे मुनिसुव्रत नमिये मुदा ए. (दाल जमावसी.) हये मालधिपे श्री यादिनाप, सवि विंय सहित नमुं जंतुनाय; नंमारी वेला तणि शांति, चौमुग नमिपे मन धरिप खंति ॥ ८ ॥ वलि शीतल आदिजिनेश पास, मूलनायक पूरे चित्त पाश; शाद सहणा जिलहरे वीय देव, जसु सवे मिलि करें सेव ॥॥ तिहां अजित जिनेसर गुण नदार, नमिये जन मन प्रानंदकार; मोजा वसही श्रीशांतिदेव, विविद परे बंदी करूं सेव ॥१०॥ ( ढाल.) राजसिंघ मंत्री तणे ए, चेहरे श्री शांतित; बंदीजे मन नाव घरे, फेमे चन गति नंतित. ॥ ४ ॥ करघि नौमुख यादिजिण, वराही संन्नव सामित सोम चिंतामणि बंदिये ए, जिम हुये पांचित कामित ।। १२ ।। मुमनि मुमति कर बंदीए ए, पंचम जिनवर वंदत; वशवाल कारित .. ।।५।।

नुवणि, बंदित सुरनर बंदित ॥ १३ ॥ चंदप्पह पाणंद करे, आदिश्वरजिन जाशित; भाव घरी सो वंदिये ए, ज्ञान प्रमुख गुण खाणित ॥ १५ ॥ द्वारा॥ तेवोशमा जिरा वंदिये ए, लय संभव पाप निकंदिये ए; पासितलावद पंचमो ए, जिन चंदी शिवपुरे वीसमो ए॥ १५ ।। मूल गेनारे पाश ए, सह तोमे नवऽख पास ए; जिनदर नमुं श्रादांवरे ए, ने दी नवख वीप्तरे ॥ १५ ॥ केइ प्रवाहे वाहिया ए, मिथ्या मत बांदे साहिया ए;ते व पाणे तंति ए, तप्त जाणी रत्नमय नंति ए॥ १७ ॥ सवि जिन प्रतिमा सारिखी ए, ए वात अठे प्रागमें लिखी ए; वेप विशेपे न वंदिये ए, इम कहेतां समकित निंदिये ए॥१०॥ इम मिणि कुमति दूर करो ए, शुद्ध समफित जाव हृदे घरोए; जिन प्रतिमा समतुल कहो ए, इणे शुद नावे शिवपुरि लहो ए ॥ १९ ॥ •ntibrstitisani

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चैत्यपरि
पाटे
।। ढाल ॥
तीर्थस्तंन पासे अ तुं नमरली, अतिहि उदार प्रासाद तुं नमरली; वीरजिनेश्वर
वंदिये तुं० जिणे कही धर्मह आदि ॥ तुंन० ॥ २० ॥ पास सुपात २ एकगं तुं० दीसे काउसमें
चंग; तुं न० नखट परी ते वंदिये तुं न. आपे सुख अन्नंग ॥ तुं न० ॥ २१ ॥ श्रीचंप्रन वंदिये
तुं न नवसय संसयहार; तुं न शाशिसंग्न जग मोदतुं तुं न अन्नय करे जयकार ।। तुंना
॥ १२ ॥ प्रतिमा अदबुद आदितणी तुं न० जोता दर्प अपारतुं न जे जनववे एक मनातुं न.
ते पामे जव पार ॥ तुं न० ॥ २३ ॥ अष्टम जिनवर बंदिये तुं न० चंमन जिनराय; तुं न.
पीतलिये प्रासादे सदा तुंना थाये निर्मल काय ॥ तुं न० ॥२४॥ सूराणे श्रीसुमतिजिया तुं ल.
खरदय वसही सातित; तुं न. पार्श्वनाथ जिन शामलो तुं न० नमतां करे नव अंत ॥ तुंन०॥
२५ ॥ सुमति जिनेश्वर वंदिये तुंज प्रापे सौख्य अनंत तुं न मागलिये चित घरी नमुं तुं न
सोलसमा श्रीशांति ॥ तुं न०॥ २६ ॥
॥५३॥

॥ ढाल ॥ लोलावसही श्रीशांतिजिणंद, दीठे मुज मन अति आणंद; सकोशले श्रीरिसद नमी- जे, जिम मनवांवित शिव पामी जे ॥२७॥ पूनमिये श्रीमति जुनारो, जिम नव संचित पातिक हारो; इग्यारमो जिन श्री श्रेयांश, दे जे क्रोधादिकनो वंश ।। २० ॥ (चोपाइ छंद.) वरित वाले ग्रादि नमीशु, शिवपुरपंथ सुखे पामीरोंतोला शाद घर जिन जोय, पार्श्वनाथ हुं 45 सोय ॥ २५ ॥ अष्टापद शत्रुजप जाण, विपुल गिरिंद सुतीर्थ वखारा; कनकाचल वैनार वर्मत, दोल शिखरे बडे जगवंत ॥ ३०॥ राणकपुर अदगिरिशृंग, वरकाणे वं मनरंग; एह आदि जगे तीरथ गम, ते सविहुं दो मजा प्रणाम ।। ३१॥ (ढाल.) श्म चौवामा जितेंद्र नमीजे, मानव जन्म तणां फल लीजे, कीजे दूरि प्रवाह iiiitainti.

पैल्पता
पाटि
चि०५०
लिए जिन प्रतिमा दहिये वीसें, तिहां चंदीजे चित्त जगीशे, रोप्त न कीजे लगोर. ॥ ३२॥
श्री अनुयोगक्षारे कदिये, निकेपा चारे सहदिये, सदिपे समकित साचो;
तेह मांहि ण काल विशेष, निषा र जेह वेखे, लेखे कुमति म राचो. ॥ ३३ ॥
तिणे कारण नाम उवणा मन घरी, हुं वै मिथ्यामति परिहरी, करी जिन धागम साखी;
दवे जिनपचन विचार्या शुः, गुरु मुखें ते नही कहुं विरुक्ष, कीध विचार मन राखी. ॥ ३४ ॥
जिनवगने हिंसा नवि नाखो, जे पूठे तसु इस परे दाखो, राखो निरतो बोध;
जे गुरु ण उपदेशे चाले, ज्ञानक्रिया ते नित अजुग्राले, ते जाणुं मुनि योध. ॥ ३५॥
(कलश.)
इण परे मन रंगे सद्गुरु संगें चैत्य सवि में वंदिया ए, पूर्यो मन सुस्त टाल्यो पुष्कृत पाप
सधि मुणि निंदिया ए; जे प्रतीत अनागत संप्रति जिन श्री पासचंद झी स्तषिय, येले सुखदायक
वांवित कारक श्री जिनयंदो जन नविय ॥ ३३ ॥ इति श्री चित्रकूट चैत्य परिपाटी समाप्तः
SadSts
॥५४॥

अथ श्री सम्यक्त्वदीपक दोधका ( सोरठा ) द. जेह तणो यादेश. साग्द्यलय दोसे नदी; तेदनो किम उपवेदा, मूला लोक मतांतर ते बलि न करे कांग, जे अनुमोदे कारणे; पशु जिम ताएया जाय, मुग्ध किपि जाणे नहीं ॥ २ सावयमग उपदेश, वेतां जे शंके नहीं; बिहु मिलि म्छेले वेष, तेमनुं शुं अनुमोदिये ?! ॥३ ढांक्या कूप समान, मुग्ण तिदा प्रसकी पमे; जे जिननी याण, वे नव विराग तेदना || Un मुनिवर पोपममाल, दीसे जे मंमि रखा; जाणे वालगोपाल, ते तो कयामा कुया ॥ ५॥ गरजु होदो जेह, जाणी पाणी काढशे; माहे न परशे तेह, काज सरे कांगे पता मा दोनो नर धीर, ढांक्या कूचा दूकमा; लदे| नीर न तोर, जीवित गण तिहां दोदि॥ क्रिया धनंती वार, यांग इण जी फरी; तोय न पाम्यो पार, विण समकित ते वेगलो ॥ ॥ किया यकी शिव दूर, समकित हुंती दूकमो; वाजे वाजी तूर, धावत धंधा चूकS Marria-RTIपिरिसिRP-RR ---

स०ई०
पतीपर
झिया तणों विश्वास, जे तेहने आयें हिये, विणु समर्फित ते पास; पमित जन-जाणे: सही ॥१७॥
नहुं राचि गमार, फटा टोप किरिया तणे, सखि समकिंत सार,जो आशा शिवपद-तणी ॥१॥
सजिसजो सहु कोय, (श्री) पार्श्वसूरिवीन, शिवसुख दायक होय आणा सहित किरिया मिलि१२
( देशना संबंधी आर्पा छंद.-.)
अस्केवलि विस्केचणि विषेपणी तदय दो संवेयणी ॥ तं. सुश-माणो जीवो. वेरग्गांसद
सुदमूर्त ॥ १ ॥ श्रापारं ववहारं देऊ. वितः दिध्विायाई ॥देसिजार-जीएसा अकेवलिः देसा
पनुमा ॥२॥ परमय विकहिं परमय वयणादि जी परमयान जणे.॥ विस्केविडार एसा विरकेवणिः
देसणावीया ॥३॥ उक्सम विवेगसंवर समया संतोप संन्नसुरकं ॥ वनिङई जीएसासंवेयंलि देसणा: ।
तईया ॥ ४ ॥ जरा मरण रोग सोगाइएदि पर दारुणं नवतरूवं । पयमिऊर जीएसा णिवेयणि
देसवा तुरिया ॥५॥

4-4-5254646- ॥ श्रोता परीक्षानी सजाय । (राग कालंगडो.) वरसे पुष्करावर्न सुमेदा । तब पृथिवी दाये नीर । पण एक मगसेलीन नेवाये । प्रति न्दानो ने कठिन शरीर ॥१॥ तिम गुरुवचने किमें न नेवाये । जे प्राणी दोय नारी कर्म । कंठ (थुक ) शोप जो प्रति घणो कीजे । तोय न पामे सूघो धर्म ॥२॥ वावना चंदन गंध तजीने। कसमल ऊपर माखी जाय । परिमन कलमतणो माने । मेरकमो नित कादव खाय॥३तिमा काले'कावस गुलियति कापमा चोल तणोनवि बेसे रंग । वायत वान न थापे घोलो । जो नित मोदे यमुना गंग ॥ ४ तिम० ॥ चिगटे कुंने जल नवि ने। न रहे काणे नाजन नीर । रवि | देखी धूम हुए अंघो पान न सहे वसंत करीर ॥ ५ तिम० ॥ मूंग कांगमू कश मांदे जेहवो । पाणी प्रगनिन पे अंत । जय केलव्या न दोवे तंडल । वग सीखव्या नयाये इंस॥६तिम०॥ मृगमद अगर कपुरे यास्पो । ससा न पामे रूमो गंध! सूरज शशिहर दीवा जोते। किमदी FRESHE09 श्री०स० भोगाप पक्षानी , नवि देखे जात्यंध ॥ तिमः ॥ ऊग्यो चंद चोरने न गमे । मे जवासो सूकी जाय । खीर खांम घृत मीठो लोजन । पेट कूतराने न समाय ॥ ८ तिम० ॥ मीनी ज्ञख न वायस चाखे । श्वानपुंकी न समी श्राय। आंवानुं वन (करदो) ऊंट चरे नही । अन्याश्ने न गमे न्याय ॥ तिम० ॥ खाय न संनिपातियो साकर । पापी ने धरमी न सुदाय । रुचे नही चंपो मधुकरने । घुण नित सूको लाकम खाय ॥१० तिम०॥ माम समीप नदी मूकीने । रासन राखें खरमे अंग । कुलवंती कामिनी तजीने । नीच करे पररमणी संग ॥ ११ तिम० ॥ नल फीटीने सेलमी न थाये । इकु तणे जो वाघे संग । दूध गुलें जो खींव सींचाये । तोदे मीगे नवि थाय प्रसंग ॥ १२ तिम० ॥ खीर सर्प मुख न हुवे अमृत । काच कमायो रतन न होय । खारो न टले समुह नो नदीयें । मोटे वा फल नीरप्सन होय ॥ १३ तिम० ॥ माये मणि नितु वहे नुजंगम । तोदे ते नवि निरविप हुंत । राम तणी सेवा करे इणुमंत । लंगोटी अधिको न लहंत ॥ १४ तिम० ।। (ढाल-श्री सदगुरुवचन करे शुं तेदने ए राग)इम लोकिक संबंध विचारी।लोकोचरनी ॥५६॥ -- 15225130 सुणजोयात चित्रे ब्राह्मदन बहु समजाव्यो। विरति तणी नविभाणीघात । श्रीसदगुरुवचन करे शुं तेदने.१५ महावीरनो शिष्य जमाली। तिहने नवि लागो उपदेश । कालिगसूरीयो कपिलावासी। गोसालो पामो कलेस ॥ १५ श्री०॥ विष्णुकुमरनां वचन सुणीने । नमुचि न मानी काई सीख । मारणार नदाई नृपनो । वार वरस लगि पाली वीख ॥ १७ श्री०॥ शिप्य पांचसे केरो नायक। धंगारमर्दक नामें सूरि । श्रावक परख्यो अन्तव्य वया विणु । निर्गुण जागी कीघो दूरि॥ १७ श्री०॥ संवेगी सायद्याचारज । सूत्र विरुइ तिरों को विचार । नागिल बंधव बहु समजाव्यो । सुमति कुगुरु न तज्पा लगार ॥ १ए श्री० ॥ शीलसनाह रिपिये प्रतिवोधी । रूपीये नधि कादयो साल। घरस पंचात तपे तर सखणा । तसु फल न यो एके चाल ॥ २० श्री० ॥ ईसरने मन धर्म न यो । रा महासतीने यो रोग। फासू जलश्री काया विषसे । म नामें घाटपां बहु लोग ॥ २१ श्री० ॥ पालककुमर नेमि जइ वंद्या । कंझरीक पाख्यो चारित्र । कृष्ण साधे वीरे जर चंद्या । फलें फेर यति थयो विचित्र ॥ २२ श्री० ॥ संगति एदने हुँति रूमी। पुरा नवि प्रीव्यो

ओ०स०
सोताप
सानी
-
॥५
सार विचार । कर्म निकाचित जेहने पोते । ते प्रतिवोघ न सहे लगार ॥२३ श्री. दृष्टिरागे
नर जे हुए रातो। जे हु दोपी प्रति घणघोर । मूढ वचन परमारथ न लहे । विग्रह पहिया वदे
फोर ॥ श्री० ॥ ए चिहुंने धर्म कहेवा वेते । ते. नवि.जाणे आगम रीत । कूकरवदनें कपूर
जपाले । जे मादपणने न घरे चित्त ॥२५ श्री० ॥ सोह वणिग. जिम करे कवाग्रह । सूत्र न
साचो प्री जेद । सोक प्रवादे मूंग मेखदाये । साचो धर्म न जाणे तेह ॥२६ श्री. ॥ नारी
फर्म घशाने ए परें । दलूकर्म मोठे ततकाल । समतकुमार चिसातीनंदन । थावचासुत गया
सुकमाल ॥ २७ श्री०॥ पर्पद पुरुष जोश्ने कदियो । धर्म कहो म प्राचारंगि । नंदी सूत्रे सोप
संन्नारी ब्रह्म कहे ज्यो ज्यो मनरंगि ॥ २८ श्री.॥
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--
॥५७॥

अथ श्री ब्रह्मचर्यव्रत हिपंचाशिका.
.
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(पुण गुण कंतारे सीरा सोहामणी-ए देशी.)
ढाल-गोयम गणहर पाय प्रामी करी, ब्रह्मवत सपशुंरे हर्ष हीये घरी
सूधो पाली रे नवसागर तरी, पामी पामे रे पामशे शिवपुरी.
नथलो-शिवपुरीना सुख लदे नवियण तेइ फल वनचेर तj,
मन वचन का शुइ पालो किशुं कहिये जिय घjः
तिशत माहे अ.विस्तर तेह संखे नपुं,-
ते नविकना नपकार देते सारंनूत सये शुणों.
१ उपलो ए हरीगीव छंदना नेवी दयनो मात्रामेल छंद छे. अने २८ मात्रान दरेक पदर्मा होय छे.
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अद्वि०
प्रलपर्ष
মাঠ
पाक्षिका
॥५८॥
RRIRAM.:..
ढाल-नारी रूप रे जगमांदे मंमी, पासति नरने रे समथि खमी
एदथी उस्तर जगमाहे नहीं, जाल मनोहर रमणी म कदी.
नयलो-इम कही जिणवरें नत्तरफयरो अध्ययनें वत्तीशमे,
जे हुए कर्मे लहुम प्राणि नारी विषय न वीसमे;
एभियानो करे नपक्रम दीये नावे नावना,
अवला तो जे पिंक यांध्यो तेइ फल के पापना.
॥२॥
ढाल-पाप अशंखद राशि एकठी मिली, स्त्रीयोनिने रे पामे संजली;
श्रुत माहे नाखे रे इणि परें केवली, एदवी सन्मुख जोइए केम वली ?
नयलो-वली संजली नारी पेखी करे श्लाघा जे जगें,
ते मोहे माता रंगे राता नमे नवमांदि तां लगें;
पुदगल यनंता एम जागी रूप देखी चिंतये,
॥५८॥

HESA-PARip- मल मूत्रनो मार तनु ए सुधी किम ते संश्रये. ढाल-मुख ते लालें रेनरियो नाशिका, पुण सिघालो रे परतिष पालिका; नेत्र ते पीहे रे कान मेलेंजर्या, कुच पलयंग्रीरूप हिये धर्श. नथलो-वर्षा कोगदाम केरा मेव मांस रुधिर नर्या, नसाजाल अमेघ पूर्या पेट चमें परवा; जधन मूत्रे नखशिखाविक अशुचि देव अ सही, विषय वायो काम अंघ जिय पवास्थिति जाणे नदी. ढाल-विषय रसासव माता जीव ए, जुगताजुगतो न जाणे कीव ए; तिल तुस मिनं सुख उख मेर समं, कुश अप विंड सागर उपमं. नथलो-पमा उखनी देशयी ए सर्वथी जगगुरु कहे, जे विपेय वाह्यो कर्म बांघे पार किम उम्मथ खड़े; เจเจ ผ64084-4444444

ग
प्राप
प्रताप
पाशिका
मध्यम वये बहेन समाणी, ते नमिये उत्तम प्राणी रे.!
ब्रह्मयत तरु राखण काजे, नववामी कदी जिनराजे रे,
ते कदीशु गुरुमुखे धारी, सोलमो अज्झयण संजारी रे.
वेसे सूवे जिहां नारी, तिदां न रहे ब्रह्मव्रतधारी रे;
मूपक कूकर मंझारी, दृष्टांत हिये अवधारी रे,
मा बहेन सुता वधू आवें, ए नाख्यो जिन विधिवारे
नारी अग्नि नर घृतकुंन, पिगले तिम विणसे बंजरे.
नाक कान चरण कर पाखे, दांत रहित सिथिल अंग दाखे रे
पूरवघर दशवियालें, शतवी नती न निदाले रे.
विकथा जाति कुल बल रूप, नेपथ्य शृंगार सरूवरे;
स्त्री सरीर यालोक न कीजे, एकांति व्रते चित दीजे रे.
जो. ॥१॥
जो.
जो. ॥२॥
जो.
जो. ॥४३॥
जो.
जो. ॥४॥
जो.
जो. ॥४५॥
जो.
जो. ॥ ४ ॥
420200+विपिन
॥१३॥

जा. जो. ॥ ४०॥ जो. जो. ॥ ४०॥ जी. एक आसने शयने न वेसे, अंग फरसयकी मन विणसे रे; मागहिय संगें फूलवालू, वेणी फरसे संनूति सीयालू रे. कुच श्रादि नयणे नहु निरखे, देखी मातादिक परखे रे कोमयंतरे वास न करीए, पूरव नोग दिये न समरिये रे. अति सरत थाहार न जिमिये, रस मी इश्यि दमिये रे; अति मात्रा आदार ते टाले, देह धोमे कवले पाले रे. विनूपण अंगे वरजे, नववा मनमथ तरजे रे; उदारिक चैक्रिय वेदें, नव नव अढार इम ने रे. सूघो जे व्रत पाराधे, ते शिवसुख सुरसुख साधे रे; जंबू ने गपसुकुमाल, ए मुनीनो झोल विशाल रे. दोष देखी अय गुण देखी, जिणे नारी दूर कवेखी रे; 1GRAMMAnsare जो. ॥ ४ाए । जो. जो. ॥ ५० ॥ जो. जो. ॥५१॥ : जो. "sthanirinthinkitd..........

ना०म०
वीतरा
गाष्टक
॥६४॥
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समकित वैरागे पूरा, ते नमिये नित नित मुरारे.। .
जोः॥५॥
(फलश. हरगीत सम हत.)
एकेक इंडी वशे पाठे कर्मग्रंथि सुदृढ करे, अनादि अने अनंत चनगर काल अनंत संचरे;
श्रीपासचंदसुरिंद शिष्य समरसिंघ श्म नच्चरे, इंस्तियो जे करे संवर देलें शियरमणी वरे.॥५३॥
इति श्री ब्रह्मचर्य वावनी स्वाध्याय संपूर्ण.
॥ अथ श्री वीतरागाष्टक.॥
(शिखरणी छंद.)
चिदानंदकंदं जिनपति जिनेई अघदरं, सदा शुनं ज्ञानं विशदवर ध्यानं सुखकर;
शरएपं कारुण्यं अचल शियमदं मुनिवरं, अनंतं श्रव्याधं परमपरसादं जिनवरं. ॥॥
हितं सर्वसत्वं सुगुणगुणराजं जगपति, विधी ब्रह्म रम्यं विदित सव योग मगपति;
अनेक एकंचा दरन सब रोग प्रन्नु तुमे, सदा शक्ति व्यक्ति परम सुखरक्ति वित्तु तुमे. ॥२॥

जगत्वंय जेष्टं जपति नगश्रेष्ठं जगगुरुं, महावीर वीर सकल मति नातं जयद; महानाग्यं नोग्यं जगतजनपाले गतवरं, मदामोसोद रहितरजपंक जयकर, 1॥३॥ गुणाधीसंघीशं रटत तव नामं मुनिजनं, महा मुक्तं गुप्तं कटत सब क्लेशं भमरनं; महा युई ति चढत सुखश्रेणी दमयुतं, मदाकिन स्फुत घटत मुखश्रेणी समयुतं. (दुनिलंपिन द.) अघी गुणाकर शंन्नु सुधाधनी, नपिजनांवुजयोपदिवामनी; कुमतिखमन घोर यतीश्वरं, सुमतिमंझन शंकर ईश्वरं ॥ ॥ नवत नापित नूत विलासने, तरन तारन पालन यामने; प्रवल कर्मवलंदतमोहन, मदनकंदन आननसोदनं ॥ ६ ॥ पर सुरासुर-फित्रर-अर्चित, अमल जासत झान सुखानते: सरव सत्वहितं गुनसागरं, सुख यनंत मदाद्युतियागरं ॥3॥ अतिशयं वसु पुन्प प्रलंकितं, जगतनाव पदं प्रप शोनितं; सहससितिसद् वपुलकर्ण, सरप सिमिदं जब रक्षणं ॥८॥ पता-

चोस्तो.
नि
(कलश) इम तरनतारन रितवारन सकल सुख संपतिकरो ॥ रविद विधुवर चरन चितघर
युएपो श्री जगदीदारो॥ निधि पूर्न केशव चं वत्सर रचित गुनमनी वाम ए । मानंदकंदा दरत
फंदा उदय मुरगवि काम ए. ॥ इति श्री दर्पचन्सूरीश्वर चरणकमल सेवी उदयचंदेश विरचिता
वीतरागस्तुतिः ॥
॥अथ श्री पांसठा यंत्र नधारमय श्री चोविशजिन स्तोत्र.॥
(अनुष्टुप छंद.)
माविनापं जगनायं मरना तथा नमिम् ।। अजितं जितमोदारिं पाश्चवंदे गुणागरम् ॥१॥
नेमिनायं त्रिलोकीशं शांतिंच सुविषि तथा ॥ अनंतनतदेव स्तुवेहमनिनंदनम् ॥३॥
सुवतं मुवतं नौमि श्रेयांसं सुखदायकम् ॥ विमलं विमलाचारं धर्म पद्ममनंजिनम्
मंतिनाथ जिनेदां च वासुपूज्यं जगद्गुरुम् ॥ कुंथु च शीतल वैदे सुपाचं परमेश्वरम् ॥४॥

1505051 ---- संजय जगदानं झालं नमाम्पदम् ।। सुमतिं वीरमदंत संघचापि चतुषिम् यंत्रोयं जिनतंझानिः पंचषष्ट्यंक निर्मितम्॥ पूज्यते यस्य युक्तास्य मंदिर सततं खलु तद्गुदे कोटि कल्पाणं श्रीविलसतो लीलया ।। कुशंपज्ञ नूनादि नश्यते व्याधि वेदनाः ११८ २१/२२१ ( मानिनी संद.) जति मुखमने तस्य यो मानवभ विमलमतिरनिंयं स्तोत्रमेतद्वितः ।। पठति परमत्तस्या प्रातरुठाय शश्वत् १९१२१०१० मुनिरनिरुतनतिर्मेघराजो वन्नाण ॥७॥ ५२४२५/22॥ इति मदामदोपाध्याय मुनि श्री मेघराजगशिरुतं स्तोत्रम् ॥ ४ ॥६५॥ दादा पास | चंद सूरि जी PORN ७ -- 'रानो पाश्वना थामिन स्तोत्रम् ॥६६॥ ॥ अथ श्री पार्श्वनाथजिन स्तोत्रम्.॥ > नजे जे नाथ तवांफिपद्मं सन्ने खले ते न कुतः प्रसादम् ॥ सदैव चिंतामलिपार्श्वदेव विदाय चान्पान् नुवि सर्वदेवान् ॥ १ ॥ नो प्राज्यं राज्यं प्रार्यये प्रार्थयेह नो गीर्वाणानामाधिपत्य सदैव ॥ एकांतेनाशुस्तंन्ननेश प्रसनि, योप्माकीणां श्रीनुक्तिमुक्तिपदां वै ॥२॥ वरीवृत्त्पते नक्ति शक्तिर्मदीया दनीध्वस्यते चेत्वयि व्यूढविनम् ॥ तदा लोश्वेश लमोसिनैव परं रीतिरेषा नुजिप्यस्य नायम् ॥ ३ ॥ सुरनरमधुपालीपीतपादारविंदे, विजयिनिखल विनव्यूह विध्वंसदके जवति नवति नाये मुक्तिलक्ष्मीसनाथे विन्नुवनजनतानां सर्वसंपनियाने ॥ ५ ॥ यदद ममलनक्त्या सेवमानोपि शश्वत् किमपि न च लनेयं स्वामिनः सेव देला इति मनति निधेया कापरेटाख्यपार्श्व तव गुणमणिमाला मालिनी इप्तिरेपा ॥५॥ धनसिदिसमृदिक्षा श्रुति सुरराजसमाजनतं मतिदम् ॥ यदिवांवसि सूतिविनूतिमदं नज रे करहदेवपापदम् ॥ ३ ॥ Ansar act-25143+ फलवदिजिनेशसुरशेनतं स्वकसेवककहितकातरो ॥ वदतां मम नात्र पात्र ने निजपाद सरोरुह नक्किमलम् ॥3॥ Py-1-1..."ETA"E+: 11 ॥श्री अनंतनायजिन स्तवन ।। सांनखं जिम जिम स्वामीना गुण, अधिक उनमप्तार; निकलंक ए अति कजला, जिणे जीत्यो रे मोतीनो दार के ॥१॥ जाणुं रे जिन जोडुं, मारे ही रे पाणंद अपार के; ते पागल मन ढोबु, मुज नयो नवे रे श्री अनंत प्रापार के. जाणुं रे.॥ २॥ पारंज परिग्रह परिहरी, उपनो केवल नाण; सब ३ मिलि महिमा करे, दवे वरते रे प्रिनुवनमांदे आण के.। जा०॥ ३ ॥ प्रनु पायपूजेवालणी, हवे मिलीय परपदा वार; मधुरी वाणी मोहता, प्रनु बोले रे घुरे घरम विचार के. । जा०॥४॥ (ढाल २ जी. अरणिक मुनिवर चाख्या गोचरी, ए राह.)जिनजी लाखे रे नविपण सखो, पदेलो जीव प्रकार; पृथिवी पाणी रे पावक पचन शें, वणस प्रसाद

मास्ता
* मार ॥५॥ भाप सरीखारे सवि जीव जायजो, दपयो को न दोप; 5 अनिवासी रे
सोनी, सुप यो सह कोप । पार०॥६॥जो कोइ यापणो एक रोम कपणे, तो न
गोमन माद एद जाणी रे परह मपीमजो, इम नाम्युं जगनादें। पाप०॥॥ परनी पीमाजी
अपरिहो, पारो माता रे जोर; नमरी जेहवीरेहिंसा नवजलें, जीवदया रे रे दीव. आप
.॥
(1 जा.) जोदपा पाजेबा कारण, जीनजी कयो उपाय; कूमो बोल किमे मत योलो, कूमे
५२म
नए मुज मने मानिपो रे, एदयो स्वामी तपोनपदेश; अमृतपान रुचे सनि केहने,
सपा वरिपरि। मुजः ॥१०॥ परप्रान कांइ न लीजिये, चोरीकार कलंक; इणे नगे
नति निमम बदिपे, परनवे नरक नि । मुज०॥ ११ ॥ धन कंचन परिग्रहनी ममता, म करो
होमगार ने दापर न मारे मायें, परिप्रद पग पग दो। मुज०॥ १२॥ (नाल ४ श्री.)
मम गवरो, जे झरे दोप रंनरे; मुरुत गसे इण संगते, जिम घानिये घृतकुंन
१३॥सपल जिम गमत्रो, ग पा पामो जेमरे, नेट न सो प्रमो, परमारोनो
॥७॥

प्रेम रे । झोल०॥ १५॥ अवता प्रादेमी सम गशो, गांकी दकमाण रे नरहिरणा पसजो परदा, बूटे ठे लोचनवाश रे. शोल. ॥ १५॥ काने कुंभल कलहले, पापे नेवर मणकार रे; गजगति चाले कामनी, देखी म घरो विकार रे । शोल० ॥ १५ ॥ (बाल ५ मी.) स्वामी को हिंतादिक टालो, मनमांदे कोष न राखो मान माया सोन किमे मयूचो, मधुर बनन मुख लाखो. शोनागी सुंदर निंदा निवारो, निज सुरुत संयम कर हारो। मोनागी. ॥ १७ ॥ अवता दूषण परना म कहो, परपश परदो म नाखो; मूहाणे को धूत नवाले, सूरज न हुए कांखो । शोला १८॥ तेदवी समता प्राणो जेहनी, शत्रुमित्र सम लेखो; मिदमेनराय कुमर इम बोले, जिम तुमे शिवपुर पेखा । शो० ॥ १५ ॥ (दाल छी.) स्वामी तुमारी शिक्षा सजिलोजो, जिप्तो खमगनो धार; नाली न शकुं इश कररेजी, कायर अछु अार.॥ २० ॥ नोलो रे नागो दिवमा सुगतिनो रे, सिनणो का प्राशतरयो तरयो रे प्राणी तुजने दादिलोर, विरा जिणचरण निवास । नोलो० ॥ २१ ॥ परने पीमा में बहुसी करीजो, कूमो कह्यो रे प्रसंग; inter भास्न. गोरी ने पनि मजाल रे, रम्पो विप रग रंग. जो. ॥ २२ ॥ रात दिवस हुँ मोघे पदमपो. मान रखो जरामापा मोद सोन पोकियो,ममता मूकी दूर। नो०॥२३॥ (ढाल.मी.) शिमोमो तुमारी शिरा सांसजीजी, पा) हुं न दाईं एदा जगतराय; कहयो न तुमारो माथे पो, माये धरिपा ताहरा पाप । जगना २५ । दीपों में ताहरा समा गुण घोजी, कंठे में कोताहो नाम जप कौरतो तुमारीजी जीने में वरीजी, तुम यागत घरी ये जोमी दाय. जगत २५॥ जा रज घरो में ताहरा पापनीजो, दिवे करजो सेवकनी सार। ज० बापने चालक मुंबतो बीनरेजी, हुं नमियो हुँ बहुल संमार । जगत० ॥ २५॥ गेरुनी पीना किम पीहर मामदेजो, मुटने एक ताहो प्राधार; ज० साम्बीने मुनझाना कुंवर नं यठेजो, देजो मुजने दत्ता सपनो पार. संडाने मामी नुमे गे जिदांजो । जगतः ॥ २१ ॥ (कजा.) विदा परम माण न रोग मोगर पनो सगार, माधिप धंसनीने निदा सुख अपार; (श्री)पावचंसूरीश्वर पाय नमीनायो श्री विजयदेवमूर,अनंतनाय नननमो नीकर सेव्यो धाणंद पूरे. ॥ २८ ॥ Titter. GENERRRRIFregnstAHSP4test ॥श्रीचतुर्विंसतिजिन-स्तुतिः ॥ (आर्या उंद.) श्रीगोतमगणधारं शुजतरुराजीप्रतानजलघारम् ॥ विनुवनशोनाकारं नौमि सदा सुंदराकारम् ॥ १॥ (त्रिनंगी वंद.) प्रादीश्वरदेवं सुरकृतसेवं पुपपविशालं नूपालं, प्रन्नुमजितं ध्येयं सुरनरगेयं ज्ञानामेयं वदेहम्। संजवनगवंतं शिवजयवंत रमावदंतं शुजवंतं, संवरनृपनंदन श्री अभिनंदन मीमे नित्यं जगदीशम् ॥२॥ (आर्या वंद.) मेघमहीपतिपुत्रं सुमतिं पद्मप्रनं स्तुवे शुलदम् ॥ श्रीमजिनं सुपाच चंशनं चं समयक्रम् ॥ ३ ॥ (वितंगी द.) सुविधि गुण जलर्षि चांचितनिधिदं वे सततं सचमुर्द, शीतलजिनमिग्यं नतसुरवस्य कृतवरचप्य सध्य; समतां विघ्राणं विश्ववाणं रुचिरमाणं श्रेयांस, निनवासुपूज्यं वासवपूज्यं धृतशिवराज्यं शोनार्यम् ।।४।।

च०स्तु० (भार्या र) विमर्ष विमझानं जिनाधिराज प्रनासुरमनंतम् ॥ धर्म धर्मनिदानं शांतिजिनं नौमि सदनात्या ॥५॥ (विनंगी द.) जनमुदंघरंत नुविविचरंतं तमोदरतं गुणवंत, बहु सिदिघतं तिवदंतं नवंतरतं श्रीमंतम् ॥ कुंथुजिनराज प्रवरसमाज स्तौमिमुदारं श्रीमलिं, निर्मलतरकीति निरुपममूनि सुवनजिनपंक्तिं शुभनयम् ॥ ६ ॥ (आर्या छंद.) इक्ष्वाकुवंशमानस- देस को नमि जिनापोदाम् ॥ नेमि दरोवरवंदपं ख्यातं पार्श्वजिनं वीरंच ॥ ७ ॥ (सम्परा द.) श्रीतोराजान् मुरवरमदितान् विश्वविश्वप्रतीतान्, गंगागोकीरचंद- पवरतररुचि-प्ररूपकीर्ति-प्रतातान् ।। श्रीमत्पूर्णऽशिप्य-प्रथित-सुहृदयो नक्तितः स्तौतिपूज्यान्, नव्यानोजालिमान धितवर-रतिदान् सर्वदानंदचंदः ॥ ८॥ श्रीजिनेश- स्तुतिः (इजाजा उद) देवाः प्रत्नोपविधिनात्मशुश्य, नक्त्यामुमेरोः शिखरेऽभ्यपिचन् ।। संस्तूयसे त्वं समया समोद-मुन्मतरते ज्ञानहटा पपा मे ॥ १ ॥ Sanian SEARHI (उपजाती वंद.) ध्यानानुकंपाधृतयः प्रधानो-शासिस्थिरा ज्ञानसुवक्रमन ।। मुनायमंति त्वयि सिसिौधाऽधिरूढकमोज्झितविश्वव्यः॥२॥ संसारनीतं जगदीशदीनं मारक रकाकमरक- गीयम् ॥ प्रौढ प्रसादं कुरु सौम्पदृष्टया विलोकय स्वीप-वचभनेहि ॥३॥ नत ! विज्ञावित दोप! दन दानावरिक्षा अपि वीत दौःस्थ्याः ॥ त्वपिकृता नूरिधना अनंतझानहिषासकममकुमासान् ॥५॥ विवेनवेर्मुक्तिमनाधिपाद्या स्तवस्त्रिपूंजीविवधघिसंध्यम् ॥ कल्पापकानां जिनपंचपरी-माराध्य जव्यः क्षपतेऽटकर्म ॥५॥ शाम्पेनपश्यन् विजगहियेकी,श्रयन् प्रनो पंचसमित्युपैति ।। मपास्यसतयधि | सिदिमध्ये, तिजवेनोपन्नवाऽपेशम् ॥ ६ ॥ मुक्त्वान्नवं सौख्यमयाप्तुमंगी, घीमांस्त्पजन् मोहम- घस्यहंता । योमुच्यमानस्तमसासिवीयेत् त्वत्सेविता काम्पतु सोत्रनेतः ।। ७ ॥ केमेपुवृक्षत्सुघ. नायमानो, दितः पितेवामृतवदुरापः ।। मम मनोनव्यतरंस्वनृत्यी, नावं सदानंदमयः प्रदेयात् ॥८॥ R ०स्तु० पंचनि पिस्तुनि ॥७॥ ॥ श्रीपंचतीर्थ-स्तुतिः ॥ (गीती) श्रीनानिसनववितुं, नवसंजवकलुपकूट-संहरणम् ॥ अज्ञानध्वांतहत्य, पुरतस्तमतो- मंझलं वंदे ॥ १ ॥ (द नुजंगी.) जगज्जुन-चंचच्चिदानंदयासं, निराधार-निर्लेप रुपावनासम्॥ विनिक्षेप-निक्षेप-वैधरिक्तं, युगादीश्वरं मूलोकानिपिक्तम् ॥ २॥ (आर्या) श्रीजितशत्रुनामब, मवनत्रैलोक्यजंतुराशीनाम् ॥ अन्नवनमध्याशानां नवोदनवानां सदा सेवे ॥ ३ ॥ (नुजंगी.) श्रुतीनामगम्यं स्वतो जिन्नजानां, सुगम्यं स्वयं संविदा नीरजानाम् ॥ मनःकायवाचां निगूढ रहस्य, स्वरूपाजितं सिदिनाजं सदास्यम् ॥ ४॥ (मार्या) श्रीशांते स्वर्णकांते, मदिष्टमंदारमूलमतगे। मामुइर ग्वाब्धेः सत्याधिकसौख्यसागरंधेदि ॥५॥ (तुजंगी) जनुर्यस्य लोकोपकारेक देतु. महातंककककये धूमकेतुः ॥ अचिंत्य-प्रनायो र यस्य नाम, तुलोत्तीर्णधाम्ने तदस्मै नमामः ॥६॥ (आ) यन्नामसि मंत्राः कृतसंकेताश्चमन्निधिंयाति ॥ नागेश्मुखादेवा स्तमाश्वसेनिजिनंस्तुम ॥७॥(लुजंगी) अदृश्यामनश्यामदास्यामरस्या-मपारामहारामचारामनाराम् ॥ कलांकांचिदगे.

Pantan फरूपां दधान, निरुलेखसदलणः संविधानम् ॥ ८॥ (ग्रापी) श्रीवीरतीयकनन, अंगमार्ग शुक्षय वुध्या ॥ विनांतः परसमपै.रवाधितं शासनं जयति ॥ ॥ (जुजंगी) नियोग निकामिनी राग नाव-प्रसिई समृदं मसाध्यस्वनायम् ॥ महानंदसोये सतायः शमास्ते, निरीदाय कम्मैनिद. स्मैनमस्ते ॥ १० ॥ (शार्दूलनिकीमित ) पोजिनपंचकस्तुतिमिपाइनक्तिर्मपानिकता, सद्दष्टेः श्रुतिबोधिदः सुविशदो देतुः सदा दैवतम् ॥ संसारचमनंजने गदमलंकारस्थनिने मनुः स्वारमारा मविधूदयाय सततंनूपादियं जाविता ॥ ११ ॥ इतिश्री पंगती- स्तुतिः ॥ श्री वीशविहरमानजिन नमस्कार, (१) समरी जिनराय धरी बहु लाय लिनं गुणगाय सदा मुखकारी,बिहरमाणनीश लोकत्रया मुदा जगदीश नमुं नितधारी; केर विदेद सदा सुखगेद मनोरयरे लजी शिवतारी, मुनिदशरत्य पाइ जिन सत्य सारि वहुप्रत्य नजे इकतारी ॥ १ ॥ सिमंघरदेव ननुं नित मेय को नित सेय ध्यान करितोरे, जुगमंघरस्वाम अनंतगुणग्राम टारिसय काम नवव्रम गरे; नपुंजिन बाहु पीन विजय साह पूरिस्त दाह सुधावच जारे, मुबाहु प्ररित गिणु नितमंत करीमन खंत घj मनोरे ॥२॥जबूगीय चारि नमे नरनारी ईतनववारि रंग रसरनो, घातकीपखं मंग अंग जिन तमि सबै जग उनो स्वामि संजात स्वयंप्रभु गात सोवन समघात महागुन जुतो, पिलानन देव अनंतवारिदेव सुरपन्न टेव नमुं मपिमनो ॥३॥ विशाल जिननाम वजधर साम हुए {मराम नबिकजग केरो. पुष्करदीवन गुनमनि ति चंचाहुदिइ श्रेयगुण मेरो, भुजंग जिनरापार मुग्मदाय नेमि प्रभुशाय रहुं गहिरो, संपम तप काय सदा मन नाय बोरसेन राय हरे मनमरो॥॥ शमि मदान करे नित न सोम्पगुनचंद्र नचिनलाई, देवपाईश सुरानर धौ नाम निज शोदा लि गुन गाई; जिन अंनतवीर्य मेरु जिम धीर्य अंनत गुण वीर्य टारि अम्मार पाई, क्षारय परिभम प्राजिन एम जप्यां जग खेम हुशे तुम्द ना ॥ ५ ॥इम वीश मन मोक्न तनात विदेहपंचसंत जिनेसर राया, प्रासी सख पुन्ध गृदयाप्त सब तनी मन गार पे पिनाया प्रप इक पारख परे जिननाख सिदंतकी साग्य पोपे तप कापा, अतिशे - . चौत्रिश वाणी पण त्रिश गुणे जगदीश परो मन नाया ॥ ३ ॥ नौविध संघठाग करे मुवावाण योजन लगि वाण महासुख सासे, कुंथु अर जम्म विने जिन पम्म मुनिसुयत नम्मि मोवीन जासें; चोसठ मिली इंद नमे नरद दिये सुखकंद मणुनववासे, उदेचंद गुरुराय नमी तसु गाय वीश जिनराप दशरथ गुन नाते. ॥७॥ श्रीजिन नाम रक्षा स्तोत्रं प्रारंज. सर्वातिशय संपूर्णान् ध्यात्वा सर्वजिनाधिपान् ॥ पंचवर्णान् पंनरूपविश्यधुमकुंजरान् ॥१॥ चतुत्राश्चतुर्वक्रान् चतुर्विशतिसंमितान् जैनी सांगेषु रक्षां कुर्ये उत्खीपघातिनी ॥ २ ॥ शिरो मे वृपत्नः पातु नासं श्री अजितमभुः पाता मे श्री जिनो नेप्रे संनवभाजिनंदनः ॥ ३ ॥ सुमतिः पद्मप्रनच श्रवणो ममरक्षताम् ।। सुपाश्चो रक्षतु प्राणं मुखं चंभानमन्तुः ॥३॥ रसनां सुविधिः पातु कंवें श्री शीतलो जिनः ।। स्कंधं श्रेयांसः श्रीवासुपुग्पश्च विमलो नुनी ॥ ५ ॥ अनंत श्री धर्मनायौ पातां मे करपद्धवौ ।। शांति महदयं रक्षान्मध्पं नान्निं कुंबरी ॥६॥ मलिः कटी पा.तो. 5: स्वामी श्री गौतमस्तबिपित गुप्तनिधिः कीत्यंत केन तुल्यः ॥ ४॥ इति०॥ ॥ श्रीपाश्चंजिन स्तोत्रम् ॥ तीवर जगनाथमदतं बोधि भनुम् ॥ सत्यातपरमानंद पोगोश परमेटिनम् ॥१॥ सामलिरनीपस्तावारमध्पगम् ॥ जनोदासक-पीठस्यं विपक्ष-घरचातरम् ॥ २ ॥ विचित्र रचनो देतातपस्विप जुरितम् ॥ धन्यदासन वादश्चिादितांजीप्तरोरुहम् ॥ ३ ॥ नम्प मानात पदादादन नास्करम् ॥ प्राणि जन्माय तापाप निवारक जलप्रदम् ॥ ४॥ प्रेसोक्य पेपमक महामारिवारकम् ॥ निर्विघ्नमदातारं पार्थपक्ष प्रसेवितम् ॥ ५ ॥ पिसंगरना. rat aranार नपारदम् ॥ गानाग-मपत्नानामुपदर विचातकम् ॥ ३ ॥ सबझं सर्वगं सा म नुन पानागेन मेमेयं वारिदानां विनाधरम् ॥ 3 ॥ रमागमादयो रम्पा यस्माद- मुवाम् ॥ वो नचंतित पाभमाधमनि मशिनम् ॥ ॥ (प्रायां यतम् ) इत्यनुजीपे- ARE EXA को व्यापान विराजिनो नमिमता मंस्तुनम्तोचान ॥ry ॥

श्रीआदिनाथजीनु स्तवन, (मानरिमा मुनिार पनपन तुम प्रगगार-देगी.) शत्रुजयमंझरा श्रादिजिन, बीनतमी अवधार; मुज मन तिम यसगी रह्योजी, जिमनाएं कतार, मनमोदन जिनवर वे साचो तुम नाम. मन सममि कापा मिलेजी, तो नदी उगाम; नित नित कवी प्रहसमेनी, प्रनु तुम करुं प्रणाम. मन. ॥२॥ जे प्रनु मुजने ते कडोजी, ते तो में नविप्राय: वैरी-कर्म निहाँ तिदांजी, विकट ते के घाय. मन. ॥३॥ इशिगिरि जे उनम चयाजी, ते न रह्या संसार; जे नीचा नदी ताजी, ते पहोता नवपार. मन. ॥ ४॥ जाणु उत्तम गति पहुंजी, ममता नहुं मूकाय; ने की गुल पण गम्पोजी, समरय शिण न सिवाय. मन. ॥५॥त समरथ पण मुज नहीजी, रे मन हजी तुं विमास; वामन ते फल किम लदेजो, जे चंचा पाकाश. मन.॥ ६ ॥रे मन तुज पाम्पो अग्रेजी,मांकानो वैराग;ए तो श्रिर तोदिज रहेजी, जे मार्य हुए नाग, मन. ।। गाएमन्नावप्रभुनो सहीजी, जेतुं खिया पिरयाय; सोनेये (मुवनटक) कोको

आत
धमीन
10४॥
पोजी, पर देखे तिलि नाप.मन.॥७॥सयल संयोग विना मिल्येजी, काज न च प्रमाण; एक
प रष किम नदेजो, निधे इम तुं जाण. मन. ॥ ए ॥ अमतुम वे साये मिलीजी, पामी अवसर
नाय; करिशुं पन्नुसेगा वळीजी, हियमा मुमशुं प्राव. मन. ॥१०॥ घj घणीपरे श्म कह्युजी,
लोपन मूके पान: उन पाम्या प्रभुतणाजी, जे जाए ते जान. मन. ॥ ११ ॥ काया प्रावी मुज्ज.
मुंजी, चिन रडुं तुम पास; ते प्रतु यिर करी राखजोजी, तुमचे चरणे निवास. मन. ॥ १२ ॥
मनमलि तुम पयपंकजेजी, रमण करुं निशदीश; परमानंदी परिमलेजी, पूर्जु तास जगीश.
मनः ॥ १३ ॥ शगुंजपमंझन तुम्हशुंजी, में मांझी अधुमार; चित्त तिदा काया इदांजी, मति
मूफेजो निसार. मन. ॥ १५ ॥ दूर उतां प्रभु दूकाजी, कीघा एणे उपाय; ए मन तुम मुज विचे
करेजी, गति मागति खिमांप.मन.॥१५॥ मननी गति ठे जेदवीजी, तेहवी तननी श्राय; तो प्रभु
दसण पादरीजी, वेळा थोमी जाप.मन.॥१६॥ स्वामी अहनिशि नलगेजी, चित्त चपल पण वारी;
मुज पपए फस मंपजेजी, अनुमतिने पापारि, मन.॥ १० ॥धासोची कायाशुं सहीजी, हुं वेदलो
He
॥७४॥

याधीश; पार्श्वचंचसूरी विनवेजी, गित फल पामीश. मन. ॥ १०॥ ॥श्री मुनिसुव्रतस्वामीनुं स्तवन. ॥ (देशी झांझरीभामुनिनी.) श्री मुनिसुव्रत चीनवुजी, प्रिनुवनतिलक समान; सुरतरु गो चिंतामणि श्रधिको, गुणमणि रयणनिधान, जगतगुरु तुमसम अवर न देव, जगनायक जगतारक मिलियो, अदनिशि करशु सेव. जगत.॥१॥ प्रापत देवलोकधी चक्यिा, वीशसागर जिदा प्रायु; राजगृदि नयर अतिसुंदर, सुमित्र नामे तिहां राय. ज. ॥२॥पनमाराणी रंजसमाणी, तासकुखे अवतार; श्रावण शुदी पूनम दिन पाम्पो, जगजीवन आधार. ज.॥ ३ ॥ श्रवण नक्षत्रे चंने योगें, उतपति अवसर होय; ज. नम जेठ वदि पाठम दिवसें, पाम्यो रिख वसी सोय. ज. ॥ ४॥ मकरराशि कुर्मलंग्न प्रन्नु, शामल वर्ण शरीर; घनुप बीश वीशमो जिनेश्वर, सायर जिम गतीर. ज. ॥ ५ ॥ ( ढाल राग जैरव.) प्रतुग यकी दिनरात, मुनिनीपरे सुप्रत मात; तिरो मुनिसुव्रत विख्यात. ॥ ६॥ ए Autan antara tara ६५.२५-७६

मुनिगम
नशामी
नुमान
11७11
नाम सजन मांदी दीघो, सुरनरवरि अंगीकार कीधो; निजजनम तणो फल लोधो.॥७॥ प्रभु दिन मुस्त:
दिन क्रमे क्रमे वाधे, रापलचिनोग समाधे; सूखे पारिणा साधे.॥७॥ राजरिहि रमणीकार,
ए जागी सहुए असार; मी ये संयमनार. ॥ ए॥ नपन्नो तिहां मनाण, राजगृद दिवागणं;
तप 36 कयों परिमाण ॥ १० ॥ फागण शूदि वारसे जाणो, दिव पारणुं प्रथम वियागो; ब्रह्मदत्त ।
गृहि सुक्खागो ॥ ११ ॥ प्रनु कर संयम पाली, तप सबल करी कर्म टाली, ज्ञान केवल अनि
अजुअाली ॥ १२॥ फागण वदी वारसे जाणी, केवल मदिमा ति वखाणी; तिदा करे विबुध
तियनाणी ॥ १३ ॥ चंपक तरुतले 35 कीघो, उपदेश अमृतसम दीधो; नवियराजण कारिज
सीघो ॥१५॥ श्रद्वार थया गणघार, सहसत्रीश हुवा मुनि सार; तप-संयम-शीलनंमार ।। १५ ।।
(दाल राग वसंत.) पचास सदस साहुणीये जास, परिवहिये संयमनो निवास; मुनिसुव्रत
स्वामी नमुं नाय, पाय प्रणमे नरपति अमरराय ॥ १६ ॥ सदस सतर एक लख अधिक जाणी,
श्रावकवत वार सहित चखाणी ॥ मु०॥ १३ ॥ त्रिण साख अधिक सहस चनतीश, श्राविप : ॥५॥

+9+8+0+2+.. गुणगायें निशिदीश ॥ मु०॥१८॥ वरुणानिहाण यक्ष करे सेव, नरदत्ता नामि तास देवि ।। मु० ॥१९॥ प्रायु पाली वर्ष सदसत्रीश, सम्मतशिखरि आल्या जगींश || मु० ॥ २० ॥ संग्रारो करी प्रनु सिइ पत्न, जेठ वदि नवमी दिनि नमुं निन ।। मु० ॥ २१ ॥ (कलश) इम वीशम जिणवर नवियण सुखकर जंवूनयरिये ध्याश्ये ए, श्रीपासू. रिवर शिप्य समरचंद एकवीश गणे गाइये ए; सोलसय नयुत्तर वर पोप वदि यापम दिनि पाराधिये ए, मन्नुपय सेवा फल बेरित लदिये अनुममि शिवसुख साधिये ए ॥ २२ ॥ ॥श्री नपदेशरहस्य सफाय ॥ "गुरु आरे गुण तुम तणा"ए देशी. विनय करीने गुरुगम सांजली, पागम अरण विचारू रे ॥ विणु परमारय जाण्या पाखे, फिम पामीस जवपारु रे ॥ १ ॥ वापरला जीवाला एद, मरम मन राखे रे, विधि उपदेश जे दिसा जाणे, तेह प्रत्ये तु नाखे रे॥ वापरला ॥ एमांकणी ॥ धर्मका उपवाइ

उपदेश
उस
नपंगे, एद यथास्थित वाणी रे ॥ प्रथम अंगे अध्ययन चोथे, जिननपदेश ते जाणी रे ॥
पापमला० ॥२॥ साधु गृही अधिकारे जिणवर, सहुए जीव रखावे रे ॥ तिणहीज वचने शूल
रखावी, सूखिम केम हणावे रे ॥ वापरला० ॥ ३ ॥ श्रलिय प्रदत्त अवन परिग्रह, जिन नपदेशे
म जोइ रे ।। सूखिम वादर मांदोमांदे, श्रुत विपरीत न होइ रे ॥ वापरला० ॥ ४॥ जे गीतारण
नाम कहावे, यादि ए नदी कतारू रे ॥ सावध कारणे आमो मंमे, ते कहीये अविचारू रे ॥वापमला०
॥५॥ आचारांगे दशाश्रुतकंघे, साधुतणे अधिकारे रे ॥ एक जले एक घले पान करीने, जयणा
जसे सतारे रे ॥ वापमला० ॥ ६ ॥ जे जले पद ते लोकाचारे, जे आले ते उपदेशे रे ॥ इणं विषु
मोदत मोदत मोदे, दीये नदीय प्रवेशे रे ॥ वापमला० ॥७॥ केवली उनमथ जल उतरतां,
इरियायही संपगई रे ॥ अनुक्रमे वेठने किरिया लागे, एह रहस्य ल्यो नाई रे ॥वापमला० ॥८॥
यागपीने धरियावदीया, सकपायी संपराई रे ॥ एक नुपदेशे विणु उपदेशे, वीजो प्रागमे थाई
रे। वारमसा० ॥ ॥ सरवी जयणा करतो रागी, निरागी पण चाले रे ॥ एक उत्सूत्रे बीजो
॥७६॥

सूत्रे, अंतर नरिये ठाले रे ॥ वापमला० ॥ १० || राग दोष परहरवे जयणा, निश्चय नय व्यवदारे २॥ केवल नाणी एदन नाख, अयर ययास्थित पारे रे ॥ वापमला ॥११॥ पंचम अंगे सप्तम दशमे, अढारमे शत घोले रे । एद नाव जे निरता जाणे, तसु मति किमे नमोले रे ।। वापरला० ॥१२॥ सावध लय जे रियाय दिया, ते निवप सहीये रे ॥ कहत विचाले संख न लाने, व्यवहारे केम कदीपे रे ॥ बापमला० ॥ १३ ॥ पंचय चारित्र चार यथास्थित, पंचम जिन विधि वादे रे ॥ एद सदगा उजद लदोने, नोला म पम प्रमादे रे ॥ वापमला० ॥ १५ ॥ एद रहस्य जग वीरतो कोइ, जिन नाखित चित्त राखे रे ॥ श्री साहुरयण गुरु चरण प्रसादे, श्री पार्श्वचं. सरि दाले रे ॥ वापमसा० ॥ १५ ॥ ॥ श्री मेघकुमार सजाय ॥ समकितधार गन्नारे.पेसताजी ए देशी.॥ वीरजिणेशर वंध विगतशुंजी, प्रणामी गोयम पायरे; यविश दरखे हुं ऋपिराजियोजी, मेघ- कुमर नले नायरे ॥ १ ॥ सदन सोनागी साधु शिरोमणीजी, जेदनुं चरित्र विस्ताररे; स्वामी ! " LevUtta मे० सुधर्म जयते कदेजी, उमा अंग मझाररे ॥ सहज०॥ २ ॥ नपरी राजगृदो प्रति रलियामणीजी, धलिक तिहां नृप साररे: धारणोदेवी तमु घरि सुंदरुजी, मंत्री अन्नयकुमाररे ॥ सहज० ॥ ३ ॥ धादिय। गज मुपन सहजी, पूया पमितराजरे; पुत्र दोशे नृप तुम घर राजियोजी, सिध्या भपा बाजरे ॥ महज० ॥ ४ ॥ धारणोने मन मोहलो उपनोजी, त्रीजा मास मकाररे; पंचवरण । उधर ननवेजो, वरम माटी धाररे । सदज० ॥ ५॥ देव पाराधी मोहलो परवेजी, मंत्री एमाण नवमे मा पुत्ररतन जएपोजी, नामे मेघकुमाररे ॥ सदज० ॥ ६ ॥ कला वहुत्तर दाज, पासी रमा पारे; देव दोगडानी परे लोगयेजी, विलसे लक्ष्मीगारे॥ सदज० नमाजः ॥ ८॥ चार दिनांग मतो मायली या RIY मारे गपटे HINणे 13. नोय करा वीर मोमाजी, वैदे मेषकुमार; समजागीने माता पिताजी, लीपो संगम Email ias पगारे मर•॥१॥ मनमा नि नोक्ता मारित्रीची पान Fairtuanitarai -....-..- (ढाल बीजी ) रवि उगमते प्रावियो रे, वीरजिणेशर पात; चार वाला मानुस , मन नलास रे मेदा, सांतल माहरी वाण, तुं तो गुणमणि केरी खाण, तुं तो शुल मति दियो पाण, जिनवचने घ्रांति म आण रे मेता ॥ सांजल० ॥१॥ दायकी नव पाग्ले रे, चीजे गिरिता; त मेरुपन्न हानियो रे, सहसगमे करी पाठ्य रे मेदा ॥ सांजल० ॥ २॥ ग्रिष्म. HTI पापोते गजराज; पहोतो एक सर एकलो रे, पाणी पोवा काज रे मेहा ।।सानल ॥३॥ Hot wiat से गणोरे, गूतो ते अंतराल; पूरव वैर हानियो रे, पीछे ते ततकाल रे aur nakshita in nomपीर, पासातो बरसांज; काल करी विंध्याचले रे, HINuो गत मेमन रातमोजी, सात सयां परिवार; मी to imminene | वन वय कगरया करे रे, + niy लोगr film innininden०॥ उमाले ht mat in hitt in meी गणारे महा ।।

मे०स० सांन०॥७॥ सतलो एक कनो रदेवारे, पामे नही जरी लाग; ते पण कान खुजालवारे, उपायो एक पाग रे मेहा ॥ सांजल. ॥१॥ गज पग देठे ससलो रह्यो रे, लाग्यो यति सुकमाल; जीवक्षया मन लेगवी रे, गल्यो पग अंतराल रे मेदा ॥ सांजल० ॥१०॥रात अढी वन दव दयो रे, ससलो पहोतो गम: दायी पण तूटी पस्यो रे, मून शुन्न परिणाम रे मेहा ॥ सांजल ११ । जीव दया मन लेखती रे, श्रेलिक घरि अवतार; गज नये जे उप ते सद्यो रे, तुं को नहि संसार र मदर । सानल॥१२॥ वचन सुणी जगगुरुतणारे, चेत्यो मेधकुमार; जातिप्तमरण ते सदरे, चितु नपणा करे सारे मेदा || सांस॥ १३ ॥ पुनरपि दिक्षा प्रादरीरे, जप तप कीधा प्रश; पुतगिरिको मेघजी रे, मंदारी मनोहार रे मेहा ॥सांनल०॥ १५ ॥ काल करी सुरपति चपोर, जिप विमान महार: एकग जाने अंतरे रे, लहेशे नवनो पार रे मेदा ॥ सांजल. ॥ ५५ ॥ sR सप्प गर्म पाशीनो, सद्गुरुए ततकाल; रापचंचसूरी जयोरे, पत्नणे मुनि मेपराजरे मदा । मानव ॥ १६ ॥ filseil Sana si fantasia ॥ श्री वीशस्थानकतपनी सज्काय.॥ (वीर मुणो मोरी वीनती. ए देशी.) वीश थानक तप सेविये, लव्य प्राणी रे प्राणी मन भाव; श्री अरिहंत इम उपदिशे, ए तपना रे मोटा परजाव || वीश० ॥१॥ नमो अरिहंताणं गुणो, पद पहिले रे मन हरख अपार; झपत मावत नेदशुं. जिन पूजारे करे आठ प्रकार ।। वीश० ॥२॥ नमो सिहाणं एडवो, शुद चिने रे गुणो वीजे गश; भाराघो तिचकनु, जिम घाए रे निज जनम प्रमाण ॥ वीश० ॥३॥ पवयस्त नमो गुणो, त्रीजे गणे रे करो नाग अन्पास; नगति करो तिघांतनी, जिम पावो रे तुमे लीलविलास ॥ वी० ॥ ४ ॥ पायरियाणं नमो गुणो, चोग्रे वोले रे पूजो गुरुजीना पाय; नमो घेराणं पंचमे, गुणो सेवो रे घरमी मुनिराप ॥ वीश० ॥ ५॥ पमित गुरुने पूजिये, के गुणिपे रे नमो उवमाप; नमो सबसाहूपं सातमें, वलि सेवो रे तपती सुखदाय ॥ वीश० ॥ नमो नाणी प्राम्मे, गुणिये नाणये रे नवा स्तवन समाप; नमो दंसधारी गुणो, पाले नवमे रे

वी०स०
समकित सुखदाप ॥ वीश० ॥ ७॥ विनयसंपन्न नमो इसो, पद दशमे. रे गुणिये शुन्न ध्यान;
पिनप करो गुणवंतनो, श्ण रीते दो सहिये शिवस्यान ।। वीश० ॥ ॥ ग्यारम थानक गुणो,
पमिकमणां रे वे सांझ सवार; चारिनस्त नमो इसो, पद घ्यायो रे शिवसुखदातार ॥वीशकाए|
गुणो पंजपारीणं नमो, पाठ पहोरी रे करो पोपद लील; वारमें गणे पालिये, शुन नावे रे
निरमल गुण शील ॥ वीश० ॥ १० ॥ नमो क्रियाघारी जणी, मन गुणिये रे मित तेरमें गण;
सामापिक परा लीजिये, दोष टालो रे वनिश प्रमाण ॥ वीश० ॥ ११ ॥ तप अधिको करो चनदमे,
नमो तपसी रे गुलिये मन रंग; तपसी सेवा कीजिये, वलि रहिये रे तासीने संग ॥ वीश ॥१२॥
(नास वीजी-देवा बनणपुरनी.) अतिथिदान बहु नावे दीजे, नमो गोयमाइणं गुणोजे;
पनरमा किरिया एद, प्रतिमाने नूपण पहिरायो, नमो जिाणाणं ए पद ध्यावो, सोलमे धरी सनेद
॥ ॥ पाठ पदो पासद विधि करिये, ध्यान नमो चारित्तस्स धरिये, ए विधि सतरम गा;
नमो नाश उतरंगे नलिपे, नमो नाल ए गुणणो गुनिये, अठारमे परिमाण ॥ २ ॥ नमो सुप्रस्त
॥७९॥

गुणो मन चंगे, पुस्तक धज करो वहु नंगे, ए जगणीसमें रोत; नमो तीत्य ए ध्यान घरायो, संघ चतुर्विध नक्ति करायो, वीशमे शास्त्र विदीत ॥ ३ ॥ (ढाल त्रीजी.) दोय दोय सहस्त्र प्रत्येके करेरे, गुणिये गुणणो सुविशे; चारमा करवान पूरीजे रे, समकित गुण शुः धरीजे ॥१॥ ए वीश स्थानक विधि जाणी रे, सेवो मन उलट भागी; विविशुं जोए तप वदिये रे, तो तीर्थकर पद लहिये ॥२॥ नावे स्तव चारित्र धारी रे, रूप नाचे विधि सागारी; सेवे जे नर ने नारी रे, ते मोकराणां यधिकारी ॥ ३ ॥ ( कलश.) इम वीशथानक तपतणी विधि शास्त्रने अनुसार ए, जे वदे नर ने नारी विधिशु धन्य तसु अवतार ए; श्री रतनपुरवर संघ सुखकर जगतना जिणेसरो, तसु चरलपंकज नमे नावे यवतचं मुनिवरो॥१॥ इति श्रीपद्मचन्घसूरि संतानीयोपाध्यायेन कृतम् ।। ॥ श्री अवंतिसुकमालनां चौढालियां. ॥ सोना रुपाके शोग सश्यां खेलत वाजी-ए देशी.

अ०चीन 16oll गोयम गणधर पाय नमी सरसती संनारी, श्री अवंतिसुकुमालनो कहुं चरित्र विचारी; मालवदेश सोदामणो नशेणी नपरी, धण कण कंचण रयण जरी नवि गंजे वैरी॥१॥ गढ मढ मंदिर प्रति लला वर पोल पगार, वाव्य सरोवर वन वली सोदे घणा फार; सारथवादी तिहां बसे नश इणि ना, आर्यसुदस्तीसूरीजी आव्या तिणे गमे ॥२॥ प्रतिमा जीवितस्वामीनी वंदेवा । काजें, समोसर्या वनमांदिअ पूरण गुण गाजें: नगरमांहि विहु साधुने गुरु ये आदेश, जोवो उपाश्रय सूझतो यती योग विशेष ॥३॥ नक्षघरि मुनिवर गया नावे ते वंदे, कि कारण तुमे प्राविपा पूरे पाणंदे; सान उपाश्रयना घणा वोल्पा सिहोते, तण देते गुरु मोकल्या पापो एकांते ॥ ४॥ वादनशाला मोकली रदेवा देखामे, सपरिवार गुरु तिहां रहें मन धर्म रमा; नलिनीगुल्म विमाननो अध्ययन संन्नारे, श्री गुरुनापित तिहां लला ते सयस विचारें. ५ गोखे वेगे भूमि सातमी वत्रीशे नारी, रूप लावएप कसा जरी यौवनवय सारी; सोल शिणगार सजी नसारंजा रतिरू, नाटिक गीत रसें रमें जिम अमर सरूपें ॥६॥सांनया अध्ययन ते कुंवर ये 1401 कान, अमियरसायरा जेहवो संजसिता ज्ञान प्रासाद हुंती छतरी गुरु पासे पावे, अति रूकी परि सांजली मन नावना नावे ॥ ७ ॥ गुरुजी पद विमाननो जिशो कदियो विचार, ते दीठो पूरय नवे नोगव्यो अपार; जातिसमरणने बलें संजारे साचुं, मावी श्रीगुरुने कद्दे ए वयणउँ जाएँ ॥॥ जगवन् हुं नक्षतणो नंदन अवधारो, इणि विमान पूरव नवे प्रयो अमर विचारो; दिव पुण तिम करूं तेहथी सहुं एह विमान, मुजने चारित्र यो तुम्हे सर्व सौख्यनिधान ॥ ए॥ (ढाल बीजी) मनुजी सुखकर समकित दिजे-ए वेशी. सुगुरु कदे सांजल रे कुंवर कर चारिग्रजार; लोदतशा जव केम चवाये, किम यहिये खोदनार ॥ १० ॥ कुंवरजी कोमल अंग तुमारो, ए व्रत कर अम्हारो ( प्रांकणी. ) अगनिकाल किणि परे पीवाय, अगनिमांहि किम चाले? तुला तुले मेरु कहो किम, फणिमणी किलि परेकाले ? | कुंवर० ॥११॥ वांद रतनागर किम तरिये, खमंगधार किम चांप; सिंदतणे मुखें किम रहिये मंझी, मरण नये जे कांपे ॥ कुंवर० ॥ १२ ॥ अज्ञनंदन वलतुं जपे, साची वाणी मग Ja; पण दुराणि चारित्र, पाजीदा मामाचारी || कुंबर० ॥ १३ ॥ श्रीगुरुजी मुज स, भुरे दया याला निंदनीपरि प्रादरी पानं, एह वचन शुरु जागो ।। श्री गुरुजी॥१४॥ ault रि अगसग पा. साहस मर संना योमे का कारिज साधु, पापतणा मल टाटुं || Pral ॥ १५ ॥ गुरु कई मान नेत। अनुमनि, से संयम मागो; मोदतणी नि मने, कान बिके जागो ॥ कुंवर ० ॥ १३ ॥ अनुमति मांगी को न प्रापे, करे आपण लोच; पोहे पर पतानो प्रादरी, करी माप संकोच ॥ श्री गुरुजी॥ १७ ॥ तिलि वेपे गपो गुरुं पासे, घोरुम उवराई गुरु प्रादेहो प्रशामल लेइ, स्मशान पान पावे ॥ श्री गुरुजी० ॥ १० ॥ (र विजी-गुरु गोतम गराधर चरणे शीदा लगानं-ए देशी.) कंग्रेरीतणे बने कानसग २ रा आप. नबार जनो कानमा निहांका टाय; मुकुमालपणे पगलायी रुविर मरती, नशा न करता करता (टा) निले गरे निहांधी शिपाती, निज बालक पाने, किन २.५ सपना, मरोनेना चाव; नमन करनी चर्मन तोफ, तमतम करती 11८ मंत; धिगधिग मेद कटकी, कस चे पग का निर्मस ॥ १९ ॥ एक पहर गम्पो इम रुपमे धर्मद ध्यान; जाणे करे क्मिासण एवो समता माने, इम वीने पहोरे जांघमांस आहार, विपता मान प्राणी इम कदी तेह न वारे; चीजे पहोरे नदर लक करतो कर्मतको कय जाणे, चोये काल करीने पुरता नलिनोगुटम विमाने पूज्य पुरुप ए धर्म आराधक इम कही नव मंझे, देवी देव तो गण तिहांका नक्तिनाव नवि खेमे २० ।। बत्रीशे रमणी गुरुने कदे तिवार, कहो नगवन किदां के यम्दतलो जरतार, उपयो” जोई परि सघली संतलावी, गुरु नापित घोड्यु मज्ञ पागल यावी, (यूटक.) प्रावी माता अने अंतेवरी, कंप्रेरी वन दोगे तु सींचे तिहां रुदन करती, कां थयो पुन अपूठो. एक वार चारित्र खइने, अम्ह अंगण कां नाव्यो; हिन तुम्न दरसण कहिये होशे, इम मनमादि नाव्यो ॥२१॥ (दाल चोयी.) वैदरनी चनमा वसवले. ए राग. रमणी कहे सुण नाथजी, अम्द कार तज्यो मोह; पुण कां मूक्यां मातजी, ते सापे शो शेद ॥ २२ ॥ वली चली कहे रे अंतेनरी, स्वामी सुणो श्रम वात; श्म तायल का 52.5-LEFEST

वा०स०
मागभि
नाराने
दीभीनी
सरहाण
1॥२॥
MP3
पार करी, श्म का उहपां मात ॥ वसी० ॥ २३ ॥ सिमा पासे कुंवरने कीघो अग्निसंस्कार; नक्ष
नावे नसी ची, जाये अनित्य संसार ॥ वली.॥२४॥ पुत्रशोक अग्निये करी, दाधी प्रति
अपार; नशा टाठक पामवा, वांठे चारित्र नार ॥ वली० ॥ २५ ॥ सात देने वावरी, पण कण
कंचन कोमि; एक वधू पाधान , घरनार ति जोमि ।। वली० ॥ २६ ॥ अवर अंतेनरशुं तिहां,
नश चारित्र से तप संयम सूधा करी, सुर पदवि पामे ॥ वली० ॥ २७ ॥ पुत्र अवंतीसुकु.
मासनो, ययो कलानिधान; चिता ठामे निज तातने, जोइ नूमि प्रधान ॥ वली० ॥ २८ ॥ एक
प्रासाद करावियो, ते वे इण काले; श्री सिइसेनदिवाकरे, दीपाव्यो चाले ॥ वली० ॥ २९ ॥
एदवा रिवि गुण गावतां, जाय पातिक दूरि; एक मना आराधिये, कदे श्री विनयदेवमूरि ॥ ३०॥
॥ वावन यमक गर्मित रहनेमीजीनी सज्झाय.॥
राग मारुणी. ( सांजलजो मुनि संजमरागी-ए देशी.)
पावस ऋतु परसे धनमाली, नीनो पदेरण फासी रे; चौर नगावतें तन
9244..
॥८२॥

कयासि, रदनेमि मति चाली रे ॥१॥ ममकर ममकर देवर आली, अम्देन नदी ते वाली रे; सतीय शिरोमणि राजुल वाली, वचन बोले टंकशाली रे ॥ मम० ॥२॥ विवस घणा दीक्षा तें पाली, इणि कारणि विटाली रे; सुकुस जात वांधव वनमाली, दीपमे जोय निहाली रे ॥ मम॥ १॥ मम काया पेखी सुंबाती, घ्रम भूलो वंदाली रे मलमूने जरी विकराली, तोदी न चेते दासी रे ॥ मम ॥ ४॥ एदवी पाल करे रे पीमाली, अम्देश नही गोवाली रे; वाघ गाय चीतर जिम गली, विहे मेघ मराली रे ॥ मम ॥५॥णे पाले जो अरे कपाली ! मन्मथ देदी वाली २३ काया कीधी विज्ञली, रावणे उरगति नाली रे ॥ मम ॥६॥ इण आले ननम गति टासी, दे रगति कंटाली रे शोना सुयश लिये उदाली, अपशतणी परनाली रे । मम०॥3॥ शण प्राले वाघे रे नवाली, काय ते सजा राली रे महीमा कीरती दोशे काली, अवर केदी देवें गाली रे ॥ मम ॥७॥ सुणि मुनि मेरी शीप विशाली, तिज किन माकममाली रे; कां घाले रज कंचन थाली, चतुर चेत्तो मनवाली रे ॥ मम || झीलें शिवमंदिर पटशाली, जनम

म.
कारमा जा; तापमान निधि कीजिप, तजिप विकया दूरजी ।। श्रीवारह० ।। १३ ।। समकित
र पापिपे, प्रापारे व्रत परसाइजीकपदाम्प वारम व्रत, दौजे दान सुसापजी ॥श्रीयारह
॥ १५ ॥ मुनि सागर इम सीखवे, श्रावक श्राविका सारजी; वारह व्रत ए धारि, देवलोक
मवतारजी ॥षीवारह०॥ १५ ॥ देवलोक मुख जोगवी,पठे जन्मे महाविदेदजी; संयम ३ जाप
शिरपुरे, एदमो नही संदेहजी ॥ श्रीवारह० ॥ १६ ॥
। सती मुलशनी सन्काय ।।
जिन गुरु गौतम पाप नमी, दीशुं सतीप्र चरियो; जिन घर्मी चंपापुरे, जिनदत शेत पवित्रो.
(दुरक) पवित्र बेटी रुपे रंजा, मुन्नत नामे सती, युवदास वाचे कपट पायक थइ, परणी गुणवत्ती;
पोषद सामापिक जैनधर्म, देव गुरु गती रहे; मदा मिष्यातणी नणंद सासू, पदोनिश मत्सरवदे
urQ जालो जोइ की, युपदा निज नारी मुनि जब पावे दोरवा, उंदर जिम मंकारी,
(e) जि तोके नेम माम, पुश्ने माता को, पतीय मारे यहू शिससे, एम शोना किम रहे; पुत्र
॥८॥

वोले मात म कदो कनक मल कुण लाख ए, सतीप्रमाहे एशिरोमणि दोषी दूरण नाम ए ॥२॥ पारण काजे सती घरे, को मुनि यावे तप गावे पादार देता ऋषि लोग, तृण जीने करी माडे (घुटक) काढतां तृण शीश, सिंदूर लागे ऋषि निलाम ए, ते देखी सामु वदृकाणी पुत्रने देखाम ए; व्यनिचारिणी निज नारी जाणी प्रेम पतिनो ऊतरे, सासुए दीप कलंक जागी सुजन वहु उख घरे ॥ ३ ॥ देदरासरे कानसग रदे, शासनदेन तिहां आये; पुत्री खेद कांड मत करो, इम कदीने बोलावे. (घुटक) सुलक्ष कहे मात जिनशासन शोजा चके, तिम कीजे देवि ततकण चंपापोळ चिहु जमेमाहे वाहिर पशु पंखी बहु नरनारी मिली, नगरसेहं सकळ नंपा हुइ प्राळ व्याकुळी ।। ४॥ गया रही कदे देवता, को सती कली कुवा का तंतु काये बांधी चालणी, जळ कादी पोळे गटे. (त्रुटक) पोले टेि तोज नघो एदये उत्सुक आई, घशी नारी बहु सप करि विलखाणी लाजी गई; म सुखिने ते मुलद्रा सासुने १३ नीनये, मा तुमारी याज्ञा पामुं पोळ ऊघाउँ हवे ॥५|| मुंह मचकोमी इम सासु कहे, हुं तुज चरित्र सवि जाणुलोक जणाव्यामां ने HEAF Yि. तुज सत फेहुं पखाj(बुटक) वखाणुं दवे कहे सुनश मात मुज सत जोईयें, इम कही चाली 10स सूप कंचे पंदनी सोहिये चालणी जळ काढी तीने पोळ घंटी ऊघमे, कुसुम बरसे जय जयारव फरे सह प्रादरवने ॥ ६ ॥ चोथी पोळ ऊपाहिये, कर जोमी नूप नाखे; वीजी सतीष ऊघामशे, म सुना दासे (पुटक) सुन्नज्ञ परिवारशुरे रायराणी परिवरी, घरे यावी कुटुंब बोधी व्हमे संयम वरी; सही सद्गति शीस समकित कीरति बाचो यतिनवी, मुनि मेघराज पाणी उलट सती पहेली वर्णवी ॥3॥ ॥श्री सती अंजनासुंदरीनी सज्झाय.॥ (चनिनंदन जिन दरिसण तरप्सि-ए देशी.) गिरिवैताढये रे प्रसादन पुरे, प्रल्हादन तिदा : गप: गपी समीरे तस पदमावतो, परनंजय मुत प्राय ॥१॥ शील सदा फल साजन सेविये, जग जग पमरे रे जेमः जित्तीपर पाच्युरे आगे अंजना, झोल घरो तन तेम ॥ शोल० ॥२॥ चानाने अंजनी निजगुना, पपनंजयने रे वीघा शीत मुनागिणी अंजना मुंदरी, जुगताजुगतुं ॥ ...

रे कीघ ॥ शोल० ॥ ३ ॥ एक दिन पचनंजय निज मित्रशुं, कन्या जोवारे जाय: देवनगर
गुण सांजलि करी, क्रोधे पवन नराय ॥ शीत ॥ ॥ मन पाखे ते कन्पा परणियो, मी बार
वरीप; रावण साने दे चाल्यो कटकीये, जननी दीध प्राशी ॥ शील० ॥ ५॥ घामां की झूरे
अंजना, पचने पंखी वियोग; देखी याव्यो रे रागनों निशि, मिली बिहुँ संयोग ॥ शोला ॥
॥६॥ कटके पदोतोरे माता विण को, पेट सहित ते नार; देखी काढेरे सासु घर की, पहुती
वनद मझार ॥ शील० ॥ ॥ पाले सतीअरे शोल सोदामj, हनुमंतसुत तिहां श्रायः सूरजकते
रे देखी नाणेजी, निज नगरे ले जाय ॥ शील० ॥८॥ पवनंजय पण जीती यात्रियो, सती
न दोनो रे जाम; करिया लाग्यो रे श्राप हत्या घणी, मित्र निवारे रे ताम ॥ गोल ॥ ९ ॥
पवनंजय मित्र जोतो युवतीने, सूरजकेत पावाप्स; पामी तिहांगीरे लेई निजपुरे, पाव्यो मन
उद्धास ।। शील० ।। १० । वहुपरे विलसारे राज्य सोहामपुं, साधी संयम काज; स्वर्ग पहोतीरे
चौथी अंजना, पत्नणे मुनि मेघराज ॥ शील० ॥ ११ ॥

मानी द०स c0 ॥श्री दशारणनदनी सज्काय.॥ (भेपर उतारो राजा भरथरी-ए देशी.) वीरजिद समोसा, दशनपुरे मुनिरायरे; सुर नर इंश सेवा करे, दरप धरी मुनिनाय रे ॥१॥ दशारणन राजा चिंतवे, प्राणी मन अनिमानरे; किणेरे न चांद्या तिम हुं वांदरों, महारो जनम करीक्षा परमाण रे ।। दशा० ॥२॥ चतुरंग सैन्यशुं परिवर्यो, साये सवि परिवाररे; त्रिन्नुवन तृण सम मानतो, वीर वैदिया हर्प अपार रे ॥ दशा ॥ ३ ॥ सोदमपति अवधियें करी, जाणियो प्रति प्रतिमानरेः च एरावण श्राविया, दोपता मेरु समान रे ।। दशा० ॥ ४ ॥ पंच सय बार मुख शोलता, मुख मुख आठ घाउ दंत रे; दंत दंत आठ पाठ वावमी, वाव्ये वाव्य पाठ कमल हुँतरे ॥ दशा० ॥ ५ ॥ कमळ कमळ लाख पंखमी, पत्रं पत्रं नाटक होय रे; पदम पदम विच करणीका, तिदां जिनमंदिर जोप रे ॥ दशा० ॥ ॥ इंशाणी पाठशु, पूजे जिनपिंत्र नागरे; चोसठ मदस गज एहवा, पाल्पा यंदगा जिन मुरराव रे ॥ वशा० ॥७॥ वली नूग इम नो, Usteres4the ॥८५ Shit vtists SUP मान जीपचा कयों नपाय रे; सिंह शियाळ न दोष सदी, सेइ संगम लगाएं पाय रे ॥ वना० ।। ॥ ८॥ दानेश्री शांति जिणेशरू, माने श्रीवशारणनद्ररे; लोगे श्रीशालिन गुणनीलो, शीले श्रीधूलिलइरे ।। दशा० ॥ ९॥ तपवलें करम क्षय करी, पामियो मुक्ति निस्त३ रे, पानार्य (श्री) शिवचं पाप नमी, विनवे मुनि रामचंदरे ॥ दशा॥१०॥ ॥ श्रीगुरुगुणनी सज्काय.॥ "देसो गति देवनी रे" त्रीश वरण घरमा वस्पा रे पुगभरतामानंद-ए देशी. वीरजिरोश्वर पप प्रशमी रे, गुरु गुण कदिशु नदार; नामे नवनिधि संपजे रे, पामे नवनो पार ॥ १ ॥ सद्गुरु राजियो रे, श्रीराजचंद्र सूरीद; चमतपय जगमगणो रे, दीपे तेज विशंद ॥ सद्गुरु० ॥ २॥ जंबूनयरे दीपतो रे, जावमशाद सुतन; मात कमळादे नरे धयों रे, जन्म्यो पुरुष रतन ॥ सद्० ॥ ३ ॥ वैरागें संयम लियो रे, श्रीसमरचंद्रसूरि पास; शास्त्र घणा पूज्ये जएया रे, पूरे वांछित प्राश ॥ सव० ॥ ४ ॥ आचारिज पदवी हुई रे,पंच महाव्रत धार; कायनी Site 10:0+HD -- शस्त मणे को पोगमः हानायोतमयं हारसमयं स्यावादविद्यालयं, श्री सिहावल. मोराजमन माजीवरम् ॥ १॥ (इंचज्ञा वृनं) श्रीमयुगादीश्वर-मात्म-रूपं योगी गगादिस्यमा सझानमदृष्टि-मुदृष्ट लोकं, श्रीनानिमूनुं प्रणमामि नित्यम् ॥ २॥ उपजानि .) गजादनाबस्तन नुमिन्नागे, पुगादिदेवांनिसरोज पीठम्; देवश्चंय नरराज. पुप, पिपजामस्थिनमर्च पानि ॥३॥ प्रादिप्रनोकिणदिविनागे, सदयकूटे जिनराज. म. पानी:गिननी निनाच, दाज यस्याः परिपूजयामि ॥ ॥ यामिनोंर्यक्रसरोरुहान, चिनिना याविषदीमराय; पोहादशांगी विदये गणेशः मधुकरीको जयतात् शियाई॥उदशाणं समयमा समनदपाल पलादिवाणम्॥ मुशाउमा जत्य विराजमागा, सनुजगं तं पणमामि IMER: 5॥ चनहरमा परिणाममा, अध्ययम्मा मुगुणेहिं पुना; नगारिअदावत उनि राई ॥ ७ ॥ अन नापी अर्णन मिलो, अणंत मुग्दवाण यांत RE'; fr! जय मिनमा, मम्मेयमार नमहं गुणामि ॥ ॥ गन्धेर नि पदमो 11८८ मुर्णिदो, गणादिवो पुरीयो विसिहो; अणेग साहू परिवार संजुमो, ते पुमरीयानलमनगामिणा ॥ सदा. (मालिनी वृनं.) विमल गिरिवर्तसः सिधिगंगांबुहंसः सकलसुख विधाता दर्शनशानदाता प्रणत सुरनरेंद्रः केवलज्ञानचंद सृजतु मुनमुवारं नानिजन्मा निः॥१०॥ LUS. ॥ विषयविकार त्यागनी सन्काय.॥ राग केदारो.(कर मन जजननो व्यापार. ए राग)नियको विषयविषमविकार,विपपविषम अपार, जगमें विषय विषम अपार; लदी नजत नर मरपिया ते, तर तजत न सार, जगमें विषय०॥१॥ २३ चंद दिणंद नरपति, जगतजंतु अपार; नीच ऊन अयान दपाने, सब किपे एक हार ॥ जग. ॥२॥ जंत्र मंत्र न यंत्र याकुं, मूल मणि उपचार; कला बुद्धि विना विद्या, सवदिसें अनिवारण ज०॥३॥ श्रवण चिंतन ध्यान पूजा, कदत तत्त्व विचार करत तपाजप मुकत किरिया, तोउ जरत नही मार ॥ ज० ॥ ४ ॥ जदपि मुनिवत सवे घर, मेरुगिरिसम नार; तदपि सवते ...

imपरि वा वि०स० 1000 महमत भति, विकट खामाधार ॥ ज० ॥ ५॥ नंदिपेण अपाठनूति, पाइते अणगार; शु६ तन मन पचन पाको, शुक्ष व्रत आचार ॥ ज० ॥६॥ इन्दों आदि अनेक मुनि व्रत, तजी लज्यो मागार; जिन चतुरनर उले असे, तो कदा और गँवार ! ॥ ज०॥ ॥ धन्य तासु अनंग ग्रीषम, ताप मेटि पसार, जनित तमता शीतलाइ, वरति श्रुतजलधार ॥ ज०॥८॥ वरजी वामा फाम वामी, पामी संयम सार; तर नवोदधि पार पाए, करी सफल अवतार ॥ ज०॥ ए॥ विविध विवि कनककामिनी, जिन किए परिहार; कर्मसिंह मुनि तासु पद जुग, नमत वारंवार।। ज०॥१०॥ श्रीजिनेश्वर दमकस्तुतिः (श्रीनागपुरीययापागरणधिराजश्रीरामचन्द्रग्रीन्द्रपादांबुनियासिना श्रीजयचन्द्रमरिणा कृता) (दंकक बंद.) रचितरुचिरचंझनागेंद्रलेखेंद्रमत्यद्रसदनक्तिसंसक्तनम्रीनवन्मौलिनीसैद्रतंजात रोगिभपावित्रजासंकुलं निर्मलं यस्प ते नकसामाणिसम्मोदकिंजल्कसारं पदाज नवासार- ॥८९) titi2516 संतापतापापदं तं स्तुवेदं सदा श्रीजिन शोलनं विमलसलिलहारमंदारकुंदपुणापागलमन्. कौमुदीप्तार विस्तारकपूरपूरामलस्फाररूप्यादिमिमीर विस्फनि संकादकीयमृतापारकाटांतकल्लोल- मालाविराजिष्णुसिंधु समासाय नव्या महानंदनाजो नयति कुनै; सकस विमलसुंदराकारमनक- चशिविद्याधरस्फारनागामराहारकादिप्रजामोदनागाररूपस्वीरनंतलगोदेशलेशोषिरूपस्य सोको- दरोदारसन्निर्मलस्फाररागाद्यलेशाणुपुंजोपजातस्प दृष्टोऽपि नो निरे शंकर, सबलमदन कंस- कालादिनझामराधीशमात्तैमसरूपाएमातुराद्ययचित्तोन्नतिवंसविकमन्नत्यविरुपातितामानमातं. गनिर्धटने ते वराशापराः सज्जनास्त्वत्पन्नावाज सारंगनायाधिका यस्पनांतीह वै नानिराजांगज सज्जयं ॥१॥ प्रगटविकटसंकटालिप्रदानझमानेकादिनैयायिकासारसांख्याक्षमालापवाचाल. नैयायिकामपंवदपत्व वैशेषिका शेपदोपाश्रया तारचाचीकसंकल्पनामात्रसंनूतिताजैमनीया. दिवाघिसध्वांत विध्वंसमाकल्पं सदा, प्रशमरसजलक्षालितानेकसंसारकांतारमागंत्रमाने. कनीचोचवैपम्पजस्थान संस्थानसंचारधानतावायुवेगांगसंलम पापमा दयोदारसुध्यानताना- 404169515302 ana.

१४ १५ १५, नामसमर्मतमागणी.
२६६१५.१ "EPTET'गबजानापायतानादा
17 दिन बायनरने'नमगोगमशागतमी गुहारोण
१००० ३४.६ बसमानदारनाकारनामांटिगमनाना
ii. . . . " मग श्रीप्तं ॥ ॥ नजन मनन
* ; नमुना पर कान गजननी मुर्गतिनं नृन पगा:
न ने मां हरमूना मामिलान
, एकदम दम भेतांदनवम्पारपसाप मां.
र चामरजानं मातरम-मनमानानि पम्याः
• . . मनपाट मानने मागविग्ना
* र नाम्नां मोगलानु माया

aavat श्ववाणी सुधासारधारातिमाधुपसनेदिनी कीररत्नाकरालोलरंगनरंगानुगा सत्कटाकावती,माता- सदसलीलागतियां तिविस्मेरशुक्लाम्बुजालस्मितागपपसायनांकिता रामलाष्टापदालेपमंगोन्निता. गान वक्तुं कर्म दालमिप्रकाशातिरेक नवप्रेमरम्पा मनोनिरस्पाःकिमन्पत्पुराणेग्जनेनाफिगमाधि वर्णिता ॥३॥ यसितनलिनकग्जलश्यामलांगाश्चमेने ! वचोतीतमहात्म्ययस्पानुनानाननेदरकुटदेखि नः काशगूलज्वरातंकविस्फोटकोदोदवातपर्धेितकतलीपदामियाराजयक्ष्मादिरोगबजाइष्टदेवा नति ध्रुवं,गहनतरकानने नीपणे शैलसंघेति चमार्ग रणे दूरदेशांगणे नीमवारांनियो पुस्तटीप्सनि. घो शत्रुवर्गे बटे संकटे विस्तरदेतिऽदृश्यदायानसेन्येषु वैषम्ययुक्तप्वयुक्तेषु कल्याणमालावृता निता। विषमविषधरापदाव्याल शार्दूलदर्यककोलोत्पतद्नूतवेतालनागप्रदोत्पातयकामरोमचमामिनीरामरी. शाकिनीमाकिनीमारिदृष्टातिनीयंतरकोलमुख्या अनेके न वाघां विधातुं समर्या:सदोपवानिशा, विशवविमलतिचिनाजो पदीयमसादाजना:सद्यशोनीटतंकल्पनाशामरदमासदाचारदीनमजानामा दं दीनभूतस्त्वनूतपादावुजसंश्रितस्तन्महाशोकरोगाद्यनेकाकुलाक मां कटतः पार्श्वनाय/मनो!॥५ SUttrinkit

।
मामुमोदमे मेहनिमारमानेनामेपु वर्क महानंदचूमामणिमुक्तिमार्गकमार्गको
मHिARITY मनमातेगमानारंमंगलोन्मीलन मौनसारं मुनि जनूतं प्रमामाश्रयं सम्मतं सन्मतं,
RERAसिा समाजासमानं समानं विमानं निरीहां महेदा विदास नरूकदा सरकरं निस्तुलं कोमलं
निमुक्तं विमुक्ति गर्न सकगति निर्गति नीरसं समं सादरं वर्णनातीतमाणितं सजनेश्चाप्य
पएक मत कनकनिकरदेवनं पुरोकोयलं निर्म लोकमुस्वामिनं निर्जरं निर्जरोपासितं शत्रु
मिथुन रागानि जनमौल्पपई चेतरासंगनिरिकं निश्चलं नैकदेशे स्थितं संकांकाधिशून्य
पनिदाए दारएपं मतो, अजमस्तसरित्रं पवित्र विपत्यं विशिष्टं गरिष्टं मदेष्टं
नान ने नशीने मदाने मुगनं मुशान मदामुपुरितं नितांतं नजे यईमानं जिनं दीतिवीनं
नसीन समाविमा माति पुण्यपुषरित्यादर्प ॥ ५॥ श्रीराजचंद्रसूरींद्रपादायुज.
ना अपराध, नारन्यं पटं मपा || इतिश्रीजिनकस्तुतयः ।।
॥९॥

ranRISirt ॥ सासुबहूना ऊगमानी सन्काय.॥ तुण वोटल दे तुरे चढायण, रतन परायो काई गोजी; मे गंभया हे माग नोजन नव मासाए उदरे पोंजी ॥१॥ उदरे धारी ना मास कारण, जनमोवन में सी. काना नो काढया फोक पाणी, एक दिन पिण सुख नही ॥२॥ पोतकारी पत पर में पलाया, हाय मन करी खोइपा, पाउरे अंचल ग्रहो नीचोया, मूत्र मल इमोश्या ॥ ३ ॥ मुग सासु दो मीन सपाणी, वात इसीपरे कांड कहोजी; या मां को पुग्न नगको साचो संच महीनी ॥१॥ साचारी संबंध हुप्रो पुराशो, लेख वांपा ननि टो; जब आप दमरों दुनो सो, काइ मार्नु समे ॥ ५॥ में रिपोयो तो प्राणी पायो, गावसो सो नाखती; दिन दश उधारो मांगी लीमो. सदा तुं क्यु राखतो ॥३॥ सुश बोटस दे तुं रे वयो कडी, वायां पनि पमि मारो नग लियोनी ते चांपा हे करमट जोमा कामगो, काम दीमण तं कियाजी 10॥त कियारी काम मांद राख्यो, मो दिशि नही देखदे; हुं पुन पुन बोलाय रहेती, पुन किमही न देखहे ॥८॥ नूग्बी

सा०स०
कायम रहो रदी प्रास देती, बार बार जिमाइपो; खेलणारी पल पल रिसाय रदेतो, गरथ दे दे मनाइयो
॥६॥ गुण सामु दो सोख सयाणी, वात इसी परे कांई कहोजी; जप उपनो दो साल हमारो
मांगा जोप न ये सह्योजी ॥ १०॥ न लगोरी सासु नीख मांगी, जूठ राम न कीज है; जव
पांन मिति कर दाय जोमया, दोप किणदीन दीज ए ॥ ११॥ ते चोक बेसी चेप पदेयों, पिता
मारो नामिपो चादोरी मांग्पो हरप करी करी, ते घणोई पाइयो ॥१२॥ सुण चोटल हे उवा
रंदे नुने, काइलियो पारा वाररोजी; तो आपणो हे कवडी साटे, रतनज वेच्यो साखरोजी॥१३॥
सासरो रतन न पिो परापा, में तुने दियो घणो; सुगडा वीदमी वेष वागा, नलेव्यो घर यापणो
॥१४ ॥ नीरमा मोग लाग दापा, रीतनांत घणी सदी; नगराय वेटो ते गरथ लियो, कूदी तुं।
जी हु ॥ १५ ॥ मुण मानु दो सीख सयाणी, रतन परायो काइ कियोनी; किणे थांकादो किया
नहोग, जून राम कांश समोजो ॥ १६ ॥ जूठी राड न लमो सामु, साल में प्रापशो कियो;
कानी यांनी कुमादि, प्रारणो करी में लिपो ।॥ १७ ॥ जय धणी यायां मांग राख्यो, नूल जन
॥९२॥

पस्तावए; भाग भागेरे रीत हुंती, हुत हुँती प्रापए ॥ १७ ॥ सुण बोटल हे पुना दे जाया, माय मनोरप सहु फलेजी; एकज हे याविजिलेसर, महदेवी माता उदरे पीजी ॥ १९ ॥ नबर पोरी मरुदेवी माता, रापजादा रंजणा; जिणे थाप पहेली माय तारी, दोर नवनयनंजणा ॥२०॥ हुं और फेताश्क कदी वखाणु, हायकी जिम मांगली; सुकुस बहू सपूत जापा, माप मन पुंगो रली ॥ २१ ॥ सुण सासुद माने रे पापां कांइ, चुरो चलो दुय परयोजी; मे यांका दो पुन सरीखा, पुन जरा जरा घर नयाँजी ॥ २२ ॥ में पून जापा हुआ पोता, मागे कुंती तुं एकली; सो माणतोकी हुइ घणीयाणी, ग्यानमें गिणती चली ॥ २३॥ श्री यादिना त्रिलोकनायक, दोय बहू परणाय ए, श्री सरत सरीखा मोक्षगामी, पुत्त सो एक जाप ए ॥ २५ ॥ मुण बोटल हे प्रादिसर, मरुदेवी माता ते नलीजी; चतो नादव दो नाप नेमिसर, शिवादेवी माता ते जसीजी ॥ २५ ॥ संजली वांमादे मनोदर, पारसनापनी ते हु अवर केताइक कहुं यखाणी दायकी निम मांगती ॥ २ ॥ सामानाम साया प्रगट किपा,नाय ने त्रिनुचनपशी; श्रीदपकीर्ति Saferikinithe

स्तु
पदे मोक्षगामी, जगतमें महीमा पणी ॥ २० ॥
॥ श्रीवईमानजिनस्तुतिः।
(उपजाति वृनं.) श्रीवईमानं करुणानिधानं, श्रेयोनिदानं कुगतेः पिघानम् ॥ शिवैकपानं
मुगुणः प्रयान, गतानिमानं स्तुतिसावधानम् ॥१॥ (स्रग्धरा वृनः) वीर नावारिवीरं प्रणत
नपदरं देमरोचिःदारीरं, धीरं कामानिनोरं परमपदगतं प्राप्त संसारतीरम् ॥ ज्ञातं सिक्षार्थजातं
वियुपपनतं नूपतिःक्षर्पजातं, सिई वुई प्रयुः नमत नमत तं सिइपे चुःइये च ॥२॥ कुंके
मामेनिरामे गिनुपनजनता पायके पायके वा, मोढेरे दस्तिकुंमी प्रवरतरपुरे वायमे नागके च ॥
नदिमामे च मुंगस्थलगजपदपो स्तुंगवैनारदोले, देवं श्रीवईमानं विपुलगुणगणै वहमान नतोस्मि ॥३॥
अध्यात्मनीसन्जाप अथवा गीत,
मापातम चिनु क्युं पार दो मेरे ससना, परम पुरुषको रूप; अघट अंग घट मिलि रह्यो हो,
मदिमा प्रगाम मनू ।। ।।१॥विषम वरप पुरो नपो दो, पापो सहज वसंत; प्रगटी
॥९॥

सुरूपचि सुगंधता दो, मनमधुकरमय मंच ॥ १० ॥२॥ सुमत कोकिला गहगही हो, वही अपुरव चान; नरम कुदिर बाहर फटे दो, घटि जामाजम लान ॥ प्र०॥ ॥ माया रजनी लघु नई हो, सम रस दिवस सजीत; मोद कंपको प्रिति घटी हो, संसम शिशिर व्यतीत ॥ Ronal शुन्न दल पद्धव सदसदे दो, दोदि यशुक्ल पक्त कार; मलिन विषय रति मालती हो, विरति वेली विस्तार || अ॥ ५ ॥ शशि विवेक निर्मल लयो दी, गिरता अमिय ककोर; फैली समकित सुचंद्रिका हो, समुक्ति नपनचकोर ॥ ५० ॥ ६ ।। सुरति अग्निज्वाला जगी हो, समकितनाव घमंक हायकमल विकशित जयो हो, प्रकट सुजश मकरंद ।। अप॥७॥दिढ कपाय हिमगिरि गवले हो, नवी निरमरा जोर; धार धार नावह चली हो, शिवसागर सुख नर ॥१०॥९॥ वितश्रवात प्रनुता मिटी हो जग्यो जगारय काज॥ जंगल नूमि सुदानि दो नृपवसंतकोराज ॥१०॥ ॥ खट जय परिनति वसुवा नइ हो, अष्ट कर्म बन जाल; अलख अमूरति पातमा हो, खेले धर्म धमाल ॥५०॥१०॥ नपपंकित चाचर मिली हो, ज्ञान ध्यान मफ ताल; पिचकारी पदसाधनो हो, RSSIS-Sandes.56

trisart.SIRaaa
सारस्पतसंपमनारम् ॥ शुन्न कातिविशालं हिरदसुचालं पार्श्वजिनं जितमारं,श्रीवीरं वीरं कर्मणि-
PATI
जिस्या.
नीर पापमलेदामसारम् ॥ ७॥ (शार्दूलविकीमित वृनं ) इत्यं सर्वसुरासुरेश्वरगणैःसंस्तूयमानाः
सक्षा, प्रत्यूदम जसंतमोदिनकरा योगीऽचिनस्थिराः ॥ संतु श्रीधृतितुटिमंगलप्रदाः श्रीराजचंताः
१९५॥ धीमरिचरचरुमौलिमुकुटैरानंदसंदोदकम् ॥ ७ ॥
॥श्री जिनपालितजिनरक्षित स्वाध्यायः॥
("राग भासाउरी" भेगरे उनारो राजा भरथरीनी अने घटफनी हरीगीतनी.)
बाल-नपरी चंपावति जालिये, माकंदी सुत दोयजी; जिनरक्षित जिनपालित, अतिह ।
विचक्षण दोपजी ॥ २०॥ चूटक-हुपि उनि सम्मति लर कियापो चल्पा प्रवदा पूरिया, जर;
समुश्माई गया जेनले उतपात अनेक नवोरिपा; धकॉल पंवर गाजवीजें वाय वाजे यति घणो, ।
परमाल परसे प्रति घंधारो भयो तिदा वोहामशो ॥१॥ ढाल-तट तटक तटके बंधणा, फट
पद कांदे नारजी; पन यू येमि मोदेखो, जे संसारे सहारजी ॥ तद० ॥ घूटक-तलाय ए
in
॥२५॥

02.1 संतार फेरो बाथनो कुण मद करे, पाटियो साधो बिहु बंधव सुखे ते सायर तरे; रतन दीप ति लदी वापी वात वेसी तिद करे, तेतले रतनदीप देवी भावी वचन तिनचरे ॥२॥ दाल- करवाल कर तीखो ग्रही, सुराजो दे नर दोयजी; अम्द वचन प्रतिपाल नो, तो तुम्हने सुग्न होपजी ॥ क० ॥ त्रूटक-इम शीख देखेर यावे कुंवर दोय निजमंदिरे, अरसर अनेरेयादेशे समुह शोधन संनरे; तव शीख दीपा बिहु नरने सुखे रहेजो घर तुमे, रामति क्रीमा सदा करजो घरे नावं जा श्रमे ।। ३ ।। ढाल-कवदी रति नहु उपजे, तो पूरव वनखंजी; उनर पश्चिम जाइजो, लहेशो सौख्य प्रखंगजी ॥ क० ॥ यूटक-प्रखंग सौख्य नवि लहो कबदी घरे पाग पावजो, पण रखे दक्षण वनमझारे वारं मत जाइजो; तिही ठे नुजंगम काल दारुण तुम्ह जीव विपति करे, श्म कही चाली प्रतिय वेगं पाठे नर वन संचरे ॥ १ ॥ ढाल-त्रिहुं मांहे सुख नवि लहो, चिंते चिन मकारजी; दक्षण कार्यों किण कारणे, चीससीये नदी नारजी ॥ नि०॥ यूटक-परनारीनो विश्वास केदो खदायक ए सदा, चित विमासि उनि बांधव दक्षिण वन जाये जिम्मा सारभूतसंपातारम् । शुनकांतिपिशालं दिसुनावं पार्वजिनं जितमारं,श्रीवीरं वीरं कर्मणि- मोर पापमोसमतारम् ॥ ७॥ (मार्दूलविकीमित वृनं ) इत्यं सर्वसुरासुरेश्वरगणैःसंस्तूपमानाः सदा, म पनजसंतमोदिनकरा योगीऽचिनस्थिराः ॥ संतु श्रीधृतितुष्टिमंगलप्रदाः श्रीराजचंताः पीरिपरचमौलिमुकुटैरानंदसंदोदकम् ॥3॥ ॥श्री जिनपालितजिनरक्षित स्वाध्यायः ॥ ("गग भामारी" भेगरे उतारो राजा भरपरीनी प्रने फूटकनी दरीगीतनी.) दाज-नपरी चंपापनि जानिपे, माकंदी सुत दोपजी; जिनरक्षित जिनपालित, अतिह रिवार दोपतो ॥ न० ॥ यूटक-हुपि उनि सम्मति लक्ष कियापो नष्पा प्रवदण पूरिया, नर समुहमा गया जेन उतरात अनेक वारिपा; प्रकाले अंबर गाजवीज वाप वाजे यति घशो, परमार रमेनिधारी पयो निदां वौहामशो ॥१॥ दास-तट तटक तटके बंधशा, फट पार पाट नापी; पन यो फि मादेतो, जे मारे सावजी ॥ तट० ।। यूटर-सानाय ए संसार फेरो बायनो कुण मद करे, पाटियो लायो बिछु बंधव सुखे ते सायर तरे; रतन दीप तिलदी वापी पात बेसी शिद करे, तेतले रतनदीप देवी यात्री वचन ति नचरे ॥२॥ नाल- करवात कर तीवो ग्रही, सुगजो दे नर वोयजी; अम्द वचन प्रतिपाल जो, तो तुम्हने सुन्य होपजी ॥ ३० ॥ यूटक-इम झीय देश से पाये कुंवर दोय निजमंदिरे, अवसर अनेरे आदेश समुश्शोधन संगर; तर शीख वीपी बिहु नरने सुखे रदेजो घर तुमे, रामति कीमा सदा करजो परे नायु जा यमे ३॥ ढाल-कवही रति नहु उपजे, तो पूरब बनखंजी; उत्तर पश्रिम गाइजो, सहमो सौख्य यजी ॥ ३० ॥ चूटक-प्रसंग सौख्य नवि लहो काही घरे पाग यावतो, पण रणे ददाश बनमझोरे या मत जाइजो; तिहां चे नुजंगम काल वारुण तुम्द जोर विरति करे, इम कही नाली यतिय येग पाठे नर वन संचरे ॥१॥ दाल-मिहुं मांहे सुग्णा नलियो, चिंते किन महारजी; वरुण गायों किया कारणे, वीससीये नदी नारजी। वि०॥ टम-गरनारीको विश्वास केदो खवायक ए सवा, चित विमाप्ति उनि बांधव वक्षिस बन जाये N44

जि-स्या.
RSantSIRBaa
सारधृतसंपमनारम् ॥ शुनकातिविशालं हिरदसुचालं पाजिनं जितमारं,श्रीवीरं वीरं कर्मणि-
नोर पापमलेशमसारम् ॥ ७॥ (शार्दूलविकीमित वृनं ) इत्यं सर्वसुरासुरेश्वरगणैःसंस्तूयमानाः
सदा, प्रत्यक्षमा जसंतमोदिनकरा योगीऽचिनस्थिराः ॥ संतु श्रीधृतितुष्टिमंगलप्रदाः श्रीराजचंईर्नुताः
पीरिश्वरचक्रमौलिमुकुटैरानंदसंदोदकम् ॥3॥
॥ श्री जिनपालितजिनरक्षित स्वाध्यायः॥
("राग भामारी" भेषरे उतारो राजा भरपरीनी भने हानी हरीगीतनी.)
दाल-नपरी चंपावति जालिये, माकंदी सुत दोयजी; जिनरक्षित जिनपालित, अतिह
विशाल दोपजी ॥ न० ॥ यूटक-हुपि उनि सम्मति स कियापो चल्या प्रवदण पूरिया, जर
ममुझमाई गया जेनले नतपात अनेक बदौरिया; अकॉल |वर गाजवीजें वाय वाजे यति घयो,.
शरमान बरसे यति धंधारो पयो तिहां वौहामशो॥१॥ दाल-तट तटक तटके बंधणा, फट
पर फांद नारजी पन घ वेदि मांदेजो, जे संसारे , सहावजी ॥ तट०॥ यूटक-तलाय ए
॥२५॥

Fes संसार केरो प्रायनो कुण मद करे, पाटियो लाधो बिहु बंधव सुखे ते सापर तरे; रतन दीप ति लदी वापी वात वेता तिद करे, तेतले रतनदीप देवी पापी वचन ति नचरे ॥२॥ ढाल- करवाल कर तीखो ग्रही, सुणजो दे नर दोयजी; अम्ह वचन प्रतिपालजो, तो तुम्हने सुख होपजी ॥ क० ॥ यूटक-इम शीख देश ले यावे कुंवर दोय भिजमंदिरे, अवसर अनेरे व आदेशे समु शोधन संचरे तव शीख दीघा बिहु नरने सुखे रहेजो घर तुमे, रामति क्रीमा सदा करजो घरे नाg जा अमे ॥ ३ ॥ ढाल-कवही रति नहु उपजे, तो पूरब बनखंजी; उत्तर पश्चिम जाइजो, लहेशो सौख्य अखंजी ॥ क० ॥ त्रूटक-अखंम सौख्य नवि लहो कवही घरे पाग पावजो, पण रखे दक्षण वनमझारे वारंई मत जाइजो; तिहां वे नुजंगम काल दारुण तुम्ह जोर विपति करे, इम कही चाली अत्तिय वेग पाछे नर वन संचरे ॥ १॥ ढाल-त्रिहुं मांहे सुख नधि सहो, चिंते चित्त महारजी; दकण वायों किण कारणे, वीसतीये नदी नारजी ॥ वि०॥ यूटक-परनारीनो विश्वास केदो सुखदायक ए सदा, चित विमासि उनि बांधव दक्षिण वन जाये 144PAPS24 मुसा प्रावे मृतक केरो अस्यि नगला पेख ए, नपत्नीत हुंता चख्या प्राधा शूलिविंधनर ! जिस्या. गए ॥५॥ दाल-तुं कोण नर अठे ? काकंदीनो वासिजी; लघु अपराधे इम कयु, रतनदीप निवासीजी ॥ पू०॥ यूटक-माप्ति दांनी असे पापिणी पुरुपने शूली दिये, स्वारथे होणो जाणी करी अपराध पुण योमे किये; माकंदीसुत तसुपास पूढे कहो किम अमे निस्तरूं, उरसार हेते का निणे सेलेग पख सेवा करो ॥६॥ ढाल-श्रावी तिहां पूजा करी, सलग भागार पारीजो; तार पालु केहने ?! निमुखी पत्नणे कुमारजी ॥ पा०॥ चूटक-अमने तारो प्रने पालो प्रमोने तमे उरो, सेज़गे वसतुं कयु नो नर रखे नारी दिये घरो; करी वचन अंगी नहिर पुटे समुमाहे नालिपा, तेनले पात्री देवी बोले जिनरक्षित जिनपालिया ॥ ७ ॥ ढाल- मरेर नाप ! तुम्हे का गपा, मादरो कुण अपराधजी; विश अवगुण कांश परिदरो, मुजयो किसी बारीम. पृ-परमादि काट करी डिगाव्यो जिनरखित इम चिंतये, पूरव नोग सो मं बनी गमये एटो विपे प्रयोगं गंगकरी जप वलि हों. जिनपानि ॥९ मन हद कया तब सलाग वग उम्पा ) II ढास-गुरु पान सलग पहा, तमुद्रत गवत तण नारी बचन जे वीसते, रूखशे ते जवनूरजी ॥ गु०॥ यूटक-नवनूरी रूलशे जिनरक्षित जिम विषपरागे मुंझशे, जयपार लद्देशे जिनपालित जिम विषय अशुन्ना बूझो; नणे आचारिज (श्री) समरचंद्रसूरि विषय राग निवारीए, नयतमु संपम पोते वेती पाप पार ऊतारिये ॥ ए॥ इतिश्रीमनागपुरीपदापागहाधिराजश्रीतमरचन्सूरीन्देशकृतः श्रीझाताधर्मकांगनवमाध्ययनस्प (जिनपालितजिनरक्षितनाम्नः) स्वाध्यायः ॥ ॥श्रीजीरावलापार्श्वजिनस्तोत्र.॥ (स्रग्धरा वृनं.) श्रीवामेयं विघुमधुसुघासारसारस्वताव, न्यायापेतो.इतमतिचमकार- कारिप्रतावंम् ॥ जीरापल्लीपदमविपद वारिदाच्छायदे, निःसंदेहं विमलकमलाकेलिगेहं स्तुयेहम् ।। ॥१॥ ताराकारा ननु जिनपते! दृश्यते ते च मूर्तिः स्पार्नस्तस्याःपुनरनुपमा विश्व विश्वप्रसिक्ष। शॉमीराणां न खलु महिमा मूर्निमात्रानुयापी, पहालोपि मवसकर टियंसघोरो मृगारिः ॥ २॥ चौरा- करPRADARMRSarine भा०स० मंजोग पग जोग कीपा नंत, तोपण नपि पापो किमे यंत ॥३॥ तिणकारण आणि मन तोप, विरतिर निरनि टारिये दोष; जेव् अनया अनंतकाप, तमु नीम धरूं ज्या एद पाय ॥ ३५ ॥ ( टास.) हरिपाय दिव नानि अब केलो नालियर, कारणि वीमा चार पान नीषु योजार याब जा चीजडा जाति रोजमिया कपर, नि जाति नीलुया तणी चिणिपाने कातर ॥ २६ ॥ शागर मोरा जाल तिरा मिलिय, यवर जियते दरियकाय ते सहुए परिप गा निमण नतिप जाति दिन चिनि संजालं, काल विशेपे जे सदोपसे जागी वारुं॥३७॥ परपर जम कपर मुंचि प्रामल याराटिय, सेलर ममी बान लिया काग्सिंविलिय; मतीराने ituti योjि जे धान, तनु निमावि धान तणुं संनाडं मान ॥३७॥ चोग्या जाति जुपारि REE RL RTI मारर, गोई चोला नणय तुपरि वरटी ने बाजर; चीजो जे जगि अवरधान पिपेश जोशीम वि पादिम परिमाण ॥ ३१ ॥ साकर साकरदल विदोष दारिक गुरम, रियोग दर पर यात्रियो गुंद, मेरी बीजो गुंदगदा दिर चौरे नीम, 1201 500.00 दिनप्रति अविरति टालीवा मंडीजे सीम ॥१०॥ ६प वीश सचित्त पंच दिन विगा चियार, जूती 7 तंबोल जाति नियचिन विचार; सोपारी सुरकुसुम चंद एला खरवमिय, पादरेवाने काज वस्त्र नंग वीशज गणिय ॥१॥ कुसुम नीम इय करद सगम वाहिणी नरवादा, कोटीवो ए जाच जीव दोविन चन सयरा; पासण जपणा तन विलेप वह कोठ बलि टीलो, दिवसे पालशुं चंन ग्रंन नहु करिये ढीलो ।। ४२ ॥ जो कोई उपजे काज तो दिन उद जोयण, अधिक न चालु एद नाम बदु पाय विमोय; क अंगोहल दिवस वरप प्रति महय न्हाण, पीवाशुं मुज कुन तिमि ए नीर प्रमाण ॥ १३ ॥ पनरशेर दिन प्रसनमान चोप: इक शेर, खाश्म पंचहशेर मिली साश्म अबोर; दिनस प्रते सालसा पंचहिय कर्मवान, अमयोपासक करे नही बहु दोष निधान ॥ ॥ १४ ॥ टाली न शकुं सर्व पकी हुँ विरति करे , वरस वरस ए सहु निरति दियमे समरेशुं; चाणे घोषण एक एकसो नंग प्रमापा, विसप रुप्प सोवन एकसो गिशि गदियारा ॥ १५ ॥ (ढाल.) अवर इंगालिया कर्म हुँ टाळीशुं, उचयु गुरु तशी शाख व्रत पालीशु; विसयमण वरति सवि Raste आ०म० सर माटो मिजो, एह करेवा तली नपिप मुज मन रती ॥१६॥ राय दशमण अंवफल ववदरूं, मदम रिपार तमु मधिक सवि परिदलं; सामिप नापि कर्म नहु किरजए, चार वीघा तj. *१३ क्षारग्जर ॥ ४ ॥ फोझिप कर्म परिमाल ए जाणिये, सागरदंतनो जलप नहु माणिये; मजोर पकनास ने फिटकमी, त्रीश मजीठ मा अवर लखपाखमी॥४८॥ उसय मण थायरम लिज पर वरसयं, तेजनी जाति मल विसप गुलमण सप; खंग चालीशमा एकमण स। ममा मना मुगए रं ॥ ५ ॥ अद व्यापार मुज नीम चउ चउ पयं, वरस विप. ATM मत पंचप: पंय पीतल नदी कर्म निलंदशं, दर तलो दाग न करेमि सर. 7॥ ॥ मम जल पोर ए दोर में टालिये, अवर व्यापारनी जया बहु पालिये; चउविह कमाल मरमवने, तानु बेरमा करि समरिप दिनप्रत ॥ ५१ ॥ न शकीए सर्वश्री ठगीए दिले. पता करता हु मां मुज मोदिलु राजमंत्रीपद धारति नहुँ छरु, नगरजनवादनुरोध RR नदु पर ।। ५२ ॥ रोग दोचा औरणं गाणं, टापिY न्दानि पख यदुख जसरेखणं; Prate हिंसक वस्तु वासिन्य पिणु नापिये, पाच उबएस बदु जयण मन पापिय ।। ५३ ॥ वियसप्रति इक सामायियं पूरिशुं, नवमवति मन तशी श्राश इम पूरिशं; दशमप्रति दिशिदि संखपमें किग्जए, इणि परे मणुप्रनव सफल जाणिज्जए ॥ ५४ ॥ वरस प्रति पोपदा वार हुँ पालिरों, सकतिनी सीम अतिचार पुण टालिशु, दिशि अवलोइशुं लोजन अवसरे, साधु संयोगवति वारमें मन घरे ॥ ५५ ॥ उहा ।। इणि परि पाली वार व्रत, शुः६ करी समकित सार, (श्री) पार्धचंड गुरुभ्यायिने, जेम पामुं नवपार ॥ इतिओ आयकप्रतविचार.स्वाध्यायः ॥ श्रीयुगादिदेवस्तुतिः॥ श्रीमन्नागपुरीयवृहत्तपागाधिराजयुगपधानश्रीपार्श्ववन्सरिचरणसरसीरुह- चंचरीकेण वाचकमुनिवरवरंदराजेन कृता ॥ ॥ जंगी वः ॥ झरचरीशांशुरादावलदं लसध्यानयन्मानसश्वेतपदं .॥ जिनं नालिज ...a Re...tarinaari-tasat श्रा०स० 11 ..... दाल आटो मिली, एह करेवा तणी मश्रिय मुज मन रती ॥१६॥ रायण दशमण अंबफल ववहरु, सहस चिपार ततु अधिक सवि परिहरु सामिप नाहिय कर्म नहु किज्जएं, चार बीघा त[. क्षेत्र वालिग्जए ॥ ४७ ॥ फोझिय कर्म परिमाण ए जाणिये, आगरदंतनो जलप नहु माणिये; कीक मरा लोइ पम्वास ने फिटकमी, त्रीश मजीठ मण अवर लखपाखमी॥४८॥उसय मण घोप रम वणिज पर वरसयं, तेलनी जाति मण विसय गुलमण सयं; खंग चालीशमण एकमण सकर, सर्वश्री मतां मुझए उकरं ॥ १५ ॥ उपद व्यापार मुज नीम चउ चउ पर्य, वरस विप. गणिज प्रदिफण मण पंचयं; यंत्र पीलण नही कर्म निटखवणं, दव तणो दाण न करेमि. सर• शॉपणं ॥५०॥ असर जण पोप ए दोप में टालिये, अवर व्यापारनी. जयण बहु पालिये; चउविह धनस्थ दम अटमवतें, तासु वेरमण करि समरिये दिनमते ॥ १ ॥ न शकीए सर्वश्री ठमीए । दोलिं, जपणा करता हुइये सर्व मुज सोहिलं; राजमंत्रीपद धारति नहुं करूं, नगरजनवादनु रोष FIT || ५२ ॥ होम दोचणजलें जीलणं, गोलणे, टाखिशुं दाणि खल बदुल जलरेलणं;

हिंसक यस्तु दाखिन्य विणु नापिये, पाच वएस वदु जयण मन थापिर्यं ॥ ५३ ॥ दिवसप्रति इस सामापियं पूरिशुं, नवमप्रति मन तशी श्राश इम पूरिशुं; दशमप्रति दिशिदि संखपमें किरजए, इणि परे मणुप्रलय सफल जाणिज्जए ॥ ५४ ॥ वरस प्रति पोपदा वार हुं पालिशुं, सकतिनी सीम अतिचार पुरा टालिथु, दिदिश अवलोइशुं भोजन अवसरे, साधु संयोगपति बारमें मन परे ॥ ५५ ॥ हा ॥ इणि परि पाली बार व्रत, शु६ करी समकित सार, (श्री) पायचं गुरुध्यापिने, जेम पामुं जयपार ॥ इतिश्री आवकप्रतविचार स्वाध्यायः ॥ श्रीयुगादिदेवस्तुतिः ॥ श्रीमत्रागपुरीपहत्तपागवाधिराजयुगपधानश्रीपार्श्ववन्सरिचरणसरसीरुह- चंचरीकेण वाचकमुनिवरवरदराजेन कृता ॥ ॥ जुजंगी वः ।। शरच्चरीशांशुरादावलकं लसाक्ष्यानवन्मानसश्चतपदं ॥, जिनं नालिज यु०स्तु -- | पस्तमोहावकारं स्तवीमि पर्नु प्राप्तसंप्तारपारम् ॥ १॥ अगाधे नवाम्नोनिधी- संपतनिर्जनस्य ते सातभावापानम् ॥ समाश्रित्य वेगाहितीर्णः स तस्मै नमस्तुभ्यमस्वमवृन्दार्चितार ! ॥२॥ महायोधपुवाँधतापात्रमार! यादीननावघे सिंदसार !॥ नवीनोलसनासुरस्वर्णदेह ! जप त्वं मनो! केवलज्ञानगेह ! ॥३॥ नवत्प्रोक्तताक्पपीयूपधारां पिवन्ति न दि प्राणिनो पे तुषाराम् ॥ कारमिट नत्र ते सरोशन्यवागाऽऽविलानां विशिष्टम् ॥धा वचस्तावकं रागनृक्षाचपा यः समं कि काजुप्परत्या विशुभम् ॥ अयस्र त्रिपामा स्वरूपाक्ष ईश ! स जन्मांच उक्तः खलुबुद्धि मभिः ॥ ५ ॥ मरागोक्तदावजेच्यो नमोऽस्तु मियःसांप्रतं संविरोधं नजन्यः ॥ अघीताजनं मारा पे प्रकामं नवजोपु बहादतिं चर्कती! ॥६॥ वचो वेपवक्ष्यावरं श्रदधाति विनो! वक्ति परना नव्यजानिः । समस्नं न जेनें प्रपाएिमवर्गवो मतसारगन्तवाशरास्यम् ॥७॥ तंत- रोपमान ममानस्य पायेगमानन्ददानम्।। मपछेदकं श्रेपमा यनिधानं तदास्तां मम स्वा- निपानम् ॥ ॥ ममत्व वालकासारसंस्यं नवारकरमरवोलासनेई । अहानीदा ! म 1१०८ निर्जितकीरजातं सुखं त्वन्मुखं पश्यतो पातु कालः ॥ ए॥ अनन्तः समालिन्निन्ता या जिनेश ! मनोमोहिनी मुनिनामा विकामा ॥ तपाऽहर्निशं कोडमानोऽपि चित्रमिदं गीयते त्वं बुधैः सुद- शीलः ॥१०॥ सुरा पासते कोटिशःतक्षितएमा जवानलमन्ये हि ते काचखएमाः ॥ न ते तेऽम्बरे जाप्रतीद ग्रहाः किं जगबहुपः कस्तुलास्ते तु नाय! ॥ ११ ॥ कति व्यगुणान्काशहासेन्डगौरा । नपोहद्यहं कुर्ग यातत्रिविश्वान् स्वचीरे कियत्राति स्वर्णमत्रा-धिगत्येश! निःस्यो हिरण्यक्षितिघ्रम् ॥ १२ ॥ सम्परा वृनं ॥ इत्यं श्रीयादिनायस्तपनमतिमतिमाप्तसिहान्तसारः कालेऽस्मिन् खमारे प्रवलमठपती नूरिपाखएडजाले ॥ पैजेनं शासन सत् प्रकटितममलं सम्पगुनासितं च अघालूनां हितार्थ परमशिविपृश्रत्य पार्श्वस्यमार्गम् ॥ १३ ॥ तेषां विद्याक्सिप्रेप्तरविद्युघशिरोलतियापा. चन्धो-पाध्यायानांप्रवादिप्रतततरुगणोन्मूलनेजमनाणाम् ॥ चश्वचारित्रनाजां नवजसनिपतत्माण- नगारकाणाम् स्वर्गद्वानीरदारोज्यसत्तरलयशःपावितक्ष्मातलानाम् ॥१७॥ गीतिः ॥ चरणार- चिन्दसेवन-मधुपः शिप्याणुवरदराजाख्यः। जम्मतिरपिनिजदर्पा-चकार चित्तान्तिापदरम् ॥१५॥ 1.23%ARI-RIRamRHARA ॥ इतिश्रीवाचकवरमुनिवरवरदराजेनकृताश्रीयुगादिदेवस्तुतिः संपूर्णा ॥ आ०स० अपा चनमी ॥ श्रीआचारंगसूत्रना लोकविजयाध्ययननी सजाय ॥ "र प्रांरा भावलीरे दीठी दाम दाप " ए-राग. (अपवा) जेम तरुपाकुं पांदडुजी, पडतां न लागे वार-ए देशी. श्री याचारंग सूत्रनोजी, अध्यपन वीजो एद ॥ लोकविजय नामे करीजी, नापे अरिहंत तेद ॥१॥ (सुण सीख)रे प्राणी परिदर विषय कपाय,जेम अनुपम सुख पाय रे प्राणी. ॥ए। प्रांकणी ॥ लोक हान्ने इहां जाणीयजी, विषय काय प्रसंग ॥ विजय केहेतां ते जीतवाजी, जेथी साय व नंग ॥रे प्राणी० ॥ २॥ वीजांकूर न्यापे करीजी, विषय कपाय संबंध ॥ चतुरंगति नमा तणोजी, तेदयी श्राय बंध ॥रे प्राणी ॥३॥ नरक तियचगते बुख सहेजी, वलि गति गरमागास ॥ कर्म तापे तप्यो जीवमोजी, जन्म जराने नास ॥रे प्राणी ॥४॥ आधि उधिने व्याधियजी, ते अति दुरावीणो दोय ॥ मदा मोद प्रादे प्रह्योजी, कण एक सुखिन म जोय ॥रे प्राणी ॥ ५ ॥ इत्यादिक ते अनर्थनाजी, कारण कारज नाच ॥ जाणी तजीने ली. जायेजी, सु अवतरनो साथ | रे प्राणी ॥ ६ ॥ श्रार्यक्षेत्र उनम कुलेजी, पामी नर अवतार ।। धर्म श्रवण रुचि उपमेजी, अममतताने धार ॥रे प्राणी ||॥नव शतकोटी दोदिलोजो, जाणी अवसर एद । संयम अनुष्टाने रमेजी, समय दरशी मुनि तेद ॥रे प्राणी ॥6॥ चित्र जोवे वली जंबुयेंजी, गजसुकुमार मुनीश।। विषय काय वेलि दिनेजी, पाम्या मुक्ति जगीश ॥ ॥रे प्राणी ॥ ॥ विषयादिकमा जे फस्यानी, ब्रह्मदत्तादिक तेद ।। नरकगते दुःख लोगवेजी, दजी सुधी नाव्यो वेद ॥रे प्राणी ॥१०॥ म जाणीनधि परिहरोजी, म करो एहशुं रंग।। जेश्री वेगे तुमे पामझोजी, मुक्तिवधुनो संग ॥रे प्राणी ॥ ११॥ नागपुरीय तपागच्छेजी, श्रोत्रातृमन्सूरी, तासचरणकजसेवतांजी, कदे मुनि सागरचा ॥ रेप्राणी ॥ १२ ॥ ।। इतिश्री लोकविजयाध्ययनस्वाध्यायः संपूर्णः॥

वेस्त . राकापु सरन ब्रह्मदत्त, सत्तमा कुंथुनाय परि मलि सुईकर, मुनिसुव्रत नमि नेम; पार्श्व वीर ए जिन चोवीश, जगवत्सल जगगुरु जगदीदा, प्रणमीजे धरी प्रेम ॥ ३ ॥ ( ढाल २ जी. प्रथम सुपन गज निरख्यो-ए देशी.) प्रथम नरत नरें, बीजो सगर सुरिंद, मघवा त्रीजो नदार, चोथो सनतकुमार ॥ ॥ पांचमो शान्ति चक्रीश, को कुंथु गणोश, सातमो प्ररि नरनाथ, अहम सुन्नूम सनाथ ॥५ नवमो पदमसरेश, हरिपेण दशमो कदेश; ग्यारम जप ताम, वारमो ब्रह्मदत्त नाम ॥ ६॥ एह चक्रीसर वार, क्षेत्र नरत शिणगार; मघवा सनतकुमार, पहुंता सरग मार ॥ ७ ॥ सुनूम अने नरप निरन: पाठ धया शिवगामी, ते प्रणमुं शिर नामी ॥ ७॥ ( ढाल ३ जी. मुनिवर आर्य सुदस्ती-ए देशी.) पहिलो त्रिपृष्ट जाण, हिपृष्ट दूसरो, तीजो स्वयंपन्न जाणिये ए; पुरुषोत्तम चोप, पंचम परगमो, पुरपसिंह प्रमाणिये ए ॥ए। उसो पुरप पुंमरीक, दत्त तीम सातमो, जखमण नामे पाठमो ए; नवमो कृष्ण नरेश, ए नव केशव, प्रद छठी ए पण नमो ए॥१०॥ तिहां पहिलो वासुदेव, नारकी सातमी, अगला पांच ही गया ए; सातमो पंचम नेर, चोथी 1१.०६ HIGH आवमो, नयमो तीजी नारया ए ॥११॥ अचल विजय ने लद, सुप्रन्न सुदर्शन, श्रानंदन शुलमति ए; रामचंद वसन्त, बलदेव ए नय, आठे थया शिवगति ॥ १२॥ वलन्नइ ब्रह्मलोक, काल नसप्पणी, नाशे शिव कृष्ण सासणे ए; अश्या निपुलाक नाम, तीर्थकर होशे, चन्दमो म बहु श्रुत नसे प॥ १३ ॥ ( ढाल ५ श्री. कुमरपणे प्रन्नु रहेतां काल सुखे गमे ए देशी.) अश्वग्रीव ने तारक, मेरुक चलिमधु तिसा ए, निशुंन अने प्रल्हाद, रावण जरासिंध जसा ए; ए नव प्रति. वासुदेव नरकगति गामिया ए, तोपण नाविजिनेश केइ प्रणमुं सपा ए ॥ १४ ॥ ( ढाल ५ मी. सफल संसार अवतार ए हुं गिणुं ए देशी.) शांति ने कुंथु पर एद नव एकही, चक्रधर तीकर दोय पदवी सही, वीर वासुदेव अरिहंत नव जुजुमा, देह त्रिसाठ पण जीव गुण सम हुआ ॥ १५ ॥ वासुदेव वलिय लदेव केरा पिता, एकहीज पाय नव एण लेखे पता; तीन चकघरतणा मिलिय वारे दख्या, एम सपना तात गवन मिल्या ॥ १६ ॥ तीन चक्रवर्ततणी टाली वीजे जिशे, माय सहुनी र साठ लेखे शे; एद नररयगनो ध्यान जे नित धरे, तेह सुरपद सदी शन मनाप 1101 नि मोक्ष पदवी बरे ॥ १७ ॥ (कलश.) इम युएयो तीर्थंकर चक्रीसर वासुदेव बलदेव ए, प्रतिवासुदेव सुसेच जेदनी करे सुर नर सेव ए; तेतशिलाका पुरुष उत्तम जयवंता वरतो सदा, प्रह समय तेदनां चरणपंकज “वखतचंह" नमे मुदा ॥१६॥ इतिश्री युगप्रधानकनकचन्सूरीश्वर संतानीय मुनिगजश्री वक्तनदेशकृतं स्तवनम् ॥ ॥ निंदापरिहारनी सज्झाय.॥ || मारगदेशक मोक्षनो रे, केवल ज्ञान निधान-ए राग ॥ चेतनशुं मन साश्यरे, परिहरि पापप्रमाद; वलि विशेपे टालबोरे, विरुवो परपरिवादो रे ॥ १ ॥ समता मन धगे. परनिंदा बहु दोपो रे, गुण प्रकट करो ॥ जिम पामो नव मोखो रे, समता मन धरो. ए प्रांकणी ॥ खिरामांदि संयम सहु गमेरे, जे संच्यो निरमालः परनिंदा करतो जतीरे, बोले नपदेश मालोरे ॥ स० २.॥ जेहने जे दूपण वियेरे, तेदिज पामे यार; पंचम अंगे जाणारे, नय नव जिणे संतापो रे ॥स०॥ ३॥ परनिंदा पातिक कहारे, बीजे अंगे विचार; नरकादिक उख धनुन्नवरे, करि तेहनो परिहारो रे ॥ १० ॥ ४॥ पाप वखाणे अधिकतार, यात मने प्रति लीण; जिणे दूपणे पर दूखियेरे, ते परत्नये सहीए दीणोत. ५॥ लोकिक ग्रंये इम फोरे, परनिंदक सोवाग, जिहां ते जाये जलें करीरे, ते सींचीने मागोरे। स०॥३॥ परनिंदक पर पूठनोरे; मंस करे पादार; वाचकालिके इम जल्योरे, पंमित लदशे सारो रे ॥ स० ॥ 3 ॥ यति गुरु धर्म संघनीरे, सुरनिंदा मिथ्यात; समकित होय प्रशंसतारे, त्रीजे अंगे विख्यातोरे ॥ स० ॥ 6 ॥ परगुण हिये संजारियेरे, अवगुण परिदरि दूर; श्रीपार्श्वचंद पाये नमी कहेगे; मुनि ब्रह्मो धाणंद पूर रे || समता मन घरो॥ ॥ इति स्वाध्यायः ।। ॥ श्रीजीरापल्लिपाटक आदिश्वरजिनस्तुतिः॥ अनुष्टुप् यत्न.॥ देनजवितं देयं, नानिनूपतिनंदनम् ॥ वृषनांकन संयुक्तं, ते सान प्रणमा. म्यहम् ॥ १॥ मरुदेवांग जन्मानं, साधुबूंदसुसेवितम् ॥ केवलज्ञानन्नास्वंत, तं देवं स्तोमि जावतः ॥२॥ सुरासुरनरेशणां, पूज्य गुणगणैर्वृतम् ॥ तृतीयारननोदीप्र; दीपं वंदे मुदा सदा निगम भोक पदको वा ॥ १ ॥ (मा.) इम तो नीर्थकर नक्रीसर वासुदेव बलदेव ए, प्रतियासुदेव jia परे नारा; मात्रामा पुरुर नुनम जयनंता वरतो सदा, प्रह समय नज "मन"नमे मुद्दा ॥१॥ इनिधी युगप्रधानकनकचन्दसूरीश्वर संतानीय मुनिगजा बनना सवनम् ॥ ॥निदापरिदारनी सन्काय.॥ दे मोनो रे, देवल हान निगन-पगग। तन मन जापपरे, परिहरि पारसमान; वति विशेष टालबोरे, विरुयो परपरिवादो रे ' ॥ ममता मन बगे. परनिंदा बहु दोरो रे, गुण प्रकट करो ॥ जिम पामो जय माकोरे, ममना मन बगे. ए ग्रांकती ॥ विणमादि संपम सहु गमेरे, जे संध्यो विरार पानेटा कानो जीरे, बोले नरदेहा मालारे ॥स०२॥ जेहने जे दृषण दियेरे, ཙའ བཀའུ ༡༣ཀ མཱན ཀ་ལ • ना नाविण मनातो ROM३॥ पनिंदा पानात 41 कह्यारे, वीजे अंगे विचार; नरकादिक उप अनुन्नवरे, करि तेहनो परिहारो रे ।। स० ॥ ४ ॥ प्राप वखाणे अधिकतार, पाठ में प्रति लोण; निणे दूपणे पर दूखिपेरे, ते परनये सहीए दीगोम ५ ॥ लोकिक ग्रंये इम कमोरे, परनिंबक सोयाग, जिहां ते जाये जलं करीरे, ते सींचीने मागोरे॥ स०॥६॥ परनिंदक पर पूछनोरे; मंस को यादार; वशवकालिके इम नगयोरे, पंमित लदशे सारो रे । स० ॥ ॥ अग्दिंत गुरु धर्म संघनोरे, सुरनिदा मिथ्यात; समकित होय प्रशंसतारे, त्रीजे 'अंगे विख्यातो रे ॥ स ॥ ७ ॥ परगुण हिये संन्नारियेरे, ययगुण परिदरि दूर; श्रीपाचंच पाये नमी को मुनि ब्रह्मो पाणंद पूर रे ॥ समता मन धरो ॥ ॥ इति स्वाध्यायः ॥ ॥ श्रीजीरापल्लिपाटक आदिश्वरजिनस्तुतिः ॥ अनुष्टुप् वृत्त । देवदितं देवं, मानिनूपतिनंदनम् ॥ वृपलांकेन संयुक्तं, तं सा प्रणमा. म्यदम् ॥ १ ॥ मरुदेवांग जन्मानं, साधुतसुसेवित्तम् ॥ केवलज्ञानन्नास्वंतं, तं देवं स्तोमि जावतः ॥ २॥ सुरासुरगाणा, पूज्य गुणगणेवृतम् ॥ तृतीपारननोदीमा दीपं यंदे मुदा सदा 53.+16+SH mintin-attest क म. मंचन जी ॥मीतिः॥१॥ नारा नसो को सहस बरस लगी, किरिया करो अनंतजी; सेतरस्पा मोरयरत सगो, ना नजो जगवंतजी ॥ प्रीति०॥२॥ संयम पालो कोमियरस वी, पारोपान तमानजी; मुनिरसोनजी रहो वनवासि, करो वहु धूमरपानजी ॥ प्रीति० ॥३॥ मुक मुंगावो सोच करावो, नगन रदो गृह वेदाजी; जटा वधारो तिलक वणायो, जावे रदो दमाजी ॥ प्रोनि ॥ जोगी जंगम पति संन्यासी, वेप अनेक प्रकारजी; से से मूक्पा पार नंती, न हुओ को निस्नारजी ॥ प्रीतिः ॥ ५ ॥ प्रीति न तोकी अधिकी कोकी, सकलगुणे प्रधानजी; मौसम मएयर सपने नाशे, न सद्दे केवलज्ञानजी ॥ प्रीतिः॥३॥ सिजंजय घउदद पसर, नंबर देर मनाजी यांनु नास्पा नपप यकी जिन, सबल प्रितीनो गफजी ॥प्री. . राधेसोवा, वसनद धार उ मासजी, रीसाशोनार नवि बोले, नमिपो महामजी ॥२॥ ॥ वारनी हुं बंधी विदा, का तांतण तारजी; चार बरस Rोगा, मनिशर मामाजो ॥ प्रति ॥ ॥ मगुपनि पनपसर्ग कीपा, प्रीसे Reatest:

05:45 हुवो अंधजी; रामचंद तीता मन साचो, वांचो एह संबंधजी ॥ प्रीतिः ॥१०॥ जीव संनूततणो मरी हुन, ब्रह्मदत्त चक्रघारजी दा कुरमति कुरमति करतो, पहुतो नरक मकारजी प्रीतिक॥१॥ वार वरस लगी चारित पायो, नारि नागिलापानजी; नावदेवें ए संपम गेमयो, जोमयो प्रीतिY मानजी ॥ प्रति० ॥ १२ ॥ घर परिवार तजी नाट कियो, कंधे नपामयो सनी; सापुत्र प्रति प्रीते नहियो, शिवगामी सुप्रशंसजी ।। प्रीतिः ॥ १३ ॥ शिवगामी रहनेमि कपीश्वर, राजिमतीनुं रूपजी; देखी ध्यान प्रको जे चलियो, प्रीति अलख स्वरूपजी ॥ प्रीतिः ॥ १५ ॥ सामुमादि लट पई मरीने, प्रीते चारे नारजी; एद अचंवो देखो हुन, वैराग्यो जरतारजी। प्रीतिः ||१५|| बालक मारी मंस नखे ए, दीसे ए अणगारजी; प्रीति वेटाइम सीखिया, नृगु नृगुनी वलि नारजी प्रो. ॥ १३॥ दही माहि पध बहु घाली, प्रीते मुनिने दीघजी, हरसपनि मुनि अगसण कीनो, एड अकारिज कीघजी ॥ प्रीति ॥ १७ ॥ गौतमने केती मुनि पूछे, संसारमादि कुण पाशनी; प्रीति पाश के प्रति नयंकर, मनराध्ययन सुनापजी ॥ मोति० ॥ १७ ॥ रातें नग्यो दासी प्रीते, सेवा SIAFIR...

Toग
" सह कार " इमा, श्री मंगने उपजयाजी ॥ श्रीनि० ॥ ३६॥ इतिश्रीमनागपुरीप.
Himshq धीमर मुनितारनः स्वाध्यायः ।
अथ श्रीगजर्पि मुकामलजीनी मकाय,
( 23 ) गोपम गोपम गदर पाये नमीए, गारशुं गान श्री मुनिराप के नामे मुकोसात
एपनि ए, सुंदर मुंदर कोमा शप के. गोयम. (यू.) पाए नमी साघु मुजाण केरा कहु
* मोसमत. ( जाय जोपन वीर जंव नग्नक्षेत्र निहां नपुं साकेत नामे नगर मादं
६ सिकागजपो, जिनयमों पूरी मदा दागे दान ने गुण गाजियो ॥१॥ (दाल) तमु
११ मनाममो नमनान के; गाणी मरदेवी नवी, मुकोसाप्त
नम् (१) बानी गुरुवंत गीते गग रंगेनधि रमे, सवितांग गुर
REE मा समानामा प्रर्पर नीति
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परवयों बेगे राजनीति घरे खरी २ ॥ (दाल) नरपति नरपति निरखे नयणमे ए, सूरज सूरज प्रहण अाकाश के; चतुर पणे म चिंतये ए, रवि किम रवि किम पमियो पास के. नर. (यूटक) चपणढांगड़ा राज पे अहो अघिर संसार ए, शशि सूर सरीखा प्रदश पामे कर्म विषम अपार ए;पुत्र परिजन पशु पराक्रम कोइन धामो प्राव ए, संवेग रंगे राय चडियो लायना इम नाथ ए॥३॥ (दाल २ जी गीता चंदानी ) ( चालती ) तव राजा रे कहे कुटुंबी पुरुपने, सझारे करो योलायो सऊनने; नृप पदची रे कुमर सुकोशलने दिये, कीर्तिघर रे नूपति चारित्र तव लिये. (पू.) नव लिये चारित्र खरो पाले दोष टाले तेदना, तप करे :कर साधु सुंदर खान पे निज वेदनाः प्रामानुप्रामे विहार करता तर चोमासी पारणे, साकेतपुर मुनिराप पाये जमे घर घर धारणे ॥ ४॥ (नालती) इण अवसर रे सहदेवी गोखे चमी, शघि देखी रे राणी घण क्रोघे नडी; समावी रे चरवादार मते नशे, श मुनियर रे शुं करियो ते आपणे (०) पापणे नगरे म पायया द्यो जाइ बरजो एहने, तब नफर यावे साधु पासे नवखे झपिरागने; ते वचन रापणीतणा 1000 ॥ १६ ॥१३॥ ते परेको स्पी, मेद टो कुंनो जामतो; कोर कलित वैताठीनो, जक सोको १५ !! देनी प्रामादि पायो, वैसनारे पूरण जेह तो; कप armik वर न बहे नेह तो || म०॥ १५॥ वाप शिकु यति धणो, हणे सुदर ने मार वापसी की परे नारियो, म दुवो तन मेद अगाद तो || स०॥१६॥ का भरतारे, माजी नावे गिरि परचम तो; थयो मचेतन योग, जद कियो कुंवरे रानो । १३ श नगी, मारे गुर पियावर कोडि तोटि करे 72 ISTोगजनी नो || म. ॥१॥म जदा सेइ गालियो, देखे नर 53 ग्रामी, नेत्र जिनो दामिनी कवहार तो || १० ||M॥ भिर दा को प्रति ना कुंवर नुमे, जिणे १२. रम:॥ १.२ देतो रंग नाले, विपनारिणी शिधारमा *.रमें इन RT !! Ramair, वेगे तस दीघो मान तो; शपिनो वचन मिल्यो संदी, जिणे कहियोएदयो अहिनाणतो ॥ २२ ॥ मानससर जे प्रायसी, जद तणो जय करसी जेह तो; ए कन्या पाठे तणो, होसी वर तेहीज नि. संदेह तो ।। स० ॥ २३ ।। श्म कहि ते परणाविया, वासनयन सूतो सुविचार तो सेज थकी धरणी पडयो, जागतां देखे एह प्रकार तो ॥ स० ॥ २४ ॥ मनदी विमासी चालियो, एकलमल्ल अटचीने संगतो; गिरिशिखरे जिहां घर अने, देखि गयो तिहां मन रंग तो ॥ स० ॥ २५ ॥ करुणास्वरे एक कामिनी, करत जपे मुखे सनतकुमार तो; तिणे ते पूठी एम कहे, मनने मेल तेदज जरतार तो ॥ २० ॥ २६ ॥ सांगली पुर साकेतनो, सुरनिचंद राजा घरं नारि तो; चंद्र जसा मुज मापडी, दूत एक श्राव्यो सुविचार तो ॥ स० ॥ २२ ॥ रूप देखाडयो कुंमरतो, तिलि मुजने तप्त कार नेह तो; वीजे नामे मागणों, तात कियो मुणी मादरो तेह तो ॥ स० ॥ २० ॥ गोचमा हुँ तिरासमे, विद्याधर अपहरी तिवार तोण धानक मूकी गयो, इमं कहेतां वलि हुइ ते वार तो ॥ स० ॥ २५ ॥ यत्तनवेग खेरीदनो, सुतवजवेग उपाझे नारि तो; ततखिरा कुवं.

समा मारजी मोरासो सरा से दण्पो, घरणी पयो मुष्टिपदार तो ॥ स ॥ ३० ॥ सनतकुमारे ते वरी, अस्त्रीरत्न सुनंदा नाम तो; रूपगुणे प्रति आगली, चक्रीश्वर सुखनो यतिधाम तो ॥स० ॥ ३१ ॥ तस जगनी संध्या वली, यावी बंधव मुश्रो देखी तो; कोपे चडी बली उपसमे, निमित्तवचन संन्नारे विशेष तो। स०॥ ३२ ॥ जे तुज वांधवने दणे, तेताहरो दोसी जरतारतो; शो कहीने कुमरशुं, पाणी- प्रदण करे तिलि चार तो ॥ सु० ॥ ३३ ॥ ति। अवसर दोय आविया, विद्याधर बोले विख्यात तो; तुम कपर थावे चमी, जे तुम पुरुष इण्यो तस तात तो ॥ स० ॥ ३५ ॥ नवनवेग नरपति घसी, चमवेग वली मेली साय तो; पाया तुम सेवानगी, करो कृपा श्रम ऊपर नाथ तो ॥स०॥ ३५ ॥ तिण अवसर संध्यावली, विद्या खचर संबंधी जेद तो; कुवरने आपे सही, असनवेगशुं मृझे तेद तो ॥स० ॥ ३६ ।। पढतां वार घणी थइ, असनवेगनो कीघो घात तो; राज लियो सपि तेदनो, पाले सनतकुमार विख्यात तो ॥स० ॥ ३७ ॥ विद्याधर सवि पोलगे, सुख विलसे सुर जेम उदार तो; चंडवेग इम वीनये, सोकन्या परमो मुजसार तो ॥ स० ॥ ३० ॥ एक दिन पुजने दाखव्यो, पाणिग्रहण तो ग्रहीनाण तो; पाउ रमलिजे परणशे, नवनवेग राजानी जाण तो । स० ॥ ३५ ॥ पूरनवना वैरथी, जदें अस्ताक्ष मनाव्यो दारि तो; ते कारण वली पूचियो वैर किसीपरे हुयो तिवार तो ॥ स० ॥ ॥ झशि वाले तिहां ज्ञानशुं, सांजल एहनी पूरव बात तो; कंचणपुर राजानलो, विक्रम जश नुवने विख्यात तो ॥ स० ॥४१॥ सारथवाह तिहां यसे, नागदन घरे अपनर नारि तो; विस्नुतिरी नामे सही, नृपनी दृष्टि पडी इक बार तो ॥ स० ॥ ४२ ॥ यंतेवर मांदे घरी, रक्त हुप्रो राजा तिण साय तो वोजी नारि न सांतरे, न्याय तणो तेन गणे काय तो ॥ स०॥ ४३ ॥ तिण उसे ते गहेलो थयो, नागदन तेहनो जरतार तो; तेह वचन मुचे कचरे, नमे नगरे तेदिज संतार तो॥ स० ॥ ॥ नूपति लङा अवगणी, अवगपयो यंतेनर सार तो; विस्नुसिरि क मन वसी, राजतणी टमी कणवार तो ॥स०॥ ४५ ॥ राणी सवि एका मित्री, पंचसयां मिति कीशे मंत तो; कामण जोगे ते दणी, विभुसिरिनो एद वृनांत तो || स. ॥ ४६॥ झोगकलित राजा हुचो, विकलपणे इम बोले वोल तो; एहनो साथ न म्हेलरों, शना म०रा० मोदन मे तेद निटोल तो ॥ स.॥४३॥ पासे नित चैगे रहे, मंत्रीसर कीघो परपंच तो; मधन पणे प्रटची घरे, मृतक तपो ए जाणे संच तो ॥स. ॥ ४ ॥ तस अगदी परिहरे भूपत्ति मत्सनादिक सपि लोग तो जश्ने देखामे जेतले, मृतक तणो थयो जूमो जोग तो॥स. ॥४९॥ तव नृप संवेगे पायो, दीक्षा ले मोटे मंमाण तो; चरण करण पाली करी, श्रीजे कलपे लह्यो शुन गण तो ॥ स. ॥५०॥ चविय रत्नपुरे अपनो, शेठ कुले जिनधी, नाम तो; समणोपासक जानीये, जेदवो नाम तिझोपरिणाम तो । स.॥५१॥ सारणवाह मरण लहे, विकलपणे रमणिने राग तो; बनण कुसे ते ऊपनो, अनुक्रमे हुन त्रिकी माग तो ॥ स. ॥ ५२ ॥ तप २ मासी माचरे, रतनपुरी यायो इक वारतो; राय घरे पारण नणी, तेमयो तापस अविचार तो ॥ स. ॥ : ॥ ५३ ॥ जिनधीने तिणे समे, पेखत सबल नराणो रीस तो; पूरव वैर तणा नवे, रायप्रते बोले गुजगी तो ॥ म. ॥ ५५ ॥ एहनी पुढे पारणो, मुजने ठे करवानो नाव तो राय वचन अंगी को, निणे तेदतो मांड्या प्रस्ताव तो ॥ स. ॥ ५५ ॥ श्रायफनी पुंचे घरे, प्रांबानो नांजन ..

जरी खीर ता; उसपणे जीमे तिहां, प्रगथ पलयो ने रुधिर शरीर तो ॥ स. ॥५६॥ वेदन शुं निज घर गयो, श्रावक मन थाणे पेराग ता; दीख ग्रही कानसगै रह्यो, पनर पनर दिन दीसने नाग तो ॥ स. ।। ५७ ॥ मांस नखे ते पंखीमा, म मास तणे अवसाण तो माराधी सुरपति हुनो, पहिले कल्प थ तस आण तो ॥ स. ॥ ५॥ तापत ते वाहन पयो, इं तो एरावण जाए तो; फीन हिये तप श्राचर्यो, तेदनो फल एदयो निरवाण तो ॥ स. ।। ५९ ॥ तिहाथी तिर नरना नवे, जमत थयो प्रस्तापि विमान तो; २२ चवीने तुमे थया, सहदेवी उररयणनिधान तो ॥ स. ॥६०॥ कपिनो कहण निवेदियो, चंवेगे नरवर तिणि गातो; सनतकुमारे ते सुपयो सो कन्पा परणी तस जाए तो स. ॥ ६१॥ एवंकारें एकतो, दश अधिकी रमणिनो जोग तो; नमर रमे जिम मालती, विविध परे तिम विलसे लोग तो॥ स. ॥१२॥ अन्य दिने वा नपनी, मानसप्तर जोवाने काज ता; इण धानक आवी रहा, मिलन हुबो एतुम्हशुं माज तो ॥ स. ॥ ३ ॥ अवसर जोर पीनये, मित्र कुंवरने वे कर जोमी तो; चाल तुं दधिशापुर नणी, जननी पिताना नीस्तु.. जो परिणाम तो ।। स. ॥१॥ कुंवर पले मंझलि पणे, संहस पंचांस वरीस तो; लाख वरपं पीपणे, तिम पारित्र पाब्युं तुजगीश तो ॥स.॥८२ अगसण समेते करी, मास दिवस पाले नितिवार तो; वर्मखपी सि गयो, नामे ऽगति दूर पलाय तो ॥स.॥६३ ॥ सोलहसे सिनोतरे, भाषण मुदि तेरसे प्राधार तो नराध्यपन संकेपश्री, वृनि थकी कीघो झार तो ॥ स. Gun धोपावनंमूरि पाप नमी, दरम्प घरी ए रनियो राम तो मुनि उदय कहे जे जणे, तिद घर मंगर जछि निराम तो ॥ स. ॥ ५ ॥ इतिश्रीमन्नापुरीयवदनपागछापिराजयुगप्रधानश्रीपार्श्वनन्. सूरीश्वरसिप्पमुनिश्रीउदपनदेशकत:श्रीप्सनतकुमाररासःसंपूर्णः ॥ ॥ श्रीचीरमनुना अग्यार गणधरनी स्तुतिः ।। (नजानि )-श्रीनृत्ति पृथवीमुपुत्र, माझीणलब्यादिगुणीः पवित्रम् ॥ जगजपं गौतमंगों गने. पोगोनमानीमिभूतमपानम् ॥१॥मुपामुपाकारितयोगिता, सरितानंतमनोनितासंग ।

विश्वैकरिश्चाविसप्तदिनूति, श्रिये आये श्रीमुनिमनितिम् ॥ २॥ श्रीवीरवत्तत्रिपदीनिधानं, सुरा. सुरैः संश्रितसन्निधानम् ॥ संस्तुत्य सत्यं प्रनयानुनूर्ति, सेवे मुनि संप्रति वापुतिम् ।। ३ ।। निजान- वयांनोषिविशुपचंई, सत्यविनिक्षिप्तसनिक्षम् ॥ व्यक्तीकृताव्यक्तसुयुक्तिसूत्रं, व्यक्तंश्रयेश्रीध. नमित्रपुत्रम् ।। ४।। श्रीनहिलाकुकिदोहरीश, मीनध्वजध्वंसनसगिरीशम् ॥ व्याख्यातविख्यात. वयाख्यधर्म, स्तुये सुधर्माणमनंतधर्मम् ॥ ५॥ धनाधिपश्रीधनदेववंशे, मुक्तोपमा यः प्रवरीधरीति ।। श्रीममितः सद्गुणमंहितः स्थ, निर्वाणसौख्यंच चरीकरीति ॥ ३ ॥ सामौर्यजाया विजयासुधन्या, पया सुतो यो जनितो जनन्या । तं मौर्यपुत्रं त्रिपदिसुपात्रं, स्तवीमि चामीकरचारुगात्रम् ।। ७ ॥ श्रीदेवनूदेवसदेवनंतनं, देवी जयंतीमुपुनः सुनंदनम् ॥ नूमीश्नोगीगौरकंपित, श्रीवीर शिष्य कथ- पाम्पकंपितम् ॥ ८॥ (उपजातिवृनं.) सदर्शलावण्यवरेण्यदेई, सौलाग्य नाग्यासुदपैकगेदम् ॥ श्रीपारिजातोनमस्तिह, मुदायसनातरमाश्रपेदम् ॥ ए॥ दीनाधिसाखीकृतनामधेयं, श्रीदनवंशा- नुतनागधेयम् ॥ चातुर्पगांनी यंगुणेरदाय, मेतार्पजीपाऊनितांगकार्यम् ॥१०॥ शिष्टोपदि- ना ०स्त. निराला, रिपडे पाय उलाम. 10 में प्रनु पेख्योरे पास सोदामणो, सेवकजनसाधार; दसण देखीरे यति यति वीन,धी प्रामणमन्दार. ॥ में०॥५॥जिण दिन वेसारे सफली ते पडी, वं श्री जिनराज परपर पोरे थे जिन देशना, सारे नवियण काज में० ॥ ६ ॥ परपद वारे रे कदिरों विगतगुरे, ते घी गुरुमु घारो; वैमानिकदेव श्रा उतरे, वेसे इशान मकार || में०॥ ॥ बीजी पर रापगला जके, धर्म मुणं मन नावित्रीजी परपद नारी मनुप्पनी, मुणे नन्नी तिहां प्रावि 1 में 10 दिसणारे प्रावी हुता, वेसे वहुला साध; जिनने प्रणमेरे दर्प हिये घणो, टाली मन भाराव ॥ में. 0 वोजो परपद माहुली गुणनरी, वैमानिकनी रंज; त्रीजी परपद सारे रारना, मनमाहे न पा दन ॥ में ॥१०॥ दक्षिण दिशियोरे यावी नेत, जगगुरु मजोर परिश्चनीरवी , पदिल परपद दो ॥ में ॥११॥जवनपतिनीरे देवी पर, पत्री बेमे मीत्री पारद मारे प्यंतरी, रघन गुणे मनरंगि, ॥ में ॥ १२.पश्रिम Frientiram वा पक्षियो पापा मग मित्र fraindina Rina tan rrrrrr RASRARSISTARSans ।। १३ ॥ वीजी परपव नवनपति सहु, अदानिश सारे सेव; जिनगुण गावे नखट प्रति घणे, श्रीजी व्यंतर देव. ॥ में ॥ १५ ॥ ( ढाल त्रीजी.) परपर प्रति जिनजी कहें, तुमे सुशंजोरे नविपण सोय; मम जन्म ठे दोदिलो, एतो लाघोरे हये पाले म खोय. ॥ १५ ॥ धनवाणी जि नवरतणी, जिणे सुणतां हुए परमाणंद; पाप टले पोतातणा, जय जो घामानोनंद. ॥धन०॥ ॥ १६ ॥ हिंसा मृपा निवारीए, नचिलीजे प्रवत्तादान; ब्रह्मवत रुपालिये,टालिये मंगथी प्रतिमान ।। धन० ॥ १७ ॥ केवल पामी सिह गया, तार्या तिदा सघला लोक; पद कायाना पीहरु, न उपाध्यो केदने मन शोक || धन० ॥ १७॥ (कलश.) जगि नीमनंजण - कर्म गंजण जिणं प्रेवीशम चंदिये, तसु नाम जपिये कर्म खपिये नेहवल्लि निकंदिये; नयणोर नयरे वनराज शाद घरि देहरातरि जिन संथव्यो, सूरौंद श्री पार्श्वयं शिष्य मुनि हापराजें वीनव्यो. ॥ १९ ॥ ॥इतिश्रीमन्नागपुरीपदत्तपागचाधिराजश्रीपार्धचंन्सूरीश्वरशिप्यमुनिराजदापराजेनरुतं स्तवनं. S आ०स० भाषा "तानी सरसाप २१२१ आत्मशीदानी सज्काय. श्री यत्ति मारग पादयों, परिदरि घर जंजाल प्राणीजी; राग ने वोपन नंडिया, किम वचीजे काल ॥ प्राणी ॥१॥ चतुरपणे चित्त चिंतजे, जवजलनिधि उचार प्राणीजी; पसयों पहट परा लगें, किम पामिश तस पार ॥ प्राणी० चतु॥शा पहिलो जाणीसोदेखडो,अब कांश वोहिलो माग; मा चपल तुरंगम ठे चमयो, घिर करि कर अदि वाग.॥ मा० च०॥३॥ नपणे निरखि श्रवण सुण्यां, खिण खिण प्राणिश रोप; प्रा० विरस कहीश रसनारसे, कर्मतयो ए दोप ॥माच० ॥४॥ शुरपणो तुज पां लगी, नहु देखे करवाल; मा० देखी देखि महारथी, नाजशि जिम शिशु. पाल प्रा० च ।। ५ ॥ नाव घणे थयो संयमी, कायरपणो करीश: प्रा० परिसद सदेवा अवसरे, वेनय का गमीश. ॥ मा० च०॥ ६॥ विण जोखम लखमी नदी, सुखे न उधमे बार; प्रा० स्वर्ग तशोम सकिहे, ए संसार अप्सारमा०॥॥नपण अंजा काने कुंमत नादशामुकताधार;प्राव कागर परगनो, गमगारेगी निगार mom.non प्रण गामामधी.गासगा गारm SABSPRSS प्राण तोही तुं या नहीं, चगति मादिनमत || मा0 | 0 || जब कोई तुज कपजे, खिरा मन अनुभवरीस, प्रा० अमरस वीसारी करी, समर समर जगदीश || मा च० ॥१०॥ वलि वलि नरनव वोहितो, साधो पालीम दार; मा. राग दोप वे परिदरि, पावागमण निवार ॥ प्रा०च० ।। ११ ।। गुरु मुखें प्रवचन तें सुपपा, लण्या गुण्या वहु वार; प्रा० तिहां कपाय सवि दासवाः पदे पदे एदिज सार । प्रा०च० ॥ १२ ॥ इम जाणी व्रत पनिवज्या, दशविध यतिनो धर्म; प्रा० प्रथम सिदा करवी क्षमा, एहिज मूल मरम्म ॥ प्रा० च ॥ १३ ॥ वोलि वचन पलटिये, एगिरि गुरुच दोप; मा० इम गिनि दोष निवारिपे, पाणी मन संतोप!! प्रा०च० ॥१४॥ अनि पवन जिम सानिपा, क्रोध मान तिम होय; मा० दहतां नगरझे किशुं? शो विमाप्ति जोय ॥प्रा०प० ॥ १५ ॥ क्रोयें परदुख काजे, कोघे मृषा चोलाय; मा० अदन असाप संनापणे, सहुए व्रत उखाय ॥ प्रा० १० ॥ १६ ॥ पञ्चख्खाण करी परिदर्या, परिग्रह ने पारंज; मा० हुँ जाणुं ते मिया, माया सोत नन. ॥ प्रा, च० ॥ १७ ॥ वकुश कुशीत जे जिए कहा, सकशाई श्रुत रिकम माने उपमस्थ न जातीर, जादपा श्री जगनाद॥ प्रा० च० ॥ १७ ॥ नमनां निनुवन शोधतो, पानक विहां न राध: मातीमा रमलिवरपामिया, शरपा श्री साप ।।प्राण्य० ॥१ मकिरमाल एएनी मायो, पिर घरवास; मा करतां तेहने मेसिहो, थाझे मन उखास मा ॥ १७ ॥ २०॥ श्रीपार्धचंई मुरी झोपत्रे, प्रारे आप संन्नाल; मा० सुगुरु सावं जे नापियो, तेह पघन मति पार ॥ मा० च० ॥ २१ ॥ इतिश्रीयुगप्रधानाचार्यश्रीपाचचरीपारुतः स्वाध्यायः श्रीरिपजदत्त ने देवानंदाजीनी सन्झाय. (देसी हिरिया मुनीनी.) पजिलेसर मारिपाजी, मादपक निवेदा; पेई वटुसाले रधाजी, देता धर्म उपवेदा. सारन रिजो तुम मम प्रार न कोष, मातरिता जिणे पातयात्री, मार रहेको परखोप. जगजीवन ॥१॥रिपनदम मुलाए यात्री, उबर भंग म माप, वार्मnanात्री वंदन पातिक जाप. ॥ ज०॥२॥ नाणे माणसम दीपताजी, हरे भनाण अंधार; सो जिंन वीर पधारियाजी, साये श्रमण परिवार ॥ ज०॥३॥ महालाल नामें सुष्याजी, मनिगम अधिक विशेष; किंबहु बंदण पूजपेजी, सजिलयो उपदेश. ॥ ज०॥ ४॥ चालि प्रिय तनु चंदवाजी, परनय सुखकार; तहत करी दरखे कदेजी, वेकर जोडी नार ॥ ज० ॥ ५॥ कौटुंबिक नर तेहि याजी, देतेदने थादेश; धर्म यांन तुम सज करोजी, चाले ते सविशेष ॥ ज० ॥६॥ शमखुर सोवन मेखसाजी, प्यासिंग सुचंग; नाथ राशि सविरुपमैजी, नीलकमल करिरंग॥ ज०॥ स्या कृपन्न जोत्री करीजी,घंटारव मनिराम;तहन करी ते तिम कयुजी,सेवक सार्यों काम जि. 110न्दाप विसेवा तय करेजी, पहिरे वहु शिणगार; धर्म यांन आवी चडेजी, नारी ने जरतार' जणा निज परियाररे परिवयीजी,पाये जिनवर पास;पंच अनिगम साचवेनी, वंदेमन उल्लास rianपंच अंगें नमि वीरनेजी, उन्नी देवाणंब; वदन कमल जिनवीरनोजी, निरखे.मन आशंद ॥ ज०॥१॥ खीर अमीसम धन मरेजी, विकसे नयन विशेष; रोमराय सविं नक्षतेजी, कंचुक Susman मेरा ल विशेष ॥ ज० ॥१२॥ निमिप दृष्टिये जोवतांजी, दीनी गौतमस्वामि; बंदी पूरे वीरनेजी, ए नारी फुल नामि ॥ २० ॥१३n मुए मोयम जिनवर कहेजी, ए मुज पूरव मात; रिपत्नवन निरे पिताजी, ए मुल निरती वान ॥ ज० ॥१४॥ पुरवपुत्र ने फरीजी, आणे प्रति अनुराग; अनिमिर पे जोरनांजी, मुलि धर्म घरे वैराग ज० ॥ १५॥ समतारस चिनपूरिजी, कोषो मस्त में सोच; पधानिधि चारित्र जियोजी, करे काय संकोच ।। जय ॥ १६ ॥ यंग पार भले गुणजी, चारित्र पा मोय नवम रिपनदान करेजी, करम खपान्यां दोय ॥ज०॥ १७॥ वि परे पारिव पारिपोजी, देवागंदा माय; नंदनवाला गुणी फनेजी, पाले निरतिचार ॥ज. सागरी मं करत उदीजी, पाम्यां अविचल गण; तेदना गुण दिये घरेजी, ब्रह्म माम.....॥ति ॥ श्री मयकुमारमुनिनी गन्नाय. सदिन गिनेर हा, मन मेशकुमार का दिख), शिरारी पनीर फदि पाये करतार, दीक्षा दोदिली. पाली जावे केम, साधु संतापे एम, नदी मुज उपर मेम, कूम कहु तो नेम. ॥ दो० ॥१॥ रात हुइ खटमासनोरेदां, चेदन वधती पाय; ॥ दी० ॥ पुखरां वाघां माणसांरेदां, जनमारो किम जाय ॥ वी० ॥ २ ॥ आवे जावे उपरेरेदां, जर पत्तियारी नीम ॥ दी. ए सहु धाप सवारथी रेहां, कुण जाणे परपीक ॥ दी०॥३॥यागें देखी पावतां रेहां. इस मिलता सहकोय; दीा दिय साथी हुना पठी रेहां, सार न पूठे कोय ॥ दी० ॥ ४ ॥ दीकालघु नीचे सुवेरेदां, काढण लागा केद;॥दीणासाचो काम सयाँ पठे रेहां, वैरी हुवा चैव दी०॥ ॥५॥ जो हुं पहिली जाणतो रेहां, तो न करतो ए काज; दी हिव हुँ पिण परवश पायोरे हां मुटिनली वराज. ॥ दी० ॥ ६ ॥ अथवा कयुं न गपो अजेरे हां, शरम न कीधी जाय; ॥दी॥ आपण हाये आपणारे हां, पग कहो केम कपाय ॥दी०॥७॥ एनघो ए मुदपति रेहां, वीनवद्यु महावीर, वीणा मे म्हारे | पहिरे रेहां, सस्पो यस्पो (साँवों) इसीर.दीगाना इम चितवीने प्रावियारे दां, प्रहसमें जिपवर पास;॥ वी॥ वीर कहे किम साधुजीरे हां, दीसो भाज उवास AR --- रा०स० ॥ दो० ॥ ए॥ दापीरे जव तुं हुवोरे दा; पर उपकार प्रधान दीका सार करी शशलातणीरे.हां, दीयो अन्नयादान ॥ दी०॥ १०॥ सात दिवस वेदन सहीरे दां, वीजें नव बहु, नांत;॥ दी। तिण उख घागे ए किशुं रेहां, न करे केम निरांत ॥ दी॥ ११॥ वचन सुपया महावीरना. रेहां, श्रवण अमृत समान; दी॥ इदापोहे उपनो रेदां, जातीसमरण ज्ञान ॥ वी० ॥१३॥ दीपो मिछा उफर्म रेदां, अन्तिमद सीधो एह; वीणा नयणपपे न करूं कदे रेहां, उपध, हुँ, इण देदे. ॥ दो० ॥ १३ ॥ चतुरपणे चारित्र लियो रेहां, सूघे मन परिणाम; दी। मुनि श्रीसार नमें सवारे दां; त्रिविध त्रिविध शिर नाम. ॥ दी० ॥ १४ ॥ इतिश्रीवादी-श्रीपार्श्वचंसूरीन्छ विनयश्री सारमुनिराजेनतः स्वाध्यायः ।। रामिनोजन निवारक सज्झाय. मारी, पण लागणारे माप. ( एदेशी) प्राती तप गाम यमेजी, फंकक पुर पतार, दोठ यशोधर जापीएजी, तेहना प कुमार मानव, रात्री नोजन वार. दोष अनंता नसरूपोजी, ज्युं न पमो संसार रे ॥ मान ॥१ रंजाजननी रूपमीजी, पुत्र सलूणारे वोप; हंसकुमर नार बमोजी, केशव सहुडो दोयरे.॥ मा। ॥रा० ॥ ३ ॥ एकदिन रमतां नेटियोजी, साधु शिरोमणि शू; धर्मपोष नामे मुनिजी, आया पाणंद पूररे. ॥मा०॥राणा साधु नणे रयणी तणाजी, जोजन गमे जेह, तेदनी सुर सेवा करे जी, मुक्ति नही संदेहरे ॥मा०रा॥ ५॥ राते रांध्यो रात (जमेजी, ए नतकृष्टो दोष दीहां राज्यों रात जिमेजी, पापतको बहु पोपरे ॥ मारा ॥ ६ ॥ रात्रं रांची म्देलियोजी, दिवस करें महार; ते नर पापं वांघियाजी, अति बहु जीवसंहार रे ॥ मा० रा०॥ ७॥ दिवसे रांध्यो दिने जमेजी पक्षी तजे दोय दोप; पुन्यवंत ते नर पूजियेजी, जेनर एदवा दोयरे ॥ मा०रा०॥७॥ साधु समी पं.सांजलीजी, रात्री नोजन दोप; वे बांधव व्रत आदरेजी, माणी मन संतोपरे । मा०रा०ा. घरावी माता कनेजी, वालु मागे वीस;ध्यार घडी दिन पारलेजी, पिता करें वतु रीसरे मारा ॥ १०॥ विहतो मांता नवि दियेजी, मौन्य करीने जाय; संघण करतां दीददाजी, पांच,पीपरें 150905 रा०स० जगनि ॥ दी॥॥ दापीरे जव तुं हुवोरे दां; पर उपकार प्रधान दीगोसार करी शशलातणीरेंदा, दीयो अन्नपादान ॥ दी.॥ १०॥ सात दिवस वेदन सदीरे दां, वीजें लव बहु नांत;॥ दी तिण उख यागे ए किशुं रेदां, न करे केम निरांत ॥ दी० ॥ ११ ॥ वचन सुएया महावीरना. रेहां, श्रवण थमृत समान; दी। इंदापोहे उपनो रेहां, जातीसमरण ज्ञान || वी० ॥१२॥ दीपो मिचा उफर्म रेदां, अतिप्रद लीधो एह; ॥दीणा नयणपपे न करूं कदे रेहां, उपध.हुँ, इण देदे. ॥ दी० ॥ १३ ॥ चतुरपणे चारित्र लियो रेदां, सूघे मन परिणाम; दी मुनि श्रीसार नमें, सदारे दा; त्रिविध त्रिविध शिर नाम. ॥ दो ॥ १४ ॥ इतिश्रीवादीन्श्रीपार्श्वचंसूरीन्छ विनयश्री सारमुनिराजेनकृतः स्वाध्यायः ।। रामिजोजन निवारक सज्झाय. मारी, मिण लागणारे नाय.( पदेशी ) मानी सप गाम यमेजी. फळ पुर घपतार, दोठ यशोधर जाणीजी, तेहना या फुमार रे मानव, रात्री लोजन वार. दोप अनंता नसख्योजी, ज्युं न पमो संसार रे ॥ मान रंजाजननी रुपमीजी, पुत्र सलूणारे दोय; हंसकुमर ना वमोजी, केशव लहुडो होयरे.॥ मा। ॥ रा० ॥ ३॥ एकदिन रमतां नेटियोजी, साधु शिरोमणि शूर; धर्मघोष नामे मुनिजी, आया पाणंद पूररे. मा०राणा साधु नणे रयशी तणाजी, नोजन गंमे जेह; तेदनी सुर सेवा करे जी, मुक्ति नदी संदेहरे ॥मा०राणा ५॥ राते रांध्यो रात जिमेजी, ए नतरुष्टो दोप; दीदां रांध्यों रात निभेजी, पापतणो बहु पोपरे ॥ मारा ॥ ६ ॥ रा रांघी म्हेलियोजी, दिवस करे माहार; ते नर पाप बांधिपाजी, प्रति बहु जीवसंहार रे ॥ मा० रा॥3॥ विवीं रांध्यो दिने जमेजी घमी तजे दोय दोय; पुन्पवंत ते नर पूजियजी, जेनर एदया दोयरे ॥ मा०noi - ॥ साधु समी 4 सानतीजी, रात्री भोजन दोप; वे बांधव व्रत प्रादरेजी, पापी मन संतोपरे । मा०रा. परभावी माता कनेजी, वालु मागे वीस यार घडी दिन पारलेजी, पिता करे वतुं रीसरे माot] ॥१०॥ विहती माता नशि दियेजी, मौन्य करीने जाय; संघरा करतां दीददाजी, पांच.शीपरे 1602 T०० मनोजेन मानव मातमा तुम्हारी, निले होति अरिहंत जिन घाण हारी; वसी जे जगे साधुनी नास्ती बोरे, तिके विल कदी पारकी गांउ खोले. ॥ ए ॥ करे व्याप व्यापारनो मूल पारखे, प्रलो ते कि.मे लादरी माण गये ! जिके धर्म प्रारंन पारंन जाणे, नही परवदे तिहज संवर वखाणे. १०॥ मही साप रे तेदने ममिनि नंग, तुम्ह साग्वि नापा तणो मूल अंग; दिवं पनगो जे तुदद मा, मन वचन तन स्वामि तुम्द वनन रा. ॥ ११ ॥ मनु मूरतें नावि तुम्दने पुर, पवमामीम मन मुगुरु घासै; दया प्राणशुं धर्म करिशुं प्रमाणं, महावीरजी दीन नमोजिम ॥१२॥ (कश.) इम नपरी गमी, जगेडे पगमी, तिणि गमें श्रीवीर जिण; मटी 45 मन मा. नवनव मांगुं तुम्ह दारण. ॥ १३ ॥ धीपाश्चनायजिन स्नवन. (जार) र अनुमानायः मुगः मविपाप कियाmarke REETरायो, में मम्मीनान. ॥१॥ (प्रजातीमारी) गाम गुण गार भी पासकंटालिये, नमिये सवि संकट कंटकं टालिये, दिपाले प्राण जिन प्राण तसु पालिये, नावज. ल पापमलपंक पखालिये. ॥२॥प्रहसमे स्वामि तुम्ह नाम समरे सदा, जेह नर नारि तेलहे सुख संपदा; एक चित्त प्रशमशे मूरति तादरी, बासीले तेहने आपदा परिदरी ॥ ३ ॥ जेहना माहि. सा नयन ठे श्रावी, सुदृढ नर दसणावरण गुण अणुसर्या; तेह तुम्द नामने पापना किम सहे, सूत्रि प्रकटी जणी तदत्ति नहु सहदे ॥५॥ पेखता रूप सरूप प्रनु तुम्हतो, ऊपजे दियमले दरख मुज प्रतिषण; चकोर रवि चक्रपंखी अली, कमल पेखेधि जिम तेहने मन रखी. ॥ ५ ॥ एम मनु पायनी सेव नितु ठिये, नवतणा पापसंताप सवि वंचीये; एदवी प्राश प्रम पासजी पूरजो, सेवक चित्त चिंता सवि चूरजो. ॥ ३॥ (चजा द.) कंटासिकस्थान विनूषणाय, विश्वेश्वराप च्युतदूपणाप; कल्याणवजीवनवारिदाय, श्रीपार्श्वनाथाय नमोस्तु नित्य म् ॥ 3 ॥ इति सूरीश्वर कृतम् ॥

०स्तक शुभ थाणे पुर। सिक्षिामी शणि गिरें, बिहु मान केरी करी संदण केवल पाम्यो सेहरे; केवल दसण नाण स- पा हिपा सौख्य विलसे जे सदा, तसु पद नमीजे पाप खपोजे मुरति निरखीजे मुदा. ॥ ३ ॥ ( दाल ) गिरि दीठे मन नल्लास ए, दोये निरमल बुद्धि प्रकाश ए; पूजे तत. खिण वंग्ति पाश ए, देखें धूटे लव सुख पास ए. (0) नव दु:ख जावे सुख पावे नाप ए, चनुकुगति केरा न हुए फेरा टले सवि संताप ए; इण गणि आगे जेद पाव्या तासु मनवांछित फल्पा, सिहांत साखें सुगुरु नाखे घणा नर ते सांजल्या ॥ ४ ॥ (चा.) श्रीधावचासुत मुक्खाणीए, ज्ञाता धम्मि अंगे जाणीए; सहस पुरुपशुं हां समोसर्या, काज विशेष सही तेदना सर्या. (पू.) सर्या काज तमुनि रिविश्वर सदस साधे सीपला, पंचसयशुं सेलग पारिय मुगति पहुता ते जसा; जालिमयाली प्रमुख इणि गिरि अनंता मुगतें गया, एकेक कहेता विस्तर दोष निशि संखेपे संयुमा ॥ ५॥ ( दास २ जी) सहज पाले निरुपम जिणवर पय बंदे, मात कहने कनर हामा कदै ते नी दो वो धर्म नारया शुन चारित्र प्रकारे, कृष्णारिक वासुदेव मस्तक ११२॥

प्राणाधारे ॥६॥ ते वीर कही जे तप वलि कर्म खपान्यो, जिनधर्म प्रकाश्या धर्मसिंह सिणि जान्यो; अरजुन प्रादें पंच पांव कीपी सेक, हरपासे लीधी रूमी जिवरदेव ॥ 3 ॥ वलि रतन चारित ते पाळयो प्रनु धन धन, जयराज लिपो शिवनगरीनो अनुदिन; माधवनी पदवी पामे जे तुम्ह दास, देसराज तणी परि गमन कयु सुप्रकाश ॥ ॥ पुष्पवती मनु वाणी सहु नवियत पाराधे, ते लीला करतां देलां शिवसुख सापे; संपूरे मनद मनोरथ सघलां स्वामी, जीवी जे चिरमिह सीधे प्रजुने नामि ॥ ॥ रुजादि जवनी नासे जे ध्यान कोजे, नवकार गुपंता नव पद मादि पवीजे; राखी मति रूमी कूमी बुद्धि सवि टाली, चंड जिम शीतल जीवदया व्रत पाली ॥१०॥ गुण पूरा जिनवर शूरा विविध प्रकार, अग्जाए वोघो रुपन नाम सुविचार; में गाइ ए स्तुति निज मतिने अनुसारि. वनराजी सेवे उमी शहि विस्तारि ॥११॥ इणि गुणि प्रनु राजे घनत्रिका प्रतिशप गजे, जिनवंतण वोठे जवसंकट सविनाजे; एवं परिवारे परिव. रिपा परिव, अनुपात्रा कारण माव्या श्रीपासचंद ॥ १२॥ (कलश) शेर्बुजगिरि श्री ऋत.

पारी मस्तक ॥वि०॥ १४ ॥ विहु नयमांहि सवि अवतरिया, निश्चयनय व्यवहारि किरिया ।। वि०॥ १५ ॥ (उपदेशाधिकार-मास चोधी-फागनी देशी.) नापा च्यार जिनागमें नाखी जिवर देव, इक सत्य वीजी असत्य बली पीजी मिश्र नेव, चनथी दिव व्यवदार जे सत्य असत्य न होइ, ए पारे नापातणा जेद वेतालिश जो ॥१६॥ च्यार नापा ए जाणिये बिहुनो करे विवेक, सत्य अने व्यवदार जे अवसरि लाखे छेक; असत्य अने मिश्र नापा एदतणो परिदार, करो एम जिण. वर कहें जाणपणानो सार ॥ १७ ॥ पर पीमा जिहां नपजे सावधनो लवलेश, ते नापा नवि नाखे कर्म खपे अशेष; केवली इम उपदेशे सत्य अने विवहार, एद मर्म उपदेशनो जाणे ते सुविचार ॥ १७ ॥ (नापाधिकार )(ढाल पांचमी-वेशी मेघकुमारना गीतनी) नगत नाखी जे दयाजी, ते शुद्धि संसार; सर्व जीव दित्तकारणोजी, पालक लहे नवपाररे जीवमा नलखे साचि तेद: बारह परपदमादि कहीजी, पढम अंगे तसुनेपरे ॥जी॥१५॥ सर्व जीव दणीए नहीजी, प्रस पायर जग जेद; एबम धर्म ने दायतोजी, साधु श्रायफने मागो॥ asdaregarls Annasarosshire के सातमेजी, गुण ठाणे पालत; निश्चय ठाणे चौदमेजी, पाली कर्म टालंतरे ॥जी॥२१॥ जिनशासनमाहि वागरेजी, मुखे दया धर्म एक; पण सूधु ते नवि लदेजी, तेदनो एद विवेकरे. । जी० ॥ २२॥ अष्पवृष्टि पति गोचरीजी,नदी उतरणो गम; मृपा वचन धर्म कारणेजी, निश पीजे जामरे ।। जी० ॥२१॥ किंबहुना केई पनवेजी, पाप प्रदारद ठाण; आचिरवा ने वांझवाजी, कदावे अम्दे सुजागरे । जी० ॥ २५ जिन विधिवादे जे कहेजी, न सदे ते जिन धर्म; हिंसा धमीति जागीएजी, नहु पामे शिवशर्मरे ॥ जी० ॥ २५ ॥ (दयाधिकार) (ढाल ठो-मुनिवर गोचरी करी बल्या ए वेशी) काले अनंते दोहिलां, लदतां एपअंगगजी; पारे ए जिणवरे नाखि- पा, चनरायणि चतरंगिजी ॥ चेतन० ॥ २६ ॥ चेतन करि सदी पातमा, घरि वैराग मनमांदिजी; विषय कपाप सवि परिदरी, फरिवो धर्म जगदिजी ।। चेतन० ॥ २७ ॥ लाख चोराशी जीव पोनि नमी, प्रिन्नुवन नव नव वेपजी; पुण्य संपोगें पामियो, जनम ते आरिज देशजी ॥०॥ ॥ २५ ॥ जार कुल वस रूलपा, पाक्षिक गुण जुनजी; मालसनो जय दोदिलो, साबय कुल SEP+11 मावीर 전준 संजुनजी ॥०॥ श्ए ॥ सांजलवा श्री जिनतणां, वचन उल्लहां जाणिजी; सुगुरु मुखें साची मस्त सही, विधिपूर्वक मति आणिजी ॥०॥३०॥ सददणा साची सही, तत्त्वातत्त्व विचारजी; जेदवा जिरावर वागर्या, एदिज समकित सारजी ॥ चे ॥ ३१॥ वीरिय तप संयम वि, मन तनु वचने शुइजी; नरवर नारी पाली थया, शिवनगरी मांहि सिजी ॥चे॥ ३२ ॥ (परमात्मा. धिकार ) ( ढाल 3 मी-विपये न गंजिए ए देशी ) श्रावक धर्मने योगिजे, तेहना गुण कवीश; स्वान्नाविक अंगे वसेजी, जाणीजे निशिदीसोरे ॥ ३३ ॥ गुणनिधि संतीये, ते श्रावक सुविचारोरे; समकित शुः घरे, पाले ते व्रत वारोरे ॥ गुण ॥ ३५ ॥ अनुर इंश्य पंच पनवमां, प्रतिये शशि सम सोम; सर्व लोकने प्रिय करे, अक्रूरपणो मनि प्रेमोरे ॥ गुण ॥ ३५ ॥ पापकी वीहे । सदा, अशठ सदाऽखिण होय; सझा दया गुण मनि वसे, अवगुणि मठ सोयरे ॥ गुण ॥ ३६ ॥ सोमष्टि सहिजे सदा, गुणना रागी जाणि, धर्मकथा अदनिशि फरे, सुपरमादक मनि मानिरे ॥ गुण ॥ ३० ॥ दीरपारशी प्रदनिदों, विदोपता यजि नाण; ग्रियर के चा सवा, .

H+14.1108 Aastet-Harire विनीत नाव सुवखारे ॥ गु० ॥ ३०॥ पगार किपो नहु उसने, पर हित निते जेह परमार गुरा सहित, विचरे श्रावक तेहोरे । गु० ॥ ३५॥ (श्रावक गुणाधिकार) (हाल: मी. देशी वसालानी ) पंच मदायत पाले, विषय काय जे टाले; पंचाचार न लोपे, समकित तरु हुन रोपे ॥४०॥ पंच सुमतिशुं विचरे, त्रिण गुपतिनी खप को एक विय असंगम परजे, राग दोष दोय तरजे ॥ १ ॥ त्रिविध त्रिविध पटकाय, राखे रखायण नाय; राखतां अनुमोदे, यापागपे परनोवे. ॥ ४२ ॥ प्रारंज परिग्रह मी, ब्रह्मचर्य प्रीति ममी; सदी परिसह वारीश, नव कल्पे सुजगीश. ॥ ५३॥ वश विध यति धर्म सूघो, पाले न करे ए गूगो; पारह नावण नावे, तप बलें कर्म खपाये ॥ ॥ चारित दसरा नाण, प्रियि रयण गुण खाण; सूबो जेद बारा, तमु समाति वाघे ॥ ४५ ॥ चीरजिन तीर वरते, वरस एकवीश सदस निरते; एदवा साधु पाराधु, पदनिशि शिवसुख साधु ।। ४६ ॥ (साधु गुणाधिकार ) (नाल ए मी. राग धनाश्री) दवे सदहणा सूची करुरे, श्रीश्रुतने अनुसार; दृष्टिराग सपि दूरे परिदरीरे, फरी परीक्षा सार ॥ 3 ॥ जिनवरे 41.....1.46.REH xnnr AA मस्त पद्योरे, किरिया मांदे मिथ्यात सहहणा मादि सावध जिहां दुवेरे, न हुवे जिन मत वात. जि०॥ ॥ ४० ॥ विणे पक्ष विस्तारे कद्याजी, सूयमंग वीप खंघ; धर्म अधर्म ने मिश्र विच रियेजी, कि- रिपा द्वाण संबंधि ।। जि० ॥धए ॥ धर्म पक्षमादि मुनिवर कदाजी, अरधमि मिथ्यादृष्टि मिश्र पहामकि भापक सघि अद्याजी, जेदनी सूची दृष्टि ॥ जि.॥५०॥ अधर्म नपापे धर्म थापे पतीजी, मिश्रे मिश्र रदंति; यापन यापन तेदनी नवि करेजी, पुण्य पाप न कदंति ॥ जि० ॥ ॥ ५५ ॥ पर्म मिश्र प्रारंन देखे जिहारे, मुनिवर रहे नदास;वीप अंगे अध्ययन ग्यारमेंजी, एद नार मुप्रकार ॥ जि० ॥ ५२ ॥ मिश्र गमि जे पुरा कहे पतीजी, खटकाय पातिक सोय; ए हवे पाना पाप जिको कहेजी, आजीविका वेदक दोय ॥जि०॥ ५३॥ एहयो सहता सूची जेदनीजी ताज मुगुरु सुमाथ; एहवा गुरुने श्रावक जे नजेजी, पामे मुख निरवाघ ॥ जि० ॥ ५४॥ (मायाधिशर. टाल १० मी देशी विवादलानी. इंग) राग प तुम्हे टालो, जिनवर घे उदा; गमादिर यहा जे पया, पाम्पा निणे लेश. रमणी गगे नर गगो, माग पटक ...

FFesse स्वामी; राजतपो सोनी अयो, कोशिके वही पामी ॥ ५५ ॥ घेवर झिएक ऊपीभर, नरके पहुतो; म जाणी देष परिदरो, मुनियर मादि महतो; राग क्षेत्र दोय पामुगा, पाप करम आणी टासे; ते सवि कर्म खपाविय, ज्ञानकला यजुपाले ॥ ५५ ॥ (राग देवाधिकार. ढाल ११ मी देशी विवादलानी. तुं तिहां पं.) संयम तप शुध पारो ए, जिम तुम्हे सदा नापार तो; जिणवर इम कदे ए, संपमि तपि सुख दोय तो, मुक्तिपत जीव लदे ए ॥ ५८ ॥ वारद ने तप तरोए, संयम सतर प्रकार तो ॥ नि०॥ ५९॥ संजमे फरम आश्रय टले ए, तप कर्य निर्जरा होय तो. । जिण ॥ ५॥ सराग संयम जे करे ए, ते लदे शिवसुख चासतो | जि० ॥ ३१॥ वीतराग नाव जे निरवदे ए, माणे शिवपुरि यात तो ॥ ज० ॥ ३२॥ (तप संयमाधिकार, ढाल १२ मी, माइ धन सु.) जिनप्रतिमा दिये, जिन वंदन फल दोय; शाश्वती अशाश्वती बिहु प्रकारे जोय; शासय चिहुं नाम, असद चंदाणण नाम, वर्षमान पारिपेण ति वंदो मन अलिराम ॥ ३ ॥ धन धन जिनशासन गीतराग जिदा देव; मुर असुर विद्याधर जेदनी सारे सेव. राग दोष रूप साना पाच- प्रतिषीपन जिनस्तुतिः समाप्ता ।। ॥श्री पार्श्वनाथचैत्पवन्दनम् ॥ पार्षनापनमस्तुभ्यं विनविध्वंसकारिणे ॥ निर्मससत्मत्तानन्द ॥ परमानन्ददापिने ॥१॥ अश्वसे- नारनोपाज ।। कूचनुमामले मनो। वामानो नमस्तुभ्यं ॥श्रीमत्पाजिनेश्वर ॥२॥ क्षितिमपल- मुरुटं पार्मिकनिकटं विश्वप्रकटं चाप्रनटं नवरेणुसमीरं जलनिधितीरं सुरगिरिधीरं गम्नीरम् । अगषपदारणं धर्मतिदरणं रचरणं सुखकरणं श्रीपार्वजिनेन् नमत सुरेन्दं कृतनम् ॥५॥ एमडे परणेच स्वोचितं कर्मकनु पः मनुस्तुल्पमनोवृनिः पार्श्वनाथः श्रियेस्तुवः ॥ ॥ इति ॥ ॥अथ श्री जिनेश स्तुतिः ॥ मापीमेश पुनाना मिद मुरमरितं वीक्ष्य कारएप घाना ॥ पृल्या मूश्चिततः परम दिमवता पेन गडापनुभम् । पारिभो पनुदिर समुदितजनता शुरूपे शुक्षी | पाण्या गाणीविलासः मरिनु रा धोरणारी पासपका पन्त भग्नापति गण mmt.

शकं लेखा अशेषा वाशतनयनं नान्वमन्यन्त घन्पम् । इष्टुं दृष्टिपेनालिलमपि युगपनेन तत्या- रमन्तः । स श्रीमान शान्तिनायः प्रयपतु मम तां नूयसी सौख्यलक्ष्मीम् ॥ २॥स पानगलने | ज्वलात्यधिकले पस्पेन्नीलवे ॥ देहस्प द्युत एवं केवलवधूपाणिप्रई कुर्वतः 1 तन्वन्तिस्म समंततः प्रसृमरा माइख्य उर्चादुर श्रेणीकार्पमसो मुदं पितनुतां श्रीपार्धनाथः मनुः ॥ ३॥ सिध्यनोक्षाद विघौ सतृप्णो निष्णातचेतास्तुरगाधिरुनः । प्रौढाप्सरःसंदतिगीयमानगुरा:श्रिपे वीरवरो जिनोऽस्तु ॥ ५॥ लवाधिजाताः सुगुणावदातवृत्तस्यनावा हदि पुरयत्नानाम् । येदारमुक्ताश्च संवसन्ति दिशन्तु तेऽन्पेपि जिनाः सुखानि ॥५॥ ये वीजमा विपी निघाय मनोवनी युझिजलेन सिताम् ।। चित्रं कणाकोटिगुणामकापुस्तन्वन्तुतोपं गणघारिणस्ते ॥ ६ ॥ ॥श्री वासुधज्य स्तुतिः ।। श्रीमन्तं वासुपूज्यं प्रवलवसजरालीरुकुम्लीन प्तिदं । शवलीलाविलासं विन्नुवनपतित्नि वन्य- पादारविन्दम् । विनन्तं विश्वलोकं तदनु-विगणनातीत मेवाप्पलोक शुक्षत्मानं निरेनोमलममलम- SHRS.

प०तो. tam पोलारक्षमता वरिवस्यमानः धौरा एप जपति प्रनुतामपानः ॥२॥ सत्यप मासरर सिनो हाम्म माम्न वामेरामुतं जगन्नन् निशातमोवनमीश्पनेशु स्तमांसि सर्वाणि तदन्तराणि ॥३॥ प्राप्ततीविषजन्मग्ला दोनानि तेनामुमतां दितेन संजातदपा इति पनि इहिं निशा दानि महानि वायुः ॥४॥ ॥ श्री धरणोरगेन्श्स्तोत्रम् ॥ परतोरगेममुरपनिविसावरपूजिनं जिनं नया दुशेप दामनं तस्यै व मदास्तवं पदये ॥१॥ मुरबोरनापजिन हर हर दरदाररोजुष्ट मरि पनग निर्ष मदावललयानान जापान ॥२॥ विदा मदममता गलनायक बोर वर्धितानन पागल कुसोनम निर्विषतां मर नरिमनार || मरि महानामा नागाविषरनकणातागपाः कनिका दाम नि. सा मारनि दिए । कार मंटम बार दानम् यापानि: १.

स्कोटान् श्वालागर्दनि शाकिनि विपवेगश्चिापिरोगश्चि ॥३॥ मारणं स्तम्जनं चैव शत्रोरुचाट- नं तया । मोदनं देषितं चापि क्रियानेदात् करोति तत् ॥७॥ दैत्यामरेन्यूजित नि शित. एकममलपटल पपति जिन हुं फुटत्वं पन्नगकुल विरमविपदर्पन ॥ ॥ निर्मपितनव जयोद्धा पोका विद्याधिपत्यमुपपन्नः श्रीपार्श्वनायविपदर दसि २ मातडिनो स्वादा ॥५॥ श्रीपार्श्वनाथ मुरपतिमुकुटतटोघृष्ट पादनलिनयुगम् नागाष्टककुल विपापद दादी हे है हो हो हं हः ॥ १० ॥ सकसजुवनानिनन्दित गुरुस्त्वं पन्नगेन्द्ररुतपूजः विषमविपानलश- मनो जलद व जलप्लुता लोकाः ॥ १९ ॥ दैत्योपसर्गनुप जलघरपारानिपातधोतमल स. वज्ञ नागवन्दित सीवपाक्षेपणेनमस्ते ॥ १२ ॥ हन २ दह २ पच २ मध २ संदर २ कप हुँ चचालि कुएफ घम २ पूरय र विपोडवणं हुं फुट स्वाहा ॥ १३ ॥ नॅचुरु २ मुरु २ फुरु २ फर फार २ पलदः त्वं किलि २ किलि २ कलितेः कलिकुएफकलाकलापजः ॥ १४ ॥ यः यः सः सः हः ६. ३ : उर रिखिरु दरुहन्त शान्तस्त्वम् विपवन्दे विध्ययनं कुरु शीघ्रमुरु प्लवाख्या- . गा11१५ टकरानीरण कुपिता सरजसाजसघरापोतः मन्पस्तानसग्वालं तदह उट नाग विषम् ॥ १॥पमान स्थित निवसति मप्ये नुजगावृतं जिनं नत्या पोमशदेव्योपगंत' कोजातपुतं तहि ॥ १३ ॥ बन्ध्यानां मुनजननं निपमाणापत्यरक्षणं परमम् पमिदं रोगदरं महानि नत निशम ॥ १७॥ दटक सर्वागतं पद्ममिदं ध्यातामृत प्रवदम् ।। कुर्याहिपाप- हारे प्रताः पतिः ॥ १५ ॥ पस्तसमलविपनि बहुचा परिकठप्प पञ्चपञ्चलिर्वणः॥ जिननामाक्षरसहितैः पदं सर्वविरमयनम् ॥ २० ॥ पिन स्वादापञ्चक मानन्दितं पश्चनूत कलम नागार कुमार मगरज स्लम सानु गतम् ॥ २१ ॥ रेफ संपुट मध्पस्नं ककारं दिमागल दोरानं स्तम्नये प्रिशानपि ॥ २२॥ नीलोत्पल दलश्यामं ककार संपु निन् । सारनं कानार शाखपेन् ॥ २॥ पमपाकान्त मिन्द्रगोपरम. पर सातशिलरम् ॥ २४ ॥ फीन्द्रावणात निर्याद मा AR AAPARStaSt16 वकारावेष्टितंशु सन्तविपनाशनम् ॥ २६॥ दस्तादुलीपुचिन्पस्तं वामकरेनूतपश्चर्कसकलम् । अ. पदरत समस्तविपं साधकमुष्टिकमावन्धात् ॥ २॥ घरगोरगेन्सुरपतिविद्याधरपूजितंदैत्यदेवता निनुतम् । जिनगुरुमममेपं चतुर्वर्णविनू पितं स्मरयेत् ॥ २७ ॥ प्राजानुकनकगोरं मानाने शंखकु- न्ददरधयसम् । आकएठतोनववियाकरकान्तितुल्य मामूर्घतोजननिन्नंगुरुमस्यरूपम् ॥ २ ॥ स्व- पदंपकराज चैनतेयं महाबलम् | नागान्तकं जितारिंच अजितविश्वरूपिणम् ॥ ३० ॥ विनतायाः सुतंदैत्यं विदगंपन्नगोनमम् । गुरुन्मन्तखगेझंच काश्यंकाश्यपनन्दनम्॥ ३१ ।। हादशैतानिनामानि गुरुरुस्य महात्मनः। यःस्मरेत्मातरुचाप स्नातोवायविवाशुचिः ॥ ३२ ॥ विपनक्रमतेतस्य नचर्दि- सन्तिपनगाः । नापयन्त्येव सर्वकार्याणिसाधयेत् ॥ ३३ ॥ एवंजूतेस्मरेवस्तु श्रीपाश्वनाम- निर्जिनम् । तस्यदोपाःप्रणश्यन्ति विपंचप्रलयंब्रजेत् ॥ ३५ ।। प्रदउस्यसम्यजननं सर्वव्दनप्रशा- तिकरम् । प्रध्वस्तरितनिचयं पाश्वयोगीश्वरंवन्दे ॥ ३५ ॥ इतिमालामंत्रपदैरनिष्टुतपःस्मरेत्- निसन्ध्यमपि । सकरोतिनागक्रीमा विपश्वविपवेदनातीतः ॥ ३६॥ नकिर्जिनेश्वरेयस्य गन्धमा- streeti सामा- फायदा परें समूलं च पिनश्यति॥२३॥ कमा तुल्यं तपोनास्ति न संतोपात्परं सुखानच तृष्णा परोव्या निपपों दयापरः ॥ २५॥ दानेन लोगीलवति मेघावी वृछतेवया । यहिंसया च दीर्घायुरितिमा- हमनीषिणः ॥२५॥ यत्कर्मकुर्वतोऽस्प स्यात्परितोपोऽन्तरात्मनः। तत्प्रयत्नेन कुर्वीत विपरीत तु व. जपत्र ।। २६ ।। सर्वेषामेशौचानामर्यशाचं परंस्मृतम्। योऽयंशुचिः सहिशुचिर्नमृद्वारिशुचिःशुचिः ॥ २३॥ शनिटे दासो नकर्तव्यःकदाचन । घटी पिवति पानीयं तामयते झल्लरी यथा ॥रणादानं रितारतं पाचः कीर्तिपमा तपायुषः । परोपकरणं कायादसारात्सारमाहरेत् ॥ २॥ ॥न माता शपते. पुर्व न दो सनते मदीन हिंसां कुरुते साधु नदेवः सृष्टिनाशकः ॥३०॥स्वाधीनेऽपि कलत्रे नीचः प. रदारजग्रटो नानि । संपूर्णोऽपि तमागे काकः कुम्नोदकं पिवति ॥३१॥ काके शौचं द्यूतकारे च सत्य- समाजिगीषु कामोरान्तिः। लोवेर्धेप मयपे तत्वचिन्ता राजा मित्र केन दृष्टं श्रुतं वा ॥३२॥ वानं परिदम्प प्रभोध दान्ति पूनां तपो छानयतां च मौनम् । शानियनिय मुखान्यितानां दया च : तेरियनपतित ॥३॥मारानगुणी पिणी क्रमेण पप्वी मुगादिमीर पाम् । दिनपर्मि 1१५ पराजिना ठायेव मैत्री खखसकनानाम् ॥ ३४ ॥ सुपात्रदानाच नवेझनाढयो धनप्रन्नावण करोति पुष्पम् । पुण्यप्रनावात्सुरलोकवाप्सी पुनर्धनाढयः पुनरेव जोगी ॥ ३५ ॥ इतिश्रीमनागपुरीय युममयराचार्य श्रीसहजकलानिधिसूरिवरचरणाम्जचंचरीकेण पुन्निीरपिशशांकेन संप्रदीता सामान्यनीतिलोकमालिका । ॥ श्री सिक्षाचल चैत्यवंदनम् ।। ॥घरणेंद्रमुखानागाः पातालस्थानवासिनः सेवंते यं सदातीर्थराजं तस्मै नमानमः॥१॥ धरेंद्रवतीद्रायाः वर्षे भुवनवासिनः । से०१२। किंनरकिंपुरुगाद्याः किनराणां च वासवाः । से० ॥ ३॥ राक्षसानालघोशाच यक्षेशाः सपरिछवाः । से०१४। श्रपत्रीपणपत्रीमुख्याध्यंतरनायकाः 1 से 14द्योतिषां चाप्सची चंज्ञसूविन्पेपिं खेचराः। से। ६ ।मनुप्यलोकसंस्थाना वासुदेवाश्च. चक्रिश से शेपेन्वादयोप्येते सिज्ञ विद्याधराधिपाः 101 वेयकानुत्तरस्था मनसा. aaaaaaaaaaaaaaa5 20163004610:

PERSe७सए शिदिवौकसः । से। एएवं त्रैलोक्यसंस्थाना स्त्रिघोरगनरामराः । से० । १० । अनंतमक्षयं पादनमनिप, मनंतफसवायकं । अनादिकालजयजतीय तस्मै नमोनमः ॥११॥ तितीर्थकृतोऽनंता यत्रसे. स्पति चापरे मुक्तेलीलागृहं यस तीयं तस्मै नमो नमः ॥ १२ ॥ इति ॥ ॥ युगादिदेवचैत्यवंदनम् ॥ मगे युगादौ देवेदा सूरस्त्वमुक्तिो नवः तमोवंसं वितन्वानो दर्शयन्नर्थसंपदः ॥१॥नमस्ते वि. श्वनापाय, विश्वदपप्रदापिने, विश्वानरचरित्राय, विश्वताताय हेमन्नो॥२॥ तवावतारेनरतक्षेत्र- स्वांटिदिशप्पते, पावित्र्यं चाद्यसंप्रात, सनाथं च जगद्गुरो ॥ ३ ॥ इति ॥ । महावीरस्वामिचैत्यवंदनम् । अपश्नयनसिपकुपलप, विपसियसपवनपनसदसटो, वीरो गईदमयगल, सुललिअगाविफमो. लप ॥ १॥ अविवातिठ, मखम अस्त जरदवासंमि, सोपद्धमापासामि, तिलुकादिवाय- एप॥२॥गादानुभलेशनिर्ण, मपनोदविनि निमार्ग पोसावितिसंचाएग. Arrit 4.Raist.. 16USESULSESSES+Se55 महावीरं ॥ ३॥ सुकमालधीरसोमा रनशिसणमुरा सिरिनिकेश्रा। सीअंकुसरगहनीरू, जलयल. नदीमणातिन्नोनयंति वीरतील, दाउं मार सुरहिमनपरिपुरणा, पंफयगरंदचंदा, लोमण- चकमियमुहाणं ॥५॥ एवं वीरजिणंदो, अछरगणसंघसंधुभपवं । पालित्तपम मदिना दिमठ खयं सवारिया ॥६॥ इति ।। । गिरनारममनश्री नेमिनाथचेत्यवंदनम् । श्रीशैवेय ? जयाऽमेयगुणरत्नमहोवघे ! जयापार कृपाधार फारसंसारतारक ! ॥१॥ श्रीमनेमिजिन ! स्वामिन् ! सदजनाऽस्मतेजसा, तमोमनं नवोधिमं मामुहर कृपापर ! ॥२॥ रागादयोऽरयो देव ! ये पुरा निर्जितास्त्वया, त एव तविरोधेन, वाघन्ते मा त्वदाश्रयम् ॥ ३॥ सर्व नविकसामान्य, मौवातीन्पमिदाश्रयन्, त्वं चेपेक्षसे तत्चे, कुतः सुस्वामिताऽमिता ॥ ४॥ नदेति न मुदे यावत्वन्मयं चिन्मयं महः स्वामिन् ! मोहतमस्तावञ्चित्नांतर्जायतेऽगिनां ॥ ५ ॥संतार सागरस्पांत मोहावर्नगतः प्रनो ? कवामाननवयानयानपात्रं मदं श्रये ॥ ६॥ पदो मदोतं 13tra.

चिनं सदालतकदाप्रहं तथा प्रसीद विश्वेश ! ययासोदति न कचित् ॥ ७॥ तृप्णयातरलं स्वामि । पाच न् ! विलं स्मरतापतः शांतिमेति यदि स्वातं, त्वयानामृतमऊनात् ॥ ७॥ जातु किं जंतवो पांति कोपराप्यना विन्नो शमैकप्तारं यन्मार्ग, मार्गयंते यदि कणं ॥९॥ पापकर्म तोन्माष नाप ! ताकुरु येन मे स्वल्पोनवंति संकल्पा, विषयग्रहगोचराः ॥ १० ॥ परानंदहदे मेऽस्तु निम. ग्नस्प जगत्पत्तो ! वेयवेदकलेदेकशून्यता त्वत्प्रसादतः ॥ ११ ॥ नार्ययेऽन्पहिनो ! किंचिद्याचे रामेतदेवदि, समुल्लसतु मशिने, त्वत्प्रसादात्परं महः ॥ १२ ॥ इतिश्री नेमिनाथ चैत्यवंदनम् ॥ ॥ श्रीपार्श्वजिन चेत्पवंदन ॥ ॥ नमः पार्श्वनायाय विश्वचिन्तामणीयते ॥ीधरणे वैरुट्या । पद्मादेवीयुताय ते ॥१॥ मानितुष्टिमदापुरिनिकोनिविपापिने ॥ दिव्यालयेतापसर्वाघिव्यापिनाशिने ॥२॥ जपाजिनाप्पाविजपा पारराजिनपानिरतः ॥ दिशा मालेप्रयदो विवागीनिरथिना ॥ २ ॥ तिमासास मारmama-m--- RANASAIRArt:1.- ॥५॥इति ॥ ॥श्री वीरजिन चैत्यवंदन ।। ॥ श्रीमते वीरनाथाय | सनापायागुतश्रिया ॥ महानंद सरोराज । मरालागाईते नमः ॥१॥ सर्वेषां वेधसामाघ | मादिम परमेटिनाम् ॥ देवाधिदेवं सर्वशं । श्रीवीर प्रसिदध्महे ॥२॥ कल्याण पादपारामं । श्रुतगगा हिमाचलम् ॥ विश्वाम्नोजरवि देयं । बन्ने श्रीज्ञातनन्दनम् । ३ । ॥अथ कर्मना पंदर बंध विचार ॥ प्रभ-पनर वैधननो प्रर्थ स्पष्ट रीते समजायो. उत्तर-आ नीचे प्रमाणे व्याख्या शास्त्रकारोये आपेल. १-चक्रवर्ती लोग निमितें वीजुं पोदारिक शरीरकरे त्यारे प्रोवारिक औदारिक बंधन करिये, मन-04-11-1......

का०दो.
कायोम
गेना १९
दोप
--
RAMAS-SE+
शरीर याद्यादित राखे ते.
१३ नमुइंगुलि दोप--ालावो गणवाने अर्थे अथवा कायोत्सर्गनी संख्या गणवाने अंगुलि
तया पापणना चाला करे ते.
१४ वायस दोप-कागमानी परे मोला फेरवे ते.
१५ कपिण्य दोप-पदेरेला वस्त्र यूका अथवा प्रस्वेदे करी मलिन यवाना नयश्री कोनी परे
सुगडं गोपवि राखे ते.
१६ शिरकंप दोप-पदावेशितनी परे मायूं धुणावे ते.'
१७ मूक दोप- मुंगानी परे हुं हुं करे ते.
१८ मदिरा दोप-यालावो गणता मदिरानी परे वमवमाट करे ते.
रए प्रेक्ष्य दोपल्यानरनी परे घासपात जोया करे, तट पुट चलावे ते.
मा दोरोपी पती प्रविधि जापणीने तेनो स्याग करी फारसग्ग करयो.

ASRAStrafont-RanaAAIIMSAR ॥ पश्नोत्तर ॥ प्रभ-गुरु महाराजने वांदण देवामा पचची आवश्यक साचया जोश्येते किया ? उत्तर-२-अवनत, १-याजात, १२-आवर्न, ४-शिरनमन, ३-गुप्ति, २-प्रवेश, १-मिक मण, यउक्तम्- दोवणयं महाजायं, आवत्ता वार चनसिर तिगुत्तं । उपवेसिगनिखमणं, पण वीसावसप किकम्मे ॥१॥ ए प्रमाणेना पञ्चीत भावनयक कृतिकर्म एटले वांदणाने विपे ग्राप. वांदणा देनारे या पच्चीस आवष्यक साचवा वरावर उपयोग राखवो जोश्ये. कारण के तेश्री विपरीत रीते वर्नतां एटले आवश्यक साचव्या शिवायं चांदणां देतां तेयी श्रवान जे फल ते प्राप्त यतुं नश्री. यउक्तम्- किश्कम्मपि कुणतो, नहोइ किश्कम्म.निङरा लागी। 24:19 प्रमोचर PRODUSESS पणवीसा मन्नयरं, साहुवाणं विराहतो ॥१॥ नावार्य-ए पचवीश आवश्यकमांथी अनेकै एक पण स्थानक विराधतो साधु तेमज साध्वी, श्रावक अने श्राविका दोय ते, कृतिकर्मने करे छे, अर्थात् वांदणा देठे तोपण तेथी जे कर्मपरिशा- टनरूप निर्जरा थाय तेनो संचिन्नागी न होय, अर्थात् ते वांदणा देवार्नु जे निर्जरारूप फल ते न पामे. प्रश्न-ए पचवीश यावश्यकनो अर्थ वतावो. ननर-चांदणाने विपे वे अवनत एटले वेवार शरीरनो नपरीतन नाग नमाववो. ज्यारे प्र. यम 'इछामि खमासमणो वंदिलं जावणिजाए निसीहिआए' एम कही गुरुने वांदवानी इछा बतावी भवग्रहमां प्रवेश करवानी थाज्ञा मांगतो एटले अणुजाणद मेमिनग्गई 'ए पद बोल- तो शरीरनो नपरनो नाग नमावे-ते एक अवनत जाणवु. बौजीवार चांदणा देतां बीजें पाय, देभननतरूप वेभावश्यक जाणवा. . " ... SAHASAff यथा जात एटले प्रप्तव पामतो वासक.जेम रचित करसंपुट यांलो दोय तेम कर संपुट करेला दाधने ललाटे लगाते यथाजात मावश्यक कहिये, वार पावन-पटसे शरीरनां पापर रूप सूत्रानिधान गनित काय व्यापार विशेष जाणवा, ते वे वांदणामां पइने वार यावर्त जाणवा. एक चांदणे व यावर्त पाप ते या प्रमाणे-प्रयम प्रणा पाव "प्रदो" " कार्य " “काप" ए वे पे अदरे पाय, एटले पोताना हायना वे तला गुरु- चरणे सगामे तथा ननान दा पोतानो सलाट देश स्पर्श. गुरुचरणे दस्त लगाता पहेलो प्र. कर अने ललाटे दाय लगामतां वीजो अक्षर वोलयो एम एवण पर बोलतांत्रण प्रावन, पठी वश्कतो" पपंत बोले अने त्यांयी वीजा प्रण पावन त्रय प्रश अकरना जाणवा. तेमा एक प्रक्षर गुरु चरणे सगामतां, वीजो अक्षर उत्तान दाये, वजे विश्रामरूप कहे अने बीजो अक्षर ललाट देशे हाथ लगामतां बोले, जेम “जताने" "जणि" " "डांचने एवाप्रपा आवर्त प्रा रा अकरना जाणवा. ए प्रमश्र वांदणे : अने वीजे वांदणे व कुस वार हाय जोमा .

पणवीसा मन्नयरं, साहुगाणं विराहतो ॥१॥ नापार्य-ए पचवीदा आवश्पकमायी अनेकै एक पण स्थानक विराघतो साधु तेमज साध्वी, भापक भने प्राविका दोय ते, कृतिकर्मने करे छे, अर्थात् पांदणा दे तोपण तेथी जे कर्मपरिशा- टनरुप निर्जरा घाय तेनो संचिन्नागी न होप, अर्थात् ते वांदणा देवार्नु जे निर्जरारूप फल ते न पामे. मन-ए परवीश पावदपकनो यर्थ वतावो. ननर-नांदणाने विपे वे अवनत एटले वेवार शरीरनो नपरीतन नाग नमाववो. ज्यारे प्र. पम 'इयामि समासमणो वंदिन जायशिकाए निसीदियाए' एम कड़ी गुरुने वांदवानी इछा घनाजी मापदमा प्रवेश करवानी याज्ञा मांगतो एटसे अणुजाणद मेमिउग्गदं ' ए पद बोल- तो दारीरनो उपरनो नाग नमारे-ते एक यवनत जाणाधु. योजीगर पांदणा देता पीठे पाप, एसपनातार मावापर जाणचा.

E- यथा जात एटले प्रसव पामतो बालक जेम रचित करसंपुट पालो होप तेम कर संपुट करेला दायने खलाटे सगामे ते यथाजात मायश्पक कहिये. धार पावन-एटसे शरीरनां व्यापर रूप सूत्रानिधान गनित काय व्यापार विशेष जाणवा. ते ये वांदणामां पइने वार भाव जाणवा. एक चांदणे व यावर्त पाय ते या प्रमाणे प्रथम त्रण यावर्न "प्रदो ""कायं ""काय " ए वे घे अकरे पाप, एटले पोताना दायना ये तलो गुम- चरणे जगामे तथा उनान दाने पोतानो ललाट देश स्पर्श. गुरुचरपो दस्त लगामता पहेलो . क्षर अने बताटे दाथ सगामतां वीजो धकर बोलचो एम ए प्रण पर बोसतो त्राश पावन. पी हाथ जोमी " वकतो" पपंत बोले अने त्यांची वीजा प्रणा पावन त्रस प्रण अकरना जागवा, तेमा एक अक्षर गुरु चरणे लगामतां, चीजो अक्षर उचान दाये, व विधामरूप कहे अने बीजो अक्षर ललाट देदो हाप लगामतां बोले, जेम “जताने" "जयण" "चने एचा त्रण प्रापर्त प्रण प्रश अक्षरना जाणवा. ए प्रमथ यांदणे ३ अने बीजे चांदणे उ कुल वार PRERPREPARTNE. -- भाव जाणघा. पतुः शिरा-एट पार वार शिर नमारवं. ते पदेला प्रपा यावर्त थपा परी एकवार यने पोजाबा मान पपा परी एकार एम एक वांदणामां वे बखत यने नेमां थईने चार वखत मस्तक नमाम ते. विगुत-एटले मन, वचन, अने कापा, ए घलने वांदणा देता अन्य व्यापारथी गोपवी रा. पना ए प्रण गुति. वे प्रवेश-एटसे वे वार गुरुनी याज्ञा मांगी अयप्रदमा प्रवेश करयो ते. एक नियम-एटले एकवार निकत. ते या प्रमाणे प्रथम चांदणे याज्ञा मागी “नि. " कही मंगामा घने जमीन पूंजी अवग्रहमा प्रवेदा करे, घने पठी 'पायस्तिघाए" परीज जो प्रश्प्रधी यहार निकले, वीजा धांदणामा प्रवेश फरे पण वहार निकले नहि गुरू मदाराशना पायमोज ग्यो तो बीजों यांदणी ममात करे तनो पण पाप नदि पटसे ये बार कागेसन एकनार पहा नियई एम पण भार:गक कलिग र गर्ग मीन जीरा सStFREE पावश्यक थापाले ते जयजयनीरू जीवोये तेनी रमणता फरवी जेथी करेल अनुष्ठान सफल पाय. विशेष खुलासो गुरुगमश्री जापायो. प्रभ-क्रिया जेने प्रिय होय ते जीवनुं कल्याण श्राय के नहि. उचर-ते जीयर्नु कल्याण थाप केमके जे क्रियावादिने, क्रिया जेने प्रिय है, क्रियाना • पर पहु आदर , ते नीव नव्य , अने नियमधी प्रई पुल परावर्तनी अंदरन मोक्ष पामे. ॥ पउक्तम् वशाश्रुतस्कंधचूर्णी. जो किरियावाइ सो जयो णियमा सुरूपाखन। 'संतपुग्गल परिअरस्स सिज्ज नियमा ॥१॥ प्रभ--शुलपति जीव कोने कहिये ? Fivehini म. सुरुपखिया खलु नगर-बई पुश्व परावर्तमां काईक न्यून संसार जेनो वाकी है, निचे करी ते शुरूपको, एटते शुक्ल पक्षना मानी माफक मुज्ञान वैराग्य क्षमादि गुणे करी ते जीव वृद्धि पामे , तेषी ते शुरूपक्षि ठे, अने तेपी विपरीत ते जीव कृष्ण पक्षो. ।। यऽक्तम्. तत्रैव. जेसिमवट पुग्गल परिअहसेसन्म संसारो। अवरे पुण कण्ह पखिया ॥१॥ प्रम-परमपोगी कोण? उनर-जेने कोइ मित्र नयी, अने शत्रु परा नथी, था मारूं ठे, था परनुं गे, प्रा प्रिय , मा अभिप , एम मानवू जेनुं नथी, इंदियोना विषयामां जेर्नु चित्त फसातुं नयी विषय विरक्त भने सरापापी जेनें मन रहित ,ते परम पोगी, ॥ पशुस्तमप्पारमकस्टयमप्रकरणे..

RPATRA PRASAIsranAR- Hitstitud-2015 न. यस्य मित्रं न च कोऽपि शत्रुनिजःपरो वापि न कथनान्ते । नचीक्ष्यार्थेषु रमेत चेतः, कपायमुक्त परमः सपोगी।। प्रश्न-श्रा नव परजवमा कया गुणे करीने मनुष्य सुखी धाय छे ? उत्तर-जे काई कार्य करे ते सांचो पिचार करीने विवेक पूर्वक को, अने कोश्नायी गाय नही, तेमज सरल बनायवान् अने जाति कुछ प्रतनी लकाने धारण करनार, निर्सता जेना. मनश्री, निर्मल भाशयश्री प्रहार दोप रहित देव प्रने शुजापक गुरुराजनी पुजानक्ति बहु मान करनार, अने माता पितादि वालोनी उचित नक्तिकारक, वली उत्तम कार्यनी अनिता- पाने धारण करनार, भने परोपकार करनार, क्ली धर्मनी मूल व्यवहार शुहिने धारण करनार, एवों गुणवान पुरुष प्रा लवमा अने परजवमा संपदाने पामे ठे, तया चोक्तम्, तत्रैव. । 'दाक्षिण्यनऊ गुरुदेवपूजा, पिनादिनक्तिः सुकृयानिलापः । 'परोपकारव्यवहारशुद्धी, 'टणामिहामुन च रोपवे स्युः।१।

मनो०
सागर जरा, मरण, प्रसन्य सदास नरकादि नवसंततिनो. आत्यंतिक क्षय थाय ,
शो TARTनी परंपरानो स्य प्रगपी एकान्तिक अने पात्यन्तिकादिक गुणयुक्त स्वात्म स्त्रि
तिरुप मोहना मारिन पाप रे. तेथी परंपराये सर्व कप्पाणानुं नाजन विनय छे. अर्थात विनय
गुण गोगर गई प्रेप सपाय ठे अने समस्त कलेदानो सर्वथा क्षय करी, यक्षय अनंत म.
ENTRY एमांक मुग माप्त पाय ठे. याम् . प्रदामरति प्रकरणे-
विनयफलं शुभ्रपा गुरु शुश्रूषा फलं श्रुतज्ञानम् ।
झानन्य फल विगतिविरतिफलं चाश्रवनिरोधः ॥१॥
मरम्पानं तपोवनमय तपमो निजरा फलं दृष्टम् ।
नम्माक्रियानिनि: क्रियानिहत्तेरयोगित्वम्॥ २ ॥
पोगनिरोधानवानननिदपः मनतिक्षयान्मोक्षः ।
सम्मान हरयाणानां गां नाननं विनपः ॥ ३ ॥

सुभाषित व्याख्यान संग्रह. HESAR URL+Put मयम व्याख्यान. श्रीजिनागमोहिछ संसारार्णवतारणम् ममेदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥ १ ॥ तरण कर्या वाद व्याख्याननी शरुवात वखते नीचे प्रमाणे वाक्यरचना रचवी.) से जगवंत अनंतगुणवंत, महंत केवलज्ञानधारक, नवनयनिवारक, संसारतारक, ताप तापठारक, सर्व जीव हितकर, प्राणी मात्रना पीहर, तत्त्वज्ञाननास्कर, श्रीदेवा. पतिरागदेव प्ररुपित सद्ज्ञानोपदेशाधिकार संबंधी तत्ववाणी व्याख्यानकार कथन करे ठे ते दे नव्यप्राणी ! सकलसुख खाणीरूप वाणीने हैयामां आणी तेनो रहस्य जाणीने पोताना सुवि- SARAFFAGAR निरोप यकी जन्म जरा, मरण, प्रबन्ध लक्षण नरकादि नवसंततिनो आत्यंतिक क्षयं थांयचे, भने जन्म मरगुनी परंपरानो क्षय यापी एकान्तिक यने यात्यन्तिकादिक गुणयुक्त स्वात्मे स्थिं तिरूप मोक्षनी प्राप्ति पाप ने. तेपी परंपरापे सर्व कल्याणोनु नाजन विनय छे. अर्थात् विनयं । गुणयमे उत्तर सर्व श्रेय सधाय ठे अने समस्त कलेशनो सर्वथा कय करी, अक्षय अनंत म. पाराध ए मोक्ष मुख प्राप्त बाप रे. पउक्तम् . प्रामरति प्रकरणे-- विनयफल शुश्रूषा गुरु शुश्रूषा फलं श्रुतज्ञानम् । झानस्य फल विरतिविरतिफलं चावनिरोधः ॥१॥ मंवरफन्तं तपोबलमय तपसो निर्जरा फलं दृष्टम्। तम्माकियानिवृत्तिः क्रियानिटत्तरेयोगित्वम्॥५॥ योगनिरोधाभ्यमंततिक्षपः संततिक्ष्यान्मोक्षः । तस्मात्कल्याणानां सर्वपां नाजनं विनयः ॥३॥ 1737F २ सुभापित व्याख्यान संग्रह. प्रथम व्याख्यान. श्रीजिनागमोहि; संसारार्णवतारणम् ममेदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१॥ (प्रथम मंगलाचरण कर्या वाद व्याख्याननी शरुवात वखते नीचे प्रमाणे वाक्यरचना रचवी.) श्री अरिहंत नगवंत अनंतगुणवंत, महंत केवलज्ञानधारक, नवनयनिवारक, संसारतारक, सकलपाप संताप तापठारक, सर्व जीव हितकर, प्राणी मात्रना पीहर, तत्वज्ञानन्नास्कर, श्रीदेवा- घिदेव वीतरागदेव प्ररुपित सद्ज्ञानोपदेशाधिकार संबंधी तत्त्ववाणी व्याख्यानकार कथन करे ठे ते दे नव्यप्राणी ! सकलसुख खाणीरूप वाणीने हैयामां आणी तेनो रहस्य जाणीने पोताना सुवि-

व्या
เห์
काराने याचारमा मूकवा भातुर रहो के जेयो नवसमुनी पार जवानो समय सानुकूल पाय
पने समस्त संतार जाय!
तत्ववाणीमा प्रयम शुं शुं जाणवानी जरूर ठे
(मालविकारित उंद.)
" तत्त्वानि (१) प्रत (५) धर्म (१०) संपम (१७) गति (३) झानानि (५) सद्लाक्ना (१२),
मन्पारपान (१०) परीपदे (२२) यि (५) मर (0) ध्यानानि (9) रत्नत्रयम् (३);
सेदपा (६) पदपक (१) माप (६)
संज्ञा (१०) कम्म (6)
-जण.
SABHUSHARESer
AKASE

1444 चखाण अने तीय फरश्या तत्त्व न जाएयु तो ते सर्व निष्फलज , माटजे साररूप तत्व नय ने ते प्रथम जाणवाज योग्य है. ए नव तस्यादि वोलोनुं निरूपण नीचे मुजब वेः- नवतत्व-१ जीवतत्व, २ अजीवतच्य, ३ पुन्यतय, ४ पापतत्त्व, ५ यावतत्व, ६ संवर. तत्व, निर्जरातच, पंचतत्व थने ए मोक्षतत्व था नय तय . नव तत्त्व जाएया समज्या पती पांच मदारत जापावानी जरूर , : पांच महावत- प्राणातिपात घिरमणमत, २ मृपावाद विरमणावत, अदनादान विरमण. यत, ४ मैथुन विरमणबत अने ५ परिग्रह विरमणप्रत. आ पांच मोटा व्रत ते. ते जाणवां अने धात्महिता तथा धीरवीर पुरुषायें यादरवां-पालवां के जेथा जयपार थाय. धर्मनां दश लक्षाण-१ क्षमा, २ मार्दव, ३ मार्जव. ४ मुक्ति, ५ तप, ६ संयम, सत्य, ७ शौच, ९ अकिंचन, अने १७ ब्रह्मचर्य या दश ज्या पूर्णपणे दोय त्यांज धर्म मनाय , -REAPONR14 न्या सा - .. (श्य ५.) ६ फरसन, ७ रस, घाण, ९ चकु, १० श्रवण, ११ क्रोध, १२ मान, १३ माया, १४ लोन, १५ मनोदम, १६ वचनदंम अने १७ कायदम. पा सत्तरनो त्याग करे तेज संयमी कदेवाय . चार गति- देवगति, २ मानवगति, ३ तिर्यंचगति अने नरकगति आ चार . पांच ज्ञान-१ मतिज्ञान,२ श्रुतझान, ३ अवधिज्ञान, ४ मनःपर्यवज्ञान अने ५ केवलज्ञान था पांच ज्ञान , ते प्राप्त करवा यत्न पादरवो. वार नावना-१ अनित्य, २ अशरण, ३ संसार, ४ एकत्य, ५ अन्यत्व, ६ अशुचि, ७ मा. श्रव, ८ संवर, ९ निर्जरा, १० धर्म, ११ लोकस्वरूप, अने १२ उर्लनवोध था १२ नागनान नाववा योग्यज . दश पञ्चकाण-नवकारसी १, पोरसी २, पुरिमठ्ठ ३, एकास' ५, एकलगणुं ५, आय . विल ६, उपवास ७, दिवसचरिमप्रत्याख्यान ८, अनिग्रह ९ अने विग १० मा दश पचरकाण पैकी गमे ते प्रत्याख्यान पोतानी शक्ति मुजव दमेशां करबुज जोश्ये. -- वावी परिपह-नूप परिपद १, तर परिषद २, ताठ परिपद ३, ताप परिपद ४, मांस परिपद ५, अलक (वस्त्र ?) परिपद ६, अरति परिषद , स्त्री परिषद, चर्या परिपद ए, नेपचकी परिपद १०, दाप्या परिपद ११, थामोश परिपद १२, वघ परिपह १३, याचना परिपद १५, घसान परिपह १५, रोग परिपह १६, तृणफास परिपह १७, मल परिपह १७, सत्कार परिपद रए, प्रज्ञा परिषद २०, अज्ञान परिषद २१ अने सम्यक्त्व परिपह २२ या वावीश परिपद समयपरत्वे साधु जनने सहन करवाज जोडपे. पांच इश्यि-पदायि (शारीर) १, रससि (जीन)२, प्राणेदिय (नाक) ३, चकुरिक्ष्यि (नांग्य) 8, अने श्रोतशि (कान) ५ या पांच इंश्योने पोत पोताना विषयनी अंदर पदय-कबजे राबवीत्र जोये. व्यात मद-जानिमा १, कुसमर २, रूपमद ३, तपमद ४, वलमद ५, श्रुत-ज्ञानमद ६, माजमव 3, प्रने घेवयंमद या पार जात्तना मा कविपण करया नहीं. -notishkiaf.

REILO
गुमापि
पारा
ना
मा
चार प्रकारनां ध्यान-पानध्यान १, रौध्यान २, धर्मध्यान ३ अने शुक्लध्यान ४ आ । 'व्या० १
चार ध्यान पैकी प्रपमनां वे त्यजी देश पीनां चे अवश्य अंगीकार करवां,
रत्नत्रयी-ज्ञान , दर्शन २ अने चारित्र ३ प्रा त्रण अमूख्य रत्ननो जरूर संग्रह करवो.
शान-कृष्ण सेश्या १, नील लेश्या २, कापोत लेश्या ३, तेजो वेश्या ४ पद्म लेश्या ५
भने शुक्स वेश्या ६, या उ लेश्यान पैकी प्रथमनी ३ लेदयान त्यजी पाग्लनी ३ जजवी जेश्री नव
ब्रमणानो अंत समय श्राधीन थाय .
आवश्यक-सामायिक १, चौवीसत्यो २, वंदणा ३, प्रतिक्रमण ४, कार्योत्सर्ग ५ अने
प्रत्यारपान ६ धाउ अावश्यक प्रवदय करवाज योग्य .
उ काय-पृथिवीकाय ?, अप्पकाय २, तेनकाय ३, वानकाय ४, वनस्पतिकाय ५ अने
प्रदा काप ६ या कायमय संमार ने, एननो विरावना न थाय तेम पलें पलें खबरदारी राखी वर्तवं ।
पंदर योग-सत्यमनोयोग ?, असायोग
-

योग , सत्य वचन ५, असत्य वचन ६, सत्यासत्य वचन , असत्याम्पायनन , ग्रोवारिक ए, श्रीदारिकमिश्र १०, वैकिपर क्रियमिश्र१२, श्राहारक १३, पादारकमिश्र १५, तेजस यने कामंग १५ या पंदर योग पैकी तजवा नगवा योग्य जाणीने जीवनव्यवदारने निर्मल राखयो. पांच समिति-र्यासमिति र, नापाप्तमिति २, एपणासमिति ३, पादान नंममात्र निके पणा समिति ५ अने नचारपासवण खेलजल पारिठावलिया समिति ५ या पांचे समिति, सदा सेवन करवू. दश माण-पांच पि ५, मन बल ६, बचन बल , काय वलयानोवास ए अने आयु १० या दश प्राण पैकी प्राणी मात्रमा नग वधता प्राण होय रे तेनो विचार ध्यानमा लर दश प्राणघारी ज्ञानवान मानवे जीवन सफल करवा खंतवंत अg. आठ प्रमाद-यज्ञान ,यसंयम २, मिथ्यात्व ३, राग, देर ५, मतिबंस ६, धर्मग्रना- दर ७ अने मनवचन काय अप्रशस्त या पाठ प्रकारना प्रमाद त्यजी देवा. fireHS. ""22"..

प्याग्दया नमंह व्या? -Rama तपना चार नंद-अनशन १, नणोदरी २, वृत्तिसंक्षेप ३, रसत्याग ४, कायक्लेश ५, संतीनता, (आ उ बाघ तपना नेद .) मायश्चित , विनय , वैयावञ्च ए, सज्जाय १० ध्यान ११ भने नत्सर्ग १२ श्रा (व अध्यंतर तपना नेद . ए वेन प्रकारना मतीने )वार लेद वो तपनी आराधना निरंतर कर्याज करवी. दश संझा-याहार संझा १, नय संझा २, मैथुन संझा ३, परिग्रह संझा ४, क्रोध संझा ए, मान संज्ञा ६, माया संज्ञा , लोन संझा , लोक संज्ञा ए अने उघ संज्ञा १० मा दश संज्ञा, सनिया-संज्ञावंत जीवोमां रदेली होय रे ते पैकी 5टसंज्ञानो त्याग करी सुसंझाने पादर प्रापवो. आठ कर्म-ज्ञानावरणीय १, दर्शनावरणीय २, वेदनीय ३, मोदनीय ४, घायु ५, नाम ६, गोत्र ७ अने अंतराय ७ था थाठ कर्म संसारी जीवनी पग्वामे लागेलां तेननो नाश करवा सतत नयमी थq. पचीश कपाय-अनंतानुबंधी क्रोध १, अनंतानुबंधी मान २, अनंतानुबंधी माया mil MORA तानुबंधी लोन , अप्रत्याख्यानि क्रोघ ५, अप्रत्याख्यानि मान ६, अप्रत्याख्यानि माया , अप्रत्याख्यानि लोन ए, प्रत्याख्यानि क्रोध ए, प्रत्याख्यानियो मान १०, प्रत्याख्यानिमाया ११, प्रत्याख्यानियो सोज १२, संजलयो क्रोध १३, संजलणी माया १४, संजसणुं मान १५, संजसको लोन १६, दास्य १३, रति १७, परति ए, नय २०, शोक २१, गंग २२, पुरुषवेद २३, स्त्रीवेद २५, अने नपुंसक वेद २५, था पचीश कपाय ते सर्वथा त्यजवा योग्य ठे, प्राण गुप्ति-मनो गुप्ति १, वचन गुप्ति २, अने काय गुप्ति ३, प्रा. त्रण गुप्तिने निरंतर सेवची योग्य . चोरीश अतिशय-तीर्थकरनें शरीर प्रति अनूत, रोग पशीनाश्री रदित होय. १, वासोवास कमलना सरखो सुगंधवंत होप २, शरीरमार्नु लोही मांस सफेद वर्णवंत होय ३, पाहार निहार कोइना जोवामां न पावे ४, (पा चार अतिशय जन्मधीज होय ,) एक यो जननी अंदर देव, मानव पशु पक्षी कोमोनो संख्या ए मसे उतां तेदलोज तीमामां समाय ५, 15216R varior परमामानी योजनगामिनी गाणो दोय ६, परमामानी गाणी प्राणी मात्र पोत पोतानी जापामा , पा० १ समजी दाके तेनी परिणमे. 3, पीउ पाउन देदीप्यमान नामंगल विद्यमान होय , सवाशो योजन उगीवर लाववाला जोशेनी अंदरनां पण वैर दामीजाय, ए, सात प्रकारनी शतिना नयन होय १०, महामारीको रोग न थाय. ११, हृदयी उपरांत वर्षादि न पाय १२, हदयी नजी वृष्टि पप न थाय १३, काल न प १५, स्वचा परचक्रनो नय न दोय. । १५ (पा प्रग्यार प्रतिशप कर्मक्ष्य पर केवलज्ञान नपजे त्यारे दाय रे.) याकाशे धर्मचक्र प्रनुनी प्रागस प्रागल चाख्या करे. १६, पादपोट सहित सिंहासन साज चालतुं १२, रत्नमय प्रण त्र मायापर विद्यमानज रहे. २८, दजार योजन नंचो ध्वजदंयागस चाख्या करे. १ए, नास्मस कार पगलां मूक्या करे. २०, सोना रूपाना त्रण गढ पाय, २१, परमेश्वर कारे वाजुए सन्मुग रायी विराजेसा जशाय. २२, देवता चैत्य वृक्ष हाजर राखे. २३, कांटा मात्र मनु पग मुके त्यां नंगा यइ रहे. २४. अनुने रस्तामांनां तमाम वृक्ष सतान नमतां - Post -1090 जणाय २५, उकुती वाग्याज करे २६, अनुकूल पवन वाया को. २३, टाकुन प्रदक्षिणा देता जाय. २७, पांचे रंगनां सुगंधी फूलोनो पांद श्राकाशमंझलना अंदरपो देवोज का को २ए, दीक्षा लीधा पनी वाल नख न गो. ३०, हमेशा एक होकी देवो सेवामा दाजर रहे. ३१, उप ऋतु अनुकूल जणाय. .३२, श्वेत नामर दृष्ट्यां कर, ३३, अने इंश्चनुर म्हों अगामी चाल्या कर. ३४, ( था नगणोश अतिशय देवताना करेला होय , १-११-१ए मसी ३४ घया.) एवा चोत्रीश अतिशयवंत नगवतनी वाणीमा लीन रही यात्म कल्यागनी प्रेरणामां निरंतर मन्या रदेवू जेयी दे नव्यजीवो ! था नवनी अंदर सर्व प्रकारनां सुख अने परनयमां शुनगति अथवा मोक्ष लक्ष्मी मदेजमा प्राप्त श्राय ए माटे जिनवाणी नपर हद सदहणा राखी मंगलिकमालाने वरो भने नवनमणाने दरो!

. पारा मंदा व्याख्यान वाजु. व्या०२ ८ (शालविक्रीडित.) "धर्मः कामगवी यदीयचरणा दानादयो यन्मुखं, शुभ जीवदया विवेकविलसत्पुछचटासंकृतिः अश्रेपस्तृणचारिणी शुलपयः संपनिदेतुश्च या, यासस्यादिकपदयतोहरगणात् दक्ष त्वया रक्षताम् ॥ २ ॥ श्री अरिहंत जगवंत अशरण शरण नव नयहरण शिवसुख करण तरणतारण पट् वनिकाय पत्तल नव्य जीव प्रते धर्म रुपी कामधेनु संबंध] व्याख्या कही बतावे ठे के दे दक्ष पतुर मानगो ! धर्म रूपी कामधेनु नूख खने दूर करी सुखमा स्वाधीन राखनारी ठे. १६८ .

SHRIHIsrtraiththirrantierrane जेम कामधेनु सर्व प्रकारे पवित्र , तेम धर्म पण सर्व प्रकारे पवित्र कामगेनु जेम प्रकारे जोइपे त्यारे ननम दूध प्रापी सेवन करनारने तुष्टि पुष्टि यापे ,तेम धर्म गण सर्वोनम मुग्गरूप मुगति आपी सेवन करनारनीलवनमणा टाली स्वर्गापवर्गरूपतुष्टि पुष्टि प्रा. जेमकामनुसनमान्य, तेम धर्म सर्वमान्य छे.जेम कामधेनु दारिद्यने नजीक पायवा देती नयी,तेमधर्म पण तिरप दारिदने नजीक पायवा देतुं नपी.जेम कामधेनु नवल वर्णवत ,तेम धर्म पण उपस तलवंत .जेम कामधेनु योमा खर्चे महान साननीनेट करावे,तेम धर्म पण सहज महेनतमा महान् प्रानंदनी लान व अने जेम कामधेनु मानवंती मंगल रूप सेम धर्म पण मानवंत महामंगल कप , तयातितेने तृप्ति प्रापवा सारवार करवानी जरूरज . जो तेनी सारवार सारी रीत करवामां आये तो बेशक अवर्णनीय आनंद प्रापे, धर्म माटे पण तेवीज रीति अनुसरवामां आवे एटलेके दया दान वक्रता साथ दश लक्षणो पालश करवामां आये तो बेशक महदानंद वर्षे , माटेज जेम कामधेनुने वसवान् चोर दरी न जाय ते माटे आलश त्यजी (तेनुं जेम) संरक्षण करवू योग्य , तेम काम ......

प्या०२ ५.६६ उदास बोयी धर्मनु- पशरदश करचुंज योग्य , नहीं तो ते डटों मतमा आणी धर्मनी दानि को. जेयी सावधानी साथ धर्मधेनुन रक्षण करी ने सुप र. काडिमा कसी तेर सबल चोर ले ते एके:- ( गाया उंद.) अाजस्म १. मोहा , बन्ना ३, यंला ४, कोहा ५, पमाय ६, कि.ना 3, जपत. गोमा ए, अन्नाणा१०, विखेव ११, कुतूहला १५, रमाणा १३.॥१॥ पहेलो काधिपो-माजम नामनो वे ते शुन धर्म करणी कावा जतां घरमांयी वदार REnा विरसाज प्रमामां न प्रारावादे. मात्र विविध प्रकारना घरकाममां सुब्ब बनावी सनी मा गजे. पीजो मोह शाठियो-वेदय नगदेपनी अंदर अथवा पुत्र मीमां निर्विनेकपणे मोद राखवानी राजयो धर्म नराशादाज न या दे.

तीजो 10treprem.25:21 अवज्ञा काठियो-ते वीजा वघा गुणीजनो ज्ञानीनने माटे निंदा कराववानीज नि पेदा करे, जेधी ते कदेतोज फरेके ए मूर्ख शुं समजे ! एनामा (ज्ञानादि) कY नत्री. पनी रीते अनेक अवर्णवाद बोलवामा मस्त रदे, किंवा मलीन वनपानादि सहित तया सकल संस्कार रहित पाखमी ठे वगेरे निंदा करे जेत्री गुणी ज्ञानीना नजीकज जवा न पामे. चोयो अहंकार काठियो-जे गुरु गुणिजनने देखी मोटारने लीधे मस्तक न नमावतां स्यंन बनी रहे, जेपी गुणि गुरुनो समागम पयानो समपन हाय न सागवा दे. पांचमा क्रोध कावियो-ते गुरु प्रमुखने विनाकारणे सढे यने अने रोसाइ रहेतां तेमनी दजूर न जाय, जेश्रो सदुपदेशना साजश्री घेनसीब (दूर) रहे . ठहो प्रमाद काठियो ते-विकया ( राजकथा देशकथा नोजनकया अने स्त्रीकथा) भने उघ मद विषय कापमा तीन वनी जतां गुरुपासे न जाय जेयो ज्ञानोपदेशनो स्वाद अनुनववा नाग्यशालिन याय.

पासपा व्या०२ नगद सातमो कृपणता काठियो ते देवरे पासरे जवायी जरापण चोखा बदाम वगेरेनु खर्च पाप ए कंजुसाइने सीधे त्यां जाय नही जेधी मंगल कल्याणना मार्गधी दूर रहे . आठमो जय काठियो- महान् उष्टकर्मक ने नर्क प्राप्त थाय ने अने त्यां नयंकर पासनयों खोनोगवा पमे वगेरे वगेरे जयानक नर्कन्नय वर्णनना जयने लीधे मरीने अय या तो कोई त्रुपी मरीने वहार न नीकले जेथी निर्नयतानो रस्तो दाय चमे नहीं. नवमो अज्ञान काठियो-ते अज्ञान मार्गमा दोरी एवुज बोलाव्या करे के मांस भक्षणमा, मदिरा पीयामां घने मैथुन सेवघामां कशो दोप नथी.॥न मांसभक्षणे दोपो, न मद्ये नच मैथुने । प्रवृनिरेपानूतानां, निवृनिस्तुमदाफला ॥१॥ स्वर्ग नर्क ठेज नहीं, ग्रंथो गपनोज भंडार ठे. वगैरे वगैरे मिथ्यात्वना वचनने लीघे गुरु गुणी तरफ अक्षा नत्पन्न घायज नही, अने प्रज्ञा पेदा पया बिना आत्मकल्याण यवानो पंथ दाथ चमेज नहीं. दशमो प्राक्षेप काठियो-ते आ हमणां करवं ने, अने आ पी करवू , एम घणा कामोनी रकर-414 REG+23+rt","URS+22S जलोजवाथी आकुलव्याकुल यतां निश्चय विचारने ताये न पर शके, जेथा विचारमाने विचारमा मानवनय एले गुमावी वेसे है. अग्यारमो शोक काठियो-ते दालाना मरणश्री शोकने स्वाधीन पद रदेतां धर्मात्साद पावया न पामे, जेयी गुरुवाणीना वियोगने लीधे सदा शोकमां ग्रस्त बनवानो वखत हाजरी आपे एटलेके अष्टगति अवाथी शोक मटवानो समय प्रातन क्यांग्रो प्रया पामे. वारमो कुतूहल काठियो-ते नाटक, चेटक, सरकस, गानतान, बाजी, रम्मत, गम्मत, वगेरे खेल तमाशानी अंदर मशगुल रहा करे जेश्री धर्म नपणी अणगमो वताये, तेना लीधे परिणाममा मनुष्यजन्म प्रफल धाय . तेरमो रमण काग्यिो- ते कूकमा, घेटा, तेतर वगेरेनी समाइ करावयामाज मन आनंद मान्या करे जेश्री धर्म तरफनी नौनज पेदा न पाय. आ तेर काठियारूपी सबस चोरोथी धर्मरूपी कामधेनुने बचायी सर तेनायी मलता लान पा.३ पापा नगर 1१७॥ संतोप पामयो ऽसन एम कद्देवामा प्राव्यु के. पाचमो सकार संघसेवा ए पण अत्यंत उर्सन टे. संघ एटले साधु-साध्वी-श्रावक-श्राविका मा चतुर्विध संघनी अनन्य प्रकारे-पूर्ण नक्तिनाव व सेवा करवी. तेमने वस्वपात्र जोजन-ौ. पध-मकान-सन्मान यने स्वामीवत्सल वगेरे को संतोपी तेन्नी सेवा करवानो नाव दृढ श्रवो बहुज मुस्केल . जे श्रावक श्राविका साधु साध्वीने वस्त्रपात्रादिनी मुशावत वेतां निहालो अथवा पोताना स्वपर्मी घातानने नृखना पुःखग्री रीवाता निहाली मनमा जरा पण परेकार आणतां नश्री अने पोतपोतानी शक्ति मुजब तेनन कट कापवाने माटे बनती कोशीप करतां नयी ते पुन्यना नागी पतांज नयी. केमके संघ ए पर्चीशमा तीर्थकर समान पूज्य माटे ते संघनी सेवा पूजा नावान- तिमी अंदर जे उदारचिन यतां नयी ते खचीत नाग्यहीनज मनाय . परंतु कर्मना कठीन योगना संपोगवते चतुर्विध संपनी सेवा प्राप्त वा जेवी शकतीनश्री तेश्रीज तेने धर्सन मानवामां आवे के.

ऊपर वतावेला पांच सकार सदेलायी प्राप्त I शकता नश्री; तयादि जो ते पनि समारने प्राप्त करवा माटे एक सरखो यत्न हाथ धरे तो बेशक उर्जन ग्तां सुसन पर शक जे. पूर्व समयनी अंदर बेसुमार मानयोए पांच सकारोनो सत्कार का रे जेयी तेन सदेलायी नवसागर तर्या , तेमज वालमा जे पांच सकारर्नु सर्व प्रकारे सेवन करे ते तेच नवोदधि तरवानी तैयारी करी रह्या , अने दवे पठी जेन या पांचे सकार, निर्मल तन मन वचनधी निरंतर सेवन करशे तेलवना अंतने जली रीते लेटी शकशे एमां जरा पण शक नश्री. माटे हे नाव प्राणियो ! संसारतारक ए पांच सकारोने प्राप्त करया पुन्यकरणी करो के जेथी पांचे सकारो सुसन थतां जन्ममरणाना नपग्री मुक्त थर सिपिदना नागी थवा लाग्यशाली पदाको. एवी जिनवरनी वाणी सांजली नचिप्राणी जाय पाणी देये घरो अने अमलमा लायो के जेपी उन्नय जय मंगल फेली कमला वरी मुगतिना संगी यान.

व्याख्यान चोथे. न्या. मुभापित उपाण्या नसंग्रह :. ( अमुष्टुप् छंद.) “ अनित्यानि शरीराणि, विजयो नैव शाश्वतः ॥ नित्यं सन्निहितो मृत्युः कर्तव्यो धर्मसंग्रहः ॥४॥ श्री जगदीश जिनराज गरीव निवाज जगनहितकाज लवजलनिधि पार वा पाज रूप सुंदर सुधाधी पण अत्यंत मिष्ट प्ररुपणा आ प्रमाणे करी गयेल के,- उहा-ऊग्या सो तो आथमे, फूटया सो करमायः चएया देवल गिर पड़े, जन्म्या सो मर जाय. चंडमा सूरज भने तारा आदि जे कग्या दोय ते आखर प्रस्तज थवाना वे अगर पाय 2GHaftiniest मे, जे वनस्पति-फलमाम वगेरे फ्लेल ठे ते फरमायज ने, जे मकानो नेवलो कोट जिल्ला वगैरे चणेल ते पाखर जमीनदोस्त प्रया( पमी जवा )नाज , अने जे प्राणीमात्र जन्म्यां ने ते आखर मरणने दारण श्रवानांज वे प्रश्रवा पाय ठे ज. परंतु को हमेशा एक स्मितिथी कायम रदेनारज नथी ! केमके- देखो लोगो माटी फूली, माटी देवी माटो फूली; माटी थावे माटी जाय, इसी रमीने माटी श्राय. देलोको! सकर्मा दरेक जीव, चेतन के जममाटोमांधी पेदाथाय ने.माटी एटले मृतिका अथवा मांस चाम एमांधीज दरेकनी नत्पनि दोय . उतां माटीनी पेवाशने निहाली मातापितारूप माटी मुले ठे-खुशी थइ मकलाय ये; परंतु तेने खबर नयी के वधी वस्तु माटी अथवा पृथ्नी-योनि- मांधीज प्रकट थाय ने भने पुनः आयु नादा भये तेमांज समा जाय ठे तया इसी रमीने माटीज बने दे. एश्री मूल श्लोक जाहेरमा लाये ठे के प्राप) मारनां शरीर अनित्य-नाश धनारी ज . ज्यारे जे वस्तु नाशवंत ने त्यारे ते वस्तु कपर ममता राखवी ए केवल व्हेलगज वे माटेज नन मानना.श्रन प्रणाम मित्रना फक लटक सलाम राखो ममस्कार तथा मीचे पचनेभो : " नवना हना नमजपमित्रनी दशदग दीवाली हुताशनी वगर परबलान दिवस नोजनानिधी व्या०५ rulect ISISIS ७६ नाय बम्न जे बम ननी मदेव नजना कर अनित्य शरीरनी जन्मयात्रा मकान का 7 मंबान गत दान- 'य': प्रधानन ममित्र त्रितय सनम ॥ तृतीया हितकझात. मात्र मुग्वः स्तया 1P पुग्न। अंदर महागजा जीतावनी द जूर मां बुकिनिधान नामना प्रदान नाम मा काम २१ कर बना ग्य जाना एकता, अन त तमाम राज्यकावारना नार वहन कर। राजा नमन ! " 77 पमन प्रसन्नता प्रापती दता. ती राजा प्रजाना पूर्ण ममताने ला विशेष मन न ।' का प्रयानन मग मित्र हता, त पकी पदला मित्रनुं नाम नित्यमित्र, बाजा पर 'मत्र अन प्रम मित्र इता. न प्रधान, नित्यमित्रनी हरहमशा नाजन व बोरेया नक्ति या मसया मनाप प्रापना दता.

राजा कोइना को दिवस मित्र या नधी अने पो पण नहीं. नियमानुसार एक समय ते राजा, प्रधान कार कोपायमान पर गया, जेषी ते प्रधान पदेवा निगमित्रन नानी ऊपर पझेली आफत संबंधी बात कहो कनो रह्यो; पण तेणे नोj का के-'राजाना शानुने सन्मान प्रापq ए खानाखराबीनोज मार्ग माटे कृपा करी तमो यात्री बीजे पधारी जान. माराश्री राजानी धुंत कोलादो नदी.' पाम जवान मततां प्रगान पमित्रने त्यां गरी प्रने त्यां पण अथ इति वात कही संनसानी उनरनी राह जोवा लाग्यो. ते बीना मित्रे पण का के- "तमारी संगतिवमे प्रमो पण शिक्षाना पाप प्रश्ये माटे मदेरवानीनी रादे अन्य स्यले पवारो.' प्रावो जवाब मलता प्रधान त्रीजा प्रणाममित्रने घेर गपो भने त्यो पश प्रयम प्रमाणे कदी कन्नो रहो, एटले ते त्रीजा मित्रे पुष्कल दिसातो आपी कह्यु-'जरा पण राजानो जग राखगो नहीं. मारं घर-घन-कुटुंब भने शरीर नाश पाम्पा पठीज तमोने ते जोवा पामहो. पण ते पहेला तो मगदूर नथी के तमारा नसी नजर पण करी सके.' त्यादि कदी सन्मान सह व्या मापित पाएका मंत्र संतोष याप्यो, अने पोताना मित्रने निर्नय पूर्वक मकाननी अंदर राख्यो, ते पीते मित्रे राजेंद्र पासे जर कला केलवी महाराजानी प्रसनता मेलवी निवाजसमा प्रधाननो अपराध क्षमावी तेने निर्नययुक्त अन्नपदाननो जोगी कराव्यो. कहेवानो मतलव एज के धर्म ते प्रणाममित्रनी पेठे अन्नयदानदाता-प्राणरक्षक एटले के जीवनेत्रण दोस्तदार ने ते ए के पदेलो देहमित्र, वीजो कुटुंगमित्र अने त्रीजो धर्ममित्र . पहेला दोसदार देवने हमेशा बान पान वस्त्र वगेरेथी साचवतां तां ते वगमी वेसी करेली ममग्ने विसरी जश्नाश पामे , एटले के सेवकनी सेवानी कशी कदर न करता वियोग प्रापे -पण पोतानो यतो नथी. चीजो कुटुंबमित्र पण ख श्रावी पमतां के काल भावी पदोचता परव दिवसोए साचवेली सेवा पता कदमी गरज सारतो नथी. सुखनोज संगी रहे . ज्यारे जे मित्र- मुखरी वेला सांगणा, उखरी वेला दूर; वे सझान वोलाविये, वदेती नदियां पूर. मतलवनाज संगी होप ते मित्रनो त्यागज करवो. श्रीजो धर्ममित्र ते प्रणामरूप १७७॥

तथापि कष्टमा पमेला पोताना पारापकने पान परजामा पण मनमानती नियता ने सुखसंपदा प्रापी अजय पत्र प्रापे रे. कडं पण ले के-चनमारणमां-शत्रुसमा पाणीमां प्रागमा- समुश्मा अने विषम विपदयाली जगामा फक्त धर्ममित्रज सहायता प्रा . माटेज कहेनानी जरूर ठे के वीजा मित्रना समान धर्ममित्र परम नपकारी . वेद-दोन या तेवो चोलमजीवना रंगवत् माग अने पण साये गेमनार . माटेज कदिये किये के- धर्ममित्र विद नदी, वीजा बिहमी जाप; इसो जापी धर्म सेविणे, इरत परत सुख प्राप! अर्थात् वीजा क्या मित्रो वदला वेत्ते, पण धर्मरूप मित्र कदी पण बदला वेसतोज नयी. जेश्री हे नविनीयो! नित्यमित्र सम देद , कुटुंब पर्व समान; हितकर जाणो धापणो, धर्म महा सुखदान, एपीज मूल लोकमां कहेढुंठे के अनित्यानिशरीराणि-शरीर अनित्य नादावंत ठे एम समजी धर्मनों. संग्रह करयो. PFCate पा०४ कूवामांनी पाणी न वापरिये तो ते पाणी निरोगी अने प्रखूट रहेतुंज नश्री; पण नसटुं गई यर कुःखदाता निवमे . एवीज रीते माया-धन पण खच्र्ये वावर्येज अखूट अने विमल शोनावंत रहे . केमके मूल श्लोकना त्रीजा पदमां कद्देल ने के-नित्यं सनिहितो मृत्युः-दमेशा मरण तो म्हों अगामीज फेरफुदमी दीधा करे . ते जेम चकलानी ऊपर वाज नचिंती ऊपट मारी प्राणने परलोक पहोचामे रे तेम काल पण नचिंते आवी दोट दे कोट मरमी नाखशे के वधी बाजी परवारी जशे अने कशुं जोर चालशे नदी. कझुंठे के- मंत्र तंत्र यंत्र जमी धरीही रहत घरी घरीहुको दोत न बचाव कहु प्रानको, दोरी धाव उपध उपाव कतु चले नाही दीप ज्यु उहाय जाय प्रेयों पवमानको; दरहीतें देखतही रोप रहें खगकुल परत अचिंत्यो आय दाव ज्यु सीचानको, गरी सव पार जार राज माया मोह जार अंतकाल शरण लजन नगवानको. माटे पमठायानी पेठे ताने साथे रदेला कालश्री वचवा धर्मनुं शरण ग्रहण करवू जेथी १

शाश्वत सुख स्वाधीन थाय ते. केमके धर्म प्रनुपरुपित सत्य धन , ते धनना सेवनयी अंनत
जीव अक्षय सुखना संगी पया, पाय ठे, अने अशेज एम जाणी हे जविप्राणी सुखनी खाणिरूपो
धर्म धननो संग्रह करी सदैव शाश्वत सुखना सेवनार थान के जेश्री कल्याणकमला वरो अने
फरी संसारमा फेरा न फरो!
व्याख्यान पांचमुं.
( अनुप्दर छंद.)
गतः सारेत्र संसारे सुखचांतिः शरीरिणाम् ।।
सालापानमिवांगुप्टे बालानां स्तन्पविचमः
श्री अरिहंत नगवंत सुरासुररोवित शातादाता नपत्राता एवं प्रकाशेल के हेनधिजीवो!
1-18++.

पुभाषित व्या०५ मंधा 1१८२ मम्पो; एथी अत्यंत आनंद मानी मस्त चिनवंत श्रयो दिवस निर्गमवा लाग्यो, कुवेरदत्ता साध्वीजीने श्रम तप करतां अने खांमानी धार प्रमाणे चारित्र पालतां कर्मक्षय घपे धवधिज्ञान प्राप्त थयुं अने अवधिज्ञान मारफत ज्यारे कुबेरदन शी दशामां वे ते तपास्युं त्यारे तो ते कलमाथी नीकली चलमा पमेलो मालूम पमयो, एथी कामदेवने शतकोटि धिःकार प्रापी विचारवा लाग्यां के-'पा जीव विषयसुखश्री कदि तृप्त थतो नश्री अने एना लीघे कार्य अकार्य करतां पण जरा मरतो नश्री. घनेपु जीवितव्येपु स्वोपु चाहारकर्मपु ॥ अतृप्ताः प्राणिनः सर्वे याता यास्यति यांतिच. प्रदा! धन एक करवाश्री, जीवनमादायी, स्त्री संबंधी कामन्नोगयी, अने नोजनपदार्थ जमवाधी को दिवस संतोप-तृप्ति पामतोज नथी!' इत्यादि इत्यादि विचारीने साध्वीजो शोच्यु के-“श्रदीयां पश्चाताप कर्ये कंश वले तेम नथी, माटे त्यां जर समजाववाश्रीज प्रयास सफल पतां धर्मनो वृद्धि थर अधर्मनो अंत आवशे." एम निश्चय करी गुरुपीजीनी आज्ञा सिन्न 1१८२।

FGUES मेसवी विदार करो क्रममद मथुरे पदाच्या अने कुवेरसेनानुं घर पूरतां तेणीने त्यां पदोची तेणीनी पासे रहवा माटे जग्यानी मागणी करी, एपी वेश्याए चित्रशालामा रदेवानी खुशी बतावी अने वोली के-'सानीजी ! श्रदीयां रदी पटली महरवानी राखजो के, कोर दिवस नपदेश न देता फक्त पुणगनीज वालो कर जो प्रने श्रमा वशुं रोतुं होय तो गर्नु राखजो. साध्वीजी त्या नद्यां श्रने धर्मध्यानमा सीन रदी घालो धारणाने सफल करवानो समय शोधशक्षाप्पां. एकगार पोरनी वखते बालक रोगा लाग्यो जेथी तेने बानो राखया साध्वीजी दावरमां गावा लाग्यां घने ते साधे घणी सगाइनो संबंध वताची अढार नातरी कदी बतायवां दारु की नार! रोना नह) ! जो तारी ने मारी एकज ना तेथी तुं मारो ना धाय १, पती तुं मारा घणीनो दीकरो जेश्री मारो दीकरो पण पाय ते २, तपा मारा पतिनो तुं नहानो भाइ दोषाश्री मारो वीर पण प्राय ले ३, मारा नाश्नो दीकरो होबाथी तुं मारो नत्रीजो पण प्राय वे ४, मारी मानो पति तेनोना दोवायी तु मारो काको पण प्राय ५, अने शोक्यना ht-1.94 मंग्रा पा०६ होवाथी पुत्र पण पाय .. आम तारी ताये उ सगपण . तेमज तारा बाप साये पण उ सगपण ते पण कहुं बु.कुबेरदतनी अने मारी मा एकज ने जेश्री ते मारो नाइ याय .१, मारी मानो धणी जेथी ते मारो वाप पण थाय . २, मारा काकानो बाप दोवाथी ते मारो वाउन पण पाय ठे. ३, शोक्यनो दीकरो होवाथी ते मारो पण वीकरो श्राय . ४, मने परणवाना सबवथी ते मारो पति पण पाय . ५ अने दीअरनो वाप होवाथी ते मारो ससरो पण पाय ठे. ६. आम तेमनी साधे पण मारे उ सगपण . अने तारी मा साथे पण एनीज रोते उसमपण ते ए के-मने गर्नमा राखी तेथी ते मारी मा थार. १, काकानी मा दोवाथी ते मारी वमीमा धाय . २, मारा जाइनी बहू होवाश्री ते मारी मोजाइ पण पाय वे. ३, सोक्पना दीकरानी दोवायो मारी वह धाय 2. ४, मारा पतिनी बहू होवानी मारी सोक्य पण थाय ठे ५, धने मारा धणीनी माता दोवाय ते मार सासु पण पाय . ६, आम तमो त्रणे जण सागे मारे १७ जातनी सगावे." वह आ प्रमाणेनुं बोलq सांजली वेश्या रातोपीली थर नीचे प्राची साधीजीने कहेवा लागी-. वाद! वाद !! पंचमदावतधारिणी उतां प्रावु अप्सत्य केम नवरोबो ? वगर पूर्वये जुतुं बोल. वायी अधर्म गणाय रे. कही वतावो के तमा वोलेढुं सर्व रीते साचुंज वे ? साध्वीजीए श्रायश्री अंत सगीनी दकीकत कही अढारे नातरांनी सगा सावित करी बतावी. जेषी ते वनेना मनमा महा संताप भयो भने पश्चाताप साये विचारया लाग्यां के पापणाधी बहुज अनिष्ट-पुष्ट कर्म प्रयु ! गजब गुजयों ! मदापापना दल बंधायां! हा! शीरीते चूटको शे! खचीत पा संसार सार वगरनोज ठे. फक्त सार श्री वीतराग देवनो धर्मजले. 'वगेरे वगेरे पापनो पाताप करी वैराग्यपूर्ण चिन अये ते वेन जणे पुत्रने अनाथाश्रममां सुंपी दीक्षा ग्रहण करी. भने तप जप को करेला कर्म क्षय करी प्रायुना अंते मरण पामी देवलोकमां देवतापणे नत्पन्न पयां. ग्राम संसारनो संबंध प्रसार ठे, एश्रीज व्याख्याननी नूमिकाना श्लोक- प्रथम पद कहे ठे के गतसारे संसार-सार-माल रदित आ संसार . इम जागी धर्मनोज सबंध करवो श्रेष्ठ है.

व्या०५ पभाषित प्पापा 4155:51.... १८॥ Hf9:425. पुनः बीजा पदमां कहे के-सुखतांतिः शरीरिणाम्-संसारनी अंदर मनुष्योने सुख से (शारीरिक सुख होय ) एवी एक शांति-नरमनाज रे. वास्तविक रोते जोशुं तो संसारना. खतर जीवनमा फक्त मधुविंऽना जेटलुंज सुख मानी सेवा जेवू . एटले के मधुबिंडानी एक कथा ते या प्रमाणे - एक मनुष्य कोइ बखते वननी लीला जोवा किंवा अगत्यना प्रसंगने अनुसरी वनमा गयेल. इतो अने वनमा पोतानी मुराद पूरी पामतां दरम्यान एक जंगली गांको हाथी दोमतो तेनी तरफ. थावतो जणायो के ते जीव लइने नाशी पोतानो वचाव खोलवा लाग्यो. थोमेटे जतां एक गंनीर वमनुं काम जोवामां श्राववाथी ते तेनी ऊपर चमी एक जबरी वमवाइने अवलंबी लटकी रह्यो. सटकचानुं कारण ए इतुं के-ते वफनी वझवाइ नीवे एक जंगी घेरावादार कूवो इतो जेथी ते वझवाइ नजीक दाश्री प्रावी शके तेम न इतुं. तेमज हाथी कदाच कामना थमने नपामी ले तो पण मा कूवामां पमतुं मूगीने मारो जान बचावी शकीश, एवा इरादात्री ते लटकी रह्यो दतो. १८४ 21060 दायी पण वोट देतो वह देवल भावी पदोऽयो अने यमने श्रम सदित उपामो नाखवा शूटनी सवलताश्री अमने दचदचावा लाग्यो. परंतु श्रम घ[.मजबूत होवाश्री तमां तेने तुरत सफलता मसी शके तेम प्रयु नदी; तथापि ए प्रयु के, ते श्रमने घंघोलवानी पाखं काम कंपी नग्युं, तश्रा जे वझवाश्ये ते जपत्तीत मानय वलगी रहो दतो ते शाखा पण कंपवा लागी. प्राम प्रधाथी ते शाखाना मूलमा रहेलो जंगी मधपुमो हतो तेनी माखीजनमो, अने ते मनुष्यना शरीरने पातानो परानव करनारमानी चटका जरवा लागी. प्राधी कं कष्टमांतो मणा रदी नही, शरीर सूजी गयुं. वेदनानो पार रह्यो नदी. क्यांक क्यांक तो लोदीनी तसेरो पण. फूटो नोकतो अने बलतरा वलवा सागी, ते उतां ते माखीनने ते मामी शके तेवा हाय तूटा कराय तेम न इतुं. शुं तेने एदलीज पीमाश्री पती जाय तेम इतुं ? ना ! जे शाखाने ते वलगी रह्यो हतो तेने घोलो भने कालो एम बेवर कापी रया दता, जेणी त्यां वघारे बखत दकी शकवानो संचव रह्यो नहीं. नीचे पमतुं मूकवानी भाशाने अमलमा लेवा धायु तो ते नीचेना गदेरा कूवामां चार जयंकर मोटा साप अने (एक) प्रजगर दता तेनीने पतोखोराकमसे एवी लालसापीम्हों फामी जीनना सपकारा करी रदेजा जोवामा पापा. प्राची दवे ऊगरयानो एके पारो रह्यो नहीं. मरणनो वायदो पूरी करवानी पर नजीक नजीक पावती जणा. तां पण प्रा वघा दु:ख अने लपना विसारा रूप ए आनं- पमा ते वधू विसरी जतुं जगायु. ते ए के, ते मघपुमाने को मालनो गोदो वागवायी माखीननु कोठे पर वेदा जवाना घे पुमामान मिट मघ टपकवा लाग्युं अने ते मधD टीपु ने जयथी वींटापता मानवना म्दोमां यात्री पमना लाग्यु. आ मधविना मलायो वधु :ख विसारे नाखी नेमांज तालीन बनी गयो. पण मरणे पोतानो केदी करवा तेनी चोमेर गवणो नाखो हतो तेनुं तेने जरा मान रझुं नदी. एटझुंज नहीं पण तेवा समयमा एक विद्याधरनुं विमान त्यां श्र पसार पर्नु हतुं तेमां वेली विद्यावरीए प्रा वापमा खियारानी बीतक बात ध्यानमा सह पति प्रत्ये -'प्राणनाथ ! प्रा मरणने वायदो पुरी करवानी प्राणी कार पदोचेला खग्रस्त जनने प्रा. पण पनाची सइपे प्रने विमानतारा तेने तेना पर पहोचतो करी.' विद्याधरे को-'ए मामार्य ARMIRIRAM मांध लोलुप मधविना सुख प्रगामीश्री दूर पर पोतानो बचाव करवा नादशेज नही माटे या श्रम शा माटे करयो जोश्ये ? ' विद्याधरी खोजातीना नियम प्रमाणे इम्पूर्वक बोली के-'प्रा. टलां मुखोपी मुक्त पनामां मधुविजनी सासचने कोइ उहाली गणे के ? पुरुषोना मन दमेशा कोर निचोर होय . "इत्यादि सांजली विद्याघरे पोतार्नु विमान ते मधुविंचना लोलुपीनी समीप राखी कहेवं शरु कयु के-दे नाइ! दये जखमां कशी मणा रदी नश्री. मरणना म्दीमां कॉलियो थानीज तयारीमा अने हो जीवने मूक्पे मार्ग नयी माटे तुं आ विमानमा भावी जा के जेपी तुं प्रा वां खोनी चूटकारा पामीशे अने ज्या तारी मरजी दशे त्यां तने पदोवामीश. दाल तुरत तुं भावी जीवनने सफलता मेसववा तत्पर प्रा. प्रावी वाणी सांजली ते आतुरता साथे कदेवा लाग्यो-'ना ! मने कगारो तो तमारो मोटो मानार. पण जरा मदेरवानी करी फक्त एक प्रपन टो मारी जीन पर पसे तेटलो समप मने पदी प्रोतया यो, मने ए मपछि वधा खोनो विसारों करावी रहेल ठे. अदा ! Hththi Int समापिन व्या०५ , मंत्रा ८ -- उखनुं तो सातपहुं नावल जमी रयुं , पण मघडि अयंत मिष्ट होवाथी मने ए :खनी दरकार कमाती रहे , माटे एक टीपुं पावा द्यो' आम एक टी' पमयु के बीजा टीपानी ला- सच बघी भने वीजुं पमयुं के त्रीजानी आशा बंधाइ. ज्यारे टीपानी लालची मुक्त यतो जोवा. मां न पायो पारे तेनुं स्वरूप पोतानी स्त्रीने समजावी विद्याधर विमान सहित पोताना पं) परवयों ना मधुविनी लालचमां लटकता रह्या. नेदरोए शाखा कापी नाखी के ते गदेरा कू. यामां परयो भने पमतांनी सायेज अंदर टांपी रहेला जीचोए ग्रास करी लीघो. नाइनो अंत पायो भने ते साये या मधुविधुनी वातनो पण अंत श्राव्यो. तथापि आमांश्री सार ग्रहण कर. वानो ए वे के-जय-संसाररूपी अटवीमा प्राणीरूपी जीवात्मा विहार करतो रहे ; परंतु तेनी पाउल कालरूपी दायी प्राण सेवा दोट दे रहेल दोवाश्री जोववा माटे फांफा मारतो फरे ने, प्रने प्रायुरूपी वनाइए यलगी रही जीवनने बचाया यत्न आदरे ; पण नथी जाणतो के वमना यमरूपी शरीरने कालरूपी हाश्री मूलमांधी खेमया मची रहेल , तेमज अंघारियु अने . १ अजुनालीयु पखवामिया रूपी वे-काला अने घोला नंबर आयु वयाइने कापी रह्या अने मोद रूपी कंमा कूवामां पमी वचवा इचनारा प्रालिने क्रोध मान माया तथा लोन रूपी धार जयंकर सापो तथा राग यने क्षेप ए रूपी वे अजगरो तेने पोतानु नक्ष करवा म्हों कामी जीन लपकावी रहा . यां वैरी सगांव्हालां रूपी मधमाखी चोमेर चटका मारी संताप्या करे उता पण फक्त सांसारिक सुख रूपी मधना टीपानी लालचमा फसायलो प्राणी गुरु रूपी विद्याधर जिन वाणी रुपी विद्याधरीना वोधथी धर्म रूपी विमान के जे धारेले स्पले (स्वगापवर्गमां) पदोचा- झवा शक्तिमान के तेनुं शरण लेवा प्राग्रह करे ये; तथापि तेमने वायदो वतावी खवेष्टित मघ. विजमा लीन रहेल . जेथी गुरू धर्मविमाननो तेने लोका न गणतां पोताना अन्य स्तुत्य कार्यमा प्रवनें ते. पाथी अंते आयु रूपी कमवाइ पक्ष मास वर्ष व पूर्ण कपाइ जतां ते अनागीन प्राणी मोदकूवामां पमी कृपायोनो कोलियो बने अने नवघ्रमणाने वश येलो जीव जवज. समां सीन इ जाय . 4761-0000052424240P Topicp+4.

पा०५ 41' पोराको जाले वे के प्रमे मुग्यो धिये; पण वास्तविकपणे जोतां सांसारिक सुख मांझ- वाना नोर (म गजर तृप्मा) जेधुंज . एटले के तापना समयमा जेम दरिलो ताश लागया. दो पायोनी पनो मेरा सारा रणमा प्राम तम नजर फेरने ; पण त्या पाणी दोतुं 'नग्री; पालोजी रेता सरोवर मरमा प्रमाण देखाव नजरे पमतां ते मेलवयानी आशाए वोमी माटो : पण प्रापर वो रोते पाणी न दोवायो ते श्राघु ने प्रायुं जणातां ताप, तरश ने पापी दंगन पइ माने तावे पाय . एज रोते संसारी जीवो पण सुख मेलवयानी प्रा. याने प्रवची ग्राम तेम दोकादो करे ये; परंतु पाखर धारेवी धारणा ब्रमरूप नीवमता ना में मात्र वनी-दाप वॉय करती मरणने स्वाधीन पाय ठे. कदाच सदेज सुख म तो मानाची प्रज्ञान यातनी पेठे अंगूठो धावतां स्तनपान- मुख मानो लेतो ते परिणाम दया . मग तो माना स्तनरानयोज नागी दशके. कांश अंगूठो चूस्ये नूख नागे नहीं. अंगूठो घमाधी फन पातानीज जार रोनाना म्होमा प्रावतां ते पदार्थने अंगटामाग्री मोखो मानी प्रानंद माने ; परंतु सत्य बुदिपी तपासता ते तदन देला तरी समज . या तो जेम कूतलं कायसा दामकाने करमतां ते दामकानी करचो पोतानीज वाताना पेठानमा नाकात तेमांधी सोही नीको तेने ते हामकामांत्री ममता लोदीना स्वादने मानी यानंदी बने , म पोतानांज वैया-बोकरा के जे पोतानाज लोहोविकारनां गुवमा छे तेने पाटा पट्टी वगेरेनी संता. लथी साचबवामां कालजी धरावी पोतानी कुदालता माने ; परंतु सत्य रीते जोता एसपना पोतार्नुज लोही चूसनारा के तां ते लोदी चूसनारने पोतानां जीवनमाण माने एज महा ध्देला . माटे ए वधी जलोजया दूर करी मा जर परतवमा सुखसंपनि प्रापनार धर्मनुंज सेवन करी जन्म सफल करवो के जेथी यात्मकल्याणर्नु सुकान इस्तमा रहेता जवादधि तरी आत्मारूप जहाज पार पक्षोचे ! and-445...

पाम्यान न.
(आ.)
मागनंगुरे श्रमारे, माणुअनवे अन्नपालसाग्न्येि:
मा इनिअमिनं, जं कीर मोहाणो धम्मो.
सम्मानायक दोनदपात्र प्रातमतिराज विनुवन नूपाल श्री देवाधिदेव जिनराज महाराज की
गर-दोनाजनो! मा मायामपी मंमार अमार के उतां या संसारनी अंदर दश दृष्टांत
मनुष्य जन्म मालपणे प्रत्यंत मुक्षेत .
। दुजा समग भने जाप रप य मुमिण चसय ॥ चम्म जुग परमाणू दसहिंता मगुअलंने।
पूजार्नु , पामा- २, धान्य, ३, जुगाग्नुं ४, ग्लनुं ५, समर्नु ६, चकk 3, कूर्मर्नु ,
ऐनगर्नु , मने परमाणुन १० मा दया दृष्टांत नीन मुनक.
१९८८

1-0-01-01:54...+2 प्रश्रम चूलाना दृष्टान्ततुं स्पष्टीकरण मा प्रमाणे :-एक चक्रवर्ती राजा अमुक ब्राह्मण उपर खुशी भइने बोल्या, “ दे ब्राह्मण, तारी इछा होय ते माग, ई प्रापचाने तैयार ढुं" परंतु ब्राह्मण पोतानी स्त्रीने वशवर्ती अएलो दोबाथी बोल्पो के हुं घेर जश्ने परी विचार करीने मागीश. राजाए कमु लले जान घेर विचार करीने मागजो. या प्रमाणे चक्रवर्तीनी सम्मति मलवाश्री ब्राह्मण घेर अाव्यो, इवे स्त्री पुरुष वेन एकान्तमा वेसी विचार करवा लाग्या जे शुं मागवु ? गाम गरास मागवाश्री प्रापणे नसटो व्याघि वधशे. आपण ब्राह्मणने तो दक्षिणा सहित नौजननी प्राप्ति श्राय तो तमाम मलेलुं गणाप. माटे स्त्रीए कहा, 'जान, वारा दीठ नोजन आपणने मले एबुं जश्ने मागो. स्त्रीनी शिकानुसार ब्राह्मण चक्रवती पाले प्रावी नतो रह्यो त्यारे चक्रवर्तीए कहा, 'माग, माग; मागे ते पापुं.' त्यारे ब्राह्मण विकस्वर मुखे चोच्यो जे हे महाराज ! आपना राज्यस्तरमा वास दी अमने दरेक घर घरटी नोजन तया दक्षिणा तरीके एक सोना मदोर मले एयुं हुं मागु .' .

व्या. मवापिस मा मंदा १८. आचात सांजली चक्रवर्ती आश्चर्यमा मग्न थइ विचार करे ये के नले पुष्करावत मेघनो वरसाद परसे तोपण पर्वत पर तो पाणी तेनी नपरनी जग्याना प्रमाणमांजरी शके. खेर, जेगा जेना लाग्य तेवुन तेने मले छे. श्राम कणवार चकित बनी विचार करी ब्राह्मणने प्रथम पोताने घेर नोजन करावी वे सुवर्णमहोर पापी विदाय को. हवे चक्रवर्तीना उन्नु कोम गाममा चूला दीप नोजन लश्ने ब्राह्मण फरीने चक्रवर्तीने घेर श्रावे खरो ? कदाच देवना अनावधी वारा पुरा करी फरी चक्रवर्तीने घेर श्रावे तोपण मनुष्य जन्म फरी मलवो उर्जन . हो वीजा पाशक दृष्टान्तनुं विवेचन करे :-चंगुप्त राजानो नंमार वधारवा सारु चाणाक्ये । एक देवनी धाराधना की, त्यारे देवे प्रसन्न प्र तेने दिव्य पाशान आप्या. या पाशा वझे जे को वाजी रमे तेने कोइ जीतो शके नहि. श्राम दोबायो तेरो एक पुरुष के जे चूत कीमामां कुशप्त दतो तेने सुवर्णनी गिनीनो एक पास नरी प्रापी तयाते दिव्य पाशा यापी शहरमा मोफरपो. दले ते पुरुष मोटा रस्ता पर बेप्ती बोले वे जे दे लोको, जे मने जीते तेने हुं आ सोना महोरी नरेलो पाल श्रा', अने जो हुं जीतुं तो फक्त एक सोना महोर खेनं. आम जाणी घणा सोको तेनी साये रमे है, परंतु कोइ. नाश्री ते पुरुर दारवो उन ठे. तेमज मनुष्यावतार पण संत समजयो, दये त्रीजा धान्यना दृष्टान्तनुं स्पष्टीकरण:-5नियामां तमाम प्रकारनां धान्यो एक करी तेमा एक पाली सरसय नांखो कोइ एक सो वर्षनी घरमो मोशीने ते धान्यनो राशि जुदो करवा हुकम करवामां आवे तो ते मोशायी ते दरेक धान्य अलग अलग धq बहु पुर्वन वे, तेम मनुष्य- नो अवतार पण नवे. चोयुं यूत दृष्टांत:-एक राजाने एकप्तोपाठ स्तंन्नवाली एक सना , प्रत्येक स्तंननी यंदर एकतो यात दांतो ने, एक दिवस एक पुत्रने राज्यनो लोन यो जे मारे राजानी गावी उपर वेस, श्रावात मंत्रीए जाणी. हवे राजाए तमाम पुत्र प्रपौत्रने एका करी कडं के लाइ ! जेनी राज्य सेवानी इचा होय ते मारी साये जुगार रमे. मने जीते ते राजा प्राय. परंतु तेनी 5151HE पा० पहासमा मंडर रीति प्राप्रमाणेः-एक सो ने आउ दाव ज्यारे तमाम एक साथे आवे त्यारे एक दास जीते, वली जो तेमां बच्चे राजानो दाव पके तो तमाम व्यर्थ थाय, एवी-रीते एकसो आठ हांस जीते त्यारे एक स्तन थाप. तेवीज रीते एकसो आठ स्तंन्न जीतवा जेम खन ने तेम मनुष्यनो जन्म पण उर्सन . पांचमुं रत्ननुं दृष्टांतः-कोइएक शेरनी पासे परंपराधी उतरी प्रावेलो तेमज पोते पण न- पार्जन करेलो, अनेक नोनो संग्रह इतो; कोइ पण ददामो ते एके रत्न बहार काढतो नहोतो. एक समये ते देशान्तर वेपारने माटे गयो, दवे पुत्रोए विचायु जे पिता लोनश्री रत्नो बहार का: दना नथी, घरमा क्रोम सोना महोर उतां पापणी ध्वजा जीजा कोटीध्वजनी माफक केम न चमे? एम चिनारी देशावरथी श्रावेलां रत्नो वेपारीने दाये वेची नांख्या, अने कोटीध्वज, बन्या. शेव देशान्तरयी प्राध्यो, अने रत्नो वेच्यानी वात जाणी, तया पुत्रोने ते रत्नो पाठा बाखया लूकम कों, परंतु दो ते रत्नो पाठा मलवा पुर्सन्न रे तेम मनुष्य जन्म पपा वर्मन .

हुं स्वप्न दृष्टांत:-कोइ एक दिवसे, मूलदेव तथा एक जितु नजयिनी नगरीनीवहार एक कोटमीमा सूतो , तेनामां चेन जलने एक सरखं चं पान- स्वप्न पाव्यु. मूलदेव कठयो, नव- कार मंत्रने गणी, देवदर्शन करी तथा फल फूल दायमां लक्ष निमिनियाने घेर गयो. विनय पूर्वक पोतानुं स्वप्न निवेदन कयु, अष्टांगना जाल पंमिते प्रथम पोतानी पुत्री साथे विवाह करवान मूलदेवनी पासे कबूल करावो क्युं जे मूलदेव ! तने प्राजश्री सातमे दिवसे राज्यनी प्राप्ति श्रशे. ते प्रमाणे ययु. हये निकुक वालक पण नठपो, तो तेणे पण गुरु पाते जर कां, "गुरुजी मैंने रातको सारा चंका पान किया," गुरुजी अपक्ष होवाशी बोल्पा " बालक! आज तेरेको घी गुमसे युक्त चंशकार रोटी मिलेगी." एज प्रमाणे यु. कालान्तरे दवे या निक्षुक वासकने मालूम पम्यु जे मारुं तथा मूलदेवतुं स्वप्न एक सरखं दतुं, परंतु में विधिपूर्वक स्वप्ननी क्रिया करी नदि, में जो ते प्रमाणे कयु होत तो हुं पण राजा पात, दवे हुं फरीने तेज प्रमाणे एवाज स्वप्नने माटे प्राज व्या०६ पूर्वोक्त फूटोमा जश्ने शयन करु, प्राम विचारी चंपानना स्वप्न माटे गयो, परंतु हवे ते स्वप्न जेम पुर्तन तेम मनुप्यनो जन्म पण उर्जन के. सात, राधायेधनुं दृष्टांत:-एक स्तंजनी उपर पाव चक्र निरंतर फरतां रहे, तेमांना चार वक उलटा फरे, अने चार सुलटा फरे . तमाम चक्रने पाठ आठ यारा , तेनी उपर एक पूतली ले ते पण चकनी माफक फरती रहे है. हवे ते पूतलीनी माबी आंखने, नीचे जरी राखेली तेजनी कुंकीमा पमता प्रतिबिंब तरफ हट करीने, जे को पुरुष वाण वो विधे तेणे राधावेध साप्पो गणाप; परंतु ते जेम न ले तेम मनुष्य देह पण पामवो उर्लन चे. भाग, कूर्म दृष्टांतः-अमुक विस्तीर्ण तसायनी यंदर एक काचवानुं कुटुंब प्रानंद सहित निवास करे . ते तलावनी अंदर लाल फूल एटली वधी बंधाणी के के जरापण जलन दर्शन पq उर्सन ने, परंतु एक दीवसे कर्म योगे वायुना जोरथी सेवालने खसवु ले के तेज वखते का. नवाने त्पांज मोक यदार काढची , तेवा समयमा काचयाने पूर्णिमाना चंझना दर्शन यां, का. ।२९१॥

चवे विचायु जे हुं एकतो अपूर्व आनंद जोगबुं तेना करता मार। कुयनी साथे आनंद लेनं तो ठीक, मा विचारी कप पाणीमा गयो, अने कुटुंब परिवारने लइने पागे आव्यो तेटलामां तो ज्या सेवाल खसी गइ हती ते विज्ञ बुराइ गयुं, कूर्म फरी फरीने पाक्यो, परंतु दवे जेम ते विह पामवु उर्सन ने, तेम मनुष्य जन्म पुर्जन . नवमुं युग समीला दृष्टांत:-कोड एक विद्याधर वे लाख योजन प्रमाण लवण समुनी अंदर युगने (घोसराने ) पूर्व किनारे नांवे तथा समीला एटले धासरामा नाखवानी खोलोने पश्चिम किनारे नांखे, दवे ते केन एकठा य खोलो घाँसराना विमा स्वयमेव श्राववी दुर्लन तेम म. नुप्प जव उर्सन समजयो. परमाणु दृष्टांत:-कोइ एक देव एक स्तंनो चुरो करी तेने वासनी नलीमाजरी, मेरु पर्वत पर चमी दो दिशामा फेंकी दे, हवे ते परमाणुनने एकत्र करी फरी संन्न बनयो माणसश्री उसन। तेम मनुप्यनो यवतार उलन जाणवो. 405 शुभाग न्या०६ १९९२ फेटलाएकनकि परिणामी जीवो दश दृष्टांते दुर्लन केवल मनुष्य जन्मने समजे , परंतु तेनी साथे एटलुं पण विशेष जाणवू के मनुष्य जन्मनी पूर्वमा पण एटले हीन्श्यि त्रीनिक्ष्य अर्बु, एम चतुरीयि पावत पंचेन्दिप थते पण दश दृष्टान्ते कुर्लन , तेज प्रमाणे मनुष्य जन्म पाम्या पची पण धार्यदेशाविकनी जोगवा मलवी ते पण पूर्वोक्त दा दृष्टान्ते करीने उर्लन जाणवी. कदाच मनुष्य जन्म प्राप्त प्राय; परंतु आर्य-पवित्र क्षेत्र तथा श्रीजिनवरत्नापित धर्म पामको अत्यंत मुदत . उता पूर्व पुण्यना संयोगव एवधा संयोगो प्राप्त थया, तो जीव प्रमाद बलथी धर्मनु सेवन करतो नथी. ते तो पुत्रना के बीना स्नेहमां अनवा धन, धान्य, परिवार, मित्र, बैनर अने रूपयादिमां लीन रही धर्मनो अनादर करे ये जमी नव दारी जाय रे. पण जीवने जाणवानी जकर वे के संमारनो संबंध बनावटी . थने एनो ख्याल श्रवा मेहश्वरदत्तनी कथा ध्यानमा सेवा जेवी रे ते ए के- विजयपुर नगरनी अंदर महेश्वरदत नामनो व्यापारी रहेतो हतो. तेने पुत्र न हतो जेथी १९२।

मम ते चिंतामा निमम प्रतिववा लाग्यो-'मारा मरण पठे मने पाणी कोण मापो! श्राद कोण करो ! पुत्र वगर नखोतियान पर शूनुं गणाशे ! पुत्र विना सद्गति पो नदी अने कहा पए के अपुत्रस्य गतिर्नास्ति स्वगों नैव च नेव च तस्मात् पुत्रमुख दृष्ट्वा पश्चात् धर्म समाचरेत् ॥१॥ अपुत्रियानी गति यती नथी, तेमज स्वर्ग मलयार्नु पोतुंज नश्री, ते माटे पुत्रनुं म्हों जोवामां आवे त्यारवाद धर्म करवा उद्यमी यq.' वगेरे वगेरे चिंतची अनेक देव देवियोनी वाधा मानता औषध प्रयोग मावि उपयोगमा लीधा. एग्री देवयोगे स्त्रीने गर्भ रह्यो भने गर्नकाल पूर्ण श्रये पुत्ररत्ननी प्राप्ती इ. आम दोवायी यपार यानंद प्रयो. अवगति थवानी चिंता दूर गइ. पुत्र महसेननी लालन पालन प्रीशान पोपण के पुत्रनी मावजत अवा लागी भने शुक्लपकनी चंकला समान दिनमतिदिन वर्षमान दशाने पामी पुत्र मोटो पतो चाग्यो. विद्याभ्यासनो सुभाति प्याख्या संग्रह व्या०६ ४, वेठेलुं अपमान ५, अने बानो नेद ६ मा वावतो सदा. गुप्तज राखवी योग्य जे. कारण जाहर करवाची लोकहांसी ने घरमा हानि.थवानो संनय रहे . आम अवाथी मदतेननी स्त्री मनमा समजी गइ के-'माझं कुकर्म नजरोनजर जोया उता जारनो नाश कर्पो; पण मने कशुं कडं नहीं, तेमज ए वात क्यांय जाहेर पण न करी जेथी मारे अनाचार निवारी दीर्घदर्शी पतिनी सेवा करवी एज हितकर ,' एम विचारी सदाचारने तावे रही ते पतिलेवा करवा सावधान रहेवा लागी. महसेननो पुत्र जेम जेम मोटो यतो चाल्यो तेम तेम पोते घणा प्यारणी रमामतो महानंद मानतो इतो; पण ते जाणतो न हतो के जेने में रोपवा पर वेजान का ठे ते शत्रुज आ पुत्रपणे पेदा थयो के अर्थात् शत्रु ते मित्र थ३ प्रकटेल ने अने राखेलो ते पुत्र पर महासेननी स्त्रीने पण प्रानंद प्रापी रहे ये एटले वहूने मातार्नु पद पापी जार पुरुपनो जीव मस्त बने . एक समय पोताना वापनुं श्राइ पायवायी श्राइने दिवसे पितानी सद्गति थवा माटे पिंक +FANA ट्रेन आपया विचारी महसेन पोताना वारनो जीर पामो यो तेनेज खरीदी लामो अने तेनोज वध करी पिताने पिंक याप्यो. यदा! पितानाज पिंकना मांसपी रित्ताने कपी! पिताना नामग्री श्रादपिम थापी पितानी सद्गति करी (1) पुत्रना हायग्री पिताना जीवनी मुमि पर !!! ए प्रस्ताव समय एक ज्ञानी-त्रज्ञानवान मुनिमहात्मा विद्यार करता जता दता, मणे धामधूमने घ्यानमां सर ज्ञानोपयोगयो जोयुं ली अनर्थ जाणी मदसेनने प्रतिबोधवा माटे तेनी समीप जइ मस्तक धूणी ज्ञानी गुरु कहेया लाग्या- पुष्णाति स्वपितुर्मासं शत्रुमुचंगसंगतम् ॥ विधने च पितुःश्रा महामोहविनितम् ॥ १ ॥ पोताना पितानुं मांस खवाय , पोताना शघुन खोलामा लइ पितुमांसभी पोषण कराय ने, उश्मनने लालपाल कराय ठे अने म्होंघी कई के के हुँवापनुं श्राक्ष करी पिंक प्रापुं ते तेने मसतां सद्गति श्रशे. अहा ! जीचर्नु अजाणपणुं तो जुयो ! खरेज मोदनी यात महान विराम !! आई सांजली पाचर्य प्रने खेद साथ साधु महाराजने पगे लागी कहेली वार्तानो खुनासो भारत या०६६ गंपा पूग्वा लाग्यो. एटले महात्माए अथेति संबंध कही वाकेफ करी तेनो भ्रम दूर अवा उद्यम पादयों. अने निःशंक थवा महासेने (तेनी प्रतीति माटे) पुनः प्रश्न कर्यो-'के मारी मा कूतरी थर ले ते जीवती ने माटे तेनो कंइ दर्शनीक पुरावो आपवा कृपा करो.' गुरुए कह्यु-'आ वात साजल. तांज तारी माता-फूतरीने जातिस्मरण ज्ञान प्रयु ने जेथी तारा घरमा दाटेढुं धन एनी जाणमां दोवाथी ते खोदी वतावशे; माटे तेनी पाउल पाउल जा! पाटली वात श्रतांज कूतरी अगामी घर अने घरमा जइ दाटेलुं धन खोदी बताव्युं, एथी महासेनने गुरुकथित वचननी पूर्ण प्रतीती थ. श्राइ तरफ कंटालो वताव्यो. जैनधर्म अंगिकार को. स्त्रीए पण जिनप्ररूपित अहिंसा एज परम धर्म ते ए तत्वने कबूल कयु. अने ते पठी अनेक दान पुन्यना प्रकार उपयोगमा लर सुकृत्य करवावके जीवनगाली आयुना अंते वेन स्वर्गे गया. या प्रमाणे संसारनी सगाइनो संबंध ठे एथी सार रहित होवायी असार , अने तेमांना दरेक पदार्थो पलमा फालेला फूलेला तथा पलमा करमार धूल साये मलेला नजरे पमे ठे. मात्र वापरानो झपट लागवायी दोयो राज था जाय तेवी-रोते मानवलव क्षणमा सय पनारो जणाय, अयया तो शरवनी वालपटा रगत उतां क्षणमां पवन योगपी विखराइ जइ तेनुं नाम निसान पण जशातुं नयी तेयो कणनंगुर मानव देह ठे. अथवा कावनी शोशी जेवो जराक ठवलाता फुटी जाय तेको नाशवंत मानवदेश . ए ध्यानमा सइ प्रसार संसारमा कणनंगुर देहरमे सार रूप जेनयमने शुभ प्रादरी पाली दया धर्मने दिलमा टांकी मानवजन्मने सफल फरवो अने जे जिनधर्ममे नूतसमयमा अनेक जीवो तर्या ठे, वर्तमान समयमा तरी रक्षा के अने नविष्यमा अनेक जीवो तरशे तेज वर्मन शरण लेवा सतत उद्यम प्रादरी कल्याण मंगलीक माला परवी एज श्रेयस्कर ! व्याख्यान सातमुं. (आर्या द.) संसारे मानुष्यं सारं हि मानुप्पे च कोलीन्यम् । कोलीन्पे धर्मत्वं धर्मत्वेचापि सदयत्वम् ॥ १॥ "590+Int व्या०७ . UPRESS त जगत केवलकमसावंत मुक्तिवधुकंतः अनेक सुरासुर सेवित नव्य जीवोना धर्मनो सार प्ररूपी गयेस ठे के-चार गति रूप संसारमा जटकतां दश व प्राप्त थयो एज संसारनुं सारपणुं . केमके जन्मस्थल चोराशी लाख प्य जन्म जेवो नव प्रशंसाने पात्र वीजो ठेज नहीं. श्रीउत्तराध्ययनजीमा परि वाणिया गांठे मुंमी वांधी लाज मेलववा परदेश गया हता. ते पैकी खी तेनी नुशलपाथलवमे विशेष सान्न मेलव्यो. बीजे सानन मेल- राखी अने त्रीजाए मुंभी गमावी दीधी. एवीज रीते मानवनव बनी गति प्राप्त करे ते मुंमी कायम राखी लान मेळव्यो गणाय अने तो गांउनी मुंमो गुमावी गणाय. आम हावाथी लाज मात्र, मूल न्ममां पण उत्तम कुलनी अंदर जन्म अने तेमां पण श्रावक कुलना "क्तपात य तो धन्यातिधन्य मनाय ; केमके श्रावक कुलमा जन्म सेवा ।

ARTH मदाराज जेवा पण उत्कंठा घराने के. अर्थात् जेनो पूर्वपुन्य संगप जबरदस्त योग तंज पार (अक्ष विवेक अने किया युक्त शुइ पायक धर्मवंत ) कुलमा जन्म गामे के. अरे ! ग्रावासमा पुत्र पणे तो शुंपण दास पणे पेदा थाय तो पण अदो नाग्य गलाय के जेमा वरदमेशां म. दावार सधर्म अने सक्रियाज जोवामा पालवामां आवे ठे. श्रावक कुलमा जन्मवायी धन्यवा- दने पात्र नथी; परंतु नपानक-पेयापेय-कृत्यारुत्य-लाजासान वगेरेनुं जाणपणा युक्त प्रति. पालन करवामां आवतुं होय, दया एज मुख्य धर्म ठे एम समजी प्राणांते पण दयाना किंचित परा नाग खंकन न पता पोप, एजले के पोताना जीन समानज परना जीवने किलामना-पोका तकलीफ-मनन उन्नावापणुं पूर्ण पणे जाणवा पासवामां थानतुं दोय एज श्रावककुल पान्यानो सार . नही के नामनाज श्रावक गणा जिननावित वचन प्रमाणे यथास्थित न चालतां घाम- घूम रूप धर्म मानी पापव्यापारमांज जीयन गाले ते श्रारक कहेवाय. आवक एकवीश गुणग्री असंकृत दोवो जोश्ये. ते कवा- १५ पोपी-परिणामे मुंदर काम एटले बहु सान ने योगी महेनतयातुं दोप अने केसगायेला मापसने पापाणवा सापक सेप तेवो काम करनारो दोय ते. १६ विदोपक-अपक्षपातपणे वस्तु. तना गुणदोर जाणनारो सोच ते. १३ वृधनुगामा-शानादी गुणे करी वृक्ष माणसनी पाग्ल पारनारो दोपते. १७ विनयी-भेना वो प्राउ प्रशारना कमनो नाटा कराप एवा सम्यक् शानद. नादी गुणोए करी मारत. ए स्तम-करेला गुराने वरावर जाणनार दोय एटले विना कारणे वरशा कानार गुरुमहागजने पण गरी बुझियो परम उपकारी गणीने तेमनु बहु मान करनारो दोपते. २० परदिताम्रकारी-पारस, हित करवामां नैयार रहनार तथा योजाने खरो धर्म पमा. मामा तार दोय. २१ जनवय-प्रात ययुं ते जाणवा सायक अनुष्ठान ते जेने यो पुरुष ते मुरे करीने सपर्नु पर्म कर्तव्य जाणो दशके ते. प्रने ममा परनो पोमा पानमां तो दोप नेज शुरु धायक गणाप . जे परनी पीम-पीर विचारे तेज पोर-महान् पुरुर गनाप के. कईं ले के- :१९८॥

देखो सब तन पीर है, पीर बिना तन नाहि जे परपीर न जानदी, सो वेपी कवाय!! एज श्री तीर्थकर देवना उपदेशनो सार ते जाणी अमलमा आणी प्राणी पूर्ण पणे तेर्मा दृढ रहे तो मा जब भने परनय सुखसंपदा तेमज, अंते मुकिकमलाने वरी सिदपवनी नोका श्राप ! °ध्यारुपान आउk. ++ IIMS (गाया द.) महरा वुड्डा प पासह, गन्नहावि चयति माणया । सेणे जह वदृयहरे एवं आनवयंमि तु ॥१॥ श्री जिनेश्वर सकल उखहर परम सुखकर नमत सुरासुर नर नरयर नविकजनहितकर a आप्पाणान सोशनिवारणार्थे उदवणाना सय भगर ग्रोवंतना मनने शनि आपका समय विशेषवांचालाय. นาคต गुमापि 'प्यारा मंदर व्या०८ मानव शरीरनी स्थिरताने मांटे या प्रमाणे कही गयेल के-हे महानुनाव ! आ संसार असार पुःखतणो मार ठे त्यां कर्मनी वहुज मारामार . एवा संसारनी अंदर मनुष्य देह पामीने जे जो धर्म न कयों तेणे मानव देद पामीने नका जीवन गुमाव्यु कडेवाय. वाल्यावस्था बाल : खेलमां, युवानी रामाना रसमां अने वृषण हाय वोयमा वखत वीतावी.मरगना मुखमां स्थान से ठे तेनो फोगट फेरोज ठे. केश्क मानवोने रुष्टपुष्ट महा स्वरूपवंत, रूपवंत स्त्री, मनदर बालक । यने मनमानता धननो संयोग उतां तेनो वियोग स्वीकारी पराणे यमदूतोना तावे थर्बु पके, ते । पण व्यर्थ जन्मारो गलाय . कोइ जीवो गर्नमांना गर्नमांज मरणने शरण बीजी योनिरूप फारागृहनी कोटमीमा केदी बनी रहे रे. केइक मास उमास वर्ष वे वर्षज जीवाने या फानी बुनियां शरापयो कूच करी बीजे मेरा नाखे ठे. केइक रोग शोकना नोग घर म्होतने मेलवे ठे ए वधांननो जन्म नकामोज श्र पसे. जे जीवे गत जन्मनी अंदर दया न पाली दोय-हिंसा । पापकर्मज कीधा को दोय ते जीवो टुंफ पावरदावाला पाय ; जेणी घेरे येरे बगासु खाते, PREPRISESSISEster गेकर वागते, के हृदय बंध पमी जते जीवन सफरने संकेलीले . आजीर का काली मार कालरूप वाज वचिंतो ऊपट मारी, किंवा कबूतरना वना कार समती कागमो साग अणयारी मपट मारी पोताना परिवारश्री विखूटा करी मोक मरमी नाखे प्रने ते नमाना मा बाप पंगा मां ची चा मचावी बने तेलु करे ; तो पण निईप प्रापि नकी पोताना नकने खाना रामशरण करी देवे. एज मुजय प्रापणा मानव शरीरकार पण रले पले काल दोट दह देश ने ते केइ बेलाए कोट मरमो चोटनी सफलता मेलरशे तेनी कशी गावर पम्तो नग्रो. नाले पनी मा वाप नाइ बहेन प्रादि सगां सतीजा रूले रतले अने चेतुमार यांत साय वाती मायां फटी कटियां चुंटी देहने दुःख प्राप; तयापि ते जीव तो गयो ते गयोज. फरी ते फोह प्रकारे गेनारांन तरफ समणो वाली शकतोज नयी. माटेज हे जीर! सदैव धर्म-करणी कर्या कर के जेपो ते कालं पण कशुं न करी शके तेवो गतिनो जोका पइ सके. तारा मनमा एवं न जायतो के मारे मरवुज नथी. कोर पदार्थ प्राणिमात्र अमरपटो सखावी लावेलज नयी! तो पनी स्थिरता शी PRINA या०८ पीरती करी के-'हे तरणतारण परमोपकारी परमात्मन् ! वदोतर वपनी वेकी वे तेश्री एकी पपा एक समप पधारी पी सिह पदने प्राप्त करो!' एना उत्तरमा परमेश्वर महावीरे ए फरमा' के- ॥पको न सन्ने प्रगती, वह आखे वीरः॥ इम जाणी जिय धर्म कर, जब लग रहे शरीर.॥ इत्पादी बोपारा इंधने समजायी जाहेरमां आप के निमायली आयुमर्यादामा कोश्यी पटामो के पारो या शकनी नदी. एयी हे जीवो! को जीवन माटे गर्व न करहशो केमके:- ॥ जे नर गिरि कंपास्ता, मायर पूंट नरंत;॥ ते नर घरतिमें सम्या, मत कोन गर्व धरंत. ॥ अर्थात् जे पर्गतने पर धूजाची नाखता दता अने दरियानुं पाणी एक घुटको करी पी जता हना तेरा महान् प्रताप परा कोण जाणे केइ वखते धरतीमा समाइ गया तेनी पण खबर पमी नही, तो नु ते धरतीमा नही समावानो ? प्रलयत सामा प्रण हायनी घरतीराज समावानो. तीपंकर नगवान पण काल धमने अंगीकार करे , तेमज गणधर नगवान के जे काची . २०१॥

वे घमौनी अंदर चौद पुन नवटा मुलटा गणी जाय ते पण आयु पूर्ण श्रये रुपवार पण स्थिर रही वाके नदी तथा महाराज अनेक वेव देवांगनाना परिवार मध्ये विराजता उतां कालने तावे श्राप अने जेम वापरानी ऊपट लागता दीयो नलाय तेम देवपति मरणने कारण पाय ठे. बली चक्रवर्ति के जे १४ रत्नना निधानरूप, ६५ हजार स्त्रीनना पति, सवा लाख साइली, चो. राझी लाख घोका, ५ लाख हाग्री, ४ लाख रथ, अने ग्नू को पैदलवंत उ खंझनो जोक्ता होय . ते पण पाखर मरी जाय . वासुदेव के जे त्रसेने साठ संग्राम-समा पोतानो जातश्री करनार, प्रण खंपति उता म्नोंत पाध्ये तेथी समाइ सीधा विनाज शरण पाय . बलदेव के जे देवलोकनी के मोशनी गति पामवावाला ते पण काल खूटये पलजर टकया पाम्पा नहीं तो मी मनप्प हा हिसाबमा रे के जे संसारमा घार्या प्रमाणे स्थिरता करी शके ?! माटेज संसा. ना सर्व पदार्थानी अधिरता समजी जीच फरी जन्म मरणने शरण पर संताप बंध पामी खदास जणावो. २०

५५५
दया.८
१
नही केली तार मनु वगैरे देशाती, धर्म करती वंय करी, रोइ कटी पानं री ध्यानने यदा
RE मा पोले भने ते मानारनामाला जीवने नारकर्मी पवा नयम करवा. फेमके-
गगा मान.
वेतन रंग पतंग मरीयो, उमी जशे सही एतारेजी;
एनो ममता म्देली प्रजमी, चेतनजी कट चेतोरेजी.
बाजीगरनी बाजी जेवी, जगनी रचना जाणारेजी;
तमांशुंताबीन वनीने, मोज मजान मापोरेजी.
२
सगां सा वारपनां संगी, मित्र सह मतसवनारेजी;
ता. मां कोई नयी तेथी, तज तनी तुं तयनारे जी.
जगामी जेवी जे लक्ष्मी, ते न पदो कदि नारीरेजी:
मरन बनो मगर मामा, माने माग मारीरेजी.
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।
व
२०१६

बल प्रपंच ठोमी चटपटतुं, करीब्ये सुकृत्य-कमाणीरजी; मान वचन पूर्णनां मा, जरूर हितकर जागीरजी. ५ प्रिय श्रोतागा! ध्यानमा सेवानी खास जरुर ले के- संसारमि यतारे मछि सुहे वादिवेषणा परे ।। जाणंतो इन जीवो न कुण्इ जिपवेप्तियं धम्मम् ॥१॥ ग्राम होवायो मा संप्तार सर्व पति प्रमार . फक्त धर्म एज एमां सार ठे. तेमज एज संसारनी अंदर अंदा मात्र पण सुख नयी. वस व्याधि यवनात्री नरपूर , त्यादि जाणवामा भावता उता जिनेश्वर प्रणित धर्म करता नपो. जे धर्म करे ठे तेज नवसमुश्ने तरी पार पदोचे प्रने उनरोत्तर श्रेप मंगल क्षमता प्राप्त करे . एम जाणो जीप्राणी वीतराग देवनी वाणी प्रापे सहदे पाले मांजले ते मानव परजव पानंद मंगल वरीयते पंचम गतिनो नोक्ता प्रया मनस शांति दितार्य शांति प्रनुर्नु पान परो.

या०९ १२०४॥ रामा मास यता नयो भने शरीरे मबल रदी दरेक कार्यमा फतेद मेलवनार पाय . प्रोजो धर्म तपस्या ठे, ते करवा-पासवाथ) अशुन कर्मनो अंत प्रावे . अशुन कर्म पाठ प्रकारनां ते एके-शानावरणी कर्म, वर्शनावरणी कर्म, वेदनी कर्म, मोदनी कर्म, प्रायु कर्म, नाम फर्म, गोत्र कर्म घने अंतराय कर्म-ए पाठे कर्मनी अंदर फसावाग्रो जीव विविध दुःख लय मुर्गति प्राप्त करे रे ते तपस्या पाराघवाना प्रताप नाश पामे , अर्थात् तपस्या करनार जीव फर्म रदित पर पंचमी गतिनो नोक्ता थाय . धोथो धर्म सारी नावना नाववी. जे जीव सारी नावना नावे ते जीवनां नगारां कर्मों क्षय पाय . केमके नावना जवन्त्रमणानो नाश करनारी . तेमज दान देवामां, शील पालवामा तपस्या करवामां पण तारी नावनानी खात जरूर , जो ए सर्वनी अंदर सारी नावना न होय ते वधुं गर कार लीपण का जेवू नकामुं जाण.जावना अनित्यादि वार प्रकारनी रे ते नावतां नवसमुइ निन्नौतिवझे तरी पार जवाय ठे. ।२०.८॥

Td4.-541 6.CE 140-11 केक जीव शानदेवाधी, केइक जीव शौरपालवानी, के तप करवाधी अने केईक जीव जा. वना नाववाश्री नीम नवोदघि तरी गया, जायचे अने अधिधमा तरशे, ए निर्विवादको विषयवे या चार विध धर्मनां मूलतत्वो जाना उत्सुक थवानी विशेष जरूर . दरेक बाबत कार चोटियापणे सांसयाथी तेनो खरो रूपाल के नंमा रदस्पनी पिगण पमती नश्री. नले श्रो सपाय तेनी दरकार नहीं, परंतु ते शुक्षपणे-परमारमानी श्राज्ञा प्रमाणे थाय तो अवश्य कथन मुजवज फल मात थाप वे. ज्यां लगी लोकरंजन माटेज जे कं धर्मना चारे प्रकारने श्रमलमा मूकाय ते के यथार्थ- फल श्रापी शकता नयो. बखते अनाज्ञाना संगी थतां लानने वदले दानी दान लागे के. सांसारिक व्यापारमा पण वस्तुनो पूर्णपणे नाव समजी, नफा तोटानो रूपात राखी ला. समयपर तेनु वेचण के खरीदी करवामां आवे तो वेशक नफोज प्राप्त थाय ठे. नि, झील, तप, जाव-ए चारना पण नेद, नियम अने फल वगेरे तथा - +1+2+4+gat व्या.? पुर्णपणे पानमा सा तेनुनी उपयोग अमसमां मकाय तो निःसंवेदपणे रोजर मममानतो मानदारी साप . एम जाणी नम्प माली निज हितने ध्यानमां पाणी ए चारे प्रकाराने इट-नपासना रूप धर्म मानी तेमनुज सेवन करो के जेया था जव थानंद-मंगल-कमला वराय थने परनवमां मुक्ति लक्ष्मीने वरीप्रजर अमर पवाय-या वचनोना नियमने जे को श्रोताजनो सानले पाले सद्दे तेनने पर मंगतिकमाला प्रकटे घने मुखवादल विघटे ! FRRESS-2-2' व्याख्यान दशम. ( अनुप्दप छंद.) देवपूजा गुरूपास्ति स्वाध्याय: संयमस्तपः॥ दानं चेति गृहस्थानां पट्कर्माणि दिने दिने ॥१॥ १२०० श्रीजिने जगवान नरें सुरे३-वंदित-पादपद्म, देवदेवेश सेचित वीतराग पन्नो गृहस्थाश्र मनां नित्यकर्म था प्रमाणे कश्री गपेल ठे के-पीतराग देवनी निरंतर त्रिकाल विधिवत पूजा करवो. तेमां पण ध्यपूजा अने भावपूजा एवा वे नेवले ते. झ्यपूजा ए जनना कपो एकवा करी ते यमे क्रमशः पूजा करवी. अने भावपूजा ए के-लगवाननी गुणस्तपना करवी, दर्शन करवां, मानसिक पूजोपचार सद उच्च नावश्रेणीनो संचप करतो ते ते. या श्रावकनी प्रथम करणो के. वीजी करणी ए वे के-सद्गुरुनी सेवा करवी. गुरुमुखयो सुशास्त्र श्रवण करी मनन करवां, नएवं गुणवू अने गुरुराजनो विनय करवो, तथा नाय नेद समजी हृदयमां ने संबंध) विचार बांधवो,२ रोजी करणी ए वे-नयकारमंत्र गणवो. स्वाध्याय ध्यान घरवू अने ते ध्यानको पापनी निनि करवो.

व्पा.१० ict पोपी करणी एके-प्रतिदिन नियम पसीनाके तो वीज, पांचम, पाठम, एकादशी, घोसा, पुनम, अमावामना दिवसे सीलोतरी, अनंतकाय, अन्नयनो त्याग करयो. अन्नदप एटर न बारा लाया वस्तुन वावीमा रे ते ए के- पंनुबर चल विग, दिम विष करगेय सब मिहोय ॥ राश्नोयणगंचिय, बहुधिय प्रणंतसंघाणा ॥१॥ गोरखमा वापंगल, अमूगोयनामाणि लफलपाणि, तुचफसंच चलियरसंवाद दद्याणि वायोसं॥२॥ पापग्नी पोपियो', वमना टेटा २, गुलर-नवरानां फल ३, काकोबर पाकर (काला नंब- राना पर गृवर ) छने पीपरना फल ५, (ए फलोमां कोणा-सूक्ष्म सजीव घणा दोय ते माट- गा। पाप नत्री.) नार महागिय ने एज के-मघ ६, दारू , मांस, अने ए, मांखण ए गाना र ननना रग मायाज ममूर्णिम जीवानी उत दोय रे माटे एनमो नपयोग करवायी मना ना पाप घने दारमा गंगा श्रवाय। जिंदगी जोग्यममां श्रावी पवे. वीजा धर्नामा mila - -...-044415 - 1२०६ 'मद्ये माले मधुनिच नवनीत तातो बहिनीत उत्पद्यन्ते विलीत धतिमूहमा जनुगमगर 11 सन प्रामे च पत्यापमानना जस्मसात्कृतम् ॥ तदेतझापते पापं मधुविपन्नकणान् ॥2॥ दारुनी, मांसनी. मपनी थने ठायी अलग करेला मांखानी अंदर अत्यंत मूक्ष्म जंतुनना समूह पेदा थाय वे श्रने लप थर जाय . तया सात गाम लाद्य म्हेली वाल्या होय तेरनु पाप एक मर्नु टोपुं खावाश्री मात श्राय . माटे ए चारे चीजो अन्नक्ष्य , ए दीम वरफ घसंख्याता अपकायनो पिंक जेनी ते यनदय . १०, तया केर अयवा तो महेरी वस्तुनयी बनेकी चीजो-योपधियो शुरु करेल उतां पण परिणामे पेटमा जीवात पेदा करी शरीरन दानि पहोचामे जेपी ते अन्नक्षय . ११, करावीदजल विकार पामवायी करा रूप वरसे वे तेती अंदर असंख्य अप्पकापनाज जीवो ते माटे ते खावासापक नयी. १२ स जातनी माटी खमी मुलतानी माटी-मटोमी परा अलक्ष्य ने, केमके तेना वावायो पेटमा पीमा, पांकुरोग, सोजो, श्यामपर, प्रांतरमाननुं समवू, श्रने पेट पपी श्वास तया अाक्तिनुं वयg ए रोग पदा पा.१ Aarti 14 ते माण साधे जेटा . शिवाप पांसी-क्षप अजीर्ण-उचलता पण प्राप्त करावे . ते वावा सापक नयी. १३ रात्रीलोजन करवू नहीं; केमके राते जमवाथी पाणी पीवानी यो प्रजा पाप . अजीर्ण ए सर्व रोगर्नु मूल रे जेथी राते खावू नहीं. ते वखते रात्री पतंगीयां जु कोको करोलिया वगेरे जीव जंतु अने वास वगेरे खावामां आवो जवानो संजय , भने ने यावामा प्रावदायी घणा रोगोनां वीज रोपाय , अन्यदर्शनमां पण कहेल वे के- रकोनति तोपानि, प्रनानि पिशितानि च ॥ रात्रीनोजन मक्तस्य प्रासे तन्मांसन्नक्षणम् ॥१॥ उदकं ना पातपं राबावत्र पुधिष्ठिर ॥ तपस्विना विशेषेण, गृहिणा च विवेकिना ॥ २॥ प रात्रौ सर्वदादार वजपंनि मुमघमः ॥ तयां पक्षोपचाप्तस्य फलं मासेन जायते ॥३॥ मूर्पा पपा प3 पाली मधिर-खादी समान अने अन्न मांस समान पाय रे. माटे राते जमनारने शोषियी लता माम गाथा जेटनु पाप लागे . हे युधिष्ठिर ! रात्रिनी अंदर पाणी गुपये न पा प्रने तरसीए तो मास कराने न पावू. जे मारी बुदिवाला ये ते रातमा एक - २०७ महिना लगा बिलकुल जमता नश्री तेमने एक पकना करेता उपवास (पापम्पमत) नुं फल मले ले. तेमज आयुर्वेदमां पण कडेल ले के-सूर्य अस्त श्रया परी नानि हृदयकमतनो मंकांच ग्राय वे माटे राते जमवाश्री गैरफायदो भाप रे भने भूक्ष्म जीवो पण अजाणते ग्वानामा पारी जाप के माटे राते खावु पोवु अनदय रे. १४, बहुवीज पंपोटा वगरे वाया लायक नी. १५. अनंतकाय के जे अनंता जोवना पात पातना हेतु रूपये माटे खावा लायक नयी. सतावर १, लीली वरियाळीनो वेलो २, कुमारपाटुं ३, पोर ५ गळो ५, लसण , पिंमानु , म जालना कंद ग्रेटले के सूरण वगेरे , बजकंद (ए, लीली हलदर १०, काचुं आई ११, वामकारला १२, गाजर १३, लूणी १५, लोठक कमलकंद १५, गरमर १६, तदन कोमल अवस्यावाला पांदमा, खरसूगा १७, प्रेग १९, लोली माघ २०. लोली मुसली २१, लूणा वृक्षनी गाल २२, खिलोमा २३, अमरबोल २४, मलानो कांदो २५, लामोफोमा २६, पलंग्खनो नाजी २०, वायो २७, नीयकोदोद्धं २ए, पलारेला धानमायो फुटेला अंकुर ३०, कुणी यामली के जेमां वीजनिसान पण न जगातुं व्या.? गुमान पापा भंडा हदि॥ अनश्यना नक्षषधी हृदयमा रुमि जीव पेदा प्राय माटे ते तजवा योग्यज . भावकनी पांचमी करणी ए के, पोताना शरीरनो शक्ति मुजव छ पर्वने दिवसे नव- फारतीयो मांझी नपरास प्रादि तपस्या करवा; केमके तपस्या करवायी नठारां कर्मो अने रोगोनुं मूल नाश पामे . माटे वार नेद वाली तपस्या अवश्य करवी. को करणी ए के-दान देवु. तेमां पण शुः साधुनी योगवाइ मले तो प्रति उनम, नहीं तो स्वपमी नाश्नने दान दवु अने कदाच तेनो पण जोग न मले तो उर्वल-अनाथ-कंगाल- बीने नोजन प्रापq. नदी के पैसा पाइ अनाज (रांध्या विनानु) प्रापQ. केमके ते वेचीने पापार चसावे . जोके दीन उखी तरफ कोमल चिन राखवु अने कशुं पण तेमना माटे नवनी शाके तो तेमना नसानी खातर सारी जीन वावी. नदी के खराब जीन वा निंदाना नागी श्रइ सारे कर्मों पg. मा प्रमाणे श्रावकने निरंतर करवानी ने करणी-कृत्यो ठे ते हमेशा शुक्ष लावधी करी ।२०-

जीवनने सफल करवं. केमके जीवननु मार्यतागुंए करणीनमांज ममाग ने. म जागी
नविमाणी हेत आणो या दितवाणीने मिलि गान सेनो जेगी ग्राना मुग्न मंदा पनेर.
नव चार देवलोक नवग्रीवेक पानअनुनर विमान अने गायन मोदनां मुग्न प्रात यार !
..+20.40-45
व्याख्यान अगीआरमुं.
..
(गामाद)
अरिहंत देवो सुगुरु, शुद्धं धम्मं च पंच नमुकारो॥
धन्नाणं च कयहाणं, निरंतरं वसई हिययमि ॥१॥

पशप व्या.११ मंदा परिदंत, महंत, दीनदयालु, नक्तवत्सल, अनायना नाथ, यशरएशरण, पतितपावन, मधमनःमरण कृपासिंधु वर्षमान जिनेश्वरे नविक्रजीवोना नझार निमित प्राप्रमाणे ललामण करेली के के-दम्मेदशां शुरू देव, शुभ गुरु, अने शु धर्म ए त्रण रत्नत्रयी तथा पंचपरमेष्टि नमस्कार ( नवकार मंत्र ) या चारेनुं यथाविषियी तन मन वचनना शुक्षपणा सहित सदा सेवन कर तोज जीवन भन्य-कृतकृत्य गणाय ते. अर्थात् जे पुन्यशाली प्राणीनना हृदयनी अंदर निरंतर या चारेनु नच लावना पूर्वक स्मरण चालु रहे तो वेशक ते प्राणियोनुज जीवन सफल प्रने पन्पवादने पात्र . शुरु देव ते शृं, जिनश्वर नगवान ब्रह्मा-विष्णु-महादेवजी-नैरव-जवानी विगेरे ठे तेज के वीजा ? पाना ननग्मा एज नमाधान बचन के गमे ते देवमा अंशमात्र पण अहार दूषणो न दोप ते शुः देव मनाय . शुरु देवनी मूर्ति शांत अने नलीलानां चिन्दो रहित दोवी जोडये.

" २ . M ! धवार पा र गणाग ने के अन्नाण कोह मय माण लोह माया रइम अरश्मा निदा सोंग अलिपत्रयाग चोरिपा महर जपाय ॥१॥ पाणिवह गेमकीना पसंग हासाय जसर ए दोसा ।। अपार सवियागग नमामि देयाहि देवंतं ॥२॥ देव एक परिदंत विदीत, रागदेश जिरोजीस १ दोष अहार रहित हितकार । त्रियुगन जनन तारणहार ॥१॥ नाम उरण पन्नाव निचार, निषा अनुगोगनार । ई प्रकार एणि.. पर अरिहंता यो लेदनमुं जयवंत ॥ ॥ चवीसत्यो जाता नाम, जिननामे तसुकलं प्रशाम ॥ठवणाश्री जिनप्रतिमा कद्दी, जिननावे ते वंसदी॥३॥ पंचमझयण आवदपकत, अविकारें व्या.१२ . संग्रा ११॥ सं. बिचायों तक पचा जन्मारानो शुन बहाव खीधो मानवो. अश्रवा जेणे ज्ञानी जनो तरफ पूर्ण प्रेम राखी तेमना सेवना करी के शीलवेत, तपस्वी, आदिनी नक्कि साचवी तेणे पण जी- वन-साफल्यता मेलवीज समजची. अने जेणे नगवानश्रीनां प्ररुपेला भने गणधर श्रीनां गुंगेला गोतयेला पिस्तालीश पागमो एटले के प्राचारांग, सुयगमांग, गणांग, समवायांग, जगवती, ज्ञातासूत्र, नपाशकदशांग, अंतगादशांग, अनुतरोवचार, प्रभवेयाकरण, अने विपाकसूत्र ए थगीयार यंग तथा वाइसूत्र, रायपशेणी जीवानिगम, पनवणा, सुरपन्नति, जंबुद्दीपपन्नति, चंदपनति-निरीयावली, कप्पिया, कप्पवसीया, पुष्फीया पुप्फचूलीया अने वन्हीदशांग आ वार उपांग, तेमज चनशरण पयना, महापञ्चरकाण, तंजुल वियाली, चंदा विजय, मरणसमाधि, आवर पञ्चरकाण, नतपचखाण गणीवीका, देविंदस्तव अने संस्थारक मा दश पयन्ना, तथा वृहत्कल्प. सूत्र, जीतकल्पसूध, मदानीशीय दशाश्रुतस्कंध, व्यवहार सूत्र, नीशीपसूत्र प्राउ वेद ग्रंथ, तथा आवदयसूत्र, दशनकालिक, उत्तराध्ययन अने पीक नियुक्ति सूत्र या चार मूलसूत्र अने अनुयोग- १२१४॥

...P4TA क्षार तथा नंदीसूत्र एवमलो पितासीश जैनागमतेमर्नु बहु मानयी जे पूजन, वाचन प्रने सांना वगरेमा नत्तम नाव राखी मनन करी ते विचारोने घाचारमा मूठे ते जीवने मानन जन्मनी सफलता मली मानवी. आउ प्रकार जे पुन्पात्माए विधिपूर्वक प्रादर्या पाण्याने ते नव्य जीवो नमो दधिग्री तरी पार पहोम्या, दाल पण तेम करे ते पार पहोचशे अने नविष्यमा कोइ करशे तो ते पण अ. वक्ष्य को पार करवानाज एम जाणी हे नविप्राणी!नाव प्राणी वीतरागीनी वाणी, हृदय. मां धरी तेने पालो-अंगीकार करो के जेथी उन्नय नवमां मन मानती सुखमंपदा अने यावत मोदनां सुखनो प्राप्ति पाय!" इति सुनापितव्याख्यानसंग्रहः समाप्तः httNAL

॥श्री वैराग्य शतक.॥
०००
मा राग अने उसपी नरपुर एवा प्रसार संसारमा सुख नश्री; मा वावत जायतां उतां
जीप जीनेश्वर कदेलो धर्म प्राचरतो नयी...
माज, काल, पोर, परार घन मलशे एम मनुप्पो चिंतये , पण खोवामां रदेला जलनी
माफक मापुप्प गले ठे ते जोता नयी! २.
दे मनुप्पो ! जे काले करवानुं दोप ते त्वराग्री प्राजे करो. काल बहु विघ्नवालो . माटे
बोजा पोरनी पण राद जोता नहि...
संसारना सरुपर्नु वर्तन तो जुन ! प्रेम अने स्नेहमां लागेला पुरुषो जे सवारमा जोवामां
मापा दता ते सांजे जसाता नयी. ४.
द सो! जागवाने ठेकाणे मुझ न रहो! नासवानी जग्याए विश्राम न करो; रोग, जरा
-PREPARESes
1२१५॥

(वृक्षवस्था) भने मृत्यु भा प्रण तमारी पु सागेला . ५. चंपने सूर्य रुप वलद रात्रिविसरूप धमानी दारख जीवनुं आयुष्य का जल प्रहाण करीने कालरुप अरहने फेरने के. ६. कास रुप सर्पश्री खवाती काया जेपी पारी रखाय तेवी को कला नयी, तेवु को यौपच नथी. तेमज तेवी को दोकमत नश्री. 3. मोटा शेष नाग रूपी जेनुं नालबुं , पर्वतो जेया जेना केतर ने, दिशान रूपी जेनां पांदमां , एवा पृथ्वी रुप कमसमापी मनुप्य रुपी रसने कालरुपी लमर पी जाय वे ए खेदनी वात के... शरीरना गयाना बहाना बसे सकल जीवोना विश्ने शोपतो काल कोई पण प्रकारे मनुः प्पनी वाजु गेमतो नथी; तेटला माटे धर्ममा नयम करवो. ए. पा अनादि काल विपे जुदी जुदी जातना कर्मने वश थपेसा जीवोने एवी एक पण स्थिति नधी के जे न संत्तने, (प्रति सपनी स्थितिमा प्रा जीव जइ आयो ते.) १० राम्य शतक. २१६॥ सर्व बांधवो, मित्रो, पिता, माता, पुत्र, स्त्री वगैरे मरेला स्वजनने जलनी अंजली आपी स्मशानथी पाठा वले . ११. रे !:जीव ! पुत्र तथा पुत्रोननो वियोग प्राय . वांधवोनो वियोग पाय ठे, स्त्रीननो वि. योग थाप , फक्त एकनोज वियोग यतो नयी अने ते जीनेश्वरे कइलो धर्म . १२. आठ कर्मना पाशवी बंधायेलो जीव आ संसार रूपी केदखानामा रहे है, यने आ आठ कर्मना पासथी छुटो धयेलो श्रात्मा शिव मंदिरमा रहे . १३. वैनव, सगां स्नेहीनो संबंध अने विलासथी मनोदर एका विषय सुख मा सवं कमलना पांदमांना किनार पर रहेला पाणीनां विंना जेवा चंचल . १५. हे मनुष्यो ! ते बल क्यां गयुं ? ते यौवन क्यां चास्यु गयुं ? ते शरीरनी शोजा पां जती रही? या सर्व अनित्य , कासे या सर्व दतुं नदतुं करी दीधु ते जुन्न भने निमारो. १५. नारे कर्म बंधश्री बंधायेलो जीन पा संसार रूपी नगरना चोटा निपे विविध प्रकारमुख •25-2424 कमाने सीधे अशुभ, अपवित्र भने अशुचि द्रव्यमा नरेला गर्नवासमां अनंतवार बसेलो. १३. या संसारमा जीवोने नत्पन्न प्रवानां स्थान चोराशी लाख कदेला ने अने एकेक स्थानमा या जीव अनंतवार उत्पन थयेलो रे. १७. जुदा जुदा नत्पनि स्थानमा नुत्पन्न श्रयेला अने संसारमा रहेला माता, पिता, बंधु वगेरेथी आ जगत् जराएj a; पण ते लोको तारुं रक्षण करे तेम नयी, तेमज तने शरण रुप श्रइ शके तेम नथी. १ए. खत्री घेराएलो जीव जल वगरनी जग्या नपर माउली जेम तरफ तेम तरफ से; वघा जीवो ते जुए के, पण तेनुं दु:ख दूर करवा कोई समर्थ नश्री. ३०. दे जीव ! पुत्र स्त्री वीमेरे मने मुखना हेतु अशे एम तुं जाणीश नहि; संसारमा बसता PAN -Pre-PNE श्री वैराग्य शतक. 1२१८ २०२७SPPSESSESE सघलु तारुं शी रीते ? ३१ आ शरीर कणलंगुर ने, वादलना समूह जेवो आ मनुष्य नव चंचल ते दरम्यान जे. टलो धर्म करी लीयो एटलोज खरो सार . ३२ जन्म उखनुं कारण ने, वृक्षावस्था रोगर्नु कारण , मरस दुःखनु कारण , अरे ! श्रा संसारज :खमय , जेयो जोवो कलेश पामे छे. ३३ ज्यां सुवी इनिइयो नाश पामो नग्रो, ज्पा सुधी घरपण रुप राक्षसे पोतानुं जोर दाखव्यु नश्री, ज्यां सुधी रोगना विकारो थया नयो, ज्यां सुध। मृत्यु नेटवाने तैयार थयु नयो, त्यां सुभी हे जीव ! धर्म करी ले. ३४. ज्यारे आग लागे ठे त्यारे कुयो खोदवाने कोश्या पण वनतुं नयो; तेम मरण पावी पहोचे जीव केवी रीते धर्म करी शकशे ? ३५. हा अशाश्वत ठे, जगत्मा जींदगी वोजली जेवी चपस-अस्थायी चे, अने पौधन संध्या २:0SESe समयना रंग जेवं कणिक रमणिय दे. ३३. सदमी वीजलीना जेवी चंचल वे, विषय सुख मेघ धनुष्यना रंग जेवु क्षणिक वे माटे है जीव ! समज, समज, अने थावो न जेवी वात्रतामा मुंकार न रहे. ३७. जेवी रीते साजरे पक्षीननो संबंध ठे, जेपी रीते मुप्ताफरोनो रस्तामा संबंध ठे, तेवीज रीते दे जीव ! स्वजनोनो संबंध पण क्षशलंगुर . ३८. रात्रि पूरी थपे मारे विचार करवो जोइए के घर लाग्यु , उत्तो हुँ केम नेषु हुं ? श्रा कमंत्री वलता प्रात्मानी केम वेदरकारी करुं ? यने धर्म रहित दिवसो केम गुमायुर्छ ? ३५. जे जे रात्रि दिवस जाय ते ते पाग आयता नी; तेमज जे जीव रात्री दिवस अयम करे , तेना रात्री दिवस अफस जाय . ४०, जेने मृत्यु साथे भैनो , अथवा मृत्युग्री नाशी चुटवाने जेने बल ने, अश्या हुं मरीश नदि एम जे नको जारो , ते मनुष्य नविष्यमा धर्म करवाने नले मुलत्यो राखे, ४१. 499NE ATER श्री घेराम्य वैश जवी रीते वणकरो लाकमी नपरथी सूतर नखेमे, तेवीज रीते रात्री अने दिसस चाल्पा जाय , तेन आयुष्पने नई करे , अने गया परी पाग आवता नथी. ४२. जेवी रोते सिंह मृगने कालीने अवश्य मारे, तेवोज रीते मृत्यु अंत समये मनुष्यने काले , ते वखते तेना माता, पिता के लाइ तेमा नाग पमावता नथी ४३. जींदगी पाणीना परपोटा समान , वैनव पाणीना तरंगनी माफक अस्थिर ठे, अने राग स्वप्न तुल्प ये; जो तुं श्रा यथार्थ जाणतो होय तो ते प्रमाणे वरत. ४. संध्या समयना रंग जेवो अने पाणीना परपोटा समान आ जिंदगी , अने यौवन नदीना वेग समान ठे, उतां दे पाप जीव ! तुं केम समजतो नथी ? ४५. नूतने वली फेंकवामां आवे तेम मृत्यु देवे कुटुंबने जूदे जूदे स्थले फेंकी दीधुं . ४६ पुत्र, पुत्री श्रादि काइक गया, स्त्री काइक चाली गई, अने स्वजनो पण बीजे स्थले चाल्या गया.४७ ।२१९॥

जूदा जूदा जयोमा जीवे जे शरीरो धारण कयाँ तथा तज्यां तेमनी संख्या अनंत सागरना
विजयी परा मपाय तेम नश्री. ४८
जूदा जूदा जन्मोनी रमती माताननां प्रांसुनी संख्या समुद्रना पाणीना विन्न करता पण
वधारे श्राय. ए
नरकमां नरकना जीवो जे अनंत घोर दु:ख यनुलवे , तेना करतां पण अनंत गणुं अख
निगादमा जीव नोगवे . ५०
दे जीव ! विविध कर्मने लीधे ते निगोद मध्ये अनंत पुद्गल परावर्तन सुघो तीकण उख
सदन करेल . ५१
त्पांयी घणी महेनते व्हार नीकलीने हे जीव ! तुं मनुष्यत्व पाम्यो यने त्यां चिंतामणी
रत्न जेवो जिनवर धर्म तने मल्यो. ५२.
हे जीव ! पायो धर्म पाम्या छतां जेयो जब रुपी कुवामां पमीने फरीथा उःख नोगवg
-140"

वै००
પી
(१२००
पमे एनो प्रमाद तुं फेम करे ? ५३.
दे जीव ! जैन धर्म पाम्पो, उता प्रमाद दोपथी ते तेनु सेवन न कयु. हे ! आत्माना वैरी जी.
ग! घागळ उपर तारे घणो पश्चाताप करवो पमशे. ५४
पाप अने प्रमादने वश पइ जेनए जैन धर्मनुं पालन कयु नथी, ते विचारा जीवो मरण
पारो प्रावे घणा दिलगोर याय . पा संसारने घिकार हो, के जेमा देव मरीने तिर्यंच थाय छे
भने चक्रवर्ती राजा मरीने नरकाग्निमां वले . ५५
पन, धान्य, भानूपण, गृह अने स्वजन कुटुंबने तजीने कर्म रुपी पवनथो हणायला वृक्षना
पुष्पनी माफक जीव अनाप थइ जाप ठे. ५६
या संसारमा प्रयाण करनो जीव पर्वतोमां, गुफामां, समुना मध्यमां, कामनी टोचे
रहेसो ठे. ५३
हे जीव ! तुं केटलोक वार देव, केटलीक वार नारकी, केटसीक वार कीमो, केटलीक बार
१२२०॥

2018SNEHNURADESH पतंगी, केटलीक बार मनुष्य, केटलोक वार रूपवान, केदलीक बार मोळ, केटतीक गार मुनी अने केटलोकवार दुःली धाय ने. ५७ दे जीव ! तुं राजा श्रपो, लोग्दारी गयो, चांमाल श्रयो, वेद जाणनार अयो, सामी अगा, दात, यो, पूज्य भयो, शम भयो, निधन भयो अने धनवान पण प्रयो. ५१ 'आमां कोई नियम नधी, पण पोताना कर्मनी प्रकृति तेनी जेवी गति करे तेम जीव अनेक अनेक वेप धारण करी नटनी माफक वर्तले. हे जीव ! नरकम तने अनंत वार बहु प्रकारनी, उपमान यापी शशाप तेवी अने डाग पूर्ण वेदना मळेली . घर देव पणामां, मनुप्प पामा श्रने परतंत्र पणु पामीने अनंत बार बहु प्रकारर्नु भयंकर दुर ते अनुन्नव्यु के. ३२ तियंच जातिमा नत्पन्न श्र अनेक प्रकारनी जयंकर वेदना दे जीव ! ते अनुन्नवी ज.

जि०मा. श्रीजिनेश्वरमार्थना. यो अमेपजावृष्टि-रदोषकुसुमं फलम् ।। अहोपुरातपुष्पं पंदृष्टोनाथ ! सोचनैः ॥१॥ पायोदरतपुपोई, निस्तीदिनवार्णवात् ॥ अनादी नवतंसारे दृष्टो येन जिनोमया ॥ २॥ स. पमिरेद्र संपूज्य सर्वज्ञाननास्करः ॥ सर्वसत्वहितानंद सर्वप्तौरुप नमोस्तुते ॥ ३ ॥ मिल्पांबुल. रोपी निमतं नवापरे ।। उपाहग्रसितं नाय ! मामुगारयतारय ॥४॥ जन्ममृत्युजरारोग- गोकसंवासवैरिणः ॥ पृटनो धावतो देव ! मयिवारयवारय ।। ५ ॥ श्रयजन्म महानाग! अद्यवृ. पिानिधे ! ॥ अव मंगलाधीश ! तीर्णः सद्योनवोदधिः ॥ ६ ॥ यद्यप्तयः सुरावासो अद्यसद्यः समायपः ॥ प्रथमयःश्रियःमा मोक्षश्वजिनदर्शनात् ॥ ॥ त्रैलोक्याइनुतवृत्ताय त्रैलोक्पादन. तनपेलापानुनसौख्याय त्रैलाक्यानुतकीनये ॥मा विश्वप्रयत्रि नेत्राय विश्वत्रयहितेपिणे ॥शिवपानिनादाय नमोविश्वविन्तपे ॥ १ ॥ (मालिनीद) प्रशमरसनिमग्नं दृष्टियुग्मंप्रसन्न बदनामउमरःरामिनीसंगमन्यापरयुगमपिपदाम्पसंबंधवयं तदसिजगतिदेवोवीतरागस्त्यमेय१० ." 1२२५१ ॥ अथ श्रीआदिजिन चैत्यवंदन. ।। धादिमंपृथिवीनाथ-मादिमं निः परिग्रहम् ।। श्रादिमंतीर्थनार्थ ऋपनस्वामिनस्तुमः ॥ १ ॥ श्रीमन्नानिफुलादित्य मरुदेवांगजनो ! ॥ संसाराब्धिमहापोत ! जय त्वं वृपनवज ! ॥२॥ ( आर्या छंद. ) जयतिफन कायदातःकृष्णजटामुकुटमस्तिोपतः ॥ इक्ष्वाकुवंशतिलकस्विनु. चननूमामशिनंगवान् ॥ ३ ॥ ( उपेन्श्वजा द. ) सुवर्णवणंगजरांजगामिन प्रलंधवाई सुविधशाललोचनम् ॥ नरामर३ःस्तुतपादपंकजं नमामिन्नत्यावृपनंजिनोतमम् ॥ ॥ इति ॥ अथ श्रीदशान्तिजिननमस्कार ॥ श्रीमतेशांतिनायाय नमः शांति विधायिने ।। त्रैलोक्यस्यामराधीश ! मुकुटाल्पचितांघ्रये ॥ १ ॥ सुधासोदरवागज्योत्स्ना निर्मली. रुत दिङ्मुखः ।। मृगलमा तमः शांत्यै शांतिनाथ जिनोस्तुवः ॥२॥ नमः श्री शांतिनाथाय कृ. त विश्वाघमांतये ॥ पोमशाय जिनेंशय पंचमायचचक्रिणे ॥ इति ॥ ३॥ श्री नेमिनाथनमस्कार यउदासमुद्रः कर्मकदहुताशनः ।। अरिष्टनेमिनगवान् नूयारिष्टनाशनः ॥ १॥ नमो विश्व- +5%BE%E""storesureness चै०व० नाधाय जन्मतोब्रह्मचारिणे ॥ कर्मवल्लीवनवेदनेमयेरिटनमये ॥२॥ शिवगामिन् शिवासूनो! समुद्रानंदचंद्रमाः ॥ अरिष्टनेमिनंगवान् नूयाछोरिष्टनाशने ॥३॥ (नपेंद्रवजा बंद) अन्नंग वैरा- ग्यतरंगपूर्ण हदित्वदीयेयवंशरत्न ॥ कथंकशाग्योपिहिमांतुहंत यस्मादनगोपिपदंन लेने ॥शाति॥ अथ श्रीपार्श्वनाथनमस्कार || कमठे धरणेंद्रेच स्वोचितकर्मकुर्वति ॥ अनुस्तुल्प मनोवृत्निः पार्श्व- नायः श्रियेस्तुनः॥१॥ पार्श्वनाथनमस्तुभ्यं विघ्नविध्वंसकारिणे ॥ निर्मलसुमन्नातंते परमानंददा- पिने ॥ २ ॥ अश्वसेनावनीपाल कुलचूडामणे ! प्रनो ! ॥ वामासूनो ! नमस्तुभ्यं श्रीमत् पार्श्व- जिनेश्वर ॥३॥ इति ॥ अथ श्रीमहावीरप्रन्नु नमस्कार ॥ श्रीमते वीरनाथाय सनाथायाद्नुतभिया ॥ मदानंदसरोराज-मरालापाईते नमः॥१॥ सर्वपविधसामाद्य मादिमपरमेष्टिनां ॥ देवाधिदेवं स. पज्ञ श्रीवोरंपणिदध्मदे ॥ ७ ॥ कल्याणपादपारामं श्रुतगंगाहिमाचलम् ॥ विश्वांनोजरविंदेच वंदे श्री ज्ञातनंदनम् ॥ ८॥ (प्रार्या छंद) जपतिविजितान्यतेजाः सुरासुराधीश सेवित्तः श्रीमान् ।। विमल स्वासविरहित त्रिलोक चिंतामणिोरः ॥ १५ ॥ जयतिनुपनेक नानुः सर्वत्राविदितकेवला .२२६॥

लोकः ॥ नित्योदितः स्थिर स्तापवर्जितो वईमानो जिनः ॥ १५ ॥ जयतिनमदमरमुकुट प्रति- विधवविदित बहुरूपः ॥ ननुमिव समस्तं विश्वंनव पंकतो चौरः ॥ ६॥ (शार्दूल विकीमित चंद.) वीरःसर्वसुरासुद्र महितो पीरं बुधाः संश्रिता वीरेशानिहतः स्त्रकर्म निचयो वीरायनि- स्पं नमः ॥ चोरातोमिदं प्रवृत्तमतुलं वीरस्य घोरंतपो वीरे श्री धृति कोर्ति कांति निधयः श्री चीर नविश 3॥ इति नमस्कार चैत्यवंदना, ॥ पंचपरमेष्ठि स्तोत्रम् ॥ (वसंततिलका द.) लोकोनमास्त्रिजगतीजनताशरण्याः पुण्यपनावपरमाः परमेष्टिनोमे ॥ तीशसिगुरुवाचकप्तामुख्याः सौख्यापमंगलमदोदयदानदक्षाः ॥१॥ उन्नरशोकचमरामर. पुष्पवृष्टि सिंहासनध्वनिविशेषसितातपत्रैः॥ नाममलनेवरनिनासनाथ स्तेमंगलापनविनांनुवि- तीर्थनायाः ॥ २॥ आनंदमंदिरचिदात्मपरस्वरूपा रूपाद्युपाघिरदिता जवहेतुमुक्ताः । मुक्ताफसोज्व- कस्तो पतराः परमामराज ॥स्तेमंगलापत्तविनांनुविप्तिनाजः॥३॥ सद्भूतलकणगलागुणमेदिनूता नू. सायपपिकततीकरानुकाराः सूधार्थतार्थपरमार्थविवोगनीरा स्तेमंगलापनदिनांभुविसूरिवीराः ।। ॥४॥ याचार्पवर्षपदवी युवराजकब्याः सदज्ञानदर्शनयुताजितमोहशल्पाः॥ सूत्रादितंत्रमगिरोहण भूपरैश स्तेमंगलापत्नपिनांभुविवाचकेंद्राः ।। ५ ।। दोलांगतुंगरथधूर्वदणेधुरीणाः स्वाध्यायसंयमस- माविरिधिमवीणाः ॥ चरिमारकरिकुंजविनेदसिंहा स्तेमंगलायत्नविनांभुविसाधुसिंहाः ॥ ६ ॥ तोश्चराः क्रमविनम्रदरिमवीराः सिक्षाश्चप्तितिलनोरुललामदीराः ॥ आचार्यवाचकवराजगद~- पायाः सत्साघवधमपिसंतुरुतप्रसादाः ॥ ७॥ (मालिनी छंद.) पतपतसंतः संततंक्तिमतः परमिदपरमेष्टि स्तोत्रमेतत्पवित्रम् ।। सततमनवबोचे पेनवःसिहितौधे ॥ मदतिविमलचंद्र श्रीमति स्पानियासः ॥ ॥ इति श्रीविमलचन्द्रसूरिराजसतं पंचपरमेष्टिमंगलाष्टकम् .॥ ।२२७

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॥ श्रीसिघगुणस्तवना. ॥
(चोपा द.)
मंगलकारण नमिय निकाल कर जुग अंजलि म्देलीनाल
सिह गुण स्तुति जगतिये करु, जवसायर उत्तर जिम तरुं. १
एक अपेदा तदा अनंत, सर्व गिणुं ते अनादि अनंतः॥ अजर अमर कीपोनवअंत, वं सिद
सदा जयवंत.शावत देसण केवल नाण,निर्मल सम्यग् दृष्ट प्रमाण । मोद नरिंद मनाची पारा॥
पाम्युं तिहपुरी, ठाण.॥३॥जव्य अनन्य घावर प्रप्त नहीं। सनि असनिधि नको कहीः ।। पत्ता
पकन न होइ, केवल जीव सरुवी जोय |||| म श्री सिद्धी प्रकल अकलंक;समतृणमणि समनू-
पनेरंक; तस सरूप जोगीसर सदै, ध्यान ज्योति पातिकमल दहेः॥ ५॥ नरनय पामी सुधा वार,
तर संपम गुण विनप विचार; कर्म खपी पहोता नवपार, गति प्रागतिसंसारनिवार ॥६॥

श्री सि०स्त. सिद्ध गुण सामना. 1२२८1 लोक अप्रध्यायो श्री सिह, अलख जीव गुण रिक्ष समृ॥ ते को नदि प्रकट विवहार, जिण क- हिये श्रीसिइविचार ॥ ७॥ देखीतो तिहां कहो न जाय, अतो कहेता किमसमझाय; धन्य धन्य श्रीगुरुनी वाण, जगप्रकाश हुवो जस प्राण ॥ ॥ श्राचारंगे पहिले खंघ, पंचम अकया सिक संबंध, बहे नद्देशे गुण एकत्रीश, ते हुं समरु मन निश दीश ॥ ए॥ चउखुणो संबो वा- टलो, वलि कहिये परिमंझलो त्रिखुणो पंचमे सुठाणि, तेदनो जाणे इम जाण ॥ १० ॥ कालो नीलो ने पीअलो, रातो वर्ण वली गजलो, पंच वर्ण रहित श्री सिंह, प्रवचन मन निश्चल मन कीध ॥ ११ ॥ सुरनि उनि ए वेए गंध, जिहां सुए तणो संबंध; रागपिना कारण जेद, सिदे संगत टाली तेह ॥ १२ ॥ मधुरो तिखो कडुन जाण कसायलो अंबिल मन आण; पंचेरस सर्वत परिदरी, संवर शिवरमणी जिहां वरी ॥ १३ ॥ सुखो स्निग्धखरमीउलो, नारी सघु उन्दो सी- पलो; पाठ फरस इणि परि पंचवीश, प्रकृति निवारी थया जगदीश ॥ १४ ॥ काय रदित लेश्या सवि टली, संसार न अवतरसी वली; नीरा कों तिण तेदनो संग, न स्त्री पुरुष नपुंसक रंग ॥ "GIRRARENESS १२२८१ ॥ १५ ॥ सिह स्वरूप एगीपरे सही, रूप रदातसाता तसुकदी; पद विशेप तिहां कोई नही, कदणी पागम तेणे सही ॥ १६ ॥ कोइ न पम जिण तोसीएं, कोई न शवद जिणे बोलीएं; लोकश्रत एक गाउ तपो, उठे लागे क्षेत्र ते जणो ॥ १७ ॥ तिहां सासइ ठे सिद अनंत; काल अनंत न सहिये अंत; सुखसायरजल कोले सदा, समरते टाले आपदा ॥ १७ ॥ ति साप चम्यान) श्रेणि, संपम मंमि खिपकां श्रेणि; अनुक्रम पामी गण संजोग, केवलनाणी या प्रयोग ॥ १ ॥ सर्वत समत लदे विवदार, निश्चय सकल कर्म परिदार; अशरीर तिण मारग पहुं, धन दिन जिरा शिव मारग सहुं ॥ २० ॥ इणिपरि सिह गुरा स्तुति करी, तिरा गुणते प्रत्तु हियो घरी; पार्यवंशसूरीश्वर सीस, सिद प्रणाम करे निश दीश ॥ १ ॥ .2.65MENT ॥श्रीगोडीपार्श्वनाथजी-स्तोत्र.॥१॥ (प्रमाणीका द.) वरिष्ट इष्ट देवता सुगोमीपार्श्वसेविता; तपःमन्नावलासिता गुणोमु- न गोलो शर्षिता ॥१॥ परिव नार गोपति देताष्ट कर्म विश्रुतिः विवेक युक्ष्विाक्पति गुणेश्य सपतिः ॥ २ ॥ पझोमराजमंगसी गताब्दमार्गमगली; दिगंगनांगनूषिता नवगुणाधिपोपिता सीपधमीदाना तारकर्मपेरणा; सरत्मपावधीरिणी सुतंत्र तत्व नीरिणी ॥४॥ कुहिता भवंतमेत्यदूषिता; परे प्रवीणवारा थपास्तमानमत्सराः ॥ ५॥ त्वदीय पादनभितःपचकातिनः जनानवंति दूरतः गुन्नानिमेरमात्रतः ॥६॥ त्वदीयदानशामता हतारिता; किमस्ति कामधेनुका धनानुध्यसेवकाः ॥ 3 ॥ गुणा विलोक्य सर्वतः बारने दानतः वसंपनन्नविनमा नवचरीर अत्रमाः ॥ ॥ गुणाष्टकं सुखाकर सतां मानानु भंवर घारि नयी परै गुंणंउन्नकिनिन्नरः ॥ ए॥ (वसंततिलका छंद.) इत्यष्टकं गुजरतो गुरामाजिशनि स्सम्पर प्रयोगरुचिरं रचितं चिराय; श्रीमन्मुनेमिलशीलभृतो गुपणेदो पारित नग्नु नपतराय नूमौ ॥ १० ॥ (दालविक्रीडित छंद.) कोवालंधितुमिश्वतीद जल- सिंगोलन् नुशानांनरन् कोवा मेरगिरिसकीपतरता प्रोनितुं चेटते; कोया सागरमध्यरत्न १२२९॥

निचयान् संख्यातुमुज्झुलते तनेपि गुणाकरस्य निखिलान वक्तुं गुणान् कः (इंऽवजा वेद.) एवंतथाप्युत्सुकमानसेन मया-प्रणीतं तव नकिनावात् यचात्र उष्टं सुधिया विशोध्यं निसर्ग वाघदता हि वासाः ॥१२॥ ॥श्रीगोडीपार्श्वनाथजी-स्तोत्र.॥५॥ (शार्दूलविक्रोमित वेद. ) स्वस्ति श्रीपदमद्भुतं सुरुतिनामानंदसंदोहदं मुक्तिस्वीरम- प्रिलोकारणं कारुएपकल्पागमं ॥ संतारार्णवलंघने गुरुतरे निष्णातनियामकं चंदेवीतनयं मसिइसमयं भोगोमिपा जिनं ॥१॥ (नुजंगप्रपात छंद.) स्फुरत्स्फाररोचिःकलापानि- रामं जगज्जालजंजालदावानलानं; प्रनायोडुरंवंधुरं स्वर्वराणां, मजे पार्श्वपाच मनु गौडिपार्श्व ॥7॥ यदीपा यशोराजहप्ती हसंती सुधासिंधुशोना सती संचरंती; नमनाकनागाधिपैर्गीय- नारहारावलीसंविनीनां कणकिंकिणीमेखलाकंकृतीनां; गणैः सा- , स०६० पर स्वयंपूना समय ॥नजे ॥ ४॥ पदीयः प्रतापः प्रतिष्टां प्रयातः सदलांगुलझामसायातनो ति: मदीपान प्रकाशो यतो विश्वलोके ॥ जे ॥५॥ अपायादपैति स्मरत्राम घोराद्यदीयं जनो नू. तसे नूतिनूतं, जितो पेन चिंतामनियंत्र मुख्पः ॥ जे ॥॥ सुधासारणिं नक्तिमत्सूजिरंतं शरत् कालशुनाप्रमूर्तिपदंत; दपालुं दसंत महाजासकंदं ॥जे ॥ ७॥ यदि स्वांतपारं प्रयातुं प्र. पत्नो नपा स्तदा गौम्पिार्धाप नित्यं; नमस्कुर्वतस्ते पुनर्मात्रपातो ॥ जे० ॥ ॥ हृदिस्याय । दालोट पुग्पस्पयार्धस्तदा तस्य किं कम्यवृतः पुरोगैः किमय पशुः कामधेनुर्वराकी ॥नजेan | (प्रार्या उंद.) अष्टकमनुपममरचन्मंत्रपदेनापि गुंफितं गुणिना; यो जानाति स विक्षान् रत्ने सुरज पताधतं दारदां ॥10॥ इति श्रीपाश्र्धचन्द्रसूरिवर संतानीयगणीरत्नचन्द्रेणकता स्तुतिः ।। अथ तत्त्व विचाररूप उहा सोरठा. -- जिनमतना सुद्धा पणा, अवगुरा वोलं निन; जो इम चित्त चंचल करिश, धर्म सदिश किममिन?॥१॥ (२३०॥

श्रीजिन अवगुण दाखवी, रोहिणी गुणगण; लोहखुरे तो नोलव्यो, जां लगे हुतो अजाण ॥२॥ वित्रं सुत विस्तारिया, कूडा देई पाल, मुनिजनने ते वीसस्या, जां लगी हुँता वाल. ॥३॥ घरग रगको संनली, कोई पूढे एकुण पमयो; वसतो उत्तर दीघ, जे नर परवचने चडयो. 11 इत्यादिक दृष्टांत, लौकिक लोकोनर बहु; कुण पामे तसु अंत, इण वानगीए ते सहु. मनरसे धनरकाश, जिहने दीजे जेदवो पंचम अंगि ठे गण, भोगविपे वली तेहवो. अवगुण हुँतो जो कहे, तो मन परतावो किशु वलि संजलि अरात, ते तो जोईजे किशु. ॥ करसतां पहुंचे काल, पण जे अवगुण मन वश्यो; खिलखित पाप विशाल, ते पूछि जिद जाश्शु.॥ जे दे कूमो मास, अधमाधम ते जागीए; ते मोटो जंजाल, विण परख्ये मन आतिपे, मा जे कीजे पररूपा विना, तिदयी दुए संताप; नादल्नेद खरनी परे, पापे नाणे आप, जे कोज परख्या दिना, तिदयी दुए संताप; नकुरघाति जिम बंजणी, पापे जाणे आप. ॥११॥ जे कीजे परख्या पिना, तिहयो दुवे संताप; अंबद नृपतणी परे, आपे जाणे भाप, रशा १०स्त महावीर स्वामी स्तरन 2૨૪ समान, तिणे कारणे जाणीए निरुपमान. ॥३॥ अठे सूर शशि कमस हरि हय गर्यक,मणि काम गो कुंन सुरसाल इंद; इशा जग जलानाव नणिये अनेक, जिणि दिये किशो तासु उपमा विवेक जिम वनचर नयरना गुण न जाणे, जिम्पा लामुआ घेवर शुं वखाण करी बुझवे सजनने पंशु रेह, तिमस्वामीने एह उपमान एद. ॥५। जिनाधीश श्रीवीर निहुं वनवीर, जिणे जीतला मू. सथी कर्मवीर; यह केवली मनरली चोक केरी, करी तेम जिम वाणी न गमे अनेरी.॥६॥करूं वीनती वीरजिण तुम्ह थांगे, तुम्द दसण निर्मल बुद्धि जागे; प्रनो कर्मने योग में जनम पाम्यो इहां जारतें नूरि पाखंग नाम्पो. ॥ ७ ॥ घणा नवनवा जुजूमा धर्म नासे, सह वास आपापणे लोक वासे; अनेरांतणी दृष्टि निदे निशंक, हुन हुं हिये हरघडि म सशंक. ॥७॥ मन्नो जे न मानति प्रतिमा तुम्हारी, तिणे दीलि अरिहंत जिन आणहारी; वली जे जगि साधुनी नास्ति बोले, तिके विण कही पारको गांउ खोले. ॥णा करे व्याप व्यापारनो मूल पाखे, प्रनो ते किमे ताहरी आप राखे; जिके धर्म धारंन आरंन जाणे, नदी परखदे तिहज संवर वखाणे. ॥१णा सदी पाय 17 तेहने समितिन्नंग, तुम्ह साखि नापातणो मूल भंग; हिवं पत्नयो जे तुम्हे तेद साचुं, मन वचन तन स्वामि तुम्ह पनि राचु. ॥ ११ ॥ प्रजु मूरते नावि तुम्हने जुहारु, थरी पंच मा. सीम मनि मुगुरु धारु; दया थाणशुं धर्म करिशुंप्रमाणं, महावीरजी जिन नमो मे जिणाएं. ॥ ॥ २२॥ (कलश.) इम नगरी धगमी जगिठे पगमी तिणि गमे श्रीवीरजिष; प्रह ऊठी वंई मान थाणं, नवनव मांगु तुम्द शरण. ॥ १३ ॥ उपदेश वत्रीसी. (क्या गुमान जिंदोनी आखर मीहीमें मिलजाना ए देशी.) धानमराम सपाने तुं झूठे नरम नूलाना, झूठे जरम मूलाना तुं तो झूठे नरम भूलाना किसके नाइ किसको माइ, किसके लोग लुगाइजी; तुं न किसीका को नहीं तेरा, आपोआप स. साइ. प्रातम. ॥ १ ॥ चार दिनांका सब दे मेला, पिर कोइ न रहाइजी, हटवाने ज्यो उनियां साही, मिलि मिलि आइ जार. प्रा० ॥२॥ मंदिर मेमी भदेल चुणाचो, जातीयंघ झरोंखाजी;

पर जंगल पार पसारिके परुणा, घरणा कछु न घोखा. पा० ॥ ३॥ पघको खूबीदार उपहा, जामा जायसी पागाजी; साज सवेही नोमो चलेगा, धागा विन तुं नागाजी.पा० ॥ सहस नी जोगी लिसनी कोमी, अरव खरवकुं पापाजी; तृप्या लोन पलीता लाया, फिर फिर ढूंडे माया. आप ५॥ नूगा बदन त लेले, करता है सुप्तपोइजी; हंस उढते गिरे जमीपर, तनु वदवोइ दोइ. घा० ॥ ६ ।। या संसार सराद मंको है, जहां घर लख चोराशीजी; नाम कर्म सवही घर चुके है, जीव कमाउवासी. पा० ॥ 3 ॥ सोहु मांस वन्या या गारा, पत्यर हाम लगाएजी; पर सीपल चमको लाइ, श्रोत्र ार दिखाए. प्रा० ॥८॥धायु कर्म ले घरका लामा, दिन दिनमा करो सेखाजी; महेतल पूगा पलक न राखे, ऐसा का अदेखा. या० ॥ ए ॥ सांझ सवेर प्रवर न जाणे, न ग धूप अरु वर्पाजी; न गणे नेद मुलाजा किसका, पाउ सबकों सरीखा. प्रा० ॥ १० ॥ जीन वटाउके फिरि दोधे, करम चेजीरा संगीजी; जाइ अगाउ गेद वनावे, प्रीति यनारे चंगी. प्रा० !! ?? ॥ जोलों घरमें पाप बसे है, तोलों प्रीति वणावोजी; शूने पीछे गामो स्विरaasaraSIRSTERSISRUARY २३५।

जलायो, नावे नीर बहायो. मा० ॥ १२ ॥ जित घर अंदर मार वया दे, सो घरनांही तेराजी3B ऐसेसे घर बहुत वसाए, राद चलत ज्यो मेरा ॥ प्रा० ।।१३ ॥ जित घरको जप गेमी चल्या है, तिसको चिंत न यापीजी; नइ नइ फिर माया जोमी, तोमो प्रोति पुराणोजी. श्रा.॥ १४ ॥ जो आये तो सब जावेंगे, जीव सने जगवासीजी; अपणी त्रुटि कमाइ के विनु, जीवके संग न जासो. या ॥ १५ ॥ यद है जीव सदा अविनाशी, मरि मरि जाय शरीराजी; इसकी चिंता कवुय न करणी, दुर अपणे धर्मधारा. आ० ॥ १६ ॥ सदात साखतुं जोघ लजावल, लमते जंग अकेलेजी; ब्रह्मा विष्णु महासुर दानव, काल तये संकेले. पा० ॥ १७ ॥ वामी यह संसार कन्या है, काल तदा है मालोजी; काचे पाके चुशीले सवही, सगे जो दरखत माली. प्रा० ॥१७॥ तन धन योयनका मतवाला, गिणत कितीको नाहीजी; बादशाह उत्रपति भूमिपति, मोतिगले है बांदी. या० ॥ १५ ॥ न्याती गोती सेण संबंधी, सव स्वारयके मेजी, स्वारथ विण सूके दर- खत ज्यौं, देख पंखेरु को. आ० ॥ २०॥ पवन वरूपी काया अंदर, हंस लिया है वासाजी;

पलपल प्रागु पटत दे ऐसें, पानी मांदे वतासा. मा० ॥ २१ ॥ मूरख करि कार मेरी मेरी, पर- संगति उप पावेजी; ममता तोरी सहज मुख पावे, जो सुमता घर याचे. था० ॥ २२ ॥ तन पं. पर विच जोर पंखेरू, कात ऊमत प्रापाजी; आवत जावत किसी न इनका, खोज कहुं न पाया मा०॥३॥ मोलत बोलत तन अंदर वमी, चेतनचि दिन दिखावेजी; ज्पी वाजीगर काठ पूत. रोधा, नव नर नाति नचावे. प्रा० ॥ २४ ॥ कापा पाटण चेतन राजा, मन कोटवाल विगया. जो पंच उगोमुं एका करिकरि, सब पटरा मुसि खाया. या० ॥ २५ ॥ नये नये तन जामे पहि. रे, नय नप याट पटे दैजी; तीन धौव है तीन अवस्या, चोये घोव फटे है. आ० ॥ २६ ॥ तेरा सो कहुं न जादे, तुं प्राणा ना खोयेजी; विगमया गया विडाणा पासो, तुं मुरख क्पो रोवे. मा० ।। २३ । नसा पुरा तुज कुयु करेगा, जो कछु तुंदी देगाजी; पंथ विचे होयगासो संवल, तेरे संग चलेगा. मा० ॥ २७ ॥ मोरी ज्यौ अंगुल अटकाइ, चकरी यावे जावेजी; मोरी तूटे या तन पकरी, ना जावे ना आवे. पा० ॥२॥ ॥ यद करता हूं यह में किया, यह में सही करुंगा. २३६ जी; मेरे मोत लगी है सारे, गणे नही जिय गुंगा. मा० ।। ३० ॥ भावत जावत सास उसासा, करत है गौन प्रत्यासाजी; जाणेका कछु अचरिज नाही, रोका है तमासा. माa || ३१ ।। इस कापा पायेका लाहा, सुरुत कमाइ कोजेजी; राज कहे उपदेश बनौती, सद्गुरु शीख मुशीजे. मा० ॥ ३२ ॥ इतिश्रीमन्नागपुरीयतपागछाचार्यश्रीराजचंरिकता ॥ पुष्पो माटे असत् आदेपदाताओने उत्तर. वर्तमान समपनी अंबर कोशएक मुनिमहाराजो अने आवको गुरुगम विना उपाय प्रसिद्धिमा मायेला पुस्तको उपलकपणे यांची पोताना आत्माने गीतार्य मानी मदान् पूर्वाचार्योना सिहांतोने संपूर्ण अवसोकन का विना नवनपनीरुपणानो त्याग करी जेम फावे तेम कुयुक्तियो भादरे ठे घने जोलाजनाने नरमाची जमावी जयहिन संबंध तैयार करे के केमके सांजळेली वातो उप- रपी समर्थ गीतायोनी निंदा करवा तत्पर रहे ए जयनिज कारा. श्री पाचर्च मूरीश्वरजीए पुपने मानेल ने बतां असत् पाप पापी रदेल के-ते प्रति [पु० माजीने फूल लगाया मान्य करता न दता. पेनो पियरे के तेनुनीना रचेता प्रयोनी झोप खोल करी पठी एवो साक्षेप ापत तो तेजाजमो गणात, परा तेम कर्या विना गपाटगोळा चसावा अन्य जीयोने खेदित करवा एनिमित प्रकार . प्रमाः मानगुं तो संपुर्णरणे तेन्त्री पुष्प पूजाने मानता हता एम ते पूज्यश्रीना रचेला प्रपोज प्रपकरणे साको प्रारी रहेस ठे. जून जिनेंद्रगुणरत्नमाला नामना पुस्तक यंदर पुष्ट ५५ मां सनरनेदो पूजाना स्तवनमा १५ मी गाथा वे के- " सनम पिरत चि सरस ले रचे, देव अनुनाव ते कहिये नवि संकुचे; माल सुविशाल पति उ जिनवरतो, पिप सुर अम्मा पूजा पागम नणे. जिहां जिहां जेदवो वर्ण शोना घरे, निहां निदा तेहवो कुसुम वर्णक करे. फूल घर करे पूजा ए तेरमी, समकितधारक लोक मनने रमी; नरे गुर फुडनो पगर नंगी घी, चौदमी पूजाए जापा पागम भणी. जेम तेम HimanartRaert.

" नक्तिकारक नएया, विरति अधिकार सविशेष अंतर सुएया; प्रथ तेहने अनुक्रमे सहुअ जविपण लदे. इत्यादि ग्रंथोमा जोतां स्पष्ट मालम पमेवे के तेन पुष्पपूजा मानताज इता; तथापि अवता थारोप थापया ए केवी याचरणा ! मुखथी कहे ठे के निंदा करे ते पाप नारकीरे' परंतु ए वचन, मात्र पोपीमांनां रांगणानी पेठे समजाय रे. वळी अन्य स्थळे पण दृष्टि करतां सत्तर नेदी पूजा पंचप्रतिक्रमण पत्र २३० थी पूजा पांचमीमां पचन वे के- पंचमी पूजा जिनवर केरो, मुकुलित कुसुमनी जाती रे; लाल गुलाब ने केतकी चंपक, पूजतां बहु परि लांतीरे. पंचमी. ॥१॥ ममरो जार जुर ने मरवो, कुमुद निलुप्पल साररे; पेटलतीरी वेली मोगर अरविंद, परिमल जास अपाररे. पंचमी. ॥२॥ गयादि पांचमा पूजा निहालवानी जरुर - पुनः उही पूजामां पण पाठ वे के- SUR 070 int भाले कुमुर निप्पल सदसपन, रनुग्स परम सयपन, यतिमुन चंपक केतकीस्युं मिस्याए, नाग पुमाग ने मचकुंद, कमरो मरयो अरविंद, पळी कुंद जार जुर पाल नळ्यांए. योलसीरी फोज कोरंद, मोगर जासु शुन वीट नहीं कंठ-यहुल तिलक नव मालतीए; लाल गुलाब ने |" मंदार टोकर गुष्पो तमुसार प्रती फार वो पूजा दोनतीए. (रागकालदरो) उगोरे पूजा श्रीजिन केरी को दोगर दीपरे पंच विध वरणी कुसुमको माला. रयणायली दार जीपरे.वही॥१॥" ॥ सा मध्पेनी ॥ श्रीराचंसूरीश्वर गुणनिधि, तसपट समरसूरीदो।। राजचंसि नात पटोपर, सेजे कोही दिशंदोरे ॥वामा॥ अवरामुनि गुरु साधु तणो शिप्प, मेघराज मुनि नाये ॥ संपत सोलसेगसाठे पुजा सार नेदी पाखे रे ॥ वामानो नंदन गुठपो ।। इति ॥ पपादि घिदोर विस्तार पूर्वक लेखना दाखला मौजूद थे, तो पत्री वातागण! तेश्री छल पमा नपी मानता, ए केम मानी शकाय ! माटे सत्यासत्यनो परतो तपास करी सावध व. पन पार बंप पापो एज योग्य , मत्ती वात उती बतायवी ए अति अनि परिणाम दाता २३८ है. ए हेतुने लीधे सत्यने ग्रहण करी गन्नेदयी उपजतो नेदबुद्धिनो नाव त्याग करवो जेयी नवोनव सुख संपदा प्राप्त पइ जय मंगळ कमळाना जागी पवाय. शान्ति ! शान्ति ! शान्ति !! ॥श्री पार्श्वनाथ जिन स्तवन.।। (उपजाति छंद.) कंटासकस्यः प्रजु पार्श्वनाथः, सुरासुरेः सेवित पादपदमः ॥ विरुपात कीर्तिः प्रकट प्रत्नावो, ददातु मे सर्व समीहितानि, (प्रजाती गोमी वंद.) गाम गुण ठाम श्री पास कंटालिये, नमिय सवि संकट कंटक टालिय; दियमले प्राण जिन घाण तसु पाविये, नावजलें पापमळपक पखालिये.॥२॥ प्रह- समे स्वामि तुम्द नाम समरे सदा, जेह नर नारि ते खदे सुत्रसंपदा; एक चित्त प्रणमशे मू. रति ताहरी, प्राससे तेहने थापदा परिहरी. ॥ ३ ॥ जेदना मांदिता नयन वे थावर्या, सुदृढ जर वरणावरण गुण थाणुसर्या; तेच तुम्ह नाम ने थापना किम सहे, सूत्रमा प्रकट नणी तहति साना पनि पा.न. गड़ सहदे ॥ ५॥ पेसता रूप सरूप प्रउ तुम्दतशो, ऊपजे हियडले हरख मुज यति घणो; चंद्रकोर रविचक पंखी थमी, कमल पेसेवि जिम तेदने मन रळी. ॥५॥ एम प्रजु पायनी सेज नितु लिए, नातणा पाप संताप सपि वंचीये; एदयी थाश यम पासजी पूरजो, सेवक वित चिंता सवि चूरजो. ॥ ६ ॥ (नरजा छंद.) कंटासिकस्थानविनूपणाय, विश्वेश्वराप व्युतपणाय; कल्याणवती पनगरिदाप, धी पार्श्वनाथाय नमोस्तु नित्यम् ॥ ॥ इति श्री पार्श्वचंऽ सूरीश्वर कृतम् ॥ ॥ श्री विमलजिन वासुपूज्य जिन स्तवन. ॥ (चोपाइ) हरियामासी विमसजिणंद, वासुपूज्य वीजो जियचंद; वे ए बंई मन नलात, सपरिजियारे जिम पास. ॥ १॥ लंठन सोहे जास वराह, धन धन बिनुबन करे सलाह, म्हा नदिप सवस शामयो, जे नविक तणो धामलो. ॥२॥ कनक वर्ण विजुम तनति, वेय जिरेसर एके पनि वेग पदमासणे सोदंति, निरुपम रुप जन मोदंति ॥३॥ साठ अने सि-

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तर धनु माण, पिहुं तणो किम करुं वखाण; एक जीद गुण कह्या न जाय, लाने शिवपद स्वामि
पसाय. ॥ ४ ॥ वंश इखाग तणो शिणगार, केवलखछीनरवरहार; नृप कृतवर्म थने वसुपूज्य,
सुखदीपक सुरनरवर पूज्य. ॥ ५ ॥ श्यामा जया नाम जसु माय, उरसरिहंस सरित मिण-
राय; महिमावंत सदा जयवंत, ये ए हुवा शिवरमणीकत. ५ ६ ॥ गिरि संमेते चंपा नाम, नगरी
पदुता शियपुर वाम; प्रह ऊवी तसु समरी नाम, नाव जगतिशं करुं प्रणाम, ॥७॥
॥श्री जिनेंद्रस्तुतिः॥
मोनेनोवी व्यहतपरितो परसराणां सहसं । यो निर्माणश्चरणयुगलं नव्यमालोपकारी ॥
यत्तिारयतु हृदयारतस्वकीयं कलानां । यो निर्माणश्चरणयुगलं नव्यमालोपकारी ॥ १ ॥
नमस्पत्पीलोमीपतिमुकुटरलांगुकवरं । नतानां दत्तनीधनयुवतिरत्नांशुकवरं ॥ त्रिलोकी जंतू.
नामनिलपितसंपादकमलं ! जिनस्य श्रीशांतः स्तुतसरलसं पादकमलं ॥ २॥ पुनर्नवमार्गलं.
जक क्रमकममा नहिनिप्रजापतेः । शरणं समुपैमि नेमिनः कमकमज्ञानतिनितनुस्विपः ॥३॥

पार्जिना फसिताऽपचयं विदधङगतः कसितापचयं ॥ फणिचक्रमणीरुचिरं जितसः प्रद- पातुमुर्य रुपिरजितसः॥४॥थगषयंतमुपप्लवमुबके-रहित संगमकाऽमरनिर्मित ॥ नमतवीरजिनं मुनिएनम रदित संगम कामरसं मुदा ॥ ५ ॥ शिवरतोवरतोपवशानतो मघवताऽवतामतिपूरगः ॥ यमदनो मदनोदनकोविदः दाममममसंनयतातिनः ॥६॥ थविकलं विकखंकधियां सुख विदधतं दधतं जगदीक्षितम् ॥ थकसई कसहंसगतिं श्रये जिनवरं नवरंगतरंगितः ॥ ७॥ पेपकल्याणपतीविपिनवनमुवः स्वर्गगंगातरंग-छायादायादरोचिः पटसधवलिताखंग दिए मंगसस्य ॥ नन्नामाखिमोतिप्रसृतपरिमसोगारमंदारमाखा-ज्यय॑श्चंद्रप्रत्नस्य प्रनवतु नरतां नूतये पादपाः ॥ ए ॥ ॥ इति जिनेऽस्तुतिः ॥ तिपटझम्पत्वनायनपविचारादिप्रकरणसंग्रह समाप्त.

-+rent । राग जरवः । गत चोवीसी स्तवन, जागोरेमुग्यानिजीवनयो सुप्रनातरे, पावोरे घरम ध्यान वीतगई रातरे। जागो० ॥ पहेला श्रीकेवलप्यानि, बीजानिणारे,बीजा सागरस्यामि नाम,ध्यान घरो प्राणीरे जा॥१॥ चोया महा- जसदेव पांगमाविमरे,सर्वानुनुतिया प्रजु आपे सुख अमलरेजाणा॥ सातमाश्रीधरईश आठमा श्रीदनरे,दामादर देव नोमा नांमपीपविनरे ॥जा०॥३॥ सुतेजास्वस्वामिदोई दस ने ग्यारे, बारमा श्रीनुनिमुवा समरणसाररे | HORI तुमति शिवगति प्रस्ताजिनेशरे, तेर चोद पनरमा सेवेसुर मोजाणाशानेमिवासोसमाधनिलवासातरे, अष्टादशयशोधर स्वामीसुविख्यातरे जाग- पीसीसवीसमा अरिदमरे,कतारण जिनेश्वर शुक्ष्मतिसंतरे।जाणाशिवकर दोययीत स्पंद- नगीनर संमतिमु नामध्यान वपति सफल जगीसरेजाजापगतचोरिद हुयाजिनागरे गु. पर कई सदा सरल विगिरे घना इति गलगोलीत Hati वि०स्त समान ॥अथ विस विहरमानजिन स्तवन । रागरामकली ॥ विदरमानजिनवंदो सुगुणनवि, विहरमान जिनवंदो. श्रीमंधर जुगमंधर स्वा- मि पालुमुवाहू मुणीदो,जंबुदीव विदेदिजिन प्रणम्ये परम थाणंदो ॥सु ॥१॥ श्रीसुजात स्वयंपन्न स्वामी झपनानन जिनचंदो, अनंतवीरजसुरमन अरिहा अरचे चोसग्इंदो ॥सुणाशा श्री विशाल जपर्वतापजधर चंद्रानन मुखचंदोधातकी खो दो विदेदि ए धजिनपति वंदो ॥॥३॥ पुष्कर सरपमा पुगमविदेदे, विचरे जिनराजेंदो,चंवाहू नुजंग जिनेश्वर, इश्वर सेवेसुरेंवो ॥सुण नेमि मनवीरसेनदोइ फेनवनवफंदो,महानद्रदेव यसदेवा नामिदूरित निकंदो।सु०॥५॥अनंतविरज अरि- दंत माराघो दूर टले उखदंदो, ए वीसें जगदिसळपासन करता नविचिरनंदो।।सुणाक्षारत्नत्रयीगुणक- मल विशसन अनुगुण नग्यो दिदो रामकतिरागें जिनराया गायागुणीगुणचंदो गसु ॥॥इति। ॥ अय अनागत चतुर्विसति स्तवन । (राग प्रभाति) प्रभातै वीने माता मुपमुजोवे । ए देशी ।

"HAPPeani मनाते नठी नावे परमेश्वरजजिये, परमेश्वर नजीपेरे नावे परमेश्वर नजिये ।। उंघउमामी प्राणी सुजपरणती सजी, मनाते नठिने नावे० पद्मनाजपदिसाजिनहोस्ये वीजाश्री मुरदेव, प्रीजा श्रीमुपारस जिननी करशे त्रिनुयन सेव ॥१॥ स्वयंपन्न चोमोजिन दोस्पे, पांचमा सर्वानुत्तुति,देवश्रुत महानदयानीघ,सातमायें शिवसुती प्र०ा पाठमा श्रीपेनाल प्रन्नुजी,पोटि- सनीमानाय,सतकीरतएदशमादोस्पेसिइपुरिनोसाथ प्रशासुनतएकादशमासमरोवारमा यममइष्ट निकषाय तेरमा निपजत्यै स्वामि सर्वपाश्रेष्ठ मा निःपुलाकनिर्ममदोयदेवा.चौदपनरचितचाद चित्रगुप्त सोलमा धर्मचक्रि उपजस्ये उचाद ॥॥ सुखवाइसनरमासमाधि भनारमा संवरका यझोपर श्री विजय जिनेवर उगणीसनेवलीबीस ॥०॥ मशिनाप शिमोय चालु एकवीस ने वापीस अनंत विर्षनकरएदोइ नाविजिन चोवीस ॥५०॥ केवललही अजुवाला करश्ये धापरस्ये नपगार सिप्रन्नुध्यान घरंतां वरस्ये शिवतीरीसार मा सुचीदारो नवीने समरे सेन्नविछिन र कहे तेदने मंदिर होस्पे सफल जगीत ॥०॥ इति ।।

पास्त
। श्री पाचजिनस्तवन ।
PRISISert:
उनमः पार्थमनुपत्कजे, विश्व चिंतामणि रत्नरे, झीधरणेपद्मावती, वैरुटया करे सुपत्नरे
।१।३०। अब मोये शांति महा पुष्टिदे, धृतिकीर्तिकांतिविधायने, उसी अक्षर शब्दथी. सर्व प्रा-
धिव्यापि बिनाशिने ॥3॥२॥ जया अजिता विजया तथा, अपराविजयान्वितादेविरे, दशदि-
दशापालनदयक्षेजे, विद्यादेवि प्रसन्न होय सेपिरे ॥ ॐ०।३ असि आन सा नमोनमः तुहीं त्रै-
सोफ्पनो नाथरे, चोस: इंद्र टोले मली, सेविये मनुने जोमि दायरे ॥ । ५ ॥ झीझाँ
मनुपासजी, मूलना मंत्रनुं वीजरे, जापथी उरित दूरे रहे, थायमिलेसविचीजरे, ॥ ०५॥
गोमो प्रनुपास चिंतामणि, स्थनणो महिनो देवरे, जगवल्लन्न जगतमा जागतो, अंतरीक अवंति
फरूसेवरे ॥३०॥६॥ श्री श्री संखेश्वर मंझलो, पार्श्वजिन प्रपत्त तरुकापरे, चूरय घटनामातने,
पूरप सुजय सुखतस्परे, सुजय सोनाग मुखकरूपरे । नमः पार्थ प्रनु पत्कजे ॥ ७॥ इति ॥
॥४२॥

॥ सफाय॥ काया माया कारमी, परदेशीरे, कबहुन अपनि होय, मित्र परदेशोरे, इसको गरच न की. जिये । पाउिनमे दिखावे वेद ॥ मित्रप॥१॥ जैसे रंग पतंगको । ०। निमें फीको होय, मिण मणि मारोक मोति हीरता, प० त्राण शरण नही कोय || मि०प० ॥३॥ जिस घर हयगय धूमते । प० । हुंता त्रीस राग ! मि प० । सोनी घर सुना पडया । पवेता- साग्या काग मित्रप० ॥३॥ मशि माणेक मोति परतो । प० राजा हरचंद घर नार । मिव प० एक दिन ऐसा हो गया । १२ परघरको पनिदार, ॥ मित्रप० ॥ ४॥ हाये परवत तोल ते। ५० करते नरपति सेव । मि०५०। सोजी नर सब चले गये। प० । तेरी क्या गिणती भदेव ।। मित्रप०.॥ ५॥ गेमके मंदिर मालिया। प० । करसे जिन सुं राग। मि० ५० १ वो दो- नको कर सोचना । प० । लगती इन तन माग | मिए प० ॥६॥ झुगे सब संसार दे ।।

म० मा मएमय - แ usly PCOSCOPES6054 मुपनाका सोखेल । मि०प० । नगके तास समनके । प० । करले मन्नु सुं मले। मित्र परदेशोरे॥७॥ इति ।। ॥ अष्ट प्रवचन माता सफाय॥ पाले जया जोवतारे, पाले जीव उ काय । निरवद्य वचन मधुर कद्दे, नितु जाणे धर्म प्रायनमुं गुरु पायारे, जसुसी निरमल सार। सुदाये कायारे । सुमिति गुप्ति धर्म प्रकार, कहे जिनरापारे । तिण कारण दर्य अपार ॥ नमु०॥१॥ दोप वेंतालीस दासतारे, सूधो से पाहार । नपणे निरखी पूजता, सेवे उपगरण प्रकार ॥ नमु०॥२॥ जब महादिक परठ. रे, सूचो स्थमित जोई। शुज ध्याने मन राखतां, जसु चारित्र निरम होई ॥ नमुं० ॥३॥ वचन सावप न उचरेरे, वचन गुप्ति संभार काया करणी ते करे, जेधी हुए जीव उपगार । ॥ नमु०॥४॥ प्रवचन माता पाउ एरे, जे पाले अनुदिन सार । बहा कहे ते मुनि नमुं, जिम पा, जैन धर्मसार ॥ नमु गुरुपायारे, जसुसीले निरंमल सार सदावे कायारे ॥५॥शति ।।

आ मेयने अगाउथी आश्रय आफ्नार गृहस्थोना मुबारक नामो.
(धन्यवाद)
११८ आचार्य महाराजश्री १००८ श्री देवसूरी-
६ वायुसादेव वाहातरमलजी हजारोमलजी श्वरजी तरफथीबीकानेरना ग्रहस्थोए नरेला.
हीरालालजी रामपुरीया
१होठ तेजकरण मूलचंदजी रामपुरीया
बाबुसाहेब जेवतमलजी रामपुरीपा
१ शेठ प्रासकरमजी
याधुसाहेव नेरुवाननी राखेचा
नायुसाद्देव उदयचंदजी रामपुरीया
बीकानेर वासी ग्रहस्पोना नामो लखीमो-
चपरना प्रदस्थो तरफयी या पुस्तकमा
कलेला परावर नदी उकलवाधी उपायांनी ते
मदद घावयाधी ने साहबोनो वासना अंत:क-माफ करशोजी.
रपा पूर्वक बाजार माने .
अमदावाद.
सी. श्रीपार्चचंगछनी जेन दठीसीध १ शेव. फत्तेचंद दोलतचंद.
सरस्वती सना. १ शा. मंगलदास लब्लुनाई पावतार,
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१हा. दरखचंद रवचंद
१ शान्यालचंद कस्तुर
१ वा. यावद मगनलासनी मातुश्री वा जीवी- १ शा. दससुख प्रागजी इलवद गामना
पुष्पस्थळ घांगना
१ शा. कचरा कानजी
१ दा. मामर खोमीदाप्त
१ शा. लेरा जेसीग
१दा. मशीसात साटकचंद
१ शा. मणीलाल लखमीचंद खेरवापा
१शा. पतुरनाइ पदमसी
१ शा. शीवलाल फुलचंद कुढना.
गांधी. ताराचंद मामर
१ दफतरी उगनलाल नानचंद
१ कपासी. जगजीवन बचत
१० शा. चतरनूज देवसी दाल वीकानेर
१ शा. नानजी वेशा खेरवापा
जैन स्कुल देम मास्तर
१पारेख. रमनाय लखमीचंद
१ वेन चंदु दीसोंग घीसनगर.
शा. जपान परन्तु
१ शा. गलास मन्ना मदिजना
HINFSUPERHSRSSL

मुषिदीत मुनिमहाराज श्री १०८ श्री गुणपंजी महारा
कछ-गाम-देवपुर निवासी गृहस्थोनां मुवारक नाम.
२ शा. कल्याणजी खेराज
१ शा. पचाण लखु मोटी लाजा
१ शा. खेराज पचाण
१ शा. लालजी देमा राएवाळा
? शा. गेला देराज
५ शा. सधा रतनसीनी वीधवा वाइ
१ शा. रवजी अमरसी
मेघवाइ गाम तुंबडी
१ शा. कोरसो पाला
१ शा. उगनलाल नथुन्नाइ गाम मदीजना
१ झा. ठाकरसी कानजी
१ शा. महासुखन्ना काळोदास थमदावाद
१शा. पदमसी भारमल
सी.मं. ल.
१ शा. नरसी नेणसी

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महाराजना सउपदेश
॥ आत्महितोपदेशेनां सुधारक नाम न.
शा. पचाण सखु मोटी लाजा
शा. लालजी देमा राएवाळा
T. सधा रतनलीनी बीघवा वा
मजुर थाचार्य श्री व्रातृवन्ऽसूरीश्वरपादपद्ममेवी मुनि महा मेधया गाम तुंबडी
श्रावक सशुरुचरणोपासक मंगलना प्रति लखेल गनलाल नथुनाइ गाम महीजना
नव्यजीवोने अवश्य उपयोगी जाणी या प्रकटनहामुखनाइ काळोवास यमदावाद
सी.मं.स.
था संसारनी थंदर सर्व जीव सुखनी चाहना करनार
साधन समजवामां थावे तोज जीय यथार्थ सुखनो नागो था
फिर ययेख नथी, एटले के ज्यां सुधि शीपमा रुपानी बुद्धि, रज्जुमा (दोरह
जांधवाना जल (मृगतृष्णा) मां जलन

दशका, बंधनकारी पदार्थोमा तल्लीनता, थने परपरिणतिमां प्रीति-स्वाभिमान विगेरे मिथ्याशान जोधमाधी दूर ससेस नथी त्यां सुघि था जीव साचा सुखनो नागी थवानो नथी, था जीव सुखी साधी घाय? या प्रश्नना उत्तरमा मारे जणाव, जोइये के परमात्मा प्ररुपित धर्म श्रारा. धन करवाची था जीव सुखी थाय , पण स्वकपोलकल्पितधर्मथी श्रेयनी प्राप्ति थति नथी. थोडं पण थाणा थने विधिपूर्वक करवामां थावे तो तेथी मोटा लाल थाय . जेने थाझा थने विधिनो तो खप नथी, पण मात्र लोकप्रवाहमा धर्म माने ठे, तो ते जीव शो रीते नुखनो जागी थाय.जिनथाणा रहित थने थविधियी तो घणी वखत पेहेला पण था जीरे क्रियानुष्ठान कयौ, तेनाथी कशो फायदो ययो नदि थने एमज था जीव संसारमा जन्म मरणजनित पुःखोने नौगवतो नमतो रह्यो. जो था जीवने जिनेप्रणीत पदार्थ तत्वोनुं रह- स्य प्राप्त ययुं होत तो था जीवनी थाची दशा न होत, पण स्वस्वन्नावमा रमण करी परमानंद प्राप्त करन. दजी मुधि पण परपरिणति पुजलदशानो जो था जीव त्याग नहि करे तो फरीथी रिस्रिररररररर Ast":"INS , सBHEL पश्चाताप करवाना दिवस था जीवने श्राव्या विना नहि रहे; माटे 'समय न चूको चतुर नर, कवि कहत हे कूक चातुरकुं खटके सदा, समय चूककी हूक, समयनो अर्थ सूत्रकार उपकारी पूज्योये थायो करेस वे के सर्व श्रेयना साधनभूत मनुष्य देद, थार्यक्षेत्र, उनम कुस, इंघियपूर्णता, श्रावक कुलमा उत्पत्ति, शरीरे निरोगता, सुविहित गुरु थाचार्यश्रीना उपदेशघी जिनेंअप्रणीत धर्मनी श्रवणरुचि, धर्मपर श्रद्धा थने ते प्रमाणे प्रवृत्ति, या पामयां जीवने बहु पुर्खन्न . केमके मनुष्यन्नव तो था जीव घणी वखत पाम्यो; पण सर्व सानुकूल सामग्री था जीवने मली नदि तेथी सुखनो नागी था जीव थयो नहि, माटे था समये सर्व सानुकूस सामग्री मलेस , तेने चूकवी जूसवी नदि, एज समयनो थर्थ ठे, थने तेथीज ज्ञानी पुरुषो उद्घोपणा करे ठे के, थायो समय फरीफरीने नहि थावे. ए सर्व सामग्रीमा एकनी पण खोट होय तो मनुष्यत्नव नकामो ठे थने ते सर्व सामग्री सदाय जीवने मसती नथी; किन्तु बहु पुन्यराशी प्रयख थाय ठे त्यारेज सर्व सामग्रीनो संयोग थाय ठे माटेज पुर्खन्नपणुं वतावेस ARMERELESERVERLES SESENDU " सई गागमी महोप नेपी समय गयो नहि, यो था जीप खनो नागी चाय गाईपाल ६ स्यापारमा मार्ग सेवन करवा. नस्पता-बीयावामपूर्वक धर्म अनुदानादि- फशिया पोरंजन माटे नदिः पा स्वयात्मरंजन करवा माटे करवामां थावे, थर्थान् " माशाम धर्म कायो, त्या उननुं मुं काम; अनमनरंजन धर्मनु, मूल न एक यदाम. गाटे स्वारेजन दितार्य जो धर्म करवामां थावे तो था जीवन अवश्य कल्याण याय. पणो धर्म ए नोज नेनुं नान नयी नेने कर्मोयो थारमाना कया कया गुणो गावराप ? कर्मने दुर करशमा मुख्य माधन क्या है ? थने या जोर मुख करे: तेनो विचार तो करतो नयी, मात्र प्रतनच्चारण करवायी तथा ढुं साधु, ई श्रा. कपम मानव शा जीव मुम्बनो नागी यतो नयी, कारण के " तत्व तो परख्यो नहि मतभार ! पान विदुमा मेलमें, वृथा बनाई वाद." माटे जे जे कोइ पण धर्म-कार्याधि कार्य कर्तु ने मम्मतले विवारी थने पती झा नहीं पण जले योई करवामां कम पाम्या मREE थाये तो ते सन्मार्गानुगामी जीव धीमे धीमे स्वश्रेय साधन करी उंची पायरी उपर थाव्या विना रदेशे नदि थने यनुक्रमे सर्व खोनो नाश करी था जीव शास्वता सुखनो लागी याय एमां किंचित्मात्र संदेह नथी. हमेशां जेमना हृदयमा एवी नावनानो थाविनीव थाय छे के हुँ क्यांची थाल्यो ? थाहि कया पुन्यना उदययोमारी उत्पत्ति थइ हशे? केवां में सारां कर्म करेसा हशे के जेथी श्रावो उत्तम देह पाम्यो j, हवे हुं केवां कर्म करूंछ थने अन्य जन्ममा था जीवन क्या जवानुं थशे एटले था नवधी कया वो था जीवनुं प्रस्थान यशे, थावा प्रकारनी विचारणा जेना हृदयमा उन्नव पामती न होय तो था जीव धर्ममा प्रवीण केम थाय श्रने धर्म बिना सूचनो नागी पण क्यांधी याय! कयुं वे के " इहोपपत्निर्ममकेन कर्मणा ? करप्रयानव्यमिनो नवादिति । विचारणा यस्य न जायते हदि कथं स धर्मप्रवणो नविष्यति !" माटे जयजीवोय याची नावना चूलवी नहीं, पण सदाय ध्यानमा राखवी. ताजीच मदानो मसार के केमके केटली योनियोमा मुसाफरी करी करीथा नवमां पण रामSARASTR-152

रेज का निद शानदपपशे. माटे जो थाजीवर्नु कल्याण इछता हो तो प्रमाद घर करो. प्रमाद
एटले ८ मद,५ विषय (पान इंडियोना विकार), ४ काय, विकथा थने निकाए पांच प्रमाद ठे.
एमने इर करवापी ज मुख प्राप्त थाय छे.उनम चरित्रयाला पुरुषोनी सदायमादृष्टि विश्वव्यापक
पई जोगे ऊपर समान वत्या करे छे.स्वश्रेय थथवा स्वयश्रेय ते स्वस्वाधीन के अन्य निमित्त
कारणमात्र दे.दा ए शान नोठीक ठे के जो कारण सानुकूस दोय तो कार्य
सानुकूल थतां उत्तम
लायन्ने उनमज फस मो. नद्यमयी कार्यनी सिद्धि याय ठे ए प्राये मुख्य नियम समज-
पो. नेम करतां पण जो न घाय तो पीलावी. पंच समवायथी कार्यसिद्धि ए परमात्मा देवा.
पिदार्नु मुख्य सिद्धान्त सर्वत्र थरखसित प्रवतें वे, कोइ वखत कोश्नी गौणता, कोई वखत
शोनो मुग्पना नमां ए धर्म रहेस के; पण एकनेज थंगीकार करी सेवु ए एकान्तवाद
कादेगार ठे यने नेयोज जगनमा थनेक मतमतांतर प्रामुनीव ययेत . जो जीवनी अनेकान्त'
दुटि पाप नो सर्पना मनमनांतर सप यह जाय ते थने जीवने जिनवचन उपर प्रतोतिनो
॥ ४ ॥

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तेज जाणपां. गुरुमहाराजनी रूपाथो तरवानो निकट रस्तो उपशम संवर विवेक थने आचर
पिचार के उनम पुरुषो जे मागें चाले ते मार्गे चासवं, अने तेवा उत्तम विचार करवा प्रकृतिने
अनुगृल थाहार विहार मुखदायि थाय . हाख तो शुद्ध स्वरुपी थनंत सुखनोगी थाय एथी
नारना फरवी थने जिनोत शुष्यनुष्ठानमां रक्त रहेवू के जेयी परंपराये था जीव थष्टकर्मातीत यइ
शास्वत मुसनोनागी थाय, थवकाश थल्प होवाथी अल्प सखेल टे. श्रावकजी! जेम तमने
मेक लागे तेम करजो,थाप्सस प्रमाद घर करजो, दरिअपणुं ठगेमजो, धर्ममा उद्यम राखजो, घरमा
तो कोई नमने प्रेरणा करे नेम नथी के धर्म करो; परंतु तमे तमारं हित नूलशो नहीं एज था
समपनो सार . थाप सुझो जाण वो विशेष शुं खखयुं जेम थात्मश्रेय थाय तेवा कार्योमां
तत्पर रदे, शुष्क थध्यात्मनो पहो पकडशो नहीं, जिनथाणा सहित क्रिया ते नाव श्रध्या-
रमपूर्वक थादरजो जेपी थात्मश्रेय पाय. स्त्री पुत्र पुत्रीमा अनादि कालथी था जीव घेरायेल ठे
पण था जोपने एक बखते जो परमात्मा प्रापित शुरू तत्व सहदाणा यइजाय अने ते प्रमाणे ॥५॥

जो वरताय तो था जीवनो वेमो पार थाय; पण घणा जीयो अंधश्रद्धालु थइ गयेला ते तेथी
गुणी थपुणीनी पण परीक्षा करता नथी, जिनवचन श्राराधनपणुं स्वप्नमां पण तेमने थाव,
प्राये मुसकेस . हलुकर्मी जीव हशे ते विधि बहु मानी विधिपर थादर करनार यशे. इतितत्यं
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ध्रांगद्रा संवन १९६९ वैशाख शुक्ल पस.
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41414144ua. खदय नय विचारादि प्रकरण संग्रह- ग्रन्थः समातः Psg.

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Dravya Nav Vichar Sangrah

Author
Shri Pashrv Chand
Title
Dravya Nav Vichar Sangrah
File name
Dravya Nav Vichar Sangrah
Text
OCR done
Citation
1901
Published
2011/07
Publisher
Ahmdabad, Nirmal Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
404
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
DLI number
313796
Barcode
99999990311188.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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dBMDIOG5Wux
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