Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Sansar Tarnika
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॥ श्री॥
सस्कृति रक्षक सघ साहित्य रत्नमाला का १८ वां रत्न'
संसार तरणिका
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अखिल भारतीय साधुमार्गी
जैन संस्कृति रक्षक संघ
सैलाना (म. प्र.)
के दृढ़धर्मी प्रियधर्मी सुश्रावक श्रीमान्
सेठ मिलापचन्दजी साहव बोहरा, मंड्या
निवासी की धर्मप्राणा मातेश्वरी की भोर से
सादर भेंट।
प्रथमावृत्ति ३०००
द्वितीय श्रावण पूर्णिमा
। वीर सवत् २४६२
विक्रम संवत् २०२३
সক কত न -- पर्वाधिराज के शुभ प्रसग पर 'ससार तरणिका' धम साधक मात्माओ की सेवा मे प्रस्तुत हो रही है । इसमे प्रात्मा को पवित्र एव शुद्ध बनानेवाली सामग्री संग्रहित हुई है । इसमे की-वठ- सरणपइण्णा, पापपडिग्घाय-गुण-बीजाहाणा-सुत्त, भवनाशिनी भावना, पालोचनाकुलक, सुविहित आलोचनादि सामग्री तो पहले भिन्न पुस्तको मै छप चुकी थी, उन्ही का संग्रह है। उनके प्रप्राप्य हो जाने और मांग होते रहने के कारण सग्रहित की गई है। पृ८३ मे दी हुई विस्तृत अालोचना और 'समाधि-मरण भाषापाठ' (दिगम्बर विद्वान रचित) आदि कुछ सामग्री प्रियधर्मी उदारमना श्रीमान् सेठ किसनलालजी साब मालू की सग्रह को हुई है। तथा मृत्यु महोत्सव के अन्तर्गत सस्कृत प्राकृतमय अतिम पारा- धना, प्रस्तुत विषय के अनुरूप एव अत्यत उपयागी होने के कारण नई दी जा रही है । आशा है कि इसमे धमप्रिय साधक मन्धुओ और बहनो को विशेष लाभ होगा। इसका भाव पूर्वक माठ करने से आत्म-पवित्रता वढेगी और बहुत निर्जरा होगी। कोई यह नही समझे कि मृत्यु महोत्सव, अतिम साधना और समाधीमरणादि, देवल अतिम समय में ही पढने की है। यह कभी भी पढी जा सकती है। भावोल्लास पूर्व जब भी पढा जाय, लाम ही है । इनके प्रवलम्बन से सामायिकादि की साधना सरल एव सफल होती है। सघ पाशा करता है कि समाज इसमें ययेप्ट लाभ प्राप्त कर इसमे लगे हुए श्रम एव शक्ति को सार्थक करेगा।
विषयानुक्रमणिका- क्रमाक १ विपय चउसरण पइन्ना पावपडिग्घाय-गुण-बीजाहाण सुत्त भवनाशिनी भावना २ २० ३० ३ ४ आलोचना कुलक ५ ४५ ५२ ७४ " ७७ सुविहित पालोचना बृहदालोयणा । आलोयणा श्री जडावबाई कृत २ पू श्री माधव मुनिजी ३ श्री खोडीदासजी म ४। पू श्री माधव मुनिजी ५ मु श्री प्रेमराजजी म६ मृत्यु महोत्सव " ७६ " 1 १० " ८१ ८३ १०३ १०४ १२ अतिम आराधना आत्म समर्पण समाधि मरण भाषा पाठ वदमान स्तुति हितोपदेश गुरु गुण गान सकट मोचन वीराष्टक १२३ । १२५ १२६ सस्कृति रक्षक सघ साहित्य रत्नमाला का १८ वां रत्न संसार-तरणिका चउसरण-पइण्णा पडावश्यक विचारणा सावज्जजोगविरई उविकत्तण, गुणवओ य पडिवत्ती। खलिप्रस्स निदणा, वणतिगिच्छ-गुणधारणा चेव ॥१॥ सावद्य योगो से निवृत्ति करना, सामायिक रूप प्रथम प्रावश्यक है । भगवान का गुणानुवाद करना दूसरा 'उत्कीर्तन' आवश्यक है। गुणवान गुरु महाराज का वन्दन करना, वन्दना' रूप तीसग प्रावश्यक है । लगे हुए दोपो की शुद्धि करना, 'प्रतिक्रमण रूप चतुथ आवश्यक है। विशेष शुद्धि के अतिचार पव्रण (घाव) की चिकित्सा करना, 'कायोत्मग नामक पचम आवश्यक है । और नवीन गुणो को धारण करना, प्रन्याख्यान'रूप छठा अावश्यक है। चारित्तस्स विसोही, कीरइ सामाइएण किल इह य । सावज्जेतरजोगाण, वज्जणाऽऽमेवणतणओ ॥२॥ सामायिक व्रत की साधना से चारित्र की शुद्धि की जाती २ संसार-तरणिका है। सावद्य-पापयुक्त मन, वचन व काया के व्यापार का त्याग करना तथा निर्वद्य योगो की प्रासेवना करना ही सामायिक है । दसणायारविसोही चउवीसत्थएण किच्चई य । प्रच्चन्भुप्रगुणकित्तणस्वेण जिणरिदाण ॥३॥ भगवान् मे रहने वाले अत्यन्त अद्भूत गुणो की स्तुति करने रूप चतुर्विशतिस्तव से दर्शनाचार की विशुद्धि होती है । भगवान् के गुणो का प्रमुदित भाव से उत्कोत्तन करना'चतुर्विशति- स्तव' कहलाता है, जो दूसरा आवश्यक है। नाणाईआ उ गुणा, तस्तपन्नपडिवत्तिकरणाओ। वदणएण विहिणा, कोरई सोही उ तेसि ॥४॥ शान, दशन, चारित्र प्रादि गुण हैं । ऐसे गुण सम्पन गुरु महाराज का वन्दन करना 'बन्दना' नामक तीसरा आवश्यक है। विधिपूवक वन्दन के द्वारा गुणवानो की भक्ति करने से ज्ञान मादि (ज्ञान, दशन, चारित्र) गुणो का लाभ होता है । वन्दन से उन गुणो की शुद्धि होती है । खलिग्रस्स य तेसि पुणो, विहिणा ज निदणाई पडिक्क्रमण तेण पडिपकमणेण, तेसि पि प्रकीरए सोही ॥५॥ ज्ञान, दशन तथा चारित्र मे लगे हुए अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार, अनाचार आदि दोपो की पुन विधिपूर्वक प्रात्म साक्षि से शुद्धि करना 'प्रतिक्रमण' रूप चतुथ आवश्यक कहलाता है और इस प्रतिक्रमण के द्वारा उन दोपो की शुद्धि होती है।
चउसण पइण्णा चरणाईयारा ण जहक्कम्म, वणतिगिच्छरूवेण। पडिक्कमणा सुद्धाण, सोही तह काउसग्गेण ॥६॥ प्रतिक्रमण के द्वारा शुद्धि करने पर भी जो दोप रह गये हैं, व्रत के उन दोपो की व्रण चिकित्सा अर्थात् घाव पर मरहम पट्टी की तरह यह कायोत्सग नामक पचम आवश्यक है,जिसमे साधक, देहभान को भूलकर प्रात्मनिष्ठ हो जाता है । गुणधारणस्वेण, पच्चक्खाणेण तवइमारस्स । थिरिमायारस्स पुणो, सव्वेहि वि कीरए सोही ॥७॥ गुण धारण रूप नमुक्कारसी पोरसी आदि पच्चक्खाणो से तप के अतिचारों को विशुद्धि होती है और सामायिक आदि सभी क्रियाओ से वीर्याचार के दोष की विशुद्धि की जाती है। चौदह स्वप्न तीथङ्कर के गर्भ मे आने पर उनकी माता चौदह महास्वप्न देखकर जागृत होती है । वे चौदह महास्वप्न ये हैं, गय वसह सोह अभिसेग्र, दाम ससि दिणयर झय कुम । पउमसर सागर, विमाण भवण रयणुच्चय सिहि च ।। १ हाथी २ वपम (वेल) ३ सिंह ४ लक्ष्मी देवी का अभि- पेक ५ पुष्पमाला ६ शशि (चन्द्रमा) ७ दिनकर (सूय) ८ ध्वजा ६ कुम्भ ( कलश ) १० पद्मसरोवर ११ सागर १२ विमान १३ रलराशि और १४ निधूम अग्नि शिखा । अमरिंद नरिंद मुणिदवदिश, वदिउ महावीर ।
ससार-तरणिका H कुसलाणुवधि बधुरमजायण कित्तइस्सानि IIEn जो देवेन्द्र नरेन्द्र तथा मुनीन्द्र से वदन प्राप्त हैं, उन भगवान् महावीर को नमस्कार करके कुशलानुबधि-मोक्षदायी, मनोज्ञ अध्ययन का कधन करूगा। चउसरणगमण-दुक्कडगरिहा, सुकडाणमोअणा चेव । एस गणो प्रणवरय, काययो कुसलहेउत्ति ||१०|| इस गाथा के द्वारा ग्थकार इस प्रकीर्णक मे ३ अधिकार चारो'शरण'का ग्रहण, २ पापो की निन्दा और ३ सुकम का अनुमोदन । ये तीनो मोक्ष के हेतु, नित्य करने याग्य हैं । प्रस्तुत अध्ययन मे इही का विचार किया जायगा। बतलाते हैं-१ -1 चार शरण। . । प्ररहत-सिद्ध साहू, केवलिकहिओ सुहावहो धम्मो । एए चउरो चउगइहरणा, सरण लहई धन्नो ॥११॥ अरिहन्त, सिख,साधु तथा केवलज्ञानियो द्वारा कथित धम, जो प्राणियो के लिए मुखावह अर्थात सुख देने वाला है । चतुगति के बन्धन को टालने वाले इन चार शरणो को भाग्य शाली प्राप्त करता है। अरिह ता भगवान् का शरण स्वीकार करने वाले भक्त का लक्षण मागे की गाथा मे बताया गया है। मह सो जिणत्ति, भरुच्छरत रोमच फुचुअ करालो। पहरिसवण उम्मीस, सोममि फेयगलीभणई ॥१२}; - - -- न चउसरण पइण्णा ५ - जिनेन्द्र भगवान् की भक्ति से जिमके रोम-रोम पुलकित हो रहे हैं, ऐसा वह भक्त, प्रमोद भाव से युक्त होकर दोनो हाथों से सिर पर अजलि करके, अरिहन्त भगवान के शरण को स्वी- कार करता है। भी अरिहत भगवान का शरण रागद्दोसारीण हता, कम्मलुगाई परिहता। विसयकसायारीण, अरिहता हुतु मे सरण ॥१३॥ जो अरिहन्त, राग द्वेप रूप शत्रु का हनन करने वाले हैं, ज्ञानावरण आदि कर्मों को नाश करने वाले है, विषय और कपाय रूप शत्रु का जड से उन्मूलन करने वाले हैं-ऐसे अरि- हन्त भगवान् का मुझे शरण हो । रायसिरिमुवक्कमित्ता, तवचरण दुच्चर अणुचरित्ता। केवल-सिरिमरिहता, अरिहता हुतु मे सरण ॥१४॥ जिहोने राज्य वैभव का त्याग करके कठिन तप और चारित्र का आचरण किया, घाती कर्मों का सवथा नाश करने से जो केवलज्ञान रूपी लक्ष्मी के सवथा योग्य है, ऐसे अरिहन्त भगवान् का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। थुइवदणमरिहता, अमरिंदरिंदपूअमरिहता। सासयसुहमरहता, अरिहता हुतु मे सरण ॥१५॥ जो स्तुति और वन्दना के सवथा याग्य हैं, देवेद्र और नरेद्रो के सदा पूजनीय हैं और जो शाश्वत सुखो को प्राप्त करने योग्य हैं, ऐसे प्ररिहन्त भगवान् का मैं शरण स्वीकार करता हूँ।
योगीन्द्र, शद्र महेद्र प्रादि ध्यान करते हैं, जो भव्य प्राणियों संसारसरगिरा परमणगय मुणता, जोइदमहिंदझाणमरहता। धम्मकह प्ररहता, मरिहता हुतु मे सरण ॥१६॥ जो दूसरों के मनोगत भायो को जानने वाले हैं जिनका के लिए श्रुत और चारित्र धम का निस्पृह भाव से कयन करत हैं, ऐसे अरिहन्त भगवान् का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। सम्वजिप्राणहिस, अरहता सच्चवयणमरहता। चमव्ययमरहता, अरिहता हुतु मे सरण ॥१७॥ जो अरिहत,समस्त जीवों को अहिंसा-दया करने वाले,पूण अहिंसा के पालक, सत्य वचन बोलने वाले, सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य व्रत के धारक हैं । ऐसे अरिहन्त भगवान् का शरण में स्वीकार करता हूँ। ओसरणमवसरित्ता, चउतीस अइसए निसेचित्ता। धम्मकह च कहता, अरिहता हुतु मे सरण ||१८|| जो देवों के द्वारा रचे गये समवसरण में बैठ कर और ३४ प्रतिशय से युक्त होकर भव्य प्राणियो को हितकर देशना देने वाले हैं, ऐसे अरिहन्त भगवान् का शरण में स्वीकार करता हूँ। एगाई गिराउणेगे, सदेहे देहिण सम छिता। तिहुयणमणसासता, अरिहता हुतु मे सरण ॥१६॥ अपनी अद्भुत एक ही वाणी से प्राणियो के विविध सदेहों का छेदन करते हैं, तथा तीनो लोको का अनुशासन करने वाले चरसरण-पडण्णा हैं, ऐसे अरिहन्त भगवान् का शरण में स्वीकार करता हूँ। वयणामएण भवण, निव्वाविता गणेसु ठावता । जिप्रलोअमुद्धरता, परिहता हुतु मे सरण ॥२०॥ जो परिहन्त, वचन रूप सुधा वृष्टि से ससार के सतप्त प्राणियो को शान्त करने वाले हैं, तथा कुमार्ग से हटा कर गुण. माग मे स्थिर करने वाले हैं और जो तीन लोक का उद्धार करने वाले हैं, ऐसे परिहन्त का शरण में स्वीकार करता हूँ। प्रच्चन्भूय गुणवते, निप्रजसससहरपसाहिअदिअते । निभयमणाई अणते, पडिवन्नो सरणमरिहते ॥२१॥ जो अनन्त ज्ञान, अनन्त दशन प्रादि अपूव गुणों को धारण करने वाले हैं, जिनके यश रूपी चन्द्रमा की निर्मल ज्योति से सभी दिशाएँ प्रकाशित हैं । अनादिकाल से नियत ऐसे अनन्त परिहत भगवान् का शरण में स्वीकार करता हूँ। उझिप्रजरमरणाण, समतदुक्सत्तसत्तसरणाण । तिहुअणजणसुहयाण, अरिहताण नमो ताण ॥२२॥ जो जरा, जन्म, मरण से रहित हैं, दुय से सतप्त समस्त प्राणियो के लिए शरणभूत हैं और जो तीनों लोको प्राणियों को सुग-शान्ति देने वाले है एसे प्ररिहन्न भगवान को मेरा नमस्कार हो। मरिहतसरणमतसुद्धिलद्ध, सुविसुद्धसिद्धग्रहमाणो। पचय-सिर-रइय-फरस्मत, सेहरो सहरिम भगई।२३। - .
ससारन्तरणिका -....-...- - । , अरिहन्त भगवान् का शरण स्वीकार करने से जिनके माभ्यन्तर पाय रूप मल की शुद्धि हो गई है, अतएव जिनको सिद्ध भगवान के प्रति प्रादर व बहुमान उत्पन्न हो गया, ऐसा वह साधक, सिर पर अजलि चढा कर सहर्प यो बोलता है। सिद्ध भगवान् का परण कम्मटुक्खयसिद्धा, साहाविनमाण-दसण समिद्धा । सम्वटुलद्धि सिद्धा, ते सिद्धा हुतु मे सरण ॥२४॥ ज्ञानावरण प्रादि पाठो कर्मों का क्षय करके जो सिद्ध हो चुके हैं, ज्ञान दशन से जो समद्ध हैं और सर्वाथ लब्धि से जो सिद्ध हैं अर्थात् कृतकृत्य हैं, वे सिद्ध भगवान् मेरे शरण-रक्षक हा। तिअलोप्रमत्थयथा, परमपयत्था अचितसामत्था । मगल सिद्ध-पयत्था, सिद्धा सरण सुहपसत्या ॥२५॥ घाती तथा अघाती कर्मों का नाश होने से जो लोक के अग्रभाग पर विराजमान हैं, प्रत जो परमपद को प्राप्त हैं, जिनका सामथ्य अचित्य है, तथा मगलमय सिद्ध पद पर स्थित हैं, ऐसे सिद्ध भगवान का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। मूलुक्खयपडिवक्खा, अमूढलक्खा सजोगिपच्चरखा । साहाविअत्तसुक्खा सिद्धा सरण परमसुक्खा ॥२६॥ जिन्होने राग और द्वेष की जड को मूल से उखंड दी है, जो अमूढ लक्ष वाले और सयोगी केवलज्ञानियो द्वारा प्रत्यक्ष हैं,जिनको प्रात्मिक सहज सुख प्राप्त है, ऐसे श्री सिद्ध भगवान - घउसरण-पइण्णा ६ का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। पडिपिल्लिप्रपडिणीया, समग्गशाणग्गिदट्टमवीना। जोईसरसरणीया, सिद्धा सरण सुमरणीया ॥२७॥ जिन्होने राग द्वेप रूपी शनु का विनाश कर दिया है और धर्मध्यान तथा शुक्लध्यान रूप अग्नि से भवभ्रमण के बीज को जला दिया है, योगीश्वर भी जिनकी शरण मे जाते हैं, ऐसे सिद्ध भगवान् की मैं शरण स्वीकार करता हूँ। पावियपरमाणदा,गुणनीसदा विभिन्न भवकदा। लहुईकयरविचदा, सिद्धा सरण खविप्रददा ॥२८॥ जिन्होने परमानन्द प्राप्त कर लिया है, जो ज्ञानादि गुणों के भण्डार हैं, जिन्होने ससार रूपी कद का सर्वथा नाश कर दिया है, जिनके सामने चन्द्र और सूर्य का प्रकाश भी फीका लगता है और जिन्होने राग और द्वेप रूपी द्वन्द्व को सम्पूणतया मिटा दिया है, ऐसे सिद्ध भगवान् का मैं शरण स्वीकार करता उवलद्धपरमवमा, दुल्लहलमा विमुक्कसरभा । भुवणघरधरणखभा, सिद्धा सरण निरारमा ॥२६॥ जिहोने परम ब्रह्म के स्वरूप को प्राप्त कर लिया है, जिन्होने कठिनाई से प्राप्त होने योग्य मुक्ति को प्राप्त कर लिया है, जो प्रारम्भ से रहित हैं, लोक रूप धर को धारण करने के लिए जो स्तम्भ के समान हैं, ऐसे सिद्ध भगवान् की में शरण स्वीकार करता हूँ।
संसार-तरणिका
m-.-.-.-
-.-
-.-..
सिद्धसरणेण नवबम हे उसाहुगुणजणिप्रबहुमाणो।
मेइणिमिलतसुपसत्यमत्यओ तत्यिम भणई ॥३०॥
सिद्ध भगवान का शरण स्वीकार करने से और ज्ञान तथा
ब्रह्मचय के कारणभूत साधुगुण के प्रति जो बहुमान (अनुराग)
वाला है, जिसका उत्तमाग (मस्तक) भूमितल पर लगा हुआ है,
वह साधक आगे की गाथा द्वारा साधुजनो का शरण स्वीकार
करता हुआ निम्न प्रकार कह रहा है-
साधु पद का शरण
जिअलोप्रबधुणो कुगइसिंधुणो पारगा महाभागा ।
नाणाइएहि सिधसुक्खसाहगा साहूणो सरण ॥३१॥
जो साधु, समस्त प्राणियो के लिए बधु रूप हैं, कुगति
स्वरूप ससार समुद्र के पारगामी हैं, ज्ञान, दशन तथा चारित्र
रूप मोक्ष मार्ग के साधक है, ऐसे महाभाग साधुओ का मैं भाव-
पूवक शरण स्वीकार करता हूँ।
केवलिणो परमोही, विउलमई सुयहरा जिणमयमि ।
पायरिय-उवज्शाया, ते सव्वे साहूणो सरण ॥३२॥
केवलज्ञानी, परमावधिज्ञानी, विपुलमति, विशिष्ट श्रुत को
धारण करने वाले तथा जिनमत मे जो प्राचार्य उपाध्याय हैं,
इन सब का मैं शरण स्वीकार करता हूँ।
चउदस-दस-नवव्यो, दुवालसिक्कारसगिणो जे य ।
जिणकप्पाहालदिय, परिहारविसुद्धि साहू य ॥३३॥
चउसरण-पइण्णा . चौदह पूर्व को धारण करने वाले, दस पूर्व को धारण करने वाले, नो पूर्व को धारण करने वाले, द्वादशागी के जानने वाले और जो जिनकल्पी तथा यथालदिक और परिहार विशुद्ध चारिष वाले साधु हैं, उन का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। खीरासवमहुआसव, सभिन्नस्सोअकुट्ठबुद्धी य । चारणवेउविपयाणुसारिणो साहुणो सरण १३४। क्षीरासव-क्षीर के समान मधुर वचन बोलने वाले, महुआ- सव-मधु (शहद) के समान मधुर वचन बोलने वाले, सभिनश्रोत सब्धिवाले, कोप्ठ वुद्धि वाले, जघाचारण, विद्याचारण, वैमिन्य लब्धिवाले तथा पदानुसारी लब्धिवाले साधुओ का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। उज्झियवइरविरोहा, निच्चमदोहा पसतमुहसोहा। अभिमयगुणसदोहा, हयमोहा साहुणो सरण ॥३॥ जो वैर विरोध से रहित हैं, ईयाभाव से जो सर्वथा मुक्त हैं, कपाय रहित होने से जो सदा प्रशात मुखमुद्रा वाले हैं, क्षमा, शाति, सरलता प्रादि अनेक गुणो से सयुक्त हैं, जिहोंने मोहनीय कम का सवथा विनाश कर दिया है, या विनाश करने मे तत्पर हैं, ऐसे साधुओ का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। खडिप्रसिणेहदामा, अकामधामा निकामसुहकामा । सुपुरिसमणाभिरामा, आयारामा मुणी सरण ।३६। जिन्होंने स्नेह को डोरी को काट दिया है, जो काम और वासना से रहित हैं, प्राध्यात्मिक सुख में तल्लीन हैं, श्रेष्ठ पुरुषों .
ससार-तरणिका
के हृदय को प्रादित करने वाले हैं और प्रात्म सुख मे रमण
करने वाले हैं, ऐस साधुओं का मैं शरण स्वीकार करता हूँ।
मिल्हिअविसयकसाया, उज्झियघरघरणिसगसुहसाया ।
प्रफलिमहरिसविमाया, साहू सरण गयपमाया ।३७॥
जिन्होंने पाच इन्द्रियो के विषय और कपाय को दूर हटा
दिया है और जो घर, दार, मित्र तथा कुटुम्बियो के ससग तथा
साता-सुख की लालसा से सदा दूर हैं, जिनके हृदय मे न हपं
है और न शोक है, ऐसे अप्रमादी साधुओ का मैं शरण स्वीकार
करता हूँ।
हिंसाइदोससुन्ना, कयकारुन्ना सय भूरप्पना (प्पुण्णा) ।
अजरामरपहखुन्ना, साहू सरण सुकयपुन्ना ।३८॥
जो हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन और परिग्रह आदि पापो से
रहित है, षट्कायिक जीवो के प्रति करुणा बुद्धि वाले हैं, ब्रह्मा
के समान बुद्धि वाले हैं, जो जरा और मरण रूप पथ से जो दूर
हुट गये हैं, ऐसे पुण्यशाली साधुओ का मैं शरण स्वीकार करता
कामविडबणचुक्का कलिमलमुक्का विमुक्कचोरिक्का ।
पावरयसुरयरिक्का, साहू गुणरयणच्चिका ३६।
जो कामवासना की भयकर विडम्बना से रहित हैं, पाप
रूपी कलिमल से जो सवथा रहित हैं, जो देव प्रदत्त, गुरु प्रदत्त,
गायापति अदत्त आदि चौय कम मल से रहित हैं, मैथुन
रूपी रज से जो रहित हैं और जो साधुओ के उत्तम गुणो से
सुशोभित हैं ऐसे साधुओ का मैं शरण स्वीकार करता हूँ।
घउसरण पडणा साहुत्तमुट्ठिया ज, आयरिआई तओ य ते साहू। सामणिएण गहिया, तम्हा ते साहुणो सरण ॥४०॥ साधु धर्म की कठोर साधना के माग में स्थित हैं, जो प्राचाय, उपाध्याय, स्थविर, प्रवत्तंक प्रादि विशेष पदो के धारक हैं, वे सब साध इस पद से सगृहीत हो जाते हैं। उन सभी माधुओ का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। पडियन्नसाहुसरणो, सरण काउ पुणोवि जिणधम्म । पहरिसरोमचपवचकचुअचिप्रतणू भवइ ।।४।। साधुओ का शरण स्वीकार करके फिर जिन धम का शरण स्वीकार करने के लिए वह साधक, हर्पित रोमराजी वाला होकर अर्थात् प्रत्यत हर्पित होता हुआ प्रागे की गाथाओ से इम प्रकार कह रहा है- - मगलमय धमका शरण पवरसुकएहिं पत्त, पत्तेहिवि नवरि केहिवि न पत्त । त फेवलिपन्नत, धम्म सरण पवन्नोऽह ।।४२।। जो धम, प्रयप पुण्यशालियो के द्वारा प्राप्त है और कभी- कभी पुण्यशाली जीव भी भोगासवत होने मे जिस धर्म की साधना से वचित भी रह जाते हैं (जमे ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती प्रादि), जो केवलज्ञानियो द्वारा सुप्रज्ञप्त एव सुकथित है, ऐसे धर्म का मैं शरण स्वीकार करता हूँ। पत्तेण अपत्तण य पत्ताणि य, जेण नरसुरसुहाइ । मुखसुह पुण पत्तेण, नवरि धम्मो स मे सरण ॥४३।। .
१४ ससार-तरणिका ......... मनुष्य सम्बन्धी सुख और देव सम्बन्धी सुख तो पात्र (भव्य) और अपात्र (अभव्य) जीवो के द्वारा भी प्राप्त किये गये हैं, किंतु मोक्ष सुख तो पात्र (भव्य) जीवो के द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं। इसलिए मैं धम का शरण स्वीकार करता हूँ। निद्दलिप्रकलुसकम्मो, फयसुहजम्मो खलोकयनहम्मो । पमुहपरिणामरम्मो, सरण मे होउ जिणधम्मो ॥४४॥ जो धम, कलुषित कम मल को नष्ट करने वाला है, जिस धर्म की साधना से मानव जीवन सफल बनता है, हिंसा आदि अधम प्रवृत्तियो को जिसने दूर हटा दिया है और जिस धर्म की साधना का परिणाम, साधको के लिए बड़ा ही सुन्दर एव सुखद हाता है, ऐसे जिनधम का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। कालत्तएवि न मय, जम्मण जरमरणवाहिमय-समय । अमय व बहुमय, जिणमय च सरण पवन्नोऽह ॥४५॥ जो श्रुतधम, प्रवाह की अपेक्षा से तीनो काल मे नित्य एवं शाश्वत है । जन्म, जरा, मरण तथा अनेक विध रोगो का नाश करने वाला है और जो जनता मे अमृत की तरह उपादेय है ऐसे इस द्वादशागी रूप श्रुतधम-जिनधर्म का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। पसमिनकामपमोह, दिद्वादिद्रुसु न कलिअविरोह । सिवसुहफलयममोह, धम्म सरग पवन्नोऽह ॥४६|| काम और विकार का शमन करने वाला,दृश्य और अदृश्य चउसरण पइण्णा . पदाय समूह मे अविरोधी और निश्चित रूप से मोक्ष सुख देने वाले ऐसे द्वादशांगी रूप श्रुतधर्म का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। नरयगइगमणरोह, गुणसदोह पवाइनिषखोह । निहणिअवम्महजोह, धम्म सरण पवन्नोऽह ॥४७॥ नरकादि गतियो का निरोध करने वाला, अहिंसा सत्य क्षमा प्रादि गुण समूह का स्थान, प्रवादियो से अक्षुब्ध (दह एव शात) रहने वाला, तथा जो कामरूप सुभट को नष्ट करने वाला है, ऐसे धम का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। भासुरसुवन्नसुदर-रयणालकार-गारवमहग्ध । निहिमिव दोगच्चहर, धम्म जिणदेसिअ वदे ।४।। स्वर्ण के समान प्रकाशमान देवगति का कारण, रत्नो के मलकारो से भी महामूल्यवान, चक्रवत्तियो की नवनिधियो की तरह निधान रूप, तथा नरकादि दुगतियो का नाश करने वाला, ऐसे जिनेन्द्र भगवान् द्वारा सुकथित धर्म की मैं वन्दना करता हूँ। दुष्कृत गही चउसरणगमणसचिअसुचरिअरोमचचियसरीरो। कयदुक्कडगरिहा, असुहकम्मक्सयक खिरो भणई ।४६ परिहन्त, सिद्ध, साधु तथा वेवली प्ररूपित धर्म, इन चार का शरण स्वीकार करने से अत्यन्त हर्षित बना हुआ वह साधक, अपने किये हुए दुष्कृत (पापो) की गर्दा करके, अशुभ कर्मों को क्षय करने की इच्छा रखने वाला, निम्नोक्न गापामो द्वारा अपनी मालोचना करता है- १४ ससार-तरणिका . मनुष्य सम्बन्धी सुख और देव सम्बन्धी सुख तो पात्र (भव्य) और अपात्र (प्रभव्य) जीवो द्वारा भी प्राप्त किये गये हैं, किंतु मोक्ष सुख तो पात्र (भव्य) जीवो के द्वारा ही प्राप्त किये जा सकते हैं । इसलिए मैं धर्म का शरण स्वीकार करता हूँ। निद्दलिप्रकलुसकम्मो, फयसुहजम्मो खलोकयनहम्मो । पमुहपरिणामरम्मो, सरण मे होउ जिणधम्मो ॥४४॥ जो धम, कलुपित कम मल को नष्ट करने वाला है, जिस घम की साधना से मानव जीवन सफल बनता है, हिंसा आदि अधम प्रवृत्तियो को जिसने दूर हटा दिया है और जिस धर्म की साधना का परिणाम, साधको के लिए बडा ही सुन्दर एव सुखद होता है, ऐसे जिनधम का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। कालत्तएवि न मय, जम्मण जरमरणवाहिमय-समय । अमय व बहुमय, जिणमय च सरण पवन्नोऽह ॥४५॥ जो श्रुतधम, प्रवाह की अपेक्षा से तीनो काल मे नित्य एव शाश्वत है । जन्म, जरा, मरण तथा अनेक विध रोगो का नाश करने वाला है और जो जनता मे अमृत की तरह उपादेय है ऐसे इस द्वादशागी रूप धृतधर्म-जिनधर्म का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। पसमिनकामपमोह, दिवादिठेसु न कलिअविरोह । सिवसुहफलयममोह, धम्म सरण पवन्नोऽह ॥४६|| काम और विकार का शमन करने वाला,दृश्य और अदृश्य चउसरण पइण्णा . पदार्य समूह मे अविरोधी और निश्चित रूप से मोक्ष सुख देने वाले ऐसे द्वादशांगी रूप श्रुतधर्म का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। नरयगइगमणरोह, गुणसदोह पवाइनिक्खोह । निहणिअवम्महजोह, धम्म सरण पन्नोऽह ॥४७॥ नरकादि गतियो का निरोध करने वाला, अहिंसा सत्य क्षमा प्रादि गुण समूह का स्थान, प्रवादियो से अक्षुब्ध (दृष्ट एव शात) रहने वाला, तथा जो कामरूप सुभट को नष्ट करने वाला है, ऐसे धर्म का शरण मैं स्वीकार करता हूँ। भासुरसुवन्नसुदर-रयणालकार-गारवमहाघ । निहिमिव दोगच्चहर, धम्म जिणदेसिस वदे ॥४८॥ स्वण के समान प्रकाशमान् देवगति का कारण, रत्नो के मलकारो से भी महामूल्यवान, चक्रवत्तियो की नवनिधियो की तरह निधान रूप, तथा नरकादि दुगतियो का नाश करने वाला, ऐसे जिनेद्र भगवान् द्वारा सुकथित धम की मैं वदना करता हूँ। दुष्कृत गहरे चउसरणगमणसचिअसुचरिअरोमचचियसरीरो। कयदुक्कडगरिहा, असुहम्मक्सयकखिरो भणई ।४६ परिहन्त, सिद्ध, साधु तथा वेवली प्ररूपित धर्म, इन चार का शरण स्वीकार करने से प्रत्य त हर्षित बना हुआ वह साधक, अपने क्येि हुए दुष्कृत (पापा) को गर्दा करके,अशुभ कर्मों को क्षय करने की इच्छा रखने वाला, निम्नोक्त गापाओ द्वारा अपनी मालोचना करता है- ससार-तराणका .............. इहमविअमनमविभ, मिच्छतपवत्तण जमहिगरण । जिणपवयणपडिकुट्ठ, दुट्ठ गरिहामि त पाव ।५०। इस भव और परभव मे मिथ्यात्व का प्रवर्तन रूप जा भयकर पाप किया है, तथा जिनन्द्र भगवान् के सिद्धात के विरुद्ध भाषण एव पाचरण किया है, उस दुष्ट पाप को मिथ्या करने के लिए मैं आत्मसाक्षी तथा गुरुजनो को साक्षी से निन्दा करता हूँ। मिच्छत्ततमधेण अरिहताइसु अवन्नवयण ज । अन्नाणेण विरइय, इहि गरिहामि त पाव ॥५१॥ मिथ्यात्व रूप अन्धकार से अन्धे बने हुए मैंने अरिहन्त प्रादि के सम्बन्ध मे प्रवणवाद बोलकर, या उसका सवथा अप- लाप कर के अज्ञानवश पाप कम का सचय किया है, उसके लिए मैं आत्म साक्षी से तथा गुरु साक्षी से निन्दा करता हूँ और भवि. ष्य मे ऐसा नहीं करूगा, इसके लिए विशेष सावधान रहूँगा। सुअधम्म सघसाहुसु, पाव पडिणीप्रयाइ ज रईस । अन्नेसु अ पावेस, इण्हि गरिहामि त पाच ॥५२॥ श्रुतधम और सघ धम के सम्बन्ध मे तथा साधु जीवन की साधना करने वाले साधुओ के सम्बध मे, ईर्ष्या बुद्धि से जो उनके प्रति दाह बुद्धि जय पाप कम किया हो, तथा भय हिंसा, झूठ, चारी प्रादि १८ पाप कम का सचय किया हो, तो उसके लिए मैं अब प्रात्म साक्षी से तथा गुरु साक्षी से निदा करता हूँ और मैं अपनी आत्मा को पवित्र बनाता हूँ।
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संसार-तरणिरा - अरिहन्त भगवान मे प्ररिहन्तपना, सिद्ध भगवान् मै सिद्ध- पना, प्राचार्यों में प्राचार्यपना, उपाध्यायो मे उपाध्यायपना, साधुओ मे साधुपना, श्रावको मे श्रावकपना और सम्यग्दृष्टियो मे सम्यक्त्व, इन सब का मैं अनुमादन करता हूँ। अहवा सव्व चित्र, वीयरायवयणाणुसारि ज सकय । कालत्तएवि तिविह, अणुमोएमो तय सबब ।।५।। अथवा श्री वीतराग भगवान् के वचनानुसार जितने भी सुवृत (धम) काय हैं, उन सब की मैं मन, वचन और काया से, तीन काल मे अनुमोदना करता हूँ। सुहपरिणामो निच्च, चउसरणगमाइ प्रायरे जीवो। कुसलपयडीउ बधइ, बद्धाउ सुहाणुबधाउ ॥५६॥ चार शरण को नित्य स्वीकार करने वाला साधक, शुभ परिणाम वाला होता है, जिससे वह पुण्य की शुभ प्रकृतियो को बाधता है और पहले बधो हुई अशुभ प्रकृतियो को भी शुभ बना लेता है। मदणुभावा बद्धा, तिवणुभावाउ कुणइ ता चेव । असुहाउरिणुबधाउ, कुणइ तिब्याउ मदाउ ॥६०॥ साधक अपने शुभ अध्यवसायो से पुण्य की मन्द रसवाली उन प्रकृतियो को तीव्र रसवाली बना लेता है और पहले बधी हुई तीव्र रसवाली अशुभ प्रकृतियो को मद रसवाली अथवा शुभ प्रध्यवसाया से निरनवर अर्थात् विना बन्धवाली बना लेता है।
घउसरण पइण्णा
,
ता एय कायव्व, बुहेहि निच्चपि सकिलेसम्मि ।
होइ तिकाल सम्म, असकिलेसम्मि सुरुयफल ।६११
इसलिए बुद्धिमान साधक को रोगादि कारणो के उपस्थित
होने पर सदा अशरण मे शरण देनेवाले अरिहत, सिद्ध, साधु,
केवलि-प्ररूपित धर्म, इन चार शरणो को स्वीकार करना
चाहिए । इससे त्रिकाल मे हित होता है और यह शरण बिना
कष्ट के पुण्य सचय का कारण बनता है।
चउरगो जिणधम्मो न कओ, चउरगसरणमवि न कय ।
चउरगभवच्छेओ न कओ हा । हारिओ जम्मो ।६२।
दान, शील, तप एव भाव स्प चार अग वाले जिनधर्म
का मैंने आचरण नहीं किया और ससार से पार करने वाले
इन चार शरणो को भी अगीकार नही किया। इस प्रकार मैने
चतुर्गति भवभ्रमण का उच्छेद भी नहीं किया। हा, मैंने मानव
जैसे श्रेष्ठ जन्म को व्यथ गंवा दिया।
इअ जीवपमायमहारिवीरभद्द तमेप्रमज्झयण ।
झाएस तिसझमवझकारण निवुइसुहाण १६३।
लिए मैं जीव के प्रमाद रूप शत्रु का नाश करने वाले
और अन्त मे क्ल्याण करने वाले, इस चतु शरण अध्ययन का
त्रिकाल-प्रात , मध्याह और साय, अध्ययन करता हूँ। क्योकि
यह अध्ययन निश्चित रूप से मोक्ष सुखो को देने वाला है।
"चउसरणपण्णा सम्मत्ता,
पावपडिग्घाय-गुणबीजाहाण मुत्तं Sund- णमो वोयरागाण सवण्णूण देविदपूइयाण जट्ठिय- वत्थुवाईण तेलुक्कगुरूण अरूहताण भगवताण । जो राग द्वेप से सवथा रहित हैं, जगत् के समस्त पदार्थों को सम्पूर्ण रूप से जानते हैं, देवेन्द्रो से जो पूजित हैं और जो वस्तु को यथाथ प्ररूपणा करते हैं, तथा जिन्होंने पुनर्जन्म की जड को काट कर भव मन्तति का ममूल नाश कर दिया है, एसे त्रैलोक्य गुरु अहत भगवतो का मेरा नमस्कार हो। जे एवमाइक्खति-इह सलु प्रणाइजीवे अणाइ. जीवस्सभवे, प्रणाइकम्मसजोगनिव्वत्तिए, दुक्खस्वे, दुक्खफले, दुक्खाणुबधे। वे भगवन्त, इस प्रकार कहते है कि ससार में जीव अनादिकाल मे है। अनादि जीव का ससार भी अनादि कर्म सयोगो से हुआ है । यह ससार जन्म, जरा, मरण, व्याधि आदि दुखा से भरा हुआ है । चारो गति मे जम मरणादि दुख लगे होने से इसका फल भी दुख रूप ही है । यह संसार दुख के अनुबध वाला है । इसलिए अनेक भवो मे दुख के साथ भुगत सके-ऐसी कम परम्परा का बन्धक है। एयस्स ण वृच्छित्ती सुद्धधम्माओ, सुद्धधम्म सम्पत्ती पावकम्मविगमाओ, पावकम्मविगमो तहा भव्य- ताइभावओ। इस भव परम्परा का विच्छेद, शुद्ध धर्म से होता है। - पावपडिग्धाय गणबोजाहाण सुत्त शुद्ध धम की प्राप्ति, पाप कम के विनाश से होती है और पाप कम का विनाश तथा भव्यत्वादि कारणो से होता है । तथा भव्यत्व उदय के साधन तस्स पुण विवागसाहणाणि चउसरणगमण दुक्कड- गरिहा सुकडाणासेवण । अओ कायवमिण हे उकामेण सया सुप्पणिहाण भुज्जो मुज्जो सक्लेिसे लिकाल- मसकिलेसे। तथा भव्यत्वादि परिपक्व होने के साधन इस प्रकार हैं-१ अरिहन्तादि चार की शरण मे जाना, २ दुष्कृत्यो की निन्दा करना और ३ सुकृत्यो का सेवन करना। इसलिए मोक्षार्थी भव्य प्राणियो के लिए मन, वचन और शरीर के शुभ व्यापार से सदैव चार शरणादि करने योग्य हैं । ये चतु- शरणादि तीव्र रागादि सक्लेश में बार-बार करने चाहिए और सक्लेश न हो, तो नित्य तीन काल मे करना चाहिए । जावज्जीव मे भगवतो परमतिलोगनाहा अणुत्तर- पुनसभारा खीणरागदोसमोहा अचिनचितामणी भव- जलहिपोया एगतसरणा प्ररहता सग्ण । ज्ञानादि समग्र ऐश्वर्यादि युक्त, तीन लाक के परम नाथ, सर्वोत्तम पुण्य के समूह वार, जिनके रागद्वेप और मोह सवथा नष्ट हा गय है, ऐस अचिंत्य चिन्तामणि रत्न समान, ससार रूपी समुद्र मे सुदढ जहाज के समान तथा एकात रूप से सर्वथा शरण करने योग्य, ऐसे अरिहन्त भगवन्तो का मुझे ससार तरणिका ... .-.--.-98 शरणा हो। तहा पहीणजरमरणा अवेअकम्मकलका पणढवा. वाहा केवलनाणदसणा सिद्धिपुरनिवासी निरुवमसुह- सगया सव्वहा कयकिच्चा सिद्धा सरण । जिनके जरा और मृत्यु का नाश हो चुका है, जो कम रूपी कलक से सवथा रहित हैं जिनकी सभी प्रकार की बाधाएं नष्ट भ्रष्ट हो चुकी, ऐसे केवलज्ञान और केवलदशन वाले, सिद्धपुर निवासी, अनुपम उत्कृष्ट सुख के भोक्ता तथा सम्पूर्ण रूप से कृतकृत्य ऐसे सिद्ध भगवान् मेरे लिए सदा शरण रूप होवे। तहा पसतगभीरासया सावज्जजोगविरया पच- विहायारजाणगा परोययारनिरया पउमाइ निदसणा झाणज्झयणसगया विसुज्झमाणभावा साहू सरण । उन सुसाधुओ का मुझे शरणा हो, जिनका हृदय क्षमादि उत्तम गुणो से शात एक गम्भीर है, जो सावद्य प्रवृत्तियो से विरत हैं, ज्ञानादि पाच प्रकार के प्राचार को जानते और पालते हैं, जो धमदान रूप परोपकार मे तत्पर हैं, तथा कमल की तरह विषयादि से निलिप्त है, जो स्वाध्याय और ध्यान मे मग्न रहा करते हैं और जिनके परिणाम विशुद्ध रहते है, ऐसे साधुओ का मुझे शरणा हो। तहा सुरासुरमणुप्रपूइओ मोहतिमिरसुमाली राग- दोसविसपरममतो, हेऊ सयलकल्लाणाण, कम्मवणविहा- पावपडिग्याय-गणबोजाहाण सुत्त २३ वसू, साहगो सिद्ध भावस्स, केलिपण्णत्तो धम्मो जावज्जीव मे भवउ सरण । सकल सुरासुर एव नरेन्द्रो से पूजित, समस्त ऐश्वर्यादि से युक्त, मोह अन्धकार का नाश करने मे सूर्य के समान, राग द्वेष रूपी विष को दूर करने वाले महामन्त्र के समान, सभी प्रकार के कल्याण का कारण, कम रूप वन को भस्म करने मे अग्नि के समान और मोक्षरूप महासिद्ध के साधन वाले, ऐसे केवली भगवान् द्वारा उपदिष्ट धम का मुझ जीवन पर्य त शरण हो । दुष्कृत्य निदा सरणमुवगओ अ एएसि, गरहामि दुक्कड | इन अरिहतादि चार के शरण को पाकर, मै अपने दुष्कृत्य की निन्दा करता हूँ। जण अरहतेसु वा सिद्धेसु वा पायरिएस वा उवज्झाएसु वा साहुसु वा साहुणीसु वा अन्नेसु वा धम्म- ट्ठाणेसु वा माणणिज्जेसु पूअणिज्जेसु तहा माईसु वा पिईस वा बधूम वा मित्तेसु वा उवयारिसु वा, ओहेण वा जीवेसु मग्गद्विएस, अमग्गट्ठिएस, मग्गसाहणेस, अमग्गसाहणेस,ज किंचि वितहमायरिअ अणायरिअध्व प्रणिच्छिअव्व पाव पावाणुबधि सुहुम वा बायर वा मणेण वा वायाए वा काएण वा, कय वा काराविअ वा अणुमोइम वा, रागेण वा दोसेण वा मोहेण वा, इत्थ वा जम्मे जम्मतरेसु वा गरहिअमेअ दुक्कडमे उज्झिमन्त्रमेज विआणि मए
२४
ससार-तरणिका
..
.
कल्लाणमित्तगुरुभगवतवयणाओ एवमेअति रोइअ सद्धाए,
अरहतसिद्धसमक्ख गरहामि प्रहमिण दुक्कडमेय उज्झि-
अव्वमेय । इत्थमिच्छामि दुक्कड । मिच्छामि दुक्कड ।
मिच्छामि दुक्कड़ ।
अरिहत, सिद्ध, प्राचाय, उपाध्याय, साधु, साध्वी और
धम के दूसरे गुणाधिक स्थान-श्रावक श्राविका, जो माननीय,
प्रादरणीय एव पूजनीय हैं, तथा माता, पिता, बन्धु, मित्र, उपकारी
अथवा सामान्यतया सम्यक्त्वादि धम माग मे रहे हुए जीव
और माग मे नही रहे हुए (उन्मागगामी) जीव, माग के साधन
आगम प्रादि शास्त्र और माग का नही साधने वाले ऐसे खड्गादि
शास्त्र, इन सब के विषय मे मैंने शरीर से नही करने याग्य दुरा-
चरण किया हो, मन से नही इच्छने योग्य की इच्छा की हो,
इस प्रकार मने छोटे या बडे पापानुबन्धी पाप का प्राचारण,
मन वचन और काया से स्वय क्यिा हो, दूसरो से करवाया हो
और दूसरे के पापा की अनुमादना की हो, राग द्वेप अथवा मोह
स, इस जन्म अथवा पूर्व के भवातरो मे मने कुछ भी पाप किया
हो, ता वह सभी पाप कार्य, निन्दा करने योग्य है, दुष्कृत्य है,
और त्याग करने के योग्य है । यह मने कल्याण मित्र ऐसे
भगवन्त गुरु महाराज के वचनो से जाना है। मुझे इसकी रुचि
हुई है । म इसकी श्रद्धा करता हूँ और इसीलिए मैं
अरहन्त
और सिद्ध भगवान की साक्षी से सभी दुष्कृत्यो को निदा करता
हूँ। मेरे सभी पाप मिथ्या हो जाओ। मेरे सभी पाप मिथ्या
हो जाओ । मेरे सभी पाप मिथ्या हो जाओ।
.
।
पावपडिग्याय गुणवीजाहाण सुत्त
२५
होउ मे एसा सम्म गरिहा । होउ मे प्रकरण.
नियमो। बहुमय ममेम ति, इच्छामि अणुढि अरहताण
भगवताण गुरुण कल्लाणमित्ताण ति ।
उपरोक्त गर्दा मुझे भाव रूप होओ और पुन ऐसे पाप
नही करने का मेरे नियम हो । ये दोनो बाते मुझे स्वीकार है।
इसलिए मै अरिहत भगवन्त और कल्याण मित्र ऐसे गुरु महा-
राज की हित-शिक्षा चाहता हूँ ।
होउ मे एएहि सजोगो । होउ मे एसा सुपत्यणा ।
होउ मे इत्य बहुमाणो । होउ मे इओ मुक्खवीय ति ।
इन अरिहतादि के साथ मेरा सयोग (उचित योग) प्राप्त
होवो । मेरी अरिहतादि से की हुई यह प्राथना सफल हो । इस
प्राथना मे मुझे बहुमान-हर्प उत्पन्न हो और इस प्राथना से
मुझे मोक्ष के बीज रूप शुभानुवधी-पुण्यानुवन्धी पुण्य की प्राप्ति
हो।
पत्तेसु एएसु ग्रह सेवारिहे सिया। प्राणारिहे सिया ।
पडिवत्तिजुत्ते सिया । निरइआरपारगे सिया।
इन अरिहतादि की प्राप्ति होने पर मैं उनकी सेवा के
योग्य होऊँ । उनकी आज्ञा पालन करने के योग्य बनूं । उनको
भक्ति युक्त हो जाऊँ और उनकी प्राज्ञा को निरतिचारपने
पालन करने वाला बन सकूँ। ऐसा शुभ अवसर मुझे प्राप्त हो।
सुकत सेवना
सविग्गो जहासत्तीए सेवेमि सुकड प्रणुमोएमि
ससार-तरणिका सव्वेसि अरहताण अणुट्ठाण । सव्वेसि सिद्धाण सिद्ध भाव । सब्वेसि प्रायरियाण पायार । सम्वेसि उवज्झायाण सुत्तप्पयाण । सन्वेसि साहूण साहुकिरिय । सव्वेसि सावगाण मुक्खसाहणजोगे। सम्वेसि देवाण सव्वेसि जीवाण होउकामाण कल्लाणासयाण मग्गसाहणजोगे। मैं माक्ष का अभिलापी हुआ हूँ, इसलिए मैं अपनी शक्ति के अनुसार (आत्म वीय को छिपाये बिना ही) सुकृत्य का सेवन इस प्रकार करता हूँ। मैं सभी तीर्थंकरो के धमोपदेशादि अनुष्ठान की अनुमोदना करता हूँ। इसी प्रकार सभी सिद्धो के मव्यावाधादि सिद्ध दशा की, सभी प्राचार्यों के ज्ञानाचारादि माचार की, सभी उपाध्यायो के सूत्रदान की, सभी साधुओ को स्वाध्याय ध्यानादि शुभ क्रियाओ को और सभी श्रावको के वया- वृत्यादि तथा सम्यक्त्व सहित देश विरति रूप मोक्ष साधना की मैं अनुमोदना करता हूँ और प्रासन भव्य तथा शुद्ध प्राशय वाले इद्रादि देवो की और सामा यतया सभी जीवो के कुशल व्यापार (मार्गानुसारी प्रादि शुभ परिणति की) में अनुमादना करता हूँ। होउ मे एसा अणुमोप्रणा सम्म विहिपुग्विआ, सम्म सुद्धासया, सम्म पडिवत्तिरूवा, सम्म निरइयारा, परमगुणजुत्तअरहताइसामत्थओ। अचितसत्तिजुत्ताहि ते मगवतो वोयरागा सबष्णू, परमकल्लाणा परमकल्लाण- हेऊ सत्ताण । मूठे अम्हि पावे अगाइमोहवासिए, अण- भिन्ने भावओ, हिमाहियाण अभिन्ने सिया, अहिअनि- पावपडिग्धाय-गुणबीजाहाण मुत्त www बित्ते सिया, हिअपवित्ते सिया, आराहगे सिया, उचि- अपडिवत्तीए सव्वसत्ताण सहिअ ति । इच्छामि सुक्कड । इच्छामि सुक्कड । इच्छामि सुक्कड । अरिहतादि के अनुष्ठानो को मेरी यह अनुमोदना सूत्रोक्त विधि पूर्वक हो । यह कम को नष्ट करने से शुद्ध प्राशय वाली हो । सम्यक क्रिया से आचरण करने योग्य बनो । इसका अति- चार रहित सम्यक् निर्वाह हो । क्योकि अरिहन्तादि भगवन्त वीतराग और सर्वज्ञ हैं और प्राणियो के लिए उत्कृष्ट कल्याण के करने वाले तथा कल्याण के हेतु है । और मैं तो मूढ पापी और अनादि मोह करके सहित हूँ। मैं परमार्थ (हिताहित) को भी नहीं जानता । इसलिए उन अरिहन्तादि के सामथ्य से मैं हिताहित का जाननेवाला बनू । हिताहित को जानकर अहित से निवृत्ति करके हित मे प्रवृत्ति करू । अपना हित जानकर सभी प्राणियो की उचित सेवा से मैं आराधक बनूं । इसलिए मैं सुकृत्य की इच्छा करता हूँ। मैं सुकृत्य की इच्छा करता हूँ। मैं सुकृत्य की इच्छा करता हूँ। सूत्र पाठ का फल एवमेअ सम्म पढमाणस्स सुणमाणस्स अणुप्पेह- माणस्स सिढिलिभवति, परिहायति, खिज्जति, असुह- कम्माणुबधा । निरणुबधे चासुहकम्मे भग्गसामत्थे सुह- परिणामेण कडगबद्धे विप्र विसे अप्पफले सिया, सुहा. वणिज्जे सिया, अपुणभावे मिया । - - - २८ संसार-तरणिका A-.-.-.-.-.. -.-.-.- इस सूत्र का सवेग पूर्वक पाठ करने वाले के अथवा दूसरो से सुनने वाले तथा अथ की विचारणा करने वाले के अशुभ कम के अनुबध (निरन्तर-श्रेणीबद्ध) मद विपाक से शिथिल हो जाते हैं । कर्म के पुद्गल कम हो जाते हैं और फिर विशष प्रकार के अध्यवसाय से क्षय भी हो जाते है । इसके बाद यदि अनुबन्ध रहित अशुभ कम शेष रहे हो, तो वे इस सूत्र पाठ से उत्पन्न हुए शुभ परिणामो के प्रभाव से शक्ति रहित हो जाते हैं । जिस प्रकार मन्त्र के प्रभाव के कगन (सूत्र के धागे) द्वारा बाधा हुआ विष, अल्प फल वाला हो जाता है, उसी प्रकार वे कर्म भी सरलता से-सुखपूर्वक नष्ट करने योग्य हो जाते हैं और ऐसी परिणति बन जाती है कि जिससे फिर वैसे पाप कर्मों का बन्ध नहीं होता। तहा आसगलिज्जति परिपोसिज्जति निम्मविज्जति सुहकम्माणुबधा । साणुबध च सुहकम्म पगिट्ठ पगिट्ठ- भावज्जिअ नियमफलय सुप्पउत्तै विअ महागए सुहफले सिया, सुहपवत्तगे सिया, परमसुहसाहगे सिया । अओ प्रपडियधमेश असहभावनिरोहेण सहभावबीय ति सुप्प- णिहाण सम्म पढिप्रय सोअव्व अणुपेहिअव्व ति । इस सूत्र के पठन करने से शुभ कर्म के अनुबन्ध, चारों तरफ से एकत्रित होकर भावो की अभिवृद्धि से पुष्ट होते हुए पूण हाते हैं । इसके बाद अनुवध सहित शुभ भावो से उपाजन फिया हुआ और अवश्यमेव फल देने वाला ऐसा प्रधान शुभ कर्म,
पायपडिग्याय-गुणबीजाहाण सुत्त
२६
M
उस प्रकार शुभ फल देने वाला होता है-जिस प्रकार अनुभूत
मोर भली प्रकार से प्रयोग की हुई उत्तम औषधि फल देती है।
शुभ अनुवध वाला वह शुभ कम, शुभ कृत्यो की ओर ही प्रवृत्ति
कराने वाला होकर परम्परा से मोक्ष के शाश्वत सुखो को
साधने वाला होता है। इसलिए निदान रहित होकर और
अशुभ भावो का निरधन करके इस सून को शुभ भावो का
बीज समझ कर, शुभ ध्यान और एकाग्र चित्त से पाठ करना,
सुनना और चिन्तन करना चाहिए।
अतिम मगत
नमो नमिअनमिआण परमगुरुवीयरागाण । नमो
सेसनमुक्कारारिहाण जयउ सव्वण्णुसासण । परमसबो-
हीए सुहिणो भवतु जीवा, सुहिणो भवतु जीवा, सुहिणो
.
भवतु जीवा।
सभी लोक, देवो और ऋपियो को नमस्कार करते हैं ।
उन लोक पूज्य देवा और ऋपियो से नमस्कार किये हुए, ऐसे
परम गुर वीतराग भगवतो का नमस्कार हाओ । तथा शेष
नमस्कार के योग्य प्राचार्यादि गुणाधिको को नमस्कार होओ।
सर्वज्ञ जिनेन्द्रो का शासन जयवन्त वर्तो । श्रेष्ठ वाधि-सम्यवाव
रत्न की प्राप्ति से सभी जीव सुखी होओ। सभी जीव सुखी
होओ। सभी जीव सुखी होओ।
॥ पावपडिग्याय-गुणबीजाहाणसुत समत्त ।।
भवनाशिनी भावना त्यक्तसगो जीर्णवासा मलक्लिन्नकलेवर । भजन्माधुकरी वृत्ति, मुनिचर्या कदा श्रये ॥१॥ वह शुभ दिन कव पायगा-जब मैं सभी सासारिक सबधी को त्याग दूगा । मेरे तन पर जीण शीण वस्त्र मात्र होगे । देह पर जमे हुए मल से मुझे घृणा नही होगी और माधुकरी वृत्ति को धारण कर मुनिचर्या का पालन करूंगा? त्यजन् दुशीलससर्ग, गुरुपादरज स्पृशन् । फदाह योगमभ्यस्यन्, प्रभवेय भवच्छिदे ॥२॥ दुराचारियो की सगति को छोड कर, गुरु महाराज के चरणो की रज को स्पश करते हुए और योगाभ्यास करते हुए, भव बधनो को नष्ट करने की शक्ति मुझ मे कब प्रगट हागी? महानिशाया प्रवृत्ते, कायोत्सर्गे पुराबहि । स्तभवत्स्कन्धकषण, वृषा कुर्यु कदा मयि ॥३॥ कब मैं निग्रंथ बनकर, अधेरी रात मे, नगर के बाहर कायुत्सर्ग में स्थिर, सूखे हुए ढूंठ अथवा स्तम्भ की तरह अडाल रहूँगा कि जिससे वृषभ (बैल) मुझे स्तम्भ मान कर, अपने कधे की खाज मिटाने के लिए मेरा घपण करेगे। ऐसी निर्भीकता और अडो. लता मुझ मे कब प्रगट हागी? वने पद्मासनासीन, क्रोडस्थितमगार्भकम् । फदाऽऽघ्रास्यन्ति वक्त्रे मा, जरन्तो मृगयूथपा ।४। मैं वन मे पद्मासन लगा कर चढूं। मेरे खोले मे मृग- , भवनाशिनी भाव। www 7 शावक खेल रहे हो, मेरे मुंह को मृगो के समूह का अधि. पति सूंघ रहा हो और मैं अपने प्रात्मध्यान मे मग्न हो रहा हूँ, ऐसी शुभ घडी कब प्रायगी? शत्रौ मित्रे तृणेस्त्रेणे, स्वर्णेऽइमनि मणौ मृदि । भवे मोक्षे भविष्यामि, निविशेषमति कदा ||५|| शत्रु और मित्र मे, तृण और स्त्रियो के समूह मे, स्वर्ण और पापाण मे, मणि और मिट्टी मे तथा समार और मोक्ष में मेरी समान वृत्ति-समभावना कब होगी फश्चित्काल स भावी जिनवचनरतो, यत्र युक्तो यतीन्द्र-ामादौ मासकल्प स्वजनजनसमो, मुक्तलोभा- भिमान । पुण्या पुण्याऽतिशायिप्रवगुणयुतैर्जानिभि सेविता ता । भिक्षा नि सगचेता प्रशमरसरतोऽह भ्रमि- ष्याम्यजनम् ॥६॥ ऐसा अपूर्व अवसर कब आवेगा, जब कि में श्री जिनेश्वर भगवान् के वचनो (ग्रागम) मे प्रीति और स्वजनो तथा परजनों मे समभाव रखता हुमा विचरूंगा । लोभ, अभिमान तथा पोद्- गलिक सग से रहित और प्रशम-शान्त रस मे लीन होकर प्राम नगरादि मे मुनीन्द्रो के साथ मास कल्प युक्त रहूँगा और पुण्य के अतिशय वाले उत्तमोत्तम गुण सम्पन्न एसे ज्ञानी महा- त्माओ द्वारा सेवित, पवित्र भिक्षाचरी के लिए भ्रमण करता हुमा विचरूंगा।
ससार-तरणिका ? गुप्तो मानविजितो व्रतरत , षट्कायरक्षोद्यत , कृत्वा साधुविहारिता शमरसो, नि सगचित्त क्षमी। स्यक्ताऽहकृतिनिश्चलेन मनसा, ध्यायन पद नैवत । स्थास्येऽह तु कदा शिलातलगतो, भव्या य मार्ग दिशन ।। मन वचन और काया से गुप्त, अभिमान रहित, पच महा- व्रतो मे प्रीति, पट्काय रक्षा मे तलर और साधु के प्राचार के अनुसार विहार करता हुआ, मैं कब सम रस मे निमग्न बनूंगा वह मगल वला कब प्रावेगी-जब कि मैं पौदगलिक सग से सवथा विमुक्त क्षमावान् तथा अहकार रहित हा, शिलातल पर बैठ कर निश्चल मन से निवृति (मोक्ष) पद का ध्यान करता हुआ और भयजनो को मोक्ष माग का बोध देता हुमा जीवन यापन करूगा दग्ध्वा मोह समस्त, निरवधि विशद, ज्ञानमुत्पाद्य- लोके । तीथं निर्वाणमार्ग, शुभतरफलद भव्यसाय कृत्वा ।। गत्वा लोकान्तदेश, कलिमल रहित, शर्वशर्मा- तिशायि । लप्स्येऽह मोक्षसौख्य, सहजनिजगुण कोऽपि- काल स भावी? ॥८॥ वह धय दिन कब आयगा जब कि मैं मोह का पूर्ण रूप से नाश करके असीम अन त ज्ञान को प्राप्त कर लूगा और भव्य प्राणियो के हित के लिए प्रतिशय शुभ फलदायक, निर्वाण माग रूप तीथ का प्रवतन करके, कम रूप मल से , मोकात देश (सिद्ध शिला) पर पहुँचूगा और " 7 .
आलोचना कुलक w ? सुखो से उत्कृप्ट ऐसे सहज निजात्म गुण रूप मोक्ष सुख को प्राप्त करुगा अहा ! कैसी पवित्र, कितनी उच्च और परम पावनी भावना है यह । ऐसी भावना मे लीन होकर अभ्यास वढाते- वढाते ही अन्तपरिणति बढती है और श्रेणी पर आरूढ होकर घाती कर्मों को नष्ट क्यिा जाता है। जो आत्मा, भाव- पूर्वक इन भावनाओ का चिन्तन करेगे, उन्हे प्रात्मानन्द की प्राप्ति होगी। आलोचना कुलक जो कोवि मए जीवो, च उगइ-भव-चक्क-मज्झारम्मि । दूहविओ मोहेण, तमह खामेमि तिविहेण ॥१॥ चार गति रूप भव चक्र में फंसकर, मोहवश मैंने किसी भी जीव को दुखित किया हो तो उन्हे में मन, वचन और काया से खमाता हूँ। नरएसु उववन्नो, सत्तसु पुढबीसु नारगो हो । जो कोवि तत्य जीवो, विओ त पि खामेमि ॥२॥ नर्क की सात भूमियो मे, नारक रूप मे उत्पन्न होकर, वहा किसी जीव को मैंने दुखित किया हो, तो उन्हे त्रियोग से खमाता हूँ।
ससार तरणिका निय-परमाहम्मिय-हवेण, ज कयाइ दुक्खाइ । हा' हा । मह जीवेण, मूढेण त पि खामे मि ॥३॥ हाय । परमाधार्मिक रूप मे मुझ मोही जीव ने, जिनका कितने ही दुख दिये है, उनको भी मैं त्रियाग से खमाता हूँ। हा हा तइया मूढो, न याणिमोज करस्स दुक्खाइ। फरवत्तय छयण भेयणाइ, केलीइ विहिप्राइ ।।४।। ज किचि मए तइया, कलकली भाव-मुवगएण कय । दुक्ख नेर इयाण, त पि अतिविहेण खामेमि ॥५॥ हाय । मैंने मोहान्ध होकर अपनी क्रीडा से, करवत आदि से उन नर्क के जीवो को छेदन भेदन किया और उहे होने वाले दुखो को नहीं देखा । मैंने तीन क्रोध भाव से युक्त होकर, नरयिको को जो भी दुख दिये, उनके लिये उन्हे त्रियोग से खमाता हूँ। तिरियाण चिय मझे, पुढवी-माईसु खार-भेएमु । अवरुप्प-रसत्येण, विणासिया ते वि खामेमि ॥६॥ तियंच गति मे, क्षार आदि अनेक प्रकार की पथ्वी प्रादि मे उत्पन होकर, विकृत अहितकारी रस मे रहकर, जिन जीवो का विनाश किया, उनसे भी मैं क्षमा मांगता हूँ। बेइदिय तेइदिय-चरिदिय माइ-णेग-जाइसु । जे भक्खिय दुक्खविया, ते वि य तिविहेण खामेमि ७! द्विइद्रिय, विद्रिय, चतुरिद्रिय प्रादि अनेक जाति , - .
मालोचना कुलप ३५ उत्पन होकर, मैंने जिन जीवो को भक्षण करके दुःख पहुचाया हो, तो उन्हें भी मन, वचन और काया से खमाता हू। जलयर-मज्झ-गएण, अणेग-मच्चाइ-रुव-धारेण । आहारट्ठा जीवा, विणासिया ते वि खामेमि ।। मैंने जलचर जीवो मे मच्छ प्रादि रूप मे उत्पन्न होकर, पाहार के लिये जीवो का विनाश किया । उन सभी जीवो से भो मै क्षमा याचना करता है। छिन्ना-भिन्नाय मए, बहुसो दळूण बहु-विहा जीवा । जलयर-मज्झ-गएण, ते वि य तिविहेण खामेमि ||६|| जलचर योनि मे जाकर, मैने अनेक प्रकार के जीवो को देखकर, बहुत से जीवो को छिन भिन्न किए, उन सब को भी श्रियोग से समाता हू। सप्प-सरीसव-मज्झे, वन्नरो-मज्जार-सुणह-भेएसु । जे में जीवे लविश्रा, दुक्खत्ता ते वि खामेमि ॥१०॥ सप, सरिसृप प्रादि (उरग) जीवो मे, वानर आदि (भुजपुर) जीवो मे और बिल्ली-कुत्ता प्रादि (स्थलचर) अनेक प्रकार के जीवो में पैदा होकर मैंने जिन जीवो को मारा, या दुखी किया हो, उहे भी त्रियोग से खमाता हू । सद्ल सीह-गडय-जाईसु जीव-घाइ-जणिआसु । जे उयवन्नेण मए, विणासिया ते वि खाममि ॥११॥ शार्दूल, सिंह, गेंडा आदि जीवो की हिंसा करने वाली जीव - ३४ ससार-तरणिका -.-.-..-....-- - कय। निद्दय-परमाहम्मिय-रूवेण, ज फयाइ दुक्खाइ । हा हा । मह जीवेण, मूढेण त पि खामेमि ॥३॥ हाय | परमाधामिक रूप मे मुझ मोही जीव ने, जिनको कितने ही दुख दिये हैं, उनको भी मैं त्रियोग से खमाता हूँ हा हा ! तइया मूढो, न याणिमोज करस्स दुक्खाइ । फरवत्तय छयण-भेयणाइ, केलोइ विहिआइ ॥४॥ ज किंचि मए तइया, कलकलो-भाव-मुवगएण दुक्ख नेरईयाण, त पि अतिविहेण खामेमि ॥५॥ हाय ' मैंने मोहान्ध होकर अपनी क्रीडा से, करवत आदि से उन नक के जीवो को छेदन भेदन किया और उन्हे होने वाले दुखो को नही देखा । मैंने तीव्र क्रोध भाव से युक्त होकर, नरयिको को जो भी दुख दिये, उनके लिये उहे त्रियोग से खमाता हूँ। तिरियाण चिय मज्झे, पुढवी-माईसु खार-भेएसु । अवरुप्प-रसत्येण, विणासिया ते वि खामेमि ।।६।। तियंच गति मे, क्षार आदि अनेक प्रकार की पथ्वी प्रादि में उत्पन्न होकर, विकृत अहितकारी रस मे रहकर, जिन जीवो का विनाश किया, उनसे भी मैं क्षमा मांगता बेइदिय तेइ दिय-चरिदिय माइ-णेग-जाइसु । जे भक्सिय दुक्ख विया, ते वि यतिविहेग खामेमि ।७) द्विद्रिय, विद्रिय, चतुरिद्रिय प्रादि अनेक जाति में हूँ आलोचना पुलक - उत्पन्न होकर, मैंने जिन जीवो को भक्षण करके दुख पहुचाया हो, तो उन्हे भी मन, वचन और काया से ख माता हू। जलयर-मज्झ-गएण, अणेग-मच्छाइ-रूव-धारेण । आहारट्ठा जीवा, विणासिया ते वि खामि ॥८ मैंने जलचर जीवो मे मच्छ आदि रूप मे उत्पन्न होकर, पाहार के लिये जीवो का विनाश किया । उन सभी जीवो से भी मैं क्षमा याचना करता हूँ। छिन्ना-भिन्नाय मए, बहुसो दळूण बहु-विहा जीवा । जलयर-मज्झ-गएण, ते वि य तिविहेण खामेमि || जलचर योनि में जाकर, मैने अनेक प्रकार के जीवो को बहुत से जीवो को छिन भिन्न किए, उन सब को भी त्रियोग से खमाता हूँ। सप्प-सरीसव-मज्झे, वन्नरो-मज्जार-सुणह-भेएसु । जे मे जीवे लविना, दुक्सत्ता ते वि खामेमि ॥१०॥ सप, सरिसृप आदि (उरग) जीवो मे, वानर आदि (भुजपुर) जीवो मे और बिल्ली कुत्ता प्रादि (स्थलचर) अनेक प्रकार के जीवो मे पैदा होकर मैंने जिन जीवो को मारा,या दुखी किया हो, उन्हे भी त्रियोग से खमाता हू सदूल-सीह-गडय-जाईसु जीव-घाइ-जणिआसु । जे उघवन्नेण मए, विणासिया ते वि खाममि ॥११॥ शार्दूल, सिंह, गेडा प्रादि जीवो की हिंसा करने वाली जीव देखकर, .
ससार-तरणिका -.--.-.-.. . जाति में उत्पन होकर, मैंने जिन जीवो का विनाश किया हो, उनको त्रियोग से खमाता हूँ। होलाह-गिद्धि-कुक्कड-हस वगाईसु सउणि-माईसु । ज खुह-वसेण खद्धा, किमि-माई ते विखामि ॥१२॥ होला, गिद्ध, कुकडा, हस, बगुले आदि पक्षियो की जाति में उत्पन्न होकर, मने भूख के मारे जिन कोडे प्रादि जीवो को खाया हो, उनको भी मन, वचन और काया से खमाता हूँ। मणुएसु वि जे जीवा, जिभिदिय-मोहिण-मूढेण । पारद्धि-रमतेण, विणासिया ते वि खामेमि ।।१३।। मनुष्य योनि में उत्पन होकर, मैंने रसनेन्द्रिय के कारण मुग्ध और मूख बनकर तथा प्राखेट (क्रीडा)के द्वारा जिन जावो का विनाश किया हो, उनको भी खमाता हूँ। फास गिद्धेण ज चिय, पर दाराई गच्छ माणेण । जे दूमिप्र दूहविश्रा, ते वि प्रतिविहेण खामेमि ।१४ मैंने स्पश-इन्द्रिय के विषय मे प्रासक्त होकर, परस्त्री-गमन मादि के द्वारा जिन जीवो को दमन पीडन से दुखित किया हा, उन्हे भी खमाता है। धक्खुदिय-धाणिदिय सोइदिय वसगएण जे जीवा । दुक्खमि मए ठविना, ते वि अतिविहेण खामेमि ॥१५॥ मैंने चक्षु नाक और कान के वशीभूत होकर, जिन जीवों को दुख मे डाला हो, उन्हे भी खमाता हूँ। - मालोचना कुलक सामित्त लहिण, जे बद्धा घाइया य मे जीवा । सवराह निरवराहा, ते पि अतिविहेण खामेमि ।१६। मैंने स्वामित्व या सत्ता पाकर जिन अपराधी निरपराधी जीवो को बन्दी बनाए और मारे हो, उन्हें भी खमाता हूँ। अक्कमिऊण आणा, फारविमा जे उमाण-भगेण तामस भाव-गएण, ते वि अतिविहेण खामेमि ।१७। मैंने अपनी प्राज्ञा का उल्लघन करने के कारण, मान-भग होने से क्रोधित होकर, जिन जीवो के साथ जबरन या बरजोरी की हो, उन्हे भी खमाता हूँ । अन्मक्खाण दिन्न, दुठेण मएण कम्स वि नरस्स । कोहेण च लोहेण व, त पि प्रतिविहेण खामेमि ॥१८॥ मैंने क्रोध लोभ, दुष्टता और अभिमान में किसी मनुष्य पर झूठा पाराप लगाया हो, तो उन्हे भी खमाता है । पर-प्रावयाइ हरिहो, पेसुन्न ज कय मए इहि । मच्छर भाव-गएण, त पि अतिविहेण खामेमि ॥१६॥ मैंने ईर्षावश चुगली करके जिनकी पाजीविका छीनी हो, उन्हे भी खमाता हू। आरिय-खित्ते विमए, खट्टिय-वागुरिय-डुम्ब-जाइय | जे वहिया मे जीवा, ते वि प्रतिविहेण खामेमि ।२०॥ मैंने आर्य क्षेत्र मे भी खटिक, वागरी और डुम आदि नीच जाति मे उत्पन्न होकर, जिन जीवो का वध क्यिा हो, उन्हे भी
ससार-तरणिका
.
खमाता हूँ।
मिच्छत्त-मोहिएण, जे जीवा के वि धम्मबुद्धिए ।
अहिगरण-कारणेण, वहाविया ते वि खामेमि ॥२१॥
मैंने मिथ्यात्व मोह के उदय से जिन जीवो को धर्म बुद्धि
से क्लेश पहुचा कर मारे हो, उहे भी खमाता है।
दवदाण-पली-वणय, काऊण जे मए सिमा दड्डा ।
सर दह तलाय-सोमे, जे वहिना ते वि खामेमि ॥२२॥
मैंने पल्ली जगल आदि मे आग लगाकर, जिन जीवो को
जलाया और सरावर-कुण्ड प्रादि जलाशय के शाषण से जिन
जोवा का वध किया हो, उहे भी खमाता हू ।
देवत्ते पि हु पत्ते, केलि-पगेण लोहयुद्धीए।
दूविया सत्ता, ते वि य तिविहेण खामि ॥२३॥
देवता म उत्पन्न हाकर मैंने खेल खेल मे और लोभ बुद्धि
से जिन प्राणिया का दुखित किया हो, उन्हे भी त्रियोग से
खमाता हू।
भवणबई-मज्झेसु, प्रासुर-भावेण चट्टमाणेण ।
निय-हणमाणेण, दूहविया ते वि खाममि ॥२४॥
भवनपति देव मे उत्पन्न होकर, प्रासुरी भावो में स्थित
होकर, निदयता से हनन करके जिन जीवो को दुखी किया
हो, उहे भी खमाता हूँ।
वितरभावमि मए, केलीक्लि भावओ य ज दुक्ख ।
जीवाण सजणिय, त पि य तिविहेण खामि ॥२५॥
आलोचना कुलक . मैंने व्यन्तर देव होकर,खेल (कोडा) के भाव से जिन जीवो को उद्वेग पहुचाया हो, उन्हे भी त्रियाग से खमाता हू । जोइसिएसु गएण, विसयाविस-मोहिएण-मढेण । जो कोवि को दूहिओ, पाणी मे त पि खामे मि ।२६॥ मैंने ज्योतिषी देव मे उत्पन्न होकर, विषयो मे निर्विषता (अमृत) की भ्राति से मूस बनकर, जिस किसी भी प्राणी को दुखित किया हो, उसे भी खमाता पर-रिद्धि-मच्छरेण वि, लोहनिबुड्डेण मोहवसगएण। अभिओगेण व दुक्ख, जाण कय ताण खामेमि ॥२७॥ मैंने दूसरे की ऋद्धि समृद्धि से जलकर, लोभ मे डूबकर और लोभ का ब दी वनकर, प्रावेश से जिनको दु ख दिया हो, उन्हे भी मै खमाता हू इय चउगइमावन्ना, जे केवि य गणिणो मए दुहिया । दुक्खे वा सठविया, ते वि य तिधिहेण खामेमि ॥२८॥ इस प्रकार मैने चारो गति मे परिभ्रमण करते हुए, जिन किन्ही जीवो को दुखित किये हो दुख सागर मे डाले हो, उन सभी जीवो को मन, वचन और काया से सव्व खमतु मज्झ, अपि तेसि खमामि सवेति । जज कयमवराहे वेर चडऊण मज्यत्थो ॥२६॥ ममी जीव मुझे क्षमा करें । मै भो उन सभी को क्षमा । जो भी प्रापसी अपराध और वैर विरोध है, उन्हे भूलकर माध्यस्थ भाव मे स्थिर होता है । - खमाता करता ससार तरणिका AM-.. ..-.-.-.--.-.-.- न य कोवि मज्झ वेरो, सयले वा इत्य जीवलोमि । दसण-नाण सहावो, इक्कोह निम्ममो निच्चो ॥३०॥ इस सारे जीव लाक मे मेरा कोई भी वैरी नही है (क्योकि वैर मेरा स्वभाव नहीं है।) मै ज्ञान दर्शन स्वभाव वाला अकेला । मेरा काई भी नहीं है। में नित्य हूँ। जिण सिद्धा सरण मे, साहूधम्मो य मगल परम । जिण नवकारी सरण, कम्मक्खय-कारण होउ ॥३॥ अरिहत, मिद्ध, साधु और सवज्ञ कथित दया धर्म, सव श्रेष्ठ मगल हैं और ये मेरे लिये शरण्य हैं । राग-द्वेष से रहित मात्मा का नमस्कार करना (नमस्कार मन्त्र) भी शरण है, क्योकि वह कम क्षय का कारण होता है। आयरिय-उवज्झाये, सीसे साहम्मिए कुलगणे य । जे मे केइ कसाया, सवे तिविहेण खामि ॥३२॥ प्राचाय, उपाध्याय, शिष्य, गुरुकुल और गण के प्रति मैने जो भी कपाय क्यि हो, उन सब के लिये मै मन, वचन और काया से क्षमा याचना करता हूँ। सम्वे प्रवराह पहे, खामि मह खमेउ से भयन । महमपि खामेमि सुद्धो, गुण-सघायस्स संघस्स ॥३३॥ हे भगवन् अपराध पथ मे पड़ा हुआ मैं क्षमा चाहता है। मत मुझे क्षमा करें। मै शुद्ध हृदय से गुणो के समूह सप से क्षमा मागता हूँ। - ।
आलोचना कुलक सव्व दुक्ख-पहीणाण, सिद्धाण अरहओ नमो । सद्दहे जिण-पण्णत्त, पच्चक्खामि य पावग ॥३४॥ सभी दुख से रहित सिद्ध और अरिहत प्रभु को नमस्कार और वीतराग कथित तत्वो पर श्रद्धा करके पाप को करता छोडता हूँ। ज किंचि उच्चरिय, तमह निंदामि सम्व-भावेणं । सामाइय च तिविह, करेमि सव्व निरागार ॥३५॥ जो कुछ भी मुझसे बुरा आचरण हुआ हो, उसकी में सम्पूर्ण भाव से निन्दा करता हू और प्रागार से रहित सम्पूर्ण सामायिक को मन, वचन और काया से ग्रहण करता हूँ। बाहिरभितर उहि, सरीराइ सभोयण । मणसा काय-वक्केण, सव्व तिविहेण वोसिरे ।३६। धन-धान्य, स्त्री पुरुष आदि बाह्य उपधि, क्रोध, लोभ आदि प्राभ्यन्तर उपधि, भोजन सहित शरीर आदि (पर से ममत्व भाव) को मन, वचन और काया से और सम्पूण तीनो करणों " से छोडता हूँ। इक्को उपज्जए जीवो, इक्को चेव विवज्जई। इक्कस्स होइ मरण, इक्को सिज्झइ नीरओ ।३७। जीव अकेला ही उत्पन्न होता है, अकेला ही दुखी होता है, अकेले का ही मरण होता है और मकेला ही सिद्ध होकर कर्म रहित होता है।
ससार-तरगिरा SAH.... . न य कोवि मज्म वेरो, सयले वा इत्य जीवलोगमि । दसण-नाण सहावो, इक्कोह निम्ममो निच्चो ॥३०॥ इस सारे जीव लोक मे मेरा कोई भी वैरी नहीं है (क्योंकि वैर मेरा स्वभाव नहीं है।) मै ज्ञान दशन स्वभाव वाला अकेला हू । मेरा काई भी नही है । मै नित्य हूँ । जिण-सिद्धा सरण मे, साहूधम्मो य मगल परम । जिण नयकारो सरण, फम्मक्खय-कारण होउ ॥३१॥ अरिहत, मिद्ध, साधु और सवज्ञ कथित दया धर्म, सव श्रेष्ठ मगल हैं आर ये मेरे लिये शरण्य है । राग-द्वेप से रहित पात्मा का नमस्कार करना (नमस्कार मन्त्र) भी शरण है, क्योकि वह कम क्षय का कारण होता है। आयरिय-उवज्झाये, सीसे साहम्मिए कुलगणे य । जे मे केइ फसाया, सम्वे तिविहेण खामि ॥३२॥ प्राचाय, उपाध्याय, शिष्य, गुरुकुल और गण के प्रति मैने जो भी कपाय किये हों, उन सब के लिये में मन, वचन और काया से क्षमा याचना करता हूँ। सम्वे प्रवराह पहे, सामेमि मह खमेउ से भयब । अहमपि खामेमि सुद्धो, गुण सघायस्स सघस्स ॥३३॥ हे भगवन् । अपराध-पथ में पड़ा हुआ मैं क्षमा चाहता हूँ। मत मुझे क्षमा करें। में शुद्ध हृदय से गुणो के समूह सघ से क्षमा मागता हूँ।
आलोचना कुलक w - सव्व दुख-पहीणाण, सिद्धाण अरहो नमो। सद्दहे जिण-पण्णत्त, पच्चक्खामि य पावग ॥३४॥ सभी दुख से रहित सिद्ध और अरिहत प्रभु को नमस्कार करता ह और वीतराग कथित तत्वो पर श्रद्धा करके पाप को छोडता है। ज किंचि उच्चरिय, तमह निदामि सन्व-भावेणं । सामाइय च तिविह, फरेमि सव्व निरागार ॥३५॥ जो कुछ भी मुझसे बुरा आचरण हुआ हो, उसको में सम्पूर्ण भाव से निन्दा करता हू और प्रागार से रहित सम्पूर्ण सामायिक को मन, वचन और काया से ग्रहण करता है। वाहिरभितर उवहि, सरीराइ सभोयण | मणसा काय-वक्केण, सव्व तिविहेण वोसिरे ।३६। धन-धान्य, स्त्री पुरुष प्रादि बाह्य उपधि, क्रोध, लोभ आदि आभ्यन्तर उपधि, भोजन सहित शरीर आदि (पर से ममत्व भाव) को मन, वचन और काया से और सम्पूर्ण तीनो करणों से छोडता हू। इक्को उपज्जए जीवो, इक्को चेव विवज्जई। इक्कस्स होइ मरण, इक्को सिज्झइ नीरओ १३७। जीव अकेला ही उत्पन होता है, अकेला ही दुखी होता है, अकेले का ही मरण होता है और अकेला ही सिद्ध होकर कर्म रहित होता है।
४२ ससार-तरणिका इक्को करेइ कम्म, फलमवि तस्सिक्सओ समणुहबई । इक्को जायइ मरइ, परलोय इक्कमओ जाइ ॥३८॥ जीव अकेला कम करता है, उनका फल भी अमेलाही भोगता है, अकेला जमता-मरता है और अकेला ही परभव जता है। इक्को में सासओ प्रप्पा, नाण-दसण-लक्षणो। सेसा मे बहिरा भावा, सन्वे सजोग-लक्षणा ||३६) ज्ञान-दशन लक्षणवाला मेरा अकेला ( भौतिक भावो से रहित) आत्मा शाश्वत है और शेष सयोग लक्षणवाले सभी भाव मुझसे बाह्य-भिन्न है। सजोगा मूल जीवेण, पत्ता दुक्ख परपरा। तम्हा सजोग सबध, सम्व तिविहेण वोसिरे ॥४०॥ जीव सयोग के कारण दुख-परम्परा को प्राप्त करता है । इसलिये सभी सयोग सम्बन्धो को, मन, वचन और काया से छोडता हूँ। प्रसजम-मन्नाण, मिच्छत्त सधओ विय ममत्त । जीवेसु अजीवेसु य, त निदे त च गरिहामि ॥४१॥ जीव और अजीब मे असयम, अज्ञान, मिथ्या श्रद्धा और सभी प्रकार के अपनेपन की निन्दा और गर्दा करता है। सप पाणारभ, पच्चक्खामि प्रलीय-दयण च । सव्व प्रदत्तादाण, प्रवभ-परिगह चेव ॥४२॥ सभी जीवो को हिंसा, सभी झूठ वचन, सभी तरह की चोरी, अब्रह्मवय और समी प्रकार के परिग्रह को छोडता हूँ ।
वालोचना
कुलक
४३
,
सन्ध च प्रसण पाण, चउटिवह जो य बाहिरो उवहि ।
अस्मितर च उवहि, सब तिविहेण बोसिरे ।।४।।
सभी प्रशन पान आदि चार प्रकार का प्राहार तथा बाह्य
और आभ्यतर उपधि को नियोग से छोडता है।
समणोमित्ति य पढम, बीय सम्वत्थ-सजओमित्ति ।
सव्व च वोमिरामि य, जिणेहि ज ज च पडिकुट्ठ ॥४४॥
पहले तो श्रमण-समताशील तपस्वी हू और दूसरे सर्वार्थ-
सम्पूर्ण सयमी बन चुका हू । प्रत जिन जिन क्रियाओ का जिनेन्द्र
ने निषेध किया है, उन सभी को छोडता है।
मम मगलमरिहता, सिद्धा साहू सुय च धम्मो य ।
तेसि सरणोगओ, मावज्ज वोसिरामिति ॥४५॥
अरिहत सिद्ध, साधु, श्रुत-शास्त्र और धर्म, मेरे लिये मगल-
कारी हैं इनके शरण में जाकर, मैं सभी सावध कर्मों की छोडता
.
.
हतूण मोहजाल, छित्तूण य अट्ठकम्म-सफलिय ।
जम्मए मरण-ट्ट, भित्तूण भवाउ मुच्चिहिसि ॥४६॥
मोह स्पी जाल का नाश करके, कर्म रूपी साकल को तोड-
कर और जम-मरण स्पी हाट को छिन्न-भिन्न करके मैं भव
(कारागार) से मुक्त जाऊँ।
अरहता मगल मज्झ, अरिहता मम देवया।
अरिहते कित्तइत्ताण, वोसिरामि ति पावग ॥४७॥
४४
ससार तरणिका
अरिहत मेरे लिये मगलकारी हैं और अरिहत मेरे देवता
हैं । इसलिये परिहत का कीत्तन-गुणगान करके मैं समस्त पापों
को छाडता ।
सिद्धा य मगल मज्झ, सिद्धाय मम देवया
सिद्ध य कित्तइत्ताण, वोसिरामि ति पावग ॥४८॥
सिद्ध प्रभु मेरे लिये मगलकारी है । सिद्ध प्रभु मेरे देवता
हैं। इसलिये उनका गुणागान करके, मैं पापो को छोडता हू ।
प्रायरिया मगल मज्झ, आयरिया मम देवया ।
आयरिए कित्तइत्ताण, वोसिरामि ति पावग ॥४६॥
श्राचाय मेरे लिये मगलकारी हैं । प्राचार्य मेरे देवता हैं ।
प्रत में प्राचाय के गुणगान करके, पापो को छोडता हू ।
उवज्झाया मगल मज्झ, उवज्झाया मम देवया।
उवज्झाए कित्तइत्ताण, वोसिरामि ति पावग ॥५०॥
उपाध्याय मेरे लिये मगलकारी हैं । उपाध्याय मेरे देवता
हैं । इसलिये उपाध्याय के गुणगान करके, मैं पाप को छोडता हूँ
सन्द साहु मगल मश, सन्य साहु मम देवया ।
सव्व साहु कित्तइत्ताण, वोसिरामि ति पावग ।।५।।
सभी साधु मेरे लिये मगलकारी हैं, मेरे देवता हैं । सभी
साधुओ के गुणगान करके मैं पापकर्म को छोडता हू ।
साममि सव्वे जीवे, खमामि अह सन्यजीवाण |
सम्म ते सव्वभूएसु, वेर मन न फेणइ ॥५२॥
सुविहित आलोचना . मैं सभी जीवो से क्षमा चाहता हूँ और सभी जीवो को क्षमा करता हू, तथा सभी पाणियो मे समभाव को धारण करता है। किसी भी प्राणी के प्रति मेरा किंचित् भी वैर नही है। एय पच्चपखाण, अणुपालेऊण सुविहीओ सम्म । वेमाणिएसु देवो, हविज्ज अहवावि सिज्झिज्जा ॥५३॥ सुविहित (सर्वज्ञोक्त धम मे स्थिर उत्तम मुनि) इस प्रत्या- ख्यान का अच्छी तरह से पालन करके वैमानिक देव होता है, प्रयवा सिद्ध हो जाता है। " आलोचना कुलन समाप्त ।। सुविहित आलोचना . जे मए अणतेण भव भमणेण पुढधी-काइया आउ. काइया तेउ-काइया वाउ-काइया वणस्सइ-काइया एगि- दिया, बेइदिया, तेइ दिया चारदिया, पचिदिया, देवा वा, मणुप्रा वा, नेरइया वा, निरिक्ख-जोणिमा वा, जल- यरावा, थलयरावा, खयरावा, सन्निमा वा, असन्निप्रा वा, सुहमा वा, वायरा बा, पज्जत्ता वा, अपज्जता वा, कोहेण वा, माणेण वा, मायाए वा, पचिदि- अट्टेण वा, रागेण वा, दोसेण वा, घाइआ वा, पीडिआ वा, मणेण वायाए काएण तस्स मिच्छा मि दुक्कड ॥१॥ लोहेण वा, ससार तरणिका -CM ... - चा, रागेण वा, मैंन अन त भव भ्रमण करते हुए पृथ्वी, पानी, अग्नि, वायु और वनस्पति रूप एकेद्रिय जीव, द्वीन्द्रिय जीव, निद्रिय जीव, चतुरिन्द्रिय जीव, पञ्चेन्द्रिय जीव-देव, मनुष्य, नर्क और तिर्यच मानि के जीव-जलचर, थलचर, खेचर प्रादि मे, सज्ञी असजी, सूक्ष्म बादर और अपर्याप्त पर्याप्त जीवो को, क्रोध, मान, माया, लोभ, पांचो इन्द्रियो को प्रातुरता, राग या द्वेप से, मारे या पीडित किये हो, तो मन, वचन, और काया से सभी दोप निष्फल हो। ज मए अणतेण भव भमणेण अलिअ मणिय कोहेण वा, माणेण वा, मायाए वा, लोहेण वा, पचिदि-पट्टण दोसेण वा, मण वायाए काएण, तस्स मिच्छा मि दुक्कड ॥२॥ मैंने अनन्त भव भ्रमण करते हुए क्रोधादि से झूठ बोला होऊँ, तो उसका फल निष्फल हो। जमए अणतेण भव भमणेण अदिन्न गहिअ कोहेण वा, माणेण वा, मायाए वा, लोहेण वा, पचिदि-अट्टेण वा, रागेण वा, दोसेण वा, मणेण वायाए काएण तस्स मिच्छा मि दुधकड ॥३॥ मैंने भव परिभ्रमण मे क्रोधादि से प्रदत्त ग्रहण किया हो, तो वह पाप निष्फल होओ। ज मए अणतेण भव भमणेण दिन्च माणुस्स तिरिच्छ मेहुण सेविम कोहेण वा, माणेण वा, मायाए सक्षिप्त आलोचना ४७ वा, लोहेण वा, पचिदि-अट्टेण वा, रागेण वा, दोसेण वा, मणेण वायाए काएक तस्स मिच्छा मि दुक्कड ॥४॥ जो मैंने भव भ्रमण मे क्रोधादि से दिव्य, मानुपीय और तियञ्च सम्बन्धी मथुन सेवन किया हो, तो उसका बुरा फल निष्फल हो। लोभेण वा, ज मए अगतेण भव-नमणेण अट्ठारस्स पाव-ठाणाइ क्याइ कोहेण वा, माणेण वा, मायाए वा, पचिदि-अट्टेण वा, रागेण वा, दोसेण वा, मणेण वायाए काएण तस्स मिच्छा मि दुक्कड ॥५॥ मैने भव-भ्रमण मे क्रोधादि से अठारह पाप स्थानो का सेवन किया हो, तो मेरे वे सभी पाप निष्फल होवे । ज मे पुढवि-फायगयस्स सिला-लेहु-सक्करा-सहा वालुमा-गेरिन-सुवन्नाइ महाधाउ-रूव सरीर पाणि-वहे पाणि सघट्टणे पाणि-पीडणे, पाव-वडणे, मिच्छत्त-पोसणे ठाणे सलग्ग त निंदामि गरहामि वोसिरामि ॥६॥ जा मैं पृथ्वीकाय मे शिला पत्थर आदि, गेरू मोना आदि महाधातु रूप शरीर धारण करके, प्राणि वध, सघप, पीडा पाप- व्यवहार, मिथ्यात्व पोषक स्थान आदि मे सलग्न हुआ होऊ, तो उसकी निन्दा गहीं करता हू । उससे अलग हाता हूं। ज मे पाउ-कायगस्स जल-करग-महिला-ओस्सा- हिमहरतणरुव सरीर पाणिवहे पाणि-सघट्टणे पाणि- ४८ ससार-तरणिका - CĐ - - - पीडणे पाव-वडणे मिच्छत्त-पोसणे ठाणे सलग्ग- त निदामि गरहामि वोसिरामि ॥७॥ जा मैं जलकाय मे जाकर जल, करा, हिम प्रादि रूप में प्राणि-वध, प्राणि सघात, मिथ्यात्व पोषक प्रादि स्थान मे सलग्न, रहा होऊ, तो उस पाप की निन्दा गर्दा करता हू और उपवास से पृथक होता है। ज मे तेउ-कायगयस्स प्रगणि इगाल-मम्मर-जाला- मलाय-विज्ज-उक्का-तेअ-रूव सरीर पाणि-बहे पाणि- सघट्टणे पाणि-पीडणे पाव-वडणे मिछत्त-पोसणे ठाणे सलग्ग त निदामि गरहामि बोसिरामि ॥८॥ जा अग्निकाय मे अग्नि, अगार, विद्युत ज्वाला आदि तेज रूप मेरा शरीर मिथ्यात्व-पोषक, प्रादि स्थानो मे स्थित हुप्रा हो, तो उसकी निन्दा-गर्दा करता हूँ। उस पापसे अलग होता है। ज मे बाउकायगयस्स वाउ उझा-सास-रुव-सरीर पाणिवहे पाणि-सघट्टणे पाणि-पोडणे पाव-वडणे मिच्छत्त- पोसणे ठाणे सलग्ग त निदामि गरहामि वोसिरामि ।। जो वामुकाय मे शुद्ध प्रशुद्ध वायु, सास रूप मेरा शरीर मिथ्यात्व पोषक प्रादि स्यानो मे लगा हो, तो उसकी निन्दा- गहीं करता है। ज मे घणस्सइ-कायगयस्स मूल-कट्ठ-छल्लि-पत्त- पुप्फ-फल-यीय-रस-निज्ज्ञास-स्व सरीर पाणिवहे पाणि- सघट्टणे पाणि-पोडणे पाय-वड्दणे मिच्छत्त-पोसणे ठाणे .
सक्षिप्त आलोचना ४६ . . सलग त निदामि गरहामि वोसिरामि ॥१०॥ जो वनस्पति काया मे मूल, काष्ठ, छाल, पत्ता आदि रूप मेरा शरीर पाप वधक, मिथ्यात्व पापक स्थान मे लगा हो, तो उसकी निन्दा-गर्दा करता हू । उमसे अलग होता है। ज मे तसकायगयस्स रस-रत्त-मस-मेल-अद्वि-मज्जा- सुक्क-चम्म-रोम-नह नसा-रूव सरीर पाणि-वहे पाणि- सघट्टणे पाणि-पोडणे पाव-वडढणे मिच्छत्त-पोसणे ठाणे सलग त निदामि गरहामि वोसिरामि ॥११॥ सकाय मे रस, रक्त, मास, चर्बी, हड्डी, मज्जा, शुक्र, चमडी, रोम, नख, नसा रूप मेरा शरीर प्राणि-वध, प्राणि- सघात, प्राणि-पीडा, पाप वृद्धि, और मिथ्यात्व रक्षा के स्थान मे लगा हो, तो उसकी निन्दा गर्दा करता हूँ । उस पाप से अलग होता है। ज मए इहमवे मणेण वायाए काएण दुट्ठ-कय त निदामि गरहामि वोसिरामि ॥१२॥ जो मैने इस भव मे मन, वचन और काया से बुरा चिन्तन, बुरा भाषण और बुरा काय किया हो, तो उसको निन्दा गर्दा करता है । उस पाप से अलग होता है । आयरिय-उवज्झाए सीसे साहम्मिए कुल-गणे अ। जे मे कया कसाया, सव्वे तिविहेण खामेमि ॥१३॥ आचाय, उपाध्याय, शिष्य, स्वधर्मी, कुल और गण के प्रति ससार-तरणिका सब को मैंने जो भी कपाय किये हो, उन सब के लिये क्षमा चाहता हूं। सव्वस्स समण-सघस्स, भगवओ अजलि करिय-सीसे । सव्व खमावइत्ता, खमामि सधस्स अहय पि ॥१४॥ सपूर्ण श्रमण सघ भगवान् को हाथ जोडकर, सिर झुकाकर भौर उनसे तथा सभी से क्षमा याचना करता हुआ मैं क्षमा करता हूँ। सन्वस्स-जीव-रासिस्स,मावओ धम्म-निहिय-frय-चित्तो। सन्व खमावइत्ता, खमामि सवस्स अहय पि ॥१५॥ भाव से धम मे हमेशा चित्त लगाकर और सभी जीवो को खमाकर, मैं भी सबको क्षमा करता हू । भयव जे मए-चउ-गइ-गएण देवा तिरिआ मणुस्सा नेरइया, चउ-कसाओ-बगएण, पत्रिदिय-वसट्टेण इहम्मि भवे अन्नेसु वा भवग्गहणेसु वा मणेण वायाए कारण दूमिया सतावित्रा प्रभिताविना, तस्स मिच्छामि दुक्कड । जेहिं अह अभिदुमियो सताविओ अभिहओ तमह पि खमामि ॥१६॥ भगवन् । मैंने देव, तिर्यञ्च, मनुष्य और नक गति मे घुमते हुए परभव मे, या इस भव मे, चार कपाय और इद्रियवश मातता से जिस किमी का दमन, पोडन प्रादि किया हो, तो वह क्रिया निष्फल हो और जिनसे मैं दमित, पीडित, दुखित हुआ और मारा गया, उह भी मैं क्षमा करता हूँ। 1 सुविहित आलोचना w जे मे जाणतु जिणा, अवराहा जेसु जेसु ठाणेसु । तेऽह आलोएमि, उवडिओमि सब-कालमि (बि)।१७। श्री जिनदेव, मेरे अपराधो के जिन जिन स्थानो को देखते हैं, मैं उन सब की पालाचना करता हू और सभी काल मे, या सदा के लिये जागृत बनता हूँ। छउमत्यो मूढमणो, कित्तियमि त पि समरइ जीवो। ज च न सुमरामि अह, मिच्छा मि दुक्कड तस्स 1१८॥ क्योकि मैं छद्भस्थ और मोहित मनवाला जीव हू । अत मेरे जो दूपण मुझ याद आए हैं, व कहे हैं, किंतु जो दूषण याद नहीं रहे, वे भी निष्फल हो जावे । ज ज मणेण बद्ध, ज ज वायाई भासिय किचि । ज ज काएण क्य, मिच्छा मि दुक्कड तस्स ॥१६॥ मैंने जिन कर्मों को मन से वाधे हो, वाणी से बुरे कथन कहे हो और काया से बुरे कर्म किये हो, तो वे दुष्कृत मिथ्या हो। सच पाणाइवाय पच्चक्खामि, सव्व मुसावाय पच्चक्खामि, सव्व प्रदिन्नादाण पच्चक्खामि, सव्व मेहुण पच्चक्खामि, सव्व परिगह पच्चक्खामि, सध्व राइ- भोयण प० सव्व कोह प०, सव माण प०, सव्व माय सब लोह ५०, सव्व पिज्ज प०, सव्व दोस, कलहं प्रभक्खाण, अरइ-रइ, पेसुन्न, परपरिवार्य, मायामोस, मिच्छादसण-सल्ल इच्चेइयाइ अट्ठारस्स पावठाणाह . १०. - ५२ ससार-तरणिका -~- दुविहेण तिविहेण वोसिरामि । अपच्छिममि उसासे तिविह तिबिहेण वोसिरामि ॥२०॥ सपूर्ण हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, परिग्रह, क्रोध, मान, माया, लोभ, राग, द्वेष, कलह, झूठा आरोप, हप-विषाद, चुगली, निन्दा, विश्वासघात और मिथ्या-दशन रूपी काटे को दो करण तीन योग से और अन्तिम उच्छवास मे तीन करण, तीन योग से छोडता है। बृहदालोयणा दोहा सिद्ध श्री परमात्मा, अग्गिजन अरिहत । इष्टदेव वदू सदा, भयभजन भगवत ।१। परिहत सिद्ध समरूं सदा, प्राचारज उवज्झाय । साधु सक्ल के चरन को वदू शीश नमाय १२। शासन नायक सुमरिये भगवत वीर जिनद । मलिय विधन दूरे हरे, प्रापे परमानद 1३। अगुठे अमृत वसे, लन्धि तणा भडार। श्रीगुरु गौतम सुमरिये, वाछित फल दातार ।४। श्रीगुरुदेव प्रसाद से, होत मनोरथ सिद्ध । ज्यू धन वरसत वेलि तरु, फूल फलन को बद्ध १५१ बृहदालोयणा ५३ धर्म सूत्र पच परमेष्ठी देव को, भजनपुर पचान । कर्म अरि भाजे समी, होवे परम कल्याण ।६। श्रोजिन युग पद कमल मे, मुझ मन भमर वसाय । कब ऊगे वो दिन करूँ, श्रीमुख दरिसन पाय ७। प्रणमी पद पकज भणी, अग्गिजन अरिहत । कथन कहें अब जीव को, किंचित मुझ विरतत ।। आरभ विषय कपाय वस, भमियो काल अनत । लख चोराशी योनि से अब तारो भगवत ।। देव गुरु मे नत्र तत्त्वादिक जाय । अधिका ओछा जे कह्या, मिच्छा दुष्कृत मोय ।१०। मोह प्रज्ञान मिथ्यात्व को, भरियो रोग अथाग । वैद्यराज गुरु शरण से, औषध ज्ञान वैगग ।११॥ जे मैं जीव विराधिया, सेव्या पाप अठार । प्रभु तुम्हारी साख से, वारवार धिक्कार 1901 बुरा बुरा सब को कहू, बुरा न दीसे कोय । जो घट शोधू आपणा, तो मोस् वृरो न कोय ।१३। कहेवा मे आवे नही, अवगुण भरया अनत । लिखवा मे क्यु कर लिखू जानो श्री भगवत ।१४। करुणानिधि कृपा करी, कठिन कम मोय छद । मोह अज्ञान मिथ्यात्व को करजो ग्रथीभेद ॥१॥ पतित उदारन नाथजी, अपनो विरुद विचार । भूल चूक सब माहरी, खमिये वारवार ।१६। माफ करो सब माहरा, आज तलक ना दोप । - ५४ ससार तरणिका H.. - - दीनदयाल देवो मुझे, श्रद्धा शील सतोप ॥१७॥ प्रातम निंदा शुद्ध भणी, गुणवत वदन भाव । रागद्वेष पतला करी, सबसे खमत खमाव ॥१८॥ छूटू पिछला पाप से, नवा न बांधू कोय । श्रीगुरुदेव प्रसाद से, सफल मनोरथ होय ।१६। परिग्रह ममता तजी करी, पच महाव्रत धार । मत समय आलोयणा, करू सथारो सार ।२०। तीन मनोरथ ए कह्या, जो ध्यावे नित्य मन्न । शक्ति सार वरते सही, पावे शिव सुख धन्न ।२१॥ रहन देव निग्रंथ गुरु सवर निजरा धम । केवली भापित शास्त्र, यही जैन मत मम ।२२। भारभ विषय क्षाय तज शुद्ध समकित व्रत धार । जिन आज्ञा परमाण कर, निश्चय खेवो पार ।२३। क्षण निकमो रहना नही, करनो आतम काम । भणना गुणनो शीखनो, रमनो ज्ञान प्राराम ॥२४॥ मरिहत सिद्ध सब साधुजी, जिन आज्ञा धर्म सार । मागलिक उत्तम सदा, निश्चय शरणा चार ।२५। घडी घडी पल पल सदा, प्रभु सुमरण को चाव । नरभव सफला जो करे, दान शील तप भाव ।२६॥ २ सिद्धा जैसो जीव है, जीव सोही सिद्ध होय । कम मेल का भातरा, बूझे विरला कोय ।। कम पुद्गल रूप है, जोव रूप है ज्ञान ।
बहदालोयणा ५५ wwwww . . दो मिलकर बहु रूप है, विछड्यां पद निर्वाण ।२। जीव करम भिन्न भिन्न करो, मनुष्य जन्म को पाय । ज्ञानातम वैराग्य से, धीरज ध्यान जगाय ।। द्रव्य थकी जीव एक है क्षेत्र असख्य प्रमाण । काल थकी सर्वदा रहे, भावे दशन ज्ञान ।४। गभित पुद्गल पिंड मे, अलख अमूरति देव । फिरे सहज भव चक्र मे, यह अनादि की टेव ।। फूल अतर घी दूध मे, तिल मे तेल छिपाय । यू चेतन जड करम सग, वध्यो ममत दुख पाय ।६। जो जो पुद्गल की दशा, ते निज माने हस । याही भरम विभावते, बढे करम को वस ।७। रतन बध्यो गठडी विषे, सूय छिप्यो धन माहि । सिंह पिंजरा मे दियो, जोर चले कछु नाहि ।। ज्यु बदर मदिरा पियां, विच्छू डकित गात । भूत लग्यो कौतुक करे, त्यू कमा का उत्पात ।। कम सग जीव मूढ है, पावे नाना रूप । कर्मरूप मल के टले, चेतन सिद्ध स्वरूप ।१०। शुद्ध चेतन उज्ज्वल दरब, रह्यो कम मल छाय । तप सयम सु धोवता, ज्ञान ज्योति बढ जाय ॥११॥ ज्ञान थकी जाने सकल, दशन श्रद्धा रूप । चारित्र से प्रावत रखे,तपस्या क्षपन स्वरूप ।१२। कर्म रूप मल के शुधे, चेतन चादी स्प। निर्मल ज्योति प्रगट भया, केवल ज्ञान अनूप ।१३।
५६
ससार-तरणिका
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-
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मूसी पावक साहगी, फूका तणा उपाय ।
रामचरण चारो मिल्या, मैल कनक को जाय ।१४।
कमरूप बादल मिटे, प्रगटे चेतन चद ।
ज्ञानरूप गुण चादनी, निमल ज्योति अमद ॥१५॥
राग द्वेष दो बीज से, कम बध की व्याध ।
ज्ञानातम वैराग्य से, पावे मुक्ति समाध ॥१६॥
अवसर बीत्या जात है, अपने बस कछु होत ।
पुण्य छता पुण्य हात है, दीपक दीपक ज्योत ॥१७॥
कल्पवक्ष चिंतामणि, इण भव मे सुखकार ।
ज्ञान वृद्धि इन से अधिक, भवदु ख भजनहार ।१८।
राइ मात्र घट वध नही, देरया केवलज्ञान ।
यह निश्चय कर जानके, तजिये प्रथम ध्यान ॥१६॥
दूजा भी नहि चितिये, कम बध बहु दोष ।
त्रीजा चौथा ध्याय के, करिये मन सनीष १२०॥
गई वस्नु माचे ही, पागम वाछा नाहि ।
वनमान वर्ते सदा, सो ज्ञानी जग माही ।२१॥
अहा समदृष्टि जोवडा, करे कुटुव प्रतिपाल ।
अतगत यारा रहे ज्यू धाय खिलावे घाल ॥२२॥
सुख दुख दानु बसत है, शानी के घट माहि ।
गिरि सर दोसे मुकर में भार भीजवो नाहि ।२३।
जा जा पुद्गल फरसना, निश्चे फरस सोय ।
ममता समता भाव से, करम वध क्षय होय ॥२४॥
बृहदालोयणा - वाध्या सोही भोगवे, कर्म शुमाशुभ भाव । फल निर्जरा होत है, यह समाधि चित्त चाव १२५॥ वाध्या विन भुगते नही, बिन भुगत्या न छुडाय । आप ही करता भोगता, आप हो दूर कराय ।२६। पथ कुपथ घट वध करी, रोग हानि वृद्धि थाय । युं पुण्य पाप किरिया करी, सुख दुख जग मे पाय ।२७। सुख दिया सुख होत है, दुख दिया दुख होय । आप हणे नही अवर को, तो आपको हणे न कोय ॥२८॥ ज्ञान गरीबी गुरु वचन, नरम वचन निर्दोप। इन को कभी न छोडिये, श्रद्धा शील सतोप ।२६। सत मत छोडो हो नरा, लक्ष्मी चौगुनी होय । सुख दुख रेखा कम की, टाली टले न कोय १३०॥ गोधन गज धन रत्न-धन, कचन खान सुखान । जब आवे सतोप धन, सब धन धूल समान ।३१॥ शील रतन महोटो रतन, सब रतना की खान । तीन लोक की सपदा, रही शील मे पान ।३२॥ शीले सप न पाभडे, शीले शीतल भाग । शीले अरि करि केसरी, भय जावे सब भाग १३३॥ शील रतन के पारख, मीठा बोल वैन । सब जग से ऊँचा रहे, जो नीचा राखे नन ।३४॥ तन कर मन कर वचन कर, देत न काहु दुख । कम रोग पातक झडे, देखत वा का मख ३५॥ ,
ससार-तरणिका
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पान खरतो इम कहे, सुन तरुवर बनराय ।
अब के बिछुडे कब मिलें, दूर पडेगे जाय ।३६।
तव तरुवर उत्तर दियो, सुनो पत्र एक बात ।
इस घर एही रीत है एक आवत एक जात ।३१
वरस दिना की गाठ का, उत्सव गाय वजाय ।
मूरख नर समझे नही, वरस गाठ को जाय ।३८।
सोरठा -पवन तणो विश्वास, किण कारण तें दढ कियो।
इनकी एही रोत, आवे के प्रावे नही ।
दोहा
करज विराना काढ के, खरच किया बहु नाम ।
जब मुद्दत पूरी हुवे, देना पडस दाम ।१।
बिन दिया छूटे नहीं, यह निश्चय कर मान ।
हँस हँस के क्यु खरचिये, दाम बिराना जान ।२।
जीव हिंसा करता थका, लागे मिप्ट प्रज्ञान ।
शानी इम जाने सही, विष मिलिया पकवान ।३।
काम भाग प्यारा लगे, फल किम्पाक समान ।
मोठी खाज सुजावता, पीछे दुख की खान ।४।
जप तप सजम दोहिलो, औषध कडवी जान ।
सुप कारण पीछे घणो, निश्चय पद निर्वाण ।।
हाम प्रणी जल बिंदुवो, सुख विषयन को चाव ।
भवसागर दुख जल भरयो, यह ससार स्वभाव १६॥
चढ उत्तग जहा से पतन, शिखर नही वा कूप ।
जिस सुख भीतर दुख वसे, सो सुख भी दुख रूप 101
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बहदालोयणा १६ जब लग जिसके पुण्य का, पहोचे नही करार । तब लग उसका माफ है, अवगुण करे हजार ८ पुण्य क्षीण जब होत है, उदय होत है पाप । दाजे बन की लाकडी, प्रजले पापोग्राप ।। पाप छिपाया ना छिपे, छिपे तो मोटा भाग । दावी दुरी ना रहे रुई लपेटो आग ।१०॥ बहु बोती थोडी रही, अव तो सुरत सभार । परभव निश्चय जावनो, वृथा जन्म मत हार ॥११॥ चार कास ग्रामान्तरे, खरची बाधे लार । परभव निश्चय जावणा, करिये धम विचार ।१२। रज विरज ऊँची गई, नरमाइ के मान । पत्थर ठोकर खात है करडाइ के तान ।१३। अवगुन उर धरिये नही, जो हो वृक्ष बबूल । गुण लीजे 'कालू' कहे, नहीं छाया मे शूल ।१४। जैसी जापे वस्तु है, वैसी दे दिखलाय । वाका बुरा न मानिये, वो लेन कहा से जाय ।१५॥ गुरु कारीगर सारीखा, टाँची वचन विचार । पत्थर से प्रतिमा करे, पूजा लहे अपार ।१६॥ सतन की सेवा किया, प्रभु रीझत है अाप । जाका वाल खिलाइये, ताका रीझत बाप ।१७। भवसागर ससार मे, दीपा श्री जिनराज । उद्यम करी पहोचे तीरे, बैठी धर्म जहाज ॥१८॥ निज प्रातम को दमन कर, पर आतम को चीन । .
६०
ससार तरणिका
परमातम को भजन कर, सो ही मत परवीन 1१६।
समझ शके पाप से, अणसमझू हरपत ।
वे
लूखा
वे चीकणा, इण विध कम बधत ।२०)
समझ सार ससार मे, समझू टाले दोष ।
समझ समझ कर जीवडा, गया अनता मोक्ष ।२२।
उपशम विषय कपाय नो, सवर तीनो योग ।
किरिया जतन विवेक से, मिटे कर्म दुख रोग ।२२।
रोग मिटे समता वधे, समकित व्रत आराध ।
निर्वेरी सब जीव को, पावे मुक्ति समाध ।२३।
॥ इति भूल चूक मिच्छामि दुक्कड ।।
सिद्ध श्री परमात्मा अरिगजन अरिहत ।
इष्टदेव वदु सदा, भयभजन भगवत ।१।
अनत चौवीशी जिन नमु, सिद्ध अनता क्रोड ।
वर्तमान जिनवर सबे, केवली दो कोडी नव कोड ।२।
गणधरादिक सर्व साधुजी, समकित व्रत गुणधार ।
यथायोग्य वदन करूं, जिन प्राज्ञा अनुसार ।।
यहां एक बार नमस्कार मत्र का स्मरण करना चाहिए।
पच परमेष्टी देवनो, भजन पुर पचान ।
कम अरि भाजे समी, शिव सुख मगल थान ।४।
प्ररिहत सिद्ध सुमरु सदा, प्राचारज उवज्झाय ।
साधु सकल के चरन को, व शीश नमाय ।।
शासन नायक सुमरिये, वर्धमान जिनचद ।
मलिय विघन दूरे हरे, आपे परमानद ।६।
बृहदालोयणा -- ...- अगुठे अमृत बसे, लब्धि तणा भडार ।' जय गुरु गौतम सुमरिये, वाछित फल दातार ७। श्रीजिन युग पद-कमल मे, मुझ मन अलिय बसाय । कब उगे वो दिन करूँ, श्रीमुख दरिसन पाय ।। प्रणमी पदपकज भणी, अरिगजन अरिहत । कथन करूँ अब जीव को, किंचित मुझ विरतत ।६। गाथा हू अपराधी प्रनादि को, जनम जनम गुना किया भरपूर के । लूटिया प्राण छकाय ना, सेविया पाप पठारे करूर के । श्रीमुनिसुव्रत साहिबा। आज दिन तक इस भव मे, पहिले मस्यात, असख्यात और अनत भवो मे, कुगुरु कुदेव और कुधर्म की सद्दहणा प्ररूपना फरसना सेवनादिक सबधी पाप दोप लगा, उनका मिच्छामि दुक्कड । मैंने प्रज्ञानपन से, मिथ्यात्वपन से,अवतपन से, पन से, प्रशुभयोग से, प्रमाद करके, अपछदा अविनीतपना किया, श्री अरिहत भगवत वीतरागदेव, केवलज्ञानी गणधरदेव, प्राचार्यजी महाराज, धर्माचायजी महाराज उपाध्यायजी महा- राज, साधुजी महाराज, आर्याजी महाराज तथा सम्यगदृष्टि स्वधर्मी श्रावक और श्राविका, इन उत्तम पुरुषो की तथा शास्त्र सूत्रपाठ अथ परमार्थ और धर्म सबधी समस्त पदार्थों की अवि. नय अभक्ति आशातना आदि की, कराई, अनुमोदी मन वचन काया से, द्रव्य,क्षेत्र, काल, भाव से, सम्यक् प्रकार विनय भक्ति पाराधना, पालना, फरसना,सेदनादिक यथायोग्य अनुक्रम से नहीं पपाय-
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ससार-तरणिका
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की, नही कराई, नही अनुमोदी, तो मुझे धिक्कार धिक्कार
वारवार मिच्छामि दुक्कड । मेरी भूल चूक अवगुण अपराध
सब मुझे माफ करो । मैं मन वचन काया करके क्षमाता हूँ।
दोहा
में अपराधी गुरदेव को, तीन भवन को चोर ।
ठगू बिराना माल मैं, हा हा कम कठार ।।
कामी कपटी लालची अपछदा अविनीत ।
अविवकी क्राधी कठिन, महापापी छ रणजीत ।२।
ज मैं जीव विराधिया, सेव्या पाप अठार ।
नाथ तुम्हारी साख से, बारबार धिक्कार ।।
मैंने छकायपन से छकाय को विराधना की, पृथ्वीकाय,
अपकाय, ते उकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय, बेइन्द्रिय, तेइद्रिय,
च उरिन्द्रिय, पचेन्द्रिय, सन्नी, प्रसन्नी, गभज, चौदह प्रकार के
समुच्छिम आदि त्रस थावर जीवो की विराधना, मन वचन
काया स का कराई, अनुमोदी। उठते, बैठते, सोते, हालते, चालते,
शस्त्र, वस्त्र,मकानादिक उपकरण उठाने धरते,लेते, देते, वतते
वर्तावत, अप्पडिलेहणा दुप्पडिलेहणा सबधी, अप्रमाजना, दु.
प्रमाजना सवधी न्यूनाधिक विपरीत पडिलेणा सबधी और
पाहार विहार प्रादि अनेक प्रकार के क्त्तव्यो मे सख्यात, अस.
ख्यात और निगाद पाश्रयी अनत जीवो के जितने प्राण लूटे,
उन सब जीवा का में पापी अपराधी । निश्चय करके बदले
का देनदार हूँ। सब जोव मेरे प्रति माफ करो, मेरी भूल चूक
पढ़ने धांचने वाले यहाँ अपना नाम घोते।
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यहदालोयगा प्रवगण अपराध सव माफ करो । देवसी, राई, पक्खी, चौमामी और मम्वत्मरी सबधी वार- वार मिच्छामि दुक्कड । वारवार मैं क्षमाता हूं। तुम सब क्षमा करो। खामेमी सव्वे जीवा, सत्वे जीवा समतु मित्ति मे सव्व भूएसु वेर मज्म ण केणइ ॥१॥ वह दिन धन्य होगा जिस दिन मैं छ काय का वर बदला से निवृत्त होउगा । समस्त चौगसी लाख जीवायोनि को अमय- दान देउगा । वह दिन मेरा परम कल्याण का होगा । सुख दियां सुख हात है, दुःख दियाँ दुख हाय । आप हणे नही अवर को, आपका हण न काय ।। दूजा पाप मृपावाद-भूठ वालना । ऋध के वश, मान के वश, माया के वश, लाभ के वश, हाम्य करक, भय के वश, मृपा (झूठ)वचन बोला, निंदा, विकथा की, ककश कठार मरम वचन बोला, इत्यादि अनेक प्रकार मे मृपावाद (भूठ) बाना वालवाया और अनुमोदा, उनका मन वचन काया मे मिच्छामि दुक्कड । थापनमोसा मैं क्यिा करी विश्वास घात । परनारी धन चारिया, प्रकट क्ह्यो नही जात ।१। मुझे धिक्कार कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । वह दिन ध य होवेगा, जिस दिन सब प्रकार से मपावाद का त्याग करूगा । वह दिन मेरा कल्याणरूप होवेगा ।२। तीसरा पाप अदत्तादान-विना दी हुई वस्तु चारी करके लेना । यह बडी चोरी लौकिक विरुद्ध । अल्प चोरा मकान मबधी ६४ ससार-तरणिका -.- अनेक प्रकार के कत्तव्यो मे उपयोग सहित या बिना उपयोग से । अदत्तादान, मन वचन काया से चोरी की, कराई और अनुमोदी तथा धम सबधी, ज्ञान दशन चारित्र और तप श्री भगवत गुरु- देव की बिना आज्ञा किया, उसका मुझे धिक्कार धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । वह दिन मेरा धन्य होगा, जिस दिन सव प्रकार से अदत्तादान का त्याग करूँगा । वह दिन मेरा परम कल्याण का हावेगा ।३। चौथा मैथुन सेवन करने के लिये मन वचन और काया के योग प्रवाया । नववाड सहित ब्रह्मचर्य नही पाला । नववाड मे अशुद्धपन से प्रवृत्ति हुई। मैंने मैथुन सवन किया,दूमरो से सेवन करवाया और सेवन करने वाले का अच्छा समझा, उसका मन वचन काया स मुझे धिक्कार धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । वह दिन मेरा ध य होगा, जिस दिन मैं नववाड सहित ब्रह्मवय शोलरल प्राराधूगा, याने सवथा सव प्रकार से काम विकार से निवतूंगा । वह दिन मेरा परम कल्याण का होवेगा । पाचवों परिग्रह-सचित्त परिग्रह तो दास दासी, द्विपद, चतुष्पद,(पशु)प्रादि अनेक प्रकार के और अचित्त परिग्रह-सोना, चादी वस्त्र, प्राभूषण आदि अनेक प्रकार के हैं। उनकी ममता मूर्खा की, क्षेत्र घर प्रादि नव प्रकार के बाह्य परिग्रह और चौदह प्रकार के प्राभ्यन्तर परिग्रह को रखा, रखवाया और अनुमोदा, तथा रात्रि भोजन, प्रभक्ष्य आहारादि सबधी पाप दोप सेव्या हो, वह मुझे धिक्कार धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । वह दिन मेरा धन्य हावेगा, जिस दिन सभी प्रकार के परिग्रह का बृहदालोयणा m त्याग कर ससार का प्रपच से निवतूंगा। वह दिन मेरा परम कल्याण स्प होवेगा । छठा क्रोध-क्रोध करके अपनी आत्मा को तथा पर आत्मा को दुखी की ।। सातवा मान-ग्रहकार भाव लाया, तीन गारव और पाठ मद आदि किया । पाठवा माया-धर्म सवधी तथा समार सबधी अनेक कत्तव्यो मे कपट किया ।। नववा लोभ-मूर्छाभाव लाया, आशा तृष्णा वाछा आदि की हा दसवा राा-मनपसद वस्तु से स्नेह किया 1१०॥ ग्यारहवा द्वेष-अपसद वस्तु देख कर उस पर द्वेप किया ११ बारहवा कलह-अप्रशस्त (खराव) वचन बोल कर क्लेश उत्पन किया ।१२। तेरहवा अभ्यारयान-झूठा कलक दिया ।१३। चौदहवा पैशून्य-दूसरे की चुगली की ॥१४॥ पद्रहवा परपरिवाद-दूसरे का अवगुणवाद (अवर्णवाद) बोला-निन्दा की ।।१५॥ सोलहवा रति अरति-पाच इद्रिय के २३ विषय और २४० विकार हैं । इनमे मनपसद पर राग किया और अपसद पर देप किया तथा सयम तप आदि पर प्ररति (अरुचि) की और पारभादिक असयम और प्रमाद मे रति (रुचि)भाव किया ।१६। सत्रहवा माया मृपावाद-कपट सहित झूठ बोला ।१७॥
ससार-तरणिका -.- अठारहवा मिथ्यादशनशल्य-श्री जिनेश्वरदेव के धम मे शका कखा आदि विपरीत श्रद्धा परूपणा की ।१. इस प्रकार अठारह पाप का द्रव्य से, क्षेत्र से, काल से, भाव से, जानते, अजानते, मन, वचन और काया से सेवन किया, कराया और अनुमोदा, दिया वा राओ वा एगआ वा परिसा गओ वा सुत्ते वा जागरमाणे वा, इस भव मे, पहिले के सख्यात, प्रसख्यात और अनत भवो मे भवभ्रमण करते आज दिन तक + राग द्वेष, विषय, कपाय, आलस, प्रमाद आदि पौदगलिक प्रपच, परगुण पर्याय को विकल्प भूल की, ज्ञान की विराधना की, दशन की विराधना की, चारित्र की विराधना की, चारित्रा चारित्र की व तप की विराधना की । शुद्ध श्रद्धा, शील, सतोप, क्षमा आदि निज स्वरूप की विराधना की। उपशम, विवेक, सवर, सामायिक, पोसह, पडिक्कमणा, ध्यान, मौन आदि व्रत पच्चक्खान दान, शील तप वगैरह को विराधना की। परम कल्याणकारी इन बालो की आराधना पालनादिक मन वचन और काया से न नहीं की, नही कराई और नही अनुमोदी । छह प्रावश्यक सम्यक् प्रकार से विधि उपयाग सहित पाराधा नही, पाला नही, फरसा नही, विधि उपयोग रहित निरादर- पन से किया, किंतु आदर सत्कार भाव भक्ति सहित नहीं . •इत्यादि यहाँ अठारह पापस्थानों को आलोयणा विशष विस्तार पूर्वक अपने से मन इस प्रकार कहनी। + यहा बालन वाले पत्तमान जो सयत् महिना और तिथि हो वह रहे।
बहदालोयणा W किया । ज्ञान के चौदह, ममकित के पाच, बारह व्रत के साठ, कर्मादान के पद्रह, सलेषणा के पाच, एव निन्नाणवे अतिचार मे, तथा १२४ अतिचार मे, तथा साधुजी के १२५ अतिचार मे, तथा बावन अनाचार का श्रद्धानादिक मे विराधना आदि जा कोई अतिनम व्यतिक्रम, अतिचार आदि सेवन किया, मेवन कराया, अनुमोदना की, जानता, अजानता मन, वचन काया से, उनका मुझे धिक्कार धिक्कार बारवार मिच्छामि दुक्कड। मैने जीव को अजीव सद्दह्या परूप्या, अजीवको जीव सद्दह्या परूप्या, धम को अधम और अधर्म को धम सद्दह्या प्ररूप्या, तथा साधुजी का अमाधु और असाधु को साधु सद्दह्या प्ररूप्या, तथा उत्तम पुरुष साधु मुनिराज महासतियाजी की सेवा भक्ति मान्यता प्रादि यथाविधि नही की, नहीं कराई, नही अनुमोदी, तथा असाधुओ की सेवा भक्ति मान्यता आदि का पक्ष किया, मुक्तिमार्ग मे ससार का माग, यावत् पच्चीस मिथ्यात्व सेवन किया, सेवन कराया, अनुमोदा, मन वचन और काया से, पच्चीस कपाय सबधी, पच्चीस क्रिया सबधी, तेतीस पाशातना सबधी, ध्यान के १६ दोष, वदना के ३२ दोष, सामायिक के ३२ दोप, पौषध के १८ दोप सबधी मन वचन और काया से जो कोई पाप दोप लगा लगाया अनुमोदा, उसका मुझे धिक्कार धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । महामोह- नीय कर्मबध का तीस स्थानक को मन वचन और काया से सेवन किया, मेवन कराया, अनुमोदा, शील की नववाड तथा पाठ प्रवचन माता की विराधनादि, श्रावक के इक्कीस गुण और .
ससार तरणिका
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बारह व्रत को विराधनादि मन वचन और काया से की, कराई,
भनुमोदी, तथा तीन अशुभ लेश्या के लक्षणो की और अय
बोलो की विराधना की, चर्चा वार्ता वगैरह मे श्री जिनेश्वर देव
का मार्ग लोपा, गोपा, नही माना, अछते की थापना की, छते
की थापना नही की ओर अछते को निषेधना नहीं की, छते की
पापना और अछते की निषेधना करने का नियम नहीं किया,
कलुषता की, तथा छ प्रकार के ज्ञानावरणीय बध का बोल, ऐसे
छ प्रकार के दशनावरणीय बध का बोल, माठ कम की अशुभ
प्रकृतिबध का,पचपन कारणो से, पाप की बयासी प्रकृत्ति बाधी,
बधाई, अनुमोदी, मन वचन काया करके उनका मुझे धिक्कार
धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । एक एक बोल से लगाकर
कोडाकोडी यावत् सख्याता असख्याता अनता बोलो मे से
जानने योग्य बोलो का सम्यक् प्रकार जाना नही, सद्दह्या और
परूप्या नही, तथा विपरीतपन से श्रद्धा आदि की, कराई,
अनुमोदी, मन वचन और काया से, उनका मुझे धिक्कार
धिक्कार वारवार मिच्छामि दुवाड ।
एक एक वोल से यावत अनता प्रनता बोलो मे छोडने
योग्य बोल को छोड़ा नही, उनको मन वचन काया से सेवन
किया, सेवन कराया और अनुमोदा, उनका मुझे धिक्कार
धिक्कार वारवार मिच्छामि दुवाड । एक एक बोल से लगा
कर जाव प्रनता प्रनता बोनो मे पादरने याग्य बोलो को प्रादरा
नही, पाराधा नही, पाला नही, फरसा नही, विराधना खडना
मादि को, कराई, अनुमोदी, मन वचन काया से, उनका मुझे
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बृहदालोयणा ६९ W M धिक्कार धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । श्री जिन भग- वतजी महाराज आपकी प्राज्ञा मे जो जो प्रमाद किया और सम्यक् प्रकार उद्यम नही क्यिा, नही कराया, नही अनुमोदा, मन वचन काया करके, तथा अनाज्ञा मे उद्यम किया, कराया, अनुमोदा । एक अक्षर के अनन्तवे भाग मार दूसरा कोई स्वप्न- मात्र में भी भगवत महाराज आपकी आज्ञा से न्यूनाधिक विप- रीत प्रवर्ती हूँ, तो उनका मुझे धिक्कार धिक्कार वारवार मिच्छामि दुक्कड । दोहा श्रद्धा अशुद्ध प्ररूपणा, करी फरसना मोय । अनजाने पक्षपात मे, मिथ्या दुप्कृत मोय ॥१॥ सूत्र अर्थ जानू नही, अल्प बुद्धि अनजान । जिनभाषित सव शास्त्र का, अथ पाठ परमान ।२। देव गुरु धर्म सूत्र को, नव तत्वादिक जाय । प्रधिका ओछा जो कह्या, मिश्या दुप्कृत हू मगसेल्यो हो रह्यो, नही ज्ञान रस भीज । गुरु सेवा न करी सकु, किम मुझ कारज सीज ।४। जाने देखे जे सुने, देवे सेवे मोय । अपराधी उन सबन को, बदला देशु सोय ।। गवन करूं बुगचा रतन, दरब भाव सब कोय । लोकन मे प्रगट करू सूई पाई मोय ।। जैनधर्म शुद्ध पाय के, वरतु विपय कपाय । यह अचभा हो रह्या, जल मे लागी लाय ७॥ मोय ।३1 - ससार तरणिका जितनी वस्तु जगत मे, नीच नीच से नीच । सबसे मैं पापी बुरो, फसुं मोह के बीच ।। एक कनक अरु कामिनी, दो माटी तलवार । उठयो थो जिन भजन को, बीच मे लिनो मार । सवैया मैं महापापी छाड के ससार छार, छार ही का विहार करूँ, अगला कुछ धोय कीच, फेर कोच बीच रहू, विषय सुख चारु मन प्रभुता वधारी है । करत फकीरी ऐसी अमीरी की आस करूं, काहे को धिक्कार सिर पगडी उतारी है ।१०। दोहा त्याग न कर संग्रह करूँ, विषय वमन जिम प्राहार । तुलसी ए मुझ पतित को, वारवार धिक्कार ॥११॥ राग द्वेष दो बीज है, कम वध फल देत । इनकी फांसी मे वध्यो, छूटू नही अचेत ।१२। रतन बध्यो गठडी विषे, भानु छिप्यो धन माहि । सिंह पिंजरा मे दियो जोर चले कछु नाहि ॥१३॥ बुरा बुरा सबको कहे, बुरा न दीसे कोय । जो घट शोधु प्रापनो, तो मोसम बुरो न कोय ।१४। कामी कपटी लालची, कठण लोह को दाम । तुम पारस परसग थी, सुवरण थाशु स्वाम ॥१५॥ श्लोक में जपहीन हूं तपहीन हूँ, प्रभु हीन सवर समगत ।
आलोयणा .--.-.- - हे दयाल कृपाल करुणानिधि, आयो तुम शरणागत । प्रभु पायो तुम शरणागत ॥१६॥ - दोहा - नही विद्या नही वचन बल, नही धीरज गुण ज्ञान । तुलसीदास गरीब की, पत राखो भगवान् ।१७। विपय कपाय अनादि को, भरियो रोग अगाध । वैद्यराज गुरु शरण से, पाउ चित्त समाध ।१८। फहेवा मे आवे नही अवगुण भर्या अनत । लिखवा मे क्यू कर लिखू जाणा श्री भगवत ।१६। पाठ कर्म प्रबल करी, भमियो जीव अनादि । पाठ कर्म छेदन करी, पावे मुक्ति समाधि ।२०। पथ कुपथ कारण करी, राग हानि वृद्धि थाय । इम पुण्य पाप किरिया करी, सुख दुख जग मे पाय । २१॥ बाध्या बिन भुगते नही, बिन भुगत्या न छुटाय । आप ही करता भोगता, पाप ही दूर कराय ।२२। हू अविवेकी मोहवश, प्राख मोच अधियार । मकडी जाल बिछाय के, फसु पाप धिक्कार ।२३। सव भक्षी जिम अग्नि हू, तपियो विषय पाय । स्वच्छन्दी अविनीत मैं, धर्मी ठग दुखदाय ॥२४॥ कहा भयो घर छाड के, तज्यो न माया मग । नाग तजी जिम काचली, विष नही तजिया अग ।२५॥ प्रालस विषय कपाय वश, प्रारभ परिग्रह काज । योनि चौरामी लख भम्यो, अव तारो महाराज ।२६।
७२ ससार तरणिका आतम निंदा शुद्ध भणी, गुणवत वदन भाव । राग द्वेप उपशम करी, सब से खमत खमाव ।२७। पुत्र कुपुत्र जो मैं हुवो, अवगुण भर्यो अनत । अपनो विरुद विचार के, माफ करो भगवत ।२८। शासनपति वद्धमानजी, तुम लग मेरी दौड । जैसे समुद्र जहाज बिन, सूझत और न ठौर ।२६॥ भव भ्रमण ससार दुख, ताका वार न पार । निर्लोभी सत गुरु बिना, कौन उतारे पार ।३०॥ भवसागर ससार मे, दीपा श्री जिनराज । उद्यम करी पहोचे तीरे, बैठी धम जहाज ।३१। पतित उद्धारन नाथजी, अपनो विरुद विचार । भूल चूक सब माहरी, खमिये बारबार ।३२॥ माफ करा सब माहरा, आज तलक ना दोष । दीनदयाल देवो मुझे, श्रद्धा शील सतोष ।३३। देव अरिहत गुरु निग्रंथ, सवर निजरा धर्म । केवली भापित शास्त्र है, ये ही जैन मत मर्म ।३४। इस अपार ससार मे, अवर शरण नही कोय । या ते तुम पद कमल ही, भक्त सहायी होय ॥३५॥ छूट पिछला पाप से, नवा न बाधु कोय । श्री गुरदेव प्रसाद से, सफल मनारय मोय ॥३६॥ प्रारभ परिग्रह त्यजी करी, समकित प्रत आराध । प्रन्त समय पालोय के, अनशन चित्त समाध ।३७। तीन मनारप ए कहा, जे ध्यावे नित्य मन्न । ,
बृहदालोयणा
७३
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शक्ति सार वरते सही, पावे शिव सुख धन्न 1३८॥
श्री पच परमेष्टी भगवत गुरुदेव महाराजजी आपकी प्राज्ञा
है, सम्यक् ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, सयम, सवर, निर्जरा और
मक्तिमाग यथा शक्ति शुद्ध उपयोग सहित आराधने, पालने,
फरसने, सेवने की आज्ञा है। वारवार शुभ योग सबधी, सज्झाय
ध्यानादिक अभिग्रह, नियम, पच्चक्खाणादिक करने, करावने
की समिति गुप्ति प्रमुख सर्व प्रकारे प्राज्ञा है ।
निश्चय चित्त शुद्ध मुख पढत, तीन योग थिर थाय ।
दुर्लभ दीमे कायरा, हलुकर्मी चित्त भाय ।११
प्रक्षर पद हीणो अधिक,भूल चूक जो होय ।
अरिहत सिद्ध प्रात्म साख से, मिथ्या दुष्कृत मोय ।२।
भूल चूक मिच्छामि दुक्कड ।
॥ इति श्री श्रावक लाला रणजीतसिंहजी कृत ॥
बहदालोयणा सपूण
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२ लाया . अहोनाथजी पाप आलोऊ पाछला, दिन रातरा, केइ जातरा, किया पचेद्रिय विनाश, मार्या गले देइ फास, घणा खाया मद्य- मास । दीनानाथजी, जोडू हाथजी, मानो बातजी । ते मुझ मिच्छामि दुक्कड ॥ टेर ॥१॥ अहो नाथजी प्राण लूटया छ कायना, केइ जाण मे, केइ अजाण मे, मैं नही जाणी पर पीडा, चाप्या कुथुवा ने कीडा,खाया पान मेती बीडा दीनानाथजी॥२॥ अहो नाथजी, वनस्पती तीन जातरी केइ भातरी, छमकी सातरी, तोड्या पत्र फल फूल, सेक्या गाजर पद मूल, खाया भर भर लूण ॥दीनानाथजी ॥३।। अहोनाथजी आचार घाल्या हाथ सु, चोप्या दात सु घणी खात सु, माही भर्या है मसाला, खाधा मर भर प्याला, पाया फुलणियारा जाला ॥दीनानाथजी ।।४।। महोनाथजी पानी आलोच्या तलाब रा, कुप्रा बावरा, नदिया नालरा, फोडी सरवर नी पाल, तोडी तरुवर नी डाल, हम गिरा दिया गाल दीनानाथजी ॥५॥ अहोनाथजी अधर आकाश ना झेलिया, भर भर मेलिया, ऊना ठण्डा भेलिया, दीना अथ मनथ, ढोल, किया अणजाण्या अघाल, जाणे माडी भंसा रोल ॥दीनानाथजी ॥६॥ अहोनाथजी मातासु बाल बिछोविया, घणा रोविया, दुधिया दाविया, खाम्या नानडिया सा वाल, पराये पेटा पाडी झाल, तोड्या पखियो रा माल ॥दीनानाथजी 11७।। अहोनाथजी जू माड ने मारिया, रोकीने राखिया, रस्ते नासिया तडके दिया माचा मेल, ऊपर उना पाणी ठेल, प्रागे होसी घणो हेल ॥दीनानाथजी॥६॥ महानाथजी सियाले मिगडी आलोयणा ७५ 04.......... .. -..- करी, खीरा भरी, चवडे धरी, माही पड पड मरिया जीव, पाप किया निश दीव, दीधी नरका री नीव ॥दीनानाथजी ।।६॥ अहो नायजी उनाले वाय विजिया, फूल विछाविया, पाणी सिंचिया, कीधी बागाँ माहे गोठ, खाया चूरमाने रोट, वांधी पाप तणी पोट ।।दीनानाथजी ॥१०॥ अहानाथजी चौमासे हल हाकिया, बैल भूखा राखिया, मार्या चावूकिया, फोड्या पृथ्वी रा पेट, मार्या साप सपलेट, दया नही पाणी ठेट ।। दीनानाथजी ॥११॥ प्रहानाथजी जूना नवा कर वेचिया, सुलिया सचिया, अनसोया दीधा पीस, इल्या मारी दस बीस, दया नही पाणी शीप ॥दीना. नाथजी ॥१२॥ अहोनाथजी दूध, दही, छाछ, प्राछरा, शरबत दाखरा, केरीपाकरा, धली घोरत ने नेल दिया उघाडा ही मेल, किडिया आई रेलम ठेल ॥दीना० ॥१३॥ अहोनाथजी कूड कपट छल ताकिया, नही भाखिया, छाना राखिया, वोल्या मृपावाद झूठ, धाडो पाड लाया लूट, जन मत्र मारी मूठ ।।दीना०॥१४॥ प्रहानाथजी परनारी धन चोरिया, होली खेलिया, गाइ गोरिया, देरया तमाशा ने तीज, ताल्या पाडी होय हीज, गाल्या गाइ घणी रोज दीना०॥१५॥ अहोनाथजी अवगुण वाद गुरु तणा, वोल्या घणा प्रणसुहावणा, मैं नही जाण्यो अज्ञानी, निंदा कीधी छानी छानी, मैं नही धाम्यो अन्न पाणी दीना०॥१६॥ अहो नाथजी सूस किया मैं माटका, केई छोटका, किया खोटका, छाने छाने किया पाप, सो तो देखी रह्या प्राप, मारे थें छो माय बाप ॥दीना०॥१७ । अहोनाथजी भोजन भली भली भातरा, केइ जातरा, खाया रातरा, पीधा प्रण छाण्या पाणी, ससार तरणिका दया दिल नही प्राणी, पर पीडा न पिछाणी ॥दीना०॥१८॥ महोनाथजी सासु सोक सुहासणी, पाडोसणी, सताई घणी, मुख सु बाली मोठी गाल, मैं तो दिया कडा पाल, रागी तपसी बूढा बाल, जाकी कीधीन सभाल । दीना॥१९॥ अहानाथजी स्त्री भात पडाविया, गभ गलाविया, जीव जलाविया, मारी जू ने फोडी लीख, बैठी पापी रे नजीक, नही मानी सतगुरु सीख ॥दीना०॥२०॥ अहोनाथजी थापण राखी पारकी, साहुकार की, केइ हजार की, देता किधी सटपट माग्या तुरत गयो नट, कीधा समुलाइ गट ॥दीना०॥२१॥ अहानाथजी जप तप सयम शील रो, भणता ज्ञानरो, देता दानरा, इण सु मोक्ष नही पाय, पडयो करे हाय हाय, रुल्यो चौरासा के माय ॥दीना०॥२२॥ अहो- नाथजी मात पिता गुरुदेवा तणा, अविनीत पणा, कीधा घणा, रुलिया चौरासीरे माय, ज्यासु वाध्या वैर भाव, खमा निर्मल माव ।दीना०॥२३॥ अहोनाथजी सार करीने सभालजा, मती विसारजो, पार उतारजो, सवत उगणीसे वासट, सुणी मती कीजो हट, दर्शन दीजो म्हाने भट ॥दीना० ॥२४॥ प्रहानाथजी पालोयणा ऐसी कीजिये, कम बीजिये, मिच्छामि दुक्कड दीजिये, जयपुर मे जडाव,ज्यारो निमल भाव, जोड किधी चित्त चाय ।। दीनानाथजी०१.२५॥
३ आलोयणा - प्रधम मो सम नही कोई । मोय कैसे उबारोगे ।। लख्यो मैं सकल जग जोई। मोय कैसे उबारोगे ।टेर।। सरागी देव मैं ध्याये । पान फल फूल चढवाये । हने पशू पूत हित चाये ॥माय०॥१॥ कुगुरु की सेवा मैं कीनी । अहित शिक्षा विविध दीनी ।। कुपथ की गैल गहि लीनी ।।मोय०॥२॥ सदा हिंसा धरम ध्यायो। कियो औरो से करवायो । दयामय धरम बिसरायो । माय० ॥३॥ कुश्रुत मे सुन्यो अरु दाग्यो। जिनागम विरुद्ध मैं भारयो । जान के हलाहल चारयो । मोय०॥४॥ अठारे पापहु कीने । पराय प्राण हरली न । झूठ वच बोल दु ख दीने ॥ मोय०॥ करी चोरी हरयो परधन्, हुया मे मुदित लखि कामन् । कियो हा शील व्रत पडन् । मोय०॥६॥ कुवानिज पचदश कर के, और दुष्कृत्य आचर के ।। सचियो धन हरप धर के ॥ माय०॥७॥ बडो क्रोधी मैं अभिमानी, छली लोभी ओ दुनिी ।। राग रुष पास लिपटानी ॥ माय० ॥1 बिना कारण कलह कीनो । दोप निज अन्य शिर दीनो ।। पिशुनता करण परवीनो ॥ मोय० ॥६॥ परपरिवाद को रसियो । कदा रति अरति मे फसियो । लवी माया मृषा हसिया ॥मोय० ॥१०॥ ।
७८ ससार-तरणिका .-.-- रच्यो मिथ्यात्व के रस मे । कुश्रद्धा बसी नस नस मे ॥ फस्यो लोकीक के जस मे ॥मोय० ॥११॥ तत्त्व सरधान को तज के। होम पूजादि को यज के ॥ भम्यो भवभव कुगुरु भज के मोय०॥१२॥ जीव यत्ला न उर पानी । बिना छान्यो पियो पानी ।। जिवाडी नाहिं जीवानी ॥मोय०॥१३॥ कियो हा रात्रि मे भोजन् । पचायो बिन शुध्यो ओदन् ॥ भख्यो मद मास तन पोपन् ।मोय०॥१४॥ कद मूलादि को चूरन् । करी कियो उदर पूरन् ।। बन्यो मैं शूर तरु झूरन् ॥मोय०॥१५॥ सेविये सात मैं कुविसन, वचन दे के न पारयो पन् ।। बडो ही धीठ अरु कृतघन् ॥मोय०॥१६॥ वेद घर कर जनम धारन् । कियो धातु तनो जारन् । औषधी दी गरभ गारन मोय०॥१७॥ जपे में जाप नर मारन् । पराई त्रिया वश कारन् । भज्यो नातू तिरन् तारन् ।मोय०॥१८॥ बनाये शूर भव मे भूर । नाल गोला शतघ्नी तूर ।। क्येि सग्राम में भरपूर ॥मोय०॥१६॥ मधम जोनी जनम पाके । किये अघ निर्दयी था के ॥ में गा के मोय०॥२०॥ न मेंने साधु यत धारे । श्राद्ध के व्रत न स्वीकारे ।। प्रादरे तो न शुद्ध पारे ।।मायः॥२१॥ ज्ञान को मान उर मानो। भ्रम जिन चैन में ठानो। कहा लो बदालोयणा ..... । गाय के करी तप कियो नियानो ॥मोय॥२२॥ रुल्यो ताते चहू गति मे । पडयो परभाव अापत्ति मे ।। न रमियो शुद्ध परिणति मे ॥मोय०॥२३॥ उवारे तुम पतित प्राणी । सुनी यो सुगुरु मुख बानी ।। सरण ताते लई आनी ॥मोय०॥२४॥ लोक माही अणु जेते । ऐव मोमे भरे तेते ।। मैं देते ॥मोय०॥२॥ फल मेरे न चित्त दीज, विरुद अपनो विचारीजै ।। दीन जानी दया कीजै ।।मोय०॥२६॥ एतली ही अरज मानो । आपणो दाम कर जानो। पलट द्यो पढम गुणठानो ।।मोय०॥२७॥ किये जे पाप भव भव मे । ति हे द्यु कोटि धिक् अव में छुडास्यो छुटस्यु जब मैं माय०॥२८॥ पूर्व जे किये अघ भारी । तिन्हे मिथ्या दुकृत म्हारी ।। साख अग्हित प्रभु थारी ।।मोय०॥२६॥ मगन मुनि चरण शिर नाई, मुनि 'माधव' ने चित्त लाई ।। पाप पालोनना गाई ॥मोय०॥३०॥ 1 ४ आलोयणा परम देव नो देव तु खरो, धम ताहरा मे नवी कर्यो । भरममा भम्यो तू नवि गम्यो, कम पाश मा हू अति दम्यो ॥१॥ गरीव प्राणी ना प्राण मे हण्या, बस ने स्थावरो जीव ना गण्या। परर धूजता मोत थी डरी, अरर अहनी घात मे करी ।।२।।
८० ससार तरणिका , सद-सभा जइ झूठ बोलिया, धर्मी जीवनो मम खोलियो । सद्गुणी शिरे पाल प्रापिया, अरर पाप ना पथ थापिया ॥३॥ मदत्त दानथी हू नवी डों, परधनो हरी केर मे कर्यो । तस्करो तणा तानमा चट्यो, अरर पाप ना पुज मा पडयो ॥४॥ रमणी रग मा प्रग उलस्यु विषय सुख मा चित्तडु वस्यु । शियल भग नो दोष ना गण्यो, अरर हायरे वावरो बण्यो ॥१॥ प्रथिर दाम मा हु रह्यो अडी, धम वात तो चित्त ना चडी। उद्धत मोह मा हु थयो अति, अरर माहरी शी थशे गति ॥६॥ क्रूर भाव थी काध मे कर्यो, सज्जन दुभवी रोप मा रह्यो । सव स्वजन थी सप छोडियो तरण तोल थी तुच्छ हू थयो ॥७॥ मत्सर मन थी मे बहु कर्यो, ममत्व भाव थी हू बहु भर्यो । मद छके चड्या मान मा अड्या, अरर गर्व ना कूप मा पड्यो।। दगलबाजी ए हु बहु रम्यो, कूड कपट मा काल निगम्यो । मुख मीठु लवी सष्टि भोलवी, परर के मरे भूल से भवी ॥६॥ धन हीराकणी माती ने मणी, प्रखूट अथ नो हु थयो धणी। अधिक पाश तो अतरे घणी,अरर लोभ ने ना शक्यो हणी ॥१०॥ मगन मन थो स्वजनो परे, हित घणु धरी पोषिया परे । तरकटी तणा फद मां फस्यो, प्ररर राग थी ना लह्यो कशो।११॥ दिल डुबी गयु द्वेप दद मा गुण नवी गण्या मेरी मद मा। भरुण प्रायडा राप थी भरी, परर सव नो हु यथो अरि ।१२। निज कुटु वने नातजात मा वढी पडयो हु तो वातवात मा । अबुझ प्रातमा घात मा घडयो, प्ररर फ्लेश ना कूप मा पडयो ।१३। भणहुना दीधा प्राल प्रयने, अलिक उच्चरी मेल्य धनने। सद्गुरु तणा मग ना क्यों, प्ररर पाप थी पिड में भयो ।१४॥ - आलोयणा ८१ पर नी चोवटे चुगली करी, नृप सभा जुठो साहेदी भरी। पिशुन धूत हु लाच लालची, पशुपणे रह्यो पाप मा पची ।१५॥ परपुठे परा दोष दाखवा, जश तणो अति स्वाद चाखवा । रहस्य बात तो मे करी छनी, भव अरण्य मा हु रुल्यो अति ।१६ अधम काम मा हप मे धर्यो, धम ध्यान मा अमृपे भर्यो । दुर्गुणे रच्यो, मोह मा मच्यो, प्ररर कर्मना नृत्य मा नच्यो ।१७ छल विद्या करी कम सचिया, जुठ लवी घणु लोक वचिया । पतित राक ने छेतर्या बहु, अरर पाप हु केटला कहु ।१८। शरीर शोध तो मे नवि कर्यो, जड प्रसग थी योनि मा फर्यो । शुद्ध विचारतो चित्त ना चड्या, मिछत्त शल्य तो मुजने नडयो ।। कम वेरी वीटियो मने, करगरी करूँ अर्ज जिन ने । कर ग्रहो प्रभु राक जाणी ने, दिल दया धरो महेर आणी ने ।२०। तकशिरो घणो को शके गणी, बक्षिमो गुनाह जगत ना धणी । रीझ करी खरी वोडी त्रास ने, शरण राखजो खोडीदास ने ।२१॥ नभ भुजा अहि चद्र मा ग्रही, पटण प्राची थी पश्चिमे सही। चतुरमास मा बन्दरे रही, ललित छन्दनी जोड आ कही ।२२। ५ आलोयणा शरण में लीनो तुम चरणारा हे जिन । हर भव बास पाश, अरदास दास की धारो।टेर। भव अनन्त से भ्रमण करत, भव विपन गहन मझारो। भ्रम तम माहि नाहिं पथ सूझे, करहु ज्ञान उजियारो ॥१॥ भू भृत् अष्ट कर्म दुगम महि, मोह मेरु गिरि भारो। काल अनन्त उलघत वीत्यो, अजहं न पायो पारो ।
ससार-तरणिका
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लघत वढत नाथ | प्रति छिन ये, ऐसो विषम पहारो
चरण रूप देओ चरण कृपा कर, तो नहिं लघत वारो ।।
विषय भुजग डसन को धावे, कर विकार फुकारो।
होय रह्यो भयभीत जिनद | जिम तिम कर इहे विडारा ।।
मृग मन मौज करे मनमानी, कके लालच स्यारो।
मान मृगादन द्वीपी मद दूठ, मूके नहि मम लारो ।।
है बेराह बराह भयङ्कर, भ्रम भल्लूक करारा ।
सशय शशक शक नहि माने, वृक भयदा विभचारो।६।
मदन मत्त गज फिर घूमता, चहै तरु शील उखारा ।
हे जिनसिह । प्रकट मम हृदये, भव-वन, विधन विदारो।७।
वार अनन्त निगोद माहि, मर मर लीनो अवतारा ।
कहा लो कथा व्यथा को वरणी, कापत हृदय हमारो।।
पच से अरु पटतीस अधिक, पूरे पैसठ हज्जारो।
जनम मरण किये दो घटिका मे, तू सब जानन हारो ।।।
पुनि नारक पर्याय पाय, बहु बार मह्यो सहारा ।
भागी विविध वेदना वैवश, परमाधामी मारो ।१०।
भू जल जलन पवन तरु-मश तन, धार प्रनती वारा ।
भावी वश भ्रमराक्षर न्याय, पायो मनुप जमारा ।११॥
प्रवल पुण्य से लरयो जिनद तू, सकट को हरणारो ।
परौं पोय कर जोर नाय शिर, भट मम अठ दुठ टारो ।१२।
हू मति-हीन दीन द्रवलिंगी, कपटी कुटिल लवारो।
मेरी गति मति लखा नाथ | तुम, अपना विपद विचारो॥
चरण करणयुत सुगुरु मगनमुनि', कविकुल शिर शृगारो ।
नामु पसाय नमाय माय मुनि, माधव परत पुधारा 1१४॥
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६ आलोयणा H प्रादिश्वर प्रादे नमू, नमू शान्ति जिनराय ।। नमू नेम फणधार ने, वर्द्धमान सुखदाय ॥१॥ प्रादि 'र' कार अते 'म' कार, तिण मे जिन जो होय । पाचो अग नमाय के, नमू नमू नित्य सोय ॥२॥ ॐ ह्री श्री नमू, नमू साधु गुणधार ॥ असि प्रा उ-सा नमू दशन ज्ञान सुखकार ॥३॥ ॐ सोह अात्मा, ह्री पच पद जान ।। श्री सम्यक् ज्ञान है, ऐसो तत्त्व पहिचान ॥४॥ त्रिवणे ओकार है, व्याकरण सिद्ध करेह ।। ग्राकार उकार म कार की, मात्रा अर्ध धरेह ॥५॥ मात्रा ऊपर विदु है, ताको नमन करेह ।। ता सम निमल पात्मा, ऐसो भाव धरेह ॥६॥ श्रावक ने वलि श्राविका, श्रमणी ने अणगार ।। चौमासी पवखी सवत्सरी, करे आलोयणा सार ॥७॥ अठारह पापा की आलोयणा ढाल-प्राणी थें पाप किया घणा, नही कियो धर्म लगारो रे॥ इण भव की चिंता करी, परभव नाही विचारो रे ॥प्रा ॥१॥ हिंसा कीनी जीव की, वोत्या झूठ अपारो रे ।। चोरी अन्यायी थें करी, परिग्रह सावध व्यापारो रे ॥प्रा ॥२॥ क्रोध करी गाली दीवी, मूछा ताव अभिमानो रे ॥ कपट करी ठगीया घणा, लोम को नही परिमाणो रे ।।प्रा ॥३॥ .
८२ ससार-तरणिका - लघत बढत नाथ | प्रति छिन ये, ऐसो विषम पहारो। चरण रूप देओ चरण कृपा कर, तो नहिं लधत वारा ।३। विषय भुजग डसन को धावे, कर विकार फुकारो। हाय रह्यो भयभीत जिनद । जिम तिम कर इन्हे विडारा॥ मृग मन मौज करे मनमानी, कूके लालच स्यारा । मान मृगादन द्वीपी मद दूठ, मूके नहि मम लारो ॥५॥ है बराह बराह भयङ्कर, भ्रम भल्लूक करारा । सशय शशक शक नहिं माने, वृक भयदा विभचारा १६। मदन मत्त गज फिर घूमतो, चहै तरु शील उखारा । हे जिनसिंह प्रकट मम हृदये, भव-वन, विघन विदारो।७। बार अनत निगोद माहि, मर-मर लीनो अवतारो। कहा लो कथा व्यथा को वरणौ, कापत हृदय हमारो।। पच से अरु पटतीस अधिक, पूरे पैसठ हज्जारो । जनम मरण किय दो घटिका मे, तू सब जानन हारो ।। पुनि नारक पर्याय पाय, बहु बार मह्यो सहारा । भागी विविध वेदना बवश, परमाधामी मारो ।१०। भू जल जलन पवन तरु-त्रश तन, धार प्रनती वारा। भावी वश भ्रमराक्षर न्याय, पायो मनुष जमारो ।११॥ प्रबल पुण्य से लग्यो जिनद तू, सकट को हरणारो । परों पांय कर जोर नाय शिर, झट मम अठ दुठ टारा ।१२। हू मतिहीन दीन द्रवलिंगी, कपटी कुटिल लवारो। मेरी गति मति लखा नाथ तुम, अपना विरुद विचारा॥ चरण मरणयन सुगुरु 'मगनमुनि', कविकुल शिर शृगारो। तासु पसाय नमाय माय मुनि, माधव' परत पुकारा 1१४॥
६ आलोयणा PAC- नमू नेम . आदिश्वर प्रादे नमू, नमू शान्ति जिनराय ।। फणधार ने, वद्धमान सुखदाय ॥१॥ आदि 'र' कार अते 'म' कार, तिण मे जिन जो होय ॥ पाचो अग नमाय के, नमू नमू नित्य सोय ॥२॥ ॐ ह्री श्री नमू, नमू साधु गुणधार ॥ असि प्रा उ-सा नमू दर्शन ज्ञान सुखकार ॥३॥ ॐ सोह आत्मा, ह्री पच पद जान ।। श्री सम्यक् ज्ञान है, ऐसो तत्त्व पहिचान ॥४॥ विवणे ओकार है, व्याकरण सिद्ध करेह ।। प्राकार उकार म कार की, मात्रा अर्ध धरेह ॥५॥ मात्रा ऊपर बिदु है, ताको नमन करेह ।। ता सम निर्मल आत्मा, ऐसो भाव धरेह ॥६॥ श्रावक ने वलि श्राविका, श्रमणी ने अणगार ।। चौमासी पक्खी सवत्सरी, करे आलोयणा सार ॥७॥ - अठारह पापा की आलोयणा ढाल-प्राणी थें पाप किया घणा, नही कियो धर्म लगारो रे ॥ इण भव की चिंता करी, परभव नाही विचारो रे ॥प्रा ॥१॥ हिंसा कीनी जीव की, वोल्या झूठ अपारो रे ॥ चोरी अन्यायी थें करी, परिग्रह सावध व्यापारो रे ॥प्रा ॥२॥ कोध करी गाली दीवी, मूछा ताव अभिमानो रे ।। कपट करी ठगीया घणा, लोम को नही परिमाणो रे ।।प्रा ॥३॥ ११ ८४ ससार तरणिका स्नेह करी नाता जोडिया, हास्य करी नाता तोड्या रे॥ आपण पुत्र ने पालिया, पर पूत कडका मोड्या रे ॥प्रा ॥४॥ क्लेश कदाग्रह थे किया, कूडा पाल जो दीधा रे ॥ चाडी चुगली थे करी, कीधी पारकी नि दा रे ॥ प्रा ॥५॥ स्वमद्धी देख राजी हुवो, पर की देख बेराजी रे ।। ममकारी भाषा बालने, खेल्यो कपट की बाजी रे ॥ प्रा ॥६॥ कुगुरु कुदेव सेविया, हिंसा मे धम बताया रे ॥ मिथ्या पव आराधिया, बड पीपल पूजाया रे ॥ प्रा ॥ ७॥ ऐसे १८ पापस्थान के विषे जो कोई अतिचार दोष लगा हो तो देवसी, पक्खी, चौमासी और सवत्सरी सम्धी तस्स मिच्छामि दुक्कड ।। पच्चीस मिथ्यात्व कुदेव कुगुरु-क्रुधर्म सेवतो, नही छोडे अभिग्रही टेको रे ।। सब देव-गुरु धर्म सारीखा, अनभिग्रही न विवेको रे ॥ प्रा ॥८॥ अभिनिवेशी मिथ्यात्वी हुवो, अथ परूप्या विरुद्धो रे ॥ सशय-शका पुण्य पाप की, अनाभोगी अशुद्धो रे ॥ प्रा ॥६॥ लौकिक, लाकोत्तर कुप्रवचन, कुमाग से कोनी प्रीतो रे ॥ ओछा अधिका परूपिया, जिन वचन विपरीतो रे ॥प्रा ॥१०॥ छकाया जीव ने अजीव कह्या, पुद्गल जीव बताया रे ॥ दया शील प्रधर्म कह्या, हिमा मे धम कहाया रे ।। प्रा ॥११॥ रत्नत्रय साधन करे, तिनको प्रसाधु बताया रे ।। छकाया को गटको करे, साधुजी यही पूनाया रे ॥ प्रा ॥१२॥ व्याह सगाई ससार का, कारज मुक्ति बताया रे ॥
आलोयणा ८५ - - दान शीयल तप भावना, ससारी काय समझाया रे ॥ प्रा ॥१३॥ सिद्धा ने स कर्मी कह्या, कर्मी प्रकर्मी ठहराया रे ।। प्रविनय अक्रिय,अज्ञानता असातना मिथ्यात्व दर्शाया रे॥प्रा ।१४। जीव रूले ससार मे, सेव्या पच्चीस मिथ्यातो रे ।। खोटा जाणी मै परिहरूँ, नही सेऊ कोई भाँता रे ॥प्रा ॥१५॥ ऐसे पच्चीस प्रकार के मिथ्यात्व मे से, कोई भी मिथ्यात्व मैने सेवन किया हो, कराया हो, अनुमोदन किया हो, तो देवसी, पक्खी, चौमासी, सवत्सरी सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कड । . प्रथम व्रत बलदा रे बलदा रे सिर जूडा दिया, अकुश टोच चलाया रे । । भात पाणी रोकी दिया, गाढा बन्धण वधाया रे ॥१६॥ सूया, सारस, मोर ने, पिंजरा माह धाल्या रे सामर रोज ने हिरणला, घणा जीवा ने पाल्या रे ।।१७।। मुख छी की दीनी, बाछरु दूध रुकाया रे । वियोग सोग पडाविया, ऊभा बैख सुखाया रे ॥१८॥ ऊट बलद कीडा पडया, अधिक भार लदाया रे। ताप ठण्ड मे चलाविया, सीग पूछ कटाया रे ॥१९॥ 'ब्रह्मदत्त राय' शिकार से, 'वक' राक्षस माम याया रे । नर्के गया जीव घात से, भव अनेक बधाया रे ॥२०॥ नधूक राजा डूबियो हिंसा के प्रतापो रे । हिंसा फल कडवा घणा, आगम सुण दुख विपाको रे ॥२१॥ ऐसे प्रथम व्रत में, दोप अतिचार लगा हो, तो देवसी, पक्खी, चौमासी, सवत्सरी सम्बधी तस्स मिच्छामि दुक्कड । -
ससारन्तरणिका
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द्वितीय व्रत
शका करी कलक दिया, अणहोता कलेश जगाया रे ।
रहस्य मरम तू बोलियो, अछत्ता दोप लगाया रे ॥२२॥
कन्या गा भूमि कारणे आल पपाल तू बोत्यो रे ।
पारको थापण दबाय ने, उलटी चाल तू चाल्यो रे ॥२३॥
जाली कागज खोटा लिरया, साख खोटी मे अगवानी रे।
पाणी पियो थे छाण ने, पियो लोही अणछाणी रे ॥२४॥
"सत्यघोप" थापण दाब ने झूठी महिमा फैलाई रे ।
अत हुआ पछतावणो, गयो दुगति माहि रे ॥२॥
असत्य भाषा नही बोलिये, प्रतीति उठ जावे रे ।
वसु राजा मिश्र बोलने, भव अनन्त बधाया रे ॥२६॥
ऐसे द्वितीय व्रत मे जो कोई दोप अतिचार लगा हो तो
देवसी, पक्षी, चोमासी, सवत्सरी सम्बधी तस्स मिच्छामि
दुक्कड़।
ततीय व्रत
चारी की वस्तु लोवी, चोरो ने सहाज्य दीधो रे ।
राज विरद्ध ताला मापा, वस्तु भेल सभेल कीघो रे ॥२७॥
प्राज्ञा विना वस्तु पारकी, लेइ हुवो घणो राजी रे ।
मित्र वनी धन छोनिया, पर घात बछो पाजी रे ॥२८॥
पापण अथवा कुटम्ब के, सज्जन प्रेमी काजे रे ।।
करे करावे चारी कम, देव गुरु से न लाजे रे ॥२६॥
मार पडी मादा सिरे घेवर घर वाला पाया रे।
पर मन को शानी कह, इण भव मे दुरा पाया रे ॥३०॥
आलोयणा
ऐसे तृतीय व्रत मे दोप अतिचार लगा हो तो देवसी, परखी,
चौमासी और सवत्सरी सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्कड।
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चतुथ व्रत
घर छोडी पर स्त्री रम्यो, लोका में अपयश लियो रे ।
धन गमायो गाँठ को, फिट फिट सहु कियो रे ॥३१॥
काम अन्ध तू हाय ने, नही गिण्यो पुण्य पापो रे।
सव ज्ञाति की भारजा, माता भगिनी को खोयो पापो रे ॥३२॥
इतर थोडा काल की, ऊमर छोटी नारो रे ।
तिण से ही क्रीडा करी, लागो तुझ अतिचारो रे ।।३३।।
विधवा किसवण नारी से, दाम दे प्रीत लगाई रे ।
के दूजाने मेलिया, व्याह सगाई कराई रे ॥३४॥
विपय अभिलापा करो, अनेक पाप कमाया रे ।
काम विकार बधाविया, मनुष्य भव गॅवाया रे ॥३५॥
रावण पद्मनाभ मणीरथ, परस्त्री का रसिया रे ।
राज अने लाज सब तजी दुगति मे जाई वसिया रे ।२६।
ऐसे चौथे व्रत के विषय मे जो कोई प्रतिचार दोप लगे हों
तो देवसी पक्खो, चौमासी, सवत्सरी सम्बन्धी तस्स मिच्छामि
दुक्कड ।
पचम व्रत
वेत वत्यु हिरण सुवण, धन धान द्विपद चऊपदो रे ।
धातु सर्व प्रकार की यो परिग्रह नव भेदो रे ॥३७।।
परिग्रह मूर्छा घणो, दिन दिन अधिक बधाया रे ।
धन धन करतो मरी गयो, हिरदे समता न लायो रे ॥३८॥
दम
ससार तरणिका
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कृत्य अकृत्य न देखता, नही सोचे न्याय अन्यायो रे।
झूठ-चारी हिंसा करे, धन तृष्णा मे लुभायो रे ॥३६॥
खोडा बेडी दड भोगवे, सूली फासी कोई जावे रे ।
गुप्त मृत्यु से केइ मरे, जाका पता नही पावे रे ॥४०॥
नही सुकृत कियो हाथ से, मूजी मे नाम लिखायो रे ।
बेटी ज्यं पाल पोस ने, धन दूजा ने भोलायो रे ॥४१॥
धन म्हारो हूँ धन को धणी, धन मे धम गंमायो रे ।
प्राठमो चको नर्क साप्तमी, तृष्णा फल यह पायो रे ॥४२॥
एत पाचवे व्रत के विषय मे जो कोई अतिचार दोष लगा
हो तो दवसी, पवखी, चौमासी और सवत्सरी सबधी तस्स
मिच्छामि दुक्कड ।
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पष्टम प्रत
देश देशावर मे भमे, जिसकी मर्यादा न काई रे।
प्रवन नाला नही रोकिया, सब की क्रिया आई रे ॥४३॥
लोभवश मर्यादा लोपने, विदेशी वस्तु मगाई रे ।
धम ने धन दानो गया, कैसी करी है कमाई रे ॥४४॥
स्वामी हुक्म या व्यापार के, कारण से तू ममियो रे।
अथवा सलानी जीवडो, धन जोबन को छकियो रे ॥४॥
ऐस छठे व्रत मे जो कोई दोष अतिचार लगा हो तो देवसी,
पक्यो, चौमासी, सवत्सरी सम्बन्धी तस्स मिच्छामि दुक्क्ड ।
सप्तम प्रत
वस्तु भोग-उपभोग की, नही मर्यादा थारे रे ।
मक्ष ममदा जाणे नही, यों मानव भय हारे रे ॥४६॥
आलोयणा ८६ -.-.-.. . , उल्लण दतण फल अभगण, उवट्टण मजण वत्यो रे। विलेपण धूप पुप्फ पेज विही, भूपण चाहण कत्यो रे ॥४७।। भक्खण आदण सूर विगय विही, साग महूर वखाणो रे । जीमण पाणी मुखवास, पण्ही सयण तुम जाणो रे ॥४८॥ सचित्त द्रव्य छब्बीम की, मर्यादा करो भाई रे। प्रागम के अनुसार से, देसू अर्थ सुणाई रे ॥४॥ रुमाल भात-भांत के, सण सूत ने घासो रे ऊन रेशमी जात का, घणा राख तोपासो रे ॥५०॥ हरिया वृक्ष तोडने, दातुन तू ही करतो रे। फल भखे बहु बीज का तिर्यच ज्यू तू चरतो रे ॥५१॥ तेल फुलेल लगावता, बन रह्यो भोगी भमरो रे । पीठी मर्दन अरु स्नान कर, ढोले पाणी अपारो रे ॥५२॥ झीणा वस्त्रो ने धारतो, तुर्रा किलगी लगातो रे । जामारे जरकस पहेग्ता, पटका कमर वधातो रे ॥५३॥ चूवा चदन लगावतो, गले फूलो की माला रे। फूला का बगला रचावतो, फूलो मे सज रसाला रे ॥५४।। धूप खेवी धूओ कियो, माखी मच्छर मराया रे । मिश्री मिलाय दूध पीवतो लोही मास बधाया रे ॥५५।। भूपण विविध प्रकार का, ककण कदोरा छल्ला रे। मोती माला ने चौकडा, भुजवध पहेरिया भला रे ॥५६।। कडा ताडा विछिया वाजणा, गले नवसर हारो रे । टोटी कुडल और झूमका, और भी गेणा अपारो रे ॥५७।। हाथी घोडा और पालखी पिन्नस ने सुखपालो रे। .
ससार-तरणिका - तामजाम और नाल की, गाडी रथ चढ चाल्यो रे ॥५८|| लाडू पेडा और लापसी, घेवर जलेबी खाई रे । खाता खाता उमर गई, तृष्णा कोई न पुराई रे ॥५६॥ विगय रस छोडया नहीं, काल सिराण आया रे। चावल ने सीरा पूरी, बूढा चित्त उमायो रे ॥६॥ साग बणाया कई भात का, तलिया छुगार्या धुगार्या रे । घत मसाला डालने, आरभी खूब बनाया रे ॥६१॥ दाख दाडम ने खोपरा, मेवा कइ भात भातो रे। पिस्ता बादाम चारारी दाणा, स्वाद लेई लेई खातो रे ॥६॥ जीमण तू केइ जीमता, तेहना नहीं प्रमाणो रे । प्रारभ हावे माटका, दोष लगावे अजाणो रे ॥६३॥ शीतादक सुगधोदक, उष्णोदक मे लेवे र। नदी कुंप्रा ने वावडी, अण छाण्यो जल सेवे रे ॥६४॥ लोग सुपारी इलायची, नित-नित चाबतो बीडा रे। निदा चुगली कीधी घणी, तिण मुख पडिया कीडा र ॥६५।। मखमली विलायती पहिनतो, माजडी लाह जडातो रे । पावडियां पेहरी चालता, घणी होवे जीव घानो रे ॥६६।। गादी गलीचा पर बैठना, ढोल्या मेज बिछाया रे । चन्द्र-बदन तिरिया सगे, सेजे रमी सुखपाया रे ॥६७।। पादीना कोथमोर की, चटनी कर कर पातो रे । कार से लूण नाखतो, नीम्बू रस निचाता रे ॥६॥ खाण की गिणती नही, नही द्रव्य परमाणो रे । सब ही की पिया लगायता, प्रम ता ममम हिये पाणारे।६६। .
आलोयणा ६१ . अपक्क आहार थे कियो, के थे दुपक्क पकाया रे। वेगण भरीता थे किया, भट्टा होरा भुजी वाया रे ॥७०॥ थोडा खाया ने घणा नाखिया, जीवा की जतना न काई रे। द्रव्य भावे तू डूवियो गुरु विन समझ न आई रे ॥७॥ पत्रावली मे जीमता, अस स्थावर की घाता रे । एठवाडो घणो नाखतो, दोप लगातो साक्षातो रे ॥७२।। अभक्ष बावीस जाणे नही, न जाणे तेहना दोपो रे । मनुष्य भव ने पाय ने, पाप से प्रात्मा पोपो रे ॥७३॥ रात्रि भोजन थे किया, अण छाण्यो जल पीया रे । अनत काय जमीकद का, निशि दिन भक्षण कीधा रे ॥७४।। मध महुवा ने सडावतो, कीडा किलबिल करता रे । सर्व इकट्ठा पीवता, मध्यम नर आचरता रे ॥७५।। अस स्थावर हिंसा घणी, दया को नही रहे असा रे । लाज मर्यादा खोय ने, लजाया मात तात वशो रे ॥७६।। तेल लूणी ने घृत का, व्यापार से घणो राजी रे । कम उदय जब पावसी, काइ करसी पाजी रे ॥७७।। भागा पीकर छक रह्यो, काई नही रही सुद्धो रे । कपडा गमावै गाठ का, होय रह्यो बेसुद्धो रे ॥७८।। गाजा तमाखू पीवतो, प्राकोती खाई छकियो रे । माता भगिनी भारिया, देखी ज्यो त्यो बकियो रे ॥७॥ ऊबर अजीर ने पीपली, तीनो फलो मे जीव रासो रे । ते त्यागन कीधा विना, माठी गत हासी वासो रे ।।८।। गडा काचो गर्भ है, आचारज इम भाखे रे ।
ससार तरणिका बड़ी पीली मे जीव है, आगम की है साखो रे ।।१।। माचार केइ भात का, खावण ने घणो रसियो रे । नीलण-फूलण देखे नही, रसेन्द्रिय मे फसियो रे ।।८२॥ जिण मे फूलण शका नही, नही त्रस जीव को घातो रे । तिण मे जीव बतावणा, मानो मिथ्या बातो रे ॥३॥ अनुत्तरोववाई सूत्र मे, ठण्डो पाहार मुनि लेवे रे। रस चलित फूलण सहित, कदापि नही सेवे रे ॥१४॥ "दशवकालिक" ठाणाग मे, अस जीव आठ ठेकाणो रे । "आवश्यक व्रत सातमे" वावीस अभक्ष + वखाणो रे।।५।। ऐसे सातवे व्रत मे दोष अतिचार लगा हो तो देवसी, पक्षी, चौमासी और सवत्सरी सम्बधी तस्स मिच्छामि दुक्कड । . पद्रह कर्मादान अग्नि प्रारम्भ थे किया, चूना का प्राव कराया रे । वन मे झाडी लेय ने, घणा वृक्ष कटाया रे ॥८६॥ कोयला कर्म ते किया, सोनो ने रूपो तपाई रे। शीत निवारण कारणे, सिगडियां सिलगाई रे ॥७॥ गाहा गाडी रथ पालखो, किया में व्यापारो रे। कट बलद भाडे दिया, नही श्रावक माचारो रे ॥८॥ डुगर पत्थर फोडाविया, देवल देव धराया रे । हीरा पना बढाविया, मदिर महल पहाया रे ॥६॥ + इस मापता में मतभेद है-होगी।
आलोयणा १३ . नवीन नारी नर सेज मे, अस्फालन कर्म कमाया रे । धरती मे दारू विछायने, रोज उडाइ दिया रे ॥१०॥ दात चिराई, सीग काटिया, चमरी गाय पूछ लीधा रे । लाख तोडाइ वृक्ष की, व्यापार रस का कीधा रे ॥११॥ सोमल सख थे वणजिया, ते खाया प्राण जावे रे । यन्त्र के इ चलाविया, घणा जीव कष्ट पावे रे ।।१२।। व्यापार गुली का थे क्यिा, रगण पाखा कराया रे । बैल घोडा कुटाविया, निलछण कर्म कीधा रे ॥६३।। दव दिया वन मे घणा, हरिया वृक्ष जलाया रे । धन खाया ताका तणा हिरदे दव लगाया रे ॥१४॥ पाल तालाब फाडाविया, मच्छ कच्छ मर जावे रे । लाभी नर ममझे नही, शालि गेहूँ बुवावे रे ॥१५॥ कुत्ता विल्ली पालने, जीवा की घात करावे र । प्रव्रत तू पोपे यो ही, बात न व्रत की सुहावे रे ॥६६॥ ऐसे पन्द्रह वर्मादान के विषय मे दाप अतिचार लगा हो ता देवमी, पक्खी, चौमासी और सवत्सरी सम्बधी तस्स मिच्छामि दुक्रड। आटम व्रत कोक शास्त्र तू ही पढे, काम क्या तू करतो रे । कदप जागे जिण बात सू नि शमा होय फिरतो रे ॥६॥ तीद्राभिलाषा भाग भोगव्या, प्रायुध हाथ बंधाया रे । रेकारा तूकाग देवतो, अनर्थादण्ट कमाया रे ॥१८॥ चवदे ठिकाणारा जीवकी, ओलखाण नही पाई रे।
ससार-तरणिका . जाण पणा बिन यो ही खाया, मानव भव को ठाणो रे ॥१२०॥ सामायिक पौषा मायने, नेणा नेण जो साध्या रे । नाम लेइ वखाण को, चिकणा कम जो बाध्या रे ॥१२॥ निज हाथे दान देइ ने साधु सुपात्र न पोष्या रे । टग-मग सामो जावता, भक्ति सु न सतोष्या रे ॥१२२॥ भरिया घर मे जनमियो, श्रमणापासक कहायो रे। खाली हाथे जावसी, यो अवसर जो गमायो रे ।।१२३॥ दान देता देखी और ने, मन मलिनता धारी रे। परभव मे इण पाप से, हो दरिद्री अवतारी रे ॥१२४॥ ऐमे चार शिक्षा व्रत मे देवसी, पक्खी, चौमासी, सवत्सरी सम्बधी जो कोई दाप अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छामि - दुक्कड। पच्चास किया क्रिया पच्चीस लगावतो, भेद कहूँ न्यारा न्यारा रे । सदगुरु क प्रसाद से, पागम के अनुसारा रे ॥१२॥ काया क्रिया लागे अग मे, प्रधिकरण मे खड्ग दडो रे । तापना कार सव तपे पाऊसिया क्रोध प्रचडा रे ॥१२६।। पाचमी जीव धान की, छट्ठी छ काय प्रारम्भो रे । परिग्रह धन मेला करे, पाठमी क्पट प्रसगो रे॥१२७॥ मिथ्यात्व उलटा सरदहे, दसमी नही पच्चषाणो रे। दिटठी मे स्त्री पुरुष देख ले, पुटठी माधव सुजानो रे ॥१२॥ पाडुचिया योटो चिन्तवे, चवदमी सामन्त पहावे रे । महत्यिया शस्त्र थी, माठी लोटी से कम उपाये रे ॥१२६॥ .
यालोषणा -.-.- प्राणवणिया गाली देवे, विदारे फल ने पानो रे । अण अयोगी क्यिा लागती, इस लाक विरुद्ध जाणा रे ॥१३०॥ मन वचन काया जोग से, लागे कम यो जाणी रे। नाटक जोता चार मारता, कम बधे समुदाणी रे ॥१३॥ पेज क्रिया लागे स्नेह थी, वैरी देख उपजे द्वेपो रे । इरियावही वेवली सगे, कारण कम पच्चीसो रे ॥१३२॥ ऐसी पच्चीस क्रियाओ के योग से, जो पाप दोष सचित हुए होवे तो त्रिविध विविध कर अनत केवली गुरुदेव और प्रात्मा की साक्षी से वोसिरामि वोसिरामि । 1 वोसिरामि ।।। . . स्त्री-कृत्य आलोयणा कुलटा नारी होय ने, पर पुरुप सेवन कीघा रे। नारी-पुरुप मयोग मेलव्या, गर्भ गाली दीधा रे ॥१३३॥ नीबू के री चीर ने, भरिया माही मसाला रे । गड गूबड हुमा थका, ऊपर वाध्या पाला रे ॥१३४॥ गाली गीत गाया घणा, नाटक बहुत नचाया रे । नित्य शृगार वणावती, ताजा माल कर खाया रे ॥१३॥ पीठी ने उवटण क्यिा, जुल्फा पड्या सवार्या रे। आरोसा मे देखने, मुख पर हाथ फेराया रे ॥ ऐनक तिलक नथ चादला, कर प्रीतम ने रिजाया रे । हास्य विनोद विलास से, विषय फास रचाया रे ॥१३॥ सासु-स्वमुर देवर जठ ने, सुख रत्ती नही दीधा रे । भाई भोजाई माय ने, जुदा-जुदा घर कीधा रे ।।१३।। घर मे बडेरी होय ने, व्याह सगाई करिया रे ।
ससार-तरणिका
बटा वेटी परणाय ने, उपदेश सोवण का दिया रे .१२६॥
बीद बीदणी माय ने, देखिया नजर विकारो रे।
प्रत भग होवे सहा, उँडी दृष्टि विचारो रे ॥१४०।।
केईक डूबी देखने, के ईक मनसा पापो रे ।
केई काया से डूविया, ऐसा समझो प्रापो रे ।।१४१॥
किसबण का भव मे किया, भोगी पुरुष रिझाया रे।
काम कुचेष्टा करी घणी, दाम दे गुज दिखाया र ॥१४२॥
क्षण क्षण में कोध कियो, धन देखी किया अभिमानो रे ।
कपट कियो भरतार से, गेणा को लोभ असमानो रे ॥१४३॥
पाप शोभा परनिंदा करी, करिया पाप अठारो रे ।
घर धन्धो कियो घणो, रिम हासी भव पारो रे ।।१४४।।
समझणी बाई वाजती, साले शृगार बनाया रे ।
झीणी चाल ज्यो चालती, पर पुरुषों ने रिझाया रे ॥१४५।।
डोरा डडा करे घणा, टामण टूमण करती रे ।
निज घर पर टिके नहीं, पर घर नित की फिरती रे ॥१४६॥
साधु साध्वी माय ने, घणो बधायो द्वेषो रे ।
मन मे तूं राजी हुई, प्रागे कोई देशी लेखो रे ॥१४७।।
व्यापार करे बाजार मे, ऊपाडो गख माथो रे ।
घर कारज छोडी करी, धणी करे या बातो रे ।।१४।।
रस्ता माहे बैठी रहे, लाज नहीं नही नाता रे ।
पुरुषा में बैठी रहे. जावे प्राधी राता रे ॥१४६।।
सतियां का नही काम ये, हृदय ममझा बायो रे ।
कोई पुरुष जा देवसी, देसी लक लगाया रे ॥१५०॥
आलोयणा EE M... -.-.-.-....-. इतनी सिखामण मानसी, तब सुधरेला काजो रे । साधु गरजी कहण का, मान्या सु सुख होसी साजो रे ॥१५१॥ पुरुप कृत्य आलोयणा धोत्री तेली तम्बाली थयो, शुद्र वणिक ने राजो रे । ब्राह्मण होय यज्ञ किया, धीवर पारधी अखाजो रे ॥१५२॥ रगारा भव मायने, अनेक भट्टिया चढाई रे। घाची मोची खटिक भवे, लुटाया प्राण हर्षाई रे ॥१५३।। श्रावक नाम धराय ने व्रत बारह नही लीना रे। चवदा नही चितारिया, रात्रि भाजन कीना रे ॥१५४।। प्रश्न कपट से पूछने, ठट्टा मश्करी करतो रे । । भोला साधु ने देखने, मुखे पल्लो दई हसतो रे ॥१५॥ छल-छिद्र देखे धणा, घणी कपट की फांसी रे । अणहोती बाता स्थापने, सीधो दुगति जासी रे ॥१५६।। निंदा कीधी साधु की, अठी-वठी ने लगाया रे। निज तत्त्व जाण्यो नही साधाने खूब लडाया रे ॥१५७।। साधु अज्ञानी जा होत्र, श्रावक मे मिल जावे । श्रावक पक्ष बधे घणो, दोनो की निंदा होवे रे ॥१५॥ ऐसे अज्ञान वश, धावक श्राविका के पद मे स्त्री-पुरुष मिश्रित दुष्कृत्य मन, वचन, काया से, सेवन किये हो अथवा दोप अतिचार लगा हा तो देवसी, पक्खी, चौमासी और सवत्सरी सम्बन्धी जोदाप अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कड । साधु को आलायणा साधु नाम धरायने, हिंसा मे धर्म बताया रे ।
ससार-तरणिका माया कपट किया घणा, धूर्त पणे पुजाया रे ।१५।। पर की प्रशसा देखने, धम मे द्वेष कराया रे। छता अछता औगुण बोलिया, निंदा बहुत कराया रे ॥१६०॥ यत्र मत्र तत्र किया, काल दुकाल बताया रे । गृहस्थ की चिन्ता करी, साधु धम गमाया रे ॥१६॥ ममत्व नजी नही कुटुम्ब की, घणा परिचय राखे रे । मोह कम मे लिपटिया, वे शिव सुख किम चाखे रे ॥१६२।। अणजाणी वस्तु लिवी, मेटी मूत्र की प्राणा रे। राजा गुरु और गृहस्थ का, अदत्त दाप लगाया रे ।।१६३ । चौथा व्रत के मायने, वाई अकेली से बातो रे। मन वचन से डिग गयो, पकड तहनो हाथो रे ॥१६४॥ बाया से प्रीत राखे घणो, पारजा से घणो परचो रे । काम स्नेह अरु दृष्टि का, राग रग मु राच्यो रे ॥१६५॥ पाथो पाना गट्ठा घणा, गृहस्थ के घर धरतो रे । नाम घाली ने माय ने, ममता अधिक करतो रे ।।१६६।। सामान भर ताला दिया, निग्रथ नाम धराया रे । कपट क्रिया घणी केलवे, (फेर) मुक्ति आवणने उमाया रे।१६७१ समकित दूजा साधा तणो, थें तो दूर कराई रे। श्रावक प्राविका माहरा, ममता अधिक बधाई रे॥१६८॥ सम्बध करावे ससार पा, भक्ता को मन मोये रे। सट्टो पट्टो देण लेण को सयम धन यो बारे रे ॥१६॥ चारित्र शुद्ध पाल्यो नही, शरीर का सुख चायो रे। समरित शुद्ध न पालिया, ता में दोप लगाया रे ॥१७॥ .
आलोयणा १०१ , अनाचार बावन मेविया, पाहार असूझतो लीधो रे । उपकरण अधिक राखिया, पडिलेहण नही कीधो रे ॥१७१।। क्रिया पच्चीस लगावतो, ब्रह्मचर्य शुद्ध नाही रे । यति धम दस प्रकार को, लगाया दोप तिण माही रे ॥१७२।। बावीस परिपह ऊपना, स्थिरता ना धरी काई रे । सत्तावन सामाचारी कही, दोप लगाया भाई रे ।।१७३॥ नव कल्प साधु तणा, बारह सभोग विचारी रे । बारह भावना भाई ही, किम होमी भव पारा रे ॥१७४।। चरण करण न पाराधिया वयालीस दोष नही टाल्या रे । जाग सग्रह बत्तीस मे, मन उछरगे चाल्या रे ॥१७॥ दाप सबल एकवीस है, ते तो थे नित्य सेव्या रे । टाली नही गुरु आशातना, असमाधि दोप सेव्या रे ॥१७६।। इर्या समिती देखी नही, भाषा वोले पाल पालो रे । मन वचन जीत्या नही, काया को दोप न टाल्या रे ॥१७७।। दान देता मना किया, शील व्रत भगाया रे । तपस्या कदी करी नही, भाव अशुद्ध हिये लाया रे ॥१७॥ इतनी बाता छोडमी, तब सुधरमी काजो रे । शुद्ध करणी प्ररूपणा, करो मुक्ति को साजो रे ॥१७६।। और जजाल छोडी करी, भावना बारे भावो रे । उज्ज्वल मन तुम राख जो, अमरापुर मे जावा रे ॥१०॥ इत्यादिक मुनि क्रिया के विषय देवसी, पक्खी चौमासी, सवत्सरी मम्बधी जो कोई दाप अतिचार लगा हो तो तस्स मिच्छामि दुक्कड। - १०२ ससार-तरणिका M द्वादश भावना - अनित्य भावना नित्य नही, काल पाया नहीं शरणो रे । चारो गति छ काय मे, अनत काल हुयो फिरणो रे ॥१८॥ एकत्व एकलो आवियो, शरीर कम से भिन्नो रे । शरीर औदारिक अपावनो, सव जीव को चिनो रे॥१२॥ माधव, सवर, निजरा, लोक मे, वहुविध भटक्यो रे । समकित शुद्ध न आराधियो, धम विना यो अटक्यो रे ॥१८३॥ ऐसी आलायणा प्ररूपणा, नित्य नित्य करजो भावे रे । शुद्ध माग प्ररूपणा, उत्तम ने सुहावे रे ॥१८४॥ सम्वत् उगणीसे छत्तीस का, धूलिया शहर मझारो रे । कृष्ण गुरु प्रसाद से, प्रेमराज मगलाचारो रे ॥१८॥ पात्म दाप अनक छ, अहो ! प्रभु आप स्वीकारो रे । अवगुणी पर गुण करो, श्री जिन मुझ ने तारो रे ॥१८६॥ ऐसे शुद्ध भावो से प्रात्मकृत दाप-पापो की आलोचना करगे, करायेग, वे जिने द्र महाप्रभु की प्राज्ञा के प्राराधक हो, उभय लोक मे सुख शाति का अनुभव करेगे। मोह कम के बधन का ताड केवलज्ञान प्राप्त करके, वे यशस्यो मोक्षगामी प्रात्माएँ अचल, अविनाशी, नित्य, शाश्वत निराबाध सुखो मे लीन बनेगी। ॐ शाति । शाति ।। शाति ।।। .
मृत्यु महोत्सव - सद्धर्मपथ्यपाथेय, यस्स्वादाय प्रतीक्षते । मरण तस्य तत्प्राप्ती, न भी क्तुि महोत्सव ॥१॥ धर्मरूपी धन से धनवान् बना हुआ आत्मा, धर्म की उत्तम पाराधना पूवक, परलोक के लिए उत्तम पाथेय (माता) लेकर जो मृत्यु को प्रतीक्षा कर रहा है, उसे मृत्यु से कुछ भी भय नहीं है । उसके लिए मृत्यु महोत्सव रूप है । ज्ञानदर्शनचारित्र-तपोल्पापनाशिनी । पाराधना चतु स्कधा, यस्य स्यात्तस्य किं मृतम् ॥२॥ -जिस भव्यात्मा ने पाप को नष्ट करनेवाली और ज्ञान, दशन, चारित्र और तपस्प चार स्तभो वानी, ऐसी शुभ पाराधना की है, उसके लिए मृत्यु क्या चीज है ? वास्तव म वह जीवित एव अमर है। आनन्दोत्पादका स्तेऽत्र,भगवन्तो मुनीश्वरा । ये क्षालयित्वा पापौघ, मृता, पडितमृत्युना ॥३॥ -जो मुनीश्वर भगवत, पाप समूह का नष्ट करके पडित भरण को प्राप्त हुए हैं, वे वास्तव में मानन्दप्रद हैं। उन महात्माओ का पडितमरण, महोत्सव रूप है ।
अंतिम साधना पडित-मरण को स्वीकार करनेवालो भव्यात्मा,महन्त भग- वान् और गुरु साक्षी से अपने दुष्कृत्यो का प्रतिक्रमण करती हुई पापा को प्रात्मा से पृथक् करती है । वह उल्लास पूर्वक कहती है कि,- इच्छामि भते । उत्तमटठ पडिक्कमामि अईय पडिक्कमामि अणागय पडिक्कमामि पच्चप्पन्न पडिक्क- मामि, कय पडिक्कमामि, कारिय पडिक्कमामि अणुमोइय पडिक्कमामि मिच्छत्त पडिक्कमामि असजम पडिषक- मामि कसाय पडिक्कमामि पावप्पओग पडिक्कमामि। हे भगवन उत्तम प्रथ (प्रात्म पाविश्य) के लिए मैं पूव के किये हुए सभी पापो से पृथक होता हूँ। भूतकाल मे मुझ से बने हुए पापो की निदा द्वारा प्रतिक्रमण करता हूँ, प्रत्याख्यान करक भविष्य के पापा से निवृत्त होता है और सवर युक्त हाकर वत्तमान काल के पापो से पीछे हटता हूँ। मैने अपने जीवन मे जो जो पाप स्वय किये, दूसरो से करवाय और पाप कृत्यो को प्रमोदना की, उन सब से पृथक होता हूँ। मैं मिथ्यान्द से पीछे हटता हूँ, असयम से प्रतिक्रमण करता हूँ, कपाय से पृथक होता हूँ और सभी प्रकार के पापमय प्रयाग से पृथक हाता हूँ। मिच्छादसणपरिणामेसु वा इहलोगेसु या परलोगेसु वा सच्चित्तेसु या अच्चित्तेसु वा पचमु इदियत्येसु वा ।
मत्य महोत्सव-अतिम साधना -.. .. मैने मिथ्यादशन के परिणाम से इहलोक और परलोक के विषय मे, सचित्त अचित्त पदार्थो के विषय में और पांच इन्द्रियो के शब्दादि विषयो के विषय मे, किमी भी निमित्त से, सुप्तावस्था में या जाग्रत अवस्था मे, किसी भी प्रकार के दुष्कृत्य का चिन्तन किया हो, ता मैं उस अधम कृत्य का प्रतिक्रमण करता हूं। मेरे वे सभी दुप्कृत मिथ्या होवे। अन्नाणझाणे प्रणायारहाणे, कुदंसणझाणे कोह- माणे माणझाणे मायज्ञाणे लोमझाणे रागझाणे दोसझाणे मोहझाणे इच्छझाणे मिच्छझाणे मुच्छझाणे, सकझाणे कखझाणे हिंझाणे आसझाणे तण्हझाणे छुहझाणे पथझाणे पथाणझाणे निद्दझाणे नियाणझाणे नेहसाणे कामझाणे कलसझाणे कलहझाणे जुज्झझाणे निजुज्झझाणे, सग- झाणे सगहझाणे बवहारहाणे कयविक्कयझाणे अणत्य- दडझाणे प्राभोगझाणे अणाभोगदाणे प्रणाइल्लझाणे वेरझाणे वियक्कझाणे हिंसझाणे हासझाणे पहासझाणे पोसझाणे फहसझाणे भयझाणे रुवझाणे अप्पपससझाणे परनिदझाणे परगरिहझाणे परिग्गहझाणे परपरिवायझाणे परदूमणझाणे आरमझाणे सरमझाणे पावाणुमोयणझाणे प्रहिगरणझाणे असमाहिमरणशाणे, कम्मोदयपच्चयंझाणे इडिगारवझाणे रसगारवझाणे सायागारवझाणे अवेरमण- शाणे अमुत्तिमरणशाणे पसुत्तस्स वा पडिबुद्धस्स वा ससारन्तरणिका - जो मे कोई देवसिओ राइओ उत्तमठे अइक्कमो वइ- क्कमो अईयारो अणायारो तस्स मिच्छा मि दुक्कड । ज्ञान पर उपेक्षा-अरुचि एव विपरीत भाव हाकर अज्ञान मे रुचि की हो, प्रज्ञान मे लीन हुआ होऊँ, अनाचार मे आसक्न बना हाऊँ, कुदर्शन में रुचि रखो, कोध मे रत, मान मे मत्त, माया मे लीन और लोभ मे गृद्ध बना हूँ, राग मे मस्त, द्वेष मे जलन तथा-मोह, इच्छा, मिथ्या, मूर्छा, शका, काक्षा, आदि के विकल्पो मे तल्लीनता रखी हो, घर कुटुम्ब आदि मे, आशा, तृपा, क्षुधा, माग के कष्ट, कठिन माग के कष्ट आदि का चितन किया, निद्रा मे अशुभ चिंतन किया, निदान किया, स्नेह, कामा- भिलाप कलुपितता पूण विचारो मे, कलह, युद्ध, महायुद्ध, स्नीसग, सग्रह, लोकव्यवहार, क्रयविक्रय एव अनथ दड विषयक मनोरथ किय हो। अशुभ उपयोग मे अथवा प्रनाभोग से कुविकल्प किये हो, कजदारी दशा मे, वैरभाव मे, वितक कुतक चिन्तन मे, हिंसक विधारो मे, हास्य विकल्प मे, प्रहाम्य-विशप रूप को हँसी के परिणाम मे, रोपपूण विचारो मे, कठोरता पूर्ण हृदय स,भयसज्ञा मे,सुदर रूप पर मोहित हार स्वात्म प्रशसा के भावा मे मगन होकर, दूसरो की निदा के विचारो मे, दूसरो की गर्दा के चिंतन में, परिग्रह सज्ञा में, दूसरो की गई करने के विचारो मे, दूसरो के दूपणो के चिंतन मे, प्रारम्भयुक्त मन से, सरम युक्त विकल म, पाप की अनुमोदना के चितन मे, शस्त सग्रहादि विचारमे, प्रसमाधि मरण-गाल मरण के विचारी में, उग्र पाप यम के उदय से, मप्रशस्त पिता दाग, अदि के गव मुक्त मानस . - .
मृत्यु महोत्सव-अतिम साधना १०७ ++ree...... ..-.-.4 - से, रस और सुख सामग्री के गव से उन्मत्त हृदय हुअा हूँ, अविरति मे रति लाया हू और काम भोग की लालसा युक्त मरण का अभिलापी हुप्रा हूँ। इस प्रकार उपरोक्त ६३ प्रकार के अशुभ ध्यान-पापमय भावो मे लीन बने हुए मैने सोते हुए, या जागते हुए, दिन में अथवा रात्रि मे, उत्तम अथ में अतिक्रम, व्यतिक्रम, अतिचार या अनाचार रूप दुष्कृत्य का प्राचरण किया हो, ता मेरा समस्त पाप मिथ्या (निप्फल) हो जाओ। एस करेमि पणाम, जिणवरवसहस्स बद्धमाणस्स । सेसाण च जिणाण, सगणहराण च सव्वेसि ॥१॥ -सामान्य केवलज्ञानियो मे वृषभ के समान जिनेश्वर श्री बद्धमान स्वामी को तथा सामान्य केवलज्ञानी और गणधर महाराज, इन सब को नमस्कार करता हुआ मैं सागारी अनशन करता हूँ। सव्व पाणारभ पच्चक्सामित्ति अलियवयण च । सबमदिन्नादाण, मेहुण्णपरिग्गह चेव ॥२॥ -सभी प्रकार की जीव हिंसा, झूठ, अदत्तादान, मैथुन और परिग्रह का मैं सवथा त्याग करता हूँ । सम्म मे सवभूएसु, वेर मज्झ न केणई । प्रासाओ ओसिरित्ताण समाहिमणुपालए ॥३॥ -सभी जीवो के प्रति मेरा समभाव (मंत्री भाव) है । किसी के प्रति मुझे वैर नहीं है । मैं कुटुम्ब, परिवार, धन, सम्पत्ति आदि तथा शरीर सम्बन्धी सभी प्रकार की प्राशा प्रभिलापा और १०५ ससार तरणिका 7 कदा इच्छा का सवथा प्रकार से त्याग करके समाधिभाव को स्वीकार करता हूँ। सव्व चाहारविहिं सन्नाओ गारवे कसाए च । सव्व चेव ममत्त चएमि सव्व खमावेमि ॥४॥ -प्रशनादि पाहार और आहारादि सज्ञा, तीन प्रकार के गारव (गव) चार कपाय और सभी प्रकार के ममत्व का सवथा त्याग करके मैं समस्त जीवो से क्षमा चाहता हूँ। हुज्जा इममि समए उवक्कमो जीवियस्स जइ मज्झा। एय पच्चक्खाण बिउला आराहणा होउमे ॥५॥ -वर्तमान मे जीवो का प्रायुष्य सोपक्रम है, न जाने किस समय और किस निमित्त से आयुष्य का क्षय हो जाय चित इस समय मेरा जीवन समाप्त हो जाय, तो मुझे समस्त पापो और समस्त प्रविरति तथा कपाय भावादि का त्याग होको और मुझ ज्ञान, दशन और चारित्र रूप रत्नत्रयी की विपुल माराधना होओ। सम्वदुषखपहीणाण, सिद्धाण अरहो नमो। सद्दहे जिणपन्नत्त, पच्चमामि य पायग ।।६।। -जन्म मरण, कर्म, कपायरूप समस्त दुयो को सवथा नष्ट करनेवाले सिद्ध भगवतो को और परिहत देवी का मैं नमस्कार करता हूँ। मैं जिनेश्वर प्रणीत धम की श्रद्धा करता हू और समस्त पापो वा प्रत्याख्यान करता हूँ। नमत्य धुयपावाण, सिद्धाण घ महेसि । सयार पटियज्जामि, नहा केलिदेसिय ।।७।।
मत्यु महोत्सव-अतिम साधना १०६ -पाप कर्मों को सदा के लिए एव सर्वथा नष्ट करनेवाले सिद्ध भगवान् तथा महपिंगण को नमस्कार करके मैं केवलज्ञानी भगवान द्वारा उपदिष्ट सथारे को स्वीकार करता हूँ। ज किंचिवि दुच्चरिय, त सत्व वोसिरामि तिविहेण । सामाइय च तिविह, करेमि सब निरागार ॥८॥ -मैने इस भव मे या परभव मे जो कुछ भी दुराचरण किया हो, उस सब का मन, वचन और काया के त्रियोग से मैं त्याग करता हूँ और सम्यक्त्व, श्रुत और सव विरति-ऐमे तीन प्रकार के सामायिक का बिना किसी प्रागार के स्वीकार करता हूँ। बज्झा अमितर उहि, सरीराइ सभोयण । मणसा वयकाएहि, सव्वभावेण वोमिरे ।।६।। बाह्य और ग्राभ्यतर उपधि, तथा भोजनादि सहित शरीरादि को मैं मन, वचन और काया के समस्त भाव से वोसि- राता (त्यागता) हूँ। सब्व पाणारभ पच्चक्खामित्ति अलिययण च । सबमदिन्नादाण मेहुण्णपरिग्गह चेव ॥१०॥ मैं पुन सभी प्रकार के प्राणारम्भ (हिंसा) झूठ, प्रदत्तादान, मैथुन और परिग्रह का त्याग करता हूं। सम्म मे सव्वभूएसु वेर मज्श न केणई। प्रासाउ ओसरित्ताण समाहिमणुपालए ॥११|| -सभी जीवो के प्रति मेरा मित्रभाव है किसी के प्रति भी ससार-सरणिका मेरे वैरभाव नही है । मैं सभी प्रकार की प्राशा, अभिलाषा का त्याग करता हुमा समाधिभाव का पालन करता हूँ। राग बध पओस च, हरिस दीणभावय । उस्सुगत्त भय सोग, रइ अरइ च वोसिरे॥१२॥ -राग, द्वेष, हर्प, दीनता, उत्सुकता, भय, शोक, रति, परति, कम ब ध के इन सभी निमितो को मैं वोसिराता(छोडता हूँ। ममत्त परिवज्जामि, निम्ममत्त उर्वाट्टओ। आलबण च मे आया, अवसेस च वोसिरे ॥१३॥ ममत्व का त्याग करता हुमा में निर्ममत्व भाव मे सावधान होता हूँ । समस्त वधनो मे मुक्त हाने वाले ऐसे मेरे प्रात्मा का ही अवलम्बन करके शेष सभी सम्बधो को छोडता हूँ। प्राया हु मह नाणे, पाया मे दसणे चरित्ते य । आया पच्चखाणे, पाया मे सजमे जोगे ॥१४॥ -मेरा प्रारमा स्वय ज्ञान रूप है, प्रात्मा ही दर्शनरूप है। प्रात्मा ही चारित हप है, प्रात्मा स्वय प्रत्याख्यान रूप है और मात्या स्त्रय सयम योग से युक्त है । अर्थात् मेरा मात्मा ही गव कुछ है । मेरा मात्मा अपने पाप समथ अवलबन है। मुझे प्रन्य प्रवलवन यो प्रावश्यक्ता ही क्या है ?-कुछ भी नहीं। एगी वच्च जीयो, एगो चेवयवज्जई । एगरस चेव मरण, एगो सिनशाइ नौरो॥१५॥ -पारमा प्रोता जाता है, प्रदेला जम लेता है, भपेला हो मरता है और मुक्त भो भयेला ही होता है ।
मृत्यु महोत्सव-आत्म समर्पण एगो मे सासओ अप्पा, नाणदसणसजुओ । सेसा मे बाहिग भावा, सव्वे सजोगलक्खणा ।१६। -ज्ञान और दशन गुणवाला मेरा प्रात्मा शाश्वत है । इसके सिवाय अन्य सभी बाह्य पदार्थ सयोग जन्य है और विनश्वर हैं। सजोगमूला जीवेण, पत्ता दुक्खपरपरा । तम्हा सजोगसबध, सबभावेण वोसिरे ॥१७॥ -दुख परम्परा का मूल कारण ही सयोग है। पौद्गलिफ सयोग के कारण ही प्रात्मा अनादि से दुख भोग रहा है। अब मैं इस सयोग सम्बध का सवथा त्याग करता हूँ। (माउरपच्चक्खाण पइण्णा मे स) आत्म समर्पण - ज्ञानदर्शनचारित्र-वीर्याराधनतत्पर । एक एवाऽन्तरात्मा मे, व्युत्सृप्टमधुनाऽपरम् ॥१॥ -श्री जिनेश्वर कथित ज्ञान, दर्शन, चारित्र और वीर्य की पाराधना मे तत्पर ऐसा मेरा अन्तरात्मा एक-अकेला ही है। इसके सिवाय अन्य सभी का मैने त्याग कर दिया है।
ससार तरणिका । रागद्वेषमहामोह-कषायमलधूनक । विशुद्ध साप्रत वर्ते, स्नातकोऽह समाहित ॥२॥ -राग द्वेष, महामोह एव कपायरूप मल को धोकर में निमल बना हूँ, अतएव इस समय में स्नातक * हो गया हूँ। क्षाम्यन्तु सर्वसत्त्वा मे, क्षान्ति में सर्वजन्तुषु । निर्वर साप्रत शान्त , क्षेत्रज्ञो मम वतर्ते ॥३॥ -समस्त जीव मुझे क्षमा प्रदान करे। मैं सभी जीवो से क्षमा चाहता हूँ । इम समम मेरा प्रात्मा शान्त है । मुझे किसी के साथ वैर विरोध नही है। यदन्तर्यायिन किचिद, बहिर्भूत पुरा मया । गृहीत स्वीयबुद्धया तद्-व्युत्सृष्टमधुनाऽखिलम् ।४। -जो वस्तुएँ चैत य स्वरूप ऐसे मेरे आत्मा से कभी भी सम्बध नही रख सकती, ऐसी पर वस्तुओ को में अब तक अपनी मान रहा था, उन सभी पौद्गलिक-पर वस्तुओ को मैं वोसि- राता हूँ। तीर्थश्वरा महात्मान , सिद्धा निधूतकल्मषा । सद्धर्म साधवश्चेति, भवन्तु मम मगलम् ।।५।। तीश्वर-तीथनाय महात्मा, पाप मल से सवपा रहित -स्नातक का अयं पसनानी' होता है । यहाँ यह अप नहीं सेना । मिस प्रकार स्नान रके मनुष्य पवित्र होता है, उसी प्रकार मन्तो पपी मत करो घोर पवित्र मनी हुई मारमा भी स्नातक पहलाती है। उसरे भाषों में से पाप र पुरा। - मत्य महोत्सव-आत्म समर्पण सिद्ध भगवतो, साधु साध्वियों तथा जिनेश्वर प्रणीत धम मेरे लिए मगल रुप बनो। एतावानेवोत्तमत्वेन, गृह णामि भुवनेऽप्यहम् । एतानेव प्रपद्येह, शरण भव भीरुक ॥६॥ ये चार वस्तुएँ ही विश्व मे श्रेष्ठतम हैं और ये चार तत्व ही शरण के स्थान है। मैं भवभ्रमण से भयभीत बना हुआ, इन चारो का शरण स्वीकार करता हूँ। निवृत्तसर्वकामोऽह, मनोजालनिरोधक । बन्धु समस्तभूताना, सूनुवत्सर्वयोपिताम् ॥७॥ -मैं सभी प्रकार की कामना, अभिलाषा एव लालसा से निवृत्त हो गया हूँ। मैने मन से दुष्ट विकल्पो को सर्वथा रोक दिये हैं । लाक के समस्त जीवो को मैं अपने वन्धु मानता हूँ और सभी स्त्रियां मेरी माता के समान हैं, मैं उनका पुत्र हूँ। स्थित सामायिके शुद्धे, सर्वयोगनिरोधिनी । व्युत्सृप्टचेष्ट मा सिद्धाः, पश्यन्तु परमेष्ठिन ॥८॥ -सभी प्रकार के योगो का निरोध करनेवाली ऐसी शुद्ध सामायिक मे में स्थिर हुआ हूँ । सभी प्रकार की चेप्टाओ को छोड देनेवाली एसी मेरी प्रात्मा को हे सिद्ध भगवन् कृपा दृष्टि से देखें। यच्च दुश्चरित किचिदिहान्यत्र च मे भवेत् । सजात जातसवेग-स्तन्निन्दामि पुन पुन ॥६ ~मने इस भव मे, या परभव मे, दुष्कृत्य का किञ्चित् भी । प्राप ससार तरणिका रागद्वेषमहामोह-कपायमलधूनक । विशुद्ध साप्रत धर्ते, स्नातकोऽह समाहित ॥२॥ -राग द्वेष, महामोह एव कपायरूप मल को धोकर मैं निमल बना हूँ, अतएव इस समय मैं स्नातक * हो गया हूँ। क्षाम्यन्तु सर्वसत्त्वा मे, क्षान्ति में सर्वजन्तुष। निर साप्रत शान्त , क्षेत्रज्ञो मम वतते ॥३॥ --समस्त जीव मुझे क्षमा प्रदान करे। मैं सभी जीवो से क्षमा चाहता हूँ। इस समय मेरा अात्मा शात है । मुझे किसी के साथ वैर विरोध नहीं है । यदन्तर्यायिन किंचिद्, बहिर्भूत पुरा मया । गृहीत स्वीयबुद्धया तद्-व्युत्सृष्टमधुनाऽखिलम् ।४। -जो वस्तुएँ चैतन्य स्वरूप ऐसे मेरे प्रात्मा से कभी भी सम्बध नही रख सकती, ऐसी पर वस्तुओ को मैं अब तक अपनी मान रहा था उन सभी पौद्गलिक-पर वस्तुओ को मैं वोसि- राता हूँ। तोश्वरा महात्मान , सिद्धा निघृतकल्मषा। सद्धम साधवश्चेति, भवन्तु मम मगलम् ॥५॥ तीश्वर--तीथनाथ महात्मा, पाप मल से सर्वया रहित नाता त अप यलमानी' होता है । यहाँ यह भय नहीं मेना । मिस प्रसार स्नान से माष्य पवित्र होता है, उसी प्रकार मन्त परण से पापगे मस रो घोर पवित्र मनी हई भारमा भो स्नातक रहमाती है। उगर मार्यों में से पाप १४ धुरा है। - मत्य महोत्सव-आत्म समपण -- सिद्ध भगवतो, साधु साध्वियों तथा जिनेश्वर प्रणीत धम मेरे लिए मगल स्प वनो। एतावानेवोत्तमत्वेन, गृह णामि भुवनेऽप्यहम् । एतानेव प्रपद्येह, शरण भव भीरुक ॥६|| ये चार वस्तुएँ ही विश्व मे श्रेष्ठतम हैं और ये चार तत्त्व ही शरण के स्थान है । मैं भवभ्रमण से भयभीत बना हुआ, इन चारा का शरण स्वीकार करता हूँ। निवृत्तसर्वकामोऽह, मनोजालनिरोधक । बन्धु समस्तभूताना, सूनुवत्सवयोषिताम् ॥७॥ -मैं सभी प्रकार की कामना, अभिलाषा एव लालसा से निवृत्त हा गया हूँ । मैने मन से दुष्ट विकल्पो को सवथा रोक दिये हैं । लाक के समस्त जीवो को मैं अपने वधु मानता हूँ और सभी स्त्रियां मेरी माता के समान हैं, मैं उनका पुत्र हूँ। स्थित सामायिके शुद्धे, सर्वयोगनिरोधिनी । व्युत्सृष्टचेप्ट मा सिद्धा', पश्यन्तु परमेष्ठिन ॥८॥ -सभी प्रकार के योगो का निरोध करनेवाली ऐसी शुद्ध सामायिक मे में स्थिर हुअा हूँ। सभी प्रकार की चेष्टामओ को छोड देनेवाली ऐसी मेरी आत्मा को हे सिद्ध भगवन् - प्राप कृपा दष्टि से देखें। यच्च दुश्चरित किचिदिहान्यत्र च मे भवेत् । सजात जातसवेग-स्तन्निन्दामि पुन पुन En -मने इस भव मे, या परभव मे, दुष्कृत्य का किञ्चित् भो - ससार-तरणिका M यो क्लेश हिये धार मरण कर, चारो गति भरमायो। सम्यग दर्शन ज्ञान चरण ये, हृदय मे नही लायो ॥१२॥ प्रब या अरज करू प्रभु सुनिये, मरण समय ये मागू। रोग जनित पीडा नही हाने, अरु कपाय मत जागो ॥१३॥ ये मुझ मरण समय दु ख दाता, इन हर साता कीजै । जो समाधियुक्त मरण होय मुझ, अरु मिथ्या मद छीज ॥१४॥ यह तन सात कुधातु मइ है, देखत ही घिन आवे । चम लपेटी ऊपर सोहे, भीतर विप्टा पाले ।।१५।। प्रति दुर्गन्ध अपावन सो यह, मूरख प्रीति बढावे । देह विनाशी जीय अविनाशी, नित्य स्वरूप कहावे ॥१६॥ यह तन जीण कुटी सम आतम, याते प्रीति न कीजे । नूतन महल मिले जव भाई, तब याम क्यो छीजे ॥१७॥ मृत्यु हाने से हानि कौन है याका भय मत लावो। समता से जो देह तजोगे, ता शुभ तन तुम पावो ॥१८॥ मृत्यु मित्र उपकारी तेरा, इस अवसर के माही । जीरण तन ले देत नयो यह, या सम काहू नाही ॥१६॥ या सेती इस मत्यु समय पर, उत्सव प्रति ही कीजै । क्लेश भाव का त्याग मयाने, समता भाव धरीजै ॥२०॥ जा तुम पूरव पुण्य क्यि हैं, तिनका फल सुखदाई । मृत्य मित्र विन वोन दिखावे, स्वग सम्पदा भाई ॥२१॥ राग राप को त्याग सयाने, मात व्यसन दुखाई। मत समय में ममता धारो, पर भव पथ सहाई ॥२२।। बम महादुष्ट वरी मेरो, या सेती दुम पाव ।
समाधि मरण मापा पाठ
तन पिंजर में बध कियो, या सो कौन छुडावे ।।२३।।
भूख तृष्णा आदि दुप अनेक, इस ही तन मे गाढे ।
मृत्युराज अब दया कर, तन पीजर से काढे ॥२४॥
नाना वस्त्राभूपण मैंने, इस तन को पहराये ।
गध सुगधित लगाये, पटरस अशन कराये ।।२।।
एता दिनो मैं दास होयकर, सेव करी तन केरी ।
सा तन मेरे काम न पायो, भूल रह्यो निधि मेरी ॥२६॥
मृत्युराय को शरण पायकर, तन नूतन ऐसो पाऊ ।
जामैं सम्यक् रतन तीन लही, पाठो कर्म खपाऊ ॥२७।।
देखो तन सम और कृतघ्नी नही सुण्या जग माही ।
मृत्यु समय मे ये ही परिजन, सब ही है दु खदाई ॥२८॥
यह सब मोह बढावन हारे, जिय को दुगति दाता ।
इनसे ममत निवारो जियरो, जो चाहा सुख शाता ॥२६॥
मत्यु कल्पद्रुम पाप सयाने, मागो इच्छा जती ।
समताधर कर मृत्यु करो तो, पावा सपत्ति तेती ॥३०॥
यो आराधन सहित प्राण तज, तो या पदवी पावै ।
हरि प्रतिहरि चक्री तीर्थेश्वर, स्वग मुक्ति मे जावे ॥३१॥
मृत्यु कल्पद्रुम सम नही दाता, तीनो लोक मझारे ।
ताको पाय क्लेश करो मत, जन्म जवाहर हारे ॥३२॥
इस तन मे क्या राचे जियरा, दिन दिन जीण होवे ।
तेज कान्ति बल नित्य घटत है, या सम अथिर सु को है ॥३३॥
पाचो इन्द्रिय शिथिल भइ अब, श्वास शुद्ध नही आवे ।
ता पर भी ममता नही छोडे, ममता उर नही लावे ॥३४॥
ससार-तरणिका . . यो क्लेश हिणे धार मरण कर, चारो गति भरमायो। सम्यग दशन ज्ञान चरण ये, हृदय मे नही लायो ॥१२॥ अव या अरज करू प्रभु सुनिये, मरण समय ये मागू । रोग जनित पीडा नही होय, अरु कपाय मत जागो ॥१३॥ ये मुझ मरण समय दु ख दाता, इन हर साता कीजै । जो समाधियुक्त मरण होय मुझ, अरु मिथ्या मद छीजे ॥१४॥ यह तन सात कुधातु मइ है, देखत ही घिन आवे । चम लपेटी पर सोहे, भीतर विष्टा पाले ॥१५॥ अति दुगध अपावन सो यह, मूरख प्रीति बढावे । देह विनाशी जीय अविनाशी, नित्य स्वरूप कहावे ॥१६॥ यह तन जीण कुटी सम आतम, याते प्रीति न कोजे । नूतन महल मिले जब भाई, तब यामे क्यो छीजे ॥१७॥ मृत्यु हाने से हानि कौन है याका भय मत लावो। समता से जो देह तजोगे, तो शुभ तन तुम पावो ॥१८॥ मृत्यु मित्र उपकारी तेरा, इस अवसर के माही । जीरण तन ले देत नया यह, या सम काहू नाही ॥१६॥ या सेतो इस मृत्यु समय पर, उत्सव प्रति ही कोज । क्लेश भाव का त्याग सयाने, समता भाव धरीजै ॥२०॥ जा तुम पूरव पुण्य क्यि हैं, तिनका फल सुखदाई । मृत्यु मित्र बिन कौन दिखाव, स्वग सम्पदा भाई ॥२१॥ राग राप को त्याग मयान, मात व्यसन दुखदाई । मन ममय में ममता धारी पर भय पथ सहाई ॥२२॥ चम महादुष्ट वरी मेरा, या सेतो दुध पावे ।
समाधि-मरण मापा पाठ
"-.-.-..-
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तन पिंजर में बध कियो, या सो कौन छुडावे ॥२३॥
भूख तृष्णा आदि दु ख अनेक, इस ही तन में गाढे ।
मृत्युराज अब दया कर, तन पीजर से काढे ॥२४॥
नाना वस्त्राभूपण मैंने, इस तन को पहराये ।
गध सुगधित लगाये, पटरस अशन कराय ॥२५॥
एता दिनो मैं दास होयकर, सेव करी तन केरी ।
सा तन मेरे काम न प्रायो, भूल रह्यो निधि मेरी ॥२६॥
मृत्युगय को शरण पायकर, तन नूतन ऐसो पाऊ ।
जामै सम्यक् रतन तीन लही, पाठो कर्म खपाऊ ॥२७॥
देखो तन सम और कृतघ्नी नही सुण्या जग माही।
मृत्यु समय मे ये ही परिजन, सब ही है दुखदाई ॥२८॥
यह सब मोह वढावन हारे, जिय को दुगति दाता ।
इनसे ममत निवारो जियरो, जो चाहो सुख शाता ॥२६॥
मत्यु कल्पद्रुम पाप सयाने, मागो इच्छा जेती।
समताधर कर मृत्यु करो तो, पावा सपत्ति तेती ।।३०।।
यो अाराधन सहित प्राण तज, तो या पदवी पाव ।
हरि प्रतिहरि चक्री तीर्थेश्वर, स्वग मुक्ति मे जावे ॥३१॥
मृत्यु कल्पद्रुम सम नही दाता, तीनो लोक मझारे ।
ताको पाय क्लेश करो मत, जन्म जवाहर हारे ॥३२॥
इस तन मे क्या राचे जियरा, दिन दिन जीण होवे ।
तेज कान्ति बल नित्य घटत है, या सम अथिर सु को है ॥३३॥
पाचो इन्द्रिय शिथिल भइ अब, श्वास शुद्ध नही आवे ।
ता पर भी ममता नही छोडे, ममता उर नही लावे ॥३४॥
ससार-तरणिका आचरण किया हो, उन सब की मैं सवेग भाव से भावित हाकर बारबार निन्दा करता हूँ। सर्वोपाधिविशुद्धोऽह, ममेयमधुना मति । साक्षात्केवलिनस्तत्त्व, भगवन्तो विजानते ॥१०॥ -सभी प्रकार का परिग्रह त्याग कर मैं विशुद्ध बन गया हूँ । इस समय मेरी मनोवृत्ति निष्पाप है । मेरी इम विशुद्ध परिणति को केवलज्ञानी भगवत साक्षात् जानते हैं । भवप्रपञ्चनविरतो, मोक्षकगतचेतसा । समपितो मयाऽन्मेष, जिनाना जन्मनाशिनाम् ॥११॥ -एक मात्र मोक्ष की इच्छा से ही मैं ससार के सभी सम्बधो से पृथक हुआ हूँ और ज म मरण रूप महादु ख का नाश करनेवाले ऐसे जिनेश्वर देव के शरण मे मैने अपनी प्रात्मा को समर्पित कर दिया है। तत एव महात्मान , सद्भावापितचेतस । स्वशक्त्याशेषकर्माश च्छेद कुवन्तु मेऽधुना ||१२|| -प्रतएव ये परम कृपालु महात्मागण, सद्भाव पूर्वक समर्पित ऐसी मेरी प्रात्मा के समस्त कर्मों का पानी शक्ति से प्रभी नष्ट कर दें। .
समाधिमरण भाषा पाठ -- . - वदू श्री अरिहत परम गुरु, जो मव का सुखदाई । इस जग मे दुख जो मैं भुगते, सो तुम जानो राई ॥वद्॥१॥ अब मैं अरज करू प्रभु तुमसे, कर समाधि उर माही । अन्त ममय मे यह वर मागू, सो दोजे जगराई ॥वदू॥२॥ भव भव मे तन धार नये मैं, भव भव शुभ सग पायो । भव भव मे नृप ऋद्धि लई मैं, मात पिता सुत थायो ॥३॥ भव भव मे तन पुरुष तणो, मैं नारी हू तन लीनो। भव भव मे मैं भयो नपुसक, प्रातम गुण नही चीनो ॥४॥ भव भव मे मैं मुग्-पद पाई ताके सुख अति भोगे। भव भव मे मैं गति नरक धर, दुख पायो विधि योगे ॥५॥ भव भव मे में तियञ्च योनि धर, पायो दुख अति भारी। भव भव में मै साधर्मी जन को सग मिल्यो हितकारी ॥६॥ भव भव मे जिन पूजन कीनी, दान सुपात्र ही दीनो । भव भव में मैं ममवशरण मे, देख्यो जिन गुण भीनो ॥७॥ ऐती वस्तु मिली भव भव मे, सम्यक् गुण नही पायो । न समाधियुक्त मरण कियो मैं, ताते जग भरमायो॥८॥ काल अनादि भयो जग भ्रमते, सदा कुमरण ही कोनो । एकबार हू सम्यक्त्व युक्त मैं निज प्रातम नही चीनो ॥६॥ जो निज परको ज्ञान होय तो, मरण समय दु ख काई । देह विनाशी मैं अविनाशी, ज्योति स्वरूप सदा ही। १०॥ विषय पायन के वश होकर, देह आपनो जायो। कर मिथ्या श्रद्धान हिये विच, मातम नही पिछान्यो ॥११॥ .
ससार-तरणिका w यो क्लेश हिये धार मरण कर, चारो गति भरमायो । सम्यग् दर्शन ज्ञान चरण ये, हृदय में नहीं लायो ॥१२॥ अब या अरज करू प्रभु सुनिये, मरण समय ये मागू । रोग जनित पीडा नही हान, अरु कपाय मत जागो ॥१३॥ ये मुझ मरण समय दु ख दाता, इन हर साता कीजै । जो समाधियुक्त मरण हाय मुझ, अरु मिथ्या मद छीज ॥१४॥ यह तन सात कुधातु मइ है, देखत ही घिन आवे । चम लपेटी ऊपर साहे, भीतर विष्टा पाले ॥१५॥ अति दुगध अपावन सो यह, मूरख प्रीति बढावे । देह विनाशी जीय अविनाशी, नित्य स्वरूप कहावे ॥१६॥ यह तन जीण कुटी सम प्रातम, याते प्रीति न कीजे । नूतन महल मिले जब भाई, तब यामे क्यो छीजे ।।१७।। मृत्यु होने से हानि कौन है याको भय मत लावो । समना से जो देह तजागे, ता शुभ तन तुम पावो ॥१८॥ मत्यु मित्र उपकारी तेरा, इस अवसर के माही । जीरण तन ले देत नया यह, या सम काहू नाही ।।१६।। या सेतो इस मृत्य समय पर, उत्मव प्रति ही कीजै । क्लेश भाव का त्याग मयाने, समता भाव धरोजे ॥२०॥ जा तुम पूरव पुण्य क्यि हैं, तिनका फल सुखदाई । मत्य मित्र विन कौन दिखावै, स्वग सम्पदा भाई ॥२१॥ राग राप का त्याग सयाने, सात व्यसन दुपाई। मन समय में समता धारी, पर भव पथ सहाई ॥२२॥ कम महादुष्ट वैरी मेरो, या सेती दुय पाये। .
समाधि मरण भाषा पाठ - तन पिंजर में बध कियो, या सो कोन छुडावे ॥२३॥ भूख तृष्णा आदि दु ख अनेक, इस ही तन मे गाढे । मृत्युराज अब दया कर, तन पीजर से काढे ॥२४॥ नाना वस्त्राभूपण मैंने, इस तन को पहराये । गध सुगधित लगाये, पटरस प्रशन कराये ॥२५।। एता दिनो मैं दास होयकर, सेव करी तन केरी। सा तन मेरे काम न आयो, भूल रह्यो निधि मेरी ॥२६॥ मृत्युराय को शरण पायकर, तन नूतन ऐसो पाऊ । जामै सम्यक् रतन तीन लही, आठो कर्म खपाऊ ॥२७॥ देखो तन सम और कृतघ्नी नही सुण्या जग माही । मृत्यु समय मे ये ही परिजन, सब ही है दुखदाई ॥२८॥ यह सब मोह बढावन हारे, जिय को दुगति दाता । इनसे ममत निवारो जियरो, जो चाहा सुख शाता ॥२६॥ मृत्यु कल्पद्रुम पाप सयाने, मागो इच्छा जती । समताधर कर मृत्यु करो तो, पावा सपत्ति तेती ॥३०॥ यो आराधन सहित प्राण तज, तो या पदवी पाये। हरि प्रतिहरि चक्री तीर्थेश्वर, स्वग मुक्ति मे जावे ॥३१॥ मृत्यु कल्पद्रुम सम नही दाना, तीनो लोक मझारे । ताको पाय क्लेश करो मत, जन्म जवाहर हारे ॥३२॥ इस तन मे क्या राचे जियरा, दिन दिन जीण होवे । तेज कान्ति वल नित्य घटत है, या सम अथिर सु को है ।।३३। पाचो इन्द्रिय शिथिल भइ अब, श्वास शुद्ध नही आवे । ता पर भी ममता नहीं छोडे, समता उर नही लावे ॥३४॥ , - ससार-तरणिका W . - मृत्युराज उपकारी जियका, तनसो तो ही छुडावे । नातर या तन बदोग्रह मे, पच्यो पच्यो विलवावे ॥३॥ पुदगल के परमाणु मिल ले, पिंड रूप तन भाषी। याही मूरत मे प्रमूरति, ज्ञान ज्योति गुण खासी ॥३६॥ रोग शोक प्रादिक जो वेदन, ते सब पुद्गल लारे । में तो चेतन व्याधि बिना नित, है सो भाव हमारे ॥३७॥ या तन सो इस क्षेत्र सम्बधी, कारण पान बन्यो है। खान पान दे या को पोस्यो अब समभाव ठयो है ॥३८॥ मिथ्या दशन प्रातम ज्ञान विन, यह तन अपनो जायो। इन्द्री भोग गिने सुख मैंने, पापो नही पिछान्यो ॥३६॥ तन विनशते नाश जाणो निज, यह पाया न दुखदाई। कुटुम्ब आदि को अपनो जायो, भूल अनादि छाई ॥४०॥ प्रब निज भेद यथारथ समझ्यो, मैं हूँ ज्योति स्वरूपी । ऊपजे विनस मो यह पुद्गल, जा यो लोको रूपो ॥४१॥ इष्ट पनिप्ट जे ते सुख दुख है सो सब पुदगल लागे। में जब प्रानो रूप विचारा, तब वे सब दुख भागे ॥४२॥ विन समता तन अनन्त घरे में, तिन मे यह दुख पायो । शस्त्रघात त अनन्त वार मर, नाना योनि भरमाया ॥४३॥ वार प्रनत ही भग्नि माही जल, मुवो सुमति न लायो । मिह व्याघ्र पट्टी अनन्नवार मुझ, नाना दुख दिखाये ॥४॥ विन समाघि यह दुख लहै में, अब उर समता पाई। मुत्पराज का भय नहीं माना, देवे तन सुखदाई ॥४॥ या त जब लग मृत्य न माये, तब सग जप तप कोज ।
समाधि मरण भापा पाठ ११६ --.. जप तप बिन इस जग के माही, कोई भी ना समझे ।।४६॥ स्वर्ग सम्पदा तप सो पावे तपसो कम नसावे । तप ही सो शिव कर्मे निपति है, या सो तप चित लावै ॥४७।। अब जानी मैं समता बिन मुझ, कोऊ नाही सहाई । मात-पिना सुत-बधव त्रिया, ये सब है दुखदाई ॥४८।। मृत्यु समय मे मोह करे ये, ताते प्रारत हाई । प्रारत ते गति नीची पावे, यो लख मोह तज्यो है ।।४।। और परिग्रह जेते जग मे, तिन सो प्रीति न कीजे । परभव मे यह सग न चाले, नाहक प्रारत कीजै ॥५०॥ जे जे वस्तु लखत है ते पर, तिनसु नेह निवारा । पर-गति मे ये साथ न चाले, ऐसा भाव विचारो ॥५१॥ जो परभव मे सग चले तुझ, तिनम प्रीत मुकीजे । पच पाप तज समता धारा, दान चार विध कीज ॥५२।। दस लक्षणमय धम धरा उर, अनुकम्पा उर लावा । पोडस कारण नित्य चितवा, द्वादस भावना भावा ॥५३।। पक्खी आदि को पोपध कीजै, प्रशन रात का त्यागो। समता धर दुर्भाव निवारो, सयम मु अनुरागो ॥५४|| अत समय मे यह शुभ भावना, हावे आनि सहाई । स्वग मोक्ष फल ताही दिलावे, मृद्धि देही अधिकाई ॥५५।। खोट भाव सकल जिय त्यागा, उर मे समता लाके । जा सेती गति चार दूरकर, वसा मोक्ष पुर जाके ॥५६।। मन थिरता करके तुम चितो, चौ पाराधन भाई । ये ही तो को सुख की दाता, और हितु कोऊ नाही ॥५७।।
१२० ससार-सरणिका w - - मागे वहु मुनिराज भये हैं, तिन गही थिरता भारी। बहु उपसग सहे शुभ भावना, पाराधन उर धारी ॥५८॥ तिनमे कछु ए नाम कहू मैं, सुना जिया चित्त लाके । भाव सहित अनुमादे तासे दुगति होय न जाके ॥५६॥ अरु समता निज उर मे आये, भाव अधीरज जावै । वो निशदिन जा उन मुनिवर के, ध्यान हिये बिच लावै ॥६०॥ धय धन्य सुकमाल महामुनि, कैसे धीरज धारी। एक शियालनी युग वच्चा युत, पाव भरयो दुखकारी ॥६१।। ढाल-मेरी भावना की तर्ज में यह उपसग सह्या घर थिरता, आराधन चितधारी । ता तुमरे जीव कोन दुख है, मृत्यु महोत्सव वारी ॥टेर।।६२॥ धन्य ध य जु कौशल स्वामी, व्याघ्री ने तन खायो। ता भी श्री मुनि नेक नही डिग्यो, प्रातम सो हित लायो ।यह ।६३। देयो गज मुनि के सिर कार, विप्र अग्नि बहु यारी । शीप जल जिम ताडी तनको, तो भी नाही चिगारी ॥४॥ मनतकुमार मनि । तन में, कुष्ट वेदना व्यापी। छिन्न भिन्न तन तासा हुवा, तव चित्यो गुण मापी ।।६।। अणिक मुत गगा मे डन्यो तब जिन नाम चितार्यो । घर मगना परिग्रह छाडया, शुद्ध भाव उर धार्यों हो॥६६॥ ममनभद्र मुनिवर के तन म, शुधा वेदना पाई। ता दुग म मति ने न डिगियो, चित्या निज गुण माई ॥६॥ मलित पगदिव तीस दोय मुनि, पोसम्यो सट जानो। नदी में मुनि वहार मूले, सा दुघ उन नही मानो ॥६८|| समाधि मरण माषा पाठ -....-.--..--..- - धर्मघाप मुनि चम्पा नगरी, वाह्या ध्यान धर ठाढो। एक मास की कर मर्यादा, तृषा दुख सह्यो गाढो ।।६।। श्रीदत मुनि पूर्व जन्म को वैरी देव सु आके । वैक्रिय कर दुख शीत तणो सो, मह्यो साध मन लाके ॥७॥ वृषभसेन मुनि उष्ण शिला पर, धर्यो ध्यान मन लाई। सूय घाम अरु उष्ण पवन की, वेदन सही अधिकाई ॥७१।। अभयघोष मुनि काकदीपुर, महा वेदना पाई । वैरी चड ने सब तन छेद्या, दुख दीनो अधिकाई ॥७२॥ विद्युतवर ने बहु दु खलायो, तो भी धीर न त्यागी। शुभ भावन से प्राण तज निज, धन्य और बडभागी ॥७३॥ पुत्र चिलाती नामा मुनि को, वैरी ने तन घातो। मोटे मोटे कीट पडे तन, तापर निज गुण दण्डक नामा मुनि की देही, वाणन कर अति भेदी। ता पर नेक डिगे नही वे मुनि, कम महारिपु छेदी ॥७॥ अभिन दन मुनि आदि पाच सो, घाणी पेली जु मारे । तो भी श्रीमुनि ममता धारी, पूर्व कर्म विचारे ॥७६॥ चाणक मुनि गौ घर के माही, भूद अग्नि परजाल्यो। श्री गुरु उर समभाव धार के, अपनो रूप सभाल्यो ॥७७।। सात शतक मुनिवर ने पायो हथिनापुर मे जानो। वली ब्राह्मण कृत घोर उपद्रव, सो मुनिवर नही मानो ॥७८|| लोहमयी प्राभूषण गढ के, ताते कर पहिराये । पाचो पाडव मुनि के तन मे, तो भी नही चिगाये ॥७६।। और अनेक भले इस जग मे, समता रस के स्वादी। रातो ।।७४॥ . - ससार-तरणिका वे ही हमको हो सुखदाता, हरहै टेव प्रमादी ॥८॥ तर्ज प्रथमवत् सम्यग् दर्शन ज्ञान चरण तप, ये आराधन चारो। ये ही हमको सुख के दाता, इहे सदा उरधारो ॥१॥ यो समाधि उर माही लावो, अपनो हित जो चाहो । तज ममता अरु पाठो मद को, ज्योति स्वरूपी ध्यावो ॥२॥ जो कोई नित करत पयानो, ग्रामातर के काजे । सो भी शकुन विचारे कानी, शुभ के कारण साजै ॥३॥ मातादिक अरु सव कुटुम्ब सौ, निश को शकुन दनावे । हलदी, धनिया, पुगी अक्षत, दूध दही फल लावै ॥४॥ एक ग्राम के कारण एते, करे शुभाशुभ सारे । जब पर-गति को करत पयानो, तब नही सोचे प्यारे ।।८।। सव कुटुम्ब जव रोवन लागे तो हो रुलावे सारे । यह प्रपशवुन कर सुन ताको, तू यो क्यो न विचारे ॥६॥ पब परगति को चालत विरिया, धर्म घ्यान उर मानो। चारा माराधन पाराधा, मोह तणो दुख हानो ॥७॥ है नि मत्य तजा सब दुविधा, प्रातम राम सु ध्यावो । जर पर-गति का कर ह पयानो,परम तत्त्व उर लावो ॥८॥ माह जाल को पाट पियारे, प्रपनो रूप विचारो। मत्य मित्र उपकारो तेरा, यह उर निश्चय धारो ॥८६॥ दोहा-मृत्य महात्सव पाठका, पढो सुनो बुद्धिवान । सरधार छ नित सुन सहो, सूरचद शिव याT ||१|| पच उभय नय एक नम, सब ते सो सुखदाय । प्राश्विन श्यामा मनमी, मह्यो पाठ मन लाय ॥२॥इति।।
श्री वर्धमान स्तुति रचयिता-श्री भीखमचदजी टाटिया, राजनादगाव (म प्र) -जन्म ।। शरण तुम्हारे, निशला दुलारे,तारो जिनद प्रभु तारणहारे टे। पंसठ हजार पांच सौ छत्तीस, जन्म मरण हम कोना हो- कोडी के अनत भाग मे, विके निगोद भव लीना हो-विके ।। गाजर कद मूल आलू, जनम लिये रतालू-तारो॥१॥ बारह हजार आठ सौ चौवीस, पृथ्वी पाणी वायु हो-पृथ्वी ।। बेइन्द्री भव अस्मी कोना, वायु जिम ही तेऊ हो-वायु ।। तेइन्द्री मैं साठ लीने, चउइद्रिय चालीस कोने-तारो ॥२॥ प्रसन्नी पचेन्द्रिय माही, वीस-चार भव कोना हो-वीस ।। सन्नी भव तो एकज जानो, चार गति प्रमाणा हो-चार ।। सब ही का हिसाव जानो, एक मुहूतं प्रमाणो-तारो ॥३॥ प्रनत पुण्य का उदय हुवा तब, नर भव उत्तम पाया हो- आर्य क्षेत्र और जैन धर्म का, योग यथावत् पाया हो-योग । सुने मुनि देशना, शुद्ध हो स्पशना-तारो ॥ ४ ॥ सुवह शाम हम करे वदना, निमल चित्त सुधारी हो-निमल ।। इकवीम गुण के धारक हो हम,श्रावक व्रत आचारी हो-श्रावक । (सत्ताईम गुण धारक हो हम, शुद्ध महाव्रत धारी हो-शुद्ध ॥) "चरण रज" भापे यू, भगत भटकावे क्यू-तारो ॥५॥ -नर॥
हितोपदेश (रचयिता-बहुश्रुत भ्रमणश्रेष्ठ प र पू श्री समयमलजी म सा) . प्रातम दमवोरे प्राणिया, प्रातम दमिया सुख थाय । परने दमिया दुखडो हुवे, या छ वीरनी वाय ॥१॥ स्ववश जो प्रात्म दमे नही, विवश निश्चय दमाय । देखो जगना रे जीवडा, किण किण विध दुख पाय ॥२॥ सुखनी प्राशा करीकरी, हरतो परना तू प्राण । सुख निश्चय इम ना मिले, भासे त्रिजग भाण ॥३॥ जीमे भोजन जहेरना, धरी मूढ जोवणरी आश । तीम ही मोह हिंसा यकी, बाछे सुखनी रे राश ॥४॥ कर्ता हर्ता सुख दुख तणो, आतम मित्र अमित्र । भला मूडा प्राचार मे, वा हुवे रे मित्र ॥५॥ दुख वैतरणी नदी तणा, वली कूड-सामली ना जोय । मापे निश्चे दुर मातमा, जो पापे प्रवृत्ति होय ॥६॥ नन्दन वन सम सुप सही, बली कामधेनु सम जोय । तह मापे सु प्रातमा, रुडा रोते जा हाय ॥७॥ दुदम दमयी नीज प्रातमा, प्रति उत्तम वलि जोय । सयम तप से ते वश क्यिा, बैह लोरे मुख हाय || माप्त वाणी उर माणने, धारे मुनि धम जेह । तह निश्चं शिव गति लहे, ह वछु प्रभु एह ।।दति। - (विदुलो धोनु गुमरा ता यहिन से प्राप्त) गुरु गुण गान भाए समयं मुनि माए हो भव्यों के हृदय रिकसाए। जो धो समय गुण गाए, हो समक्ति निमल हो जाए ।ध्रुव । मागम ज्ञाता बहुश्रुत पण्डित, सभी आपको कहते। सूत्र याय से सबके मा का, समाधान नित करते ॥ हां कोई न साली जाए । हो० ॥१॥ तक शक्ति अद्भुत है ऐसी, बादी कोई न टिक्ते । उदाहरण चुन ऐसे दें कि, फिर प्रति प्रश्न न उठते ।। हां कटुता कमी न लाए । हो ।। क्रिया आपकी इतनी ऊंची, 'निया-पान' पहलाये । दशन पा चौये आरे की, स्मृति सभी को आए । हा बाल वृद्ध हुत्साए । हो० ॥३॥ नाम आपका सुदर वसे, गुण भी आप में मिलते । सेवा विनय क्षमा आदि में, स्थान अनुपम रपते ॥ हा गव न विचित लाए । हो ।४। शान श्यिा दोनो का आप में, योग मिला है भारी। दौड दौड सेवा में आते, श्रद्धालु नर-नारी ।। हां शीप स्वत पुकजाए । हो० ॥५॥ जिन शासन के सत्य रूप की, झाकी आप में मिलती। माप सरिसों से ही ऐसी, रीति नीति सब निमती॥ हाँ धम दीपन पाए । हो ।६। दीप्ति अखडित ब्रह्मचय को, ढको अग्नि ज्यों दम । ज्ञानच द्र मुनि सम्प्रदाय में, सूरज बनकर धमके। हाँ कीति बहुत ही पाए । हो०१७॥ पा कर आपको लगता जैसे, मैने सब कुछ पाया। "पारस" ने चरणों में आपके तन मन सभी चढ़ाया । हा दया आपको चाहे । हो ।।
संकट मोचन वीराष्टक
धम सरूप विलीन भयो जग, मे अरु पाप सरूप पसारो।
राज्य प्रखडित पापन को जब, धर्म ही दीन सुदेश निकारो॥
जीवन जीवनि को जब सकट, पूण तबै तुमने पग धारो।
को नही जानत है प्रभु वीर, कि सकट मोचन नाम तुम्हारो ।।
पाप विनाशन दर्शन को जव, सेठ सुदशन पाय तुम्हारो।
मारग अर्जुन माली मिलो निज, देह विषे खल यक्ष ही धारो ।।
मारन तत्पर माली भयौ तब, ध्यान सुदर्शन ने तव धारो।।को ।२।
दुर्जन अर्जुन पाप पिये नर, नारि हने बन के हतियारो।
मारक को भी दियो तुमने शिव, तारक है प्रभु नाम तिहारो।
जम जरादिक चोर सतावत, है यह सकट दूर निवारो॥को ।।
मोपण कौशिक वास करे अरु, भास करे वन जीव ही भारो।
ध्यान धरा उसक बिल ऊपर, डक दियो तुमको प्रति खारो ॥
प्राप दिया उपदेश सुधा सव,कौशिक को दु ख सकट टारो।को।४।
गौतम गव निमग्न हुवे प्रभु, जीतने पायहु पास तुम्हारो।
देखत शात मनाहर सूरत, गव गयो सब भाग विचारो ।।
मापहिं कीन निशा उहे जिन शासन भार लियो प्रमु सारो।५।
पोर हरो मुझ वीर । करो, भवसागर तीर तरड हमारी।
हे जगनाय जगतति 'पावन मार को भीषण मार निवारो।
जा विध प्राप क्यिा वश में प्रमु सो हम उपर तेज पसारो ।६।
सूप बमे निज मटन में पर, फैल रहो जग मे उजियारो।
पापहि तार दिये यह लेविन, नामहिं तार दिये नही पारो॥
क्या पगराज ने मत्रन से नहीं, शीघ्र विलात मुजग विकारो।
ससार-तरणिका
तो फिर क्योकर होय रही अब, देर जब मुझ प्रायहु वारो।
पारस कचन लोह करे पर, आपहि तो अपने समधारो।
वधमान श्री वीरप्रभु तुम, शरणागत को क्यो नही तारो।
को नही जानत है प्रभुवीर । कि मकट मोचन नाम तिहारो।।
卐 संघ के प्रकाशन 卐 ०-०८ मूल्य पोस्टेज १ मोसमाग प्रय १-७१ २ भगवती सूत्र माग १ ३ भगवती सून भाग २ ५-०० १-८३ ४ उत्तराध्यपन सूत्र ५ व्ययाइय सुत ०-४६ ६जन स्याध्यायमाला २-०० ०-४६ ७ दशवकालिक सूत्र ०-३७ ८ मतगडदसा सूत्र ०-२५ स्त्री प्रधान धम ०-२५ १० सुख विपाक सूत्र ०-२० ११ प्रतिक्रमण सूत्र १२ सामायिक सूत्र ०-०७ ०-०५ १३ सूपगडाग सूब अप्राप्य १४ सिद्धस्तुति अप्राप्य १५जन सिद्धांत पोर साह भाग १ १-०० ०-२५ १६ नदी सूत्र १७ यहदालोयणा ०-०५ १८ ससार-तरणिका १६ मारमसाधना सग्रह ०-४० छप रहा है बस सम्यश्रय विमरा छप रही है। ०-०८ मुद्रफ-श्री जैन प्रिंटिंग प्रेस संलाना (म प्र.)
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evar
धुमागी
जैन
QUELE
सघ
सलानाराम
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