Allahabad University, Allahabad
Kathopnishad
Front matter
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत (कठो० ११६।१४)
(उठो, जागो और शिष्ट लोगो के पास जाकर ज्ञान प्राप्त करो।)
कठोपनिषद्
( मन्त्रो के पदच्छेद, अन्वय, शाङ्करभाष्य, संस्कृत व्याख्या,
हिन्दी शब्दार्थ, हिन्दी भावार्थ, अग्रेजी अनुवाद सहित )
व्याख्याकार
डॉ० रामरङ्ग शर्मा
एम. ए. ( सस्कृत-हिन्दी), पी. एच-डी, सहित्याचार्य,
साहित्यरत्न
संस्कृत विभागाध्यक्ष
डी ए. वी. डिग्री कॉलेज, वाराणसी
तथा
मालती शर्मा
एम. ए., साहित्याचार्य
भारतीय विद्या प्रकाश
वाराणसी
ली
प्रकाशक: भारतीय विद्या प्रकाशन १-यो० बान० १०८, कचौडी गली. वाराणसी-१ २-१ यू० बी० जवाहर नगर, बँग्लो गेड, दिल्ली- ७ प्रथम संस्करण १९७९ मूल्य विद्यार्थी सस्करण सम्पूर्ण- ५-०० पुस्तकालय संस्करण- १०-०० प्रथम अध्याय- -- मुद्रक : अनुपम प्रेस, दुर्गाघाट, वाराणसी
KATHOPANISHAD
with
SHANKARA-BHASHYA
(Edited with Sanskrit, Hindi and
English Commentaries )
Ву
Dr. Ram Rang Sharma
Head of the Sanskrit Department
D, A. V. Degree College.
Varanasi
&
Malati Sharma
WS
AMEY Alus
LA
BHARATIYA VIDYA PRAKASHAN
Varanasi,
Delni
BHARATIYA VIDYA PRAKASHAN
(1) P Box 108, Kachourigalı, Varanasi. 221001
(2) 1 U B. Jawahar Nagar,
Bungalow Road, Delhi-110007
First Edition : 1979
Student Edition
5.00
Library Edition
10.00
First Chapter
3.00
Also Can be had of:-
Bharatiya Book Corporation
P. Box 2144, Jawahar Nagar
Delhi-110007 ( India )
समर्पणम्
त्यागमूर्ति-महामण्डलेश्वर
अनन्तगुणविभूषित
परमश्रद्धेय श्री स्वामी गणेशानन्दगिरि
महाराज
कनखल ( हरिद्वार )
के
चरणकमलों में सादर समर्पित
रामरङ्ग शर्मा,
रथयात्रा
वि० सं० २०३६
एवं
मालतो शर्मा,
दो शब्द वेदों के रूप में गूंजने वाली ऋषियो की वाणी का मंगलमय स्वर चाहे इस रती के साधारण जनो के लिए बोधगम्य न हो, परन्तु जन्म में मृत्यु पर्यन्त आप्त रहनेवाले महत्त्वपूर्ण हमारे षोडश सस्कारों ने हमे एक सूत्र में आज भी व रखा है। यही कारण है कि भारतीय जन जीवन अतीत से भविष्य तक, धूल से सूक्ष्म तथा अनादि से अनन्त तक दृष्टि रखकर ही अपनी अवस्था करने प्रवृत्त होता है। फलतः सच्चा भारतीय सदा अनात्मवाद ' आत्मवाद, गवाद से योगवाद, स्वार्थवाद से परमार्यबाद, नास्तिकवाद से आस्तिकवाद एव कुचित सम्प्रदायव द से सदा मानवतावाद को अधिक महत्त्व देता रहा है । इस इ आस्था की पृष्ठभूमि का श्रेय एवं गौरव निःसन्देह उपनिषद्-वाड्मय को ही या जा सकता है, क्योंकि इनके गम्भीर अनुशीलन से ही भगवान् शङ्कराचार्य, मानुजाचार्य, वल्लभाचार्य, निम्बार्काचार्य, मध्वाचार्य आदि विभूतियों ने भाकुल नव जातिको सान्त्वना दी। आज सर्वत्र नैनिकता का ह्रास हो रहा है। सभी लोग भौतिकवाद की काचौध मे चक्कर काट रहे है । आमा एवं विश्वास है कि प्रस्तुत ग्रन्थ के यिक नचिकेता के उदारचरित से देश के वर्तमान कर्णधार एवं राष्ट्र के होनहार वक शिक्षा लेंगे। यदि ऐसा हो मका तो हम अपने परिश्रम को सफल मानेगे। पुस्तक प्रकाशन मे पूरी सावधानी बरती गयी है तथापि पूर्ण निर्दोषता का वा नही किया जा सकता । प्रूफ, मुद्रण आदि की असावधानियो से भी त्रुटियां म्भव है । सहयोगी सभी लेखक विद्वानो के हम आभारी है जिनकी कृतियो से मे सहायता मिली है। सुविज्ञ पाठको से हमारा अनुरोध है कि वे हमारी वषयगत तथा अन्य मूलो की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करेंगे ताकि द्वितीय स्किरण इससे अच्छा बन सके। रामरङ्ग शर्मा मालती शर्मा भूमिका . उपनिषद् किसे कहते है-'उपनिषद् शब्द उप तथा नि उपसर्ग पूर्वक सद् धातु से बना है जो शरण, अवसादन तथा गति अर्थ का बोध कराता है । इस की व्युत्पत्ति के सम्बन्ध में कहा भी है-"सदेर्धातोविशरणगत्यवसादनार्थस्योपनि पूर्वस्य क्विपप्रत्ययान्तस्य रूपमिदमुपनिषदिति” ( काठकोपनिषद्-शाकरभाष्य )। 'उपनिषद्यते प्राप्यते ब्रह्मविद्या अनया इति उपनिषद्' अर्थात् जिससे ब्रह्मविद्या की प्राप्ति होती है, उसे उपनिषद् कहते है । ब्रह्म अथवा आत्मा के स्वरूप का ज्ञान कराने वाली जो विद्या है वह उपनिषद् कहलाती है। क्योकि, जो मुमुक्षु अधिकारी दृष्ट और श्रुत दोनो विषयो से विरक्त होकर उपनिषदो में कथित ब्रह्मविद्या की शरण लेते है और उस विद्या का निश्चयपूर्वक अनुष्ठान करते है उन अधिकारियो का उप- निषदो के द्वारा ससार के मूल बीज अविद्या ( अज्ञान ) आदि का नाश हो जाता है। अविद्या की विरोधिनी विद्या है और वह विद्या उपनिषदों में निहित होने के कारण उपनिषदो को विद्या शब्द से सबोधित किया जाता है । यह अर्थ मद् धातु के अवसादन अर्थ से है । संसार का यह नियम है कि जब तक मूल कारण को निवृत्ति नही होती तब तक उसके कार्यभूत पदार्थ की निवृत्ति भो आत्यन्तिक रूप से नहीं होती। निवृत्ति दो प्रकार की शास्त्र में कही गयी है एक लयरूप निवृत्ति और दूसरी आत्यन्ति की निवृत्ति । लयरूप निवृत्ति वह है जो कारण को विद्यमान रखते हुए कार्य की ऊपर से निवृत्ति करती है ( नाश करती है )। लेकिन इस निवृत्ति से कार्य का समूल नाश नहीं होता-जैसे हम नाई के द्वारा बाल बनवाते है। जिस समय हमारे बाल नाई बना देता है उस समय तो ऐसा लगता है कि अब ये बाल जल्दी ऊपर नहीं आयेंगे, लेकिन दूसरे दिन प्रातःकाल उठते ही हाथ घुमाओ तो पता लगता है कि बाल फिर से अपना प्रभाव जमा रहे है । यही खूबी नाखूनो की भी है। क्षण भर के लिए मालूम देता है कि बिलकुल इनकी निवृत्ति हो गयी लेकिन ( 1 ) बाद में वे पुनः अपना प्रभाव बताते है । दयोकि उनका कर्त्तन ऊपर से ही किया गया है, लेकिन उनकी जड अर्थात् कारण तो वैसा ही मौजूद रहता है । इस प्रकार की निवृत्ति ( विनाश ) को लय रूप निवृत्ति कहते है। ठीक इसी प्रकार ससार की लय रूप निवृत्ति (क्षणिक निवृत्ति ) सुषुप्ति अवस्थाएँ ( निद्रित अवस्थाएँ ) होती हैं । लेकिन प्रातःकाल जागते ही पुनः संसार उबुद्ध हो जाता है । वास्तव मे ससार की निवृत्ति मे सुख है, न कि ससार को स्थित रखने में। वह सोता है ससार की निवृत्ति के लिए लेकिन उसकी यह ससार- निवृत्ति सदा के लिए नही होती इसलिए पुनः जागते ही दुःखो के काले बादल उसके सिर पर छा जाते है । हर एक व्यक्ति का प्रयत्न ससार निवृत्ति के लिए अर्थात् सच्ची आनन्दानुभूति के लिए चल रहा है, लेकिन जीवात्मा अविद्या मे जब तक पडा हुआ है तबतक संसार की निवृत्ति न कर पायेगा । क्योकि संसार का मूल कारण अविद्या तो पडी ही है । इस निवृत्ति को लयरूप निवृत्ति कहते है । दूसरी निवृत्ति है आत्यन्तिकी निवृत्ति और वह होगी उपनिषद् विद्या से । गकराचार्य कहते है “कुरुते गगासागरगमन, व्रतपरिपालनमथवा दान, ज्ञानविहीने सर्वमतेन, मुक्तिन भवति जन्मशतेन ।" पुरुष कितना ही गगा मे नहाता रहे, व्रतो का पालन करता रहे, अथवा दान देता रहे लेकिन मुक्ति ज्ञान के बिना नहीं होगी। सच्चा ज्ञान कहाँ है ? उपनिषदो में । उपनिषद् विद्या क्या करती है ? ससार की निवृत्ति । वह भी संसार की कारणीभूत अविद्या के निवृत्तिसहित-अर्थात् कारण सहित कार्य का नाश होता है, उपनिषद् से । इसी को कहते है आत्मा की निवृत्ति । जब आदमी ससार के लय रूप निवृत्ति मे, निद्रा अवस्था मे, आनन्दानु- भूति प्राप्त कर लेता है तो उसकी कल्पना करना ही कठिन है। किसी अकिंचन को सार्वभौम पद मिले वैसे ही यह अवस्था होती है। यह अवस्था उपनिषदों के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है। वैदिक वाङ्मय मे उपनिषदों का स्थान-आध्यात्म विज्ञान की चर्चाओ में वेदो के बाद उपनिषदो को ही सर्वाधिक आदर मिला है। ब्रह्म सम्बन्धी दार्शनिकता का विवेचन इन ग्रन्थो मे जिस प्रकार वर्णित है, वैसा वर्णन विश्व के अन्य ग्रन्थो मे यदि असम्भव नही, तो दुर्लभ अवश्य कहा जा सकता है । वेदों के वास्तविक सन्देश-वाहक के रूप मे उपनिषद् वाड्मय को आलोचको ने देखा है ।
( 11 ) इन ग्रन्थो की रचना उस समय हुई, जब लोग ब्राह्मण एवं आरण्यक ग्रन्थो की सहायता मे वेदो पर अपनी-अपनी व्याख्यायें करने लगे । कर्म को प्रधानता देते वाले ब्राह्मण तथा आरण्यक ग्रन्यो ने जब ज्ञान को गौण मानकर कर्मकाण्ड के नाम पर पशु-हिंसा आदि को प्रश्रय एव जाति-पॉति के नियम-उपनियमो को और सुदृढ वगाने की कल्पनायें को तो उपनिषद् ग्रन्थ कारो ने ज्ञान की दुन्दुभी वजाकर ब्राह्मण एवं आरण्यक ग्रन्थो की आलोचना आरम्भ कर दी। यही प्रमुख कारण है कि अधिकाश विद्वान् उपनिषदो को ब्राह्मण-आरण्यक साहित्य का आलोचनात्मक वाड्मय मानते है। विश्व की अधिकतर जीवित भाषाओ में इन ग्रन्थो का अनुवाद ही इस बात का प्रमाण है कि लोगो ने उपनिषदो के महल को समझने का प्रयास किया है। मुगल साम्राज्य मे औरगजेब के सुपुत्र दाराशिकोह ने लगभग पचास उरनिपदो का अनुवाद फारसी भाषा मे करवा कर उनके अध्ययन की ओर अपना मन लगाया था। फारसी अनुवाद से प्रेरणा पाकर डुपरेन महोदय जैसे न जाने कितने फ्रेच विद्वानो का ध्यान उपनिषदो के प्रगाढ विषय की ओर गया। इन ग्रन्थो का मूलरूप में अध्ययन करने के लिये विदेशी विद्वानो ने सस्कृत का अध्ययन किया और मुक्तकण्ठ से प्रशसा की कि "उानिषद् मानव मस्तिष्क की सर्वोत्तम कृति है ।" भारतीय विद्वानो के अतिरिक्त प्रमुख रूप से जिन पाश्चात्य विद्वानो ने पूर्ण रूप से उपनिषदो का चिन्तन किया है उनमे मैक्समूलर, फ्राक, बेबर, विटरनित्स आदि का नाम बडे आदर से लिया जाता है। जीवात्मा, जगत् और ब्रह्म क्या है ? इनको वास्तविक स्थिति क्या है ? जिज्ञासुओ के इन प्रश्नो के नवीन एव सरल प्रणाली से युक्तिसगत उत्तरो के कारण ही उपनिषदो का महत्व वर्णनातीत हो गया है । उपनिषदों का प्रतिपाद्य विषय-उपनिषदो का प्रधान रूप से वय विषय मात्मा, पुनर्जन्म, कर्मफल आदि है जिनका वर्णन वेदो मे प्रायः नही के तुल्य है । उपनिषद् ग्रन्थो को वेदान्त ग्रन्थ ही माना गया है । आनन्द-कन्द भगवान कृष्ण ने गीता का जो उपदेश दिया उसको आधारशिला उपनिषद् ही है । सम्पूर्ण भारतीय दार्शनिक एवं धार्मिक वाड्मय के बीजभूत उपनिषद् ही माने जाते है । विषय की दृष्टि से इन ग्रन्थो के तीन प्रयोजन कहे जा सकते है-ज्ञान प्रतिपादन, ब्रह्मविद्या प्रतिपादन, साधनामार्ग प्रतिपादन ।
( 17 . (१) ज्ञान प्रतिपादन-'ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः' अर्थात् वास्तविक ज्ञान के बिना जीव की मुक्ति कभी नही हो सकता। आवागमन के चक्र मे पडकर जीवात्मा को कूकर, शूकर, कोट पतग आदि चौरासी ( ८४ ) लाख योनियो मे तब तक भटकना पड़ता है जब तक जीव अपने सच्चे स्वरूप का अवलोकन नही कर लेता। इसीलिए मोक्ष-प्राप्ति की अभिलापा वाले विवेकी जन सदा अपने कल्याण के लिए ज्ञान विषयक उपनिषदो की शरण लेते है। ज्ञान विषयक उपनिषदो मे प्रधान उपनिषद् है :-ईशावास्य, कठ, केन, प्रश्न, मुण्ऽक, माडूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, तैत्तिरीय, श्वेताश्वतर, आध्यात्म, महोपनिषद्, मैत्रायणो। इन उपनिषदो में ब्रह्मविद्या के प्रतपादन के अतिरिक्त प्रश्नोत्तर के रूप में विभिन्न गूढार्थो का विवेचन भी किया गया है। प्रश्नोपनिपद् म ब्रह्म- प्राप्ति की चार आधार-शिलाएँ मानी गयी है :-श्रद्धा, ब्रह्मचर्य, तप और धैर्य । ऐतरेय उपनिपद् मे सृष्टि निर्माण सम्बन्धी विषय को बडी सरल विधि से समझाया गया है । ईशोपनिषद् से प्रधानरूप से ब्रह्म की व्यापकता के साथ ही साथ ब्रह्म एव आत्मा मे अभेद-बुद्धि रखने का उपदेश भी दिया गया है। (२) ब्रह्मविद्या प्रतिपादन-ब्रह्मविद्या के प्रतिपादक उपनिषदो की सख्या लगभग ३५ हैं। ये उपनिषद् प्राय. गद्य साहित्य मे हो लिखे गये है। ब्रह्म के स्वरूप का चित्रण बडे ही मनोरजक ढग से किया गया है जिससे एक साधारण बुद्धि वाला व्यक्ति भी ब्रह्म के विषय में जानकारी कर सके। ब्रह्म विद्या के प्रकाशक उपनिषदो मे मुख्य है-ब्रह्मोपनिषद्, तेजोबिन्दु, योगतत्व, स्वसंवेद्य, शाडिल्य, नारद, परिव्राजक, आत्मबोध, याज्ञवल्क्य, अवधूत, परमहस, निर्वाण । ३) साधना मार्ग प्रतिपादन-साधना का महत्व हमारे प्राचीन ग्रन्थो मे भरा पड़ा है। केवल उपनिषद् साहित्य मे ही लगभग चालीस ग्रन्थ होगे जो साधना की महत्ता तथा उसके विधानों पर पर्याप्त प्रकाश डालते है। साधना द्वारा लौकिक एव पारलौकिक दोनो प्रकार के सुखो की प्राप्ति का विशद वर्णन है। देवी और देवताओ मे राम, सीता, हनुमान आदि देवताओ की साधना का वर्णन अच्छी प्रकार से इन ग्रन्थो मे वर्णित है। साधना मार्ग का प्रतिपादन करने वाले उपनिषदो में मुख्य है-गायत्री रहस्य, सौभाग्य- ( v ) लक्ष्मी, मीता, राधा, नीलरुद्र, सावित्री, चाक्षुष, कलि-सतरण, कृष्णोपनिषद, ध्यान बिन्दु, प्राणाग्निहोत्र । इन उपनिषद् ग्रन्थों के नामकरण से स्पष्ट प्रतीत होता है कि इस काल में अवतारवाद अपनी जड़ें जमा चका था। विभिन्न सम्प्रदाय अपने-अपने देवताओ की साधना में पर्याप्त रुचि लेते थे। महर्षियों द्वारा प्रतिपादित विषयो की साधना में लगे हुए साधकों की मनोवृत्ति का बडा ही सुन्दर वर्णन इन ग्रन्थो मे उपलब्ध है। उपनिषदो की संख्या-उपनिषदों की निश्चित संख्या के बारे में विद्वानो में मतैक्य नहीं है। मुक्तिकोपनिषद् में उपनिषदो की संख्या १०८ बतायी गयी है जिनका विवरण इस प्रकार है-ऋग्वेद से सम्बन्धित १० उपनिषद्, शुक्ल- यजुर्वेद से १९, कृष्ण यजुर्वेद से ३२, सामवेद से १६ और अथर्ववेद से ३१ । इस प्रकार १०८ उपनिषद् ग्रन्थो का प्रकाशन बम्बई के निर्णय सागर प्रेस ने किया है। किन्तु बम्बई के गुजराती प्रिंटिंग प्रेस से प्रकाशित 'उपनिषद् वाक्य महाकोष' मे २२३ उपनिषदो की नामावली दी गयी है जब कि अडियार लाइब्रेरी, मद्रास द्वारा उपनिषद् संग्रह मे १७९ उपनिषदों का सकेत है । अस्तु, उपनिषदो की संख्या जो भी हो, किन्तु इस समय उपनिषदो मे ११ उपनिषद् अत्यधिक प्रसिद्ध है जिनपर शाकरभाष्य भी मिलता है-ईशावास्य, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, श्वेताश्वतर, छान्दोग्य, बृहदारण्यक । । - कथावतरण-वाजश्रवस मुनि विश्वजित् यज्ञ के अन्त में जब ऋषियों को दक्षिणा में गायें देने लगे तो उनके बालक (पुत्र) नचिकेता ने देखा कि पिताजी हृष्ट पुष्ट और दूध देने वाली गायें मेरे लिए बचा ले रहे है और बूढी एवं बेकाम गायों को ब्राह्मणो के लिए दे रहे है । तब अपने पिता को उनके इस दान की व्यर्थता और ममत्व त्याग द्वारा आत्मज्ञान का बोध कराने के लिए उसने स्वयं अपने दान को जिज्ञासा की, क्योंकि विश्वजित यज्ञ मे सर्वस्व दान कर दिया जाता है, अपना कहने योग्य कोई पदार्थ शेष नहीं रह पाता। अत! "जिसके लिए हृष्ट-पुष्ट गायें रख रहे है उसका भी आपको दान करना चाहिए," यह दर्शाना ही कठोपनिषद् के कथानायक (नचिकेता) को अभीष्ट है एवं इस उपनिषद् के अवतरण का यही हेतु है। .
( vi ) कठोपनिषद् कथासार-यज्ञो के माध्यम से हमारे तपःपूत विश्ववन्ध महषियो ने ईश्वर-अस्तित्त्व, आत्म-नित्यत्त्व, पुनर्जन्म विषयक मान्यता तथा वेदो की प्रामाणिकता के असीम सौरभ से निःसन्देह सम्पूर्ण ससार के कण-कण को सुरभित किया है । यद्यपि कालचक्र के अव्याहत प्रभाव ने मानव जाति की सास्कृतिक परम्परा को झकझोर दिया है तथापि भारतीय चिन्तन के मूलतत्त्व आज भी अपनी अमरता की अमिट छाप बनाये हुए हैं। प्रस्तुत उपनिषद् का कथानक भी हमारी प्राचीन पवित्र परम्पराओ की एक कडी है । यह कृष्ण-यजुर्वेद की कठ शाखा का उपनिषद् है। इसमे दो अध्याय एवं छः वल्लियां है। महर्षि वाजश्रवा के पुत्र उद्दालक ने विश्वजित ( सर्वमेध) नामक एक यज्ञ किया। परम्परा के अनुसार 'सर्ववेदसं ददौ'-की उक्ति को मुनि उद्दालक ने चरितार्थ किया, किन्तु ऋत्विजो को दक्षिणा देते समय उनसे एक भूल हो गयी। अच्छी गायें तो पुत्र नचिकेता के लिए रख ली और बूढी तथा दुग्ध- रहित गायें ब्राह्मणों को अर्पित करने लगे। यह देखकर 'पुम् नाम नरकात् त्रायते इति पुत्र'' को चरितार्थ करनेवाले नचिकेता के मन में श्रद्धा ने प्रवेश किया और पिता के अनिष्ट निवारण हेतु हो उसने अपने पिता से पूछा-'तत् कस्मै मा दास्यसीति' । दो बार पूछने पर भी पिता ने नचिकेता की बात अनसुनी कर दी। अपनी धुन के पक्के ऋषिकुमार ने तीसरी बार फिर पिता से वही प्रश्न किया। उद्दालक चिढ गये और खीझकर कहा-'मृत्यवे त्वा ददामीति'। पिता के इस वचन को सुनकर नचिकेता सीधे यमपुरी में पहुँच गया। यम कार्यवशात् वहाँ न थे। तीन दिन तक अन्न-जल ग्रहण किये बिना नचिकेता ने यम की प्रतीक्षा की। यम भगवान के आने पर उनकी पत्नी ने उन्हे सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया और सर्वप्रथम अतिथि सत्कार की बात की। यम ने तत्काल इस अनोखे अतिथि से क्षमा याचना की और तीन दिन तक कष्ट सहने के कारण तीन वरदान मागने की प्रार्थना की ( कठोप० ११११९) । इस प्रकार अतिथिसत्कार को सुगम, सरल सरणि भारतीय परम्परा की विशेषता रही है। तीन वरदान-नचिकेता ने अपने प्रथम वरदान मे अपने प्रति पिता प्रसन्नता की याचना की ( कठोप० १।१।१०)। द्वितीय वरदान मे स्वर्ग V11 साधन भूत अग्नि-(नचिकेत ) विद्या के ज्ञान को मागा ( कठोपनिषद १.१.१३)। इन दो वरदाना का देने में म भगवान ने कोई आनाकानी नही की। परन्तु, तीसरे वरदान मे आत्मबोध ( अर्थात् मृत्यु के पश्चात् आत्मा की क्या स्थिति है। कठा० १६१ ) के मागने पर यम सतर्क हो गये और जिज्ञासु नचिकेता पर तृतीय वरदान न मागने हेतु दबाव डालने लगे। यम ने मसार का सम्पूर्ण वैभव देने की बात की, किन्तु विवेकी नचिकेता अपने प्रण से तनिक भी विचलित नहीं हुए। यम ने माधक की प्रत्येक प्रकार से परीक्षा ली, यहाँ तक कि उसे भय और लोभ की शृङ्खलाओ मे बाँधना चाहा, परन्तु सब व्यर्थ नहा । अन्त मे नचिकेता को एक सुयाग्य आत्मविज्ञान का अधिकारी मान कर यम ने हार मान ला और नचिक्ता का आत्मतत्त्व का बोध कराने से पहले श्रेय और प्रेय पदार्थो का अन्तर समझाया । श्रेय और प्रेय पदार्थ-प्रयोजन भिन्न होते हुए भी श्रेय और प्रेय पदार्थ मा व को अपने बन्धन मे बाँधते है, अर्थात् अपनी ओर आकृष्ट करते है ( कठो० १।२।)। इतना होने पर भी श्रेय ( कल्याण मार्ग ) अपनाने वाले का कल्याण होता है और दूसरी ओर प्रेय-सासारिक भोगवाले प्रवृत्ति पथ के पथिक को बारम्बार ८४ लाख पानियो मे भटकना पडता है। सौभाग्य से नचिकेता ने श्रेय मार्ग को अपनाकर सासारिक विविध प्रलोभन दिखाने वाले यम को चकित एव प्रभावित किया है। नचिकेता की प्रशसा करते हुए स्वयं यम ने ( कठा. १।२।४। ) कहा है कि मैं तुम्हें विद्याभिलाषी मानता हूँ। रथ-रथी का रूपक- यद्यपि यह आत्मा नित्य एव प्रकाशरूप है तथापि इसके दर्शन सहज नहीं है, क्योकि यह बुद्धिरूपी गुफा मे छिपा नहता है। जब कोई धीर पुरुष सासारिक विषयो से ऊपर उठकर देखता है तभी उसे इसका साक्षात्कार होता है । आत्मा के स्वरूप को जानने से पूर्व उसके साधन प्रणव ( ओकार ) का ज्ञान आवश्यक है। सूक्ष्मातिसूक्ष्म एव मान से भी महान् आत्मा है । इसे पाने के लिये न तो विशाल बुद्धि को आवश्यकता है और न ही असीम ज्ञानराशि की, क्योकि इस आत्मतत्त्व को जानने के लिये निर्मल मन तथा लगन की आवश्यकता है। यहाँ ब्रह्म-प्राप्ति के साधार को रथ और रथी के रूपक द्वारा समझाया गया है ( कठा० १.३.३.४)। शरीर रथ है, जात्मा रथो (मालिक) VIII है, बुद्धि सारथि है, मन लगाम है, इन्द्रियाँ अश्व ( घोडे ) है, रूप-रस-गन स्पर्श-शब्द ही इन घोडो के मार्ग है और मन से युक्त आत्मा हो भोक्ता है । जि साधक की मनरूपी लगाम बुद्धिरूपी सारथि के कब्जे में है और इन्द्रियाँ रू घोडे नियन्त्रण मे है उसे परमपद की प्राप्ति होती है। उसे ही 'तद्विष्णोः पर पदम् कहा गया है और इस पुरुप से परें और कोई नहीं 'सा काष्ठा सा परा गरि कहा गया है। मृत्यु के पश्चात् प्राणी की क्या गति होती है ? इस प्रश्न का उर यम ने देते हुए कहा-कर्मफल के अनुसार जीव विभिन्न योनियो मे भ्रमण कर है और कर्मफल के त्याग से उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। ब्रह्म सर्वव्याप ह, वह दु खो से लिप्त नहीं होता। उसी परम ब्रह्म द्वारा ही यह सब कु प्रकाशित होता है ( कठो० २१२११५)। कठोपनिषद् की अन्तिम बल्ली मे सस को अश्वत्थ (पापल वृक्ष ) के रूप में वर्णित किया गया है जिसका मूल ( ब्रह्म पर कहा गया है। सम्पूर्ण स्थावर और जगम जगत् इसी मे आश्रित है। प्रकार बडी सूक्ष्मता से ब्रह्म, जीव एव जगत की स्थिति को स्पष्ट किया गया है कठोपनिषद् के महायज्ञ-स्मृतिकारो ने मानव कल्याण हेतु पाँच यज्ञो प्रतिपादन किया है भूतयज्ञ पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ, देवयज्ञ तथा ब्रह्मयज्ञ कठोपनिषद् मे इन पाँचों यज्ञो का सकेत है। १ वैश्वदेव ( भूत यज्ञ ) की ओर नचिकेता का ध्यान है तभी तो उर 'पीतोदकाः, जग्धतृणा , दुग्धदोहाः निरिन्द्रिया' इत्यादि गायो को दान देने अपने पिता को रोका है, क्योंकि इनकी रक्षा करना भूतयज्ञ मे आता है अथ गृहस्थ को चाहिए कि वह ऐसे पशुओ का स्वय पालन करे न कि उनसे अप जान बचाने हेतु औरों को दान कर दे । २ पितृयज्ञ के प्रति कठोपनिषद्कार की दृढ आस्था है कि माता-पि की प्रसन्नता ही के विशेषता है । नचिकेता ने यम से तीन वरदान माँगते सः सर्वप्रथम पितृ-परितोष ही मागा, क्योकि वह पिता को अप्रसन्न नहीं देख चाहता ( कठोप० १११११०)। ३. देवयज्ञ में देवताओ की अर्चना की जाती है। यहाँ भी अ द्वितीय वरदान मे नचिकेता ने नचिकेत अग्नि के ज्ञान की इच्छा की है, क्यो अग्निदेव के प्रसन्न होने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है (कठोप० १११११२-१३) ( 1x ) ४. अतिथियज्ञ के प्रसग मे ब्रह्मविद्या के महान् प्रवक्ता यम ने एक लघु ब्राह्मण कुमार के आगे सिर झुका दिया और तीन दिन अनुपस्थित रहने हेतु क्षमा मांगी। इसके साथ ही प्रायश्चित्तस्वरूप तीन वरदानो की घोषणा की। ५. ब्रह्मयज्ञ के अन्तर्गत नचिकेत ने आत्मज्ञान की याचना की है। इस आत्मज्ञान रूपी यज्ञ के सामने शेष सभी सासारिक सुख तुच्छ एव नाशवान है । आत्मबोध होने पर जीव को ८४ लाख योनियो के आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। उपर्युक्त इन पाँच महायज्ञो के द्वारा कठोपनिषद् की शिक्षाओ का बोध जहाँ सुगमता से होता है वही प्रस्तुत उपनिषद् के नायक नचिकेता के उज्ज्वल चरित्र का भी पता चलता है। रथयात्रा सवत् २०३६ रामरङ्ग शर्मा एवं मालती शर्मा विषय सूची पृष्ठ il iii भूमिका- उपनिषद् किसे कहते है ? वैदिक वाङ्मय में उपनिषदो का स्थान उपनिषदो का प्रतिपाद्य विषय उपनिषदो की संख्या कठोपनिषद् का कथासार तीन वरदान, श्रेय और प्रेय रथ-रथी का रूपक कठोपनिषद् के महायज्ञ प्रमथ अध्याय.. v VI vii Vini 1x प्रथमावल्लो १-४७ ४८-८३ ८४-१०० द्वितीयावल्ली तृतीयावल्ली द्वितीय अध्यायः- प्रथमावल्ली द्वितीयावल्ली - १०१-११८ ११९-१३७ तृतीयावल्ली १३८-१५९ परिशिष्ट
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श्री सरस्वत्यै नमः
कठोपनिषद्
प्रथम अध्याय
प्रथमा वल्ली
शान्तिपाठ
ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य
करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु ।
मा विद्विषावहै।
ॐ शान्ति. | शान्तिः !! शान्ति. !!!
पदच्छेद-ॐ, सह, नौ, अवतु । सह, नौ, भुनक्त । सह, वीर्य, करवा-
वहै । तेजस्वि, नौ, अधीतम्, अस्तु । मा, विद्विषावहै ।
[शां०] ॐनमो भगवते वैवस्वताय मृत्यवे ब्रह्मविद्याचार्याय
नचिकेतसे च।
।
प्रथ अल्पग्रन्था - ( २ ) काठकोपनिषद्वल्लीना सुखार्थप्रबोधनार्थम् वृत्तिगरभ्यते। सदेर्धातोविंशरणगत्यवसादनार्थस्योपनिपूर्वस्य विप्प्रत्ययान्तस्य रूपमुपनिषदिति। उपनिषच्छब्देन च व्याचिख्यासितग्रन्थप्रतिपाद्यवेद्य- वस्तुविषया विद्योच्यते। केन पुनरर्थयोगेन उपनिषच्छब्देन विद्योच्यते ? इत्युच्यते- ये मुमुक्षवो दृष्टानुविक विषयवितृष्णाः सन्त उपनिषच्छब्दवाच्य वक्ष्यमारणलक्षणा विद्यामुपसद्योपगम्य तन्निष्ठतया निश्चयेन शीलयन्ति तेषामविद्यादेः ससारबीजस्य विशरणाद्धिमनगद् दिनाशनादित्यनेनार्थ- योगेन विद्या उपनिषदित्युच्यते। तथा च वक्ष्यति-निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते" (क० उ० ११३।१५) इति । पूर्वोक्तविशेषणान्मुमुक्षुन्वा पर ब्रह्म गमयतीति ब्रह्मगमयितृत्वेन योगाद् ब्रह्मविद्य पनिषद् । तथा च वक्ष्यति-"ब्रह्म प्राप्तो विरजोऽ भूद्विमृत्यु (क० उ०२।३।१८) इति । लोकादिब्रह्मजज्ञो योऽग्निस्तद्विष्णया विद्याथा द्वितीयेन वरेण प्रार्थ्यमानाया स्वर्गलोकफल प्राप्तिहेतुत्वेन गभवारजन्मजराद्य द्रव- वृन्दस्य लाकान्तरे पौन पुन्येन प्रवृत्तस्यावमादयतृत्वेन शेर ल्यापादनेन धात्वर्थयोगादग्निविद्याप्युपनिषादत्युच्यते । तथा च वक्ष्यति-स्वर्ग- लोका अमृतत्व भजन्ते" (क० उ. १९१३१३) इत्यादि । ननु चोपल्पिच्छब्देनाध्येतारो ग्रन्थमप्यभिलन्ति-- उमानषदमधी- महै, उपनिषदमध्यापयाम इति च ? एक नेप दोषोऽविद्यादिससारहेतुविशरणादे सदिधात्वर्थस्य ग्रन्थमात्रेऽम्भवाद्विधाया च सम्भवात् ग्रन्थस्यापि तादयेन तच्छब्द- त्वोपपत्त, प्राय घृतमित्यादिवत् । तस्माद्विद्याया मुख्यया वृत्योप- निषच्छब्दो वर्तते, ग्रन्थे तु भक्त्येति । एवमुपनिषन्निर्वचनेनैव विशिष्टोऽधिकारी विद्यायामुक्त । विषयश्च विशिष्ट उक्तो विद्यायाः पर ब्रह्म प्रत्यगात्मभूतम् । प्रयोजन चास्या उपनिषद आत्यन्तिकी ससारनिवृत्तिबह्मप्राप्तिलक्षणा। सम्बन्धश्चै- .
( ३ ) वम्भूतप्रयोजनेनोक्तः। अतो तथोक्ताधिकारिविषयप्रयोजनसम्बन्धाया विद्यायाः करतलन्यस्तामलकवत् प्रकाशकत्वेन विशिष्टाधिकारिविषय- प्रयोजनसम्बन्धा एता वल्लयो भवन्ति इत्यतस्ता यथाप्रतिभान व्याचक्ष्महे। मस्कृत व्याख्या-ॐ पदवाच्यः परमात्मा । नौ-आवाम् ' द्वौ (गुरु- शिष्यौ ) सह-सार्धम् । अवतु-रक्षतु । नौ-आवाम् द्वौ। सह-मार्धम् । सुनक्तु पालयतु । वीयम्-पराक्रमम् ( पुरुषार्थम ) । सह-साधम् । करवावहै , कुर्याव । नौ-आवयोः (द्वयो ' अबीतम्-अव्ययनम् ( पठितम् ) तेजस्वि: प्रकाशमयम्। अस्तु-भूयात् । मा-नैव । विद्विपाव है-परस्पर द्वषम् कुर्याद । हिन्दी शब्दार्थ-- सह = साथ ( साथ-साथ ) । नौ -- हम दोनों (गुरु शिष्य । अवतु = रक्षा करे । भुनक्त = पालन करें । वीर्य = पराक्रम ! करवाब- हे - करे । तेजस्वि = प्रकाशमय । अधीतन् = अध्ययन किया हुया । अस्तु = हो । मा = (कभी) नहीं । विद्विपाव है द्वेष करे । भावार्थ-यह वैदिक परम्परा मे शान्ति पाठ है, इसका भावार्थ यह कि ओंकार पद से कहे जाने वाले परमात्मा हम दोनों (गुरु और शिष्य ) की रक्षा करें तथा हम दोनों का माय-साथ पालन करें। हम दोनों एक साथ ही मिल कर पुरुषार्थ के लिए पराक्रम करे । हम दोनों का पढा हुअा इस लोक तथा परलोक में प्रकाशमय हो । हम किसी से दूप न करे । विशेष-१ वेद को आनुश्रविक कहते हैं (वेदस्याध्ययन सर्व गुर्वध्ययन- पूर्वकम् ) वेदों का सब अध्ययन गुरु से अध्ययनपूर्वक ही होता है। गुरु के उच्चारण के पश्चात् उच्चारण करना यही प्रानुश्रविक शब्द का अर्थ है। वेदारम्भ के समय गुरु शिष्य ही प्रस्तुत होते हैं, इसलिए आवाम इस द्विवचन से गुरु शिष्य ही ग्रहण किये गए है। २. भुनक्तु शब्द भुज धातु से बनता है । इसके दो अर्थ हैं-पालन ( रक्षा । और भोजन करना । पूर्व में भी रक्षतु पद आया है इससे पालन कहने से पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि त्रिविध ताप ( आध्यात्मिक, आधिदैविक, आधिभौतिक ) से बचाना रक्षा है, योगक्षेम करना (अलब्ध वस्तु का लाभ योग है, लब्ध का रक्षण) है ( ४ ) पालन पदाथ है । ३. करवावहै-कृ धातु का विधिलोट् आत्मनेपद मे उत्तम पुरुष का द्विवचन है। ४-तेजस्वि इस लोक और परलोक मे प्रकाशमय होना, क्योंकि वैदिक परम्परा परलोक मे अधिक विश्वास करती है । ५. मा-निषेधार्थक अव्यय पद है। May He ( God ) protect and support us both ( the teacher and taught ) to-gether May we both try to achieve opulence and to continue our study together May our study be sublime and there be no bitterness and malice between us. ॐउशन्ह वै वाजश्रवस. सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र आस ॥ १ ॥ पदच्छेद.. .-उशन्, ह, वै, वाजश्रवसः, सर्ववेदस, ददौ, तस्य, ह, नचिकेता, नाम, पुत्रः, श्रास । अन्वय-ह वै वाजश्रवसः सर्ववेदसम् ददौ । तस्य ह नचिके ता नाम पुत्रः आस । [शा०] तत्राख्यायिका विद्यास्तुत्यर्था। उशन्कामयमानः, ह वा इति वृत्तार्थस्मरणार्थों निपातौ। वाजमन्न तद्दानादिनिमित्त श्रवो यशो यस्य स वाजश्रवाः, रूढितो वा। तस्यापत्य वाजश्रवस. किल स. विश्वजिता सर्वमधेनेजे तत्फल कामयमानः। स तस्मिन्क्रतौ सववेदस सर्वस्व धन ददौ दत्तवान् । तस्य यजमानस्य ह नचिकेता नाम पुत्रः किलास बभूव ॥१॥ सस्कृत व्याख्या-उशन्-कामयमान. (स्वर्गादिलोकान् अभि- लषन् ) वाजश्रवस.-वाजम्-अन्नम् तेनान्नेन दानादिकर्मणा श्रव कीत्तियस्य स वाजश्रवास्तस्यापत्यम् वाजश्रवसः, अथवा रूढिनाम कस्यचिद् ऋषेः। ( स विश्वजिता सर्वदक्षिणेन यज्ञेन ) सर्ववेदस--सर्वधन-ददौ दत्तवान् , तस्य ~ऋपेः ( गौतमगोत्रस्य ) नचिकेता नाम पुत्रो ह किल आस-बभूव । हिन्दी शब्दार्थ-वाजश्रवसः = वाजश्रवा नामक ऋषि के पुत्र वाजश्रवस - नामक ऋषि । उशन् = कामना करते हुए। सर्ववेदसम् = सम्पूर्णघन । ददौ-दे दिया । आस -- था। भावार्थ -वाजश्रवा के पुत्र वाजश्रवस नामक ऋषि ने स्वर्गादिलोक प्राप्ति कामना से विश्वजित् नामक यज्ञ करके अपना सब धन ऋत्विज आदि को दान मे दे दिया। उनका एक नचिकेता नाम का पुत्र था। विशेष-उशन्' इस पद से काम्य कर्म की पर्ति के लिए दक्षिणा आवश्यक है यह सूचित किया गया है । 1 Once upon a time at the vishwajit sacrifice vajasravas ( the son of vajasrava ) having a desire of heavenly rewards, sacrificed every thing what he possessed. He had a son called Nachiketa, as it is said. तँ ह कुमार सन्तं दक्षिरणासु नीयमानासु । श्रद्धाऽऽविवेश सोऽमन्यत ॥२॥ पदच्छेद-सन्त, कुमार, तं, दक्षिणासु, नीयमासु, श्रद्धा, आविवेश, सः, अमन्यत। अन्वय-कुमारम् सन्तम् तम् दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धा आविवेश सः अमन्यत। [शां०] त ह नचिकेतस कुमार प्रथमवयस सन्तमप्राप्तजननशक्ति बालमेव श्रद्धास्तिक्यबुद्धिः पितुर्हितकामप्रयुक्ताविवेश प्रविष्टवती । कस्मिन् काल इत्याह-ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च दक्षिणासु विभागेनोप- नीयमानासु दक्षिणार्थासु गोषु । स आविष्टश्रद्धो नचिकेता अमन्यत । सस्कृत व्याख्या-सन्तम् - उपस्थितम्-कुमारम्'-नचिकेतसम तम् दक्षिणासु नीयमानासु-ऋत्विग्भ्यः सदस्येभ्यश्च प्राप्यमाणासु ( गोषु ) श्रद्धा-श्रास्तिक्यबुद्धिः। आविवेश-प्राप । सः कुमार । अचिन्तयत् । हिन्दी शब्दार्थ -त कुमार सन्तम् = ( यद्यपि ) वह ( नचिकेता) बालक था। नोयमानासु = ले जाते हुए । श्रद्धा - आस्तिक बुद्धि । आविवेश - उत्पन्न हुई । स अमन्यत = उसने विचार किया। अमन्यत- ( ६ ) भावार्थ- उपस्थित वह कुमार नचिकेता ( यद्यपि बाल अवस्था का ही था तथापि अपने सम्मुख ) दान मे अनर्ह गोदान से पिता का नरकादि लोक प्राप्ति रूप अहित समझ कर ऋत्विजों तथा सदस्यों द्वारा ले जायी जाने वाली गायों को देखते हुए हृदय में श्रद्धा बुद्धि उत्पन्न होने से इस प्रकार विचारारूढ हो गया। विशेष कुमार-कु= कुत्सित. = मार.-कामोयस्य स कुमार इस व्युत्प- त्तिसे कुमार शब्द का अथ अप्राप्त यौवन (प्रजननादिशक्तिक) है। २-दक्षिणासु-वृद्धा-"जो गावो रजा कन्या जीर्णवासो ददाति यः तावन्नरके वासो याछिद्रा चतुर्दश इत्यादि वचनानुसार अ.गे के मन्त्रों के कथनानुमार दुग्ध रहितादि गायों को दक्षिणा मे दिये जाने के परिणाम की चर्चा है। 2 When the gifts ( old cows ) were being sorted and carried (to give the priests and Brahmans assembled ) Nachiketa, though still a boy, was overpowered with the faith ( to do good to his father) and thought नचिकेता की शङ्का पीतोदका जग्धतृणा दुग्धदोहा निरिन्द्रिया. । अनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता ददत् ॥ ३ ॥ पदच्छेद-पीतोदकाः, जग्धतृणा., दुग्घदोहा , निरिन्द्रिया', अनन्दाः, नाम, ते. लोका' तान् स, गच्छति ताः ददत् । अन्वय-पीतोदका' जग्धतृणाः दुग्धदोहा निरिन्द्रियता ददत् सः तान् लोकान् गच्छति ते नोका अनन्दा नाम । [शा०] कथमित्युच्यते। दक्षिणार्था गावो विशेष्यन्ते। पीतमुदक याभिस्ता. पीतोदकाः, जग्ध भक्षित तरण याभिस्ता जग्धतणा , दुग्धो दोहः क्षीराख्यो यासा ता दुग्धदोहाः, निरिन्द्रिया अप्रजननसमर्था जीर्णा निष्फला गाव इत्यर्थः । यास्ता एवभूता गा ऋत्विग्भ्यो दक्षिणाबुद्धया ददत्प्रयच्छन्ननन्दा अनानन्दा असुखा नामेत्येतद्य ते लोकास्तान्स यजमानो गच्छति ।
( ७ ) . सस्कृत व्याख्या-पीतोदकाः' -पीतमुदक याभिस्ताः पीतोदकाः । वृद्धत्वात् जलपानशक्तिरहिता इत्यर्थः। जग्धतृणाः-जग्ध तृण यामिस्ताः, घासादिभक्षणासमर्थाः । दुग्धदोहाः-दुग्धो दोहो यासास्ता , निरिन्द्रियाः अप्रजनन समा., वृद्धा निष्फला इत्यर्थः, एवमुता या गावस्ता ददत्- (ऋत्वग्भ्यो दक्षिणारूपेण, प्रायच्छत् । अनन्दा सुखविहीनास्ते शास्त्र- प्रसिद्धा लोकाः सन्ति तत्र स यजमानो गच्छति । इति नांचकेता अमन्यतेति पूर्वेण योजना। हि० श.--पीतोदका = जो जल पी चुकी है अर्थात् जिन मे ( वृद्धा- वस्थावश ) जल पीने की शक्ति नहीं रह गयी है । जग्धतृण =घास खाने में असमर्थ । दुग्धदोहा दूध देने मे असमर्थ । निरिन्द्रिया प्रजनन- शक्ति हान अथात् बछड़ा देने में असमर्थ । अनन्दा अानन्द रहित, दुख कारक। भावार्थ-बृद्वा अवस्था वाली गौए जो जल पीकर विरत हो गई हैं अर्थात् जल पीने में असमर्थ हैं एव घास खाने मे और दूध देने में भी असमर्थ तथा जनन शक्ति रहित अर्थात् बछड़ा ब्याने म असमथ ऐसी निष्फल गौओं को दक्षिणा रूप में होता इत्यादि को देने वाला यजमान अनन्द ( आनन्द रहित~दुःखोदर्क ) लोक को जाता है। ऐसा नचिकेता ने विचार किया। विशेष-पीतोदका' इत्यादि पद बहुव्रीहि समास हैं सभी शब्द गायो के वाचक हैं। सभी लाक्षणिक प्रयोग हैं। 3 He, who ingifts, endows such that have drunk their water and eaten their grass and that are incapable of bearing calves and giving milk, goes to such worlds that are full of sorrow and are joyless. पिता के प्रश्न स होवाच पितर तत कस्मै मा दास्यसीति । पदच्छेद-सः, ह, उवाच, पितरम, तात ! कस्मै माँ दास्यास, इति, द्वितीयम्, तृतीयम् । COWS - ( ८ ) अन्वय-सः पितरम् उवाच ह तत कस्मै मा दास्यसि इति । सस्कृत व्याख्या-स-नचिकेता.', इ, निश्चयार्थको निपातः, पितरा स्वजनकम् उवाच-उक्तवान् - तात-हेपितः, मा पुत्ररूप धनम् कस्मै- याज्ञिकाय ऋत्विजे दक्षिणारूपेण दास्थसि इति । प्रथममुक्तेनापि पित्रा, उपेक्ष्यमाणो द्वितीयम् तृतीयम् श्रावृत्त्या उक्तवान् तादृशमेव वाक्यम् । भावार्थ-दी जानेवाली दक्षिणा के अनौचित्य को समझकर नचि- केता अपनी आत्मा को भी देकर पिता के लाभ की इच्छा करता हुआ अपने पिता से बोला-हे पिता। मुझे दक्षिणा मे किसको देंगे? जब पहलीबार कहने से पिता ने पुत्र की बात की उपेक्षा को तो दुवारा, तिबारा अाग्रह करने लगा। विशेष-१. नचिकेता को जन्मान्तर का तप.पूत होने के कारण- "शुचीना श्रीमता गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते" अथवा "योगिनामेव कुले भवति धीमताम्" इत्यादि गीता के कथन अनुसार अल्पकाल मे ही ऐसी आस्तिक बुद्धि जागृत हुई और पिताको पाप से बचाने का उपाय उसने सोचा। पिता का उत्तर द्वितीयं तृतोयं त होवाच मृत्यवे त्वां ददामीति॥ ४॥ पदच्छेद-तम्, ह, उवाच, मृत्यवे त्वा, ददामि इति ॥४॥ अन्वय-द्वितीयम् तृतीयम् । ( अपि सः पित्रे उवाच ) तम् ह पिता उवाच त्वा मृत्यवे ददामि । इति । [शा०] तदेव क्रत्वसम्पत्तिनिमित्त पितुरनिष्ट फल मया पुत्रेण सता निवारणीयमात्मऽ दानेनापि ऋतुसम्पत्ति कृत्वेत्येव मन्यमानः पितरम् उपगम्य स होवाच पितर-हे तत तात कस्मै ऋत्विग्विशेषाय दक्षिणार्थ मा दास्यसि प्रयच्छसीत्येतत् । एवमुक्तेन पित्रोपेक्ष्यमाणोऽपि द्वितीय तृतीयमप्युवाच-कस्मै मा दास्यसि कस्मै मा दास्यसीति । नाय कुमार- स्वभाव इति ऋद्धः सन्पिता त ह पुत्र किलोवाच मृत्यवे वैवस्वताय त्वा त्वा ददामीति। संस्कृत व्याख्या-तम्-पुत्र नचिकेतसम्, ह, उक्तोऽयः, उवाच- ( ६ ) 4. उक्तवान् । त्वाम्-अनवसरवादिनम् , मृत्यवे-यमराजाय, ददामि-दास्यामि इति क्रोधावेशेन उक्तवान् ।।४।। हि. श.--पितरम् = पिता से । उवाच = बोला। कस्मैक्सिको अर्थात् किस होता या ऋत्विज को । माम् = मुझे । दास्यसि = देगे। द्वितीय तृतीयम् - दुबारा तिवारा । तम् = उसे अर्थात् नचिकेता को, त्वाम् = तुमको मृत्यवे = यमगज को। ददानि = दूगा। भावार्थ-क्रोध मे श्राकर पिताने पुत्र नचिकेताको कहा-तुम्हे यमराज को दूंगा। विशेष -इस प्रकार कहने पर भी उसे न तो भय हुअा न भ्रम या क्रोध, और शान्तिपूर्वक फिर बोला। "To whom will you offer me. My father " Asked he once, twice and thrice And then his father answered him ( in anger) "I will present you to death नचिकेताका अनुताप बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । कि स्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति ॥ ५ ॥ पदच्छेद-बहूनाम्, एमि, प्रथम', बहूनाम् एमि मध्यमः, किंस्वित्, यमस्य कर्तव्यम्, यत्, मया, अद्य, करिष्यति । अन्वय- बहूनाम् प्रथमः एमि, बहूनाम् मध्यमः एमि, यमस्य किस्वित् कर्तव्यम् यत् मया अद्य करिष्यति । [शा०] स एवमुक्तः पुत्र एकान्ते परिदेवयाञ्चकार। कथम् ? इत्युच्यते- बहूना शिष्याणां पुत्राणा वैमि गच्छामि प्रथमः सन्मुख्यया शिष्यादिवृत्त्येत्यर्थ । मध्यमाना च बहूना मध्यमो मध्यमयैव वृत्त्येमि । नाधमया कदाचिदपि । तमेव विशिष्टगुणमपि पुत्र मा मृत्यवे त्वा ददामीत्युक्तवान् पिता। स किस्विद्यमस्य कर्तव्यं प्रयोजन मया प्रक्तेन करिष्यति यत्कर्तव्यमद्य ? नूनं प्रयोजनम् अनपेक्ष्यैव क्रोधवशादुक्तवान्
( १० )
-
पिता। तथापि तत्पितुर्वचो मृषा मा भूदित्येवं मत्वा परिदेवनापूर्वकमाह
पितर शोकाविष्ट कि मयोक्तमिति ।
संस्कृत व्याख्या-बहूनाम-मध्ये प्रथम एवाहम् एमि-गच्छामि, बहूनाम्
तादृशाना बहूनाम्मध्ये मध्यमः एवाहम, एमि गच्छामि । न तु मन्थरगमनेन
पश्चात् इति भावः । तर्हि किमित्याह मृत्युमयाऽद्य यत्करिष्यति तत्तादृश
यमस्य कर्तव्यम् । मादृशेन वालिशेन मृत्योःकि-प्रयोजनम् स्यात् यन
भृत्विरस्य इव मम गमन सफलम् स्याद् इति भावः।
हि० श.-बहनाम् = बहुत से पुत्रों या शिष्यों में। प्रथम = श्रेष्ठ ।
एमि = हूँ । किं स्वित् = कौन सा ! कत्र्तव्यम् = कार्य यत् = जो । मया =
मुझसे । अद्य=आज | करिष्यति = कराया जायगा ।
.-नचिकेता पिता की बात सुनकर सहर्ष बोलता है कि
(पिताके ) शिष्यों मे, मैं बहुतों से अच्छा हूँ ( कई शिष्यों की अपेक्षा मेरा
व्यवहार उत्तम है ) और बहुतों से मध्यम हूँ ( कई शिष्यों की अपेक्षा मेरा
व्यवहार मध्यम है) किन्तु किसा से अघम वृत्ति मेरी नहीं है फिर भा पिता
मुझे मृत्यु के मुखमे दे रहे हैं। आखर यमराज को क्या काम है जो मुझसे
श्राम कराया जायगा।
विशेष-प्रकृत मन्त्र से यहो तात्पर्य हुआ कि व्यङ्ग ध्वनि से नचिकेता
यही कहना चाहता है कि जैसे ऋत्विजों को अनह गौओं का दान निष्फल
है, उसी प्रकार यमराज को मुझे दे देना भी निष्फल प्रतीत होता है ।
5 Having heard his father's word he thought to himself
among many ( sons & disciples ) I am at the top and among
many in the middle What object of death can be there that
my father wants to achieve through me
अपने अनुचित कथन पर पश्चात्ताप करते हुए पिता को देखकर
नचिकेता ने
पुनः
पिता से कहा-
पिता से आग्रह
अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथापरे ।
सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः ॥६॥
( ११) पदच्छेद-अनुपश्य, यथा, पूर्वे, प्रतिपश्य, तथा, अपरे, सस्यम् इव मयं. पच्यते, सस्यम् इव, श्राजायते, पुनः ।। अन्वय-पूर्वे यथा (वृत्ता.) अनुपश्य तथा अपरे प्रतिपश्य । मर्त्यः सस्यम् इव पच्यते, पुनः सस्यम् इव आजायते । [शा०] अनुपश्यालोचय निभालय अनुक्रमेण यथा येन प्रकारेण वृत्ता. पूव अतिक्रान्ता पितृपितामहादयस्तव। तान्दृष्ट्वा च तेषा वृत्तमास्थातुमहास । वतमानाश्च साधवो यथावतन्ते ताश्च प्रतिपश्या- लोचय तथा न च तेषु मृषाकरण वृत्त वर्तमान वास्ति। तद्विपरीतम- सता च वृत्त मृषाकरणम्। न च मृषा कृत्वा कश्चिदजरामरो भवति । यत सस्यमिव मयों मनुष्य. पच्यत जाणा म्रियत। मृत्वा च सस्यमिव पाजायते आविर्भवति पुन. एवम नित्ये जीवलो कि मृषाकरणेन । पालय प्रात्मन. सत्यम् । प्रषय मा यमाय इत्यभिप्रायः। सस्कृत व्याख्या - पूर्व-पितामहादयः, यथा-यन प्रकारेण (मृषावादादि परित्यज्य स्थिता.) तथा तन प्रकारण अपर इतरे (साघव.) अद्यापि तिष्ठन्ति इति यावत् । अनुपश्यैतान् अवलोकय तान् प्रातपश्य प्रत्यलाकय सर्वान् दृष्ट्वा तथेव भवताप वतितव्यामातभावः । यताहि मर्त्य -मरणधर्ममृत्युलोकेप्राणा सस्यमिव-धान्यसदृश. (अल्पकालेन) पच्यत जाणता प्राप्नाति (जीणश्च पुन.) सस्यमिव-धान्यसदृश एव पुनराजायते-पुनरुत्पद्यते । हि० श० -पू व = पहल के अर्थात् पितामह आदि पूर्वज | यथा जैसे । अनुपश्य दाखय । पूर्व यथा अनुपश्य = अथात् अपने पितामह आद पूर्व पुरुषों को देखिय (ओर) उनक सदृश (आचरण) कााजय । अपरे = दूसर । सस्यम् = धान्य । इव = सहश । मर्त्य = मनुष्य । प्रतिपश्य = देखिये । पच्यते = पक जाता है वृद्ध मर जाता है । सस्यमिव=अन्न की तरह पुनः% फिर । श्राजायते पैदा होता है। भावार्थ- पूर्व के पितामह आदि श्रेष्ठ लोग जिस प्रकार आचरण करते रहे उसपर दृष्टिपातकरे और अन्य साधुजन अाज भी जैसे स्वधर्म मे स्थित हैं उनको देखिए । इस मृत्यु लोक मे प्राणी धान्य की तरह थाड़े ( १२ ) समय म पककर जर्जर होकर मरते हैं और फिर समय से अन्न की तरह उत्पन्न होते हैं। विशेष-यथा जिस प्रकार पूर्वज मिथ्यावाद को छोड़ कर जीते रहे हैं उसी प्रकार आपको भी होना चाहिए । इस लिए हमारे मोहको छोड़कर अपने सकल्पवाक्यानुसार यमराज को देने में अब सकोव न कोजिए यह भाव है, अपरे-अाधुनिक साधुजनों से तात्पर्य है। ३-सस्यमिव-जैसे क्षेत्र में धान्य अल्पकाल मे पक जाता है उसी प्रकार इस मृत्युलोक मे प्राणी भी थोडे समय में जीर्ण होकर मर जाते हैं और फिर पैदा होते हैं। इस लिए इस नश्वर और अस्थिर जगत् मे आस्था न रखकर सत्यमार्ग का अवलम्बी होना चाहिए। 6. Think over your forefathers how they behaved and also consider how the other peoples do ( Now a days ) the mortal is like corn which once ripens and grow again. अनुक्रम-इस प्रकार सुनकर पिता ने मिथ्यावाद से डर कर नचिकेता को यमराज के यहा भेज दिया और नचिकेता ने यमराज के द्वार पर जाकर तीन रात्रि पर्यन्त बिना खाये पिये निवास किया । यमराज उस समय अन्यत्र गये थे, प्रवाम से आने पर वृद्ध मन्त्रियों ने इस प्रकार यम से कहा यमलोक मे नचिकेता के सत्कार का आग्रह वैश्वानरः प्रविशत्यतिथिहिमणो गृहान् । तस्यैता शान्ति कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥ ७ ॥ पदच्छेद-वैश्वानर. प्रविशति, अतिथिः ब्राह्मण. गृहान् । तस्म एताः शान्तिम् , कुर्वन्ति, हर, वैवश्वत उदकम् ।। अन्वय-ब्राह्मणः अतिथि (सन् ) वैश्वानरः ( इव ) गृहान् प्रविशति, तस्य एताम् शान्ति कुर्वन्ति वैवस्वत् उदकम् हर । [गा०] स एवमक्त पितात्मन सत्यतायै प्रेषयामास। यमभवन गत्वा तिस्रो रात्रीः उवास यमे प्रोषिते। प्रोष्यागत यमममात्या भार्या वा ऊचुर्बोधयन्तः- - ( १३ ) वैश्वानरोऽग्निरेव साक्षात् प्रविशत्यतिथिः सन्ब्राह्मणो गृहान दहन्निव तस्य दाहं शमयन्त इवाग्नेरेता पाद्यासनादिदानलक्षणा शान्ति कुर्वन्ति सन्तोऽतिथेर्यतोऽतो हराहर हे वैवस्वत उदक नचिकेतसे पाद्या- र्थम् । यतश्चाकरणे प्रत्यवाय श्रूयते । सस्कृत व्याख्या-वैश्वानरः-साक्षादग्निरेव, अतिथि-अतिथिरूपेण ब्राह्मणः, गृहान् प्रविशति गृह आगच्छति, तस्य-अतिथेः एता. पद्यार्धादि- रूपाः शान्ति कुशल, कुर्वन्ति, सन्तः साधवः, अतो हे वैवश्वत-यम उदक हर तस्य पूजनाय जलमानय । हि० श०-वैश्वानरः = अग्नि । ब्राह्मण =ब्रह्मज्ञानी। प्रविशति प्रवेश करता है, अाया हुआ है । तस्य = उस ( अतिथि ) को । एता = इम ( पूजादि ) । शान्तिम् = प्रसन्नता को ! वैवस्वत = यम । हर = लाइये। उदकम् भावार्थ-साक्षात् अग्नि रूप ही ब्राह्मण अतिथि होकर गृहस्थ के धर मे आता है, पूज्य होता है, उसकी पूजा के लिए सन्त ज्ञानी लोग पाद्य अर्घ आदि विधि का अपने ही कुशल के लिए करते हैं। इसलिए हे यमदेव आपके यहाँ भो अतिथि आया है उसकी पूजा कीजिये । विशेष-१ अतिथि-भारतीय परम्परा में शास्त्रों के आधार पर अतिथि का बहुत महत्त्व कहा गया है। "गुरुरग्निद्विजातीना, वर्णाना ब्राह्मणो गुरुः, पतिरेको गुरुः स्त्रीणा सर्वस्याभ्यागतो गुरुः। अतिथिर्यस्य भग्नाशो गृहात्प्रति निवर्तते, स तस्मै दुष्कृत दत्वा पुण्यमादाय गच्छति ॥२॥ इत्यादि । अर्थात् अतिथि यदि निराश होकर घर से चला जाय तो वह अपने पाप को देकर उस गृहस्थ के पुण्य को लेकर चला जाता है। किन्तु यह बात स्मरण रहे कि अतिथि की परिभाषा क्या है, इस विषय मे मनु ने लिखा है कि जिसके आनेकी कोई निश्चित तिथि न हो। A Brahmana guest enters the house like fire. House holders welcome him with the appeasing offerings therefore O Death bring water etc ( for him ) उपक्रम-उपयुक्त विषय को लेकर अग्रिम मन्त्र है । अतिथि की उपेक्षा मे अधिक प्रत्यवाय और मगल की हानि है।-- 7 ( १४ ) एतद् वृङक्ते अाशाप्रतीक्षे संगत सूनृतां च इष्टापूर्ते पुत्रपशूश्च सर्वान् । पुरुषस्याल्पमेधसो यस्यानश्नन्वति ब्राहमणो गृहे ।। ८॥ पछच्छेद-आशाप्रतीक्षे, सगतम्, सूनृताम् च, इष्टापूर्ते पुत्रपशून्, च, सर्वान् । एतद् वृडते, पुरुषस्य, अल्पमेधसः यस्य, अनश्नन्, वसति, ब्राह्मणः गृहे ॥ अन्वय-ब्राह्मण अनश्नन् यस्य गृहे वसति ( तस्य ) अल्पमेधसः पुरुषस्य आशाप्रतीक्षे सङ्गतम् सूनृताम् इष्टापूर्ते पुत्रपशून् सर्वान् एतत् वृक्त। [शा०] आशाप्रतीक्षऽनितिप्राप्येष्टार्थप्रार्थना प्राशा, निति प्राप्यार्थप्रतीक्षण प्रतीक्षा, ते आशाप्रतीक्षे। संगत तत्सयोगज फलम्, सूनृता च सूनुता हि प्रिया वाक्तानिमित्त च, इष्टापूर्ते इष्ट यागज पूर्तमा- रामादिक्रियाज फलम्, पुत्रपशू श्च पुत्राश्च पशूश्च सर्वानेतत्सर्व यथोक्त वृक्ते आवर्जयति विनाशयतीत्येतत्, पुरुषस्याल्पमेधसोऽल्पप्रज्ञस्यः यस्यानश्नन्नभुञ्जानो ब्राहमणो गृहे वसति । तस्मादनुपेक्षणीयः सर्वा- वस्थास्वप्यतिथिरित्यर्थः। संस्कृत व्याख्या-अल्पमेधसः-अल्पप्रज्ञस्य पुरुषस्य यस्य गृहे ब्राह्मणो-अनश्नन्-अन्नमभुजानो-वसति, पुरुषस्य- अाशाप्रतीक्षे-आशा च प्रतीक्षा च आशा प्रतीक्षे (द्वन्द्वसमासः) काम सकल्पो, संगत -नत्सगम सूनृता सत्यप्रियवाचम् इष्टापूत - इष्ट च पूर्तम् - इष्टापूर्ते, इष्ट ~यागादि, पूर्त-कूपाराममठादिनिर्माणम्, पुत्रान् पशून् , च सर्वान् एतद वृडक्त-वृजि वर्जने इनि वजयति नाशयति इति तत्त्वम् । हि. श०-यस्य - जिसके। गृहे - घर मे। ब्राह्मण = ब्रह्मज्ञानी ( अथि ) अनशन् -- बिना भोजन किये। वसात = निवास करता है। तस्य अल्पमेधसः == उस अल्पबुद्धिवाले पुरुष की । अाशा = अज्ञात वस्तु को पाने की इच्छा । प्रतीक्षा = ज्ञात वस्तु को पाने को इच्छा । सङ्गतम् - तस्य %3D- ( १५ ) सत्सगति । सुनृताम् = प्रिय वाणी इष्टापूर्त = यज्ञादि का फलोदय । सर्वान् = सभी। पुत्रपशून् = पुत्र और पशु एतत् = इन सबों को। वृडक्त = नष्ट करता है। भावार्थ-जिस अल्पज्ञानी पुरुष के घर मे ब्राह्मण अतिथि रूप मे आकर बिना खाये पिये बसता हा, उस पुरुष के सकल्प मनोरथ तथा सत्संगति, और मत्यत्रियवाणी तथा किया हुआ यज्ञादि कर्म, कर वाटिका धर्मशाला आदि लोकापकार कर्म, पुत्र और पशु आदि का नाश करता है । विशेष- इस मन्त्र में यह कहा, कि पुरुष के लिए अन्य मब शुभ कर्मों से अतिथि सत्कार श्रेष्ट है । महापुरुपो का कहना है कि भगवत अर्चन, पूजन मे मिद्धि हो न हो किन्तु अतिथि मेवा से इह लौकिक और पारलौकिक दोनों सिद्धि होने मे सशय ही नहीं है। 8 That man of little in-telligence to whose house a. brahman guest comes and gets no food or hospitality destroys all hope, expectation, the fruit of good associations, sweet words sacifice, charity sons and catte etc (theze foie ) at any cost a guest should never be negleted ), उपक्रर-इस प्रकार मन्त्रियों के कहने पर यमराज ने नचिकेना से कहा- यमराज द्वारा वर प्रदान तिस्त्रो रात्रीर्यदवात्सीगृहे मे अनश्नन्ब्रमन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्मन्स्वस्ति मेऽस्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ६ ॥ पदच्छेद-तिस्र', गत्री. यद्, अवात्मी., गृहे, मे, अनश्न् ब्रह्मन्, अतिथि , नमस्य , नमः, ते, अस्तु, ब्रह्मन् , सस्ति मे, अस्तु, तस्मात्, प्रति, त्रीन्, दरान्, वृणीष्व अन्वय-हे ब्रह्मन् यत् अतिथिः त्वम् अनश्नन् गृहे तिस्त्रोरात्री. अवात्सी: तस्मात् प्रति त्रीन् वरान् वृणीष्व हे ब्रह्मन् ते नमः अस्तु, मे स्वस्ति अस्तु ।
( १६ ) - - [शा०]-एबमुक्तो मृत्युरुवाच नचिकेतसमुपगम्य पूजापुर सरम्- तिस्रो रात्रोर्यद्यस्मादवात्सीः उषितवानसि गृहे मे ममानश्नन् हे ब्रह्मन्न- तिथिः सन्नमस्यो नमस्कारार्हश्च तस्मान्नमस्ते तुभ्यमस्तु भवतु । है ब्रह्म- स्वस्ति भद्रं मेऽस्तु तस्माद्भवतोऽनश्नेन मद्गृहवासनिमित्ताद्दोषात्प्रा- प्त्युपशमेन । यद्यपि भवदनुग्रहेण सवं मम स्वस्ति स्यात्तथापि त्वदधिक- संप्रसादनार्थमनश्नेनोषिताम् एकैको रात्रि प्रति त्रीन्वरान् वृणीष्व अभिप्रेतार्थविशेषान् प्रार्थयस्व मत्तः ।। ६ ।। सस्कृत व्याख्या-हे ब्रह्मन्, यस्मात्कारणाद् भवान, अतिथि. तस्माद हेतोः इति अध्याहारेणान्वयः, भवान्नमस्यः मे गृहे यतिस्रोराशी. अनश्न- अन्नममुजेन अवात्सी.-ऊपिवान् । हे ब्रह्मन ते तुभ्यम्, नमः नमस्कारोऽ स्तु मे-मह्यम् स्वस्ति, अस्तु, तस्माद् हेतो मह्य स्वस्ति यथास्यात, इत्येवमर्थ त्रीन् वरान् प्रतिरात्रिम् उद्दिश्यवृणीष्व-प्रार्थय । हि. श०-नमस्य = नमस्कार करने योग्य । अतिथि. = अभ्यागत ( नचिकेता) ते = आपको। नमः = नमस्कार है। मे = मेरा । स्वस्ति कल्याण । अस्तु = हो। यत् = जो । मे = मेरे । गृहे = घर मे । तिस्त्र तीन । रात्रीः रात । अनशन् = बिना खाये। अवात्सी = निवास किये। तस्मात् = इस कारण से । प्रति = एक-एक रात के लिए । त्रीन् - तीन । वरान् = वरदान । वृणीष्व = मॉग लो। भावार्थ - हे ब्रह्मन् आप अतिथिरूप से नमस्कार के पाग हैं, जिस कारण आपने हमारे घर मे तीन राशि बिना अन्न खाये बास किया इसलिये आपको नमस्कार है जिससे हमारा कल्याण हो इसके निमित्त प्रत्येक रात्रि वास की सख्या से तीन वरदान मॉग लो। विशेष-जन्म जन्मान्तर के पुण्यों द्वारा बाल अवस्था में ही यम के पास स्वस्तिमान होकर जाना और उनसे सम्मान को प्राप्त करना, इससे ऋषि पुत्र का लोकोत्तर प्रभाव का वर्णन किया गया है । 9 Since you have lived as a venerable guest in my house without eating and drinking for three nights O my Brahaman ( now ) accept my selutation and let there be ( १७ ) good fortune to me from that error'ask for three boons for each of the three nights नचिकेता द्वारा प्रथम वर (पितृपरितोष ) की याचना उपक्रम-इस प्रकार यम के प्रार्थना करने पर नचिकेता उत्तर देते हुए बोला। शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्या- द्वीतमन्युगौतमो माभिमृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतोत. एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥ १० ॥ पदच्छेद-शान्तसकल्प', सुमनाः, यथा, स्यात्, वीतमन्युः, गौतमः, मा, अभि, मृत्यो, त्वत्प्रसृष्ट, मा, अभि, वदेत्, प्रतीतः, एतत्, शयाणा, प्रथम, वरं, वृणे। अन्वय-मृत्यो गौतमः शान्तसङ्कल्प सुमनाः मा अभिवोतमन्युः यथा स्यात् प्रतीतः त्वत्प्रसृष्टम् माभिवदेत् एतत् त्रयाणाम् प्रथम वरं वृणे । शा० -- नचिकेतास्त्वाह-यदि दित्सुर्वरान् -शान्तसंकल्प उपशान्त: संकल्पो यस्य मा प्रति यम प्राप्य कि नु करिष्यति मम पुत्र इति स शान्तसंकल्पः सुमनाः प्रसन्नमनाश्च यथा स्याद्वोतमन्युविगतरोषश्च गौतमो मम पिता माभि मा प्रति हे मृत्यो कि च त्वमसुष्ट त्वया विनिमुक्तं प्रषित गृह प्रति मामभिवदेत्प्रतीतो लब्धस्मृति. स एवाय पुत्रो ममागत इत्येवं प्रत्यभिजानन्नित्यर्थः । एतत्प्रयोजन त्रयाणां प्रथममाद्यवर वृणे प्रार्थये यत्पितुः परितोषणम् । सं० व्या०-हे मृत्यो-यम, मम पिता-गौतमः, सुमना:-प्रसन्नचित्तः, शान्तसंकल्पः-( मत्पुत्रः यम प्राप्त कि कारष्यति इति मद्विषयक ) चिन्ता रहित., मा अभि-मा प्रति, वीतमन्यु:-क्रोधरहितश्च यथा स्यात्, त्वत्प्रसृष्टं- त्वया इतः गृहाय प्रोषित मा अभि मा प्रति, प्रतीत:-यथा पूर्व विश्वस्तः प्रीत इत्यर्थः सन् वदेत्यद्वा मा प्रति अभिवदेत् - श्राशोर्वादान् वदेत् । एतत् त्रयाणा वराणा मध्ये प्रथम वरम् वरदान वृणे-प्रार्थये। " २ ( १८ ) हि. श०-मृत्यो = हे यमराज । गौतमः = वाजश्रवस् ( मेरे पिता)। मा अभि = मेरे प्रति । यथा = जिस प्रकार । शान्तसकल्पः = शान्तचित्त एव शान्त विचारों वाला । सुमनाः =प्रसन्न मन वाला। वीतमन्यु' = क्रोध रहित । स्यात् = हो जाय । त्वत्प्रसृष्टम् - आप के द्वारा भेजे के द्वारा भेजे हुए। प्रतीतः = पहचानकर । वदेत् - बोले । एतत् = यह । त्रयाणाम् = तीनों मे से । प्रथमम् = पहला । वृणे = माँगता हूँ। भावार्थ-हे मृत्यु ! मेरे पिता गौतम ( वाजश्रवस ) जिस प्रकार शान्त संकल्प, प्रसन्नचित्त और क्रोध रहित हो जायं तथा आपके द्वारा (मृत्यु- लोक मे ) भेजने पर मुझे पहचान लें और विश्वस्त होकर मुझ से बात करें, यही प्रथम वरदान आपके दिये हुए तीन वरदानों में से मैं चाहता हूँ। विशेष—यहाँ शान्त सकल्पादि पदों का लाक्षणिक अर्थ किया गया है। यह नचिकेता के आत्म सयम और क्रोध राहित्य का द्योतक है कि पिता के इस प्रकार के विरुद्ध व्यवहार पर भी उसने कितना ऊंचा पितृ- भक्ति का आदर्श प्रगट किया है। 10 first prayer of the tnree said boons is that my father(Gautam) may be satisfied and pleased with me and become free from all worries and anger on me and also he may recognise me when I go back to him ( father ) from here ( Death). यमराज की स्वीकृति नचिकेता के ऐसा कहने पर यम ने इस प्रकार कहा- यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत औद्दालकिरारुणिर्मत्प्रसृष्टः । सुख रात्रीः शयिता वीतमन्यु स्त्वा ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥११॥ पदच्छेद-यथा, पुरस्तात्, भविता, प्रतीत', औद्दाल कि', आरुणिः, मत्प्रसृष्टः, सुखम्, रात्रीः, शयिता, वीतमन्युः, त्वा, ददृशिवान् , मृत्युमुखात्, O yama my - प्रमुक्तम् ।
( १६ ) - अन्वय- औद्दालकिः श्रारुणिः पुरस्तात् यथा प्रतीतः आसीत् मृत्यु- मुखात् प्रमुक्तम् त्वाम् ददृशिवान् ( दृष्ट्वा ) वीतमन्यु तथा भविता रात्री: सुखा शयिता च। शां० -मृत्युरुवाच यथा बुद्धिस्त्वयि पुरस्तात् पूर्वमामीत्स्नेह- समन्विता पितुस्तव भविता प्रीतिसमन्वितस्तव पिता तथैव प्रतीत- वान्सन्नौद्दालकि उद्दालक एवौद्दालकि. । अरुणस्यापत्यमारुरिणः, यामु- ध्यायणो वा। मत्प्रसृष्टो मयानुज्ञात सन् इतरा अपि रात्री: सुखं प्रसन्नमनाः शयिता स्वप्ता वीतमन्यविगतमन्यश्च भविता स्यात्वां पुत्रं दभिवान्दृष्टवान्स मृत्मुखान्युमृत्युगोचरात् प्रमुक्त मन्तम् । सं० व्या०-ौद्दालकिः १-उद्दालक एव श्रौद्दालकि स्वार्थे इत्र प्रत्यय., आरुणि:-अरुणस्थापत्यमारुणि, अथवा उद्दालक्स्थापत्यम्- अरुण तस्य गोत्रापत्यम्, आरुणि , ( नचिकेतस पिता ) मत्प्रसृष्टः२ मदनु- गृहीतः-मदनुग्रहात् इत्यर्थः । यथापुरस्तात् यथापूर्वम् , ल यि प्रसन्न: प्रतीत:-तथाऽपि प्रसन्नो भविता, श्रपर च विगतमन्यु निवृत्तक्रोध सन् रात्री:-उत्तरा अपि रात्री सुख.शयिता-सुखनिद्रा प्रास्यतीति भाव मृत्युमुखात् प्रमुक्तम्-पुनरागतम् त्वा दृशिवान् ३–दृष्टवान् मन् इति पूर्वत एवान्वयः। हिन्दी शब्दार्थ--आरुणिः = अरुण के पुत्र (तुम्हारे पिता) पुरस्तात = मेरे यहां आने से पहले। यथा - जैसे। प्रतीतः% स्नेह युक्त मत् प्रसृष्टः = मेरी अाज्ञा प्राप्त किया हुआ। भविता = होंगे ( प्रसन्न होंगे)। मृत्युमुखात् = मृत्यु के मुख से अर्थात् मेरे अधिकार से | प्रयुक्तम् = छूटे हुए । त्वाम् = तुमको ददृशिवान् = देखेगे। वीतमन्युः = क्रोध रहित होकर रात्री = रात्रियों मे । सुखम् = सुखपूर्वक । शयिता=सोवेंगे। भावार्थ-ौद्दालक के (पुत्र) आरुणि तुम्हारे पिता हमारे अनुग्रह से जैसे पहले तुम पर प्रसन्न थे वैसे ही श्रागे भी प्रसन्न रहेंगे, और क्रोध रहित तथा श्रागे भी तुम्हारी चिन्ता से रहित होकर सुख पूर्वक सोयेगे। क्यो कि मृत्यु के मुख से बच कर आये हुए तुमको देखकर उनका सुखी होना स्वाभाविक है। विशेष-औद्दालकि के विषय मे पहले व्याख्या कर चुके हैं या तो उद्दालक वंश के होने से औद्दलकि कहे गये हैं अथवा अरुण का पुत्र उनका ( २० ) गोत्रापत्य श्रारुणि तद्धितान्त पद सिद्ध होता है । छान्दोग्योपनिषद् में इनका सवाद इसी नाम से आया है । मत्प्रसृष्टः-हमारे अनुग्रह होने से, पिता का विशेषण है अथवा मत्प्रसृष्टम् यह द्वितीयान्त पद भी पाठान्तर म मिलता है, जो नचिकेता का विशेषण है । दहशवान् यह छान्दस प्रयोग है । दृश् धातु से परोक्षे लिट् के स्थान मे कसु प्रत्यय लाकर ददृशिवान् रूप सिद्ध होता है, किन्तु यहा द्विर्वचनाभाव और कित् प्रयुक्त गुणाभाव का अभाव करके बना है। 11 (Death said) With my permission your father Auddalakı Aruni will identify and favour you as before When (your father ) sees you before him being set free from the jaws of Death his anger will be disappeared and he will have a sound sleep in future स्वर्ग का स्वरूप नचिकेता प्रथम वरदान प्राप्तकर द्वितीय वर की प्रार्थना करता है- स्वर्गे लोके न भयं किंचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिभेति । उभे तीर्वाशनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१२॥ परिछेद -स्वर्गे, लोके, न, भयम्, किचन , अस्ति, न, तत्र, त्व, न, जरया, बिभेति, उभे, तीर्वा, अशनाया, पिपासे, शोकातिग , मोदते, स्वर्गलोके। अन्वय-स्वर्गे लोके किञ्चन भय न अस्ति तत्र त्व न ( असि ) न च जरया बिभेति उभे अशनायापिपासे तीर्वा शोकातिग' स्वर्गलोके मोदते । [शा०]-नचिकेता उवाच-स्वर्गे लोके रोगादिनिमित्त भय किचन किंचिदपि नास्ति न च तत्र त्व मृत्यो सहसा प्रभवस्यतो जरया युक्त इह लोकवत्त्वत्तो न बिभेति कुतश्चित् तत्र । किंचोभे अशनायापिपासे तीर्वा- ( २१ ) - तिक्रम्य शोकमतीत्य गच्छतीति शोकातिगः सन् मानसेन दुःखेन वजितो मोदते हृष्यति स्वर्गलोके दिव्ये। सं० व्याख्या-स्वर्गे लोके-'देशविशेषे, किञ्चन-अल्पमात्रमपि भय नास्ति, हे मृत्यो त्वमपि तत्र-स्वर्गलोके न नैव स्वप्रभाव कतु समर्थः इत्यर्थः । न च जरयाग्रस्तः सन् बिभेति-भय करोति, अशनाया-बुभुक्षा-पिपासाच ते उभे तीवा अतिक्रम्य, शोकातिगः-वीतशोकः सन् स्वर्गलोके मोदते । हिन्दी शब्दार्थ-किञ्चन = कुछ भी, थोड़ा भी। जरया=बुढापे से बिभेति = डरता है। अशनयापिपासे == भूख और प्यास । उभे दोनों को । तीत्वा = अतिक्रमण करके। शोकातिग' = दुःख-शोक से मुक्त । भावार्थ-स्वर्ग लोक मे थोड़ा भी डर नहीं होता है, हे मृत्यु देव ! आप का भी प्रभाव वहाँ नहीं है और न तो वहाँ के लोक बुढापा से ही डरते हैं, वहाँ के लोग भूख प्यास दोनों को अतिक्रमण कर शोक से मुक्त हो आनन्द से रहते हैं। विशेष--यहाँ स्वर्ग पद से मोक्ष ही विवक्षित है। प्रागे मन्त्र मे वही कहा गया है। स्वः---स्वर्गस्थैः गीयते स्वर्ग इस व्याख्या से स्वर्ग का अर्थ मोक्ष है। आगे मन्त्र में सब मोक्ष का लक्षणा कहा गया है। 12. At the time of second boon Nachiketa said "No fear is there in heaven O Death ' you too are not there, nor any one trembles with the fear of old age Having Surpassed both hunger and thirst and being free from all the mental worries one rejoices there in the heavenly world स त्वमग्नि स्वयंमध्येषि 'मृत्यो प्रभू हि त्व श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्वितीयेन वृणे वरेण ॥१३॥ पदच्छेद-सः, त्वम् , अग्निम्, स्वय॑म् , अध्येषि, मृत्यो, प्रव्र हि, .
( २२ ) , त्वम्, श्रद्दधानाय, मह्यम् , स्वर्गलोका, अमृतत्वम् , भजन्ते, एतद् , द्वितीयेन, वृणे, वरेण । अन्वय-मृत्यो स. त्वम् स्वर्ग्यम् अग्निम् अध्येषि तम् श्रद्दधानाय मह्यम् प्रव्र हि स्वर्गलोका अमृतत्वम् भजन्ते एतत् द्वितीयेन वरेण वृणे । [शा०] एवगुरणविशिष्टस्य स्वर्गलोकस्य प्राप्तिसाधनभूतमग्नि स त्वं मृत्युरध्येषि स्मरसि जानासि इत्यर्थः, हे मृत्यो यतस्त्व प्रब्रू हि कथय श्रद्दधानाय श्रद्धावते मह्य स्वर्गार्थिने, येनाग्निना चित्तन स्वर्गलोकाः स्वर्गो लोको येषां ते स्वर्गलोकाः, यजमाना अमृतत्वम् अमरणता देवत्व भजन्ते प्राप्नुवन्ति । तदेतदग्निविज्ञान द्वितीयेन वरेण वृणे । स० व्या०-हेमृत्यो-यमदेव' स त्व-भवान् , स्वय॑म् - स्वर्गप्रापकम् अग्निम् , अध्येषि-जानासि, येन, स्वर्गलोका -स्वर्गलोकस्था जनाः अमृतत्व- अमरताम्-भजन्ते-सेवन्ते (प्राप्नुवन्ति ) इतिभावः, तथोक्तम् (छान्दोग्ये ) 'परज्योतिरूप सपद्य स्वेन रूपेणाभिनिषद्यते' तम् त्व श्रद्दधानाय-श्रद्धालवे- मह्यम् प्रब हि कथय-उपदिश इतियावत् एतद् द्वितीयेन वरेण वृणे-याचे। हिन्दी शब्दार्थ-स्वय॑म् = स्वर्ग को प्राप्त करानेवाली। अध्येषि जानते हो । श्रद्दधानाय == श्रद्धालु । प्रब हि=उपदेश दो। स्वर्गलोकाः स्वर्ग के लोक । अमृतत्वम् = अमरता । भजन्ते = प्राप्त करते हैं । वृणे = मागता हूँ। भावार्थ-हे यमदेव ! स्वर्ग को प्राप्त कराने वाली उस अग्नि को श्राप जानते हैं जिसको जानलेने से स्वर्ग के लोग भी अमरता अर्थात् अपने स्वरूप को प्राप्त हो जाते हैं। छान्दोग्य उपनिपद् मे लिखा है कि 'परज्योतिम- भिसपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते।' इत्यादि । उस अग्नि का उपदेश मुझ श्रद्धालु के लिए कीजिए, मैं दूसरा वरदान मागता हूँ। वि० -यहा स्वर्गस्थ लोगो की अमरता प्राप्ति का कथन है-चेतन को स्वस्वरूप का ज्ञान होना । चेतन के, स्वस्वरूप ज्ञान के बिना जरामरणादि उपद्रवों का विच्छेद नहीं होता-गीता मे भगवान् श्री कृष्ण भी कहते हैं- 'ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोक विशाल क्षीणे पुण्ये मृत्युलोक विशन्तीत्यादि ।' 13. O yama' you know well that fire which leads to heaven, I am full of this faith that by that fire the heaven % यह ( २३ ) ब्रवीमि तदु seekers gets immortality So let me know that supreme Fire, this is my second boon यमराज का उत्तर इस प्रकार नचिकेता की प्रार्थना पर पुनः ज्ञान का फल दर्शाते हुए यमराज ने कहा प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यमग्नि नचिकेत. प्रजानन् । अनन्तलोकाप्तिमथो प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् ॥१४॥ पदिच्छेद-प्र, ते, ब्रवीमि, तद्, उ, मे, निबोध, स्वर्ग्यम्, अग्निम् , नचिकेत. प्रजानन् , अनन्तलोकाप्तिम् , अयो, प्रतिष्ठाम्, विद्धि, त्वम् , एतम्, निहितम् , गुहायाम् । अन्वय-( अहम् ) स्वय॑म् अग्नि प्रजानन् ते प्रब्रवीमि तत् उ मे निबोध नचिकेतः त्वम् एतम् अनन्तलोकाप्तिम् अथो प्रतिष्ठाम् गुहायाम् निहितम् विद्धि । [शा०] मृत्यो. प्रतिज्ञेयम्-प्र ते प्रब्रवीमि; यत्त्वया प्रार्थित तदु मे मम वचसो निबोध बुध्यस्वैकाग्रमानाः सन्स्वयं स्वर्गाय हितं स्वर्गसाधनमग्नि हे नचिकेत. प्रजानन्विज्ञातवानह सन्नित्यर्थ.। प्रब्रवीमि तन्निबोधेति च शिष्यबुद्धिसमाधानार्थं वचनम् अधुनाग्नि स्तौति । अनन्तलोकाप्ति स्वर्गलोकफलप्राप्तिसाधनम् इत्येत् प्रथो अपि प्रतिष्ठाम् आश्रयं जगतो विरापेरण, तमेतमग्नि मयोच्यमान विद्धि जानीहि त्वं निहित स्थित गुहाया विदुषां बुद्धौ निविष्टमित्यर्थः। स० व्या०- त्वत्प्रार्थितम् , ते-तुभ्यम् , प्रब्रवीमि-कथयामि, प्रेति- उपसर्ग' व्यवहिताश्चेति छन्दसि व्यवहृतेऽपि प्रयुज्यते। तत् मे-ममोपदे- हे नचिकेतः, निबोध-जानीहि, यतोहि-स्वय॑मग्निम्-पूर्वोक्तम् , प्रजानन् , बुध्यमानः, अनन्तलोकाप्तिम्-अनन्तस्य विष्णोः लोकस्य प्राप्तिम् “तद् विष्णो तुभ्यं शाद्, ( २४ ) परम पद सदा पश्यन्ति सूरय." इत्यादि अग्रे वक्ष्यमाणत्वात्, अथो, तत्प्राप्त्य नन्तरम् प्रतिष्ठामपुनरावृतिरूप च लभते इति शेष , इति एव त्वम् गुहायाम्- हृदयमध्ये, निहितम्-प्रतिष्ठितम् विद्धि-जानीहि । हिन्दी शब्दार्थ--प्रजानन्-ठीक से जानते हुए । तत् = उस अग्नि को। मे = मुझसे निबांध = जान लो। अनन्तलोकाप्तिम् = स्वर्ग लोक की फल प्राप्ति का साधन । प्रतिष्ठाम् - अाधारभूत, विराट् रूप से जगत् के आश्रय, गुहायाम् = अन्त. करण मे । निहितम् = निविष्ट । विद्धि = जानो। भावार्थ-यम ने कहा कि हे नचिकेता तुम्हारे प्रार्थित उस पूर्वोक्त स्वयं अग्नि का मैं वर्णन करता हूँ, उसे ध्यान पूर्वक समझो, जिसको जानने से अनन्त श्री विष्णुलोक की प्राप्ति हाती है जो वेद मे तद्विष्णोः परम पदम्' इत्यादि से कहा गया है, उसे तुम अत्यन्त अन्तः हृदय देश में निहित जानो। 11 ( Yama said ) Be attentive and follow me O Nachiketa ! having a good knowledge I will speak to you of that fire which leads to heaven and which is the support of the world is found in the intellect or within the heart of learned. अग्नि विद्या का उपदेश लोकादिमग्नि या इष्टका यावतीर्वा यथा वा। चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्त- मथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥१५॥ परिच्छेद-लोकादिम् , अग्निम् , तम् , उवाच, तस्मै, याः, इष्टकाः, यावतीः, वा, यथा, वा, । स, च, अपि, तत् , प्रति, अवदत् , यथा, उक्तम् , अथ, अस्य, मृत्युः, पुनः, आह, तुष्टः । अन्वय-( यमः ) तस्मै लोकादिम् तम् अग्निम् उवाच याः यावतीः वा तमुवाच तस्मै , ( २५ ) इष्टका यथा वा सः च अपि तत् यथोक्तम् प्रत्यवदत् अथ मृत्युः अस्य तुष्टः सन् पुनः एव आह । [शा०] इद श्रुतेर्वचनम् - लोकादि लोकानामादि प्रथमशरीरित्वा- दग्नि त प्रकृतं नचिकेतसा प्रार्थितमुवाचोक्तवान् मृत्युस्तस्मै नचिकेतसे। कि च या इष्टकाश्चेतव्या. स्वरूपेण, यावतीर्वा सख्यया, यथा वा चीयतेऽग्नियेन प्रकारेण सर्वमेतद् उक्तवानित्यर्थः । स चापि नचिकेता- स्तन्मृत्युनोक्त यथावत्प्रत्ययेनावदत्प्रत्युच्चारितवान् । अथ तस्य प्रत्युच्चा- रणेन तुष्ट मन्मृत्यु पुनरेवाह वरत्रयव्यतिरेकेणान्य वर दित्सुः । स० व्या.-लोकस्य, आदिम् कारण भूतम् स्वय॑मिति यावत्-तमग्नि तस्मै-नचिकेतसे उवाच कथितवान् , अग्निवर्णन प्रकार मेवाहयमः--- इष्टका- यादृशलक्षणा इष्टका यावती यत् सख्यापरिमिता'-अत्र यावत्य -इतिरूपस्य छान्दसः पूर्वसवर्णः यथा वा-येनप्रकारेण चेतव्या इति मर्वमुक्तवान् । श्रत्वा च स नचिकेता तत्-अग्नि विद्यो पदेश तथैवानूदितवान् इत्याह-प्रत्यवदत् इति । शिष्यस्येतादृशग्रहणधारण सामर्थ्यं दृष्ट्वा सन्तुष्ट सन् गुरुः यमः प्रसन्नः सन् मृत्युः-यम पुना पाह-उवाच । हि. श०-तस्मै = नचिकेता के लिए। लाकादिम् लोक के आदि कारण भूत । तं प्रकृतम् अग्नि को। इष्टकाई टें। यावती -जितनी। यथोक्तम जैसा यमराज ने कहा था वैसाही । प्रत्यवदत् = प्रत्युच्चारण किया । तुष्टः-प्रसन्न । आह = कहा। भावार्थ-इस के अनन्तर यम ने नचिकेता के लिए उस पूर्वोक्त स्वयं अग्नि का जो कि लोक का हेतु भत है । तथा उस अग्नि के चयनमें जैसी और जितनी इंटे होती हैं और किस प्रकार उनका चयन किया जाता है, इन सभी का उपदेश किया। मेधावी नचिकेता ने उसे तत्काल समझकर ज्यों का त्यों उसका अनुवाद करके यम को सुना दिया। इसपर शिष्य की प्रतिभा से सन्तुष्ट होकर यमराज फिर, नचिकेता से बोले । वि० -यहाँ श्राचार्यपरम्परागत गुरु-शिष्यवत् उपदेश मे यमा ने आचार्य रूप में उपदेश दिया हैं। इस प्रकार नर-नारायण की तरह परमदेव ( २६ ) भूयः । विश्व नियन्ता यम ब्रह्मस्वरूप के परतत्त्व के उपदेष्टा हुए, यही इस उप- निषद् श्रुति का परमार्थ तत्त्व समझना चाहिए । 15 Death told him every thing of the fire, the source of heaven, he explained the kind and number of bricks required to perform the altar and also the manner of arraging for fire etc And Nachikata two repeated word by word as he had been told Death became satisfied and pleased and then said again नचिकेता के नामपर अग्निका नामकरण सन्तुष्ट होकर यम ने पुनः नचिकेता से कहा- तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य ददामि तवैव भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥१६॥ पदच्छेद -तम् अब्रवीत् , प्रीयमाणः, महात्मा, वरम् , तव, इह, अद्य, ददामि, भूयः, तव, एव, नाम्ना, भविता, अयम्, अग्निः, सङ्काम्, च, इमाम्, अनेकरूपाम् , गृहाण ।। १६ ॥ अन्वय-प्रीयमाण. महात्मा तम् अब्रवीत् तव अद्य इह भूयः वरं ददामि । अयम् अग्निः तव एव नाम्ना भविता इमा च अनेकरूपा सङ्का गृहाण । [शा०] कथम् - त नचिकेतसमब्रवीत्प्रीयमाणः शिष्ययोग्यता पश्य- प्रीयमाणः प्रीतिमनुभवन्महात्माक्षुद्रबुद्धिर्वर तव चतुर्थमिह प्रोतिनिमि- त्तमद्य दानी ददामि भूयः पुनः प्रयच्छामि। तवैव नचिकेतसो नाम्ना विधानेन प्रसिद्धो भविता मयोच्यामनोऽयमग्निः । किं च सृड्का शब्द- वती रत्नमयीं मालामिमामनेकरूपा विचित्रा गृहारण स्वीकुरु । यद्वा सुकाम् अकुत्सिता गति कर्ममयों गृहाण। अन्यदपि कर्मविज्ञानमनेक- फलहेतुत्वात्स्वीकुवित्यर्थः ।
( २७ ) सं० व्या०-प्रीयमाणः सन्तुष्टमनाः महात्मा-महान्-प्रकृतेः पर आत्मा यस्य स यमदेवः तम्-नचिकेतसम् अकथितञ्च इति वच धातुयोगे कर्मसज्ञा संम्प्रदानस्येति, बोध्यम्। अब्रवीत् उवाच इह-अस्मिन् देशे अद्य-अस्मिन्काले भूयः पुनः तव-तुभ्य वर-वरदान ददामि । अतोऽग्रिम चतुर्थवर ददामीति तत्त्वकिमित्याह-अग्निरयम् तवैव नाम्ना भविता (नाचिकेताग्निरिति) नाम्ना- प्रसिद्धो भविता इति, इमो, अनेकरूपाम्-विचित्राम्-सङ्का-शब्दवती रत्न- मालाम गृहाण स्वोकुरु इत्यर्थ । हि• श.-प्रीयमाण. प्रसन्न होकर । महात्मा=यमराज । तव अद्य तुम्हे अाज । भूयः=फिर । अनेकरूपा= विचित्र रूप वाली । शृङ्काम रत्नमाला. वाली । गृहाण = ग्रहण करो। भावार्थ-प्रसन्न होकर उस महापुरुष यम ने उस नचिकेता को पुनः यह चतुर्थ वरदान दिया कि यह परमार्थ रूप अग्नि तुमारे नाम से ही प्रसिद्ध होगी, नाचिकेताग्नि शास्त्रों में प्रसिद्ध होगी यह भाव है। जो विचित्र रूप वाली और शब्द करनेवाला रत्नमालावती रूप से व्यक्त होगी, ऐसी अग्नि को तुम ग्रहण करो। वि०-वेदान्त मे इस अग्नि का वर्णन होने से कर्मकाण्ड से सम्बन्धित अग्नि से यह पृथक् अग्नि है जिसका स्थान हृदय देश है जिसका वर्णन पूर्व में किया जा चुका है । 16 Being delighted the high souled-yama said to Nachiketa "Now you are granted an additional boon with my favour to you this fire will will be famous by your name from to-day And so accept even this garland of various colours अग्निचयन का फल त्रिणाचिकेतस्त्रिभिरेत्य सन्धि त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । ब्रह्मजज्ञं देवमीड्य' विदित्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥१७॥ पदच्छेद–त्रिणाचिकेतः, त्रिभिः, एत्य, सन्धिम् , त्रिकर्मकृत् , तरति, ( २८ ) । “जन्ममृत्युः, ब्रह्ममज्ञम्, देवम्, ईड्यम्, विदित्वा, निचाय्य, इमाम्, शान्तिम्, अत्यन्तम्, एति । अन्वय-त्रिणाचिकेत त्रिभिः सधिम् एत्य त्रिकर्मकृत् ( सन् ) जन्ममृत्यू तरति ( स ) ब्रह्मजज्ञम् ईड्यम् देव विदित्वा निचाय्य ( च ) इमाम् अत्यन्तम् शान्तिम् एति । [शा०] पुनरपि कर्मस्तुतिमेवाह-त्रिणाचिकेतस्त्रिःकृत्वो नाचि- केतोऽग्निश्चितो येन स त्रिणाचिकेतस्तद्विज्ञानस्तदध्ययनस्तदनुष्ठान- वान्वा। त्रिभिर्मातृपित्राचार्यैरेत्य प्राप्य सन्धि सन्धान सम्बन्ध मात्रा- द्यनुशासन यथावत्प्राप्नोत्येतत् । तद्धि प्रामाण्यकारण श्रुत्यन्तराद् अव- गम्यते यथा “मातृमान्पितृमानाचायवान्ब्रूयात्" । बृ० उ० ४ । १ । २) इत्यादेः। वेदस्मृतिशिष्टैर्वा प्रत्यक्षानुमानागमैर्वा, तेभ्यो हि विशुद्धिः प्रत्यक्षा, त्रिकर्मकृदिज्याध्ययनदानाना कर्ता तरत्यतिक्रामति जन्ममृत्यू । कि च ब्रह्मजज्ञ ब्रह्मणो हिरण्यगर्भाञ्जातो ब्रह्मज.। ब्रह्मजश्चासौ ज्ञश्चेति ब्रह्मजज्ञ सर्वज्ञो ह्यमौ । त देव द्योतनाज्ज्ञानादि गुणवन्तमीडय स्तुत्य विदित्वा शास्त्रतो निचाय्य दृष्ट्वा चात्मभावेनेमा स्वबुद्धिप्रत्यक्षा शान्तिम् उपरतिमत्यन्तमेत्य तिशयेनैति । वैराज पद ज्ञानकमसमुच्च- यानुष्ठानेन प्रप्नोतीत्यर्थः। सस्कृत व्याख्या-त्रिणाचिकेत:-त्रिःकृत्वा नाचिकेतोऽग्नि' चितो येन सः त्रिणाचिकेता त्रिकर्मकृत्-यज्ञाध्ययनदानानि कृतानि येन स, पाकयज्ञ- हविर्यज्ञ-सोमयज्ञ इति यज्ञयकर्ता वा त्रिकर्मकृत् त्रिभि.-त्रिभिरग्निभिः त्रिभि- रनुष्ठितै अग्निभिः सह मातृपित्राचार्य. सह वा वेदस्मृतिशिष्टः वा सह सन्धि-सन्धान परमात्मोपासनेन सम्बन्धमेत्य-प्राप्य जन्ममृत्यू तरति,, करोति तयन पुनर्न जायते, इत्युक्तप्रकारणैति ब्रह्म नजम ब्रह्मण' जातः, ब्रह्मजः ब्रह्मजश्चासौ शश्चेति ब्रह्मजज्ञ' त, ब्रह्मजज्ञशब्दो जीवात्मपर' इति 'विशेषणाच' (ब्र० सू० १।२।१२) इति सूत्रे भगवता व्यासेनोक्त. देव-परमात्मान ईड्य- स्तुत्य-स्तुत्यहँ विदित्वा सम्यक् जात्वा निचाय्य स्वात्मान ब्रह्मात्मक साक्षात्कृत्य इमा-त्रिकर्मकृतरति इत्यादि पूर्वकथित ससाररूपानर्थशान्ति- मत्यन्तमेति प्राप्नोति । " ( २६ ) - , हि. श०-त्रिणाचिकेतः = तीन बार नाचिकेताग्नि । त्रिभिः = माता- पिता और प्राचार्य, त्रिकर्मकृत् = यज्ञ, वेदाध्ययन, दान । तरति = तर जाता है। ब्रह्मजज्ञम = ब्रह्मात्मक । ईड्यम = स्तुति करने योग्य । विदित्वा जानकर, निचाय्य = देखकर । एति = प्राप्त होता है। भावार्थः -इस नाचिकेताग्नि का तीन वार चयन करने वाला और यज्ञ अध्ययन दान रूप कर्म, अथवा पाकादि त्रियज्ञ करने वाला, माता पिता आचार्य का सत्यकार अथवा वेदस्मृतिशिष्ट अथवा तीनों अग्नि से अनुष्टित अग्नि से परमात्मा की उपासना से सम्बन्ध को प्राप्त करने वाला इस शिष्ट को मानने वाला जन्म मरण रूप उपद्रव से तर जाता है, और जीवात्माको ब्रह्मात्मक जानकर उस परमात्माको जो सर्वथा स्तुति के योग्य हैं, अच्छी प्रकार जानकर तथा पूर्वोक्त 'त्रिर्मकृत् तरति' इस पूर्व वाक्यार्थ को समझकर जीव अत्यन्त शान्ति को प्राप्त होता है। विशेष—यह मन्त्र कर्म और ज्ञान दोनों की स्तुति करता है। इसकी व्याख्या में भी भिन्न-भिन्न आचार्यों की व्याख्या भिन्न-भिन्न प्रकार से है यहाँ प्रायः समन्वय की दृष्टि से निर्देश किया गया है। 17 Yama said. "One, who being connected with the three performes Nachiketa fire thrice and alsodes three kinds of duties, over-comes birth and death He who have learnt and realised that omnicient onee (Agni) born of Brahma attains the perfect peace thoroughly त्रिणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एव विद्वाँ श्चिनुते नाचिकेतस् । स मृत्युपाशात्पुरतः प्रणोद्य शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥१८॥ पदछे-त्रिणाचिकेत', त्रयम्, एतद्, विदित्वा, य., एवम्, विद्वान् , चिनुते, नाचिकेतम् , सः, मृत्युपाशान्, पुरतः, प्रणोद्य, शोकातिगः, मोदते, स्वर्गलोके ॥१८॥ अन्वय-यः त्रिणाचिकेतः विद्वान् एतत् त्रयम् विदित्वा नाचिकेतसम् ( ३० ) चिनुते सः पुरतः मृत्युपाशान् प्रणोद्य शोकातिगः ( सन् ) स्वर्गलोके मोदते। [शा०] इदानीमग्निविज्ञानचयनफलम् उपसहरति प्रकरण च- त्रिणाचिकेतस्त्रय यथोक्त या इष्टका यावतीर्वा यथा वेत्येतद् विदित्वा- वगत्य यश्चैवमात्मरूपेण अग्नि विद्वाश्चिनुते निवर्तयति नाचिकेतमग्नि ऋतु स मृत्युपाशान् अधर्माज्ञानरागद्वषादिलक्षणान् पुरत. अग्रतः पूर्वमेव शरीरपातात् इत्यर्थ., प्रणोद्यापहाय शोकातिगो मानसैदु. खैर्वजित इत्येतत् मोदते स्वर्गलोके वैराजे विराडात्मस्वरूपप्रतिपत्त्या । स० व्याख्या--त्रिणाचिकेतः-पूर्वोक्तः, एतत्त्रयम्-ब्रह्मजज्ञ , देवमीड्य त्रिमिरेत्य सन्धिो इति पूर्वमन्त्रनिर्दिष्टार्थरूपम् विदित्वा-सम्यग्ज्ञात्वा यः एव-एतादृशार्थत्रयानुसन्धानपूर्वकनाचिकेतम्-नाचिकेताग्नि चिनुते चयन करोति स मृत्युपाशान्-रागद्वेषादिलक्षणान् पुरतः :-शरीरपातात्पूर्वमेव प्रणोद्य- अनादृत्य ( जीवदशायामेव रागद्वषादिरहित सन् ) शोकाटिग सासाकि- शोकान् अतिक्रम्य स्वर्गलोके-मोदते आनन्दभाग भवति । हि० श.--विदित्वा = जानकर । चिनुते = चयन करता है । पुरतः = पहले ही। मृत्युपाशात् = मृत्यु के बन्धन से । प्रणोद्य = अतिक्रमण कर । मोदते = प्रसन्न होता है। भावार्थ-पूर्व कथितार्थ त्रिणाचिकेत पुरुष पूर्वमन्त्र मे कहे हुए उन तीनों पदार्थो-ब्रह्मजज्ञ देवमीड्य और त्रिभिरेत्य सन्धि इत्यादि रूप को अच्छी तरह जानकर जो नाचिकेत अग्नि को चयन करता है वह पुरुष मरणादि शोक को अतिक्रमण करके आवागमन रहित स्वर्गलोक मे प्राप्त होकर आनन्द का भागी होता है। विशेष-इस मन्त्रार्थ मे पूर्व मन्त्र का स्पष्टीकरण किया गया है । 19. He who after getting the knowledge of building up the sacrifice Altar, performes three times the Nachiketafire, becomes free from the bondage of death and crossing over sorrow rejoices in heaven.
( १ ) करोति तद् । [ योवाऽप्येतां ब्रह्म जज्ञात्म भूतां चितिं विदित्वा चिनुते नचिकेता । स एव भूत्वा ब्रह्म जज्ञात्म भूतः तद् येन पुनर्न जायते । ] पदच्छेद-यः, वा, अपि, एताम् , ब्रह्मजज्ञात्मभूताम्, चितिम्, विदित्वा, चिनुते, नचिकेतम्, स, एव, भूत्वा ब्रह्मजज्ञात्मभूतः, करोति, तत् येन, पुन:, न, जायते । संस्कृत व्याख्या-य: एता-चितिं ब्रह्मजज्ञात्मभूताम् जीवात्मान ब्रह्मात्मक- भूता विदित्वा-अनुसन्धाय नाचिकेत-अग्नि चिनुते, स ब्रह्मजज्ञात्मभूतो भूत्वा तत्-तादृशं कर्म करोति, येन पुनर्न जायते, अपुनर्भवपद प्राप्नोति । हि० श०-एता चितिम् - इस कथिन चिति को । ब्रह्माजज्ञात्भूताम् = ब्रह्मात्मक । विदित्वा % जानकर, स्वरूप का अनुसन्धान करके । ब्रह्मजज्ञात्म भूतः = ब्रह्मरूप । भूत्वा होकर । पुनः = फिर । जायते = पैदा होता है, अर्थात् मोक्ष पद को प्राप्त करता है। भावार्थ-जो पुरुष इस कथित चिति को ज्ञानात्मरूप से स्व-स्वरूप का ब्रह्मात्मक अनुसन्धान करके चयन करता है, वह वैसा ही होकर ऐसा कर्म करता है जिससे पुनरागमन रहित मोक्ष पद को प्राप्त कर सके । विशेष—इस मन्त्र को कुछ आचार्यों ने प्रक्षिप्त मानकर व्याख्या नहीं की किन्तु यह मन्त्रभाग मे मिलता है, इससे यहाँ व्याख्या की गयी है। एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वयों तमवृथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्नि तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनास- स्तृतीय वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥१६॥ पदच्छेद-एष., ते, अग्नि , नचिकेतः, स्वयं , यम्, अवृणोथा , द्विती- येन, वरेण, एतम्, अग्निम, तव, एव, प्रवक्ष्यन्ति, जनास तृतीयम्, वरम्, नचिकेतः, वृणीष्व । ३ ( ३२ ) -- अन्वय-हे नचिकेतः एष ते स्वयः अग्नि य द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः जनासः एतम् अग्निम् तव एव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति हे नचिकेतः तृतीय वर वृणीप्व। [शा०] एप ते तुभ्यमग्निवरो हे नचिकेत स्वर्ग्य स्वर्गसाधनो यमग्नि वरमवृणीथा प्राथितवानसि द्वितीयेन वरेण सोऽग्निवरो दत्त इत्युक्तो- पसहार । किञ्चंतमग्नि तवैव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति जनासो जना इत्येतत् । एष वरो दत्तो मया चतुर्थस्तुप्टेन । तृतीय वर नचिकेतो वृणीप्वं । तस्मिन्ह्यदत्त ऋणवानहांगत्यपिपाय.। स० व्या०-हे नचिकेत, एपोऽग्निः स्वग्य -स्वर्ग माधनभूत उपदिष्ट- इति वाक्यशेप', यम् अग्निम् द्वितीयेन वरेण अवृणीथाः, एत्म अग्निम् जनास -जनाः छन्दसि असुगागम , तब एव नाम्ना प्रवक्ष्यन्ति-कथयिष्यन्ति, अतः परम, तृतीयम् वरम्, वृणीष्व याचस्व । हि० श० - स्वयं - स्वर्ग का साधन । अनुवृणाया. = वरदान में पाये हो। प्रवक्ष्यन्ति = कहेगे। वृणीव = मागा, याचना करो। भावार्थ- हे नचिकेता यह अग्नि स्वर्ग का साधन है जिसका मैंने उपदेश किया है, जिस अग्नि का द्वितीय वरदान म तुमने वरण किया। इस अग्नि को मनुष्य तुम्हारे नाम से ही कहेगे, इसके बाद अब तुम तृतीय वर की याचना करो। इसके अनन्तर नचिकेता ने अत्यन्त अभीष्ट तृतीय वर को मागते हुए आगे कहा। 19 O Nachiketa this told to you is about the fire (Sacrifire) the source of heaven as asked in your second boon, People will call this fire after your name Now what is your third boon? तृतीय वर (आत्म रहस्य) की प्रार्थना येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये- ऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनुशिष्टस्त्वयाह वरागामेष वरस्तृतीयः ॥२०॥ पद०-या, इयम्, प्रेते, विचिकित्सा, गनुष्य, अस्ति, इति, एके, न, ( ३३ ) यत अयमस्तीति च एके, एतद्, विद्याम्, अनुशिष्टः, त्वया, अहम्, वराणाम्, एष. वरः तृतीयः। अन्वय-मनुष्ये प्रेते या इय विचिकित्सा एके (आहुः) अस्ति इति एके अय नास्ति इति च (आहुः ) त्वया अनुशिष्टः एतत् विद्याम् एष. वराणाम् तृतीयः वर। [शा० ! एताद्धयतिक्रान्तेन विधिप्रतिषेधार्थेन मन्त्रब्राह्मणेनाव- गन्तव्यं यद्वरदयसूचितं वस्तु ! न आमतत्त्वविपययाथात्म्य विज्ञानम् । अतो विधिप्रतिपेधाविपयस्यात्मनि कियाकारकफलाध्यारोपलक्षणस्य स्वाभाविकस्याज्ञानस्य समारवीजस्य निवृत्त्यर्थ तद्विपरीतब्रह्मात्मैकत्व- विज्ञान क्रियाकारककलाध्यारोपगलक्षणशून्यम् प्रात्यन्तिकनि यसप्रयो- जन वक्तव्यमिति उत्तरो ग्रन्थ प्रारभ्यते । तमेतमर्थ द्वितीयवस्मात्याप्य- कृतार्थत्व तृतीयवारगोचरमात्मज्ञानमन्तरेण इत्याच्यायिकया प्रपञ्चयति- पूर्वस्मात्कर्मगोचरात्साध्यन्नाधनलक्षमादनित्याद्विरक्तस्य यात्म- ज्ञानेऽधिकार इति तन्निन्दार्थ आधुपन्यालेन प्रलोभन क्रियते । नचिकेता उवाच तृतीय पर नचिोनो नृगीबेयुक्त सन्- येय विचिकिल्ला सशय प्रेते मृते म,प्येऽस्तीन्योऽस्ति शरीरेन्द्रियमनो- बुद्धिव्यतिरितो देशान्तरसम्बन्ध्यात्मेत्येक नायम् अस्तीति चैके नायभेव- विधोऽस्तीति चकेतरचास्माक न प्रत्यक्षेण नापि वा मानेन निर्णय- विज्ञानमेतद्विज्ञानावीनो हि पर पुरुषार्थ इत्यत एतद्विद्या विजानीया महम् अनुशिष्टो जापितस्त्वया। वरागाम् एष बस्तृतीयोऽवशिष्ट । स. व्याख्या-प्रेते ( सति } मनुष्य-मृते ति मनुष्ये या, सामान्य रूपेण सर्वजनप्रासद्धा, इयम्-एतादृशी, विचिकित्सा-सशय भवति इति शेष.। अयम्-अात्मा शरीरात् पृथक् कश्चित् अस्ति इति एके-प्राचार्याः वदन्ति एके-केचन न-चैवास्ति शरीराद् भिन्नः कोपि आत्मपदार्थः इति वदन्ति । अतः त्वया-भवता अनुशिष्ट -उपदिष्टः अहम् , एतद्विद्याम- जानीयाम्, इति वराणाम मध्ये एषः तृतीय. वरः मह्यं दातव्य इति शेषः। हि० श.-मनुष्ये = जीव मे । प्रेते = मरने पर । विचिचित्सा -- सदेह । अयम् = अात्मा। एके = दूसरे । अनुशिष्टः = शिक्षित हो । विद्याम् जान लू।
। ३४ ) mat- भावार्थ-मनुष्यों के मर जाने पर जो प्रायः सभी लोगों को प्रसिद्ध यह संशय आत्मा के विषय में होता है, उस विषय में किसी आचार्य का मत है कि शरीर के अतिरिक्त अविनाशी अनश्वर जरामरणरहित आत्मा है । गीता मे भगवान् कृष्ण कहते हैं - "न जायते म्रियते वा कदाचित् नाय भत्वा भविता वा न भूयः। अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे" । इति।) गीता के द्वितीयाध्याय में देखिए। और कोई तो यह कहते हैं कि शरीरातिरिक्त अात्मा नाम की कोई वस्तु नहीं है, इसी से चार्वाक मत का प्रादुर्भाव हुआ इसके मूल उपदेष्टा साक्षात् विद्या अधिष्ठाता बृहस्पति जो ही हैं । "भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमन कुतः" । इत्यादि कहा जाता है। इसलिए हे देव श्राप ऐसे परमो- स्कृष्ट ज्ञानी से उपदेश को प्राप्त करके हम यह जानना चाहते हैं कि वास्तव मे यह अात्म विषयक तात्त्विक विचार क्या है? अतः वरो मे तृतीय वरदान से हम अात्म विषयक उपदेश चाहते हैं। विशेष -यहा से लेकर आगे ब्रह्मज्ञान का प्रकरण आरम्भ होता है जो उपनिषद् शास्त्र की अपूर्व देन है । इस विषय में सम्प्रदाय भेद से प्राचार्यों के भिन्न-भिन्न व्याख्यान हैं। हमने मौलिक शब्द के आधार पर सामान्य व्याख्यान किया है। ऐसा सुनकर श्री यम ने नचिकेता को ब्रह्म ज्ञान का अधिकारी न समझकर इस वरदान को न देकर उस विषय की अति गहनता को समझाते हुए कहा- 20 After the death of a man some says "self exists" and others say "It does not exist"-I wish to know what is right under your instruction And this is my third and last boon. अन्य वर मागने का आग्रह देवैरत्रापि विचिकित्सितं पुरा न हि सुज्ञेयमणुरेष धर्म.। अन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सीरति मा सृजैनम् ॥२१॥ पद०-देवैः अत्र, अपि, विचिकित्सितम, पुरा, न, हि सुज्ञेयम्. अणुः देवैरपि पुरा, ( ३५ ) एषः, धर्म. । अन्यम्, वरम, नचिकेतः, वृणीष्व, मा, मा, उपरोत्सी. अति मा सजैनाम् । अन्वय-देवैरपि अत्र पुरा विचिकित्सितम् हि ( इदम् ) न सुज्ञेयम् एषः धर्म अणु. नचिकेत. अन्य वर वृणीष्व मा मा उपरोत्सीः मा एनम् अतिसुज। शा०] किमयमेकान्ततो नि श्र यससाधनात्मज्ञानार्हो न वेत्येतत्प- रीक्षणार्थमा–देवैरप्य तस्मिन्वस्तुनि विचिकित्सितं संशयितं पुरा पूर्व न हि मुज्ञेय मुष्ठु ज्ञेय श्रु तमपि प्राकृतेर्जनैर्यतोऽणु सूक्ष्म एष आत्माख्यो धर्मोऽनोऽन्यमसदिग्धफल वर नचिकेतो वृणीष्व मा मा मोपगेत्सीर परोध मा कापीर धमर्णम् इवोत्तमर्ण अतिसृज विमुञ्च एनं वर मा मा प्रति सं० व्याख्या-अत्र-अस्मिन् श्रात्मविषये, विचिकि- त्सितम्, सशयः कृत , यतो हि अणुः-अतिसूक्ष्मः, एषो धर्मः एवम्, न हि सुज्ञेयम्-सरलत्या ज्ञातु शक्यम् । अत एव हे नचिकेतः एन परित्यज्य अन्य, वरम्, वृणीष्व-याचस्व, मा मा, उपरोसीः अस्मिन् वरे मा आग्रह कुरु । एनम् वर, मा मा सुज । हि० श. पुरा = प्राचीन काल मे । विचिकित्सितम् है। इदम् = यह ( रहस्य )। सुविज्ञेयम् आसानी से न जानने योग्य अणु. = सूक्ष्म । उपरोत्सी. = आग्रह न करो। अतिसूज =त्याग दो। भावार्थ- इस आत्मा के विषय में पूर्व काल मे देवताओं ने भी संशय किया था, किन्तु अत्यन्त सूक्ष्म होने से किसी निर्णय पर नहीं पहुंचे थे । इस- लिए यह धर्म सरलतया जानने योग्य नहीं है। इस कारण हे नचिकेत. तुम अन्य वरदान माग ला । हमारे ऊपर इस विषय के लिए अधिक अाग्रह मत करो। इसे हमारे लिए छोड़ दो। विशेष-ईशोपनिषद में लिखा है कि "नैव देवा श्राप्नुवन्" । देवताओं से दुर्गम इस आत्मतत्त्व को श्री यम ने बताया, यह बात नहीं कि यमदेव नचिकेता से वचना करने के लिए ऐसा कहे हों। देव लोग मर्त्य प्राणी को ठगते नहीं बल्कि कृपालुता प्रगट करते हैं। सशय किया 21. In ancient times even the gods had this doubt, for being mystic this is not easily comprehensible ( Therefore ) O Nachiketa without giving any kind of pressure on me. Leave off this boon and ask for another. नचिकेता की दृढता देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्न सुज्ञेयमात्थ वक्ता चास्य त्वादृगन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥२२॥ पद०-देवैः, अत्र, अपि, विचिकित्सितम्, किल, त्व च मृत्यो, यत्, न, सुज्ञेयम, आत्य, वक्ता, च, अस्य, त्वादृग्, अन्य. न, लभ्य', न, अन्यो, वरः, तुल्यः, एतस्य, कश्चित् ।२३। अन्वय-अत्र देवैरपि विचिकित्सितम् हे मृत्यो त्व च यत् न सुविज्ञेयम् आत्थ अस्य वक्ता त्वाहक अन्यः न लभ्यः एतस्य तुल्य अन्यः कश्चित् वरः न अस्ति । [शं० भा०] देवैरत्राप्येतस्मिन्वस्तुनि विचिकित्मित किलेति भवत एव नः श्रुतम् । त्वं च मृत्यो यद्यस्मान्न सुज्ञेयमात्मतत्त्वमात्थ कथयसि, अत पण्डितैरप्यवेदनीयत्वाद् वक्ता चास्य धर्मस्य त्वादृक्-वत्तुल्य प्रन्यः पण्डितश्च न लभ्यः अन्विायमाणोऽपि । अय तु वरो नि यमप्राप्तिहेतु । अतो नान्यो वरस्तुल्य सदृशोऽस्त्येतस्य कश्चिदप्यनिन्यफलत्वादन्यस्य सर्वस्यैवेत्यभिप्राय । स० व्याख्या-अत्र-अस्मिन्नात्मविषये, देवैरपि, विचिकित्सितम्- सशयितम् किल-निश्चैयन चेत्, मृत्यो-हे यमदेव त्वम् च-भवानपि यम्- विषयम्, सुज्ञेयम् सरलतया ज्ञातव्यम् नैव अात्थ-ब्रवीषि (अतो हेतो ) अस्य दुर्जेयपदार्थस्य, वक्ता-व्याख्याता, वागन्यः-भवतोऽ यः नैव लभ्य'-प्राप्तव्यः, अतः, एतेनेदं स्पष्टतया प्रतिभाति, एतस्य तुल्यो वर कश्चिदन्यो न, नास्तीति भावः।
( ३७ ) हि० श०-विचिकित्सितम् = सशय किया है । आत्थ = कहा । वक्ता उपदेशक । वाहक = तुम्हारे जेसा । लभ्यः = मिलने वाला। भावार्थ-इस आत्म विषय में यदि देवताओं ने भी संशय किया और किसी निश्चय पर नहीं पहुंच सके और आप भी इसकी पुष्टि करते हुए कह रहे हैं कि यह प्रश्न सुजेय नहीं है, तो फिर यह स्पष्ट हो गया कि इसका समाधान करने वाला अप जैसा अन्य हमको कोई नहीं मिलेगा, और इस वरदान के तुल्य अन्य कोई वरदान भी हमारे लिए हमारी दृष्टि में नही है। इस प्रकार शिष्य की जिज्ञासा मे दृढता देखकर कि यह आत्म विषय श्रवण का अधिकारी तो है, किन्तु वैषयिक भोग से यदि विरक्त नहीं तो भी जान प्राप्त होकर भी, स्रवतीन्द्रिय लोलुपात्, के अनुसार ज्ञान कच्चे घड़ो की तरह वह जायगा तो लौकिक विषयों का प्रलोभन देने पर भी यदि परीक्षा में उत्तीर्ण हो तब ही पूर्ण अधिकारी होगा। इस प्रकार लौकिक भोग प्राप्ति का प्रलोभन देते हुए यमराज ने कहा- Even the gods had doubt indeed and you too say that it is a not easily comprehensible matter, I, more over find no other master of this subject as you And so I think consequently there is no other comparable boon यमराज द्वारा प्रलोभन शतायुष पुत्रपौत्रान्वृणीष्व बहून्पशून्हस्तिहिरण्यमश्वान् भूमेमहदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३॥ पद-शतायुष ,पुत्रपौत्रान् , वृणीष्व, वहून् , पशून् , हस्ति-हिरण्यमश्वान् भूमेः, महदायतनम्, वृणीष्व, स्वय च जीव, शरदः, यावद्, इच्छसि । अन्वय-शतायुषः पुत्रपौत्रान् वृणीष्व बहून् पशून् हस्तिहिरण्यम् अश्वान् ( वृणीष्व ) भूमेर्महदायतन वृणीष्व । स्वय च यावत् शरदः इच्छसि जीव । [शा०] एवमुक्तोऽपि पुनः प्रलोभयन्तुवाच मृत्यु:-शतायुष.--शतं 22 ( ३८ ) . वर्षाण्यायूषि एषा ताशतायुष पुत्रपौत्रान् वृणीष्व। कि च गवादिलक्ष- णान् बहून्पशून् हस्तिहिरण्य हस्ती च हिरण्य च हस्तिहिरण्यम् अश्वाश्च किं च भूमे पृथिव्या महद्विस्तीर्णमायतनमाय मण्डल राज्य वृणी व कि च सर्वमप्येतद् अनर्थक स्वय चेदल्पायुरित्यत आह–स्वय च जीव त्व जीव धारय शरीर समग्रेन्द्रियकलाप शरदो वाणि यावदिच्छनि जीवितुम् । स० व्याख्या-( हे नचिकेतः ) शतायुषः शतम्-शतवर्षाणि श्रायुः येषा तान्-तादृशान् पुत्रपौत्रान्, वृणीष्व-तथा चापरम्-बहून् पशून्, हस्तिनश्च हिरण्यम्-सुवर्णम् च, अश्वान् च एतान् सर्वान् पुनश्च भूमे.-महदायतनम्- पृथिव्या महद्भाग अायतनम् गृहम् च एव च एतेषा सर्वेषां भोगार्थम्-स्वस्य जीवन च, यावद्-यावन्त शरद. इच्छसि तावन्त जीव तावदायुः प्राण धारण कुरुष्व इत्येतान् सर्वान् याचस्व इति । हि० श०-शतायुषः = सौ वषो तक जीने वाले । वृणीष्व मागो। हस्ति-हिरण्यम् = हाथी-सोना । महदायतनम् = विस्तृतमण्डल वाला । शरदः= वर्षों तक । जीव = जीते रहो। भावार्थ-यम कहते हैं, हे नचिकेत तुम वर्ष के आयुष्य तक जीने वाले पुत्र पौत्रों को माग लो, बहुत पशु हाथी सुवर्ण और घोड़ा आदि को माग लो और बहुत लम्बी चौड़ी विस्तार भूमि और गृह मागो तथा जब तक जितने वर्ष के जीवन की इच्छा हो उतनी अायु को माग लो, किन्तु आत्म ज्ञान की चर्चा मत करो। बिशेष—इससे यह स्पष्ट होता है कि ऐहलौकिक सकल भोग प्राप्ति से आत्म ज्ञान सर्वोपरि है। आगे और भी लौकिक पदार्थ को कहते हुए यमदेव बोले- Pray for sons and grandsons bearing hundred years life Ask for many horses, elephants gold, ther animals, even a vast expanse of land yourself live long according - 23 to wish एतत्तुल्यं यदि मन्यसे वर वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च ।
( ३६ ) सत्यसकल्पो देव । महाभूमी नचिकेतस्त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥२४॥ पद०-एतत्, तुल्यम्, यदि मन्यसे, वरम्, वृणीष्व, वित्तम्, चिर- जीविकाम् च । महाभूमौ नचिकेत त्वम्, एघि, कामाना, त्वा, कामभाजम् करोमि । अन्वय-एतत्तल्यम यदि ( अन्य ) वर मन्यसे ( तम् ) वृणीष्व वित्तं चिरजीविका च वृणीष्व हे नचिकेत. त्व महाभूमौ एधि ( अह ) त्वा कामाना कामभाज करोमि ।' शा० एतत्तुल्यमेतेन यथोपदि टेन सदृशमन्यमपि यदि मन्यसे वरं तमपि वृणी-व। कि च वित्त प्रभूत हिरण्यरत्नादि चिरजीविका च सह वित्तेन वृणीवेत्येतत् । कि बहुना महत्या भूमौ राजा नचिकेतस्त्वमेधि भव । कि चान्यत्कामाना दिव्याना मानुषाणा च त्वा त्वा कामभाज' कामभागिन कामार्ह करोमि ह्यह सस्कृत व्याख्या-नचिकेत.-हे नचिकेत. एतद्-आत्मज्ञानतुल्यम्- समानम् यदि अन्यद् वरम् मन्यसे-जानासि, तादृशम् वित्तम्-धनम्, चिरजी- विकाम् बहुतकालपर्यन्तं जीविकासाधनमत्रमहाभूमौ त्वम् एधि-वर्तस्व- अर्थात् श्राधिराज्य साम्राज्य प्राप्नुहि, किमुत वक्तव्यम् त्वा-त्वाम् कामाना- अभिलाषाणा मनोनुकूलभोगकरत्व करोमि इति । हि० श०-एतत्तुल्यम् = इसके समान । महाभूमौ = विस्तृत पृथ्वी पर । भव = हो जायो, शासक हो जात्रो। त्वा = तुमको कामाना काम माजम-भोगों को भोगने वाला । करोमि कर देंगे | भावार्थ- हे नचिकेत. इस आत्म ज्ञान के समान तुम जो जो लौकिक भोग समझो तादृश धन चिरकालीन जीविकासाधन, पृथ्वी का महान् साम्राज्य प्राप्त कर लो, तुमको सपूर्ण इच्छानुकूल भोग भोगने वाला कर देगे और भी भोग का प्रलोभन देते हुए यम ने कहा । Or ask for another boon which you think parallel to this If you want to have wealth with long life and even - 24 ( ४० ) , मा to be the ruler of this vast land ask for that I will make you fit to enjoy of all according to wish ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामा श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामा. सरथाः सतर्या न हीदृशा लम्भनीया मनुष्यैः । प्राभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षी ॥२५॥ पदच्छेद-ये, ये, कामाः, दुर्लभा', मर्त्यलोके, सर्वान् कामान, छन्दतः प्रार्थयस्व, इमा, रामा', सरथा', सतूर्याः, न, हि, ईदृशा , लम्भनीया. मनुष्यै आभि, मत्प्रत्ताभिः, परिचारयस्त्र, नचिकेत मरणाय, अनुपाक्षीः । अन्वय-मत्यलोके ये ये कामा दुर्लभाः ( तान् ) सर्वान् कामान् छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा सरथा सतूर्या. रामा. ईदृशाः मनुष्यैः न लम्भनीयाः हि मत्प्रत्ताभिः श्राभिः परिचारयस्व हे नचिकेतः मरण मा अनुप्राक्षी । शा० ये ये कामा प्रार्थनीया दुर्लभारच मर्त्यलोके सर्वास्तान् कामाश्छन्दत इच्छात प्रार्थयस्व। किं चेमा दिव्या अप्सरसो रमयन्ति पुषानिति रामा सह रथैर्वर्तन्त इति मरथा मा मवादित्रास्ताश्च न हि लम्भनीया प्रापणीया ईदृशा एवविधा म 'यमन्घरस्मदादिप्रसाद- मन्तरेण । आभिर्मत्प्रत्ताभिर्मया दत्ताभि परिचारिणीभि परिचारयत्व आत्मान पादप्रक्षालनादिशुश्रू पा कारयात्मन इत्यर्थ । नचिकेतो मरणं मरणसम्बद्ध प्रश्नं प्रेतेऽस्ति नास्तीति काकदन्तपरीनाम्प मानुप्राक्षीमवं प्र टुमर्हसि । सस्कृत व्याख्या-पुनरपि, हे नचिकेतः मर्त्यलोके अस्मिन्मरण धर्मिणि मनुष्यलोके ये ये-यावन्तः दुर्लभा दुखेन प्रापणीयाः कामा-मनोरथाः तान् सर्वान् छन्दत -यथेच्छम्-प्रार्थयस्व-याचस्व, सरथाः सतूर्याः-वाहन वाद्या- दिभियुक्ता. इमाः रामाः-स्वर्गिण्य अप्सरसः याचस्व हि-निश्चयेन ईदृशा और बाजा के साथ ( ४१ ) प्राप्तव्या मनोरथा मनुष्यैः-अन्यैः नैव लम्भनीया -प्रापणीया', अत: मत्प्रत्ताभि श्राभिः रामाभि.-अस्माभि दत्ताभि एतादृशीभिः रमणीभिः, परिचारयस्व-सेवस्व किन्तु मरणम्-मरणात्परम् आत्मविषय मा-नैव अनु- प्राक्षी - अपृच्छः-प्रश्न मा कार्षी इत्यर्थः । हि० श.-कामा भोग । छन्दतः- इच्छानुसार । प्रार्थयस्व-मागो । इमाः ये । सरथाः रथ-सहित । सतूर्या =बाजा सहित | रामा = रमण कराने वाली, अप्सराये ईदृशा. इस तरह के। न लम्भनीयाः = नहीं प्राप्त होते । मत्प्रत्ताभि = मेरे दिये हुए से । आभिः इनसे । परिचारयस्व = सेवा कराइये मरणम् = मृत्यु के विषय मे । मा अनुप्राक्षीः = ऐसा मत पूछो। भावार्थ हे नचिकेत जितने मनोरथ इस मर्त्यलोक मे मनुष्यों से दुर्लभ हैं, उन सबको यथेच्छ तुम माँग लो, वाहन स्वर्गीय अप्सराओं को प्राप्त कर लो। जो मनुष्यों से सदा अलभूय हैं। हमारे से दी हुई उन रमणियों से सेवा करा लो किन्तु हे नचिकेतः मरने के बाद आत्मा के विषय का प्रश्न मत करो। इस प्रकार यमराज ने नचिकेता की परीक्षा के लिए ही यह सब प्रलो- भन दिखाया था। इस पर प्राकृत पुरुष से अशक्य अत्यन्त उदारचेता नचि- केता यमराज से इस प्रकार बोला- 25. Yeu may pray for according to your choice, all these things that are desirable but not available on the earth for mortals Here are they. Women sitting in the chariots with the musical instruments, surely not found there on the earth for montals are ready to serve you But O Nachiketa de not ask me about death नचिकेता की निरीहता श्वोभावा मर्त्यस्य यदन्तकैत- त्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेज. । अपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥२६॥ पद०-वःभावाः, मर्त्यस्य, यद्, अन्तक ! यद्, अन्तक ! एतत्, सर्वेन्द्रियाणाम् NA ( ४२ ) जरयन्ति तेजः । अपि सर्वम् जीवितम्, अल्पम् एव, तव एव वाद्यः तव, नृत्यगीते। अन्वय-अन्तक ( त्वदुक्ता. भोगाः ) श्वोभावाः मय॑स्य सर्वेन्द्रियाणाम् यत्तेजः एतत् जरयन्ति अपि सर्वम् जीवितम् अल्पम् एव तव वाहा नृत्यगीते तव एव ( तिष्ठन्तु )। [शा० एवं प्रलोभ्यमानोऽपि नचिकेता महाह्रदवदक्षोभ्य आह- श्वो भवि यन्ति न भविष्यन्ति वेति संदिह्यमान एव येषां भावो भवनं त्वयोपन्यस्ताना भोगाना ते श्वोभावा । किं च मय॑स्य मनुष्यस्यान्तक हे मृत्यो यदेतत्सर्वेन्द्रियाणा तेजस्तज्जरयन्ति अपक्षयन्त्यप्सर प्रभृतयो भोगा अनर्थायैवैते धर्मवीर्यप्रज्ञातेजोयश प्रभृतीना क्षपयितृत्वात् । या चापि दीर्घजीविका त्वं दित्ससि तापि शृणु। सर्वं यद्ब्रह्मणोऽपि जोवितमायुरल्पमेव किमुतास्मदादिदीर्घजीविका। अतस्तवैव तिष्ठन्तु वाहा रथादय तथा नृत्यगीते च । म० व्या०-हे अन्तक-यमदेव श्वोभावा.-श्वो -अग्रिमदिवस यावत् स्थिरस्वभावा सर्वेभावा.-पदार्थाः, यद्मर्त्यस्य-मरण धर्मणो मानुषस्य एतत्-भवदुक्तम् भोग्यम् न सुखाय भवति किन्तु सर्वेन्द्रियाणाम्-तेजा जर- यन्ति-नाशयन्ति । अपि च चिरायुषो विषये यदुक्तम तदपि पराधकालापेक्षया जीवितम् अल्पमेव-अत्यल्पमेव, अत. एवत्-सवं भोग्यरूपम्, वाह्य-अश्वा- दयः नृत्यगाते-नाट्य गानं च तवैव अस्तु, नैवेन अस्माकं प्रयोजनम् । हि० श०-अन्तक = यम । श्वोभावा - क्षणभगुर । यत्तेजः = जो तेज है। जयन्ति जीर्ण करते हैं। वाहाः = वाहन । नृत्यगीते-नाच गाना । तव तुम्हारे ही रहे। भावार्थ-हे यमराज ! ये भोग “कल रहेंगे या नहीं" ऐसे ( अनि- श्चित ) हैं और समग्र इन्द्रियो के तेज को जीर्ण करते हैं, यह सारा जीवन भी अल्प ही है, आपके ( दिये हुए ) वाहन तथा नृत्य गीतादि आप ही रखें ( मुझे उनकी आवश्यकता नहीं है)। विशेष - गीता मे स्वय भगवान् कृष्ण ने कहा है- येहि सस्पर्शजा भोगा दु खयोनय एव ते । आद्यन्तवन्त कौन्तेय न तेषु ( ४३ ) चेत्त्वा। वरस्तु मे रमते बुधः। इति-अर्थात् लोक के सभी भोग्य दुःख की उत्पत्ति के स्थान हैं और अन्त होने वाले हैं। 26. O yama' all these things ( enumenrated by you ) have doubt in their existence, they waste away the activity of all the senses of man and ( consequently ) the life becomes sour So let these horses, songs and dances etc for yourself alone आत्म ज्ञान के लिये आग्रह न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं मे वरणीयः स एव ॥२७॥ पद०-न, वित्तेन, तर्पणीयः, मनुष्यः, लप्स्यामहे, वित्तम्, अद्राक्ष्म, चेत्, त्वा, जीविष्याम यावदीशिष्यसि, त्वम्, वर' तु, मे, वरणीयः सः, एव । अन्वय--मनुष्यः वित्तेन न तर्पणीयः चेत् त्वा अद्राक्ष्म वित्त लप्स्यामहे यावत् त्वम् ईशिष्यसि ( तावत् ) जीविष्यामः मे वरस्तु स एव वरणीयः ।। शिान प्रभूनन वित्तेन तर्पणीयो मनुष्य । न हि लोके वित्तलाभ, कस्यचित्रप्तिकरो दृष्ट । यदि नामास्माक वित्तत णा स्याल्लप्स्यामहे प्राप्स्यामह इन्येतद्वित्तमद्रास्म दृष्टवन्तो वय चेत्त्वा त्वाम् । जीवितमपि तथैव । जीवि यामो यावद्याम्ये पदे त्वम् ईशियमीशिष्यसे प्रभु स्या कथ हि मयस्त्वया समेत्याल्पधनायुर्भवेत् । वरस्तु मे वरणीय स एवं यदात्मविज्ञानम् सस्कृत व्याख्या--मनुष्यः, वित्तेन, न तर्पणीय – पूरणीयः, त्वा- त्वाम-भवन्तम् अद्रक्ष्म-अपश्याम चेत्, वित्तम-धनम् लप्स्यामहे अर्थात् धनतु भानुषङ्गिकफलम् एवमभवदर्शनस्य, इदमपि, फल लभामहे, इत्याह- त्वम्, यावत् ईशिष्यसि-यावत्कालपर्यन्त यमलोकम, अनुशासिष्यसि तावत कालपर्यन्त स्वेच्छया जीविष्यामः अतोहेतोः वरः, तु स एव आत्मविषयकमेव नान्य इति ।
( ४४ ) हि० श०-वित्तेन = घन से । न तर्पणीय =तृप्त नहीं किया जा सकता। वा = आपको । अद्राक्षम = देख लिया। लप्स्यामहे = पा जाऊंगा । यावत् त्वम्-जब तक तुम । ईशिपसि = शासन करोगे। भावार्थ-नचिकेता ने बड़ी ही बुद्धिमानी प्रदर्शन करते हुए कहा कि हे देव इस मर्त्यलोक मे मनुष्य धन से तृप्त नहीं किया जा सकता और इमको आपका दशन हो जाने से आवश्यकतानुसार धन प्रात हो ही जायगा तथा आपके यमलोक के शासन करते हुए इच्छानुसार जीवन भी प्राप्त हो जायगा इसलिए वरदान तो मुझे वही आत्म-विषयक ही प्राप्त करना है अन्य तो आपके दर्शन का आनुपङ्गिक फल है और सभी फल अत्यन्त अकिञ्चित् कर हैं। विशेष-श्रीमद्भागवत आदि में बहुत लिखा है-“न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यात, हविपा कृष्णवमंव भूव एवाभिवद्धत" अर्थात् काम प्राप्ति से काम की शान्ति नहीं हाती जसे अग्नि में आहुति देने से ज्वाला और प्रज्वलित ही होता है न कि शान्त । 27 O Death! man is not to be satisfied with wealth, When we have seen you we must get wealth and long life uptıll your rule But the boon asked by me is only worth praying for अजीर्यतामसूतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्य क्वध स्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्णरतिप्रमोदा- नतिदीर्घ जीविते को रमेत ॥२८॥ पदच्छेद-अर्ज येताम्, अमृतानाम्, उपेत्य, जीर्यन्, मयः, कुशध स्थ, प्रजानन्-अभिध्यायन् वरितिप्रमोदान, अतिदीर्घे, जीविते क रमेत । अन्वय-३ प्रजानन् जीयन् क्वध स्थ मर्त्यः अजीर्यताम् अमृतानाम् उपेत्य वर्णरतिप्रमोदान् अभिध्यायन् अतिदीर्घ जीविते रमेत । [शा०] यतश्च-अजीर्यता बयोहानिमप्राप् वताममृताना सकाशमु- पेत्य उपगम्यात्मन उत्कृष्टं प्रयोजनान्तरं प्राप्तव्यं तेभ्य प्रजानन् उपलभ- -- मान स्वय तु जीर्यन्मयो जरामरणवान्क्वध स्थ कु पृथिवी अधश्चान्त- रिक्षादिलोकापेक्षया तस्या तिष्ठतीति क्वध स्थ सन् कथमेवमविवेकिभि. प्रार्थनीय पुवित्तहिण्याद्यस्थिरं वृणीते ! क्क तदास्थ इति वा पाठान्तरम् । अस्मिन्पक्षे चाक्षरयोजना । तेषु पुत्रादिप्वारथा प्रास्थिति तात्पर्येण वर्तन यस्य स तदास्थ. । ततोऽ धिकतर पुरपार्थ दुष्पमपि प्रापिपयिषु व तदास्थो भवेन्न कश्चित्तद- मारजस्तदर्थी ल्या, इत्यर्थ सर्वो छुपयु पर्येव बुभूषति लोक. तरमान्न पु. पित्तादितो लोभ्योऽहन् । कि चाप्सर प्रमुखान्वर्णरतिप्रमोदानन- वस्थितपतयाभिध्यायनिरूपयन्यथावत् अतिदीर्षे जीविते को विवेकी रमेत सस्कृत व्याख्या-अजीर्यताम् -जरामरणादिशून्यानाम्, अमृतानाम्- मुक्तात्मनाम भवाशानन रवरूपम्-उपेत्य-सम्यग् ज्ञात्वा-अथवा भवादृशाना सङ्गतिमुपेत्य-पाय जोयन, मर्त्य -जरामरणादिधर्मा, कु-पृथिवी-तत्र अध तिष्ठति इति कघ स्थ अथवा अत्र पाठन्तरम्-क्क तदास्था--जरामरणाद्युपप्लुत अत्रत्य विपये क-कथ आस्थावान् भवेत्, अत्रत्य-वर्णरतिप्रमोदान सौन्दर्य ब्रह्मादिपर्यन्तभोग' आमोद-प्रमोदाश्च, तान् सर्वान अभिध्यायन्—चिन्तयन्- अस्थिरताम जानन्-अतिदीर्घ जीविते-बहुकालपर्यन्तजीवने क.-बुद्धि मान् रमेत-ग्रीतिमान् भवेत इति भाव । हि० श०-अजीर्यताम् वृद्धावस्था-हीन | अमृतानाम् = अमरों के। उपेत्य = सगति पात कर । जीर्यन् - बृद्धावस्थावाला। मर्त्य मरणशील कु == पृथ्वो । अधः - (स्वर्ग से। नीचे । स्थ = स्थित । प्रजानन् - जानते भी। अभिध्यायन्-चिन्ता करता हुआ। वर्णरतिप्रमोदान्-रूप रग, प्रम, श्रामोद, प्रमोद । अतिदोर्ष = लम्बे। जीविते = जीवन मे । को = कौन । रमेत् = रमेगा, लित रहेगा। भावार्थ-जा मरण अादि शून्य आपके समान मुक्तात्मा महापुरुषों की सङ्गति प्राप्त कर जन्म जरामरण आदि धर्मवाला स्वर्ग के नीचे की पृथिवी पर रहने वाला मर्त्यलोक का प्राणी अपनी स्थिति को जानकर भी यहाँ के पदार्थों मे कैसे अभिमान रखेगा और मर्त्यलोक का नश्वर नचिकेता पुनः सौंदर्य नाना प्रकार का ब्रह्मलोक पर्यन्त का भोग और आनन्द के स्वरूप को ठीक-ठीक चिन्ता करता हुअा कौन ऐसा प्राणी बहुत दिन पर्यन्त यहाँ जीने का प्रेमी होगा, अर्थत् घृणा ही करेगा। इस प्रकार सकल कामनाओं के प्रलोभन को अतिक्रमण करता हुआ बोला- 28 Having reached the place of immortals once what mortal is there who lives here on the earth but knows of higher goal will ever prefer worldly enjoyment? यस्मिन्निदं विचिधित्सन्ति मृत्यो यत्साम्पराये महति ब्रूहि नस्तत् । योऽयं वो गढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता वृणीते ॥२६॥ पदच्छेद-यस्मिन्, इदम्, विचिकित्सन्ति, मृत्यो, यत्, साम्पराये, महति ब्रूहि, न. तत्, यः, अयम् , वरः मर्त्य अनुप्रविष्टः, न अन्य, तस्मात् नचिकेता, वृणीते। मृत्यो यस्मिन् महति साम्पराये यत् इद विचिकित्सन्ति नः तद् ब्रहि य अयम गूढम् अनुप्रविष्ट वरः ( विद्यते ) नचिकेना. तस्मात अन्यम् न वृणीते । शा०) अतो विहायानित्यै कामै प्रलोभनं यन्मया प्रार्थितम्- यस्मिन्प्रेत इद विचिकित्सन विचिकित्मन्ति अस्ति नास्तीत्येवप्रकार हे मृत्यो साम्पराये परलोकविषये महति महत्प्रयोजननिमित्ते प्रात्मनो निर्णयविज्ञान यत्तब्रूहि कथय नोऽस्मभ्यम् । कि बहुना योऽयं प्रकृत आत्मविषयो वरो गूढ गहन दुर्विवेचन प्राप्तोऽनुप्रविष्ट । तस्माद्वरादन्यम- विवेकिभि प्रार्थनीयमनित्यविषय वर नचिकेता न वृणीते मनसापीति श्रुतेर्वचनमिति । सस्कृत व्याख्या-हे मृत्यो, यमराज यस्मिन् महति साम्पराये-महद्भते पारलौकिक इदम्विचिकित्सन्ति शका कुर्वन्ति, यः अयम्, गूटम्-अनुप्रविष्ट. अात्मतत्वं सम्प्रविष्टः वरः, तस्माद् अन्यं वर नचिकेता नैव वृणीते याचते । - ( ४७ ) - हि० श०-यस्मिन् जिस । महति = महान् । साम्पराये-परलोक सम्बन्धी आत्मज्ञान के विषय में । इदम् = यह । विचिकित्सन्ति =शका करते हैं। न' = मुझसे । ब्र हि-कहो ! गूढम् = रहस्यमय । अनुप्रविष्ट. अात्म तत्त्व में प्रविष्ट । तस्मात् = उससे { आत्मतत्त्व से ) अन्यम् = दूसरा । भावार्थ-हे यमदेव, जिस महान् स्वरूप वाले परलोक सम्बन्धी आत्मतत्व की शका सब महान लोग भी करते आये हैं, जो अात्मतत्व अत्यन्त गूढ है, उसको छोड़ कर अन्य वरदान नचिकेता आप से नहीं मांग सकता। 29. O Death ; tell me about the existence of life after death about which (Self) people have doubt Apart from this, I never want to pray for any other boon than that of the mysterious one.
प्रेय- प्रथमाध्याये द्वितीय वल्ली यमने द्वितीय वल्ली में प्रथम शिष्य की ऐहलौकिक ऐश्वर्य के विषय में परीक्षा लेकर उसमे उसे सर्वथा उत्तीर्ण समझ कर तथा मुसुक्षा विषयक उसकी स्थिरता निश्चल देखकर उपदेश देने के लिए नुमुक्षा की महिमा ( महत्त्व ) को इस प्रकार कहा- अन्यछ योऽन्यदुतव स्ते उभे नानार्थे पुरुष सिनीतः। तयोः शेय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीते ॥१॥ पदच्छेद--अन्यत्, श्रेय , अन्यत्, उत, एव, प्रयः, उमे, नानार्थ, पुरुपम् , सिनीतः, तयोः, आददानस्य, साधु, भवति, होयते, अर्थात्, यः, उ, प्रेयः, वृणीते। अन्वय-अन्यत् श्रेयः उत अन्यत् एव प्रेयः ते उभे नानार्थे (सती) पुरुष सिनीत. तयो श्रेयः आददानस्य साधु भवति उ सः अर्थात् हीयते य. प्रेयः वृणीते। [शा०] परीक्ष्या शिष्य विद्यायोग्यता चावगम्याह–अन्यत्पृथगेव श्रेयो नि श्रेयसं तथान्यदुताप्येव प्रेय प्रियतरमपि । ते प्रेय श्रेयसी उभे नानार्थे भिन्नप्रयोजने सती गुरुपमधिकृत वर्णाश्रमादिविशिष्टं सिनीतो बध्नीतस्ताभ्यामात्मकर्तव्यतया प्रयुज्यते सर्व. पुस्प । श्रय प्रेयसोह्यभ्यु- दयामृतत्वार्थी पुरुष प्रवर्तते अत श्रय प्रेय प्रयोजनकर्तव्यतया तास्या बद्ध इत्युच्यते सर्व पुरुष । ते यद्यप्येकैकपुषार्थसम्बन्धिनी विद्याविद्यारूपत्वाद्विरुद्ध इत्यन्तरा- त्यागनैकेन पुरषेण सहानुष्ठातुमशक्यत्वात् तयोहित्वाविद्यारूपं प्रेयः , और। ( ४६ ) श्रेय एव केवलमाददानस्योपादानं कुर्वत. साधु शोभनं शिवं भवति । यस्त्वदूरदर्शी विमूढो हीयते वियुज्यतेऽस्मादर्थात् पुरुषार्थात् पारमार्थि- कात्प्रयोजनान्नित्यात् प्रच्यवत इत्यर्थः । कोऽसौ य उ प्रेयो वृणीत उपादत्त इत्येतत् सस्कृत व्याख्या-श्रेयः-अतिशयेन प्रशस्तः श्रेयः-अति प्रशस्त मोक्ष मागः अन्यत्-पृथस्ति, प्रय.-अतिशयन प्रियः प्रेयः-प्रयास्पद भागमाग. अन्यत् पृथगेव भवति, ते उभे-अयप्रयसा नानार्थे-परस्पर विलक्षण प्रयाजने सता पुरुप सनीतः-वनीत.-पुरुण स्ववशतामापादयतः इत्यर्थः। द्वयो. तयाः-मध्य श्रयः श्राददानस्य-मोक्ष प्रयतमानस्य साधु 'गांत.' भवात यस्तु प्र यावृणीत-अभिलषति स अथात्-पुरुषाथात् हीयत- भ्रष्टो-भवाते निश्चयन उ इति अवधारणे । हि० श०–श्रय. = कल्याण का माग । अन्यत् = दूसरा : उत = एव-हा । प्रय =प्रय अर्थात् याग्य वस्तुओं । उभे-दाना । त-वे। नानार्थे भन्न-भिन्न पारणाम वाले । पुरुषम् - मनुष्य का । सनातः = बाँधते हैं। योः =उन दानों म । आददानस्य = स्वाकार करने वाला। साधुउत्तम । वृणात स्वाकार करता है। हीयते= भ्रष्ट हाता है । भावार्थ-अति प्रशस्त जा मोक्ष माग है, वह पृथक् है तथा प्रात प्रय लगने वाला भाग माग पृथक ई । य दाना परस्पर भिन्न-भिन्न प्रया- जन वाले हाकर पुरुष का अपना-अपना तरफ बांधते है। इन दानों के बोच जा धोर पुरुष श्र य का प्राप्ति का यत्न करता है उसको उत्तम गति हाता है तथा भाग की अभिलाषा करनवाला यथाथ पुरुषाथ से भ्रष्ट हो जाता है। विशष-यद्याप शास्त्र के लिय मनुष्य क प्राप्तव्य चार पुरुषाथ है-धर्म, अथ, काम तथा माक्ष, तथापि परम प्राप्तव्य चतुर्थ माक्ष हा है, उसके बिना अन्य का प्राप्ति से भा मनुष्य अधूरा हा रह कर जन्ममरण रूप ससार चक्र म भटकत-भटकत स्वग नरकााद भागत ८४ लक्ष योनि के चक्र से कभी छुटकारा नहीं पाता है। Metaphysies (ET) and Materialism (1) are two quite different things One is preferable, the other pleeasurable.
( ५० ) These two solve the different objects of men by binding them, Good befalls only on him who chooses the former (श्रेय ) but the man who accepts the latter (92) falls from the real path of his life श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेत- स्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः। श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्षेमावृणीते ॥२॥ पदच्छेद-श्रयः, च, प्रेयः, च, मनुष्यम्, एतः, तौ, सम्परीत्य, विविनक्ति, धीरः, श्रेयः, हि, धीरः, अभि, प्र यसः वृणीते, प्रयः, मन्द', योग- क्षेमाद्, वृणीते। अन्वय -श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यम् एतः धीर. तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः प्रेयस श्रेय अभिवृणीते मन्दः योगक्षेमात् प्रेयः वृणीते । [शा०] यधुभे अपि कर्तु स्वायत्ते पुरुषेण किमर्थ प्रेय एवादत्ते बाहुल्येन लोक इत्युच्यते-सत्यं स्वायत्ते तथापि साधनतः फलतश्च मन्दबुद्धीना दुविवेक रूपे सती व्यामिश्रीभूते इव मनुप्यमेतं पुषमा इतः प्राप्त श्रेयश्च प्रेयश्च । अतो हंस इवाम्भस. पयस्तौ श्रेयःप्रेय पदार्थों सम्परीत्य सम्यक् परिगम्य मनसालोच्य गुरुलाघवं विविनक्ति पृथक्करोति धीरो धीमान् । विविच्य च श्रेयो हि श्रय एवाभिवृणीते प्रेयसोऽभ्यहितत्त्वात् । कोऽसौ ? धीर.। स विवेकासामर्थ्याद्योगक्षेमाद्योगक्षेमनिमत्त शरीराधुपचयरक्षणनिमित्तमित्येतत्प्रेय पशुपुत्रादिलक्षणं वृणीते। संस्कृत व्याख्या-श्रयः प्रयश्च-मोक्षभोगौ द्वौ मनुष्यम् एतः- प्राप्नुतः, तौ-तौ श्रेयःप्रेयसौ सम्परीत्य-सम्यगालोच्य धीर. विविनक्ति हंस इव क्षीरनीरे पृथक्करोति । तत्रधीर. विकारहेतौसत्यपि अविकारवान् स धीरः (विकारहेतौ सति न विक्रियन्ते चेतास येषा त एव धीराः इति व्याख्यानात् ) श्रेयः हि निश्चयेन प्रेयसः-प्रेयोपेक्षय अभिवृणोते-अभ्यस्ति- स्वात् अभिलषति मन्दः-मन्दमतिः योगक्षेमाद् हेतोः प्रेय एव वृणीते । यस्तु मन्दोऽल्पबुद्धि - ( ५१ ) कार्पण्यदोषत्वात् अलब्धलाभः योग' लब्धस्य परिरक्षणम् क्षेमः ‘तयो' प्राप्ती- यतते इतिभावः । हि०श०-मनुष्यमन्मनुष्य को । एतः = प्राप्त होते हैं । धीरः = बुद्धिमान् मनुष्य । तौ-उन दोनों के विषय में । सम्परीत्य-भली भांति विचार करके । विविनक्ति-पृथक-पृथक् रूप से जान लेता है। प्रयसः =प्रय अर्थात् योग की अपेक्षा । श्रयः = कल्याण के मार्ग को ही । अभिवृणीते स्वीकार करता है । मन्दः = मूर्ख । योगक्षेमात् = सांसारिक योग क्षेम की इच्छा से । प्रेयः = योग के मार्ग को ही । वृणीते स्वीकार करता है। भावार्थ-श्रेय और प्रय दोनों मनुष्य को जब प्राप्त होते हैं तो विवेकी मनुष्य दोनों को हस की तरह दूध और पाना की तरह पृथक् कर लेता है। उस समय धीर पुरुष प्रय की उपेक्षा करके श्रेय को हा वरण करता है और मन्द अर्थात् क्षीण बुद्धि योगदोम के लिए प्रेय की आकाक्षा कर लेता है। विशेष-यहाँ घीर शब्द की व्याख्या शास्त्रों के अनुसार की गयी है। विकार के साधन उपस्थित होने पर भी जिसका चित्त विकार को न पाया हा वही धीर कहा जाता है । यहाँ प्रकृत मे श्रय प्रय दोनों के प्राप्त होने पर धीर ही रेय की उपेक्षा कर सकता है, अज्ञानो कभी भा नहीं वीग क्षेम शब्द की व्याख्या इसके पहले भी की गयी है। अलब्ध की प्रास्ताको योग और लब्ध वस्तु की रक्षा होना क्षेम कहा गया है । इस प्रकार श्रेय की प्रशसा करके यम श्रेय के अनन्य अधिकारी प्रिय नचिकेता की प्रशसा करते हुए आगे कहते हैं। These two paths (the preferable and the pleasure (श्रय and so lie before men The man of intelligence examines the both and separates these He chooses the path of the preferable () while the fool selects the path of the pleasure (प्रेय) for the development and protection of body. नचिकेता की प्रशंसा स त्वं प्रियान्प्रियरूपा श्च कामा- नभिध्यायन्नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ( ५२ ) नैता सृङ्का . वित्तमयीमवाप्तो यस्यां मज्जन्ति बहवो मनुष्याः ॥३॥ पदच्छेद-स, त्वम्, प्रियान्, प्रियरूयान् च, कायान् अभिध्यायन् नचिकेत , अत्यनाक्षीः,। न एताम् सृङ्काम्, वित्तमयीम्, अवाप्त यस्याम्, मजन्ति, बहव मनुष्याः। अन्वय-नचिकेत स त्वम् प्रियान् प्रियरूपान् च कामान् अभिव्यायन् श्रत्य स्नाक्षी वित्तमयम् एताम् सङ्काम् न अवाप्त यस्याम बद्दव मनुष्या: मज्जन्ति । [शां०] त्वं पुनः पुनर्मया प्रलोभ्यमानोऽपि प्रियान् पुत्रादीन् प्रिय- रूपांश्चाप्सर प्रभृतिलक्षणान् कामानभिध्यायंश्चिन्तयंस्तपाम् अनित्य- त्वासारत्वादिदोषान् हे नचिकेतोऽत्यस्राक्षीरतिसृष्टवान् परित्यक्तवान- स्यहो बुद्धिमत्ता तव । नैतामवासवानसि सृङ्का सृति कुत्सिता मूढजन- प्रवत्ता वित्तमयी धनप्रायाम् । यस्या सृतौ मज्जन्ति सीदन्ति बहवोऽनेके मूढा मन या । संस्कृत व्याख्या-हे नचिकेतः, स त्वम् , प्रियान् - प्रियवस्तूनि स्वतः, प्रियरूपान स्वरूपश्च प्रियसुन्दरताम्-आदीनि, कामान्-मनोरथान अभिध्यायन्- दुःखोढर्कत्वदुःख मिश्रितत्वादि-दोषयुक्ततयानिरूपयन् सर्वथाअत्यनाक्षा:- त्यक्तवान् असि । वित्तमयी-धनप्रायाम् सङ्कम् -शृंखलाम् मूढजनसेवि- ताम् एवाम् न अवासः-न प्राप्तवानसि यस्याम् बहवो मनुष्या नजन्ति अवगाहन्ते । हि० श०-त्वम् =तुमने । प्रियात् = प्रिय लगने योग्य ! प्रिय रूपात् । अत्यन्त प्रिय लगने वाले अप्सरादि । कामान् भोगों को। अभिध्यायन् = विचार करते हुए । अत्यनाक्षी: त्याग दिया । एताम् हस । वित्तमयीम् - सम्पत्तिरूपी। सृङ्काम् = माला। अवाप्तः प्राप्त किया यस्याम् = जिसमे । बहवः = बहुत से । मज्जन्ति - डूब जाते हैं। भावार्थ- हे नचिकेत ! तुमने तो स्वयमेव स्वाभाविक रूप मे प्रिय कामनाओं, स्वर्ग तक के अप्सरादि भोगों को, दुख रूप और दुःख - , मिश्रित उनका विचार कर ही (दोष युक्त देखते हुए) सर्वथा त्याग कर दिया है जिसमें सभी मनुष्य गोता खाते रहते हैं। Nachiketa, you, such as you are, have kicked out all the desirable objects having fully considered and knowing them futile as they are themselves delightful or the generator of delight You have not selected this path of wealth wherein many of the people sink and come to griel दूरमेते विपरीते विषूची अविद्या या च विद्योति ज्ञाता। विद्याभीप्सिनं नचिकेतसं मन्ये न त्वा कामा बहवोऽलोलुपन्त ॥ ४ ॥ पदच्छेद-दूरम्, एते, विपराते, विषूची, अविद्या या च विद्या इति ज्ञाता। विद्या, अभीप्सिनम्, नचिकेतसम्, मन्ये, न स्वा, कामा, बहवः, अलोलुपन्तः । अन्वय-या अविद्या या च विद्या इति एते दूरम् विपरीते विषूची च इति-ज्ञाता नचिकेतस त्वा विद्याभीप्सिन मन्ये बहव कामा. (त्वाम् ) न अलोलुपन्त । [शा०]तयो.श्रय आददानस्य साधु भवति हीयतेऽर्थाद्य उ प्रेयो वृणीत इत्युक्त तत्कस्माद्यत -दूर दूरेण महतान्तरेणैते विपरीते अन्योन्य- व्यावृत्तरूपे विवेकाविवेकात्मकत्वात्तम प्रकाशाविव । विषूची विषूच्यौ नानागती भिन्नफले संसारमोक्षहेतुत्वेनेत्येतत् । के ते इत्युच्यते या चाविद्या प्रेयोविषया विद्येति च श्रेयोविषया ज्ञाता निर्मातावगता पण्डितै । तर विद्याभीप्सिन विद्यार्थिनं नचिकेतसं त्वामहं मन्ये । कस्माद्यस्मादविद्वबुद्धिप्रलोभिन कामा अप्सर प्रभृतयो बहवोऽपि त्वा त्वा नालोलुपन्त न विच्छेदं कृतवन्त श्रेयोमार्गादात्मोप- भोगाभिवाञ्छासंपादनेन । अतो विद्यार्थिनं अयोभाजनं मन्य इत्यभिप्रायः। संस्कृत व्याख्या-या अविद्या इति ज्ञाता-कामकर्मा'त्मकारूपा, या च- विद्या-हाते ज्ञाता-वैराग्यतत्वरूपाज्ञानमयी, एते-द्व दूरम-अत्यन्तम् विषूची- ( ५४ ) विषूच्यौ-(पूर्वसवर्णदीर्घ छान्दसः ) भिन्नगती, विपरीते-परस्परविरुद्ध च तत्र नचिकेतसम् त्वाम् विद्या अभीप्सिनम्-विद्याभिलाषम् मन्ये अहम् रति- शेष', बहवोऽपि कामा प्रयासः न त्वाम् अलोलुपन्तः श्रेयमार्गात् त्वाम् न दूर कृतवन्तः। हि० श०-रते ये दोनों अर्थात् प्रेय और श्रेय के मार्ग। दूरम् = बहुत विपरोते = परस्पर विरुद्ध । विषची = भिन्न-भिन्न फल देनेवाले हैं। अविद्या = प्रिय अर्थात् सासारिक लोग की इच्छा वाली। विद्या = श्रेय की इच्छा वाली। ज्ञाता = जानी गयी। विद्याभाप्सनम् = यथार्थ ज्ञान को वाहने वाला ही । मन्ये = मन्ये = समझता हूँ । त्वा = तुमको अलोलुपन्त= लुभा सके। भावार्थ -काम कर्मात्मरूप जो यह अविद्या और वैराग्यतत्वरूपा ज्ञानात्म- रूपा जो यह विद्या ये दोनों अन्तत. भिन्न गति वाली और परस्पर विरुद्ध हैं, उसम तुमको हम विद्याभिलाषी मानते हैं क्योंकि बहुत से प्रयाभिलाष पदार्थ भी तुम्हे पथ भ्रष्ट नहीं कर सके । विशेष-'अनित्या शुचिदुःखात्मसु नित्यशुचि सुखात्मख्याति 'इति वा यह अविद्या पदार्थ का लक्षण योग सूत्र २।५ में है, उससे भिन्न विद्या है, अर्थात्-ऐहिलौकिक भोगसाधन जो अनित्य अपवित्र दुःखात्मक और आत्मा से भिन्न शरीरादि मे नित्य पवित्र सुखात्मक और अात्म बुद्धि है यही अविद्या पदार्थ है, इनमें तादृश यथार्थ ज्ञान ही विद्या है। इस लोक में अविद्या में निमग्न बडे-बडे पण्डित मानी लोग अविद्या को ही विद्या मानकर उपदेश देते हुए देखे जाते हैं, जैसे अन्धों का नायक अन्धों को। Knowledge (विद्या) and ignorance (अविद्या अथवा श्रेय और प्रेय) are quite mutual ly inconsisent and they produce different fruits I think all the enjoyable things can not tempt or atta ract you, O Nachiketa, who desires knowledge (श्रेय) only अविद्या-ग्रस्तो की दुर्दशा अविद्यायामन्तरे वर्तमानाः स्वयं धोरा. पण्डितंमन्यमानाः ।
( ५५ ) मन्यमानाः दन्द्रम्यमाणाः परियन्ति मूढा अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ॥ ५ ॥ पदच्छेद-अविद्यायाम्, अन्तरे, वर्तमानाः स्वयम्, धीराः पण्डितम्, दन्द्रम्यमाशाः, परियन्ति, मूढाः, अन्धेन एव, नीयमानाः, यथा, अन्धाः। अन्वय-अविद्यायाम् अन्तरे वर्तमाना धीराः पण्डित मन्यमानाः द्रन्द्रम्य- माणाः मूढाः अन्धेन एव नीयमाना. यथा अन्धा. ( तथा ) परियन्ति । शा०] ये तु संसारभाजना -अविद्यायामन्तरे मध्ये घनीभूत इव तमसि वर्तमाना वेष्ट्यमाना पुः पश्वादितृष्णापाशशतैः। स्वयं वय धीरा. प्रज्ञावन्त पण्डिता. शास्त्रकुशलाश्चेति मन्यमानास्ते दन्द्रम्यमाणा अत्यर्थ कुटिलामनेकन् पा गतिम् इच्छन्तो जरामरणरोगादिदु सौ परियन्ति परिगच्छन्ति मूढा अविवेकिनोऽन्धेनैव दृष्टिविहीनेनैव नीयमाना विषमे पथि यथा बहवोऽन्धा महान्तमनर्थमृच्छति तद्वत् ! संस्कृत व्याख्या-अविद्यायाम्-काम्यकादि लक्षणा अविद्या अन्धकार रूपा तस्याम अन्तरे-मध्ये वर्तमाना.-निमग्नाः स्वय च स्वकीयम् धीराः- विद्वासः पण्डितम् मन्यमानाः-पाण्डत मानिनः-पण्डितम् आत्मान मन्यन्ते, वस्तुतो अपण्डितो एवेति तत्वम्, ताहशाः मूढाः मूखाः दन्द्रम्य- माणा -जरारोगादि दुःखपीडिताः परियन्ति-परिभ्रमन्ति यथा अन्धेन नीयमाना अन्धेन एव तथा इति दृष्टान्तः । हि० श०-अविद्यायाम् अन्तरे = अविद्या के बीच म। वर्तमानाः = रहते फसे हुए ! स्वय = अपन आपको । घीरा. = विद्वान् । पण्डितम् मन्यमाना = पण्डित मानने वाले । दन्द्रग्यमाणा. -जन्ममरण आदि का दु.ख मोगते हुए। परियन्ति = ठोकर खाते हैं, मटकते हैं । अन्धेन = अन्धे व्यक्ति द्वारा। नीयमानाः = ले जाये जाने वाले । अन्धा = अन्धे व्यक्ति । भावार्थ-काम्यकर्म तत् फलादि रूप अविद्या के चक्कर म फसा हुश्रा और अपने का धीर और शास्त्रकुशल पण्डित मानने वाले बहुत से अविवेकी जन्म जरारोगादि दुःख भार से पीड़ित हाते हुए इस ससार के चक्र म घूमते हैं, वे अपने को भ्रष्ट करते हुए दूसरे को भी भ्रष्ट करते देखे जाते हैं यह वैसे ( ५६ ) ही है जैसे एक अन्धा दूसरे अन्धे को ले चलता है और अपने साथ दूसरे को भी कूप मे गिराता है । इस मसार की अविद्या की निन्दा करते हुए आगे और यमराज कहते हैं। The people who live in the midst of ignorance thinking themselves intelligent and learned, astray alround just like the blind led by the blind न साम्परायः प्रतिभाति बालं प्रमाद्यन्तं वित्तमोहेन मूढम् । प्रयं लोको नास्ति पर इति मानी पुनः पुनर्वशमापद्यते मे ॥६॥ पदच्छेद-न, साम्परायः, प्रतिभाति, वालम्, अयम, लोकः, अस्ति, पर, इति, मानी, पुन., पुन , वशम्, श्रापद्यते, मे, प्रमाद्यन्तम्, वित्तमोहेन, अन्वय-साम्पराय. प्रमाद्यन्तम् वित्तमोहेन मुटम् बाल प्रति न प्रतिभाति अयम् लोक (अस्ति) नास्ति पर इति मानी पुन पुनः मे वश प्रापद्यते । शा०] अत एव मूढन्वात्-न साम्पराय. प्रतिभाति सम्पर ईयत इति सम्पराय पग्लोकस्तत्प्राप्तिप्रयोजन साधन साधनविशेष शास्त्रीयः साम्पराय । स च बालमविवेकिनं प्रति न प्रतिभाति न प्रकाशते नोप- तिष्ठत इत्येतत् । प्रमाद्यन्त प्रमाद कुर्वन्त पुत्रपश्वादिप्रयोजने वासक्तमनम तथा वित्त- मोहेन वित्तानिमित्तेनाविवेकेन मूढं तममाच्छन्न सन्तम् । अयमेव लोको योऽयं दृश्यमान स्न्यन्नपानादिविशिष्टो नास्ति परोऽदृष्टो लोक इत्येवं मननशीलो मानी पुन पुनर्जनित्वा वश मदधीनतामापद्यते मे मृत्योर्मम । जननमरणादिलक्षणदु खप्रबन्धारूढ एव भवतीत्यर्थ प्रायेण ह्येवंविध एव लोक । संस्कृत व्याख्या-वित्तमोहेन-धनमदेन प्रमाद्यन्तम - भ्रान्तप्रज्ञम्- मूढम्-विवेकशून्यम् बालम् -विषयासक्तम्, साम्परायः-परलोकः न प्रति- ( ५७ ) -- भाति-न प्रकाशते। अतः अयमेवलोकः दृश्यमान एवास्ति पर-परलोका नैव अस्ति कश्चित् इति मानी-मन्तारः पुनः पुनः बारम्बारम् मे मम-वशम् आपद्यते-प्रपद्यते-यमयातनासु पतति इति तात्पर्यम् । हि० श०-वित्तमोहेन = धन के मोह से । मूढम् = मुग्ध । प्रमाद्यन्तम् प्रमाद करने वाले के अन्दर | साम्पराय = परलोक का विचार । न प्रति- भाति = प्रगट नहीं होता । अयम = यह ( भौतिक ) लोक = ससार ( ही सब कुछ है )। परः = दूसरा । मानी = अभिमानी, मानने वाला । पुन पुनः बार-बार । मे = मेरे । अापद्यते = आ पड़ता है। भावार्थ-धन के मद से भ्रान्त बुद्धि वाले विवेकशून्य, विषय में श्रासक्त जीव को परलोक नहीं दिखाई पड़ता है। यही संसार ही है, इससे परे पालोक (कोई नहीं है ऐसा मानने वाले प्राणी हमारे ही वश मे बारम्बार पड़ते हैं और यम यातना का फल भोगते हैं। अब यमराज प्रिय शिष्य नचिकेता को आत्मतत्व न जान सकने का कारण बतलाते हुए आगे कहते हैं। The man involved in the worldly pleasures thinks never of the world beyond this life In his eyes this is only the world and nothing else In this way he suffers the pain of birth and death again and again आत्मज्ञान की दुर्लभता श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्यः। प्राश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा- कुशलानुशिष्ट ॥ ७ ॥ पदच्छेद-श्रवणाय, अपि, बहुभिः, य', न लभ्यः, शृण्वन्तः, अपि, बहव', यम्, न, विद्युः। श्राश्चर्यः, वक्ता, कुशलः, अस्य, लब्धा, आश्चर्य , ज्ञाता, कुशलानुशिष्टः । अन्वय-य' बहुभि श्रवणाय अपि न लभ्य. शृण्वन्तोऽपि बहवः यं न श्चर्यो ज्ञाता .
( ५८ ) . विद्य : ( तस्य ) अस्य वक्ता श्राश्चर्यः, लब्धा आश्चर्यः कुशलानुशिष्टः ज्ञाता च आश्चर्यः। [शा०] यस्तु योऽर्थी सहस्रपु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधो यस्मात्-श्रवणायापि श्रवणार्थ श्रोतुम् अपि यो न लभ्य आत्मा बहु- भिरनेकै शृण्वन्तोऽपि बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युर्न विदन्त्यभा- गिनोऽसस्कृतात्मानो न विजानीयु. । कि चास्य वक्तापि आश्चर्योऽद्भुत- वदेवानेकेषु कश्चिद् एव भवति। तथा श्रु त्वाप्यस्य प्रात्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति । यस्माद् आश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्ट. कुशलेन निपुणेन आचार्येणानुशिष्ट. सन् । संस्कृत व्याख्या-यः = आत्मतत्वम् बहुभि.- नरै. श्रवणाय श्रवण- लाभाय अपि न लभ्यः प्राप्यः, य च बहवः शृण्वन्तो अपि न विद्यु . न जानीयुः, । अस्य-श्रात्मतत्वस्य कुशलः वक्ता-चतुरो वक्ता, कुशलः लब्धा- प्राप्ता च आश्चर्यः-दुर्लभः, कुश लानुशिष्ट ज्ञाता-कुशलेनाऽऽचार्येण शिक्षित: ज्ञाताऽपि श्राश्चर्यः-दुर्लभः इति । हि० श०-य. = जो । बहुभि. बहुतों को। श्रवणाय = सुनने के लिए। अपि - भी। लभ्यः = प्राप्त होता । यम् = जिसको। बहवः = बहुत से लोग। शृण्वन्तः = सुनते हुए । न विद्य . = नहीं समझ पाते । अस्य = उस अात्म- तत्त्व का। वक्ता - समझाने वाला। आश्चर्य = आश्चर्यमय अर्थात् दुर्लभ है। लब्धा = प्राप्त करने वाला। कुशलः = योग्य व्यक्ति कुशलानु- शिष्टः = कुशल आचार्य से उपदेश प्राप्त करने वाला। भावार्थ-यह आत्मतत्व बहुतों को तो सुनने को ही नहीं मिलता, बहुत से सुनकर भी नहीं समझ पाते हैं। इस वस्तु का वक्ता और प्राप्त करने वाला अति दुर्लभ है तथा कुशल आचार्य से उपदेश प्राप्त कर जानने वाल। भी दुर्लभ है। विशेष-गीता मे भगवान श्रीकृष्ण स्वयम् कहते हैं- 'मनुष्याणां सहस्रषु कश्चिद् भवति सिद्धये,यतनामपि सिद्धाना कश्चिन्मा- वेति तत्वतः । To many it is not available to hear of Self and to many it is not available to understand even after hearing The ( ५६ ) , teacher and thc pupil both are equally wonderful, and more wonderful is he who learns This ( Atman) being taught by a teacher full of skill. न नरेणावरेण प्रोक्त एष सुविज्ञेयो बहुधा चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्ते गतिरत्र गतिरत्र नास्ति अणीयान्ह्यतर्यमणुप्रमाणात् ॥८॥ पद० -न, नरेण, अवरेण, प्रोक्तः, एषः, सुविज्ञेयः, बहुधा, चिन्त्यमानः । अनन्यप्रोक्त', गतिः, अत्र, न, अस्ति, अणीयान् , हि, अप्रतय॑म् , अणुप्रमाणात्। अन्वय- एष अवरेण नरेण प्रोक्तः न सुविज्ञेयः (यस्मात् एष अनेकै.) बहुधा चिन्त्यमानः ( भवति ) अनन्यप्रोक्ते अत्र गति. न अस्ति हि ( एष ) अणुप्रमाणात् अणीयान् ( अपि च ) अतय॑म् । [शा०] कस्मात् न हि नरेण मनुष्येणावरेण प्रोक्तोऽवरण हीनेन प्राकृतबुद्धिना इत्येतदुक्त एष प्रात्मा यं त्वं मा पृच्छसि । न हि सुष्ठु सम्यग्विज्ञेयो विज्ञातुं शक्यो यस्माद् बहुधास्ति नास्ति कर्ताकर्ता शुद्धोऽ- शुद्ध इत्याद्यनेकधा चिन्त्यमानो वादिभिः । कथं पुनः सुविज्ञेय इत्युच्यते अनन्यप्रोक्तेऽनन्येन अपृथग्दशिना आचार्येण प्रतिपाद्यब्रह्मात्मभूतेन प्रोक्त उक्त आत्मनि गतिरनेकधास्ति नास्तीत्यादिलक्षणा चिन्ता गतिरत्रास्मिन् आत्मनि नास्ति न विद्यते सर्वविकल्पगतिप्रत्यस्तमितत्वादात्मनः। अथवा स्वात्मभूतेऽनन्यस्मिन् आत्मनि प्रोक्तेऽनन्यप्रोक्ते गतिः अत्रान्यावगतिर्नास्ति ज्ञ यस्यान्यस्य अभावात् । ज्ञानस्य ह्यषा परा निष्ठा यदात्मकत्वविज्ञानम् । अतोऽवगन्तव्याभावान्न गतिः अत्राव- शिष्यते । संसारगतिवनि नास्त्यनन्य आत्मनि प्रोक्त नान्तरीयकत्वात्त- द्विज्ञानफलस्य मोक्षस्य । अथवा प्रोच्यमानब्रह्मात्मभूतेनाचार्येण प्रोक्त आत्मनि अगतिरनव- ( ६० ) बोधोऽपरिज्ञानम् अत्र नास्ति । भवत्येवावगतिस्तद्विषया श्रोतुस्तदस्म्यह- मित्याचार्यस्येवेत्यर्थ । एव सुविज्ञ य आत्मा आगमवता आचार्येणानन्यतया प्रोक्तः। इत- रथा ह्यणीयानणुप्रमाणादपि सम्पद्यत आत्मा। अतर्गमतर्ण स्वबु- घ्याभ्यूहेन केवलेन तर्केण तळमाणेऽणुपरिमाणे केनचित् स्थापित आत्मनि ततो ह्यणुतरम् अन्योऽभ्यूहति ततोऽप्यन्योऽणुतममिति न हि कुतर्कस्य निष्ठा क्वचिद्विद्यते। संस्कृत व्याख्या-अवरेण-प्राकृतबुद्धिना ( देहात्मध्यासिना ) नरेग- पुरुपेण प्रोक्त --उपदिष्टः, एष.-आत्मा सुविज्ञेयः सम्यक् रूपेण ज्ञान विषयः न भवति इत्यर्थः । यतोहि बहुधाचिन्त्यमान · वादिभिः विविध-प्रकारेण विवदमान एव भवति न तु तत्वज्ञान जायते इत्यर्थः । अन्न्यप्रोक्त-न अन्येन-स्वत एव उपदिष्टे अात्मविषये गतिः-अवगतिः ज्ञान नास्ति नैव प्राप्नोति-यतोहि सम्यक् गुरूपदिष्टः सन्नेव आत्म परिचयो जायते नतु स्वत एव कुत इति चेत् -आत्मा खलु अणु प्रमाणादपि अणीयान् अस्ति, अप्रतय॑म् -तकांगोचरम्-तर्केण न स. ज्ञाप्यमानम् जानीहि इतिः शेषः । हि० श०-अवरेण = साधारण। नरेण = पुरुष द्वारा । प्रोक्तः कहा गया। चिन्त्यमानः - नाना प्रकार से विचार किये जाने पर भी एष = यह आत्मतत्त्व । सुविज्ञेयः न = सरलता पूर्वक समझने योग्य नही है । अनन्यप्रोक्त = किसी अन्य ज्ञानी पुरुष द्वारा उपदेश न प्राप्त किये जाने पर । इस आत्म तत्त्व के विषय अणुप्रमाणात् = अत्यन्तसूक्ष्म अणु से भी। अणीयान् = अति सूक्ष्म है । अतक्यम, = यह तर्क का विषय नहीं है । भावार्थ-प्राकृत बुद्धि वाले जो देहात्मवादो जन हैं उनसे उपदेश प्राप्त कर आत्मज्ञान नहीं होता- क्योंकि प्राकृत बुद्धि वाले पण्डितमाना तो ब्रह्म विषय मे भी विवाद ही करते हैं और वह विवाद से निश्चय नहीं कर सकते और सद्गुरु के उपदेश के बिना स्वय शास्त्र को आधार लेकर कथन करने से भी आत्म ज्ञान नहीं होता क्योकि वह आत्मा तो 'अणोर- णीयान् महतो महीयान्' है, इसलिए स्वतः ज्ञान कैसे वहाँ तक जा - अत्र - + ( ६१ ) यम अनित्य लौकिक साधनों से नित्य ब्रह्मतत्व कैसे जाना जा सकता है, इसके बारे में कहते हैं- The Soul, thought of variously, can never be understood perfectly when it is taught by an inferior or incompetent teacher, but when it is taught by a competent one who has full knowledge and well experience of Self, no doubt will be left at all For it can not be argued as it is the smallest par. ticle even smaller than the atomic नषा तर्केण मतिरापनेया प्रोक्तान्येनैव सुज्ञानाय प्रेष्ठ । यां त्वमापः सत्यधृतिर्बतासि त्वादृड्नो भूयान्नचिकेतः प्रष्टा ।। ६ ॥ पद०-न, एपा, तण, मतिः, आपनेया, प्रोक्ता, अन्येन, एव, सुज्ञा- नाय, प्रेष्ठ ? याम, आप', सत्यवृतिः, वत, असि, त्वादृक् न भूयात् नचि- केतः :टा। अन्वय-(हे ) प्रष्ठ त्वम् याम् अाप. एषा मतिः तर्केण न आपनेया भवति ) अन्यन प्रोक्ता सुज्ञानाय एव ( भवति ) हे नचिकेत. सत्यधृतिः अलि बत न वाक् प्रष्टा भूयात् । शा० अतोऽनन्यप्रोक्त आत्मनि उत्पन्ना येयमागमप्रतिपाद्यात्म- मतिर्नैषा तर्केण स्वबुद्धयभ्यूहमात्रेणापनेया न प्रापणीयेत्यर्थ । नापने- तव्या वा न हातव्या ताकिको ह्यनागमज्ञः स्वबुद्धिपरिकल्पितं यत्कि- ञ्चिदेव कथयति । अत एव च येथमागमप्रभूता मतिरन्येनैवागमाभिज्ञ न प्राचार्येणैव ताकिकात्प्रोक्ता सती सुज्ञानाय भवति हे प्रेष्ठ प्रियतम । का पुन सा तर्कागम्या मतिरित्या च्यते या त्वं मति मद्वरप्रदानेन आप प्रासवानसि । सत्या अवितथविषया धृतिर्थस्य तव स त्व सत्यधृतिर्वतासीत्यनुकम्पयन्नाह मृत्यु र्नचिकेतसं वक्ष्यमाणविज्ञानस्तुतये । त्वादृक्त्वत्तु ल्यो नः अस्मभ्य भूयाद्भवताद्भव- त्वन्य. पुत्रा. शिष्यो वा प्रष्टा. कीदृग्यादृक्त्वं हे नचिकेतः प्रष्टाः । ~ ( ६२ ) संस्कृत व्याख्या-एषा-आत्मविषयिणी मति , तर्केण न आपनेया न प्राप्तव्या, तर्क निपुणाप्राप्या इत्यर्थ, अन्येनैव-सदाचार्येणैव उपदिष्टा मतिः मोक्षसाधनशानाय भवति इति । हे प्रेष्ठ-नचिकेतः हे प्रियतम शिष्य नचिकेतः ! या मतिम्-यादृशी बुद्धिं त्वम् आप.-प्राप्तवानसि, अतः त्वम्, वत-निश्चयेन सत्यधृतिः-सत्या-अप्रकम्प्या धृतिः-धारणा यस्य तथा असि नः-अस्मान् त्वादृग् एव प्रष्टा जिज्ञासु भूयात् इति । हि० श०-एषा = यह ( आत्म तत्त्व सम्बन्धिनी बुद्धि । याम = जिसे त्वम = तुमने । आपः= प्राप्त किया है। मतिः= बुद्धि । तर्केण - तर्क के द्वारा । आपने या = नहीं प्राप्त की जा सकती अन्येन -किसी प्राचार्य के द्वारा। प्रोक्ता एव = कही हुई ही। सुज्ञानाय = उत्तम अात्म ज्ञान के निमित्त । भवति = होती है। वत-सचमुच ही। सत्यधृति. -उत्तम धैर्य वाले । असि = हो । त्वादृक् = तुम्हारे जैसा दी। प्रष्टाः -- पूछने वाला नः = हमे । भूयात् प्राप्त हुआ करे। भावार्थ-यह आत्म तत्त्व सम्बधिनी बुद्धि तर्क के द्वारा नहीं प्राप्त की जा सकती है किन्तु सदाचार्य गुरु के उपदेश द्वारा कही गई ही अच्छी प्रकार जानी जा सकती है। उस प्रकार की बुद्धि तुमने प्राप्त की है इसलिए तुम हमको अत्यन्त प्रिय हो, हे नचिकेत, तुम्हारे ऐसे ही जिज्ञासु प्रश्नकर्ता हमको मिले हम यही चाहते हैं। फिर प्रसन्न होकर यमराज कहते हैं। O my dear! the knowledge that you have is not possible to obtain through argumentation, but it is attained only when it is imparted by someone else O Nachiketa ! you are of true determination really Such questioner like you is welcomed always कर्मफल की अनित्यता शेवधिरित्यनित्यं न ह्यध्र वैः प्राप्यते हि ध्रवं तत् । जानाम्यहं.
( ६३ ) ततो मया नाचिकेतश्चितोऽग्नि- रनित्यव्यः प्राप्तवानस्मि नित्यम् ॥१०॥ पद०-जानामि, अहम्, शेवधिः, इति, अनित्यम, न हि अघ्र वैः, प्राप्यते, हि, ध्र वम् तत् ! ततः, मया, नाचिकेतः, चितः, अग्निः, अनित्यैः द्रव्यैः, प्राप्तवान् , अस्मि, नित्यम् । अन्वयः--शेवधिः अनित्य मिति अहं जानामि ध्र वं तत् अध्रु वैः हि न प्राप्यते ततः मया नाचिकेअग्नि: चितः अनित्यैः द्रव्यैः नित्यं प्रामवान स्मि । शां०] पुनरपि तुष्ट पाह-जानाम्यहं शेवधिनिधिः कर्मफललक्षणो निधिरिव प्रार्थ्यत इति। असावनित्यमनित्य इति जानामि । न हि यस्मादनित्यैः अनित्यं ध्रुवं तत्प्राप्यते परमात्माख्यः शेवधिः । यस्त्व- नित्यसुखात्मकः शेवधिः स एवानितणैव्यैः प्राप्यते । हि यतस्ततस्तस्मान्मया जानतापि नित्यमनित्यसाधनैर्न प्राप्यत इति नाचिकेतश्चितोऽग्निः । अनित्यैव्योः पश्वादिभिः स्वर्गसुखसाधन- भूतोऽग्निनिर्वतित इत्यर्थः । तेनामधिकारापन्नो नित्यं याम्यं स्थानं स्वर्गाख्यं नित्यामापेक्षिकं प्राप्तवानस्मि। संस्कृतव्याख्या--शेवधिः-निधिः (तुल्य जातीयत्वात् कुबेरादि ऐश्वर्यमपि एतज्जातीयकम् तच्च कर्मफलजन्यमनित्यमेवाहम् जानामि, अतः अध्र वैः अनित्यफल साधनभूतैः अनित्यद्रव्यसाधनीयैः वा ध्र वम्-नित्यम् तत्त्वम् न प्राप्यते न सभ्यते, अतो मया ब्रह्मप्राप्तिसाधनज्ञानोद्देश्येन अनित्यैरिष्टकादिद्रव्यैः नाचिकेतागिरः चित:-कृतसंधानः । तस्माद् हेतोः नित्यफलसाधनज्ञानं प्रतवान् अल्मीति अर्थात्-ब्रह्मप्राप्तेर्सानैकसाध्यत्वम् अनुभवामि । हि० श०-अहम : मैं । शानि = जानता हूँ। शेवधिः = कर्म फल जन्य निधि अनित्य है । अध्र वैः = नश्वर साधनों से । ध्रुवम् = नित्य आत्मतत्त्व । नहि प्राप्यते = नहीं प्राप्त किया जा सकता। ततः= इसलिए । मया = मैंने नाचिकेतः = नाचिकेत नामक अग्नि का। चितः = चयन किया। अनित्यैः द्रव्यैः अनित्य साधनों द्वारा । नित्य = अात्मतत्त्व को। प्राप्तवान् अस्मि = प्राप्त कर लिया है। ।
( ६४ ) भावार्थ -यम ने कहा कि कर्म फल से उत्पन्न होने वाले लौकिक धन को कौन कहे कुबेरादिदेवों का भी ऐश्वर्य सब अनित्य और नश्वर है। इसलिए इस अनित्य वस्तु के द्वारा भ्र व नित्य ब्रह्म की प्राप्ति नहीं हो सकतो। इसलिए हमने यह नाचिकेत नाम की अग्नि का चयन किया है अर्थात् यह नित्य फल माधन करने का ज्ञान स्वरूप है इसको प्राप्त किया है। 10 I know that this treasure is temporary The permanent existence can not be obtained through this temporary treasure Therefore I performed the Nachiketa-fire with these impermanent things and have attained this permanency of Ijfe नचिकेता के त्याग की प्रशंसा कामस्याप्ति जगत. प्रतिष्ठा क्रतोरानन्त्यमभयस्य पारस्। स्तोममहदुरुगायं धृत्या धीरो नचिकेतोऽत्यस्राक्षीः ॥११॥ पद०-कामस्य, प्राप्तिम्, जगत , प्रतिष्ठाम् , क्रतोः, आनन्त्यम्, अभयस्य, पारम्, स्तोममहत्, उरगायम्, प्रतिष्ठाम्, दृष्ट्वा, धृत्या, धीर , नचिकेतः, अत्यनाक्षीः। अन्वयः-धृत्या धीरः ( सन् ) कामस्याप्ति, जगत. प्रतिष्ठाम् क्रतोः आनन्त्यम् अभयस्य पारम् स्तोम महत् उरुगायम् प्रतिष्ठा दृष्ट्वा त्वम् (तत्) त्यस्राक्षोः। [शा०] त्वं तु कामस्याप्ति समाप्तिम्, अत्रैवेहैव सर्वे कामाः परिस- माप्ता , जगत साध्यात्माधिभूताधिदैवादेः प्रतिष्ठामाश्रयं सर्वात्मकत्वात्, क्रतो. फल हैरण्यगर्भ पदमानन्त्यम्, अभयस्य च पारं परा निष्ठाम्, स्तोमं स्तुत्यं महदणिमाद्यैश्वर्याद्यनेकगुणसंहतं स्तोम च तन्महच्च निरतिशयत्वात्स्तोममहत्, उरुगायं विस्तीर्णा गतिम्, प्रतिष्ठा स्थिति- मात्मनोऽनुत्तमामपि दृष्ट्वा धृत्या धैर्येण धीरोधीमान्सन् नचिकेतोऽत्यनाक्षीः प्रतिष्ठा दृष्ट्वा - mund परमेव आकाङ्क्षन्नतिसृष्टवानसि सर्वम् एतत् संसारभोगजातम् । अहो बतानुत्तमगुणोऽसि। संस्कृतव्याख्या-क्रतो:-कर्मणः प्रतिष्ठाम्-फलभूताम् जगतः कामस्य- ब्रह्मलोक-पयन्तसर्वलोकसम्बन्धि, ज्यादिविषयात्मककामस्य प्राप्तिम् दृष्टा अनेक श्रानन्त्यम् - अविनाशित्वम्-अभयम् स्तोममहत्-अपहतपाप्मत्व सत्यसकल्यत्वादिमहागुणगणाना स्तोमः समूहः तस्य महत्वम् उरुगायम्- बहुलकीर्तिन प्रतिष्ठाम् च स्थैर्यम् मोक्षगतिम् च दृष्ट्वा धीरः-स्वम् धृत्या- धैर्येण हे नचिकेतः एहलौकिकान् कामान् अत्यस्राक्षो -त्यक्तवानसि । हि० श०-कामस्य = इच्छित कर्मों की । श्राप्तिम् = प्राप्ति को। जगतः प्रतिष्ठाम् = ससार की प्रतिष्ठा को । क्रतोः = यज्ञ के । आनन्त्यम् = चिरस्थायी फल को। अभयस्य = निर्भयता की। पारम् = अवाधे से मुक्त । स्तोममहत् स्तुति करने योग्य एव महत्त्वपूर्ण । उरुगायम् = महान् पुरुषों द्वारा स्तुति किये जाने योग्य । प्रतिष्ठाम् = प्रनिष्ठा से युक्त स्वर्ग को। दृष्ट्वा = देख कर । धृत्या = धैय के साथ। अत्यनाक्षीः = त्याग कर दिया है। धीरः धैर्यशाली । असि = हो। भावार्थ-कर्म फलभूत जो कि ब्रह्मलोक पर्यन्त स्त्रो आदि भोग हैं उनकी प्राप्ति को देखकर तथा अविनाशी और निर्भय तथा सत्य काम, सत्य सकल्प आदि गुणों के समूह से युक्त बहुन कार्ति रूप मोक्ष स्वरूप का देख कर हे नचिकेत तुमने लौकिक कामनाओं को त्याग दिया-यह तुम्हारी बड़ी धीरता और प्रज्ञाशालिता है। 11 All the enjoyable things as the accomplishment of desire, the support of the world, the fruits of meditation, the shore without fear the greatness of reputation and statelike vast land scuttered before You have given up them all patiently O Nachiketa ! प्रात्मज्ञान का फल तं दुर्दर्श गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम् ।
+ अध्यात्मयोगाधिगमेन देवं मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति ॥१२॥ पद०-तम्, दुर्दर्शम्, गूढम. अनुप्रविष्टम्, गुहाहितम्, गहरेष्ठम्, पुराणम्, अध्यात्मयोगाधिगमेन, देवम्, मत्वा, धीर , हर्षशौकी, जहाति । अन्वयः-त दुर्दर्शम गूढम् अनुप्रविष्टम् गुहादितं गह्वरेष्ठ पुराणम् देवम् अध्यात्मयोगाधिगमेन मत्वा धीर इपेशाको जहानि । शा०] यं त्वं ज्ञातुमिच्छम्यात्मानम् तं दुर्दर्श दु.खेन दर्शनम् अस्येति दुर्दर्शोऽतिसूक्ष्मत्वात् गूढं गहनमनप्रविष्टं प्राकृतविषयविकारविज्ञानैः प्रच्छन्नमिन्येतत्, गृहाहितं गुहाया बुद्धौ स्थितं तत्रोपलभ्यमानत्वात् गह्व- रेष्टं गह्वरे विषमेऽनेकानर्थसंकटे तिष्ठतीति गह्वरेष्ठम् । यत एव गूढमनु- प्रविष्टो गृहाहितश्चातो गह्वरेष्ठ , अतो दुर्दशः । तं पराणं पुरातनमध्यात्मयोगाधिगमेन विषयेभ्यः प्रतिसंहत्य चेतस आत्मनि समाधानम् अध्यात्मयोगस्तस्याधिगमस्तेन मत्वा देवमात्मानं घोरो हर्षशोकावात्मन उत्कर्षापकर्षयोः अभावाज्जहाति । संस्कृतव्याख्या -तम्-आत्मानम टुर्दशम् द्रष्टुमशक्यम् गूढम्-कर्मरूपा- विद्यातिरोहितम्, अनुप्रविष्टम् सर्वभूताधिवासम्, गुहाहितम्-हृदयगुहायाम् वर्तमानम , गहरेष्ठम-अन्तर्यामिणम पुराणम्, अन्नगदिम, अध्यात्मयोगाधिगमेन- अध्यात्मयोगेन ("यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह" इति वक्ष्यमाण- पकारेण योगेन, देवं परमात्मान मत्वा ज्ञात्वा, धीरः तितिनु , हर्षशोको- ऐहिक विषयलाभालाभेन जायमानौ हर्षशोकौ जहानि, त्यजति इत्यर्थः । हि. श०-तम् - उम ' दुर्दशम् =अरि यष्ट दे गा देखे जाने यग्छ । गूढम् = रहस्यपूर्ण । अनुप्रविष्टम् सर्वत्र व्याप्त, गुहादितम्-बुद्धरूपी गुहा में स्थित । गहरेष्ठम् = विषम सकट मे रित, पुरागाम्प्राचान । देम दिव्य गुणों से युक्त । मत्वा =मानकर ' धीर धैर्यशाली नहाति-त्याग देता है। भावार्थ-कठिनाई से दीख पड़ने वाले, गुप्त स्थान में प्रविष्ट हुए, बुद्धि रूप गुडा में स्थित, गहन स्थान मे रहनेवाले, उस पुरातन देव को अध्यात्मयोग की प्राप्ति से जानकर बुद्धिमान् पुरुष हर्ष और शोक को छोड़ देता है । - Ammam ७ ( ६७ ) 12 The learned can only be free from all the Joy and sorrow if he concentrates his mind and meditates on Self which is hard to be visible and explained, settled inccessibly found in intellect एतच्छ्र त्वा संपरिगृह्य मर्त्यः प्रवृह्य धर्म्यमणुमेतमाप्य । स मोदते मोदनीय हि लब्ध्वा विवृत सद्म नचिकेतसं मन्ये ॥१३॥ पद० -एतत्, श्रुत्वा, सपरिगृह्य, मर्त्य , प्रवृह्य, धर्म्यम्, अणुम्, एतम्, आप्य, सः, मोदते, मोदनीयम, इ, लब्ध्वा, विवृतम्, सद्म, नचिकेतसम्, मन्ये । अन्वय.-मर्त्य एतत् श्रुत्वा अणुम् धर्म्यम् प्रवृह्य सम्परिगृह्य सः एतम् आप्य मादनीय लब्ध्वा मोदते हि नचिकेतसम् (प्रति) सद्म विवृत मन्ये । [शां कि च-एतदात्मतत्त्व यदहं वक्ष्यामि तच्छ्रुत्वाचार्य- प्रसादात्सम्यगात्मभावेन परिगृह्योपादाय मर्यो मरणधर्मा धर्मादनपेतं धर्म्य प्रवृह्योद्यन्य पृथक्कृत्य शरीरादेः अणु सूक्ष्ममेतमात्मानम् प्राप्य प्राप्य स मर्यो विद्वान्मोदते मोदनीयं हर्षणीयमात्मानं लब्ध्वा । तदेतदेवं- विधं ब्रह्मसम भवनं नचिकेतस त्वा प्रत्यपावृतद्वारं विवृतमभिमुखीभूतं मन्ये मोक्षाई त्वा मन्य इत्यभिप्राय.। संस्कृतव्याख्या-मर्त्य -मरणधर्मा मनुष्यः एतदात्मस्वरूपतत्व श्रुत्वा सपरिगृह्य-सम्यड मननादि कृत्वा, धर्म्यम् कर्मसाध्यम् शरीरादि परित्यज्य एतमणुम् एव स्वात्ममूतम् सूक्ष्मतया चतुराद्यविषयम् परमात्मानम्-प्राप्य- प्राप्य स-विद्वान् मोदनीयम् अपहतपाप्मादिगुणाष्टक विशिष्ट लब्ध्वा स्व- स्वरूप प्राप्य मोदते-आनन्दी भवति । अत. पर मोक्षाधिकारिणम् नचिकेत- सम् प्रशसति-नचिकेतसम्-विवृत सद्म ब्रह्मस्वरूप धाम विवृतद्वारम् प्रवेशाहम् मन्ये-जानामि इत्यर्थः।
( ६८ ) हि० श.-मर्त्य मनुष्य । एतत् इस । धर्म्यधारण करने योग्य उपदेश को। सम्परिगृह्य-अच्छी तरह ग्रहण कर, प्रवृह्य =विचार कर । अणु =सूक्ष्म अात्मतत्त्व को। प्राप्य प्राप्त कर । मोदनीय आनन्द स्वरूप परमात्मा को, मोदते भगवान् के चिरन्तन आनन्द मे मग्न होता है। विवृतं सद्म =परमात्मा का खुला हुआ द्वारा । मन्ये =मानता हूँ। भावार्थ-मरणधर्मा मनुष्य इस आत्मस्वरूप को श्रवण कर, अच्छी तरह मनन करके और कर्म फल से होने वाले शरीरादि से आत्मा को पृथक समझ कर अणुस्वरूप आत्मा को ( अपहत पाप्मादि अष्ट गुण युक्त परमात्मा को ) प्राप्त करके आनन्द का अनुभव करता है। इस प्रकार तृतीय पश्न का उत्तर देते हुए यम मोक्षाधिकारी नचिकेता की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि नचिकेता के लिए उस ब्रह्मरूप धाम का द्वार खुला हुआ है ऐसा हम समझते हैं। अब नचिकेता "मत्वा धीरो हर्षशोको जहाति" इत्यादि श्रवण से कृत- ऋत्य होकर प्राप्तव्य श्रात्मा का स्वरूप प्रवृति से परे कैसे है । ऐसा शोध करने के लिए परम गुरु यमराज से पूछते हुए आगे बोला । 13. After hearing this, understanding it perfectly, recognising at supreme and obtaining it subtle, the man feels a great joy because he achieved that which is the source of delight I think that the residence of Brahman is open to Nachiketa नचिकेता का प्रश्न अन्यत्र धर्मादन्यत्राधर्मा- दन्यत्रास्मात्कृताकृतात् अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वद ॥१४॥ पद०-अन्यत्र, धर्मात्, अन्यत्र, अधर्मात्, अन्यत्र, अस्मात्, कृता- कृतात् । अन्यत्र, भूतात्, च, भव्यात्, च, यत्, तत्, पश्यति, तत्, वद । अन्वय यत् धर्मात् अधर्मात् अन्यत्र अस्मात् कृताकृतात् अन्यत्र, भूतात् भव्यात् च (अन्यत्) यत् तत् पश्यसि तत् वद । , ( ६६ ) हिश- सर्वे वेदा=सम्पूर्ण अर्थात् चारों वेद । यत् = जिस । पदम् पद अर्थात् परमात्मा का। आमनन्ति = प्रतिपादन करते हैं । सर्वाणि तपासि = सम्पूर्ण तप। वदन्ति = कथन करते हैं। यत् इच्छन्तः - जिस ( पद ) को इच्छा रखने वाले । चरन्ति = श्राचरण करते हैं। तत् = उस (पद) का । = तेरे लिए । संग्रहेण = सक्षेप मे । ब्रवीमि = वर्णन करता हूँ । एतत् - यह । ओम् इति = "ओऽम्" ( पद ) ही है। भावार्थ-जिस प्राप्यभूत वस्तु को समस्त वेद साक्षात् या परम्परा रूप से प्रतिपादन करते हैं और सकन वेदान्त भाग जिसका एक मत से प्रतिपादन करता है तथा जिस पद की प्राप्ति के लिए लोग सब विषय परि- त्यागपूर्वक गुरुकुल में वास करके क्लेशादि सहन करते हैं उस पद को तुमसे सक्षेप मे कहता हूँ । वह प्रणववाच्य परमात्मा है, यद्यपि उसमे अकार, उकार और मकार की वाच्यता भिन्न हैं तथापि अन्त में एकार्थ का प्रति- पादन होता है। 15 Teaching of Yama-In short I tell you of that attainable goal which all the Vedas describe, which is attained only by the act of selfmortification, and desiring for which people observe Brahmacharya it is Om. ॐ कार की प्रशंसा एतद्ध येवाक्षरं ब्रह्म परम् । एतद्ध ये वाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥१६॥ पद०-एतद्, हि, एव, अक्षरम् , ब्रह्म, एतद्, हि, एव, अक्षरम्, परम्, एतद्, हि, एव, अक्षरम्, जात्वा यः, यद्, इच्छति, तस्य, तत् । अन्वयः-हि एतत् एव अक्षर ब्रह्म, एतत् एव हि अक्षरम् परम्, एतत् हि क्षा, ज्ञात्वा यः यत इति तस्य तत् (सिध्यनि) । [शां० । अत.–एतद्धय वाक्षरं ब्रह्मापरमेतद्धय वाक्षरं परं च । तयोहि प्रतीकमेतदक्षरम्, एतद्धयवाक्षरं ज्ञात्वोपास्यब्रह्मेति यो यदिच्छति परम- परं वा तस्य तद्भवति । परं चेज्ज्ञातव्यमपरं चेत्प्राप्तव्यम् । संस्कृतव्याख्या- एतद् एव हि अक्षरम्-प्रणवात्मकम्, ब्रह्म-ब्रह्म- एतद्ध यवाक्षर .
(..) [शां०] यद्यहं योग्यः प्रसन्नश्चासि भगवन्मां प्रति-अन्यत्र धर्माच्छा- स्त्रीयाद्धर्मानुष्ठानात्तत्फलात्तत्कारकेभ्यश्च पृथग्भूतमित्यर्थः। तथान्यत्र अधर्मात्तथान्यत्रास्मात्कृताकृतात् कृतं कार्यमकृतं कारणमस्मात् अन्यत्र। कि चान्यत्र भूताच्चातिक्रान्तात्कालाद्भव्याच्च भविष्यतश्च तथा वर्त- मानात्, कालत्रयेण यन्न परिच्छिद्यत इत्यर्थः । यद् ईदृशं वस्तु सर्वव्यवहार- गोचरातीतं पश्यसि तद्वद मह्यम् । संस्कृतव्याख्या-धर्मः-उपायभूत यनादिकर्म तस्माद् अन्यत्र-भिन्नः अधर्मात्-अधर्मः उपेयभूत काम्यकर्मफलम, मोक्षोपाये काम्यकर्म तथा तस्य फलम् उभेअपि प्रतिबन्धके तच्च, 'सुखसङ्गन बध्नाति-ज्ञानसङ्गेन चानघ' इति गीताया भगवतोक्तत्वात् तस्माद् अन्यत्र-भिन्न.-विलक्षणः इत्यर्थः, अस्मात् कृताकृतात् -इदशब्दार्थोऽत्र बुद्धिस्थलक्षणोपेता-कर्मका गृह्यते स एव साधकः तस्मादपि विलक्षण , भूतात् भव्यात् च-अन्यत्र काल- त्रयपरिच्छेदराहित्यम् यत् पश्यसि तत् मोक्षरूपम्-आत्मस्वरूपम् वद- कथय। हि० श०-धर्मात् =यज्ञादि कर्त्तव्य क्मों से। अधर्मात् अधर्म अर्थात् शास्त्रनिषिद्ध कमों से। अन्यत्र अतीत । अस्मात् इससे अन्यत्र = भिन्न ! भूतात् = भूत काल से । भन्यात् = भविष्यत् काल से अन्यत्र = भिन्न, पृथक् । पश्यसि देखते हो । तत् वद-उसे कहो । भावार्थ-प्रज्ञादि साधन कर्म से जो उपाय भूत है उससे विलक्षण तथा तत्कम साध्य-फलभूत सुखादि से विलक्षण एव कर्तृत्व भोक्तत्व विशिष्ट कर्ता से विलक्षण और भूत, भविष्य और वर्तमान काल त्रय के परिच्छेद से विलक्षण जिसको आप समझ रहे हैं उस मोक्ष रूप अात्मतत्व का उपदेश हमको दीजिए। इस प्रकार नचिकेता के पूछे जाने पर परम प्राप्य अात्मतत्व के वैभव पर प्रकाश डालते हुए हर्ष सूचक शब्दों से यमराज आगे बोले- 14. Question of Nachiketa-Let me know what is beyond just and onjust, what is different from cause and effect, and what is above from past and future.
( ७१ ) प्रोकार का उपदेश सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपा सि सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य चरन्ति तत्ते पद सग्रहेण ब्रवीम्योमित्येतत् ॥१५॥ पद०-सर्वे, वेदा', यत्, पदम्, आमनन्ति, तपांसि, सर्वाणि, च, यद्, वदन्ति । यद्, इच्छन्तः, ब्रह्मचर्यम्, चन्ति, तत्, ते, पदम् , सग्रहेण, ब्रवीमि, इति एतत् । अन्वय.-सर्वे वेदा यत्पदम् श्रामनन्ति सर्वाणि तपास च यत् वदन्ति यत् इच्छन्तः ब्रह्मचर्य चरन्ति तत् पदम् ते संग्रहेण ब्रवीमि ओम् इति एतत् । [शा०] इत्येवं पृष्टवते मृत्युरुवाच पृष्टं वस्तु विशेषणान्तरं च विवक्षन् सर्वे वेदा यत्पद पदनीयं गमनीयमविभागेनामनन्ति प्रतिपादयन्ति तपासि सर्वाणि च यद्वदन्ति यत्प्राप्त्यर्थानीत्यर्थः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्य गुरुकुल- वासलक्षणमन्यद्वा ब्रह्मप्राप्त्यर्थ चरन्ति तत्ते तुभ्य पद यज्ज्ञातुम् इच्छसि संग्रहेण सक्षेपतो ब्रवीमि। प्रोमित्येतत् । तदेतत्पद यद्बुभुत्सितं त्वया। यदेतद् प्रोमित्योशब्द- वाच्यमोशब्दप्रतीकं च । संस्कृतव्याख्या -यत् पदम्-प्राप्यभृतम् स्थानम् सर्वे वेदा. अामनन्ति- साक्षात् परम्परया वा-प्रतिपादयनित, यथा “न जायते म्रियते वा कदाचित्" इत्यादि "विनाशि तु तद् विद्धि" इत्याद्यपि, सर्वाणि-तपासि वेदान्त- भागा यद् वदन्ति, यदिच्छन्त.~यदभिलाषुकाः सन्तः ब्रह्मचर्य-गुरुकुल- वासादिक्लेश सहन्ते, तत् पदम्-आस्पदम् ते तुभ्य सग्रहेणैव सक्षेपेणैव ब्रवीमि-कथयामि तच्च ॐ इलि एतत्-प्रणव एव, प्रणवस्य ब्रह्मवाचकत्वम्, वेदान्तादिषु दृश्यते 'ॐ तत्सदितिनिर्देशो ब्रह्मण-स्त्रिविधः स्मृतः' अकारो- कारमकारावयक्त्वेन रूपेण भिन्नार्थ प्रतिपादयन्नऽपि एकार्थं प्रतिपादयति इति भाव ।
, (७२ ) प्राप्तिसाधनत्वाद् ब्रह्म ( श्रोमित्यनेनैवाक्षरेण परमपुरुषमभिध्यायीत ) इत्यादि उक्तन्वात् ब्रह्ममाप्ति साधनम्, एतद् एवहि अक्षरम् परम् सर्वेषु जपनीय- ध्यानीयेषु श्रेष्ठम् | एतद् एव हि अक्षरम् ज्ञात्वा-उपासकः, उपासमानः अनेनैव यद् यद् फल मिच्छति-मे भूयादिति तस्य तत्-लभ्यते इति भावः । हि० श.-हि-निश्चित रूप से । एत्त्-यह । अक्षरम् एव == अक्षर ही परमपरब्रह्म अथवा सर्वश्रेष्ठ । ज्ञात्वा = जानकर । यः = जो, यत् इच्छति- जिसकी इच्छा करता है। तस्य-उसहो, तत्-वही। भावार्थ-यह प्रणवात्मक अक्षर ब्रह्म स्वरूप है ब्रह्मप्राप्ति के साधन होने मे, अनेक वचनों से सिद्ध है कि ओम् इम अक्षर से परम पुरुष की उपामना करनी चाहिए तथा यही अक्षर सब जप और ध्यान किये जाने में श्रेष्ठ है, इस अक्षर ब्रह्म की जो उपासना करता है वह जिस जिस फल की कामना करता है उसे वह सब प्राप्त होता है। 16 The letter Om' is the Brahman and this is supreme Anvone who knows this word meditating on fulfils his desire whatever it may be. एतवालम्बनम् श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥१७॥ पद० -एतद्, पालम्बनम्, श्रेष्ठम्, एतद्, आलम्बनम्, परम्, एतद्, आलम्बनम्. ज्ञात्वा, ब्रह्मलोके, महीयते । अन्वयः-एतत् श्रेष्ठम् अालम्बनम्, एतत् परम् अालम्बनम् एतदालम्बनं जाला ब्रह्मलोके महीयते । शा०] यत एवमत-एतदालम्बनमेतद्ब्रह्मप्राप्त्यालम्बनाना श्रेष्ठं प्रशस्यतमम् एतदालम्बनं परमपरं च परापरब्रह्मविषयत्वात् । एतदा- लम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते परस्मिन् ब्रह्मणि । अपरस्मिश्च ब्रह्मभूतो ब्रह्मवदुपास्यो भवतीत्यर्थः। संस्कृतव्याख्या-एतद्-प्रणवरूपम्, आलम्बनम् -अाश्रयणम्, श्रेष्ठम्, सर्वेषु ध्यानादि-उपायेषु इति शेषः, अत एव एतदालम्बनम् परम् सर्वोत्कृष्टम् । , ( ७३ ) - एतद् अालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके-प्रापणीये महीयते-तत्र गत्वा पूज्यमानो भवतीत्यर्थः। हि० श०-एतत् = यह ( ओङ्कार ही ) श्रेष्ठम् - अत्युत्तम ! आलम्बन - सहारा । आलम्बन = आश्रय । परम् = अन्तिम । ज्ञात्वा जानकर महीयते = पूजित होता है अथवा महत्त्व का स्थान प्राप्त करता है । भावार्थ-इस प्रणवात्मब्रह्म का प्राश्रय सबसे श्रेष्ठ है इसलिए सबसे उत्कृष्ट भी है, इसको अच्छी तरह जान करके ब्रह्मलोक में भी जीव पूजनीय होता है। 17 This Om' is our best and last recourse By the help of this Om one can know Brahman and can take an enjoy living in the abode of Him आत्म-स्वरूप का निरूपण न जायते म्रियते वा विपश्चि- नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित् । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१८॥ पद०-न, जायते, म्रियते, वा, विपश्चित्, न, अयम्, कुतश्चित्, न, बभूव, कश्चित् । अज', नित्यः, शाश्वतः, अयम्, पुराण', न, हन्यते, हन्यमाने शरीरे । अन्वय-विपश्चित् न जायते न वा म्रियते कुतश्चित् न बभूव अस्मात् किंचित् न अजः नित्यः शाश्वतः पुराणः अय शरीरे इन्यमाने न हन्यते । शां०] अन्यत्र धर्मादित्यादिना पृष्टस्यात्मनोऽशेषविशेषरहितस्य आलम्बनत्वेन प्रतीकत्वेन चोड्कारो निर्दिष्टः अपरस्य च ब्रह्मणो मन्द- मध्यमप्रतिपत्तन्प्रति । अथेदानी तस्योडारालम्बनस्यात्मनः साक्षात्स्वरूप- निर्दिधारयिषया इदमुच्यते-न जायते नोत्पद्यते म्रियते वा न म्रियते चोत्पत्तिमतो वस्तुनोऽनित्यस्य अनेकविक्रियाः तासामाद्यन्ते जन्मविनाश- लक्षणे विक्रिये इहात्मनि प्रतिषिध्येते प्रथमं सर्वविक्रियाप्रतिषेधार्थ न जायते म्रियते वेति । विपश्चिन्मेधावी अविपरिलुप्तचैतन्यस्वभावात् । पुराणो ( ७४ ) कि च नायमात्मा कुतश्चित् कारणान्तराद्वभूव । स्वस्माच्च आत्मनो न बभूव कश्चिदर्थान्तरभूत. । अतोऽयमात्माजो नित्य. शाश्वतोऽपक्षय- विजित । यो ह्यशाश्वत. सोऽपक्षीयते, अय तु शाश्वतोऽत एव पुराणः पुरापि नव एवेति । यो ह्यवयवोपचयद्वारेणाभिनिर्वय॑ते स इदानी नवो यथा कुम्भादि. । तद्विपरीतस्त्वात्मा पुराणो वृद्धिविवर्जित इत्यर्थः । यत एवमतो न हन्यते न हिस्यते हन्यमाने शस्त्रादिभिः शरीरे। तत्स्थोऽप्याकाशवदेव। संस्कृतव्याख्या-अयम् विपश्चित् , न जायते-नोत्पद्यते, न म्रियते- जननिषेधात् मरणमपि न जायते, अयम् कुतश्चित् न-उत्पादक्शून्य इत्यर्थः, न बभव कश्चित् -पूर्वमनुष्यादिशरीररूपेण नोत्पन्नः, अत. पूर्वोक्तः न जायते इत्यादिहेतो अयम् अनः उत्पत्तिरहित सन् शाश्वत सनातनः पुराणः पुरातनपुरुष. शरीरे हन्यमाने स न हन्यते । हि० श०-अयम् = यह । विपश्चित् ज्ञानी (आत्मा)। न जायते- न तो उत्पन्न हाता है। वा-या। न म्रियते = न मरता ही है। कुतश्चित् किसी अन्य से उत्पन्न हुआ है। न कश्चित् - न (इसी से) कोई ( उत्पन्न हुआ है)। अज = अजन्मा। नित्य अजन्मा। नित्य = नित्य। शाश्वतः - सदा एक रस रहने वाला | पुराणः = प्राचीन है। शरीरे इन्यमाने = शरीर के नष्ट होने पर भी । न हन्यते-माग नहीं जाता। भावार्थ-यह सर्ववेत्ता आत्मा उत्पत्ति और मरण का आश्रय नही होता तथा कतृत्व शून्य है, मनुष्याद रूप शरीर रूप से कभी उत्पन्न नहीं होता, इन हेतुओं से यह अज, सनातन और पुरतन कहा जाता है, शरीर के मरने पर भी यह कभी नहीं मरता है । 18 The Self is neither born nor does it die Neither it has brought anything into existence nor anything has been brought into existence from it This Soul has no birth and no beginning or end It is perpetual and ancient It has no harm when the body is killed - ( ७५ ) हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् । उभौ तौ न विजानीतो नायँ हन्ति न हन्यते ॥१६॥ पद०-हन्ता, चेत्, मन्यते, हन्तुम् , हतः, चेत्, मन्यते, हतम् । उभौ, तौ, न, विजानीतः, न, अयम्, इन्ति, न, हन्यते । अन्वयः-इन्ता चेत् हन्तु मन्यते चेत् हतः (आत्मानम् ) हत मन्यते उभौ तौ न विजानीतः अयम् (आत्मा) न हन्ति न हन्यते । [शा०] एवभूतमप्यात्मानं शरीरमात्रात्मदृष्टिहन्ता चेद्यदि मन्यते चिन्तयति हन्तुं हनिष्याम्येनम् इति योऽप्यन्यो हत. सोऽपि चेन्मन्यते हतमात्मान हतोऽहम् इत्युभावपि तौ न विजानीत , स्वमात्मानं यतो नायं हन्ति अविक्रियत्वादात्मनस्तथा न हन्यत आकाशवदविक्रियत्वादेव । अतोऽनात्मज्ञविषय एव धर्माधर्मादिलक्षणः संसारो न ब्रह्मज्ञस्य । श्रुति- प्रामाण्यान्न्यायाच्च धर्माधर्माद्यनुपपत्तेः । संस्कृतव्याख्या-हन्तु इन्ता मन्यते चेत्-अहमेनं हनिष्यामि इति स्वय कस्यचित् वधकर्ता जानाति, यद्वा हतः हननाश्रय. स्वय हतम् मन्यते चेत् तौ उभावपि न विजानीतः एतद्विषयज्ञानशून्यौ एव भवतः, यतः अयम् न कञ्चित् हन्ति, न स्वयम् केनचित् हन्यते। हि० श०-चेत् =यदि । हन्ता =मारनेवाला । हन्तुम् = मारने में सक्षम । मन्यते = मानता है । चेत् = यदि । हता = मारा गया हुआ। इतम्- (अपने को) मारा गया । तौ उभौ- वे दोनो ही । न विजानीतः (आत्मा के स्वरूप को) नहीं जानते। अयम्=यह (आत्मा) न इन्ति-न मारता है । न हन्यते-न (किसी के द्वारा मारा ही जाता है। भावार्थ-इसको जो मारने वाला जानता है और जो अपने को मारा हुआ समझता है ये दोनों ही इस आत्मविषयक ज्ञान से शून्य हैं क्योंकि वस्तुतः यह न किसी को मारता है न किसी से मारा जाता है। जीवात्म तत्व को कहकर आगे परमात्म तत्व को कहते हैं, अणोरणीयान् इत्यादि। 19. If the destroyer thinks that he has destroyed, and if the ( ७६ ) तमक्रतुः पश्यति destroyed thinks that he has been destroyed-both of them are equally ignorant Neither He kılls nor He is killed. अणोरणीयान्महतो महीया- नात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् । वीतशोको धातु प्रसादान्महिमानमात्मन ॥२०॥ पद०-अणा., अणीयान् , महतः, महीयान् , आत्मा, अस्य, जन्तोः, निहितः, गुहायाम् , तम्, अक्रतुः पश्यति, वीतशोक', धातुः, प्रसादात्, महि- मानम्, आत्मनः ॥२०॥ अन्वयः-श्रणोः अणीयान् महत महीयान् आत्मा अस्य जन्तोः, गुहा- याम निहितः अक्रतु वीतशोकः धातुप्रसादात् अात्मनः तम् महिमानम् पश्यति । [शा०] कथं पुनरात्मानं जानाति इत्युच्यते-अणोः सूक्ष्मादणीयाश्या- माकादेरणुतरः । महतो महत्परिमाणान्महीयान्महत्तर. पृथिव्यादेः अणु महरा यदस्ति लोके वस्तु तत्तेनैवात्मना नित्येन आत्मवत्संभवति । तदा- त्मना विनिमुक्तमसत्संपद्यते। तस्माद् असावेवात्माणोरणीयान्महतो महीयान्सर्वनामरूपवस्तूपाधिकत्वात् । स चात्मास्य जन्तोर्ब्रह्मादिस्तम्ब- पर्यन्तस्य प्राणिजातस्य गुहाया हृदये निहित आत्मभूत. स्थित इत्यर्थ । तदात्मानं दर्शनश्रवणमननविज्ञानलिडमक्रतुरकामो दृष्टादृष्टबाह्य- विषयोपरतबुद्धिरित्यर्थ । यदा चैवं सदा मनादीनि करणानि धातवः शरीरस्य धारणात्प्रसीदन्तीत्येषा धातूना प्रसादादात्मनो महिमानं कर्म- निमित्तवृद्धिक्षयरहितं पश्यत्ययम् अहमस्मीति साक्षाद्विजानाति । ततो वीतशोको भवति। संस्कृतव्याख्या-प्रणोः सर्वचेतनापेक्षया सूक्ष्मात् अणीयान्- अणुतरप्रमाणः सकलचेतनाऽचेतनान्तःप्रवेशयोग्यः, महतः आकाशादेरपि महीवान-मदत्तर' स्वाव्याप्यवस्तुरहितः अस्य जन्तोः प्रत्यगात्मरूपस्य जोवा- स्मन इति यावत्, गुहाया निहितः प्रात्मान्त. प्रविश्य नियन्तृत्वेन स्थितः, तं- ताहश परमात्मानम्-अक्रतुः-काम्यकर्मरहितः वोतशोकः सन् धातुः धारकस्य .
( ७७ ) परम त्मनः प्रसादात् अात्मनो महिमानम् पश्यति । 'जुष्ट यदापश्त्यन्यमीशम्' इत्याद्य क्तत्वात् । हि० श०-अस्य-दस । जन्तोः जीवात्मा के । गुहायाम् = हृदयरूपी गुफा म । निहितः स्थित । आत्मा परमात्मा । अणोः सूक्ष्म से । अणीयान् अतिसूक्ष्म । महतः महान् से भी, महीयान् महान् है । आत्मनः परमात्मा के। तम्-उस, महिमानम् = महिमा को। अक्रतुः = निष्काम कर्म करने वाला। वीतशोक शक रहित । धातुः प्रसादात् = परब्रह्म की कृपा से । पश्यति = देख पाता है। भावार्थ-वह परमात्मा सर्वचेतनाचेतन की अपेक्षा सूक्ष्न हाने के कारण अति अणुनर-सूक्ष्मतर रूम का है, क्योंकि सकल चेतनाचेतन मे प्रवेश के योग्य है तथा महत् परिमाण वाले आकाशादि से भी महत्तर अर्थात् अपने से व्यापक वस्तु से रहित है । और इस प्रत्यगात्म जावात्मा के अन्तः प्रवेश करके स्थित है, उस परमात्मा को काम्यकमरहित मोक्षार्थी निष्काम कर्म भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म करनेवाला हर्ष शोक रहित होकर उस परमात्मा के प्रसाद से आत्मा की महिमा को देखता है । ( जुष्ट यदा पश्यांत अन्यमीशम् ) इस प्रकार व्यास सूत्र का यही तात्पर्य है । 20. The self is subtler than the subtle and similarly greater than the great It is found in the heart of every living-body, The man who has given up all his desires, achieves the glory of the soul through the calmness of the senses and he becomes free from sorrow आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्त मदामद देव मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥२१॥ पद-आसीन , दूरम्, व्रजति, शयानः याति, सर्वतः। का, तम्, मदामदम्, देवम्, मदन्यः, ज्ञातुम्, अर्हति । अन्वय-आप्तीनः दूर व्रजति शयानः सर्वतः याति मदामदम् देवं मदन्यः कः ज्ञातुम् अर्हति । [शा ] अन्यथा दुविज्ञेयोऽयमात्मा कामिभिः प्राकृतपुरुषैः, यस्मात्- ( ७८ ) आसीनोऽवस्थितोऽचल एव सन् दूरं व्रजति । शयानो याति सर्वत एवमसा- वात्मा देवो मदामदः समदोऽमदश्च सहर्षोऽहर्षश्च विरुद्धधर्मवानतोऽ- शक्यत्वाज्ज्ञातुं कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति । अस्मदादरेव सूक्ष्मबुद्ध पण्डितस्य सुविज्ञेयोऽयमात्मा स्थितिगति- नित्यानित्यादिविरुद्धानेकधर्मोपाधिकत्वाद्विरुधर्मवत्त्वाद्विश्वरूप इव चिन्ता- मणिवदवभासते। अतो दुविज्ञेयत्वं दर्शयति कस्त मदन्यो ज्ञातुमर्हतीति । करणानामुपशमः शयनं करणजनिरस्यैकदेशविज्ञानस्य उपशमः शया- नस्य भवति । यदा चैवं केवलसामान्य विज्ञानत्वात् सर्वतो यातीव यदा विशेषविज्ञानस्थः स्वेन रूपेण स्थित एव सन्मनादिगतिपु तदुपाधिक त्वाद् दूरं व्रजतीव । स चेहैव वर्तते । सं व्या:--अासीन -सर्वत्र स्थितोऽपि जीवद्वारा दूरगन्तृधर्मा, तत्र भवति- अतो गच्छतीति व्यवहार , एवमेव शयानोऽपि सर्वतः यात सर्वत्र गच्छति, अतः तं परमात्मानं मदामदम् देव. -इप-अहन्दि शारापत विरुद्धधर्मम्, न तु वास्तविकम् मदन्यः परमात्मप्रसादानगृही : महा- जनाद् अन्यः इतर को वा ज्ञातुमर्हति । हि० श०-आसीन. = बैठा होने पर भी। दूर व्रजात - दूर चना जाता है, शयानः = सोता हुा । सर्वतः यानि सब श्रोर चला जाता है। तम् = उस । मदामदम्-हर्ष और अहर्ष दोनों से रहित ! देवम् - देव को । मदन्यः = मुझसे भिन्न, मेरे अतिरिक्त । कः - कौन । ज्ञातुम् = जानने में अर्हति = समर्थ है। भावार्थ-सब जगह वर्तमान रहते हुए भी चेतन द्वारा दूर गमनत्वादि उपाधि प धर्मवाला है और एकत्र स्थित भी सर्वत्र व्याप्त होने से गमन- शील है। ऐसे हर्ष और अहदि अारोपित न कि वास्तविक धर्मवाले उस परमात्मतत्व को भगवत्प्रसाद से अनुगृहीत हमसे भिन्न दूसरा कोन जानने में समर्थ हो सकता है ऐसा यमराज ने कहा। 21 When sitting it goes very far, when sleeping it moves everywhere Except me who knows that Self which is beyond joy and sorrow. J- ६ ( ७९ ) धीर, अशरीर शरीरेष्वनवस्थितेष्ववस्थितम् । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥२२॥ पदच्छेद-अशरीरम्, शरीरेषु, अनवस्थेषु, अनवस्थितम् । महान्तम्, विभुम्, आत्मानम्, मत्वा, न, शोचति । अन्वय-गरीरेषु अशरीरम् अनवस्थेषु अवस्थितम् महान्तम् विभुम् आत्मानम् मत्वा धीर न शोचति । [फा०] तद्विज्ञानाच्च शोकात्यय इत्यपि दर्शयति-अशरीर स्वेन रूपेण आकाशकल्प आत्मा तमशरीर शरीरेषु देवपितृमनुष्यादिशरीरेषु अनवस्थेष्वस्थितिरहितेष्ववस्थित नित्यमविकृतमित्येतत्, महान्त महत्त्व- स्यापेक्षिकत्वगायामाह-विभु व्यापिनमात्मानम् -आत्मग्रहण स्वतो- ऽनन्यत्वप्रदर्शनार्थम्, आत्मशब्द प्रत्यगात्मविषय एव मुख्यस्तमीदृश- मात्मान मत्वा अयमहमिति धीरो धीमान्न शोचति । न ह्येव विधस्यात्म- विद शोकोपपत्ति । संस्कृत व्याख्या-अशरीरम्-कर्मकृतशरीररहितम्, अनवस्थेषु-नश्व- रेषु शरीरेषु, अवस्थितम्-नित्यतपातन्त्रस्थितम्, महान्तम्-प्रसिद्धवैभवशालिनम्, विभुम्-सर्वव्यापिनम्, आत्मानम्-स्वस्वरूपम्, मत्वा-सम्यक्परिजाय, धीरः ज्ञानवान्, न शोचति-नाकृतार्थात्मत्वमनुभवति । हि० शब्दार्थ-अनवस्थेषु = स्थिर न रहने वाले । शरीरेषु = शरीर मे । अशरीरम् = शरीर रहित रूप से । अवस्थितम् = नित्यरूप से स्थित है। महा- न्तम् = सबसे महान् । विभुम् = सर्वव्यापक । आत्मानम् = उस आत्मा को । मत्वा = जानकर । धीर = बुद्धिमान पुरुष । न शोचति = शोक नहीं करता। भावार्थ-आत्मा के सम्बन्ध में यम ने फिर कहा-अनित्य शरोरो मे नित्य आत्मा स्वयं आकार रहित होकर रहता है। इसी नित्य, महान्, सर्वव्यापक आत्मा को अच्छी तरह से जान लेने पर ज्ञानो शोक से मुक्त हो जाता है। 22. Yama said --Knowing the soul as bodiless in the midst of bodies, as firm among the fleeting things and as great and pervasive, the wise casts off all grief, ( ८० ) नायमात्माप्रवचनेन लम्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्य- स्तस्यैप आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥२३॥ पदच्छेद-न, अयम्, आत्मा, प्रवचनेन, लभ्यः, न मेधया, न बहुना, श्रुतेन, यम्, एव, एष, वृणुते, तेन, लभ्य , तस्य, एष, आत्मा, विवृणुते, तनूं, स्वाम् । अन्वय-अयम् आत्मा प्रवचनेन न लभ्य , न मेधया न बहुना श्रुतेन ( लभ्यः) । एष यं वृणुते तेन एव लभ्यः, एष तम्य स्वा तनू विवृणुते । [ शां० ] यद्यपि दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा तथाप्युपायेन सुविज्ञेय एवेत्याह नायमात्मा प्रवचनेनानेकवेदस्वीकरणेन लभ्यो ज्ञेयो नापि मेधया ग्रन्था- र्थधारणशक्त्या । न बहुना श्रुतेन केवलेन । केन तर्हि लभ्य इत्युच्यते- यमेव स्वात्मानमेष साधको वृणुते प्रार्थयते तेनैवात्मना वरित्रा स्वयमात्मा लभ्यो ज्ञायत एवमित्येतत् । निष्कामस्यात्मानम् एव प्रार्थयत आत्मनै- वात्मा लभ्यत इत्यर्थः । कथ लभ्यत इत्युच्यते-तस्यात्मकामस्यैष आत्मा विवृणुते प्रकाशयति पारमार्थिकी तनूं स्वा स्वकीयां स्वयाथात्म्यमित्यर्थः । सस्कृत व्याख्या-अयमात्मा प्रवचनेन-अत्र प्रवचन शब्द. प्रवचनसाधन- मननार्थपर अग्रे मेधया श्रुतेनेति श्रवणनिदिध्यासनपरत्वात् । अतः अयं- आत्मा, प्रवचनेन-मननेनेत्यर्थं , न लभ्यः-न प्राप्यः, नापि बुद्धया-मेघया, नापि श्रुतेन-स्वाध्यायेन लभ्य । एष आत्मा (परमात्मा ), यं-साधकं, वृणुते- स्वीकरोति, तेनैवोपायेन लभ्य नान्यथा, एष आत्मा तस्य-उपासकस्य ( अने) स्वा-निजा, तनु-स्वरूपं, विवृणुते-प्रकाशयति । हिन्दी शब्दार्थ-अयम् = यह, आत्मा = परमात्मा, प्रवचनेन = उपदेश सुनने मात्र से, न लभ्यः = प्राप्त किये जाने योग्य नहीं है, न मेधया = न बुद्धि से, न बहुना श्रुतेन = न बहुत अधिक शास्त्रो के अध्ययन से, एषः = यह पर- मात्मा, यम् = जिस ज्ञानी को, वृणुते = स्वीकार कर लेता है, तेन = उसी के द्वारा, लभ्यः प्राप्त करने योग्य है, एषः = यह परमात्मा, तस्य = उस साधक के समक्ष, स्वा अपनी, तनूम् = शरीर को, विवृणुते = स्वय हो प्रकट कर देता है। SA . - १ ( ८१ ) भावार्थ-यह आत्मा केवल शास्त्रो के शिक्षण मात्र से प्राप्त नहीं हो सकता, यह बुद्धि के चातुर्य या अधिक स्वाध्याय से भी दृष्टिगोचर नही होता, आपतु जिसे यह स्वय अपनाता है केवल उसी को प्राप्त होता है और उसी क सम्मुख अपने वास्तविक स्वरूप को प्रकट करता है । 23 This soul can not be gained through much study, not by wisodm nor through much hearing. It can be known by the soul by which it is desired His soul reveals Its own nature to him . अन्वय नाविरतो दुश्चरितानाशान्तो नासमाहितः। नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ २४ ॥ पदच्छेद-न अविरत , दुश्चरितात्, न, अशान्त , न, असमाहितः, न, अशान्तमानसः, वा, अपि, प्रज्ञानेन, एनम्, आप्नुयात । न दुश्चरितात् अविरत , न अशान्तः, न असमाहित , न वा अगान्तमानस. अपि एवं प्रज्ञानेन आप्नुयात् । [ शा० ] कि चान्यत्-न दुश्चरितात् प्रतिषिद्धात् श्रुति स्मृत्यविहिता- पापकर्मणोऽविरत अनुपरतो नापीन्द्रियलौल्याद् अशान्तोऽनुपरतो नाप्य- ममाहिताऽनेकाग्रमना विक्षिप्तचित्त , समाहितचित्तोऽपि सन्समाधानफला- थित्वान्नाप्यशान्तमानसो व्यापृत्तचित्त प्रज्ञानेन ब्राह्मविज्ञानेनैनं प्रकृत- मात्मानमाग्नुयात् । यस्तु दुश्चरिताद्विरत इन्द्रिलौल्याच्च समाहितचित्तः समाधानफलादप्युपशान्तमानसश्चाचार्यवान्प्रज्ञानेन यथोक्तम् आत्मानं प्राप्नोतीत्यर्थ । सस्कृत व्याख्या-आत्मानं प्राप्तुं को शक्नोतोति दर्शयन्नाह यम.- अयम्-आत्मा, दुश्चरितात्-परदारा-परद्रव्यापहारादिमहापापाद् अविरत:- अनिवृतः, त-परमात्मानं, न प्राप्नुयात् इति परेणान्वयः, नापि अशान्त -अनुप- शान्तकामक्रोधवेग, नापि असमाहित नानाविधलोकिकव्यापारेण विक्षिप्ततया अनवहितचित्तः, नापि अशान्तमानसः--अनिगृहीतमनाश्च न प्राप्नुयात् । अपिनु, दुश्चरितान्निवृतः, शान्तेन्द्रिय , समाधिस्थ , शान्तमना एव जन. आत्मज्ञानेनैवैन- मात्मानं आप्नुयादित्यर्थः । - . , ( ८२ ) हिन्दी शब्दार्थ- दुश्चरितात् = पापकर्मो से, न अविरत = जो हटा नही, अशान्त = जिसका मन शान्त नहीं है, असमाहितः = जिसका मन और इन्द्रियाँ वश मे नही, अशान्तमानसः = अशान्तचिनवाला, प्रज्ञानेन = प्रकृष्ट आत्मज्ञान से, एनम्- उस परमात्मा को, न आप्नुयात् = प्राप्त नहीं कर सकता है। भावार्थ-जिसने पाप कर्मों से अपने को नहीं हटाया, जो शान्त नही, जिसकी इन्द्रियाँ और मन वश में नहीं एव च चल चित्तवाला है वह केवल अपने प्रचण्ड ज्ञान के भरोसे उस परमतत्व (आत्मा) को प्राप्त नहीं कर सकता। 24 He who has not desisted from wicked ways, whose senses are not under control, whose mind is not concentrated and nor free from anxiety, does not obtain it. It is quite clear that the soul is obtainable only by high spiritual know ledge. यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः । मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः ॥ २५ ॥ पदच्छेद-यस्य, ब्रह्म, च क्षत्रम्, च उभे, भवत., ओदनः। मृत्यु यस्य, उपसेचनम्, कः, इत्था, वेद, यत्र, सः । अन्वय-यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे ओदनः भवतः, मृत्यु यस्य, उपसेचनं सः यत्र इत्था क. वेद । [शां०] यस्त्वनेवं भूत.- यस्यात्मनो ब्रह्मक्षत्रे सर्वधर्म विधारके अपि सर्वत्राणभूते उभे ओदनोऽशन भवत स्याताम्, सर्वहरोऽपि मृत्युर्यस्यो- पसेचनम् इवौदनस्य, अशनत्वेऽप्यपर्याप्तस्त प्राकृतबुद्धिर्यथोक्तसाधनरहितः सन् क इत्था इत्थमेव यथोक्तसाधनवानिवेत्यर्थ., वेद विजानाति यत्र स आत्मेति । सस्कृत व्याख्या-विरला एव आत्मज्ञानिनो भाव प्रकाशयन् यमः प्राह- ब्रह्मक्षत्रपद-ब्रह्मक्षत्राख्य- वर्णद्वयोपलक्षितचराचरात्मकमिदं जगद् यस्य परमा. त्मनः ओदनम्-भोग्यम् भवति, मृत्यु -चराचरभक्षकः स्वय यस्य अघमानत्वात् उपसेचन-दध्यादिरूपेणोपसेचन कर्मभवति, तं कः इत्थं सर्वतोभावेन ज्ञातुं शक्नोति यद् स मात्मा कुत्रास्ति । न कश्चिदपि जानातीत्यर्थ.।
( ८३ ) क्षत्रं - हिन्दी शब्दार्थ-यस्य = जिस परमात्मा के, ब्रह्म = ब्राह्मण, क्षत्रिय, ओदन' = भोजन, भवतः = हो जाते है। मृत्यु --सर्वनाशक शक्ति काल भी, यस्य = जिस परमात्मा का, उपमेचन = शाक, चटनो बनता है, स. = वह ईश्वर, यत्र = जहाँ ( कहाँ) इत्था = किस रूप में है, क = कौन, वेद = जानता है। भावार्थ--जिस परमात्मा के ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनो ही भोज्य पदार्थ हैं अर्थात् सपूर्ण विश्व ही जिसका भक्ष्य पदार्थ है, मृत्यु स्वय जिसके भोज्य पदार्थ में चटनी की तरह स्थित है उस परमतत्त्व को कौन बता सकता है कि वह कहाँ है ? अर्थात् कोई नही बता सकता। 25. Who is able to know and to say that where It is? Whose food is both Brahmana and Kshatriya and for which death takes the place of sance इति प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली समाप्ता प्रथम अध्याय तृतीया वल्ली . इस वल्ली मे परमात्मा की प्राप्ति के साधनो का वर्णन किया गया है। इससे पूर्व द्वितीय पल्ली मे स्पष्ट किया जा चुका है कि जीवात्मा का लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति है। ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः ॥ १॥ पदच्छेद--ऋतम्, पिबन्ती, सुकृतस्य, लोके, गुहाम्, प्रविष्टी, परमे, परार्धे, छायातपो, ब्रह्मविद , वदन्ति, पञ्चाग्नय , ये, च, ये, च, त्रिणाचिकेताः। अन्वय.--ब्रह्मविदा ये च पञ्चाग्नय ( ये च ) त्रिणाचिकेताः (ते) सुकृतस्य ऋत पिबन्ती लोके गुहा परमे परार्धे प्रविष्टौ छायातपो वदन्ति । [शा०] ऋत पिबन्तावित्यस्या वल्लया सम्बन्ध -विद्याविद्य नानाविरुद्धफले इत्युपत्न्यस्ते न तु सफले ते यथावन्निीते, तन्निर्णयार्था रथरूपककल्पना, तथा च प्रतिपत्तिसौकर्यम् । एव च प्राप्तृप्राप्यगन्तृ गन्त- व्यविवेकार्थं द्वावात्ममानो उपन्यस्येते-ऋत सत्यमवश्यभावित्वात् । कर्म- फल पिबन्ती, एकस्तत्र कर्मफल पिबति भुक्ते नेतर , तथापि पातृ- सम्बन्धात्पिबन्तौ इत्युच्यते छत्रिन्यायेन, सुकृतस्य स्वय कृतस्य कर्मणः ऋतम् इति पूर्वेण सम्बन्ध ; लोकेऽस्मिन् शरीरे गुहा गुहायाम् बुद्धौ प्रविष्टौ, परमे बाह्यपुरुषाकाशसस्थानापेक्षया परमम्, परस्य ब्राह्मणोऽधं स्थान परार्धम् । तस्मिन् ह पर ब्रह्मोपलभ्यते, अतस्तस्मिन् परमे परार्ध हार्दाकाशे प्रविष्टावित्यर्थ । तौ चच्छायातपाविव विलक्षणो ससारित्वा- - - ( ८५ ) ससारित्वेन ब्रह्मविदो वदन्ति कथयन्ति । न केवलमकर्मिण एव वदन्ति, पञ्चाग्नयो गृहस्था ये च त्रिणाचिकेताः त्रि कृत्वो नाचिकेतोऽग्निश्चितो यैस्ते त्रिणाचिकेता। सस्कृत व्याख्या-जीवब्रह्मणो सम्बन्ध प्रतिपादयन् यमो वदति -लोके जीवब्रह्माणी स्वकर्मण फल भुञ्जानौ स्त । यद्यपि सुकृतकर्मणा भोक्ता जीव एव अस्ति न तु ब्रह्मा तथापि द्वयो साहचर्येण द्विवचनमुक्तम् । ब्रह्मज्ञानिनः, पञ्चमहा- यज्ञकार गृहस्था , त्रिणाचिकेता याजकाः सर्व एव परमोत्कृष्टस्थाने बुद्धिगुहाया प्रविष्टौ इमौ द्वौ छायातपो इव सम्बद्धौ निगदन्ति । हिन्दी शब्दार्थ-सुकृतस्य = कर्मो के फलस्वरूप, लोके = शरीर मे, परमे परार्धे = उत्कृष्ट स्थान मे, गुहाम् = बुद्धि रूपी गुफा मे, प्रविष्टौ = प्रवेश किए हुए, ऋतम् = अवश्यम्भावी कर्मफल को, पिबन्ती = भोग करते हुए, छाया- आतपो = छाया और घाम के समान ( अज्ञानी-ज्ञानी ), ब्रह्मविद = ज्ञानी लोग, पश्चाग्नयः = गृहस्थ लोग, ये च = और जो, और जो, त्रिणाचिकेताः = विधिपूर्वक अग्नि- उपासक, विदन्ति = जानते है। भावार्थ-ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी लोग, पाँच प्रकार से अग्नि की उपासना करने. वाले साधारण गृहस्थ लोग एवं आहवनीय, गार्हपत्य तथा दक्षिणाग्नि की विधि- पूर्वक पूजा करनेवाले विद्वान् लोग भी, अपने कर्मो के फल को इस शरीर रूपी लोक मे भोगनेगले, उत्कृष्ट हृदयाकाश रूपी बुद्धि मे प्रविष्ट जीव और ब्रह्म को छाया ( अज्ञान ) एवं आतप ( प्रकाश ) के समान मानते है । 1. The superior and inferior souls are compared here to shade and light. Both of them enjoy the results of their work in the world entered the cave, the highest place of the supreme power. The knowers of Brahman call them shadow and sun light, worshipers of the five fires and sacrificers of the Nachiketa fires. सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि । २।। या ( ८६ ) पदच्छेद-य', सेतु., ईजानानाम्, अक्षरम्, ब्रह्म, यत्, परम्, अभयम्, तितीर्षताम्, पारम, नाचिकेतम्, शकेमहि । अन्वय- ईजानानाम् य. सेतु पार तितीर्षताम् यत् अभयम् अक्षरम् पर ब्रह्म त नाचिकेतम् शकेमहि । [गा० ] य सेतुरिव सेतुरीजानाना यजमानाना कर्मिणा दु खसन्तर- मार्थत्वान्नाचिकेतोऽग्निस्त वय ज्ञातु चेतु च शकेमहि शक्नुवन्त । कि च यच्चाभव भयशून्य ससारपार तितीर्षता तर्तुमिच्छतां ब्रह्मविदा यत्पर- माश्रयमभरमात्माख्य ब्रह्म तच्च ज्ञातु शकेमहि शक्नुवन्त । परापरे ब्रह्मणी कर्मब्रह्मविदाश्रये वेदितव्ये इति वाक्यार्थ । एतयोरेव ह्यपन्यासकृत ऋत पिवन्ताविति । सस्कृत व्याख्या-यमो नचिकेत सम्बोधयन कथयति-नाचिकेसोऽग्नि परं ब्रह्म द्वयमपि अस्माभि ज्ञातु शक्यते । अयमग्नि उपासकाना यजमानाना सेतु- भवति यतो हि एतमाश्रित्य जनाः दुःखादिकं तरन्ति । द्वितीय च यत् अनश्वर- ब्रह्मससारस्य पार गन्तुमिच्छताम् निर्भय स्थानमस्ति । इत्थं क्षर ब्रह्म, अग्नि- विद्यातत्वम् च उभौ तौ ज्ञातु वयं समर्थाः । हिन्दी शब्दार्थ-पारं तितीर्षताम् = जन्म-मरण रूपी सागर को पार करने को इच्छावाले, ईजानानाम् = यज्ञ करनेवाले जनो के लिए, य. सेतु = जो पुल है, अक्षरं = अविनाशी, पर ब्रह्म = परब्रह्म, अभयम् = निर्भय बनाने वाले, नाचिकेतम् = नाचिकेत नामक अग्नि को, शकेमहि = हम चयन करें। भावार्थ-जो नाचिकेतस अग्नि अपने उपासको के लिए सेतु है और जो संसार-सागर को पार करनेवालो का विश्रामस्थल है, उस परब्रह्म को हम जानने में असर्थ है । (इस श्लोक में मानव कल्याण हेतु कर्मकाण्ड एवं ज्ञानकाण्ड की ओर सकेत किया गया है ।) 2. We can understand both the Nachiketas fire which is the bridge for the sacrificers, and also we can understand the imperishable Brahman, the place where all fear disappears and which is the shelter for those who want to cross the ocean of the world.
( ८७ ) - आत्मान रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥३॥ पदच्छेद-आत्मानम्, रथिनम्, विद्धि, शरीरम्, रथम्, एव, तु, बुद्धिम्, तु, सारथिम्, विद्धि, मन , प्रग्रहम्, एव च । अन्वय--आत्मानम् रथिनं विद्धि, शरीरं तु रथम् एव । बुद्धि तु सारथि विद्धि, ब्रह्म त मन प्रग्रह एव च विद्धि । [ शा० ] तत्र य उपाधिकृत. ससारी विद्याविद्ययोरधिकृतो मोक्ष- गमनाय ससारगमनाय च तस्य तदुभयगमने साधनो रथ कल्प्यते--तत्र तत्रात्मानमृतप ससारिण रथिन रथस्वामिन विद्धि जानीहि । शरीर रथ- मेव तु रथवद्धहयस्थानीयैरिन्द्रियैराकृष्यमाणत्वाच्छरीरस्य । बुद्धि तु अध्यावसायलक्षणा सारथि विद्धि बुद्धिनेतृप्रधानत्वाच्छरीरस्य सारथि- नेतृप्रधान इव रथ । सर्व हि देहगत कार्य बुद्धिकर्तव्यमेव प्रायेण । मनः सङ्कल्पविकल्पादिलक्षणं प्रग्रह रशना विद्धि । मनसा हि प्रगृहीतानि श्रोत्रादीनि करणानि प्रवर्तन्ते रशनयेवाश्वा । सस्कृत व्याख्या-हे नचिकेतस्त्वमात्मान रथस्य स्वामिन जानीहि । शरीर तु तस्यात्मनो रथ जानीहि एवं बुद्धि तस्य यन्तार अवेहि तथा मनश्च रश्मि जानोहि । इदन्तु स्पष्टमेवास्ति यत् यत मनसा हि प्रगृहीतानि इन्द्रियाणि विषयेषु प्रवर्तन्ते । भावार्थ-आत्मा का शरीर के अन्य अंगो से सम्बन्ध बताते हुए यम ने कहा-हे नचिकेता। तुम इस शरीर मे आत्मा को रथी, शरीर को रथ, को सारथि एव मन को लगाम (रास) समझो। 3. Yama said, Oh Nachiketas' know the soul as lord of a chariot and body as the chariot itself Know the intellect as the charioteer and the mind indeed is the reins. इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयॉस्तेषु गोचरान् । आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ॥ ४ ॥ पदच्छेद--इन्द्रि याणि, हयान्, आहु , विषयान्, तेषु, गोचरान्, आत्मा, इन्द्रिय, मन युक्तम्, भोक्ता, इति, आहु., मनोषिणः । बुद्धि ( ८८ ) अन्वय-मनीषिणः इन्द्रियाणि हयान् विषयान् तेषु गोचरान् आहुः आत्मेन्द्रियमनोयुक्त भोक्ता इति आहुः । [शा०] इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान् आहु रथकल्पनाकुशला गरीररथाकर्पणसामान्यात् । तेष्वेव इन्द्रियेषु हयत्वेन परिकल्पितेष गोचरान्मार्गान्रूपादीन्विषयान् विद्धि । आत्मेन्द्रियमनोयुक्त शरीरेन्द्रिय- मनोभि सहित सयुक्तमात्मान भोक्तेति मसारीत्याहुनीषिणो विवेकिन । न हि केवलस्यात्मनो भोक्तृत्वमस्ति वुद्धयाधुपाधिकृतमेव तस्य भोक्तृ- त्वम्। तथा च श्रुत्यन्तर केवलस्याभोक्तृत्वमेव दर्शयति-"ध्यायतीव लेलायतीव' (बृ० उ० ४ १३१७) इत्यादि । एव च सति वक्ष्यमाणरथ- कल्पनया वैष्णवस्य पदस्यात्मतया प्रतिपत्तिरुपपद्यत नान्यथा स्वभावा- नतिक्रमात् । सस्कृत व्याख्या-विवेकिन इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि हयान् अश्वान् आहुः प्रतिपादितवन्तस्तेषु विषयान् रसरूपादीन् गोचरान्, मार्गान् आहुः। इन्द्रियमनो युक्तम् इन्द्रियैर्मनसा च युक्त यथा स्यात्तथेति आत्मा भोक्ताऽस्तीत्याहुः । हिन्दी शब्दार्थ- इन्द्रियाणि = इन्द्रियो को, हयान् = घोडे, आहुः = कहा है, विषयान् = संसारिक भोग्यपदार्थों को, गोचरान् = मार्ग, आत्मा-इन्द्रिय-मनः युक्तम् = आत्मा-इन्द्रिय मन समूह को, मनीषिणः = विद्वान लोग, भोक्ता = भोग करने वाला, आहु. = कहते है। भावार्थ-विचारको ने इन्द्रियो को घोडे, उनके विषयो को मार्ग कहा है। इन्द्रिय एव मन से युक्त आत्मा को फल भोगनेवाला स्वीकार किया है। 4 The wise thinkers say, the senses are the horses and their objects are the roads. The enjoyer is the soul, endowed with body, sense and mind यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथः ॥ ५ ॥ पदच्छेद–य , तु, अविज्ञानवान्, भवति, अयुक्तेन, मनसा, सदा, तस्य, इन्द्रियाणि, अवश्यानि, दुष्टाश्वाः, इव, सारथेः ।
( ८९ ) अन्वयः-~य. तु अविज्ञानवान् सदा अयुक्तेन मनसा भवति सारथेः दुष्टाश्वा इव तस्य इन्द्रियाणि अवश्यानि भवन्ति । [गा०] तत्रैव सति यस्तु बुद्धयाख्य सारथिरविज्ञानवाननिपुणोऽ- विवेकी प्रवृत्तौ च निवृत्तौ च भवति यथेतरो रथचर्यायामयुक्तेन अप्रगृही- तेनासमाहितेन मनसा प्रग्रहस्थानीयेन सदा युक्तो भवति तस्याकुशलस्य बुद्धिसारथे इन्द्रियाण्यश्वस्थानीयान्यवश्यानि अशक्यनिवारणानि दुष्टाश्वा अदान्ताश्वा इवेतरसारथेर्भवन्ति । संस्कृत व्याख्या-यस्तु बुद्धयाख्यः सारथिरकुशलो भवति एवं सर्वदा अव्यवस्थेन मनसा ( चेतसा ) प्रग्रहेण च तिष्ठति तस्य सारथे?ष्टा अश्वा इव, इन्द्रियाणि नियन्त्रणाद् बाह्यभूतानि भवन्ति । कथनस्यायमाशय यथा कश्चिद् प्रमादी चालको दुष्टान् घोटकान् नियन्त्रयितुमशक्तो भवति तेनैव प्रकारेण अव्य- वस्थितजनोऽपि स्वेन्द्रियाणि वशीकर्तुं न प्रभवति । हिन्दी शब्दार्थ--य. तु = जो व्यक्ति । अयुक्तेन मनसा अस्थिर मन से। सदा = हमेशा अपिज्ञानवान् = प्रमादी। भवति = होता है। सारथे.-( उस ) रथ चालक की। दुष्टाश्वा इव - दुष्ट घोडो के समान । इन्द्रियाणि = पांच ज्ञानेन्द्रियां एव पांच कर्मेन्द्रियाँ । अवश्यानि (भवन्ति) = अनियन्त्रित रहती है । भावार्थ-जो विवेकशून्य बुद्धि ( सारथि ) सदा अस्त-व्यस्त बना रहता है उसके वश में इन्द्रियाँ उसी प्रकार नही रहती जिस प्रकार प्रमादी रथचालक के अधीन चंचल घोडे नही रहते । 5. One who is always unwise and ever associated with an uncontrolled mind can not controlles his senses like untrained horses to a charioteer. यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ ६ ॥ पदच्छेद-य. तु, विज्ञानवान्, भवति, युक्तेन, मनसा, सदा, तस्य, इन्द्रि- याणि, वश्यानि, सद्, अश्वा इव, सारथे. । अन्वय-यः तु सदा युक्तेन मनसा विज्ञानवान् भवति तस्य इन्द्रियाणि सारथेः सदश्वा इव वश्यानि भवन्ति ।
[ शां०] यस्तु पुनः पूर्वोक्तविपरीत सारथिर्भवति विज्ञानवान्प्र- गृहीतमना सामाहितचित्त सदा तस्याश्वस्थानीयानीन्द्रियाणि प्रवर्तयितु निवर्तयितु वा शक्यानि वश्यानि दान्ता सदश्वा इवेतरसारथे । सस्कृत व्याख्या-~-यस्तु बुद्धयाख्यः सारथिविज्ञानवान् ज्ञानसम्पन्नो भवति तथा सदा व्यवस्थितेन मनमा प्रग्रहेण च तिष्ठति । तस्य सारथेः सुशिक्षिता अश्वा इव इन्द्रियाणि वश्यानि वशगतानि भवन्ति । भावार्थ-ज्ञानी एव एकाग्र चित्तवाले साधक के वश में इन्द्रियाँ उसी प्रकार रहती है जिस प्रकार सजग चालक के अधीन सुशिक्षित घोडे रहते है। 6 On other side, who is wise with his mind can controle his senses like the good horses of the charioteer यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदा शुचिः। न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥ ७ ॥ पदच्छेद - य., तु, अविज्ञानवान, भवति, अमनस्कः, सदा. अशुचिः, न, स, तत्, पदम्, आप्नोति, संसारम्, च, अधिगच्छति । अन्वय-य. तु अविज्ञानवान् अमनस्क' सदा अशुचि भवति स. तत् पदम् न आप्नोति संसारम् चाधिगच्छति । [शा० ] तस्य पूर्वोक्तस्याविज्ञानवतो बुद्धिसारथेरिद फलमाह-यस्त्व- विज्ञानवान्भवति अमनस्कोऽप्रगृहीतमनस्क सतत एवाशुचि सदैव, न स रथी तत्पूर्वोक्तमक्षर यत्पर पदम् आप्नोति तेन सारथिना। न केवलं कैवल्य नाप्नोति ससार च जन्ममरणलक्षणमधिगच्छति । सस्कृत व्याख्यायो रथी ( आत्मा) अविवेकी अनव हितश्च सः तु सदा अपवित्रो भवति । स आत्मा पूर्वोक्त ब्रह्मधाम पद कदापि लब्धु न शक्नोति अपितु संसारस्य जन्ममरणादिविविध दुःखजाल च अधिगच्छति-प्राप्नोति । हिन्दी शब्दार्थ-यस्तु = जो व्यक्ति, अविज्ञानवान् = विवेक रहित, अमनस्क = चचल, सदा अशुचिः = सदा मन-कर्म-वचन से अशुद्ध, भवति = होता है, सः = वह, तत्पदम् = उस मोक्षपद को, न आप्नोति = प्राप्त नहीं करता, (अपितु ) ससारं अधिगच्छति = जन्ममरण रूपो ससार को प्राप्त करता है ( ९१ ) भावार्थ-जिसका मन अव्यवस्थित रहता है वह अज्ञानी व्यक्ति सदा अपवित्र रहता है। यही कारण है कि वह, उस परम पद को कभी नही प्राप्त करता, अपितु बार-बार इसी चौरासी के चक्कर मे पड समार-यातनाएं सहता है। 7. Who ever is unwise, careless and unmindful remains always impure and never gains that supreme goal, but descends to the world again. यस्तु विज्ञानवान् भवति समनस्कः सदा शुचिः । स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥ ८ ॥ पदच्छेद-यः, तु, विज्ञानवान्, भवति, समनस्कः, सदा, शुचिः सः, तु, तत्, पदम्, आप्नोति, यस्मात्, भूयः, न जायते । अन्वय-यः तु विज्ञानवान् समनस्क. सदा शुचि भवति सः तत् पदम् आप्नोति यस्मात् भूय न जायते । [शा०] यस्तु द्वितीयो विज्ञानवान् विज्ञानवत्सारथ्युपेतो रथी विद्वान् इत्येतत् युक्तमना समनस्क स तत् एव सदा शुचिः स तु तत्पदमाप्नोति, यस्मादाप्तात्पदाद् अप्रच्युत सन् भूय पुनर्न जायते संसारे । सस्कृत व्याख्या-यस्तु विशिष्टज्ञानसम्पन्नः समाहितमना जायते स तु सदा सर्वदा शुचि पवित्रोऽतस्तपरमपदं, तबलेन एव लभते, यस्मात् स्थानात् स भूयो न जायते उत्पद्यते । भावार्थ-परन्तु जिस रथ ( शरीर ) का स्वामी ज्ञानवान्, सयत और पवित्र होता है वह उस परमोत्कृष्ट (मोक्ष) पद को प्राप्त कर लेता है जहाँ से फिर उसका जन्म नहीं होता। 8. But, whoever has understanding, is wise mindful, always careful and pure, gets the goal from which he is never born again, विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः। सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ ९ ॥ पदच्छेद-विज्ञान-सारथिः, य. तु, मन', प्रग्रहवान्, नर., सा, अध्वनः, आप्नोति, तद्, विष्णो., परमम्, पदम् आप्नोति ।
( ९२ ) अन्वय-यः तु नरः विज्ञानसारथि मन प्रग्रहवान् सः अध्वन. पारं तद् विष्णोः परम पदम् आप्नोति । [ शा० ] विज्ञानसारथिर्यस्तु यो विवेकबुद्धिसारथि पूर्वोत्तो मन.- प्रग्रहवान् प्रगृहीतमना समाहितचित्त सञ्शुचिर्नरो विद्वान् सोऽध्वनः ससारगते पार परमेव अधिगन्तव्यमित्येतदाप्नोति मुच्यते सर्वससार- बन्धन. तद्विष्णो व्यापनशीलस्य ब्रह्मण परमात्मनो वासुदेवाख्यस्य परमं प्रकृष्ट पद स्थान सतत्त्वमित्येतद्यदसौ आप्नोति विद्वान् । सस्कृत व्याख्या-विशिष्टं ज्ञानम् यस्यासी विज्ञानः एवभूतः सारथिर्यस्येति, भाव । एतादृशः विशिष्टो समाहितचित्तो रथवाहक एव ससारमार्गस्य पारम् चरमलक्ष्यं लक्षीकृत्य व्यापकस्य विष्णोः प्रसिद्ध शास्त्रोक्त पद स्थान लभते । भावार्थ-जो विवेकी पुरुष बुद्धिरूपी सारयी से युक्त होकर मन रूपी लगाम को अपने वश मे रखता है। वह परम साधक ही भवसागर के उस पार स्थित भगवान विष्णु के परम पद को प्राप्त करता है । 9 The wise man, who has, as his charioteer and who has under control the reins of the mind, achieves the end of the road, that is the highest place of Visnu इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धेरात्मा महान्परः ॥ १० ॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥ ११ ॥ पदच्छेद–इन्द्रियेभ्यः, परा., हि, अर्था', अर्थेभ्यः, च, परम्, मनः, मनस, तु, परा, बुद्धि , बुद्धेः, आत्मा, महान्, परः, महत , परम, अव्यक्तम्, अव्यक्तात्, पुरुषः, परः, पुरुषात्, न, अपरम्, किंचित्, सा, काष्ठा, सा, परागति । अन्वय-इन्द्रियेभ्य' अर्था परा. अर्थेभ्यश्च मनः परम् मनस तु बुद्धिः परा बुद्धेः महान् आत्मा परः महत अव्यक्तम् परम् अव्यक्तात् पुरुष. परः पुरुषात् परं न किञ्चित् सा काष्ठा सा परा गतिः ।
( ९३ ) [ शा० ] अधुना यत्पद गन्तव्यं तस्य इन्द्रियाणि~ स्थूलान्यारभ्य सूक्ष्मतारतम्यक्रमेण प्रत्यगात्मतया अधिगम कर्तव्य इत्येवमर्थमिदम् आरभ्यते-स्थूलानि तावदिन्द्रियाणि तानि यैरथैरात्मप्रकाशनाय आर- ब्धानि तेभ्य इन्द्रियेभ्य स्वकार्येभ्यस्ते परा ह्या सूक्ष्मा महान्तश्च प्रत्यगात्मभूताश्च । तेभ्योऽप्यर्थेभ्यश्च पर सूक्ष्मतर महत्प्रत्यगात्मभूत च मन । मन शब्दवाच्य मनस आरम्भक भूतसूक्ष्म सकल्पविकल्पाद्या- रम्भकत्वात् । मनसोऽपि परा सूक्ष्मतरा महत्तरा प्रत्यगात्मभूता च बुद्धि , बुद्धिशब्दवाच्यमध्यवसायाद्यारम्भक भूतसूक्ष्मम् । बुद्धरात्मा सर्वप्राणि- बुद्धीना प्रत्यगात्मभूतत्वादात्मा महान्मर्वमहत्वात् । अव्यक्ताद्यत्प्रथम जात हैरण्यगर्भ तत्व बोधावोधात्मक महानात्मा वुद्धे पर इत्युच्यते । महतोऽपि पर सूक्ष्मतर प्रत्यगात्मभूत सर्व महत्तर च अव्यक्त सर्वस्य जगतो बीजभूतम् अव्याकृतनामरूपसतत्त्व सर्वकार्याकारणशक्तिसमाहार- रूपम् अव्यक्तान्याकृताकागादिनामवाच्य परमात्मन्योतप्रोतभावेन समा- श्रित वटकणिकायामिव वटवृक्षशक्ति । तस्मादव्यक्तात्पर सूक्ष्मतर सर्व- कार्यकारणत्वात्प्रत्यगात्मत्वाच्च महाश्च अत एव पुरुष सर्वपूरणात् । ततोऽन्यस्य परस्य प्रसङ्गं निवारयन्नाह पुरु पान पर किचिदिति । यस्मा- नास्ति पुरुषात् चिन्मात्रघनात् पर किचिदपि वस्त्वन्तर तस्मात्सूक्ष्मत्व- महन्वप्रत्यगात्मत्वाना सा काष्ठा निष्ठा पर्यवसानम् । अत्र हीन्द्रियेभ्यः आरभ्य सूक्ष्मत्वादिपरिसमाप्ति । अतएव च गन्तृणा सर्वगतिमता ससा- रिणां परा प्रकृष्टा गतिः "यद्गत्वा न निवर्तन्ते' ( गीता ८।२१।१५।६ ) इति स्मृते । सस्कृत व्याख्या-अर्थाः विपया इन्द्रियेभ्य. पराः महत्तरा', मन. अर्थेभ्यः परम् महत्तरम्, बुद्धिस्तु मनसोऽपि परा महीयसी, महान् आत्मा तु बुद्धरपि परः महायान् विद्यते इति । महतो महत्तत्वाद् अव्यक्तम् (प्रकृति.) प्रधान परम् श्रेष्ठतरम् , अव्यक्ताद् प्रधानादपि पुरुष. ( परमात्मा) पर महीयान् विद्यते । पुरुषात्पर परमात्मनः पर महत्तरं किंचिन्नपि नास्ति । इय पराकाष्ठा चरमसीमा इयमेव परा गति. महत्तम गन्तव्यस्थानं भवतीति ।
भावार्थ-चक्षु, श्रोत्र, प्राण, जिह्वा, चर्म नामक इन पाच ज्ञानेन्द्रियो से उनके विषय-रूप, शब्द, गन्ध, रस और स्पर्श श्रेष्ठ ( सूक्ष्म ) है। इन विषयो की अपेक्षा मन, मन की अपेक्षा बुद्धि, बुद्धि की अपेक्षा महत् तत्त्व ( हिरण्य- गर्भ ), हिरण्यगर्भ की अपेक्षा मूल प्रकृति एव मूल प्रकृति से श्रेष्ठ परमात्मा है । परमात्मा से श्रेष्ठ ( सूक्ष्म ) कुछ भी नहीं। परमात्मा ही परमगति है। जिसे पा लेने पर साधक को फिर ससार में कभी नहीं आना पडता । 10 The sense-objects are higher than the senses and beyond the objects is the mind, but the intellect is higher than the mind, and the Great Shoul ( Atman ) is higher than the intellect. 11. The uumanifested is superior to the Great (Atman) and the Purusha (Parmatman ) is superior to the unmanifested. There is nothing higher than Purusha He is the culmination That is the end and that is the supreme goal. एष सर्वेषु भूतेषु गूढात्मा न प्रकाशते । दृश्यते त्वग्रयया बुद्धया सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥ पदच्छेद-एष., सर्वेषु, भूतेषु, गूढात्मा, न, प्रकाशते, दृश्यते, तु, अग्रथया, बुद्धया, सूक्ष्मया, सूक्ष्मदर्शिभि.। अन्वय.-सर्वेषु भूतेषु गूढः एव आत्मा न प्रकाशते सूक्ष्मदर्शिभिः तु अग्रघया सूक्ष्मया बुद्धया दृश्यते। [शा० ] ननु गतिश्चेदागत्यापि भवितव्यम् । कथ यस्माद् भूयो न जायत इति ? नैष दोष , सर्वस्य प्रत्यगात्मत्वादवगतिरेव गतिरित्यु- पचर्यते। प्रत्यगात्मत्वं च दर्शितमिन्द्रियमनोवुद्धिपरत्वेन । यो हि गन्ता सोऽगतमप्रत्यग्रूप गच्छत्यनात्मभूतं न विपर्ययेण । तथा च श्रुतिः-"अन- ध्वगा अध्वसु पारयिष्णवः' इत्याद्या । तथा च दर्शयति प्रत्यगात्मत्वं सर्वस्य-एष पुरुष. सर्वषु ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तेषु भूतेषु गूढ सवृत्तो दर्शन- श्रवणादिकर्माविद्यामायाच्छनोऽत एवात्मा न प्रकाशत आत्मत्वेन कस्य- ९५ ) ? चित् । अहो अतिगम्भीरा दु खगाह्या विचित्रा माया चेय यदयं सर्वो जन्तुः परमार्थत परमार्थ सतत्त्वोऽप्येव बोध्यमानोह परमात्मेति न गृह्णात्यना- त्मान देहेन्द्रियादिसङ्घातमात्मनो दृश्यमानमपि घटादिवदात्मत्वेनाहम- मुष्य पुत्र इत्यनुच्चमानापि गृह्णाति । नूनं परस्यैव मायया मोमुह्यमाना. सर्वो लोको बम्भ्रमीति । तथा च स्मरणम् -- “नाहं प्रकाश सर्वस्य योगमायासमावृत” ( गीता ७।२५ ) इत्यादि। ननु विरुद्धमिदमुच्यते "मत्वा धीरो न शोचति" ( क० उ० २११४) "न प्रकाशते" ( क० उ० ११३११२ ) इति च। नैतदेवम् । असस्कृतबुद्धेरविज्ञेयत्वान्न प्रकाशत इत्युक्तम् । दृश्यते तु सस्कृतया अग्रयया अग्रमिवाग्रया तया, एकाग्रतयो- पेतयेत्येतत्, सूक्ष्मय। सूक्ष्मवस्तु निरूपगपरया, कै. ? सूक्ष्मदर्शिभि ‘इन्द्रि- येभ्य परा ह्यर्था' इत्यादिप्रकारेण सूक्ष्मतापारम्पर्यदर्शनेन पर सूक्ष्म द्रष्टु शील येषा ते मूक्ष्मदर्शिनस्तै सूक्ष्मदर्शिभि पण्डितैरित्येतत् । सस्कृत व्याख्या-'प्राणिमात्रेषु गूढ. अन्तर्हितः एष आत्मा सामान्य पुरुषैः न प्रकाशते न बहिदृश्यते । परन्तु सूक्ष्मदर्शिभि. ( योगिभि.) मूभ द्रष्टु शीलं येषा तै अग्रया श्रेष्ठया सूक्ष्मया बुद्धया द्रष्टुं शक्यते । सामान्यजनाना कृते अदृष्टोऽपि आत्मा तत्त्वज्ञ ज्ञायत एवेति भावः । भावार्थ-सभी जीवो में छिपा हुआ यह आत्मा सामान्य व्यक्तियो द्वारा दृष्टिगाचर का विषय न होते हुए भी सूक्ष्मदर्शी उसे अपनी पैनी दृष्टि देख लेते है । 12. This soul is hidden in all beings and this is why He does not appear to all. He is seen only by the seers through their pointed and subtle intellect. यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि ॥१३॥ पदच्छेद--यच्छेत्, वाक् , मनसी, प्राज्ञ , तद्, यच्छेत्, ज्ञान, आत्मनि, ज्ञानम्, आत्मनि, महति, नियच्छेत्, शान्ते, आत्मनि । अन्वय-प्राज्ञ वाक् मनसी यच्छेत तत् मनः ज्ञाने) आत्मनि यच्छेत् ज्ञानम् जात्मनि महति नियच्छेत् तत् शान्ते आत्मनि यच्छेत् ।
( ९६ ) [शा० ] यच्छेन्नियच्छेदुपसहारेत्प्राज्ञो विवेकी, किम् ? वाग्वाचम् । वागत्रोपलक्षणार्था सर्वेषामिन्द्रियाणाम् । क्व ? मनसी। मनसीतिच्छान्दस दैय॑म् तच्च मनो यच्छेज्ज्ञाने प्रकाशस्वरूपे वुद्धौ आत्मनि । बुद्धिर्हि मन- आदि करणान्याप्नोतीत्यात्मा प्रत्यक् तेषाम् । ज्ञान बुद्धिमात्मनि महति प्रथमजे नियच्छेत् । प्रथमजवत् स्वच्छस्वभावकमात्मनो विज्ञानम् आपा- दयेदित्यर्थ । त च महान्तम् आत्मान यच्छेच्छान्ते सर्वविशेषप्रत्यस्तमित- रूपेऽविक्रिये सर्वान्तरे सर्वबुद्धिप्रत्ययसाक्षिणि मुख्य आत्मनि । सस्कृत व्याख्या-निर्विकल्प-सयाधिं गत एवात्मानं द्रष्टु शक्यते । आत्मान द्रष्टुकामे विवेकी प्रथमं वाक्वाणी (वागत्रोपलक्षणार्या सर्वेषामिन्द्रि- याणाम् ) मनसि यच्छेत् उपसहरेत् । अर्थात् यत्कथयति तस्यैवमननमाचरेत् ) । मनश्च ज्ञानरूपे आत्मनि बुद्धो पर्यवस्येदिति । ज्ञानञ्च महत्तत्त्वे नियच्छेत् । तदनन्तर महत्तत्त्वमपि परमे शान्ते चैतन्यस्वरूपनिर्विकारे आत्मनि एकाग्र-मनसा स्थापयेत् । तदैवायं सूक्ष्म आत्मा द्रष्टु पार्यत इति । हिन्दी शब्दार्थ-प्राज्ञः = विवेकी पुरुष, वाक् = वाणी, मनसि = मन में, यच्छेत् = लय करे, तत् = उस मन को, आत्मनि = अन्त करण मे, ज्ञानम् = अहंभावात्मक ज्ञान को, महति = महत्तत्व मे, नियच्छेत् = लीन करे, शान्ते आत्मनि = परमात्मा मे, यच्छेत् विलय करे। भावार्थ-पुरुष के साक्षात्कार का इच्छुक व्यक्ति उत्तरोत्तर सूक्ष्म मे लीन होते हुए अन्त मे उसी मे लीन होकर उसे पा सकता है । इस लक्ष्य की प्राप्ति में सर्वप्रथम विद्वान् व्यक्ति वाणी को मन मे, मन को ज्ञान रूपी बुद्धि मे, ज्ञान को महान् आत्मा में और फिर इसी क्रम से आत्मा को निर्विकार परमात्मा में लय करे। 13 The wise man should merge the speech into the mind, that mind into the knowledge and than again subdue the knowledge into the great self and that Great Soul into the spirit of peace उत्तिष्ठ जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया- दुर्ग पथस्तत्कायो वदन्ति ॥ १४॥ - ( ९७ ) पदच्छेद-उत्तिष्ठत, जाग्रत, प्राप्य, वरान्, निबोधत, क्षुरस्य, धारा, निशिता, दुरत्यया, दुर्गम्, पथः, तत्, कवयः, वदन्ति । अन्वयः-उत्तिष्ठत, जाग्रत वरान् प्राप्य ( तत् ) निबोधत निशिता क्षुरस्य धारा दुरत्यया दुर्गम् तत् पथः ( इति ) कवय वदन्ति । शा० -अनाद्यविद्या प्रसुप्ता उत्तिष्ठत हे जन्तव | आत्मज्ञानाभिमुखा भवत । जाग्रताज्ञाननिद्राया घोररूपाया सर्वानर्थवीजभूताया क्षयं कुरुत । कथम् ? प्राप्योपगम्य वरान् प्रकृष्टानाचार्यास्तद्विदस्तदुपदिष्टं मन्तिरमात्मानमहमस्मोति । निबोधतावगच्छत । न ह्यपेक्षितव्यमिति श्रतिरनुकम्पयन्नाह मातृवत् । अतिसूक्ष्मबुद्धिविपयत्वाज्ज्ञेयस्य । किमिव मूक्ष्मवुद्धिरित्युच्यते । क्षुरस्य धाराग्र निशिता तीक्ष्णीकृता दुरत्यया दु खे- नात्ययो यस्या मा दुरत्यया । यथा सा पद्भ्या दुर्गमनीया तथा दुर्ग दु ख- सम्पाद्यमित्येतत् पथ. पन्थान तत्त्वज्ञानलक्षणं मार्ग कवयो मेधाविनो वदन्ति । ज्ञेयस्यातिसूक्ष्मत्त्वात्तद्विषयस्य ज्ञानमार्गस्य दु खसम्पाद्यत्वं वदन्तीत्यभिप्राय । सस्कृत व्याख्या-अरे अनाद्यविद्याप्रसुप्ता जना | उत्तिष्ठत ससार-मोहं परित्यज्यात्मज्ञानाभिमुखा भवत, जाग्रत स्वप्नकल्पमपहाय आत्मनो विषये जागरूका भवत, वरान् श्रेष्ठान् आचार्यान् प्राप्य आत्मस्वरूप जानीथ, कवयो विद्वास तत् आत्मज्ञान तीक्ष्णीकृता क्षुरस्य धारा इव दु सम्पाद्यम् वदन्ति । हिन्दी शब्दार्थ-उत्तिष्ठत = आलस्य का त्यागकर उठो, जाग्रत = मोह- निद्रा को छोड़कर जागो, वरान् = ज्ञानवान पुरुषो को, प्राप्य = प्राप्त करके, निबोधत = उनसे अपने को जानो, कवय = विद्वान् लोग, निशिता अत्यन्त तेज, दुरत्यया = अत्यन्त कठिन, क्षुरस्य धारा इव = छुरे की धार के समान, दुर्गम् = कष्टसाध्य, वदन्ति कहते है। भावार्थ-(अज्ञानी लोगो) उठो, अज्ञान निद्रा को छोडकर ज्ञानो पुरुषो के पाम जाओ और आत्मज्ञान प्राप्त करो। विद्वान् लोग आत्मबोध के इस मार्ग को तीक्ष्ण छुरे की धारा के समान कहते है । 14 Arise, awake (o man o man ) get the great teachers and know it from them the wise say that path is narrow and difficult to tread on as a razor's edge . ( ९८ ) अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा रसं नित्यमगन्धवच्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रवं निचाप्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥ १५ ॥ पदच्छेद-अशब्दम्, अस्पर्शम्, अरूपम्, अव्ययम् तथा अरसम, नित्यम्, अगन्धवत्, च, यत्, अनादि, अनन्तम्, महत , परम्, ध्रुवम्, निचाय्य, तम्, मृत्युमुखात, प्रमुच्यते। अन्वय-तम् अशब्दम् अस्पर्शम् अरूपम्, अरसम् अगन्धवत् च अव्ययम्, नित्यम् अनाद्यनन्तम् महतः परम् ध्र वम् निचाय्य मृत्यमुखात् प्रमुच्यते । [शा०] अशब्दमस्पर्शमरूपमव्यय तथारस नित्यमगन्धवच्च यत् एतद् व्याख्यात ब्रह्माव्ययम्- यद्धि शब्दादिमत्तद् व्येतीद तु अशब्दादिमत्वाद- व्यय न व्येति न क्षीयते, अत एव च नित्यम् यद्धि व्येति तदनियमिद तु न व्यत्यतो नित्यम् । इतश्च नित्यम् अनाद्यविद्यमान आदि कारणम् अस्य तदिदमनादि । यद्धयादिमत्तत्कार्यत्वादनित्यं कारणे प्रलीयते यथा पृथिव्यादि । इद तु सर्वकारणत्वादकार्यमकार्यत्वान्नित्यम् । न तस्य कारणमस्ति यस्मिन्प्रलीयेत । तथानन्तरम् अविद्यमानोऽन्त कार्यमस्य तदनन्तम् । यथा कदल्यादेः फलादिकार्योत्पादनेन अपि अनित्यत्व दृष्ट न च तथाप्यन्तवत्त्व ब्रह्मण. अतोऽपि नित्यम् । महतो महत्तत्वाद् बुद्धयाख्यात्पर विलक्षण नित्यविज्ञप्तिस्वरूप- त्वात्सर्वसाक्षि हि सर्व तात्मत्वाद् ब्रह्म । उक्त हि- “एप सर्वेषु भूतेषु ( क्ट० उप० १।३।१२ ) इत्यादि । ध्रुव च कूटस्थ नित्य न पृथिव्यादि- वदापेक्षिक नित्यत्वम् । तदेवम्भूत । ह्मात्मान निचाय्यावगम्य तमात्मानं मृत्युमुखान्मृत्युगोचरादविद्याकाम में लक्षणात्प्रमुच्यते विमुच्यते । सस्कृत व्यारया- यमो नचिवेत प्रबोधयन् प्रतिपादयति-तत् आत्मतत्त्वं निचाय्य सम्यगधिगम्य पुरषः ( मुमुक्षु ) जरामरणादिदु खात्प्रमुच्यते । कीदृश उत् ब्रह्मेति जिज्ञासमाने तत्राह- ३ शब्दम्- अस्पर्शम् अरूपम् अरसम् अगन्धवाच ।
( ९९ ) ( अर्थात्-शब्द स्पर्श-रूप-रस गन्धादि वजितम् ) अस्ति तथा अन्यम्-नित्यम्- अनादि-अनन्तम्-ध्रुवम् ( अर्थात् सयरहितम्-कार्यकारणभावशून्यम्-चिरसत्यम्- एकरूपञ्चास्ति । भावार्थ-जो (आत्मतत्त्व) शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, नाशरहित, रसादि गुण रहित, ( किन्तु ) नित्य है और गन्धरहित है। जो अनादि, अनन्त, महत्तत्वादि से परे है और निश्चल है उसी परमतत्त्व को अच्छी तरह से जानने पर हो साधक जराभरणादि दुःखो से मुक्त होता है । 15. whoever, fully understands this soundless, touchless, colourless, tasteless, eternal, without begining and without end, higher than Mahat and ever constant Atman, becomes free from the jaws of death. नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥ य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्म संसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७॥ पदच्छेद-नाचिकेतम्, उपाख्यानम्, मृत्यु-प्रोक्तम्, सनातनम्, उक्त्वा, श्रुत्वा, च मेधावी, ब्रह्मलोके, महीयते । यः, इमम्, परमम्, गुह्यम्, श्रावयेद्, ब्रह्म, ससदि, प्रयतः, श्राद्धकाले, वा, तद्, आनन्त्याय, कल्पते । अन्वय -मृत्युप्रोक्तम् नाचिकेतम् सनातनम् उपाख्यानम् उक्त्वा श्रुत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते । यः प्रयतः ब्रह्मससदि श्राद्धकाले वा इय परम गुह्य श्रावयेत् तत् आनन्त्याय कल्पते । तत् आनन्त्याय कल्पते इति । [ शा० ] प्रस्तुतविज्ञानस्तुत्यर्थमाह श्रुति -नाचिकेत नचिकेतसा प्राप्तं नाचिकेत मृत्युना प्रोक्तं मृत्युप्रोक्तमिदमाख्यानमुपाख्यान वल्लोत्रय- लक्षण सनातन चिरन्तनं वैदिकत्वादुक्त्वा ब्राह्मणेभ्य श्रुत्वाचार्येभ्यो .
( १०० ) मेधावी ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोकस्तस्मिन्महीयत आत्मभूत उपास्यो भवतीत्यर्थ । य कश्चिदिम ग्रन्थ परम प्रकृष्ट गुह्य गोप्य श्रावयेद् ग्रन्थतोऽर्थतश्च ब्राह्मणाना ससदि ब्रह्मससदि प्रयत शुचिर्भूत्वा श्राद्ध काले वा श्रावयेद् भुजानाना तच्छ्राद्धमस्यानन्त्यायानन्तफलाय कल्पते सम्पद्यते । द्विर्व- चनमध्यायपरिसमाप्त्यर्थम् । संस्कृत व्याख्या-अन्ते कठोपनिषद्ग्रन्थस्य माहात्म्य प्रकटयन्नाह- मृत्युना यमेन प्रतिपादितम् नाचिकेतसा प्राप्तमिद सनातन प्राचीन आख्यानकल्पम् कथ क्थयित्वा आकर्ण्य च मेधासम्पन्नः पुरुष ब्रह्मलोके महीयते महिमाशाली जायते । य कश्चिदपि पवित्रो भूत्वा अत्यन्तं रहस्यमिमं ( यम-नाचिकेतस-सम्बन्धि- नमुपाख्यानम् ) विद्वत्सभाया श्राद्धकाले वा शृणोति श्रावयति च सः आनन्त्याय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति अथवा अनन्त फलाय उपास्यो भवति । हिन्दी शब्दार्थ- मृत्युना-प्रोक्तम् = यम द्वारा उपदिष्ट, नाचिकेतम् : नचिकेता द्वारा सुने गये, सनातनम् = चिरन्तन, उपाख्यानम् मेधावी = विद्वान्, उक्त्वा = कहकर, श्रुत्वा = सुनकर, ब्रह्मलोके = ब्रह्मलोक मे, महीयते = आदर प्राप्त करता है। प्रयतः = जितेन्द्रिय, परम-गुह्य = परम गोपनीय, ब्रह्म ससदि ब्रह्मवेत्ताओ में, श्राद्धकाले = जिज्ञासुओ मे, श्रावयेत् = सुनाता है, तद् = वह विद्वान् पुरुष, अनन्त्याय = ब्रह्मप्राप्ति के लिए, कल्पते = समर्थ होता है। भावार्थ-भगवान् यम द्वारा प्रतिपादित इस नाचिकेता सम्बन्धी कथानक को कहने और सुनने वाला ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है। जो कोई भी (स्त्री-पुरुष ) इस पवित्र आख्यान को शुद्ध होकर श्रद्धावान् साधारण लोगो को या विद्वत्समाज को सुनाता है उसे अनन्त ( मोक्ष ) फल की प्राप्ति होती है । 16-17. If any one, becoming purified says and hears the eternal tale in the assembly of Brahmans or at the time of Shraddha said by Death to Nachiketa, is adored in the world of Brahman प्रथमाध्याये तृतीय वल्लो समाप्त (प्रथम अध्याय समाप्त) उपदेश कथा, .
द्वितीय अध्याय प्रथम वल्ली प्रथमाऽध्याये आत्मपरमात्मनोः स्वरूपं तत्प्राप्त्युपायश्च प्रतिपादितम्, अधुना तद् बाघकानि वहिर्मुखसाधनानि सर्वाणीन्द्रियाणि विघ्नकराणि, तानि प्रदश्य, आत्मप्राप्तो विघ्नान्येव ज्ञातव्यानि, ज्ञात्वैव तदुपायसाधनानि भवन्ति, इत्यादी- न्याह-पराञ्चिखानीति- पराश्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षदावृत्तचक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ १ ॥ पदच्छेद-पराञ्चि, खानि, व्यतृणत्, स्वयम्भू , तस्मात्, परान्, पश्यात, न अन्तरात्मन् कश्चिद्, धीर , प्रत्यक्, आत्मानम्, ऐछत्, आवृत्तचक्षु अमृत- त्वम्, इच्छन् ॥१॥ अन्वय- स्वयभू खानि पराञ्चि व्यतृणत् । तस्मात् पराड पश्यति, अन्तरात्मन् न ( पश्यति)। कश्चिद् धीर. अमृतत्वम् इच्छन् आवृत्तचक्षु प्रत्यगात्मानम् ऐक्षत् । गा० भा०- एप सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते दृश्यते त्वग्रयया वुद्धया, इत्युक्तम् । क पुन प्रतिबन्धोऽग्रयाया बुद्ध र्येन तदभावादात्मा न दृश्यत इति तददर्शनकारणप्रदर्शनार्था वल्ल्यारभ्यते। विज्ञाते ही श्रेय - प्रतिबन्धकारणे तदपनयनाय यत्न आरब्धु शक्यते नान्यथेति । पराञ्चि पर।गञ्चन्ति गच्छन्तीति खानि तदुपलक्षितानि श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि खानी- त्युच्यन्ते । तानि पराञ्च्येव शब्दादिविषयप्रकाशनाय प्रवर्तन्ते । यस्मादेवं स्वाभाविकानि तानि व्यतृणद्धिसितवान्हनन कृतवानित्यर्थ । कोऽसौ ? स्वयभू परमेश्वर स्वयमेव स्वतत्रो भवति सर्वदा न परतत्र इति । तस्मात्पराड्पराग्रूपाननात्मभूताञ्शब्दादीन् पश्यत्युपलभत उपलब्धा, नान्तरात्मन्नान्तरात्मानमित्यर्थ एव स्वभावेऽपि सति लोकस्य कश्चि- नद्या प्रतिस्रोत प्रवर्तनमिव धीरो धीमान्विवेकी प्रत्यगात्मान प्रत्यक्चा- ( १०२ ) सावात्मा चेति प्रत्यगात्मा। प्रतीच्येवात्मशब्दो रूढो लोके नान्यस्मिन् । व्युत्पत्तिपक्षेऽपि तत्रैवात्मशब्दो वर्तते । 'यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह । यच्चास्य संततो भावस्तस्मादात्मेति कीर्त्यते।' इत्यात्म- शब्दव्युत्पत्तिस्मरणात् । तं प्रत्यगात्मान स्व स्वभावमैक्षदपश्यत्पश्यतीत्यर्थः, छन्दसि कालानियमात् । कथ पश्यतीत्युच्यते। आवृत्तचक्षुरावृत्त व्यावृत्तं चक्षु श्रोत्रादिकमिन्द्रियजातमशेषविषयाद्यस्य स आवृत्तचक्षु स एव सस्कृतः प्रत्यगात्मान पश्यति । न हि बाह्यविषयालोचनपरत्व प्रत्यगा- त्मेक्षण चैकस्य सभवति । किमर्थं पुनरित्थ महता प्रयासेन स्वभावप्रवृत्ति- निरोध कृत्वा धीर प्रत्यगात्मान पश्यति इत्युच्यते, अमृतत्वममरणधर्मत्व नित्यस्वभावतामिच्छन्नात्मन इत्यर्थः । सस्कृत व्याख्या-स्वयम्भूः स्वकर्मतन्त्र ईश्वर खानि इन्द्रियाणि पराश्चि- परान् विषयार्थान् शब्दस्पर्शादीन् अञ्चति-प्रकाशति-पराञ्चि-परप्रकाशकानि भवन्ति तत्र हेतु कथयन्शोचति, आत्मा यत् स्वयम्भूः तानि व्यतृणत्-हिसितवान् - तृहिसायाम् इति धात्वर्थत्वात् यद्वा धातूनामनेकार्थत्वात्-तानि-तादृशस्वरूपाणि सृष्टवान् इत्यर्थ तस्मात् परान्-विषयानेव पर न्ति-पश्यन्ति अन्तरात्मन्-अन्तरा- स्मान न- पश्यन्तीत्यर्थ । कश्चिद्धीर -शब्दादि विषयानासक्तचितः ( प्रत्यक्- स्वात्मानमेवैच्छन्-पश्यति छान्दसत्वात् वर्तमानकाले; लड्लकारपरस्मैपद- प्रयोगश्च ) आवृत्तचक्षु स्वस्वविषयव्यावृतेन्द्रियः, अत्रचक्षुः शब्द इन्द्रियमात्रपरः, अमृतत्वम्-मोक्षरूपमनुत्तमं पदार्थमिच्छन्-मुमुक्षुरित्यर्थ ) हिन्दी शब्दार्थ-स्वयम्भू = परमेश्वर ने । खानि = इन्द्रियो को। पराश्चि = बहिर्मुख । व्यतृणत् = बनाया है। तस्मात् = इसीलिए । पराड् बाह्य विषयो को। पश्यति = देखता है । अन्तरात्मन् = अन्दर के आत्मा को । कश्चित् = कोई । अमृतत्वम् = अमृतत्व अर्थात् मोक्ष को। इच्छन् चाहता हुआ । आवृत्तचक्षु = चक्षुरादि इन्द्रियो को विषयो से हटाकर । प्रत्यगात्मानम् - अन्तर्यामी ब्रह्म के स्वरूप को । ऐक्षत् = देखता है । भावार्थ-परमेश्वर ने इन्द्रियो को बहिर्मुख बनाया है । इसी लिए (प्राणी) बाह्य विषयो को ही देखता है अर्थात् बाह्य विषयो में ही प्रवृत्त होता है, अन्दर की आत्मा को नही देखता । कोई धीर पुरुष मोक्ष को चाहते हुए बाह्य विषयों से इन्द्रियो को हटाकर अन्तर्यामी ब्रह्म के स्वरूप का साक्षात्कार करता है। -- --
( १०३ )
.
1. The self-existent creato: has created the senses in
such way that they go outward and not inward Therefore
one sees the external and not the inner-self. Only some
judicious having desire for immortality turns his eyes
inward and sees the internal Self.
पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् ।
अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्त ॥२॥
पदच्छेद-पराच कामान्, अनुयन्ति, वाला , ते मृत्योः यन्ति, विततस्य,
पाशम्, अथ, धीराः, अमृतत्वम् विदित्वा, ध्रुवम्, अधुवेषु, इह, न प्राय॑यन्ते ॥२॥
अन्वय-बाला पराचः कामान् अनुयन्ति । ते विततस्य मृत्योः पाशम्
यन्ति । अथ धीरा ध्रुवम् अमृतत्व विदित्वा ( अथवा अमृतत्वं ध्रुव विदित्वा )
इह अभवेषु न प्रार्थयन्ते।
शा० भा०-पराचो बहिर्गतानेव कामान्काम्यान्विषयाननुयन्ति अनु-
गच्छन्ति वालो अल्पप्रज्ञास्ते तेन कारणेन मृत्योरविद्याकामकर्मसमुदायस्य
यन्ति गच्छन्ति विततस्य विस्तीर्णस्य सर्वतो व्याप्तस्य पाश पाश्यते बध्यते
येन त पाश देहेन्द्रियादिसयोगवियोगलक्षणम् ! अनवरतजन्ममरणजरारो-
गाद्यनेकानर्थवात प्रतिपद्यन्त इत्यर्थ । यत एवमथ तस्माद्धीरा विवेकिन
प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षणममृतत्व ध्रुव विदित्वा, देवाद्यमृतत्व ह्यध्रु-
वमिद तु प्रत्यगात्मस्वरूपावस्थानलक्षण 'न कर्मणा वर्धते नो कनीयान्'
(वृह० ४।४।२३ ) इति ध्रुवम् । तदेवभूत कूटस्थमविचाल्यममृतत्व
विदित्वाध्रुवेपु सर्वपदार्थेष्वनित्येपु निर्धार्य ब्राह्मणा इह मसारेऽनर्थप्राये न
प्रार्थयन्ते किचिदपि प्रत्यगात्मदर्शनप्रतिकूलत्वात् । पुत्रवित्तलोकैषणाभ्यो
व्युतिष्ठन्त्येवेत्यर्थ ॥
सस्कृत व्याख्या-बाला अल्पप्रज्ञा पराच-बाह्यान् विषयान् कामान् •
काम्यमानान् एव अनुयन्ति-अनुमन्यन्ते ते विततस्य-विस्तीर्णास्य मृत्यो-संसारस्य
यद्वा यमराजस्य पाश बन्धन यान्ति प्राप्नुवन्ति । अथायं शब्द प्रकृत विषयार्थान्तरं
परिगृह्णाति एव ज्ञात्वा धीरा.-बुद्धिमन्त प्रत्यागात्मनेवध्र वं-विनिश्चलम्-शाश्वत-
मितियावत् अमृतत्व-परं श्रेयो विदित्वा अध्रुवेषु-पदार्थेषु इह ससारमण्डले कमपि
न प्रार्थयन्ते, आत्मतत्वज्ञस्य लौकिक सर्व त्याज्यमिति भावः ॥२॥
( १०४ ) हिन्दी शब्दार्थ- बाला = मूढ अर्थात् अविवेकी जन । पराचः = बाह्य । कामान् = विषय अर्थात् सुख के भौतिक साधन । अनुयन्ति = अनुसरण करते है। ते = वे। विततस्य = विस्तृत अर्थात् बहुकालव्यापी । मृत्यो. = मृत्यु के। पाशम् = बन्धन को। यन्ति = प्राप्त होते है। अथ = और इह = लोक मे। धीरा = विद्वान् । अमृतत्वम् = मोक्ष को । ध्रुवम् नित्य, स्थायी अनिश्चित रूप से । विदित्वा = जानकर । अध्र वेषु-नश्वर सासारिक विषयो मे । न प्रार्थयन्ते = आनन्द को प्राप्त करने की इच्छा नही करते । भावार्थ- अज्ञानी पुरुष बाह्य (भौतिक) विषयो का अनुसरण करते है अर्थात् सासारिक विषयो को प्राप्त करने में लगे रहते है। वे बहुकालव्यापी मृत्यु के बन्धन को प्राप्त होते है अर्थात् जन्म-मरण के जाल मे फसे रहते है । विद्वान् लोग मोक्ष को नित्य या निश्चित रूप से जानकर भौतिक विषयो की इच्छा नहीं रखते। 2. The unintelligent people hanker after the worldly pleasures and get entangled in the snare of death widespread Therefore the prudents understanding the immortality permanent and steady do not have a desire for any mortal of the world येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाश्च मैथुनान् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते । एतद्वै तत् ॥३॥ पदच्छेद-येन, रूपम्, रसम्, गन्धम्, शब्दान्, स्पर्शान् च, मैथुनान् । एतेन, एव, विजानाति, विम्, अत्र परिशिष्यते ।। एतद्वै तत् ॥ ३ ॥ अन्वय-येन एतेन एव रूप रस गन्ध शब्दान् स्पर्शान् च मैथुनान् विजानाति । अत्र किम् परिशिष्यते । एतत् वै तत् । शा० भा०-येन विज्ञानस्वभावेनात्मना रूप रस गन्ध शब्दान् स्पर्शाश्च मैथुनान्मैथुननिमित्तान्सुखप्रत्ययान्विजानाति विस्पष्ट जानाति सर्वो लोक । ननु नैवप्रसिद्धिलॊकस्य आत्मना देहादिविलक्षणेनाह विजा- नामीति । देहादिसघातोऽह विजानामीति तु सर्वो लाकोऽवगच्छति । न त्वेवम् । देहादिसघातस्यापि शब्दादिस्वरूपत्वाविशेषाद्विज्ञेयत्वाविशेषाच्च न युक्त विज्ञातृत्वम् । यदि हि देहादिसघातो रूपाद्यात्मक सन्रूपादी-
..
( १०५)
न्विजानीयाद्वाह्या अपि रूपादयोऽन्योन्य स्व स्व रूप च विजानीयुः । न
चैतदस्ति, तस्माद्देहादिलक्षणाञ्च रूपादीनेतेनैव देहादिव्यतिरिक्तेनैव
विज्ञानस्वभावेनात्मना विजानति लोक । यथा येन लोहो दहति सोऽग्नि-
रिति तत् । आत्मनोऽविज्ञेय किमत्रास्मिल्लोके परिशिष्यते न किचि-
परिशिष्यते । सर्वमेव त्वात्मना विज्ञेयम् । यस्यात्मनोऽविज्ञेय न किचि-
परिशिष्यते स आत्मा सर्वज्ञ । एतद्वै तत् । कि तद्यन्नचिकेतसा पृष्टं
देवादिभिरपि विचिकित्सित धर्मादिभ्योऽन्यद्विष्णो परम पद यस्मात्परं
नास्ति तद्वा एतदधिगतमित्यर्थ ॥
सस्कृत व्याख्या-यदा येन साधनेन अर्थात् सर्वप्रकाशके सर्वभासात्मनैव
( तद्देवा ज्योतिषा ज्योतिः) इत्युक्त प्रकारेण स एव सर्व प्रकाशब्दत्वात् रूपम्,
रस, गन्ध, शब्दान्, स्पर्शान्, मैथुनान-मैथुनजन्यसुखविशेषान् नि शेषमेतेनैव
कारणेन विजानाति, तदा तस्य किम-किमपि अत्र-ससारे परिशिष्यते न किमपि
इत्यर्थः । एतद् वै तत् तत् ।
हिन्दी शब्दार्थ- येन = जिससे अर्थात् जिसके फलस्वरूप । एतेन एव =
इिसीसे अर्थात् आत्मा के विद्यमान रहने पर ही रूप . मैथुम रूप-रस आदि
वषयों को। विजानाति = जानता है । अत्र = यहाँ । किम् = क्या । परिशिष्यते
शेष रह जाता है अर्थात मरने के बाद प्राणी के लिए यहाँ कुछ भी शेष नही
रह जाता । एतत् = यह । वै = निश्चित रूप से तत् = वही ( है )
भावार्थ- परिणामत. इस आत्मा के विद्यमान रहने पर ही (प्राणी ) रूप,
रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श और मैथुन को जान पाता है। ( इसके न रहने पर
अर्थात् मर जाने पर ) यहाँ शेष ही क्या रह जाता है ? यह वही है । अर्थात् जिस
तत्त्व के विषय मे तुमने प्रश्न किया था यह वही ( आत्मा) है ।
3. In this world nothing remains unknown to this self
through which the very self people know, colour, taste,
smell, sounds and sexual enjoyments. This is that (Soul
wanted to know by Nachiketa ).
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥४॥
( १०६ )
पदच्छेद-स्वप्नान्तं, जागरितान्तम्, च, उभौ, येन, अनुपश्यति। महान्तम्
विमुम् आत्मानम्, मत्वा, धीरः न शोचति ।
अन्वय-येन स्पप्नान्तं जागरितान्त च उभी अनुपश्यति ( तम् ) महान्तं
विभुम् आत्मनं मत्वा धीर न शोचति ।
शा० भा०-स्वप्नान्त स्वप्नमध्य स्वप्नविज्ञेयमित्यर्थः । तथा जाग-
रितान्त जागरितमध्य जागरितविज्ञेय च; उभौ स्वप्नजागरितान्तौ
येनात्मनानुपश्यति लोक इति सर्व पूर्ववत् । त महान्त विभुमात्मानं
मत्वावगम्यात्मभावेन साक्षादहमस्मि परमात्मेति धीरो न शोचति ॥ ४ ॥
संस्कृत व्याख्या--स्वप्नान्तम्-सकलं स्वप्नप्रपञ्चम्, जागरितान्त जाग्रत्प्रप.
ञ्चं चोभो येन साक्षीभावापन्नेन येन परमात्मना लोकोऽयं सर्वावस्थापन्नं पश्यति
त महान्तमविभुम् व्यापकमात्मानम् मत्वा सम्यविदित्वा धीरो न शोचति नानु-
तप्यति इति भावः।
हिन्दी शब्दार्थ-स्वप्नान्तम्-स्वप्नावस्था मे ज्ञात होने वाले। जागरि.
तान्तम् = जाग्रतावस्था मे ज्ञात होनेवाले । उभौ% दोनो प्रकार के विषयो को।
येन = जिस आत्मा के द्वारा । अनुपश्यति देखता है । महान्तम्-महान् । विभुम्-
- सर्वव्यापक । आत्मानम् = आत्मा को। मत्वा = जानकर । न शोचति ।
शोक नही करता है अर्थात् कभी शोक को प्राप्त नहीं होता।
भावार्थ-जिस आत्मा के द्वारा स्वप्न तथा जाग्रत अवस्था के ज्ञात होने
वाले सभी विषयो को (प्राणी ) जान पाता है उस महान् सर्वव्यापक आत्मा को
जानकर बुाद्धमान पुरुष कभी शोक को प्राप्त नहीं होता।
4 Having understood fully that great and universal self
through which one knows the objects in both the states of
dreaming and waking the wise does not grieve,
य इमं मध्वदं वेद आत्मानं
जीवमन्तिकात् ।
ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥५॥
पदच्छेद-य , इदम, मध्वदम्, वेद, आत्मानम्, जीवम्, अन्तिकम्, ईशानः,
भूतभव्यस्य, न ततः विजुगुप्सते ।। एतवद्, वै, तत् ॥ ५ ॥
( १०७) अन्वय-यः इम मध्वद जीवम् आत्मानम् अन्तिकात् भूतभव्यस्य ईशानं वेद ( स ) तत. न विजुगुत्सते । एतत् वै तत् । गा० भा०-य कश्चिदिम मध्यवद कर्मफलभुज जीव प्राणादिकला- पस्थ धारयितारमात्मान वेद विजानात्यन्तिकादन्तिके समीप ईशानमी- शितार भूतभव्यस्य कालत्रयस्य ततस्तद्विज्ञानादूर्ध्वमात्मान न विजुगुप्सते न गोपायितुमिच्छत्यभय प्राप्तत्वात् । यावद्धि भयमध्यस्थोऽनित्यमात्मान मन्यते तावद्गोपायितुमिच्छत्यात्मानम् । यदा तु नित्यमद्वैतमात्मान विजा- नाति तदा कि क कुतो वा गोपायितुमिच्छेत् । एतद्वै तदिति पूर्ववत् ॥ ५ ॥ सस्कृत व्याख्या-यः इदम् इमम् ( छान्दसलिङ्गव्यत्ययः) मध्वदम्-मधुम्- अत्तीति तम्-मध्वदम्-कर्मफलभोक्तारम् जीवात्मानम्, अन्तिकात्-निकटे वर्तमानात् (गुहा प्रविष्टौ इत्युक्तत्वात् श्रुतिप्रमाणात् जीवपरमात्मानी सहैव सन्तौ अन्त:- प्रविष्टौ ) अतएव भूतभव्यस्य-कालत्रयतितया ईशानश्च एव च फलभोग्यत्वेन विषयाः उचित् पदार्था. जीवात्मा ईशानश्चेति चिदचिदीश्वरन् यो वद पृथक्तया जानाति ततो तन विजुगुप्सते न निन्देत् ( जुगुप्साविरामादि सूत्रेण पञ्चमो विधानम् ।। ५ ॥ हिन्दी शब्दार्थ-अः = जो ( व्यक्ति ) । इमम् = इस । मध्यवदम् = कर्म फल के भोक्ता । जीवम् = जीवात्मा को। भूतभव्यस्य = अतीत एव भविष्यत् के। ईशानम् = स्वामी । आत्मानम् = परमात्मा को । अन्तिकान = समीप से। वेद = जानता है। तत. = उस ज्ञान से । न जुगुप्सते = निन्दा को प्राप्त नही होता । एतत् वैतत् = यही वह परमात्मतत्व है। भावार्थ-जो व्यक्ति इस कर्मफलभोक्ता जीवात्मा को ( ही ) भूत और भविष्यत् का स्वामी परमात्मा ( ऐसा) समीप से जानता है वह निन्दा को प्राप्त नही होता । अर्थात् यह कर्मफल का भोक्ता जीवात्मा हा वह परमात्मा है जो भूत और भविष्यत् का शासन करता है। इस प्रकार जीवात्मा और परमात्मा दोनो हो तादात्म्य की स्थिति में है। इस तथ्य को निकट से जानने वाला व्यक्ति कभी निन्दा को प्राप्त नहीं होता। 5. The man who knows this Self-the consumer of the fruits of works, the sustaining of life and the lord of the ( १०८ ) यः पूर्व past aud future is present in himself, has no fear at all. This is that. तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिव्यपश्यन । एतदेतत् ।।६॥ पदच्छेद-यः, पूर्वम्, तपसः जातम्, अद्भय , पूर्वम्, अजायत, गुहाम्, प्रविश्य तिष्ठन्तम्, य भूतेभ्यः, व्यपश्यत । एतद्वै, तत् ।। अन्वय - यः पूर्व तपसः जातम् अद्भ्यः पूर्वम् अजायत, गुहा प्रविश्य भूतेभिः तिष्टन्तं य. व्यपश्यत । एतत् व तत् । शा० भा०-य कश्चिन्मुमुक्षु पूर्व प्रथम तपसो ज्ञानादिलक्षणा- ब्रह्मण इत्येतज्जातमुत्पन्न हिरण्यगर्भम्, किमपेक्ष्य पूर्वमित्याह--अभ्य. पूर्वमप्सहितेभ्य पञ्चभूतेभ्यो न केवलाभ्योऽभ्य इत्यभिप्राय । अजायत उत्पन्नो यस्त प्रथमज देवादिशरीराण्युत्पाद्य सर्वप्राणिगुहा हृदयाकाश प्रविश्य तिष्ठन्त शब्दादीनुपलभमान भूभिर्भूतै कार्यकरणलक्षणे सह तिष्ठन्त यो व्यपश्यत य पश्यतीत्येतत् । य एव पश्यति स एतदेव पश्यति यत्तत्प्रकृत ब्रह्म ॥ सस्कृत व्याख्या-अद्भय -( अप एव ससर्जाऽऽदौ तासु वीर्यमवासृजत् ) इत्यादिमन्त्रोक्तप्रकारेण अस्याः, व्यष्टिसृष्टे. पूर्व अप एव सृष्टवान् ततोऽपि पूर्व योऽजायत तपस -सकल्पादेव पूर्व जातम् गुहा प्रविश्य तिष्ठन्तम्-(हिरण्यगर्भ- पश्यत जायमानम् इति स्मृ-युक्तरोत्या प्रथम जातं गुहा प्रविश्य हृदयगुहा प्रविश्य वर्तमानम् यः, भूतेभि ~भूतै. (विभक्तिव्यत्येन ऐसादेशाभाव.) देहेन्द्रियान्त करणादिभिरुपेतम् चतुर्मुखमयम् सकलजगत् सृष्टवान् व्यपश्यत- कटाक्षणक्षत । एतद्वैतत्-एवं मन्त्रार्थप्रकारेण त जानोहि । हिन्दी शब्दार्थ-यः = जो। तपस = इस चराचर विश्व से । पूर्वम् : पहले ही। अजायत = उत्पन्न हो चुका था अर्थात् विद्यमान था। (जो) अद्य. = जल से । पूर्वम् = पहले ही। अजायत = उत्पन्न हुआ अर्थात् विद्यमान था। यः = जो (मोक्षकामी)। गुहाम् = हृदयरूपी गुफा मे । प्रविश्य = प्रवेश करके । भूतेभिः = सभी प्राणियो के साथ । तिष्ठन्तम् = स्थित् । व्यपश्यत = देखता है । एतद्वै तत् = वही वह है। - ( १०९ ) भावार्थ-जो इस चराचर विश्व से पहले ही विद्यमान था। जो जल से पहले ही विद्यमान था। ( उसे ) जो मोक्ष की इच्छा रखनेवाला व्यक्ति सभी प्राणियो की हृदयरूपी गुफा में सभी प्राणियो के साथ स्थित देखता है (वह निन्दा को प्राप्त नहीं होता)। यही वह परमात्मतत्व है । 6 He sees indeed, that Brahman who sees the Hiranyagarbha born before the five elements hidden in the heart in the midst of body and organs after entering. या प्राणेन संभवत्यदितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भतेभिर्व्यजायत । एतद्वै तत्॥७॥ पदच्छेद-या, प्राणेन, सम्मवति, अदिति', देवतामयी, गुहाम्, प्रविश्य, तिष्ठन्ती, या, भूतेभ्य', व्यजायत ।। एतद वै, तत् ।। ७ ।। अन्वय-या देवतामयी अदिति प्राणेन सभवति शा० भा०-या सर्वदेवतामयी सर्वदेवतात्मिका प्राणेन हिरण्य- गर्भरूपेण परस्माद्ब्रह्मण सभवति शब्दादीनामदनाददितिस्ता पूर्ववद्गुहा प्रविश्य तिष्ठन्तीम् । तामेव विशिनष्टि-या भूतेभि भूतै समन्विता व्यजायत उत्पन्ना इत्येतत् ।। सस्कृत व्याख्या-अदिति -कर्मफलानि अत्तीति, अदिति जीव उच्यते या प्राणेन सह सम्भवति वर्तते देवतामयी-इन्द्रियाधीनभोगो यस्याः तत्स्वरूपा गुहा प्रविश्य तिष्ठन्ती-हृदयपुण्डरीककुहरवर्तिनी सती, भृतेभिव्यजायत-पृथिव्या- दिभिर्भूतै सहिता देवतामनुष्यादिनानारूपेण अजायत इत्यर्थ. अस्य मन्त्रस्य शाकरभाष्ये अन्य प्रकारेण व्याख्यातम् तत् प्रकृतिप्रसगविरुद्धम् । एतद्वैतत्- उक्तोऽर्थः। हिन्दी शब्दार्थ-देवतामयी = प्रकाशयुक्त । अदिति = अज्ञान की विनाशिका । या = जो बुद्धि । प्राणेन = प्राण से । सम्भवति = उत्पत्र होती है। या = जो बुद्धि । तिष्ठन्तीम् = स्थित रहती हुई। गुहा प्रविश्य = हृदयरूपी गुफा में प्रवेश करके भूतेभि = प्राणियो के साथ । व्यजायत = प्रगट होती है। एतत् वै तत् = यही वह सूक्ष्म बुद्धि है।
( ११० ) भावार्थ-अज्ञान को नष्ट करने वाली प्रकाशमयी जो बुद्धि प्राण से उत्पन्न होती है और सभी प्रणियो की हृदयरूपी गुफा मे प्रणियो के साथ स्थित दिखायी देतो है यही वह सूक्ष्म बुद्धि है (जिसके द्वारा परमात्मतत्त्व जाना जा सकता है। 7 He, who sees that Goddess Aditi containing all the duties, who, has come into existance, who has born from elements and who lives in the heart after entering, sees surely that very Brahman. अरण्योनिहिता जातवेदागर्भ इव सुभृतो गर्भिणीभिः । दिवे दिवे ईड्यो जागृवद्भिर्ह वि-मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः । एतद्वै तत् ।८। पदच्छेद-अरण्योः, निहित. जातवेदा, गर्भः, इव, उत्, सुभृतः गभिणीभि । दिवेदिवे, ईडय जागृद्धि, हविष्मद्भिः मनुष्ये भि अग्नि । एतद्वैतत् ॥ ८ ॥ अन्वय-गर्भिणीभि सुभृत गर्भ इव अरण्योः निहित जातवेदा अग्निः जागृवद्भि हविष्मद्भि मनुयेभि. दिवे दिवे ईडय । एतत् वै लत् । शा० भा०-योऽधियज्ञ उत्तराधरारण्योनिहित स्थितो जातवेदा अग्नि पुन सर्वहविषा भोक्ताध्यात्म च योगिभिर्गर्भ इव गर्भिणीभिरन्तर्वत्नी- भिरगहितानपानभोजनादिना यथा गर्भ. सुभृत सुष्टु सम्यग्भृतो लोक लोक इवेत्थमेवत्विग्भिर्योगिभिश्च इत्येत । किच दिवे दिवेऽहन्यहनीड्य. स्तुत्यो वन्द्यश्च कमिभिर्योगिभिश्चाध्वरे हृदये च जागृवद्भिर्जागरणशा-! लवद्भिरप्रमत्तैरित्येतत्, हविष्मद्भिराज्यादिौद्भानभावनावद्भिश्च मनुष्येभिर्मनुष्यैरग्निरेतद्वै तत्तदेव प्रकृतं ब्रह्म । सस्कृत व्याख्या-अरण्यो.--उत्तराधरारण्यो निहित:-स्थितो जातवेदा अग्नि: गभिणोभि. पानभोजनादिना सुभृतः-सम्यक दिवे दिवे अहन्यहनि जागृवद्भिः-जागरणशीलः अप्रमत्तै प्रवुद्धधोभिः, ईडय -स्तुत्य.- हविष्मद्भिः-आज्यादिहवि प्रदानप्रवृतः, ऋत्विग्भिः मनुःष्यैरपिस्तुत्यः स अग्निः, एवद् वै तत्-अग्निस्वरूप पूर्वोक्तब्रह्मात्मकम् तत्, इत्यर्थ ॥ ८१ पोषितो गर्भ इव, - ८ ( १११ ) % 3D हिन्दी शब्दार्थ-गर्भः इव = गर्भ के समान गर्भ के समान । अरण्यो दो अरणियो के बीच मे। निहित = विद्यमान । जातवेदाः = अग्नि। अग्निः = परमात्मा । जागृवद्भिः = जागरणशील योगियो के द्वाग। हविष्मद्भि मनुष्येभि - यज्ञादि करनेवाले मनुष्यो के द्वारा । दिवे दिवे - प्रति दिन । ईड्य = स्तुति करने के योग्य है। भावार्थ-जिस प्रकार गर्भाशय मे गर्भ विद्यमान रहता है और अरणियो में आग छिपी रहती है उसी तरह अन्त'करण मे परमात्मा विद्यमान रहता है। वह परमात्मा योगाभ्यास आदि के प्रयत्न मे उसी तरह प्रत्यक्ष होता है जैसे अरणियो के घर्षण से आग प्रगट होती है। इसीलिए गर्भिणी स्त्री जैसे गर्भ के धारण- पोषण का प्रतिदिन यत्न करती रहती है उसी तरह ज्ञानी पुरुषो को चाहिए कि अपने अन्तःकरण मे स्थित परमात्मा की एकाग्र मन से सदैव स्तुति किया करें। 8 The omniscient fire-that is lodged in ths two firesticks, that is well presented like the faetuses by the pregnant women and that is worshiped every day by the cautious men with religious offering --is only that Brahman, यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वेऽर्पितास्तदु नात्येति कश्चन । एत तद्वैत् ॥९॥ पदच्छेद-यतः, च, उदेति, सूर्य:,अस्तम्, यत्र, च गच्छति, तं, देवाः सर्वे, अपिता , तद्, उ, न, अत्येति, कश्चन त, एतद् वै, तत् ॥ ९॥ अन्वय-यत च सूर्य. उदेति यत्र च अस्त गच्छति, त सर्वे देवः अपिता. । दद् उ कश्चन न अत्येति । एतद् वैतत् । [ शा० ] यतश्च यस्मात्प्राणादुदेति उत्तिष्ठति सूर्योऽस्त निम्लोचन यत्र यस्मिन्नेव च प्राणेऽहन्यहनि गच्छति त प्राणमात्मानं देवा अग्न्या- दयोऽधिदैव वागादयश्चाध्यात्म सर्वे विश्वेऽरा इव रथनाभावर्पिता. संप्र- वेशिता स्थितिकाले सोऽपि ब्रह्मैव । तदेतत् सर्वात्मक ब्रह्म। तदु नात्येति नातीत्य तदात्मकता तदन्यत्वं गच्छति कश्न कश्चिदपि । एतद्वैतत् ।। संस्कृत व्याख्या-यत.-यस्मात् ब्रह्मण सकाशात् सूर्य उदेति यत्र च अस्तम् गच्छति लयं गच्छति सर्वे देवा तमेव-तस्मिन्नेवात्मनि अपिता.-प्रतिष्ठिताः . - , ( ११२ ) सन्ति तत्-सर्वात्मक ब्रह्म उ-इति वितर्के कश्चन-कोऽपि न अत्येति-नातिक्राम्यति अर्थात् छायावद् अन्तर्यामिणो दुर्लचत्वादिति भावः । एतद्वैतत्-उक्तोऽई. हिन्दी शब्दार्थ-यत = जिससे । उदेति = उदित होता है। जिसमे । अस्त गच्छति = डूब जाता है। तम् = उस (परमात्मा ) मे । सर्वे देवा अपिता. = सभी देवता प्रविष्ट रहा करते है। तत् = उमका । उ = निश्चय करके । कश्चन = कोई भी अत्येति = अतिक्रमण नही कर सकता। भावार्थ - जिससे सूर्य उगता और वह जिसमे डूबता है उपी मे सभी देवता प्रविष्ट होकर रहा करते है । निश्चय ही उसका कोई भी व्यक्ति अतिक्रमण नही कर सकता। 9 That from which the sun rises and in which it sets again and into which all the gods are merged. None is apart froin that-This is surely that यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥ १० ॥ पदच्छेद -यद्, एव, इह, तद्, अमुत्र, तद्, नु, इह । मृत्योः सः मृत्युम्, एव, आप्नोति, य., इव, नाना, इव, पश्यति ॥ १० ॥ अन्वय-यद् इह तद् अमुत्र, यद् अमुत्र तद् अनु इह । य इह नाना इव पश्यति स. मृत्यो मृत्युम् आप्नोति । [शां] यदेवेह कार्यकरणोपाधिसमन्वित ससारधर्मवदवभास- मानमविवेकिना तदेव स्वात्मस्थममुत्र नित्यविज्ञानघनस्वभावं सर्वससार- धर्मवजित ब्रह्म । यच्चामुत्रामुष्मिन्नात्मनि स्थित तदेवेह नामरूपकाय- करणोपाधिमनुविभाव्यमान नान्यत् । तत्रैव सत्युपाधिस्वभावभेददृष्टि- लक्षणयाविद्यया मोहित सन् य इह ब्रह्मण्यनानाभूते परस्मादन्योऽह मत्तोऽन्यत्पर ब्रह्मेति नानेव भिन्नमिव पश्यत्युपलभते स मृत्योर्भरणान्मरणं मृत्यु पुनः पुनर्जन्ममरणभावमाप्नोति प्रतिपद्यते। तस्मात्तथा न पश्येत् विज्ञानैकरसं नैरन्तर्येणाकाशवत्परिपूर्ण ब्रह्मवाहमस्मीति पश्येदिति वाक्यार्थः॥
( ११३ ) सस्कृत व्याख्या-यदेव-यावदेव आत्मतत्वम् इह ससारे वर्तते, तदेवात्म- तत्वम् अमुत्र लोकान्तरस्थानामपि अस्ति सर्वयाऽपि ब्रह्मात्मक-त्रात् अनश्च त्म- भेदोनास्ति इत्यर्थः। तत्तच्छरकतवा ब्रह्मात्मक-वात्, ज्ञानिनामात्मनस्वविदाम् तथैवानुसन्धीयमानत्वात्-अत उक्तम्, अहमनुर नव सूर्यश्चेत् यदि एव च परमा- स्मनि भेददर्शिनाम स मृत्योः मृत्युमेवाप्नोति समारात् सनारमेव प्राप्नाति य इह नानेव आत्मभेद पश्यति अत ब्रह्मात्मक मर्व जगन् द्रष्टव्यमिति श्रुत्यर्थः । हिन्दी शब्दार्थ-यत् = जो परमात्मा । इह = इस लोक मे । तत् एव = वही । अमुत्र - परलोक में भी । यत् = जा । अमुत्र = परलोक मे । अनु इड़ = यहाँ पर । य* = जो व्यक्ति । इह = इस विषय मे अर्थात परमात्म के विषय में। नाना इव = अनेकत्व अर्यात् परमात्मा अनेक है। म = वह ! मृत्यो. = मृत्यु से । मृत्यु = मृत्यु को। भावार्थ-जो परमात्मा इमलोक मे है अर्थात् मर्वव्यापक रूप से प्राणियो में विद्यमान है वही परलोक मे भी है । इसीतरह जो परलोक मे है वही इस ला मे भी विद्यमान है । अभिप्राय यह कि परमा-मा एक ही है। उममे अनेकरूपता नही है । जो व्यक्ति इस परमात्मा में अनेकरूपता देवता है अर्थात् जामक्त परमात्मा को अद्वितीय नही मानता वह मृत्यु में मृ-यु को प्राप्त हात. है अर्थात् मरने के बाद भो मुक्त नही हो पाता अपितु मरगागोल शरार का पुन धारण करने के लिए बाध्य होता है। 10 What, in fact, is here is there also and in the way what is there is here also. The unwise who sees the else entangles into the snare of birth and death again and again, मनसैवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किञ्चन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥ ११ ॥ पदच्छेद ~मनसा, एव, इम्, आप्तव्यम्, न, इह नाना, अस्ति, कि बन । मृत्योः, स, मृत्यु, गच्छति, य, इह, नाना, इव, पश्यति ।। ११ ॥ अन्वय -मनसा एव इदम् पासव्य इह किञ्चन नाना 1 अस्ति [शा० ] मनसेद ब्रह्मकरसमाप्तव्यमात्मैव नान्यदस्तीति । आप्ते च नानात्वप्रत्युपस्थापिकाया अविद्याया निवृत्तत्वादिह ब्रह्मणि नाना नास्ति - . BY ( ११४ ) किञ्चनाणमात्रमपि । यस्तु पुनरविद्यातिमिरदृष्ट न मुञ्चति नानेव पश्यति स मृत्योर्मृत्यु गच्छत्येव स्वल्पमपि भेदमध्यारोपयन्नित्यर्थ ।। सस्कृत व्याख्या- इदम् आत्मतत्वम् मनसा-शुद्धेन मनसा एव आप्तव्यम् नान्य रुपायैः, यतोहि इह-जगति नाना आत्मभेदम् विञ्चननास्ति अतः स मृत्यो एक ससारात्-मृत्युम्-अन्य-ससार जन्मान्तर प्राप्नोति य इह नाना इव पश्यति इति स्पष्टोऽर्थः। हिन्दी शब्दार्थ- इदम् = यह ( परमात्मा)। भन्सा एव = मन से ही आप्तव्यम् = प्राप्त किये जाने योग्य है । इह = इसमे । नाना = नानापन । किंचन = कुछ भी । न अस्ति = नही है । य = जो व्यक्ति । इह = इसमें । नाना इव - अनेकरूपता। पश्यति = देखता है। सः = वह । मृत्यो = मृत्यु से । मृत्युम् = मृत्यु को । गच्छति = प्राप्त होता है भावार्थ- इस परमात्म तत्त्व को मन के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है अर्थात् इन्द्रियातीत होने से परमात्मा को मन के अतिरिक्त किसी दूसरे साधन से प्राप्त कर सकजा सम्भव नहीं है, मन के द्वारा ही इसे प्राप्त किया जा सकता है। यह अद्वितीय अर्थात् एक ही है। अत इसमें नानापन का सर्वथा अभाव है। जो व्यक्ति परमात्मा को एक मानने के बदले अनेक मानता है वह मरने पर पुन. शरीर धारण करने के लिए विवश होता है । 11. that is to be aquired only by the pure mind. No variety, is there, He who sees as if there is variety, obtains death after death. अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्थ न ततो विजुगुप्सते । एतद्वै तत् ॥१२॥ पदच्छेद-अङ्गुष्ठमात्रः, पुरुष , मध्ये, आत्मनि, तिष्ठति । ईशान भूतभव्यस्य, न तत., विजुगुप्सते ॥ एतद्वै, तत् ।। १२ ॥ अन्वय- अगुष्ठमात्र• पुरुषः आत्मनि मध्ये तिष्ठति । (स ) भूतभव्यस्य, ईशाना (इति ज्ञात्वा) तत न विजुगुप्सते । एतत् वै तत् । [ शा०] अड्गुष्ठमात्रोऽड्गुष्ठपरिमाण.। अड्गुष्ठपरिमाण हृदय- पुण्डरीकं तच्छि दवर्त्यन्त करणोपाधिरड्गुष्ठमात्रवशपर्वमध्यवर्त्यम्बरवत्, ( ११५ ) पुरुष पूर्णमनेन सर्वमिति मध्य आत्मनि शरीरे तिष्ठति यस्तमात्मान- मीशान भूतभव्यस्य विदित्वा न तत् इत्यादि पूर्ववत् ॥ संस्कृत व्याख्या-अङ्गुष्ठमात्रः अङ्गुष्ठपरिमाणः पुरुषो भूतभव्यस्येशान- कालत्रयवति सकलचेतनाचेतनस्येश्वरः-नियन्ता पुरुषः मध्ये आत्मनि-उपासक- शरीरमध्ये तिष्ठति ततो न विजुगुप्सते-वात्सल्यातिशयादेव चेतनदोषान् न निन्दति किन्तु भोग्यतथा पश्यति इत्यर्थ । ( श्वेताश्वतरेऽपि-अङ्गुष्ठमात्रोरवितुल्यरूप इत्यादि उक्तत्वात् ) न च-अङ्गुष्ठमात्र पुरुषं निश्चकर्षयमोबलात् इत्युक्त वात्, अन्यत्र श्रुतिस्मृतिषु प्रतिपादितेन जावात्मन , एवास्मिन् मन्त्रे प्रतिपादन कि न स्यादिति ( शब्दादेव प्रमित ब्र. सू १।३।२४। ) इत्यस्मिन्नाधिकरणे पूर्व पक्षं कृत्वा परमात्मन एव प्रतिपादितम् । अड्गुष्ठमात्रः पुरुषः अड्गुष्ठं च समाश्रित इति तैतिरीपेऽपि उक्तत्वात् । एतद्वंतत्-उक्तोऽर्थ तदेव । हिन्दी शब्दार्थ-भूतभव्यस्य = भूत और भविष्यत् का। ईशानः = स्वामी। आत्मनि मध्ये = शरीर के मध्य मे। अगुष्ठमात्र अगूठे के बराबर परिमाण वाले हृदय स्थान में । तिष्ठति = स्थित है । तत. = उसी के जानने से। न विजुगुप्सते = निन्दा को नही प्राप्त होता। भावार्थ-परमात्मा ही भत और भविष्यत् का स्वामी है । वह अन्त करण ( अगुष्ठ मात्र स्थान ) में निवास करता है । उस परमात्मा को जान लेने वाला साधक पुरुष ( कभी ) निन्दा को नही प्राप्त होता । यही वह है। 12, The thumb size Purush lives in the body. Only he is the coutroller of the past and future. Thinking this the wise does not fear. This is that अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाय स उरवः । एतद्वै तत् ॥१३॥ पदच्छेद-अड्गुष्ठमात्र., पुरुष , ज्योति., इत्र, अधूमकः, ईशानः, भूतभव्यस्य, स, एव, अन्य, स, उ, श्वः॥ १३ ॥ अन्वय-अंगुष्ठमात्र. पुरुष अधूमक, ज्याति. इव ( वर्तते )। भूतभवस्य ईशानः ।
( ११६ ) [ शा०] अगष्ठमात्र पुरषो ज्योतिरिवाधूमकोऽधमकमिति युक्तं ज्योतिप्परत्वात् । यस्त्वेव लक्षितो योगिभिर्हृदय ईशानो भूतभव्यस्य स नित्य कृटस्थो वेदानी प्राणिपु वर्तमान स उ श्वोऽपि वत्तिष्यते नान्यस्त समोन्यश्च निप्यत ईत्यर्थ , अनेन नायमस्तीति चैक इत्यय पक्षो न्यायतोप्राप्तोऽपि स्ववचनेन श्रुत्वा प्रत्युक्तस्तथा क्षणभङ्गवादश्च ।। सस्कृत व्याख्या-अड्गुष्ठमात्र अड्गुष्टपरिमाणक. रुषः अधूमक-धूम रहित (निर्धूम ) ज्योति , इब तुल्यः भूतभव्यन्येशान. पूर्वोक्तार्थ , एव, स, एकाद्य अद्यत्न पदार्थ जातम स उ श्व.-श्वस्तनपदार्थजातम कालत्रयपदार्थ- जातम् सर्वं तदात्मकमेवास्ति इत्यर्थ. हिन्दी शब्दार्थ- अगुष्टमात्रः = अगुष्ठ परिमाण वाले अन्तःकरण में निवास करने वाला। पुरुषः = परमात्मा । अधूमक = धूम-हीन । ज्योति. इब - प्रकाश के समान । भूत-भव्यस्य = भूत और भविष्यत् का। ईशानः = स्वामी। स. एव = वही । अद्य = आज । स उ = वही । श्व = कल है । एतत् वै तत् = यही वह है। भावार्थ-वह परमात्मा धूम-रहित अग्नि के समान तेजोमय है । वही भूत और भविष्यत् का स्वामी है। वही आज और वही कल है अर्थात् वह काल के प्रभाव से प्रभावित नहीं हुआ करता । इस प्रकार की स्थिति वाला तत्त्व ही परमात्मा है। 13. The thumb-size Purush is like a light without smoke He is the controller of the past and future. He exists today and tomorrow in the very same state This Is that. यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मानपृथक्पश्यंस्तानेवानुधावति ।। १४ ॥ पदच्छेद-यथा, उदवम्, दुर्गे, वृष्ट, पर्वतेषु, विधार्वात, एव धर्मान् पृथक् पश्यन् तान् एव, अनुधावति ॥ १४ ॥ अन्वय-यथा ढग वृष्टम् उदक पर्वतेषु विधावति ।
(११७ ) शा० यथोदक दुर्गे दुर्गमे देश उच्छ्रिते वृष्ट सिक्त पर्वतेषु पर्वत- बन्सु निम्नप्रदेशेषु विधावति विकीर्ण सद्विनश्यति एव धर्मानात्मनो भिन्नान्पृ- यक्पन्यन्पृथगेव प्रतिगरीर पश्यस्तानेव शरीरभेदानुवर्तिनोऽनुविधावति । शरीरभेदमेव पृथक्पुन पुन प्रतिपद्यत इत्यर्थ ।। मस्कृत व्याख्या--८था दुर्गे दुर्गभूमी उच्चै पर्वताःपु वृष्टमुदक-जलम् पर्वतेषु-विधाति-नाना मार्गेणाघोगच्छति एवं धर्मान् देवमनुष्यादिपु, अन्तर्या- मित्वादिरूपेण परमात्मान सन्तमपिभेदेन परयन् नानायोनिषु तानेव-ससारान्धकारे एव विधाति-पतति-इत्यर्थ । हिन्दी शब्दार्थ-यथा = जिस तरह । दुर्गे = विषम शिखर पर । वृष्टम् = बरसा हुआ। उदकम् = जल । पर्वतेषु = पर्वतीय स्थानो मे। विधावति = बह जाया करता है। एवम् = उसी तरह । धर्मान् = गुणो को । पृथक् = भिन्न अर्थात् गुणी से अलग । पश्यन् = देखता हुआ । तान् एव = उन्ही गुणो को । अनुधावति = अनुगमन करता है। भावार्थ-जिस प्रकार पर्वत के शिखर पर बरसा हुआ जल विविध उपधाराओ मे विभक्त होकर पर्वत के विभिन्न भागो मे पहुँचता है और विभिन्न नामरूपो के साथ व्यवहृत होता है। परन्तु विविध रूपो मे दिखायी देता हुआ भी वह जलतत्त्व सर्वत्र एक ही रहता है, उसी तरह विविध धर्मों के कारण पृथक्- पृथक् प्रतीत होनेवाला भी वह परमात्मतत्त्व एक ही है। विभिन्न धर्मो के कारण उस परमात्मतत्त्व में नानात्व का अनुभव करनेवाला व्यक्ति उन्ही धर्मों का अनुसरण करता रह जाता है । वह उस परमात्मतत्त्व को नहीं देख पाता। 14. As water rained on the peak of mountain down on hilly regions and in the end disappears, in the same way who sees the Atman differently goes to death. यथोदकं शुद्ध शुद्धमासिक्तं ताडगेव भवति । एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥ १५ ॥ पदच्छेद - यथा, उदकम्, शुद्धे, शुद्धम्, आसिक्तम्, तादृग एव, भवति । एम्, मुने, विजानतः, आत्मा, भवति गोतम ॥ १५ ॥ अन्वय-- यथा शुद्धे ( उदके ) आसिक्तं शुद्धम् उदकं तादृक् एव भवति, एवं हे गौतम ! विजनत• मुने. आत्मा भवति । flows ( ११८ ) [ शा० ] यथोदक शुद्धे प्रसन्ने शुद्ध प्रसन्नमासिक्त प्रक्षिप्तमेकरसमेव नान्यथा तादृगेव भवत्यात्माप्येवमेव भवत्येकत्व विजानतो मुनेर्मनन- शीलस्य हे गौतम | तस्मात्कुतार्किकभेददृष्टि नास्तिककुदृष्टि चोज्झित्वा मातृपितृसहस्रेभ्योपि हितैषिण वेदेनोपदिष्टटमात्मैकत्वदर्शन शान्तदर्प- रादरणीयमित्यर्थ । सस्कृत व्याख्या-यथा शुद्ध-शुद्धे जले, शुद्ध-गच्छं जलम्, आसिक्तं- योजितम् तादृगेव-तत्सदृशमेव भवति न किञ्चिद्वैपरोत्य भवति । एव-इत्थ विजानत -ज्ञानवत मननशीलस्य मुने आत्माऽपि तादृगेव यथावत् परमात्म- स्वरूपज्ञानेन परमात्मसदृशो भवति-( मम साधर्म्यमागता.) इत्यादि उक्तेः सम्भवात् । हिन्दी शब्दार्थ-गौतम = हे नचिकेता ! यथा जैसे । शुद्ध = शुद्ध जलमें। आसिक्तम् = डाला गया। शुद्धम् = शुद्ध उदकम् = जल। तादृक् एव = वैसा ही । भवति = हो जाता है । एवम् = उसी तरह । विजानतः = ज्ञानी । मुनेः मननशील व्यक्ति की। आत्मा = आत्मा। भवति = हो जाती है । भावार्थ-हे नचिकेता! जैसे शुद्ध जल की बूंदें यदि किसी शुद्ध जल में गिरें तो वे शुद्ध जल के ही रूप को ग्रहण कर लेती है, दोनो एकाकार हो जाते है, उसी तरह परमात्मतत्व का ध्यान करने वाले ज्ञानी पुरुष की आत्मा भी परमात्मरूप प्राप्त कर लेती है। 15. O Gautama ! as pure water being poured in pure water becomes pure and the same thing happens with the Soul of the man of knowledge द्वितीय अध्याय द्वितीया वल्ली पुरमेकादशद्वारमजस्यावक्रचेतसः अनुष्ठाय न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्वै तत् ॥१॥ पदच्छेद-पुरम्, एकादशद्वारम्, अजस्य, अवक्रचेतस । अनुष्ठाय, न शोचति विमुक्तश्च विमुच्यते । एतद्, वै, तत् । अन्वय-अजस्य अवक्रचेतस. एकादशद्वार पुरम् अनुष्ठाय (नरः) न शोचति विमुक्त विमुच्यते च । [ शा० ] पुनरपि प्रकारान्तरेण ब्रह्मतत्त्वनिर्धारणार्थोऽयमारम्भो दुर्विज्ञेयत्वाद् ब्रह्मण पुर पुरमिव पुरम् । द्वारपालाधिष्ठात्राद्यनेकपुरोपकरण- सम्पत्तिदर्शनाच्छरीर पुरम् । पुर च सोपकरण स्वात्मनासहतस्वतत्र- स्वाम्यर्थं दृष्टम्, तथेद पुरसामान्यादनेकोपकरणसहत शरीर स्वात्मनासहत- राजस्थानीयस्वाम्यर्थ भवितुमर्हति । तच्चेद शरीराख्य पुरमेकादशद्वारमेकादश द्वाराण्यस्य सप्त शीर्षण्यानि नाभ्या सहाञ्चि त्रीणि शिरस्येक तैरेकादशद्वार पुरम् | कस्याजस्य जन्मादिविकियारहितस्यात्मनो राजस्थानीयस्य पुरधर्मविलक्षणस्य । अवक्रचेतसोऽवक्रमकुटिलमादित्यप्रकाशवन्नित्यमेवावस्थितमेकरूप चेतो विज्ञानमस्येत्वकचेतास्तस्यावक्रचेतसो राजस्थानीयस्य ब्रह्मण यस्येद पुर तं परमेश्वर पुरस्वामिनमनुष्ठाय ध्यात्वा, ध्यान हि तस्यानुष्ठान सम्यग्वि- ज्ञानपूर्वम्, तं सर्वेषणाविनिर्मुक्त सन्सम सर्वभूतस्थ ध्यात्वा न शोचति । तद्विज्ञानादभयप्राप्ते शोकावसराभावात्कुतो भयेक्षा। इहैवाविद्याकृत- कामकर्मबन्ध विमुक्तो भवति । विमुक्तश्च सन्विमुच्यते पुन शरीरं न गृह्णातीत्यर्थ ॥ सस्कृत व्याख्या-अवक्रचेतस -ऋजुबुद्धेः ( क्रूरादिप्रवृत्तिवजितबुद्धेः) अजस्य-जन्मादिविकाररहितस्य, आत्मनः, एकादशेन्द्रियलक्षणबहिनिर्गमन द्वारयुक्तं शरीराख्य पुरं भवति, अर्थात्, यथा पुर (नगर) स्वामिनो लोके स्वस्मात् ( १२० म्वपुर पृथगनुभति तथा शानिन: स्वशरीरादात्मानं विविच्य जानाति । अविवेकिनस्तु देहे एवात्मबुद्धिं कुर्वन्ति पृथक् न जानाति । एव शरीरात्मनोः पृथक्तयाऽनुष्ठाय न शोचति-देहानुवन्धिभिर्दुःखै कामक्रोधादिभिश्च विमुक्तो भवति, विमुक्तश्च विमुच्यते प्रारब्धकर्भावसाने गोतोशुल्कगत्या ( अनिरादि- मार्गेण ) शरीवछ नर्वथापरित्यजति । एतत् वैतत्-एतन्म-त्रप्रतिपाद्यमुक्त- स्वरूपमपि परमात्मकमेव भवति । हिन्दी शब्दार्थ-अवक्रचेतस. = बुटिलता से रहित । अजस्य = अजन्मा आत्मा का। एकादशद्वारम् = व्याह द्वारोवाला । पुरम् = शरीर रूपी नगर । अनुष्ठाय = अनुष्ठान करने से । = शोचति = शोक को प्राप्त नहीं होता। विमुक्तश्च = मुक्त होकर । विमुच्यते = बन्धन से छूट जाता है। भावार्थ-यह आत्मा अजन्मा है । उसमे चित्त की सासारिक कुटिलता जैसी कुटिलता नहीं है। यह ग्यारह दरवाजोवाला शरीर ही उस आत्मा का नगर है। अर्थात् इस शरीर रूपी नगर से आत्मा के बाहर निकलने के ग्यारह दरवाजे है। वैदिक कर्मों का अनुष्ठान करने पर वह शोक से मुक्त हो वन्धन से छुटकारा पा जाती है। यही वह है । 1 This is unborn and unchangable This dwells in the city of eleven gates Meditating on such Atman one does not grieve but breaking all the bondages gets perfect freedom. हंसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिर्दुरोणसत् । नृषद्वरसदृतसद्वयोमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्रिजा ऋतं बृहत् ॥२॥ पदच्छेद-हस, शुचिदत्, वसु , अन्तरिक्षसत्, होतावेदिषद्, अतिथि: दुरोणसत् । नृषद् वरसद्, ऋत्तसद् व्योमसत् । अब्जा, गोजा, ऋतजा, अद्विजा ऋतम्, वृहत् । अन्वय-(सः आत्मा शुचिषत, हस' अन्तरिक्षसदत् वसुः वेदिषत् होता दुरोणसत्, अतिथि नृषत्, वरसत्, ऋतसत्, व्योमसत् अब्जा , गोजाः, ऋतजाः, अद्रिजाः, ऋतम्, बृहत् ।
( १२१ ) [ शा० ] हसो हन्ति गच्छत्तीति । शुचिपच्छुचौ दिव्यादित्यात्मना सोदतीति । वमुसियति सर्वानिति । वाय्वात्मनान्तरिक्षे सीदतीत्यन्त- रिक्षसत् । होताग्नि “अग्नि होता' इति श्रुते । वेद्या पृथिव्या सीदतोति वेदिपद् । “इय वेदि परोऽन्त. पृथिव्या ' ( ऋ० स० २।३।२० ) इत्यादि- मन्त्रवर्णात् । अतिथि सोम मन्दुरोणे कलगे सीदतीति दुरोणसत् ब्राह्मण अतिथिरूपेण वा दुरोणेषु गृहेषु सीदतीति । नृपन्नृषु मनुष्येषु सोदताति नृपत् । वरसद् वरेपु देवेषु सोदतीति, ऋतसहत सत्य यज्ञो वा तस्मिन्सी- क्तीति । व्योमसद्व्योम्न्याकाशे सीदतीति व्योमसत् । अव्जा अप्सु शङ्ख- शुक्तिमकरादिरूपेण जायत इति । गोजा गवि पृथिव्या व्रीहियवादिरूपेण जायत इति । ऋतजा यज्ञाङ्गरूपेण जायत इति । अद्रिजा पर्वतेभ्यो नद्यादि- रूपेण जायत इति सर्वात्मापि सन्नृतमवितथस्वभाव एव । बृहन्महान्सर्व- कारणत्वात् । यदाप्यादित्य एव मन्त्रेणोच्यते तदाप्यस्यात्मस्वरूपत्वमा- दित्यस्येत्यङ्गीकृतत्वाद् ब्राह्मणव्याख्यानेऽप्यविरोध. । सर्वव्याप्येक एवात्मा जगतो नात्मभेद इति मन्त्रार्थ.॥ सस्कृत व्याख्या--पुनरपि, अस्यात्मनः सर्वात्मकमेव प्रकाशयति-हस , शुचिषद्-शुचौ-ग्रीष्म-ऋतौ सीदति-शुचिषद्, तेजस्वी इत्यर्थः । वसु - वासयति इति वसुयुः, अन्तरिक्षसत्-अन्तरिक्षे-आकाशे सीदतीति-आकाशगतो वायुस्वरूप , होता-ऋत्विविशेषोऽग्निर्वा, वेदिपत्-वैद्यन्तर्गत., दुरोणसत्- गृहागतोऽतिथि , नृषद्-नृषु-सीदति-मनुष्यादि चेतनेषु आत्तपा वर्तमान, वरषद्-वरेषु- देवादिश्रेष्टेषु सीदति-वर्तते स एव व्योमसद्-कोम्नि-परमपदे प्रत्य- गात्मतया वर्तमानम् । अब्जा -जलजा, गाजा-भूमिजा , ऋतजा-यज्ञोत्पन्ना कर्मफल- भूताश्च सर्गादय इत्यर्थ । अद्रिजा -पर्वतजाः एतनवं बृद्ऋतम्-अपरिच्छिन्न- सत्यस्वरूप ब्रह्मात्मक्मेवेत्यर्थ । हिन्दी शब्दार्थ - हस = सूर्य ( यहाँ जीवात्मा से तात्पर्य है जो अज्ञान का विनाशक है ) । शुविपत् = पवित्रस्थान मे स्थित रहने वाला है । वसुः अन्तरिक्ष. षत् = बन्धन से मुक्त होने पर अन्तरिक्ष मे विचरण करने वाला है । वेदिषत् = यज्ञ वेदी पर स्थित रहकर । होता = यज्ञादि कर्मों का अनुष्ठाता। अतिथिः = एक ही शरीर मे स्थित न रहनेवाला। दुरोणसत् = अनेक आश्रमो मे विचरण करनेवाला । नृपत् = मनुष्ययोनि को प्राप्त करनेवाला । वरसत् = ज्ञानी (श्रेष्ठ) ( १२२ ) - पुरुषो का सम्पर्क प्राप्त करनेवाला । ऋतसत् = सत्य में निवास करनेवाला । अब्जा = जल में जन्म लेनेवाला । गोजा = पृथ्वी पर जन्म लेनेवाला । ऋतजा = विविध योनियो मे जन्म लेनेवाला । अद्रिजा = पर्वतो पर भी जन्म लेनेवाला है । बृहत् ऋतम् = महान् सत्य है । भावार्थ-यहां यह बताया गया है कि विविध स्थितियो के अनुसार यह जीवात्मा विभिन्न अवस्थाओ को ग्रहण करने के लिए पूर्ण स्वतन्त्र है। अर्थात् वह किसी एक रूप या अवस्था के बन्धन में रहनेवाला नहीं है अज्ञान के विनाशक इस जीवात्मा की स्थिति सर्वथा पवित्र है। मुक्त होने पर यह अन्तरिक्ष मे स्थित रहता है। मनुष्य रूप में यह श्रेष्ठ, ज्ञानी पुरुषो का सत्सग प्राप्त करता है। यज्ञ की वेदी पर स्थित होकर यह यज्ञादि कर्मों को सम्पन्न करता है । यह एक ही शरीर में स्थित रहनेवाला नही ( अपितु) अनेक आश्रमो मे विचरण करनेवाला है। यह सत्य मे निवास करनेवाला, जल में जन्म लेनेवाला, पृथ्वी पर जन्म लेनेवाला, विविध योनियो में जन्म लेनेवाला, पर्वतो पर भी जन्म ग्रहण करने वाला और एक महान् सत्य है । 2. Atman in the form of the sun dwells in the heaven, in the form of the air dwells in the shy, in the form of fire He exists in the Altar, in the form of soma He dwells in in the jar. He lives among men and gods. He resides in the sacrifice and sky. He is born in water, born on earth and born on mountains even. He immutable and he is great, ऊवं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वे देवा उपासते ॥ ३ ॥ पदच्छेद-ऊध्वम्, प्राणम, उन्नयति, अपानम्, प्रत्यग्, अस्यति । मध्ये, वामनम्, आसीनम्, विश्वेदेवाः, उपासते । अन्वय-(आत्मा) प्राणम् ऊर्ध्वम् उन्नयति अपानं प्रत्यक् अस्यति । मध्ये आसीन वामनं विश्वे देवा उपासते। [ शां] ऊध्वं हृदयात्प्राणं प्राणवृत्ति वायुमुन्नयत्यूध्वं गमयति । तथा- पानं प्रत्यगधोऽस्यति क्षिपति य इति वाक्यशेषः। त मध्ये हृदयपुण्डरी- " ( १२३ ) काकाश आसीनं बुद्धावभिव्यक्तविज्ञानप्रकाशन वामन सभजनीय सव विश्वे देवाश्चक्षुरादय प्राणा रूपादिविज्ञानं बलिमुपाहरन्तो विश इव राजानमुपासते तादर्सेनानुपरतव्यापारा भवन्तीत्यर्थ । यदर्था यत्प्रयुक्ता- श्च सर्व वायुकरणव्यापारा. सोऽन्यः सिद्ध इति वाक्यार्थ ॥ सस्कृत व्याख्या-सर्वेषा हृदयगत. परमात्मा प्राणम्-प्राणवायुम्-ऊर्ध्वम्- ऊर्ध्वमुखम्, उन्नयति-उगिरति । अपानम्-अपानवायुम् प्रत्यम् अधोमुखम् अस्यति प्रक्षिपति । मध्ये हृदयपुण्डरीकमध्ये, आसीनम् विद्यमानम् वामनम् वमनीयम् ( भजनीयम् ) अथवा ह्रस्वपरिमाणम्, तम् विश्वेदेवसत्वाप्रकृतय. उपासते आराध्यते इत्यर्थः। हिन्दी शब्दार्थ-प्राणम् = प्राण वायु को। ऊर्ध्वम् = ऊपर । उत् नयति = ले जाता है। अपानम् = अपान वायु को। प्रत्यक् = हृदय देश के नीचे की ओर। अस्यति = फेंकता है । मध्ये = मध्य मे । आसीनम् = मध्य मे । आसीनम् = स्थित । वामनम् = आत्मा को । विश्व = मभी । देवा इन्द्रियाँ । उपासते = सेवा करती है भावार्थ-आत्मा ही प्राणवायु को ऊपर ले जाता तथा अपान वायु को नीचे फेंक देता है । यह मध्यदेश मे स्थित है । सभी इन्द्रियाँ इसी की सेवा मे रत है अर्थात् इसी की प्रेरणा से समस्त इन्द्रियाँ कार्य रत रहती है । 3. All the gods worship that adorable God centered in the heart, who pushes the Pran upward and sends the Apan backward. अस्य विस्रंसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः। देहाद्विमुच्यमानस्थ किमत्र परिशिष्यते एतद्वै तत् ॥ ४ ॥ पदच्छेद-अस्य, विस्रसमानस्य, शरीरस्थम्य, देहिन । देहाद्, विमुच्य- मानस्य, विम्, अत्र, परिशिष्यते ॥ एतद्, वै, तत् । अन्वय-शरीरस्थस्य अस्य देहिन देहात् विमुच्यमानस्य विस्रसमानस्य अत्र कि परिशिष्यते । एतत् वै तत् । शा०] अस्य शरीरस्थस्यात्मनो विस्रसमानस्यास्त्रसमानस्य भ्रशमानस्य देहिनो देहवत., विस्रसनशब्दार्थमाह-देहाद्विमुच्यमानस्येति किमत्र परिशिष्यते प्राणादिकलापे न किञ्चन परिशिष्यते । अत्र देहे imes ( १२४ ) पुरस्वामिविद्रवण इव पुरवासिना यस्यात्मनोऽपगमे क्षणमात्रात्कार्यकरण- कलापरूप सर्वमिद हतबलं विध्वस्त भवति विनष्ट भवति सोऽन्य सिद्ध । सस्कृत व्याख्या-अस्य--उपासकस्य, देहिन -आत्मन शरीरस्थस्य देह- प्रतिष्ठितम्य विस्रसमानस्य शिथिलीभावप्राप्तशरीरस्य देहाद् विमुच्यमानस्य (म्रियमाणस्य) अत्र-अस्मिन् संसारे किम् अवशिष्यते--कृतकृत्यत्वा किञ्चिदपि- कर्तव्य कर्म नावशिष्यते इत्यर्थ., तस्य ( तावदेवविरं यावन्न विमोक्ष्ये ) इति श्रुत्युक्तप्रकारेण शरीरपात एव अन्नराय प्रारब्धावीतत्वात् । हिन्दी शब्दार्थ-रीरस्थस्य = शरीर मे स्थित । अस्य = इस । देहिन आत्मा के | पिमुच्यमानस्य = छोडकर । विस्रसमानस्य = पृथक हो जाने पर । अत्र = यहाँ ! किम् = क्या । परिशिष्यते = शेष रह जाता है । एतत् वै तत् = यही वह है। भावार्थ- गरीर मे स्थित यह आत्मा जब शरीर को छोड़कर अलग ही जाता है तब इन शरीर मे क्या शेप रह जाता है अर्थात् कुछ शेष नहीं रह जाता। 4. When this self the inhabitant in the body being free gets away from the body-what other remains there? It is certainly that. न प्राणेन नायानेन मयों जीवति कश्चन । इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥ ५ ॥ पदच्छेद न, प्राणेन, न, अपानेन, मर्त्य , जीवति, कश्चन । इतरेण तु, जीवन्ति यस्मिन् एतौ, उपाश्रितो। अन्वय--कश्चन मयं न प्राणेन न अपानेन जीवति । तु इतरेण जीवन्ति यस्मिन् एतौ उपाश्रिती। [ शा०] न प्राणेन नापानेन चक्षुरादिना वा मर्यो मनुष्यो देहवान् कश्चन जीवति न कोऽपि जीवति न ह्येषां परार्थाना संहत्यकारित्वाज्जीवन- हेतुत्वमुपपद्यते। स्वार्थेनासंहतेन परेण केनचित्प्रयुक्त संहतानामवस्थान न दृष्ट गृहादीना लोके; तथा प्राणादीनामपि सहतत्वाद्भवितुमर्हति । अत इतरेणैव सहतप्राणादिविलक्षणेन तु सर्व सहता सन्तो जीवन्ति प्राणान्धार- यन्ति । यस्मिन्सहतविलक्षणात्मनि सति परस्मिन्नेतौ प्राणापानौ चक्षुरा- - ( १२५ ) दिभिः सहतावुपाश्रितौ यस्यासहतस्यार्थे प्राणापानादिः स्वव्यापारं कुर्वन्वर्तते सहतः सन्सः ततोऽन्य सिद्ध इत्यभिप्रायः ॥ सस्कृत व्याख्या - कश्चन मर्त्य -प्रणवर्माचेतनः प्राणेन- प्राणवायुमहिम्ना न जीवति न च अपानेन-अपानवायुना जीवति किन्तु इतरेण जीवति के नेतरेणेति आह-यस्मिन् एतौ-द्वौ आश्रितो.-८ दधीनप्राणापानौ जीवनीत्यर्थः तदधीनमेव सर्वेण जीवनम् । हिन्दी शब्दार्थ-कश्चन = कोई भी । मर्त्य = मनुष्य । न प्राणेन = न तो प्राण से। न अपानेन - न अपान से । जीवति = जीवित रहता है। यस्मिन् = जिम ( आत्मा ) में । ऐतो प्राणापान । उपासितो = आश्रित रहते है । इतरेण - दूसरै अर्थात् आत्मा मे । जीवन्ति = जीवित रहते है। भावार्थ-कोई भी मनुष्य प्राण या अपान वायु के क रण नही जीवित रहता है, अपितु आत्मा के कारण जोदित रहता है । इसी आत्मा के कारण वह जीवित ह । प्राण और अपाल वायु तो उभी आत्मा के आश्रित है। 5 Pran and Apan are not the source of life of mortals but something else on which these two (Pran and Apan) depend. हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥ पदच्छेद-हन्त, ते, इदम्, प्रवक्ष्यामि गुह्यम्, ब्रह्म, सनातनम् । यथा, च, मरणम् प्राप्य, आत्मा, भवति, गौतम । अन्वय हे गौतम ! हन्त ते इद गुह्य सनातन ब्रह्म प्रवक्ष्यामि । च मरणं प्राप्य आत्मा यथा भवति । [ शां० ] हन्तेदानी पुनरपि ते तुभ्यमिद गह्यं गोप्य ब्रह्म सनातनं चिरन्तन प्रवक्ष्यामि यद्विज्ञानात्सर्वससारोपरमो भवति, अविज्ञानाच्च यस्य मरण प्राप्य यथात्मा भवति यथा ससरति तथा श्रृणु हे गौतम ॥ संस्कृत व्याख्या -हे गौतम | गौतमगोत्रोद्भब । हन्त ! श्ररणा धि- कारितया हर्षसूचनाय हन्त इति पदम् ते तुभ्यम्----गुह्यम् अतिरहस्यमय सना- ( १२६ ) तनम् शाश्वतम् ब्रह्म पुनरपि प्रवक्ष्यामि--कथयामि । अयमात्मा--मरणं मोक्ष प्राप्य यथा यत् प्रकार विशिष्टोभवति । हिन्दी शब्दार्थ-हे गौतम = हे नचिकेता । हन्त ते = तुम्हारे लिए। इदम् = इस । गुह्यम् = रहस्यमय । सनातन = शाश्वत । ब्रह्म = परमात्मा के विषय मे । प्रवक्ष्यामि = कहूँगा। मरणम् = मृत्यु को। प्राप्य = प्राप्त कर । यथा = जैसी ( अवस्था) आत्मा भवति = आत्मा की होती है भावार्थ-हे नचिकेता ! अब मै तुम्हारे लिए इस रहस्यमय ब्रह्म के विषय मे कहूँगा। (और यह भी बतलाऊँगा कि ) मृत्यु के बाद जीवात्मा की क्या स्थिति रहती है । अर्थात् ब्रह्म के रहस्य तथा मृत्यु के उपरान्त प्राप्त होनेवाली जीवात्मा की स्थिति पर प्रकाश डालने का प्रस्ताव यहाँ य-चार्य ने क्यिा है। 6. Well O Gautama ! I tell you of this hidden and everlasting Brahman and also I shall tell you again what happens to the Self after death योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥ ७ ॥ पदच्छेद-योनिम् अन्ये, प्रपद्यन्ते, शरीरत्वाय, देहिन । स्थाणुम्, अन्ये, अनुमयन्ति यथाकर्म, यथाश्रुतम् । अन्वय -यथाकर्म यथाश्रुत अन्ये देहिन शरीरत्वाय योनि प्रपद्यन्ते अन्ये स्थाणुम् अनुसयन्ति । [ शा०] योनि योनिद्वार शुक्रबीजमन्विता सन्तोऽन्ये केचिद- विद्यावन्तो मूढा प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय शरोरग्रहणाथं देहिनो देवहन्त , योनि प्रविशन्तीत्यर्थ । स्थाणु वृक्षाद्रिस्थावरभावमन्येऽत्यन्ताधमा मरण प्राप्यानुसयन्त्यनुगच्छन्ति यथाकर्म यद्यस्य कर्म तद्यथाकर्म यैर्यादृश कर्मेह जन्मनि कृत तद्वशेनेत्येतत्। तथा च यथाश्रुतं यादृश च विज्ञानमुपार्जितं तदनुरूपमेव शरीरं प्रतिपद्यते इत्यर्थ । “यथाप्रज्ञ हि सभवा" इति श्रुत्यन्तरात्॥ संस्कृत व्याख्या-अन्ये- त्वादृशभिन्ना' ब्रह्मकथाश्रवणविमुखाः देहिन - आत्मानः शरीरत्वाय-शरीरपरिग्रहाय योनिम् ब्राह्मणादियोनि प्रपद्यन्ते-परि- १ (१२७ ) गृह्णान्ति अन्ये ततो कर्मविधुराः स्थाणु स्थावरादिभावम् अनुसंयन्ति अनुगच्छन्ति । तादृशाः यथाकर्म स्वानुष्ठितयज्ञादिकर्मानुष्ठानामतिक्रमेणेन आचरणेन च वेदोक्त- रमणीयचरणाः इत्युक्तप्रकारेण शुभाशुभयोनिमप्राप्नुवन्ति एवं यथा श्रुतमपि- श्रवणानुरोधादपि तद्भेदैन गतिभेद इति भावार्थ । हिन्दी शब्दार्थ-- अन्ये = कुछ । देहिनः = प्राणी । यथाकर्म = अपने कर्म के अनुसार । यथाश्रुतम् = अपने ज्ञान के अनुसार । शरीरत्वाय = शरीर धारण करने के लिए । योनिम् = ( मानव, कीट, पतंग आदि ) योनि को। प्रपद्यन्ते = प्राप्त होते है । अन्ये - कुछ दूसरी तरह के । स्थाणम् = स्थावर शरीर को। अनुमयन्ति = मरणोपरान्त प्राप्त होते है। भावार्थ -कुछ लोग अपने कर्म और ज्ञान के अनुसार शरीर धारण के लिए जीवलोक की किसी योनि को प्राप्त होते है और कुछ लोग ( अशुभ कर्मो के कारण ' मरणोपरान्त स्थावर शरीर प्राप्त करते है । तात्पर्य यह कि परमपद की प्राप्ति से पूर्व प्राणी को जन्म-मरण के बन्धन में आवद्ध रहना पडता है। 7 Some souls go to the womb for assuming body and some go to the innumerable things, as trees or plant, according to their previous knowledge and work य एष सुप्तेषु जागर्ति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद् तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एतद्वै तत् ॥८॥ पदच्छेद–य , एष , सुप्तेषु, जागति, कामम्, कामम्, पुरुप , निर्मिमाण , तद्, एब, शुक्रम, तद्, ब्रह्म, तद्, एव, अमृतम्, उच्यते । तस्मिन्, लोका श्रिता , सर्वे, तद्, उ, न, अत्येति, कश्चन, एतद् वै, तत् ॥ ८॥ अन्वय-काम काम निर्मिमाण य एष पुरुष सुप्तेषु जागति तत् एव शुक्रम् तत् ब्रह्म तत् एव अमृतम् उच्यते । तस्मिन् सर्वे लोका श्रिता । तत् उ कश्चन न अत्येति । एतत् + तत् । [ शा० । य एष सुप्तेषु प्राणादिषु जागति न स्वपिति । कथम् ? कामं काम त तमभिप्रेतं स्त्र्याद्यर्थमविद्यया निर्मिमाणो निष्पादयञ्जागति पुरुषो यस्तदेव शुक्रं शुभ्र शुद्ध तद्ब्रह्म नान्यद् गुह्य ब्रह्मास्ति । तदेवा- .
- ( १२८ ) मृतमविनाश्युच्यते सर्वशास्त्रेषु । किंच पृथिव्यादयो लोकास्तस्मिन्नेव सर्वे ब्रह्मण्याश्रिताः सर्वलोककारणत्वात्तस्य । तदु नात्येति कश्चनेत्यादि पूर्ववदेव। संस्कृत व्याख्या- य एषः परमात्मा सुप्तेषु सर्वेषु भूतेषु स्त्रयं जागति अन्तर्यामितया काम कामं संकल्प्यसकल्प्यनिर्मिमाण , पुन पुनः निर्माणं कुर्वन् पुरुषः स्त्य पृथकतया वर्तते इत्यर्थः । तदेव ब्रह्मव्यापकतता सर्वप्रकाशकम्, तदेव अमृतम् सर्वथाऽनधीनम् ( परमात्मतन्त्रम् ) उच्यते न तु अन्यः त्वत्सदृशः स्वतन्त्रः। तस्मिन्नेव सर्वेलोकाः, आश्रिताः सम्बद्धाः कश्चनापि न तद् ब्रह्म उ इति निश्चयेन अत्येति अतिक्रमितु शक्नोति ॥ हिन्दी शब्दार्थ-य एष = जो यह । पुरुषः- परमात्मा । कामं कामम् - इच्छानुरूप अपनी कामना की पूर्ति के लिए । निमिमाणः = निर्माण करते सुप्तेषु = अज्ञानी जीवो मे। जागत्ति = जागता रहता है । तत् एव = वही । शुक्रम् = शुद्ध । तत् ब्रह्म = महान् । तत् एव = वही । मृत्यु से रहित । उच्यते - कहा जाता है । तस्मिन् = उसी ब्रह्म मे । सर्वे लोका. = समस्त संसार । श्रिताः= स्थित है । तत उ = उसका । कश्चन = कोई भी। न अस्येति = अतिक्रमण नही कर सकता। भावार्थ- सम्पूर्ण सृष्टि का निर्माण करनेवाला जो परमात्मा सोये हुए (अज्ञानी) लोगो को उनके कर्मानुसार फल प्रदान करता हुआ अन्तर्यामी रूप से जागता रहता है, वही शुद्ध तथा चिरन्तन ब्रह्म है अर्थात् वह कर्म के बन्धन का कलंक उसका स्पर्श नहीं कर पाता । सम्पूर्ण लोक उसी के आश्रय में स्थित है। कोई भी उसका अतिक्रमण नहीं कर सकता। 8. The Purush remains awake and creates desirable things even when we fall asleep. He is called Brahman and he immortal. The entire world is fastend to him and none can infringe him. This is that. अग्नियथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥९॥ एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं ( १२९) पदच्छेद-अग्निः, यथा, एक , भुवनम्, प्रविष्ट , रूपम्, प्रतिरूपः बभूव । एक., तथा, सर्वभूतान्तरात्मा, रूपम्, रूपम्, प्रतिरूपः, बहिः, च ॥ ९ ॥ अन्वय-यथा भुवन प्रविष्टः एकः अग्नि रूप रूप प्रतिरूप बभूव तथा एक सर्वभूतान्तरात्मा रूप रूप प्रतिरूपः बहि. च ( वर्तते )। [ शा० ] अग्निर्यथेक एव प्रकाशात्मा सन्भुवनं भवन्त्यस्मिन्भूतानीति भुवनमय लोकस्तमिम प्रविष्टोऽनुप्रविष्ट । रूप रूपं प्रतिदादिदाह्यभेदं प्रतीत्यर्थ., प्रतिरूप तत्र तत्र प्रतिरूपवान्दाह्यभेदेन बहुधो बभूव, एक एव तथा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वेषा भूतानामभ्यन्तर आत्मातिसूक्ष्मत्वाद् दादिष्विव सर्वदेह प्रति प्रविष्टत्वा-प्रतिरूपो बभूव बहिश्च स्वेन अवि- कृतेन स्वरूपेणाकाशवत् । सस्कृत व्याख्या-यथा यादृश एकोऽग्निः भुवन ब्रह्माण्डान्तरगतः त्रिवुत- करणतया प्रवृष्टः सर्वत्र विद्यमान. सन् रूप रूप प्रत्येकस्वरूपे विद्यमानः अन्त:- बहिश्च विद्यते अर्थात् सर्वासु भौतिकव्यक्तिषु तेजोधातु मिलित्वा सक्रान्तः, तथा एक एव परमात्मा सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान्तर्यामिः सन् बहिरपि तिष्ठतीत्यर्थ. । हिन्दी शब्दार्थ-यथा-जैसे । एकः अग्नि =एक ही अग्नि प्रवेश करके । रुपम् रूपम् = प्रत्येक रूप के अनुरूप । प्रतिरूप उसी के समान रूप वाला। बभूव = हो गया। तथा = उसी तरह । सर्वभूतान्तरात्मा = सम्पूर्ण प्राणियो में विद्यमान परमात्मा । एकः = एक होने पर भी। रूप रूपम् = प्रत्येक रुप में प्रतिरूप - प्रत्येक आकारवाला । बहिश्च = बाहर भी। भावार्थ-यहाँ परमात्मा की सर्वव्यापकता को स्पष्ट करने के लिए अग्नि का दृष्टान्त उपस्थित किया गया है । अग्नि वास्तव मे प्रत्येक पदार्थ के भीतर विद्यमान है। जिस पदार्थ का जैसा रूप है वैसा ही रूप उसमें अग्नि भी ग्रहण कर लेता है। जिस प्रकार पदार्थ से भिन्न वहाँ अग्नि का कोई अलग आकार नहीं दिखायी देता। ठीक उसी तरह विश्व के प्रत्येक रूप मे परमात्मा को स्थिति विद्यमान है, किन्तु उसका कोई अलग रूप प्रगट नहीं है, फिर भी प्राणियो के भीतर रहने के साथ- साथ वह बाहर भी है।
( १३०) in the प्रतिरूपो बभूव । 9. Just as fire-though one-after entering the world assumes different shapes according to the shapes same way the soul inside all the livings assumes different shapes for different creatures and it is outside too वायुर्यथैको भुवन प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥ पदच्छेद-वाय, यथा, एकः, भुवन, प्रविष्टः रूय रूपं प्रतिरूप., बभूव । एकः, तथा, सर्वभूतान्तरात्मा, रूप, रूप, प्रतिरूप बहिः, च । [शां०] वायुर्यथैक इत्यादि । प्राणात्मना देहेष्वनुप्रविष्टो रूप रूपं प्रतिरूपो बभूवेत्यादि समानम् । सस्कृत व्याख्या-वायु वायुर्दृष्टान्तेनाह शेष पूर्वमन्त्रवत् व्याख्या ज्ञेया। हिन्दी शब्दार्थ-यथा = जैसे। एक वायु. = एक ही पवन । भुवन = लोक । रूप रूपम् = प्रत्येक रूप मे। प्रतिरूप = प्रत्येक रूप वाला। बभूव = हो गया है। तथा = उसी तरह । एकः सर्व भूतान्तरात्मा = सभी प्राणियो मे विद्यमान एक ही परमात्मा। रूप रूप = प्रत्येक रूप मे। प्रतिरूप = विविधरूप वाला । बहिः = बाहर । च = भी। भावार्थ-यहाँ परमात्मा की एकरूपता तथा सर्वव्यापकता को वायु के उदाहरण द्वारा स्पष्ट किया गया है। जिस तरह एक ही वायु प्राणियो के भीतर तथा बाहर एक रूप मे ही व्याप्त हो रहा है उसी तरह परमात्मा की सम्पूर्ण प्राणियो के भीतर तथा बाहर भी व्याप्त है। इस प्रकार परमात्मा सर्वव्यापक होते हुए भी निर्विकार बना रहता है। 10 Just as air, though one after coming into this world assumes different shapes according to the different shapes, in the same way, the soul inside the livings, though one, assumes different shapes according to different forms The soul is as inside is as outside too.
( १३१) . . सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्वाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥११॥ पदच्छेद-सूर्यः, यथा, सर्व, लोकस्य, चक्षुः, न, लिप्यते, चाक्षुष बाह्य- दोषः । एक , तथा, सर्वभूतान्तरात्मा, न, लिप्यते, लोकदु खेन वाह्यः । अन्वय यथा सूर्यः सर्वलोकस्य चक्षु ( सन् अपि ) चक्षुपै बाह्यदोषै नः लिप्यते, तथा एक सर्वभूतान्तरात्मा बाह्यः लोकदुःखेन न लिप्यते । [ शा० ] सूर्यो यथा चक्षुप आलोकेनोपकार कुर्वन्मूत्रपुरीषाद्यशुचि- प्रकाशनेन तद्दर्शिन सर्वलोकस्य चक्षुरपि सन्न लिप्यते चाक्षुरशुच्यादि- दर्शननिमित्तैराध्यात्मिक पापदोषैर्बाझैश्चाशुच्यादिससर्गदोपै । एकः मस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदु खेन बाह्य । लोको ह्यविद्यया स्वात्मन्यध्यस्ततया कालकर्मोद्भव दु खमनुभवति । न तु सा परमार्थतः स्वात्मनि । यथा रज्जुशुक्तिकोपरगगनेषु सर्प रजतोदकमलानि न रज्ज्वा- दीना स्वतो दोपरूपाणि सन्ति । ससगिणि विपरीतबुद्धयध्यासनिमित्तात्त- दोषवद्विभाव्यन्ते । न तद्दोषैस्तेषा लेप । विवरीतबुद्धयध्यासबाह्या हि ते । तथात्मनि सर्वो लोकः क्रियाकारकफलात्मक विज्ञान सादिस्थानीयं विपरोनमध्यस्य तन्निमित्त जन्ममरणादिदु खमनुभवति । न त्वात्मा सर्व- लोकात्मापि सन्विपरीताध्यारोपनिमित्तेन लिप्यते लोकदु खेन । कुत. बाह्य रज्वादिवदेव विपरीतबुद्धयध्यासबाटो हि स इति । सस्कृत व्याख्या-पथा सूर्यः सर्वलोकस्य चक्षु नेत्रम् ( आदित्यश्चक्षु,. स्वाऽऽक्षिणी प्राविशत ) इति ऐतरेय श्रुत्युक्तप्रकारेग चक्षुरविष्टतया। सर्व- चक्षुरन्तगतोऽपि चाक्षुष चक्षुपा गृह्मन्ते इति चाक्षुपनि तैश्वाक्षुपैः बाह्यदोषैः बहिर्गतैर्दोषै न लिप्यते । तथा एक सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान्तर्यामो भूत्वाऽपि बाह्य , लोकदु खेन बहिर्भूत्वा लोकदु खेन न लिप्यते । हिन्दी शब्दार्थ-यथा = जिस तरह । सर्वलोकस्य = सम्पूर्ण समार का। चक्षुः = नेत्र ! सूर्य = सूर्य । चाक्षुष सूर्य । चाक्षुष = नेत्र सम्बन्धी । बाह्य दोषः - बाहरो दोषो से । न लिप्यते = लिप्न नही होता है। तथा = उमो प्रकार। एक = अद्वितीय । सर्वभूतान्तरात्मा = सभो में व्याप्त होकर भो । बाह्य = पृयक् रहकर । न लिप्यते = पदार्थों में लिप्त नहीं रहता। ?
(३२) भावार्थ-जिस प्रकार सूर्य सम्पूर्ण ससार के नेत्र होते हुए भी, देखे जाने वाले बाह्य पदार्थो के दोषो से पृथक् रहता है उसी प्रकार सभी इन्द्रियो मे व्याप्त होकर भी अन्तरात्मा लोक के दुःखो में लिप्त नहीं होता। 11 Just as the sun which is the eye of the entire world is not currupted by the visual and outer curruptions, in the way, the Atman that exists in all the things is not stained by the sorrow of the world, as it is above all एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एक रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषा म्।१२। पदच्छेद-एक , वशी, सर्वभूतान्तरात्मा, एकम्, रूपम्, बहुधा, य, करोति तम, आत्मस्थम्, ये, अनुपश्यन्ति, धीरा, तेषाम, सुखम्, शाश्वतम्, न, इतरेषाम् ॥ १२ ॥ अन्वय-वशी एकः सर्वभूतान्तरात्मा य एक रूपं बहुधा करोति तं ये धीरा आत्मस्थ अनुपश्यन्ति तेषा शाश्वत सुख ( भवति ), इतरेषा न ( भवति )। (अथवा आत्मस्थं त ये धीरा. अनुपश्यन्ति ) [शा०] स हि परमेश्वर. सर्वगतः स्वतत्र एको न तत्समोऽयधिको वान्योऽस्ति वशी सर्वं ह्यस्य जगद्वशे वर्तते। कुत.? सर्वभूतान्तरात्मा। यत एकमेव सदैकरसमात्मान विशुद्धविज्ञानरूप नामरूपाद्य शुद्धोपाधिभेद- वशेन बहुधानेकप्रकार य करोति स्वात्मसत्तामात्रेणाचिन्त्यशक्तित्वात् । तमात्मस्थ स्वशरीरहृदयाकाशे बुद्धौ चैतन्याकारेणाभिव्यक्तमित्येतत् । न हि शरीरस्याधारत्वमात्मन., आकाशवदमूर्तत्वात्, आदर्शस्थ मुख- मिति यद्वत् । तमेतमीश्वरमात्मान ये निवृत्तबाह्यवृत्तयोऽनुपश्यन्ति आचार्यागमोपदेशमनु साक्षादनुभवन्ति धीरा विवेकिनस्तेषा परमेश्वर- भूताना शाश्क्त नित्य सुखमात्मानन्दलक्षण भवति, नेतरेषा वाह्यासक्त- बुद्धीन त्रिवेकिना स्वात्मभूतमप्यविद्याव्यवधानात् । व्याख्या-एक अद्वितीय. (तादृश द्वितीयाभावः) वशी वशकान्तो पम् कान्ति. इच्छा अर्थात् इच्छातन्त्राः ( इच्छया सर्व कर्तुमकर्तु सर्वभूतान्तरात्मा सर्वान्तर्यामी एक बीज अव्यक्ततत्वम् बहुधा ( १३३ ) महदादिरूपेण विश्वप्रपञ्चम् यःकरोति योविस्तारयति । तम् परमात्मानम् आत्म- स्थस्वान्तर्यामिणम् स्वसन्निधिवर्तमान ये धीराः धैर्यशालिन. अनुपश्यन्ति तेषामेव शाश्वतम सुखम् इतरेषाम् सुखम् अर्थात् ईश्वरं दूरस्थं तद्रहितम् जगत् मन्य- मानानाय दुःखमेव । हिन्दी शब्दार्थ-सर्वभूतान्तरात्मा = सभी प्राणियो मे विद्यमान पर- मात्मा। वशी = सब प्राणियो को अधीनस्थ रखने वाला । एकः = जीवात्मा । यः = जो । एक रूप = एक निज रूप को। बहुधा = अनेक प्रकार का । करोति = प्रगट करता है। तम् = उस । आत्मस्थम् = स्व-स्वरूप में विद्यमान को। ये धीरा. = जो धीर लोग। अनुपश्यन्ति = साक्षात्कार करते है। तेषाम् = उन्ही को। शाश्वतम् सुखम् = स्थायी मोक्षरूपी सुख मिलता है। इतरेषाम् न = अनात्मवादी अन्य जनो को नही। भावार्थ-सभी प्राणियो का नियामक परमात्मा एक होते हुए भी अपने को अनेक शक्तियो मे व्यक्त करता है । इस परमतत्त्व का जो विवेकी विद्वान् साक्षात्कार कर लेते है उन्ही को नित्य सुख मिलता है, अन्य अज्ञानावृत्त लोगो को ( कभा) नही। 12. The same controller and dweller in all the livings. Soul transfer himself into man only who feels this soul within himself, take real enjoyment and not others नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। तस्मात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम्१३ पदच्छेद-नित्य , अनित्यानाम्, चेतनः, चेतनानाम्, एक बहूनाम्, यः, विदधाति कामान् । तम्, आत्मस्थम्, ये, अनुपश्यन्ति, धीरा , तेषाम्, शान्तिः शाश्वती, न, इतरेषाम् ॥ १३ ॥ अन्वयः--अनित्याना नित्य, चेतनाना चेतन: य. एकः बहूना कामान् विदधाति त ये धीराः आत्मस्थ अनुपश्यन्ति तेषा शाश्वती शान्ति ( भवति ) इतरेषा न ( भवति)। [शा०] नित्योऽविनाश्यनित्याना विनाशिनाम्। चेतनश्चेतनाना चेतयितृणा ब्रह्मादीना प्राणिनामग्निनिमित्तमिव दाहकत्वमनग्नीनामुदका.
( १३४ ) दोनामात्मचैतन्यनिमित्तमेव चेतयितृत्वमन्येषाम्, किच स सर्वज्ञ सर्वेश्वरः कामिना ससारिणा कर्मानुरूप कामान्कर्मफलानि स्वानुग्रहनिमित्ताश्च कामान्य एको बहूनामनेकेषामनायासेन विदधाति प्रयच्छतोत्येतत् । तामात्मत्थ येऽनु पश्यन्ति धीरास्तेपा शान्तिरूप रति शाश्वती निन्या स्वात्मभूतैव स्यान्नेतरेपामनेवविधानम् ।। सस्कृत व्याख्या-अनित्यानाम् अचेतनप्रकृतीना मध्ये तिष्ठन्नपि चेतन एक एव, एकस्वरूप एव, तादृशाना बहूना चेतनाना परमात्मरूपेण चेतन एक अद्वितीय तेषा कामान् अपेक्षितान् अर्थात् यो विदधाति पूरयति । तम् आत्मस्थं ये धीरा: अनुपश्यन्ति तेषा शाश्वती शान्तिः न इतरेषाम् । हिन्दी शब्दार्थ-यः = जो । एकः = अद्वितीय । अनित्यानाम् = नाशवान् पदार्थो में। नित्यः-अपरिवर्तनशील । चेतनाना चेतन = चेतन प्रतीत होने वाले मन-बुद्धि आदि अन्त.करण को भी प्रेरणा देने वाले। बहूनाम् = अनक लोगो के । कामान् = अभीष्ट पदार्थों को । विदवाति - सृजन करता है। भावार्थ-विनाशशील पदार्थो में भी जो एकमात्र अविनाशी है जो ब्रह्मादि देवो का प्रेरक है एव बाह्य तथा अन्तःकरण की कामनाओ को पूरा करने वाले आत्मस्थ परमतत्त्व को जो अपने में देखते है उन्ही को स्थायी शान्ति मिलती है, औरो को नही। 13. Only those get everlasting peace and not others who consider him within themselves and who is eternal among non-eternals, the consciousness among the conscious and who is though out pacify the many. तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४॥ पदच्छेद-तत्, एतद्, इति, मन्यन्ते, अनिर्देश्यम् परमम् सुखम् । कथम्, नु, तद्, विजानीयाम्, विम्, उ, भाति, विभाति, वा ॥ १४ ॥ अन्वय-अनिर्देश्य परमं सुख 'तत् एतत्' इति मन्यन्ते । तत् कथं नु विजानीयम् ? किम् उ ( तत् ) भाति विभाति वा । .
- ( १३५ ) [ शा० ] यत्तदात्मविज्ञानं सुखमनिर्देश्य निर्देष्टुमशक्यं परम प्रकृष्टं प्राकृतपुरुषं वाड्मनसयोरगोचरमपि सन्निवृत्तषणा ये ब्राह्मणास्ते यत्तदेत- त्प्रत्यक्षमेवेति मन्यन्ते। कथं नु केन प्रकारेण तत्सुखमहं विजानीयाम् इदमित्यात्मबुद्विविषयमापादयेय यथा निवृत्तषणा यतय किमु तद्भाति दीप्यते प्रकाशात्मक तद्यतोऽस्मबुद्धिगोचरत्वेन विभाति विस्पष्ट दृश्यते कि वा नेति। सस्कृत व्याख्या-तत् अलौकिकम् एतद् पूर्वत कथितम्, अनिर्देश्यम् सर्वथा इदमित्थतया निर्देष्टुमयोग्यम् परम सुखम् अत्यन्तानन्दस्वरूपम् श्रुत्यभि. हतम् ब्रह्म मन्यन्ते भवादृशा ज्ञानिन एव जानन्ति । कथ तत् रूपादिहोन ब्रह्म- ग्रहणोऽसमर्थचेता अह विजानीयाम् ज्ञातुं शक्नुयाम् यत् तद् ब्रह्म भाति प्रकाशमत्तया भामते सुम्पष्टं भासते यद्वा तेजोऽन्तराभिभूत या न विभाति इत्याह बिभातिवेति । हिन्दी शब्दार्थ-तत् = वह । एतत् = यही है। अनिर्देश्यम् = अवर्ण- नीय । परमं सुखम् = सर्वोत्कृष्ट आनन्द । इति = इस प्रकार । मन्यन्ते (विवेकी ) लोग स्वीकार करते है। कथ नु = किस प्रकार। तद् = उस अनिर्वचनीय सुख को। विजानीयाम् = मैं जानूं। किमु भाति - क्या वह (परमतत्त्व ) स्त्रय प्रकाशित होता है । वा = अथवा । विभाति = अन्य पदार्थों मे प्रतिभासित होता है। भावार्थ-आत्मविज्ञान को अधिक स्पष्ट करने के विचार से ग्रन्थकार ने जिज्ञासु व्यक्ति के मन मे एक प्रश्न जागरित किया है। क्या वह परमतत्त्व (परमात्मा ) ससारिक अन्य पदार्थो की तरह अपने स्परूप मे व्यक्त होता है या अपने प्रभाव से अन्य पदार्थो को भी प्रकाशित करता है ? इसी शका के समाधान मे ही 'अनिदेश्य'-पद द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि वह निज रूप में भासित नहीं होता, अपितु विवेकी जन उसका साक्षात्कार करते है। परमानन्द तत्त्व अनिर्देश्य है अर्थात् 'वह यह है ऐता विद्वान् स्वीकार करते है। उसे मैं ( नचिकेता) कैसे जानूंगा कि वह परमतत्त्व व्यक्त होता है या व्यक्त नहीं होता? इसी का उत्तर आगे के श्लोक मे दिया गया है। 14. The intelligent peoplc realise that the supreme and indesirable great happiness is this only How then shall I know it ? Does it shine plainly or does it not ?
( १३६ ) न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो मान्ति कुतोऽयमग्निः । तमेव भान्तमनुभाति सर्व तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१५॥ पदच्छेद-न, तत्र, सूर्य. भाति, न, चन्द्रतारकम्, न, इमा, विद्युत., भान्ति, कुतः अयम्, अग्नि तम्, एव, भान्तम्, अनुभाति, सर्वम्, तस्य भासा, सर्वम्, इदम्, विभाति ॥ १५ ॥ अन्वय-तत्र सूर्य न भाति चन्द्रतारकं न ( भाति ), इमाः विद्युत. त भान्ति, अयम् अग्नि कुत ? तम् एव भान्तं सर्वम् अनुभाति, तस्य भासा इदं सर्व विभाति । [शा०] न तत्र तस्मिन्स्वात्माभूते ब्रह्मणि सर्वावभासको पि सूर्यो भाति तद्ब्रह्म न प्रकाशयतीत्यर्थः । तथा न चन्द्रतारक नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमस्मदृष्टिगोचर अग्नि । कि बहुना यदिदमादिक सर्व भाति तत्तमेव परमेश्र भान्त दीप्यमानमनुभात्यनुदीप्यते । यथा जलो- ल्मकाद्यग्निसयोगादग्नि दहन्तमनुदहति न स्वतस्तद्वत्तस्यैव भासा दीप्त्या सर्वमिद सूर्यादि विभाति । यत एव तदेव ब्रह्म भाति च विभाति च । कार्यगतेन विविधेन भासा तस्य ब्रह्मणो भारूपत्व स्वतोऽवगम्यते । न हि स्वतोऽविद्यमान भासनमन्यस्य कर्तुं शक्यम् । घटादीनाम् अन्यावभास- कत्वादर्शनाद्भासनरूपाणा चादित्यादीना तदर्शनात् ॥ संस्कृत व्याख्या-आदित्यवर्णं तमस परस्तात्, इत्युक्तप्रकारेण सर्वा- तिशयमानिति उच्यते-न तत्र सूर्यो भाति सर्वतेजसाम् आच्छादकत्वात्, अङ्गुष्ट- प्रमितस्य ज्योतिर्मयस्य ब्रह्मणासन्निकाशेन सूर्यो भाति (प्रकाशते ) न चन्द्रादि- तारका. प्रकाशन्ते, न चरमाः दृश्यमानाः विद्युतः प्रकाशते, तत्र अग्नि. कुत. प्रकाशितु शक्नोति इति । तस्य भासा ज्योतिषा सर्वमिद जगत् विभाति प्रकाशते सर्वज्योतिष कारणाभूतत्वात् । अनुभाति इति अनु शब्देन कार्यकारणभाव जगद्- ब्रह्मणोर्दर्शितः । तमेव भान्तम् सर्व पश्चात् अनुभाति इति तस्यैव भासाप्रकाशेन इदम् सर्व विभाति प्रकाशते । हिन्दी शब्दार्थ-तत्र = वहाँ (उस आत्मा को)। सूर्यः-सूर्य ( प्रकाश )। न भाति = प्रकाशित नहीं करता । चन्द्रतारकम् न = चन्द्र और तारे भी नहीं। अयं अग्नि = यह अग्नि । कुत. = कैसे प्रकाशित कर सकता है। भान्तम् ( १३७ ) प्रकाशशील । तम् - उस आत्मा के । अनु = पीछे ( उसके प्रकाश से )। सर्वम् एव = सभी पदार्थ । भाति = प्रकाशित है। इदम् सर्वम् = यह सभी सूर्य- चन्द्रादि । तस्य भासा = उस आत्मा के तेज से। विभाति = प्रकाशित होता है। भावार्थ-उपर्युक्त श्लोक (१४) के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा गया है कि परमात्मा भासित और प्रतिभासित होता है जब कि अन्य पदार्थो में एक ही गुण है। वहाँ (परमात्मा के यहाँ)सूर्य, चन्द्र, तारागण प्रकाशित नही होते तथा विद्युत समूह भी प्रकाशित नहीं होता। अग्नि की तो बात ही क्या है। उसी परमानन्द के प्रकाश से सभी पदार्थ भासित होते है अर्थात् उसी के प्रकाशित होने के बाद ही उसी की दीप्ति से सभी पदार्थ ( चन्द्रादि ) दीप्तिमान होते है। 15. There (In Atmaloke) the sun does not shine, neither the stars and the flashes of lightning shine. How can this fire ? But the fact is this that when it shines everything shines after that and all these are illuminated by its own light. द्वितीयाध्याये द्वितीय वल्ली समासा ।
तृतीया वल्लो ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन । एत द्वैतत् ॥१॥ पदच्छेद-ऊर्ध्वमूलः, अवाक् , शाख., एषः, अश्वत्य., सनातन. । तद्, एव, शुक्रम्, तद्, ब्रह्म, तद्, एव, अमृतम्, उच्यते । तस्मिन्, लोकाः, श्रिताः, सर्वे, तद्, उ, न, अत्येति कश्चन, एतद्, वैतत् । अन्वयः-ऊर्ध्वमूलः अवाक्शाख एषः अश्वत्थ. सनातनः तत् एव शुक्रम् तत् बह्म तत् एव अमृतम् उच्यते सर्वे लोकाः तस्मिन् श्रिता तत् उ कश्चन न अत्येति । [ शा० ] ऊर्ध्वमूल ऊवं मूलं यत्तद्विष्णो परमं पदमस्येति सोऽयम- व्यक्तादिस्थावरान्त. संसारवृक्ष ऊर्ध्वमूल' । वृक्षश्च वश्चनात् । जन्मजरा- मरणशोकाद्यनेकानर्थात्मकः प्रतिक्षणमन्यथास्वभावो मायामरीच्युदक- गन्धर्वनगरादिवदृष्टनष्टस्वरूपत्वादवसाने च वृक्षवदभावात्मक कदलीस्त- म्भवन्नि सारोऽनेकशतपाखण्डवुद्धिविकल्पास्पदस्तत्त्वविजिज्ञासुभि निर्धारि- तेद तत्त्वो वेदान्तनिर्धारितपरब्रह्ममूलसारोऽविद्याकामकाव्यक्तबीजप्रभ- वोऽपरब्रह्मविज्ञानक्रियाशक्तिद्वयात्मकहिरण्यगर्भाङ्कर. सर्वप्राणिलिङ्गभेद- स्कन्धतृष्णाजलावसेकोद्भूतदर्पो बुद्धीन्द्रियविषयप्रवालाङ्कुरः श्रुतिस्मृति- न्यायविद्योपदेशपलाशो यज्ञदानतप आद्यनेकक्रियासुपुष्प सुखदु खवेदना- नेकरस. प्राण्युपजीव्यानन्तफलस्तत्तृष्णासलिलावसेकप्ररूढजीकृतदृढबद्ध- मूल सत्यनामादिसप्तलोकब्रह्मादिभूतपक्षिकृतनीड. प्राणिसुखदुःखोदभूत- हर्पशोकजातनृत्यगीतवादित्रक्ष्वेलितास्फोटितहसिताक्रुष्टरुदितहाहामुच्चमु- ञ्चत्याद्यनेकशब्दकृततुमुलीभूतमहारवो वेदान्तविहितब्रह्मात्मदर्शनासङ्ग- शस्त्रकृतोच्छेद एष ससारवृक्षोऽश्वत्योऽश्वत्थवत्कामकर्मवातेरितनित्य- ( १३९ ) प्रचलितस्वभावः, स्वर्गनरकतिर्यप्रेतादिभिः शाखाभिरवाक्शाख', सना- तनोऽनादित्वाच्चिर प्रवृत्त । यदस्य ससारवृक्षस्यमूल तदेव शुक्र शुभ्र शुद्ध ज्योतिष्मच्चैतन्या- त्मज्योति स्वभाव तदेव ब्रह्म सर्वमहत्त्वात् । तदेवामृतमविनाशस्वभाव- मुच्यते कथ्यते सत्यत्वात् । वाचारम्भण विकारो नामधेयमनृतमन्यदतो मर्त्यम् । तस्मिन्परमार्थसत्ये ब्रह्मणि लोका गन्धर्वनगरमरीच्युदकमाया- समा परमार्थदर्शनाभावावगमना श्रिता आश्रिता सर्वे समस्ता उत्पत्ति- स्थितिलयेषु । तदु तद्ब्रह्म नात्येति नातिवर्तते मृदादिकमिव घटादिकार्य कश्चदपि विकार । एतद्वै तत् । संस्कृत व्याख्या-ऊर्ध्वमूलमधः शाखा इत्यादि गीतोक्त-व्याख्यानस्य मूल श्रुतिरुच्यते-ऊर्ध्व मूल -ऊवं मूल यस्यास्य संसाराख्य वृक्षस्य ऊर्ध्व-सप्तलोकोपरि- स्थितस्यचतुर्मुखस्यैव मूलत्वमाहुः अत ऊध्वं मूल सिद्धम् अवाक्शाख. अवाक्- अधो देशे शाखा यस्य स अवाक्शाख-अस्य शाखा च अधो देशे पृथिवी निवासि- सकल-मनुष्यपश्वादि स्थावरन्तजीवयोनय अत एष सनातनोऽश्वत्यः वृक्ष । एतल्लक्षणमेव ब्रह्मेति दर्शयति । हिन्दी शब्दार्थ-उर्ध्वमूल = ऊपर मूल वाला । अवाक्शाखः = नीचे की ओर शाखाओ वाला । एष = यह । सनातनः = प्राचीन । अश्वत्थः = पीपल का वृक्ष । तत एव = वही । शुक्रम् = निर्मल । तद् ब्रह्म = वही महान् अत्मा । तद् एव = वही । अमृतम् = अविनाशी । उच्यते = कहा जाता है । तस्मिन् उसी आत्मा पर । सर्वे लोका = सभी चन्द्रादि लोक । धिता. = आश्रित है । तद् उ = और उसे। कश्चन = कोई भी। न अत्येति = अतिक्रमण नही करता। एतद् वै तद् = यही वह आत्मा ( ब्रह्म) है। भावार्थ-यह ससार रूपी पीपल का वृक्ष बडा ही विलक्षण है। इसकी जड ऊपर की ओर तथा शाखाएँ नीचे को ओर है । वही ( मूल ) शुद्ध ज्योति- स्वरूप, वही ब्रह्म और वही अमृत है। सभी लोग उसी ब्रह्म पर निर्भर है। उसके ऊपर कोई नही । निश्चय ही ऐसे गुणो वाला ब्रह्म है। विशेष-यहाँ आत्मा के शरीर ग्रहण को बृक्ष रूपक द्वारा स्पष्ट किया गया है । शरीर या ससार को अश्वत्थ कहना बड़ा ही युक्तिसगत है, क्यो कि 'न श्वः ( १४० ) स्थास्यति' अर्थात् जो कल रहनेवाला नही । अश्वत्थ ( पीपल ) भी जिसके पत्ते थोडी सी प्रतिकूल हवा से इधर-उधर चलायमान हो जाते है और जो सुदृढ मूल के अभाव में उखड जाता है। शरीर भी अस्थिर होने के कारण थोडी सी विपरीत दशा में नष्ट हो जाता है और इसकी हाथ-पैर रूपी शाखाएँ भी अधोमुखी है अर्थात् पतनशील है । दूसरी ओर इस बृक्ष के मूल (ब्रह्म) को चेतन, शुद्धस्वरूपादि गुणो के कारण सभी लोको का आधार कहा है। शरीर मे भी चेतन सस्थान ( मस्तिष्क) ऊपर ही रहता है । इन्द्रियाँ आत्मा के अधीन है उसके ऊपर नही । अत इसी आत्मतत्त्व की ही उपासना करना उचित है। 1. This Peepal tree of eternity has its roots above in heaven and branches down on earth. That is Brahman, that is pure and that is called realy immortal Only on that all the worlds rest and none can surpass him. यदिदं किं च जगत्सर्व प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ २ ॥ पदच्छेद-यद्, इदम्, किञ्च, जगत् सर्वम्, प्राणे, एजति, निसृतम् । महद्, भयम्, वज्रम्, उद्यतम् य., एतद्, विदुः, अमृता ते, भवन्ति । अन्वय - यत् किं च जगत् इद सर्व नि सृतं प्राणे एजति । उद्यत वज्र (इव ) महत् भयम् । ये एतत् विदु' ते अमृताः भवन्ति । [ शा०] यदिद किंच यत्किचेद जगत्सवं प्राणे परस्मिन्ब्रह्मणि सत्ये- जति कम्पते तत एव नि सृतं निर्गत सत्प्रचलति नियमेन चेष्टते । यदेव जगदुत्पत्त्यादिकारण ब्रह्म तन्महद्भयम् । महच्च तद्भय च बिभेत्यस्मा- दिति महद्भयम्, वज्रमुद्यतमुद्यतमिव वज्रम् । यथा वज्रोद्यतकरं स्वामिन- मभिमुखीभूत दृष्ट्वा भृत्या नियमेन तच्छासने वर्तन्ते तथेद चन्द्रादित्य- ग्रहनक्षत्रतारकादिलक्षण जगत्सेश्वरं नियमेन क्षणमप्यविश्रान्तं वर्तत इत्युक्त भवति । ये एतद्विदु स्वात्मप्रवृत्तिसाक्षिभूतमेक ब्रह्मामृता अमरण- धर्माणस्ते भवन्ति । सस्कृत व्याख्या-यदिदम् पुरोदृश्यमान जगत्सर्वम्, अस्मिन् अङ्गुष्ठमात्रे प्राणे प्राणशब्द अभिधेये स्थितम् सर्वम्, निःसृतम्-तस्मादुत्पन्नं महाभयनिमित्तम्, ( १४१ ) एजनं-कम्पनम्-श्रूयते इतितात्पर्यम्, तच्छासनातिक्रमणे किं भविष्यतीति उच्यते उद्यत वज्रमिव उद्यतात् आरोपिताद् वज्रादिवेति पञ्चभ्यर्थे प्रथमाविभक्तिः छान्दसव्यत्ययात् महद्भयम् यथेति भावः अत्र प्राण शब्द परब्रह्मवाचकः बिभेत्यस्मात्तद्भयम भयानकमित्यर्थः। महाभयानक वज्रवत् स्वस्माद् निःसृतं सकलं जगत् प्राणशब्दवाच्य परमात्मा कम्पयति, परमात्मा कम्पयति, इतितत्वम् । ये एतद्-परमा- स्मनो जगतः पृथक् रूपेणानुभवन्ति-अमृतास्ते भवन्तीत्यर्थः। कृतार्थता सम्पद्यते इत्यर्थः। हिन्दी शब्दार्थ-यत् इद किंच = यह जो कुछ । सर्वं जगत् = सम्पूर्ण ससार । प्राणे एजति = आत्मा के चलायमान होते ही। निसृतम् = चलायमान होता है। तत् उद्यत वज्र इव महत् भयम् = वह ब्रह्म उठे हुए महान् भय रूप वज्र के सदृश है । एतत् ये = इसे जो । विदुः= जानते है । ते अमृताः भवन्ति = वे ज्ञानी पुरुष अमर हो जाते है। भावार्थ-यह जो कुछ भी विश्व है, उसी प्राणभूत ब्रह्म से उत्पन्न होकर गतिशील होता है। जो विवेकी जन इसे भयोत्पादक वज्र के सदृश जानते है वे अजर-अमर हो जाते है । कहने का तात्पर्य स्पष्ट है कि आत्मा ही प्राण रूप में मभी शक्तियो का आधार है। इसी गति से सब गतिवान है और इसकी स्थिरता से सभी काम-काज ठप पड़ जाता है। 2 This whole world comes forth and moves because there is the Brahman He is an extreme fear like a thunder bolt Those who realise so become immortal भयादस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः। भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः ॥ ३ ॥ पदच्छेद-भयात्, अस्य, अग्निः, तपति, भयात् तपति, सूर्य । भयाद् इन्द्रश्च, वायु च, मृत्युः धावति पञ्चम इति । अन्वयः अस्य भयात् अग्निः तपति, ( अस्य ) भयात् सूर्यः तपति । (अस्य ) भयात् इन्द्रश्च वायुश्च पञ्चम मृत्युः धावति । (शा) भयाद्भीत्या परमेश्वरस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यो भयादि- न्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चम.। न हीश्वराणा लोकपालाना समर्थाना raise ( १४२ ) । = आग सता नियन्ता चेद्वज्रोद्यतकरवन्न स्यात्स्वामिभयभीतानामिव भृत्यानां नियता प्रवृत्तिरुपपद्यते । सस्कृत व्याख्या-अस्य शास्तु परमात्मनो भयाद् अग्निः तपति-ज्वलति, सूर्यश्च तद् भयादेव तपति, तद्भयाद् इन्द्रः वायुः मृत्युः धावति-स्वस्वव्यापारे प्रवर्तते, तच्छासन शिरसाऽनुगालयति, इत्यर्थः । हिन्दी शब्दार्थ-अस्य भयात् = इसी के भय से । अग्निः तपति जलती है। सूर्य तपति = सूर्य प्रकाशित होता है । इन्द्रश्च वायुश्च = इन्द्र और वायु गतिशील होते है । पञ्चम. मृत्युः धावति = पाचवाँ ( अग्नि-सूर्य-इन्द्र-वायु) के अतिरिक्त मृत्यु भी उसी (आत्मा) के नियन्त्रण में है। भावार्थ -आत्मा के भय से ही अग्नि (उदानवायु ), इसी के भय से सूर्य (प्राणवायु ), इन्द्र ( मन ), वायु (व्यानवायु ) एवं पाचवा मृत्यु भी अधीनस्थ होकर कार्यरत रहते है। यहां प्राण का अर्थ ब्रह्म मानकर भगवान शंकराचार्य ने अग्नि, सूर्य, इन्द्र, वायु, और मृत्यु को भी अग्निस्वरूप स्वीकार किया है। 3 From fear of him fire buins, from fear of Him the sun shines and from fear of Him Indra, Vayu and the fifth Death do their own works. इह चेदशकद् बोर्बु प्राक् शरीरस्य विस्रसः । ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते ॥ ४ ॥ पदच्छेद-इह, चेत् अशकद्, बोद्धम्, प्राक्, शरीरस्य, विस्रस । ततः सर्गेषु, लोके पु, शरीरत्वाय कल्पते । अन्वय-इह चेत् शरीरस्य विस्रस प्राक् बोद्धुम् अशकत् ( तदा मुक्तो भवति ) ततः सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय कल्पते । [शा० ] इह जीवन्नेव चेद्यद्यशक्नोति शक्त सञ्जानात्येतद्भयकारणं ब्रह्म बोद्धमवगन्तु प्राक्पूर्व शरीरस्य विस्रसोऽवस्रसनात्पतनात्संसारबन्ध- नाद्विमुच्यते । न चेदशकद्वोधु तत अनवबोधात्सर्गेषु सृज्यन्ते येषु स्रष्टव्याः प्राणिन इति सर्गा पृथिव्यादयो लोकास्तेषु सर्गेषु लोकेषु शरीरत्वाय शरीरभावाय कल्पते समर्थो भवति शरीर गृह्णातीत्यर्थः। तस्माच्छरीर- विस्रसनात्प्रागात्मबोधाय यत्न आस्थेयः ।
( १४३ ) । सस्कृत व्याख्या-इह-अस्मिन् संसारे शरीरस्य विस्रसः-विस्त्रमनात्- पतनात्-प्राक् बोद्धम्-ब्रह्मज्ञातु अशकत्-अशक्नुवान चेत् अत्र छान्दसविकरण- व्यत्ययो शेय.। तत --तस्माद् हेतो ( ज्ञानाभावाद् ) सर्गेषु लोकेषु-सृज्यमान सर्व- लोकेषु शरीरत्वाय-जन्मजरामरणादिलक्षणाससृति कल्पते-प्राप्नोति । हिन शब्दार्थ --इह = समार मे । गरीरस्य = शरीर के । विस्रप.प्राक् = विनाश के पहले। चेत् = यदि । बोद्ध अगकत् = जानने में समर्थ । तत' = इसके बाद । सर्गेपु लोकेपु = लोक-लोकान्तरो मे । शरीरत्वाय = बारम्बार शरीर ग्रहण के लिये । कल्पने = समर्थ होता है । भावार्थ-गरीरान्त के पूर्व ही आत्मबोध करनेवाला व्यक्ति समार के आवागमन ( ८४ लाख योनी) से छुटकारा पा जाता है, अन्यथा उसे बार बार शरोर धारण करना पड़ता है । 4 If one gets success in knowing that Brahman here in this world before decaying of the body, one becomes free from the bondage of the world otherwise entangles in the creation again and again. यथादर्श तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथाप्सु परीव ददृशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥५॥ पदच्छेद-यथा, आदर्श, तथा, आत्मनि, यथा, स्वप्ने, तथा, पितृलोके, यथा, अप्सु, परि इव, ददृशे, तथा, गन्धर्वलोके, छायातपयो', इव, ब्रह्मलोके । अन्वय-यथा आदर्श तथा आत्मनि, यथा स्वप्ने तथा पितृलोके, यथा अप्सु तथा गन्धर्वलोके परिददृशे इब ब्रह्म लोके छायातपयो इव । [ शा० ] यथादर्श प्रतिबिम्बभूतमात्मानं पश्यति लोकेऽत्यन्तविविक्तं तथेहात्मनि स्वबुद्धौ आदर्शवनिर्मलोभूतायां विविक्तमात्मनो दर्शन भवती- त्यर्थः । यथा स्वप्नेऽविविक्त जाग्रद्वासनोद्भूतं तथा पितृलोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मन कर्मफलोपभोगासत्वात् । यथा चाप्सु अविभक्तावयवमात्मरूपं परीव ददृशे परिदृश्यत इव तथा गन्धर्वलोकेऽविविक्तमेव दर्शनमात्मन. एवं च लोकान्तरेष्वपि शास्त्रप्रामाण्यादवगयते । छायातपयोरिवात्यन्त- .
( १४४ ) विविक्त ब्रह्मलोक एवैकस्मिन् । स च दुष्प्रापोऽत्यन्तविशिष्टकर्मज्ञानसाध्य- त्वात् । तस्मादात्मदर्शनायेहैव यत्नः कर्तव्य इत्यभिप्रायः । संस्कृत व्याख्या-आत्मनो दुर्बोधत्वमुच्यते-यथा आदर्श-दर्पणे प्रतीयमानं वस्तु-साक्षादृष्टवस्तुवत् प्रतिकूलमुखत्वाद् सम्पक्तया नोपलभ्यते । तथा आत्मा- ऽपि सम्यक् नावबुध्यते । एव लोकान्तरविषयेऽपि माह-यथा स्वप्ने-स्वप्नदर्शनस्य जाग्रदर्शनवत् न सम्यक्तया, अव-बोधोमवति तथा पितृलोके ( अर्थात् कर्मणि- एव व्यापृतात्मनि परमात्मनोऽन्यथा प्रतीतिर्भवति ) । यथा अप्सु-जलान्तर्गत वस्तुनो बहिर्वतमानवत् न सम्यक् परिददृशे-न स्पष्टतया परितो दृश्यते तथा गन्धर्वलोके आपातत भवतीत्यर्थः। छायातपयो-उभयोमिश्रणे शुद्धातपवति पदार्थवत् नावबुध्यते तथा ब्रह्मलोके न सम्यग् उपलभ्यते अतो ब्रह्मलोकपर्यन्तं दुरधिगमनात्मतत्त्वमिति भावः । हिन्दी शब्दार्थ-यथा आदर्श = जैसे स्वच्छ दर्पण मे। तथा आत्मनि उसी प्रकार अन्तःकरण में । यथा स्वप्ने = जैसे स्वप्नावस्था मे । तथा पितृलोके उसी तरह मंसार-प्रपत्र मे । यथा अप्सु - जैसे जल मे । परि इव = फैले समान । ददृशे = दिखाई पडता है । गन्धर्वलोके = गन्धर्व लोक मे । छायातपयो: इव = छाया और धूप की तरह । ब्रह्मलोके = ब्रह्म लोक में । भावार्थ-दर्पण मे जैसी मुखाकृति दिखाई देती है उसी प्रकार बुद्धि में भी आत्मा दृष्टिगोचर होता है । स्वप्नावस्था मे जैसे अज्ञानी व्यक्ति को जाग्रत अवस्था के संस्कार सत्य प्रतीत होते है उसी प्रकार पितृलोक मे जलमे भी पडी तिच्छाया के समान, स्तुतिपरक गन्धर्व लोक में आत्मा के अस्पष्ट ए व सदिग्ध दर्शन होते है । केवल ब्रह्मलोक में ही छाया और धूप के समान आत्मा और अनात्मा का सभ्यक् ज्ञान होता है। विशेष -ससार जाल में फंसा व्यक्ति संसारिक लोगो द्वारा माने गये रूप को यदि अपना वास्तविक रूप मानता है तो उसकी यह मान्यता स्वप्न में देखे हुए विश्व को यथार्थ मानने के समान है। वस्तुतः गन्धर्व लोक के समान प्रशसकों द्वारा रचित यशोगान जल में पड़ी रेखा के समान चंचल एवं अस्पष्ट है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप का भान तो ब्रह्म लोक में ही सम्भव है जहाँ ज्ञान और अज्ञान, प्रकाश एवं अन्धकार के समान प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होते है। अन्त करण के के धीरो, न, ( १४५ ) अवस्थाभेद से और लौकिक अनुभव के भेद से यहाँ चार अवस्थाओ का वर्णन किया गया है। (१) दर्पण-बुद्धि, (२) स्वप्न-पितृलोक, (३) जलगन्धर्व लोक, ( ४ ) आतप-छाया । 5 As an image is seen in a mirror, SO Atman is seen in pure inte]lect, as in a dream so in the world of forea fathers; as it is seen in water so in the world of Gandharvas and as it in the world Brahman like light and shade. इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानाना मत्वा धीरो न शोचति ॥६॥ पदच्छेद-इन्द्रियाणाम्, पृथग्भावम्, उदयास्तमयो, च, यत् । पृथग्-उत्पद्य- मानानाम्, मत्वा, शोचति । अन्वय-पृथक् उत्पद्यमानानाम् इन्द्रियाणा यत् पृथग्भावम् उदयास्तमयो, च यत् धीरः ( एतद् ) मत्वा न शोचति । [ शां०] इन्द्रियाणा श्रोत्रादीनां स्वस्वविषयग्रहणप्रयोजनेन स्वकार- णेभ्य आकाशदिभ्य. पृथगुत्पद्यमानानामत्यन्तविशुद्धात्केवलाच्चिन्मात्रात्म- स्वरूपात् पृथग्भावं स्वभावविलक्षणामकता तथा तेषामेवेन्द्रियाणमुदया- स्तमयौ चोत्पत्तिप्रलयौ जाग्रत्स्वापावस्थापेक्षया नात्मन इति मत्वा ज्ञात्वा विवेकतो धीरो धीमान शाचति । आत्मनो नित्यकस्वभावस्याव्यभिचारा- च्छोककारणत्वानुपपत्ते । तथा च श्रुत्यन्तरम् 'तरति शोकमात्मवित्' (छा० ७११३) इति । सस्कृत व्याख्या-पृथगुरुपद्यमानानाम्-पृथग्भूतानामुम्पद्यमानानामिन्द्रिया- णाम-देहादीनामाप प्रहणम्, उदयास्तमयो-उम्पादविनाशलक्षणौ च यत्-यो इत्यर्थ पृथग्भात्रम् -परस्पर वैलक्षण्य लक्षणम् तान् सर्वान् स्वभावान्-इन्द्रमादि- गतान् मत्वा-सम्यगवगम्य नतु आत्मगतम् इति बुद्ध्वा धीरो-विवेकिनः न शोचति (शोक तरति आत्मवित् त्युक्तत्वात् । हिन्दी शब्दार्थ पृथक = आत्मा से भिन्न । उत्पद्यमानानाम = उत्तन होने वाले । इन्द्रियाणाम् = चक्षु-प्राणादि इन्द्रियो के । पृथक् भावम् च = और भौतिक इन्द्रियो से पृथक् भाव को । उक्ष्य अस्तमयौ = उत्त्पत्ति और प्रलय । यत् एतत् ( १४६ ) मत्वा = जो यह जानकर (वार्य करता है ) । धीर = विवेकी । न शोचति शोक नहीं करता। भावार्थ पृथक् पृथक् भूतो ( आकाशादि ) से उत्पन्न इन्द्रियो के अलग अलग भाव एव उनकी उत्पत्ति तथा विनाश को जो जान लेने पर विवेकी व्यक्ति शोक नहीं करता। तात्पर्य यह है जो व्यक्ति ऐन्द्रिक सुखो को ही वास्तविक सुख मानता है उसे अपार वेदना होती है और जो आत्मा को इन्द्रियो से पृथक् मानता है, उसे कोई कष्ट नहीं होता। 6. The intelligent man realising the unlikeness of the senses that are produced seperately and also knowing their rise and fall grieves not at all इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्वमुत्तमम् । सत्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥ ७ ॥ अव्यक्तात्तु परः पुरुपो व्यापकोऽलिङ्ग एव च। ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥ ८ ॥ पदच्छेद-इन्द्रिये म्यः, परम्, मन , मनसः, सत्वम्, उत्तमम् । सत्वाद् पि, महान् आत्मा, महत , अव्यक्तम्, उत्तमम् । अव्यक्तात्, तु, पर , पुरुष, व्यापकः, अलिङ्गः एव, च । य ज्ञात्वा, मुच्यते, जन्तुः अमृतत्वम् च गच्छति । अन्वयः-इन्द्रियेभ्यः मनः पर मनस. सत्त्वम् उत्तम सत्त्वात् अधि महान् आत्मा महत. अन्यतम् उत्तमम् । अव्यक्तात् तु व्यापकः अलिङ्ग एव च पुरुषः परः य ज्ञात्वा जन्तु मुच्यते अमृतत्व च गच्छति । [शा०] इन्द्रियेभ्य पर मन इत्यादि । अर्थानामिहेन्द्रियसमानजातीय- त्वादिन्द्रियग्रहणेनैव ग्रहणम् । पूर्ववदन्यत् । सत्त्वशब्दावुद्धिरिहोच्यते । अव्यक्तात्तु पर पुरुषो व्यापको व्यापकस्याप्याकाशादे सर्वस्य कारण- त्वात् । अलिङ्गो लिड्ग्यते गम्यते येन तल्लिड्ग बुद्धयादि तदविद्यमान- मस्येति सोऽयमलिङ्ग एव । सर्वससारधर्मवजित इत्येतत् । य ज्ञात्वाऽऽ- चार्यतः शास्त्रतश्च मुच्यते जन्तुर विद्यादिहृदयग्रन्थिभिर्जीवन्नेव पतितेऽपि शरीरेऽमृतत्वं च गच्छति सोऽलिङ्गः परोव्यक्तात्पुरुष इति पूर्वेणैव सम्बन्ध । यं ( १४७ ) संस्कृत व्याख्या-इन्द्रियेभ्य:-अत्रेन्द्रियपदमर्थविशिष्टस्य वाचकम्- अन्यत्रेन्द्रियेभ्यः पराह्यर्या इत्युक्तत्वात्, एवं चार्थविशिष्टेभ्य.-शब्दादि, विषय- विशिष्टेभ्य इन्द्रियेभ्यो मनः परमुत्कृष्टम, मनस सत्वम्--बुद्धिः परत्वम्, चात्र वशोकार्यत्वम्, तदेवोत्तमम्, सत्वाद्-बुद्धे , आत्मा महान्परः महत.-अव्यक्तम्, परम्, अव्यक्तात्-पुरुषः पर., स तु व्यापकः, स तु अलिङ्ग -किञ्चिल्लक्षगरहित एव, यमेव ज्ञात्वा जन्तुः जीवात्मा, अमृतत्वम् च गच्छति । हिन्दी शब्दार्थ-इन्द्रियेभ्य. मनः परम् = इन्द्रियो से मन उत्तम ( पृथक् ) है। मनसः सत्वं उत्तमम् = मन से बुद्धि श्रेष्ठ है। सत्वात् महान् आत्मा = बुद्धि से आत्मा उत्तम है। महत अव्यक्तम् = महत्' से त्रिगुणात्मिका मूल प्रकृति । अवि- उत्तमम् = उत्कृष्ट है। भावार्थ-इन्द्रियो की अपेक्षा मन श्रेष्ठ है, मन की अपेक्षा बुद्धि श्रेष्ठ है, बुद्धि की तुलना में आत्मा उत्तम है एव आत्मा से श्रेष्ठ प्रकृति उत्कृष्ट है। कहने का आशय स्पष्ट है कि आत्मा केवल इन्द्रियो से ही भिन्न नही है, अपितु मन, बुद्धि और मूल प्रकृति से भी भिन्न है । विशेष:-उपनिषद्कार ने इस मन्त्र मे आत्मा के सम्बन्ध मे आस्तिक- नास्तिक दर्शनो में प्रचलित शरीरात्मवाद, इन्द्रियात्मवाद आदि से ऊपर उठ कर परब्रह्म त्रिगुणातीत पुरुष को आत्मा को मान्यता दी है। हिन्दी शब्दार्थ-अव्यक्तात् = प्रकृति से । अलिङ्गः = निर्गुण । व्यापकः = सब पदार्थों मे व्यापक । पुरुष' = आत्मा । परः = उत्कृष्ट है। य ज्ञात्वा = जिसकी जान लेने पर । जन्तुः = प्राणी । मुच्यते अमृतत्वम् च गच्छति = जन्म- मरण से छूट जाता है और अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। भावाथ-निर्गुण सर्वव्यापी परमात्मा प्रकृति से भी परे है जिसको जानकर जीव बन्धनमुक्त हो जाता है और अमरत्व को प्राप्त कर लेता है। 7. Mind is higher than senses, the intellect is higher than the mind, Atman is higher than the intellect, and the manifested ( The Prakriti ) is higher than the Atman 8. And the supreme Purush is higher than the 11 in ini fested ( Prakritz). He is pervasive and he has no world.y - ( १४८ । attributes By knowing him every one becomes free and gets immortality न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पक्ष्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषी मनसाभिवलप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ९ ॥ पदच्छेद-न, सदृशे, तिष्ठति, रूपम्, अस्य, न चक्षुषा, पात, कश्चन, एनम्, हृदा, मनीषा, मनसा, अभिषलुप्तः, य', एतद्, विदुः अमृता. ते भवन्ति । अन्वय-अस्य रूप सदृशे न तिष्ठति कश्चन एन चक्षुषा न पश्यति । मनीषा हृदा मनसा अभिक्लप्तः (आत्मा ज्ञातु शक्यते )। ये एतत् विदुः ते अमृताः भवन्ति । [ शा० ] न सदृशे सदर्शनविषये न तिष्ठति प्रत्यगात्मनोऽस्य रूपम् । अतो न चक्षुषा सन्द्रियेण, चक्षुग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वात्, पश्यति नोपल- भते कश्चन कश्चिदप्येनन प्रकृतमात्मानम् । कथ तर्हि त पश्येदित्युच्यते । हृदा हृत्स्थया बुद्धया। मनीषा मनस. सङ्कल्पादिरूपस्येष्टे नियन्तृत्वेनेति मनीट् तया हृदा मनीषा विकल्पयित्र्या मनसा मननरूपेण सम्यग्दर्शनेन अभिलुप्तोऽभिसमर्थितोऽभिप्रकाशित इत्येतत् । आत्मा ज्ञातु शक्यत इति वाक्यशेषः । तमात्मान ब्रह्मतो विदुरमृतास्ते भवन्ति । सस्कृत व्याख्या--अस्य- व्यापकस्य परमात्मनः रूपम्-स्वरूपम् व्यापकत्वा- देव न सदृशे--संदर्शनविषयतया न तिष्ठति, न च कश्चन, एनम् चक्षुषा पश्यति-- अवलोकयति । किन्तु हृदा-आर्द्रहृदयेन-भक्त्येत्यर्थ. मनीषाधृति--धृत्येत्यर्थः मनसा च अभिवलुप्त -अभिमुखी भवति, ये, एतद् विदुः ते अमृता-जन्मजरामरणादि- विमुक्ता भवन्ति इत्यर्थ.। हिन्दी शब्दार्थ- अस्य रूपम् = इस आत्मा का स्वरूप । सन्दृशे न तिष्टति = नेत्र श्रोत्रादिक इन्द्रियो के विषय मे नही ठहरता । एन कश्चन चक्षुषा न पश्यति = इस आत्मा को कोई नेत्र आदि से प्रत्यक्ष नहीं कर सकता। हृदा मनीषा = हृदयस्थ बुद्धि से । मनसा = मनन से । अभिक्लृप्त. - प्रकाशित । एतत् ये विदुः इसे जो जानते है । ते अमृताः भवन्ति = वे अमर हो जाते है । भावार्थ- प्रत्यक्ष का विषय न होने से कोई भी व्यक्ति इस आत्मतत्त्व को भौतिक चक्षु आदि से दृष्टिगत नहीं कर सकता। निर्विकल्प बुद्धि द्वारा निरन्तर ( १४९ ) . चिन्तन से ही यह अभिव्यक्त होता है। जो इसे अच्छी तरह जान लेते है वे मुक्त हो जाते है । तात्पर्य स्पस्ट है कि आत्मा के साक्षात्कार के लिये इन्द्रियो की नही, तत्त्व विवेचिनी बुद्धि की आवश्यकता है। 9. His form is not an object of vision None can see Him with the eyes He is revealed by the insight of the intellect which lives in the heart and controlls the mind. One who knows this becomes immortal. यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥ तां योगमिति मन्यते स्थिरामिन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्तस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ ॥ ११ ॥ पदच्छेद --- यदा, पञ्च, अवतिष्ठन्ते, ज्ञानानि, मनसा, सह । बुद्धि , च, न, विचेष्टति, ताम्, आहुः, परमाम् गतिम् । ताम्, योगम्, इति, मन्यन्ते, स्थिराम्, इन्द्रियधारणाम् । अप्रमत्त तदा, भवति, योग., हि, प्रभवाप्ययौ । अन्वय-यदा पञ्च ज्ञानानि मनसा सह अवतिष्ठन्ते बुद्धिः च न विचेष्टति ता परमा गतिम् आहु । ता स्थिराम् इन्द्रियधारणा योगम् इति मन्यन्ते तदा अप्रमत्तः भवति हि योगः प्रभवाप्ययो । [फा०] यदा यस्मिन्काले स्वविषयेभ्यो निवतितान्यात्मन्येव पञ्च ज्ञानानि-ज्ञानार्थत्वाच्छोत्रादीनीन्द्रियाणि ज्ञानान्युच्यन्ते, अवतिष्ठन्ते सह मनसा यदनुगतानि तेन सल्पादिव्यावृत्तेनान्त करणेम, बुद्धिश्चाध्यवसाय- लक्षणा न विचेष्टति स्वव्यापारेषु न विचेष्टते न व्याप्रियते तामाहु. परमा गतिम् । तामीदृशी तदवस्था योगमिति मन्यन्ते वियोगमेव सन्तम् । सर्वानर्थसंयोगवियोगलक्षणा हीयमवस्था योगिन । एतस्या ह्यवस्थायाम- विद्याध्यारोवणवर्जितस्वरूपप्रतिष्ठ आत्मा। स्थिरामिन्द्रियधारणा स्थिराम- चलामिन्द्रियधारणा बाह्यान्त करणानां धारणमित्यर्थ.। अप्रमत्तः प्रमाद- वर्जितः समाधानं प्रति नित्यं यत्नवांस्तदा तस्मिन्काले यदैव प्रवृत्तयोगो ( १५० ) भवतीनी साम्यर्थ्यादवगम्यते । न हि बुद्धयादिचेष्टाभावे प्रमादसंभवोऽस्ति । तस्मात्प्रागेव बुद्धयादिचेष्टोपरप्रमादो विधीयते। अथवा यदैवेन्द्रियाणा स्थिरा धारणा तदानीमेव निरङ्कुशमप्रमत्तत्वमित्यतोभिधीयतेऽप्रमत्तस्तदा भवतीति । कुत ? योगो हि यस्मात्प्रभवाप्ययावुपजनापायधर्मक इत्यर्थो- ऽतोऽपायपरिहारायाप्रमादः कर्तव्य इत्यभिप्राय । संस्कृत व्याख्या-यदा- यत्र ज्ञानानि-ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानमिति व्युत्पत्या ज्ञानशब्दो इन्द्रिय पर , अतो यत्र सर्वाणीन्द्रियाणि मनसा सह मनयुक्तानि अवतिष्टन्ते-न वास्तुशक्नुवन्ति, ततः परापि बुद्धिरपि न यत्र विचेष्टते-चेष्टाविषय करोति; तामेव परमा गतिम-पदम् आहुर्मनीषिणः इति शेषः । ताम्-पूर्वमन्त्रनिर्दिष्टाम् परमा गतिम् स्थिरमिन्द्रियधारणाम्-निश्चला. मिन्द्रियाणाम धारणाम ( धारणाध्यानसमाधानमध्य प्रथमामवस्थाम् ) अवष्टम्भन- मित्यर्थ , योगमिति मन्यन्ते, तथोक्तम् योगसूत्रे व्यासाय -परमागति. योगः, इति-तदा, जीवोऽप्रमत्तो भवति-इन्द्रियाणा निप्यारत्वे हि अवहतचित्तता भवति । चित्तावधारणकिमर्थमित्याह योगोहि प्रभवाप्ययो-उत्पत्तिविनाशलक्षणौ तद्धि इष्टप्रभवानिष्टाप्ययलक्षण सर्वपुरुषार्थसाधनत्वात् । हिन्दी शब्दार्थ-यदा = जब । पञ्च ज्ञानानि = पाचो ज्ञानेन्द्रियाँ । मनसा सह = मन के साथ। अवतिष्ठन्ते = कार्य-विरत हो जाती है। बुद्धि च न विचेष्टति = वृद्धि भी मन को नियन्त्रित करने की चेष्टा नहीं करती। ता परमा गतिम् = उसे परम गति । आहु. = कहते है । ताम् = उस । स्थिरामिन्द्रियधारणाम् = इन्द्रिय-मन बुद्धि की शान्तावस्था को। योगं इति मन्यन्ते = योग कहा जाता है। तदा = तब । अप्रमत्तः प्रमाद रहित साधक। योग = इस प्रकार का योग । प्रभवाप्ययौ = उत्पत्ति और विनाश। भावार्थ-विषयो को परित्याग कर जब पाँचो ज्ञानेन्द्रियाँ मन के साथ अन्तर्मुख हो जाती है, बुद्धि भी चेष्टाशून्य हो जाती है, उस स्थितप्रज्ञ स्थिति को विद्वान् लोग परम गति कहते हैं। उस गति को योग कहा गया है जिसमे इन्द्रियाँ स्थित हो जाती है। अगर साधक सावधान रहता है तो उसे सिद्धि मिलती है अन्यथा उसका पतन हो जाता - ( १५१ ) है। यही कारण है कि योग को सिद्धि और विनाश का कारण कहा गया है । यहाँ निर्विकल्प समाधि और सविकल्प समाधि के अन्तर की ओर सकेत है। 10 When the five organs of knowledge and the mind take rest together and the power of thinking stops to work then the supreme state comes 11 That atate when the senses are controlled is called Yoga. Then the yogi becomes watchful for the growth and decay of yoga is both possible alike. नैव वाचा मनसा प्राप्तुं शक्यो न चक्षुषा । अस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते ॥ १२ ॥ अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । अस्तीत्येवोपलब्धम्य तत्त्वभावः प्रसीदति ॥ १३ ॥ पदच्छेद-न, एव, वाचा, न मनसा, प्राप्तुम्, शक्य , न चक्षुषा। अस्ति इति, ब्रुवतः, अन्यत्र, क्थम्, तद्, उपलगते । अस्ति, इति, एव, उपलब्धव्यः, तत्वभावेन, च, उभयो.। अस्ति, इति, एव, उपलब्धस्य, तत्वभावः, प्रसीदति । अन्वय -- (परमात्मा) न वाचा एव न चक्षुषा न मनसा प्राप्तु शक्य ! अस्ति इति ब्रुवत अन्यत्र तत् कथम् उपलभ्यते ? उभयोः तत्त्वभावेन अस्ति इति एव उपलब्धव्यः अस्ति इति उपलब्धस्य तत्त्वभाव प्रसीदति । [ शा०] नैव वाचा न मनसा न चक्षुषा नान्यैरसीन्द्रिय प्राप्तु शक्यत इत्यर्थः । तथापि सर्वविशेषरहितोऽपि जगतो मूलमित्यवगतत्वादस्त्येव कार्य- प्रविलापनस्यास्तित्वनिष्ठत्वात् । तथा हीद कार्य सूक्ष्मतारतम्यपारम्पर्येणा- नुगम्यान सद्बुद्धिनिष्ठामेवावगमयति । यदापि विषयप्रविलापनेन प्रविलाप्य- माना बुद्धिस्तदापि सा सत्यप्रत्यगéव विलीयते । बुद्धिहि न प्रमाण सद- सतोर्याथात्म्यावगमे। मूलं चेज्जगतो न स्यादसदन्वितमेवेद कार्यमसदित्येव गृह्येत न त्वेतदस्ति सत्सदित्येव तु गृह्यते, यथा मृदादिकार्य घटादिमृदाद्यन्वितम्। तस्माज्जगतो मूलमात्मास्तीत्येवोपलब्बव्यम् । कस्मात् ? अस्तीति ब्रुवतो- ऽस्तित्ववादिन आगमार्थानुसारिण श्रद्दधानादन्यत्र नास्तिकवादिनि नास्ति , ( १५२ ) जगतो मूलमात्मा निरन्वयमेवेद कार्यमभावान्तं प्रविलीयत इति मन्यमाने विपरीतदर्शिनी कथं तद्ब्रह्म तत्त्वत उपलभ्यते न कथञ्चनोपलभ्यत इत्यर्थ.। अस्तीत्येवात्मोपलब्धव्य सत्कार्यो बुद्धयाधुपाधि । यदा तु तद्रहितो- ऽविक्रिय आत्मा कार्यं च कारणव्यतिरेकेण नास्ति 'वाचारम्भण विकारो नाभधेय मृत्तिकेत्येव सत्यम्' ( छा० ६।१।४ ) इति श्रुतेस्तदा यस्य निरुपा- धिकस्यालिङ्गस्य सदसदादिप्रत्ययविषयत्ववर्जितस्यात्मन तत्त्वभावो भवति तेन च रूपेणात्मोपलब्धव्य इत्यनुवर्तते । तत्राप्युभयो सोपाधिकनिरुपाधिक- योरस्तित्वतत्त्वभावयो निर्धारणार्था षष्ठो-पूर्वमस्तं त्येवोपलब्धस्यात्मनः सत्कार्योपाधिकृतास्तित्वप्रत्ययेनोपलब्धस्य इत्यर्थ । पश्चात्प्रत्यस्तमितस- ोपाधिरूप आत्मनस्तत्त्वभावो विदित विदिताभ्यामन्योऽद्वयस्वभाव 'नेति नेति' (बृह० २।३।६।, ९।२६) इति ‘अस्थूलमनण्वह्रस्वम्' (बृह ३८८) 'अदृश्येऽनात्म्येऽनुरुक्तेऽनिलयने. (ते० २७१) इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टः प्रसीदत्यभिमुखी भवति । आत्मप्रकाशनाय पूर्वमस्तीत्युपलब्धवत् इत्येतत् । सस्कृत व्याख्या केषाश्चिदपि इन्द्रियाणाम् विषया भावान् तम् परमात्मानं वाचा मनसा चक्षुषा वा न प्राप्तुं शक्य , यतो अस्तीति व्यपदेश्यत्वात् । अस्तीति एव ब्रुवतो अन्यत्र कथं तद् उपलभ्यते- भावयति इति तस्वभावस्तेन च तत्वभावेनान्त:-करणेन परमात्माऽस्तीत्येव, उपलब्धव्य ज्ञातव्य. ( बोद्धव्यः ) उभयोः हेत्वो.-उभाभ्यां हेतुम्पामितिति यावत् उभाभ्या शब्दमनोरूपाभ्यामस्तीत्येवोपलब्धस्य ज्ञातवतः पुरुषस्य तत्वभावः अन्त करणं ( मनः) प्रसीदति- प्रसन्न भवति रागादिदोषरहित भवतीत्यर्थः। हिन्दी शब्दार्थ-न एव वाचा = न वह (आत्मा) वाणी से। न मनसा = न मन से । न चक्षुषा = न नेत्रो से । प्राप्तुं शक्य. = प्राप्त किया जा सकता है । अस्ति इति ब्रुवत' = वह है कहने वाले द्वारा। उपलभ्यते - प्राप्त होता है। अन्यत्र = इसके विपरीत । तत् कथम् = वह (आत्मा) कैसे प्राप्त हो सकता है। अस्ति = आत्मा है । इति एव = इस प्रकार । उपलब्धव्य -प्राप्ति का विषय है। तत्त्व-भावेन = आत्मा को सत्ता और उसके गुणो के सम्यक् ज्ञान से । उपलब्धव्य. = ज्ञातव्य है । उभयो. = दोनो ज्ञानो मे । अस्ति = है । तत्व ( १५३ ) उपलब्धस्य = ज्ञानवान के। तत्त्वभाव = आत्मा का यथार्थ स्वरूप । प्रसीदति प्रगट होता है। भावार्थ-आत्मज्ञान केवल वाणी-मन-नेत्रो के बाहरी ज्ञान से प्राप्त नही किया जा सकता । समस्त चैतन्य के कारणभूत इस आत्मा की सत्ता स्वीकार करने वाला साधक ही इसका साक्षात्कार कर सकता है, इसके विपरीत आचरण करने वाला नास्तिक इसे कैसे पा सकता है। अर्थात किसी प्रकार प्राप्त नही कर सक्ता। आत्मा की सत्ता तथा उनके गुणो का ज्ञान इन दोनो मे जो साधक आस्थावान है, उसे तत्त्वभाव अनायास ही मिल जाता है। उपनिषद्करा का आशय पूर्ण रूप से स्पष्ट है कि आत्मानुभूति के लिये सर्वप्रथम सात्त्विकश्रद्धा से युक्त परमतत्त्वरूपी परमात्मा में आस्तिकता की आवश्यकता है। इत वह है ऐसा मानना परमावश्यक है। बात भी सत्य है सविकल्पक ज्ञान, निर्विकल्पक ज्ञान के विना संभव कैसे होगा। 1-. The self can not be obtained neither through speech nor thiough mind. He can not be seen through the eyea too How can he be then known except bo tuose who accept his existence. 13 The soul is to be realised only by having the faith and real sense bothen his existence Those who accept that the soul exists, the real senso itself come to themselves. यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः । अथ मोऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते ॥१४॥ यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मोऽमृतो भवत्येतावद्धयनुशासनम् ॥ १५ ॥ पदच्छेद-यदा, सर्ने, प्रमुच्यन्ते, कामा, ये, अस्य, हृदि, श्रिता । अथ, मत्यः, अमृतो, भवति, अत्र, ब्रह्म, समश्रुते । यदा, सर्ने, प्रभिद्यन्ते, हृदयस्य, इह, ग्रन्थयः । अथ, मर्त्यः अमृत , भवति, एतावत्, अनुशासनम् । .
( १५४ ) अन्वय-यदा अस्य हृदि श्रिता सर्व कामा प्रमुच्यन्ते अयं मर्त्यः अमृतः भवति अत्र ब्रह्म सनश्नुते । यदा इह हृदयस्य सर्वे ग्रन्थय प्रभिद्यन्ते अथ मर्त्यः अमृत' भवति । एतावत् ही अनुशासनम् । [शा०] यदा यस्मिन्काले सर्वे कामा कामयितव्यस्यान्यस्याभावात्प्र- मुच्यन्ते विशीर्यन्ते येऽस्य प्राक्प्रतिबोधाद्विदुषो हृदि बुद्धौ श्रिता आश्रिता । बुद्धिर्हि कामानामाश्रयो नात्मा । 'काम सकल्प' (बृह० ११५१३) इत्यादि- श्रुत्यन्तराच्च । अथ तदा मर्त्यः प्राक्प्रबोधादासीत्स प्रबोधोत्तरकालम- विद्याकामकर्मलक्षणस्य मृत्योविनाशादमृतो भवति। गमनप्रयोजकस्य मृत्योविनाशाद्गमनानुपपत्तेरत्रेहैव प्रदीपनिर्वाणवत्सर्वबन्धनोपशमाद् ब्रह्म समश्नुते ब्रह्मैव भवतीत्यर्थ. यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते भेदमुपयान्ति विनश्यन्ति हृदयस्य बुद्धेरिह जीव एव ग्रन्थयो ग्रन्थिवद् दृढबन्धनरूपा अविद्याप्रत्यया इत्यर्थः । अहमिद शरीरं ममेदं धनं सुखी दु खो चाहमित्येवमादिलक्षणास्तद्विपरीतब्रह्मात्मप्रत्ययोप- जननाद् ब्रह्मवाहमस्मि अससारीति विनष्टेष्वविद्याग्रन्थिषु तन्निमित्ता' कामा मूलतो विनश्यन्ति। अथ मर्योऽमृतो भवत्येतावद्धय तावदेवताव- न्मात्र नाधिकमस्तीत्याशङ्का कर्तव्या। अनुशासनमनुशिष्टिरुपदेश सर्व- वेदान्तानामिति वाक्यशेष । यदा पुरुषस्य सर्ने कामा -विषयविषयकमनोरथाः ये अस्य हृदि- अन्त.करणे श्रिता. स्थिताः प्रमुच्यन्ते--शान्ता भवन्ति तदा अथ-अनन्तरमेव अयम् मर्त्यः उपासको, अमृतो भवति अर्थात् पूर्वोत्तरकृताधनिवृत्त भवति -तदाऽत्रैव ब्रह्म समश्नुते--अनुभवतीत्यिर्थः। सस्कृत व्याख्या-युक्तमेवार्थ सादरेणानुशासनेनोपदेष्ठव्यरूपेण कथयन् उपसहार करोतिन्यदेति--यस्यामवस्थायाम्, अस्योपासकस्य हृदयस्य सर्ने-ग्रन्थयः दोषा रागद्वेष्यादयः प्रभिद्यन्ते--विदीयंन्ते, अथ--अनन्तरमेव उपासकोऽमृतो भवति, एतावद् अनुशासनम्--अनुशासनीयम्-उपदेष्टव्यम् । हिन्दी शब्दार्थ-ये कामाः = जो वासनाएँ। अस्य हृदि श्रिताः = इस ( साधक ) के हृदय में वर्तमान है। सर्वे यदा प्रमुच्यन्ते = जब सभी छूट जाती हैं । अथ = इसके बाद । मत्यः अमृत. भवति = मनुष्य बन्धनमुक्त हो जाता है। - ( १५५ ) इह = इस जीवन में। यदा हृदयस्य ग्रन्थयः = हृदय की ग्रन्थियाँ । प्रभिद्यन्ते = सुलझ जाती है। अथ = इसके बाद । मर्त्यः = मनुष्य । अमृतो भवति = अमर हो जाता है । एतावद् = इतना। अनुशासनम् = उपनिषद् की आज्ञा ( आदेश ) है। भावार्थ-हृदयगत सभी काम्य कर्मों के नष्ट होने पर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है और इसो अवस्था मे उसे ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। तात्पर्य स्पष्ट है कि जीवन्मुक्ति और ब्रह्म की प्राप्ति के लिये कामनाओ का त्याग आवश्यक ही नही, अनिवार्य भी है। जब जीवित अवस्था में ही ग्रन्थिके समान अविद्या-बुद्धि का नाश हो जाता है तथा तन्मूलक कामनाओ का सहार हो जाता है तब साधक अमरपद पा जाता है, क्योकि उसे 'अह ब्रह्मास्मि' का बोध हो जाता है। बस, यहो सभी वेदान्तो का उपदेश है। 14 When all the desires living in a mortal's heart are killed, he becomes immortal and attain Brahman here 15. When all the bondages of heart are destroyed here a mortal becomes immortal. This is the teaching (of all the Upanisads ) शतं चैका च हृदयस्य नाडयास्तासां मूर्धानममिनिःसृतैका। तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६॥ पच्दछेद-शतम् च, एका, च, हृदयस्य, नाड्यः तासा, मूर्धानम्, अभि- नि सृता, एका । तया, ऊर्ध्वम्, अयन्, अमृतत्वम्, एति विष्वड्, अन्या, उत्क्रमणे, भवन्ति । अन्वय-हृदयस्य शतं च एका च नाड्य । तासाम् एका मूर्धानम् अभिनि सृता। तया ऊर्ध्वम् आयन् (जीवः ) अमृतत्वम् एति । अन्या उत्क्रमणे विष्वक भवन्ति । शा ) शतं च शतसख्याका एका च सुषुम्ना नाम पुरुषस्य हृदयाद्वि- निःसृता नाड्य शिरास्तासा मध्ये मूर्धान भित्त्वाभिनि सृता निर्गता सुषुम्ना नाम। तयान्तकाले हृदय आत्मानं वशीकृत्य योजयेत् । तया नाड्योर्ध्व- , प्रधानतया शत- - ( १५६ ) मुपर्यायन्गच्छन्नादित्यद्वारेणामृतत्वममरणधर्मत्वमापेक्षिकम् । 'आभृतसंप्लवं स्थानममृतत्व हि भाव्यते' ( वि० पु० २१८९७) इति स्मृते ब्रह्मणा वा कालान्तरेण मुख्यममृतत्वमेति भुक्त्वा भोगाननुपमान्ब्रह्मलोकगतान् । विष्वड्नानाविधगतयोऽन्या नाड्य उत्क्रमणे निमित्त भवन्ति संसारप्रति- पत्यर्था एव भवन्तीत्यर्थ । सस्कृत व्याख्या-हृदयस्य-हृदयदेशे विद्यमाना नाड्य का च-एकगतसंख्याकाः सन्ति, तासा मध्ये एका सुषुम्ना नाम्नी नाडी मूनिमभिनि सृता सैव ब्रह्मनाडी इत्युच्यते । तया-नाड्या, ऊध्वं-लोकं अयन्- गच्छन अमृतत्व--ब्रह्मलोकम एति -प्राप्नोति तदा एति -प्राप्नोति तदा ब्रह्मप्राप्तिर्भवति, इत्यर्थः, अन्मस्तु नाडयः, विष्वग-गतयः सन्ति तयोत्क्रमणे- ऊर्ध्वगमने नानाविधससार- मार्गोत्क्रमणा युज्यन्ते इत्यर्थ । हिन्दी शब्दार्थ-हृदयस्य शत च एका च नाड्यः = हृदय की एक मौ एक नाडियां है । तासाम् = उनमे से । एका मूर्धानम् = एक (सुषुम्ना शिर को ओर । अभिनि सृता = निकलती है । तया = उसके द्वारा । उध्वमायन् = प्राणो को ब्रह्म- रन्ध्र की ओर ले जाता हुआ। अमृतत्त्वम् एति = अमरत्व को प्राप्त करता है । उत्क्रमणे = प्राण त्याग मे । अन्याः = दूसरी सो नाडियाँ । विष्वड भवन्ति = अमरत्व से भिन्न गतियो का कारण हाती है । भावार्थ- हृदय मे एक सौ एक नाडिया है उनमे सुषुम्ना नाडी के ब्रह्म- रन्ध्र को आर गयी है जिसकी सहायता से साधक अमरत्व लाभ करता है। अन्य सौ नाडियाँ विभिन्न भागो की आर उन्मुख रहती है, फलतः साधक को बार-बार ससार मे आना पडता है । 16 The heart has one hundred and one nerves number of them one goes out by piercing through the head If o he goes up through this uerve gets immortality and if he chooses the nerves having different directions becomes mortal, अंगुष्ठमात्र: पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । तं स्वाच्छरीरात प्रवृहेन्मञ्जादिवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममतमिति ॥ १७ ॥ in - ( १५७ ) पदच्छेद- अङ्गुष्टमात्र:, पुरुष , अन्तरात्मा सदा, जनानाम्, हृदये सन्नि- विष्ट । तम्, स्वात्, शरीरात्, प्रवृहेत्, मुखात्, इव, वा, इषीकाम् धैर्येण, तम्, विद्यात्, शुक्रम्, अमृतम्, तम् विद्यात्, शुक्रम्, अमृतम् । अन्वय - अगुष्ठमात्रः पुरुष. अन्तरात्मा सदा जनाना हृदये सन्निविष्ट । मुञ्जात् इषीकाम् इव तं स्वात् शरीरात धैयेण प्रवृहेत् । त शुक्र म् अमृत विद्यात् । [ शा०] - अड्गुष्ठमात्र पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनाना सम्बन्धिनि हृदये सनिविष्टो यथाव्याख्यातस्त स्वादात्मीयाच्छरीरात्प्रवृहेदुद्यच्छेन्निकर्षे- त्पृथक्कुर्यादित्यर्थः। किमिवेत्युच्यते मुञ्जादिव इषोकामन्त स्था धैर्येणा- प्रमादेन । त शरीरान्निष्कृष्ट चिन्मात्र विद्याद्विजानीयाच्छुक्रममृत यथोक्तं ब्रह्मेति । द्विवचनमुपनिषत्परिसमाप्त्यर्थमितिशब्दश्च । सस्कृत व्याख्या-पूर्व शरीरान्तवर्तिहृदयदेशे अड्गुष्ठमात्रप्रमाण. जीवा- स्मन स्थितिः उक्तः अधुना तु अड्गुष्ठमात्र पुरुष , अन्तरात्मा अन्तर्यामी सदा जनानाम् हृदये-हृदयदेशे सन्निविष्ट---प्रविश्य स्थित -पूर्वोक्तस्तु नियम्यः धार्यः शेषश्च, अय तु नियन्तृत्वधारकत्वशेषत्वादिना ततो विलक्षण इत्यर्थः तम्--परमात्मानम् स्वात् शरीरात्-स्वस्य शरीर सम्बधिन आत्मन. प्रवृहेत्--पृथक्त्वेन विविच्य विलक्षण बानीयात्, अत्रोदाहरणम् मुञ्जाद् तृणविशेषात्--तन्मध्यभागे विद्यमान द् इषीकाद् इव । इषीक-तन्मध्यस्थ-तृणम् -यथा मुखाद् भिन्नः तथा जीवात्मन' परमात्मापि भिन्नतया जनायात् धैयेण ज्ञानकौशलेनेत्यादि पूर्वेणान्वयः । त शुक्रम्- वीर्यवत्तरम्, अमृतत्वम्, च विद्यात्-जानीयात् । द्विवचनम् अत्र समाप्ति सूचनार्थम् । हिन्दी शब्दार्थ-अंगुष्ठमात्र---अगूठे के परिमाण वाला । अन्तरात्मा पुरुष - हृदयवासी जीवात्मा । जनानाम् = जीवो के। हृदये - हृदय में। सन्निविष्ट = स्थित । तम् = उस आत्मा को । स्वात शरीरात् = अपने भरीर से। मुञ्जात इषिकाम् इव मूज के सीक के समान । धैर्येण प्रवृहेत=सयम से पृथक् भावार्थ-- (अपने शरीर के) अगूठे के बराबर अन्तरात्मा सभी जीवों मे सदा रहता है । साधक नूज के सीक के समान उस आत्मा को शरीर से विवेकपूर्वक पृथक् करे। शरीर से निकले हुए उस चिन्मय को अमृतस्वरूप ब्रह्म जाने, अमृत जान । D ( १५८ ) 17 The Purush of the size of a thumb the inner self lives always in the hearts of all the creatures one should firmly withdraw him from one's body like a stalk from Munja grass Know Him pure and immortal Know Him pure and immortal मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विभृत्युरन्योऽप्येवं यो विदधत्यात्ममेव १८ पदच्छेद - मृत्युप्रोक्ताम्, नचिकेतः, अथ, लब्ध्वा, विद्याम्, एताम् योग- विधिम्, च कृत्स्नम् ब्रह्मप्राप्त , विरजः, अभूत्, विमृत्यु , अन्य. अपि एवम्, यः वित, अध्यातमम् एव । अन्वय-अथ मृत्युप्रोक्ता एता विद्या कृत्स्न योगविधिं च लब्ध्वा नचिकेत: विरजः विमृत्यु ब्रह्मप्राप्त: अभून । अन्यः अपि य. अध्यात्मम् वित् एवम् एव ( भवति)। [शा०] मृत्युप्रोक्ता यथोक्तामेता ब्रह्मविद्या योगविधि च कृत्स्नं समस्तं सोपकरण सफलमित्येतत्, नचिकेता वरप्रदानान्मृत्योर्लब्ध्वा प्राप्ये- त्यर्थः, किम् ? ब्रह्मप्राप्तोऽभून्मुक्तोऽभवदित्यर्थ । कथम् । विद्याप्राप्त्या विरजो विगतधर्माधर्मो विमृत्युविगत कामाविद्यश्च सन्पूर्वमित्यर्थ । न केवल नचिकेता एवान्योऽपि नचिकेतोवदात्मविदध्यात्ममेव निरुपचरितं प्रत्यक्स्वरूप प्राप्य तत्त्वमेवेत्यभिप्राय , नान्यद्रूपमप्रत्यग्रूपम् । तदेवमध्या- त्ममेवमुक्तप्रकारेण वेद विजानातीत्येव वित्सोऽपि विरज सन्ब्रह्मप्राप्त्या विमृत्युर्भवतीति वाक्यशेषः। संस्कृत व्याख्या-अथ-अनन्तरम् मृत्युना यमेन प्रोक्ताम्--कथिताम्-एताम्- विद्याम्- ब्रह्मविद्याम् कृत्स्नम्--सम्पूर्णम्- योगविधिम, च- पञ्चेत्यादि पूर्वोक्त योग- विधानं च लब्ध्वा प्राप्य नचिकेतो--नचिकेता ब्रह्मप्राप्त, विरज --कल्मषरहितः विमृत्यु--विगतमृत्यु::-आवागमनरूपाससृतिमतिक्रान्तः इत्यर्थ एतादृशः अन्योऽपि य एवं वेत्ति नचिकेता इवात्मम् आत्मान विदध्य--प्राप्य कृतकृत्यो भवतीत्यर्थः। अतः % 3D ( १५९ ) हिन्दी शब्दार्थ-नचिकेत.=वाजश्रवस का पुत्र, कठोपनिषद् कथानायक । मृत्युप्रोक्ता एता विद्याम् = यम द्वारा कही गयो इस आत्मविद्या का । कृत्स्नम् योगविधिम् - सम्पूर्ण योग प्रक्रिया को । लब्ध्वा=जानकर । विरज.= धर्म- अधर्म से मुक्त । विमृत्यु.-मृत्यु के बन्धन से मुक्त होकर । ब्रह्म प्राप्त : अभूत् = ब्रह्म को प्राप्त कर गया। अन्य अपि य.और भी जो कोई । अध्यात्मम वित् इस आत्मतत्व को जान लेता है । एव= उसी प्रकार जीवन्मुक्त हो जाता है। भावार्थ-भगवान् यम द्वारा प्रतिपादित इस ब्रह्म-विद्या तथा सम्पूर्ण योग विधियो को जानकर नचिकेता दोषरहित होकर ब्रह्ममय हो गये। अन्य भी जो साधक अध्यात्मतत्व को नचिकेता की तरह जान लेता है उसे भी ब्रह्मलोक का सायुज्य प्राप्त होता है। विशेष -नचिकेता के तीन प्रमुख प्रश्नो तथा विभिन्न शंकाओ के समाधान के साथ ग्रन्थकार ने अन्त मे आत्मविद्या के अर्थवाद का वर्णन भी कर दिया है, क्योकि लाभात्मक परिणाम को जानकारी के अभाव में मानव की उस ओर प्रवृत्ति नहीं होती चाहे ज्ञान कितना भी उत्तम हो। इस अध्यात्मविद्या प्रतिपादक ग्रन्थ की समाप्ति पर आचार्य और अध्येता की कल्याण कामना हेतु शान्ति पाठ ॐ सहनाववतु-इत्यादि का आवृत्ति की गई है। पाठक इसकी व्याख्या आदि को अन्य के आरम्भ में ही देखने को कृपा करें। 18 Nachiketas having got knowledge as well as the whole proces of yoga imparted by death became free from all impurities and death. Thus the others, too will obtain Brahman who know the inner self. ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु । विद्विषावहै ॥१६॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ग्रन्थ समाप्ति परिशिष्ट कठोपनिषद् में युक्त मन्त्रों की आकारादि क्रम से सूची मन्त्र संकेत अध्याय वल्ली मन्त्र संख्या पृष्ठ अग्निर्यथैको भुवनम् ૨ ९ १२८ २ २ १ २ mr १५६ २ १ १ १ २८ २ २० ७६ १ १ १ ६ १० २ १ ४८ १ २ १४ ६८ २ १ ८ १ २ ५ ५४ अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिः अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा अडगुष्ठमात्र पुरुषो मध्ये अजीयताममृतानाम् अणोरणीयान्महतः अनुपश्य यथा पूर्वे अन्यच्छ्रेयोऽन्यत् अन्यत्र धर्मादन्यत्र अरण्योनिहितः अविद्यायामन्तरे अव्याक्तात्तु परः अशब्दमस्पर्शम् अशरीर् शरीरेषु अस्तीत्येवोपलब्धव्य: अस्य विस्रसमानस्य आत्मान रथिनम् आशाप्रतीक्षे सगतम् आसीनो दूर व्रजति इन्द्रियाणा पृथग्भावम् इन्द्रियाणि हयानाः २ ३ ८ १४६ १ ३ ९८ १५ २२ १ २ ७९ २ १५१ १२३ २ २ ३ ८७ १ १ १ ८ १४ १ २ २१ ७७ ३ ६ १ ३ ८७ ( १६१ ) मन्त्र संकेत अध्याय वल्ली मन्त्र सख्या पृष्ठ २ ३ १ ३ १० १४६ ९२ १४२ २ ३ १ ३ १४ १ १ १ २ २ ३ २ १२२ १३८ ३ १ ३ १ २ २ १३२ १ २ १२ १३ २४ १ ३८ १ २ १ ७२ ६९ ६१६ इन्द्रियेभ्यः परं मनः इन्द्रियेभ्यः परा इह चेदशकद्बोद्धम् उत्तिष्ठत जाग्रत ओम् उशन्ह वै वाजश्रवसः ऊर्ध्व प्राणानुन्यति ऊध्वमूलोऽवाक्शाखः ऋतं पिबन्तो सुकृतस्य एकोवशी सर्वभूतान्तरात्मा एतच्छ्रुत्वा सपरिगृह्य एतत्तुल्यं यदि मन्यसे एतदालम्बन श्रेष्ठम् एतद्धयेवाभर ब्रह्म एष तेऽग्निर्नचिकेतः एष सर्वेषु भूतेषु कामस्याप्ति जगतः जानाम्यहँ शेवधिः तह कुमार सन्तम् तदेतदिति मन्यते तमत्वोत्प्रीयमाणः त दुर्दर्शगूढम ता योगमिति मन्यन्ते तिस्रो रात्रीर्यदवात्सी. त्रिणाचिकेतस्त्रयम् त्रिणाचिकेतस्त्रिभिः दूरमेते विपरीते देवरमापि विविकित्सितम् २ १ १ ३१ १ ३ १२ १ २ १ २ १० २ १ २ २ १४ १ १ ६८ २६ १ २ २ ३ १ १४९ १५ १ १ ९ १ १८ १७ १ १ २ १ १ २७ ५३ १ २१ ( १६२) अध्याय वल्ली मन्त्र सख्या पृष्ठ १ १ २२ १८ १ २ ७३ २ २ १५ १ ८ २ २ १२४ १ 10 २७ २ ३ १४८ मन्त्र सकेत देवरत्रापि विचिकित्सितम् न जायते म्रियते वा न तत्र सूर्यो भाति न नरेणावरेण न प्राणेन नापानेन न वित्तेन तपंणीयः न सदृशे तिष्ठति न सांपरायः प्रतिभाति नाचिकेतमुपाख्यानम् नायमात्मा प्रवचनेन नाविरतो दुश्चरितात् नित्योऽनित्यानाम् नैव वाचा न मनसा नैषा तर्केण मति. पराचः कामाननुयन्ति पराञ्चिखानि व्यतृणत् १ २ ६ १ १ ३ २ २ २३ ८० १ २४ १३ २ २ १ १२ ९ २ ६१ २ १ २ १०३ १०१ २ १ १ पीतोदका जग्धतृष्णाः १ १ ३ ६ २ २ १ १ १ २३ ३ १ १ ५ पुरमेकादशद्वारम् प्रते ब्रवीमि तदु बहूनामेमि. प्रथमः भयावस्याग्निस्तपति मनसैवेदमाप्तव्यम् महतः परमव्यक्तम् मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतः २ ३ ३ ट २ १ १ ११३ १ ११ २ १८ १५८ १ ३ य इमं परम् य इमं मध्वदम् २ १०६ १२७ य एष सुप्तेषु जागति २ २ ८ ( १६३ ) मन्त्र सकेत अध्याय वल्ली मन्त्र संख्या पृ० or ३ १३ १ ९ २ ३ ५ १११ १४३ १८ १ १ २ १ २ १ १५ १ २ २ ३ १५ २ my ११७ १४९ १५३ १५३ १४० ११२ ८९ ९१ २ ३ यच्छेद्वाड्मनसी यतश्चोदेति सूर्यः यथादर्श तथा यथा पुरस्ताद्भविता यथाोदकं दुर्गे वृष्टम् यथोदक शुद्ध शुद्धम् यदा पञ्चावतिष्ठन्ते यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते यदिद किच जगत्सर्वम् यदेवेह तदमुत्र यस्तु विज्ञानवान् यस्तु विज्ञानवान् यस्त्वविज्ञानवान् यस्त्वविज्ञानवान् यस्मिन्निद विचिकित्सन्ति यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च यः पूर्वे तपसः यः सेतुरीजानानाम् या प्राणेन संभवति २ २ १ १ ६ १ ३ ८ ३ १ my १ or २९ २ ८२ १०८ २ ६ १ my २ २ ७ ये रूप रसम् १०९ १०४ १ ३ २ १ १ २० ३२ १ १ २५ २ २ ७ येयं प्रेते विचिकित्सा ये ये कामा दुर्लभाः योनिमन्ये प्रपद्यन्ते लोकादिमग्निम् वायुर्यथैको भुवनम् विज्ञानसारथियंस्तु १ १ १५ १२६ २४ १३० २ २ १ ३ on (१६४ ) मन्त्र सकेत अध्याय वल्ली मन्त्र सख्या पृ० १ १ ७ १२ २ ३ १५५ १ १ २३ १ १ १० १ २ १ २ २ २६ ५७ ५० ४१ २१ १ १ १ वैश्वानरः प्रविशति शत चैका च हृदयस्य शतायुष, पुत्रपौत्रान् शान्तसकल्पः सुमनाः श्रवणायापि बहुभिः श्रेयश्च प्रेयश्च श्वोभावा मत्य॑स्य स त्वमग्नि स्वय॑म् स त्वं प्रियान्प्रियरूपांच सर्वे वेदा यत्पदम् सह नाववतु स होवाच पितरम् सूर्यो यथा सर्वलोकस्य स्वप्नान्त जागरितान्तम् स्वर्गे लोके न भयम् ह, सः शुचिषद्वसुः १ २ ३ १ २ १५ ७१ २ ३ १ १५९ १ १ ७ २ २ ११ २ ४ १ १२ २० २ २ २ २ २ ६ हन्त त इद प्रवक्ष्यामि हन्ता चेन्मन्यते १२० १२५ ७५ १ २