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ऋशी दयानन्द जीवन कथा

Ghaasiiraama Baabuu · 2005/07/25

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श्रीमदयानन्द जन्म शताब्दी सं० १९८१ के उपलक्ष्य में
श्रो३म्
ऋषि दयानन्द जीवन कथा
बालकों के हितार्थ।
१४
ऋषि दयानन्द,
लेखक:-बाबू घासीराम एमे.
मेरठ
मुद्रक व प्रकाशक:-बाबू शिवकृपाल विद्या प्रिंटिंग प्रेस मेरठ ।
प्रथमवार ५०००
सन् १९२५
र मूल्य )

श्रोम
आर्यसमाज के नियम ।
(१)-सव सत्यविद्या और जो पदार्थ विद्या से जाने जाते हैं
उन सब का आदि मूल परमेश्वर है ।
(२)-ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान ,
न्यायकारी, दयालु, अजन्मा,अनन्त, निर्विकार, अनादि,
अनुपम,सर्वाधार,सर्वेश्वर सर्वव्यापक. सर्वान्तर्यामी. अजर
अपर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। उसी की
उपासना करना योग्य है ।।
(३)-वेद सत्यविद्याओं का पुस्तक है वेद का पढ़ना पढाना और
सुनना सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है ।।
(४)-सत्य ग्रहण करने और असत्य के छोड़ने में सर्वदा उद्यत
रहना चाहिये।
(५)-सब काम धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य को विचार
करके करने चाहिये ।
(६)-संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है
अथात् शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करना।।
(७)-सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार यथायोग्य वर्तना चाहिये ॥
(८)-अनिंद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करनी चाहिये।
(९) प्रत्येक को अपनी ही उन्नति से सन्तुष्ट न रहना चाहिये
किन्तु सवकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिये ।।
(१०)-सब मनुष्यों को सामाजिक सर्वहितकारी नियम पालने
में परतन्त्र रहना चाहिये और प्रत्येक हितकारी नियम
में सब स्वतन्त्र रहें।
.

मेश्म् . ऋषि दयानन्द जीवन कथा जन्म स्थान व पितृकुल । भारतवर्ष के पश्चिम में एक देश है जिसे गुजरात कहते हैं। उसी के एक भाग का नाम काठियावाड है जिसमें बहुत से छोटे २ देसी रजवाड़े राज्य करते हैं जिन्हें ठाकुर कहते हैं। इनमें से एक राज्य का नाम मो: है। उसमें एक कस्बा है जिसका नाम टंकारा है । जिस समय की हम कथा कहने वाले हैं उस समय वहां एक जमेदार रहते थे जो सामवेदी औदीच्य ब्राह्मण थे। उन दिनों टंकाग के इलाके को मोर्वी के ठाकुर ने एक मरहटा संठ के पास गिरवी रख छोड़ा था और उस सेठ को ओर से प्रबन्ध के लिए जमंदार ' नियत थे जिन्हें आज कल की भाषा में तहसीलदार ' कहना चाहिए । जमेदार के नीचे मुन्शी मुत- सही और सिपाही प्यादे रहते थे। टंकारे के उक जमेदार का नाम था करसनजी लालजी त्रिबाड़ी । गुजरात में मनुष्यो के दोहरे नाम होते हैं पहिला नाम मनुष्य का अपना होता और दूसरा उसके पिता का । इसलिए करसनजी जमेदार का नाम था और लालजी उनके पिता का।सं० १८५ विक्रममें जिसे अब सं० १६८१ विक्रम में पूरे सौ बरस हुए उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ जिसका नाम मूलशंकर करसनजी रक्खा गया। प्यार में लोग अपने पुत्रो के नाम को छोटा करके पुकारा करते हैं इसलिए गाता पिता मूलशकर को मूलजी कहा करते थे। मूलशंकर हमें भी बहुत प्यारा है इसलिए हम भी इस बालक

(२)
को मूलजो ही कहेंगे । मूलजी के पिता वैसे तो सामवेदी थे
परन्तु वह शिवजी के भक्त होने के कारण यजुर्वेद को बहुत
मानते थे। पांच ही बरस की श्रायु में मूलजी को पढ़ने
बिठा दिया गया। मूलजी था बुद्धि का तेज़, थोड़े ही दिनों
में पढ़ने में चल निकला और रुद्री श्रादि वेद के बहुत स
मंत्र और संस्कृत के श्लोक कंठ कर लिये। आठवें वर्ष में
मूलजी का जनेऊ हुअा और उसके पिता उसे अपने समान
शिवजी का पका भक्त बनाने का यत्र करने लगे। वह उसे शिव
जी की पूजा का फल बताते, शिवजी की कथा सुनाते और
जहां कहीं शिव पुराण की कथा होती अपने साथ ले जाते।
शिव रात्रि का व्रत
गुजरात में शिवरात्रि का व्रत माघ बदि १४ को होता
है। मूलजी १४ वर्ष का हो गया। करसनजी ने शिवरात्रि का
मूल जी से व्रत रखने को कहा । मूलजी अपनी मां को आंखों
का तारा था। उसकी मां ने अपने पति से बहुत कुछ कहा
कि मूलजी से व्रत न रक्खा जायगा परन्तु करसनजी कदर
शिव भक्त थे, वह काहे को मानने वाले थे। उन्होंने मूलजी से
व्रत रखाकर हो छोड़ा। टंकारे से कुछ दूर शिवजी का एक
बहुत बड़ा मन्दिर है जहाँ टंकारे के आस पास के शेव शिव
चौदश की रात को रात भर शिवजी की पूजा करने के लिए
इकट्ठे होते थे । करसनजी मूल जी को साथ लेकर वहाँ पहुंचे।
पहले पहर की पूजा तो ठोक २ होगई, दुसरे पहर की
पूजा भी ज्यो त्यों करके लोगों ने पूरी की परन्तु उसके पीछे
तो सबको नींद ने श्रा दबाया और सबसे पहले यदि कोई
सोया तो वह करसनजी ही थे । मुलजी तो बालक था उसे
सबसे पहले नींद आनी चाहिये थी और उसे नींद आई भी
परन्तु वह इस डर से कि कहीं सोने से व्रत न टूट जाय

(३)
प्रांतों पर पानी के छींटे देकर जागता रहा। जब सब के सो
जाने के कारण मंदिर में सन्नाटा होगया तो मूलजी ने देखा
कि चूहे अपने बिलों में से निकल कर शिवजी की मूर्ति पर
दौड़ लगाने और चढ़ावे को खाने लगे । मूलजी इसे देख कर
सोचने लगा कि इस मूर्ति को तो सारे जगत् का मालिक
बताया जाता है, यह क्या बात है जो इससे अपने ऊपर से
चूहे भी नहीं हटाए जाते। जब किसी तरह मूलजी का संदेह
न मिटा तो उसने करसनजी को जगाया और जो बात उसके
मनमें खटक रही थी उनसे पूंछो । अब करसनजी चुप, माथे
पर हाथ रखकर साचने लगे कि यह क्या हुश्रा, कहां
१४ वास का लड़का और कहां यह विकट प्रश्न । उत्तर भी
क्या देते ? जब ईश्वर की मूर्ति हो ही नहीं सकती तो मूलजी
को समझाते भी क्या ? ज्यो त्यो करके कुछ उत्तर दिया परंतु
मूलजी ने तुरंत ही काटकर रख दिया। फिर तो करसाजी
बहुत सिटपिटाए और झंझलाए भी परन्तु मूलजी जिसके
मन में सच की खोज की लगन लगी हुई थी उनकी धमकी
में न पाया और प्रश्न पर प्रश्न करके करसनजी को तंग करने
लगा, अन्त को करसनजी को चुप होना पड़ा और मूलजी
के मन से सदा के लिए मर्तिपूजा से श्रद्धा बिदा होगई । अब
मूलजा का मंदिर में जा काहे को लगना था, उसने अपने
पिता से घर जाने की प्राज्ञा मांगी। पिता ने सोचा अच्छा
यह झंझट दूर हो आशा देवी और चपरासी को साथ करके
मूलजी को घर भेज दिया। परंतु चलते २ भी उससे कह दिया
कि देखना कुछ खापी कर व्रत मत तोड़ देना । मूलजी घर
पहुँचा, मां मूलजी का कुम्हलाया हुआ चेहरा देखकर समझ
गई कि बालक से व्रत नहीं रक्खा गया और जब उसने कुछ
खाने को मांगा तो उसने खुशी २ उसे दे दिया । दिन निकलते
ही करसनजी भी मंदिर से लौट कर घर पहुंचे और मूलजी
।

(४) के रात में भोजन करने का हाल सुनकर बहुत बिगड़े। मूलजो के चचा उसे बहुत प्यार करते थे उनके कहने सुनने से करस- नजी का क्रोध शांत हुआ और मुलजी पहिले की तरह लिखने पढने में लग गया। मौत से बचने का उपाय सोचना इसके दो बरस पीछे की बात है कि एक रात को उसकी बहिन को हैजा हो गया। बहुतेरा इलाज किया गया परंतु कुछ फल न निकला और थोड़ी ही देर में वह मर गई । सारे घर में रोना पीटना मच गया परन्तु मूलजी की प्रांख से एक प्रांसू न निकला। वह एक कोने में खड़ा हुभा चुपचाप यह सोचता रहा कि मौत से बचने का भी कोई उपाय है वा नहीं । लोगों ने समझा कि मूल जी का हृदय बहुत कठोर है और इसलिए उसे सबने ही बुरामला कहा । खर दिन बीतते गये और मूलजी के मन में मौत से बचने के उपाय ढूंढने की किरोद बढ़ती गई । जब मूलजी १६ बरस का हुआ तो उसके प्यारे चचा भी हैजे से चल बसे । मरते समय उन्होंने मूलजी को अपने यिस्तर के पास बुलाकर प्यार के साथ देखा और चचा भतीजे फूट २ कर रोने लगे। चचा की मौत के बाद तो मूलजी का चित्त संसार से बिल्कुल ही उछट गया और वह चुपके २ लोगों से यह पथमे लगा कि मनुष्य मौत से कैसे बच सकता है। उसके यह विचार मां बाप पर भी प्रकट हो गये । उन्होंने सोचा कि मूलजी का ब्याह कर देना चाहिये नहीं तो वह किसी दिन घरबार छोड़ कर निकल जायगा। इधर मां बाप के यह विचार उधर मूलजी का यह इरादा कि चाहे जो हो मैं ब्याह नहीं करूंगा। उसने यह सोचा कि मां बाप से काशी जाकर पढ़ने की आशा लू और इस (५) बहाने से शायद ब्याह की बला से बच जाऊं, मां बाप लड़के की बातों में क्यों भाने लगे थे वह उसकी चाल को भाँप गये और उन्होंने भेजने से साफ इन्कार कर दिया । अंत को मूल जी ने सोचकर उनसे यह कहा कि अच्छा जो काशी नहीं भेजते हो तो टंकार से ३ कोस पर जो अमुक पंडित रहता है उसी के पास पढ़ने भेजदो। इस पर वह राजी हो गये और मूलजी वहां जाने लगा । बातों २ में एक दिन उसके मुंह से निकल गया कि मैं ब्याह कभी भी नहीं करूंगा। यह बात करसनजी के कानों तक भी पहुंच गई और वह मूलजी की मां से सलाह करके उसके ब्याह की तैयारी करने लगे । उधर मूलजी ने भी यह ठानली कि घर छोड़ना पड़े सो पड़े पर ब्याह नहीं करूंगा। बाहर एक दिन दिन छिपे घर बार, माता पिता, भाई बंध, का मोह छोड़ कर उसने जंगल का रास्ता लिया और पगडंडियों और खेतों में होता हुश्रा दूसरे दिन सूरज डूबते २ घर से १६, २० कोस निकल गया और एक हनुमान जी के मन्दिर में डेरा किया। उन दिनों वहां सामले गांव में जो मोर्वी रेलवे के मूल नाम के स्टेशन के पास है एक लाला भगत नाम का साधु रहता था जिसके योगी होने की चर्चा थी। मूलजी ने भी उधर को ही कदम बढ़ाया । गस्ते में कुछ साधुओं ने उसके रुपये और अंगूठी प्रादि पहने ठग लिये । वहां वह ब्रह्मचारियों की संगत में पड़कर ब्रह्मचारी बन गया और उसका नाम शुद्ध चैतन्य रक्खा गया। सामने से शुद्ध चैतन्य काठगांगड़ गाँव में पहुंचे जो अहमदाबाद के पास है। यहां उन्हों ने सुना कि कार्तिक में सिद्धपुर में बड़ा भारी मेला होता है जहाँ अच्छे २ योगी याते हैं। रास्ते में उनकी घर से ..

(६) एक बैरागी से भेट हो गई जिस की उनके पिता से जान पहिचान थी। उससे उन्हों ने अपने घर से भागने और सिद्धपुर जाने का सब हाल कह दिया। उसने जाकर कर- सनजी को सब बातें बतादीं। फिर पकड़े गये और फिर भागे प्यारे पुत्रका पता पाते ही करसनजी ने झटपट अपना सामान ठीक करके कई सिपाही साथ लिये और सिद्धपुर को चल खड़े हुए । सिद्धपुर में मूलजी को ढूँढत खोजत नीलकंठ महादेव के मंदिर में पहुंचे। वहाँ उन्होंने देखा कि मूलजी गेरुए कपड़े पहने और तूंवा हाथ में लिए दूसरे साधुश्रा के साथ बैठा है। उसका यह रूप देखकर उनकी आंखों में लोहू उतर आया। उन्होंने आव देखा न ताव झपट कर उसके तू'बे को ज़मीन पर दे पटका और उसके कपड़े चीर २ कर डाल और कहनो न कहनी जो मुंह में आई सो कही । मूलजी क्या करता भीगी बिल्ली बना हुआ सब कुछ चुपचाप खड़ा सुनता रहा और अंत में यह कह कर अपना पीछा छुड़ाया कि वह बुरी संगत में पड़ कर घर से निकल पाया था,अब वह फिर घर लौट जाने पर तय्यार है। करसनजी ने उसे नए कपड़े दिये और उसपर सिपाहियों का कड़ा पहरा खड़ा कर दिया । शुद्धचैतन्य फिर मूलशंकर बनने को तैयार न था। वह इस ताक में रहा कि कब सिपाहियों की आँख झपके पार कब वह भागे । उसने बे नोंद भी जार २ से खर्राटे लेने शुरू कर दिये । सिपाही भी यह सोचकर कि अब तो उनका कैदी सो गया है अब चिंता काहे को है लेट गये और लेटते ही चित हो गये। शुद्ध चैतन्य उठे और एक लोटा हाथ में लेकर दबे पांव पहरे में से निकले कि यदि पकड़े जांयगे तो कह देंगे कि टट्टी जाते हैं नहीं तो काम बन ही गया है। एक बार वहां से निक- (७) लना था फिर तो वह ऐसे भागे जैसे पिंजरे में से तोता। शुद्ध चैतन्य एक पुराने 'दिर में एक बड़े धने पेड़ की डालियों में जा छिपे और सारा दिन वहीं बैठे रहे ।जब गत होगई तब उतरे और जितना जल्द उनसे भागा जा सका भागे और गत को एक गांव में ठहरते हुए अहमदाबाद होकर चाणोद कल्याणी जा पहुंचे जहां विद्वानों की एक बड़ी सभा होने वाली थी। वहां उन्होंने इसलिए कि ब्रह्मचारी वेश में रहते हुए उन्हें भोजन श्राप पकाना पड़ता था संन्यासी बनना चाहा और एक विद्वान् संन्यासी पूर्णानन्द से उन्होंने संन्यास लिया और अब उनका सदा के लिए · दयानन्द सरस्वतो' नाम पड़ गया। योगियों की खोज वह जहां कहीं भी रहे विद्या पढ़ते और योग सीखते रहे। अहमदाबाद में ज्वालानन्द पुरी और शिवानन्द गिरि दो साधुओं सं योग विद्या के बहुत से छिपे भेद उन्हें मालूम हुए और वहां से यह सुन कर कि अाबू पर्वत पर बहुत अच्छे २ योगी रहते हैं वहां जा विराजे और योगियों से मिलकर योग अभ्यास करते रहे । इतने में ही हरिद्वार का सं० १६१२ का कुभ प्रा पहुंचा । उन्हों ने सुना था कि वहां भी बहुत से योगी इकट्ठे होते हैं । वहां पहुंच कर वह चंडी के जंगल में योग अभ्यास करते रहे। जब मला हो चुका तो हृषीकेश गये और वहां से टिहरी। टिहरी में एक दिन एक ब्राह्मण ने इन्हें अपने घर भोजन कान्यौता दिया । परन्तु जब यह उसके घर पहुंचे तो इन्हों ने देखा कि वहां मांस बनाया जा रहा है। यह उलटे पैरों ही वापिस चले पाए । स्वामी जी पहाड़ के बहुत से स्थानों में योगियों को खोजते और पर्वत की सुन्दर, सुहावनी जगहों को देखते । और विद्वान और अच्छे साधुओं से सत्संग करते रहे। घूमने २ एक दिन वह एक ऐसे जंगल में जा पहुंचे जहां से बाहर निकलना दूभर हो गया। कांटों ओर झाड़ियों में इलझकर इनके सारे कपड़े फट गये और शरीर लोहू लुहान हो गया। वहाँ से बड़ी कठिनाई से कितनो ही रात गये ओखी मठ पहुंचे। प्रोखो मठ के महंत ने दयानन्द को चेला बनाना चाहा और उन्हें धन दौलत का लालच दिया। उन्हों ने कहा महंतजी जो मैं रुपये पैसे का भूखा होता तो अपने पिता का घर छोड़ कर ही क्यों पाता। वहां से बदरी नारायण पहुंचे। एक दिन योगियों की खोज में पहाड़ों में घूम रहे थे कि अलखनंदा नदी के निकास की ओर जा निकले जहां इन्हें कोई मार्ग न मिला। सर्दी बड़े कड़ाके की पड़ रही थो पार इनके शरीर पर कपड़े काफ़ी न थे। नदी को पार करके ही यह उस बीहड़ और विकट जगह से निकल सकते थे इस लिए यह नदी में उतरे परन्तु धार ऐसी तेज़ थी कि पैर न जमते थे और बरफ़ के टुकड़े छुरी से अधिक पैन थे। नदी को पार करना बहुत मुश्किल हो गया । बरफ के टुकड़ों से पैर छिद कर छलनी बन गये और उनसे खून कं. फव्वारे छुटने लगे । सारा शरीर सुन्न पड़ गया । एक बार तो दयानंद को यह दिखाई देने लगा कि मौत सामने खड़ी है। वह हिम्मत करके नदी से पार तो होगये परन्तु उनमें हिलने जुलने की ताकत महीं रही थी। उन्हों ने कपड़े फाड़२ कर पैरों के घावों पर पट्टी बांधी और जब कुछ घंटे पीछे उन्हें होश आया और थकान उतरा तो गिरते पड़ते रात के ८ बजे बदरी नारायण के मन्दिर में पहुंचे। वहां से घूमते घामत काशीपुर व द्रोण सागर गये। यहां एक बार उनके मन में प्राण छोड़ने की बाई परंतु फिर आप ही यह सोच कर कि जिस ज्ञान की तलाश में घर से निकले हो उसे बिना जाने ही मर जाना मूर्खता है इस कुविचार से हट गये।

पर दिन नह गंगा के किनारे २ जा रहे थे कि उन्हें एक मुर्दा बहता हुआ दिखाई दिया। हठ योग की पुस्तकों में इन्होंने मनुष्य के शरीर के अन्दर के कई भागों का विचित्र वर्णन देखा था। इनके जी में पाया कि इस मुर्दे को चीर कर देखें कि उन पुस्तकों का लेख ठीक है कि नहीं, बम फिर क्या था, गंगा में कूद पड़े और मुर्दे को किनारे पर खींच लाए । हाथ में छुरी लो श्रीर सामने पुस्तकें रक्खी और मुर्दे को चीरना शुरू किया और एक २ श्रंग का पुस्तकों में लिखी बातों से मिलान करने लगे। जब दोनों में बिल्कुल भी मेल न पाया तो मुर्दे के चिरे फड़े शरीर के साथ ही पुस्तकों को भी गंगा में बहा दिया। गंगा के किनारे घूमते घामते चिडालगढ़ चहुंचे। यहां उन्हें भांग पान की आदत पड़ गई । एक दिन वह चिंडा- लगढ़ के पास एक गाँव में जा निकले जहां एक महादेव जो का मंदिर था। इसमें नादिये की एक बड़ी भारी मूर्ति थी जिस का पेट भीतर से खाली था। इन्हों ने देखा कि उसके पेट में एक आदमी छिपा हुआ है। इन्हों ने उसकी ओर ज्यों ही हाथ बढ़ाया- त्यो ही वह निकल कर भाग गया। यह भी भांग के नशे में चूर थे, उसी नादिये के पेट में घुस कर सो गये। दिन निकन एक बुढ़िया उस पर गुड़ और दही चढ़ाने लाई। इन्हें भूख लग रही थी, उस दही और गुड़ को खूब खाया । दही खट्टा था उसने भांगका नशा उतार दिया। भांग पीने पर यह बहुत पछताए और वहीं इस कुटेव का छोड़ने का परन कर लिया। इधर उधर विचरने २ एक दिन इनके जी में नवंदा नदी का निकास देखने की आई | विचार का आना था कि यह डंडकमंडल लेकर उधर का हीचल दिये। रास्ते बड़े बिकट थे। एक दिन ऐसे जंगल में जा फंसे जहाँ घास और झाडियों के कारण कोई मार्ग न सूझता था। यह उस झाड़ झंकाढ़ में से (१०) निकलने का यत्न कर रहे थे कि एक काला रीछ अपनी पिछली टांगों पर खड़ा होकर चिंघाड़ता हुआ मुंह फैला कर इनकी भोर लपका। यह भी उसके सामने डट गये और अपना साटा उस के मह में दे दिया । वह डर कर पीछे की तरफ को ही लौट गया । यह धागे को बढ़ गये। की जगह जंगल इतना धना था कि इन्हें अपने पेट के बल सरक २ कर उसमें से निकलना पड़ा। इसी प्रकार नर्बदा के किनारे दो तीन बरस घूमते रहे । सत् गुरु मिल गया सम्बत् १६१७ के लगभग दयानंद मथुरा में स्वा०विरजानंद जी से विद्या पढ़ने के लिए गये। स्वा०विरजानंद ऋषियों की बनाई हुई पुस्तकों को ही मानते थे। उन्होंने दयानन्द से दो बान कहीं एक तो यह कि अब तक तुमने जो मनुष्यों की बनाई हुई पुस्तके पढ़ी हैं उन्हें जमना में फेंक आश्रो, दूसरी यह कि अपने खाने पीने का ठीक बन्दोबस्त करलो । गमलान एक गुजराती ब्राह्मण ने जिन्हें जोशी बाबा कहते थे अपने घर भोजन खिलाने का प्रबन्ध कर दिया और यह स्या. विरजानन्द जी से पढ़ने लगे। जैसा चेला विचित्र था गुरु भी वैसे ही विचित्र थे । दयानन्द को अब तक जो गुरु मिले थे उनमे से एक भी विद्या में विरजानंद के जोड़ का न था और विरजानन्द को भी जितने विद्यार्थी मिले थे उनमें से एक भी दयानन्द के पल्ले का न था। दोनों में खूब बनी । चेले ने मन भर के पढ़ा और गुरु ने मन भर के पढ़ाया । विरजानन्द स्वभाव के बड़े तज़ थे। कभी यह दयानंद को पीट भी दिया करते थे परन्तु वह उससे ज़रा भी बुरा न मानते थे। जब दयानंद विद्या पढ़ चुके तो गुरु से विदा होने को सेरभर लोग लेकर गये और उनसे कहा अहाराज मेरे पास दक्षिणा देने को धन तो है नहीं शाप संन्यासी की भेट यह लौंग ही स्वीकार कीजिये । विरजानन्द की आंखों में श्रांस् . ( ११) भर बार और प्यारे शिष्य को छाती से लगाकर बोले कि मैंने तुझे दक्षिणा के लालच से नहीं पढ़ाया है। मैंने तो इस लिए पढ़ाया है कि देश में वैदिक धम् का लोप होकर तरह २ के पाखंड फैले हुए हैं, तू वेदों का और ऋषियों की बनाई हुई पुस्तकों का प्रचार और पाखंड मतों का खंडन कर । दयानन्द ने गुरु का कहना सिर अांखों पर रक्खा, और बिदा हुए । मथुरा से दयानंद श्रागरा गये और वेदों पर विचार और योग अभ्यास करते रहे । भामरे में दयानंद लगभग २ बरस रहे, बीच बीच में जब कोई शंका होती तो उसे मथुरा जाकर गुरुजी से पूछ पाते । ग्वालियर के महाराजाने सं० १६२२ में देश भर से १०० भागवती पंडित इकट्ठे करके भागवत का पाठ कराया था और उस पर हजारों रुपया खर्च किया था । दयानंद भी इस अवसर पर ग्वालियर पहुंच गये। इनके श्राने का समा- चार सुनकर महाराजा ने भागवत पाठ का माहात्म्य पूँछा। इन्हो ने कह दिया कि इसका फल सिबाय दुःख के और कुछ न होगा। कहते हैं कि इधर कथा पूरी दुई उधर महारानी का गर्भ गिरगया, नगर में हैजा फैल गया और छोटे महाराज कुमार का परलोक हो गया । दयानन्द बराबर भागवत का खंडन करते रहे परन्तु पंडितों में से शास्त्रार्थ करने को एक की भी हिम्मत न पडी । ग्वालियर से दयानन्द ने कगेली को कूच किया । करौली के राजा की सभा के पंडित मणिराम से स्वामी जी के शास्त्रार्थ की चर्चा हुई। एक दिन म्वामी जी के सामने पंडित जी राजा को संकल्प का मंत्र बता रहे थे। उन्हों ने 'करिष्ये ' की जगह 'कारस्ये' बोला। स्वामी जी ने कहा आपकी सभा मूर्ख सभा है यहां शास्त्रार्थ कौन करेगा और वहां से उठकर चले श्राए । एक दिन एक पंडित ने श्राकर महा- गजा को आशीर्वाद दिया और उन्हें अन्न दाता कहा । दयानन्द ने तुरंत उसे रोक दिया और कहा ईश्वर के सिशय कोई भी (१२) अन्न दाता नहीं हो सकता। इसके पीछे जब गौज आई नो जयपुर चले गये। जयपुर में उन दिनों वैष्णवों और शैवो में बड़ा भारी शास्त्रार्थ चल रहा था। दयानन्द ने शैवों का पक्ष लिया और वैष्णवों को हराया। महागजा रामसिंह भी शैव बन गये। और सैंकड़े हजारों लोग विष्णु की पूजा छोड़ शिव की पूजा करने लगे। रुद्राक्ष बेचने वालों की चांदी होगई । हाथी और घोड़ों के गले तक में रुद्राक्ष की मालाएं पड़ गई । दयानन्द को लोगो ने बहुत कह सुन कर महाराजा से मिलने की जान के लिए कहा परन्तु जो लोग महाराजा के मंह लगे थे वह नहीं चाहते थे कि दयानन्द की महाराजा से भेट हो क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं उनके उपदेश से महाराजा के विचार पलट जावें और उनका टुकड़ा छिन जावे । एक दिन दयानंद महलों में गये भो परन्तु ऊपर लिखे मनुष्यों की चाल के कारण भेट न हुई । फिर महाराजा ने बहुतरा चाहा कि दया. नन्द उनसे मिल जावें परन्तु वह न गये । एक दिन बहुत से पंडितों ने इकट्ठे होकर कर उनसे शास्त्रार्थ किया परन्तु हार खाई । एक जैनगुरु से भी शास्त्रार्थ की बात चीत हुई और उन्हों ने कुछ प्रश्न दयानन्द के पास लिखकर भेजे। यहां क्या था प्रश्न प्राते देर हुई नहीं कि उनके उत्सर तैय्यार हो गये और उनके साथ में हो कुछ प्रश्न जैनमत पर भी कर दिये गये जिन का जैनगुरु से उत्तर न न पडा। जयपुर से दयानन्द अजमेर पहुंचे और वहां से पुष्कर । वहां भी वह वैष्णवों का खंडन करते रहे और उसका यह परिणाम हुआ कि मैंकड़ों मनुष्यों ने अपने गले से कंठी उतार २ कर फेंक दी। अजमेर आकर उन्हों ने मूर्ति पूजा के खंडन " इश्तहार बंटवाए परन्तु कोई भी उसका मंडन करने के लिए सामने न पाया। पादरियों से भी ३ दिन मुबाहिसा हुआ और उन्हें भी चुप कराकर ही छोड़ा। उन दिनी राजपूताना के एजेंट

कर्नल
ब्रूक
थे जो साधुओं से बहुत चिड़ते थे। एक दिन स्वा०
कोठो के बरामदे में बैठे हुए थे कि सामने सड़क पर से प्रक
साहब निकले। यह स्वामी को देखकर कोठी में चले आए। लोगों
ने स्वामी से अलग हो जाने को कहा परंतु वह और सामने को
हो बैठे। ब्रकसाहब स्वामी से बड़े आदर से मिले और स्वामी
ने उन्हें गौरक्षा का उपदेश किया।
अजमेर से दयानंद जयपुर आए परंतु इस बार शैव मत का
भी खंडन किया । आगरा में सन् १८६६ का लारेंस साहब का
दर्बार था वहां दयानंद ने भागवत के खंडन पर एक पुस्तक बना
कर कई हज़ार बांटो और हरिद्वार सं०१६२४क/कुंभ में चले गये।
पाखण्ड खण्डिनी पताका
मेले में पहुंच कर दयानंद ने अपनी कुटिया पर 'पाखंड
खंडिनो' झंडी लगाई। अनेक लोग उनका उपदेश सुनते रहे।
मेले में उन्होंने देखा कि साधु संन्यासी,महन्त मठधारी,पंडित
पुजारो सभी श्रापापंथी और स्वार्थी बने हुए हैं,देशमें अधर्म का
राज है। तरह २ की बुगई हिन्दुओं में फैली हुई हैं। वेद
विरुद्ध मत चल रहे हैं और जिधर देखो उधर ही अंधेर मचा
हुमा
है। देश की ऐसी बुरी हालत देख कर उनका जी भर
आया और एक दम उन्हें गुरु विरजानंद के सामने दिये हुए
वचन याद आगये। उन्हों ने सोचा तुझे क्या करना चाहिये
था और क्या कर रहा है। इतना सोचना था कि उनके जी पर
उदासी छागई और उन्हो ने तप करने और वैदिक धर्म
का प्रचार करने की तैयारी की जो में ठानली । तुरंत ही जो
कुछ उनके पास था लोगों को बाँट दिया और आप केवल
एक कौपीन बाँध कर गंगा के किनारे घूमने के लिए चल
दिये। उन्हों ने यह नियम कर लिया था कि सिपाय संस्कृत
के और कुछ न बोलते थे और किसी से कुछ न मांगते थे।

पूजा पर शास्त्रार्थ (१४) सी गर्मी की परवाह न थी। मर जाड़ों में जबांलिहाफ़ो में भी दांत से दांत बजते हैं वह खुले मैदान में गंगा के किनारे केवल पुराल ओढ़कर पड़े रहते, शरीर पर रज लगाते और निद्वंद्व रहते । उस समय जिन्हो ने उन्हें देखा है वह कहते हैं कि उन का बदन कुदन सा चमकता था। जहां कहीं भी वह जाते लोगों को ग़फ़लत की नींद से जगाते और वैदिक धर्म का उपदेश सुनाते। इसी तरह बिचरते और विचारते वह कर्णवास ज़िला बुलन्दशहर में प्रा निकले । उनके आने की चर्चा पान की आन में चारों ओर फैल गई । कर्णवास के ठाकुरों ने उनके उपदेश को मान कर जनेऊ लिये । पं० अंबिकादत्त से मूर्ति हुना और उसने उनकी बात को मान कर कह दिया कि जो स्वामी जी कहते हैं ठीक है परंतु लोगों ने कहा कि जो अनूपशहर के पं० हीराबल्लम भी मानले तो हम भी मानले वह भी पाए और अपने ठाकुरोका सिंहासन साथ लेकर आए और यह कह कर पाए कि अब मैं जब उलूंगा जब दयानंद से ठाकुरों को भोग लगवालूँगा। शास्त्रार्थ कई दिन तक हुआ अंत को हीराबल्लभ को दयानंद के बचनों के आगे सिर झुकाना पड़ा और कहां तो वह दयानंद से ठाकुरों को भोग लगवाते थे और कहां प्रापही को अपने ही हाथों से ठाकुरों के सिंहासन समेत गंगा में डालना पड़ा। तलवार का वार संवत् १९२५ के जेठ में फिर कर्णवास आ गये । इसबार बरौली के ठाकुर कर्णसिंह जो चक्रांकित थे दयानन्द के पाए । और स्वामी जी से अंडबंड बाते कहने लगा। उसके माथे पर चक्रांकितो की श्री का तिलक लगा हुआ था । दयानंद ने कहा तुमने क्षत्रिय होकर यह भिखारियों का वेश क्यों बनाया है। बस फिर क्या था वह आपे से बाहर हो गया और लगा गाली पास

.
( १५)
गलौच देने और स्वामी जी के मारने को तलवार म्यान से
निकाल ली, दयानंद ने जमीन पर टेक कर उसके दो टुकड़े
कर दिये। इस पर उसका एक साथी दयानंद पर वार करने
को आगे बढ़ा पर उन्होंने उसे ऐसा धक्का दिया कि पछाड़
खाकर गिर पड़ा। कर्णसिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया।
असौज सु० १५ को कर्णसिंह फिर गंगा स्नान को प्राया
और दयानन्द के डेरे से १००-१२५ कदम की दूरी पर ठहरा ।
उसने कुछ नौकरों को दयानन्द को मार डालने को भेजा,
वह दो बार तो लौट २ गये, तीसरी बार कर्णसिंह ने उन्हें
धमकाकर वह फिर भेजा परन्तु दयानन्द के कान में भी उसकी
बातो की भनक पड़ गई थी और वह सावधान होकर बैठ
गये थे। वह आदमी फिर आए और उन्होंने प्राकर कहा कुटी
में कौन है दयानन्द ने दरवाजे पर खड़े होकर ऐसे ज़ोर से हुँ'
कहा कि वह डरकर उलटे ही पांव भाग गये और घबराहट
में गिर भी पड़े। कहते हैं कि कर्णसिंह को अपने पाप का बदला
जल्द ही मिल गया। वह एक बड़ा मुकद्दमा हार गया, उस
का एक बहुत अच्छा घोड़ा मर गया, और श्राप भी बीमार
होगया जिसमें उसका हाल पागलों जैसा हो गया।
मैं कैद कराने नहीं छुड़ाने आया हूं
दयानन्द जब अनूपशहर पहुंचे तो वहां रामलीला हो रही
थी। उन्हों ने लोगों को समझाया कि अपने बड़ों का सांग
बनाना अच्छा नहीं। इसका फल यह हुआ कि अगले साल
रामलीला न हुई । अनूपशहर में एक दिन एक दुष्ट ने उन्हें
पान में जहर दे दिया परन्तु उन्हें मालूम हो गया और योग
की क्रिया करके उसे अपने शरीर से निकाल दिया। उस समय
अनूपशहर के तहसीलदार सैय्यद मुहम्मद मुसलमान थे।
वह स्वामी के भक्त थे, उन्होंने उस पापी को पकड़ कर उस

( १६ ) पर मुकदमा चलाना चाहा परन्तु दयानंद ने उसे यह कह कर छुड़वा दिया कि “ मैं लोगों को कैद कराने नहीं आया छुड़ाने आया हूं।" छलेसर के ईस ठा० मुकन्दसिंह ने उनके उपदेश को मानकर अपनी जमींदारी के २० गाँवों के मन्दिरों की मूर्तियां उठवाकर काली नदी में डलवादी । छलेसर से कूच करके दयानन्द सोरौं पहुंचे । बड़े मशहूर पंडित अंगद शास्त्री ने शास्त्रार्थ में हारकर मातयां गंगा में फेंक दी। इस समय स्वामी मूर्तिपूजा,मृतक श्राद्ध,पुराण,तिलक छाप,भागवत आदि का बहुत जोर शोरसे खंडन करते थे। सोरौं में एक दिन कुछ बदमाशों ने सलाह की कि स्वामी को सोते हुए को गंगा में डाल दो परन्तु धोखे में एक और साधु को गंगा में डाल पाए। सोरों से कासगंज के लोग आकर स्वामी को लिवा ले गये। वहां भी स्वामी ने वेदों का प्रचार किया। एक दिन वह शौच को जंगल जा रहे थे, कुछ और लोग भी उनके साथ थे। जब नगर से बाहर पहुंचे तो देखा रास्ते में दो सांड में लड़ रहे हैं और रास्ता रुक रहा है, न इधर का कोई मनुष्य उधर जा सकता है न उधर का इधर । स्वामी श्रागे बढ़ गये। लोगों ने बहुतेरा रोका पर यह न माने और सांडों के पास पहुंचकर दोनों के सींग पकड़कर अलग कर दिया। शहबाजपुर में उन्हें स्वा०विरजानन्द के देहान्त की खबर मिली जिसे सुनकर वह बहुत दुखी हुए और कहा कि "श्राज व्याकरण का सूर्य प्रस्त होगया" । फर्रुखाबाद में एक साहूकार ने बहुत लागत से एक मन्दिर बनवाया था पर अभी तक उसमें मूर्ति नहीं रक्खी गई थी। जब म्वामो वहां पहुंचे तो उनके उपदेश से उसने मूर्ति रखने का विचार छोड़ कर उसमें पाठशाला कायम करदी। इधर उधर घूमकर दयानन्द फिर फ़र्रुखाबाद पाए तो एक दिन वह गंगा के किनारे जल में पांव लटकाए बैठे थे कुछ दंगई लड़को ने उनपर रेत के गोले फेंकने शुरू किये, वह चुप प्रापस (१७) चाप बैठे रहे। जन्म एक गोले से उन की आंखों में रेत जा पड़ा तो वहां से उठ कर चले गये परन्तु लड़कों से कुछ न कहा । पौराणिक दयानन्द के मुकाबिले के लिए मेरठ से पंडित श्री गोपाल को लाए। सभा हुई , मूर्तिपूजा पर बात चली परन्तु थोड़ी ही देर में पं० श्रीगोपाल बगलें झांकने लगे और चुप्पी साध कर बैठ गये । और तो इन से कुछ न बना काशी भागे हुए गये और वहां के पण्डितों से इस बात की कि वेदों में मूर्ति पूजा की आशा है एक व्यवस्था लाकर लोगों को दिखाते फिरे परन्तु शास्त्रार्थ करने पर राजी न हुए । इस के बाद कानपुर से पण्डित हलधर ओझा को शास्त्रार्थ के लिए बुलवाया गया । मूर्तिपूजा पर शास्त्रार्थ शुरू हुआ परन्तु वह उसे सिद्ध न कर सके और दूसरे विषयों पर बातें करने लगे। दयानन्द के सामने संस्कृत बोलना हँसी ठट्ठा न था, जहां अशुद्ध शब्द मुंह से निकला और उन्हों ने पकड़ा। हलधर जी अटक २ कर और अशुद्ध संस्कृत बलने लगे। स्वामी ने कहा भाई यदि संस्कृत नहीं बोल सकते तो भाषा में ही बात चीत करो। होते २ रात का १ बज गया तब सभा दूसरे दिन के लिए रक्खी गई । दूसरे दिन की सभा में हलधर की वह गत बनी कि कही नहीं जाती। उन के होश ठिकाने न रहे और वह मूर्छा खाकर गिरने लगे तब उन के साथी उन्हें वहां से लिवा ले गये । फर्रुखाबाद में जीत के डंके बजा कर महाराज कानपुर पहुंचे। वहां एक दिन गंगा के किनारे बैठे थे कि कुछ दुष्ट उन पर चढ़ पाए । उन्हों ने एक पेड़ की डाल तोड़ कर सब को मार भगाया और दो मनुष्यों को बग़लों में दबाकर गंगा में कूद गये । आप तो डुबकी लगाकर दूर जा निकले परन्तु वह बेचारे बड़ी मुश्किल से जल से बाहर निकले । थहां उन के उपदेश से लोगों को मूर्तिपूजा से ऐसी घृणा हुई कि मूर्तियों को धड़ाधड़ गंगा में (१८) फेंकने लगे तब हलधर प्रोझा ने एक नोटिल छपवाया कि जिसे मूर्तियां फेंकनी हो वह उन्हें कैलास नामी मन्दिर में पहुंचा दिया करे फेंका न करे। पण्डित हलधर के कहने सुनने से कानपुर में बहुत बड़ा शास्त्राथ रचा गया जिस में ५० हजार मनुष्य इकट्ठे हुए और यहां के जाइन्ट मजिस्ट्रेट मि० थेन सभापति बने । हलधरजी इस में भी हारे पर उनके साथियों ने यह नोटिस छपवा कर बांटे कि स्वामी हार गये। इस पर थेन सा० से जाकर लोगों ने कहा कि ऐसा अन्याय होरहा है तो उन्हो ने लिख कर दे दिया कि जीत दयानन्द की हुई थी। काशी का शास्त्रार्थ २८ अक्तूबर सन् १८६६ को दयानंद काशी में पहुंचे और आनन्द बाग में उतरे । उन के पाते ही नगर में खलबली मच गई । महाराजा काशी ने पण्डितो को शास्त्रार्थ के लिए उकसाया और उस का दिन नियत कर दिया। उस दिन लोगों का इतना जमाव था कि मानो सारी काशी उमड़ पड़ी है, कोई पचास हज़ार आदमी होगे । काशी के महाराजा आप आए। दो एक को छोड़कर काशी के नामी२सारे पंडित तामझामो में सवार होकर बड़े ठाठ के साथ प्राए । शास्त्रार्थ शुरू हुश्रा दयानन्द कहते थे कि वेदों में मूर्तिपूजा नहीं, पण्डित कहते थे कि है। चार घण्टे तक बात चीत होती रही , पण्डितों ने बहुतेरा चाहा कि किसी तरह मूर्तिपूजा को छोड़कर दयानन्द को न्याय व्याकरण के चक्कर में डालें परन्तु स्वामी जी उन्हें बार बार ललकारते रहे कि मूर्तिपूजा को वेद में दिखाओ । पण्डितों ने दयानन्द को ताना दिया कि यदि तुम्हें सारे ग्रन्थ कएठ नहीं है तो काशी में क्यों माए थे। इस पर स्वामी जी ने पूछा क्या आप लोगों को सारे ग्रन्थ कण्ट हैं। उन्होंने कहा (१९) हो । दयानन्द ने स्वा०विशुद्धानन्द से कहा कि मनुके अनुसार धर्म के लक्षण बताओ।वह न बता सके। तब एक दूसरा पंडित बोला मैं बताता हूं। दयानन्द बोले तुम अधर्म के लक्षण बताओ। इसपर वह भीचुप होगया। जब किसी तरह दयानन्द पण्डितो के जाल में न फंसे तो एक पंडित ने दो पुराने पत्रे निकाल कर कहा कि देखो यह वेद के पत्रे हैं, इन में पुराण सुनने की आशा है । इस समय शाम हो गई थी। रोशनी का. कुछ प्रबन्ध न था । एक धुन्धलीसी लालटेन लाई गई। दयानन्द उन पत्रों को लेकर देखने लगे। अभी एक दो मिनट ही हुई- थी कि विशुद्धानन्द खड़े होगये कि हम अधिक नहीं ठहर सकते और सब ने मिलकर शोर मचा दिया कि दयानन्द हार गये । महागजा काशी भी इस अन्याय में शामिल हो गये और शास्त्रार्थ समाप्त हो गया । शास्त्रार्थ के पीछे कुछ दिन काशी रह कर जनवरी १९७० में महाराज प्रयाग के कुभ पर चले गये । उसके पश्चात एक वर्ष से अधिक गंगाके किनारे विवरते रहे। इसी भ्रमणमें इन्होंने एक स्त्रीकाभूत उतारा । उसके घर वाले महाराज के पास गये और अपनी विपत्ति कही । महाराज अपना सौंटा लेकर पहुंचे । दुष्ट स्त्रोइनका डीलडोल और सौंटा देखकर ऐसी डरी कि तुरन्त बकार उठो कि मैं अच्छी हूं । बंगाल निहाल हो गया। सन् १८७२ में पटना गये । वहाँ एक पंडितसे बातचीत हुई उस ने भागवत की बड़ाई की स्वामी ने उस का खण्डन किया इस पर उसने कहा कि खण्डन करना तो आसान है पर भागवत के बनाने वाले की विद्या देखो उसने १८००० श्लोक रचं दिये । स्वामी ने कहा कि हम ३८ हजार रच सकते हैं तुम कलम कारोज़ लेकर बैठ जाओ। स्वामी ने जूते और खडाऊ के संवाद पर श्लोक बोलने शुरू किये। पंडित बेचारा लिखता २ हार गया और अन्त को लज्जित होकर चला गया। - ..

- (२०) दिसम्बर सन १८७२ में स्वामी दयानन्द कलकत्ता पहुंच गये।यहाँ आदि ह्मसमाज के नेता महर्षि देवेन्द्रनाथ ठाकुर से मिले और नवीन ब्राह्म समाज के प्राचार्य केशवचन्द्र सेन से भी भेट हुई और उन्हीं के मकान पर व्याख्यान भी दिये । लोग स्वामीकी शुद्ध, सरल और मनोहर संस्कृत को सुनकर दंग रह गये। एक व्याख्यान का सारांश समझाते हुए पण्डित महेश चन्द्र न्यायरत्नने उनके प्राशयके विपरीत लोगों को समझा दिया इस पर बाबू केशवचन्द्र सेन ने उन से कहा कि लोग आप के मतलब के विरुद्ध समझाते हैं इस से तो अच्छा है आप भाषा में ही बोला करें। उन्हों ने ही स्वामी जी को वस्त्र पहनने की सलाह दी। स्वामीजी के मन में हठ तो थी ही नहीं यह दोनों बात अच्छी लगी और मानलीं । दयानन्द कलकत्ते से चल कर हुगली आए और वहाँ पण्डित तारानाथ तर्कवानस्पति से जो महाराज काशी की सभा के सब से बड़े पण्डित थे शास्त्रार्थ हुधा परन्तु तारानाथ ऐसे बहके कि यही कह बैठे कि सारी उपासना ही भ्रममूलक है। आए तो थे मूर्तिपूजा सिद्ध करने और आप ही उस का खण्डन करने लगे। कलकत्ते से लौटते हुए दयानन्द छपरा पधारे। यहां एक पण्डित जगन्नाथ थे जो अपनी विद्या की बहुत डीग मारा करते थे। लोगों ने उन से स्वामीजी से शास्त्रार्थ करने को कहा तो उन्होंने यह कहदिया कि मैं उस नास्तिक का मुख नहीं देख सकता । जब यह बात स्वामीजी को मालूम हुई तो उन्होंने कहा कि वह मेरा मुख न देखे बीच में पर्दा डाल कर बातचीत करलें । अब तो पंडित जी को भागने का मार्ग ही न रहा । लाचार होकर उन्हें ऐसा करना ही पड़ा। अभी बातचीत शुरू ही हुई थी कि पण्डित जी लगे बहकने और थोड़ी ही देर में गूंगे बहरे बन गये। मिर्जापुर से महाराज कानपुर आए और परेड के मैदान में व्याख्यान का प्रबन्ध हुमा परम्तु वहां के मुसलमान कोतवाल

( २१ )
की धूर्तता से व्याख्यान न हो सका तब दूसरे स्थान पर हुआ
मार्च सन् १८७४ में दयानन्द वृन्दावन पधारे। रंगाचार्य
मथुरा के सेठों के गुरु वैष्णवमत के प्राचार्य थे और बड़े
विद्वान गिने जाते थे। वृन्दावन में भी स्वामी ने वैष्णवमत की
खूब पोल खोली । रंगाचार्य को शास्त्रार्थ के लिए बुलाया पर
वह न पाए और बीमारीका बहाना कर दिया। एक दिन पं.
मदनदत्त को स्वामी का व्याख्यान सुनकर मूर्तिपूजा से इसनी
ग्लानि हुई कि उसी दम भरी सभा में खड़े होकर उस का
खण्डन करने लगे। इस पर पौराणिको में बड़ी खलबली मची
और वह कहने लगे कि दयानन्द के पास जादू है जो कोई उस
के पास जाता है उसी कीसी बोली बोलने लगता है। वृन्दावन
से स्वामी मथुरा पाए । वहां विरोधियों ने यह लीला रची कि
एक दिन एक शराब बेचने वाले को उन के व्याख्यान में भेजा।
उसने स्वामी से कहा कि हमारे दाम दिलवाइये। स्वामी ने कहा
कि ठहरो व्याख्यान के बाद देंगे। व्याख्यान समाप्त होने पर
स्वामी ने उसे कान पकड़ कर अधर उठा लिया, और कहा बोल
सेरे कितने दाम हैं। वह गिड़गिड़ाया और बोला महाराज
छोड़िये मुझे तो दुष्ट लोगों ने सिखा कर भेजा था।
जून १८७४ में स्वामी ने काशी श्राकर पौराणिको को फिर
शास्त्रार्थ के लिए ललकारा परन्तु कोई सामने न पाया।
मुसलमानों के नेता सर सैयद अहमदखां उन दिनों काशी के
सब जज थे। उनके गले पर कई व्याख्यान हुए । महाराजा
बनारस ने बहुत विनती करके बग्यो भेजकर खामी को किले में
बुलाया और सोने के सिंहासन पर बिठाकर पिछले अपराधों
के लिए क्षमा मांगी और बड़े सम्मान के साथ विदा किया।
गुजरात में वेदों का नाद ।
२६ अक्तबर सन् १८७४ को स्वामी बम्बई पहुंच गये वहां

(२२) उनके व्याख्यान के लिए एक अलग मण्डप बनाया गया । स्वामी ने अपने व्याख्यानों में गोकुलिये गुसाईयों की लोला की बखिया उधेड़नी प्रारंभ की , जिस पर वह बहुत घबराये । कुछ बदमाशों को इन के मारने के लिए भेजा गया और रसोइये के द्वारा भी इन्हें विष दिलाने का यत्न किया गया। जब कुछ न बना तो गोकुलियों ने प्राचार्य गुट्ट लाल जी को जो अंधे थे परन्तु बहुत विद्वान थे इनके विरुद्ध उकसाया । पण्डित ग(लाल ने लालबाग़ में एक सभा की और ऊटपटॉग बातें कहकर सभा को समाप्त कर दिया और कहा कि हमने वेदों से मूर्ति पूजा सिद्ध कर दी परन्तु स्वामी के एक शिष्य ने वहीं उन की भरी सभा में पोल खोल दी। बम्बई से महाराज अहमदाबाद पधारे । यहां गोपालराव हरि देशमुख जज के उद्योग से एक शास्त्रार्थ भी हुआ जिस में २५० के लगभग पण्डिस थे परन्तु वह मूर्तिपूजा सिद्ध न कर सके और गालियों पर उतर भाए। इस पर जज साहब ने बड़े होकर कह दिया कि पण्डित लोग मूर्तिपूजा सिद्ध नहीं कर सके । सूरत में बड़े धड़ल्ले से स्वामी के व्याख्यान हुए वहाँ खामी नारायगा मत वाले उन के शत्रु हो गये । एक दिन जिस मकान में व्याख्यान होने वाला था उन्हो ने उसका ताला बन्द कर दिया। स्वामीने सड़क पर ही व्याख्यान दिया। सूरत में एक बूढ़े गुलाई २६स थे जो पत्रों में महारान की प्रशंसा सुन कर उनके दर्शनो की लालसा रखते थे। उन्हों ने बहुत विनीत भाव से स्वामी को अपने घर पर बुलाया और उसे ऐसा सजाया मानो कोई राजा आने को है। जब स्वामी वहां पधारे तो गुसाई जी उन के चरणों पर गिरगये। बड़े प्रेम से भोजन कराकर अपने चेले चेलियोको एनसे उपदेश सुनवाया । बड़ौदे में एक दिन स्वामी ने राजनीति के ऐसे मर्म खोले कि वहां के दीवान सरटी माधव राध उनके चरणों में गिर गये कि महाराज --

( २३ )
मैंने राजनीति की इतनी पुस्तकें पढ़ीं परन्तु मुझे उसका महत्व
न मालूम हुआ जो आज श्राप के एक व्याख्यान से हुआ ।
उम्हों ने म्यामी को १०००) रुपय भेट देना चाहे परन्तु म्वामी
ने स्वीकार न किये, फिर राजकोट जाकर पहिला आर्य समाज
स्थापित किया और फिर अहमदाबाद पाकर स्वामी नारायण
मत का खण्डन किया जो बम्बई प्रान्त में बहुत प्रचलित है
और जनवरी सन् १८७१ में बम्बई लौट आए और १० अप्रेल
सन् १८७५ को आर्य समाज स्थापित करके अहमदाबाद चले
गये । तब परिहता ने कहना शुरू किया कि हम ता शास्त्रार्थ के
लिए तैयार थे, स्वामी हम से डरकर भाग गये। इस पर तार
देकर उन्हें फिर बम्बई बुलाया गया। पौराणिको ने पंडित कमल
नयनाचार्य को शास्त्रार्थ के लिए तैयार किया । सभा हुई, पं.
कमलनयन पहले तो सभा में आने से बहुत बचते रहे परन्तु
लोगों ने बैठने न दिया तो कुछ देर पीछे आप पर आते ही इस
बात पर अड़ गये कि जो लोग सभा में मौजूद हैं पहले यह
बताएं कि किस २ संप्रदाय के हैं। उन से सभापति ने बहतेरा
कहा कि महाराज इस व्यर्थ बात से क्या मतलब है मूर्तिपूजा
पर शास्त्रार्थ की जिये परन्तु वह अपनी हठ पर अड़े रहे और
अन्त को विना शास्त्रार्थ किये ही चले गये ।
बम्बई से जूलाई सन् १८७५ में महाराज पूना गये और
दो महीने तक धूम के साथ प्रचार कर रहे ! छावनी में भी
उनके व्याख्यान हुए। वहांस जब वह विदा होने लगे तो लोगोंने
एक जलूस बनाया जिस के लिए हाथी मंगाया परंतु वह
हाथी पर सधार नं हुए और पैदल ही चले । जब जलूस
शहर में पहुंचा तो विरोधियों ने एक गधे को सजाकर उस
पर लिखा 'दयानन्द' । दोनों जलूसों की मु:भेड़ होगई और दमा
भी हो गया। स्वामी व्याख्यान के स्थान पर चले गये और
दंगा शांत होने पर उसी रात को व्याख्यान दिया। पूना से

(२४) महाराज बम्बइ लौट आए और व्याख्यान देने प्रारंभ किये। पण्डित रामलाल एक पौराणिक पंडित शास्त्रार्थ के लिए पाए और पुराणों के श्लोक पढ़ कर मूर्तिपूजा सिद्ध करने लगे। खामीने कहा वेदों के प्रमाण दो। उस बेचारे को वेदोका ज्ञान न था वह लज्जित होकर बैठ गया। बम्बई से वेदभाष्य के नमूने छपवा कर स्वामीने पण्डितों के पास भेजे। सन् १८७५ में राजा जय किशनदास ने सत्यार्थ प्रकाश छपवाया परन्तु उस में लेखकों ने दुष्टता से कई जगह स्वामीजी के प्राशय के विरुद्ध बातें मिलादी इसलिए उन्हों ने उसे रद कर दिया । अयोध्या पहुंचकर उन्होंने ऋवेदादिभाष्यभूमिका लिखनी शुरू की। अयोध्यासे स्वामी लखनऊ पहुंचे। पं० गंगाधर से शास्त्रा भी हुआ जिसमें उन्होंने मुहकी खाई। सन् १८७७के दरबार में स्वामी दिल्ली पहुंचे और सर सैयद अहमदखां, बाबू केशवचन्द्र सेन कन्हैयालाल अलखधारी आदि अनेक नेताओंसे बात हुई। उनके डेरे पर लोगोंकी सदा भीड़ रहती थी। शाहजहांपुर जिले में मुन्शी प्यारेलाल रईस ने अपनी जमींदारी के गाँव चाँदापुर में मार्च सन् १८७७ में एक मेला किया जिस में हिन्दू, ईसाइ, मुसलमान विद्वानोको सत्य असत्यके निर्णयके लिए बुलाया। वैदिक धर्म के प्रतिनिधि स्वामी हीथे। तीन दिनतक बड़ी उत्तमता से शास्त्रार्थ दुमा जिस में स्वामी ने सब को निहत्तर किया । पंजाब का दौरा। ३१ मार्च सन् १८७७ को खामी लुधियाने पहुंचे और व्याख्यान देने 'भारम्भ किये। इन के ब्याख्यानों को सुन कर एक ब्राह्मण जो ईसाई होने का निश्चय कर चुका था, ईसाई होने से बच गया । जब दयानन्द लाहौर पहुंचे तो पहिले तो ब्राह्मसमाजियों ने उन की प्राव भगत की परन्तु जब स्वामी ने उनके मत का खण्डन किया तो नाराज हो गये

( २५ )
और उनके भोजन आदिके खर्चका बिल भेजदिया । पौराणिको
मकान के मालिकों को बहकाकर मकान खाली करा लिया
तब वहां के प्रसिद्ध डा० रहीमखां ने अपनी कोठो उन के ठहरने
के लिए देदी और वहाँ व्याख्यान होने लगे जिनका यह प्रभाव
हा कि श्रार्य समाज स्थापित होगया। प्राय समाज के
१० नियम स्वामी ने लाहौर ही बनाए थे।
ही में बनाए थे। अमृतसर में
४० हिंदू विद्यार्थी ईसाई होने का इरादा करचुके थे परंतु स्वामी
के उपदेश सुनकर वह पतित होने से बच गये। सितम्बर सन्
१८७७ मै दयानन्द जालन्धर पहुंचे और मौलवी अहमदहुसैन
से शास्त्रार्थ किया । रावलपिंडी पहुंचकर स्वामी एक पारसी
की कोठी में ठहरे परन्तु पौगणिकों ने उसे बहकाकर कोठी
खाली कराली और वह एक बाग़ में चले गये। एक दिन
सत्संगमें उन्होंने ब्रह्मचर्य की महिमा बयान करते हुए ब्रह्मचारी
के बल की बहुत प्रशंसा की । सरदार विक्रमसिंहको विश्वास
न पाया। सत्संगके बाद जब वह अपनी दो घोड़ों की गाड़ी
में बैठकर चलने लगे तो दयानन्द ने पीछे से गाड़ीका पहिया
पकड़ लिया। कोचवानने बहुतरे हँटर पटखाए पर घोड़े टस
से मस न हुए, तब सरदार साहब ने पीछे मुड़कर देखा तो
स्वामीने मुसकराते हुए कहा कि ब्रह्मचारीके बलका नमूना दिखा
रहा हूं। मुलतान में राय सगरमल एगजेक्टिव इंजिनियर कहा
करते थे कि मैं १४०० पुस्तकें पढ़ कर नास्तिक हुआई परन्तु
दयानन्द के ३ दिनके तर्कने उन्हें आस्तिक बना दिया।
युक्तप्रांत में भ्रमण
जूलाई सन् १८७८ में स्वामी रुड़की पधारे । एक दिन
रुड़की कालिजके कुछ विद्यार्थी कहनेलगे कि हमारे बड़े साइंस
नहीं जानते थे इस पर उन्हों ने बतलाया कि संस्कृत में सब
विद्याएं हैं और साइन्सकी जो२ बात विद्यार्थियोंने पूछी उसक
तत्काल ऐसा ठीक उत्तर दिया कि वह लोग सुनकर

(२६) गये। मई सन् १८७८ में यह फिर मेरठ प्राबिगजे। यहाँ करनस पालकट और मैडम ग्लैबैट्स्की थियासाफिकल सोसाइटीके प्रधान और मंत्री मा अमेरिकासे पाएथे उनसे मिलने पाए। इन्हीं दिनों पण्डिता रमाबाई भी मेरठ ही थी । स्वामीने उनसे स्त्रीयों में धर्म प्रचार करनेको कहा परन्तु उन्होंने न माना और अब स्वामीने उन्हें एक बंगाली कायम्थसे विवाह करनेसे रोकना चाहा तो नाराज होकर चलीगई। बरेली में स्वामीका कई दिन तक पादरी स्काट से शास्त्रार्थ हुधा और हर बात में पादरी साहब का मुंह बन्द किया । एकदिन म्वामो उनके गिरजाकी तरफ़ जानिकले । स्काटने उन से उपदेश दिलवाया , स्वामी वहां भी सच कहनेसे न चूके और ईसाके घर में ही ईसाई मत का खण्डन किया। दिसम्बर सन् १८७६ में स्वामी काशीमें थे और करनल और मैडम भी उनसे मिलने भाए हुए थे। करनल और दयानन्दके बंगाली टोले के स्कूल में व्याख्यान होनेको थे । विरोधियोंने जाकर कलक्टर के कान भरदिगे कि यदि दयानंद का व्याख्यान होगा तो ग़दर होजायगा। उसने झट व्याख्यान बन्द करनेका हुक्म दे दिया और जैसे ही स्वामी व्याख्यान देने को वेदी पर चढ़े वैसे ही उन्हें कलक्टरका हुक्म दिया गया । इसपर समाचार पत्रों में बहुत आन्दोलन मचा और सरकार से भी लिखा पढ़ी हुई तब वह हुक्म रद हुआ । देहरादून में दयानंद ने मोहम्मद उमर नामक जन्मके मुसलमान को शुद्ध करके उस का नाम अलखधारी रक्खा । आर्य समाज के इतिहास में यह पहिली शुद्धि थी। राजस्थान यात्रा और निर्वाण जून सन् १८८१ में दयानन्द अजमेर से मसूदा पहुंचे। वहां के राव साहब ने बड़े प्रेम से उनका सत्कार किया। वहां क जाति में यह रीति थी कि वह लोग अपनी लड़कियों का गह एक विशेष जाति के मुसलमानों से किया करते थे।

में (२७) स्वामी ने उन्हें समझाकर उस गति को बन्द कराया और हजागें आर्य कन्याओं को मुसलमान होने से बचा दिया । नवम्बर सन् १८८महाराज चित्तौड़ पधारे वहां महाराणा सजनसिंहने श्रीमेवा उदयपुर पधारने की प्रार्थना की। वह यह कह कर कि बम्बई से लौटते हुए श्रावे गे बम्बई चले गये । बबई पहुंच कर उन्हों ने श्रार्य समाज से थियासोफ़ि- कल सोसाइटी का संबन्ध तोड़ दिया क्योंकि उन्हें निश्चय हो गया था कि उक्त सोसाइटी के दोनों नेता नास्तिक थे। बम्बई से लौटते हुए महाराज उदयपुर पहुंचे, महाराणा ने अपने प्रेम अंर सत्कार से उन्हें ऐसा.प्रसन्न रक्खा कि वहां कई मास ठहरे रहे। वहां ही उन्हों ने परोपकारिणी सभा स्थापित की और सत्यार्थ प्रकाश का दूसरा संस्करण तैयार किया मार्च सन् १८८३ में स्वामी. शाहपुरा चले गये। गजाधिराज सर नाहरसिंहजी ने श्रीचरणों को बहुत से को और आर्य समाज स्थापित किया। मई सन् १८८३ में दयानन्द मोधपुर पहुंच गये। राज्य की ओर से उन का उचित सन्मान हुा । महाराजा सर कर्नल प्रतापसिंह और रावराजा तेजसिंह उनकी सेश बहुत प्रेम से करते थे। महाराजासे भी कई बार मिले । एकदिन जब महाराजाकी कोठीपा पहुंचे तो उन्हों ने देखा कि महागजा की वेश्या नन्हीजान की पालकी जारही है, उन्होंने महाराजाको बहुत फटकाग और कहा कि क्षत्रिय सिंह हैं और वेश्या कुतिया, सिंहका कुतिया के साथ कभी भी मेल उचित नहीं है। इसे सुनकर नन्हीजान उन की जानकी गाहक होगई । राज के मुसलमान मुसाहिब श्राला भी उनके विरोधी होगये । निदान कुछ षड्यन्त्र रचा गया और एक दिन दूध रसोइयेसे मिलकर उन्हें विष दिलवा दिया गया। उन्हें मालूम तो होगया और उन्हों ने विष निकालने का बत्न भी किया परन्तु विष बहुत तेज था कुछ भाराम न हुआ।

उन्हें श्रावू । बढ़ता ही ( २८ ) डाक्टर भी उलटो दवा देने लगा, जब उन को अवस्था बहुत भयानक होगई तो महाराजा ने बहुन अफ़सोस किया और भेजा गया । डाक्टर लछमनदास श्राबू से बदली होजाने के कारण नीचे उतर रहे थे, रासमें उनकी महागजसे भेट हुई । वह अपनी नोकरी की परवाह न करके प्राबू लौट गये और वहां ऐसी चतुरता और परिश्रम से इलाज किया कि स्वामीको बहुत कुछ आराम होगया । डाक्टर लछमनदास के अफसरने बदली की जगह जाने के लिए तंग किया और उन्हें जाना पड़ा। उनके पीछे स्वामीकी तबीअत फिर बिगड़ी और वह अजमेर के लिए रवाना होगये । अजमेर पहुंचते २ दशा बहुत बिगड़ गई । बहुत कुछ दौड़ धूप की गई परन्तु रोग गया। ता० ३० अक्त बर सन् १८८३ को सायंकाल के ५ बजे उन्होंने कहा कि प्रार्य लोगों को बुलाकर हमारे पीछे खड़ा करी और कमरे के सब द्वार खोल दो । कुछ देर छत की मार देख कर वेद मन्त्र पढ़े और संस्कृत में ईश्वर प्रार्थना की फिर गायत्री मन्त्र पढ़ा और कुछ देर ध्यान करके कहने लगे "हे ! दयामय ! हे सर्वशक्तिमन् ईश्वर ! तेरी यही इच्छा है, तेरी यही इच्छा है, तेरी इच्छा पूर्ण हो। आहा ! तैने अच्छी लीलाको" ! इतना कहते हो करवट ली और सांस रोक कर सदा के लिए उसे बाहर निकाल दिया । यह है संक्षिप्त जीवनी ऋषि दयानन्द को जिसने वेदों का फिरसे प्रचार किया, संसारको दिखाया कि एक सच्चा ईश्वर भक्त कितना सच्चा, निडर और देशहितैषी होता है, जिस ने जीवनभर ब्रह्माचरो रह कर बतलाया कि ब्रह्मचारी में कितना बल, साहस विद्या, देश और जाति प्रेम होता है। जिसने बत लाया कि हिन्दुओं की दुर्दशा वेदों की शिक्षा को न मानने,और आपसकी फूटसे ही हो रही है। प्यारे पाठको हमारा कल्याण यानन्द के पीछे चलने से हो हो सकती है ।। इति ॥

ओ३म्
ऋपिवचनामृत ।
२-परमेश्वर की स्तुति, प्रार्थना, उपासना अवश्य करनी चाहिये
२-वेद चार है - ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद । वेद
परमेश्वरोक्त हैं। सबको इन्हीं के अनुसार चलना चाहिये ।
३-वेद पढ़ने सुनने का सबको अधिकार है।
४-परमेश्र निराकार सर्वव्यापक है उसकी मूर्ति नहीं बन
सकती।
५-पाषाणादि मूर्तिपूजा सज्जन लोगों को त्यक्तव्य है।
६-मद्यमांस का ग्रहण कदापि भूलकर भी न करे ।
७-वीर्यरक्षा में अनन्द और नाश करने में दुःख प्राप्ति है।
--क्रोधादि , दोष और कटुवचन का छोड़ शान्त और मधुर
बचन बोले।
हजिस देश में यथायोग्य ब्रह्मचर्य विद्या और वेदोक्त धर्म
का प्रचार होता है वही देश सोभाग्यवान है।
१०-जिस देश के पदार्थ से अपना शरीर बना, अभी पालन
होता है, आगे होगा उस की उन्नति तन, मन, धन से
सब मिलकर प्रीति से करें।
Anamosamanarma

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ऋशी दयानन्द जीवन कथा

Author
Ghaasiiraama Baabuu
Title
Rxshhii Dayaananda Jiivan Kathaa
File name
ऋशी दयानन्द जीवन कथा
Text
OCR done
Citation
1925
Published
2005/07/25
Publisher
Baabuu Shivakrxpaala Vidyaa Printinga Presa, Meratha
Language
Sanskrit
Pages
32
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
GEOGRAPHY BIOGRAPHY HISTORY
DLI number
477350
Barcode
99999990173195.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
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