Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Geeta Nibandhavali
Front matter
प्रथम सरण १०००१०१९८८
द्वितीय सस्करण १२०० १० १९८८
सूतीय सरवरण २०००स० १९.१
चतुर्थ सरकरण १८०० स०१९९५
पञ्चम सस्करण २००० स० २०००
गीता-निबन्धावली
श्रीरिक
विषय-सूची
विषय
1-गीताक अनुमार जीयरगुनका मरूप
१-जीब, इश्वर और प्रनका भेद
:-गीसाके अनुसार कर्म, विकर्म भोर भफममा
परूप
५-क्षर, अपर और पुरुषोत्तम
५-गीता मायावाद माननी हे या परिगमपार।
६-मानयोग भादिशग्दोंका पृथक-पृथक अपाम
प्रयोग
५.
७-गीतार्म भति
गीता-सम्बधी प्रभासर
९-गीतासम्बन्धी प्रभाका उत्तर
१०-गीताका उपदेश
11-शोक-सूची
८"
९९
१२-एन्द विवरण
10.
श्रीहरि .
गीता-निवन्धावली
भूक करोति बाचाल पडु लड्दयते गिरिम् ।
यत्कृपा तमह चन्दे परमानदमाधवम् ॥
वास्तवमें गीताके तात्तिक विषयोंपर भगान्का क्या
आशय है, इसका प्रतिपादन करना कोई साधारण बात
नहीं है । मेरी तो बात ही क्या है, बडे-बड़े विद्वान्
भी इन विषयों में मोहित हो जाते हैं । इस अवस्थामें
भगवान्का आशय अमुक ही है यों निश्चितरूपसे कहना
एक प्रकारसे अपनी बुद्धिका परिचय देना है। तथापि
लोग अपने-अपने मानोंके अनुमार अनुमान लगाया ही
करते हैं, इसी न्यायसे मैं भी अपना अनुमान आपलोगों-
की सेगमें उपस्थित कर देता हूँ। वस्तुत अपनी दिव्य
वाणीका यथार्थ रहस्य तो भगवान् ही जानते हैं।
गीतानी धायरी
गीताके अनुसार जीवन्मुक्तका स्वरूप
मात्मौपम्ये। सर्वत्र सम पश्यति योऽर्जुन ।
सुरा या यदि पा दुम स योगी परमो मत ॥
(६।३२)
'हे अर्जुन! जो योगी (जीर मुक्त) अपनी सादृश्यतासे
सम्पूर्ण भूनोंमें सम देराता है और सुख भयमा दुखको
भी सबमें सम देवता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना
गया है।
गीताके अनुसार जीव मुक्त यही है, जिमका मर्वदा,
सर्वथा, सर्वत्र समभार है । जहाँ-जहाँपर मुक पुरुषका
गीतामें वर्णन है, वहाँ समताका ही उल्लेख पाया जाता
है। गीताके अनुसार जिसमें समता है वही स्थितप्रज्ञ,
ज्ञानी, गुणातीत, भक्त और जीव मुक है । ऐसे
जीव मुक्तमें रागद्वेषरूपी विकारोंका अत्यत अभार होता
है, मान अपमान, हानि-राम, जय-पराजय, शनु मित्र,
निन्दा स्तुति आदि समस्त द्वद्रोंमें वह समतायुक्त रहता
है। अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति अथवा घटना उसके
ब्रह्मभूत हृदयमें किसी प्रकारका भी विकार उत्पन्न नहीं
कर सकती। किसी भी कालमें किसीके साथ किसी
जीवन्मुक्तका खरूप
प्रकारसे भी उसकी माम्यस्थितिमें परिवर्तन नहीं होता।
निन्दा करनेगलेके प्रति उसकी द्वेष या वैर-बुद्धि और
स्तुति करनेगलेके प्रति राग या प्रेम-बुद्धि नहीं होती।
दोनोंमें समान वृत्ति रहती है। मूद अज्ञानी मनुष्य ही
निन्दा सुनकर दुखी और स्तुति सुनकर सुखी हुआ करते
हैं । सात्विक पुरुप निन्दा सुनकर सावधान ओर स्तुति
सुनकर लजित होते हैं। पर जीपन्मुकका अन्त करण
इन दोनों भागोंसे शून्य रहता है, क्योंकि उसकी दृष्टिमें एक
सच्चिदानन्दधन परमात्माके अतिरिक्त अपनी भी भिन्न
सत्ता नहीं रहती, तब निन्दा-स्तुतिमें उमकी भेदबुद्धि
कैसे हो सकती है ? यह तो सबको एक परमात्माका
ही स्वरूप समझता है।
भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥
(१३ । ३०)
जिस समय यह पुरुष भूतोंके पृथक् पृथक् भावोंको
एक परमात्माके सङ्कल्पके आधारपर स्थित देखता है तथा
उस परमात्माके सङ्कल्पसे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार
देखता है, उस समय वह सच्चिदानदघन ब्रह्मको ही प्राप्त
होता है । इसलिये उसकी बुद्धिमें एक परमात्माके सिवा
--
यदा
६
गीता निरन्धावली
अन्य कुछ रह ही नहीं जाता । लोकसमह और
शास्त्रमर्यादाके लिये सबके साथ यथायोग्य वार करते
हुए भी, व्यवहारमें बड़ी विषमता प्रतीत होनेपर भी उसर्क
समबुद्धिमें कोई अतर नहीं पड़ता । इसीसे भगवान्
कहा है--
विद्याविनयसम्पने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।।
शुनि चैव सपाके च पण्डिता समदशिन ॥
(५ । १८)
वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें तथा गौ,
हाथी, कुत्ते ओर चाण्डालमें भी सममापसे देखनेवाले ही
होते हैं । इस श्लोकसे व्यवहारका मेद स्पष्ट हे । यदि
केवल मनुष्योंकी ही बात होती तो व्यवहार-भेदका खण्डन
भी किसी तरह खींचतान कर किया जा सकता, परन्तु
इसमें तो ब्राह्मणादिके साथ कुत्ते आदि पशुओंका भी
समावेश है। कोई भी विकसम्पन पुरष इस श्लोकमें
कथित पाँचों प्राणियोंके साथ व्यवहारमें समताका प्रति-
पादन नहीं कर सकता । मनुष्य ओर पशुकी बात तो
अलग रही, इन तीनों पशुओंमें भी व्याहारकी बड़ी भारी
मिलता है। हाथोका काम कुत्तेसे नहीं निकलता । गौकी
जगह युतिया नहीं रखी जाती। जो लोग इस श्लोकसे
- जीवन्मुक्तका सरूप व्यवहारमें अभेद सिद्ध करना चाहते हैं, वे वस्तुत इसका मर्म नहीं समझते। इस श्लोकमें तो समदशी जीवन्मुक्की आध्यात्मिक स्थिति बतलाने के लिये ऐसे पाँच जीवोंका उल्लेख किया गया है, जिनमें व्यवहार में बड़ा भारी भेद है और इस मेदके रहते भी ज्ञानी सबमें उपाधियोंके दोपसे रहित सम ब्रह्मको देखता है । यद्यपि उसकी दृष्टि में किसी देश, काल, पात्र या पदार्थमें कोई मेदबुद्धि नहीं होती, तथापि वट व्यवहारमें शास्त्रकी मर्यादाके अनुसार भेद- बुद्धिवालोंको विपरीत मार्गसे बचाने के लिये आसकिरहित छोकर उन्हींकी भोति न्याययुक्त व्यवहार करता है (३। २५-२६) क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषोंके आदर्शको सामने रखकर ही अन्य लोग व्यवहार किया करते हैं-- यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्चदेवेतरो कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ।। (३।२१) श्रेष्ठ पुरुष जो जो भाचरण करता है, अन्य पुरुष भी उस उसके ही अनुसार वर्तते हैं, वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है, अन्य लोग भी उसीके अनुसार यत्प्रमाण वर्तते हैं। वास्वरमें जीवन्मुक्त पुरुषके लिये कोई
गीता नियधापली
या विधिनिषेध नहीं है, तथापि लोकसप्रहार्थ, मुक्तिका
पुरुषोंको असत् मार्गसे बचाने के लिये जीव मुक्तके अन्त
करणद्वारा कर्मोकी स्वाभाविक चेष्टा हुआ करती है
उसका सबके प्रति समान सहज प्रेम रहता है। सब
समान आत्मबुद्धि रहती है। इस प्रकारके समता स्थिर
हुए पुरुष जीते हुए ही मुक हैं। उनकी स्थिति बतला
हुए भगवान् कहते हैं-
न महप्येत्मिय प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसमूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थित ॥
(५। २०
'जो पुरुष प्रियको अर्थात् जिसको लोग प्रिय समझ
हैं, उसको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको
भर्यात् जिसको लोग अप्रिय समझते हैं, उसको प्राप्त होकर
उद्धेगवान् न हो, ऐसा स्थिरबुद्धि सशयरहित ब्रह्मवेत्ता
पुस्प सच्चिदान दधन परमात्मा एकीभावसे नित्य स्थित
है।' सुख दुख, अह ता, ममता आदिके नातेसे भी वह
सबमें समबुद्धि रहता है । अज्ञानीका जैसे व्यष्टि शरीरमें
आत्मभाव है, वैसे ही ज्ञानीका समष्टिरम्प समस्त ससारमें
है । इसका यह अर्थ नहीं है कि उसे दूसरेके दर्दका
दर्दके रूपमें ही अनुभव होता है। एक अंगुलीके कटनेका
2
जोय मुक्कका सरूप
अनुभव दूसरी अगुठीको नहीं हो सकता, परन्तु जैसे
दोनोंका ही अनुभव आत्माको होता है, इसी प्रकार झानी-
कि
भामरूपसे सबमें समभार है। यदि माझग, चाण्डाल
और गौ, हाथी भादिके वाह्य शारीरिक सानपान आदिमें
ममान व्यवहार करनेको ही समताका भादर्श समझा जाय
तो
यह
आदर्श तो बहुत सहजमें ही हो सकता है। फिर
भेदाभेदरहित आचरण करनेवाले पशुमारको होजीर मुक्त
समझना चाहिये। आचाररहित मनुष्य और पशु तो सबके
साप स्वाभाविक ही ऐमा व्यवहार करते हैं और करना
चाहते हैं, कहीं रकते हैं तो भयसे स्कते हैं । पर इस
समवर्तनका नाम ज्ञान नहीं है। आजकल कुछ लोग
सिद्धातकी दृटिसे भी समपर्ननके व्याहारकी व्यर्थ चेष्टा
करते हैं, परन्तु उनमें जीव मुक्तिके कोई लक्षण नहीं देखे
जाते । अतएव गीताके समदर्शनका सबके साथ समवर्तन
करनेका अभिप्राय समझना अर्थका अनर्थ करना है। ऐसी
जीवन्मुक्ति तो प्रत्येक मनुष्य सहजमें ही प्राप्त कर
सकता है। जिस जीन मुक्तिकी शात्रों में इतनी महिमा
गायी गयी है और जिस स्थितिको प्राप्त करना महान्
कठिन माना जाता है, यह क्या इतनेसे उच्चहल
समवर्तनसे ही प्राप्त हो जाती है ? यास्तवमें समदर्शन
।
८
गीता नियाधापरी
या विधिनिषेध नहीं है, तथापि लोकसंप्रहार्थ, मुक्तिक
पुरुषोंको असत् मार्गसे बचा के लिये जीप मुकके अन
करणद्वारा कोकी सामारिक चेटा हुआ करती।
उसका सबके प्रति समान सहज प्रेम रहता है। सबमें
समान आरमबुद्धि रहती है । इस प्रकारके ममतामें स्थित
हुए पुरुष जीते हुए ही मुक्त है। उनकी स्थिति बतलाते
हए भगवान् करते हैं-
न प्रहप्येत्प्रिय प्राप्य मोदिजेरणाप्य चामियम् ।
स्थिरयुद्धिरसमूदो ग्रामपिद्मााणि स्थित ॥
(५।२०)
'जो पुरुष प्रियको अर्थात् जिसको लोग प्रिय समझते
है, उसको प्राप्त होकर हर्पित न हो और अप्रियको
अर्थात् जिसको लोग अप्रिय समझते हैं, उसको प्राप्त होकर
उद्वेगवान् न हो, ऐसा स्थिरबुद्धि सशयरहित ब्रह्मवेत्ता
पुरुष सच्चिदान दधन परमात्मामें एकीभावसे नित्य स्थित
है।' सुख दुख, अहता, ममता आदिके नातेसे भी वह
सबमें समबुद्धि रहता है । अज्ञानीका जैसे व्यष्टि शरीरमें
आत्मभाव है, वैसे ही ज्ञानीका समष्टिरूप ममस्त ससारमें
1 इसका यह अर्थ नहीं है कि उसे दूसरेके दर्दका
दर्दक रूपमें ही अनुभव होता है। एक अंगुलीके कटनेका
1
।
जीवन्मुकमा स्वरूप
अनुभा दूसरी मेंगुलीको नदी हो सकता, परन्तु जैसे
सोनोंका ही अनुमा भारमाको होता है, उसी प्रकार ज्ञानी-
का आरमापसे सबमें समभार है। यदि प्रामण, चाण्डाल
और गौ, हाथी भादिक वाह्य शारीरिक, गानपान आदिमें
समान व्यवहार करनेको होसमताका आदर्श समझा जाय
तो यह आदर्श तो बहुत सहज में ही हो सकता है। फिर
मेदाभेदरहित आचरण करनेवाले पशुमात्रको ही जीपमुक्त
समझना चाहिये। आचाररहित मनुष्य और पशु तो सबके
साय स्वाभाविक ही एमा व्यवहार करते हैं और करना
चाहते है, कहीं रफते हैं तो भपसे रुकते हैं। पर इस
समपर्तनका नाम ज्ञान नहीं है । आजकउ थुछ लोग
सिद्धातकी दृष्टिसे भी समवर्तनके व्यवहारको व्यर्थ चेष्टा
करते हैं, परन्तु उनमें जीव मुक्तिके कोई लक्षण नहीं देखें
जाते । अतएव गीताके ममदर्शनका सबके साथ समवर्तन
करनेका अभिप्राय समझना अर्थका अनर्थ करना है। ऐसी
जीर मुक्ति तो प्रत्येक मनुष्य सहजमें ही प्राप्त कर
सकता है। जिस जीर मुक्तिको शास्त्रों में इतनी महिमा
गायी गयी है और जिस स्थितिको प्राप्त करना महान्
कठिन माना जाता है, वह क्या इतनेसे उच्छल
समवर्तनसे ही प्राप्त हो जाती है १ यास्तवमें समदर्शन
१०
द्वपमा विकार नही होता । इस सममुदिके कारण यह
अपनी स्थितिसे कमी विचलिन नहीं होता। इसमे टस
गीता निष्पापी
दी यया गान। ममर्शनया कोई मदा नदी
यह को मारी कियाताप्य याा है, जो जागे
सपा पशुओंमें प्राय पापी पानी है।
गीता सारा अभिप्रापयापि नही
गनु मित्र, मान अपमान, जप पराजय, Bale
আছি মহা ধা + ষাঘ না ।
पह सरना ही पकता है। यही परमेशका
है। इसमें स्थित हो जानेका नाम दी मारी स्थिति
मिराकी इममें गाद स्थिति होती है, उसो ...
साविकी, राजसी, तामसी किसी भी कार्यके
जानेपर किसी भी कामें कमी हर्ष शोक और रात
धीर पुरुषको स्थितप्रन कहते है । किमी भी गुण
कार्यसे यह रिकारको प्राप्त नहीं होता, इमीसे या
गुणातीत है । एक ज्ञानस्वरूप परमात्मामें नियथित है
इसीसे वह ज्ञाती है। परमारमा वासुदेवके सिरा का
कुछ भी नहीं देखता, इमीसे यह भान है। उसे में
कर्म कभी बार नहीं सकते, इसीसे यह जीप मुक्त है
इच्छा, भय और क्रोधका उसमें अत्यत ममार
म
जीव, ईश्वर और ब्रह्मका भेद
वह मुक्त पुरुष लोकदृष्टिमें सब प्रकार योग्य
तरण करता हुआ प्रतीत होनेपर भी उसके कार्योंमें
नी मनुष्योंको भेदकी प्रतीति होनेपर भी, वह
जानानन्दधन परमात्मामें तद्रूप हुआ उसीमें एकी-
से सदा सर्वदा स्थित रहता है। उसका वह आनन्द
य शुद्ध ओर बोपखरूप है, सबसे विलक्षण हे! लौकिक
दिसे उसका अनुमान भी नहीं किया जा सकता।
(२)
जीव, ईश्वर और ब्रह्मका भेद
उपद्रष्टानुमता च भर्ता भोक्ता महेश्वर ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुप पर ॥
(१३ । २२)
'वास्तवमें यह पुरुप देहमें स्थित हुआ भी पर
त्रिगुणमयी मायासे सर्वथा अतीत ) ही है । केरल
नाक्षी होनेसे उपद्रष्टा, यथार्थ सम्मति देनेवाला होनेसे
अनुमन्ता, सबको धारण करनेवाला होनेसे भर्ता, जीररूपसे
नोका, ब्रह्मादिका भी खामी होनेसे महेश्वर और शुद्ध
सच्चिदानन्दधन होनेसे परमात्मा है, ऐसा कहा गया है।
पण्डितजन कहते हैं कि गीताके सिद्धान्तानुसार
झ, ईश्वर और जीपमें कोई भेद नहीं है । उपर्युक्त
श्रीसेठिया जैन अालय ।
,
14
F
गीता-निय चायली
लोकसे यह स्पष्ट है कि यह परपुरुष परमाना
भोगने के समय जीय, सृष्टिको उत्पति, पाटन -
संहारके ममय चिर और निस्किार भाम्पा मक्ष
जाता है। इस स्लोयमें भोका शन्द जीरका, उur
अनुमन्ता, भर्ता और महेश्वर शब्द ईभरका एवं पर
शुद्ध मसका याचक है । परमपुरुषफे विशेषण
सब उसीके रूप हैं। इदी तीनों रसोका वर्णन
अध्यायके भारम्भमें अर्जुनके सात प्रश्नोंमसे तीन
उत्तरमें आया है । अर्जुनका प्रश्न था कि 'कि तमा
यह प्रा क्या है । इसके उत्तरमें भगवान्ने कहा
'अक्षर मा परमम्' 'परम अविनाशी सचिदानदघन
परमात्मा महा है। मिथ्यात्मम्' अध्यात्म क्या है ।
के उत्तरमें 'स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते' 'अपना मात्र यानी
जीगत्मा' और 'का अधियज्ञ' 'अपियज्ञ कौन है"
के उत्तर में 'अधियज्ञोऽहमेवान' में ईश्वर इस शरीरमें
अधियज्ञ हूँ।' ऐसा कहा है। इसी बातको अवतारका
कारण बतठानेके पूर्वके श्लोकमें भगमान्ने कहा है-
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रति खामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ।
जीय, घर और प्राका मेर में अग्निाशीवरए जमा होनेपर भी तया सत्र भूत प्रागियोंका पर होनेपर भी अपनी प्रातिको अधीन करके योगमायासे प्रकट होता आघटकर भगाने स्पर यहा है कि मैं जो श्रीकृष्ण के सपने साधारण मनुष्य-मा दीखता हूँ सो मैं ऐसा नहीं, पर मसाधारण ईवर सम्पूर्ण भोंके महा ईश्वरम्प मेरे परम भाको जाननेवाले मूद लोग मनुष्यया शरीर धारण करनेराले मुझ परमामाको तुच्छ समझते हैं यानी अपनी पोगमाया- से ससारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते हुए मुझको साधारण मनुष्य मानते हैं (२॥ ११) भगवान् श्रीकृष्ण (ईश्वर) और प्राका अमेद गीतामें कई जगह बतलाया है। ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतम्यान्ययस्य ध। भादयतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिपस्य च। (१५२०) 'हे अर्जुन ! अग्निाशी परग्रहका और अमृतका तथा नित्य धामका एच अखण्ड एकरस आन दका ही आश्रय हूँ। अर्थात् ब्रह्म, अमृत, मन्यय और शान्धत- धर्म तथा ऐकान्तिक सुख यह सा मेरे ही नाम है, इसलिये मैं इनका परम आश्रय है।" गीताके कुछ गीता नियधावी अंश है, परन्तु वह किस प्रकारका अश है, यह कठिन है । कुछ विद्वान् इसके लिये स्वप्नका दृष्टान्त हैं। जैसे म्वनकालमें पुरुष अपने ही अदर १ प्रकारके दृश्यों, पदार्थों और व्यक्तियोंको देखता उनसे व्यवहार करता है, परन्तु जागनेके बाद अब सिमा स्वमदृष्ट समस्त पदार्थोंका अस्पत अभाव समय है। सममें दीखनेराले समस्त पदार्थ उसके कल्पित थे, इसी प्रकार ये समस्त जीर परमात्माके अंश है यद्यपि यह दृष्टान्त बहुत उपादेय और आदर्श हे, तय इससे यथार्थ वस्तुस्थितिकी सम्यक् उपलब्धि नहीं सकती । क्योंकि नित्य चेतन, निर्धात, ज्ञान परमात्मामें निद्रा, भ्रान्ति और मोहका आरोप कि भी कालमें नहीं किया जा सकता । अतएव उदाहर युक्तियोंके बलपर इस रहस्यको समझाना असम्भव- ही है । गीतोक्त साधनोंद्वारा परमात्माकी और मह पुरुषोंकी दयासे ही इसका तत्त्व जाना जा सकता इसीसे यमराजने नचिकेतासे कहा है- उत्तिष्ठत घरानियोधत 'उठो, जागो और श्रेष्ठ पुरुषोंके समीप जाकर ३ प्राप्त करो ।' भगवान्ने भी कहा है- जानत प्राप्य -- जीव, ईश्वर और प्रलका भेद तद्विद्धि प्रणिपातेन परिपप्लेन सेक्या। उपदेष्यन्ति ते पान शानिनस्तत्त्वदर्शिन। "इसलिये तत्त्रको जाननेवाले ज्ञानी पुरुषोंसे भली प्रकार दण्डपत्, प्रणाम तया सेना और निष्कपट भावसे किये हुए प्रश्नद्वारा उस ज्ञानको जान । वे मर्मको जाननेवाले ज्ञानीजन तुझे उस ज्ञानका उपदेश करेंगे। परन्तु इससे यही न मान लेना चाहिये कि गीतामें भेदके प्रतिपादक शब्द ही नहीं हैं । ऐसे बहुत से स्थल हैं जहाँ भेदमूलक शब्द पाये जाते हैं। मिन्न भिन्न लक्षणोंसे तीनोंका मिन्न-भिन्न वर्णन है । शुद्ध प्राको मायासे अनीत, गुणोंसे अतीत, अनादि, शुद्ध, बोध- ज्ञान भानन्दखरूप अग्निाशी आदि बतलाया है। जैसे- शेय यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते । अनादिमत्पर ब्रह्म न सत्तनासदुच्यते ॥ (१३ । १२) जो जाननेके योग्य है तथा जिसको जानकर (मनुष्य ) परमानदको प्राप्त होता है, उसको मैं अच्छी प्रकारसे कहूँगा, यह आदिरहित परम ब्रह्म न सत् कहा जाता है और न असद ही कहा जाता है, वह दोनोंसे गी०नि०२--
अनिर्देश्यम् , यूटस्थम्, धूयम्, अचलम्, अव्यवमा
गीता नियन्धावली
अतीत है।" 'अक्षरं मा परमम्, अचित्यम्, सर्पप्रगम
।
अक्षरम्' आदि नामोंसे वर्णन किया गया है, श्रुतियों में
'सत्यं ज्ञानमन त मम' 'प्रज्ञानं मन आदि कहती है।
ईश्वरका वर्णन सृष्टिके उत्पत्ति पालन सहारको
और शासनकर्ता आदिके रूपमें किया गया है । यथा-
मयाध्यक्षेण प्रकृति सूयते
सूयते सचराचरम्।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ॥
(९।१.)
मर्पय सात पूर्व चत्वारो मनयस्तथा ।
मढ़ाया मानसा जाता येषा रोकमा प्रज्ञा ॥
(२०१६)
ईश्वर सर्वभूताना
सर्वभूताना हद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।
भ्रामयन्सर्घभूतानि यत्रासदानि
मायया॥
(१८१६१)
म्हे अर्जुन ! मुझ अधिष्ठाताके सकाशसे यह मेरी
माया चराचरसहित सर्व जगत्को रचती है
1 इस
हेतुसे ही यह ससार आवागमनरूप चक्रमें घूमता हे।
सातों महर्षि और उनसे भी पूर्वमें होनेवाले चारों
सनकादि तथा स्वायम्भुर आदि चौदह मनु मेरेमें
भाववाले मेरे सक्ल्पसे उत्पन्न हुए हैं, जिनकी ससारमें
जीय, ईश्वर और ब्रह्मका भेद पह. सम्पूर्ण प्रजा हे । हे अर्जुन ! शरीररूप यन्त्रमें मारूद हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी मायासे उनके कर्मोके अनुसार भ्रमाता हुआ सब भूतप्राणियोंके हृदयमें स्थित है । इसी तरह अ० ४ । १३ में 'चातुर्वर्ण्यके कर्ता', अ० ५। २९ में 'सर्व- लोकमहेश्वर', अ० । ७ । ६ में 'सम्पूर्ण जगत्के उत्पत्ति-प्रलयरूप', अ० ११ । ३२ में 'लोक-संहारमें प्रवृत महाकाल' इत्यादि रूपोंसे वर्णन है। जीवात्माका भोक्ता, कर्ता, ज्ञाता, अंश, अविनाशी, नित्य आदि लक्षणोंसे निरूपण किया गया है । जैसे- अध्याय २॥ १८ में नित्य अविनाशी अप्रमेय', अध्याय १३ । २१ में 'प्रकृतिमें स्थित गुणों के भोक्ता और गुणोंके संगसे अच्छी-बुरी योनियोंमें जम लेनेवाला', अ० १५। ७ में 'सनातन अश', अ०१५।१६ में 'अक्षर कूटस्थ' आदि लक्षणोंसे वर्णन है इस प्रकार गीतामें अमेद-भेद दोनों प्रकारके वर्णन पाये जाते हैं । एक ओर जहाँ अभेदकी बड़ी प्रशंसा है, वहीं दूसरी ओर ( अ० १२ १२ में) सगुणोपासककी मैदकी महिमा बढ़ायी गयी है । इससे यह शङ्का होती है कि गीतामें
गीता नियन्धाचली
प्रतिपादन है या अमेदवा जब मेद और अभेद देने
का स्पष्ट वर्णन मिटता है, तर उनसे किसी एव
गटत नहीं कहा जा सकता। परनु सत्य भ!
२०
नहीं हो सकते, वह तो एक ही होता है । अत् ।
विषयपर विचार करने से यही अनुमान होता है।
वास्तवमें जो वस्तु तत्व है, उसको न भेद ही कार
सकता है और न अभेद ही । यह सबसे विटक्षण
मन-याणीसे परे है, यह वस्तुस्थिति, वाणी या
युक्तियोंसे समझी या समझायी नहीं जा सकती
जानते हैं वे ही जानते हैं। जाननेवाले भी :
याणीसे वर्णन नहीं कर सकते । शुनि. कहती है.
नाह मन्ये सुवेदेति नो न घेदेति घेद च।
यो नस्तद्वेद तोद नो न वेदेति चेद च ।
(केन उ
जबतक वास्तविक तत्वको मनुष्य नहीं समझ
तबतक इनका भेद मानकर साधन वरना आ
सुरक्षित और लाभदायकहे, गीतामें दोनों प्रकारके वर्ण
यह प्रतीत होता है कि दयामय भगवान्ने दो प्रव
अधिकारियोंके लिये दो अवस्थाओंका वर्णन किया
वास्तविक खरूप अनिर्वचनीय है। यह अतयं ।
जीव, ईश्वर और ब्रह्मका भेद
रमात्माकी कृपासे ही जाननेमें आ सकता है । उस
स्विको यथार्थरूपसे जाननेका सरल उपाय उस परमात्मा-
से शरणागति है । इसमें सबका अधिकार है । भगवान्ने
(९।३२)
मा हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनया।
रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपियान्ति परागतिम्॥
'स्त्री, वैश्य और शूदादि तथा पापयोनिवाले भी जो
कोई होवें वे भी मेरे शरण होकर तो परमगतिको ही
तत्प्रसादात्परा शान्ति स्थान प्राप्यसिशाश्यतम् ॥
रणको प्राप्त हो, उस परमावरी कृपा से ही परमशाति
और सनातन परमगमका होगा। यह परमेश्वर
वृष्ण ही है, इसलिये मतदाने कहा-
त होते हैं ।
तमेव शरण
सर्वधर्मान्परित्यज्य
आगे चलकर भगनान्ने स्पष्ट कह दिया है कि-
गच्छ
3
सर्वभावेन
मारत।
(१८॥६२)
'हे भारत ! सा प्रकारसे उस परमेश्वरको ही अनन्य
माह त्या सर्यपापेभ्यो मोना
शरण
मा "
२२
गीता-गिय पापरी
ई धोको अर्गाद सम्पूर्ण कर्मकि STAR
स्यागकर पेट पक गुन्न सधिदान दधन परे
परमारमाकी ही भाय शरणको शाम हो, में IFE
समस्त पापोंसे गुफ पर दूंगा । शोक मा कर
गीताके अनुमार कर्म, विकर्म और अकर्मका
पर्मणो ापि योग्य पोथ्य च विषमंग ।
अकर्मणध योद्धयं गहना पर्मणो गति ।
(४।१७
फर्मको गति बड़ी ही गहन है, इसीसे भगवान् बड़ा
जोर देकर उसे समझने के लिये करते हैं और समझाते
हैं। यहाँ कर्मकी तीन संज्ञा दी गयी है-धर्म, विकर्म
और अकर्म । यद्यपि इस बातका निर्णय करना बहुत
फटिन है कि भगवानका अभिप्राय वास्तवमें क्या है,
परन्तु विचार करनेपर जो कुछ समझमें आता है यही
लिया जाता है। साधारणतया विजन इनका स्वरूप
यही समझते हैं कि १-इस लोक या परलोकमें जिसका
शरणागतिके विषपर्म सविस्तर देखा होतो तित्त्व
चिन्तामणि' नामक गीताप्रेससे प्रकाशित पुस्तकमे दखिये ।
-
कर्म, विकर्म और अकर्मका स्वरूप
फल सुखदायी हो उस उत्तम क्रियाका नाम कर्म है।
२-जिमका फल इस लोक या परलोकमें दु खदायी हो
उमका नाम विकर्म है ओर ३-जो कर्म या कर्मत्याग
किमी फलकी उत्पत्तिका कारण नहीं होता, उसका नाम
अकर्म है । इन तीनोंके रहस्यको समझना इसलिये भी
बडा कठिन हो रहा है कि हम लोगोंने मन, वाणी,
शरीरसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओंको ही कर्म नाम
दे रक्खा है, परन्तु यथार्थमें यह बात नहीं है। यदि
यही बात होती तो फिर ऐसा कौन सा रहस्य था जो
सर्वसाधारणके समझमें न आता ! भगवान् भी क्यों
कहते कि कर्म और अकर्म क्या है, इस विषयमें बुद्धिमान्
पुरुष भी मोहित हो जाते हैं (कि कर्म किमकर्मेति
कायोऽप्यत्र मोहिता ) और क्यों इसे गहन ही
बतलाते।
इससे यह सिद्ध होता है कि मन, वाणी, शरीरकी
स्थूल क्रिया या अक्रियाका नाम ही कर्म, विकर्म या
अकर्म नहीं है । कर्ताके भावोंके अनुसार कोई भी
क्रिया कर्म, विकर्म और अकर्मके रूपमें परिणत हो
सकती है। साधारणत तीनोंका भेद इस प्रकार समझना
चाहिये।
3
२४
गीता निवन्धावली
कर्म
मन, वाणी, शरीरसे होनेवाली विधिसगत उत्तम
कियाको ही कर्म मानते हैं, पर ऐसी विधिरूप क्रिया
भी कर्ताक भावोंकी विभिन्नताके कारण कर्म, विकर्म
या अकर्म बन जाती है। इसमें भान ही प्रधान है।
(१) फल्की इच्छासे शुद्ध भावनापूर्वक जो
विधिसगत उत्तम कर्म किया जाता है, उसका नाम
तप,
(२) फलकी इच्छापूर्वक बुरी नीयतसे जो यज्ञ,
दान, सेवा आदि रूप विधेय कर्म भी किया जाता
है, वह कर्म तमोगुणप्रधान होनेसे विकर्म यानी पापकर्म
हो जाता
है
। यथा-
मूढमाहेणात्मनो यत्पीडया मियते तप ।
परस्योत्सादनार्थे
तत्तामसमुदाहृतम् ॥
(१७।११)
जो तप मूढतापूर्वक हठसे मन, वाणी, शरीरकी
पीडासहित अथवा दूसरेका अनिष्ट करनेकी नीयतसे
किया जाता है, वह तामस कहा गया है।'
(३) क-फलासक्तिरहित हो भगदर्य या
या
- कर्म, विकर्म और थर्मका स्वरूप भगवदर्पणबुद्धिसे अपना कर्तव्य समझकर जो कर्म किया जाता है (९।२७२८,१२१०-११) मुकिके अतिरिक्त अन्य फलोत्पादक न होनेके कारण उस कर्मका नाम अकर्म है । अपना- ख-परमात्मामें अभिन्न भावसे स्थित होकर कापन- के अभिमानसे रहित पुरुषद्वारा जो कर्म किया जाता है, वह भी मुक्तिके अतिरिक्त अय फल नहीं देनेवाला होनेसे अकर्म ही है (३ । २८, ५ । ८-९, १४।१९)। विकर्म माधारणत मन, वाणी, शरीरसे होनेवाले हिंसा, असत्य, चोरी आदि अकर्तव्य या निषिद्ध कर्ममात्र ही विकर्म समझे जाते हैं, परन्तु वे भी क्ताक भावानुसार कर्म, विकर्म या अकर्मके रूपमें बदल जाते हैं। इनमें भी भाव ही प्रधान है- (१) इहलौकिक या पारलौकिक फलेच्छापूर्वक शुद्ध नीयतसे किये जानेवाले हिंसादि कर्म ( जो देखने- में विकर्म से लगते हैं) कर्म समझे जाते हैं (२१३७)। (२) बुरी नीयतसे किये जानेवाले निषिद्ध कर्म तो सभी रिकर्म हैं। ।
गीमा-निषघायली
(३) आसकि और महफारसे रहित होकर शुद्ध
नीयनसे कर्तश्य प्राप्त होोपर किये जानेवाले हिमादि
फर्म (जो देउनमें रिफर्म यानी निषिद्ध कर्म से प्रतीत
दोते) भी फलोत्पादक न होनेके कारण अकर्म
समझ जाते हैं (२।३८,१८११७)।
अकर्म
गन, पाणी, शरीरकी क्रिया के अमायका नाम ही
धर्म ही है । क्रिया न करनेवाले पुरुषोंके माके
अनुसार उनका किया पागप अकर्म भी कर्म, रिकर्म
और अकर्म बन सकता है । इसमें भी मार ही
प्रधान है।
(१) मन, वाणी, शरीरको सर क्रियाओंको
त्यागकर एकातमें बैठा हुआ क्रियारहित साधक पुरुष
जो अपनेको सम्पूर्ण क्रियाओंका त्यागी समझता है,
उसके द्वारा स्वरूपसे कोई काम होता हुआ न दीखने-
पर भी त्यागका अभिमान रहनेके कारण उससे यह
'त्याग' रूप कर्म होता है। यानी उसका नह त्यागरूप
अकर्म भी कर्म बन जाता है।
(२) कर्तव्य प्राप्त होनेपर मय या स्वार्थक कारण,
कर्तव्यकर्मसे मुंह मोड़ना, विहित कर्माको न करना
कर्म, विकर्म और अकर्मका स्वरूप और बुरी नीयतसे लोगोंको ठगनेके लिये कौका त्याग कर देना आदिमें भी स्वरूपसे कर्म नहीं होते, परन्तु यह अकर्म दुखरूप फल उत्पन्न करता है, इससे इसको विकर्म या पापकर्म समयना चाहिये (३॥६॥ (३) परमात्माके साथ अमिन भानको प्राप्त हुए जिस पुरुषका कर्तृत्वाभिमान सर्वया नष्ट हो गया है, ऐसे स्थितप्रज्ञ पुरुषके अदर समाधि-कालमें जो क्रियाका आत्यन्तिक अभार है, वह अकर्म ही यथार्थ अकर्म है (२१५५, ५८,६११९, २५)। उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध होता है कि कर्म, विकर्म और अकर्मका निर्णय केरल शिया- शीलता और निष्क्रियतासे ही नहीं होता । मावोंके अनुसार ही कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म आदि हो जाते हैं । इस रहस्यको तत्वसे जाननेवाला ही गीताके मतसे मनुष्योंमें बुद्धिमान् , योगी और सम्पूर्ण कोंक करनेवाला हे। स बुद्धिमान् मनुष्येषु स युक्त कृत्सकर्मकृत् ।। और वही ससार बधनसे सर्वथा छूटता है-- 'यज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुमात् ।'
गीता-नियन्धावली
(३) आसक्ति और अहंकारसे रहित होकर शुद्ध
नीयतसे कर्तव्य प्राप्त होनेपर किये जानेवाले हिंसादि
कर्म (जो देखनेमें पिकर्म यानी निषिद्ध कर्म से प्रतीत
होते हैं ) भी फलोत्पादक न होनेके कारण अकर्म
समझे जाते हैं (२१३८,१८११७)।
अकर्म
मन, वाणी, शरीरको क्रियाके अमारका नाम ही
अकर्म नहीं है। फिया न करनेवाले पुरुषोंके मानोंके
अनुसार उनका क्रियात्यागरूप अर्म भी कर्म, विकर्म
और अकर्म बन सकता है । इसमें भी भार ही
प्रधान है।
(१) मन, वाणी, शरीरको सन क्रियाओंको
स्यागकर एका तमें बैठा हुआ क्रियारहित सारक पुरुष
जो अपनेको सम्पूर्ण क्रियाओंका त्यागी समझता हे,
उसके द्वारा स्वरूपसे कोई काम होता हुआ न दीखने-
पर भी त्यागका अमिमान रहनेके कारण उससे पह
'त्याग' रूप कर्म होता है। यानी उसका वह त्यागरूप
अकर्म भी कर्म बन जाता है।
(२) कर्तव्य प्राप्त होनेपर भय या स्वार्थके कारण,
लव्यकर्मसे मुंह मोड़ना, विहित कोको न करना
कर्म, विकर्म और अकर्मका स्वरूप और बुरी नीयतसे लोगोंको ठगनेके लिये कर्मोका त्याग कर देना आदिमें भी स्वरूपसे कर्म नहीं होते, परन्तु यह अकर्म दुखरूप फल उत्पन्न करता है, इससे इसको विकर्म या पापकर्म समझना चाहिये (३॥६॥ १८१७)। (३) परमात्माके साथ अभिन्न भाषको प्राप्त हुए जिस पुरुषका कर्तृत्वाभिमान मर्वया नष्ट हो गया है, ऐसे स्थितप्रज्ञ पुरुषके अदर समाधि-कालमें जो क्रियाका आत्यतिक अभार है, वह अकर्म ही यथार्थ भकर्म है (२१५५, ५८,६१९, २५)। उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध होता है कि कर्म, विकर्म और अकर्मका निर्णय केवल क्रिया- शीलता और निष्क्रियतासे ही नहीं होता । मावोंके अनुसार ही कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म आदि हो जाते हैं । इस रहस्यको तत्वसे जाननेवाला ही गीताके मतसे मनुष्योंमें बुद्धिमान, योगी और सम्पूर्ण कर्मोके करनेवाला है। स धुद्धिमान मनुष्येपु स युक्त फवकर्मकृत् ॥ और वही ससार-बन्धनसे सर्वथा घटता है- 'यज्ञात्वा मोक्ष्यमेऽशुमात् ।' 1
गीतसिएन्यायली
U
घर, अक्षर और पुरुषोपम
सा अपापफे भौथे, पाँच और छठे इले काम
परा', 'परा' और 'अदा' के रूपमे मिस तलका
वर्णन है, उसीका तेरह में अध्यायके पहले और दूसरे
लोकमें क्षेत्रा, क्षेत्रज्ञ और गम्' के नाम एवं
पत्ये अध्यापके सोलह और सनरहये स्टोकविर',
'अक्षर' और 'पुरोत्तम' के भागमे है। इन तीनोंगे
भारा', 'और' और 'क्ष' प्रतिसहित इस जद जगतफे
वाचक है, 'परा', 'क्षेत्र' और 'अक्षर' जीयके वाचक
हैं तपा 'अहम्', 'मार' और 'पुरुपोचम' परमेश्वरके
वाचक है।
क्षर-प्रातिसहिन विनाशी जड़ तत्वोंका विस्तार
तेरह अन्यायके पाँचौ श्लोकमें है-
महाभूता यहवारो पुद्धिरव्यत्तमेष
द्रियाणि दर्शपच पच चेन्द्रियगोचरा॥
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वीके सूक्ष्म
मावरूप पञ्च महाभून, अहहार, मुदि, मूलप्रकृति
अर्थात् निगुणमयी माया, (श्रोत्र, यचा, नेत्र, रसना,
प्राण, वाणी, हस्त, पाद, उपस और गुश) दस इन्द्रियों,
क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम एक मन और पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंके ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ) पाँच विषय इस प्रकार चौबीस भर- तत्त्व हैं । सातवें अध्यायके चौथे श्लोको इन्हींका सक्षेप अष्टधा प्रकृति के रूपमें किया गया है-- भूमिरापोऽनलो घायु ख मनो थुद्धिरेव च । अहद्वार इतीय मे भिन्ना प्रतिरएया। और भूतोंमहित इसी प्रकृतिका और भी सक्षेपरूप पंद्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें 'क्षर सर्वाणि भूतानि' है। या यों समझना चाहिये कि 'क्षर सर्वाणि भूतानि का विस्तार अष्टधा प्रकृति और उसका विस्तार चौबीस तत्व हैं। वास्तवमें तीनों एक ही वस्तु हैं। सातवें अध्यायके तीसवें और आठवें अध्यायके पहले तथा चौथे श्लोकमें 'अधिभूत' के नामसे, तेरहवें अध्यायके बीसवें श्लोकके पूर्वार्द्धमें (दस) कार्य, ( तेरह ) करण और (एक) प्रकृतिके नामसे ( कार्यकरणारीत्वे हेत प्रतिरुच्यते ) एव चौदहवें अध्यायके तीसरे और चौथे श्लोकमें 'महद्ब्रह्म' शब्दसे भी इसी प्रकृतिसहित विनाशी जगत्का वर्णन किया गया है अक्षर-सातवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें पराप्रकृति के नामसे, तेरहवें अध्यायके दूसरे श्लोको क्षेत्र में भोर रे -
गीता नियमावली
नामसे और पद्रहवें अध्यायके सोलहवें श्लोक, कूटस्थ
और अक्षरके नामसे जीवका वर्णन है। यह जीवात्मा
प्रकृतिसे श्रेष्ठ है, ज्ञाता है, चेतन है तथा अक्षर
होनेसे नित्य है। पंद्रहवें अन्यायके सोलहवें श्लोकमें
'कूटस्थोऽक्षर उच्यते' के अनुसार जीवका विशेषण
'कूटस्थ' होने के कारण कुछ सजनोंने इसका अर्थ प्रकृति
या भगवान्की मायाशक्ति किया है, पर तु गीतामें 'अक्षर'
और 'कूटस्थ' शब्द कहीं भी प्रकृतिके अर्थमें व्यबहत
नहीं हुए, बल्कि ये दोनों ही स्थान स्थानमें जीवात्मा
और परमात्माके वाचकम्पसे आये हैं। जैसे-
ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रिय ।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोपाश्मकाञ्चन ॥
(६८)
ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्त पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्य च कूटस्थमचल
(१२ । ३)
अव्यकोऽभर इत्युक्तस्तमाहुः परमा गतिम् ।
(८१२१)
कर्म ब्रह्मोद्गव विद्धि
प्रामाक्षरसमुद्भवम् ।
(३११५)
दूसरी बात यह विचारणीय हे कि आगे चलकर
ध्रुवम् ॥
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३
गीता नियन्धावली
अध्यात्म के नामसे एवं तेरहवें अध्यायके श्लोक १९,
२०, २१ में 'पुरुष' शब्दसे है । यहाँ सुख-दुखोंके
भोका प्रकृतिमें स्थित और सदसद् योनिमें जम
लेनेवाला बतलानेके कारण 'पुरुष' शब्दसे 'जीवात्मा'
सिद्ध है । पदहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें जीवभूत'
नामसे और आठवेंमें 'ईश्वर' नामसे, चौदहवें अध्यायके
तीसरेमें गर्भ और 'बीज' के नामसे भी जीनामाका ही
कथन है । जीवात्मा चेतन है, अचल है, ध्रुव है, नित्य
है, भोक्ता है, इन सर भावोंको समझाने के लिये ही
भगवान्ने विभिन्न नाम और भावोंसे वर्णन किया है।
पुरुषोत्तम यह तर परम दुर्विज्ञेय है, इसीसे
भगवान्ने अनेक भागोंसे इसका वर्णन किया है। कही
सृष्टिपालन और संहारकर्तारूपसे, कही शासकरूपसे,
कहीं धारणकर्ता और पोषणकर्ताक भावसे, कहीं
पुरुषोत्तम, परमेश्वर, परमात्मा, अव्यय और ईश्वर आदि
नाना नामसे वर्णन है । 'अहम्', 'माम्। आदि शब्दोंसे
जहाँ तहाँ इसी परम अव्यक, पर, अविनाशी, नित्य,
चेतन, आनद, बोधस्वरूपका वर्णन किया गया है।
-
थह प्रत्खस्य जगत
ममय
प्रलयस्तथा।
(७।६)
RE, Irr rTR PremrTITI Prernाविप REET RATE TIMER ru rig my deare | Trrer, rogramir- Star marrias रmarti KHI * { rẻ tru tinh tri T मकर मार rat ता. मे पामा मानही या जा हममें बद ५ नपुरलय परगद freyee प्रतिम गदर Ar, 7 मा. धरण, अम, अपिनानि उसे मा भोट मागियों की है। ER
गीता नियमावली
और समस्त कार्य परमारमामें केवल अध्यारोपित है।
यस्तुत परमात्माके सिमा अय कोई वस्तु है ही नहीं।
इस रहस्यका तच जाननेको ही परमपदकी प्राप्ति
और मुक्ति कहा जाता है । अत इसको जाननेके लिये
विशेष प्रयत्न करना चाहिये । मगरान् कहते है--
विद्यादु खमयोगवियोग योगसगितम् ।
स निश्चयेन योक्तयो योगोऽनिर्विष्णचेतसा॥
(६ | २३)
दुखरूप ससारके संयोगसे रहित है, जिसका
नाम योग है उसको जानना चाहिये, यह परमा माकी
प्राप्तिरूप योग तपर चित्तसे निश्चयपूर्वक ही करना
वाहिये ।
त
गीता मायावाद मानती है या परिणामवाद ?
श्रीमद्भगवद्गीतामे दोनों ही वादोंके समर्थक शब्द
मिलते हैं। इससे निश्चयरूपसे यह नहीं कहा जा
सकता कि गीताको वास्तपम कान सा वाद खीकार है।
मेरी समझसे गीताका प्रतिपाद्य विषय कोई बाद विशेष
नहीं है । मचिदान दधन सर्वशकिमान् परमात्माको
प्राप्त करना गीताका उदेश्य है। जिसके उपायस्वरूप
गीता मायावाद मानती है या परिणामपाद ? ३५ कई प्रकारके मार्ग बतलाये गये हैं, जिनमें परिणामवाद और मायावाद दोनों ही आ जाते हैं । जैसे- अव्यकायकय सर्वा प्रभरत्यहपगमे। মম प्रलीयन्ते तत्रैवान्यकसशके। भूतमाम स एवाय भूत्वा भूत्वा प्रलीयते । राज्यागमेऽवश पार्थ प्रभवत्यहरागमे । (८॥१८-१९) इसलिये वे यह भी जानते हैं कि 'सम्पूर्ण दृश्यमात्र भूतगण ब्रह्माके दिनके प्रवेशकालमें अव्यक्तसे अर्थात ब्रह्माके सूक्ष्म शरीरसे उत्पन्न होते हैं और ब्रह्माकी । रात्रिके प्रवेशकालमें उस भव्यक्त नामक ब्रह्माके सूक्ष्म शारीरमें ही लय होते हैं। और वह ही यह भूतसमुदाय उत्पन्न हो होकर प्रतिके वशमें हुआ, रात्रिके प्रवेशकालमें लय होता है भोर दिनके प्रवेशकालमें फिर उत्पन्न होता हे, हे अर्जुन! इस प्रकार प्रमाके एक सौ वर्ष पूर्ण होनेसे अपने लोक- है सहित ब्रह्मा भी शात हो जाता है ।। इन श्लोकोंसे यह स्पष्ट प्रकट है कि समस्त व्यक्त जड़ पदार्य अन्यक्त समष्टि-शरीरसे उत्पन्न होते हैं और उसीमें लय हो जाते हैं । यहाँ यह नहीं कहा 1 गीता frnाय कि सपन पास्य होनेरो प्रतीत होने ही, पन्च पर उत्पन होना अर्थात् उRE- या ही मापन परिणाम प्राप्त होना और इमरा परिनाम से गुन अगरए होना बनाया। इन अ सयोका संभार (भागमटि ) भी महा- मध्यके अत गल अन्यको जित हो जाता है और सीसे उसकी उपसिहोती। उस मूल अरक प्रीिरे ही मनमान्ने धौरह प्यायके रोक ३, ४ में महद बदा है 1 गहासनये आदिमें सम्पूर्ण मूर्तियों ( शारीरों की उत्पत्तिमें महसभकोही कारण मतटापा है अर्थात् जदपक विमारमें इस प्रतिको दी हेतु माना है । अप्याय १३ । १९-२० में भी कार्य-करणरूप सेस को दी प्रकृतिका विस्तार बतलाया है। इससे यह सिद्ध होता है कि जो कुछ ० आकाश, वायु, अग्नि, जा और पृथ्योम्प पाँच महाभूत एव द स्पर्श, रूप, रस, गध ये पाँच विषय- इन दसको कार्य कहते हैं। मुद्धि, अहकार, मन ( अन्त करण), श्रोत्रा सक, रसा, नेय, प्राण (पानेन्द्रियाँ) एम वाणी हाथ, पैर, उपस्थ, गुदा (बद्रियाँ)-इन तेरहके समुदायका नामकरण है। साल्यकारिकामें कहा है-- मूल प्रतिरविकृतिमहदाद्या प्रतिविनय सा पोशाख सोता मायावाद मानती है या परिणामवाद : ३७ देखने में आता है, सो सब प्रकृतिका कार्य है । यानी प्रकृति ही परिणामको प्राप्त हुई है। जीपारमासहित जो चतुविध जीनोंकी उत्पत्ति होती है, यह प्रकृति और उस पुस्पके सपोगसे होती है। इनमें जितने देह-शरीर हैं, विकारोन प्रकृतिन विकृति पुरुष (सा० का० ३)। मूल प्रकृति विमति नहीं है, महत् आदि सान प्रकृति विकृति है, सोलह विकार है और पुरुष न प्रकृति है, न विकृति है। अव्याहत मामा नाम मूर प्रकृति है। यह किसीका Faार होने के कारण किसीकी विकृति नहीं है । ऐसा पहा जाता है । महत्तत्त्व (माय बुद्धि, अहङ्कार, भूतोंदी सूक्ष्म গালাগা-ই ৪ার সৰি মিৰি ই} মুক্ত বিদ্যা विकार होने से इनको विकृति कहते हैं। एवं इनसे अन्य विकाकी उत्पति होती है। इसीसे इन्ह ही प्रकृति कहते हैं। अतएव दोनों मिलकर का नाम प्रकृति विकृति है। पाँच शानेन्द्रिमा, पाँच कर्मेंद्रियों, एक मन और पाँच स्थूल भूत- में सोलह विकृति है। सात प्रति आकार और तमात्रासे हमती उत्सति होने के कारण इन्हें विकृति कहते हैं। इनसे भागे अय विसीको उत्पत्ति नहीं है। इससे ये किसीकी प्रतिनीतिमात्र है। मायके अनुसार मूल प्रकृति से महताय, महताब अहहार महासे पान्मापा, FR माद्वारछे ११ मोद्रियों और पतन्मापारे पक्ष स्थल भूत गीता १३ असार ५ लोक में भी प्राय रेश
३८
गीता नियन्यावली
सर प्रकृतिका परिणाम हैं और उन सबमें जो चेतन
है सो परमेघरफा अंश है। चेतनरूप श्रीज देनेवाल
चिता भगवान् हैं । भगवान् करते हैं-
सर्पयोनिषु कौन्तेय मूर्तय सभयन्ति या ।
तासा प्रल महयोनिरह धीजप्रद पिता ॥
(१४।४)
'हे अर्जुन ! नाना प्रकारकी सत्र योनियों में जितनी
मूर्तियों अर्थात् शरीर उत्पन्न होते हैं, उन सबकी
त्रिगुणमयी माया तो गर्भको धारण करनेवाली माता है
और मैं बीजको स्थापन करनेवाला पिता हूँ। गीतामें
इस प्रकार समस्त प्राणियोंको उत्पत्तिमें प्रकृतिसहित
पुरुषका कथन जगह-जगह मिलता है। कहीं परमेश्वर
की अध्यक्षतासे प्रकृति उत्पन्न करती है, ऐसा कहा
गया है (९1१०) तो कहीं में उत्पन्न करता हूँ
(९।८)ऐसे वचन मिलते हैं । सिद्धान्त एक ही है।
उपर्युक्त विवेचनसे यह सिद्ध हो जाता है कि
यह सारा चराचर जगत् प्रकृतिका परिणाम है । परमेश्वर
सपरिणामी है, गुणोंसे अतीत है। इस संसारके
परिणाममें परमेश्वर प्रकृतिको सत्ता-स्कृति प्रदान करता
है, सहायता करता है, परन्तु उसके परिणामसे परिणामी
गीतामायावाद माननी हे या परिणामयाद १ ३९
नहीं होता । आठ अध्यायके २० वें श्लोकमें यह
स्पष्ट कहा है कि 'अव्यक्त प्रकृतिसे परे जो एक
सनातन अन्यक परमात्मा है, उसका कभी नाश नहीं
होता अर्थात् वह परिणामरहित एकरस रहता "
इसीलिये गीताने उसीका समझना यथार्य बतलाया है जो
सम्पूर्ण भूतोंके नाश होनेपर भी परमारमाको अग्निाशी
एकरस समझता है-~-
सम सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्त
भूतेषु तिष्ठन्त परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्त य पश्यति स पश्यति ॥
(१३ । २७)
ससे सिद्ध होता है कि नित्य शुद्ध बोधखरूप
परमात्मामें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता । वास्तवमें
इस परिवर्तनशील ससारका ही परिवर्तन होता है।
इस प्रकार गीतामें परिणामवादका समर्थन किया गया है।
इसके विपरीत गीता, ऐसे श्लोक भी बहुत हैं
जिनके आधारपर अद्वैत-मतकै अनुमार व्याख्या करने-
वाले विद्वान् मायाराद सिद्ध करते हैं । भगवान्ने कहा
हे--मेरी योगमायाका आश्चर्यजनक कार्य देख, जिससे
बिना ही हुमा जगत् मुझसे परिणामको प्राप्त हुआ-सा
दीखता हे ( न च मत्थानि भूतानि पश्य में.
गीता नियधायनी
यागर्म घरम् ९१५) यानी याक्षरमें समार मुम
(पामारमा) में है नहीं। पर दीनना है इस न्यायसे
६ भी । अत यह सब मेरी मायाका सेल है। जैसे
रनमें बिना ही हुए सर्प दीयता है वैसे ही विना हो
हुए अज्ञानसे संमार भी भासता है । आगे चलकर
भगवानने जो यह कहा है कि जैसे आयागसे उत्पन
आ सर्वत्र रिचरनेगला महान् यायु सदा ही आकाशमें
स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्पनारा उत्पत्तिथाले होनेसे सम्पूर्ण
भूत मुझमें स्थित है, ऐसे जान । इमसे यह नहीं समयना
चाहिये कि आकाशसे उत्पन्न होकर उसीमें रहनेवाले
यायुके समान संसार भगरा में है। यह हात फेवर
समझानेके ठिये है। मातवें अध्यायमें भगवाने कहा
है कि सात्तिक, राजस, तामस भाव मुझसे उत्पन
होते हैं पर तु वास्तबमें उनमें में और ये मुझमें नहीं है
(न वह तेषु ते मयि ७/१२)।
मेरे अतिरिक्त फिश्चिमार भी दूसरी पतु नहीं।
(मत्त परतरं नान्यत् विशि
'सन उ आसुदे
यहाँ।
भानयोगआदि शब्दोंका पृथक् पृथक्योंमें प्रयोग ४१ तथोपलभ्यते ) आदि वचनोंसे मायावादको पुष्टि होती है । एक परमात्माके अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं । जो कुछ प्रतीत होता हे सो केवल मायामात्र है। इस तरह दोनों प्रकारके वादोंको न्यूनाधिकरूपसे समर्थन करनेवाले वचन गीतामें मिलते हैं । मेरी समझ- से गीता किसी वादविशेषका प्रतिपादन नहीं करती, वह किसी वादके तत्यको समझानेके लिये अपतरित नहीं हुई, वह तो सब वादोंको समन्वय करके ईश्वर- प्रातिके भिन्न भिन्न मार्ग बतलाती है। गीतामें दोनों ही वादोंके माननेवालोंके लिये पर्याप्त वचन मिलते हैं, इससे गीता सभीके लिये उपयोगी है । अपने-अपने मत और अधिकारके अनुसार गीताका अनुसरण कर भगवत्प्राप्ति- के मार्गपर आरुद्ध होना चाहिये । (६) ज्ञानयोग आदि शन्दोंका पृथक्-पृथक अर्थों में प्रयोग श्रीमतगादीनामें कई गन्द ऐसे हैं जिनका प्रसगानुसार भिन्न भिन अमेि प्रयोग हुआ है। उदाहरणार्थ धान, योग, योगी, युक्त, आत्मा, ब्रह्म, अव्यक भोर साक्षरके उ मेद प्रमाणसहित बतलाये जाते हैं । एक- ।
૨
गीता निप धायरी
एक अपके लिये प्रमाणमें विस्तारभयमे केवल एक ही
प्रसंगका अवतरण दिया जाता है। पर ऐसे प्रसंग
प्रायेक अर्यके रिये एकारिक या रात मे मिल सकते हैं-
ज्ञान
'ज्ञान' शब्दका प्रयोग गोतामें सात अयोंमें हुआ
(१) तत्वज्ञान-अ० ५। ३७-३८-इनमें
नानको सम्पूर्ण कमेकि भन्म करनेवाले अग्निके समान
और अतुलनीय पवित्र बनाया है, जो नशान ही
हो सकता है।
(२) सारगज्ञा
निष्ठामें
की
है, इससे
धानयोग आदिशब्दोंका पृथक् पृथक् मोंमें प्रयोग
गुणसे उत्पन्न होनेवाला है, इससे विवेकज्ञान है।
(६) लौकिक ज्ञान-अ० १८ । २१-इस
ज्ञानसे मनुष्य सर प्राणियों में भिन्न-भिन्न भाव देखता है,
इसलिये यह राजस या लौकिक ज्ञान है।
(७) शास्त्रज्ञान-अ० १८१४२-इसमें विज्ञान'
शब्द साथ रहने और ब्राह्मणका खाभाविक धर्म होनेके
कारण यह शास्त्रज्ञान हे।
योग
योग' शब्दका प्रयोग सात अर्थोंमें हुआ है--
(१) भगवत् प्राप्तिरूप योग-अ०६।२३-
इसके पूर्व लोकमें परमानन्दकी प्राप्ति और इसमें
दुखोंका अत्यन्त अभार बतलाया गया है, इससे यह
योग परमात्माकी प्राप्तिका वाचक है।
(२) ध्यानयोग-अ० ६ । १९-वायुरहित
स्थानमें स्थित दीपफकी ज्योतिके समान चित्तकी अत्यात
स्थिरता होने के कारण यह ध्यानयोग है।
(३) निष्काम कर्मयोग-०२।१८-योगमें
स्थित होकर आसकिरहित हो तपा सिद्धि-ममिद्धिमें
समान बुद्धि होकर कर्मोके करनेकी आज्ञा होनेसे यह
निष्काम कर्मयोग है।
४४ गीता नियन्धावली (४) भगवत्-शक्तिस्प योग-अ० ९ । ५- इसमें आश्चर्यजनक प्रभार शिवलनेका कारण होनेसे यह शक्तिका याचक है। (५) भफियोग-अ० १५ । २६-निरन्तर अव्यभिचाररूपसे भजन करनेका उल्लेख होनेसे यह भक्तियोग है । इसमें स्पष्ट 'मकियोग' शब्द है । (६) अष्टाङ्गयोग-अ०८ । १२-'धारणा' शब्द साथ होने तथा मन इन्द्रियोंके सयम करनेका उल्लेख होनके साथ ही मस्तकमें प्राण चहानेका उल्लेख होने से यह अष्टाङ्गयोग है। (७) सारख्ययोग-अ० १३ । २४-इसमें साख्ययोगका स्पष्ट शब्दोंसे उल्लेख है। योगी प्योगी' शब्दका प्रयोग नौ अोंमें हुआ है- (१) ईश्वर-अ० १० ११७-भगवान् श्रीकृष्ण- का सम्बोधन होनेसे ईश्वरवाचक है। (२) आत्मज्ञानी-अ० ६१८-ज्ञान विज्ञानमें तृप्त और स्वर्ण, मिरी आदिमें समतायुक्त होनेसे आत्म- ज्ञानीका वाचक है।
- शानयोग आदिशब्दोका पृथक् पृथक् अर्थों में प्रयोग ४५ (३) ज्ञानी भक-अ० १२ १४-परमात्मामें मन, बुद्धि लगानेवाला होने तथा मद्भक्त' का विशेषण होनेसे ज्ञानी भकका वाचक है। ४) निष्काम कर्मयोगी--अ० ५ । ११- आसक्तिको त्यागकर आत्मशुद्धिके लिये कर्म करनेका कथन होनेसे निष्काम कर्मयोगीका वाचक है (५) सांत्ययोगी-अ० ५। २४-अभेदरूपसे ब्रमकी प्राप्ति इसका फल होने के कारण यह साख्य- योगीका वाचक है। (६) मकियोगी-अ० ८।१४-अनय चित- से नित्य निरन्तर भगान्के स्मरणका उल्लेख होनेसे यह भक्तियोगीका वाचक (७) साधायोगी-२० ६ १४५-अनेक जन्म- ससिद्ध होनेके अनन्तर ज्ञानकी प्रासिका उल्लेख है, इससे यह साधकयोगीका वाचक है। (८) ध्यानयोगी-अ० ६ । १०-एकान्त स्थानमें स्थित होकर मनको एकाम करके आत्माको परमारमा लगानेकी प्रेरणा होनेसे यह ध्यानयोगीका वाचक है।
30
गीता निवाचायली
(0)समाम कर्मयोगी-अ० ८ । २५-यापस
लौटनेवाला होनसे यह साम कर्मयोगीका वाचक है।
'युक्त' शरफा प्रयोग नात अपोंमें हुआ है--
(१) तपा-१० ६ । ८-मा दिनानसे
तृप्तामा होनेसे यह तत्वज्ञानीका वाचक है।
(२)fiकाम कर्मयोगी-अ० ५।१२-कोका
पल परमेश्वरके अर्पण करनेवाला होनेसे यह निष्काम
कर्मयोगीमा पाचक है
(३ ) साल्ययोगी-अ० ५। ८-सब मिपाओं के
होते रहनपर वर्तापनके अभिमानका न रहना बनलाया
जानेके कारण सारययोगीका पाचक है।
(४) ध्यानयोगी-अ०६।१८-वशमें किया
हुआ चित्त परमात्मामें स्थित हो जानेका उल्लेख होनेसे
यह ध्यानयोगीका वाचक है।
(५) सयमी-०२१६१-समस्त इन्द्रिका
सयम करके परमात्मपरायण होनेसे यह संपमीका
याचक है।
६) संयोगसूचक-अ० ७ । २२-श्रद्धाके
ज्ञानयोग आदि शब्दोका पृयक् पृथक्अर्थों में प्रयोग साय संयोग बतानेवाला होनेसे यह सयोगमूचक है। (७) यथायोग्य व्यवहार-म० ६ । १७-यथा- योग्य आहार, विहार, शयन और नेष्टा आदि लक्षण- वाला होनेसे यह यथायोग्य व्यवहारका वाचक है । आत्मा 'आत्मा' शब्दका प्रयोग ग्यारह अयों में हुआ है-- (१) परमात्मा-० ३ । १७-ज्ञानीकी उसीमें प्रीति, उसीमें तृति और उसीमें स तुष्टि होनेके कारण परमात्माका वाचक है। (२) ईश्वर-अ० १० । २०-सब भूतोके हृदय- में स्थित होनेसे ईश्वरका वाचक है । (३) शुद्धचेतन-अ० १३१२९-अकर्ता होनेसे शुद्धचेतनका याचक है। (४) परमेश्वरका स्वरूप-अ०७११८- ज्ञानीको अपना आत्मा वतलानेके कारण वह स्वरूप ही समशा जाता है। इससे स्वर पका वाचक है। (५) परमेश्वरका साकारस्वरूप-अ० ४। ७- अरतारम्पसे प्रकट होनेका उल्लेव रहनेसे सगुण स्वरूपका वाचक है --
गीता नियघायली
(६) जीयामा-अ० १६ । २१-अधोगनिमें
जानेका वर्णन होनेसे जीपारमाका वाचक है।
(७) युधि अ० १३ । २४-(आत्मना)
ध्यानके द्वारा हत्यमें परमात्माको देखनेका वर्णन है, यह
देवना घुदिसे ही होता है। अत यह बुद्रिका याचक है।
(८) अन्त करण-अ० १८ । ५१-इसमें
'आत्मानम् नियम्य' यानी आत्माको शमें करनेका
उल्लेख होनेसे यह अत करणका वाचक है।
(९) रदय-अ० १५ । ११-इसमें 'थतन्तो
योगिनश्चन पश्यत्यात्मयास्थितम्' योगीजन! अपने
मात्मामें स्थित हुए इस आत्माको यत करते हुए ही
तत्वसे जानते हैं। आत्मा हृदयमें स्थित होता है, अत
यहाँ यह ( आत्मनि ) हृदयका वाचक है।
(१०) शरीर-अ०६ । ३२-'आरमौपम्येन'
अपनी साहश्यतासे लक्षित होनेके कारण यहाँ आत्मा
शरीरका याचक है।
(११) निजवाचक-अ० ६।५-आरमा ही
आत्माका मित्र और आत्मा ही आत्माका शतु है, एसा
उल्लेख रहनेसे यह निज राचक है।
शानयागादिशब्दाका पृथक् पृथक यथामभया॥४९
प्र
ब्रह्म' शब्दका प्रयोग सात अघोंमें हुआ है.-
(१) परमात्मा-म०७१२९-भगवान्के शरण
होकर जरा मरणसे छूटने के लिये यन करनेवाले ब्रह्मको
जानते हैं, ऐसा कथन होने से यहाँ परमात्माका वाचक है।
(२) ईश्वर-अ० ५।१०-सब कर्म ब्रह्ममें
अर्पण करनेका उल्लेख होनेसे यह ईश्वरका वाचक है।
(३)प्रति-अ०१४१४-महत् विशेषण होनेसे
प्रकृतिका नाचक है।
(४) बमा अ० ८। १७-कालकी अवधिवाला
होनेसे यहाँ 'ब्रह्म' शब्द ब्रह्माका वाचक है ।
(५) ओंकार-अ०८1१३-एकाक्षर' विशेषण
होने और उच्चारण किये जानेवाला होनेसे ओंकारका
वाचक है।
(६) वेद-० ३ । १५ (पूर्वार्ध)-कर्मकी
उत्पत्तिका कारण होनेसे वेदका वाचक है।
(७) परमधाम-अ०८१२४-शुक्-मार्गसे प्राप्त
होनेवाला होनेसे परमधामका वाचक है।
गी.नि.४-
५०
गीता नियाधायली
अव्यक्त
•अन्यक्त' शन्दया प्रयोग तीन अपनि हुआ है-
(१) परमात्मा-म० १२ । १-अक्षर विशेष
होनेसे परमामाया वाचक है।
(२) शुस्ता-अ० २।२५-स्पर है।
(३) प्रशति-०१३ । ५-स्पष्ट है।
अक्षर
'अक्षर' शब्दका प्रयोग चार अमेिं हुआ है---
(१) परमात्मा-अ० ८। ३-ग्रमका विशेषण
होनेमे परमारमाया वाचक
(२) जीवात्मा-अ०१५। १६-कुटम्थ विशेषण
होने और अगले श्लोकमें उत्तम पुरप परमात्माका अन्य
सपसे उल्लेख होनेसे यह जीवारमाका वाचक है।
(३) ओंकार-अ०८।११-स्पष्ट है।
(१) वर्ण-अ०१० । ३३-स्पष्ट है ।
गीताम भक्ति
श्रीमद्भगवद्गीता एक अद्वितीय आध्यात्मिक ग्रन्य है।
यह कर्म, उपासना और ज्ञानके तत्वोंका भण्डार है।
या स्वय गीतामें भक्ति इस बातको कोई नहीं कह सकता कि गीतामें प्रधानतासे केवल अमुक विषयका ही वर्णन है। यद्यपि यह छोटा- सा ग्रन्थ है और इसमें सर पियोंका सूरमपसे वर्णन परन्तु किमी भी विषयका वर्णन स्वल्प होनेपर भी अपूर्ण नहीं है, इसीलिये कहा गया है- गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यै शास्त्रविस्तर । पद्मनामस्य मुखपमाद्विनि सता इस कपनसे दूसरे शास्त्रोंका निषेध नहीं है, यह तो गीताफा सचा महत्व बतलानेके लिये है। वास्तवमें गीतोक्त ज्ञानकी उपलब्धि हो जानेपर और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता । गीतामें अपने-अपने स्थानपर कर्म, उपासना और ज्ञान-तीनोंका विशद और पूर्ण वर्णन होनेके कारण यह नहीं कहा जा सकता कि इसमें कौन- सा विषय प्रधान और कौन-सा गौण है, सुतराम् जिनको जो विषय प्रिय है-जो सिद्धान्त माय है, वही गीतामें भासने लगता है। इसीलिये भिन्न भिन्न टीकाकारोंने अपनी-अपनी भावनाके अनुसार मिन-मिन्न अर्थ किये हैं, पर उनमेंसे किसीको हम असत्य नहीं कह सकते। जैसे वेद परमात्माका निश्वास है इसी प्रकार गीता भी साक्षात् भगवान्के वचन होनेसे भगात्-म्वरूप ही है।
गीता नियन्धावली
अतएव मगवानकी मौनि गीताका स्वरूप मी भकों को
अपनी भावनाके अनुसार भिन्न मित्र प्रकारसे मासता है।
कृपाति भगानने अपने प्रिय सखा मक्त अर्जुनका
निमित्त बनाकर समस्त संसारके कल्याणार्य इस अद्भुत
गीताशास्त्रका उपदेश किया है। ऐसे गीताशासके किसी
तत्पर विवेचन करना मेरे सदृश साधारण मनुष्यके लिये
बालचपलतामात्र है। मैं इस विषयमें कुछ कहनेका अपना
अधिकार न समझता हुआ भी जो मुछ कह रहा हूँसो केवल
अपने मनोविनोदके लिये है। निवेदन है कि भक्त और
विज्ञजन मेरी इस बालचेष्टापर क्षमा करें।
गीतामें कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों सिद्धान्तोंकी ही
अपनी-अपनी जगह प्रधानता है तथापि यह कहा जा
सकता है कि गीता एक भक्तिप्रधान प्राय है, इसमें ऐसा
कोई अध्याय नहीं, जिसमें भक्तिका कुछ प्रमग न हो।
गोताका प्रारम्म और पर्यवमान भक्ति में ही है। आरम्भमें
अर्जुन 'शाधि मा त्या प्रश्नम्' कहकर भगान्की शरण
प्रक्षण करता है और अतमें भगवान् 'सर्वधर्मान्परित्यज्य
मामेक शरण ब्रज' कहकर शरणागतिका ही पूर्ण
समर्थन करते हैं-समर्थन ही नहीं, समस्त धोका आश्रय
सर्वथा परित्यागकर केवल भगवदाश्रय-अपने आश्रय
।
।
गीतामें भक्ति
होनेके लिये आज्ञा करते हैं और साथ ही समस्त पापोंसे
छुटकारा कर देनेका भी जिम्मा लेते हैं । यह मानी हुई
बात है कि शरणागति भक्तिका ही एक स्वरूप है।
अवश्य ही गीताकी भक्ति अविवेकपूर्वक की हुई अन्धभक्ति
या अज्ञानप्रेरित आलस्यमय कर्मत्यागरूप जडता नहीं है।
गीताकी भक्ति क्रियात्मक और विवेकपूर्ण है । गीताकी
भक्ति पूर्णपुरुष परमात्माकी पूर्णताके समीप पहुँचे हुए
साधकद्वारा की जाती है। गीताकी भक्तिके लक्षण
बारहवें अध्यायमें भगवान्ने खय बतलाये हैं । गीताकी
भक्तिमें पापको म्यान नहीं है। वास्तरमें भगवान्का जो
शरणागत अनय भक्त सब तरफ सबमें सर्वदा भगवान्को
देखता हे वह छिपकर भी पाप कैसे कर सकता है।
जो शरणागत भक्त अपने जीवनको परमात्माके हाथोंमें
सौंपकर उसके इशारेपर नाचना चाहता है उसके द्वारा
पाप कैसे बन सकते हैं । जो भक्त सब जगत्को
परमात्माका स्वरूप समझकर सबकी सेवा करना अपना
कर्तव्य समझता है वह निष्क्रिय आलसी कैसे हो सकता
है। एव जिसके पास परमात्मखरूपके ज्ञानका प्रकाश
है वह अन्धतममें फैसे प्रवेश कर सकता है ।
इसीसे भगवान्ने अर्जुनसे स्पष्ट कहा है-
।
मोहिमा
५४
गीता नियन्धावली
तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
मग्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेकैप्यम्यसशयम्
'युद्ध करो, पर तु सब समय मेरा ( भगवान्का
स्मरण करते हुए और मेरेमें (मगवान्में ) अर्पित मन
बुद्धिसे युक्त होकर करो।' यही तो निष्काम कर्मसयुक्त
भक्तियोग है, इससे नि सन्देह परमात्माकी प्राप्ति होत
है। इसी प्रकारकी आज्ञा अध्याय ९ । २७ और १८
५७ आदि श्लोकोंमें दी है।
इसका यह मतलब नहीं कि केरल कर्मयोग य
केवल भक्तियोगके लिये भगवान्ने स्वतन्त्ररूपसे कई
भी नहीं कहा है। 'कर्मण्येवाधिकारस्ते' 'योगस्थ
कुरु कर्माणि' आदि श्लोकोंमें केवल कर्मका और ममना
भव' भक्त्या मामभिजानाति' आदिमें केवल भक्तिक
वर्णन मिलता है, परन्तु इनमें भी कर्ममें भक्तिका और
भक्ति में कर्मका अयोयाश्रित सम्बध प्रच्छन्न है
समानरूप योगमें स्थित होकर फलका अधिकार ईश्वर
जिम्मे समझकर जो कर्म करता हे वह भी प्रकारान्तर
ईश्वरस्मरणरूप भक्ति करता है और भक्ति, पूजा-
नमस्कार आदि भगवद्भक्तिपरक क्रियाओंको करता हुआ
मी साधक तत्तत् क्रियारूप कर्म करता ही है। साधारण
--
-
३
गीता मात्र
सकामकममि और उसमें भेद इतना ही है कि
की कर्मका अनुष्टान सासारिक कामनामिद्धिके शिय
करता है और नियामकर्मा भगवत्-प्रीत्यर्थ करता है।
म्वरूपसे कर्मत्यागकी तो गीताने निन्दा की है और उसे
तामसी त्याग बताया है ( १८१७)। एव ०३
श्लोक ४ में कर्मत्यागसे सिद्धिका नहीं प्राम होना
कहकर अगले श्लोक, म्वरूपमे कर्म यागको अात्य मी
बताया है । अतएव गीताके अनुमार प्रधानत
अनन्यभावसे भगवान्के म्वरूपमें स्थित होकर भगवान्
आशा मानकर भगवान के लिये मन, बागी, मोगम
स्ववणानुसार समस्त का गदाण काही मानन्-
की भक्ति है और इसीसे पामिदिम्पनि
हो सकती है । भगवान् घोषणा काने है--
यन प्रचिर्भूनाना पन गमिट नाम
स्थकर्मणा समभ्यव्यं सिद्धि मिति
'निम परमारमासे मामूनो सानि
निससे पद सम्पूर्ण जगत् यार है, उममा
अपने म्यामायिक कर्मद्वारा पूर मनुष्य पान
माम होता है।
इस प्रकारे कर्म अपना काम न
गीतानिय घायली
के कारण ही होते हैं । इनमें पतनका डर बिल्कुल नहीं
रहता है। भगवान्ने साधकको भगवत्प्राप्तिके लिये और
साधनोत्तर सिद्धकालमें ज्ञानीको भी लोकममह यानी
जनताको सामार्गपर लाने के लिये अपना उदाहरण पेशकर
कर्म करनेकी आज्ञा दी है । यद्यपि उसके लिये कोई
फर्तन्य शेष नहीं है।-'तस्य कार्य न विद्यते।'
इसके सिश अजुन क्षत्रिय, गृहस्य और कर्मशील
पुरुष थे, इसलिये भी उन्हें कर्ममहित भक्ति करनेके
लिये ही रिशेपम्पसे कहा है और वास्तबमें सर्वमाधारणके
हितके लिये भी यही आवश्यक है । संसारमें तमोगुण
अधिक आया हुआ है । तमोगुणके कारण लोग भगवत्तत्त्व
से अनभिज्ञ रहकर एकातवासमें भजन, ध्यानके बहाने
नींद, आलम्य और अकर्मण्यताके शिकार हो जाते हैं।
एसा देखा भी जाता है कि कुछ लोग 'अब तो हम
निरन्तर एकान्तमें रहकर मजन, “यानही किया करेंगे।
कहपर कर्म अड़ देते हैं, परन्तु थोड़े ही दिनोंमें उनका
मन एकान्तसे हट जाता है । कुछ लोग सोने समय
बिताते हैं, तो कोई कहने लगते हैं क्या करें, ध्यानमें
मन नहीं लगना ।' फठत कुछ तो निकम्मे हो जाते हैं
और कुछ प्रमादरश इदियोंको आराम देनेवाले भोगोंमें
गीतामें भकि
प्रवृत्त हो जाते हैं । सच्चे भजन, ध्यानमें लगनेवाले
विरले ही निकलते हैं । एकान्तमें निरामकर भजन,
ध्यान करना बुरा नहीं है। परन्तु यह साधारण बात
नहीं है। इसके लिये बहुत अभ्यासकी आवश्यकता है
और यह अभ्याम कर्म करते हुए ही क्रमश बढाया ओर
गाढ किया जा सकता है, इसीलिये भगवान्ने कहा है
कि नित्य-निरन्तर मेरा स्मरण करते हुए फलासकिरहित
होकर मेरी आज्ञासे मेरी प्रीतिके लिये कर्म करना
चाहिये । परमेश्वरके ध्यानकी गाद स्थिति प्राप्त होने में
कोका सयोग नियोग बाधक साधक नहीं है । प्रीति
और सच्ची श्रद्धा ही इसमें प्रधान कारण हे । प्रीति
और श्रद्धा होनेपर कर्म उसमें बाधक नहीं होते बल्कि
उसका प्रयेक कर्म भगवत्-प्रीतिके लिये ही अनुचित
होकर शुद्ध भक्तिके रूपमें परिणत हो जाता है। इससे
भी कर्मत्यागकी आवश्यकता सिद्ध नहीं होती। परन्तु
इस कथनसे एकान्तमें निरन्तर भक्ति करनेका निषेत्र
भी नहीं है।
अधिकारियोंके लिये विवितदेशसेवित्वम्' और
'अरतिर्जनससदि' होना उचित ही है, परन्तु संसारमें
प्राय अधिकाश अधिकारी कर्मके ही मिलते हैं ।
गीता नियन्यापसी
एकान्तमासके वास्तविक अधिकारी ने हैं जो भगवान्की
भक्ति में तहीन हैं, जिनका हृदय अनन्य प्रेममे परिपूर्ण
है। जो क्षणभरके भगवान्के विस्मरणसे ही परम ब्याकुल
हो जाते हैं, भगवत् प्रेमकी विद्वलतासे वाध ज्ञान लुप्तप्राय
रहने के कारण जिनके सासारिक कार्य सुचारुरूपसे
मम्पन्न नहीं हो सकते ओर जिनको संसारके ऐशोआराम
भोगके दर्शन-श्रवणमात्रसे ही ताप होने लगता है, ऐसे
अधिकारियोंके लिये जनसमुदायसे अलग रहकर
एका तदेशमें निरन्तर अटल साधन करना ही अधिक
श्रेयस्कर होता है। ये लोग कर्मको नहीं छोड़ते । कर्म
ही इहें छोड़कर अलग हो जाते हैं। ऐसे लोगोंको
एका तमें कमी आलस्य या विषय चितन नहीं होता।
इनके भगवत्प्रेमकी सरितामें एका तसे उत्तरोत्तर बाद
आती है और वह बहुत ही शीर इन्हें परमात्मारूपी
महासमुद्रमें मिलाकर इनका खतत्र अस्तित्व समुद्रके
विशाल असीम अस्तित्वमें अभिन्नरूपसे मिला देती है
पर तु जिन लोगोंको एकातमें सासारिक विक्षेप सताते
हैं वे अधिक समयतक कर्मरहित होकर एका तवासके
अधिकारी नहीं है । जगत्में ऐसे ही लोग अधिक है।
अपिसंख्यक लोगों के लिये जो उपाय उपयोगी होता हे,
।
गीतामें भकि
प्राय वही बतलाया जाता है, यही नीति है। इसलिये
शास्त्रोक्त सासारिक कोंकी गति भगवकी ओर मोड देने-
काही विशेष प्रयत्न करना चाहिये, कोको छोड़नेकानहीं।
ऊपर कहा गया है कि अर्जुन गृहस्थ, क्षत्रिय और
कर्मशील था इससे कर्मकी बात कही गयी है। इसका
यह
अर्थ नहीं है कि गीता केरल गृहस्थ, क्षत्रिय या
कर्मियों के लिये ही है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि
गीतारूपी दुग्धामृत अर्जुनरूप वत्सके व्याजसे ही विश्वको
मिला, परन्तु वह इतना सार्वभौम और सुमधुर है कि
सभी देश, सभी जाति, सभी वर्ण और सभी आश्रमयों
लोग उसका अबाधितरूपसे पानकर अमरत्व प्राप्त कर
सकते हैं। जैसे भगवत्प्राप्तिमें सबका अधिकार है वैसे
ही गीताके भी सभी अधिकारी हैं, अवश्य ही सदाचार,
श्रद्धा, भक्ति और प्रेमका होना आवश्यक है, क्योंकि
भगवान्ने अश्रद्धाल, सुनना न चाहनेवाले, आचरणभ्रष्ट,
भक्तिहीन मनुष्यों में इसके प्रचारका निषेध किया है
(१८१६७) । भगवान्का आश्रित जन कोई भी
क्यों न हो, सभी इस अमृतपानके पात्र हैं (९।३२) ।
यदि यह कहा जाय कि गोतामें तो सारययोग और
कर्मयोग नामक दो ही निष्ठाओंका वर्णन है। मतिकी
६०
गीता निमावली
तीसरी कोई निष्ठा ही नहीं, तर गीताको भक्रिप्रधान
कैसे कहा जा सकता है। इसका उत्तर यह है कि
यद्यपि भक्तिकी भिन्न निष्टा भगवान्ने नहीं कही है परतु
पहले यह समझना चाहिये कि निष्ठा किमका नाम है और
क्या योग और साक्ष्यनिछा उपामना बिना सम्पन हो सकती
है। उपासनारहित कर्म जड होनसे कदापि मुक्तिदायक नही
होते और न उपासनारहित ज्ञान ही प्रशंसनीय है । गीतामें
भक्ति ज्ञान और कर्म दोनों ओतप्रोत है। निमाका
अर्थ है-परमारमाके स्वरूपमें स्थिति । यह स्थिति जो
परमेश्वरके स्वरूपमें भेदरूपसे होती है, यानी परमेश्वर
अंशी और मैं उसका अश हूँ, परमेश्वर सेव्य और में
उसका सेफ हूँ। इस मारसे परमात्माकी प्रीति के लिये
उसकी आज्ञानुसार फलासक्ति त्यागकर जो कर्म किये
जाते हैं उनका नाम है निष्काम कर्मयोगनिष्ठा और जो
सच्चिदानधन ब्रह्ममें अमेररुपमे स्थित है यानी ब्रह्ममें
स्थित रहकर प्रकृतिद्वारा होनेवाले समस्त कर्मों को
प्रकृतिका विस्तार और मायामात्र मानकर वास्तवम एक
सच्चिदानदधन ब्रह्मके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है
यो निश्चय करके जो अभेद स्थिति होती है उसे
साख्यनिष्ठा कहते हैं। इन दोनों ही निठाओमें उपासना
भरी है। अतएव भक्तिको तीसरी स्वतन्त्र निष्ठाके मामसे
गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर ६१ कथन करनेकी कोई आवश्यकता नहीं। इसपर यदि कोई यह कहे कि तब तो निष्काम कर्मयोग और ज्ञान- योगके बिना केवल भक्तिमार्गसे परमात्माकी प्रासि ही नहीं हो सकती तो यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि भगवान्ने केरल भक्तियोगसे स्थान-स्थानपर परमात्माकी प्राप्ति होना बतलाया है । साक्षात् दर्शनके लिये तो यहाँतक कह दिया है कि अनन्य भक्तिके अतिरिक अन्य किसी उपायसे नहीं हो सकता ( १११ ५४) । प्यानयोगरूपी भकि- को (१३ । २४ में ) ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति' कहकर भगवान्ने और भी स्पष्टीकरण कर दिया है । इस ध्यान- योगका प्रयोग उपर्युक्त दोनों साधनोंके माय भी होता है और अलग भी । यह उपासना या भक्तिमार्ग बड़ा ही सुगम और महत्वपूर्ण है । इसमें ईश्वरका सहारा रहता है और उसका अल प्राप्त होता रहता है । अतएव हमलोगोंको इसी गीतोक्त निष्काम विशुद्ध अनन्य भक्ति का आश्रय लेकर अपने समस्त सामाजिक कर्म भगवत्प्रीत्यर्य करने चाहिये । गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर एक सजनके प्रश्न हैं-- गीता वेदोको मानती है कि नहीं? यदि मानती है तो किम दृष्टिसे । अध्याप २ शोक १२,१५
गीतानिय घायरी
१६, ५३ में पेदोंको क्यों मीशा दृष्टिमे पाकिया है।
(२) गीता वर्माधम धर्मको मानती है या नहीं।
पदि मानती है तो किम प्रकारसे। यदि नही मानती है
तो वर्णाशयको क्यों चाहती है। अगर मानती है तो
सर धर्म छोड़कर अ०१८ के ६६ (लोक) या
क्या अर्थ है। जब कि शह और नीच योनियोंको
परमगति दोना लिया।
(३) गीता कर्मको मानती है या ज्ञानको, या
दोनोंको । यदि केराउ कर्मको मानती है तो शान निष्फल
है, यदि ज्ञानको मानती है तो कर्म निकाल है, यदि
जानको बताती है तो कर्मको क्यों पाहती है।
(४) गीता मूर्तिपूजाको मानती है कि नहीं। यदि
नही मानती है तो भ०० के २६ शोकमा क्या अप
है। यदि मानती है तो निगुण या सगुण ।
(५) गीतामें लिया है कि ग्निा शिष्य बनाये
शानका उपदेश नहीं देना चाहिये तो क्या अर्जुन शिष्य
थे। क्या अर्जुनको उपदेश देनेसे ज्ञान हुआ
वे परमपदको प्राप्त हुए
(६) गीताको भगवा र कृष्णने अपने मुखारविन्दसे
वर्णन किया है या (उसके) रचयिता कोई और पुरुष थे।
है क्या
.
गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
W
(१) गीता वेदोंको मानती है और उनको बहुत
ऊँची दृष्टिसे देखती है। दूसरे अध्यायके इन श्लोकोंमें
वेदोंकी निन्दा नहीं की गयी है, के भोग ऐश्वर्य या
खर्गादिरूप क्षणभङ्गुर और चिनाशी फल देनेवाले सकाम
कोसे अलग रहकर आत्मपरायण होनेके लिये कहा
गया है। भोगोंमें मनुष्यको म्वाभाविक ही प्रवृत्ति रहती
है । इसपर यदि 'अमुक कर्मसे बहुत धन मिलेगा।'
'अमुक कर्मसे मनचाहे स्त्री-पुत्रादि मिलेंगे। 'अमुकसे
स्वर्गादिकी प्राप्ति होगी। आदि सुहारने वचन सुननेको
मिल जायें तब तो मनका अपहरण हो जाना अनिवार्य
हो जाता है । भोग-लालसा बढ़कर बुद्धिको टारोंडोल
कर देती है । बहुशाखावाली बुद्धिसे आमतत्वकी
उपलब्धि नहीं होती और उसके हुए बिना दु खोंसे
सदाके लिये छुटकारा नहीं मिलता । इसीसे आगे
चटकर नरें अध्यायमें फिर कहा गया है.---
विधा मा सोमपा पूतपापा
योरिष्ट्रा वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक
मन्नन्ति दिव्यान्दिधि देवभोगान् ।।
४ गीता नियाधापली ते त भुक्त्या स्वर्गलोक विशाल क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोक पिशन्ति । एय अयोधर्ममनुप्रपन्ना गतागत कामकामा लमन्ते। (९।२०२१) 'तीनों वेदोंमें विधान किये हुए सकाम कोको करनेवाले, सोमरसको पीने वाले पापोंसे पनित हुए जो पुरुप मुझे यज्ञोंद्वारा पूजकर स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं, वे अपने पुण्योंके फलस्वरूप इन्द्रलोकको प्राप्त होकर स्वर्गमें दिव्य देवताओंके भोगोंको भोगते हैं और उस विशाल स्वर्गलोकको भोगकर पुण्य क्षीण होनेपर मृत्युलोकको प्राप्त होते हैं, इस प्रकार (स्वर्गके साधन- रूप ) तीनों (माक, यजु, साम ) वेदोंमें कहे हुए सफाम कर्मके भोगकामनापाले पुरुष बार बार आवागमनको प्राप्त होते हैं।' तात्पर्य यह कि सकाम कर्ममें लगे हुए पुरुषोंको बारबार संसारमें आना जाना पड़ता है, उहें जमरूप कर्मफल ही मिलता है । जम-मृत्युके चक्रसे उनका पिण्ड नहीं छटता । इस विवेचनसे यह बतलाना है कि यहाँ वास्तवमें वेदकी निदा नहीं है। सकाम कर्म, परम श्रेयकी प्राप्ति नहीं करानेवाले होनेके कारण हे शरण हुए सत् ये ब्रह्मके त्रिविर नाम कहे हैं, सृष्टिके आदिमें ६५ गीता सम्बधी प्रश्नोत्तर निष्काम कर्म और निष्काम उपामनाकी अपेक्षा नीची श्रेणीका बतलाया है । उनको बुरा नहीं बताया, यह कहीं नहीं कहा कि वैदिक मझामकी पुरुष 'मोहजालसमावृता' आसुरी सम्पत्तिमाले पुरुषों की तरह 'पतति नरकेशुचौ' या 'आसुरी योनिमापना मूढा जमनि जमनि । मामप्राप्यैर कौन्तय ततो यात्यधमा गतिम् [१६ । २०] अपवित्र नरकमें पड़ते हैं या हे को तेय । वे मूद्र पुरुष जाम-जममें आसुरी योनिको प्राप्त हुए मुझे न पाकर उससे भी अति नीच गतिको ही प्राप्त होते हैं । बल्कि यह कहा है कि वे पूताप ( देवऋणरूप पापोंसे मुक्त होकर ) सर्गकी इच्छासे यज्ञद्वारा भगवत् पूजा करनेवाले होने के कारण स्वर्गके दिव्य और विशाल भोगोंको भोगते हैं। पक्षातरमें वेटका महत्त्व प्रकट करनेवाले अनेक वचन गीतामें मिलने है-'कर्म ब्रह्मोद्भव विद्धि ब्रह्माक्षर- समुद्भवम्' [३।१५] 'कर्मको वेदसे और वेदको अक्षर परमात्मासे उत्पन हुआ जान तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मगतिविध स्मृत । ब्राह्मणास्तन वेदाश्च यज्ञाश्च निहिता पुरा ॥ [१७१२३ ] ॐ, तत्। गी०नि० ५-
गीता नियन्धावी
माण, वेद और यज्ञादि उसीसे रचे गये हैं। इन
वचनोंसे वेदकी उत्पत्ति परमात्मासे हुई बतलायी गयी है।
'ण्य बहुविधा यज्ञा पितता ब्रह्मणो मुस । कर्मजाविधि
तान्सनिर्व ज्ञात्या विमाक्ष्यसे । [४।३२ ] ऐसे
बहुत प्रकारके यज्ञ द-याणीमें विस्तार किये गये हैं,
उन सबको शरीर, मन और इन्द्रियोंकी क्रियाद्वारा ही
उत्पन्न होनेवाले जान । इस प्रकार तवसे जानकर
निष्काम कर्मयोगद्वारा ससार-बधनसे मुक्त हो जायगा ।'
यहाँ वैदिक कमोका तत्त्य समझकर उनके निष्काम
भाचरणमे साक्षात् मोक्षकी प्राप्ति बतलायी है । 'यदक्षर
घेदविदो वदति विशति ।[८११] 'वेदको
जाननेनाले जिस परमात्माको अक्षर (ओंकार नामसे)
कहते है । इसमें वेदकी प्रशसा स्पष्ट है। ठीक यही
वाक्य कठोपनिषद्के निम्नलिखित मन्त्रमें है-
सर्वे चेदा यत्पदमामति
तपासि सर्वाणि च यद्दन्ति ।
यदिछ तो ब्रह्मचर्य चरति
तत्ते पद सग्रहेण नवीम्योमित्येतत्॥
(१।२।१५)
पवित्रमोंकार ऋक्साम यजुरेव च [९/१७]
'पवित्र ओंकार, ऋक्, साम तथा यजुर्वेद मैं ही हूँ।' इन
गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर पचनोंसे गीताकार भगवान्ने वदको अपना स्वरूप माना है। 'छन्दोभिविविध पृथक् । [१३४] विविध वेदमन्त्रोंसे ( क्षेत्रक्षेनज्ञका तत्व) विभागपूर्वक ( वर्णित है ) कहकर अपने वचनोंकी पुष्टिमें वेदका प्रमाण दिया है 'देव महमेव वेद्यो वेदानवेदविदेव चाहम् ।' [१५/१५ ] 'ममस्त वेदोद्वारा जाननेयोग्य मैं ही हूँ।' और 'वेदातका कर्ता तथा वेदरित् भी मैं ही हूँ।' इन वचनोंसे भगवान्ने अपनेको वेदसे वेद्य और वेदका ज्ञाता बतलाकर वेदकी महान् प्रतिष्ठा स्पष्ट स्वीकार की है। इसके सिम और भी कई स्थल ऐसे हैं जहाँ वेदोंकी प्रशंसा की गयी है। इससे यह पता लग जाता है कि गीता वेदको नीचा नहीं मानती। गीताने केवल साम यामको ही निष्काम- की अपेक्षा नीचा नलाया । बास्तरमें इस लोक और परलोकके भोगपदार्थ तो मोक्षसे सदा ही नीचे हैं। स्वयं वेद भी इसी मिद्धानका प्रतिपादन करता है। गनुर्वेदके चालीसो भन्यायमें इसका वेिचन है। कठोपनिषदके यम-नचिकेता-मादमें प्रेय-यका शिवचन करते हुए यमगनन भोग-ऐमर्यादि प्रेपको निदा और मोक्ष-श्रेयकी बड़ी प्रशंसा की एव भोग-श्वर्य में गीता निव धायरी अनामक होनके कारण नचिकेताको बहुत बड़ाई को है ( कर० २ १, २, ३)। इसी प्रकारकी बात गीतामें है। निष्काम कर्म, निफाम उपासना और आ मतपसी जगह जगह प्रशसारके गीनाने प्रकारातर- से चेदका ही सग किया है। । २) गीता वर्णाश्रमको माननी है । माझग, क्षत्रिय, वश्य आर शूद्र चारों वर्ण अपने अपने स्वामानिक वर्ण धर्मका सार्थरहित निष्काम भावमे भगवत्-प्रीत्यर्थ आचरण करें तो उनकी मुक्ति होना गीताको सर्वथा मान्य है । अयाय १८ श्लोक ४१ से १४ नक चार्गे उनि म्यामायिक कर्म पतलाकर २५४६ में उन्हीं खाभाविक कर्मोसे उनके लिये परम मिद्धिकी प्राप्ति होना तलाया है और ४७-४८ में वर्णधर्मके पालनपर विशेष जोर दिया है। गीता जम कर्म दोनोंसे वर्ण मानती है। 'चातुर्वण्य मया सृष्ट गुणामविमागश' [१३] 'गुण और कमांक विभागसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद मेरे- द्वारा रचे गये हैं। इन वचनोंसे उनका पूर्वकृत कमों के फलस्वरूप गुणकमके अनुसार रचा जाना सिद्ध होता है न कि पीठेमे मानना । इमीरिये गीता वर्णधर्मको
सभावज' और 'सहज' (जन्मके साथ ही उत्पन्न
होने वाला ) कर्म कहती है । परमेश्वरको शरण होकर
कोई भी अपने सामाषिक वर्मद्वारा निधाममापसे
उसकी उपासना करके मुक्त हो सकता है । कमोमें
भेद मानती हुई भी मुक्तिके सम्रवमें गीता सरका
समान अधिकार बतलाती है। गीताकी घोषणा हे..-
यत प्रवृत्तिर्भूताना येन सर्वमिद ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यर्य सिद्धि विन्दति मानन ॥
(१८1 ४६)
मा हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्यु पापयोनय ।
त्रियोवैश्यास्तथा शूदास्तेऽपि याति परागतिम् ।।
कि पुरानोक्षणा पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
अनित्यमसुप लोकमिम प्राप्य भजस्व माम् ॥
(1 ३२३३)
जिस परमात्मासे ममस्त भूतोंकी उत्पत्ति हुई है,
जिससे यह सब जगत् व्याप्त है, उम परमेश्वरको अपने
खाभाविक कर्मद्वारा यूजकर मनुष्य परमसिद्धिको प्राप्त
होता है । हे अर्जुन ! सी, श्य और शुद्रादि तथा
पाप-योनिवाले भी जो कोई हो ये भी मेरे शरण होकर
तो परमगतिको ही ग्रास होते हैं फिर पुण्यशील माह्मण
और राजर्षि भक्तोंका तो कहा ही क्या है । इस
गीता-नियमावली तू मुखरहित और क्षणभङ्गुर इस मनुष्य-शरीरको प्राप्त होकर निरतर मेरा ही मजन कर ।' अन्याय १८ । ६६ में 'सर्वधर्मान्परित्यज्य का अर्थ सम्पूर्ण धर्मोंका सम्पसे त्याग नहीं है। क्योंकि पहले अध्याय १६ । २३-२४ में शासविरिके त्यागसे सिद्धि, सुख और परमगतिका न होना बतलाकर शास्त्रविपिसे निपन किये हुए धर्मका पालन करना कर्तव्य बतलाया है। अध्याय १८। ४७४८ सर्म पालनपर बड़ा जोर दिया है। वहाँ ऐसा प्रतिपादन करके यहाँ सर धोशा स्वरूपसे त्याग करनेकी आज्ञा देना सम्भव नहीं । यदि थोड़ी देरके लिये मान भी लें कि अपने वचनोंके विरद्ध यहाँ भगगन्ने खम्पसे धर्म छोड़नेकी आज्ञा ही दी है तो फिर भ०१८ । ७३ में 'करिष्ये पचन तय' आपसी आज्ञानुसार करूँगा' कहकर अर्जुनका युद्धरूप वर्णधर्मका आचरण करना उससे विरुद्ध पड़ता है । भगवान्ने सर धर्मोके त्यागकी आज्ञा दी। अर्जुन ने उसे स्वीकार भी कर लिया, फिर उसके विरुद्ध अर्जुन युद्ध क्यों करता । इससे यही सिद्ध होता है कि भगवान्ने सबधर्मों के त्यागफी आज्ञा नहीं दी। यहाँ 'सधमान्यरित्यज्य से उनका यही मतलब है कि मनुष्य-
१
गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
को सब धोका आश्रय' छोड़कर केवल एक परमात्मा-
का ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये । धर्मको खरूपसे
त्यागकी बात नहीं है। बात है केवल आश्रय (शरण)
के त्यागकी। यह तो वर्ण धर्मकी बात हुई । वर्णकी
भौति आश्रम-धर्मका गीतामें स्पष्ट और विस्तृत वर्णन
नहीं है । गौणरूपसे आश्रमको गीताने स्वीकार किया
है। ब्रह्मचर्य चरन्ति' 'यतयो वीतरागा'[८1११]
'तपस्विभ्यः । [६१४६ ] 'ब्रह्मचर्यका आचरण
करते हैं। आसकिरहित सन्यासी' 'तपस्त्रियोंसे' आदि
शब्दोंसे ब्रह्मचर्य, सयास और वानप्रस्थका निर्देश
किया गया है। गृहस्थका वर्णन तो स्पष्ट ही है।
(३) गीता अधिकारी-मेदसे ज्ञानयोग और कर्मयोग
दोनों निष्टाओंको मुक्तिके दो स्वतन्त्र साधन मानती है।
दोनों ही निष्ठाओंका फल एक भगवत्प्राप्ति होनेपर भी
दोनोंके साधकोंकी कार्यपद्धति, उनके भार और पय
सर्वया मिन भित होते हैं। दोनों निष्ठाओंका साधन
एक ही कालमें एक पुरुषद्वारा नहीं बन सकता।
निष्काम कर्मयोगी साधनकाउमें कर्म, कर्मफल,
परमात्मा और अपनेको भिन्न-भिन्न मानता हुआ कर्मों के
फल और आसक्रिको स्यागकर ईश्वर-परायण
-
गीता निरन्धायली ईश्वरार्पण-बुद्धिसे ही ममस्त कर्म करता है और ज्ञान- योगी मायाके गुण ही गुणोंमें वर्तते हैं यों समझकर देहेदियों से होनेवाली समस्त क्रियाओंमें कर्तृत्वाहकार न रग्बकर वेल मयापी परमात्मा म्वरूपमें ऐक्य- भारसे स्थित रहता है। दोनों में किसी भी निष्ठारे अनुसार स्वरूपमे कर्म रयाग कर का आवश्यकता नहीं है । उपासनाकी आवश्यकता दोनोंम है। इस विषयका स्तित विवेचन गीतोक्त मयास' और 'गीतोक्त निष्काम कर्मयोगका स्वरूपा शीघक लेखोंमें क्यिा गया है । ४) गीता मूर्तिपूजाको माननी है, अध्याय १२६ और । ३४ वे लोकसे यह प्रमाणित है । अर रही स्वरूपको जात सो गीताको भगवान्के सगुण निर्गुण दोनों ही स्वरूप मान्य है । उदाहरणार्थ कुछ श्लोक उद्धृत किये जाते हैं...- अजोऽपि सम्पध्ययात्मा भूतानामोइवरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय सभघाम्यात्ममायया॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ! यभ्युस्थानमधर्मस्य तदात्मा तदात्मा सृजाम्यहम् ॥ गीताच सारथयोग और निष्काम कर्मयोग' व पुनकारगर भी छप गया है, गीताप्रेससे मिल सकता है। ।
७३
गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
परित्राणाय साधूना विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसस्थापनार्थाय सभवामि युगे युगे
जन्म कर्म च मे दिव्यमेव यो चेति तत्वतः।
स्यक्त्वा देह पुनर्जन्म नेति मामेति सोऽर्जुन ।
(४१६-९)
अवजानन्ति मा मूढा मानुपा तनुमानितम् ।
पर भावमजान तो
मम भूतमहेश्वरम् ॥
पत्र पुष्प फल तोय यो मे भक्त्या प्रयन्यति ।
भक्त्युपहृतमश्नामि
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मा नमस्कुरु ।
मामेवेष्यसि युक्त्वेरमात्मान मत्परायण ॥
(९ । ११, २६, ३४)
भगवान् कहते हे-~मैं अग्निाशीस्वरूप अज मा
होनेपर भी तथा सब भूत प्राणियोंका पर होनेपर भी
अपनी प्रकृतिको अधीन करके योगमायासे प्रकट होता
है। है भारत । जब जब धर्मको हानि आर अधर्मकी
तदा
प्रयतात्मन ॥
-
वृद्धि होता है तब-तब ही म अपने रूपको प्रकट
करता है । साधु पुस्पोंका उद्धार करने के लिये और
दषित कर्म करनवालों का नाश करनेके लिये तथा धर्म
सापन करनेक लिये मैं युग-युगमें प्रकट होता है। हे
अर्जुन ! मेरा यह जम भोर कर्म दिव्य अर्थात् अलौकिक
है, इस प्रकार जो पुरुष तत्वसे जानता है,
गीता निरन्धावली
त्यागकर फिर जन्मको नहीं प्राप्त होता है, किन्तु मुझे
ही प्राप्त होता है।
'सम्पूर्ण भूतोंके महान् ईश्वररूप मेरे परमभावको
न जाननेवाले मूढलोग मनुष्यका शरीर धारण करनेवाले
मुझ परमात्माको तुच्छ समझते हैं अर्थात् अपनी
योगमायासे ससारके उद्धारके लिये मनुष्यरूपमें विचरते
हुएको साधारण मनुष्य मानते हैं । पत्र, पुष्प, फल,
जल इत्यादि जो कोई भक्त मेरे लिये प्रेमसे अर्पण
करता है उस शुद्ध-बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्तका
प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पर पुष्पादि में
( सगुणरूपसे प्रकट होकर प्रीतिमहित ) खाता
(तू) मुझमें ही मनगाला हो, मेरा ही भक्त हो, मेरी ही
पूजा करनेवाला हो, मुझ वासुदेवको ही प्रणाम कर,
इस प्रकार मेरे शरण हुआ तू आत्माको मुझमें एकीभाव
करके मुझको ही प्राप्त होगा।'
पर ब्रह्म पर धाम पवित्र परम भवान् ।
पुरुष शाश्वत दिव्यमादिदेवमज विभुम् ॥
आहुस्त्वामृपय सन
देवर्षिनारदस्तथा ।
असितो देवलो व्यास स्वय चैव ब्रवीपि मे॥
क्रीिटिन गदिन चक्रिण च
तेजोराशि सर्वतो दीप्तिमन्तम् ।
- गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर पश्यामि त्वा दुनिरीक्ष्य समन्ता- दीक्षानलाधुतिमप्रमेयम् किरीटिन गदिन चमहस्त- मिच्छामि त्वा द्रष्टमह तथैव । तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रयाहो भव विश्वमूर्ते ॥ (१० १ १२ १३ और ११ । १७, ४६ ) अर्जुन कहते हैं- 'आप परम ब्रह्म, परम धाम, परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब पिजन सनातन, दिव्य पुरुष, देवोंके भी आदिदेव, अजमा और सर्वव्यापी कहते हैं वैसे ही देवर्षि नारद, असित, देवल ऋषि, महर्षि व्यास और स्वयम् आप भी मेरे प्रति कहते हैं । आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब तरफसे प्रकाशमान, तेजका पुन, प्रचलित अग्नि और सूर्यके सदश ज्योतियुक्त, देखनेमें अति गहन और अप्रमेय- स्वरूप सर ओरसे देखता हूँ। मैं वैसे ही आपको मुकुट धारण किये हुए तथा गदा और चा हायोंमें लिये हुए देखना चाहता हूँ। अतएव हे विधम्प ! हे सहस्रनाहो। चतुर्मुजरूपमे युक्त होइये अर्थात् ३ "
गीता-निएाधारली
मप्यायव्य मो ये मा निन्यगुता उपासते।
अस्या परयोपतास्ते में युसतमा मता ॥
(१२१२)
भागा हो ?-मुन्ना मन्को एकाम करके
रतर मेरे मजा में लगे
जो भक्तजन
अतिशय श्रे: अदामे युक हुए मुझ सगुणरूप
परमेश्वरको भगोग मुझको योगियों में भी अति
उत्तम योगी माय अधात् में करें अनि शेर
मारता है।'
तश सम्मृत्य सस्मृत्य रूपमत्यशुस हरे ।
विगायो मे महार राजप्यामि च पुन पुरा ॥
(१८७७)
राजा धृतराष्ट्रसे मजय महते हैं-
हे राजा । श्रीहरित उम अति अतुत रूपका
पुन पुन स्मरण करके मेरे चित्तमें महान् आश्चर्य
होगा और मैं वारंवार हर्षित होता हूँ।'
उपर्युक्त श्लोक मगुणस्त्रम्हपके प्रतिपादक हैं।
नीने निर्गुणके प्रतिपादक श्लोक है-
मचभूतस्थित यो मा भजत्येकत्वमाथिा ।
सर्वथा पर्तमानोऽपि स योगी मयि चर्तते ॥
(६ । ३१)
।
गया
गीता सम्बन्धी प्रश्नोत्तर
बहना जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मा
प्रपद्यते।
वासुदेव समिति स महात्मा सुदुर्लभ ।।
(७११९)
अन्यकोऽक्षर इत्युक्तस्तमातु परमा गतिम् ।
य प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परम मम ॥
(८१२१)
ततमिद सर्व जगदव्यतमूर्तिना।
मत्स्थानि सर्वभूतानि म चाह तेष्वरस्थित ॥
न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
भृतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावना ॥
(१।४५)
ये लक्षरमनिर्देश्यमव्यक्त पर्युपासते।
सर्वप्रगचित्य च फूटस्थमचल ध्रुवम् ॥
सनियम्येन्द्रियग्राम सर्वत्र
समवुद्धय ।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥
(१२ १३४)
पहिरन्तब्ध भूतानामचर
चरमेध
मूक्ष्मत्यात्तदविज्ञेय दूरस्थ चान्तिके व तत् ॥
सम सर्येषु भूतेषु तिष्ठत परमेश्वरम् ।
विनश्यत्स्वविनश्यन्त य पश्यति स पश्यति ।
यदा
भूतपयग्भावमेकस्थमनुपश्यति ।
सत पय च विस्तार ब्रह्म सम्पद्यते तदा ॥
(१३ | १५,२७,३०)
गीता नियन्धायली
सर्वभूतेषु येनेक भावमव्ययमीक्षते।
भविमक्त विमकेपु सन्सान विद्धि साचिकम् ॥
(१८।२०)
भगवान् कहते हैं-
जो पुरुप एफीमायमें स्थित हुआ सम्पूर्ण भूतोंमें
मात्मरूपसे स्थित मुझ सच्चिदान दधन वासुदेवको
मजता है, यह योगी सर प्रकारसे वर्तता हुआ भी
मुझमें ही वर्तता है । क्योंकि उसके अनुभवमें मेरे
सिगय अन्य कुछ है ही नहीं । ( जो ) बहुत
जोके अन्तके जममें तत्वज्ञानको प्राप्त हुआ ज्ञानी
'सब कुछ थासुदेव ही है। इस प्रकार मुझको भजता
है यह महात्मा अति दुर्लभ है। ( जो ) अव्यक्त
अक्षर ऐसे कहा गया है उसी अक्षर नामक अन्यक्त
भाषको परमगति कहते हैं तया जिस सनातन
अव्यक्तमानको प्राप्त होकर मनुष्य वापस नहीं आते
यह मेरा परमपाम है । मुझ सच्चिदान दधन
परमारमासे यह सब जगत् ( जलमे बर्फके सदृश )
परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अन्तर्गत सङ्कल्पके
आधार स्थित है ( इसलिये वास्तवमें ) मैं उनमें स्थित
नहीं है, और ( वे ) सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं।
(कितु ) मेरी योगयाया और प्रभावको देख (कि)
७९ गीता-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर भूतोंका धारण-पोषण करनेवाला और भूतोंका उत्पन्न करनेवाला भी मेरा आत्मा ( बास्तबमें ) भूतोंमें स्थित नहीं है। जो पुरुष इन्द्रियममुदायको अच्छी प्रकार यशमें करके मन बुद्धिसे परे सर्वव्यापी, अकयनीय- स्वरूप, सदा एकरस रहनेवाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी सच्चिदान दधन ब्रह्मको निरन्तर एकीभावसे ध्यान करते हुए उपासते हैं वे सम्पूर्ण भूतोंके हितमें रत हुए सनमें समान भावनाले योगी भी मुझको ही प्राप्त होते हैं । (परमामा ) चराचर सब भूतोंके बाहर-भीतर परिपूर्ण है, और चर- अचररूप भी ( वही) है और वह सूक्ष्म होनेसे अविज्ञेय है तथा अति समीपमें और अति दूरमें भी वही स्थित है। जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतोंमें नाशरहित परमेश्वरको सममानसे स्थित देखता है वही देखता है । (पुरुष ) जिस कालमें भूतोंके न्यारे-न्यारे भावको एक परमात्माके सकल्पके आधार स्थित देखता है तथा उस परमात्माके मङ्कल्पसे ही सम्पूर्ण भूतोंका विस्तार देखता है, उस कालमें (वह) सच्चिदानन्दधन ब्रह्मको प्राप्त होता है। जिस झानसे ( मनुष्य ) पृथक्-पृथक् सर भूतोंमें एक अविनाशी परमात्मभावको विभागरहित ( समभावसे ।
गी नियन्यायगी
रियल) ता है, उगगनको (सू) मासिक
जान।
(५) गीता मा य न वहा गया कि
যিনা বি এলাৰ না শুখ না বলা
चाहिये । नापि न तो अपनेको भावाका
शिष्य मानता भी पा-यत: शाधि मा त्या
प्रपाम् ।' [10] 'आपका शिष्य हूँ, आपके
शरण है, मुग शिक्षा नीजिये' कहकर अर्जुनने
शिष्यार स्वीकार किया है और भगगन इसका
विशेष 7 कर तथा " जगह अर्जुनको अपना
इए प्रिय और भक्त मानयर प्रयाग तरसे उमका
शिष्य होना स्वीकार किया है। अर्जुनको परम
पदको प्राप्ति हर थी, इसका उल्ले। महाभारत
বাগী, যুৱ সর্ম ঃ ।
(६) गीता भगाके ही श्रीमुखका वचनामृत
है। गीतामें जितो रचर श्रीभगशवाच' के नाममे
हैं उनमें बुर तो श्रुतियोंके प्राय ज्यों के त्यों वचन
हैं जो अर्जुनको भोक्सपर्म ही का गये थे और
अवशेष साद गोरचालको भाषामें हुआ था जिसको
भगवान श्रीव्यासपने मोका रूप दे दिया।
নামী সহনা নয়
--
गीता सम्बन्धी प्रश्नोंका उत्तर
एक सजन लिखते हैं कि मेरी जहाँतक भावना
है, अशान्त व्यक्तिके लिये गीतासे बढ़कर शाति-
प्रदायक कोई अन्य नहीं है, तथापि गीताके श्लोकों में
कहीं कहीं पूर्वापर-निरोधात्मक भावोंका भान होता है
यद्यपि ऐसा भान होना मुझ जैसे अल्पज्ञोंका केवल
भ्रम भी हो सकता है, परन्तु इस विषयमें गीताके
जाहरियोंके बिना जौहर देखे सन्तोष कर लेना अपने
आपको और भी भ्रममें रखनेके पापका भागी होना
पडेगा, अत इस विषयमें कुछ शङ्काएँ समाधानार्थ
उपस्थित की जाती हैं।
शङ्काएँ ये हैं.
(१) गीताके १८ वे अन्यायके श्लोक ५९-
६०६१ में भगवान्ने अर्जुनके हृदयमें ऐमा भार
- क्यों भरा कि 'युद्धसे विमुख होनेपर प्रकृति तुम्हारा
पिण्ड नहीं छोडेगी।
(२) उपर्युक भार भरनेसे क्या मनुष्यकी
अपने व्यक्तित्वसे आसान उठ जायगी।
६
८२ गीता निघावली (३) आस्था उठ जानेपर क्या मनुष्य सत्कार्यादिके करनेमे उत्साहरहित नहीं हो जायगा। (४) १८ । अयायके ६७ चे श्लोकमें भगवान्ने तपश्चर्यारहित व्यक्तिको आत्मविश्यक' ज्ञानोपदेश करनेसे मना क्यों किया। (५) क्या ६१ वें श्लोकमें उपदिष्ट ‘य प्रारूढानि मायया' अभक्तोंके विषयमें ग्राह्य नहीं है। यदि नहीं नो क्यों । और यदि है तो वे बेचारे उपदेशसे पश्चित क्यों रक्खे गये । न्यायसे तो ज्ञानके अभावमें दरिद्र होनेके कारण वे ही विशेष अधिकारी हैं, किन्तु ऐसा किया नहीं गया । (६) क्या ऐसा करनेपर भी समदर्शिताकी रक्षा हो सकती है। शक्षाओंका समाधान (१) भगवान्ने अर्जुनको अपनी प्रकृतिके वश होकर युद्धमें नियुक्त होनेकी बात बहुत ठीक कही है । प्रकृतिका अर्थ यहाँ स्वभाव है। पूर्वकृत पाप- पुण्यके अनुसार सरकार बनते है, संस्कारोंसे सञ्चित बनता है, सश्चितके एक अश विशेषसे प्रारब्ध बनता है । असख्य सञ्चित और प्रारब्रके जो समुदाय हैं उन
गीता सम्बन्धी प्रश्नोंका उत्तर
-
स्वस्या
सबके मिले हुए भावको स्वभाव कहते हैं, इस
स्वभावसे स्मृति उत्पन्न होती है और उससे क्रियाएँ
बनती हैं। इस सिद्धान्तके अनुसार क्रिया करने में
पुरुष स्वभावके ही अधीन रहता है। ज्ञानीको भी
अपने स्वभावानुसार क्रिया करनी पड़ती है।
भगवान्ने कहा है-
सरर्श चेएते
प्रकृतेनरानपि ।
अर्थात् ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृति ( स्वभाव )
के अनुसार चेष्टा करता है। परन्तु इसका यह अर्थ
नहीं कि स्वभावमें परिवर्तन नहीं होता, प्रयनसे
स्वभाव बदला जाता है और स्वभाव बदलनेमे किया
भी बदल जाती है। ज्ञानीकी वृत्तियों में राजस और
तामस भावोंका तो साधन कालमें ही नाश हो जाता
है, उमकी सत्त्वप्रधान वृत्ति होनेसे उसका स्वभाव
सालिक बन जाता है, तदनुसार उसके द्वारा सारी
साविक क्रियाएँ होती हैं । अर्जुनके उस समय के
क्षत्रिय-स्वभानको जानकर ही भगवान्ने कहा कि
'प्रतिस्मा नियोश्यति' या 'स्वेन स्वभावजेन कर्मणा
निग्न अवश करिष्यति' 'तुझको क्षनियपनकी प्रकृति-
युद्ध में लगा देगी' या 'अपने र
A
-
कमसे ना हुआ 1 परवश होकर ( युद्ध ) करेगा।
इसमे यह सममना चाहिये कि जबतक स्वमार नहीं
बदलता तबतक उस स्वमारके अनुसार ही क्रिया
होती हैं । परतु कोई भी क्रिया मनुष्यको अधनकारक
नहीं होती, बाँधनेवाले होते हैं राग-द्वेष' जिनका
मनुष्य अपने पुरुषार्थसे नाश कर सकता है। इसीलिये
भगवान्ने कहा है-
इद्रियस्येन्द्रियस्यायें रागद्वेपी व्ययस्थिती।
तयोर्न घशमागच्छेत्तौ हम्य परिपयिनी ॥
(३1३४)
'इन्द्रिय इद्रियके अपमें अर्थात् सभी इन्द्रियों के
भोगों में स्थित जो राग आर द्वेष हैं उन दोनोंके यशमें
नहीं होये, क्योंकि वे दोनों ही इस मनुष्यके कल्याण
मार्ग, विप टालनेवाले महान् शन
(२)न माघोंसे मनुष्यकी अपने पुरुषार्यमे आस्था
नहीं उठती। गीतामें यह स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य
पुरुषार्थसे राजसी-तामसी भावोंका दमन कर अपने
स्वभावको पद सकता है, जिससे उसकी क्रियामें भी
परिवर्तन हो जाता है। भगवान्ने जगह-जगह काम
क्रोके त्यागको आज्ञा दी है और त्यागके उपाय भी
นี้
गीता-सम्बन्धी प्रश्नों का उत्तर बतलाये हैं। यह नहीं कहा कि मनुष्य इन कुभायोंको जीत नहीं सकता ! खाभाविक होनेके कारण अर्जुनके क्षात्र-स्वभावकी क्रिया उम समय नहीं बदल सकती थी, परन्तु अर्जुन राग-द्वेष और काम-क्रोधसे खून बच सकता था। युदम्पी क्रिया भी अन्यायपूर्वक हो तो पतन करनेवाली, न्याययुक्त हो तो स्वर्गमें पहुँचानेवाली और निष्काम भारसे भगवदर्थ होनेपर मुक्ति देनेवाली होती है। क्रियाका रूप बदलनेकी आवश्यकता नहीं, कर्ताका भाव बदलना चाहिये, जिसके बदलने में यह समर्थ माना गया हे ! राग द्वेषके नाशसे ही मनुष्यको किया भगवदर्थ हो जाती है। इस राग-देष और उसके स्थूलरूप काम क्रोपके त्यागके लिये भगवान्ने जगह- जगह उपदेश दिया है और मनुष्यको इसमें समर्थ भी बतलाया है। यया--- तस्मात्वमिन्द्रियाण्यादी नियम्य भरतर्षमा বাগান এলছি দুল লখিমালবাহান। इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य पर मन । मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धे परतस्तु स ॥ पर युद्ध. पर युट्या सस्तभ्यात्मानमात्मना । जहि शत्रु महाबाहो कामरूप दुरासदम् ॥ (३३४१-४३)
गीता नियघायली
इसलिये हे अर्जुन ! तू पहले इद्रियोंको वशमें
करके ज्ञान और विज्ञानके नाश करनेवाले इस (काम)
पापीको निश्चयपूर्वक मार । ( यदि तू यह समझना है
कि इन्द्रियोंको रोककर कामरूप पैरीको मारनेकी मेरी
शति नहीं है तो यह तेरी भूल है, क्योंकि इस शरीरसे
तो ) इन्द्रियोंको श्रेष्ठ, बलवान् और सूक्ष्म कहते हैं,
इन्द्रियोंसे श्रेठ मन है, मनसे परे बुद्धि है और बुद्धिसे
भी अ य त श्रेष्ठ आत्मा है । इस प्रकार बुद्रिसे परे
अथात् सर प्रकार बलवान् और श्रेष्ट अपने आत्माको
जानकर, बुद्धिके द्वारा मनको वशमें करके हे महाबाहो ।
अपनी शक्तिको समझकर इस दुर्जय कामरूप शत्रको मार !'
(३) इस शङ्काका उत्तर उपर्युक्त दूसरीके उत्तरमें
आ गया है। जब मनुष्य अपने पुरुषार्थसे काम, क्रोधको
जीतकर सदाचरणमें प्रवृत्त हो सकता है, तब वह
सरकायादिमें उत्साहरहित क्यों होने टगा?
(४) १८ वें अध्यायके ६४ चे श्लोकमें भगवान्ने
अर्जुनको अपना अतिशय प्रिय बतलाकर उसको
'सर्वगुद्यतम' परम रहस्ययुक्त उपदेश देनेकी प्रतिज्ञा की
। बहुत गुह्य बात बहुत ऊँची श्रेणीके विश्वासपार
अधिकारीके अतिरिक अन्य किसीसे नहीं कही जाती।
गीता-सम्बन्धी प्रश्नोंका उत्तर
ऐसा अधिकारी वही होता है जो विशेष श्रद्धासम्पन्न
परम प्रेमी हो । भगवान्ने शास्त्रोक्त ज्ञानोपदेशके लिये
मने नहीं किया है, मने किया है अपने ईश्वरस्व-सम्बन्धी
गुप्त रहस्यको प्रकट करनेके लिये। आगे चलकर विश्वासी
भक्तोंमें इस रहस्यको बतलानेकी प्रशसा भी की है।
यह मनाही न तो ज्ञानोपदेशके लिये है और न ईश्वरकी
शरणागतिके लिये ही है। तू 'मुझमें ही मन लगा, मेरा
ही भक्त बन, मेरी ही पूजा कर, मुझे ही नमस्कार कर,
तुझे मैं तार दूंगा, मेरी शरण आ जा, पापोंसे मैं
दंगा। यानी में जो तेरे सामने श्रीकृष्णके रूपमें स्थित
हूँ, वही साक्षात् सचिदानन्दधन परमात्मा हूँ, दूसरी
ओर ताकनेकी आवश्यकता नहीं। इत्यादि रहस्यकी
पाते अभक्तोंके सामने न कहनेके लिये भगवान्ने भाज्ञा
दी है । ईश्वर-शरणागतिकी आज्ञा तो सबके लिये है।
जहाँ ६१ वें श्लोकमें यह कहा है कि शरीररूप यन्त्रमें
आरूद हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको ईहर अपनी मायासे
भ्रमाता हुआ सत्र भूत-प्राणियोंके हृदयमें स्थित है। मही
अगले ६२ वें श्लोकमें उस परमात्माके शरण प्रहण
परम शान्ति और शाश्वत परम धामको
শীয়া নিশায়ী
(५) अतएर १८ वे अन्यायके ६१ में लोकका
उपदश सरके लिये प्राध है, इसके लिये कहीं मनादी
भी नहीं की है, न इम उपदेशसे कोई यश्चित ही रस्सा
गया है, बल्कि यह ईश्वर शरणागतिका उपदेश तो
सबके लिये बतलाया गया है । भगरान्ने म्यय कहा है-
अपि चेसुदुराचारो भजते मामान्यभार।
साधुरेघ स मन्तव्य सम्यग्व्ययसितो हिस ।
क्षिप्र भयति धर्मात्मा शश्वन्छाति निगच्छति ।
कौतेय प्रति जानीहि न मे भक प्रणश्यति ।
मा हि पार्थ व्यपाधिस्य येऽपि स्यु पापयोग्य ।
खियो येत्यास्तथा शुदास्तेऽपियान्ति परागतिम्।।
यदि कोई अतिशय दुराचारी भी अन यमायसे
मेरा भक्त हुआ मुझको निरतर भजता है, यह साधु ही
मानने योग्य है, क्योंकि वह यथार्थ निचयाला है
अर्थात् उसने भलीभाँति निश्चय कर लिया है कि
परमेश्वरके भजनके समान अन्य कुछ भी नहीं है।
इसलिये वह शीच ही धर्मात्मा हो जाता है और सदा
रहनेवाली परम शान्तिको प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! तू
निश्चयपूर्वक सत्य जान कि मेरा भक्त नष्ट नहीं होता।
।
- गीता-सम्बन्धी प्रश्नोंका उत्तर क्योंकि हे अर्जुन । स्त्री, वैश्य और शूद्रादि तथा पाप- योनिवाले (चाण्डालादि ) भी जो कोई हो बे भी मेरे शरण होकर तो परम गतिको ही प्राप्त होते हैं।" (६) गीताकी समदर्शिनामें कोई हानि नहीं होती, क्योंकि भगरान्ने जो निषेर किया है मो भेद, घृणा या द्वेषादिके हेतुसे नहीं किया है। मेद, घृणा और द्वेषका तो वहाँ सर्वथा अभाव है। अपात्र होनेके कारण जो बात उसपर विशेष प्रभाव नहीं डाल सकती, उसीके लिये निषेध किया है । भगवान ने यह स्पष्ट ही कहा है- समोऽह सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न मिय । ये भजन्ति तु मा भक्त्या मयि ते तेषुचाप्यहम् ॥ यद्यपि मैं सब भूतोंमें समभारसे व्यापक हूँ, न कोई मेरा अप्रिय है और न प्रिय है, परन्तु जो भक्त मुझको प्रमसे भजते हैं वे मुझमें और मैं भी उनमें (प्रत्यक्ष प्रकट ) हूँ।' जैसे सूक्ष्मरूपसे सब जगह व्यापक हुई भी अग्नि साधनोंद्वारा प्रकट करनेसे ही प्रत्यक्ष होती है, वैसे ही सब जगह स्थित हुआ भी परमेश्वर भक्तिसे भजनेगालेके ही अत करणमें प्रत्यक्षरूपसे प्रकट होता है। इसमें कोई विषमता नहीं है। जैसे अग्नि किसीसे यह नहीं म
९०
गीता नियमावली
कहती कि मैं तेरे द्वारा प्रकट नहीं होती। जो साधन
करता है उसीके सामने प्रकट हो जाती है। इसी प्रकार
ईश्वर भी भजन करनेवालेके अतरमें प्रकट होता हे।
जैसे भगवान सूर्य का प्रकाश सब जगह सममारसे रहनेपर
भी दर्पणादि पदार्थ उज्ज्चर होनेसे उसे विशेषररूपसे
ग्रहण करते हैं और सूर्यकान्तमणिसे अग्नि प्रकट हो
जाती है । इसमें सूर्यमें कोई विषमता नहीं है। पात्रकी
तारतम्यता है । इसीलिये पात्रोंकी शक्तिके अनुमार ही
उनको उपदेश दिया गया है, उद्देय सत्रका समानरूपसे
कल्याण करना ही है
(१०)
गीताका उपदेश
एक सज्जनने कुछ प्रश्न किये हैं। प्रश्नोंका सुधारा
हुआ म्वरूप यह है--
(१) भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म हैं, उनके लिये
'कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्' कहा गया है, ऐसे साक्षात्
ज्ञानस्वरूप परमात्माने उपनिषद्रूपी गायोंसे तत्वरूपी
दूध किसलिये दोहन किया और क्यों उनका आश्रय लिया।
(२) क्या वर्तमान समयके गीता भक्तोंकी भाँति
अर्जुन श्रद्धासम्पन्न नहीं थे ! यदि श्रद्धालु ये तो
।
गीताफा उपदेश
श्रीभगरानको उन्हें समझानेके लिये शन्द प्रमाणका
क्यों प्रयोग करना पड़ा और अन्तमें क्यों विश्वरूप
दिखलानेकी आवश्यकता हुई ।
(३) अर्जुनको गीताका ज्ञान हो गया था' फिर
आगे चलकर उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि 'हे भगवन् !
आपने सख्यभावसे मुझे जो कुछ कहा था, उसे मैं
भूल गया ।' तो क्या अर्जुन प्राप्त ज्ञानको भूल गये थे।
(४) भगवान् श्रीकृष्णने इसके उत्तरमें कहा कि
'हे धनञ्जय ! मैंने उस समय योगयुक्त होकर तुमसे यह
ज्ञान कहा था, अब पुन मैं उसे कहने में असमर्थ हूँ।'
तो क्या मर्मज्ञ भगवान् भी आत्मविस्मृत हो गये थे
जिससे उन्होंने पुन वह ज्ञान कहने में अपनी असमर्थता
प्रकट की और योगयुक्त होनेका क्या अर्थ है।
(५) यदि यह मान लिया जाय कि भगवान्
गीताज्ञान अर्जुनको फिरसे नहीं सुना सके, तब फिर
व्यासजीने अनेक दिनों बाद उसे कैसे दुहरा दिया ।
(६) अगर गीता भगवान् श्रीकृष्णके श्रीमुखकी
वाणी है तो भगशन न्यासके इन शब्दोंका क्या अर्थ है
जो उसने श्रीगणेशजीके प्रति कहे हैं......
गीता-निरन्धायली
कहती कि मैं तेरे द्वारा प्रकट नही होती। जो साधन
करता है उमीमामने प्रकट हो जाती है। इसी प्रकार
पर भी मजन करोगालेके भतरमें प्रकट होता है।
जैसे भगवान सूर्यका प्रकाश सर जगह समभागमे रहनेपर
मी दर्पणादि पदार्थ उम्भर होनेमे उसे विशेषरूपसे
प्रहल करते हैं और सूर्यकान्तमगिसे अग्नि प्रकट हो
जानी है। इसमें सूर्यमें कोई विषमता नहीं है। पात्रकी
तारतम्यता है । इसीलिये पात्रोंकी शक्ति के अनुसार ही
उनको उपदेश दिया गया है, उद्देश्य सबका समानम्पसे
कल्याण करना ही है।
(१०)
गीताका उपदेश
एक सजनन कुछ प्रश्न किये हैं। प्रशोंका सुधारा
हुआ खरूप यह है-
(१) भगवान् श्रीकृष्ण पूर्ण ब्रह्म हैं, उनके लिये
'कृष्णात भगवान् स्वयम्' कहा गया है, ऐसे साक्षात्
ज्ञानस्वरूप परमात्माने उपनिषदरूपी गायोंसे तत्वरूपी
दूध किसलिये दोहन किया और क्यों उनका आश्रय लिया।
(२) क्या वर्तमान समयके गीता भक्तोंकी मोनि
अर्जुन श्रद्धासम्पन नहीं थे ? यदि श्रदाल थे तो
गीताका उपदेश
श्रीभगवानको उन्हें समझानेके लिये शब्द प्रमाणका
क्यों प्रयोग करना पड़ा और अन्तमें क्यों विश्वरूप
दिखलानेकी आवश्यकता हुई ?
( ३ ) अर्जुनको गीताका ज्ञान हो गया था फिर
आगे चलकर उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि 'हे भगवन् ।
आपने सख्यभावसे मुझे जो कुछ कहा था, उसे मैं
भूल गया ।' तो क्या अर्जुन प्राप्त ज्ञानको भूल गये थे।
(४) भगवान् श्रीकृष्णने इसके उत्तरमें कहा कि
'हे धनञ्जय ' मैंने उस समय योगयुक्त होकर तुमसे वह
ज्ञान कहा था, अत्र पुन में उसे कहने में असमर्थ हूँ।'
तो क्या मर्मज्ञ भगवान् भी आत्मविस्मृत हो गये थे
जिमसे उन्होंने पुन वह ज्ञान कहनेमें अपनी असमर्थता
प्रकट की और योगयुक्त होनेका क्या अर्थ है।
(५) यदि यह मान लिया जाय कि भगवान्
गीताज्ञान अर्जुनको फिरसे नहीं सुना सके, तब फिर
व्यासजीने अनेक दिनों बाद उसे कैसे दुहरा दिया।
(६) मगर गीता भगवान् श्रीकृष्णके श्रीमुखकी
वाणी है तो भगान् व्यासके इन शन्दोंका क्या अर्थ है
जो उन्होंने श्रीगणेशजीके प्रति कहे है---
गीतारघावली
लेखको भारतस्यास्य भव व गणनायक।
मयैव प्रोच्यमानस्य मनसा करिपतस्य च ॥
'हे गणनायफ! तुम मेरे मनोकल्पित और वक्तव्यरूप
इस भारतके लेखक बनो ।' गीता महाभारतके अतर्गत
है, इससे यह भी क्या व्यासजीकी मनोकल्पना है और
क्या सारे श्लोक उहीके रचे हुए हैं।
उपर्युक्त प्रश्नोंका क्रमश उत्तर इस प्रकार है-
(१) भगरान्के निश्वासरूप वेदका अङ्ग होनेसे
उपनिषद् भी भगवान्के ही अनादि और नित्य उपदेश'
माने गये हैं। उनके आश्रयकी कोई बात नहीं, भगरानने
ससारमें उनकी विशेष महिमा बढानेके लिये ही उनका
प्रयोग किया। इसके सिवा उपनिषद्को भाषा ओर
वर्णनशेली जटिल होनेसे उनको अधिकाश लोग समझनमें
भी असमर्थ हैं, इसलिये लोक कल्याणार्थ भगान्ने
उपनिषदोंका सार निकालकर गीतारूपी अमृतका दोहन
किया । वास्तवमें उपनिषद् और गीता एक ही वस्तु है ।
(२) आजकल्के लोगोंके साथ अर्जुनकी तुलना
नहीं की जा सकती । अर्जुन तो महान् श्रद्वासम्पन्न परम
विश्वासी प्रिय भक्त थे । भगवान्ने वय श्रीमुखसे
खीकार किया है-
गीताका उपदेश
भकोऽसि मे सखा चेति
शेऽसि मे दमिति
'मियोऽसि में
'तू मेरा मत है, मित्र है, दृढ़ इष्ट है, प्रिय है। आदि ।
ऐसे अपने प्रिय सखा अर्जुनके प्रेमके कारण ही भगवान्
सदा उसके साथ रहे, यहाँतक कि उसके रथके घोड़े
सय हाँके । आजके भक्तोंकी पुकारसे तो भगवान्
पूजा भी नहीं आते। अतएर यह नहीं मानना चाहिये
कि अर्जुन श्रद्धाल नहीं था । भगवान्ने शब्द प्रमाण तो
वेदोंकी मार्यकता और उनका आदर बढ़ानेके लिये दिया।
विश्वरूप दर्शन करानेमें तो अर्जुनकी श्रद्धा प्रगान है ही।
गीताके दशम अव्यायमें अर्जुनने जो कुछ कहा है वही
उमकी श्रद्धाका पूरा प्रमाण है । अर्जुन कहता है-
पर ग्रह पर धाम पवित्र परम भवान् ।
पुरुष शाश्वत दिव्यमादिदेवमन विभुम् ।
सर्वमेतरत मन्ये यन्मा यदसि केशव ।
नहि
भगवन्स्यक्ति विदुदेवा न दानया ।।
म्वयमेवात्मनारमान घेत्य व पुरुषोत्तम ।
পূবায়ন भूतेश देयदेव जगत्पते ।।
आप परमझ, परमधाम और परम पवित्र है, मनातन,
दिल्य पुरुष एवं देशोंके भी आदिदेव, अजमा और
m
गीता निरन्धाधली
-
नन्यापी हैं, हे केशर ! आप मेरे प्रति जो कुछ भी
कहते हैं, उस समस्तको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगान् !
आपके लीलामय खरूपको न दाना जानते हैं और न
देता ही जानते हैं। हे भृतोंके उत्पन्न करनेवाले, हे
भूतोंके सर, हे देवोंके देव, हे जगत्के स्वामी, है
सुरुषोत्तम । आप स्वयं ही अपनेसे अपने को जानते हैं ।'
इन शब्दोंमें अर्जुनकी श्रद्धा छलकी पड़ती है। इस
अकार भगरानकी महिमाको जानने और बखाननेला
अर्जुन जब ( एकादश अपायमें ) यह प्रार्थना करता है
कि 'नाय | आप अपनेको जैसा कहते हैं (यानी दशम
अध्यायमें जैसा कह आये हैं) ठीक वैसे ही है, परन्तु
हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल,
वीर्य
और तेजयुक्त रूपको प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ...-
'द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्' अर्जुन परम विश्वाप्ती था,
भगवान के प्रभावको जानता ओर मानता था। इसीलिये
भगवान्की परम दयासे उनके दिव्य विराटपके दर्शन
करना चाहता है, भककी इच्छा पूर्ण करना भगवान्को
बान है इसलिये भगवान्ने कृपा करके उसे विश्वरूप
दिखलाया। यह विश्वरूप श्रद्धासे ही दिखाया गया, श्रद्धा
या विश्वास करवानेके हेतुसे नहीं। भगवान्ने खय ही कहा
गीताफा उपदेश
है कि 'अनन्य भक्त के सिवा किसी दुसरेको यह रूप में
नहीं दिखा सकता । मेरा यह सरूप वेदाध्ययन, यज्ञ,
दान, क्रिया और उग्र तपोंसे नहीं दीख सकता। इसमे
यह सिद्ध है कि अर्जुन परम श्रद्धाल, भगवापरायण और
महान् भक्त था । भगवान्ने अनन्यभकिका स्वरूप
और फल यह बतलाया है-
मत्कर्मन्मत्परमो
सवर्जित ।
निर्धर सर्वभूतेषु य स मामेति पाण्डव
'हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिये, सब
कुछ मेरा समशता हुआ~यज्ञ, दान और तप आदि सम्पूर्ण
कर्तव्यकर्मोको करनेवाला है और मेरे परायण है,
अर्षात् मुझको परम आश्रय और परम गति मानकर
मेरी प्रासिके लिये तत्पर है तथा मेरा भक्त है
अर्थात् मेरे नाम, गुण, प्रभार और रहस्यके श्रवण,
मनन, ध्यान और पठन पाठनका प्रेमसहित निष्काम
भावसे निश्तर अभ्यास करनेवाला है और आसकिरहित
है अर्थादत्री, पुत्र और धनादि सम्पूर्ण सासारिक पदायोंमें
स्नेहरहित है और सम्पूर्ण भूत-प्राणियोंमें वैरभारमे रहित है
ऐसा वह अनन्यभकियाला पुरुष मुझकोही मात होता है।"
(३) अर्जुनने निष्काम
कर्मयोगसहित
शरणागतिरूप भक्ति' को ही अपने लिये प्रधान उपदेश
समझकर उसीका विशेष स्मरण रक्खा था।
गीता नियधावली
कथनानुसार इसीको 'सर्वगुशतमा माना था । ज्ञानके
उपदेशको शरणागतिकी अपेक्षा गौण समझकर उसकी
इतनी परना नहीं की भी 1 इस प्रसंगमें भी अर्जुन उस
मगुपतमा शरणागतिके लिये कुछ नहीं पूता । यह
नत्वज्ञान तो उसे स्मरण ही है । इसीलिये भगवान्ने भी
उससे कहा कि मैंने उस समय तुम्हें गुम' सनातन ज्ञान
सुनाया था (पारितस्य मया 'गुह्य ज्ञापितच सनातनम् ।
महाभारत अघ १६ । १) इस गुह्य' शब्दसे
भी यही सिद्ध होता है । उलहना देने के बाद भगवान्ने
अर्जुनको जो कुछ सुनाया, उसमें भी गीताकी भाँति निष्काम
कर्मयोग और शरणागतिके मम्यधर्मे कुछ नहीं कहाा केवल
नही ज्ञानमाग सुनाया, जिसको कि अर्जुन भूल गया था।
(४) भगवानके अपनेको असमर्थ बतलानेका यह
अर्थ नहीं कि आप उम ज्ञानको पुन सुना नहीं सकते
थे या वे उसको भूल गये थे। सच्चिदानन्दघन भगवान्के
लिये ऐसी कल्पना करना सर्वया अनुचित है। भावान्के
कहनेका अभिप्राय ज्ञानयोगका सम्मान बढ़ाना है । गुरु
अपने शिष्यसे कहता है कि 'तुझको मैने बड़ा ऊँचा उपदेश
दिया था, उसे तूने याद नहीं रक्खा । आत्मज्ञानका
उपदेश कोइ वाजास बात नहीं है जो जब चाहे तभी
कह दी जाय इस प्रकार यहाँ 'असमर्थता' का अर्थ
यही है, मै इतनी ऊँची बात इस तरह लापरवाही
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गीता नियाधारली
गया था तथापि मात्रामा यह उरहना देना तो सार्यक
ही था कि तुम मेरी कही हुई बातोयो क्यों भूल गये ।
शरणागनको अपने इटकी बात फभीनही भूलनी चाहिये।
परत यह नहीं समझना चाहिये फिझानका अधिकार ऊँची
श्रेणीका है और निष्काम कर्मयोगयुक्त शरणागति भक्तिका
नीची भेणीका । जब दोनोंया फल एक है तब इनमें कोई
भी लोटा-मड़ा नहीं है। अर्जुन की और भक्त था, अत
उसके लिये यही मार्ग उपयुक था।
(५) मगगन सब सुना सकते थे, यह बात ऊपर
के विवेचनसे सिद्ध है। भगवान् ब्यास महान् योगी थे,
उन्होंने योगबलसे सारी बातें जानकर सुना दी। जिनकी
योगशकिसे साप दिव्यदृष्टि प्राप्त करने में समर्थ हो
गया, उनके लिये यह कौन बड़ी बात थी।
(६)व्यासजीके कहनेका मतलब यह है किडहोंने
कुछतोसंगाद ज्यों-के-यों रख दिये, कुछ संवादोंको संग्रह
करके उन्हें सजा दिया । भगवान्ने अर्जुनको जो उपदेश
दिया था उसमें से बहुत से श्लोक तो ज्यों के क्यों रख दिये
ग्ये, कुछगधभागके पर बना दिये और कुछ इतिहास कहा।
दुर्यापन,समय,अर्जुन और धृतराष्ट्र आदिकी दशाका वर्णन
व्यासजीकी रचना है। इससे यह नहीं मानना चाहिये कि यह
मनोकल्पित उपन्यासमात्र है। वास्तवमें व्यासजीने अपने
योगबलये सारी बातें जानकर ही सचा इतिहास लिखा है।
श्लोक-सूची जन्याय धृतराष्ट्र सजय अर्जुन श्रीभगवान् पूर्ण सख्या 6 । . २ ६ - . ७२ . . १ १ ४२ . . ४२ . ur 9 . ० २ ३ . २६ . 6 ० २८ . ० ७ - . - N . . १ १४ . a ७५ . . . ० . . . ० . . २८ जोद १ 4 त
छन्द-विवरण
सन्दकाम भस्माय इलोका सरन्या कुल मेर
न्द्रपमा सो"
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८
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२०१२२१२७,३०
उपद्रयतामोकन
उपजातिया ३७
१,२८.२.१४
२ १६.८२....
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३
१
१५,१६,१७,१९,२,
२३,२४२.१६,३१,
३२,३३,१४,१६,२८,
४०,४१,४२,४३,४६,
२४
विपरीतपूया भोक ४ ५ ३५, २७) ३.४४
अनुष्टुप् लोक ६४५ सम्पूर्ण १८ अध्यायों में ६
७.०
७.०
M घनश्यामदास जालान, गीताप्रेस, गोरखपुर