Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sadhu Shikhsa
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आत्मतिलक ग्रन्थ सोसायटी पुस्तक न २८. साधुशिक्षा. e अनुवादक- भिक्षु श्रीयुत तिलकविजयजी पंजाबी. प्रकाशक- आत्मतिलक ग्रन्थ सोसायटी. भारत जैन विद्यालय पूना सीटी माट कशवजी हेमचा तथा रामचद गंगचटके स्मरणाथ- साधु साध्वियोको भेट पीरम २४४९] [वि स १९७९ प्रथम सत्करण गृहस्पोमे मूल्य ॥)
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रा० रा लक्ष्मण भाऊराव कोकाटे.
हनुमान प्रेस, सदाशिव पेठ घ न. ३.०, पुणे.
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प्राक्कथन इस अशान्तिपय ससारमें सपस्त प्राणी शान्ति प्राप्त करनेकी तीव्र इच्छासे अनेक प्रकारकी प्रवृत्तियों करते हैं, परन्तु विना मार्ग मालूप हुये मनुष्य कदापि अपने इष्ट स्थानको प्राम नहीं कर सकता। मसारके तापसे सतम हृदयवाले भन्य प्रापिओके लिये परम शान्तिके माग चलनेवाले तत्वज्ञानी महापुरुषोंने शान्ति प्राप्त करने के दो मार्ग बनलाये हैं। वे दो मार्ग एक वो गृहस्थ धर्म और द्विनीय मन्यस्त धर्म है। पूर्वकृत कोंके प्रभावसे जो मनुष्य सासारिक सोहके पागसे सर्वथा छूट नहीं सकता अर्थात् जो पोहक पावल्यसे मासारिक भावो-वृत्तिका माथा परित्याग करनेपे असमर्थ है उम मनुष्यके लिये शान्ति प्राप्तिका जरा गृहस्थ धर्म कहलाता है और जिसने पूर्वकृत शुभकर्मके उदयसे अथवा अपने मानसिक बल द्वारा परम पुग- पार्थमे या सासारिक प्रवृत्तियोंसे सिन्नताको प्राप्त हो ममार सम्बन्धी वृत्तिओंके परित्यागका मामय प्राप्त किया है और जो अपने भाई गृहस्थकी अपेक्षा श्रीव ही परम शान्ति प्राप्त करना चाहता है उसके लिये जो कुछ कष्टसाध्य नजदीकका मार्ग है वह मन्यस्त धर्म कहलाता है। इस सन्यस्त मार्गमें गान करनेवाले मन्यासी, माधु, मन्त, महन्त, महापुरुष परम त्यागी, वैरागी और तपस्वी होते हैं। पूर्वोक्त गृहस्थ धर्म मार्गमे यह मन्यस्त साधु धर्म- मार्ग सर्वथा विभिन्न है। अर्थात् इन दोनो धर्ममा!में एक मकान के पहले और दूसरे मजलके समान अन्तर है। यद्यापि लम्या मार्ग -
[२]
यह त्यागी धर्ममार्ग ससारमें प्राप्त होना वडा ही दुर्लभ है
क्योकि संसारके छोटे बडे सूर्स और विद्वान, वृद्ध और तरुण
त्री और पुरुप समस्त प्राणियोंको अपने वशमे रसनेवाले
मोहराज पर विजय प्राप्त किये विना यह त्यागी धर्ममार्ग मिलना
सर्वथा अशक्य है, तथापि जिस भावनासे सासारिक मोहक
यत्तियों पर सयस प्राप्त कर मनुष्य इस त्यागमय धर्ममार्म पर
आरूढ होता है उसी भावना से अन्त तक इस मार्गमें गमन
करना सचमुच ही अपने एक कृत्रिम सबल शत्रुके साथ युद्ध
करनेके समान है।
यह बात भी स्मरण रखनी चाहिये कि जितना इस
मार्गमें कष्ट है उससे लाखों गुना सुख और आनन्ट भी
भरा है। जिस सहात्याको इस मार्गमें गमन करते सयमीय
सुखका कुछ भी आस्वाद प्राप्त हुआ है वह उम आत्मीय
लीनताजन्य सुसके सापने देवदेवेंद्रों तकके और
चक्रवर्ती राजा महाराजाओं वकके सुस सभोगको तृण स--
मान समझता है।
ससारमें हर एक मनुष्यको अपना ध्येय सिद्ध करनेमे
सासारिक लालचे पीछे धक्षा देती हैं। जो बलवान है वह
उन लालचोके धो मुदो को सहन करता हुआ---उस पर
संयमन करता हुआ अपने इष्ट मार्गमें आगे धसता है और
जो कमजोर है मानसिक वृत्तिओंके वश है वह उन, तुच्छ
लालचोंके धपेसे फिसल पड़ता है। किन्तु अपनी असाव
घान के कारण तुच्छ लालचों द्वारा फिसल पडनेसे उसे
अन्वमें कितना महान दुख उठाना पडता है इसका अनु-
मान उसे सस
समय नहीं होता। लालचोंके वश,
[३]
पडनेके परिणामम उसे शान्तिके बदले घोरातिधोर तीन
वेदनाओंका अनुभव करना पड़ता है। अतएव परम
सान्ति सुख देनवाले इस त्यागमय माधुधर्म मार्गमें चलने-
पाले महात्माको मानसिक कमजोरीके कारण पुन उन्हीं
लालचोंके यश हो जिनका कि उसने सोत्साह परित्याग
किया है दुसन मोगना पड़े इसी करुणा हेतुसे शास्त्रका-
रले यह हितकर उपदेश दिया है।
इस प्रन्यके रचयिता पूर्षाचार्य श्रीमान् मुनिसुन्दर सूरि
महाराज हैं। उनका पवित्र जन्म विक्रम संवत १४ ३६ में
और सन् १३८०में हुआ था। उन्होंने बाल्यावस्थामे ही
अनमतकी पवित्र दीक्षा अगीकार की थी। महान् प्रतिमा
शाली होनेके कारण उन्होंने अपने असाधारण व्यक्तित्वक
प्रकर्षप्रभावसे जैनाचार्य-सरिपद प्राप्त किया था। उन्होंने
भासाधारण ज्ञान द्वारा उपदेश रत्नाकर आदि महान् प्रन्यों-
की रचना कर जनसमाज पर अत्यन्त उपकार किया है।
सन्हीं महात्माका एक अत्युत्तम अध्यात्म कल्पद्रुम, नामक
अन्य है, जिसमें बडे ही सुन्दर और भिन्न विषयक लग भग
सोलह अधिकार है। यह प्रन्य सस्कृत भाषामे सरल श्लोक.
बद्ध और टीकासहित है। इस समग्र प्रन्थको भावनगर
निवासी श्रीयुत मोविचंद गिरधर लाल बी ए एल एल
मौ. ' सोलीसीटरने गुजराती भापामें विवेचन पूर्वक मनु
वादित कर गुजरावी जैन समाजको लाभ पहुँचानेका श्रेय
प्राप्त किया है।
इस प्रन्यान्तरगत सोलह अधिकारोंमसे एक यति शिक्षाधि-
कार नामक अधिकार (निबन्ध) यह साधुशिक्षा उसी
-
[४]
का अनुवाद है। इसमे धर्मगुरु-साधु मुनिवरोंको अपना
आचरण सुधारनेका उपदेश दिया है । इसके पढनेसे मालूम -
होता है कि पूल ग्रन्थको श्रीमान् मुनिसुन्दरसूरि महाराजके
समय जब कि इस ग्रन्थकी रचना हुई थी उस ममय भी
बहुधा धर्मगुरुओंकी साधु मुनिवरोकी आधुनिक समय
जैसी ही पडती दशा होगी। अन्यथा उस सपयका उपदेश
आज कलके धर्मगुरुपुीनवरोंको यथार्थ रीविसे किस
प्रकार लागू पडे ।
यद्यपि इसका मुख्य विषय सावु मुनिराजाओको उनके
कर्तव्य मार्गमें चूस्त बनानेका है तथापि इसे पढनेसे
गृहस्थ वर्गको भी महान् हितकारी उपदेश मिलता है ।
यों तो इस सपूर्ण ही ग्रन्थका हिन्दी भाषा अनुवाद
फरनेकी सूचना मुझे मेरे परमोपकारी धनाचार्य श्रीपान्
वल्लभ विजयजी महाराजकी ओरसे की गई, थी,
परन्तु अन्य कार्योंमें भी समय व्यय होता रहनेके कारण
मैं उस सपूर्ण अन्यका अनुवाद नहीं कर सका. किन्तु आधुनिक
समयमें उपदेशकोंके योग्य उपदेश विशेष लाभदायक
समझ कर इस विषयमे एक महान् गुरुकी आज्ञाको सिरसा
वन्द्य कर भाई श्रीयुत मोतिचद गिरधरलाल सोलीसीटर
कृत गुजराती अनुवादित अध्याता कल्पदुममें आये
हुये यतिशिक्षाधिकार नामक विषयको माधु शिक्षाके
रूपमें हिन्दी अनुवाद करने समर्थ हुआ हूँ। इस साधु-
शिक्षासे यदि एक भी साधु या गृहस्थ अपने जीवनमे कुन
शिक्षा ग्रहण करेगा तो मैं अपने स्वल्प परिश्रमको सफल
समाँगा।
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शा० रामचद खमचद शा तुळजागम गमचद -- साधुशिक्षा - - ससारसं प्राणी पात्रको शान्तिका स्थान और आत्माको पवित्र-निर्गल बनानेका एक मात्र साधन धर्म है । धर्मार- लम्बी मनुष्य ही वर्माचरण द्वारा क्रमसे अपने शुद्वान्म स्वरू- पको प्राप्त कर सकता है । परन्तु धर्मकी बागडोर धर्मगुन- ओंके हाथमे रहती है । धर्मगुरु ही भव्यात्माओको निम्नार्थ धर्मोपदेश दे बनी गल्लाका कल्याण कर सकते हैं और उनका जीवन उ बना सकते हैं । क्यो कि समारी मनुष्योको सासारिक वृत्तियोमे जकडे हुए रहनेके कारण स्वत धर्मका स्वप जाननेके लिए अवकाश नहीं ल्तिा, अतग्य व विचार वमके असे अनभिज्ञ रहते हैं । परन्तु यागुम्आपर विश्वास होने के कारण वे उनके कथन किये गार्गी चलनेको तैयार रहते हैं । इस लिये पहले यही आवश्यकीय प्रभ है कि उन धर्मगुरओका जीनन केसा होना चाहिये ? हम प्रश्नके उत्तर रूपी उन्ही वर्गगुरुओको-साधुओको ला कर यहाँ पर शिक्षा दी जाती है जो वसेके, समाजके नेता कहलाते हैं और अपने मनो भी जा यह भावना रनते हैं कि हममे गुरुपन- साधुपन है । अद्वयतारकोपनिपटने गुरशब्दको व्याल्या इस प्रकार की है। गुगन्दरवन्धकार न्याहु शन्दन्तनिषेधक ॥ अन्धकारनिगीनगद्गुरुरित्यभिधीयते ॥ १ ॥ धात गु शब्द का अर्थ अन्धकार होता ह एवरु शब्दका [२] अर्थ निरोधक होता है, याने अन्धकारका निरोध करनेवाला अज्ञान तितिरका नाश करनेवाला गुरु कहलाता है। साधारणत गुरु या साधु शब्दप ससारसे विरक्त रहनेकी प्रतिज्ञा करनेवाले मुनि, माधु, सन्त, महन्त, यति, महात्मा, श्रीपूज, भट्टारक आदि स त्यागीवर्गका समावेश हो जाता है। यदि इससे भी विशाल दृष्टिसे देसाजाय तोससारमावसे विरक्त तमाप आत्माओका सपावेश हो जाता है । इस दूसरी अपे- क्षा वेशमात्र देसनेकी आवश्यकता नहीं रहती, किन्तु उसका आचार देखा जाता है । इस साधु शिक्षासे धर्मगुरु या उप- देशक ही नहीं किन्तु दूसरे मनुष्य भी वहुतसा फायदा उठा सकते हैं, अर्थात् यह विपय सर्वोपयोगी है । क्यों कि इस विपयको जाननेवाला मनुष्य दम्भी प्रपची, दुराचारीक फन्द्रों एकदप नहीं आसकता । इस विषय पर विशेष विवेचन कर- नेका मुख्यत यही कारण बतला सकते हैं कि विशेष श्रोता- ओकी अपेक्षा एक उपदेशकको सुधारना अत्यावश्यक है। जिस शुभ भावनासे पूलप्रन्यकार श्रीमुनिसुन्दर सूरिजी महाराजने यह विश्य लिखा है उसी भावना द्वारा इस पर विवेचन किया गया है, अतएव इस विषयको सननपूर्वक पढनेसे पाठक बहुत कुछ लाभ ले सकते हैं। मुनान्धरका भावना मय स्वरूप । ते तीर्णा भाववारिधि मुनिवरा- स्तेभ्यो नमस्कूर्महे, येपा नो विषयेषु गृध्यति मनो नो वा कपायै प्लुतम् ।
राग द्वेष विमुक् प्रशान्त-कुलपं साम्याप्त शर्मा द्वयं, नित्यं खेलति चाप्तसंयमगुणा क्रीडे भजद्भावनाः ॥१॥ मूलार्थ जिन महतमाओंका मन इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्त नहीं होता, कषायोंसे व्याप्त नहीं होता, जो मन राग द्वेषसे मुक्त रहता है, जिसने कलुषता को शान्त किया है, जिसने समताके द्वारा अद्वैत सुखको प्राप्त किया है और जो भावनायें भाता हुआ सयम गुण रूप बगीचे क्रीडा करता है इस प्रकार के मनवाले महामुनिराज ससार-समुद्रसे पार होग है उन्हें हम नमस्कार करते हैं, वि० अत्यन्त विशुद्ध पवित्र दशापे वर्तनेवाले धर्मगुरु निरा- जकी स्थितिका पृथकरण करनेसे निम्न लिसित मद्गुणांका उसमें आविर्भार होता हुआ स्पष्टतया देस पडता है?? पवित्र धर्मगुर सुनिराजका पाँचौ इन्द्रियोके तेईम विषयों में मन आसक्त नहीं होता, अर्थात् उनके शरीर पर कोई चन्द्र- नादिका विलेपन करे या उन्हें कोई लया पूरी मिलाने तथापि उस पर उन्हें राग नहीं होता। वे अनेक प्रकारके सुगन्धित पदाथों पर तथा सडी हुई सोरीकी दुर्गन्ध पर एक मपान मात्र रसते हैं । स्त्रीमौन्दर्यादि तथा अनेक प्रकारके मोहक पढाथा को देस उनका अन मोहित नहीं होता। हारपोनियम, प्याना सारगी, सतार, फोनोग्राफादि वाग तया अनेक प्रकारके मनो मोहक मगीत सुन कर उनका मन क्षोभित नहीं होना,
[४]
अर्थात् उसमे उन्हे राग उत्पन्न नहीं होता, इन सबमे वे
समान भाव रखते है।
क्रोध, मान, माया और लाभ जो प्राणियोंको समारमें
परिभ्रमण कराने के मुख्य कारण है कपायोके प्रबल कारणो-
का अभाव होनसे पूर्वोक्त प्रशान्त मुनिपहात्मा पर वे कुछ भी
अनपा असर नहीं कर सकते । सर्व टोपीको पैदा करनेवाले महान,
दूषण राग और द्वेष है, उन दोनो टोपोका स्वरूप वे भली
भाँति सपझते है अतएव अनेक प्रकारके ढोप उत्पन्न करने-
वाले राग द्वेषमे दूर रहनेके लिए वे सदैव प्रयत्नशील"
रहते है । अर्थात् इन दोनो दोपों पर वे सयन ररते है।
पहले और दृमरे गुणसे यह सिद्ध ही है कि किसी भी
अशुभ अध्यवसायको उत्पन करनेवाले कारणके अभावसे
उन्हे अशुभ कर्मका बन्ध नहीं होता, क्योंकि वे ममता
रसमे लीन होते हैं और वास्तनिक सुग्व-आध्यात्मिक मुसमे
मस्त रहते है । वस्तुतत्वका यथार्थ ज्ञान होनेके कारण
आत्मीयगुण ज्ञान, दर्शन, चारित्रके सिवा समारक अन्य
पदार्थों पर उन्हें मसत्व भाव ही नहीं होता।
पूर्वोक्त सुनिमहात्मा भयगद्वाग पिकासको प्राप्त हुए
आत्मीय सद्गुणरूप पुष्पोके वीच मे आनन्न करते है
और अनित्यादि बारह भावनाओ तथा सेत्री प्रमोद कारुण्य
और माध्यस्थ इन चार भावनाओ तथा पाच महानतोकी पाच
भावनाओ द्वारा अपने अन्त करणको मदव पवित्र-निर्मल
रखते है
यह उनका मात्र जादर्श होता है । इस प्रकारके मद्गुणों
द्वारा उन्म और पवित्र जीवन वितानेवाले महागा स्वयं
संसार सागरमे पार 'उतर जाते हैं और अपने आलम्बन
द्वाग दूसरोंको पार उतारते हैं। उन्हीका जीवन मसारमें मुगुधु प्राणियोंके लिये अनुकरणीय है, उन्हींका जीवन सफल है अत वन्य है महा कोपती उनके उस आदर्श जीवन को । जिनकी आत्मा आत्मीय गुणोका विकास नहीं हुआ, जिनके अन्त करणारे मुनिधर्म वासित नहीं हुआ है ये वेश- धारण करने मानसे मुनि नहीं बन सकते । गोदट सिंहको साल ओढनेसे सिंह नहीं बन सकता । अर्थात् बाहोश पारण करनेसे गोल नहीं मिलता। स्वाध्यायमाधिससि नो प्रमादेः, शुद्धा न गुप्तीः समितीश्च धत्ते। तपो द्विधा नासि देहमोहा- दल्पेपि हेतौ दधसे रुपायान् ।। परीपहानो सहसे न चोप सर्गान शीलाङ्गधरोपि चासि । तन्मोक्ष्यमाणोपि भवाधिपारं, मुने । कध यास्यसि वेभमात्रात् ॥ १ ॥ मुगमम् । मू० हे मुने । तू विकथादि प्रमादसे स्वाध्याय कर नेकी इच्छा नहीं करता, और न ही शुद्ध गुप्ति तथा समिति धारण करता । देहके मोहसे दोनों प्रकारका तप भी नहीं करता, जरासा कारण उपस्थित होने पर भी ऊपाय धारण करता है, परीपहोंको नहीं सहता, उपसगोंको नहीं सहन करता, गीलाग धारण नहीं करता तथापि तू मोक्ष [६] प्राप्तिकी इच्छा करता है। परन्तु हे मुने ? वेशमानसे ससार समुद्रसे किस तरह पार होगा? वि० प्रथप भावनामय स्वरूप कहे बाद अब व्यतिरेक- रूपसे मुनिका कर्तव्य कहते हैं। वांचन, पृच्छना-शका पड़ने पर ज्ञानवृद्धोसे पूछना, परा- वर्तन-सम्पादित नानकी पुनराधत्ति करना, अनुप्रेक्षा-अर्थ- विचार करना, तथा धर्मकथा करना, यह पाच प्रकारका म्वाध्याय मुनिराजको प्रतिदिन करना चाहिये । ईर्यासमिति सूर्योदय पीछे निर्जीव मार्गमे साढे तीन हाथ प्रमाण लम्बी सामने जमीन पर दृष्टिरस देस कर चलना । मापासमिति-किसीको हानिकारक न हो इस प्रकारका सत्य, हितकारी, प्रिय, प्रमाणोपेत और विचारपूर्वक वचन बोलना सत्य ब्रूयात् प्रिय ब्रूयात् न याद प्रिय वच । एपणासमिति-झारसे कयन किये हुवे चैतालीस दोप- रहित आहारपानी ग्रहण करना । आदान भण्टमत्त निक्षेपणासमिति-जब किसी वस्तुको लेने घा जमीन पर रखनेकी जरूरत पडे तब जीव रहित स्थान देख प्रमाजन कर उसे उपयोगसे ग्रहण करना या रसना । पारिष्टापनिकासामति-जीव रहित भूमीमे लघुनीति तथा गुरुनीतिका करना। मनोगुप्ति-अशुभ चिन्तनके लिये मन पर पूर्णतया अकुश रसना या सर्वथा अशुभ मनोव्यापार वन्द रसना । वचनगुप्ति-जिसमे दूसरेका हित न हो इस प्रकारके वचनका निरोध करना-वचन पर सयम रखना अथवा सर्वथा मानश्रत धारण करना ।
[७] देना तथा कायगुप्ति-यतना सहित शरीर व्यापार करना अथवा सर्वथा शारीरिक व्यापार-क्रिया चन्द रसना । साधुको दो प्रकारका तप करना चाहिये । (१)बाह्यतप-उप- वासादि करके खान पानका सर्वथा परित्याग करना, या कम साना, हमेशहके खाद्य पदार्थो से कुछ कम करना, रसवाले पदार्थ घी, दूध, दही, मिष्टान्नादिक पौष्टिक वस्तुयें विना का रण न साना । कमोंसे आत्माको मुक्त करनेके लिये याने कर्मक्षर करनेके वास्ते सहनशीलता पूर्वक शरीरको कष्ट शरीर, इन्द्रियो ओर मनको अप्रशस्त विषयोसे रोक कर सयममे रसना || (२) अभ्यन्तर तप-अज्ञानावस्थामे किये हुये पाप- अशुभ कृत्यका गुरके पास प्रायश्चित्त लेना, जिनेश्वर देव आदि पूजनीय दशकका यथाक्रमसे विधियुत विनय करना, पूज्य देव गुरु आदिकी शुद्धान्त करणसे योग्य सेवा भाक्ति करना । वाचनादिक पूर्वोक्त पाच प्रकारका स्वाध्याय करना, आत्मस्वरूपका दर्शन करनेके लिये एकान्तमें ध्यान करना और पाह्य तथा अभ्यन्तर उपाधियोका परित्याग करना। सोय, मान, माया, लोभ, यथानमसे प्रसग पड़ने पर उनके दलको कम करना, तथा प्रकारका कारण उपस्थित होने- पर भी उन्हे अपने हृदयसे अवकाश न देना, ग्व उनके साथ सम्बन्ध रखनेवाले हास्य, रति, अरति, भय, शोक, दुगच्छा, इन छ टोपीका भी परित्याग करना चाहिये । अर्थात इन सन पर उपयोग पदक सयम रसना चाहिये । भूख प्यास आटिका सहन करना वगैरह वाईस परिपह सहना एव मनुष्य तथा देवता कृत अनुकूल, प्रतिकूल उपसगाको
[८]
समता पूर्वक सहन करना चाहिये, उस प्रसग पर कपका स्वरू-
प ध्यान रख कर अपने ऊपर उपसर्ग करनेवालो-अपनेको
कष्ट पहुँचानेवाल, व्यक्ति पर सनो लेश पात्र भी कोव या
द्वेष अथवा लेग पैटा न होना चाहिये ।
शास्त्रकारोंने मुख्यतया चार भेद और प्रभेद माहित नोलह
प्रकारके उपसर्ग फरपाये हैं-
१ देवकृत उपसर्ग-१ हास्यमे, २ द्वेपसे, उविपर्शसे-विचार
(दृढताको परीक्षा करनेकी भावना) से४ पृथक् विपात्रासे-
चार्निक भिन्नताके कारण वर्षकी इस वैक्रिय (दिव्य )
शरीर धारण करके जो देवता द्धारा उपसग कियाजाता है मो,
२ मनुष्यकृत उपसर्ग-१ हास्यसे, • द्वेषसे, ३ विपर्शसे,
४ कुशीलतासे-त्राचारीसे जो पुत्र होता हे वट वडा वलबान
होता है. यह समझ कर धर्मभावना रहित पनु य ब्रह्मचर्यसे
चलायपान करने के लिये अनेक प्रकारके अनुकूल एव प्रतिकूल
उपसर्ग करता हे सो।
तिर्यंचकृत उपसर्ग-१ भयमे (मनु को देव उसके भयमे ।
सापना करे सो) द्वेगसे, ३ आहारके लिये भूख लगनेसे
इसे निवारण करनेके वास्ते व्यान गृवादि पशु पनी अपने
यचा रक्षणार्थ उपसर्ग करे मो,
४ आत्मकृत उपसर्ग-पूर्वकृत अशुभ कर्मजन्य १ वात,
२पित्त, ३ कफ, ४ और सनिपात रोग इन चार मुख्य
कारणो द्वारा जो उपसर्ग उपस्थित होता है सो।
साधु मुनिराजको अठारह हजार शीलाझा धारण करना
चाहिये । नीलाझाक्या चीज है और वह अठारह हजार किस
प्रकार हो सकता हेमो समझनेकी प्रथा आवश्यकता है। तीन
[९] - योग, तीन करण, चार मना, पाँच इन्द्रिय, दश पृथ्वीमाया- रम्मादिक, आर दश ही अपणवर्ष । इस प्रकार इन पैनीसमें अठारह हजार शीलाहग भेट होते है । गीलाग यह साधु मुनिराजके वर्मगुनके लिये यास आवश्यकीय वस्तु है । एक प्रकारासे गोलाग ये चारित्रके अवयव है । अठारह हजार भेट इस प्रकार साना चाहिये। तीन योग-गनोयोग, वचनयोग, शरीरयोग । तीन करण-स्वय करना, दूसरेसे कराना, कृतकपको अनुमो- दना करना । चार मना-आहार सजा, भयसक्षा, परिग्रह सना, गथुन सजा । पाँच इन्द्रिय-स्पर्शेन्द्रिय, रसनेन्द्रिय, बाणेन्द्रिय, चयुरिन्द्रिय आरकन्द्रिय(श्रोत्रेन्द्रिय) । दश पृथ्वी काबारम्भादिक-मृतीहाय आरम्भ, अपकाय आरम्भ, तेउकाय आरम्भ, बाउकाय आरम्भ, वनस्पतिकाय आरम्भ द्वीन्द्रिय पारम्भ, नीन्द्रिय आरम्भ, चतुरिन्द्रिय आरम्भ, पत्र- न्द्रिय आरम्भ आर अजीव आरम्भ । दा प्रकारका मुनिधर्म- अमा, मार्दव आर्जर, निलभिता, तप, सयप, सत्य, शौच, अकिञ्चनता आर चमचर्य । इन सरमसे पक एक पर लेकर जुदै जुरे भेद करने चाहिये । दृष्टान्तके तौर पर प्रथा भेट नीचे लिये मुजन किया जा सकता ह-पन द्वारा आहार सज्ञा गहित होकर श्रोनेन्द्रियका सवर कर दापायुक्त रह कर पृथ्वी कारका आरम्म न करे, यह वाक्य काया रख क्षपा- युक्त के पालो मार्दव युक्त वगरह यथाक्रपमे दश प्रका- रके मुनिपर्पको रसता जाय तर उसके दश भेट होते हैं, परन्तु यह ज्यान रमना कि वे सन पृथ्वीकाय सम्बन्धी ही होते हैं। इसी तरह उपर पतलाये हुये अपकायादि दया भेदोंके [१०] साथ जब एक एक के दश दश भेट पूर्वोक रीतिसे किये जाये तब १०० भेद होते हैं । ये सब श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा समझना चाहिये। इसी प्रकार शेष रही हुई चार इन्द्रियो द्वारा मौ सो भेद होने पर पाँचो इन्द्रिय द्वारा सब पाच सौ भेद होते हैं । उन्हें प्रत्येकको आहार, भय, परिग्रह और मैथुन सज्ञाके साथ मिलानसे दो हजार भेद होते हैं । मन, वचन, काय के साथ लगानेसे म्ह हजार होते हैं और करना, कराना तथा अनुमोदन करना, इन तीनोके मिलानेसे छह विआ अठारह हजार भेद पूर्ण होते हैं। इन अठारह हजार भेदोके स्पष्टी करणके लिये श्री प्रवचन सारोद्वार, अथके ३३९ पृष्टपे ( प्रकरण रत्नाकर तीसरा भाग) एक कोष्टक दिया हुआ है उसमे यह सूबी है कि उसे न्जर सामने रसनेसे अठारह हजार गाथाये मुगमतासे बन सकती हैं। विशेष जिज्ञासुओको वह अवश्य देख लेना चाहिये, क्योकि उपयोगी हानेके उपरान्त वह कर्ताकी सहान् विद्व- त्ताका भी परिचय कराता है। मुमुक्षु मुनिराजको उपरोक्त आचरण करना चाहिये । परन्तु हे मुनिराज । तृ न तो स्वाध्याय करता है और न ही समिति गुप्ति पालता, तथा नहीत् यथाशक्ति तप करता,प्रत्युत जरासा कारण उपस्थित होने पर मारे क्रोध के आपसे बाहर हो जाता है। परिपह उपसर्ग सहन करनेसे तृ कोसो दूर भागता है। पूर्वोक्त अठारह हजार शीलागसे तु सर्वथा विप. रीत आचरण करता है। तू यह भली प्रकार जानता है कि पूर्वोक्त ज्ञान ध्यानाटि सयमके गुणोंमे लीन रहनेसे ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है, तथापि तू उन गुणोसे विपरीत आचरण कर मोक्षकी इच्ज करता है। महात्मन् । मोक्ष नगर बड़ी दूर . है, वहाँ पहुँचनके लिये तुझे सयाके गुणरूप नावके द्वारा इस ससार समुद्रसे पार होना चाहिये । तुझे याद रखना चाहिये कि वेश मात्रसे मोम नहीं मिलता, किन्तु सोक्ष प्राप्तिके लिये तदनुसार आचार विचार होना चाहिये । शास्त्रोक्त अथवा देशकालके अनुसार सयमके गुण न सपादन करने पर भी सयमी कहलाना वेश्यागे सतीत्वका आरोप करना है । शासकार कहते है कि तदनुसार गुण रहित रजौहरण और मुहॅपत्ति अर्थात् गुणरहित मुनिवेश तो इस जीवात्माने गेरु पर्वतके समान धारण किया है तथापि अभी तक जन्म जरा मरणसे मुक्त না । वेशमात्रसे कुछ सिद्धि नहीं होती। आजीविकाथमिह ययतिवेपमेप, धसे चरित्रममलं न तु कष्टभीरु । नत्सि किं न न विभेति जगज्जिघृक्षु- मृत्यु कुतोपि नरकश्च न वेपमात्रात् ॥४॥ मृ० तू मात्र आजीविकाके लिये इस ससारमें यतिवेष धारण करता है परन्तु क्टसे डरपोक हो शुद्ध चारित्र नहीं पालता, पर तुझे मालम नहीं कि तमाम दुनियाको ग्रहण करनेकी इच्छा रखनेवाली मृत्यु और नरक कहीं किसी भी प्राणीके वेशसे नहीं डरते ॥ वि कितनेएक अनानी प्राणी ससारसे अनेक दुसांम पीटित हो दुस गर्भित वैराग्यका स्वांग धारण कर दीक्षा htt । [१२] ग्रहण करते हैं । दीक्षा लिये बाद भी जिन वस्तुओके अभा- वसे ससारा दु सित थे उन्ही वस्तुओंका ग्यान करते हैं, उन्हीका म्वप्न देखते है । भिक्षाका समय होने पर सानके लालचू होनेके कारण भक्त मानकोके घरोंसे अच्छी अच्छी साद्य वस्तुये प्राप्त करनेका प्रयत्न करते हैं। किन्तु चारि- ऋकी क्रिया तरफ लक्ष्य ही नहीं देते, याने प्रथम कयन किये मुजय माधुधर्म-साधुके आचारसे जरा भी पवृत्ति नहीं करते, प्रत्युत एफ यर छोड कर वे एक प्रकारका नूतन मसार आर- भते है । कितनेक श्रीपूजनाम धारण करनेवाले तथा जो पूर्वकालमे शुद्ध साधुपनसे पतित हो गोरजीके नापसे प्रमि- द्विने आ गये है,जोकि आज भी दीक्षा लेते समय क्षणभर के लिये शुद्ध माधुके ही पच पहाव्रतधारण करनेकी प्रतिज्ञा करते हैं और बाद ताजिन्दगी तक उनकी और लक्ष्य ही नहीं देते, वे काचन कामिनीतकसे भी अपनी आपको पलीन करते हैं। अर्थात् चारित्रके प्राणभूत ब्रह्मचर्य व्रतको भीभग करते हैं। इस प्रकारके नाम मात्र महावतधारीको इस अधिकारसे उपस्थित होनेका भी अधिकार नहीं है । इस प्रकारके पत्तिन परंगुरू अपने अनुयायी भक्तजनोंको ससार सागरपे डयोनेके लिये पापागकी नावके समान हैं । कितनेएक शिथिलाचारी-आ- चारहीन, एकले विचरनेवाले तथा समुदाय में रह कर भी आ- याकर्मी आहार लेनेवाले याने सूचना कर अपने भक्तों द्वारा अपने लिये ही कोई साद्य पदार्थ बनना कर गानेवाले या भक्तिरागसे मुनिके निमित्त बनाये हुये गाद्य पदार्थको जानबूय- कर ग्रहण करनेनाले-इतना होने पर भी अपने आपको शुद्ध साधु समझनेवाले और परीपइ उपप्तर्गसे दरनेवाले मुनिवेश
धारीको शालमे कष्टमीर कहा है, और उन्ही कष्टमी देशके
पडदे में पिंड पोपण करनेवाले धर्मगुरु नामधारिओंको उद्देश फर
शासकार कहते हैं कि समस्त समारकामास करनेकी इच्छावाली
मृत्यु जिसके पने दाँतामे बडे बडे महारथी भी न वचमके
तथा उससे आगे भरकर अन्धकारसे परिपूर्ण दु सका स्थान,
कल्पना मात्रसे ही कलेजेको कॅपानेवाली नरस विद्यावान है।
ये दोनो ही बेशकी कुछ दरकार नहीं करते । मनुष्य अनेक
प्रकारको वारपद्धतासे तथा बाह्य नाटिसे पूजनीय त्यागी
वैशमे दुनियाको ठग सकता है, किन्तु उन दानोके सामने
धूर्त गिरोमाणि भी गुलाल और रक बनजाते हैं । तथापि पू-
वोल शुद्ध आचरण करनेवाले महात्मा गहापुरुप अपनी
शुद्धाचरणासे उन्हें भी जीत लेते हैं । शालोत्त शुद्धाचार पा-
लन करनेवाले महात्माओको उन भयकर जगतके शत्रुओका
दर्शन ही नहीं करना पडता । अर्थात् वे शुद्ध मयनी जन्म
जग मृत्युमे रहित हो परपपट निर्वाणको प्राप्त कर लेने हैं
अत आसन्वरूपको प्रगटानेनाले शुद्ध चारित्रको धारण कर
तदनुसार प्रवृत्ति करते रहना चाहिये । साधुन्ध धारण कर
उसकी जवानदारीकी ओर मय ध्यान रखना चाहिये । यदि
साधुपनकी जवानदारीको भूल कर अपने कर्तव्यसे परामुख
हुआ तो महात्मन ! माझ लेना कि पोक्त दोनों राक्षम
तेरा पीछा न छोडेंगे।
केवल वेश धारण करनेवाला प्रत्युत दोषका भागी है।
वेपेण माद्यसि यतेश्चरणं पिनात्मन् ,
पूजा च वाञ्छसि जनाहहुधे । पधि च ।
।१४ - मुग्धमतारण भवे नरकेशस गन्ता, न्याय विभपि तदजागलकर्तरीयम् ॥५॥ मू० हे आत्मन् । तू चारित्र विना मुनिके वेश मात्रसे ही मगरूर-अहकार धारण करता है और लोगोंसे अपनी पूजा की इच्छा रखता है तथा उनसे अनेक प्रकारके वस्त्रपात्रादि उपधि-उपकरण प्राप्त करनेकी इच्छा रखता है । इससे विश्वास रखनेवाले भोलेभाले मनुष्योंको ठगनेसे प्राप्त की हुई नरकमें तू अवश्य जानेवाला है, सचमुच ही तू अजागल कर्तरी न्याय धारण करता है। वि०उपपि- यह एक साधुके वोपकरगरूप वस्त्रपात्रादि सपूह वाचक शब्द है । मुनिवेश देस कर मुनिभक्तलोग वस्त्र पात्र पुस्तक वगेरह सब कुछ देते हैं, भक्तिभावसे नम्र हो वन्दन करते है और अपने आपको इससे वे कृतकृत्य सम- झते हैं। तू यह सब कुछ इच्छता है। परन्तु तुझे स्मरण रसना चाहिये कि मुनि पदके गुण सपादन किये विना, "अर्थात् जिस पद पर तू विराजपान है उसके योग्य गुण तेरे अन्दर न होने पर लोग तुझे वन्दन नास्कार करें इस प्रका- रकी इच्छा रसना और अनेक प्रकारकी उपाधि प्राप्त करनेकी बाच्छा करना यह सर्वथा अनुचित है । वन्दन नपस्कार किसको वटता ह ? उपधिकी किस लिये आवश्यकता है ? उसका हेतु क्या है ? वह कोई सोज शोक उडानका साधन नहीं है। तुझे इन सब बातों पर पूर्ण सयाल करना चाहिये । वन्दन नमस्कार मुनिगुण सपन्न सहात्माको ही चटता है । उपधि यह-सयप गुणको वृद्धिमें बाधा न पहुचे इस लिये
[१५]
पूर्व पुरुषों द्वारा योजित किया हुआ एक चारेका साधन
है। मया गुगोंकी वृद्धि के लिये ही उसे मेवन किया जाता
है। मात्र पाखाचार पर ही-साधन मात्र पर ही वृत्ति रखना
और सयमके गुण प्राप्त करने के लिये किंचित् कष्ट माध्य
अपना वर्तन-आचार जरा भी उचा न रखना यह अपने
हाथसे अपना हनन करने के समान हे ।
जिस तरह एक कसाईने एक बकरीको जिनह करनेके
लिये तेयार की आर वह क्रिया करनके लिये छुरी लेनेको
गया । परन्तु छुरी न मिलनेसे वह दूइने लगा, दवयोग हुरी
यकररीके पास ही पड़ी थी, बकरीने छुरीको देखा और अपनी
जान बचाने हेतुसे या जातिस्वभावसे उसने उस छुरी को-
ढक देनके लिये उस पर धूल डाल दी और उसे छिपानेका
बुद्विमे उस पर गरदन रख लेट गई। ऐसा करनेसे उसी कुरी
द्वारा उसका अन्त होगया । इमीको अजागलकचरी न्याय
कहते हैं। इस तरह अपने ही हाथोंसे अपना विनाम करना
सरया अयोग्य और अनुचित वर्तन है। सिर्फ वेश पात्र
साधुका और वर्नन उससे विपरीत रपना इसमे अपने
हाथोंसे दुर्गति दुस प्राप्त करने जैसा है। विशुद्ध सयपी भी
वन्दन नपस्कार अथवा उपधि वगेरहको वान्छा तो नही करे
परन्तु कदाचित् कार्य पड़ने पर इन्छे तो वह नीतिको अपेक्षा
अनुचित न गिना जाय । क्योकि उसे वैमा करनेका अधिकार
है। परन्तु हे नारधारी मुने । तेरे लिये तो कोई मार्ग ही
नहीं कि जिमसे तेरा वचाय होसके ।।
[१६] - बाघवेश धारण करनेका फल । जानेऽस्ति संयम तपोभिरमाभिरात्म- नस्य प्रतिग्रहभरस्य न निक्रयोऽपि । किं दुर्गतौ निपततः शरणं तवास्ते, सौख्यञ्च दास्यसि परत्र किमित्यवहि ॥६॥ मू० हे आत्मन् । मेरी समझ मुजब इस प्रकारके सयम तपसे तो " गृहस्थोंके पाससे ली हुई वचपात्र भोजनादि वस्तुओं का भाडा-कीमत भी पूरी नहीं होती, तो फिर दुर्गति में पड़ते हुये को तुझे शरण क्या होगा ? और परलोवमें मुख कौन देगा तू इसका विचार कर । वि० t० उपर कहे मुजब वाहाचार मात्र मुनिवेप रसनेते और तप जप दानादि मयपके योग्य आचरण न करनेसे अथवा जो कुछ भी थोडाबहुत किया जाता है वह सिर्फ बाह्या- डन्दरके ही लिये-निज मान राहत्ता बढानेके ही लिये करनेसे तथा ऊपरी मुनिवेश या कृत्रिम आचारसे तो गृहस्थोके पासमे प्रहण की हुई वरूपात्र उपधि व भोजनादि वस्तुओंका भी तू बदला नहीं उतार सकता । अतग्व मुने तुझे अपने सिर- पर चढे हुए ऋणसे उऋण होनेके लिये भी अपना उच्च वर्तन रम्बनेकी आवश्यकता है। जो मनुष्य वर्मोपदेशक बननका दावा करता हो उसके जीवनमे दो प्रकारकी झलक कदापि नहीं हो सकती । उसका जीवन ही उपदेगपूर्ण होना चाहिये । उसकी जीवन चर्याकी दूमरो पर अवश्य पवित्र अमर होनी चाहिये । अन्तरमे कुछ और तथा वाहिरका वर्ताव कुछ औ- ।
[१७] रही हो और उससे दुनियाकी आसोंग धूल डाल कर की आडसे अपनी स्वार्थवृत्तियोंका पोपण करना, इस भावनाको क्षणभर के लिये भी मुमुक्षुके हृदयसें स्थान नहीं मिलता। उ- सके लिये जनता क्या अभिप्राय धारण करती है इस बातका उसे सयाल तक नहीं होता। उसे तो सिर्फ अपने उच्च कर्तव्य का ही सयाल रहता है और उस अपने उच्च कर्तव्यको वह पान तव्यके भारसे दव फर ही नहीं किन्तु अभिरुचि-प्रेसे पालन करता है । इस लिये इस भव तथा परभपके सुखार्थीको वेश और आचरणकी एकता करनेकी आवश्यकता है। इन पाच शोको बाहात्म्नर मुनिवेश धारण करनेवाले और तदनुसार आचरण न करनेवाल्के लिये बहुत कुछ कहा गया है। श्रीपूज यति और संवेगी पक्षों कितनेएक देश सानसे जो अपनी आजीपिका चला रहे हैं उन्हें इस प्रस्तुत विषयसे बहुत कुछ सीखना चाहिये । उनके सावदा कार्यों में सलाहकार बन कर, जतर सन्तर द्वारा गृहस्थोंको अपने दृष्टिरागी बना कर गुग्ध प्राणियोको धर्म के नासे ठगनेवाले, गुरका पद धारण कर सिरों तेल पुलेल लगा कर भाडोके समान पालो की राग भरके शारीरिक सुभपाके लिये अथवा अपनीपानसिक वासनाओंको सतोपित करनेके लिये अनेक प्रकारके रग विरगे गिरगटके समान रूप धारण कर लोगो गुरु पदकी एच ध की निन्दा कराने वाले सन्द गति पापर प्राणी ससार समुद्रो आपतो पउवे ही हैं किन्तु वे अपने गलेो अपने आश्रितजनाको भी डुबानयाले पापल्प पत्थरके समान बाघते हैं । इससे उन्हें उची गरदन करने तकका भी अवसर न आयगा । वधुतसी दफा तो संवेगी पक्ष जैसे शुद्ध प्रवाहले भी कितनेएक अनुचित दि-
[१८]
साव देस पडते हैं, सुने जाते हैं। खास कर साध्वियोंके समु-
दायमें भी कितनीएक साध्वियोंकी स्थिति पर विशपत ध्यान
देनेकी आवश्यकता देस पडती है। सिर्फ वेप धारण कर-
नेसे आत्माको कुछ भी लाभ नहीं बल्कि वे धारण कर
तदनुसार आचरण न करनेसे और अपने आपको उस पदका
अधिकारी मान कर लोगोको अनेक प्रकारसे ठगनेसे आत्मा
चडी गलीन होती है ओर वैसी अशुद्धाचरणा देस अन्य
मनुष्योको भी उसके निमित्त बड़ी भारी हानि होता है।
जिस किमीको वर्ग पर कुछ श्रद्धा हो या धरगुरु पर श्रद्धा
हो वह सथा निल हो जाती है । यद्यपि किसी साय वेश
अधोमानी जाते हुयेको रोकता है, अर्थात् मनकी दीवार
फिसल पड़ने पर भी पेशकी लन्जा शारीरिक
नीनको नहीं उखड़ने देती, तथापि जिस वेशको लोग पाय
समझते हो, जिस वेशको धारग करने वाले लोग उच्च
उच आचार की आशा रसते हों, जिस वेश वा चेवा-
रीसे वे अपनी आरपाको कल्याणका भागी बनाना चाहते
हों और जिमे ससार तारक गुरुकी मुद्रा साझते हों यदि
उसीपे सया गुणोका अभाव और ससार वर्धक दुर्गुणोंका
सद्भाव देस पडता होतो कितने सेदकी बात है यह विचार
करनेमे पालूप हो सकता है।
वर्तन रहित लोकरजन बोधिवृक्षको कुठार रूप है।
किं लोकसत्कृतिनपस्करणार्चनाये,
रे मुग्म तुष्यास विनापि विशुद्धयोगान् ।
कृन्तन् भवान्युपतने तब यत्ममादो,
बोधिद्रुमाश्रय मिमानि करोति परशुन् ॥ ७ ॥
[१९]
.
म० तेरे त्रिकरण योग विशुद्ध न होने पर भी लोग तेरा
भादर करें तुझें नमस्कार करें अथवा तेरी पूजा सेवा करें उस
वत हे मूढ तू किस लिये सतोषित होता है? । ससार समु-
में पड़ते हुएको तुझे मात्र बोधिवृक्षका ही आधार है, उस
वृक्षको काटनेमें नमस्कारादिजन्य सतोपादि प्रमाद "लोक
सत्कारादिको " कुठार बनाता है ।।
वि० मानसिक अस्थिरता पर सयप्त प्राप्त किये विना,
वाचिक सयप सपादन किये विना और कायिक योगी पर
पूर्णतया अपना अधिकार जपाये विना लोगोंके किये हुए
चन्दन पूजन आदि सत्कारसे तू आनन्द मनाता है यह कितनी
वंचता और दम्भता है । इम ऋणका बदला तुझे किस
प्रकार देना पडेगा इस वातका तू जरा भी सयाल नहीं
करता ' सुने । जरा विचार कर इस अनधिकारी वन्दन
पूजनादि सरकारको प्रहण करने या इच्छेनेका तुझे क्या हक
है ' तुझे याद रखना चाहिये कि जो मनुष्य इस प्रकारकी
कुटिल वृत्तियों द्वारा इस अपार ससार सागरमे डूबवा है
उसका अन्त आना-भवसागरसे पुन बाहर निकलना बडा'
मुश्किल है । यदि मसार समुद्रों निपतित प्राणीको कटाचित्
भाग्यवशात् सोधिवृक्षका आलम्बन मिल जाय तो ही वह
उसके द्वारा ससार समुद्रका तट प्राप्त कर सकता है। परन्तु
तुझे वो इस तरफका कुछ सयाल ही नहीं है । तू रात दिन
प्रमाद ही अपय साय निता रहा है, इस शिथिलताक
. कारण लोगोंका किया हुआ चन्दन पूजनादि सत्कार वेरे
सबोधि वृक्ष-सम्यक्त्व तहको निरील करनेने कुहाडेका काप
करता है । इसे बोधिसका नाश होने पर-पुन इमकी
[२०] आप्ति न होने पर ससार सागरसे पार होना असम्भव है ।' अनन्त काल पर्यन्त तुझे इस दुस्तर अपार संसार समुद्र की जन्म, जरा, मृत्यु, आधि, उपाधि, व्याधिरूप तरगोंके अकोरे साने पड़ेंगे और उससे बचनातीत दुस सहना पड़ेगा। इस शुद्ध वेशके कारण तुझ पर कितनी जिम्मेदारियाँ बढती हैं इस बातका ख्याल कर । इस तेरे विशुद्ध देशसे तेरी प्रतिक्षानुसार लोग तुझमे क्तिने उच्च आचार- वर्तनकी आशा रसते है जरा इस दातका विचार कर । मुने' जरा अपने अभ्यन्तर विवेक चक्षु द्वारा देस, इस प्रकारका संयोग, इस प्रकारकी आत्मोद्धारक सागपी तुझे वारवार न सिलेगी । याद रस तुझे धूल धोते हुये यह सयम मार्ग एक अमूल्य रत्न मिल गया है। इसका सदुपयोग कर तृ अनन्त सुख प्राप्तिकी कीमत उपार्जन कर सकता है। अतएन तुझे अपने पदके तथा इस पदको अगीकार करते सार अपनी की हुई प्रतिक्षाके अनुसार इस सर्व सामग्रीका सदुपयोग उधाचरण करना चाहिये। इस श्लोक्के भावार्थसे मुनिका अधिकार होने पर भीशावक वर्गको भी बहुत कुछ बोध लेनका है, पीला तिलक मस्तक पर लगा कर श्रावकपनका डोल रख तथाप्रकारके गुण न होने पर वसाचौकडी पचा कर नौकारसी-साधर्गी वात्सल्य वगैरह विना अधिकार मालगसाले उदाना, अनेक प्रकारकी प्रमावनायें हक दगैर अनीतिसे एक दफाके बदले अनेक टफा लेनेकी तुच्छता धारण कर अपने आपको उसका हक- दार सानना यह सब कुछ सर्वथा अनुचित है। इस लिये आवक नागधारीको भी अपने आत्सहितके लिये इस अधि- कारसे यथोचित बोध ग्रहण करना चाहिये।
[२१]
लोक सत्कारका हेतु, गुणरहित गति,
गुणांस्तवाश्रित्य नमन्त्यमी जना,
ददत्युपध्यालय भक्ष्याशिष्यकान् ।
"विना गुणान् बेपमृषे विपि चेत्
ततष्ठगानां तव भाविनी गतिः ।।८।।
मू०
लोक तेरे गुणोंका आश्रय ले तुझे नमते है, उपधि,
उपाश्रय, आहार ओर शिप्य वगैरह तुझे देते हैं। अब यदि
तू विनागुण ऋषि-मुनीका वेश धारण करता होगा तो ठगोंके
समान ही तेरी गति होगी।
वि० मुने तेरे भत सेवक तुमे अच्छेसे अच्छे वस्त्र
प्रदान करते है । गरमीकी ऋतु शरबनी वारीकों बारीक
मलपलके थान देते हैं, जाडेकी ऋतु निलायतों भी नहीं
बन सकते इस प्रकारके बढिया कामीरी गरल दुष्य जो
कीत भारी और वजन हलके तुझे भक्ति पुरस्सर देते हैं।
अपने घर जन कमी ये श्रेष्ठ सास पढार्य यनावें तो
नुझे प्रथम आपत्रण देते हैं, तुझे देकर ही वे मुमुक्षु बुद्धिनाले
गृहस्थ अपने उस भोजनको पवित्र और सफल समझते हैं।
आप भले ह्ढे फूटे मकानोरे या सपरेलो छप्परों में रहते हों
किन्तु तेरे रहने के लिये वे चहा करके भी राजमहल के समान
सुन्दर उपाय बनाते हैं और अलो अपने प्रागामे प्यारी
अपनी सन्तानको शिव्य बनाने के लिये तुझे समपंग करते ही
तुझे विचार करना चाहिये कि तेरे साथ उनका क्या सम्बन्ध
है कि जिसके कारण पसीना ओर सून एक होकर पेदा होने-
- [२२] वाली अपनी सपत्तिका भोग वे तुझे प्रेमपूर्वक दे रहे हैं ? तेरे अन्दर माधुत्व है, तुझमें साधुके सत्ताईस गुण हैं, दश प्रकारका साधु धर्म तेरे अन्दर है यह समझ कर ही वे तुझे सर्व प्रकारसे सतोपित रसते हैं । ससारकी वासनाओं तथा आधि व्याधि उपाधिसे सतप्त उनके हृदयको शान्त कर- नेमें तू गुणाढ्य होनेके कारण सहायक होगा इसी हेतुसे वे तेरा पोपण करते हैं । तूने सर्व साहा पदार्थोंपर सगा प्राप्त किया है, लड्डू और पेटे सत्तु और बाजरेके सुये टुकडोंमें रतिअरति-रुचि अरुचि धारण न करके गात्र वर्षके साधन- भूत शरीरको टिका रसनेके हेतुसे ही तू पेट पोपण करता है, और जिस तरह तूने इस रसना इंद्रियकी गृद्धिको जीता है उसी तरह अपने भक्तो-सेवकोंको भी तू उम सयम मार्गमें लावेगा यह समझ कर ही वे तुझे अनेक प्रकारके श्रेष्ठ खाय पदार्थ जुटाते है । तुझे वसति या जगलमे रहना समान है, महल और झोपडीपे तेरी समान वृद्वि है और इसी प्रकार तु अपने भक्तोको भी इन विनश्वर ससारी स्थावर मिलकतके मोहसे पराइमुरस कर उन्हें आल्मस्वरूपकी ओर झुकावेगा यह समझ कर वे तुझे रहने के लिये गगनचुम्बी राजमहलोके समान भव्य उपाश्रय देते हैं । तूने शीत ओर उष्ण कालीन पारसहाको जीता है, वस मात्र पर तुझे किसी प्रकारका मोह मसत्व नहीं है, मान शरीरको ढकनेके लिये ही तू वख धारण करता है और इसी प्रकार अपने भत्तोंका भी वासस्व- न्धि मोह तू का करावेगा यह समझ कर ही वे तुझे अनेक प्रकारके कीमती वस देते हैं । यदि यह पूर्वोक्त भावना और गुण तेरे जीवन नहीं हैं तो तुझे दम्भी, वचक ओर स्वार्थ-- , पोपीकी उपणा दी जासकती है। ऐमा होने पर वेरे जीवनका फल भी तुझे यही मिल मकता है जो दम्भी और परवचन- को मिलता है। पूर्वोक्त दो शोकॉो अपनी आगध्वनिके विरुद्ध लोक. रंजनसे हट कर शुद्ध मुनिएनके गुण ग्रहण करनेका हितो- पदेश दिया गया है। दम्भ द्वारा वाह्याटम्बरसे सरल हृदय- वाले भोले भाले लोगो प्रतिष्ठा जमा कर, तथाप्रकारके गुणोंकी गन्ध तक भी अपने अन्दर न होने पर सवनायक आचार्य-उपाध्याय, पन्यास, गणी अथवा और भी अनेक प्रकारकी सनसनी लम्बी लम्बी छे लगा अपने आपको युगप्रधानके समान मान कर सरल मुमुक्षुओंकी आखोंने धूल डालकर अपनी स्वार्थसिद्वि सिद्ध करनेवाले वेगधारी महात्माओंको सास विचार करना चाहिये कि यह दम्म यह वचकता यह स्वार्थ पोपणता कितने दिन और किसके लिये परते हैं। ऐसा करनेवाले वास्तवरो वे अपनी आत्माको ही ठगते हैं। ये जिस आलोद्वारके आदर्शको प्राप्त करनेके लिये घरवार जोद कर त्याग सागो चले हैं अपनी दम्भमरी आच- रणाओंके कारण उस आदर्शको मलीन कर रहे हैं इतना ही नहीं बल्कि उससे कोसो दूर भाग रहे हैं। उनके ये पाय स्वार्थति रूप मोठे दुर्गुण उनके सनोधि वृक्षको जड पूलसे काट रहे है। ये मीठे दुर्गुण मनुष्यका वास्तविक कर्तव्य क्या है उसे यह मालूम ही नहीं होने देते। इस लिये प्रथा अपने भीतर रही हुई नाच वृत्तियों पर अधिकार जपाना चाहिये । साधु मुनिराजका कर्तव्य केवल लोगोंको सुश करनेका ही नहीं किन्तु आप विशुद्ध मार्गप, चलते हुये दुनियाको उसमें than
ARTMENसान आज अ
| मी महापारमक =
मोसार करे तो गलाव
[२४]
THE या धागुरु पदका द
दिन बन्नुभाका चार्षिध तर
*कियाओंकी आडने
नन्य पालन करने की
र उनसे तथा सि
FT या गुरु नारया
लादीमिक्षा देंगे। उनके
जिन्तु मला साधुनार धारय
सोसल विचारको अप
दानहीं करने देता फिर
मोहरे ही कैसे ? 'जित
ATE ETER नही होगा। वन
मेरा राज है। यामी जि
तथा गुरुनीजीक
-
1'
है
पया सिद्धि
गुनिराज
7
।२५ कर्म बन्ध पर अवलम्बित है वहाँ पर बाह्यद्दष्टिकी कीरत सान विना अदके शून्य (निंदी) सपान है। श्री पल्लिनाथ स्वागीके स्तवनले श्री यशोविजय उपाध्यायजी लोक रजन और लोको- तर रजनकी तुलना करते हुये लोकोत्तर रजन को प्रधान पद देते हैं। इस लिये अनन्त कालचालक ससार समुद्र परिम मग करनेवाले गहाल इस शुद्धमाधु गर्गरूप जहाज पर चढे हुयेको तुझे इस लोकप्रशसा रूप प्रचण्ड पपनसे अपनी आसाका रक्षण करनेको परपानश्यकता है। यदि इस प्रचण्ड परनसे तू पुन ससार समुद्रने पड गया तो फिर पता लगना मुस्किल है अत तुझे संभल कर अपना मार्ग तय करना चाहिये ।। साधुपनका सुख और कर्तव्य । नाजीविका प्रणयिनी तनयादि चिन्ता, नो राजनीश्च भगवत्समयं च वेत्सि। शुद्ध तथापि चरणे यतसे न भिक्षो, तचे परिग्रहमरो नरकार्थमेव ॥ ९॥ मृ० तुझे आजीविषा, स्त्री, पुत्रादिकी चिन्ता नहीं, रा- ज्यकी ओरसे भीति नहीं और भगवानके सिद्धान्तोंको तू जानता है, अथवा सिद्धानके पुस्तक तेरे पास है, तथापि हे मुने । यदि तू शुद्ध चारित्र पालने के लिये प्रयत्न न फोगा तो फिर तेरे पासकी वस्तुओंका भार नरकके लिये ही है। पि० मुने तुझे विचार करना चाहिये कि इस स्पर्षावाले विपप ससारसे आज महाकष्ट सह कर आजीविकाके लिये पैसा पैदा किया जाता है, परन्तु तुझे तो ससारसे किनारा [२४] लानेका है। धर्मोपदेश या धर्मगुरु पदका दाना करके एकान्व कुर्का फरें, जिन वस्तुओंका चनुपि तय मास परित्याग किया हो उन्हीको क्रियाओफी आइ सेवन करे और सपके सामने जो कर्तव्य पालन करनेकी प्रतिज्ञा ली हो उस तरफ लक्ष्य न ररा कर उससे सर्वथा विपरीत ही आचरण करें वेले धर्योपदेशक या गुरु नानपारियोको तो अन्त उनके वे गुनकुळ ही शिक्षा देंगे । उनके लिये अधोगतिका मार्ग खुला है । किन्तु समा साधुनात वारण करनेवाला आ- लार्थी मुनिराज तो सरान विचारको अपने पवित्र हत्या- न्दिर भी प्रमेश तक नहीं करने देता फिर शारीरिक खरान आचरण तो उससे रोने ही कैमे' जिनका पिचार शुद्ध है उसका आचार अवश्य शुद्ध ही होगा। बस उसीका नाम साधु है, वही सपा मुनिराज है। याकी जिस प्रकार यतिका जति और गुरुजीका गोरजी तथा गुरुनीजीका गेणी बन गया है उसी प्रकार शब्दापभ्रसके समान आज आचाररो मी अप- भ्रस देस पडता है। यदि नहातीरभक्त कोई देव मता. जमें शुद्ध पानका सचार करे तो गलाचारकी कदर हो सकती है। लोकरजनसे उमय लोको क्या सिद्धि ? कुछ समयके लिये लोग बोलते हैं कि अमुक मुनिराज बड़े अच्छे हैं । परन्तु उनके उस सर्टिफिकटसे मुनिराजको क्या प्राति क्या उनके कइ देनेसे वह सचमुच ही अच्छा बन गया ? क्या उनके उस प्रमाणपनसे मुनिराजकी आत्लशुद्धि होगई? नहीं कदापि नहीं । जहाँ पर सुख दुस, आत्मविकास और आत्म- मलीनताका आधार अपने अन्त करणकी भावनाजन्य -
[२५]
बन्ध पर अपलम्बित है वहाँ पर वाह्यदृष्टिको कोपत सान
रा अके शून्य (बिंदी) सपान है। श्री पल्लिनाथ स्वागीके
नरें श्री यशोविजय उपाध्यायजी लोक रजन और लोको-
रजनकी तुलना करते हुये लोकोत्तर रंजन को प्रधान पर
हैं। इसलिये अनन्त कालचमारक ससार समुद्र परिम
करनेवाले महाजन् । इस शुद्धसाधुमार्गरूप जहाज पर चढे
को नुसे इस लोकप्रशंसा रूप प्रचण्ड पपनसे अपनी आलाका
ण करनेकी परपावश्यकता है। यदि इस प्रचण्ड पवनसे
पुन ससार समुद्रो पड गया तो फिर पता लगना मुस्किल
अत तुझे संभल कर अपना गार्ग तय करना चाहिये ।।
साधुपनका सुख और कर्तव्य ।
नाजीविका प्रणयिनी तनयादि चिन्ता,
नो राजभीश्च भगवत्समय च वेत्ति ।
शुद्ध तथापि चरणे यतसे न भिक्षो,
तत्ते परिग्रहमरो नरकार्यमेव ।। ९ ।।
मू० तुझे आजीविका, स्त्री, पुत्रादिकी चिन्ता नहीं, रा-
की ओरसे भीति नहीं और भगवानके सिद्धान्तोंको तू
निता है, अथवा सिद्धानके पुस्तक तेरे पास है, तथापि हे
है | यदि तू शुद्ध चरित्र पालने के लिये प्रयत्न न करेगा
फिर तेरे पासकी वस्तुओंका भार नरकके लिये ही है।
वि० मुने तुझे विचार करना चाहिये कि इस स्पर्धावाले
पप ससारमें आज महाकष्ट सह कर आजीविकाके लिये
सा पैदा किया जाता है, परन्तु तुझे तो ससारसे किनारा
अपने पास [२६] करनेके कारण इस वातकी कोई चिन्ता नहीं, सीके वास्ते साड़ी, चोली या गहने आदिकी चिन्ता तुझे नहीं, लडके लड- कियोंके भरण पोपण या उनके व्याह सगाईकी तुझे चिन्ता नहीं, किसीको देने या किससे लेनेकी चिन्ता तुझे नहीं, तेरे पास धन न होनेके कारण तुझे यह भी चिन्ता नहीं कि तेरा धन किसी राजा आदिसे लूट जायगा और वन न रखने अथवा अपनी मालकीयतका धन किसीके पास भी न रसने रसानेकी प्रतिज्ञा की हुई होने के कारण तुझे यह भी चिन्ता नहीं है कि उस वनका रक्षण कैसे होगा । नि- दान इस उलझन भरे ससारसे अपने जीवन निर्वाह सम्बन्धी या अपने सम्बन्धियोके जीवन निर्वाह सम्बन्धी तुझे किसी भी प्रकारकी चिन्ता फिकर नहीं, अतएव तू इस चिन्तामय संसारमें राजाओंका भी सहाराजा है। इसके उपरान्त तू ज्ञानवान् है, सपझदार है, शातवेत्ता है और शालोका सर्पज्ञ है, सर्वज्ञ प्रमु कथित सर्व देश कालमें अनुकूलता धारण करनेवाले अबाधित शुद्ध सिद्धान्तके रहस्य को भी तू यथामति सब समझता है। किन्तु तुझे यह बात बराबर स्मरण रखनी चाहिये कि जिस आदर्श (चारित्र) के कारण तू यह सर्व प्रकारका ऐथर्य गौरव भोग रहा है उसकी तरफ लक्ष न रखनसे-उसका पालन दरावर न कर- नेसे यह उच्च गति लेजानेवाला और आगीय गुणका विकास करनेवाला आदर्श ही तुझे उस दुर्गति पटकेगा जहाँ पर करोडों शताब्दियाँ तक महा पीडा भोगने पर भी तेरा छुट- का न होसके । अर्थात् जिस आदर्शको सिद्ध करनेके बहानेसे लोगोंसे तू अनेक प्रकारके श्रेष्ठ में श्रेष्ठ खाद्य पदार्थ, अच्छेसे [२७] अच्छे वन, बढ़ियासे बढिया कारसीरी और विदेशी शालें, हजारों रुपयेके पुस्तक, सैकडो रुपयेके कपाट एव शिष्य शिप्या वगरह सपादन कर अपनी बाह्यस्वार्थवृत्तिको पोप रहा है, उस पर उपेक्षा धारण कर मात्र इहलौकिक गौरव वृ- त्तिमें ही रत रहनेके कारण तुझे नरकादि दुर्गतियोंमें जन्स धारण कर घोरातिघोर दुसोको सहना पड़ेगा। यह बात हम प्रथम ही कह चुके है कि इस अधिकारसें उन मुनिनासधारियोंके लिये स्थान नहीं जो पात्र नाम ही मु. नियोंकासा रसते हैं और मुनिके आचार विचारको सूंटी पर टाग रसते हैं एव जो अपनी आजीविकाके ही हेतुसे-श्राव- कोंकी सिलकत पर तागड धिन्ना करने हेतुसे जनताके स- मक्ष टो घडीके लिये मुनिका वेश धारण कर मुनिव्रत पाल- नेकी आजन्मकी प्रतिज्ञा कर उस प्रतिज्ञाको उसी दिन पानी में घोल कर पी जाते है और आगरण जिनका व्यमनापे ही जीवन पूर्ण होता है। किन्तु जो मुनिव्रतकी प्रतिज्ञा पालनका दावा करते हैं और जो मुनिके वाह्याचारसे बडी कुशलतासे वर्तते हैं पर मानसिक निर्वरताके कारण जिनके विचार उधार और आचारमें समानता नहीं होती और जो बाहा लालचोंके वश होकर लोगोंकी ऑसोंसे धूल डाल कर गुप्त तया अपनी आत्मध्वनिके विरुद्ध अपने विशुद्धादर्शका सून करते है, उन्हीं मुनियोंके लिये यह साधुशिक्षा निति की गई है। जानी मुनिको, प्रमादयश होनेके टो कारण, शास्त्रज्ञोपि धृतव्रतोपि गृहिणीपुत्रादिवन्यनोज्झितो,- प्यङ्गी यद्यतते प्रमादवशगो न मेत्य सौल्यश्रिये, 44 [३०] उदय भावने अशुम प्रवृचि या अशुभ विचार तक न उत्पन्न होसके। इस लिये पवित्रात्मा मुनि, ऋपि, साधु, सन्यासीको सोह ममत्व एव 'मैं' पनका परित्याग कर सदैव अपने साध्य को सिद्ध करने तत्पर रहना चाहिये ।। सावधाचारमें मृषोक्ति दोप, उच्चारयस्यनुदिनं न करोमि सर्वे, सावधमित्यसकृदेतदथो करोपि । नित्यं मृपोक्ति जिनवञ्चन भारितात्तद, सावद्यतो नरकमेव विभावय ते ॥११॥ मू० तू सदैव रातदिनमें नर दफा करेमि भन्तेका पाठ पढ़ने हुये बोलता है कि मैं सर्वथा सावध ( पापसहित ) काम न करूगा और फिर पुन पुन वही काम किया करता है। ये सावध कर्म कर मिथ्या भाषी होनेके कारण तू प्रभुको भी उगनेवाला है और मै समझता हू कि उस पापके भारसे भारी हुये तेरे लिये तो नरक ही तैयार है ।। वि० करोनि भते सापाइअ सन सावज जोगं पच्च- क्यामि जावजीनाए तिविह तिविहेण इत्यादि । याने सारे जीवनमें मानसिक, वाचिक और कायिक सर्व सावध स्वयं न कलगा, दूसरोसे न कराऊगा और न ही करनेवालोंको मैं अच्छा समाँगा । इस प्रकारकी प्रतिज्ञा प्रतिदिन अविकरणपे एवं पोरसीके समय कई दफा करता है, किन्तु इस प्रतिज्ञाके अनुसार आचारसें तो तू इससे विपरीत ही कर रहा है। बोलना कुछ और करना कुछ और यह तेरे लिये [३१] तो सर्वथा ही अयोग्य है, क्योकि तूने दम्भका परित्याग कर चायाभ्यन्तर एकतानुसार शुम प्रवृत्ति करनेकी प्रतिज्ञा की हुई है। ऐसा करने तू द्विगुणा भारी होता है । सावध कर फरनेसे तुझे अशुभका(पाप) वन्ध होता है और असत्य बोलने के कारण भी तुसे अशुभ कामे भारी होना पड़ता है। तुझे चाहिये कि अपने कयनानुसार आवार रकसे । तुझे यह स्मरण रखना चाहिये कि जहाँ पर मन वचन कायकी त्रिपुटी चीन रास्ते पाडती है वहाँ पर दु सका समुद्र उठलवा है, मानि विपत्तियोंकी धनपटाये उपडती है और वोरातिवार स- कटोंकी जाले निठी हुई है। अर्थात् याय दिसाव-उपदेश जुद प्रकारका करना और आचार-चाव जुरे प्रकारका करना, यह भयकर पाप है और ऐमा करनेसे परभप अनेक प्रका- रकी पानसिक उपाधियोंके उपरान्त नरक आदि महाभयकर शारीरिक पीडाय भोगनी पड़ती हैं और इस भयो भी उसे अपनी पोल-खराब आचरणाको ऊपरी प्रशस्त आचरणाओं द्वारा दवा रग्वनेके लिये अनेक प्रकारके प्रपची प्रयत्न करते हुये भी रात दिन अपनी उस सराब आचरणाका पडदा उठ जानेकी चिन्ता जन्य दुस सततिका अनुभव करना पड़ता है । यहा पुरुषोंका कथन है- यथा चित्त तथा पाचो, यथा वाचवथा किया । चित्ते वाचि क्रियाया च, साधनाकरूपता ।। अर्थात् माधुओके विचार, उधार और आचारसे एकता होती है । मानसिक वाचिक और शारीरिक प्रवृत्ति जिनकी एकसी ही होती है वे ही साधु कहलाते हैं और जिनो इस महान गुणका अभाव हो और यदि वे सचे साधुपनका दावा [३२] , करें तो यह व्यर्थ है। मानसिक दुर्बलताके कारण जितने अशमे अपने भीतर भूले भरी हों उन्हें सच्चे सरल दिलसे कबूल करना और उन्हें सुधारनेका प्रयत्न करना यह मी सभी साधुता है । परन्तु सर्वज्ञके सिद्धान्तानुसार जनताके सराक्ष की हुई प्रतिज्ञासे विपरीत आचरण करनेगे तो अपनी आत्सा ही साभी है, अपनी आत्मीय ध्वनिके विरक्षाचरण कर अनेक प्रकारके वायाटम्बरोंसे उस पर पडदा टालना, उसे ढकना और अपने आपको जनतागे सरा साधु त्यापन करना यह मृणोक्ति नहीं तो और क्या कहा जाय ? ॥ मुनिके सावद्याचरणसे परखचाताका दोष । चेपोपदेशाद्युपधि प्रतारिता, ददत्यभीष्टानृजवोऽचुना जनाः भुक्षे च शेपेच सुखं विचेष्टसे, भवान्तरे ज्ञास्यसि तत्फलं पुनः॥१२॥ मू० वेश, उपदेश और उपधिसे ठगे गये हुये सरल लोग अभी तो तुझे इच्छित वस्तु देते है, तू सुखसे खाता है सोता है और फिरता है परन्तु इसका फल तू भवान्तरमें जानेगा। वि० चीथे तथा पाचवे शोकमे यह विषय चर्चा गया है। गहागन् । सरल हृदयवाले भद्रमनुष्य तुझे गुणाधिक साझ कर, संयी समझ कर आप न सा सकें इस प्रकारकी अच्छी- शे अच्छी नानेकी वस्तुये तुझे देते हैं एव तेरे उपयोग आ- नेवाली अनेक प्रकारकी तमाम चीजें देते हैं, जगर तू उन वस्तुओंका दुरुपयोग करता है । यदि साधुपनके योग्य वेरा आचार-वर्तन न हो तो उन वस्तुओं पर तेरा कोई अधिकार
[३३]
या हक नहीं। यदि विना हक तू उन वस्तुओंको ग्रहण करेगा
वो याद रस भवान्तरसें किसी न किसी प्रकारसे तुझे उसका
बदला अवश्य देना पडेगा । यह तो तू ममझता ही है कि
कपट करनेवाले मनुष्यको भवान्तरमे सिवा दुर्गतिके अन्य
कोई स्थान नहीं । भवान्तरमे ही उसे दुर्गतिजन्य दुस भो-
गना पड़ता है इतना ही नहीं किन्तु इस भवमें भी उसे
अनेक प्रकारकी कष्ट जनक उपाधिमे जीवन विताना पड़ता
है। उसे अपना असत्य डौल सहीसलामत रसनेके लिये
अनेक प्रकारके जागडाल रचने पड़ते हैं । असत्य बोलना
पटवा है, दूसरोंकी चापलोसी-खुशामद करनी पड़ती है,
दूसरोंकी हा मे हा मिलानी पड़ती है और इतना सब कुछ
करने पर भी उसे रातदिन अपना दम्भ सुला पड जानेके
भयमें ही चिन्तित रहना पड़ता है।
इस उपरोक्त मोफो कहे गये विषय पर महामहोपाध्याय
श्रीमान् यशोविजयजी महाराज स्वल्पाक्षरों में फरमाते हैं ".
झूठा उपदेश करता है, लोक रजनार्य वेश धारण करता है
उसका धर्मार्थ सेवन किया हुआ तमाम कष्टानुष्ठान व्यर्थ---
निष्फल है"। इससे यहाँ पर यह बात लक्ष्यमे रसनेकी है कि
उपदेश और आचरणमें भिन्नता रसना इसीका नाम माया-
मृपावाद है। आगे चलकर प्रसगोपात इस विषयका स्पष्टी-
करण किया जायगा।
'सयममें यान न करनेवालेको हितबोध'
आजीविकादि विविधानि भृशानिशाः,
कछेण केपि महतैव सृजन्ति धर्मान् ।
[३४] तेभ्योपि निर्दय जिघृक्षसि सर्वमिष्ट, नो संयमे च यतसे भविता कथं ही ॥१३॥ मू० आजीविका चलाना आदि अनेक प्रकारकी पीडा- ओंसे रातदिन वहुत हैरान होते हुये कितने एक गृहस्थ बडी मुस्किलसे धर्मकृत्य करते हैं। उनसे भी हे दयाहीन साधु ! तू तेरी सर्व इष्ट वस्तुयें प्राप्त करनेफी इच्छा रखता है और सयममें प्रयत्न करता नहीं तो फिर तेरी क्या दशा होगी? वि० जिस प्रकार तमाम वल उतार कर मात्र एक धोती पहने नदी उतरनेवाला मनुष्य अल्फ नगा न होने पर भी वह नगा कहा जाता है उसी प्रकार दयाका भंडार साधु मुनिराज भी अपने अधिकारके प्रमाणसे बहुत कम दया होते हुये भी दयाहीन कहा जाता है । क्योंकि सर्व साधारण गृहस्थ जनोंकी अपेक्षा धर्मगुरुका दावा रसनेवाले साधु मुनिराजमें विशेपत सद्गुणाका सद्भाव होना चाहिये । बिचारे भद्रिक भाववाले साधारण स्थितिके गृहस्थ इस विषम परिस्थितिवाले जमानेमें बडी मुस्किलसे अपने कुटुम्बका भरण पोषण करते हैं, तथापि वे धार्मिक श्रद्वासे जकडे हुये होनेके कारण उस अपनी साधारण स्थिति भी साधु महाराजको देस अपने घरकी अच्छेसे अच्छी वस्त्र पात्रादि वस्तु देनेपे जराभीआना कानी नहीं करते । उसमें भी जन सप्रदायमें तो साधुओंके प्रति इस प्रकारकी श्रद्धाभक्ति है कि जनोंकी चाहे जैसी गर्गव-साधारण स्थिति हो किन्तु जब तक उनके घरमें वरतन तक भी रहेंगे तब तक वे उन्हे वेच कर अपने बच्चोंको भी न देकर पहले अपने धर्मगुरु साधु मुनिराजको प्रोत्साह n [३५] पूर्वक देनेमे जरा भी न हिचकिचायगे । ऐसी तंग दशामें दूसरोकी सेवा करना आदि अनेक प्रकारके कष्टो द्वारा प्राप्त की हुई वस्तुयें विचारे श्रद्वालु भक्तोंके पाससे लेकर अपने जीवनको सुसद स्थितिम रसनेका प्रयत्न करता है, परन्तु अपना कर्तव्य पालन करनेमें तू जी चुराता है । न तो तू इन्द्रियो पर ही सयम रसता है न मन पर और न ही जि- न्दगी पर्यन्त को हुई अपनी पाच प्रतिज्ञाओ अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य ओर अपरिग्रह को निरतिचार पालन कर- नेका प्रयत्न करता है । इस लिये महात्मन् ! तू जरा इस वातका तो विचार कर कि कर्तव्य न करनेसे और अकरणीय के करनेसे क्या परिणाम उपस्थित होगा ? यद्यपि तू तेरे इन आदम्बर पूर्ण दम्भि आचरणों द्वारा श्रद्धालु धर्मनिष्ट गृह- स्थोंको ठग सकता है तथापि सर्वज प्रभुको तो किसी प्रकार भी नही ठग सकता । लौकिक कहावत है कि दूध पीनेकी तीन इच्छा रखनेवाली निचारी निली जहाँ तहाँ दूधको ही देखती है किन्तु पीछेमे कमर पर पडनेपाले डण्डेको नहीं देसी । वम वही दशा तेरी देस पडती है, परन्तु अपने नामीका कार्य कर, अपना कर्तव्य पालन कर सूची रोटियोंमें भी कि- तना स्वाद-माधुर्य रहा हुआ है, कर्मव्य वजाते हुये भुने हुये मुट्ठी भर चने पाकर ठडा पानी पीनेमें कितनी मधुरता और कितना स्वाद है इसका भी तू अनुभव करना या किमी अनुभवी व्यक्तिसे जानना । तेरा क्या कर्तव्य है इस बातका तुझे सयाल करना चाहिये । विशेषत दुनियाके तमाम प्राण धारिआके प्रति तेरा क्या कर्तव्य है इस वातका विचार कर। कितनीएक टफा साधु लइनको फलकित करे इस प्रकार- का पान साधुवेश धारियोंमें देस पड़ता है। जनसमझ की [३६] हुई पूर्वोक्त पच महाव्रत पालनकी प्रतिज्ञा भंग होती देसनेमे आवी है, जिन, क्रोध, मान, माया-कपट, लोभ, ईर्ष्या, द्वेषादि महादुर्गुणोके परित्यागका उपदेश करनेका अधिकार विशेषत उनसे दूर रहनेके कारण धर्मगुरुओं-साधु महारा- जाओको ही है उन्हीं दुर्गुणोके वश होकर न लिखे जायें इस प्रकारके हलके कृत्य किये जाते देख पडते हैं । क्रोधके आवेशमे भापासमितिका यून करनेवाले और एक ही शब्द- मे दूसरेके हृदयको मसोस डालनेवाले मार्मिक वचन चोल जाते हैं । ईपी-असहिष्णुताके कारण दूसरे महापुरपो-गुण- वानोकी कीर्तिको दूपित करनेका भरसक प्रयत्न किया जाना है। मान-अभिमानमे आकर अपनेसे सहन गुणाधिक गुण- वान और विद्वानको अभिवन्दन तक भी नहीं किया जाता, मायाके वश होकर अपनी स्वार्थ सिद्धिके लिये या अपने दुर्गुणोंको ढकनेके लिये दम्भसे हृदयगत भावनासे विपरीत कयन किया जाता है और लोमके विवश होकर बहुमूल्य वस्त्र, हजारों और लाखों रुपयके पुस्तकोंके भण्डार अपने नामसे सग्रह किये जाते हैं। बस इसीसे साधु असाधु पनकी भावना मालूप हो जाती है । दुनियाको स्थल मर्यादासे ऊची सपाटी पर चलनेवाले महात्मन् । यह सब कुछ अलीक वर्तन संसार कान्तारसे अनन्त काल तक परिभ्रमण करानेवाला हे। इस प्रकारके वर्तनमे सर्वथा हानि है । तेरे इन कपडोसे मोक्ष न मिलेगा, किन्तु जब तू अपने मन पर सयम रस कर साधु लाइनके योग्याचार विचार और उच्चारमे एक रंग लगायगा तभी आत्मकल्याण होगा अन्यथा दम्भवद्धिसे नेश धारण किया हुआ मात्र एक नाटकके पात्रके समान है।
[३७] निर्गुण मुनिको कुल लाभ नहीं, आराधितो वा गुणवान् स्वय तरन्, भवाब्धिमस्मानपि तारयिष्यति। श्रयन्ति ये त्वामिति मरिमक्तिभिः, फलं तवैपांच किमस्ति निर्गुण १ ॥१४॥ मू० इस गुणवान पुरुषकी आराधना की हो तो ससार समुद्रसे तरते समय वह अपने को भी तारेगा इस प्रकारकी बाहुल्य भक्तिसे बहुतसे मनुष्य तेरा आश्रय लेते हैं, परन्तु हे निर्गुण ! इससे तुझे और उनको क्या लाभ है १ ॥ वि० यह साधु सन्त है, गुणवान है, धर्मोपदेशक है, वरन तारन है अत इसका आश्रय लेनेसे-इसकी सेवा भक्ति करनेसे हमारा भी कल्याण होगा यह जान कर गृहस्थी लोग तुझे बहुमान भक्तिपुरस्सर सब कुछ देते हैं, तेरी अनेक प्रका- रसे सेवा करते हैं, परतु इससे उन्हें पुण्यपन्ध होगा यह कल्पना कर उसका कारणमूत होनेसे तुझे भी पुण्यका बन्ध होगा यदि तू यह समझता हो तो यह तेरी भूल है । क्योंकि तुझमे उन भक्तगृहस्थोंकी धारणा मुजर जरा भी सद्गुण नही मालुन पडते । यदि तू उनके माने हुये सद्गुणोंका पात्र हो और भवसागरसे स्वयं तरने तथा दूसरोंको तारनेकी शक्ति रखता हो तो उन मोक्षार्थी गृहस्थोंसे कराई हुई सेवा भक्ति योग्य है, अन्यथा अपनी कपोल कल्पनामे अपने आ- पको उस पवित्र और उच्च पदका अधिकारी मान लेनेसे पर- भवमे तुझे जरा भी लाम न होगा इतना ही नहीं बल्कि अनधि कारी तया तू बाह्याडम्बर द्वारा भद्रिक गृहन्योंको ठगनेके कार- . [३८] ण प्रत्युत पापका वन्ध करता है और उस अशुभ कर्मका बन्ध अपनी स्थिति परिपक होने पर तुझे वह दारुण फल चसा- यगा जिसकी तुझे अभी स्वममें भी कल्पना तक नहीं होती। जिस आशासे गृहस्थी लोग तेरा पोपण करते हैं और तेरा आश्रय लेते हैं जब तू उनकी उस आशाको शताश भी पूर्ण करनेके लिये और अपने पोपणार्थ उनके पाससे लिये हुये अन्न वखा पात्रादि पदार्थोके बदले में उन पर कुछ भी उपकार करनेको असमर्थ हे तो तुझे किस वातका लामहो सकता है ? ॥ निर्गुण मुनिको प्रत्युत पापबन्ध स्वयं प्रमादैनिपतन भवाम्बुधौ, कथं स्वभक्तानपि तारयिष्यसि । प्रतारयन्. स्वार्थमृजून शिवार्थिनः, स्वतोऽन्यतश्चैव विलुप्यसेंऽहसा ॥ १५ ॥ मू० तू स्वय ही प्रमादसे ससार समुद्र में पडता जाता है तो अपने भक्तोंको किस तरह तारेगा ? विचारे मोक्षार्थी सरल जीवोंको अपने स्वार्थके लिये ठग कर अपने और अन्यसे तू पाप द्वारा लेपित होता है ।। वि० दु स भरे ससारकी मोहजालसे मुक्त होनेकी भाव- नावाले और मोक्षप्राप्तिकी इच्छा रखनेवाले विचारे सरल स्वभावी मनुष्य तेरा आश्रय लेते हैं और तेरे किये हुये उप- देशानुसार अपना जीवन विताते है । उन्हें तू जो मार्ग बत- लाता है तुझ पर अटल श्रद्धा-विश्वास होनेके कारण वे उसी को अपने कल्याण और आत्मोद्धारका मार्ग समझ कर आश्रय करते हैं, क्योंकि वे तुझे श्रद्धा भक्सेि अपना हितपी . [३९] नेता समझते हैं। इस प्रकारके विश्वास पात्र और भद्र मनु- प्योंको ठग कर तू विश्वासघाती हानेके कारण (अन्य द्वारा) महाचीकने कर्म बाँधता है। पच महानतोके पालन करने- के लिये स्वय की हुई प्रविज्ञा-प्रत्यास्यानको विषय कपायादि प्रमादमें पडनेक कारण भग करता है और तजन्य पापकर्मसे तू स्वय लिप्त होता है । इस प्रकार सयमीय गुणोंसे रहित होनेके कारण तू निर्गुणी है, अतएव तुझे इस दाम्भिक नि. थासे कुछ भी लाभ नहीं । तेरे जैसे दम्भीको, लोकमत्कारके अर्थीको वस्त्रान्न टेनेसे देनेवालेको लाभ हो ओर उसका निमित्त कारण तेरे बननसे तुझे भी लाभ हो यह दाम्भिक विचार छोड़ दे। यदि तू स्वार्थका चस्मा उतार कर विचार करेगा तो तुझे अवश्य यह मालूम हो जायगा कि इस वचक वृत्तिसे तू द्विगुणे पापभारसे भारी बन रहा है। इस दाम्भक आचारमे ससारमे तुझे ऐसी नीच गतियोमे परि- भ्रमण करना पडेगा जहाँ पर चिरकाल तक अपनी उत्क्रान्ति करने के लिये गरदन ऊची करने तकका भी समय मुअस्सर न हो। इस लिये महात्मन | इस अपार भवससार समुद्रको तर- नेके लिये तुझे यह सर्वज्ञप्रभु कथित सन्यस्त एक महान् जहाज मिल गया है । इस जहाजको उन्मार्गम लेजानेकी मूर्सताको छोड कर सथा कप्तान बन । पवनका रुस देस अपने इष्ट- मार्गमें जहाजको चला, इस भवसागरके ऐन उस पार सा- भने ही तेरे पहुचनेका स्थान मोक्षनगर है, उसे अपना साध्यविन्दु बना कर जहाजकं चलानेका प्रयत्न कर, तु अवश्य अपने प्रामन्य स्थान पर पहुंच जायगा। यद्यपि मार्गमें सामुद्रिक जलचर जन्तू तुझे उपद्रव करेंग, कई पहाड [४०] , भी तेरे जहाजकी गति रोकनमें विन डालेगे, परन्तु यदि अपने प्राप्तव्य स्थानको लक्ष्यविन्दु बना कर हिम्मतके साथ निर्भय हो उपयोग पूर्वक अपने जहाजको इष्ट मार्गमें लेजानेके लिये प्रयत्नशील रहेगा तो अवश्य ही तू अपने साध्यको सिद्ध करने में विजय प्राप्त करेगा । जो सावुपहात्मा पूर्वजन्मकृत सुस्तके प्रभावसे प्राप्त हुये इस अद्वितीय जहाजका सदुपयोग नहीं करता बल्कि अक्षा- नताके वश हो इसका स्वय नाग कर बचावके साधनोको ही प्रत्युत डुबानेवाले साधनोगे फिरा डालता है, वह किसी प्रकार भी अपने आपको एव अपने आश्रितोंको इस भव सागरसे बचानेके लिये सर्वथा असमर्थ है। वह आत्मकल्याणका मार्ग न लेकर अपने आश्रितो-भक्तो सहित ससार समुद्रा डूबता है॥ निर्गुण पर चढते हुये ऋणका परिणाम गृहास शय्याहृति पुस्तकोपधीन् , सदा परेभ्य स्तपसारित्वय स्थितिः । तत्ते प्रमादाद्भरितात्मतिग्रहै, ऋणार्णमग्नस्य परत्र का गति. १ ॥१६॥ मू०-तू दूसरों के पाससे वसति (रहनेका स्थान ) आ: हार, पुस्तक और उपधि ग्रहण करता है, यह स्थिति तपस्वी लोगोंकी ( विशुद्ध चारित्र पालकोंको ) है पर तू तो उसे स्वीकार कर पुन प्रमादवश पड़ जाता है तो फिर महान् फर्जमें डूबे हुयेकी तेरी परमवमें क्या गति होगी १ ॥ वि०-आवश्यकीय वस्तु वर, पात्र, पुस्तकादि धर्मों- [४१] "पकरण सिवाय परिग्रह न रसनेके लिये साधु साध्वीको "यास उपदेश किया गया है। यद्यपि शास्त्रोक्त वास्तविक साधुपन-साधुका आचार खाँडेकी धारके समान है, साधु- पना पालन करना यह कोई लड्डु उडाने जैसा सुगप नहीं है, किन्तु लाहेके चने चावने जैसा है। किसी महापुरुषने सा- "धुको उपदेश करते कहा है कि फकीरा फकीरी दूर है जैसी लम्बी सजूर, चढे सो सेवा चासले पडे सो चकना- 'चूर" इस प्रकार सचमुच ही साँडेको धारके सपान पवित्र दुष्कर साधुपनको आज हमारे पूज्य मुनिराजाओं-साधु सन्त महन्त धर्मगुरुओने अपनी आराप तलमीके लिये इतना मुगम कर दिया कि वह साडकी धार बन गया है । जिस साधुपनको बडे बडे राजा महाराजादि कर्मवीर धारण करते थे आज उसे ससार व्यवहार चलानेकी भौतिसे कायर या ससारके भारको उठाने में असमर्थ पुरुष धारण करते हैं। इस पवित्र साधुत्वके आदर्शको नीचा गिरानेके कारणभूत मान उसे अगीकार करनेवाले अनधिकारी पुरुष ही है। यद्यपि आज इस विषम कालपे उस आदर्श साधुपनके दर्शन होने दुर्लभ हैं तथापि यदि अधिकारी और योग्य पुरुप ही इस महान पदको धारण करे तो उस सो साधुप- नके आदर्शकी झलक तो अवश्य ही देस पड़ने लगे। साधमुनिराजको यह विचार करनेकी आवश्यकता है कि साधुपन धारण करते समय वह अपने पूर्वकालीन जीवनके “यही सातको मपात कर उस दिनसे उतर नवीन जीवन वितानेको प्रतिक्षा करता है और महान् जिम्पेदारियोंको अपने सिर पर उठाता है। इस लिये उसे अपने सिर पर 'उठाई हुई जिम्मेदारियोंके मुताविक जीवन बितानेका ध्यान [४२] रसना चाहिये। अर्थात् उसने जिन जिन जवाव दारियोका भार अपने सिर पर लिया है उनकी ओर सदैव लक्ष्य रख- कर अपनी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार ही उसे अपना आचार विचार और उत्चार रखना चाहिये । छानस्थिक दोपके कारण कदाचित् अपनी की हुई प्रतिज्ञामें कुछ अतिचार- दूपण लग जाय और वह मालूम होने पर उसके पश्चात्तापमें सर्वथा साधुपदको छोड देनेका विचार होता हो तो यह बडी' भारी भूल है । क्योंकि अज्ञानतासे होनेवाली उस भूलके मालूम होनेसे यदि सन्चा पश्चात्ताप होता हो तो उसका प्रायश्चित्त साधुपदका परित्याग कर पुन ससारमें डूबनेसे नहीं कन्तु उस दिनसे वह भूल या उस प्रकारकी अन्यभूल जो अपने आदर्शको धक्का पहुंचाती हो न करनेसे ही पञ्चा- त्तापकी सफलता और उस दोपका प्रायश्चित्त होजाता है। क्योकि साध्यदशामे रह कर ही सिद्ध दशा प्राप्त की जा सकती है। साध्यदशाको छोड कर सिद्ध दशा प्राप्त करनेका प्रयत्न करना यह वालुमेंसे तेल निकालनेके समान है । इस लिये साध्य दशा और सिद्ध दशाके बीच जो अन्तर है उसे व्यानमे रग कर ही इस उपदेशको हृदयसे उतारा जाय तो ही लाभ होनेका सम्भव है, अन्यथा जिस प्रकार शास. शब्दसेसे एक पाण निकाल डालनेसे वही शल बन जाता है उसी प्रकार यहा पर भी समझ लेना चाहिये । शाखो लिसे हुये अशुद्ध अभ्यासक्रमके वचनों और इस प्रकारके उपदे- के सक वचनोकी पूर्वापर अविरोधी तया व्यवस्था करने और विचार पूर्वक उनका रहस्य समझ लेनेकी इस जमा नेमें परमावश्यकता है। यदि सयममे दिनप्रतिदिन मूल और उत्तर गुणो
[४३]
सम्बन्धी दूषण सेवनकी वृद्धि ही होती जाय और मुरय
साध्यकी ओरसे सर्वथा लक्ष्य ही उठ जाय या हृदयमे रात
दिन आर्तध्यानी सन्तति कायम रहती हो और हजारो
प्रयत्न करने पर भी पूर्वकृत अशुभ कमायके प्रबल प्रभा-
वसे चित्त स्थिर न हो सकता हो तो इस प्रकार असूल्य मानन
जन्मको सर्वथा व्यर्थ गवाँ देनेकी अपेक्षा अध्यात्मसारप्रथमे
लिसे मुजब साधुवेशको छोड कर उत्तम गृहस्थीपनके योग्य
गुण सपादन कर उसे अपना जन्म सफल करना चाहिये।
परन्तु जिसमें लेश भी रुचि नहीं उस पवित्र साधुपदके भार
नीचे दब कर अपने दुर्लभ मनुष्य जीवनको नष्ट न करना
चाहिये । यदि उसे यह मालूम देता हो कि वेश छोडनेसे
सर्वथा ही मेरा अध पतन हो जायगा, या वेशप्रेस होनेके
कारण वेश छोडनेमे भी असमर्थ हो तो आगे बतलाये हुये
मार्गके अनुसार सवेगपक्ष धारण करके भी आत्माहितकी दृष्टि
न चूकना चाहिये और आति प्रमाद सेवन कर साध्यष्टि
रहित हो अनन्त भक्ससार उपार्जन न करना चाहिये ।
कचित् प्रवल कर्मोन्यसे अमुक अनाचरणरूप दूपण लग
भी जाय तो उससे वेश परित्याग करनकी कोई आवश्यकता
नहीं । यदि ऐसा न होता तो फिर स्सलनाक सभागमे दश
प्रकारका प्रायश्चित्त आगममे लिसनेकी शासकारोको कोई
जरूरत ही न थी। मोक्षामिलापी और तदनुसार आचरण
करनेकी इन्चावाले मुनिराजको उद्मस्थताके कारण उगा
हुआ दूषण प्रायश्चित्तसे दूर हो सकता है। हाँ यदि प्रायश्चित्त
द्वारा शुद्ध होकर भी वह मोहकी विवशतासे धर्मके उडाहसे
निरपेक्ष हो धारवार उसी अनाचरणके गडसें उतरे और उससे
अनन्तकाल पर्यन्त दुर्लभ योधिपन प्राप्त करताहो तो इम अपे.
[४४]
क्षासे तो उसे वेश परित्याग कर उत्तम श्रावकपन-उत्तम
गृहस्थाश्रम या सवेगपक्षीपना स्वीकारना यह सर्वोत्तम तथा
एकान्त आत्महितकारी है।
कदाचित् संयम ग्रहण किये बाद इस प्रकारको स्थितिमें
आगया हो कि सयम पालनेके लिये उसे सर्वथा अपना
असामर्थ्य मालूम देता हो और उस उलझन भरे प्रमका
निराकरण वह म्वय न कर सकता हो तो उस परिस्थितिमे
उसे किसी यथार्थ गीतार्थ महात्माकी शरण जाकर
उसकी सम्मति ले पुन अपनी आत्मध्वनिके अनुसार जीवन
विताना चाहिये ।
कितनेएक अल्पज्ञानी साधु मुनिराज राग, द्वेष, क्रोध,
मान, माया लोभ ईपदिके परित्यागकी प्रतिज्ञा कर थोडेसे
ममत्वके लिये अपने उस आदर्श पालनसे मिलनेवाले महान्
लाभको खो धैठते हैं, या कितनेएक भोले मुनिराज प्रमा-
द विवश जनताको मन्नार्गका उपदेश देनेके अपने पवित्र
कर्तव्यको भूल जाते हैं । वे अपने कर्तव्यमार्गसे च्युत हो-
कर अधोगतिके अधिकारी न वने इसी हेतुसे ग्रन्थकारने
जग कटु दवाके समान यह हितोपदेश दिया है अन्यथा
किसी व्यक्ति पर आक्षेप करनेका या किसीकी निन्दा करनेका
कोई कारण नहीं है । अर्थात् धर्मगुरु पदाधिकारी प्रमादके
वश हो अपने अधिकारसे नीचे न गिरे इस दृष्टिबिन्दुसे ही
अन्यकर्ताने कुछ कटु परन्तु सर्वथा हितकर शब्दोंन बोध
दिया है।
वेशक जो सयमको अनुपयोगी है वैसे अनेक प्रकारके
परिग्रहको धारण कर जो ससारके विषयोंमें आसक्त रहते
हैं उनके लिये यहाँ पर स्थान नहीं है । उन्हें साधु, सन्त,
[४५] महन्त, सन्यासी यति, श्रीपूज्य तथा मुनिराज कहलानेका कोई अधिकार ही नहीं। धर्मके बहाने आजीविका चलानेवाले, अपने आश्रित भक्तोंको ठगनेवाले धर्मशासका दुरुपयोग कर मंत्र तंत्रादिका स्वांग रच कर लोगों में अपनी स्याति करने वाले प्रमादी, गृहस्थो पर भार रूप इस प्रकारके अधोगति गामी अपने आपको साधु महाराज कहलानेवाले महात्मा नन इस विषय पर वास्तविक रीतिसे, हितबुद्विसे विचार करेंगे उस वक्त उनकी और साथ ही उनके आश्रितोंकी भी स्थिति जरूर सुधरेगी। यद्यपि लोकरंजन और स्तुतिइच्छाके बारेमे प्रथम कुछ विवेचन किया गया है तथापि यह विशेष आवश्यकीय हानेके कारण अन्यकार पुन रुपान्तरसे इसी विषयका उपदेश महात्मन्! तेरे किस गुणके कारण तू ख्यातिकी इच्छा करता है। न कापि सिद्धिर्न च तेऽतिशायि, मुने क्रियायोगतपः श्रुतादि। तथाप्यहङ्कारकर्थितस्त्वं, ख्यातीच्छया ताम्यास धिमधा किम् ॥ २१ ॥ मू० हे मुने! तेरे अन्दर न तो कोई खास सिद्धि है, उच्च प्रकारकी क्रिया है, न योग तप है और न ही ज्ञान है, तथापि महकारसे कथित हो म्याति प्राप्तिको इच्छासे तू व्यर्थ ही परिताप क्यों करता है ? ॥ वि० साधु मुनिराजके तप प्रकर्षसे उसमे आठ महान [४६]. शक्तिये पैदा हो जाती हैं, उन शक्तियोंको सिद्धियाँ कहते हैं और उनका नाम तथा प्रभाव निम्न लिसे मुजय होता है। अणिमा सिद्धि-इस सिद्धि द्वारा महात्मा अपने शरीरको इतना सूक्ष्म बना सकता है कि एक सोईके नको जितने सूक्ष्म रंध्रमेसे भी वह सुगपतासे निकल सके। महिमा सिद्वि-यह दूसरी सिद्धि प्रथात सिद्धिसे विपरीत प्रभाववाली है, इसके द्वारा इसका मालिक महात्मा अपने शरीरको इतना स्थूल बना सकता है कि लास योजन ऊचा । मुमेरु पर्वत भी उसके जानु मपान हो जाय । लधिमा सिद्वि-इस शक्ति द्वारा वह महात्मा अपने शरी- रको पवनके सपान हलका बना सकता है । गरिमा सिद्धि----इसके द्वारा वह महात्मा अपना शरीर वनसे भी अत्यन्त कठिन और इतना भारी बना सकता है कि जिमका भार इद्रादि देवता भी सहन न करसके । प्रामि सिद्धि-इस प्रानिशक्तिपे मुनिराज अपने शरीरको वना ऊचा कर सकता है कि वह भूपि पर रहा हूआ भी अगुलोके अप्रभाग द्वारा मेरु पर्वतकी चोटी ओर ग्रह नस- त्रादिका स्पर्श कर सकता है। प्राकाम्य सिद्धि-उस शक्तिको प्राप्त करनेवाला महात्मा जलके समान स्थलपे (जपान) गोता-डुबकी लगा सकता है और स्थलके समान जलपे चल सकता है । इयत्व सिद्वि- इस शक्ति द्वारा वह महापा चक्रवर्ती सम्राट तथा इद्र के समान ऋद्धि प्रगट कर सकता है। वशित्व सिद्धि---इस शक्तिसे इसका सपादक क्रूरमें क्रूर कि पशुओं तकको वश कर लेना है, अर्थात् जिसे [४७] वह शक्ति समान होती है रातितर प्राणी भी उसके वश होजाते हैं। कितनेएक मात्र ऐसे हैं कि जो साधुपन ग्रहण करने पर भी तुरन्त ही उनके पढनेकी आज्ञा नहीं है । उन शाल सिद्धान्तोको पढने के लिये योग्यता सपाटन करनेकी आव. श्यकता होती है, इस लिये अमुक समय तकका दीमापांच होने पर ही विधि पूर्वक क्रिया और तप करके साधु उन धर्म- शाखाका अध्ययन कर सकता है। शास्त्र में इस तप किया पुर- स्सर सूत्राध्ययनको योगोद्वहन कहते हैं । इस योगोद्वहनका हेतु समझनकी साधुवर्गको विशेपत आवश्यकता है। यदि इसका रहस्य सपझाजाय तो जैन सपाजके साधु और गृहस्थ वर्गम यहुत कुछ सुधार हो सकता है । नासमझीके कारण आज इस योगाद्वहन और उपधानके नामसे समाजका प्रतिवर्ष लासी रुपया व्यय होता है और उसका परि- णाप क्या आता है यह भी सपाज समझता है। पान्तवारे विचार किया जाय तो आज होनेवाले योगोद्वहन और उपधानको किया आत्मारहित देहके सपान रह गई है। उसके करने और करानेवाले मात्र महत्वाकाक्षाके लिये ही कर करा रहे हैं । श्रावक वर्ग तो सर्वथा ही इस विषयके रह- स्यस अनभिज्ञ है और न ही उममें जिज्ञामा वृत्ति रहे साधु पुनिराज, उनमें भी इस क्रियाको करानेवाला अरिकांश वर्ग इसके हेतु रहस्यसे अनजान ही है । स्वल्पाल्प साधु जो इस नियाके हेतु रहस्यको जानते हैं वे भी गतानुगत की प्रधागे फस गये हैं। इस नित्याके करानेवाले आचार्य और पन्यास सब ही अपनी आरम्भ की हुई क्रियाकी उत्क- पना दिखानेका प्रयत्न करते हैं और अज्ञानताके कारण [४८] इससे वे अपना पड़ा भारी महत्व समझते हैं। जब उपधान' नामक इस निर्जीव क्रियाकी समाप्ति होती हे और माला पहनने- का समय आता है उस वक्त वरघोडा (समारोह) निकाला जाता उसमें एक दूसरेकी स्पर्धासे हजारो रुपयोंका पानी करते हैं। आज कल श्रीमत लोग विशेपत इस क्रिया कराने अपने धनका व्यय कर अपने आपको जैन धर्मके आराधक समझते हैं। किन्तु उस क्रियाको करनेवाली विधवाये वालविधवाये एव एक दफा मिल गया तो दूसरी दफाका फाका भरनेवाले विचारे गरीब साधी भाइयोकी सोचनीय दशाफी ओर जरा भी लक्ष्य नहीं देते। जैन धर्मकी उन्नति मात्र क्रियाकाण्डकी उत्कर्षता या मंदिरोकी उत्कर्पतासे नहीं हो सकती किन्तु क्रियाकाण्ड- को करनेवाले और मदिरोंको पूजनेवालोंकी उत्कर्पता पर ही जैन धर्मकी उन्नति निर्भर है। यद्यपि शालोक्त क्रियाकाण्डकी उत्कर्पतासे धर्मकी पुष्टि होती है तथापि समाजकी नस नसगे भरा हुआ अज्ञानतारूप वुसार जव तक दूर न किया जाय नब तब उसे सिलाई हुई पुष्टिकी दवाये कुछ भी फायदा नहीं कर सकी । इस लिये जो आधुनिक समयमे धर्मोन्नतिके नाससे उपधानादि क्रियाओंमें प्रतिवर्ष लासी रुपया व्यय किया जाता है (कई जगह पर जिसका परिणाम भी धर्मो- शहका रूप धारण करता है) यदि समाजके नेता सगयकी परिस्थितिको देस कर इन अनावश्यक क्रियाओंको कुछ समय तक मुल्तवी रख उनसे व्यय होनेवाली रकम शिक्षणादि समाज सुधारके कार्यमें नियुक्त करें और व्यवस्था पुरस्सर उसको सदुपयोग किया जाय तो अवश्यमेव जैन धर्मकी समुन्नादि दशवपमें ही दृष्टि गोचर हो सकती है। योगबहनकी क्रिया अमुक विधि और तप किये [४९] मुबका पाठ पढनेको मामालती है, उसे उद्देश कहते हैं। इससे अधिक योग्यता प्राप्त होने पर गीतार्थ गुरु महारा- नकी ओर से उस पाठका अर्थ रहस्य साझने, पुनरावर्तन करने क्या उस विषय का समाधान कर उसे स्थिर करनेकी चर्चादि करनेफी आज्ञा मिलती है, उसे समुदेश कहते हैं। जय इससे भी अधिक योग्यता प्राप्त हो जाय तप उस सूत्रार्यको दूसरोंको पढाने, सुनाने एव उसका चाहे जो सदुपयोग करनेका पूर्ण अधिकारीलता है उसे अनुमा कहते हैं। योगोदहनफा साधारणत यह हेतु है कि अमुक दीक्षा पर्यायके बाद योग्यतानुमार पूर्वोक्त तीन सोपान प्राप्त करने पर सयसको रमणता द्वारा वह मन वचन और काया पर योग्य अंकुश रस सकता है, अतएव वह साया- नुकूल अपवाद मार्ग भी ग्रहण कर सकता है। अर्थात् इस क्रिया सरा मन वचन और शरीर पर योग्य सयत प्राप्त करना ही योगोदनका साधारण हेतु है। योगपूर्णादिकी प्राप्तिसे भी लोक रजनता और सन सानी म्याति प्राप्त हो सकती है। जड वस्तुगी अनन्त शक्ति नही हुई है, दो वस्तुओंके सयोगसे या अधिक वस्तुओफे संयोगसे इस प्रकारका पूर्ण यन सफता है कि उसके द्वारा अनेक चमत्कार बतलाये जासके । दृष्टान्तके तौर पर यदि उस चूर्णको पानी डाल दिया जाय तो बहुतसी गलियाँ बन जाती है, सिंह पैदा हो जाय, जल मार्ग दे देवे, इत्यादि अनेक पायर्य उत्पन्न हो सकते हैं। इन पूर्वोक्त ताप शक्यिोंका तुझसे सर्वथा अभाव देस पद्धता है । मुनिपदके योग्य परीपद या उपसर्ग सहनादि किसी प्रकारका घोर- सप मी तू नहीं करता। सूत्र सिद्धान्तका रहस्य सराहने
.
"
[५०]
या गीतार्थ बनने जितना ज्ञान भी तूने सपादन नहीं
किया, यद्यपि इन पूर्वोक्त शक्तियों के प्राप्त होने पर उस
गम्भीर हृदयी महात्माको महत्वाकाक्षादिकी लेश सात्र भी
भावना नहीं होती, तथापि यदि तुझे इस प्रकारके गुण
प्राप्त हुये हों या इनसे एक भी असाधारण गुण तुझं
प्राप्त हुआ हो तो भी तेरी यह आताख्यातिकी भावना प्रसिद्ध
होनेकी इच्छा कदाचित् योग्य समझी जाय । परन्तु जब तेरे
अन्दर मुनिपदके योग्य एक भी ऐसा असाधारण गुण नहीं कि
जिसके कारण जनता तेरी पूजा करे, उस गुणसे तेरी ख्याति
हो ,मान सन्मान रिले, तब फिर तू किस विरते पर इतना
आभिनान, इतना आडम्बर रखता है ? गुण प्राप्ति किये
विना प्रसिद्धिकी तीन खोसी इच्छासे क्यो अपनी आपकी
कदर्थना करता है ? मुनिपदके गुण कस्तूरीके सपान होते
हैं, जिस सहापाको वे प्राप्त होते हैं वे उसके छिपानेसे मी
नहीं छिपते । उन गुणांकी सुगन्ध स्वयं ही दूर दूर तक
फैल जाती है । इस लिये पहात्मन् आत्पख्यातिको चिन्ता
छोड कर अपने पदके योग्य गुण सपादन करनेकी चिन्ता
कर । मुनिफ्दके योग्य गुण प्राप्त हो जायँगे तब स्वय ही तेरी
ख्याति होनी देरी न लगेगी।
निर्गुण होने पर भी स्तुतिको इच्छा रखनेका फल ।
हीनोऽप्यरे भाग्यगुण सुधात्मन् ,
वाच्छस्तवार्चाय न वाप्नुवंश्च ।
ईन् परेभ्यो लभसेऽतिताप,
मिहापिसाताकतिपन्न ॥१७॥
मृ० आत्मन । तू निप्पुण्यक होने पर भी पूजा वगैरहकी
इच्छा रखता है और वह न मिलने पर ईर्षा करता है।
इससे तु इस लोकमें सताप प्राप्त करता हे और परलोकमें
स्वराव गतिमें जायगा।
वि-परभवा तूने किसी प्रकारका सत्कार्य न किया
होनेके कारण इस भव तू निष्पुण्यक है, तथापि तू प्रसिद्धि
प्राप्तिको इन्छा करता है और वह नीलने पर मनमें रोड
धारण करता है। ऐसा करनों तू रडी भारी भूल करता
है। क्योकि किसी भी वस्तुको प्राप्त करनेकी इन्न करनेमे
प्रथम उस वस्तुको प्राप्त करने की योग्यता-पानता प्राप्त करना
अत्यावश्यक है। योग्यता सपादन किये विना उसकी प्राप्ति
को उन्ना करना व्यर्थ है। यदि किसी प्रकार वह इच्छित
चस्तु विना योग्यता प्राप्त भी होगई तो वह चिरस्थायी
कदापि नही रह सकती। प्रसिद्धि प्राप्तिकी इच्छा करनेसे
पहले तुझे चाहिये कि एसके योग्य गुगवान बने । ससारमें
सदैव सदगुगी मनुष्यकी ही प्रसिद्धि और रयाति होती है,
गुणहीन मनुष्योंसे तो सात ससार भरा हुआ है अत
उनकी ख्याति ही किस बातसे हो ? ससाररो असार वस्तुये
बहुत भरी हैं परन्तु सार और कीरती पदार्थ बहुत कम हैं।
गुणरहित निस्सार जीवन जीनेनाले अनुष्य बहुत हैं किन्तु
मद्गुणयुक्त जीवन जीनेवाले महात्मा ससार बहुत ही अल्प
है, अतण्य उन सहगुणात्य जीवन जीने वाले महात्या महापुरु-
पोका ही जीवन महा कीपती होता है और संसार कीपत्ती तथा
अल्प वस्नुकी ही ख्याति प्रसिद्धि होती है । इस लिये यदि
योग्य गुण संपादन कर
t
तुझे प्रसिद्ध होना हो तो
[२] और अपने कर्तव्यको प्रेस पूर्वक पालन कर । प्रसिद्धि य स्तुति कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि जो इच्छा मात्रसे प्रा होसके । वह तो गुण प्राप्त होने पर बिना इच्छा किये भी प्राप्त हो जाती है, परन्तु गुण प्राप्ति बगैर ताजिन्दगी इच्छ करने पर भी वह प्राप्त नहीं होती। वास्तवने योग्यता विन जो उसकी इच्छा करता है उससे वह कोसों दूर मागती। और जो उसे तुच्छ समझ कर आत्मविकाशी गुणको प्रा करने तत्पर रहता है इच्छा न करने पर भी वह उस पैरोंमे आकर पडती है । इस लिये इससे सिद्ध है कि ख्याति खति पाप्त करनेकी इच्छावालेको गुण संपादन करनेमें ई तत्पर रहना चाहिये। यदि सूक्ष्प दृष्टिसे देसा जाय तो यह सवाल पैदा होता है कि तू कौन है ? तू अनन्त जीवात्सराशि से एक व्यवहारी जीवात्मा है, उन अनन्त जीवात्माओंपैसे अनेकानेक जीवा- स्मायें ससारखे ऊच नीच जातियोपजन्मधारण कर अनेक चस. कारी कार्य कर पानीके घुलबुलेके समान पुन अपने म्वरूपसे नष्ट हो दूसरी गतिको प्राप्त करती है । उनके किये हुये उन चम- स्कारी कार्यासे ससारमे किसकी कितने दिन प्रसिद्धि कायम रही है ? किसकी सदेव याद दास्ती रही है? इस अनादि अनन्त काल चलने न तो सदैव किसीकी कीर्ति या ख्याति रही है और न ही रह सकती है। यदि दूसरी अपेक्षास विचार करें तो तू साधु महात्मा है, सर्वज्ञ देव सहावीर प्रभुका तू ज्येष्ठ पुत्र है, अर्थात् सर्वज्ञ देव कथित साधुश्रावक मार्गपे तू साधु मार्गको अगीकार करनेवाला है। राहावीर प्रमुका ज्येष्ठ पुत्र होनेके कारण उनके शासनका आधार भताज्या सरी [५३] या अपनी कीर्ति र ख्यातिको इच्छा करते थे ? इन्द्रों द्वारा किये हुये उनके सत्कार महोत्सनसे या दशार्णमद्रादि राजा महाराजाओके किये हुये उनके स्वागत सहोसबसे महावीर देवके मन पर क्या कभी भी कुछ असर हुई थी। यदि नहीं तो मुझे भी तेरे उपकारी पूज्य नेताके पार्गका अनुकरण करना चाहिये । अनादि अनन्त ससारों परिभ्राण करते हुये इस प्रकारका सुअवसर मिलना सहादुलभ है, इस लिये प्रसिद्धि प्राप्तिके लालचको छोड कर गुण प्राप्त करनेका लालच फर। विना गुण स्तुतिफी इच्छा करनेवाले पर कर्ज गुण विहीनोऽपि जनानतिस्तुति-, मतिग्रहान् यन्मुदितः प्रतीच्छसि । मुलायगोऽयोष्ट्रखरादिजन्मभि- विनाततस्ते भवितान निष्क्रय ॥ १८ ॥ मू-तू निर्गुणी होने पर भी लोगोंकी ओरसे चन्दन, स्तुति, आहार पानी ग्रहण करना आदि खुशी होकर बच्छता है, परन्तु स्मरण रखना कि भैंसा, बेल, घोडा, स्ट मा गधा भादि के जन्म धारण किये पिना कर्जसे तेरा छुट रान होगा वि-अधिकार प्राप्त किये विना जितनी वस्तुयें तू गोसे ले रहा है ये सब तुझे वापिस देनी पडेंगी । उनके कर्जका वहीसाता तुझे चुकता कर देना पडेगा । तू यह न झना कि तेरे वाम वेशको देख नियुगी होने पर भी से समझ कर लोग तुझे यन्दन करते हैं, तेरी सेवा पूजा हैं, खुशामद कर तेरे पैरों में पड़ कर मी तुझे [ ५२] और अपने कर्तव्यको प्रेम पूर्वक पालन कर । प्रसिद्धि या स्तुति कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि जो इच्छा मात्रसे प्राप्त होसके । वह तो गुण प्राप्त होने पर विना इच्छा किये भी प्राप्त हो जाती है, परन्तु गुण प्राप्ति बगैर ताजिन्दगी इच्छा करने पर भी वह प्राप्त नहीं होती । वास्तवप्ने योग्यता विना जो उसकी इच्छा करता है उससे वह कोसों दूर भागती है और जो उसे तुच्छ समझ कर आत्पविकाशी गुणको प्राप्त करने तत्पर रहता है इच्छा न करने पर भी वह उसके पैरोंमे आकर पडती है । इस लिये इससे सिद्ध है कि स्याति स्तुति पाप्त करनेकी इच्छावालको गुण मपादन करनेमें ही वत्पर रहना चाहिये। यदि सूक्ष्प दृष्टिसे देखा जाय तो यह सवाल पैदा होता है कि तू कौन है ? तू अनन्त जीवात्मराशिजें से एक व्यवहारी जीवाल्या है, उन अनन्त जीवात्माओमेसे अनेकानेक जीवा- त्मायें ससारमेऊच नीच जातियोपजन्म धारण कर अनेक चम- कारी कार्य कर पानी के बुलबुलेके समान पुन अपनेम्वरूपसे नष्ट हो दूसरी गतिको प्राप्त करती है । उनके किये हुये उन चम-- स्कारी कार्यासे ससारने किसकी कितने दिन प्रसिद्धि कायम रही है ? किसकी सदेव याद दास्ती रही है? इस अनादि अनन्त काल चक्रले न तो संदेव किसीकी कीर्ति या ख्याति नही है और न ही रह सकती है। यदि दूसरी अपेक्षास विचार करें तो तू साधु महात्मा है, सर्वन देव महावीर प्रमुका तू ज्येष्ठ पुत्र है, अर्थात् सर्वज्ञ देव कथित साधुश्रावक मार्गमे तूसाधु गार्गको अंगीकार करनेवाला है। सहावीर प्रमुका ज्येष्ठ पुत्र होनेके कारण उनके शासनका तू आधार भूत है । क्या सर्वज्ञ प्रमु महावीर कभी स्तुतिकी [५३] या अपनी कीर्ति र स्यानिकी इच्छा करते थे ? इन्द्रों द्वारा किये हुये उनके सल्फार महोत्सवसे या दशाणमद्रादि राजा महाराजाओके किये हुये उनके स्वागत पहोसबसे महावीर देवके मन पर क्या कभी भी कुछ असर हुई थी ? यदि नहीं तो तुझे मी तेरे उपकारी पूज्य नेताके प्रार्गका अनुकरण करना चाहिये । अनादि अनन्त ससारने परिभ्राण करते हुये इस प्रकारका सुअवसर पिलना सहादुर्लभ है, इस लिये प्रसिद्धि प्राप्तिके लालचको छोड कर गुण प्राप्त करनेका लालच कर। विना गुण स्तुतिफी इच्छा करनेवाले पर कर्ज. गुण विहीनोऽपि जनानतिस्तुति-, भतिग्रहान् यन्मुदितःमतीच्छसि । लुलापगोऽयोष्टखरादिजन्मभि- विनाततस्ते भवितान निष्क्रय ॥ १८॥ मू-तु निर्गुणी होने पर भी लोगोंकी ओरसे चन्दन, स्तुति, आहार पानी ग्रहण करना आदि खुशी होकर इच्छता है, परन्तु स्मरण रखना फि भैंसा, बैल, घोडा, कट या गधा मादि के जन्म धारण किये पिना कर्जसे तेरा छुट कारान होगा। वि-अधिकार प्राप्त किये विना जितनी वस्तुयें तू लोगोंसे ले रहा है वे सब तुझे वापिस देनी पडेंगी । उनके चस कंजका बहीखाता तुझे चुकता कर देना पडेगा। यह न समझना कि तेरे बाम वेशको देख निगुगी होने पर भी गुणी समझ कर लोग तुझे वन्दन करते हैं, तेरी सेवा पूजा करते हैं, खुशामद कर तेरे पैरों में पड कर भी तुझे , , [५२] और अपने कर्तव्यको प्रेम पूर्वक पालन कर । प्रसिद्धि या स्तुति कोई ऐसी वस्तु नहीं है कि जो इच्छा मात्रसे प्राप्त होसके । वह तो गुण प्राप्त होने पर विना इच्छा किये भी प्राप्त हो जाती है, परन्तु गुण प्राप्ति बगैर ताजिन्दगी इच्छा करने पर भी वह प्राप्त नहीं होती । वास्तवो योग्यता विना जो उसकी इच्छा करता है उससे वह कोसों दूर भागती है और जो उसे तुच्छ समझ कर आत्मविकाशी गुणको प्राप्त करने तत्पर रहता है इच्छा न करने पर भी वह उसके पैरोंमे आकर पडती है । इस लिये इससे सिद्ध है कि ख्याति स्वति पाप्त करनेकी इच्छावालेको गुण मंपादन करनेमें ही वत्पर रहना चाहिये। यदि सूक्ष्म दृष्टिसे देसा जाय तो यह सवाल पैदा होता है कि तू कौन है ? तू अनन्त जीवात्सराशि से एक व्यवहारी जीवात्मा है, उन अनन्त जीवात्साऑगसे अनेकानेक जीवा- त्मायें ससारमेऊच नीच जातियोमेजन्सधारण कर अनेक चम- कारी कार्य कर पानी के बुलबुलेके सपान पुन अपनेम्वरूपसे नष्ट हो दूसरी गतिको प्राप्त करती है । उनके किये हुये उन चम- कारी कार्यासे ससारने किसकी कितने दिन प्रसिद्धि कायम रही है? किसकी सदैव याद दास्ती रही है? इम अनादि अनन्त काल चको न तो संदेव किसीकी कीर्ति या त्याति रही है और न ही रह सकती है। यदि दूसरी अपेक्षासे विचार करें तो तू साधु महात्मा है, सर्वज्ञ देव सहावीर प्रमुका तू ज्येष्ठ पुत्र है, अर्थात् सर्वज्ञ देव कथित साधु शावक मार्गमे तूसाधु मार्गको अगीकार करनेवाला है। राहावीर प्रमुफा ज्येष्ठ पुत्र होनेके कारण उनके शासनका तू आधार मूत है । क्या सर्वज्ञ प्रमु महावीर कमी स्तुतिकी .
[५३] या अपनी कीर्ति क ख्यातिकी इच्छा करते थे ? इन्द्रों द्वारा किये हुये उनके सफार महोत्सवसे या दशार्णमद्रादि राजा महाराजाओंके किये हुये उनके स्वागत पहोसबसे महावीर देवके मन पर क्या कभी भी कुछ असर हुई थी ? यदि नही तो तुसे भी तेरे उपकारी पूज्य नेताके प्रार्गका अनुकरण करना चाहिये । अनादि अनन्त ससारनें परिभ्राण करते हुये इस प्रकारका सुअवसर पिलना सहादुलंम है, इस लिये प्रसिद्धि प्राप्ति के लालचको गेड कर गुण प्राप्त करनेका लालच कर। विना गुण स्तुतिकी इच्छा करनेवाले पर कर्ज. गुण विहीनोऽपि जनानतिस्तुति-, प्रतिग्रहान यन्मुदितः प्रतीच्छसि । लुलायगोऽयोष्ट्रखरादिजन्मभि- चिनाततस्ते भवितान निष्क्रय ॥१८॥ मू-तु निर्गुणी होने पर भी लोगोंकी ओरसे वन्दन, स्तुति, आहार पानी ग्रहण करना आदि खुशी होकर इच्छता है, परन्तु स्मरण रखना कि भैंसा, बैल, घोडा, या गधा मादि के जन्म धारण किये विना कर्जसे तेरा छुट कारान होगा ॥ वि-अधिकार प्राप्त किये बिना जितनी वस्तुयें तू कोगोसे ले रहा है के सब तुझे वापिस देनी पड़ेगी । उनके चस कंजका वहीखाता तुझे चुकता कर देना पड़ेगा। तू यह न समझना कि तेरे वाह्य वेशको देस निर्गुगी होने पर भी गुणी समझ कर लोग तुझे यन्दन करते हैं, तेरी सेवा पूजा करते हैं, खुशामद कर तेरे पैरों में पड़ कर भी तुझे [५४.] वे अपने घर ले जाते हैं और कष्टमे प्राप्त किया हुआ आहार पानी जो भक्ति पुरस्सर देते हैं वह तुझे यों ही मुफत मे पच जायगा । कदापि न पचेगा। हाँ यदि तू अपने अधिकार के अनुसार अपना कर्तव्य पालन करेगा तो बेशक तू उन वस्तुओंको ग्रहण करनेका हकदार है, अन्यथा भवान्तर से बैल बन कर भार वह्न करके, या घोडा बन कर वाहन साँचकर अथवा ट्रापका घोडा बन कर भूख प्यासादि अनेक कष्ट सहकर, या गधा भैंमा आदिका जन्म ले भार वहन करके भी तुझे यह कज अवश्य देना पड़ेगा। भवान्तर मे तुझे पूर्वोक तु खनय स्थिति प्राप्त न हो इस लिये गुणरहित स्तुति स्याविकी इच्छा न रस कर गुण प्राप्तिका प्रयास कर । स्तुति और ख्याति गुणोंके सामने तुन्छ है, उसकी कुछ कीमत नहीं, जिस प्रकार धान्य प्राम करने की इछावाले किसान को धान्य प्राप्तिका उपाय करने पर घास स्वत ही प्राप्त हो जाता है उसी प्रकार गुण प्राधिकार उपाय करनेसे स्तुति ख्याति तो स्वयं ही होने लगती है।। गुणेषु नोद्यच्छसि चेन्मुने ततः प्रगीयसे वैराप वन्दसेऽय॑से । जुगुप्सितां मेत्यगति गतोपित हसिप्यमे चाभि भविष्यसेऽपिवा ॥ १९ ॥ म-हे मुने ! यदि तू गुण प्राप्त करनेका प्रयत्न नहीं करता तो फिर जो तेरी गुणस्तुति करते है पूजा करते हैं, वन्दन करते हैं जब तू कुगति मे जायगा तब वे ही तेरी हसी करेंगे या तेरा पराभव करेंगे । . -- .-.
[५५] वि-दुनियामे सर्वत्र गुणाकी ही पूजा सेवा होती है, गुणोंकी ही स्तुति स्याति होती है और यही शोभा मी देता है शासमें कहा है कि-गुणा सर्वत्र पून्यन्ते नच लिड्नास कटाचन" गुणहीन मनुष्य अपनी महस्वाकाक्षाके लिये कदाचित माले मनुष्योंसे गुणस्तुति पूजा सेवा प्राप्त कर भी ले तो वह उछ शोभा पात्र नहीं गिनी जाती और न ही उसकी कुछ कीसत होती है, बल्कि भवान्तर में उससे बडा कष्ट उठाना पडता है । कदाचित् अपनी वाफचतुराईसेवाचालतासे या वाद्याडम्बर से इस लोक मे भोलभाले मनुष्यों के दिल पर अपनी छाप डाल कर याने उन्हे ठग कर मान सन्मान प्राप्त कर ले और अपने दुराचरणोंका पडदा न उठने दे, किन्तु भवान्तर मै तो उसका वह दम्भ कदापि नहीं चल सकता । वहाँ पर उसकी चतुराई पर पानी फिर जाता है, अपने किये कर्सका फल वहाँ पर रिसी भी रूपो अवश्य भोगना पडता है।। गुणरहित चन्दनपूजनसे स्वहित नाश । दानमाननुति वन्दनापरै, मदिसे निकृतिरञ्जितै जनै । नत्ववैपि सुकृतस्य चेलव., कोऽपि सोऽपि तव लुठ्यते हि तैः॥२०॥ म्तेरी कपट जालसे रजित हुये लोग तुदो दान दे, नमस्कार करें तब तू खुशी होता है परन्तु तुझे यह मालम नहीं कि तेरे पास यत्किंचित् सुकृत होगा तो वे उसे भी लूटते है। हुये अशुभ . भ S
विन्यायवेश, असत्योपदेश और ध्याउम्बर करके
तू कपट जाल फैलाता है । इस जालो अनजान पक्षियोंक
समान विचारे भोले भाले सनुप्य भूलसे फम जाते हैं और
फिर वे तुझे दान सानादि सर्व वस्तुये देकर सतोपित रखते
है। इससे तू बडा खुशी और गर्वीष्ट होता है। परन्तु यह
तेरी यडी मारी पूर्खता मी भूल है । क्योंकि ऐसा करनेसे
कदाचित् तेरे पास कुछ थोडासा पुण्याश होगा तो वह मी तू
सतप कर रहा है और आगे के लिये केवल पाप कर्प बन्ध
के सिवा अन्य कुछ नहीं करता। तुझे इस अशुभ
कपका भवान्तरो क्या फल मिलेगा तू इस पर कुछ विचार
करता है ? अज्ञानतावश तू दूसरोको अपनी स्वार्थी जालमे
फसा कर सहर्ष यह विचार करता है कि पेरी जाल से पक्षी
खूब फसे है। किन्तु तुझे सरण रखना चाहिये कि वे
पक्षी जिन्हे तू फसा कर खुशी होता है और मन ही मन
अपनी कपटपूर्ण चतुर्राईको सराइता है निर्दोप है, मद्रिक
वे शुम मावनासे ही आकर तेरी सायावी जाल से
अतएव अवसर पाफर वे तो निकल भी जायँगे परन्तु
जब वे निकल जायेंगे तब तुझे घडा भारी नुकसान होगा।
सेरे पास जो पक्षियोको फसानेकी साधन शक्ति है यह भी नष्ट हो
जायगी । इस प्रकार इस तेरी कपटपूर्ण प्रवृत्तिसे तुझे लामके
बदले हानि ही होती है। इसके उपरान्त तुझे तेरी कपट
प्रवृत्तिको ढक रखने के लिये रातदिन अनेक प्रकारके प्रपच
रचने पड़ते हैं। इस लिये इन सब यातो पर तुझे भली प्रकार
विचार करना चाहिये ॥
स्तुतिका रहस्य गुणार्जन।
भनेद्गुणी मुग्धकृतेन हि स्तवै-
न ख्याति दानार्चन वन्दनादिभिः ।
.
। [५७] विना गुगानो भवदुःख संक्षय-, स्ततो गुणानर्जय किं स्तवादिभिः॥२१॥ म्-मुग्ध मनुष्योंकी की हुई स्तुतिते कोई गुणी नहीं बनता, एव प्रत्याति प्राप्त करनेसे अथवा दान, पूजा, वन्दना माप्त करनेसे भी कोई मनुष्य गुणवान नहीं होता । गुण विना संसारके दुख का नाश नहीं होता, अतएव महात्मन् ! गुण प्राप्त कर, स्तुति वगैरहसे क्या लाभ है ? ॥ वि-ससारमें सपस्त प्राणधारी दुखका नाश करने और सुख प्राप्त करने की इच्छा रखते हैं । किन्तु मनुष्यको यह पात परावर लक्ष्यों रखनी चाहिये कि जिस सुखके पीजे मुंह फाड कर दु खराक्षस सडा हो उसे शातकार वास्त- विक सुख नहीं कहते । परन्तु जिस सुसके प्राम होने पर फिर कमी दु खका दर्शन ही न हो, आत्ला सदाकाल सुखासीन रहे उसे सया सुस साझना चाहिये। वह वास्तविक सम्मा मुस सोश प्राप्त होने परहोलिना है। जितने ससार सम्बन्धी सुख है उनो छिप कर दु ख रहता है । अज्ञानतावश अनुभ्य उसे देख नहीं सकता, इसी कारण वह मोम प्रातिके उपायोंसे पराउन होकर सासारिक सुवोंकी और दोडता है । अतएक अज्ञानको दूर कर मचे सुग्वका निदान मोझको प्राप्त करने के लिये मनुष्यको असाधारण गुगार्जन करना चाहिये । सप्ता- रमें ऐसे भी बहुत से सनुप हैं जो बाद्यवृत्तिसे सोझ प्रातिक पथ पर आरूढ हो कर भी अज्ञानताके कारण उसके रहस्य- को न समझनेस गुगार्जन करनेको ओर ध्यान तक नहीं देवे। वे मात्र पुग्ध प्रागियों द्वारा की हुई अपनी स्तुति प्रशंसा सुन- जाते है और सिर्फ उतनी ही प्राप्तिसे अपने आपको कर फूल , [५८] कृतकृत्य समझ लेते हैं। कोई व्यक्ति अपने मनके यह कह- नेते कि महाराज ! आप तो सगता सागर है या आपश्री तो गौतम प्रमुके समान गुणनिधि हैं कदापि गुणधान नहीं हो मकता । हा जो उसका प्रतिपक्षी वर्ग है यदि वह भी सचे दिलसे उसकी स्तुति प्रशंसा करता हो तो अवश्यमेव यह मानना पडेगा कि उसो जरूर गुणोंने पास किया है। गुगोंका अभाव होने पर गुणी तरीके प्रसिद्ध होना, गुणवान योग्य चन्दन पूजनकी इच्छा करना यह सब कुछ आत्माको मलीन करनेवाला है। क्रोध, मान, माया, लोभको जीतना पन पर सयम प्राप्त करना, ब्रह्मचर्य प्रत पालन करना, अस- त्यका परित्याग करना, निस्पृहता धारण करना, न्याय वृचिसे जीवन गुजारना और शुद्धव्यवहार वगैरहको हृदयमें दृढ़ तया जमा रखना यह सब कुछ आत्मविकास और आत्मोन्नतिका का है। इस मार्गम चलनेमे ही आत्मोसार हो सकता है सन्यथा नहीं। अध्येपि शास्त्रं सदसद्विचित्रा- लापादि भिस्ताम्यसि वा समाय। येषा जनानामिह रञ्जनाय, भवान्तरे ते क्व मुने क्व च त्वम् ॥२२॥ म्हे मुने ! जिन मनुष्योंका मन रजन करनेके लये तू अच्छे और बुरे अनेक प्रकारके शास्त्रोंका अध्यायन अता है और माया ( कपट ) पूर्वक विचित्र प्रकारके भाषणों द्वारा (कण्ठशोषणादि) खेद सहन करता है भवान्तरमें वे रुदाँ जायेंगे और तू कहाँ होगा ? ॥
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[५९]
घि-यदि यो कहा जाय कि हम तो सब कुछ जनरंजनार्थ
ही करते हैं, लोगोंको रिझानेके लिये ही व्याख्यान देते है या
निमित्त शाल, ज्योतिप शास, सामुद्रिक शालादि पढ़ते हैं,
अथवा मायायुक्त बर्ताव और वचन रचना रसत है, हमें तो
इसीसे आनन्द प्राप्त होता है, आगे जो होगा सो देसलेगे। तो
तुझे कहा जाता है कि भाई । तेरी यह लोकरजन पालीसी कब
तक चलेगी? तू कढापि जीवन सग्राममे इस काप्टकी तल्वारस
विजय प्राप्त नहीं कर सकता । कदाचित इस वक्त पचीस
पचास भोले भद्रिक मनुष्य तेरी स्तुति प्रशसा करे परन्तु
उससे तेरी आत्माको क्या लाभ ? तेरे इस वनावटी मुलम्मेके
आचारका झोल उतर जाने पर तेरी क्या दशा होगी? या
तेरी मृत्यके बाद लेरे विपयमे लोगोके क्या सयाल पैदा होगे?
यदि कथंचित् तूने अपने मुलम्पेका झोल न भी उसरने
दिया और इस तुच्छ जिन्दगी पर्यन्त भी तु अपने भक्ती
द्वारा अपनी स्तुति सुनता रहा तो तेरी मृत्युके बाद लोग तेरी
स्तुति करते हैं या निन्दा यह तू कहाँ सुनने आयगा ? इम
लिये तुझे इन सब बातों पर विचार कर अल्प जीवन सम्बन्धी
तुम्छ मान बडाईकी आकाक्षा जंड कर सथे परमार्थी लाभ
लिये प्रयत्न करना चाहिये और सास कर अपने विचार
उभार और आचारको एक रमनेके प्रयत्नसे विशेष ध्यान
रसना चाहिये। ऐसा करनेसे तेरे इहलोक तथा परलोक दोनो
ही मुधर सकेंगे । इस लोकमें तू मदाके लिये अपनी पवित्र
अचल कीर्ति रम जायगा और परलोकमे अपनी आत्माको
सुखासीन वनायगा।
यह बात हम प्रथम लिस चुके हैं कि मसाग्म मानकी
माना अधिक होने के कारण समस्त प्राणियोमे अहकारता देख
।६० पड़ता है । अज्ञानतावश ससारी जीवोंको लोक सत्कार बडा ही मीठा-पधुर लगता है। मनुष्य स्वभावमें अपूर्णताके कारण प्राय सदेव ये तरगें उठा करती है कि सब लोग उसे सन्सानकी दृष्टि से देखे । इसी लिये जब कभी उससे कुछ श्रेष्ठ कार्य बन जाता है तब वह उस अपने किये स्वल्प प्रशस्त कार्यको जनता प्रकाशित करनेके लिये भातुर रहता है । अखबार पत्रोंो उसे महानरूप देकर प्रगट करता है । उस प्रशस्त समाचारको सुन कर जनता उस मनुष्यकी प्रशसा करती है, उसके किये हुये शुभ कार्य की अनुपोदना करती है और शुभ कायकी अनुमोदनासे अपनी आत्माको पवित्र बनाती है। किन्तु उस शुभ कार्यका कर्ता प्रजासे अपनी एव अपने किये कार्यकी प्रशसा सुन कर फूला नहीं समाता । क्यों कि वास्तव में जनहित बुद्धिसे नहीं किन्तु जनताकी स्तुति प्राप्त करनेके हेतुसे ही वह कार्य किया गया था। जितने प्रपाणपे तुपने अच्छा कार्य किया हो यदि चतने ही प्रमाण तुम्हारी स्तुति सुननेकी इच्छा रहती हो तो भी वह किसी अश योग्य गिनी जाय, परन्तु जरासा कार्य कर उसे पर्वतके समान महान स्वरूप जन- ताके समक्ष प्रगट कर उससे महाकीपती प्रशसा प्राप्त करके खुश होना, अपने आपको उस प्रशसाके योग्य सपझना यह आत्माको मलीन करनेवाला और भवान्तरमें आत्मविका- सकी हानि करनेवाला है। यदि इस बात पर विचार किया जाय कि अपना आदर्श क्या है और उस आदर्शको प्राप्त करनेके लिये अपना कर्तव्य क्या है, तो अवश्यमेव यह जान पडेगा कि उस शादर्शके सामने जनताके स्तुति प्रशसादि लोक
[६१]
है।
सत्कार मुछमी दम नहीं, उसकी कुछ फीत ही नहीं। तब
सिर दस किसो है और किसकी कीरत है ? योग्यता प्राप्त
करने तथा अपने कर्तव्यको प्रेापूर्वक पालनों दम है,
गुणोंकी कीमत है और उनकी प्राप्तिके प्रयास आनन्द है।
क्योकि गुणार्जन वृत्ति शान्त रहती है । गुण प्राप्तिके विचा-
रमें भी आनन्द है, गुण प्राप्त होने पर उसके अनुमवमें तो
भविष्यकाल मम्बन्धी भी आनन्द साया हुआ है । गुण-
सरह यह एक महान् राजा है । स्तुति प्रशसा या लोकस.
त्कार उसका दास-गुलाप
जिस प्रकार सेती करने वाला किसान धान्य प्राप्तिका
आदर्श सापन रस कर खेत जोतना, भूपि शुद्ध करके
उस बीज बोना, अकूर पृटने पर सर्व प्रकारसे उसके
रक्षणका ध्यान रखते हुये उसकी वृद्धिके उपायों लगे रहना
आदि प्रवृत्ति धाम मासिकी ओर लक्ष्य न देकर करता है
और तथापि धान्य प्राप्तिके साथ ही उसे घास प्राप्ति भी हो
ही जाती है । वस उसी प्रकार सयप धारी महालाको
गुण प्राप्तिके अपने उच्चादर्शको प्राप्त करनेके लिये सदैव
आपने कर्तव्य पथ पर दृढ रहना चाहिये । तत् प्राति प्रवृत्ति
मतत प्रयास करना चाहिये । उसकी प्राप्तिके साथ ही स्तुति
प्रशंसादि- लोकसत्कार रूप पासफी प्राप्ति तो स्वत ही
हो जायगी।
परिग्रह चेदव्यजहा गृहादे,
स्तत्किं नु धर्मोपकृतिच्छलात्तम् ।
करोपि शय्योपधि पुस्तकादे---,
गरोऽपि नामान्तरतोपि हन्ता ॥२३॥
[६४]
मू-हे मूढ ! धर्मके साधनको उपकरणका नाम
मात्र देकर स्वीकृत किये हुये परिग्रहसे तू क्यों खुश होता
है ? क्या जानता नहीं कि यदि जहाजमें सुवर्णका भी मति
भार भरा हो तो वह भी बैठनेवाले मनुष्यको शीघ्र ही
समुद्र में डुबो देता है।
वि-ससारलें पोद्गलिक वस्तुओंका स्वरूप प्राय
मोहक होता है । ससारके प्राणी बहुधा वा सौन्दर्यप्रिय ही
होते हैं, अतएव प्रयप तो इन वस्तुओंकी लालचका परित्याग
ही करना सहा कठिन है और यदि कभी कोई प्राणी किसी
शासगिक चैराग्यसे उन्हें त्याग भी दे तो उस परित्यागको
उसी भावनासे जीवन पर्यन्त कायम रखना यह सचमुच
आधुनिक सायमें लोहेके चने चारनेके समान है । जिस
पोत्साह और वैराग्य भावसे जिस लालचका आज परित्याग
किया है उस उत्साह और वैराग्य भावको जीवनके हरएक
असंगो काया रसना यदि असमव नहीं तो अतिदुस्कर
अवश्य है । क्योंकि समुद्रकी तरगोके सपान निरन्तर
चंचलताको धारण करनेवाली सानसिक वृत्तिको सदैव सम
राना यह अनुष्य स्वभावसे वाहिर है । इसी कारण बहुतसे
प्राणी दु खगर्भित या सोहगर्मित भणिक वैराग्यमें आकर
संसारके स्थूल पदार्थाका परित्याग कर साधु मुनिराज बन जाते
हैं किन्तु जीवन पर्यन्त उस पवित्र पदका चे निर्वाह नहीं कर
सकते । आधुनिक साय जिन वस्तुओका परित्याग किया
जावा है उन्हीके प्रसगाते रह कर सयप याना व्यतीत
करनी परती है। ज्ञान नै ग्यका अभाव होनेके कारण उन
छालाको देख मन कमजोर हो जाता है और उन द्रव्यादि
[५] लालचोको किसी न किसी धार्मिक बहानेसे अपने अधिकारम रख रखा कर अपनी उस प्रतिज्ञा भ्रष्टवाली खासियतको पूर्ण किया जाता है। परन्तु सारण रखना चाहिये कि जिस वस्तुका मनसा वचसा तथा कर्मणा निरावधि जीवन पर्यन्त परित्याग किया है उसे धार्मिक बहानेका रूप देकर या अन्य किसी प्रशस्त वहानका रूप देकर अपने स्वाधीनमें सग्रहित करना यह वमनकृत वस्तुको चाटनेके समान है और इससे वह मुनिराज अपनी प्रतिक्षाओके पलको सर्वथा हार जाता है। कई दफा तो परित्याज्य वस्तुओंको धार्मिकताका रूप देनेसे वे साधुके लिये परित्याज्य हैं या नहीं इस बात पर जरा भी विचार नहीं किया जाता । अपनी असयपी वृत्तिक अनुसार अपनी हरकते दूर करनेका विचार अवश्य किया जाता है। बल्कि अपनी अनुकूल प्रवृत्तियोपे ही वर्म माना और मनाया जाता है । इस प्रकार मनुष्य अपने आत्मवि. कासके सन्मुख होकर भी मान मानसिक निलताके कारण अपने अमूल्य मानव जीवनको हार जाता है ।। यहः कपाय कलि कर्मनिनन्य भाजनम्, स्यु पुस्तकादिभिरपी हितधर्मसाधने । तेषां रसायन वरैरपि सर्पदामय- रात्मनागदहते सुखकत्तु किं भवेत् ॥ २५ ॥ जिनके द्वारा धर्मसाधनको इच्छा रक्ली हो उस प्रकार पुस्तकादिसे भी जो प्राणी पाप, कयाय, केश और कर्मबन्ध करते है तो फिर उन्हें सुखका साधन क्या हो सकता है । जिस मनुष्यकी व्याधियाँ उत्तम प्रकारके रसाय- ५ नौसे भी उल्टी बढ़ती ही जाती हों उसे व्याधिकी शान्तिके लिये क्या साधन हो सकता है । वि० सूत्र सिद्धान्त पुस्तकादि यह प्रभुके उपदेशका सरह है । इस पचा कालने प्रमुक उपदेश वाक्योंका समूह आत्म- कल्याणका महान् साधन है । इन धर्मग्रन्योंसे ही मनुष्य अपने कर्तव्याकर्तव्यको जान सकता है । बल्कि मोक्ष प्राप्ति जो गहान् पूर्व पुरुपोंने चित्तकी निर्विकल्पता पर खास कर विशेष जोर दिया है वह भी पुस्तकोंके वाचन सनन निदि- ध्यासनसे ही प्राप्त हो सकती है । अर्थात् आत्मविकास पर लिये पुस्तक अद्वितीय साधन है । परन्तु खेदकी बाव है कि आज उस आत्सकल्याणके साधनसे ही बहुतसे मुनिराज प्रत्युत अपनी आत्माको सलीन कर रहे हैं। जिन्हें अपनी प्रतिदिनकी आवश्यक क्रिया भी पूरे तौरसे नहीं आती वे बिचारे मुग्धमुनि पन्नणा, ठाणा, मगवती आदि महा- गहन विषयक अन्योंका सग्रह करते हैं । कितनेएक साघु तो पुस्तक समहकी धुन में अपने मूल गुणोको भी भूल जाते है । जिन सस्थाओगेसे वे प्रथ मिलते हों और उनकी तरफसे प्रथम इस आशयसे कि इन सहान धर्मप्रथोंका विद्वान गीतार्य साधुओंके लाम लेने सिवा लोमके वश मुग्ध साधु मगवा कर दुरुपयोग न कर सके, यह सूचना प्रकाशित हो चुकी हो कि दश रुपये एडवसके पेस्तर भेजनेसे गल कीम- तसे सब प्रथ मिल सकेंगे तो गीतार्य या उन अन्योंको पढ- नेकी योग्यता धारण करनेवाले तो अभी विचार ही करते होगे इतनेगें तो निसटु मुनियोको ओरसे उन संस्थाओंको डरल एडवेंस पहुँच जाते हैं और सदाके लिये उन्हें डबल [६७] डपल नकलें भेजने के लिये उनका दफतरसेनापदायल हो जाता है।सन्छीसे साहित किये हुए उम पुस्तक साइका कीडॉकी खो- राक बननेके सिवा अन्य कुछ भी उपयोग नहीं होता। मासे सग्रह किये हुए पुस्तक यदि कोई योग्य साधु या विद्वान पढ- नेके लिये याचना करे तो अनेक प्रकारके मिथ्या बहाने निकाल कर दूसरोंको नहीं दिये जाते । जिस प्रकार युद्धि- रहित धनी मनुष्य अपनी धनसपत्तिका न तो म्नय ही और न दूसरोको लाभ देकर जमीन गहरा गडा सोट कर उसे उसमें दायता है और उस सपय यह प्रार्थना करता है कि हे प्रमु । इस धन में दूसरा भले ही मिलाऊ किन्तु जिन्दगी भर इसे बाहर न निकालू तो अच्छा हो । यस इसी प्रकार आज प्राचीन साहित्य धनभाण्डार अनेक जगह समातीतालोसे बन्द किये हुए अलमारियों एव सदूकोंमें पड़ा सड रहा है । किन्तु जिन महात्माओंके सातहत उस आत्मविकासके कारणभूत पवित्र साहित्यका वह दुरुपयोग हो रहा है यदि उनसे उस साहित्यका उद्धार करनेके लिये गागा जाय तो वे साफ इन्कार करते हुए जरा भी न हिचकिचायेंगे । इमका प्रनाल कारण सिवा सुच्छकि अन्य कुछ भी नहीं। आज इस ज्ञानोदयके समययें माधु मुनिराजोको इस प्रकारके सुभीते प्राप्त हैं कि वे जिस गारंप, जिस शहर में और जिस देश में जायें वहाँ पर ही उन्हें पढनेके लिये पुस्तक मिल सकते हैं। परन्तु ऐसी परिस्थिति होने पर भी मुनिपहा- राज पुस्तकोंकी सदृके जगह जगह रेलमें चिंचवाये फिरते हैं। जिस शहर या जिस गावों चातुर्मास करते हैं वहास जहाँ पर चातुर्मास करना होता है वहाँ पर रेल्वे द्वारा पुस्तकोंकी दश पाच सदूके तो अवश्य आती हैं । प्रतिवर्षकी इस नियासे Z 1 , यह परिणाम निकलता है "दमडीकी बुढिया टका सिर मुडाई' अर्थात् इतनी कीमतके वे पुस्तक भी नहीं होते जितनी कीमत उन्हे मगवाने और भेजनेमे लग जाती है। परन्तु जब तक उन पुस्तको सम्बन्धी ममत्व बुद्धि दूर न हो तब तक उनकी कीमतमे भी डबल तवल रेल्वे सर्चकी ओर किसकार ध्यान जाय ? जब इस प्रकार धर्मसाधनोका दुरुपयोग कर अपनी आत्माको गव अपने अनुयायी समाजको हानि पहुँचाई जाती है तब फिर उपाय ही क्या किया जाय ? अर्थात् जब आत्म- कल्याणके साधनो द्वारा ही आत्ममलीनता प्राप्त की जाय तब संसार समुद्रसे पार होनेका अन्य कोई मार्ग ही नहीं रहता ।। रक्षार्थ खलु संयमस्य गदिता, येऽर्था यतिना जिन-सि. पुस्तकपात्रक प्रभृतयो, धर्मोपकृत्यात्मका । मुर्छन्मोहवशात्त एव कुधिया, संसारपाताय धिक, स्वं स्वस्यैव वधाय शस्त्रमधियां, यद्दष्पयुक्त भवेत् ॥ २६ ॥ मू० तीर्थकर भगवानने वस्त्र, पुस्तक और पात्र वगैरह धमोपकरणके पदार्थ सयमकी रक्षाके लिये साधुओंको वत. लाये है । तथापि मद बुद्धिवाले मूढ मनुष्य मोहमे विशेष वशीभूत होकर उन्हें ससारमें डालनेवाला साधनभूत बनाते है, उन्हें धिक्कार है । मूर्स मनुष्य द्वारा अकुशलतासे चलाया हुआ शस्त्र उसके स्वत के विनाशका निमित्त बनता है। वि-यह हकीकत मूलमें ही विशेप स्पष्ट शब्दोसे है । यदि यह मालूम हो जाय कि, मी, यही परिग्रह है तो फिर इस विषयको विशेष चर्चनेकी आवश्यकता नहीं रहती। वास्तवमे ।
[६९] सत्य बात तो यह है कि मनुष्य अपने कर्तव्यको भूल कर मोहविवश हो दुस गर्मित पढाथोंकी प्राप्ति में सुरस मानने लग जाता है। परन्तु उसे अज्ञानताके कारण यह मालूम नहीं होता कि ससारके इन विनश्वर पदाथोंकी प्राप्ति नहीं किन्तु सतोपमें सुख हा "सतोप एव पुरुपस्य पर निधानम्" स- न्तोपीनर सदा सुखो,इत्यादि वाक्योंसे सुसका पूल सतोरही होता है । परन्तु मनुष्यका स्वभाव ही ऐसा है कि वह बाद लालचोमे पड कर गल स्वरूपको न सपझ कर समारके विनश्वर पदार्थोके ममह करने ही सुसकी आशा रख कर जीवन पर्यन्त इधर उधर भटका करता है । यह बाघ लाल- चान फस कर अपने जीवनको उच्च और पवित्र बनानेवाली की हुई प्रतिज्ञाओको भी भूल जाता है । इस समार समुद्रमें जीवन जहाजको ले उतर पडना तो रडा सुगप और महज है, लेकिन अनेक प्रकारके लालचरूप विनोंका सामना कर के बगनर सीधे मार्गसे उस पार तलक लेजाना पडा ही कठिन काम हे । बडे बडे त्यागी वैरागी महात्माओंका भी इस महा भयकर समुद्र में जहाज डूब गया है। कोई विरला ही इस समाररूप महासागरके इस विपन मार्गको तय कर उस पार पहुँचता है । इस लिये महात्मन् । तू भी आज इम महा भयकर समार सागरसे पार होनेके लिये सर्वज्ञ देव- कथित सयमरूप जहाजका आलम्बन ले इसमें कूट पडा है। अतण्य तुझे सदैव बडा सावधान रहनेकी आवश्यकता है। जिस मार्गमे ले जानेका तूने प्रतिज्ञा की है यदि बरावर उसी मार्गमे अपने जीवन जहाजको ले जायगा तो अवश्य तू इस महासागरके उस पार अपने इष्ट स्थान पर पहुँच सकेगा और यदि प्रमाटके वश हो जरा भी इस मार्गसे इधर उधर - - , [७०] हुआ तो समझ लेना कि तेरा जहाज इस महासागरमे ही दूव जायगा और फिर तुझे कोई सहाय करनेवाला मी न मिलेगा। सयमोपकरणच्छलात्पराम् , भारयन् यदसि पुस्तकादिभिः । गोखरोष्ट्रमहिपादिरूपमृत, तच्चिर त्वमपि भारयिष्यसे ॥ २७ ॥ मृ० सयमोपकरणके बहानेसे तू पुस्तक वगैरह वस्तुओंका भार दूसरों पर लादता है, परन्तु वे बैल, गधा, ज्ट, भैसा आदिके रूप धारण क्रा कर चिरकाल पर्यन्त तुझसे भार बहन क्रायेंगे। वि-सयसके उपकरण ग्रहण करनेका उद्देश भूल जानेके कारण उन पर समत्व होनेसे मुनिराज उन वस्तुओका अति- संग्रह करने लगता है । चारित्रके उपकरणों के बहानसे ममत्व वश गृहस्थोंसे अपनी उपयोगितासे अधिक वत, पात्र, पुस्तकादिका मग्रह कर लेता है और जब विहार करनेका समय आता है तब उन वस्तुओको साथ लेचलनेके लिये गाडी वगैरह की जरूरत पड़ती है। इससे अपने निमित्त दूसरोसे मार उठवा कर उन्हें पीडा पहुँचानेका प्रसग आता है और उन उपकरणोंकी मासे परिप्रहरूप दृपण लगता । है मो जुदा। जिस सपय मुनि सुन्दरसूरिमहाराजने इस ग्रन्थकी रचना की है उस समयकी परिस्थितिका बरावर,अनुभव न होनेके कारण यह कहा जा सकता है कि उस मसबसे हर- एक जगह वय, पात्र, पुस्तकादि सयमीय उपकरणोंका [१] मिलना मुनिओंके लिये दुर्लम होगा, परन्तु आज तो हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं कि इस समय इस प्रकारका मुभीता है कि जैन मुनिराज जहाँ पधारते हैं वहाँ ही घसा, पात्र, पुस्तकादि धपिकरण अनायास ही मिल सकते हैं, तथापि मोहके वश होकर हमारे पूज्य मुनिराज हजारों लाखोंके पुस्तक खरीद कर अपने नामाकित सि. उन पुरतको पर लगा कर अपने नामके माण्डार तैय्यार कराते हैं । चातुरमास पैठते सपय डेढ दो वर्ष के लिये काफी हो इतने बढियासे बढिया बारीक और बहुमूल्य कपडोंकी पोटलिये चीटिये वाव रसते हैं । मायॉकी जोड एक तोसदैव पास रहती ही है, एक दो और भी चातुर्माससे नवीन रग कर तैयार करके रसली जाती हैं। प्रात ओर सध्या कालके समय शरीरके सस्पर्शमे अपकायके जीनोंका विनाश न हो इस लिये उस सपय एक साधारण उनी चरा रखनेके बदले आज ५०-६०-१००-१२५ रुपये तकके अलवान-सुफेद दुशाले रसनेपे आते हैं । यह सब कुछ मोह विवश नहीं तो और इसका क्या कारण है ? विचार करना चाहिये, कि इस प्रकारकी आचरणामोसे अपने आपको शुद्ध मयपी-मचे माधु माननेवाले उस पवित्र साधुपदसे कितनी दूर है । अव सचा साधुपट प्राप्त करनेकी इन्छा वाले सयगीको चाहिये कि जितने अपने सबका निर्वाह हो सकता हो और जोसयसके उपयोगी वस्तु जगह ज- गह मिल सकती हो उसे उपयोगप्ने आवे उससे जरा भी अधिक अपनी मालकीयतकी ले कर न रसना, ताकि उसके रमणकी चिन्ता क्या दूसरोंसे अपने साथ उठवानेके पापा पडना न पडे।। वसपानतनुपुस्तकादिनः, , शोभया न खल्लु संयमम्य सा।
[७२। . , आदिमा च ददते भवंपरा, मुक्तिमाश्रयतदिच्छयैकिकाम् ।। २८ । । मू० वस्त्र, पात्र, शरीर या पुस्तकादिकी शोमासे सयमफी शोभा नहीं होती। प्रथम प्रकारकी शोभा भववृद्धि देती है ओर दूसरे प्रकारकी शोभा मोक्ष देती है, अतएव दोनों से जो तुझे पसद हो उस एकका आश्रय कर, किंवा वस्त्र पात्रं पुस्तक शरीर वगैरहकी शोभाका परित्याग कर ॥ वि-शोभा दो प्रकारकी होती है। एक तो आत्मीय शोभा और दूसरी अनात्मीय । आत्पीय शोभाको अभ्यन्तर और अ- नात्मीयको बाह्य शोभा कहते हैं। आत्मीय गुणोंका विकाश कर- नवाली शुभ प्रवृत्तिकी ओर दुर्लक्ष कर मात्र वस, पात्र, शारीरिक शोभा वगैरहको बाह्य शोभा कहते हैं और शरीर ढकनेके लिये चाहे जैसा फटा पुराना या मोटा वस्त्र धारण कर तथा उस- पर सूक्ष्म ममत्व भी न धारण कर और वन सके उतना अल्प वसमे निर्वाह करनेकी वृत्ति रख कर, शरीर यह एक आलीय गुणोंके विकासका साधनभूत हे अतएव इसे टिका रखने के लिये भोजन ग्रहण करनेकी आवश्यकता है, तदर्थ नवा पुराना चाहे जेसा पात्र हो इस भावनासे निर्मपत्वतया जैसा मिले वैसा पात्र रग्ब कर, शरीर सम्बन्धी किसी भी प्रकारका मोह ममत्व न रप कर मात्र आत्मीय गुणों के विकासार्थ दत्त चित्त होकर शुभ प्रवृत्ति करना इसे अभ्यन्तर शोमा कहते हैं । ससारमें परिभ्रमण करानेवाली बाह्य शोभाका परित्याग कर अभ्यन्तर शोभा प्राप्त करना साधु मुनिराजका परम कर्त- व्य है । भावना सहित सतरह प्रकारका सयात या चरम सत्तरी
[७३]
और करण सत्तरीका पालन करनेसे अभ्यन्तर शोमा प्राप्त की
जाती है। साथपे यह भीध्यान रखना चाहिये कि जहॉपर बार
शोमा प्राप्त करनेका प्रयत्न कियाजाता है वहाँ पर अभ्यन्तर
शोभा प्राप्त हो ही नहीं सकती, अतएव अभ्यन्तर शोमा प्राप्त
करनेके लिये चाह्य गोमाका परित्याग करना ही चाहिये ।
फितने एक व्यवहार दृष्टिवाले कहते हैं कि ज्ञान, दर्शन,
चारित्रके उपकरणोको परिग्रह नहीं कहा जा सकता। इस
पर जग विचार किया जाय तो स्पष्ट मालूप होगा कि ज्ञान,
दर्शन, चारित्रके उपकरणोंको यदि सयप साधनके तौर पर
अगीकार किया जाय और वे भी आवश्यकतानुसार हीरखो
जायें तो वह परिग्रह नहीं हो सकता, उससे परिमहजन्य
दोप नहीं लग मकता । किन्तु जर सयपमाधनकी दृष्टि दूर कर
मात्र मोहविवश उनका सग्रह किया जाता हो तो अवश्य वे
ज्ञान, दर्गन, चारित्रके उपसरण भी परिग्रह जन्यदोषसे
दूपित करते हैं। उन वस्तुओं पर साझी भूतपनको दृष्टिमे
उपरान्त मालिक पनकी दृष्टि होते ही वे परिग्रहका रूप धारण
कर लेते हैं । ज्ञान दर्शन चारित्रके उपकरण सयमको पुष्टि-
कारक होनेके कारण साधुपनका रक्षण करनेके लिये, मोद
सुभटको पगम्त नेके लिये तौर पर प्रहण किये
जाते हैं, इमसे विपरीत यदि वे ही साधन साध्यकी हानि
करनेनाले, सयपका विनाश करनेवाले हो जायँ तो फिर
साध्यके सिद्ध होने की कोई समावना ही नहीं रहती । यद्यपि
घरवार, वन धान्य, स्त्री वगेरहका परित्याग करना बडा
कठिन काम है, तथापि इन सर्व वस्तुओंको त्याग कर वक्ष,
पान, पुस्तक वगैरह धर्पोपकरणों पर पपत्य भाव रखना
यह बडी मारी मानसिक निर्मलता है और इसके परिग्रहसे
[७६] मार्गका आश्रयी कला कर लोगोसे तयोग्य मान सन्मान और अनेक प्रकारकी वस्तुयें ग्रहण करता है, उसका प्राप्तव्य- स्थान उसकी कल्पित की हुई मजिलसे सकडा कोस दूर होता जाता है। अर्थात् उस मुनिका जो अपने अगीकृत मार्गकी कठिनाइयोसे मुह चुराता है, भवभ्रमण अधिक होता जाता है। जिससे नवीन काँका आगमन रुकता हो उसे शास्त्र कार सवर कहते हैं। आत्मस्वभावसे विपरीत विभाव दशामे मनोवृत्ति बहुधा अधोमार्गमे ही गमन करती है, क्योंकि मनोवृत्ति पर विशेपत राग द्वेपादिका ही अधिकार होता है । इस लिये प्रतिकूल सयोगोंके उपस्थित होने पर मानमिक वृत्तिको समान रसने के लिये राग द्वेषादि आन्तर शत्रुओं पर समय प्राप्त करना, आत्माको हानि पहुँचानेवाले उनके कार्यको रोकना यह सवरका कार्य है और विशेषतः वह परीपहोके जीतने-उन्हे सहन करनेसे प्राप्त हो सकता है ।। विनश्वरदेहका सार तपजप करना है। मुने । न किं नश्वरमस्वदेह-, मृत्पिण्डमेनं सुतपोव्रताये। निपीडन्य भीतिर्भवदुःखराशे-, हित्वात्मसाच्छैच सुख करोषि ॥ ३० ।। मू०--मुने। यह शरीररूप मृत्पिड नाशवन्त है, अतएव अनेक प्रकारके उत्तम तप और व्रतादि द्वारा इसे पीडा दे कर अनन्त भवोंमें होनेवाले दुखोंको दूर करके मोक्ष सुखको अपने स्वाधीन क्यों नहीं करता ?॥
[७७ ]
वि० जिस शरीरकी चापलोसीसे रातदिन लगे रहते हैं,
जिसे प्रतिदिन बढिया सायनसे मसल मसल कर धोते हैं,
जिसके जरा भी अनारोग्य हो जाने पर आरोग्यता प्राप्तिक
लिये हजारो रूपया वैद्य और डाक्टरको देते हुए जरा भी
नहीं हिचकिचाते, जिसकी शोभाके लिये न पाहिनने योग्य
विदेशी वस पहिनते हैं, और भी अनेक प्रकारकी जिसकी
सेवा शुश्रूषा करते है, वह विनश्वर देह एक रोज मट्टीमे
मिल जानेवाला है। जिस मट्टीसे नफरत करते हैं अज्ञानी
प्राणी उसी मट्टीके पुतलेको अपना सर्वस्व समझ कर उसकी
यहाँ तक चापलोसी करते हैं कि आत्मोद्धारके साधन भूत
धर्मकर्ममे भी उसे जरा तकलीफ नहीं देते । इस दुर्गन्धपूर्ण
शरीरकी सार्थकता किस प्रकार हो सकती है, इससे क्या
करना है इत्यारिके ज्ञानसे वचित हो मुग्ध प्राणी अपने
अमूल्य जीवनको व्यर्थ ही सो जाते हैं। पूर्वोक्त प्रकारसे
अनेक तरहकी अशुचिका पात्र होने पर भी तथा विनाशी
स्वभाववाला होने पर भी यह नरदेह आत्मविकाशके लिये
अद्वित्तीय साधन है । आत्मोत्क्रान्तिके लिये, आत्साकी मा-
स्कृष्ट सपूर्ण शक्तियाँ सपादन करनेके लिये प्रथम साधन
मानव देह ही है। इस प्रथम साधनके बगैर अन्य तमा
साधन व्यर्थ है। कहा है कि "शरीरमाघ खलु धर्मसाधनम्"
यदि मानव शरीरको प्राप्त करके प्राणी उसे आत्मोन्नतिका
साधन तरीके समझ कर उससे अपने साध्यकी सिलिके लिये
प्रयत्न करे तो हो यह नरदेह धारण किया हुआ मफल और
सार्थक हो सकता है । यदि इसे मात्र भोग पिलासका साधन
समझ कर आत्माको मलीन करनेवाली विषय वासनाओंकी
पर्तिकी प्रवृत्तिमे ही प्रवृत्त किया जाय तो समझ लेना चाहिये
[७८] कि आत्मोद्धारका यह आय साधन आत्माकी अधोगतिका भी आद्य साधन बन जाता है। यदि इस शरीरसे तप, जप, शीलादि शुभ प्रवृत्ति न की जाय तो यह मट्टीका पुतला एक दिन भस्म हो कर साकमें मिल जानेवाला है, इसकी प्राप्तिसे कुछ भी लाभ नहीं। "असारात्सारमुद्धरेत्" इस कहावतके अनुसार इस असार विनश्वर देहसे आत्मसिद्धिकी साधनारूप सार ग्रहण करना यही मनुष्यका परम कर्तव्य है। इस लिये मुनिवर । इस क्षणभगुर शरीर पर ममत्व न रख कर इससे परम पद प्राप्तिका मुख्य कारण चारित्रके पाल- नमें रावर काम ले ताकि यह सार्थक हो । 1 चारित्रके कष्ट और नरफ तियेचादिक घाटोंमें विपक्षता । यदत्र कष्टं चरणस्य पालने, परत्र तिर्यड्नरकेपु यत्नः । तयोधि समतिपक्षता स्थिता, विशेषदृष्टयान्यतरं जहीहि तत् ॥ ३१ ॥ मृ० चारित्र पालनेमें इस भवमें जो कष्ट पडता है और परभवम नारकी तथा तिर्यच गतिमें जो कष्ट भोगना पटता है उन दोनोंमें परस्पर प्रतिपक्षी पना है । अत. विवेकवुद्धि- द्वारा उन दोनोमसे एकका परित्याग कर दे। वि० यदापि ससारी मनुष्योंके की अपेक्षा सा जीवन कष्ट साध्य है, परन्तु सहन कष्टोंक - लिय स्व तथा नारकी एक म,
[७९]
निकलवाता है, उस समय उसे कष्ट होता है, किन्तु उम
फष्टको वह जान बूझ कर सहन करता है । इसका कारण
यही है कि काटा निकलवाते साय होनेवाला दुख काटा न
निकलवालेसे पेर पक जाने पर नस्तर लगवाने के सपय होने-
वाले दु सके सामने कुछ हिसाबपे ही नहीं । अर्थात् मावी
कालों परवशता आनेवाले महान् दुखको दूर करनेके
लिये ही यहाँ पर स्वगता साधु जीननके योग्य स्वल्प
कष्टको कष्ट न समझ कर सहन करना चाहिये । यदि साधु
जीवन सम्बन्धी कष्टानुष्ठानको कष्ट सपझ कर उससे मुंह
चुराया जाय तो भवान्तरसें परवशता नारकी और पशु-
गतिजन्य घोर दु खोंको अवश्य सहना ही पड़ेगा।
ससारण प्रत्यक्ष देखते हैं कि जो विद्यार्थी स्कूल या
कालेज अथवा अन्य किसी सस्था अनेक प्रकारकी शिक्षायें
कलायें सीपत हैं उस साय उन्हें उम विधार्थि अवस्था अनेक
प्रकारके कष्टोंका सामना करना पडता है, परन्तु अपने उद्दे-
शको सिद्ध करलेने पर ये जीवन पर्यन्त उस कष्टसाध्य
शिक्षासे सुस भोगते हैं । जो उस अभ्यास करनेके समय
उस जरासे कष्टमे सिनवित्त होकर घर बैठ रहते हैं वे
भविष्यो अपनी सूर्मताके कारण जिन्दगी पर्यन्त दुख
भोगते हैं, अपना पेट भरनेके लिये भी वे दूमरोंका मुंह
ताकते हैं और विगाभ्यास कालपे किये हुये अपने प्रपादको
स्मरण कर रातन्नि पश्चात्ताप करते हैं । साधक आवस्थायें
कार उठाये विना कदापि सिद्ध नहीं बन सकता।
चारित्र ग्रहण कर उसके पालनेमे प्रयत्न न करना
उसमें अनेक प्रकारका दूपण सेवन करना यह भवान्तरम
[८०] पशुगति आदि नीच गातिओके घोर दुखोंको स्वीकृत करना है। पशुगतिमे भार वहन करना पड़ता है, योडा बन कर दाम आदि गाडिये खींचना पडता है । वेल बन कर हल खाचना पड़ता है, गाडीमें जुड़ना पडता है। श्रीप्पकालका ताप सहना पडता है, पावस कालीन पीडायें सहनी पड़ती हैं, शीतका- लीन पीडायें सहनी पडती हैं । और भी भूस प्यास, खस्सी करना, नाक कान आदिका छेदन वगैरह अनेक प्रकारके घोर दुखोंका अनुभव करना पड़ता है। यह सब कुछ पराधीनतामे सहना पड़ता है। यदि मर कर कहीं जंगली पशुका जन्म उदय आया तो वहाँ पर अपनेसे क्लीष्ट स्वजातीय पशुओंका और जातीय बैरवाले विजातीय पशुओका रातदिन भय रहता है। पेट भरनेकी चिंताये रहती हैं। यह सब कुछ भवान्तरमें सहनेका प्रसग आयगा । यहाँ पर साधु जीवनमें माधारणत गृहत्याग, परिग्रहत्याग, स्वादीष्ट भोजन परि- त्याग, पच महाव्रत पालन, अप्रतिबद्ध विहार, भूपि शय्या गैरह कायहेशादि दुस सहने पड़ते हैं 1 इन दो प्रकारके दुःसोमेंसे एक तरहका दु स तो अवश्य ही सहना होगा । यदि भावी कालीन घोर दु सोसे बचना हो तो इस समय प्राप्त किये हुये साधुपनमें दूपण न लगा, उसे पालन कर- नेमें यत्किंचित् कष्ट सहना पड़ता है उसे खुशीसे अपना, कर्तव्य समझ कर सहन कर । यदि इस जरासे कष्टसे डर कर अगहित चारित्रको भली प्रकार न पालेगा, उसमे दूपण लगायगा तो भविष्य कालीन घोरातिधोर दुसौको अवश्य ही सहना होगा।
[८१] प्रमारजन्यसुम्प और मुक्तिमुम्बमे विपक्षता । शमत्र यादिन्दरिच प्रमादज, परत यच्चाभिरिव मुक्तिनम् । तयोमर मप्रतिपक्षता सिता, विशेष ध्यान्यतरद गृहाण नत् ।। ३२॥ मुम भनो प्रमादान्त्र पुश होना है नर बिन्दु समान है और परनामे देवर र मान्धीत गा सम्बन्धी जो सुग्म होना यह समुद्र समान है। उन ओनो मुखोंमें परस्पर निपजता है, अत विवेक बुद्धि द्वारा इन दोनों में एक्को ग्रहण पर ॥ ति. जिम प्रशारजन्य सुग्नके लिय गनुष्य अपन कर्तव्यसे परामुस हो अनेक प्रकारके दोमान करता है और उन दोगो द्वारा अपनी मा को मन करता है या मुनीज- लोके चारकारले सान क्षणिकहे। उन मुग्यके भीतर छिप कर दुग रहा हुआ है, वह अज्ञानता के कारण अभी देख नही पत्ता, किन्तु उस प्रपाठजन्य सुचने अन्तरे वह विकराल रूप धारण कर गत्यय नुमापन आ पडा होता है। उस सपत्र उसको अवश्य ही उसका साना करना पडेगा और उससे पराजित होना पड़ेगा। उससे पत्युन प्रसाद न करनेसे-अपना कर्तव्य यथार्थतया पालन करनेसे स्वर्गसुस तथा गोक्षसुस चिरस्थायी और अनन्व गुणाविक है । यमपि स्वर्गमुस बहुतसे समय के बाद मुंह छिपाता है, परन्तु निरतिचार चारित-निर्गतिया कर्तव्य पालनेमे जो मोक्षसुप प्राप्त होता है वह अनन्त काल- [८] पर्यन्त स्थायी याने बह प्राप्त होकर कभी भी नष्ट नहीं होता। सोश मुरारूप देन मात्राच्या आतलाको किसी भी बालप दुसप राक्ष का दर्शन ता नहीं होता । म दोनो प्रका- रके सुमो परस्पर विपाना है। यहाँ प्रशारजन्य सुग्न ह यहाँ पर सर्ग वा मोबसुस नहीले गरता और जहॉ पर स्वर्ग चा लोशनुसकी प्राप्ति होती है वहाँ पर प्रसादजन्य सुस रूप रमत गोक्षस्रप सूर्य के जयाशो ऑले गीच फर भाग जाता है। रा लिये सहारान् । पापको उन दोनो विपक्षी समोसे जो सुप गर रोड निवेक बुद्वि द्वारा सपस कर अदण कर ।। चरित्र.स जगतारमादिका दु.ख नियन्त्रणा या चरणन तिर्य- वीगर्भम्मानरका या च । तयामिक रामतिपक्षमा तात् , विषयान्यनरा नाण ॥ ३३ ॥ मृ. इस भरने चास्त्रि पाने में जो तुझ पर नियंत्रणा होती और परमदमे शीशगर्भमे या तिथंच गनिमें जथवा नाती कुम्भीरमें जो नियत्रणा ( पराधीन कष्ट ) होती है, शदोनों नियत्रणा में परस्सर विरोव है अतविक बुद्धि डारा दोनोममे पज मण र ॥ नि० लाधुजीना पच महाव्रत पालनलप तथा चीतराग सन मनु कानानु गुरासायनी आत्ये पालन- सप कष्ट सहन डता है । इरा कष्टको जलन करनेसे भगान्तरी चिरजाल पर्यन्त देव देवकी पनीर सुख प्राप्त [८३] होते हैं। साधुजीयन के योग्य पच महानतादिका सर्वज्ञ टेवके कथनानुसार पालन न किया जाय, साधुपनके उचित किया- नुष्ठानजन्य करने कायर बन कर उसे पालन करनेमे भवान्तर, तिर्यंच गति गर्मानाम सम्बन्धी त्या नरक गति कुभीपारु आनि अनेक प्रकारले कष्टोको करोडो,आजो, सख्या- स तथा सरयाती गोपन्त सरन कार पडेगा । स लिये वर्तमान कालीन सुखदु सका सवाल छोड कर परिणापमे आ- नेवाले सुग्गदु स पर विचार करके भालरो जति चिरकाल पर्यन्त सुरा देनगाले परा पवित्र साधुपके योग्य सहायत पालनादि इस अस्प कष्टको अपना कसा कर सहन कर और उन पदार्द वनपालनापाओ पर मनानुसार सा॥ परीपह सहन नेका ७ । सह लपांगमसमयमा स्वतासन गुणा महान् । परवशस्त्वांत भूरि सहिप्यसे, न च गुण दहा त्यात न बन ॥ २४ ॥ पू० तू तप यम और सयमदी नियत्रणा सहन कर, जपते बरा रह कर (परीपहादिर का) राहताले महान गुण है । परवशताम बहुत दु स सहना पड़ेगा, उसका कुछ मी फल नहीं । सी० बारह मरका तप का | जिसनेमा और ६ चन्नन्तर फरसगा? तपा उपासामिला - वेश होता है और अभ्यन्नर को भूकसे हा रिती-पापोके .
[] , , प्रायश्चित्तका समावेश होता है। उप पंन हैं, अहिंमा पालन, सत्य वचन उधार, अतेव चोरी परित्याग, अग्रण्ड नामचर्य पालन, ओर वा वस्तुओ परने गल्छी-गमत्व परित्याग । अर्थात् पच पहातों या पत्र गणतोका पालन करना इसे टी पाच या कहते है। सयप मतगत प्रकारका है, उपर कथन किये हुए पाच पहावतो का पाचरण, कोष, नान, गाना, लोभ, चार मायांका परियाग, वचन और शरीर सम्बन्धी अशुभ प्रवृत्ति पर गबुश रचना या उसका निरोध करना जार पाचों इन्द्रियोका दान करना । यह सतरद पकारका मत है। दन तप, या और सयको पालन कर नोजो बारा कट परता, उसे यत्रणा कहत।। यद्यपि पोर तप या, मय के पालनों कुछ गट अपश्य पडता है, परन्नु परिणाम हान् सुख देनेवाला हानले वह फट अपने आप ही अंगीकार लिया हुआ है । यदि न धका- जन्य साप कष्टको भविया हा पल मारक साझ कर महन शीलताने सहा जाय तो इस झट सहनमे भी आनन्द चित्तको शान्ति प्राम होती है। चाहे जसा महान कष्ट क्या न हो यदि उसे स्ववशताने सहन किया जाय नो वह बिल्ल तुन्छ पाला होता है और यदि परवाता जरासा भी कष्ट सहना पड़े तो वह पर्वतके समान महान् रूप धारण किये देर पडता है। भर्तहरि कहते है कि अवश्यं यातर श्विरतरमुपित्यापि विषया, वियोगे को भदस्त्यजति न जनो यत्स्वयममन् । अजन्त स्वातन्यादतुलपरितापाय मनसः स्वयं त्यक्ता होते शमगुरवमनंतं विदयते ॥ मिल सकता आर [८५] बहुत माय तकराने पर अन्त तो विषयभोग बाने- वाले ही हैं। यदि नुर उन्हें अपनी इच्छासे न त्याग देतो भी उनका वियोग वो आश्य ही होगा। अर्थात् मनुष्य अपनी इच्छासे उनका परित्याग न करे तो अन्तमें वे ही मनुका परियाग कर देते हैं और उस समय मनु- प्यके हृदय पर वे हा शोफको यनाटा जोड कर जाते हैं । मनुष्य पिपय भोगोंकी विनवरताको साझ कर उन्हें स्वय ही त्याग दे तो उस बहुत कुछ शान्ति प्राप्त होती है, यह बात तो अनुभव मिट्ट ही है। जो मनुष्य मदेव द्रियोंके विषयों जशाल रहता है, वृद्धावस्था गरीर निर्मल होजाने पर उसे नी रिपयोका परि- त्याग करना पडता है,परन्तु पूर्वकी तीन इच्छा होनके कारण उस असक्त अवस्थामे भी उसकी बालचेष्टायें नहीं जाती। वृद्धावस्था प्राप्त होने तक भी इन्द्रियोंके वियों लीन रहनके कारण ही यह हास्यास्पद स्थिति प्राप्त होती है। यनि वृद्धावस्था प्राप्त होनेसे पहिले ही विपयोका परित्याग किया जाय तो अन्तरे परिवापके बदले आनन्दका अनुभव होता है। इस भवमें दा वील पचीस या पचास बरस मयत पालन कर स्ववशता जो आत्पविभूति प्राप्त होती है, उस- का फल जब चिरकाल पर्यन्त स्वर्गसुस किंना अनन्त काल पर्यन्त सोक्षसुस प्राप्त होता है तर अनुभवने आता इससे प्रत्युत सयम पालने जो प्रसाद सेवन किया जाता है, जानबूझ कर भी दोप सेनन किया जाता है, उसका फल पूर्वोक्त मुजय पर भवसे परवगताएँ अत्यन्त दुस सहन [८६] करना पड़ता है। इस लिये सया सन्बन्धी परीपहोके सह- ने भागी सहान् लाभ सा कर स्वशता उन कष्टोंको सहा सहन कर और शुद्ध वर्तन रस कर तप, जप, ध्यान, सयन, सन्द्रिच दान गैरहा नियोग प्रयत्न करनेकी आव- इयकता है और मागादमा सर्वथा परित्याग करनकी जरू- हैं परीपह सहनेका शुभ फल । अणीयसा साम्य नियन्त्रणा भुवा, मुनेत्र कप्टेन चरित्रजेन च । यदि आयो दुर्गतिगर्भवासगा---' सुखावलेस्तत्किमवापि नाथितम् ।। ५॥ मु० समतासे और नियत्रणा (परीषद सहन ) से उत्पन्न हुए थोडेसे पट द्वारा एव चारित्र पालनेसे उत्पन्न हुए थोडेसे कष्ट द्वारा यदि दुर्गतिमें जानेकी और गर्भावासमें रहने की परपराका नाश हो जाता हो तो फिर तूने क्या इच्छित प्राप्त नहीं किया। वि० समता सर्वसुसाकी जननी है, उसे प्राप्त करनेपेसनो नित्रह वगैरहके करनेकी आवश्यकता पड़ती है । समता आ- त्मीय धर्म होनेके कारण उसमें नाप मात्र भीमटका अनुभव नहीं होता । उसकी प्राप्ति एव इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिका परि- त्याग करनेमे यातीय राहज स्वल्पकी और रुचि बढती है और परम आनन व शान्तिका अनुभव होता है, एव मकरप रूप दाहजन्य कष्टसे मुक्ति मिलती है। चारित्रके पालनो यद्यपि वाहा कष्ट कुछ अवश्य सेवन करना पदता है, परन्तु उसके मुकाबलेगे आत्मसंतोष ।
[८]
अपरिशीत :सलिये चारित्रजन्य कष्ट कटकी दृष्टिसे
कुछ भी नहीं है । तथापि पति म जरासे काटनेननले
भवानगि हा कटोजी पापरा नहोजाती हो, नियंपादि
गलो सान्वी गतिशीजा तो फिर इससे
अधिक और सा चाहिगे?
शालार जगह जगः ९ उपोश है कि सत्तायुक्त
चारित्र पालनेसे जपान दुर्गतिका नाश होता है । अर्थात्
भवान्तरणे मद्गानिकी प्रानि होती है तथा परमपर जोक्षका
अक्षय अनन्त सुख प्राप्त होता है, इसलिये तदनुसार माचार
रमना चाहिये ।।
परीषद न मनेश फल ।
त्यज स्पृहाच शिवरामलामे,
स्त्रीत्य तिर्यटनकादि दु राम् ।
सुखाणुभिनेपियादिनातः,
सतोप्यसे समकभीर || ३६ ॥
मू० मपम पारनेके पटने डर कर विषय पाय द्वारा
होनेवाले गल पुराने यदि गन्तोष पा, तो फिर तिच,
नारताने आगामी दुःलीको सतीकारले और स्वर्ग तथा परोक्ष
सुग्री प्राप्तिको रच्चा छोटे ॥
fire पूर्वोक्त अर्थो शागतार अतिरेकनया पाहत
हैं। मुने तुझे संया पाना-जिलों कुछ कर नहीं
पष्ट गाला होता हो और न्द्रिचोके निषय सेरन करने
मुरादा होता हो तो फिर गर्ग तथा गोत्यको आशा
छोदे, उनकी इजराफ उदे और तियन या रस
.
1८८ । प गतिके पोरातिपौर गोको स्वीकार ले। अस्पष्ट होनेम विशेष लिरनेकी आग्यकता नहीं है । चारित्र ग्रहण करके तयोग्य परीपोतो मान मरनेमे जी बुराय और नुखाभि- लागारो इन्द्रियोनिमय सेवन कर चारित्रपे दृषण लगाय तो परभवभे अवश्य ही उसे तिथंच तथा नरकादि गतिजन्य घोर दुसाका सहना पड़ेगा ।। परीपह सहन करनेमें विशप शुभ फल । समग्रचिन्तातिहतेरिहापि, यस्मिन्मुख स्मात्परम रतानाम् । परत्र चन्द्रादिमहोदयश्री प्रमायसीहापि कथ चन्त्रेि ॥ १७ ॥ मू० चारित्रसे इम भव में सर्व प्रकारको चिन्ता ओर मानसिक आपिस विनाश होता है अत जिन्हे उसमे लय लगी हो उन्हें महान् सुख होता है तथा परभवमै इन्द्रासन या मोक्षकी महालक्ष्मी प्राप्त होती है। इस प्रकार होने पर भी तू इस चारित्र प्रमाद क्या करता है ? ॥ वि० चिन्ता-रायभय और चोरभय, आधि-अपना एव दूसरोका भरण पोषण करने आरिसे होनेवाली मानसिक पीडा, साधुजीवनपे बहुधा स्वात्मसतोष और लभ्य वस्तुला भी इच्छा पूर्वक परित्याग देखने आता है। इस स्वापसताप और स्व्य त्यागो कितना आनन्द सपाया है यह तो आज अनुभव सिह ही है । प्रथा तो इसने चिन्ता या अन्य किसी प्रकारको सानसिक उपाधिको जरा भी अवकाश नहीं मि- ।
[८९]
रना। मान्य न प्रकार के लाभ
तुच्छ । सभामा ननित नुन माम रंनो चाहे
जितना समुभीता हो-प सहन परोपते तथापि
उनण सा करना जरा भी स्कोच न करना चाहिये।
गानसिक उसके नानि ससारफे IT एरा फुड हिमापो
नहीं } उस मुपसे उपरान्त आतिपक सृत्ति शुद्ध होनेके
कारण नवीन फानन्ध नीता जोर पगचित होता है
तो शुभमन्य होता । मानसिक नपवृषि प्रान होनेसे
नवीन पन्धका अभाव होता है । नृनन कर्मन्यो अमा
में मृतकालीन फाँका भुगतान होता है । इस प्रकार यदि
शुभ निन्य हुआ तो उमसे देव देवेन्द्र आदिकी लती
प्राप्त होती है। मी तर चारित्र पालनेसे सर्वत्र आनन्द की
प्राप्ति होती है। इनी लिंग शासकार फरगाते रि-
न च राजमय न च चौरभर,
न च वृत्तिभय न रियोग भयम् ।
इन्लोकमुग्व परलोकमुख,
अमणत्वमिद रमणीयतरम् ॥
अर्थात् साधुजीवनी राजभय,चौरभय, आजीविका भय,या
वियोगमय नहीं होता । म लोकभी नुस है और परलो-
को भी मुरा, अन सावुपन जतीय रमणीय, आनन्दका-
री। इस लिये सहा सर्व प्रकारमे लामटायर साधुजी-
वनको नाम करना और यदि प्राप्त किया हो तो उसे दरार
पालनेमे प्रगाद क्यो करता है ?
ये पर्वोक्त नव शोक सास कर साधुजीवनको ही उद्देश
कर लिसे गरे होनेके कारण पद्धे असर कारक उपदेशपूर्ण
।
- L९०J हैं अतएव मुसुक्षु प्राणीको स असर कारक उपदेशले पहुत कुछ प्रहण करने का है। इन नव सोको द्वारा किये हुए उप- देश परीपह सहन और प्रसाद परित्यागका विषय स्ख है। इन नाम परी होके गहने ने निजीान सार्थक होता है। ये बान परी" नित लिन गुजाई। साताने सुना सहन करना, तासे पिपाना सहन करना, मरतासे ठडी सहन करना, नाताले गरजी सहन करना, मयतासे डास-पच्छर आदिका डस सहन करना, शरीरको टफनके लिये प्रमाणोपेत वस रचना, किमी सपय भी न्याोजनीति न करना सीके ससर्गका सन्था परित्याग करना, उनिगल्न योग्य सता अप्रतिद्व विहार करना, शागो हे मुतानि जनासम्मानकी उचाडा पालना, चाहे जैनी शया--वसतिशिल परन्तु उसके लिये राग द्वेप न करना, यपि किसीले अपना तिरस्कार किया जाना हो तो उसे साताले सहन करना रणान्त कष्ट जो तचापि नाका परित्याग न करना गमा निर्गदके योम पस्तुको नाचना करने ज शर- माना, यदि याचना करने पर रस्तु न तो मानसिक वृत्तिों समानता रसना, दि गरी रोगोत्पत्ति हो तो उसकी पीड़ा सातास स- हन रजा, [११] शयन साय दर्भ तृगारिपचा स्पर्म करना पड़े तो उसे मातासे गहना, गरीरको युगा न करना, किसीकी तरफ जा-सार सिले पानीले उसकी परगाह न करना, आदर लगान पिल ता गर नकारना, अपने ज्ञानका अकार न करना, बुद्धिमन्द होनेके कारण पनि अस्प ज्ञान आता हो तो पढनेसे सिन्नचित्त न होना, सर्वज्ञ कथित तलता पर दृढ श्रद्धा रमना, इन पूर्वोक्त बाईस परीपहार अनुकूल ए7 प्रतिकूल सर्व परीपदों को सहन करनेसे गहा सवरको प्राति होती है। अर्थात् उस परिस्थिति जीवाना नूतन करके आगमन को रोकता है, नवीन कप उपार्जन नहीं करता। जिस प्रकार ये स्थूल परीपह हैं उसी प्रकार ये मानसिक भी हैं । मनो- राज्य में भी उसका आमाम उसी पलतासे होता है और इसकी हाजरीमे जीवाताको बहुत ही वीर्योल्लाम होता है। एक एक परीपहका रसरूप ध्यान में रख कर विचार करनेमे माला हो सकता है कि स्थूल हरकते सहन करतो तयारी बतलानेमे जीनागा बहुत कुर मुप प्राप्त कर सकता है । साधुजीवनको उद्देश फर लिखे हुये ये विचार गृहस्थोक लिये भी विशेषत अनुकरणीय है। जो परमन, आत्मा और पुद्गल का भिा स्वभाव तथा मिन भिन्न अस्तित्व मानवा हो उसीको इस आध्यातिक पियो आनन्द प्राप्त हो सकता है। इस वियो विशागहरा उतरनेकी आव- इयकता है, परन्तु यहाँ तो पयाप्रकारके व्याहारमा अस्तित्व
-
-
[९२]
स्वीकार कर ही इस विषयकी योजना की गई है। धर्मा-
धर्म जीवाजीव तथा दह भर गैर परभवो शुभाशुभ कृत
कर्मक फलको पाननेवाले आस्तिक नुग्योको थोडा सा कष्ट
सहने के बदले सदैव रहनाले गहा सुसको प्राप्त करने में
प्रबल पुरुषार्थ करना चाहिये ।।
सुसाव्य
वर्म कर्तव्य ।
महातपो ध्यानपरीपहादि,
न सत्वसाध्यं यदि वर्तुमीश
तद्भावनाः किं समितीश्वगुप्ती-
वत्से शिवार्थिन मन प्रसाध्याः ॥३८ ।।
मू० उग्र तप, ध्यान, परीपदादि सत्वसे सिद्ध हो सकें
उस प्रकार के है, यदि उन्हें साधनेके लिये तू शक्तिमान् न
हो तथापि भावना, समिति और गुप्ति जो मन वचनसे
ही साधी जा सक्ती है उन्हें तू क्यों नहीं धारण
करता १ ॥
पूर्वोक्त नव श्लोको साधुजीवनके योग्य परीपहाको सहन
करनेका उपदेश दिया गया है । उलष्ट पट गासिक तप और
सहा प्राणायापाटिक व्यान एव वडे बडे उपसर्ग परीपहोके
सहन करनेके लिये कदाचित् पंचा कालके प्रभावसे शारी-
रिक बल तथाप्रकारका न हो तथापि यह मार्ग बन्द नहीं
है। इस कालपेभी वर्तमान शक्तिसे मनुष्य बहुत कुछ प्राप्त कर
सकता है। यदि गन पर अकुग हो तो तदनुसार इन्द्रिय
दमन, आत्पसयस, योगसन्धन वगैरह शारीरिक कष्ट विनाके
-
।
[९३]
"
मा पिस्ट कार्य भी मिल हो सकते है । अतएव यदि
तुझसे उपरोक्त पद गासिकारि तप न हो, पहा प्रागवाय
दमन हा प्राणायादि धान न हो सके अथना स्यूल
वाईस परीत सहनादिन बन सके तथापि धर्माद्धिमे उत्पन्न
होनेनाली ससारको अनिलगता सात भावनाय भाना, अपने
गिक का विचार करना, शरीरको अशुचिका पिंड नाम कर
उसके उपरमे पता करना, यह तेरा मुरम
का है।
इसी प्रकार मेगी, प्रमोद, कानग्य और माता मानाने
भी विचारना। सके उपरान्त कोई भी वस्तु लेनी हो या
रमनी हो तो उस पाय Tरार उपयोग रस, एव उठते,
बैठने, चलते, फिरते, पोलते साय उपयोग रचना ताल पाँचौ
समिति का गवार्थ पालन हो सके । गानसिक, वाधिक
व भारीरिक वृत्ति पर अकुश या रचनेमे तीन गुतियोका
पाला हो सकता है । सति गुमिको धारण करना यह तेरे
मनोर पर निर्भर ? । यतिन पोत आचरण करेगा तो
बहुत कुछ कार्य सिट कर सकेगा।
भारना सयमस्थान तथा उसका आश्रय।
अनित्यताबा भज भागना सदा,
यतर दुसाध्यगुणेऽपि संयमे ।
जियत्मया ते त्वरते हय यम
श्रयन् प्रमादान भवादिभेपि किम् ।
मूल अनि यता आदि सर्व भावनायें निरतर विचार, जो
सयमके ( मूल तथा उत्तर ) गुण बड़ी मुन्किलमे मिद्ध किये
जा साने है उनमें गगन र । यह काल तुझे खाजानक
लिये जल्दी करता है तो फिर तू प्रमादमा आश्रय लेते समय
ससार भ्रमणसे नहीं डरता १ ॥
वि० इस असार ससारो कोई वन्तु नित्य नहीं, तपान
वस्तुयें नाशवन्त हैं, तात्र आजा ही नित्य है ।
२ ससारो जीवालाको सनत देन के वचन सिपाय
अन्य कुछ भी आधार नही । यदि यह चाहे तो अपनी
सत्ताको सिद्ध कर अपने पैरोसे सड़ा हो सकता है।
३ ससारो परित्राण करते हुए नीवाला अनेक दफा रक,
अनेक दफा राजा, अनेक कार, अनेक दफा रोगी, अनेक,
दफा निरोगी और नकार जीतो सने वार योगी
बनता । एन सरकारले सम्बनना भी जो पिता यह पुत्र
भी होता है, जो सी है यही ता भी बनती और याता
है सो ती बन जाती है। अनेक कारकी गतियोों अनेक
प्रकारके जन्न वारण कर यह जीपाला समारफे सर्व प्रका-
रक सन्नन्धोको पात मरता है। इस तरह अनेक कारकी
विचित्रता होती ही रहती है।
४ यह जीव एकला ही जाया है और एकला ही जायगा,
यह
किसीका नहीं और इसका भी लोई नहीं है। यह
किसीफे माय नहीं जाता और न ही कोई इसके साथ
आता है।
५ हे जातान । जिगेन अपना नाजता नह तेरा ही
है। समारगे IIT पौविक पदार्य विनश्वर , अतण्य ने
त्याग। उसी प्रकार सो सन्धी र मुनानि भी तेरे नहीं
है, तू मरने जुदा ही है।
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[९५] ६ नुझे इस शरीर पर अतीन गोह गमन हे, परन्तु यह गन्द्रकीका पुतला है। इसके भी पदार्थ मास, रुधिर एडिना या लजा आदि पर मोह किया जाय ऐसा है ही नहीं, क्योकि शरीरके तमा अनपर अपवित्र है। इस लिये विनावर शरीर सम्बन्धी विमोहका परित्याग करना चाहिये। ७ निन्यान्य, जविरति, कपाय ओर मन वचन कायक योगोमे ही को बन्ध होता है,कोंके शुभाशुभ पनका समझना और उनके प्रवाहका विचार करना हमे आश्य भावना , 14 सन्ध ८ दनी पकार मारिति, गति, यतिधर्ष, चारि परी- पर सरनादिनी कचन्द 'कता का प्रोश हाता है । स नियत विगार रना इसे १६ गनना करते हैं। ५ इसके उपरान्त जागा माल गार प्राचीन कोमोबास तप अन्तर ना द्वारा दूर करना, तप उप व्यानापिसे उन पति ने रिपालो या काही न होने देना रत प्रकार प्रात पुस्पार्थ निग कहते : और इसका विचार करता हमे निर्जग मा कहते १०रिकी रचना, ना पाच डो तमा आँत- गेका ए, TTM" ग, शाह, नाती- पाँच अगरी मान राज पर से हुए जावालगा और उनहाय जना स्या सार उन [१] सर्वमानो अनन बार पारण किये हुए अपने जना पर- णानिमाविार मना। ११ वीच जाकर जामो सुगतिर पडने हुए अचाता है, अतएव उसे सेवन करते तो आनन्द पेटा होता है और दृसरोगे उछ नि नग होनी । इस जि स्वरुप वान, शीत, तपार भागना बारा गया किया है, जरा साधु दायात बारा, भाको बारह व्रत एन २१ गुण- द्वारा, गांभारी ३५ गुण द्वारा इस तरह अनेक प्रकारसे शामापे वर्णन किया है। उमयिः को ज्यन करने वाले उता पुरुषांसी दुल- भता विचार करना। १२ समाधानासे अनेक सम्याय होने के कारण वर्गको पहचानना बरा कठिन का है। तथा पर भी आदि के लिये विकारगनी परि- तास उनकी पूजा करना, बन्दन सेना करना, आराधना- करन हात पुर्लभ है। परन्तु ही अपना कतंत्र। देव गुर्ग
[९७]
पच सहावत पालन,
दश प्रकारका साधुधर्म, यह दशविध यति-साधुधर्म
बडा उपयोगी है, एक प्रकारसे यह दशविध साधु धर्म ही
साधु जीवन है।
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१क्षसा धारण करना,
२ अहकारका परित्याग करना,
३ अन्त करणमे सरलता रसना,
४ लोभका परित्याग करना,
५ यथाशक्ति निरन्तर तप करना,
६ आश्रवकी विरति करना, याने उसे रोकना,
७मत्य धारण करना,
८ सयममे आतिचार न लगाना,
९ धन ममत्व एव धनका परित्याग करना,
१० मन वचन कायासे असड ब्रह्मचर्य पालन करना,
१७ प्रकारका सयम इस तरह है
पाँच आश्वोका विरमण, नृतन कर्मवन्ध करानेवाले
प्राणातिपातादि पाँच महा दोपोंसे पीछे हटना ।
पाँच इद्रियोंका दमन करना, क्रोध, मान, माया, लोभ
इन चार क्पायोंका परित्याग करना, गन वचन कायाके
अशुभ व्यापारजन्य तीन दण्डसे विरवि धारण करना।
यह सतरह प्रकारका सयप कहा जाता है।
दश प्रकार पूज्य पुरुपोंकी सेवा करना। आचार्य महा-
राजकी सेवा, उपाध्याय महाराजकी सेवा, तपस्वी मुनिकी
सेवा, नवीन दीक्षत मानिकी सेवा, रोगी मुनिकी सेवा,
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.. [९८] सामान्य मुनिकी सेवा, वृद्ध मुनिकी सेवा, समस्त सपकी सेवा, कुलकी सेवा, और गणकी सेवा । एक वाचनावाले अर्थात् जिनका एक ही जगह पठन पाठन होता हो उस प्रकारके साधु समुदायको गण कहते हैं और गणके समूहको कुल कहते हैं तथा कुलके साहको संघ कहते हैं । इन सभोंकी आधिकार तथा योग्यताके प्रमाणों शक्य सेवा शुक्पा करना इसे दशविध चेयावध-सेवाधर्म कहते हैं। नव ब्रह्मचर्यकी गुमि, इसे ब्रह्मचर्यकी नव वाडे भी क. हते हैं। १ जिस स्थानसे ती, नपुसक एव पशु सी रहते हों उस जगह न रहना। २ सीके साथ एकान्तों बात चीत न करना, सीसम्बन्धी कथा न करना, ३ ती जिस आसन पर या जिस जगह प्रथा वैठी हो उस स्थान पर दो घडी पर्यंत न बैठना, लाके अवयवोको टकटकी लगा कर न देखना, साधार- णत कदाचित् दृष्टिपात हो जाय तो दृष्टिको पीछे खींच लेना, उमके किसी भी अवयवकी सुन्दरता पर चिन्तन न करना। ५ जिस स्थान पर पतिपत्नीकी काराधिकार सम्बन्धी बातें हो रही हो और अपनेको सुन पडती हों या उनकी चेष्टाये देस पडती हो उस प्रकारके पासवाले सकानो न सोना और न रहना । ६ पूर्वी ससारके सुख भोगे हों तो उन्हे सारण न करना। - [९९] ७ स्निग्ध साइक वस्तु न साना, याने जिससे विकारको पुष्टि पिले उस प्रकारका आहार न साना । ८ अधिकारी खुराक भी प्राणसे अधिक न साना । मात्र शरीरका निर्माह हो सके उतना ही सोराक ग्रहण करना। ९ शारीरिक पिभूगशृगार न करना । शानादि त्रय-शुद्ध ज्ञान, शुध्द श्रद्धा और निरतिचार चारित्र धारण करना। बारह प्रकारका तप, छ बाह्य और अभ्यन्तर-उप- वास आदि करना १ कागाना सानेकी वस्तुओंपे प्रमाण करके उनसे कर वस्तुयें साना ३ दूध, दही, घी, तेल, मिठाई तथा पकान्न इन छहों विगयोंस (जो उत्कृष्ट गार्ग विना कारण प्रण करना साधुके लिये सर्वथा निषिद्ध है) अपनी हाजानुसार प्रतिदिन एक दो विगयका परित्याग करना । आताफल्याण के लिये जिससे शरीरको कुछ कष्ट पहुँचे उस प्रकारको आनन्द पूर्वक धरक्रिया करना ५ सोते समय शरीरके अगोपागोंको सफूचित रसना ६, यह छ प्रकारका वाय तप कहा जाता है। यदि अज्ञाततया चारितों किसी प्रकारका दूगग लग गया हो तो उसका प्रायश्चित करना १ पूज्य पुरुसोका विनय- आदर सकार करना २ वाल, वृद्ध, ग्लान मुनियोंकी सेना करना ३ हशह ज्ञानाभ्यास करना, ४ चाहे उतने उप- सर्ग-विनकट आय जपने ध्येयको सिद्ध करने के लिये उन्हें उत्साह पूर्वक महन करना ६,
[१००]
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इसे छ प्रकारका अभ्यन्तर तप कहते है।
एव क्रोध, सान, माया, लोभ, इन चार प्रकारके कपा--
योका परित्याग करना। कपाय पैदा होने के प्रसग पर
उस पर अंकुश रसना, अर्थात् आत्मीय गुणसमूह रूप बगीचेको
भरम करनेवाला दावानल सगझ कर क्रोधको ह्रदयमे जन्म ही
न लेने देना।
इस प्रकार ये चरण सत्तरीके सत्तर भेद समझना । करण
सचरीके भेद भी नीचे लिखते हैं।
४ चार प्रकारका पिण्ड-आहार, शय्या, वस्त्र, और
पात्र, अकल्पनीय न ग्रहण करना । पाँच ममितियोका स्वरूप
प्रथम आ ही चुका है।
तथा बारह भावनाये, इनका भी स्वरूप पहले आचु-
का है।
साघु मुनिराजकी वारह प्रतिमाये होती है, जोचारह प्रकारके
नियम विशेष होते हैं, और साधु जीवनपे महान् उपयोगी
पाँचों इन्द्रियोका दमन करना, अर्थात् अप्रशन्त विपयो-
से रोक कर प्रशस्त विपयोग नियोजित करना।
२५ प्रतिलेखना-- मुनह, सध्यान्ह, और सव्या सप्पय मर्व
उपकरणों की प्रतिलेसना करना ।
पूर्वोक तीन गुप्तियें।
चार अभिग्रह-द्रव्य, क्षेत्र, काल भावसे अमुक प्रकारका
तप-नियम अगीकार करना।
पूर्वोक्त चरण सत्तरी और करण सत्तरीमे मे चरण सत्तरी
T
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[१०१] नित्य अनुष्टान है और करण सत्तरी प्रयोजन क्शाएँ प्राप्य अनुष्ठान है। साधु योग्य इस सर्व कर्तव्य सोपयोग प्रवृत्ति करना चाहिये । प्रसादसे ससार परिभ्रमण बढ जाता है। मृत्यु समय निक्र आता जाता है और गया हुआ वक्त अनेक बार पश्चात्ताप करने पर भी वापिस नहीं आता एव इन धार्मिक सर्व सापनियों सहित पुन पुन मानव जन्मको प्राप्ति भी महा दुर्लभ है। यह सोच विचार कर अपने अगकित सयस मार्ग प्रसाद रहित प्रयाण करना चाहिये ।। योगरुन्धनकी आवश्यकता । हत मनस्ते कुविकल्पजालै-, वचोप्यपद्यैश्च वपुः प्रमादः लपीश्व सिद्धीश्च तथापि वाञ्छन् , मनोरथ रे वा हताऽसि ॥ ४०॥ भू० मुने । तेरा मन खराब सकल्प विकल्पोंसे नष्ट हुआ है, तेरी वाणी असाय और कठोर माषणसे सनी हुई है। शरीर प्रमादसे दूषित है तथापि त लब्धि और सिद्धिओंनी वाठा करता हुआ (मिथ्या) मनोरथोंसे हणा 'गया है। वि० जिसने मनको साध लिया उमने सन कुछ साध लिया। मनोव्यापारका निरोध करने पर वचन और कायका व्यापार रोकना कुछ कठिन काप नहीं। मन वचन कायके योगों पर सयान-अकुश प्राप्त करना यह साधुजीक- [१०२] नका प्रथम कर्तव्य है । मन वचन कायके योगों पर अकुश प्राप्त किये विना लधि तथा सिद्धियोंकी इच्छारसना व्यर्थ है। किसी भी वस्तुकी योग्यता प्राप्त किये बगैर-उसकी प्राप्तिका मार्ग परिमार्जन किये विना उसकी इच्छा करना उल्टा सेद्कारक होता है। श्रीगौतम स्वामीको लब्धियें प्राप्त हुई थीं, परन्तु साथमें यह भी समझना चाहिये कि उनका मन वचन कायके योगो पर इतना प्रबल अकुश था कि यदि महावरिप्रनु पर राग न होता तो प्रमुके अस्तित्वमें ही उन्हें परराज्ञान केवल ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती। इस लिये मुनिराज । योगवा कर- नेकी अत्यावश्यक्ता है। ससारके दु खोका सर्वथा अभाव और परमपद मोक्षकी प्राप्ति योगीको वश करने पर ही होती है। मनोयोग पर अकुश। मनो वशस्ते सुखदु खसङ्गमो, मनो मिलेद्यैस्तु तदात्मक भवेत् । प्रमादचोरिति वार्यतां मिलत्, शीलाङ्गमित्रैरनुपजयानिशम् ॥ ४१ ॥ मू० तुझे सुखदु खकी प्राप्ति होना यह तेरे मनके स्वाधीन है। मन जिसके साथ मिलता है उससे वह एकाकार होजाता है अत. प्रमादरूप चोरके साथ मिलते हुये तेरे मनको रोक और शीलाडगरूप मित्रोंके साथ निरन्तर नियोजित कर ॥ विo-मन एव मनुष्याणां कारण वन्धमोक्षयो, - [१०३] इस सूत्रके अनुसार कानन्ध और मुक्ति या सुते और दुखकी प्राप्तिका आधार गनुष्योंका गन ही है। शासकार पनका स्वभाव तेलके सपान कहते हैं । जिम तरह बहुतसे पानी तेलफा जरासा विन्दु सर्वत्र पसर जाता है उमी प्रकार ससार सागरों यदि पनको निरकुश रक्सा जाय तो वह चारों ओर दौड धूप कर ससारको उपाधियोपे तद्रुप हो जाता है। तेल के साथ जिस तरहके पुष्पोका मेल किया जाय उसी प्रकारका वह तेल होजाता है। यदि तेल के साथ चोली आदि के पुष्पोका गेल किया जाय तो वही तेल चमेली के पुष्पोकी सुगन्ध धारण करता है। उसी प्रकार यदि मनको प्रशस्त संयोगो रक्सा जाय तो वह भी तथाप्रका- ग्का होजाता है, अतएव उसे अप्रशस्त सयोगोसे हटा कर सदैव प्रशस्त सयोगोंने रखना चाहिये । इसी प्रकार पानी ओर रगका दृष्टान्त है। पानीले रंग डालनसे पानी और रंग तदाकार हो जाते हैं, अर्थात् जिम अकारका रग हो उसी प्रकारका रूप वह जल धारण कर लेता है। ऐसे ही समारक किसी भी कार्यरूप रगपे गनरूप पानी को लिया हो तो वह उस कार्यका ही रूप धारण कर लेता है। इस प्रकार पनकी सम्बन्धक वस्नुके साथ होनेवाली तादात्म्य- रूप प्राप्तिकी ओर ध्यान योच कर शासकार फर पाते हैं कि जन इस प्रकारको पारेस्थिति है तो फिर पनको प्रसाद के साथ रखना यह बडा हानिकारक है। माता, दया, उदारना, सन्य, धैर्य, शीलाग आदि सद्गुणोके साथ नियोजित करने पर तद्रूप हो जानेसे आत्ताको महान लाभ होता है, र [१०४ ] . 1 अत नीच वृत्तियोके साथ पनका सयोग न होने देनेके लिये सदैव ध्यान रखना चाहिये ।। मत्सरत्याग। ध्रुवः प्रमादैर्भववारियो मुने! तय प्रपातः परमत्सर पुनः। गले निवद्धोरुगिलोपमोऽस्ति चेत, कथं तदान्मजनमप्यवाप्स्यसि ॥ ४२ ॥ म. मुने । तू प्रमाद करता है अतएव ससार समुद्रमें तेरा पतन होना तो निश्चय ही है, परन्तु तू दूसरो पर मत्सर करता है यह गलेमें वाधी हुई शिलाके समान है तो फिर तू उससे किस प्रकार ऊचे आ सकेगा। वि०-साधुजीवनने प्रपाट महान् शत्रु है। अतिशययुक्त ज्ञानको धारण करनेवाले बडे बडे धुरन्धर सहारसा भी प्रसाद सेवन करनेसे अधोगति फिमल पड़े हैं। सदेव आत्म- जागृति रग्वना यह साधुजीवनो मुख्य वर्ष है। आत्म जागृति विनाका सर्व धार्मिक व्यवहार व्यर्थ है, इतना ही नहीं किन्तु निन्दा भी है। आत्मजागृतिसे वचित अनुप्य अवश्य प्रसादके वा पड़ता है, अथवा यो कहना चाहिये कि प्रमादी मनुष्य अवश्य ही आत्मजागृतिसे वंचित रहता है, इसी कारण मुमुक्षु महात्माओके लिये शासकारोंका फर- मान है कि सहाकाल ज्ञान ध्यान द्वारा अप्रपत्त अवस्थामे- रहना । यहाँ पर प्रसादमे विषय, काय विकथा मा और निद्रा तथा आलस्यके वा अपने कर्तव्य पालन यवोचित [१०५] प्रवृत्ति न करना समझना चाहिये । इस प्रसादको सेवन करने पाला अपने आत्मोकान्ति पानसे च्युत होकर ससार सर- द्री पटता है। यदि दुसरे गुणवानोंको देस याने अपनेसे उच्चात्माओंको देय कर उन पर ईपी या मसरभाव धारण किया जाय तो वह सप्तार सागर डूबते समय गो पापाग की जिला बाँध लेने के समान है । अर्थात् प्रसाद और सत्सर साधुजीरनरूप जहाजको ससार सागर डनोटेनेवाले हैं। लत्मर न करना, दूमरोंके अवर्णनाद न बोलना और प्रसार न करना यह उपदेश जितना साधुजीवन के उपयोगी है उत्त- ना ही सर्व साधारण जनताके उपयोगी है। अतएव मुउनु एवं अन्य मनुष्योको चाहिये कि आ पाका अध पात करने- चाले इन यहान दुर्गुणोका परित्याग कर अपनी उत्क्राविक मार्ग सतत प्रयास करे। निर्जरानिमित परीपह सहन । महर्षयः केऽपि सहन्त्युदीया, प्युगातपादान्यदि निर्जरार्थम् । राष्ट्र प्रमगागत मध्यणीयो, पीन्छन शिव किं सहस न भिक्षो ॥४३॥ मू० जज बो वडे ऋषिमुनि कर्मको निर्जराके ख्येि उदीर्णा पर भी आतापनादि सदन करते हैं तो फिर तू मोक्षको इच्छा रखता हुआ नो प्रहगोपात प्राप्त हुये थोडेसे कष्ट को भी क्या नहीं सहन करता ? | वि० फर्मका उज्यकाल परिपक होनेसे पहिले ही पुरुषार्थ 3 [१०] द्वारा उसे आकर्पण कर मोगलना इसे उदीर्णा कहते हैं। अर्थात् पूर्वसचित कमॉकी निर्जरा करनेके लिये उनकी परिस्थिति परिपथः होनेसे पहिले ही किसी भी प्रकारसे उन्हें उदयमें लाकर भोगना, आत्मप्रदेशोंसे दूर करने के लिये उस उपस्थित किये हुए कप्यादिको सहन करना इसे शासकार उीर्णा कहते हैं। अद्भुत चारि- वाले महात्मा पुरुप आत्मविकाशकी प्राप्तिके लिये पूर्व- उस कर्पोदयसे या उदीणी द्वारा प्राप्त हुये कष्टको सहनके लिये सदैव सोत्साह वत्पर रहते हैं। बल्कि कर्ष निर्जराके हेतु उस प्रकारका कष्ट प्राप्त हो यह राह ही देया करते है। ये मभुसे प्रार्थना करते हैं कि हगे उस प्रकारके कष्ट दो, "विपद सन्तु न. शश्वत्" हमें निरन्तर विपत्ति प्राप्त हो। इस तरह प्रार्थना कर- के भी शुद्ध दृष्टि से आत्मकल्याणके लिये विपत्ति सहन करने- वाला, पुरुपार्थ करनेवाला धीर वीर गहाला मध्यान्ह मराय नदीकी रेतीस सूर्यकी आतापना लेता है। पास ही. नेके जाडेमे शरीरसे वल उतार कर नदी के किनारे जैसे ठडे प्रदेशमे जा कर कायोत्सर्ग ध्यान, समाधी करता है। जिसे मोक्ष प्राप्तिकी इच्छा हो उसे पूर्वोक्त प्रकारमे उच्च जीवन गुजारना चाहिये। महात्मन् । तुझे विचार करना चाहिये कि तूने तो मोक्ष प्राप्तिके लिये ही सर्व सगका परित्याग किया है, तो फिर जरासा कष्ट-जो तेरे साध्यकी सिद्विों सहायक है, प्राप्त होने पर तू कायरता क्यो धारण करता है? तुझे गाला है कि उच स्थिति प्राप्त करनेके लिये कितना स्वार्थत्याग करना [२०७] पडता है। एव अपने इष्ट सार्गमे उपस्थित होनेवाले कष्टको सहन करना पटता है और उच्च स्थिति प्राप्त करना यह तो तेरा मुस्य ध्येय ही है। आत्मार्थके साधनमें प्राप्त हुये काटको सहन करनेमें जी चुराना तेरे लिये उचित नहीं है, इस लिये तुझे चाहिये अपने जीवन समाप उतर कर कायरताको जोड शूर वीरताके साथ काटो-विनोका सापना करे। क्षगाखड्ग वारण करके क्रोध, मान, साया, लोभ, मत्सर आदि अपने अन्तरग शत्रुओको परास्त कर । पूर्वोक्त पॉच श्लोकोंो साधुगुणकी मुर्रयता वतलाई गई है। जिसपे चरण सत्तरी, करण सत्तरी, भावनाओंकी प्रधा- नता और मुख्य वृत्तिसे निर्दल शरीर धारी वगैरह अमग- थके लिये भी तीन गुप्तिका प्रबल साधन बतलाया गया है। यह सन कुछ अभ्यास द्वारा साव्य है । यदि इसमें बाद्य वस्तु- ओमी पूर्णतया सामग्री प्राप्त न हो तथापि किसी प्रकारको हरकत नहीं आती। समारभरमें कोई भी वस्तु ऐसी नहीं जो उसकी प्राप्तिके अभ्यास द्वारा प्राप्त न होसके- अभ्यासेन क्रिया सर्वा, अभ्यासात्सकला कलाः। अभ्यासाद् ध्यानानादि, किमभ्यासस्य दुष्करम् । अभ्याससे सर्व क्रियायें हो सकती हैं, अभ्याससे सर्व कलाये प्राप्त होती है, अभ्यासमे व्यान मोनादि हो सकते हैं, अभ्याससे क्या दुष्कर है?, अतएव अभ्यास करनेकी आवश्यकता है। सारीति गुप्तिको अष्ट प्रवचनपाता कहा जाता है, सो सत्य ही है, इस अष्ट प्रवचनपाताको प्राम करनेसे प्रमुकी सर्व आलायें पाली जा सकती है। अनमे आगेफे तेरह लोकोरों मुनिको सीधे तौरसे और - [१०८] आक्षेपरूपसे शिक्षा दी गई है जो बड़ी ही उपयोगी है, अतएव उस पर वरावर ध्यान रसनेकी सास आवश्यकता है। , यतिस्वरूप भावदर्शन। यो दानमानस्तुतिनन्दनाभि, न मोदतेऽन्यैर्न तु दुर्मनायते । अलाभलाभादि परीपहान् सहन् , यतिः स तत्वादपरो विडम्पकः॥४४॥ मृ० जो दान मान ( सत्कार ) स्तुति और नमस्कारमे खुशी नहीं होता और इससे विपरीत (निंदावगैरह असत्कारसे) दुःख भी न मनाता हो तथा अलाभादि परीषहोंको महन करता है वह परमार्थसे यति ( साधु ) है, वाकी अन्य वेप विडम्बक है॥ वि०--कोई मनुष्य आदर सत्कार करे, स्तुति प्रशसा करे और कोई तिरस्कार करे या निन्दा करे उन दोनो पर समान भाव रहे यह साधुस्वरूप हे । कहा है कि "समोय माणा- वमाणेसु" इसमें भाव वर्गका सूक्ष्म आचरण होता है। पान सिक क्षेत्रमे इस प्रकारका उच्चभाव वर्तता हो और शारीरिक क्षेनो अनुकूल एव प्रतिकूल सर्व प्रकारके परीपह सहन कर- ने दृढता हो, वास्तवो तत्वसे वही साधुपन है और वह जिसने हो वही सच्चा साधु-पनि महात्मा कहा जाता है । बाकी पूर्वोक्त गुणरहित साधुवेष धारण करनेवाले वेश- विडम्फ-साधुवेशधारी नटके समान है। गुणविहीन वेश- यारियोंका तो एक प्रकारसे यह व्यापार ही चल पडा है कि [१८९] साधवेश धारण कर वाद्य क्रियाओं द्वारा श्रद्धानिष्ट गृहस्थोमे अपने आपको सच्चा साधु स्थापन कर मान सन्मान प्राप्त करना, अपनी लालचोंको पूर्णकर आनदित जीवन गुजारना, परन्तु उन्हें इस बात पर ध्यान करना चाहिये कि इस प्रकारको प्रवृत्तिसे धार्मिक जीवनतरु सर्वथा जडलसे उसड जाता है। इस लिये नाटकी वेश भजनेवाले पात्रके सपान जीवन चरि- याको परित्याग कर शुद्ध साधुदशा प्राप्त करना चाहिये, अन्यथा पुण्योदयसे प्राम की हुई यह सर्व सामग्री प्रसाद वश यो हो सोनेसे अन्तमे महान पश्चात्ताप करनेका सपय आयगा। साधुको गृहस्थकी चिन्ता करनसे हानि दधद् गृहस्येषु ममत्वबुद्धि, तदीयतप्त्या परितप्यमान । अनिवृतान्तःकरण सदा स्वै- स्तेपा च पापै भ्रमिता भवेऽसि ॥४५॥ पू० गृहस्थों पर ममत्व बुद्धि रखनेसे और उनके सुख- दुखको चिन्ता द्वारा सतप्त रहनेसे तेरा अन्त करण सर्वदा व्याकुल रहेगा, और अपने तथा उनके पापसे तू ससारमें परिभ्रमण करेगा। वि० साधुजीवन और गृहस्थ जीवन जगीन आसमान जितना अन्तर है। तथापि पचस कालके प्रवाहसे आज त्यागी और निरन्तर परमार्थ जीवन वितानका दावा करनेवाले साध महात्माओंका जीवन भी गृहस्थोंके अतिपरिचयसे .
[११] , पतिदिन अवनतिके गती पडता जा रहा है। जिन्होंने अपनी आत्मा एव दूसरोका कल्याण करनेके लिये गृहस्योंके सचय परिचयका परित्याग कर सर्वज्ञ प्रभु कथित मुनिपटको अगीकार किया है, आज वे ही गृहस्थोंके सावध कार्योम सलाहकार बनते देख पड़ते हैं। गृहस्थोंको अपना अनुरागी वनाने ही वे अपनी सर्व शक्तिका उपयोग करते हैं। एक साधु जब दूसरे साधुके अनुरागी गृहस्थ पर अपना प्रभाव डाल कर उसे अपना अनुरागी वनालेता है उस समय उस पहले साधुके दिलों दूसरे साधुके प्रति कट्टर शत्रुमाव पैदा होता है और उस गृहस्थको पुन अपना अनुरागी बनाने के लिये तनतोड प्रयत्न करता है। गृहस्थ के सामने उस साधुके दुर्गुण प्रगट करता है। अहादाबाद जैसे बडे शहगो यदि कमी दो चार महीने बाद कोई वडा सेठ साहूकार गृहस्य किसी आचार्य महाराजको वन्दन करने के लिये उपाश्रय आजाता है तो पूर्वकालों कमी देव देवेन्द्र मुनियोको वन्द- नार्थ आया करते थ उस से भी अधिक महत्व आज सेठ साहूकारोंके उपाश्रयों आने और उनके चन्दनका पाना जाता है। क्योकि पूर्व कालीन निस्पृह महर्षियोंका देव देवे- न्द्रोफी मुलाकात या उनके वन्दनकी स्पृहा न होती थी, किन्तु आज कलके वर्मगुरुओंगे इस स्पृहाकः प्रल प्रवाह बढ रहा है इतना ही नहीं परन्तु इसे पूर्ण करने के लिये वे दत्त- चित्त होकर प्रयत्न भी कर रहे हैं ओर वडे पद थ मुनिरा जोसे यह चेपी रोग छोटे मुनियों भी पूर्ण जासकै साय फैलता जा रहा है। सायकी परिस्थितिको न देव कर आज प्रगतिशील युगमें भी हमारे विद्वान गुरु प्राचीन रूडी- .
[१११] को सामने रख कर अपने अनुयायी गृहस्योंका हजारोंच लासो रुपया प्रतिवर्ष मात्र अपनी महत्वाकाक्षा की पूर्ति में सर्च कराते हैं। जिस महावीर प्रभुकेपार्गके अनुयायी कहला कर वे सर्व प्रकार की मन मानी सौज पजा उडा रहे हैं, मान सन्मान पा रहे है आज उसी महावीर देवका अनुयायी सपाज अस्ताव्यस्त हो रहा है। धर्मोन्नति एव समाजोन्नतिके नारसे प्रतिवर्ष लामो रुपया सर्च होते हुये भी प्रति दगी हजा- रोंको जनसरया घटती ही नजर आती है। ऐसी परिस्थि- तिों यदि समाजके अग्रगण्य धर्मगुरु अपने रागी श्रावकोंमे मिलनेनाले सत्कारको ही अपने जीवनका आदर्श मान कर तत्पूर्तिके प्रयत्नसे आगे न चढेगे तो ये अपनी आलाका तथा समाजका कल्याण करनेसे सर्वथा चंचित रहेगे। जो मुनिराज महावीर प्रभुके कथन किये हुये वास्तविक सुनिशानी चलना चाहता हो उसे गृहस्थाका परिचय करना छोड शालो कथन किये पुजन किसी मनुष्य या यस्तु पर गमत्व न रखकर, हजारो रुपयोंकी लागतके इन मोहक उपाशयोका परित्याग कर अरण्यवास स्वीकारना चाहिये और एकान्तों रहकर सा काल अपने आत्सकल्याणकी ही प्रवृत्तिों प्रवृत्त रहना चाहिये। जो गुनिराज उस वीतराग प्रमुके व्यन किये वास्तविक कठिन मुनिपार्गप चलनेके लिये अस- पर्य हो उसे द्रव्य क्षेत्र काल भावानुसार गलगुणोंका रक्षण करते हुए उत्तर गुणगों कुछ अपवाद भी सहन कर महावीरके अनुयायी समाजका रक्षण करना चाहिये, अर्थात् उसे साल सबा करने के लिये कार कम लेनी चाहिये, में समाजका धर्मगुरु हूँ, प्रथा तो इस अहभावनाका परित्याग करना [११२] पाहिये। समाजकी परिस्थिति सुधारनेके लिये ही अपनी नर्व प्रवृत्ति करनेसे भी अपने जीवनका कुछ व्यय सिद्ध हो सकता है। अन्यथा सिध्या मोहविवश अथवा किमी तुन्छ लालचके बरा होकर गृहस्थो पर ममत्व रसना, इनके सासारिक सावध कायोंके सिद्ध होनही चिन्तासे पडना यह मेरा भक्त श्रावक है, यह समझ कर सावहा कार्योंमे भी सलाह देना यह सब कुछ ससत्त्व बुद्धिजन्य दोप मुनिपट रूप कल्पतरकी जडको उसाड कर फेंक देता है। अर्थात् गृहन्योले तुच्छ मान बडाई प्राप्तिकी इच्छासे (जो आत्मविकागक मार्ग कंटकरूप है) उनके सुखदु सो हर्प शोक मनाने, उनकी हा हा मिलाने या किसी स्वार्थ मिद्धिके लिये दीनतापूर्ण वचन बोल उनका सुशामदी टटु वननेसे साधुजीवन नष्ट होजाता है और जो समाजकी सेवा करनेका सध्यम मार्ग है उससे भी वचित रह कर पुन ससारचको पड़ जाता है । गृहस्थचिन्ताका फल। त्यक्त्वा गृहं स्व परगेहाचिन्ता-- तप्तस्य को नाम गुणरतवर्षे ? आजीविकास्ते यतिवेपतोऽत्र, सुदुर्गति प्रत्य तु दुनिवारा ॥४६॥ मू० अपना घर छोड कर दुसरेके घरकी चिन्तासे सतप्त- रहने वाले मुने । तुझे क्या लाभ होगा? साधुवेशसे इस भवमें तेरी आजीविका चल सकेगी किन्तु परभवमें तू महा खराब दुर्गतिको न रोक सकेगा।
[११३] वि० जिस वस्तुका एक टफा परित्याग किया हो उसका युन साह करना बडा ही निन्दनीय काम है इतना ही नहीं परन्तु परित्यक्त वस्तुका समह आत्माके लिये महान हानि- कारक है। साघुपट प्रहण करते समय संसारको समस्त मावनाओंका, घर धार आदि तपार निजकीय वस्तुओंका परित्याग किया जाता है, किन्तु गृहस्थोंके साथ अतिपरिचय होनेके कारण यदि उनकी घरनार आदि वस्तुओं पर ममत्व स्रो, उनके अच्छे युरेकी चिन्वासे रातदिन सतत रहे तो सांसारिक और धार्मिक दोनों ही भावनाओसे यचिव रहता है। उसका जीवन अतिगर्हित और निजके लिये दु सप्रद होता है। जिन भावनाओं एव वस्तुओंका परित्याग किया था अपने मार्गसे पतित हो फिर उन भावनाओं उन वस्तुओंको सप्र- हित करता हुआ "लेने गई थी पूत खो बैटो खसमको" इसकहावतके योग्य बनता है। यधपि तू अपनी साझ गुजव तो सुख प्राप्त करनेके लिये ही यह सन प्रपच रचना कर रहा है, किन्तु यदि तू ज्ञानदृष्टिसे विचार करे तो तुझे स्पष्ट मा. सूस होगा कि यह प्रपच रचना ही प्राप्त होते हुये उस यास्त- विक सुखको रोकनेवाली है। सर्व प्रकारके अपचोंकी निवृ- चिसे ही परम सुख प्राप्त हो सकता है, अर्थात् सब तरहकी अपंच जालसे विगुफ होने पर ही मुक्तिसुख मिलता है। मुगु के लिये ज्ञानी पुरुषोंने फरमाया हे कि- धुंचा सर्वाणि कार्याणि सग चान्यैश्च सगतिम् । भो भव्य ! शुद्धचिपलये वांछास्ति ते यदि ॥ हेच मुने! यदि तू वास्तविक सुस-सचिदानन्द में लीन ८ [११४ ] ॥ होना चाहता है तो सांसारिक समस्त कार्यों, वाझम्यन्तर दोनों प्रकारके परिप्रहों ओर दूसरोंका सचय परिचय सह- वास सर्वथा छोड दे। अन्यथा बाह्य पदार्थो सुख प्राप्तिका याशा रस उन्हें प्राप्त करने की प्रवृत्ति ही जीवन बिताना यह अपने आरय जीवनकी कदर्थना करना है।। फयि तुलसीदासर्जाने भी कहा है कि त्यागन कर सग्रह करे विषय भोग संसार । तुलसी ऐसे सन्तको वार वार धिक्कार ।। यदि खाने पीने और सौज मजा उडानके लिये पेश धारण किया हो तो इस बनावटी त्यागी जीवनकी कुछ भी कीमत नहीं। क्योंकि साधारण अनुष्य भी पुरुपार्थ द्वारा अपने जीवन में मौज सजा उडा सकता है। तेरा जीवन वो, जनसाधारण में सर्वोच और सहाकीपवी गिना जाता है, अतएव परित्यक्त वस्तुओंको उच्छीष्ट यस्तुके सपान सपझ कर उन पर सात्र अनुरागकी भावना भी न रख पार अपने परोपकारी त्यागपय जीवन द्वारा दूसरोंको फायदा पहुँचा कर आपकल्याणकी प्रवृत्ति करना यही श्रेयस्कर है ।। तेरी प्रतिज्ञा और तेरा वर्तन। सुर्वे न सायद्यमिति प्रतिज्ञा, वदन्न कुर्वन्नपि देहमात्रात् । शय्यादि कृत्येषु नुदन् गृहस्थान् हृदा गिरा वासि कय मुमुक्षुः ॥४८॥ मू० सावध (पापसहित ) कार्य न करूगा इस तरहकी प्रति- शाफा प्रतिदिन उच्चारण करता है, तथापि शरीर मात्र .
[११५] सावध न करता हुआ तू शव्या वगैरह कार्योम गृहस्थोंको मन ओर वचनसे प्रेरणा करता है तो फिर तू मुमुक्षु कैसा?॥ वि० सासारिक वृत्तियोंका परित्याग कर साधुपद प्रण करते समय तू इस प्रकारकी प्रतिज्ञा करता है कि "सब्ब सावज जोगं पञ्चक्खामि जावज्जीवाए तिविहं तिविहेणं इत्यादि" अर्थात् हे प्रभु । सर्व प्रकारके सावध कायोंको जीवन पर्यन्त से न तो चिन्तन करगा, न दूसरों को करनेकी आज्ञा दूगा, न स्वय करगा। तथा सर्व प्रकार सावध कार्य सन वचन कायासे न करगान करा जगा और न ही अन्य करनेगालेको अच्छा मासगा। इस प्रकारकी सख्त प्रविशा चारित्र धारण करते वक्त ही की थी इतना ही नहीं किन्तु इस कठिन प्रतिज्ञाकी प्रतिदिन तू नर दफा पुनरावृत्ति करता है, उसे पालन करने के लिये दिन नन वार गरण करता है। परन्तु वास्तनिक गैतिस देखा जाय तो किसी बाह्य कारण वश तु पात्र शरीरसे ही सावध कार्य नहीं करता, अन्यथा वचन और मनसे तो अनेक प्रकारके आदेश तथा उपदेश सीचे तोरसे एव नाभिक पढ- दोकी ओटसे तु प्राय होशहा करता है और दूसरोंसे किये हुएकी अनुमोदना भी करता है। इस कार प्रतिभा पालन न करनेसे गायावानादका दोष भी लगता है। निवृत्ति गार्गका वास्तविक स्वरूप ध्यान से हो तब ही विचार श्रेणीने भी सारथका परित्याग पल सकता है। जिस मनुष्यको मसारकी वृत्तियोंसे पैराग्य भावना पैदा हुई हो वह सब पापभीर हाकर विशेषत सद्गुण सपादन करने की इच्छा रखता है। परन्तु वमन .
[११६] की हुई वस्तुके समान त्याग किये हुए योगा (मन वचन कायके अशुभ व्यापारों) की ओर दृष्टिपात तक नहीं कर ता। इस लिये यदि तुझे सचा मुमुक्षु बनना हो तो हल- की वृत्तियोंकी और लक्ष्य न रसकर सावधान हो अपने तथा दूसरोके हितकी प्रवृत्ति कर ।। प्रशस्त दीखनेवाले सावध कायाँका फल । कथं महत्वाय ममत्वतो वा, सावधमिच्छस्यपि संघलोके। न हेममय्यप्युदरे हि शस्त्री, क्षिता क्षणोति क्षणतोप्यमन् किम् ॥४९॥ मू० महत्वके लिये अथवा ममत्वसे सघलोकोंमें भी सावधकी इच्छा करता है, परन्तु क्या सुवर्णकी छुरी पेटमें मारने पर एक क्षणयारमें प्राणोंका नाश नहीं करती ? ।। वि०-- इस जगह प्रतिष्ठ सम्बन्धी शिलालेख सोदे जायेंगे, उनमे गेरा नाम आयगा तो लोकमें प्रसिद्धि होगी, कुछ तो इस भावनासे, कुछ मेरे पनकी ममत्व बुद्धिसे और विशपत अज्ञानताके कारण का आदेश उपदेश किया जाता है। किसी भी आशा रख कर अभिमान । कहा जाता अप्रास्त सवन्धील " । है र परिण । चाहे . । 액 17 [११] हो यदि उसे पटा नारा जाय तो अवश्य ही वह प्राणोंग सहार करेगी। इस प्रकार यातुस्नमावीच्या सयालसे कितनेएक साधु महाराज के बहानेसे अप्रशस्त भावरम पर अपनी आत्माको मलीन कर उम नितितसे अनन्त मद- ससार बढाते हैं। ममत्व और महत्त्वाकाक्षासे किया हुआ, कराया हुआ और अनुमोदन किया हुआ सावध कार्य आता जीनन रूप उदरसे पइनेसे वह सया रूप अथवा मशविरूप प्राणाको हर लेता है। इस लिये मावद्यमुफ अपने उद और पवित्र साधु पदको लझा रख कर ऊपरसे प्रशस्त दीख नेवाले आरम्भ सपारम्म युक्त कार्योंका आदेश व उपदेश न रङ्कः कोपि जनाभिभूतिपदचीं त्यक्त्वा प्रसादाद्गुरो- वे माप्य यते कंथचन फियच्छासं पदं कोपि च । मौरपर्यादिवशीकृतर्जुननता दानार्चनैर्गर्वभाग, आत्मान गणयनरेन्द्रमिव घिग्गन्ता द्रुत दुर्गती॥५०॥ म० कोई गरीब मनुष्य लोगोंके अपमानके योग्य स्थान को छोड कर गुरु महाराजकी कृपासे मुनि वेष प्राप्त कर बुद्ध शाखोंका अभ्यास करता है और कोई पदवी प्राप्त करता है तब अपनी बाचालतासे मदिक लोगों को वश कर उनसे प्राप्त हुये दान व पूजासे गर्व धारण करता है और अपने मापको राजाके समान मानता है उन्हें (वैसे वेशधारियोंको) धिकार है, वे शीत ही दुगतिमें जाने वाले हैं। वि०-सासारिक सर्व वृत्तियाँ सर्व पदरियाँ अपमान के पात्र हैं। गरीब कुल, दूसरों के मुंह वरक देखना, दूसरों ।
[११८]
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की गुलापी भोगना, परतत्रता युक्त जीवन गुजारना, इत्यादि
संसारसे पैदा होनेवाले अनिवार्य सहचारी भाव है। इन
का परित्याग होना यह पहान पुण्यका उदय है। जब
महापुण्यका उदय होता है तब सद्गुरु महाराजका समागल
प्राप्त होता है, जब इससे भी अधिक पुण्योत्कर्ष बढता है
तब ही फिर गुरु महाराजके मुससे सदुपदेशामृत की धारा
मनुष्यके अन्त करणरूप क्षेत्रमें पड़ती है। उससे मुनि पद
प्राप्तिका उद्गम होता है और उक्त अपमानके पान समारके
भावों-वृत्ति प्रवृत्तियोका परित्याग करना बन सकता है।
इस प्रकारका महान् लाभ होने पर मनुष्य शास सिद्धान्तका
अभ्यास करता है । पढित, उपाध्याय, आचार्य आदि पदवी
प्राप्त कर दुनियामें विद्वान्के तौर से प्रसिद्ध होता है। भोले
भाले मनुष्य व्याख्यान की छटासे उसके अनुरागी बन कर
दान, शील, तप, पूजा, भावनादि धार्मिक क्रियाये करते.
हैं। परन्तु पडितादि पदवीको धारण करनेवाला, गीतार्थ
कहलानेवाला और अपने उपदेश द्वारा हजारों मनुष्योंको
सन्मार्गमे चलानेवाला बिचारा वह धर्मगुरु पुन ससारकी
लालचोंमें पड कर धर्मक्रियाओमें भी ससार चलाता है।
सासारिक वृत्तिओंमें ही आनन्द मानता है। वन्दन पूजनादि
सत्कार के समय अभाव धारण कर मनमें विचारता है
देसो कितने मनुष्य मेरी सेवा करते हैं, मुझे आदर सत्कार
देते हैं, कितने मनुष्य मेरी आज्ञानुसार प्रवृत्ति करते हैं, मैं
कैसा भाग्यशाली हू
अक्षानताके कारण ही अहभावनासे यह मिथ्या खयाल
पैदा होता है। उसे इस बावका विचार करना चाहिये
कि लोगों को आज्ञामें चलाने के लिये उसम कौनसी शकि
[११९] है। एक सिपाही राजाका फरमान लेकर आता है, उसे सुनते ही या देखते ही मनुष्य उस सिपाहीके अधीन हो नाते हैं। इससे सिपाहीके पनों यह गर्व पैदा होना कि मैं महाल पुरुष हूँ अवएव लोक सेरी आज्ञा सान कर मेरे तामों होते हैं, सर्वथा र्सवाका चिन्ह है। वह सिपाही राजकीय पुरुष है, उसके पास राजकीय वर्दी और चपठास है; अव' लोग, उसके द्वारा सुनाये हुये राजकीय फरसानके अधीन होते हैं, किन्तु उसके फरमान या आज्ञाकी कुछ मी कीमत नहीं। साधुके पास सर्वज्ञ देवरूप गजाकी साधु पेश. रूप वदी या चपरास (पट्टा) होनेसे और प्रभुको वाणीरूप फरपान होने के कारण ही मनुष्य साधुके वचनको सादर प्रहण करते हैं। यदि उसे अपने व्यक्तित्व पर ही अभिमान हो यो जिस वक्त उसके पास साधुमेश न था उस वक्त कितने मनुष्य उसकी आज्ञा उठाते थे,? कितने जने उसे मान सन्मान देते थे? इस यावका विचार करलेना चाहिये ।। चारित्रप्राप्ति प्रमादत्याग- माप्यापि चारित्रमिदं दुराप, स्वदोपयद्विषयममाद। भवाम्बुधौ धिक् पतिताऽसि भितो, हतासि दु खैस्तदनन्तकालम् ॥ ५१ ।। मु० महाकष्ट से भी प्राप्त होना मुस्किल इस प्रकारका यह चारित्र प्राप्त करके अपने दोषसे पैदा किये विषय और पमादद्वारा हे मिक्षु ! तू ससार समुद्र में पडता बा रहा है और उसके परिणाममें अनन्त काल पर्यन्त दुख पायगा ।। वि० मावार्थ स्पष्ट ही है। ऊपरके शोकका ही माप यहाँ पर प्रगट किया है। कापन्धन द्वारा मेरे सुदफे पैदा -
[१२०]
किये हुये विषय वासना और प्रपाद दोष है। यदि तू
अपने जीवनको पवित्र और उच्च बनाना चाहे वो उनका
सुगपतासे परित्याग कर सकता है। मात्र लक्ष्य बदलनेकी
ही देर है। लक्ष्य बदलनेसे तग जीवनकी लाइन ही
बदल जाती है। जिस प्रकार एक सोटरका ड्रायवर बागे.
बैठा हुआ मात्र हेन्डलको घुपाता है, परन्तु हेन्डलके पुपाते
ही मोटर उसी दप दूसरे सार्ग पर चली जाती है। इसी
प्रकार मनोवृत्तिरूप हेन्डलको हलका लक्ष्यरूम मार्ग से हटा
कर उन्ध लयमार्गकी ओर धुना दनकी आवश्यकता है।
यह सिद्धान्त होशह याद रखना कि उच्च लक्ष्य रखनेसे
इलकी वृत्तिया स्वयं नष्ट होजाती हैं।
मनुष्य चाहे जैसा उच्च जीवन बिताता हो, परन्तु जिस
दिन उसके अन्त करणों हलकी वृत्तियोंने प्रवेश किया उसी
दिन निश्चय सपझ लेना कि उस का जीवन अवश्य नीचे
गिरेगा। जब तक मानसिक निर्विकल्पताप्राप्त करने की शखि
प्राप्त न हो तब तक मनोवृत्तिको उच्च लक्ष्य वरफ शेरित
कर अपने जीवन जहाज को आगे बढाते रहना चाहिये।
ससार उस जीवन बितानेके सयोग घडी दुर्लमलासे
प्राप्त होते हैं, अत महात्मन् । देवदुर्लम चारित्रको प्रास
कर विषय वासना, प्रपाद आदि सहा दोपोंका परित्याग
कर अपने आलीय सद्गुणोंका विकाश कर ।
वोधिबीज प्राप्ति-आत्महित साधन
फयमपि समवाप्य बोधिरत्नं,
युगसमिलादि निदर्शनारामम् ।
कुरु कुरु रिपुवश्यतामगच्छन्,
किमपि हितं लमसे यतोऽयिंत पम्श
[ १२१]
० युगसमिला वगैरह प्रसिद्ध दृष्टान्तों द्वारा दुर्लभवासे
प्राप्त होसके ऐसा बोधिरत्न ( समषित) पा कर शत्रुगों के
ताबे न होकर कुछ भी आत्महित कर जिससे इच्छित
सुखकी प्राप्ति हो।
वि० शासों साकित प्रामिक ग्यारह कारण बतलाये
हैं। अनुकपा, अकालनिर्जरा, अज्ञान तप, दान, विनया,
अभ्यास,, सयोग, वियोग, दुख, उत्सव, ऋद्धि, और
सत्कप्ता
यह सम्यक्त्व मनुष्यको ससार अतीव दुर्लगतासे, प्राप्त
होता है। मानव जनाकी दुर्लभताके लिये शाखों पर
दृष्टान्त फरमाये हैं, जो प्रसिद्ध ही है। उसमें भी सानद
जन्के उपरान्त सहादुर्लम वोधिरन (मृटिमात्रकी वस्तु
स्थितिका त्वज्ञान और तदनुसार सम्यग श्रद्धान) का प्राप्त
होना यह कितनादुर्लभ है सो निम्न लिखे दृष्टान्त द्वारास
लेना।
एक देववा आकाशों से सी सण वजन घाला एक को
हेका गोला जमीन पर फेंके, उस छोइके गोलेको नवीन
आते हुये छ सहीने व्यतीत हो जायें, इतने साय अलिक
वेगसे पाये हुये उस गोलेने जितनी लबाईके क्षेत्रका अगा-
हन किया है उतने लो क्षेत्रको जैन शासों एक राज कहते
हैं। इस प्रकारके अर्धराज प्राण पाला लोकान्वा रहा
हुमा स्वयमूरनग नाक समुद्र है। उस समुद्रों एक
किनारे गाडीका जुगा डाल दिया जाय और दूसरे किनारे
उस जुरेकी सेल (जुषों जोत अटकानेकी कीलिका) जल
[१२२] दी जाय और वे वरते हुये उस सहान् अन्तरका अन्त कर रूपापा इक्ठे हों, यह बढा ही दुर्लभ कार्य है और इकट्ठे होकर सेलका स्वत जुक्के अन्दर प्रवेश करना यह तो एक प्रकारसे अतीव दुप्फर है। इसी प्रकार अनन्त संसारों परि- माण करते हुये जीवात्माको प्रथम तो मानव जन्मकी ही माहि अति दुर्लभ है और उस पर भी बोधिरलका प्राप्त दोन दो महादुष्कर है। महात्पन् । पूर्वोक दृष्टान्तसे महा दुष्प्राप्य बोधिरत्नको मास करके भी यदि तू क्रोध सान माया लोभादि अन्वरग शशुओंके अधीन होगा तो स्परण रखना कि इस वेरे महा सावी रत्नको लूट कर ये तुझे भवकूपमें डाल देंगे, वहाँ पार तुझे अनन्त दु.सवेदनाये सहन करनी पडेगी और एक दुफा हायसे गई हुई यह अमूल्य सासमी पुन प्राप्त होनी , महादुर्लम हो जायगी । अत मनकरिपत सासारिक तुच्छ सुखोंफी लालसा छोड फर वास्तविक सुख मोक्ष प्राप्त करनेके सपायों में लगा रह॥ तेरे शत्रुओंके नाम द्विषस्त्विमे ते विषयममादा, असंवृता मानसदेहबाचः। असंयमा सप्तदशापि हास्या- दयश्च विभ्यञ्चर नित्यमेभ्यः॥५३॥ मू० तेरे शत्रु-विषय प्रमाद, अकुश वगैरका मन, सहरीर और वचन, सत्रह असयमके स्थानक तथा हास्यादिक षट् हैं। इन्होंसे तू निरन्तर डरते हुए चलना ।।
[१२३] वि० मनुष्य अज्ञानतावश दूसरे रानुग्योंसे वैसनस्य होजाने पर अपना शत्रु समझ उन्हें जीतनेका, दपन करनेका प्रयत्न करता है, परन्तु जो दूसरों के साथ शत्रुताव पैदा करावे हैं और जो सदैव अपने पास रहकर भव भवान्तरॉप भी सदा काल अपने साथ कट्टर शत्रुभाव रखते हैं उन्हें जीतनेका या दमन करनेका मनुष्य कभी प्रयत्न ही नहीं करता, वास्तविक शत्रु जो रातदिन मनप्यके पीछे पडे हैं उनकी ओर उसका ध्यान तक नहीं जावा । यदि सनुष्य उन्हे जीतना चाहे-जो कि बडे दुर्जेय है तथापि उसे किसी शास की आवश्यकता नहीं पडती और उन्हें दान करने के लिये--जीवनेके लिये उसे आठों पहर समय मिल सकता है। अत महात्मन् यदि तु अपने पदके अनुसार ससारके समस्त प्राणधारियों के साथ क्षेत्री भाव रखना इच्छता हो वो अपने आन्तर शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर, तेरे जीव- न रही हुई त्रुटिओको दूर कर । मुख्य वृत्त्या अनादि कालसे करे साथ ही रहनेवाले क्रोध, मान, माया, लोम नापक ये तेरे चार शत्रु हैं। ये ही कुछ न कुछ बाहर निमित्त उपस्थित कर तुझे अनेक प्रकारके दुख देते हैं परन्तु वेरी सूर्खताके कारण तू उस बाह्य निमित्त को ही अपना शत्रु मान लेता है जो इन वेरे अन्तरग शत्रुओं द्वारा उपस्थित किया गया है। यदि तू बराबर विचार करेगा तो तुझे गाला होगा कि यह चाय निरित्त वेरा शत्रु नहीं है। तेरे शत्रु वो तेरी ही वगलों छिप कर सडे हैं, तू उधर लक्ष्य ही नहीं करता, इसी कारण तू पट पद में दुखका अनुमय कर रहा है। इन अन्तरग शत्रुओंको जानने के लिये तुझे अन्दर शर " [१२४ ] ही चाहिये, क्रोथ शत्रुको जीतनेके लिये क्षमा शस्त्र काफी है। साय आने पर इस शसका बरावर, उपयोग करेगा तो अवश्य ही तू अपने गत्रुको दयन कर सकेगा। मान नापक शत्रुको जीतनके लिये निरहकारता नापफ शररको धारण कर। इस शससे तेग शत्रु शीन ही परास्त होजायगा। मायानापक शत्रु को सर करनेके लिये सरलता रूप शरद प्रहण कर। इस शखको देखते ही तेरा शत्रु सहा न रहेगा, वह भागता ही नजर आयगा। लोम नापक शत्रुको दान करने के लिये तुझे सतोप रूप शरू धारण करना चाहिये। इस शसे अवश्य ही तेरे सत्रुका सिरच्छेद हो जायगा। इन पूर्वोक्त चारों शत्रुऑफ परास्त हो जाने पर इनके सहायक पाँचो इन्द्रियोंके स्पर्श रस, गन्ध, रूप, शब्द, रूप पाँचों विषय अथवा इनके अवा- न्चर भेद तेईस विषय स्वय दूर माग जायेंगे। पाँच प्रका- रफा प्रपाद मी वेरे शओंका परम सहायक है। परन्तु यह स्मरण रखना कि मुख्य चार शत्रुओका नाश होने पर उनके सेस्क तरीके कार्य करनेवाले तेरे सपस्त शत्रुओंका विनाश हो जायगा और फिर तेरे हृदय मदिर चमत्कारी हामीय गुणोंका प्रादुर्भाव होने लगेगा। प्राप्त सामग्री और उसका उपयोम- गुरूनचाप्याप्यपहाय गेह-- मधीत्य शास्त्राप्यपि तत्ववञ्चि। निर्वाह चिन्तादि भराद्यमावे, ऽप्यूपे ! न किं त्यहिताय यल.448 - 1 [१२५] मू०-, मुने! महान् गुरुकी प्राति हुई, घरबार अडा, बल प्रतिपादन करने वाले अन्योंका अभ्यास किया और निर्वाह करनेकी चिन्ता वगैरहका भार भी उत्तरगया तथापि परमवके हितार्य क्यों नहीं प्रयत्न होता ? वि०महात्पन् । पूर्व पुण्योदयमे तुझे सद्गुरुकी प्राप्ति हुई है, गुरुमहाराजके सदुपदेशसे किंवा पूर्वजन्मक सस्कारसे ससारके वैभवोंको तुच्छ और क्षणभगुर साझ कर तूने धन धान्य कौरहका परित्याग किया है। घरवार, सी, पुत्र, पौत्रादि प्रिय समन्धी जनोंका त्याग किया है । तू बालबचो के भरण पोपमकी चिन्तासे गुक्त हुआ है। कुटुम्यका परित्याग कर- नेके कारण तू ससारके अलीक व्यापार धधोकी चिन्वासे भी मुफ हुआ है। सरसे कीती तुझे कुछ चस्ववान-द्रव्या- नुयोगळी फोलोसोफीका रहस्य भी प्राप्त हुआ है। महा पुण्योदयसे मिली हुई इन सर्व सानियोको प्राप्त करके भी तू पुन ससारकी उच्छीष्ट वस्तुओं सन लगा कर अपने गहाकीपती जीवनको व्यर्थ खो रहा है। महात्पन् । तरे अन्त करण जिन लालचौका जन्म होता है वे मव तेरे कट्टर शत्रु हैं। अज्ञानताके कारण तू स्वय अपने शत्रुओंको जन्म देता है और स्वय ही उनका पालन पोषण करता "पयः पान भुजगाना केरल विषवर्धनम् सर्पको दूध पि. लाना गात्र उसके विषको वहाना है, इसी प्रकार अपने भीतर रही हुई लालचोंका पोपण करना अपने कट्टर दुश्मन का बल बढाना है। यदि अपने घरके आंगनॉरिपवृक्ष जागया हो तो उसके भाते हुये अकूरको ही नष्ट करना चाहिये, अन्यया गब
[१२६]
वह पढ जायगा तो उसका उसेडना बडा कठिन और दु-
साध्य हो जायगा। अपने हदयरूप आंगनमें पैदा होने वाली
लालचोंफो पुष्टि न देकर उन्हें जन्म लेते सपय ही कुचल
डालना चाहिये। अन्त करणमें जन्म धारण करनेवाली
अपने शत्रुरूप ससार की अनेक प्रकारकी लालचोंके सा-
राने मानसिक दुर्बलताके कारण सहानुभूतिको नजरसे देखना
ही उन्हें पुष्टि करना है।
यद्यपि इस पुस्तक बाह्याचार पर भी विशेपतः जोर
दिया गया है तथापि इससे यह नहीं प्रहण करना कि बाहा-
चार ही चारित्र या अद्वितीय आत्मसाक्षात्कारका मुख्य मार्ग
है। ऐसा नहीं है किन्तु व्यवहार शुद्धिके लिये पाह्याचारको
प्राधान्य पद दिया गया है। आत्मसाक्षात्कारका या शुद्ध
मात्प स्वरूपकी प्राप्तिका मुख्य मार्ग तो मानसिक पवित्रता
ही है। सानसिक पनित्रता विना सान वाह्याचारकी पवित्रता
अपने सापकी सिद्विों कुछ भी काम नहीं आसकती। इस
लिये वाघाचारके साथ सानसिक पवित्रता प्राप्त करनेका
यही मार्ग है कि सदा काल अपने साध्य पर लक्ष्य रक्खो
और कदाचित् किसी प्रसंग वश आपके अन्त करणरूप
गृहागण ससार समधी कोई लालचरूप आपका शत्रु जन्म
धारण करता माला पडे तो उसे उसी वक्त नष्ट करनेका
प्रयत्न करो। अर्थात् ससारके पदार्थोकी आसकि पर समाप्त
प्राप्त करनेसे, उन वस्तुओं परके सोहसे स्वतत्र होनेसे, ही
मानसिक पवित्रता प्राप्त होती है। जिन जिन पदार्थों पर
मोह पैदा होता है वे सभी ससारी प्राणियोंका उच्छीष्ट है
और अनन्द भवोंने उन पदार्थों की प्राति हुई है तथा जहातक
जन्म धारण करने वाकी है वहातक भव भवने वन पदार्थों
[१२]
-
कर सागर होगा। सवा साधुपन ससारकी लालवों वरफन
देख अपने अभिष्ट मार्ने प्रयाण करनेसे प्राप्त होता है।
क्यपि इस पर सत्यक साग चलनेनाले सहापुरुषों को
अनेकानेक वितमाघायें होती है तथापि अपनी साम्यता
काया रख धर्य और सनके साथ उन विनवाघाओंको
दसन फर अपने ध्येयकी प्रातिये सदैव प्रयत्न शील रहते
हैं। ये परगसायके मार्गसे न ठिगने के लिये अनेक प्रकारले
पष्ट सहन करते हैं, शरीर तकको सर्पग कर देते हैं परंतु
परम सत्यके-आत्मस्नरूपको प्राप्तिके मार्गसे पीछे नहीं हटते।
घटान्तके तोर पर परमसत्यके गार्गमे चलनेवाले एक
महारपाकी छोटीसी कथा है -
यह सहाना अपने साध्यको सिद्ध करने के लिये एक
पर्वतकी गुफा रह कर ध्यान किया करता था। दो
चार दिनके बाद जर भूप सवाती तव पर्वतके सनीपपी
सागों पर फिरता । सार्ग चलनेवाले किसी मनुष्यसे थाहार
मिल जाने पर अपने स्थान पर आकर सा लेना और
अपने आरजध्यानरें लीन हो जाता। एक
दिन पह सहाला आहार की वलाश पर्वतके नजीक
चलनेवाले रास्तोंपर फिर रहा था। देव योग उसे एक नय
योवनातील गई। उसके पास कुछ सानका साधना
था अव उस सीने सहानाको कुछ अन्न दिया। महात्मा
उस अन्न को ले पर्वतकी गुफाप चला गया। दूसरे दिन.
रास्तोंपर उस सहानाको भोजन न लिनेसे वह गावकी
ओर चला। गावके समीप पहुंचते ही उसे यही ली
जिसने या एक दफा भोजन दिया था विधान साहार
लिये सने आती ली। उसने साधुको आहार दिया
.
।
[ १२८]
साधु महात्मा आहार ले पीछे जंगलपे लौट गया। फिर
बीसरी दफा एक रोज वह महात्मा आहारके निमित्त
गांधमें आ रहा था। रास्ते वही सी और दिनकी अपेक्षा
न्मति स्वादिष्ट भोजन लिये पिली। उसने साधु महालाको
भोजन दिया। देते समय बोली-महाराज। आज देरीसे
निकले, मैं कवसे आपकी वाट देस रही हूं, आपकी राह
देखवे देसते मेरी आसे भी फट गई आपकी आखोंने मुझे
'मोहित किया है ? महात्सा उस सीके मुखसे पूर्वोक्त वाक्य
सुन कर उससे ग्रहण किये हुये अन्नको लेकर दूसरे घर
गया। वहांसे रूसी सूसी रोटी ले जगलमें अपने स्थान
पर चला गया। वहा जाकर उसने उस सीवाले स्वादिष्ट
यन्न को जगलमे फेक दिया और दूसरे ठिकानेसे सिले हुये
'मुखे टुकड़े खा लिये। दूसरे दिन उस महाताने कहींसे
एक लोहका तकवा लाकर उससे अपनी आसें निकाल
झाली! आहारका समय होने पर आखोंके (निकाले हुये)
डोले एक चीयों वाध कर साथ ले और हाथ एक लकड़ी
लेकर उसके सहारे गावकी ओर चल पड़ा। रास्तेने आज
तो वह भाग्यवती बडी ही उत्सुकता से बाट देस रही।
महात्माको देखते ही बोल उठी-पधारो स्वागिन् ? मैं
यापकी वाट ही देख रही हूं। साधुकी दृष्टि नीचे जसी-
मजी ओर थी इस लिये वह सी अभीतक महात्माकी
स्थितिसे अनभिज्ञ थी। वह स्वादिष्ट भोजन लेकर गहा-
माके सामने आई। महालला उस युवती के सामने एक
"मीथडेसे बँधे अपनी आखोंके डले रखकर योला-पावा?
ये आंखें लो, जिन आंखोंने तुम्हें मोहित किया है ये ही
ये आंखें हैं। इन्हें उठा लो इन पर तुम्हारा अधिकार है, इन्हें
-
[१२९] मनगाना प्यार करो, परन्तु कृपा कर मुझसे किसी वातको आशा मत रखना, किसी आकाक्षासे मुझे मेरे मार्गसे चलायमान करनेका प्रयत्न न करना ।। इस दृष्टान्तसे यहाँ पर यह सार ग्रहण करना चाहिये कि यदि अपने कर्तव्य-सत्यमार्ग चलते हुये अपनी आखें भी हरकत करती हों तो उनकी भी परवा न करना। कर्तव्य पथगे अंगीकृत परम सत्यके मार्गसे हरकत करनेवाली अपनी आसोंका परित्याग करना पड़े तो भले, किन्तु अपने अमिष्ट परग सत्यमार्गका परित्याग न करना । आत्मा अधो- गावगे जाय उससे शरीरको प्रकाश न मिले तो बेहतर है। यदि अपने कर्तव्य मार्ग अपनी प्यारी प्यारी वस्तु हर- कत पहुँचाती हो तो उमका त्याग ही करना बेहतर है। ससारमें मियमें प्रिय वस्तु अपना कर्तव्य ही है। जो मनुष्य सासारिक तुन्छलालचके लिये अपने कीमती फर्तव्यका परित्याग करना उसका जीवन ही निन्दित गिना जाता है। इस लिये महात्मन् । अपने लक्ष निन्दुकी ओर ध्यान रस कर प्राप्त की हुई सर्व सामग्री का सदुपयोग कर और जदिन दौडमें हरकत पहुँचानेवाली लालचोकी लरफ इष्टि पात ही न कर । अपने कर्तव्य मार्गमे दृष्टि रख कर भर- भर प्रयत्न करता रहे, इममे तू अवश्य ही अलौकिक शासन सुरुको प्राप्त करेगा। अगीकृत सयमकी विराधनाका फल निगाधिर्त' सयमसर्वयोगः, पतिप्यतस्ते भवदु ग्वराशी। है [१३०] - 1 शास्त्राणि शिष्योपधिपुस्तकाधा, भक्ताश्च लोकाः शरणाय नालम् ॥५५॥ मू०-- सयमके सर्वयोगोंकी विराधना करनेसे जब तू मव- दुखकी राशि पडेगा उस वक्त शास्त्र, शिष्य उपाधि, पुस्तकादि एव भक्त लोग कोई भी तुझे शरण देनेके लिये शक्तिमान् न होगा। वि-सयमके सतरह भेदेोफी विराधनाका फल क्या होता है यह बात पूर्वके श्लोको द्वारा अनेक दफा स्पष्ट होचुकी है। दुर्गतिगमन और अनन्त भवभ्रमण यह सयपकी विराधना-अगीकृत सयमको प्रमादशात् किंवा परित्यक्त किसी तुच्छ वस्तुकी लालचसे सडन करनेका अनिवार्य फक माधुका वेश धारण फर चाहे जितने पुस्तकोमा मडार सप्रह किया हो, ज्ञान रक्षणका नाप ले भक्त गृहस्थोके हजारों रुपये सर्च करा कर अपने नामके चाहे जितने पत्थरके पुस्त- झालय बंधवाये हों (जिन्हे कि उन साधुओके मठ भी कहे जा सकते हैं और जिन सठोंको अपने अपने नापसे बँधवानकी माजकल विशेप नयी प्रवृति घडे बडे साधुओंने देख पडती है) चाहे जितने शिष्योका टोला बढा कर आप सबसे बड़े महाराज कहलाते हों और उन पर अपना हुक्म चला कर स्कुराई भोगते हों, अपने कर्तव्यको भुलावे उस प्रकार धार्षिक क्रियाक नाससे सैकडों सियोंको इकट्ठी कर उद्देश समझाये विना ही उन्हें किसी असुक धपक्रियाने प्रवेश करा कर उन पर हुक्म चलाने और उनकी भक्तिभरी आजीजिका या [१३१] चापलासीले मनपाले चाहे जितने स्खुशी होवो, साधुपनमें दूपणाप चाहे जैसी पारीक मलमलके वस्त्र पहन कर तथा कीमतीपे कीमती दुशाले ओढ कर मनसे खुगी होवो, अपनी चतुराईसे भद्रिक लोगोको अपने भक्त धना कर चाहे गांव गावम सामइये-आउपरी सपारोहके साथ प्रवेश कर अपनी प्रसिद्विके समाचार अकनार पत्रों में छपना कर मारे खुशी फूले न समाओ और चाहे ताजिन्दगी अपने दुन्योको वाह्य धार्मिर किया पडदेसें डिपा स्सो परन्तु जिन दुष्कृत स्योंके लिये मृत्यु सपय आत्मा ही गवाही देगी उस समय पूर्वोक्त ठकुराई कुछ भी काम न आयगी, वरिक दुर्गति जा. नेमे वे समस्त वस्तुयें आगे धकेलेंगी। अगीकृत सयममें लगाये हुये दूपोंका फलोदय होने पर परम भक्त लोग भी कुछ सहायता न दे सकेंगे। इस लिये महात्मन मासारिक तुच्छ लालचोंका परित्याग कर अपने कर्तव्य मार्ग गपन किया कर। अन्यथा यह तो निर्विवाद सिद्ध हो है कि अगीकृत चारित्रको विराधना-उसमें दूपण सेवन करनेका फल घोरातिघोर दुखदायक दुर्गति ही . . ( सयमसे सुख) यस्य क्षणोऽपिसुरधाममुखानिपल्य- कोटीनणा द्विनपती ह्यघिका ददाति। किं हारयस्यधम । संयमजीवितं तत्, हा हा प्रमत्त पुनरस्य कुतस्तवाप्तिः ॥१६॥ मूल-जिसका एक क्षण-मुहूत्तमात्र मी बाणवे करोड पल्योपमसे भी अधिक समय तक देवलोक सुख देता [१३] है ऐसे सयम जीवनको हे अघम! तू क्यों हार रहा। हे प्रमादी । पुन तुझे इस सयमकी प्राप्तिमी कहासे होगी। वि० देवलोक आदिके मंसारिक सुरस तो सयमी महापुरु- योंके अफ्रीत दासके ममान ताबेदार ही होते है। परन्तु उनका ध्येय उसे प्राप्त करनेका नहीं होता। उन महात्मा ओंका ध्येय तो विनश्वर सासारिक सुसोस पर शाश्वत मोक्षसु- सकी प्राप्तिका होता है। परन्तु जिस प्रकार खेती करने- वाले एक किसानका धान्य प्राक्षि करनेका ध्येय होने पर भी उसे घासकी प्राप्ति भीस्वतःही हो जाती है, उसी प्रकार सयमी महात्माओका ध्येय उमसे ऋचा होने पर भी सासारिक सुख तो उन्हें स्वत ही प्राप्त होजात हैं और वे सुस मोक्षप्राप्तिके मार्गमें उन महात्माओंको विश्रा- न्तिस्थान रूप होते हैं। सयमकी करणीमें इस प्रकार की शक्ति या प्रभाव रहा हुआ है कि यदि दो घटिका शुद्ध सयम पालन किया हो तो देवलोक सम्बन्धी चिरकारिक सुख प्राप्त होता है। शाम फरमाया है कि- सामाइय कुणतो समभावं सावजओय घडियदुगं । " , आउं सुरेसु बधइ इचियमित्ताइ पलियाई ॥ बाणवड कोडीओ लक्खागुण सद्विसहस पणवांसं । नव सय पणवीसाए सतिहा अड भाग पलियस्स॥१॥ भावार्थ सामायिक-देशविरति सयम धारण करता हुआ श्रावक दो-घड़ी समभावरों वर्तता हुआ यदि आयुका बन्ध करे तो देवगति सम्बन्धी इतने लड़े युका बन्ध करता है दाणवे करोड, उणसठ लाल, पचीस हजार ली और ।
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[१३३]
पचीस तथा नीन आठवाँ भाग (९२, ५८, २५, ९२५६ )
इतने पल्योपसका देवता सम्बन्धी आयु वाँधता है।
सामायिक यह एक प्रकारसे कमसे कम दोघडीका सयाम है,
इस दाधीक मयसपे भी यदि मनुष्य आय गाँधे तो देवगतिका
पूर्वोक्त चिरकाठिक आयु नॉधता है। उस दो घडीके सयमका
पल देवलोकमे जाकर उतने लोसाय तक भागता है।
विचार करनकी बात है, जो वस्तु मात्र दो घडी मेवन करने
से चिरकाल पार्यन्त देवलोकके सुप देनेपे समर्थ हे यदि
उसे विशुद्ध रीतिमे जीवन पर्यन्त सेवन किया जाय तो मोक्ष
सुस प्रान होना क्या कुछ दूर है ?
साधुका समस्त जीवन पूर्वोक्त लाभदायक मयमा ही
है, या यो कहना चाहिये कि साधु जीवनका ही नाम मयम
है। यदि साधु मुनिराज अपने साधु जीवनके कर्तव्योको
यथार्थ रीतिसे पालन करे तो वह उसी भयो मोक्षकी प्राप्ति
करता है। कदाचित् तथाप्रकारकी भावविशुद्धिक अभावस
अथवा द्रव्य क्षेत्र काल भावकी परिस्थितिक कारण प्रयत्न
करने पर भी अपने कर्तव्यको पूर्णतया न पाल सके तो पूर्वोत्त
देवलोक आदि मुख भोगनेके स्थान प्रथम कथन किर
मुजन उसके लिये विश्राम स्थानके समान हैं। नहाँसे पुन
मनुष्यजन्म धारण कर वह एक अथवा दो तीन भवमें वो
अवश्य ही अपने साध्य परपपद सोमको प्राप्त करेगा।
अत मोक्षकी सडकप प्राप्त किये हुये साधुजीवन-सयामे
सदेव दत्तचित्त हो कर अपने कर्तव्योंका पालन करना
चाहिये।
नानापि यस्यति जनेसि पूज्य ,
शुद्धात्ततो नेष्टसुखानि कानि।
[ १३४] . . तत्सयमेऽस्मिन् यतसे मुमुक्षो, नुभूयमानोरुफलेपि किं न ॥५॥ मू०---स यमके नाम मात्रसे भी लोगोंमें यदि तेरा पूजा मन्कार होता है तो उसके शुद्ध होनेसे कौनसा इष्ट फल तुझे न मिले ? जिस सयमका महान् फल प्रत्यक्षमें अनुभव क्यिा जाता है, हे मुमुक्षो (मोक्षको इच्छा रखनेवाले ) उस सयममें तू क्यों नहीं प्रयत्न करता? ॥ वि० इस शोक्का भावार्थ तो स्पष्ट ही है, प्रथमके को- मोमे यह भावार्थ सविस्तर दर्शा दिया गया है। समझ दार को इसारा मात्र ही काफी होता है। जिस वर्गको उद्दिश्य कर यह प्रथ लिया गया है वह पूज्य मुनिवर्ग वि. द्वान वर्ग है, अत वह थोडे को घनासमझ कर अपने योग्य उपदेश ग्रहण कर सकता है। उस वर्गके लिये इतना उप- देश काफी है। जो अभी तक सयरा साप आये ही नहीं वे भी मयमीय सुख और उसके परम प्रशस्त परिणाम की ओर लक्ष्य देसके तथाप्रकारकी योजना भी ग्रन्थकर्त्ताने ग्क्सी है। उस योजनाको ज्यानमें रस कर ही इस विषय पर विवेचन किया गया है। जो वर्ग वक्र होकर अपने दुष्ट हत्याका यनाव करता है, सयमी कहला कर भी गृहस्थोंमे भी विशेषतया अपनी इद्रियों एव मनको निरकुश रसता है और साधुके वेशमें धर्मगुरु कहला कर अपनी आजीविका चलाता है, अपनी लालचोको पूर्ण करता है वह वर्ग कदापि सामान्य उपदेश द्वारा नहीं सुधर सकता। वक स्वभाववालों पर चाहे [१३५] उतना सामान्य वाक्प्रहार करो किन्तु सत्र न्यर्थ जाता है। उस प्रकारके धर्मगुरुओ-सायु वेग धारियोंके लिये स्वत अन्यकर्ताने ही कहीं कहीं पर कठिन शब्दोका प्रयोग किया है, सो भी उनके एकान्त हितकी भावना हृदयो रम कर, वे किसी भी प्रकारसे अपने मार्गमे आजायें मात्र इसी उद्दे- मसे कहीं कही पर कठिन वायोमे उपदश दिया है। यदि उन कठिन धारयावाले उपदेशसे भी वे महानुभाव अपने कर्तव्य पथ पर आजाये तो इस प्रथ रचनेका अन्य रचयिता का प्रदेश पूर्ण हो सकता है इस विषय पर विवेचन करते समय अथवा इस विषय को विशेषत स्पष्ट करते समय हसने सल अन्धकार श्री- मान् मुनिसुन्दरसूरि गहाराजके उद्देशको लक्ष्य रख कर ही कलम चलाई है। अन्यथा आधुनिक धर्मगुरओको अपने कर्तव्य मार्गसे नीचे उतर जानेसे उनके आधार पर सविस्तर टीका हो सकती है। परन्तु यहाँ पर किमी व्य- तिके आधार पर टीका करने का कोई कारण नही, उद्देश मात्र इतना ही है कि जिसे जो उच्च अधिकार प्राप्त हुआ हो और उस अधिकारका पात्र वह अपने आपको मानता है तथा उस अधिकारके अधिकारी योग्य गान सन्मान प्राप्त करता हो और जनतामे इस बातका काड करता हो कि मैं अपने अधिकार का यथार्थ पालन करता है उसे उस पवित्र अधिकारके योर वर्तव्योसे मुँह चुराकर मात्र पाहाडम्बर द्वारा विचार माहे-अज्ञान गृहस्थो को अपना अनुरागी बना उनसे अपनी स्वार्थवृत्तिपूर्ण कर अपने अपुल्य मानव जीवनको व्यर्थ ही नष्ट न करना चाहिये ।
[१३६ ] गहावीरके बडे पुत्र साधु उनिराजोके लिये पूर्व कालमें एक सपय ऐसा विपसआया था कि जिस समय वेत्यागी महात्मा मसारकी लालचोंने फस कर सर्वथा ही अपने कर्तव्योंसे परा- मुस हो वैठे थे । यद्यपि उस समय कितने एक त्यागति प्रिय महात्माओंने महापीरके उस कठिन साधुपार्गको कायम रखने के लिये किया उद्वार किया था, परन्तु वह क्रिया उद्धार जितनी उत्कर्पता तक होना चाहिये था उतना न हो- नेके कारण ही आज हमारे पून्य धर्मगुरु महाराज अर्घचैत्य वासीपन भोगते हुये भी अपने आपको शुद्ध साधु मानव है और लोगोको सनाते हैं। अपने अनुरागी गृहस्य या अपने शिष्य भले ही उन्हें परम त्यागकी पूर्ति मानते हो या पनो मागर सपगभीर,सेरु समधीर,भारंड पक्षीयत अप्रपार्टी और त्यागी वैरागी सर्वगुण भडार आदि आरोपित गुण- मसूह लिसे, परन्तु अन्तरात्मा तो यह वेधडक कबूल मारती है कि सहावीरके उस कठिन माधु मार्गप्ने चलनेवाले महात्माओके लिखे हुये साधु आचारके मुताबिक अपने मुनिजीवनमें मगरे आवा मेर भी मुनिआचार नहीं। बुद्धिपान, इस बात पर स्वय विचार कर मकता है कि जो मुनिमार्ग धर्मग्रन्यो तल्लारकी धारके समान कहा है, और जो महा दुर्गमनीय कहा है आज उस मारें पलने वाले साधु मुनिराजाओंने अपनी अनुकूलतानुसार उसे कितना सरल और सुगम बना डाला है ? इसका कारण पचम काल या देशकालकी परिस्थिति नहीं कहा जा सकता। क्योंकि पचन कालमें भी देश कालकी परिस्थिविके अनुसार तो आज जिस प्रकारका साधु मुनिराज माधुपना पाल - [ १३७] रहे हैं उससे हजार दर्जे अधिक त्यागवत्तिवाला मापन पल मरूता है । द्रव्य-क्षेत्र, काल,भावानुमार भी साधु पना न पलनेका कारण साधुओंसी मानसिक दुर्बलता और साधु पनको नष्ट कर डालनेपाली अनेक प्रका- रकी तुच्छ लालचे ही होसकती है। साधुओंको साय पदसे पतित करनेमें गृहस्थोंका अति पारिचय मी एक महान कारण है। प्रथम साधु किसी प्रकारकी न होनेके गृहस्थ लोगोसे विशेष परिचय न ररते अवसे माधु ऑन अनेक प्रकारकी स्पहाने घर किया सभासे उन्हें अपने ध्येयसे परामुख हो गृहस्थोंका खुसासनी दृटु बनना पड़ा है। "निरपृहस्प तृण जगद" जिम महालको किसी प्रकारकी स्पृहा नहीं जमके लिये समारभर तृण म- कारण आशाया ये दासा सर्व लोकस्य, याशा दामी येषा तेपां दासायते लोका । जो सहाला होर भी किसी प्रकारकी आशाके दास अनते है उन्हें अपनी आशा पूर्ण करनेकी लालचसे अदम्य ही लोगोंका दाम बनना पड़ता है, लोगोंकी हामे हा मिर- कर चलना पडता है और जिन महात्माओने मात्र आशाको अपनी दामी बना लिया है ससार भरके मनुष्य जन मAPE ओंके दास पन कर रहते हैं। धर्वमान कालीन साथुपन तो बड़ी ही सराम परिस्थिति आ पहा है। ब्रह्मचर्यकी जिन नवगुप्तियों किंवा न्य [१३८] बाड़ोंका सक्षेपसे वर्णन प्रथम आ चुका है, उनका पालन प्ररना आधुनिक परिस्थितिके प्रसगोंगे साधु पुनिराजके नये महा दुम्साध्य है। जिस प्रकार एक महा दुर्गम पहा- के शिम्पर पर चढना महामुस्किल है उसी प्रकार माधु हीवन गुजारना सयमका पालना सदेव दुस्कर कार्य है। उमगे भी आज पचम कालीन प्रवृत्तिसय जमानेमें गृहस्थोंके समागमसे रह कर अनेक प्रकारके विषम प्रसगोंमें परम निवृत्तिमय पवित्र साधु जीवन जीना अत्यन्त कठिन कार्य है। रात दिन भक्त श्रावक श्राविकाओके परिचयमें रह कर 'दुरणुचरो मग्गो वीराण अणियह गामीण" वर्गजनीय महावीर प्रमुक मार्गमे चलना उतना ही कठिन काम है जितना कि लोहेके चने चारना । परम त्यागपूर्ति प्रभु महावीरका कथन किया हुआ निवृत्ति मार्ग सनुप्य मात्र के लिये परम शान्तिप्रामिका राज मार्ग है। परन्तु जिस- नागम अनेक प्रकारकी वासनाओका एक या दूसरे प्रकारमे बोपण होता हो, अपनी सुरलक लालचोंको पूर्ण करनेके लये अपने कर्तव्यमे विरुद्व अनेक प्रकारकी प्रवृत्तियोमे जीवन व्यतीत होता हो उसे भले ही महावीरका छोट चाहे आदीश्वरका मार्ग कहो, परन्तु सर्वज्ञ देवके परम पवित्र सत्यके मार्गमे वह लासों कोस दूर है। वर्तमान कालिक साधु मार्गको त्यागी शिरोमणि महावीरका निवृत्ति बार्ग कहना वैसा ही है जैसा कि अपनी वृत्तिया पूर्ण करनेके लिये एक तुक्वन्दी बना कर उसे किसी महा कविके नासमे प्रसिद्ध करना। महावीर दवेके अनुयायी-महावीर के पुत्र कहलानेवाले निवरोंमे एव महावीरके पूजारी गृहस्थोमे वार्मिक प्रवृत्तिके [१३९] विषयमं तो यष्टी ही विचित्रता देस पडती है। उन्होंने अपनी अपनी अनुकूलताके अनुसार ही महावीर कथित साधु आचार एच श्रावकाचार मान लिया है। गृहस्थ लोग तो अपनी सासारिक वृत्तियोंमें ही मशगूल रहनेके कारण महावीर कथित साधु आचार और गृहस्थाचारको स्वत जाननेके लिये असमर्थ ही हैं, किन्तु पूज्य मुनिरा- जोसे महावीर प्रतिपादित परम निवृत्तिमय निर्ग्रन्थ सुनि- मार्ग एव यत्नामय गृहस्थ का मार्ग अज्ञात नहीं है। न्तु पूज्य माधु मुनिराज मानेपणा, लोकेपणा, एव अन्य भी अनेक लालचोंके वश हो जानेसे स्वत अपने कष्टपय मार्गसे नीचे फिमल पडनके कारण गृहस्थोंको भी वे यही उपदेश करते हैं कि सर्वज्ञ देव कथित परमत्याग एव परम निवृत्तिमय और मोक्ष प्रालिका अद्वितीय कारण निर्धन्य मुनिमार्ग यही है जिसमें कि हम चल रहे हैं। अज्ञान श्रद्धाशाली गृहन्थ विचारे धर्मगुरुओंके वचन पर पूर्ण विश्वास रस तहत्ती-तथैव इति, जी महाराज कह कर वैसा ही स्वीकारते हैं। जो महात्मा महावीरके परम त्यागमय पवित्र निर्ग्रन्थ साय मार्गको जानते हुये और अपने अन्दर देश कालके अनुसार भी उसमेसे कुछ न होने पर गृहस्थीम अपने आ- पको सरा निमंन्य-सचा सातु रयापन करते हैं उनकी प्रवृत्ति वैसी ही समझना चाहिये जैसे कि एक पतित मा- चार वाली सी अपने पतिताचारको जानती हुई भी लोगामें अपने आपको सती कहला कर शुश होती हो और उसे मव सती ही मान इस प्रकारका सदैव प्रयत्न करती हो। इस प्रकारकी आचरणासे द्विगुणा गुन्हा किया जाता है। ।
। १४०] -- इस तरहकी अलीक आचरणाके हर प्रथप ही पुख्यत' दो कारण बतला चुके हैं, एक तो तथाप्रकारका त्यागपय सयप पालन करने में मानसिक कमजोरी ओर दूसरा अनेक प्रकारकी सासारिक क्षुल्लक लालचें । मानसिक कपजोरी दूर होने पर भी सासारिक लालचोका परित्याग करना वद्य ही कठिन काम है । यद्यपि बाह्यत तो उन लालचोका त्याग करने पर ही साधु मुद्रा प्राप्त होती है, किन्तु जब तक मनमे उनका परित्याग न किया जाय तब तक भालसे साधुपना प्राप्त ही नहीं होता। चोगी महात्माओको भी मामारिक लालचे किस प्रकार जीवन दोडो पीछे पटकती है इस बातको सपझने के लिये आप निम्न दृष्टान्त पढिये । गूरोप, एटलान्टा, नासक एक लेडी थी, वह दौड इतनी हुशियार थी कि उस सपय दूमरा मनुष्य उसकी परावर न दौड सकता था। एक समय किसी एक मनुष्यके माय दोडनेकी शरत लगी। जिस मनुष्यको एटलान्टाकं साथ दौटना था उसने अपने प्रिय देवकी आराधना कर एट- लान्टाको किस प्रकार जीतना यह मवाल किया। देवने कहा एटलान्टा अन्य किसी प्रकारसे भी नही जीतीजा सकती, यदि वह जीती जा सकती है तो उसका एक मात्र उपाय यहीं है कि जिस रास्ते परमे दौडनेका निश्चित हुआ है उस तमाम रास्ते पर अन्त तक सुवर्णके टुकडे डाल दो। इस युक्ति सिवाय अन्य कोई युक्ति ही उस देवक पास न थी, क्यों कि एट- लान्टाको एक महान देवताकी ओरसे वरदान मिला हुआ था कि जिस कारण वह सबसे बलवती और त्वरित गति- वाली थी।
[१४१] अपने इष्ट देवकी सलाहस उस मनुष्यने दौडक रास्तम सुवर्णके टुकडे डाल दिये और एटलान्टा को दौडनेके लिये कहा गया । एटलान्टाके साथ उस मनुष्यने भी दोडना शुरु किया। वह मनुष्य एटलान्टासे बहुत कमजोर था अत घण्टलान्टा शुरुआतमे ही आगे बढ़ी। पटलान्टान दौडते हुये आगे रास्ते में सुर्वणगढ पड़ा देसा, वह मनुष्य न देस- सके उम प्रकार आस बचाकर एटलान्टाने उस मुवर्ण सढको उठा लिया । व योग इतनेमे वह मनुष्य एटलान्टासे का पाच कदम आगे निकल गया। एटलान्टाको उस गनुप्यक आगे निकल जानेकी कुछ भी चिन्ता न थी, क्योकि ण्टला- न्टाकी गति के सामने वह विचाग कुछ हिसाबसे हीन था। पटलान्टा पुन क्षण वारसे आगे निकली। आगे फिर सम्तमे सुवर्णकी ईट पड़ी देसी, उसने फिर उस ,टको रठाया । वह मनुष्य फिरसे आगे निकल गया था, परन्तु रण्टलान्टाको दौडके सामने वह कितना आगे जा मकता पटलान्टा फिर उससे आगे निकल गई। परन्तु रास्में पड़ी हुई उन ईटोंकी लालचने उसे बराबर पश कर माग पी ईटों को उठाती गई, अत उसकी गति स्कावट करनेवाला उन ईटोका कुछ वजन भी उसके पाम हो गया और उस दौडमे आगे निकल कर विजय प्राप्त करनेके बदले उन ईंटोंकी लालचने ईंट उठाना ही उस का मुख्य लक्ष्यविन्दु बना दिया। वह बिचारा दुर्बल सनुष्य अपनी धुनो तन चोड प्रयत्नसे भागता रहा, परन्तु एटला. न्टा तो अपनी शीतगतिके घमडमें रह कर उन इंटों की लाल- चसे रास्ते मे ठहर ठहर कर उन्हें बटोरती गई। टीडी भरतके अन्तिम स्थान तक इसी प्रकार इंटों बटोरनेने एटलान्टा या 7 अन -- [१४] पोछे पड़ी और वह कमजोर मनुष्य जो अपने आपको एट. लान्टासे दुर्चल समझ कर भराक प्रयत्नसे आगे भागता: रहा अन्त एटलान्टासे आगे निकल गया । एटलान्टा-जिसे महान् देवके वरप्रदानका गर्व था और जो अपनी शीत्र गतिके प्रमापसे अपने जीवनमे किसीसे भी परास्त होना सर्वथा असभवित मानती थी उसे सुवर्ण व- टोरनेकी लालचने परास्त कर दिया । वे तमाम मुवर्णकी ईंटें और पराजित हुई एटलान्टा उस गनुन्यको ही मिली। आधुनिक धर्मगुरुओंकी-पृश्य साधु सुनिराजोंकी विशे- पत परावर एटलान्टाके समान ही परिस्थिति है। आत्म कल्याण की सर्वसामग्री प्राप्त होने पर भी सासा- रिक तुच्छ लालचोने उनकी जीवन दौडका लक्ष्य बिन्द ही बदल डाला । मनुष्य सानके लिये यह शाश्वत नियम है कि जिस प्रकारका उसका आदर्श हो उसी प्रकारको उसकी बहुधा प्रवृति होगी। जब आदर्श ही हलका हो तो उच्च प्रवृत्ति होना असभव ही है। लोगोको दिसलाने के लिये भले ही वाह्यत शुभ प्रवृत्ति की जाती हो परन्तु अभ्यन्तरीय प्रवृत्ति भिन्न होनेके कारण वाह्य शुभ प्रवृत्तिकी कुछ कीमत नहीं मिलती। इस लिये उच्च सार्गले आरुढ हुये महात्मा ओको अपने परम ध्येयको लक्ष्यमे रस कर अपने मार्गमें आनेवाली लालचोंका परित्याग करना चाहिये । वास्तव में यह प्रपच अज्ञानताके कारण ही आचरा जाता है। जिस समय मनुष्य अपने आपको पहचान लेता है फिर वह परपदार्थों में आसक्त नहीं हासकता। परन्तु जिसे स्व और पर वस्तुका ज्ञान नहीं रहता वह स्वकीयको पर और परकीय %3D
[१३]
यस्तुको स्वकीय समझ कर प्रवृत्ति करता है और उमीसे कर
अपनी मालाको मलीन करता है।
एक मनुष्य पेट और आसॉकी व्याधिको पीडासे पीडित
रहता था। एक राजवह किसी एक वैध पास गया और अपने
पेट तथा आसक व्याधिफाययान कर उसने वैद्यराजसे अपनी
दोनों व्याधियाँ दूर करनेकी दवा मागी। वैद्यराजने उसे
सोनों रोगाके दूर करनेकी दवा जुदी जुही दो पुटियामें
याँध कर दी। याखोंमे डालनेकी दवा सीसा और गंधकली
मिश्रणतासे यनाया हुआ सुरना था । वह दवा मान आसों में
ही सालनेकी थी परन्तु रानिकी नहीं थी, क्योंकि वह एक प्रका-
रका विष ही होता है। दूसरी दवा जो पेटका रोग दूर करने
के लिये दी थी इसा मिरचे वगैरह गरम मसाले डाले हुये बेर
समपि वैथराजने दोनों रोगोंको दवा जुई। जुदी दी थी भार
दोनों दवाका गुण दोप भी सपझा दिया था तथापि यह मा
मनुष्य थर जाकर उन दोनों दवाओंके भेदभावको
भूल गया! अर्थात् उसने आसोंकी दवा पेटकी और पेटकी
दवा आसोंकी समझ कर खाली। आसोंकी दवा पालेनेसे
और सानेकी आसमें डाल लेनेसे परिणाम यह हुआ कि
आखे निस्तेज हो गई और पेटका व्याधि भयकर रूप
पफट गया, इतना ही नहीं बल्कि उसका व्याधि असाध्य
रोग बन गया।
आप कल्याणके साग चलने वालोंकी मी माय
सी ही दशा देख पढ़ती है। दुनिया अकर्तव्यके आस्ति-
त्वका कारण भी यही देख पडता है। यहाँ पर यासके
समान अपने अन्दर रही हुई परम ज्योतिर्मय मात्मा सा
स
[१४४] म्सना और पेटके स्थान पर शरीर। जो आगार्थ करना या वह शरीरके अर्थ किया जाता है और जो शरीरके निये कर्तव्य था वह आत्माके लिये किया जाता है। भारतीय धर्म शरीरमे और शारीरिक धर्म आत्पाले आरो- पित किया जाता है। सहावीर प्रभुके समयका अवलोकन करने या उनके द्वारा कपन किये गये मोक्ष मार्गके साधनोंग प्राय मर्वथा परिव- तेल-ठलटा सुलटा पन देस पडता है। धर्मगुरुओने आपनी अनुकूलता के अनुसार परग त्याग पर्ति सहावीर प्रभु के कथन किय हुये कहक मार्गको आज बडा ही सरल मार्ग बना दिया। प्राय हरएक वस्तुको ऊपी सीवी कर डाली है। उसी कारण आज हरक व-स्वरूपके ज्ञानकी भान्ति हो गई देख पडती है। पूज्य बर्मगुरु अपने मासिक व्यारस्यानोंसे सम्यक्त्वका स्वरूप प्रतिपादन करते हुए माहते हैं कि आत्मीय तथा अनात्मीय वस्तु स्वरुपका तत्प सान होने पर सम्यक्त्त्व गुण रत्नकी प्राप्ति होती है, और पर्मगुरु तो अवश्य ही उस वस्तुका अधिकारी-मालिक होता है। साथमें यह भी स्मरण रहे कि जिसे वह आत्पीय गद अनात्सीय वस्तुस्वरूका यथार्थ तत्वज्ञान-सम्यग्बान हुआ हो, अनात्मीय वस्तुओमें उसकी सन्मानित सादर राष्टि कदापि नहीं रहती। अन्य साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा उमकी मानसिक वृत्ति एव शारीरिक प्रवृत्तिमे दिन रातके समान अन्तर पड जाता है। वास्तविक वस्तु स्वरू- घको समझनेवाले धर्मगुरुके लिये पृथ्वी पर ही स्वगं उतर खाता है। वह मानव जन्ममें ही देवोंका भी देव बनता है। परन्तु जो मय ही वस्तुस्वरूपको अपने आपको है [१४५] और अपने पवित्र कर्तव्यको उलटा समझ कर प्रवृत्ति करता है उसके लिये स्वर्ग मी मयकर नरक बन जाता । पूज्य मुनिराजोंमें वास्तविक यस्तु स्वरूपके तत्वज्ञान- का अभाव होने के कारण ही आज वे अन्यका छोड़ अपनी मात्माका भी कल्याण करनेमें असमर्थ देस पडते हैं ईर्षा उपकी भी वीव्रताका मुख्य कारण अज्ञानता ही है और अपने आहितकी प्रवृत्तिका मूल कारण भी अज्ञान ही हो सकता है। चाहे जैसी लालच क्यों न हो परन्तु ज्ञान दशाने वह एक महात्मा या जीवात्माके क्तव्य मार्ग में कदापि हरकत नहीं कर सकती। जव मनुष्य किसी लालचके गडेमे पडवा है उससे पहले ही उसके ज्ञान गुण दीपक पर अज्ञानताका पडदा पड़ जाता है। फिर वह उस अन्धकारमें अपने कर्तव्य मार्गसे च्युत होकर गमन करता है। जिस वस्तुतत्त्वज्ञान-सम्यग्ज्ञानकी सूक्ष्म समस्या दूसरोंके लिये हल की जाती है यास्तवमें उम बस्तुस्वरूपके तत्त्वज्ञानसे घे धर्मगुरु सर्वया अनभिज्ञ है जो मात्मस्वरूपको मलीन करने वाली सासारिक तुच्छ लालचोंके लिये अपनी सर्व शक्तिका दुरुपयोग कर अपने अनुयायिओं मंदित महावीरके कयन किये मार्गसे विमुख हो गपन करते है। अपनी अनुकूलतानुसार प्रचलित की हुई रुढीको ही दो महावीरका कयन किया मोक्षमार्ग यवलाते हैं और उस स्टीको ही पुष्ट करनेमें प्रतिवर्ष भक गृहस्योका लासों रुपया सर्व कराकर अपने आपको परम श्रेयफा मपादफ मानते हैं, इचने मात्रसे ही अपनी पात्माकोशवात्य समझते है, ये बिचार गायरमिय धर्मगुरु सत्वशानिओं दवा पात्र हैं। जिस स - के धर्मगुरु अपने अनुयायी गृहत्यों dl- [ १४६] की मान घटाई सपादन करनेके लिये ही अपनी संवं प्रवृत्ति करते हो, तायन्मात्रसे ही अपने जीवनके परम साध्यकी सिद्धि समझते हों उस समाज के धर्मगुरु आत्मविकाशके परम साधन वास्तविक वस्तु स्वरूपके सूक्ष्म तत्वज्ञानका अभाव होना सिद्ध ही है। जहाँ तक सत्त्वज्ञान नहीं होता वहाँ तक वैराग्यका अस्तित्त्व मर्वया निल है और जब तक वैराग्यका अस्तित्व नहीं तब तक लालचों पर विजय प्राप्त करना अशक्य है। लालचों पर विजय प्राप्त किये विना साधुपन प्राप्त ही नहीं होता। मानेपणा, लोकेपणा, विषय वासनादि तमाम स्वार्थ वृत्तियोका परित्याग करने बालेको ही साधुपन प्राप्त होता है। माधुपन पीले वस पहननेसे प्राप्त नहीं होता, साधुपन भीस पाग खानेसे प्राप्त नहीं होता, साधुपन मस्त : मुडानेसे प्राप्त नहीं होता, माधु- पन मिरकेश लुचन करनेसे प्राप्त नहीं होता, माधुपन पाट पर बैठकर सभारजक व्याख्यान देनेसे या भक्त लोगोंके दिये हुये आचार्य, उपाध्याय, पंन्यास, व्याख्यान वाचापति आदि आरोपित टाईटलोंमे प्राप्त नहीं होता, परन्तु मनोद्यान में जन्य धारण करने वाली स्वार्थीय वृत्तियों-लालचोंका मरदन-निर्मूलन करनेसे ही साधुपन प्राप्त होता है। साधु- पदकी प्राप्तिके साथ ही चिन्ता, उद्वेग, इं, द्वेष ममत्व आदि दोप स्वय नाश होजाते हैं, फिर हृदयमें परम शान्ति, परम धैर्य, वास्तविक प्रेम, परम सत्य, परम प्रसोद-परम आनद प्राप्त होता है। वह अपने आपको पहचानने लगता है और जो अपने आपको पहचानता है वही समस्त वस्तु स्वरूपके तत्त्वज्ञानको जान सकता है। अथवा यों कहो कि जो ममस्त यस्तु स्वरूपका तत्त्वज्ञान प्राप्त करता है, वही एक [१४७] अपने आपको पहचान सकता है। जन तक अपने आपकी पहचान न हो तब तक आन्तर शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना दुसाध्य है। जो महात्मा अपने आपको पहचाने विना ही आयवृत्ति में सुख प्राप्त करनेको प्रवृत्तिपे मच रहे हैं वे व्यर्थ के ही कष्टोंमें अपने अमूल्य जीवनको व्यतीत कर अन्तरे पदको प्राप्त होते हैं। इस बातको स्पष्ट करनेये महात्मा स्वामी रामती- वका दिया हुआ दृष्टान्त ही काफी होगा! एक लडका जो अभीलगभग एक वर्षकी ही उमरवाला था, जिमे अमी तक अपने पैरोंसे चलना न आता था, युटानियो मे ही चलता था एक दिन खेलते हुये उस बच्चे की दृष्टि अपने पडछायें पर पड़ी। उस यचेको वह बडी ही अजन चीज- मादल दी, अतएव वह उसे पकडनेका विचार कर घुटनि, योसे उसकी ओर चला । वह बचा उस अपने पडछायेका मस्वक पकडना चाहता था। ज्यो ज्यो वह बालक उस मस्तक की ओर चलता है त्यो त्यो वह मस्तक भी उसी प्रकारकी गति मे आगे बढता जाता है। इस प्रकार जर वह मस्तक लड़के के दायों न आया तब वह बालक सनमेंदु वित हो रोने लगा, परन्तु उसे पकडने की प्रवृचि तो उसने चालू ही रस्खो । वह पमा जप पड़ जाता तय वह मस्तक जिसे वह पकडना चाहताथा भी पड जाता था। बच्चा उठ कर चलता तो वह मस्तक भी आगे चलता था, इससे उस बालकको वडा ही आश्चर्य युक्त दुख होता था। अन्तमें वह बालक थक कर जमीन पर गिर- पहा और उसकी इच्छा पूर्ण न होने के कारण यह फूट फूट कर रोने लगा। इतने में ही उसकी माता जो दूर येठी उसकी सम्वं चेष्टायें देस रही थी वहाँ आई, उसने अथको उठा कर
[१४८]
उसका हाथ उसके मस्तक पर रख दिया। अब उस पर
छायेमा सत्तक उस बालक हाय आ गया ।।।
इसी प्रकार सनुष्य भी अज्ञानता वश अपनी आत्मा ही
समाये हुये अनन्त सुसकी ओर दुर्लक्ष कर संसारको तुच्छ
लालचोंमें सुसके स्वप्न देख कर उन्हें प्राप्त करने के प्रयत्न मे
ही अमूल्य जविन व्यतीत करते हैं। परन्तु अन्वमें सुखकर
लेश भी न मिलनेसे वे खेदको प्राप्त होते हैं।
पूय मुनिवरो। यदि आप वास्तविक सुख प्राप्त करना
चाहते हो, यदि आप समस्त सृष्टिपदार्थक तत्वज्ञानको
प्राप्त करना चाहते हो तो तुम्हारे परजायके पीछे न दौड कर
प्रथस अपने आपको पहचानो।
अपना मस्तक परुडो,
अपने अन्दर पैदा होनेवाली बाह्य लालचोंको नष्ट कर
अपने मन पर पूर्ण सया प्राप्त करो, आप अन्तरमुख वना,
अपने भीतर रहे हुये अपने प्रमुके-आत्माके दर्शन करो,
उसीकी उपासना करो। फिर देखो.सपस्त ससारके पदार्य
तुम्हारी ठोकरोंमें आ पहेगे। दुनियाके सर्व मोहक एवं
आकर्पक पदार्थ तुम्हारे स्वाधीन हो जायेंगे, पर उस परिस्थि-
तिचे तुम्हें वे तुच्छ और तुम्हारे परछायेके सपान भामित
होगे।
अहा केसी आश्चर्यकी बात है कि गीतार्थ कहलानेवाले भी
महामुनि आज परछायेको पकडनेके सपान ससारकी क्षुद्र
मान बडाई प्राप्त करने के लिये दौड धूप' कर रहे हैं। ज्ञानी
कहलाते हुये भी उनका
अन्त करण अज्ञानान्धकारमें
परिपूर्ण देख पड़ता है। पवित्र हृदयी कहलाते हुये मी.'
-
[ १४९] उनका हृदय क्रोध, सान, माया, लोम और असहि- प्णुता आदि अपवित्र दोषोंसे सना हुआ देख पड़वा है । निष्ट भापी कहलाते हुये भी उनकी सरस्वती-वाणी कटु एव द्वेषगर्मित मार्मिक वाक्योंसे दूषित देख पहती है। सरल स्वभावी कहलाते हुये भी वे दम्मतासे दूपिव देख पाने | निस्पृह कहलाते हुये भी लालचोंके दास घने देख पड़ते हैं। अपरिग्रही कहलाते हुये भी वे सीधे या वर तौरसे आकण्ठ परिप्रहमें डूबे देख पाते है। सत्यवादी कहलाते हुये भी वे अपनी मान वडाइके लिये असत्य कार्य फरते देस पडते है। यदि वे अपने आपको पहचानें, यदि वे अपने आत्मस्नरूप मस्तकको पकडे तो ससारकी क्षुद्र वास- नायें, मानसिक रुपजोरीके कारण अपने भीतर पैदा होने- वाली नीच वृत्तिये रूप परछाया स्वत ही उनके स्वाधीन हो जाय। प्रिय पूज्य धर्मगुरुओ। अब इस ज्ञानमानुके उदय जरा करवट तो पदलो, इस कुम्भकरणी निद्राको छोटो, उठो सधे धर्मसिंह बन कर गर्जना करो। तुम्हारी शिथिल- ताकै कारण देशका अधिकाश माग धर्मसे विमुख हो गया हो रहा है। तुम्हारी यासे घषित हो जनता अधर्मको धर्म समझ कर अपने विकाश मार्गसे परामुख हो रही है। प्रिय धर्मगुरुओ! धर्म, ममाज एव देशकी उन्नति आप महात्माओं पर ही निर्भर है। आप ही धर्मकी उन्नाव कर सकते हैं, क्यों कि आप धर्मफे ज्ञाता हैं। धर्म- रुओ। आप ही समाजकी पढती दशाको समुन्नत पर सकते, क्यों कि समाज का थापफे वधनों पर विश्वास
[ १५२]
.
इतना अवश्य स्मरण रक्यो कि जो कार्य करो उसके
प्रारम्भसे पहले उस पर शान्त चित्तसे पूर्वापर विचार
बरो.! उसके प्रारंभिक परिणामको नहीं किन्तु
अन्तिम परिणामको देखो। कोई भी कार्य किसी
असंगवश आवश्की झुल झुलामें आकर विना विचारे
मत करो अपनी वर्तमान स्थिति सुधारनेके लिये
और यदि सुघरी हुई है तो उसका विशेष विकाश
करनेके लिये अपना परम कर्तव्य समझ कर अवश्य वि
सरफरो।
ति शम्॥
श्री आत्मतिलक ग्रन्धसोसायटी द्वारा छपी हुई महत्त्वपूर्ण और सस्ती कीमतको पुस्तके गुणस्थान क्रमारोह. यह अध्यात्म विषयक अन्य है। इसमें चार प्रकारके ध्यानका सविस्तर स्वरूप लिया गया है। प्रथम गुणस्थानसे लेकर जीवात्मा किस प्रकार श्रेणी आरूढ होकर आत्म चिन्तन द्वारा फर्म प्रकृतियोंमोक्षय करता हुआ या उपशपाता हुआ उपरके गुणस्थानोंको प्राप्त कर फैल्य ज्ञानको प्रामि करता है, इस विषयका सविस्तर स्वरूप पानुसार लिखा गया है । इसके अलावा गृहस्थ धर्मकं बारह व्रती, ग्यारह प्रतिमाओका एव मोझका स्वरूप भी सरल भाषामें बहुत ही उमदा लिया गया है । अत. मोझामिलापी एव अध्यात्म मार्गानुयायी मनुष्योंको यह अन्य अवश्य पढना चाहिये । इसके पढनेसे जिज्ञासु मनुष्योंको तत्वज्ञानकी प्राक्षिका लाभ हो सकेगा। पुस्तकको छपाई मम्बन्धी सफाईकी प्रशसा करना व्यर्थ है, बढिया ग्लेज पेपर डेती आठ पेजी साईजके दोसो पृष्ट और सुनहरी अक्षरोंवाली सुन्दर रंगीन पकी जिल्द तथा अन्दर दो फोटोग्राफ इत्यादि सब कुछ होने पर भी इस दल- दार महत्त्व पूर्ण पुस्तककी कीमत मात्र सवा रुपया है । परिशिष्ट पर्व। इस पुस्तकमें महावीरके यादका इतिहास है। महावीर अमुकी पट्ट परपरामें जो जो प्रमावली महान आचार्य [१५४] ? हैं उन सबका सविस्तर पवित्र जीवन चरित्र इस पुस्तक है जम्बूस्वामीके चरित्रान्तरगत अठारह कथाय और आदिमें ही वल्क्लचीरी ग्व प्रसन्नचन्द्र राजर्पिके जीवनकी घटनाये बडी ही वैराग्य और शिक्षा देनेवाली हैं। यह पुस्तक दो भागोंमे विभाजित है। पुस्तककी छपाई व सफाई वढिया है, इस पुस्तकमें भी दो फोटोग्राफ दर्ज हैं ! वी तो इसकी सस्ताईसें है, डेसी आठपेजी साईजके तीनसो सत्तर पृष्ठ होने पर भी कीमत मात्र डेढ रुपया है। जैनसाहित्यमा विकार थवाथी थयेली हानि । जैनसमाजमे पडित बेचरदासजीको कौन नहीं जानता उन्हीकी प्रौढ लेखनीसे गुजराती भापामें लिया हुआ यह प्रय है। इस पुस्तक्का जैसा नाम है सचमुच उसी प्रकारके वर्ण- नका यह ओबहूब जीता जागता चित्र है। महावीर प्रभुसे टेकर आज तक महावीरके अनुयायी मुनिवरोके आधार विचारमे एव जैन साहित्यमें किस किस समय पर किस किस प्रकार निवर्तन परिवर्तन हुआ, जैन समाजकी दिगम्बर श्वेताम्बर दो शासायें कब और किस कारण जुदी पडी, चैत्यवाद एव चैत्य द्रव्य आदि विषयोंका वर्णन इतिहासकी दृष्टिसे सूत्र सिद्धान्तोंके प्रमाण सहित लिखा गया है। इस महत्त्वपूर्ण पुस्तककी एक एक प्रति हरएक जैनको अपने पास रखनी चाहिये । कौन सोलह पेजी साईज२०३ पृष्ठ होनेपर भी इस दलदार पुस्तककी कीमत मात्र एक रुपया है। महावीर शासन, सयम साम्राज्य, मूल्य २) [१५५] सीमधर स्वामीने खुल्ला पत्रो, मूल्य 1) सूराचार्य और मीमदेव, मूल्य ।) जिनगुणमंजरी, मूल्य 1) प्रभावना करने योग्य पुस्तके-- उर्जावनके सात सोपान, मूल्य आरामनन्दन, मूल्य २) रत्नेन्दु या पुर्नजीवन, मूल्य ।) चारित्र मदिर, मूल्य मूल्य मूल्य मेरे विचार न २ मूल्य यशोमद्रसरि, मूल्य राष्ट्रीय गीतावाल, मूल्य शिशुशिक्षा, सल्य जैन धर्म, । दिव्य प्रेम, निम्नलिखी दो पुस्तकें भी यही ही मिलती हैं। सुखी जीवन, मूल्य नयकर्णिका, पूर्वोक्त सब पुस्तके मिलनका मात्र एक ही पता- भारत जैन विद्यालय पूना सिटी क्षमाऋपि, सप्रतिराजा, " सल्य १ सल्य
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गजल।
जरा ध्यान देके सुनलो, पद साधु पाने वालो।
सुनके विचार करलो, हित मार्ग जाने वालो ।।
जिस हेत भेख धारा, उस ध्येयको विसारा।
भवसिन्धुका किनारा, फिर कैसे पाने पालो ।।
साधुत्वको न जाना, निजरूप ना पिछाना।
बानियोका माल खाना, पदवीके मोह वालो।
महावीरके पुजारी, है क्या दशा तुम्हारी।
क्यों ऐक्यता बिसारी, झगडे, मचाने वालो ।।
आत्मध्वनि दवाई, परहों में हा मिलाई ।
सन्मानकी कमाई, तनतोड करने वालो॥
जाने हो यह सभी तो, ऐसे बने तभी तो।
वाकी पतन अभी तो, है मान खाने वालो।
इसमें न माल भाई, मिथ्या सभी वटाई।
यह जिन्दगी गंवाई, दो दिनका मान पालो ।।
ओ धर्मआगे वानो!, कुछ देश काल जानो।
मेरे कहे को मानो, निज धर्मको संभालो।
लालचको लात मारो, फर्तव्य दिलमें पारो।
स्वाचारको सुधारो, स्वर्गीय पन्थ चालो॥
-भिक्षु तिलक विजय पंजाबी
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