Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Vidur Neeti
Front matter
विषय अवतरणिका। - करना और प्रथमोऽध्यायः- पञ्चमोऽध्यायः- विदुरजी का युक्ति पूर्वक सामयिक वृथा कर्त्तव्य करने वालों का स उपदेश देकर पृतराष्ट्रको पण्डित और बतला कर धर्मनीति और यधो मूरों के लक्षण बताना और पाण्डवों व्यवहार का विवरण करते हुये को राज्य दिलाने की सम्मति देना। और 'बन की उपमा से पाण्डव द्वितीयोऽध्यायः कौरवों का परस्पर का मेल धृतराष्ट्र को कर्तव्याकर्तव्य का हित कर बतलाना । उद्बोधन कराना राज धर्म के स्वरूप, पप्ठोऽध्यायः-- ज्ञान पूर्वक युधिष्टिर की योग्यता कह कूट नीति किसे कहते हैं एक कर कौरवों से उन्हें राज्य-भाग देने विविध मन्त्रणामों से दुर्योध में उनकी महत्ता वर्णन करना । सर्वथा राज्य के अयोग्य प्रमें तृतीयोऽध्यायः- कहना कि दुर युधिष्टिर के प्रति कौरवों के कोमल अवश्य राज्य से गिरेगा । व्यवहार करने की श्रेष्ठता कहते हुए सप्तमोऽध्यायः- केशनी विरोचन और राजनीति के उपदेश से जीवन के सुधन्वा सम्बाद का वर्णन करना और पृथ्वी बनाने की क्रिया वतलाना और के लिये झूठ बोलने का उपदेश एवं राष्ट्रसे कहना कि अपने पुत्रोंके । मनुष्य जीवन का कर्त्तव्योपदेश पांडदों से भी समानता व्यवह आचरण करना चाहि, चतुर्थोऽध्यायः श्राष्टमोऽध्यायः-- दत्तात्रेय और साध्यो के सम्बाद द्वारा तीन प्रकार के मलप्यो और धर्म की मार्मिक बातें बतलाः चारों वर्गों के कथ्य, कर्मों । उत्तम कुलों की पहिचान एवं कर्तव्य विभिन्न उपदेश देहुये युधिष्ठिर स्मझ कर परस्पर प्रीति पूर्वक रहते योग्य अधिकार का परामर्श दे हुए शत्रुओं को लाभ का अवसर न परन्तु देना और दुर्योधन की प्रवृत्ति कुछ दैवाधीनहै । कह कर अप सुधारने का उपदेश करना। - अन्तमें धपुर प्रष्ट्र का यह स विशेषता प्रकट या ।
मासिका है, than एक बगर सन् १६३२ ई. में, मैं अपनी जन्म भूमि लखना, जिला इटावा को गया। वहाँ पुरानी पुस्तकों की खोज करते हुए मुझे मेरे बाल्य-काल के मित्र श्री० पं० मिश्रीलाल जी दीक्षित हैडमास्टर,जैतपुर स्कूल ( इटावा ) के पास यशस्वी कवि श्री बिहारीदास जी के पुत्र श्रीकृष्ण कवि की बनाई हुई विदुर- प्रजागर की बन्दोबद्ध लिपि मिली. यह लिपि उन्होंने मेरे बड़े आग्रह करने पर दिखलाई, कि जिसका मैं आभारी हूं। सतसईकार बिहारी के पुत्र कृष्ण ने इस विदुर-नीति पर दोहे रचे हैं। उन्होंने स्वयं पुस्तक रचना का कारण यह लिखा ( यह पुस्तक अब तक अप्रकाशित है कि:- "राना आयो मल्ल की, प्राज्ञा अति हितु जान । विदुर प्रजागर कृष्ण कवि, भापा कह्या बखान ।। सत्रह से अरु बानवे, सम्बत कार्तिक मास। शुक्ल पक्ष पाँच गुरू, कोनो अन्य प्रकास 1," मेरे चिन में बड़ी उत्कएठा थी, कि यह पुस्तक प्रकाशित की जावे, परन्तु एक तो उक्त महाशय ने पुस्तक की लिपि नहीं दी, दूसरे लिपि करने का समयाभाव दोनों विपम कारण उपस्थित थे। विदुर नीति का अब केवल भाषानुवाद मनुष्यों के कल्याण के लिये ही प्रकाशित किया जा रहा है । भारतवर्ष में बृहस्पति-नीति, चाणक्य नीति, धौम्य-नीति, कामन्द की नीति, ।
( ४ ) कामन्द की नीति सार, पञ्चतन्त्र, शुक-नीति, कणिक नीति आदि. २ अनेक नीति विद्या के ग्रन्थ उपलब्ध होते हुए भी अपनी नीति के आश्रित जनपदों के जीवन न रहने से उन्हें. बड़ी २ विषम समस्याओं का सुलझाना कठिन हो गया है । इसका खेद है, विदुर-नीति उस समय की. है, कि जब से आर्य- संस्कृति के पतन का सूत्रपात हुआ है। इसलिये हमको इससे लाभ उठाना चाहिये और अपना जीवन एक नैतिक जीवन बनाना चाहिये। प्राज्ञस्य मूर्खस्य चकर्म योगे, समत्व मभ्येति तनुर्नबुद्धिः ॥ ज्ञानी और मूरों के शरीर कर्म करने में तो एक से होते हैं, परन्तु केवल बुद्धि में भिन्नता होती है । यह विशेष बुद्धि नीति अन्थों के पढ़ने से ही प्राप्त होती है, वह बुद्धि शुक्र नीति अनुसार यदि प्राप्त हो सकती है, तो- सर्वलोक व्यवहार स्थिति त्या बिना नहिं । यथा .शनैविनी दहस्थितिर्न स्याद्धि देहिनाम् ।। बिना नीति के लोक व्यवहार नहीं सध सकते, जैसे विना भोजन के शरीर नहीं रह सकता। अतः हमको नीति ग्रन्थों के स्वाध्याय में कभी भी प्रसाद न करना चाहिये । यही हमारी नीति-बुद्धि वर्द्धक है। कुसमय पर सच्चे मित्र के समान परामर्श देती है और दुःखों से पार कर देती है। शारदी पूर्णिमा सं० १९६२ विद्वानों का अनुग्राह्य- राजा मन्डी, आगरा गोकुलचन्द दीक्षित "चन्द्र" Com विदुर चरित्र . पांच हजार वर्ष से अधिक हुये कि भारतीय स्वतंत्रता का सूर्य मध्याह्न तक तप के शनैः अस्ताचल की ओर जाने लगा। इस परिवर्तन के युग में भी चक्रवर्ती सारभौम राज्य आर्यों का ही था। इन आर्य पुरुषों के प्रसिद्ध वंश कुरु और पाण्डु वंशी कौरव और पाण्ड्य कहलाते थे । भाग्य चक्र के रूठने का कलंक इन्हीं दोनों के समय में इस आर्य कुल को परस्पर के कलह से लगा था । यहां पर हम केवल महात्मा विदर जैसे नीतज्ञ के जीवन का चरित्र चित्रण करने का उद्योग करेंगे, कि जिसका विषय से सम्बन्ध है। एक दिन व्यास जी की माता सत्यवती ने अपने कुल परम्परा के अनुसार "एष धर्मः सनातनः कहती हुई भीष्म को यह आदेश दिया, कि तुम्हारा भाई विचित्र वीर्य निस्सन्तान मर गया है। मैं आज्ञा देती हूँ, कि अम्बिका अम्बालिका से नियोग (आज्ञा) द्वारा सन्तान उत्पन्न कर कुल को क्षय दोप से बचाओ! भीष्म ने प्रतिज्ञा पूर्वक ऐसा करने से मना कर दिया। सत्यवती ने बड़े २ प्रमाण दिये,परन्तु परम दृढ़ प्रतिज्ञ भीष्म पर यह वचनं क्या प्रभाव डाल सकते थे। निदान.सत्यवती ने अपने पुत्र वेद व्यास से कि जिसका सम्बन्ध विचित्र वीर्य से माई चारे का भी थो, उसको नियोग-नियुक्ति में अनमति लेकर " .
[ ६ ] प्रस्तावना थी,भीष्म देशकाल अवस्था से पूर्ण परिचित थे, उन्होंने प्रस्ताव मान लिया । सत्यवतीने व्यास को बुला कर समझाया । अन्ततोगत्वा व्यासजी ने माता की आज्ञा से अपने शरीर में घृत लगाकर नियोग का आयोजन किया । व्यास का नाम कृष्ण द्वैपायन भी था । वह बड़े तेजस्वी और काले डरावने थे, नियोग की रात्रि में जब अम्बिका और अम्बालिका आपत्ति धर्म की रक्षा के कारण व्यास के समागम में गई तो डर गई और अम्बिका ने अपने नेत्र मूंद लिये, अम्बालिका सहम कर पीली पड़ गई । गर्भाधान में इस करतूत का यह प्रभाव पड़ा, कि एक अन्धा और एक पीला पुत्र हुआ। दोनों के क्रमशः धृतराष्ट्र और पाण्डु नाम रक्खे गये । इन सन्तानों में कमी देख कर सत्यवती ने फिर अम्बिका को पुनः नियुक्त किया,परन्तु उसने छल किया और अपने स्थान में एक दासी को भेज दिया | निदान यही सन्तान व्यास जी के वीर्य विदुर नाम से हुई थी। विदुर जी धर्म-नीति शास्त्र में बड़े पारंगत हुये, परन्तु दासी पुत्र होने से रोज्याधिकारी न हो सके। इन दिनों सत्यवती के हाथों राज की बागडोर थी । जव राजकुमारों के विवाह किये गये तो हमारे चरित्र नायक श्री विदुर जी का भी विवाह रोजा देवक की सुलक्षणी कन्या पारसवी के साथ रचाया गया । महा प्राज्ञ विदुर जी का बड़ा सम्मान और प्रतिष्ठो थी । आप म्लेक्ष भाषा के भी पारंगत विद्वान थे । इसका परिचय उस समय मिला था, कि जब श्री युधिष्ठिर जी ने वारणावत को प्रस्थान किया तो विदुर जी ने उन्हें म्लेक्ष भाषो में उपदेश दिया था। विदुर जी की नीतज्ञता की छाप तो थी ही, उन्हें कठिन से कठिन कामों पर लगा दिया जाता था। वारणावत में लाक्षागृह में जब पाण्डव रह रहे थे तो विदुरजी के भेजे हुए विश्वासपात्र मनुष्यों से सुरंग बनवाई गई थी और इसीसे निकल कर उन्होंने अपने प्राण बचाये थे । विदुरजी सदैव पाण्डवों की महायता पर रहे। जब सुरंग से पाण्डव बाहर आये तो विदुरजी ने ही गङ्गा पार करने के लिये रातों रात नौकाओं को भेजा था और उन्हें पार उतरवा दिया और प्राण बचाये थे। धीरे २ जब पाण्डवों के जीवित रहने की चर्चा फैली तो विदुर ने धृतराष्ट्र से सब समाचार कहा था। इधर जब पाण्डवों ने पांचाल-क्षत्रियोंसे सम्बन्ध कर लिया तो दुर्योधन और कर्ण की मंत्रणा से धृतराष्ट्र ने द्रोणाचार्य और विदुर ने परामर्श किया । विदुरजी ने धृतराष्ट्र से पांडवों के लौटाने के लिये कहा और विदुर को पांडवों को लेने भी भेजा। महाप्राज्ञ विदुरने श्री कृष्णचन्द्र जी के सहयोग से पांडवों को हस्तिनापुर ले आये और इन्द्रप्रस्थ का प्राधा राज्य भी दिलायो तब कौरव पांडवों ने जूआ खेला तो इन्हीं विदुरजी को बुलाने के लिये भेजना चाहा, परन्तु परम नीतज्ञ विदुरजी ने निषेध किया, परन्तु धृतराष्ट्र के बन पूर्वक कहने पर विदुर जी इन्द्र प्रस्थ गये, वहाँ युधिष्ठिर तथा विदुरजी में बड़ा मंलाप हुआ। युधिष्ठिर ने चूत में भाग लेने लेने से मना भी किया और विदुरजी ने भी जुये को बुरा बतलाया, परन्तु राज्याज्ञा शिरोधार्य मान कर फिर भी युधिष्ठिर को प्रेरित किया गया. जब युधिष्ठिर लगातार हारे तो उन्होंने धृतराष्ट्र से दुर्योधन की निन्दा की और खेलने को वन्द करा देना चाहा, विदुरजी की और दुर्योधन में खूब कहा सुनी भी होगई, परन्तु "होनहार बलवान जूओ होता ही गया। द्रौपदी के हारने पर विदुरजी ने फिर अनर्थ सम्भावना से हस्त- क्षेप किया.परन्तु होना ऐमाही था,विदुर नफन प्रयत्न नहीं हुए ।
. (८) निदान जब अज्ञात वास के लिये पाण्डव चले; धृतराष्ट्र से विदुर की मंत्रणा हुई और विदुर ने चाही, कि फिर राज्य पर पाण्डवों को लाया जाये, परंतु इनका बड़ा अपमान किया गया। अन्त में विदुर पाण्डवों की ओर होगये । जब विदुरजी कामा (काम्यक ) चन में पहुंचे तो युधिष्ठिर ने आने का कारण पूछा, इधर धृतराष्ट्र को विदुर के चले जाने का बड़ा दुःख हुआ और सञ्जयको भेजा,कि लौटालावे और वह फिरलौट भी आयोनिदान यह कलह बढ़ता ही गया, जब अनर्थ बढ़ा तो श्रीकृष्णचंद्रजी के उद्योग से दून भेजा गया,कि युद्ध न किया जावे और पांडवों का अपना विजित राज्य लौटा दिया जावे, परन्तु वे असफल हुये और निजकी सहायता मांगने पर अर्जुन और दुर्योधन दोनों को सहायता देने का वचन बद्धं होना पड़ा, युद्ध प्रारम्भ हो जाने पर एक दिन रात्रि को धृतराष्ट्र ने विदुरजी को बुलाया और विदुर से परामर्श किया। इसी रात्रि को जो नीति-कथन की गई यह "विदुर प्रजागर" नीति कहलाती है । श्रीकृष्णचन्द्रजी की विदुर की गाढ़ी मैत्री थी, एकवार विदुर पत्नी श्रीकृष्णचन्द्र को स्वागत करते हुए इतनी प्रेम में विह्वल होगई थी. कि उन्हें यह ज्ञान नहीं रहा, कि केले जो छील २ कर खिला रही हूं, वह अपने अतिथि को छिलके खिलादूं या उसका गृदा ! इसी पर श्रीसूरदासजी ने कहा था "दुर्योधन की मेवा त्यागी, शाक विदुर घर खायो'" बहुधा श्रीकृष्णचन्द्रजी इन्हीं के यहाँ आकर विश्राम करते थे। इससे विदुर का महान् धर्मात्मा और नीतिवान होना प्रमाणित होता है।
अथ विदुरनीतिः , प्रथमोऽध्यायः। प्रणम्य परमात्मानं, गिरानन्दं च सद्गुरु । विदुरनीतिस्सुवोधाय, क्रियते देशभापया । वैशम्पायन उवाच- द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपतिः । विदुरं द्रष्टुमिच्छामि तमिहानय मा चिरम् * ॥१॥ वैशम्पायन बोले- महा बुद्धिमान् महाराजा धृतराष्ट्र ने द्वारपाल से कहा कि "मैं विदुर से मिलना चाहता हूँ, उन्हें यहाँ ले आओ, देर न - करना & 'विदुर को देखना चाहता हूँ' जैसे आज कल (I wanted to see you Mr. Jedeo ) अर्थात् "महाशय जयदेवजी मैं श्राप से मिलना चाहता था" में "See you" मिलने के अर्थ में प्रयोग किया गया है।
( १० ) विदुर नीतिः प्रहितो धृतराष्ट्रेन दूतः क्षत्तारमब्रवीत् । ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति ॥२॥ इस प्रकार धृतराष्ट्र जी का भेजो हुआ द्वारपोल विदुरजी से जाकर बोला। "हे महा बुद्धिमान् (विदुर ) ऐश्वर्यशाली महाराज धृतगष्ट्र) आप से मिलना चाहते हैं। एवमुक्तस्तु विदुरः प्राप्य राजनिवेशनम् । अब्रवीद्धृतराष्ट्राय द्वाःस्थ १ मा प्रतिवैदये ॥३।। तव विदुर जी राजभवन पर पहुंच कर द्वारपाल से कहने लगें, कि द्वारपाल ! मेरा निवेदन धृतराष्ट्र से कर दो कि - द्वा:स्थ उवाच- Maa + विदुरोऽयमनुप्राप्तो राजेन्द्र ! तब शासनात् । द्रुष्टुमिच्छति ते पादौ कि करोतु प्रशाधिमाम् ।४। द्वारपाल ने तब जाकर कहा- हे राजेन्द्र ! आपकी आज्ञा से विदुरजी आ गये हैं और वह चरण देखना चाहते हैं। वह क्या करें, यह आज्ञा मुझे दीजिये। - + यहां 'चरण देखने से शिष्टाचार वाक्य का प्रयोग करना ही इष्ट है । यह अभिवादन प्रथा टर्की में अब भी है। वहां क्रमशः लवेफर्श, कोरनिश और तहत्तुस्सलाम यह शिष्टाचार कहलाता है।
प्रथमोऽध्यायः ( ११ ) धृतराष्ट्र उवाच- प्रवेशय महाप्राज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् । अहं हिं विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने ॥५॥ धृतराष्ट्र ने कहा- दूर की सोचने वाले,परम बुद्धिमान विदुर को ले आओ, मैं विदुर के दर्शनों के लिये सर्वथा समर्थ हूँ। अर्थात् दर्शन कर सकता हूँ। द्वा:स्थ उवाच- प्रविशान्तःपुरं क्षत्तमहाराजस्य धीमतः । नहिते दर्शनेऽकल्पो जातु राजा ब्रवीद्धिमाम् ॥६॥ ' द्वारपाल ने आकर विदुरजी से कहा- हे विदुर जी! बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्र के अन्तःपुर (भवनों ) में चलिये । आपके दर्शन करने में महाराज कभी भी असमर्थ नहीं, ऐसा ( राजा ने) मुझ से कहा है। वैशम्पायन उवाच- ततः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्र निवेशनम् । अब्रवीत्प्राञ्जलिर्वाक्यं चिन्तयानं नराधिपम् वैशम्पायन जी कहने लगे- तब विदुर जी ने धृतराष्ट्र में जाकर चिन्तित (सोच में पड़े हुए ) महाराज धृतराष्ट्र से हाथ जोड़ कर बोले । के भवन
( १२ )
विदुर नीतिः
॥८॥
विदुरोऽहं महाप्राज्ञ सप्राप्तस्तव शासनात् ।
यदि किञ्चन कर्तव्यमयमस्मि प्रशाधि माम्
हे महामतिमान् ! मैं विदुर श्रापकी आज्ञा से आगया हूं,
यदि कोई कार्य हो तो मैं उपस्थित हूं । क्या आज्ञा है !
धृतराष्ट्र उवाच --
सज्जयो विदुर ! प्राज्ञो गर्हर्थित्वा च मां गतः ।
अजातशत्रोः श्वो वाक्यं सभामध्ये स वक्ष्यति ॥६॥
--
धृतराष्ट्र बोले-
-
हे विदुर बुद्धिमान् सञ्जय मेरी निन्दा करके इस समय
यहां से गया है और कल सभा में भी वह “युधिष्ठिर के वाक्यों"
को कहेगा।
तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञात वचो मया ।
तन्मे दहति गात्राणि तदकापीत्प्रजागरम् ॥१०॥
उस युधिष्ठिर के "वह वचन" अभी मुझे विदित नहीं
हो सके । वह मेरे अन्नों को जलाता है और उसी से मुझे नींद
भी नहीं आई।
जाग्रतो दह्यमानस्य श्रेयो यदुनुपश्यसि ।
तब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो ह्यसि ॥११॥
प्रथमोऽध्यायः - ! - "जागते हुए भी जो जल रहा हो"उसके हितकी जो बात तुम्हें सूझती हो वह कहो । हे प्रिय ! तुम ही हम सब में धर्म और अर्थ का ज्ञान कराने में चतु' हो । यतःप्रातःसजयःपांडवेभ्यो, न मे यथावन्मनसः प्रशान्तिः । सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिंगतानि किंवक्ष्यतीत्येवमेऽद्यप्रचिन्ता॥१२ जब से संजय पांडवों के पाप्त से प्राया है, मेरे मन को जैसी शान्ति होनी चाहिये, नहीं है। सब इन्द्रियों ने अपने २ स्वभाव को छड़ सा दिया है । सुझे यही चिन्ता है, कि संजय आज क्या कहेगा। विदुरो उवाच- अभियुक्तं बलवता दुर्बलं हीनसाधनम् । हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागरोः ॥ १३ ॥ विदुर जी कहने लगे- बलवान से दबाया हुआ, दुर्वल, सामग्री रहित, धनहीन, कामी और चोर को नींद नहीं आती अर्थात् वही अधिक जागता है। कचिदेतैर्महादोपैन । स्पृष्टोऽसि नराधिप ! कचिच परवित्तेषु गृध्यन्न परितप्यसे । १४ ।। हे राजन् ! कहीं इन (उपयुक्त) महादोषों (व्याधियों) से तो छुये हुये (ग्रसित ) तो नहीं हो; नथा ऐसा तो नहीं है, कि - ( १४ ) विदुर नीतिः किसी दूसरे के धन की लालसा रखते हुए दुखी तो नहीं हो रहे हो। धृतराष्ट्र उवाच- श्रोतुमिच्छामि ते धा परं नैःश्रेयसं वचः । अस्मित्राजर्षिवंशे हि त्वमेकः प्राज्ञसम्मतः ॥ १५ ॥ - धृतराष्ट्र बोले A- हे विदुर ! मैं तो आपके धर्मयुक्त एवं परम हितकारी बचनों को सुनना चाहता हूं। इस राजर्षि वंश में केवल तुम्हीं' एक आदरणीय विद्वान् हो । विदुर उवाच राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् । प्रष्यस्ते प्रेपितश्चैव धृतराष्ट्र ! युधिष्ठिरः ॥ १६ ॥ विदुर जी ने कहा- हे धृतनाष्ट्र ! राजाओं के लक्षणों सहित तीनों लोकों का स्वामी बनने योग्य तुम्हारा सेवक युधिष्ठिर है, उले बन निर्वासन किया गया अर्थात् यह निर्वासित कर दिया गया है विपरीततरंच त्वं भागधेये न सम्मतः । अर्चिपां प्रक्षयाचैव धर्मात्मा धर्मकोविदः ॥ १७ ॥ धर्मानुकूल आवरण करने वाले, धर्म को जानने वाले होते हुए भी नेत्र ज्योति न होने के कारण तुम (गन्य ) भाग के अयोग्य एवं अन्य राज लक्षणों से प्रतिकूल हो, परन्तु- प्रथमोऽध्यायः ( १५ ) आनृशंस्यादनुक्रोशाद्धर्मात्सत्यात्पराक्रमात् । गुरुत्वात्त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून्क्लेशांस्तितिक्षते ॥१८॥ वह ( युधिष्ठिर ) हिसा न करने से, दयालु न होने से, धर्म और सत्य से, पराक्रम एवं तुम में गुरु भाव ( सम्मान ) रख कर लश सह रहा है। दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा । एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतमिच्छसि ॥ १६ ॥ इन दुर्योधन, सौबल. कर्ण तथा दुःशासनादि को राज्य का अधिकारी बना कर तुम अपने ऐश्वर्य की क्या कामना खते हो अर्थात् यह तुम्हें ऐश्वर्य कल्याणकारी नहीं, अपितु ! हानिप्रद है, क्यों कि- आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता | यमर्था नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ।। २० ।। श्रात्म ज्ञानी, उद्यम शील, सान शील, सदा धर्म में हद वृत्ति और जिस को संसार के पदार्थ आकर्पित कर (खोंच न सके उसे ही पण्डित कहा जाता । मनु भगवान ने भी ऐसा ही कहा है। "अर्थ कामेव सक्तानां धर्म ज्ञान विधीयते"। 1 अर्थात् जो धन के लालच में न पा सके और इन्द्रियों के वशीभूत न हो उस के लिये ही धर्म और ज्ञान का विधान है, सब के लिये नहीं।
निपेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते । अनास्तिकः श्रद्दधान एतत्पण्डितलक्षणम् ॥२१॥ . जो प्रशंसां के योग्य काम करता है, निन्द्यकर्मों का त्यागन करता है, ईश्वर और वेद में विश्वास रखता है। श्रद्धालु हो, यही पण्डितों के लक्षण हैं । क्रोधो दर्पश्च हीस्तम्भो मान्यमानिता। यमर्थान्नाकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥ २२ ॥ क्रोध, हर्प, अभिमान, लता, धैर्य और अहम्मन्यता ( मैं हूं, मैं बड़ा हूं ) जिस को कर्त्तव्य से नहीं हटा सकते, वह ही पण्डित जानो। यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे । कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥२३॥ जिसके कृत्य ( विचार आयोजन ) अथवा विचार किये हुये कार्य को कोई नहीं जानता, किन्तु जब तक वह कार्य सिद्ध होकर प्रमाणित न हो जावे, तब तक न जान सके, उमेही पण्डित कहते हैं। यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रतिः । समृद्धिरसमृद्धिर्वा स वै पण्डित उच्यते ॥ २४ ॥ जिस के कृत्य (करनी) को सर्दी, गर्मी, डर, काम धन प्रभाव अयवा धन हीनता से कोई बाधा उपस्थित नह होती वह ही पण्डित कहलाने योग्य है।
प्रथमोऽध्यायः , ( १७ ) यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्चते । कामादर्थं वृणीते यः स वै पण्डित उच्यते ॥२॥ जिसकी व्यावहारिक बुद्धि धर्म और अर्थ के अनुसार रहती है, जो कोम ( लालच ) को त्याग कर अर्थ (कर्तव्य) को पकड़ता है वह ही पण्डित कहलाता है। यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते । न किञ्चदवमन्यन्ते नराः पण्डितबुद्धयः ॥ २६ ॥ पण्डित प्रज्ञा (बुद्धि) के लोग शक्ति (बल) के अनु. सार ही करते हैं और शक्ति (सहायता) के अनुकूल आचरण करते हैं, वे किसी का अपमान ( निरादर ) नहीं करते। क्षिप्रं विजानाति चिरंशृणोति, विज्ञाय चार्थं भजते न कामात् । नोसम्पृष्टौ व्युपयुक्त परार्थे, तत्प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य ।। जो कठिन विषय को शीघ्र समझ ले, अधिक समय तक स्वाध्याय करे, अर्थ का जानने वाला, कामना रहित लोकोप- कार दृष्टि से सेवन करने वाला विना पूछे सम्मिति न देने वाला हो यह पण्डित के प्रथम लक्षण हैं। नाप्राप्यमभिवाञ्छन्ति नष्टं नेच्छन्ति शोचितुम । * आपत्सु च न मुह्यन्ति नराः पण्डितबुद्धयः ॥२८॥ पण्डित प्रज्ञा वाले मनुष्य न मिल सकने वाले पदार्थों की भर्तृहरि जी ने कहा है-"प्रारभ्य विघ्न विहता विरमन्ति मध्या" .
( १८ ) विदुरनीतिः इच्छा नहीं करते और नष्ट हो जाने पर उसका पश्चाताप नहीं करते और विपत्ति में घबड़ाते भी नहीं हैं। x निश्चित्य यः प्रक्रमते नान्तर्वसति कर्मणः। अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते ॥२॥ निश्चय करके प्रारंभ करने वाला, विन्न होने पर बीच में न रुकने बाला, व्यर्थ समय व्यतीत नहीं करता और मन को वश में रखता है, उसे ही पण्डित कहते हैं। आर्गकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्नते । हितं च नास्यम्यन्ति पण्डिता भरतर्षभ ! ॥३०॥ हे धृतराष्ट्र! पण्डित सज्जनों को करने योग्य कर्मों में प्रेम करते हैं, सदेव वैभवशाली कामों को करते हैं और हित की अवहेलना नहीं करते। न हुण्यत्यात्म सम्माने नाचमानेन तप्यते । गाङ्गो हद इवाक्षोभ्यो यः स पण्डित उच्यते ॥३१॥ अपनी प्रतिष्ठा में प्रसन्न न होने वाला, अपमान से दुखित न होने वाला, गङ्गा के गहरे हृद के समान जो अचल रहता है वह परिडत कहलाता है। तत्त्वज्ञः सर्वभूतानां योगज्ञः सर्वकर्मणाम् । उपायज्ञो मनुष्याणां नरः पण्डि उव्यते ॥ ३२ ॥ श्री कृष्णने गीता में कहा है-“गतासून्गतातूंश्च नैवमुल्यन्ति पंडितः" ।
प्रथमोऽध्यायः ( १ ) १ . सब प्राणियों के भाव को जानने वाला, सब कार्यों के अर्थों का ज्ञाता और मानवी उद्योगों का जानने वाला मनुष्य पण्डित कहलाता है। प्रवृत्तवाचित्रकथ उहवान् प्रतिभानवान् । आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते ॥३३॥ जो धारा प्रबाह वक्ता, व्यङ्ग भाषी, तर्कशील, व्युत्पन्न बुद्धि एवं ग्रंथों को अनवरुध्यगति ( बिना रुके ) पढ़ने वाला पण्डिन कहलाता है। श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैत्र श्रुतानुगा । असम्मिन्नार्यमर्यादापण्डिताल्यांलभेत सः॥३४॥ जिस की बुद्धि सुने सत्यार्थ के अनुकूल और जिस का सुना हुआ बुद्धिपूर्वक हो, जो कभी श्रेष्ठ धार्मिक मनुष्यों की सीमा का उल्लंघन न करें, दही पण्डित कहलाता है। अर्थ महान्तं मा साथ विद्या मैश्वर्य मेव वा । विचरत्य सगुनद्धो यः स पण्डित उच्यते ॥ ३५ ॥ अधिक धन अथवा विद्या एवं ऐश्वर्य को पाकर जो नि निमानी होकर रहता है वही पण्डित कहलाता है। इति पण्डित लक्षणम् ।
( २० )
अश्रुतश्च समुन्नद्धो दरिद्रश्च महामनाः ।
अर्थाश्चाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ़ इत्युच्यते बुधैः ॥ ३६ ॥
जो शास्त्र विहीन महा अभिमानी, दरिद्री होकर मनार्थ
करने वाला और बिना कर्तव्य किये कर्म पदार्थ ( फलों) की
आशा करे, उसको बुद्धिमान मुर्ख कहते हैं।
स्वमर्थं यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति ।
मिथ्या चरतिमित्रार्थे यश्च मूढ़ः स उच्यते ॥ ३७॥
जो अपने प्रयोजन का त्याग करके अन्य के अर्थ
(प्रयोजन ) के झंझट में पड़ता है और मित्र के लाभ में मिथ्य
व्यवहार करता है, वह मूर्ख कहलाता है।
अकामान् कामयति यः कामयानान् परित्यजेत् ।
बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूढचेतेसम् ॥ ३८
जो न चाहने वालों को चाहे, चाहने वालों का त्याग
करे और बलवान् से द्वेष करे, जसको मूढ़ बुद्धि कहते हैं।
अमित्रं कुरुते मित्रं मित्रं द्वेष्टि हिनस्ति च ।
कर्म चारभते दुष्टं तमाहुर्मूढचेत सम् ।। ३६ ॥
जो शत्रु से मित्रता करे, मित्र से द्वेष करे, उसे दुःख
पहुँचावे, दुष्ट कर्मों को करे. उसको मृढ़ बुद्धि करते हैं।
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते ।
चिरं करोति क्षिप्रार्थे सु मूहोभरतर्षभ ! ॥ ४० ॥
बेदुरथमोऽध्यायः ( २१ ) . हे धृतराष्ट ! जो काम को तो अधिक फैलावे और सर्वत्र शङ्का ही की दृष्टि रक्खे, एवं शीघ्रता के कामों में देर करे, वह मूर्ख है। श्राद्धं पितृभ्यो न ददादि दैवतानि न चार्चति । सुहृन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूढचेतसम् ॥ ४१ ॥ जो श्रद्धा पूर्वक अन्न, जल से पितरों का आदर दान, हवनादि से पञ्च देवताओं का यजन (पूजन ) नहीं करता, मित्र को साथ नहीं रखता, उसको मुर्ख बुद्धि कहते हैं। नाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भासते। अविश्वस्त विश्वसिति मूढचेता नराधमः ॥ ४२ ॥ जो बिना बुलाये कहीं घुसे, बिना पूछे अधिक बोले और अविश्वासियों में विश्वास करे, वह मनुष्यों में अधम मूढ़ मति है। परं क्षिपति दोपेण वर्तमानः स्वयं तथा । यश्च क्रुध्यत्यनीशानः स च मूढतमो नरः ॥४३॥ दूसरे पर दोष लगावे, परन्तु वही दोष चाहे, अपने में भी विद्यमान हो और असमर्थ होकर क्रोध करे, वह मनुष्य महा मूर्ख है। आत्मनो वलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् । अलभ्यमिच्छन्नैष्कान्मृत्युद्धिरिहोच्यते ॥ ४४ ॥ धर्म और अर्थ रहित, अपने वल को न पहचानने वाला ( २२ ) विनो कर्म ( उद्योग) किये न मिलने योग्य की इच्छा करने वाला संसार में मूढ़ बुद्धि कहलाता है। अशिष्यं शास्ति यो राजन्यश्च शून्यमुपासते । कदर्यं भजते यश्च तमाहुर्मुढचेतसम् ॥ ४५ ॥ हे राजन् ! जो अशिष्य (अनाधिकारी) को शिक्षा देवे जो शुन्य ( बिना ध्येय ) की उपासना करे, जो निन्दित की सेव करे उसको मूद कहते हैं। x एकः सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्च शोभनम् । योऽसंविभज्य भृत्येभ्यः को नृशंसतरस्ततः ॥४६॥ अपने श्राधीनों को जो विना बाँटे हुए अकेला ही.भोज करे और फिर अच्छे वस्त्र धारण करे, इससे बढ़ कर को नीच होगा। एकः पापानि कुरुते फलं भुङक्ते महाजनः । भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्त्तादोपेण लिप्यते ॥ ४७ । एक पाप को करे और परिणाम जन समुदाय भोगे भोगने वाले तो छूट जाते हैं, , परन्तु कर्ता दोष से लिप्त है जाता है। एक हन्यान्न वा हन्यादिपुमुक्तो धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद्राष्ट्र सराजकम् ।। ४८ । * घरमें मुँजी भांग नाहीं, वेड़िनी नचावें। टेढ़ी मेढ़ी पाग बांधे, लालाजी कहावें ॥(वाली कहावत के मनुष्य प्रथमोऽध्यायः ( २३ ) OUP धनुष से छोड़ा हुआ वाण एक को मारे अथवा न मारे, परन्तु बुद्धिमान् द्वारा प्रयोजन साध्यवती बुद्धि राजा सहित राष्ट्र को नष्ट कर देती है। एकया द्वे विनिश्चित्य त्रीश्चतुर्मिर्वशे कुरु । *पञ्च जित्वा विदित्वा पट्सप्त हित्वा सुखी भव ४६ एक वुद्धि से दो ( सत्य और असत्य ) को जांचे । चार साम, दाम, दण्ड, भेद ) से तीन ( काम, क्रोध और लोभ) को वशीभूत करे, पांच (ज्ञानेन्द्रियों ) को विजय कर (सन्धि विग्रहादि ) छः को जान कर सात दोपों को छोड़ देने से सुखी होता है। सात दोप यह हैं-१ निन्दा, २ कलह, ३ चापलूसी, ४ काम वासना, ५ चोरी, ६ मद्यात्य, ७ मिथ्या मापण । एक विपरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्च बध्यते । सराष्ट्रं सप्रजहन्ति राजानं मन्त्रविप्लवः ॥ ५० ॥ विप एक को मारता है, शस्त्र द्वारा भी एक ही मारा जाता है, परन्तु गुप्त सम्मति से उत्पन्न बिगाड़ राजा को राज्य सहित नष्ट कर देता है। एकः स्वादु न भुञ्जीत एकश्चार्थान्न चिन्तयेत् । Wएको न गच्छेदध्वानं नैकः सुप्त पु जागृयात् ॥५१॥ अकेला स्वादिष्ट मोजन खावे, अकेला सांसारिक बातों सब से पूर्व ज्ञानेन्द्रियां ही इन्ट वासना की ओर ले जाती हैं। चाणक्य का "चतुर्भिर्गमनं इत्यादि वाला भाव है।
विदुरनीति । को न लोचे, मार्ग में अकेला न जावे और जहां अधिक सो रहे हों, अकेला न जावे। अभिप्राय ! बहुधा स्वादिष्ट भोजन में विप मिलाकर देते हैं, इस लिये पहिले कुत्ते, तोते, चकोर को खिलावे, इसी सिद्धांत पर यह जानवर राज घरों में पाले जाते थे । कुत्ता खाकर पागल हो जाता है, तोता विपयुक्त पदार्थ खाकर बोट करके तुरन्त पदार्थ छोड़ देता है, चकोर विपयुक्त पदार्थ देखकर अपने नेत्र लाल कर लेता है । सांसारिक बातें अकेले सोचने से इस लिये ठीक नहीं उतरती, कि मनुष्य अपना सदैव मला सोचता है; बुराई को विचारता भी नहीं, दो में प्रश्नोत्तर ऊंचाई, नींचाई सब ओर दृष्टि डाली जा सकती है। अकेला मार्ग में असहाय रहता है, मार्ग कटता भी नहीं । अकेला सोते हुओं में जाने से उसे चोरी लग सकती है और चोर के धोखे में पीटे जाने का भय है. इत्यादि दोप हैं। एकमेवाद्वितीय तद्यद्राजन्नावबुध्य से। सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ।। ५२ ॥ हे राजन् ! एक ही अनौखेसंसार रूपी समुद्र की. नाव समान स्वर्ग की सीढ़ी जो सत्य है, उसको तुम नहीं जानते । एकः क्षमावतां दोपो द्वितीयो नोपपद्यते । यदेन क्षमया युक्तमशक्तं मन्यते जनः ॥ ५३ ॥ क्षमाशील में एक दोप है,कि वह क्षमा कर देने से अशक्त समझा जाता है, अर्थात् न्याय युक्त दण्ड देने में क्षमा को स्थान प्रथमोऽध्यायः ( २५ ) - है। देना अशक्तता है। इसके सिवाय क्षमाशील में कोई अन्य दोष नहीं। सोऽस्य दोपो न मन्तव्यः क्षमा हि परमं बलम् । क्षमागुणो ह्यशक्तानां शक्तानां भूपणं क्षमा ॥५४॥य यह दोप इन (क्षमा शीलों ) का न मानना चाहिये, क्यों कि क्षमा ही एक बड़ा है । निर्वलों का तो क्षमा साधन एक गुण विशेप ही हैं, परन्तु वलवानों का वह भूषण क्षमा वशीकृतिलोंके क्षमया कि न साध्यते ? । शान्तिखड्गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जना।।५।। क्षमा संसार को वश में कर लेती है । क्षमा से क्या सिद्ध नहीं होता ! जिसके हाथ में शान्ति रूपी तलवार है उसका दुष्ट पुरुप क्या कर सकेगा। अतृणे पतितो वह्निः स्वयमेवोपशाम्यति । अक्षमावान्परं दोपैरात्मानं चैत्र योजयेत् ॥५६॥ तिनके रहित भूमि पर पड़ी हुई अन्नि श्राप दुझ जाती है.और क्षमा हीन मनुष्य अपने को बड़े दोपों युक्त कर लेता है। एको धर्मः परं श्रेयः क्षमैका शान्तिरुत्तमा । विद्यका परमा तृप्तिरहिंसैका सुखावहा ॥ ५७ ॥ एक धर्म ही परम कल्याणप्रद है। एक क्षमा ही उत्तम शान्ति है एक विद्या ही परम संतोप देती है और अहिंसा एक मात्र सुख देने वाली है।
२६ ) विदुरनीत द्वाविमौ ग्रसते भूमिः सर्पो विलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम् ॥ ५८ ॥ पराक्रम रहित राजा, द्वार सेवी ब्राह्मण इन दोनों को वहीं की भूमि ऐसे खा जाती है ( अर्थात् उनका वृथा जीवन है) जैसे कि सांप बिल में रहने वालों को खा जाता है। द्वे कर्मणी नरः कुर्वनस्मिल्लोके विरोचते । अब्रुवन्परुपं कञ्चिदसतोऽमर्चयस्तथा ॥ ५६ ॥ दो कामों का करने वाला संमार में प्रसिद्ध होता है, एक कटु वचनं न वोले,दूसरे नीचों का सत्कार न करे । द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र ! परप्रत्ययकारिणौ । स्त्रियः कामितकामिन्यो लोकः पूजितपूजकः ॥६०॥ हे पुरुपों में श्रेष्ठ धृतराष्ट्र ! यह दो पराश्रित हो काम करते हैं, स्त्रियां अन्य की चाही हुई वस्तु को द्वप (घद्धा ) से चाहती हैं और संसार पूजनीय को पूजने लगता है। द्वाविमौ कण्टको तीक्ष्णौ शरीर परिशोपणौ । यश्चाधनः कामयते यश्च कुप्यत्यनीश्वरः ।। ६१ ।। यह दो पैने कांटे हैं जो शरीर को सुखा हैं देते । दरिद्रो रहाकर अंची इच्छा करे और अप्तमर्थ होकर क्रोध करे। द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा । गृहस्थश्व निरारम्भः कार्यावांश्चैत्र भितुकः ॥ ६२ ॥ !
प्रथमोऽध्यायः ( २७ ) । यह दो विरुद्ध कर्मों से शोभा को नहीं प्राप्त होते । जो गृहस्थी होकर उद्यम न करे और भिखारी उद्योग करता फिरे। द्वाविमौ पुरुपौ राजन्स्वर्गस्योपरि तिष्ठतः । प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्च प्रदानवान् ॥ ६३ ॥ हे राजन् ! यह दो मनुष्य विशेष सुख का अनुभव करते हैं, क्षमा सम्पन्न ऐश्वर्यवान् और दरिद्री दाता। न्यायागतस्या द्रव्यास्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ । अपात्रे प्रतिपत्तिश्च पात्रे चाप्रतिपादनम् ।। ६४ ॥ न्याय से उपार्जित धन के दो ही दुरुपयोग होते हैं। अयोग्यों को दान देना और योग्य पात्र को न देना। द्वारम्भसि निवेष्टव्यो गले वद्ध्वा दृहां शिलाम् । धनवन्तमदातारं दरिद्रं चातपस्विनम् ॥ ६५ ॥ दो के गले में भारी पत्थर बाँध कर जल में डुबादे। दान न देने वाले धनी को और असह्य दरिद्र को। द्वाविमौ पुरुषव्याघ्र ! सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राउंयोगयुक्तश्च रणे चाभिमुखो हतः ॥६६ ।। हे धृतराष्ट्र ! यह दो सूर्य मण्डल को भेदन करने वाले (दिगन्त कीर्तिमान ) हैं योगाभ्यासी, संन्यासी और रण में सन्मुख लड़ता हुआ सरने वाला। त्रयः पापा मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ ! कनीयान्मध्यमः श्रेष्ठ इति चेदविदो विदुः ॥६७॥ ॥
( २८ ) विदुर नीतिः हे धृतराष्ट्र ! मनुष्यों में तीन प्रकार के पापी सुने जाते हैं, उत्तम, मध्यम व निकृष्ट; इन्हें वेद के जानने वाले (अनुभवी) जानते हैं। त्रिविधाः पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमाः । नियोजयेद्यथावत्तास्त्रिविधेष्वेव कर्मसु ॥ ६८ ॥ हे राजन् ! तीन प्रकार के पुरुप होते हैं-उत्तम, मध्यम, नीच यह यथावत् तीन ही प्रकार के कामों में लगते हैं यथा संख्या उत्तम, मध्यम और नीच । त्रय एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुतः । यत्ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद्धनम् ॥६६॥ हे राजन् ! तीन ही धनहीन माने गये हैं-स्त्री, दाल और पुत्र जो कुछ वह कमाते हैं वह जिसके आश्रित रहते हैं उसका होता है। हरणं च परस्यानां परदाराभिमर्शनम् । सुहृदश्च परित्यागस्त्रयो दोपा: क्षयावहाः ॥७०॥ तीन दोप नाश करने वाले होते हैं-पराये धन का छीनना, पराई स्त्री का सङ्ग और उत्तम मित्र का विछोह । ! त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः । कामाक्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्रयं त्यजेत् ॥ ७१ ॥ तीन प्रकार के दुःखों से आत्मा (अपनी) को हानि होती ( २६ ) प्रथमोऽध्यायः , - है अर्थात् काम, क्रोध तथा लोभ ! अतः यह तीनों अति के त्याज्य है। वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत ! शत्रोश्च मोक्षणं ऋच्छात्रीणि चैकं च तत्समम् ॥७२॥ हे धृतर ष्ट्र बरदान (इच्छा शक्ति) राज्य दान और पुत्र का जन्म : - तीन कार्य हैं, परन्तु शत्रु को कटिन दुख से मुक्त कगना पूर्वोक्त तीनों और यह एक बराबर है। भक्तं च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम् । त्रीनेतांश्छरणं प्राप्तान्विपमेऽपि न सन्त्यजेत् । ७३|| भक्त, भत्य और "मैं श्रापका हूँ। ऐसा कथन करने वाले इन तीन शरण में आये हुओ का कभी साथ न छोड़े। चत्वारि राज्ञा तु महावलेन, वोन्याहुः पण्डितस्तानि विद्यात् । अल्पप्रज्ञैः सह मन्त्रं न कुर्यात् , दीर्घसूत्रै रभसैश्चारणश्च ।। ७४ ॥ शक्तिशाली राजा को चार बातें वर्जित हैं, वह बुद्धिमान् को जान लेनी चाहिये। थोड़ी बुद्धि वाले के साथ, आनागना ( टालमटोल ) करने वाले तथा छटोरे और भाटों (व्यर्थ स्तुनि काने वा ) के नाय मन्त्रणा विचार न करे। चत्वारि ते तात ! गृहे वमन्तु श्रिगभिजुष्टस्या गृहस्थधर्मे वृद्धो ज्ञातिरवसन्न,कुलीनः सखा दरिद्रो भगिनी चानपत्या ॥ है ( ३० ) विदुर नीतिः हे प्यारे ! गृहस्थ धर्म में, लक्ष्मी युक्त तेरे घरमें चार हो निवास करें, कुटुम्बी, दुःखित कुलीन, दरिद्र मित्र और सन्तान हीन बहिन अर्थात् इन्हे गृहस्थ में श्राश्रय देना चाहिये। चत्वार्याह महाराज ! साधस्कानि बृहस्पतिः । पृच्छते त्रिदशेन्द्राय तानीमानि निबोध मे ॥७६॥ हे महागज ! उस राजा के लिये कि जो प्रश्न करे चार बातें सद्य (तत्काल) लाभदायक है मुझसे समझ ले, वह यह हैं। देवतानां च सङ्कल्पमनुभावं च धीमतास् । विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम् ॥७७॥ बुद्धिमानों का संकल्ल (विचार) मेधावियों का अनुभव, विद्या पढ़े हुओं का विनय और पापाचरण करने वालों का नाश होता है। चत्वारि कर्माण्यभयङ्कराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः॥७८।। चार कामो से मनुष्य निर्भय रहता है, परन्तु वीं अनु- चित रीति से करने पर भय देने वाले होजाते हैं, अर्थात् विधि- वत् अग्निहोत्र विधि से मौन धारण, विधि से विद्याध्ययन और विधि से ही यज्ञ करना । . विद्या मोहि देवा । विद्वानों का ही नाम देवता है, ऐसा शतपथ ब्राह्मण में लिखा है।
( ३१ ) प्रथमोऽध्यायः * पञ्चाग्नयो मनुष्येण परिचर्याः प्रयत्नतः । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्च भरतर्षभ ! ||७६॥ धृतराष्ट्र ! मनुष्यों को इन पांच अग्नियों की यत्न से सेवा करनी योग्य है । माता, पिता,अग्निहोत्र यात्मा और गुरू । + पञ्चैव पूजयंल्लोके यशः प्राप्नोति केवलम् । देवान्पित्तन्मनुष्यांश्च भिक्षुनतिथिपञ्चमान्॥८॥ देवता, पितर, मनुष्य,भिनुक और पांचवां अतिथि इन पांचों का सत्कार करने वाला लोक में कीर्तिमान होता है। पञ्च त्वानुगमिप्यन्ति यत्र यत्र गमिप्यसि ।। मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविनः ॥८॥ जहां २ तू जावेगा यह पांच तेरे ही पीछे जायगे, मित्र, शत्रु, उदासीन, आश्रयदाता और आश्रित अर्थात् इनका ध्यान (बिचार ) तू अपने चित्त से भुला नहीं सकता। . * जनिता चोपनीताच यस्तु विद्या प्रयतिः । अन्न दाता भय नाता पंचते पितरः स्मृतः। चाणक्य के मत में भी यही पितर माने गये हैं। " जगत. पितरौ वन्दे पार्वती परमेश्वरी " महा कवि कलिदास ने भी "पितर" शब्द का प्रयोग जन्म दा.. केही अर्थ में किया है। + पंचाग्नि का जो महत्त्व है वह इन्हीं की सेवा करने से प्रात्त होने से इन्हें ही तादाल्य सन्बन्ध में पंचाग्नि 'स्वयं कह दिया है।
विदुर नीतिः २४ ) प्रमदाः कामयानेषु यजमानेषु याजकाः । राजा विवंदमानेपुं नित्यं मूर्येषु पण्डिताः ॥१०॥ मदोन्मत्ता कामियों में, यजमानों में, यज्ञ कराने वाले, झगड़ा करने वालों में गजा और निपट मुखों में पण्डित । पडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्त्तमनवेक्षणात् । गावः सेवा कृपिर्भार्या विद्यां वृपलसङ्गतिः ॥११॥ मुहूर्त मात्र ( क्षणभर ) की भूल यह छः नष्ट होजाते हैं-गौ, नौकरी, खेती, स्त्री, विद्या और खोटी सङ्गति । पडेते ह्यवमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम् । प्राचार्य शिक्षिताः कृतदाराश्च मातरम् ॥ १२ ॥ यह छः किये हुए उपकार का अनादर करने वाले होते हैं- शिक्षित शिष्य पढ़ाने वाले प्राचार्य का और स्त्री प्राप्त विवाह हो चुकने पर) पुरुष माता का। नारी विगतकामास्तु कृतार्थाश्च प्रयोजकम् । नावं निस्तीर्णकान्तारा आतुराश्च चिकित्सकम् ॥१३॥ यौवन ( काम ) नष्ट स्त्री का, कृतार्थ कार्य साधक को, पार उतर जाने पर नाव का और निरोग होने पर वैद्य का । आरोग्यमानृण्यमविप्रवासः, सद्भिर्मनुप्यैः सह सम्प्रयोगः। स्वप्रत्ययावृत्तिरभीतवासःपड्जीवलोकस्य सुखानि राजन्ह-४ ।
प्रथमोऽध्यायः ( ३५ ) म्वस्थता, ऋणी होना, परदेश में नरहना, सत्पुरुषों से मेल, अनुकूले जीविका एवं निर्भयता, हे राजन् ! यह छः प्राणी के सुख-साधन हैं। ईपुणी न संतुष्टः क्रोधिनों नित्यशक्तिः । परभाग्योपजीवी च पडेते नित्य दुःखिताः ॥ १५ ॥ डाह करने वाला, दयालु, सन्तोष हीन, क्रोधी, सदा शङ्का युक्त, दूसरे के सहारे जीविको "वाले यह छः नित्य दुखी रहते हैं। सप्त दोपाः सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदयाः । प्रायशो गविनश्यन्ति कृतमूला अपीश्वराः ।। ६६॥ बहुधा जिनसे बड़े २ सुदृढ़ राज भी विनाश को प्राप्त होते हैं, अतः ऐसे व्यसनों को उत्पन्न करने वाले सात दोषों को राजापों को त्यागन कर देने चाहिये। स्त्रियोऽक्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञ्चमम् । महच दण्डपारुप्यमर्थदूपणमेव च ॥ ७ ॥ विगं, जथा, आखेट (शिकार ) शराब पीना और पांचवां कठोर भाषण, कठोर दण्ड तथा धन का दुरुपयोग । अप्टो पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिप्यतः.। ब्राह्मणान्प्रथमं द्वेष्टि ब्राह्मणांश्च विरुध्यते ॥१८॥ जिस का नाश होने वाला होता है इसके पूर्व रूप यह हैं- ब्राह्मणों से इंप फT PT. टामा निमो. --
विदुर नीतिः
( ३६ )
-
ब्राह्मणस्वानि चा दचे ब्राह्मणांश्च जिघांसति ।
रमते निन्दया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति ॥ ६ ॥
वह ब्राह्मणों के अधिकारों को छीनता है और उन्हें दुख
देता है, उनकी निन्दा से प्रसन्न होता है और प्रशंसा सुनना नहीं
"चाहता-
नैनान्स्मरति कृत्येषु याचितश्चाभ्यसूयति ।
एतान्दोपानरःप्राज्ञो बुध्येवुद्ध्वा विसर्जयेत् ॥१००॥
न उन्हें (ब्राह्मणों को) शुम कार्यों में
बुलाता
है और
मांगने पर उनकी निन्दा करता है इन दोषों को बुद्धिमान् जान
कर इनका त्यागन करे।
अष्टाविमानि हर्पस्य नवनीतानि भारत ।
वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव स्वसुखान्यपि ॥१०॥
भारत ! इन आठ अवस्थाओं में हर्प का सार है जो
अपने को भी सुखदायक होती हैं ।
समागमश्च सखिभिर्महांश्चैव धनागमः ।
पुत्रेण च परिप्वङ्गः संन्निपातश्च मैथुने ॥ १०२ ॥
मित्रों से मिलाप, अधिक धन का आना. पुत्र को गले
लगाना और मैथुन (विषय) के समय गिरावट (स्खलित) होना।
समये च प्रियालापः स्वयूथ्येषु समुन्नतिः ।
अभिप्रेतस्य लोभश्च पूजा च जनसंसदि ॥ १०३ ॥
प्रथमोऽध्यायः ( ३७ ) अवसर पर प्रिय वाक्य. अपने समुदाय (गिरोह) में उन्नति शील जिसकी इच्छा हो उसकी प्राप्ति और समा में आदर। अष्टौ गुणाः पुरुष दीपयन्ति, प्रज्ञा च कौल्यं च दमः श्रुतंच । पराक्रमश्चाबहुभापिता च, दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च ॥ १०४ ।। आठ गुणों से मनुष्य यश प्राप्त करता है । श्रेष्ठ बुद्धि उच्च कुल, इन्द्रियों पर अधिकार, वेद पाट, पुरुषार्थ, कम बोलना, शक्ति के अनुकूल दान और किये हुये का उपकार मानना । नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम् । क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान्यो वेद स परः कविः ॥१०॥ इस शरीर रूपी घर के नौ द्वार हैं तीन खम्भे और पांच झरोखा (इन्द्रियां) साक्षी इसमें जीव रहता है, जो यह जानता है, वह महा चतुर और विद्वान् है। दश धर्म न जानन्ति धृतराष्ट्र ! निवोध तान् । मत्तः प्रमत्त उन्मतः श्रान्तःक्रुद्धो बुभुक्षितः ॥१०६॥ हे धृतराष्ट्र ! दशः प्रकार के मनुष्य धर्म , नहीं जानते अर्थात् मदमत्त (घमण्डी) प्रमादी (दीर्घ सूत्री) उन्मादादि मस्तिष्क रोगों से प्रसित, थका हुआ और क्रोधी तथा भूखा। - 1 ३८ ) विदुर नीतिः in है . त्वरमाणाश्च लुब्धश्च भीवः कामी च.ते दश । तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डितः ॥ १०७!! शीघ्रता करने वाले, लालची, डरपोक तथा कामी इनसे बुद्धिमान् अधिक मेल न रक्खे । अत्रैवोदाहरन्तीमंमितिहासं पुरातनम् । पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीतं चैवः सुधन्वना॥ १०८ ।। यहां पुराना इतिहासः कहा जाता है कि पुत्र के लिये प्रह्लाद ने.सुधन्वा के साथ कही। या काम सन्यू प्रजहाति राजा, पात्रे प्रतिष्ठा पयते धनं च । विशेष-विच्छतवान् : क्षिप्रकारी, तं. सर्व लोकः कुरुते प्रमाण ॥१०॥ जो राजा काम, क्रोध का त्यागन करके देने योग्य (सत्पात्र ) धनं देता है, अधिक जानने वाला, शास्त्रों का ज्ञाता, और कार्यों को शीघ्र करने वाला होता है, उसको सब संसार में प्रमाण रुप मोना जाता है जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान्- विज्ञातदोपेषु · दधाति दण्डम् । जानाति-मात्रांच यथानमा च, तं तादृशं श्रीजुंपते समग्राः ॥ ११० ॥ - प्रथमोऽध्यायः ( ३६ ) जो मनुष्य को विश्वास दिला सकता है। दोष के शान के अनन्तर अपराधी को दण्ड देता है और दोष की मात्रा तथा क्षमा को जानता है, उस चैसे ही पुरुष को लक्ष्मी सदा सेवन करती हैं। सुदुर्वलं नावजनाति कञ्चिद्युक्तो रिपुं सेवते बुद्धि पूर्णम् । न विग्रहं रोचयते बलस्थैः काले च यो निक्रमते स धीरः।१११ "जो छोटे से छोटे शत्रु की ओर से तनिक भी असावधान नहीं, युक्ति से बुद्धि-पूर्वक इससे व्यवहार-रखता है जो बलवानों से विग्रह ( झगड़ा ) नहीं करता, समय पड़ने पर पराक्रम दिखलाता है, वही धीर है। प्राप्या पदं न व्यथते कदाचि दुयोगमन्विच्छति चाप्रमतः। दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिता:सपना:११२ श्रापत्ति पाने पर कमी दुखियाता नहीं, सावधान होकर उद्योग करता है, समय पर दुःख को सहन करता है, वही.मार का उठाने वाला महात्मा है उसके सब शत्रु सोधीन रहते हैं। अनर्थ कं विप्रवासंगृहेभ्यःपापैःसन्धिं पर दाराभि मर्शम् । दम्भं स्तन्यं पैशुनं मद्यपानं न सेवते यश्च मुखीसदैव ॥११३ जो व्यर्थ घर से बाहर रहे, पापियों से सम्बन्ध, पर सी गमन, पाखण्ड, चोरी और शराब का सेवन नहीं करता, वह सदैव सुखी रहता है।
४२ ) - नंमोहंदैवतमङ्गलानि प्रायश्चित्वान्विविधाल्लोक वादान् तानि यः कुरुते नैत्यकानि तस्योथानं देवताराधपित्त १२१ दान, प्रेम देव पूजा, शुभकर्म, प्रायश्चित्त, (पापों की शुद्धि ) संसार की ऊँच नीच बातें इनको जो नित्य - करता है, विद्वान उसकी उन्नति चाहते हैं। समैर्विवाहं कुरुते न हीनः समैः सख्यं व्यवहारं कथां च। गुणै विशिष्टांश्य पुरो दधाति विपरितस्तस्य नया सुनीताः।। "नीचों से विवाह सम्बन्ध , न.,करके बराबर वालों से करता है, समान स्थिति वालों..से मेल व्यवहार तथा संलाप (वार्तालाप ) करता और बड़ों ( वयोवृद्ध, ज्ञानवृद्धों) को आगे रखता है, . उस बुद्धिमान् (ज्ञानी) की नीति ( चलन चातुरी) अच्छी चलती है। मितं भुंक्ते सं.विभज्याश्रितेभ्यो मितं स्वपित्य मितंकर्म कृत्वा ददात्वमित्रेष्वपि याचितःसस्तमात्मवन्तं प्रजहत्यनाः १२३ अपने आधीनों (आश्रितों) को बांटने पर जो थोड़ा खाता है, अधिक काम करने पर जो थोड़ा सोता है। मांगने पर शत्रुओं को भी देता है.ऐसे. अात्मवान्.( अपने पहिचानने, वाले का कभी अनर्थ नहीं होता।
( ४३ ) प्रथमोऽध्यायः २ EN चिकीर्पितं विप्रकृतं च यस्य, नान्ये जनाः कर्म :जानन्ति किञ्चित् । सन्ने गुप्ते सम्यगनुष्ठित्ते चा, नाल्पोप्यस्य च्यवते कश्चिदर्थः ॥ १२४ ॥ जिसके स्वभाव से उसके बिचारे हुए कामों को मनुष्य जान-पावे गुप्त विचार को भी न जोन, सकें और जब कार्य मली प्रकार सिद्ध हो जावे-तब जानें ऐसे पुरुष का कोई थोड़ा सा,भी काम नहीं बिगाड़.सकता। यः सर्वभूतप्रशमे निविष्ठः सत्योमृदुर्मान कृच्छुद्धभावः । अतीव स ज्ञायते ज्ञाति मध्ये महामणिर्जात इव प्रसन्नः॥ जो सब प्राणियों को चाहता है, सत्य बोलता है, कोमल स्वभाव वाला है, योग्य मनुष्यों का मान करता है, शुद्ध भावना वाला है वह उत्तम जाति के निर्मल रत्न की भांति अपने कुटुम्बं में शोमन शील और प्रसिद्ध होता है। प आत्मनापनपते भृशं नरः स सर्चलोकस्यगुरुर्भवत्युत । अनंत तेजाः सुमानाः समाहितः स तेजसासूर्यइवाव भासते।। • गिरधर कवि की कुण्डलियों में इसी का अनुवाद है। साई अपने चित की भूल न कहिये कोय । तब लगि मन में राखिये, जब लगि कारज होय" ।। इत्यादि.
विदुर नीतिः । अनारभ्या भवन्त्यर्थाः केचिन्नित्यं तथाऽगतः । कृतः पुरुपकारो हि भवेद्येषु निरर्थकः ॥ २० ॥ नित्य के प्राप्त अर्थ के भी ऐसा नहीं, कि आरम्भ कर ही देना चाहिये,क्यों कि बहुधा उनमें किया हुआ प्रयत्न निष्फलं भी होता देखा गया है। प्रसादो निष्फलो यस्य क्रोधश्चापि निरर्थकः । न तं भारि मिच्छन्ति पएढं पति मिव स्त्रियः ॥२१॥ जिसका वृथा हर्ष और क्रोध भी निरर्थक है उसको प्रजा अपना स्वामी नहीं बनाती जैसे नपुंसक को स्त्रियाँ नहीं चाहतीं। कांश्चि दर्थान्नरः प्राज्ञो लघु मूलान्महा फलान् । क्षिण मारभते कंत्तुं न विघ्न यति तादृशान् ।।२२।। बुद्धिमान मनुष्य छोटी जड़ वाले (जिस को पुष्ट न देखे ) और बड़े फल वाले (प्रत्यक्ष में बड़े लाभ के ) कार्यों को शीघ्र ही श्रारम्भ करने में विघ्न (देरी) नहीं करते । अर्थात् विचार पूर्वक काम में देरी नहीं करना चाहिये। ऋजु पश्यति यः सर्व चक्षुसानुपिवन्निव । आसीन मपि तूष्णीकमनुरज्यन्ति तं प्रजाः ॥ २३ ॥ आँखों में पीते हुए के समान (प्रेम दृष्टि से ) सब से प्यार की दृष्टि से देखता है चुप बैठे हुए ऐसे राजा को प्रजा प्रेम करती है।
द्वितीयोऽध्यायः . - सुपुष्पिता स्याद फलः फलितः स्याद दुरारुहः । अपक्व: पक्क संकाशो न तु शीर्यत कर्हिचत् ॥२४॥ भली प्रकार फूला हुआ ('वृक्ष ) फल रहित हो, फला हुआ कठिनता से प्राप्त होने योग्य हो, कच्चा होते हुए भी पक्का प्रतीत होवे फिर भी टपके ( गिरे) नहीं तो उससे क्या लाभ । अर्थात् जो राजा इस प्रकार के वृक्ष समान होते हैं उनसे प्रजा को क्या लाभ। चनुसा मनसा वाचा कर्मणा च चतुर्विधम । प्रसादयति यो लोकं तं लोकोऽनु प्रसीदति ॥२५॥ नेत्र ( दर्शन देकर ) मन, वाणी और व्यवहार इन चार भांति से जो संसार (प्रजा) को प्रसन्न करता है उस राजाको प्रजा प्रसन्न रखती हैं यस्मात् त्रस्यन्ति भूतानि मृग व्याधान्मृगाइव । सागरान्तामपि महीं लब्ध्वा स परि हीयते ॥ २६ ॥ जिस पर व्याधे से हरिण डरते हैं उसी प्रकार जिस राजा से प्राणी दुःख पाते हैं उस राजा का यदि सागरांत (समुद पर्वत ) भी राज भी नष्ट हो जाता पितृ पैतामहराज्य प्राप्तवान स्वेन कर्मणा। वायुरभ्र मिया साध भ्रंश यत्यनये स्थितः ।। २७॥ शनीति के भरोसे, बल पर। राजा अपने याप-दादे श्रादि
विदुर नीतिः
( पूर )
से प्राप्त (वंश परम्परा गत ) राज्य को भी ऐसे नष्ट कर गैठते
है कि जैले वायु वादल को नष्ट (छिन्न-भिन्न ) कर डालता है।
धर्ममा चरतो राज्ञः सदभिश्चरित मादितः ।
वसुधा वसु सम्पूर्णा वर्धते भूति वर्द्धिनी ॥ २८ ॥
प्रारम्भ से सज्जनों द्वारा करने योग्य धर्म के अनुकूल
श्रीचरण वाले राजा की भूमि धनधान्य युक्त रहती है कि जिस
से उसका ऐश्वर्य बढ़ता है।
अथ संत्यजतो धर्मम्धम चानुतिष्ठितः ।
प्रति सम्वेष्टते भूमि रग्नौ चर्माहित यथा ॥ २६ ॥
पर, जो धर्म को छोड़ कर अधर्म का श्राश्रय लेता है,
उसकी भूमि में घटोतरी होती है , जैसे अग्नि में डाला हुश्रा
चाम अर्थात् दुर्गन्ध देता है, इसी प्रकार राजा का अपयश
होता है।
ए एव यत्नः क्रियते परराष्ट्र विमर्दने ।
स एव यत्नः कर्त्तव्यः स्वराष्ट्र परिपालन ॥ ३० ॥
जो शत्रु के राज्य नष्ट करने में प्रयत्न किया जावे तो वही
यत्न राजा अपने राज्य के पालन और रक्षण में क्यों न करें
अर्थात् स्वराज्य स्थापन में प्रयत्न करना चाहिये ।
धर्मेण राज्यं विन्देत श्वर्नेण परि पालयेत् ।
धर्म मूलां श्रियं प्राप्य न जहाति न हीयते ॥३१॥
द्वितीयोऽध्यायः ( ५३ ) धर्म से ही राज्य ले और धर्म से हा राज्यका पालन करे, धर्मयुक्त लक्षमीवान् राजा को नलक्ष्मी छोड़तीहै और न राजा ही लक्ष्मी रहित हो सकता है । अप्युन्मत्तात्प्रलयतो वालाञ्च परि जल्यतः । सर्वतः सार मदद्या दश्मभ्य इव कांचनन् ।। ३२ ।। उन्मत्त से, यातून से, बालक से एवं गाली देने वाले से भी लार ग्रहण करे, जैसे मनुष्य पत्थरों से सोना निकाल लेते है अर्थात् विना कसौटी पत्थर पर रगड़े सोना सोना नहीं कहलाता। इसी प्रकार विना सारग्राही होने के वाक्य तत्व नहीं जाना जा सकता। 'सुव्याहतानि सूक्तानि सुकृतोनि ततस्ततः । संचिन्वन धरि आसीत शिलाहारी शिलं यथा ॥३३॥ धीर मनुष्य सुमधुर वचन द्वारा तथा उत्तम उत्तम कर्मों को सय ओर से एकत्रित करते हैं जैसे शिला चीनने वाला खेत में से शिला ( गिरे हुए ) अन्न को चीन लेता है। गन्धेन गावः पश्यन्ति वेदैः पश्यन्ति ब्राह्मणाः । चारैः पश्यन्ति राजा नश्च शुामितरे जनाः ॥३४|| गन्ध से गाय देखती है (पशू सयको प्रथम सूंघ लेता है। इसी से हिताहित जानता है ) वेदवता बाह्मण ज्ञान (वेदोक्त आशा) से रोजा गुप्त दूतों से एवं अन्य लोग नेत्रों से देखते हैं अर्धात् साधन द्वारा सब काम किये जाते हैं। । -- विदुर नीतिः भूयां सं लभते क्लेशं या गौर्भवति दुर्दुहा । अथ यासुदुहा राजन्नैव तां वितुदन्त्यपि ।। ३५ ।। हे राजन् ! जो गाय कठिनाई से दुहने देती है, उसे बड़ा दुःख मिलाता है अर्थात् लोगों लगाकर दुहाने वाली और जो अच्छे प्रकार दुहलेने देती है उससे कोई युक्ति नहीं की जाती। यदतप्त प्रणमति न तत्संतापयन्त्यपि । यच्च स्वयं नतं दारु न तत्सन्नमन्त्यपि ॥ ३६.॥ जो वस्तु विना तपाये ही लब जावे, उसको कोई नहीं तपाता जैसे स्वयं लबी लकड़ी ( डाल या टहनी ) को कोई लचाने का यत्न नहीं करता। एतयोपमया धीरः सन्नमेत बलीयसे । इंद्राय स प्रणमते नमते यो बलीयसे ॥ ३७ ।। इसी उदाहरण से धीर पुरुप बलवान से नम्र रहें । जो बलवान से नम्र रहता है, वह · इन्द्र (ईश्वर) के लिये नमता है। पर्जन्यनाथाः पशवो राजानो मंत्रिवाँधवाः । पतयो बांधवाः स्त्रीणां ब्राह्मणा.वेदवांधवा ।। ३८ ॥ * गीता में कहा है कि- यत्तद् विभूति मत्सत्वं अर्थात् जहाँ जहाँ मेरी विभूति है, वहाँ वहाँ उस रूप में “ मैं ही हूँ" ईश्वर को वेदों में "वल" बतलाया है, इसीलिये "वलमसि वलं मयि धेहि" प्रार्थना बतलाई है।
द्वितीयोऽध्यायः । ( ५५ ) मेघ (पशुओं के लिये घास श्रादि तृण उत्पन्न करने से ) पशुपति कहलाते हैं, मन्त्री राजा के सहायक होते हैं। पति त्रियों के प्रेम में बँधे हुये और वेद ब्राह्मणों के सहायक माने गये हैं।" सत्येन रक्ष्यते धर्मों विद्या योगेन रक्ष्यते । मृजया रक्ष्यते रूपं कुलं वृत्तेन रक्ष्यते ॥ ३४ ॥ सत्य से धर्म की रक्षा की जाती है। अभ्यास से विद्या' की रक्षा होती है.स्नान से रूप की रक्षा होती है और सदाचार से कुल की रक्षा होती है। मानेन रक्ष्यते धान्यमश्वान् रक्षत्यनुक्रमः । अभीक्ष्णदर्शनं गाश्चस्त्रियो रक्ष्याः कुचैलतः॥ ४० ॥ अन्न की तौल ( से ) घोड़ों को टहलाने (फेरने से) देख रेख से गायों की और कुवैल (मलिन वख) से स्त्रियों की रक्षा करे। न कुलं वृत्तहीनस्य प्रमाणमिति में मतिः । अन्त्येष्वपि हि जातानां वृत्तमेव विशिष्यते ।। ४१ ।। मेरी सम्मति में आवरण भ्रष्ट मनुप्य सदाचारी नहीं * जान ध्रुत शूद्र कुलोत्पन्न था, परन्तु श्राचरण-श्रेष्टता से बाहरण पद के योग्य हुधा और भी अनेक उदाहरण है "शुचं वर्तातिशूद्रः" जो पवित्रता से गिर जावे वही शूद्र है। यहाँ पवित्रता बड़ा गंभीर 'भाशय रखती है। सदाशरए में शाने वाली जितनी पवित्रता है, उनसे गिरना 'शूदत्य' है। जिसका अन्तःकरण से संपन्ध है, जो पाह्य कारणों द्वारा संस्कार, दोप और अविया से प्राप्त होता है। --- ( ५६ ) विदुर नीतिः माना जा सकता, परन्तु अति पवित्रता से भी गिरे हुये कुल में उत्पन्न पुरुष प्राचरण से ही विशेषता को प्राप्त होता है। य ईर्षः परविचेपु रूपे वीर्ये कुलान्वये । सुख सौभाग्य सत्कारे तस्य व्याधिरनंतकः ॥ ४२ ॥ जो अन्य के धनों में, रूप में, कुल में,(परिवार-कुटुम्य) सुख में, सौभाग्य और प्रतिष्ठा में जलन रखता है । अर्थात् डाह व ईर्षा करता है, उसे अनन्त दुख है अर्थात् उसका चित्त सुखी नहीं रह सकता। अकार्यकरणाझीतः कार्याणां च विवर्जनात् । अकाले मंत्रभेदाच्च येन मायेन नत्पिवेत् ।। ४३ ।। जिस मद्य ले कर्तव्य कर्म के करने ले, कर्तव्य कर्म के त्यागने से और जो विचार लमय से पूर्व ( काम होने से पहिले) ही खुल जावे, सब पर प्रकाशित होने की सम्भावना हो, उले कभी न पीचे अर्थात् इस प्रकार की असावधानता. रूपी शराब न पीये। असावधानता को मद्य के नशे के समान त्याज्य माना है। विद्यामदो धनमदस्तृतीयोऽभिजनी मदः । मदा एतेऽवलिप्तानामेत एव सतां दमाः ॥ ४४ ॥ विद्या मद,धन मद,तोमरा कुटुम्ब-मद यह केवल नीवों (पतिता)के मद है,श्रेष्ठों को भी यही तीनों शान्तियाँ है, अर्थात, उन्हें विद्या, धन और जन का घमण्ड नहीं होता।
द्वितीयोऽध्यायः ( ५७ ) असतोऽभ्यर्थिताः सद्भिःक्वचित्कार्ये कदाचन । मन्यांते संतमात्मानमसंतमपि विश्रुतम् ।। ४५ ॥ सज्जन को कभी दुष्टों से निवेदन जो करना पड़ा तो वह (दुष्ट) अपने को भी साजन-कक्षा में मानने लगता है, चाहे घह संसार में दुष्ट करके ही क्यों न प्रलिद्ध रहा पावे । गतिरात्मवतां संतः संत एव सतां गतिः । असतां च गतिः संतो नत्वसंतः सतां गतिः ॥४६॥ लाधुजनों श्राश्रित श्रात्मवान रहते हैं और साधु (सज्जन) ही उत्तम पुरुषों का ठिकाना है यही किन्तु दुष्ट भी सासन (साधु षों के ही सहारे रहते हैं, परन्तु विपरीत इसके साधु दुष्ट का श्राश्रय नहीं लेगा। जिता सभा वखवता मिष्टाशा गोमता जिता । अध्धा जितो यानवता सर्व शीलवता जितम् ॥४७॥ अच्छे वनों धाला सभा को, गौ वाला मिष्ट (मीठे) को सवारी चाला मार्ग को जान लेता है, परन्तु शाल वाला पुरुष सय पर विजय प्राप्त करता है। शालं प्रधानं पुरुषे तद्यस्येह प्रणश्यति । न तस्य जीवितेनार्थों न धनेन न वंधुभिः ।। ४८ ॥ मनुष्य में शीलही तत्व यन्तु है। जिसका यद गुरा नष्ट हो जाता है.. उसके जीवित रहने से लाभ न धन में न म्यादि से कुछ ग्योजन सिद्ध होता है अर्थात् शील जीवन का उद्योत लक्षण है। । .
विदुरनी : . आत्मनात्मानमन्विच्छेन्मनो बुद्धीन्द्रियैर्यतैः । आत्माह्य वात्मनो बंधुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ ६४ ॥ अपने आधीन मन, बुद्धि और इन्द्रियों को करके अपने पर विजय प्राप्त करे,क्यों कि आत्मा ही आत्मा का मित्र और • श्रात्मा ही आत्मा का शत्रु है अर्थात् मनुष्य चाहे तो अपने को मित्र धनाले और चाहे शत्रु । अपने हित और अनहित का विचार नित्य रखना चाहिये। वंधुरात्मात्मनस्तस्य येनैवात्मात्मना जितः । स एव नियतो बंधुः स एव नियेतो रिपुः ॥ ६५ ॥ जिसने अपने मन पर विजय प्राप्त करली उस जीव क पापा ही वन्धु है । वह जीता हुआ मन ही निश्चय आत्मा का धन्धु है वही निश्चय उसका शत्रु है । अर्थात् जो मन पर विजय प्राप्त कर लेता है,उसे आत्म विश्वास हो जाता है । यह आत्म विश्वास ही मित्रता है और अविश्वास शत्रुता है। क्षुद्राक्षेणेव जालेन झपावपिहिताबुरू । कामश्च राजन् ! क्रोधश्च तौ प्रज्ञानं विलुम्पतः ॥६६॥ छोटे छेदों वाले जाल ले दो बड़ी२ मछली ढंकी हुई हैं। हे गजन् ! यह दो मत्स्य ( मछली ) काम और क्रोध है, जो ज्ञानरूपी जाल को तोड़ देती है. अर्थात् काम और क्रोध के आगे ज्ञान नहीं ठहरता।
द्वितीयोऽध्यायः . - समवेक्ष्येह धर्मार्थो सम्भारान् योऽधिगच्छति । स वै संभृतसम्भारः सततं सुखमेधते ॥ ६७ ॥ जिसने धर्म और अर्य का विचार करके भार ( उत्तर दायित्व ) किया है, वह निश्चय पूर्वक उत्तरदायित्व वाला मनुष्य सदा सुख की बढ़ोतरी करता है। यः पंचाभ्यंतरान् शत्रुनविजित्य मनोमयान् । जिगीपति रिपूनन्यान् रिपवोऽभिभवन्ति तम् ।।६८|| जो मनुष्य भीतर की पांच मानसिक वृत्तियों ( काम, मोध, मद लोभ, मोह ) को न जीत कर बाहर के शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना चाहता है, उसको शत्रु दवा लेते हैं । अर्थात् जिन्होंने मानसिक विजय प्राप्त की है, उन पर बाहर के शत्रु आक्रमण नहीं कर सकते। दृश्यते हि-महात्मानो वध्यमानाः स्वकर्मभिः । इंद्रियाणाननीशत्वाद्राजानो राज्यविभ्रमैः ।। ६६ ।। अपने कमी से महात्मा भी बँधे हुये हैं,जैसे इन्द्रियों का स्वामी न होने से राजा राज्य के दोपों से घंधा होता है। असंत्यागात् पापकृतामपापांस्तुल्यो दण्डःस्पृशते मिश्रभावात्। शुष्कणादह्यते मिश्रभावात्तस्मात्पापैःसह संधिं न कुर्यात्।।७० पाप रहित यदि पापियों का साथ न छोड़े तो उस संग दोप से दोनों को दण्ड मिलता है, जैसे सूखे के साथ गीला जलता है। अतः पापियों से मेकन रक्ने। Y
विदुर नीतिः
प्रह्लाद ने कहा-
विरोचन ! जुझ से तेरा पिता अङ्गिरा श्रेष्ठ है,
सुधन्वा तुमसे श्रेष्ठ है और तुम्हारी माता से इसकी माता
ठ है, इलले तुमको सुधन्वा ने जीत लिया।
विरोचन ! सुधन्वायं प्राणनामीश्वरस्तव ।
सुधन्वन ! पुनरिच्छामि खया दत्तं विरोचनम् ॥३६।
हे विरोवन ! यह सुधन्वा तुम्हारे प्राणों का स्वामी है,
हे सुधन्वा ! विरोचन को तुम फिर लौटा दो (प्राणदान दो )।
सुधन्यवाच !
यद्धसमवृणीयास्त्वं मा कामादनृतंवदीः ।
पुनर्ददामि ते पुत्रं तस्माद् प्रहलाद ? दुर्लभम् ॥३७
-
-
सुधन्वा बोला-
के
हे प्रह्लाद ! धर्म को तुमने पालन किया है, काम के
वशीभून ट न बोला और इस लिये तेरे मिलने योग्य
पुत्र
न होते हुए भी उसे लौटाता हूँ अर्थात् प्राण दान देता हूँ।
एव प्रहलाद ! पुत्रस्ते मया दत्तो विरोचनः ।
पादप्रक्षालनं कुर्यात्कुमार्याः सन्निधौ मम ॥ ३८ ॥
हे प्रहाद ! इल तेरे
पुत्र
विरोचन को मैंने प्राण दान
दे दिया, परन्तु कुमारी ( केशिनी ) के सम्मुख ( समक्ष ) मेरे
पावों को धोना होगा ।
विदुर उवाच--
तस्माद्राजेन्द्र ! भूम्यर्थे नानृतं वक्तैमर्हसि ।
'मागमः ससुतामात्यो नाशं पुत्रार्थम चन् ॥ ३६ ॥
तृतीयोऽध्यायः ( १ ) विदुर कहने लगे- अतः हे राजेन्द्र धृतराष्ट्र ! पृथ्वी के लिये झूठ बोलना उचित नहीं। अतः पुत्र के लिये झूठ बोलने से मन्त्री और पुत्रों सहित विनाश की अोर न जा। न देवा दण्डमादाय रक्षन्ति पशुपालवत् । यंतु रक्षितु मिच्छन्ति युद्धया रांविभजन्ति तम् ॥४०॥ देवता लेग जैसे पशुओं के पीछे डण्डा लेकर रक्षा को जाते हैं, इस प्रकार रक्षा नहीं करते, किन्तु जिसकी रक्षा उन्हें अभीष्ट होती है, वे उसे शुद्धि त्रुद्धि प्रदान करते हैं। यथा यथाहि पुरुषः कल्याणे कुरुते मनः । तथा तथास्य सर्वार्थाः सिध्यन्ते नात्र संशयः ॥४१॥ मनुष्य ज्यों २ कल्याण (मला करने) में मन लगाता है, त्यो २ उसके सब कार्य सिद्ध होते हैं, इसमें सन्देह नहीं। नैनं छंदासि वृजिनात्तारयति मायाविनं मायया वर्तमानम् । नीडं शकुन्ता इव जायपक्षाश्छन्दाँस्येनं प्रजहत्यन्तकाले। ४२॥ लैं * महात्मा तुलसीदास जी ने इसी भाव को इस प्रकार स्फुटित किया है:- फाल दएद यहां काल और देवता पद के परिवर्तन ने भाव में कुछ चौर ही रोचकता उत्पन करदी है। अब मुदि के प्रदान और हरर ने पद में एक अनोखा चमत्कार वरपन कर दिया है। पाहुन मारा विदुर नीतिः ( १०२, ) क्षीण हुआ, क्षीण नहीं, किन्तु श्राचरणहीन नए भ्रष्ट हो जाता है। गोभिः पशुभिरश्वैश्च कृघ्या च सुसमृद्धया । बुलानि न पुरोहन्तियानि हीतानि वृत्ततः ॥ ३१ ॥ जो कुल आचरण भ्रष्ट हैं वे न गौओं से न अन्य पशुओं स, न घोड़ों से और न भरी-पूरी खेती करने से बढ़ोतरी को प्राप्त हो सकेंगे। अर्थात् आचरण की हीनता मनुष्य को गिरा देती है। * मा नः कुले वैर कृत्कश्चिदस्तु राजा मात्यो मा परस्वापहारी । मित्रद्रोही नकृष्टतिकोऽनृतीया पूर्याशी वा पितृदेवा तिथिभ्यः ॥३२॥ हमारे वंश में कोई भी वैर करने वाला राजा, अथवा पराये धन का चुराने वाला मन्त्री, मित्र से वैर मानने वाला, घरोहर का दवा लेने वाला, मिथ्यावादी एवं पितरों [माता पिता वृद्ध जनों] देनों [विधानों और अतिथियों से पूर्व भोजन करने वाला न हो, अर्थात् हम ऐसे को नहीं चाहते। यश्च नो, ब्राह्मणान्हन्याद्यश्च नो ब्राह्मणान्द्विपेत् । न नः स समिति गच्छेयश्च नो निर्वपेत् कृपिम् ॥ ३३ ॥ " पञ्च यज्ञ करके भोजन करने वाले कुल उत्तम कुल ~
चतुर्थोऽध्यायः
( १०३ )
हम में होकर जो ब्राह्मण-बध करे और उनसे वेप करे,
हम में से खेती का नाश । उजाड़ ) करे यह हमारी (सभा)
समाज के योग्य नहीं शार्थात् वह सभ्य है, सभा में पान
पाने के अयोग्य है।
तृणानि भूमिरुदकं वाचतुर्थी च मूनृता ।।
सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन ।। ३४ ।।
श्रासन, स्थान, जल, चौथे प्रिय बोलना यह भले मनुष्यों
के घर में कभी कम नहीं होते अर्थात् यह सभ्य शिष्टाचार है,
कि शागन्तुक को श्रासन, (विष्ठर =विस्तर देना) स्थान
उहरने को, जल = मुन्न मार्जनादि को तथा मिष्ठ भाप से
वार्तालाप करना शिष्टता है।
श्रद्धया परमा राजन्नुप नीतानि सत्कृतिम् ।
प्रवृत्तानि महाप्राज्ञ ! धर्मिणा पुण्य कर्मिदार ।।
हे महा मतिमान राजन् ! बहीवारों पस्नु पुण्यशील
धर्मात्माओं में परम श्रद्धा से सत्कार के लिये विरामान रहती
हैं। अर्थात् श्रदालु धर्मात्मा श्रद्धा से पूर्वोक रस्तुओं ने
सत्कार करते है
(१०६) जो अकारण क्रोध करे, अकारण ही प्रसन्न हो जावे यहं दुष्टों के स्वभाव हैं जैसे तितर-बितर होताने वाले मेघ अर्थात् उनका एकला स्वभाव-स्नेह नहीं रहता। सत्कृताश्च कृतार्थाश्च मित्राणां न भवंति थे । तान्मृतानयि क्रव्यादाः कृतघ्नानोपभुञ्जते ॥ ४२.॥ जिनका मित्रों से सत्कार नहीं होता और उनका भला नहीं होता, उन कृतघ्नों के शव ( लाश) को मांसाहारी जीव भी नहीं खाते। X अर्चयेदेव मित्राणि सति वाऽसति बाध ने । नानर्थयन् प्रजानाति मित्राणां सारफल्गुताम् ॥४३॥ धन हो अथवा न हो, मित्रों का सत्कार करना ही चाहिये । विना व्यय झिये मित्रों की मित्रता का पता नहीं - लगता! -- । सन्तापाद्मश्यते रूपं सन्तापाद्मश्यते बलम् । सन्तापाद्मश्यते ज्ञानं सन्तापाव्याधिमृच्छति॥४४॥ चिन्ता से रूप नष्ट हो जाता, है, शोक से. बल कम होजाता है, चिन्ता से ज्ञान नष्ट हो जाता है और शोक करने वाले को रोगबेर लेता है। ४ देत लेत मन शंक न धरहीं, बल अनुमान सदा हित करहीं । विपति काल करि सत्गुन नेहा, श्रुतिकहिं सन्त मित्र गुण एहा ।। ['तुलसीदास जी चतुर्थोऽध्यायः ( १०७ ) - अनवाप्यं च शोकेन शरीरे चोपतप्यते । अमित्राश्च प्रहृष्यंति मास्स शोके मनः कृथाः॥४॥ चिन्ता से कुछ मिलता नहीं, केवल चित्त (शरीर) को दुख होता है. इससे शत्रु प्रसन्न होते है। अतः शोक में मन को 'न लगाये। पुनर्नरो म्रियते जायते च पुनर्नरो हीयतो वर्धते च । पुनर्नरो याचयि याच्यते च पुनर्नरः शोचति शोच्यते च ४६ मनुष्य मरता है और उत्पन्न होता है वह वार २ घटता और बढ़ता है उसे वार २ मांगना पड़ता है अथवा उससे मांगा जाता है । इसी प्रकार वारंवार ही उसे शोक (चिंता) करनी पढ़ती है अथवा चिन्तायुक्त कराया जाता है अर्थात यह संसार का क्रम ही ऐसा है। + सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभा लाभौ मरणं जीवितं च । पर्यायशः सर्वमेते स्पृशन्ति तस्माद्धीरो न च हण्येन्न शोचेत् ॥ ४७ ॥ + इस श्लोक में "भवा भो" पद का अर्थ बहुधा टीकाकारों ने मृत्यु फिश है, परन्तु यह असमीचीन इस लिये है कि "मर जीवितं" पद स्वयं उसीरलोक में विद्यमान है। पतः पुनरुक्ति दोष जन्म और ११४ ) विदुर नीतिः मैं है । पुरायुक्तं नाकरोस्त्वं वचो मेघृते जितां द्रौपदी प्रेक्ष्यराजन् । दुर्योधनं वारयेत्यक्षवत्यां कितवत्वं पण्डिता वर्जयन्ति ॥७॥ यह पर्व ही कह चुका हूँ कि जुये में जीती हुई द्रौपदी को देखकर फांना डालने में दुर्योधन को रोकना चाहिये, हे राजन् पण्डित ऊन छल (जुये ) को रोकते हैं। न तदलं यन्मृदुना विरुध्यते सूक्ष्मो धर्मस्तरसा सेवितव्यः । प्रध्वंसिनी क्रुर समाहिता श्री दुनौढा गच्छति पुत्रपौत्रान्।। नम्र से विरोध करना बल नहीं कहलाता, धर्म सूक्ष्म उसका पालन तुरन्त करना चाहिये । दुष्ट का संचित धन शीघ्र ही नाश हो जाता है और भले मनुप्यों का संग्रहीत उनके पुत्र पौत्रों ( नानी बन्ती ) तक बना रहता है। थार्तराष्ट्राःपाण्डवान्पालयन्तु पाण्डोःसुतास्तवपुत्रांश्च पान्तु। एकारिमित्रा:कुरवो ह्य ककार्या जीवन्तु राजन्सुखिनः समृद्धाः ।। धृतर.ट के पुत्र पाण्डवों की और पाण्डु के पुत्र तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करें। हे राजन्! समस्त कुरु एक शत्रु-मित्र वाले और एक ही उद्देश वाले होकर सुख-समृद्धशाली होकर जीवें अर्थात् इतने मिल कर रहे कि एक दूसरे के शत्रु मित्र को देखें। मेढीभूतः कौरवाणां त्वमद्य त्वय्याधीनं कुरुकुलमाजमीढ ! । पार्थान्बालान्वनवासप्रतप्तान गोपायस्व स्वं यशस्तात ! रक्षन।। ऐ अजमीढ वंशीय धृतराष्ट्र! तुम कुरु कुल की सीमा हो । कुरु-कुल आज तुम्हारे प्राधीन है । हे नाथ ! यालक पांडव ।
पंचमोऽध्यायः ( १९५ ) जो धनवास से दुखित हैं रक्षा करो और अपना यश विरं. जीव करो। सन्धत्स्व त्वं करोव ! पाण्डुपुत्रर्मा तेऽन्तरं रिपवः प्रार्थयन्तु । सत्ये स्थितास्ते नरदेव ! सर्वे दुर्योधनं स्थापय त्वं नरेन्द्र ।। हे कुम्वंशी राजेन्द्र ! तुम पाण्डवों से सन्धि कालो। जिसमें तुम्हारे शत्रुओं को अबगर न मिले, क्यों कि वे सब सत्य पर स्थित है तुम दुर्योधन को लम्हाल लो। इन्ते श्री पं० गोकुलचन्द्र दीक्षित कृते, श्री महाभारने उद्योगपर्वणि प्रजागर विदुर हित वास्ये, भापानुवादे चतुर्थोऽध्यायः । अथ पंचमोऽध्यायः । - बेदुर उवाच- सप्तदशेमान् राजेन्द्र मनुः स्वायम्भुवोऽत्रवीत् । वैचित्रवीर्य ! पुरुषानाकाशं मुष्टिमितः ॥१॥ विदुरजी ने कहा- हे राजा विचित्रवीर्य के पुत्र धृतराष्ट्र! स्वायम्भुव मनु ने सब मनुष्यों को व्यर्थ पुरु गर्थवादी कदा है।
( १७२ ) विदुर नीतिः दुख से पालित मृत पुत्र को मनुष्य लोग उठाकर अपने घर से बाहर फेंक पाते हैं उसके लिये खुले बाल दुःखित हो रोते हैं और लड़की ईधन की तुल्य चिता में फेंक देते हैं । अन्यो धनं प्रेतगतस्य भुङ्क्ते त्यांसि चाग्निच शरीरधातून् । द्वाभ्यामयं सह गच्छत्यमुत्र पुण्येन पापेन च वेष्टयमानः ।। उस मृतक के धन को अन्य भोगते हैं, उसके शरीर और धातुओं को पक्षी तथा अग्नि भोगता है, केवल यह (जीव) पुण्य और पाप ले लिपटा हुआ जाता है। उत्सृज्य विनिवर्तन्ते ज्ञातयः सुहृदः सुताः । अपुष्पानफलान्वृक्षान् यथा तात् ! पतत्रिणः ॥१७॥ हे तात् ! भाई,मित्र, पुत्र सब इस प्रकार छोड़कर लौट श्राते हैं । पुण्य और फल रहित वृक्षों को पक्षी छोड़ देते हैं । अग्नौ प्रास्तं तु पुरुष कर्मान्वेति स्वयकृतम् । तस्मात्तु पुरुषो यत्नाद्धर्मा सञ्चिनुयाच्छनैः ॥१८॥ अग्नि में फैंके उल पुरुप का अपना लिया कर्म साथ जाता है इसीलिये मनुष्यको धीरे२ धर्म संग्रह करना चाहिये। अस्माल्लोकार्बममुष्य चाधो महत्तमस्तिष्ठति ह्यन्धकारम् . तद्वै महामोहनमिन्द्रियाणां वुध्यस्व मा त्वां प्रलभेत राजन हे राजन् ! इस लोक से उत्तर और इसके नीचे निविड़ अन्धकार है, वह इन्द्रियों का बड़ा अचेत (असावधान) करने वाला है,इसे समझो कि.जिससे वह अन्धकार तम्हें न पकड़े। - । -- -- ( १७३ ) अष्टमोऽध्यायः द वचः शक्ष्यसि चेचथावन्निशम्य सर्व प्रतिषत्तुमेव । पशः परं प्राप्स्यसि जीवलोके भयं न चामुन न चेह तेऽस्ति । यदि तुम इस वचन को ज्यों का त्यों सुनकर यशानुकूल करने में समर्थ होने तो संसार में महान् यश होगा और लोक तथा परलोक में नभय हो जात्रांगे आत्मा नदी भारत! पुण्यतीर्था सत्योदका धृतिकूला दयोभिः तस्यां स्नातः पूयते पण्यकमा पुण्या हात्मा नित्यगलोभ एव हे भारत ! यह आत्मा मानो एक नदी है इसके पुण्य घाट है इसमें सचाई का जल है धीरज ही किनारे है. दया की लहरें है, पुण्यशील प्राणी उक्त (आत्मा नहीं। में स्नान कर पवित्र होता है और यह आमा पवित्र माना कि जिसमें लोभ न हो। कामक्रोधग्रावतीं पञ्चेन्द्रियजला नदीम् । नाव धृतिमयीं कृत्वा जन्मदुर्गाणि सन्तर ॥२२॥ फाम और क्रोध ही मानो इसमें मगर मच्छ है, इस पाँच इन्द्रियरूपी जलनद को धैर्य की नाव ना कर जन्मरूपी गहरे जल से पार हो जाओ। प्रज्ञावृद्धं धर्मवृद्ध स्वबन्धु विद्यावृद्ध वयसा चापि वृद्धम् । कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य यः सपृच्छेन स मुहकदाचित् जो बुद्धि में पड़े, धर्म में बढ़े विद्या में बढ़े और श्रयस्था में भी बढ़े, अपने भाई को कार्य तथा कार्य में २७४ विदुर नोनिः सत्कारपूर्वक प्रसन्न करके अच्छे प्रकार सम्मति लेता है, वह कमी भून सहीं करता। धृत्या शिश्नोदरं रक्षेत्पाणिपादं च चक्षुपा । चलुः श्रोत्रे च मनसा मनो वाचं च कर्मणा ॥२४॥ उरश और उत्तर को धैर्य से, हाथ पाँव को आँख से, आँख कान की नस और मन शाणी को कर्म से चबाये। नित्योदकी नित्य यज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान वी सत्यंत्रवन्गुरवे कर्म कुर्वन्न ब्राह्मणश्च्यवंते ब्रह्मलोकात् ॥२॥ शरीर को सदा जल से धोने वाला, सहा जनेऊ धारण करने वाला, वेद का पाठ करने वाला, निकृष्ट श्रन को न लेने वाला, सत्यवादी, गुरू के लिये काम करने वाला, ब्राह्मण ब्रह्मलोक (ब्रह्म मर्यादा ) से पतित नहीं होता। अधीत्य वेदान्परिसंस्तीर्यचाग्नीनिष्ट्वा यज्ञैः पालयित्वाप्रजाश्च गोब्राह्मणार्थशस्त्र पूतान्तरात्मा हतासंग्रामे क्षत्रियः स्वर्गमेति वेदों को पढ़, अग्नि-अाधान कर, यज्ञों से देव-यजन कर और प्रजाओं का पालन करता हुआ स्त्र-द्वारा गो-ब्राह्मण की रक्षा के लिये जिसका अन्तरात्मा पवित्र है, वह संग्राम मारा गया क्षत्रिय स्वर्ग को प्राप्त होता है। वैश्योऽधीत्य बामणान्क्षत्रियांचा धनैकालेसंविभज्याश्रितांश्च त्रेतापूतं धृममाघ्राय पुण्यं प्रेत्य स्वर्गे दिव्यसुखानि भुङ्क्ते॥
মোঃ १६५ म वैश्य पढ़ रासले और लोग साधतों को अायता पड़ने पर धन द्वारा सत्कार करे और तीन 'धुओं को (आहवतीय, गार्हपत्य नया दक्षिणाशि) संता हु (यह यर करता हुत्रा) वृत्तुमार होने पर स्वर्ग में दिव्य सुख को भोगता है। ब्रह्म क्षत्रं वैश्वर्ण च शूदः अमेणतान्यायतः पूजयानः । तुष्टेप्तेष्वन्गयो दग्ध पापस्त्यस्या देहं स्वर्ग सुखानि भुङ्क्ते जो जूद क्रमपूर्वक ब्रायण, जानिये शोर वैध की न्याय पूर्वक परिचर्या करता है, वह इन (बामणादि) को परितोषित करने पर दुख हिन पाप से मुक देह त्यागन करने पर स्वर्ग के तुम्नों को भोगता है। चातुर्वस्मैप धर्मस्तयोक्ती हेतुं चानुब्रुवती से निबोध । ज्ञानाद्धर्माद्धीयते पाण्डुपुत्रस्तं त्वं राजन् ! राजधर्मेनिपुच्च यह चारों बलों का धर्म मैंने तुमले कहा इनका यह कारण है कि पाण्डु का पुत्र (युधिष्टिर) क्षमियों के कर्म से गिरा जाता है, हे राजन् ! तुम उसको राज-धम में लगायो । चतराष्ट्र उनाच- एवमेतद्यथा त्वं मामनुशाससि नित्वदा । ममापि च पतिः सौम्य! भवत्येवं यथात्य माम् ॥३० तराष्ट्र ने कहा- यह समय है जैसा कि मुझे तुमने समझायामात्र बेदुर ! भगीनी में ऐसा ही है जैसा कि तुम्ने यहा।
विदुर नीतिः - सा तु बुद्धिः कृताप्येवं पाण्डवान्प्रति में सदा । दुर्योधनं समासाद्य पुनर्विपरिवर्तते ॥ ३१ ॥ परन्तु वह ज्ञान, पाण्डवों के प्रति मेरा दुर्योधन के समीप जाने पर फिर विपरीत हो जाता है। न दिष्टमेभ्याति क्रान्तुं शक्य भूतेन केनचित् । दिष्टमेव ध्रुवं मन्ये पौरुष तु निरर्थकम् ॥३२॥ कोई ग्राणी प्रारब्ध को नहीं लग सकता, मैं प्रारब्ध ( होनी ) को अटल मानता हूं। अर्थात् ( वोल अटल छत्र की जय ) पुरुषार्थ तो व्यर्थ ही है। ऊन विंश, पै. वानवे, बार शारंदी बार । जन पद हित की कामना, कियो नीति विस्तार ॥ ऊन विंशनौ वेद में, सित.आश्विन रविवार । तिथि छट को शोधन करी, पुनर्प्रचार विचार ।। इति इटावा प्रान्तर्गत लखना ग्राम्य वास्तव, श्री पं० चन्द्रिकाप्रसादात्मज सिद्धान्तवाचस्पति, श्री पं० गोकुलचन्द्र दीक्षितकृते, श्री महाभारते, उद्योग पर्वणि प्रजागर पर्वणि विदुर हित वाक्ये, भाषा टोकायां अष्टमोऽध्यायः पूर्तिमगात् ।। शुभम् भूयात् ।।
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