Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Italy Ki Swadhinta
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तेरण-भारत-प्रन्थावली-सं०७
२१.
इटली की स्वाधीनता
अथवा
उसका आधुनिक इतिहास
-
लेखक
नन्दकुमारदेव शर्मा
प्रकाशक
तरुण-भारत-प्रन्थावली-कार्यालय,
दारागंज, प्रयाग
द्वितीयावृत्ति १०००]
A
स०१६-४ पि०
[मूल्य 1)
1
तरुण-भारत-मन्थावली कार्यालय, दारागज्ञ, प्रयाग मुद्रक- यद्रीप्रसाद पाण्डेय, नारायण प्रेस, प्रयाग
समर्पण
एक यद तुच्छ
भेट
पूज्यपाद पिताजी महाराज
स्वर्गीय पं. जगन्नाथदेव शर्मा
चरण-कमलों
म
लेखक
अत्यन्त भक्ति-श्रना-पूर्वक, सादर
मर्पित है।
नन्दकुमाग्देव शर्मा
-
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निवेदन । इतिहास जातीय जीवन है। राष्ट्रों के गिरने-पडने, उठने और सम्हलने का पता केवल इतिहास से ही लगता है। इति- हास "त्रिकालदर्शी आइना" है। सिर्फ इतिहास विज्ञान के अतिरिक्त इस दुनिया में ऐसा ओर कोई विज्ञान नही है जिसस जातियों श्रोर देशों की भूत और वर्तमान परिस्थिति का परि- चय प्राप्त हो सके, भूत और वर्तमान परिस्थिति पर विचार फरके भविष्य में होनेवाले भले-बुरे का विचार कर सकें। इतिहास-विज्ञानवेत्ता ही ऐसी जटिल उलझनों को समझने में समर्थ होते है । किसी देश की भूत और वर्तमान घटनाओं को लेकर न केवल इतिहास-विज्ञानवेत्ता उस देश का ही भविष्य श्रनुमान करते हैं, परन्तु यहा तक अपनी बुद्धि दौडाते है कि उस देश की वर्तमान परिस्थिति का प्रभाव उसके आसपास पडोसी देशों पर क्या होगा। यही कारण है कि यूरोप का महाभारत होने से कइ वर्ष पहले इतिहास की केवल पुरानी घटनाओं और वर्तमान परिस्थिति को देख कर कितने ही विद्वानों को यह अनुमान हो गया था कि किसी समय यूरोप में महासग्राम अवश्य चलेगा। इस विषय की पहले कितनी ही पुस्तकें छप गई थी। इसी लिये इतिहास को साहित्य का एक श्रावश्यक अङ्ग कहा जाता है। जिस साहिल्य-सरोवर में ( ख ) इतिहासरूपो सरोज नही है यह साहित्य, साहित्य नहीं-कहा जा सकता है । जिस तरह स एक सुन्दर सरोवर में खिला हुश्रा कमल दशकों के खिन्न और मलिन चित्त को प्रफुल्लित कर देता हे वस ही साहित्यरूपी सरोवर में इतिहासरूपी पमल न केवल पाठकों के सिन्न और मलिन चित को प्रसन्न ही करता है, किन्तु सजीवनी शक्ति का भी सञ्चार कर देता है। जो जातिया मरने के लिये सिसक रही है, उनके लिये इतिहास रामवाण प्रोपधि है। जेसे नेत्रों में किसी प्रकार का विकार हो जाने पर सुरमा तथा अन्य योपधियों के पाखों में भाजने की जरूरत हुश्रा करती हे देस ही हृदय के अज्ञानान्धकार को दूर करने के लिये इतिहास ज्ञानाञ्जन शलाका है। जिस भानि एक पहाड़ की चोटी पर चढ़ने के लिये लकडी के सहारे की श्रावश्यकता हुना करती है, वैसे ही उन्नति के शिखर पर चढने के लिये इतिहासरूपी सहारे की आवश्यकता है। पर दुख है कि हमारी हिन्दी भाषा के विद्वानों का ध्यान ऐतिहासिक ग्रन्थों के लिसने की ओर बहुत कम गया है। यद्यपि हिन्दी भाषा में ऐतिहासिक ग्रन्थों का प्रभाव नहीं है, तथापि जितनी पुस्तके किस्स-कहानी की प्रकाशित होती है उतनी पुस्तके इतिहास तथा अर्थशास्त्र की नहीं होती है। मेरा विचार बदुत दिनों से कुछ ऐतिहासिक ग्रन्थों को हिन्दी में प्रकाशित करने का हो
--
(ग)
रहा है। बस, इस विचारवश ही यह क्षुद्र ऐतिहासिक भेट
पाठकों की सेवा में उपस्थित है।
इस लघु पुस्तिका में, सन् १८१५ से १८७० तक इटली-
निवासियों ने अपनी सोई स्वतन्त्रता प्राप्त करने के लिये जो
द्वन्द किया था, जो चेप्टाएँ की थी, जो कष्ट सहन किये थे,
उन्हीं के सम्बन्ध में अनेक पुस्तकों से कुछ घटनाए चुन कर
अपने ढक पर लिख दी गई हैं। यह लघु पुस्तिका किसी ग्रन्थ
का अनुवाद नहीं है। देखना चाहिये कि इतिहासनिक
पाठकों को यह उपहार पसन्द आयेगा या नहीं। क्योंकि
अनुनाद की अपेक्षा यानसी पुस्तकों से घटनाओं को चुनकर
स्वतन्त्र रूप से लिपना कठिन और कष्टदायक है। इति-
हाम की पेचेली पहेलिया को बूझने में बडी मगजपश्वी
करनी पड़ती है। अनेक उलझनों को सुलझाने में समय लगता
है। यदि पाठकों ने ऐसे ऐतिहासिक निवन्धों को पसन्द किया
ता मेरो इच्छा बहुत शीघ्र इस ढङ्ग के कई ऐतिहासिक निबन्ध
पाठकों की सेवा में भेट करने की हा रही है। इस छोटे से
निबन्ध में जो कुछ भूल चूक हुई हो, उसको पाठक क्षमा ही
न कर,प्रयुत लेपक को सूचित करने की भी कृपा कर, जिससे
दुसरे संस्करण में उनका सशावन कर दिया जायगा।
निवेदक,
बड़ा बाजार, फलफत्ता।
-
४२, शियठाकुर लेन, } नन्दकुमारदेव शर्मा ।
अनुक्रमणिका पृष्ठ १ ५ ... २१ .. २५ २८ ३३ .. ४० ४४ परिच्छेद १-प्रारम्भिक वचन २-सक्षिप्त परिचय ३--पूर्वदशा का दिग्दर्शन ४--अशानता का प्रचण्ड राज्य ५-नेपोलियन की शरण ६-यात्मत्याग के ज्वलन्त उदाहरण ७-मेजिनी और चार्ल्स एलवर्ट :-युधा इटली की स्थापना है-देशभक्ति की कठोर परीक्षा १०---जागोनी के चिन्ह ११--स्वतन्त्रता का युद्ध १२---रोम में प्रजातन्त्र राज्य १३--रणचएडा का नाच १४-पुन शनि की दृष्टि १५-फिर भाग्य की परीक्षा १६-भाग्योदय के चिन्ह १७-यन्दर-बाट १८-सिसिली टापू का युद्ध और सन्धि-रहस्य १६-युद्ध और घेनिस पर विजय २०-पाशा में निराशा २१-रोम का पतन २२-रोम पर अधिकार ४६ ५३ ५६ ६२ ६७ . ७७ ७8 ... .
इटली की स्वाधीनता
पहला परिच्छेद
Hd
प्रारम्भिक वचन
उत्सवे व्यसने चैव दुर्मिक्षे राष्ट्रविप्लवे ।
राजद्वारे श्मशाने च यस्तिप्रति स बान्धर ॥
यूरोप में युद्ध के छिडते ही वहा के बड़े बडे राजनीतिज्ञों
के दिमाग में यह सवाल उठने लगा था कि इस कुरुक्षेत्र में
इटली फिसका साथ देगा? वह जर्मनी और श्रास्ट्रिया की
मित्रता निवाहेगा अथवा फ्रास तथा इदलेण्ड का पक्ष ग्रहण
करेगा । इस विवादग्रस्त प्रश्न को लेकर यूरोप के राजनीतिज्ञों
के दिमाग में दूसरा महामारत होरहा था। वहा के सवादपों
में इस विषय को लेफर बड़े बड़े लेख निकल रहे थे। पडा
पादविवाद हो रहा था । यद्यपि युद्ध के प्रारम्भ से ही इटली
ने एक प्रकार से जर्मनी और ग्रास्ट्रिया का साथ देने से स्निाग
कर लिया था, तथापि तब तक यह प्राशा नहीं हुद थी कि
इटलो इलेएट मास और रूस का साथ देगा। परन्तु अन्त
में इटलो ने यास्ट्रिया और जर्मनी का साथ न देकर मित्र-त्रय
(फ्राम इङ्गलेएड और सस) का साथ दिया और श्रास्ट्रिया
और जर्मनी क विरुद्ध अस्त्र प्रहण कर लिया । इटली के
सम्बन्ध में इस भाति चर्चा होने का कारण यह था कि इस युद्ध में इटली की परिस्थिति "इधर कुया, उधर खाई" के समान थी। क्योंकि इटली का जव से स्वतन्त्र राज्य स्थापित हुश्रा था, तव से उसने पहले पर-राष्ट्रनीति कुछ भी स्थिर नहीं की थी। परन्तु कई प्रकार के चढाव-उतार देसकर सन् १८७३ में श्रास्ट्रिया और जर्मनी के त्रिगुट (ट्रिपल पलाइन्स) में सम्मिलित हो गया था। इसी कारण इटली के सम्बन्ध में पान्दोलन हो रहा था। यद्यपि जर्मनी और श्रास्ट्रिया के त्रिगुट में इटली सम्मि- लित होचुका था, तथापि त्रास्ट्रिया और इटली की चिरकाल से शत्रुता चली पाती थी, जैसा इस पुस्तक के पढ़ने से पाठकों को श्रागे विदित होगा। इटली का जर्मनी के साथ श्रास्ट्रिया के गुट में सम्मिलित होने का कारण जर्मनी के चाणक्य-विस्मार्क की कुटिल नीति थी। विस्मार्क को यह आशा थी कि वह जर्मनी, श्रान्ट्रिया, इटली एवम् तुर्किस्तान और बालकन राज्यों को लेकर यूरोप में एक महाशक्ति का सगठन कर 'लेगा और जर्मनी का यूरोप मे प्रभुत्व रहेगा। पर वह अाशा पूरीन हो सकी। दूसरा कारण इटली का इस गुट में शामिल होने का यह भी था कि उसको फ्रास से सदैव भय रहता था और रूम की बालकन नीति से वह सन्तुष्ट नहीं था। जर्मनी से मित्रता का एक कारण यह भी हुया कि इटली दरिद्र देश है। उमे जर्मना से व्यापार-वाणिज्य में बहुत सहायता मिली थी। इस प्रकार से जर्मनी ने इटली को अपने फन्दे में फंसा लिया था। फास ने इटली का स्वाधीन राज्य स्थापन करने में
.
कमी तो प्रास्ट्रिया के पों से मुक्ति दिलाने में सहा-
यता की थी, कभी इटली को दवाने के लिये रोम के पोय की
पीठ ठोकी थी, तथापि स्वाधीन राज्य होने पर इटली की
फास से मैत्री नहीं हुई। परन्तु इटली और फ्रास दोनों बहुत
सी बातों में मिलते-जुलते हैं। दोनों की भाषाओं की उत्पत्ति एक
ही भापा से है और भी कई प्रकार की एकता है। जर्मन
चाणक्य-विस्मार्क यह वात ताड गया था कि जर तक इटली
ओर मास में वैरभाव उत्पन्न न किया जायगा, तब तक उसकी
श्राशा पूर्ण नहीं होगी। इसलिये उसने बहुत से जोड़ तोड
लगाकर इटली को अपने गुट में सम्मिलित कर लिया था।
इधर इटली इङ्गलेण्ड का भी कृतन है। जिस समय उसने
स्वाधीनता का द्वन्द किया था, उस समय इङ्गलेण्ड ने जो
सहानुभूति प्रकट की थी, उसको इटली भूल नहीं सका, और
इसीलिये यूरप की भयानक लडाई के छिडेते ही इटली ने ब्रिटेन
के साथ सहानुभूति दिखलाई । जर्मनी से मित्रता होजाने पर
उससे सन्तुष्ट न होने का कारण यह भी था कि वहा पर भी
जर्मनी का प्रभाव दिन पर दिन बढ़ता जाताथा । "गङ्गा आने-
वाली और भागीरथ के सिर पडी" इस कहावत के अनुसार
गत दिपाली समर में जर जर्मनों ने रूम के साथ अपनी सहानु-
भूति प्रकट की, तर तो इटली जर्मनी से और भी अप्रसन
हुआ । जर्मनी का रूम के साथ सहानुभूति दिसलाना-घाव
पर नमक छिटकने के समान हुना। और तभी से इटली
त्रिगुट-मण्डला से उदासीनता ग्रहण करता जाता था।
आस्ट्रिया से भी इटली के असन्तुष्ट होने का कारण यह
हे कि उसका यदुत सा सीमान्त प्रदेश भास्ट्रिया के अधीन
है।डीट वन्दर, जा आलियन व्यापार का केन्द्र है, पस्तुत.
(४)
इटली का है। ऐसे ही अनेक कारणों से इटली ने इङ्गलेण्ड का
पक्ष लिया। इससे कोई कोई महानुभाव इटली पर सन्धिमा
का दोप मढते है, पर यह भूल है। इटली की सन्धि जर्मनी
अथवा श्रास्टिया से यह कभी नहीं थी कि वे जब कभी किसी
राज्य पर श्राक्रमण करेंगे तब भी इटली उनका साथ देगा।
इटली और जर्मनी की यह सन्धि थी कि जब कभी दो
शक्तिया मिलकर किसी पर थाक्रमण करेंगी तब दोनों में से
एक दूसरे को सहायता देंगे-सो किसी ने भी जर्मनी पर
आक्रमण नहीं किया था। पर जर्मनी स्वय आक्रमण करने
चला था । ऐसी दशा में इटली पर सन्धिभर का दोप लगाना
'सरासर अनुचित है। श्रस्तु। जो कुछ हो। इटली का मित्रों
का साथ देना अच्छा ही हुआ। उससे इङ्गलेण्ड के साथ
उसकी मैत्री और भी घनिष्ट हो जायगी।
-
-
- दूसरा परिच्छेद संक्षिप्त परिचय (भौगोलिक वृत्तान्त, शिक्षा, धर्म, सैन्यबल, समुद्री शक्ति प्रादि का सक्षिप्त निदर्शन) वलसाहित्य-सम्राट बाबू वद्धिमचन्द्र चट्टोपाध्याय महाशय ने अपनी पुस्तक "विषवृक्ष" में कविकुल-मुकुटमणि कालिदास और एक मालिन की एक कथा लिखी है कि एक मालिन कविकुल-मुकुटमणि कालिदास के यहा नित्य पाया करती थी और उनको फूल दे जाया करती थी। कालिदास ये दरिद्र ब्राह्मण । उनके पास मालिन को फूलों के बदले पैसे देने को नहीं होते थे। वे नित्य मालिन को फूलों के बदले अपनी कविता सुना कर प्रसन्न कर दिया करते थे। एक दिन मालिन सदैव की भाति फूल लायी । कालिदास भी अपने नित्य नियम के अनुसार मालिन को अपनी कविता सुनाने लगे। उस दिन ये अपनी नवीन रचना मेघदूत मालिन को सुनाने धैठे। मालिन ने मेघदूत का कुछ प्रारम्भिक अश सुना । पर उसका जी मेघ- दूत का प्रारम्भिक अश सुनते ही ऊब गया। मेघदृत का प्रारम्भिक अश फुछ नीरस होने के कारण मालिन को श्रानन्द नहीं पाया। वह कहने लगी कि "कालिदास, मुझे तुम्हारी यह कविता अच्छी नहीं लगी।" इस पर कालिदास क्दा- "मालिन, तुझे यह कविता चाहे अच्छी न लगती हो, पर आगे । .
(४)
इटली का है। ऐसे ही अनेक कारणों से इटली ने इङ्गलेण्ड का
पक्ष लिया। इससे कोई कोई महानुभाव इटली पर सन्धिमा
का दोष मढ़ते है, पर यह भूल है। इटली की सन्धि जर्मनी
अथवा आस्ट्रिया से यह कभी नहीं थी कि वे जब कभी किसी
राज्य पर श्राक्रमण करेंगे तव भी इटली उनका साथ देगा।
-इटली और जर्मनी की यह सन्धि थी कि जब कभी दो
शकिया मिलकर किसी पर याक्रमण करेंगी तव दोनों में से
एक दूसरे को सहायता देंगे-सो किसी ने भी जर्मनी पर
आक्रमण नहीं किया था। पर जर्मनी स्वय आक्रमण करने
चला था। ऐसी दशा में इटली पर सन्धिभङ्ग का दोप लगाना
सरासर अनुचित है। अस्तु । जो कुछ हो। इटली का मित्रों
का साथ देना अच्छा ही हुआ। उससे इङ्गलेएट के साथ
उसकी मैत्री और भी घनिष्ट हो जायगी।
-
।
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-
- दूसरा परिच्छेद , । संक्षिप्त परिचय (भौगोलिक वृत्तान्त, शिक्षा, धर्म, सैन्यबल, समुद्री शक्ति श्रादि का सक्षिप्त निदर्शन) वनसाहित्य-सम्राट घावू वकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय महाशय, ने अपनी पुस्तक "विपवृक्ष" में कविकुल-मुकुटमणि कालिदास और एक मालिन की एक कथा लिखी है कि एक मालिन कविकुल मुकुटमणि कालिदास के यहा नित्य पाया करती थी और उनको फूल दे जाया करती थी। कालिदास ये दरिद्र ब्राह्मण । उनके पास मालिन को फूलों के यदले पैसे देने को नहीं होते थे। वे नित्य मालिन को फूलों के बदले अपनी कविता सुना कर प्रसन्न कर दिया करते थे। एक दिन मालिन सदैव की भाति फूल लायी । कालिदास भी अपने नित्य नियम के अनुसार मालिन को अपनी कविता सुनाने लगे। उस दिन ये अपनी नवीन रचना मेघदूत मालिन को सुनाने घेठे।' मालिन ने मेघदूत का कुछ प्रारम्भिक अश सुना । पर उसका जी मेघ- दूत का प्रारम्भिक अश सुनते ही ऊब गया। मेघदत का प्रारम्भिक अंश कुछ नीरस होने के कारण मालिन को श्रानन्द नहीं पाया। वह कहने लगी कि "कालिदास, मुझो तुम्हारी यह कविता अच्छी नहीं लगी।" इस पर कालिदास ने कहा- "मालिन, तुझे यह कविता चाहे अच्छी न लगती हो, पर आगे ।' -- इसमें वडी सुन्दर कविता है, तू ध्यान से सुन । इसका उससे सम्बन्ध है।" कालिदास के कहने पर मालिन कविता सुनने लगी। उसको वह कविता बडी पसन्द श्राई और दूसरे रोज मालिन बडी बढिया माला कालिदास के लिये लाई। न हम फालिदास हैं, न हमारी पुस्तक मेघदूत है, पर हमारे पाठक- पाठिकाओं में जो कालिदास की मालिन हो और जिनको "इटली की स्वाधीनता" का यह परिच्छेद नीरस प्रतीत होता हो उनसे हमारा निवेदन है कि वे चाहे भले ही इस नीरस परिच्छेद को छोड दें, परन्तु वास्तव में इटली के घर का कुछ हाल जाने विना उसकी स्वाधीनता का पूरा परिचय नहीं मिल सकता है। अपने मित्रों और पड़ोसियों के यहा के वृत्तान्त जानने की किसको इच्छा नहीं होती है ? इटली भी इङ्गलेण्ड का मित्र हाने के कारण भारतवर्ष का मित्र है। इसलिये हमको भी उसके कुछ वातों से परिचित होना श्रावश्यक है। यूरप के मानचित्र (नकशा) को देखने पर ज्ञात होगा कि उसके मध्य भाग में पाल्प्स नाम की पर्वतमाला वहुत दूर तक चली गई है, जिसकी चोटी माउण्ट ब्लैङ्क १५,७३२ फीट ऊंची है। इस पर्वतमाला के बहुत से पर्वतों पर सदा बर्फ जमी रहती है। स्विटजरलेण्ड के आल्प्स से लेकर अग्निकोण की ओर रूमसागर में बहुत दूर तक कुछ कुछ बूट अर्थात जूते कासा जो श्राकार दिखलाई पडता है, वही इटली है। इसके ऊपर की ओर स्विटजरलेण्ड और आस्ट्रिया है। पूर्व की पोर एड्रियाटिक सागर है । दक्षिण की अोर मेडिट्रेनियन समुद्र और फ्रास देश है। दक्षिण की ओर पाल्प्स पर्वतमाला का जो सिलसिला इटली में चला जाता है, उसको एपीनाइन्स कहते हैं। एपी' यहां की (७) नाइन्स की पर्वत-श्रेणी नीचे की ओर और इटली के मध्य तक चली गई है। जिसकी सब से ऊची चोटी मोनटोकार्न १,५७६ फीट है। ज्वालामुखी पर्वत-इटली में एपीनाइन्स पर्वतमाला के अतिरिक्त कई ज्वालामुखी पर्वत हैं। जिनमें से विस्यूविएस, पेटना और स्ट्रोमयोलो विख्यात हैं। समय समय पर इन ज्वालामुखी पवतों से इटली की बड़ी हानि हुई है। कितने ही बार अनेक शहर ओर गाव के गार इन ज्वालामुखी पर्वतों से नष्ट होगये हैं। वहा पहले समय में पोस्पियाई नगर बडा वि- ख्यात था। ग्रन्थकर्तायों और कनियो के जो वर्णन इस नगर के सम्बन्ध में मिलते हैं, उनसे तो यही ज्ञात होता है कि ज्वाला. मुखी पर्वत के फूटने से पहले यह नगर स्वर्गधाम ओर अानन्द- निकेतन था। सन् ७६ की २३वीं अगस्त का विस्यूरियस नामक ज्वालामुखी पर्वत अचानक फूट पडा, जिससे यह सुन्दर नगर नष्ट हो गया और सन् १७०६ तक किसी को इस नगर का कुछ पता न लगा । परन्तु सन् १७४८ में सवसाधा- रण का ध्यान इसके प्राचीन पदार्थों की ओर गया। तब से इसके पुराने चिन्हों की योज सन् १८६० तक होती रही। उसके पश्चात् इटालियन गवर्नमेण्ट ने इस खोज के कार्य का भार ले लिया था। नेपल्म के एक अद्भुतालय (अजायवघर) में वहा के बहुत से दर्शनीय पदार्थो का सग्रह है। नदिया-इटली में छोटी मोटी कई नदिया है। पाल्प्स के दक्षिण भाग में पो नदी बहुत वडो है। इटली के जिस भाग में पौ नदी यहती है वह बहुत उपजाऊ है । पाल्प्स पर्वत के पास पौ नदी के जले से कई झीलें होगई हैं। जिनमें से तीन, लागोडी ।
गरडा, मागागाटी और कोमो, विख्यात हैं। पौ नदी के अतिरिक्त पश्चिम किनारे में टाइवर, परनो और वोलटग्नो है। खनिज पदार्थ---इटली में यात स्त्राने नहीं हैं, जिससे खनिज पदार्थ भी विशेष नहीं होते हैं। खनिज पदार्थों में कोयला होता है, पर बहुत बढ़िया नहीं होता। कुछ स्थानों में लोहा भी होता है, पर सबसे अधिक खनिज पदार्थों में गधक इतनी अधि कता से होता है कि जितनी श्राय समस्त खनिज पदार्थों से प्रति वर्ष होती है उसकी श्राधी केवल गन्धर्क मात्र से हो जाती है। सङ्गमरमर, सगमूसा और एक प्रकार की चूने की सी मिट्टी, जो चिकनी होती है, उसके लिये भी इटली विख्यात है। शतु-इटली की ऋतु इशलेएड की अपेक्षा गर्म है। पर भारतवर्प को देखते हुए ठण्डी है। उत्तर-इटली में सालभर में दो वार वर्षा होती है। दक्षिण इटली में सालभर में एक बार ठएड पडती है और फिर गर्मी होती है। वर्षा भी होती है। और कभी कभी १८ इञ्च से ६० इञ्च तक वर्षा हो जाती है। खेतीवारी-अनाजों में गेह, ज्वार, चावल और बाजरा मुख्य हे । चावल की खेती पौ नदी के मेदान में होती है। इस नदी में से जो नहर निकाली गई है, उन नहरों के जल से ही यह खेतो सींची जाती है। शाक-पात में भालू, मटर प्रभृति बहुत होते है। अगूर, नारङ्गी, अञ्जीर वगैरह भी इटली के विख्यात होते है। अगरों की अधिक खेती होने के कारण शराव भी यत बनता है । और भी कई प्रकार के फल-फूल वहा होते हैं। भारतवर्ष को भाति वहा पर सेती का समस्त काम बैलौ से हा लिया जाता है। अमेरिका में खेतों में जैसे घोडे जोते जाते है, वैसा इटली में नहीं होता है। पशुओं में वहा पर अन्य +
(8)
चौपायों के अतिरिक्त भेड़ें ज्यादा होती हैं। पहाडों में खेती का
काम गौओं से भी लिया जाता है।
यापू-सिसीली, सारडेनिया तथा और भी कई छोटे छोटे
.
दापू हैं।
है।
मुख्य नगर- -इटली की राजधानी टाइवर नदी पर रोम
नगर है। रोम का प्राचीन इतिहास बड़ा मनोरञ्जक है।
कहते हैं कि एक समय एल्वालोमा ( Albalonga ) में एक
अत्याचारी राजा राज्य करता था। उसने अपने बड़े भाई का
राज्य छीन लिया था और अपने भाई के पुत्रों का वध कर डाला
था। इतना ही करके वह शान्त नहीं हुश्रा, उसने अपने भाई
की पुत्री के दो पुत्रों को नदी में फेंक दिया था। वे लडके बहते
वहते वहा तक बह गये, जहा वर्तमान नगर रोम वसा हुआ
उन लड़कों की एक गडरिये ने रक्षा की और बडे होने पर उन्हें
उनके नाना को सौंप दिया। इन लडकी का नाम रोमल और
रिमूस था। पहिले उन्होंने अपने नाना के भाई का वध
किया, फिर पीछे दाइवर नदी पर दोनों भाइयों ने एक नगर
वसाने की सोची, इस पर दोनों भाइयों में वापस में झगडा हो
गया कि नगर किसका होगा। इस झगडे में रिमूस मारा गया
और रोमल ने अपने नाम पर रोम नगर बसाया, जो वर्तमान
इटली की राजधानी है।
रोम नगर के अतिरिक, जिनोश्रा, फ्लारेन्स, वेनिस,
नेपल्स, लोम्बार्डी, पेडमेण्ट, मिलन श्रादि कई नगर और
हैं।
जन सहया-३५०००००० है। इसका क्षेत्रफल ११००००
1
प्रान्त
।
।
(१०)
है । धन-५०००,००००००० पौण्ड है। इटली का सुवर्ण
भण्डार ५६८००००० है। वार्षिक औसत ६४३० पौण्ड का
सुवर्ण निकलता है।
शिक्षा-भारतवर्ष से कहीं छोटी वस्ती होने पर भी भारत
वर्ष के समान वहा पर शिक्षा का प्रभाव नहीं है । जिस
अनिवार्य और मुक्त शिक्षा का यहा प्रचार कराने के लिये ,
स्वर्गीय महात्मा गोखले थक गये थे, वहा उसी मुप्त और
अनिवार्य शिक्षा का सरकार की ओर से प्रवन्ध है । वहा पर
शिक्षा का कितना प्रचार है इसका पाठक केवल इतने से ही
अनुमान कर ले कि वहा २१ विश्वविद्यालय स्थापित हैं । नेपल्स
का विश्वविद्यालय बहुत बड़ा है। इसके अतिरिक्त खनिज, कपि,
च्यापार, शिल्पादि के अनेक विद्यालय हैं।
धर्म- इटालियन सरकार का धर्म रोमन कैथोलिक है।
परन्तु सरकार प्रजा के धर्म में हस्तक्षेप नहीं करती है। सभी
धर्मावलम्बियो को धार्मिक स्वतन्त्रता प्राप्त है । जब रोम
साम्राज्य खूब चढा-चढा हुया था, तब वहा ईसाई धर्म का
प्रचार होने लगाया। परन्तु वहा के सर्वसाधारण लोग ईसाई
मत के घडे विपक्ष में थे। ईसाइयों को वहा अपने धर्मप्रचार में
बड़ी दिक्कतों से सामना करना पड़ा था। यहा तक कि सन् ६५
में ईसाई धर्म के प्राचार्य सन्तपाल का सिर काट लिया गया
था। परन्तु काल की क्रमोन्नति के साथ साथ, उसी रोम में पोप
का राज्य हो गया था। उसी रोम में सन्तपाल के अनुयायी एक
दिम समस्त यूरोप के स्वामी होगये थे। रोम के पोप के कारण
इटली-निवासियों को किस तरह से मायाजाल में फंसना
पडा था, उनकी कैसी दुर्गति हुई थी और फिर उनका किस
।
माति पोप के जाल से छुटकारा हुश्रा था-यह सब वृत्तान्त पाठकों को समस्त पुस्तक पढने पर विदित होगा। सैन्य-बल अाजकल सभ्यता के समय में नार्मल पशिल श्रादि भले ही शान्ति शान्ति के उपाय कह कर चिलाया करें, परन्तु प्रत्येक देश की रक्षा उसके सैनिक बल पर ही निर्भर है। इटली भी इम सिद्धान्त को माननेवाला है कि अपने बाचल पर भरोमा खना चाहिये । लहाई के लिये इटली में जो फौज है, वह तीन हिस्सों में बाटो जा सकती है। इसमें एक माग, यानी सारी फौज का तिहाई भाग, पूरे तौर से शिक्षित रहता है। दूसरे भाग में रख्टी शिक्षा होती है और उसके बाद कभी कमी उसे अभ्यास करना पडता हे । तीसरे भाग में अशिक्षित रिजविस्ट होते हैं। नौकरी दो वर्ष तक सेना के साथ देनी पड़ती है। छ वर्ष तक कार्य से छुट्टी मिलती है और चार वर्ष तक चलती-फिरती फोज में सम्मिलित होना पडता है। दूसरे भाग के मनुष्य मी इतने ही समय तक कार्य करने के लिये वाध्य होते है। तीसरा भाग अशिक्षित होता है । गत कुछ वर्षों से चलती-फिरती सेना अधिक सख्या में शिक्षा प्राप्त करती है । इटली में बारह बडे बडे सैनिक दल है। प्रत्येक दल में दो पैदल पलटने है। तर मिल कर इटली की फोजों में तीन सो उन्नासो बटालियन पैदल पलटनें ह । घुड- सवार सेना में उन्तीस रिसाले हैं और छत्तीस मैदानी ताप- खाने हैं। इनमें एकसौ वानवे तोपे हे। छत्तीस तोपखानो का एक पहाडी तोपखाना है। समुद्र तट के दश तोपखाने हैं और सार्डिनिया में भी एक निगेड हे। दो किलों के तोपखाने हैं और (१२) छ इञ्जिनियरों के। इटली के फौजी अफसर १६,००० सिपाही २,६०,०००, घोडा और खच्चर ६४,३०० कुल सैन्यात १२००,००० और अतिरिक्त सेना जो तैयार हो सकती है- १२००००० है। युद्ध के समय इटली जितनी सेना तैयार कर सकता है, उसका मोटा हिसाव यह है झण्डे के नीचे की फौजे २५०००० छुट्टी पर गई हुई ४५०००० चलती-फिरती ३२०००० टेरिटोरियल २२००००० कुल सख्या ३२२०००० इनमें १०२०००० से कुछ कम अथवा अधिक सिपाही शिक्षित हैं। समुद्री बल ऊपर इटली की स्थलसेना के विषय में लिखा गया है इटली में समुद्री वल के तीन जिले हैं। इटली के जहाजी बेडे में भरती होने के लिये सिपाही मजबूर किये जाते हैं। समुद्र में श्राने जाने वाले वीस वर्ष की अवस्था वाले मनुष्यों को कम से कम अठारह महीने या इससे अधिक समय तक समुद्री सेना में काम करना पड़ता है । कभी कभी समुद्री सेना की सेवा की अवधि चार वर्ष तक हुआ करती है। लड़कों की समुद्री शिक्षा के लिये इटली में स्कूल भी खुले हुए हैं। सन् १९१४-१५ का सागर-बल-सम्बन्धी खर्च १५४६६५१३५) रु० मजूर हुश्रा था। इस वर्ष के लिये ४००६३ अफसरों और जहाजी सिपाहियों की भी मजूरी हुई थी। इनमें प्राय तृतीयाश स्वेच्छासेवक ह जङ्गी जहाज सशस्त्र क्रूजर छोटे यूजर टारपीडा जहाज टारपीडो जहाज नाशक धौर वाकी नौकरी करने के लिये वाध्य है। इटली की जलसेना में १ एडमिरल ७ वाइस एडमिरल, १५ रियर एडमिरल, ५६ कतान,७५ कमाण्डर,५ लेफ्टिनेएट कमाण्डर, ४२० लेफ्टिनेण्ट ओर ३४० सव लेफटिनेएट हैं । सन् १९१४ की ३१वीं अक्टूबर को इटली के जहाजों की सख्या निम्नलिखित थी १५ (६वन रहे थे) १६ (२ वन रहे थे) ३ ३३ (१३ वनते थे) टारपीडो बोट ६४ (१ घनता था) गोताखोर २० (१० बनते थे) अन्य जहाज स्वीजिया, नेपल्स, वेनिस ओर दारपटो में इटालियन सरकार फे बन्दरगाह हैं । स्वीजिया के वन्दरों में बड़े से बडे जड़ी जहाज खड़े हो सकते हैं । वेनिन के दो वन्दरों में क्रूजर खडे हो सकते हैं और जला जहाजो के लिये भी धन्दर बनाया जा रहा है । टारपीडो रखने तथा अन्यान्य समुद्र-युद्ध-सम्बन्धी सामान बनाने और रसने के लिये भी इटली में कितने ही स्थान हैं। इसके अतिरिक्त इटली में ४ एअरशिप ( बड़े बड़े हवाई जहाज ) ओर २०० छोटे उडनेवाले (एराप्लेन) है। इटली की जन-सख्या देखते हुए कहना पड़ता है कि इटली की सामरिक - शक्ति अच्छी है । यूरोप के महासमर से यह सब को अच्छी तरह से अनुभव हो गया है कि जिस देश के निवासियों को अस्त्र-शस्त्र पने की रोक-टोक नहीं होती है, घे श्रात्मरता = करने में समर्थ होते हैं । यही कारण है कि इटली की इतनी ( १४ ) थोडी जन-मख्या होने पर भी वह पडे बडे राष्ट्रों से भिडने के लिये तैयार है। जब हम इस सम्मन्ध में इटली की अपने देश से तुलना करते हैं, तब हम को अान्तरिक रोद हुए बिना नहीं रहता है। यदि भारतवासियों को, ठास्त्र-शस्त्र रखने की स्वाधीनता होती, तो सरकार देराती कि कितने भारतवासी अगरेजों का पक्ष लेकर जर्मनों से मैदान में भिडते । इसमें सन्देह नहीं कि फिर भी बहुत स भारतवासियों ने युद्धक्षेत्र में अपनी असोम वीरता का परिचय दिया है, परन्तु यहा सर्व साधारग को अस्त्र-शस्त्र रखने की आज्ञा न होने तथा भारत वासियों को स्वेच्छासेवक होने की आज्ञा न होने के कारण भनेक भारतवालियों के हृदय की उमङ्ग हदय में ही रह गइ है। क्याही अच्छा हो कि गवर्नमेण्ट भारतवासियों को अस्त्र पाईन से मुक्त करदे । यदि आज सर्वसाधारण भारतवासी अस्त्र श्राईन से मुक्त होते और अस्त्र-शस्त्र-सञ्चालन की क्रिया से परि चित होते तो सरकार से विना किसी सङ्कोच के कह देते कि हमें अपनी रक्षा के लिये कुछ भी सना को दरकार नहीं है समस्त सनाए शत्रुओं के मुकाबले में भेज दो, हम अपनी रक्षा खय कर लेगे-पर हमारे ऐसे भाग्य कहा? अल्मोडादि पहाडी स्थानों में नित्य प्रति अनेक व्यक्ति जगली जानवरों के शिकार होते रहते हैं, तब भी सरकार श्रात्मरक्षा के लिये, जङ्गली जानवरों से बचने के लिये, विना लाइसेन्स के हथियार नहीं देती है। आजकल नित्य भयानक डाके पड़ते हैं, रोकने के लिये भी बिना लाइसेन्स के हथियार रखने की आशा नहीं है । तर यहा के सवसाधारण को स्वेच्छासेवक आदि बनाना बहुत दूर की बात है। परन्तु उनके
तीसरा परिच्छेद
पूर्वदशा का दिग्दर्शन
"A thousand years' scarce serve to form a state,
An hour may lay it in the dust "Byron
संसार में ऐसी कोई जाति अथवा देश नहीं है, जिसको
काल की कुटिल गति के सामने सिर न झुकाना पड़ा हो। यों
ता समय समय पर सभी देशों का उत्थान और पनन होता हा
रहता है, पर यूरोप के देश में काल की कुटिल गति के जितने
थपेडे इटली पोर ग्रीस ने पाये हे, कदाचित् उतने वहा किसी
अन्य देश ने नहीं खाये हैं। एक समय था कि इटली और यूनान
उन्नति की चोटी पर पहुँचे हुए थे। इनके वन्त, ऐश्वर्या और
सामर्थ्य को देख कर अन्य देशों का कलेजा दहलता था। उस
ममय इटली और यूनान यूरोप के अन्य देशों के गुरु थे । अन्य
देशों ने विज्ञान, गणित, काव्य, चित्रकारी, शिल्प, सङ्गीत श्रादि
ग्रीस की दशा पर एक सहदय कवि के निम वाक्य पढ़ने योग्य है
" Tis Greece I but living Greece no more
so coldly sueet so deadly fur
we start for soul is wanting there
किसी हिन्दी कवि ने उपयुक्त पध का हिन्दी अनुवाद यह किया है
"प्रोस है, पर ग्रीस यह, अब हाय प्राणविहीन है।
है मधुर श्रर सुघर पर निवेष्ट है पर सीख है।
सापेक्ष्य इसमें जीय है, पर जीवहीन मलीन है।
अनेक विद्याए इटली और यूनान दोनों देशों से ही सीखी थीं। पर जिस चाण्डालिनी फूट ने सव से ऊँचा मस्तक रखनेवाले हिमालय की वृद्धा भारतमाता की अधोगति कर दी, उस फूट ने ही इटली और ग्रीस मे परस्पर वैरभाव पैदा कर दिया। जिसका फल उक्त दोनों देशों को हाथों हाथ भुगतना पडा। जिसके कारण दोनों की स्वाधीनता लोप हो गई और बहुत दिनों तक पराधीनता की बेडी पहन गुलामी करते रहे। परन्तु कालचक्र के कारण पीछे स्वतन्त्रतादेवी दोनों देशों पर प्रसन्न हुई, दोनों देशो को स्वतन्त्रता प्राप्त होगई। यहा पर हमें नीस के सम्बन्ध में ग्शेिष बातों का उल्लेख न करके इटलो के विषय में मुख्य धाते सुनानी हैं, क्योंकि जो इटली श्राज दिखलाई पड रहा है, वह श्राधी शताब्दी पूर्व ऐसा नहीं था। प्रकृति का कुछ ऐसा नियम देखने में आता है कि सुरा के पीछे दुःख और दुख के पीछे सुख होता है। इटली के सम्बन्ध में प्रकृति का नियम विशेष रूप से देखने में आता है। इटली के भाग्य ने तीन बार वेढव पलटा खाया है । लोक में एक कहावत है कि रियों के चरित्र और पुरुषों के भाग्य की मनुष्यों को तो क्या देवताओं को भी घर नहीं होती है। सच पूछिये तो पुरुषों की भाग्य की ही नहीं, देशों के भाग्य की भी किसी को सवर नहीं होती है। न मालूम कब किस देश का भाग्य पलट जाय । इटली का भाग्य नीन चार विशेष रूप स चमका था। यूरोप के सीजरों के समय में इटली अपने पूरे प्रोज पर था। फिर अपने धार्मिक पोपों के समय में भी इटली का यशसौरभ दूर दूर तक फैला हुआ था। उसके पीछे चौदहवीं और पन्द्रहवीं शताब्दी में इटली के कई नगरों का, उनको राज्य. घ्यवस्था प्रजातन्त्र हाने तथा व्यापार के कारण, दो चार सौ वर्ष तक अच्छा महत्व रहा था। इन नगरों में जिनोत्रा, फ्लारस और बेनिस मुख्य थे। इटली के दक्षिण कोने पर श्रामल्फी (Amalphi) नाम का शहर है। वही सब से पहले प्रसिद्ध हुया । वहा बड़े बड़े व्यापारी जहाज थे और चे माल लाटने के लिये मिसर श्रादि देशों को जाया करते थे। श्रामल्फी के अतिरिक्त दूसग शहर पीसा था, इस नगर का भी व्यापार खून चमका था । सन् २००० ई० के लगभग जिनोया ओर पीसा नगरों में व्यापार बढ़ने के कारण श्रामरफी का गौरव घट गया था। पीसा का व्यापार भी, सन् १२८४ से, सन् १४०६ तक जिनोश्रा और फ्लारेंस के व्यापार के कारण नष्ट हो गया था । १२५४ मे फ्लारस शहर व्यापार में बहुत प्रसिद्ध होगया था। वहा के जुलाहे और सुनार बहुत ही प्रसिद्ध होगये थे। उस समय फ्लारस का इतना दवदवा था कि जब इङ्गलेण्ड के राजा तीसरे एडबड ने मास से युद्ध छेडा था, उसके खर्च के लिये तीसरे एडवर्ड ने फ्लारस से कर्जा लिया। फ्लारस में पार्डी नाम का एक व्यापारी था। उस अकेले व्यापारी से ही राजा एडपड ने तीस लास रुपये का कर्जा लिया था। इसी तरह एक दूसरे व्यापारी से भी २० लाख रुपये लिये थे। वार्डी का ऋण राजा पडवई ने नहीं चुकाया। इस लिये उसका दिवाला निकल गया। कहने का साराश यह है कि उस समय फ्लारस नगर में रुपये-पैसे की कमी नहीं थी। वह नगर धनाढ्य था । व्यापार के साथ ही साथ फ्लारस में विद्या और कला की अच्छी उन्नति हुई। उन दिनों यहा पर बडे बड़े नामवर कवि, ग्रन्थकार और मूर्तिकार थे। इसके बाद पीसा यन्दर पनारस के हाथ पाया । इस लिये कुछ दिनों तक समुद्र का घ्यापार भी पलारस के अधिकार में रहा।
( १८ ) फ्लारेंस की भाति वेनिस ने भी व्यापार में अत्यन्त उन्नति की। थी, ओर यहा तक उन्नति की थी कि सात साठ सौ वर्ष तक घेनिस के समान धनवान् श्रोर शक्तिमान नगर यूरोप में दूसरा नहीं था। सन् ६०७ ई० में वेनिस में प्रजातन्त्र राज्य स्थापित।' हुया था। राज्य चलानेवाली सभा का जो सभापति होता था उसे डोज ( Doge ) कहते थे। इन डोजों का महल, उनका दीवानखाना, न्यायालय, मीनार, रियाल्टो नामकालेनदेन का वाजार, पुतलियों के तथा मूत्तियों के और कांच की चीजों के कारखाने और प्रदर्शिनी इत्यादि वेनिस के दृश्य प्राज भी देखने योग्य है। वैनिल की उत्तनी उनति का कारण उनका समुद्री व्यापार था। पन्द्रहवी मदी के प्रारम्भ में वनिस उन्नति के शिखर पर। पहुँच गया था। उस समय चेनिस में कम से कम एक हजार साह पार ऐसे थे, जितकी चार्षिक आय धीस हजार रुपये से लेकर सवा लाख रुपये तक थी । यूरोप में होटलों की चाल पहले वेनिस मे ही प्रारम्भ हुई थी। सब से पहला होटल वहा सन् १३१६ और १३२४ ई० में स्थापित हुआ था। जिनोत्रा नगर ने भा वेनिस के समान व्यापार में उन्नति की । परन्तु इन नारों में श्रापन में युद्ध छिड़ गया, जिसके कारण दोनों का युद्ध में सत्यानाश हुआ । इटली के मिलन श्रादि नगरों की भी व्यापार म बड़ी उन्नति हुई थी, जिनका वर्णन स्थान के सदोच के कारण यहा पर नही किया जाता है। केवल व्यापार- वाणिज्य में हा उस समय इटली नही वढा हुभा या, प्रत्युतार उस समय इटली में अनेक विद्वान् चित्रकार और कवि भी उत्पन्न हुए थे। इटली के प्रसिद्ध कवि डान्टी का जन्म सन् १२६५ : में फ्लारेन्स में हुआ था। अगरेजी के प्रसिद्ध लेखक टान्स - - ( १९) कारलाइल ने अपनी पुस्तक "चीर पोर घोरपूजा" मैं इस कवि के सम्बन्ध में लिखा है -"हम के पास चाहे जितने कज्जाक सवार हो, पर इटली डान्टी कवि के होने से विशेष भाग्यवान्, है।" कारलाइल के उपर्युक्त वाक्य से अनुमान किया जासकता है कि डान्टी कैसा शक्तिशाली कवि था। सन् १४७४ में चील पडलो बडे अच्छे मूर्तिकार और चित्रकार का टमकनी में जन्म 'हुआ था। सन् १५६४ में प्रसिद्ध वैज्ञानिक गेलीयो का पीसा 'नगर में जन्म हुआ था। इस वैज्ञानिक विद्वान् ने ही यह पता लगाया था कि सूर्य नहीं धूमता, पृथ्वी घूमती है। ऐसे न मालम क्तिने कवि, चित्रकार पार लेखक हुए थे। कहने का साराश यह है कि चौदहवीं पोर पन्द्रहवीं शताब्दी के इटली ने अपनी विद्या, बुद्धि और बल से यूरोप के समस्त देशों पर सिका जमा लिया था । परन्तु यह सब होने पर भी इटली की उन्नति में फूट- रूपी दीमक लग गई थी, जिससे इटली की उन्नति में बाधा पहुँ- चने लगी। प्रत्यक्ष में तो इटली के ग्द्विान्, चित्रकार और कवि अपनी विद्या बुद्धि और वल से यूरोप में बहुत कुछ प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके थे, तथापि भीतर हो भीतर फुटरूपी जो घुन लग रहा था, उससे उन्नति की बाढ रक गई। जैसे मधुमेह से पीडित मनुष्य का शरीर भीतर ही भीतर पोयला और जजरित हो जाता है, वैसेही श्राफ्स की फूट और द्रोह से इटली जर्जरित हो रहाया। पहले राजनीति में रोमन सम्राट और धर्म में पोप सारे 'यूरोप के शासा समझे जाते थे।पर १४-१५ शताब्दी में इटली के नगरों में व्यापार, वाणिज्य को लेकर ही कलह नहीं हुई, किन्तु वहा आपस के झगडे से राजव्यवस्था भी विगड " गई थी। उस समय रोम के पोप क्लीमेण्ट को अपने प्राणों का | इतना भय हुआ कि वह वहा से मास को भग गया। उसको ।
(२०)
अपने जीवन के अन्तिम दिवस मास में व्यतीत करने पड़े थे।
यूरोप के अन्य भागों में पोप का प्रभाव कम हो जाने पर भी
इटली में नहीं घटा। दूसरा पोप नियुक्त हुा । परन्तु भीतर ही
भीतर जो फूट फैल रही थी, उसका परिणाम यह हुआ कि
इटली एक राष्ट्र न होकर फुछ हिस्सों में विभक होगया, और
फई शताब्दियों तक पराधीनता की चेड़ी में जकड़ा रहा।
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चौथा परिच्छेद अज्ञानता का प्रचण्ड राज्य "The blood of the martyars is the seed of the church" -Lord Maculay उस समय इटली में ही नहीं, समस्त यूरोप में अज्ञानता का प्रचण्ड राज्य छा रहा था। वहा के सर्वसाधारण के विचार अत्यन्त सङ्कीर्ण थे। उस समय वहा इतना अन्धकार फैला हुआ था कि राजमहलों से झोपडियों तक जादू-टोने, भूत-प्रेत की चर्चा हुआ करती थी। यहा पर उन दिनों विशान का विकास नहीं था। जादू-टोने के भय से जीते जी किसी की खाल उधड़वा लेना, नुचवा डालना, जला देना तो एक साधा- रण सी बात थी। इटली भी ऐसे मूढ विश्वासों से पच नहीं सका। एक तो जन-साधारण में स्वत हो ऐसे विचार फैले हुए थे, दूसरे पोपों की प्रभुता कम नहीं थी। फिर भला इटली में अज्ञानता की मात्रा क्यों न बढ़ती? ससार का इतिहास साक्षी है कि कोई जाति, चाहे जितनी क्यों न गिर गई हो, किन्तु फिर भी उसमें समय समय पर ऐसे महात्मा निकल पाते हैं जो अपने देशभाइयों को उनकी दुर्दशा समझाते रहते हैं। चाहे उनके कथन पर उनके देश- बन्धु ध्यान देयान दें, यह जुदी वात है। इस प्राकृतिक नियम के अनुसार हीपन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त में स्वाधीनता के उपासक "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" इस मन्त्र के अपने- -
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( २४ )
का भाव पैदा कर दिया था। परन्तु उस समय से एकोनविशति
शताब्दी तक इटली की भूमि युद्धस्थल बनी रही। इस बीच में
इटली के भाग्य ने बडे बडे चक्कर पाये। बहुत से चढ़ाव उतार
देखे, परन्तु इटलीवालों में जातीयता का भाव कभी उत्पन्न नहीं
हुआ। उस समय इटली की जो परिस्थिति थी, उस पर एक
इतिहास-लेखक ने अत्यन्त करुण-भरे शब्दों में लिखा है-
*"रोमन साम्राज्य के पतन होने के समय से ऐसा कोई युग
नहीं आया, जिसमें इटली को एक राष्ट्र कहा जाय । तब
लकड़ियों के ढेर को भी जहाज कहा जायगा जव इटली को
एक राष्ट्र कहा जा सकेगा।" एक और लेखक ने कहा था कि
इटली केवल भौगोलिक परिभाषा को प्रकट करने के लिये ही
है। इस भाति उस समय इटली को न केवल घृणा की दृष्टि से ही
देखा जाता था, बल्कि "जिसकी लाठी, उसकी भैस," इस कहा
वत के अनुसार, जिससे जो बनता था, वह वैसा ही उस पर
अत्याचार करने में नहीं हिचकता था। उन दिनों इटली के
निवासियों के जीवन का मूल्य कुत्ते-विल्ली से विशेष नहीं
समझा जाता था। उस समय उनकी दुर्दशा का अन्त न था।
पिछली शतानी तक यूरोप में भूत-प्रेत जादू-टोने का विश्वास रहा
था जो अभी एकदम मिट नहीं गया है। जब कभी यहा कोई नवीन
वैज्ञानिक याविष्कार करता था तव लोग उसे जादू-टोना करनेवाला समझ
कर मार डालते थे। वेज्ञानिक, भौतिक श्रादि विषयो पर ग्योज करनेवालो
को पारी लोग शैतान का चेला बतलाते थे। पादरियो ने स्त्रियों को पापों
का मूल ठहरा रखा था। अधिकाश स्त्रिया ही जादूगरीनिया समझ कर
मारो जाती थीं। धीरे धीरे विद्या का प्रचार पड़ने से वहा के लोगों में से
रह विनाम हट गया परन्तु अभी तक जहमुल से यह अन्धविश्वास और
मूर्सता नष्ट नहीं हुई है।
पांचवां परिच्छेद नेपोलियन की शरण "रे चासक सावधानमनसा मिन घण श्रूयता मम्मोदा यहवो वसन्ति गगने सर्वेपि नैतादशा । केचिदृष्टिमिरादयन्ति वसुर्धा गर्जन्ति केचिद् वृथा । य म पश्यसि तस्य सस्य पुरतो मा यूहि दीन पच -भर्तृहरि इस निवन्ध के लिखने का उद्देश्य यूरोप अथवा इटली का लावद्ध इतिहास लिखने का नहीं है। अतपव कालक्रम की घटनाओं को छोड कर यहा पर पतन्मात्र कहना है कि सत्रहवीं और अठारहवीं शताब्दियों का युग यूरोप के लिये विचित्र युग था । इस युग में यूरोप के बहुत से देशों के मनुष्यों ने मनुष्यो- चित अधिकारों के महत्व को पहचाना। इसमें तनिक भी सन्देश नहीं है कि इङ्गलेण्ड ने तेरहवीं शताब्दी से ही जातीयता के महत्व को पहचाना था। फ्रांस और स्पेन सोलहवीं शताब्दी तक श्रन्धकार में पड़े रहे थे। जर्मनी और इटली अठारहवीं और उन्नीसवी शताब्दी में ही चेते हैं। पर सच पूछिये तो पश्चिमी यूरोप के अभ्युदय का समय सत्रहवीं शताब्दी से है। चौदह लुई के समय में फ्रास देश में जो राज्यक्रान्ति हुई थी, उसका प्रभाव यूरोप के समस्त देशों पर थोडा-बहुत पडा था। इस राज्यक्रान्ति से, यूरोप के अनेक देशों में सर्व- साधारण समझने लगे थे कि मनुष्य की हैसियत से मनुष्य के .
( २६ । फ्या अधिकार है, और राष्ट्र की हैसियत से राष्ट्र के क्या अधिकार होते है । अठारहवी और उन्नीसवी शताब्दी में यह विचार और भी परिपकहोगये।। इस बीच में नेपोलियन साधारण सैनिक की हैसियत से बढते बढ़ते, फ्रास देश का सम्राट होगया । नेपोलियन बोना पार्ट के नाम से यूरोप के अन्य राष्ट्र ऐसे ही कापते थे, जैसे भारतवप मे बच्चों को हौभा, लुल कह कर डराया करते हैं। जिस समय अन्य यूरोपियन राष्ट्रों के, महावीर नेपोलियन के नाम पर, कलेजे दहल रहे थे उस समय इटली ने भी वाह गहे की लाज निवाहने के लिये नेपोलियन की शरण ली थी। सन् १७६७ में वेनिस राज्य ने नेपोलियन की वीरता पर मुग्ध होकर उसके हाथ में अपने को समर्पण कर दिया । पर न जाने नेपो. लियन'ने क्या समझ कर वेनिस आस्ट्रिया को दे दिया। -पहले सम्राट नेपोलियन ने वेनिम वीम्युनिस्पलट्री को,बडे लम्बे लम्वे -वचन दिये थे। उसने चेनिस म्युनिस्पलटी को विश्वास दिलाया था कि वह बेनिस की स्वतन्त्रता की रक्षा के निमिच सय कुछ करेगा...उसने म्युनिस्पलटी को लिखा था:- 'सव दशाओं में मैं प्राणपण से,यही प्रयत्न करूगा,कि तुम्हारी स्वतन्त्रता दर और स्थायी,हो । मै दुसरी इटली को परदेशियों के हाथ से मुक्ति और स्वतन्त्रता का श्रासन प्राप्त करते हुए देखना चाहता है। इस तरह की घोषणा करने पर भी नेपोलियन ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार इटली को स्वतन्त्र बनाने का उद्योग नहीं किया। यद्यपि,इसके पीछे नेपोलियन ने बहुत सा भाग जीत लिया, अपने प्रतिनिधि भी रपे, पर लोग सन्तुष्ट नहीं
( २७ )
नेपोलियन के हाथ में आत्मसमर्पण करके वेनिसवालों
की श्राखें खुली, और उनको अनुभव हुया कि जो देश अपने
पैरों के बल खड़ा नहीं हो सकता है, जिस देश को अपने वाहु-
बल पर विश्वास नहीं है, वह देश कदापि नहीं उठ सकता
है। मसार से प्रात्मविश्वास सव विश्वासो-से ऊपर है।
श्रात्मविश्वास से चढकर ससार में और कोई शक्ति नहीं है।
नेपोलियन के हाथ में इटली के कुछ भागों की बागडोर
पहुँचने पर इटली का भला हुआ या बुग, इस विषय में अनेक
इतिहासलेखको का मतभेद है । परन्तु इसमें सन्देद नहीं कि
इटली की पानेवाली सन्तान के हदय में यह भाव उत्पन्न हो
गया थाकि भाग्य का निश्चय भगवान् के हाथ म हे श्रार
भगवान् भी उसी को सुनते , हे, जो अपने निश्चय पर बढ़
होता है।
छठा परिच्छेद आत्मत्याग के ज्वलन्त उदाहरण "दुरबल को न सताइये, जाकी मोटी हाय, मुई साल की स्वास सो, सार भसम होजाय ।" कवीर "न तदफने की इजाज़त है न फर्याद की है, घुटकर मर जाऊ मर्जी मेरे संयाद की है।" सन् १८१५ का वर्ष फ्रास के इतिहास में ही नहीं, बल्कि समस्त यूरोप भर के इतिहास में चिरस्मरणीय है। ससार- चक्र का पहिया उलट-पुलट करता ही रहता है और कौन ऐसी शक्ति है जो इस चक्र से वची हो १ अखण्डनीय शक्ति का घमण्ड रखनेवाले भी ससार-चक्र से अपनी रक्षा करने में समर्थ नहीं हुए है । इस प्राकृतिक नियमानुसार ही यूरोप की जवरदस्त शक्तियों को चकनाचूर करनेवाला नेपोलियन भी ससारचक्र के नीचे दब गया। वाटरलू के युद्ध में नेपोलियन से विजयलक्ष्मी रूठ गई। एक दिन जिस नेपोलियन का प्रताप मध्याह के सूर्य के समान यूरोप में देदीप्यमान हो रहा था, वाटरलू का युद्ध उस वीर-शिरोमणि नेपोलियन को राहु और केतु के ग्रहण के समान अमित करनेवाला हुआ। जिस माति पूर्ण चन्द्र की सुन्दर, सुहावनी कौमुदी ग्रहण के कारण छिन्न- भिन्न हो जाती है वैसे ही वेचारे नेपोलियन का वैभव वाटरल के सग्राम के पीछे क्षीण होगया। वाटरलू के युद्ध के पीछे, अपने विश्वासघाती मित्र मुरा के पड्यन्त्र में फंसकर, वेवारे नरकेशरी ( २६ ) नेपोलियन को सेएटहलना में जीवन के अन्तिम दिवस व्यतीत करने पडे जैसे शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना, सिह को अपने जाल में फंसाकर, नहीं रहता हे, वसे ही नेपोलियन का पतन देखकर यूरोप के अन्य राष्ट्रों को प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । सन् १८१५ में नेपोलियन के पतन के पीछे वेनिस की काग्रेस में यूरोप के सब झगड़े तय किये गये और मिन राज्यों में परस्पर बहुत से निश्चय हुए और पृथ्वी का वटवारा छुना । इटली स्वाधीनता का उपभोग उस समय भी न कर सका । इटली में उस समय दस राज्य स्थापित हुए, परन्तु एक सारडिनिया के राजा को छोड़ कर, वाकी के सब राज्य प्रास्ट्रिया के हाथ की कठपुतली बने हुए थे। सभी प्रास्ट्रिया के इशारे पर नाचते थे। श्रास्ट्रिया की तूती एक ओर वेनिस से लेकर दूसरी ओर नेपल्स तक बजती थी। श्रास्ट्रिया के राजकुमार कइ राज्यां में राज कर रहे थे । सन् १८१५ में इटली की यडी शोचनीय दशा होरही थी। सन् १८१५ में उसके एक देशभक्त ओर सहृदय कवि ने कहा "इटली मुर्दे की लोथ के समान हो जायगी । सन् १८१५ से १८४८ तक इटली के इतिहास के पृष्ठ दुस, अन्याय और अत्याचारा के विवरणों स रेंगे हुए है। उस समय उसक निवासियों पर जो अत्याचार किय गये थे उनकी फुछ सीमा नहीं हे। तनिक मुंह सोलने पर लोगों को जेल में ठूम देना कोई बड़ी बात नहीं थी। चारों ओर अराजकता का राज्य छाया हुना था। उस समय वहा के निवासियों का शिकार हिसक जीव जन्तुओं के समान किया जा रहा था। श्रास्ट्रिया के ( ३० अधिकारीवर्ग यही चाहते थे कि स्वतन्त्रता के 'भाव सर्व साधारण में फैलने न पावें। देवर्षि नारद ने धर्मराज युधिष्ठिर से राजकीय विषयों पर अनेक प्रश्न और उपदश करते हुए पूछा था-"राजन् ! श्राप किसी दुर्वल को तो नहीं सताते हैं ? सुनने और देखने में यह प्रश्न साधारण सा है, पर इसमें गूढ तत्व भरा हुआ है । क्यों. कि दुर्बल पर अत्याचार करना ही उसको सबल बनाना है। जब रिसी निर्यल व्यक्ति या राष्ट्र पर बहुत अत्याचार किया जाता है नव यह अपने प्राणों का मोह परित्याग करके प्रत्या चारियों का सामना करने का तैयार हो जाता है। यही नशा उस समय इटला की हुई । निरन्तर अत्याचारों ने इटली निवा- सियो की श्रास सोल दी । सव से पहले सन् २०२१ मं देशभक्त कानफैलोनीटी ने ही मिलन नगर में एक खुली सभा स्थापित" की। इस सभा में भर्ती होते समय बडी कठोर प्रतिज्ञा करनी पडती थी। जो मनुष्य इस सभा में भरती होता था, उसको यह शपथ ग्रहण करनी पडती थी -"मैं ईश्वर और अपनी मर्यादा की शपथ खाता हूं कि मैं पूरी शक्ति स और अपने प्राणों की बाजी लगा कर भी इटली को विदेशियो के शासन के पजे से छुडाने की चेष्टा करूगा"। इस ढग की सभा स्थापित करने के कारण वेचारे. कानफैलोनीटी को जन्मभर के लिये कारागार का दण्ड मिला। बहुत से पराधीन देशों में सची देशमक्ति राजद्रोह, का श्रद समझी जाती है। देशभक्ति कठिन कसौटी पर कसी जाती है। चाहे जिस पराधीन देश के इतिहास को उठा लीजिये- गा, उसम देशभक्ति की कठिन परीक्षा के ज्वलन्त दृष्टान्त मिलेंगे। पटली में भी उस कठिन समय में अनेक देशभक्तों को देश तिवी परीक्षा में कठोर यत्रणाए सहन करनी पड़ी।
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श्रास्ट्रिया के सम्राट ने न जाने कितने देशभक्तों-सिलवियो'
पालेका पादो, मारेनसीली श्रारेनसीली श्रादि--के प्राण केवल
देशभक्ति के अपराध में लिये थे।
उन दिनों इटली के शुभचिन्तकों ने कुछ और उपाय
चलता न देखकर अपना खून बहाकर अज्ञानता की, पराधी-
नता की, अन्याय की दीनाले कमजोर करनी श्रारम्भ कर दी
थीं। ऊपर इटली के जिन व्यक्तियों के मारे जाने का वर्णन किया
गया है, उनमें से अधिकाश "कारपोनेरी" नामक सभा के
मेम्बर थे। बहुत दिन हुए जब इटली में यह सभा (कारवोनेरी)
स्थापित हो चुकी थी। इस सभा का उद्देश्य समय समय पर
राज्य के विरुद्ध पलना करा देना था । "कारयोनेरी" के
प्रभाव से पोप के राज्य में कुछ बलपा हो चुका था। तीसरी
फरवरी सन् १-३१ को मैनोटी के पर से कुछ पड्यन्त्रकारी
गिरमार हुए थे। पोप गरगरी सोलहवें के निर्वाचन में दो
दिन पीछे ही वोलगना में विद्रोह तुया था। चाग मेनोटी
बडी दुर्दशा स मारा गया। मैनोटी ने जो पत्र मृत्युसमय अपनी
स्त्री को लिखा था, उससे मेनोटी के देशप्रेम का पूरा पूरा पता
लगता है। उस पत्र से ज्ञात होता है कि मेलोटी अपने नतपालन
में अचल धा पोर देशभक्ति की पराक्षा में वह अटल पवत
के समान दृढ था। साथ ही उसकी इच्छा थी कि देशभक्ति
एक इतिहासलेराफ इस ममा के सम्बन्ध में लिखता है-
The practical aims of the Cirbonın may be sumined
up in two words trecdom iud indtpendence
इसका श्रथ यह है कि कारगोनेरी सभा का व्यावहारिक उद्देश्य हो
शब्दों में विभक्त किया जा सकता है ---म्वतन्त्रता और स्वाधीनता।
( ३२)
,
सदव उसके वंश में निवास करती रहे। उसने अपनी स्त्री को
चडे ही मर्मभेदी शब्दी में लिखा था.-
"जव मेरे बच्चे बडे हो, तब उनको समझा देना कि मुझे
अपने देश से कैसा प्रेम था?" उस समय इटली के अनेक
व्यकियों के हृदय में अपने देश की दुर्दशा देखकर इस भाति
ज्वाला उठ रहा थी कि ये देश को शोचनीय स्थिति को विचार
करके मृत्यु के सामने सहर्ष अपने सिर को नवा देते थे।
।
सातवां परिच्छेद मेजिनी और चार्ल्स एलवर्ट "पय पान भुजलाना केवल विषवर्द्धनम् । उपदेशो हि मूर्खाणाम् प्रकोपाय न शान्तये ॥" जिस वर्ष ऊपरवाली घटना हुई थी, उसी वर्ष अर्थात् सन् १८३१ में चार्ल्स फिलीक्स के सारटियन सिहासन पर उसका चचेरा भाई चार्ल्स एलपर्ट उत्तराधिकारी हुआ। *मेजिनो उस समय मासेल्स में था। उसने चास पलवर्ट को १३ मेजिनी एक टास्टर का पुत्र था । सन् १८०५ की २२वीं जून को जेनाथा के एक गाव में इसका जन्म हुआ था। इसकी माता प्रत्यन्त बुद्धिमती और सुशीला थी। मेजिनी बाल्यावस्था से ही अपरी जन्मभूमि की दुर्दशा देखकर इतना दुखित हुआ कि वह सदैव काला कपड़ा पहन रहता था । तेरह वर्ष की अवस्था में ही इसके लेख वढे प्रभावोत्पादक हात थे । वकालत पास करने पर भी, माता पिता के थनुरोध से उसने वकालत नहीं की। निस 'कारवोनेरी" सभा का वृत्तान्त ऊपर लिखा गया था, यद्यपि यह इस ममा से सन्तुष्ट 7 था, तथापि इसके समान और कोई समा न होने पर उसको इसीमें रहना पड़ा। सन् १८३० में इटली की लिम ने उसको पकड़ा। जब उसके पिता ने उसके पकडे जाने का कारण पूछा, तो गवर्नमेंट ने उसे यह उत्तर दिया :-"The Government were not found of youngmen of talent, the subject of whose musings were unknown to then" पर्यात् गवन में ऐसे शुद्धिमान युवकों को पसन्द नहीं करती है जिनके विचार उमसे गुप्त रखें।"
आठवां परिच्छेद
-
युवा इटली की स्थापना
"Not by material, but by moral force, are men and
their actions governed"
-Carlyle
अमानुपिक वल से, पाशविक अत्याचारों से, कभी किसी
ने सर्वसाधारण के उदय पर अधिकार प्राप्त नहीं किया है।
जनता के हृदय पर शासन करने के लिये श्रामिक बल, प्रेम
और उदारता की आवश्यकता हुया करती है। बादशाह की
धमकी से सर्वसाधारण के हृदय से मेजिनी का आदर कम नहीं
हुश्रा। मेजिनी ने उस समय युवा इटली (यङ्ग इटली ) नामक
सभा स्थापित की थी। उसमें लोग सहर्प शामिल होने लगे।
मेजिनी ने सवोना जेल में रहते समय ही इस सभा के स्थापन
करने का विचार किया था। क्योंकि प्रथम तो वह "कारवो-
मेरी" सभा छे कार्यक्रम से सहमत न था, वह "कारवोनेरी"
क्षमा के उद्देश्य और कार्य करने के ढस को पसन्द नही करता
था। कारबोगरी सभा"उस समय इटली के शासन को उल्टा
पुसट करना तो साइतो थी, परन्तु भनिष्य के लिये उक्त सभा
की रचनात्मक नीति म थी। दूसरे मेजिनी यह भी समझता
था कि प्रत्येक देश की स्थिति नवयुवानों के हाथ में है, जिस
देश के नवयुवक फर्तव्यपरायण नहीं होते हैं, उस देश का
मविष्य अन्धकारमय होता है । मेजिनी ही क्यों, समस्त यूरोप
भर में नवयुधानों के छदय में अपने देश के प्रति प्रीति उत्पन्न
,
( ३७ ) करने के भार फैल रहे थे। फ्रास और जर्मनी में "युवा स्यह) फ्रास" और "युवा (पङ्ग) जर्मनी" समाए स्थापित हो चुकी थी। मेजिनी ने भी उसी भाति "युवा इटली" स्थापित की। इस सभा के सभासद होते समय देशसेवा करने के लिये वटी कठोर प्रतिष्ठाए करनी पड़ती थीं। इस सभा के अनेक उद्देश्यों में से दो उद्देश्य यह भी थे जो मनुष्य इसके सभासद हो, उन्हें यह विचार लेना भी जरूरी है कि उसको देश के स्वतन्त्र होमे तथा सारे देश में एक प्रजातन्त्र राज्य स्थापित करने में अनेक प्रकार की यन्त्रणाए भोगनी पडेगी। इस सभा का एक उद्देश्य यह भी होगा कि इसके सभासद इटली के मर्षमाग. रस में शिक्षा का प्रचार करें जिसमे घहा के लोगों के हृदय से अज्ञानान्धकार दूर हो, और ये स्वाधीनता प्राप्त करने मे प्रयत्न करें तथा स्वावलम्बन सीखें, किसी सभा अथवा नाति के भरोसे न रहे। मेजिनी ने केवल "तरण इटली" नाम की सभा ही स्थापित करके अपने कर्तव्य की समाप्ति नहीं समझी, किन्तु उसने टन सभा से “यन इटली" नाम का ए पत्र भी प्रकशित करना प्रारम्भ कर दिया। इस पत्र के द्वारा यह अपने धार्मिक और राजनैतिक विचारों का प्रचार करता रहा । “यन्न इटली" नामक पत्र की बहुत सी प्रतिया इटली में भेजी जाती थीं । यहा लोग इस पत्र को बड़े चाव से पढ़ते थे। इस पत्र के द्वारा मेजिनी की शिक्षानों का यह प्रभाय हुया कि अनेर युवा इस सभा में शामित होने लगे। ये ही लोग गुप्त भाव में "यह इटती" पत्र का अपने देश में प्रचार करने लगे। मेजिनी ने अपने अनुयायियों को बार बार यही उपदेश दिया -"फेवल इटली के नाम से उठो, किसी दूसरे के नाम से मत उठो।" या इटली के स्थापन करने से मेजिनी को कैसी सफलता प्रास दुई थी, इस विषय में उसने स्वय जो कुछ लिखा है उसका भावार्थ यह है-"सिद्धान्तों की सच्चाई के कारण थोडे ही समय में इटलीनिवासियों में से थोडे से नवयुवक निकले, जो निस्सहाय और अपरिचित थे। उन्होंने एक ऐसे ऐसोसियेशन को स्थापित किया, जो सात गवर्नमेन्टों को डराने के लिये काफी शौर जबरदस्त था। मेरे विचार में इसका यही प्रत्यक्ष प्रमाण है कि उन्होंने जो झण्डा उठाया था वह झण्डा सच्चाई का था।" इस सभा के कारण मेजिनी और उसके साथियों को किन फिन कठिनाइयों से सामना करना पडा, इस विषय में मेजिनी ने स्वय लिया है.-"मैंने यह दो वर्ष वडे कए, परन्तु देशप्रेम में, प्यतीत किये। चारों श्रोर से शत्रुओं ने हम लोगों को घेर रखा था और सदा हम अपनी प्रापरता के लिये चिम्लित रहते थे। कभी भी अपनी ही मित्रमण्डली में किसी किसी पर सन्देह करने लग जाते थे। परन्तु जो लोग किसी भय, घिरोध और बाधा की चिन्ता न करके अपने देश के काम में जुटे रहे, उन्होंने देश में यह महान् आदर्श उपस्थित कर दिया कि हम लोग जो काम करते हैं उससे अपना कोई सरोकार नही है । अपनी हानि-लाम के लिये नहीं करते हैं। अपने देश और समाज के कारण दुख को दुख नहीं समझते, समस्त सुख-चैन अपनी जाति को पहले ही समर्पण कर चुके हैं।" वास्तव में मेजिनो को अपने उद्देश्य की पूर्ति में कितनी ही पार असफलता प्राप्त हुई। जिन दिनों “यङ्ग इटली" की धूम ( ३६ ) मच रही थी, इटली के कई स्थानों में राजमोद होगयागम- वाले पाप के अत्याचार से तो पहले ही से दुलित थे। "गङ्गा श्राने घाली ओर भागीरथ के सिर पड़ा" इस कहावत के अनु- सार उन्होंने राज्यक्रान्ति कर दी । मुद्दत से परतन्त्रता की वेडो में जकडे हुए, इटली के मुर्दा निवासियों के दिलों में स्वतन्त्रता की इतनी प्रवल तालसा होगयी थी कि अनुमानत २५ लाख मनुष्यों ने पोप तथा आस्ट्रिया के अनुचित शासन से भरने श्रापको स्वतन्त्र कर लिया । परन्तु उस समय इटली के भाग्य में स्वतन्त्रता वदी नहीं थी, क्योंकि इस राष्ट्रीय यन को उन्होंने मान्तिक बना डाला। इसका परिणाम यह हुआ कि छोटे छोटे राज्य श्रास्ट्रिया के सामने ठहर न सके ओर इस जाताय फाय में वारा पहुंची। परन्तु मेजिनी और उसके साथा इससे निराश न हुए, उन्होंने अपना उद्याग निरन्तर प्रचलित रखा। सन् १८३२ के अगस्त में मेजिनी को फास स देशनिकाला हुआ । एक घप या उससे कुछ अधिक दिन तक मेजिनी के पीछे पुलिस फिरती रही, पर वह पुलिस को छकाता ही रहा, उसके हाथ न पाया। सन् १:३३ में वह यहा से स्वीटजरलेण्ड को चला गया। वहा उसने “यन यूरोप" नाम की एक सभा और स्थापित की जिसमें समस्त युराप के कैदो तया देश से निकाले हुए लोग शामिल थे। परन्तु मेजिनी हे मान्य ने उस स्वोटरलेण्ड में भी नहीं टिकने दिया। म्बीटजरमपस की सरकार मी मेजिनी को अपने यहा टिकने को तैयार नहीं हुई। अन्त में लावार होकर मेजिनी को स्वीटजरलेण्ड छोडना पड़ा और अन्त में इलेएड में जाकर शरण ली - .
नवां परिच्छेद । देशभक्ति की कठोर परीक्षा "धापद्गगत किल महाशय चक्रवती विस्तारयत्यकृसर्वमुदारमावम् । काला गुरुर्दहन मध्यगत समन्ता- लोकोत्तर परिमन प्रकटीकरोति ॥" (भामिनीविलास) धीरज धर्म मिन्न घर नारी, आपतकाल परखिये चारी। (गो० तुलसीदास) सुष्टि का यह कुछ नियम है कि जो लोग धर्मात्मा तथा देश- भक होते हैं, उनकी परमात्मा की ओर से कठिन परीक्षा होती है। जिसने वालपन में सहनशीलता और धैर्य का अभ्यास कर लिया है, वही इस कठोर परीक्षा में उत्तीर्ण होता है। कौन गहीं जानता कि पाण्डवों को अपना राजपाट छोडने के पश्चात् बन में कैसे कैसे लश भोगने पडे थे। भिखारी तक का भेष धारण करना पड़ा था और विराट राजा की दासता तक ग्रहण करनी पड़ी थी। खैर, पाण्डवों की बात जाने दीजिये। इधर पिछली शताब्दियों के चाहे जिस महापुरुप के चरित्र को देस लीजिये तो पता लगेगा कि उनको अपने देश और धर्म की रक्षा करने में कैसी केली कठोर यन्त्रणाए महन करनी पड़ी हैं। केवल भारतवर्ष के महापुरुषों को ही नहीं, ससार के ब्राहे जिस देश के, चाहे जिस इतिहास को उठाकर देख लीजियेगा, इस ( ४१ ) कथन की सचाई के प्रमाण मिलेंगे। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं कि उसी व्यक्ति को अपने उद्देश्य में सफलता प्राठ होती है, जो मार्ग में रकामटे श्राती हो उनसे म उकसाकर अपने उद्देश्य की पूर्ति की निरन्तर चेपा करता रहे। मेजिनी को भी अपने जीवन में बड़ी बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। खेएड में पहुंचकर मी मेजिनी की श्रात्मा को शान्ति नहीं मिली। वहा उसका जीवन बडा ही अन्धकारमय रहा। उसको रुपये-पैसे की वडी तङ्गी भुगतनी पड़ी। जिस समय मेजिनी इलेएड पहुँचा, उसके साथ, उसके तीन मित्र और थे, उनको भी देशनिकालेकी श्राशा मिली थी। मेजिनी अपने इन तीनों मित्रों से अत्यन्त प्रेम रस्मता था। मेजिनी हदय का सथा था। पह अपने इन मित्रों को बडा विश्वासपात्र समझता था। मेजिनी का अपने इन मित्रों के प्रति कैसा व्यवहार था, इसके विचारने सही मेजिनी के चरित्र की महत्ता प्रकट होती है। 'जिस समय वह रुपये-पैसे से बडा तन्न था, उसको कही भोजन का भी ठिकाना न था, उस समय उसकी माता अपने पति से छिपाकर उसको कुछ खर्च भेज देती थी। मेजिनी थोड़े से धन की प्राप्ति में श्राप सयम से रहकर अपने मित्रों की भी सदा- यता करता था । परन्तु उसके तीनों मित्र उससे सदैव अप्रसन्न रहते थे। प्राय दुनिया में यह देखने में श्राता है कि सीधे,सच्चे पोर ईमानदार व्यक्ति से स्वार्थी लोग कुछ न कुछ लाभ उठाया ही करते हैं। भला तब मेजिनी के तीनों मित्र क्यों चूसने लगे? वे भी मेजिनी के निष्कपट व्यवहार से लाभ उठाने लगे। मेजिनी इतना उदार था कि वह कोई तनिकसी वस्तु होती तो भी उसके चार भाग कर डालता था। उसकी माता जिनोग्रा से मेज़िनी के पिता ने मेज़िगी को पार्थिक सहायता देगी फेरल इस --- ( ४२ ) उसके लिये घस्त्र भेजा करती थी। पर जव उसे पता लगा कि उसका पुत्र अपने तीन मित्रों को बिना दिये नहीं लेता है, तब वद चार मेजने लगी। पर तिस पर भी उसके ये तीनों मित्र सन्तुष्ट न एप। इशालेण्ड में सन् १८३७ से सन् १-३- के जून तक मेजिनी फी जो दशा रही थी, उस दशा का उसने एक स्थान पर पडे हश्यविदारक शब्दों में वर्णन किया है। एक दिन मेजिनी को एक पुराना जूता और एक कोट तक गिरवी रखने की नीवत आगई थी। किन्तु ऐसे पेमे सङ्कट उपस्थित हाने पर भी मेजिनी अपने धैर्य से च्युत नहीं हुश्रा । मेजिनी ने अपनी इस दशा का उल्लेख करते हुए उन धनवान पुरुषों को घडी 'फटफार पतलायी है जो अपने बच्चों को सुख और ऐश्वयं का अभ्यस्त और फीडा बना देते हैं। इस स्थल पर मेजिनी ने अपना माता की पडी प्रशला की है और लिखा है -"उसने ही मुझे वाल्यावस्था में सहनशीलता और धैर्य की शिक्षा दी थी, जिससे में बडे बडे सङ्कटों में धैर्य से विचलित नहीं हुआ।" ऐसे ऐसे सङ्कट श्राजाने पर भी इनलेण्ड में मेजिनी चुप मही रहा । वह अपने देश निकाले हुए भाइयों की सहायतार्थ अहस्रेजी अखबारों में लेख लिखा करता था । लेखों में वह कुछ न कुछ अपने देश का वर्णन करता ही था। धीरे धीरे मेजिनी कारण से यद कर दी थी कि मेजिनी सड्स धाकर राजनीतिक मान्दोजन परिल्याय कर देगा। परन्तु ऐसे कठिन समय में मी माता का स्नेह न माया, वह अपने पति अर्थात् मेजिनी के पिता से छुपाफर छठे महीने मेजिनी को खर्च भेजा करती थी। इस कार्य में मेजिनो की एक यहिन ने भी अपनी माता को बहुत सहायता पहुँचायी। मेजिनी को उस समय यह पता मही सगा कि किस कठिनता से उसकी माता धन भेजती है।
( ४३ ) का यश-सौरभ यहा तक फैला कि यूरोप के बड़े बड़े राज्य मेजिनी के नाम से कापने लगे-सुना जाता है, उस समय मेजिनो की चिडिया तक सोल ली जाती थीं। उसी समय मेजिनी ने इटालियग कारीगरों तथा मजदूरों को शिक्षित करने के लिये एक एसोसियेशन स्थापित किया था। कहने का साराश यह है कि चाहे जिस अवस्था में मेजिनी रहा, पर यह अपने देश को नहीं भूला । रातदिन उस अपने देश की ही धुन सवार रहती थी। प्रत्येक स्थिति में वह अपने देशवासियों में राष्ट्रीयता का भाव फैलाता रहा। या तो प्रेम की बहुत सी कहा- निया सुनने में श्राती हैं-ससार में देखा जाता है कि यहुत से लोग फिसी नायिका अथवा प्रेयसी के प्रेम में अपना सर्वस्व गया बैठते हैं, परन्तु मेजिनी का वैसा तुच्छ प्रेम न था, उनका देश के प्रति प्रेम सर्वोपरि था।कितनी ही प्रिया उसले विवाह करने के लिये आई, परन्तु वह किसी से विवाह करने को गजी न हुआ। उसे अपने देश की दुर्दशा के सामने सब सुच्छ प्रतीत हुश्रा। . १
दसवां परिच्छेद
नागोनी के चिन्ह
"People once awakened and nghtly caù not be put
dortn"
--Lala Lajpatrai
मेदिनी का प्रयत्न निष्फल नहीं गया। उसके लगातार
प्रयता से देश में जागृति फैलने लगी। मेजिनी के हृदय में अपने
देश की स्वतन्त्रता के लिये जो भाव उठ रहे थे, वे भाव ,उस
समय की इटली की तरुण पीढ़ी के भाव थे । मेजिनी के निर.
न्तर उद्योग का यह फल हुश्रा कि इटली के नवयुवकों में
जागृति फैल गई । सन् १८३३ में मार्शल नगर में गेरीवाल्टी
मे मेजिनी से भेट की। मेजिनी और गेरीवाल्डी का यह
मिलाप पड़े शुभ मुहर्च में हुआ था। दोनों एक ही पथ के
पथिक थे। दोनों का उद्देश्य एक ही था। दोनों के हृदय की
महत्वाकाक्षाए अपने देश की पराधीनता की वेडिया तोडने
की थीं। मेजिनी कितना गुणग्राहक था, इसका पता केवल इस
घटना से लगता है कि जब अमेरिका के दक्षिण विभाग में
गेरीबाल्डी के नाम की धूम मच रही थी, तव मेजिनी ने उसके
कार्यों का वृत्तान्त प्रकाशित करके उसकी कीर्ति बढ़ा दी थी।
किसी किसी का कहना है कि जव गेरीवाल्डी सन् १८४८ में
लौटकर आया, तब समस्त देश ने उसे एक स्वर से अपना
मेता स्वीकार कर लिया। इसका कारण केवल मेजिनी के लेख
थे। यदि मेजिनी ने गेरीवाल्डी के सम्बन्ध में अस्त्रवारों में लेख
प्रकाशित न किये होते तो गेरीवाल्डी का इतना नाम न होता।
।
।
(४५) जिन लोगों का गेरीवाल्डी के सम्बन्ध में ऐसा अनुमान है, उन से हम सहमत नहीं है । तथापि यह कहे विना नहीं रह सकते है कि मेजिनी गुणग्राही था,स्वय उसको किसी और से उत्साह प्राप्त न होने पर भी वह दूसरों को खूब उत्साहित करता था। इसी से उसने मेरीवाल्डी का उत्साह बढाने के लिये लेन लिखे थे, जिनके कारण गेरीवाल्डी की कीर्ति-कोमुदी का अच्छा विस्तार हुश्रा । अस्तु, इतनी लम्बी-चोडी दन्तकथा का तात्पर्य यह है कि मेजिनी ने अपने उपदेशों के यल से समस्त देश में जातीयता और स्वतन्त्रता के भाव उत्पन्न फर 'दये थे। इसका परिणाम इदलो के भविष्य के लिये शुभ हुआ। सन् १८४३ में बूढे पोप गरगरी सोलहवे का देहान्त हो गेरीवाल्डी ने भी मेजिनी के समान अपने देश के लिये अनेक कार उहन किये थे। सन् १८०७ में गेरीवाल्ही का जन्म नाइस नामक स्यान में हुया था। मेजिनी को भाति इसकी माता भी सुशिक्षिता थी । एक पार गैरीगल्डी ने स्वयं अपने एक मित्र से अपनी माता के सबंध में कहा था कि जो लोग मुझे निर्भीक सथा मेरा योग्यताप्रा को देखकर आश्चर्य करते है वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि माता ने वालपन में मुझे कैसी उत्तम शिक्षा दी थी। गेरीयाल्दो के पिता की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी, तथापि उसने पुत्र को शिक्षा देने में कमी नहीं रखी । लड़कपा में गेरी- घारही को समुद्रयात्रा का बड़ा शौक हो गया था। गेरीवाल्दी की त्री पनिटा मी बड़ी बहादुर थी, उस वीरवाला ने गेरीवाल्डी के साथ युद्ध में बहुत कष्ट सहन किये थे। इस समय यूरोप में जो महा सग्राम हो रहा है, इस में थमी गेरीवाल्दो का एक पौत्र मी वीरगति को प्राप्त हुया है। होरदाता का देहान्त सन् १८८२ में हुया था। मेरीयाल्टी की नीवनी पिरोप मुत्तान्त लेखक की "वर्तमान इटली के मिमांसा" मामा दूसरी पुस्तक में लिखा हुमा है। ।
गया और पायोनो ( Prono ) उसकी गद्दी पर बैठा । नये पोप ने तरुण इटली को शान्त करने के लिये बड़ी मीठी मीठी बाते वनानी शुरू की। उसने युवा इटली को फुसलाने के लिये एक चालाकी चली गद्दी पर बैठते ही उसने राजनीतिक अपराधियों को क्षमा करने की सूचना दे दी। उसने और भी कुछ सुधार करने प्रारम्भ कर दिये । ग्रीष्म ऋतु में जैसे प्यासे मृग को वालुका स्थान पर पानी का भ्रम हो जाता हे वैसे ही इटली-वासी पोप के माया-जाल को पहचान न सके। प्राय. देखा जाता है कि जो जातिवाँ से पराधीन रहती है, उसके मस्तिष्क की शकिया भी सडजाती हैं। जिस भाति एक तालाब में पानी बन्द रहने से सड जाता है, वैसे ही पराधीन जाति की मस्तिष्क की शाक्तिया काम लेने का अवसर न श्राने से निकम्मी पड जाती.. हैं। यही दशा उस समय के इटलीवासियों की हुई । वर्षों से पराधीनता की वेडी में जकडे रहने के कारण, उनके मस्तिष्क' की शक्तिया इतनी रद्दी हो गई थी कि उन्होंने पोप के विषय में वोखा खाया, पर मेजिनी बुद्धि से ऐसी शत्रुता नहीं रखता था कि जो पोप की वनावटी बातों में फंसकर अपने कर्तव्य से विमुरा हो जाता। मेजिनी ने पोप की बातों में न फंसकर उलटी उसकी सच्चाई की परीक्षा की। उसने पोप के पास एक चिट्ठी भेजी, जिसमें यह अनुरोध किया था कि धार्मिक तथा राष्ट्रीय सुधारों के लिये यह अच्छा अवसर है। भला अग्नि-परीक्षा में नकली सोना कब तक ठहर सकता है ! अन्त में पोप के ढोल की, पोल खुल गई। पोप "यथावाणी तथा पाणी" न निकला जिस स्वदेशानुराग की वह डीग हाकताथा उसका वह रचदेशानुराम' "हाथी के दात स्वाने के और, और दिखलाने के और" के समान दुरा। मेजिनी के कारण पोप की कलई सव पर खुल गई। 1 - (४७) इसमें सन्देह नहीं कि उस समय इटली में ग्वतन्त्रता के भाष घडी तेजी से फैल रहे थे। उस समय इटली में कितनी ही मभाए ऐसी थी कि जो ऊपरी उद्देश्य कुछ और रखती थी, पर भीतरी कार्य उनका कुछ और था। जेनोया की वैज्ञानिक महासभा ( Scientific congress) और कैसेले ( Casele ) की कृषि महासभा ( Agricultural congress )-दिसाने को कृषि और वैज्ञानिक सभाए थीं; पर भीतरी तौर पर राजनीतिक कार्य करती थीं। फैसले को महासभा में पेडमान्ट के चाल्स पलस्ट ने-- Count of Castepnefo को एक पत्र वहा के प्रति- निधियों को सुनाने के लिये भेजा, जिसमें निन शब्द थे- "Austria has sent a note to all the powers, in which she declires her wish to retain Ferrara, believing she has a right to it If providence sends us a war of Italian independance, I will mount my horse with my sons will place myself at the head of any army what a glorious dav it will be in ahich we can raise the cry of war for the independence of Italy"-FAT ATTENTE यह है कि श्रास्ट्रिया ने सब शक्तियों को पत्र भेज दिया है कि उसकी इच्छा फेरेंग को रखने की हे । क्योंकि श्रास्ट्रिया का विश्वास है कि फेरेग को रखने का उसे स्वत्व है। यदि परमात्मा ने इटली की स्वतन्त्रता के लिये यह युद्ध फराया, तो में अपने घोडे पर अपने लड़कों के साथ सवार होऊगा। में अपने को सेना के शिरोमाग में रसूंगा। वह कौन सा शुभ दिन होगा, जब हम इटली की स्वतन्त्रता के लिए युद्ध की आवाज उठावेंगे।" I -
बादशाह की इस घोषणा में और भी उत्तेजना यह गई।
फाउंस मे पादशाह में इटला के इम मान्दोलन में अगुमा होने
सथा स्वतन्त्रता के लिये तलवार की शरण प्राय फरने का लिय
प्रार्थना का।
समझ पाठस! गल्यान्ति के समय इटली की प्रेमी
परिस्थिति था। इटली दी क्यो, उस समय ममस्त यूरोप में
ऐसी हो गदर पद रही थी।
। धासियो का देश-प्रेम, घे रेडेट्सकी की जीत से हतो- साह न हुए, उन्होंने राम्रि भर में धैरो से बचने के लिये बहुत से टोले बना लिये, लोगों को जा कुछ मिला-गाडी, घेञ्च, चारपाई, विस्तरा, बाजा, प्रभृति सब सामान टीले बनाने में बेच दिये। १५०० पन्द्रह सौ से ऊपर टीले रात्रि भर में धन गये। पाच दिन के बाद श्रास्ट्रिया के रेडेट्सकी को मिलन छोड देना पडा। मार्च के अन्त तक वेनिस से भी परदेशियों की सेना निकल गई। इस अवसर पर रस- कनी के प्राण्ड य क को भी अपने राज्य के ववाने का और को उपाय न रहा और उसने भी ग्रास्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा फर दी। पेडमान्ट के बादशाह चास पलवर्ट को भी राष्ट्रीय भएडे के नीचे थाना पडा शोर वह भी श्रास्ट्रिया से लड़ने को तैयार हुशा। जेनेवा में सब से पहले स्वेच्छासेवक एकत्रित हुए। दस हजार रोमन्स तथा सात हजार रसकनी वाले अर- शस्त्रों से सज धज कर लाम्गाई-निवासियों की सदायता के लिये तैयार हो गये । इसकनी के ग्राउ व्यक ने अपनी सेना से इस युद्ध के लिर घडे जोशोले शब्दों में अपील की थी। जिसका भावार्थ यह है.--"सैनिको! अब लोम्बार्डी के क्षेत्र में इटली की पवित्र स्वाधीनता का निवटारा होगा। अभी मिलन के नागरिकों ने अपना रक्त यहाकर और ऐसी चीरता दिसला कर, जिसके उदाहरण इतिहास में बहुत कम मिलते हैं, स्वतन्त्रता को परीद लिया है। यद्यपि सारडिनिया का सेना अपने वीर राजा की अध्यक्षता में युद्धक्षेत्र में जा रही है, पुन, उनके पूर्वज टलका की प्रतिष्टा के अधिकारी, अवसर पर विधाम से नहीं रह सकते है। जाओ। और गरिकों में सम्मिलिन हो जो स्वेच्छासवक हो - (५०) चढ़ा हुआ था। उसने अभिमान के कारण-गेरीवाल्डी की सहायता स्वीकार नहीं की। "विनाशकाले विपरीत बुद्धि."- इस समय चाल्र्स एलवर्ट की भी यही दशा हुई। राजा चार्ल्स एलपट के इस व्यवहार से दुखित होकर, गेरीवाल्डी ने कर्नल मेसिडिन से मिलना निश्चय कर लोम्बार्डा और पेडमान्ट में अत्यन्त शीघ्रता स पाच हजार सेना इक्ट्ठी कर ली । सेना सहित जर ये लोग शत्रुओं की सेना पर चढ़ाई करने की तैयारी कर रहे थे तव इन लोगों को ज्ञात हुआ कि नेपल्स पराजित होगया। उस समय ये लोग प्रास्ट्रियों की सेना को भेदकर स्वीटजरलेएड पहुँचे । उस समय पाच हजार मनुष्यों में से केवल पाच बचे थे। दोनों शोर की सेनाओं को इसस भारी हानि हुई। सिसिली के निवासियो ने नेपल्स राज्य के विरुद्ध बलवा कर दिया । कहा जाता है कि इन विद्रोहों के करनेवाले वराबर मेजिनी से चिट्ठी-पत्री द्वारा सम्मति लेते रहे और पेडमान्ट तथा टसकनी के राष्ट्रीय दल से परस्पर पत्रव्यवहार रहा। मिलन में भी विद्रोह फूट निकला। मिलन के निवासियो के पास अस्त्र-शल नहीं थे। श्रास्ट्रिया ने एक चतुर सैनिक रेडै. ट्सकी के अधीन मिलन में बडी सेना रखी थी। जिस भाति विना जल के मीन तडफ कर मर जाती है, मणि खो जाने पर, साप निर पटक पटक कर मर जाता है, वैसी ही दशा मिलन- वासियो की हुई। वे विना हथियारों के कब ठहर सकने थे। रेडेट्सकी ने दो घण्टे की लड़ाई में नागरिकों से म्युनिस्पल्टी का घर छीन लिया और प्रास्ट्रिया के सम्राट को लिख भेजा कि विद्रोह शीघ्र शान्त हो जायगा। परन्तु चाह रे मिलन- . 3 (५१) वासियों का देश-प्रेम, घे रेडेट्सकी की जीत से हतो- त्साह न हुए, उन्होंने रात्रि भर में पैरो से बचने के लिये बहुत से टीले बना लिये, लोगों को जा कुछ मिला-गाडी, घेच, चारपाई, विस्तरा, याजा, प्रभृति सब सामान टीले बनाने में बेच दिये। १५०० पन्द्रह सो से ऊपर टीले रोत्रि भर में बन गये। पाच दिन के बाद श्रास्ट्रिया के रेडेट्सकी को मिलन छोड़ देना पड़ा। मार्च के अन्त तक वेनिस से भी परदेशियों की सेना निकल गई। इस अवसर पर टस- फनी के प्राएड य क को भी अपने राज्य के बचाने का और कोई उपाय न रहायोर उसने भी यास्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी। पेडमान्ट के बादशाह चार्ल्स एलरर्ट को भी राष्ट्रीय भएडे के नीचे थाना पड़ा और वह भी आस्ट्रिया से लड़ने को तैयार मुना। जेनेवा में सव से पहले स्वेच्छासेवक एकत्रित हुए। दस हजार रोमन्स तथा सात हजार टसकनी वाले अस्त्र- शस्त्रों से सज धज कर लास्वाड-निवासियों की सहायता के लिये तैयार हो गये। उसकनी के ग्राउ य क ने अपनी सेना से इस युद्ध के लिर पड़े जोशोले शब्दों में अपील की थी। जिसका भावार्थ यह है -"सेनिको ! अब लोम्बाडी के क्षेत्र में इटली की पविन स्वाधीनता का निपटारा होगा। अभी मिलन के नागरिकों ने अपना रक्त वहाकर और ऐसी वीरता दिखला फर, जिसके उदाहरण इतिहास में बहुत कम मिलते हैं, स्वतन्नता का खरीद लिया है। यद्यपि सारडिनिया का सेना अपने वीर राजा की अध्यक्षता में युद्धक्षेत्र में जा रही है, इटली के पुत्र, उनके पूर्वज टसकों की प्रतिष्टा के अधिकारी, ऐसे अवसर पर विधाम से नही रह सकते हैं। जाना। और तुम उन वीर नागरिकों में सम्मिलिन हो जो स्वेच्छासबक हो ( ५२' ) कर एक दी भएडे के नीचे अपने लोम्बाही भाइयों की रक्षा के लिये रहे है ।" जर क्रिसी समाज अथवा देश के प्रादश बदल जाते हैं तब उस समाज प्रथवा देश के निवासियों की रुचि भी बदल जाती है । उस समय इटली के निवासियों की रुचि भी पलट गई थी । अपनी प्यारी मातृभूमि की स्वतन्त्रता के पदिन युद्धम धनाख्य मनुष्यों ने भी धन की सहायता विना व्याज के का थी। स्वेच्छासवका की सना ने पराजित आस्ट्रिया की सेना का पीछा पाल्पस प्रवत तक किया। इस युद्ध से प्राय उत्तर इटली, शारिट्रया के निवासियों स खाली होगया। कोई कोई कहते है कि केवल पचास हजार आस्ट्रियन्स शेप रह गये ये। उत्तर इटती श्रास्ट्रिया के पजे से निकल कर बिलकुल स्वतन्त्र होगया था। लेकिन इतने पर भी प्रास्ट्रिया चुपचाप इटली को घाउ देनेवाला न था। सारडिनिया के राजा चार्ल्स से पुन आस्ट्रिया का युद्ध ठन गया । वाहर के शत्रु की अपेक्षा घर का शत्रु वडा भयानक होता है । स्वार्थ मनुष्यों को बड़े माच नचाता है । वत, स्वार्थ के वशीभूत होकर ही, ईसाइयों के गुरु रोम के पाप ने अपनी पृथ्वी के स्वार्थ में फंसकर आस्ट्रिया को सहायता दी। उधर फ्रास ने भी आस्ट्रिया की पीठ ठोक दो। बस, यास्दिया ने पोप श्रोर फ्रास से सहायता प्राप्त कर के सारडिनिया के राजा चाल्स एलबर्ट का हरा दिया। बेचारे राजा चारस पलवई ने अपने को सफल-मनोरथ न देख कर अपना राज्य अपने पुत्र विक्टर इमानुएल को दे दिया। + .1 बारहवां परिच्छेद रोम में प्रजातन्त्र राज्य "Good government could never be a substitute for government by the people themselves' (Sir Henry Campbell Bannerman ) "मर्ज बढता गया ज्यों ज्यों दवा की"-इधर इटली में उप युंक घटनाए हो रही थी, उधर रोम में भी स्वतन्त्रता और जातीयता का भाव बढ रहा था। सर हेनरी कैम्पबेल बैनर- मैन का कथन है-"अच्छा राज्य प्रजातन्त्र शासन का प्रति- निधि नहीं हो सकता है।" परन्तु उस समय गेम म अच्छा राज्य भी नहीं था, तब क्यों न लोकमत प्रजातन्त्र राज्य की ओर मुकता ? रोम में भी बलवा हो गया और बलवा हो जाने पर भी पोप ने घोषणा की कि में इटली में श्रान्ट्रियन शक्ति के विरुद्ध राष्ट्रीय अान्दोलन में सम्मिलित नहीं हाऊगा । पोप यह घोपखा फर के ही चुप नहीं हुआ। उसने रोम के कार्यों के सम्बन्ध में सब से ऊचा एक कर्मचारी, जो कुछ उदार विचार का भी था, जिसका नाम काउन्ट रोशी था, नियुक्त किया। नवम्बर के मास में काउन्ट रोशी माग गया। इसका कारण यह था कि वह गज्य क्रान्ति के समय में दब्बू नीति प्रचरित करना चाहता था। पोप डर के मारे भाग गया। टनकनी के मेएड ड्यूक भी राज-पाट छोड कर भाग गये। नी फरवरी को पालीमेण्ट ने प्रजातन्त्र राज्य की घोषणा कर दी। मेजिनी भी ।
. (५४) रोमन पालीमेण्ट का सभासद निर्वाचित हुश्रा । वह शीघ्र ही रोम की ओर चला गया। मार्ग में वह टसकनी में भी ठहरा। टमकनी में प्रैण्ड ज्यक के चले जाने से एक प्रोविजनल गवर्नमेंट नियत हो चुकी थी। मेजिनी समझता था कि टसकनी के लोग अपनी स्वतन्त्रता स्थिर न रख सकगे। उसने टसकनी वालों को, प्रजातन्त्र राज्य स्थापित करके, रोम के साथ मिलने का परामर्श दिया, जिससे इटली को एक करने में सुगमता प्राप्त हो। सर्वसाधारण मेजिनी के इस परामर्श से समहत हुए, परन्तु टसकनी को मेजिनी का यह परामर्श अच्छा न मालूम हुआ। अस्तु । मेजिनी रोम चला गया। रोम में पहुंचते समय मेजिनी को कैसा श्रानन्द प्राप्त हुआ था। इस विषय में मेजिनी के शब्द सुनने योग्य हैं। वह लिखता है -"मेरे वालपन में रोम मेरा स्वप्न था, मेरी मानसिक धारणा के लिये रोम उच्च ज्ञान था। मेरी बुद्धिरूपी इमारत के लिये रोम एक कुञ्जी थी। वह मेरी आत्मा का धर्म था। शहर में प्रवेश करते समय मुझ में भय और आदर दोनों का सञ्चार हुश्रा । जैसे मैं पोटाडेल 'पोपोलोभ में होकर निकला, मुझ में एक विद्युत्शक्ति सी दौडने लगी। मुझे नवीन जीवन सा प्रतीत होने लगा। मुझे रोम के फिर दर्शन न होंगे, परन्तु मृत्यु समय परमात्मा और अपनी जन्म देनेवाली प्यारी अन्मभूमि के साथ ही साथ रोम का भी म्मरण रहेगा। और भाग्य चाहे जहां मेरी हड्डिथा गडवा दे, परन्तु मुझे विश्वास है कि जब इटली में एकता होने पर प्रजातन्त्र राज्य की पताका रोम के मुख्य स्थानों पर फहरायेगी, तब तो मेरी इलियों से भी उत्साह की उमङ्ग उठने लगेगी।" मेजिनी के इन शब्दों में उसकी रोम के प्रति हार्दिक श्रद्धा और भकि प्रकट ( ५७ ) न तो हम रोमन कैथोलिकों के लिये,म रोम के श्राद- मियों के लिये रोम में गये । हमारे वहा जाने का, अर्थात् रोम पर चढाई करने का, कारण मास था।" पाठक, उक्त लेखक के शब्दों को पढकर, उस समय फ्रान्स की नीयत कैसी थी, खो पहचान गये होंगे। यूरोप के प्राय समस्त राष्ट्र अपने स्वार्थ के सामने दूसरे देश के स्वार्थ की किञ्चित् चिन्ता नहीं करते हैं, अपने स्वार्थ की रक्षा के लिये दूसरे देश के स्वार्थ का मटियामेट तक कर देते हैं। बस, इस विचारवश उस समय फ्रान्स ने भी इटली के प्रजातन्त्र राज्य को मटियामेट करना चाहा। फरासीसी सेना लगभग पैंतीस हजार के थी। रोम- निवासियों ने इस युद्ध में अच्छी वीरता दिखलायी। वे बहे साहस से फ्रान्स की सेना से लडे । परन्तु मुट्ठी भर रोम पैंतीम हजार फ्रान्स सेना के सामने कहा तक ठहर सकते थे, अन्त में रोम का पतन हुआ । फ्रान्स की सहायता से पोप ने पुन शक्ति प्राप्त की। "चार दिना की चादनी और वही अन्धेरी रात," इस कहावत के अनुसार प्रजातन्त्र राज्य पर पनपात हुआ। - तेरहवां परिच्छेद - रणचण्डी का नाच "शरीर या पातयेवम् , कार्यम्या साधयेवम् ।" रोम में प्रजातन्त्र राज्य के स्थापित होने तथा इटली की बागडोर द्वितीय विफ्टर इमानुएल के हाथ में आने पर भी रणचण्डी इटली से प्रसन्न नहीं हुई । उसने पुनः अपना नृत्य प्रारम्भ करने की तैयारी की। इटली पर से युद्ध के काले काले, डरावने वादल टले नहीं। इस समय इटली की वडी शोचनीय दशा थी। इस समय इटली में दो दल हो गये थे। एक ता ईसाइयों के गुरु पोप के पक्षपातियों का था, जो सब प्रकार के सुधारों का विरोधी था। जितनी कुरीतिया और अत्याचार फैल रहे थे, उनका पक्षपाती था। इस समय इटली में ऐक्य की बडी जरूरत थी। श्रास्ट्रिया ने रोम के प्रजातन्त्र राज्य को चकनाचूर करने के लिये "Divide and Rule' अर्थात् भेद- भाव का प्रचार करके, शासन करने की नीति प्रचलित की-- "निवल की जोरू सबकी भौजाई" यह कहावत ठीक ही है। पादिया के अतिरिक्त फ्रान्सका दात भी इटली पर लगा हुआ था । लुइस नेपोलियन, जो उस समय फ्रान्स के प्रजातन्त्र राज्य के राष्ट्रपति हुए थे, उन्हों ने पञ्चायती राज्य को नष्ट करने के लिये फरासीस सेना भेजी। मान्स ने उस समय रोम को अपने स्यार्थ-सम्बन्ध के लिये हडपना चाहा था। एक लेखक ( Thi-17) लिखता है.
( ५७ ) न तो हम रोमन कैथोलिकों के लिये, म रोम के श्राद- मियों के लिये रोम में गये । हमारे वहा जाने का, अर्थात् रोम पर चढ़ाई करने का, कारण फ्रास था।" पाठक, उक्त लेखक के शब्दों को पड़कर, उस समय फ्रान्स की नीयत कैसी थी, वो पहचान गये होंगे। यूरोप के प्राय समस्त राष्ट्र अपने स्वार्थ के सामने दूसरे देश के स्वार्थ की किञ्चित् चिन्ता नहीं करते हैं, अपने स्वार्थ की रक्षा के लिये दूसरे देश के स्वार्थ का मटियामेट तक कर देते हैं। बस, इस विचारवश उस समय फ्रान्स ने भी इटली के प्रजातन्त्र राज्य को मटियामेट करना चाहा। फरासीसी सेना लगभग पैंतीस हजार के थी। रोम- निवासियों ने इस युद्ध में अच्छी वीरता दिखलायी।चे वडे साहस से फ्रान्स की सेना से लडे । परन्तु मुट्ठी भर रोम पैंतीम हजार फ्रान्स सेना के सामने कहा तक ठहर सकते थे, अन्त में रोम का पतन हुआ। फ्रान्स की सहायता से पोप ने पुन' शक्ति प्राप्त की। "चार दिना की चाश्नी और वही अन्धेरी रात," इस कहावत के अनुसार प्रजातन्त्र राज्य पर पजपात हा।
चौदहवां परिच्छेद पुनः शनि की दृष्टि "उचितमनुचित वा कुर्वते कार्यजान न तदपि परिताप यान्ति एष्टा कदापि ॥" इटली की बातें सुनाते सुनाते हमने बीच में पाठकों को सेवा में रोम के प्रजातन्त्र और पतन का वृत्तान्त भी उपस्थित कर दिया है। अतएव हम पुन अपने मुख्य विषय की ही चर्चा करते है । जब बेचारा मेजिनी रोम में प्रजातन्त्र शासन- प्रणाली स्थापित करने में इस भाति लगा हुया था, उधर आस्ट्रिया भी चुप नहीं था। उसने भी अपना अधिकार जमाने की चेष्टा की। यह हम ऊपर कह पाये है कि विक्टर इमानु एल ने जिस समय अपने वाप से राजसिहासन ग्रहण किया था, उस सगय इटली में दो दल थे । एक तो ईसाइयों के गुरु पोप के पक्षपातियों का था, जो अन्ध लकीर का फकीर बना हुश्रा था और सव प्रकार के सुधारों का विरोधी था, जितनी कुरीतिया और अत्याचार फैल रहे थे, उनको दूर करना नहीं चाहता था। दूसरा प्रजा के शासन का पक्षपाती था। विक्टर इमानुएल ने दोनों दलों से यचकर चलना चाहा । सिदामन पर बैठते ही दूसरे दिन वह यास्ट्रिया के मैनिक रैडेट्सकी के यहा स्वय गया। सेनापति ने उसको समझाया कि यदि यह उन नियमों को छोडकर, जो उसके पिता ने बनाये थे, पुराने नियमों पर चले, तो अच्छा हो । श्रास्ट्रिया उसके राज्य में से (५४) कुछ भी पृथ्वी नहीं छीनेगा, किन्तु यह अपना राज्य और अधिक बढा सकेगा। विक्टर श्रास्ट्रिया के इन नियमों को पालने को तैयार नहुया। मेनापति फ विशेष अनुरोध करने पर विक्टर ने जो उत्तर दिया, वह उसी के शब्दों में सुनने योग्य है "सनापति । इस तरह की शर्त स्वीकार करने की अपेक्षा में सैकडों राजमुकुट यो दूंगा । मेरे पिता ने जो कुछ शपथ ग्रहण की है, मैं उसी का पालन करूगा। यदि तुम मृत्यु के लिये लहाई चाहोगे तो वैसा ही होगा। मैं अपनी जाति को युद्ध के लिये एक बार बुला लगा, तव तुम देखोगे कि साधारण उत्थान में पेडमाएट किस योग्य है । यदि मेरा पतन होगा तो भी कोई लजा की बात नहीं है। मेरा घराना अपमान की अपेक्षा देश- निर्वासन अच्छी तरह से जानता है।" श्रास्ट्रिया के सनापति से विक्टर को पाच मास, एप्रिल से अगस्त तक, लगातार सन्धि की बात चीत होती रही। अन्त में विक्टर को यात द्रव्य दण्डरूप में आस्ट्रिया को देना पडा। श्रास्ट्रिया की सेना ने इटली के गढ़ों पर अधिकार कर लिया। परन्तु इतने पर भी विक्टर और उसके मन्त्री ने श्रास्ट्रिया से यह शर्त करा ली थी कि, श्रास्ट्रिया को उन व्यक्तियों के अपराध क्षमा फग्ने छोंगे, जिन्होंने श्रास्ट्रिया के विपक्ष में हथियार उठाया है । प्रास्ट्रिया ने यिस्टर की यह शर्त ग्वीकार नहीं की। विक्टर अोर उसक 'कर्मचारी अपनी बात पर दृढ़ रहे । सारडिनिया को बहुत हानि उठानी पडी, पर अन्त में आस्ट्रिया को लगभग सब विद्रोह करनेवालों को क्षमा करना पड़ा। परन्तु इस सन्धि से इटली में कुछ शान्ति नहीं हुई। श्रान्ट्रिया के सिर पर फिर भूत सवार हो गया। उसने चौदहवां परिच्छेद -- पुनः शनि की दृष्टि "उचितमनुचित या कुर्वते कार्यजात । न तदपि परिताप यान्ति एष्टा कदापि ॥" इटली की बातें सुनाते सुनाते हमने बीच में पाठकों की सेवा में रोम के प्रजातन्त्र श्रोर पतन का वृत्तान्त भी उपस्थित कर दिया है। श्रतएव हम पुनः अपने मुख्य विषय की ही चर्चा करते हैं । जव बेचारा मेजिनी रोम में प्रजातन्त्र शासन- प्रणाली स्थापित करने में इस भाति लगा हुआ था, उधर आस्ट्रिया भी चुप नहीं था। उसने भी अपना अधिकार जमाने की चेष्टा की। यह हम ऊपर कह पाये है कि विक्टर इमानु- पल ने जिस समय अपने बाप से राजसिहासन प्रहण किया था, उस सगय इटली में दो दल थे । एक तो ईसाइयों के गुरु पोप के पक्षपातियों का था, जो अाध लकीर का फकीर धना हुआ था और सब प्रकार के सुधारों का विरोधी था, जितनी कुरीतिया और अत्याचार फैल रहे थे, उनको दूर करना नहीं चाहता था। दूसरा प्रजा के शासन का पक्षपाती था। धिक्टर इमानुएल ने दोनों दलों से पचकर चलना चाहा । सिहासन पर बैठते ही दूसरे दिन वह श्रास्ट्रिया के मैनिक रैडेट्मकी के यहा स्वय गया। सेनापति ने उसको समझाया कि यदि वह उन नियमों को छोड़कर, जो उसके पिता ने बनाये थे, पुराने नियमों पर चले, तो अच्छा हो । श्रास्ट्रिया उसके राज्य में से ज ( 8 ) भी पृथ्वी नहीं छीनेगा, किन्तु यह अपना राज्य और धिक बढ़ा सकेगा। विक्टर श्रास्ट्रिया के इन नियमों को लने को तैयार नहुधा । सेनापति के विशेष अनुरोध करने पर विक्टर ने जो उत्तर दिया, वह उसी के शब्दों में सुनने याग्य है । "सेनापति ! इस तरह की शर्त स्वीकार करने की अपेक्षा मैं सेकडो राजमुकुट सो दूंगा। मेरे पिता ने जो कुछ शपथ ग्रहण की है, मैं उसी का पालन करूगा। यदि तुम मृत्यु के लिये लडाई चाहोगे तो वैसा ही होगा। मैं अपनी जाति को के लिये एक यार बुलालगा, तब तुम देखोगे कि साधारण उत्थान में पेडमाएट किस योग्य है । यदि मेरा पतन होगा तो भी कोई लज्जा की बात नहीं है। मेरा घराना अपमान की अपेक्षा देश- निर्वासन अच्छी तरह से जानता है।" प्रास्ट्रिया के सेनापति से विक्टर की पाच मास, एप्रिल से अगस्त तक, लगातार सन्धि की बात चीत होती रही। अन्त में विक्टर को बहुत द्रव्य दण्डरूप में श्रास्ट्रिया को देना पडा। श्रास्ट्रिया की सेना ने इटली के गढ़ों पर अधिकार कर लिया। परन्तु इतने पर भी विक्टर और उसके मन्त्री ने श्रास्ट्रिया से यह शर्त करा ली थी कि, श्रास्ट्रिया को उन व्यक्तियों के अपराध क्षमा करने होंगे. जिन्होंने ग्रास्ट्रिया के विपक्ष में हथियार उठाया है। श्रास्ट्रिय ने विक्टर की यह शर्त ग्वीकार नहीं की। विक्टर और उसके कर्मचारी अपनी बात पर दृढ़ रहे । सारडिनिया को वह हानि उठानी पडी, पर अन्त में प्रास्ट्रिया को लगभग विद्रोह करनेवालों को क्षमा करना पडा । परन्तु इस सा से इटली में कुछ शान्ति नहीं हुई। प्रास्ट्रिया के सिर पर फिर भूत सवार हो गया।
- (६०) पुन. अनेक बहाने करके प्रजा को दुख देना प्रारम्भ कर दिया। रोम का पोप भी अपने राज्य में लौट पाया और वह भी मनमाने अत्याचार करने लगा। फ्रान्स के संत्राट तृतीय मेपोलियन ने रोम के पोप को बहुत समझाया, पर उसने एक म मानी, वही पुरानी ११वीं और १२वीं शताब्दी की कुरी- तिया १६वीं शताब्दी में जारी रखी । नेपल्स में अत्याचार होने लमे । उदार विचार के आठ सौ मनुष्यों को पुरी यन्त्रणाए पहुंचाई गई। पुलिस लोगों को तग करती थी । चाहे जिसको पकड लेती थी। उस समय का अपनी जेल का कुछ वर्णन एक देशभक ख्यक सिजिसभाड्यो केस्टोनीडियानों ने किया है। इस देशभक ने अपनी जेल की कहानी वृद्धावस्था में लिखी थी। जिसमें वह कहता है कि जीवन का वह समय सुरा था जब वह छ कैदियों के साथ बुलाया गया था, जिन्हों ने मुश्राफी मागी थी। सिजिसमाख्यो कैस्टोनीडियानों को भय था कि वे क्षमा कर दिये जायगे। परन्तु यह भय निर्मूल निकला। उनके चरित्र पर देशद्रोही होने का घवा लगाया गया। इसके अतिरिक जो लोग ऐसे समाचार-पत्र निकालते थे, जिनमें सरकार के विरुद्ध कुछ लिखा होता था, थे तत्काल फासी पर चढ़ा दिये जाते थे। इस समय विक्टर ने एक और काम किया कि पादडियो की निराली कचहरिया बन्द करवा दी । इस बीच में सन् १८५० में • कैबूर केर बदा मारी राजनीतिज्ञ था। उसका जन्म १०ीं अगस्त सन् १८१० को दुभा या। मेजिनी और कैदूर में परस्पर बदा मतभेद रहा। मैनूर नरम दल दवा नियमबर पान्दोलन Constitutional agitatroh कासपाती मा । बैदूर के सम्बन्ध में भनेक इतिहास लेखकों का बार- -- । ( ६३ ) प्रत्येक भाग में मनुष्य नियत कर दिये गये और सबको समझा दिया गया कि नियत समय पर सव विगड सडे हो। यह प्रबन्ध यहा तक कर लिया गया कि जिस समय मिलन के विद्रोह के समाचार लोम्बार्डी में मिले, उसी समय वहा की नेशनल पार्टी स्वतन्त्रता के लिये झण्डा सडा कर दे। पेद है, एक नेता ने सारा काम मटियामेट कर दिया। क्योंकि यह पहले निश्चय हो चुका था कि अमुक स्थान पर आक्रमण उस समय आरम्भ हा, जर पद्दले नेता की ओर से इशारा कर दिया जाय । पर उस नेता ने यह कपट किया कि वह ठीक 'समय पर भाग निकला। जो लोग नियत समय पर वहा एक- त्रित हुए थे, वे इस नेता के कपट को समझ न सके। उन्होंने ममझा कि नेताओं का इस कार्य के करने का विचार नहीं रहा है अथवा इस कार्य का पता राजकर्मचारियों को लग गया है। इस लिये वे लोग भी चलते बने । उनके दलों ने इस ढङ्गस दो स्थानों पर श्राममण किया कि श्रास्ट्रियन सेना में दो सिपाही ओर दो सनापति मारे गये । इस उपद्रव क सम्बन्ध में श्रास्ट्रिया को यह कहने का अवसर मिल गया कि इस विद्रोह में वे लोग सम्मिलित थे, जो अस्ट्रिया की सर- कार की सीमा स पाहर या तो चले गये, या निकाल दिये गये। यद्यपि यह सन्दह न था, परन्तु इस बहाने श्रास्ट्रिया ने लगभग-एक हजार बडे घरानों को पृथ्वी जप्त कर ली, और गासियों को फासो को पाना दे दी। सारडिनियन "गहिया के इस कार्य को सन् २०४६ की सन्धि । था. मारडिनिया का प्रतिनिधि पाईना गोनों देशों में लडाइ के सामान हो तक रकी रही।
पन्द्रहवां परिच्छेद -0. फिर भाग्य की परीक्षा "अधोमुखस्यापि कृतस्य च न ध शिखा याति कदाचिदेव" -~कालिदास जिनके मन में किसी कार्य की लौ लगी हुई होती है ये बार वार की असफलताओं से फभी निराश नहीं होते है। इटली निवासियों को भी स्वतन्त्रतादेवी की प्रसनता के लिये वार- बार द्वन्द करना पटारुई के ढेर में पाग की चिनगारी छिपाने से नहीं दब सकती है, वैसे ही इटली-निवासियों के स्वतन्त्रता के भाव दयाने से नहीं दव सके। सन् १८५३ में मिलन में फिर विद्रोह प्रारम्भ हुया, परन्तु उसमें मिलन के लोग सम्मिलित नहीं हुए। कहा जाता है कि मिलन का यह विद्रोह वहा के कारीगरों के पडे परिश्रम का फल था। जव सेजिनी को इस विद्रोह का समाचार मिला तब उसने एक सैनिक को वहा की परिस्थिति देखने और यह विचार करने के लिये भेजा, कि वहा स्वतन्त्रता प्राप्त हो सकती है या नहीं। उस सैनिक ने देख- भाल कर मेजिनी को लिया कि सफलता की आशा है। मेजिनी ने वहा के लोगों की द्रव्य से सहायता की, पर यह सोच कर कि कहीं वे पकड न लिये जाय, अस्त्र नहीं भेजे। मेजिनी ने उनको अस्त्रों के सम्बन्ध में लिख दिया:--"जो लोग भरने-मारने पर उतारू हो जाते हैं वे शत्रुनों के शस्त्र छीन कर उनसे काम लेते हैं, जैसा कि सन् १८४८ में हुआ था।" लोगों की मेजिनी पर इतनी भक्ति थी कि उन्होंने मेजिनी के इस कथन को ईश्वरीय सन्देश समझा और लड़ने को तेयार हो गये। लडने की तैयारिया छिप छिपे की गई। मिलन के - .
प्रत्येक भाग में मनुष्य नियत कर दिये गये और सवको समझा दिया गया कि नियत समय पर सव विगड पडे हाँ। यह प्रबन्ध यहा तक कर लिया गया कि जिस समय मिलन के विद्रोह के समाचार लोम्बार्डी में मिले, उसी समय वहा की नेशनल पार्टी स्वतन्त्रता के लिये झण्डा राडा कर टे । सेद है, एक नेता ने सारा काम मटियामेट कर दिया। क्योंकि यह पहले निश्चय हो चुका था कि अमुक स्थान पर आक्रमण उस समय आरम्भ हो, जर पहले नेता की ओर से इशारा कर दिया जाय । पर उस नेता ने यह कपट किया कि यह ठीक समय पर भाग निकला। जो लोग नियत समय पर वहा एक- त्रित हुए थे, वे इस नेता के कपट को समझ न सके। उन्होंने समझा कि नेताश्रा का इस कार्य के करने का विचार नहीं रहा है अथवा इस कार्य का पता राजकर्मचारियों को लग या है। इस लिये वे लोग भी चलते बने । उनके दलों ने इस इस दो स्थानों पर आक्रमण किया कि श्रास्ट्रियन सेना में का सिपाही और दो सेनापति मारे गये। इस उपद्रव के सम्बन्ध में श्रास्ट्रिया को यह कहने का अवसर मिल गया कि स विद्रोह में ये लोग सम्मिलित थे, जो अस्ट्रिया की सर- कार की सीमा स बाहर या तो चले गये, या निकाल दिये गये । यद्यपि यह सन्दह न था, परन्तु इस बहाने श्रास्ट्रिया ने लगभग एक हजार बड़े घरानों का पृथ्वी जप्त कर ली, ओर तेरह मिलन-वासियों का फासी को श्राज्ञा दे दी। सारडिनियन पन्त्रियों ने प्रास्ट्रिया के इस कार्य को सन् १८४६ की सन्धि का विरुद्ध ठहराया था। सारडिनिया का प्रतिनिधि वाईना बुला लिया गया, योर फिर दोनों दशों में लडाई क सामान हो गये, परन्तु लडाइ बहुत दिनों तक रुकी रही ।
सोलहवां परिच्छेद
भाग्योदय के चिन्ह
"पूर्वजन्मजनित पुराविद कर्मदैवमिति सम्प्रचपते ।
उद्यमो सदुपार्जित चिराइवमुद्यमवश न तरूयम् ॥"
इस बीच में यूरोप में एक और सग्राम छिड गया । यह
सप्राम-क्रीमिया के युद्ध के नाम से विख्यात है। क्रीमिया
युद्ध की जड़ यह कही जाता है कि पूर्व यूरोप में कैथोलिक और
ग्रीक चच के पादरियों में फिलिस्तीन देश के धर्ममन्दिरों पर
आधिपत्य करने के विषय में झगडा उठा। यह देश रूम के
अधिकार मे था पोर रूम पर रुस का दनदया था । इभर
कैथोलिक सम्प्रदाय के नेता रोम के पाप का सहायक झव
सम्राट, बसराज स लागडाट रखता था। वस, इस तरह स
मास और रूस में लड़ाई ठहरी । इङ्गलेएड का भी यह भय था
कि रूस का यदि रूम पर अविकार रहा तो भूमध्यसागर
में
अवश्य हो उसका अधिकार हो जायगा। और फिर-सोने की
चिडिया हिन्दुस्तान पर भी रूस का दात गडाना सहज है।
इस लिये इङ्गलेण्ड ने फ्रास को सहायता दी। दूरदर्शी कपूर ने
भी, इस युद्ध म इटली का भविष्य भाग्योदय समझ कर,
योग
देना उचित समझा। उस समय इटली की जनता ने, अपने
देश का और देशों के झगडे में पड़ना, पागलपन समझा था।
परन्तु विक्टर ने किसी वात की चिन्ता न करके अपने मन्त्री
का साथ दिया । कमी हुराई से मी भलाई निकल पाती है.
द ( ६५ ) प्रतएव इस लड़ाई में इटलीका विशेष गौरव रहा *सारडेनिया के सिपाहिया की बहादुरी स इटली का यूरोप भर में महत्व फैल गया। युद्ध के पश्चात् १८५६ में जब सन्धि हुई तव उस अवसर को अच्छा टेस कर कपूर ने इटली की यात ट्रेड दी, जिसत उस समय इटली ने अपने उद्देश्य श्रोर आकाक्षायों की और अन्य देशों की सहानुभूति श्राफषण कर ली। इस युद्ध से ही पहले पहल इटली अन्य शक्तियों के समान समझा जाने लगा। श्रास्ट्रिया के प्ररल विरोध करने पर भी फैबूर पेरिस की काग्रेस में सम्मिलित हुआ। कैदूर का इस काग्रेस में सम्मिलित होना ही सारडेनिया और इटली को भाग्य को पलटने वाला हुआ। इस काग्रेस में इङ्गलेएड की ओर से मी लाई फोले पोर लार्ट क्रारेडन थे। इस काग्रेस में आस्ट्रिया का भी मन्त्री था। परन्तु काग्रेस में प्रास्ट्रिया के मन्त्री के होने पर भी वूिर ने श्रास्ट्रिया के अत्याचारों के सम्बन्ध में स्वतन्त्रतापूर्वक अपने विचार प्रकट किये । कैबूर ने निडर होकर कहा था-"प्रास्ट्रिया इटालियन स्वतन्त्रता का जानी दुश्मन है। इटली में स्वतन्त्र जाति के लिये यह भयानक विपत्ति है और उस जाति को, जिसको यहा प्रतिनिधि होने का सौभाग्य प्राप्त है ।" पर छ एक इतिहासलेखक इस युद्ध के सम्बन्ध में लिखता है *as solenin monient for the King and decided the fato por tus country, that treat was the fortune of Italy, piercuin so many difficulties the genius of Cavour vas sot enough there was ne ded firinne.s of Victor uel for sithout hun the treaty pould not frave bani - 10 oncluded 'Messara inma.
प्रास्ट्रिया की बुद्धि पर उस समय इतना गहरा पर्दा पड गया
था कि उसने इङ्गलेएड और फ्रास के अनुरोध करने पर भी
अपने शासन का कुछ भी सुधार करना उचित नहीं समझा।
कोई कोई इतिहास-लेखक यह भी कहते हैं कि कैवूर ने काग्रेस
के पीछे लार्ड फ्लोरेडन से-जो इद्गलेण्ड की ओर से प्रतिनिधि
था, श्रास्ट्रिया के अत्याचारों के सम्बन्ध में बातचीत की थी,
परन्तु कैबूर को लार्ड लोरेडन की वार्तालाप से ऐसा सन्देह
हो गया था कि उसको इङ्गलेण्ड से कुछ कम सहायता
मिलेगी। बस, इस विचारवश उसने अपनी'उच्चाकाक्षाओं को
तीसरे नेपोलियन के भरोसे पूरा करना चाहा। कहते हैं, सन्
१८५५ में तीसरे नेपोलियन ने कैबूर से पूछा कि मैं इटली के
लिये क्या कर सकता है? कैबूर ने बिना किसी सङ्कोच के यह
उत्तर दिया कि श्राप बहुत कुछ कर सकते हैं।
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सत्रहवां परिच्छेद "वन्दर-बांट" 'वधिक यध्यौ मृग बानते रुधिरी दियो यसाय । अति हित अनहित होतु है तुलसी दुरदिन पाय ॥ जोसिप भागम जान सव भूत भविष्य धर्तमान । होनहार जव होति हे उलटि जातु है ज्ञान ॥" उस समय मास-सम्राट नेपोलियन की मीठी मीठी बातों से इटली के अनेक कार्यकर्ताओं की बुद्धि पर पर्दा पड़ गया था। उन्होंने समझा कि सचमुच सम्राट तृतीय नेपालियन के हाथ से ही उनके भाग्य का निश्चय होगा। उपर्युक्त घटना होने के दा तीन वर्ष पीछे सारडेनिया शोर श्रास्ट्रिया में अधिक विगाह हो गया। नेपोलियन ने कैबूर से प्रतिज्ञा की कि मास श्रास्ट्रिया के विरुद्ध युद्ध करने को तैयार है। इस सहायता के बदले में बन्दरगाट के नाम से एक कहानी मशहूर है कि दो बिल्लियां प्रापस 'एक रोटी के लिये लड़ रही थीं, अन्त में उन्होंने अपना फैसला एक दर से कराया । बन्दर एक तराजू लेकर रोटी के टुकड़े बराबर तोलने लगा और तराजू के जिस पलडे में अधिक टुकड़ा देखता था, टसमें से बराबर करने के यहाने से खा जाता था। अन्त म इमी भाति थाटते याटते यह सारी रोटी सा गया और विल्लिया मुह सकतीं रह गई। इटली के कई इतिहास-लेखकों का इस विषय में मतभेद है। प्रक इतिहास लेखक ने कपूर और नेपोलियन के इस निधय पर यह बिनोक्कि को यो कि यह कारवाई ऐमे मनुष्य के समान है, मा अपने घर म यह तय हुआ कि इटली के दो सूये (मेनजा और सेवाई) केंच राज्य में मिला लिये जायगे। सन् १८५६ में आस्ट्रिया और सारडेनिया में लडाई छिद गई। दिसम्बर सन् १८५८ में कंवर ने • गेरीवाल्डी को उस के घर से वुलया लिया थोर स्वेच्छासेवकों की सेना का सना- पति बनाया। माल और सारडेनिया की सम्मिलित मना के सामने श्रास्ट्रिया की मेना के पैर उखड गये । कुछ वश चलता न दराकर प्रास्ट्रिया ने कास से सन्धि कर ली। परन्तु इटली के भाग्य में उस समय भी सुस नही बदा था। फास ने थास्ट्रिया न मेल करके इटली की स्वतत्रता को नष्ट कर दिया। वेनिस आस्ट्रिया के पास रहा । लोम्याट पेडमान्ट के राजा को मिला । मोरहिना और टसकनी पूर्ववत् उय कों के अधीन रहे। ब्लोना पुना पोप को दे दिया गया। इन सब प्रान्तों पर पोप' राजा माना गया। इटली के इतने दिनों का परिश्रम व्यर्थ हुआ। सच पूछिये तो तीसरे नेपालियन ने इटली का “यन्दर-वाट" कर दिया । मेजिनी श्रारम्भ त हा इस युद्ध के विरुद्ध था। उस से किमी डाकू की सहायता से एक चोर को निकाल दे, पर इसके बदले अपने घर के अगले और पिछले हिस्से को चादिया टाकू को सौंप दे। वास्तव में उस समय इटली के नेताओं ने, विशेषत कपूर ने, यह कार्य किया था। यह कहावत ठीक ही है कि गुददी ने ताल नहीं छिपते हैं । जिस समय गेरोगाड़ी फैचूर से मिलने गया उस समय उसकी बहुत मामूली पोगाक थी । एक दिन प्रान काल यह कैबूर के घर पहुँचा । कैबूर के नौकर ने गेरीयाल्डी को गली भाति न पहचान कर अपने स्वामी को उसके पाने की सूचना दी। केयूर ने गैरयाली को न समझ कर अपने नौकर हो कहा, उसे पाने दो, मालूम होता है कि कोई गरीय प्रौनान मुझे अजी (६६) की भविष्यवाणी सशी निकली। तीसरा नेपोलियन अपने मन में कुछ और ही सोचे हुए था, पर सकनी की प्रजा को उसके 'बन्दर-बाट” से प्रसन्नता नहीं हुई। अन्त में फिर लागों के कयन का स्मरण होने लगा। ब्लोना तथा उसकनी की प्रजा ने मास के सम्राट तथा आस्ट्रिया के मन्धिपत्र के अनुसार रहना अस्वीकार किया। दोनों देशों की प्रजा मे पेडमाएट के अधीन रहने पर बल दिया । नेपोलियन ने कैपूर से उक गान्तों की बात न मानने के लिये इच्छा प्रकट की। फास के सम्राट यह लिखकर हो चुप नहीं हुए, किन्तु उन्होंने अपने भाई को उक्त प्रान्तों का गवर्नर नियुक्त किया। पर इटली में उस समय लोकमत बहुत प्रवल था। इस लिए उक्त प्रान्तों का विरोव ऐसे प्रबल अान्दोलन द्वारा किया गया कि सम्राट नेपोलियन ने उक्त प्रान्तों को छोड़ देना ही अच्छा समझा। ब्लोना तथा टसकनी की वह अटल प्रतिक्षा देख कर पेउमाएट- नरेश को उक्त प्रान्त अपने अधीन रम्रने के लिये वाध्य होना पड़ा । मेजिनी ने पुन उपदेश प्रारम्भ कर दिया। उसके उप- देशों का साराश यही था कि इटली को सब विराध-भान छोड कर एक हो जाना चाहिये । मेजिनी की इस शिक्षा का इटली के लोगों पर अच्छा प्रभाव पड़ा। देने आया है। इस मांसि प्रसिद्ध राजनीतिज्ञ कपूर से मुनिण्यात रणनीतिश गेरीवाल्टी की भेंट हुई। * मेजिनी इस युद्ध के विरुख था। उसने अपो नरामियों को पहुत चेताया, पर किसी ने सुना नहीं । मेशिनी सर को नीति के विपरीत था। इस लड़ाई के भयर परिणाम को देखकर यहुम न माग फैसूर को देश- दोही कहने लगे।
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अठारहवां परिच्छेद
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सिसिली टापू का युद्ध और सन्धि-रहस्य
"The Goddess of liberty is the most sacred goddess
in the world and before you can approach her, you
should show by your life, life of selfdenial that your are
fit to enter her temple"
-Lala Lajpatras
मेजिनी केवल उपदेशों की झड़ी बांध कर ही चुप नहीं
हुआ, उसने सिसिली टापू में युद्ध का झण्डा उठाने की ठानी।
उसे अपना यह उद्योग सफल होता भी दिखलाई पड़ने
लगा। उसने गेरीवाल्डा को इस कार्य के लिये उभारा । पहले
तो गेरीवाल्डी ने स्वीकार कर लिया, परन्तु अन्त में उसने
सारडेनिया के बादशाह की बातों में श्राकर युद्ध के इस झएडे
को उठाना अस्वीकार किया । गेरीवाल्डी के अस्वीकार करने पर
मेजिनी ने इस युद्ध का भार अपने एक युवक मित्र पाइलों पर
रखा। पाइलो सिसिली का रहनेवाला था। उसने इस युद्ध
में
बडी वीरता दिसलाई । दो सप्ताह तक वह वादशाही मेना के
दात खट्टे करता रहा। अन्त में वह वीरगति को प्राप्त हुश्रा, पर
युद्धक्षेत्र से हरा नहीं।
कहावत है, खरबूजे को देखकर खरबूजा र पलटता है।
का यह कुछ नियम हो है कि एक नाचनेवाले को
देखकर दूसरे नाचनेवाले का कला अपने आप फड़क उठता
. । 1 है, एक गवैये को दूसरे गवैये का गान सुनकर गाने की तबियत होती है, वैसे ही वीरता का हाल है। इस भाति पाइलो को युद्ध में मरते देखकर गेरीवाल्डी ने भी इस युद्ध में योग दिया। बादशाह ने बहुत प्रयत्न किया, कि गेरीवाल्डो इस युद्ध में सम्मिलित न हो, परन्तु अन्त में गेरीवाल्डी को इस युद्ध में सम्मिलित होना पड़ा और उसको इसमें विजय हुई। गेरी- बाल्डी को विजय पर विजय प्राप्त होती चली गई। इस समय तक मेजिनी इटली में ही उपस्थित था । वह बेचारा छुपे छुपे स्वेछासेवक सेना की सहायता करता था ! ७वीं सितम्बर को गेरीवाल्डी ने नेपल्स में प्रवेश किया । इस युद्ध में गेरीवाल्डी ने ऐसी चीरता प्रकट की कि * जन-साधारण उसमें देवी शति का अनुमान करने लगे। गेरीवाल्डी के पाने पर नेपल्स- वासियों ने बडी प्रसन्नता प्रकट की। नेपल्स और सिसिली में इम समय कोई राज्य नहीं था। एक तरह से गेरीवाल्डी उसका कर्ताधर्ता विधाता हुश्रा। इस भाति गेरागल्डी को सफल होते देखकर कपूर को भय हुया और उसके इस अवसर पर भयभीत होने का एक फारण यह भी था कि मेजिनी भी नेपल्स में था। कैबूर ने नवीन विजित प्रान्त को इटेलियन राज्य में सम्मिलित करने का प्रस्ताव किया। उसने सेनापति पेरसानो को लिखा.- "विदेशियों से, बुरे सिद्धान्तों से और पागल आदमियों से इटली की रक्षा करनी चाहिये।" उसको डर था कि कहीं "Garibaldt was regarded rather as the hero of 2 mythical romance than an ordinary, martal of flesh and blood." -JAR Manott. है
अठारहवां परिच्छेद
सिसिली टापू का युद्ध और सन्धि-रहस्य
"The Goddess of liberty is the frost sacred goddess
in the world and before you can approach her, 'sou
should show by your life, life
seifdenial that your are
fit to enfer her temple'
Lala Lajpatrat
मेजिनी केवल उपदेशों की झडी बांध कर ही चुप नहीं
हुथा, उसने सिसिली टापू में युद्ध का झण्डा उठाने की ठानी।
उसे अपना यह उद्योग सफल होता भी दिखतलाइ पड़ने
लगा। उसने गेरीवाल्डा को इस कार्य के लिये उमारा। पहले
तो गेरीवाल्डी ने स्वीकार कर लिया, परन्तु अन्त में उसने
सारडेनिया के बादशाह की बातों में श्राकर युद्ध के इस भएडे
को उठाना अस्वीकार किया गेरीवाल्डी के अस्वीकार करने पर
मेजिनी ने इस युद्ध का भार अपने एक युवक मित्र पाइलो पर
रखा। पाइलो सिसिली का रहनेवाला था। उसने इस युद्ध
घडी वीरता दिखलाई । दो सप्ताह तक वह वादशाही सना के
दात खट्टे करता रहा । अन्त में वह वीरगति को प्राप्त हुआ, पर
युद्धक्षेत्र से हटा नहीं।
कहावत है, खरबूजे को देखकर परबूजा रङ्ग पलटता है ।
समार का यह कुछ नियम हो है कि एक नाचनेवाले का
देखकर दूसरे नाचनेवाले का फूला अपने आप फडक उठता
.
4
( ७१ ) है, एक गवैये को दूसरे गवैये का गान सुनकर गाने की तबियत होती है, वैसे ही वीरता का हाल है। इस भाति पाइलो को युद्ध में मरते देखकर गेरीवाल्डी ने भी इस युद्ध में योग दिया। बादशाह ने बहुत प्रयत्न किया, कि गेरीवाल्डो इस युद्ध में सम्मिलित न हो, परन्तु अन्त में गेरीवाल्डी को इस युद्ध में सम्मिलित होना पड़ा और उसको इसमें विजय हुइ । गेरी- बाल्डी को विजय पर विजय प्राप्त होती चली गई। इस समय तक मेजिनी इटली में ही उपस्थित था । वह बेचारा छुपे छुपे स्वेछासेवक सेना की सहायता करता था। ७वीं सितम्बर को गरीबाल्डी ने नेपल्स में प्रवेश किया । इस युद्ध में गेरीवाल्डी ने ऐसी वीरता प्रकट की कि * जन-साधारण उसमें देवी शक्ति का अनुमान करने लगे। गेरीवाल्डी के आने पर नेपल्स; वासियों ने बड़ी प्रसन्नता प्रकट की । नेपल्स और सिसिली में इस समय कोई राज्य नही था। एक तरह से गेरीवाल्डी उसका कर्ता धर्ता विधाता था। "इस भाति गेरावारडी को सफल होते देखकर कैदूर को भय हुआ और उसके इस अवसर पर भयभीत होने का एक कारण यह भी था कि मेजिनी भी नेपल्स में था। कैबूर ने नवीन विजित प्रान्त को इटेलियन राज्य में सम्मिलित करने का प्रस्ताव किया। उसने सेनापति पेरसानो को लिखा- "विदेशियों से, बुरे सिद्धान्तों से और पागल प्रादमियों से इटली की रक्षा करनी चाहिये।" उसको डर था कि कहीं "Garibaldi was regarded atlier as the hero or a mythical romance than an ordinary martal of flesh and blood." - AR Marriott MAN - 7 U - ( ७० ) मेजिनी के प्रजातन्त्र राज्य के सिद्धान्त का प्रभाव गेरोबाल्डी के हदय पर भी न हो जाय । कही गेरीवाल्डो नेपल्स से रोम पर आक्रमण न कर दे । कैबूर अच्छी तरह म जानता था कि यदि ऐसा हुआ तो मास का मम्राट भी हस्तक्षेप करेगा। परन्तु कैचूर का चाहा कुछ न दुआ । इटेलियन गवर्नमेण्ट ने नये 'प्रान्त का सम्मिलित करना उचित समझा, लेकिन गेरी- बाल्डी ने स्पष्ट उत्तर दिया, -"मैं तब तक नये प्रान्त को इटेलियन राजधानी में सयुक्त नहीं करूगा जब तक उटली के राजा विक्टर इमानुएल की गेम में घोषणा न कर दूं।" कैचूर इस समय बडी सोचा-विद्यारी में पड़ा । अन्त में उसने वाद- शाही सेना को गेरीवाल्टी के मुकाविले में भेजना निश्चय किया। थाहर जो इटेलियन राजदूत थे, उनको उसने लिया | "लाकाटोलिका में गरीबाल्डी के पहुंचने से पहले यदि हम वोलटरोनो न पहुंचे तो राज्य नष्ट हो जायगा और इटली सदैव राजद्रोह का शिकार बना रहेगा।" इस अवसर पर वादशाहो सेना दक्षिण की ओर जा रही थी और गेरीवाल्डी की सेना उत्तर की ओर जा रही थी। कैबूर ने निश्चय कर लिया कि बादशाही सेना गेरोधाल्डो के आने से पूर्व रोम में पहुँच जाय । दुरदशी मेजिनी, कैचर की यह नीति समझ गया, उसने शीघ्र कैबूर की इस चालम सावधान होने के लिये गेरी- बाल्डी को चेतावनी दी। गेरीवाल्डी को जो पत्र उसने भेजा था, उसका साराश यह है कि यदि तुमने तीन सप्ताह से पूर्व रोम अथवा वेनिस की और कुच न किया तो तुम्हारा प्रारम्भ किया हुश्रा काम चौपट हो जायगा। मेजिनी की यह चिट्ठी प्राप्त हाने पर गेरीवाल्डी चोलटनों के उत्तरीय किनारे पहुंचा। पहली श्रम्हवर को बोलटनों पर लडाई हुइ । फरासीती सेना । 1 - - ( ७३ ) तितर-बितर हो गई। उसके बादशाह ने गेटा में शरण ली। गेरीवाल्डी का अपनेराजा विष्टर इमानुपान से भी मुकाविला हुआ। । पीरवर गेरीयाल्डी जैसा युद्धक्षेत्र में पीठ दिखाने वाला नहीं था, वैसा ही वह अपनी धात का वडा पका और सच्चा या। बादशाह के नेपल्स में पाने के पूर्व उसने वहा के जन- साधारण को बधाई को सूचना दी, जिसका पाराय यह था कि कल जाति का निर्वाचित राजा विक्टर इमानुएल श्रावेगा। वह उम सीमा को तोडेगा, जिसने शताब्दियों से हमको देश के शेष भाग से पृथक कर रखा है। वह परमेश्वर का भेजा हुन्ना पा रहा है। उसका हमें हदय से स्वागत करना चाहिये। श्रव हमको श्रापस का भेदभाव त्याग देना चाहिये, अब कोई राजनेतिक रज, दत अथवा विचार नहीं रहना चाहिये । इस माति गेरीवाल्डी और गजा ने माथ ही साथ नेपल्स में प्रवेश किया-इस भाति गेरीवाल्डी, नयी प्रजा को राजा का परिचय देकर, विना रिसी लालमा के, बिना किसी प्रकार के पाटर- सत्कार के, अपनी तलवार के वल से जीता हुश्रा देश राजा को समर्पित करके कापरा चला गया। इसके पश्चात् १८वीं फरवरी १८६१ को येनिस और गेम को डाड कर इटली के समस्त भागों के प्रतिनिधि हरीन की पालीमेण्ट में पहली बार एकत्रित हुए । इस पार्लीमेण्ट का 20 मेजिनी गेरीयारडी के इस काय्य को सुनकर पड़ा श्रमसम हुआ। इस स्थान पर गरीबी और मेजिनी दो के भक्तों ने एक दूसरे को दोपो ठहराया है। गेरीवाल्डी से मागण कहते हैं कि उसमे धादाने प्रतिमा की थी कि मे रोम पर याममय करूगा । मेशिनी बादशाद के आने से पहले ही शहर छोड़ कर चल दिया। * . .
( ७४ ) । सब से पहला कार्य नियमानुसार नयी राजधानी का स्थापित फरना था। दूसरा कार्य राजा विक्टर इमानुएल के इटली के राजा होने की घोषणा करना था। परन्तु इस पर भी प्रायः सभी लोगों के चित्त में रोम और वेनिस का अलग रहना खटक रहा था। मेजिनी का लक्ष्य बरावर अपने उद्देश्य की पूर्ति का था। उसने रोम पर चढ़ाई करने की प्रबल चेष्टा की। इसमें सन्देह नहीं कि कैबूर की इच्छा भी रोम को सम्मिलित करने की थी। किसी किसी इतिहास लेखक का कथन है कि कैबूर ने कहा था, कि रोम के राजधानी हुए विना कभी इटली में "दृढता से एकता का प्रचार नहीं हो सकता है। परन्तु कैबूर और मेजिनी की पारस्परिक कायप्रणाली में विशेष भेद था। मेजिनी तो कैबूर की नीति से असन्तुष्ट था ही, किन्तु १ची पप्रेल को अपनी एक वाकृता में गेरीवाल्डो ने भी कैर की नीति के सम्बन्ध में बहुत कडे शब्द कहे थे। अस्तु सन् १८६२ में वहुत से व्यक्तियों ने गेरीवाल्डी से रोम पर आक्रमण करने के लिये विशेष अनुरोध किया। वह भी कुछ स्वेच्छा- सेवकों की सेना एकत्रित करके रोम पर आक्रमण करने को प्रस्तुत हुआ। किन्तु मेजिनी का अनुमान था कि बादशाह रोम पर आक्रमण करना स्वीकार नहीं करेगा। क्योंकि उसके रोम पर आक्रमण करने से सम्राट नेपोलियन के क्रोधित हो जाने का भय है । इसलिये पहले वेनिस को स्वतन्त्र कराने की चेष्टा की जाय । इसी विचार से मेजिनी ने गेरीवाल्डी को रोम पर आक्रमण न करने की सलाह दी। परन्तु गेरीवाल्डी ने मेजिनी की एक नहीं सुनी, और अन्त में बिना सोचे-विचारे उसने गेम पर आक्रमण करने की तैयारी कर दी। गरीबाल्डी निकपट और सरल हृदय काथा । उसने बादशाह के छल और -
( ७५ )
कपट को नहीं समझा। बादशाही सेना ने उसकी सेनाकामार्ग
रोक लिया, तब भी उसने यह श्राक्षा दी कि यादशाही सेनापर
गोली न चलाई जाय, क्योंकि गेरीवाल्डी समझे हुए था कि
बादशाही सेना उसके मार्ग में कएटक-स्वरूप नहीं है। किन्तु
नहीं, गेरीबाल्डी की यह भूल थी, शाही सेना ने गोली दाग दी।
इससे उसकी सेना के स्वेच्छासेवक तितर-बितर हो गये।
*गेरीवाल्डी घायल हुश्रा और उसको गवर्नमेएट ने कैद कर
लिया । परन्तु इतने पर भी मेजिनी अपने कार्य की उपेक्षा नहीं
करता था। वह पुन इटली में एकता का प्रचार करने का उद्योग
करने लगा। मन् १८६३ में जब पोलएड और रूस में ठनी तक
फिर मेजिनो ने अपने देशवालों को चेताया कि वेनिस पर
प्राक्रमण कर लोगों में जागृति के कुछ चिन्ह प्रकट होने लगे
के गदशाह ने भी मेजिनी को एक पत्र लिख कर धेनिस पर
प्राक्रमण करने की इच्छा प्रकट की। मेजिनी ने उसका यह स्पष्ट
उत्तर दिया कि वह न तो वादशाह पर विश्वास करता है,
और न वादशाह के साथ मिलकर कार्य करना चाहता है। यदि
दशाह वेनिस पर चढ़ाई करना चाहता है तो उसे उचित
है कि वेनिस-वासियों को अपने यल भरोसे पर छोड दे,
रीवाल्डो को सम्पूर्ण अधिकार दे दे। गेरीवाल्डी म्वेच्छा-
तेरकों की सेना इकट्ठा करेगा और श्रावश्यकता के अवसर पर
सहायता देगा। इस भाति मेजिनी यादशाह की चिकना-चुपड़ी
गतों में नहीं पाया। उधर बादशाह ने एक और चाल चली
के लुइस नेपोलियन और बादशाह विस्टर के बीच में एक
जिसने गेराल्डी पर गोली चलाई थी उसको बादशाह ने एक
N पद पर नियुक्त किया।
सन्धिपत्र लिम्बा गया । नेपोलियन ने यह प्रतिमा का कि वह
फ्रेच मना को रोम मे हटा लेगा, लेकिन बादशाह पाप को
गद्दी पर स्थिर रखेगा। टूरिन राजधानी न रहकर फ्लारेन्स
रहेगी। पाप से यह भी ठहराव हो गया था कि यह सेना आदि
के संगठन में कुछ हस्तक्षेप न करे । परन्तु सर्वसाधारण इस
सन्धिपत्र से सन्तुष्ट नहीं हुए। क्योंकि कहा जाता है कि इस
सन्धिपत्र के माय एक और गुप्त प्रतिज्ञापत्र था, जिसमें
यह
ठहराव हुआ था कि शहर पेडमान्ट का बहुत मा भाग फ्रान्स
को दे दिया जायगा और वेनिस में श्रास्ट्रिया शामन करता
रहेगा। मेजिनी ने किसा प्रकार इन सब प्रतिज्ञापत्रों की टोह
लगा लो ओर सर्वसाधारण में इन प्रतिज्ञापत्रों की सब बातें
प्रकाशित कर दी। सर्वसाधारण में इन प्रतिज्ञापत्रों के प्रकाशित
हो जाने पर इतनी हलचल मची, कि जिन मन्त्रियों के इन
प्रतिज्ञापत्रों पर हस्ताक्षर कहे जाते हैं, उनको मेजिनी के कथन
का सण्डन करना पड़ा 1 तीसरी फरवरी को प्रातःकाल विना
किसी सूचना के विक्टर इमानुएल को अपनी पहली राजधानी
छोड कर फ्लारेन्स को पाना पड़ा। कहते हैं, नेपोलियन के
महामत्री ने बादशाह को यहां तक धमकी दी थी कि यदि
बादशाह पाप के राज्य की भली भाति रक्षा न की तो केवल
फ्रास ही नहीं, बल्कि यूरोर के समस्त रोमन कैथोलिक उसके
राज्य पर चढ़ धावेंगे। इस धमकी का बडा हीभ यर फल
हुआ। राणीय दलवालों के साथ वडे बडे अत्याचारों का जा
परिणाम हाना चाहिये था, वही हुआ। अत्याचारों के कारण
लोग विशेष उतेजित दोगये।
कोई कोई इतिहास-लेग्वक कहते है कि मेजिनी की बात सची
यो । मन्त्रयों ने ही पालीमेण्ट में सवसाधारप के प्रांदोलन के कारण मर
बोला था।
उन्नीसवां परिच्छेद
।
-
युद्ध
और वेनिस पर
विजय
"पातितोऽपि करापातरूपतत्येष कन्दुक" महरि
उस समय इटली-निवासी अपने कार्य की साधना में तो
जुटे हुए थे दी कि परमात्मा की कृपा स एक और सुयोग प्राप्त
हुआ। इस सुयाग के सम्बन्ध में यदि यह कह दिया जाय कि,
दिल्ली के भाग्य से छीका टूटा तो अनुचित न होगा। इटली वेनिस
की श्रीर ठीक वैसे ही ताक लगाये हुए था जैस विली छीके
पर रखे दूध के कटोरे की पोर आम् लगाय रहती है । इस
वर्ष प्रशिया और श्रास्ट्रिया में युद्ध ठन गया । मार्च मास में
प्रशिया ने इटली से मित्रता कर ली, जिसमें यह ठहराव हुया
कि प्रशिया भास्ट्रिया से तर तक लडेगा जय तक धद वेनिस
के पास शहर और किले को छोड कर समस्त भागों को इटली
कानददगा। मेजिनी भी इस अवसर पर चुप न था,
उसने
श्रखवारों में इस श्राशय के लेख लिखने शुरू कर दिये कि इटली-
यासियों को अपने पाहुवल पर भरोसा रख कर नास्ट्रिया से
युद्ध करना चाहिये, सास अथवा प्रशिया स सहायता लेना,
एक प्रकार से नया झगडा परीदना हे । क्योंकि युद्ध की
समाप्ति के पश्चात् इसके बदले में, कृतज्ञता-स्वरूप, उन्हें अवश्य
कोई न कोई प्रान्त देना पडेगा। मेजिनो की ये विडिया बड़ी
ही जोशीली थी। इन चिडियों में उसने अपने देश भाइयों से
म्वेच्छासेना होकर आन्ट्रिया से युद्ध करने का मादेश किया
( ७६ )
सन्धिपत्र लिखा गया। नेपोलियन ने पहा
फेञ्च मना को रोम से हटा लेगा, लेकिन ६
गहो पर थिर रमेगा। हरिन राजधानी में
रहेगी। पोप से यह भी ठहराव हो गया था
के संगठन में कुछ हस्तक्षेप न करे । परन्तु
मन्धिपत्र से सन्तुष्ट नहीं हुए। क्योंकि कहा,
सन्धिपत्र के माय एक और गुप्त प्रतिज्ञापत्र
ठहराव हुया था कि शहर पेडमान्ट का बहु
को दे दिया जायगा और वेनिस में आस्ट्रि
रहेगा। मेजिनी ने किसा प्रकार इन सब प्र
लगा लो अोर सर्वसाधारण में इन प्रतिसापर
प्रकाशित कर दी। सर्वसाधारण में इन प्रति
हो जाने पर इतनी हलचल मची, कि जि
प्रतिज्ञापत्रों पर हस्ताक्षर कहे जाते हैं, उनक
का पण्डन करना पड़ा। तीसरी फरवरी
किसी सूचना के विक्टर इमानुएल को अपर्न
छोड कर फ्लारेन्स को श्राना पड़ा। कहर
महामनी ने वादशाह का यहा तक धमई
बादशाह
ने पाप के राज्य की भली भाति
फ्रास ही नहीं, बल्कि यूरोर के समस्त रोम
राज्य पर चट धागे। इस धमकी का घर
हुया। राप्रीय दलवालों के साथ बड़े वर
परिणाम होना चाहिये था, वही हुया।
लोग विशेष उतेजित होगये।
कोई कोई इतिहास-लेग्वक कहते हैं कि
यो । मन्त्रयों ने ही पानीमेपर में सवमाधारण
बोला था।
उन्नीसवां परिच्छेद 1 युद्ध और वेनिस पर विजय "पातितापि करापातरूपतत्येय कन्दुक भर्तृहरि । उस समय इटली-निवासी अपने कार्य की साधना में तो जुटे हुए थे ही कि परमात्मा की कृपा से एक और सुयोग प्राप्त हुया । इस सुयोग के सम्बन्ध में यदि यह कह दिया जाय कि, दिल्ली के भाग्य से छीका टूटा तो अनुचित न होगा। इटली वेनिस का पोर ठीक वैसे ही ताक लगाये हुप था जैसे विली छीके पर रखे दूध के कटोरे की घोर आलं लगाय रहती है । इस धर्ष प्रशिया पोर श्रास्ट्रिया में युद्ध ठन गया । मार्च मास में प्रशिया ने इटली से मित्रता कर ली, जिसमें यह ठहराव हुआ कि प्रशिया भास्ट्रिया से तब तक लडेगा जब तक वह बेनिन के खास शहर और किले को छाड कर समस्त भागों को इटली को न द टेंगा । मेजिनी भी इस अवसर पर चुप न था, उसने अखबारों में इस प्राशय के लेय लिखने शुरू कर दिये कि इटली- यासियों को अपने धानुवल पर भरोसा रन कर नास्ट्रिया से युद्ध करना चाहिये, काम अथवा प्रशिया स सहायता लेना, एक प्रकार से नया झगडा नगदना है । क्योंकि युद्ध की समामि के पश्चात् इसके बदले में, कृतज्ञता-स्वरूप, उन्हें अवश्य में कोई न कोई प्रान्त देना पडेगा। मेजिना की ये चिट्ठिया बड़ी ही जाशीली थी। इन विडियों में उसने अपने देश-भाइमा से ! स्वच्छासत्य दोकर श्राम्दिया से युद्ध करने का मादेश किया
,
-
( ७८ )
था । इटली की सरकार मेजिनी की इन चिहियो से यहां तक
घवडाई हुई थी कि जिन समाचारपत्रों में यह चिट्ठियां प्रका-
शित हुई थीं, उन पत्रों को उसने रोक दिया । परन्तु मेजिनी के
विचार इटालियन सरकार के द्वारा इस भांति रोके जाने पर
भी ४५ हजार स्वेच्छासेवक श्रा जुटे। युद्धसचिव स्वेच्छा-
सेवकों के उत्साह और उमङ्ग को देखकर यहा तक भयभीत
हुए कि उन्होंने यह कह कर सेना को टाला कि राज्य
की सेना आवश्यकता से अधिक है। लोगों का उत्साह
इस भाति देखकर २०वी जून को इटली ने श्रास्ट्रिया से
युद्ध की घोषणा कर दी। श्रास्ट्रिया ने १,००,००० सैनिक
द्वीप को भेजे और २७ जहाज थे। इटली ने भी तीन लाख
श्रादमी और ३६ जहाजों का वेडा आस्ट्रिया के मुकाबले को
भेजा। इस युद्ध में जल और थल में इटेलियन सेना की क्षति हुई,
परन्तु प्रशिया ने श्रास्ट्रिया की सेना को विशेष पददलित कर
दिया। श्रास्ट्रियाने निराश होकर वेनिस प्रान्त तीसरे नेपो-
लियन को भेट कर दिया। इटली ने फास से, वेनिस प्रान्त को,
प्राप्त किया। १६वीं अक्टूबर सन् १८६६ को सेन्टमार्क पर इटे-
लियन झण्डा फहराने लगा। ६,४७,३८४ नागरिकों ने विक्टर
इमानुएल के शासन के लिये सम्मति दी, केवल ६६ सम्मतिया
इसके विपरीत श्राई। ७वीं नवम्बर को विक्टर इमानुएल
ने यडी धूमधाम से वेनिस में प्रवेश किया।
-
वीसवां परिच्छेद - आशा में निराशा "येनैवाम्बर खडे सवीतो निशि चन्द्रमा । लेनैव च दिवा भानुरहो दोर्गस्यमेसयो" ॥ -महरि यह लोकोक्ति प्रचलित है कि "कानी के विवाह को सौ कोसों" सो ही दशा इटली की हुई । यह सब होने पर भी मि का प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहा। तत्कालीन मन्त्री रिका- सोली को वेनिस प्रान्त इटली की राजधानी में सम्मिलित करने का सोभाग्य प्राप्त था । परन्तु वह आस्ट्रिया से सन्धि हो जाने के पश्चात् थोड़े,मास ही मन्त्री रहा । उसने रोम- हरवार से, जो धर्म-सम्बन्धी मामले थे, उनका निपटारा रना चाहा । इस निबटारे के लिये उसने चेष्टा भी की। उसने एक ऐसे कानून का मसविदा बनाया, जिसमें धर्माचार्य तथा राज्य दोनों शक्तियों को स्वतन्त्रता रहे। इस मसविदा का जन-साधारण ने प्रबल प्रतिवाद किया। अपवारों में इस मसविदे के विरोध में बहुत से लेस निकले, और सभाएँ इसके प्रतिवाद में हुई। सरकार ने कितनी ही मभाएँ चन्द कर दी, परन्तु राजसभा में मन्त्री का यह कानून पास न हो सका। इसलिये उसने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया, जो वीकृत होगया। इटली के दुर्भाग्यवश उस समय मेजिनी और गेरीवाल्डी । बहुत सी ८०) - में भी मतभेद हो गया था। परन्तु मेजिनी शान्त नहीं था, वह पहले के समान ही अपनी कलम के बल से जोशीले लेखों द्वारा सर्वसाधारण में रोम के विजय करने का विचार फैला रहा था। गेरवाडी यहा समझे हुए था कि बादशाह उसका साथ देगा। गेरीवाल्डी ने प्रथम सूचना, स्वेच्छालेवकों को इकट्ठा करने के लिये, सन् १८६७ के जुलाई मास में प्रकाशित की। जिसमें उसने रोम पर आभामण करने के लिये इटेलियनों से अपील की थी। उसके पश्चात् उसने १६वी सितम्बर का एफ पत्र श्रोर प्रकाशित किया। जिसमें उसने दस हजार नवयुवकों से तैयार होने के लिये प्रार्थना की थी। गेरीवाल्डी की यह प्रार्थना वहरे कानों पर नहीं पड़ी। पलारेन्स तथा दूसरे स्थानों में रोम राज्य पर आक्रमण करने के लिये छुपे छुपे तैयारिया होने लगी, और बहुत से नवयुवक सीमा पर भेजे गये। गेरीवाल्डी का यह अनुमान मिथ्या निकला कि बादशाह उसका साथ देगा। गेराबाल्डी फ्लारेन्स स अपनी स्वेच्छासेवक सेना की अध्यक्षता के लिये चला गया और पलेसेन्डिया के किले में वन्द किया गया। परन्तु इस आकस्मिक विपत्ति के आ जाने पर भी स्वेच्छा- सेवक सना तितत-वि नहीं हुई, उसने अपने उद्देश्य की पूत्ति की योर ध्यान रखा। स्वेच्छासेवकों की प्रेमी दृढता देखकर, अथवा किसी पार नीतिवश, गवर्नमेट ने गेरीवाल्डी को कैद से एक साधारण सी इस शत पर छोड दिया कि वह आगे से केपरेरा में शान्तिपूवक रहे। किन्तु वेच्छासंवक सना गेरीवाल्ही के पुत्र, मेनोटी गेरीवाल्डा की अध्यक्ष्ता में । होम की ओर चलने लगी। विटेरवों से गेरोबाल्डा की सना ।
में से दो सो श्रादमिरों का एक दल पहुँच गया और उसी
समय टा पलटने सीमा पर होकर निकल गई।
१४वीं अक्टूबर को करारा टापू से गेरीवाल्डो भी श्राकर
अपने लड़के की सेना में, जो उस समय रोमेगिना में थी,
सम्मिलित हुया । गेरोबाल्डी और उसके बेटे, दोनों की सम्मि-
लित मेना रोम की ओर बढी । इसके पश्चात् १६वीं अहवर
का यह भयङ्कर समाचार सुनाई पडा कि यदि इटालियन
गवर्नमेण्ट गेरीवाल्डी के दल को रोकने की चेष्टा नहीं करेंगी,
तो लाचार होकर मञ्च सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना
पडेगा । इटालियन सरकार इस समय बडे सङ्कट में पडी,
"दुविधा में दो गये, माया मिली न राम" उसके लिये प्रश
गवर्नमेएट का दमन करना, जितना कठिन था, उतना ही
गरोबाल्डियन सेना को दमन करना भी फठिन था। क्योंकि
गेरीवाल्डी की सेना जल के प्रवल वेग के समान आगे बढी
चली जा रही थी। २५वी अक्टूबर को गेरीवाल्डी की सेना
ने पोपों के सवारों पर मोन्ट रेनडे पर भयङ्कर विजय प्राप्त की।
जर मञ्च सरकार ने देखा कि गेरीवाल्डी की सेना बढती
ही चली जा रही है तव सम्राट तीसरे नेपोलियन ने भी फ्रेंच
सेना गेरीवाल्डी की स्वेच्छामेवक-सेना के मुकाबिले के लिये
भेजी। दोनों सेनाओं को मुठभेड एक छोटे से गार के पास हुई।
यद्यपि स्वेच्छासेवकों की संख्या अधिक थी, तथापि फ्रेञ्च सेना
का सङ्गठन अच्छा था, उसके पास शस्त्र-शस्त्र खूब थे, जिसके
कारण फ्रेञ्च सेना के सामने स्वेच्छासेवक सेना ठहर न मपी।
गेरीवाल्डी ने अपनी सेना को लोटने की आज्ञा दी। इटालियन
गवनमेण्ट ने उसको गिरतार कर लिया और जब तक शान्ति
ना हा गई, तब तक उसको नहीं छोड़ा।
- (२) म्वेच्छासेवकों की सेना का सारा परिश्रम व्यर्थ हुआ। रोम फिर मचों के हाथ में चला गया। राजा विक्टर इमानु- एल ने इस अवसर पर दूरदर्शिता से कार्य किया। जहा उसने गेरीवाल्डी को गिरकार किया था, वहा उसने तीसरे नेपोलि- यन को भी एक पत्र लिखा था, जिसमें उसनेसम्राट नेपोलियन से यह अपील की थी कि वह अपने को पोपों क फन्दे से निकाल कर यूरोप के लिबरल दल का प्रधान बनाये। इस पत्र में विस्टर इमानुएल ने यह भी लिखा था कि अन्तिम घटना ने इटलीवासियो के हदय से फ्रास के प्रति पुरानी प्रतिज्ञा का भाव मेट दिया है। अव गवर्नमेंट की शकि में फास से मित्रता का निचाहना कठिन प्रतीत होता है । मेनटेना के युद्ध ने मृत्यु- सदृश धका पहुँचाया है। परन्तु नेपोलियन ने वादशाह की अपील पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। सुनते है कि वैदेशिक विभाग के मत्री ने कहा था "अब रोम इटालियन गवर्नमेंट के पास कभी नही रहेगा"। फ्रेञ्च मनी के इस कथन पर उमानुएल ने अपना बड़ा भारी अपमान समझा । उसने कहा कि "हम दिखला देंगे कि कैसे रोम फिर इतालियन गवर्नमेंट के हाथ में नही आवेगा" । विस्टर ने मञ्च पन्त्री के उपर्युक्त शब्दों पर इतना क्रोध प्रकट किया कि हार कर फ्रेञ्च मन्त्री को उक्त शब्दों के लिये क्षमा- प्रार्थना करनी पड़ी। मिस्टर ने इस समय पुराने मत्रि-मगडल के स्थान में नये मन्त्रिमण्डल का सगठन किया । पुगने मन्त्रियों में से सात मन्त्री नवीन मन्त्रिमण्डल में रहे। सन् १६ के लगातार युद्ध मे स्टली की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं रही। नये १ (५) पद हो जायेंगी। इन उत्पातों का नाम निशान भी नहीं रहेगा मञ्च सरकार मेनेवेरा को सम्मति से सहमत नहीं हुई और मेनेरेराने अपनी बात चलती न देस फर सन् १८६81 मार्च के अन्त में अपने पद का परित्याग कर दिया । इस बीच में श्रोर भी बहुत सी बाते दोनों पार हुई, पर कुछ फल न हुआ। अन्त म सन् १८७० में जुलाई मास के बीच में जर्मनी और मास में लडाई चेत गई । इस लडाइ का चेतना ही इटली के भाग्य में छीका टूटने की कहावत के अनुसार हुना । इस युद्ध के कारण झञ्च गवर्नमेण्ट के सारे हौसले हट गये । "मेरे मन कुछ और है, कर्ता के मन श्रोर" फ्रेञ्च गयनमेण्ट जो कुछ सोचे हुई थी, उसके विपरीत हुश्रा । फ्रेंच गवर्नमेण्ट, इस युद्ध के चेत जाने से, पोप की सरतकता नहीं कर सफी । लाचार होकर उसको अपनी सेना वहा से हटानी पडी । अपनी लोकलज्जारपने के लिये प्रेञ्च सरकार ने सेना हटाते समय बडी वडी लम्बी बातें बनायां । जैसे एक लोमडी को अगूर हाथ न थाने से सारे अगूर सट्टे मालूम होने लगे, वैसे ही उस समय फ्रेञ्च सरकार को रोम में सेना हटाते समय बहुत से बहाने बनाने पडे । दूसरे राष्ट्रों के सामने उसकी हसी न हो, अन्य शक्तिया उसका उपहाम न करें-इसलिये उसने एक युक्ति चली, और वह युक्ति यह थी कि सेना को हटाते ममय जैश गर्नमेण्ट ने कहा था कि हम १५वीं सितम्बर के कोनशन में प्रदर्शित राजभक्ति पर विश्वास करके अपनी सेना हटाते हैं। ती विल्ली चूहों से कान कटाती है"। फेञ्च गवर्न- भारी उदारता को देखकर विक्टर इमानुएल कपन लिय कर पोप के पास अपना राज- इमानुपल में पोप को पूजनीय
इक्कीसवां परिच्छेद
-
--
--
"
रोम का पतन
"Injustice will bring down the mightiest to ruin
Lord Salisbury
रोम का भी अन्त समय था पहुँचा । बडे बडे अत्याचार
फरनेवालों के हृदय भी न्याय के जरा से पत्ते के सटकने पर
ही दहल जाते हैं, परन्तु अब तो इटली में अन्याय के कटीले
वृक्षों के उसाडने के लिये प्रचण्ड अाधी चल चुकी थी।
ऐसी दशा में भला फिर कब तक पोप धाधल मचाता रहता ?
जिन शासनों की नीव अन्याय और अत्याचारों पर होती है,
चे चाहे जितने बलवान् और सुदृढ़ क्यों न हो, पर अन्त में
न्याय और सत्य के सामने वे नहीं टिकते है। बस पोपों के
अत्याचारों की भी सीमा समाप्त हो चुकी थी।
जिन दिनों पालीमेण्ट इटली की प्रार्थिक स्थिति के सुधार
में लग रही थी, उन दिनों तत्कालीन इटालियन मन्त्री मेनेवेरा
ने फ्रेञ्च सरकार से रोम में स फ्रेञ्च सेना हटाने का अनुरोध
किया। इटालियन मन्त्री ने मञ्च सरकार को यह भी आश्वासन
दिया था कि पोप को धार्मिक स्वतन्त्रता पूरी रहेगी और पोप
के ऋण में से बहुत से भाग का भार इटली ले लेगा । ऐसा
करने से इटली में सर्वत्र शान्ति छा जायगी । राजविद्रोहसम्बन्धी
सान्दोलन सब ग्रस्त हो जायेंगे । गुप्त सभाप नादि सव
. ( ५ ) पद हो जायेंगी। इन उत्पातों का नाम-निशान भी नहीं रहेगा फ्रेञ्च सरकार मेनेवेरा को मम्मति से सहमत नहीं हुई और मेनेराने अपनी वात चलतो न देख कर सन् १६E में मार्च क अन्त में अपने पद का परित्याग कर दिया । इस बीच में श्रोर भी बहुत सी बातें दोनों पार हुई, पर कुछ फल न हुआ। अन्त म सन् १८७० में जुलाई मास के बीच में जर्मनी और फ्रास में लडाई चेत गई । इस लडाई का चेतना ही इटली के भाग्य में छोका दृटने की कहावत के अनुसार हुा । इस युद्ध के कारण फेञ्च गवर्नमेएट के सारे हौसले टूट गये । “मेरे मन कुछ और है, कर्ता के मन और" फ्रेञ्च गवनमेण्ट जो कुछ सोचे हुई थी, उसके विपरीत घुश्रा । फेञ्च गवर्नमेण्ट, इस युद्ध के चेत जाने से, पोप की सरक्षकता नहीं कर सकी । लाचार होकर उसको अपनी सेना वहा से हटानी पडी । अपनी लाम्लजारसने के लिये मञ्च सरकार ने सेना हटाते समय बडी वही लम्बी बातें बनायो । जसे एक लोमडी को अगूर हाथ न श्राने से सारे अगूर सट्टे मालूम होने लगे, वैसे ही उस समय मञ्च सरकार को रोम में सेना हटाते समय बहुत से वहाने बनाने पडे। दूसरे राष्ट्रों के सामने उसकी हँसी न हो, अन्य शक्तिया उसका उपहास न करें--इसलिये उसने एक युकि चली, और वह युक्ति यह थी कि मेना को हटाते समय फेञ्च गर्नमेण्ट ने कहा था कि हम १५वीं सितम्बर के कोनवेशन में प्रदर्शित राजभक्ति पर विश्वास करके अपनी सेना हटाते हैं। ठीक ही है, "दवी दिल्ली चूहों से कान कटाती है"। फ्रेञ्च गर्न- मेट की इस लाचारी उदारता को देखकर विक्टर इमानुएल ने अपने हाथ से एक पन लिस कर पोप के पास अपना राज- दूत भेजा । उस पत्र में विक्टर इमानुपत ने पोप को पूजनीय ७ पिता और अपने को पुत्र कह कर सम्बोधन किया था। इस पत्र का श्राशय यह था कि वह राजकीय सेना को, जो रोम के वाहर स्थित है, रोम में प्रवेश करने दे और रोम राज्य में पाप के अधिकार और शान्ति की रक्षा के लिये रहने दे । पोप ने राजा का यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया। उसने ११वीं सितम्बर सन् १८७० को जो पत्र वादशाह को भेजा, उसमें उक्त प्रस्ताव को स्पष्ट अस्वीकार किया। अन्त म लाचार होकर गवर्नमेंट ने अपने जनरल रेफेऐली फेडोरेना को अपनी सेना सहित सीमा पार करने की प्राज्ञा दी। और उसी समय यूरोप के अन्य राज्यों को गश्ती चिट्ठी भेज कर सूचित किया कि रोम का इटालियन राज्य में शान्ति और प्रेमपूर्वक सम्मिलित होना असम्भव है । इस चिट्ठी में यूरोप की शक्तियों को यह भी विश्वास दिलाया गया था कि पोप की धार्मिक स्वतन्त्रता पूर्णतया स्थिर रसी जायगी । ११वीं सितम्बर को केडोरेना ने पोप के राज्य में प्रवेश किया और रहवीं सितम्बर को रोम के परकोटे के पास पहुंच गया। इटालियन सेना के आगमन की यात सुनकर नवे पायस पोप ने भी वारशाही सेना के मुकाविले की ठानी। उसने अपनी सेना के सेनापति को जो चिट्ठी भेजी थी, उसमें लिखा था कि रोम के परकोटे की दीवाल थोडी सी टूटने पर भी बादशाही सेना का सामना करना चाहिये, और हुआ भी ऐसा ही । २१वीं सितम्बर को इटालियन सेना ने पाया और सोरालारा तया सेएट जीन और सएट पेनफारस दरवाजों के बीच में तो दागनी शुरू कर दी। रोम का इस भाति पतन होते देखकर पोप की सेना ने अग्नि वरताना बन्द दिया, और अपने तोपसानों पर सफेद झडा फहरा दिया। ५ ने एक दृत केडारेना के पास भेजा और शीघ्रता से यह निश्वय हो गया कि रोम केवल *लेनाईन शहर को छोड कर सव समर्पण कर देगा। यह निश्चय होजाने पर पोप की सेना युद्ध-सम्मान से सम्मानित की गई, पर साय दी उन्हें अपने भएडे और हथियार रखने के लिये लाचार किया गया। जो कृपक सिवाहा हाकर पाये थे, वे अपने घर भेज दिये गये और सब विदेशी सैनिकों का इटालियन सरकार ने अपने मर्च से उनके घर भेज दिया। इस भाति बेचारे रोम का पतन हुया । जिस पोप का एक दिन यूरोप भर में श्रातङ्क छा रहा था, जिसको लोग केवल इस लोक का ही राजा नहीं, परलोक का भी समझते थे, जिसके इशारे पर यूगर की जनता नाचती थी, जिसके चरणों में बडे बडे सन्नाट पपने मस्तक नवाने में अपने को गोरमान्वित समझते थे, उसका क्षय होते होते इतना हागया रि वह केवल एक साधारण ठाकुर के अतिरिक्त और कुल नहीं रहा। हमारे अनेक सहदय पाठक पोप की इस दशा पर कहेंगे कि यह समय का फेर है, भाग्य की बात है, होनी को कोन टाल सकता है, प्रथया यह देवगति हे-ऐसा विचार करने वाले प्यारं पाठको ! यह विधि का विधान नहीं हे । भाग्य, होनी अथवा देवगति सद कमा के सामने नहीं किमी क्सिी इतिहासलेखक के कथन से ज्ञात होता कि इटली को यह जीत महंगी पड़ी थी । सुबह साढे पाँच बजे से दस बजे तक अग्निवर्षा होती रही। दस बजकर दस मिनट पर सफेट कपडा फहराया गया। इस युद्ध मे दोनो योर से कितने मनुष्य मारे गये, इसका ठीक पता नहीं लगता है । इटालियन सेना का कथन था कि केनल ३२ श्रादमी उसकी पार के मारे गये और १४३ अान्मी घायल हुभार कुछ लोगो ने लग- भग दो हजार जनमण्या की हानि का अनुमान किया था । लोक हो, लगातार प्रयल करने से अन्त में इटलोनिवासियों को सफलता प्राप्त दुइ ।
टिकने है। प्रत्येक राष्ट्र अपने कर्मों में ही बनता-विगडता है। इसी लिये तो राजर्षि भर्तृहरि ने स्पष्ट कहा है कि भाग्य अथवा दैवगति कर्मा के अधीन है। गेम के पतन होने का कारण भा पोपों के कर्म थे-ओर उनके वे कर्म ये जिनको लोग सहन करने को तैयार नहीं थे। अन्याय के कटीले वृक्ष चाहे जितने सुदड क्यों न हो, किन्तु वे न्याय प्रोर सत्य रूपी पचन के सामने ठहर नही सकते है। यही कारण है कि पोप-साम्राज्य का पतन हुया । अज्ञानरूपी तिमिर का क्षय हुया, भला तब ऐसी दशा में पोप का शासन कब तक ठहर सकता था- "सत्य का बोलवाला और झूठे का मुह काला" यही वात हुइ । -- 4TAS - बाइसवां परिच्छेद रोम पर अधिकार "Unselfish work lays God under debt, and God is bound to pay bich sith interest' Swami Ram Turth प्रयत कभी निष्कता नहीं जाता है। सफलता उद्योग की दासी है। विना परिश्रम शोर स्वार्थत्याग किये सफलता फी शाशा करना ठीक वैसाही है जेसे प्यासा कुत्रा पर बैठा हुया विना पानो सीचे अपनी प्यास बुझाने की लालसा रयता हो । कहने का तात्पर्य यह है कि विना चेष्टा के, केवल कल्पनामों के भरासे, कभी सफलता प्राप्त नहीं होती है। परमात्मा उनी की सुनते हे जिसका अपने ऊपर भरोसा होता है। इटती-नियासिया के लगातार प्रयत का फल यह हुया कि उनका चिरभिलपित स्वतन्त्रता प्राप्त हुई । केवल विदेशियों के पक्ष म ही उनका छुटकारा नहीं था, किन्तु पोप के भो अज्ञानरूपी जाल से उन्हें मकि प्राप्त हुई । स्वाधीनता प्राप्त होने के साथ ही साथ रोम पर भी उनकी विजय पताका फहराने लगी। सच है, उद्योग और परिश्रम के सामने श्रम- म्भर भी सम्भव है। इटली के अनेक नि.खार्थ व्यकियों के आत्मत्याग के कारण विजयलक्ष्मी उनपर प्रसन्न हुई। जनरल केडोरेना ने रोम पर केवल विजयपताका फहरा कर ही अपने पचित्र कर्त्तव्य की पूर्ति नहीं समझी, किन्तु उसने , . (६०) पहले राज्य की कुछव्यवस्था की, फिर उसने वहा के राजमहलों के निवासियों से लेकर झोपडों के रहनेवाले तक सर्वसाधारण से सम्मति पूछी कि वे किस प्रकार का राज्य चाहते हैं ये पोप की श्रधीनता में रहना चाहते हैं अयमा गजा विक्टर इमानुएल की अध्यक्षता में १ इस प्रकार की मम्मति सग्रह करने के लिये दूमरी अहवर नियत हुई। सच हे, लोक. प्रियता केवल विजय के साथ ही निवास करती है। पोप से विजयलक्ष्मी पहले ही रूठ चुकी थी, साथ ही लोग उसके अत्याचारों से भी टु पी थे। उस, फिर कहना ही क्या था! ४०,७८८ सम्मतिया विक्टर इमानुएल के शासन के पक्ष में भाई और ४६ पोप के लिये श्याई । वाह रे ससार ! किसी मनुष्य की अवस्था बदलते ही, समी उसके प्रतिकूल हा जाते है- सङ्कट के समय में, विगडी के दिनों में, मित्र भी शत्रु हो जाते है। अापत्ति काल में काई किसी का मित्र नहीं रहता है। कहा जाता है, जब भगवान् रामचन्द्रजी लझा विजय कर के अयोध्या को लौट रहे थे, तब उन्होंने विभीषण से पूछा हे विभीषण ! क्या कारण हे जब हम अयोध्या से रन को गये थे तव मार्ग में किसी ने हमाग यादर सत्कार नहीं किया था, किन्तु आज अयोध्या जाते समय सभी लोग हमारा वडा स्वागत कर रहे हैं" ? विभीपण ने भगवान् रामचन्द्रजी के उपर्युक्त प्रश्न का जो उत्तर दिया था, वह प्रत्येक राष्ट्र ओर व्यक्ति के सम्बन्ध में हर समय ठीक प्रतीत होता है। विभीषण ने उस समय कहा था-राजन् ! मनुष्य के शरीर की पूजा नहीं होती है, उसकी स्थिति पूजनीय होती है। यह अवस्था-भेद है। उस समय श्राप वन को जा रहे थे, इस समय ग्राप राजधानी अयोध्यापुरी का राज्य करने के लिये जा रहे है" विभीषण के ..." !
। ( १ ) उपर्युक्त कथन का अतर अक्षर सत्य है। अवस्था भेद से ही मनुष्य पूजनीय प्रथा निन्दनीय होता है। पोप के पक्ष में थोडे दिन पहले, जिन सैकडों हजारों श्रादमियों ने अस्त्र शस्त्र ग्रहण किये थे, जो पोप के पक्ष में अपने प्राण तक देने का तैयार थे, जिन्होंने कुछ दिन पहले ही पोप के अधिकार की रक्षा के लिये अपना रक यहाया था, और रक्त बहाने में सौभाग्य समझते थे, उन्होंने ही पोप की अवस्था पद न जाने पर उसके शासन में रहना स्वीकार नहीं किया ! पोप के शासन का रोम में अन्त हुया । पाची एमिल सन् १८७१ को चेम्बर ने निश्चय किया कि पोप पपिन था। उसकी राजधानी में उसको गजकोय सम्मान प्राप्त है । उमे ३,२२,५०० इटालियन मुद्रा बापिक दान मिला करेगा। इसके अतिरिक्त वेरीकन पार लेटेरन अासपास के महल उस मिलेंगे। पोप को धार्मिक कार्यों में पूरी स्वतन्त्रता होगी। पोप को विदेशी राजदूतों से, अन्तर्जातीय रीति के अनुसार, सव अधिकार प्राप्त होंगे। शिक्षण तथा धार्मिक सस्थाए पोप की अध्यक्षता में स्वतन्त्र रहेंगी। इसके अतिरिक्त पोप को थाडी बहुत और भी सुविधाएँ प्राप्त हुई। इसके वाढ फिर विक्टर टमानुएल, इटलीनिवासियों और पोप में कोइ झगडा नहीं हुया। * दूसरी जून सन् १८७१ को बादशाह विक्टर ने राजधानी रोम में प्रवेश किया । इटली-वासी भाई भाई के गले मिले। 8 या शाह के रोम में जाने से एक वर्ष पहले सन् १८७० म टाइवर नदी में बाइ पाने मे बड़ी हानि हुई थी। पारियो ने इसको परमेश्वर
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तरुण-भारत-ग्रन्थावली
(सम्पादक-१० लक्ष्मीधर वाजपेयी)
(१) इम ग्रन्थमाला में इतिहास, जीवनचरित्र, धर्म-नीति,
साहित्य, विज्ञान, इत्यादि उपयोगी विपयों के उत्तमोत्तम
ग्रन्थ निकलते है।
(२) जो सज्जन पाठ पाना प्रवेश-फीस एक वार भेजकर इसके
स्थायी ग्राहक बन जाते हैं, उनको सव ग्रन्थ पौन मूल्य पर
मिलते रहते है।
(३) पिछले ग्रन्थ लेना न लेना ग्राहकों की इच्छा पर है, पर
अगले अन्य उनको अवश्य लेने पड़ते है।
(४) प्रत्येक अन्य प्रकाशित होने पर उसकी सूचना पहले ग्राहकों
को दे दी जाती है । इसके बाद वी० पी० से ग्रन्थ भेजा
जाता है । वी० पी० ग्राहकों को वापस न करना चाहिये,
क्यांकि अाजकल डाक-महसूल वढ जाने के कारण बी०
पो० वापस करने से बड़ी हानि होती है।
अव तक निम्नलिखित ग्रन्थ निकल चुके हैं
(१) अपना सुधार-इसमे शारीरिक, मानमिक और याचरण
सम्बन्धी मुधार के अनुनवजन्य उपाय बतलाये गये हैं। इसके पढ़ने से
श्रावालवृद्ध-गरनारी सव के चरित्र पर समान ही कल्याणकारी प्रभाव
पडता ह । मूल्य II) आने ।
(२) मास का राज्यक्रान्ति-अठारहवीं शताब्दी में राजकीय
अत्याचारो से त्रस्त होकर मास की प्रजा ने जो राज्यक्रान्ति की
और जिसके प्रभाव से सारे यूरप में स्मतनता की लहर बढे वेग के साथ
वह निकली, उसका न यन्त मनोरजक सच्चा इतिहास इस पुस्तक
में
आपको मिलेगा। मूल्य 13) श्राने ।
.
(२) (३) महादेव गोविन्द रानाडे-राजनेतिक, सामाजिक, धार्मिक थौर श्रौद्योगिक, चारी विषयों में समान ही रूप से पान्दोलन करके भारत की उन्नति करनेवाले महात्मा रानाडे का यह जीवनचिरित ५० बनारसीदास चतुर्वेदी ने बड़ी प्रोजस्विनी भापा में तिसा है। पुस्तक सचिन है। मूल्य ॥jाने । (४) एव्राहम लिकन-जिस महात्मा ने एक दीन झोपडी में जन्म लेकर अपने साहस, उद्योग, मटाचार, पोर परोपकार के बल पर अमे- रिका के राष्ट्रपति की पदवी प्रात की, पोर अनेक सकटो को झेलकर उस देश से गुलामी की प्रथा सदैव के लिये उठा दी उसी का मनोरजक पचित्र- चरित इस पुस्तक मे दिया गया है। अवश्य पढ़िये । मूल्य ॥2) आने (4) ग्रीस का इतिहास-ग्रीस देश की धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक इत्यादि घटनाओं का सुन्दर इतिहास । राष्ट्रीय पाठशालाओ के लिये अत्यन्त उपयोगी है। मूल्य 15) (६) रोम का इतिहास-ग्रीस की तरह रोम का भी इतिहास हमने प्रो० ज्वालाप्रसाद जी एम० ए० से लिखा कर प्रशशित कर दिया । मूल्य १)रु० (७) दिल्ली अथवा इन्द्रप्रस्थ-पाडवो से लेकर जितने राजा दिल्ली की गद्दी पर शासन कर चुके हैं, उन मर का इतिहास, वहा के दर्शनीय स्थलो का साहित्यिक वर्णन, इत्यादि बडी मनोरजकता के साथ इस पुस्तक में लिखा है। ऐसी अच्छी पुस्तक इस विषय की हिन्दी में दूसरी नहीं है । मूल्य १) प्राने (E) इटली की स्वाधीनता-मेज़िनी, ग्यारीवाल्डी, कापूर इत्यादि इटालियन देश-भक्तो ने क्रान्तिकारक प्रयत्न करके किस प्रकार अपने देश को स्वाधीन किया, इसका प्रोजम्वी वृत्तान्त स्वर्गीय पढित नन्दकुमारदेव शर्मा की सजीव लेखनी के द्वारा लिसा गया है । मूल्य ॥ श्राने । ขึ้น , । (E) सदाचार और नीति-शिक्षा, व्यवहार, सत्कार्य, श्रात्म- । निरीक्षिण, सयम, श्रद्धा, समाजनियम, इत्यादि विषयों का सदाचार से क्या सम्यन्ध है, इसका विस्तृत विवेचन किया है। बीच बीच में ऐतिहा. सिक दृष्टान्तों का भी समाग हो जाने के कारण पुस्तक का विषय बहुत ही सुगम और मनोरजक हो गया है । पुस्तक एक बार अवश्य पहिये । मूल्य माने। (१०) मराठों का उत्कर्ष छत्रपति शिवाजी महाराज ने यवनों का दमन करके स्वराज्य किस प्रकार स्थापित किया, इसका विस्तृत इतिहास। देशभक महात्मा रानाडे के प्रसिद्ध अन्य “राइज़ माफ दि मगा पावर" "Rise of the fihratta Power" का सुन्दर अनुवाद । परिशिष्ट में पेशवाओं की डायरी के आधार पर और भी अनेक विषय दे दिये हैं । कुल पुस्तक के पढ़ने से मराठो के उत्थान और पतन का पूरा इतिहास ज्ञात हो जाता है। सनिल्द, मूल्य:॥२०॥ (११) धर्मशिक्षा-श्रुति, स्मृति, पुराण, महाभारत, छै दर्शन, गीता, उपनिषद, अनेक नीतिग्रन्य, इत्यादि सेकड़ों पुस्तकों का अध्ययन करके यह अन्य लिखा गया है। श्राप इस ग्रन्थ को पढ़ कर ही लिखने चाले के परिश्रम का अनुमान कर सकते हैं । राष्ट्रीय विद्यालयों के परीक्षा. थियों के लिये प्रत्यन्त उपयोगी, थोर स्त्री पुरुष दोनों के लिये समानरूप से अध्ययन करने योग्य है । मूल्य रु. (१२) गार्हस्थ्यशास्न-अगरेजी में डोमेस्टिक एकोनोमी(Domestic Economy) के ढग पर यह थपूर्व ग्रन्थ अब हिन्दी मे भी तैयार हो गया है। गृहस्थी के प्रबन्ध की ऐसी कोई भी बात नहीं, जो इस पुस्तक म न पा गई हो । कन्यामहाविद्यालयों और महिलाविद्यापीठों की जात्राओं के लिये कोर्स में रखने लायक है । मूल्य पर। व्यवस्थापक, तरुण-भारत-ग्रन्थावली, दारागज, प्रयाग। F
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