Sanmati Library, Jaipur
Sammedachal Pooja
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सर्गीय पं. जवाहर लावजी कृत ।
सम्मेदाचल पूजा
माहात्म्य सहित।
प्रकाशक-मूलचंद्र गुप्त ।
मालिक-जैनग्रंथ प्रभाकर कार्यालय, श्यामबाजार कलकता ।
मुद्रा-श्रीलाल जैन, जैन सिद्धांनप्रकाशक (पवित्र ) प्रेस
८ महेन्द्रबोसलेन श्यामनाजार कलकत्ता!
न्योछावर)
पत्रांक ४ संकुल ओंकन पर अर्घ चहानेका पाठ इन कोठों में देखकर निकालिये। गंबर मोक्ष भए तीर्थकरों और फलों के नाम पत्रांक पर मोक्ष भए तीर्थकर और अटीके नाम १ चोवीस गणधरों के प्रथम टोंक १४ संभवनाथ धवलदस १५ बासुपूज्य मंदागिरि ३ नमिनाथ मिषधर १६ अभिनंदननाथ मरनाथ १७ बड़ा मंदिर जलमंदिर ५ मल्लिनाथ संचल १४ १८ श्रनाथ ६ श्रेयांशनाथ २६ सुमतिनाथ গৰিম ७ पुष्पदंत २० शॉन्निनाथ शांतिप्रभ मोहन ८/२१ महावीर गावापुर ६ मुनिसुनत नि २२ सुपार्श्वनाथ भभास १० चंद्रमा २३ विमलनाथ सुधीरकुद्ध ११ शादिजाय सर्वसिद्धिनर २४ अजितनाथ सिडवा १२ शीतलनाथ ६२२ नेमिनाथ १३ सनंतनाथ उहंगनकूट २६ पाश्वनाथ सुवरणभद्र ६ ८ पमप्रभ स ३ वित श्रीसम्मेदाचलमाहात्म्य । दोहा। स्वयंसिद्ध परमातमा, महज सिद्ध है सार । तिनको बंदों भावसों, निश्चय करि निरधार ॥१॥ पहिरभाव सम छोडकर, निजस्वभावमें लीन । होय होय मुकती गये, समझ देख परवीन ॥२॥ सब तीर्थनमें सार है, श्रीसमेदगिरिराज । बीस जिनेश्वर और बहु, मोक्ष गये मुनिराज ॥ ताकी कथनी वारता, जिन भागम अनुसार । कहता हूं कुछ वचनसों, सुनहु भाविकजन सार॥४॥ इस मध्य लोकमै एक लाल योजनका जम्बूद्वीप है उसके मध्य एक सुपशन मेल है, जिसकी स दक्षिण दिशा में एक भरत नाम का क्षेत्र है। भरतक्षेत्रमें छह बंध है, जिसमें यह पायवंश बहुत प्रसिद्ध है। जिसमें मगध देशको राजगृही नगरी में एक श्रेणिक नामका राजा अपनी रानी बेलना सहित राज्य करता था। राजगृही नगरीके समीपचिपुलाचल, उदयगिरि, सोनागिरि, रतनागिरि और विहारगिरि नामके पाच पर्वत हैं। उनमें विपुलाजल पर्वत पर श्री १००८ महावीर भगवानकासमवसरण थायाधनमालीने राजाके समीप जाफर निवेदन किया कि, महागज विपुलावलपर त्रिलोकी नाथ यद्धं मान भगवानका समवसरण पाया है। सुनकर राजा इतना प्रसन्न सुला कि उसने अपने शरीर परफे सारे याभूषण उतारकर मालोको दे दिये, और सिंहासनसे उतर कर सात पैड (फदम) परवतकी तरफ चलकर साांग नमस्कार किया तत्काल हो शहरमें घोषणा कादो कि, महावीर भगवानका समवसरण आया है इसलिये सब लोग दर्शन पूजनके लिये चलो। और आपभी हाथो पर भारुढ होकर वन्दनाके लियेचला। दूरसेही समवसरण देखकर हाथीसे उतर पड़ा और फिर समीप जाकर उसमे भावपूर्वक बन्दनाकी । मनुष्य मंडलों में बैठकर भगवान् की दिव्यध्वनि द्वारा धर्मामृतका पान किया तत्पश्चात् अवसर पाकर हाथ जो वडा होकर पूछा- भगवन् ! श्रीऋपमदेव, अजितनाथ आदि तीथकर किस क्षेत्रसे मोक्षको प्राप्त हुए और आएका निर्माण कहाँसे होगा १५सके सिवाय पूर्व कालमें अनंतानंत चौवीसी किन २ गोले मोक्ष गई है, भविष्य अनतानंत तोयंकर जो मोक्ष आवेग, सो किस क्षेत्रले जावेंगे? और उन तीर्थंकरों के मध्यवती समयमें कौन २ मुकि गये हैं चौबीस तीर्थंकर जिस क्षेत्रसे मोक्षजाते हैं, उस क्षेत्रके दर्शनसे क्या फल होता है ? और आगे ऐसी यात्रा किसने को है तथा उन्हें क्या २ फल मिले हैं, इन सब प्रश्नोंके उत्तर भाप कृपाकरके विस्तारपूर्वक कहिये ? यह सुनकर भगवानकी दिव्यध्वनि हुई कि राजा श्रेणिक ! तुमने बहुत अच्छे प्रश्न किये अब तुम उनका उत्तर चित्तको समाधान करके सुनो। पूर्वकालमें अनंतानंत चौवोस तीर्थंकर श्रीसम्मेदशिखर पर्वतपरसे मोक्षको प्राप्त हुए है और आगे (भविष्यमें ) भो जो अनंतानंत चौधोस तीर्थकर होंगे, वे श्रीसम्मेदशिखरसे ही मोक्ष जायेंगे इसी प्रकार चौवीसौं तीर्थकरों का जन्म भी श्रीअयोध्या नगरीमें होता है और होवेगा परन्तु वर्त- मान कालमें केवल २० हो तोर्थकर इस सम्मेदशिखर से मोक्ष गये हैं। क्योंकि श्रीऋषभदेव.के- लास पर्वतले वासुपूज्य चंपापुरसे तथानेमिनाथ गिरनारसे मोक्षजा युके हैं, और हम पावापुरसे मोक्ष जायेंगे। शेष बीस तीर्थकर श्री सम्मेदशिखरजी से निर्वाण प्राप्त हुये हैं। इसी प्रकारले वर्तमान कालमें अयोध्या नगरीमें केवल ५ तीर्थकरौंका जन्म हुआ है। शेष १६ का अन्यान्य नगरियों में हुआ है।
यह सुनकर राजा श्रेणिकने पूछा-भगवन् ! ऐसा होने का क्या कारण है? पकही स्थानमै जन्म और एकही स्थानमें मोक्ष होनेका जो नियम है उसका मंग क्यों हुआ? भगवान ने उत्तर दिया कि हे राजन् ! यह एक कालका दोष है । मनंतानंत कोदाकोड़ी उत्स- पिणीकाल व्यतीत होनेपर कोई एक ऐसा ही काल आ जाता है जिसमें इस नियमका उल्लंघन हो जाता है अर्थात् उसके प्रभावसे अनेक तीर्थंकरों का जन्म और निर्वाण अन्य स्थानों से हो जाता है ऐसे कालको दु'डावसर्पिणी कहते हैं इस विषयमें तुम कुछ सन्देह मत करो। यथार्थ में चौघी सों तीर्थंकरों की जन्मभूमि अयोध्या है और निर्वाणभूमि श्रीसम्मेदशिखरजी ही है। राजानोणिक-भगवन् ! आपने जिस प्रकार कहा वही सत्यार्थ है अब कृपा करके यह वत. लाइये कि श्रीपभदेचसे लगाकर आप तक निर्वाणक्षेत्रोंकी बंदना का फल क्याहै और शिखर जी को यात्रा करके आगे किस २ को क्या २ फल मिले तथा आगे क्या मिलेंगे? वीर भगवान हे राजन् ! कैलाश पर्वतसे दशहजार मुनि मोक्षको प्राप्त हुए हैं और श्रीसम्मेद शिखरजीपर बीस टोंक हैं उनमें से सिद्धवरकूटले श्री अजितनाथ तीर्थकर एक अरव अस्सीकरोड़ चीवनलाख एक हजार मुनियों सहित मोक्ष गये हैं। इस टॉककी बन्दनाका फल बत्तीस करोड़ उपवासक वरावर है दूसरे धवलादत्त कूटसे संभवनाथ तीर्थंकर नब्बे कोडाकोटी बहत्तरलालसात R- बलकूट लें: हजार पांच सौ व्यालोस मुनियों सहित मोक्ष पधारे हैं। शन करने का फल व्यालीस लाख उपवास करने के बराबर है तीसरे आनन्द कूटसे श्रीअभिनन्दनः तीर्थकर सिंहतर कोडाफोडी, सत्तर करोड सत्तर लाख सात हजार पांच सौ व्यालीस मुनियों के सहित निर्वाण प्राप्त हुए हैं। कूट के दर्शन करनेका फल सोलह लाख उपवास करनेके फलंके तुल्य है। चौथै अ समतिनाथ तीर्थकर एक कोडाकोदो चौरासो करोई बहत्तर लाख सात सौ इक्याली मुनियों सहित मोक्ष पधारे हैं। इस कूटके दर्शन करनेका फल एक करोड उपवास करनेके समान है। पांचवे मोहनकूटसे पद्मप्रभ तीर्थकर निन्यानवे करोड.चोरासो लाख रियालीस हजार सातसौ सतासो मुनि सहित मोक्ष प्राप्त हुए हैं। इस कूटके दर्शनका फल बत्तीस करोड उपवास करने के तुल्य हैं। छठे प्रभास कूटले सुंगाश्वनाथ तीर्थकर तीन करोड बहत्तर लाख सात हजार. सातसौ व्या:. लोस मुनि सहित मुक्ति गये हैं। इस कूटके दर्शन करने का फल वत्तोस कपैड उपवास के वरा- घर है । सातवें ललितकूटले चन्द्रप्रभ तोर्थकर, चौरासी कोडाकोडि बहत्तर करोड, अस्सोलाल- चौरासी हजार पावसौ पचपन मुनि सहित मोक्षगये हैं। इस कूट के दर्शन करनेका फल सोलह करोख, सके तुल्य है। आउ सुप्रभकूटले श्रीपुष्पदन्त तीर्थकर निन्यानवे करोड नब्बैलाख नौ एजार भार सौ मस्सो मुनि सहित मुकि गये हैं। इस कूटके दर्शन करनेका फल सोला करोड, पू० उपवासके पत्तवर है। भय विद्य तवर कूट से शांतल नाथ तीर्थ कर अठारह कोडाकोली धियालीसा करोड पचीस लाख लियालीस हजार नौसे पांच मुनियों ने मुक्त पाई है। इस कूटके दर्शनका फल भी घसीस करोड उपवास करने के घराघर है दशवें संकुलकूट से श्रेयांसनाथ तीर्थंकर छयानवे कोडाकोझीशानने करो च्यानचे लाख पैतालोल हजार पांचसौ व्यालोस मुनियोंने मुक्ति पाई है। इस कूटके दर्शन करने का फल भो एक करोड उपवास करने के बराबर है। यंपापुरले धासुपूज्य तीर्थकर हजार मुनि सहिन मोक्ष पधारे हैं। सम्मेदशिखर के ग्यारहवे संचल कूटसे विमलनाथ तीर्थकर सत्तर कोडाकोडी सात लाख छह हजार सानसौ वियालोल मुनि मुक्ति गये है। इस कूट के दर्शन का फल एक करोड उपवास करने के घराधर है । यारहवें स्वयंभूकूर अनंतनाथ तीर्थकर छयानधे कोडाफोडीसतरह करोड मतर लास्त्र सतर हजार सात लोमुनि मोक्ष गये हैं। इस फूटप्ने दरशनका फल एक करोड उपवास करने के तुल्य है। नेरहवें सुद- सवर कूटने धर्मनाथ नोथैकर उन्नीस करोड नौ लाख नर हजार सातमी पचास मुनि मुक्त हुए हैं इग्शन करनेका फल एकको उपवास करनेके बगवर है। चौदहवे शांनिधभकूटसे श्रीशानि- नाथ तीर्थंकर एक केडाकोडोनयकोडनव लास नब हजार नच सौ निन्यानवे मुनियोंने पंचमगति पाई है इसके दशान करीका फल एक करोच उपास करने के बराबर है। पंद्रह जानधर कूट से श्रीकुथुनायतीर्थकर छयानः कोसाकोडौख्यान करोष बत्तीस लाख छयानवे हमार सातसौ भ्यालीस मुनि मोक्ष धामको गये हैं। दर्शन करनेका फल एक करोड उपवास करनेके बराबर है। सोलहवे नाटक कूटसे श्री भरनाथ तीर्थकर निन्यान करो निन्यानवे काल निन्यानये हजार नवसे नवे मुनियोंने मुक्ति लक्ष्मी प्राप्त को है इस कूटके दर्शन करनेका फल छयानवे करोड़ उप- वाल करने के बरावर है सत्रहवे संवलकृष्टसे धीमलिनाथ तीर्थंकर निन्यानवे करोड मुनि परमपद प्राप्त हुए हैं। इसका दर्शन करना एक करोड उपवास करने के वरावर है अठारहवें निर्जराकूड से श्रीमुनिसुव्रतनाथतीर्थकर निन्यानवे कोद्धाकोली, सतानवै करोच नौ लाख नौ सौ निन्यानव मुनि मुक्ति धामको गये हैं। इस दौंक के दर्शनका फल एक करोड उपवास करने के समान है । उन्नीसचे मित्रधर कूटसे श्री नमिनाथ तीर्थंकर नोसोकोडाकोडी पैंतालीस लाख सात हजार नौ सौ विया- लोस मुनि काँले छूटे है। इस टोंकके दशनका फल एक करोड उपवास करने के बराबर है। गिरनार पर्वतले श्रीनेमिनाथ तीर्थकर पांच सौ छत्तीस मुनिसहित मोक्ष प्राप्त हुए हैं। तथा बहत्तर करोड़ सातसौ मुनि और गिरनार पर्वतले मुक्त हुए हैं। सम्मेदशिखरके वीसवें मुवर्णभद्र कूटसे श्रीपादवनाथतीर्थकर एक करोड पैतालीस लाख सात हजार सात सौ दश अधिक मुनि मुक्त हुए हैं। इस कटके दरशन अग्नेका फल एक करोड़ उप- वास करने के फलके बराबर है।
स० ४ इसके पश्चात श्रीगौतमगंणधर बोले-हं राजन् ! ये महावीर भगवान पाधापुरी के पासरोवर मैंसे छत्तीस मुनियों के सहित मोक्ष जावेंगे तथा शिखरजीकी जिन्होंने पूर्वकालमें यात्रा की हैं, उन मेंसे थोड़के नाम मैं कहता हू-सगर, सागर, मघवा सनत्कुमार, प्रभासेन आनन्द ललितदन्त,कुद सेन, सेनादत्त घरंदत्तं, सोमप्रभ, चारुसेन भादि इनके सिचाय और भी हजारों राजाभोंने यात्राकी है, परंतु उनसैसे दरशन केवल उन्ही को हुए हैं जो भव्य थे अभव्यों को दरशन नहीं मिलते। श्रेणिक-हे भगवन् ! शिखरजीकी यात्रा करनेका फल जो कुछ आपने कहा सो तो यथार्थ है परंतु उससे अधिक तथा सम्पूर्ण फल और क्या है वह कृपा करके कहो। गौतमस्वामी हे राजन् शिखरजीको यात्रा करनेवाला फिर संसारमें अधिक नहीं भरकता उनचास-भव लेकर वह जीव पचासवें भवमें अवश्य ही सिद्धस्थानमें जाकर अजर अमर अखंड सदा जागती जोत होकर अचल रहता है यह नियम है। इसके सिवाय यात्रा करनेवाला नरक तिथंच गति तथा स्त्रीपर्याय में भी जन्म नहीं लेता। :श्रेणिक-यदि ऐसा है, तो भगवन् ! रावणने शिखरजीकी यात्रा की फिर उसे नरकंगति क्यों प्राप्त हुई ? गौतम-रावण शिलालीको यात्रा करने के लिये नहीं किन्तु अलोषयमंचन बाधीको एक- ४ डने के लिये मधुवन गया था। इसलिये वह यात्रा फलका भागी नही हो सकता। श्रेणिक-भगवन् ! यदि कोई विना भावले शिखरजीकी यात्रा करै तो उसको नरक तिर्यच गति छूटे कि नहीं। गौतमल-राजन् ! जिस प्रकारसे विना साषसे खाई मिश्री मीठी लगती है और दवाई रोगको शांत करती है उसी प्रकारसे बिना भावसे की हुई यात्रा भो ऐसा नहीं है कि फलवती न हो। श्रेणिक-भगवन् ! आपने कहा कि भव्यको यात्रा होती है परंतु अभव्यको नहीं होती सी यह वनलाइये कि, खास शिखरजीमें भीलादिक तथा पृथ्वी जल वनस्पति पकेन्द्रियादिक जीव राशि हैं ये सव भव्य हैं अथवा अभव्य ? गौतम-सम्मेदशिखर पर जितने जीवराशि हैं वे सब भन्यथाशि हैं। श्रेणिक-भव्य किसे कहते हैं ? गौतम-जो जीव मुक्त अवस्था प्राप्त करने वाले होते है भव्य कहाते हैं। इस प्रकार राजा श्रेणिक श्रीसम्मेदशिखर सिद्ध क्षेत्रका माहात्म्य सुनकर बहुत आनंदित हुआ और अपनी रानो चलना सहित यात्रा के लिये चला परंतु ज्याही पर्वतके निकट पहुचा त्यों ही यहां के निवासी दशालाल एयर देवाने वाले और धोर अधिकार कर दिया। धूलधि मेघगर्जब पाषा- प्रवृष्टि आदि अनेक प्रकारके और भी घिन किये तब रानी चैलनाने समझायानाथ आपको यात्रा नहीं होवेगी क्योंकि जिस समय आपने दिगम्बर मुनिराजके गले में राहुधा सर्व डाला था उसी समय आपको नरकगतिका बंध पड़ चुका है। इसलियेश्स पर्याय तीराजके दरशन होना असंभव है यह सुंसकर राजा अपने कर्मों की गति जानकर अपने जगरफी लौट गया। योता। सिद्ध क्षेत्र सिद्ध है, जिन भागम में सार । अर्मदास क्षुल्लक कहै, श्रीसभेदगिरि पाए ॥१॥ ताकी कथनी बारता, कह गये श्रीमुनिराज । अव वाहीकी नचनिका, यह कीनी निज काज़ ।।२।।
श्रीसम्मेदाचल पूजा।
दोहा।
सिद्धक्षेत्र तीरथ परम, है उतकृष्ट सुथान ।
शिखरसमेद सदा नमो, होयं पापकी हान ॥१॥
अगणित मुनि जहत गए, लोकशिखरके तीर।
तिनके पदपंकजं नमो, नाशै भेवकी पीर ॥२॥
स० पू डिल। उज्वल वह क्षेत्र सुअति निरमल सही। परम पुनीत सुठौर महा गुणकी मही॥ सकल सिद्धि दातार महा रमणीक है। बन्दों निज सुखहेत अचल पद देत है ॥३॥ सोरठा। शिखरसमेद महान, जगमें तीर्थ प्रधान है। महिमा अदभुत जान, अल्प मती में किमि कहों ॥४॥ सुश्री छंदा सरस उन्नत क्षेत्र प्रधान है। अति सु उज्वल तीर्थ महान है। करहिं भाक्त सुजे गुण गायकें। वरहिं सुर शिवके सुख जायकें॥५ अडिल्ला सुर हरि नर इन आदि, और बंदन करें। भव सागरतें तिरें, नहीं भवमें परें। सफल होय तिन जन्म शिखर दरशन करें, जन्मजन्मके पाप सकल छिनमें टरें॥६॥ पछड़ो उद। श्रीतीर्थकर जिनवर जु वीश, अरु मुनि असंख्य सब गुणन ईश। पहुंचे जहंत कैवल्य धाम, तिनको अब मेरी है प्रणाम ॥७॥ गीतिका छंद । सम्मेदगढ है तीर्थ भारी सबहिकों उज्यल करै। चिरकालके जे कर्म लागे दर्शतें छिनमें टरै। १मोक्ष।
है परमपावन पुण्यदायक अतुलमहिमा जानिये। है अनूप सुरूप गिरिवर तासु पूजन ठानिये ॥ ८ ॥ श्रीसम्मेदशिखर सदा, पूजो मन वच काय हरत चतुर्गातदुःखकों मनवांछित फल दाय ॥९॥ *ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र । अत्र अवतर भवतर । सवौषट् । ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अब सिष्ठ विष्ठ ठः ठः। *ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र मम सनिहितो भव भव । वपद् । इस प्रकार तीन बार होने में पुष्पों से माननादि करें। अथ अष्टका अडिल्ला क्षीरोदधि सम नीर सु निरमल लीजिये।
कनक कलशमें भरके धारा दीजिये। पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाये जी। नरकादिकदुख टरें अचलपद पाय जी ॥१॥ *ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विंशतितीर्थकरायसंख्यातमुनिसिद्धपदमासेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाशनाय जलं निर्वपामीति स्वाहा ॥१॥ पयसों घसि मलयागिरिचंदन लाइये। केसरि आदि कपूर सुगंध मिलाइये। पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाय जी। टरें अचलपद पाय जी॥२॥ *ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विशमितीर्थकराधसंख्यातमुनिसिद्धपदषातभ्यो संसारातापविनाशनाय चन्दनं निर्वषामीति स्वाहा ॥१॥ नरकादिक दुख ।
४
तन्दुल धवल सुवासित उज्वल धोयकें।
हेमरतनके थार भरों शुचि होप ।।
पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिकदुख टरें अचलपद पाय जी ॥३॥
*ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विंशतितीर्थकरावसंख्यातमुनिसिदमाप्तम्यो अक्षय-
पदमामये अक्षनान् निपामानि स्वाहा ।। ३ ।।
सुरतरुके सम पुष्प अनूपम लीजिये।
कामदाहदुखहरण चरण प्रभु दीजिये।
पूजो शिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिक दुख टरें अचलपद पाय जी ॥४॥
ओं ही श्रीसम्मेदशिस्वरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विशतितीर्थ काराद्यसंख्यातमुनिसिद्धपदमासेभ्यः
कामवाणविध्वंसनाय पुष्पं निर्वपामीवि स्वाहा ॥ ४॥
कनकथार नैवेद्य सु.षटरसते भरे।
देखत क्षुधा पलाय सुजिन आगें धरे॥
पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिकं दुख टरें अचलपद पाय जी॥५॥
ओं ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरासिद्धक्षेत्रेभ्यो विशतितीर्थकरादिनसंख्यातमुनिसिदपदमाप्तभ्यः
झुधारोगपिनाशनाय नैवेद्य निर्वधामीति शहा ॥५॥
लेकर मणिमय दीप सुज्योति प्रकाश है। :-
पूजत होत सुज्ञान मोहतम नाश है।
पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिक दुख टरें अचलपदःपाय जी॥६॥
ओं ही श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षत्रेभ्यो विशतितीर्थकर संख्यातमुनिसिद्धपदमामेभ्यः
मोहधिकारपिनाशनाय दीप निपामीवि स्वाहा ॥ ६ ॥
पू०
'दशविधि धूप अनूप अगनिमें खेवहूं।
अष्टकर्मको नाश होत सुख-लेवहूं।
पूजों सिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिक दुख टरें अचलपद पाय जी ॥७॥
ओं ही श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विशतितीर्थकरादिनसंख्यातमुनिसिद्धपदमामेभ्यो
'अष्टकर्मदहनाय धूपं निर्वामीति स्वाहा ॥७॥
एला लौंग सुपारी श्रीफल लाइये।
फल चढाय मनवांछित शिवफल पाइये।
पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिक दुख टरें अचलपद पाय जी॥८॥
ओं की श्रीसम्मेदशिखरमिक्षेत्रेभ्यो विंशतितीर्थकरादिअसंख्यातमुनिसिद्धपदपातेभ्यो
मोक्षफल्मासये फलं निर्वामीति स्वाहा ॥८॥
जल गन्धाक्षत पुष्प सुनेबज लीजिये।
दीप धूप फल लेकर अर्घ सु दीजिये।
पूजों शिखरसमेद सुमनवचकाय जी।
नरकादिकदुख टरै अचलपद पाय जी॥९॥
ओं ही श्रीसम्मेदसिसरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विंशतितीर्थकरादिप्रसंस्पातमुनिसिद्धपदमातेभ्यो
अनर्यपदमासये अर्थ निपामीति स्वाहा ॥९॥
पछड़ोसन्य।
श्रीविंशति तीर्थकर जिनेंद्र । अरु असंख्यात जहंते मुनेंद्र ॥
तिनको करजोरि करों प्रणाम । जिनकों पूजों ताज सकल काम॥१०॥
भों ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विंशतितीर्यकादिनसंख्यातमुनिसिद्धपदमामेभ्यो ।
महार्ष निपामीति स्वाहा ॥१०॥
स अडिल। जे नर परम सुभावन पूजा करें। हरि हलि चक्री होय राज छह खंड करें। फेरि होय धरणेंद्र इंद्र दवी धरें। नानाविध सुख भोगि बहुरि शिवतिय वरै ॥११॥ इत्याश' नादः (पुष्पाजलि क्षिपेत् ) जोगीरास। श्रीसम्मेदशिखरगिरि उन्नत, शोभा अधिक प्रमानो। विंशति सिंहपर कूट मनोहर, अदभुत रचना जानो। श्रीतीर्थंकर-वीस तहातै शिवपुर पहुंचे जाई। तिनके पदपंकज जुग पूजो अब प्रत्येक चढाई ॥१॥ ो ही श्रीसम्मेदसिखरसिद्धतंत्रेभ्यो अर्धे निपामीति स्वाहा ।। १ ।।
नं०२४ अजितनाथ सिद्धवरकूट। प्रथम सिद्धवर कूट सुजानो, आनंद मंगलदाई। अजितनाथ जहंतें शिव पहुंचे पूजों मनवचकाई ॥ कोडि जु अस्सी एक अरब मुनि, चौवन लाख जु गाई। कर्म काटि निर्वाण पधारे, तिनको अर्घ चढाई ॥२॥ ॐ ह्रीं श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रसिद्धवरकूट. अजितनाथ जिनेंद्रादि मुनि असीकोटि एक अरब चौवनलाख सिद्धपदप्राभ्या सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्धे निर्वपामीति स्वाहा ।। २॥ . नं०१४ सम्भवनाथ धवलकूट। धवलदत्त है कूट दूसरो, सब जियको सुखकारी । श्रीसम्भव प्रभु मुक्ति पधारे पापतिमिरको टारी॥
- अवलदच दै आदि मुनी, नव कोडाकोडी जानो। लाख बहचरि सहस वियालिस पंचशतक ऋषि मानो। कर्मनाश करि शिवपुर पहुंचे वंदों शीश नवाई। तिनके पदजुग जजहुं भावसों हरषि २ चितलाई ॥ ओं ह्रीं श्रीसम्मेदसिखराशिद्धक्षेत्रधवलकूटते सम्भवनायजिनेंद्रादि मुनि नौकोदाकोटीपहचर- सासव्यालीसहजारपांचसौसिद्धपदमाप्तेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्धे निर्व० स्वाहा ॥३॥ नं०१६ अभिनंदननाथ आनंदकूट । खोयाई आनंदकूट महासुखदाय । आभिनंदन प्रभु शिवपुर जाय। कोडाकोडि बहत्तर जान । सत्तरकोडि लखछत्तिस मान॥ सहस वियालिस शतक जु सात । कहे जिनागममें इह भांत ।। ए ऋषि कर्मकाटि शिवगए । तिनके पदजुग पूजत भए ॥४॥ A द - 4 भओं ह्रीं श्रीसम्मेद शिखरतिक्षेत्र मानंदकूटते श्रीअभिनंदनमिनेंद्र प्रादिनिवहत्तरकोडाकोडी सचरकोडि छत्तिसलाख व्यालिमहजार सांतसो सिद्धपदप्राप्तेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ नं० १९ सुमतिनाथ अविचलकूट । अडिलक। आविधल बोथो कूट महासुखधाम जी। जहते सुमतिजिनेश गये निर्वाण जी। कोडाकोंडी एक मुनीश्वर जानिये। कोटि चौरासी लाख बहचर मानिये ॥ सहस इक्यासी और सातसौ गाइये। कर्म काटि शिव गए नमो शिर नाइये ॥
सो थानक मैं पूजू मनवचकाय जी। पाप दूर होजांय अचलपद पाय जी॥५॥ भों ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रमविचलकूटत सुपतिनाथ जिनेन्द्रादि मुनि एककोड़ा- कोड़ी चौरासीकोड़ि बहत्तरलाख इक्यासीहजार सातसौ सिद्धपदमाप्तभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्षे निवपामीति स्वाहा ॥५॥ नं. ८ पद्मप्रभ मोहनकूट।. मोहन कूट महान परम सुंदर कह्यो। पद्माभ जिनराज जहां शिवपुर लह्यो । कोटि निन्यानवे लाख सतासी जानिये। सहस तियालिस और मुनीश्वर मानिये ॥ सप्त सैकरा सत्तर ऊपर वीसजू । मोक्ष गए मानि तिनको नमुं नित शीसजू.॥
कहें जवाहरलाल' दोयकर जोरिके। अविनाशीपद दे प्रभु कर्मन तोरिके ॥६॥ भों ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रमोहनकूटते पद्ममभजिनेंद्रमुनि निन्यानवेकोहि सतासीलाख- तितालीसहजार स.तसौसचर वीससिद्धपदमाप्तेभ्य सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥६॥ नं०२२ सुपार्श्वनाथप्रभासकूट । सोरठा। कूट प्रभास महान, सुंदर जनमन मोइनो। श्रीसुपार्थ भगवान, मुक्तिगए अघनाशके ॥ कोडाकोडि उनचास, कोडि चौरासी जानिये। लाख बहत्तर मान, सात सहस हैं सात सौ॥
स ६ और कहे व्यालौस जहत अनि मुक्ती गए। तिनहिं नमै नित शीश, दास जबाहर जोरकर ॥७॥ ओं ही श्रीसम्मेदशिखरामिक्षेत्रप्रभासफूटते श्रीसुपार्श्वनाथजिनेंद्रादिनि उनचास- कोषकोदी चौरासीकोड़ि बहत्तरकाल सातहजार सातप्तौ बियालीस सिद्धपदमाभ्या सिद्धक्षेत्रेभ्यो अबै निर्षपामीति स्वाहा ॥ ७ ॥ नं० १० चन्द्रप्रभुललितकूट। दोधा। पाइन परम उतंग है, ललितकूट है नाम । चन्द्रप्रभ शिवकों गए वदों आठों जाम ॥ कोडाकोडी जानिये, चौरासी ऋषिमान । कोडि बहत्तर इम कहे, अस्सी लाख प्रमान। सहस चौरासी पंचशत, पचपन कहे मुनिंद॥
वसुकरमनको नाशकर, पायो सुखको केद।
ललितकूटते शिवगए, वदौं शीश नमाय ॥
जिनपद पूजों भावसों, निजहित अर्घ चढ़ाय ॥८॥
ओं ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रललिनकूट चन्द्रप्रभजि-द्र ग्रादिमुनि चौरासीकोडाकोडीबह-
तरकोडिअसीलाख चौरासीहजार पांचसौ पचपन सिद्धपदमाप्तभ्यः सिद्धक्षेत्रे यो अर्धे
निपामीति स्वाहा ॥ ८॥
नं. ७ पुष्पदंतसुप्रभकूट।
पड़ी छन् ।
श्रीसुप्रभकूट सु नाम जान । जंह पुष्पदंतको मुक्ति थान ।
मुनि कोड़ाकोड़ि कहे जु भाख । नव ऊपर नवधर कहे लाख ॥
शतचारि कहे अरु सहमसात । ऋषि अस्सी और कहे विख्यात ॥
मुनि मोक्षगए हनिकर्मजाल । बंदो करजोरि नमाय भाल ॥९॥
पू०
E
ॐ ह्रीं श्रीसम्मेदसिखरीक्षेत्रसुप्रभकूटते पुष्पदन्तजिनद्रादिमुनि एककोडाकोडीनिन्न्या-
नबेलाग्य सातहज र चारसौ 'सी सिद्धपदमावेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निषेपामीति
स्वाहा ।।९॥
नं० १२ शीतलनाथ विद्युतकूट ।
सुन्दरी छन्द।
सुभग विद्युतकूट सु जानिये । परम अदभुत तापर मानिये ।।
गए शिवपुर शीतलनाथजी । नमहं तिन इह करधर माथजी॥
जु कोडाकोडि अठारहू । मुनि जु कोडिवियालीस जानहू।
कहे और जु लाखबतीस जू । सहसव्यालीस कहें यतीश जू॥
अवर नौसौ पांच जु जानिये । गए मुनि शिवपुरको मानिये ॥
करहिं जे पूजा मन लायक । घरहिं जन्न न भवों आयके ॥
ओं ह्रीं श्रीसम्मेदसिससिद्धक्षेत्रविद्युतकूटनै शीतलनाथ जिनेंद्र दिमुनिमारहकोडाकोडीच्या
लीसकोडिरतीसलाखयाशीमहजारनौ पांच सिद्धपदमाप्तेभ्यः सिद्धक्षत्रेभ्यो अर्धे नियामीति स्व.हा ॥ १० ॥ नं० ६ श्रेयांसनाथ संकुलकूट। जोगीरासा। कूट जु संकुल परत्र मनोहर, श्रीश्रेयान् जिनराई कर्मनाश कर शिवपुर पहुंचे, बंदों मनवचकाई ।। ध्यानय कोडाकोडी जानो च्यानवकोडि प्रमानो। ल.ख छयानवे साम मुनीश्वर, साढे नव अब जाना॥ ताजार व्यालीम कहे हैं श्रीमुनिके गुण गावें ॥ त्रिवियोग करि जो कोई पूजें. सहजानंदपः पावै ॥ सिद्ध नमो सुखदायक जगमें, आनद मंगलदाई। y जजो भावसो पण जिनेन्नर, हाथ जोडि शिरनाई। परम मनोहर थान सुपावन, दवत विधन पलाई ।। तीन काल नित नमत जवाहर मेटो भवभटकाई। जहते जे मुनि सिद्ध भए हैं, तिनको शरण गहाई। जा पदको तुम प्राप्त भए हो, सो पद देहु मिलाई ॥११॥ ओं ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरामिद्धक्षेत्रसंकुलकूटनैं श्रीश्रेयांसनाथनिनंद्रादिमुनि छचानये कोडाकोड़ी छयानवेकोहि छयानदेलाख नवहजार पांचसो पियालीस सिद्धपदमाप्तेभ्यः मिक्षेत्रेभ्यो अर्थ निषेपानीति स्वाहा ॥ ७॥ नं० २३ विमलनाथसुवीरकुलकूट । कुसुमलता छद। श्रीसुवीरकुल कूट परम सुन्दर सुखदाई, विमलनाथ भगवान जहां पंचमगति पाई। २० कोडि जु सत्तर सात लाख पटसहस जुगाई, सात सतक मुनि और वियालीस जानो भाई॥ - अष्टकर्मको नष्टकर, मुनि अष्टमक्षिति पाय । तिनप्रति अर्घ चढावहूं, जनम मरण दुख जाय॥ विमलदेव निरमल करण, सब जीवन सुखदाय । मोतीसुत वंदत चरण, हाथजोर शिरनाय ॥ ओं ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र सुनीरकुलकूटते श्रीविमलनाथजिनेंद्र भादिमुनि सचरकोडि सातलाख छहहजार सातसौव्यालीस सिद्धपदप्राप्तेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥४॥ न०१३ अनन्तनाथ स्वयंभूकूट ।
स० • अछि। कूट स्वयंभू नाम परम सुन्दर कहो। प्रभु अनंतजिननाथ जहां शिवपद लहरे॥ मुनि जु कोडाकोडि छयानवे जानिये। सत्तर कोडि जु सत्तरलाख प्रमानिये ॥ सतर सहस जु और मुनीश्वर गाइये। सात सतक ता ऊपर तिनको ध्याइये ॥ कहें जवाहरलाल सुनो मनलायके। गिरिवरकों नित पूजो अति सुखपायके॥ पूजत विधन पलाय; ऋद्धि सिद्धि आनंद करें। सुर शिवको सुखदाय, जो मनवच पूजा करै ॥१३॥ PORN सोग्ठा।
ओं ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रस्वयंभूकूटते अनंतनायजिनेन्द्रादि मुनि उचानवैकोड़ा-
कोड़ी सत्तरिकोडि सत्तग्लाख सचरहजार सातसौ सिद्धपदप्राप्तेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्थ
निर्वणमीदि स्वाहा ।।५।।
नं० १८ धर्मनाथ सुदत्तकूट।
कूट सुदत्त महाशुभ जान । श्रीजन धर्मनाथको थान ।।
मुनि कोडाकोडी उनईस । और कहे ऋषि कोडि उनीश ॥
लाख जु नव नौसहस सु जान । सात शतक पंचानव मान ।।
मोक्षगए वे कर्मनचूर । दिवस रु रयनि नमो भरपूर ।।
महिमा जाकी अतुल अनूप । ध्यावत वर इंद्रादिक भूप ।
शोभत महा अचलपद पाय । पूजों आनंद मंगल गाय॥
दोहा।
परम पुनीत पवित्र अति, पूजत शत सुरराय ।
तिहं थानककों देख कर, मोतीसुत गुणगाय ॥ पावन परम सुहावनो, सब जीवन सुखदाय ॥ सेवत सुर हरि नर सकल, मनवांछित्तपदपाय । ॐद्रीं श्रीसम्मेदशिखरासिद्धक्षेत्रसुदत्तकूटते धर्मनाथ जिनंद्रादिमुनि उनीसकोडाकोडी उन्नीसकोडि नोलाख नोहजार सातसौ पंचानवै सिद्धपदमातेभ्यो अर्धे निर्व- पामीति स्वाहा ॥३॥ नं०२० शान्तिनाथ शांतिप्रभकूट । सुगीतिका-छन्द। श्रीशांति प्रभ है कूट सुन्दर अति पवित्र सु जानिये। श्रीशांतिनाथ जिनेंद्र जहंत परमधाम प्रमानिये ॥ नव जु कोडा कोडि मुनिवर लाख नव अव जानिये। नौ सहस नवसै मुनि निन्यानव हृदयमें धर मानिये ॥ ૨૨.
कर्मनाश शिवको गए, तिन प्रति अघ वढाय । त्रिविधयोग करि पूज हैं, मनबांछित फलपाय ॥ ओं ह्रीं श्रीलम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रशांतिप्रभकूदते शांतिनाथ जिनेंद्रादिमुनि नोकोडा- कोडि नोलाख नोहजार नौसै निन्नानवे सिद्धपदमामेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निपामीति स्वाहा ॥ ४॥ नं. २ कुन्थुनाथ ज्ञानधरकूट । गीतिका छन् । ज्ञानधर शुभकूट सुंदर परम मन मोहन सही। जहते श्रीप्रभु कुन्थुस्वामी गए शिवपुरकी मही॥ कोडा सु कोडी छयानवै मुनि कोडि च्यानव जानिये। अर लाख बत्तिस सहसछयानव शतकसांत प्रमानिये ।।
और कहे ज्यालीस मुनि, सुमिरौं हिये मंझार । तिनपद पूजों भावसे, कर भवदधिसे पार ॥ १६॥ ॐ ह्रीं श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रज्ञानघरकूटः श्रीकुंथुनाथ जिनेंद्रादि मुनि च्याननैकोदा- कोडी छयानवे कोटि वत्तःसलाख छयानवैहजार सातसौं व्यालीस सिद्धपदप्रासेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्धे निर्वपापीति स्वाहा ॥ २ ॥ नं०४ अरनाथ नाटककूट। दोहा। कूट जु नाटक परमशुभ, शोभा अपरम्पार। जहते अरजिनराज जी, पहुंचे मुक्तिमंझार ॥ कोडिनिन्यानव जानि मुनि, लाखनिन्यानव और। कहे सहस निन्यानवे, बन्दों कर जुग जोर॥
अष्टकर्मको नष्ट करि, मुनि अष्टमक्षिति पाय । ते गुरु मो हृश्य बसो, भवदधि पार लगाय॥ सोरठा। तारण तरण जिहाज, भवसमुद्रके बीचमें। पकरो मेरी बांह डूबतसे राखो मुझे ।। अष्टकरम दुख दाय, ते तुमने चूरे सबै । केवलज्ञान उपाय, अविनाशीपद पाइयो। मोतीसुत गुणगाय,चरणन शीशनवायके। मेटो भवभटकाय, मांगत अब बरदान यों ॥१७॥ ॐहीं श्रीसम्मेदशिखगसिद्धक्षेत्रनाटककूटनै अरनाथ जिनेंद्रादि मुनि निन्यानवै कोहि निन्यानवै लाख निन्यानवै हजार सिद्धपदमातभ्यो सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।।२॥
नं०५ मल्लिनाथसम्बलकूट।
सुन्दरी छन्द।
कूट सम्वल परमपवित्र जू । गए शिवपुर मल्लिाजनेश जू॥
मुनि जु छयानवकोडि प्रमानिये । पदजजत हृदये सुख आनिये ॥
मोतीदाम छन्द।
भजो प्रभुनाम सदा सुखरूप, जजौ मनमें धर भाव अनूप ।
टरें अघपातिक जाहिं सु दूर, सदा जनको सुख आनंदपूर ॥
डरे ज्यों नाग गरुडको देखि, भ6 गजजुत्थ जु सिंहय पेखि ।
तुमनाम प्रभू दुखहर्ण सदा , सुखपूर अनूपम होय मुदा ॥
तुमदेव सदा अशरणशरणं,भट मोहवली प्रभुजी हरणं ।
तुम शरणगही हम आय अबै. मुझ कर्मवली दिढ चूर सबै ॥१०॥
*ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रसम्बलकूट श्रीपालनाथजिनेद्रादि मुनि छथान कोडी
सिद्धक्षेत्रेभ्योऽध निर्वपामीति स्वाहा ॥
नं. ९ मुनिसुव्रतनिर्जरकूट।
मदअवलिसकपोल छंद।
मुनिसुव्रत जिननाथ सदा आनंदके दाई।
सुंदर निर्जरकूट जहांतें शिवपुर जाई ।
निन्यानवकोडाकोडि कहे मुनि कोडि सत्याना।
नव लख जोडि मुनिन्द कहे नौसै निन्न्याना॥
सोरठा।
कर्म नाशि ऋषिराज. पंचमगतिके सुख लहे।
तारणतरण जिहाज, मो दुखदूर करो सकल ।
सा पू० भुजंगप्रयान। वली मोहकी फौज प्रभुजी भगाई,जग्यो ज्ञानपंचम महासुक्खदाई। समोशरण धरणेन्द्रने तब बनायो। तवै देव सुरपति सबै शाशनायो।। जय जय जिनेंद्र सुशब्द उचारी, भए आज दरशन सबै सुक्खकारी। गए सर्व पातिक प्रभू मूरहीतें, जबै दर्श कीने प्रसू दूरहीतें ॥ सुनी नाथ श्रवनो जुतरी वढाई, गहे शरण हमने तुम्हारो सु आई। बली कर्मनाशे जबै मुक्ति पाई, तिन्हे हाथजोरें सदाशीश नाई ॥१९॥ ओं ह्रीं श्री सम्मेदतिग्वराशिद्धक्षे निर्जरकूट मुनिसुव्रतनाथ जिनेंद्र दि मनिनिन्यान्यकोडाकोडी गचान्ये कोडि नोलाख नासेनिन्यान सिद्ध पदपाप्तेभ्यः सिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्प निर्व० स्वाहा ।। ३।।
नं०३ नमिनाथमित्रधरकूट। जोगीरासा कूट मित्रधर परममनोहर. सुन्दर अति छविदाई। श्रीनमिनाथ जिनेश्वर जहत, अविनाशीपदपाई। नौसै कोडाकोडी मुनिवर, एक अरव ऋषि जानो। लाख पैंतालील सातसहस, अरु नौसै व्यालिस मानो। दोहा। वसु करमनको नाश कर, अविनाशी पदपाय। पूजो चरणसरोजकों, मनवांछितफलदाय ॥. ओं ह्रीं श्रीसम्मेदारी सिद्धक्षेत्र मिश्वर कूटतै नमिनाथ जिनेंद्र दिमुनि नोसो कोड:- कोडि एकअरव पैतालीसलाख सा हजार नोसो व्यालीस सिद्ध दाभ्यो सिद्ध- चत्रेभ्योऽर्ष निषेपामीति स्वाहा ।। --
निलंगी मंच।
नं. २६ पार्श्वनाथ सुवर्णभद्रकूट ।
सुवरण भद्र जु कूटप, श्रीप्रभुपारसनाथ।
जह शिवपुरको गए, नभो जोरिजुगहाथ ॥
मुनि कोडिवियासी लाचौरामा शिवपुरवासी सुखदाई।
सहसपैंतालीस सातसो व्यालीस ताजके आलस गुणगाई॥
अवदधित तारण पतित उधारण सबदुखहारण सुखकीजै।
यह अरज हमारी सुनि त्रिपुरारी शिवपदभारी मोदीजै।
पछडी उंद।
यह दर्शनकूट अंनत लह्यो । फल पोडशकोटि उपास कह्यो।
जगमें यह तीर्थ कहो भारी। दर्शन करि पाप कटें सारी।।
मोतीदाम-छन्द । ट गति वंदत नर्क तिथंच । कबहुं दुखको नहिं पावै रंच ॥ यही शिवको जगमें है द्वार । अरे नर वन्दो कहत जवार' ॥ पारशप्रभुके नामतें, विघन दूरि टरि जाय । ऋद्धि सिद्धि निधि तासुको, मिलिहं निशिदिनआय ॥२१॥ ओं ह्रीं श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो विंशतितीर्थंकरादिअसंख्यातनुनिसिद्धपदमासेभ्यो अनर्घ्यपदमाप्तये अर्धे निर्बपामीति स्वाहा ॥९॥ अडिल्ल। जेनर परमसुभावनतें पूजा करें, हरिहाल चक्री होय राज्यपटखंडकरें। फेरिहोयधरणेंद्रइंद्रपदवीधरे,नानाविधि सुख भोगि बहुरि शिवतिय वरें।। दिः (पुष्पांजलि क्षिपेत् )
अथ समुच्चयपूजा।
दोहा।
याविध बीस जिनेशके, बीसो शिखर महान।
और असंख्य मुनीश जहं, पहुंचे शिवपदथान ॥
ओं ही श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्रावतर अवतर संत्रौपद् ।
ओं ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्र ! अत्र तिष्ठ तिष्ठ ।
ओं ह्रीं श्रीसम्मेदशिखरक्षेत्र ! मम संनिहितो भव भव वपद् ॥
अथ अष्टक।
गीतका उन्द।
पदमद्रहको नीर निर्मल, हेमझारीमें भरों।
तृषारोग निवारनको, चरणतर धाराकरों॥
सम्मेदगढतै मुनि असंख्ये, करमहर शिवपुरगये। सो थान परमपवित्र पूओं, तासु फल पुनिसंचये ॥१॥ ओं ही असंख्यानमुनिसिद्धपदमाप्तेभ्यो श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो जन्मजरामृत्युविनाश- नाय जल निपामीति स्वाहा ॥१॥ चंदन कपूर मिलाय केसर, नीरसौं घसि लाइये। जिनराज पापविनाश हमरे, भवाताप मिटाइये ।। सम्मेदगढतें मुनि असंख्ये, कर्महर शिवपुर गये। सो थान परमपवित्र पूजों, तासु फल पुनिसंचये ॥२॥ ओं ही असंख्यातमुनिसिद्धपदमामेभ्यः श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो संसारतापविनाश- नाय चन्दनं निपामीति स्वाहा || २ || चंद्रके सम ल्याय तंदुल, कनकथारनमें भों। अक्षय सु पदके कारणे जिनराजपद पूजा करों।
सम्बेदगढत सुनि असंख्ये, कर्महर शिनपुर गये। थान परमपवित्र पूजों, तासु फल पुनिसंत्रये ॥३॥ ओं ही असंख्यातानिसिद्धपदप्राप्तभ्यो श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यः अक्षयपदप्रासये अक्षतान् निर्वपामीति स्वाहा ॥३॥ कुंद कमलादिक चमेली गंध कर मधुकर फिर। मदनबाण विनाशवकों प्रभुचरण आगे धरें। सम्मेदगढतै मुनि असंख्ये, कर्महर शिवपुरगये। सो थान परमपवित्र पूजों, तासु फल पुनिसंचये ॥४॥ ओं ही असंख्यातमुनिसिद्धपदमाप्तेभ्यः श्रीसम्मेदशिखरक्षेत्रेभ्यः कामवाणविध्वंसनाय पुष्प निपामीति स्वाहा ॥४॥ नेवज मनोहर थाल में भर, हरपकर ले आरने। करहु पूजा भावसों, नर क्षुधा रोग मिटावनें ।।
सम्मेदगढतें मुनि असंख्ये, कर्महर शिवपुर गये। सो थान परमपवित्र पूजौं, तासु फल पुनिसंचये ॥५॥ ओं ह्रीं असंख्यानमुनिसिद्धपदमाप्तेभ्यः श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यः क्षुधारोगकि- नाशनाय नैवेद्य निर्वामीति स्वाहा ॥५॥ दीप ज्योति प्रकाश करके, प्रभुके गुण गावने। मोह तिमिर विनाश करके, ज्ञान भानु प्रकाशने ॥ सम्मेदगढतें मुनि असंख्ये, कर्महर शिवपुरगये। सो थान परमपवित्र पूजों तासु फल पुनिसंचये ॥ ओ ही असंख्यातनुनिसिद्धपदभाप्लेभ्यः श्रीसम्मेदाशेखरसिद्धक्षत्रभ्यो मोहांधकार. विनाशनाय दीपं निर्वपामीति स्वाहा ॥ ६ ॥ वर धूप सुंदर ले दशांगी, ज्वलनमांहि तु खेइये। वसु कर्मनाशनके सु कारण, पूज प्रभुकी कीजिये।
पू० सम्पदगढ मुनि असले, कर्महर शिवपुर गये। सो थाल परमपवित्र पूजों, तासु फल पुनि संचये ॥ ७॥ ओं ह्रीं श्रासंख्यातमुनिसिद्धपदमायेभ्यः श्रीमध्येदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अष्टकर्मदानाय धूपं निपानीति स्वाहा ॥७॥ उनकृष्ट फल जगाहिं जेते, ढूंढ करके लाइये, जो नेत्र रसना लगै सुंदर, फल अनूग चढाइये। सम्मेदगत मुनि असंख्ये, कर्भहर शिवपुर गये, सो थान परमपवित्र पूजों, तासु फल पुनि संचये ॥८॥ ओं ही असंख्यातमुनिसिद्धपदमाप्तेभ्यः श्रीसम्मेदशिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो मोक्षफलप्रामये फलं निर्वपामीति स्वाहा ॥८॥ वसुद्रव्ययुत शुभ अर्घ लेकर, मनप्रफुल्लित कीजिये। तुमदास यह वरदान मागें, मोक्षलक्ष्मी दीजिये॥
सम्मेदगढ मुनि असंख्ये, कर्महर शिवपुर गये। सो थान परमपवित्र पूजों, तासु फल पुनि संचये।। ओं ही असंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तभ्यः श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यो अनर्घपदमासये अर्थ निर्वयामीति स्वाहा ॥६॥ नितकरें जे नरनारि पूजा, भाव भक्ति सु लायके । तिनको सुजस कह कहें. जवाहर हरषमनमें धारके। ते है सुरेश नरेश खगपति, समझ पूजाफल यही। सम्मेदगिरिकी करहु पूजा, पायहो शिवपुरमही ॥ ओं ही असंख्यातमुनिसिद्धपदप्राप्तेम्यः श्रीसम्मेदसिखरसिद्धक्षेत्रेभ्यः पूर्णार्घ निर्वामीति स्वाहा ॥१०॥ कवित्त परम शिखरसम्मेद-सबहीको है सुख करता।
स०
२०
बर्दै जे नरनारि तिन्होंके अघ सब हरता।
नरकपशू गति टरे सुक्ख जगके बहु पावें।
नरपति सुरपति होय फेरि शिवपुरको जावें ।।
दोहा।
जे तीरथ वंदें नहीं, सुनें धर्म नहिं सार ।
ते भववनमें भ्रमहिंगे, कबहुं न पावें पार॥
नरभव उत्तम पायके, श्रावककुल अवतार ।
पूजा जिनवरकी करें, ते उतरें भवपार ॥
सबावधिजोग जुपायकें. शिखर न बंदें सार ।
रतन पदारथ पाय ते, देत समुद्र में डार ॥
ढाल कार्तिक। नं. ११ आदिनाथसर्वसिद्धवरकूट । प्राणी हो आदीश्वर महाराज जी, अष्टापद शिवथान हो। पूजत सुर हर नर सकल, सो पावे निर्वाण हो ।। पाणी हम पूजत इनहीं सदा, यह नाशै भवभव भीति हो। प्राणी पूजो मनवचकाय कर, ॥१॥ ओं ह्रीं श्रीऋषभनाथजिनेंद्रादिमुनिसिद्धपदप्राप्तेभ्यः श्रीकलाशगिरिसिद्धक्षेत्रेम्पो अर्ध नं० ११ वासुपुज्यमंदारगिरि। वासुपूज्य जिनराज चम्पापुरतें शिव गये। मनववजोग लगाय, पूजों पदयुग अर्घले ॥ २॥ ओं ह्रीं वासपूज्यसिद्धपदमातेभ्यः श्रीर्चपापुरसिद्धसेनेभ्यो अर्थ निर्वामीति स्वाहा ॥२॥ निर्यपाभीति स्वाहा ॥ मोला।
०२५ नेमिनाथ ऊर्जयतकूट। दोहा। २१ नेमीश्वर ताव राजमति, लीली दीक्षा जाय। सिद्ध भए गिरनारतें, जो अर्घ बनाय ॥३॥ ओं ह्रीं श्रीनेगिनाथसिद्धपदमाप्तेभ्यः श्रीगिानारिसिद्धक्षेत्रेभ्यः अर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥३॥ नं.२महावीर वर्द्धमान जिनेश्वर पूजिये. सकलपातक दूर सु कीजिये। गये पावापुरतें मोक्षको, तिनहिं पूजत अर्घसंजोयके ॥४॥ ओं ह्रीं श्रीमहावीरसिद्धपदमामेभ्यः श्रीपानापुरसिद्धनेत्रेभ्यो बर्षे निर्मपामीति स्वाहा ॥४॥ नं० १ चौवीसगणवरप्रथमटोंक। तीर्थकर चौवीसके, गणनायक हैं जेह दोहा।
तिनको पूजों अर्घ ले. मनवच धारि सनेह ॥ ५॥ ओं ही चतुर्विशतिजिनगणवरचरणकमलेभ्यो निर्वपामीति स्वाहा ॥५॥ सिद्धक्षेत्र जे और हैं, भरत क्षेत्रके ठाहिं। और जे अतिशय क्षेत्र हैं, कहे जिनागममांहि ॥ तिनके नाम सु लेतही, पाप दूर हो जाय । ते सब पूजों अर्घ ले, भवभवमें सुखदीय ॥ ओं ही श्रीभरतक्षेत्रसम्बन्धी सिद्ध क्षेत्रातिशयसिद्धक्षेत्रेभ्यो अर्थ नि० ॥६॥ सोग्ठा। द्वीप अढाईमांहि, सिद्धक्षेत्र जे ओर हैं। पूजों अर्घ चढाय, भवभवके अपनाश हे॥७॥ ओं ह्रीं ढाईद्वीपकेषिर्षे विद्यमानसिदक्षेत्रेभ्योऽर्थ नि०॥ ७ ॥ पूजों तीस चौवीस परमसुखदाय जू अडिला स० भूत भविष्यत वर्तमान गुणगाय । कहे विदेहके वीस नमों शिरनाय जू अौं अर्घ बनाय सु विघन पलाय जू॥८॥ ओं ह्रीं श्रीभूतभविष्यद्वर्त्तमानसंबंधी त्रिशचतुर्विशतिगिद्रेभ्यो विदेहक्षेत्रे शाश्वत विद्यमान विंशतितीर्थकरेभ्यश्च अर्धे नि० ॥८॥ दोहा। कृत्याकृत्रिम जे कहे, तीन लोकले माय । ते सब पूजों अर्घ ले, हाथजोर शिरनाय॥ ओं ह्रीं श्रीतीनलोकसम्बन्धीकृत्याकृत्रिजिनालपजिनविवेभ्यो अर्धे निर्ब० ॥६॥ अथ जयमाला लोलतरंग छंद । मनमोहन तीरथं शुभ जानो, पावनपरम सु क्षेत्र प्रमानो।
उन्नतशिखर अनूपम सोहै, देखत ताहि सुरासुर मोहै ॥ १॥ तीरथ परम सुहावनो, शिखरसमंद विशाल । कहत अल्पबुधि गक्तसों, सुखदायक जैमाल ।। चौपाई १५ मात्रा ! सिद्धक्षेत्र तीरथ सुखदाइ, वंदत पाप दूरि हुइ जाइ। शिखरशीशपर कूट मनोज्ञ. कहे वीम अति शोभायोग्य ॥ १ प्रथम सिद्धवरकूट सुजान.अजितनाथको मुक्ति सुथान । कूटतनो दरशन फल एह, कोटि वतीप्त उपास गिनेह ॥२॥ दूजो धवलकूट हे नाम , संभवप्रभु जहं ते शि.धाम । दरश कोटि प्रोपधफल जान. लाख वियालिम कहो वखान ॥३॥ आनंदकूट महा सुखदाय, जहंते अभिनंदन शिवजाय ।
कूटतनो दरशन इमजान, लाख उपासतनो फलमान ॥४॥
अविचलकूट महासुख वेश, मुक्ति गए जहं सुमति जिनेश ।
कूट भावधरि पूजै कोय, एक कोटि मोषधफल होय ॥५॥
मोहनकूट मनोहर जान, पद्मप्रभु जहते निर्वान ।
कूटपूज फल लेहु सुजान, कोटि उपास कहो भगवान ॥६॥
मनमोहन है कूटे प्रभास, मुक्ति गए जहं नाथ सुपास।
पूजै कूट महाफल होय, कोटे बतीस उपास जु सोय॥
चंद्रप्रभुके मुक्ति सु धाम, परमविशाल लालतघट नाम ।
कटतनो दरशन फलजान, प्रोषध सोलह लाख बखान ॥८॥
सुप्रभ कूट महासुख दाय, जहत पुष्पदंत शिवपाय।
पूजें कूट महाफल लेव, कोडि उपास कहो जिनदेव ॥९॥
श्रीविद्युतवर कूट महान, मोक्षगये शातल धार ध्यान । पूजै त्रिविधजोग करकाय, कोडि उपासतनो फल होय ॥१०॥ संकुलकूट महा शुभ जान, श्रीश्रेयांश गये शिवथान। कूटतनो दरसन फल सुनो, कोडि उपास जिनेश्वरभनो ॥ ११ कूट सुवीर परभमुखदाय, विमल जिनेश जहां शिवपाय। , मनवच दरश करै जो कोय, कोटि उपासतनो फल होय ॥१२॥ कूट स्वयंभू सुभग सु नाम, गये अनंत अमरपुर धाम । यही फूटको दरशन करै, कोडि उपासतनो फल धरै ॥ १३ ॥ है सुदत्तवर कूट महान. जहनै धर्मनाथ निरवान । 'परमविशाल कूट हे सोय, कोटे उपास दरश फल होय ॥१४॥ छूट प्रभास परमशुभ कह्यो, शांतिनाथ जहंत शिव लह्यो।
सक
५०
र तनो दाशन है सोय, एक कोडि प्रोषधफल होय ॥ १५
परम ज्ञानघर है शुभकूट, शिवपुर कुन्थु गये अषछूट।
जालों पूजे जो करजांडि, फल उपवास कहो इक कोडि ॥१६॥
नाटककूट महाशुभ जान, जहत शिवपुर अर भगवान ।
दरशन करै कूटको जोय, छ्चानव कोडि वासफल होय॥ १७ ॥
सवलकूट मल्लि जिनराज, जहंत मोक्ष भये शुभकाज ।
पोडिदरशफल कहो जिनश, कोडि एक पोपध शुभ वेश ॥१८॥
निर्जरकूट कहो सुखदाय, मुनिसुत्रत जहतें शिव जाय।
कूटतनी अब दरशन सोय, एक कोडि प्रोपधफल होय।।१९।।
कूट मित्रधरतॆ नमि मुक्त, पूजत पाय सुरासुर युक्त।
कूटतनो फल है सुखकन्द, कोटि उप.स कहो जिनचंद ॥२०॥
H श्रीप्रभु पार्श्वनाथ नराज, चहुंगातसे छूटे महाराज । सुवरणभद्र कूटको नाम, तासों मोक्ष गये सुखधाम ॥२१॥ तीन लोक हितकरण अनूप, वंदत ताहि सुरासुर भूप। चिंतामाणि सुरवृक्ष समान, ऋद्धि सिद्धि मंगलसुखदान ॥२२॥ नवनिधि चित्रावेलि समान, जातै सुक्ख अनूपम जान । पारस और कामसुरधेन, नानाविध आनंदको देन ॥७॥ व्याधिविकार जाहिं सव माज, मनचीले पूरे होंय काज । भवदधिरोग विनाशकसोथ, औषधिजगने और न को ॥ ४॥ बिरमल परम थान उत्कृष्ट, वंदत पाप भजे अरु दुष्ट । जो नर ध्यावतपुण्य कमाय, जशगावत सबकर्म नशाय ॥२५॥ कटें अनादिकालके पाए, म एल छिनमें सराय।
जरपति इंद्र कणेंद्र जुसले, और लगेंद्र मृगेंद्र जु नः ॥२६॥
नित सुर सुरी करें उचार, नाचत गावत विविधप्रकार ।
बहुविधि भक्ति करें मनलाय, विविधप्रकार बादित्रबजाय॥२७॥
हम हम हमता बजै मृदंग , धन धन घंट बजे मुहचंग।
झुनझुन झुनझुन झुनिया झुनें, सर सर सर सारंगी धुने ॥२८॥
मुरली बीन बजे धुनि मिष्ट,पटहा तूर सुरान्वित पुष्ट ।
सव सुरगण थुति गावत सार, सुरगण नाचत वहुत प्रकारा॥२९॥
झन नन नन ना नूपुर वान,तन नन नन ना तोरत तान।
ताथिइ थिइ थिइ थिई चाल, सुर नाचत नावत निजसुभाल ॥
नाचत गावत नाना रंग, लेत जहां सुर आनंद संग।
नितपति सुरजहं वंदत जाय, नानाविध के मंगल गाय ॥३१॥
अनहदधुनिकी मोद जू होय, पापति वृष की अतिही होय । तातें हमको सुम्ब दे सोय, गिरिवर वंदों करधरि दोय ॥३२ मारुत मंद सुगंध चलेय, गन्धोदक जहं नित वये। जियकी जाति विरोध न होय, गिरिवर वंदों करधरि दोय ३३ ज्ञान चरन तप साधन सोय, निजअनुभवको ध्यान जु होय । शिवमंदिरको द्वारो सोय,गिरिवर वंदे करधरि दोय ॥३४॥ जो भवि वंदे एक हि वार, नरक निगोद पशू गति टार । सुर शिवपदको पावै सोय, गिरिवर वंदों करधरि दोय ॥३५॥ जाकी महिमा अगम अपार, गणधर कहत न पा पार । तुच्छबुद्धि में मति कर हीन, कही भक्तिवश केवल लीन ॥३६॥ घतान्द। श्रीसिघखेतं अति सुखदेतं, शीघ्रहि भवदधि पार कर।।
अस्विविनाशननिखार, जग गिरिवर जगतारवर ॥२७॥ औ ही श्री सम्मेदशिर गिद्धक्षेने यो पूर्ण निर्वधामा स्वाहा । होगा। शिखर सु पूजें जो सदा. मन राचननचितलाय। दास जवाहर यों कही, सो शिरपुरको जाय ॥ इत्यायो । इति श्रीमम्मेदचल पूजा समाप्ता। कवि परिचय अडिल्ल। पिना सु मोतीलाल "चाके कहे। काका हीरालाल गुणन पूरे लहे। भास मूरी गोत जु भारिल जानिये, शाण जिनेश्वर धर्म यही उर आनिये ॥१॥ यश के लहने ना कही, कही धर्म के काज । श्रीजिनवर की भक्ति से, मिलिहै सुक्न समाज ॥२॥ :
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२७ करम तुम चूरण कर डारे, जय शिवकामिनिकन्त जिनेश्वर गवहीके प्यारे ।। प्रभू तुम अगणित बलधारी, अतुलअनन्तचतुष्टयधारक सबको सुखकारी ॥ प्रभू तुप तपलक्षमी धरता, धरमधुरंधर धीर जिनेश्वर स्वर्गमुक्ति करता। मभू तुम रत्नत्रयधारी, नारणतरथा जिनेश्वर स्वामी सबको हितकारी ।। प्रभू तुम संशयमदहाली, निर्विकार निदोष जिनेश्वर गुणअनन्तधारी । प्रभू तुम कामसुभटविजई, घर संयम बापाल जिनेश्वर चारितदलसजई ।। प्रभू तुप मोहमहामारो, क्रोधमानमायाको त्यागो शिवपदको धागे। प्रभू गुणमागर है भारी, बानजिहाज बैठके गणधर पहुंचे नहिं पारी ॥ मयू गुणकीपति वेलि श्ढी, यतन विना जगमंड ऊपर आपुहित जु चढी। कुदेव यश अब जी नित चाहैं,पै अपने घरहीके भीतर यशको नहिं लाहे ।। प्रभू तुम सबको सुखदाई, जन्मजन्मके पार कटन है तुमरे गुणगाई। जगतमें बहु पदार्थ जानो, सुरता चिंतामणि पारस हैं नवनिधिको मानौ ।। अरे इक भव जानो भई, जे नियोग ये जियको होई किंचित सुखदाई । करें जे प्रभुचरणन की सेवा, जनम जनम सुखदायक प्रभुजी तुमही हो देवा ॥
तुमहीं हो पानाथ स्वामी, तुम बांधव जगतात दयानिधि अन्तरके जामी। प्रभु तुम समं सुखकेदाता, जगजीवनको पार लगावत-देते सुखमाता ।। प्रसू तुम गुणरबनखाना,तुम पुनीत समदर्शी प्रभुजी तुम्ही मर जाना ॥ प्रभू विन तीनकालमाही, नहिं नहिं शरण जीवको कोई या जगके माहीं । प्रभू तुम करुणानिधि नाथा, तुमसनमुख हम ठ ढे निशिदिन जोरे जुगहाथा ॥ होय नहिं जबलों निग्वाना, जगनिवाम छूटै अब नाहीं दुबको जो दाना ॥ प्रभू तुम चरणांबुजवासा, भवभव मिले करत या अग्जी है 'जवार दामा। और नहि मांगत प्रभु तुमसों, है दयाल दीजे बरदाना खुसी होय हमसों ॥ दोहा। त्रिशुवनपति अरजी सुनो, कृपानाथ गुणखान । भवसागरते काढिय, शिवपद दे भगवान ॥ १ ॥ अनिल। अथ वैशाख बदी नवमी शुभ जानिये । शुक्रवार के दिना समापत मानिये ॥ इक बसु नेव को अंक एक अव फिर लिखो। संवत यही प्रमाण सरस मनमें लखो।
* दी। स० . जे नर नारी भानसों, पूलै श्रीजिनदेव ।। नाना विध सुखभोगके, पाचे शिव स्वयमेव ॥ ३ ॥ तिहं को एक दृष्टांत है, सुनो मध्य जन लोग। अद्धार्ने पूजा करें, रन समान जु होय ॥ ४ ॥ "विन भद्रा पूजा कर, कांच ममान सुजान । रतन बडो है मोलको, थुम्मोलो कांच समान || ५॥ त करी तो क्या भई, भाव न मनमें लाय । श्रद्धा से थोरी कर, पावै पद सुम्य दाय ॥ ६ ॥ श्रद्धासे थोरी करो, लेहु बहुत कर मान । प्रापति हो की, पाचे पद निरवानः॥ ७॥ तुच्छ बुद्धि मेरी सही, पंडिन करों विचार । मूल चूक अब होय जो, लीज्यो चतुर सुधार ॥ ८॥ २८
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MAM
पच कादक जीन धोश. मिला पता...
जनमेशप्रभाकर कालिग;
९।१ भादंबगोसलेगा, जार :
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