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संस्कृतवाक्यप्रबोधः

Sarasvatii Svaamidayaanand · 2006/03/09

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ओ३म्
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संस्कृतवाक्यप्रबो
१
श्रीमत्स्वामिदयानन्दसरस्वतीनिर्मितः ॥
अजमेरनगरे
वैदिकयन्त्रालये मुद्रितः
पठनपाठनव्यवस्थायां द्वितीयं पुस्तकम् ।
इस पुस्तक के छापने का अधिकार किसी को नहीं
है
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क्योंकि
इमर नटरी कराई गई है.
कि प्रपा पोटा
संवत् १९७० वि०
नवमवार
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श्रीमहयानन्दाब्द ३१
डाकव्यय)॥
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COMPILED ओ३म् PHP ECKEW 1973 मा परमगुरवे परमात्मने 14 MAINoynoposapna ला --- -------- न अथ संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ ५LON pay 66060 --- * गुरुशिष्यवार्तालापप्रकरणम् * भोः शिष्य उत्तिष्ठ प्रातःकालो जातः। हे शिष्य ! उठ सवेरा हुश्रा । उतिष्ठामि । उठता हूं। अन्ये सर्वे विद्यार्थिन उत्थिता न वा? और सब विद्यार्थी उठे वा नहीं ? अधुना तु नोत्थिता खलु। अभी तो नहीं उठे हैं। तानपि सर्वानुत्थापय । । उन सब को भी उठा दे। सर्व उत्थापिताः । सव उठा दिये। सम्पत्यस्माभिः किं कर्त्तव्यम् ? इस समय हम को क्या करना चाहिये ? आवश्यकं शौचादिकं कृत्वा सन्ध्या आवश्यक शरीरशुद्धि करके सन्ध्योपासना। वन्दनम् । पावश्यकं कृत्वा सन्ध्योपासिताऽतः आवश्यक कर्म करके सन्ध्योपासन कर- परमस्माभिः किं करणीयम् ? लिया इसके आगे हम को क्या करना चाहिये ? अग्निहोत्रं विधाय पठत । अग्निहोत्र करके पढ़ो। पूर्व किं पठनीयम् ? पहिले क्या पढ़ना चाहिये ? वर्णोधारणशिक्षामधीध्वम् । वर्णोच्चारणशिक्षा को पढ़ो। पश्चात्किमध्येतव्यम् । पीछे क्या पढ़ना चाहिये ? किंचित्संस्कृतोक्तिबोधः क्रियताम् । कुछ संस्कृत बोलने का ज्ञान किया जाय। पुनः किमभ्यसनीयम् ? फिर किसका अभ्यास करना चाहिये ?

संस्कृतवाक्यमबोका। 2. पथायोग्यव्यवहारानुष्ठानाय प्रयतध्वम्। यथोधित व्यवहार करने के लिये प्रयत्न करो। यते। कुतोऽनुचितव्यवहारकर्तुवियैव न जा क्योंकि उलटे व्यवहार करनेहारे को विद्या ही नहीं होती। को विद्वान् भवितुमर्हति ? कौन मनुष्य विद्वान होने के योग्य होता है। यः सदाचारी मात्र पुरुषार्थी भवेत् । जो सत्याचरणशील बुद्धिमान् पुरुषार्थी हो। कीदृशादाचार्यादधीत्य परिडतो भ- कैसे प्राचार्य से पढ़ के पण्डित हो वितुं शक्नोति? सकता है ? भनूचानतः। पूर्ण विद्यावान् वक्ता से। अथ किमध्यापयिष्यते भवता ? अब आप इसके अनन्तर हम को क्या पढ़ाइयेगा ? अष्टाध्यायीमहाभाष्यम् । अष्टाध्यायी और महाभाष्य । किमनेन पठितेन भविष्यति ? इसके पढ़ने से क्या होगा ? शब्दार्थसम्बन्धविज्ञानम् । शब्द अर्थ और सम्बन्धों का यथार्थबोध पुनः क्रमेण किं किमध्येतव्यम् ? फिर क्रम से क्या २ पढ़ना चाहिये। शिक्षाकल्पनिघण्टुनिरुक्तछन्दोज्योति- शिक्षा, कल्प, निघण्टु, निरुक्त, छन्द और 'पाणि वेदानामङ्गानि पीमांसावैशेषि- ज्योतिष वेदों के अङ्ग । मीमांसा वैशे- कन्याययोगसांख्यवेदान्तान्युपाङ्गान्या- षिक, न्याय, योग, सांख्य और वेदान्त युर्धनुर्गान्धर्वार्थानुपवेदानतरेयशतपय- उपाङ्ग । आयुर्वेद, धनुर्वेद, गांधर्ववेद, सामगोपथ ब्राह्मणान्यधीत्य ऋग्यजु- | और अर्थवेद उपवेद । ऐतरेय, शतपथ, स्सामाऽथर्ववेदान् पठन्तु । साम और गोपथ ब्राह्मण ग्रन्थों को प्रढ़के ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद को पढ़ो। एतत्सर्व विदित्वा किं कार्यम् ? इन सब को जान के फिर क्या करना चाहिये ? धर्मजिज्ञासाऽनुष्ठाने एतेषामेवाऽध्या- धर्म के जानने की इच्छा तथा उस का पनं च। अनुष्ठान और इन्हीं को सर्वदा पढ़ाना।

LUMPHLEGE देवदत्त । पञ्जाब। संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ नामनिवासस्थानप्रकरणाम् ॥ तव किमामास्ति? तेरा क्या नाम है। देवदत्तः। कोऽभिजनो युवयोर्वर्तते ? तुम दोनों का जन्मदेश कौन है ? कुरुक्षेत्रम् । कुरुक्षेत्र देश। युष्माकं जन्मदेशः को विद्यते ? तुम्हारा जन्मदेश कौन है ? पञ्चाला:। भवन्तः कुत्रत्याः १ आप कहां के हो ? वयं दाक्षिणात्याः स्मः। हम दाक्षिणी हैं। तत्र का पूर्वः ? वहां आप के निवास की कौन नगरी है ? मुम्बापुरी। मुम्बई। इमे क निवसन्ति ? ये लोग कहां रहते हैं। नयपाले। नयपाल में। अयं किमधीते ? यह क्या पढ़ता है ? व्याकरणम् । व्याकरण को। त्वया किमधीतम् ? तूने क्या पढ़ा है ? न्यायशास्त्रम् । अयं भवदीयश्लाः किं प्रचर्चयति ? यह आप का विद्यार्थी क्या पढ़ता है ? ऋग्वेदम् । ऋग्वेद को। त्वं किं कर्तुं गच्छसि ? तू क्या करने को जाता है ? पाठाय व्रजामि पढने के लिये जाता हूं। कस्मादधीषे ? किससे पढ़ता यवदत्वात् । यज्ञदत्त से इमे कुतोऽधीयते ? ये किससे पढ़ते हैं ? विष्णुमित्रात् । विष्णुमित्र से। त्वयि पठति कियन्तःसंवत्सराव्यतीता? तुझ को पढ़ते हुए कितने वर्ष बीते ? पञ्च । पांच । भवान् कविवार्षिकः? आप कितने वर्ष के हुए ? न्यायशास्त्र।

४ संस्कृतवाक्यप्रयोषः॥ mmmmmmmmmmmmm जीते हैं। प्रयोदशवार्षिकः। तेरह वर्ष के। त्वया पठनारम्भः कदा कृतः ? तूने पढ़ने का प्रारम्भ कब किया था ? यदाहमष्टवार्षिकोऽभूवम् । जब मैं आठ वर्ष का हुआ था । तव मातापितरौ जीवतो न वा ? तेरे माता पिता जीते हैं वा नहीं ? जीवतः। तव कति भ्रातरो भगिन्यश्च ? तेरे कितने भाई और बहिन हैं ? प्रयो भ्रातरश्चैका भगिन्यस्ति । तीन भाई और एक बहिन है । तेषु त्वं ज्येष्ठस्ते, सा, वा ? उनमें तू ज्येष्ठ वा तेरे भाई अथवा बहिन ? अहमेवाग्रजोऽस्मि । मैं ही सब से पहिला जन्मा हूं। तव पितरौ विद्वांसो न पा ? तेरे माता पिता विद्या पढ़े हैं वा नहीं ? महाविद्वांसो स्तः। बड़े विद्वान् हैं। तर्हि त्वया पित्रो सकाशात्कुतो न विद्या तो तूने माता पिता से विद्या ग्रहण क्यों गृहीता? न की ? अष्टमवर्षपर्यन्तं कृता । आठवें वर्ष पर्यन्त की थी। मत ऊर्य कुतो न कता ? इससे आगे क्यों न की ? मातृमान् पितृमानाचार्यवान् पुरुषो माता पिता से आठवें वर्ष पर्यन्त इस के वेदेति शास्त्रवियः। आगे आचार्य से पढ़ने का शास्त्र में वि- इस से अन्यच्च गृहे कार्यवाहुल्येन निरन्तर- और भी घर में बहुत काम होने से निर- मध्ययनमेव न जायते । न्तर पढ़ना ही नहीं होता । प्रतापरं कियद्वर्षपर्यन्तमध्येष्यसे ? इसके आगे कितने वर्ष पर्यन्त पढ़ेगा ? पञ्चत्रिंशद्वषोणि। पैतीस वर्ष तक। धान है 4 गृहाश्रमप्रकरणम् ॥ पुनस्ते का चिकीर्षास्ति ? फिर तुझ को क्या करने की इच्छा है ? गृहाश्रमस्य । गृहाश्रम किंव भोः पूर्णविद्यस्य जितेन्द्रियस्य क्यों जी ! जिस को पूर्ण विद्या और जो परोपकारकरणाय संन्यासाश्रपग्रहणं जितेन्द्रिय है उस को परोपकार करने की।

संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ शास्त्रोक्तमस्ति तम करिष्यसि ? के लिये संन्यासाश्रम का ग्रहण करना शा- स्त्रोक्त है इसको न करोगे ? किं गृहाश्रमे परोपकारो न भवति ? क्या गृहाश्रम में परोपकार नहीं होता ? पादृशः सन्न्यासाश्रामिणा कर्तुं श- जैसा संन्यासाश्रमी से मनुष्यों का उपकार क्यते न तादृशो गृहाश्रमिणाऽनेक- हो सकता है वैसा गृहाश्रमी से नहीं हो कार्यैः प्रतिबन्धकत्वेनाऽस्य सर्वत्र सकता क्योंकि अनेक कामों की रुकावट भ्रमणाशक्यत्वात् । से इसका सर्वत्र भ्रमण ही नहीं हो सकता। भोजनप्रकरणम् ॥ आगतो गन्तव्यम् । नित्यः स्वाध्यायो जातो भोजनसमय ! नित्य का पढ़ना पढ़ाना होगया, भोजनस- । मय आया चलना चाहिये। तव पाकशालायां प्रत्यहं भोजनाय किं तुम्हारी पाकशाला में प्रतिदिन भोजनके कि पच्यते ? लिये क्या २ पकाया जाता है ? शाकसूपौदश्वित्कौदनापूपादयः । शाक, दाल, कढी, भात, पुश्रा और रोटी आदि । - ? किं वः पायसादिमधुरेषु रुचिर्नास्ति ? क्या आप लोगों की खीर आदि मीठे भो- जनों में रुचि नहीं है ? अस्ति खलु परन्वेतानि कदाचिद् २ है सही परन्तु ये भोजन कभी २ होते हैं। भवन्ति । कदाचिच्छष्कुली श्रीखण्डादयोऽपि कभी पूरी कचोड़ी शिखरन आदि भी होते भवन्ति न वा हैं वा नहीं ? भवन्ति परन्तु यथर्तुयोगम् । होते हैं परन्तु जैसा ऋतु का योग हो । सत्यमस्माकमपि भोजनादिकमेवमेव ठीक है हमारे भी भोजन आदि ऐसे ही ब- निष्पद्यते । त्वं भोजनं करिष्यसि न वा तू भोजन करेगा वा नहीं ? अद्य न करोम्पजीर्णतास्ति । आज नहीं करूंगा अजीर्णता है । अधिक भोजनस्येदमेव फलम् । । अधिक भोजन का यही फल है । नते हैं।

-naimaa ज्यते । संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ बुदिमता तु यावज्जीर्यते तावदेव भु- बुद्धिमान पुरुष तो जितना पचे उतना ही खाता है। अतिस्वल्पे भुक्के शरीरबलं सत्यधिके बहुत कम और अत्यधिक भोजन करने में चातः सर्वदा मिताहारी भवेत् । शरीर का बल घटता है इससे सब दिन मिताऽऽहारी होवे । योऽन्यथाऽऽहारव्यवहारौ करोति स जो उलट पलट आहार और व्यवहार क- कथं न दुःखी जायेत ? रता है वह क्यों न दुःखी होवे । येन शरीराच्छूमो न क्रियते स नैव । जो शरीर को प्राप्त होकर परिश्रम नहीं क- शरीरसुखमानोति । । रता वह शरीर के सुख को प्राप्त नहीं होता। येनात्मना पुरुषार्थी न विधीयते नस्या जो श्रात्मा से पुरुषार्थ नहीं करता उसको त्मनो बलमति न जागते । आत्मा का बल भी नहीं होता। तस्मात्सर्वैमनुष्यैयथाशति सक्रिया इसमे सब मनुष्यों को यथाशक्ति उत्तम नित्य साधनीया । कर्मों की साधना नित्य करनी चाहिये । भो देवदत्त ! त्वामहं निमन्त्रये । हे देवदत्त ! मैं तुम्हारा निमंत्रण करता हूं। मन्येऽहं कटा खल्वागच्छेयम् ? मैं मानता हूं परन्तु किस समय श्राऊं ? श्वो द्वितीयमहरमध्ये प्रागन्तव्यम् । कल दोपहर दिनचढ़े आना चाहिये । श्रागच्छ मो श्रासनमध्यारस्व । सुजन ! आइय श्रासन पर बैठिये । भवता ममोपरि महती कृपा कृना। ने मुझ पर बड़ी कृपा की। हे प्राप देशदेशान्तरप्रकरणम् ॥ ? भवानेतान् जानानी महाविद्वांसः सन्ति। आप इनको जानते हैं ये बड़े विद्वान् हैं। किन्नामान एते कुत्रत्याः खलु इनके क्या नाम और ये कहां २ के रहनेवाले हैं ? अयं यादतः काशीनिवानी। यह यज्ञदत्त काशी में निवास करता है। विष्णुमित्रोऽयं कुरुक्षेत्र वास्तव्यः । यह विष्णुमित्र कुरुक्षेत्र में वसता हैं । सोमदत्तीयं प्राथुर । यह सामदत्त मथुरा में रहता है । अय सुगमा यः। | यह सुशम्मा पर्वत में रहता है।

७ संस्कृतवाक्यमबोधः।। अयमाश्वलायनो दाक्षिणात्योऽस्ति । यह श्राश्वलायन दक्षिणी है । अयं जयदेवः पाश्चात्यो वर्तते । यह जयदेव पश्चिमदेशवासी है। भयं कुमारभट्टो बाङ्गो विद्यते । यह कुमारभट्ट वंगाली है। भयं कापिलेयः पाताले निवसति । यह कापिलेय पाताल अर्थात् अमेरिका में रहता है। अयं चित्रभानुहरिवर्षस्थः । यह चित्रभानु हिमालय से उत्तर हरिवर्ष अर्थात् यूरोप में रहना है। इमो सुकामसुभद्रौ चीननिकायो। ये सुकाम और सुभद्र चीन के वासी हैं। अयं सुमित्रो गन्धारम्थायी । यह सुमित्र गन्धार अर्थात् काविल कन्धार का करने वाला है। अयं मुभटो लङ्काजः। यह सुभट लंका में जन्मा है। इमे पंच सुवीगतिबलसुहर्षसुधर्मशतध- सुवीर, अतिवल, मुकर्मा, सुधर्मा और न्वानो मारवाः । शतधन्वा ये पांच मारवाड़ के रहने वाले हैं। एते मया आमन्त्रिताः स्वस्वस्थानादा ये सब मेरे बुलाये हुए अपने २ घर से गताः। इमे शिवकृष्णगोपालमानसुच द्राक- शिव, कृष्ण, गोपाल, गाधव, मुचन्द्र, प्र- मभूदेवचित्रसेनमहारथा अत्रत्याः । कग, भूदेव, चित्रसेन और महारथ ये नव इस मध्यदेश के रहने वाले हैं। अहोभाग्यं मे गद् भवत्कृपयैतेषामपि मेर। वहा भाग है कि जो आप की कृपा समागमो जातः । से इन मत्पुरुषों का भी मिलाप हुआ । अहमपि सभवतः सर्वानेतानियन्त्रयि- मैं भी आप के समेत इन सब का निम- तुमिच्छामि। न्त्रण करना चाहता हूं। अस्माभिर्भवनिमन्त्रणमूरीकृतम् । हमने श्राप का निमन्त्रण स्वीकार किया। प्रीतोस्मि परन्तु भवद्भोजनार्थ किंकि आप के निमन्त्रण मानने से मैं बड़ा प्रसन्न हुआ परन्तु आप के भोजन के लिये क्या क्या पकाया जाय? यद्यद्भोक्तुमिच्छास्ति तचदाज्ञापयन्तु । जिस २ पदार्थ के भोजन की इच्छा हो उस २ की आज्ञा कीजिये। आये हैं। पक्तव्यम् ?

. संस्कृतवाक्यमबोषः॥ पोग्यमेव पक्कष्यम् । भवान् देशकालबः कथनेन किं यथा आप देशकाल को जानते हैं कहने से क्या यथायोग्य ही पकाना चाहिये। सत्यमेवमेव करिष्यामि। ठीक है ऐसा ही करूंगा। उत्तिष्ठत भोजनसमय मागतः पाक: उठिये भोजनसमय आया पाक तैयार है। सिदो वर्तते । भो भृत्य ! पाद्यमय॑माचमनीयं जलं हे नौकर ! इन को पग हाथ मुख धोने देहि । के लिये जल दे। इदमानीतं गृह्यताम् । यह लाया लीजिये। भोः पाचकाः सर्वान् पदार्थान् क्रमेण हे पाचक लोगो ! सब पदार्थों को क्रम से परिवेविष्ट । मुञ्जीध्वम् । भोजन कीजिये। भोजनस्य सर्वे पदार्थाः श्रेष्ठा जाता भोजन के सब पदार्थ अच्छे हुए हैं वा नहीं ? प्रत्युत्तमाः सम्पन्नाः किं कथनीयम् । क्या कहना है बड़े उत्तम हुए हैं। भवता किंचित् पायसं ग्राह्यं वा यस्ये. आप थोड़ीसी खीर लीजिये वा जिसकी च्छाऽस्ति । इच्छा हो। प्रभूतं भुक्तं तृप्ताः स्मः। बहुत रुचि से भोजन किया तृप्त हो गये परोसो। न वा? sho तर्युत्तिष्ठत । जलं देहि । गृखताम् । ताम्बूलादीन्यानीयंताम् । तो उठिये । जल दे। लीजिये। पान बीड़े इलायची आदि लाओ । ये हैं लीजिये। इमानि सन्ति गृहन्तु । सभाप्रकरणम् ॥ इदानीं सभायां काचिचर्चा विधेया। धर्मः किंलक्षणोऽस्तीति पृच्छामि ? अब सभामें कुछ वार्तालाप करना चाहिये । मैं पूछता हूं कि धर्म का क्या लक्षण है ?

संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ 8 वेदप्रतिपाद्यो न्याय्यः पक्षपातरहितो वेदोक्त न्यायानुकूल पक्षपात रहित और यश्च परोपकारसत्याऽऽचरणलक्षणः। जो पराया उपकार तथा सत्याचरणयुक्त है उमी को धर्म जानना चाहिये । ईश्वरः कोऽस्तीति हि ? ईश्वर किसको कहते हैं आप कहिये ? यः सच्चिदानन्दस्वरूपः सत्यगुणकर्म- जो सच्चिदानन्दस्वरूप और जिसके गुण स्वभावः। कर्म स्वभाव सत्य ही हैं वह ईश्वर कहाता है । मनुष्यैः परस्परं कथं वर्तितव्यम् ? मनुष्यों को एक दूसरे के साथ कैसे २ वर्त्तना चाहिये ? धर्मसुशीलतापरोपकारैः सह यथा- धर्म, श्रेष्ठ स्वभाव और परोपकार के साथ योग्यम् । जिनसे जैसा व्यवहार करना योग्य हो वैसा ही उनसे वर्तना चाहिये । आर्यावर्त्तचक्रवर्तिराजप्रकरणम् ॥ अस्मिन्नार्यावर्ने पुरा के के चक्रवर्चि इस आर्यावर्त देश में पहिले कौन २ राजा अभूवन् ? चक्रवर्ती राजा हुए हैं। स्वयंभुवाधा युधिष्ठिरपर्यन्ताः। स्वयम्भू से लेके युधिष्ठिर पर्य्यन्त । चक्रवर्तिशब्दस्य कः पदार्थः ? चक्रवर्ति शब्द का क्या अर्थ है ? य एकस्मिन् भूगोले स्वकीयमाशां जो एक भूगोल भर में अपनी राजनीति- प्रवर्चयितुं समर्थाः। रूप आज्ञा को चलाने में समर्थ हों। ते कीदृशीमाज्ञां प्राचीचरन् ? वे कैसी आज्ञा का प्रचार करते थे ? यया धार्मिकाणां पालनं दुष्टानां जिससे धर्मियों का पालन और दुष्टों का ताड़नं च भवेत् । राजप्रजालक्षणराजनीत्यनीतिप्रकरणम् ॥ ताड़न होवे। राजा को भवितुं शक्नोति ? राजा कौन हो सकता है ?

१० संस्कृतवाक्यमयोपा यो धार्मिकाणां सभाया अधिपतित्वे जो धर्मात्माओं की सभा का सभापति योग्यो भवेत् । होने योग्य होवे। यः प्रजा पीड़यित्वा स्वार्थ साधयेत् जो प्रजा को दुःख देकर अपना प्रयोजन स राजा भवितुमर्दोऽस्ति न वा ? साधे वह राजा हो सकता है वा नहीं ? नहि नहि नहि स तु दस्युः खलु । नहीं नहीं नहीं वह तो डाकू ही है । या राजद्रोहिणी सा तु न प्रजा किन्तु जो राजव्यवहार में विरोध करे वह प्रजा स्वेनतुल्या मन्तव्या। तो नहीं किन्तु उसको चोर के समान जानना चाहिये। कथंभूताः जनाः प्रजा भवितुमही ? कैसे मनुष्य प्रजा होने को योग्य हैं ? ये धार्मिकाः सततं राजापियकारिणः । जो धर्मात्मा और निरन्तर राजा के प्रिय- कारी हों। राजपुरुषैरप्येवमेव प्रजामियकारिभिः राजसम्बन्धी पुरुषों को भी वैसे ही प्रजा सदा भवितव्यम् । के प्रिय करने में सदा रहना चाहिये । शत्रुवशकरणप्रकरणम् ॥ एते शत्रुभिः सह कथं वर्तेरन् ? ये लोग शत्रुओं के साथ कैसे वर्त ? राजप्रजोत्तमपुरुषैररयः सामदामदण्ड राजा और प्रजा के श्रेष्ठ पुरुषों को योग्य है भेदेवशमानेयाः। कि अरियों को। साम ) मिलाप (दाम) गुप्तदण्ड और ( दण्ड ) उनको दण्ड ( भेद ) आपस में उनको फोड़ देना उन- से वश में करना चाहिये। सदा स्वराज्यमनासेनाकोषधर्मविद्या. सब दिन अपना राज्य, प्रजा, सेना, कोष, सुशिचा चर्द्धनीयाः । धर्म, विद्या और श्रेष्ठ शिक्षा बढ़ाते रहना चाहिये। ययाऽधर्माविद्यादृष्टशिक्षादस्युचोरादयो जिस प्रकार से अधर्म, विद्या, बुरी शिक्षा, न बरंस्तथा सततमनुष्ठेयम् । डाकू और चोर आदि न बढ़े वैसा निरन्तर पुरुषार्थ करना चाहिये।

R - संस्कृतवाक्यमयोधः॥ ११ पार्मिकैः सह कदापि न यादव्यम् । धर्मात्माओं के साथ कभी लड़ाई न करनी चाहिये। निर्जिता अपि दुष्टा विनयेन सत्कर्तव्याने पराजित किये शत्रुओं का भी विनय के साथ मान्य करना चाहिये। राजमजाजनाः प्राणपत् परस्परं सं राजा और प्रजा प्राण के तुल्य एक दूसरे पोष्य सुखिनो भवन्तु । की पुष्टि करके सदा सुखी रहें । कर्षिते क्षयरोगवदुभे विनश्यतः । एक दूसरे को निर्बल करने से दमा रोग के समान दोनों निर्बल होकर नष्ट हो जाते हैं। सदा ब्रह्मचर्येण विद्यया च शरीरात्म सब काल में ब्रह्मचर्य और विद्या से शरीर बलमेधनीयम् । और आत्मा का बल बढ़ाते रहना चाहिये। यथा देशकालं पुरुषार्थेन यथावत । देश काल के अनुसार उद्यम से ठीक २ कर्माणि कृत्वा सर्वथा सुखयितव्यम् । कर्म करके सब प्रकार सुग्वी रहना चाहिये। वैश्यव्यवहारप्रकरणम् ॥ वैश्याः कथं वरन् ? सर्वा देशभाषालेखाव्यवहारं च विज्ञाय पशुपालनक्रयविक्रयादिव्यापारकपीद- वृद्धिकृषिकर्माणि धर्मेण कुवन्तः । बनिय लोग कैसे वर्त ? सब देशमापा र हिसाव को ठीक २ जान कर पशुओं की रक्षा लेन देन यादि व्यव- हार याजगृद्धि और खेती कर्म धर्म के साथ करते हुए। कुसीदग्रहगाप्रकरणम् ॥ यधेकवारन्दद्याद् गृह्णीयाच्च तईि कु. जो एक बार दें लें तो व्याजवृद्धि सहित मूल सीदवृद्ध्या द्वैगुण्ये धर्मोऽधिकेऽधर्म धन द्विगुण तक लेने में धर्म और अधिक इति वेदितव्यम् । लेने में अधर्म होता है ऐसा जानना चाहिये।

? संस्कृतवाक्यमयोषः॥ प्रतिमासं प्रतिवर्ष वा यदि कुसीदं - जो महीने २ में अथवा वर्ष २ में व्याज हीयाचदा समूलं द्विगुणं धनमागच्छे. लेता जाय तो जब दूना धन भाजाय फिर तदा मूलमपि त्याज्यम् । आगे कुछ भी न लेना चाहिये । नौकाविमानादिचालनप्रकरणम् ॥ स्वं नौकाश्चालयसि न वा तू नाव चलाता है वा नहीं ? चालयामि। चलाता हूं। नदीषु वा समुद्रेषु ? नदियों अथवा समुद्रों में ? उभयत्न चालयामि। दोनों में चलाता हूं। कस्यान्दिशि कस्मिन्देशे गच्छन्ति ? किस दिशा और किस देश में जाती हैं ? सर्वासु दिनु पातालदेशपर्यन्तम् । सर्व दिशाओं में पातालदेश अर्थात् एमेरि- का देश पर्यन्त । ताः कीदृश्यः सन्ति केन चलन्ति ? वे नौका कैसी और किससे चलती हैं ? कैवर्तवाय्वग्निजलकलावाष्पादिभिः। मल्लाह वायु अग्नि जल कलायन्त्र और भाफ आदि से। याः पुरुषाश्चालयन्ति ता इस्वाः या जिनको मनुष्य चलाते हैं वे छोटी २ महत्यम्ता वाय्वादिभिश्चाल्यन्ते ता नौका और जो बड़ी होती हैं वे वायु आदि शाश्वतरीश्यामकर्णाश्वाख्याः सन्ति। से चलाई जाती हैं उन के अश्वतरी और श्यामकर्णाश्व आदि नाम हैं। विमानादिभिरपि मर्वत्र गच्छामश्च । और विमान आदि से सर्वत्र आया जाया करते हैं। क्रयविक्रयप्रकरणम् ॥ अस्य किम्मून्यम् पञ्च सप्याणि। गृहाणेदं वस्त्रं देहि । प्रयरवो घृतस्य कोऽर्षः ? इस का क्या मूल्य है ? पांच रुपये। लीजिये पांच रुपये यह वस्त्र दीजिये। आज कल घी का क्या भाव है ? ।

संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ १३ मुद्रैकया सपादमस्यं विक्रीयते । एक रुपया का सवासेर बेचते हैं। गुडस्य कोभावः ? गुड़ का क्या भाव है ? अष्टभिः पणैरेकसेटकमात्रं ददति । दो पाने का एक सेर भर देते हैं। त्वमापणं गच्छ एलामानय । तू दूकान पर जा इलायची ले प्रा। पानीता गृहाण । ले श्राया लीजिये। कस्य हट्टे दधिदुग्धे अच्छ प्राप्नुतः ? किसकी दूकान पर दूध और दही अच्छे मिलते हैं ? धनपालस्य। धनपाल की। स सत्येनैव क्रयविक्रयौ करोति । वह सत्य ही से लेन देन करता है। श्रीपतिर्वणिकीदृशोऽस्ति ? श्रीपति बनियां कैसा है ? स मिथ्याकारी। वह झूठा है। अस्मिन्संवत्सरे कियांलामो व्ययश्च इस वर्ष में कितना लाभ और खर्च हुआ। जातः ? पंचलवाणि लाभो लनदयस्य व्ययश्च । पांच लाख रुपये लाभ और दो लाख खर्च हुए। मम खल्वस्मिन् वर्षे लक्षत्रयस्य हानि- मेरी तो इस वर्ष में तीन लाख की हानि र्जाता। होगई। कस्तूरी कस्मादागीयते । नयपालात् । बहुमूल्यमाविक कुत आनयन्ति ? कश्मीरात् । कस्तूरी कहां से लाई जाती है ? नयपाल से। दुशाले आदि कहां से लाते हैं ? कश्मीर से। - पटने को। गमनागमनप्रकरगाम् ।। कुत्र गच्छसि ? कहां जाते हो? पाटलिपुत्रकम् । कदाऽऽगमिष्यसि ? कब आओगे? एकमासे। एक महीने में। सकगतः? वह कहां गया ? शाकमानेतुम् । शाक लेने को।

संस्कृतवाक्यप्रयोगः ॥ क्षेत्रवपनप्रकरणम्॥ खेत जोतो। बीज बोये वा नहीं ? बोदिये। इस खेत में क्या बोया है ? धान। क्षेत्राणि कर्षन्तु । वीजान्युप्तानि न वा? उप्तानि । अस्मिम् क्षेत्रे किमुप्तम् । व्रीहयः। एतस्मिन् ? गोधूमाः। भस्मिन् किं वपन्ति ? तिलमुगमाषाढकी। एतस्मिन् किमुप्यते ? इस में? गेहूं। इस खेत में क्या बोते हैं। तिल मूंग उड़द और अरहर । इस में क्या बोया जाता है ? जौ। यवाः। munism शस्यच्छेदनप्रकरणम् ॥ mamimanmasume संप्रति केदाराः पकाः। इस समय खत पक गये हैं यदि पक्काः स्युस्तहि लुनन्तु । जो पक गये हों तो काटो । इदानी कृषीवला भन्योन्य केदारान् | इस समय खेनी करने वाले आपस में एक व्यतिलुनन्ति । दूसरे का पारापारो खेत काटते हैं। एषमो धान्यानि प्रभूतानि जातानि । इस साल में धान्य बहुत हुए हैं। अत एवैकस्या मुद्राया गोधूमाः खारी- इसी से एक रुपये के गेहूं एक मन और प्रमिता अन्यानि तण्डुलादीन्यपि कि चावल आदि अन्न भी मन से कुछ चिदधिकन्यूनानि मिलन्ति । अधिक न्यून मिलते हैं। गवादिदोहनपरिमाणप्रकरणम् ॥ इयं गौग्यं ददाति न वा गौ दूध दती है वा नहीं ? ? यह AN संस्कृतवाक्यायोषः॥ १५ ददाति । देती है। इयं महिषी कियदुग्धं ददाति ? यह भैंस कितना दूध देती है ? दशप्रस्थाः। दश सेर । तवाऽजावयः सन्ति न वा ? तेरे बकरी भेड़ हैं वा नहीं ? सन्ति । हैं। प्रतिदिनं ते कियदुग्धं जायते ? नित्य तेरे कितना दूध होता है ? पञ्च खार्यः। नित्यं किंपरिमाणे घृतनवनीते भवतः ? | प्रतिदिन कितना घी और मक्खन होता है ? साईद्वादशप्रस्थे । साढ़ेबारह सेर। प्रत्यहं कियद् भुज्यते कियञ्च विक्री- प्रतिदिन कितना खाया जाता और कितना यते । विकता है ? साद्विपस्थं भुज्यते दशप्रस्थं च विक्री- अढ़ाई सेर खाया जाता और दश सेर यते । बिकता है। पांच मन । ? ------ -- K तैलस्य कियन् मूल्यम् क्रयविक्रयाप्रकरणम् ॥ एतद्रूप्यकेन कियन मिलति ? ये घी और मक्खन एक रुपया का कितना मिलता है ? त्रित्रिमस्थम् । तीन तीन सेर। तेल का क्या मूल्य है ? मुद्रापादेन सेटकद्वयं प्राप्यते । चाराने का दो सेर मिलता है । अस्मिनगरे कति हट्टास्सन्ति ? इस नगर में कितनी दूकानें हैं ? पञ्चसहस्राणि । पांचहज़ार । कुसीदप्रकरणम् ॥ शतं मुद्रा देहि। सौ रुपये दीजिये।

संस्कृतवाक्यप्रयोगा। ददामि परन्तु कियत् कसीदं दास्यसि ? दूंगा परन्तु कितना व्याज देगा ? mayapurimag ream+mins प्रतिमास पुद्रार्दम् । प्रतिमहीने पाठाना। उत्तमर्णाधमर्णप्रकरणम् ॥ meanemammymend- भो अधमर्ण ! यावद्धनं त्वया पूर्व हे ऋणिया! जो धन तूने पहिले लिया गृहीतं तदिदानी देहि। था वह अब दे। मम सांपतं तु दातुं सामर्थ्य नास्ति । मेरा इस समय तो देने का सामर्थ्य नहीं है। कदा दास्यसि ? कब देगा ? मासद्वयाऽनन्तरम् । दो महीने के पीछे । यचेतावतिसमये न दास्यसि चेचहि जो तू इतने समय में न देगा तो राज- रामनियमाभिग्रहीष्यामि । प्रबन्ध से पकड़ा के लूंगा। यद्येवं कुर्यो तर्हि तथैव ग्रहीतव्यम् । जो ऐसा करूं तो वैसे ही लेना । - राजप्रजासम्बन्धप्रकरणम् ॥ भो राजन् ! ममायमणं न ददाति । हे राजन् ! मेरा यह ऋण नहीं यदा तेन गृहीतं तदानीन्तनः कश्चित् जब उसने लिया था उस समय का कोई साची वर्तते न वा? साक्षी वर्तमान है वा नहीं ? अस्ति। तर्वानय । तो लाओ। मानीतोऽयमस्ति । लाया यह है। साक्षिप्रकरणाम् ॥ - भोः सातिस्त्वमत्र किंचिज्जानासि न हे साक्षी ! तू इस विषय में कुछ जानता बा है वा नहीं?

संस्कृतवाक्यमबोधः ॥ जानामि । आनता हूं। यादृशं मानासि तादृशं सत्यं ब्रूहि । जैसा जानता है वैसा सच कह । सत्यं वदामि । सत्य कहता हूं। अस्मादनेन मत्सम सहस्रं मुद्रा गृहीताः। इससे इसने मेरे सामने सहस्र रुपये लिये थे। मो भृत्य ! तं शीघ्रमानय । ओ नौकर | उस को जलदी लेना। मानयामि। लाता हूं। गच्छ राजसभागं राज्ञा त्वमाहूतोऽसि । चल राजसभा में राजा ने तुझको बुलाया है। चलामि। चलता हूं। भो राजनुपस्थितस्सः। हे राजन् ! वह आया है। स्वयाऽस्यर्ण कुतो नादायि ? तूने इस का ऋण क्यों नहीं दिया ? अस्मिन् समये तु मम सामर्थ्य नास्ति इस समय तो मेरा सामर्थ्य नहीं है परन्तु पएमासानन्तरं दास्यामि । छः महीने के पीछे दूंगा। पुनर्पिलम्बन्तु न करिष्यसि ? फिर देर तो न करेगा ? महाराज ! कदापि न करिष्यामि । महाराज | कभी न करूंगा। मच्छ गच्छ धनपाल यदि सप्तमं मास्वयं अच्छा अच्छा जाओ धनपाल जो यह सातवें न दास्यति तर्षेनं निगृह्य दापयिष्यामि। महीने में न देगा तो इसको पकड़ के दिलादूंगा। अयं मम शतं मुद्रा गृहीत्वाऽधुना न यह मेरे सौ रुपये लेके अब नहीं देता। ददाति । किंच भो यदयं वदति तत् सत्यं न वा ? क्योजी जो यह कहता वह सच हैवा नहीं ? मिथ्यवाऽस्ति । महन्तु जानाम्यपि नाऽस्य मुद्रा मया मैं तो जानता भी नहीं कि इसके रुपये कदा स्वीकृताः। मैंने कब लिये थे। उभयोस्साक्षिणः सन्ति न वा दोनों के साक्षी लोग हैं या नहीं हैं ? सन्ति। है झूठ ही है। ?

सन्ति। १८ संस्कृतवाक्यमबोषः॥ कुत्र वर्तन्ते ? कहां वर्तमान हैं ? इस उपतिष्ठन्ते । ये खड़े हैं। अनेन युष्माकं समक्षे शतं मुद्रा दत्ता न इसने तुम्हारे सामने सौ रुपये दिये वा वा? नहीं ? दत्तास्तु खलु। निश्चित दिये तो हैं। भनेन शतं मुद्रा गृहीता न था ? इसने सौ रुपये लिये वा नहीं ? वयं न जानीमः। हम नहीं जानते। पादिवाकेनोक्तम् । वकील ने कहा। अयमस्य साक्षिणश्च सर्वे मिथ्यावादिनः यह और इसके साक्षी लोग सब झूठ बोलने वाले हैं। कुत इदमेतेषां परस्परं विरुदवचोऽस्ति। क्योंकि यह इन लोगों का वचन परस्पर विरुद्ध है। यतस्त्वया मिथ्यालपितमतएव तवैक- जिससे तूने झूठ बोला इसी कारण तेरा संवत्सरपर्यन्तं कारागृहे बन्धः क्रियते। एक वर्ष तक बन्दीघर में बन्धन किया जाता है। भयमुत्तपर्णस्त्वदीयान् पदार्थान् गृहीत्वा यह सेठ तेरे पदार्थों को लेकर अथवा बेंच विक्रीय वा स्वर्ण ग्रहीष्यति । के अपने ऋण को ले लेगा। भयं मदीयानि पञ्चशतानि सप्याणि यह मेरे पांचसौ रुपये लेकर नहीं देता। स्वीकृत्य न ददाति । कुतो न ददासि ? तू क्यों नहीं देता ? मया नैव गृहीताः कथं दद्याम् ? मैंने लिये ही नहीं कैसे दूं ? भयम्मम लेखोऽस्ति पश्य तम् । यह मेरा लेख है देखिये इसको ? भानय। लाओ। गृह्यताम् । प्रयं लेखो मिथ्या प्रतिभाति । यह लेख झूठ मालूम पड़ता है। तस्मान् स्वं षण्मासान् कारागृहे वस इस से तू छः महीने बन्दीगृह में रह और तवेमे साक्षिणश्वदौ द्वौ मासौ तत्रैव बसेयुः। तेरे साक्षी भी दो दो महीने वहीं हैं। लीजिये।

संस्कृतवाक्यमयोपा॥ १६ सेव्यसेवकप्रकरणम् ॥ भो मालदास ! सेवार्थ कार्य करि हे मंगलदास ! सेवा के लिये नौकरी प्यसि ? करेगा? करिष्यामि । करूंगा। किंमतिमासं मासिकं ग्रहीतुमिच्छसि ? प्रतिमहीने कितना वेतन लिया चाहता है ? पञ्चरूपयाणि । पांच रुपये। मयैतावदास्यते चेद्ययायोग्या परिच- मैं इतना दूंगा जो तुझ से ठीक २ सेवा या विधेया। हो सकेगी। यदाहं भवन्तं सेविष्ये तदा भवानपि जब मैं आपकी सेवा करूंगा तब आप भी प्रसन्न एव भविष्यति । प्रसन्न ही होंगे। दन्तधावनमानय । दातून ले आ। स्नानार्य जलमानय । नहाने के लिये जल ला । उत्तरीयं वस्त्रं देहि । अंगोछा दे। भासन स्थापय । आसन रख । पाकं कुरु । रसोई कर। उत्तम बना। हे सूद ! त्वयानं व्यञ्जनं च सुष्ठु हे रसोइये ! तू अन्न और शाक आदि सम्पादनीयम् ।। भद्य किं २ कुर्याम् ? आज क्या २ करूं? पायसमोदकौदनसूपरोटिकाशाकान्युपः। खीर, लड्डू, चावल, दाल, रोटी, शाक व्यन्जनादीनि च और चटनी आदि भी। मिश्रितप्रकरणम् ॥ । नित्यमति किं वेतनं दास्यसि ? नित्यप्रति क्या नौकरी दोगे ? प्रत्यहं द्वादश पणाः। प्रतिदिन बारह पैसे। वस्त्राणि श्लक्षणे पट्टे प्रक्षालनीयानि । कपड़े चिकने साफ़ पत्थर की पटिया पर धोने चाहिये।

संस्कृतवाक्यप्रयोषः।। गा बने चारय। पुष्पवाटिकायां गन्तव्यमस्ति । भाम्रफलानि पक्कानि न पा ? पकानि सन्ति । उपानहावानय । गायें बन में चरा। फूलों की बगीची में जाना है। आम पके वा नहीं? पके हैं। जूते लाभो । ---- गमनागमनप्रकरणम् ॥ अयं रकोष्णीषा क गच्छति ? यह लाल पगड़ी वाला कहां जाता है ? स्वगृहम् । अपने घर को। भस्य कदा जन्माऽभूत् इस का कब जन्म हुआ था ? पञ्च संवत्सरा प्रतीताः । पांच वर्ष बीते। परेधुामो गन्तव्यः । कल गांव जाना चाहिये। गविष्यामि । जाऊंगा। भवान् परेयुः क्व गन्ता ? आप कल कहां जाओगे ? अयोध्याम् । अयोध्या को। तत्र कि कार्यमस्ति? वहां क्या काम है ? मित्रैः सह मेलनं कर्तव्यमस्ति । मित्रों के साथ मेल कर्तव्य है। कदागतोऽसि ? कब आया है ? इदानीमेवाऽगच्छामि। अभी आता हूं। अथ रोगप्रकरणम् ॥ अस्य कीशो रोगो वर्चते ? इस को किस प्रकार का रोग है ? जीर्यज्यरोस्ति । जीर्णज्वर है। प्रौषधं देहि। औषध दे। ददामि। देता हूं।

संस्कृतवाक्यप्रयोधः॥ वर्तते । परन्तु पथ्यं सदा कर्तव्यं कुतो नहि परन्तु पथ्य सदा करना चाहिये क्योंकि पथ्येन विना रोगो निवर्तते । पथ्य के विना रोग निवृत्त नहीं होता। अयं कुपथ्यकारित्वात् सदा रुग्णो यह कुपथ्यकारी होने से सदा रोगी रहता है। अस्य पित्तकोपो वर्तते । इसको पित्त कोप है। मम कफो वर्दत औषधं देहि । मेरे कफ बढ़ता जाता है औषध दीजिये। निदानं कृत्वा दास्यामि । रोग की परीक्षा करके दूंगा। अस्य महान् कासश्वासोऽस्ति । इसको बड़ा कासश्वास अर्थात् दमा है। मम शरीरे तु वातव्याधिर्वते । मेरे शरीर में तो वातव्याधि है। संग्रहणी निवृत्ता न वा? संग्रहणी छूटी वा नहीं ? मद्यपर्यन्तन्तु न निवृत्ता। आज तक तो नहीं छटी। औषधं संसेव्य पथ्यं करोषि न वा १ औषधि का सेवन करके पथ्य करते हो वा नहीं? क्रियते परन्तु सुवेद्यो न मिलति कश्चिद्यः करता तो हूं परन्तु अच्छा वैद्य कोई नहीं सम्यक् परीक्ष्योषधं दद्यात् । मिलता किजो अच्छे प्रकार परीक्षा करके औषध देवे। तृषाऽस्ति चेज पिब। प्यास हो तो जल पी। मिश्रितप्रकरणम् ॥ इदानीं शीतं निवृत्तमुष्णसमय भागतः। अब तो शीत निवृत्त हुआ गरमी का समय आया। हेमन्ते क स्थितः? जाड़े में कहां रहा था ? बंगेषु । बङ्गाल में। पश्य ! मेघोन्नति कथं गर्जति विद्युद्- देखो ! मेघ की बढ़ती, कैसा गर्जता और बिजुली चमकती है। प्रय महती दृष्टिोता यया तड़ागा आज बड़ी वर्षा हुई जिससे तालाब और नयक्ष पूरिताः। नदियां भर गई। योतते च।

२३ संस्कृतवाक्यमयोषा॥ शृणु, मयूराः सुशन्दयन्ति । सुनो, मोर अच्छा शब्द करते हैं। कस्मात् स्थानादागतः ? किस स्थान से आया? जालात् । जङ्गल से। तत्र त्वया कदापि सिंहो दृष्टो न वा! वहां तूने कभी सिंह भी देखा था वा नहीं? बहुवारं दृष्टः। कई वेर देखा। नदी पूर्ण वर्तने कथमागतः नदी भरी है कैसे पाया ? नाव से। प्रारोहत हस्तिनं गच्छेम । चढो हाथी पर चलें। महन्तु रथेनागच्छामि। मैं तो रथ से आता हूं। अहमश्वोपरि स्थित्वा गच्छेयं शिविका- मैं घोड़े पर चढ़ के जाऊं अथवा पालकी यांवा पश्य ! शारदं नमः कथं निर्मलं वर्तते। | देखो शरदऋतु का आकाश कैसा निर्मल नौकया। पर ? चन्द्र उदितो न वा? चन्द्रमा उगा वा नहीं ? इदानीन्तु नोदितः खलु। इस समय तो नहीं उगा है। कीदृश्यस्तारका प्रकाशन्ते । किस प्रकार तारे प्रकाशमान हो रहे हैं। सूर्योदयाच्चलबागच्छामि। सूर्योदय से चलता हुआ आता हूं। क्वापि भोजनं कृतन वा ? कहीं भोजन किया वा नहीं ? कृतम्पध्यानात् प्राक् । किया था दोपहर से पहले । अधुनाऽत्र कर्चव्यम् । अब यहां कीजिये। करिष्यामि । विवाहस्त्रीपुरुषालापप्रकरणम् ॥ त्वया कीदृशो विवाहः कृतः ? तूने किस प्रकारका विवाह किया था ? स्वयंवरः। स्वयंवर । वयनुकूलास्ति न वा? स्त्री अनुकूल है वा नहीं ? करूंगा। m- है। संस्कृतवाक्यप्रबोधः २३ सर्वथाऽनुकूलाऽस्ति । सब प्रकार से अनुकूल है कत्यपत्यानि जातानि सन्ति ? कितने लड़के हुए हैं ? चत्वारः पुत्रा द्वे कन्ये च । चार पुत्र और दो कन्या। स्वामिन्नमस्ते । स्वामीजी, नमस्ते अर्थात् मैं आप का सत्कार करती हूं। नमस्ते पिये! नमस्ते प्रिया । काचित्सेवामनुज्ञापय । किसी सेवा की आज्ञा करिये। सर्वथैव सेवसे पुनराज्ञापनस्य कावश्यक- सब प्रकार की सेवा करती ही हो फिर ताऽस्ति। आज्ञा कराने की क्या आवश्यकता है। भद्य भवाछूमं कृतवानत उष्णेन आज आपने श्रम किया है इस कारण जलेन स्नातव्यम् । गरम जलसे स्नान करना चाहिये । गृहाणेदं जलमासनं च । लीजिये यह जल और आसन । इदानीं भ्रमणाय गन्तव्यम् । इस समय घूमने के लिये जाना चाहिये। कृ गच्छेव ? कहां चलें ? उद्यानेषु। बगीचों में । स्त्रीश्वश्रूश्वशुरादिसेव्यसेवकप्रकरणम्॥ हे श्वश्रु ! सेवामाज्ञापय किं कुर्याम् ? हे सास ! सेवा की आज्ञा कीजिये क्या करूं? सुभगे ! जलं देहि । सुभगे ! जल दे। गृहाणेदमास्ति । लीजिये यह है। हे श्वशुर ! भवान् किमिच्छत्याज्ञाप- हे श्वशुर ! आप की क्या इच्छा है प्राज्ञा ! कीजिये। यतु। हे यशंवदे ! नित्यं सदाचारमाचर । हे वशंवदे ! नित्य सती स्त्रियों का प्रा- चरण कर।

२४ संस्कृतवाक्यमपोषः॥ - अथ ननन्दभ्रातृजायावादप्रकरणम् ॥ हे ननन्दरिहागच्छ वार्तालापं कुर्यात् । हे ननन्द ! यहां आओ बात चीत करें। बद भ्रातृजाये ! किमिच्छसि ? कहो भौजाई ! क्या इच्छा है । तव पतिः कीशोऽस्ति? तेरा पति कैसा है ? अतीव सुखप्रदो यथा तव । अत्यन्त सुख देने वाला है, जैसा तेरा। मया वीरशः पतिः सुभाग्येन लब्धो- मैंने तो इस प्रकार का पति अच्छे भाग्य से पाया है। कदाचिदप्रियं तु न करोति ? कभी कोई बुराई तो नहीं करता ? कदापि नहि किन्तु सर्वदा प्रीति कभी नहीं किन्तु सब दिन प्रीति बढ़ाता बर्द्धयति । है। पश्याभ्यां बाल्यावस्थायां विवाहः कृ. देखो इन दोनों ने बाल्यावस्था में विवाह तोऽतः सदा दुःखिनौ वर्चेते। किया है इससे सदा दुःखी रहते ह । स्ति । यान्यपत्यानि जातानि तान्यपि रुग्णा. जो लड़के हुए वे भी रोगी हैं आगे लड़का न्यग्रेऽपत्यस्याऽऽशव नास्ति निर्बलत्वात्। होने की आशा ही नहीं है निर्बलता से पश्य तव मम च कीरशानि पुष्टान्य- देखो तेरे और मेरे कैसे पुष्ट लड़के दो पत्यानि द्विवर्षानन्तरं जायन्ते । वर्ष के पीछे होते जाते हैं। सर्वदा प्रसन्नानि सन्ति वर्दन्ते च सब काल में प्रसन्न और बढ़ते जाते हैं सुशीलत्वात् । सुशीलता से। नास्मिन् संसारेऽनुकूलस्त्रीपतिजन्यस- इस संसार में अनुकूल स्त्री और पुरुष दृशं सुखं किमपि विद्यते । होनेवाले सुख के सदृश दूसरा सुख कोई नहीं है। इदानी वृद्धावस्था प्राप्ता यौवनं गतं इस समय वृद्धावस्था पाई जवानी गई केशाः श्वेता जाताः प्रतिदिनं बलं बाल सफेद हुए और नित्य बल घटता है। इसति च।

संस्कृतवाक्यप्रयोषः॥ २५ स इदानीं गमनागमनमपि कर्तुमशक्तो वह इस समय आने जाने को भी अस- मर्थ हो गया है। बुद्धिविपर्यासस्वादिपरीतं भाषते । बुद्धि के विपरीत होने से उलटा बोलता है। जातः। अचाऽस्य मरणसमय मागत ऊर्च- आज इसके मरने का समय आया ऊपर भासत्वात् । को श्वास के चलने से । सोऽध मृतः। वह श्राज मरगया । नीयतां श्मशानं वेदमन्त्रघृतादिभिर्द- ले चलो श्मशान को वेदमन्त्रों करके घी यताम् । आदि सुगन्ध से जला दो । शरीरं भस्मीभूतं जातमतस्तृतीयेऽय- शरीर भस्म होगया इससे तीसरे दिन स्थिसंचयनं कृत्वा पुनस्तनिमित्तं शो- हाड़ों को वेदी से इकट्ठे कर उठा के फिर कादिकं किंचिदपि नैव कार्यम् । उसके निमित्त शोकादि कुछ भी न करना चाहिये। त्वं मातापित्रोः सेवा न करोष्यतः तू माता पिता की सेवा नहीं करता इससे कृतघ्नोऽवर्तसेऽतो मातापितृसेवा के- कृतघ्नी है इसलिये माता पिता की सेवा का नापि नैव त्याज्यां। त्याग किसी को कभी न करना चाहिये। अथ सायंकालकृत्यप्रकरणम् ।। -- इदानीन्तु सन्ध्यासमय मागतः सायं अब तो सन्ध्या समय आया सन्ध्योपासन संन्ध्यामपास्य भोजनं कृत्वा भ्रमणं और भोजन करके घूमना घामना कर । कुरुत। मध त्वया कियत्कार्य कृतम् आज तूने कितना काम किया ? एतावत्कृतमेतावदवशिष्टमस्ति । इतना किया और इतना शेष है। अद्य कियांडाभो व्ययश्च जातः आज कितना लाभ और खर्च हुआ ? पञ्चशतानि मुद्रा लाभः सादेशते । पांच सौ रुपये लाभ और अढाई सौ खर्च व्ययश्च। हुए। ४ २६ संस्कृतवाक्यमबोधः॥ 7... 2 :-- लाये। गाइये। इदानी सामगानं क्रियताम् । इस समय सामवेद का गान कीजिये। वीणादीनि वादित्राण्यानीयताम् । वीणादिक बाजे लाइये। मानीतानि । वाचताम् । बजाइये । गीयताम् । कस्य रागस्य समयो वर्तते । किस राग की वेला है षड्जस्य। इदानीं तु दशघटिकाप्रमिता राश्यागता, इस समय तो दश घड़ी रात आई सोइये । शयीध्वम् । गम्यतां स्वस्वस्थानम् । जाइये अपने २ घर को । स्वस्वशश्यायां शयनं कर्त्तव्यम् । अपने २ पलंग पर सोना चाहिये । सत्यमेवेश्वरकृपया सुखेन रात्रिर्गच्छे- सत्य है ऐसे ही ईश्वर की कृपा से सुख- स्मभातं भवेत् । पूर्वक रात बीते और सुवेरा होवे । षड्ज की। है है शरीराऽवयवप्रकरणम् ॥ अस्य शिरः स्थूलं वर्तते । इस का शिर बड़ा देवदत्तस्य मूर्दकेशाः कृष्णा वर्तन्ते । देवदत्त के शिर में बाल काले हैं। मम तु खलु श्वेता जाता। मेरे तो सुपेद होगये। तवापि केशा अर्द्धसाः सन्ति । तेरे भी बाल श्राधे सुपेद हैं । अस्य ललाटं सुन्दरमस्ति । इस का माथा सुन्दर भयं शिरसा खल्वाटः। इसके शिर में बाल नहीं हैं। तस्योत्तमे भुवौ स्तः। उस की अच्छी भौंहें हैं। श्रोत्रेण शृणोषि न वा सुनता है वा नहीं? शृणोमि । भनया त्रिया कर्णयोः प्रशस्तान्याभू- इस स्त्री ने कानों में अच्छे सुन्दर गहने षणानि धृतानि । पहिने हैं। किमयं कर्णाभ्यां बधिरोस्ति ? क्या यह कानों से बहिरा है ? कान से सुनता हूं।

Animurdem- संस्कृतवाक्यप्रयोषः॥ बधिरस्तु न परन्तु श्रवणे ध्यान न | बहिरा तो नहीं परन्तु सुनने में ध्यान नहीं ददाति। देता। अयं विशालाक्षः। यह अच्छे नेत्रवाला है। त्वं चक्षुषा पश्यसि न वा ? तू आंख से देखता है वा नहीं ? पश्यामि परन्त्विदानी मन्ददृष्टिर्जातो देखता हूं परन्तु इस समय मन्ददृष्टि अर्थात् हमस्मि । थोड़ी दृष्टिवाला होगया हूं। इदानीन्ते रक्ते अतिणी कथं वर्तेते ? इस समय तेरी आंखें लाल क्यों हैं ? यतोहं शयनादुत्थितः। जिससे मैं सोने से उठा हूं। स काणो धूर्तोऽस्ति । वह काना धूर्त है। द्रष्टव्यमयमन्धः सचक्षुष्कवत् कथं गच्छ- देखना चाहिये यह अन्धा आंखवाले के ति। समान कैसे जाता है। तवाक्षिणी कदा नष्टे । तेरी आखें कब नष्ट हुई ? यदाऽहं पञ्चवर्षोऽभूनम् । जब मैं पांच वर्ष का हुआ था । इदानीम्मक्षेत्रे रोगोऽस्ति स कथं निव इस समय मेरे नेत्र में रोग है वह कैसे त्यति ? अञ्जनायौषधसेवनेन निवर्चिप्यते । अजन आदि औषध के सेवन से निवृत्त होगा। तस्य नासिकोचमास्ति । उसकी नाक अति सुन्दर है । भवानपि शुकनासिकः । आप भी सुग्गे के सी नाकवाले हैं। घ्राणेन गन्धं जिघ्रसि न वा ? नाक से गन्ध सूंघते हो वा नहीं ? श्लेष्मकफत्वान्मया नासिकया गन्धो न सरदी कफ होने से मुझ को नासिका से प्रतीयते । गन्ध की प्रतीति नहीं होती। अयं पुरुषः सुकपोलोऽस्ति । यह पुरुष अच्छे गालवाला भतिस्थूलस्वादस्य नाभिर्गभीरा । बहुत मोटा होने से इसकी नाभि गहरी है। स्वमद्य प्रसभमुखो दृश्यते किमत्र कार तू आज प्रसन्नमुख दिखाई देता है इसमें क्या कारण है ? . अयं सदाऽद्दलादितवदनो विद्यते । यह सब दिन प्रसन्नमुख बना रहता है। अस्यौष्ठौ श्रेष्ठौ वर्चेते। इस के ओष्ठ बहुत अच्छे हैं । अयल्लम्बोष्ठत्वाद्भयङ्करोस्ति । यह लम्बे ओष्ठवाला होने से भयङ्कर है। निवृत्त होगा? णम् ?

संस्कृतवाक्यमयोपः॥ सर्जिहया स्वादो गृह्यते । सबलोग जीभ से स्वाद लिया करते हैं। वाचा सत्यं प्रियं मधुर सदैव वाच्यम् । वाणी से सत्य और प्रिय सब दिन बोलना चाहिये। नैव केनचित्खन्वनृतादिकं वक्तव्यम् । कभी किसी को झूठ बोलना नहीं चाहिये। प्रयं सुदन् वर्तते यह अच्छे दांतों वाला है। तव दन्ता दृढाः सन्ति वा चलिताः ? तेरे दांत दृढ़ हैं वा चल गये हैं ? मम दृढ़ा अस्य तु त्रुटिताः सन्ति । मेरे दृढ़ हैं अर्थात् निश्चल हैं और इस के तो टूट गये हैं मन्मुख एकोऽपि दन्तो नास्त्यतः कष्टेन | मेरे मुख में एक भी दांत नहीं है इससे भोजनादिकं करोमि। क्लेश से भोजन करता हूं। अस्य श्मश्रूणि लम्बीभूतानि सन्ति । इसको मूंछे लम्बी हैं। तव चिबुकस्योपरि केशा न्यूनाः सन्ति। तेरी ठोढ़ी के ऊपर वाल थोड़े हैं । त्वया कण्ठ इदं किमर्थं बद्धम् ? तूने गले में यह किसलिये बांधा है ? भस्योरू विस्तीरें स्तः । इसकी जंघा तैयार हैं। स्वया हृदये किं लिप्सम् ? तूने छाती में क्या लगाया है ? इदानी हेमन्तोऽस्त्यताकुङ्कुमकस्तू? लिखे। इस समय हेमन्त ऋतु है इससे केसर और कस्तूरी लेपन किये हैं। तथा दृच्छूलनिवारणायौषधम् । वैसे ही हृदयशूल निवारण के लिये अपध । माणवकः स्तनाद्दुग्धं पिबति । लड़का स्तन से दूध पीता है । पश्य ! देवदत्तोऽयं लम्बोदरो वर्तते । देख ! देवदत्त यह बड़े पेटवाला अर्थात् तुन्दीला है। भयन्तु खलु सामोदरः। यह तो छोटे पेटवाला है तव पृष्ठे किं लग्नमस्ति? तेरी पीठ में क्या लगा है ? । किंस्कन्धाभ्यां भारं वहसि ? क्या तू कन्धों से भार उठाता है ? पश्याऽस्य चत्रियस्य बाहोज येन । देख ! इस क्षत्रिय का बाहुबल जिसने अपने स्वभुजबलपतापेन राज्यं वर्द्धितम् । बाहुवल राज्य बढ़ाया है।

1-AMRA . -MIRALVI --- संस्कृतवाक्यप्रयोषः॥ मनुष्येण हस्ताभ्यामुत्तमानि धर्मकार्या- मनुष्य को चाहिये कि हाथों से उत्तम णि सेव्यानि नैव कदाचिदधाणि। धर्मयुक्त कर्म करे न कभी अधर्मयुक्त कों को। मस्ति । अस्य करपृष्ठे करतले च घृतं लग्न इस के हाथ की पीठ और तले में घी लगा है। मष्टिबन्धने सत्येकत्राऽगुष्ठ एकत्र प. मूठी बांधने में एक ओर अंगूठा और एक चागुलयो भवन्ति । ओर पांच अंगुली होती हैं। शरीरस्य मध्यभागे नाभिः पुरतः प. शरीर के आगे बीच भाग को नाभि और श्चिमतः कटिः कथ्यते । पीछे के भाग को पीठ कहते हैं। अयं मल्लः स्थूलोरुः । यह पहलवान् मोटी जंघा वाला है। माणवको जानुभ्यां गच्छति । लड़का घोंटू के बल से चलता है। प्रघातिगमनेन जो पीडिते स्तः । आज बहुत चलने से जांघे दूखती हैं। अहं पद्भ्यां यो ग्राममगमम् । मैं पैदल कल गांव को गया था । अस्य शरीरे दीर्घाणि लोमानि सन्ति । इसके शरीर में बड़े २ रोम हैं । तव शरीरे न्यूनानि सन्ति । और तेरे शरीर में थोड़े रोम हैं अस्य शरीरचर्म श्लदणं वर्चते । इसके शरीर का चमड़ा चिकना है। पश्यास्य नखा भारताः सन्ति । देख ! इसके नख कुछ २ लाल हैं। भयं दक्षिणेन हस्तेन भोजनं वामेन हाथ से भोजन और बांये से जलं पिबति । जल पीता है। इदानीं त्वया श्रमांकृतोऽस्त्यतो धमनी इस समय तूने श्रम किया है इससे नाड़ी शीघ्र चलति । शीघ्र चलती है। मधुना तु ममान्तस्त्वम् दह्यतेऽस्थिषु इस समय मेरे भीतर की त्वचा जलती पीडापि वर्तते । और हाड़ों में पीडा भी है। यह दाहिने अथ राजसभाप्रकरणम् ॥ तिष्ठ, भो देवदत्त ! त्वया सह गच्छामि खड़ा रह देवदत्त ! तेरे साथ मैं भी राज- राजसभाम् । सभा को चलता हूं।

AMADI वर्तेत । युदस्य। संस्कृतवाक्यमवोधः॥ सभाशब्दस्य का पदार्थः । समा शब्द का क्या अर्थ है ? या सत्यासत्यनिर्णयाय प्रकाशयुक्का जो सच झूठ का निर्णय करने के लिये प्रकाश से सहित हो। तत्र कति सभासदः सन्ति । वहां कितने सभासद् हैं। सहस्रम् । हज़ार। या मम ग्रामे सभास्ति पत्र खलु पञ्च जो मेरे ग्राम में सभा है उसमें तो पांच शतानि सभासदः सन्ति । सौ सभासद् हैं इदानीं सभायां कस्य विषयस्योपरि इस समय सभा में किस विषय पर विचार विचारः कर्तव्यः । करना चाहिये। युद्ध अर्थात् लड़ाई का । तेन सह युदं कर्त्तव्यं न वा उसके साथ युद्ध करना चाहिये वा नहीं ? यदि कर्त्तव्यं तर्हि कथम् । यदि करना चाहिये तो कैसे। यदि स धर्मात्मा तदा तु न कर्त्तव्यम् । यदि वह धर्मात्मा हो तब तो युद्ध करना योग्य नहीं। पापिष्ठश्चेत्तर्हि तेन सह योदव्यमेव । और जो पापी हो तो उसके साथ युद्ध करना ही चाहिये। सोऽन्यायेन मजां भृशं पीडयत्यतो म वह अन्याय से प्रजा को निरन्तर पीड़ा हापापिष्ठः। देता है इस कारण से बड़ा पापी है। एवं चेतर्हि शस्त्रास्त्रपक्षेपयुद्धकुशला यदि ऐसा है तो शस्त्र अन चलाने में बलिष्ठा कोशधान्यादिसामग्रीसहिता और युद्ध में कुशल बड़ी लड़नेवाली ख- सेना युदाय प्रेषणीया। जाना और अन्नादि सामग्री सहित सेना युद्ध के लिये भेजनी चाहिये । सत्यमेवात्र वयं सर्वे सम्मति दनः । सच ही है इसमें हम सब लोग सम्मति देते हैं। युद्ध होता है। इदानीं कस्यां दिशि कैः सह युद्ध म इस समय किस दिशा में कौन २ के साथ वर्चते। पश्चिमायां दिशि यवनैः सह हरिवर्ष- पश्चिम दिशा में मुसलमानों का और ह. रिवर्षस्थ अर्थात् यूरोपियन लोगों का । स्थानाम् ।

संस्कृतवाक्यमबोषः पगजिता अपि यवना अद्याप्युपद्रवं न हारे हुए मुसलमान लोग अब भी उपद्रव स्यजन्ति । अर्थात् धूम धाम नहीं छोड़ते। प्रयं खलु पशुपक्षिणामपि स्वभावोऽ- यह तो पशु पक्षियों का भी स्वभाष है कि स्ति यदा कश्चित्तद्गृहादिकं ग्रहीतुमि- जब कोई उनके घर भादि को छीन लेने च्छेत् तदा यथाशक्ति युध्यन्त एव । की इच्छा करता है तब यथाशक्ति युद्ध करते अर्थात् लड़ते ही हैं। में अथ ग्राम्यपशुप्रकरणम्॥ भो गोपाल ! गा वने चारय । हे अहिर ! गौओं को बन में चरा । तत्र या धेनवस्ताभ्योऽर्द्ध दुग्धं त्वया वहां जो नई व्यानी गौयें उनसे आधा दुग्ध्वा स्वामिभ्यो देयमर्द्ध च वत्सेभ्यः | दूध तूने दुहकर मालिक को देना और पाययितव्यम् । आधा बछड़ों को पिलाना चाहिये । एतौ वृषभौ रथे योक्तुं योग्यौ स्तः । ये दोनों बैल गाड़ी में वा रथ में जोतने के योग्य हैं। इमो हले खलु । और ये दोनों हल ही में । पश्येमाः स्थूला महि यो वने चरन्ति । देखिये, ये मोटी भैंसें वन में चरती हैं। आगच्छ भो द्रष्टव्यम्महिषाणां युद्धं | आओ जी देखने योग्य भैंसों का युद्ध परस्परं कीदृशं भवति । किस प्रकार आपस में हो रहा है। अस्य राज्ञो बहव उत्तमा प्रश्वाः सन्ति । इस राजा के बहुत उत्तम घोड़े हैं। किमियं रामः सतुरङ्गा सेना गच्छति ? क्या यह राजा की घोड़ों सहित सेना जा रही है ? श्रोतव्यं हरयः कीदृशं षन्ते ? सुनिये, घोड़े किस प्रकार हिनहिनाते हैं ? यथा हस्तिनो स्थूलाः सन्ति तथा इस्ति- जैसे हाथी मोटे होते हैं वैसी हथिनी भी। न्योऽपि । नागास्समं गच्छन्ति ? हाथी बराबर चाल से चलते हैं शृणु, करिणः कीदृशं बृहन्ति । सुन, हाथी कैसे चिंहारते हैं।

संस्कृतवाक्यप्रयोषः।। पांच हजार। मूषकानति। -- पश्येमे गजोपरि स्थित्वा गच्छन्ति । देख ये हाथी पर बैठ के जाते हैं। भस्य राज्ञः कतीमास्सन्ति ? इस राजा के कितने हाथी हैं ? पञ्च सहस्राणि । रात्रौ थानो बुकन्ति । रात में कुत्ते भूसते हैं। माता कुक्कुटाः संप्रवदन्ति । सुवेरे मुरगे बोलते हैं। मार्जारो बिल्ला मूसों को खाता है कुलालस्य गईभा प्रतिस्थूलाः सन्ति । कुम्हार के गदहे अत्यन्त मोटे हैं। शृणु, लम्बकर्णा रासमा रासन्ते । सुन, लम्बे कानोंवाले गदहे बोलते हैं। प्राम्यसूकराः पुरीषं भक्षयित्वा भूमि गांव के सुवर मैला खाके भूमि को शुद्ध शुन्धन्ति । करते हैं। उष्ट्रा भार वहन्ति । ऊंट बोझ ढोते हैं मजाविपालोऽजा अवीग्धि । गडरिया बकरी और भेड़ों को दुहता है । पशवपुर्नया जलम् । पशुओं ने नदी में जल पीया था । रकमुखो वानरोऽतिदुष्टो भवति कृष्ण लाल मुख का अन्दर बड़ा दुष्ट और काले मुखस्तु श्रेष्ठः खलु । मुंह का लंगूर तो अच्छा होता है । वानरी मृतकमपि बालकं न त्यजति । बंदरी मरे हुए बच्चे को भी नहीं छोड़ती। गोपालेन गावो दुग्धाः पयो न वा ग्वाले ने गौओं से दूध दुहा वा नहीं ? कपिलाया गोर्मधुरं पयो भवति । कपिला (पीली ) गाय का दूध मीठा होता है। भयं वृषभः कियता मूल्येन क्रीतः ? यह बैल कितने मोल से खरीदा है ? शंतन रूप्यैः। सौ रुपयों से। कतिभिः पणैः प्रस्थं पयो मिलति ? कितने पैसे सेर दूध मिलता है ? द्वाभ्यां पणाभ्याम् । दो पैसों से। पश्य, देवदत्त वानराः कथमुत्प्लवन्ते ? | देख, देवदत्त बंदर कैसे कूदते हैं ? ? भयं महाहनुत्वाखनुमान्वर्त्तते । यह बन्दर बड़ी थुन्डीवाला होने से हनुमान है।

संस्कृतवाक्यमबोधः ॥ १३. अथ ग्रामस्थपक्षिप्रकरणम् ॥ एताभ्यां चटकाभ्यां प्रासादे नीडं | इन चिड़ियों ने अटारी पर घोंसला बनाया रचितम् । है। भाण्डानि धृतानि । यहां अण्डे धरे हैं। इदानीं तु चाटकैरा अपि जाताः । अब तो इन के बच्चे भी हो गये हैं। पश्य, विष्णुमित्र ! कुक्कुटयोयुदम् । देख विष्णुमित्र ! मुरगों की लड़ाई । कुक्कुटी स्वान्यएडानि सेवते । मुरगी अपने अंडों को सेवती है। पश्य, शुकानां समूयो विरुवझुड्डीयते। देख, सुग्गों के मुंड को जो चचेता हुश्रा उड़ा जाता है। रात्रौ काका न वाश्यन्ते । रात में कौवे नहीं बोलते हैं। भरे ! भृत्योड्डायय ध्वांक्षमनेन पातव्य अरे नौकर ! कौवे को उड़ादे उसने पीने के जलपात्रे चञ्चुं निक्षिप्य जलं विना जल के बरतन में चोंच डालकर जल नष्ट शितम् । कर दिया। बायसेन बालकहस्ताद्रोटिका हृता । कौए ने लड़के के हाथ से रोटी लेली। पश्य,कीदृशं काकोलूकिकं युदं प्रवर्त्तते। | देख, किस प्रकार की कौवे और उल्लुओं की लड़ाई हो रही है। अनेन शुकहंसतिचिरिकपोताः पालिताः। इसने सुग्गा हंस तीतर और कबूतर पाले हैं। अथ वन्यपशुप्रकरणम् ॥ वने रात्री सिंहा गर्जन्ति । वन में रात के समय सिंह गर्जते हैं। शार्दलं दृष्ट्वा सिंहा निलीयन्ते । शार्दूल को देखकर सिंह छिप जाते हैं। ह्यः सिंहो गामहन् । कल सिंह ने गौ को मारडाला । परश्वो विक्रमवर्मणा सिंहो हतः । परसों विक्रमवर्मा क्षत्रिय ने सिंह मारा। ५ M संस्कृतवाक्यमबोधः॥ , प्याजिः कृता। शूकर का युद्ध । देते हैं। द्रष्टव्यं हस्तिसिंहरणम् । देख हाथी और सिंह की लड़ाई । जाले हस्तियथाः परिभ्रमन्ति । जंगल में हाथियों के झुंड घूमते हैं। इदानीमेव केण मृगो गृहीतः । अभी भेडिये ने हिरन पकड़ लिया। अयं कुक्कुरो बलवाननेन सिंडेन सहा यह कुत्ता बड़ा बलवान् है इसने सिंह के साथ भी लड़ाई की। पश्य सिंहवराहसंग्रामम् । देख सिंह और शूकरा इक्षुक्षेत्राणि भवयित्वा विना- शूकर ऊख शूकर ऊख के खेतों को खाकर नष्ट कर शयन्ति । पश्य, बेगेन धावतो मृगान् । देख, वेग से दौड़ते हुए हिरनों को। अयं कषभवत्स्थूलोस्ति । यह काला रोज बैल के समान मोटा है। यो निलयादुत्प्लुत्य धावति स शश जो भांटी से लपटझपट के दौड़ता है स्त्वया दृष्टो न वा? उस खरहा को तू ने देखा है वा नहीं ? बन्दृष्टवान् । बहुतों को देखा है। कदाचिद्भालवोऽपि दृष्टा न वा कभी रीछ भी देखे हैं वा नहीं ? एकदा ऋच्छेन साकं मम युदं जातम् । एक समय रीछ के साथ मेरी लड़ाई भी हुई थी। रात्रौ शृगालाः क्रोशन्ति । रात्रि में सियाल रोते हैं। कदाचित्खद्गोपि दृष्टो न वा ? कभी गैंडा भी देखा वा नहीं ? य पारएया महिषा बलवन्तो भवन्ति। जो अरणा भैंसे बलवान होते हैं उनको तान्कदाचिद् दृष्टवान वा ? कभी देखावा नहीं ? अथ वनस्थपक्षिप्रकरणम् ॥ कदाचित्सारसावप्युड्डीयमानौ क्रीडन्तौ कभी सारस पक्षी भी उड़ते और क्रीड़ा महाशब्दं कुरुतः। करते हुए बड़े शब्द करते हैं। श्येनेनातिगेन वर्तिका इता। बाज ने बड़े वेग से बटेर मारी । शृणु, तितिरयः कीदृशं मधुरं नदन्ति ? सुन, तित्तिर किस प्रकार मधुर बोलते हैं ? ?

३५ संस्कृतवाक्यप्रबोषः॥ बसन्वे पिकाः प्रियं कूजन्ति । वसन्त ऋतु में कोयल प्रिय शब्द करते हैं। काककोकिलवदुर्वचाःसुवाक् च मनु- कौवे और कोयल के सदृश दुष्ट और ज्यो भवति । अच्छा बोलनेवाला मनुष्य होता है । अयं देवदत्तो हंसगति गच्छति । यह देवदत्त हंस के समान चलता है। पश्येमे मयूरा नृत्यन्ति । देखिये मोर नाचते हैं। उल्का रात्रौ विचरन्ति । उल्लू रात को विचरते हैं। पश्य वका सरस्सु पाखण्डिजनव- | देख बगुला तलाबों में पाखण्डी मनुष्य न्मत्स्यान् हन्तुं कथं ध्यायति ? के तुल्य मछली मारने को किस प्रकार ध्यान करता है ? वलाका अप्येवमेव जलजन्तून् घ्नन्ति । वलाका भी इसी प्रकार जलजन्तुओं को मारती हैं पश्य कथञ्चकोरा धावन्ति । देख किस प्रकार चकोर दौड़ते हैं । येऽत्यूद्धमाकाशे गत्वा मांसाय निप- जो बहुत ऊपर आकाश में जाकर मांस तन्ति ते गृध्रास्त्वया दृष्टा न वा ? के लिये गिरते हैं वे गीध तूने देखे हैं वा नहीं ? मैनका मनुष्यबदन्ति । समान बोलती हैं। चिल्लिका माणवकहस्वाद्रोटिकां छित्वो- चील्ह लड़के के हाथ से रोटी छीन कर उड़ जाती है। मैंना मनुष्य हीयते । mammu अथ तिर्यग्जन्तुप्रकरणम् ॥ सर्पाः शीघ्रं सर्पन्ति । सर्प जल्दी सकिलते हैं। भयं कृष्णः फणी महाविषधारी। यह काला सांप बड़ा विषवाला है। भवता कदाचिदजगरोऽपि दृष्टोनवा? आप ने कभी अजगर भी देखा है वा नहीं ? पश्याहिनकुलस्य संग्रामो वर्चते । देख सांप और नेउले का युद्ध होता है। स वृश्चिकेन दष्टो रोदिति । वह बिच्छू से काटा गया रोता है। इयं गोधा स्थूलास्ति । rague यह गोह मोटी है संस्कृतवाक्पपयोगा। सूपका पिले शेरते। मूसे बिल में सोते हैं। मतिका भवयित्वा वमन प्रजायते । मक्खी खाकर वमन हो जाता है। भत्र वासः कन्यो निर्मक्षिकं वर्त्तते। यहां वास करना चाहिये मक्खी एक भी नहीं है। मधुमक्षिकादशनेन शोथः प्रजायते । मधुमाक्खयों के काटने से सूजन होजाती भ्रमरा गुञ्जन्तः पुष्पेभ्यो गन्धं गृह- न्ति । भौरे गूंजते हुए, फूलों से सुगन्धि प्रहण करते हैं। अथ जलजन्तुप्रकरणम् ॥ तिमिशिला मत्स्याः समुद्रे भवन्ति । तिमिङ्गिल मच्छी समुद्र में होती हैं । रोहिद सिंहतुण्डराजीवाश्च पुष्करिणी- रोहू सिंहतुण्ड और राजीव इन नामों की नदीतड़ागसमुद्रेषु निवसन्ति । मछलियां पुखरिया नदी तलाब और समुद्र में वास करती हैं। मकरः पशूनपि गृहीत्वा निगलति । मगर पशुओं को भी पकड़ कर निगल जाता है। नक्राग्राहा अपि महान्तो भवन्ति । नाके घरियार भी बड़े २ होते हैं कुमाः स्वाहानि संकोच्य प्रसारय कछुए अपने अङ्गों को समेट कर फैलाते न्ति । हैं वर्षासु मण्डूकाः शब्दयन्ति । जलमनुष्या अप्सुनिमज्य तट भासते। वर्षा में मेंडके बोलते हैं जल के मनुष्यं पानी में डूबकर तीर पर बैठते हैं। अथ वृक्षवनस्पतिप्रकरणम् ॥ पिप्पलाः फलिता न वा पीपल फले हैं वा नहीं ?

संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ । * इमे वटाः सुच्छायास्सन्ति । ये बड़ अच्छी छाया वाले हैं। पश्येम उदुम्बराः सफला वर्तन्ते । देख, ये गूलर फलयुक्त होरहे हैं। इमे विन्याः स्थूलफलास्सन्ति । ये बेल बडे २ फल वाले हैं। मबोधान मामा।पुष्पिताः फलिताः सन्ति। मेरे बगीचे में आम फूले फले हैं। इदानीं पकफला अपि वर्तन्ते । इम काल में पक्के फलवाले भी हैं। अस्याऽम्रस्य मधुराणि रसवन्ति च फ इस आम के मीठे और रसीले फल होते हैं। लानि भवन्ति । तस्य त्वम्लानि भवन्ति । उस के तो खट्टे होते हैं। पनसस्य महान्ति फलानि भवन्ति । कटहल के बड़े २ फल होते हैं। शिंशपायाः काष्ठानि दृढानि सन्ति शाल. सीसों की लकड़ी कठिन होती और साखू स्य दीर्घाणि च। की लकड़ी लंबी होती है। भस्य बर्बुरस्य कण्टकास्तीक्ष्णा भवन्ति। इस बबूल के कांटे तीखी अणी वाले होते हैं। बदरीणांतु मधुगम्लानि फलानि कण्ट बेरियों के तो मीठे खट्टे फल और इन के काश्च कुटिला भवन्ति । कांटे टेढ़े होते हैं कटुकोनिम्बो ज्वरं निहन्ति । कडुआ नींब ज्वर का नाश कर देता है। मातुलुङ्गकफलरसं सूपे निक्षिप्य भो- नींबू का रस दाल में डालकर खाने योग्य क्तव्यम् । मम वाटिकायां दाडिमफलान्यत्युत्तमा- मेरे बगीचे में अनार बहुत अच्छे होते हैं। नि जायन्ते । नागरगफलान्यांनय । नारंगी के फलों को ला । वसन्ते पलाशाः पुष्प्यन्ति । वसंतऋतु में ढांक फूलते हैं। उष्ट्राः शमीवृत्तपत्रफलानि भुञ्जते । ऊंट शमी अर्थात् खींजड (छोंकर ) वृक्ष के पत्ते और फलों को खाते हैं । है अथौषधप्रकरणम् ॥ कदलीफलानि पक्कानि न वा ? केला के फल पके वा नहीं ? तण्डलादयस्तु वैश्यप्रकरणे लिखिता- चावल आदि तो बनियों के प्रकरण में स्तत्र द्रष्टव्याः। लिखे हैं वहां देख लेना।

संस्कृतवाक्यमयोषः॥ विषनिवारणायाऽपामार्गमानय । विष दूर करने के लिये चिंधिका ला। निर्गुरख्याः पत्राण्यानेयानि । निर्गुण्डी के पत्ते लाने चाहिये। लजावत्याः किंजायते ? लज्जावन्ती का क्या होता है ? गुडूची ज्वरं निवारयति । गिलोय ज्वर को शांत करती है शंखावली दुग्धे पाचयित्वा पिवेत् । शंखावली को दूध में पका के पिये । यय योग हरीतकी सेविता सर्वान् | जिस प्रकार से ऋतु २ में हरडेका सेवन रोगानिवारयति । करना योग्य है वैसे सेवी हुई हरड़ सब रोगों को छुड़ादेती है। शुण्ठीमरीचपिप्पलीभिः कफवातरोगो सोंठ मिर्च और पीपल से कफ और वात निहन्तव्यो। रोगों का नाश करना चाहिये । योऽश्वगन्धं दुग्धे पाचयित्वा पिबति जो असगन्धं को दूध में पकाके पीता है स पुष्टो जायते । वह पुष्ट होता है। इमानि कन्दानि भोक्तुमाणि वर्चन्ते। ये कन्द खाने के योग्य हैं। एतेषान्तु शाकमपि श्रेष्ठं जायते । इन कन्दों का तोशाक भी अच्छा होता है। अस्यां वाटिकायां गुल्मलताः प्रशंस- इस बगीचे में गुच्छा और लताप्रतान प्रशं- नीयाः सन्ति । सा के योग्य अर्थात् अच्छे हैं। अथात्मीयप्रकरणाम् ॥ तव ज्येष्ठो बन्धुभगिनी च कास्ति ? तेरे बड़ा भाई और बहिन कौन है ? देवदत्तस्सुशीला च । देवदत्त और सुशीला। ---- भो बन्धोऽहं पाठाय ब्रजामि । हे भाई ! मैं पढ़ने को जाता हूं। गच्छ प्रिया पूर्णाविद्यां कृत्वाऽऽगन्तव्यम्। जा प्यारे ! पूरी विद्या करके आना । भवतः कन्या प्रद्यश्वः किं पठन्ति ? आपकी बेटियां आजकल क्या पढ़ती हैं ? वणेचारणशिक्षादिकं दर्शनशास्त्राणि वर्णोच्चारण शिक्षादिक तथा न्याय आदि चाधीत्येदानी धर्मपाकशिल्पगणित- शास्त्र पढ़कर अब धर्म, पाक, शिल्प और विद्या भधीयते। गणितविद्या पढ़ती है।

संस्कृतवाक्यमयोषा ॥ भवज्ज्येष्ठया भगिन्याकिं किमधीतमि आपकी बड़ी बहिन क्या २ पढ़ अब वह दानीच तया किं क्रियते ? क्या करती है ? वर्णज्ञानमारभ्य वेदपर्यन्ताः सर्वाविया | अक्षराभ्यास से लेके वेद तक सब पूरी विद्या विदित्वेदानी बालिकाः पाठयति । पढ़के अब कन्याओं को पढाया करती है। तया विवाहः कृतो न वा? उसने विवाह किया वा नहीं ? इदानीं तु न कृतः परन्तु वरं परीक्ष्य अभी तो नहीं किया परन्तु वर की परीक्षा स्वयम्बरं कर्तुमिच्छति । करके स्वयम्बर करने की इच्छा करती है। यदा कश्चित् स्वतुल्यः पुरुषा मिलिष्यति जब कोई अपने सदृश पति मिलेगा तब तदा विवाहं करिष्यति । विवाह करेगी। तव मित्ररधीतं न वा? तेरे मित्रों ने पढा है वा नहीं ? सर्वएव विद्वांसो वतन्ते यथाऽहं तथैव सब ही विद्वान हैं जैसा मैं हूं वैसे वे भी तेऽपि समानस्वभावेषुपैयारसम्भवात् । हैं क्योंकि तुल्य म्वभाव वालों में मित्रता का सम्भव है। तब पितृव्यः किं करोति ? तेरा चाचा क्या करता है ? राज्यव्यवस्थाम् । राजा का कारवार। इमे किं तव मातुलादयः ? क्या तेरे मामा आदि हैं ? बाढ़मयं मम मातुल इयं पितृष्व सेयं ठीक यह मेरा मामा यह बाप की बहिन मातृवसेयं गुरुपत्न्यं च गुरुः । बूआ यह माता की बहिन मौसी यह गुरु की स्त्री और यह गुरु है। इदानीमेते कस्मै प्रयोजनायकत्रमि- इस समय ये सब किसलिये मिलकर इकडे लिताः? मया सत्कागयाऽऽहूताः सन्त आगताः। मुझसे सत्कार के अर्थ बुलाये हुए आये हैं। इमे मे मातामहीश्वसुरश्यालादयः सन्ति। ये मेरे नानी, ससुर और साले आदि हैं। इमे मम मित्रस्य स्त्रीभगिनीदुहितजामा- ये मेरे मित्र की स्त्री बहिन लड़की और तरः सन्ति । जमाई हैं। इमो मम पितृव्यस्य श्योलदौहित्रौस्तः। ये मेरे मामा और भानेज हैं। ये हुए हैं ?

४० संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ mame--- अथ सामन्तप्रकरणम् ॥ त्वगृहनिकटे के के निवसन्ति ? तेरे घर के पास कौन २ रहते हैं ? ब्रामणक्षत्रियविदशूद्राः। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र । इमे राजसमीपनिवासिनः । ये राजा के समीप रहने वाले हैं। अथ कारुप्रकरणम् ॥ मोस्तस्त्वया नौबिमानरयशकटहला- | हे बढ़ई ! तुझ को नावें, विमान, रथ, गाड़ी दीनि निर्वाय तत्र प्रशस्तानि कलाकी-| और हल आदि रचके उन में प्रत्युत्तमः लशलाकादीनि संयोज्य दातव्यानि । कलायन्त्र कील कांटे आदि संयुक्त करके देने चाहिये। इदं काष्ठं छित्वा पर्यई रचय । इस लकडी को काट के पलंग बना । अस्माकपाटाः सम्पादनीयाः। इससे किवाड़ों को बना । इमं वचं किमर्थं छिनत्सि ? इस वृक्ष को किसलिये काटता है ? मुषलोलुखलयोनिर्माणाय । मूसल और ऊखरी बनाने के लिये । अथायस्कारप्रकरणम् ॥ भो अयस्कार ! त्वयाऽस्यायसोवाणा- हे लोहकार ! 'तुझ को इस लोहे के बाण, सिशक्तितोमरमुद्ररशतघ्निभुशुण्डयो तलवार, बरछी, तोमर, मुद्गर, बंदूक और निर्मातम्याः। तोप बना देने चाहिये। एतस्य तुरादीनि च । इस के छुरे आदि। इमो कलशकटाहो त्वया विक्रीयेते नवा? ये घड़ा और कड़ाही तुम बेचते हो वा नहीं ? विक्रीणामि । बेचता हूं। एतान् कीलकण्टकान् किमर्थान् श्चयसिी इन कील कांटों को किसलिये बनाता है ? विक्रयणाय । बेचने के लिये।

तू संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ अथ सुवर्णकारप्रकरणम् ॥ त्वया सुवर्णादिकं नैव चोर्यम् । सोना आदि मत चोराना। आभूषणान्युत्तमानि निर्मिमीन । गहने अच्छे सुन्दर बना । अस्य हारस्य कियन्मूल्यमस्ति ? इस हार का कितना मोल है ? पञ्च सहस्राणि राजत्यो मुद्राः। पांच हज़ार रुपये। इमौ कुण्डली त्वया श्रेष्ठौ रचितौ वलयौ ये कुंडल तूने अच्छे बनाये परन्तु कड़े तो तु न प्रशस्तौ। बिगाड़ दिये। एतान्यंगुलीयकानि मुक्तापवालहरिकनी- ये अंगूठियां मोती, मूंगा, हीरा और नील- लमणिजटितानि सम्पादय । मणि से जड़ी हुई बना। एनेनालङ्कारा प्रत्युत्तमा रच्यन्ते । इससे गहने बहुत अच्छे बनाये जाते हैं। नासिकाभूषणं सद्या निष्पादय । नथुनी शीघ्र बनादे। इदं मुकुटं केन रचितम् ? यह मुकुट किसने बनाया ? शिवप्रतापेन । शिवप्रतापने । अस्य सुवर्णस्य : कटककगणनपुरान् इस सोने के कड़ा ककणी वा कंगना और निर्माय सद्यो देहि । बिछिया बनाके शीघ्र दे। अथ कुलालप्रकरणम् ॥ - भो कुलाल ! कुम्भशरामृद्गवकाग्निर्मि- अरे कुम्हार ! घड़ा सरवा और मट्टी की मीस्व घटं देखनेन जलमानेष्यामि । गौओं को बना और घड़ा दे जल लाऊंगा। अथ तन्तुवायप्रकरणम् ॥ भो तन्तुवाय! अस्य सूत्रस्य पटशाट्यु- ो कोरी ! इस सूत के पटका साड़ी और शीषाणि वय। पगड़ियां बुन ।

संस्कृतवाक्पयोषः॥ अथ सूचीकारप्रकरणम् ॥ भो सूच्या किं सीव्यसि ? श्रो सूई से क्या सीता है ? शिरोवरक्षणाधोवस्त्राणि सीव्यामि । टोपी अंगरखा और पाजामा सीता हूं। अथ मिश्रितप्रकरणम् ॥ जाते हैं। भो कारक! कटं वय । अरे चटाई वाला चटाई बुन । इमे व्याधा मृगादीन्पशून घ्नन्ति । ये बहेलिये हरिन आदि पशुओं को मारते हैं। किराता बने निवमन्ति । किरात अर्थात् भील लोग वन में रहते हैं। सकमलानि सरांसि कुत्र सन्ति ? कमलवाले तलाब कहां हैं ? इमे तड़ागा ग्रीष्मे शुष्यन्ति । ये सब तलाब गरमी में सूख कूपाज्जलमानय । तू कूए से जल ला। अद्य वाप्या स्नातव्यम् । आज बावडी में नहाना चाहिये । रजकेन शतमि भुशुण्ड्यादयश्चलन्ति। बारूद से बन्दूक और तोपें श्रादि चलती हैं। अयं कम्बलस्त्वया कस्माद् गृहीतः कस्मै यह कम्बल तूने किससे लिया और किस प्रयोजनाय ? प्रयोजन के लिये ? कश्मीगच्छीतनिवारणाय । कश्मीर से जाड़ा छुड़ाने के लिये । पश्य माणवकाः क्रीडन्ति । देख, लड़के खेलते हैं। प्रस्मिन्गृहस्रस्नराणि श्रेष्ठानि सन्ति । इस घर में बिछौने अच्छे हैं । इमे चोराः पलायन्ते । ये चोर लोग भागे जाते हैं । तत्र दम्युभिरागत्य सर्वन्धनं हनम् । वहां डाकू लोगों ने आकर सब धन हरलिया। द्वापरान्ते युधिष्ठिरादयो बभूवुः । द्वापर के अन्त में युधिष्ठिरादि हुए थे । मम पादे कण्टकः प्रविष्ट एनमुदर । मेरे पैर में कांटा घुस गया इसको निकाल । केशान् सम्बय। बालों को संभाल । भोनापित नखाञ्छिन्धि मुण्डय शिरः श्रो नाऊ ! नखों को काट शिर मूंड और श्मश्रुणि च । मूछ भी मूंड ।

myim देता हूं। संस्कतवाक्यप्रयोषः॥ अयं शिल्पी प्रासादमत्युत्तमंरचयति यह राज अटारी बहुत अच्छी बनाता है। अयं कोटपालो न्यायकारी वर्तते । यह कोतवाल न्यायकारी है। स तु धर्मात्मा नैवास्त्यन्यायकारित्वात् । वह कोतवाल तो धर्मात्मा नहीं है अन्या- यकारी होने से । एते राजमन्त्रिणः कुत्र गच्छन्ति ? ये राजा के मंत्री लोग कहां जाते हैं ? राजसभां न्यायकरणाय यान्ति । राजसभा को न्याय करने के लिये। भोस्ताम्बूलानि देहि । ओ ! पान दे। ददामि। भोस्तैलकार ! तिलेभ्यस्तैलं नि: -श्रो तेली ! तिलों से तेल निकाल कर दे। सायं देहि । दास्यामि । दूंगा। अरे रजक ! वस्त्राणि प्रक्षाल्य सद्यो अरे धोबी ! कपड़ों को धोकर शीघ्र देने देयानि । चाहिये। कपाटान् बधान। किवाड़ों को बन्द कर । इदानीं प्रातःकालो जातः कपाटाबुद्- इस समय सुवेरा हुआ किवाड़े खोल । घाटय। सर्वे युदाय सज्जा भवन्तु । सब सिपाही लोग लड़ाई के लिये तैयारहों। अर्थिप्रत्यर्थिनौ राजगृहे युध्येते । मुद्दई और मुद्दायले कचहरी में लड़ते हैं। किमियं गोधूमान् पिनष्टि ? क्या यह गेहुओं को पीसती है ? कुतोद्य दुर्गे शतघ्न्यश्चलन्ति ? क्यों आज किले में तो चलती हैं ? तेन भुशुण्ड्या सिंहो हतः । उसने बन्दूक से बाघ को मारा। तेनाऽसिना तस्य शिरश्छिन्नम् । उसने तलवार से उसका शिर काट डाला । प्रजनं किमर्थमनति ? उपानही धृत्वा व गच्छसि ? जालम् । किं स्थान्यामोदनं पचसि सूपं वा १ कटाहे शाकं पच । अञ्जन किसलिये प्रांजता है ? जूते पहिन के कहां जाता है ? जङ्गल को। क्या बटुवे में भात पकाता है वा दाल ? कड़ाही में तरकारी पका ।

संस्कृतवाक्यप्रबोधः॥ विरुदं वदिष्यसि चेहि दन्तांनोटयि- विरुद्ध बोलेगा तो तेरे दांत तोड़ डालूंगा। ध्यामि । तब पितस्तु सामर्थ्य नाभूत् तव तु का तेरे बाप का तो सामर्थ्य न हुआ तेरी तो क्या ही बात कहनी है। येन प्रजा पाल्यते स कथन स्वर्ग जिसने प्रजा का पालन किया वह स्वर्ग गच्छेत? को क्यों न जाय ? यो राज्यं पीड़येत्स कथन नरके पतेत् ! जो राज्य को नष्ट करे वह क्यों नरक में कया। न पड़े ? न होवे ? येनेघरमुपास्यते तस्य विज्ञानं कुतो जो ईश्वर की उपासना करे उसका न वर्देत ? विज्ञान क्यों न बढ़े? यः परोपकारी स सततं कथन सुखी जो परोपकारी है वह सर्वदा सुखी क्यों भवेत ! भस्यां मजूषायां किमस्ति ? इस संदूक में क्या है बसपने। कपड़ा और धन । इदानीमपि कुम्भ्यां धान्यं वर्चते न वा? अब कोठी में अन्न है वा नहीं ? स्वल्पमस्ति। थोड़ासा है। त्वमालसीतिष्ठसि कुतो नोयोगं करोषि। तू आलसी रहता है उद्योग क्यों नहीं करता ? धेहि। किया। उभयत्र प्रकाशाय देहल्यां दीपं नि- दोनों ओर उजियाला होने के लिये दर- वाजे पर दिया धर। वेनासिचाभ्यां शतेन सह युदं उसने ढाल और तलवार से सौ पुरुषों के कृतम्। साथ युद्ध अतिथीन् सेवसे न वा। अतिथियों की सेवा करता है या नहीं। खासमा मा गच्छ । कभी मेले तमाशे में मत जा । यूवसमाहयौ कदापि नैव सेवनीयो। जो अप्राणी को दाव पर धरं के खेलना वह द्यूत और प्राणी को दाव पर धर के खेलना वह समाह्वय कहाता है उनको कभी न सेवना चाहिये।

mileunavar इसेत् ? संस्कृतवाक्यायोषा॥ ४५ यो मद्यपोऽस्ति तस्य बुदिः कथं न जो मद्य पीनेवाला है उसकी बुद्धि क्यों न न्यून होवे । यो व्यभिचरेत्स रूग्णः कयं न जायेत् ? जो व्यभिचार करे वह रोगी क्यों न होवे ? योजितेन्द्रियःस सर्वे कर्तुं कृतोन शक्नु- जो जितेन्द्रिय है वह सब उत्तम काम क्यों न कर सके? योगाभ्यासः कुतो येन ज्ञानदीप्तिर्भवे- जिसने योग का अभ्यास किया है वह भरः। ज्ञानप्रकाश से युक्त होवे । वस्त्रपूतं जलं पेयं मनः पूतं समाचरेत् । वस्त्र से पवित्र किया जल पीना चाहिये और मन से शुद्ध जाना हुआ काम करना यात् ? चाहिये। sue स भ्रान्तो कदापि न पतेत् । वह भ्रमजाल में कभी नहीं गिरे। अयं वाचालोऽस्त्यतो बरबरायते । यह बहुत बोलने वाला है इसी कारण बड़बड़ाता भूमितले किमस्ति भूमि के नीचे क्या है ? मनुष्यादयः। मनुष्य आदि । यः पद्भया भ्रमति सोऽरोगो जायते । जो पग से चलता है वह रोगरहित होता है। व्यजनेन वायं कुरु । पो से वायु ( हवा ) कर । किं धर्मादागतोऽसि यत् स्वेदो जा क्या घाम से आया है जो पसीना तोऽस्ति। होरहा है। स्वस्ये शरीरे नित्यं स्नात्वा मितं भोक्त- अच्छे शरीर होते रोज नहा के थोड़ासा न्यम् । खाना चाहिये। जलवायू शुद्धौ सेवनीयो। पवित्र जल और वायु का सेवन करना चाहिये। सर्वतके शुदे गृहे निवसनीयम् । जो सब तुओं में सुख देनेवाला हो उसी घर रहना चाहिये। नैव केनचिन्मलीनानिवस्त्राणि धार्याणि। किसी को भी मैले कपड़े पहिनने न चाहियें। तव का चिकीर्षास्ति ? तेरी क्या करने की इच्छा है ? गृहं गत्वा भोक्तुम् । घर जाके खाने की। में ALARIA ४६ संस्कृतवाक्यप्रदोषः॥ Arch १ स्वं सक्तुं भुङ्क्षे न वा? तू सत्तू खाता है या नहीं? घृतदुरपमिष्टैः सहाऽभि । घी दूध और मीठे के साथ खाता हूं। त्वयाम्रफलानि चूषितानि न वा ? तूने आम चूसे वा नहीं ? उर्वारुकफलान्यत्र मधुराणि जायन्ते । खरबूजे के फल यहां मीठे होते हैं । इक्षुभ्यो गुहादिकं निष्पद्यते । ऊख आदि से गुड़ आदि बनाये जाते हैं। इदानीमाकण्ठं दुग्धं पीतं मया। इस समय गले तक मैंने दूध पिया । तनं देहि । मठा दे। अत्र श्वेता शर्करा वर्तते । यहां सफेद चीनी है। भयं रुच्या दध्नौदनं भुते । यह प्रीति से दही के साथ भात खाता है। अद्य मोदका भुक्ता न वा ? आज लड्डू खाये वा नहीं ? त्वया कदाचित्कुशराऽपि भुक्तान वा ? तूने कभी खिचड़ी भी खाई वा नहीं ? मयाऽपूपा भक्षिताः। मैंने मालपूवे खाये हैं। सशर्करं दुग्धं पेयम् । शक्कर के सहित दूध पीना चाहिये । येन धर्मः सेव्यते स एव सुखी जायते । जो धर्म का सेवन करता है वही सुखी रहता है। अथ लेख्यलेखकप्रकरणम् ॥ मनुष्यो लेखाभ्यासं सम्यक् कुर्यात् । मनुष्य लिखने का अभ्यास अच्छे प्रकार करे। अयमत्युत्तममक्षरविन्यासं करोति । यह अत्युत्तम अक्षर लिखता है। लेखिनी सम्पादय । कलम बनाओ। मसीपात्रमानय । पुस्तकं लिख। । पोथी लिख । तत्र पत्रं लिखित्वा प्रेषितं न वा ? वहां चिट्ठी लिखकर भेजी वा नहीं ? मेषितं पञ्चदिनानि व्यतीतानि तस्य भेजी पांच दिन बीते उसका जवाब भी प्रत्युचरमप्यागतम् । सुवर्णातराणिलिखितुं जानासि नवा ? सुनहरी अक्षर लिखने जानता है वा नहीं ? -ream दवात ला। भागया।

जानता हूं परन्तु । संस्कृतवाक्यम्बोषः॥ जानामि तु परन्तु सामग्रीसंचयने लेखने तो चीज इकट्ठी करने चविलम्बो भवति । और लिखने में देर होती है । यद्यङ्गुष्ठतर्जनीभ्यां लेखनी गृहीत्वा जो अंगूठा तर्जनी अंगुली से कलम को मध्यमोपरि संस्थाप्य लिखेत्तहि प्रशम्तो | पकड़कर बीचली अंगुली पर रखकर लेखो जायेत । लिखे तो बहुत अच्छा लेख हो । भयमतीव शीघ्र लिखति। यह अत्यन्त जल्दी लिखता हैं। एतस्य लेखिनी मन्दा चलति । इस की लेखिनी धीरे चलती है। यदि त्वमेकाहं सततं लिखेम्तर्हि कि- यदि तू एक दिन निरन्तर लिखे तो यतः श्लोकांल्लिखितुं शक्नुयाः ? कितने श्लोक लिख सके ? पञ्चशतानि । पांच सौ। यदि शिक्षां गृहीत्वा शनैः शनैलिखि- यदि शिक्षा ग्रहण कर के धीरे २ लिखने तुमभ्यस्येत्तातगणां सुन्दरं स्वरूपं का अभ्यास करे तो अक्षरों का दिव्यस्व. स्पष्टतया च जायेत । रूप और स्पष्टता होवे। प्रस्मिल्लावारसे कजलं सम्मलितं न इस लाख के रस में कज्जल मिलाया है वा नहीं ? मेलितं तु न्यूनं खलु वर्तते । मिलाया तो है परन्तु थोड़ा है । मनुष्यैर्यादृशः पठनाभ्यासः क्रियेत ता. मनुष्य लोग जैसा पढ़ने का अभ्यास करें दृश एव लेखनाभ्यामोऽपि कर्तव्यः । वैसा ही लिखने का भी करना चाहिये। मयावेदपुस्तकं खयितव्यमस्त्य केन रू- मुझ को वेद का पुस्तक लिखाना है एक प्येण कियतः लोकान्दास्यसि ? रुपये से कितने श्लोक देगा ? प्रत्युत्तमानि ग्रहीष्यसि चेत्तर्हि शतत्रयं जो बहुत अच्छे लोगे तो तीनसौ और मध्ययानि चेच्छतपञ्चकम् । मध्यम लोगे तो पांचसौ । साधारणाने चेत्सहस्रं श्लोकान्दा. यदि बहुत साधारण वा घटिया लोगे तो स्यामि । हजार श्लोक दूंगा। शतत्रयमेव ब्रहीष्यामि परन्त्वत्युत्तमं तीन ही सौ लूंगा परन्तु बहुत अच्छा लेख लिखित्वा दास्यसि चत् । करेगा तो। वरमेवं करिष्यामि। अच्छा ऐसा ही करूंगा। वा? अथ मन्तव्यामन्तव्यप्रकरणम् ॥ त्वं जगत्स्रष्टारं सच्चिदानन्दस्वरूपं पर तू इस संसार के बनाने वाले सञ्चित् और मेधरं मन्यसे न वा? आनन्दस्वरूप परमेश्वर को मानता है वा नहीं?

संस्कृतवाक्यप्रयोषः॥ भयं नास्तिकत्वात्स्वभावात्सृष्ट्युत्पत्ति यह मनुष्य नास्तिक होने से स्वभाव से मत्वेश्वरं न स्वीकरोति । सृष्टि की उत्पत्ति को मानकर ईश्वर को नहीं मानता। यद्ययं कर्वकार्यरचकरचनाविशेषान् जो यह नास्तिक कर्ता क्रिया बनानेहारा संसारे निश्चिनुयात्त वश्यं परमात्मानं | और बनावट को इस जगत् में निश्चय करे मन्येत । तो अवश्य ईश्वर को माने । योऽत्र सृष्टौ रचितरचनां पश्यति स जो इस सृष्टि में बने हुए पदार्थों की बनावट जीवः कार्यवत्स्रष्टारं कुतो न को प्रत्यक्ष देखता है वह जैसे कारीगरी को दे- मन्येत? खके कारीगर को निश्चय करते हैं वैसे जगत् के बनानेवाले परमात्मा को क्यों न माने ? यत्रोत्तमा धार्मिका भास्तिका विद्वांसो- | जहां श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रास्तिक विद्वान् लोग ऽध्यापका उपदेष्टारश्च स्युस्तत्र कोपि पढ़ानेवाले और उपदेशक हों, वहां कोई भी कदाचिमास्तिको भवितुं नैवात् । मनुष्य नास्तिक कभी नहीं हो सकता। के कर्मभिक्तिर्भवति तदा क वसन्ति किन कर्मों से मुक्ति होती है उस समय तत्र किं भुज्यते च ? कहां वास करते और वहां क्या भोगते हैं ? कर्योपासनाविज्ञानमुक्तिजीयते धर्मयुक्त कर्म उपासना और विज्ञान से तदानी ब्रह्मणि निवसन्ति परमा- मोक्ष होता है उस समय ब्रह्म में मुक्त जीव नन्दं च सेवन्ते । रहते और परम आनन्द का सेवन करते हैं। मोक्ष प्राप्य तत्र सदा बसन्त्याहोखि- जीव मुक्ति को प्राप्त होके वहां सदा रहते कदाचित्ततो नित्य पुनर्जन्ममरणे हैं अथवा कभी वहां से निवृत्त होकर पुनः माप्नुवन्ति ? जन्म और मरण को प्राप्त होते हैं ? प्राप्तमोक्षा जीवास्तत्र सर्वदा न वसन्ति मुक्ति को प्राप्त हुए जीव वहां सर्वदा नहीं किन्तु महाकल्पपर्यन्तमर्थाद् ब्राह्ममा- | रहते किन्तु जितना ब्राह्म कल्प का परिमाण युवत्तावत्तत्रोषित्वाऽऽनन्दं भुक्त्वा | है उतने समय तक ब्रह्म में वास कर आ- पुनर्जन्ममरणे प्राप्नुवन्त्येव । नन्द भोग के फिर जन्म और मरण को अवश्य प्राप्त होते हैं। ? धयः 7 .. इति श्रीमहयानन्दसरस्वतीस्वामिना निर्मितः संस्कृतवाक्यप्रबोधनामको निबन्धःसमाप्तः॥

संस्कृतवाक्यप्रबोधः

Author
Sarasvatii Svaamidayaanand
Title
Sanskrxtavaakyaprabodh:
File name
संस्कृतवाक्यप्रबोधः
Text
OCR done
Citation
1913
Published
2006/03/09
Publisher
Vaidik Yantraalay, Ajamer
Language
Sanskrit
Pages
49
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
LANGUAGE LINGUISTICS LITERATURE
DLI number
477393
Barcode
99999990173250.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
dV5Dj1s6RBp
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