Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Kasaya Pahudam Thidi Vihatti Bhag-4

Acharya, Gunadhar · 2011/09

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1011
भा० दि० जैनसंघ-ग्रन्थमाला
KA
इस ग्रन्थमालाका उद्देश्य
प्राकृत संस्कृत आदि में निबद्ध दि० जैनागम, दर्शन,
साहित्य, पुराण आदिका यथासम्भव
हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशन करना
GI
CHUTHIS
THE TAY
सञ्चालक
VIRA
भा० दि० जैनसंघ
Pandit
ग्रन्थाङ्क १-४
प्राप्तिस्थान
Pandit :
मैनेनर
भा० दि० जैन संघ
चौरासी, मथुरा
मुद्रक कन्हैयालाल, कैलाश प्रेस, बी०७।९२ हाड़ाबाग (सोनारपुर) वाराणसी।
THE SEL
THE ALL-1,
स्थापनाद]
प्रति ८००
[वी०नि० स० २४६८
VIRA SAMVAT

1063 del Didi Jala Sangha Guptamta NO 1 M RITMIT KASA YA PAGOUDAM IV THIDI VIHATTI ata BY मुम्भव GUNADHARACHARYA WITH CHURNI SUTRA OF YATIVRASHABHACHARYA AND THE JAYADHAVALA COMMENTARY OF VIRASENACHARYA THERE-UPON EDITED BY Pandit Phulachandra Siddhantashastri, XDITEOR NAH ABANDHA JOINT EDITOR DHAVALA, Pandit kailashachandra Siddhantashastri Nyarallelke, Sidhantarata, Prodonadhyamat Syaduado Digambar Jain Pldgaley. Bonorat PUBLISHED BY THE SECRETARY PUBLICATION DEPARTMENT THE ALL-INDIA DIGMBAR JAIN SANGHA CHAURASI MATHURA RE) TRUI VIRA SAMVAT 2483 ] VIKRAMS 2013 [1906 A C. [MFK " 1511 Sri Dig. Jain Sangha Granthamala Foundation year-] [-Vra Niravan Samvat 2468 -- Aim of the Series:- વિમા छापने के लिए साथ ही शुरुके ५ Publication of Digambara Jain Jain Siddhanta, Darsana, Purana, Sahitya and other Works in Prakrit, Sanskrit etc. Possibly with Hindi Commentary and Translation. गवा। फिन्तु इतनेमें तीसरे हो रहे हैं। दा वैयार है। इन सब गदको ओरसे हो DIRECTOR SAurmersit SRI BHARATAVARSIYA DIGAMBARA JAIN SANCHA NO. 1. VOL. IV धर्मप्रेमी और माशा है। देता हूँ। इसम है, मेरा भी अपने जन्म To be had from - - . नीचे के भागों सुपौत्र वा० सानि मत मै आप THE MANAGER SRI DIG. JAIN SANGHA. CHAURASI, MATHURA, U P. (INDIA) इसमास है। दोनोंकि स्वामी Printed by-Kanhaya Lal At The Kailash Press, B.7192 Hara Bagha, Sonar pur Banaras ROCEABI यदवसार मदेनी, दीपावनी, 800 Copies Price Rs. Twelve only 5 - , nthamala Tarn Samme18 प्रकाशक की ओरसे Siddhanta, other Worts ty with Hard ही सायपार (बयपबाममी) के चौमे भाग स्पितिविमति मोर पाय माग भनुमग विमटिका प्रकाशन एक साप हो याहै। इसका कारण पर कि बिस प्रेसमें बीषा माग मपमे मिस दिवा मा पस प्रेसने उसे अपनेमें मावश्यहवास मषिक विक्षम्म किया । मात्र हो इसके पाँच फर्मों दीमक चाट गई । वन महासे काम ठार दूसरे प्रेसको दिया गया। किन्तु एसके पाप फौंको छापकर देने में पाले मेंसने पुन' मनापश्यपिसब किया। स्वने में पीसरे प्रेसने पाँचा माग छापकर दिया। इस पर ये दोनों भाग एक साप प्रकाशित हो। पावरीके परमात् छठा और सावदा माग मी प्रेसमें दिये जाने ठिये प्राप देवार है। इन सब मागाँका प्रकाशन संघ पर्वमाम समापति रामवीर सेठ भागपदमी गैगर गमकी मोरसे हो पा है। पेठ साल सबा नको मर्मपत्नी सेठानी मदाबाईची गती मर्मप्रेमी और पार है। मापके साहाय्पसे पह पर्व शीम को निर्विप्न पूर्ण होगा ऐसी माझा है। बापछी मारता मोर पर्मप्रेमकी सराहना करते हुए मैं मापको बहुत २ पम्पपाव labon RA JAIN SANCHA देवा ।। इस मागके सम्पावन मारिका भार भी पंचमुखी सिखाम्तमामीमे परम पिया है. मेरा मी पवासस्प सरपोगया है। मैं परिवमीको मी पववर्य पम्पबार पेवाई। अपने चम्मकाय दोबमासा पर्याय असी सपा दीपालीके जिनमन्दिरके मीले मागम स्थित है। भौर पर सब स्व० वा सारके सपुत्र वा गनेसपासमी मोर सपोज मा० सामिारामबी क्या मा० अपमासमीके सौमम्प मौर धर्मप्रेमान्न परिचायक है। मत मैं माप सरन मी बामारी। इस मागवा पामाग 'बम्बई प्रिमिंग प्रेस' मा मन्स फर्मे गस प्रेस में पे है।दोनोरिलामी क्याम्मेवारी मी इस बाके लिए बम्पमापके पात्र हैं। - NGHA 4S1 MATHURA -- ७.P (rma) बबपषमा कार्याल मौनी, काशी दीपावली सा कैलाशपन्द्र बासी मंत्री साहित्य दिमाग मानसप, म्रुप u Sowerfur Balance Pada A Trefn aally -- . उत्तम मा प्रहतियों न सके17 २. नि५० उर याद माझेद बाजा स्पिनिमय हता है। है। यद्यपि नो नो किन्न पहन , विषय-परिचय प्रस्तुत अधिकारका नाम स्थितिविमक्ति है। कर्मका बन्ध होनेपर जितने कालतफ उसका कर्मरूपसे अवस्थान रहता है उसे स्थिति कहते हैं। स्थिति दो प्रकार की होती है-एक बन्धके समय प्राप्त होनेवाली स्थिति और दूसरी सक्रमण, स्थितिकाण्डकघात और अघ स्थितिगलना आदि होकर प्राप्त होनेवाली स्थिति । केवल बन्धसे प्राप्त होनेवाली स्थितिका विचार महाबन्धमें किया है। मात्र उसका यहाँपर विचार नहीं किया गया है । यहाँ तो बन्धके समय जो स्थिति प्राप्त होती है उसका भी विचार किया गया है और बन्धके बाद अन्य कारणोंसे जो स्थिति प्राप्त होती है या शेष रहती है उसका भी विचार किया गया है । मोहनीय फर्मको उत्तर प्रकृतियाँ अहाईस हैं। एक बार इन मैदोंका आश्रय लिए बिना और दूसरी बार इन मेदोंका आश्रय लेकर प्रस्तुत अधिकार में विविध अनुयोगद्वारोंका आश्रय लेकर स्थितिका सागोपांग विचार किया गया है। वे अनुयोगद्वार ये हैं-अद्धाच्छेद, सर्वविभक्ति, नोसर्वविभक्ति, उत्कृष्ट विमक्ति, अनुत्कृष्ट विभक्ति, जघन्य- विमक्ति, अजघन्यविभक्ति, सादिविमक्ति, अनादिविमति, ध्रुवविभक्ति, अध्रुवविभक्ति, एक जीवकी अपेक्षा स्वामित्व, काल, अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भङ्गविचय, परिमाण, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, सन्निकर्प भाव और अल्पबहुत्व । मूलप्रकृति स्थितिविमक्ति एक है, इसलिए उसमें सन्निकर्ष अनुयोगद्वार सम्भव नहीं है, इसलिए इस अधिकारको उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा ही जानना चाहिए । अद्धाच्छेद-अद्धा शब्द स्थितिके अर्यमें कालवाची है। तदनुसार अदाच्छेदका अर्थ कालविभाग होता है। यह जघन्य और उत्कृष्ट मेदसे दो प्रकारका है। मोहनीय सामान्यका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध सत्तर कोडाकोडी सांगरप्रमाण होता है यह विदित है, इसलिए मोहनीय सामान्यका उत्कृष्ट अद्धाच्छेद उक्तप्रमाण कहा है। इसमें सात हनार वर्ष आबाघाकालके भी सम्मिलित हैं, क्योंकि ऐसा नियम है कि कर्मका बन्ध होते समय स्थितिबन्धके अनुसार उसकी आवाधा पड़ती है। यदि अन्त कोडाकोडी सागरके भीतर स्थितिबन्ध होता है तो अन्तर्मुहूर्त प्रमाण आबाधा पडती है और सौ कोड़ाकोड़ी सागरप्रमाण स्थितिबन्ध होता है तो सौ वर्षप्रमाण आबाधा पड़ती है। आगे इसी अनुपावसे आबाधाकाल बढ़ता जाता है, इसलिए सत्तर कोडाकोड़ी सागरप्रमाण स्थितिबन्धके होने पर उसका आबाधाकाल सात हजार वर्षप्रमाण बतलाया है। विशेष खुलासा इस प्रकार है-किसी भी कर्मका बन्ध होने पर वह अपनी स्थितिके सब समयों में विभानित हो जाता है । मात्र बन्ध समयसे लेकर प्रारम्भके कुछ समय ऐसे होते हैं जिनमें कर्मपुञ्ज नहीं प्राप्त होता। निन समयोंमें फर्मपुज नहीं प्राप्त होता उन्हें आवाघा काल कहते हैं। इस आवाधाकालको छोडकर स्थितिके शेष समयोंमें उत्तरोत्तर विशेष हीन क्रमसे कर्मपुञ्ज विमाजित होफर मिलता है। उदाहरणार्थ मोहनीयकर्मका सत्तर कोडाफोडी सागरप्रमाण स्थितिबन्ध होने पर बन्ध समयसे लेकर सात हनार वर्ष तक सब समय खाली रहते हैं। उसके बाद अगले समयसे लेकर सत्तर कोडाकोड़ो सागर तकके फालके नितने समय होते हैं, विवक्षित मोहनीयकर्मके उतने विभाग होकर सात हजार वर्ष के बाद, प्रथम समयके बटवारेमें जो माग आता है वह सबसे बड़ा होता है, उससे अगले समयके बटवारे में जो भाग आता है वह उससे कुछ हीन होता है । इसी प्रकार सत्तर कोडाकोडी सागरके अन्तिम समय तक जानना चाहिए। यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि यहाँ पर मोहनीयको जो उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोड़ाकोडी सागर कही है वह सत्तर कोडाकोडी सागरके अन्तिम समयके बटवारेमें प्राप्त होनेवाले द्रव्यको अपेक्षासे कही है। वस्तुतः आबाधाफालके बाद निस समयके बटवारेमें जो द्रव्य आता है उसकी उतनी ही स्थिति जाननी चाहिए । स्थितिके अनुसार बटवारेका यह क्रम सर्वत्र जानना चाहिए । इस प्रकार मोहनीय कर्मके उत्कृष्ट अक्षाच्छेदका विचार किया। मोहनीय- कर्मका बघन्य अदाच्छेद एक समयप्रमाण है। यह क्षपक सक्षमसाम्परायिक जीवके अन्तिम समयमें सूक्ष्म- लोभकी उदयस्थितिके समय प्राप्त होता है। मोहनीयको उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्वका उत्कृष्ट अद्धाच्छेद मोहनीय सामान्यके समान सत्तर कोड़ाकोड़ो सागर है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका पग्रयोगाट है। उन सम्बना प्रकृतियाँच नट दिसो बीतने सेटर नत्व कर पा है, कान्ति मी करने वेद वन बामगा ५ स्पितिदन्द कार उपायोती उत्कृष्ट प्रमाग प्राप्त करे। इस पौत्व पड़ी है मिथ्यात्व, 4 रनो अपनी ०५१ अदान्देद देता है। और नपुसकवेद ये समय प्रालवालो ५५ सूनसवटन, ५० . समसमें पूरा नवपत्यके अपने अपने दो व्यवस्यिमापन मदो महीना, और पुरुषवेदकी. यन्तिम पदका वर्षप्रमाण पहा हे 4 JARAT स्थितियाँ विवक्षित छेना चाहिए। L पिरेमा समपो तो ये ऐम स्वामी सनबर मिस र मेरो रिपरि और इस पर परमा र हासिल पुरी, राम " त गम्मुिरेपारम्स अरमानta परका ग्या मसपो गम्मर समन mine | Rata पारपत्रमा रामरहमत समोर बस में पासपी राम पER Thमरमरकर (२) उका मा मतमत कम सचर फोदामेड़ी मगर , मोड में दोनों कम कविय न र म प्रहतिया, इसलिए किस बीपने मिन्माला उका स्वितिय पर उम्प प्रगामात से बिना ममत प्रबके मीर वेरसम्मलने पास किस रतले सम्पपलको प्रश्न करने के प्रपम समसमें ममम मियत्वो सब निपेशाम संक्रममारे नियमानुस्पर सम्पमा और सम्पमिप्यास्त्र स्मसे संक्रमित हो चाखरे, इत्तपिए इन दो मावियों तामापोर मह म मर होगामेड़ी गरप्रमाण प्राव होता । सोम पाग्रेस सर मापसेर बामस प्रेगकोपी सायरममाण मोबि सी पधेन्द्रिय पास बीरमकमान इतना कर स्विविय होता है। नी मनप्पयों का मापद एक भापति कम पामैस कोपापी गरप्रमाण पपि न मो. पावन्य प्रतिमा पर बसे इनकी ठठ प्रमाग का पति नमी प्रास होती। न्ति पाउका मवाद संक्रममसे प्राप्त रोग। पर इबना विशेष बनना चाहिए या सोम ज्यायोग कर स्पति रोष नपुंसकोद, मति, यो, मप भौर गुप्साच मिवम्से मर रोग है। उस समय बीवेर, पुरपवेर, पस्प मैर रसिभ नही रोग। इसमय नपुंसकर मादि पार मातियो कर माद सोम प्यायो सका विविध समस मौ सम्मर है, मोनि मनमषिप किसी बोलने सामोध उतर पिपिच प्रारम्म लिया मौर उस समय मा नपुसको मारिन मी बरया। इसलिए यह बीर एक मापरि पाद सोम पोम टकर स्थिति मसको मातम संयमित मी करने मेग्न । मना सामोरेमको मौतरी मर्पसकामे प्राविप उत्का मा- रक्न बाम्य पर पीबेर माविध रस समय वोक्म यही मही, इसलिए सोम कमायो ठका लिवियर मौर उस पर मीनेर मारि पारध कर माये और एकमा म सोम क्यानो गका स्पिषिमा संक्रमण पहना उकर मय मागरिकम समादी सागर प्रमन प्राप्त करे। सोवेर मादि चार प्रकविरोधी भीभी पुच माठियों सब परिगणना जाती। इसमपाल नही पा सहा मग्यो।म मठियोंकि काम मात्र वियर करने पर मित्व, सम्ममिप्यत्व और पय म्याग ये स्पोरसे पर रोपेवाम मातिा नहीं, इसरियन पत्र मानौ ममीपणारे मन्तिम समयमें दो एमप मम्मामै एक नियस्थिति शेप रही बिना बाप भार रोग। सम्मान मौर मेमसम्ममइनमबे निपम स्पोरमसे ही पर ध। क्या मीर मेर भएसमोर मी तोरसे पर मास हो सकती। पापा इन एपमा मन्तिम समयमे एक समय सम्पती एक निस्पिति रोष पतीसहमत्र बम्प मापन होव।एको बगान, मानसन्मान, मनम्न मोर पुम्पवेद इन सपकाभेगिम मानी मानी उस्मुभितिक मन्तिम समसमें पूर्व सनयर न होता। दूसरे पर इनके माने माने परनताको मन्तिम एमबमें गमप लिपेकों अप प्रथम चितिक निफे मी पेप गये। इसलिए इसकी बाप कति अपने मपने पदनाम मन्तिम समसमें मप्रास मदमें बो नूतन मरोषा है उसके एक माम ऐमपरिणाम पम देने पर भवमें इम पाँबपन्न स्वाति श्री। बोक्सानकी मम मरो माना मानमान मनात म एक माना मापन महर्व कम पारिन मेर पुरुपयेर मामा कम पाठ प्रमाण होगी।दोहनम कपब मरा । मोपयोग मन्तिममा मन्तिम प्रतिपत पर्पमान हो इसलिए इन्म बपन्न भाग्ने संस्थत पप्रमनपस। सम्मोउपविमणिसरिवनितिमपि न स्थितियों मैर मोहस्वितिविमपि उनसे म्न दिनानिमितौर पर मातियों में या पपायोन परिवरना चाहिए। का-मनुमाविमधि-पते उकास्पिति गल स्विसिविमति और इससे विति मला निविमति। मेरमेर भावपचे दाविसकर सम्मल हो उस भरते हे पान देना चाहिए। रामर पीपगा। मेरा मित्र माना MINAR र --- m - । ( ३ ) जघन्य-अजपन्यविभक्ति-सबसे जमन्य स्थिति सपन्य स्थितिविधि और उससे अधिक रिगति अजपन्य स्थितिविभक्ति है। मूठ और उत्तर प्रकृति में इस पीजपदफे अनुसार पस्ति फर ऐना नाहिए । सादि-अनादि-ध्रुव-भध्रुयविभफ़ि-सामान्यसे मोहनीशी गपन्य स्थिति क्षपक सूमसाम्परापिक नीवके अन्तिम समयमें होती है, अतः जपन्न स्थितिविभकि सादि और अशुल है। इसके पूर्व अणपन्य स्थितिविभक्ति होती है, इसलिए पर अनादि तो है ही। साथ ही पद भमयों की अपेक्षा भुव और भन्योकी अपेक्षा अनुव भी है। तथा उत्कट और आलए स्थितिविभफि मादाचिक होती है इसलिए ये सादि और अधुप हैं। उत्तर प्रतियोकी अपेक्षा मिथ्यात्व, पारद काय भौर नो नो पार्योफे विषयगे इसीप्रकार जानना चाहिए । अर्थात् इसकी उत्कृष्ट, अनुत्कट और गमन्य स्थितिविभक्ति सालि और साथ होती है। तथा अजधन्य स्थितिविभक्ति सादि विकल्पको छोड़फर तीन प्रकारको होती है। कारण स्पष्ट । सम्पम्प और सम्पमिथ्यात्व ये दो प्रतियों को सादि हैं, इसलिए इनफी उपE. अनुत्कए, जपन्य और अनपन्य ने पारो स्पितिविभक्तियाँ सादि और भाव होती है। अब ररी अनन्तानन्धीचतरफ सो इसकी उत्कए और अनुत्कष्ट स्थितिविभक्तियों फादाचित्क होनेते सादि और अधुप है। सथा गपन्य स्थितिविभकि रिलयोपनाके पाद इसकी सयोजना रोनेके मपम समयमें दो होती है, भी सादि और भव है। किन्तु अजघन्य स्थितिविभक्ति विसयोजनाके पूर्व अनादिसे रत्तो है तथा पिसंयोगना के बाद पुन' समोजना रोनेपर भी होती है, इसलिए तो यद अनादि और सादि है। राभा अभयोकी अपेशा धुव और भन्योंकी अपेक्षा अनुव मोरे । इसप्रकार अनन्तानुपन्धीचतुष्फी अजघन्य स्थितिविभफि सादि आदिके भेदसे चारों प्रकारकी है। पर ओघ प्ररूपणा है। मार्गणाओंमें अपनी अपनी विशेषताफो पानकर योजना फरनी चाहिए। TREE H इसलिए पद འུར :ནཨ rrr C स्वामित्व-सामान्यसे मोहनीयफी उत्कृष्ट स्थितिका पभ परनेवाग जोय उत्जर स्लितिविभक्तिका स्वामी है। अवान्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा मिग्याल और सोश फपायोंफे विषयमें इसी प्रकार स्वामिल जानना चाहिए। यपि यहाँ पर यह कहा जा सकता है कि उत्तर स्थितिका पन्ध फरफे दितीयादि समयों में अनुत्कष्ट स्थितिका पन्ध करनेवालेके उता स्वितिका एक भी निषेक नहीं गन्ता, इसलिए फेपल पन्भफे समय उत्कृष्ट स्थिति न मानकर अन्य समयों में भी उत्कृष्ट स्थिति मानी जानी चाहिए पर यह गहना ठीक नहीं है, क्योंकि उत्कृष्ट स्थिति कारप्रधान होती है और द्वितीयादि समयों में अब स्थिति गल्नाले मारा एक एक समय कम होता बाता है, इसलिए उत्कृष्ट स्थितिमधफे समरी उलए स्थितिविभक्ति मानी गई है। तम्यक्त्व और सम्यग्मियात्वकी उत्कृष्ट स्थितिविभक्तिका ऐसा प्रथम समावों पेदफसम्पयापि जोष स्वामी है जिसने मिथ्यात्व गुणस्थानमें मिप्यात्वकी उत्कृष्ट स्थितिका पन्ध फर अन्तर्मुहूर्तमें पेदक्तम्परत्व प्रास किया है। तथा कषायोंकी उत्कृष्ट स्थिति बाँधकर जो एक आवलिकालके पाद उसे नौ नौपायों में संकान्त कर रहा है पर नौ नोकषायोंकी उत्कृष्ट स्पितिविभकिका स्वामी है। सामान्यसे मोनोपको मधन्य स्थितिविभक्ति क्षपक सूक्ष्मसाम्परायके अन्तिम समयमें होती है, इसलिए वह इसफा स्यामी है। उत्तर- प्रतियोंकी अपेक्षा मिथ्यात्वकी क्षपणा करनेवाला जीव उसकी क्षपणाके अन्तिम समयमें उसकी जमन्य स्थिति विभक्तिका स्वामी है। इसी प्रकार सम्परत्व, सम्पग्मिध्यात्व, सोल्द फषाय भौर छर नोफपायको बघन्य स्थितिविभक्तिका स्वामी अपनी अपनी क्षपणाके अन्तिम समयवती बीवको गानना चाहिए। माप सम्पग्मिथ्यात्वका पर जघन्य स्वामित्व अपनी उगनाफे अन्तिम समयमें भी बन जाता है। तथा तीन षेदको जघन्य स्थितिविभक्तिफा स्वामी लोदयसे क्षपकणि पर चदा हुआ अन्तिम समयवती जीव है। यह ओषसे स्वामित्व कहा है। मार्गणाओंमें अपनी अपनी विशेषता बानकर यर स्वामित्व घटित फर लेना चाहिए। जो गिन प्रकृतियोको क्षपणा सम्भव हो वहाँ उसका विचार कर और जहाँ क्षपणा सम्भव न हो वहाँ अन्य प्रकारसे बघन्य स्वामित्व पटित करना चाहिए। सपा उत्कृष्ट स्वामित्वमें भी भपनी अपनी विशेषताको जानकर वह ऐआना चाहिए। . राम बरानो हो। मन्वर- ससा देत NARAY AN 1 मागोमति परिसरमरि। विसलामत या। मसाल मरेबार मात्र रिपस कमर करेगा। परस्त पत्रप्पा यतीमो लिए पानी है। अब पीपीपी पम्वरम प्रम-उता स्वितिर कमसे कम एक समय का मौर मषिकसे भक्ति मामा भाग तक एता है, इसलिए सामान्यसे मारना मानवनितिमक्किम बपन्य एक समम भौर उका मामन है। एक बार सा स्पितित्र न होकर पुनः उका स्थितिम य होनेमें कमसे कम मत मावा भौर गरिन सा स्पिरिक एसिपाहि पाम परि ममम करमे वो रसके मनन्त ताउका स्थिति कप मही हग इसलिए यहां ममुकर स्पितिविमतिम समन्व भौर का कारण बानना चाहिए । मौ नोकमायोंमें नपुसार मति शत मर मौर हुगुप्सानब सोगापाड उत्तर पतिकपरे साप मौ सम्भव र सहिए न कर विनिमविका बन्न पाएक सम्प भौर ठकर अहमता बन पाता है पर क्षेप पार मोलपोप कम होम पामोरे एका पविकलो समय सम्मान नहीं है इसलिए इन मार स्पिनिलमटिम अबब सा एक समर मौर का एकमावमिमम। सपा न मी नासाको मनुका स्पति लिमठिनपानमा एक समय पाकिवादिपमोती एक मारे मन्तरसे एक सामादि कम मनुका स्विविय कमरमानसिपर उसप इसी क्रमसे नौ मोरवपमें संगमण करने पर इनकी मनुका विविध अपत्यक एक समय उपभोता। क्या उकाम सोम पोंके समान मनन्त का सरही है। तम्माल मेर सम्ममियात्री उकर स्पतिविमटिको मारनोगकी उतार स्पिवित्र करनेवाम पास मतममि बेदसम्मको प्रप्त रोगा। उसके परम समबमें रोटी इसलिए इस बपन्य मौर उत्तरमा एक समसमा। तपोबार ठपण्मसम्पावरे खान दोनों प्रकृतियों की स्व मास भइमि पातिक सम्पति हो म उसके मन्त्री भवति- हिमचिमच मा मर्व देला पाया है और वो बीचमै सम्पमिपावके साबरोबसठ सामर प्रवर मेस्सम्यो सप यब उसके साविक दो व्यासठ साम प्रयानी मनुता परी विमति देतीपाती है इसलिए इमी मनुवास्पिठित्र वन्य भौर कापत उकराम पर। सामान्यसे मोनीयमय वितिसक्षमसाम्परायके मन्तिम समय में होती इसपि सन अफ्न मौर सका प्रा एक समय । तवा भरपत्य पतिविमति भमकी मपेया मनात मान्त और मम्मोत्र भपेच मनादि-सान्त है। उत्तर महतियोश्री मपेक्षा मनोलयमोंके सिवा रोष व मस्तीपोतीबा रिपपिरिमठिमपान मोर उकापा एक समवामिप्याल प्रय पान मीर पीन पेरी भवन स्पतिविमधिमा मारि-मनत मैर मनादि-शान्ती इनकी बान विधिपणारे मन्तिम समयमें होती है इसलिए यह सपना । सम्पमतमोर सम्बम्मिम्मी मम स्पिति मी अपनी मामी परे मन्तिम समपमें होती है, इसलिए इनी मसम्म विविध बम मम मैर मनमा साविको बासठ सम्र प्रमाण है। भरण प्रनिदेय पाहेरही पो।। मरन्धानुम्दी विसनोबना प्रतिसिमिय इसकी मरम्प स्मिविणे भयाव-मनन्त भावि-सन्द और सादि-खरान विमसम पते । सनमें धारिखन्य मम्मम्म स्विमि पाव प्राममात है क्योति योजना हाने पर पुना ममम इसलिचोजना से ती मेर रकम कम मईपुर परिक्वनप्रमान, मोति विसंबोमनरेपार संबोजना होने पर इने पाठकबीच रतनसंधोक्नामको पा सम्मबमोसमायोवविवि मन्दिम विधि- अपको पतन समतोटी है मौर उसमें मम माता है इसलिए इसका पल मेर गका प्राममा प्रावध मापाप रिमति इसके पारेगमी यती र भमोरा मी प्रमाण नहीं रोग पानी मवरम्यविधिमाहि-समन्तभैर मनादि-सान्तमा । गधि पति मर्मगमोमें इसी पर मरनी मानी मिोपलानन पाप्तिमना चाहिए । पवार मित्र मरमर । परपस पर एप परिधिषियी रिमोशन मानसtim मदिन हममें उस धमिमी मम्वर-अमाप मोइनीस एकर मना स्पिनिक र पुना मर्मक पर हो जया मोर एपेनिशी परम परिभ्रमण खरोबोमनाभरसे सलिली मापस । M + + . - rar । 1 ( ५ ) उत्कृष्ट स्थितिफा जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त और उत्कृष्ट अन्तर अनन्त काल है। तथा इसको अनुत्लष्ट स्थिति कमसे कम एक समयके अन्तरसे और अधिकसे अधिक अन्तर्मुहर्तके अन्तरमे होती है, क्योंकि इसकी उत्कृष्ट स्थितिबन्धका जघन्य फाल एक समय और उत्कृष्ट फाल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिए इसफी अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है। उत्तर प्रहतियोकी अपेक्षा मिथ्यात्व और चारह कपायोंको उत्कृष्ट और अनुत्कृष्ट स्थितिका इसी प्रकार अन्तर काल जानना चाहिए । सम्यस्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वको उत्कृष्ट स्थिति अन्तर्मुहूर्त के अन्तरसे भी हो सकती है और उपार्ध पुनल परिवर्तनके अन्तरसे मी हो सकती है, इसलिए इनकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहर्त और उत्कृष्ट अन्तर उपार्ध- पुद्गल परिवर्तनप्रमाण कहा है। तथा इनकी उत्कृष्ट स्थितिफा फाल एफ समय होनेसे इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिका अन्तर एक समय होता है और जो जीव अर्धपुद्गल परिवर्तनके प्रारम्भमें और अन्त में इननी तता प्राप्त कर मध्यके उपार्धपुद्गलपरिवर्तन काल तक इनकी सत्चासे रहित होता है उसके उपापुद्गलपरिवर्तन प्रमाण अन्तर हो सकता है, इसलिए अनुत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर उक्तप्रमाण फहा है। अनन्तानु- बन्धीचतुष्कको उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर तथा अनुत्कृष्ट स्थितिमा नपन्य अन्तर एक समय मिथ्यात्वके समान घटित कर लेना चाहिए । तथा नो वेदकसम्यग्दृष्टि इनकी विसयोजना कर मध्यमें सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त होकर कुछ कम दो छयासठ सागर काल तक इनके मिना रहता है उसके इनफी अनुत्कृष्ट स्थितिका उक्त अन्तर देखा जाता है, इसलिए इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिका कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण उत्कृष्ट अन्तर कहा है। नी नोकपायोंकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर तथा अनुत्कृष्ट स्थितिका जघन्य अन्तर मिथ्यात्वके समान ही है। मान इनकी अनुत्कृट स्थितिके उत्कृष्ट अन्तरमें मेद है। बात यह है कि पाँच नोकपायोंका स्थितिनन्ध सोलह फपायोंके उत्कृष्ट स्थिति के समय भी सम्भव है, इसलिए इनको अनुत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर तो अन्तर्मुहूर्त बन जाता है पर चार नोकपायोंका वन्ध सोलह कपायोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धके समय सम्भव नहीं है, इसलिए इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर एक आवलि प्राप्त होता है। जघन्यकी अपेक्षा मोहनीय सामान्यको जयन्य स्थिति क्षपकश्रेणिके अन्तिम समय में प्राप्त होती है, इसलिए इसकी जघन्य और अजपन्य स्थितिका अन्तर काल नहीं है। इसी प्रकार मिथ्यात्व बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी जघन्य और अजघन्य स्थितिका अन्तर माल नहीं है। सम्यक्त्वकी जघन्य स्थितिका भी अन्तर काल नहीं है। इसकी अनघन्य स्थितिका अन्तर अनुत्कृष्ट के समान है। सम्यग्मिथ्यात्वको जघन्य स्थिति उद्वेलनाके समय और क्षपणाके समय होती है, इसलिए इसको जघन्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त कहा है, क्योंकि जो जीव इसकी उद्देलना फर के और दूसरे समयमें सम्यक्त्वके साथ पुन इसकी सत्ता प्राप्त कर अन्तर्मुहूर्त में इसकी क्षपणा करता है उसके यह अन्तर- काल बन जाता है । तथा इसका उत्कृष्ट अन्तर उपापुद्गल परिवर्तन प्रमाण है, क्योंकि वो परिवर्तनके प्रारम्भमें इसकी करके कालमें इसको सत्तासे रहित रहता है और उपार्ध पुद्गल परिवर्तनके अन्तमें पुन' इसकी सत्ता प्रास कर क्षपणा करता है उसके इसकी जघन्य स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर उपार्घपुद्गल परिवर्तनप्रमाण देखा जाता है । इसकी अनघन्य स्थितिका अन्तर अनुत्कृष्टके समान है यह स्पष्ट ही है । अनन्तानुबन्धी विसयोजना प्रकृति है, इसलिए इसकी जघन्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर उपाधं पुद्गलपरिवर्तन प्रमाण प्राप्त हो जाता है इसलिए वह उक्त प्रमाण कहा है । तथा इसकी विसयोजना होकर कम से कम अन्तर्मुहूर्त काल तक और अधिकसे अधिक कुछ कम दो छयासठ सागर काल तक इसका अभाव रहता है, इसलिए इसकी अजघन्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम दो छयासठ सागरप्रमाण कहा है। गति आदि मार्गणाओंमें अपने अपने स्वामित्वको जानकर इसी प्रकार यह अन्तरकाल घटित कर लेना चाहिए। भगविचय–ो उत्कृष्ट स्थितिवाले होते हैं वे अनुत्कृष्ट स्थितिवाले नहीं होते और जो अनुत्कृष्ट स्थितिवाले होते हैं वे उत्कृष्ट स्थितिवाले नहीं होते। इसी प्रकार जघन्य और अणघन्य स्थितिकी अपेक्षा ट- 4 पनर उपार्थ पुद्गल सत्ता प्रास मध्य देशची अनुतगत और अमन वास्ता सर्शन- मरपति का सर्वसामानस और अनुरा . S r- पासपी से वोकिएका पसरमा र संपरेनोस्रो पूर्व भार उता मा सिस से मना सम्पये और ममें न है उसमे उपाय नासिर सोनम से लिया। उसी TH मरोमात्र मौर राम मासिकाम मा Ratna मालीसा समAmit मौपा मपर अनना चापिए। इस मर्वपके मनुसार १ माणित सब को मोहनापती ग्कार सितिसे व पित् गार वीर मोहनीर उकर लिपिसे रवि पर एक बीच उकर पवित्रम साचित् बहुव बीव मोहनीयकी उका स्पितिसे रहित । मौर पर कम उका परिवाहे से तीन माहै। मनुका पतिमी अपेय । प्राचित् सब बीज मोहनीय प्रेमनुकर स्थितिय ६१माचित् बहुत बार मोमोपी मनुका रिमधिमा मौर एक बार मनुका स्पिविसे रवि पावित पात को मोहनीयको मनुका स्पिठिबाछे और बात बोल मनुका स्पतिसे रमितहीन मंग होते हैं। उन २८ प्रतियोगी मपेषा पेही मापनने चाहिए। मोनास समय वय मर मवपल्प स्पिति मपेक्षा मीमो उक्ता और मनुक्का स्थविधीमपेच तीन दाल मारकोसी पर तीन तीन मंग बनने चाहिए । २८ उतर प्रालियों अपेच मी इसी मधर मा परितकर सेने पारिए। आप पहलमो का स्थविधी मसा तीन मा कोरे समय पतिकी पेशा तीन माह बनने पाहिए मौर जो मनुका स्पिरिक मपेशा तीन मा देसर मसम्म स्पति मपेक्षा तीन मापने चाहिए। मति मादि मार्गमामों में मी मपनी मपनी विशेषताकोचनमपे माहेमाने चाहिए। मागाभा-मोदनीय सामन्पाली मशा उत्तम स्थितिमा बीच मनसा मागणमान मार मनात महिला की ममत मागममाम । इसी समर मोरनाली व्यास उत्तर प्रतियों मपंचा मम्माम पन्ना चाहिए। समस्त भौर सम्पम्मिापासी अपेडा उकर स्पितिवारे पर मरम्पक माम्पमा और मनुकस विपिना की भसम्पत पुमागप्रमाण । मोहनीव सामान्य और उत्तर प्रकृतियों में मपेशा अपच और मबपन्य स्थितिमात्र इसी प्रपर मागामाम है। भर्मात् बाप पति- पावे मनव मागप्रमन मोर मपन्य विविवारे मनन्त बहुमायणमान वा सम्मान मोर सम्बामप्पावधी मपेशा बनस्पतिको बील मला मागप्रमाण मोर मचान्स लिविवाहे बाल मसम्मान हुमागप्रय है। गति मादि मनपाओं मपनी मानी समा भरिको पानामा मपामाग परित करना चाहिए। परिमाण -मोरनार सामालकी भपेय मा स्पिनिपके बाल भात और प्रमुका चिदिका बीच मन्त। सो प्रचार पीस उतर प्राविकी मपेचासे या परिमाय चानना चाहिए । सम्पाव और सम्पमियत्व मन और मनुका वितिबारे बीच मसमपात है। मोरनीय सामान्यकी मफेवा पाप चितिशबीर संपाव मोर मान स्पितिषसे बील मनात बस उत्तर प्राधियौली भय इसी प्रभर परिमाण चानन पहिए | हम्ममवती गोता पम्प विविधासे बीत समाव और भवाम्म स्थितियाले भाग परमात है। तय समग्निप्पाली पप और मक्पस स्थितिमातेर मसगाव । यति माहि मर्यप्रमों में मरने सपने परिमाण और त्वमिराको चमकर नापति कर देना चाहिए। मंत्र--म्पनीमची उत्तर और पाय स्पिलिमेको मामा मागप्रमाम मोर मनुनामबन मितिमा प्रवेष समान है। मिप्पल सोता या भौर मोनोपयगोत्री मपेश इसी प्रकार पेषबनना चाहिए। सम्मान और सम्मपाल मपेषा नका, ममुक्कर कन्य मेर मरकस स्थितियामेन पेनगेरे मस्सा मामा है। विभाी मर्गपामों में अपने सपने स्वामिषधमकर यह परिवाना चाहिए । स्परीन पोरनीय समय पेसा ठत्र लिविवान मन स्थान से मचा मामप्रमाण निसपरिमफेवा प्रतीत पान बसनाले म माठ को और मापनमन मेर मरमाथि पर मा बस्नालेमतेपको बाबा माफ्यमान है। तवा मनुका विवरण सपमा सम है। पर क्रीमो मया मियाल पेमप्यार और मोमोमा यता मौर मनुका विमेन मी सर्पन है। मीनिक्योरमौर पुष्पोरी म्हालिदि- मरा। मी मरम्वार र नार mtोन सोतो marati परिम पस मा पुरा राम पर है।मgreat मरिसर देखर M Aprrn 1 और - - दर ( ७ ) वालोंका यह स्पर्शन त्रसनालीके कुछ कम आठ बटे चौदह भागप्रमाण है । तथा अन्य आचार्यों के अभिप्रायसे यह त्रसनालीके कुछ कम बारह बटे चौदह भागप्रमाण है। कारणका निर्देश 'ठ ३६८ फे विशेषार्थ में फिया है। सम्यक्त्व और मम्गग्मिथ्यात्वको उत्कृष्ट स्थिति वेटकमम्यक्त्वको प्राप्तिके प्रथम समयमें मम्मर है और ऐसे जीवोंका स्पर्शन प्रसनालीके कुछ कम आठ रटे चौदह भागप्रमाण है, इसलिए यह सर्शन उक्त प्रमाण कहा है। इस अपेमासे वर्तमान स्पर्शन लोकके असरण्यातवें भागप्रमाण है यह स्पष्ट दी है। इनको अनुत्कृष्ट स्थितियालोका उत्कृष्ट के समान स्पर्मन तो बन ही जाता है। साथ ही मारणान्तिक और उपपादकी अपेक्षा सर्वलोक प्रमाण स्पर्शन भी बन जाता है इसलिए यह उत्तप्रमाण कहा है। मोहनीयको गधन्य स्थिति क्षपकश्रेणिमे प्राप्त होती है, इसलिए इसकी जान्य स्थितिवालों का लोकके अमरूपातर भागप्रमाण गर्शन है और मोहनीय की सत्तावाले जीव सर्व लोकम पाये जाते हैं, इसलिए इसकी अजयन्य स्थितिवागत सर्वलोक प्रमाण स्पर्शन कहा है। उत्तर प्रकृतियोंमें मिथ्यात्व, पारद कपाय और नौ नोपार्योकी अपेक्षा इसी प्रकार स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए । सम्यक्त्वकी जघन्य स्थितिवालोंका सर्शन क्षेत्र के ममान और अगधन्य स्थितिवालोंका स्पर्शन अपने अनुत्कृष्टके समान है यह स्पष्ट ही है । तथा सम्यग्मिध्यात्तके जघन्य और अजघन्य स्थितिवालोका स्पर्शन अनुत्कृष्टके समान है यह भी पट है। अनन्तानुबन्धीचतुप्पसी जघन्य स्थिति देवोंके विहारादिके समय भी सम्भव है इसलिए इसवाले जीवोंका पनि वर्तमानको अपेमा लोकके अमख्यात भागप्रमाण और अतीतकी अपेक्षा प्रसनालीके कुछ कम आट घटे चौदह भागप्रमाण पहा है। इसके अजघन्य स्थितिवालोंका स्पर्शन सर्वलोकप्रमाण है यह सष्ट ही है। गति आदि मार्गणाओम अपनी अपनी विशेषताको मानकर इसी प्रकार स्पर्शन घटित कर लेना चाहिए । काल-नाना जीव मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका एक समय बन्ध करके दूसरे समयमें न फरें यह सम्भव है और अधिकसे अधिक पल्यके असख्यातवें भागप्रमाण काल तक परते रहें. यह मी मम्भव है, इसलिए मोहनीयकी उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल पल्पके असरख्यात भाग- प्रमाण कहा है । तथा इसको अनुत्कृष्ट स्थितिका काल सर्वदा है यह स्पष्ट ही है। मोहनीयको छन्नीस उत्तर- प्रकृतियोंकी अपेक्षा यह काल इसी प्रकार जानना चाहिए। मात्र सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वको उत्कृष्ट स्थितिका जघन्य काल एक समय है और उत्कृष्ट काल आवलिके असख्यात भागप्रमाण है, क्योंकि मोहनीय- की उत्कृष्ट स्थितिवाले नीव कमसे कम एक समय तक और अधिकसे अधिक आवलिके असख्यात भागप्रमाण फाल तक वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त होते हैं । तथा इनको अनुत्कृष्ट स्थितिवाओंका काल सर्पदा है यह स्पष्ट ही है । मोहनीयकी नघन्य स्थितिवालोंका नघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल सख्यात समय है, क्योंकि क्षपकश्रेणिकी प्राप्तिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल सख्यात समय है। तथा इसकी अनघन्य स्थितिवालोंका काल सर्वदा है । मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, बारह फपाय और तीन वेदवाले जीवोंका यह काल इसी प्रकार है । सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुसन्धी चतुष्क को जघन्य स्थितिवालांका नपन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असख्यातवें भागप्रमाण है। कारण स्पष्ट है। इनकी अनघन्य स्थितिवालोंका काल सर्वदा है। छह नोकषायोंकी जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य भौर उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि एक स्थितिकाण्डकघातमें इतना काल लगता है और उत्कृष्ट काल सर्वदा है। गति आदि मार्गणाओंमें अपनी भपनी विशेषता जानकर यह काल घटित कर लेना चाहिए । अन्तर-मोहनीय सामान्य और अहाईस उत्तर प्रकृतियोंकी अपेक्षा उत्कृष्ट स्थितिवालोंका जघन्य अन्तर एक समय है, क्योंकि एक समय के अन्तरसे उत्कृष्ट स्थितिको प्राप्ति सम्भव है और उत्कृष्ट अन्तर अगुलके असख्यातवें भागप्रमाण है, क्योंकि उत्कृष्ट स्थितिबन्धके बाद उसका पुन बन्ध होनेमें अधिकसे अधिक इतना अन्तरफाल प्राप्त होता है। इनकी अनुत्कृष्ट स्थितिवालोंका अन्तरफाल नहीं है यह स्पष्ट ही है। मोहनीयको जघन्य स्थितिवालोंका जघन्य अन्तर एक समय है और उत्कृष्ट अन्तर छह महीना है। अनघन्य स्थितिवालोंका अन्तरकाल नहीं है। मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, आठ कषाय और छह नोकषायोंकी अपेक्षा यह अन्तरकाल इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिए । सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुवन्धीचतुष्ककी जघन्य स्थिति पा 1. म न मद। - सा है। मदन्नौर सतत मारे स्मिता सात घरास हितोमा उदष्ट रिपतिका मुसार पर बानना चाहिए। भाग्य. अपना एक ममा सिसमसमा मेह गोषम बना हम्स सामीर परम भारतमरतिमे उम्म 140 मोसम भराधा मेरमा सरदेस मेरे मन दर मरिसोलर मासस मन मनोमान मी मधमा गमन मोमा समय बामपन्य मान एक समय मौर उका मन्त्र स्थापिक चौबीस दिनपत है, मोति सम्पत्यो पास होनेवायप्रमौर सम्पमसे मिप्यास्त्रमें बानेपाछे पीरोन उता मम साभिक पोलीस दिन-रात इसलिए म उहा मतर उठ समान मादीन सम्पन्न मैर पुरुषमेकी मपन्य स्थितिमात्र मान्य मन्त्र एक समर है और उहा मार साविक एक वर्प है क्योकिइन मालिक उसे इतने प्रमत्मसे सपपिपर मायण करना सम्मय है।मेमसम्मानबपन्न स्विटियान परममतर एक समोर उहा मरममहीमारिपकमिश्नपत्र भर एक समप और उका मतर म महीना है। मोमेद और सम्वेदकी नमन रिपरिणाम पम्म मन्स एक समन भौर उन मतर मात, पोटामग्रमोन इन्ने प्रो अन्तरले सपथमेपि पर अणमा सम्मष म सब महविरोधी मवन्य स्थिदिवान मास प्रमही है पासा। मति मादि मार्गमामों में मानी मानी विशेषता बनम कामावरमा हे मना चाहिए। सम्निकर-मिपात उकास्वविबाल सम्ममत्व मेर सम्ममिपाल्ती सच्य होती मी है भौर मरी मी होती । गरि मनादि मिम्माल बीत गनिने इन दोनोंदी गोना र उनके धनी , रोय पोतोकोठीवन सथ वो उनकी इमली पति नियमस मनुक्कर होगी मोस मिस्तकी उका स्थिति मिपाल गुणस्थानमें होगी और हमारे समा Rमति मेरमसम्पकत्वको मासिक प्रथम समसमें रोची। इसलिए मिप्यती सम्म चितिचाते बीलोन पामो सका स्थितिध नियब निनकी मनुका स्पति मो मतमहर्व कम भनी उकर स्थिति और एक पित होण। प्ररण पानी पिली कि धिम नाप तोम्नप्रसपी मन्तिम प्रतिम चितम होते रखने वाली उकास्पतिवान रोनों पारियों मनुका पनि सन्नि मिस नहीं हारे । मिप्यत्की कर चिरिबारे पार होनापोली तका स्पिति माहोली और मनुका स्वति मी होती है। यदि मिप्यारी सका विशाल प्रमय सोन पयोधी या विविध काममोको उतम चिति लीमन्वया मनुका स्थिति होतीीको मपनी उका स्वविध पेटा कमसे कम एक समप और मनिासे भपिक पपके मरम्पको मापमान कम होती है। मीर, पुष्पर हास्म और गिनी नियमसे मनुका पति हावी है, मोकि उस समय इनार नहीं पता मो भपनी उकर स्थिति मपेक्षा कमसे कम मम कम बाजी भोर प्रभर उमपेज कम ऐदी It m मा स्पति मतमामा ममाग तक पास हो सती है। मिप्पारकला स्का स्वतिके समय शेष पाँच नोभ्यायोंकी स्थिति स्कर मी होती है और मका मी होती है। पति रस समय सोम पायो का स्पिकिन कप ऐर एक भापति कम सत्र पाँच पोनपापों संक्रमण हो रहतमा पति होगी। ममय मनुका पतिली बोमपमा का रिस्पतिकी पेक्षा एक समय कमसेकर पत्रमसंस्मनी माग कम बीस मामी खर तक सम्ममइस प्रपर मिपावकी उकास्थिति प्रमान निर्यविचार किया। सम्पपलम्का पिक्निाठो मिम्पको स्थिति निमसे मुकर ही बो भरनी ठकर स्थितिकी परेषा मन्तम मम होती है । उस समय सम्ममिप्यानी चिीि नियमसे उतर ही है। प्ररण स्पा है। समाप और नी नासमायोनी पनि निकमसे मकर सीबोमानी उका विविध मपेवा मा मो टेन पालो मसम्पादनं ममाप्रमाण कमजतो है । सम्बग्निपरी उता विडियो मुलपासी प्रचार समिकम विस चानना चाहिए। मिस्माकी अतर स्विविये मुस के पहरे सलिममापे । सो प्रसार सोम पो गत पसिनी मपेसा सविकर्म पानम पाहिए। मेरी उमा बितिचा मिप्यमय पनि निगमसे मनुवा होमो मम्मो मकाभी मपेचा एक माप मोर पल मसममा मापसमागम की। सम्बाल और सम्पमि सोपाल पास मरममिली उमा कामपनीमा Mut नामा सरासस TA मा tar कमबाट मोहम पारमा 7 - मन. । . म ति 1 उगवत -- 4 रा 3 भार... । 1 दहा- मान (९) ध्यात्वको स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्ट की अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त कमसे लेकर एक स्थिति तक होती है। मात्र इनको अन्तिम नघन्य स्थितिफाण्डककी अन्तिम फालिको इन सनिकर्प विकल्पमिसे कम कर देना चाहिए । सोलह कपायोंकी नियमसे अनुत्कृष्ट स्थिति होती है जो अपनी उत्कृष्ट की अपेक्षा एक समय कमसे लेकर एक आवलि कम तक होती है। पुरुपवेदकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अन्त- मुहूर्त कमसे लेकर अन्त.कोडाकोडी सागर तक होती है। हास्य और रतिको स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। स्त्रीवेदके बन्धके समय हास्य और रतिका बन्ध होता है तो उत्कृष्ट होती है, अन्यथा अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर अन्त.फोड़ाफोही सागर तक होती है। अरति और गोककी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। स्त्रीवेदके बन्धके समय इनका वन्म होता है तो उत्कृष्ट होती है, अन्यथा अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यका असख्याता मागकम बीस कोडाकोडी सागर तक होती है। नपुसकवेदको स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो एक समय कमसे लेकर पल्यका असख्यातवा भाग कम बीस फोडाफोडी सागर तक होती है । भय और जुगुप्साको स्थिति नियमसे उत्कृष्ट होती है। पुरुपवेटकी उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य फरके इसी प्रकार सन्निकर्ष जानना चाहिए । हास्य और रतिकी उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य परके भी इसी प्रकार सनिकर्ष जानना चाहिए । मात्र इसके स्त्रीवेट और पुरुषवेदको अनुत्कृष्ट स्थिति अपनी उत्कृष्ट स्थितिकी अपेक्षा एक समय कम आदि न होकर अन्तर्मुहूर्त आदि कम होती है। फारणकी जानकारीके लिए पृष्ठ ४७३ देखो। नपुसकवेदकी उत्कृष्ट स्थितिवाले जीवके मिथ्या वकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। अनुत्कृष्ट स्थिति अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यके असख्यात मागतक कम होती है। सम्यक्त्व और सम्याग्मध्यावत्की स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है, जो अन्तर्मुहूर्त कमसे लेकर एक स्थिति तक होती है। सोलह कषायोंकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। अनुत्कृष्ट स्थिति एक समय कमसे लेकर एक आवलि कम तक होती है । स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी स्थिति नियमसे अनुत्कृष्ट होती है जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा अन्तर्मुहूर्त कमसे लेकर अन्त कोडाकोडी सागर तक होती है । हास्य और रतिकी स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है जो अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर अन्त कोड़ाकोडी सागर तक होती है। अरति और शोकको स्थिति उत्कृष्ट भी होती है और अनुत्कृष्ट भी होती है। अनु- त्कृष्ट स्थिति अपनी उत्कृष्टकी अपेक्षा एक समय कमसे लेकर पल्यका असख्याता मागकम वीस फोडाकोडी सागर तक होती है। भय और जुगुप्साकी स्थिति नियमसे उत्कृष्ट होती है। इसी प्रकार अरति, शोक, भय और जुगुप्साको उत्कृष्ट स्थितिको मुख्य करके सन्निकर्ष जानना चाहिए। यहाँ जो विशेपता है उसे ४८३ पृष्ठसे जान लेनी चाहिए। मिथ्यात्वकी जघन्य स्थितिवालेके अनन्तानुबन्धीचतुष्कका सत्त्व नहीं होता, क्योंकि दर्शनमोहनीयकी क्षपणाके समय मिथ्यात्वकी नघन्य स्थिति होती है और अनन्तानुबन्धीकी इससे पूर्व विसयोजना हो जाती है । शेष फर्मों की स्थिति नियमसे अजघन्य असख्यातगुणी अधिक होती है। सम्यक् वकी जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचारकी सत्ता नहीं होती। शेष कर्मों की अनघन्य असख्यातगुणी स्थिति होती है। सम्पग्मिथ्यात्वकी जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व, सम्यक्त्व और अनन्वानुबन्धीचारको सत्ता है भी और नहीं भी है। उद्वेलनाके समयसम्यग्मिथ्या वको जघन्य स्थितिवाले जीवके सम्यक्त्वकी सत्ता नहीं है शेषकी है और क्षपणाके समय सम्यग्मिध्यात्वकी जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धीचारकी सत्ता नहीं होती, सम्यक्त्वकी होती है । जब इनकी सत्ता होती है तो इनकी नियमसे अनघन्य असख्यातगुणी होती है । इन छह प्रकृतियोंके सिवा शेष प्रकृतियोंकी नियमसे अजघन्य असख्यातगुणी स्थिति होती है। अनन्तानुबन्धी क्रोधकी जघन्य स्थितिवालेके मिथ्यात्व आदि सब प्रकृतियोंकी नियमसे अनघन्य असख्यातगुणी स्थिति होती है । मात्र अनन्तानुबन्धी मान आदि तीनकी जघन्य स्थिति होती है। इसी प्रकार 411 चादर वाय दिनन्नयने ।। दरखाकानी परनिन, दि को समत तान पवार मते मी रवितानोम ऐ मन मा मोजत म मसावीस देपलि सामवीर ऐया ऐयशाली, सय ग मनात +rtोमोम ऐ मया मंच राती है। कोर सिी यमगरम मोसा सप्रेस मो मेर उजारिते मर्ममा है। मानधनुरूपी मान मारिवनको पाल स्पिति श्री मुरवा सम्निकर्ष बनना चाहिए। मापमानावरण फोरकी बमव मिवियाग्नेचार संपन्न और नौ मोसमायोपी निमसे मवमव मसल्पगुग्गी स्पिति हो है। मप्पास्मानारम मान मारि तीन मोर मस्यामानावरम पम निपासे बसम्म स्पिति हावी। इसी प्रपर इन सात पायो पात स्थितिकी मुस्वासे सन्निा मनना चाहिए। पारेर परम्प स्पितिवार समत मोजमाप मौर तीन संमम्मोको नियमसे भरपन्न सल्लागुणा स्पिति होती है और गेमसम्मानकी मबपन्य मरम्पगुमो रिपति पदमपुंसकमेलम्प स्पितिवार इसी प्रपर पनि बन्न चाहिए । पुस्योरी बसम्म स्पिविषालेरे वीन संमानोको मापन समपात गुपी पति धीमेर मेम पनी भयमन मसंयमावगुणी स्पिति होती है। एस्पी परम्म स्वितेबाक सीन समन भौर पुरपमेरी मबपन्य संभावगुणी स्पिति वी और प्रेमसम्मको ममपन्य मम्ममात्गुणी मुमति होग।पा पार मोरपायों पर स्पिति रोती है। इसी प्रभर पाप मोरयारोपपन्य स्पिविधी मुस्पतासे सन्निपानना चाहिए। प्रोपसम्मान वरप स्पिरिधारेके दो सम्मान भवन समावगुणी मौर गेमसम्मम्मकी मपन्य मरम्गुनी स्पिति वीरे। मनसम्बनती बम स्विपिनाते मापासम्मम्मी भवपत्प सम्पायगुणी और भेमठनम्न मवफाप सम्पावगुणी स्पिति दी है। मसलन पम्प पति- यो मेमसम्मान भरपन्य माम्सागुमी स्थिति होतीरामेमानश्री बपन्य विविवाहेमन्प प्रहतियानी होगी। माष-मूक मोर उपर मानोश्री मपेक्षा सर्वत्र मौरमिक मान। मात्पपात-सामम्पसे मोनायकी उकर स्विविमाठे बोल मोरे पनि उकर स्वतिम पपवेत्रिय पांस मिप्यारी नसे भगुता स्पिदिया भरगुपे भरण सा सपने मपेश मेनोपपन्य स्पिनियो सबसे पाले पनि कामसाम्मपपिक के मन्तिम समपमें मोदमोपी पप स्पति पानसे मवमाप रिमविवान मनन्तगुरचर महदिपोती भपेषा यहां मिति मारपालन विचार नपा बिसन्म शान महादसे हो समय, इसपिरमरपा पी। इस प्रभर स ममुयोमबाप्रमाभप से स्पतितिमहिना विचार करके मागे मुबगर, परनिक्षेप 4 और वितिसकर्मस्वामन मविरोध मापन पर विचार के स्पितिसमडि समान होती है। इन मविप्रकी विशेष बननले लिए मूल्याम्पका साम्पमा मापस्पक। मी मेरमा मम मालेमस कालिम मलेममायोजन सरसा माम मानदेय परमीम रामायेtan प्रम। IHAR फोरममा मातरमन FRसमीप मंसिरबासमत्व (Ayana माणसाला 1 में + निपत PHP भाग परिपके १ प्रता तान बारमारे बपन्य “त्या मियत शेष कर्म सम्परत कर १०-१४ | उच्चारणाके अनुसार भागाभाग अतिर मेर नपुसच्चे, ----- विषय-सूची भुजगार आदिके अर्थपद कहनेकी प्रतिज्ञा १ १ | अनन्तानुबन्धीके अवक्तव्यका काल २३-२४ अर्थपद शब्दका अर्थ सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजगारविभक्तिका अर्थपद २ मुजगार आदिका काल २४-२६ अल्पतरविभक्तिका अर्थपद २ उच्चारणाके अनुसार कालका विचार २६-४२ अवस्थितविभक्तिका अर्थपद एक जीवकी अपेक्षा अन्तर ४२-५० अवक्तव्यविभक्तिका अर्थपद ३ मिथ्यात्व ४२-४३ भुजगारके १३ अनुयोगद्वार ३-१०५ शेप कर्म उञ्चारणाके अनुसार अन्तर ४३-५० समुत्कीर्तना ४-५ नाना जीवोकी अपेक्षा भगविचय स्वामित्व ६-२४ मिथ्यात्व, सोलह कपाय और मिथ्यात्व ६ नौ नोकपाय ५०-५१ सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ७-९ सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ९-१० उच्चारणाके अनुसार भगविचय ५१-५५ उच्चारणाके अनुसार स्वामित्व ५५-५७ सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वके उच्चारणाके अनुसार परिमाण ५७-५९ विषयमें दो उम्चारणाओंके मतोंका उच्चारणाके अनुसार क्षेत्र ५९-६० निर्देश १२-२३ उच्चारणाके ६०-६६ एक जीवकी अपेक्षा काल १४-४२ नाना जीवोंकी अपेक्षा काल ६७-७३ मिथ्यात्व १४-२० सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व ६७-६८ भुजगारविमक्तिके चार समय १५ शेष कर्म ६८ भिन्न-भिन्न स्थितिबन्धके अनन्तानुबन्धीका अवक्तव्यकाल ६८-६९ उच्चारणाके अनुसार काल ६९-७३ विचार १६-१७ नाना जीवोंकी अपेक्षा अन्तर ७४-८२ स्थितिबन्धाध्यवसानस्थानोंके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व परिणमनकालका विचार १७-१८ / शेष कर्म सोलह कषाय और नौ नोकषाय २०-२३ | अनन्तानुबन्धीके अवक्तव्यका अन्तर सोलह कषायोंके भुजगारके १९ उच्चारणाके अनुसार अन्तर ७८-८२ समयोंका विचार २०-२१ उच्चारणाके अनुसार भाव ८२-८३ नौ नोकषायोंके भुजगारके १७ सन्निकर्ष ८३-९५ समयोंका विचार २१ मिथ्यात्वकी मुख्यतासे ८३-८४ स्त्रीवेद आदिके अवस्थितका शेषके विषयमें जाननेको सूचना अन्तर्मुहूर्त काल कहाँ किस व उसका व्याख्यान ८४-९५ प्रकार प्राप्त होता है इसका विचार २३-२३ अल्पबहुत्व ९५-१०५ और तुगमा अनुसार स्पर्शन सम्यक्त्व मोर उभारणा सत्सवहत्व उपन्य का च्चारणाके कारणभूत सक्लेशपरिणामोंका यात वृद्धिके १३ ॥ प्रतिज्ञा ७७ ७७ वृद्धिके दो भेद स्वस्थानद्धि परस्थानमृद्धि स्वस्थानवृद्धिका कथन परस्थानदि -- 4 " शपायास र सममिमालो गरिमा मनुसर पर AIR RHR बिरामदर HR १६/प में अनुसार मात्र मोहा मीर - मोयना और १९०५ | प धर्म " . मिप्पाव ९५-९७ ) स्मामहानिप्ररूपणा बारापाप मोर नो नोकपाव ९. मिप्यावकी कितनो पसियां मौर जितनी सम्पावभीर सम्पम्मिप्यास्व ९५-१०२ रानियां होती रे इसका निर्देछ १४०-१४१ भन्वानुबन्पी चतुष्क १०२ सेप कर्मों की प्रक्रिया भौर हानियां १४१-१५१ पारणाके भनुसार मत्पपात १०२-१०५ बरणारे मनुसार समुस्कीतना १५१-११० पदनिक्षेपके ३ मनुयोगदार १०५-११७ स्वामिल १६०-१६३ प्रब्दिा १०५ एकबोषकी भपेक्षा का १९४-१९० दीन मनुयोगमार्गकि नाम १८५१०६ मिप्यात्व १६५-१६९ सवारणाके भनुसार समुत्तीवना १६ मामय भीर पायप्रामवमें १०६ | मवमेषका निर्देश उपन्य मारणाभनुसार स्वामित्व १००-११० उरचारमा अनुसार कार १६९-१९० १००-१०९ | एक बीवी मपेक्षा मन्दर १९१-२२१ उपम्प मिप्याल १९१-१९४ हतारमरपाल मिम्पाल ११०-१११ सचारण मनुसारमन्चर १९४२२१ सम्पबल मौर सम्पम्मिम्बावरे मंगविषय २२२-२२३ भतिरिकमेपकर्म २२५-२२८ मपुंसफोर, भरवि, शोक, मय परिमाण २२८-२३० क्षेत्र सम्परतत भीर सम्पग्मिम्मान स्पसेम २१२-२५० धारणाके मनुसार मकर २५१-२६ मम्पपल २६०-२७४ २७४ पारणा भनुसार अपम्प भत्सवात २०४-११९ ११६-११-मिप्यात २०४-२८८ पदिफे १३ मनुयोगशार ११७-२१९ मारपार मौर मौ नोपाय २८८-२८९ प्रविना सम्पबत्तमीर सभ्यग्मिच्याच २८९-३२ पहिलेदो मेव भौर पनका विचार ११८-१५९ मनन्तानुकम्पीचतुष्क स्वस्थानवृति मारणारे मनुसार मापात १९८१२ परथानाद्धि १२१ स्पिविसकर्मस्पान २१९-३३६ सम्पामानिकी निरम्वर हामिका स्विविसलमत्पादोभाषिकार १२१-१५४| प्ररूपमा परस्थानदि १५५-१२५ मापवस्व २२९-३११ . ते सम्ममपात - मागामाग और मुगुप्सा " " अनुसार पर मनुधार मायमर अनुसार परमान अनुमार पत्र अनुसार स्न पक्षा र समम्मिमात P " माव मनुसम्म पाकम सम्मम्मम्ममार मामाचम्पप्रभास अनुमार पर रमजानन सुचा

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माचारवी बिनचना:
नाम भवन मयर
घोष प्रतिष्ठान
भी भाचार्य विनयरामान मपार ययपुर
सिरि-बावसहाइरिमपिराप-पुणिमुपसममिदं
सिरि-भगवंतगुणहरमडारमोवइट्ट
क सा य पाहुडं
सिरि-वीरसेणाइरियविरइया टीका
जयघवला
उपरपपरिडिदिविची नाम निरिमो धत्वारिपारो
•जे भुजगार अप्पवर-अवष्ठिव-भवत्तम्पया तेसिमपदं ।
१ किमापदं माम! सममार-अप्पर भवधिपचमपार्य सम्पद परवेमि
पि मपिद होति । किमई पुरबागपासस्सस्स एबमारबिसमो पोहो सोष
म सप्पम्बदि पि तदुप्पापना एपदे ।
कमर वो स्त्रपार, अल्पवर, बास्क्ति और माझम्प पद उनका
बर्षपद से है।
१ऐश-नामपए से क्या वात्पर्य है।
समावान-मुबगाय मापवर, मवस्थित मौर मममममनो खल्म से परे है
पर इसका वारपर्य है।
शंग-मुबगार मावि तस्स किसमिसे कहते है?
समापान-मिममि मुझगार भावि पाशा स्वरूप नहीं बामा ने मुमगार विषयक
बाम एसपूर्वक नदी मपम होता है मत मुनगापदि विपपा पानो सनपूर्वक मत्पन मेरे
लिये नोसरमा बम परवे ।।
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होता है। 1 २ गा०२९] 04 * ६४, रोदिन पर बमा ते * एदेश ६६. ६७.. विभक्तियों होता होता है। *बो जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ * जत्तियाओ अस्सि समए हिदिविहत्तीओ उस्सकाविदे भणंतर- विदिते समए अप्पदरानो बहुदरविहत्तिो एसो भुजगारविहत्तिो । २. 'अस्सि' समए अस्मिन् वर्तमानसमये 'जतियाओ' यावन्त्यः 'द्विदिविहत्तीओ' स्थितिविभक्तयः स्थितिविकल्पाः इति यावत्। 'उस्सक्कापिदे तासूत्कर्षितासु वद्धितासु इत्यर्थः। 'अणंतरविदिक्कते समए' अनन्तरव्यतिक्रान्ते समये । अप्पदराओ अल्पतराः स्थितयो यदि भवन्ति । बहुदरविहत्तिओ स बहुतरस्थिति विकल्पो जीवः । एसो भुजगारविहतिओ । स एप जीवो मुजगारविभक्तिः। अणंतरादीदद्विदीहिंतो जदि वट्टमाणसमए पहुआओ द्विदीओ बंधदि तो भुजगारविहत्तिओ ति मणिदं होदि । * ओसकाविदे षहुदराम्रो विहत्तीओ एसो अप्पदरविहत्तिो । $ ३. 'बहुदराओ विहत्तीओ' अनन्तरव्यतिक्रान्ते समये बहुस्थितिविकल्पेषु व्यवस्थि. तेषु 'ओसकाविदे' वर्तमानसमये स्थितिकांडघातेन अधास्थितिगलनेन वा अपकर्षितेषु । एसो अप्पदरविहत्तिओ एषः अल्पतरविमक्तिकः । * श्रोसकाविदे [ उस्सकाविदे वा] तत्तियाओ चेव विहत्तीओ एसो अवद्विदविहत्तिो। ४. ओसक्काविदे उस्सक्काविदे वा जदि तचियाओ तचियानो चेव हिदिवंधवसेण * इस समय में जितनी स्थितिविमक्तियां हैं उनके, अनन्तर व्यतीत हुए समयमें अल्पतर स्पितिविमक्तियोंको उत्कर्षित करके, बांधने पर वह बहुतरविभक्तिवाला जीव मुजगारस्थितिविमक्तिवाला होता है। ६२ 'अस्सिं समए' का अर्थ 'इस वर्तमान समयमें है। 'जाचियाओ' का अर्थ 'जितनी' है। 'हिदिविहत्तीओ' का अर्थ स्थितिविभक्तियाँ अर्थात् स्थितिविकल्प है। 'उस्सकाविदे' का अर्थ 'उनके उत्कर्षित करने पर अर्थात् बढ़ाने पर है। 'अणतरविदिक्कते समए' का अर्थ 'अनन्तर व्यतीत हुए समयमें' है । 'अप्पदराओ'अर्थात् 'अल्पतर स्थितियाँ' यदि होती हैं । तो वह बहुदरविहत्तिओ' अर्थात् ‘बहुत स्थितिविकल्पवाला जीव' है। एसो भुजगारविहत्तिओ' अर्थात् यह भुजगारविभक्ति- वाला जीव है । इसका यह तात्पर्य है कि अनन्तर अतीत समयसे यदि वर्तमान समयमें जीव बहुत स्थितियोंका बन्ध करता है तो वह भुजगारविभक्तिवाला कहा जाता है। * जो अनन्तर अतीत समयमें बहुतर स्थितिविमक्तियों में रहकर पुन: उन्हें अपकर्षित करके इस वर्तमान समयमें अल्पतर स्थितिविभक्तियोंको प्राप्त होगया वह जीव अल्पतर स्थितिविभक्तिवाला होता है। $३ 'बहुदरामओ विहत्तीओ' अर्थात् जो अनन्तर अतीत हुए समयमें बहुत स्थितिविकल्पोमें रहा वह जब 'ओसक्काविदे' अर्थात् इस वर्तमान समयमें स्थितिकाण्डकघात या अधस्थिति- गलनाके द्वारा वहुत स्थितियोंको घटाकर अल्पतर स्थितिविभक्ति कर देता है तब वह जीव अल्पतर स्थितिविभक्तवाला होता है। * अपकर्षित करने पर या उत्कर्षित करने पर यदि उतनी ही स्थितियां रहें तो वह जीव अवस्थितविभक्तिवाला होता है। ६४. अपकर्षित करने पर या उत्कर्षित करने पर यदि स्थितिबन्धके कारण उतनी ही स्थिति- ६५ नो स विमच्छिवाला अवस्थानका नाम और अवस्थान विना पाया जान विकल्प है ५५ 1 शब्दके द्वारा मी . इसके अनुसार अल्प स्थिति है C करता है तो वह अधिक स्थिति स्थिति कर लेता स्थितिकी - स्थिति बनी निसत्त्वकर्मवाळा कहा जाता है। विचार दिल्या M 17 *इस ६६ म ७ 1.

[विमितिक। उस्समापदे मातर . नुमगारविनिम्। पारन्या वरितिभावी सर्विवाद परिसरात कोपमा सियो पर । एसो सामरपिपिये। दि समापसपर गमाशे गा० २२] हिदिविहीर वरपथरिमुखगारसमुकिमा हिदिमिरचीमो हाठि को एसो भपहिरविहरियो पाम । अपिहत्तिपायो पिहतियामो एसो प्रवत्तविहतियो । लिविम्मियो होग पनि स संवकम्मिमो होदि वो भवचमाहिरियो होकि बाहिणिमहापालममावारो। सदमानो वि पुर्व संतकम्मस्स ममावादो पुम्बिन संतसम्ममवेस्सिप हिदपहिराषिपाबा मग विणा संमयो दिदि, विरोहारो। वहा वे भविश्य मबचन सिर मया मवमवसरम पि वस्सामाचप्पसंपादो। ० पदेण महपदेष 1. परमापर फारम गरि मनमानमभियोगदाराम परम कस्सामो। 10. एस्व ताप मंडविषनाशम्पहासबारपा पुषदे। सबमारे रस भनियोग- पररमितियो। पातिविषिम्रो मानि सिपस्ने माता गे पर मिलीमो एसो पियानो सरिसोग परन्म स्तोत्र पर सबसे रामसिमसिम पोल पाक्षिाप्रपी मा। सो समर प्रबर सीमापारिक लोग पारपपिनि से पीमा सम गोर रिमसियाँ होती है बिनी कि पिण्डे समपमें थी वो पा वीर पवस्थितविमसियाम होता है। •बो भविमतिकसे पुनः विमविपासाहोवा परमवलम्पनिमकिवाया बोष है। ५ो निसस्वकर्मवान होकर पदि पुन सर्मबाडा होता है तो यह भवसम्म विमणियाणा बीच है पोंकि इस सि, शनि और मवस्थानका ममाष है। दिनि मौर मरस्थानमा ममात्र मी पासचामें स्थित मभिमाषसे होता है क्योकि यो पनि हानि और पवस्वान पाठे सयम स्पित कमानी मपेपासे पाये जाते येनका सत्तामें स्थित कि बिना पापा बाना सम्भव नहीं है। अपवा विरोप मावा है। इसपिये चमपपासे मबचम्म विमाप पाबात सिसई, मन्पबा भरतम्य समसे मी सके पबचम्पपनेका प्रसंग प्राप्त वा है। वर्षात् पूर्वोच परसे पदि भजन मंग म माना पाप वो उसे 'पवलम्ब इस सपारा मी महारसकी। पिता-पाँस्विविसत्तकी मपेमा सुबगार मादिन विचार किया गया है पर इसके अनुसार मुनगार मारिक निम्न पक्षण प्राप्त होते-बिस भीष पनवर वीव समपमें माप स्थिति पर पति पर्वमान समयमै मय वा संस्मरा ससे भषिक विपिको प्रास वायोपा मुखगार स्थितिविमख्यिा बीचमा बावा है। बिसयन्टरमवीच समयमै माविक स्थिति है यह पवि स्विधिपाद पा नपास्थिक्षिामना के बारा पर्वमान समबमें कम स्थिति परमेवा है तो पर मार स्विविधिमचियाा बीच कहा जाता है। विस बोषके स्पिक्तिी पठाबड़ी होवे ममी यो यससे मधमावि मोके समान विवीयादि समपमि विधि पनी गवीर बीच मपवित स्थविविमणिमाम मा बा है। क्या बो मिससम्मेवाण रोकर पुन स्विसिमको प्रात नवा वामवचम्म स्विविनिमज्यिाम महाबाता है। प्रात मनुवारमै नीची भपेचा मोहमीयले मवादर मेवाती बिपिन विचार किया गया है। .इस समपरके भमुसार। १६ इस अर्थपरको भागे प्रेमामेवा मनुषोगद्वारा मन करते हैं। - पब मानि बनॉपर मनुमा परमेकेसिपे सचारप्पा मन भने- सवाला है। - जिनो मनाने विगाँधे पास होतान हर समय पुरसिधिनम पवित्रपारपती बरगला उनी सहित ये परिवार र -- a 1 गा०२२] न ६९, जीवा। बोर्म एवं वमाहार सामाइप-छेदो- जयधवलासहिदे कसायपाहुडे 1 द्विदिविहत्ती ३ दाराणि णादन्वाणि भवंति-समुक्कितणा सामित्वं कालो अंतरं णाणाजीवेहि भंगविचओ भागाभागं परिमाणं खेचं पोसणं कालो अंतरं भावो अप्पाबहुए ति । समकित्तणाणुगमेण दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मिच्छत्त-पारसक०-णवणोक० अत्यि भुजगार-पप्पदर-अवविदविहत्तिया । सम्मत्त सम्मामि० अणंताणु०चउकाणमेवं चेव । णवरि अस्थि अवत्तव्वं पि। एवं सम्वणेरड्य-तिरिक्ख-पंचिंदियतिरिक्ख-पंचिंदियतिरि०पज० पंपिंदियतिरिक्खजोणिणी-मणुसतिय-देव० भवणादि जाव सहस्सार०-पंचिंदिय-पंचिं.. पज-तस-तसपल पंचमण-पंचवचि०-कायजोगि०-ओरालिय-वेउन्धियः-तिग्णिवेद- चचारिक०-असंजद०-चक्खु०-अचक्खु०-पंचले०भवसि०-सण्णि-आहारि सि । ६८. पंचिं०तिरिक्खवपञ्जत्त० छन्वीसं पयडीणमोघं । सम्मत्त-सम्मामि० अस्थि अप्पदरं चेव | अणंताणु०चउक० अन्वतन्वं णस्थि । एवं मणुसअपल० सव्वएइंदिय- सव्वविगलिंदिय-पंचिं०अपज०-सव्वपंचकाय०-तसअपज्जत्त-ओरालियमिस्स-वेउन्विय. मि० कम्मइय०मदि-सुद०-विहंग-मिच्छादि०-असण्णि-अणाहारि ति । वेदप-उत्सम अन्य अबढि । शेप स्वीस ओघसे मिथ्यात्व . योजना तयासयो तथा इनके एक ग्मिध्यात्व में अस्पतर मग हो सब प्रकृतियोंकी मिथ्यात्व और स बिनम मिथ्यात्व उन मार्गणाओम नहीं माता। नोकपायोंको प्रकार जानना - भुजगार स्थितिषिमक्तिमें तेरह अनुयोगद्वार ज्ञातव्य हैं-समुत्कीर्तना, स्वामित्व, काल, अन्तर, नाना जीवोंकी अपेक्षा भगविचय, भागाभाग, परिमाण, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव और अल्पबहुत्व । उनमेंसे समुत्कीर्तनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश। उनमेंसे ओघकी अपेक्षा मिथ्यात्व, बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थितविभक्तियोंके धारक जीव हैं। सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी- चतुष्कका कथन इसी प्रकार जानना चाहिए। इतनी विशेषता है कि इनका अवक्तव्य भग भी है। इसी प्रकार सब नारकी, सामान्य तियंच, पचेन्द्रियतिथंच, पचेन्द्रियवियंचपर्याप्त, पचेन्द्रियतियंच- योनिमती, सामान्य ममुष्य, मनुष्यपर्याप्त, मनुज्यिनी, सामान्य देव, भवनवासियोंसे लेकर सहस्रार- स्वर्गतकके देव, पचेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय पर्याप्त, त्रस, त्रस पर्याप्त पाँचों मनोयोगी, पॉचों वचनयोगी, काययोगी, औदारिककाययोगी, वैक्रियिककाययोगी, तीनों वेदवाले, क्रोधादि चारों कषायवाले, असयत, चक्षुदर्शनी, अचक्षुदर्शनी, कृष्णादि पाँच लेश्यावाले, भव्य, सही और आहारक जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-मिथ्यात्व, बारह कषाय और नौ नोकषाय इनका क्षय हो जाने के पश्चात् पुन' इनकी उत्पत्ति नहीं होती, अत इनकी स्थितिमें ओघसे भुजगार अल्पतर और अवस्थित ये तीन विभक्तियों ही बनती हैं। किन्तु अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी विसयोजना हो जानेके पश्चात् पुन उत्पत्ति सम्भव है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना हो जानेपर भी उनका सत्त्व पुन प्राप्त हो जाता है, अत इन छह प्रकृतियोंमें ओघसे भुजगार आदि चारों विभक्तियाँ बम जाती में जितनी मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमें ओघके समान व्यवस्था बन जाती है, अत उनकी प्ररूपणाको ओघके समान कहा है। ६८ पचेन्द्रिय तिथंच अपर्याप्तकोंमें छब्बीस प्रकृतियोंफा भग ओघके समान है। किन्तु सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका अल्पतर ही है और अनन्तानुबन्धी चतुष्कका अवक्तव्य नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य अपर्याप्त, सव एकेन्द्रिय, सब विकलेन्द्रिय, पचेन्द्रिय अपर्याप्त, सब पाँचों स्थावरकाय, बस अपर्याप्त, औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाय- योगी, मत्यन्नानी, श्रुताज्ञानी, विभगज्ञानी, मिथ्यादृष्टि, असज्ञा और अनाहारक जीवोंके जानना । . अनुदिशसे लेकर है। इसी । वोधिकहानी, पनि ग्दृष्टि । मूल दृष्टि जीवोंके M विभक्ति के पार r समयमें होती जाती है, स्थिविविमति दो मग होते है।

गा०२२ २२] [वनमा र बालापोह मपतिको [हुए पिसारिवार नारसम्बायो गति अपवावकारता विस्मिपिरियतिरित मस्सार पिरिसर मिनीषिय-सिमिस विचारपि। 11 सम्म-समानिया समसयावा.प्रमोद मोपस्पिपिस्सनोमा (पहार पि। गर्दना, स्वामित्व, समार द्विदिविाचीए सरपपरिमुबगारसमुस्तिका ९ थामदादिमाग सबरिमगेपछ• मिच्छत-पारसक०-गवणोक. अस्थि अप्प. बीया। ममता०प०प० एवं पेव । पारि मपचम पि गरिय। समच-सम्मामि० बोष एव मुक्से । मरिसाद बाप समा० समपपरीम मरिय भप.बीया। एबमाहाराहारमिस्सल-अवमद०-मकसा.-मामिवि० मुर-मोहि० मणपस० सबद सामाइय-वेदो०-परिहार-महम-हास्वाद-सबदासंघद-ओहिदस-सम्मादि० साय. पेपर सबसम० सासन-सम्मामिफाइत चि। बमब० पम्मी पपडीनमस्पि मुम- बप्प-अबाहिसि। एक समपित्यागमो समचो विक्षेत्रा-फन्द्रिय विमत्र सम्पपर्यासमि सम्यक्त्त मौर सम्पम्मियात्वको छोर क्षेप समीस प्रकृतियों की प्रस्मपाको मोपके समान माद। इसका पर वात्पर्य है कि मिस प्रकार भोपसे मिथ्यात्व मारिकी स्विक्मिोंमें मुखगार भाविकचनपिनारम्सीप्रकारमनुप्प भौर विर्मन सम्म्यामरमानना चाहिये । किन्तु श्वनी विशेषता है कि ममतानुबन्पीचतुफाकी विस पोबना दबासपोयना नहीं होती षव इनके मनम्तानुबन्पीचतुष्णका मवलम्प मग नहीं पायाजावा। वा इमरे एक मिय्यात्व गुपस्थान ही दोवामौर मिप्यास्व गुणस्थानमें सम्यक्त्व भोर सम्प म्मिप्यात्व मिम्पावन संकमण महीं होता, मत इनके सम्पक्व भीर सम्पम्मिम्यास्वा एक मत्पवर मंग ही पाया जाता है। इसी प्रमर मुझमें भीर बिवमी माणाएँ गिनाई १ नमें भी सब महतियोंकी नही पवस्वा बाननी चाहिये। फ्यपि पममें कुछ ऐसी मार्गमा बिममें मिप्याप मोर सासादन ये पो गुणस्थान होते हैं और मोबारिफमिम मावि छ पेसी मागणार बिममें मिप्यात्प, सासावन मौर भविरसम्पष्टि से पीन गुणस्थान होते हैं वो भी इतने मासे न मार्गणामि सम्परत्व भौर सम्पम्मिम्पावकी मापवर स्थितिविमति होनेमें काई पवर माही भावा । इस रिसेप सुनसा स्वामित्त मनुयोगटारमें किया है। १९. भानस कापसे गर परिम मरेरक वको वाम मिप्यात, पाय पाप भीर नी नोकपाकी माफ्तर स्विविधिमक्केि पारकबीच है। मनम्वानुक्न्धी चतुष्पकी भपेसा इसी प्रकार बानना चाहिए। फिन्त इक्नी विशेषता है कि इस भरतम्य मंग भी है । सम्पपल भीर सम्पम्मिम्पालका मंग मोर समाम है। इसी प्रकार समस्याबारे जीकि बामना चाहिए। मनुविभसे पर सर्विसिद्वितको बाम सम प्रक्यिोंकी मापवरस्थितिषिमणि पारफ बीब हैं। इसी प्रकार माहरफमापयोगी माहारवामिभापागी भपातोपरा, भापायी, भाभिम पोषिमानी, भुवयानी पापियानी, मनापपयसामी, संपत, सामापिफर्सयत छेवोपस्थापनासंक्त, परिवारपिहिसपत, सूक्ष्मपिरापिसवत, पनामावसयत, क्वार्समवमविपसनी, सम्प मपि भाषिकसम्बरशिकसम्बग्रष्टि उपसमसम्पन्दष्ठि, सासाइनसम्पटि भौर सम्पम्मिम्मा- एष्टि नीति बानमा चाहिए । ममम्ममि बीस प्रवियोंकी मुनगार पल्पवर मौर मवस्थित पिमतिबारहवीप। विशेपार्व-मानवापसे र परिम मैरेयक को रेवोंके यहाँ मपम दानेके पाले समपमें मिम्पात पाय पाप मोर मो मोम्पापोंकी बो स्थिति हावी पापरोपर गमती होती बागी बम्प पा संगमसे ग्राम दि मही ती, मन' इन किन्याकी एक मपवर स्थिविधिमटिही होती।फितुमनन्तामुफ्पी चप्पन स्थितिम मापवर भौर परचम्प पे रोमंग होवे ।। पाठ पर है कि स्मामि मिम्पारपि जीव मी उपम सार जिलों मे । - रन पोमा मुम्पर मम्मम्मिबल और कानुनी स्मनामप। मिति पनि व, मम्मासिस रखर पान मसानोरी गायो गोपालपा मय मम्म, सीर कारोबार RR पर सविस संगोपन होगामा मिनाह गरेर मीना Rोमिनिस बस्वासही भोर । जमानुपी ससम बारागारख। 1 , । गा०२२]] wr * ३१३. जयधंवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ * सामितं । मिच्छत्तस्स भुजगार-अप्पदर-अवहिदविहत्तिभोको होदि? १० सुगममेदं पुच्छासुत्तं । * अण्णदरो णेरइयो तिरिक्खो मणुस्सो देवो वा । ६ ११.भुज० अवविद० मिच्छाइद्विस्सेव । अप्पद० सम्मादिद्विस्स मिच्छादिद्विस्स वा। * अवत्तव्वनो पत्थि। ६ १२. मिच्छत्तसंतकम्मे णिस्संतभावमुवगए पुणो तस्संतकम्मस्सुप्पत्तीए अभावादो। -- में ३१५ . पिच्छादिद्विस्त com ६ १५.. * चरणो सो ६१६.त सम्मचे गहिदे मित्सरूवेग मिच्छाइद्वित्स पन्य करता है । pariwarwa मिथ्याष्टिक बार બવાવ્યાત્યવિ मिथ्यात्वको ४ * स्वामी कौन है सम्यक्त्व प्राप्त कर लिया है वे मिथ्यादृष्टि भी हो सकते हैं। अब यदि किसी सम्यग्दृष्टि देवने अन- न्तानुबन्धीकी विसयोजना की और वह कालान्तरमें मिथ्यादृष्टि हो गया हो तो उसके अनन्तानुवन्धी चतुष्कका अवक्तव्य भग प्राप्त हो जाता है और शेष देवोंके अनन्तानन्धी चतुष्कका अल्पतर भंग रहता है । तथा यहाँ सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना भी होती है, अत इन दोनो प्रकृतियोंके ओघके समान भुजगार आदि चारों भग बन जाते हैं । इस प्रकार शुक्ललेश्यामें जानना चाहिये । तथा अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धि तकके देवोंके सब प्रकृतियोंकी स्थितिमें वृद्धि नहीं होती, अत सब प्रकृतियोंकी स्थितिका एक अल्पतर भग ही है। इसी प्रकार मूलमें और जितनी मार्गणाए गिनाई हैं उनमें भी जानना चाहिये । जिस जीवने अनन्तानुबन्धीकी विसयोजना की है वह सासादनमें भी जाता है और ऐसे जीवके सासादनके प्रथम समयमें ही अनन्तानुबन्धीका सत्त्व हो जाता है पर यहाँ सासादनगुणस्थानसे पूर्व अवस्थाका विचार सम्भव नहीं है, अत सासा- दनमें अवक्तव्य नहीं होता । इसी कारण सासादनमें भी अनन्तानुबन्धी चतुष्कका एक अल्पतर भग कहा है। अभव्योंके छब्बीस प्रकृतियोंका ही सत्त्व होता है और उनके उन सब प्रकृतियोंकी स्थितियोंमें वृद्धि, ह्रास और अवस्थान सम्भव है, अत उनके छब्बीस प्रकृतियोंके तीन भग कहे। इस प्रकार समुत्कीर्तनानुगम समाप्त हुआ। * स्वामित्व कहते हैं। मिथ्यात्वकी मुजगार, अल्पतर और अवस्थित विभक्तिका स्वामी कौन है। १० यह पृच्छासूत्र सुगम है। * कोई भी नारकी, तिसुच, मनुष्य और देव मिथ्यात्वकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थितविभक्तिका स्वामी है। ६११ भुजगार और अवस्थितविभक्ति मिथ्यादृष्टि के ही होती है तथा अल्पतरविभक्ति सम्यग्दृष्टि के भी होती है और मिथ्यादृष्टि के भी होती है। * मिथ्यात्वका अवक्तव्य भग नहीं है। ६ १२ क्योंकि मिथ्यात्वसत्कर्मके नि सत्त्वभावको प्राप्त होनेपर पुन' उसकी सत्कर्मरूपसे उत्पत्ति नहीं होती है। विशेषार्थ-मिथ्यात्वका बन्ध मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें ही होता है और बन्धके बिना मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्ति बन नहीं सकती, अत मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्ति मिथ्यादृष्टिके ही होती है यह मूलमें कहा है। तथा जो मिथ्यादृष्टि गुणस्थानमें मिथ्यात्वको उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करके अनन्तर उत्तरोत्तर कारणवश उसकी अल्पतर स्थितिका ६१३ ॥ * कोई गार और ६१४ सम्यग्दृष्टिके मी २ ६१५. * पहले साप विद्यमान स्थिति सचामें सम्यक्त्वको प्रहण समय अधिक सम्यक्त्व और .

[छिदिया। बहिरिहचियो पे होषि था। मारिहिस्स पिरिक्षिसपा प्रदरम्ममुपदौर ममा परिसी सम्पनी परेक होगाहावोस मनाया न्याहुन्मी भनुम मर मी रोष इस सम प्रमेय मारियों की विनिरिक इसी पर सम्म बरे दिन मवानुम्मा सिमानी म समय समांत्र पर मन अनुम्मी मार गा० २२] हरिपिाचीर परपपरिमुबगारसामित्व • सम्मत्त-सम्मामिप्यताणं मुजगार-मप्पपरविहतिमो को होदि ? १५ पुमममे पूणाम। अपवरो णेरड्यो तिरिक्सो मास्सो देवो वा। ११४ पि पचर्म । सबयारो सम्माविशी पेव । मप्परं पर सम्मादिहिस्स पिष्ठादिहिस्सपा। अवडिवविहसियो को होदि। १५. सुमममेद । ० पुस्मुप्पस्पादो समतावो समयुचरमियत्तेप से काले सम्मरी परि पप्पो सो अवडिवपिहत्तिमो। १६ पहा-सम्पपसंतकम पेक्सिर समपुचरमिफचहिदिसंतकम्मिएप सम्म गरिदे वग्गापपरमसमए पेष समपुचरमियचहिदिसताम्मे सम्मच-सम्म मिपाचसोग संकते सम्मच-सम्मामिपाताममपहिरपिहची रोदि ।म परिमसमप मिमाहिस्स सम्पचहिदिसतेन फमसमयसम्माविसम्मपपिदिसवस्स समायचायो । साबरतामा निमुद परिणामक निमिरसे जिसने मिम्पाव की स्थितिका पात किया है मिम्पारले और सम्पटि मिम्पावकी मापकर स्थितिविमति होती है। फिन्त मिम्पायकी अबकम्पस्विविविमति नहीं होगी, क्योंकि जिसने मिम्पास्वमा सय कर दिपा है सके पुन' पिम्पावकी पचि नहीं थी। • सम्पाप गौर सम्परिमपातकी एबमार और अपवरस्थितिविमक्षिका ससामी चैन है। १५ पा प्रणास्त्र साम है। • कोई मारकी, तिच, मनुष्य मौर देव सम्पमत मौर सम्पग्मिभ्यासकी सम- पार मौर मत्सर स्थितिविमतिका सामी है। १४ ऐसा माना पाहिए। सुबगारमंग सम्पष्टिविही होता है। परन्तु मापवर मंग सम्पन्दरिले मी होणारे भीर मियासिके भी होता है। बास्पित विमक्षिका सामी कौन है। १५. पात्र मुगम है। ०पाले उत्पमा सम्परत्व प्रपिसे एक समय मषिक स्थितिबा मिप्यास्तके साप विपमान कोई एक बीब पदि बदमन्तर समय सम्पवये प्रास हमा है वो पर मपस्थितिविमतिका स्वामी है। १५ मुणसा इस प्रकार है-विस मिप्यारमिनारले सचामें विधमान मिथ्यात्वाकी स्थिति सचाम नियमान सम्यक्त्वकी स्थिति से एक समप भधिको यामीप बन दूसरे समपमें सम्यक्त्वको प्राण परताव सके सम्बनतोमाण र प्रयम समबमें ही मिालकी एक समप मपिक स्विति सम्पपल मौर सम्पम्मिपालस्मसे संमत हो बावी, मव सके सम्पन भौर सम्पम्मिप्यात्मकी भवितषिमछिदवी स्पॉलिमिपाकिमन्तिम समपमें मीस पात्र बने। रोर मासिामिप्र - माला मार लाम और हिमाकानी होचोर कोहोरो सीमारी समोसा P- - 1- ८ गा०१२] ६१८ तो संवकम्मरस भावादो। जुज्जरे, पर्याड द्विति है - ६१९. दरलेस्साए 1 मा साथ सम्यक्त्व इससे मालूम ६१८ स्वीकार किया जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ चरिमसमयमिच्छाइद्विस्स सम्मत्चणिसेगेहितो पढमसमयसम्माइहिस्स सम्मचणिसेगा एगणिसेगेणब्महिया, मिच्छचुदयसरूवेण त्थियुक्तसंकमेण गच्छमाणसम्मत्तणिसेगस्स सम्माइडिपढमसमए गमणाभावादो । तदो गावट्ठिदत्तं जुजदि ति ? ण एस दोसो, कालं पेक्खिद्ण सम्मचस्स अवट्टिदत्तुवल भादो । जहा–मिच्छाइद्विचरिमसमए जत्तिया सम्मचट्ठिदी तत्तिया चेत्र सम्माइद्विपढमसमए वि, अधो एगसमए गलिदक्खणे घेव मिच्छत्तादो सम्मचम्मि उवरि एगसमयवड्डिदसणादो। णिसेगेहि अवविदत्तं जदि इच्छिादि तो वि ण दोसो, काल मस्सिद्ण सम्मत्त-मिच्छत्ताणं समाणहिदिसंतकम्एिण णिसेगे पडुच एगणिसेगेणाहियमिच्छत्तहिदिसंतकम्मेण मिच्छादिविणा सम्मत्वे गहिदे चरिमपढमसमयमिच्छादिद्विसम्मादिट्ठोसु णिसेगाणं सरिसत्त वलंमादो। ६ १७. सम्मामिच्छत्तस्स पुण हेहा उवरिं च एगणिसेगाहियमिच्छाइद्विणा सम्मत्ते गहिदे भवद्विदत्त होदि, सम्माइद्विपढमसमयम्मि एगे णिसेगे स्थिक्कसंकमेण गदे उवरि एगणिसेगस्स वड्डिदंसणादो। सुत्तकारो पुण पहाणीकयकालो । तं कुदो णबदे ? सम्मत्तादो समयुत्तरमिच्छत्तण सम्मत्त पडिवण्णे सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमक्कमेण अवहिद- भोवपरूवणादो। सम्यत्वका जो स्थितिसत्त्व था, सम्यग्दृष्टिके प्रथम समयमें प्राप्त हुआ सम्यक्त्वका स्थितिसत्त्व उसके समान है। शंका-मिथ्यादृष्टिके अन्तिम समयमें जो सम्यक्त्वके निषेक हैं उनसे सम्यग्दृष्टिके पहले समयमें प्राप्त हुए सम्यक्त्वके निषेक एक अधिक हो जाते हैं, क्योंकि मिथ्यादृष्टिके मिथ्यात्वके उदय- रूपसे स्तिवुक सक्रमणके द्वारा प्राप्त होनेवाला सम्यक्त्वका निपेक सम्यग्दृष्टिके प्रथम समयमें मिथ्यात्वके उदयरूपसे नहीं प्राप्त होता है। अर्थात् मिथ्यादृष्टिके सम्यक्त्वका निषेक स्तिवुक सक्रमणके द्वारा मिथ्यात्वरूप होता रहता है परन्तु सम्यक्त्वके प्राप्त होनेपर वह निषेक मिथ्यात्वरूप नहीं होता और इस प्रकार प्रकृतमें एक निषेककी वृद्धि हो जाती है, अत' सम्यक्त्वप्रकृतिका अवस्थितपना नहीं बनता है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि कालकी अपेक्षा सम्यक्त्वका अवस्थितपना बन जाता है। उसका खुलासा इस प्रकार है - मिथ्यादृष्टिके अन्तिम समयमें सम्यक्त्वकी जितनी स्थिति थी उतनी ही सम्यग्दृष्टिके प्रथम समयमें रही, क्योंकि नीचे एक समयके गलनेके समयमें ही मिथ्यात्वसे सम्यक्त्वमें ऊपर एक समयको वृद्धि देखी जाती है। अब यदि निपेकोंकी अपेक्षा अवस्थितपना चाहते हो तो भी दोष नहीं है, क्योंकि कालकी अपेक्षा जिसके सम्यक्त्व और मिथ्यात्वका स्थितिसत्कर्म समान है और निकोंकी अपेक्षा जिसके मिथ्यात्वका स्थितिसत्कर्म एक निपेक अधिक है ऐसे किसी एक मिथ्याष्टिके सम्यक्त्वके ग्रहण करने पर मिथ्यादृष्टिके अन्तिम और सम्यदृष्टिके प्रथम समयमें दोनोंके निपेकोंकी समानता पाई जाती है। ६१७ सम्यग्मिथ्यात्वको अपेक्षा तो जिसके नीचे और ऊपर एक निषेक अधिक हो ऐसे मिथ्याटष्टिके सम्यक्त्वके ग्रहण करने पर अवस्थितपना प्राप्त होता है, क्योंकि सम्यग्दृष्टिके प्रथम समयमें एक निपेकके स्तिवुकसक्रमणके द्वारा चले जानेपर ऊपर एक निषेककी वृद्धि देखी जाती है। किन्तु चूर्णिसूत्रकारने तो कालकी प्रधानतासे कथन किया है। शका-यह किस प्रमाणसे जाना जाता समाधान-क्योंकि उन्होने सम्यक्त्व प्रकृतिसे एक समय अधिक स्थितिवाले मिथ्यात्वके स्थितिमा सम्यग्दृष्टिके वह पर अवाय कालकी या रूपसे रहना प्रकृति, स्थिति ६१६ एक मिथ्यावष्टि अन्यवर अवयमाव गतियोंकास सध्मणसे ही गवियोंके मिय्याइटिके जाती है। सम्याटिके समयोंमें करनेके पहले अधिक ? नर stion . + ---- [विकिवाये। सम्मास्ति समारिता 7 सपनासम्माविमान सीसिपएस होतो, प्रन विद्याविवरिलमयर रिंग । एमसपर परिसर रिसेमेरि बाहिर बरि शार अपातहिदिसामग मडादिति सम्माबी रखमा। सेमाहिरिनाम समा लिये पिसार परेरी गोपपई। समारो मानिसवालमा पार समान महिम गा० २२] हिदिपिक्षाचीए चरपरिमुखगारसामित्त ६ १८ मिदि पिसेगेहि पेट सम्मघ-सम्मामिष्ठचाणमवडिवचमिचिन्मदि तो मंतरकारनं काठम मिनावपरमहिदि गासिय विदिपब्दिीए परिवदसपतिपहिदि सतमम्मस्स उपसमसम्माइहिस्स वि माहिएच सीदिपरप इसममोहमिसेमाष गम्मान मावायो । पर मावसहाइरिएण एस्य मरियमावो परविदो । वदो बाणिय महा पावसाइयो परपरसे पाणीकपकासो दि। इचीए बि एसो पेय मत्यो हुन्मरे, कम्मरपान कम्ममारेपाहाबस्स कम्महिदिचायो । बरफम्मस्वंयो हिंदी पपरि हिरि-मशमागापासप्स हिदिपविरोदादो। प्रवत्तम्पषिइसिमो प्ररपदरो। १९. दो। अण्णदरमाए वापर कसाएम अमदरससपामोग्मोगारणाए अन्य परमेस्सार गिस्संतीकपसम्मच सम्मामिछम मिच्छादिहिमा पामसम्म गरिदे माचम्ममापक्चमादो। साप सम्यक्त्व प्राप्त होनेपर सम्यक्त्व मौर सम्पम्मिप्यात्वका भरमसे मस्तिवपनामा है। इससे मादम होता है कि पूर्णिसूत्रमै फरकी प्रमानवासे पपन किया है। १८ दूसरे परि निपकोंकी भपेवा ही सम्परतत भीर सम्पम्मिम्मायका मवस्थितपना स्वीकार किया जाय तो मन्तररस करके भीर मिम्पाक की प्रथम स्थितिको गठाकर दूसरी स्थितिमें जिसने पसनमोहनीयकी वीन मरुतिर्योका स्विविसलम प्राप्त कर लिया है ऐसे प्रथमोपक्षम सम्पष्टिफे मी सम्परत्व मौर सम्पम्मिय्यात्यहा भवस्थिपना प्राप्त होता है क्योकि पहॉपर रनमोहमीयके निपेकोंका गम नही होवा है। परन्तु पक्षिपम भाचार्यने पहॉपर अवस्पिवपनका मम नहीं किया है। इससे पाना मावा कि पवितपम मात्रायेने इस देसमें कापकी मपानवासे कवन किया है। गुठिसे मी यही मर्प हावा पौकि मर्मस्कोम फर्म स्मसे एना ही कमस्पिति श्री पाती है। समरूप स्थिविरूप नही हो सकता क्योंकि मावि, स्थिति भीर मनुमा मापारको पेनस स्थिति माननेमें पिरोपमावा है। ®मासम्पपिमक्तिपासा कोई मी जीव होता है। SE क्योकि पिसमे सम्पपल मौर सम्पम्मिम्पावको निःसस्वर दिया है ऐसे किसी एक मिम्यारमिनीपरमपावर गति मम्पवर पाय, प्रस पाके पोम्ब भम्बर मषगाइमा मौर मम्पवर स्वागतेसमबमोपश्चम सम्मान प्राप्त करने पर सम्पमत्व मौर सम्पम्मिम्मायका मवचम्म भाव देखा जाता है। विशेषा-सम्पद मौर सम्पम्मिप्पालकी सुमगार विविषिमणिका लामी चारों गविपीका सम्पम्रष्टि जीप रो सता है, पाकिमत दोनों प्रवियाँधी कस स्विविधिमक्ति समपसे ही प्राप्त ऐवीरेनौर इनमें मिप्यात्मका संक्रमण सम्पमटिलेही दोषा।बा चारों गतिकि मिष्याधिबीबोरक्त दोनों प्रावियाँती भापकर स्मितिविमक्ति की होती है क्योंकि मिप्यारपिक मपस्थितिमना भौर स्थितिमातक गरा रोपर इनकी स्थिति में म्यूमवा रेखी जाती है। किन्तु बिस सम्बग्रष्टिने इनकी मुबगार पा भवस्थित स्पितिविमक्ति नहीं की स सम्पन्दष्टिले मबम समयमै और हम पोमों प्रतियोगी सत्ताबाले मन्य सम्पादरियोकरितीपावि समयाँमें इसकी मापवर पिविधिमक्ति कन बापी वा बिन मिप्यास्मिोन सम्परत्वको प्राण रने पाठे समयमै सम्पन भौर सम्पम्पिमात्यकी स्थितिसे मिम्पापकी स्थिति एक समय मर्षिकरेन रितीय समपमै सम्बस्व पण परनेपर सम्पपल मौर सम्पम्मिम्पास्पकी मष से हो FIRमामलोमा free र समान समासा गाव मात्र प्ररमा पापियाम पनि सस समास शिल सम्मलेपमा जामो दोबारा पमा और सिनि अभिमा मामा नि समय। गौर RORTA संसारमार RRMA है। पर किया r त -- -- १० जयधवलासहिदे फसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ fatܟܢܢ ܝ ܙ - रकम तिई मिन्टना कम्मिएन किनारा उवारिणमुरार ArAhirw इस अपर 1 ल बो .. सिम्म पनि सा-यापार देशनिति आहरि ति। A . एवं सेसाणं कम्माणं णेदव्वं । $ २०. एदेण सुत्तस्स देसामासियत्तं जहवसहाहरिएण जाणाविटं। तेणेदेण सूधि दत्यपरूवणहमेथुच्चारणाणुगमं कस्सामो । २१. सामित्ताणुगमेण दुविहो जिद्द सो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मिच्छत बारमक २०-णवणोरु० भुजगार-अवद्विदविहत्ती कस्स होदि ? अण्णदरस्स मिच्छाद्विस्त । स्थित स्थितिविभक्ति होती है, क्योंकि ऐसे जीवके यद्यपि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका एक अध.निपेक स्तिवुकसक्रमणके द्वारा मिथ्यात्वमे सक्रमित हो जाता है तो भी सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वको स्थितिसे मिथ्यात्वकी स्थिति एक समय अधिक है, अतः सम्य- ग्दर्शनके ग्रहण करनेके पहले समयमें मिथ्यात्व द्रव्यके सम्यक्त्व और सम्यग्मिश्यात्वमे सक्रमित होनेसे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी ऊपर एक समय स्थिति वड जाती है. अत' जिस समय सम्यग्दर्शन को यह जीव ग्रहण करता है उस समय सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उतनी ही स्थिति प्राप्त होती है जितनी सम्यक्त्व ग्रहण करनेके पूर्व समयमे थी और इस प्रकार सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अवस्थित स्थितिविभक्ति बन जाती है। यहाँ इस विषयमें यह शका उठाई गई है कि इस प्रकार पहले और दूसरे समयमें सम्यक्त्वकी स्थिति समान भले ही प्राप्त हो जाओ पर निषेकोंमें समानता नहीं हो सकती, किन्तु मिथ्यात्वके अन्तिम समयमें सम्यक्त्वके जितने निपेक थे सम्यक्त्व ग्रहण करनेके समय उनमें एक निपेक बढ जाता है, क्योकि मिथ्यात्वके अन्तिम समयमें सम्यक्त्वका एक निषेक स्तिवुकसक्रमणके द्वारा मिथ्यात्वमें सक्रमित हो गया और इस प्रकार मिथ्यात्व गुणस्थानमें ही सम्यक्त्वका एक निपेक कम हो गया । पर दूसरे समयमे सम्यक्त्वके ग्रहण करने पर सम्यक्त्वका अधस्सन निपेक मिथ्यात्वमें नहीं सक्रमित होता किन्तु एक समय स्थिति अधिक मिथ्यात्वके द्रव्यके सम्यक्त्वमें संक्रमित होनेसे सम्यक्त्वका एक निपेक बढ़ जाता है, अतः उक्त प्रकारसे सम्यक्त्वकी अवस्थित विभक्ति नहीं बन सकती। इस शंकाका वीरसेन स्वामीने जो समाधान किया है उसका सार यह है कि इस प्रकार यद्यपि निपेकमें वृद्धि हो जाती है पर स्थितिमें वृद्धि नहीं होती, क्योंकि मिथ्याष्टिके अन्तिम समयमें सम्यक्त्वकी जितनी स्थिति थी सम्यक्त्वके ग्रहण करने पर उसको उतनी ही स्थिति प्राप्त हो गई, क्योकि मिथ्यात्वके अन्तिम समयमें इसकी स्थितिमें यद्यपिएक समय कम हो गया तो भी सम्यक्त्वको ग्रहण करने पर ऊपर एक समय स्थिति में वृद्धि भी हो गई, अत स्थिति समान रहो आई । और स्थिति कालप्रधान होती है निषेक प्रधान नहीं । हाँ यदि निषेकोंकी अपेक्षा सम्यक्त्वकी स्थितिमें अवस्थितपना लाना हो तो ऐसे मिथ्यादृष्टि जीवको लो जिसके मिथ्यात्व और सम्यक्त्वकी स्थिति समान हो किन्तु सम्यक्त्वके निपेकसे मिथ्या त्वका एक निषेक अधिक हो । अब यह जीव जब सम्यक्त्वको ग्रहण करता है तो इसके मिथ्यात्व के अतिम समयमें सम्यक्त्वके जितने निषेक रहते हैं उतने ही सम्यक्त्वको ग्रहण करनेके पहले समयमें भी देखे जाते हैं अत यहाँ निषेकोंकी अपेक्षा अवस्थित विभक्तिपना बन जाता है। तथा सम्यग्मि- थ्यात्वके निषेकोंकी अपेक्षा अवस्थितविभक्तिपनाका कथन करते समय सम्यग्मिथ्यात्वके निषेकॉसे मिथ्यात्वके दो निषेक अधिक लेने चाहिये । शेष कथन सुगम है। * इसी प्रकार शेष काँका जानना चाहिए। ६ २० इस कथनसे यतिवृपभआचार्यने सूत्रका देशामर्षकपना जता दिया, इसलिए इसके द्वारा सूचित होनेवाले अर्थका ज्ञान करानेके लिये यहाँ पर उच्चारणा का अनुगम करते हैं- ६२१ स्वामित्वानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकार का है-ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश । उनमेंसे ओघकी अपेक्षा मिथ्यात्व बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार और अवस्थित विमति जिसके हावा सम्पष्टिपा. प्रकार करना सम्मानक सन्यात और समय सम्यक्त्त और और समय कैसे होता है। समाधान अस्पनर है। सतनके साथ- किसके होता है। प्राप्त हुआ है उस पचेन्द्रिय वियंच, मनुमिनो, न प्रस, उस पर्याप्त फाययोगी, वीना मुष्णादि पाँच वा. -- २ . [ गरिरप मापारि बिग रेस गाईसपा पर पादिपपदरस निकाय पर मनाया मंडमिट से मान्स र सनरम मनात मौरसमपित्त- सिविलोम म और सम्मपत। समरगी मेरा पसमिमा पनि समान मात्रा होम अम स्वपमें सम्मारिस समियतो बस । संशमित हो मयमा पार सो सम समतोमर सामित होता कि मानिसमा गरी - गां०२२ विविविएपीए ठरपरि मुनगारसामि "मप्पारविची कस्स ! अण्पदरस्स सम्मोइहिस्स मिमाडिस बा। भगवामु० पठास विन पदापमेष र पचम्म । मबच० कस्स ! मग्ण परमसमयमिण्टापहिस्स सासषसम्माइहिस्सपा। सम्मच-सम्मामिष्ठचाण समपारपिहची फस्स ? सम्मच-सम्मा मिचान तप्पागोम्गमापारिदिसंवकम्मिरण मिणचस्प तप्पामोरगुस्साहिरिसंव कम्मिएन मिपादिशिया सम्म गरिदे तस्स परमसमयसम्मारिहिस्सा सम्मच-सम्मा- मिमचाणमुपरि मिछचलिए तस्व समिस्से उदयावधिपरमाए संकविदराबादो । उपरिमसुन्पम्मि क संकमी !म, तत्प बि मिपासवीए पिरोहामावादो । अप्पदर० कस्स ! मन्मद• सम्माहिस्स मिठाइहिस्स बा । यहि कस्स ! अणद० बो सम उचरमिपाचविसंतकम्मियो' सम्म परिषष्णो वस्स । मबचम कस्स ! अपदस्स को असतकम्मिमो सम्मच पडिनो वस्स । एवं सम्बइप तिरिक्त-पपिधिप तिरिक्त-पर्षि विरि ०पछ. पपि विरि बोणिणि-मसतिपदेव मवणादि बार सह सार--पपिदिय पर्षिपम-सस-सपम० पचमम०-पंचवपिनाययोगि मोरादि. बैटमि तिष्णिवेद-पारिक०-मसबद-पाखु०-प्रवास.-पपमे०-मबति०-सम्मि. मामारि चि। किसके होती है। किसी भी मिम्पारष्टि बीब होती है। मापवरबिमति रिस होती किसी सम्पग्रपि पा मिप्यारष्ठि बीपके होती है । मनवानुबन्पीचतुपो प्ठ पोम पोका काम इसी प्रकार रना चाहिये । भवसम्पपिमति पिसके होती है किसी एक मिप्यारठि पा सासापन सम्पम्धरिले प्रपम समयमें होती है। सम्पमत्व भौर सम्पम्मिमारतकी सुबगारपिविषिमछि पिसके होती है। सम्पाव पौर सम्पम्मियात यायोम्ब उपम्प स्विविस्तकमबारे भोर मिम्मायके वायोम्प सासस्थिविसलामा मिम्बारष्टि बीपके वारा सम्पावके प्राण करने पर सके प्रथम समपर्मे सम्परत्व मौर सम्पम्मिप्यास्त्रकी मुबगारस्थितिविमछि दोवी. स्पीकि पाँ पर सम्मास्त्व और सम्पम्मियाव मिपावको मपावम्सेिशित झेप समस्त स्विविका संकमण रेखा बाता है। संका-सम्पल मौर सम्पम्मिम्बालकी बसम्म स्थिति से मर सम्मम मिम्पालका सम्मण समाषान-मही बौकि यहाँ मी मिम्पावके संक्रमण होभेमें कोई पिरोप नहीं है। मम्पवर स्विविपिमधि किसके होती है। किसी एक सम्पन्द्रष्टि या मिम्पारति बीपक होती है। भपस्थिवस्थितिविमति किसके होती। यो मिप्यायके एक समप भपिक स्थिति मत्तम साप सम्पमत्वको प्राप्त हमारे पेसे किसी एक बीर होती है। मालम्पस्विविधिमति पिसोहोगी? सम्पपत्य और सम्बम्मिम्यावरूस सलमसे रहिव जो कोई एक बीप सम्पपलको प्राप्त हमारे रसके सबसम्पस्थितिविमणि होती है। इसी प्रकार सब नारकी सामान्य तिर्वच परेन्द्रिय विर्यच पंचेद्रिव तिच पर्याप्त पंचेन्द्रि लियंच पोनिमती सामाम्पममुम्प ममुप्प पर्याप्त भमुम्पिनी सायाम व मपनवासियोंसे भर सामार वर्गवकोष पवेत्रिय पदिय पर्यस अस प्रस पर्याप्त पापों मनोपोगी पाों पचम्योगी कापयोगी भौतारिफमापयागी पिकि- कापयोगी वीमा परबा कोषादि पाएँ पापपासे, बर्मयत, मुपसंगवा समुपसनवाये, प्यादि पाच याबा, मम्प, संडी मोर मादार बीप बामना चाहिए । विचारविशति मामा हात-सतमामेन इति | ग्गी। इस संमसरनार निस पनि हो पाttRRE रस्त्री शिवी सिविल पिपतिम मारनेRRORAM परिपान हो Arr सितम्मा भयो यो से full नोसिससिलिया मापन परमादेवादिकारी मरामसमरसत समान । पर सबसम्मानित TRIO/- 1ोपबरोधमा गोपायरवर मस्विवियर - १२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ ग माशि मुमन मुमदमा महोवनको पनाहानुन द्विदिर दोस्लाम - ६२२. पंचिंतिरि०अपज. छबीसं पयडीणं भुज० अप्प० अवढि० सम्मत- सम्मामिच्छत्ताणमप्पदरं० कस्स ? अण्णद० । एवं मणुसअपज०-सम्बएईदिय सन्त्र विग- लिंदिय-पचि अपज०-पंचकाय-तसअपक्ष-मदि० सुद विहंग-मिच्छादि० असणि ति। ६ २३. आणददि नाव उवरिमगेवजो ति मिच्छत्त-पारसक०णवणोक० अप्पदर० कस्स० १ अण्णद० सम्मादिहिस्स मिच्छाइट्ठिस्स पा । अणंताणु०चउक० अप्पदर०-अवत्त- व्याणमोघं । सम्मच-सम्मामि० भुन-अप्प० अवतन्माणमोघं। एदं चिराणुचारण- मस्सिण मणिदं । एदीए उच्चारणाए पुण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमोघमिदि मणिदं । तेण अवद्विदेण वि होदवं, अण्णहा ओघत्ताणुववत्तीदो । ण च एसो लिहंताणं दोसो; समुकि- तणाए वि सम्मत्त-सम्मामिच्छचाणमोघमिदि परविदत्तादो। कथमेत्य पुण अनट्ठिदमावो विशेषार्थ- यहाँ पर उच्चारणचार्यने अनन्तानुवन्धीकी अवक्तव्यस्थितिविभक्ति मिथ्या. दृष्टिके समान सासादनसम्यग्दृष्टि के भी बतलाई है सो इसका कारण यह है कि जिसने अनतानु बन्धीकी विसयोजना की है ऐसा उपशमसम्यग्दृष्टि जीव भी सासादन गुणत्थानको प्राप्त होता है यह बात कसायपाहुडकार ओर यतिवृपभ आचार्यको इष्ट है, अत सासादन गुगस्थानमें अनन्तानु- वन्धीका अवक्तव्य पद वन जाता है। बात यह है कि सक्रमित द्रव्यका एक आवलितक अपकर्पण और उदीरणा आदि काम नहीं होते यह एक मत हे ओर दूसरा मत यह है कि अनन्तानुवन्धीरूपसे सक्रमित द्रव्यका सासादनमें उसी समय अपकर्पण और उदीरणा सम्भव हैं। गुणधर आचार्य और यतिवृपभ आचार्य इसी दूसरे मतको मानते हैं। तदनुसार जिसने अनन्तानुवन्धीकी विसयोजना की है ऐसा कोई उपशमसम्यग्दृष्टि जीव सासादनमे आता है तो उसके उसी समय प्रत्याख्यानावरण आदि द्रव्यका अनन्तानुवन्धीरूपसे सक्रमित हो जाता है। ओर सक्रमित द्रव्यकी उदीरणा भी हो जाती है, अत सासादन गुणस्थानमे अनन्तानुवन्धीका अवक्तव्य पद बन जाता है। यह कथन नैगम नयकी मुख्यतासे है। शेप कथन सुगम है। ६ २२ पचेद्रिय तिथंच अपर्याप्तकोंमें छब्बीस प्रकृतियोकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थित विभक्तियाँ होती हैं । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतरविभक्ति किसके होती है ? किसी भी जीवके होती है। इसी प्रकार मनुष्य अपर्याप्त, सब एकेन्द्रिय, सब विकलेन्द्रिय, पचेद्रिय अपर्याप्त पाँचों स्थावरकाय, त्रस अपर्याप्त, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभगज्ञानी, मिथ्यादृष्टि और असजी जीवोंके जानना चाहिए। ६ २३ आनतकल्पसे लेकर उपरिम अवेयक तकके देवोंमें मिथ्यात्व, बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी अल्पतर स्थिविविभक्ति किसके होती है ? किसी भी सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवके होती है। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी अल्पतर और अवक्तव्य स्थितिविभक्ति ओघके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी मुनगार,अल्पतर और अवक्तव्य विभक्ति ओघके समान है। यह कथन पुरानी उच्चारणाका आश्रय लेकर किया है। प्रकृति उच्चारणामें तो सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका कथन ओघके समान है ऐसा कहा है, इसलिए सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वको अवस्थितविभक्ति भी होनी चाहिये, अन्यथा सम्यक्त्व और सम्मग्मिथ्यात्वके ओघपना नहीं बन है । यदि कहा जाय कि यह लिखनेवालोंका दोष है सो भी बात नहीं है, क्योंकि समु- कीर्तनामें भी सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका कथान ओघके समान है ऐसा कहा है। शंका-तो फिर सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वमें अवस्थितिविभक्तिपना कैसे प्राप्त होता है मगन मुन्नत है और दिने मन्यत्व মহত্যা सध्यान मरम्म नहीं इन, बन यदि चादर हा नहीं माय बाव में विदिक . पाईबावा। मंका समाधान मंग- - मिल नयन विरुद्ध दाबले भिन्न रबि यि इसापकर विशेषार्थ सकता होते है और ॥ रन्त किया है। वारसेन स्वामाने निधर्म वो कुछ उन्होने यह १० - A पपई तमा अपना समयनिक समी परिपारि असावा भारसहन्योत पार पर बनारस मोर। एहमि चाममोपनिदि ममि ।। एसोनिगम होगो स्मृति । इनमेस समारने मागमसिविषयनि रिपोलिसिनेमा समान गुकसान होती सासार गुममा गत म्पसमामिलार्म गा० २१] हिदिपिरतीए चरपरिभुजग्गरसामित्त सम्म ! पिम्छातिमा सम्मच-सम्मामिपचाथि उमेरसतेष मिमचरिदिसतादोहेडा परसम्मच-सम्मामिणचरिदिसंवसम्मेष सम्मचारिसशेष मिच्छाधिपरिमधिदिसंख्य फाप सम्मपहिदिसतादो कपसमठचरमिष्ठचहिदिसतकम्मिएम बेदगसम्म गरिदे सम्मच-सम्मामिछचानमवदिपिराची होरि पाामोकपकासचायो । बिसेगाव पामचे संत देवपसम्म परिपक्षमायेस समरिदिसतकम्मिएस सम्मेस माहिदपिाची होदि सम्मक्स्स । सम्मामिपाचस्स पुम महोदि । वेन दोष पि पुष्परिषदेसे पेव मपछि मावोबचमो। पदयसम्मचाविसहमिलाइसिम्मि हिदिसम्पपादो पत्तिो चि पहाण इत्त, वेदपसम्मच परिपामावम्मि पि हि पि विसोहियासेष अमिपमेन ििवजयसिहरीए पाहापुषसमादो। दो पर पमरे । एपमादो मे उबारपादो । रोणाचारपा पम विरोहोच, विरोहो पाम एपषपषिसमो। वि सबारमामो इन मियपमियामो, वमा प विरोो चि। एवं सबसेस्साए चर्म । समाधान-सम्पत्ति मौर सम्पम्मिम्पालकी पोम्ना मेवा बिसने मियावस्थित सत्तसे सम्पत नौर सम्पम्मिम्बाको स्थिविसत्तकोम पर दिया है जो सम्पमनके सम्मुस और बिसने मिथ्यात्वरे मन्तिम स्थितिकापात्र पात करणे मिम्मायके विक्सित्त्वको सम्परत्व स्पिक्सित्तसे एक समय मषिक किया है ऐसे मिप्यारठि बीपके वकसम्मत्वको मरण करनेपर सम्मल भौर सम्पम्मिम्मात्यकी मास्थित स्पितिविमपिहोवी योकि यहाँपर कासाकी प्रमानता है। नियोंकी प्रधानता होनेपर बेरसम्पत्तिको प्राप्त होनेवाले समान स्थिति सत्कर्मपाले समी बीवों में सम्पपलकी मवस्थित खितिविमचि होती है। परन्तु सम्बम्मि पालकी नही होती मत इन पोनॉकी मवस्विविमकिका बन पोच स्थानमें ही रमा चाहिये । परिघाबास किवेदकसम्यक्रसके भाभिमुखए मिम्माठि बीचमें Rयविकाण्डकपात होवा की नहीं सो ऐसा नियम परमा भी ठीक नहीं है क्योंकि मेरसम्मकत्वको प्राप्त दामेवा किसी मी बीप में विद्यारिके भनुसार मनियमसे स्थितिकाणकपावकी सिद्धि होनेमें कोई बापा नही पाईबानी।। पंगा-परमात पिस प्रमापसे बानी बावी? समापाम-इसी नवारपासे नामी बावी है। बंग-दोनों नचारणा में परसर विप से नहीं माना वार ! समाधान नहीयोंकि,विरोन एक मनको विषप करता है। परन्तु बोमो सवारप्पएँ मिन मिम नब निमिचसे सच, भव कोई पिरोप नहीं है। वात्पर्य पाहब की रिसे विप पोपावे मी जाती हैा विरोप भाग है। तिइन दानों उच्चारणामाका मन मिग्न मिम्न रिसे किया गया है बब कोई निरोप मही माता । इसी प्रकार एस्मस्वामें मना चाहिये। विशेना-मामतारिकमें सम्पात मौर सम्पम्मिमापके भवस्विको मिना पीन पर होवे भौरमपस्थित स इस बार पर होते हैं। इस प्रकार यहाँ वीरसेन स्वामीमे दो माला मम पिया।पाम मत प्राचीमनवारणानमौर दुसरा मव इस बारणानिसका बीरसेन स्वामीने सर्वत्र पपोग किया है। पहाँ पर पोरसेन स्वामीने पहले म समर्थन पा मिपेयमें दोशमी नहीं मिला है।सरे मवम नानि भवस्य समर्थन किया है। पारेको पनि पापणापा फिपर सेवकोंती मूक मही है। परिवाँकी मूग होती तो एक नगर 7 सम्मा। गुफार गत सार बिस्ने बनवाया है।और समितमा मममममसर। पर मारपल हिसोबास निमोनिक पर कार्य मी मिपावर पारपायरी रवि और विमाना विश्विनिमोपासबार। मटिमाससमाचार पारपामा सास और समर सम्ममिम मालगोपना नाम बाव गोमोरस है ऐसा मारे। भिडिपचास * x - --- ग ? - मारत टेसनम बाम २. ३६० अंजाम मुर्गाल . रचादों । दारिदिन ६३ को १४ जयधवलासहिदे कसायपाहुढे [हिदिविहत्ती ३ ६२४ अणुदिरसादि जाव सव्वट्ठसिद्धि चि सम्बपयरीणमप्परं कस्स ? अणद० । एवमाहार० आहारमिस्स० अवगद०-अकसा० आमिणि सुद०- ओहि०-मणपज संजद०. समाइय-छेदो०-परिहार०-सुहम०-जहाक्पाद० -संजदासंजद०-ओरिदंस०-सम्मादि०- खाय०-वेदय०-उवसम०-सासण-सम्मामिच्छादिहि ति । ओराजियामिस्स० छन्नीस. पयडि तिण्हं पदाणमोघं । सम्मत्त-सम्मामि० अप्पद० ओघं । एवं वेउब्धियमिस्स. कम्मइय-प्रणाहारए त्ति अभव० छब्बीसपयडीणं विण्हं पदाणमेइंदियभंगो। एवं सामिचाणुगमो समचो । * एत्तो एगजीवेण कालो । ६ २५. सुगममेदं सुत्तं । * मिच्छत्तस्स भुजगारकम्मंसियो केवचिरं कालादो होदि ? $ २६. एवं पि सुगम । * जहणणेण एगसमओ। होती किन्तु जव समुत्कीर्तनामें भी आनतादिमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके पद ओघके समान वतलाये हैं तव इसे लेखकोकी भूल नहीं कह सकते । तब प्रश्न हुआ कि तो यहाँ अवस्थित पद कैसे बनता है ? इसपर वीरसेनस्वामीने यह समाधान किया है कि जिसने आनतादिकमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलनाद्वारा मिथ्यात्वसे कम स्थिति कर ली है वह जव सम्यक्त्वके सम्मुख होता है, तब मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिसण्डके पतन द्वारा यदि सम्यक्त्वकी स्थितिसे मिथ्यात्वकी स्थिति एक समय अधिक करके वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त करता है तो सम्यक्त्व और सम्यग्मि- थ्यात्वकी अवस्थितविभक्ति बन जाती है। यह कालकी प्रधानतासे कथन किया है। पर जब निषेकोकी प्रधानतासे विचार करते हैं तब समान स्थितिवालोंके सम्यक्त्वकी अवस्थितविभक्ति प्रात होती है। किन्तु इस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वकी अवस्थितविभक्ति नहीं वनती । ६२४ अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवोमे सब प्रकृतियोंकी अल्पतरस्थितिविभक्ति किसके होती है ? किसी भी जीवके होती है। इसी प्रकार आहारककाययोगी आहारकमिश्रकाय- योगी, अपगतवेदवाले, अकपायी, अभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, सयत, सामायिकसयत, छेदोपस्थापनासयत, परिहारविशुद्धिसयत सूक्ष्मसापरायिकसयत, यथाख्यात- सयत, सयतासयत, अवधिदर्शनवाले, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशम- सम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंके जानना चाहिये। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी अपेक्षा तीन पदोका भग ओघके समान है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्ति ओघके समान है। इसी प्रकार वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगो और अनाहारक जीवोके जानना चाहिये । अभन्योंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी अपेक्षा तीन पदोका भग एकेन्द्रियोंके समान इस प्रकार स्वामित्वानुगम समाप्त हुभा। *आगे एक जीवकी अपेक्षा कालानुगमका अधिकार है। ६ २५. यह सूत्र सुगम है। * मिथ्यात्वके भुजगारस्थितिसत्कर्मवाले जीवका कितना काल है ? ६२६ यह सूत्र भी सुगम है। * जघन्य काल एक समय है। मुदगर नट 5.1 समय होता है। एन्द्रिय पान करनेवाले गाव त्व करनपान - ६२ . समाधान शंका-५ समाधान इस बारे मंझा-म समाधान - महा- सभा रहता है, मत- . ६३० समाधान -- - . समम ममममा बोरिवाज म.-बोरिससमा । बोराक्सिमिस गोप। मिरिस- सलमेरिपको। असायो होति। माथिबातोमर मारियोहा मतिमे स्ने मानहानि स्तर बोस समास सिरिसे रिमाल tो सम्मान और समय सासेपर लियास समरिक महिमोक्नदी। पानिधी विनिमय रमाययोगी पार की मााि मन समसमापिस सारसम्म या पाहिये। ग. २२] हिविपिएचीप ज्वरपपरिमुबगारसामिर्च १२७ दो मिचरिदीए बरि एमसमय बहिब पपरे पिणपहिदिसा पारस्स एमसमपकापसमादो। ठकस्सेण चत्वारि समया ४। २८ धारा-मदासपण शिविर्षपे परिरे सम्मारस्स पगो समयों । संकि सस्थएन बहिण परे विरियो समयो । पद दिपस्स विग्मई काम पपिदिएसप्पाम- पामसमए प्रसन्निहिदि परमावस्स तदियो सममो। सरीरं पेवन पठत्वसमर सम्मिदिदि पषमाबस्स पठस्पो सुधगारसममो। २६. का महा पाम । हिदिवसायो। विस्स पमाप | पा. एणसममो, 6. मोगात । एरिम्से पदाए नमो विपासो पाक्समो पाम । एमरिदिपपकासो सम्पसि धीराम समापारपायो किन होदिप, मवरंगकारपमेरेण परिसचान पचोदो । एमजीवस समासमेगपमापहार हिदिवपो हिन होदिम, मवरमकारपेट दमारिसचिव परिपचमापस्स एमम्मि पेष मवरंगकारणे समकासमबहाणामावारो। ३० को समिसेसो काम ! कोहमान माया-सोपरिनामविसेसोसिमासि Fouोकि मिपावकी स्विविकेम्पर एक समय बड़ाकर कम करनेपर मिष्यत्वकी मुबगार स्पिविषिमटिका एक समय का पावा वावा है। सम कारा पा समय है। ३२८ उसका गुणसा इस प्रकार है-मगधपसे स्मिविवपके मानेपर मुनगारफा पाया समय होता है। संकाय स्पितिको पदावर कम करने पर दूसरा मुनगार समय होता है। लेनिम पर्यापसे विमा रके पंचेन्द्रिपमें स्पन्न होने मपम समयमें मशीकी स्पितिका न्य करनेवाले ग्रीवके तीसरा मुमगारसमप होता है। सरीर प्राण परके चौपसमयमै संग्रीकी स्थितिका पम्प परनेपाछे जीवके पोपा मुबगार समय होता है। FREE-पवा किसे पते है। समाषान-स्मिविकापके मामी महारते है। शंका-सका प्रमाण क्या है। समापान-अपच का एक समय मोर पसार काम भन्दा है। इस मावा य मर्यात् बिनास नाम मठाम है। का --सब जीवोंके एक स्पिविषयका काग समान परिणामबाग पो मही होता है? समाधान-माहा, क्योंकि मन्तरंग कारण मेरोनेसेसमें समानता मही बन सकती है। का-सजीव सपा स्विविवन्य एक समान बनाया वो नहीं होती? समापान-नहाँ क्योंकि वह जीव मत्वरंग भरणाम दम्पादिको सम्मपसे परिवतन परता पवाभव सा एकही मन्तरग कारण सर्मरा भवस्थान नहीं पाषा वावा है। ३ संग-संगफिसेमते। समापान - भोप मान, मापा मोर गोमरूप परिणामपिपड़ी सकस पते । अपेश नमो सिविडिबोले या महाराजांचा राग परमपाव। समस . १४ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ ग० २२]] ६२७, गाररस ६२८.२ उपक्सएम परमसमर का धोनस पा २६. का संतामुन मलेसि जीवाणं बत्तीदो। दवादिसर्वघेण ६३०. को मुजगार नाव ६ २४. अणुहिस्सादि जाव सन्वट्ठसिद्धि चि सम्बपयरीणमप्पदरं कस्स ? अणद० । एवमाहार०-आहारमिस्स० अवगद० अकसा० आभिणि मुद०- ओहि०-मणपज० संजद०. समाइय-छेदो०-परिहार०-सुहम०-जहाक्खाद०-संजदासंजद०-ओहिदंस०-सम्मादि०- खड्य०-वेदय ०-उवसम०-सासण-सम्मामिच्छादिहि ति। ओराजियमिस्स० छन्नीस- पडि तिण्हं पदाणमोघं । सम्मत्त-सम्मामि० अप्पद० ओघं । एवं वेउवियमिस्स.. कम्मइय०-अणाहारए त्ति अभव० छब्बीसपयडीणं तिण्डं पदाणमेइंदियभंगो। एवं सामिचाणुगमो समचो। * एत्तो एगजीवेण कालो। ६ २५. सुगममेदं सुत्तं । * मिच्छत्तस्स भुजगारकम्मसियो केवचिरं कालादो होदि ? $ २६. एवं पि सुगम । * जहणणेण एगसमो। होती किन्तु जब समुत्कीर्तनामें भी आनतादिमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके पद ओधके समान बतलाये हैं तब इसे लेखकोंकी भूल नहीं कह सकते । तब प्रश्न हुआ कि तो यहाँ अवस्थित पद कैसे बनता है ? इसपर वीरसेनस्वामीने यह समाधान किया है कि जिसने आनतादिकमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलनाद्वारा मिथ्यात्वसे कम स्थिति कर ली है वह जब सम्यक्त्वके सम्मुख होता है तब मिथ्यात्वके अन्तिम स्थितिखण्डके पतन द्वारा यदि सम्यक्त्वकी स्थितिसे मिथ्यात्वकी स्थिति एक समय अधिक करके वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त करता है तो सम्यक्त्व और सम्यग्मि- थ्यात्वकी अवस्थितविभक्ति बन जाती है। यह कालकी प्रधानतासे कथन किया है। पर जब निषेकोंकी प्रधानतासे विचार करते हैं तब समान स्थितिवालोंके सम्यक्त्वकी अवस्थितविभक्ति प्रात होती है। किन्तु इस प्रकार सम्यग्मिथ्यात्वकी अवस्थितविभक्ति नहीं बनती। ६ २४ अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धितकके देवोंमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतरस्थितिविभक्ति किसके होती है ? किसी भी जीवके होती है। इसी प्रकार आहारककाययोगी आहारकमिश्रकाय- योगी, अपगतवेदवाले, अकषायी, अभिनिबोधिकज्ञानी, श्रुतझानी, अवधिज्ञानी, मन'पर्ययज्ञानी, सयत, सामायिकसयत, छेदोपस्थापनासयत, परिहारविशुद्धिसयत सूक्ष्मसापरायिकसंयत, ययाख्यात- सयत, सयतासयत, अवधिदर्शनवाले, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशम- सम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंके जानना चाहिये। औदारिकमिश्रकाययोगी जीवोंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी अपेक्षा तीन पदोंका भग ओघके समान है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्ति ओघके समान है। इसी प्रकार वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगो और अनाहारक जीवोंके जानना चाहिये । अभन्योंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी अपेक्षा तीन पदोंका भग एकेन्द्रियों के समान है। इस प्रकार स्वामित्वानुगम समाप्त हुआ। *आगे एक जीवकी अपेक्षा कालानुगमका अधिकार है। $ २५ यह सूत्र सुगम है। * मिथ्यात्वके मुजगारस्थितिसत्कर्मवाले जीवका कितना काल है ? ६२६ यह सून भी * जघन्य काल एक समय है। ६२८ समय होता है। एनेन्द्रिय पर्यायसे फरनेवाले जीवके । पन्न करनेवाले ती ६२६. समाधान प्रभाव इस महाके शंका-१ समाधान शंका-एक समाधान A-IND- सुगम है। रहता है, मत ६३० शंका समाधान- - [परिसर सामरं पास ! । •मोसिसमाज संघर- १०-योरिस-मारि- । बोराविमिसम्म संपिास हामहिपमयो। - प्रसादोहोरि म्पपिपतारबार मारियाँमा मवे मातापिप समात गौर गासमतोम ससस सिरिसे मिला itो सम्मान र सम्मान मास HIRA समासमानिकी माहियाती। पतियों पसरविकि Ranासीमा नी मासिायक सम्मानिसमा सगरि, मोहन ग. २२ हिदिपिहचीर परपपडिमुखगारसामिन २७ हो। मिपचहिदीए उपरि एपसमय पहिण पपई मिलापहिरिस मारस एमसमपकानुपर्तमादो। उपस्सेण चत्तारि समपा ४। २८ महा-मास्सरण डिविषये पहिरे सममारस्स एमो समयो । संकि सक्सएप पहिल पदे पिदियो समयो । एक दिपस्स विग्मई कार्ग पर्षिदिएमप्परम परमसमए अप्सपिहिदि पंपमानस्स तरिमोसममो। परीरं पेवर पठत्वसमर सम्मिलिदि पषमापस्स पठस्यो रसमारसमयो । २६ का मदा माम । हिदियो। किं तस्स पमाण | पा. एमसममो, 6. भोपाच । एपिम्से मवाए लामो विणासो भवाफ्सबो गाम । एमद्विदिषपकातो समेसिबीवाय समापारिमामो किष्ण होरिन, बवरमकारपमेरेण सरिसचाव बचीदो । एगधीवस्व समकारमेमपपावसाए हिदिवपो किन होदिम, बरगपरपेसु दमारिसमिण परिपचमापस्स एपम्मि र मवरमकारणे समकासमबडापामावायो । 1. को सक्रिसो माम माग मापा-गोहपरिमामविसेसो से सिपासि क्योंकि मिम्बालकी स्पितिके सर एक समप भाकर बम रमेपर मिपावकी मुबगार स्पितिविमखिका एक समय काम पाया जाता है। • उतर कारा पार समपरे । ६२८. इसका सुगमा इस प्रकार है-महासरसे स्पिदिकम्प पढ़ानेपर मुबगारका पाला समप होता है। सकेसम्मसे स्पतिको पढ़ाकर बम्म करने पर दूसरा मुबगार समय होता है। पोन्दिप पापसे पिमह परफे पपेन्द्रिय, पम्न होने के प्रथम समपर्मे भसमीकी स्पिति बन्य परमेपासे मीरवासरा सुबगारसमय होता है।सरीर प्रहण करके चौमे समबम संकीकी विविध पपनेपाछे खीव चौया मुबगार समय होता है। २६ शका-पदा पिसेरते है। समावान-स्पिविषयके मम्मोपदा प्रते हैं। गंका-सम्म प्रमाण क्या है? समापान-अपम्प का एक समय मीर यस कार मन्तमर्व है। इस भवासय पात् विनाशका माम मरावप है। संघ -सब जीपों पर स्पिविषम्पन्न काम समान परिणामबाणा पी नही वाद! समाषाम-नहीं क्योंकि मन्तरग कारपमें मेष होनेसेसमें समानता नहीं बन सकती है। पहा-पक बीब के सर्वरा स्पितिवप एक समान कामपामा वर्षा नहीं होता है। समापान-नहाँ क्योकि यागीय मन्वरंग परम इम्पादिमेसम्मपसे परिवर्तन पर पाहै न सका एकही मम्वरंग कारपदं सर्वदा अपत्यान नहीं पापा चाया है। ३ षंग-सशकिसे कहते है। समापान - मोष मान, माया मोर गोमरूप परिपामविसेपछी सकसमाते है। ना परिये। अपेशल स्पो सिसिपियहि समय। नाहारामापी। मोपल। एमा। म। निवास .

गा: २२] - उपरिमाशे। समाणेहि ..." म उपरिमायो। ३५४४ द्विरी, gix वेदव्वं बाव ६३१.८०४५ 1180 हेद्विमाशो पति प्रति । एव हो, १९०५ पतिदोबमस्स महतो वि" . १६ जयधवलासहिदे कसायपाहुहे (हिदिविहत्ती ३ द्विदीर्ण घंधस्स सव्वे वि पाओग्गा १ ण, परिमिदाणं द्विदीणं बंधस्स परिमिदसंकिलेसायं चेव कारणत्तादो । तं जहा-सव्वजहण्णबंधो धुवहिदी णाम । तिस्से द्विदीए बंधपायो- ग्गाणि असंखेज्जलोगमेचट्ठिदिबंधझवसाणहाणाणि छबड्डीए असंखे०लोगमेतछट्ठाणेहि सह अवद्विदाणि । समयुत्तरधुवद्विदीए वि एतियाणि चेव । णपरि धुवद्विदिपरिणामेहितो पलिदो० पसंखे०मागपडिभागेण विसेसाहियाणि । एवं विसेसाहियकमेण द्विदाणि जाव सरिसागरोवमकोडाकोडीए चरिमसमओ त्ति । पुणो धुवट्ठिदीए असंखेज्जलोगन्म- वसोणाणि पलिदो० असंखे०मागमेतखंडाणि कायवाणि । ताणि प अण्णोण्णं विसेसाहि- याणि । एवं सवहिदिअन्झवसाणाणि खंडेदन्वाणि | संपहि धुवद्विदीए पढमखंड- द्विदअसंखे०लोगहिदिपंधन्झवसागट्ठाणेहि धुवद्विदी चेव बज्झदि ण उवरिमद्विदीओ। कुदो ? तम्बंधसचीए तेसिमभावादो। णिरुद्धहिदीए पुण हेटिमद्विदीओ ण बझंति; सव्वजहण्णहिदिवधादो हेट्ठा बंधद्विदीणमभावादो। पुणो तत्थतणविदियखंडपरिणामेहि धुवहिदि समउत्तरघुवहिदि च बंधदि ण उवरिमविदीमो। पुणो तदियखंडपरिणामेहि धुवद्विदि समउत्तरघुवहिदि दुसमउत्तरघुवहिदि च बंदि । एवं तिसमय चदुसमय-पंचसम- युत्तरादिकमेण धुवहिदि बंधाविय णेदव्वं जाव चरिमपरिणामखंडं ति । पुणो चरिम- खंडपरिणामेहि धुवहिदिप्पाहुडि समयुत्तरादिकमेण परिणामखंडमेचट्ठिदीओ वज्झति, ण शंका-वे सब सक्लेश परिणाम क्या सव स्थितियों के बन्धके योग्य होते हैं ? समाधान-नहीं, क्योंकि परिमित स्थितियोंके बन्धके परिमित सक्लेश परिणाम ही कारण होते हैं। उसका खुलासा इस प्रकार है-सबसे जघन्य बन्धका नाम ध्रुवस्थिति है। उस स्थितिके बन्धके योग्य असख्यात लोकप्रमाण स्थितिबन्धाध्यवसानस्थान होते हैं। जो षस्थानपतित वृद्धिकी अपेक्षा असख्यात लोकप्रमाण छहस्थानोंके साथ अवस्थित हैं । एक समय अधिक ध्रुवस्थिति- बन्धके योग्य भी इतने ही स्थितिबन्धाध्यवसानस्थान होते हैं। किन्तु इतनी विशेषता है कि वे परि- णाम ध्रुवस्थितिके परिणामोंमें पल्योपमके असख्यातवें भागका भाग देने पर जितना लब्ध आवे उतने ध्रुवस्थितिके परिणामोंसे अधिक होते हैं । इस प्रकार सत्तर कोडाकोड़ी सागर-प्रमाण स्थितिके अन्तिम समय तक वे परिणाम उत्तरोत्तर विशेषाधिक क्रमसे स्थित हैं। पुन ध्रुवस्थितिके असख्यात लोकप्रमाण परिणामोंके पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण खण्ड करने चाहिये । जो परस्पर विशेषाधिक है। इसी प्रकार सब स्थितियोंके परिणामस्थानोंके खण्ड करने चाहिये । इनमें ध्रुवस्थितिके पहले खण्डमें स्थित असख्यात लोकप्रमाण स्थितिबन्धाध्यवसानस्थानोंसे ध्रुव- स्थितिका ही बन्ध होता है अगली स्थितियोका नहीं, क्योंकि उन परिमाणों में आगेकी स्थितियोंके बन्धकी शक्ति नहीं पाई जाती है तथा उन परिणामोंके द्वारा ध्रुवस्थितिसे नीचेकी स्थितियोंका बन्ध नहीं होता है, क्योंकि सबसे जघन्य स्थितिबन्धके नीचे बन्धस्थितियों नहीं पाई जाती हैं। पुन' ध्रुवस्थितिसम्बन्धी दूसरे खण्डके परिणामोंसे ध्रुवस्थिति और एक समय अधिक ध्रुवस्थितिका बन्ध होता है, किन्तु इससे आगेकी स्थितियोंका वध नहीं होता। पुन तीसरे खण्डके परिणामोंसे ध्रुवस्थिति, एक समय अधिक ध्रुवस्थिति और दो समय अधिक ध्रुवस्थितिका बन्ध होता है । इस प्रकार तीन समय, चार समय और पाँच समय आदि अधिकके क्रमसे ध्रुवस्थितिका बन्ध कराते हुए अन्तिम परिणामखड तक ले जाना चाहिये । पुन अन्तिम खण्डके परिणामोंसे ध्रुवस्थितिसे लेकर एक समय अधिक आदिके क्रमसे परिणामोंके जितने खड हों उतनी स्थितियोंका वन्य होता है. इनसे और जोकि सत्याम स्वितिका वन्ध A मा पन्ध होता है, + - अन्तिम खण्डके लिये जो मागहार ध्रुवस्थितिक पनि साडौंका वन्ध हो प्रमाण नोचेको थि प्रमाण नीचेकाथि प्रमाण नाचेकी यि एक उत्कृष्ट स्थिति अनुकृष्टि नहीं पाई स्थितिके ही बन्धक हो तो वह ६३२, इन कापतो ३ 1 1 परपस परिपिसमिमा म । किसे दिसत ए असंह पपेटमा । पारि साहिरिपरिषी सेवारियमेव दाविण पुर्वीर संहार । सानिया संपन मोर मनस वर्षिय समिदियो। कमिटीका यो वयापारिदिरवारमा गे। को वरिपरसारियासत । सिम्पस समस परिवार ति। ये परिक पासवासीयो की सोमना परिमित समय परिवार काराम परिवािसी बार हो। यो सामी सससरशिप ति एनी thी प०२९ हिदिपिएचीप परपवरिमुबगारसामिर्च एपरिमाबो। समयुवापुगहिरीए पठमपरिनामेहि संसार घुपडिदिविदिपत्रं समापति पुहिरो समवरघुपहिरी वा पनमा, न उबरिमामो। विदिपसंरपरिणामेहि पुहिदितदिवसमापेहि घुपहिही समस्चरपुर हिदो समयुचरघुपडिको प पन्मा, प सपरिमामो । एक दम भाव दुपरिमखर ति । पुपो परिमखरावसापहामोहि समपादिपघुपहिरिप्यारि परिणामामागहारमेचहिदीमो परिमामो पपति व पुष हिदी, धुपहिरिपरिणामेहि परिमखापरिनामा सरिसचामाषारो। एवं बानिप अदम्प भाव बसस्मकस्सहिरि पि । ३१ उपस्वहिरीए परमारपरिणामेहि उपसहिरिप्याति देश परिपामा मागहारमेचहिरीयो गम्मति । विदिपसरपरिवाहि म्पपरिवामसरसमागमेचहिरीमो देहिमामो पन्मति । बरिस्तरपरिपामेहि दुगपरिणामसरसमामामेचहिदोमो देहिमायो बन्नति । एष गणमस्सहिदीए परिमखंडपरिगामेहि समस्सस्विी एका वेष बन्सर । हो, वलरपरिमामा देदिमखरेदि मकडीए ममापादो। वेमेगरिदिपरिपामा परि पखिदोषमस्स मससे मागमेचाय पेर हिदीप पपकारण गोवि, सेप महाक्सएन छु महतो विहिरियसबगारो पसिदोषमस्स असखेरबदिमामो परे वि पेचमो। १३२ परि एदेसि पिविषमसाप'माण परिणामकासो पाप्मेण एपसमय हमसे और सरकी स्थितियों का मही । एक समय मषिक भूषस्पिविके पाले करके परिमाणांसे, मोकि सम्मामें मुगस्पिति सरे मंरके समान है, ध्रुवस्पिर्विम पा एक समय मषिक मुन विविका कम होता है परफी स्थितियाँ नहीं। सुपस्थितिके तीसरे सण्डके समान दूसरे मणके परिणामोंसे मुपस्थितिका एक समय मषिक मुबत्विविका मीर समय भपिक मुवस्थितिका कम होता है। सरको स्विवियोला महा। इसी प्रकार विचरमणको सामा चाहिये । पुन मन्तिम पग नपासानस्वानासे एक समय मषिक मुवस्थिदिसे मेवर परिणामकिसणारनेके लिये गो मागहार पारे प्रमाण परकी स्थितियांज पप दोवा भुषस्थितिका महा क्योंकि भुषस्पिक्केि परिणामकि साय मन्तिम सणारे परिणामांकीसमामवा महा है। इसी प्रकार मानकर मनुस्ट म्कप्ट स्विविके माप्त होने वकडे बाना चाहिये । म त् बिन परिणामोंसे जिन स्थिति बगोमा पाप हो उसका रिचारपरकपन परम्प चाहिए। महट स्विविके प्रथम सग परिणामसे पाटवितिसे मयपरिणामसपकिमागदार प्रमाण मीपेकी रिपवियाँ तीसरे लडके परिणामोंसे एक कम परिणामसणोंकी ताका- ममाय नोचेकी स्थितिमा पतीवीसरे खणारे परिणामोंसे रोम परिणामसापी शणका- प्रमाप मीपेकी स्विविया पदी इस प्रकार मार कष्ट स्विविक मन्तिम सणारे परिणामासे एक मप्र स्थिति दीपपती क्योंकि मन्तिम मणके परिणामोंकी नीचे वाले साप ममुरुष्टि नहीं पाई मादी।कि एक स्पिविक परिणाम सर फल्पोपम भर्सरसाव मागप्रमाण स्विविही मायके भरण होते, मत मसाधयारामदार मी परि मुनगार स्पिविषय होवोपा पम्पोपमरेमसम्पाट भागप्रमानारोग्य ऐसा पहा प्रण करना चाहिये। १२.इन स्थिविषापाप्पषसानरपानोपा अपम्प परिणामकाठ पा समय मौर मष्ट पा प्रतीपाला पिपा। अमात्य रसिमले मामा मापसी - मामामागे मस्यामा । स्पिम्पिायन्समस्यागासे र नपरिराम मासिक मुगिरसे सोम म्मलिलियाई (सम्माभिमुमकिन सरसरकारी विविधिमा सोमसे भूषसिरियन सन्दिय सो परियोंसे मुगलिक लोकमत ३ पा०२२) A ६३५ पाधिया ६३६ बच्चिदो, फालो गमिदो - पढमच्छावडिं ममिय ११ देवेस ३५. . सत्कालं मत एव पेia उकासकालो १८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ हिदिविहत्ती ३ मेचो, उकस्सेण अट्ठसमयमेतो। कुदो ? एगपरिणामप्पणादो । एगद्विदीए सबढिदिवंध- ज्झवसाणट्ठाणेसु अवठ्ठाणकालो पुण जहण्णेण एगसमयमेत्तो, उक्क० एगसमयमेत्तो, उक्क० अंतोमुत्तं । पुणो विसमय-तिसमयादिपाओग्गेहि द्विदिपंधज्झवसाणहाणेहि णिरुद्धगहिदि बंधमाणेण तद्विदि. पंधकाले समत्ते संकिलेसक्खयामावादो तिस्से विदिबंधन्झवसाणहाणेहि समयुत्तरादिकमेण पलिदो० असंखे भागमेत्तद्विदिवियप्पेसु उवरि चडिदण बढेसु अद्धाक्खएण एगो भुज- गारसमओ लद्धो होदि । पुणो चरिमसमए एगढिदिवंधपाओग्गद्विदिबंधावसाणहाणेसु अवट्ठाणकालो समचो । तस्स समत्तीए संकिलेसक्खओ णाम | ६ ३३. एवत्रिहेण संकिरोसक्खएण उवरि समयुत्तर-दुसमयुत्तरादिकमेण जाव संखेज- सागरोवममेतद्विदीणं द्विदिवधन्झवसाणहाणाणि समयाविरोहेण परिणामिय' बंधमाणस्स संकिलेसक्खएण भुजगारस्स विदियो समयो। तदिए समए कालं कादूण विग्गहगदीए पंचिंदिएसुप्पण्णपढमसमए असण्णिद्विदि बंधमाणस्स एइदियस्स तदियो मुजगारसमयो । चउत्थसमए सरीरं घेत्तूण अंतोकोडाकोडिहिदि बंधमाणस्स चउत्थो भुजगारसमओ । एवं मिच्छत्तभुजगारस्स चत्तारि चेव समया। जत्थ जत्थ भुजगारो वुच्चदि तत्थ तत्थ एत्थ परूबिदअत्यो परूवेयव्यो। * अप्पदरकम्मसिनो केवचिरं कालादो होदि ? ३४. सुगममेदं। आठ समय प्रमाण है, क्योंकि यहाँ एक परिणामकी मुख्यता है । परन्तु सब स्थितिबन्धाध्यवसान- स्थानोंमें एक स्थितिका अवस्थानकाल जघन्यसे एफ समय और उत्कृष्टरूपसे अन्तर्मुहूर्त होता है। पुन दो समय और तीन समय आदिके योग्य स्थितिबन्धाध्यवसानस्थानोंके द्वारा विवक्षित एक स्थितिको बाधनेवाले जीवके यद्यपि उस स्थितिबन्धका काल समाप्त हो जाता है तो भी सक्लेशका क्षय न होनेसे उस स्थितिके स्थितिबन्धाध्यवसानस्थानोंके द्वारा एक समय अधिक आदिके क्रमसे पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण स्थितिविकल्पोंके ऊपर जाकर बन्ध होनेपर अद्धाक्षयसे एक भुजगारसमय प्राप्त होता है। पुन अन्तिम समयमें एक स्थितिबन्धके योग्य स्थितिबन्धाध्यवसान- स्थानोंमें रहनेका काल समाप्त होता है। उसकी समाप्तिको सक्लेशक्षय कहते हैं । ६३३ इस प्रकारके सक्लेशक्षयके द्वारा ऊपर एक समय अधिक और दो समय अधिक आदिके क्रमसे सख्यात हजार सागरप्रमाण स्थितियोंके स्थितिबन्धाध्यवसानस्थानोंको यथाविधि परणमाकर बन्ध करनेवाले जीवके सक्लेशक्षयसे भुजगारका दूसरासमय होता है। तीसरे समयमें जो एकेन्द्रिय मरकर विग्रहगतिसे पचेन्द्रियोंमें उत्पन्न हुआ है वह वहाँ उत्पन्न होनेके पहले समयमें असझीकी स्थितिका बन्ध करता है तब इसके तीसरा भुजगार समय होता है। तथा चौथे समयमें शरीरको ग्रहण करके अन्त कोड़ाकोडीप्रमाण स्थितिका बन्ध करनेवाले उस जीवके चौथा भुजगार समय होता है. इस प्रकार मिथ्यात्वसम्बन्धी मुजगारके चार ही समय होते हैं। आगे जहाँ जहाँ भुजगारका कथन किया जाय वहाँ वहाँ यहाँ पर कहे गये अर्थकी प्ररूपणा करनी चाहिये । * मिथ्यात्वके अल्पतरस्थितिसत्कर्मवाले जीवका कितना काल है ? ६३४ यह सूत्र सुगम है। मा० प्रती परिणमिय इति पाठ । con ६३७. धन्य ६२५.५५ नीचे उतरकर । M फरता है तो - * उत्कृष्ट ६३६. उसका स्थितिका बन्ध येत्य सर्वोत्कृष्ट व्यवीव करके वहाँ पर बीवनमें काळ तक भ्रमण दूसरी बार ७५ . बाकर एकवीस बोर बद्दी यथा वह गुण एक सौ नेसठ पर । ६३७. यह र F १९ पिरितिर ।। एमवीर समर्वरिश वो सब बताई। पस्टेपवादिषयाच पदी पसाबाबेरि समाचार परम पावस एम पायोम्मतिसिवासपाच THI इसमपुरामस्येव बासि पग परिवामिरमास मए पसभापरिमार मस्स परियो समय। मस उत्सो सम तरमतो पुलिस गा०२२) हिदिपिएचीप चरपरिममगारसामि जापणेष एगगममो। ३५ छो! समगारमपहिद मो कोमाग एगसमप संतस्स रे ओदरिदन पपिप पिदियसमए रबमारे महायाबदे मापदरस्स एमसमपटपलंमाए। • सहस्सेष सेपहिसागरोवमसव सादिरेय । एको लिरिक्सो मगुस्सो वा मियापही एग हिदि पपमापो मष्टिदो, विस्से हिदीए पंपमान सम्मकस्सो वप्पामोम्पो तोमरमेचो मापदर कासो ममियो । पुणो से काले हिदिसतकर्म योसेदर महिदि पि कार्स बाप विपम्दिोमिएस सपणो । पुमो तस्य मंतोपाचागसेसे वीविदम्बए नि सम्मच पेषण परमादि ममिय सम्मामिपच परिवतिय पुनो वि सम्म पेचन विदियछापति ममिय अबसाये तप्पामोरंगपरियामेण मिष्ठच गंतूप एनसीमसामरोपमहिदिएस देवेस हवाष्णो । पुगो कार्स हादून मस्सेमाबविजय पाल सक ताव बतो. पाचकरस पतकम्पस्स हेडा पपिप पुनो संक्षिसेस परेप समगारविचिसो पादो। पप येतोपाचेहि तिहि पसिदोषमेहि य सादियोपहिसागरोषसदमप्पदरस्स एससकादि। अबधिवकम्मसिपो केवचिरं काखावो शेवि ! ६३७ मुमममेद जागणेष एगसममो। अपनप कास एक समय है। ३५. क्योंकि मुमगार पा प्रबस्वितको परमेवासा कोई एक बीब एक समयके सिपे सलमसे मीचे वरकर स्थितिम वन्य पुन' दूसरे समपमें परि मुनगार पा परस्मित विकासको करता है वो उसके मस्पतरका एक समप का मन होता है। .उस्कर काम सापित एकसौ प्रेसठ सागर है। ३१ प्सका अगसा इस प्रकार है-कोई एक विर्यच या मनुष्य मिप्याप्ति बीच एक स्विविय कम करवा हुमा विपमान है। पुनः स रिपतिके मीरे बम्प रते हुए उसने सके बोप सर्वोत्कृष्ट मन्तमुहम्ममाण मापवरच काम विठामा । पुन वनन्तर काम में स्पितिसकर्मी म्पवीत पर नप करेगा इसपि मरकर परवीन पम्पकी मापुषामेवीपोंमें असम मा । पुम माँ पर जीवन भन्यौहर का क्षेप यने पर सम्पत्वको प्राण र मोर पारेमासठ सार कार प्रमण करके सम्पम्मिम्पावडो प्राप्त किया। वबा फिर मी सम्परवको प्राणरके दूसरी बार पासठ सागर कामदक प्रमण परफेभन्दम मिम्पास्के पाम्प परिणामांसे मिम्पास्वम भाकर पणवीस समप्रमाण स्विविधा पम उपहमा। पुनः मरकर मनुष्यों में सम मा और पहा पचासमव मनमाम्य पत्कम मीचे कप फे पुमा संम्पको प्राप्त होर पर मुबम्परस्विविषिमधिमाग होगा। इस प्रकार दो बम्हमत भौर टीन पम्पसे मषित एक मौसठ मार मापवर स्विविधिमनिष्ट कास प्रत हो। मिप्यास्तक भास्पिवस्पितिषिमडियाले चीवड़ा खिना काठी! १२. पासूत्र गम है। अपनप काठ एक समय है। । परनु सास्सिविलायला Rsपहल होगी। पासवानों समास होगat समग अपिल गारमे पर काम बोल सिरिमानावर समवे। रधिकोसमशिनी पसाबसानोमावियाम होसाई। वीसरे समोर सोनपोसम बालासर सामुम्र म । अमेगासिम सभी पाये। मिला पहना 1 गा०२२] बदा। पुत्रो गारसमया । कमाया । . घेवण सा उकासेग - पये पर ६४२ बसेसे पाउ, स पवरण सव्वासि चेन प्रयो समया। पयो पुणो २० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ ६ ३८. फुदो ? भुजगारमप्पदरं वा कुणमाणेण एगसमयसंतसमाणहिदीए पपदाए अवट्टिदस्स एगसमयुवलंमादो * उक्कस्सेण अंतोमुहत्तं। ६ ३९. कुदो ? भुजगारमप्पदरं वा कादूण संतसमाणद्विदिवंधस्स उकस्सेण अंतोमहत्त- मेत्तकालुवलंमादो * एवं सोलसकसाय-णवणोकसायाणं । ६४०. जहा मिच्छत्तस्स भुजगार-अप्पदर-अवहिदाणं परूवणा कदा तहा सोलकणवणोकसायाणं भुजगार-अष्पदर-अवद्विदाणं वि परवणा कायया । एस्थतण. विसेसपरूवणमुत्तर सुत्वं भणदि । * पवरि भुजगारकम्मसियो उकस्सेण एगणवीससमया । ६ ४१. जहा-सत्तारस समयाहियएगावलियसेसाउएण एडदिएण अणंताणुबंधि- कोघं मोत्तण सेसमाणादिपण्णारसपयडीसु परिवाडीए पण्णारससमयेहि अदाक्खएम अण्णोण्णं पेक्खिय वष्टिय बद्धासु पण्णारस वि पयडीओ भुजगारसंकमपाओग्गाओ जादाओ । पुणो बंधावलियमेत्तकाले अदिक्कते सचरससमयमेचाउअसेसे पुवुत्तावलिय- कालम्मि पढमसमयपहुडि पण्णारससमएसु वड्डिदूण पद्धपण्णारसपयडिढिदि बंधपरि- वाडीए अणंताणुवंधिकोघे संकममाणस्स पण्णारस भुजगारसमया अणताणुबंधिकोषस्स ६ ३८ क्योंकि भुजगार या अल्पतरको करनेवाले किसी जीवके द्वारा एक समय तक सत्तामें स्थित स्थितिके समान स्थितिका बन्ध करने पर अवस्थितका एक समय काल पाया जाता है। * उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है। ६३६ क्योंकि भुजगार या अल्पतर करके सत्तामें स्थित स्थितिके समान स्थितिके निरन्तर बंधनेका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त पाया जाता है। इसी प्रकार सोलह कषाय और नौ नोकपार्योका काल जानना चाहिये। ६४० जिस प्रकार मिथ्यात्वके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित भगोंका कथन किया है उसी प्रकार सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके भुजगार, अल्पतर और अवस्थित विकल्पोंका कथन करना चाहिये । अब यहाँ पर विशेष कथन करनेके लिये आगेका सूत्र कहते हैं- * इतनी विशेषता है कि भुजगारस्थितिविभक्तिवालेका उत्कृष्ट काल उन्नीस समय है। $ ४१ उसका खुलासा इस प्रकार है-जिसके सत्रह समय अधिक एक आवलिप्रमाण आयु शेष है ऐसे एकेन्द्रियके द्वारा अनन्वानुवन्धी क्रोधको छोड़कर शेष मान आदि पन्द्रह प्रकृतियोंके क्रमसे पन्द्रह समयोंमें अद्धाक्षयसे एक दूसरेको देखते हुए उत्तरोत्तर स्थितिको बढाकर बाँधने पर पन्द्रह ही प्रकृतियाँ मुजगारसक्रमके योग्य हो गई । पुन. बन्धावलिप्रमाण कालके व्यतीत हो जाने पर और उस एकेन्द्रियके सत्रह समयप्रमाण आयुके शेष रहने पर पूर्वोक्त आवलिके कालके भीतर समयसे लेकर पन्द्रह समयोंमें घढ़ाकर बॉधी हुई पन्द्रह प्रकृतियोंकी स्थितिको जिस क्रमसे पन्ध हुआ था उसी क्रमसे अनन्तानुबन्धी क्रोधमें सक्रमण करनेवाले नीवके अनन्वानुबन्धी क्रोधके पन्द्रह भुजगार समय प्राप्त होते हैं। पुन सोलहवें समयमें अद्धाक्षयसे अनन्वानुबन्धी क्रोधको १ ता. प्रती-बंधिकोध इति पाठा बहा बीवे नि पदाकर पौधने बन्धी कोषके मोड़ाके द्वारा अठारह मुन जीवके उनीस । सनीस मुनगार समयोंका जिस एकेन्द्रिय - प्रथम समयसे पदाकर स्थितिका वन्ध फा नो नोट मुजगार समय झियोंकी की प्रथम शरीर प्रण- समय होते हैं। समयोंका पा .

[सय सिरसम्ममापीर मार "Rस्स समोर शिपल्या प्रामा मायाममा। सीससम्पा। उस्म रारिएका पचारमरियासत मोजो हमारसंभागायो ममरवाउमसे नमामि प्राचारसम्म स्मारम्परा स्पानिपत गा० २२] हिदिमिरचीप पचरपडिभुजगारसामिर्च २१ पदा। पुनो सोशससमपम्मि प्रदासपण भावापिफोघेग परिवण बढे सोसस सम पारसमपा । पुणो सचारससमर सकिसक्सएम मणवाशभिकोपेण सह सम्पेसि समापार्ण पहिरण पदे सचारस समपारसमपा | पुणो कार्स का ग एगविग्गण सप्पोमुप्पणपरमंसमए यसम्पिपिरि पंपमापस्स भारत समगारसमपा । पुणो सरोर घेषण सपिहिरि पंपमामास एगूणवीस समगारसमया १९ । बहा अपवायुपंपिडोपस्स एफस्सेण एमपीससमपार्ग परूपमा दा वहा माषादीप पम्मारसण पपडीण पधेय पपेप परिवाडीए पापमा कापमा । १२ पपपोकसापाणे पि एप पेव पचम्म । पारि सचारससमपाहियापलिया बसेसे भाउए बाठियपरमसमपप्पति कोपादियोससकसापाणं परिवारोए भया पपपण सोसससमयमेषकाठ पट्टिन पंपिप पुमो सचारससमप सहिसेसफ्वरम सम्मासि पेज सोससपपडी सागार कादप पुणो रावरियादिवसापदिदि पव पोम्सापापस्वरि संघपरिवारीए सफममागस्स गोकसापाणे सपारस समगारसमया । पुपो एगविगारेण सप्पीपणपउमसमर अमणिहिदि पघमामस्स भारस सबपार समया । पुगो सरीरगरिदपरमसमए सपिहिदि अपमाणस्म एगमपीस समगारसमपा । महा पादिपमस्सिप रणगारस्स एगणवीससमयाग परूपमा कदा वा विगरिदिप मोरे पि मस्सिम कायना। पहार पिने पर साब भुजगार समप होते हैं। पुनः सत्रह समपमें सम्देशमयसे मनन्तामु पम्पी कोप साप सब पापोंडोबहार पोपनेपर सत्रा मुमगारसमपरावे । पुन मरकर पक मोहाकेशारा संक्षिपोम पम होने के प्रथम समपमें भसंक्षियोंकी स्पितिका बाँपनेबारे उस जीरो बठाय मुबगार समय होते हैं। पुमा शरीरको ग्रहण करके संदीक पोम्प स्पितिको मापनमा उस बोरकेमीस मुबगार समय परावे ११९। मम्मे मिस प्रकार भनम्तानुपम्पी गोप साररूपसे मास मुबम्पर समयाँपन किया रेसीप्रकार मानादिक पत्रा महति १९ सुमगार समपोका कमसे मग मलग च्यन करना चाहिये। ४२. नौ मोकपार्यों भी इसीपनर कपन करना पाहिये । पिन्त इवनी विपदाकि मिस पोन्द्रिय जीव भापुमै पत्रा समय मधिक पामावम्पिमाण प्रसपरदेसभापति प्रपम समयसे हर कोपारि सोयरामार्पोका मसे भरामपारा सोग समप पर स्पिति पगारबम्परा पुन भावसि सवाल पमपमें सम्मापसे समासोममवियोंकी मुमरमर स्पिविराम राणे । पुनःम्पावमिकेम्पतीवो गाने पर पन्पामसे उन पापडी स्मिविपर प्रमोनीषणो संकमणरावे। इस बार सम्म परमेबागीपरे मौ मापा' सार मुरगार समप माना है। पुन एक मारेमारा संझियाम रतन धन प्रसम समयमै भर्स- प्रयोगस्पितिको मापनेपाम पूपवर पडेमिय बापरे मठारद मुमगार समय पत। पुनः शरीर प्रण करनपम समपमें सनी पोम्प बिवितो यापनपाछेरस जीरोमीस मुमगार समय होवे है। यहाँ विस प्रकार पन्द्रियों मप टेपर सुरम्मर त्पितिषिमतिमीस समाजशापमणिरेसी प्रकार हिन्द्रिपाराभाभपसर भी पनपना परिस मेलि सम्मानमा गौप्यमत सपमाना। वाची समान पिरि रमावि मोघt सापकर और विधि गयेमस्त मते- रस र আমি ময় रो समानता पेपर मिलिगाम मयमा पर मानिस समितिको रमलेगा साधार 1 म...] पानमंदो - ब। - 1.41 . - २२ जयधवलासहिढे कमायपाहुदे [हिदिविहस्ती ३ ४३. इत्थि-पुरिस-हस्स-रदीणमवहिदकालो कथमुपास्सेण अंतोमुत्तमेचो ? ण, कसायाणमंतोकोडाकोडिसागरोवममेत्तहिदिमवहिदमरूपेण अंतोहत्तं कालं पंधिय बंधाव लियादिक्कतकसायहिदि पुव्युत्तचदुण्डं पयहीणमुपरि अंतोमुत्तं संकामिदे इत्यि-पुरिस- हस्त-रदीणमट्ठिदस्स अंतोमुत्तमेतकालुपलंमादो । एमो अवद्विदकालो कत्थ गहिदो ? सणीसु । कुदो ? तत्य इत्थि पुरिस हस्स-रदीणं बंधगद्धाए बहुत्तुवलंमादो । पारसकसाय- विशेपार्थ- यहाँ सोलह कपायोकी भुजगार स्थितिका उत्कृष्ट काल १९ समय बतलाया है। इसके लिये दो पर्यायोका ग्रहण किया है, क्योंकि एक पर्यायकी अपेक्षा १९ भुजगार समय नहीं प्राप्त होते । ऐसा नियम है कि सोलह कपाय और नो नोकपायोंका परस्परमें सक्रमण होता है। इसके लिये यह व्यवस्था है कि जिस समय जिस प्रकृतिका वन्ध होता है उसमें अन्य सजातीय प्रकृतिका सक्रमण होता है। चूंकि यहाँ अनन्तानुयन्धी क्रोधकी भुजगार स्थितिके उत्कृष्ट कालको प्राप्त करना है अत ऐसा एकेन्द्रिय या विकलेन्द्रिय जीव लो जिसकी वर्तमान आयु एक आवलि और सत्रह समय शेप रही हो उसने पन्द्रह समयोंमे अनन्तानुवन्धी क्रोधको छोडकर शेष पन्द्रह कपायोकी स्थिति उत्तरोत्तर घढा चढाकर बोधी । पहलेसमयमें अनन्तानुयन्धी मानफी स्थितिको सत्तामें स्थित स्थितिसे वढाकर वॉघा । दूसरे समयमे अनन्तानुवन्धी मायाकी स्थितिको अनन्तानुवन्धी मानकी स्थितिसे बढाकर बाँधा इत्यादि । तदनन्तर एफ आवलि फालके व्यतीत हो जाने पर उसी क्रमसे इनका अनन्तानुवन्धी क्रोधमे सक्रमण किया। इस प्रकार भुजगारके पन्द्रह समय तो ये प्राप्त हुए । अव रहे चार समय सो सोलहवे समयमे अद्धाक्षयसे उसने अनन्तानुबन्धी क्रोधकी स्थितिको वढ़ाकर वॉधा । सत्रहवें समयमै सक्लेशक्षयसे अनन्तानुवन्धी क्रोधके साथ सब कपायोंकी स्थितिको बढाकर बॉधा । इस प्रकार भुजगारके सत्रह समय तो एकेन्द्रिय या विकलत्रयके प्राप्त हुए । अब यह जीव मरकर एक विग्रहसे सन्नी पचेन्द्रियों में उत्पन्न हुआ, इसलिये उसने विग्रहकी अवस्थामें असज्ञीके योग्य स्थितिको बढकर वाँधा और दूसरे समयमै शरीर ग्रहणकर लेनेसे सनी पञ्चन्द्रियके योग्य स्थितिको बढाकर वॉधा । इस प्रकार भुजगार के १९ समय प्राप्त हुए। इसीप्रकार अनन्तानुवन्धी मान आदिके और नी नोकयायोके १६ भुजगार समय प्राप्त होते हैं। किन्तु नो नोकपायोंके सम्बन्धमें इतनी विशेषता है कि सोलह कपायोका अद्धाक्षयसे उत्तरोत्तर वढ़ाकर वन्ध करावे । तदनन्तर सत्रहवें समयमें सक्लेशक्षयसे स्थिति बढाकर बन्ध करावे | पुन एक आवलि हो जानेपर इनका नौ नोक- पायोंमें सत्रह समयके द्वारा सक्रमण करावे। तदनन्तर इस जीवको सक्षियोमें उत्पन्न कराकर पूर्वोक्त प्रकारसे दो भुजगार समय और प्राप्त करे । इस प्रकार नौ नोकपायोंके १६ भुजगार समय प्राप्त होते हैं। ६४३. शका--स्त्रीवेद, पुरुपवेद, हास्य और रतिका अवस्थित काल उत्कृष्ट रूपसे अन्त- मुहूर्त कैसे प्राप्त होता है? समाघान--नहीं, क्योंकि जब कोई जीव कपायोंकी अन्त'कोड़ाकोड़ी सागर प्रमाण स्थितिको अवस्थितरूपसे अन्तर्मुहूर्त कालतक बाँधकर पुन' वन्धावलिके व्यतीत होने पर उस स्थितिका पूर्वोक्त चार प्रकृतियोंमें अन्तर्मुहूर्त कालतक सक्रमण करता है तब उस जीवके स्त्रीवेद, पुरुषवेद, हास्य और रतिकी अवस्थितस्थितिविभक्तिका अन्तर्मुहूर्त काल पाया जाता है। शंका--यह अवस्थित काल कहाँ पर ग्रहण किया गया है? मनावान प्रयास न - जिम मुमाबार- बनवार बानमा विगाय- साहेदव मदिरामा नोटिरा बना निपनिक पत्रकार मन्नरपरक विमास नदीप्रत खाएक समान पारसन स्वामान भोला स्थित निकांचा पदा स्थिति, . समाधान--सक्षियोंमें। अन्त ते ५० शका-यह अवस्थित काल सज्ञियोंमें ही क्यो ग्रहण किया गया है ? एक समय है। P दिमि। रहेप मारपेको पंढोसार साल परिप बसा तास हामिद इसिसि । महिपाठो रस पी गानमाहो। वासरा गा९सस । मश १ मुगलसर गार समाचार पता नही पपरसाको शिसभी जनमानसमा न्टनुमन्याचार गन्तनुम्मा पार मिलने सीमापालिकामा मावोबर र मुन्ना समरस गा० २२] छिपिविरचीप ज्वरपपरिमुबगारसामिल पवनोकसायापमुषसमसेडिमि बतरकर काठम सम्मोसमे कदे मपहिरकारो मंदो सचमेचो सम्मदि विहिपहिडीए बिदनिसेगापमबहिराए गसमामवादो सो रिम्प घेपदि ! प, परियायत सम्ममपहिदिसमएम् परिसमय पनमाणे कम्महिए महिमावपिरोहादो । णिसेगेहि महिद बाबसाहरियो पेशादि वि दो कमरे ! सम्मच सम्मामिछवाबमबहिरस्स मतोमुच मोचूम हमसेन एगसमयपरूपयायो अपंतागुपचिपठस्स मपत्तम्ब जाहमणुकस्सेण एगसमभो । समाधान-योकि पहपिर भीवेर पुउपवेर, हास्प और रविका पम्पकाम पार पाया बावा है। का-उपसमभेजीम भन्तररण परके सोपसम कर मेनेपर पाय पाय भौर नौ नोकपार्योका मस्तिवकास मन्समहर्व प्रमाण मास होता है, क्योंकि वहाँपर दिखीम स्पितिर्म स्पित निपेक मवस्मित गते रेनका गम नहीं होता है मत इस भवस्मितकाएका माण स्यों नहीं किया गया है। समापान-मही, क्योंकि यहाँपर पटिकापत्र बम्के समान कम्पकी स्पिति समय प्रत्येक समपमें गमते यते । मत पपिर मस्पितिका मवस्पिवपना माममेमें विरोप भावा है। का-मिपम नाचायने मिपेकौकी मपेक्षा भवस्पिवपनेको स्वीकार नहीं किया है पर कित प्रमाणसे मामा बाया है। समाचान- --गि पशिपम भाचार्यने सम्परत्व मौर सम्बम्मिष्यात्वी स्पिविका सकस मस्थितका मन्मा म पर एक समय मा है। इससे मालूम पड़ता है कि पक्षिपम भाभार्यको निपेकोंकी भपेमा भवस्पितकाछ इष्ट नहीं है। विशेषा-पाव कि कोई जीव पाय पाय मौर नौ मोकपार्योका उपसम पर मेवा दिवस प्राइविटि सब निषेक सम्पमडूर्व काश्तक अवस्थित योरेग्नमें सर्पपण, माविम मी नहीं होता । इसपर पंचर कहता है कि भवस्थित विमतिका महासयों नहीं किया जाता है। इसका बो समाधान किया गया हैम्सका माष परोलिपपपि उमा क्मिकि निपेक मातहते पाकक मवस्थित यते १ का ठीक है फिर भी जिस प्रकार पटिका- पत्रकाबण एक गंगरूपसे प्रति समय पटवा बातम्सी प्रकार उनकी स्थिति मी मवि समय रु एक समय पटदी माती है बॉफिमम्बरकरण परनेले समय नकी जिवनी स्थिति पती मन्दरकरमकी समामि समय पहभन्दा कम हो जाती है मतः उपसममेणिमें अवस्थित निमछि महीं प्राप्त होती । इसपर फिर साकार करावा कि स्थिति मीटती पामो पर निपेठ दो पक समाम बने यतेमव मिॉकी मपेपा यहाँ भवस्थिवधिमकिन बावगी। इसका पीरसेन स्वामीने बो समान किया हैम्सका भाष पहरे कि पक्षिपम माघापने निपेकोंकी मपेपा भवस्थिवधिमकियो नहीं स्वीकार किया है। इसका प्रमाण पाल परिहोंने निपेषकी भपेवा भविवपनेकोस्लीपर किया दोवा वो ये सम्बासमोर सम्पम्मिम्पालकी वितिसए मवस्थितकाम्को एक समयप्रमाण मपर मातम प्रमाण पके, पोंकि एक भन्सार्वकामवानका मी पशममाष रेखा पाता है। मनन्दानुगपीचपटी मषसम्पस्पिविषिमकिका परम्प मौर सहम पस एक समय है। -- नसक्नुमा मोग मिति रामवाससमलिलिये पाकिमसेमारामा मामिला सका र से सीनियोग ।इसपर बनन्धर । रिनोवार समय रगन्मय भारहिवामान में का सचिनी र म मोनोगपरस्त बासित बाहर मोकामा पर मामको र aatra पूर्वप्रायati गामा।

गा०२२] নিরিতি वा पडिवणे होदि. १५ बिवेगानं । सो दिन . iithe कमिएनन सम्मत समए 8 ६४७, . ४८. सम्मप-तमा मिथ्यात्वको प्रथम समयम जयधषलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ६४४. फुदो ? अणंताणु०चउकं णिस्संतीकयसम्माइट्ठिणा मिच्छत्ते सासणसम्मचे तस्स पढमसमए चेव अणंताणु०चउक्कस्स हिदिसंतुप्पत्तीदो। दो असंतस्स अणंताणु०चउक्कस्म उप्पत्ती ? ण, मिच्छत्तोदएण कम्मइयवग्गणक्खंघाण- मणंताणु०चउक्कसरूवेण परिणमण पडि विरोहाभावादो। सासणे कुदो तेसि सतुप्पसी ? सासणपरिणामादो। को सासणपरिणामो १ सम्मत्तस्स अमावो तबत्थेसु असद्दहणं । सो केण जणिदो ? अणंताणुबंधीणमुदएण। अणंताणुगंधीणमुदओ दो जायदे । परिणामपच्चएण। * सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणंभुजगार-अवहिद-अवत्तव्वकम्मसिमो केव- चिरं कालादो होदि ? ६४५ सुगम। * जहण्णुक्कस्सेण एगसमओ । ६ ४६. तं जहा-पुन्चुप्पण्णसम्मचसंतकम्ममिच्छाइटिणा सम्मत्तसंतकम्मरसुवरि दुसमयुत्तरादिमिच्छत्तद्विदि बंधिय गदिदसम्मत्तस्स पढमसमए भुजगारो होदि । समयुत्तर ६४४ क्योंकि जिस सम्यग्दृष्टि जीवने अनन्तानुषन्धी चतुष्कको नि'सत्त्व कर दिया है वह जब मिथ्यात्व या सासादनसम्यक्त्वको प्राप्त होता है तब मिथ्यात्व या सासादनके प्रथम समयमें ही अनन्तानुबन्धी चतुष्कका स्थितिसत्त्व पाया जाता है। शंका--असद्रूप अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी मिथ्यात्वमें उत्पत्ति कैसे हो जाती है ? समाधान-- .-नहीं, क्योंकि मिथ्यात्वके उदयसे कार्मणवर्गणास्कन्धोंके अनन्तानुबन्धी चतुष्क- रूफ्से परिणमन करने में कोई विरोध नहीं आता है। शंका--सासादनमें उनकी सत्तारूपसे उत्पत्ति कैसे हो जाती है ? समाधान--सासादनरूप परिणामोंसे। शंका-सासादनरूप परिणाम किसे कहते हैं ? समाधान-तत्त्वार्थो में अश्रद्धानलक्षण सम्यक्त्वके अभावको सासादन रूप परिणाम कहते हैं। शका-वह सासादनरूप परिणाम किस कारणसे उत्पन्न होता है ? समाधान-अनन्तानुबन्धीचतुष्कके उदयसे होता है। शंका--अनन्तानुबन्धीचतुष्कका उदय किस कारण से होता है ? समाधान-परिणामविशेषके कारण अनन्तानुबन्धीचतुष्कका उदय होता है। * सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यास्वके भुजगार, अवस्थित और अवक्तव्य स्थिति- विभक्तिवाशे जीवका कितना काल है ? ६४५ यह सूत्र सुगम है। * जघन्य और उत्कृष्ट कान एक समय है। $ ४६ उसका खुलासा इस प्रकार है-जिसने पहले सम्यक्त्वसत्कर्मको उत्पन्न कर लिया है ऐसा कोई एक मिथ्यादृष्टि जीव जय सम्यक्त्वसत्कर्मके ऊपर दो समय अधिक इत्यादि- रूपसे मिथ्यात्वकी स्थितिको बाँधकर सम्यक्त्वको प्रहण करता है तब उसके सम्यक्त्वके ग्रहण करनेके प्रथम समयमें सम्यत्वकी भुजगारस्थितिविभक्ति होती है। प्रथा एक समय अधिक વિના, भवस्थित रहते होता है, उसे म रहनेपर M . प्राप्त हो जायगा निपेक द्रव्य है शिन भिन्न है, ऐसा मिथ्याष्टि समयमै ५७ सम्यग्मिथ्यात्व काल एक समय हिसना का बघन्य ६५८ ५५ बब . सम्यक्त्व और ४ [शामि। पनिमा पिउने सामामा रस्स हिसिनुपरहो। सो दरप म्यापन सास हो मिसनुम! ममारो दमोतु बना। संभोगाइको हो बलदे। रसमसम्मसि परिपा सम्मासस सर सपोहोरि । समस पनिससरीयस सामान गा०२१] छिपिपिराचीए परपरिमबंगारियो मिपाचाहिर्षि पपिप गहिदसम्मचस्स परमसमेए महिलपिहचीए फागो एगसममो होरि रिदिपसमए मप्पारमिचीए समुप्पचोदो। उसमसम्माए इसपतिपरिदीए पिसेमा पिरियडिदोए बहिराम गरुमामागदो भवहिदकालो मोस्चमेचो सम्मा, सो किन गरियो ! प, सिम कम्माण कम्मतिविसमएस बसमयं पसमापेस हिदीए मेगावपिरोपादो। व पिसेमा हिदिचमस्पि, दमस्स पम्पमापपिरोहादो। निस्संत कम्मिएन मिनापहिषा सम्म गरिदे पगसमयमबचमा छोरि, पुम्बमरिग्यमान. सम्मच-सम्मामिपचतिदिसंवागमेगि समुपचोदो । तस्स फाठोएगसमको क्षेत्र, विदिप समए अप्पदरसमुप्पचोदो। अप्पपरकम्मेसिमो केचिरं कालावो होपि। ६४. मगर्म । जाएपेण अंतोमात्त। ११८ हो! निस्सठकम्मिएम मिडिया परमसम्मच पेच्प परमसमए सम्मच-सम्मामिपचायमचम काइप पिदियसमए मपदरं करिस सम्ममाम्मेवो मिम्पालकी स्थितिको पॉपर मिसने सम्पसको पहन किया है उसके सम्यक्त्वक महण परमे मबम समबम सम्मपत्तीमबस्विवषिमलिन का एक समप मास होता क्योकियूसरे समपर्मे बस्पतरविमचिपच हो जाती है। पका-पसमसम्पावके प्रतमें तीन पनमोहनीयकी स्थिति निपेक शिवीय स्थितिम बस्थित गते मत ना गान नहीं होनेके कारण भाविकास मन्तप्रमाण प्राप्त होवा से पाक्यों माहीं प्रहण किया। समाधान-महाँ पोंकि वहाँपर वीनों कमाकी कर्मस्थितिके समान प्रत्येक समयमै गते पनेपर मिवविध भवस्थान माननेमें विरोध पाता है। पदिमा पाप कि निपेकॉको स्थिविपना माप्त हो बाषगा सो मा पाव नही है क्योकि एम्पको पर्वापरूप मानने में विरोषनाता है।भर्यात् मिकाम्य भोर मका एक समयका कर्मरूपया मावि पर्याय है। पिम्पसे पर्वाप कम- बित् मिम्नमव पर्याय विचारमें इम्पको स्थान महा। जिसके सम्यक्त्वम्मेकी सचा नाही? पेसा मिपाधि जीवन सम्परत्वको प्राण करता है पासो सम्पपबमाण परके प्रबम एमपमें एक समयकामयाम्पस्विधिविमचि होतीयोंकि परमविपमान सम्मान और पपरिमपावके स्विक्सिरवकी इनके पति ऐसी बाती है। इस परकम्प स्विनिरिमतिका का एक समय दीपोंकि दूसरे समपम मापवर स्विविधिमचिरफान हो पाती है। • सम्परत और सम्पम्मिमासके अपवर स्थितिषिमहिमपर्मपाले जीवन जिवना का। पासून मुगम है। अपनप का अन्तर्व है। ६५८ क्योंकि बिसकेसम्पल भौर सम्पग्मिपालमा सत्व नहीं है पेसा मिन्यायिनीय बब प्रपमोपलमसम्मानको प्राण वा सो सम्परत्व प्राण रमे प्रथम समयमै सम्माल और सम्परिमम्पावको मबस स्विविधिमचि होती है। बापूसरे समरसे मापवर स्विविषिमणिको मारम्भ विन्मुमन्य कारण पनि समोरनीयका पर - सिहोगा। सिसमानुपी दी है। बमारा सासमार सरा ममय होय है। मानिस में सालसम्म मोमसोममर मा किहोगालामा .

गा० २२] बइ० अंतोम एमसमको। समया। . N घमाणस द्विदि पदि। समादो। तिम्णि समया माणस वे सम उ । , . २६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहची ३ महुचेण दंसणमोहणीए खविदे अप्पदरकालो जह० अंतोमुहुत्वं होदि । ॐ उकस्सेण वे छावहिसागरोवमाणि सादिरेयाणि । ६४६. तं जहा-णिस्संतकम्मियमिच्छादिविणा सम्मत्ते गहिदे उवसमसम्मचद्धा समयणमेत्ता अप्पदरकालो होदि । पुणो वेदगसम्मत्तं घेत्तूण तेण सम्मत्तेण पढमछावष्टि गमिय पुणो सम्मामिच्छत्तं पडिवज्जिय तत्थ अंतोमुहुत्तमच्छिय वेदगसम्मत्तमुवणमिय तेण सम्मत्वेण विदियछावहि गमिय पुणो मिच्छत् गंतूण पलिदो० असंखे०भागमेण सव्वुक्कस्सुव्वेल्क्षणकालेण सम्मत्त-सम्मामिच्छत्तेसु उव्वेलिदेसु वेछावद्विसागरोवमाणि पलिदो० असंखे०भागेण सादिरेयाणि सम्मत्त सम्मामिच्छत्ताणमुक्कस्सप्पदरकालो। एवं जइवसहाइरियसुत्तमस्सिदूण ओघपरूवणं करिय संपहि उच्चारणमस्तिदूण भुजगारकाल- परूवणं कस्तामो। ६५०. कालाणुगमेण दुविहो णि सो-ओघेण आदेसेण य । ओघेण मिच्छत केवचिरं कालादो होदि ? नह० एगसमओ, उक्क० चत्वारि समया । अप्पदर० केव० १ जह० एगसमओ, उक्क० तेवद्विसागरोवमसदं सादिरेयं । अवढि० केवचि० १ जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमुक्षुत्वं । सोलसक०-णवणोक. भुज० जह• एगसमओ, उक्क. एगुणवीस समया । अप्पदर-अवडिदाणं मिच्छत्तभगो। अणताणु०चउक्क० अवचव्ब० जहण्णुक्क० एगसमयो । सम्मत्त-सम्मामि० भुज० अवढि०-अवतव्ब० जहण्णुक्क० एगपो । अप्पद० देता है तो उसके अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त प्राप्त होता है। * उत्कृष्ट काल साधिक दो छयासठ सागर है। ६ ४९ उसका खुलासा इस प्रकार है-जिसके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व कर्मका सत्त्व नहीं है ऐसे मिथ्यादृष्टि जीवके सम्यक्त्व के ग्रहण करनेपर एक समयकम उपशम सम्यक्त्वका काल अल्पतरकाल होता है। पुन वेदकसम्यक्त्वको ग्रहण करके और उस सम्यक्त्वके साथ प्रथम छयासठ सागर काल बिताकर तदनन्तर सम्यग्मिथ्यात्वको प्राप्त होकर और वहाँ अन्तर्मुहूर्त कालतक रहकर पुन वेदकसम्यक्त्वको प्राप्त करके और उसके साथ द्वितीय छयासठ सागर काल बिताकर पुन' मिथ्यात्वको प्राप्त करके जब वह पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण सर्वोत्कृष्ट उद्वेलनाकालके द्वारा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी उद्वेलना कर देता है तव उसके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका पल्योपमके असख्यातवें भाग से अधिक दो छयासठ सागर प्रमाण अल्पतर काल होता है। ६५० इस प्रकार यतिवृषभ आचार्य के सूत्रके आश्रयसे ओघका कथन करके अव उच्चारणाके आश्रयसे भुजगारकालका कथन करते हैं-कालानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका हे-ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश । उनमेंसे ओघकी अपेक्षा मिथ्यात्वकी भुजगार स्थितिविभक्तिका कितना काल ? जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल चार समय है । अल्पतर स्थितिविभक्तिका कितना काल है ? जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल साधिक एकसौसठ सागर है। अवस्थित स्थितिविभक्ति का कितना काल है ? जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है । सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकीभुजगारस्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एकसमय औरउत्कृष्टकाल उन्नीस समयहे। अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका भग मिथ्यात्वके समान है । अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्टकाल एक समय है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार, १ ता० प्रती - मुहुरो होदि इति पाठः । एगसमओ, उस अवस्थित और स्थिविविमतिका प्रकार त्रसस कि बस और काल एक समय विशेषाधे दघन्य काल बन नाता है, . है उसके प्रसन स्थितिका बघन्य ६५९.मा. है। वन्यकाल है-जो असही क्ष्यसे एक बाँधते हुए उसके शंका- सम N घृद्धि पाई जाती वथा चौथे - नारकिया और पर प्रधानरूपसे मुल कमा नौ नोकपायोंकी ४५ [लिपि बोरि। (पापि। मचे पाद उमाण (वेन सम्मरुप मा चपचिप वेदसामना नूप परियो बसोबास मिस कामावरोधी पाठवायाप्तमातो। समयसिम स्मरण गरसेव । गोप मिपा. समरा । बा! पिप सम एपसमय, बसपा पापामगार जापुरसमो। दोस। मा० २२] द्विविपिरचीए तरपरिमुबगारकागे बा० भदोस०, उक. पेगपहिसापरोलमाणि सादिरेयाणि । एवं स-सपन्य. बासु मासिहिया चि। पारि पस-यसपगा. सम्म० सम्मामि• मप्पद. पा. एपसमयो। १ मावेसेप देशपम मिश्छत्स्स समर मा० एमसमयो, एक तिमि समया । बा-असपिपषिविपस्स दोविग्गाई कान पराएमु उबरबस्स विदिप समए मदाबएम एमो सममारसमबो । तबियसमए वहिरिपरिणामेहि पेय सम्पितिदि पंपमापस्स विदियो एबमारसमयो। संकिकेससएम विमा वदिपसमए कप सम्मि विवि पनि ! प, सफिसेसेब विषा समितिविपनादिमस्सिप हिदिषयगडीए म संमायो । पसत्वसमए संकिकेसस्सएम तदियो मुबगारसममो । एवं मिणचमबगारस्स विधि समया परुक्दिा । महमा अवाक्सएप संफिसेसम्सएप व बहिब प. मापस्सने समया । एस पाटो एत्व महापमान पेचमो। बप्पदर० पा. पगसमयो, पेचीससागरो० देनापि । महिर भोप । पारसक-परबोफ. एम. .. एमसमभो, सक. सचारस समपा । महारससमपमेचमबगारकालो किमेव गोवसम्मदे ? भवस्थित मौर मपम्प स्विविविमचियोमबम्ब भोर कम्त एक समयो । तवा मम्पवर स्विविविमतिका बमबकास मन्तमा मौर काम साधिक पकाची पचीस सागर है। इसी प्रचार प्रस, अस पर्याप्त मनपसनबाडे मोर मममी बानना चाहिये । किन्तु इन्नी पिपता किस और इस पर्वालकॉम सम्बत्व और सम्पम्मिन्बावकी मस्पर स्थितिषिमणिका बापम्प एक समय है। पिपाप-पपपि भोपसे सम्बपत पौर सम्पम्मियात्वकी पापपरस्विविधिमकिन बसम्म काम मान्मार्तसेम्म प्राप्त नहीं होता तो भी इस भौर प्रसपर्याप्त बीपों पर एक समय पन चावास्योंकि मिसके सम्बस्व मौर सम्पत्तिमम्बालकी मनामें पासमप प य गवा हैसके त्रस मोर सपर्याप्त काम पम होनेपर सम्पात मीर सम्पग्मिम्पावकी मस्पर स्थिति बपन्य का एक समय रेखा बाता है। १५१ मादेषकी अपेक्षा नारकिर्योम मिम्बावकी मुबगारविविषिमचिया पिवना का है।बपत्यका एक पमय भौर कासार वीन समय है। सलाम तीन समय इस प्रकार -बोगसंधी पंचेमिरवीषयो मोडेर मारपियाम पम मासकेपूसरे सममम मा पक्से पक मुबगार समय होता है। तीसरे समबमें लिक्लेिम्सीपरिणामसे ही बीकी स्थितिको पॉपलेस सोसरा सुजगार समय होता है। शंका-सापपके बिना तीसरे समपर्म या बीच समीकी बिपिको कैसे पॉपवा है। समापान-मोकिमो बिना मंत्री पचनिय बावित निमिच्से म्स लिविन्द दिपाईबावी। बापौये समयमै समसमयसे सके तीसरा सुबगार समय होता है। इस प्रभार पारविनि मिनातकी सुबगारस्मितिले वीम समापन किया। अपना भवाब मौर सकसमापसे स्मिति महामांगनेवाले नारकीके दो सबगार समय होवे है। यह पाठ पहा- पर प्रधानरूप मेना चाहिये। भापकर स्थितिविमचिम बपम्पका एक समय मौर मामा प्रम देवीससागर है। मवस्मित स्मिविविधिता समोपके समान है। बायकाय और मोमोष्पापांकी मुबगार दिपविषिमस्बिपन्यास एक समय मोरयामा समसमय है। . समम्मिमा हेमरस सोसल और गौरपबिहार रापासठ सम्पर हरिक समाप सायम पम्प समातरम्पविराम श्यप बासरसोर। मोरयारको पानिपोरोपनी पार स्थितिविमविमसि मारमसिविप्रिमियम Bसापरासाविििा ममी है। सोमवार रानव समगार है। चानुनमान तबार सम्मास्मिाता 7 1 -- . गा पनमोर० बक्तापुनः एमन, पत्रिदोजनाम बा. निमिति ६११.५॥ - . - . HI. 19- HOME पाहिरिनु. और न be अरना मानी विवार कुछ करतान २८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ ण, अट्ठारसमस भुजगारसमयस्स विचारिज्जमाणस्साणुवलंमादो। अप्पदर०- अवविद० मिच्छत्तमंगो। भणंताणु०चउक० एवं चेव । णवरि अवत्तम्ब० ओघं । सम्मत्त०-सम्मामि० अप्पद० जह० एगसमओ, उक्क० तेत्तीसं सागरो०देसूणाणि। सेसमोपं ६ ५२. पढमपुढवि० एवं चेव ।' णवरि सव्वेसिमप्पद० जह० एगसममो, उक० सगढिदो देसूणा । विदियादि जाव सत्चमि ति मिच्छत्त० भुज० ज० एगस०, उक. समया । अप्प० ज० एगम०, उक० सगसगहिदी देखणा । भवढि० पोषं । बारसक.. शंका-यहॉपर अठारह समयप्रमाण भुजगारकाल क्यों नहीं प्राप्त होता है ? समाधान-नहीं, क्योंकि अठारहवाँ भुजगार समय विचार करनेपर वनता नहीं, अतः यहाँ उसे स्वीकार नहीं किया है। बारह कषाय और नौ नोकपायोकी अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका भंग मिथ्यात्वके समान है। अनन्तानुवन्धीचतुष्कका कथन इसी प्रकार जानना चाहिये । किन्तु इतनी विशेषता है कि अवक्तव्य स्थितिविभक्ति ओघके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्ट काल कुछ कम तेतीस सागर है। शेष कथन ओघके समान है। विशेषार्थ-सामान्यसे नारकियोंमें मिथ्यात्वकी भुजगार स्थितिका उत्कृष्ट काल तीन या दो समय घटित करके बतलाया है । साथ ही यह सूचना भी की है कि यहाँ दो समयवाला पाठ प्रधान है । मालूम होता है कि यह सूचना बहुलताकी अपेक्षासे की है । एक तो असही जीव नरकमें कम उत्पन्न होते हैं। उसमें भी पहले नरकमें ही उत्पन्न होते हैं। फिर भी सर्वत्र भुजगार स्थितिके तीन समय प्राप्त होना शक्य नहीं है । हाँ दो समय सातों नरकोंमें प्राप्त होते हैं। यही कारण है कि वीरसेन स्वामीने दो समयवाली मान्यताको मुख्यता दी। तथा नरकमें वेदकसम्यक्त्वका उत्कृष्ट काळ कुछ कम तेतीस सागर है, अत इस अपेक्षासे वहाँ मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्ट काल कुल कम तेतीस सागर प्राप्त होता है। इसी प्रकार अन्य प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्ट काल जानना चाहिये । तथा किसी भी विवक्षित कषाय और नोकपायकी भुजगार स्थितिके नरफर्मे सत्रह समय ही बनते हैं, क्योंकि सक्रमणकी अपेक्षा पन्द्रह, अद्धाक्षयको अपेक्षा एक और सक्लेश- क्षयकी अपेक्षा एक इस प्रकार एक भवकी अपेक्षा भुजगार के कुल सत्रह समय ही प्राप्त होते हैं। सामान्यसे जो भुजगारके उन्नीस समय बतलाये हैं वे दो पर्यायोंकी अपेक्षा घटित किये गये हैं। पर यहाँ केवल एक नरक पर्यायही विवक्षित है, अत सत्रह समयसे अधिक नहीं बनते । यही कारण कि वीरसेन स्वामीने नरकमें भुजगारके अठारहवें समयका भी निषेध कर दिया है। किन्तु नौ नोकषायोंके सत्रह समय घटित करनेमें जो विशेषता ओघप्ररूपणामें बवला आये हैं वह यहाँ मी जान लेनी चाहिये। ६५२ पहली पृथिवीमें इसी प्रकार जानना चाहिये। किन्तु इतनी विशेषता है कि यहाँ सभी प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल' कुछ कम अपनी स्थितिप्रमाण है। दूसरी पृथिवीसे लेकर सातवीं पृथिवी वकके नारकियोंमें मिथ्यात्वकी मुजगार स्थितिविमक्ति- का जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल दो समय है। अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य- काल एक समय और उत्कृष्टकाल कुछ कम अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है। तथा अवस्थित स्थितिविभक्तिका काल ओषके समान है। बारह कषाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार स्थिति- स्पितिमानहा कारवाहा के मिथ्यातको नरमें तो नाम होता है, मत ६२३.. स्पितिविरिका स्थितिविमटिका अत्तवरवाया समान है मोर स्वाटकार विमा कालचार समय साधिक तीन स्थिति हो होता अन्तर्मुहूर्त और प्राप्त हो वावा कुछ कम वोन है, क्योंकि मेष कयन ए + ६५४ -- २६ + . Go . यसाधासमारो। बार- । बार बारमार। संसायो रेखामा र मा. मा. समाये •... एस. सामाोि। बस ०२२] हिदिपिदचीप सरपथरिमुवगारकायो परगोक• स्व० ० एमस., सक• सुचारस समपा। सेस. मिपाचर्मगो। वर्षवाशुपक एव । परि बबच मोप। सम्मच-सम्मामि• अप्प. एपस०, उप. सपदिदी रेष्पा । सेस भोप । १३ विरिक्स० मिष्कर• सम० बोष । अप्प. म. पगस, उक० तिष्णि परियोक्माणि पादिरेयामि । महि. भोपं । पारस बमोक० जणवायु-पक. मम मिष्ठचर्मयो। सेस. मोर्ष । सम्मच-सम्मामि. अप्पर .ए मस., तिम्पिपसि. १२० । सेसमोपं । Se पपिदियतिरि०-पंपि०तिरिक्सफ्य-पवि०तिरिमोमियीस मिष्ठ-सोस- उप० प्रिय होता है। पर समस्या मासिव सिनिमविषा सर एनापारे । । सम्पत और सममिवार रएecti । र मिनिसरासर 10th मेयो बाम । सामुमर HTRA मानकर मनालीराम समिकर पारिवासिम सिलिन माय मुम्पर मर्म मान्सर tamil गोपेशा।। सबसे महिनामा ममारियIRE हमपासीमा विमक्षित बपम्पका एकममप मौरसका सा समय है।वया झेप भरपर भीर मपस्पिव स्पिविषिमयिका मंग मिम्पायरे समान है। मनन्तानुबन्धी चतुफापन इसी प्रकार बानना पाहिए। विश्वनी विशेषता है किमबचम्पस्मिविषिमतिका का मोपके समान है। सम्पाव भीर सम्पम्मिप्यारी मापवर स्पितिविधिका अपम्पका एक समप भौर काम अपनी मपनी हर स्मितिप्रमाण है । तपाप स्पिविधिमनियोका काड मोपले समाम है। पिशार्प-सामापसे मारपिकि सब प्रवियोंकी बस्पर स्पिविता करार पपपि सम्म देवास सागर पडा मापे पर प्रपमादि नरकॉम पाम भपनी भफ्नी कर स्थितिप्रमाणही प्राप्त रोता कि मिस नरफकी बितनी र स्पिति होगी ससे कम प्रडकही स नरसा मारकी मल्पवर स्पिविकेसामगसकता है। पा सामान्बसे मारपियों मिथ्यावही मुमगार स्थितिका मोम काम तीन समय पापो समय बचाया पापा नरम यो मविप्रा बन चावा किन्तु दितीपारि नरकॉमें भसंबी बीच मरकर महापा होता है मत यहाँ पीन समयमा विकास महीं बनवा है। क्षेप कमन मुगम है। विमि मिप्पास्वकी मुमगार स्पितिविमतिम बार मीप समाम मापवर स्पिविषिमणिका अपम्पाए एक समय मौर का सामिक वीम फाप है। वा भवस्थित पिपतिषिमहिनामोपरे समान है। बाहर कपाष नौ मोकपाप मौरबमम्तानुक्पो चतुपती मापवर विविविमतिका मंग मिम्मायके समान है। पदा सेप स्थितिविमपियौन समीप समान सम्पास भीर सम्पम्मिम्पावकी मस्सवर स्पिविविमक्षिका बपत्यकाम एक समय भीर रुटममम वाम पाम है। वषा मे स्थितिविमक्तिींकन काम मोबके समान है। विशेषांप-विषम मिप्पालको मुमगार विविधा अपम्पका एक समप मोर प्रप्ट पाचार समय बमबावा, इसलिये इसे मोबके समाम माया मापवर विविका जी सोषिक सीन पाय मासिका कारण पर कि मोगमूमिमें दो दिवाकि मियाली मापकर स्थिति होती है इसलिये भासवर विविध वीच पप तो पे हुये क्या इसमें पूर्व पावन पन्समा भौर सम्मिलित करना चाहिये । इस प्रभर मात्पर स्पिवित्र साधिक वीम पत्प प्राप्त हो जाता है। तया पहाँ सम्ममल मौर सम्पाम्मिप्यायकी मापसर स्विविका यो कष्ट कार सम्म तीन पम्प करे सो पार, जिसने म मागमूमि के विधर्म प्रपन रोमविधीम रस्सम्यक्त्ताको प्राप्त कर दिया है और मन्तवक सम्पसके साथ या सी मपेमा मा उम्पोकिइसके सम्पाव भीर सम्पम्मिमालकी स्थिति स्पेचर मास मप ऐवी बाठी। पेपयन मुगम है। पंचेलिपतिर्वच पंचेम्पिधिप परम्स मोर पंचेनिप सिंचयोनिमवी भागमें - - विAatha बिल पर सिमित | मरासिनियर सावित रोप- ( 1 *- - । ३० २] गए। जयधवलासहिदे कासयपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ सक०-णवणोक. भुज० ज० एगम०, उक्क० तिण्णि समया अट्ठारस समया। सेसं तिरिक्खोघं । णवरि पंचिं०तिरि०पज्ज० इस्पिवेद० मुजगार० जह० एगप्स०, उक. सत्तारस समया । जोणिणि पुरिस० णस० मुज० ज० एगस०, उक० सत्चारस समया। ६५५. पंचि०तिरि०अपज्ज. मिच्छत्त-सोलमक० णवणोक० अप्पद० जह० एगसमो, उक्क० अंतोमु० । सेसं अंतोमु० । सेसं पंचिंतिरिक्खमंगो। णवरि इस्पि-पुरिस० ज० एयस०, उक्क० सचारस समया । सम्मत्त-सम्मामि० भप्प० न० एगस०, उक. अंतो. ६३.. देसमा । समोर १७... हो । परि अपार क मुगार त्याम ६५० - और नीर ताकदादा स्पितिविनाशा प्रमाा है। विशेषार्थ- इसाये इनमें और पुराने का होता है। उसका मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नो नोकपायोंकी भुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल मिथ्यात्वकी अपेक्षा तीन समय और शेपकी अपेक्षा अठारह समय है। तथा शेष कथन सामान्य तिर्यचोंके समान है । किन्तु इतनी विशेपता है कि पचेन्द्रिय तिर्यच पर्याप्तकोंमें स्त्रीवेदको भुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल सत्रह समय है । तया योनिमती नियंचों में पुरुपवेद और नपुसकवेटकी भुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल सत्रह समय है। विशेषार्थ-जिस प्रकार नारकियोमे मिथ्यात्वकी भुजगार स्थितिका उत्कृष्ट काल तीन समय घटित करके बतला आये हैं उसी प्रकार यहाँ उक्त तीन प्रकारसे नियंचोके भी घटित कर लेना चाहिये । तथा उक्त तीन प्रकारके तिर्यचामे सोलह कपाय और नौ नोकपायोकी भुजगार स्थितिका उत्कृष्ट काल अठारह समय प्राप्त होता है। जिसका खुलासा इस प्रकार है - उक्त तीनों प्रकारके तिर्यंच असज्ञी भी होते हैं और सज्ञी मी। अब ऐसा असज्ञी जीव लो जिसकी आयुम एक आवलि और सोलह समय शेप है। तब उसने विवक्षित कपायको छोड़कर शेप पन्द्रह कपायोंकी उत्तरोत्तर भुजगार स्थितिका पन्द्रह समयमें वन्ध किया। पश्चात् एक आवलिके बाद जब आयुमें सोलह समय शेप रहे तब उसने उनभुजगार स्थितियोंका पन्द्रह समयके द्वारा विवक्षित कपायमें सक्रमण किया । अनन्तर सोलहवें समयमें उसने अद्धाक्षयसे भुजगार स्थितिको वाँधा और सत्रहवें समयमें ऋजु- गतिसे सज्ञियोमें उत्पन्न होकर सन्नियोंके योग्य स्थितिका वन्ध किया। पश्चात् अठारहवें समयमें सक्लेशझयसे भुजगार स्थितिको वॉधा । इस प्रकार यहाँ भुजगार स्थितिके कुल अठारह समय प्राप्त होते हैं । किन्तु तिथंच पचेन्द्रिय पर्याप्तकके स्त्रीवेदकी और योनिमती तिर्यचके पुरुपवेद और नपुसकवेदकी भुजगार स्थितिके सत्रह समय ही प्राप्त होते हैं जिसका उल्लेख मूलमें किया ही है। बात यह है कि जो जिस वेदके साथ उत्पन्न होता है उसके पूर्व पर्यायके अन्तिम अन्तर्मुहूर्तमें वह वेद ही बघता है, अतः योनिमती तियंचमें उत्पन्न होनेवाले जीवके पूर्व पर्यायके अन्तमें पुरुष व नपुसक वेदका वैध नहीं होनेसे सोलह कपायोंका उक्त वेदोंमें सक्रमण भी नहीं होता, अत उक्त वेदोंके भुजगारके अठारह समय घटित नहीं होते । इसीप्रकार पर्याप्त नियंचके स्त्रीवेदके भुजगारका काल अठारह समय न रहकर सत्रह समय कहा है। सो यह सत्रह समय स्वस्थानकी अपेक्षा जानना चाहिये। ६५५, पचेन्द्रिय तिथंच अपर्याप्तकोंमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकी अल्प- वरस्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है तथा शेष स्थिति- विभक्तियोका भंग तियंचोंके समान है किन्तु इतनी विशेपता है कि स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी भुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल सत्रह समय है। सम्यक्त्व और सम्यग्मि- थ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। इसी पदोमा करना मुगार आदि स्वास Air . सदी और का समयमा - योनिमा मनुवा समान है किन्तु मनु एक पूर्वकोनिका आयुको बोचकर व रहते हुए सत . हु५५.देवाम सम्यक्त्व काल एक समय बानना चाहिये। अपनी अपनी 14 -- न [H [ मरा पर. एस. एजारमा पासोर बनाया को। पहिरति । ... भावनाता गा। नरि mmertie Frel पार में FREE सगरम Ramta ni mfET FACT Tomtirty सिया rrent गा०२२] हिदिपिहचीए उत्तरपपरिमुजगारकाणे सहुंच । एष मणसमपन्य। गरि हमीस पसरीण सप०३० एपस, फ० से समया सचारस समपा। १६ मशसलिए मित्र--सोतसा-मरणोक० सम. म. एपस०, उप. पेसममा सवारस समपा । सेस पपिविरिस्वमंगो। पारि मसपउन पारसक०- सरपोक० मप्प. यह पयस०, उफ. विणि परियो० सादिरेपाणि पुम्बकोडिदिमागेण । ५७ देवाण पारपर्मगो। जारि मिषचस्स सम्मत-सम्मामि०-सोउसक गरपोक बप्पम० एपस०, उक० पेचीससागरोपमानि । मषणबाण. एव पेर । परि मापदर० सगरिवी देखणा । पोरसियादि बाप सरस्सारोपि विदियपुटनिमगो। प्रकार मनुप्म मपतियोकि मानना चाहिए। किन्तु इन्नी विमेपता किम्बोस महवियोंकी भुजगार स्पितिविमणिका बपन्यास एक समय मौर बलराम मिथ्यातकी मपेक्षा दो समय सपा क्षेपकी अपेमा सत्रा समय है। सामाम्प पर्याप्त मौर मनुष्य इन दोन प्रकारले ममुयोम मिम्मत्व सोप पाप मौर नौ माकपार्योकी मुजगार स्गिविनिमतिका अपम्प का एक समप भौर एकका मिप्पा वकी मपेशा से समप वपा क्षेपकी अपेपा र समय है। दमा प्रेप मग पंपेन्द्रिय विर्यक समान है। इनी विऐपता है कि ममुप्य पर्याप्तम मारह पाय मोर मोडपार्यों की भापकर स्पितिविमतिका अपम्पमा एक समय भोर कटकारा पूछोटित्रिमागसे भाषिक वीन पम्प प्रमाम है। विक्षेपार्य-पंचेन्द्रिय विर्य सम्पपर्याप्तीची भामु भन्तमर्वसे भपिक नही होती, इससिप इनमें सब मातिवाँकी मत्पवर स्पिविका मकस कार मम्तमुपूर्वमा । क्या इनोभीर भीर पुरुपयेरकी सुमगार स्पितिकम कर कार मठारा समय प्राप्त म दोन सा समय ही मम्स पाता है। इसम विशेप मुगसा मिस प्रकार पंचेसिय विन भादि पर मायेसी प्रकार पहामी र हेना चाहिपे । रोप यन मुगम है। मनुन सम्पपर्याप्त पथपि सब महवियोंकी मुमगार भारि स्मितियो काम परेटिव निर्मच पनपमा समामी होता है फिर भी भरपीस मातियोडी मुमगार स्थिति का ममम कुछ पिझेपता है। बात पर कि मनुयाम संधी भोर मसंगी ये दो मे नही होते, मत इसके मिम्पावकी मुनगार स्पिविका कारो समय मौरसासरकपाप क्षमा नौ मोकपायांकी सरगारस्मिति मात्रा समपदी प्राप्त होग है। प्रकृतियों की मुबगार पिविष्का भने विपक्ष में यही भरष सामाम्प पर्याम मीर पोनिमती मनुमोरे जानना चाहिये । इन टीन चरके मनुप्पोका सेप कपम पंचदिप विचार समान है किन्तु मनुष्म पर्याप्तका मादपाय मीर नी नोकपार्योकी मापवर स्मिविता मान एस पूर्वकोटि का दिमाग भाषिक वीन पल्प है, मौलविस मनुप पर्यासक्ने भागामी मगकी भापुको मापार वनन्तर चायिक सम्मममम प्राप्त कर लियारेन्सके ममुप्प पर्यावमवस्या गएर चाक मापदर स्पिति देवी पाती। १५० वाम मारपियो समान बानना चाहिये । विश्वनी विपधारेबियहाँ मियास्त्र पम्पाव सम्पम्मिपाल सोग कपाय मीर नो मोषपोंकी मापवर स्मिविषिमहिका मन मा समग मौर समकार सेवास सागर। मवनवासी भौर पम्वर बाम इसी प्रमर बामना चाहिये । तिनी विपवा रेलिपारि मापवरस्पितिषिमधिक समय पपनी अपनी स्पितिप्रमाण है। मोबिपियोंसे मेम साबारम्वर्गव देवाने दूसप भिषीके fr पापा Trयता पनि अगा frketiti । এ সময় गर सारीगाडमास परिपुम्स मग RA रोप tane मोर मतोमा Animat और atti गा०२२] ५८. एगम०, उड नाराम सम्मामिल सुहम दिया पादरते ३० भिगोटा - सक० गवणो मतोमु० - बादरमपन्न पज्जताण . उघ सना एगस०, उ होता है। तवा अपेक्षा प्राप्त जयघवलासहिदे कसायपाहुडे हिदिपिरती ३ णवरि सोहम्मादिसु अप्प० ज० एगस०, उक० सगद्विदी । आणदादि जाव उपरिमगेपछी चि मिच्छत्त पारसक०-णवणोक० अप्पद० जहण्णुक द्विदी। अणंताणु०चउक्क० बप्प- दर० जह० एयसमओ, उक्क. सगसगढिदी। अवतव्वं० ओघ । सम्मत-सम्मामि० अप्प० जह० ऐयस०, उक० सगसगहिदी। सेस० ओघं । अणुदिसादि जाव सम्बहु- सिद्धि चि सव्वपयडी० अप्प. बहण्णुक० जहण्णुकस्सहिदी । णवरि सम्मच० अपदरस्स जह० एयस० । अणंताणु०चउक० अप्प० जह० अंतोमु० । समान जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेपता है कि सौधर्मादिक स्वर्गों में अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अपनी स्थितिप्रमाण है। आनत फल्पसे लेकर उपरिम प्रैवेयकतकके देवोंमें मिथ्यात्व, बारह कषाय और नौ नोकपायोंकी अल्पवर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्टकाल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है । अनन्तानुबन्धी चतुष्क- की अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी स्थितिप्रमाण है । तथा अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका काल ओघके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी मल्पतर स्थितिविमक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्ट काल अपनी अपनी स्थितिप्रमाण है। शेष कथन ओघके समान है । अनुदिशसे लेकर सर्वार्थसिद्धतकके देवॉमें सब प्रकृतियों की अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य काल जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्ट काल उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है किन्तु इतनी विशेषता है कि सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य काल एक समय है। तथा अनन्तानुबन्धी चतुष्कफी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य काल अन्तमुहूर्त है। विशेषार्थ-सर्वार्थसिद्धिके देवोंके सब प्रकृतियोंको उत्तरोत्तर अल्पतर स्थिति ही होती है इसलिये सामान्य देवोंके सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल तेतीस सागर कहा । भवन त्रिकमें सम्यग्दृष्टि जीव नहीं उत्पन्न होवे अतः यहाँ सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्ट काळ कुछ कम अपनी अपनी उत्कृष्ट स्थिति प्रमाण प्राप्त होता है। तथा वारहवें स्वर्गतक सक्लेशानुसार स्थितिमें घटापढी होती रहती है इसलिये यहाँ तक सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्य काळ एक समय भी प्राप्त होता है। किन्तु बारहवें स्वर्गके ऊपर यद्यपि सब प्रकृतियोंकी स्थिति उत्तरोत्तर अल्प ही होती जाती है फिर भी नौ ग्रैवेयकतकके जीव सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि दोनों प्रकारके होते हैं। तथा सम्यग्यदृष्टिसे मिथ्यादृष्टि भी होते हैं और मिथ्यादृष्टिसे सम् दृष्टि भी। अतः यहाँ अनन्तानुबन्धी चतुष्क, सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी स्थिति अल्पतर और अवक्तव्य दो प्रकारकी बन जाती है। किन्तु शेष कर्मों की एक अल्पतर स्थिति ही प्राप्त होती है। तद्नुसार २२ प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्य काल अपनी-अपनी जघन्य स्थितिप्रमाण और उत्कृष्ट काल अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण प्राप्त होता है। किन्तु शेष छह प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्य काळ एक समय भी बन जाता है, क्योंकि जिसने अनन्तानुबन्धीकी विसयोजना की है ऐसा कोई एक जीव सासादनमें जाकर पहले समयमें अवक्तव्य स्थितिको प्राप्त हुआ और दूसरे समयमें अल्पतरस्थितिको प्राप्त करके यदि मर जाता है तो अनन्तानुषन्धीकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल एक समय प्राप्त होता है। इसी प्रकार उद्वेलनाकी अपेक्षाउक्त स्थानों में सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पवर स्थितिका जघन्य काल एक समय बन जाता है। तथा अनुदिश आदिमें बाईस प्रक तियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्य और उत्कृष्ट काल अपनी-अपनी जघन्य और उत्कृष्ट स्थितिप्रमाण है यह तो स्पष्ट ही है। किन्तु शेष छह प्रकृतियोंमें अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अल्पतर स्थितिका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त है, क्योंकि वहाँ उत्पन्न होनेके अन्तर्मुहूर्त कालके भीतर जो अनन्तानुबन्धीकी विसयोजना कर देता है उसके अनन्तानुबन्धीकी अल्पवर स्थितिका जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त ही प्राप्त 54८. उत्कृष्टकाल दो u पमका did व्याय और नो स्थितिविमतिका सम्यक्त्व और .. पल्पके समस्या बादर पीर कायिक, वादर जी पादर वनस्पति निगोद, बादर सूक्ष्म एकेन्द्रिय ५॥ पायोंकी मुजगार स्थितिविमच्छिमा- घ्यावकी अत्सतर प्रकार पाँचों पान उभा अपर्याप्त बीवों के सिप्यात्वकी असतर स्थिति अवस्थितसिस स्थितिविमक्तिका अवस्थित - dia . १ नगरे . गणी मागादिया रस •दरो। इन सामः बोष। सम्ममा घोप। गरिमारि बम स्मदिरोपान समास गोर। परिसर मनसेमी रेपो मार स्पिलिमाम स्पतिरपार सम्पन्न रहर अमायरी विनित न। समय परवानीमा गाय माता प्रामाNिM राजन Mata पमा म परोस मामल या सारा महिनीमार शिक्षा 'मा माया समितीशियम पारि सालिर गा०२२] हिरिपिरतीप चरपरिमुबगारकालो ३५८ एदिएम मिष्ठत्व० एम०प० एपसमजओ, उफ बेसमया । मप्प० ३० एमस०, उप पलिदो० मसंखे०मागो । थपछि बोर्ष । सोलसक-पक्षणोक० मजा विदियपुरनिर्ममो। अप्प ५० एगस०, उम० परिदो० अससे०मागो। सम्मप सम्मामि० अप्प० ब० एमस०, सफ० पसिदो० मसंखे०मागो। एवं बाददिय० समेईदिय पुरवि०-बावरपुरवि०-मुहुमपुरवि-भाउ०पादरबाठ-मुहमजाउ सेउ०- पादरतेउल-मुहमवेउ 10-पाठ०-पावरबाउल-मुहमवाउ०पादरमणप्फदिपचेय-मप्फदि. निमोद पादरममाण । पादरे दियमपञ्च-मुहमेइवियफ्नचापन्मत्ताणे मिष्ठ-सोल सक० मायोकएन०-मवदि० एप्रदियमगो। अप्पदर० मह० एमस०, उप. भवोम। सम्मच-सम्मामि० वप्प० ब० एयस०, अंवोस । एवं पथकाप पादरमपन्म-मुहमपन्यताप-बचाण। बादरे दिपपन्ज० विगहिरिय० विगसिद्रिय पन्यता मिळच. सब० ब० एमस०, उक० पेसमया। मप्पद० म० एगसममो, उप० संखेन्चामि बाससास्सापि । अहिआप। सोचसक०-मपणोक० स० व. एगस०, उक० सचारस समपा । अप्पद-अति मिष्ठवर्मपो। [सम्मध-सम्मान होता है। तमा सम्यक्त्वकी भस्सर म्पितिका पम्पास ममय परके सम्यस्त्वकी अपेदा प्राप्त होता। ५८. लेनिम मिप्यात्वकी मुमगार स्पितिपिकिस वपम्पकाल एक समय पोर सालो समय है। अस्पतर स्थितिविमकिका सपन्यकाल एक समय और समझाम पस्यो पमा प्रस्थातवा भागप्रमाण है। भपस्थित स्थितिविधि काल धोपके समान है। सोसा स्पाय भोर नौ नोक्वापोंकी मुखगर स्थितिविमसिया मा दूसरी प्रविधीले समान है। मसतर स्थितिविमच्किा पन्काल एक समय और कान पत्यके भसम्पात मागप्रमाण है। सम्यक्त्व और सम्बग्मिप्यास्त्वकी मसतर स्थितिविमचिम बघम्पकात एक समय और मारकास पत्यके मसम्पात भागप्रमाण है। इसी प्रकार पाएर एकन्द्रिय सूक्ष्म एकेमिय प्रविधीकारिक, बापर प्रविधीमाथिए, सूक्ष्म प्रविधीकसिक, बसनकि, पावर बलज्ञायिक, सूक्ष्म वनकामिक, मामि- कारिक, पापर ममिमायिक, सम्म प्रतिसायिक, माबुकाबिक, बावर मायुकारिक, सूक्ष्म वायुम्भयिक, पार पनस्पतित्रायिक प्रत्येमारी, पनस्पविकायिक, बादर मनस्पतिकनिक, सूक्ष्म बनस्परिकायिक निगोर बापर निगार मौर सूक्ष्म निगोर बीकि मानना चाहिये। बादर पपेन्द्रिय अपर्याप्त रस्म एसमय पर्याप्त भौर सूक्ष्म पोलिय अपर्याप्त बीवोम मिप्यात सोलापाप और नो मोक- पायोंकी मुगार और भवस्थित स्थितिविधिमा एपेन्द्रिकि समान है। या भसतर स्पितिविमच्छिवपम्पमत एक समय भौर काकास मन्तमु । सम्यक्रम और सम्पम्मि प्यालको प्रस्पर स्थितिविमचिम बसम्पास एक समय मौर कामास भवमा है। इसी प्रबर पाँचों स्थावरप्रय बावर मर्मत, पाँच स्वावराय सूक्ष्मपर्याप्त और पापों स्वामय एम्प अपर्याप्त बाकि वारना चाहिए। वापर पणेमिब पर्याप्त,विश्चन्द्रिय और पिम्सन्द्रिय पर्वास नीलाम मिप्याकको मुखगार स्थितिविमति बपम्पसम्म एक समय और सम्मान दो समय है। भत्सर स्थितिषिमकिा अपम्पकान एक समय मोर शम्श संस्पात पर पाया अवस्थित स्विविधिमचिन्न काश मोपले समान है। सोसह पाव भौर नौ नाम्पायर्यो मुमगार स्थितिविधिका बसम्पास एक समय भौर स्वरश्न सब समय है। वा अस्पतर और अबस्थित स्थितिविधियोन भंग मिष्यापके समान है। सम्पकरब और सम्पम्मिप्पास्वकी " समीर मिनार मासिवमी। में मिनिमसर और गाना रEिRMIR यविनियम RAM समितिसर मुश्मामासरता सामना है। मासा पाजाम समयी RAN समारोबार सwिant -- गा०२) -- । जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ मिच्छत्त० अप्प० मिच्छत्तमंगो। विगलिंदियअपज्जसाणमेवं चव । मवरि अप्पद० ज० एगसमओ, उक० अंतोमु०। ५६. पंचिंदिय-पंचिं०पज्जत्ताणमोघं । णवरि भुज० जह० एगसमओ, उक. तिणि अट्ठारस समया। सम्म०-सम्मामि० अप्प० जह० एगसमयो'। पंचिदिय- अपज्ज. पंचिंतिरिक्खअपज्ज०मंगो। ६६० वमप्फटिपरेर ५५ ६६. मुना मताम अप०३० ६६२, वपद बह कायबोमि० श्री लिय० मिन्छन ३० एस० एगस० उ० ६६० १६ वायुकायिक प्रयास गार और अमि विमतिका सा ६६१ मम अल्पतर स्थितिविभक्तिका भंग मिथ्यात्वके समान है। विकलेन्द्रिय अपर्याप्तकोंके इसीप्रकार जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। विशेषार्थ-एकेन्द्रियोंमें मिथ्यात्वकी मुजगार स्थितिका उत्कृष्टकाल दो समय श्रद्धाक्षय और संक्लेशक्षयकी अपेक्षासे कहा है। तथा सोलह कपाय और नौ नोफपायोंकी मुजगार स्थितिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल सत्रह समय जो दूसरी पृथिवीमे वतला आये हैं वह एकेन्द्रियों के भी बन जाता है, अतएव यहाँ उक्त प्रकृतियोंकी भुजगार स्थितिका काल दूमरी पृथिवीके समान कहा है। एकेन्द्रियोंके सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार, अवक्तव्य व अवस्थित स्थिति नहीं होती, क्योंकि इनके ये पद सम्यग्दृष्टिके पहले समयमें ही सम्भव है। एकेन्द्रियोंमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल पल्यके असख्यातवें भाग प्रमाण है, क्योंकि जो पचेन्द्रिय जीव एकेन्द्रियोंमें उत्पन्न होकर निरन्तर एकेन्द्रिय ही रहे आते हैं उन्हें सत्ता स्थित स्थितिको घटाकर एकेन्द्रियके योग्य करनेमें पल्यका असख्यातवा भाग प्रमाण काल लगता है। मूलमें वादर एकेन्द्रिय आदि और जितनी मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमे भी इसी प्रकार जानना चाहिये । किन्तु बादर एकेन्द्रिय अपर्याप्त, सूक्ष्म एकेन्द्रिय पर्याप्त और सूक्ष्म एकेन्द्रिय अपर्याप्त जीवोंका उत्कृष्ट काल अन्तर्मुहूर्त है, इसलिये इनमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त कहा। इसी प्रकार पॉचों स्थावरकाय बादर अपर्याप्त तथा सूक्ष्म पर्याप्त और सूक्ष्म अपर्याप्त जीवोंके भी जानना चाहिये । वादर एकेन्द्रिय पर्याप्त, विकलेन्द्रिय और विकलेन्द्रिय पर्याप्त जीवोंका उत्कृष्टकाल सल्यात हनार वर्षे है इसलिये इनमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल सख्यात हजार वर्षे कहा। तथा विकलेन्द्रिय अपर्याप्तकोंका उत्कृष्टकाल अन्तमुहूर्त है, अत. इनमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्तप्रमाण कहा । शेष 'कथन सुगम है। 5 ५६ पचेन्द्रिय और पंचेन्द्रिय पर्याप्त जीवोंके पोषके समान जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनमें भुजगारका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल मिथ्यात्वकी अपेक्षा तीन समय तथा शेषकी अपेक्षा अठारह समय है । तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय है। पचेन्द्रिय अपर्याप्तकोंके पंचेन्द्रिय तियेच अपर्याप्तकोंके समान जानना चाहिए। विशेषार्थ-पचेन्द्रिय और पचेन्द्रिय पर्याप्तकोंमें सज्ञी और असज्ञी दोनों भेद सम्मिलित हैं, अत. इनमें मिथ्यात्वकी भुजगार स्थितिका उत्कृष्टकाल तीन समय तथा सोलह कषाय और नौ नोकपायोंकी उत्कृष्ट स्थितिका उत्कृष्टकाल अठारह समय वन जाता है। इन तीन और अठारह समयोंका विशेष खुलासा पहले किया ही है उसी प्रकार यहाँ भी जान लेना चाहिये। तया सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल एक समय उद्वेलनाकी अपेक्षा प्राप्त होता है। इस प्रकार यहाँ उक्त कथनमे श्रोघसे विशेषता है । शेप सब कयन श्रोधके समान है। । पंचि-इति पाठ । मा पापक समान विक्तिका रष्टकाल - एक समय और पुरवेदकी कार आज अन्तम हवं है। शेष क्यान सुगम है ९६२ पापा -- सम्यक्त्व और अन्तर्मुहते है । उया बानना चाहिये। की अल्पावरलिवि योगियों है। अवस्थित एक समय और मुजगार m विजिया काल १ ता. प्रती समयो 140 प्रती रा -- [at विचार पर कार बम R० वा एक्पयो २.पा. एससमयो। . । विसनिय पसलमेर भस्मसार स्पितिमिमिन सिनिमा समास पर काली पर मी प्रतिमा गार सिनिया Firhar ग्यार, समस्त । समय सम। सेलिने असमात जागा निगर प्रमाwmti TE मौ सौ यी) मलेनियमपर्मNE रपतिमा न पर परस्पर (पिदिर साल "सर स्पिyिaner गा २२] पिवित्तीए परपग्मुिशगारासो ६. पादरपुरविपन्जमावरप्राउ पम्ब०-बाहरवे उपन्जमादरमाउपन्जमादर बमप्फदिपरोय.पच० सम्मपपडी० सम• माहि० विदिपपुरविममो। पप्पद० पिम सिंदिपपन्यचर्मगो। ११ समपरस हमीसमयसी० सम-भवी मोपं । परि इस्वि०पुरिस० सपा सचारस समपा । अप्पद वा० एगस०, उक. अतोस.। सम्मच-सम्मामि० अपब० एगसमयो, उफपतस०'। ३५२ पंचमम०-पंचपपि. मिपाच-सोउसक०-यममोक-सम्मच-सम्मामि० वप्पद बह० एगसमयो, उक० अंतोस । सेस० विदियपुरपिमगो । एवं पेठम्मिय । कापमोमि० मोपममो । पारि सम्मेसिमप्प. . पसिदो० मससे मागो। भोरस- सिय० मियत रख० म. समओ, सक वे समया। बी. मोपं । मप्प. ब. एगस०, उक० बावीस बाससास्सामि देशवालि । सोससक-गपपोक• सम० प. एमस०, सक० सचारस समपा। प्राहि बोप । मप्पदर० सम्मच-सम्मामिच्छचाय- 5. मारपपियायिक पयाम, बार बातम्यायिक पर्माप्त, वावर भामिकामिक पर्याम, बाबर बानुपापिक पर्याप्त और वारर बनस्पविकारिक प्रत्यक शरीर पर्याप्त वीकि सब महतियों की मुग- गार और अवस्थित स्मितिविधियोंका मग दूसरी पपिपीते समान है। तमा भसतर स्थिति रिमधिका मा निकोनिग पर्याप्त समान है। १ स भपासकोंमें दबीस प्रवियों की मुबगर और अवस्थित स्थिति विमकियों मग मारके समान है। किन्तु इतनी विरोफ्तार कियाँ भीवर और पुरुषवेवकी मुबगार स्पिति- पिमतिका कमान सत्रा समय है। ज्या प्रस्सतर स्थितिविमचिकन पपम्पकाम एक समय और सासमा मम्तमान है। सम्पाव भोर सम्पम्मिप्पाली भस्सतर स्पितिविमसिन अपम्पकाल एक समय भोर करमन मन्तमात है। विचपाएं -सब भपक नपुंफ ही होते है इसलिये इस अपर्याप्त कमि मीर और पुरुपोरकी मुगार स्थितिका सामनस समर समय ही प्राप्त होता है। उमा भपातलाच एकम काम पम्तमान है इसलिये इनमें सा प्रतियोगी भासन स्थितिका काल भन्तमंत्रा। पग्रन मुगम है। १ पाचों मनोयोगी और पापमपोगी बीमि मिप्यात्व, सोमा कपाय, मो नोच्याम, सम्यक्त्व भोर सम्मिमालकी मसतर स्पितिपिपिम्यक समय मोर कापस अन्तर्मुहै। वा शेप मान दूसरी प्रविधी समान है। इसी प्रकार विनायपोगी मीकि बानना चाहिपे।पयोगिक भोपफेसमान मम है। मिनी पिरापता किमले सप प्रतियों की मस्पतर स्पितिविमाि महामा पस्पोपमके भरमसात मागप्रमाण है। पौरारिष्मा पोगिर्योम मिप्यात्वको मुजगार स्थितिविमखिम बपम्पकाम एक समय और कायान दो समय । मपस्थित स्विविधिमछिड़ा काम भापके समान है। भसवर स्पितिविमधिया पम्पकास ससमप और हम मम पास चार है। साबरमपाल और मो मोम्यापोटी मुबगार स्थितिविमतिम बकाल पक समप भोर मसभा सा समय है। अवस्थितस्विति- विविध काम मोपके समान है। तवा इन प्रातिपोंगी भत्सर स्पितिपिमचिम भोर सम्मम्मामि अप स्मन्ये, गोपा वि पामे पारित। एमावाला । mममान पनि और सियान सम्मान कर सम्मामिमा भरमोनालियों - समापन HERE Ramkum मामीजारोपीयेMAIN साल manti समोसा ।

३ ग०१२] ६६३, तिमि समया अवडि० ओथं एगस०, महरि पुरिमः एवं चेव । । ३६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे हिदिविहत्ती ३ मप्पदरस्स च ज० एगसमओ, उक्क० बावीम वस्ससहस्साणि देसूणाणि । सेसमोघं । ओरालियमिस्स० मिच्छत्त० भुज० ज० एगस०, उक० तिण्णि समया। अप्पद० उक्क० अंतोमु० । अवढि० ज० एगस०, उक्क अंतोमु० । सोलसक०-णव- णोक० भुज० ज० एगस०, उक्क० अट्ठारस समया। अवहि० ज० एगस०, अंतोमु० । अप्प० ज० एगस०, उक्क० अंतोमु०। सम्मत्त-सम्मामि० अप्प० ज० एगस०, उक्क० अंतोमु० । वेउव्वियमिस्स० अट्ठावीमपयडीणमप्प० ज० एगस०, उक्क० अंतोमु० । सेस० विदियपुढविभंगो। णवरि पदविसेसो जाणियव्यो। आहारकाय० सवपय० अप्प० ज० एगस०, उक्क० अंतोमु० । आहारमिस्स० सव्वपय० अप्प० जहण्णुक्क० अंतोमु० । एवमुवसमसम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं । कम्मइथ० मिच्छत्त-सोलसक०-णवणोक० भुज० ज० एगसमश्रो, उक० वे समया। अप्प०-अवढि० ज० एगसमो, उक्क० तिणि समया। सम्मत्त-सम्मामि० अप्प० ज० एगस० । उक्क० तिण्णि समया । एवमणाहार० । अवचन 1 प्रतिसवेढ० ५- मिच्छन-सी सचारस समय मणताणु०१४ तेचीस सागरे ~~ कायवागमे मा . तया १२ उपशमसम्यक्त्व स्थितिविभक्ति है काम काययो हैं, इसलिये इ. उत्कृष्टकाल तीन दा। ससारा . ६६३६ सम्यक्त्व तथा सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल कुछ कम वाईस हजार वर्ष है। शेष कथन श्रोधके समान है। औदारिकमिश्रकाययोगियोंमे मिथ्यात्वकी भुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल तीन समय है। अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है । अवस्थित स्थितिविभक्ति- का जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी मुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अठारह समय है। अवस्थित स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है । अल्पतर स्थिनिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकालं अन्तर्मुहूर्त है। वैक्रियिकमिश्रकाय- योगियोंमें अट्ठाईस प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। शेषका भग दूसरी पृथिवीके समान है। किन्तु इतनी विशेपता है कि पदविशेष जानना चाहिये। आहारककाययोगियोंमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। आहारकमिश्रकाययोगियोंमे सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। इसी प्रकार उपशमसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिध्यादृष्टि जीवोंके जानना चाहिए । कार्मणकाययोगियोंमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार और अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल दो । अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल तीन समय है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्यकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल तीन समय है। इसी प्रकार अनाहारक जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-पाँचों मनोयोग, पाँचों वचनयोग और वैक्रियिककाययोगका उत्कृष्टकाल अन्त- मुहूर्त है, अतः इनमे सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त कहा। औदारिक काययोगका उत्कृष्टकाल कुछ कम वाईस हजार वर्ष है, अत इसमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थिति- का उत्कृष्टकाल कुछ कम बाईस हजार वर्ष कहा। औदारिकमिश्रकाययोगका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है अतः इसमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त कहा । वैक्रियिकमिश्रकाय- योगमें भी इसी प्रकार समझना चाहिये। तथा इसी प्रकार आहारककाययोग और आहारेकमिश्र- काल एक समय और स्तृष्टकाल बारह पाय मोर काल अठारह स्थितिविधिका मिज्यात्वक किमवजय की मुजगार " स्थितिविधिका समय पंचेन्द्रियोंक सम स्थितिविमतिका नोकगायोंकी विशेषता है कि मत्सतरपति अनन्तानुवन्धी मु विका war सादुर - ससास्मावि रेस्मारी। न उममिनिसमा । का उस पो । सोमा-म ITI भाई. एस. म्मच-सम्मामि-पास पण.स.एफ्स, मो विमो। मारमा समस म. स्स. स्मार. म.सा. मार मिका सामान्य सी. एफ्सममो, मामि उस.तिम्मि समपा। एमपी भरमस समयमा गोपनिमियममापि नि चौरासी मत जमा । बा किसी । समर ERR मापस भय समापस मनमा पसमसिम सम्मान और सम्पमित्र प्रमाल अम्मत है। मनात । किन्तु इसी शिन पिसार स्थितिमिमा समयोपिगी साबित है। सी RR TRA गिराम रिमाल, नगर पास समय पिपास समय पविधिमा मानस पाए। रसिया गा०२१] द्विपिविरचीए चरपरिमुधगारकामा 5६३ वेदामुपादेम इरिप० मिम्छचस्स सब० ३० एगसममो, उफस्सेण तिमि समया | मप्प० ब० एगस०, उफ. पपपण्ण पसिनावमामि देरणाणि । भपट्टि ओपं । पारसक-परमोक० मुन० २० एगस०, उमभतारस समया । पारि परिस० स० सवारस समया। अप्प-अबाहिमिछचमगो। ममतामु० घउक एवं पेष। परि भवत्तम. महणुक एगस० । सम्मच-सम्मामि सब प्रवाहि० अपचम्ब० भोप । अप्पद. म. एगस०, उक. पणवण्पपलिदो० सादिरेयाणि । परिसवेद० पंपिदियमंगो । मारि इस्थि-णस० सम० तक सचारस समपा । गएस० मिच-सोउसक०-अवमोक-सब० प्रपति प्रोप। पपार इस्पि-गुरिस० सम० उक. सचरस समया। मप्प० म० एगस०, उक० मेचीससागरोषमाणि दमाणि । मर्णवाशु०पटक भचप्पं मोप । सम्मच-सम्मामि० अप्प. म. एगस०, उक. वेचीसं सागरो. सादिरेयागि । सेस० मोष । मवगदपेद. पपीसपपरि० अप्प. कारबागमै मा समाना पाहिय। शना पिरापता किमिभयो!म भवन्य मंग मी हाता । रूपा महारकप्रपयाग और भाहारकमिममम्पमोगमै समस्सतर स्थितिविधिही होती है। पराममम्पक्स्व और मम्पग्मिप्पाला मामला मी भन्तमुहूत है तथा इनमें एक असर स्थितिविमकिती? इसमिय इनमें अस्सर स्थितिमपनको माहारपतिका समान मा। कार्मणाययोगमै प्रतापप भोर संस्लेरामपकी अपमा सर्वत्र मुबगारका समय ही मसरावे है इसलिये इसमें लम्बीस प्रतियोंकी मुजगार स्पितिका सालो समय फरावषा इसम्म सनल तीन समय इसलिय इसमें मल मतियों की भसवर स्थिति उक्टमा तीन समय या। संसारी बीवक मनाहारक अवस्था बामपनपवागमे ती मता इसापनका महम्रपागके समान मारोप कान मुगम है। दमागमा मनुवादसे मीपरिणाम मिप्यास्त्रकी मुजगार स्मितिबिमठिन अपम्प बत एक समय भोर मारकास तान समय मस्सार स्थितिविधिमा उपन्यास एक समय भोर वरना इस फम पचपम पस्यो भवस्पित स्थितिविमछिनाल माप समान। पायकपाय और नो मोक्पानों की मुबगार स्थितिबिकिन अपम्पास एक समय मोर वा पाव भठाए समय है। पितुरानी विराफ्ता है कि इन पुरुसा और नपुंसकारका मुगार स्विविधिमक्षिका सामान सत्रह समाया अस्पतर पर मस्थित स्पितिविचिका मग मिप्याको समान अनम्तमुकम्पी चष्मन इसोप्रभर बामना चाहिए। पितु इतनावरापार विपक्षम्य स्पितिपिविभाजपम्प भोरमकामा एक समपराम्पसमा समग्मिध्यात्म श्री मुगार, भपस्थित भोर भाउम्प स्मितिविमख्मिोन प्रल मोपर समान । भरातर स्पितिविधिमा अपम्पका एक समय मौर रातस्मत साधिक पपपन पत्त्या पुरुहीमाबारे पथदिदि समान मग है। किन्तु इतमी विरोधात कि इन नतर और नपुसमाकी मुबगार स्मितिरिमठिया म्वटमस स्वर समप। मऍसमारोम मिप्यास माला कपाप मोर नो भारपायो मुगार भोर मस्थित स्पितिविमतिमा पास भाप समान है। ग्गुिइतनी विरापमानामगर भोर पुरमा मुमगर स्थितिनिधिसभा सत्रा समय है। प्रसर स्पिविषमनि पम्पकाल एक समय भोर ताज पुन म सनीस सागर। मनम्नानुबपी पपन्न भषय स्विनिषिर्मान कान भोपः समान है। सम्यमय और सम्पग्मिण्यापली मततर स्थितिविमध्यिापमान एक समर और मन साधिसमीम - मम पापी समसामति सिमिया समान अमरासोर पर ३ गा०२२] बा. एगस०, एक्कली पलिदो० ६६६. H उ811 - अम० ज० मत्विमा एवं संवटा चवीसपयः तेवीस सर -- दचन्चचान पक अत्सवर स्थिति प्रमाण है। निमा ३८ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [ हिदिविहसी ३ ज० एगस०, उक्क० अंतोमु० । एवमकसा०-सुहुम०-जहाक्खादसंजदे चि । ६४. चचारिक० मिच्छत्त-सम्मत्त-सम्मामि०-सोलसक०-णवणोक० भुज०- अवढि० सम्म०-सम्मामि०-अणंताणु०चउक्क० अवत्तव्व० श्रोधं । अप्प० ज० एगस०, उक्क० अंतोमु०॥ ६५. मदि०-सुद० मिच्छत्त-सोलसक० णवणोक० भुज० अवहि० ओघं । अप्प० ज० एगस०, उक्क० एकत्तीसं सागरो०' सादिरेयाणि । सम्मत्त-सम्मामि० अप्पद० सागर है। शेप कथन ओघके समान है। अपगतवेदियोमे चौबीस प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थिति- विभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तमुहूर्त है। इसी प्रकार अकपायी, सूक्ष्मसापरायिकसयत और यथाख्यातसयत जीवोंके जानना चाहिए । ६४ क्रोधादि चारों कषायवाले जीवोंमे मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तिका तथा सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व और अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका काल अोधके समान है। अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है। विशेषार्थ-वेदमार्गणामें निम्न बातें ध्यान देने योग्य हैं । पहली तो यह कि विवक्षित वेदमें उस वेदके अतिरिक्त शेप वेदोंकी भुजगार स्थितिका उत्कृष्टकाल सत्रह समय होता है। दूसरी यह कि यद्यपि स्त्रीवेदी आदिका उत्कृष्टकाल सौ पल्य पृथक्त्व आदि है फिर भी इनमे मिथ्यात्व आदिकी अल्पतर स्थितिका काल उस वेदके उत्कृष्टकाल प्रमाण नहीं है। इनमेसे स्त्रीवेदमें मिथ्यात्व आदि छब्बीस प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका काल कुछ कम पचवन पल्य है, क्योंकि यहाँ सम्यग्दशन हा जो उत्कृष्टकाल है वही यहाँ उक्त प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल प्राप्त होता है। किन्तु मम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके विषयमें स्थिति इससे भिन्न है। बात यह है कि इनकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्ट- काल सम्यक्त्व व मिथ्यात्वके क्रमसे प्राप्त होते रहनेसे होता है और स्त्रीवेदियोंमें मिथ्यादृष्टि जीवही उत्पन्न होता है अतः सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल साधिक पचवन पल्य प्राप्त होता है । तथा ओघमें सय प्रकृतियोंको जो भुजगार आदि स्थिति कही है वह अधिकतर पुरुपवेद- की प्रधानतासे ही घटित होती है। पंचेन्द्रियोंमे भी वह अविकल बन जाती है, क्योंकि पुरुपवेदी पचेन्द्रिय ही होते हैं, अतः यहाँ पुरुषवेदमें मुजगार स्थिति आदिका काल पंचेन्द्रियोंके समान कहा । तथा नपुसकवेदमें २६ प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल कुछ कम तेतीस सागर है, क्योंकि यहाँ सम्यग्दर्शनका जो उत्कृष्टकाल है वही उक्त प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल साधिक तेतीस सागर है। विशेप खुलासा जिस प्रकार स्त्रीवेदियोंके कर आये हैं उसी प्रकार यहाँ भी कर लेना चाहिये। शेप कथन सुगम है। अवगतवेदमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थिति ही होती है। तथा इसका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है अतः इसमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका नघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त कहा। इसी प्रकार अकषायी, सूक्ष्मसाम्परायिकसयत और यथाख्यातसंयत जीपोंके भी घटित कर लेना चाहिये । तथा क्रोधादि चारों कषायोंकी अल्पतर स्थिति का उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त है, अतः इनमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल अन्तर्मुहूर्त कहा। शेष कथन सुगम है। ६५. मत्यज्ञानी और श्रुताज्ञानी जीवोंमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तिका काल ओघके समान है। तथा अल्पतर स्थितिविभक्तिका १ ता० प्रती सागरो० देसूणाणि इति पाठः । । उपन्यवान एक विभरिका कान उत्कृष्टकाल छ कानधन्यकाल N और नो नो । छयासठ सागर हे सत्यक्त काल साधिक Mધવાવિ । 17 હિમવર્ણન स्थत और को एक समय है। स्थितिविक्किम बघन्यकाल एक कोई मिध्यादृष्टि अतः मत्यहानी स्वष्टकाल साहित इसलिये नसमें तया मिथ्याष्टिक ता० - गास्साइसादे वि। मि-मोउमापाचोरा- व.पोरा वपनाम: एगस०, राह मुबादि योग । पानि। मुम्मसम्मासि बन्द अनेसास कबित नमुन है। इस पर पर पारिश मन्त, सम्मान, पेशान समय राससन, समर्मत पार पाप समारत पसमय है। सपनाAIR सारखा स्मरता है। इसी पारिरि मौइम RAI तेइममे मीरा पन पसारसमस मसाममित गाबिसमलिक पासमा निपीitra मामासाशिRAL मिति प्रारति गा० २२] द्विपिपिचीए सरपपछिमुबगारमतो २६ मह तोम, क. परिदो• मसखे०मागो। विहग मिच-सोलसक० सम०प० उक. विदिपपुरनिमगो । बवहि बोर्ष । मप्प० वा. एगस०, उफ. एक्कचीस सामरो० देणपाणि ! सम्म०-सम्मामि० अप्प० ५० एयस०, उपक. परियो० प्रसंसे०मागो। १६ भामिनि एव० मोहि० मिष्छच-सोचसक०गबपोक० अप्प०५०वोस, उस्क० बाहिसागरोबमाथि सादिरेयाणि । गरि भयवापु० ए० । सम्मच-सम्मामि० मप्प०० अंतोम, उपा० छावतिसागरो० सादिरेयामि। राख० मवहि-अवध. परिप । मणपन० मतावीस पप० अप्प. यह बतोमु०, उस्फ० पुष्वकोडी देरपा । एव० संजद-सामाइप०-छेदोष-परिहार-संभदासंबदा चि । नगरि सामाइप-छेदोष. घठबीसपय० ० भप्प० मा० एयसममो। मसंब० बोपमंगो। परि पप्प० सादिरेय तेवीस सागरोवमामि । सम्म० अप्प० वा. एगसमभो। बपन्यास एक समय भौर काम सापिकाइकतीस सागर । सम्पत्त और सम्बम्मिमात्यकी मस्सतर स्थितिविमतिका अपम्पास मम्तमुर्त और सात पस्त्रोपमके असम्पात माग प्रमाम। विमंगशानिपोम मिप्यात्व, सासरच्या मोर मौ नोकपार्योफी मुजगार स्मिविविधिका अपम्पम एक समब भौर काम मंग पूरी परिषीके समान है। अबस्थित स्थिति पिजिनकास भापके ममान है। तमा अस्पतर स्मितिविमतिका अपम्पमत एक समय भौर सरकारकम इकतीस सागर। सम्पपस्थ और सम्पम्मियातको प्रस्सतर स्मितिविधि- प्रसपम्पमा एक समय और समग्र पस्पापमा प्रसस्पात माग प्रमान है। SH भामिनियोपियानी, मुतवानी पौर अपपिशानी बीवोंमें मिथ्यात्व सोसाज्यार और नौ मोकपापोंकी मस्सर स्थितिविमतिका अपम्पकासा भम्तमुहूर्त भौर प्रवास सापिक बपासठ सागर है। किन्तु इतनी विरोफ्ता है कि मनम्तामुक्पीकी अपेक्षा स्वम पासठ सार सम्मास्त्र और सम्बम्मिप्याककी भस्सतर स्विविविसिवा अपम्पास भन्तर्मुहूर्त और स्कुट कास प्राधिक पासठ सागर है। पहाँ मुबगार, भपस्थित भोर अपरम्प निमज्यिा नही। मनापर्यपानिमोम भदाईस प्रतियों की भरपार स्थितिविमतिका अपम्पकाल अन्वत भौर कसम्म रकम पूर्वकाटि प्रमान्य है। इसी प्रकार संपत सामायिकसपत, पापस्थापनासंपत पपिरपिरिसंपत मौर संपत्तास्मत बीजानना चाहिए। फिरतमी पिरोपताकि सामायिक संपत और वापस्थापना संवत बीवमि चौबीस प्रातियोंकी मसतर स्थितिषिमझिा अपम्पकास एक समय है। भस्वामें भोपक समाम मंग है। फितु इक्नी विशेषता है कि इनमें असर स्थितिविमन्द्रिमान सपिकतेतीस साप्त है। वा सम्यकताकी मसतर स्थितिषिममिा अपम्पमत एक समय है। विपार्व-नौ अरेस्क मिप्यारव भाषिकी भस्पतर स्थिति होती है। अब परि पाँ मिप्यारमिनी पाएमा हो सके पारिमौर मम्तमें मी मस्पतर स्थिति पाई बागी मा मत्याानी भौर मतावाना बी? मिथ्यात भारिपीस प्रातियों की प्रस्सर स्थितिमा उसमय सापिक तीस सागर प्रा। तया विमान अपम अवस्थामें नहीं पाया जाता, इसलिये इसमें प्रतियोंकी मसतर स्थितिका मान बफम इख्तीस सागरमा। तपा मिप्याटिने सम्पात और सम्पम्मिमालकी सत्ता परम भर्ममावर्षे माग प्रमाण प्रसन्न वा प्रदीबा पर इति पाल। मपात पर मनोज प्रतिनी बारा रमापी भिपसमिनिममता र माविसमा या मीना पहली बार सिौम प्रारमिनिमल माया समस भासी पाणी মনময় মূল मारी मानाबाबत ४२ the - ६७२ ए चप लोन इ०६ रदे HR - * सेसार ६७७ 1 सचिदन्यास म . ६७. वारसक 01 रेयं । प्रयदर NA - जयधवलासहिदे कमायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ 5७०. सण्णि. पंचिंदियभंगो। एवमाहारीणं । णपरि सण्णि० मिच्छ०-सोलसक०- णवणोफ० भुज० उक्क० वे सत्तारस समया। असण्णि० मिच्छत्त-सम्मत्त-सम्मामि०. सोलसक०-णवणोक० अप्पदर ज० २० अप्पदर ज० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे भागो । सेस० ओरालियमिस्स०भंगो। एवं कालाणुगमो समत्तो। * अंतरं। ६ ७१. सुगममेदं, अहियारसंभालणफलत्ताटो। * मिच्छत्तस्स भुजगार अवहिदकम्मंसियस्स अंतरंजहरणेण एगसमभो! ७२. कुदो ? भुजगार अवहिदविहत्तीओ एगसमयं कादृण विदियसमए अप्पदरं करिय तदियसए भुजगार-अवहिदेसु एगसमयमेत्तरुवलंभादो। * उक्कस्सेण तेवहिसागरोवमसदं सादिरेयं । ७३. त जहा-तिरिक्खेसु मणुस्सेसु वा भुजगार-अवहिदाणमादि कादृण पुणो तत्व अंतोमुत्तकालमप्पदरेणंतरिय तिपलिदोमिएसुप्पजिय तेवद्विसागरोवमसदं भमिय मणुस्सेसुप्पन्जिय अंतोमुहुत्ते गदे संकिलेस पूरेदूण भुज०-अबढि०कदेसु लद्धमंतरं होदि । ७. सज्ञी जीवोंके पचेन्द्रियोंके समान भग है। इसी प्रकार पाहारक जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि सनियोंमे मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी मुजगार स्थितिविभक्तिका उत्कृष्टकाल मिथ्यात्वकी अपेक्षा दो समय और शेपकी अपेक्षा सत्रह समय है । असज्ञियोंमें मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है । तथा शेष भग औदारिकमिश्रकाययोगियोंके समान है। इस प्रकार कालानुगम समाप्त हुआ। * आगे अन्तरानुगमका अधिकार है। ६७१ यह सूत्र सुगम है, क्योंकि अधिकारकी सम्हाल करना इसका फल है । * मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थिति विभक्तिवाले जीवका जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६७२ क्योंकि जो कोई जीव मुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंको एक समय तक करके और दूसरे समयमें अल्पतर स्थितिविभक्ति करके यदि तीसरे समयमें पुनः भुजगार और अवस्थित विभक्तियों करते हैं तो उनके मुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका केवल एक समय अन्तर पाया जाता है। * उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एकसौ त्रेसठ सागर है। 5७३ उसका खुलासा इस प्रकार है-जिन्होंने तिर्यंच और मनुष्योंमे उत्पन्न होकर भुजगार और अवस्थितस्थितिविभक्तिका प्रारम्भ किया । पुन. वहीं पर अन्तमुहूर्त कालतक अल्पतर स्थिति- विभक्तिसे उन्हें अन्तरित किया। पुन• वे तीन पल्यकी आयुवाले जीवोंमें उत्पन्न होकर और एकसौ प्रेसठ सागर कालतकं परिभ्रमण करके मनुष्योंमे उत्पन्न हुए और वहाँ पर उन्होंने अन्तर्मुहूर्त कालके वाद सक्लेशकी पूति करके भुजगार और अवस्थित विभक्तियोंको किया । इस प्रकार भुजगार और अवस्थित विभक्तियोंका उत्कृष्ट अन्तर साधिक एकसौ त्रेसठ सागर प्राप्त होता है। *मिया ६ue यह नपत्य ६ ॥ लिए मुगार या विच्किो करलाई 1 ६७५ रया' पार और परिस स्थितिविर्मा * सो ६४. जिस -- चाहिए। इस प्रकार अश्यसे कयन Sss 0 उससे भोपकी स्थितिविलियोंका अत्तरी नुबन्धी चतुष्की. स्थितिविमतिका । - हम मममे पुटपुग्य/ मुजरे प्रेमापारि समिमिकामोर । सम्मिपि उमापमिो ममी सपनो। हो। सिक्स मंतर पारस्पस 1 एपसमम प्रा विनिम्सर स्वटरतमाहो। पिर। . । सम्मान कामिनि म मिरमुपतिमीसामोसा माहिमेत सम्म । मा पर मादी माग पर रोमन समर मोमबल। गि म और पम्बामा असमा गौ २२] डिविषिहचाए उत्तरपर्याऽमुमगारमंतर अप्परकम्मंसिपस्स अंतर केवपिरं कालापोहोवि! S७४ सुगममेदं । • जगणेस एगसमभो। ७५ भदा! मित्स्स अप्पदर करेमापेण सबमारमवशिद वा एगसमय काम पूणो सदियसमए अप्पदरे फटे एगसमयमेचतस्बलभादो। • उमस्सेय अंतोमुत्त। 5७६ दो । अप्पदर करतेम सब-मवहिदापि मंतोमाच कापूण मप्पदरे को अवोमाचमेचतालमादो। सेसाप पिणेवम्म। 5७ मा मिउत्स्स गोद सहा सेसपपरीष पि पेदर्म । एप पुष्मिापारिएग पचिदस्पस्स उपारणमस्सिरण पारण कस्सामो। SE भवरापुपमेण पितो विरेसो-मोपेन पावेसेम य । सत्प भीपेन मिच पारसक-यमबोक० एम०-अबहि० ब० एगस० उक० बहिसागरोपमसद सादि रेप | अप्पार० ० एमस०, उह• मंतोस । अमवाणु०पठफ. सब-मबाहि . मिप्यासी मस्पसरस्मितिविमकिपाले बीपका मन्तरकाल फिसना है। S४ पासूत्र सुगम। अपन्य अन्तरकाश एक समय है। SL क्योंकिमिप्यारसकी अस्पतर स्थिििवमजिन परमबास निस जीवन रु समयके सिए मुबगार पा अवस्मित स्थितिनिक्लिादिमा पुना तीसरे समय में यदि वा प्रसवर स्थिति विमणिोपरताहो उसके अस्पतर स्थितिपिछिका एक समय भम्तर पाया जाता है। • उसप्ट मन्तरकाल अन्तर्गत है। Fu६. स्पोंकि अस्पतर स्पितिषिमलियो करमेवा बिस बीवमे अन्तर्मुहूर्त सा मुस- गर और भवस्पित स्पितिविधियों को किया। पुना सके सम्म शके पार प्रस्सतर स्थितिविधिोरमेपर मिथ्यावादी मसतर स्थितिविधिन मातरम् मम्तमहत प्रस होता है। इसी प्रकार शेप प्रतियोंका मी अन्तरकात जानना चाहिए । So मिस प्रकार मिप्यात्वका अन्तरमहमा उसी मर मेप प्रतियोमी गाना चाहिए । इस प्रकार पुर्णिसूत्रके ता पनिपमप्राचार्य नारा सचित प प्रा बारपाके मामयसे मन परव- 5 मम्तएनुगमकी अपेक्षा निरा दो प्रकारका-भोपामिरेरा और पारेरामिय। नमसे भापकी अपेक्षा मिप्याल, पारा पाप और नौ माकपापोंधी मुनगार और मपस्थित स्थितिविमचियोंका उपन्य भन्ठर एक समय भौर पर भम्तर सापिक एसो प्रेम सागरी। मसतर स्थिििवमति बपन्य भम्तर एक समय भोर मर भन्तर अन्तत है। ममता मुबन्पी चतुपकी मुमगार भोर भपस्थित स्थितिषिमच्चि मग मिथ्याला समानदे। भस्पर स्थितिषिमयिका पम्प अम्तर एक समय भोर का अन्तर सम्म पापपासठ सागर है। सपना सपना। सितारामविपन स्था सम्बनिश्मिविमानेसर र अमित स्थिििवभागल मागर र मनु पाप +7 F4 पर न F प गा०२२] ४० ६६८ उक० लेती -- । उक्क० वे अवडिक प्राई। एग समन उसन० तेतीम-सात मंगो। सुक्र० सम्मा० रेयाणि । वेदग० छावटिसागरो० નાદિકાળાવમાં लिया। । जयधवलासहिदे कसायपाहुडे हिदिषिहत्ती ३ ६७. चक्खु० मिच्छत्त-सोलसक०-णवणोक० मुज०-अवहि० अणंठाणु०चउक्क०' अवत्तव्व० ओघं । अप्प० ज० एगस०, उक्क० तेवहिसागरोवमसदं सादिरेयं । सम्मत्त-सम्मामि० भुज-अवहि ०-अवतव्यमोघं । अप्प० ज० एगस०, छावहिसागरो० सादिरेयाणि । ओहिदंस० ओहिणाणिभंगो । ही पाई जाती है अत उक्त तीनों अज्ञानोंमे इन दो प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल पल्यके असख्यातवें भागप्रमाण कहा । आभिनिवोधिकज्ञान आदि सम्यग्ज्ञानोंमें केवल अल्पतर स्थिति ही पाई जाती है। किन्तु मनःपर्ययज्ञानको छोडकर इनका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल साधिक छयासठ सागर है इसलिये इनमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल साधिक छयासठ सागर कहा। किन्तु अनन्तानुबन्धी चतुष्क इसका अपवाद है। बात यह है कि वेदक सम्यक्त्वके साथ अनन्तानुवन्धीका सत्त्व कुछ कम छयासठ सागर तक ही पाया जाता है इसलिये इसकी अल्पतरस्थितिका उत्कृष्टकाल कुछ कम छयासठ सागर कहा। तथा मनःपर्ययज्ञानका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्टकाल कुछ कम पूर्वकोटि वर्ष प्रमाण है, अतः इसमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल कुछ कम पूर्व- कोटि वर्ष प्रमाण कहा। मनःपर्ययज्ञानके समान सयत आदि मार्गणाओं में भी जानना चाहिये, क्योंकि इनका जघन्य और उत्कृष्टकाल मनःपर्ययज्ञानके समान है। इतनी विशेषता है कि सामायिक और छेदोपस्थानाका जघन्यकाल एक समय भी है जो कि उपशान्तमोहसे च्युत हुए जीवके ही सम्भव है, क्योंकि ऐसा जाव एक समय तक अनिवृत्तिकरण गुणस्थानमें रहा और मरकर यदि देव हो जाता है तो उसके सामायिक और छेदोपस्थापना सयमका जघन्यकाल एक समय पाया जाता है। पर यहाँ २४ प्रकृतियोंकी सत्ता ही सम्भव है, अत २४ प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्य- काल एक समय कहा। असयत मार्गणामें और सब काल तो ओघके समान बन जाता है किन्तु सव प्रकृतियोंकी अल्पतरस्थितिका उत्कृष्टकाल साधिक तेतीस सागर तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मि- थ्यात्वकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल एक समय प्राप्त होता है। बात यह है कि अविरतसम्यग्दृष्टिका उत्कृष्टकाल कुछ कम एक पूर्वकोटि अधिक तेतीस सागर है, अतः असयममें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्टकाल उक्त प्रमाण कहा। तथा यहाँ कृतकृत्यवेदककी अपेक्षा सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल एक समय प्राप्त होता है। 5६७ चक्षुदर्शनवाले जीपोंमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तिका तथा अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी श्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिका काल ओघके समान है। अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल साधिक एक सौ वेसठ सागर है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी मुजगार, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभ- क्तियोंका काल ओघके समान है। तथा अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल साधिक एक सौ वत्तीस सागर है। अवधिदर्शनवाले जीवोंका भग अवधिज्ञानी जीवोंके समान है। विशेषार्थ-चक्षुदर्शनमार्गणाका काल यद्यपि दो हजार सागर है पर इसमें अल्पतर स्थिति- का काल इतना नहीं प्राप्त होता, इसलिये यह कहा है कि चक्षुदर्शनमें २६ प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल साधिक एक सौ त्रेसठ सागर है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्लतर स्थितिका उत्कृष्टकाल साधिक एक सौ वत्तीस सागर है। , ता० प्रती चठक्क० [ ओघ ] भवत्तम्ब० इति पाठः । यह अापक समान कान्हमें कुछ विशेषता एक समय भी पाया। सुगम है। तथा सन कवनसे हो जाता है, ६६८ कृष्ण स्थितिविमच्चियोंकार और मकालन सोलह कपाय और नो है। तथा असत्तर स्थित स्थितिविधिका अवस्थित और अब वन्यकाल एक समय स्थत सागर है । पीतो मा है। और हत्यामें अस्पताल ६६९. अना वधिशानियोंकि समान ववन्यकाल अन्तर्मुहूर्त स्वरिमायात्र और विशेषता है कि स पाद कपाय और नी कस एयासठ सागर देवयान एक समान मेग है। 1 कति मा-या भरतानामा TR. देवदिसामोरमाई माहिती । प.व. एम., गरिमयो। ৗরীদামি লম্বা विरोष पसरली परत पात मरमा নং মিম गमततायी तुपामा बाम सिलामास समा रममा सरणार सामाजिक पन्ना और মা বৰ ৰা समान। नीता If योरसे मार गा.२२] हिरिवित्तीए तरपरिमुबगारकाला F६८ किमणीत काउ० मिच्छच० सम० प्रमति ओप । अप्पद० म० एगस०, उपक. वेचीस-सपारस-सचसागरोपमाणि देरपाणि । सोलसफल-गायोफ० सब- सार बाप। मप्प० मिम्छचमगो। मणवाजु०पउफ्फ. अपचम्ब० माणका एगस० । सम्मच-सम्मामि० सम-प्रबहि-अवचम मोघ । अप्प. ब. एगस०, उपफ वेवीस-सचारस-सवसारोम० देपाणि | वेठ. सोहम्ममगो। पम्म० सहस्सार मगो । सरक० आमदमंगो । णपरि अप्प० वेचीस सागरो. सादिरेयाणि । 5६६ ममव० छब्बीस. मदि० मगो। सम्माति. मामिणि मंगो। साप सम्मा० एस्कलीसपय० मप्पर० स० मंतोच, उफ० तेवीसं सागरो० सादि रेयापि । वेदग० मिग्छच-सम्मामिछक्-मर्णवाणु०पउन० मोहिमंगो | परि उक० छापहिसागरो० परणागि । सम्मच पारसक०-गदपोक० भप्प० म० मतोम०, उप. बापडसागरोतमाणि । सासण सम्बपपटि. अप्प० म० एगस०, उमछाक छिपामो । मिन्छाइटि० मदिमप्यागिमगो। या भोपके समान पटित कर सेना चाहिये। किन्तु इन यो प्रतियोंकी अस्पतर स्थिति बपम्प में सब विशेषता है। बात पर किसनाकी अपेक्षा इनकी भस्पतर स्थितिका बपन्य पक्ष एक समय मी पाया जाता है मता यहाँ प्रसतर स्थितिका अपम्प कास एक समय पदा। पेप बन मुगम है। क्या इस भागे भग्य मार्गणाभोम बो कास निर्देश किया सका प्रमुगम पूर्ण अपनसे हो पाता है, इसनिय पृषा मासा नही किया । S८. नीव भोर पोव मायापाले वीमें मिप्यावही मुबगार भोर भवस्थित स्थितिविधियों का पोषक समान है। भसतर स्थितिविधिमा अपम्पकाल एक समय और कष्टप्रल कमसे कुछ मदतीस, द कम स्त्रा और इसकम सात सागरप्रमाण है। सोबा पाय और नो नोच्यायों की मुनगार और भपस्थित स्थितिविमसिा पास मोमके समान या प्रसार स्थितिविमतिका मग मिप्यास्वके समान है। मन तानुमवीतुपी भवसम्म स्पितिविमतिका अपम्प और एकराम एक समय। सम्पमत्व और सम्पम्मिम्पालकी मुबगार, अबस्थित भौर भवचम्प स्थितिविधिका काम भोपके समान है। अस्पतर स्पितिपिमचिड़ा सपम्पल पक समय और कष्टकास कमसे कम वेतीस सम्म सत्रा और इनकम सात सागरी। पीतलेश्याबाबीपक सौधर्म समान मग पपमेस्पालालकिलार समान मा। और एक्सरसश्यावलोक भानाकसके समान मग है। पितु इक्नी पिपता है कि एक्स मेरपा अस्सवर स्मितिविमािम सामिक देतीस सागर है। ६९. प्रमोंमें बनीस प्रतियोंकामंग मत्पानिपोक समान है।सम्पपियानमामिनि- पोषिष्यानिकि समान मंगहै। पापिष्टम्बदप्तियोम मीस प्रतियों की प्रसर स्पितिविधिमा अपम्पमत अम्वीइत भोर छप्पकात साधिक वेतीस सागर है। मेरफसम्पन्दष्टिोम मियाब सम्पग्मिप्यास्त्र और अनन्तानुबन्धीचमा मंग भवषिमानियोंकि समान है। मितु श्वनी विशेषता कि प्रसार स्थितिविधिका हट का इस फम बपासठ सागर है। सम्पाव पार कपाय भौर नौ मोक्यायोंकी मायावर स्थितिषिमटिका बसम्मान भम्त मोर कष्ट प्रास नपाळ सागर है। सासाबनसम्पपियामि सब प्रकृतियों की मम्मतर स्विविषमहिमा बसम्पमत एक समप भौर कस्टम पर भापती है। मिप्यारपियो मस्यदानियों समान मगरे। र गुरासान या भर मरन मला सरमामाल २ मनिका असर स्ति “य मागास समाज माम मगर मा माती माहरालयमातील रन की मायाम मगत भारी उम्म मम्मस्थितिविwिant SAR HIसका म अस्ति पर HAR विभिR PRER मसिन पर सपा AM विधान समिति प्राधिक प्रेस सस मभिरा। ( ४२ for ६७२ ६७५.६ काप पूजो वाद *स ६७६. कन्द मो. १ * सेसाप (७७, म सूचिदत्यस्सा L ६७.. पारसक-२१ रे । अपदर० -- जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहसी 5७०. सणि पंचिंदियभंगो। एवमाहारीणं । णवरि सण्णि० मिच्छ०-सोलसक० णवणोक० भुज० उक्क० वे सत्तारस समया। असण्णि० मिच्छत्त-सम्मत्त-सम्मामि०- सोलसक०-णवणोक० अप्पदर ज० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे०भागो । सेस. ओरालियमिस्स भंगो। एवं कालाणुगमो समत्तो। * अंतरं। 5७१. सुगममेदं, अहियारसंभालणफलत्तादो । * मिच्छत्तस्स भुजगार अवहिदकम्मंसियस्स अंतरंजहरणेण एगसमभो। ६ ७२. कुदो ? भुजगार अवटिदविहत्तीओ एगसमयं कादूण विदियसमए अप्पदरं करिय तदियसए भुजगार-अवहिदेसु एगसमयमेत्तंतरुवलंभादो। * उक्कस्सेण तेवहिसागरोवमसदं सादिरेयं । 5 ७३. तं जहा-तिरिक्खेसु मणुस्सेसु वा भुजगार-अवहिदाणमादि कादृण पुणो तत्थेव अंतोमुत्तकालमप्पदरेणंतरिय तिपलिदोमिएसुप्पन्जिय तेवहिसागरोवमसदं भमिय मणुस्सेसुप्पन्जिय अंतोमुहुत्ते गदे संकिलेसं पूरेदूण भुज०-अबढि०कदेसु लद्धमंतरं होदि । 5७० सज्ञी जीवोंके पचेन्द्रियोंके समान भग है। इसी प्रकार आहारक जीवोंके जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि सजियोंमे मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी भुजगार स्थितिविभक्तिका उत्कृष्टकाल मिथ्यात्वको अपेक्षा दो समय और शेपकी अपेक्षा सत्रह समय है। असज्ञियोंमें मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है । तथा शेष भग औदारिकमिश्रकाययोगियोंके समान है इस प्रकार कालानुगम समाप्त हुआ। * आगे अन्तरानुगमका अधिकार है। $ ७१ यह सूत्र सुगम है, क्योंकि अधिकारकी सम्हाल करना इसका फल है । * मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थिति विभक्तिवाले जीवका जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६७२ क्योंकि जो कोई जीव भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंको एक समय तक करके और दूसरे समयमें अल्पतर स्थितिविभक्ति करके यदि तीसरे समयमें पुनः भुजगार और अवस्थित विभक्तियों करते हैं तो उनके मुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका केवल एक समय अन्तर पाया जाता है। # उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एकसौ त्रेसठ सागर है। ७३ उसका खुलासा इस प्रकार है-जिन्होंने तिर्यंच और मनुष्यों में उत्पन्न होकर भुजगार और अवस्थितस्थितिविभक्तिका प्रारम्भ किया। पुन. वहीं पर अन्तमुहूर्त कालतक अल्पतर स्थिति- विभक्तिसे उन्हें अन्तरित किया। पुन• वे तीन पल्यकी आयुवाले जीवोंमें उत्पन्न होकर और एकसौ बेसठ सागर कालतक परिभ्रमण करके मनुष्योंमे उत्पन्न हुए और वहाँ पर उन्होंने अन्तर्मुहूर्त कोलके वाद सक्लेशकी पूति करके भुजगार और अवस्थित विभक्तियोंको किया । इस प्रकार भुजगार और अवस्थित विभक्तियोंका उत्कृष्ट अन्तर साधिक एकसौ प्रेसठ सागर प्राप्त होता है। * मिय ६७. दर * बघन्य । ६७ ५५ लिए मुजगार या विमच्छिो करता है , ६७५, २५ गार और अस्ति स्थितिविर्भात * इसी 5. विस चाहिए। इस प्रकार अश्मयसे कयन J. Ad स्नमसे भोपकी स्थितिविमतियों का असतली सुदन्धी चतुष्ककी स्थितिविधिका .

सातौमर समय पारे यापी सनिमिप मोल- अमपि पिडसमस मा. परिहा मासेमा मुमघो। सिपस्स तरजापनि यसको एमसर पर सिमराज तवतमाहा। विर। .. सजगम शाशिमा पर नमुमजिस वेविसापरोपाई सबभाजिम मारो। नी" MARRIALA गरर रोष गी २२] हिदिमिचीए सचिरपरिमुजगारमंतर • अप्परकम्मंसियस्स अंतर केपचिरं कालापो होवि । 5७४ सुगममेदं । • जगणेष एगसममो। ३०५ दो! मिष्ठचस्स अप्पर फरेमाषण मुबगरमवाहिद पा एगसमय कार्य पुनो पदियसमए मप्पयरे फरे एगसमपमेचतरूपसमायो। • उपस्सेए तोमहत्त। 5७६ दो। अप्पदरं करतेम सम-अवहिदागि संतोमाच फारम मप्पदरे कले मतोमहुचमेचंवरूपसमादो। • सेसा पि वा। ३७७ बहा मिष्ठतस्स गोद पदा सेसफ्परीण पि पेदमं । एव बुणिमुपारिएम पवितत्पस्स सवारणमस्सिर्ग परूषण फस्सामो। ३७. अंतरानुगमेण दुपिहो विसो-ओपेण बादेसेम य । वप भोपेन मित्त पारसक-भरपोक० सम०-अबाहि० २० एगस० तब वेपहिसामरोषमसई सादि रेय । अप्पएर०प० एमस०, उह. अवोस। बनतापु० पटक. सब-प्रवाह •मिप्यास्पकी मस्पतरस्पितिपिमक्तिपासे भीषका अन्तरकात फिराना है। 5.४ पासूत्र मुगम है। बपन्य अन्तरकात एक समय है। 5. क्योंकि मिप्यात्मकी भस्मतर स्थितिषिभनिने रनेवाले बिस बोक्न एक समयके लिए मुझगार पा मनस्पित स्थितिविमखिो पिया पुनः तीसरे समय में पदिपा भत्सवर स्पिति- विमतिको मता समस्पतर स्थितिमिमतिका एक समय भम्तर पाया जाता है। सप्ट अन्तरकाठ अन्तर्गत है। इम स्पोंकि मस्पतर स्पितिविमतिको करनेवाले बिस पीपने मत कसतक मुंग गार भोर अपस्थित स्वितिविधियों को किया। पुमा सके भन्मताके पार अस्पतर स्थितिविमपिनेपर मिथ्यात्वीभत्सतर स्विविषिकिन मन्तरगत मन्तमा प्राप्त होता है। इसी प्रकार शेप प्रतियोका मी मन्तरकास बाम्ना चाहिए । S» मिस पर मिप्यात्वन अन्तरमा हसी प्रचार क्षेप माक्पिोंकन मी मानना पाहिए । इस मभर पूर्णिसूको पर्ता पनिपममापा बारा सूचित ए अका पारणाने मामपसे मरते- SH. मन्तरानुगमकी अपेक्षा मितेश दो ममरकामोपमिर और भारेगनिःश। नमसे मोपकी अपेक्षा मियाब, बार कयाम और नो मोश्यायों की मुबगार मोर भवस्थित स्थितिविधियोंन बसम्म मन्तर एक समय और बस मान्न साधिक पसौ प्रेसठ सागर।। प्रसर स्विविविमतिपय अन्न एक समय भौर का अन्वर भन्मात मन्त- सुगन्पी चतुफली मुबगार और मपस्थित स्विविविममिका मग मिप्यार के समान है। प्रसार स्थितिविमतिका अपम्य अन्तर समय और कम मन्तर सम्म पो पासठ सागर है। पार पर VIमस्तान न74/ 1 मितिमिसिनो गौचन मि स्पिटिशनायक मार स्थित विकि मापर। नाम पर कर समसा STAR से पास समार पर समिसिरप FARMEREnt ।

४२ hton] . ६४. ६७. काप गोता. ६७. रदे तापम - * सेसाए ६७७, न चिदन्यास म ६७.. वारसक०-५५० रेयं । अपदर जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती३ ७०. सणि. पंचिंदियभंगो। एवमाहारीणं । णारि सण्णि० मिच्छ०-सोलसक०- णवणोक० भुज० उक्क० वे सत्तारस समया। असण्णि० मिच्छत्त-सम्मत्त-सम्मामि०- सोलसक०-णवणोक० अप्पदर ज० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे भागो । सेस. ओरालियमिस्स०भंगो। एवं कालाणुगमो समत्तो। * अंतरं। ७१. सुगममेदं, अहियारसंभालणफलत्तादो । * मिच्छत्तस्स भुजगार-अवहिदकम्मंसियस्स अंतरं जहणणेण एगसमभो। ६ ७२. कुदो ? भुजगार अवटिदविहत्तीओ एगसमयं कादण विदियसमए अप्पदरं करिय तदियसए भुजगार-अवहिदेसु एगसमयमेत्तंतरुवलंभादो । * उक्कस्सेण तेवहिसागरोवमसदं सादिरेयं । ७३. त जहा-तिरिक्खेसु मणुस्सेसु वा भुजगार-अवहिदाणमादि कादृण पुणो तत्थेव अंतोमुत्तकालमप्पदरेणंतरिय तिपलिदोवमिएसुप्पजिय तेवद्धिसागरोवमसदं भमिय मणुस्सेसुप्पजिय अंतोमुहुत्ते गदे संकिलेस पूरेदण भुज०-अवडिकदेसु लद्धमंतरं होदि । ७० सज्ञी जीवोके पचेन्द्रियोंके समान भग है। इसी प्रकार पाहारक जीवोंके जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि सजियोंमे मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी मुजगार स्थितिविभक्तिका उत्कृष्टकाल मिथ्यात्वकी अपेक्षा दो समय और शेपकी अपेक्षा सत्रह समय है । असज्ञियोंमें मिथ्यात्व, सम्यक्त्व, सम्यग्मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्यकाल एक समय और उत्कृष्टकाल पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है। तथा शेष भग औदारिकमिश्रकाययोगियोंके समान है। इस प्रकार कालानुगम समाप्त हुआ। * आगे अन्तरानुगमका अधिकार है । ६७१ यह सूत्र सुगम है, क्योंकि अधिकारकी सम्हाल करना इसका फल है । * मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थिति विमक्तिवाले जीवका जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६७२ क्योंकि जो कोई जीव भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंको एक समय तक करके और दूसरे समयमें अल्पतर स्थितिविभक्ति करके यदि तीसरे समयमें पुन भुजगार और अवस्थित विभक्तियों करते हैं तो उनके भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका केवल एक समय अन्तर पाया जाता है। * उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक एकसौ त्रेसठ सागर है 5७३ उसका खुलासा इस प्रकार है-जिन्होंने तिर्यंच और मनुष्योंम उत्पन्न होकर भुजगार और अवस्थितस्थितियिभक्तिका प्रारम्भ किया । पुनः वहीं पर अन्तमुहूर्त कालतक अल्पतर स्थिति- विभक्तिसे उन्हें अन्तरित किया। पुन• वे तीन पल्यकी आयुवाले जीवोंमें उत्पन्न होकर और एकसौ ग्रेसठ सागर कालतकं परिभ्रमण करके मनुष्योंमें उत्पन्न हुए और वहाँ पर उन्होंने अन्तर्मुहूर्त कालके बाद सक्लेशकी पूति करके भुजगार और अवस्थित विभक्तियोंको किया । इस प्रकार भुजगार और अवस्थित विभक्तियोंका उत्कृष्ट अन्तर साधिक एकसौ त्रेसठ सागर प्राप्त होता है। * मिया ६७१ यर जघन्य (४५.२५॥ लिए भुनगार वा विच्छिो काताई ६७५ ५५ गार और अति स्थितिविर्भात * इसो 5. जिस चाहिए। इस प्रकार पात्रयसे कथन कते Suar ममसे प्रोपको स्थितिविमच्यिोंका अस्तरमा सुदन्धी चतुष्मकी स्थितिवितिका यसरे नापारि सथिमिकता- असम्मि पिछव-सम्म म. परिमो. मासे गायो समचो। सियस तर जाप यसो एमसम व विविसरमा तसम्माहो। र। अवमास्मारिकमा मा . एसपजिप वेवसापोतमाम को । एबवाहित सम्म । प्रमी भार मिला। माय मराज म्मर भार । मिपान भरने माना जाता नि पासमाना। गां० २२] द्विविवित्तीय वरपपरिप्रगारमंतर अप्परकम्मंसियस्स अंतर केचिरं काढायो होवि ? 5७४ सुगममेदं। ० जहरणेण एगसमभो। ३०५ हुदा ! मिन्छचस्स अप्पदर फरेमापेण सुबगारमबाहिदं पा एगममय फादन पुगो तदियसमए बप्पदरे को एमसमपमेचवबलमादो। • उपस्सेप तोमूहुत्तं । १०६ दो ! अप्पदर फरवेण सब०-मवहिदामि अंतोमुच कादण मप्पदरे को अतोमाचमेचंवरूवर्समादो। * सेसाप पि दम। ३७० महा मिष्यत्तस्स पोद वहा सेसपपरीण पिबेदमं । एप पुम्मिमुचाइरिएग सपिदत्पस्स उपारगमस्सिन परूपण कस्सामो । ७८. मतरायुगमेन इमिहो पिरसो-भोषण मादेसेप य । तत्प बोपेण मिळत पारसफ०-णवमोक० सम०-अपहि० ब० एगस० उप० वेबहिसागरोवमसद सादि रेप | मप्पर० ब० एगस०, उफ. बतोस । ममता०पटक सब-मपहि मिप्यास्तकी अस्पतरस्थितिविमकिपाले बीबका मन्तरकाल कितना। 51 पर सूत्र मुगम है। वफ्न्प मन्तरकात एक समय है। क्योंकि मिप्यारी भस्सर स्मितिषिमतिका करमबाल मिस गीवन एक समयक सिए मुरगार या अवस्थित स्पितिविधिको पिया पुनः तीसर समप में पदि पर भस्पतर स्थिति- विमणिोपरतारो प्रमो मस्सतर स्पितिविमतिका एक समय मम्तर पाया जाता है। • उक्तप्ट मन्तरकाल मन्वना है। क्योंकि मसतर स्मितिविधिको रमवान पिस बीवन मम्तमुहूर्त फसतक मुज गर और अवस्थित स्पितिविमखियोंगे किया। पुना मो मनमुहर्त मसके बार मसतर स्थितिविमरिनेपर मिप्यावानी प्रस्सतर स्मितिविमसिम अन्तरगत मन्तमहरी प्राप्त होता है। इसी प्रकार क्षेप प्रतियोरा भी अन्तरकात बानना चाहिए । 5. जिस प्रकार मिप्यावन भतरकात या रसी मनर पर माठियोम भी जानना पाहिए । इस प्रमाणिसूत्रो पता यतिपममाचार्य के पास सषित एप का मारणाके मामयसेप्सन - S८. अन्तरानुगमकी भपेक्षा निग दो प्रकारपर-पापनिरा और मारेगनिय। नमेंसे भापकी भपका मिप्यात पार पाप मोर मी नापागेकी मुमगार और अपस्थित स्पितिविधियोनसपम्प अम्वर एक समय मोर मार अम्बर सापिक पासो पसठ सागरी। मसतर स्पितिविधिमा पम्प मम्तर पर समय और त भन्तर भम्तर्मुर्त है। ममता मुषन्पी नुफसी मुरगार और भवस्मित स्पितिविमखिम मंग मिप्यात ममान। मसतर स्थितिविधि अपम्प भम्तर पर ममय भोर मर मन्तर पदमा पासठ सागररे। समान्य इस । सितिमिलिन कि सितिमिलिक रस्मीता समस्या भर भास्कि सिमित सातार है। १च परे मारेला रमा ही पर बन्न माग Int समर पर नन् माविमोमियासमा ससा सादर गी०२२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ मिच्छत्तभंगो । अप्प० ज० एगस०, उक्क० वे छावद्विसागरो० देसूणाणि । अवत्तव्व० ज० अंतोमु०, उक्क० अद्धपोग्गलपरियट्टू देखणं । सम्मत्त-सम्मामि० भुज०-अवढि० ज० अंतोमुहुर्च, अप्पदर० ज० एगस०, अव्वत्तव्व० ज० पलिदो० असंखे भागो । उक. सम्वेसि पि अद्धपोग्गलपरियट्ट देसूणं । एवमचक्खु०-भवसिद्धियाणं । ७९ समओ, - অর্ণনা देसमामि। सम्मामिल - पलिदो० ॥ वतन्वं ।।। fo समो, उस अणंतागु०१५ पलिदो० ६८९. -- पारसका ओघ । अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल- परिवर्तनप्रमाण है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त, अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है। तथा सभी स्थिति- विभक्तियोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गलपरिवर्तनप्रमाण है। इसी प्रकार अचक्षुदर्शनवाले और भन्य जीवोंके जानना चाहिए । विशेषार्थ -एक जीवने अनन्तानुबन्धीकी विसयोजना की, पश्चात् वह कुछ कम एकसौ बत्तीस सागर तक विसयोजनाके साथ रहा और छान्तमे जाकर उसने अवक्तव्य स्थितिविभक्तिपूर्वक अल्पतर स्थितिको प्राप्त किया। इस प्रकार अनन्तानुबन्धीकी अल्पतर स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम एकसौ बत्तीस सागर प्राप्त होता है। जिसने अनन्तानुवन्धीकी विसयोजना की है ऐसा एक जीव मिथ्यात्वमे गया और वहाँ उसने अवक्तव्य स्थितिको प्राप्त किया । तदनन्तर दूसरी बार अन्तर्मुहूर्तके भीतर उसने मिथ्यात्वसे वेदक सम्यक्त्वको प्राप्त करके और अनन्तानुबन्धीकी विसंयोजना करके अन्तर्मुहूर्तमे मिथ्यात्वको प्राप्त किया और इस प्रकार दूसरी बार अवक्तव्यस्थितिको प्राप्त किया। इस प्रकार अवक्तव्य स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त प्राप्त हो जाता है। तथा जिस जीवने अर्ध पुद्गलपरिवर्तन कालके आरंभमें और अन्तमें अनन्तानुबन्धीकी विसयोजना करके मिथ्यात्वको प्राप्त किया है उसके अवक्तव्य स्थितिका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवतन प्रमाण प्राप्त होता है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थिति सम्यग्दर्शन ग्रहण करनेके पहले समयमे होती है। अतः जिसने अन्तर्मुहूर्तके अन्दर दो बार सम्यक्त्वको ग्रहण करके भुजगार या अवस्थित स्थितिको या है उसके उक्त प्रकृतियोंकी भुजगार या अवस्थित स्थितिका जघन्य अन्तर अन्तमुहूर्त प्राप्त होता है। जो सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिको फर रहा है उसने एक समय तक मुजगार या अवस्थित स्थितिको किया और पुनः अल्पतर स्थितिको करने लगा उसके उक्त प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिका जघन्य अन्तर एक समय प्राप्त होता है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वकी उद्वेलनामें पल्यका असख्यातवा भागप्रमाण काल लगता है और अवक्तव्य स्थिति उद्वेलनाके विना प्राप्त नहीं होती अतः सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी प्रवक्तव्य स्थितिका जघन्य अन्तर पल्यके असख्यातवें भागप्रमाण कहा। जिसने अर्धपुद्गल परिवर्तन कालके प्रारभमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी सत्ता प्राप्त करके यथासम्भव भुजगार आदि स्थितियोंको किया । अनन्तर इनकी उद्वेलना करके कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन काल तक २६ प्रकृतियोंकी सत्ताके साथ रहा । पश्चात् कुछ कालके शेप रह जानेपर पुनः इनकी सत्ताको प्राप्त करके उक्त भुजगार आदि स्थितियोंको किया । इस प्रकार सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी मुजगार आदि स्थितियोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अर्धपुद्गल परिवर्तन प्रमाण प्राप्त होता है। यहाँ हमने सब प्रकृतियोंकी भुजगार आदि स्थितियों के अन्तरका खुलासा नहीं किया है। जिनका आवश्यक था उन्हींका किया है। शेषका मूलसे होजाता है। इसी प्रकार मार्गणाओंमे भी जहाँ जिसके खुलासा करनेकी आवश्यकता होगी उमीका किया जायगा। fve और अस्थित सागर है। अब असन्तानुबन्धी विच्मिा या स्थितिविमतिका और सायी असतरस्थिति पल्योपसके देतीस सागर है। कम देतीस São în स्थितिविमतिका है। अल्पतर अनन्तानुबन्धी भल्सतर स्थिति तथा भवजन्य पदाका भग ६८९ । मिप्यास्त्व, वारद अन्तर एक समय भोधक समान है . 1 - विहिसाबरो इस्पाती। मार मम्मच-सम्माति जमाई २. परिदो भार मासिरियल। और काम मुगर र पति यस अन्तरसमस परमात्र राजा सयामा स्यामारा सपना साम्मा सातमी बार सम्म सिमित याप्रसर सिर पनामा सिमोसा सम्यिानर साल IR RETIRI सिम दुपरामि। सिम अनुप विलोम এখন প্রমাণ মিল Rतिस्थिति ROR समसाबरगुजा गा २२] द्विविमिरचीए उत्तरपग्मुिमगारमंतर 5७९ मादेसेन पराएस मिच्छत् पारसक० अपणोफ० सज०अपट्टि ब० एग सममो, उम० तेवीसमागरोममापि देग्नामि | अप्प० ब० एगस०, उप० अवोस । मर्गतायुक ० पठन एव पेप । पवरि अप्पदर० सह. एगसमओ, तर० सेबीस सागरो. देसमापि । बसम्प० ब० मतोम०, उक० तेचीससागरो० देसमाणि । सम्मच सम्मामि• रज०माहिम० मतोम०, गप्प० म० एगस०, मवचमम० पलिदो० मसंख०मागो । उफ० समेसि सेचीस सागरो० देरणालि एवं सम्पपेरहमाण पचम् । गवार सगसगहिदी देरणा । SE. विरिक्स० मिष्ठचनारसफ०-पपणोफ. सन०-जगह ब० एग- सममो, उप. परिदो० असखे०मागो। अप्पद० ५० एगस०, . मतोमु०। बमवाणु०पटक सब-अपहि० मिच्छचमगो । मप्प० ब० एगस०, उक० विष्णि पसिदो० देरणानि । मगच मोर्ष । सम्मच-सम्मामि० पदुर्ग पदाममोपमगो । 5८१ पंचिदियतिरिक्स-पपिविरि पक्ष to-पचितिरि०बोमिपीस मिच्छच- पारसक०-गवणोक० सब-प्रवाहि २० एगस सफ. पुम्मकोरिपुमर्च । अप्प० मोपं । एवमणताण परवाम । भवरि अप्प० ५० एगस०, उन० विणि पलि.देस FE भादराकी अपेमा नारपियोंम मिथ्यात्व मार पाय भोर न्ने नोकपायाकी मुजगार और मस्थित स्थितिपिमतिका अपम्म सम्पर एक समय मौर मम मन्तर कम वतीस सागर है। अस्पतर स्मितिविमतिमा समाय मम्सर एक समय भौर नाम मन्तर मन्तम है। मन्नानुक्षी चतुष्पका इसी प्रकार जानना चाहिए । इनी विशेषता कि इसकी भस्पतर स्थिति दिमांचका बपम्प अन्तर एक समय और कम मम्तर पर कम वेठीस सागर। सपा मपथ्य स्पितिविधि अपम्प अन्तर मम्तर्मुरतं मोर मास मम्सर इस कम वेतीस सागर है। सम्पास्व और सम्पम्मिप्यास्त्रकी मुमगार और अपस्थित स्पितिविधिका अपम्प अम्तर भन्तमुत, प्रसार स्थितिविचित्र वाम्म अन्तर एकसमाम और मरम्प स्मितबिमचिन परम्प भन्म पस्योपम प्रसस्त्यात मागप्रमाण । तया समी स्पितिविमतियांका तर मम्तर सम्म तीस सागर । इसी प्रकार सब नारकियोके करना चाहिये। फिन्तु इतनी पिरोपका किश्य कम वेतीस सागरके स्थानम बम अपनी अपनी स्थिति पनी पारिप । 5. चिोंमें मियाब बाप पाप और मो मोकपायों की मुबगार और भपस्थित स्मितिविमतिभ्रमपम्प मान्तर एक समय और मकर मम्तर पस्पापमो मर्मस्पात मागमाय । मसतर स्थितिविमतिका बन मम्तर एक समष भोर कर मन्तर मम्त है। मनन्तभुगन्धी पाणी मुबगार भोर भवस्थित स्पितिविधिका भंग मिप्यास्पो समाम है। मस्पतर स्मितिविमपिप सम्तर एक समय और हम अन्तरसम्म तीन पस्यो। या अपम्प स्मितिविधि मन्तर पोषके समान है। सम्मस्व मौर सम्मग्मिध्यावर चा पानमा मोष समाम है। 5 परेनिय तिच, पंचभिप विर्यच पर्याप्त और पंचेमिव तिच पानिमती किमि मिप्मात्य, गाय पाप पौर नौ नाकपायोंकी मुबगार मौर अस्मित स्पितिषिमक्षिका पम्म मन्तर पर समय भौर मास मम्तर पूर्वरिपषमस्व प्रमाण है। भासतर स्थितिमिचिन अन्तर भापके समान है। इमी पर अनम्तमुकमीचपन बानना चाहिए। मितु इसमी सितार मे मुमगर RARIA पमिलना uk ANA अन्तरसमा THEATRE र सम्पनिमा म्सम परजण पनि समा मुगार भी सिसि । पनि मानिस में मुभा भारी कुमारी गा। IANRAI IRMARom - ४६ Ton] सेमिन अवत्तव्यज० . जयधवलासहिदे कमायपाहुडे [हिदिचिहत्ती ३ णाणि । अवत्तव्ब० ज० अंतोमु०, उक० तिणि पलिदो० पुयकोडिपुधत्तेणमहियाणि । सम्मत्त-सम्मामि० भुज० ज० अंतोमुहुत्त, अप्प० ज० एगस०, पलिदो० असंखेभागो । उक्क० सव्वैसि पि तिण्णि पलिदो० पुब्बकोडिपुधत्तंणब्भहियाणि । अवढि० ज० अंतोमु०, उक्क० पुवकोडिपुधत्तं । एवं मणुसतिय० । णवरि मिच्छत्त. सोलसक०--णवणोकसायाणं जम्हि पुत्व कोडिपुधत्तं तम्हि पुचकोडी देरणा । ८२. पंचिंदियतिरिक्खअपज्ज.मिच्छत्त०-सोलसक०-णवणोक० भुज-अप्प.. अवहिदाणं जह० एगसमओ, उक्क० अंतोमु० । सम्मत्त-सम्मामि० अप्पदरस्स णत्यि अंतर । एवं मणुसअपज्ज०-एइंदिय-बादरेइंदिय-सुहुमेहंदिय-तेसि पज्जत्तापज्जत्त-सव्वनिगलिंदिय- पंचिदियअपज्ज०-पंचकाय-बादरसुहुमपज्जत्तापज्जत्त-तसअपज्ज०-ओरालिमिस्स०-वेउ. वियमिस्स०-विभंगणाणि ति । 5 ८३ देव० मिच्छत्त-वारसक०-णवणोक० भुज० अवढि० ज० एगस०, उक० अट्ठारससागरो० सादिरेयाणि । अप्पदर० ओघ । अणंताणु०चउक्क० अप्पदर० ज० एगस०, अवत्तव्ब० ज० अंतोमु० । उक्क० दोण्हं पि एकत्तीसं सागरो० देसूणाणि । अद्धि एवं 1. दरम्य गांध । . व० सोन एवमादार मामायदे सायदा --- अनंतान दानाशाही 4 समान । अन्तर पन्चायन, न अवस्थित हामवनवानिया विशेषता है कि कहना चाहिये। नावमाया कि अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर कुल कम तान पल्य अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उन्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटिपृथक्त्वसे अधिक तीन पल्य है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त, अल्पतर स्थितिविभकिका जघन्य अन्तर एक समय और प्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है। तथा सभी स्थितिविभक्तियोंका उत्कृष्ट अन्तर पूर्व कोटि पृथक्त्वसे अधिक तीन पल्य है। अवस्थित स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर पूर्वकोटि पृथक्त्व है। इसी प्रकार सामान्य, पर्याप्त और मनुष्यनी इन तीन प्रकारके मनुष्योंके जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोपायों की जिस स्थितिविभक्तिके रहते हुए पूर्वकोटि पृथक्त्व कहा है वहाँ कुछ कम पूर्वकोटि अन्तर ८२ पंचेन्द्रिय तिथंच अपर्याप्तकोंमें मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। सम्यक्स्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका अन्तर नहीं है। इसी प्रकार मनुष्य अपर्याप्त, एकेन्द्रिय, वादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय, तथा वादर और सूक्ष्मके पर्याप्त और अपर्याप्त, सव विकलेन्द्रिय, पचेन्द्रिय अपर्याप्त, पाँचों स्थावरकाय तथा इनके वादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, प्रस अपर्याप्त, औदारिकमिश्रकाययोगी, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और विभगज्ञानी जीवोंके जानना चाहिए। ८३ देवोंमें मिथ्यात्व, धारह कपाय और नौ नोकपायोंकी मुजगार और अवस्थित स्थिति- विभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर साधिक अठारह सागर है। अल्पतर स्थितिविभक्तिका अन्तर श्रोधके समान है। अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अलतर स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। तथा , ता. प्रतौ ओघं । भवाम्ब०भण-इति पाठ । चितिविडिया भवत याम्पिति उनुका कृष्टता 5. न વિવા सवत, परिहार सम्याधिक ध्याष्टि वारों ८६ पचे नो नाग्यायोंका आ. AN . हो. पुनोदिपम्पनिमन। म. एममाशमा दो. पुमग्रेरिपुत्तरमारनी एर मपुमतिय पर मिस म पुगको देखा। सह-परपोत राम सम्मानि-अप्पारस पनिमा सिं पचासयमवस्पिनिक ह-सपबायोसिमित जी... एप्स । उता. पर" पिएसपीस सायो रेखाम। गा० २९] विषिविहत्तीए चरपरिमुडगारमंतर सेस मिल्छचमंगी । सम्माच-सम्मामि० सन० च. मंतोमु०, अप्पद० ५० एगस०, अमचम्ब०१० पलिदो बसखे०मागो। उफ सम्बेसि पि एकवीसं सागरो० देणापि । माहि० ब० मतोस, सक० बहारस सागरो० सादिरेयानि । मवणादि मावसहस्सार• एव पेव । पवरि सगहिदी देस्मा । ८४ भाणदादि बार उपरिमगेखो चि मिपात-पारसफ०-पवणोफ० अप्प परस्स परिष भवर । सम्मच-सम्मामि० सुज० ज० असोम०, वप्प.ब. एपस०, अबचम०प० पसिदो० असते.मागो। अर्णवापु०पठा० अप्पदर. अवचम्वाणं ब० अवोस । उफ्फ. सध्यसि पि सगहिदी देण्णा । एव सुबाले । ८५ मदिसादि पाप सम्बासिरि पि सनपयरीनमप्पदर० परिव भवर । एबमाहार० माहारमिप्स०-अवगद • अफसा० आमिणि-सुद० भोहि०-मणपछ०-समद सामाइय दो०-परिहार०-मुहम-बहाक्साद०-संस्वासबद-मोरिदस०-सम्मादि'. खापनोदय-उपसम०-सासन-सम्मामिच्छाडि पि । ६८६ परिदिप-पपिपल ०-मस-तसपन• मिश्वत्-पारसफ -मनोक० गोम्। अपवामु० चउक० मोघं । पपरि भपतम्ब० २० मतोम०, उप. सगहिदी देसमा । पोनोंका ही ना भातरा कम इकतीस सागर है। सेप स्थितिविमच्चिोंच मा मिप्यास्यके समान है। सम्परत्व और सम्बग्मिप्यात्वकी मुखगार स्पितिविमटिका अपम्प भम्तर अम्तमर्व, अल्पतर स्थिठिविमहिनावपम्प अन्तर एक समय और पपळम्म म्पितिविधिका बपम्प अन्तर परस्पोपमके भसम्मात मागप्रमाल। तया समीन उक्स अन्तर कम इस्तीस सागर है। अपस्थित स्थितिवितिन दरम्प भन्तर अम्तमुहूर्त मौर उकस भम्तर साधिक भठप सागर है। भवनवासिमोसे लेकर प्रसार स्वर्गतको देवकि इसी प्रकार बानना चाहिए। विनी रिसेपठारे किन कम भपनी अपनी स्थिति पनी चाहिए। 5. भानतकससे सेन्ड परिम मोपलाके म मिथ्यात्व पाए पाप और मो नोपार्योकी मसतर स्पितिविजिन भातर नहीं है। सम्बस्व और सम्बम्मिप्यास्वकी मुशगार स्थितिविमतिका अपम्य मन्तर मम्मर मसतर स्थितिविमछिका सपम्ब अन्तर एक समय पौर अपचन स्थितिविधिमा पम्प भन्तर पस्पोपमके मसम्पात मागप्रमाप च्या मनम्तानुस्पी अनुपमी मत्सर भौर प्रमत्तम्प स्पितिविमियोका बपम्प भम्तर भम्तमात है। उमा समीप भम्तर सम्म अपनी अपनी स्थितिप्रमाण है। इसी प्रकार एक्सस्याम बामना चाहिए । १ भमुरिरामे शेर सर्वार्थसिद्धितक मि सब प्रतियोगी अस्पतर स्थितिविमहिमा भम्तर महीइसी प्रकार पाहारफायागी, पाहारक मिमकायपोगी, अपगतमेवपाले भकपापी मामिनिवाधिकहानी, मतमानी अवधिमानी मनापयशानी पित, सामापिकसपत देपोपस्थापना संबत पविानिरिसयत प्रस्मसापरायिकसपत, पबाम्पातसंवत, संपताबित भयभिपर्शमी सम्पमपि, चामिफसम्पष्टि, बरसम्पन्चार, रामसम्बरि, सासापनसम्पति और सम्पग्मि प्पाधी शीबानना चाहिए । ३८५ पंचेम्पि, परेमिय पयाप्त प्रस और प्रसपयात बीलम मिप्याय, पारपाय भोर मो नोपार्योका मग आपके समान है। अनन्तानुपायी चतुप्पा मग भापके समान है। पित 1ा प्रती सामामि इति नाम। गौर शाबास! I TAE मा पूर्णभेरिससे पल पविभRNER पार प्रनय स्थितिमा 1 नामांप्रमा निभासम्म पाप और मनुप्पी घान्य माया मॉम और * ममस और ना पारander दर, नयागाराम सरप्रय मानेनरल भगी, विनिमय कपाली मुम्बासी सति यसरRE समान बर माine द LIJIL. गा०३३ द० २०५० उMI ६० देखना। उह नीलम अवार अवतः३ ओवं । १३५५६ १९०५ उ० एकनीन परिय नंतर। ६६. एगत०, उ ज० एगन कामचतर जयधवलासहिदे कसायपाहडे [हिदिविासी३ सम्मत्त० सम्मामि० भुज०-प्रवढि० ज० अंतोमु०, उक्क० सगहिदी देखणा । अप्पदर० ज० एगम०, अव्यत्तव्य० ज० पलिदो० असंखे०भागो। उक्क० सगहिदी देसूणा । एवं पुरिस०-चक्खु० सण्णि त्ति। ७८७, पंचमण-पंचवचि० मिच्छत्त मोलसफ०-णवणोफ० भुज०-अप्पदर०- अवढि० ज० एगसमओ, उक्क अंनोमु० । सम्म०-सम्मामि० अप्प० ज. एगसमओ, उक्क० अंतोमु० । सेसाणं णत्थि अंतरं । एवमोरालिय०-वेउन्धि चत्तारिकसायाणं । 5 ८८, कायजोगि० मिच्छत्त-सोलसक० णवणोक० भुज० अबढि० ज० एगस०, उक्क० पलिदो० असं०भागो। अप्प० ज० एगस०, उक्क० अंतोमु० । अणंताणु०. चउक्क० अवत्तव्य० णत्थि अंतरं । सम्मत्त-सम्मामि० भुज०-अवढि०-अवत्तव्ब० णत्थि अंतरं । अप्पदर० ज० एगसमओ, उक्क० अतोमु० । कम्महय० छब्बीसं पयडोणं भुज.. अप्पदर०-अवढि० जहण्णुक० एगसमओ । सेस णत्थि अंतरं । एवमणाहार० । ६ ८६. इत्थि० मिच्छत्त-सोलसफ०-णवणोक० भुज-अवढि० ज० एगस०, उक्क० पणवण्ण पलिदो० देसूणाणि । अप्पदर० ओघं । णवरि अणंताणु० चउक्क० अप्प. इतनी विशेपता है कि श्रवक्तव्य स्थितिविभक्ति का जघन्य अन्तर 'अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अपनी स्थितिप्रमाण है। सम्यक्त्व और सम्यग्निध्यात्वकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अपनी स्थितिप्रमाण है। अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर पल्योरमके असख्यातवें भाग प्रमाण है। तथा दोनोंका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अपनी स्थितिप्रमाण है । इसी प्रकार पुरुषवेदी, चक्षुदर्शनवाले और सज्ञी जीवोंके जानना चाहिए। ६८७. पॉचों मनोयोगी और पॉचों वचनयोगी जीवोंमें मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकषायोंकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है । तथा शेप स्थितिविभक्तियों का अन्तर नहीं है। इसी प्रकार औदारिककाययोगी, वैक्रियिककाययोगी और चार कपायवाले जीवों के जानना चाहिए । ६८८. काययोगियोंमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकपायोंकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमके असख्यातवें भाग- । अल्पतर स्थितिविभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी श्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिका अन्तर नहीं है। सम्यक्त्व ओर सम्यग्मि- थ्यात्वकी भुजगार, अवस्थित और अवक्तव्य स्थितिविभक्तिका अन्तर नहीं है। अल्पतर स्थिति- विभक्तिका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर अन्तर्मुहूर्त है। कार्मणकाययोगियोंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका जघन्य और उत्कृष्ट अन्तर एक समय है । शेषका अन्तर नहीं है। इसी प्रकार अनाहारकोंके जानना चाहिए। SEE स्त्रीवेदियोंमें मिथ्यात्व सोलह कपाय और नौ नोकषायोंकी मुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियों का जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम पचवन पल्य है। स्थितिविभक्तिका अन्तर ओघके समान है। किन्तु इतनी विशेषता है कि अनन्तानुबन्धी 1, ता प्रती एगस। अठ-इति पाठ.। पत्त्य है। Ivane स्थितिमारा। वयव अनर स्थितिविर्मतका पायोंचा मुजगार व कम तेनीम अन्तर अन्तर्मुहूर्त है विभक्तिका उपन्य स्थितिविभक्तिका है। सम्यक्त्व और दालना चाहिए। म प्रमाण मुजगार और न एलीस सागर है। ध्यात्वकी प्रत्यतर अमोम एवीस ६९१, पृथ्य, मुबगार और अपनी स्थितिप्रमाण मुनगार और अल्पतर घन्य अन्तर एक समला रत्तष्ट 16 1 कि उप समाहही देखा । ममा यो । उक० समाविस हेरला । मर-बायोक. सजावर सम्मामि १०.२० एमा मोउनि पचारिकमानत पोरवाहिका रस स०, उकाप । म म.परिममा | जम्मार मीस पर वकार बार उप-ममी. प. एस प। भारि मतापस . . . . गा० २५] हिरिमिचीए पत्रपपपिमुमगारजवर ४४ दर०० एगस. उफ. पणरण पलिदो० देणानि । मवचम्ब०व० संतोमु०, उक० सगहिदी देखणा । सम्मच-सम्मामि० सब०-अपहि० म० अंतोमहवं, मप्पदर० व० एगसममो, मवतम्म० ब० पसिदो० असंखे०मागो, उफ० सम्मेसि पि सगदिदी देखणा। पर्पस० मिच्छच० सोससफ०-मपणोफ. सम-अवड़ि० ० एगसममो, उप. चीस सागरो० दस्णाणि । मप्पदर० ब. एगस०, उक० मतोस । गरि भपाणु०पउफ० अप्पदर० २० एगसमो, उस वेचीसं सागरो० देशमाणि । 4. अठोम०, उक० प्रपोग्गलपरिपई देखणं । सम्मच-सम्मामि. ओप । एषमसंबद। ९. मदिर० मिग्छप-सोत्तसक०गरपोऊ० सम० भवहि० म० एगस०, उफ. एकवीसं सामरो. सादिरेयामि। प्रप्पदर० मोप । सम्मघ-सम्मामि० अप्प. परिप अठर । एवं मिष्ठाविहोम । बमव० छम्बोसं पपरीणमेप घेर । 18. मिणपीत०-झाउ० मिग्छच-पारसक० गवगोक० सम• अवहि.ब. एगस०, उप० सगहिदी देखणा । मप्पदर० घोषं। मर्णताणु०पउफ० सज-अपति ब० एगस, अप्पदर २० एगस०, मानव० ब० मवोम०, उप० समेसिं सगहिटी चतुष्की मसतर स्मितिबिकिन यपम्प नम्तर एक समय भोर I भम्तर कुन कम पवन परपोपबचम्म स्थितिविमतिका अपम्प भम्तर भन्तर्मुख और सतत मन्तर रुय कम अपनी स्थितिप्रमाण है। सम्पत्य और सम्पम्मिप्यावी मुनगार और मस्थित स्थितिविधियोंम पम्प भम्तर भन्तर्मुहूर्त मस्सार स्थितिविधिका अपम्प मम्वर एक समय भोर भवसम्म स्मितिविमतिका अपम्प अम्तर पस्पापमके असल्यास मागममाण है। तमा समीका र मन्तर एन कम अपनी स्थितिप्रमाण है। नसावरियोंमें मिम्पारप सासह पाप और मो मार पार्योकी भुजगार मोर भवस्थित स्पितिरिक्तियोंय बफम्य अन्तर एक समय भोर कम भम्वर सनम तेतीस सागर है। अस्पतर स्मितिविमपिता नपम्प मम्तर एक समय और तट अन्तर भम्तर्मुहूर्व है। पितु इतनी विशेषता है कि भनम्तानबीचतुपाती भस्सतर स्थिति रिमपिता पम्प अन्तर पर समय भोर उकस भम्तर सम्म देतीस सागर है। प्रवासम्म स्पितिविमस्तिन सपम्प मम्तर मम्तमुहूर्त मौर र भम्तर सम्म भर्पपुरगतपरिवर्तनप्रमाण है। सम्पप और सम्पम्मिप्यालय मग भोपके समान है। इसी प्रकार पसंपत गायक बानना चाहिए। १६. मरयत्नानी और भुवयानी बीमि मिप्पास्म सामापाय भोर मो मोकपायो मुनगार मोर मास्थित स्पितिविमतिपोन गपम्प भम्तर एक ममप भोर का अन्तर सापिक पनीम सागर पस्सनर स्पितिविनिम्न अम्तर माप: समान है। मम्पस पोर सम्पम्मि पारस भरपतर स्पिरिमिक्सिम भम्तर मही है। इमी प्रकार मिम्पादरियो जानना चाहिए। प्रमयाम दास महातिमानसी प्रमर मानना चाहिय। १९१ प्ण मोल भोर भात सापा, मिप्यास्त्र, पामराम और मो मागपती मुमगार और मस्सिन स्थितिवितियोभमपम्प भम्तर एक ममय और परमतर एडम्म अपनी स्पिनिप्रमाल रे। भसार स्थितिरिमठिनाभापा ममान। प्रनम्नामुपग्धी मुवी मुमगार और मस्थित स्थितिविधियोंप्रमपम्प भमर एक समय, बसार स्थिसिरिमतिम उपम मामा एक ममप मोर भवन स्थिनिरिमठिम मपम्प अमर पातमुवा सण ममी तर मम्तर प रम प्रपनी भपनी तिमा। मम्पमत भार मामिप्यारपती मीभामा मुस्यार करता र अमर बार पार पाऊम विधि सानोमा बER Taman |मम ममम NLম মনাম व प्रसार विनिमय सप मिनिdil पार पासपी। नौ मापारो मुम्पर परमाता प्रमर पत्र पर सपा भार RAHA नर सरनाARA माता मान स्विनिरिमठिन सम्परता मनस्य ना सामाग गुमर पर पर मिलर HARI अपनी किता J ५० गा०२२] . RAHHIA . भजिदया। साडेसु तिन 11९९५ और० आदेते गुगले सार विमतिवार जयधवलासहिदे कसायपाहुडे हिदिविहत्ती देसूणा । सम्मत्त सम्मामि० भुज०-अवहि० ज० अंतोमु०, अप्पदर० ज० एगस०, अवत्तव्य० ज० पलिदो० असंखे०भागो, उक्क० सम्वेसिं सगहिदी देसूणा । तेउ. सोहम्मभंगो । पम्म० सहस्सारभंगो । असण्णि० एइंदियभंगो। णवरि छन्वीमपयडी. भुज० अवहि० जह० एगसमओ, उक्क० पलिदो० असंखे०भागो। आहारि० ओघं । णवरि जम्हि उवड्डपोग्गलपरियटै तम्हि अंगुलस्स असंखे०मागो। एवमंतराणुगमो समत्तो। * पाणाजीवेहि भंगविचओ ६६२. सुगममेदं; अहियारसंभालणफलतादो । * संतकम्मिएसु पयदं। ६३. कुदो ? असंतकम्मिएसु भुजगारादिपदाणमसंभवादो । * सव्वे जीवा मिच्छत्त-सोलकसाय-णवणोकसायाणं भुजगारहिदि- विहत्तिया च अप्पदरहिदिविहत्तिया च अवहिदहिदिविहत्तिया च । ६९४. एदेसिं कम्माणं भुजगार-अप्पदर-अवट्ठिदद्विदिविहत्तिया सव्वे जीवा ते णियमा अस्थि ति संबंधो काययो। * अपंताणुबंधीणमवत्तव्वं भजिदव्वं । भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका जघन्य अन्तर अन्तर्मुहूर्त, अल्पतर स्थितिविभकिका जघन्य अन्तर एक समय और प्रवक्तव्य स्थितिविनक्तिका जघन्य अन्तर पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है । तथा सभीका उत्कृष्ट अन्तर कुछ कम अपनी अपनी स्थितिप्रमाण है । पीतलेश्याम सौधर्मके समान भग है। पद्मलेश्यामें सहस्रारके समान भंग है। असज्ञियोंमे एफेन्द्रियोंके समान भंग है। इतनी विशेपता है कि छब्बीस प्रकृतियोंकी भुजगार और अवस्थित स्थिति. विभक्तियोंका जघन्य अन्तर एक समय और उत्कृष्ट अन्तर पल्योपमके असख्यातवें भागप्रमाण है। आहारकोंके श्रोधके समान है। इतनी विशेपता है कि जहाँ उपार्धपुद्गल परिवर्तनप्रमाण अन्तर कहा है यहाँ इनके अंगुलके असख्यातवें भागप्रमाण अन्तर कहना चाहिये। इस प्रकार अन्तरानुगम समाप्त हुआ। * अब नानाजीवोंकी अपेक्षा भंगविचयानुगमका अधिकार है। ६६२ यह सूत्र सुगम है, क्योंकि इसका फल अधिकारकी सम्हाल करना है। * सत्कर्मवाले जीवोंका प्रकरण है। ६६३. शका-सत्कर्मवाले जीवोंमें ही इस अधिकारकी प्रवृत्ति क्यों होती है ? समाधान-क्योंकि जिन जीवोंके मोहनीयकर्मकी सत्ता नहीं है उनमें भुजगारादि पदोंका पाया जाना सम्भव नहीं है। * मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकषायोंकी भुजगारस्थितिविभक्तिवाले, अल्पतरस्थितिविभक्तिवाले और अवस्थितस्थितिविभक्तिवाले सब जीव नियमसे हैं । SE४ इन पूर्वोक्त कोंकी भुजगार, अलतर और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जो सय जीव हैं वे नियमसे हैं ऐसा यहाँ सबन्ध करना चाहिये । * अनन्तानुबन्धीचतुष्कका अवक्तव्य पद भजनीय है। ६६६ ५ अर ६६७ या वर्तमान इन ना विशेषा विचमका विचार, और नो ना. यह स्पष्ट ही है, हानेसे वन कारण किबोच है सीके यह पद पदाचित् एकमा नाना टीम तया प्रतियोंकी मात्र अत्तर पद ससे सम्यक्त्वको दाते, अतः इन प्राचार्य के द्वारा विचयानुगमसे सारे पोर, अमरस सग्रेसिं समाहिरी देखा। मंदिसममो। पारा अससे मायो। पारा असे मायो। - था। दायमसंगनमो। सरसोक्सापार्य मनमानी विधिलिपिहतियाचा अनियिमिा समान गा.२२] द्विविपिरतीए उपरपरिमुजगारममपिनमा ६९५. दो। विसंवाददममंता०पउक० सम्माशीप मिरंतर मिम्बचगुप्पेन परिणमपामावादो। ० सम्मत्त-सम्मामिच्छताणं मुजगार भवहिप-अपत्तम्पतिविधिहतिया भजिवम्या। ६९६ दो ? निरंतरं सम्मर्च परिणजमामबीबममावादो। • अप्पपरष्ठिविपिहतिया णियमा भत्यि । 58 दो। सम्मच-सम्मामिणपसंतकम्मियमीवाणं दीवामागदपामाग फास विरहामावारो। ९८, एवं बामसहाइरियदेसामासियमुत्तत्पपस्मण फाऊन सपरि पावसहा परिपरविदत्वमवारणाए मणिस्सामो। णाबाजीवेहि मगविषपाशुगमेण विहो निरसो. घोपे. भाडेसे । मोपेप० मित्त-पारसक-गरपोफ० सख०-अप्पदर अपहि। ६५. क्योंकि भनम्तनुबन्पी चतुकी पिसयोमना करनेवाले सम्बग्रधिनीपोंस मिथ्यास्त्र गुणो साब निरन्तर परिणाम नहीं पाया जाता। • सम्पफ्सस और सम्परिमप्यास्वकी सबमार, मवस्थित बौर प्रबळम्म स्पिति- विमकिवाले भीर मननीय है। ६ मोंकि, निरम्ता सम्मान प्राप्त होमेवाने बीब नही पाये जाते है। मरफ्तरस्थितिविमकिपाले बीव नियमसे। १६ कि, सम्पत्त और सम्बग्मिप्यात्वसम्मेवान बीज मतीत भनागत पौर पटेमान इन तीनों ममि भमान है। विशेपार्य-यापर मुनगार पारि पनि मालम्बन मेल नामा बीचोंकी अपेक्षा मंग रिपत्र विचार किया बाया। मोहनीयो म मेर है। इनमेंसे मिप्यास्त्र, सोमा म्याप और नौ नोकपा भुजगार, मस्सतर और अवस्थित परपाले नाना बीप निरन्तर पाम बाद में पर स्पष्ट दियो कि पपासमय मिपाव भारि गुपस्मानोंमें इमा निरन्तर कम समय होमेसे ये पन पाते। पितु मनन्तानमधी को भगक्तम्प परकी यह स्थिति भी है। भरण कियो पोपीस मतियों सपाबाला बीच मिप्याव और सासारन गुणस्थानमें माता है ससा पा पर सम्मबारे पर ऐसे बीयों का निरन्तर गुणस्थानों माप्त होना सम्मक मही। याचित् पक मी जीव गुपसानों नहीं प्राप्त होता पौर कापित् पानीय तथा माचित मामा बोरक्तगुणस्थानों का प्राप्त होता है इसलिए मनम्तानुबन्पा भास्तम्म परपाले मननीयम पा सम्मत और सम्पम्मिप्यालो अस्पतर पदमा नीष ना सरा पाप बाते है,पोकिन महावियोंकी सत्तामा सम्पपरिमौर मिप्यारपिजीबोचनिरन्तर सहाय पापाबावामोर उनके एक मात्र भसतर पर होता है पर इन मातियो क्षेत्र पर मानीम है क्योंकि प्रेप पर, मामिप्मा- पसे सम्पनत्वको माप्त मते १, नदी ममम समयमें सामवर और पेसे बीप मिरम्र म्दी पामे बाते, मल इन मतियोकि मुरगार, असित और भाजप पापाले बीच मानी है। SEE इस प्रभर पत्तिपम भाषाक रेशमपासूत्रो भईन कान के मा यतिम प्राचार्यकारा पुषित किये गये भकी सारणाम म्पन रावेर-जाना भीयोंकी अपेवा मंग- विषयानुगमसे निर्देश दो प्रकरमर-भापनिर्देश भोर माइनिग । नमसे मोपकी ममा मर मनात असली प्रामर सो पनी भार्य सिविल समार सरासर पतियों की मुयार और पति र सम्मापास। मा मापा पर समापनावारी। माममा। का परि। बस Rati भारी मतो दोग। १ सपा श्री सी पापा सम्मासितिमि मिलेमस सिले। सरसर सिविणा- ..

4- गा०२२]] पंचमणच ६१००. अणताणुः - M विगठिदिय- पड011 २ तपदामाबादी एवं दे पनि वान, पुरावदार विशेषार्य भवनीय बताया चार पदमिस जयधवलासहिदे कसायपाहु [हिदिविहत्ती ३ णियमा अस्थि । अणंताणु०चउक्क. भुज० अप्प०-अवढि० णियमा अस्थि । अवत्तन्वं भयणिज्जा । सिया एदे च अवत्तव्वविहत्तिओ च, सिया एदे च अवत्तव्वविहत्तिया च । सम्मत्त ०-सम्मामि० अप्पदरणियमा अस्थि । सेसपदा भयणिजा। एवं तिरिक्ख.. कायजोगि०-ओरालिय०-णस०-चत्तारिक०-असंजद०-अचक्खु०-किरह-णील-काउ भवसि०-आहारि त्ति । ६ ९९. आदेसेण णेरइएसु मिच्छत्त-बारसक०-णवणोक० अप्पदर०-अवढि० णियमा अस्थि । [ भुज० भयणिज्जा० ।] सिया एदे च भुजगारविहत्तिओ च, सिया एढे च भुजगारविहत्तिया च । अणंताणु०घउक्क० अप्पद० अवढि० णियमा अस्थि । सेस. पदा भयणिजा। सम्मत्त-सम्मामि० ओघभंगो। एवं सन्यणेरडय-पंचिंदियतिरिक्ख- तिय०-मणुसतिय०-देव०-भवणादि जाव सहस्सार०-पंचिंदिय-पंचि०पज-तस-तसपज०- मिथ्यात्व, वारह कपाय और नौ नाकपायोंकी भुजगार, अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीव नियमसे हैं। अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी भुजगार, अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीव नियमसे हैं। प्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीव भजनीय हैं। कदाचित् ये भुजगारादि विभक्तिवाले बहुत जीव होते हैं और प्रवक्तव्यविभक्तिवाला एक जीव होता है । कदाचित् ये भुज- गारादिविभक्तिवाले नाना जीव होते हैं और श्रवक्तव्य विभक्तिवाले नाना जीव होते हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले लीव नियमसे हैं। तथा शेप पवाले जीव भजनीय हैं। इसी प्रकार तियेच, काययोगी, औदारिककाययोगी, नपुसकवेदवाले, क्रोधादि चार कषायवाले, असंयत, अचक्षुदर्शनवाले, कृष्णलेश्यावाले, नीललेश्यावाले कपोतलेश्यावाले, भव्य और आहारक जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-मिथ्यात्व, बारह कषाय और नौ नोकपाय इन २२ प्रकृतियोंके मुजगार, अल्पतर और अवस्थित ये तीन पद होते हैं जो सर्वदा पाये जाते हैं इसलिये इनकी अपेक्षा एक ध्रुवभंग ही होता है। अनन्तानुवन्धी चतुष्कके चार पद हैं जिनमें भुजगार, अल्पतर और अवस्थित ये तीन पद ध्रुव हैं और अवक्तव्यपद अध्रुव है। अवक्तव्यपदवाला कदाचित् एक जीव होता है और कदाचित् नाना। अब इन दो भगोंमें ध्रुवभग और मिला दिया जाता है तो अनन्तानुबन्धीकी अपेक्षा कुल तीन भग प्राप्त होते हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके चार पद हैं। जिनमें भुजगार, अवस्थित और अवक्तव्य ये तीन भजनीय और एक अल्पतर ध्रुव है, अत• यहाँ फुल २७ भग होते हैं, क्योंकि एक और नाना जीवोंकी अपेक्षा तीन भननीय पदोंके २६ भग और उनमें एक ध्रुव भगके मिलानेपर कुल २७ कुल २७ भग होते हैं । तिर्यच आदि मूलमें गिनाई गई कुछ ऐसी मार्ग- णाए हैं जिनमें यह ओघ प्ररूपणा घटित हो जाती है, अतः उनके कथनको ओघके समान कहा है। ६६६ आदेशकी अपेक्षा नारकियोंमें मिथ्यात्व, वारह कषाय और नौ नोकपायोंकी अल्पतर और अवस्थित स्थितिक्भिक्तिवाले जीव नियमसे हैं। इनके भुजगार पदवाले जीव भजनीय हैं। कदाचित् ये नाना जीव हैं और एक भुजगार स्थितिविभक्तिवाला जीव है। कदाचित् ये नाना जीव हैं और नाना भुजगार स्थितिविभक्तिवाले जीव हैं। अनन्तानु बन्धीचतुष्ककी अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीव नियमसे हैं तथा शेष पद भजनीय हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वका भंग ओघके समान है। इसी प्रकार सव नारकी, पचेन्द्रिय तिर्यच, पंचेन्द्रिय तियंच पर्याप्त, पचेन्द्रिय तिथंच यानिमती, सामान्य मनुष्य, मनुष्य पर्याप्त, मनुष्यिनी, सामान्य देव, भवनवासियोंसे लेकर सहस्रार स्वर्गतकके देव, पचेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय पर्याप्त, प्रस, सपर्याप्त पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, वैक्रियिककाययोगी, स्त्रीवेद- भजनीय बनुनार जिसमकार श्रीवर सब नारकी ६१८.५ अपेक्षा नाकार અવળી- बीच निरमसे है। चादर बलसायिक कायिक प्रत्येक विशेषार्थ चतुकका ४१ इन सबके मुजगार, मुगार पद मन्ना लव यह है कि तिर्यच - , रा । एकत्सतर पद सब विजेन्द्रिय । अतः उनके यनको ६१०१. होते है, क्योंकि यहां है। मग दो होते बानना चाहिए । पद मजनीय है। किया है। यद्यपि मर्माणाके कारण बद J J गा० २५11 पा भलिवमा पनि । मा मिपा रोपमास्मतिसि। मुम्दा मपरियसंसि विदयारासुकीदा पर पापोह अपहर-मसि परमारविषिो पद-परत विमा वाम । एवं समास-नितिमा Ho-मरिरिस-पि भसम घोर तिमि पस्सनर और पसा सिमित व मारामामि सा एसपीलाबामाल Hिaath निमसे है। मनापी, समाज, + नोमा मोसमान हिपिपिरतीए पचरपरिमुजगारमंगविपभो पंचमम०-पंपपपितनियनस्पि-पुरिस-पासु०-उ०-पम्म०-सम्मिपि । ११०० पवि०तिरि अपन मिच्छच सोचसक० मषमोक० णारयमंगो। परि बता० प्रवच० परिप। सम्म०-सम्मामि० अप्प० गियमा मत्ति । एव सम्प विमरिदिप-परिदिपवपक्षमादरपुरविपनपावरमाउ०पम मादरवेउपछा-पादरवाठ पडा-पावरपमफदिपचेय०पास-ससमपन-विहगवाणि पि । १०१ मणसमपम छमीसं पयरोण सम्पपदा मपपिछा। मगा छत्रीस, घुषपदामावादो । सम्मच-सम्मामिचाणमप्परं मयपिन् । मगा दोन्मि, पुनामावादो। एव वेठभिपमिस्स०। मासे, पुस्कारमाने, पानवाने,पीतोरपाबाने, पालेश्यावाले भोर संझी सेवाकेबानना चाहिए। विक्षेपार्प नरक मिप्पास्व पाय म्पाय और नो नोकपाकि पो पर ध्रुव भौर मनमीय बतलाया, पता इनके मुख मंगके साथ तीन मैग प्राप्त होते हैं। मनम्तानुबन्मी तुपके पार पमिसे भस्सतर और अवस्थित ये दो पर घुब तपा मुबगाए और भगक्तव्य पं हो पप सनीय बसाये है इसलिये इनके नौ मग मास होते हैं। सपा सम्पत्य और सम्पग्मिप्यालके विस्मर भोपसे २७ मंग क्तमा पाप है उसी प्रभर यहाँ मी पटित कर मेना चाहिये। मूसमें सब नारफी भारि पौर मिनी मार्गमाएं गिनाईनमें एक्स म्पपस्था बन पाती है। ११०० पंचेन्निय तिपंच पपर्यास में मिथ्यात्व, सामा पाय और नौ नोभ्यायोंको भपेपा नारकि समान मंगहै। किन्तु इतनो विवेपता है कि इनमें मनन्तनुपम्पोचतुपककी भगम्पस्थितिषिमति नही है। वका सम्पमत्व और सम्पम्मिप्यात्यकी भस्सवर स्मिविमिममियाले बीच नियमसे है। इसी प्रभर सब विकलन्द्रिय, पंचेन्द्रिय अपर्याप्त, पापरपिषीमिक पयास, बार समकायिक पात, बापर अनिकामिक पर्ग माइर बागुलनिक परम्स, पावर बनस्पति अयिक प्रत्येक शरीर पर्याप्त प्रस अपर्याप्त और विभगानी बीपक बानना चाहिए। विशेषार्प-पञ्चनिष तिच मरम्पपर्याप्तक मिष्माधष्टि ही होते हैं, म्नमें मनातानुपम्पी अनुपम भक्तम्प मग नही बनता । भवाइन मिप्यात सोता पाय और मौ नोकपाय इन सबके मुगार, असार मौर मपस्थित ये तीन पद ही होते है। इनमें से पो पर मुव और स मुखगार पर मनमीपदे भतीन मग प्रप्त राव है। पााँ नायिके समान मानेका मत सबारे विमिसरकार माम्पिो एक मुमगार पद मानीय बस्थाया उसी प्रकार पन्द्रिय तिच सम्म्पपकोंक भी मामना चाहिपे । तया सम्मत भौर सम्पम्मिध्यापकी मपेशा इनके समस्पतर पर ही पाय बाताबो सपो मतः इनमें अपेक्षा एक मुष मंग ही प्राप्त हाता है। सप विमाद्रिव भारि और मिनी मार्गाएं मूसमें गिनाई १ ममें भी कामवस्था बन पातीद मनमोसनको पंचेम्ब्रिय तिच सम्म्पपसको समाना। ११ मनुष्य अपसम बप्पीस महतियो सब पर भजनीम । मंग बप्पीसदी होते है, क्योंकि या भुपपरका ममाव है। सम्पक्स भोर सम्बग्मिपात्वका भस्सतर पर मममीय है। मंग पो होते क्योंकि मुषपान प्रभाव है। इसी प्रभर भिपिरमिनलपपोगी बीबोके बानना चाहिए। विक्षेपार्यप्पपपाक ममुप्प पर साम्तर मागया है। मय इसमें १६ मतिपतीनों पर मानीपसिनो कुल मंग २६ होता है। यहाँ मुष परम्र प्रमाण हानसे प्रब मंगल मिपंच सिपपपि सम्पत और सम्पग्मिम्पास्यका का पक मस्सतर पर फिर भी साम्वर माला परम भी भजनीयरे मना सके एक बार और नाना जीरों की मपमा रोमगरे। - गाय इन २२ शनि मुबारा इमसिन मुम्पार प्रसार और सारे याचा मान FIFA मनात र ममाम्ममा Rifal सार मस्सर tad "नान मानीस मारा | रिम मिसमास- 11 ग मोरा * मापर FATHER 11। THE THAT नानपावर 1 सर r प - r7 ܙܕ ܀ . AM Fin. । anan ५४ जगधयलासहिदे कमायपारे हिदिपिहनी ३ ६ १०२. आणदादि जार उपरिमगेपओ ति मिन्ठत्त-बारगफणवणोक. अप्प: दर० णियमा अस्थि । अणंताणु०चउपा० अप्पदर० णियमा अत्यि । अत्तनिहनिया भयणिजा । भंगा तिणि । सम्मत्त-सम्मामि० ओघं । एवं सुकले० । अणुद्दिमादि जाव सबढ० सत्रपयडीणमप्पटर० णियमा थन्थि । एवमाभिणि सुद० श्रादि-मणप.. संजद-सामाइय-छेदो०-परिहार०--संजदामजद -योहिदंग -सम्मादि'.-सहय०- वेदय०दिहि चि। ६ १०३. एइंदिय० सयपयडि० सयपदा णियमा अस्थि । एवं यादरगुह मेहंदिय- पजत्तापजत्त [ पुढवि०-यादरपुढवि०.] चादरपृढवि० अरज मुहमपुडपिपजत्तापजत. [आउ०-यादग्आउ० गदरआउयपज मुहमाउ०पजत्तापजत्त [तेउ० यादरतेउ०पादर- तेउअपज०-सुहुमतेउपञ्जत्तापजत्त घाउ०-चादरवाउ०] वाटरपाउअपस० सुदुमगाउपजत्ता यहा भी ध्रुब पटका अभाव हानम म भगका निपच किया। परियमिकाययाग यह भी मान्नर मार्गणा है और इसमें लन्ध्यपयात मनुष्योके ममान नर प्रगनियों के पद तथा भंग बन जाते है, अतः इनके कथनको लन्यपयाप्त मनुष्या के ममान फहा । ६ १०२ 'प्रानतफल्पसे लेकर परिम प्रयक नको देयोग मि यात्य, बाहर कपाय पोर नों नोकपायोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तियाले जीव नियममे हैं। अनन्तानुनन्धी पतुरकी अल्पतर स्थितिरिभक्तिवाले जीव नियमसे है। अयक्तव्य चितिविभक्तिराले जीव भननीर । भग नीन होते हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिन्यात्वका कथन अोधके ममान है। इसी प्रकार शुल्क लेण्यापाले जीवोंमे है । अनुदिशसे लेकर सामिद्धितकके देयाम मन प्रकृतियोंकी अल्लतर स्थितिविभक्किाले नीय नियममे हैं। इमी प्रकार श्राभिनियाधिकमानी, शुनशानी, 'प्रयधिशानी, मन पर्ययक्षानी, मयत, मामायिकसयत, छेदापस्थापनासयत, परिहार विशुद्धिसंयत, मयतासयत, अवधिदर्शनाले, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि और वेदकसम्यग्दष्टि जीयोंक जानना चाहिए। विशेपार्थ-पानतसे लेकर उपरिमप्रैधेयकतकके देयोंके मिल्यात्न प्रादि २२ प्रकृतियोंका एक अल्पतर पद ही बतलाया है, अत: इनका एक ध्रुव भाग ही होता है। 'अनन्तानुयन्धी चतुष्कके अल्पतर और प्रवक्तव्य ये दो पद बतलाये हैं। इनमें से अल्पतर पद ध्रुव है और अयक्तन्य पद अध्रुव है। अतः एक जीव और नाना जीवों की अपेक्षा इन अवक्तव्य सम्बन्धी दा प्रध्रुर भर्गोमें एक ब्रुव भागके मिला देनेपर तीन भग प्राप्त होते है। पानतादिको मिथ्यात्वमे सम्यक्त्वकी प्राप्ति और सम्यक्त्वसे मिथ्यात्वकी प्राप्ति सम्भव है, अत. यहाँ सम्यक्त्व और मम्यग्मिध्यात्यके ओघके चारों और उनके २७ भग बन जाते हैं। यही कारण है कि यहाँ सम्यक्त्व और सम्य- ग्मिथ्यात्मके भगोंको ओघके समान कहा है। अनुदिश आदिकमे तो सम्यग्दृष्टि जीव ही होते हैं और सम्यग्दृष्टियोंक सब प्रकृतियों का एक अल्पतर पद ही होता है। इसीलिये 'अनुदिशादिकमें सब प्रकृतियोंका एक अल्पवर पद कहा है । मूलमे आभिनियोधकज्ञानी श्रादि और जितनी मार्गणाए गिनाई हैं उनमे भी एक अल्पतर पद ही सम्भव है, अत उनके कथनको अनुदिश आदिके ६१०३. एकेन्द्रियोंमें सब प्रकृतियोंके सय पवाले जीव नियमसे हैं। इसी प्रकार वादर और सूक्ष्म एकेन्द्रिय और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, पृथिवीकायिक, बादर पृथिवीकायिक, वादर पृथिवी- कायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक, सूक्ष्म पृथिवीकायिक पर्याप्त और अपर्याप्त, जलकायिक, वादर जलकायिक, बादर जलकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म जलकायिक तथा उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, अमिकायिक, धादर अमिकायिक, बादर अनिकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म अमिकायिक तथा उनके पर्याप्त भौर अपर्याप्त, वायुकायिक, वादर वायुकायिक, घादर वायुकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म वायुकायिक तथा . 1 Her सिंगा- गरेर यास तिम Prifa समान पद पी. अगर मारना चतर सवानिरिमन समान कहा। . ६९ निशा मनाला निवनवालावन वाजिनमन सिनेमात ११ हिन इतनी विरता t विपिन भासतापायो पम्पिावमिति मुकाले । रिसाद का वि.सुदामोहिम -सम्माई सास- -- - पन्ति । एर पारमावि मुामाजिक सस विभाइरसार दबाउबाजामासास परमिशाग्यमा मिन सिपाल परमार और । यस्मामुम्सीमार जाने समस्त न। इसी RF सिलसिर्विमा मयिाय, मनाया रन मारिस पर। निपत मासिकरित पलामो सरkar Tी 'र सिपाही गा.२२] द्विपिषिचीए चरपरिमुबगरमागाभागो पमच-गयफदि०-बादरवबष्फदि०-] पादरवणप्फदिपप०अपल-मुहमवषष्पादि परनचापमच-पादरणिगोद मुमपिगोदपज्जचापजत मोराठियमि० कम्मइप. मदि०मु०-अमरसिमिच्छादि० मसग्नि-भपाहारि चि। णपरि कम्माय-प्रपाहारि० सम्म० सम्मामि०अप्पद मयपि० पाहार प्राहारमि० सम्पपयरीपमप्पदरं मयपि । एवमरगद १०-अकसा महम०-चहाम्खाद० उपसम-सासाग सम्मामि दिहि पि। एवं पामाखीदेहि मगवियत्रो समयो । १०४ मागाभागायुगमेण दुविहो णिसो-मोपे० मावेसे । मोपेण मिष्यत्व पारसक०-गवनोकसम० सम्मबी० फेवरिमो मागो! असखे मागो। बप्पद. फेवरिमो मागो! मसंखेडा मागा। मप०ि सयमी० फेव० सखे भागो । एषमण ताप्पु०पटक । परि अपचप्प. मगतिममागो । सम्मच-सम्मामि० सप्पदर० सम्बनी. उनके पर्याप्त भोर भपात वनस्पतिमपिस, पादर पनस्ततिकाविक प्रस्पयरी, पार पनस्पतिकारिक प्रस्पेक शरीर मपर्याप्त, सूरमवनस्पति व उनके पर्याप्त और अपर्याप्त बाबर निगार भोर नके पास मोर अपर्याप्त, सूक्ष्म निगोष भोर नके पाप्त भौर भपास, मौरारिफमिमप्रवयोगी, बामणमयोगी, मस्मशानी भुताभानी भमन मिप्यारपि, प्रसंशी भौर मनाहारक बीके जानना चाहिए। कित इतनी विशेषता है किकामनभवयापी और मनाहारक बीमाम समय मौर सम्पग्मिप्पास्वकी मस्पर स्मिविनिमक्तिपाने वीष मानीय है। माहारफयोगी और भावरणमिमकारयोगियोम र मातियोंचा मसतर पर मननीय है। इसी प्रकार अपगत्वेदी, मापापी, सूक्मसापरामिासक्त यवारयातर्सयत, परामसम्बग्राष्टि, सासाबनमम्पमाठि मोर सम्बम्मिप्याठि गीशिवानना चाहिए । विशेषा-एथन्द्रिोंक २८ प्रतिमिसे बिसके शिवम पर सम्भव रे उन परपाले जीव सईया रहत भता पहा एक घुष भंग ही पता है। इसी बात के पोगन रनेके लिये 'सा प्रति पोरे सा पर निपमसेर पारे। इसी प्रकार मूलमें गिनाई गा पावर पणप्रिय मारि मार्गमा म प प पर ही प्राप्त होता है मतः उनके कानको एन्द्रियों समान मा। किन्तु मर्थपणापयोग और अनाहारक मागणाम सम्यक्त्व भौर सम्पम्मिभ्यासकी सचाचाले बीरमा चित् पापे बाते है और माचित् नहीं पाये जाते है इसलिये इक्म त प्रतिबोध पस्पतर पर मननीय है जिससे एक बीच मौर नाना पीयोंकी अपेक्षा पो मग प्रास होवे है। बाहरफकाम मोग भोर मादारमिाप्रपयोगर्म सप प्रतियोका एक अस्पतर पर ही होता है फिर भी पा साम्तर मार्गमा है इसलिये इसमें भलतर पर भगनीय या। माँ मी हा मग होते है । मूलमें अपगबर पारिमौर स्तिनी मायाएं गिनाई है उनमें सम्म महति मम्मतर परमामा माचित एक बीच और काचित् नाना बीष होते हैं भता मनो मनको माहारक कापयागियोंकि समान मा। इस प्रकार नानाजीकी अपेक्षा मगविषय समास एमा ११ मागाभागानुगमकी अपेक्षा निरा से प्रकारका रे-योपनिर्देश भौर पारेरा निर्देश । नमेंमे मोपडी अपेक्षा मिप्यास्प माप च्याम और नो मोराओंकी मुबगार स्थिति- विक्तिमाशबीच सब मीकि पितमे मागमसम्मान माग अस्पतर स्पितिपिमक्ति- पाने बीच सिने माग भसल्पात गुभाग है। मस्तित स्विविधिमक्तिवाने और सब बीचक चितम भागसम्पात भाग है। इसी प्रकार मनन्तनुपम्मी पाप्मी अपेक्षा बानना चाहिए। भितु इतनी पिसेपटारे विभक्तम्प स्थितिविस्तिवास बीष मनन्तर्षे भाग । सम्मान और और समरिमेय किया सम्मान र समय सस्थी httail ला है। इससी रमिारमा पानी निम्तो नर अभिमान M मर जाम सिमर्म सर्वि सरगम मा०२२ N सेसपयहि पयडी० पपि सुद० प्रोदिन संजन-प्रोहिदस- चि । अमव० - ६१०६. बारसक०-पावणोदः सवरि यवत्ता ३० तिरिस्त कायजोगि आहारि ति। - ५६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ केव० १ असंखेजा भागा। सेस० असंखे०भागो । एवं तिरिक्ख कायजोगि-ओरालिया णस०-चत्तारिक० असंजद०-अचक्खु०-तिण्णिले०-भवसि०-प्राहारि ति । ६१०५. आदेसेण णेरइएसु एवं चेव । णवरि अणंताणु० चउक्क० अवत्तव्वमसंखे०. भागो। एवं सत्तसु पुढवीसु पंचिंदियतिरिक्खतिय०-देव०-भवणादि जाव सहस्सार०. पंचिदिय-पंचिं०पज्ज०-तस-तसपज्ज०-पंचमण०-पंचवचि०-वेउव्वि०-इत्थि०-पुरिस०- चक्खु०-तेउ०-पम्म०-सणि त्ति । $ १०६. पंचिंदियतिरिक्खअपज्ज. छब्बीसं पयडीणमेवं चेव । णवरि अणंताणु०- चउक्क० अवत्तव्व० णत्थि । सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं णत्थि भागाभाग; एगप्पदर- पदत्तादो । एवं मणुसअपज्ज०-सब्बएइंदिय-सव्व विगलिंदिय०-सन्वपंचकाय-तसअपज०. ओरालियमिस्स०-वेउवि०मिस्स-कम्मइय-मदि-सुद०-विहंग०-मिच्छादिट्ठि-असण्णि अणाहारि त्ति । $ १०७. मणुस० णिरओघं । मणुसपज०-मणुसिणी० एवं चेव । णवरि जम्हि असंखे०भागो तम्हि संखे०भागो कायन्चो। ६१०८, प्राणदादि जाव उवरिमगेवजो त्ति अणंताणु०चउक० अप्प० अप्प. सव्वजी० के० १ असंखेजा भागा। अवत्तव० अमंखे०भागो। सम्मत्त-सम्मामि० ओघ । सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीव सब जीवोंके कितने भाग हैं ? असख्यात बहुभाग हैं। तथा शेष पवाले असंख्यातवें भाग हैं। इसी प्रकार तिथंच, काययोगी, औदारिक- काययोगी, नपुसकवदवाले, क्रोधादि चारों कषायवाले, असंयत, अचक्षुदर्शनवाले, कृष्णादि तीन लेश्यावाले, भव्य और आहारक जीवोंके जानना चाहिए। ६१०५. आदेशकी श्रपेक्षा नारकियोंमें इसी प्रकार जानना चाहिए । किन्तु इतनी विशेषता है कि अनन्तानुबन्धी चतुष्कफी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले असख्यातवें भाग हैं। इसी प्रकार सातों पृथिवियोंके नारकी, पंचेन्द्रिय तिर्यंच, पचेन्द्रिय तिथंच पर्याप्त, पचेन्द्रिय तिर्यंच योनिमती, सामान्य देव, भवनवासियोंसे लेकर सहस्रार स्वर्गतकके देव, पचेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय पर्याप्त, प्रस, प्रस पर्याप्त, पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, वैक्रियिककाययोगी, स्त्रीवेदवाले, पुरुषवेवाले, चक्षुदर्शनवाले पीतलेश्यावाले, पद्मलेश्याघाले, और सज्ञी जीवोंके जानना चाहिए। ६ १०६ पंचेन्द्रियतियंचअपर्याप्तकोंमें छब्बीस प्रकृतियोंकी अपेक्षा इसी प्रकार जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि इनके अनन्तानुबन्धी चतुष्कका प्रवक्तव्यपद नहीं है । तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वका भागाभाग नहीं है, क्योंकि यहाँ इन दोनों प्रकृतियोंका एक अल्पतरपद है। इसी प्रकार मनुष्य अपर्याप्त, सब एकेन्द्रिय, सब विकलेन्द्रिय, पचेन्द्रिय अपर्याप्त, सब पाँचौं स्थावर काय त्रस अपर्याप्त, औदारिकमिश्रकाययोगी वैक्रियिकमिश्रकाययोगी, कार्मणकाययोगी, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, विभगज्ञानी, मिथ्यादृष्टि, असज्ञी और अनाहारक नीषोंके जानना चाहिए। ६ १०७ सामान्य मनुष्यों में सामान्य नारकियोंके समान जानना चाहिए । मनुष्य पर्याप्त और मनुष्यनियोंमें इसी प्रकार जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि जहाँ असख्यातवाँ भाग कहा है वहाँ सख्यातवाँ भाग कर लेना चाहिये। ६ १०८ पानत कल्पसे लेकर उपरिम प्रैवेयक तकके देवोंमें अनन्नानुबन्धीचतुष्ककी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीव सव जीवोंके कितने भाग हैं ? असख्यात बहुभाग हैं। तथा अवक्तव्य ६.११०. सब्दणेरइय०-१०५५ दिय-पचिपज-त तेउ०-यम्म०-मणि स्थितिविभक्तिवाले - समान है। यहां दोष बानना चाहिए। नहीं है । इसी प्रकार बोधितवानी, म परिहारविशुद्धिसयत, झायिकसम्यग्दृष्टि, जीवोंके जानना ६ , ६ १०६. ओघ प. . अपेक्षा मिथ्यात्व, है। अनन्तानुबन्धी अवन्यजी बीच कितने है। पादि चारों .. भाहारक लीयों न ६११० व असख्यात वासियोंसे लेकर योगी, पार्टी वाले, पमलेश्यावाले - है । इसी 41 .

गा०२२ . [शिविर सिरिस्मोरियोनि- पापी वि। नापजापावामी पारि बास माता- प.उमिनासिमित पमेश। पारस पन्धि गासामा एकर पसमासस - हम-मिजारिद वित पौ. साता पनि 0- हिपिपिहचीए उमपपग्मुिजगरपरिमार्ण सेसपयति णस्पि मामामाग। एवं मुखले० । अणुरिसादि बाप सम्ब० सम्म पयठी. भपि मागामार्ग। एवमाहार० माहारमिस्स०अगद० मसा०-आमिमिक मुद०-भोहि-ममपज०-संबद-सामाइप वेदो०-परिवार मुम०-जहासाद-संबदा संसद भोहिदस-सम्मादिहि सहय०-पेदय ०-सबसम-सासाप -सम्मामिछादित पि । बमा छम्पीसपयरि० मदिर्ममो। एष मागामागाणुगमो समचो। ६१०९ परिमाणामुगमेन दुविहो गिo-मोषेण मादेसेम । वोपेण मिणच पारसक-पागोक- विप्पि पदा० केषिया ! मर्पता । अगवाणु-पक एवं पर। पपरि अवचम० असंखेमा । सम्मच-सम्मामि सम्बपदा फेषिया! प्रससेखा । एवं तिरिक्स-कापबोगि-ओरानि०-नपुंस-पचारिक० असबद-प्रपासु०-तिमिले मासि० माहारि चि। ११० भादेसेप बराएस सम्बपपरीर्ण सम्बपदा फेचिया ? असलेखा। एक सम्पपेराप०-सम्पपपिदियतिरिक्त-मणसधपम०-देव०-भषणादि बाप सहस्सार-पति- दिय-पषि-पम-रास-ससपन०-पचमणः -पंचवापिठमिय०वि०-पुरिस०-पासु पेठ ० सम्म०-सणि ति। मणम० भयवाणु०चठक. अषचष्प फेरि १ सखेज्या । स्वितिषिमतियाने बीच असम्यात माग हैं। सम्मस्व और सम्पग्मिप्यात्वका स्पन भोपके समान है। पहाँ सेप प्रतियों की अपेक्षा भागाभाग दी है। इसी प्रकार धारवायाने बायोमें नाममा चाहिए। मनुरियसे लेकर सपिसिसितको बम सब मातियोको अपेक्षा मागाभाग माही है। इसी प्रकार माहारकाययोगी, भातारपमिममवयोगी अपगतपी, अम्पायी, भामिनि- बोषिमानी, मत्मानी अपपिवानी मनःपर्यशानी, संयत, सामायिकसपत, सोपस्थापनासमत पयिापिसिसमत मसापराविसंत पयास्पातसंगत, संवतासंयत भवभिपर्शनी, सम्पमाष्टि, सायिकसम्मष्टि पेपकसम्माष्टि, परामसम्पति, सासापनसम्पष्ठि भोर सम्पम्मियाची बीबानना चाहिए। ममोमबाणीस मतियोम मंग मरमानिकि समान है। इस प्रभार भागाभागनगम स्माममा। ११९ भोप भोर मादेशची मपेषा परिमाणानुगम से प्रारधारे। इनमेसे भापकी अपेक्षा मिप्यात्व, पाग कपाप और नौ नोकपायोंकी अपेक्षा तीन पदमामे बीच कितना है । भनम्त है। मनन्तामुगाची चतुकी अपेक्षा इसी प्रकार मानना चाहिए। जितनी विशेषता भासम्म स्पितिविमतिका गीष मसंन्यात १। सम्यस्व मौर सम्पम्मिप्यारे सर परवाले बीच स्तिन मसमपात है। इसी प्रकार तिच भपयागी, मौदारिकापयोगी, मसम्मेरपाले मेवारि पा पापपासे भसंपत मानभने, मारि दीन मश्मापासे, मम्म और भावारबीक बानना चाहिए। १ मारेराकी अपेक्षा नारकियाम सर मातियो सर परवान बीर किसन : मसलाठर । इसी प्रकार सब नारकी, सम पंचेम्पितिव, मनुष्य अपर्यान, सामान्य रेष, मान- पातियोंसे सेन समारपर्गतदेष, पवेनिप पंचेनिकपर्याप्त पस, बसपा पारी मनो- योगी, पाचनबागी, चैम्मिपिकमाययागी, मीडरबार पुक्ष्यवेरवाने, बरनवाने, पौत्तस्पा पाथे परतेबाबाले और समी बीरबानमा पारिए।मनुप्पोम भनम्तामुपम्पोचतुपामरम्प आयु.प. प.ससी । समय-सम्मान योर। पालि समाज पर रि, न चला पिपिनुपित मान माप mad चिनिय टिप पनि परेलिया NR भोपाल मेशा इसस यांत परमार्थ साय, मारोगी, मा सिमीर सभा ५ Tamiynter । ५८ t . पानि नि! ११.१. । चव गरिमा संगी। मनु मुजय . जयधरलासहिदे कमायपाहुडे [हिदिनिहत्ती ३ सम्मत्त-सम्मामि० भुज०-अवढि० अवत्तव्य० केत्ति० ? संखेज्जा। सेसपयडीणं सम्व- पदा० अणंताणु० भुज०-अप्प०-अवढि० सम्म०-सम्मामि० अप्प० के० ? असंखेज्जा। ६१११. मणुसपज्ज० मणुसिणी० सव्वपयडी० सव्वपदा० के०१ ससेज्जा । एवं सयट्ट०-आहार-आहारमिस्स०-अवगद०-अफसा०- मणपज्ज० संजद० सामाइय-छेदो०- परिहार० सुहम० जहाक्खादसंजदे ति । $ ११२. आणदादि जाव उवरिमगेवज्जो त्ति सधपयडीण सवपदा० के० ? असंखेज्जा। एवं सुकले० । अणुदिसादि जाव अवराइद ति सवपयडि० अप्पदर० के० १ असंखेज्जा। एवमाभिणि० सुद०-ओहि०-संजदासंजद०-ओहिदंस० सम्मादि०- खइय०-वेदय ०-उवसम०-सासण-सम्मामिच्छादिहि ति । ६ ११३. एइंदिएसु मिच्छत्त०-सोलसक०-णवणोक० सव्वपदा० के० १ अणंता । सम्मत्त सम्मामि० अप्पदर० के० १ असखेज्जा । एवं सन्चएइ दिय-वणप्फदि०-बादर- सुहुमपज्जत्तापज्जत्त-णिगोद०- वादर-सुहम-पज्जत्तापज्जत्त - श्रोरालियमिस्स - कम्मडय- मदि-सुद० मिच्छादि०-असण्णि-श्रणाहारि त्ति । विगलिंदियाणं पंचिदियतिरिक्ख- अपज्जत्तभंगो। एव पचिं०अपज्ज०-चत्तारिकाय तस अपज्ज० -वेउन्धियमिस्स-विहग- स्थितिविभक्तिवाले जीव कितने हैं ? सख्यात हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार, अवस्थित और प्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीव कितने हैं ? सख्यात हैं। तथा शे। प्रकृतियोंके सब पदवाले अनन्तानुबन्धीचतुष्ककी भुजगार, अल्पतर और अयल्थितविभक्तिवाले तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीव कितने हैं ? असख्यात हैं। ६ १११ मनुष्यपर्याप्त और मनुष्यनियोंमे सब प्रकृतियोके सब पवाले जीव कितने हैं ? सख्यात हैं। इसीप्रकार सर्वार्थसिद्धिके देव, श्राहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, अपगत- वेदवाले, अकपायवाले, मनःपर्ययज्ञानी, संयत, सामायिकसयत, छेदोपस्थापनासंयत, परिहार- विशुद्धिसयत, सूक्ष्मसापरायिकसयत और यथाख्यातसंयत जीवोंके जानना चाहिए। ६ ११२ आनतकल्पसे लेकर उपरिमप्रैवेयकतकके देवोंमें सब प्रकृतियोंके सव पदवाले जीव कितने हैं ? असख्यात हैं। इसी प्रकार शुक्ललेश्यागाले जीवोंमे जानना चाहिए। अनुदिशसे लेकर अपराजिततकके देवोंमें स । प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीव कितने हैं ? असख्यात हैं। इसीप्रकार आभिनिवोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, संयतासयत, अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि, सासादनसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंके जानना चाहिए। ६११३ एकेन्द्रियोंमें मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंके सब पवाले जीव कितने हैं ? अनन्त हैं। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीव कितने हैं ? असंख्यात हैं। इसी प्रकार सब एकेन्द्रिय, वनस्पतिकायिक, उनके वादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, निगोद, उनके यादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, औदारिकमिश्रकाय- योगी, फार्मणकाययोगी, मत्यज्ञानी, अताज्ञानी, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी और अनाहारक जीवोंके जानना। विकलेन्द्रियोंके पंचेन्द्रियतिर्यश्च अपर्याप्तकोंके समान भग है। इसीप्रकार पंचेन्द्रिय अपर्याप्त, पृथिवी आदि चार स्थावरकाय, त्रय अपर्याप्त, वैक्रियिकमिश्रकाययोगी और विभंगज्ञानी जीवोंके पादरदिन । पमतमा चियूमिन परिहारः समः . साप० वय १३ सम्मन-सम्मापिन दानना चाहि। ६११४ रन नसे प्रोपा रहते हैं ? सब तार दिमताई कि भोर साना रत है। इसी प्रकार सारा करायवान, बाबारे जानना चादि ६११५. मा 47 है १ लाको र मनुष्य, सब दव, मय पर्याप्त, पादर अभिः पर्याप्त, सद अम, पाँचों बादारकाययागी, छानी, श्रुतक्षानी, A पिद्धिसंयत,पून पात मादि तीन सासादनसम्यग्दृधि - रमाको छोड़कर शेष " --- . R ने । संसया। सेसमा म-सम्मानित . सम्मपदा सेना अपना सब्द समान ० सम्बपसीर सरमा र पि समसी जसमा मोरिसमा । समसा. व स्परिवरपरमार जब मोरामिममिन्स का रिमसिदिमान पिरिगतिमि गा० २२] विविविाचीए सत्तरपयरिमुगारसत मामि चि । ममय हमीसपपरि० मदि०मगो। एक परिमाणाणुगमो समझो। ११. सेवाणुगमेन दुविहो णिसो-प्रोषय बादेसेम य । योपेन मिणच पारसक०-गवमोक. तिप्पिपदा वितिसेचे! सम्पखोगे। अर्णतापु० घठक० एप देव । पवरि भवच बोगस्स मसखे०मागे। सम्मच-सम्मामि० सम्मपदा० सोग प्रसंखे मागे। पर विरिपस-फापगोगि० बारातिय०-मस-पचारिक०-असमद मासु विजिसे मपसि-माहारि चि। ।११५ भादेसेष परइएस सम्पपयरी०सम्पदा के लोग मसखे मागे। एष सम्मप्राप-सम्मपचिंदियतिरिक्त ०-सम्बमणुससम्पदव-मिगलिंदिय-सम्पपपिदिप- पादपरविफल्म पावरमाउपन्या-बावरपेठपन्ध-पादरवाउपन्य पादरवयफविपचेय पन्ज.-सम्बतस०-पचमम०-पपवपि.-उम्बियउ मिस्स० बाहार-आहारमिस्स.. इस्पि-पुरिस० विहगः-आमिषि-मुद० मोहि०-मणपन्य० -सनद०-सामाइप-वेदो परिहार-मुहम० मावाद-सबदासमद-पासु०-ओदिस० विम्भिले० सम्मादिति खायोदय-उबसम-सासान० सम्मामि०-सम्मि चि। मवरि पादरवाउपन्चत. सम्मच-सम्मामि० बप्पदरवन मोगसंसे०मामे । बानना चाहिए। भमयोम धमीस मतियोंकी मपेवा मस्पानियों समान मंग है। इस प्रकार परिमाणानुगम समा भा। १११४ क्षेत्रामुगम अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका रे-मोपनिश और भादेशनिदेश। नमसे भोपकी मपेक्षा मिथ्यात्व बाप पाय और मौ नोकगयक्तिीम परमाले बाप कितम पेत्रमें पते है। सब मोकमै पते हैं। अनन्तामुकम्पीककी अपेक्षा इसीमार बानना। पितु इतनी विशेषताकिमयसम्म स्थितिविमचिमा पीप लोगो पर्सपावर्षे भाग में पवेसिम्बल और सम्पम्मिप्यास सप परगामे और फिन्तन क्षेत्रम गत ११ जोक मरम्पार माग तेवमें पते हैं। इसी प्रकार सामाच तिच, कापीगी भौतारिकमाययोगी, मपु सकारवाले, पारि पापायचा, असंबत अपानवाले रुमारि तीन स्यापा मम्म और मारक बीगरिबानना चाहिए। १११५. भादेशकी अपेक्षा मारपिमोम सब प्रतियोंके सर परपाले बीप सिमेनमें यते बोको सम्पात माग सेव दते हैं। इसी प्रकार सत्र नारकी, सब पंचेम्पितिपंच, सस ममुप सब पर सब विमोमिप, सब पंचेन्द्रिय, पावर प्रविधीकयिकपपात, दादर समयिक पर्याप्त, पावर भमिममिकपर्याप्त बार नामुमपिकायाप्त बार बनस्पतियायिक प्रत्मार पपात सास, पागों मनायोगी पाना पवनवागी बैलिपिकायमागी, विपश्यमभभपयोगी, भाहारकाययागी, माहारमिममपयोगी मीरवाले पुरुयादवा विमानी, भामिनिवाधिक पानी, मनवानी, अभिमानी मनापर्यशामी, संपत सामापिथसंवत देरापस्थापनासपत परिवार विनिसबत समस्परामिसंपत पवारपातसंपत संयतापित, अपानवात पिपिएनवाये, पात भारि तीन सापाबाले, सम्मान, वापिसम्पष्टि, सम्माधि परामसम्पन्न सासादनसम्प, मम्पग्मिध्याररि पौरसमी बीपी वानना चाहिए कि इसमी विशेषता पारमायुष्पिफरता बीमोंमें सम्यक्त और सम्पग्मिध्यात भरसर स्थिििनमस्तिमासे बानमोरम ऐप परवाले बीच मोकळे संभयान माग फेनमें एते है। सअपचनोउनियमिक और सम्मान मसात पारिधिसिम समान। पल सामाग गि बाराममोर्चा मान, पोप बोगसपीर। म सा शागिर - मि परमपरा सार TRIAll पानी संतान सम्पनी, मास + नोसाम समितिkिoli मोगर और ENEURT सर , ARA TRARमा rareeर्म सापीर सावर - 1 म.] मिन्टन नाम लोगो। पानमाला . माग पनिहो । मन मो मजस्तन लोमा० अमन नाम पर दिन काम प्रशासना असन्तान माग- ६। सबस्त और ६० जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ ६ ११६. एइंदिएसु मिच्छत्त-सोलसक० णवणोक० भुज०-अवट्ठि-अप्पदर० ओघं । सम्मत्त सम्मामि०अप्पदर ओघं। एवं वादर-सुहमेइंदिय-पज्जत्तापज्जत्त पुढवि०बादरपुढवि अपन्ज०-सुहुमपुढवि-पज्जत्तापज्जत्त-आउ०-बादरआउअपज्ज० सुहुमआउपज्जत्तापज्जच० तेउ० - वादरतेउ०अपज्ज० - सुहुमतेउपज्जत्तापज्जत्त-वाउ०-यादरवाउअपज्ज०-सुडुमवाउ- पज्जचापज्जत्त-बादरवणफदिपत्तेयसरीरश्रपज्ज० वणप्फदि०-णिगोद० चादरसुहुमपज्जत्ता पज्जत्त ओरालियमिस्स०-कम्मइय०-मदि०-सुद० मिच्छादि० असण्णि-आहारि ति । ६ ११८. अवगद० सन्वपयडि० अप्प० लोग० असंखे०भागे। एवमकसा० । । अभवसि० छन्वीसपयडीणं मदि०भगो। एवं खेत्ताणुगमो समत्तो। ११८. पोसणाणुगमेण दुविहो णिद्देसो-ओघेण आदेसेण य । तत्थ पोषण ६ ११६ एकेन्द्रियोमे मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नाकपायोंकी मुलगार, अवस्थित और अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले नीवोंका क्षेत्र ओघके समान है । तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीनोंका क्षेत्र श्रोधके समान है। इसी प्रकार वादर और सूक्ष्म एकेन्द्रिय और उनके पर्याप्त तथा अपर्याप्त, पृथिवीकायिक, वादर पृथिवीकायिक, वादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, जलकायिक, वादर जलकायिक, बादर जलकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म जलकायिक और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, अग्निकायिक, बादर अग्निकायिक, वादर अग्निकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म अग्निकायिक और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, वायुकायिक, वादर वायुकायिक, वादर वायुकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म वायुकायिक और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, बादर वनस्पति प्रत्येकशरीर, चादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त, वनस्पतिकायिक तथा उनके वादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, निगोद, तथा उनके चादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मण- काययोगी, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, मिथ्यादृष्टि, असज्ञी और अनाहारक जीवोंके जानना चाहिये। ६ ११७ अपगतवेदियोंमें सव प्रकृतियों की अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीव लोकके असख्या- तवें भाग क्षेत्रमे रहते हैं। इसी प्रकार अकपायी जीवोके जानना चाहिए। अभव्योंमें छन्बीस प्रकृतियोंकी अपेक्षा भत्यज्ञानियोंके समान भग है। विशेषार्थ-ओघसे मिथ्यात्व सोलह कषाय और नौ नोकपायोंकी भुजगार, अवस्थित और अल्पतर स्थितिवाले जीव अनन्त हैं और ये सष लोकमें पाये जाते हैं, अतः इनका क्षेत्र सब लोक कहा। तथा अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिवाले और सम्यक्त्व तथा सम्यग्मिथ्यात्वके सब पदवाले जीव असख्यात होते हुए भी स्वल्प हैं, अतः इनका क्षेत्र लोकके असख्यातवें भागप्रमाण कहा। यह व्यवस्था तिथंचगति आदि मूलमें गिनाई हुई मार्गणाओं में वन जाती है, अत: इनके कथनको ओघके समान कहा । आदेशसे जिस मार्गणावाले और उसके अवान्तर भेदोंका जितना क्षेत्र है उसमें २६ प्रकृतियोंके सम्भव पदधालोंका उतना क्षेत्र कहा। किन्तु सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वकी अपेक्षा सर्वत्र सम्भव पदवालोंका क्षेत्र लोकके असंख्यातवें भाग प्रमाण है। इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिवाले जीवोंका क्षेत्र सर्वत्र लोकके असल्यातवें भाग प्रमाण है। इस प्रकार क्षेत्रानुगम समाप्त हुन्या । ६ ११८ स्पर्शनानुगमकी अपेक्षा निर्देश दो प्रकारका है-ओघनिर्देश और आदेशनिर्देश । - तिसार लोक त्रास असन्यानवें भाग- है। इसाप्रा. दावार जानना चा विशेषार्थ- और असर सद लोकहा। असत्याउने भाग हे चाव सत्यक्त्तने यु प्रप्स नालीचे सर सातमें नरक तकरे स्त्र लाके सया नालीक माठनटेचा M घोदह माग प्रमाग प्रकार से बतलाया है लाया है। कम भोर सब लोक सर्श अपेक्षानो लोको घठलाया हे और है। यहाँ कुछ और रुपनको श्रोधके पदपाले नावाने [कि • सम्माधिमा पवारमा पुगि तिजामारपासवाना उपाइलामाजमा सादि पिपाद-नारमाराना पादियामिभार । असिमान। एसस . 11 उमादेन तर समानुग्र, पति | सम्मरम्म 11 राम रहा Trन पर रागरसी पर और पानी अनिमार्गि गि अपमान, सस परम र सीप कर मामरामला १२ बोशिमा म पगा। FIN मामा पालाप गा० २२] हिरिमितीय चरपरिमुनगारपासम मिणचनबारसक-पवणोक० तिन पदाम विपिएहि फेवरिय खेच पोसिद ? सम्म लोगो,। मर्णवा०पप० एव पेम । णपरि बातम्ब० सोग. मसखे०मागो मह पोइसमागा पारेरणा । सम्मच-सम्मामि० अप्पदर० के० खे० पो० १ सोग बसस० मामो पोसिदो बापोइस० देरणा सम्बसोगो या। सेसपिपिएहि केव० १ लोग० भसखे मागो मा चोदस० देसपा। एवं फाययोगि०-पचारिफसा• यसबद० मचम्सु०-मासिक पाहारि ति । ।११९. बारसेप घेरापस मिउप-पारसक०-गवणोक० सिह पदाण विचि० सोम० बसखे मागो 5 बोरस देखना। मणवाणु०पटकएष पेम । पारि नमसे भोपकी अपेक्षा मिनास्थ, पाप पाय भौर नो नाकपार्यो तीन पदविमतिमान बीपोन कितने क्षेत्रका स्परा भिया है। सब सोकका स्परा किया। मनम्तानुमन्पी पाककी मपेक्षा इसी प्रकार जानना चाहिए। कितनी विशेफ्ठा कि पचम्म स्पितिविमस्तिषाले बीपोन मोकळे मसम्पावर्षे माग और प्रस नाशीके मोरा मागमिसे अवम भाठ मागममाम क्षेत्रन स्परों किया है। सम्पत्र भौर सम्पम्मिथ्यात्वकी मस्पतर स्मितिनिक्तिबामे दीपोन कितने का स्पर्य किनारे खोले अस्पात भाग अस नानीके चौरा मार्गामसे ब म माठ भाग मौर सम सोधेकका स्पर्श किया है। या प पिक्तिमाम बीपोंने कितने स्पर्श किया है। मोपी भसंख्यात माग भौर प्रस मासीले पोपा मार्गमिसेकम पाठ मागप्रमाण क्षेत्रन स्पर्श मिमा है। इसी प्रकार कायपोगी, कोषादि पाएँ पायवाम, मसंवत, मनापर्शनी, भम्प और मारक बौकिवानना चाहिये। पिशेपार्ष-मोपसे मिप्यास्त्र, सोमा कपाप और नौ नोकपायोंकी मुनगार, मस्मित मोर भत्सतर स्थितिमा दीप मनन्त और पे सपनो में पाये पावे मतः इनन स्परी सप खोटमा। अनन्तामुपपी पतुफको भवनम स्विविषाले बीबोध बर्तमान स्पर्श मोका मसम्मात मागरे क्योंकि यतमान मम बिन्होंने ममन्तमपन्थी विसपोजना की है पेसे बीच सम्यक्त्वसे पुत शेर मिप्यास्यमे जानेवाले पत दो बड़े है। तमा अटीव कासीम स्परा अस नाती कम पाठ पटे चौर मागरे क्योंकि यपपि पर नौ गैरेयक तौर नीचे सात मरकको बीच भनातानुकम्पीकी प्रवक्ता स्वितिने करवे ए पाये जाते है। परन्तु उनत्र भोको सम्पात माग ही है। किन्तु इस पर पुक्त मौका मिरवत् स्वस्थान प्रस मामीले पाठपठे या मागरे मता इनका मवीत भसीन स्परोस मामीफे बम माठपदे पौर माग प्रमाण मा। समत्व भौर सम्पम्मिध्यात्लकी अस्सतर स्थितिवान परी तीन मकरसे बसाया। इनमें से झोकमा मध्यातवाँ मागप्रमाय स्परा बर्तमान कायकी अपेवापत माया है।म माठवटा पोपहाग प्रमास स्रो भिार भावि पोंकी अपेक्षासे पतलापा है। मोर मोफस्पर्श मारमान्तिक तथा पपार पपकी अपेक्षा बताया है। क्या सेप पोंकी अपेवाबो बोले मसात माग प्रमाम स्पर्श क्तवापारे पर्वमान काही प्रमानवासे बळमानामौर मम पाठमा चौपदरामु ममाम स्परी प्रीत की मफेया मसाला है। बभोर मागेवाएं गिनाई है। बिना स्परी पोपके समान प्राप्त होता है, भता ते मनको मोपक समान मासेमपयोगी मारि। १९ भादेशली भपेक्षा मारपियोम मिप्यारप, पाप पाय भौरमा मोगपकिन परपाले गोपनि झापले परमात भाग भौर प्रसमाचौके पोर मागोमसे कम या भाग नाए रख म पास PRER मिमा साल । ELEPRE of a ।। रासे सस TRAINER माला TRA 1 बादरपात .. -- गा०२२] सम्म०-सम्मामि । १५ ॥५२५ [चादरव०-] लो० सखे मागो 5 १२१, I मागो अदुपत्र बुब० अवढि० ले तिर्यच . मातम सम्बकत्व तया । है। इसी प्रकार मा MAWAN बादर बलकायिक प्रतेकापीर और बस पर्याप्तोम छन्वीस है। तया स्त्रीवेद . स विभक्तिवाले नावाने विशेषार्थ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ अवत्तव्व० खेत्तमंगो। सम्मत्त०-सम्मामि० अप्पदर० लोग० असंखे०भागो छ चोदस० देसूणा । सेस० लोग० असंखे०भागो। पढमाए खेत्तमंगो। विदियादि जाव सत्तमि त्ति णिरयोघो । णवरि सगपोसणं कायव्वं । तिरिक्ख० ओघं । णवरि अट्ट चोद्दस भागा त्ति णत्थि । एवमोरालिय०-णवूस०-तिण्णिलेस्सा त्ति । ६ १२०. पंचिंदियतिरिक्ख-पंचि०तिरि०पज्ज-पंचिंतिरि जोणिणी० मिच्छत्त०- सोलसक०-णवणोक० सव्वपदाणं वि० के० खे० पो० १ लोग० असंखे०भागो सव- लोगो वा। णवरि अणंताणु०चउक्क० अवत्तव्व० इत्थि०-पुरिस० भुज० अवट्टि. खेत्तभंगो। सम्म०-सम्मामि० अप्पदर० मिच्छत्तभंगो । सेस० खेत्तभंगो। एवं मणुस. तिय० । पंचिंदियतिरिक्ख०अपज्ज० मिच्छत्त०-सोलसक०-णवणोक० तिण्णिपदा० प्रमाण क्षेत्रका स्पश किया है । अनन्तानुबन्धी चतुष्कको अपेक्षा इसी प्रकार जानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि अवक्तव्यका भग क्षेत्रके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असख्यातवें भाग और बस नालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम छहभाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है । तथा शेष स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असख्यातवें भाग क्षेत्रका स्पर्श किया है । पहली पृथिवीम स्पर्शका भग क्षेत्रके समान है। दूसरीसे लेकर सातवीं तक सामान्य नारकियोंके समान स्पर्श है। किन्तु इतनी विशेषता है कि अपना अपना स्पर्श कहना चाहिये । तिमंचोंमें ओघके समान स्पर्श है। किन्तु इतनी विशेषता है कि आठवटे चौदह भाग यह विकल्प नहीं है। इसी प्रकार औदारिककाययोगी, नपु सकवेदी और कृष्णादि तीन लेश्यावाले जीवोंके जानना चाहिये । विशेषार्थ-सामान्यसे नारकियोंका स्पर्श लोकके असख्यातवें भागप्रमाण और कुछ कम छहबटे चौदह राजु प्रमाण बतलाया है। वह यहाँ सब प्रकृतियों के सब पदोंकी अपेक्षा बन जाता है। किन्तु इसके दो अपवाद हैं। एक तो अनन्तानुबन्धी चतुष्कके प्रवक्तव्य पदकी अपेक्षा यह स्पर्श नहीं प्राप्त होता, क्योंकि ऐसे जीव मारणान्तिक समुद्धात या उपपाद पदसे रहित होते हैं । इसलिये उनके लोकके असंख्यातवें भागप्रमाण ही स्पर्श पाया जाता है। दूसरे सम्यक्त्व और सम्यग्मिध्यात्वके अल्पतर पदको छोड़कर शेष पदोंकी अपेक्षा भी लोकके असख्यातवें भागप्रमाण स्पर्श प्राप्त होता है। कारण वही है जो अनन्तानुयन्धीके अवक्तव्य भगके सम्बन्धमें बतलाया है। प्रथमादि नरकोंमे भी इसीप्रकार अपने अपने स्पर्शको जानकर कथनकर लेना चाहिये । यद्यपि तिमंचोंमें सब प्रकृतियोंके सब पदोंकी अपेक्षा ओघके समान स्पर्श वन जाता है किन्तु यहाँ कुछ कम आठबटे चौदह राजु स्पर्श नहीं प्राप्त होता, क्योंकि यह स्पर्श देवोंकी प्रधानतासे बतलाया है परन्तु तिर्यञ्चोंमें देव सम्मिलित नहीं हैं। औदारिक काययोग आदि मार्गणाओं में भी इसी प्रकार घटित कर लेना चाहिये। ६ १२०. पचेन्द्रियतिथंच, पंचेन्द्रियतिथंच पर्याप्त और पचेन्द्रियतिर्यच योनिमती जीवोंमे मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकपायोंके सव पविभक्तिवाले जीवोंने कितने क्षेत्रका स्पर्श किया है ? लोकके असख्यातवें भाग और सब लोक क्षेत्रका स्पर्श किया है । किन्तु इतनी विशेषता कि अनन्तानुषन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवालोंका तथा स्त्रीवेद और पुरुषवेदकी भुजगार और अवस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका भग क्षेत्रके समान है। सम्यक्त्व और सम्य- ग्मिध्यात्वकी अल्पतर स्थितिवालोंका भंग मिथ्यात्वके समान है और शेषका भंग क्षेत्र के समान है। इसी प्रकार सामान्य, पयोप्त और मनुयिनी इन तीन प्रकारके मनुष्योंके जानना चाहिये । पचेन्द्रिय आये है वही तित वही है जो न और अवस्थित लिा लोक स्पर्श बतलाया या बो एडेन्द्रियोंमें मुनगार और अमा मनुष्यत्रिको मी सध्यपर्याप्तकोम अल्पतर पदकी सा नियंचोंके समान 1 इन बाती है, अतः स्पर्श लोकके सहा स्पर्श लोकके ४९५ अवस्थित दो पहले वतला ६१२१ दे- सोलके असख्यात प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श स्थिावविभक्तिवाले वान बीयोंने लोकके चना स्पर्श किया है .

दिदि मेगा पसे मायने हमा गा। गिरिरादि बास भाप । पारि ग पानस 1 रतियोपिक म. बससे पास विपरिस. वर्ष मि. समायो। संस या पापोर सिंह समी कार पनि नमामि मराडे शासपोरमलम मारले समान है। इससे मेरा RTHA इतनामिमा मसापी2 गा० २२] हिरिपिरत्तीय सचरपरिमुबगारपोसम सम्म-सम्मामि० अप्पदर० पबिंदियतिरिक्खमंगो। एर्ष मणुसअपत० सम्बविग सिदिय-परिदिपअप पादरपुरविपल-पाइरपाउपम-बादरवेउपञ्जबादरपाठपज्ज [बारम-] क्सअपसचा ति । परि पादरवाउपख० छनोसपहि० विभिपदा० मो० मत मागो। इरिप० परिस० सब० प्रबहि० पलं सम्बसोगो वा । । १२१ देव० मिच्छच-सोस्सक० गवणोक० सम्मपदार्ण वि० होग० वसंखे० मागो मापा घोर देसया । मवरि अपवाघउक अवयम्य इत्वि०-पुरिम. एब अपहि० होग० असंखे०मागो भाचोइस० देगपा । सम्म०-सम्मामि० एन० तिच अपर्याप्त प्रेम मिथ्यात्व, सोशा कपाय और नौ मापार्यो तीन परवाले भीषोंध और सम्यक्स्प तया सम्पम्मिमात्यकी अस्पतरस्थितिविमचिया बीघोंघ मग पंचेन्द्रिपतिक समान है। इसी प्रकार ममुन्न भपर्याप्त, साविकमेन्द्रिय, पंचेन्द्रिय अपर्याप्त वापर प्रथिवी कायिकपयाप्त, पातर बसकायिक पोत, पावर मनिकानिक पात, मादर वायुकाविक पाप्त, मार बनस्पतिकायिक प्रवेशारीर और प्रस भपस मीकि बानना चाहिए। किन्तु इतनी विशेषता है कि पार पाउचारिक पसम दरपीस प्रतिकितीन परपाले बीबोंने लोकके संम्पाव भाग मत्रता स्पो किया है। उवा सीवेद और पुरुपरमै मुखगार और भपस्थित स्पितिविमति बिना सेप स्पिति विमखियाले जीवोन सब सामन म्पर्श किया है। विक्षेपार्ष-सामाम्प मारपियोंमें सा प्रहतियों सब पर स्परफिलिम बो पुक्ति के भाषा तिपत्रिकर्म भी मार होती है। जितु नहाँ भी जब अपपार । भपगारवा पीबोरगतिमें बताना पाय ।। तथा एक तीसरा अपवार नीचेर मोर पुषवाको मुखमा मोर भवस्थित स्थिति स्पराका। बात यह है कि पापित तीन प्रकारके विर्गोंका सब सोफ स्पर्श बतलायाहे पर पाकि प्रसहोता।बो पपेन्द्रियोंमसे भाम इनमें स्पाम होते है पाबी एकनियम मारपन्तिक समुवात करते है। परन्तु पेसे बोनोंडे सीवेर भोर पुरुषको मुबगार भोर अवस्थित स्थिति नहीं पाई जाती, पता हाँ इनकम स्सरी सके समान बनाया है। मनुष्यमिकमें भी इसीमकार पिसेपतामोको बानकर सामान करना चाहिये। परनितिन सम्पपर्याप्त काम मिप्यास्थ भारिके तीन परोंकी अपेक्षा तथा सम्पास्म और सम्पम्मिप्यावर अस्पतर परकी अपेचा स्पर्श पंचेन्द्रिबतिक समान प्राप्त होता है मता इनकेसन पंचेद्रिक विकि समान बताया। मनुमपर्याप्त पारिश और मार्गमाए बिनम पाम्पषस्था बन बापी माइनो मनको पंचेन्द्रिमविच सम्पपनि समान बताया है। कि पर बाबुकामिकमाप्त बीच इस अपवार । पात पा है कि बापर बायुप्रपिक पर्यापन स्पर्श मोका सम्पात मागप्रमाल मतमाया बता इनमें पन्नास प्रातिपरि तीन परवाहों स्पर्श को सम्मात मागप्रमाण बन पाता है। वह बो सीवेर और पुम्पोरकी मुनगार और मस्थित स्पितिविमस्मिाकि सब सोक स्पर्शभ निरोप किया। मोइसका कारण प्रायापही है बो पाले मतमा माये। ११२१ रेप मिपाव सोलर माय भौर मो मोकपाबारे सब पदधिमच्मिा बीपनि भोको प्रारम्पात माग तपास नानीके चौर मागमिसेसम्म माठ भौरम मो माग- ममायन स्पा किया है। ति इतनी विशेषता है कि भनम्तामुपपी चतुफळी भातम्प स्थितिविमक्तिमाने गोषोंने तमा पावर और पुरुपयेपकी मुरगार और मस्थित स्वितिपिमस्ति पाने बानि नोकर भसम्पात मा । और अस नापीके चौपर मार्मिसेम्बकम माठ भागपमाप सन सर्श किया। सम्पत और सम्पग्मिप्यावही मुबगार, मन्यामपसमम मासमान Tपामाशय Faati मा ।। पास भाना सामो- माय मासस म समबनी। "ग बन शामि गर्म सामेल मwit भपस्थित भोर मस्तम्भ पपमित HिndiARMER सरा fontinuA मानावर स्प समन Rोला सास । + 1 गा..] तिमिट कि दक्षिण पेर पनि त्य राज । T .. विशाय- और ~-~- सुकरा स्पितिवार - ६४ जयधवलामहिदे कसायपाहुटे [हिदिविहत्ती ३ अवढि०-अवत्तव्य० लोग० असंखे०भागो अट्ट चोदम० देसूणा । अप्पदर० लोग० असंखे०भागो अट्ठ-णव चोद्दस० देसूणा । एव सोहम्म० । भवण० वाण-जोदिसि० एवं चेव । णवरि अधुट्ठ-अट्ठ-णव चोदस० देसूणा । सणकुमारादि जाव महस्सार० सवपयडि० सव्वपदवि० लोग० असंखे०मागो अट्ठ चोह० देसणा। आणदादि जाव अच्चुदे ति सबपय० सयपदवि० लोग० असंखे०भागो छ चोदस० देसूणा। एवं सुक्क० । उवरि खेत्तभगो। एवमाहार०-आहारमिस्स०-अवग० अकसा-मणपस.. संजद०-सामाइय छेदो० परिहार०-सुहुम जहाक्खाद०-अभवसिद्धिया ति । ६ १२२. एइंदिएसु मिच्छत्त-सोलसक०-णवणोक० तिण्हं पदाणमोघं । सम्मत्त.. सम्मामि० अप्पदर० पंचिंदियतिरिक्खअपजत्तभंगो। एवं चत्तारिकाय-बादरअपज.- सव्वेसि सुहमपजतापञ्जत्त-चादरवणप्फदिपत्तेय अपज्ज०-वणप्फदि-णिगोद०-ओरालिय- मिस्स-कम्मइय०-मदि०-सुद०-मिच्छाइट्ठि-असण्णि०-अणाहारि ति । स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असख्यातवें भाग और मनालीके चौदह भागोंमसे कुछ कम पाठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीर्वोने लोकके असख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमेसे कुछकम आठ और कुछकम नौ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसीप्रकार सौधर्म और ऐशान स्वर्गक देवोंके जानना चाहिये । भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिषी देवोंके इसीप्रकार जानना । किन्तु इतनी विशेषता है कि उन्होंने बसनालीके चौदह भागोंमसे कुछकम साढेतीन, कुछकम पाठ और कुछक्रम नो भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। सनत्कुमारसे लेकर सहस्त्रार स्वर्गतकके देवोंमे सब प्रकृतियोंके सब पदविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असख्यातवें भाग और त्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे फुलकम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। आनतसे लेकर अच्युत कल्पतकके देवोंमे सब प्रकृतियोंके सर पदविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असंख्यातवें भाग और सनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछकम छह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसीप्रकार शुक्ल- लेश्यावाले जीवोंके जानना चाहिए। ऊपर नौ अवेयक आदिमे स्पर्श क्षेत्रके समान है। इसीप्रकार आहारककाययोगी, आहारकमिश्रकाययोगी, अपगतवेदी, अकपायी, मन पर्ययझानी, सयत, सामायिकसयत, छेदोपस्थापनासयत, परिहारविशुद्धिसंयत, सूक्ष्मसापरायिकसयत, यथाख्यातसयत और अभव्य जीवोंके जानना चाहिये। विशेषार्थ-पूर्वमें नरकगति आदिमें स्पर्शका जो विवेचन किया है उसे ध्यानमें रखते देवोंमें और उनके अवान्तर भेदोंमें यदि सब प्रकृतियोंके यथासम्भव पदोंकी अपेक्षा स्पर्शका विचार किया जाता है तो किस अपेक्षा कहाँ कितना स्पर्श बतलाया है यह बात सहज ही समझमें भाजाती है। इसीलिये यहाँ अलग अलग खुलासा नहीं किया है। तथा 'एव' कह कर जो आहारककाय- योग आदिमें स्पर्शका निर्देश किया है उसका यही अभिप्राय है कि जिसप्रकार नौ अवेयक आदिमे स्पर्श क्षेत्रके समान है उसी प्रकार इन मार्गणाओंमें भी जानना चाहिये। ६ १२२ एकेन्द्रियोंमें मिथ्यात्व, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंके तीन पदवाले जीवोंका स्पर्श अोधके समान है । सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका स्पर्श पंचेन्द्रियतिथंच अपर्याप्तकोंके समान है। इसीप्रकार पृथिवीकायिक आदि चार स्थावरकाय इनके बादर तथा यादर अपर्याप्त, सभी सूक्ष्म तथा इनके पर्याप्त और अपर्याप्त, वादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर और उनके अपर्याप्त, वनस्पतिकायिक, निगोद, औदारिकमिश्रकाययोगी, कार्मण काययोगी, मत्यज्ञानी, श्रुताज्ञानी, मिथ्यादृष्टि, असंज्ञी और अनाहारक जीवोंके जानना चाहिये । मुवनरपान दिमान- ६१२५६ और नी नामा हरिपोवद और चोन्ह मागानेन पी चनुका विनिवारवाना प्रायके समान है। चतुदर्शनवान और न भागान ना और बाद भागोममे छ विशेषार्थ और पुरसवेदका उन्नु वतनागा वह सर्श मारणान्तिक अपना इससे अधिक परित कर लेना 11 पारण यह है कि अपर विहार करते हुए अनः नका स्पशा विशेषता नहीं पाती। मनगार और पादि ६१२४ वैवि ६ - । स. देरखा। समर म. मनाईन सपस्मादि यह पस पोदेरा। समास पायो पोस देला।। स्म-अपभमानास अम्लसिरिया नि • हिपसायोग। समान | जातिकमा मिर-मिरम्मोमि प्रममा कि महिना से पारेको मास्यसमा । सास, मार गा० २२] द्विपिमिचीए उत्तरपपरिमुबगारफोसम ६५ ११२३ पपिदिय-पपिपत्र-तस-रासपच. मिष्ठमारसक-पवणोक. सिविपद पि. नोग• असंखे मागो बह पोस० देशमा समलोगो ना। परि इत्यि-गरिस• सब० महि० मा पारस पोरस० देखा। ममतामु०परफ० एष पेव । परि यवतम. बोष । सम्मच-सम्मामि० मोपं । एष पंचमण-संपपि. इरिष०-पुरिस० पम्नु०-सणि पि। गरि इस्पि०-पुरिसपेदमग्गणाम इत्यि०-परिस० सब० अपहि ० मा पारस० देरणा। १२५ पेठमिय० मिन-पारसक० मबमोफ० निश्णिपद. सोग. बससे० विपार्य-समियोंमें मिम्पास्म मावि २६ मातियोंक तीम परवानों को भोपक समान पथ लोक बतलाना कारण यह है कि ये श्रीच समोर पारे पाते हैं। क्या सम्यक्त्व मौर सम्पम्मिप्यास्तके मस्सर स्पितिवाशोक सरोको पंचेन्द्रिगतियच अपर्यातकोंक समान बतमानेका कारण या है कि विसप्रकार पंचेम्भूिपतिर्यच अपर्याप्त में इन प्रतियोगी भत्सवर स्थितिमाझेका पर्तमाम कालीन सरो साफ संस्थात मागममाम और भतीतकालीन स्पर्श सा मोड़ पाया जाता है सी प्रचार पोधिोम मी पन बाता है। इसीप्रवर चारों स्थापरकाप भारिमार्गणामोम स्पर्शका विपन रमेना चाहिये। ११९१ पंचेमिय, पंचेनिवपर्याप्त बस मोर इसपर्याप्त बोपोंमें मिथ्यात्व, पाय उपाय और नो मोकपातीन पाविमतिचा नीबोन लाकडे प्रसपाट भाग, प्रसनामी बोरर मागोमसेकम पाठ माग भौर सब शोममाण भेत्रमा परी किया हैपितु इतनी विपता कबीर और पुस्पोरकी मुबगार, और भवम्बित स्पितिविमखियाले बीपीने सनाही के बार मागोमसे सम्म माठ मौर म म बाद मागप्रमाण पत्र पर किया है । मनम्तामु- पापी चतुप्पी अपेक्षा इसीपकार बामना चाहिये । किन्तु इनी पिसेका बिचम्प स्पिति- रिमधिमाले जीपोंका म्परो भापके समान है। सम्मान और सम्बग्मियात्वकी भपेमा स्परा भोप समान है। इसी प्रकार पात्रों मनोपोगी पानी पचायोगी मीरमान पुरुषवरले पहुरानवाने और संदी बीबहि मानना चाहिये । किन्तु इतनी पिसेपता है किसी और पुरुपरंप मागणाममि मा बोर पुरुपवेदकी मुरगार भोर भमस्मिक स्थितिविमतिमा बौनि सनासाले चौर भागोमसे कम पाठ मागपमाण मन्त्र स्परा स्मिा है। रिशेपार्य-पंचेम्ब्रिय भारि पार मार्गमामि भौर सरा ता सुगम है। कि पीर और पुरसवको भनगार और भपस्थित स्मितिविस्तिवालाधरपर्यमा सम्म पाठबटे बोरर एनुमतमापारे पाहिार भारिकी अपेक्षा पतलाया है। सपा अम्म पापण्टे रारा स्सा मारमास्तिक भौर पपाद पर अपेमा बनाया है। इन दोनों प्रातिपरस्त पोंडी अपेपा इससे अधिक स्पर्श नहीं प्राप्त होता। इसी मनापार मनोयोगी मारि मार्गधामोम भी पटित रमेना चाहिय। पितु मार और पुरुषार मार्गणमोम मोबीवर मोर पुरुपयरको मुनगर भोर भापतर स्थितिबामा स्याम पाठाटे चौर राम बनाया है सो इसका परम पाकिमीच मभितर रेबहावर पा तीसरे नरक नीरे और पप्पुन सक पर विहार र प पाय बाये है। इस कार पपि पुरुपारी बीर पर शिरमा मते माता नप स्पर्श सोको मर्ममपात मागपमान ही है इमलिये समसे इस सामि गई विपता महीमाती १४ विरिकाबपागियोंमें मिष्माष पार पाय भौर नौ मापार्योकमान पदबाने ६ मोमि। सक्ने पास सामान मात्र मिलेर समापन होकोम समसनिक TER समान पाली, मला मुममानिस सामास गोसAR पक्षाचार्य नपाएका ARTी प्रतम तिमि प्रसिपी MAY मोरारी Tr, पिर गी०२२] - * ६ १२६, केवचितं . -- ६६ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती भागो अट्ट तेरह चोदसभागा वा देसूणा । णवरि इत्थि०-पुरिस० भुज०-अवढि० अट्ठ- पारस चोदस० देसूणा। अणंताणु०चउक्क० एवं चेव । णवरि अवत्तव्य० ओघं । सम्मत्त-सम्मामि० अप्पदर० मिच्छत्तमंगो। सेस० ओघ । वेउन्वियमिस्स० खेत्तमंगो। ६ १२५, विहंग० मिच्छत्त०-सोलसक०-णवणोक० तिण्णिपदा सम्मत्त-सम्मामि० अप्पदर० पंचिंदियभंगो। आमिणि-सुद०-ओहि० सवपयडि० अप्पदर० लोग० असंखे भागो अह चोद्द० देसूणा। एवमोहिदंस०-सम्मादि०-खइय०-वेदय०-उवसम०. सम्मामिच्छादिहि त्ति । संजदासंजद० सवपयडि० ० अप्पदर० लोग० असंखे०भागो छ चोदस भागा वा देसूणा। तेउ० सोहम्ममंगो। पम्म० सहस्सारभंगो। सासण० सन्व- पयडि० अप्पदर० लोग० असंखे भागो अट्ठ वारस चोदस० देसूणा । एवं पोसणाणुगमो समत्तो। ६ १२७. - ई कारण वि . ६ १२६. १० माण -- ६१३०० * सम्बद्धा अपेक्षा स्पर्शन पता की विशेषता न *अब जीवोंने लोकके असल्यातवें भाग और बसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछकम आठ और कुछकम तेरह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। किन्तु इतनी विशेपता है कि स्त्रीवेद और पुरुपवेदकी भुजगार और अपस्थित स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने बसनालीके चौदह भागोमेंसे कुछकम पाठ और फुछकम बारह भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अपेक्षा इसी प्रकार जानना चाहिये। किन्तु इतनी विशेषता है कि अवक्तव्य स्थितिभक्तिवाले जीवोंका भंग ओघके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका- मग मिथ्यात्वके समान है। तथा शेष कथन ओघके समान है। वैक्रियिकमिश्रकाययोगियों में क्षेत्रके समान भग है। विशेषार्थ-अन्यत्र वैक्रियिककाययोगियोंका स्पर्श जो तीन प्रकारका बतलाया है वही यहाँ मिथ्यात्व आदिके तीन पदोंकी अपेक्षा प्राप्त होता है जो मूलमें बतलाया ही है। किन्तु इनमें स्त्री- वेद और पुरुषवेदकी भजगार और अल्पतर स्थितिवालोंका वही स्पर्श प्राप्त होता है जो पचेन्द्रिय जीवोंके पहले बतला पाए हैं इसलिये यहाँ इसका तत्प्रमाण कथन किया। वैक्रियिककाययोगियों में अनन्तानुबन्धी चतुष्कका स्पर्श इसी प्रकार है। यह जो कहा है सो इसका यह तात्पर्य है कि जिस प्रकार इनमें मिथ्यात्व आदिके सम्भव पदोंका स्पर्श बतलाया है उसीप्रकार अनन्तानुबन्धी चतुष्कके अवक्तव्य पदको छोडकर शेप पदोंका स्पर्श जानना चाहिये । शेष कथन सुगम है। ६१२५ विभगज्ञानियोंमे मिथ्यात्व सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके तीन पद और सम्यक्त्व तथा सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतरस्थितिका भग पचेन्द्रियोंके समान है। आभिनि योधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी और अवधिज्ञानी जीवोंमे सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीवोंने लोकके असख्यातवें भाग और बसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम आठ भागप्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। इसी प्रकार अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, क्षायिकसम्यग्दृष्टि, वेदकसम्यग्दृष्टि, उपशमसम्यग्दृष्टि और सम्यग्मिथ्यादृष्टि जीवोंके जानना चाहिए । सयतासयतोंमे सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीनोंने लोकके असख्यातवें भाग और त्रस नालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ कम छह भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। पीतलेश्याका भग सौधर्मके समान और पालेश्याका भंग सहसार कल्पके समान है। सासादनसम्यग्दृष्टियोंमें सब प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तियाले जीवोंने लोक्के असख्यातवें भाग और प्रसनालीके चौदह भागोंमेंसे कुछ पम आठ और कुछ कम बारह भाग प्रमाण क्षेत्रका स्पर्श किया है। ६ १२.. यह सम्पक्त्व विमक्तिवाले ६१२७. यह जघन्य स्वितिविमज्यिोंको गमन पाया जाता है। है। १ समयली अवस्थित अधान्य - 1 ६१३०. यह [at मापस नाईक सा पार पाया है। पाउमाविल से • विचिनासम्बरसमानी मागणी मादि • मरदेश सम्मेर सम- मदरगामी सामान सरकार TE देसा। हो। पिपरम समा -मतामया भन्मनुम्न गुपयर मातार मित पनगासिनीसा रामगसिार गा० २२] द्विपिपिरचीए उत्तरपग्मुिमगाराला • पापाजीवेहि कालो। १२६ सुगममेद। • सम्मान-सम्मामिष्लत्तार्ण भुजगार-अपाहिद-भपत्तमाहिपिपिहस्तिया केबधिर कावापो होति। ६१२७ एद पि मुगर्म । जहरणेण पगसमभो। ३१२८ दो ! सम्मव-सम्मामिछवाण समगार भवहिद-अब अवसम्माणि एगसमय कारण विदियसमए सम्वेसि मौवाममप्पदरस्स गमणुपसमादो। * उकस्सेण भापजियाए असंखेजदिमागो। १२९ हो? सगसगतरफाले महिपते सजगार अबाहिद-बचमाणि रुपमा भाग णिरसरमापत्ति असंख०मागमेचफासमबहिवामपन-मजगारालमुसमादो । अप्पवरहिदिविहत्तिया केपधिर काढायो होति ? १३. सुगम । सम्पदा। विक्षेपार्ष-पहा विमगलानी भारि तिमी मागेवामोंमें भपने अपने सम्भव परकी माझा स्परांम पतलापारेषन इन मार्गकामंकि स्पर्शनको बान र पटित कर लेना चाहिए। माँ पिपता महोमेसे उसमहममे धनगसे स्पष्टीकरण नहीं किया है। इसपर स्तरोनामुगम समाप्त हुमा। बा नानाचीयोंकी सपेसा कासानुममका मपिकार है। १२. पप सूत्र मुगम है। ० सम्पपत्त और सम्पम्मिप्याकी राजमार, मनस्पित और भरकम्यस्थिति- विमकिपाबीका खिना काल है। ६१७ पासूत्र मी सुगम है। अपन्य फार एक समय है। ३१२८ क्योंकि सम्मस्व और सम्बाम्मपालकी मुबगार, अपस्थित और नबसम्म स्थितिविधियों पक समय तक दूसरे समयमे न स बीपोंका मसतर स्थिििधमसिम गमम पाया जाता है। उसकस का मापसीके प्रसस्पाउ मागप्रमाप है। १६ सोफि मपम अपन मम्तरामबतीतो बान पर मुबगार, अबस्थित पौर अपम्प स्विसिविचित्रको परमवासे मीकि निरन्तर मावतिके मसला भागप्रमाण भवस्थित पचप और मुबगार पर पाबे बाद है। मस्परस्थितिषियक्तिबाछे बीपौका मिरुना फास है। १५. पात्र गम है। सब कासरे। नामा मangal पिनागिन । सिन मामय पल्लामा मुगर।। समग समय समसामयि गाममाप्रपा भासीमा पसमीर माता REM म।

-- Fil गी० २२] तेण सचिन पारसका चेव । मरि ४ ऐगस०, उक० मयंस ६१३६. सबदा। मुन मम्पदर ०-अव इसका जघन्य और जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती $ १३१. कुदो ? णाणाजीवप्पणाए सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणमप्पदरहिदिविहतियाणं तिसु बि कालेसु विरहाभावादो। सेसाणं कम्माणं विहत्तिया सव्वे सव्वद्धा । ६ १३२. कुदो, अणंतरासीसु भुजगार-अवविद-अप्पदराणं विरहामावादो । * पवरि अर्णताणुबंधीणमवत्तवहिदिविहत्तियाणं जहरणेण एगसमभो। $ १३३. कुदो, अवत्तव्वं कुणमाणजीवाणमाणंतियाभावादो । ण सम्मत्सअप्पदर- विहत्तिएहि वियहिचारो;सम्मत्तप्पदरस्सेव भणंताणुबंधीणमवत्तव्वस्स सगपाओग्गगुणद्धाए- सव्वसमए असंभवादो। ६ १३१ क्योंकि नाना जीयोकी अपेक्षासे सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थिति- विभक्तिको करनेवाले जीवोंका तीनों ही कालोंमें विरह नहीं होता। * शेष कर्मोकी सब स्थितिविभक्तिवाले जीव सर्वदा पाये जाते हैं । 8 १३२ क्योंकि शेष कर्मोंकी भुजगार, अवस्थित और अल्पतर स्थितिविभक्तियोंको करने- याली जीवराशि अनन्त है, अतः उनका कभी विरह नहीं होता। * किन्तु इतनी विशेषता है कि अनन्तानुवन्धीकी अवक्तव्यस्थितिविभक्तिवाले जीवोंका जघन्य काल एक समय है । ६१३३ क्योंकि प्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिको करनेवाले जीवोंका प्रमाण अनन्त नहीं है। यदि कहा जाय कि इस तरह तो सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीवों के साथ व्यभिचार हो जायगा, क्योंकि इनका प्रमाण भी अनन्त नहीं है अतः इनका भी विरह पाया जाना चाहिये, सो घात नहीं है, क्योंकि जिस प्रकार सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिविभक्तिके योग्य सय काल प्रकार अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिके योग्य सब काल नहीं है अतः अनन्ता- नुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका सर्वदा पाया जाना सम्भव नहीं है। विशेषार्थ-यहाँ यह बतलाया है कि चूँकि अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थिति- विभक्तिवालोंका प्रमाण अनन्त नहीं है अतः उनका नाना जीवोंकी अपेक्षा जघन्य काल एक समय घन जाता है। इस पर यह शका की गई है कि सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिवालोंका भी प्रमाण अनन्त नहीं है परन्तु उनका काल सर्वदा बताया है अत: उस कथनके साथ इसका व्यभिचार प्राप्त होता है । तात्पर्य यह है कि सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिवाल जीव भी असंख्यात हैं और अनन्ता- नुवन्धी चतुष्ककी अवक्तव्य स्थितिवाले जीव भी असख्यात हैं । अतः अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी प्रवक्तव्य स्थितिवाले जीव अनन्त नहीं होनेसे इनका जघन्य काल यदि एक समय माना जाता है तो 'अनन्त नहीं होनेसे' यह हेतु व्यभिचरित हो जाता है, क्योंकि सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिवाल जो कि अनन्तानुबन्धी चतुष्ककी प्रवक्तव्य स्थितिवालोंके विपक्ष हैं उनमे भी यह हेतु चला जाता है। वीरसेन स्वामी ने इस शकाका जो समाधान किया है उसका भाव यह है कि यद्यपि ये दोनों विभक्तिवाले जीव असख्यात हैं फिर भी सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिवालोंका सर्वदा काल यन जाता है, क्योंकि सम्यक्त्वकी अल्पतर स्थितिका एक जीवकी अपेक्षा जो जघन्य काल अन्तर्मुहूर्त और उत्कृष्ट काल साधिक एक सौ वत्तीस सागर बतलाया है उसे देसते हुए उसका सर्वदा पाया जाना सम्भव है। परन्तु यह घात अनन्तानुवन्धीकी अवक्तव्यस्थितिकी नहीं है क्योंकि एक जीवकी अपेक्षा नुबन्धीकी पर इसका धन्या । स्थितिषालोंका समय बतलाया है *उत्कए उस प ६१३४ के अघ उसके ६१३५ P उनमें से श्रोधकी. अवस्थित स्थिति अपेक्षा इसी प्रकार कितना काल हे १ है। । सम्यक्त्व सब काल है। शेप । suva स्वार काल व योगी, बाले, मध्य और न ६१३६ भल्पतर और स्थितिविभक्तिवाले , प्रमाण है। And मिथ्यात्वके समान समय भोर उत्कृष्ट म मामिछाचारमप्रतिनिधि जसा। अपरान नियमासादो। इनिपार जारकर यसको चिसिपामागहो । यसमा पीचरमस सपायापार र सम्पमियत मत सहा पार पाते हैं। भरपसार सिर्मिप्र TI पोको सम्पतियां गी० २२ द्विपिपिहचीए ज्रपरिमुबगारकालो 48 • सकस्सेण पावलियाए पसंखेजविभागो। १३५ कार मगर्म । एष पावसहाइरिपदेसामासिपमुपस्थपरक कान सपहि वेब एपिदवत्वमुचारपमस्सिद्ग फस्सामो । ०१३५ काठावगमेष दुरिहो णिदेसो-बोषेण यादेसे । तस्व मोपम मिच्छच पारसफ गयोक० मजल-अप्पर महि० केवचिरं ! सम्पदा । अमवापुएवं व । गगरि मवचम्बकेपधिर ! मा. एगसमभो, तक० बापसि० संसे मागो। सम्म-सम्मामि० 10 वप्पदर० केवपिरं० ! समदा । सेसपदवि० फेवचिरं । वह ऐगस०, उप. आवति० बसखे मामो। एवं तिरिक्स-कायमोगि०-मोराशियः मईस०पचारिक०-अर्सबद-भपासु-विप्पिले०-भवसि० माहारि चि। । १३६ भादसेन प्रयएस मिछचबारसफ०-गरमोफ० बप्पद०-अपहिलेप ! समदा । सम० • एगस०, उ० पावसि. मसखे०मागो। अमवा०पठफ. अप्पदरम्भमहि० मिच्छचमंगो। सब अपरम्प०५० एगस०, सफ० मावलि० मसंखे. इस मसम्म भोर कर काम एक समय ही बताया है। जब परि नाना जीप एक साल मनम्ता- मुचपीभी भवचम्प स्पितिको प्राप्त हों और दूसरे एमबमें मन्य जीव इस परको न प्राप्त हो तो इसमपरम्प कान एक समय मी पर बाता है। पही कारण है कि मनन्तामुक्पाली भातम्य स्थितिषालोन प्रमाण मनात होते हुए मी नामा गोषोंकी भपेषा भी इसका पम्प काम एक समय बतलाया है। • उस्कए काठ बारसीके वसंस्पात मागप्रमार है। ११३४ परन मुगम है। इस प्रभर पतिपम मापाके पेरामपक सूना मगन पान करके अब उसके द्वारा सूचित होनेवाने प्रवासबारमा भामबसे पन करते है। ३१३५. कामानुगमको अपेक्षा निराको प्रकारम-भोपनिश और भारेश निरा। हममेस भोपी भपमा मिप्याल, बाप कयाय और नोपायोंकी मुखगार, मत्सर भौर पपस्थित स्थितिमिममियाले बीबोंन फितमा काना। सब मत है। अनन्तशुरूपी नुकती अपेक्षा इसी प्रकार बामना चाहिए। किंतु इतनी पिपता किमलम्प स्थितिविाि मात्र कितना कालपम्प प्रल एक समय और कर अल माक्सीके मसम्पात मागममायण है। सम्पक्स भोर सम्पम्मिप्यास्वकी अस्पतर स्मितिषिमनिषाले बीपि विना काल है। सब पह। क्षेप पदस्पितिपिमतिबाले बोषन कितना मशहै। बसम्म काश एक समप बोर कर काल भावनीक संस्थातर्ष मागप्रमाण है। इसी प्रकार वित्र काम्बागी, पौरारिकाय पोगी नपुंसमवान पापि पायें पारपाने, मसक्त मानवाश समापि तीन लामा- बास, मम भोर मारक बीपकवानमा पारिए। ५. भारेशकी अपेक्षा नारनिमि मियाय, पाय कराव और नो नाम्पागोंकी मस्सातर मोर भवस्थित स्थितिविभक्तिवाले बीनोंका जिमा आम है। र काम । मुनगार स्पितिषिमस्तिवाले बीबोंम अपम्प का एक समय और ससमा भागहीने भर्सम्यात प्रम- पमासरे। अनन्तानुमन्त्री की मसतर और मस्मितस्थितिविमस्तिवाचे बीबोन मग मिप्यालो समान है। मुबमार और प्रवक्तम्प स्मितिविस्तिमाले बीपोंभमपन्य मत एक ममप मौर ममा काम भावशिके मम्म्यात मागप्रमान है। सम्पर और सम्पम्मिप्यास्त्रकी नान THAman नामसिन न मी पिय पर स्नान राय साहस मामा पापा ममासमा मानापमम्मसन सम्म तिमि ग्म तासरा भजन- 'बापत मगरला PATNA HARANE यसन ससा पाय सरसिधिना समयसम्ममा मेराम- सम । . N गा०२२] .. -- १३८, मधुन देव । गरि ३१ सम्मामि० अयहर गम०, ३० सद अमं मामो तम्मि प्रणमा इससे भागो । ५३० १३६ मा ~~ লয়া। অন্য रत्न ३०० सुइछे । जयधवलामहिदे कसायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ भागो। सभ्मत्त-सम्मामि० ओघं। एवं सव्वणिरय-पंचिंदियतिरिक्ख पंचिंतिरि० पञ्ज०-पंचिंतिरि जोणिणी-देव०-भवणादि जाव सहस्सार-पंचिंदिय-पंचि०पज० तस तस- पज ०-पंचमण०-पंचवचि०-वेउब्धिय०-इथि०-पुरिस०-चक्खु० तेउ०-पम्म०-सण्णि ति । १३७. पंचिंतिरि०अपज० मिच्छत्त-सोलसक० णवणोक० तिण्हं पदाणं णेरइयाणं भंगो । सम्मत्त ०-सम्मामि० अप्पदर० केव० १ सम्बद्धा । एवं वियलिदिय पअत्तापजत्त पंचि० अपञ्ज० वादरपुढविपन्ज० वादरआउपज० बादरतेउपज्ज० - बादरवाउपज्ज० बादर- वणप्फदिपत्तेय'पज्ज-तसअपज्ज-विहंगणाणि त्ति । अपेक्षा श्रोधके समान भग है । इसी प्रकार सब नारकी, पचेन्द्रिय तिर्यञ्च, पचेन्द्रिय तिर्यश्च पर्याप्त, पचेन्द्रिय तिर्यश्च योनिमती, सामान्य देव, भवनवासियोंसे लेकर सहस्रार स्वर्गतकके देव, पचेन्द्रिय, पचेन्द्रिय पर्याप्त, बस, बस पर्याप्त, पाँचों मनोयोगी, पाँचों वचनयोगी, वैक्रियिककाययोगी, स्त्रीवेद- घाले, पुरुपवेदयाले, चक्षुदर्शनी, पीतलेश्यावाले, पद्मलेश्यावाले और सज्ञी जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-नारकियोंके एक जीव की अपेक्षा मिथ्यात्व श्रादि २२ प्रकृतियोंकी अल्पतर और अवस्थित स्थितिविभक्तियोंका जो काल बतला आये हैं उसे देखते हुए यहाँ नाना जीवों की अपेक्षा उनका सर्वदा काल प्राप्त होता है अतः यहाँ उनका सर्वदा काल बतलाया है। किन्तु भुजगार स्थितिकी यह बात नहीं है। नाना जीवोंकी अपेक्षा भी यदि इसके उपक्रम कालका विचार किया जाता है तो उसका जघन्य प्रमाण एक समय और उत्कृष्ट प्रमाण श्रावलिके असख्यातवें भाग- प्रमाण प्राप्त होता है इसलिये यहाँ इसका जघन्य और उत्कृष्ट काल उक्त प्रमाण कहा। इसी प्रकार अनन्तानुबन्धी चतुष्कके पदोंका भी यथायोग्य विचार कर लेना चाहिये । सम्यक्त्व और सम्यग्मि- थ्यात्वकी अल्पतर स्थितिवाले जीव नरकमें भी सर्वदा पाये जाते हैं। अव रहे शेप पवाले जीव सो उनका उपक्रम कालके अनुसार पाया जाना सम्भव है। ओघमें भी यही यात है। अतः सम्य- पत्व और सम्यग्मिथ्यात्वके सब पदोंके कालको श्रोधके समान बतलाया। आगे जो और मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमे यह व्यवस्था बन जाती है, अतः उनके कथनको सामान्य नारकियोंक - समान बतलाया। ६ १३७ पचेन्द्रिय तिर्यश्च अपर्याप्तकोंमें मिथ्यात्व, सोलह कषाय और नौ नोकषायोंके तीन पवाले जीवोंका भंग नारकियोंके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थिति- विभक्तिवाले जीवोंका कितना काल है ? सब काल है। इसी प्रकार पिकलेन्द्रिय और उनके पर्याप्त और अपर्याप्त, पश्चेन्द्रिय अपर्याप्त, बादर पृथिवीकायिक पर्याप्त, बादर जलकायिक पर्याप्त, यादर अग्निकायिक पर्याप्त, बादर वायुकायिक पर्याप्त, वादर वनस्पतिकायिक प्रत्येकशरीर पर्याप्त, प्रस अपर्याप्त और विभगज्ञानी जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-पंचेन्द्रिय तिर्यंच अपर्याप्तकोंमें मिथ्यात्व आदि २६ प्रकृतियोंके अल्पतर आदि तीन पदोंका काल नारकियोंके समान बन जाता है इसलिये यहाँ इनके कथनको नारकियोंके समान बतलाया है । यहाँ अनन्तानुबन्धीकी अवक्तव्य स्थिति नहीं होती यह स्पष्ट ही है। तथा सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी एक अल्पतर स्थिति ही होती है। साथ ही यहाँ सम्यक्त्व और सम्यग्मि- ध्यात्वकी सत्तावाले जीव नियमसे पाये जाते हैं, इसलिये इसका काल सर्वदा बतलाया है। आगे जो और मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमें भी यह व्यवस्था बन जाती है अत उनके कालको पचेन्द्रिय तिथंच अपर्याप्तकोंके समान बतलाया है । , ता० प्रती 'अपज्जा' इति पाठ. । ६१२८ मामा समान ६ अवस्य स्थिति स्त्यात समय है। कपन १ सब कान माजई १ उघन्य काल मनुष्यनियोंके जानना रहा हे पहा सख्यात वो नोकपायोंकी मुना सम्पग्मिध्यावकी र पौर स्कृष्ट काज त्या स्थितिविभक्तिवाले वा विशेषार्थ- - इन है अतः इनम . सम्बस्व और स बान सेना चाहिये। मनुष्योम जिन स्थिति इसके सत्यात समय का मनाप्रमाण है यत यहाँ मुबगार स्थितिका स्खष्ट काल आपलीरे ६५३६ मानव से बोकपायोंकी अवच्य स्थितिविर्मा मुगार, अवस्थित और मत आगलाके असर सम्पपिदिवविरम- मारपनिरिस्परि पामुन्नाभाय माविता पागोस बिमा श। एक रितिरिसमा नउपज पारसागवान 0 रेमिग तिहमा तिवारी र मसर सपनि सरापी, प्रेमियम पौरागस नमीमामा ऐसारमोगरा अपनाया है। नियम TARAT रमाला गा.२२] हिपिपिहचीए उत्तरपपषिमुनगारकायो १३- मधुस० मिसव-पारसम्ममोक० पेरापमगो। प्रणवाण चरक एवं खेव । मवरि वपच० फेब०१ मा० एगस०, उप० सखेन्या समया। सम्मच० सम्मामि० मप्पदर० के०१ सम्पदा । रामगार-अबाहिद प्राचमाण के! बा. एगस०, उप संखे० समया । एवं मणुसपन्यच-मणसिणीर्ष । परि बम्मि भावसि० पसंखे०मागो गम्मि सखेच्या समया । मणस प्रपम्ज० मिल्छच-सोससकसाय-मबमोफ. सप० अप्पद भरहि० सम्मच-सम्मामि० अप्प० के० म० एगस०, उम० पसिदो. असखे०मायो । परि सब० भावनिक अससे०मागो। १३६. मागदादि बार उवरिमगेबन्यो पि मिडच-साससक०-गवणोक० मप्पदर० सम्पदा । अपवाणु०पठक बबच० मोष । सम्मच-सम्मामि० भबगार पहि ववचम्प० २० एगसममो, उप. आपति० मसले०मागो। अप्पदर० सपदा । एष मुझसे । मदिसादि बाप सम्बा गावीसपय० मप्पद समदा । एवमामिमि० १८ सामाम्प मनुष्योंमें मिव त्व, पाय पाप और नौ नाकपार्योका मग नारपियोंकि समान है। मनम्तानुपन्धी तुम्ही अपेक्षा इसी प्रकार बानना चाहिए। किंतु इसनी क्ोिपता अबलम्म स्पितिविधियास बीपोंका कितना फासो बम्ब काम एक समय और मसाल सम्मात समय है। सम्पत्व भोर सम्बग्मिध्यात्यकी भासतर स्थितिविमकिपासे बीका कितना काम है। सब कमरे। मुनगार, अवस्थित मौर मपळम्प स्थितिविमचिबाले बीपोप तिना कान है। पम्प का एक समय और सप का सम्मात समय है। इसी प्रकार मनुष्य पर्याप्त भौर मनुप्पपिकि बानना चाहिए। किन्तु इतनी पिसेपमा हेकियाँ भावमीका मसम्पात माग काम पापा सम्मान समय काश मना चाहिये। मनुप्प अपर्याप्त में मिप्यात, सोलाप्पाप और नौ नोक्यायों की मुबगार, अस्पयर और पपस्थित स्पितिविमकिपाले बीचमा सम्पमस्थ मोर सम्पम्मिम्पाताई परसतर स्वितिविधिमा वीपोंका कितना काशीपम्प का एक समय और मम मा पस्यापम भसरणात मागपमाप है। मितु इतनी विशेपता है कि मुनगार स्थितिविमसिवाचवायोका कम काम भावनीके मरम्पात मागप्रमाण है। विशेपार्प-मनुमि भनम्तामुपन्थी चतुणती अपम्प स्मितिबाले औष सम्पात ही होते मता इनमें 10 विमटियानोभ म मास सक्ष्मात समय बतखाता है। पहो पात सम्पारण भोर सम्पम्मिम्यास्पकी मुबगार, अपस्थित मौर भरतम्य स्थितिवार सम्पत्यम बान मना चाहिये । ममुप्प पाप्त भोर मनुबनी तो संस्पात ही रोते मता मूममें सामान्य मनुप्पोम बिन स्थितिविमविवाहोन भारती के मरीपपात माग काम बतलाया रे यहाँ भी इन संस्पात समय शबानना चाहिये। सायपर्याप्त मनुष्योंघमास काश पस्पोमसम्मात मागप्रमाण यहाँ सब प्रकृतिपति सम्मर परोपमहसमप्रमाप बतलाया । फितु मुबगार स्थितिका पम काही मापशीले अस्पात मागप्रमाय रे मा सध भपेमा पटनामावली प्रसंस्पावर्षे माग प्रमाण बसाया। BRE मानतम्ससे क्षेत्र उरिम एकसको देम मिप्यास्त्र सोलह पाप मोर नो मोमार्योंकी मार स्थितिविमखियाले सीबोका सब बात है। गितु प्रमाणानुबन्पी चतुष्की भरकम स्पितिपिममिवारी बीबों का काम मोपके समान है। सम्पाव और सम्पम्मियापकी मुजगार, पपस्थित और भमणम्प स्थितिविधिमा गीभवपम्म मात्र एक समय और मास्ट पा भाषमीके असमात भागप्रमाण है। या भसतर स्पिनिषिर्मालयाने बीमामा सा नागरि। मामी समारोप "धर्म कीमत समास/ प्रोमो समनत्र सम्पनी पाथ और fr মশা / | Err निर्व 14 बार मापन मानमतिमा सा मनाला NEPAL - - गा.२२] 11 अरमाः- मोर १४... मायो । एवं पन्दिा सम्मन सम्मानित पदही हालाई रात माई। . पर पानी, ६१. ७२ जयधवलासहिदे कसायपाहुडे [हिदिविडत्ती ३ सुद०-ओहि०-मणपज्ज०-संजद०-सामाइय-छेदो०-परिहार० संजदासंजद०-ओहिदंस०- सम्मादि०-खइय०-वेदय दिहि त्ति । १४०. एइंदिएसु मिच्छत्त-सोलसफ०-णवणोक० सवपदाणमोघं । सम्मत.. सम्भामि० अप्पद० केव० १ सम्बद्धा । एवं वादरेइं दिय-सुहुमेहंदियपज्जत्तापज्जत-बादर- पुढविअपज्ज०-सुहमपुढविपज्जत्तापज्जत्त-चादरआउअपज्ज०-सुहुमआउपज्जत्तापज्जत्त. बादरतेउअपज्ज०-सुहुमतेउपज्जत्तापज्जत्त-बादरवाउअपज्ज०-सुहुमवाउपज्जत्तापज्जत- वणप्फदि-णिगोद-बादरसुहुमपज्जत्तापज्जत्त-चादरवणप्फदिपत्तेयसरीरअपज्ज०-ओरालिय. मिस्स-मदि०सुद०-मिच्छादि० असण्णि त्ति । है। इसी प्रकार शुक्ललेश्यावाले जीवोंके जानना चाहिए। अनुदिशमे लेकर सर्वार्थ सिद्धितकके देवोंमें अट्ठाईस प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिविभक्तिवाले जीवोंका काल सर्वदा है। इसी प्रकार आनिभिबोधिकज्ञानी, श्रुतज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, सयत, सामायिकसयत, छेदो. पस्थापनासयत, परिहारविशुद्धिसयत, सयतासयत्त, अवधिदर्शनी, सम्यग्दृष्टि, भायिफसम्यग्टष्टि और वेदकसम्यग्दृष्टि जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-पानतादिकमें मिथ्यात्व आदि २६ प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थिति ही होनी है अतः वहाँ इसका सर्वदा काल बन जाता है। किन्तु इतनी विशेषता है कि अनन्तानुबन्धीकी अवक्तव्य स्थिति भी होती है सो उपक्रम कालके अनुसार इसका यहाँ भी श्रोधके समान काल बतलाया है। अब रहीं सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्व प्रकृतियाँ सो इनके यहाँ चारों पद बन जाते हैं। उनमेंसे तीन पदोंका तो उपक्रम कालके अनुसार जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असंख्यातवें भाग प्रमाण बतलाया है। और अल्पतर स्थितिवालोंका सर्वदा सद्भाव पाया जाता है इसलिये इसका सर्वदा काल बतलाया है। शुक्ललेश्यामें यह व्यवस्था बन जाती है, अत: उसमें सब प्रकृतियोंके सम्भव पदोंके कालको पूर्वोक्त प्रमाण कहा है। अनुदिशादिमें तो सब प्रकृतियोंकी एक अल्पतर स्थिति ही होती है, परन्तु वहाँ सब प्रकृतियोंका सर्वदा सद्भाव पाया जाता है इसलिये वहाँ अल्पतर स्थितिका सर्वदा काल बतलाया है। श्राभिनिवाधिकज्ञानी आदि जो और मार्गणाएँ गिनाई हैं उनमें भी इसी प्रकार यतल'नेका कारण यह है कि उनमें भी अनुदिशादिकके समान व्यवस्था प्राप्त होती है। $ १४० एकेन्द्रियोंमें मिथ्यात्य, सोलह कपाय और नौ नोकपायोंके सब पदोंका भग ओघके समान है। सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतरस्थितिविभक्तिवाले जीवोंका कितना काल है ? सब काल है । इसी प्रकार यादर एकेन्द्रिय, सूक्ष्म एकेन्द्रिय और इन दोनों के पर्याप्त और अपर्याप्त, बादर पृथिवीकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म पृथिवीकायिक और इनके पर्याप्त और अपर्याप्त, बादर जलकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म जलकायिक और इनके पर्याप्त और अपर्याप्त, वादर अग्निकायिक अप- प्ति, सूक्ष्म अग्निकायिक और इनके पर्याप्त और अपर्याप्त, बादर वायुकायिक अपर्याप्त, सूक्ष्म वायु- कायिक और इनके पर्याप्त और अपर्याप्त, वनस्पति, निगोद तथा इन दोनोंके वादर और सूक्ष्म तथा पर्याप्त और अपर्याप्त, वादर वनस्पतिकायिक प्रत्येक शरीर अपर्याप्त, औदारिकमिश्रकाययोगी, मत्यज्ञानी, अताज्ञानी, मिथ्यादृष्टि और असज्ञी जीवोंके जानना चाहिए। विशेषार्थ-ओघमे मिथ्यात्व प्रादि २६ प्रकृतियों के भुजगार, अल्पतर और अवस्थित पदोंका जो काल कहा है वह एकेन्द्रियोंकी मुख्यतासे ही बतलाया है अतः यहाँ उक्त प्रकृतियों के उक्त पदों के कालको ओघके समान कहा । तथा एकेन्द्रियों में सम्यक्त्व और सम्यग्मध्यात्वका एक अल्लतर नवन्द शान सापराविरस्वत प्रवृत्तियोंकी - બિનરાવલિ मत्यजानियोंके . विशेषार्थ तया उसमें सद अस्तर परका अपगठवेद आदि काल अन्तर्मुहू मुंहवे बताया मागप्रमाण है। - सन्ध्यपर्याप्तक मन शानियोंकि समान काज अन्तर्मुहूर्त रष्टि के भी जानना बीवोंका उपन्य कामेणकायबागी विशेषता है कि . एक समय और विशेषार्थ प्रमाण पवस १० - गिर सदासयय-योगिता . . गा०२१] किपिवित्तीए उत्तरपग्मुिजगारकाना ६१४१, माहार० सम्पपपी० अप्पद० ब० एगस०, उप० बसोमा एवमवगर- असा०-मुम-महापसादे पि। माहारमिस्स. समपपी० अप्पर० बापुष. भगोए । उविपमिस्स. मसमपन्भवमंगा । ममा. मोसपयरी. मदि०मगो। ।१४२ उपसम० सषपयो० अप्पद० ब• अतोसु०, उक० पसिदो• मसखे० मागो । एवं सम्मामिछापिस्स कि। सासष० समपयरी. मप्पद. ५० एगस., उप० परिदो० वसंखे०मागो । फम्मइय० मणाहारि० मोराठिपपिस्स०-मंगो। मगरि सम्मत-सम्मामि० ० मप्पद० २० एगस०, उक० बापनि मसखे०मामो । एर्ष फासावगमो समचो। मनरालयो। म मामासिवधावा मापायाम परवा माना गया रहिवरमरमर . गि म सामना ficाका l, सम, समसिमान, संग समीप नरसिपी मी पिmR इमारत 11 माराम --सामान गमनासोगायत रायता न था। बरियताम सिम मारियानवी he परही है और पानमसा समाव पाया जातामा पो अस्पतर पदका पदा समाई। भाग बार पन्द्रिय भारिया युत सी मागमाएँ गिना उनमें पद म्यवस्था बन पाती। प्रतापनके पालक एमिकि समान पारे। ११४१ मारककाययोगिमि सब प्रतियोगी पस्पतरस्थितिविमध्यिा नीबोका बम्ब का एक समय भौर का काम भम्तमुई है। इसी भर अपगतमी, मापानी, सूक्ष्म सांपराविसंबर और पपायातसंपत नोकिवानना चाहिए। पादारमिनप्रमागियोंमें सब प्रातिपोपी मस्सतर स्पितिनिधिमा बीबोका बम्प और कसका भन्मातरे।मिरिक मिमाययोगियोम मनुष्य अपर्यातक समान मा। ममममि बनीस प्रतियोगी अपेक्षा मत्यानियो समाम मा है। विवा--भामारावयोगम सपम्प काम एक समय और काम मन्तबात है। समासमें सब महतियोच एक मसतर पर होताहै। पदीपरप्प है कि यहाँ सब हतियोकि मस्तर पर बम्ब का एक समर भोर मह बसमार्त तलाया है। इसी प्रकार अपगतबेर भारि मार्गणादिं मी सममला पारिय। फि माहारकमिमनवम्म भोर महरा मासम्मको मताहाँ सब प्राविक अस्सवर परक समय और कम कास मन्त मोठे पहाया है। विपिमित्राययोगमनाना बीयोंकी मपेचा उतारकास पस्यमसम्पतये मप्रमाण है। सम्पपमा मनुषोभ भी इसमा मत मता क्रिस्चिमिमापयोगा मग सम्मपम पमुमकि समान पतमाना। ममम्प मस्पसानी ही होवे, मता रम मंग मस्य पामिकि समाम तमारा। ६१४२. परामसम्बारमियमें सबमतियोंकी भसतर स्थिििषमणियाने बोपनापन्न प्रान्तमा भौरमा परलोपमो मसल्पात भामाप्रमाण है। इसी प्रथम सपरिमप्या पिके मी बास्न्य चाहिए। सासादरम्यारपियो सब प्रालियोंकी भसम्म स्विविविधियाचे जीवोन पाय पाद पर समम और चमकमा पस्पोपमो भात भागममान। भर्मणामवयोगी और ममाहारकाम पौरारिश्रमिनकापयोगियो समान मंग है। पितु सनी पिसेरताकि सम्पासव भौर सम्पम्मियातकी मसतर स्मितिपिचिपास दीपोमबाम्ब कस एक समय और महाकाल माविले असक्यात मागप्रमान है। विशेपार्म -पराम सम्पमाथिका नाना भीषोंकी अफेया अपम्प प्रम मन्तइतं और प्रत पस्केपसम्पात मागप्रमापरेमा समातियों की भसता स्पिरिन कान प्रमाप बसावा है। इसी प्रथा सम्बग्मिचारियों के मी मानना चाहिये । पितु सासाइन नो पर पीशन " और न SAHarya * प्रामाyिin Eng, दान THE AIR वर्षा मुंभार मसkre 1 । न - 7 ७४ जयधवलासहिदे सायपाहुडे [हिदिविहत्ती ३ २०] दोसो; lin . M ११. 4 उम्मेहि सः मैतरम्म मन निय जंगुटम हाल सम्म मागम परिष हेतु *अंतरं। ६ १४३. सुगम, अहियारसंभालणफलत्तादो। * सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं भुजगार-अवत्तवहिदिविहत्तियंतर केवचिरं कालादो होदि ? ६१४४. एदं पि सुगमं । * जहरणेण एगसमत्रो। $ १४५. कुदो ? सम्मत्त-सम्मामिच्छत्ताणं भुजगारमवत्तव्यं च कादण सम्मतं परि. वज्जमाणजीवाणं जह० एगसमयमेत्तरुवलंभादो । * उक्कस्सेण चउवीसमहोरत्ते सादिरेगे। ६१४६. सामण्णेण सम्मत्तग्गहणंतरकालो चउवीसं अहोरत्तमेचो ति पुच्वं परूविदो। संपहि अवत्तन्वभावेण सम्मत्तग्गहणंतरकालो वि तत्तिओ चेवे त्ति कथमेदं जुज्जदे?ण एस सम्यग्दृष्टियोंका जघन्य काल एक समय है, अतः यहाँ जघन्य काल एक समय पतलाया है। उत्कृष्ट काल पूर्ववत् है। कार्मणकाययोग और अनाहारक जीवोंका सर्वदा काल है। यही वात औदारिक- मिश्रकी है, अतः यहाँ सब प्रकृतियोंके सम्भव पदोंका काल औदारिकमिश्रके समान बन जाता है। किन्तु सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी अल्पतर स्थितिवालोंके कालमे विशेषता है। बात यह कि एक जीवकी अपेक्षा कार्मणकाययोग और अनाहारक अवस्थाका उत्कृष्ट काल तीन समयसे अधिक नहीं है और सम्यक्त्व तथा सम्यामिथ्यात्वकी सचावाले जीय असंख्यात होते हुए भी स्वल्प हैं । अब यदि उपक्रम कालकी अपेक्षा विचार किया जाता है तो यहाँ प्रावलिके असख्यातवें भागसे अधिक काल नहीं प्राप्त होता। अतः यहाँ उक्त दोनों प्रकृतियोंकी अल्पतर स्थितिवालोंका जघन्य काल एक समय और उत्कृष्ट काल आवलिके असख्यातवें भागप्रमाण बतलाया है। इस प्रकार कालानुगम समाप्त हुआ। * अव अन्तरानुगम का अधिकार है । ६१४३ यह सूत्र सुगम है, क्योंकि इसका फल अधिकारका सम्हालनामात्र है। * सम्यक्त्व और सम्पग्मिथ्यात्वकी भुजगार और प्रवक्तव्य स्थितिविभक्तिका अन्तरकाल कितना है? ६१४४. यह सूत्र भी सुगम है। # जघन्य अन्तरकाल एक समय है। ६ १४५ क्योंकि सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वके भुजगार और अवक्तव्यके साथ सम्यक्त्व- को प्राप्त होनेवाले जीवोंका जघन्य अन्तरकाल एक समयमात्र पाया जाता है । विशेषार्थ-सम्यग्दर्शनके प्राप्त होनेके प्रथम समयमें सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी भुजगार और प्रवक्तव्य स्थिति होती है। अब यदि प्रथम और तीसरे समय में बहुतसे जीव उक्त पदोंके साथ सम्यग्दर्शनको प्राप्त हुए और दूसरे समयमें नहीं हुए तो उक्त पदोंका जघन्य अन्तर काल एक समय प्राप्त हो जाता है । यह उक्त सूत्रका भाव है। * उत्कृष्ट अन्तरकाल साधिक चौवीस दिन रात है। ६१४६. शंका-पहले सामान्यसे सम्यक्त्वके ग्रहणका अन्तरकाल चौथीस दिन रात कहा है अब सम्यक्त्व और सम्यग्मिथ्यात्वकी प्रवक्तव्यस्थितिविभक्तिके साथ सम्यक्त्व ग्रहणका अन्तर- कान मान्नुतार समाधान अन्तरकत सवन * ६१४३ जयत्य ६१५३ प्रथम समयमें हा धानाता है। छोडकर सत्यात अगुलके असा . मागप्रमाण हे २० समाधान स्थितियोक द्वारा अंगुलके शंका- उन सरका अन्तर लोक प्रमाण में । , है

Kasaya Pahudam Thidi Vihatti Bhag-4

Author
Acharya, Gunadhar
Title
Kasaya Pahudam Thidi Vihatti Bhag-4
File name
Kasaya Pahudam Thidi Vihatti Bhag-4
Text
OCR done
Citation
1956
Published
2011/09
Publisher
Varanasi, Naya Sansar Press
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314156
Barcode
99999990312298.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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