Adarsh Library, Jaipur

Virudha

Hamid Karsai · 2011/03

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विर

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विरुद्ध

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। उस वडी-मी कुर्मी में उसका तकरीवन पूरा हो घड समा गया था। एक बार उसने धुघल-मे उठकर बैठ जाने की मोची भी, फिर वते ही पड़ी रही। पुरानी कुर्मी को वह विराट झिलंगी गोद एक निष्क्रिय बना देने वाली खुमारी से भरपूर थी। यह बात और थी कि वह तकरीवन पूरी को पूरी ही उसमे समाई जा रही थी। वह अलस लेटी रही, सिर्फ गर्दन-भर मोड़ ली। शाम की नारंगी-शिथिल झाई में उदय का नाधा मिर सुनहरा- रपहला होकर चमक रहा था। उसे पुराने सिक्कों पर बने ऐतिहामिक चेहरों का खयाल आया। चौड़ा, कुछ-कुछ उभरा हुआ-मा माथा, लम्बी- शाही नाक, पुतलीहीन आंखों और उभरी ठोटी का गर्वीला पथरायापन । उदय ने आखिरी कागज के हाशिये पर कुछ लिखकर पूरी ढेरी एक और को मरका दी। "क्या सोच रही हो?" वह चुप रही। हालांकि उसे मालूम था कि वह एक बार सवाल पूटने लगे तो जवाब दिए विना निस्तार नहीं । यू उसकी यह चपी विद्रोह प्रकट करने का एक काफी लचर और नाकारगर और मालसो तरीका था- हमेशा की तरह।

"क्या सोच रही हो?" उदय हथेली पर मुंह टिकाए अभी भी उसीकी ओर तक रहा था। उसने अपनी आवाज़ भरसक संयत रखने की कोशिश की। "कुछ नहीं।" "कुछ तो होगा ही।" वह लस्त, गुड़ी-मुड़ी वैसी ही कुर्सी के बीच पड़ी रही जैसे कि प्रश्न उससे नहीं किसी और से पूजा गया हो । एक बार मन में आया कि कह दे तुम्हारे बारे में ही सोच.. पर फिर वह जानना चाहेगा कि उसके बारे में क्या और अन्ततः वह या तो उसकी बात आधी ही सुनकर उकताया-सा उठ खड़ा होगा या फिर उसके सोचने को लेकर कोई चालू फिकरा... उफ् ! उसे लगने लगा कि जैसे दिन-भर मंडराती लू अभी तक उसकी फनपटियों से टकरा रही है । एक क्षण को उसकी सारी पेशियां चेतना-तंतु बनकर एक चमकीले बिन्दु पर टिक गई, फिर एक विल्ली की- सी खूखार तेज़ी से वह कुर्सी की विराट् गोद से छूट निकली। "चलो कहीं बाहर घूम आएं।" उदय हल्की-सी सीटी बजाता हुआ कागज़ समेट रहा था, रुक गया। ''तुम हर काम ऐसे झटके के साथ क्यों करती हो, ऐं ? रात को पुकारो तो कूदकर खड़ी हो जाओगी, कुर्सी पर बैठोगी तो खटाक से, उठोगी तो.."हर वक्त तुम इतनी तन्नाई हुई क्यों रहती हो? यहां हम लोग छुट्टी विताने आए हैं, कोई प्रतियोगिता जीतने नहीं, समझी।" "हटाओ भी..." रणनी फिर अनमनी हो गई। इस वक्त अपने बारे में बात करना उसे काफी फूहड़पन महसूस हुआ जैसे कि अपनी ओर ध्यान खींचने को ही वह यह सब ड्रामाई हरकतें करती रही हो.. वैसे क्या पता, हो ही शायद । अनजाने में नहीं ? वह भीतर को मुड़ गई। "लो, उदय ने फड़फड़ाते काग़जों को अटैची की चौकोर वाली व्यवस्था में पैककर रख दिया था। "गाड़ी निकलवा लूं ?" - ८/ विरुद्ध भीतर जाती-जाती वह रक गई। "ड्राइवर को साय लेकर नहीं चलेंगे।" "क्यों ?" उदय के प्रश्न में गुम्से की हली-मी टकोर थी। "वम यूं ही, इतना तामझाम हरदम साय लिए चलना तुम्हें अजीय नहीं लगता क्या?" उदय के होंठो के कोने कुछ सिकुड़ने लगे थे । उसको उतावली इंद्रियों ने लकडी को चिरायध की तरह झाडे की गंध आसपास भत्ती महमूस की। उफ ! उसने कातर होकर मोचा, वही सब फिर से नहीं... "देखो रजनी, बचपना मत करो। तुम्हें पता है कि यह गाड़ी कितनी सटारा है, अपनी होती तो और वात थी। यह उजाड इलाका है, कही बीच में ही वन्द हो गई तो धक्का लगाने को भी कही कोई नहीं जुटेगा।" "तब फिर मत चलो," वह मुन्नाकर भीतर मुड गई। तीमे गुस्से के बावजूद उसे पूरा महमाम था कि हमेशा की तरह 'इस बार भी उदय की बात सही थी। तो फिर उमका आक्रोश था किस- पर उदय की बात के अवश्य मावी सहीपने पर? या उसकी उस चलाग ताविता पर? जो उमको अनुभवहीन बहमी को पिच्च से दबाकर एक- दम बुद बना देती है, उसीकी आखों के सामने। कभी-कभी तो उसे लगता है कि हर वक्त उसके पूरे वजूद के भीतर ‘एक सूवार नामहीन आक्रोश पिंजड़े मे बन्द कद्दावर पीते की तरह चहल- कदमी करता रहता है, किमो भी साधारण-से वाक्य या हरकत को लेकर उछन पहने को मातुर और चौकन्ना। पर आमिर यह सारा मानोश. भरा आवेग है किसके विरुद्ध ? उदय के ? अपने ? या खुद उन दोनों से परे किमी अलसित ताकत के प्रति, जो कि इन मुठभेड़ों के प्रति उनकी सारी वितृष्णा के बावजूद हर रोज दोनों को प्रतिद्वद्वियो की तरह परस्पर ‘चुनौती देने को आमने सामने ला खडा करती है। सबसे प्यादा जो बात सालती है वह यह है कि इन मौको पर उसके भीतर का आरोश जितना ही भभक्ता है, उतना ही कुछ और डर से आर्त हो गिमटता चला जाता -विरुद्ध है। इतना, कि कभी-कभी उसे लगता है कि उसका पूरा अस्तित्व ही दो गुगलों में बंट गया है : एका प्रचार विद्रोह मे कांपता हुआ विम्फोट को मातुर, धौर दूसरा घर और ग्लानि से शिगटा, आई 1 काहां कोई इससे नजात पा सकता है गला? शहर में नमी या जंगल में। वह यू ही गेश पर. मी कितायें पिर उठाने-रणने लगी। बेकार एतनी मिलायें एग गर्मी में यहां दो नाई। पढ़ने का तो दूर, छूने का भी मन नहीं होता इन्हें इस गर्मी को बीच । उसने होठों के ऊपर चुनचुनाता पसीना पांच साला और नहानघर में घुग गई। जादों में शायद यहां कुछ अच्छा मी लगता हो, एग मोगम में तो तौवा। देर तक यह रगड़-रगरकर नहाती रही। नहाफर वह निगाली गो बदरंग मोटे पर्दा मे पीछे शाम चलने लगी थी। पिछवाड़े के गिगी पोखर गे उटती हुई पक्षियों की पाश आवाजें किसी भीथरी आरी की तरह गन्नाटे को धीरे जा रही थीं। गुर्मी पर धेटकर उगने दांजिस्टर चाल गार दिया । खल-गुड़ के बीच गारंगी ये कारण स्पर...जगे गो गला भींचकर रो रहा हो । प्रधार उगन ट्रांजिस्टर बन्द गार दिया । एक तो भाग के समय यूं ही जी धिरता भ, तिगपर, जंगल की यह औघड़ घुणी जिगणे गामने आदमी वयत पाटगे-गरमी भी ईमपानी नकोसला हा नहीं गर गमता, माध्यम चाहे पिताही गा गंगीत । मुटी मारणोंगो लेकर आप माला पे मिसी रहस्य को नहीं टटोल गया जाना । यह गांग खींचमार पलंग पर बैठ गई। बरामद गोर गे पदचाप पास आ रही थी। उदय होगा, उसने अनुमान लगाया। क्षण को उसगी पगियां तनकर गया हुई, फिर णिथिन । उग्य उगो पाम गाला था। गाल देर चुप्पी रही । सिव पनी भी, वाघरको मना कर दिया है।" उदय की आवाज़ इंजलाई दुई थी। उगने यूपयाप उटगार चप्पलों में पांच साल दिए । गारा उत्साही गर गया था। बेकार जग-सी बात को नगर इतनी...पर राय में गोची ती गया मि इतनी-सी ही बात थी ? यया उनी विगत मारे १०/विरुद्ध झगड़ो की तल्खी किसी न किमी तरह परोक्ष रूप में हर वार उन दोनों के दान फिर-फिर नहीं आ पठनी? उसने दरवाजा खोला और गाड़ी में बैठ गई। गाड़ी रेस्टहाउस से बाहर निकली तो उसने शीशा गिरा लिया। हवा न ठण्डी थी, न बहुत गर्म, पर ताजी जहर थी। उसने कनखियो से ताका । उदय ऐन सामने देखता हुआ गाड़ी चला रहा था। वह फिर बाहर देखने लगी। शाम की किरणों ने एक-एक कर सव परछाइयो को रवड की तरह तानकर लम्बा और दुबला बना दिया था। उस अजीव-से उजाले की झिलमिल लकीरो के बीच यह यूझना कठिन था कि कहा आकार मरम होते थे और कहां परछाइया शुरु वह देखती रही। उसके देखते-देखते अर एक तीखी लाल रोशनी झिल्ली की तरह यहां-वहां आ लिपटी थी। क्षण- भगुर पर चटक । ओझल होती खिड़कियों के काच अचानक दियासलाई की तीलियों की तरह भ से जल उठे, स्टियरिंग पर रपे उदय के हाय, कार को सिडको पर टिकी उसकी कुहनी सब इस तरह पारदगिता की ललाई में विधकर कुछ और ही अद्भुत-से हो गए थे। पत्तों के रंग बदल गए थे, फुनगियों के आकार, सड़कों के कोण सब अचानक कुछ और हो। फिर सूरज डूय गया था शायद । चोजें धीरे-घोरे अपनी परिचित स्थिरता ग्रहण करती वमी हो हो चलीं। उदय अवकचाकर उसको ओर मुडा । "श्या हुआ, क्यों हंस रही हो?" "कुछ नहीं।" उसने अपने यो समेट लिया ! शायद कुछ भी ऐसा नहीं होना जैसा कि हम देखते हैं या सोचते हैं कि हमने देखा है। शायद कुछ भी ऐसा जरूरी या गैरजरूरी नहीं होता, हम ही उसे ऐमा बनाते जाते है जब तक कि कोई छोटा-सा अस्थायी अजूबा इस रोशनी की तरह अचा- नक नही आ पड़ता। "सोच रही थी कि हमारी पवादातर झड क्तिनी बेतुकी होती हैं ! नहीं ?"

- "चलो, कभी तो तुमने ऐसा महसूस किया।" उदय ने आगे से आती वैलगाड़ी को वचाते कार निकाल ली । गाड़ी पर कोई नई बहू गठरी-सी वनी बैठी थी। साथ में तीन-चार बच्चे और छः-सात वुजुर्ग कल्फ लगे लट्ठे की आत्मसजगता में सतर बैठे हुए । बच्चों की तेलिहा-काजल-पुती उत्सुकता देर तक गाड़ी का पीछा करती रही। उफ! इतने लिपटे-लिप- टाए इस बहू को गर्मी नहीं लग रही होगी, उसने सोचा । शायद न भी लग रही हो । वही अपनी भावनाओं को दूसरों पर थोपे चली जाती है, हरदम । गाड़ी अव सीधी-सपाट सड़क पर अकेली थी । उदय उसकी ओर मुड़ा। । "अव वतामो शाम को उस वक्त तुम क्या सोच रही थीं।" एक चिड़चिड़ा क्षण भभककर गुज़र गया । फिर उसने पाया कि वह हंस रही है । उदय उसके हंसने से सहज हुआ। "वताओ न।" उसके भीतर फिर कुछ विदका, "क्यों ?" "क्यों क्या, यूं ही।" रजनी ने सिर दूसरी ओर घुमा लिया। "पुराने सिक्कों के बारे में सोच रही थी।" "क्या?" एक क्षण को उसे लगा कि फिर वही पुरानी बदरंग ज़िद उसके गले को रुंघा देगी, फिर एक कोशिश के साथ उसने अपना आक्रोश निगल -- लिया। 4 "यही कि उनपर क्या-क्या चीजें बनी रहती हैं, चांद, सूरज, चिड़ियां, चेहरे।" "और?" "और कुछ नहीं।" उसे अचानक मन बड़ा हल्का महसूस हुआ । पता नहीं यह झूठ वोल- कर अनचाहे प्रसंग से कतरा पाने की खुशी थी या अपनी ज़िद के बचकाने- १२ / विरुद्ध पन को दवा पाने की । वह दरवाजे के हत्ये पर यूं ही उगलियां टकोरने लगी। "एक ज़माने में हिस्ट्री में एम० ए० करने की मोचती थी।" "फिर किया क्यों नहीं ?" "शादी कर डाली आपसे ।" रजनी हंस पड़ी। उदय गमीर रहा। "तो वह तो अभी भी कर सकती हो, अगर चाहो तो।" उनने गाड़ी स्टार्ट की। "हा. सो तो है पर..." रजनी अनमनी-मी बाहर ताकने लगी महक के साथ-माथ मटकर चलती एक सुई-सी पतली नदी थी, जिसका वहाव पानी से कम, चिकने ढोको की अनपढ़ धूसर कतार से ही फ्यादा मालूम पड़ता था। गर्मी ने नदी के आकार को एकदम सुखा- कर छोटे-से नाले में बदल डाला था। पर पानी साफ था, और सारी मुश्की के बावजूद लगता था कि नदी के दोनों किनारों पर नमी का आभास-भर पाते ही जंगल का पूरा एक टुकड़ा हरे पत्तों में फूट पड़ा था। "गाड़ी रोकोगे?" रजनी ने आंखों पर उड़े आते चाल पछि किए। उदय ने चुपचाप गाड़ी रोक दी। एक क्षण को दोनो उस नीम अधेरे में वैसे ही स्थिर बैठे रहे, फिर उदय स्टियरिंग पर कुहनी रखकर उसकी और मुड़ा, "उतरोगी?" "अं? हा-हां ।" वह उतर पड़ी। सूची मिट्टी के लाल फैलाव के बीच जगह-जगह नीचे छिपी चट्टानों की काली नो दीख रही थी । जाने अंधेरे की वजह से या जंगल की नीरज करता के कारण, रजनी को लगा जैसे कि उसके चारो तरफ उगे वे छोटे, नाटे और गठीले आकार दरस्त नहीं बल्कि कुछ जीवन्त उपस्थि- तियां है,एक काली हिकारत से दम साधे उसे धूरती हुई। है हिम्मत उममे कि आगे बढ सके। उनके काईदार संशय की दामघोंट चुप्पी के वीत्र ? सब एकदम स्थिर, पर चौकन्ना था! ऐसी चुप्पी जो एक सुरक डर के विरुद्ध/१३ - मुहाने पर उसने दंभ से सिर झटकारा । वह वेकार अपनी दब्बू आत्म- हीनता को लेकर वेकार का ऊल-जलूल सोच.... पर भय झटके से नहीं हटा । मुट्ठी की तरह उसके पेट में कुछ सख्त होता जा रहा था। भय ? असमंजस ? क्रोध ? किसी झाड़ी में कोई जानवर हिला तो वह कूद पड़ी, फिर एक ज़िद में दांत भींचे स्थिर हो गई। ऐसा नहीं कि उसने कभी जंगल देखा ही न हो। उस खुशनुमा पहाड़ी शहर में उनका स्कूल भी तो एक जंगल के ही बीच था, जिसकी सोंधी हरी गहराइयों के बीच वे लोग बिना वार्डन की इजाजत के भी टहल-घूम सकते थे । चीड़ की कसली तुर्श सुई- सी पत्तियों को चूसते, दरख्तों पर चाकू से नाम गोदते, मूंगफलियां चवाते। पर स्कूल की बाल्कनी या पहाड़ों की चक्करदार सड़कों के परे कार की चमकीली खिड़की से दीखते वे जंगल इस सवसे कितने भिन्न थे! विल्ली तरह एक पालतू नर्माई, ये घुरघराते हुए भरपूर नीले उजास और तरल परछाइयों में कांपते हुए, धुंध में नहाए, नमकीन । और यहां ? उसने चारों ओर नज़र दौड़ाई । जैसे वह किसी दूसरे ही उपग्रह के तल पर आ खड़ी हुई हो जहां फूहड़ झोंटे-से झक्कड़ पेड़ों में न देवदारों का सहज आभिजात्य था और न ही चीड़ों की सुघड़ ज्यामि- तीय लम्बाई । सूखी बंजर घरती को चुप जकड़े खड़ी इस वनस्पति में चट्टानी धरती फोड़कर उगने और सूखे पत्तों के बीच से जबरन खुराक ले पाने का एक अजीब-सा झक्कड़-झगड़ालू मलंगपना था। शायद उदय ही ठीक कहता था। यहां आ खड़े होने की उसकी ज़िद एकदम वेतुकी थी; वेतुकी और गैरज़रूरी। पापा का कहना था कि हर चीज़ का एक समय होता है, एक मौका, जिसके बिना कोई चीज़ ठीक से नहीं....मां-पापा के पास जीवन की हर उलझन को निबटाने के लिए एक फार्मूला था, जिसके अनुशासन में बंधकर हर कोई एक सुखी-सम्पन्न गृहस्थ धर्म की मर्यादा वखूबी निवाह ले। वस, इतना-भर ज़रूरी था कि इन मैरजरूरी और वचकानी ज़िद-भरे प्रयोगों को दूर हटाकर.. - १४ / विरुद्ध । "क्या हुआ ?" उदय कार से उतरकर कब उसकी बगल में बड़ा दुआ, उसकी मिची हुई चेतना को मालूम हो "कुछ नही। "ता फिर खड़ी-घड़ी क्या कर रही हो?" अपनी आवाज की रखाई से शायद शर्मिन्दा होकर उदय ने उमकी कुहनी छुई। योड़ी देर दोनों चुपचाप चलते रहे। अब जमीन ढलवा हो चली थी । कभी उनके पैरों से टकरा कोई पत्थर लुढ़कता तो देर तक उसके नीचे लुढ़कते जाने की आवाज आती रहती। उदय ने पर पटककर जूते की गर्द झाडी। "हम लोग जय वहा पहाड़ों में थे तो विल्लो और मैं ढाल पर हाथ पकड़कर तेजी से भागना शुरू कर देते थे। कुछ देर बाद पर अपने-आप इतनी तेजी से चलने लगते हैं कि लगता है कि कोई और धक्का दे रहा है।" "समझदारी की बात करो। इतने अधेरे में वह सब ठीक नहीं होगा, समझी !" उदय ने बडप्पन-भरे लाई से उसकी पीठ थपथपाई । "वुरा मत मानना, पर तुम शायद यह सोचती हो कि इस वक्त हम लोग फिर वही बातें करें जो तुम तब किया करती थी, तो वह लौट आएगा, पर बैमा नहीं हो सकता। तुम बड़ी हो गई हो तब से । और शायद बदल भी गई हो, अपने दो चोटी वाले बचपने से लेकर.. " वह हंसने लगा। पगडडी पर ऊपर बढ़ते हुए रजनी को लग रहा था कि वह मपने में उदय को बोलता हुआ सुन रही है। अपरा, चारो ओर के अपरिचित आकार, हवा की अजीव-सी आवाजें । उसे लग रहा था कि जैसे वह है भी, और नहीं भी। उसे किसीकी हसी की आवाज आई। उदय ? नहीं, यही हम रही थी शायद । या शायद उसके भीतर कही से हंसी की आवाज़ आ रही थी। वह बकरी की चतुर फुर्ती से पगडंडी चढने लगी, एडिया रोपकर टमने की पेशियों को रुद्ध मावैग से ठोस करते हुए, जैसे बिल्तो ने मिनाया... • "रजनी !" भूखी टहनिया कुचलने का स्वर पाम आ रहा था। उसे शायद उतने कार नहीं चढना चाहिए। शायद वह गिर सकती है । शायद .विरुद्ध/१५ . उसकी गदराई पिंडलियां एक चालू ढंग से उघड़ आई हैं । वेशर्मी । वह हंसने लगी, पापा होते तो क्या कहते? और उदय ? और उदय के पापा ? उसे किसीके वाप की परवाह नहीं, वह ऐसे नहीं रहेगी। "रजनी, नीचे उतरो।" उदय के स्वर में डर भी था, धमकी भी। "अगर न उतरूं तो?" एक अभद्र छलांग से वह दूसरे ढोके पर जा कूदी। "वड़ा मज़ा आ रहा था, बड़ा मज़ा--आ-आ-आ..." कोई उसे झकझोर रहा था। वह थमकी। फिर उसके पैर नीचे उतरते-उतरते सपाट-समतल ज़मीन पर टिक गए। उसकी सांस फूल रही थी। उसने पुतलियां सिकोड़कर देखने की कोशिश की । अंधेरा बढ़ गया था, जाने कब ? एक पल गुज़रा, सदियां गुजर गई, उसके सामने पहले एक आकार उभरा, फिर एक चेहरा, फिर आकार एक परिचित स्पर्श बनता गया और चेहरा एक परिचित आवाज़ । उदय उसके कंधे झकझोर रहा था, "रजनी ।" उसने आंखें झपकाई । हवा और भी तेजी से हल्ला मचाती गुजर रही थी । अंधेरा काफी बढ़ गया था । "पागल हो गई हो क्या ?" रजनी ने कार का शीशा चढ़ा दिया और आंखें मूंद ली। सीधी- सपाट सड़क पर गाड़ी चुपचाप बढ़ती जा रही थी। उसने खिड़की खोली और बाहर सिर निकालकर सपाटे से निकली जा रही हवा में गहरी सांस ली। साफ और ताजे झोंके की तुर्शी से आंखों में पानी आ गया। एक धुंध- सी कट गई मानो। उसने खिसियाई कनखियों से उदय की ओर ताका। उसके पोरों में कुछ रिसने-सा लगा था। शायद डर, शायद संकोच, या दोनों । शायद यह गर्मी न पड़ रही होती तो... अच्छा तमाशा कर डाला उसने भी । ज़रा गर्मी क्या बढ़ गई तो ऐसा तूफान ! पर जाने क्या है कि इस मौसम में उसकी हर क्रिया-प्रकिया एक अजीव-से ढंग से फनफनाकर वेलगाम-सी हो उठती है। छोटी-छोटी बातें १६/विरुद्ध वि-१ । जिन्हें वैसे वह यूं ही टाल जाती, गर्मी की तपन में जमा होकर काटने आती हैं। पड़ोमियों का रेडियो जरा भी तीखा पड़ा तो मन करता है कि अभी घम-धम करतो वहा जाए और रेडियो को उठाकर ऐमे घाय से दे पटफे कि उनकी आंखों के मामने ही उसके सारे अंजर-पंजर ढीले पर जाएं । मेज पर रखा खाना जरूरत से ज्यादा गर्म हो, तो जी करता है कि कालर से पकड़ कर नौकर को ऐसा शकझोरे कि उसकी घिधियाती टोडी खुली ही रह जाए। पता नहीं क्या होता जा रहा है उमे ! उफ् ! काश यह गर्मी नहीं होती तो... उदय ने गियर बदला था शायद । एक गुर्राहट के साथ गाही कुछ यमकी, फिर ऊपर चढ़ने लगी थी। "क्या सोच रहे हो ?" उमने अपनी हथेली स्टियरिंग पर से उदय के हाथ पर रख दी। "कुछ नहीं।" उदय ने उमकी आवाज को नकल की और हम पड़ा। "मुझपर हंस रहे हो, नही?" रजनी भी हंस पड़ी। एक बार मोच रहा था कि तुम जब भी कभी कोई यात पूछती या बताती हो तो हमेशा अंत में सकपकाकर एक 'नही ?' क्यों जोड़ देती हो? शायद तुम्हें हमेशा गलत बात कह जाने का डर लगता रहता है, क्यो ?" "पता नही।" रजनी ने जमुहाई लो। "जरा जल्दी चली। ड्राइवर बैठा-बैठा हमें कोस रहा होगा।" "वस देखा न ? यही तो बात है । जहां बहस का सवाल उठना है तुम जमुहाई लेने लगती हो। दरअसल तुम्हारे जैसी औरतो के साथ परे- गानी यह है कि तुम सोवती बहुत हो पर साथ ही दिमागी तौर से हो पोर आलसी । बस कुछ और सोचकर जवाब देने का मौरा आया तो या तो जमुहाई लेने लगती हो या हिस्टोरिकल हो जाओगी। यूं मैं एक वात- भर यह रहा हूं।" उदय ने सफाई दी पर उसकी आंखों मेतरती हल्ली चिन्ता रजनी ने ताह ली थी। वह फिर डर गया था कि वह मभक पड़ेगी। वह चुपचाप सर झुकाए पर्म के फीते से सेलती रही। चांदनी रात में विरुद्ध | १७ तेजी से पीछे छूटी जाती झाड़ियां काले लबादों में लिपटी विलाप करती स्त्री-आकृतियां-सी लग रही थीं-झुकी हुई और धीरे-धीरे हिलती हुई। हर सांत्वना के परे अपने काले दुःख की गोपनीयता में डूबी हुई। "किस सोच में पड़ गई ?" उदय गाड़ी को डाक बंगले के भीतर मोड़ रहा था। इमारत अंधेरी-सी लगती थी। विजली चली गई थी शायद। "लो। यह भी।" उसने हताशा से अपने को ढीला और छोटा होता... चौकीदार एक पुराना लैम्प जलाकर भीतर के कमरे में खाना लगा गया था। छोटा-सा कमरा धुंधली, कांयती परछाइयों में भरकर और भी छोटा और दीन लग रहा था। वह डाक बंगला पहले किसी स्थानीय ताल्लुकेदार की शिकारगाह हुआ करता था, फिर सरकार ने खरीद लिया था। अब पुराने फर्नीचर के कुछ टूटे-फूटे अवशेषों को छोड़कर बाकी सब नया, भोंडा, और फारमाइका के चिकने चमकीले चालपन में मढ़ा था। दरियों पर जगह-जगह चीकट धचे थे, कांच के विराट केस में इक्के-दुक्के बदरंग और वेमेल चीनी के बर्तन उपेक्षित-से पड़े थे। इनके और नेताओं की धूल-भरी तस्वीरों के बीच जानवरों के भुस-भरे सिर जगह-जगह टंगे हुए थे, जिनकी खाल पतंगों ने कुतर खाई थी। "सव उठा ले गए जंगलात वाले मेम सा..."पुराने चौकीदार ने सुरती थूकते हुए एक पनियाली हिकारत से इमारत को देखा था। "ऐसे-ऐसे गलीचे थे, सीसम के छपरखट थे, ये भारी-भारी छुरी-कांटा, चम्मच, सव बुटिस कर दीन ।" "किसीने पकड़ा नहीं ?" प्रश्न पूछते ही उसे अपनी बेवकूफी खली। चौकीदार भी हंस दिया। "अरे उन्हें कोन पकड़ेगा?" लंगड़ाता-सा वह अपने क्वार्टर को चल दिया। दो-तीन अधनंगे बच्चे कुतूहल से उंगलियां चूसते उसे देख रहे थे । चौकीदार ने हाथ उठाकर धमकाया । हात् ! तोचूजों की तरह कुड़कुड़ाते हुए विखर गए थे। उसका मन किया कि उन्हें पास बुलाकर कुछ दे दे- १८ / विरुद्ध पंसा या स्माल या कुछ भी फिर अपने अनुचित औदार्य से वह गुद ही मिकुड़ गई। घि., उन गेवाकलर गृहोपयोगी पत्रिकाओं में मुस्कराती गदराई समाज-मेविकाओं ने वह क्या कुछ बेहतर है । अपने बेहतरीन नाखूनों को घूरते-पूरले उमने अचानक मुद को वहुत अफेला और फालतू महमूम किया था। उदय तो अटवी-मर कागजात ते आया था और मजे मे उन्हे निवटा रहा था । "कुछ कहा ?' उमने व्यस्त भाव से रजनी की ओर देखा। "कुछ नहीं।" उमे जो रही गही भूय थी वह भी मिर्च वाले लाल घी मे उतराती मस्जियों और वनस्पति घी से चुह चुहाती रोटियो को देखकर उतर गई। वैचारा चौकीदार अपने तई मोटी टिप की आशा में काफी तर माल बना- कर रख गया होगा। "लो न!" उदय ने उसकी ओर प्लेट सरकाई। एक तो डायनिंग रूम छोटा-सा था, और उसपर पसे की गर्म हवा मे पाने की गघ और भी चोझिल होकर नीचे झुक आई यो। भरे मन से उगने पोडी-सी सम्जी प्लेट में डाल ली। उदय आदतन कम साता है और वह भी एक स्नायविक व्यग्रता से, जमे एक काम है जिसे तुरत निवटाना होगा। उसके चेहरे से कोई बंदाज़ नहीं लगा सकता कि उसे खाना अच्छा लग रहा है या बुरा। एक मगट मुस्तैदी से कोर के बाद कोर। गुरू-शुरू में उसे अजीब-गा लगता था, पर अब तो आदन-मो पड़ गई है। हालांकि बचपन के अधि- काग दिन उसने भी होस्टलो काही नीरम साना सावर बिताए हैं पर उदय की तरह से उसे पाने में एंमा विराग भी नहीं हुआ। पहले-पहल उसे देर तक घटवारे ले-लेकर गाना पसन्द था।सामार तर्जनी की नोक पर जरा-मा ममाता या चटनी सोगी करते हुए चाटना या अचार की गुठली को देर तक मुंह मे घुमा-धुमाकर चूमना । पर जब जीम से आखिरी चटगारा लेकर वह उदय की तरफ देखती तो पाती शिवह कब का पाना खत्म कर एक उदासीन सहिप्ता से उसके उठने की राह दे रहा है तब उसे अचानक अपने चटखारे एक बेहद लोलुप और वचकानी हरकत लगने लगते थे। फिर पता नहीं कब उसने भी खुद-बखुद उदय की ही अनमनी तेजी अपना ली थी। कैसे अजीबोगरीब ढंग से हम धीमे-धीमे बदलते रहते हैं और हमें ही पता नहीं चलता । अजीव वात है, नहीं ? "कुछ और लोन !" उदय ने व्यस्त भाव से उसकी ओर प्लेट बढ़ा दी थी। "हं ?" बचकचाकर उसने ताका, फिर प्लेट हटाकर पानी की एक बड़ी-सी चूंट ली। "नहीं, वस !" पानी कुनकुना और खारा था, उसके मुंह का स्वाद वकवका हो पाया। "बड़ी गर्मी है, नहीं?" उसने झुककर पिंडली खुजलाई। पोखर पास होने से यहां ढेरों मच्छर थे। "तुमने इधर खाना बहुत कम कर दिया है।"उदय चिन्ता-भरी आंखों से उसे ताक रहा था। रजनी ने फिर वही कहना चाहा, गर्मी के बारे में, पर चुप रही। क्या फायदा? हर बात के लिए फिर-फिर वही कारण देना कि गर्मी है, गर्मी है। हालांकि बात काफी हद तक सही थी, लेकिन तव भी। वह चुपचाप पापड़ का एक छोटा टुकड़ा कुतरने लगी। काली मिर्च की झारसे आंखों में पानी भर आया। उसने फिर उसी खारे पानी की चूंट ली और उठ खड़ी हुई। ऊमस में छत और भी नीची लग रही थी। बाहर निकलकर उसने गहरी सांस ली। चौकीदार ने दोनों पलंग वाहर खुले में लगा दिए थे, मसहरी समेत । बगल में एक विराट प्रागैतिहासिक पंखा डरावनी ध्वनियां करता घूम रहा था । विजली आ गई होगी शायद, उसने सांत्वना की सांस ली। पर मसहरी देखते ही उसे सस्त कोफ्त होती है । एक तो गर्मी, ऊपर से बदन के चारों ओर तना हुआ यह बंद डब्बा। करवट बदलो तो मसहरी, पर फैलाओ तो मसहरी, अंगड़ाई लो तो "कभी-कभी तो उसका मन करता २०/विरुद्ध था कि पागलों की तरह दांतों से उसे चीय डाले । "सो गई क्या?" उसके बगल का पलंग उदय के लेटने से कुछ हिला। रजनी ने ममहरी को दीयार हटा ली थी और घर्राने टेबल फैन के ऐन मामने चेहरा किए लेटी थी।पये की तेज हवा से उसकी आखें घुद-बखुद मुंदी जा रही थी। हालाकि नींद जरा भी नहीं आ रही थी। पमे की घहिट ने आसपास की ध्वनियों को दबाकर एक कांपता हुआ शून्य उसमें चारों ओर तान दिया था। उमने इल्ली की तरह सिकुड़कर उसमें घुसने की कोशिश की। "सो गई क्या?" उदय ने फिर पूछा शायद उसने मप्रयास करवट लेकर अपने दोनों के बीच टंगी मसहरी की फांक कपर की, "नही।" "मसहरी क्यों उठा दी तुमने ? मच्छर लगेंगे।" वह चुप रही। वह फिर एक फिजूल को वहस में फसकर अपने को बौना होते नहीं महमूस करना चाहती थी; कम से कम इस वक्त तो। "बहुत गर्मी है, नही ?" "हूं।" उदय का हाय उसके खुले वालो की कई फा बनाता उन्हें सहला रहा था -धीरे-धीरे । उसे भला सगा। शारीरिक सुख रिमते- रिसते, भीतर की सव दुसती गाठों को ढीला करता जा रहा था। इतना कि शायद वह दिल्ली होती तो चित लैंटकर घुरघराने लगती । वह हमने लगी। ?" "कुछ नही । वम सोच रही थी कि अगर मैं बिल्ली होती तो शायद ऐसे सहलाने से घुरघुराने लगती।" उदय हंसा या नहीं वह नहीं देख पाई। दोनों के बीच मसहरी की झीनी पर स्पष्ट दीवार थी। उदय का हाथ वैसे ही फिरता रहा। "उदय।" "वया हुआ ' क्या हर साल इतनी ही गर्मी पड़ती है या इस साल' कुछ ज्यादा ही है ?" उदय ने मसहरी से सिर निकाल लिया था, "तुम्हें गर्मी में वहृत तक- लीफ होती है न ?" "तकलीफ तो सभीको होती है, मैं तो ऐसे ही..." "उहुंक, तुम्हें गर्मी में रहने की आदत जो नहीं है न, इसीसे तुम्हें ज्यादा होती है।" "हो जाएगी।" लहजे को हल्का रखने की भरपूर कोशिश करते हुए उसने हाथ पंखे की ओर बढ़ा दिया और गदेली हवा में उलटती-पलटती रही जैसे आग सेंक रही हो । "इम्तहान के दिनों में वहां इतनी ठण्ड होती थी कि हम लोग दो-दो दस्ताने पहनकर स्कूल जाते थे, वर्ना लिखते-लिखते उंगलियां ठिठुर जाती। क्लास में हम लोग हमेशा खूब लड़-झगड़कर हीटर के पास वाला डेस्क लेने की फिराक में रहते थे।" अनमनी-सी रजनी ने हाथ समेट लिया। "कौन कहेगा कि इसी देश की बात कर रही हूं, नहीं ?" चित लेटकर वह ऊपर ताकने लगी। मसहरी की छत धूल और चिकनाई से भूरी-पीली हो चली थी। कभी हिलने से कहीं एकाध तारा दिख जाता। चांद एक धुंधला धन्चा-भर । उस छोटे-से पहाड़ी कस्वे के स्कूल में वीता उसका विगत कभी उसे खुद इतना हैरतअगेज़ मालूम देता है कि लगता है, अचरज-लोक की एलिस की तरह उसने कोई मजेदार और अजीब-सा सपना-भर देखा है। "रजनी !" उदय ने उसकी ओर करवट बदल ली। "तुमने आखिर मुझसे शादी क्यों की?" एक तीली सांस उसके गले में आकर अटक गई। प्रश्नों का सरकस शुरू हो गया था। एक के बाद एक मंजे-मंजाए उत्तर अब अखाड़े में उतरते चले जाएंगे, एक चिपचिपी तेलिहा तेजी समेत । फिर वही जानी-पहचानी चकरघिन्नियां-दांव-पेंच। "क्योंकि तुम अच्छे लगे, वस।" २२/ विरुद्ध "पर क्यों ? तुमने तो मुझे दो-एक ही बार देखा था।" "पर तुम्हारे बारे में सुना तो था।" "तुमने या तुम्हारे घर के लोगो ने ?" रजनो ने मर तकिया में गहा दिया । उमे मालूम था कि प्रश्न को कर मच्चाई मे उदय उमे निलमिनाता हमा देखना चाहता था। वह चुप रही। क्या कहे यह ? अपने मारे हममुख गदराव के बावजूद उमका अतीन कितना पराया या, युद उनके लिए भी। अब कम से कम । एक नम और सुरक्षिन अन्य में मजे में पलता- पुगना ममय । गाल-दर-गाल वही कार्यत्रम , माल के नौ महीने उप मुशतुमा स्कूल के हास्टल में, जाडो मे तीन महीने मंदानो मे बिनाई चुट्टिया, नन्स के कटोर पर ममता-भरे अनुशासन के बीच उभर आए छोटे-छोटे कुंवारे कामनाद्वीप पाटिया, मेर-मपार्ट, नये कपडे--तम, यही कुछ तो? युछ भी तो ऐमा नहीं था जिसपर उगली टोपकर वह कह सके कि हा, मह मेरा एकदम निजी क्षण था। पर तब उसे वह नागवार गुजरा हो, ऐगा भी नहीं था। बस, कमी-कभी हर गर्मी में उसी बाल्कनी में उन्ही उन्ही मैलानियों की भीड़ में परिचित नेहरे मोजते हुए एक हल्की ऊवन्मी जर महमूम होने लगती थी। पर तब तक मालाना जल्मो की तैयारिया गुस्ट हो जाती थी, फिर शहर के सिनेमाघरों में नई अंग्रेजी फिल्मे आ जाती थी और फिर गर्मी की छुट्टिया बिताने की मां-पापा अपने उमी सुगनुमा काटेज में आ जाते थे जिसका नाम था, 'स्लीगी होलो' यानी ऊपती हुई माद । कंगा मटीक नाम था। वह हमने लगी। उदय की चारपाई फिर हिली। गर्मी में उगे भी नीद नही जा रही थी शायद । "गो गई क्या?" उसे लगा कि एक तीया उत्तर भन्ना-मन्नाकर उनके चाकर काट रहा है । यकायक दिन में दूनरी बार एक ऐसी स्पष्टता में उगने छुटकारे पो चाहना को महसूम दिया कि यदन में झुरझुरी-मी दौड गई। उसे लगने लगा कि जैसे उस अपरिचिन जगल में उमड़ती जंगली हवा वापर और अंधा सैलाब उमली वनपटी में फिर टकरा रहा है। वह स्पिर लेटी रही। विरुद्ध/२३ तनाव से वदन की हर पेशी इस कदर खिंची हुई थी कि अगर उदय उसे फिर छू लेता तो शायद वह चिल्ला पड़ती। पर उदय की चारपाई पर कोई हरकत नहीं हुई। वह सो गया होगा शायद । टिप् ! चौकीदार ने बरामदे की बत्ती भी बुझा दी। अब बस रात का उजाला और रात की आवाजे-भर वच रही थीं। वह उठकर बैठ गई और घुटनों पर ठोड़ी रखे अंधेरे में ताकने लगी। डाक बंगले के परे कोई बच्चा रोया शायद । फिर कोई औरत कुछ देर एक उनींदेपन से कुछ गुनगुनाती रही। थोड़ी देर बाद बच्चा भी चुप हो गया और औरत भी। फिर वही अजहद चुप्पी। कहीं एक पत्ता भी नहीं खड़क रहा था। उसने धीरे से उठ- कर सुराही से एक गिलास पानी लिया और चूंट भर लिया। पानी वैसा ही था, कुनकुना और खारा-सा । उसने बाकी पानी ज़मीन पर उलट दिया। एक 'सोंड' की आवाज़ आई और पानी ऐसी उतावली से सूख गया जैसे गर्म तवे पर डाला गया हो। वह कुछ देर उस गाढ़े-भूरे धब्बे को देखती रही, फिर लेट गई। यहां तारे खूब चटक थे। पर चांद नहीं था। अमावस्या हो शायद । वहां होस्टल में रहते उसने कभी सोचा भी नहीं था कि ऐसे बाहर एकदम खुले में भी सोया जा सकता है। वहां तो शाम के पांच बजे नहीं कि सब लड़कियां भेड़ों के मिमियाते झुण्ड की तरह भीतर हांक दी जाती थीं। खुशनुमा उजास और गर्मी-भरी लम्बी डामेंटरी में करीने से झक्क उजले और नर्म विस्तरों की कतारें लगी रहती थीं। कपड़े बदलकर वे सब अपने-अपने पलंग के बगल में घुटनों के बल झुक जाती प्रार्थना करने को। पिछवाड़े शाम के एंजेल्स की मधुर घंटियां बजती रहतीं- 'आवर फादर हू आर्ट इन हैवन...' सच में कौन कहेगा कि वह इसी देश, अपनी इसी ज़िन्दगी की बातें कर रही है ! अब तो वह सव याद भी आता है तो एक धुंधली परीकथा की तरह । जैसे घने कुहासे में कोई हाथ फैला-फैला- कर कुछ टटोलता जाए और उसकी सारी कोशिशों के बावजूद जो हाथ २४ / विरुद्ध लगता है वह एक मुट्ठी-भर धुंध-भर । राप के रंग को पुरनम धंध जो उसकी असहाय पकड़ से फिसल."! और कपर से तन-मन को घोला. खोलाकर पटोरने वाली यह गर्मी जिसने फीच-फीचकर उसकी सारी चेतना को ऐसा कुन्द कर डाला है कि अपनी ही हरकतों पर कोई वम नहीं चलता। पर क्या पता शायद यह गर्मी उसके लिए अपनी सारी उकताहट और वेचनी को एक अदृश्य उपस्थिति पर थोपने का एक आसान बहाना-मर है ! नही ? सिर तले का तश्मिा पसीने से एकदम भीग गया था। उसने तकिया निकालकर अलग डाल दिया और वाल गर्दन से हटाकर ऊपर छिनरा दिए । जहा वदन का स्पर्श नहीं हुआ था वहा चादर अभी भी आश्चर्यजनक रूप से ठण्डी और नम थी। उसने आखें मूंद ली। कुछ पत्ते मुडके और हवा का एक बहुत हो मोठा झोका वह आया। उदय को मसहरी उसको कुहनी के पास एक नाजुक थिरकन से कापी, फिर दूसरा झोंका, फिर तीसरा । आऽह । उसने एक भरपूर सांस छोड़ते हुए अपने को हवाओं को सौंप दिया। मन के एक कोने में विद्रोह-सा भी उठा । मौसम को तानाशाही और अपने बदन की उस पुलकित बेचारगी के विरुद्ध पर थकान बहुत ज्यादा थी और हवा बेहद नम । जाने कर उमको आय लग गई। गाड़ी के पीछे कुछ दूर तक चन्द अधनंगे भूरे बच्चे अपनी नाक सुड़कते, हल्ला करते भागते रहे और एक मरियल कुत्ता भी, जिसे कभी एकाध टुकड़ा मेज़ से फेंककर उसने अनजाने ही परिचय मोल ले लिया था। "याक् ! या!" कुत्ते को मावाज भी उसकी मुजलिहा देह की ही तरह पतली और चिचिपाती हुई-सी थी। रजनी को न मालूम क्यों उमकी यह बनचाही मक्ति बेहद नागवार गुजरी। सिड़की से सर निकालकर उसने डांटा भी, "दुत्त ! भाग !" "या !" कुत्ता कुछ थमककर अपनी पनौली कीचड़-भरी आंखों से ताकने लगा। उसकी गुलाबी जीम बाहर लटकी विरुद्ध/२५ हांफ रही थी। रजनी ने सर फिराकर खिड़की चढ़ा ली। फिर जाने कब कुत्ता भी पीछे छूट गया। इतनी अलस्सुबह भी गर्मी शुरू हो गई थी। उसने वाल कसकर लपेट लिए और फिर से शीशा नीचे कर लिया । सुवह को हवा के झोंके से गर्दन पर की चुनचुनाती गर्मी कुछ कम हुई । जंगल तेजी से पीछे छूट रहा था और गांव दीखने लगे थे। थोड़ी-थोड़ी दूर पर छोटे-बड़े पोखरों में नहा रही मैसें और चरवाहे या सड़क किनारे अधर्मली धोतियों के अवगुण्ठन से झांकती उदास पसीजती आंखें दीखती जाती थीं। जैसे कोई सिनेमा की वही रोल फिर-फिर दिखा रहा हो। वहां घबराई- घबराई-सी कच्ची झोपड़ियां, दालानों में लोटते सुअर, मुर्गियां और नंगे बच्चे, छतों पर सूखता पुआल और मुआई लतरें, और फिर दरवाजों से टिकी, मुंडेरों पर बैठती वही पीली ज्वरग्रस्त आंखें जो शायद कुछ देखती नहीं, दिखातीं नहीं, वस है। "थोडा और जल्दी रवाना होना था, नहीं ?" उदय बिना किसी उद्वेग के बाहर देख रहा था। बड़े आराम से । उसके लिए जैसे गर्मी थी ही नहीं, रजनी को हल्की जलन-सी हुई। "पानी पियोगी?" उदय पूछ रहा था। वह चौंकी "अं? हां-हां।" ड्राइवर ने गाड़ी रोक ली और जेब से वीड़ी का वंडल निकालता हुआ झुरमुट के परे चल दिया जहां शायद चाय की दुकानें थीं । उसने थर्मस से निकालकर पानी का एक गिलास उदय को दिया, एक खुद होंठों से लगा लिया। फिर वही मिट्टी से कुछ-कुछ किरकिराता हुआ खारा पानी। रूमाल भिगोकर उसने चेहरा पोंछा। उदय एहतियात से गिलास खंगाल- कर औंधा चुका था और सीट से टिका माराम से सामने ताक रहा था। "तुम्हें गर्मी नहीं लग रही ?" उसने कुछ कुढ़कर ही पूछा। "हं ? नहीं तो, हां, थोड़ी-बहुत ।" उदय ने बालों पर हाथ फिराया ।। "क्यों ? बहुत थक गई क्या ? बस घण्टा-भर और है।" "हूं s" वह चुप हो गई । गर्मियों की सुबह की हवा भी कैसी घुटी- घुटी होती है, नहीं ? बस, घर पहुंचते-पहुंचते फिर वही धूल-भरी बीहड़ । । - - २६/विरुद्ध ? । आधी उड़ने लगेगी। उफ, गर्मी के इस विकराल मंदानी रूप की तो उसने कभी कलना भी नहीं की थी। उनके स्कूल में मियों की छुट्टिया नहीं होती थी सो मा पापा ही उनसे मिलने को पहाड़ों पर चले आते थे, जाडौं में जब वे घर जाते तो मंदानों का दूसरा ही रूप होता था। वह बोराते अंधडों का उन्माद, धूल और चटक सफेद दुपहरियों का बंधा कर देने वाला तीखापन, मूनी सड़कों पर भटको आत्माओ से उडते पत्ते और प्रेत- से नाचते धूलिस्तम्भ । सब एकदम आकस्मिक थे। वह कुनकुना आसमान और धूप के नर्म परगोशी धब्बो वाली सडके, नीले कुहासे में लिपटी टिम- टिमाती रूमानी शामे, जिन्हे उमने मैदानी मौसम के रूप में जाना था, अब छलावा भर लगते थे । पर छलावा क्या सिर्फ मोमम तक ही सीमित था अब तो कुछ बच रहा था तो यही घटक सफेद दुपहरी का तपता सन्नाटा और उसके बीचो-बीच मुरझाए पौधों की तरह जड़ी हुई भूरी-उदास- ज्वरप्रस्त आसें । और शायद जब तक कोई कुछ और सोचना भी चाहे तब तक इस सारे को सहला-सहलाकर ढकती हुई रात गए की बूढी वयारे चलना शुरू हो जाती हैं और थकी चेतना एक शर्मनाक खुमारी में हूय..' ड्राइवर जाने कब आकर गाड़ी में बैठ गया था। कार झटके से स्टार्ट हो गई। आसमान का एक हिस्सा फिर एक रुपहली अभद्रता से चमकने लगा। वह मंत्रमुग्ध-सी सामने बैठे ड्राइवर को काती गर्दन पर उभरती पसीने की बूंदें देख रही थी। काली-स्याह चमड़ी पर एक-एक कर बू उभरती, फिर कुछ बूंदें मिलकर एक बड़ी-सी वूद बन जाती और होले से वहकर उसकी वर्दी के इक्क उजले कालर के भीतर रेंग जाती। उसने अपनी गर्दन पर उन बूदों की कुनकुनी सुरमुराहट महसूस की। पर ड्राइवर को स्पष्ट ही कोई परेशानी नही महसूस हो रही थी। शायद उसे पता भी न चला हो कि उनका बदन कसे यूदों में फूटा पड़ रहा है। उसने उदय की ओर देखा । वह चुपचाप दरवाजे के शीशे से सिर टिकाए मो रहा था। उसके भरे-भरे होठों और ठोडो के हठीले मोड के बीच भी वही बूंदें । एक बार उसका मन किया कि उदय को जगा दे और उससे .

"क्या हुआ . वातें करने लगे--कुछ भी, किसी भी तरह की। पर इस तपन में किसी भी शब्द, हाव-भाव का कोई मतलव रह जाता है क्या ? पानी की तली में चलने वाले गोताखोर की तरह उसकी हर मुद्रा अपने वेग के बावजूद गर्मी से टकराकर कुन्द हो-होकर रह जाती है। ? तबीयत तो ठीक है न ?" उदय उसकी कुहनी छू रहा था। उसने हंसने की कोशिश-सी की। "कुछ भी तो नहीं।" "तुम्हारा चेहरा बहुत उतरा हुआ लग रहा है। चाहो तो थोड़ी देर को गाड़ी रुकवा लें ?" "नहीं-नहीं, मैं तो विल्कुल ठीक हूं।" उसने होंठों पर जुबान फिराई, "अब तो जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहती हूं, फिर जी भरकर नहाना ।" उसने उदय को देखा । उदय मुस्कराया। फिर दोनों चुप बैठे रहे । अनाज की बोरियों से लदी एक ट्रक बगल से गुज़र गई। बोरियों के ऊपर बैठे मजदूर देर तक उन्हें मुड़-मुड़कर देखते रहे। सबने अपने चेहरों को गमों से ऐसे बांध रखा था कि सफेद-काली पुतलियां-भर नजर आती थीं। रजनी ने निगाह फिरा ली। ट्रक के पीछे बने एक कमल के फूल और नजरवटू चप्पल के दान लिखा था फिर मिलेंगे।' अव एकाध पक्के मकान दीखने लगे थे। नोनी झड़ती हरी-भूरी दीवारों पर काले, सफेद और गेरुआ अक्षरों में जनाना-मर्दाना और बच्चों के रोगों से संबंधित दवाओं के विराट नाम थे। कहीं-कहीं फिल्मों के अधफटे नये पोस्टरों पर गदराई मांसल तारिकाएं और नकाबपोश झलक जाते थे । आगे-पीछे गड़हियां, ठेले, रिक्शे, सब्ज़ियों, फलों की असम्भव लगती लदाने लादे हुए मरियल टट्ट ओं वाले इक्के । कार एकदम रेंग-सी रही थी। ड्राइवर की ओर का शीशा आधा गिरा हुआ था जिससे रह-रह- कर आसपास के ढाबों में भुन रहे मसालों की घी-दार गंध और सड़ते नालों की भभक भीतर आती जा रही थी। उसका मन किया कि कहे, । २८/विरुद्ध सीमा चढा लो, परखर... 'यो जानेमन ये हुसन तेरा-'रान धुजाता एक मटमैला डोकरा एक गली से निकला मोर एक अश्लील ढंग से उसे मांस मारकर एक ढावे में घुस गया। अभी गधे को ममें ही भीग रही थीं। आवाज भी मजीव फटी-फटी-सी पीपर उसकी मांघों में यह एक पास वहशियत झांक रही थी जो अंधेरी गली के नुक्कड से रेलवे प्लेटफार्म की रेलपेल तक में भी एक औरत को कुहनी मार जा सबती है, और उसकी मजाल नहीं हो कि यह चूं भी कर सके । रजनी को लगा जैसे उसपर कोई बाल्टी- भर कीचड़ साल गया हो। उमने शीशा चढ़ा लिया। शहर शुरू हो गया था। । २ कार्ड था, मेज पर कुछ पुराने अखबार पहे थे और दो-तीन लिफाफे। एक चिट्ठी मां की थी, एक विल और एक निमंत्रण । एक रंगीन पिक्चर पोस्ट- विल्लो का। उसने पलटकर पता देसा, ज्यूरिख के किमी होटल मे लिखा गया था। वह मा की चिट्टी सोलकर पढने लगी। इधर जब से पापा रिटायर हुए हैं, मां-पापा गर्मी शुरू होते ही पहाड़ चले जाते हैं। "पानी लोगी?" उदय ने ठण्डे पानी का गिलास उसकी ओर बहा दिया था। उसने वर्गर पत से आखें उठाए गिलास थाम लिया।".."यहा बाकर बार-बार हमें तुम्हारा हो ख्याल आता है-तुम्हें गर्मी की एकदम आदत नहीं है । न हो तो कुछ हफ्तों को यहां आ जाओ, इतना बड़ा घर एकदम खाली पड़ा है। इस साल विल्लो वर्गरा भी नहीं..." "क्या लिखा है ?" उदय ने आत्मीयता से सत झपट लिया। "कुछ खास नहीं, पड लो।" वह अलमारी से धुले कपड़े निकालने लगी। घूम-घामकर वापस लौटो तो परिचित काम भी अच्छे लगते हैं, एक सुरक्षित ठहराव का बहसास देते हुए। यह गुनगुनाती हुई नहाने लगी। "बाज गाम माई आठ बजे वी०एम० के घर डिनर है।" उदय हजा. hto मत बना रहा था। "अच्छा" भीगा तौलिया टांगकर वह. रसोई की ओर मुड़ गई। "खाना जल्दी लगवा देना, मुझे अभी जाना है।" गोपालसिंह सफाई से रसोई में धनिया कतर रहा था। उसकी कार्यकुशलता के सामने रजनी हमेशा खुद को फूहड़ महसूस. करती जाती थी। वह पिछले सात सालों से उदय के साथ था। यानी देखा जाए तो अनुभव के लिहाज से उससे कई साल सीनियर । साहब को क्या खाना पसन्द है, सफर के लिए उन्हें क्या-क्या साथ ले जाना है, कब क्या खाना बनेगा, यह सब निर्णय दो-चार रस्मी औपचारिकताओं के अलावा उसी- पर छोड़ दिए जाते थे। रजनी ने भी इस व्यवस्था का विरोध नहीं किया। शायद आलस रहा हो या संकोच । उसकी बड़ी बहन विल्लो के घर में मजाल थी कि उसके हुक्म के बगैर पत्ता भी खड़क जाए । हालांकि खुद अपने हाथ से वह कोई काम नहीं करती थी, पर निगरानी उसकी सब- पर रहती। कई वार तो नौकरानी को पुकारते हुए उसकी दबंग आवाज़ की हिकारत के सामने रजनी खुद को एक अजीव-से संकोच से सिकुड़ती पाती। पर उसके नौकरानी को स्पष्ट ही इससे कोई उलझन नहीं होती थी या शायद जब होने लगती तो वे चट से तबदील कर दी जाती थीं। इन छोटे लोगों को ज्यादा सर चढ़ाना ठीक नहीं। उसकी, मां का भी यही कहना था । शायद हमेशा की तरह वे ही लोग सही थे और वह गलत । "सब ठीक है?" उसने रटी हुई-सी मुस्कान दी। "जी साव।" अल्पभापी गोपालसिंह ने गैस पर चढ़ी एक पतीली में पकता कुछ कड़छी से हिलाया और फिर नल के नीचे सलाद धोने लगा। "साहव को आधे घंटे में आफिस जाना है, खाना तैयार है न ?" "जी साब।" कुछ देर वह असमंजस में यूं ही एक पैर से दूसरे पैर पर वज़न तोलती खड़ी रही, फिर मुड़ गई। उसे. कभी लगने लगता है कि अपनी जिम्मे- दारियों से कतराते-कतराते उसने अपने-आपको एकदम व्यक्तित्वहीन ३०/विरुद्ध बना हाला है। शायद उमे इम सवार कुछ पगदा नियंत्रण रखना चाहिए । पर कमे? गोपालसिंह के काम मे उमे तो कोई माम मामी नजर नहीं आती थी, और मिर्फ एक जिद में उसे हटाना ग बेवजह गचड़ निकालना उसे बहुत भद्दा-सा लगता है । वहरहाल, वह धन्द चालू, काम- चलाऊ वाक्यों में ही काम चला लेती थी। अपने को बेहद फालतू महमूम करती हुई थोड़ी देर वह पिडको पर पड़ी रही। यूं देखा जाए तो घर के दैनिक कामकाज को चलाने के लिए उसकी उपस्थिति कोई खाम जरूरी नहीं थी। उदय अपने मभी निजी काम मुद मासी पटुता से कर सकता था, घर का वाको गोपालसिंह निभा ही देता था। झाड़-पोंछ को एक चुप्पी.मी मदरासन अलस्सुबह आ जाती थी और घण्टे-भर के बीच सब कर-करा चल देती थी। वह यया करे ? उदय का कहना था कि इसमें सोच-विचार की जरूरत ही क्या यो भला? यह मत्र तो होता ही रहेगा, वह अपने बारे में कुछ करे। कुछ भी। वाहर जाए, पढाई करे, कुछ खास काम हाय मे ले ले, वर्ना इस तरह घर में बैठे. बैठे तो..इसी खौफनाक 'तो' पर ही आकर सबके तकक जाते थे, चाहे मा हो या उदय । मा के लिए घर की देहरी एक अनुल्ल पनीय सच थी, जिसके भीतर का सब उसका राजपाट या, पर जहा उमने बाहर का हाय में लिया और यह सब छोडा तो । एक अपरिहायं दुःखद अन्त की खौफनाक घमकी से भरा यह 'तो' सब कोई उमपर लटकता छोडकर चल देते थे। में उसे इन उनसनी को संभावना का कतई गुमान न था । उसका मापेक्ष अस्तित्व घर और घरवाले के प्रति या, वम, इम मोघं से तक की मुदृढ सुरक्षा में उरो बचपन में ही मढ़ दिया गया था और उदय की वेलाग ताफिरता ने उममें दरार डाल दी थी जो दिन पर दिन चौडा रही थी। "तुम्ह दिन-भर पाली बैठे, बिना अपने लिए कुछ किए कोई हैरत या परेशानी नहीं होती क्या?" रजनो ने गीले वालों की सट कान के पीछे खोंस ली और मिड़की पर पर्दै गीच दिए । आज वह किसी के घर मिलने को चली जाएगी, वर्ना घर में-दिन-भर... "आज तुम दिन में क्या करोगी?" रजनी ने चप्पल के भीतर उंगलियां सिकोड़ ली। प्रश्न के भीतर दवे सपाट आत्मीय अभियोग से हमेशा उसके कांटे खड़े हो जाते हैं । "साव, खाना।" वह मन ही मन गोपालसिंह के प्रति कृतज्ञ हुई। "बिल्ली ने क्या लिखा?" उदय ने कुर्सी पर बैठकर उसकी ओरताका। "कुछ खास नहीं, एक पिक्चर पोस्टकार्ड-भर है ज्यूरिख से।" "कब तक रहेंगे?" "पता नहीं, अभी नो सितम्बर तक बच्चों की छुट्टियां होंगी।" "मां की चिट्ठी के बारे में क्या सोचा है ?" "क्या करना है दो-तीन हफ्तै-भर को जाकर?" रजनी ने पानी का लम्बा चूंट लिया, "गर्मी तो लौटकर भी लगेगी ही।" "तो फिर दो-चार महीने को चली जाओ। वे लोग तो सितम्बर से पहले पहाड़ों से नहीं उतरते।"उदय ने चम्मच उठा लिया। क्या उदय के स्वर में व्यंग्य की वू थी? उसने कपर ताका। उदय निर्विकार भाव से खा रहा था। पता नहीं शायद वही अपने घरवालों के लिए उसके रुख को लेकर जरूरत से ज्यादह सजग है। कई बार वह तय नहीं कर पाती कि उनके प्रति उदय की भावहीन वेरुखी स्वाभाविक है कि... "हटाओ भी । क्या करना है जाकर, विल्लो वगैरह भी तो नहीं होंगी इस वार।" अनमनी होते हुए भी उसने देखा कि उदय की आंखों में संतोष या तृप्ति-सा कुछ झलका या शायद उसीका प्रम था । एक बार उसका मन हुआ कि कह दे,'हां जाऊंगी।' पर यह एक अजीव वचकानी जिद-भर होती,नहीं? "तुम्हारी मर्जी।" उदय ने कोर मुंह में डाला। थोड़ी देर चुप्पी रही। "सोचती हूं आज दिन में कहीं मिल आऊं। कार खाली है ?" "हो आलो। मैं ड्राइवर को भेज दूंगा । कब तक भेजूं ?" ३२ / विरुद्ध वि-२ "यही, ग्यारह तक 7" उमने ऊपर ताकां, "ठीक है ?" "नहीं, गलत है ।" उदय मुस्करा रहा था। वह भी हम पड़ी। "तुम जो जरूरत से ज्यादा नरमाई और विनय दिसाती हो न, कभी. कभी हमने काबिल लगता है। गाड़ी मगवानी है तो मांग लो, पाती नहीं होगी तो तुम्हें बता दूंगा। इतनी झिझक और डर लेकर तो तुम कभी 'कुछ नहीं कर सकोगी, समझीं ?" उदय ने पानी का चूंट लिया। "जाना । कहा है ?" - "बुआ जी के घर । सोच रही थी, मा भी लिखती रहती है कि हो माना।" 'धूप काफी है।" "हां, पर फिर घर में बैठे-बैठे भी तो..." रजनी ने आतक बात अधूरी ही छोड़ दी । अब उदय फिर चालू हो जाएगा उसके दिमागी आलस और नैराश्यवादिता पर । क्या जरूरत थी यह करने की ? पर उदय ने कुछ नहीं कहा, कुर्सी सिसकाकर उठ गया। वह पता नहीं क्यों, रांसी हो पाई। वालों पर ब्रश फेरते-करते उसे ख्याल आया कि वुमा जी उमके क्टे वालों को देखकर आदतन जहर कुछ कहेंगी।ड्रायर से एक रवरखण्ड निकालकर 'उसने वाल पीछे वांध लिए। यूं उनसे कोई खास करीबी रिश्ता तो या नहीं पर परंस इतनी दूर रिश्तेदार के नाम पर बम पही पौं। बचानक उसका मन किया कि न जाएं। मां और यिस्तो को पली मामानिकता की आड़ लेकर वह बचपन में ही रिदतेदारों और रिश्ते. 'दारियों की बोपचारिकताओं से बचती आई थी, और अब कभी अगर भरेले में उन सबसे मिलने का मौका आता है तो उसे वही घबराहट होने सन्नी है । जाने कौन कल क्या वह बैठेगा? थोड़ी देर वह होली आदने में अपनी परछाई को ताकती रही। "क्यों ? जाऊं?" उसने हॉट 'गोल किए। परछाई हम पड़ी। हुंह, उसे चाभी रखी और गोपालसिंह को जरूरी निर्देश देकर सीढ़ियां उतर आई। धूप तेज़ होगी, यह तो उसे पता था, पर इतनी तेज होगी यह वह उस ठण्डे कमरे में कुछ ही घण्टे रहकर भूल गई थी। उसने धूप का चश्मा चढ़ा लिया और कार में बैठ गई। वुआ जी के घर का दरवाजा बन्द नहीं था, वस, उढ़का-भर दिया गया था। पुरानी चाल का हवेलीनुमा घर था। एक अजीव-से चटक नीले रंग में पुते खिड़की-दरवाजे, पुरानी वेलदार नक्काशियों से कहीं भी मेल नहीं खाते थे। बाहर कुछ सूखे झाड़ों पर चन्द बकरियां मुंह मार रही थीं। इस भांय-भांय चलती लू में बाहर दिखता भी कौन ? सारे घर पर गर्मियों की सन्नाटा-भरी उदासी और रहने वालों की सपाट ज़िन्दगी की परछाई-सी झीनी धूल की चादर पड़ी थी। वह कुछ देर असमंजस में बाहर ही खड़ी रही, फिर वगैर कुण्डी खड़काए यूं ही भीतर घुस गई। पहले दो-तीन कमरे पार करने पर भी भीतर कोई नज़र न आया तो वह कुछ सहमी-सी। "तुआ जी !" उसने गला धीरे से खंखारा। "अरे कौन है ? अरी सीला, देखियो जरा.." भीतर से कोई गुहार आई। वह खड़ी रही। वगल का दरवाजा खुला। "अरे जीजी, आप !" बुआ जी की बड़ी लड़की शीला आंखें मलती खड़ी थी। शायद सोते से उठकर आई थी। इस गर्मी में नींद ? उसने चलते-चलते रश्क से सोचा। "आइए जीजी, इधर ड्राइंगरूम में आइए । अम्मा चौके में हैं, अभी आती हैं।" शीला के हाथ छिप-छिपे अपने तंग कपड़ों की सलवटें दुरुस्त कर रहे थे। "बुआ जी कहां हैं ? मैं वहीं चली जाती हूं।" वह वाहर निकल आई। शीला शायद इसके लिए प्रस्तुत न थी । वह कुछ अप्रतिभ-सी हो गई। बाहर आंगन में वुझा जी एक टोकरे में कच्चे आमों के टुकड़े ३४ / विरुद्ध । समेट रही पों। पास में एक टोकरी में कुछ साबुत आम और एक विराट सरौतानुमा यंत्र रखा था जिससे शायद आम काटे जाते होंगे। "अरे तू है रजनी! आज कैसे भूल पड़ी इधर ?"बुआ जी की छोटी- छोटी बुरीट आखों ने उसका नम-शिख मुआयना किया। "अरी बाहर गर्मी में काहे ले आई इन्हें ? अन्दर विठामो हिराइंग रूम में। तुम दोनो चलो, मैं अभी आई। अरी महरी, मुनियो, ये टोकरे समेट लोजो, सुनी!" बुआ जी ने मलगी साड़ी पर हाथ पोछ । "अचार की सोची थी आज । इस साल आमो की भी अच्छी फमल नहीं हुई। क्या ऐसे ही सब..." रजनी को लगा जैसे स्वर के चिड़चिड़ेपन में उसके लिए अकारण उलाहना है, जैसे फसल खराब होने का कारण वही हो। वह कुछ रुआसी हो आई। "आप काम पूरा कर लीजिए ना। मैं तब तक शीला-शान्ता के साथ बैठती हूं।" • फिर होता रहेगा।" वा जी ने घोती के पल्लू से गर्दन का पसीना सुखाया। मारे घमौरियों के मुमीवत है । दू चल भीतर, मैं अभी आई।" इसके बाद तो बाहर रुकने की गुजाइश ही कहा रह जातो पी। वह चुपचाप शीला के साथ भीतर चली आई । बैठकमाना एक बड़ा हालनुमा कमरा था और ऊंची छत के कारण अपेक्षाकृत ठण्डा भी। उसने पसं एक ओर रख दिया और बैठ गई। "और सुनाओ शीला, कैसा चल रहा है ? शान्ता कहां गई है ?" शीला गौर से उसकी वेशभूपा का मुआयना कर रही थी 1 "ठीक हो है । बोर हो रहे हैं और क्या ? शान्ता सो रही थी, आती होगी।" "कालेज तो आजकल बन्द होगा?" "तभी तो और भी बोरियत है।" शीला के नीद से फूले-फूले चेहरे पर रूटने का एक फिल्मी भाव आया। रजनी को लगा कि उसकी सारी अदाएं और वातवीत किसी न किसी अभी या पहले की देसी फिल्मों पर विरुद्ध | ३५ चाभी रखी और गोपालसिंह को जरूरी निर्देश देकर सीढ़ियां उतर आई। धूप तेज़ होगी, यह तो उसे पता था, पर इतनी तेज़ होगी यह वह उस ठण्डे कमरे में कुछ ही घण्टे रहकर भूल गई थी। उसने धूप का चश्मा चढ़ा लिया और कार में बैठ गई। बुआ जी के घर का दरवाज़ा बन्द नहीं था; बस, उढ़का-भर दिया गया था। पुरानी चाल का हवेलीनुमा घर था। एक अजीब-से चटक नीले रंग में पुते खिड़की-दरवाजे, पुरानी वेलदार नक्काशियों से कहीं भी मेल नहीं खाते थे। बाहर कुछ सूखे झाड़ों पर चन्द बकरियां मुंह मार रही थीं। इस भांय-भांय चलती ल में बाहर दिखता भी कौन ? सारे घर पर गर्मियों की सन्नाटा-भरी उदासी और रहने वालों की मपाट ज़िन्दगी की परछाई-सी झीनी धूल की चादर पड़ी थी। वह कुछ देर असमंजस में वाहर ही खड़ी रही, फिर वगैर कुण्डी खड़काए यूं ही भीतर घुस गई। पहले दो-तीन कमरे पार करने पर भी भीतर कोई नज़र न आया तो वह कुछ सहमी-सी। "बुआ जी !" उसने गला धीरे से खंखारा। "अरे कौन है ? अरी सीला, देखियो ज़रा..." भीतर से कोई गुहार . आई। वह खड़ी रही। वगल का दरवाजा खुला। "अरे जीजी, आप!" बुआ जी की बड़ी लड़की शीला आंखें मलती खड़ी थी। शायद सोते से उठकर आई थी। इस गर्मी में नींद ? उसने चलते-चलते रश्क से सोचा। "आइए जीजी, इधर ड्राइंगरूम में आइए । अम्मा चौके में हैं, अभी आती हैं।" शीला के हाथ छिप-छिपे अपने तंग कपड़ों की सलवटें दुरुस्त कर रहे थे। "बुआ जी कहां हैं ? मैं वहीं चली जाती हूं।" वह बाहर निकल आई। शीला शायद इसके लिए प्रस्तुत न थी। वह कुछ अप्रतिभ-सी हो गई। बाहर आंगन में वुआ जी एक टोकरे में कच्चे आमों के टुकड़े ३४) विरुद्ध "हां, वो लोग वहीं है।" चुआ जी ने नायूनों पर मे कुछ गुरचा । "देख तो मान्ता, चाय का पानी खोल गया होगा, चाय-नाश्ता ले आना अच्छे से लगा के । ले!"एक भद्दे फूहडपने से उन्होंने तालियों का एक गुच्छा उमकी ओर उछाल दिया। रजनी ने प्रतिवाद में संसारने की चेष्टा की, "इतनी गर्मी में क्या तकल्लुफ..." "अरी कौन छप्पन पकवान खिला रहे हैं, हम गरीबों की रूपी-मुगी ही तो है।" रजनी की गिराएं फिर सख्त होने लगी थी। पर मे घुमते ही मकड़ी के अदृश्य जाले की तरह आ लिपटा बदरंग परापापन क्षण- क्षण और भी चिपचिपा और तकलीफदेह होता जा रहा था। उमने प्रसंग बदलना चाहा। "फूफा जी नहीं है ?" "आज मिया जी के यहां गए थे गाने पर, आते होंग।" थोडी देर चुप्पी रही। कमरे में गर्मी और नीद की पत-सी जमी हुई थी। रोशनदान के कांचो पर भी हरा कागज चिपका दिया गया था। दरवाजे-चिड़कियां वदरंग नीले पदों से ढके थे । कमरे में व्याप्त मोल-भरी गंध से लगता या कि वह कभी-कभी ही खोला जाता रहा होगा। दीवारों पर ढके दो साल पुराने कलेंडर, टेडी बतार से लगी वही-छोटी काठ की बत्तमें, पोली-पुल-अंटी दीवार घड़ी-सब चीजें मानो ररो-रसे सो गई थीं। छत पर टंगा एक पुराना सीलिंग फैन डरावनी आवाजें करता हिचकोले ले रहा था। रजनी को पंसे को घर-५ भी येहद थकी और उनीदी लगी उसने पत्न से उमड़ती जम्हाई जबड़ों में ही रोक ली। "शीला-शान्ता किस-किम क्लास में हैं अब ?" "एक बारहवी में है, एक ग्यारहवीं मे।" "कहां पढ़ती हैं ?" "यही पास में लड़कियों का स्कूल है, वही जाती हैं। यूं हमें तो लड़कियों को ज्यादा पढाना पसन्द नही, पर आजकल सब पढ़ी-लिपी विरुद्ध/३७ : --- आधारित हों। "कम से कम कालेज में दो चार सहेलियों से तो मिल लेते थे- अव तो वो भी वन्द है । कभी, वस, खुशामद से भैया ने फिल्म दिखा दी तो वस, वर्ना पड़े-पड़े झख मारते हैं । भैया की ही मौज है, बस सायकिल उठाई और चल दिए, कोई पूछता भी नहीं कुछ। इस वक्त भी मैटिनी शो देखने गए हैं।" "नमस्ते जीजी, शान्ता कमरे में आ गई थी। उसके यत्न से पहने गए कपड़े अभी-अभी बदले लगते थे। काजल की मोटी रेखा से आंखों में मद्रासी अभिनेत्रियों का-सा औचक हिरनी वाला कटाक्ष लाने की भरसक चेष्टा की गई थी। शीला-शान्ता दोनों के तंग कपड़ों से लगता था कि बुआ जी-फूफा जी के अनुशासन को शायद कपड़ों के मामले में काफी ढील दे दी जा चुकी थी, हालांकि जिस काट की चुस्त कमीजें और पाजामे दोनों बहनों ने चढ़ाए हुए थे अव फैशन में थे भी नहीं। उनके आवश्यकता से ज्यादा गदराये शरीरों पर वे चुस्त लिबास और भी ज्यादा कसे-कसे और फूहड़ लग रहे थे। "उठ गई ?" रजनी कुछ हंसी, पर लगा कि शान्ता कुछ कुढ़-सी गई। उसने बड़ी बहन की ओर इशारा किया, "इन्होंने कहा होगा। खुद भी तो खरटि ले रही थीं।" :: रजनी ने कुछ अप्रतिभ होकर बात संभालने की चेष्टा की, "तो क्या हुआ ? इतनी लम्बी दोपहर वर्ना कैसे कांटेगी ?" पर्दा हिला, तो वह चुप हो गई। पर्दा हटाकर बुआ जी भीतर आई। रजनी ने नोट किया कि उन्होंने भी धोती बदल ली थी। अचानक उसने अपने को बहुत 'वेगाना महसूस किया । शायद न आती तो बेहतर था, पर अब सोचने से क्या फायदा? "पहाड़ नहीं गईं तुम इस बेर? आनन्द भैया-भाभी तो गए होंगे?" बुआ जी एक निखालिस कस्वाई मुद्रा में जांघों के बीच धोती उड़सती तख्त पर बैठ गई। . ३६ / विरुद्ध "हां, वो लोग वहीं हैं।" बुआ जी ने नाखूनों पर से कुछ युरचा। "देख तो मान्ता, चाय का पानी खोल गया होगा, चाय-नाश्ता ले याना अच्छे से लगा के। ले!" एक भद्दे फूहडपने से उन्होंने तालियों का एक गुच्छा उसकी ओर उछाल दिया। रजनी ने प्रतिवाद में पंखारने की चेष्टा की, "इतनी गर्मों में क्या तकल्लुफ.. "अरी कौन छप्पन पकवान खिला रहे हैं, हम गरीबों की रूखी-मूखी ही तो है।" रजनी की गिराएं फिर सस्त होने लगी थी। घर में घुमते ही मकडी के अदृश्य जाले की तरह आ लिपटा बदरंग परायापन क्षण- क्षण और भी चिपचिपा और तकलीफदेह होता जा रहा था । उमने प्रसंग बदलना चाहा । "फूफा जी नहीं हैं ?" "आज मिश्रा जी के यहां गए थे खाने पर, आते होंगे।" थोड़ी देर चुप्पी रही। कमरे में गर्मी और नीद की पत-सी जमी हुई थी। रोशनदान के कांची पर भी हरा कागज चिपका दिया गया था। दरवाजे-खिड़किया बदरंग नीले पदों से ढके थे। कमरे में व्याप्न मील-भरी गध से लगता था कि वह कभी-कभी ही खोला जाता रहा होगा। दीवारों पर ढके दो माल पुराने कलेंडर, टेढी कतार से लगी बडी-छोटी काठ की बत्त, पीली-धूल-अंटी दीवार-घड़ी-सब चीजें मानो रखे-रसे सो गई थी। छत पर टंगा एक पुराना सीलिंग फैन डरावनी आवाजें करता हिचकोले ले रहा था। रजनी को पंसे की चरं-चूं भी बेहद थकी और उनीदी लगी। उसने यत्न से उमड़ती जम्हाई जबड़ों मे ही रोक ली। "शीला-शान्ता किस-किम क्लास मे हैं अब ?" "एक बारहवी में है, एक ग्यारहवी मे।" "कहां पढती हैं ?" "यहीं पास में लड़कियों का स्कूल है, वहीं जाती हैं। यूं हमे तो सडकियों को ज्यादा पढ़ाना पमन्द नहीं, पर आजकल सब पढ़ी-लिखी । विरुद्ध | ३७ - लड़की ही मांगते हैं सो भेज दीं।" मानो लड़कियां आलू के बोरे हों, जिस गोदाम-तहखाने में चाहो पटक दो। "तो फिर और आगे पढ़ाइएगा ?" "नाहीं।" वुआ जी ने गौतम बुद्ध की मुद्रा में पंजा फैलाया ।. "लड़के-लड़कियों का साथ-साथ कालिज में पढ़ना हमें कतई पसंद नहीं। आग-धी का साथ क्या? ज्यादा की हैसियत होती तो तुम्हारी विल्लो की तरह अंगरेजी लड़कियों के कालिज भेजते, पर सो तो है नहीं।" रजनी ने साड़ी के पल्ले से एक धागा खींच लिया था, उंगली में लपेटने लगी। "शादी की बात चल रही है कहीं ?" "हां , खास नहीं." बुआ जी चुप हो गई। रजनी को लगा शायद उसे यह नहीं पूछना चाहिए था। फिर वही बात का कोई सूत्र तलाशने की बेचैनी । बुआ जी के लड़के का नाम ही याद नहीं आ रहा था वर्ना उसके बारे में पूछ लेती । उसे हल्की-सी याद है कि कभी उसकी बेकारगी या वेचारगी को लेकर घर में कुछ बात हुई थी। पापा से किसी नौकरी के लिए उसकी सिफारिश को कहा गया था शायद । पर उनका कहना था कि लड़के की कोई भी ऐसी विशेषता नहीं जिसे गिनाकर वे उसका ' केस प्रमोट कर सकें। शायद बुआ जी की रुखाई का एक कारण यह भी हो। पता नहीं यह चाय कब आएगी, उसने कसमसाकर सोचा। "तू यहां का बैठी है, सीला का हाथ बंटवा दे ना।" वुआ ने शान्ता को इशारा किया । शान्ता काफी स्पष्ट अनिच्छा से उठी, फिर एक जिद्दी सटके से कूल्हे हिलाती चल दी। शायद वह न होती तो मां-बेटी में झड़प हो जाती, उसे बुआ जी की त्योरियां देखकर लगा। "दिनेस सनीमा गए हैं।" बुआ जी ने खुद ही कहा। दिनेश ! हां यही तो नाम था। दुबला, निष्प्रभ चेहरा, मोटा चश्मा और तोते की-सी नाक-एकदम फूफा जी का युवा रूप। "किस क्लास में है ? । । ३८/विरुद्ध "एमेस्मी में है। गए माल फिर पर्चा विगड गया था।" बुआ जी ने एक विवाईदार पर मे दूसरा पर सुजाया। उसे फिर जोरो से जम्हाई आने लगी। जाने दोनों बहने ताली लेकर कहा अलोप हो गई थी। "और कहो !"बुआ ने जूड़ा ममेटते हुए उसे प्रश्नमूचक निगाहों मे देना। स्वर कुछ धीमा हुमा, "पीली लग रही हो, कुछ है क्या?" प्रश्न की मोही आत्मीयता से रजनी के भीतर कहीं कुछ विदक गया । "नही तो,"उसका स्वर जरूरत से ज्यादा रखा था क्या ? उमने नमी लाने की चेप्टा की, "गर्मी से ही दमा हो शायद ।" अब की उसे लगा कि स्वर में दयनीयता ही ज्यादा थी। उसे अपने पर गुम्सा आने लगा। "हा, वैसे तो आजकल तुम लोग जल्दी लिपत में फमना नहीं चाहते। हमारे ज़माने में तो साल पीछे गोद नहीं भरी तो..." बुआ जी ने अगूठे से गाल खुजलाया। तब फिर इन्हें पूछने को क्या पड़ी थी भला? वाहर किवाह उइकाए जाने की आवाज आई। "ये होंगे" बुआ जी ने जांपों पर हाथ रखकर बदन तोला और उठकर लसर-पसर बाहर चली गई। रजनी को बेहद नींद आ रही थी। उसे अपना ठण्डा सुकून-भरा कमरा याद आया। काश, इमी तख्त पर पसर कर सो सकती! रूमाल से चेहरा पोछते फूफा जी कमरे में घुसे । "हल्लो जी, कब आई ? बैठो बैठो । अरे भई, कुछ नाश्ता-पानी मंगाओ रजनी के लिए।" "ला रही है सोला-सान्ता" चुना जी का स्वर झगड़ालू ढंग से नक्की हुआ। "तुम्हें वही देरी हो गई ?" "हा जरा बैठ गए थे।" फूफा जी ने झड़प के आमत्रण को सफाई से टालते हुए, अधिकार से हांक लगाई, "जरा पानी लाना।" फिर प्रभाव परखने के लिए कनखियों से उन्होंने रजनी की बोर ताका । उनके ढोले-दाले दुवले शरीर पर अचानक ही एक तोंद निकल आई थी और. कमर से नीचे का भाग फैलकर रह गया था। मुग्गे-सी नाक तले मूंछों की एक पतली रेख पी, जैसे कोई कनखजूरा लेटा हो। छोटी-छोटी मासों विरुद/१६ हो मांगते हैं सो भेज दीं।" मानो लड़कियां आलू के बोरे हों, जि -तहखाने में चाहो पटक दो। 'तो फिर और आगे पढ़ाइएगा ?" "नाऽऽहीं।" बुआ जी ने गौतम बुद्ध की मुद्रा में पंजा फैलाया ।. ड़के-लड़कियों का साथ-साथ कालिज में पढ़ना हमें कतई पसंद नहीं। ग-धी का साथ क्या? ज्यादा की हैसियत होती तो तुम्हारी विल्लो । तरह अंगरेजी लड़कियों के कालिज भेजते, पर सो तो है नहीं।" रजनी ने साड़ी के पल्ले से एक धागा खींच लिया था, उंगली में लपेटने लगी। "शादी की वात चल रही है कहीं ?" "हां 5, खास नहीं..." बुआ जी चुप हो गई। रजनी को लगा शायद उसे यह नहीं पूछना चाहिए था। फिर वही बात का कोई सूत्र तलाशने की वेचैनी। वुआ जी के लड़के का नाम ही याद नहीं आ रहा था वर्ना उसके बारे में पूछ लेती । उसे हल्की-सी याद है कि कभी उसकी वेकारगी या वेचारगी को लेकर घर में कुछ बात हुई थी। पापा से किसी नौकरी के लिए उसकी सिफारिश को कहा गया था शायद । पर उनका कहना था कि लड़के की कोई भी ऐसी विशेषता नहीं जिसे गिनाकर वे उसका केस प्रमोट कर सकें। शायद बुआ जी की रुखाई का एक कारण यह भी हो। पता नहीं यह चाय कब आएगी, उसने कसमसाकर सोचा। "तू यहां का बैठी है, सीला का हाथ बंटवा दे ना।" बुआ ने शान्ता को इशारा किया। शान्ता काफी स्पष्ट अनिच्छा से उठी, फिर एक जिद्दी झटके से कूल्हे हिलाती चल दी। शायद वह न होती तो मां-बेटी में झड़प हो जाती, उसे बुआ जी की त्योरियां देखकर लगा। "दिनेस सनीमा गए हैं।" वुआ जी ने खुद ही कहा। दिनेश ! यही तो नाम था। दुवला, निष्प्रभ चेहरा, मोटा चश्मा और तोते की- नाक-एकदम फूफा जी का युवा रूप । "किस क्लास में है ?" ३८ / विरुद्ध "एमेस्मी मे है । गए माल फिर पर्चा बिगड़ गया था।" बुआ जी ने एक विवाईदार पर से दूसरा पर सुनाया। उसे फिर जोरों में जम्हाई भाने लगी । जाने दोनों बहनें ताली लेकर कहां अलोप हो गई थी? "और कहो !" बुझा ने जूडा समेटते हुए उसे प्रश्नमूचक निगाहों से देखा । स्वर कुछ धीमा हुआ, "पोली लग रही हो, कुछ है क्या ?" प्रश्न की भोंडी आत्मीयता मे रजनी के भीतर कही कुछ विदक गया। "नही तो,"उसका स्वर ज़रूरत से ज्यादा रखा या क्या? उसने नर्मी लाने की चेप्टा की, "गर्मी से ही वमा हो शायद ।" अब की उसे लगा कि स्वर में दयनीयता ही ज्यादा थी। उसे अपने पर गुस्सा आने लगा। "हा, वैसे तो आजकल तुम लोग जल्दी लिपत में फमना नहीं चाहते। हमारे जमाने में तो साल पीछे गोद नहीं भरी तो..." बुआ जी ने अंगूठे से गाल खुजलाया। तब फिर इन्हें पूछने की क्या पड़ी थी भला? बाहर किवाड उढकाए जाने की आवाज आई। "ये होंगे" मा जी ने जाधों पर हाथ रखकर बदन तोला और उठकर लसर-पमर बाहर चली गई। रजनी को बेहद नीद आ रही थी। उसे अपना ठण्डा सुकून-भरा कमरा याद आया। काश, इमी तख्त पर पसर फर सो सकती! रूमाल से चेहरा पोंछते फूफा जी कमरे मे घुमे। "हल्लो जी, क्व आई? वैठो-बैठो । अरे भई, कुछ नास्ता-पानी मंगाओ रजनी के लिए।" "ला रही है सीला-सान्ता" बुआ जी का स्वर गड़ालू ढग से नक्की हुआ। "तुम्हे बड़ी देरी हो गई?" "हां जरा वंठ गए थे।" फूफा जी ने झड़प के आमश्रण को सफाई से टालते हुए, अधिकार से हाक लगाई, "जरा पानी लाना।" फिर प्रभाव परखने के लिए फनखियों से उन्होंने रजनी की ओर ताका। उनके दीले-ढाले दुबले शरीर पर अचानक ही एक तोद निकल आई थी और कमर से नीचे का भाग फैलकर रह गया था। मुग्गे-सो नाक तले मूंछों की एक पतली रेख पी, जमे कोई वनमजूरा लेटा हो । छोटी-छोटी आखो - विस्ट/२६ गोल चेहरे पर एक ऐसी दीन प्रसन्नता छाई थी जैसे हर वक्त के पर हंसने को तत्पर हो । रजनी को उनकी पनियाली आंखें देख- पता नहीं क्यों रेस्ट हाउस के कुत्ते की याद आ गई। 'याक् ।' उसने र अटकारा "बड़ी गर्मी है।" "हूं।" फूफा जी ने बुआ के हाथ से गिलास लेकर लम्बा-सा चूंट लया । "तुम्हें तो इसकी एकदम आदत भी नहीं होगी। क्या नाम, हमेशा मियों में पहाड़ ही चले जाते थे तुम सब । इस वार नहीं गई ?" "नहीं, इस बार नहीं।" "वैसे पूछना क्या, एयरकंडीशनर तो होगा ही, उदय इतने सा बाहर रहे हैं, साथ में लाए ही होंगे।" उमने कहना चाहा कि एयरकंडीशनर तो है ही नहीं पंखा भी खालिस हिन्दुस्तानी है, फिर चुप रही। क्या ज़रूरत इस सबमें पड़ने की। "हां, इनका क्या, सव सम्पदा घर में ही ठहरी । सामान-वस्त हो तो पहाड़ जैसी ठण्डक में यहीं रह लो। वहां जाकर क्या करना ?” बुआ जी सरौते से छाली कतर रही थीं। "खैर, आनन्द भैया की दोनों लड़कियां जैसे घर से आई, वैसे ही घरों में गई, हमें तो खुशी ही है।" बुआ जी ने निःश्वास छोड़ी। "वैसे ऐसे ही टैम लड़का काम आता। लड़कियां तो व्याह के अपने-अपने घर की हुईं। हम तो सालों तक भैया से कहते रहे कि भगवान की दया हो तो क्या पता तीसरी बार लड़का, पर उनकी जिद्द थी कि बस दो ही चाहिए। खैर, राजी-खुशी रहें सव; हां, अकेले उन्हें खूब लगता होगा । दामाद लाख हो, हुए तो पराये ही।" उन्होंने हथेली फैलाकर फूफा जी को सुपारी पेश की। उन्होंने एक दवी डकार छोड़ते हुए, कुछ कतरे उठा लिए। "उदय कैरे - "ठीक हैं।" रजनी को अपना स्वर रुआंसा लगा। "अव तो सुना कम्पनी में और तरक्की पर पहुंच गए हैं । कहीं 3 ४० / विरुद्ध बाहर जाने का इरादा है कि अभी यही रहेगे?" "फिलहाल तो नहीं है।" रजनी के हाथ साडी में छोटी-बड़ी चुन्नटें डाल-बिगाड़ रहे थे "हां, वह तो बड़े, क्या नाम, आदर्श वाले हैं, वर्ना वाहर के पढ़े-लिखो को तो पया नाम, अपने देश का अन्न-पानी फिर रास नहीं आता।" अपनी वक्तृता पर गद्गद होकर वे हंसे, फिर गंभीर हो गए। "एक रिक्वेस्ट है हमारी बेटा, उदय से ज़रा कहना कि हमारे दिनेश के लिए जगह देने कही। उसके तो, क्या नाम, बड़े अच्छे व नेक्शन हैं और भी कम्पनियों में, चार लोगों में ज़रा बात ही करें।" "जी," रजनी या हलक मूग रहा था। "हम तो चाहते थे कि नौडा इजीनियरी कर ले पर इसके हाल तो बस ऐसे ही है। दो साल से एमेस्मी में है, अव देखो इस बार क्या होता है ?" बुझा जी ने तस्त के नीचे घपलें तलाशने को पांव डाले, "भाग्य ही यौटा है वैचारे का वर्ना कैसे-कैसे तो निकल जाते हैं। मदद के नाम कोई तिनका तोड़कर दो नहीं करता। कह सब देते है कि कोलिफिकेसन नही है। अरे करना चाहे तो लोग यूं करा दें।"उन्होने हवा में चुटकी-सी बनाई। इंगित शायद पापा के असहयोग के ही लिए था। रजनी की लवें सुर्व हो गई । अव वह चली ही जाएगी। भाड़ में जाए इनकी चाय। वह कोई 'यहाना तलाश ही रही थी कि पर्दा हिला यौर ट्रे और प्लेटों सहित शीला- शान्ता प्रकट हुई। फूफा जी की खुशी वातावरण को कुड़वाहट के बावजूद बरकरार थी। उचककर उन्होंने ट्रे में झांका, "यह क्या? चाय ?" फूफा जी का बचकाना उत्साह रजनी को गढ़ रहा था। "कोककोला, फैण्टा कुछ मंगाती। क्या इतनी गर्मी में तुम भी..." बुआ जी ने बहुत अर्थपूर्ण नजर से देख-भर लिया पर वोली कुछ नहीं । रजनी खिसिया-सी गई । "अरे तुम लोगों ने तो बहुत कुछ कर डाला।" उमको हंसी माफी-मी माग रही थी। उत्तर में शीला-शान्ता ने रटी-रटाई मुस्कानें दो और प्लेटें यमाने लगीं। 1 । 1 C..

"नमस्ते, खुश रहो।"बुआ जी भीतर मुड़ गई। ड्राइवर ने ' - जैसे-तैसे चाय खत्म करके उसने सुपारी मुंह में डाल ली "अच्छा वुआ अव चलूंगी। काफी देर हो गई। अब आप लोग भी आराम करें।" "अरे इस गर्मी में क्या आराम करना? आराम तो वे ही लोग कर कते हैं जिनके पास साधन हों। बरीसान्ता,ये टिरे रसोई में रख देना और कवाड़ लगा देना, चितकबरी विल्ली तुरत भीतर घुस आती है वर्ना।". बुआ जी उठ खड़ी हुई। फूफा जी की व्यस्त प्रसन्नता वरकरार थी। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि अपने हाथों का क्या करें। बार-बार वे दोनों हाथ मलते, फिर सीने पर उन्हें बांधकर बगल में मुठ्ठियां दवा लेते। "क्या बताएं वेटा, कोई खातिर तुम्हारी नहीं कर पाए। सुदामा के, क्या नाम, तण्डुल ही सही, हैं हैं हैं, अब कभी खाने को बुलाएंगे तुम्हें ठीक से । तुम्हारी बुआ जी,क्या नाम, दही-बड़े बहुत बढ़िया वनाती हैं- एक्सीलेण्ट ।" उन्होंने हवा में हाथ नचाए। "क्या वढ़िया ! उन्हें तो रोज गोस-मच्छी खाने की आदत होगी। हमारा घासपात क्यों कर रुचेगा? अरी सीला, ये पंखा वन्द कर देना, मरा विजली का बिल भरते-भरते मुसकिल हो जाती है वर्ना।" वुमा जी ने सरीता माले पर रख दिया और बाहर निकल आई। लड़कियों ने बाहर " माने का उपक्रम किया तो फूफा जी ने घूरकर देखा। "तुम लोग क्या करोगी इस धूप में, वाहर ? यहीं से नमस्ते वाई-बाई कर लो।" शीला-- शान्ता घबराकर लोट गई। फूफा जी के आते ही दोनों को मानो सांप सूंघ गया था। "आप वैठिए बुआ जी, धूप बहुत है-गाड़ी यहीं खड़ी है।" बुआ जी का चेहरा भावहीन था। 'अच्छा, आना फिर कभी। त तो भाई कार वाली हो। हमारा तो इस गर्मी में रिक्से से आना-ज मुश्किल पड़ता है। तुम्हीं आ जाया करो, वर्ना एक शहर में हो, हम ही जाते हैं।" "आऊंगी।" उसने हाथ जोड़ दिए, "अच्छा नमस्ते।" ... ४२ / विरुद्ध स्टार्ट की तो उसने फिर हाय जोड़े, "अच्छा फूफा जी।" "अच्छा भाई, दिनस वाली बात याद रखना, अच्छा ?" "जी।" ३ कुछ क्षण बाहर की गर्मी से वाण पाकर बहुत अच्छा लगा पर धीरे- घोरे पंसे की परिचित फडफड़ाहट और कमरे की परिचित गंध से वही कुलयुताता शून्य उमके चारों ओर घोरे-धीरे तनने लगा था। उसने तकिये में सिर गढ़ाकर सोने की कोशिश की, पर कुछ ही देर पहले जोड़-जोड़ में उमड़ती नीद न जाने कहां गायव हो गई। अपनी हल्की हरी शान्त स्थिरता में डूबा वह कमरा भी अलसाया पड़ा था। उसने गिलाम पर ठण्डा पानी ले लिया और सहरा-सहराकर पोने लगी। मां चिट्ठी का इंतजार करती होंगी। विल्लो वर्गरा आते तो शायद उन्हें इतनी उत्सुकता उसके आने की न होती। विल्लो को चिट्ठी का जवाब भी देना होगा। पर अभी तो कुछ दिन वे लोग अलग-अलग जगहो पर घूमते रहेंगे । न्यूयार्क के पते पर ही वाद को लिदेगी। उसने पानी का साली गिलास रसोई में रस दिया। इस बार मां को काफी अकेला लग रहा होगा। वर्ना हमेशा गर्मियों में उनके साथ दोनों बेटियों में से कोई न कोई रहती ही थी। पर वैसे बिल्लो पिछली बार ही कह रही थी कि अव में हर साल के बजाय हर दूसरे माल आया करूंगी। उसे तो ललक होती ही है हर बार, पर बच्चे बहुत उपता जाते हैं । वहा उनके ढेरों हमउम्र संगी-साथी हैं, टेलीविजन पर ढेरों रगोन प्रोग्राम हैं, फिर यादतें भी वहां रह-रहकर विगड़ गई हैं। यहां के दूध मे उन्हे बू आती है, फल बेस्वाद लगते हैं, खाना बहुत ही मसा- लेदार और अरुचिकर। नरेश भाई कह रहे थे कि पिछले साल ही अड़ गये थे कि हमको यही छोड जाओ, तुम दोनों हो आओ। सो हमने यही तप किया कि एक साल छुट्टियों में इनके मन को करेंगे, दूसरे साल अपने दोनों विरुद्ध |४३ की या दरअसल विल्लो की। नरेश भाई काकर हंस पड़े थे पर विल्लो भिच गई थी, “जैसे मैं तुम्हें वींचकर लाती हूं न? मत जाया करो। मैं अकेली भी सफर कर सकती हूं।" "ओहो भाई रिक्स।" नरेश भाई कतिपय तलखी से ऊ गए थे। उसने नोट किया कि वे पीछे से गंजे हो चले थे, हालांकि उचमी जिन्दगीने बदन में अभी कसाव था। फिर विल्लो भी उठकर चली गई थी। ...कि...' फोन जाने कब से बज रहा था। वह कूदी। गोपालत्तिह भी चला गया था। "हलो!" उदय की आवाज सुनकर उसे गहरी आश्वस्ति हुई, जैसे कि एक गहरी खाई में झांकते हुए चकराकर गिरने बाली हो कि आवाज ने थाम" "क्या हाल है ?" उदय का स्वर हंसमुख था। शायद वह व्यवस्थित होती तो, उनी लहजे में जवाब दे देती। पर अभी वह कुछ अचकचा-सी गई। "कुछ खास बात?" दरअसल वासु फैमिली पहाड़ जा रही है। मैं पूछना चाहता था कि अगर जाना हो तो अभी भी रिजर्वेशन हो सकता है।" "क्या जरूरत है ?" रजनी को अपनी जावाज कुएं से बाती-जी लगी। पक्का? फिर बाद में गर्मी का रोना मत रोना।" "नहीं, पक्का।" उसने फोन रख दिया और बाथरूम में घुसकर देर तक कपड़ों समेत भीगती रही। कल मदरासन जो भी सोचे । कपड़े बदल- कर वह चप्पल पांव में डाल रही थी कि घण्टी बजी,मोह पोस्टमैन । उसने उदासीनता से सोचा। पहले तो वह पोस्टमैन की बाहट पाते ही वेतहाशा भाग पड़ती थी, चाहे जिस हालत में भी हो। शुरू-शुरू की बात है। तब चिट्टियां भी तो ढेरों आती थीं, उसके दोस्तों की, अध्यापिकाओं की, घर वालों की मां और विल्लो के खत छोटे-छोटे बचकाने विवरणों से भरे रहते थे : 'जानती हो नाज कनाट प्लेस में किसे देखा? वही डान जुबान राकेज मेहता। साथ में एक बड़ी सुन्दर लड़की थी। वही होगी जिसके बारे में मधु बताती थी। स्कूल की डीन के पर्दे बदल गए हैं, सामने का भ ४४ विरुद्ध ... लान और बड़ा किया जा रहा है."तुम्हारी बिल्ली के चार बच्चे हुए है,हा, आया की लड़की की भी शादी हो गईं, तुम्हे बहुत याद करती थी, तुम्हारे ही कपड़ों पर पली थी वेचारी याद है?' याद है? याद है ? याद है? नहीं, उसे कुछ भी याद नहीं। वह कुछ याद करना भी नहीं चाहती। म जाने कब चिट्ठिया खुद-बग्वुद फार्मल होती चली गई। कूल की सालाना मंगजीन भी कभी आती है तो उसमें सब चेहरे नये दीसते हैं, उसकी फ्यादातर क्लास सहेलियों के व्याह-बच्चे हो चुके हैं, एकाध की तस्वीर भी मुद्धन्दर पति या गदयदे बच्चे के साथ मैगजीन के पुरानी छात्राओ वाले कोने में कभी दिन जाती है। उसके मन का कोई ठण्डा कोना इन कतरनो को वीनता-भुलाता रहता है, बस । उसे लगता है कि कभी इन सबसे दुवारा भेंट हो भी तो आपस में उन्हे कहने को कुछ नहीं बचा होगा। दरवाजे पर अंग्रेजी की एक महिला-पत्रिका पडी थी, एक बिजली का विल, उसने बिल ऐश ट्रे से दबा दिया और कुर्सी पर लेटी-लेटी पत्रिका के पन्ने पलटने लगी। सुन्दर सुडौल विदेशी परिधानों में लिपटी देशी माडल्स तकरीबन हर पन्ने पर मुस्करा या इतरा रही थी। दुवले होने की आयासहीन तरकीवें, क्या आप वही लड़की हैं जिससे आपके पति ने प्यार किया या? कपड़ों-पानी को कीमती गेवाकलर तस्वीरें, हसती हुई गदराई समाजसेवी गृहिणियां जो पुष्प-सज्जा की साकर्षक प्रदर्शनी में रेशमी फीता काट रही है, फिर एकाध रोमाण्टिक कहानी, मद के चौड़े खुरदरे कधे पर मिर टिकाए अघवेहोश तन्वंगी, 'और फिर उसने मुझे चूम लिया और मेरे चारो ओर सितारे नाच उठे। सितारे नाचेंगे? हह ! उसने पमिका पटक दी। जाने क्यों यह कबडा मंगवाती है वह । भाषा ही नही, खाने- पहनने के नुस्मे तक एक नकली पश्चिमी रंग में डूबी हुई रंगीन तस्वीरे- भर। दुवले होने के आयासहीन ढंग! उसे रेस्ट हाउस में खेलते चौकीदार के नंगे, रेंट वहाते बच्चे याद आए । मटके से फूले पेट और सीक से हाय- पांव । माया के बच्चे भी तो, जब वह गांव से शुरू-शुरू मे आई थी,ऐसे ही थे। खाने के बचे अवशेपो पर कुत्तों की तरह गुर्राकर टूट-टूट पड़ते हुए । मां उन्हें देखती और सिर हिलाकर मृदु स्वर में शोक व्यक्त करती, 'उफ् कसी गरीबी है हमारे देश में ! वेचारे !' शायद उसी टोन में जिस टोन में वह कहती है, 'उफ कैसी गर्मी पड़ती है हमारे देश में, नहीं ?' और शायद इसीलिए उसे ऐसे वोलता सुनकर उदय झटके से कुछ कड़वा-सा सच उसके बारे में कह जाता है जिसपर वह घण्टों तन्नाई फिरती है। अपनी कमजोरियों का खुद मजाक बनाना एक बात है पर उन्हींको दूसरे के मुंह से सुनकर स्वीकार करना और, नहीं ? पर फिर क्या उसकी सारी जिन्दगी दूसरों के फतवे ही स्वीकार करने की प्रक्रिया-भर बनकर नहीं रह जाएगी? क्या इसी सिर-झुकाऊ विन- भ्रता ने उसकी मां के व्यक्तित्व को कुतरकर बौना नहीं बना डाला है ? खाओ तो, पहनो तो दूसरों की पसन्द का। दोस्त भी बनाओ तो दूसरों की पसन्द के। इसीलिए आज रात के डिनर में बी० एम० के घर जाने का उसका मन कतई नहीं था। चकोतरे-से गोल और खुरदुरे चेहरे वाली सिर से चौगुने आकार का जूड़ा वांधे मिसेज़ वोहरा को देखकर उसके भीतर सदा कुछ ऐंठकर फिरण्ट हो जाता है। उनके स्लीवलैस ब्लाउज से उबली-सी पड़ती वांहों पर छितराए-छितराए चेचक के टीकों के पुराने निशान, उनकी इन-गंधाती चुम्वनयुक्त आत्मीयता, उनके गंजे पति का गोल-गोल अंग्रेज़ी लहजा सब एक भोंडी कामेडी के अंग लगते थे, जिस- पर हंसी कम गुस्सा ज्यादा आता है। यूं चाहे तो लड़-झगड़कर इस सव- को टाला भी जा सकता है,पर फिर वही रवड-सी खिंचती बहसें, नाटकीय संवाद, नहीं! इस तरह तो मैं कुछ भी नहीं कर पाऊंगी । निराशा से आरामकुर्सी में धंसते हुए उसने सोचा । ढीले हाउसकोट की फांक से उसका चिकना घुटना कुछ दीख रहा था-बच्चे की पीठ की तरह नर्म और साफ । उसने धीरे से उस गुलावी कोमलता को छुआ। मैंने आखिर चाहा क्या था कोई वहुत भारी फलसफाना सफाई तो नहीं, सिर्फ यही-भर जानना कि मेरा निजी प्रयोजन क्या है ? किसी रूमानी भावावेश में फुसलाए ? फुसलाए जाने ४६ / विरुद्ध के बजाय । क्या यह बहुत बड़ी आकांक्षा है ? या जिस बेलाग निनोरन को वह तलाशती रही है वह इस सरहा और आराम-परी जिन्दगी के परे गड़ी चुनौतियों को टालने का एक आसान बहाना-भर है ? 'ट्री' घण्टी को कर्कश आवार से वह पोंकी। न जाने कब कुर्सी पर बैठे-बैठे ही आस लग गई थी। गोपालसिंह तो आज शाम की छुट्टी लेकर गया था। तब कौन हो सकता है ? एक हाप से जम्हाई छकते उसने कलाई-घडी देखी। छ बज चुके थे। न जाने वह कितनी देर सोती रही होगी! उदय बहुत वचन हो जाता है, यदि तुरन्त दरवाजा न मुले तो अपने को वटोरती वह हडबडाकर दरवाजा खोलने को लागी । घण्टी फिर बजी। 'ट्रीs! ' उफ,कितनी बार सोचा है कि उस कर्कश आवाज वाली घण्टी को बदलवा डालेगी, किन्तु फिर भूल जाती है, और एक उदय है कि मिनट- भर भी रुक नहीं सकता, जैसे कि घण्टी दबाने भर से ही दरयाचा धुल जाएगा। उसने एक हाथ से ऊनीदी आयें मलते-मलते दूसरे हाथ में दरवाजा खोला। उदय वेचनी से धूप के पश्मे को डण्डी पकहकर उसे चुभाता बहा था, "उफ, अभी तक ऐसी गर्मी है!" वह मीधा उस कुर्मी में जा घसा जिसमे वह बैठी थी। "आ!"मंण्डिल घटकारते हुए उसने एक कुशन मिर के नीचे रखा और पसर गया। "अरे गोपालसिंह ! एक गिलास पानी देना!" "उसको तो आज शाम को छुट्टी है न !" उमने फिज धोला। "ओह हां, अच्छा।" उदय ने एकमाप पूरा पानी पीकर गिलाम आगे बढ़ाया, "और देना तो ज़रा! इतनी उनीदी क्यों लग रही हो? सो रही थीं क्या ?" "तुम्हारा विजिट कैसा रहा? कोई मिता?"

" रागी थे।" रजनी पुछ अटक-सी गई। "गर्मी बहुत थी।" "।" उदय उसे सीधा.तकारहा था। उसगी बेबाक परगती हुई नज़र के सामने वह हमेशा अपने को बहुत होन और छोटा महमूरा गरने लगती है। "तुम रिजर्वेशन के लिए मना गयों कर दिया?" गोसे ही।" रजनी पारा गढ़ी पत्रिका के पन्ने पलटने लगी, बेकार हो। " जरा नहा लू ।" उदय उठ खड़ा हुभा । वह जाने गो उठा तो रजनी ने पनिगा एक और गो रख दी, "सुनो।" "गया?" वह पूछना चाहती थी गि गया शाम को वी० एम० के घर जाना बहुत ज़रूरी है ? पर चुप रही। "पुछ नहीं।" बाथरूम से शावर की लगातार आवाज आ रही थी। वह पलंग पर बैठगार पर शुलाने लगी। गाभी उसे अपनी गुटोल टांगों के कारण स्कूल में मालिन डिएट्रिच गाहा जाता था। उसने हाउराकोट उतारगार फर्श पर बाल दिया और लम्बे आईने के सामने खड़ी होकर परों को लचकायार देखने लगी जैसे गोवरे सांरारा करती हैं। फिर वह मुस्कराई। "हेलो मालिन।" पावर की आवाज थम गई थी। उसने तमीपा से हाउसकोट लपेट लिया और पलंग पर बैठ गई। उदय तोलिया लपेटे-लपेटे निगाला। "गया वजा है?" "साहेछः।" रणनी गालों को उसको गधेगा ताजा ठण्डा स्पर्श मला लगा। यह स्पर्श उतना ही परिचित था जितना उसके अपने घुटने की गोल नाई। ऐसे समय खुशी कितनी भासाग और चौगन्नी होती है, नहीं ? कुछ भी पाहे वगैर । काम, उसका गन उतना ही सहज और उदार हो पाता जितना इस क्षण उसका बदन होता जाता है ! वह अन्यमनस्प-सी हंसी। उदय या तृप्त गाथा उसमे कंधे पर था। उसने अपने-आपको बहुत भरपूर महसूस ४F / विपक्ष वि-२ । किया। पर थोड़ी देर को ही 1 मईक पर एक स्कूटर कर्कश आवाज ने सन्नाटे को चीरता निकल गया। चीजें मानो फिर अपनी शंका-भरी जहता में लौट रही थी। उसके बदन तले दया दाहिना हाय उदय के वोह मे मुन्न हो रहा था। उसने धीरे से हाथ छुड़ाकर करवट बदल ली। "क्या सोच रही हो?" "तुम हर वक्त यही क्यों जानना चाहते हो कि मैं क्या सोच रही हूं?" "क्योंकि मैं तुम्हें जानना चाहता हूं।" उदम ने उसका कंधा पकड़कर जबरन अपनी ओर मोड़ लिया था। उमने फिर एक उग्र विरोध में अपने आपको पनाकर नुकोला और मतर होता महमूस किया। "तुम समझते हो कि जवरन मुझसे अपनी पसंद की बात कहलवा सकते हो? वह भी सिर्फ इसलिए कि अपनी ताकत से तुम मुझे इस तरह.." उदम का हाथ तुरंत ढीला पंड गया । जैसे अगारा छू गया हो। एक बार उसने सोचा कि शायद वह ज्यादा ही अशिष्ट बात कह गई। पर भीतर टूटी मुई की किर्च-सी चुभी। शिप्टता और क्षमादान का ठेका उसीने लिया है क्या? वह उठकर बैठ गई। "चलो बाहर चलकर बटते हैं । यव तक गर्मी कम हो गई होगी।" उदय पोड़ी देर से ऐसे गौर से ताकता रहा जमे वह पुरानी दीवान को कोई घुघली काईदार इवारत पढ रहा हो। 1. "मैं मोच रहा हूं कि तुम किमसे ज्यादा डरती हो, मूझसे या अपने. - "क्या बकवास है !" उमने हंसना चाहा पर हम नहीं पाई। 'नहीं, मच मे।" उदय कुहनी के बल उठ गया, "तुम जानती हो जय विल्लो के घर में मैंने तुम्हें पहली बार देखा था तो तुम्हारे बारे में सबसे अनोखी चीज मुझे क्या लगी थी ?" "क्या?" मुम्मे के कालेपन के बीच कुतूहल को कच्ची कोंपल फूट ही पड़ी थी। 1 आपमै ?" .

' "जिम वक्त और सब लोग मजे में एक-दूसरे से हंस-बोल रहे थे, तुम इस कदर नाराज और घबराई हुई लग रही थीं जैसे गलती से पार्टी के बीच घुस बाई हो।" "और तुम्हारा बड़प्पन पिघल गया, क्यों?" उदय हंसने लगा। "फिर तुमने सोचा होगा कि तुम्हारी दमदार मर्दानगी के लिए मैं कितनी अच्छी पृष्ठभूमि बन सकती हूं, नहीं ?--श्रीमती घबरालू से मिलिए, इनकी खासियत लोगों से तुरंत उकता जाना, पार्टियों में पानी- पानी होना, अपनी वैचारगी से लाचार, मेरे बिना न जाने इस वेचारी का क्या होगा?" उसने सुबकने का नाट्य किया। "इतना तो नहीं पर हां, शायद थोड़ा कुछ । उदय छत तक रहा था। "तुम दरअसल उतनी बेवकूफ नही हो, जितना कि वनने की कोशिश करती हो।" "मालूम है।" उदय अचानक फिर उसकी ओर मुड़ गया जैसे इसी जवाब के इंतजार में रहा हो। "इसीसे तो कहता हूं कि वजाय अपने को दवा-दवाकर हर वक्त झुंझलाते फिरने के कुछ करो। पढ़ी-लिखी हो, कम उम्र हो, अक्ल- मन्द हो, इस तरह अपने को जबर्दस्ती "छोड़ो भी।" "नहीं, छोड़ो-वोड़ो नहीं। तुम जानती हो कि जब तक तुम अपनी इस नकली हीन भावना से नहीं छूटोगो, तुम किसी तरह स्थिर नहीं हो पाओगी, चाहे अपने बारे में या दूसरों के साथ।" ले आया न फिर मसला अपने पर । वात को घुमा-फिराकर भी। शायद मां-बाप के इकलौते बच्चे अपने से परे किसीके बारे में सोच ही नहीं सकते। उसने तल्खी से बाल पीछे किए। पर अकसर क्या खुद वह भी यही नहीं करती है ? फिर हो सकता है उसका मतलब कुछ और हो। कुछ देर चुप्पी रही। - विरुद्ध रजनी" वह चुप रही। उदप का परिचित स्पर्श उसको गर्दन से होता हुआ पुहनी, कलाई-पोरो नक धीरे-धीरे फिमल रहा था। "मतरंगे पानी की चमकीली सुडौल वूद नाराज हो गई फिर से?" मारी तल्खी के बावजूद उदय की प्रश्न-भरी आंगों का अकेलापन उमे फिर कहीं से पिघलाने लगा था। उदय ने अब मानें बन्द कर ली थीं। वह कुछ सोच रहा पा शायद । उम के मुडौल माये के नीचे पपोटो के नम मोपी मे भाकारों में थिरकनी गर्माहट थी। क्या सोच रहा होगा वह ? मच में वह उसे जानती ही क्तिना है अभी तक ? अभी कुछ ही देर में जब शरीर और मन के उधड़ेपन के साथ-माय उमको यह असहाय आतुरता भी ढयः चुकी होगी तो क्या उमकी उमी चुम्न सशंक मर्दानगी के आगे वह फिर अपने-आपको कटा जाता महमूम नहीं करेगी? कायर औरत । भीतर का चीता उछन- कर पहलकदमी करने लगा था। यह आदमी तुम्हारी ही भावनाओं से लकमेल करके तुम्हारा आपा भुला सकता है तुम्हें ? वह पलंग से उतर आई। - फ्लंट की गली यात्कनी ही उसे इस पर को सबसे अच्छी जगह लगती थी। खास कर इस पकी वेला में। दिन-भर को घुटन के बाद इस वक्त मुले में आकर वह पद को यवानक बहुत ताजा और बातून महमूस कर रही थी। दोस्ताना, गली, वेलगाम । जैसी न्यूयार्क की सड़कों पर साथ-साथ टहलते वान होती थी। मड़क यकायक उत्सव की-सी रंगीली और वैवजह व्यस्तता से भर उठी यो। सड़कियों का एक हजूम किमी बात पर जोरो से विनसिनाया। एक रिको को घण्टी हंसी से टकराई, टुल ! रिक्शे में एक अधेड़ दमति बैठे थे । गहिणी के मुदाउ व्यक्तित्व में मोटापे की शिथिलता नहीं,उभ्रमा भात्मविश्वास और मुयरापन या। पति के बगल में बैठने की उमरी चुस्त अलसता में बरसों का सुखद साहचर्य झलकता था'। बगल में एक बुर्राक कलफदार तसल्ली में बैठे पत्ति का खिचड़ी सिर तत्परता से उसकी बात सुनने झुका । वह मुस्कराकर कुछ कह रही थी। रजनी को भला । লা। "क्या सोच रही हो?" उदय ने शर्बत खत्म कर लिया था और गिलास को हिला-हिलाकर बर्फ के टुकड़ों का खनकना सुन रहा था। उसे हंसी आ गई। "तुम जब ऐसे ही कार के काम करते रहते हो तो अच्छे लगते हो।" "अच्छे यानी पालतू, नहीं ?" उदय ने गिलास रख दिया। उसने असमंजस में इधर-उधर ताका । कव उदय बात को हंसी में उड़ा देगा और कब संजीदा हो जाएगा, उसे मालूम नहीं होता। उसने झट से बात बदलनी चाही। "स्कूल में गर्मियों की शामों में हमें रोज घुमाने को ले जाया जाता था। कतार की कतार हम लोग सड़क पर ऐसे भागते थे जैसे कि जेल से छूटकर आए हों।" "फिर?" उदय ने हाथ कुर्सी के पीछे बांध लिए। "फिर क्या? वही बंधा-बंधाया रास्ता था। हम लोग राह चलते . सैलानियों की भीड़ में जाने-पहचाने चेहरे तलाशते रहते थे । अकसर दिख भी जाते थे।" उदय का ध्यान इसी बीच कुर्सी के पास पड़ी उसकी किसी पुरानी पत्रिका पर चला गया था। वह उसे खोलकर सरसरी निगाह से तस्वीरें और सतरें पढ़ने लगा। वह चुप हो गई। .."क्या कचरा मंगाती हो तुम भी।" उसने पत्रिका नीचे डाल दी। "हैन ? मैं भी यही सोच रही थी। दरअसल घर में बैठकर भी न करना बहुत खतरनाक ढंग से आसान है।" रजनी हंसने लगी, "वस अव फिर शुरू मत कर देना अपने उपदेश । मैं जानती हूं तुम क्या कहोगे।" "तब फिर ? कुछ सोचा?". उदय खड़ा हो गया था, "ऐसे बैठे-बैठे 7 . ५२/-विस्ट मजाक में उड़ा देने की बात नहीं है, मममी?" "क्या ?" रजनी भी उठ पड़ी हुई। "ऐसी ही रहोगी तो अपनी अडोम-पड़ोम थी थुलथस गृहस्तिनी भी तरह दिन-भर बिजलकर चर्चा बटाने वाली भम बन जाभोगी।" उदय ने उसके कन्हे पर धौल जमाई। 'यां"उमने कान से उंगलिया मटाकर आश्मण को उद्यत भंग को मुद्दा बनाई। फिर दोनों हंस पड़े। । पार्टी खामी बडी और औपचारिक लगती थी। रजनी को गहत-गी मिली। उन आत्मीय घरेलू मम्मेलनी से, जहा जमकर बात करनी पड़ती है. उसकी रूह कांपती है। हालाकि मा या विल्लो जैसे लोग यह एक बही सुघड़ निपुणता से निभा ले जाते हैं। पर कुछ लोग हमेशा सब कुछ ठीक से निभा लेने है। नही ? उसने दम भीचकर दाया गाल मेजवान महिला की तरफ बढ़ा दिया। उनकी मास पर हिस्पी की हल्की वू थी। पहला दौर शुरू हो चुका था शायद। उसने कवियो में उदय को भांपा। यह उमकी तरफ पीठ किए मेजवान मे कुछ कह रहा था। उसके पड़े होने, बदन साधने और आवाज, सत्र में उम आदमी का सहज आत्मविश्वागचा जिसने कभी किसी तरह का अभाव महसूस नहीं किया है। मिस्टर बोहरा की आवाज उठी। वह वैसी ही थी जैसी कि उसे याद थी। गोल-गोल ब्रिटिश उच्चमध्यवर्गीय उच्चारण, जैसे मुंह में गर्म आलू दवाकर अंग्रेजी बोल रहे हों। उसने सामने रको ट्रे में से एक गिलास उठा लिया। मपु. मकरवी के छत्त-सी भिनकती अतिथियों की भीड़ कुछ हटी, कुछ जुटी, फिर उसने दोनों को लील लिया। हाय का गिलास चोही रेलिंग पर टिकाकर रजनी ने फन को हरी रंडक पर अनमना गाल छलाया। इतनी देर वह किससे या पात कर रही थी शायद दिमाग पर जोर डालने पर भी याद ममाए । जरूरत भी क्या थी? वह संभे से टिककर गड़ी हो गई। बरामदे में यग एक हला - । हरा वल्व-भर जल रहा था। यहां अपने को बहुत सुरक्षित, हल्का और तटस्थ महसूस किया। बीच-बीच में कांच के परे भारी पर्दे क्षण-भर को हिलते तो किसीकी नंगी वाह या चेहरे के किसी कोण की झलक-भर मिल जाती, बस, कभी दरवाज़ा थोड़ा खुल जाता तो फांकों से बातचीत के टूटे, अव्यवस्थित टुकड़े उधर घुस आते। जैसे नीमबेहोशी में कोई अनर्गल सपना. देख रही हो। उसे अचानक जोरों की भूख लग आई थी । खाना तो यहां वारह बजे से पहले मिलना असम्भव है। घर से कुछ खाकर चलती तो अच्छा होता। उसने गिलास उठाकर एक चूंट लिया । वर्फ पिघल जाने से तुर्शी ढक-सी गई थी। अजव कुनकुना-सा खारा स्वाद, उसे रेस्ट हाउस का पानी याद आया, वह भी तो तकरीबन ऐसा ही बेस्वाद था। उसने वाकी गमले में उडेल दिया। गर्मियों की रात का खिचता सन्नाटा बुरा नहीं लगता। उसे पहाड़ी रातों की चुप्पी याद आई। यहां रात का सन्नाटा जितना ही स्तवध और शिथिल लगता है पहाड़ के बीच वह उतना ही आतुर और चौकन्ना महसूस होता था। जाने क्या-क्या हो गुजरने की संभावना से भरपूर । वैसे क्या पता शायद तब वही अपने ऊर्ध्वगामी चमकीले स्वप्नों से जोड़कर हर चीज़ को देखती रही होगी। तीन-चार साल भी तो हो गए"वह मुस्करा पड़ी। कितनी आसानी से एक- दो साल उंगलियों के बीच से फिसल जाने दे रही थी, जैसे अभी से अघेड़ हो चुको हो । वह कुछ उदास-सी हो गई। औरतें जब सालों का हिसाब- किताब बैठाने लगती हैं तो उसीके साथ अधेड़ होना शुरू कर देती हैं, रीना दत्ता कहती थी। उन्हीं छुट्टियों में एक छोटी बीमारी से वह जाती रही थी और अगले साल स्कूल मैगजीन में काले स्याह व डर के बीच उसकी तस्वीर छपी थी- उसकी आत्मा को शांति मिले । उसे पता नहीं क्यों अभी भी नहीं लगता कि वह नहीं रही। उसकी मौत का ख्याल आता भी है तो बहुत धुंधला-सा, पर रीना की लम्बी पलकें और उसके गीले होंठों के किनारे की परिचित लकीरें उसे अभी भी स्पष्टता से याद हैं। उसकी युवा इंद्रियां जीवित होने के अहसास को इतनी तेजी से महसूस ५४ | विरुद्ध करती है कि उसके परे जो भी है वह उपकी पाड से दिटक-छिटक जाता है। उमने गमले की मिट्टी को उगलियों में कुरेदा। मिट्टी की ठण्डी आत्मीयता ने उसे आश्वस्ति-सी दी। गिलाग उठाकर वह भीतर जाने की ही थी कि सोमेन्दु मा निकला । वह थम गई। "यहां क्या कर रही हो? फार परफाम द मंडिंग काउड 'सोमेन्दु को हृमी हल्की और मंगीतमय थी। वह कुछ चिढ-मी गई। पना नहीं इसकी वजह मोमेन्दु का चुस्त-चिकना आत्मविश्वास या कि गर्मी को यकायक उभरती अनुभूति । उसे अपनी माही के मौनेपन के बावजूद 'अंगो के बीच और गर्दन पर पसीने की चूदें रेंगती-सी मनीत हुई। वह चुप रही। "अन्दर को मोड के वाद यहा अच्छा लगता है ना?" सोमवे की तरह गर्दन टेढ़ी कर उसे देख रहा था। जैसे अपनी किमी पटना का मुआयना कर रहा हो। "यहाँ अच्छा लगता है, नहीं." उसने होंठो पर ज़बान किराई। उसे अपनी बात बचकानी और फालनु महमूम हो रही थी। "जहां भी यूवमूरती हो, ठण्डक हो, अच्छा तो लगेगा ही।" मोगेन्दु को आवाज़ में आकाशवाणी की नाटकीय बंगाली भावना से उसे कोपत हुई। वह उसके और भी पास बा खडा हुआ था। रजनी की उगलियां काच पर कस गई-बम्नस्त, अब यहीं छूने-छाने की कोशिश न करें।' उसके सिर में यकायक तेज दर्द होने लगा था। सोमेन्दु को वह आप में नहीं सालों से जानती है। कुछ साल पहले दिल्ली और उसे लेकर कुछ चिमेगोइयां भी होती रही थीं; सच वीं या नहीं वे ही दोनों जाने पर दोनों ने फिर अपने स्वभावानुमार वह रिश्ता तोडकर दूसरे साथी योज लिए थे। इसकी वर्तमान बीदी ग्रीक थी गायद, या आर्मीनियन, या शायद आर्मीनियन ग्रीक । विल्लो का कहना था कि सोमेन्दु को हर औरत में एक सफेद फिरमिन की तलाश है, और इम हीनप्रपि को वह कतई स्वीकार नहीं कर सकती। वैचारी बिल्लो, अपनी बड़ी-सी विदियों, हयकर की घटया देहाती साड़ियों और चांदी के आदिवासी गहनों के बावजूद वह मुद भी तो छिपने के बजाय वही लगती थी जो दरअराल थी--निखालिस एग्लोइंडिपन स्कनों की एका संभ्रान्त नीम अंग्रेजी पैदाइश । कम से कम सोमेन्दु की चटखारेदार गोरा-परस्ती उससे तो कम ही प्रच्छन्न थी, नहीं ? वह चौकी । सोमेन्दु कुछ पूछ रहा था शायद । "तुम आजकल इतनी थकी और उदास-सी क्यों लगने लगी हो ? सुछि रिश्ता टीक से नहीं जम पा रहा है क्या?" उराका सुर भेद-भरे अंदाज में धीमा हुआ, "अगर किसीसे कहने से जी हल्का होता हो तो जब चाहो मेरे पास आ सकती हो । य नो !" उसने सिगरेट हवा में लहराई। वह चुप रही। अपने निजी जीवन में सोमेन्दु की कुरेदती रुचि उसे इतनी ही भांडी लगा रही थी जितनी बुआ जी की गिलगिली जिज्ञासा। वह भागकर भीतर चली जाना चाहती थी पर खड़ी रही। "तुम तो हमेशा इतने सुरक्षित और दूसरी तरह के माहौल में पली हो, तुम्हारे लिए यहां एडजस्ट करना काफी तकलीफदेह होगा, नहीं ? खासगार इस गर्मी में।" सोमेन्दु ने भवें सिकोड़कर सिगरेट का गहरा काग लिया। कुछ तो धुएं से और कुछ उसे देखने की एकाग्रता से उसकी पुतलियां नाक गी और ऐसी सिमट आई थी कि वह कुछ-कुछ भेगा लगने लगा था। उसे हंसी आने को हुई। "तुम वापस क्यों नहीं लोट जाती ? कुछ दिन को ही सही ! अपने माता-पिता के पास रहो। वे लोग तो बहुत ही ग्वुश होंगे अपनी चहेती बिटिया को देखकर ।" सोमेन्दु का सुर पुरमजाक हो चला था । शायद उसे डर था कि वह उसकी सहानुभूति से पिघलकर सुबकना न चालू कर दे। बेचारा सोमेन्दु । शायद उसे मालूम नहीं कि उसकी करुणा का रातहीपन कितना साफ और हास्यास्पद है । दरवाजा खुला और बातचीत में भिनकता एक हजूम खाने के दरवाजे की ओर मुड़ चला। "आज पाना बड़ी जल्दी मिल रहा है, नहीं ?" सोमेन्दु बोल उरासे रहा था पर उसकी आंमें लावारिस कुत्ते की उतावली लपलपाहट के गाय भीड़ में स्त्रियों को टटोलने लगी थी। "आज को रान की फ्लाइट से इनके चीफ आ रहे हैं सो माढे ग्यारह तक हम सबको विदा हो जाना है।" फिर उमने गिलाम उठाकर विसीको हांक लगाई और अलमलाती दूयपैस्टी मुस्कान बिगरती एक कमसिन फिरंगन चांदी और मनकों को गनखनाहट ममेत अपना रंगीन झोला गंभालती उधर आने की कोशिश करने लगी। उसने चुपचाप गिलाम रख दिया और भीड में यो गई। मोमेन्दु ने अगर उसे जाते हुए देखा गा भी, तो रोकने की कोशिश नहीं की। - 1 बिस्तर पर सेटे-लेटे रजनी ने पर सीधे किए। बगल में उदय वेगवर सो रहा था। हमेशा की तरह पेट के बल । एक हाय शियित मोहादं उसके कपर पड़ा हुआ पा - शान्त और आत्मीय । उगने बहुत धीरे में उदय का हाय उठाया जमे किमी छोटे शिशु को छू रही हो, और उठाकर तकिये पर टिका दिया । उदय के पपोटे कुछ कापे, फिर कुले, "क्या वजा है ?" उमने विना सिर उठाए पूटा । तकिये मे दवी उमकी आवाज मिची हुई-सी थी। रजनी ने घडी देखी। "आठ।" उदय ने गुग की तरह फिर तकिये में सिर घुमा दिया। उनकी दाढी की हरी झाई और कुछ-कुछ मूजी आंखों से उसका चेहरा एकदम पस्त लग रहा था। रजनी ने पाय नीचे किए। "काफी लोग?" सिर महमति से हिला। "यासी उबाऊ रही कल की पार्टी, क्यों?" वह नागन बुतरने लगी। उदय को देह एक प्लय मुद्रा से उमको ओर घूमी-"कब नही होती है ?" "हां, वह तो है ही।" उसने पांव समेटकर उनके गि हाम फंसा लिए और घुटनों पर ठोड़ी रयकर बैठ गई। "या तुम्हे क्रा कभी ऐसा नहीं लगता कि ऐसे सब लोग किताबों में छांटकर अपने लिए एक रोल निकाल लेते हैं और हर वक्त उसीको निभाते रहते हैं। बोहरा को लो या सोमेन्दु को, नहीं ?" "तुम समझदार हो रही हो धीरे-धीरे।" उदय ने हंसकर करवट लेने की कोशिश की। "नहीं, सच में, तुम्हें नहीं लगता कि ये सब एक नकली कितावी ज़िन्दगी जी रहे हैं ? बिना जड़ों के, विना गहराई. उदय शायद उसकी वात पूरी सुने बगैर फिर अधमुंदा हो गया था। वह उठकर बाहर ना गई। उसकी अपनी पलकों पर भी अधूरी नींद का रेतीला भारीपन था। मुंह सूख रहा था। गोपालसिंह को काफी के लिए कहकर वह नहान घर में घुस गई । गर्मी फिर शुरू हो गई थी। ... तिपाई पर दोनों पैर रखे वह पत्रिका के पन्ने पलट रही थी। उदय की नाहट पाकर उसने सिर उठाया। नहा-धोकर वह फिर से चुस्त और व्यवस्थित लगने लगा था। "गोपालसिंह से नाश्ते के लिए कह देना।" उदय ने व्यस्त भाव से जेबी डायरी निकाली और कुछ पढ़ने लगा। गोपालसिंह उदय की आवाज़ सुनकर प्लेटें लगाने लगा था। वह वगैर कुछ कहे वापस लौट आई। कमरे में पंखे की फरफराहट-भर थी । कभी मैगजीन के पन्ने सरसरा जाते, वस । उसने एक बड़ी-सी जमुहाई ली। उदय ने डायरी जेव में रखते हुए ऊपर ताका, "नाज क्या करोगी दिन में?" "पता नहीं।" उसे जोरों से नींद आ रही थी, "शायद सोऊंगी।" "पूरे दिन?" "पता नहीं," वह हंसने लगी। "कुछ न कुछ तो करूंगी ही, तुम इतना परेशान क्यों हो रहे हो?" उदय चुप रहा। गोपालसिंह ने झांका। नाश्ता लग गया था। दोनों उठ खड़े हुए। "दिन में बाओगे?" "हं, शायद।" उदय ने कुर्सी सरकाई और उठ खड़ा हुआ। थोड़ी - ५८/ विरुद्ध देर वह चुप बैठी उसका जाना सुनती रही, उंगलियों से नामालूम लकीरें मेज़ पर बनाती। फिर वह भी उठ खड़ी हुई। सिर हल्के-हल्के चकरा रहा था, “गोपालसिंह,ये प्याले उठा लेना।" कुर्सी पर बैठकर उसने आंखें मूंद ली। क्या करेगी आज वह ? दिन का सन्नाटा-भरा समूचा चिलकता विस्तार उसके सामने पड़ा था। उसने कलम में खूब देर लगाकर स्याही भरी और पंह सामने खीचकर मा को चिट्ठी लिखने लगी. 'तुम्हारी चिट्ठी मिली। इस बार तो गर्मियों ने मेरा आना शायद...' उसने हल्के से पैन दातो से टकोरा। क्या कारण दे वह ? कि उदय को छुट्टी नही मिलेगी ? पर इसीलिए तो उन लोगो ने लिखा है कि अकेले वही चली आए । तो फिर वह लिख दे कि वह उदय को छोडकर...? बकवास है। जिन्दगी-भर क्या वह भी अपनी मा की ही तरह अपने साविन्द की परछाई का देवत्व यामे अपने को अलोप करती जाएगी? उसने चिट्ठी फाड़कर मेज़ के नीचे रखी टोकरी में डाल दी। फिर उसने एक गिलास पानी पिया, एक कुछ तिरछी दीखती पेंटिंग मीधी की, एक रिमाले को स्टेण्ड पर रखा और फिर खिडकी खोलकर खड़ी हो गई। घूप जैसे हरहराकर कमरे में उफना आई। सड़क एकदम खाली थी। दो-एक दूधवाले साइकिल पर खाली कनस्तर खड़खड़ाते गुजर गए । दूर कहीं सब्जी वाली को पतली आवाज चील की तरह हवा में गोता लगा रही थी-'ले लौकी, पालक-मिरी तोरी ..' हर चक्कर के बाद दूर होती हुई... 'तुम वापस क्यों नहीं लौट जाती? कुछ दिन को ही सही। क्या कल वह सोमेन्दु को जरालिफ्ट देती तो वह...? क्या विल्लो अभी भी उसके बारे में कभी-कभी...? उसे बिल्लो के पति का स्याल आया, ऊचा- लम्बा कद, कनपटियों पर संभ्रान्त आघी सफेदी चमकती हुई, पतली आर्मी वालो की-सी मूंछ। अक्सर वे अपने शिकार और सरों के लम्बे किस्म मुगाने लगते तो विल्लो का चेहरा पत्थर की तरह भावहीन और जड़ हो जाता। उसके पति का हृष्ट-पुष्ट खिलण्डरपना शायद उसे बहुत योया और जिस्मी लगता था।खुद अपने रूहानी और बौद्धिक व्यतित्व के आगे विरुद्ध ५६ , शायद वह छि:, कैसी कमीनी बात सोच रही है वह भी अपनी ही बहन के बारे में। कुछ तो उदय के कहे का असर है, कुछ शायद वही कहीं बिल्ली की सफल नामाजिकता के परिप्रेक्ष में एक हीनभावना पालती जा रही है। खिड़की बन्द करते हुए उसने होंठ भीत्र लिए । इस तरह सबके बारे में उल्टी-सीधी कमीनी बातें सोच-सोचकर कुण्ठा पालने से बहुत बेहतर होगा अगर वह कुछ दिन को मां के पास हो ही आए । उनने पर्दे खींच लिए। वस । हो गया निर्णय। कोई देरी लगी क्या? जाने क्यों उदय के सामने पड़ते ही फिर-फिर कोई किशोर दीनता ही-हीं करती हुई झुकने लगती है। वह कोई वच्ची नहीं रही कि वस अनिश्चय में गोते लगाती पड़ी-पड़ी अपनी किस्मत को कोसती रहे। गोपालसिंह, देखो एक रिस्मा ले जाना, स्टेशन जाना है।" 'रिक्या?" गोपालसिंह के स्वर में कित्रित माश्चर्य था। "हां," वह आल्मारी खोलकर रुपये निकालने लगी। रिकमा ढूंढ़ने में काफी देर लग रही थी शायद । यह गोद में पर्स से काफी देर बैठी ही रही। उदय नाराज जरूर होगा। पहले तो भौंचक्का ही रह जाएगा। विना कहे रिजर्वेशन भी करा आई ? इतनी गर्मी ? लू? वह होले ने एक राज-भरी हमी हंसी, कल्पना में वह उदय की उछलती उतेजना को अपने ठण्डे सहज कौतुक ने के गर्दन थोड़ी देवी किए बैठी थी। बेकार मुझे कुछ करने धरने नहीं देता। उदय अपने को समझता क्या है ? क्या वही सब कर सकता है ? शुरू में इतनी आसानी ने न भी हो, अंततः नत्र हो ही जाता है, नहीं ? जितनी जल्दी का रिजर्वेशन मिल जाएगा करवा लेगी, उसने उमंग के साथ सोचा। 3 *. ४ रिक्शा वासा पुराना और पिसा हुआ था, रिक्शे वाला भी। "यह ६०/विरुद्ध - खींच भी पाएगा स्टेशन तक ?" "हैद सं को रहता था पर सं को बोल दिया है।" गोपालामह ने रिबो का हुड कार कर दिया और फिर कुछ युदबुदाया। शायद इस फिल्म की कोई बात कि इतनी गर्मी में जाने क्या वगैरह । र । भाड़ में जाए उदय और उमक चौबदार। वह आत्मविश्वारा मे मुस्कराई "चली।" कोपता, हिचकोले साता रिक्शा आगे बढ़ने लगा। बाली पनली. हदिार टांगों पर से चमड़ी जगह-जगह मूराकर चिपकी हुई थी। घट्ट पड़ी एड़ियों पर फटे म्लीपर अघटगे-से झूल रहे थे। एक पिचतो मी गति में झुककर रिक्शे वाले को पतली काठी हर बार एक खतरनाक ढग से दुहरी हो जाती, इतनी कि लगने लगता कि अब वह मतर नहीं हो पाएगा। पर तभी एक बमभव-से हिचकोले से वह फिर मोधी हो जाती थी। उसने चेहरा फिरा लिया। कुछ देर पहले छलकी पडती उमग अय मंदिग्ध जान पड़ने लगी थी। गर्मी बहुत तेज थी। उसने मुह सोलकर मांस मरने की कोशिश की, जैसे शीशे के जार में तैरती महलिया सतह पर आकर करती हैं। फिर उसने अपनी पसीजती मुट्ठी धोती पर पोछ ली। हलका मटमैला, तेलिहा-सा एक निशान बन गया। धूप बहुत तेज दी। दूर तक फैली कोलतार से काली सड़क बीच-बीच में ऐमी रुपहली चमक रही थी जैसे पानी भरा हो । पर पास जाते-जाते वह रुपहलापन फिर एक काले फैलाव में तबदील हो जाता था, और पानी के चकत्ते कुछ और दूर जाकर विधर जाते । एक भड़कीला-सा साइकिल सवार जोर से उसे देवता निकल गया और दूर तक भुइ-मुड़कर देखता रहा । उ मलाइट- सी होने लगी। रिक्शा थम गया। चैन उतर गई थी। पोपले में मह में कुछ युदबुदाता हुआ रिको वाला चैन चढ़ाने लगा। उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई । मड़क के दोनो और उदास-मदमली बंगलिया थी, जिन्हें देखकर लगता था कि सालों से उनपर पुताई नहीं हुई होगी... मूगे पेड़, मुरझाई-सी झाड़ियां, उसने सिर पल्लू से ढांप लिया 1 पानी में अजीब सीटियां-सी बज रही थीं। चरीता-कापता रिवगा फिर पल पड़ापा।

। । - . टेशन पर उतरकर उसने रिक्शे वाले को नोट थमाया और मुड़ने यी कि रिक्शेवाले का मुंह खुला,"अरे हजूर,इत्ती गर्मी में इत्ती दूर।" में दीनता कम, दबंग धमकी ज्यादा थी। पर्स खोलते रेजगारी तला- उसे लगता रहा कि उसे भी गुस्से से प्रतिवाद करना चाहिए था। खिर किराया तो पहले ही तय कर लिया था। पर लू के विराट झोंकों वीच अपने या उससे उलझने की ताव उसमें थी कहां? रेजगारी थमा- कर वह चुपचाप आगे बढ़ आई। छत की छांव के वावजूद प्लेटफार्म पर वही तपिश थी। ऊंची-ऊंची छतों से टंगे पंखे प्रागैतिहासिक पक्षियों के कंकाल-से फड़फड़ाने लगते थे, हवा के उन छोटे-छोटे द्वीपों के तले लालवर्दी वाले कुली जहां-तहां रानों तक धोतियां समेटे कटी लाशों-से पड़े थे। धीरे- धीरे भपाते उनके पसीने की बोझिल रोमश गंध एक चादर की तरह टंगी हुई थी। उसे मितली-सी आने लगी। धूप का चश्मा उतारकर उसने पर्स में रख लिया, उसे अचानक वह एक गैरजरूरी ओछेपन का प्रतीक लगने लगा था। प्लेटफार्म के छोर पर दूसरी ओर जाने की सीढ़ियां बनी थीं, वह ऊपर चढ़ने लगी। पुल के नीचे पटरियों को काटती पटरियों का धूल और कोयले से किरकिराता जाल बिछा था। बीच-बीच में जगह-जगह अधटूटे कुल्हड़, कोयले की गिट्टियां, गंदगी के ढेर । हर चीज़ कतई व्यर्थ और उपेक्षित नज़र आ रही थी। पर शायद इस चिलक-भरे मौसम के परिप्रेक्ष्य में किसी भी और पैटर्न की कल्पना ही नहीं हो सकती थी। सारा कुछ लगता था कि धूप के तीखे माले से विधकर छटपटाते-छटपटाते एक दम निश्चल हो गया हो-ऊंघते अधनंगे कुली, पटरियों पर पड़े मलवे ढेर, बुक स्टाल पर बुत-सा टिका आदमी । जैसे,इन सबके लिए समय धे होते-होते एकदम रुक ही गया हो। और तो और, शंटिंग करते इंजनों सीटियां और भपाती छकरछक्क भी गर्मी के अदृश्य शिकंजे तले एक घि याई आवाज़-भर बनकर रह जा रही थी । वह साड़ी संभालकर सी उतरने लगी। उसकी पिंडलियां हल्के-हल्के दुख रही थीं। कुछ देर के उत्साह की सोचकर ही उसे अजीब-सा लगा। क्या करने आई १६२ विरुद्ध वह ऐसी दुपहर में इतनी दूर, अकेली? घा को कौंध से बचने को आंखें सिकोडते हए उमने बुकस्टान की लकड़ी खटमटाई। "रिजर्वेशन कहा होगा? स्लीपर के लिए?" कंप से चौंककर बुकस्टाल व ले ने एक बेवकूफी भरी चुप्पी से दो क्षण उसे पूरा जैसे उसके चेहरे पर लिखा कुछ पढ़ रहा हो, फिर एक ओर, उंगली कर दी। "उघर।" "थवपू।" वह मुह गई। पीछे वह आदमी उसकी आवाज की नकल करते पतले सुर मे भिनभिनाया 'येक्यू' साली अगरेज को दुम बनती है । देसी कुतिया विनंती बोल।" फिर दोन्नीन उवामी-भरे अश्लील अट्ट- हास उसकी पीठ से टकगए। वह ओमी हो आई। पसीने में नाउज भी लगता था पीठ में चिपका जा रहा था। अपनी पीठ की मांसलता पर उनकी निगाहें महमूस करती वह चुपचाप चलती गई। एक रेलवे की वर्दी पहने शरुम, उसे देखकर वाइयापने से मुस्कराया। "येस ?" उमने दात भौचकर अपने-आपको मयत दिया। कनपटियों पर गर्मी या शर्म से चीटियां सो रेंग रही थी। उसे प्यास भी लगने लगी थी। एक स्टात पर कुछ शोगियों में पेय द्रव्य दीख रहे थे पर फिर उन्ही निगाहों से अपने को चीये जाते महसूस करते हुए अकेली वहां खड़ी होकर पीना ! इससे तो प्यास ही सही। उसने उदास होकर सोचा। रिजर्वेशन को तरुती पासा वह कमरा खाली था। एक नाराज-सा दीखता खलासीनुमा आदमो कुछ शाह-पोछकर रहा था। रिजर्वेशन यहीं होते हैं ?" "हाँ ।" आदमी ने माइन से दो झुंझलाए वार एक भूरे रजिस्टर पर किए। "पर अभी धावू नहीं है।' "कब तक आएंगे?" उसे लगा किसे उसका सिर धीरे-धीरे चारा रहा है। गला सूखा जा रहा था। "का मालुम ? बैठ जाओ।" उसने बैंच की और साइन हिलाया। वह चुपचाप लकड़ी की उस हिलती बेंच पर बैठ गई। ऊपर एक पंसा । - उनींदी बोझिल हवा को धीरे-धीरे कारता जा रहा.पा । छिन्चर-छिरक- छिक-छिपा । उसने बत्ल ते जमुहाई रोकी। "कब तक शुरू होता है काम?" "जव वायुबा जाएं।" खलासी ने ड्रार ते एक पिन निकाली और दांत खोदने लगा। "वारह बजे को है, आते होंगे, यहीं गए रहे थे कौनो काम ने।" वह एक कोने में बैठकर पहले गुड़ीमुड़ी हो गया और फिर एक नाश्चर्यजनक फुर्ती से पसरफर ऊंघने लगा । "ज्जा साली गर्मी।" वह चुप चुत-सी बैठी रही। गर्मी के छोटे-छोटे चुनचुनाते रेले उसपर एक उनींदी निरन्तरता से आ-आकर टकरा रहे थे। कपड़े भीगकर बदन से चिपके पड़ रहे थे। वह मशीनी एकाग्रता से छत की कड़ियां गिनने लगी। बाहर कोई पटरियों पर धन से कुछ कूटकर बिठा रहा था शायद । टंग,टंग, टंग। इस्पात से इस्पात टकराने की आवाज मिचली जोर जोर से आने लगी थी। फिर बाहर कोई ट्रेन आई शायद । एक हल्की हलवल- सी मची, कुछ मानव-आकार गरियां लिए खिड़की के पास से गुजरे, चाय, पान, बीड़ी की कुछ हल्की बावाजें आई। फिर वही त्रुप्पी। छिक्कर- छिक्क...छिक्कर-छिक्क । छत के एक कोने पर कोई मकड़ी बड़ी व्यस्तता से जाला वुन रही थी। एक नियंत्रित आवेग में इधर-उधर चहलकदमी करती, फुर्ती से तारों का तनाव कातती हुई। उसने यूं ही पतं खोल लिया और झांकने लगी : दो सिनेमा के पुराने टिकट, एक चाभी, एक नेलकटर, मुसा-सा एक रूमाल । उनने पर्स बन्द कर दिया। क्या तलाश रही थी वह ? छिक्कर-छिक्क छिक्क-छिक्क । बाहर कोई कुत्ता शायद किसी- की लात खाकर रिरियाया। उसने घड़ी देखी-। एक वजने को था। दो-चार गंदे-से कपड़े पहने नौजवान जाने कब आकर खिड़की के पास खड़े हो गए थे और उसे सुनाने को जोर-जोर से.वातें करने लगे थे। "क्या रक्खा है साली यूनिवमिटी में पढ़ने से। हम तो सोचते हैं कि कोई विजनेस शुरू कर दें, एक बार चल निकले तो वस्ल मजे ई मजे क्यों पाटनर ?" दूसरे ने उसकी मोर इशारा कर दवे स्वर में कुछ कहा। "यज्जिा।" विरुद्ध वि.४ । ।

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? कर लिए। साड़ी की कोर गीली कैसे हो गई होगी भला एक भिनभि- नाती भिखारिन कटोरे से रिक्शा की लकड़ी खटपटा रही थी। "ऐ माई तोर हा हा खाई, एई बुबनी तोहार बालक जीवें।" उसे न झुंझलाहट ही आई न दया ही। लगा रहा था कि जैसे भीतर की सारी संज्ञा चाकू से तराशकर निकाल ली गई हो...रिक्शा रुका तो उसने अचानक पाया कि वह घर आ गई है । उसीने रास्ता बतलाया होगा। रिक्शे वाले को रुकने को कहकर वह वैसी ही स्वप्नाविष्ट-सी सीढ़ियां चढ़ गई । शारीरिक थकान उस सीमा तक पहुंच चुकी थी जब वह महसूस होनी बन्द हो जाती है। उसने घण्टी बजाई। घण्टी बजते ही दरवाजा खुल गया। घबराया-सा उदय सामने खड़ा । "ऐसी गर्मी में कहां चली गई थीं तुम ? मुझसे कहा तो होता, कार भेज देता । स्टेशन में क्या... उसने धीरे से अपने-आपको उदय के हाथ के घेरे से हटाया और पर्स से रेज़गारी निकाली। "गोपालसिंह, नीचे रिक्शे वाला खड़ा है, उसे दे देना।" उसे अपना दिमाग आश्चर्यजनक रूप से व्यवस्थित और ठण्डा लग रहा था। सिर्फ शरीर में ऐसी थकान भरी हुई थी कि हाथ का वल कुर्सी पर डालकर बैठने तक का ख्याल अजीब लगता था। वह कुर्सी में समा गई। "अकेली क्यों चली गई थीं तुम ?" उदय तेजी से कमरे में चहल- कदमी कर रहा था। ऐसी गर्मी में कोई धूमने का मौका है क्या ? गोपाल सिंह ने बताया कि वह स्टेशन गई है तो उसे पहला खयाल यही आया कि वह घर तो नहीं चल दी। फिर उसने कहा कि सामान नहीं ले गई तो कुछ भरोसा हुआ। ऐसी दुपहर में... रजनी अपने हाथों को उलट-पलटकर ऐसे ताक रही थी जैसे कि कोई अजूबा हो। "तुम इतनी जल्दी कैसे आ गए ?" "मीटिंग नहीं हुई तो मैंने सोचा कि खाने के लिए घर ही आ जाऊं पर तुम वहां करने क्या गई ?" ६६ / विरुद्ध उदय की आवाज का भयभीत आगोश पिघलकर एक राहत-मरी मसखरी में बदलने लगा था। "धूप मेंकने तो गई नहीं होगी, क्यों ?" रजनी ने कातर क्रोध से ओठ भीच लिए। अचानक उसे बहुत नीद आने लगी थी। बम, कहीं किमी अंधेरे कमरे में नम तकिये मे मुह गहाकर सो मकनी । हर शशट से दूर हर प्रश्न से परे । काश! "रिजर्वेशन कराने।" आखों में तिलमिली मच रही यो । नीद थी कि लांमू? "पर मुझने तो तुमने कहा था कि नही जाओगी?" फिर वही प्रश्न, फिर वही कुरेदती उत्सुकता। कहा जाभोगी ? किम- लिए किमी पुरप के सदर्भ में जो गवाल निहायत बेहूदे लगते हैं वही एक औरत पर एक किस कदर खुबसूरत और योयो भावरता से चस्म हो जाते हैं, ताज्जुब है । उसने मिर मटकारा। "मुझसे कहा होता तो जब भी जाना चाहती रिजर्वेशन हो जाता। गैर, यह मव हटाओ । पर कर जाती है तम्हारी गाडी?" उदय के स्वर को मगटपने के नीचे उबलते गुस्मे को वह पहचान सकती थी। टिकट नहीं मिला, बाबू वहा नही था।" उदय हंस पडा, रजनी ने मुद को घिसियानी और आसी होती पाया। मोच-सोचकर उदप की हंसी और भी ऊंची हो रही थी। वह और भी सिसिया गई। कितने भोंड़े ढंग से उसने अपनी नाकारगुजारी का इजहार कर डाला था। हालांकि यह बात नहीं कि उसे सुद अपने पोले निकम्मेपन का मामास नहीं था। "नया मा कुछ करोगी तो अपने ही ढंग का ।" उदय ने स्वर को उदार कोमलता मे ढाला। "वहत पकी लग रही हो, ठण्डा पानी लोगी?" इस स्वर के भीतर का पुपारा-भरा बड़प्पन उसे पहले के क्रोध से भी ज्यादा तिलमिलाए जा रहा था। हे भगवान, मैं रोऊ नहीं, है भगवान ! उमने मिचे दातों के पीछे से मन ही मन दुहराया। । 'उठो! उठो!!" उदय कुर्सी के पीछे गहा था। उसकी गर्दन पर उदय को जंगलियों का स्पर्श उभरा। "इतना दुःम, मनाने के नहीं, टिकट आ जाएगा।" यह हाथ को एक रौद्र शटके से परे फेंक देना चाहती थी पर जबरन रोके आवेग का रुद्र प्रवाह बढ़ाव को स्प्रिंग की तरह ऐंठाए जा रहा था। वह चुप बैठी रही। गोपालसिंह साफ गिलास में खूब ठण्डा पानी रख गया था। वह पीने लगी। उदय निष्प्रयोजन भंगिमा से पर्दे हटाकर बाहर देख रहा था-"बहुत गर्मी है।" उसने जैसे अपने-आपसे ही कहा । उसने पानी का आखिरी चूंट लेकर गिलास मेज पर रख दिया और तौलिया लेकर नहान घर में घुस गई। - वाल्कनी में आकर उसे हमेशा हल्का लगता था। उसने रेलिंग के पास कुरसी खींच ली और नीचे झांकने लगी जहां लड़कियों का एक किशोर शुरमुट सड़क के मोड़ पर खड़ा दवी-दवी आवाज में हंस रहा था । कभी कोई जरूरत से ज्यादह जोर से हंस पड़ती तो अपनी ही आवाज से सकुचा- पर मुंह पर हथेली रष लेती, हाय ! फिर वही दबी हंसी। उसके साथ की अधिकांश लड़कियां इससे बहुत भिन्न, बहुत खुलकर हंसती थीं। उनकी आवाजें, उनकी हंसी, उनकी दो-तीन सीढ़ियां एक साथ फांदकर उतरने की अदा, सबमें अपने से ज्यादा अपने परिवेश और भापा का अमर्यादित दंभ था जिसे वे डंके की चोट पर जतलाती चलती थीं। नन्स के गुर्राट कानों के परे होते ही वे एक-दूसरे को याराना ढंग से अश्लील और फूहड़ भाषा-भरे किस्से सुनाती जो छुट्टियों में उन्होंने अपने भाइयों या दोस्तों से सुने थे । कभी-कभार ये टायलेट में छुपकर सिगरेट भी पी लेतीं। स्वाद के लिए उतना नहीं, जितना कि वरावरी के दावे के लिए। वे गया लड़कों से कम हैं ? पर क्या यह सब उतना ही कारुणिक और वेमानी नहीं था जितनी कि इन लड़कियों की दवी खिलखिलाहटें। क्या इन अरवों औरतों में से कुछ को भी पुलकर हंसना नहीं आता होगा? यगर किसी आत्मसजगता के ? ६८/ विरुद्ध उदय वालों पर हाथ फेरता पास आसड़ा हुआ था। "अव ठीक हो?" "हां।" उसे पता नहीं क्यों उदय की ओर देखने में अजीव मिमियाहट-सी हो रही थी। "मैंने कह दिया है । अगले हफ्ते किसी दिन उसी ट्रेन से तुम्हारी सीट चुक हो जाएगी, ठीक है? तुम पापा को लिए देना तो लेने आ जाएंगे, वर्ना बस लेनी पड़ेगी।" "अच्छा।" उदय की ओर देसते हुए उसने अपने आपको धीरे-धीरे हताश और बौना होते पाया। जैसा बचपन में किसी घृष्टता के बाद अप्रत्याशित रूप से माफी मिल जाने पर होता था। पर उसने गलत किया क्या है? ताज्जुब है। "लोटकर कब आओगी?" उदय अब उसके वाजू में सटकर बहा था। वह हमने लगी। "अभी गई भी नही और तुम लौटने को पूछ रहे हो अभी से।" "दरअसल.."मेर, हटाओ भी। मैं शायद तुम्हें लेकर पयादा ही स्वार्थी हो जाता हूं।" उदय बैठ गया। हे ईश्वर उसने कातर होकर सोचा, यह शहीदाना कुर्वानी वाले इस स्वर को वह क्यों इस्तेमाल कर रहा है ? पर प्रकट में कुछ कहा नही, अपने हाथों को घूरती रही । चलें नाखून ही काट लें, उसने वैवजह सोचा । उदय कुर्सी पर बैठा उसे सीधा ताक रहा था। "तुम्हारी गाड़ी रात दस बजे छूटती है, मालूम है ?" "हां नहीं अच्छा!" वह अचकचा-सी गई। "मामान भी पंक करना होगा। वहां टण्ड होगी, गर्म कपड़े साथ रण लेना वर्ना कार में बीमार पड़ोगी।" उदय ने एक कामकाजी व्यस्तता से घड़ी पर नजर डाली। "गोपालसिंह, ट्राजिस्टर दे जाना, न्यूज का वक्त हो रहा है।" - विरुट/६९ । गोपालसिंह ट्रांजिस्टर रख गया। थोड़ी देर दोनों के बीच आकाश- वाणी के प्रसारक की भावहीन आवाज़ बजती रही। वह बीच में उठकर अपना नेलकटर ले आई थी। कट-कट । उसने अपना हाथ रोशनी की ओर फैलाया । नाखून कट जाने से उंगलियां अजीव नंगी-बौनी-सी लग रही थीं । पोरों का जो हिल्सा अभी तक नाखूनों ने ढका हुआ था वह हिला- छिला-सा हो आया था। "सुनो।" पोरों पर फूंक मारती वह उदय की ओर मुड़ी। "क्या है ?" उदय ने ट्रांजिस्टर बन्द कर दिया। खबरें खत्म हो गई यी शायद । उसने हाथ उदय की ओर फैला दिया । "देखो। "क्या?" उदय के स्वर में जिज्ञासा नहीं थी। उसे अपनी हरकत वचकानी और गैरजरूरी लगने लगी थी। उसने हाथ समेटकर चुपचाप गोद में रख लिए । नीचे नाखूनों के अर्द्धचन्द्रकार टुकड़े पड़े थे। उसने चप्पल से सरकाकर उन्हें एक कोने में कर दिया। "कुछ कहा क्या ?" उदय उठ खड़ा हुआ था। "नहीं।" उसने नाखूनों के टुकड़े बीनकर गमले में डाल दिए । "गंदी लड़की।" उदय ने हंसती भर्सना में उंगली हिलाई। "शट अप।" उसने भी उसी लहजे में कह दिया। फिर दोनों उठ खड़े ५ गाड़ी रुकने से पहले ही उसने उन दोनों को देख लिया था। फिर शायद उन्होंने भी, और वे उसके डिब्बे की दिशा में तेजी से चलने लगे थे। मां को इतनी तेजी से नहीं चलना चाहिए, उनकी पीठ दुखने लगेगी वाद को, उसने उतरते-उतरते सोचा। मां उसे लिपटाते-सहलाते बोलती जा रही थी। "सांवली होकर आई है इस बार, धूप में विना छाते के निकल जाती होगी।" ७०/ विरुद्ध "सामान यही है ?" पापा पूष्ट रहे ये । उमने सहमति में सर हिलाया। मां का शाल नया था। "कोई काश्मीर जा रहा था तो मंगवाया। तुझे पसन्द है तो तेरे लिए भी मंगा दूं? बिल्लो तो लेती नहीं।" उतनी गर्मी में शाल । वह हमने लगी। "और तू विट्टी इननी देरी से क्यों लिखनी है, वो भी यस नार लाइन की ? चिल्लो चाहे दुनिया के जिस कोने में हो, हर हफ्ते दो वार या उसकी या नरेश को चिट्ठी आ जाती है।" आवाजें, आवाजें, परिचित ध्वनियां गध, माकार । उसने नहाए धुत्ते की तरह भटकारकर अपने-आपको खोल लिया था। पर । पापा ने दरवाजा भेडकर गाडी स्मार्ट की । वे घर की तरफ रवाना हो गए थे। उठनी सड़कों के बल और कहावर पहाहो की मजबूती की पाश्वस्ति । उमने खिड़की से सर निकालकर सुशनुमा हवा मे गहरी सास ली। यह पहाड़ी के बीच लौट आई थी। फिर से। - ...वाहर लॉन पर मां और वह दोनों धूप में छोटी-छोटी बातों में घिरे हुए बैठे थे। मा के हाथों मे बुनाई थी और वह यं ही अपनी कुर्मी टेडी- सीधी करती धूप में कोई आरामदेह कोण बनाकर बैठने की चेष्टाए कर रही थी। मां कुछ बोल भी रही थी शायद, पर वह एक ध्वनि-भर थी। उसकी पीठ के परे दरस्तो के बीच कही बोल रहे फास्ता के जोडे की तन्मय 'घायू पू:' की तरह । एक परिचित, अर्थहीन आहट-भर । एक सुगबुगाती आत्मीयता को रचता हुआ, धूप के नरम तद्विल ताप में भीगा हुआ सब वैसा ही था जैसा कि सदा हुआ करता था। पगडंडियों के अनघड़ विस्तार से लेकर फूलों को क्यारियों तक। नीचे ढलवान को तरफ नगे फलो के पेडों पर फलों के छोटे-छोटे नर्म गएंदार आकार उभराने लगे थे, पत्तियों में दुबके अभो वैमे कसले होग, गिलहरियो- तीतो के लिए भो,उसने उनींदे यालस के साय सोचा। मां ने बनाई की किताव उठाकर उसमे से कुछ निर्देश पद और फिर होती में कुछ बुदबुदाकर गिनती हुई धुनने लगी । बुनाई अटिन थी विरद्ध/७१ शायद । वह अपने को इस तरह की चीजों में रचा नहीं पाती कतई। बैठकर कोई भी एकरस काम देर तक करना पड़े तो दिमाग छटपटाते जानवर की तरह गोल-गोल दायरों में भीतर ही भीतर घुमने लगता था । मां की अलस एकाग्रता पर उसे हमेशा ताज्जुब होता है। उसने इधर-उधर नजर दौड़ाई । पापा शायद टहलने निकल गए थे। घर धूप में सूखने डाले गये गलीचे-सा शिथिल पड़ा था। रंगीन उनींदे आकारों के नमूनों से रचा जाता एक श्लथ आकार । यहां धूप में वे दोनों पसरी बैठी हैं, पेण्ट्री में आया ऊघ रही होगी, पिछवाड़े के क्वार्टर में माली और उसकी कानी कुतिया... पैरों से अन्दाजन चप्पलों को टोहती वह झटके से उठ खड़ी हुई। "क्या हुआ? धूप तेज़ लगती है क्या ?" मां ने अपने फन्दों के रोएंदार फैलाव के बीच से सर उठाया। "नहीं। कोई किताव ले आऊं।" "हल्का-फुल्का चाहिए तो क्लव की लाइब्रेरी से पापा मेरे लिए कुछ उपन्यास लाए थे, भीतर रेडियो के पास रखे हैं।" "कैसे हैं ? पढ़े तुमने कोई ?" वह कुर्सी के पीठ के सहारे आगे-पीछे झूल-सी रही थी। ''अब हैं तो मेरी ही पसन्द के..." मां हंसने लगी। "ये तमाम मार- धाड़ और सेक्स और दिमागी उलझनों से भरे नये उपन्यास तो मुझे कभी जंचे नहीं । तुम और विल्लो, मुझे चाहे दकियानूसी ही समझ लो।" मां ने ऊन का धागा तोड़ा और गिठान लगाने लगी "अब ये अंग्रेजी उपन्यास हैं। चाहे इन्हें तुम लोग पुरानी चाल का रूमानी साहित्य ही कह लो पर इनमें एक तहजीव है, एक परम्परा है, कुछ वैल्यूज..." "हां।" वह धीरे-धीरे पैर घसीटती भीतर चल दी। मां अपने प्रिय विषय पर फिर चालू हो गई थीं। आधुनिक उच्छृखलता और नये साहित्य में कोमलता का अभाव । दुर। कहीं भी कुछ नहीं बदला था इतने दिनों के । ७२ / विरुद्ध चाद भी । वही परिवेश, वहीं वार्तालाप, वही वहमें,क्तिनी छलनाओं में जीते हैं हम, नही ? उसने गिड़को से बाहर तारते सोचा। बाहर की घप के बाद कमरा काफी ठण्डा लग रहा था। उसने उपन्यासों को रंगीन री में एक छांटकर उठा लिया। मामने शोगे में उसका चेहरा एकदम माट या-भावहीन । न यश, न दुःखी । टंगा हुआ। उसके जीवन में चीज बम एक अनिश्चय के विन्दु पर आकर अटक गई मानो। चाहे वह वहां उदय के पाम बैठी हो, या यहा धूप-भरे इम पुराने घर की परिचित पारि- वारिक सुरक्षा में पमरी हुई। अगर वह यह सोचती थी कि वहां मे इतनी दूर का यह फासला-भर नमकी उन तमाम कायर उलमनी और अन्तं दन्द्रों से उसे अचानक छुटकारा दिला देगा तो या तो वह उमका निपट वचपना पा, या भारी वेवकूफी । यू उन के इस मोड पर आकर इन दोनों में फर्क ही क्या रह जाता है. नहीं? मेज पर तार को गुलाबी रसीद पडी थी। उसने उठा ली। पापा हमेशा से अपने पुराने कायदों का पालन करते आए थे। उसके आने की मारी आकस्मिकता और हड़वोग के बीच भी समय निकालकर पब उन्होने उदय को उसकी पहच की खबर भेज दी, पता ही नहीं चला। रीड सेफली'-तुम्हारा माल सकुशल पहुच गया। मदं से मदं की बात । अपमान से उसकी लवें जलने लगी थीं। चाहे तो इस बात पर काफी हल्ला गुल्ला मचाकर प्रतिवाद कर सकती है, पर उसका यह क्षणिक आवेग-भरा विस्फोट क्या उसके और वचकाने विद्रोहों की ही तरह न होगा? क्या बदल जाएगा उससे ? बहुत होगा तो मा रो पड़ेंगी और पापा एक अनावश्यक तल्खी से फुर्सी सरकाकर घूमने निकल जाएंगे। उमने रसीद किताब में दवा ली और बाहर निकल आई। - "वाहर तिपाई परदे में काफी रयी हुई थी। मां ने उसे प्याला थमा दिया । "शक्कर चला लेना, अभी भी उतनी ही काफी पीती है तू?" "नही।" वह धम्मच से काफी में उप्र दायरे मनाने सगो। बचानक विस्ट/७३ उने उन उचाटपीली दुपहरों का अनहद सूनापन याद मा गया था। गर्मी में वरति हुए धूल-भरे दे किरकिरे मैदानी दिन, जिन्हें वह पीछे छोड़ "तनी गर्मी में यह लव पीने क्या बनाने की भी कोन..." "हूं, गर्मी तो होगी ही।" मां फिर बृनने लगी थीं"नीवे मैदान में तो जो भी आता है यही कहता है कि एकदम नाग बरस रही है इस नान। बन्छा होता अगर उदय भी आ जाते।" मां की आंखों में हल्का झिनक- भरा इंगित-सा था कि वह चाहे तो शायद । वह कुछ निड़ गई। वह कौन होती है किसीको बुलाने वाली मां की यह पुरानी बावत है । आधे पूछे प्रश्नों ने संजय की बुंध फैलाकर अपना दायित्व समेट लेना। "नहीं, मैं तो एक बात कह रही हूं।' मां ने वाक्य पूरा किया। "हूंह !" जैसे अपने प्रश्न की बेतुकी जिनामा ने इन्हें कोई मतलब ही नहीं। वह जानती है कि अभी फिर हर तीन-चार मिनट के बाद वही प्रश्न घुमा-फिराकर वैतव तक पूछती रहेंगी जब तक जवाब न मिल जाए। मां की जिनासा की वह लाड़-भरी कुरेदन उसे हमेशा चिड़विड़ा जाती है। "तार तो मिल गया होगा?" मां ने काफ्ती का चूंट लिया। "हां, जायद।" उसने किताब खोल ली और पढ़ने का उपक्रम करने लगी। "नीचे पाइन्न काटेज में.."सुन रही हो क्या?" उसने किताब से सयल मिराया। मां पढ़ने को कभी भी इतना महम नहीं समझती कि पढ़ने वाली की एकाग्रता भंग न की जा सके खासकर, औरतों की। "हूं?" "नीत्र पाइन्न काटेज में जो रमानी रहते हैं उनकी बीवी बता रही थीं कि उनकी लड़की भी नुन्हारे ही साथ स्कूल में पढ़नी थी।" "कौन?" 'रमला या अमला कुछ ऐसा ही नाम था।" मां ने वृद्ध से जन तोड़ ७४ / विरुद्ध दिया । एक हिम्मा पूरा हो गया । तुष्ट, वे अपनी बनाई लपेट रही पी, "कुछ याद आई?" उसे कुछ-कुछ हल्को मो याद आ रहो यो । रमना रमानी, गोगनम्बी, भरे-भरे जिस्म वाली लड़की, कुछ-कुछ भूरे नाम्बई में पने बान । ह' हफ्ते इतवार के दिन एक आध्यात्मिक तन्मयता मे बाइना लिए होन्टर की बालकनी में रेलिंग पर बैठकर चिमटी से अपनी भौहें प्नक किया करती थी। वह मुस्कराने लगी। "हां, याद आई, मुन्दर-सी पी। लम्बी-गोरी, पूच बोलती थी।" "मुन्दर तो मुझे पाम नही लगी, पर हां बोलती कापी है । तेरे और बिल्लो के लिए अकसर पूछती रहती है । अपने बच्चे को लेकर आई हुई है आजक्ल ।" मां कुछ की । "यूं जाना तो तुझे कई जगह या पर यहा पादातर लोगों मे तो शाम क्लब में मुलाकात हो ही जाती है। पुरानी टीचरों से मिलने कभी कान्वेंट पली जाना। बिल्लो जव भी आती है जरूर... उसके भीतर कुछ तन-मा गया। हर बार घर लौटने का मतलब है एक सामाजिक परेड । इससे मिल लेना, उमके घर हो याना, उन्हें फोन कर लेना। किसलिए ? यह बखूबी जानते हुए भी कि उन तीन-चार हपतों की यह भद्रमामाजिकता उभयपक्षी रस्म अदायगी-भर है। यहा तो तब भी ठीक है, जब जाड़ों में मां-पापा अपने शहर में होते हैं तो इस लिस्ट में उन अनगिनत नातेदारों और पुश्तैनी दोस्तों के नाम जुड़ जाते जिनसे उसका ही नहीं, वास्तव में उसके माता-पिता का भी कोई खास मम्मकं नहीं। "चलो तुम लोग आ गए तो इमो बहाने हमारी भी मुलाकात हो जाएगी वर्ना जाने की सोचते-मोचते महीनों निकल जाते है हैं।" जिन लोगों से मिलने के लिए बहाना तलाशने की जरूरत पड जाए उनसे जबरन मिलने का तुक? विल्लो तो हमेशा गर्मियों में आती है तो उसका उन सबसे मामना नहीं होता। होता भी तो वह माफ इन्कार कर देती। उमे ऐसी पिच पिच से साफ करा जाना पसन्द था। पर वह न ना विष्ट/७५ कह सकती है न हो। हमेशा की तरह असमंजस में कसमसाती अंततः मां के पीछे-पीछे चल ही देती है। फिर वही ऊबाज शिष्ट वार्तालाप, चाय- नाश्ते का गरिष्ठ सिलसिला और जम्हाई दवाते वापस ! मां से कहो तो चाहेगी कि सबंधों की डोर ऐसे ही जुड़ती है या इसी किस्म की कोई और योथी रुमानी व्याख्या। "मैं तो छुट्टियों में यहां आकर खास कहीं आती-जाती नहीं। वस, कभी जरा क्लव चले गए या थोड़ा-बहुत इधर ही टहल लिया। ज्यादा चलने से अब मुझे चक्कर-सा आने लगता है,सो तुम्हारे पापा तो अकेले ही घूमने जाते हैं ज्यादातर । इन लोगों को विना डेढ़-दो मील चहल कदमी किए खाना ही हजम नहीं होता शायद ।" मां मुस्कराने लगी । स्वर में खीज या क्रोध नहीं, सिर्फ अपनी नाजुक स्त्रियोचित कमजोरी और पापा की शारीरिक महत्ता की लाड़-भरी स्वीकारोक्ति-भर थी। उसे मां से हल्की जलन-सी हुई। कितनी आसानी से वे हर चीज़ को एक जायकेदार समान में लपेटकर देखने लगती है, चाहे,अपने नारीत्व की असहायता हो या पापा को इस्पाती मर्दानगी का चमकीला कर अहसास । उसने होंठ काट लिया और किताव से खोया पन्ना तलाशने लगी तोतों की एक हरी पांत फलों के किसी पेड़ पर जा पड़ी। माली के बच्चे उन्हें भगाने को टीन पीट रहे थे-ढम्म ढम्म । कभी लगता है कि भीतर की एक छटपटाती रिक्ति शायद मातृत्व से भर पाएगी, पर कहीं ऐसा न हो पाया तो? उदय शायद ठीक कहता था कि अपने भीतर उत्तर तलाशने की बजाय बच्चे को तलाश का माध्यम बना लेना एक दूसरी कायरता नहीं होगी क्या ? पर वह खुद क्या चाहती है भला? मां को सतयुगी मूक्तियों और उदय की ठण्डी तार्किकता के परे कुछ और भी तो हो सकता है। है कि नहीं? उसने किताब बन्द करके रख दी और कुर्सी के पीछे हाथ बांधकर पसर गई। - "बिल्लो का कैसा चल रहा है सब?" ७६ / विरुद्ध "अच्छा ही है ।" मां का स्वर अनिश्चित-मा था। "नरेश की ट्यूब बैल एजेंसी खूब चल निकली है वहां, बस उसीमें लगे रहते हैं। दिल्ली एक छोटो मैगजीन छापने की मोच रही है।" "किस बारे में ?" वह उत्सुकता से सतर्क हो वैठी। यह विल्लो का पुराना अरमान था। लिखना-उपवाना । दूसरों का लिखा छापना शतिमा उसे खूब गुदगुदाता होगा। यहा थी तब भी कभी-कभी अंग्रेजी को हिन्दु- म्तानी पत्रिकाओं में कुछेक कविताएं एपती थी उसको। स्कूल की मैगजीन में मदर सोलयां ने पुरानी छात्राओं की खबरों में इसका सगर्व उल्लेख भी किया था गायदा "कसी मंगजीन ?" उसने प्रश्न दुहराया। "पता नहीं, मुझे तो वह यह सब लिखेगी नहीं।" मां का स्वर उदास था। "कविताएं या कहानियां कुछ ऐसा ही होगा। तुझे नहीं लिखा कुछ?" मां के स्वर में करुण जिज्ञासा थी। पता नही क्यो जव से वे दोनों बड़ी हुई हैं मां को हमेशा लगा रहता है कि वे दोनों उनकी पहुंच के कुछ परे हैं. एक शिक्षक भरी दूरी जिसे लांधना शायद वे अब चाहती भी नहीं । "ज्यूरिख से एक पिक्चर पोस्टकाई-भर आया था। इस साल गर्मियों की छुट्टियों में सब यूरोप गए हैं. तुम्हें भी तो लिखा होगा।" 'हां पाश तो हमने लगा रखो थी कि शायद इस साल हिंदुस्तान आ जाए। पर यहां रखा भी क्या है ?" मां के स्वर को यात्मदया उसे कुछ गड़ी-सी । पर वह कह क्या सकती है ? आखिर छुट्टियां तो बिल्लो और नरेश भाई को अपनी है, जहां मन करेगा जाएंगे। वैसे एकाध हफ्ते को यहां आ ही जाते तो मां-पापा साल. भर उनके और बच्चों के आने के दिन गिनते रहते होंगे। उसने किताब फिर खोल ली। मां बुनाई समेटती उठ गई। "कुछ खास वनवा दूं खाने में?" "जो तुम चाहो।" मां अन्दर चली गई तो उसने फिर किताब बन्द कर दी और दूर नीचे माल पर घूमते रंगीन चित्ती से आकारों को देखने लगी। विल्लो हमेशा से घर में अहम रही थी। बिल्लो हमेशा से उससे ज्यादा जहीन, ज्यादा वाचाल और ज्यादा हंसमुख थी। पारिवारिक दंतकथाओं में से प्रायः हरेक में उसका खुद का वचपन में खासा चिड़चिड़ा और कमजोर होता बताया था। एक बार मां ने भी कहा था कि जब वह हुई थी तो वे तकिये में मुंह छिपाकर खूब रोई थीं। विल्लो की वार तो तव भी ठीक था । सबने कहा था कि पहली लड़की लक्ष्मी होती है, वगैरह । पर उस दफा सबको बेटे की आस थी। इस बात से पता नहीं क्यों उसके भीतर का वह एक अजीब-सा अपराध-भाव और भी अधिक गहरा गया था, जैसे कि यह उसीकी गलती हो, हालांकि मां का मतलब यह कतई नहीं रहा होगा, पर फिर भी तो...। उसने किताब फिर खोल ली और पढ़ने की कोशिश करने लगी। यह बात नहीं कि उसे यह तब कभी खला हो । बच्चों का मन अपने घरेलू अहमियत के वर्गीकरणों को बड़ी आसानी से सोख लेता है और फिर जब तक वे दोनों दस-ग्यारह साल की हुई तो साथ-साथ होस्टल ही भेज दी गई थीं। घर से उसके बाद सिर्फ छुट्टियों का ही रिश्ता रह जाता है--एक फुर्सती, अदव-भरा,उवासी लेता अपरिचय का जिज्ञासा- हीन विस्तार-भर । शायद एक खास उम्र के बाद बहनें जिस बिन्दु पर मां-बाप से टूटती हैं, उसीपर एक-दूसरे से और अधिक गहरे से जुड़ती जाती हैं, या शायद तव मां वह दीवार बन जाती है जिसे ठेलकर वे अपनी नई चमकीली वैयक्तिकता की परख करती जाती हैं, जैसे नया. बछेरा पहले मां पर दुलत्ती झाड़ता है। शुरू-शुरू में साथ के लिहाज से होस्टल में दोनों को एक ही कमरा दे दिया गया था। उसे अभी भी वे . दिन स्पष्टता से याद हैं । पहाड़ की नीम-धुंधली उदास शामें, सात बजे वे रात के खाने के बाद अपने-अपने कमरों को भेज दी जाती थीं। फ्लनल की सफेद लम्बी सोने की पोशाकों में तकिये पर कुहनी टिकाए वे दोनों आमने-सामने लेट जातीं और घण्टों मां के बारे में बोलती रहती। उसे बिल्लो को सूक्ष्म परख पर ताज्जुब होता था। कई-कई बातें तो उसे ५८/विरुद्ध . ।

मूझनी ही नहीं अगर वह न साफ करतो तो। वातें करते-करते उमे मां अमामान्य रूप से कूर, दंभी और क्षुद्र लगने लगती, इतना कि कभी अपने हो सींचे खाके के सच हो उठने का डर उमै जड़ बना डालता। रात मे बुरे-बुरे सपने में वह अक्सर चोंककर उठ जाता, प्राय: हर तीसरे-चौथे दिन उसे सपने में दीखता कि मा किसी दर्दनाक रोग से जूझती हुई मर रही है. या मा की निश्चल देह सामने पड़ी हुई है और वह जैसे पाताल में झारकर बमुश्किल सब देख पा सिरहाने रखा कुनकुना पानी भिंचे हलक में नीचे उतारनी वह देपत्ती कि बगल के पतग पर दिल्ली शात. लियर पडी मो रही है, जैसे कि बातें करके उसने अपने भीतर के उन सारे भूतो-होवो से छुट्टी पा ली हो। हो भी शायद, क्योंकि हर हपते अपनी लम्बी साप्ताहिक चिट्ठी को वह मजे में 'माई डालिग ममी से सम्बोधित कर दो पन्ने आनन-फानन लाड-भरी खबरो से रग डालती जव कि वह घण्टौ दात पर पेन टकोरती, और लडकियो के पंड पर उभरते अक्षर ताक्ती रहती-वया लिसे वह ? यह मां से कभी दिल्ली की सहजता से रंगीन रेशमी साडी या अधिक जेब सर्च या बडे केक की फर्माइश नहीं कर पाती थी। बहुत होता तो फैला-फैलाकर आधे पन्ने में अपनी पढ़ाई का विवरण भर देती और आधे में मौसम वगैरह की बात। बाकी सब तो बिल्लो लिख ही देती थी एक बार छुट्टियों मे जब वे मां-पापा के पास गए हुए थे तो मां ने किसी उत्सव के लिए उन दोनो को अपनी साड़ियां पहनने को दी थी। किमी बुजुर्ग रिश्तेदार की तरह साडी हाथ मे तोलते हुए विल्लो ने उससे कहा था। देखा भारी वाली हमे नही दी कि हम गंदी कर देंगे।' उसने तंग मै माड़ी तुरत जाकर मा के पलंग पर रख दी। पर जब वह अपने सद वदरंग कपड़े पहनकर निकली यो तो पाया था कि दिल्ली ने मां को दूपरी साडी ही नहीं पहनी थी, बल्कि मांग कर उनके कर्णफूल भी पहन डाले थे, और कंगन भी। 'यह क्या जोकरों को-सी पोशाक है ! 'पापा ने उससे कहा था और वे सब हंस पड़े थे। 'जा बदल ते, अभी वक्त है, कुछ नहीं हम रुक जाते हैं ।' मां ने पुचारा दिया था पर उसके भीतर तीखे गुस्से की नोक और भी चमकीली हो लपलपा पड़ी थी। 'मैं तो यूं ही जाऊंगी।' रास्ते-भर वह किसीसे एक शब्द नहीं बोली थी। पता नहीं क्यों उसे लगता रहा कि विल्लो ने उसके साथ दगा किया है। आज से वह अकेली ही भटकने को छोड़ दी गई है अपने सारे गुस्से और पाहत अभियोगों समेत, जिन्हें कोई भी गौर से नहीं सुनेगा। किसीने इसके बाद उससे कहा था ! सिर्फ मां की कोमल-भूरी मांखों में एक हल्का विपाद सा कुछ गहराया था जो अपने सारे गुस्से के वावजूद उसके भीतर कांच की किर्च की तरह चुभता रहता था। शायद जनजाने, अनचाहे ही उसने मां को हमेशा यह अहसास दिलाया है कि वह कहीं उनकी कसौटी पर पूरी नहीं उतरती है । पर अब सोचने पर लगा है कि ज्यादातर तकरारों में उसके माध्यम से विल्लो ही मां से जूझती रहती थी। कैसे हम एक झूठे अभिमान की ओट में रिश्तों का अपनत्व भुरभुराता हुआ देखते जाते हैं और जब तक कुछ करने लायक इच्छा समो पाते हैं, दूरियां अकाट्य हो चुकती हैं। धूप से अचानक उसके सिर में दर्द होने लगा था । उसने पट से किताब बन्द की और भीतर जाकर लेट गई। मां की आवाज़ प्रत्याशित रूप से तुरत गुंजी "क्या है ? सर में दर्द है क्या ? आया से कह दं, दाव देगी?" "नहीं, ऐसे ही ।" उसने दीवार की ओर करवट बदलकर आंखें बंद कर ली। कुछ ही क्षणों में आया की परिचित कड़वी, हल्की, मसालेदार गंध सिरहाने उभर आई। वह पूछ रही थी कि सिर दाब दे क्या ? "नहीं भाई।" उसने आंखें खोली । माया की छोटी-छोटी आंखें पोली उत्सुकता से भरपूर थीं। "कुछ चक्कर-उपकर का हिसाव है?" "नहीं भाई, सोने दो मुझे।" माया दिठाई से फर्श पर फसकड़ा मारकर बैठ गई और अभ्यस्त हाथों से माया दवाने लगी। घट्टेदार हथेली का परिचित स्पर्श उसे बुरा नहीं लगा। ८०/ विरुद्ध वि-५ । वगीचे को क्यारियो की तरह आया भी घर का एक अन्दरूनी स्वयंभू अंग है । कब आई थी, उसे याद भी नही । उसका पति बंगले का स्थायी चौकी. दार और माली है और जब से शायद बंगला बना है साल-दर-साल वह वगीचे और घर की रखवाली करता रहा है। मां-पापा पहले सिर्फ छुट्टियों में ही आते थे, पर रिटायर होने से कुछ साल पहले उन्होंने इसे खरीद लिया था। अब साल में चार-पाच महीने तो इघर ही रहते हैं, बाकी महीने आया और माली। पिछवाड़े के क्वार्टर में कही उनके वे मनगिन बच्चे हैं जो गिलहरियों की तरह पेडों पर चढ़ते-उतरते, चिल्लाते-धींगामस्ती करते, रहते हैं। अब आया उसे अपनी बड़ी लड़की रत्ती की शादी के बारे में बना रही थी। कितनी बड़ी होगी रत्ती? सोलह ? पन्द्रह ? इत्तो-सी थी जव घे स्कूल से छुट्टी में आते थे। उनकी उतरन की पोशाकों में और भी छोटीन्दुबली और निरीह लगती। "क्या करता है तुम्हारा दामाद ?" उसने उनीदे स्वर में पूछा। "वैरा लगा है, उघर आपके क्लब में। मा मिडफ है।" "रती खुश है ?" "अरे खूब खुश है ।" मा पता नहीं कब आकर कुर्सी में बैठ गई थी। "पन्द्रह तोले की चादी की करधनी दी है,दो जोड़ी पाजेव--और क्या-क्या आया ?" उन्होंने मजाक मे पुनारा दिया जैसे किसी बच्चे को अभ्यागतों के मामने कविता सुनाने को कह रही हो। माया सब गिनाने लगी, कित्ता माया, कित्ता दिया, कित्ते वराती थे। फिर अचानक रुककर भेद-भरे स्वर में बोली "अब पाव भारी है, भादों तक खवर है।" कमरे में कुछ क्षण चुप्पो रही। जाहिर था कि उसे रत्ती के उस नितान्त अप्रत्याशित दहेज या उतनी ही प्रत्याशित जचगी पर कुछ कहना पाहिए था पर वह चुप रही। आया ने ही मौन तोड़ा। "मुझ गई है छोटी येवो हमारी, नई मेम साव? विल्लो देवी को देखो, दो-दो बच्चो के साथ अस को तस घरी हैं।" मा चश्मा लगाकर दिल्ली को अभी आई चिट्ठी पढ़ रही थीं। .

"तुम्हें भी याद किया है।" "खुस रहैं, खुस रहें।" जाया गद्गद हो उठी, "यहां कब आएंगी मेम साव?" "क्या पता, शायद अगली गर्मी में ही आएगी।" "अच्छा लगेगा तब । वावा-वैवी भी ना जाते हैं तो कोठी में रौनक हो जाती है। बच्चोंई से तो रौनक होती है घर की।" बहुत अर्थपूर्ण नजर से आया ने उसे देखा उसकी स्पष्ट झंझलाहट पर मां हंस पड़ी। "आया तो वस इसी इंतजार में है कि तुम्हारी वारी कब होगी।" "और क्या, दो साल तो हो ही गए, नई मेम साब?" तो तुम्हें क्या? वह रुखाई से कहना चाहती थी पर चुप रही। आया इधर मां की काफी चहेती हो गई है । वह चौंकी। क्या उसे जलन हो रही है ? पर सोचो तो यहां उनके इस निपट उचाट अकेलेपन की साथिन तो वही है, वहां मैदानों में तो बेशुमार लोग हैं मिलनेवाले,रिश्तेदार,मित्रकार से आने-जाने का भी साधन है। यहां बंगले तक तो कार आती नहीं, पैदल ज्यादा चलने से मां की तबियत खराब हो जाती है। घर में बैठे-बैठे रूमानी उपन्यास पढ़कर कोई कितना समय निकाल सकता है भला? मां ने चिट्ठी को शायद पन्द्रहवीं बार पढ़कर चश्मा उतार लिया था, और गोद में दोनों हाथ धरे हुए खिड़की के बाहर ताक रही थीं। उसे कभी लगता है कि सांसारिक जटिलताओं और मां-पापा के उनसे निवटने को बैठाए गए उन अनेक ताल-मेलों के प्रति उदय और उसकी उदासीनता उन्हें खासा निराश करती जाती है। नरेश भाई को समझना उन्हें कतई कठिन नहीं लगा होगा, शादी से पहले उन्हें लेकर चाहे जो भी पूर्वाग्रह रहे हों। एक तरह से उन दोनों पक्षों का मानसिक संसार एक-सा है। सरल, खुला, एक पुरानी आत्म-मुग्यता में घिरा हुआ। मां को देखते ही नरेश भाई तपाक से प्रणाम में दोहरे हो जाते हैं और वे निहाल । मां के व्यक्तित्व का यह अतीतजीवी रूमानी पहलू चतुराई से मापकर नरेश भाई उनके सामने हर बात पुश्तैनी परम्परा के दायरे में खींच ले जाते हैं। पुराने - ८२/विरुद्ध नौकर-चाकर, हवेलियां-बावड़ियां, उत्सव-महोत्सव, मीरासने-खवासने इन मवके लच्छेदार प्रसंग मा की उप भीतरी दुनिया का अनिवार्य अंग है, जिसमे वे यतमान के कड़वे-भौंपरे उधड़ेपन को छेके रहती हैं। और मां की ही तरह बिल्नो की आत्मसज्जा देहाती पोगा,नाक को जड़ाऊ नयनी और आदिवासी झोले में रखी पनहिम्ची, क्या तनिक मजा-संवारकर उसी प्रलमले अतीन को जा पकड़ने की ललक नहीं दिखाती ? 'वजह चाहे कुछ और हो। पर वैसे मच में सोचो तो क्या यह भी कभी हो सकता है भला? उसे तो कमी यह नहीं लगा है कि उसके दिमागी फैलाव में कही कुछ ऐमा है जिससे आ जुड़ते ही दतकयाओ का यह सामंती अतीत भक्क से उसके भीतर उजागर हो जाएगा। चलता, फिरता पुनम्मंन्दित । पर फिर यह भी नही, तो उसके लिए कौन-मा प्रसंग सच रह जाता है ? महारानी विक्टोरिया के जमाने से उधार ली गई बोहरा जैसे लोगो को कारुणिक साहवियत ? वह और उसके जैसे वे सैकड़ों तन्नाए फिरते युवा लोग हैं क्या? किस समाज या संस्कृति की पुरी से छिटके अग हैं वे सब ? विकराल नंगी घूप से तराशे कर माहौल के ऐन वीचों-बीच अपने छोटे- छोटे छलाव के दुर्ग रचते हुए." "वाना अभी लगाएं या जरा देर में।" "हां, हां, लगा दो। मैं जरा हाय-मुंह धो लू।" पापा की भूरी आं नरमाई से मुस्करा रही थीं। वह भी मुस्कराने लगी। 'हां, सब कसर निकाल रही हूं?" "उदय दौरे पर गए हैं कि वही हैं ?" "सो रही थीं?" "अपने क्षेत्र में नाम तो बहुत अच्छा है उसका।" पापा धीरे- धोरे रुक-रुककर कौर चुमला रहे थे । "इतने कमिटेड और नौजवान हो तो कहना ही क्या? क्या जवाब दिया यूनिवर्सिटी को उमने ?" विस्ट/८३ . - "कैसा जवाब? "मां ने पानी का एक बूंट लिया, और प्रश्नसूचक आंखों उसे देखा। "एक प्रोफेसरशिप देने.की.वात.थी। शायद जगह खाली थी वहां ।' "तो फिर ? अमरीकन यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर नियुक्त होना तं काफी बड़ा सम्मान है, नहीं?" मां की ललक हल्के से उसके भीतर कहीं जा चुभी। या शायद उसमें अपनी चाहना की प्रतिध्वनि पाकर वह अव्यवस्थित;:: "क्या था, तीन-चार साल तुम भी.साथ में घूम आती-वापस आकर तो जो चाहे वो नौकरी उन्हें मिल ही जाती। नहीं ?" "उदय तो वहां सिर्फ तफरीह को नहीं जा रहा था। मेम साहब,उसका काम पहले आता है, किस तरह की प्रोफेसरशिप थी, कैसी यूनिवर्सिटी थी, यह सव भी तो देखना होता है। वह तो वहां इतना--रह चुका है, सब जानकर ही निश्चय किया होगा!" पापा हंस, दिए। "खैर, यह तो तुम लोग समझो,मैं तो प्रैक्टिकल बात कहती हूं,तीनेक साल में तो वहां कुछ और खासा रिसर्च कर सकते थे।" . "यहीं क्यों नहीं कर सकते ?" रजनी की आवाज़ में उसकी पुरानी ज़िद की गुस्सैल गंध थी। "अरे यह सब तो क्या जानूं, पर मैं सब यही कहते हैं कि इस लाइन में जो सुविधाएं वहां हैं यहां कतई नहीं हैं । फिर चाहे, तुम भी वहां कुछ कोर्स-वोर्स कर लेती।" "कैसा कोर्स ?" रजनी ने चम्मच प्लेट पर. रख दी। उसके हाथ उत्तेजना से कांप रहे थे। "घर की सजावट या रुई-भरे खिलौने बनाने का या फ्रेंच कुकिंग का "तुम हमेशा इतने थोथे प्लान क्यों बनाती हो? तुम सोचती हो । तुम्हारे इन सब चालू घरेलू नुस्खों से घिर कर मैं खुश रहूंगी?" - "क्यों वेकार उसे कह रही हो!" पापा हमेशा की तरह मौके गंभीरता फांदकर बात को मामूलीपने की तरह रगेद रहे थे। ८४/विरुद्ध - 7 "हमें तो यहा फम्य है कि सब देख-मुनकर भी उसने अपने ही देश में रहने की ठानी है, वर्ना चनी जाती हमारी मुम्हारी यह वाली बिटिया भी दम हजार मील दूर, जसे बिल्लो जा बैठी है । पर आया, प्लेट ले जाओ।" कुर्सी विसकाकर पापा उठ खड़े हुए थे। हाय धोने को बाहर जाते वे मा से धीमे से कुछ कह रहे थे। उसीके बारे में बह रहे होंगे, उसने सोचा। उसने तोलिया टांग दिया और बाहर आ गई। कहीं कुछ नही वदलता। एक हमी होते हैं जो एक स्थिति से दूसरी तक भागते हुए इस प्रक्रिया में अपने अपूरेपन की काट खोजते फिरते हैं । नही धूप अव कुछ तेज हो चली थी। यानी कि देर तक बैठने लायक नही रही थी। वह नीचे झाकने लगी। दलवान पर पेडी से अघढके घरो की लाल-भूरी, जंगवाई टीन की छतें बीच-बीच में दिग्र जाती थी। वहीं रमला भी बेटी होगी । शायद नायून रगती या भवें नोचती हुई । वह हसने लगी। "वहा धूप तेज होगी। भीतर आ जाओ न।" मा अपने कमरे की खिड़की से बाहर झांक रही थी। "रमला अभी यही होगीन?" उसने पलंग के पैताने पाव समेटकर बठते हुए पूछा। "आराम से लेट इघर, काफी जगह है।" वह मो के बगल में जाकर लेट गई । मा को सुशबू वैसी ही थी। टेलकम पाउडर और पमीने की हल्की मिली-जुली नर्म और आरामदेह गंध । मा को त्वचा इम उम्र में भी उससे अधिक चिकनी है । उसको रगत पिता पर गई है। "यह अंगूठी नई है क्या ?" मां उसका हाय सहला रही थी, और भी दुवली होकर माई है इस बार राधाना-बाना वक्त पर नहीं पाते होगे तभी। अभी समझते नही हो तुम लोग चाद मे..." "उदय की मा की है।". . विरुद्ध ८५ " . "तेरी सास का तो और भी काफी जेवर होना चाहिए। उन लोगों में तो काफी देते हैं।" मां का 'उन लोगों उसके गले में कुछ अटका-सा। उदय की मां हैदराबाद के किसी मुस्लिम परिवार की महिला थीं। उनकी खानदानी रईसी के वावजूद उनका हिन्दू न होना मां की गुप्त आचार-संहिता में इनके खिलाफ जाता था। हालांकि उदय के पिता से उन लोगों का पुराना परिचय था। "उन लोगों का जेवर तो बहुत भारी होता है न?" मां की चटख दुनियादारी उसे फिर चुभी। "मैं क्या जानें, उन्हींकी तो चीजें थीं।" "सो तो है पर जाना तो कायदे से बहू को ही था न। ऐसी अचानक मौत नहीं हुई होती तो दे ही जातीं।" का हुआ था, उनको मेमसाब ?" माया कुछ और पास सरक आई थी। "मोटर टकरा गई थी कहीं", वस । होश भी नहीं आया। उदय आठेक का रहा होगा। फिर उन्होंने दुवारा शादी नहीं की। बड़े भले आदमी थे । बस अपने काम से काम और पढ़ाई-लिखाई। जब तक जिन्दा रहे, ऐसे ही।" आया की आंखें परीलोक के विवरणों की तरह बातें लीले ले रही थीं। "अच्छा देवी ने तो नहीं देखा होगा उनको, नई ?" "नहीं,ज्यादातर तो बाहर ही रहे दोनों वाप-बेटे, फिर इसकी शादी से तीन-चार साल पहले गुज़र ही गए।होते तो कितने खुश होते।" "किस बात पर?" उसने उद्धतपने से करवट ली "मुझे देखकर?" मां हंसने लगी, "लो। अब इसे कौन समझाए ? बरे उस जमाने के लोगों में बच्चों के लिए कैसी माया होती थी, तुम लोग क्या समझोगे? उदय के ही कारण तो शादी नहीं की दुवारा।" "तब फिर उदय को हमेशा घर से इतनी दूर क्यों रखा? खुद ८६/विरुद्ध चाहर थे तो उसे वहां बोडिंग में रसा, जव लौट आए तो उसे बाहर भेज दिया।" वह माया को छकने को अंग्रेजी में बुदबुदाया। "खूब मजे किए ये उन्होंने भी । प्ले वाय कुंवारों की तरह, मैने क्या यह सब कहानिया नही मुनी ? एक रहती तो थी..." मां ने हाथ उठाकर रोक दिया। हमेशा की तरह मां मजाक में भी अपने रूमानी मियक महराकर गिरने देना नहीं चाहती थी, "ऐसी बातें तो कहनी क्या सोचनी भी नही चाहिए। बड़ों के बारे मे ।" मां के स्वर को गरिष्ठ आदर्शवादिता उसे हमेशा बुझा जाती है। वह चुप हो गई। पर आया का दिमाग अभी भी मां के लगाए रूमानी जंगलों में फिर रहा या।"अरे चारेक साल और रह जाते इनके ससुर जी तो चाहे पोता- पोतो खिला लेते, नई मेमसाब ?" "तुम्हारा बस चले आया, तो तुम खुद ही दो-चार और पैदा कर डालो, नही?" पर उसका व्यंग्य आया की शमिजाज कल्पनाओं से टकरा. कर भौथरा हो गया। मां और याया हंसने लगी। "अरे इसका अब क्या होगा, अब तो इसकी छुट्टी है, वह मो वन्द हो गया।" मां ने अर्थपूर्ण भंगिमा से आया को ओर देखा! "और क्या मेम साहब।" माया भेद-भरे अंदाज में स्वर पास खीच लाई । "बारे साल से हमारा जो 'वो' शुरू हुआ तो बस तेरमें मे रत्तो पेट में, बस तब से... छुट्टी हुई, बन्द हुआ, सो वर्ना जाने क्या-क्या और...।" "तो फिर औरों से बच्चे पंदा करने को क्यों कहती फिरती हो? खुद को तो कहती हो कि छुट्टी मिलो।" "अरे वेवी,गरीब आदमी को इत्तो संतान भगवान क्यों देता है! जाने अब आपका बेटा-बेटी हो तो हाथों-हाथ लेंगे यहां सव कोई । इधर अपने हो पेट को पूरा नहीं पड़ता तिसपर ले दनादनी हर साल एक और ! भगवान को माया है, और क्या? हमान पाप किए होंगे।" बाया अब मां के हाय दाब रही यो। मा की गोरी गुदाज बांहों पर उसकी पतली सम्बी घट्ट दार उंगलियां केकडे को टांगों को-सी टेढ़ी विरुद्ध /८७ चपलता से रेंगने लगी थीं "अच्छा, आया, तुम्हारे कुल कितने बच्चे हैं ?" "ये लो।" आया पायरियाग्रस्त सूजे मसूड़े दिखाकर हंस दी। उसके पोले-काले दांत कोड़ियों की तरह एक खतरनाक पोलेपन से जबड़ों में अटके हुए थे। कितने साल की होगी वह ? चालीस? पैतालीस ? "सात तो हैंई। दो छ:-सात महीने के होके नई रहे, चार कच्चे गए, अब गिन लेव आप।" मां ने पैर समेटकर साड़ी की कोर नीचे की। "अच्छा माया, अव जाओ तुम वर्ना चौकीदार फिर झल्लाएगा तुमपर, दरवाजा भिड़ाती जाना वर्ना मक्खियां घुस आती हैं।" दोनों हाथों से घुटनों पर वज़न डालती, माया खड़ी हो गई। "वेवी के पांव दाब दें ?" रजनी ने झटके से पांव समेट लिए। "नहीं-नहीं, यह सव हमको अच्छा नहीं..." मां उसकी हड़बड़ाहट पर हंस पड़ी। "अच्छा रहने दो, अव तुम जाओ, वर्ना फिर डांट खाओगी मरद की।" "अरे से माता ले जाए।" आयो ने उग्रता से हाथ झटकारे, "सुभ-शाम उसके और उसके बच्चों का धंधा करें तो पांच मिलट वैठकर सुसता भी नहीं सकते? सच्च कहते हैं वेवी, औरत का जलम परभू दुसमन को न दे। हां नहीं तो, सारी बलाय-बलाय झेलो तो भी जिसे देखो सोई मांन्वें दिखाता है।" बुदबुदाती हुई आया वाहर चल दी। कुछ देर एक कुनुकनी तंद्रिलता फैली रही। "भाग्य की हीन है वेचारी और क्या।" मां ने पड़ने का चश्मा लगाकर एक किताव उठा ली थी। इन लोगों में जौरतों की हालत बड़ी खराव है।" उन्होंने पन्ना पलटकर पढ़ना चालू कर दिया था शायद । रजनी चुपचाप छत पर सीलन से वने पुराने दाग को ताकती रही। आया की लड़की रत्ती उससे कुछ ही छोटी होगी। अपने पिता के मरकहे गुस्से और मां की चिरन्तन झल्लाहट से थर-थर कांपती वह अक्सर उसकी पढ़ने की मेज़ के पास दुवको वैठी मिलती थी। "जी ८८ विरुद्ध वैवी जी, हमें कोई काम दे दीजिए वर्ना अभी अम्मा बुला लेगी।" तय अपनी दया के कतरे बडापन से उसपर टपका देना कितना गरिमामय और महज लगता था! अब तो आया के प्रति मा की स्वाभाविक उदारता भी कहीं से कुतर खाती है । या शायद जो सच में घटकता है वह है यहा की सारी जिन्दगी मे बसी नम पुरानी-शर्मनाक व्यवस्था की गंध, जिसको गुरक्षा कार तक तानकर उसने अपनी जिन्दगी के पूरे यठारह साल एक तनावहीन-घटनाहीन शून्य में पनपते हुए विता दिए थे। बिना प्रश्न पूधे. विना उत्तरों की अपेक्षा किए-मां के नमकीन रूमान को हल्के-हल्के चेतना की नोक से सराहते हुए। मां के हाथों ने उसे कुछ हल्की चादर या शाल-सा उढाया। उसने मप्रयास आखें बंद रखी। इस वक्त किसी हल्की लुत्फ-भरी चर्चा में आकण्ठ सुगबुगाने का खपाल ही अजीब-सा लगता था। फिर मां ने जम्हाई लेकर चश्मा मेज पर रखा शायद और फिर उनकी सासो की नियमित आवाज आने लगी। वे सो गई थी शायद । उसने चित लेटकर बाखें खोल ली और हथेलियां फैलाकर ताकने लगी। हथेलिया देखने से दु ख बढ़ता है । किमने कहा होगा ? किमीने कहा होगा या कही पहा था ? कमाल है । उमे तो यह भी याद नही रहता । शायद मां को तरह उसके भी मानसिक और व्यावहारिक संसार की दूरी ऐसी घटती जा रही है कि शायद दसेक साल बाद धूप में एक कुर्सी डाले वह भी स्वेटर का नमूना युनती, बाया से बतियाती अपने विगत इतिहास परम्परा के रूमानी उजाम में गदराई बैठी होगी। मगर अभी से उमने कुछ नहीं किया तो । उसने झटके से चप्पल पहन ली और बाहर आ गई।' नीचे ढलवान से डाकिया ऊपर जा रहा था। जिस साल उनको शादी होने वाली थी वह घण्टों यहां खड़ी डाकिये की बाट जोहती थी। अक्सर सर आते भी थे। उदय की छोटी-सी लिखाई में लिखे नियमित-हल्के खत। उदयसे उसकी मुलाकात न्यूयार्क में हुई थी। वह गर्मी की छुट्टियां for le . विताने विल्लो-नरेश भाई के पास गई हुई थी। हमेशा की तरह उनके अपार्टमेण्ट में पाटियों का एक अनवरत सिलसिला चलता रहता था। कई बार कई मेहमान अपने दोस्तों को लेकर आ जाते थे, शहर में होती हुई अनगिन पार्टियों में एक के बाद एक से गुज़रते। उन्हीं में किसीका दोस्त उदय भी रहा होगा। उस दिन वह हमेशा की तरह चुपचाप भीड़ के बीच से खिसककर बच्चों की नर्सरी में जा सोने की फिराक में थी कि अचानक गलियारे में रोककर किसीने उससे वर्फ मांगी थी। ज्यादा समय वहां रह चुकने से उसके लहजे में एक हल्की विदेशी गंध थी जो हमेशा उसे चिड़- चिड़ा जाती थी। वर्फ चुक गई थी, एक ढीठ झटके से फ्रिज का दरवाजा भिड़ाकर उसने बताने को मुंह खोला ही था कि उदय ने कहा था, चलो वगल के किसी ड्रग स्टोर से ले आते हैं। वह मुस्करा रहा था। उसकी आंखें हल्की भूरी-हरी थीं-धूप-छने शहद की तरह । चलो, उसने कहा था यहां कुछ करने को था नहीं, न किसीसे खास परिचय था। आधी छुट्टियां तो यहां यूं ही निरुद्देश्य सड़कों, पार्को, म्यूज़ियमों की आश्वासन-भरी नामहीनता में घूमते वीत गई थी, उसे नींद आ रही थी। लिफ्ट का बटन दवाते हुए उदय ने उसे बताया था कि वह विल्लो-नरेश को नहीं जानता था, यूं ही अपने किसी दोस्त के साथ आ गया था। वह आकस्मिक संकोच में सिमटी चुप खड़ी रही। क्यों चली आई होगी वह ऐसे ? शायद, बहुत उनींदी थी, या शायद बहुत उकता चली थी। किस क्लास में हो ? उसने बड़े भाई के पुरमज़ाक लहजे में पूछा था। उसने तन्नाकर कहा था कि वी० ए० कर चुकी है। उसने कालेज का नाम बताया तो उसने कहा, था कि वह तो लड़कियों का कालेज है । उसे हंसी आ गई थी। मैं भी तो...' नहीं, मेरा मतलब यह नहीं पर अजीव-सा ही लगता था तुम्हें हमेशा लड़- कियों के साथ पढ़ते हुए । 'नहीं तो।' उसने उसी संजीदगी के साथ जवाब दिया था। फिर और खास बात नहीं हुई थी। दो-चार दिन बाद बिल्लो ने बड़ी अर्थपूर्ण कंजी शरारत से उसे देखते हुए कहा था कि उनके एक दोस्त का उन दिनों निमंत्रण आया है। उसका एक दोस्त है, विल्लो ने । । ६०/विरुद्ध नरेश भाई की और एक आम दया दो थो, 'जो रज्जू पर एकदम सट्ट। मानी हम-लाइन सिकर।'नरेश भाई ने एक घोल सगाई थी।पयों भाई छपे रस्तम।' वह चिसियाहट से रुआंसी हो गई थी। जव उदय से वे लोग मिले तो वह उसी बिसियाहट से चुप रही थी। फिर बिल्लो ने हमेगा की घरह हर पीज की वागडोर हाथ में ले ली थी। आप्रवासी हिन्दुस्तानियों की अधिकतर मर्जालसों की तरह यह अपेक्षाकृत छोटो और बहुत मंजोदा ढंग से हिन्दुस्तान की चर्चा से भरी गोष्ठी पी। वह फिर बने सगी यौ। सोग गूध बोल रहे थे, दर्शन, इतिहास, कानून से भरी पुरजोर पियाकड़ वहमें । उसे इतनी आक्रामक मंजीदगी से भरी यह निरर्थक बातें आतंकित फरती थी, तय भी और अब भी। यह नहीं कि इनमें से कोई भी हिन्दुस्तान वापस जा यमने को स्वतंत्र इच्छा रमता हो, पर बोलना तो था ही, क्यों कि अपनी हिंदुस्तानियत का यही माटम्बर-भरा इजहार उन्हें अमरीकी समाज के उस विराट मोरूते मे सोये जाने में बचा मरता था। शायद का रही हो ?' उदय ने पूछा था। फिर वे दोनों काफी देर सड़कों पर टहलते रहे थे। घर वालों से परे उसे उदय से बोलना इस वक्त ज्यादा कठिन नहीं लगा था। शायद वही श्यादा बोलती रही थी, जमीदोज सब वे स्टेशन को मीडिया पहने हुए उसे अचानक शर्मनार खयाल आपा--"मैं ही बोलती रही, तुममे तो कुछ पूछा ही नहीं।' "पूछो।वह हंस दिया था। रजनी और भी शिसिया गई घो। शर्माले व्यक्ति के आकस्मिक मुंह फटने से उसने अचानक उदय से पूछा था कि उसका भविष्य के लिए क्या इरादा है ? उसने कहा था कि कोई सास नहीं। फिर थोड़ी देर बाद हककर उसने कहा था कि शायद इस महीने के अंत तक वह हिन्दुस्तान वापस चला जाए। 'हमेशा-हमेशा के लिए?' 'हां, हमेशा-हमेशा के लिए।' उसने कहा था और हंस पड़ा था। वह कुछ बुढ़ गई थी, 'तुम तो वाकई बच्चों को परोकयात्रओ की ही भाषा इस्ते. माल करती हो।' उसने चिड़कर कहा था कि इसमें कोई खास हैरतअंगेज -- : बात है क्या? वह तुरन्त चुप हो गया था। पर इन छोटी-छोटी नुकीली झड़पों के बावजूद अक्सर वह आ जाता था और वे देर तक मैनहटन की उन हड़बड़ाती-हांफती-अनर्गल सड़कों पर टहलते रहते थे। उसे यह भला लगता था। उदय से उसके संबंधों का तनावं; उदय की विपरीत प्रकृति की सान से पैना कर कुछ देर को असमंजस और उकताहट की उस राख- रंगी धुंध को छांट जाता था जो उसके भीतर ही भीतर धधकती रहती थी। बिल्लो ने तुरंत मां को लम्बी चिट्ठियां इस बारे में लिख डाली थीं। लड़का अच्छा था। हिन्दुस्तान जा रहा था। और क्या ज़्यादा. खुचई निकालना? उसकी छुट्टियां बीतते न बीतते उन सब लोगों ने उसके और उदय के प्रति एक चिड़चिड़ा देने वाली समझदार चुप्पी अख्तियार कर ली थी। इतनी, कि जाने से कुछ दिन पहले उसने उदय से मिलनां वन्द कर दिया था। कोई तमाशा है क्या ? जिसे देखो हाथ मल-मलकर पीठ थपथपा रहाहै। उसके आते ही मां ने तुरत अपनी भावुकता का रेशमी खोल चढ़ाकर 'पूरे प्रसंग को अपने दायरे में समेट लिया था। इतने दिन वह उनकी अधिकार-परिधि से दूर जा रही थी। उसे अपनी लाड़-भरी जिज्ञासा से कुरेद- कुरेद कर उदय के आते न आते उन्होंने उसके और उसके परिवार से सम्बद्ध सारे विवरण सोख लिए थे। मां का यह महाउत्साह कहीं उसकी -खुशीको कुन्द करता जाता था। क्या कभी कोई चीज, कोई घटना, कोई सम्बन्ध ऐसा नहीं होगा जिसपर उंगली टीपकर वह यह कह सके कि हां, यह मेरा एकदम निजी है ? मां का ज़रूरत से ज्यादा स्निग्ध-बाग- 'विलास उदय को भी प्रायः आतंकित कर देता था। उनके कमरे में घुसते ही वह फड़फड़ाते हुए कुछ ही देर में उठ खड़ा होता ।. अच्छा अब चलूं?' फिर इधर वह जाता और उधर मां की लच्छेदार विरुदावली शुरू हो 'जाती । 'इतने बड़े घर का लड़का है । मां हिन्दू भी नहीं पर तहजीव देखो, तपाक से उठकर प्रणाम करेगा। यही तो खानदानी लोगों की...वगैरह। ब्यौरा सुनते-सुनते उसे लगने लगता कि मां की वांतों में विधकर उदय . ६२/ विरुद्ध देरवह का दिमाग एक पाका, एक कार्टून बनता चला जा... उमने एक वेदर्द ठोकर मारकर पत्थर का टुकड़ा नीचे बगीचे की बीर सुटका दिया और उसककर आवाज सुनने लगी। दीवार के नीचे पगडंडी वाला हिस्मा विच्छू बूटी, गुलवाक और कई नामहीन कंटीली माडियों मे अटा पहा या । उसी हरी वनराई के बीच उमका पत्थर कही पो गया था। सिर्फ उसके गिरने की हल्की थावाज-भर बच रही थी। थोड़ी आँधो से पत्तों को सिहरन का पीछा करती रही, फिर मेड़ पर ही गई। धूप के बावजूद पत्थर ठण्डे और नम पे। उसे भला लगा । उदय पया कर रहा होगा? टहनी से आकारहीन लकीरें उकेरते हुए उसे स्याल आया। शायद आफिस में होगा या साइट पर निकल गया होगा। उदय की काम-काजी जिन्दगी के प्रति वह इतनी निरमुक क्यों होगी, उसने सोचा। पर उदय की ही क्यों ? अपनी भी तो शायद । पर यह क्या सिर्फ दिमागी बालस-भर है ? क्या उसकी निष्क्रियता उस गहराती नैराश्य भावना से कहीं नहीं जुड़ी हुई है जो मां से लेकर उसके मान स्त्रियों के लिए वाले स्कूली विगत तक फैली हुई है - -उस लाड़-भरी और भावुक दमघोंटू जकड़ के तले वह अपने को धीरे-धीरे मुट्ठी की तरह इस कदर मस्त भीचती चली गई थी कि अब खुलने की कल्पना-मी आतक्ति करती है । उसे मालूम है कि विल्लो का मुंहफट फर्राट जीवन-दर्शन मां को उतनी ही अव्यवस्थित और असहज वना देता है जितना कि उसका अंत- मुंशी चुप्पापन । माझी उम गूढ आचारसंहिता में पुरुष का गंभीर होना एक रझावप्रद गुण है पर औरत की चुप्पी का अयं ही है मानसिक अशाति । शायद वह पटर बटर वोलती साडी-गहनों के नमूनों, प्रसाधन उपकरणों या अपने समुराल के खानदानी किस्सों के टुकड़े छिटकारती चनती तो वे उसे भरपूर मुत्र से झलती पर अपने सारे मूक अभियोगों समेत वह उनके उस दिमागी गुरुत्वाकर्षण-क्षेत्र से ऐमी छिटक आई है कि "कुर्मी लगा दूं येची ?" चौकीदार कोने से नमूदार हुआ। विरुद्ध /६३ - "नहीं, ठीक है ।" वह उठ खड़ी हुई। घड़ी देखी तो पांच बजने को ये। पहाड़ों का दिन ढलते पता ही नहीं चलता, नहीं ? मां तरोताजा बनी हुई, आया से चाय लगवा रही थीं। "तुम सोई नहीं दिन में ?" "नहीं, काम कुछ है नहीं, वस खाती हूं और पड़ी रहती हूं, नींद भी नहीं आती ऐसे तो।" उसने मेज़ से एक विस्कुट उठा लिया और कुतरने लगी। "वहां कौन करता है सब ? गोपालसिंह है अभी ?" "हांड, वही सब देख लेता है।" मां केतली से चाय प्याले में लौट रही थीं। सुनहरी खुशबूदार धार से उड़ते भाप के नन्हे-नन्हे वादल, "अच्छी चाय है, कौन-सी है ?" "अच्छी है न ?" मां भेद-भरी पुलक से मुस्कराई । "विल्लो नरेश के दोस्त हैं एक टी एस्टेट में। पिछले साल जाड़ों में बर्फ देखने आए तो यही कोठी में टिके थे। इस वार अचानक बड़े से बाक्स में यह भेज दी । उन्हींकी स्पेशल ब्राण्ड है कोई, शायद सिर्फ एक्सपोर्ट के लिए बनाते हैं। उसने हाथ बढ़ाकर प्याला ले लिया और चम्मच चलाने लगी। "दूध और दूं ? कम लगता है।" मां ने दूधदानी की ओर हाथ बढ़ाया। "नहीं, फिर दूधिया स्वाद ज्यादा आने लगेगा। ऐसे ही स्वाद लगती है। हमारे यहां तो गोपालसिंह पता नहीं क्या भूसा-सी पत्ती डालता है, एकदम वेस्वाद।" उसने चाय की चुस्की ली। मां ने आंख की कोर से पंण्ट्री की ओर देखकर पाया की अनुपस्थिति का जायजा लिया और फिर अंग्रेजी में उसे बताने लगी कि इन नौकरों से जरा चौकस रहना चाहिए वर्ना खूब फायदा उठाते हैं ये लोग । एक तो जब से मंहगाई बढ़ी है खाने की चीजों की कीमतें ऐसी बढ़ गई हैं.. वगैरा वह सिर झुकाए सुनती रही। मां हमेशा की तरह इस मुद्दे पर सही थीं। १४ / विरुद्ध 1 अपनी मारी कमजोरियों के बावजूद उनके कुशत गृहिणी होने की दार देनी ही पड़ेगी। अभी तक घर में उनकी मर्जी के बगर पता भी नहीं सड़क मरता या। इधर जव से पापा रिटायर हुए हैं। उनकी पाली जिन्दगी को अनुशासन में बांधने का शम भी उन्होंने उठा लिया है। उन लोगों ने हमेगा पापा को बहुत व्यस्त, बहुत गंभीर और बहुत सत्ता के साथ घर के भीतर छन-भर को घुसने वाले अजनवी-मा ही जाना या।रिटायरमेण्ट के वाद घर में उनकी सतन मौजूदगी शायद मां को भी वही पटकती है या शायद पुरुषों का यह बेहद कामकाजी, वेहद मुलता और लापरवाह रूप एक चालू मिथक-मर है जिसे गदराई प्रतीक्षा में बैठी उनकी औरते उनके पारों और निरंतर बुनती, कातती, फैलाती रहती हैं। होते-होते गायद यह जाल इतना सघन हो जाता है कि जब पुस्प के इन फुर्मती दिनों की सपाट आत्मीयता अचानक दोनों के दरम्यान आन खड़ी होती है तो वे विदक जाती हैं, एक्दम आतंक्ति होकर । "हं ?" वह पौकी, मां कुछ कह रही थी। "चाय पीके तैयार हो ले, फिर जरा क्लब चलें चलेंगे।" "पापा?" उसने दरवाजे की ओर ताका । "अभी सोकर उठे हैं। चाय वहीं पी रहे हैं । याद है, हमेशा रहते ये किरिटायर होने के बाद रोज दिन-भर सोऊगा, जब से होश संभाला काम ही किया।" "सोते हैं रोज?" वह हंसने लगी। पापा का आराम करना एक नितान्त अकल्पनीय बात थी। कम से कम उन लोगों के लिए। मां भी हंस पडौं । "और पया, सुबह-शाम टहलने चले जाते हैं, बाको वक्त ढेर सारे बैंक और शेपर्म के कागज और फाइलें, दर्जनों चिट्टिया उन सबरी, अखवारों के एडिटम को। पापा को तो अभी भीमस काम ही काम है।" मां को मुस्कराहट ऐसी यो जंगे कि किसी दुदांत बच्चे के भोने किया. कलापों का ब्यौरा दे रही हो। "और तुम?" उसने पाय का आखिरी पूंट लिया। विर/६५.

"नहीं, ठीक है।" वह उठ खड़ी हुई। घड़ी देखी तो पांच वजने को थे । पहाड़ों का दिन ढलते पता ही नहीं चलता, नहीं ? मां तरोताजा बनी हुई, आया से चाय लगवा रही थीं। "तुम-सोई नहीं दिन में?". "नहीं, काम कुछ है नहीं, वस खाती हूं और पड़ी रहती हूं, नींद भी नहीं आती ऐसे तो।" उसने मेज़ से एक विस्कुट उठा लिया और कुतरने लगी। "वहां कौन करता है सब ? गोपालसिंह है अभी ?" "हांड, वही सब देख लेता है।" मां केतली से चाय प्याले में लौट रही थीं। सुनहरी खुशबूदार धार से उड़ते भाप के नन्हे-नन्हे बादल, "अच्छी चाय है, कौन-सी है ?" "अच्छी है न ?" मां भेद-भरी पुलक से मुस्कराई । "विल्लो-नरेश के दोस्त हैं एक टी एस्टेट में। पिछले साल जाड़ों में बर्फ देखने आए थे तो यही कोठी में टिके थे। इस वार अचानक बड़े से बाक्स में यह भेज दी। उन्हींकी स्पेशल ब्राण्ड है कोई, शायद सिर्फ एक्सपोर्ट के लिए बनाते हैं। उसने हाथ बढ़ाकर प्याला ले लिया और चम्मच चलाने लगी। "दूध और दूं ? कम लगता है।" मां ने दूधदानी की ओर हाथ वढ़ाया। "नहीं, फिर दूधिया स्वाद ज़्यादा आने लगेगा। ऐसे ही स्वाद लगती है। हमारे यहां तो गोपालसिंह पता नहीं क्या भूसा-सी पत्ती डालता है, एकदम वेस्वाद।" उसने चाय की चुस्की ली। मां ने आंख की कोर से पैक्ट्री की ओर देखकर आया की अनुपस्थिति का जायजा लिया और फिर अंग्रेजी में उसे बताने लगी कि इन नौकरों से जरा चौकस रहना चाहिए वर्ना खूब फायदा उठाते हैं ये लोग । एक तो जव से मंहगाई बढ़ी है खाने की चीजों की कीमतें ऐसी बढ़ गई हैं. वगैरा वह सिर झुकाए सुनती रही। मां हमेशा की तरह इस मुद्दे पर सही थीं। ६४/ विरुद्ध अपनी मारी कमजोरियों के बावजूद उनके कुगल गृहिणी होने की दाद देनी ही पड़ेगी। अभी तक पर में उनकी मर्जी के बगैर पता भी नहीं सड़क माता था। इधर जब से पापा रिटायर हुए हैं। उनकी पाली ज़िन्दगी को अनुशामन में बांधने का काम भी उन्होंने उठा लिया है। उन लोगों ने हमेशा पापा को बहुत व्यस्त, बहुत गंभोर और बहुन सत्ता के साय पर के भीतर छन-भर को घुसने वाले अजनवी-सा ही जाना था। रिटायरमेण्ट के याद घर में उनकी सतन मौजूदगो शायद मा को भी कही खटकती है या गायद पुरुषों का यह बेहद कामकाजी, बेहद मुलझा और लापरवाह रूप एक चालू मियक-भर है जिसे गदराई प्रतीक्षा में बैठी उनकी औरतें उनके धारों और निरंतर बुनती, कातती, फैलाती रहती हैं। होते-होते शायद वह जाल इतना ममन हो जाता है कि जब पुरुष के इन फुर्मती दिनों की सपाट आरमीयता अचानक दोनों के दरम्यान यान खड़ी होती है तो वे विदक जाती हैं, एक्दम यातंकित होकर। "हं ?" यह चौकी, मां कुछ कह रही थी। "चाय पीके तैयार हो ले, फिर जरा क्लव चले चलेंगे।" "पापा?" उसने दरवाजे की ओर ताका । "अभी सोकर उठे हैं । चाय वहीं पी रहे हैं । याद है, हमेशा रहते कि रिटायर होने के बाद रोज दिन-भर सोऊंगा, जब से होग सभाला काम ही किया।" "सोते हैं रोज?" यह हंसने लगी। पापा का आराम करना एक नितान्त अकल्पनीय बात पो। कम से कम उन लोगों के लिए। मां भी हंग पहों।"और क्या, सुबह-शाम टहलने चले जाते हैं, चाकी वक्त र सारे बैंक और यमं के कागज और फाइलें दर्जनों चिट्टियां उन सबकी, अयवारों के एडिटम को। पापा को तो अभी भी बस काम ही काम है।" मां को मुहाराहट ऐसी थी जैसे कि किसी दुदांत बच्चे के भोंने किया- कलारों फा पौरा दे रही हो। "और तुम?" उसने चार का आखिरी पूंट लिया। मिल "मेरी समझ में तो यह सब हिसाब-किताब आता नहीं। धूप में बुनाई करती रहती हूं या कुछ पढ़ लिया। मैगज़ीन वाला मैगजीन के साथ नई कितावें भी दे जाता है।" "वही रामदयाल बुकस्टोर वाला है न जिससे हम कामिक्स लेते थे?" वह हंसने लगी। याद है उसकी दुकान के बोर्ड पर कितने सारे गलत हिज्जे थे और बिल्लो कहती थी, "कि कितावों की दुकान पर अनपढ़ होने का कैसा बढ़िया नमूना है, नहीं ?".: दोनों हंस पड़ी, सुखद पारिवारिक यादों में पगी-पगी-सी। हर पुराने घर में ऐमी सामूहिक यादें जगह-जगह चूड़ी की जगमगाती किर्ची-सी विखरी रहती हैं, पर सिर्फ टुकड़ों को ही भींचकर पूरा अतीत फिर जिया जा सकता है.क्या? शायद नहीं। "विल्लो भी होती इस वक्त..." मां ने सांस खींचकर शायद खुद से ही कहा। वह चुपचाप चम्मच से खाती रही सर झुकाए । मां फिर बुझ गई थीं। "चल तू भी तैयार हो ले।" वे कुर्सी खिसकाकर उठ गई। वह अपने कमरे में आ गई। ऐसे वापस लौटने-भर से अकेलापन घटता नहीं और भी गहराता जाता है, यह बात उसने पहले क्यों नहीं सोची होगी भला? शायद उदय को 'कुछ-कुछ आभास रहा होगा कि वह इस तरह अचानक उसने वापस लौटने की इच्छा को उबकाई की तरह गले में उभरते पाया। वह शीशे के सामने बैठकर बालों में कंघी फिराने लगी। शीशे के किनारे फेम की लकड़ी पर जूड़े की पिन से उकेरा एक तीर विधे दिल का आकार का बना हुआ था। विल्लो ने उन दिनों बनाया था जिन दिनों नरेश भाई से उसकी तूफानी कोर्टशिप चल रही थी। दिल के भीतर दो अक्षर खुदे थे वी० एन० और चारों ओर घने वेल-बूटे। मजीव जमाना था वह भी ! पापा पहले शादी के पक्ष में एकदम नहीं थे। नरेश भाई उम्र में तो आठेक साल बड़े थे ही तिसपर खासे खिलंडरे रईसजादे के रूप में मशहूर थे। पर विल्लो की ज़िद इस विरोध से और भी पुख्ता ६६/विरुद्ध वि-६ होती चली गई थी। रोज रात गाने की मेश पर मे मामी ५ जाते थे जिनको शुरुआत दोस्ताना बमों मोर अन्तमा पापा के कुर्मी खिमकाकर दनादन बाहर निकन मागे होता। पना नहीं क्यों उम पूरे दौरान लगता रहा था कि उसके मामा Enhit. डामाई स्थिति का वे सभी बड़े जायके से रसास्वादन कर रहे थे, माने आंसुओं, गर्जनों और हरकतो के बावजूद । मिलो को मारे गोगामा माकोश और किताबी भाषा को उगलने का मौका मिला, पा) मनि प्रतिरोध के जोशीले इजहार का और मा? यह गो जो भागुमी मोर हिस्टीरिया के कगार पर खडी सदा एक ट्रेनेडी की प्रतीक्षा करती ही पी-उफ, कितनी क्रूर और ओछी बातें सोचती है यह भी। गायर अगर उनमे में कोई गलती पर था तो वही युद। मां ने दरवाजे सेनाका । "तैयार हो?" ६ उनके घर की ढलवान जहां खत्म होती थी, वही पहाइपासलहटी पर एक छोटा मैदानी विस्तार था। उसके छोर पर बलय को सा लकड़ी की इमारत गुड़िया घर-मी दुवको बैठी थी। पापा वसात कि गई इमारत कुछ नहीं तो कोई दो सौ साल पुरानी होगी । जय मंदागों में हिंदुस्तानो ताप ने वरतानिया से आए साहब लोगों की नामुक गमड़ी को यादा झुलसाया तो वे भागे पहाड़ों की ओर-जओं की तरह रामहटिया, पगडंडियों, देवदार कंजों के पास इन नियालिग एटियन अंगों को जनते हुए। तब मे लेकर इन बंगलों का कुछ भी नही याग गाय मनाम । रिग्रीव सेण्ट क्वेनटिन, स्लीपी होली, प्रायरी ना आने में ममता है कि पादातर सब खस्ता हाल है, तगडी नायियो-मार गोणे, भाडेपन से पोती सस्ती वानिग में चमनी रेमि भार थामा । झांकते जंगली पौधों के काइयां देसी विस्तार। पूरे शहर को देखो तो लगता है जैसे यहां समय ल्लीपिंग ब्यूटी के किले की तरह अचानक सो गया हो। फिर शहर का एक नया भाग है। फुटनोट सरीखा, देसी सैलानियों की खातिर गद में चस्पां किया गया-नियान में चमकते 'कार्नफ्लेक्स' या अंगरेजी शराब के इश्तहार, ज्यादा ही भड़कीले रंगों से पुती वेंचें और पार्क, कतिपय कुरुचिपूर्ण रंगों के, मिलों में बने कनी कपड़े वेचते हुए तिब्बती फेरी वाले। "अब कुछ भी खात यहां रह नहीं गया वैसे।" हंफनी दवाती मां कह रही थी। उसने सोचा कि वापसी में जिद करके उनले डांडी पर जाने को कहेगी। "हां," पापा बादतन देख कहीं, वोल कहीं रहे थे। कैसे-कैसे हूश सैलानी चले आते हैं। कपड़ों का सलीका नहीं, धोती पहनकर घुड़सवारी करेंगे, सड़क चलते गाजर, मूली चबाएंगे ! वात-बात में हुज्जत बोर भाव-ताव ! तेरा पुराना घोड़े वाला कह रहा था कि एक दिन चवन्नी-भर बचाने को उसे घण्टा-भर वारिश में खड़ा रखकर भाव- ताव किया इन लाला लोगों ने, टिप तो दूर रही। कहां अंग्रेजों के जमाने में वेचारों को मुंहमांगा मेहनताना मिलता था, ऊपर से इनाम अलग । सच में, काम की कदर तो वही लोग जानते थे।" मां-बापा अपने प्रिय विषय पर चालू हो गए थे। विगत की भव्यता और वर्तमान का ओछापन । उसने अपने-आपको भिचता हुआ पाया। क्या इन लोगों को अपने दोहरे मानदण्डों का दोगलापन सत्र में नहीं सलता होगा? बिल्लो के विदेश से आने पर उसके सामने हर साल भारत के स्वर्णिम भविप्य और रुपहली संस्कृति के रूमानी खाके बींचे-दुहराए जाते हैं और पश्चिमी मूल्यों के छिछलेपन की छीछालेदर की जाती है, पर परिप्रेक्ष्य बदलते ही दोनों एकजुट हो फिर उसी सामंती उपनिवेश- वादी अंग्रेजियत की दुहाई देने और हिन्दुस्तानियों के भोंड़े जीवन की बालोचना में लीन हो जाते हैं । शायद उच्चमध्यवर्गीय सब हिन्दुस्तानियों के दो मुखौटे होते हैं। एक विदेशिगे के लिए, एक स्वदेशियों के लिए। ६८/विक्ष पर इम दोगलेपन के बीच एक पोटी की पोदो जो वोनी और अजनबी बना दी गई है उसके बारे में कोई वो नहीं माना? का उगका और विरूनो का दोप है कि वे मुपरी हिन्दी नही बोन पानी या परेलू रिप्तों के प्रति यह देशी ललक और भावना नहीं दिशा पाती जो मा-पाषा को अपेक्षित है ? अगर उन्हें इतनी ही परम्परावादी बनाना या ता पश्चिमी सभ्यता के उम छोटे द्वीप सरोगे अलग-थलग कान्वेण्ट में बन्द करो किमलिए माली पढ़ाया गया? और अगर वह गंस्कृति तब इतनी ही मापनीय मगनी थी तो अब उन्हें कुछ दूमरी तरह की मान्यताओ की दुहाई देकर क्यो शमिन्दा किया जाता है ? "एक यही कनर रह गया है जरा ढग का, जहा एकाध घण्टे को जाया जा सके ।" मा बह रही थीं। क्लय आ गया था–वर्षों पुरानी यह विलिंडा अभी भी आश्चर्यजनक दमयम के गाय कलगी उठाएनडीपी, रग-रोगन से पुख्ता । यह इलाके का सबसे प्रमुप और वगंदभी पनब था। एक जमाने में यहां नेटिव लोगों और कुतों का प्रवेश निषिद्ध था, कुछ चुनिन्दा लोगों को छोड़कर । मां बड़े गर्व मे यतातो पोंकि वे उस जमाने में भी वैफिको मे यहा जाते-आते थे। "पर तब बात हो और थी।" बुध सकर उवामी मे वे जोडती हैं। पहले मा यो पुलक उसे भली लगती थी पर गांची तो यह मत्य भी तो उसी शर्मनाक व्यवस्था का अंग था, मही? समय के भीतर सड़कों पर विराम वर्गभेद नहीं दीसता पा, पर आयुभेद को थेणियों का वर्गीकरण बडो आमानी से होता जा रहा था। एक सम्यूतरे गलियारे में मां की हमउम्र महिलाओं वा गोल बैठा था। सहजीव और पहरावे के लिहाज मे इसका उमा ओर ही पा~-महंगा पर तनिक भी भडकीला नहीं, पानी जिसे पढ़ते हैं 'पुराना पैमा'। यहीं एका पान-गे मोनियों मे. आर या पुरानी माल के जवाहरात की जाती. गीशनर कौंध जाती थी, पर वे उंबरान पहनने यालियो के व्यक्तित्व ना एक आरयम्त पुलंनी अंग-भर थे। टीक इसके विपरीत दूसरे छोर पर विस्ट/६ । - - । नये रईसों की वातून वीवियों का टेवल था। वे जोरों से हंसती-बोलती अपने बच्चों को फूहड़पने से भजियों में सांस लगाकर ढुंगा रही थीं। उनके वजूद पर हर चीज़ ज़रूरत से ज्यादह थी-~-मांस, जेवर, कपड़े, हीरे, सेण्ट, सभी। मां हिकारत से फुसफुसाईं कि यही थे वे सीज़नल सदस्य जिनके पास वस नया पैसा ही है दिखाने को, ऑक्सीन (अश्लील) ! पापा ने ज़रा अर्थपूर्ण ढंग से खंखारा "माथुर्स।" मां के चेहरे की सामान्य लज्जालु मुग्धता तुरन्त लोट आई। लम्बे-चौड़े मेजर जनरल माथुर ने दोनों को बांहों में भर लिया, "इसे कहते है एक साथ दो-दो ईद के चांद । हा-हहा-हहा।" वे ज़ोरों से ठहाका लगाकर हंसे । यूं भी वे अपने मज़ाकों पर हमेशा से सबसे ज़ोरों से और सबसे देर तक हंसा करते थे। पापा और वे स्कूल से लेकर कालेज तक सहपाठी रह चुके थे। "कहिए चन्द्रा जी, आज हम लोगों को कैसे कृतार्थ किया ? समझा, विटिया खींच लाई होगी। क्यों रज्जो? भई कव आई तुम ? और जमाई बाबू कैसे हैं ? वेरी सीरियस यंग मैन ।' उनकी गरदन स्प्रिंग लगे मिट्टी के बूढ़े की तरह कुछ देर उदय की मूक प्रशंसा में हिलती रही। तभी पीछे. से गठियाग्रस्त टांगों पर हिलती-डुलती एक पृथुलकाय महिला हाथ में होल्डर में सिगरेट लिए नमूदार हुई। यह माथुर आण्टी थीं। "हलो चन्द्रा!" उन्होंने मां का गाल चूमा। उनके पत्तीदार वाल, मान पेंसिल से अंकित भवें और चटक लिपस्टिक से पान के पत्ते के आकार में रंगे होंठ, चालीस के आस-पास की विलायती फैशन पत्रिकाओं से निकला लगता था। देखकर डिकेन्स को अभिशप्त मिस हैविशम की याद आती थी जिसने जबरन अपने घर के भीतर समय को रोके रखने की चेष्टा की थी, "हेलो माः डी।" उनका उच्चारण भी निखालिस विलायती था। भारी आवाज यानी जिसे पीने वाले कहते हैं ह्विस्की वायस । अपने जमाने में वे मशहूर पलर्ट और वर्गदंभी मशहूर थी। वात करते-करते वे सब अब तक एक खाली मेज़ की ओर बढ़ चले थे---कुर्मी में अनिच्छा से धंसते उसने सोचा कि अगर कोई उद्धारक नहीं आया तो सारी शाम इन्हीं सव सन् १००/विरुद्ध लोगो के दरम्यान फटेगी सन् अड़तीग के क्रिसमस वाल या गन् उत्तीग के मालाना लेडीज बाजार के लिये मुनते हुए। उमने मप्रयाग जम्हाई दयाई। "किमी-मनी कहा है आष्टी?" किमी यानी उनकी लडकी कामना जो उसके माय पत्ती यो और सनी उनका बेहद विगईल वेटा जो एक घोहे वाले को चाबुक मे पीटने के अपराध में स्कूल में तकरीबन निकाल ही दिया गया था, वह तो कई पनि प्ठिन लोगों ने बीच-बचाव कर दिया था। "किमी तो शादी करके फैनेडा में वम गई है। दो वहुत पारे जुड़वा बच्चे हैं उसके ।"उन्होंने हाथों से बच्चों का माकार बनाया। "मनी लण्डन मे है । वही एक वेग सहकी से शादी कर सी है। पिछले साल बेटा हुआ तो हम लोग गये थे। लवली चाइल्छ । तुम कब आई?" उन्होंने आगे गिकोड़कर पुएं-भरा कर लिया। इसी अदा पर तीम माल पहले माया लोग लट्ट हो रहे होंगे पर अब उनके झुरींदार चेहरे और अधपके बालों के साय वह मब देखकर अजीय-सा लगता था। "अमी दो-एक दिन हुए।" "अभी तो रहोगी न?" "हूं।" उसने उत्तर अधूरा-सा ही छोड़ दिया। "क्यों भाई, तुम यच्चे लोगों को यह नहीं महमूग होता कि हम बूढे कितनी आस लगाए रहने हैं तुम्हारे आने की ? ये यंग सोग पाएगे भी तो हवा के घोड़े पर मवार।" मापुर माहब ने हवा में चुटको बजाई। "क्यो - था चन्द्रा?" मा हंस दी "इमका तो वम यही है, आज आई तो कल में उदय के तार और टेलीफोन, कर लौट रही हो? गर अब चीज तो उसीकी है।" गुस्सा अम्ल की तरह गना, जला रहा था, चीज! वह पीर-भर है, यम ! "क्या लोगो ?" पापा पूछ रहे थे। तभी लोगों के बीच होती एक गुदाज लहीम-राहीम आकार वाली चली आई : रमला । वह उठ पड़ी हुई। रमना पुरमजाक नानी " "हास्य !! विरुद्ध/१०१ वेहोशी में लद्द से उसपर दुलक पड़ी। "एट लास्ट।" "हलो आण्टी ।" वह हंसती हुई मां की ओर मुड़ी।"ले आई इस कम्बत को न? चल-चल । बभी लौटा जाती हूं इसे आण्टी ।" हाय से उसे घसीटती रमला साथ के दूसरे कमरे की ओर होती चल दी। बाहर गलियारे में किशोर-किशोरियों का एक बदहवास हुजूम था। कम्यून की-सी पोशाकें। लगभग सभीने बदरंग डेनिम के जीन्न और रंगीन कमीजें पहन रखी थीं । एकाध दादा लोगों ने श्मशुजाल उगाकर चेहरे के कच्चेपन को बूंखार मर्दानगी के महानास से ढांक डाला था। उने उनको तीखी आक्रामक उन्मुक्तता भली लगी। दो काफी सुन्दर लड़कियां सिर पर सेलर कैप लगाए रेलिंग पर बैठी थीं। उनके चरणों के पास दसेक किशोर प्रशंसक जांबाज कोशिशों से उनका मनोरंजन कर रहे थे। वे दोनों एक- कर खिड़की के पार उनकी अठखेलियां देखने लगी । रमला की रनिंग कमेंट्री चालू थी। "हाये दोज़ टीन एजर्स । हम-तुम भी यंग थे, पर ये लोग तो बाबा रे। कोई डर-परवाह नहीं, इन दो बहनों के देख रही हो, कित-- का हाथ पकड़कर कव चल दें इनकी मां को भी नहीं मालूम होगा। वैसे उसे फिकर होगी, ऐसा भी नहीं।" रमला कुटिल हंसी हंसने लगी। उसकी ईर्ष्या से रजनी के भीतर कुछ खुरच-सा गया। जब हमें दूसरों के युवक होने से झुंझलाहट होती है तो शायद हम ढलने लगे होते हैं, नहीं? रमला पूरी तौर से न सही काफी हद तक पीछे कमरे में बैठी अधेड़ औरतों के गोल के निकट आती जा रही थी । वदन जरूरत से ज्यादा भरा हुआ, सही मेकअप, पर जरूरत से ज्यादा, वाल वांधने का सलीका "मां कह रही थीं तुम्हारा बच्चा बड़ा प्यारा है।" उसने सोचने को रुद्ध किया। रास्कल है, पूरा।" रमला खिली-खिली हंसने लगी। "वाप के साथ बैठकर ऐसी छांटता है कि बस । यह मरद लोग बेटों के साथ चट- पट अपनी टीम बना लेते हैं । तेरी अभी तक कोई खबर नहीं इवर की ?" रमला ने उसके पेट की ओर इशारा किया। उसने सिर हिलाया। - ... . १०२/विरुद्ध "क्यों ?" यह हम पड़ी । “वम, ऐसे ही कोई छोटा-मोटा उत्तरदायित्व थोड़े ही "छोड़ यार । तू तो हमेशा जरूरत से ज्यादा सोचती है। हमारी तो दिल्ली से पटती थी। उसने तो अपना काम सत्म कर डाला । छुट्टी हुई और सच में तो वह भेद-भरे ढंग से झुको । "जय चार-पाच माल • याद वो यान नहीं रह जाती तो एक निज चाहिए होता है जोड़ने को, नही ? तेजी मेरी तो न मुनें पर मजाल है कि टीटो कहे तो टाल दें, यही तो हम मद से सुपीरियर हैं माई डियर।" रमला आख मारकर हंसी। "सच कहती हूं फिलामफर, तू भी कर डाल तैयारी। कौन तुझे सद पालना है ! गेट अ गुड आया लाइक माइन, बस।" वह चुपचाप शीशे के बाहर देखती रही। बिल्लो और उमने भी इसी जगह अपनी गर्मी की छुट्टियों को कितनी शामें विताई थी। हसते-बोलते. एक अभेद्य सुरक्षा के अहसाग मे घिरे-घिरे अब लगता है कैसे किया होगा? तब तो घर से क्लव का रास्ता एक रास्ता भर था जिसके ओर-छोर पर दो सुरक्षा-स्थल थे चीच-बाहर, जो भी हो गुजरता हो उसके बारे में माथापच्ची करने तब कतई जरूरत नहीं थी। "एई।" अभद्र इशारे से बाहर के एक झुण्ड ने वेरा को बुलाया, फिर उससे कुछ कह रहे थे। डांट रहे होगे शायद । वैचरा सर झुकाए चुप पड़ा था। पीढियों की तहजीब अपने पट्टेदार बदन मे दबोचे। फिर एक लड़की ने, जिसकी वनियान के सीने पर अमरीकी क्षण्डे के ऊपर पीस' लिया हुआ था, कुछ कहा और ये सब उठकर बाहर चल दिए। "चल कुछ पीने को ले ले बार मे।" रमला ने उसको बांह खीची। "अभी तो चाय पी है।" "मालूम है । अब कोक भी पी ले।" रमला उसे लेकर आगे के कमरे में चल दी, जहां साफ्ट यार था। वहां उसे कोई परिचित फिर दोल गया 1 "एक मिनट, अभी आई।" वह एक कोने में खड़ी हो गई। वगल में विरुद्ध/१०३ - कार्डरूम था जहां हरी मेज़ों पर तन्मयता से झुके सिरों का हुजूम था। पापा कहते थे कि लोग एक रात में दस-बारह हज़ार भी हार सकते हैं। परिचित कोने में आण्टी बलजीत बैठी थीं, ब्रिज की पुरानी खिलाड़िन हैं। इकहरी मर्दानी देह, खिचड़ी वाल, हड्डिहा चेहरा। उनके पति खुल्लम- खुल्ला एक पठान रखैल रखते थे । दोनों में सालों से वोलचाल नहीं थी। विल्लो ने एक बार कहा था कि ऐसे चेहरे-मोहरे की मेरी बीवी होती तो मैं भी रखैल रख लेती । मां बहुत गुस्सा हुई थीं। 'तुम लड़कियों को बोलने का अन्दाज़ नहीं है । एकदम । लिख-पढ़कर हम कोई अंग्रेजों की तरह थोड़े ही हो जाते हैं कि जो मुंह में आया सो बोल दिया । है कोई जो पति की परित्यक्ता औरत के दामन के दाग गिन सकेगा...'वगैरह। मां की भावुक आदर्शवादी व्यख्यानमाला शुरू होते ही वह और विल्लो उचट जाते थे। उसने इधर-उधर ताका, रमला कहीं वार के पास की भीड़ में गुम गई थी। वह चुपचाप वाहर वाल्कनी में निकल आई। रमला मिलेगी तो कह देगी कि टायलेट गई थी। रेलिंग से झुककर वह सामने के धुंधलाते पहाड़ देखने लगी। घर लौटना इस मायने में कितना यंत्रणादायक होता है कि आप अपने बचपन के लम्बे-चौड़े सपनों को,ठिठके उन बौने आकारों में सिमटा हुआ पाते जाते हैं, हास्यास्पद और कारुणिक। हर चीज़ उम्र के अपरिहार्य दवाव तले ढलकती चली जाती है, ऐन आपकी आंखों के सामने और आप कुछ नहीं कर सकते । शायद मां-बाप के रूप में जिससे हम जूझते हैं वह एक पूरी व्यवस्था की अनन्त क्रूरता का अहसास है जिसने हमारे मां-बाप को भी उतना ही कुण्ठित और घायल किया है जितना कि हमें ! दाहिनी ओर के पहाड़ों के ऊपर से हल्के पारदर्शी रोगन की पर्त-सा कोहरा उतरने लगा था। कोहरे के बीच झपकती वत्तियां,पहाड़ों का अन- घड़ हरा-काही विस्तार, कुहासे का धुंधला-गाढ़ा उभराव-सब मिलकर एक जीवनहीन संसार गढ़ते जाते हैं जिसमें हमारा होना कतई गैरजरूरी है, नहीं ? शायद ऐसा सूरज के चारों ओर स्थिरता से घूमते उन जीवन- १०४/विरुद्ध हीन उपग्रहों में निरंतर होता होगा जहां बाकायदा दिन-रात होते-- लते जाते है, हमारे ओछे प्रयोजनों के कतई परे, अनन्त । "ले । तू यहा खड़ी है और मैंने सारा क्लव छान मारा। चल भीतर चल, अभी थोड़ी देर मे ब्यूटी क्वीन का चुनाव होगा।" "क्या?" उसने वत्तियो मे झकझकाते हाल के उजास से आखें सिकोडी। "याद नही क्या ? हर साल तो होता है। एक बार बिल्लो भी तो गई थी हिस्सा लेने।" "नही, पापा ने मना कर दिया था। स्कूल वाले भी मना करते थे।" "तुम्हारे पापा पुराने ख्यालो के खासे हिमायती हैं न ? ऊ ही इज क्यूट । मैं तो विल्लो से उनके बारे में सुन-सुनकर बहुत डरती थी पहले। विल्लो कहती रहती थी न कि बहुत गंभीर हैं, बहुत अनुशासन के पावन्द है, वगैरा-वगैरा, पर ही टर्ड आउट टु बी रियल चार्मर । सच,तुम्हारी मा बहुत भाग्यवान हैं । अभी भी अंकल कितने कमउम्र लगते है ! नहीं ?" "जरा देरी हो गई तुझे।" रजनी मुस्कराई। "क्या ? ओ हो हो हो।" मजाक का मतलब समझकर रमला जोरों से हंस पड़ी। "यह हुई ना बात । तब से मर चूहे का-सा मुंह बनाए बैठी थी। वैसे असल में शादी के बाद मियां के बिना कहीं जाना अजीब-सा लगता है म? जैसे घर से बिना चप्पल पहने निकल आए हो।" अपनी उपमा पर वह फिर ठठाकर हंसी। "आने वाला है उदय यहां ?" 'न 5 ही," वह चुप हो गई, आगे क्या कहे कुछ समझ नहीं आया। अपने सारे सतहीपने के बावजूद रमला की बात गलत नहीं थी। उस/ सारे तनाव और आक्रोश के बाद भी उसके भीतर की एक रिक्ति उद की उपस्थिति से ही भर पाती थी। वे शायद एक-दूसरे के आश्वस्तकार तत्त्व थे, परस्पर किरा-टकराकर अपने अस्तित्व, अपनी संवेदआओ की धार पैनाते हए । मां की आंखों में अक्सर उसने उदय से उसके रिश्ते को लेकर दवे प्रश्न सुगबुगाते देखे हैं। उसे मालूम है कि वे इसी भय से उन्हें स्पष्ट नहीं पूछ लेती कि उसके उत्तर कही वे ही न हों जिनसे वह खौफ खाती हैं । पर क्या वह मां को यह कभी समझा सकती है कि उदय और उसके संबंधों यह जुझारूपन उनकी एकदम निजी ज़रूरत हैं? जिसकी प्रखर. अनुभूति के आगे दोनों में से किसी एक का दब जाना या एक रूमानी फैलाव में दुवक जाना उस पूरी कामरेडशिप को दगा देना होता । मां से वह कहेगी भी तो वे तुरत पुरुष की मजबूत छत्रछाया के विना नारी की असहायता या तट से लगी नाव सरीखे अनुप्रास समेत भावुक फिकरा चस्पांकर उसे पहले ही छेक देंगी। मां-पापा के सुनिश्चित नियमवद्ध संसार में औरत और मर्द के बराबरी के रिश्ते का कोई खाका ही नहीं था जिसको दिखाकर वह कह "कव तक हो?" रमला पूछ रही थी। "वस कुछ ही दिन और ।" उसने अचानक अपने निर्णय से अपने- आपको खुश होता पाया। "अरे इतनी गर्मी में क्या जा रही है ? ज़रा बारिश हो लेने दे। हम तो हर साल जुलाई में पटियाले लौटते हैं,, तव भी उबलते रहते हैं।" "कैसी जगह है ?" "अच्छी है। तेजी ने तो नई फैक्टरी लगाई है सो काम में मशगूल रहते हैं, हमारा एक लेडीज़ क्लब है उसीकी कार्ड पार्टी, किटी पार्टी होती रहती है।"रमला के स्वर में वालसुलभ निश्छलता थी। सव कुछ स्वीकार कर संतुष्ट रहने का अहसास । उसके मन में ललक-सी उठी। काश, उसका मन-संसार इतना सीधा सहज हो पाता ! "फिर मिला-जुला परिवार है, हालांकि मेरी सास जी ने वंगले सब- को अलग वनवा दिए हैं पर हाता एक ही है, मर्दो काविजनेस भी एक ही है, सो खासी रौनक रहती है। "दिन में क्या करती है ?" १०६ / विरुद्ध "सो लिए, कभी कुछ हल्का-फुल्का पढ़ लिया, जाहों मे बुनाई- कढाई। फिर अभी तो टीटो छोटा है। कभी आया से मांगकर उसीसे खेल लिया। तू?" वह कुछ अटक-मी गई। क्या कहे वह ? करती तो वह भी कुछ नहीं, वस धुधवाती बैठी रहती है। "सोचती हूँ, वापस जाकर एम० ए० जायन कर लू । पढाई तो पूरी हो ले।" वह खुद चौंक गई। यह पहली दफा हुआ था कि उसने इतने खुलेपन से अपनी इच्छा का शाब्दिक इजहार किया हो। "छड यार। रही तू भी भोंदू ही । अब बच्चे-बच्चे का टाइम है, एम. ए० करके क्या करेगी? मेरी देवरानी को ही ले, डाक्टर है, सुबह से शाम तक क्लिनिक में रहती है और हमसे कहती है कि टाइम वरवाद कर रही हो । पर मरी को छुट्टी के दिन समझ नहीं आता कि क्या करे ? नौकरी तो उसके लिए घर से भागने का बहाना-भर है, वस। बच्चे आया और दादी संभालती हैं, मरद एक मदरामन डासर के फेर में पड़ा है। ' रमला जोर-जोर से हंसने लगी। "फिर एम० ए० करके तू कहेगी डाक्टरेट करनी है । फिर बाहर हायर स्टडीज़ को जाना, मियां विचारा तो गया " "वाह, अगर वह दिन-भर घर की फिकर किए बिना नौकरी कर सकता है तो मैं क्यों नहीं?" "ले। उसे इस सबसे क्या माथापच्ची करना। आखिर इसीलिए तो इंसान शादी करना है कि जरा घर आवाद रहे, जरा दंग से काम होता रहे। और क्या?" रजनी हंस पड़ी। 'वो सब तो उसका पुराना नौकर मुझसे भी अच्छी तरह चला लेता है. मेरी उसमे क्या ऐमी ज़रूरत ?" रमला ठट्ठा मारकर हमी । "सो तो तेजी का नौकर भी कर ले पर हुकूमत का फरेव तो बनाए रखना चाहिए अपने को। मैं तो वीच-बीच मे यूं ही जाकर खूब लाइ आती हूं सब नौकरों को, वर्ना सच ये लोग होते बड़े 'वह बात अधूरी ही छोड़कर पोछे मुड़ी "आण्टी बुला रही हैं. विरुद्ध १०७ तुझे। अभी जा रही हो?" "हां, शायद।" रजनी ने आंखें सिकोड़कर बाहर देखा। "पानी भी फिर से आने को हो रहा है। मां को वैसे भी डाक्टर ने ज्यादा देर जागने को मना किया है । चलूं । अव आऊंगी फिर कभी, तुम तो पास ही रहते हो न?" "बाय !"रमला ने हाथ हिलाया। "ज़रूर आना, यह नहीं कि कह- भर दिया। अच्छा?" वह सीधे अस्वीकार और उससे सम्बद्ध लम्बे कारणों की फेहरिस्त को तूल देकर नहीं उठाना चाहती थी,उसने सहमति में सिर हिला दिया-जरूर। सब लोग उठकर हाल की ओर जा रहे थे, शायद कार्यक्रम शुरू होने वाला था। उसके उठते ही उसकी कुर्सी भर गई थी। "तुझे बीच में तो नहीं उठा दिया? फिर से पानी आने का हिसाव लगता है । चाहो तो तुम और पापा रुक जाओ। डांडीवाले पहचान के हैं, चली जाऊंगी।" "नहीं, मैं भी चलती हूं। "जा रही हो?" मिसेज़ माथुर पास से गुजर रही थीं, "आना कभी वेटे, ममी को लेकर सनी और किमी के बच्चों की रंगीन तस्वीरें दिखाएंगे।" "जरूर।" डांडी वाले तेजी से कदम दौड़ाते हुए आगे निकल गए थे। पापा और वह पगडंडी चढ़ने लगे। दोनों के बीच सहज चुप्पी थी। कुछ देर चढ़ने के बाद वह रुककर किनारे के खम्भे के सहारे सांस सीधी करने लगी। "आदत छूट गई न?" पापा का स्वर आया। "हां, हर बार शुरू में कुछ वक्त लगता है।" दोनों फिर चढ़ने लगे 'पैरों तले के पत्थर कभी ढलवान पर नीचे तक सरकते चले जाते, कभी कोई दुर्वल टहनी चटखती-चटाख । वस, वाकी सिर्फ चुप्पी। इस मोड़ से नीचे पुराने बाजार की इमारतों के पीछे अलाव घेरकर बैठे कुलियों - । - १०८ / विरुद्ध को जमात दीख रही थी। लपटों पर शुका रक्ताम अंधकार। कोई गा रहा था शायद, अपने डोटी गाव मे पीछे छूटे यौवन के गीत। एक शम्महीन करुण ध्वनि हवा के फैलाव की तरह कुछ देर कनपटियों पर सुरसुराती रही, फिर पीछे छूट गई। वे चढ़ते रहे। "कुछ भी बदल जाए, ये सब वैसे ही रहेगे।" ढलवान तले की देसी शराब की दुकान लडखड़ाता मानव-आकार निकला और सम्पपोस्टो के परे अंधेरे मे विला गया। बचपन में इस सड़क पर उन्हें अकेसे आने-जाने की कतई मनाही थी। "पब्लिक न्यूसेंस !" पापा बुदबुदाए । "क्या ?" उसने समझने से पहले ही पूछ लिया। "अरे यही शराब की भट्ठी । एक बार गए साल हम कुछ लोगो ने पेटिशन भेजकर बन्द करवाई। अब फिर चालू हो गई। भट्ठी का मालिक लोकनेताओं को कुछ दे-दिला आया, बस । फाइल ही दवा लो।" "किसी आफिसर से नहीं कहा?" "अरे बेटा, वो लोग तो और भी गए-बीते हैं। एक नम्बर ये हर. पोक और आलसी। दंगे का अंदेशा हो तो दौरे पर नियाल पड़ेंगे। फोन करो तो चपरासी कहेगा, पूजा करने बैठे है । हिपोक्रेट्स !" पापा ये स्वर मे क्रोध नही उदासीन तिरस्कार था। "कगले ऐसे हैं कि यस ! आज यहाँ से मुफ्त सामान, आज वहां से । अरे डाली-वाली का पहले मी हिसाव पा पर अग्रेज़ मे कलेजा था। हिम्मत यी कि उनके जमाने में ऐन शहर में वीच ताड़ीखाना खोल दिया जाता? पीते तो ये छोटे लोग तय भी पेपर शहर के बाहर । यह थोड़ी कि..." कुछ देर दोनों चुपचाप चलते रहे। "मां कह रही थी कि माप कोई फलों का आरचई मेने की सोष रहे थे।" उसने वान पलटनी चाही। "वागीचा तो क्या, ऊपर के रिग्रीव काटेज वाले अपनी जमीन का कुछ हिम्मा और एक छोटा गेस्ट हाउस येचना चाह रहे थे, हमने गांचा - वि.

था,ले लेंगे। वहां उसे थोड़ा बढ़ाकर एक बंगला और बन जाता--तुम्हारे- बिल्लो के लिए एक-एक हो जाता। पर अव विल्लो-नरेश शायद एमीग्रेशन के लिए सोच रहे हैं । हम लोग जब तक हैं तव तक ही शायद दो-चार साल में एक बार आते रहें। वाद को पड़ा-पड़ा बरबाद होगा। उदय को भी पहाड़ शायद खास पसंद नहीं।" स्वर में अभियोग था या स्वीकारोक्ति-भर, उसे टटोलने का साहस नहीं हुआ। क्या तुक वह सब खंगाल डालने से, नहीं ? घर की वत्तियां सामने आ गई थीं। उसने बाजू पर खड़े उस कुबड़े बांज के पेड़ को धीमे से छुआ। खाल नर्म और गीली थी। पालतू कुत्ते की थूथनी की तरह बूढ़ा पेड़ जैसे उसे टटोल रहा था। उसने हाथ हटा लिया । "अब तुम्हारी मां दरवाजे पर ही खड़ी मिलेगी।” पापा मुस्करा रहे थे।"दस मिनट की भी देरी हो जाए तो वह दरवाजे पर चहलकदमी करने लगती है जैसे कि अभी भी सड़कों पर भालू और चीते घूमते रहते हों।" दरवाजा सचमुच मां ने ही खोला। "लो मेम साहब।" पापा ने अपना छाता उन्हें थमा दिया और अपने कमरे की ओर चले गए। "उदय का फोन आया था।" मां ने छाता स्टैण्ड पर रखते हुए कहा। वहुत सारा कुछ घुमड़कर भीतर उठा, पर उसने अपनी आवाज़ भरसक संयत रखी। "तुमसे वात हुई क्या?" "नहीं, मेरे आने से पहले माली ने फोन उठाया था शायद । कह दिया था क्लव गए हैं, देरी से आएंगे।" उसने हताशा से अपने-आपको भीगी वरताती-सा लस्त होता महसूस किया। ७ सुबह वह उठी तो कोहरा छाया था। अभी तो सिर्फ एक झीनी फुही-भर ११० / विरुद्ध पड रही थी, पर शायद रात काफी वरमात हुई होगी। सारा कुछ गीला था। उसकी खिडकी के पास के सेव के पेड से पानी लगातार चू रहा था। टप-टप । सारा वातावरण पानी को मगीतमय ध्वनियों से भर गया था। पत्तो से छनता पानी, टिन की छत पर तडातड बरसता पानी, छत की कोरों से नालियों में भरकर दौड़ता पानी और इस सबके परे बीच में कभी एक हल्की-सी ध्वनि रुक-रुककर उभरती-टिप्प । उसके कमरे की छत एक जगह से चू रही थी और उस जगह पर एक पुराना तसला रख दिया गया था। टिन्न। उसने हाय पलट कर घडी देखी, साढे सात। वह लेटी रही। उदय ने किसलिए फोन किया होगा ? कोई जरूरी बात होती तो शायद दुबारा भी कर लेता, नहीं ? टिप्प | उसने सोचना छोड़ने की कोशिश की। पहाड़ की बरसात मे हरेक घर द्वीप बन जाता है -निर्जन, शांन, पानी की छलछलाहट और कुहासे की पतों में खोया, ता-उत- राता। पहले उसे यह बहुत अच्छा लगता था। कमरे के, घर के, हाते के चारों ओर बुनी जाती यह तरल संरचना एक अजीब-सी ऊष्मा देतो जाती थी, अपनी भरपूर ज़िन्दगी में और भी लिपटते जाने का नर्म अहसास, पर अब कोहरा और जल-ध्वनियां जब बाहर की दुनिया से काटकर उसे उसी जिन्दगी के ऐन बीच धंसा जाती है तो वह उसे कतई झेल नहीं पाती । क्या यही सव नही था जिससे कतराने की चेष्टा मे वह छटपटाती, भागती फिर रही थी। नाश्ते की मेज़ पर उदय की चिट्ठी थी। छोटा-सा खत था। उसका तार मिला । आशा है रास्ते में सब ठीक रहा होगा। वह अपना सयाल रसे, ठण्ड से बचाव वगैरह । उसको मालूम था कि अपने हल्के-फुल्के वार्ता- लाप के परे मां-बाप अपनी उत्सुकता चुपचाप भीचे हुए प्रतीक्षा कर रहे हैं कि वह कुछ बताए। एक बार उसके मन में स्याल आया कि पढ़कर चुपचाप तहा आखिर चिट्ठी कोई सामूहिक ग्रंथ तो है नहीं कि बांच, कर मुनाना जरूरी हो। "तार मिल गया था।" उसने खयाल परे किया।

"वाकी सब ठीक है ?" मां ने उसे प्याला थमा दिया। "आं? हां, ठीक ही है।" नाश्ते के बाद पापा टहलने निकल गए थे। वह अपने कमरे की खिड़की से उनकी लम्बी-छरहरी आकृति मोड़ के परे ओझल होती देखती रही। मां पता नहीं कब आकर पास में खड़ी हो गई थी । "तू.''तुम लोग कहीं लड़-वड़ कर तो नहीं...?"मां उसकी ओर नहीं देख रही थी। "नहीं तो।" उसे ताज्जुब हुआ। पर शायद उन लोगों ने यही सोचा हो। शायद काफी भय और शक के साथ अटकलें भी लगाई हों उन दोनों को लेकर । एक बार उसने सोचा कि कह दे वह खुद तो पहाड़ जाने के बारे में इतनी उत्सुक नहीं थी पर उदय ने ही कहा था कि.. पर फिर मां शायद यह सोचेगी कि उदय ने शायद खीझकर ही कह दिया होगा। "सोच रही हूं, आज स्कूल हो आऊ । पुरानी नन्स से भी मुलाकात हो जाएगी। फिर फुरसत हो न हो।" "मौसम ?" मां ने प्रश्नसूचक निगाह आसमान पर डाली, जहां बादलों के फटने के कोई आसार नज़र नहीं आते थे। "मुझे तो आदत है।" उसने कहा। मां चुप हो गई। रसोईघर से रसोइया बुला रहा था। मां चली गई। उसके कमरे की आलमारी में उसके कुछ पुराने कपड़े पड़े थे, यत्न से तहाए । शायद मां अभी भी उसी उत्साह से मौसम बदलने पर कपड़ों की सार-संभाल करती हो। कपड़ों में नेप्थलीन की हल्की गुलाबी गंध थी। बरसाती के बटन लगाते-लगाते उसने रसोई के पास रुककर जरा स्वर ऊंचा किया, "जा रही हूं।" मां ने कुछ कहा था या नहीं, उसे पता नहीं। तेज़ बौछार अब रुक गई थी। बस एक हल्की अनवरत फुहार-सी बच रही थी जो शायद दिनों तक चलती रहे। उसके पांवों को रबड़ के वूटों को साधने में हल्की-सी कोशिश करनी पड़ी। आदत छूट गई थी। स्कूल के लिए उनके घर से पहाड़ के साथ-साथ सीधा रास्ता जाता था। इस . ११२ / विरुद्ध मड़क के सारे उतार-चढाव, मोड-किनारे उगे दरस्त, यहा तक कि सीमेण्ट के सम्मों से उन तलक बध तारों के निरन्तर कसाव से उनके पतनो वन घट्ठदार गड़े तक उसके परिचित थे। एकाध जगह सडक पानी के फटाव से बैठन-सी लगी थी। यह हर साल होता था। फिर हर साल मज- दूरों के नामहीन गैंग गैती-फावड़े लिए आ जाते में और मिट्टी से पाटकर उसे फिर पुख्ता कर जाते थे--अगली बरसात तक के लिए। यही लड़को के बोडिंग स्कूल के बूढ़े पादरी अक्सर टहलते हुए मिलते थे। क्या भला-सा नाम था? उसे याद ही नहीं आया। वे लोग उन्हे देखते ही हथेलिया फैला देते थे-विदेशी डाक-टिकटो को माग मे । फिर वे साथ-साथ हसते-बोलते स्कूल तक चलते जाते। लड़कियो और लड़कों के स्कूल एकदम पास-पास ही थे। रास्ते-भर फादर उन्हें अपने देश में विताए अपने जीवन की छोटी-छोटी खुशनुमा कहानियां बताते, कैसे उन्होंने घड़ी मे समय देखना सीखा, कैसे साइकिल चलाना, कैसे वे बर्फीले समुद्र में तैरते हुए एक बार एक खोह में ज्वार भाते वक्त फंस गए थे । हा, याद माया, उनका नाम था फादर झास्की । कुछ महीने पहले किसीने लिखा था कि वे शायद चल बसे थे। क्या पता जिन्दा रहते वे दुबारा जर्मनी के अपने उस छोटे-से कस्बे में वापस गए या नहीं, जिसको चमकीली धनकती रंगीन यादें वे कंचों की तरह जेब में भरे फिरते थे। वह स्कूल की परिचित सीढ़ियां चढने लगी। यहा से हाय हिला-हिलाकर वे लोग देर तक फादर कास्की की ओझल होती आकृति को विदाई देती रहती थी-बाय-बाय फादर कास्की। गुड्वाय! जहां सीढ़ियां खत्म होती थीं, खेल के विराट् मंदान शुरू हो जाते हैं। बिल्लो स्कूल को बास्केट बाल टीम की कैप्टन पौ। नरंग भाई ने हमें पहली बार स्कूल के किसी मैच में खेलते देखा था, फिर देहरबान हर मंच देखने आते थे। खेल के मैदान में आज कोई नहीं था। बरसात के दिलों में मदर. सीलिया उन्हें सिलाई-कढाई सिखाने भीतर विटा देती थी। पुरानी पूरा- पियन पत्रिकाओं से कढ़ाई के खाके उकेरती, रंगीन धागों के रंग मिलाती नन्स कैची और अंगुस्तानों की पिटारियां लिए वत्तखों की तरह उनकी कतारों के बीच तिरती रहती। जरा भी टांका टेढा पड़ा नहीं, कि सारा का सारा खोल देना होता । वह बड़े रश्क से बड़ी लड़कियों के हाथों तले थमे फ्रेमों में विलायती फूलों के गुच्छे, आकृतियां और वेलें उभरती देखती रहती। वायलेट, स्वीट-पी, डेजी, जॉन क्विल, फ्यूशिया-फूलों के नाम ही जैसे कमनीय कविताएं हों। इसी सबके सहारे तो चारदीवारी के भीतर स्कूल की जर्मन नत्म ने यथासंभव अपने देश के वातावरण को मिरजने की कोशिश की थी। स्कूल के बगीचे में वे बाहर से प्याज की शक्ल की जड़ें मंगवाकर लगवाती थीं-ग्लैडियोली, ट्यूलिप, लिली की अनेक रंगी कतारों की कतारें। स्कूल के किचन में अजीब-अजीव नामों वाले यूरोपीय व्यंजन बनते थे, रात देर तक उनके लाउंज से प्यानो पर यूरोपीय संगीतज्ञों की धुनें बजती रहतीं। हर क्रिसमस पर उन सबके नाम स्वजनों के संगीन चमकीले कार्ड आते थे। वर्फ-भरे खुशहाल नजारों से टंके हुए वे रेनडियर, साण्टा क्लास, पिघलाती मखमली मोमबत्तियों और गदवदे गोरे शिशु क्राइस्ट से अंकित कार्ड महीनों स्कूल में यत्र-तत सजे रहते । सव कुछ इतना सौम्य और मृदुल था कि लगता ही नहीं था कि इन सबके परे... "हलो मेरी बच्ची, रजनी ही हो न?" मदर जूडिथ मोटे चश्मे के कांचों के परे आंखें सिकोड़े उसे ताक रही थीं। वह हंसकर आगे बढ़ी। एक जमी हुई वर्फ पिघल-सी रही थी मानो। कुनकुनी निश्छल आत्मीयता से मदर ने उसके दोनों हाथ थामकर उसका माथा चूम लिया । “एकदम वैसी ही हो मेरी वच्ची । विल्लो कहां है, कैसी है ? इस वार नहीं आई ?" "ठीक है।" वह मदर को पारिवारिक सूचनाएं देने लगी। मदर गौरेया की तरह गर्दन टेढ़ी किए सिर सहमति में हिलाती जाती। ऊपर कोई घण्टा वजा। मदर ने घड़ी देखी, "माफ करना वेटी, जरा स्टोर से सामान निकालना है, फिर मिलूंगी ।" गर्मजोशी से हाथ दवाकर मदर जूडिथ अपनी कलफदार चुस्ती में ढकाढक आगे बढ़ गई। कोने के उस पार रुक- . । ११४ / विरुद्ध कर उन्होने तनिक आवाज ऊंची कर किमीको हाटा । एक हल्का शोर जो गुनगुना रहा था, तुरन्त थम गया। फिर उनके जूतों को सटगट लकही ये फर्श पर दूर होती गई । जब बिल्लो और यह होस्टम में थे तो वे लोग मदर की परछाई से भी थरथर करते थे। तब जारी प्रतिरोध करना क्या, खिलाफन को कल्पना भी उन्हें बातकित करती थी। अब यकीन भी नहीं आता कि इस छोटी-मी झुर्रा भरो वृद्धा के पैरों की आवाज भर उन्हे घरी जाती रही होगी, कभी। "देखिए मैं आपमे माफ ही कह रही है कि हमारे यहा पाच गी बच्चियों का नाम वेटिंग लिस्ट में है, आप चाहें नो एक नाम उगमे जोड़ दें पर इसी सेशन में सीट मिलना कतई नामुमकिन है।" मदर सुपीरियर अपने भारी वक्ष पर अपने जिद्दी गुदाउ हाय बांधे खंभे-मी खड़ी थी। सामने एक जोडा था; नई रईमो मंगवाना हुआ। बीवी बाजार में प्राप हर महंगी चीज धारण किए हा लगती थी। उसके चेहरे का आत्ममग दा विमियाकर गुलाबी हुआ। "पर, हम ना बढ़ी आशा से आए थे।" "मो तो है, पर मैंने तो श्रापसे कुछ छाया नहीं। अब आपकी मड़ी। गुयाय ।" मदर मुपीरियर नौतर को मुड़ गई । जोड़ा कुछ देर तक अग. मजम में खड़ा रहा, फिर चला गया । पत्नी जान-बाने बहुत ही हिमा- रात मे पनि को देखकर कुछ बुदबुदाई। शायद उमार अपनी माग निकाल रही होगी, बैचारा! नमने धीरे में पालिश में चमचमाने दरवाजे पर उंगोटकोरी,"पा सकती है ?" मदर ने तल्ली में सिर उठाया, फिर में देना तो हम पड़ीं। "आया मेरी बच्ची, मैने मोचा फिर कोई मेहमान वागणा" "श्राप व्यस्त तो नहीं है ?" वह कुछ मिसकी मरमा निमार उठ मुडी हुई।"नहीं, अगले दमगंद्रह मिनट नह नहीं, आयो। म हाय थामकर मदर ने जोरों ने हिलाए तो अब तुम गाया महिला हो मेरी बञ्ची, है ? वदनी नहीं तुम । विस्ती वट्टी है या नया :

- । और ? और तुम्हारे माता-पिता कैसे हैं ?" फिर वही रस्मी पूछताछ । वह फिर रटे-रटाए-से जवाब देने लगी। "चलो, तुम्हें स्कूल का नया विंग दिखा दें, वर्ना फिर कोई न कोई मिलने वाला आ जाएगा। इस नई इमारत को हमने सिर्फ चन्दे से खड़ा किया है-हम लोगों ने और हमारी बच्चियों ने, भगवान उन्हें आशीप दे।" "एडमिशन क्या अब गर्मियों में होते है।" "तो तुमने भी उन्हें देखा ?" मदर ग्लानि से हंसीं। मुझे रुखाई से पेश आना बुरा लगता है, पर कुछ लोगों को मनाही सुनने की आदत ही नहीं होती शायद । कह रहे थे कि हम उनकी बच्चियों को अभी ले लें। अण्डर द काउण्टर हम जितना कहें वे देने को राजी हैं। क्या तुम यकीन करोगी?" अपमान और आवेश से मदर की भूरी आंखें स्याह हो गई। "ऐसे लोगों से क्या हुज्जत की जा सकती है ?" नई बिल्डिग आ गई थी। मदर महाउत्साह से इमारत दिखाने लगीं। उनका क्रोध विला गया था। "यहां पर एक बड़ा हाल और स्टेज होगा, यहां पर मदर जेनिफर खुशबूदार पत्तों वाली शाड़ियां लगाएंगी, यहां पर एक लाउंज..." स्कूल की यूनीफार्म अभी वही थी। लड़कियों की आवाजें, उनकी भापा, उतार-चढ़ाव सब विलकुल एक वलास छूटी थी शायद । पटर-पटर बोलता गुलाबी गालों वाला एक गदवदा रेला कारीडोर में बिखर गया। वह और बिल्लो भी कभी ऐसे ही रहे होंगे, नहीं ? लडकियां कुतूहल से उसे ताक रही थीं, जैसे वे लोग नये चेहरों को पूरा करते थे, छिपे-छिपे। वे अभी वचपन के उस अंतिम दायरे से नहीं छूट पाई थी, जिसे पार करते ही बड़ों के अनुशासन-भरे आतंक का फूला हुआ बबूला पट से बैठ जाता है। पर उस रस्मी अनुशासन की जगह तव क्या घिर आता है, शर्म? गुस्सा ? ग्लानि? जाते वक्त मदर ने उसे दोनों गालों पर चूमा, स्कूल की सालाना पत्रिका की एक प्रति दी और उससे नई बिल्डिंग के फंड के लिए दस रुपये के साथ यह पक्का आश्वासन भी लिया कि भविष्य में वह अपने जीवन - -- ११६ / विरुद्ध की उत्तेजक, खुशगवार घटनाओं से उन्हें व स्टाफ को समय-समय पर वाकिफ करती रहेगी। उसे याद है न कि मंगजीन में पुरानी छात्राओं का एक पन्ना छपता है । है न ? गुड । पानी थम गया था। उसने छतरी बन्द कर ली और लम्बे हग भरती चलने लगी। लंगूरों का एक झुण्ड पेड़ों पर कूद रहा था । वदरियों के पेटों पर नन्हे-नन्हे बच्चे जोकों की मुस्तैदी से चिपके हुए थे। पट । पट । पट । कई बूंदें और वाजफल हिलती शाखों से टपक पड़े। वारिश बन्द होने से घहराते पहाड़ी नालो का शोर और भी उभर आया था। वह सोमेण्ट की बेंच के पाम रक गई। इस मोड़ से तलहटी में फैला पूरा शहर वारिश से लेमनजूम की गोली की तरह साफ और तुर्शीदार रंगों का सघन पुंज लगना था। यूं भी हर सैलानी शहर परीकथाओ के कुछ स्यादा हो नजदीक होता है । जहां घुस- कर उन चटक शोख आकारों, छोटी घुरनीदार सड़को के ज्यामितीय नियंत्रण और गदवदे उजास में हम विलाते जाते हैं । फिर जब छुट्टियो के बाद शहर की परिधि से निकलो तो एक तिलस्म-मा टूटता है मानो, और उन चमकीली यादों से लेकर कभी यहे उत्माह से जमा किए शंख-सीपियों और चिकने पत्थरों के खजाने तक मव एक गैरजरूरत बचपना-भर बनकर रह जाते हैं। वह बेंच पर बैठकर सामने ताकने लगी। पापा का कहना सही था। उदय को पहाड़ में बसना कतई पसन्द न आता । उसके व्यक्तित्व के सीधे, ताकिंवा और कर्मठ तौर-तरीकों का पहाड़ों के इस उजाड़-अनघड़ विस्तार से या उसे पाटने वाली उसके माता-पिता की जिद्दी रूमानियत के साय कहीं कोई तालमेल नहीं बैठता था। उदय को वेलाग जिन्दगी में शायद कभी कोई मोड़ नहीं आए थे। सीधे-सपाट रास्ते-भर थे, जिनपर चलते जाने की नियति को उमने विना दुविधा के स्वीकार कर लिया था। जब कमी उसने पूछने की कोशिश की थी कि इतने साल शहर रहकर एक विरुद्ध/११७ मामूली-से शहर में आकर रहना उसे कुछ अजीब-सा नहीं लगता क्या, तो उसे आश्चर्य ही हुआ था। शहर के आकार और जनसंख्या से उसे क्या लेना-देना था? वह अपने काम से संतुष्ट था, वस । पर काम के बाहर की जिन्दगी भी तो उसके कुल वजूद का खासा बड़ा हिस्सा थी, उसमें क्या बहुत फर्क नहीं? कैसे?' वह अटकती है । क्या वताये ? उसे तो खुद नहीं मालूम । बाहर जाने से पहले मां की मंगाई विदेशी पत्रिकाओं और किताबों से झांकती उस चमकीली विदेशी ज़िन्दगी का जो एक सहज सुन्दर रूप उसने सुघड़ाई से तहा कर धर रखा था, वहां पहुंचकर जाने कव धीरे-धीरे विला गया था। खुद जाकर जव जहां रहो तो लगता है कि उस आकर्पक उत्तेजना के पीछे भी वही तनाव और कशमकश है जिससे बच भागने को हमने यह स्वप्न रचे थे। और फिर कनपटी की टीस की तरह चिलकता अपने बाहरी आदमी होने का अहसास जो हर बातचीत और मैत्री के दरम्यान औपचा- रिकता की झीनी, पर स्पष्ट, दीवार खड़ी करता जाता है। और सबके तो धीरे-धीरे अभ्यस्त हुआ जा सकता है, पर उस आपसी संशय की तो कोई काट ही नहीं । शायद उदय ही ठीक कहता था। उन जैसे लोगों के लिए फर्क बहुत कम था। यानी अगर ठण्डे तौर से सोचो तो। "टैम क्या होगा मेम साव?" गती लिए कुलियों का मेट उससे पूछ रहा था। "ग्यारह!" उसने हड़बड़ाकर बरसाती संभाली और घर की ओर चल दी। मां सोच रही होंगी, पता नहीं वह कहां रह गई है। - बैठक से स्त्रियों के वोलने की आवाज़ आ रही थी। उसने बरसाती वाहर टांग दी और छाता स्टैण्ड से टिकाकर कमरे में जाने को ही थी वि मां ने पुकार लिया। "रजनी, रमला आई है।" पतलून के पांयचे कुर गोले थे। ११८/विरुद्ध 'अभी आती हूं, कपडे बदल लू ।" कपडे बदलकर वह बैठक मे घुसी तो वे सब चाय पी रहे थे। रमला के साथ उसकी मां और दो महिलाए थी । अच्छा किया, कपड़े बदल लिए। वे सब अपने प्रसाधन और आभूषणो से ऐसी लैस थी,जैसे शादी मे जा रही हो। विल्लो होती तो वैसे ही चली जाती जैसे घर में घुसी थी। धड़धडा- कर यू ही चले जाना भी एक अदा होती है, एक स्टाइल होता है । पर उसे कर सकने के लिए विल्लो का चेहरा और वार्तालाप-कुशलता भी चाहिए। "चाय लेगी?" मा ने पूछा। उसने हाथ वढाकर प्याली ले लो। "स्कूल में किस-किससे मिली ?" रमला ने चाय का घूट लिया। "सभी थे-मदर जूडिय, मदर सुपीरियर "मदर परेरा, मदर पिण्टो ?" "ये शायद किचन में होंगी, उनसे नहीं मिली।" "तुम्हे नहीं लगता कि ये सफेद नन्स बेकार के फटीचर और थकाऊ काम काली देशी नन्स को भिड़ा देती हैं, नही ?" वह चुप रही। "हाय, कभी बडी याद आती है स्कूल की। मैं तो अव को से बेटी होते ही नाम लिखा दूगी। सच मे इतने अच्छे स्कूल अब बहुत कम रह रजनी का ध्यान पहली बार रमला के कुछ उभरे-से पेट पर गया । "कब तक ड्यू है ?" "सितम्बर तक है पर यह भी वेटा हुआ तो ममी के पास फेंक आऊंगी।" मां-बेटी दोनों हंसने लगी। भरी-भरी-सी। "तुम्हारी तैयारी कद है बेटे जी?" रमला की मां ने उसकी ओर अयं-भरी नज़र डाली। "यह तो एम० ए० की तैयारी करने जा रही है।" रमला हसी। "अरी एमे-वीए तो लगा रहता है, पर इसमें देरी न करनी चाहिए।" रमला की मां ने तमीज़ से मुघर पल्लू लपेट लिया, "वखत को चीज़ की विरुद्ध | ११६ शोभा ही और है।" "यही तो मैं भी कहती हूं, आप लोग भी समझाइए न ।" मां खुश लग रही थीं। यह उनके हितोपदेश की शुरुआत थी। "आजकल तो यूं ही सबके दो ही दो होते हैं, फेर क्या सोचना?" यह रमला की बुमा थीं। "अच्छा मान लीजिए एमे कर भी लिया तो भी तो देर-सवेर वही काम सर पड़ेगा कि नहीं?" कुढ़न के उस क्षण में उसे लगा कि जैसे मां के मुंह से माया बोल रही हो । तर्क वे ही थे सिर्फ लहजा और शब्द और थे। "मान लो बच्चे ही न हों, गोद ले लें तब?" उसने उद्ध तता से प्याला रख दिया। अजूवा यह कि सव हंस पड़ी जैसे उसने कोई मजाक किया हो। "ले, जाने किसकी अलाय-वलाय तुम अपने सिर पाल लो।" मां ने केक की प्लेट सबकी ओर बढ़ाई। "लाख हो, रहेगा तो बच्चा पराया ही, है नहीं आण्टी ?" रमला ने केक का वड़ा-सा टुकड़ा उठा लिया। "खाना नहीं चाहिए पर खा रही हूं।" "खाओ-खाओ न । आजकल तो तुम्हें दो-दो की खुराक लेनी चाहिए।" मां ने पुचारा दिया। "मीठा-मीठा तो लड़का मांगता है।" वुआ हंसने लगी। "हाय, माण्टी, ऐसा मत कहो।" रमला ने हाथ आसमान की ओर उठाए । "इस बार तो लड़की हो, लड़के तो मरे जहां दो साल के हुए वस उनकी दुनिया अलग। लड़की ही होती है हमेशा को अपनी। खूब सजा लो, गुड़िया की तरह खिला लो,गोदी में विठा लो। लड़कों के तो कपड़े भी कैसे ड्रेव होते हैं, नहीं ? “सो तो है।" सबने समर्थन किया। "यह तो पालने पर है, चाहो तो तुम लड़के को भी गुड़िया की तरह खिला सकती हो, लड़की को लडके की तरह कूद-फांद .. " " १२० / विरुद्ध - "अरे नहीं।" रमला ने हाय झटकारा, "लड़का लड़कियाना हो जाएगा तो सिसी-सिसी कहकर स्कूल मे, आस-पड़ोस के बच्चे नाकोदम कर देंगे विचारे का। और लड़की हुड़दंगी हो गई तो कौन ब्याहेगा?" "जिसकी जैसी कुदरती बाढ है उधर ही जाने देना चाहिए बेटा।" मां ने दूसरी प्याली चाय उड़ेली, "अब तुम्ही लोगों को लो, तुम्हारे पापा कभी लड़कियो का जोर से बोलना-कूदना पसन्द नही करते थे, आज तक तुम लोग धीमे वोलती-चालती हो। लडकियों को यही शोभा देता है।" मा के स्वर मे फिर वही परिचित पैगम्बरी खनक आ गई थी। उसने अपने- आपको छुई-मुई की तरह भीतर को ऐंठ कर बन्द होते महसूस किया। "जी फोन है, छोटी बेबी जी के लिए।" माली ने दरवाजे से भीतर झांका । वह झटके से उठ खड़ी हुई तो महिला-समाज ज़ोरों से हंस पड़ा। "ले, आ गया उसका भी बुलावा।" मा गदगद थी । वह कुढ़ गई। "हलो।"उसने पूछा। गला कुछ फस-सा रहा था । ऐसा हमेशा होता है, जब भी वह डरी हुई या उत्तेजित होती है तब । उसने धीरे से गला संखारा, "हलो।" "हलो।" लाइन पर आवाज़ काफी धीमी थी। बीच मे शिल्ली की झनकार-सी एक पतली फिर निरन्तर आ रही थी। "मेरी चिट्ठी मिली? कैसी हो?" "हा, मिल गई थी। सब ठीक है । तुम "हा।" वह असमंजस से एक पर से दूसरे पर वजन तोलती खड़ी रही। "अच्छा अगर अभी टाइम है तो मेरे लिए एम० ए० का फार्म मंगवा सकोगे?" "क्या मां-पापा ने सलाह दी?" स्वर में ठण्डा व्यंग्य था क्या? उसने अपने-आपको सतर होता पाया। "नही, मैंने खुद ही सोगा।" C ..."

. "और कुछ ? "ठीक है, मंगवा लूंगा, और कुछ ?" उसे लगा कि वह कहीं एक सिरे से निराश हो उठी है। शायद उसकी नचेतन कल्पना थी कि उदय उनका निर्णय सुनते ही उस छोर से वाहवाही के पुल बांध देगा, वाग-बाग हो उठेगा । पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। तो क्या दरअसल वह सिर्फ उदय को खुश करने के ही लिए यह सब.."उसमें और मां में फर्क ही क्या है फिर? ?" उसने यावाज़ को भरसक संयत रखा। "मौसम कैसा है, यहां तो अंधड़ आने से काफी ठण्डा हो गया है।" "यहां बारिश हो रही है।" "अभी तो रहोगी न?" उदय के स्वर में जिज्ञासा थी या ललक उसके निर्णय करने से पहले ही ऑपरेटर की आवाज़ गूंजी। "हलो, आपके तीन मिनट हो गए।" उसने धीरे से फोन रख दिया-क्लिक । "क्या खबर?" उसे मां की आवाज़ में हल्के मजाक की ध्वनि खली। "ठीक है।" उसने अनमने भाव से कहा। "ममा चलें बव, टीटो ने नौकरों को परेशान कर रखा होगा।" "अच्छा जी।" रमला की मां ने हाथ जोड़ दिए। "आप दोनों कल दिन में हमारे घर ही खाना खाएं, अगर फुर्सत हो तो।" "जरूर, हमें तो है ही।" मां ने रजनी की ओर ताका। "जरूर ।" उसने भी सर सहमति ने हिला दिया । "कोई खास बात?" "नहीं, परसों मेरी ननद चली जाएगी, सो सोचा। रमला तो अभी डिलीवरी तक यहीं है । अच्छा जी।" पानी नक गया था, गेट से लौटते हुए उसने बगीचे पर नजर डाली। "इस बार फूल बहुत अच्छे नहीं आए।" "पानी जल्दी वरस गया वेबी।" माली काम करते हुए रुक गया "वर्ना आपके भक्तिन इस्कूल के माली से पौद लाया था। अभी भी हफ्त भर घूप आ जाए तो पनप जाएंगी।" 1 १२२ विरुद्ध "पीता बहुत है ।" मां ने अंग्रेजी में कहा । "अभी भी?" "और क्या? कोई छूटने की आदत थोड़े ही है। कितना समझाया। पुराना प्लूरिसी का मरीज भी है, पर कुछ असर नहीं। आया को देखकर दुरा लगता है और क्या?" गए सालों की कई रातें उसे याद आई जब माली लड़खडाता हुआ रात को घुसता था और उनके कमरे के पिछवाडे क्वार्टर में मारपीट,रोना-गाना चालू हो जाता था । बच्चो की पिल्ल-पिल्ल, आया की तीखी-मर्राई आवाजें, माली की लटपटाती गालिया। 'स्साल्ली शुअर की तरह शाल में छ जनती है...' फिर मा या वाप मे से किसी एक को बाहर ढकेलकर अपेक्षाकृत स्याने बच्चे घर दुबक जाते। तव विल्लो और उसको गालियों की संवया टटकी नवीनता पर बहुत हंसो माती थी पर अब वे शायद टटकी लगती न मजेदार । खासकर जब सुबह वावर्चीखाने के पीछे विमूरती भूखी-प्यासी रती का मुह याद आता है। बहुत गक, बहुत भली लडकी थी। पहले-पहल जब वे आते थे तो इत्ती-सी थी, तुतलाती हुई- है---लत्ती-लामलती । सलाम कहो 1-तलाम । उसके घर के वे कसले-कंटीले झगड़े उसीकी अवोध जिद पर आकर विचरते थे। उसके सीधेपन से माली भी दबता था। तर्रार बीवी के आगे उसकी जीभ पर जो सान चढती वह वेटी के चुप्पे क्रोध के सामने भौंयरी पड जाती । "ले सालो, धो आया हात-मूं । कुल्ला भी कर लिया। दे अब रोटी।" "रत्ती खुश है ?" मां धुले कपड़ों को ड्राअर मे रख रही थी। वह पलंग पर बैठ गई। "ठीक ही है । आदमी काफी तेज स्वभाव का है। किसी और से भी दोस्ती थी शायद।" "फिर?" "फिर क्या, पिट-पिटाकर कमी रोती हुई आ जाती है फिर समझा.. कर में ही भेज देती है। मां से तो उसकी पटतीनहीं। वैसे लड़का कमाता विरुद्ध | १२३ -नाम क्या ।

. ठीक-ठाक से है, सास भी कमाती है। अक्सर तो वही लगा-बुझा देती है। अब इन लोगों में तो यह चलता ही है। कौन कहां तक समझाए।" मां ने दराज वन्द करके वुनाई उठा ली। "आया छोड़ क्यों नहीं देती माली को ?" मां फन्दे गिनती हुई हंस 'पड़ीं। "पागल है तू भी। इस सारी पलटन को लेकर कहां जाएगी?" "कहां क्या, तुम माली को हटा दो, उसे रहने दो क्वार्टर में।" "फिर माली का काम कौन देखेगा? अभी चारेक महीने में हम लोग नीचे चले जाएंगे तो कोठी की चौकीदारी कौन करेगा? वैसे भी अकेली औरत का यहां रहना ठीक नहीं। दस तरह की बातें हो सकती हैं । एक और आफत उठ खड़ी होगी।" थोड़ी देर चुप्पी रही। कोहरा छंट रहा था। ऊपर जहां-जहां वादल फट गए थे, आसमान अक्क नीला था, इतना कि देखने से आंखों में पानी आ जाए। धूप के धब्बे नमी की पर्तों से टकराकर इस्पात से चमक रहे थे, जहां-तहां । उसने मां की ओर प्रश्न-भरी आंखें फिराई । ''तुम्हें बाजार का कोई काम है ?" मां ने सलाई बदल ली । "छोटे-मोटे काम तो हैं कुछ । मैं जरा यह बांह घटा लूं तब चलते हैं।" wa कम मुख्य बाजार से पहले सड़क के दोनों ओर आ बैठी उन छोटी-छोटी 'अस्थायी, पर चमकीली दुकानों में अधिकतर सामान गैर-जरूरी था, से कम मैदानी मौसम के लिहाज से। पर हर साल सैलानी लोग महा- उत्साह से यही सब समेट-समेटकर ले जाते थे। रंगीन फुदनेदार टोपियां, “जालीदार पतले शाल जिनसे जाड़ा कतई न कट पाए, पीतल के भोंडे सजावट के सामान, नकली मनके, कच्ची मालाएं। पर शायद सैलानियों की खरीदारी इस लिहाज़ से होती भी नहीं। ये सब यादों के साथ जीम की झुरझुरी पत्तियों और नेप्थलीन की कड़वी-मीठी गंध में चापकर धरते -जाने की चीजें हैं । तस्वीरों के इन पंकटों की तरह, जिनमें फूटी पड़ती १२४/ विरुद्ध अपनी अजीब दचकानी खुर्गी बाद में खुद नहीं पहचान पाते । दे गर्ने बाजार में आ गए थे। मां को यहां तकरीबन ममी पुराने दुकानदार जानने ये और कुछ बननन के बाद उसे मी चौन्ह लिया गया था। उनकी बशाहीन आनीयता उसे मनी नगी। मा ने कई दुकानों से छोटी-छोटी चीजें ली। बटन, मुइयों का पैकेट, पानी-मोटी मनाइमा, सान तरह की तीखे स्वाद वाली वह पीली पनीर जो ने नन्द थी, एक न्ट केक, मोमबत्तियां। भइतना मद किन के लिए ले रही हो? तुम और पाता टोहाना बाजार कामाते नहीं।" 'तेरे लिए नोर किन लिए?" "में कोई दानव हूं क्या?" मा हम दो । “अरे चार दिन को तो तुन लोग आती हो, उतनी गर्मी में दो का हो मा पाती होनी ।" उन्होंने एक पुड़िया उसके आगे दड़ा दी, एकदम नी ममता ने बकान में करती यौं। उनके गले में कुछ किरकिरा मारुंध गया। पुडिया में पिरनिट के स्वाद वानी दे धारीदार तिकोनी मोटी गोलिया यो जो छुट्टियों में हर बार दे भोग करने लिए इसी दुकान में निवाते हैं। मने एक मांगे नह में डाल लीमिरमिट का मोवाडा स्वाद तान पर पनने-सा लगा। यहां रहते हुए यह बहमान और भी गहराता जाता है कि मा-पापा का जीवन नाल-दर-साल उन लोगों से सम्बद्ध मुद्धों के कितने इ-दिमिनट चना जा रहा है। उन लोगों की हर चीज को लेकर दे लोर एक लिन तन्मयता से भरे दिन के दिन गुजार सकते थे, योनियों की तरह बिल्ली की चिट्ठी आई तो दौलने से पहले दोनों ने ढुकर आने पहने के चार निकाले-लगाए, फिर बड़े एहतियात वह कागजी निशाना एक खान छुरी ने खोला गयाबार बिन्नो मार्जिन पर लिख देती है. कहीं कोई वाम गलती से फट न जाए। फिर बारी-बारी से दोनों दिन-पर पते-सुनते रहे। वह बिल्लो को जानता है। च-रते, बिना किसी खान मवेदना के मी दह चार पन्ने का भावना दन तुरत मिन डानही । विद/१२२ है। और वह ? वह तो अक्सर लिखती ही नहीं, लिख-लिखकर फाड़ती रहती है या पेन टकोरती बाहर ताकती रहती है, शायद इस इंतज़ार में कि अभी कुछ होगा जिसकी आड़ लेकर यह काम कल पर ही छोड़ दिया जा सकेगा। मां-पापा की तन्मय एकाग्रता और उनकी मूक जिज्ञासा उसे हर वार लौटने पर और भी ज्यादा सालती है। कैसी अजीब बात है कि अपनी जवानी में जव मां-बाप अपनी निजी ज़िन्दगी को गहराई से जीना चाहते हैं तो बच्चों की उपस्थिति उस तीव्रता को कुन्द कर जाती है, और बाद को जब तक वे अपनी ज़िन्दगी के समतल पठार पर पहुंचकर बच्चों के जीवन के उतार-चढ़ाव वांटने को उत्सुक हों, बच्चे अपने निजी चेतना- तन्तु उस साझे के दायरे से समेट चुके होते हैं। अजीव वात है, पर इतनी व्यापक होते हुए भी हर वार नये सिरे से दुःख देती है, नहीं ? "फल ले लें कुछ ?" मां ने फल वाले की ओर इशारा किया। वह उत्सुकता से ताक रहा था। "विल्लो के बच्चे तो बस फलों पर ही जीते हैं यहां आकर । अब वहां की आदत से और तो हमारा खाना उन्हें रुचता नहीं, पर ताजे फल जितने कहो।" स्मृतियों के मीठे गुवार से घिरी मां मुस्कराने लगीं । "वह तो वस मोड़ पर आए नहीं कि हाथ खींचकर यहां ले आते हैं। छोटी तो अक्सर बिना धोए ही गप से खाना चालू कर देती है, लाख मना करो" "बच्चे नई आए इस साल मेम साब ?"फल वाले ने तराजू संभाली। "इस बार वहीं छुट्टी बिता रहे हैं, वाद को आएं शायद ।" मां का स्वर अनाश्वस्त था, वे स्मृति-दंश से फिर बुझ-सी गई थीं। "वावा तो खुमानी के सौकीन थे, वेवी को पलम।" "हां, बस यही तो खाते रहते थे। देखो शायद, सितम्बर में आ जाएं, क्या पता? तव सेव खिलाना।" मां प्रयास से छलावों की मरीचिका रच रही थीं, फल वाले से ज्यादा खुद अपने लिए.। उसने होंठ काट लिया और परे ताकने लगी। तभी उन लोगों पर निगाह पड़ी। कुछ देर पहचानने की कोशि - । १२६ / विरुद्ध । करती रही। फिर आगे बढ़ गई। मामान, शॉन, कोट, म्वेटरों और टोपियों मे लदा-फदा वासु का परिवार ही या-मलानी भेस मे। उसकी पत्नी मे आंखें मिली तो वह पहचान में किलक पड़ी। वह पास गई। "अरे मिस्टर वासु, मैं तो आप लोगों को पहचानी ही नहीं। इस मबके साथ..." । उमने उनकी वेशभूषा की ओर इशारा किया। मा पास आ गई थीं । "मां, ये मिस्टर बासु हैं । उदय के माय काम करते हैं, मेरी मा ।" "मिस्टर मैरूप को हाम वोला था कि इघर आने को है, अगर आप चलें तो अच्छा, पर वो बोला की अभी नहीं जाएंगे। आपको शायद पूछा वी नहीं होगा ...."वे पुलककर हंसे, मर्द जात के पाजीपन के उन्मुक्त समर्थन में। "नहीं, पूछा तो या, पर तब मैंने पक्का नहीं सोचा था ।" यह उदय से । उस नामालूम-मे नाक्षेप को हटाने की कोशिश थी क्या ? "यहा ठण्डा बोन जास्ती। वाऽऽवा ।" मिसेज वासु ने शाल कसकर लपेट लिया । "हाम तो मीस्टर को बोला की यहां शीत से तो वहां का गोर्मी अच्छा।" उनकी नाक जुकाम से लाल थी। "कब तक हैं आप लोग यहां ?" उसने प्रश्नसूचक नजर दोनों पर डाली। "काल-पोरशू तक हैं । यसंडे जाएगा। आप तो अभी आया है वर्ना साथ-साथ चल सकता या । हाम वाय रोड जाएगा।" "अच्छा तो अब चलें, फिर मिलेंगे। आप लोग कहा टिके हैं ?" उन्होंने एक होटल का नाम लिया। "वो तो कोम्पनी भेकेशन, का अलाउन्म अलग दिया तो सोचा की इनको इधर का पहाड़ दिखा दें।" बच्चा फिर मिनका । वे शिष्टतापूर्वक अलग हुए । के कार रमला के यहां पहुंचते ही खाने का दौर शुरू हो गया। पहले छोटे- छोटे चादी के गिलासों में कोई स्वास्थ्य की दृष्टि से मुफीद, पर जरूरत से ज्यादा मीठा और सुगंधित शर्वत आया, फिर कांजी के बड़े गिलास, विरुद्ध | १२७ । - फिर छोटी-छोटी चीजों का अनवरत तांता। "इतना अभी से खालें तो खाना क्या खाया जाएगा?" "ये लो, इसी उमर से यह हाल है !"रमला की चाची ने कचर-कचर भजिया चवाते हुए कहा। खुद बीजी चर्वी का एक विराट पहाड़ थों जिसमें शरीर के कटाव मांस की पर्तों में कव से विला चुके थे। खमीरी चपाती-सी छातियों पर वढ़िया चुना हुआ मलमल का दुपट्टा पड़ा था, कानों में होरे की वालियां। उनके हाथ और पांव शरीर के अनुपात में इतने नन्हें लगते थे मानो किसी और के शरीर से लेकर जोड़े गए हों। "अभी तो देटा जी, तुम्हारी खाने-खेलने की उमर है, अभी का खाया-पिया सदा संग रहेगा, समझी? हमने तो रमला को भी बचपन से असली चीज़ों पर ही पाला। पर जव से इस्कूल गई छुट्टियों में घर आती थी तो ऐसी कांटा कि तुम्हारी विलायती संतनियों ने सारा सत्त इंच लिया हो जैसे । इसके पापा को तो मैंने वीयर की बोतलों में दूध पिलाया है वेटा। छोटी बोतल से मेरे काके का पेट ही नहीं भरता था।" बेटे का बचपन याद कर वे आनन्दित होकर हंसने लगीं।"अव मेरा डाक्टर कहता है कि तुसी चर्वी घटाओ, वर्ना दिल कमजोर हो जाएगा। मैंने कहा जी, यह, चर्वी आपके तेल-डालडे की नहीं मेवे-मलाई की है, इससे तो दिल होर मजबूत होएगा जी।" तभी आया के हाथों से गुलेल का पत्थर-सा छूटा वह बच्चा कमरे में घुस आया। रमला का लड़का भी पारिवारिक परम्परा को बरकरार रखे था। मोटा-सा गोरा गदवदा वच्चा। कमरे में आते ही उसने सबको घकिया कर प्लेटों से दोनों मुट्ठियां भर ली थी, पर उसकी अभद्र हरकतों को रोकने के बजाय घर वाले उसकी उच्छृखला पर निहाल हुए जा रहे थे। एकाध बार रमला ने हल्के से धमकाया तो उसने दबंगपने से जुवान चिढ़ा दी। "मरद बच्चा है नी, करने दे मन की। अपने मामे पर गया है। सति- दर कोई कम था ?" मरद वच्चे ने एक तिपाई उलटी, दो-चार प्लेटें गिराई, घी-सने हाथ अपनी मां की साड़ी में पोंछे और फिर किसी छोटी- - १२८/विरुद्ध - सो चीज के लिए फर्श पर मजे से एड़ियां रगड़ता हुआ अमानवीय चीत्कारो मे घर को कंपाने लगा। रजनी का मन कर रहा था कि वही उठकर उसे पकड़कर बाहर धकेल दे। विगाड़ने की भी हद होती है ! मदं वच्चा न हुआ काशी का साड़ हो गया। शायद जो आजादी उन्हें खुद कभी नहीं मिली उसे दुगुनी कर अपने बेटों को बाटने में कुछ औरतों को एक गूढ तृप्ति होती है, जो उतनी ही अताकिक है जितना बेटा जनकर अपनी नस्ल से बेहतर जीव पैदा करने का उनका गर्व ! अन्ततः एक आया नमूदार हुई और धोर-अभ्यस्त हायों से हेलीकाप्टर के चक्के की तेजी से घूमते उस मदं बच्चे को बाहर उठा ले गई। बैरे ने आकर तहजीव-भरे हाव-भाव से जतलाया कि खाना लग गया था।वोलती- बोलती वे उठ खड़ी हुई। बाजार की हर उपलब्ध सब्जी शायद उस मेज पर सजी थी। साथ में तरह-तरह के सालन और अचार । तौवा ! कैसे लोग रोज इतना खाना देख भी पाते होंगे, नहीं ? खा-पीकर वे फिर गोल कमरे में आ बैठी । अव एक वोझिल तंद्रिलता-सी छा गई थी, जैसे सब कल्पना में जुगाली कर रही हो । सप्रयास कुछ हल्के-फुल्के प्रसंग उठाकर छोड़ दिए गए जो हवा मे चकराकर झड़ती पत्तियों की तरह धीरे-धीरे खुद-बबुद वंठ भी गए ये। "चलें ?" उसने शिष्टता से जमुहाई रोक मां से पूछा "चलो।" सड़क पर चलते हुए उसने छुटकारे की सास ली "उफ् । कुछ फ्यादा ही हो गया, नहीं ?" मां ने सीने पर हाथ रखा। "घर जाकर कुछ दवा लेनी होगी, वर्ना गला जलने लगेगा। मेरी तो मसालेदार खाने की आदत ही नहीं।" मां माराम करने चली गई थी। वह बाहर कुर्सी छांव में सोचकर बैठ गई। तिपाई पर मां को मंगाई कोई विदेशी महिला-पत्रिका पड़ी थी। वह पन्ने पलटने लगी। वही आयासहीन ढंग से पतली होने की तरकीबें, पति को कैसे रिझाएं, झुरियां कैसे छिपाएं, बच्चों को कैसे खुश रखें? घत् । उसने मैगजीन वापस रख दी। औरतों को पत्रिकाएं हर देश में एक विरुद्ध / १२६ ।

सी होती हैं। चाहे वे सफेद हो या मूरोया काली चमड़ी वाली। वही अपने चेहरे को लेकर नाखुशी, शारीरिक गठन को लेकर असंतोष, हन- जोलियों, बच्चों, पतियों को लेकर जनगिन शंकाएं-चिन्ताएं, जैसे कि पूरी नौरत जात इस हीनता और नाक्रोश के परे कुछ हो ही नहीं। उसने तिपाई पर टांगें रखकर आंखें बन्द कर लीं। तो इसके परेसच क्या है फिर? इस सारे आक्रोश जोर भय के पीछे कहीं कोई स्थिर विन्दु तो होगा जिससे जुड़कर वह इत्त सबके ऊपर ऊ सकती हो। या इससे निकलने को कल्पना करना बेवकूफो हो होगी? पर फिर चालू सामाजिकता के संदर्भ में वह क्या गेल चुन सकती है अपने लिए? यही न किया तो विल्लो जैसी लड़कियों की तरह भरसक बौद्धिकता का जावरण जोड़कर परिवार के बंधनों के परे एक ऊंची गद्दी खोजे, या फिर रमता को तरह एकाध देवा जनकर मर्दो को उस चमकीली इस्पाती दुनिया में परोक्ष रूप से घुल- पै० कर मातृकला में लीन हो जाए। छि:! उत्तने पर तिपाई से हटा लिए और ऊ खड़ी हुई। वह कितनी हो दूर भागे, निर्णय उसे लेना ही होगा-अभी तक अपने बारे में किए जाते उन सब सुव्यवस्थित-तमनदार घरेलू निर्णयों के परे, जो गर्म खाने की रकाबी की तरह हमेशा उसके जागे परोस दिए गए हैं। वह या तो बहुत अपरिपक्व रही होगी या फिर बहुत ही बेवकूफ, जो यह समझती रही थी कि इस सबपर उसका कुदरती हक है। नहीं है ! किसी भी चीज पर कितीका हक नहीं है। यहां हर चीज़ का मोल चुकाना पड़ता है। उसे भी तो चुकाना पड़ा था, नहीं ? उस अपेक्षाहीन भक्ति की दासता, उस दमघोंट मर्यादा से भरे अपने कल्पनाहीन-घटनाहीन वचपन के रूप में, जिसमें कहीं भी कुछ भी ऐसा नहीं था जिसपर टिप से उंगली रखकर वह यह कह सके कि हां यह मैं हूं, यह मेरा है-एकदम । १२०/विल

उसने फोन उठाकर ऑपरेटर से नम्बर मांगा। वासु साहब को आने
में कुछ देरी हुई। कही चले तो नहीं गए और भी जल्दी ? उसे श्रीमती
वासु की जुकाम से लाल शक्ल याद आई।
"हल्लो।" परिचित स्वर मुनकर वह आश्वस्त हुई।
"हलो, हां, मैं रजनी बोल रही हूं मिस्टर वासु।"
"हाल्लो, हाल्लो, कैसा है आप?"
"ठीक हूं, आप सव?"
"ठीक है, मिसेज को सार्दी-खांसी हो गया सो वो तो लेटा है, हाम
बाच्चों को ले जा रहा था, तो पोकनीक को चलेगा नाप ?"
"आज तो मुश्किल होगी।" उसने फंसता गला खंखारा, "दरअसल
मैंने यह पूछने को फोन किया था कि आपकी गाड़ी में मेरे लिए अभी भी
जगह होगी क्या? अगर होगी तो मैं भी आपके साथ बृहस्पति को जाना
चाहती हूं।"
"जरूर, जरूर । विद प्लेजर । पर आप तो मन्बी-अम्वी बाया है,
नई?"
"हांड, दरअसल कुछ काम भी है वहां।"
समय-स्थान निश्चित कर उसने फोन रख दिया और सोचने लगी कि
मा-पापा को कैसे बताएगी।
'मां को तो प्रत्याशित रूप से रोना आ गया, । "सोचा था अभी कुछ
दिन तो रहेगी ही। साल में एक बार तो भेजते हैं, फिर आते ही से बुला
लियाँ।" उसने हत्का प्रतिवाद किया कि उसने खुद ही निश्चय लिया था,
उदय को तो अभी खबर भी न होगी। मां आश्वस्त नहीं हुई, सिर्फ उठ.
कर चली गई।
विरुद्ध/१३१

- , पापा कुछ देर खिड़की के पास खड़े रहे। "तुम उकता गई होगी, इस बार विल्लो-नरेश भी नहीं हैं, हमारा साथ कव तक..." वह गुस्से या आंसुओं को झेलने को तैयार थी पर इस उदास आत्म. भत्सना को नहीं। उसके भीतर शर्म से कुछ ऐंठ-सा गया । पर कुछ हद तक यह सही तो था ही। वह कुछ देर चुप बैठी रही। मां भी फिर आकर बैठ गई। चुप्पी। आया ने आकर झांका। "मेम साव चीनी! मां के जाने के बाद वह उठकर अपने कमरे में आ बैठी, सामने का दरवाजा बन्द हुआ। पापा छड़ी लेकर घूमने को निकल गए थे शायद । उसने आलमारी खोलकर कपड़ों को एक ढेरी निकाल ली और तहाने लगी। टप से एक आंसू स्वेटर को पर्त में गिरा। फिर उसने तहाकर सूटकेस में डाल दिया। अपने प्यार का चावुक सड़काते हुए सव कोई उसे एकदम पालतू बना. देना चाहते हैं। उसीकी भावनाओं से उसे ही ब्लैक मेल"। उसने तीन-चार साड़ियां यूं ही उठाकर सूटकेस में पटक दीं। पूरी शाम एक: हल्का-सा तनाव व्याप्त रहा । न उन लोगों ने उसके जाने के बारे में कुछ और बात की, न उसने। उस रात सव जल्दी ही सो गए या अपने-अपने कमरों की वत्तियां गुलकर जा लेटे थे। शायद मां-पापा का कहना ही सही है कि उनकी पूरी की पूरी पीढ़ी ही आत्म-केन्द्रित और स्वायीं है। आखिर अपने बच्चों के अलावा और है ही कौन उनका ? सीमित-सा परिवार यूं ही था। रिश्तेदारियां मात्र औपचारिक थीं। कितने उत्साह से उन्होंने योजना बनाई. होगी, अगल. बगल दो-दो काटेज खरीदकर उन्हें उसमें बसाने की? और अपने ठण्डे. पन और उदासीनता से उन्होंने उसपर पानी फेर दिया। पर सिर्फ अदव या डर से उस पूरे प्लान को स्वीकार कर लेना फिर से उसी जीवन को मोढ़ लेना न होगा जिसकी घुटन-भरी सीमाओं से वह उन तपते-चौराते अंधड़ों के बीच भागी जा रही है ? बाहर खूब अंधेरा था। कहीं झींगुर बोल रहे थे। बाकी सब शांत । .. । १३२/विरुद्ध पा, सिवा कभी किसी रात-पक्षी के आकस्मिक आतंनाद के। सबके परे नालों में निरन्तर बहे जाते पानी की मद संगीतमय कलकल । पर अंधेरे में एकदम वैसा ही हो आया था, जैसा कि सोलह साल पहले था उसके लिए। चौकन्ना, आतुर, मजेदार-मोठे भेदों से भरा हुआ। वह आंखें बन्द करके भी इसे अपने चेतना के अवयवों से नाप सकती है, सारे कोनों, अस- मतल सीढियों, छेदों समेत । उसके हाथों को हर चिटखन, हर दरवाजे के हैण्डिल का स्पर्श, खुलने का ढंग तक याद है-हर कमरे की खुशबू, हर गलियारे की गंध । उहूंक, उसका वजूद और किसी भी घर में कभी इस सुरक्षित नर्माई के साथ फिट नहीं हो पाएगा। वह विस्तरे में घुस गई और लिहाफ ओढ़ लिया। सुबह मां की आंखें कुछ सूजी थी, अभी भी। पर पापा ने बड़ी सफाई से उसके निर्णय से समझौता कर लिया था। "मैं तार करवाने माली को भेज रहा हूं, के बजे पहुंचने का लिखू ? रास्ता तो सात घण्टे का ही है पर बच्चों का साथ है।" "क्या ज़रूरत है ? वामु का घर पास में ही है, दरवाजे पर छोड़ देंगे, उदय नहीं भी हुआ तो गोपालसिंह तो होगा ही।" पापा ने चश्मा नाक पर तनिक नीचे सरकाकर उसे पुरमजाक नजर से देखा जैसे बचपन में उसकी शिकायत. आने पर देखते थे। झूठे गुस्से से अपनी पतली नाक सिकोड़ते, भंवो पर हंसते बल हाले । "तुम अपने मन की करो बेटा, हम अपनी करेंगे। खबर देना तो हमारा फर्ज है । उसे हमपर छोड़ दो।" मां फिर खाने की चीजों की फेहरिस्त बनाने में व्यस्त हो गई थी "पूरी-आलू तो गर्मी में टिकेंगे नहीं, संण्डविच बनवा देती हूं। एकाध पैकेट बिस्किट के रख दूंगो, उनके बच्चों को भी हो जाएगा। तेरा फूट- केक-पनीर भी लपेटकर रखवा दूंगी, खाया ही नही तूने । आया, देखना जरा भण्डार में कोई पुरानो टोकरी हो तो।" वे बाहर चली गई। . विस्त १३३ अच्छा फिर।" आखिरी बार हाथ हिले। कार चल पड़ी। मां ने धूप का चश्मा बड़ा लिया या, पापा ने एक सयल मुस्कान । "अच्छा वेटे, उदय से कहना, पहुंचकर कार तुरत भेज देगा वरना मां को फिकर होगी।" वह मोड़ तक मुड़-मुड़कर हाथ हिलाती रही। फिर वे पीछे छूट गए। उनले पर्म खोलकर पेपरमिंट की निकोनी गोलियों का पकेट निकाल लिया और बच्चों की ओर बढ़ाया । "लो, मुंहबाजा हो जाएगा।" बच्चों ने संशक दृष्टि से मां की मूक माज्ञा ली, जब उन्होंने कहा कि ले लो तो उन्होंने ले लिए। "क्या कहते हाय, ऐं?" वासु साहब ने तनिक सिर फिराकर पूछा, स्वर में हल्की धमकी भी थी। "यक्यू नाष्ट्री।" वे एक स्वर में गुनगुनाए । वातचीत की संभावना और भी बुझ गई थी। लागे वेठी श्रीमती वानु जुकाम से लस्त लाव खोली। "हमारा सिर एकदम भारी हो रहा है, वान साहब ने पूछा, उन्होंने एस्पिरिन ली थी या नहीं, उन्होंने कहा कि ली थी। फिर वे भी चुप हो गई। बच्चे निल्लुक-से बाहर तक रहे थे। कमी क्षण-भर को किसी चटक रंग या नाकार को देखकर उनका हा भक्क-ने उजला होता, फिर वुझ जाता। बीच-बीच में वे सशंक छिपी निगाहों से उसे तोल लेते पर जब तक वह कहने लायक कुछ सोच पाती, वे बाहर ताक रहे होते । फिर रास्ते के घुमाव बढ़ गए थे दौर बच्चों को मितली जाने लगी थी। गाड़ी रोक ली गई और उसे मागे विकाकर धीमतो वासु पोछ बच्चों के साथ स्थापित हो गई. अखिचड़ी जुकाम-भरी भाषा में रास्ते की अनगढ़ दशा पर चिन्ता व्यक्त करती हुई। व सबको नींद-जी आ रही थी। सिर्फ बासु साहब कुछ स्यादा हो तेज स्वर में थोड़ी देर तक बच्चों को जबरन हंसाने को कुचेष्टाएं करते रहे । फिर वे भी चुप हो गए। गर्मी-मरे मैदान पास आ रहे थे, हरियाली दिलाने लगी थी। जैसे-जैसे समतल भूमि पास माती जा रही ने - १३४ / विस्त थी, बच्चे उत्सुकता से फूलने लगे। "देखो मा घोडागाड़ी! रेल!" हफ्ते-मर मे ही वे परिचित दृश्यों के लिए अधीर हो चले थे। शायद फिर थोड़ी देर बाद वह दौर भी वोझिल ऊंघती चुप्पी मे घुल गया। अब गाड़ी फिर एक बार रोकी गई। एक पेट्रोल पम के साय सटे धूलिहा वाथरूम में सवने हाय-मुह धोए । टोपे-स्वेटर, मोजे सब डिकी में रख दिए गए। बच्चों में कुछ खाया-पिया। फिर वे चल पड़े । गर्मी अब पूरे वेग से आ चिपटी थी। उसने शीशा चढ़ा लिया। पानी! पानी! पानी ! हर पाच मिनट में बच्चे पानी माग रहे थे। पीछे रखा खाना,गद्दियों के रेक्मीन, पसीने की भपही गंध-सबकी मिली-जुली गधं से एक असाध्य दमर्पोट भभक-मी उठने लगी। मैदानी इलाका शुरू हो गया था। उसने अपनी उतावली इद्रियो को जंगली जानवरों को तरह आमन्न खतरे की अपेक्षा मे चौकन्ना होते पाया। ताप अब उनके चारो ओर आ बैठा था। अपरिहार्य। वामु माहब भीतर नहीं आए। उनके बच्चे और पत्नी भी काफी थक चुके थे । फिर कभी । सामान उतरवाकर वे जल्दी से पलट गए। गोपाल- सिंह ने हाय जोड़े और सूटकेस उठा लिया। सामान लिए वे तीनों भीतर को सीढिया चढने लगे। कही कोई उत्तेजना या हड़बोग नही। जैमें यह रोज ही होता हो। उसने पाया कि वह कुढ रही है । पर क्यो? क्या वह स्वागत में किसी रोमांचक नाटकीयता की आस लगाए थी। पर क्या वह उसे अच्छा लगता? सच मे सोचा तो"। दे भीतर आ गए थे। सब वैसा ही था जैसा कि हुआ करता था । शांत-स्थिर-साफ कमरे को परिचित आत्मीयता उमे भली लगी। उसने सिर झटकारकर बाल ढीले किए और बैठ गई। गोपालसिंह रसोई में कुछ खटर-पटर कर रहा था। शायद चाय-बाय का कुछ। उत्सुकता नहीं हुई। वह आज कुछ क्षण मेहमान ही बनी रहना चाहती थी। बसम्पृक्ता "कैसा रहा ?" उदय उसके पाम मा बैठा। विरुद्ध/१३५

.
"ठीक, तुम्हारा
?"
"बस, यूं ही। नहा लो, गोपालसिंह चाय ला रहा है। ताजा ही
जाओगी।"
"जरूरी है क्या?" उसका स्वर कुछ तना।
"जरूरी तो
कुछ भी नहीं। जैसा तुम चाहो।" उदय के स्वर की
सणिक आत्मीयता वापस लौट गई थी।
कमरे में अब चुप्पी थी, और वे दोनों बाज फिर से अकेले एक-दूसरे
के सामने आ बैठे थे-जुझारू योद्धाओं की तरह तैयार, अपने सशंक
हथियार मां ते हुए।
.

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Virudha

Author
Hamid Karsai
Title
Virudha
File name
Virudha
Text
OCR done
Citation
1800
Published
2011/03
Publisher
New Delhi,the Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
142
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
General
DLI number
552213
Barcode
4990010032928.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
VMLT id
dVONwvE1jLY
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