Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )

Karmaprakriti

Acharya Nemichandra · 2010/08

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ब- पुण्यश्लोका माना मूर्तिदेवीकी पवित्र स्मृतिमें तत्सुपुत्र साहू शान्तिप्रसादजी-द्वारा ! संस्थापित भारतीय ज्ञानपीठ मृतिदेवी जैन ग्रन्थमाला मालक र प्राकृत, समान, अपनंग, हिन्दी, कंगड, तमिल आदि प्राचीन मापाामें लव्य मार्गानर, दागनिरु, पौराणिक, साहित्यिक, ऐतिहासिक श्रादि विविध विपयक अन गायिका अनुसन्धान पूर्ण सम्पादन तथा उसका मृल और यथासम्भव अनुवाद यादिक मा प्रकाशन हो रहा है। जैन भण्डारीको मृवियां, शिलालेय-संग्रह, विशिष्ट विद्वानों के अध्ययन- मन्य और लोकहितकारी जन-साहित्य अन्य भी एमी ग्रन्थमालामें प्रकाशित हो रहे हैं। S ग्रन्थमाला सम्पादक डॉ. हीरालाल जैन, एम. प.., डी. लिट. अ. आ० ने० उपाध्ये, एम. प., डी.लिट. - मुद्रक मानि मुटपालय, दुगांकुण्ट गेट, वागणी सर्वाधिकार सुरक्षित

भारतीय ज्ञानपीठ, काशी
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स्व० मूर्तिदेवी, मातेवरी सेठ मान्तिप्रसाद जैन

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JNANAPĪTHA MURTIDEVI JAIN GRANTHAMALĀ PRĀKRIT GRANTHA NÖ'it KARMAPRAKRITI of SHRI NEMICHANDRA ACHARYA with HINDI TRANSLATION; INTRODUCTION & APPENDICES EDITED BY Pt. HIRALAL SHASTRI our BHARATIYA JNANPITHA: KASHI First Ej:..... VIRA SAMVAT 1190 1, S. 2020, 1964 .. D. Rs. El-

SHARATIYA UNĀNPITHA MŪRTIDEVI
JAIN GRANATHAMĀLĀ
FOUNDED BY
SHU SHANTIPRASAD JAIN
IX MEMORY OF HIS LITE BENEVOLENT MOTHER
SHRI MÜRTIDEVī
1:111-..!!! CRITICALLY EDITED JAINA AGADIC, PHILOSOPHICAL,
11:181, 1111, 115TORICAL AND OTHER ORIGINAL TEXTS
15:11 SVIETS SRJERIT, SANSKRIT, SPADRIRANISÁ, HINDI,
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Dr Hiralal Jain MAAD, Litt.
Or A N Upadhyo. M A. D, Litt.

यु विषय - वन्थमाला-सम्पादकीय कर्म सिद्धान्त जैन धर्मका प्राण है। उसके अनुसार तीन जो कुछ अच्छा-बुरा करता है उसका तदनुरूप फल उसे भोगना पड़ता है। यह कार्य और कर्म-फल-संयोग स्वाभाविक गतिसे अपने-आप चलता रहता है जबतक जीव कर्मवन्धकी परम्पराका निरोध कर उससे सर्वथा शुद्ध, बुद्ध और मुक्त नहीं हो जाता। यही मुक्ति-साधना जीवनका और धर्मका चरम ध्येय है। इस सिद्धान्तका प्रतिपादन करनेवाला साहित्य भी बहुत विशाल है । षट्खण्डागम आदि ग्रन्थों में इसका सुव्यवस्थित, सविस्तर और सूक्ष्म विवेचन पाया जाता है। गोम्मटसार जीवकाण्ड और कर्मकाण्डमें इस विषय- के समस्त शास्त्रोंका सार खोंचकर भर दिया गया है जिससे इसी ग्रन्थका अध्ययन-अध्यापनमें प्रचार बहुत बढ़ गया है, एवं उससे पूर्वको रचनाएँ अन्धकारमें पड़ गयौं । प्रस्तुत ग्रन्थका सर्वप्रथम परिचय हमें पं० परमानन्द शास्त्रीके “गोम्मटसार कर्मकाण्डको त्रुटिपूर्ति" शीर्षक लेख ( अनेकान्त, वर्ष ३, किरण ८-९, पृ० ५३७, सन् १९४०) से हुआ। इसमें लेखकने यह प्रति- पादित किया कि गोम्मटसार कर्मकाण्डका प्रकृति समुत्कीर्तन अधिकार त्रुटिपूर्ण है, किन्तु उसमें यदि कर्मप्रकृति- की ७५ गाथाएँ यत्र-तत्र समाविष्ट कर दी जाये तो उन त्रुटियोंकी पूर्ति हो जाती है । लेखकका यह भी अनुमान था कि कर्मप्रकृति भी गोम्मटसारके कर्ता नेमिचन्द्राचार्यकी ही कृति है जिसकी वे गाथाएँ सम्भवतः किसी समय कर्मकाण्डसे छूट गयों, अथवा जुदा पड़ गयीं । उन्हें फिरसे कर्मकाण्डमें यथास्थान जोड़ देनेसे उसे पूर्ण, सुसंगत और सुसम्बद्ध बनाया जा सकता । इसपर प्रस्तुत प्रधान सम्पादकोंमें से एक (प्रो० हीरालाल जैन ) ने दो लेखों-द्वारा ग्रन्थके विपय, शैली आदिका पूर्ण विवेचन करके उक्त मतका निरसन किया ("गो० कर्मकाण्डको त्रुटिपूर्तिपर विचार" अनेकान्त, वर्ष ३, किरण ११, पृ० ६३५, तथा “गो० कर्मकाण्डको त्रुटिपूर्ति-सम्बन्धी प्रकाशपर पुनः विचार", जैनसन्देश, १२ दिसम्बर १९४० से १६ जनवरी १९४१ तक पांच अंकोंमें ) । इन लेखोंमें सप्रमाण विवेचनपूर्वक यह निर्णय निकाला गया कि "कर्मप्रकृति एक पोछेका संग्रह है जिसमें बहुभाग गोम्मटसारसे व कुछ गाथाएं अन्य इधर-उधरसे लेकर विषयका सरल विद्यार्थी-उपयोगी परिचय करानेका प्रयत्न किया गया है। यह गाथासंग्रह सावधानीपूर्वक नहीं किया गया इसके भी कुछ उदाहरण उपत लेखोंमें दिये गये हैं। जैसे प्रस्तुत ग्रन्थको ११५वों गाथा गोम्मटसार कर्मकाण्डकी ४७वीं गाया है और उसमे 'देहादी फासंता पण्णासा' अर्थात् नामकर्मकी देह या शरीर नामक प्रकृतिसे लेकर स्पर्श नामप्रकृति तकनी पचासको पुद्गल विपाको कर्मोमें गिनाया गया है। किन्तु इसका प्रस्तुत ग्रन्थको ६७ से ९३ तककी गायाओमे परिगणित नाम प्रकृतिसे मेल नहीं खाता, क्योंकि यहाँ शरीरसे लेकर स्पर्श तकको प्रकृतियों में दो विहायोगति नामक प्रकृतियां भी हैं जिनसे उक्त संख्या ५० नहीं ५२ हो जाती है । अत एव ये गाथाएं गो० कर्मकाण्टकार- द्वारा रचित हो ही नहीं सकती। उनके ग्रन्थमें "देहादी फासंता" प्रकृतियोंका उल्लेख गा० ३४० में भी आया है तथा दो विहायोगतियां उनसे बाहर गिनायी गयी हैं। यह क्रम ठोक पट्खण्डागमके अनुसार है जहां जोवट्ठाणान्तर्गत चूलिका अधिकारमें शरीरसे लेकर स्पर्श तक वे हो ५० पुद्गलविपाको प्रकृतियां गिनायी गयी जो उक्त दोनों गाथाओंमें अपेक्षित है, तथा प्रस्तुत कर्मप्रकृतिको उक्त गाघासे मेल नहीं खातों। प्रस्तुत ग्रन्थमें जो गाथाएँ गोम्मटसारको नहीं हैं उनमें रचना-दौपित्यका भी अनुभव होता है । उदा. हरणार्थ, प्रकृति मादि चार बन्धोंके नाम-निर्देश मात्र के लिए एक पूरी गाघा नं० २६ खर्च की गयी है, और उसमें चार भेदोंका उल्लेख दो-दो वार तथा गायबो, होदि, गिट्टिो, कहिमो-जैसे चार पदोंका प्रयोग करके गाधाके कलेवरको भरना पड़ा है । उतनी हो वात नेमिचन्द्राचार्य ने अपने द्रव्यसंग्रहको नापा ३६ एकामे अपनी सुगठित सूत्ररोलीते भले प्रकार कह दो 'पपडि-दिदि-अणुभान-पदेवघोति चविछो यो' । -

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- सम्पादकीय लगभग बीस वर्ष हुए जब मुझे कर्मप्रकृतिको एक संस्कृतटोका युक्त तथा एक पं० हेमराजजी कृत भाषा टीका युक्त ऐसी दो प्रतियाँ प्राप्त हुई। उन दिनों में कसायपाहुडसुत्तके अनुवादमें व्यस्त था, अतः उसके पश्चात् ही इसे हाथमें लेना उचित समझा। परन्तु इस बीच कसायपाहुडसुत्तके सम्पादनके अतिरिक्त वसुनन्दिश्रावकाचार, जिनसहस्रनाम, पंचसंग्रह और जैनधर्मामृतके सम्पादन करने में व्यस्त रहने से इसे ई० सन् १९६० तक हाथ हो नहीं लगा सका। जब उक्त समस्त ग्रन्थोंके सम्पादनसे निवृत्त हुआ तब कर्मप्रकृतिके कार्यको हाथमें लिया और मेरे पास जो प्रति थी, उसके आधारपर उसको प्रेस कापी मूल और टीका दोनोंकी कर लो। पीछे जयपुर और ब्यावरके शास्त्रभण्डारोंसे इसको और भी प्राचीन प्रतियाँ प्राप्त हुई और उनमें श्री ज्ञानभूपण-सुमतिकोत्ति-रचित टोका भी उपलब्ध हुई। यह टोका पहले प्राप्त टीकासे विस्तृत देखकर उसे भी प्रस्तुत संस्करणमें देना उचित समझा और श्रीमान् डॉ० हीरालालजोने पं० हेमराजजीकृत भापा टीका- के रूपको देखकर उसे भी प्रकाशित करनेको अनुमति प्रदान की। इस प्रकार प्रस्तुत संस्करणमें तीन टोकाएं सम्मिलित हैं- १. मूलगाथाओंके साथ ज्ञानभूपण-सुमतिकोत्तिकी संस्कृत टीका और उनका मेरे द्वारा किया हुआ हिन्दी अनुवाद । २. अज्ञात आचार्य-द्वारा लिखी गयो संस्कृत टीका । ३. संस्कृत टोका गर्भित पं० हेमराजकृत भाषा टोका। श्रीमान् डॉ० आ० ने० उपाध्यायका सुझाव था कि इसका मिलान दक्षिण भारतको प्राचीन ताड़पत्रीय प्रतियोंसे अवश्य करा लिया जाये। तदनुसार मैंने श्रीमान पं० के० भुजवली शास्त्रीसे प्रार्थना को और उन्होंने मूडबिद्रोके प्राचीन ताड़पत्रीय प्रतिसे अपने सहयोगी श्री० पं० देवकुमारजीके साथ मिलान कर पाठ-भेद भेजनेकी कृपा की । पाठ-भेदोंको येधास्थान दे दिया गया और जो उनके सम्बन्धमें विशेप वक्तव्य था, वह प्रस्तावनामें दे दिया है। अनुवाद या विशेपार्थमें अनावश्यक विस्तार न हो, इस बातका भरपूर ध्यान रखा गया है । साधमें पं० हेमराजकृत भाषा टोका दो ही जा रही है, जिसमें यथास्थान सभी ज्ञातव्य वातोंका स्पष्टीकरण किया हो गया है। मूल गाथाओंके पाठ-भेदों आदिको पादटिप्पणमें हिन्दी अंकोंके तथा टोकागत पाट-भेदोंको रोमन अंकोंके साथ दिया गया है। मूलग्रन्य कर्मप्रकृतिके रचयिताके बारेमें कुछ विवाद है। कुछ विद्वान् उसे नेमिचन्द्राचार्यको कृति माननेको तैयार नहीं हैं, परन्तु जबतक सवल प्रमाणोंसे वह अन्य-रचित सिद्ध नहीं हो जाती तबतक उसे प्रसिद्ध आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती-रचित मानने में कोई आपत्ति भी दृष्टिगोचर नहीं होती । टीका- कारों और प्रतिलिपिकारोंके द्वारा उसे नेमिचन्द्र सिद्धान्ति, नेमिचन्द्र सैद्धान्तिक और सिद्धान्तपरिमान चक्रवर्ती- विरचित लिखा हुआ मिलता ही है । इसके पश्चात् भी यदि किन्हीं प्रबल प्रमाणोंते वह किन्हीं दूसरे ही नेमि- चन्द्र-द्वारा रचित सिद्ध हो जायेगी तो मुझे उसे स्वीकार करने में भी कोई आपत्ति नहीं होगी। श्री ऐलक पन्नालाल दि० जैन सरस्वती भवन व्यावरको प्रति उसके व्यवस्थापक श्रीमान् पं० पन्नालाल- जो सोनीसे, तथा जयपुर भण्डारको प्रति उसके मन्नो श्रीमान् केशरलालजी तथा श्रीमान् डॉ० कर कासलीवाल एम० ए० को कुपासे प्राप्त हुई । तथा ताडपत्रीय प्रतियों का मिलान श्रीमान् पं० २० नगदली शास्त्री और श्री पं० देवकुमारजीको कृपासे हुआ इसके लिए मैं उक्त सभी महानुभावोंका भामागे हैं। अन्यको भारतीय ज्ञानपीठको मूत्तिदेवी अन्यमालाले प्रकाशनको स्वीकृति उनके प्रधान मागदर ८ कमभात श्रीमान् डॉ० हीरालालजी जैन एम० ए०, डी० लिट् जबलपुर और श्रीमान् डॉ० मा० ने० उपाध्याय एम० ए०, डी० लिट् कोल्हापुरसे प्राप्त हुई। समय-समयपर पत्रोंके द्वारा एवं प्रत्यक्ष भेटमें मौखिक रूपसे आपने जो सुझाव एवं प्रोत्साहन ग्रन्थको प्रकाशमें लाने के लिए दिये उसके लिए मैं दोनों महानुभावोंका बहुत आभारी । भारतीय ज्ञानपीठके सुयोग्य मन्त्री श्रीमान् वावू लक्ष्मीचन्द्रजी जैन एम० ए० का मैं बहुत याभारी हूँ जिन्होंने ग्रन्थकी पाण्डुलिपि दिये जानेके पश्चात् स्वल्प समयमें ही इसे प्रकाशित करके ग्रन्यको सर्वसाधारणके लिए सुलभ कर दिया है। सर्वप्रथम धन्यवादके अधिकारी दानवीर, श्रावक-शिरोमणि श्रीमान् साहू शान्तिप्रसादजी और सी० रमारानी जैनका आभार प्रकट करनेके लिए मेरे पास समुचित शब्द नहीं है । सारा हो जैन समाज आपके इस ज्ञानपीठका चिरकृतज्ञ रहेगा । आप लोगोंके द्वारा संस्थापित और संचालित यह भारतीय ज्ञानपीठ अपने पवित्र उद्देश्योंकी पूत्ति में उत्तरोत्तर अग्रेसर रहे यही अन्तिम मङ्गल-कामना है । मारतीय ज्ञानपीठ, काशी -हीरालाल शास्त्री १६-४-६३ .

प्रस्तावना + माम जिस-जिन प्रतियोका उपयोग हमा है, उनका परिचय इस प्रकार है : जिमको त्यागी मुन्नालालमो बन्दे के संग्रहने हुई। इसका आकार ९.४ । प्रतिपन नितम्या ६ चौर प्रतिपंबित अक्षर-संग्या २८-३० है । पर बना ली गनी । गापामा उ.पर और हासिौ टिप्पणके रूपमें एक iii. जग पर दूगरी टोकानोरी कुछ विशेषता रखती है और इसी कारण का सामना काशित किया गया है। प्रतिफ अन्तमें जो प्रशस्ति दी हुई है उससे स्पष्ट ... fac८१९. मापद कप्ता १० को लिगी गयी है। इसे पं० सिंभूरामने बघू नामक नगर की पगार साना दटकार अपने बध्ययन लिए लिया है । लेखकाने अपनी गुरु-परम्पराका उपनाम जायजो धीमेपलिहजीके प्रवर्तमान राज्यका भी निर्देश किया है। मूल पादक, प्रतिमा है। किन्तु पंक्तियोंके जार और हासियेमें जो टोका दी गयी है वह बनेका बोर अनेक पलोपर पत्रात चिपक जाने से हाप्ट पढ़ने में नहीं आ सकी टोपावाली अन्य प्रतिको अन्नन गाही प्रानि न हो सकने के कारण जैसा चाहिए संशोधन नहीं हो सका है। फिर भी अन्य टीकाको साधारने में गोधनेका प्रयत्न किया गया है । जहाँ कोई पाठ ठोक संशोधित नहीं पिया काममा, Rai (१) नयाचफ चित लगा दिया गया है। प्रतिक मतमे जी प्रगति दी गयी है, वह इस प्रकार है : "बरं धेन्दुवनु केवलयुत १८६९ भाद्रपदमास कृष्णपक्षे दशम्यां तिथौ शनिवासरे वेधूनाम- नगर श्रीपाश्र्धनाथचन्यालय रावजीधीमसिंहजीराज्यमवर्तमाने महारकेन्द्र-मटारकजीश्रीक्षेमेन्द्रकीर्तिजी भाचार्ययपंधीधर्मकीतिजी तच्छिष्य प्राचार्यवयंजो श्रीमरुकीर्तिजी पण्डितमनराम चैनराम लालचन्द रतन चन्द गुमानी लिन सेवाराउ एतेपा मध्ये ५० मनराम तच्छिप्य सिंभूरामेण इदं ग्रन्थं स्वपठनार्थ लिपिनं ॥" प्रतिहानियेपर ग्रन्धका नाम यद्यपि कर्मकाण्ड लिखा है, तथापि ग्रन्यकी अन्तिम गाथाके अन्त में "इति श्रीनेमिचन्द्रनिद्धान्ति-विरचित कर्मप्रकृतिग्रन्थः समाप्तः" लिखा है, जिससे मूलग्रन्धका नाम कर्म- प्रकृति सिद्ध है। सबसे ऊपर के पत्रपर 'कर्मकाण्ड पुस्तक भट्टारकाजोको' लिखा है, जिससे स्पष्ट है कि लेखकके पश्चात् यह प्रति किसी भट्टारको स्वामित्वमें रही है। ज प्रतियह प्रति भामेर-भण्डार जयपुर की है, जिसका नं० १६४ है। इसका आकार ११४५. इंच है। पत्र संख्या ५४ लिखी है, पर वस्तुतः ५५ है; क्योंकि दो पत्रोंपर ४२-४२ अंक लिपिकारकी भूलसे लिखे गये हैं। प्रतिपत्र पंक्ति-संख्या ९ और प्रतिपंक्ति अक्षर-संख्या ३६.३७ है। प्रतिके अन्तमें लेखकने प्रति-लेखन-काल नहीं दिया है, किन्तु कागज, स्याही और अक्षर-बनावट आदिको देखते कमसे कम इसे दो-सौ वर्ष प्राचीन अवश्य होना चाहिए। कागज देशो, मोटा मोर पुष्ट है, तथा प्रति अच्छी दशामें है। केवल एक पत्र किनारेपर कुछ जला-सा है। प्रतिमें एकारको मात्रा अधिकतर पडिमात्रामें है। यथा दोप-दाप, शिलाभेद-शिलाभद आदि । प्रतिके अक्षर सुन्दर एवं सुवाच्य हैं, तथापि वह अशुद्ध है। लेखकने 'श' के स्थानपर 'स' और कहीं-कहीं 'स' के स्थानपर 'श' लिखा है। कई स्थलोपर पाठ छूटे हुए हैं, और कई स्थलोंपर दोबारा भी लिखे गये हैं। यथा, . २ -- ८ कर्मप्रकृति श्रीमान् डॉ० हीरालालजी जैन एम० ए०, डी० लिट् जबलपुर और श्रीमान् डॉ० मा० ने० उपाध्याय एम० ए०, डी० लिट् कोल्हापुरसे प्राप्त हुई। समय-समयपर पत्रोंके द्वारा एवं प्रत्यक्ष भेटमें मौग्निक मपसे आपने जो सुझाव एवं प्रोत्साहन ग्रन्थको प्रकाशमें लानेके लिए दिये उसके लिए मैं दोनों महानुभावोंका बहुत आभारी हूँ। भारतीय ज्ञानपीठके सुयोग्य मन्त्री श्रीमान् बाबू लक्ष्मीचन्द्रजी जैन एम० ए० का में बहुत आभारी हूँ जिन्होंने ग्रन्थकी पाण्डुलिपि दिये जाने के पश्चात् स्वल्प समयमें ही इसे प्रकाशित करके ग्रन्यको सर्वसाधारणके लिए सुलभ कर दिया है। सर्वप्रथम धन्यवादके अधिकारी दानवीर, श्रावक-शिरोमणि श्रीमान् साहू गान्तिप्रसादजी और सौ० रमारानी जैनका आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास समुचित शब्द नहीं है। सारा ही जैन समाज मापके इस ज्ञानपीठका चिरकृतज्ञ रहेगा । आप लोगोंके द्वारा संस्थापित और संचालित यह भारतीय ज्ञानपीठ अपने पवित्र उद्देश्योंकी पूर्ति में उत्तरोत्तर अग्रेसर रहे यही अन्तिम मङ्गल-कामना है। भारतीय ज्ञानपीठ, काशी -हीरालाल शास्त्री १६-४-६३

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कर्मप्रकृति JI श्रीमान् डॉ० हीरालालजी जैन एम० ए०, डी० लिट् जबलपुर और श्रीमान् ऑ० आ० ने० उपाध्याय एम० ९०, डो० लिट् कोल्हापुरसे प्राप्त हुई। समय-समयपर पत्रोंके द्वारा एवं प्रत्यक्ष भेंटमें मोनिक रुपमे यापने जो सुझाव एवं प्रोत्साहन ग्रन्थको प्रकाशमें लानेके लिए दिये उसके लिए मैं दोनों महानुभावोंका बहुत आभारी हूँ। भारतीय ज्ञानपीठके सुयोग्य मन्त्री श्रीमान् वावू लक्ष्मीचन्द्रजी जैन एम० ए० का मैं बहुत आभारी हूँ जिन्होंने ग्रन्यकी पाण्डुलिपि दिये जानेके पश्चात् स्वल्प समय में ही इसे प्रकाशित करके ग्रन्थको सर्वसाधारणके लिए सुलभ कर दिया है। सर्वप्रथम धन्यवादके अधिकारी दानवीर, श्रावक-शिरोमणि श्रीमान् साह शान्तिप्रसादजी और सी० रमारानी जैनका आभार प्रकट करने के लिए मेरे पास समुचित शब्द नहीं है। सारा ही जैन समाज मापक इस ज्ञानपीठका चिरकृतज्ञ रहेगा । आप लोगोंके द्वारा संस्थापित और संचालित यह भारतीय ज्ञानपीठ अपने पवित्र उद्देश्योंकी पूत्ति में उत्तरोत्तर अग्रेसर रहे यही अन्तिम मङ्गल-कामना है। भारतीय ज्ञानपीठ, काशी -हीरालाल शास्त्री १६-४-६३ प्रस्तावना अ प्रति - . प्रस्तुत ग्रन्थ के सम्पादन में जिन-जिन प्रतियोंका उपयोग हुआ है, उनका परिचय इस प्रकार है : इसकी प्राप्ति मुझे धी त्यागी मुन्नालालजी चन्देरोके संग्रहने हुई। इसका आकार ९॥४४॥ इंच है। पत्र संख्या २३ है । प्रतिपत्र पंक्ति-संख्या ६ और प्रतिपंक्ति अभार-संग्या २८-३० है। मुख्यरूपसे इसमें मूल गाथाएँ ही लिखी गयो है । गाथाओंके ऊपर और हासियेमें टिप्पणके रूपमें एक लघुटीका लिखी हुई है, जो अनेक स्थलोंपर दूसरी टीकाओंसे कुछ विशेषता रखती है और इसी कारण उसे मूल वा अनुवादके अनन्तर प्रकाशित किया गया है। प्रतिके अन्तमें जो प्रगस्ति दी हुई है उसले अष्ट है कि यह वि० सं० १८१९ के भाद्रपद कृष्णा १० को लिखी गयी है। इसे पं० निभूरामने बंधू नाममा नगरके श्री पार्श्वनाथ चैत्यालयमे बैठकर अपने अध्ययनके लिए लिखा है । लेखक ने अपनी गुरु-परम्पराका उल्लेख करते हुए तात्कालिक राजा रावजी श्रोमेघसिंहजीके प्रवर्तमान राज्यका भी निर्देग किया है। मूल पाठका जहांतक सम्बन्ध है, प्रति शुद्ध है। किन्तु पंक्तियोंके ऊपर और हासियेमें जो टोका दी गयी है वह अनेक स्थलोंपर अशुद्ध है और अनेक स्थलोंपर पत्रोंके चिपक जानेसे स्पष्ट पढ़ने में नहीं जा सकी है। हम टोकावाली अन्य प्रतिको अन्यत्र कहींसे प्राप्ति न हो सकने के कारण जैसा चाहिए संशोधन नहीं हो सका है। फिर भी अन्य टीकाओंके आधारसे उसे शोधने का प्रयत्न किया गया है । जहाँ कोई पाठ टोक गोधिन नको किया जा सका, वहाँ (?) प्रश्नवाचक चिह्न लगा दिया गया है। प्रतिके अन्तमें जो प्रशस्ति दी गयी है, वह इस प्रकार है : "संवत्सरे रन्धेन्दुवसुकेवलयुते १८१९ भाद्रपदमासे कृष्णपक्षे दशम्यां तिघी मनिवासरे नाम- नगरे श्रीपार्श्वनाथचैत्यालय रावजीधीमसिंहजीराज्यप्रवर्तमाने महारकेन्द्र महारकीधीमेन्द्रका निजी भाचार्यवर्यश्रीधर्मकीर्तिजी तच्छिप्य शाचार्यवर्यजी श्रीमरकीर्तिजी पण्डितमनराम चनराम लालच रतनचन्द गुमानी सिंभ सेवाराउ एतेषां मध्ये ५० मनराम तच्छिप्य सिंगमेण मनसपटना लिपिकृतं ॥" .

१० कर्मप्रकृति पाठ छूटे स्थल-पत्र-संख्या ३०, ४४, ४५/B, ४७, ४९, ५१ इत्यादि । गाथाङ्क १४४-१४५ की पूरी टीका और गा० १४६ को अधिकांश टीका बिलकुल ही छूट गयी है । दोबारा लिखे स्थल-पत्र-संख्या १५, २४, ४५/A इत्यादि । पत्र ४९वेंपर तो लेखकसे बहुत गड़बड़ी हुई है। छूटे पाठका कोई भी संकेत न होकर इस ढंगसे लिखा गया है मानो वहाँपर कोई गड़बड़ी ही नहीं है । पर वास्तवमें इस स्थलपर बहुत आगेका पाठ लिखा गया और यहाँका पाठ छूट गया है। इसी पत्रपर जो संदृष्टियाँ दी है, वे भी अशुद्ध हैं और सम्भवतः उन्हें ठीक रूपसे न समझ सकनेके कारण ही उक्त गड़बड़ी हुई है । पत्र ५० पर दी गयी संदृष्टि भी अशुद्ध है । यह प्रति मूल गाथाओंके अतिरिक्त भ० मल्लिभूपण-सुमतिकीत्ति-विरचित टीकासे समन्वित है । इस टीकाको जो अन्य प्रति ऐलक सरस्वती भवन ब्यावरसे प्राप्त हुई है, उसके साथ मिलान करनेपर ज्ञात हुआ कि अनेक गाथाओंकी संस्कृत टीका भी संक्षिप्त एवं संदृष्टिविहीन है, जो कि व्यावर प्रतिमें पायी जाती है। प्रतिके अन्त में भिन्न कलमके द्वारा यह वाक्य लिखा हुआ है : "म० श्रीवादिभपणस्तत् शिप्य ब्रह्म श्रीनेमिदासस्येदं पुस्तकं ॥श्री॥" इस पंक्तिके आधारपर इतना निश्चित रूपसे कहा जा सकता है कि इसके लिखनेका काल ब्रह्म- श्रीनेमिदाससे पूर्वका है । ये कब हुए, यह अन्वेषणीय है । व प्रति-यह प्रति श्री ऐलक पन्नालाल दि० जैन सरस्वती भवन व्यावरकी है । इसका र० ज० नं० ९ है और पत्र संख्या ४८ है। आकार १२४५॥ इंच है। प्रतिपत्र पंक्ति-संख्या ११ और प्रतिपंक्ति अक्षर- मंख्या ३७-३८ है । प्रतिके अन्तमें उसी स्याही किन्तु पतली कलमसे जो प्रशस्ति दो गयो है उससे स्पष्ट है कि यह प्रति वि० सं० १६२७ के कार्तिक कृष्णा ५ के दिन श्रीमधूकपुरके श्रीचन्द्रनाथ चैत्यालयमें लिखकर समाप्त हुई है । इसे बलसाढनगरके रहनेवाले सिंहपुराजातीयश्रेष्ठी हांसा और उनकी पत्नी मटकूसे उत्पन्न पुत्रो पूतलीवाईने टीकाकारके सहाध्यायी श्री भ० प्रभाचन्द्र के उपदेशसे लिखाकर उन्हींको समर्पित की है । इस व्रत-शील-सम्पन्ना एवं यति-जन-भक्ता वाईने अपने रहनेका मकान भी सम्भवतः उक्त चन्द्रप्रभजिनालयको दे दिया था। यह प्रति बहुत गुद्ध बहुत शुद्ध है । अक्षर सुवाच्य एवं पडिमात्रामें लिखे हुए हैं । कागज अति जीर्ण-शीर्ण एवं पतला पोले-से रंगको लिये हुए श्वेत है । प्रतिमें यथास्थान जो संदृष्टियां दी हुई हैं, वे भी शुद्ध एवं स्पष्ट हैं । प्रतिके अन्तमें जो लेखक-प्रशस्ति दी गयी है, वह इस प्रकार है "स्वस्ति श्री संवत् १६२७ वर्षे कात्तिकमासे कृष्णपक्षे पञ्चम्यां तिथौ अद्येह श्रीमधूकपुरे श्रीचन्द्र- नाथचैत्यालय श्रीमूलसंघ सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे श्रीकुन्दकुन्दान्वये भ० श्रीपद्मनन्दिदेवास्तत्प? भ० श्रीदेवेन्द्रकीर्तिदेवास्तत्प? म० श्रीविद्यानन्दिदेवास्तत्प? म० श्री[म-]ल्लिभूपणास्तत्प? म० श्री लक्ष्मीचन्द्रास्तत्पट्टे म० श्रीवीरचन्द्रास्तपट्टे भ० श्रीज्ञानभूपणास्तत्प? म० श्रीप्रमाचन्द्रोपदेशात् बलसाढ- नगरवास्तव्यः सिंहपुरानातीयः धर्मकार्यतत्परः श्रे० हांसा मार्या मटक तयोः पुत्री यतिजनमत्ता अने[क] व्रतकरणतत्परा जिनालयार्थ दत्तनिजगृहा बाई पूतली तयेमां श्रीकर्मकाण्डटीका लिखाप्य भ० श्रीप्रमाचन्द्र भ्यो दत्ता । चिरं नन्दतु ।। (पृ० ८४) उक्त प्रगस्तिमे सिद्ध है कि यह प्रति कर्मप्रकृतिके टीकाकार भ० श्रीज्ञानभूपणके शिष्य थोप्रभाचन्द्रके लिए लिखा कर समर्पित की गयी है, अतएव यह प्राप्त समस्त प्रतियों में प्राचीन होने के साथ-साथ प्रामाणिक एवं महत्त्वपूर्ण है । इसका कारण यह है कि टीकाकारने पंचसंग्रहकी संस्कृत टीका वि० सं० १६२० में पूर्ण को है और यह प्रति १६२७ को लिखी हुई है । प्रतिके अन्तिम पत्रको पीठार भिन्न कलम और भिन्न स्याहीसे लिखा हुमा है : "गां० २ पो ६ प्र५म० श्रीजिनचन्द्राणां शिष्य म० श्रीविद्यानन्दिकस्य पुस्तकम् ।" - प्रस्तावना . इससे ज्ञात होता है कि पीछे यह प्रति भ० श्रीविद्यानन्दिके अधिकारमें रही है। स प्रति-यह प्रति मेरे साढूमल भण्डारको है। इसका आकार १०x४॥ इंच है। पत्र संख्या ७६ है। प्रतिपत्र पंक्ति-संख्या १० और प्रतिपंक्ति अक्षर-संख्या ३५-३६ है। कागज देशो पुष्ट, लभर सुन्दर सुवाच्य एवं स्याही गहरी काली तथा लाल है। सारी प्रतिमें उत्यानिका वाक्य लाल स्याहीसे ही लिखे हुए हैं । इस प्रतिमें श्री पं० हेमराजजीकृत भाषा टोका दी हुई है। प्रति वि० सं० १७५२ के बंगाख नुदि ५ को चन्द्रापुरीके आदिनाथ चैत्यालयमें लिखकर समाप्त हुई है। इससे ज्ञात होता है कि भाषा टीकाकारके द्वारा टोका रचे जानेके तत्काल पश्चात् ही यह प्रति लिखो गयी है । प्रतिके अन्तमें जो प्रशस्ति दी गयी है, वह इस प्रकार है : संवत् १७५३ वर्षे वैशाख सुदि ५ रवो चन्द्रापुरीमध्ये श्रीश्रादिनाधचैत्यालये धीमूलमधे सरस्वती- गच्छे बलात्कारगणे नंद्याम्नाये कुन्दकुन्दाचार्यान्वये तदनुक्रमेण भहारक श्रीधर्मकीर्ति तत्पर महारक श्रीपा. कीर्ति तत्पट्टे भट्टारक श्री ५ सकलकीर्तिजू देव तत्पहे धरणधीरगच्छपति नायकमहारक श्री श्री श्री श्री श्री श्री श्री सुरेन्द्रर्कात्तिंजू देव प्राचार्यश्री ५ कनककीर्तिज, देव तच्छिप्याचार्य श्रीभूपण ब्रह्म मुमतिसागर पण्डित चिंतामणि पं मनिराम पं घनस्याम पं मानसाहि इदं पुस्तकं लिखितं पंदिन चिन्तामणि न्यपटना ज्ञानावरणीकर्मक्षयार्थ । श्रीरस्तु । उक्त प्रशस्तिसे स्पष्ट है कि इसे पं० चिन्तामणिने अपने पढ़ने और ज्ञानावरपोकर्मके क्षय करने के लिए लिखा है। ग्रन्थ-नाम-निर्णय प्रस्तुत ग्रन्थके संस्कृत टोकाकार श्रीज्ञानभूषण वा सुमतिकात्तिने आदिके मंगल दलोकोंमे तथा मन्तिम प्रशस्तिके पचोंमें स्पष्ट शब्दोंके द्वारा ग्रन्थका नाम कर्मकाण्ड घोषित किया है, परन्तु यह यथार्थता दम विपरीत है। इसी संस्करण में मुद्रित संस्कृत टोका युक्त पं० हेमराजकृत भापाटोका के अन्तम 'कर्मनिविधान' नाम पाया जाता है, पर यह भी ठीक नहीं है। हाँ, दूसरी संस्कृत टोकावाली प्रतिके अनमें इनका नाम स्पष्ट शब्दोंमें 'कर्मप्रकृति' ही दिया गया है। वह पुष्पिका इस प्रकार है : इति श्रीनेमिचन्द्र सिद्धान्तिविरचित कर्मप्रकृतिग्रन्धः समाप्तः ।" इसके अतिरिक्त अन्यको जितनी भी मूल प्रतियां मुझे प्राप्त है, उनमे तथा मदिलीमाट प्रतिम ग्रन्थका नाम 'कर्मप्रकृति' हो मिलता है । इसलिए मैंने इसका नाम 'द मंति'! कर्मप्रकृति-परिचय - कर्मप्रकृति १२ अतः यह नन्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीका ही रचा हुआ होना चाहिए । परन्तु मुख्तार साहब का कहना है कि "मुझे वह उन्हीं ( गो० कर्मकाण्डके रचयिता ) आचार्य नेमिचन्द्रकी कृति मालूम नहीं होती; क्योंकि उन्होंने यदि गोम्मटसार-कर्मकाण्डके वाद उसके प्रथम अधिकारको विस्तार देने की दृष्टि से उसकी रचना की होती, तो वह कृति और भी अधिक सुव्यवस्थित होती ।""और यदि कर्मकाण्डसे पहले उन्हीं आचार्य महोदयने कर्मप्रकृतिकी रचना की होती, तो उन्हें अपनी उन पूर्वनिर्मित २८ गाथाओंके स्थानपर मूत्रोंको ( जो कि कर्मकाण्डको ताडपत्रीय प्रतियों में पाये जाते है ) नवनिर्माण करके रखनेकी जरूरत न होती - खासकर उस हालतमें जब कि उनका कर्मकाण्ड भी पद्यात्मक था । और इसलिए मेरी रायमें यह 'कर्मप्रकृति' या तो नेमि- चन्द्र नामके किसी दूसरे आचार्य, भट्टारक अथवा विद्वान्की कृति है जिनके साथ नाम-साम्यादिके कारण 'सिद्धान्त चक्रवर्ती' का पद बादको कहीं-कहीं जुड़ गया है ~ सब प्रतियों में वह नहीं पाया जाता । और या किसी दूसरे विद्वान्ने उसका संकलन कर उसे नेमिचन्द्र आचार्यके नामांकित किया है और ऐसा करने में उसकी दो दृष्टि हो सकती है - एक तो ग्रन्थ प्रचारको और दूसरी नेमिचन्द्रके श्रेय तथा उपकार-स्मरणको स्थिर रखने की । क्योंकि इस ग्रन्थका अधिकांश शरीर आद्यन्त भागोंसहित उन्हींके गोम्मटसारपर-से बना है।" इत्यादि (पुरातन-जनवाक्य-सूची पृ० ८८) गो० कर्मकाण्डसे पहलेकी रचना न माननेमें श्री मुख्तार साहबने जो युक्ति दी है, वह विचार करनेपर कुछ अधिक महत्त्व नहीं रखती। इसका कारण यह है कि आ० नेमिचन्द्र ने अपने जीवनके प्रारम्भकालमें जन-साधारणको कर्मप्रकृतियोंका बोध करानेके निमित्त इस सरल सुबोध ग्रन्थको रचना को हो और पीछे कर्म- विषयके विशिष्ट जिज्ञासुओं एवं अभ्यासियोंके लिए गो० कर्मकाण्डकी रचना की हो, यह अधिक सम्भव जंचता है। फिर जबतक सबल प्रमाणोंसे उसका अन्य आचार्य के द्वारा रचा जाना सिद्ध नहीं हो जाता तबतक उसे नेमिचन्द्र सिद्धान्त चक्रवर्तीकी कृति मानने में कोई आपत्ति दृष्टिगोचर नहीं होती। यह तर्क कि कर्मप्रकृतिकी अनेक गाथाएं भावसंग्रहादि अन्य ग्रन्थोंसे संगृहीत हैं, अतः वह प्रसिद्ध नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्तीरचित नहीं माना जा सकता, कुछ ठीक नहीं है । कारण कि गो० जीवकाण्डमें अपनेसे पूर्ववर्ती प्राचीन पंचसंग्रहके प्रथम प्रकरण जीवसमासको १०० से भी ऊपरको गाथाएं ज्योंकी-त्यों संगृहीत हैं। इसी प्रकार गो० कर्म- काण्डमे भी उसी प्राचीन पंचसंग्रहके तीसरे, चौथे, पांचवें प्रकरणकी अनेक गाथाएं संगृहीत दृष्टिगोचर होती हैं। प्राकृत साहित्य खासकर कर्म साहित्यके अनुशीलन करनेपर यह पता चलता है कि आचार्य परम्परासे आनेवाली पुरातन गाथाओंको परवर्ती ग्रन्थकारोंने अपने ग्रन्थों में बिना किसी उल्लेख या संसूचनके स्थान दिया है। गोम्मटसारके रचयिता आचार्य नेमिचन्द्रका समय विक्रमको ग्यारहवीं शताब्दी है। इसका सबसे पुष्ट एवं सवल प्रमाण यह है कि उनके शिष्य चामुण्डरायने अपना चामुण्डराय पुराण शक सं० ९०० (वि० सं० १०३५) में रचकर समाप्त किया है। और यतः गोम्मटसारकी रचना उनके लिए हुई है, अतः उसके रचयिता भी उनके ही समकालिक सुनिश्चित सिद्ध हैं। कर्मप्रकृतिका परिमाण कर्मप्रतिको मूलपाठवाली प्रतियोम-से अधिकांगमें १६१ गाथाएँ मिलती है, किन्तु ताडपत्रीय प्रतिमें वा कुछ उत्तरदेशीय प्रतियोमे १६० ही गाथाएं मिलती हैं, 'सिय अत्यि णत्यि उभयं' वाली सोलहवीं गाथा नहीं पायी जाती। इसके विषयों श्रीमुल्तार साहब लिखते हैं कि "वह ग्रन्थ सन्दर्भकी दृष्टि से उसका संगत तथा आवश्यक अंग मालूम नहीं होती, क्योंकि १५वीं गाथामें जीवके दर्शन, ज्ञान और सम्यवत्व गुणोंका निर्देश किया गया है, वीचमें स्यात् अस्ति नास्ति आदि सप्तनयोंका स्वरूप निर्देशके बिना ही नामोल्लेखमात्र करके यह कहना कि 'द्रव्य मादशवगसे इन सप्त भंगप्प होता है कोई संगत अर्थ नहीं रखता । जान पड़ता है १५वों गाथा सप्त नंगोंडामा श्रद्धानकी जो बात कही गयी है, उसे लेकर किसीने 'सत्तभंगोहिं' पदके - --- प्रस्तावना १३ .. टिप्पणरूपमें इस गाथाको अपनी प्रतिमें पंचास्तिकाय ग्रन्यसे, जहां वह नं० १५ पर पायी जाती है, उद्धृत किया होगा, जो वादको संग्रह करते समय कर्मप्रकृतिके मूल में प्रविष्ट हो गयी।” (पुरातन जनवाक्य मूची, पृ० ८३) श्री मुख्तार साहवकी सम्भावना ठीक हो सकती है, क्योंकि मूडविन्द्रीकी जिस प्राचीन ताडपत्रीय प्रतिस मैने श्री० पं० भुजबली शास्त्रीके द्वारा मूलपाठका मिलान कराया है, उसमें भी वह नहीं पायी जाती है । परन्तु फिर भी प्रस्तुत संस्करण में उक्त गाथा यथास्थान दी गयी है और इसका कारण यह है कि कामप्रतिको संस्कृत टोकावालो जो प्रतियां मुझे उपलव्ध हुई है, उन सबमे जो सबसे प्राचीन है अर्थात् वि० सं० १६९ को लिखी हुई है उसमें भी वह गाथा अपनी संस्कृत टोकाके साथ उपलव्य है । इससे इतना तो निश्चित है। कि टोका-रचनाके पूर्व ही वह मूलका अंग बन चुकी थी। हां, टोका-प्रतियों में एक अन्तर अवश्य दृष्टिगोचर होता है, वह यह कि जयपुरवाली प्रतिमें उसको टोका ठोक वही है, जो पंचास्तिकायने पायी जाती है। किन्तु व्यावरवाली प्रतिमें टीका उससे भिन्न है और जिसका टीकाकार के द्वारा हो रचा जाना मित्र होता है। ताड़पत्रीय प्रतिमें चौथी गाघाके वाद “सयलरसरूवगन्धेहिं परिणदं चरिमर्हि फार्म । सिन्दादोऽमव्वादोऽयंतिमभागं गुणं दव्वं ।।" यह गाथा; तथा पचीसवों गापाके वाद "भाउगमानी धामी णामागोदे समो तदो अहिओ। घादितिए वि य तत्ती मोहे तत्तो तदो नदिये ॥" का गाया पायी जाती है। परन्तु ये गाथाएँ न तो संस्कृत टीकावाली प्रतियों में पायी जाती है और न ५० हेमराजजीवाली भाषा- टोकाको प्रतिमे ही पायी जाती हैं, अतः उन दोनोको प्रस्तुत संस्करण में नहीं दिया गया है । ताडपत्रीय प्रतिमें एकासी उनतालीसवों गाया भी नहीं पायी जाती है, किन्तु का शत और मिनी टोकामें यथास्पान पायी जाती है, लतः उसे ज्योंका-त्यो रसा गया है। तापमोद प्रतिगत र पाटनको यथास्थान पाद-टिप्पणमें दे दिया गया है। ज और व प्रति-गत विशेषताएँ - कर्मप्रकृति (७)ज प्रतिको गा० ९९ को टोकामें दिया हुआ छहों पर्याप्तियोंका स्वरूप भी व प्रतिमें नहीं है । वहाँ केवल पर्याप्तियोंके नाम दिये गये हैं। (८) गा० १०० को टोकामें जो 'साहारणमाहारों' आदि तीन गाथाएं दी हुई हैं, वे भी य प्रतिमें नहीं हैं। (९) गा० १०१ को टीकामें शरीरोंके १० उत्तर भेद गिनाये गये हैं, वे भी इसमें नहीं हैं । (१०) गा० १०२ की टोकामें 'अथवा' कहकर अन्तराय कर्मकी पांचों प्रकृतियोंका जो स्वरूप दिया गया है, वे प्रतिमें वह न देकर इतना मात्र ही लिखा है-"अथवा दानादिपरिणामस्य व्याघातहेतु- त्वाद् दानाद्यन्तरायः।" ( ११ ) गा० १०४ के पूर्वार्धके अन्तमें 'सम्ममिच्छत्तं' के स्थानपर टोकाकारको 'मिच्छत्तं' पाठ ही मिला रहा प्रतीत होता है, तभी उन्होंने टोकामें 'सम्म' इति मीलित्वा आदि कहकर पूरे नामको पूर्ति की है। (१२ ) व प्रतिमें गा० १०८ की टीका अति संक्षिप्त रूपसे दो गयी है, जब कि ज प्रतिमें वह विस्तृत रूपके साथ पायो जाती है। ( १३ ) ज प्रतिकी गा० १०९ की टोकामें पांचों निद्राओंके नाम पाये जाये हैं, किन्तु व प्रतिमें पृथक्-पयक नाम न देकर 'स्त्यानगृद्धयादिपंचकं' इतना ही दिया गया है । (१४ ) गा० ११३-११४ की टोकामें पांच संस्थान पाँच संहननोंक नाम नहीं दिये गये, जब कि ज प्रतिमें ये पाये जाते हैं । (१५ ) व प्रतिको गा० ११६ को टोकामें प्रत्येक कपायपदके साय 'वासनाकाल:' पद नहीं दिया गया है, जब कि वह ज प्रतिमें पाया जाता है । ( १६ ) व प्रतिमें गा० ११७ को टोका संक्षिप्त है, वह ज में विस्तृत है । ( १७ ) आगे अनेक स्थलोपर दोनों प्रतियोंको टीकामें संक्षेप-विस्तारका भेद नामादिके साथ भी पाया जाता है। जिनमें से कुछ एकको उदाहरणके स्वरूप यहां दिया जाता है- व प्रति ज प्रति गा० १२१ चतुर्गतयः नरकादि चतुर्गतयः पंच जातयः एकेन्द्रियादि पंच जातयः गा० १२३ पोडशकपायेपु अनन्तानुबन्धि..."भेदभिन्नेषु पोडशकपायेपु ( १८ ) ब प्रतिकी गा० १३९ को टीकाके अन्तमें जो संदृष्टियाँ दी गयी हैं, और जो कि प्रस्तुत संस्करण में मुद्रित है, वे जयपुर-भण्डारकी प्रतिमें नहीं पायी जातीं। ( १९) ज प्रतिमें स्थितिबन्ध प्रकरणके अन्तमें संदृष्टियोंसे पूर्व 'इत्यनुभापाप्रकरणं समाप्तं' वाक्य लिखा है । पर व प्रतिमें वह नहीं है । किन्तु संदृष्टियोंके अन्तमें 'इति स्थितिबन्धप्रकरणं समाप्तं' दिया है । उको अन्तरोंक अतिरिक्त और भी छोटे-मोटे अनेक अन्तर हैं, जिन्हें विस्तारके भयसे नहीं दिया गया है। टोकागत इन विभिन्नताओंको देखनेपर उसके दो व्यक्तियोंके द्वारा रचे जानेको बातपर प्रकाश पड़ता है कि एकके द्वारा संस्कृत टोकाके रचे जाने पर दूसरेने उसे यथास्थान जो पल्लवित किया है, वही भेद जयपुर बोर व्यावरको प्रतियोंमें दिखाई दे रहा है, दोनों प्रतियोंको देखते हुए यह बात हृदयपर सहज में ही अंकित होती है। (२०) गा०१६ की टीका ज और य दोनों ही प्रतियों में भिन्न-भिन्न प्रकारको पायी जाती है। ब में वह मंभित है, वह पाठ पादटियण में दिया गया है । ज का पाठ विस्तृत है, उसे कर दिया गया है। यहाँ यह विशेष ज्ञातव्य है कि ज प्रतिका पाठ पञ्चास्तिकायको टोकाका शब्दशः अनुकरण करता है।

प्रस्तावना . मूल ग्रन्थकी विशेपताएँ यद्यपि कर्मप्रकृतिको बहुभाग गाथाएं गो० कर्मकाण्डमें, तथा कुछ गाधाएं भावसंग्रहादिमें पायी जातो हैं, तथापि अनेक गाथाएँ ऐसी हैं जो कि अन्यत्र नहीं पायी जाती हैं और न उनके द्वारा प्रपित अर्थ हो अन्यत्र दृष्टिगोचर होता है। उदाहरणस्वरूप कुछ बातोंको नीचे दिया जाता है । ( १ ) गा० ८७ में गुणस्थानोंके भीतर संहननोंका वर्णन है जिससे स्पष्ट नात हो जाता है कि किन संहननका धारक जीव किस गुणस्थानको प्राप्त कर सकता है । २ ) गा० ८८ में जोवसमासोंके भीतर संहननोंका अस्तित्व बतलाया गया है । ( ३ ) गा० ८९ में विदेह क्षेत्रवाले मनुष्योंके, विद्याधरोंके, म्लेच्छ मनुष्योंके तथा नागेन्द्र पर्वत परवर्ती क्षेत्र में रहनेवाले तिर्यचोंके छहों संहननोंका सद्भाव बतलाया गया है । ४ ) गो० कर्मकाण्डको टीकामें यद्यपि अगुरुलघुपट्क, सहादशक, स्थावरदंशक नामसे नुचित प्रकृतियोंका वर्णन मिलता है। पर गाथाओंमें उनका निर्देश इसी ग्रन्यमें पहली बार देखने को मिलता है। गुणस्थानों, जीवसमासों एवं मार्गणास्थानोंके भीतर वन्ध, उदय, सत्त्व प्रकृतियों के निरूपण-कालमें उनका बार- वार उपयोग होता है और कण्ठस्य न रहने के कारण अभ्यासोको कठिनाईका अनुभव करना पड़ता है। किन्तु प्रस्तुत ग्रन्यमें गा० ९५ के द्वारा अगुरुलघुपट क, गा० ९९ के द्वारा प्रसादगक और गा० १०० के द्वारा स्थावरदशकका निरूपण करके ग्रन्थकारने अभ्यासियोंको कण्ठस्थ करने का सुवर्ण-अवसर प्रदान किया है। ( ५ ) तीर्थकर प्रकृतिको सत्तावाला जीव कितने भवमें मोक्ष प्राप्त कर लेता है, इसका सष्ट निका गा०.१५८ में किया गया है, उससे यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि जिन जीवोंने गास्वाधम कहा तीर्थकर प्रकृतिका बन्ध किया है, वह तीन ( दोक्षा, ज्ञान, निर्वाण ) कल्याणकीका धारी होकर उनी भयो मोक्ष जा सकता है और जिसने मुनि-अवस्थामें तीर्थकर प्रकृतिका वन्ध किया है, यह ( भाग-निर्वाण ) को कल्याणकोंका धारक होकर उसी भवसे मुक्त हो जाता है । जो जोव तीर्थकर प्रकृतिका वन्य करके उनी भयो मुक्त नहीं हो पाते, वे स्वर्ग या नरक जाकर और वहीं से भाकर मनुष्य भयको धारण परफे पंन कल्याणका धारी बनकर तीसरे भवमें मोक्ष जाते हैं। इसी गाथामें क्षायिकसम्यपत्यो जीवको भी मुक्ति। पन दिया गया है कि वह अधिकसे अधिक तीसरे या चौधे भवमें नियमसे मोक्ष प्राप्त कर लेता है।

१६ कर्मप्रकृति गया है और अपने लिए एक भी विशेषणका प्रयोग न करके केवल 'सुमतिकोत्तियुक्' इतना मात्र लिखा है, उससे यह बात अमन्दिग्ध रूपसे सिद्ध है कि वस्तुतः आदि मंगल-श्लोकोंसे लेकर अन्तिम प्रशस्ति-श्लोकों तक बीमाली रचना मुमतिकोत्तिने हो की है। किन्तु संशोधन-परिवर्वनादि करने के कारण कृतनता-ज्ञापनके लिए उन्होंने अपने गुरु नामका भी रचयिता रूपसे उल्लेख कर दिया है। इसके अतिरिक्त प्रशस्तिके अन्तमें जो कत्रिका दी है, उससे भी मेरे अत अनुमानकी पुष्टि होती है। वह इस प्रकार है- "नि भट्टारकज्ञानभूषणनामाङ्किता सूरिश्रीमतिकोतिविरचिता कर्मकाण्डस्य टीका समाप्ता।" एक भ्रम-परके उद्धरणों को देखते हुए यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि संस्कृत टोकाकारने प्रस्तुत अन्यको कर्मकाण्ड ही समझ लिया है । जब कि यह ग्रन्थ गो० कर्मकाण्डके पहले और दूसरे अधिकारसे हामन्यन्ध रखता है और विवेचन पद्धतिको देखते हुए वह एक स्वतन्त्र ग्रन्थ है और विपयको दृष्टि से 'कर्मप्रकृति' हो उगका बयार्थ नाम है। टीकाकार-परिचय प्रस्तुत कर्मप्रकृतिको टीकाके अन्तमें जो प्रशस्ति दी हुई है, वह बहुत संक्षिप्त है । इन्हीं सुमतिकोत्तिने प्राकृत पञ्चनंग्रहकी भी टीका लिखी है और उसके बन्त में एक विस्तृत प्रशस्ति दी है, जिसके द्वारा उनकी गुम्परापर अच्छा प्रकाश पड़ता है। उसका सार इस प्रकार है- "आचार्य कुन्दकुन्दके मूलसंघमें क्रमशः पद्मनन्दी, देवेन्द्रकोति, मल्लिभूपण हुए। उनके पट्टपर अनेक नियाल न० लक्ष्मीचन्द्र हा । उनके पट्टपर वोरचन्द्र हुए, उनके पट्टपर ज्ञानभूपण हुए । और उनके पट्टपर प्रमानन्द्र हुए। इनमें से लक्ष्मीचन्द्र मुमतिकीत्तिके दीक्षागुरु और वीरचन्द्र तथा ज्ञानभूपण शिक्षागुरु थे।" प्रारम्भको गुरुपरम्परा के पश्चात् लक्ष्मीचन्द्र, उनके शिप्य वीरचन्द्र , उनके शिष्य ज्ञानभूपणका उल्लेख मुमनिकोनिने दम अन्यकी प्रगति में भी किया है। उक्त कथनसे इस वातमें कोई सन्देह नहीं रह जाता है रिमनिकोनिक शिक्षागुन श्रीजानभूषण थे । उक्त परिचयके अतिरिक्त दोनों ही प्रशस्तियोंसे न टोका- काय माता-पितामाही परिचय प्राप्त होता है और न उनके जन्मस्थान, जाति आदिका ही। हाँ, पञ्च- मंकी प्रतिम यह अवश्य ज्ञात होता है कि उन्होंने पञ्चसंग्रहको टोकाको समाप्ति ईलाव (?) नगरके श्रीआदिनायचंयालयमें की। यह ईलावनगर ईडर है, या अन्य कोई नगर, यह अन्वेषणीय है । ईडर-गादीकी भट्टामा जमरा सम्भवतः इसका निर्णय किया जा सकेगा। - - - टीकाकारका समय पनि कामप्रतिको टीकाके रचनेके समयका कोई उल्लेख इसको प्रशस्तिमें नहीं दिया गया है, तथापि ज्यको प्रगनिमें उनकी टोकाममाप्तिका सष्ट निर्देश किया गया है। वह टीका वि० सं० १६२० में है, अन उनके रचे जाने का समय भी इनके आस-पास होना चाहिए । अधिक सम्भावना तो यह नहाती टीका पूर्व ही कर्मप्रकृतिको टोका रची गयी है । इसके दो कारण हैं-एक तो यह कि पाककृति स्वल परिमाणवालो है, दूसरे मुगम भी है, जब कि पञ्चसंग्रह विस्तृत एवं दुर्गम । निम्ति पञ्चमंग्रह-जैसे दुर्गम एवं विस्तृत ग्रन्यको टोकापर तो केवल सुमतिकात्तिका ही नाम है, यदि तिमी टीकार उनके नाम अतिरिक्त उनके गुरु नानभूपणका भी नाम अंकित मोमिद होता है कि मुमतिकात्तिने अपने जीवन के प्रारम्भमें कर्मप्रकृतिको टीका गुरुकै साहाय्यसे । विद्या और वोट हो जानेर पञ्चग्रहकी टीकाका उन्होंने स्वयं निर्माण किया । टीकागत-विशेषताएँ देशमा जानी देवारा प्रारम्भ करते हुए 'नावं हि कर्मकाण्डम्य वये भव्यहितंकरम्' इस या पानी निंदाली वृतिको 'माय' रहा है और प्रत्य-समाप्तिपर 'टीका ही कर्मकाण्ड- प्रस्तावना १७ -- स्य चक्रे सुमतिकोत्तियुक्' कहकर उसे 'टोका' नाम भी दिया है। यद्यपि सूक्ष्म दृष्टिसे भाष्य और टोकामें अन्तर है, वह यह कि टोका तो मूलमें दिये गये पदोंके अर्थका ही स्पष्टीकरण करती है, किन्तु भाष्य उक्त, अनुक्त एवं दुखत सभी प्रकारको वातोंको स्पष्ट करता है, साथ ही स्वयं शंकाएँ उठाकर उनका समाधान करना यह भाष्य को विशेषता होती है । इस दृष्टि से देखनेपर सुमतिकोत्ति के शब्दोंमें इसे भाष्य और टीका दोनों ही कहा जा सकता है। प्रस्तुत गन्यमें कर्मके विषयका निरूपण किया गया है और जहाँतक विषय-प्रतिपादनका सम्बन्ध है, वह आगम-परम्पराके अनुकूल ही है। फिर भी अनेक स्यलोंपर हमें कुछ विशेषताएं भी दृष्टिगोचर होतो हैं, जो कि इसके पूर्ववर्ती दिगम्बर साहित्यमें नहीं पायी जाती। हालां कि श्वेताम्बर साहित्यमें वे पायी जातो है । उदाहरणके रूपमें छह संहननोंकी आकृतियोंको लिया जा सकता है, जिन्हें कि प्रस्तुत संस्करणमें छपाईको कठिनाईके कारण टोका-स्थानपर न देकर परिशिष्ट में दिया गया है। वस्तुतः संहननोंको उक्त आकृतियां अर्थकी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं और उनपर विद्वानोंको विचार करना चाहिए । इसके अतिरिक्त वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श नामकर्मका स्वरूप बतलाते हुए 'वा' कहकर एक-एक और भी लक्षण दिया है, जो मुझे दिगम्बर-परम्मराके शास्त्रोंमें दृष्टिगोचर नहीं हुआ है। इसी प्रकार अन्तरायकर्मको पांचों प्रकृतियोंको परिभाषा भी दो-दो प्रकारसे दो है, जो कि अपनी एक खास विशेषता रखती है। । शेष टीका अपने पूर्ववर्ती गन्योंको आभारी है। कर्म-प्रकृतियोंके स्वरूपका बहुभाग सर्वार्थसिद्धि, तत्त्वार्थराजवात्तिक, तत्त्वार्थवृत्ति और गो० कर्मकाण्डको टोकासे ज्योंका-त्यों या कहीं-कहीं थोड़े-से शब्द परि- वर्तनके साथ लिया गया है । गा० ७६ को टोका करते हुए मूलमें प्रयुक्त "अणाइणिहणारिसे उत्तं" का अर्थ बड़ा विलक्षण किया गया है-"इतिसंहननं पड्विधं अनादिनिधनेन ऋपिणा भणितं आद्यन्तरहितेन ऋद्धिप्राप्तेन वृषभदेवेन कधितम् ।" अर्थात् इस प्रकार छह प्रकारका संहनन आदि-अन्तरहित, ऋद्धिप्राप्त वृपभदेवने कहा । वस्तुतः उक्त गाधाचरणको संस्कृत छाया यह है-'अनादिनिधनापे भणितम्' इसका सीधा-सादा अर्थ यह है कि ये छह संहनन अनादि-निधन आप अर्थात् ऋपिप्रणीत आगममें कहे गये हैं। सम्भवतः प्राकृतभापाको ठीक जानकारी न होनेसे उक्त अर्थ किया गया प्रतीत होता है। दूसरी संस्कृत टीका प्रस्तुत संस्करणमें किसी अज्ञात आचार्य-रचित एक और संस्कृत टीका प्रकाशित की गयी है। इसके आदि और अन्तमें रचनेवालेके नाम आदिका कोई भी उल्लेख नहीं मिलता । यद्यपि यह संक्षिप्त है और अनेक स्थलोंपर पं० हेमराजकृत भाषा टोकाके साथ समान है, तथापि कुछ स्थलोंपर अपनी विशेषताओंको भी लिये हुए है । अतः हमारे प्रधान सम्पादक महोदयोंने इसे भी प्रकाशित करनेको अनुमति प्रदान की । इसकी कुछ विशेषताएं इस प्रकार हैं-) १) गा० २४ की टीकामें दो प्राचीन गाधाएं देकर यह बतलाया गया है कि कर्मभूमियां मनुष्य- तिर्यचोंके आगामी भवकी आयुका बन्ध कब होता है। भागमके अनुसार वर्तमान भवको दो विभाग प्रमाण आयुके बीतनेपर और एक त्रिभागके शेप रहनेपर एक अन्तर्मुहर्तकाल तक आगामी भवको आयके वांधनेका अवसर आता है, यदि इस अवसरपर वह न बंध सके, तो शेप आयुके भी दो त्रिभागके बीतने और एक विभागके शेप रहने पर पुनः दूसरा अवसर आता है। इस प्रकार जीवन में आठ अवसर आते हैं। यदि इनमें से किसी भी अवसरमें आगामी भवको आयु न बंध सकी हो तो मरणके कुछ क्षण पूर्व अवश्य ही नवीन पायुका बन्ध हो जाता है । गाथाओंमें वर्णित इसी त्रिभागके नमको टोकाकारने अंकसंदृष्टि देकर स्पष्ट किया है कि यदि किसी मनुष्यको वर्तमान भव-सम्बन्धी आयु ६५६१ वर्षको मानी जाये, तो दो विभागके बीतने और २१८७ वर्पप्रमाण एक विभागके शेष रहनेपर, पहला अवसर लायुवन्धका प्राप्त होगा। दूसरा ~ ३ - कर्मप्रकृति १८ अवमार ७२९ वर्षके गेप रहनेपर, तीसरा २४३ वर्षके शेप रहनेपर, चौथा ८१ वर्पके शेप रहनेपर, पांच २७ वर्षके शेष रहार, छठा ९ वर्षके शेप रहनेपर, सातवा ३ वर्षके शेप रहनेपर, और आठवीं १ वर्षके गेप रहनेपर प्राप्त होगा। आयुबन्धके उक्त आठों अवसरोंको आगमकी भाषामें अपकर्पकाल कहते है । यदि उक्त जीवके आठवें अपकर्षकाल अर्थात् एक वर्षके शेष रहनेपर भी आयुबन्ध न हो सके, तो मरणके कुछ समय पूर्व तो वह नियमसे होगा । यहाँ एक विशेष बात ज्ञातव्य है कि कोई जीव एक अपकर्पकालमें ही नवीन भवकी आयुका बन्ध करते है, कोई दो अपकर्पकालोंमें, कोई तीन अपकर्पकालोंमें; इस प्रकारसे बढ़ते हुए कितने ही जीव आठों ही अपकर्ष कालोंमें नवोन भवको आयुका वन्ध करते हैं। किन्तु इतना निश्चित जानना चाहिए कि एक बार जिस गति-सम्बन्धी आयुका वन्ध हो जायेगा, आगामी दूसरे-तीसरे आदि अपकर्प- कालोंमें उसी ही आयुका बन्ध होगा, उससे भिन्न अन्य आयुका नहीं । बाठों अपकर्पोमें आयुका वन्ध करने- वाले जीव नबसे कम पाये जाते है, सातमें उससे अधिक । इसी प्रकार उत्तरोत्तर अधिक-अधिक जानना चाहिए। कुछ मन्दिन्य स्थलोंके निर्णयार्थ मैंने गाथाओंके टीका पाठ मिलानके लिए श्री कस्तूरचन्द्रजी काशली- वालको लिखा था, कि यदि और भी प्राचीन प्रतियां जयपुरके भण्डारों में हों, तो आप उन्हें भेजिए । व प्रति तो नहीं भिजवा सके पर सन्दिग्य स्थलोंका मिलान कर पाठभेद आदि भिजवाये। उसमें प्रस्तुत संस्करण- के अन्तर्गत मूल गायांक १४२ के नीचे पादटिप्पणमें आमेर प्रतिका पाठ दिया है, वह इन दोनों ही टोकाओंसे गर्वथा भिन्न है। जयपुर से इस प्रतिका जो परिचय प्राप्त हुआ है, उससे ज्ञात होता है कि यह टोका सुमति- कीतिको पहली टीकासे भी प्राचीन है, क्योंकि वह प्रति वि० सं० १५७७ के आपाढ़ सुदी ३ को लिखी हुई है। जब कि मुमतिकत्तिको टोका १६२० के आस-पासको लिखी है। प्रयत्न करनेपर भी हम उस प्रतिको नहीं प्राप्त कर सके। यदि वह मिल जाती तो निश्चयपूर्वक कहा जा सकता कि एक और प्राचीन तथा विस्तृत टीका कर्मप्रकृतिको है। ( २ )(गा० ३७ की टोकामें मतिज्ञानके अवग्रहादि चारों भेदोंका बहुत ही थोड़े शब्दोंमें सुन्दर स्वरूप दिया गया है। इतने स्वल्प गब्दोंमें अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणाका इतना सुन्दर स्वरूप अन्य दोनों टोकाओं में नहीं आया। (३) गा०६९ में पांचों शरीरोंके संयोगी १५ भेदोंको एक संदृष्टि-द्वारा बहुत ही सुन्दर ढंगसे दिपलाया गया है । यह मंदृष्टि भी शेष दोनों टीकामें नहीं पायी जाती।) (४) गा० ८४ में छहों मंहनन-घारियोंके स्वर्ग-गमनको योग्यता भी एक संदृष्टि-द्वारा प्रकट की गयी है। इस गंदृष्टि में एक विशेषता और भी है और वह यह कि संहननके साथ उसके धारक स्त्री या पुरुप दोनों- का नामोलग कर दिया गया है।) (५ ) गा० ८५.८६ की टोकामें उक्त संहनन-बारियोंके नरक गमनकी योग्यता भी एक संदृष्टि-द्वारा बननानी गयी है। ( ६ ) गा० ८७ को टीकामें मंहनन-बारियांक गुणस्यानोंका निरूपण एक संदृष्टि-द्वारा किया गया है। उक्त दोनों मंदृष्टियां भी मेष दोनों टीकाओंमें नहीं दी गयी हैं । (७) गा० १३२.१३३ की टीका में सिद्धान्त ग्रन्योंसे एक प्राकृत गद्यका उद्धरण देकर उत्कृष्ट, यम और ईवन नंगका स्वर समझाया गया है। टोमा बदन मुगम है । प्रत्येक स्वाध्याय-प्रेमीको इसका अवश्य स्वाध्याय करना चाहिए । पं० हेमराजजी कृत भाषा टीका . अनुन र मूलबन्य, न नदिनृपग-मुमतिकीर्तिको संस्कृत टीका और अनुवादके पश्चात् गीत मासा टीका भी दी जा रही है। पण्डितजी आजसे लगभग ३०० वर्षके पूर्व हुए हैं । करेगा और प्रान हुई, वीके. माथार पर आपने भाषा टीका लिखी है। इस मापा टोकाकी प्रस्तावना - कै-यह विशेषता यह है कि आपने मूलमें दिये हुए प्रायः प्रत्येक निपयको खुलासा करनेका प्रयत्न किया है । अनेक स्थलोपर स्वयं ही शंकाएं उठाकर भागमानुकूल उनका समाधान किया है । यद्यपि यह टीका ढुंढारी भापामें पुरानी शैलीके ढंगपर लिखी गयी है, तथापि यह सुबोध है और जिन लोगोंने ढुंढारी भापामें लिखी गयो वचनिकाओका स्वाध्याय नहीं भी किया है, उन्हें भी इसके समझनेमें कोई कठिनाई नहीं होगी। फिर भी दुंढारो भाषामें लिखे गये कुछ मुहावरोंकी सूचना करना आवश्यक है, ताकि पाठकोंको समझनेमें सुगमता होये। बहुरि- - यह शब्द पुनःके अर्थमें व्यवहार किया जाता है। अरु-यह औरका ही अपभ्रंश रूप है । जातें-यह यतः के अर्थ में प्रयुक्त होता है, जिसे हिन्दुस्तानीमें 'चूंकि' कहते हैं । तातें-यह ततः के अर्थमें प्रयुक्त होता है, जिसे हिन्दोमें 'इसलिए' लिखा जाता है । वर्तमानमें प्रयुक्त 'कि' के स्थानमें लिखा गया है। करि-यह तृतीया विभक्तिके अर्थमें प्रयोग किया जाता है यथा - ज्ञानकरि अर्थात् ज्ञानके द्वारा। - इसका प्रयोग जिस शब्दके अन्तमें किया जाये उससे पष्ठी विभक्तिके बहुवचनका अर्थ समझना चाहिए। जैन कर्मनिकरिका अर्थ कर्मोके द्वारा। हु-इसका प्रयोग भी पष्ठी विभक्तिके बहुवचनमें किया गया है। यथा - कर्महुको दशाका अर्थ कर्मोकी दशा है । कहीं-कहीं इसका प्रयोग 'हो' के अर्थमें भी हुआ है । जु-का प्रयोग 'जो' के अर्थमें हुआ है । सु-का प्रयोग 'सो' के अर्थमें हुआ है। वि-या विपैं-का प्रयोग सप्तमो विभक्तिके अर्थमें होता है । यथा - कुल विर्षे यानी कुलमें । ताई-की अर्थ 'तक' है । जैसे - छठे ताई - अर्थात् छठे गुणस्थान तक । कहा-कहा। काहे क्यों, किस कारण। संते-संस्कृतके 'सति' के अर्थमें प्रयुक्त हुआ है । जैसे ज्ञानके होते संते यानी ज्ञानके होते हुए । इसो प्रकारके कुछ और भी शब्दोंका प्रयोग इस भापा टोकामें हुआ है जिनका कि अर्थ पढ़ते हुए हो पाठकोंको समयमें आ जायेगा। यह तो हुई टोकाको भाषाके विषयमें सूचना । अर्थके विषयमें भी कुछ बातें सूचनाके योग्य है । यद्यपि भापा टीकाकारने प्रत्येक पारिभापिक शब्दको व्याख्या करने में पूरी सावधानी रखी है और जहाँतक सम्भव हुआ - आगमानुकूल ही अर्थ किया है, पर कुछका अर्थ फिर भी विचारणीय है। जैसे सप्तभंगोंके स्वरूपमें पांचवें, छठे, सातवें भंगका स्वरूप; गाथा ३७ की टोकामें 'नियमित' का अर्थ; इसोके भावार्थमें क्षिप्र-अक्षिप्र. का अर्थ; ध्रुव-अध्रुवका अर्थ विचारणीय है। बहु-ईहाके अर्थको करते हुए 'बहुतको सन्देहरूप जानना' भी विचारणीय है । इनके अतिरिक्त कुछ और भी स्थल विचारणीय हैं, जिन्हें विद्वज्जन तो सहज हो समझ जायेंगे और साधारण जन प्रारम्भमें दो हुई संस्कृत टीकासे निर्णय कर सकेंगे। भाषा टोकाको शैलोको देखते हुए इसे हिन्दीभाष्य कहना उपयुक्त होगा, क्योंकि मूलमें अनुक्त ऐसे कितने ही विपयोंकी चर्चा स्वयं शंका उठा करके को गयो है । कितने ही गूइ विषयोंका भावार्थ में स्पष्टी- करण किया गया है। इससे यह भापा टोका स्वाध्याय करनेवालोंके लिए बहुत ही उत्तम है। इसी वातको देख करके हमारे प्रधान सम्पादकोंने इसके प्रकाशनको भावना प्रकट कर सहर्ष स्वीकृति प्रदान को । पं० हेमराजजोने अपनी भाषा टोका जिस संस्कृत टीकाके आधारपर को है और जिसके वाक्य वोच- बीचमें देकर अपनी टीकाको समृद्ध किया है, उसके आदिमें न कोई मंगलाचरण पाया जाता है और न अन्तमें कर्मप्रकृति रचयिताकी प्रगति आदि ही । इससे उसके कर्ता आदिके विषयमें कुछ नहीं कहा जा सकता। केवल इतना ववन्य वह मरते है कि आपके सामने भ० मल्लिभूषण-सुमतिकोत्तिकी संस्कृत टोका नहीं थी। अन्यथा अपनी वनिकाने आप उसका अवश्य ही भरपूर उपयोग करते~या यों कहना चाहिए कि उसीको आधार बनाकर या अपनी नापा टीका लिखते । संस्कृत टीकाकारके समान आपने भी 'कर्मप्रकृति' को 'कर्मकाण्ड' नामसे उल्लेख किया है और टीका- समाप्तिपर जो इति वाक्य लिखा है, उसमें स्पष्ट शब्दोंके द्वारा अपनी टीकाको 'कर्मकाण्ड' को टीका घोपित किया है। पर यह गो० कर्मकाण्डसे भिन्न एक स्वतन्त्र ग्रन्य है, यह बात मैं पहले ही बतला आया हूँ विपय-परिचय प्रस्तुत ग्रन्यका नाम कर्मप्रकृति है और इसमें अपने नामके अनुरूप ही कर्मोकी प्रकृति यानी स्वभाव या स्वरुपका वर्णन किया गया है । यहां स्वभावतः यह प्रश्न उठता है कि कर्म क्या वस्तु है, और इसे स्वीकार करनेको क्या आवश्यकता है, कर्मको माननेकी आवश्यकता हमारे महपियोंको इसलिए हुई कि तर्ककी कसौटीपर कसने या जांचे जानेपर गगारका बाटा ईश्वर आदि कोई सिद्ध नहीं होता। उसके विपयमे इतने प्रश्न उठ खड़े होते हैं कि न कोई जगन्ना सनहारा सिद्ध होता है और न असंख्य जातिका जगत्-वैचित्र्य किसी एकके द्वारा रचा जाना सम्भव है। वस्तुतः प्रत्येक प्राणी अपने व्यक्तिगत जगत्का स्वयं स्रष्टा है ! वह स्वयं कैसे अपने शरीरादिका साया है, यह बात र मसिद्धान्तके विवेचन और मननसे पाठकोंको स्वयं ही भली-भांति विदित हो जायेगी । मनः बरके जगत्-कनुं त्वया खण्डन या निराकरण जो न्यायक ग्रन्थोंमें बहुत अच्छी तरह किया गया है, अत: यहां पर उसकी चर्चा करना आवश्यक नहीं है। कर्म क्या वन्तु है ? इसका उत्तर यह है कि (राग-द्वेपसे संयुक्त इस संसारी जीवके भीतर प्रतिसमय जो परिस्पन्दरूप एकाकी क्रिया होती रहती है उसके निमित्तसे आत्माके भीतर एक प्रकारका बीजभूत अचेतन द्रव्य आता है और यह राग-रेप का परिणामोका निमित्त पाकर आत्मा के साथ बंध जाता है। समय पाकर को बोजन द्रव्य मृग-दु ग्वरूप फल देने लगता है, इसे ही कर्म कहते हैं ।) जीवके साथ इस प्रकारके वर्मका गायन्ध अनादिकालीन है ।) ऐना नहीं है कि जीव अनादिकालसे सर्वथा शुद्ध चैतन्य रूपमैं था, पछि किती समय उनका कर्मके साथ नम्बन्ध हो गया हो। अन्यकारने इसी वातको अपने ग्रन्थको दूसरी ही गामाने या दृष्टान्त देकर स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार खानके भीतर स्वर्ण और पापाणका अनादि- बालीन मन्याचा भा रहा है, उसी प्रकार जीव और कर्मका भी अनादिकालीन सम्बन्ध स्वयं सिद्ध जानना नादि।

प्रस्तावना २१ इन्द्रियों द्वारा दिखाई देता है, तथा वह पकड़ा और छोड़ा भी जाता है । "पूरणाद् गलनात् पुद्गलः" इस निरुक्तिके अनुसार मिलना और विछुड़ना इसका स्वभाव ही है । इस पुद्गल द्रव्यकी ग्राह्य-अग्राह्यरूपसे (२३ प्रकारकी वर्गणाएं जैनसिद्धान्तमें बतलायी गयी हैं, उनमें से जो कर्म और नोकर्मवर्गणाएं हैं उन्हें यह जीव अपनी चंचलता रूप क्रियाके द्वारा प्रति समय अपने भीतर खींचता रहता है। जिस प्रकारसे कि लोहेका गरम गोला पानोके भीतर डाले जानेपर चारों ओरसे अपने भीतर पानीको खींचता है। इनमें जो (कर्मवर्गणाएँ हैं, वे ज्ञानावरणादि आठ कर्मोके रूपसे परिणत होती हैं और जो नोकर्मवर्गणाएँ हैं, वे शरीर रूपसे परिणत होती हैं ।) इन कर्मवर्गणाओंको ही आत्मासे संबद्ध हो जानेपर द्रव्यकर्म कहा जाता है । प्रस्तुत ग्रन्थमें इसी द्रव्यकर्मका सांगोपांग विवेचन किया गया है । द्रव्यकर्मके मूलमें माठ भेद हैं-१ ज्ञानावरण २ दर्शनावरण ३ वेदनीय ४ मोहनीय ५ आयु ६ नाम ७ गोत्र और ८ अन्तराय । आत्माके जाननेकी शक्तिको ज्ञान कहते हैं और इस ज्ञानके आवरण करनेवाले कर्मको ज्ञानावरण कहते हैं। आत्माके देखनेकी शक्तिको दर्शन कहते हैं और उस दर्शन गुणके आवरण करनेवाले कर्मको दर्शनावरण कहते हैं । सुख और दुःखके अनुभव करानेवाले कर्मको वेदनीय कहते हैं । सांसारिक पदार्थोमें मोहित करनेवाले कर्मको मोहनीय कहते हैं। मनुष्य तियंचादिके किसी एक शरीर में नियंत काल तक रोक रखनेवाले कर्मका नाम आयुकर्म है। मनुष्य-तिर्यच आदिके शरीर, अंग-उपांग आदि बनानेवाले कर्मको नामकर्म कहते है । ऊंच-नीच कुलोंमें उत्पन्न करनेवाले कर्मका नाम गोत्रकर्म है और जिसके उदयसे जीव मनोवांछित वस्तुको न पा सके उसका नाम अन्तराय कर्म है। प्रस्तुत ग्रन्थमें गाथा ८ से लेकर ३५वों गाथा तक उक्त आठों कर्मों के स्वरूप आदिका दृष्टान्तपूर्वक बहुत सुन्दर ढंगसे विवेचन किया गया है, जिसे विशेष जिज्ञासुओंको वहीसे देखना चाहिए । उक्त आठों कर्मोके उत्तरभेद जिन्हें कि उत्तर प्रकृति कहते हैं, इस प्रकार बतलाये गये हैं ज्ञानावरणके ५, दर्शनावरणके ९, वेदनीयके २, मोहनीयके २८, आयुके ४, नामके ९३, गोत्रके २ और मन्त रायके ५ । ये सब मिलकर आठों कर्मोके उत्तरभेद एक सौ अड़तालीस ( १४८ ) हो जाते हैं । मूल आठ कर्मोको दो भागोंमें विभक्त किया गया है -१ घातिकर्म और २ अघातिकर्म । जो कर्म आत्माके ज्ञान-दर्शनादि गुणोंका घात करते हैं उन्हें घातिकर्म कहते हैं । ऐसे घातिकर्म चार हैं - १ ज्ञानावरण २ दर्शनावरण ३ मोहनीय और ४ अन्तराय । जो कर्म आत्म-गुणोंके घातने में असमर्थ हैं, उन्हें अघातिकर्म कहते हैं। उनके भी चार भेद हैं -- १ वेदनीय, २ आयु, ३ नाम और ४ गोत्र । घातिकमके भी दो भेद हैं - १ देशघाति और २ सर्वघाति । जो कर्म आत्म-गुणोंको पूरे रूपसे घातते हैं उन्हें सर्वघाति कहते हैं और जो आत्म-गुणोंके एक देशको घातते हैं, उन्हें देशघाति कहते हैं। ऊपर जो आठों कर्मोके. उत्तरभेद बताये गये हैं, उनमें (घातिया कर्मों के ४७ उत्तरभेद हैं । इनमें से २१ प्रकृतियां तो सर्वघाती हैं और २६ प्रकृतियाँ देशघाती हैं । (घातिया कर्मों को पाप रूप ही माना गया है, किन्तु अघातिया कर्मोमें पुण्य और पाप दोनों रूप)पाये जाते हैं । इसका विशद विवेचन भी ग्रन्थमें यथास्थान किया गया है । बन्धके भेद कर्म-बन्धके चार भेद होते हैं--१ प्रकृतिबन्ध २ स्थितिबन्ध ३ अनुभागबन्ध और ४ प्रदेशबन्ध । प्रकृतिवन्ध-प्रतिसमय आनेवाले कर्मपरमाणुओंमें आत्माके रागादि परिणामोंके निमित्तसे जो ज्ञान- दर्शन आदि गुणोंको आवरण करनेका स्वभाव पड़ता है, उसे प्रकृतिबन्ध कहते हैं। प्रकृतिबन्धके ज्ञानावरण आदिक आठ मूल भद हैं, इन्हीं के उत्तरभेद एक सौ अड़तालीस होते हैं और तर-तम भावोंकी अपेक्षा असंख्यात भेद होते हैं । प्रस्तुत ग्रन्थमें प्रकृतिबन्ध प्रकरणके भीतर कर्मोके १४८ भेदोंका स्वरूप गा० १२१ तक क्त- लाया गया है, जिसे विस्तार भयसे यहां नहीं दे रहे है । पाठक ग्रन्थसे ही ज्ञात करें। स्थितिबन्ध-आनेवाले कर्म-परमाणु जितने कालतक आत्माके साथ बंधे रहते हैं, उस कालको मर्यादोको स्थितिबन्ध कहते हैं । यह स्थितिबन्ध दो प्रकारका है-उत्कृष्ट स्थितिबन्ध और जघन्य स्थितिबन्ध । - .

। कर्मप्रकृति जब आत्मा क्रोधादि कृपायोंके तीव्र उदयका निमित्त पाकर संक्लेश-परिणतिकी चरम सीमाको प्राप्त होता उनु समय उसके बंधनेवाले कोका (उत्कृष्ट स्थितिबन्ध होता है और जब कपायोंका उदय अत्यन्त मन्द होनेसे आमा विगुरिले परिणत होता है, उस समय उसके बंधनेवाले कोका जघन्य बन्ध होता है। उदाहरणके तौर- पर मोहनीयकर्मके उत्कृष्ट स्थितिबन्धका प्रमाण ७० कोडाकोड़ी सागरोपम काल) है ।(यह उत्कृष्ट स्थितिबन्ध उम मियादृष्टि तीवकपायी जीवके होगा, जो संक्लेश परिणामोंकी चरमसीमा पर पहुँचा) हुआ है । मोहनीय- कर्मक जघन्य स्थितिबन्धका प्रमाण अन्तर्मुहूर्त काल है इतनी अल्प स्थितिवाला मोहकर्मका बन्ध उस जीवके होगा जो मिथ्यात्व के महागलमे निकल कर आत्मपरिणामोंको विशुद्धिसे सम्यग्दृष्टि हो ऊपरके गुणस्थानोंमें बड़ता हुआ नंयमी बनकर मोहकर्मकी २८ प्रकृतियों में से २७ के नवीन बन्धका निरोध कर चुका है, पुरानी बंधी प्रकृतियोकि सत्वका विनाश कर चुका है, ऐसे कर्मभयके अभिमुख महासंयमोके न गुणस्थानके अन्तिम समयमे होगा। इसी प्रकारसे गेप कर्मकि उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिवन्धत विषयमें जानना चाहिए। स्थिति- बन्धक उक्त नियमको ३ प्रकृतियां अपवादरूप भी हैं-देवायु, मनुष्यायु और तिर्यगायुको उत्कृष्ट स्थितिका वन्ध उत्कृष्ट विगुद्धिको अवस्था में होता है और जवन्य स्थितिका बन्ध उत्कृष्ट संक्लेशको अवस्था में होता म प्रकार सभी कर्म-प्रकृतियोंका उत्कृष्ट और जयन्य स्थितिबन्धका निरूपण प्रस्तुत ग्रन्थकी गाथा १२२ से देकर १३९यों तक किया गया है। अनुभागबन्ध-बंधनेवाले कर्मपरमाणुओंमें आत्माके संवलेश या विशुद्ध परिणामोंका निमित्त पाकर जो मुग-दु.प या भले-बुरे फल देने की शक्ति पड़ती है, उसे अनुभागवन्ध कहते हैं (घातिया कर्मोके अनुभागको उपमा दना (वेलि), दारु (पाट), अस्थि (हड्डी) और शैल (पापाण) के रूपमें)दी गयी है । जिस प्रकार लतासे काटमे कटोरता अधिक होती है उसमे हड्डीमें और उससे अधिक पापाणमें कठोरता अधिक पाई जाती है, उनी प्रकार गंग परिणामोके तर-तम भावसे ज्ञानावरणादि चार घातिया कर्मोकी ४७ प्रकृतियोंकी अनुभाग पानी फलदानगक्तिनना, दारु आदिके रूपसे चार प्रकारकी होती है। इसका अभिप्राय यह है कि उन प्रकृति- लोकी जनी अनुभाग गक्ति होगी, उसीके अनुसार वे अपना फल भी होनाधिक रूपमें देंगी। यतः (घातिया- पाती गभी प्रतियोको पापम्प हो माना गया है, अतः उनका अनुभाग भी बुरे रूपमें ही अपना फल देता । वंदनीय आदि चार अघातिया कर्माको १०१ प्रकृतियोंका विभाजन पुण्य और पाप दोनों में किया गया है । मांगावंदनीय, उच्चगोत्र आदि पुण्य प्रकृतियां है और असातावेदनीय, नीचगोत्र आदि पाप प्रकृतियाँ हैं । पाप प्रनिया अनुभागको उपमा नीम, कांजी, विप और हालाहलसे दो गयी है । जैसे इन चारोंमें कड़वापन उत्त- गत्तर अधिक मायाम पाया जाता है, उसी प्रकारसे पापप्रकृतियों में अपने फल देनेकी शक्ति भी चार प्रकारको पाची माली है । पुष्प प्रतियांक अनुभागको उपमा गुड़, खांड़, शक्कर और अमृतसै दी गयी है । जिस प्रकार न नागमे मिटतोकी मात्रा उत्तरोत्तर अधिक पायी जाती है उसी प्रकारसे पुण्य प्रकृतियोंके अनुभागमें भी चार प्रसार फल देनको नावित पायी जाती है। इस प्रकार कुछ अन्य विशेपताओंके साय संक्षिप्त-सा वर्णन प्रस्तावना. २३ गया प्रकरणसंगत है । किन्तु यह गाथा गोम्मटसार कर्मकाण्डमें प्रदेशवन्ध प्रकरणके भीतर ही दी गयी है । प्रस्तुत ग्रन्थमें प्रदेश बन्ध-प्रकरणके भीतर पृथक्-पृथक् आठों कर्मोंके बन्ध-कारणोंका निरूपण किया । यहाँ यह बात ज्ञातव्य है कि उक्त वर्णन गो० कर्मकाण्डमें प्रदेशबन्ध-प्रकरणके भीतर न करके अन्धके अन्तमें प्रत्यय-प्ररूपणाके अन्तर्गत किया गया है। इस प्रकरणमें जो गाथाएँ वहाँ पायी जाती हैं, वे ही ज्योंकी त्यों यहाँ कर्मप्रकृति के प्रदेश वन्ध-प्रकरणमें दी गयी हैं । और प्रदेशबन्ध सम्बन्धी वर्णन करनेवालो जो गाथाएं गो० कर्मकाण्डके प्रदेशबन्ध अधिकारके भीतर पायी जाती हैं, उनमें से एक भी गाथा यहां नहीं पायी जाती है । दोनों ग्रन्थोंके विषय-निरूपणकी यह विभिन्नता यद्यपि दोनोंके एक कर्तृत्वमें सन्देह उत्पन्न करती है, तथापि यतः बन्धका सम्वन्ध आस्रवसे है और तत्त्वार्थसूत्र आदि प्राचीन सूत्र एवं आगम ग्रन्थोंमें तत्प्रदोप, निह्नव आदिको मास्रव-कारणोंके रूपसे प्रतिपादन किया गया है, अतः उक्त परम्पराको सूचित करने या अपनानेको दृष्टिसे ग्रन्यकारने ज्ञानावरणादि कर्मों के प्रधान बन्ध-कारणोंका यहाँ प्रतिपादन करना उचित समझा हो। जो कुछ भी हो, पर यहाँ एक बात अवश्य उल्लेखनीय है कि श्वेताम्बरीय प्राचीन कर्म ग्रन्थोंको नवीन कर्मग्रन्य रूपसे रचनेवाले श्वेताम्बराचार्य देवेन्द्रसूरिने अपने कर्मविपाक नामक प्रथम कर्मग्रन्थके अन्तमें कुछ शब्द-परिवर्तनके साथ उक्त गाथाओंको स्थान दिया है, जब कि गर्ग ऋषि प्रणीत कर्मविपाक नामक प्राचीन प्रथम कर्मग्रन्थमें उक्त वर्णन इस स्थलपर नहीं है । यहां यह ज्ञातव्य है कि देवेन्द्रसूरिका समय विक्रमको तेरहवीं शताब्दी है जब कि आचार्य नेमिचन्द्र विक्रमको ग्यारहवीं शताब्दीमें हुए हैं। (दि० श्वे० कर्म-साहित्यमें समता और विषमता ) - मोटे तौरपर प्राचीन दिगम्बर और श्वेताम्बर कर्म-साहित्यमें कोई विषमता या विभिन्नता नहीं है । किन्तु जब उनके स्थानपर नवीन पंचसंग्रह और नवीन कर्मग्रन्थोंकी रचना की गयी, तबसे कर्मप्रकृतियोंके स्वरूपमें तथा उनके बन्ध, उदय, सत्त्व आदि सूक्ष्म वातोंके वर्णन में कहीं कुछ विभिन्नता दृष्टि-गोचर होने लगी, इस वातका कुछ जिक्र मैंने दि० पंचसंग्रहकी प्रस्तावनामें किया है। प्रकृत ग्रन्थमें यतः केवल कर्मकी प्रकृतियोंके स्वरूपका निरूपण ही प्रधानतासे किया गया है, अतः यहाँपर जिन प्रकृतियोंके स्वरूप आदिमें कुछ अन्तर है, वह दिखाया जाता है : प्रकृति-नाम दि० मान्यता श्वे० मान्यता १. निद्रा जिसके उदयसे चलता व्यक्ति खड़ा रह जिसके उदयसे हलकी नींद आये, सोता जाये, खड़ा हुआ बैठ जाये और बैठा हुआ जीव जरा-सी आवाजसे जग जाये । हुआ गिर जाये । ( कर्मप्र० गा० ५०) (प्रा० कर्मवि० गा० २२, न० कर्मवि० ० गा० ११) जिसके उदयसे जीव कुछ जागता और जिसके उदयसे खड़े-खड़े या वैठे-बैठे नोंद कुछ सोता-सा रहे। ( कर्मप्र० गा० ५१ ) आ जाये । (प्रा० कर्मवि० गा० २३, ० गा० ११) ३. प्रचला-प्रचला. जिसके उदयसे मुखसे लार वहे और सोते- जिसके उदयसे मनुष्यको चलते-फिरते में जीवके हाथ-पांव आदि चलें। भी नोंद आ जाये। ( कर्मप्र० ५०) ( कर्मवि० गा० ११) ४. सम्यक्त्वप्रकृति जिसके उदयसे सम्यग्दर्शनमें चल-मलि. जिसके उदयसे जोद सर्वन-प्रणीत तत्त्व नादि दोप लगें। श्रद्धान करे । (प्रा० कर्मवि० गा० ३७ १५) २. प्रचला न० कर्मवि० . न० - न० - - कर्मप्रकृति प्रकृति-नाम दि० मान्यता श्वे. मान्यता ५. सम्यग्मिध्यात्य जिसके उदयसे जीवके तत्त्व और जिसके उदयसे जीवके जिन-धर्ममें न अनत्वश्रद्धानरूप दोनों प्रकारके भाव हों। राग हो और न द्वेप हो । प्रा० कर्म० गा० ३८, न० १६) ६, सुगुप्सा - जिसके उदयसे जीव अपने दोप छिपाये जिसके उदयसे जीवके गन्दो वस्तुओंपर और परके दीप प्रकट करे। घृणा या ग्लानि हो। ( कर्मप्र० टो० गा० ६२) (प्रा० कर्मवि० गा० ६०, टो० २२) २. गनिनामकर्म जिमके उदयसे जीव भवान्तरको जाता है। जिसके उदयसे जीवको तियंच मनुष्य, ( कर्मप्र० ६७) आदि पर्यायकी प्राप्ति हो । ( कर्मवि० गा० २४ टोका) ८. शरीरक संयोगी पांचों गरीरोंके संयोगी भेद १५ हैं । पांचों शरीर सम्बन्धी बन्धननामकर्मके भंद ( कर्मप्र० गा० ६९ ) संयोगो भेद १५ होते हैं । (प्रा० कर्मवि० गा० ९३-१०१ न० ३७) १. परघान - जिसके उदयसे दूसरोंके घात करने वाले जिसके उदयसे जीव दूसरे बलवानोंके गरीरके अवयव उत्पन्न हों, दाढ़ीमें विष द्वारा भी अजेय हो वह परवातकर्म आदि हो। ( कर्मप्र० गा० ९५ टोका) है। ( न० कर्मवि० गा० ४४) नोट - प्राचीनकर्म विपाकमै परघातका स्वरूप दि० स्वरूपके समान है। (प्रा० कर्मवि० गा० १२०) १०. आनुपू नामकर्म- जिसके उदयसे विग्रहगतिमें जीवका आकार जिसके उदयसे समणिसे गमन करता पूर्वगरीरके ममान बना रहे । हुआ जीव विधणि गमन करके उत्पत्ति- ( कमंत्र० गा० ९३ ) स्थानको पहुँचे। (कर्मवि० गा० २५ टी०) 11. सिनामकर्म - जिक उदयसे उग्र तपश्चरण करनेपर भी जिस कर्मके उदयसे दाँत, हड्डी, ग्रीवा परिणाम स्थिर रहें । ( राजवा० अ० ८) आदि गरीर के अवयव स्थिर रहें। जिनके उदय से शरीर धातु अधातु अपने ( प्रा० कर्मवि० गा० १४०, अपने स्थान पर स्थिर रहे। न० ५०) ( कर्मप्र० गा० ९९ टी०) 13. अभिरनाममं - जिम कर्मक उदयसे जरामे उपवासादि जिस कर्मके उदयसे जीभ, कान आदि करने पर परिणाम चंचल हो जायें । अवयव चंचल रहें। ( राजवा० अ०.८ मू०) (प्रा० कर्मवि० गा० १४१, जिम उदय दारीरक धातु-उपधातु, टी० ५१) मिथर न रहें। (कर्मप्र० गा० १०० टी०) दयका जिम उदय गरीर प्रना हो । जिसके उदयमे जीयकी चेष्टा बचनादि ( कर्मर गा० १९ टीका) मुर्वमान्य हो। (प्रा० कर्मवि० गा० १४६ न. ५१ टी०) न० प्रस्तावना २५ . - । प्रकृति-नाम दि० मान्यता श्वे. मान्यता १४. सनादेयकर्म जिसके उदयसे शरीरमें प्रभा न हो। जिसके उदयसे जीवको चेष्टा, वचनादि ( कर्मप्र० गा० १०० टोका) सर्वमान्य न हों। (प्रा० कर्मवि० गा० १४६ ,,५१ टो०) १५. शुमनाम जिस कर्मके "उदयसे शरीरके अवयव जिस कर्मके उदयसे नाभिसे ऊपरके अव- सुन्दर हो। (कर्मप्र० गा० ९९ टी०) यव सुन्दर हों (प्रा० कर्मवि० गा० १४२ ५०) १६. शुभनाम जिस कर्मके उदयसे शरीरके अवयव कुरूप जिस कर्मके उदयसे नाभिसे नीचेके ( कर्मर० गा० १०० टो०) अवयव असुन्दर हों। (प्रा० कर्मवि० गा० १४३ ५०) 10 निर्माणनामकर्म इसके दो भेद किये गये हैं - स्थाननिर्माण श्वे. शास्त्रोंमें इसके दो भेद नहीं किये और प्रमाणनिर्माण । स्थाननिर्माणके उदय- गये हैं और इसका कार्य अंगोपांगोंको से अंगोपांग अपने स्थानपर होते हैं और अपने अपने स्थानमें व्यवस्थित करना प्रमाणनामक.मके उदयसे जिस अंगका इतना ही माना गया है। जितना प्रमाण होना चाहिए उतना होता ( कर्मवि० गा० २५ टीका) है। ( कर्मप्र० गा० ९९ टोका) जिसके उदयसे संसारमें यश फैले । जिसके उदयसे दान-तपादि जनित यश ( कर्म० गा० ९९ टी०) फैले। एक दिशामें फैलनेवाली ख्यातिको यश और सर्वदिशामें फैलनेवालो ख्याति- को कोत्ति कहते हैं। ( कर्मवि० गा० ५१ टीका) जिस कर्मके उदयसे लोक-पूजित, कुलमें जिस कर्मके उदयसे वुद्धि-विहीन, निर्धन जन्म हो। ( कर्मप्र० गा० १०१ टी.) भी व्यक्ति लोकमें पूजा जावे। (प्रा० कर्मवि० गा० १५४) 20 नोचगोत्र जिस कर्मके उदयसे जीव लोक-निंद्य कुल- जिस कर्मके उदयसे वुद्धिमान्, धनवान् में उत्पन्न हो। और रूपवान् भी व्यक्ति लोकमें निन्दा (कर्मप्र० गा० १०१ टी०) पावे। (प्रा० कर्मवि० १५५) वीर्यान्तरायकर्म- जिस कर्मके उदयसे जीवके वल-वीर्यको जिस कर्मके उदयसे वलवान्, नीरोग प्राप्ति न हो, किसी कार्यके करनेका उत्साह और सामर्थ्यवान् होते हुए भी वीर्यसे न हो। ( कर्मप्र० गा० १०२ टीका) विहीन हो। (प्रा० कर्मवि० गा० १६६) उपर्युक्त विभिन्नताके अतिरिक्त एक और सबसे बड़ी दोनों सम्प्रदायोंमें कर्मप्रकृतियों के पुण्य-पापमें विभाजनको है। वह यह कि दिगम्बर सम्प्रदायके सभी कर्मविषयक ग्रन्थों में घातिया कर्मों की सभी प्रकृतियोंको पाप प्रकृतिमें परिगणित किया गया है, तब श्वेताम्बर सम्प्रदायमें : मोहनीय कर्मके अन्तर्गत दर्शनमोहकी सम्यक्त्व प्रकृतिको, तथा चारित्र मोहके अन्तर्गत जो नव नोकपाय प्रकृतियाँ हैं उनमें से हास्य, रति और पुरुषवेद इन तीन प्रकृतियोंको पृण्यप्रकृतियों में गिना गया है । ( देखो तत्त्वार्थ भाष्य अ० ८, नू० २६ ) 6. यशस्कोति- - - १९. उहगोत्र एवं कुरूप २

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विषय-सूची गाथा-संख्या .. १-१२१ ३ ६ ८ १२ १५ प्रकृति समुत्कीर्तन मंगलाचरण और प्रकृतिसमुत्कीर्तनके कथनकी प्रतिज्ञा प्रकृतिशब्दका अर्थ और जीव-कर्मके सम्बन्धकी अनादिता शरीर नामकर्मके उदयसे जीव कर्म सौर नोकर्मवर्गणाभोंको ग्रहण करता है एक समयमें बँधनेवाले समयमबद्धका परिमाण उदय और सत्व-गत समयप्रबद्धका परिमाण कर्म के दो भेद और उनका स्वरूप द्रव्यकर्मक मूल और उत्तर भेदोंका वर्णन, तथा घाति-अघाति संज्ञाका निर्देश द्रव्यकर्मको पाठो मूल प्रकृतियोंका नाम निर्देश -मूल कर्मीका घाति और श्रघाति रूपसे विभाजन जीवके क्षायिक और क्षायोपशमिक गुणोंका वर्णन शायुकर्मका स्वरूप नामकर्मका स्वरूप गोत्रकर्मका स्वरूप वेदनीयकर्मका स्वरूप जीवके ज्ञान-दर्शन और सम्यक्त्वगुणकी सिद्धि सतभंगीके नाम और उसके द्वारा द्रव्य-सिद्धिकी सूचना पाठों कर्मोके पाठ-क्रमकी सयुक्तिक सिद्धि अन्तराय कर्मको सबसे अन्तमें रखनेका सयुक्तिक निरूपण नाम और गोत्रकर्मके पौर्वापर्यका सयुक्तिक निरूपण 'घातिकमों के मध्य मोहकर्मके पूर्व वेदनीयको रखनेका सयुक्तिक निरूपण आठों कोंका सयुक्तिक सिद्ध पाठ-क्रम वन्धका स्वरूप पूर्व कर्म-बन्धके उदय होनेपर राग-द्वेषकी उत्पत्तिका निरूपण राग-द्वेषके कारण पुनः नवीन कर्म बन्धका वर्णन एक समयमें बँधा कर्म-पिण्ड सात कर्मरूपसे परिणत होता है बन्धके प्रकृति-स्थिति आदि चार भेदोंका निरूपण आठ कमाके दृष्टान्त ज्ञानावरणकर्मका दृष्टान्तपूर्वक स्वरूप और भेद दर्शनावरणकर्मका वेदनीयकर्मका मोहनीयकर्मका आयुकर्मका ६६ २१ २२ २३ २२ .

कर्मप्रकृति गाथा-संस्था ३४ ...- -- " ३७ ४१ ४२ ४४ ४५ नामम्मका दृष्टान्त पूर्वक स्वरूप और भेद गांवकर्मका अन्नगयकर्मका आठों को उत्तर भदोंकी संख्याका निरूपण आमिनियोधिक (मति) ज्ञानका स्वरूप ध्रुवज्ञानका स्वरूप अवधिज्ञानका मनःपयं यज्ञानका कालजानका ज्ञानावरणक पाँच भेदीका नाम- नाम-निर्देश कांनका स्वरूप चक्षुदर्शन और यचक्षुदर्शनका स्वरूप शवधिदानका स्वरूप यलदर्शनका स्वरूप दगंनावरण कर्मक ना भेदोंका निरूपण यानगृद्धि और निद्रानिद्राका स्वरूप प्रचनाप्रचला और निद्वाका स्वरूप प्रचनाकान्यरूप बंदनीयकमक दो भेदीका नाम-निदंश मोटकमक मृल दो भेदोंका नाम-निर्देश दर्शन माह तीन भेदोंका निदंग दनमोहक नीन भेदोंकी उत्पत्तिका सदृष्टान्त निरूपण चारित्रमोहकमक मृल दो भेद और उनके उत्तर भेदोंका निर्देश कायमोहनीयक सोलह मंदीका नाम निर्देश माकपायकी चार जातियाँ और उनका फल मानकायकी मायापायकी ४६ ४७-४८ ४९ ५३ ५४ ५८ " ५९ ६० ६१ पायाटकी निरनि और कार्यका निरुपण नव नारायांक नाम मोदर: म्यर ६२ विषय-सूची २६ गाथा-संख्या .७० ७२ ७३ ७४ ७५-७६ ८० ८२ ८३-८४ बन्धननामकर्मके भेदोंका निरूपण संघातनामकर्मके संस्थाननामकर्मके भेदोंका निरूपण भांगोपांगनामकर्मके आठ अंगोंके नाम विहायोगतिनामकर्मके भेद संहनननामकर्मके भेद वज्रवृषमनाराचसंहननका स्वरूप वननाराचसंहननका नाराचसंहननका अर्धनाराचसंहननका कोलकसंहननका सृपाटिकासंहननका किस संहननका धारक किस स्वर्ग तक उत्पन्न हो सकता है, यह वर्णन किस संहननका धारक किस नरक तक सातों नरकोंके नाम किस संहननका धारक किस गुणस्थान तक चढ़ सकता विकलेन्द्रिय और मोगभूमियाँ जीवोंके संहननका वर्णन चौथे, पाँचवें और छठे कालके जीवोंके संहननका निरूपण विदेहवर्ती, विद्याधर और म्लेच्छ मनुष्य तथा तियंचोंके संहननका वर्णन कर्मभूमियाँ स्त्रियोंके संहननका वर्णन वर्ण और गन्धनामकर्मके भेदोंका वर्णन रस और स्पर्श नामकर्मके आनुपूर्वी नामकर्मके पिण्डप्रकृतियोंका उपसंहार और अपिण्डप्रकृतियोंके निरूपणकी प्रतिज्ञा श्रगुरुपटकप्रकृतियोंका नाम निर्देश आतप और उद्योतनामकर्मका स्वरूप वा अन्तर शेष अपिण्डप्रकृतियोंके नाम वस-द्वादशक प्रकृतियोंके नाम स्थावर-दशक गोत्रकर्मके भेदोंका निर्देश अन्तरायकर्मके बन्ध और उदयकी अपेक्षा नामकर्मकी प्रकृतियोंका परस्परमें अन्तर्भाव अबन्ध प्रकृतियों का नाम-निर्देश पाठों कर्माकी वन्ध-योग्य प्रकृतियोंको संख्या आठों कर्मोकी उदय-योग्य प्रकृतियोंकी संख्या भेद और अभेदको अपेक्षा बन्ध और उदय-योग्य प्रकृतियोंकी संख्या आठों कमोंकी सत्त्व-योग्य प्रकृतियोंकी संख्याका निर्देश ८९ ९२ ९३ ९५ ९७-९८ ९९ १०२ " १०४ .०५ १०८ कर्मप्रकृति गाथा-संख्या । " '१११-११२ ११३-११४ १५५ सवातिया प्रकृतियोंका नाम-निर्देश देशवातिया पुण्य प्रकृतियोंका पाप प्रकृतियों अनन्तानुवन्धी श्रादि चारों जातियोंकी कपायोंके कार्य संज्वलन आदि चारों जातियोंकी कपायोंका वासनाकाल पुद्गल विपाकी प्रकृतियोंका वर्णन भवविपाकी, क्षेत्रविपाकी और जीवविपाकी प्रकृतियोंका वर्णन जीवविपाकी प्रकृतियों का नाम निर्देश नामकर्मकी सत्ताईस जीव विपाकी प्रकृतियोंका नाम-निर्देश ११७ ..११८ . ११९ १२०.१२१ मूलकाको १२२-१३६ १२२ १२३-१२७ १२८ १२९ स्थितिवन्ध- उत्कृष्ट स्थितिका निरूपण उत्तर प्रकृतियोंकी कमांकी उत्कृष्ट स्थितिक बाँधनका अधिकारी जीव कमांकी उत्कृष्ट स्थिति-यन्धका कारण निरूपण विभिन्न प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिक बन्ध करनेवाले जीवोंका निरूपण मृलकमीकी जयन्य स्थितिका निरूपण उत्तर प्रकृतियोंकी गंप प्रकृनियोंकी जयन्य स्थिति बाँधनेवाले जीवका निरूपण एकन्द्रिय और विकलचनुष्कक मिथ्यात्वकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिक बन्धका निरूपण १३०-१३३ " १३५-१३७ १३८ - १४०-१४३ १४० '१४१ १४२ १४३ यानुभागवन्ध- शुभ और अशुम प्रकृतियों के उत्कृष्ट योर जघन्य अनुमाग-बन्धके कारणका निरूपण घानिया कमांक अनुभागमी चार जातियोंका वर्णन तथा उनमें देशघाती और सर्वघाती अनुमागका विमाजन दर्शनमोहकी तीनों प्रकृतियांक देशघाति-सबंधाति अनुभागका विभाजन प्रयानिकीकी पुण्य और पाप प्रकृतियाँक अनुमागका वर्णन प्रदेशवन्ध- मानायरा और दर्शनावरण कर्मक बन्धक विशेष कारणांका निरूपण चंदनीय कमर दानी भेदोंक अमानावंदनीय दमनमीटर पातिमाह नाम युके बंगा १४४-१६१ १४४ १४५ " " १४६ १४८ १४९ १५०

विषय-सूची
३१
गाथा-संख्या
१५२
१५३
१५४.१५७
१५८
देवायुके यन्धके विशेष कारणोंका निरूपण
शुभ और अशुभ नामकर्मके
तीर्थकर प्रकृतिके
तीर्थकर प्रकृतिको सत्तावाले जीवके सिद्धि-प्राप्तिका जघन्य वा उत्कृष्ट काल-वर्णन
क्षायिक सम्यग्दृष्टि जीवकी सिद्धि-प्राप्तिके उत्कृष्ट कालका वर्णन
गोत्रकर्मके बन्धके विशेष कारणोंका निरूपण
नीचगोत्रके
अन्तरायकर्मके
१५८
"
"
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श्रीनेमिचन्द्राचार्यविरचिता कर्मप्रकृतिः महावीरं प्रणम्यादौ विश्वतत्त्वप्रकाशकम् । भाप्यं हि कर्मकाण्डस्य वक्ष्ये भव्यहितङ्करम् ॥१॥ विद्यानन्दि सुमल्ल्यादि भूषलक्ष्मीन्दुसद्गुरून् । वीरेन्दुं ज्ञानभूषं हि वन्दे सुमतिकीर्तिक: ॥२॥ । सिद्धान्त परिज्ञानचक्रवर्तिश्रीनेमिचन्द्रकविः ग्रन्थप्रारम्भे पूर्व ग्रन्थनिर्विघ्नपरिसमाप्त्यर्थमिदेवनेमि- नाथं नमस्कुर्वन् गाथामाह- पणमिय सिरसा णेमि गुणरयणविहसणं महावीरं । सम्मत्तरयणणिलयं पयडिसमुक्त्तिणं वोच्छं ॥१॥ वोच्छ अहं' नेमिचन्द्रकविः वक्ष्ये । किम् ? प्रकृतिसमुत्कीर्तनम् , प्रकृतीनां ज्ञानावरणादिमूलोत्तर- भेदयुक्तानां विवरणमित्यर्थः । किं कृत्वा ? पूर्व पणमिय सिरसा मि इति । शिरसा मस्तकेन नेमि तीर्थकर स्वामिनं प्रणिपत्य । किं लक्षणं नेमिम् ? गुणरयणविहूसणं । गुणाः अहिंसादयः, त एव रत्नानि तान्येव विभूपणानि यस्य स गुणरलाविभूषणस्तम् । पुनरपि कथम्भूतं नेमिम् ? महावीरम् । विशिष्टां ई लक्ष्मी राति ददाति यात्मीयत्वेन गृहातीति वा वीरः । महांश्चासौ वीरश्च महावीरस्तम् । भूयोऽपि कथम्भूतम् ? सम्मत्तरयणणिलयं । सम्यक्त्वरत्ननिलयं स्वस्वरूपलामः सम्यक्त्वम् , सप्तप्रकृतिक्षयलक्षणं क्षायिक- सम्यक्त्वं वा । तदेव रतं तस्य निलयः स्थानं तं सम्यक्त्वरत्ननिलयम् ॥१॥ प्रकृतिसमुत्कीर्तनं वक्ष्ये इति नमस्कारगाथायामुक्तम् । तहिं का प्रकृतिरित्याशक्षायामाह- पयडी सील सहावो जीवंगाणं अणाइसंबंधो । कणयोवले मलं वा ताणत्थित्तं सयं सिद्ध ॥२॥ - 3 - मङ्गलाचरण और ग्रन्थ-निरूपण-प्रतिज्ञा मैं (ग्रन्थकार नेमिचन्द्र ) अनन्त ज्ञानादि गुणरूप रत्नोंके आभूपण धारण करने- वाले, महान् वलशाली और क्षायिक सम्यक्त्वरूप रत्नके स्थान ऐसे नेमिनाथ तीर्थकरको, तथा उक्त विशेषणोंसे विशिष्ट एवं धर्मतीर्थरूप रथके चक्रको धुराको धारण करनेवाले ऐसे महावीर तीर्थंकरको नमस्कार करके प्रकृतिसमुत्कीर्तन नामक अधिकारको कहता हूँ ॥१॥ प्रकृति शब्दका अर्थ तथा जीव-कर्मके सम्बन्धकी अनादिता- प्रकृति, शील और स्वभाव ये कर्मके पर्यायवाची नाम हैं । जीव और कर्मका सम्बन्ध १. त क विभूसणं । २. गो० क० १ । ३. गो० क० २ । 1. जदी। 2. व मल्लादि। 3. व कोत्तिकं । . ज सिद्धान्तस्य परिज्ञान । 5. 6. व कुर्वनाह। 7. व अहं कविः । वननि २ कर्मप्रकृति प्रकृतिः शीलं स्वमार इति प्रकृतः पर्यायनामानि । स्वभावस्य लक्षणं किमिति चेत् कारणान्तर- निरपेक्षवं स्वभावः । यथाऽग्नरूधंगमनं स्वभावः, वायोस्तिर्यग्गमनं स्वभावः, जलस्य च निन्नगमनं स्वभावः । स च स्वभावः स्वभाववन्तमझते । स स्वभावः कयोः ? जीवाङ्गयोः । अङ्गशब्देन कर्म लभ्यते, जीवक्रमणारियर्थः । तत्र जीवकर्मणामध्ये प्रात्मनः रागादिपरिणमनं स्वभावः, कर्मणः रागाद्युत्पादकत्वं स्वभावः । स्वमावो हि स्वमाववन्तमन्तरेण न भवति, स्त्रमाववान् स्वभावं विना न भवतीत्युच्यमाने इनरंतराश्रयदीपग्रसङ्गः स्यात् । तत्परिहारार्थमनयोजीवकर्मणोः सम्बन्धोऽनादिर्तत इत्युक्तम् । कयोरिव ? कनकापलयोमलमिव । यथा कनकपापाणे मलसम्बन्धोऽनादिः, तथा जोवकर्मणोरनादिसम्बन्धः । तयोर्जीच. कमणीरस्तित्वं कथं सिद्धम् ? स्वत: सिन्हम् । कथमिति चेत् 4 अहम्प्रत्ययवेद्यत्वेन आत्मनोऽस्तित्वं सिन्ह- मिनि एको दरिदः, एकः श्रीमान् इति विचित्रपरिणमनात कर्मणोऽस्तित्वं सिद्धमिति ॥२॥ मंसारिणां नीवानां कर्म-नोकमंग्रहणप्रकारगाथामाह- देहोदएण सहिओ जीवो आहरदि कम्म-णोकम्म । पडिसमयं सव्वंगं तत्तायसपिंडओ व्य जलं ॥३॥ देशा थोदारिकवक्रियिकाहारकतैजसकार्मणशरीराणीति नामानः। तत्र पञ्चभेदमिन्नेषु मध्ये कार्मण- देहनामोदयजनित्तयोगेन सहितोजीवः ज्ञानावरणाद्यष्टविधं कर्म आहरति आकर्षति । पुनः प्रौदारिकशरीरोद- यंन महिनो जीवः औदारिकनीकर्म थाहरति, वैक्रियिकदेहोदयन सहित आत्मा बैक्रियिकनोकर्म आकर्पति, आहारकदेहादयन महिती जीवः श्राहारकनीकर्म आहरति, तैजसकायोदयेन सहितः प्राणी तैजसनोकर्म आकति ! कदा शाहरतीति चेत. प्रतिसमयम् । तेपामौदारिकाविशरीराणामुदयकाले समय समयं प्रति भाहरतान्यर्थः । केन प्रकारणाऽऽहरनि ? सर्वाङ्गं यथा भवति तथा सर्वात्मनः प्रदेशरित्यर्थः । किमिव ? नहायसपिण्टः जलमिय । यथा तप्तो लोहमयपिण्डः सर्वप्रदेशलमाहरति, तथा शरीरनामोदयन सहितो जीवः प्रतिसमयं कम नोकर्म आहरतीत्यर्थ: ॥३॥ अनादिकालिक है। जिस प्रकार कनकोपल ( सुवर्ण-पापाण ) में सोने और पापाणरूप मलका मिलाप अनादिकालिक है और इसीलिए सुवर्ण-पापाणके अनादिकालिक अस्तित्वके समान जीव और कर्मका अस्तित्व भी स्वयं सिद्ध है ।।२।। भावार्थ-संसारी जीवका स्वभाव रागादिरूपसे परिणत होनेका है और कर्मका स्वभाव रागादिम्पसे परिणमानेका है, इस प्रकार जीव और कर्मका यह स्वभाव अनादि- कालसे चला आ रहा है, अतएव जीव और कर्मकी सत्ता अनादिकालसे जानना चाहिए। श्रय अन्धकार बतलाते हैं कि यह जीव कर्म-नोकर्मका ग्रहण किस प्रकारसे करता है- जिस प्रकार अग्निसे सन्तप्त लोहेका गोला प्रतिसमय अपने सर्वाङ्गसे जलको खींचता है.. उसी प्रकार शारीग्नामक नामकर्मक उदयसे चंचलताको प्राप्त हुआ यह जीव प्रतिसमय मर्य ओरसे कर्म और नोकर्म वर्गणाओं को ग्रहण करता है ||३|| भावार्थ-जो पुल वर्गणाएँ ज्ञानावरणादि आठ कर्मरूपसे परिणत होती है, उन्हें कर्मवर्गणा कहते हैं और जो औदारिकादि शरीररूपसे परिणत होती है, उन्हें नोकर्मवर्गणा - । प्रकृतिसमुत्कीर्तन कियत्सङ्ख्योपेतान् तत्परमाणूनाहरतीति चेत् प्राह- सिद्धाणंतिमभागं अभव्वसिद्धादणंतगुणमेव । समयपबद्धं बधदि जोगवसादो दु विसरित्थं ॥४॥ सिद्धेभ्योऽनन्तैकमागं सिद्धराश्यनन्तैकभागं अभव्यसिद्धेभ्यः अनन्तगुणं अभव्यजीवेभ्योऽनन्तगुणं कर्म-नोकर्मदव्यं जीवो बध्नाति । कथं (किं ) बध्नाति ? समयप्रबद्धम् । समये समये प्रबध्यते इति समय- प्रबद्धत्तम् । कुतो बन्नाति ? योगवशात् , मनोवचनकाययोगवशात् । कीदृशं बनाति ? विसदृशमनेकरूप- मित्यर्थः । समयप्रबद्धस्य लक्षणमाह-- परमाणूहि अणंतहिं वग्गणसण्णा हु हवदि एक्का दु। ताहि अणंतहिं णियमा समयपबद्धो हवइ एक्को ॥ १ ॥ वर्गः शक्तिसमूहोऽणोरणूनां वर्गणोदिता। वर्गणानां समूहस्तु स्पर्धकः स्पर्धकापहैः ॥ २ ॥ श्रथप्रतिसमयभवस्य बन्धस्य प्रमाणं कथयित्वा उदयसत्त्वप्रमाणं कथयति- जीरदि समयपबद्धं पओगदो णेगसमयबद्धं वा । गुणहाणीण दिवई समयपबद्ध हवे सत्तं ॥शा अस्य जीवस्य प्रतिसमयमेकः कार्मणसमयप्रबद्धः जीर्यते हीनो भवति । पुन एतस्याऽऽत्मनः प्रति- समयं एकः कार्मणसमयप्रवद्धः उदेति उदयं प्राप्नोति । वा अथवा सातिशयक्रियासहितस्य जीवस्य प्रयोगतः सम्यक्त्वादिप्रयोगलक्षणहेतुना एकादशनिर्जरा [ स्थान ] विवक्षया अनेकसमयप्रवद्धो जीर्यते । द्वयर्धगुण- हानिमानसमयप्रबद्धः प्रतिसमयं सत्वं भवति ॥५॥ कहते हैं ये दोनों प्रकारकी पुद्गलवर्गणाएँ सारे संसारमें भरी हुई हैं, उन्हें यह जीव अपने मन-वचन-कायकी चंचलतासे प्रतिसमय ग्रहण करता रहता है। जैसे कि गर्म किया हुआ लोहेका गोला पानीमें डालनेपर सर्वाङ्गसे जलको अपने भीतर खींचता रहता है । अव ग्रन्थकार प्रतिसमय ग्रहण की जानेवाली उन वर्गणाओंका प्रमाण वतलाते हैं- साधारणतः यह संसारी जीव सिद्धराशिके अनन्तवें भाग और अभव्यराशिसे अनन्त- गुणित समयप्रबद्धरूप कर्म-नोकर्मवर्गणाओंको प्रतिसमय ग्रहण कर अपने साथ सम्बद्ध करता है। किन्तु योगोंकी विशेषतासे अर्थात् मन्दता या तीव्रतासे होन या अधिक परिमाणमें भी बाँधता है ॥४॥ इस प्रकार कर्म-परमाणुओंके वन्धका प्रमाण वतलाकर अव अन्धकार उनके उद्य और सत्त्वका प्रमाण बतलाते हैं- साधारणतः एक समयमें एक समयप्रबद्धप्रमाण कर्म-परमाणु उदयमें आकर और अपना फल देकर निर्जीण हो जाते हैं अर्थात् झड़ जाते हैं। किन्तु तपश्चरणादि विशेष प्रयोगसे अनेक समयप्रबद्ध भी निर्जीर्ण हो जाते हैं । तथापि कुछ कम डेढ़ गुणहानि आयाम- गुणित समयप्रबद्ध सत्त्वरूपसे अवस्थित रहते हैं ॥५॥ विशेपार्थ-पूर्वोक्त दो गाथाओं में प्रतिसमय बंधनेवाले, उदयमें आनेवाले और सत्तामें रहनेवाले कर्म-परमाणुओंका परिमाणो बतलाया गया है । जिसका खुलासा इस प्रकार है- १. गो० क० ४ । २. आ-समयपवद्धं । ३. गो० क० ५ । 1. इलोकोऽयं व प्रतो नास्ति ।

सामान्य . कर्मप्रकृति मान्य तौर पर वह जीव एक समयमें एक समयप्रबद्ध-प्रमाण कर्म-परमाणुओंको बाँधता है. और गुणश्रेणी निर्जराको अविवक्षासे इतनेकी ही निर्जरा करता है, फिर भी उसकी मना कुछ कम डेढ़ गुणहानिसे गुणित समयप्रवद्ध-प्रमाण पायी जाती है। यहाँ यह शंका स्वभावतः उत्पन्न होती है कि जब प्रत्येक समयमें (जितना आता है उतना ही चला जाता है नब सत्त्व इतना अधिक कैसे रहता है ? खासकर उस दशामें जब कि आय और व्यय दोनों समान है, नव यह कैसे सम्भव है ? क्या जो आता है वही जाता है या इसके अन्तर्गत कुछ और रहस्य है ?) इनमें से दूसरी शंकाका समाधान कर देनेपर पहली शंकाका समाधान सुगम हो जायेगा । अतः पहले उसीका समाधान किया जाता है। (जीवके भीतर एक समय में सिद्धराशिके अनन्तवें भाग-प्रमाण और अभव्य-राशिसे अनन्त-गुणिन कर्म परमाणु आते हैं, इसे ही दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि जीव अपने आत्म-प्रदेशोंकी चंचलना रूप योग-शक्तिसे उक्त परिमाण अनन्त परमाणुओंको प्रतिसमय बाँधना है। वे परमाणु आयुकर्म के बन्ध न होनेको दशामें शेष सात काँके बन्ध-योग्य होते है, क्योंकि आयुकर्मका बन्ध सदा नहीं होता, किन्तु त्रिभाग आदि विशेष अवसरपर ही होता है। अब इन प्रतिसमय बँधनेवाले कमपरमाणुओंमें फल देनेकी जो शक्ति है वह तुरन्त फल नहीं देने लगती, किन्तु कुछ समयके बाद फल देना प्रारम्भ करती है। जितने समय तक फल नहीं देती उसे ही शास्त्र की भाषामें अबाधा-काल कहते हैं। (जैसे कोई भी बीज बोये जाने के तुरन्त बाद ही नहीं उग आता, कुछ समय के बाद ही उगता है, यही हाल कमांका है । यहाँ यह भी ज्ञातव्य है कि आनेवाले कर्मकी एक निश्चित काल-मर्यादा भी आने के साथ ही पड़ जाती है, सो आनेवाले कर्मकी आत्माके साथ रहनेकी काल मर्यादाका नाम ही स्थितिबन्धो है । उसे और भी सुगम शब्दोंमें कर्मस्थिति-काल सकते हैं । इस कर्म- स्थिनिकालमें से अबाधा-कालको छोड़कर शेष कालमें उक्त बँधे हुए कर्मपरमाणु एक निश्रित व्यवस्था अनुसार अपना फल देकर झड़ते हुए चले जाते हैं । उनके इस प्रकार झड़नेका क्रम कर्म स्थिति के अन्तिम काल तक चलता है । (एक समय में जितने कर्म-परमाणु उस विवक्षित समयप्रबद्ध में से झड़ते हैं, उसका नाम निषेक है । यह व्यवस्था इस प्रकार की है कि अबाधा- कालय बाद पहले समय में कर्म-परमाणु सबसे अधिक निर्जीर्ण होते हैं दूसरे समयमै उससे कम नीसर समयमें उससे कम । इस प्रकार उत्तरोत्तर कम होते हुए अन्तिम समयमै सबसे कम कम-परमाणु अपना फल देकर झड़ जाते हैं । (इस प्रकार समयबद्ध में उत्तरोत्तर कमती- कमनी हानेका नाम ही शात्रीय भाषामें गुणहानि है । उक्त क्रमके भीतर भी कुछ समय तक एक निश्चित परिमाणमें परमाणु कम-कम होते है । पुनः कुछ समयके बाद उससे आधे कर्म- परमाणु एक निश्चित संख्याको लेकर कम होते हैं । इस प्रकारका यह क्रम बन्ध और उदयमें अन्तिम समय तक चला जाता है। निश्चित एक परिमाणसे जहाँतक संख्या घटती जाती है. उसका नाम एक गुणहानि है और उतने समय तक निश्चित कालका नाम एक गुणहानि- अयाम है। उत्तरोनर आधे-आधे परिमाणको लिय हुए जितनी गुणहानियाँ होती है, उन्हें नाना गुवाहानिकहते हैं । इसे स्पष्ट करनेके लिए एक अंक-राशिको लेते हैं-(एक समयमें आनेवाले कन-परमाणुओंकी संख्याको ६३०० मान लीजिए, इसीका नाम एक समयप्रबद्ध है। उसकी पूरी स्थिति ५१ समयको कल्पना कीजिए। उसमें-स (अवाधाकाल ३ समय) रखिए और फल देनेकः काल जिसे कि निषेककाल या निषेक-रचनाकोल कहते हैं वह ४८ समयका) मानित । ममें नगेनर आयआये होकर जिस क्रममे उक्त परमाणु विभक्त होंगे। गली राणियोंकी संख्या होगी और प्रत्येक गुगद्दानिका काल ८ समय)होगा। इस प्रकार मायाकाल बाद ८४: ननयों में वे बधे हुए कर्म-परमाणु विभक्त होंगे। इनमें से कह m ५ प्रकृतिसमुत्कीर्तन (पहली गुणहानिमें ३२०० । दूसरोमें १६००, तीसरीमें ८००, चौथीमें ४००, पाँचवीमें २०० और छठीमें १०० । सवका जोड़ ६३००)हो जायेगा। यतः प्रत्येक गुणहानिका काल ८ समय) है, अतः ऊपर बतलाये गये प्रत्येक गुणहानिके ३२००, १६०० आदि परमाणु इन आठ-आठ समयोंके भीतर विभक्त होते हैं। उनमें से प्रत्येक समयमें प्राप्त होनेवाले परमाणुओंकी जो विधि आगममें बतलायी गयी है उसके अनुसार (पहली गुणहानिके प्रथम समयसें.५१२, दूसरेमें ४८०, इस प्रकारसे ३२-३२ कम होते हुए ८ वे समयमें २८८ परमाणु प्राप्त होंगे। पुनः दूसरी गुणहानिका प्रारन्म)होगा। पहलीकी अपेक्षा दूसरीमें प्रतिसमय ३२ के आधे अर्थात् १६-२६ परमाणु कम होकर प्राप्त होंगे। तदनुसार पहले समयमें २५६, दूसरे समयमें २४० । इस प्रकार १६-१६ कम होते हुए 5 वें समयमें १४४ परमाणु रहेंगे। पुनः तीसरी गुणहानिका प्रारम्भ होगा।) उसमें १६ के आधे अर्थात् ८-८ कम होते हुए परमाणु रहेंगे। तदनुसार पहले समयमें १२८, दूसरेमें १२० इस प्रकार आठवें समयमें ३२ कर्म-परमाणु रहेंगे। पुनः चौथी गुणहानिका प्रारम्भ होगा। इसमें तीसरेसे आधे अर्थात् ४-४ कर्म-परमाणु प्रतिसमय कम-कम होकर रहेंगे। तदनुसार पहले समयमें ६४, दूसरेमें ६०, इस प्रकार कम होते हुए आठवें समयमें ३६ कर्म-परमाणु रहेंगे । पुनः पाँचवी गुणहानि प्रारम्भ होगी। इसमें चौथीके ४ को अपेक्षा आधे अर्थात् २-२ कर्म-परमाणु प्रतिसमय कम होंगे। तदनुसार पहले समयमें ३२, दूसरेमें ३०. इस प्रकारसे आठवें समयमै १८ कर्म-परमाणु रहेंगे। पुनः छठी गुणहानि प्रारम्भ होगी। इसमें पाँचवीं के २ की अपेक्षा आधे अर्थात् १-१ ही कम होकर प्रतिसमय परमाणु रहेंगे। तदनुसार पहले समयमें १६, दूसरेमें १५ इस प्रकार एक-एक कम होकर आठवें समयमें ९ कर्म-परमाणु रहेंगे। (इस प्रकार बन्ध और उदय दोनोंकी अपेक्षा ४८ समयों में प्राप्त होनेवाले परमाणुओंकी अंक-संदृष्टिोइस प्रकार होगी- - समय प्रथम गुणहानि द्वितीय गुणहानि तृतीय. गुणहानि चतुर्थ गुणहानि पंचम गुणहानि गुणहानि १ १२८ ६४ -- 4411 ४८० ३० ४४८ २२४ ११२ २८ ५४ १३ ३८४ ४८ २४ १२ ६ ३५२ ८८ • २२ ३२० ८.: २० २८८ ५४४. M सर्व घन ३२०० १६०० ८०० ४०० % ६ कर्मप्रकृति वह तो हुआ विवक्षित एक समयमें बँधने और उद्यमें आनेवाले कर्म-परमाणुओंकी रचनाको क्रम । इसे ही शास्त्रीय भाषामें निपेक-रचना कहते हैं । इसी क्रमके अनुसार अनादि कालसे प्रति समय प्रत्येक जीवके कर्म-परमाणु बँधते और उदय होते चले आ रहे हैं। अतः हम जब भी जिस किसी समय बँधने और उदयमें आनेवाले परमाणुओंको देखेंगे तो वे हमेशा ही एक समयप्रवद्ध-प्रमाण बँधते और उदय होते हुए दिखायी देंगे इसका कारण यह है कि पहले जैसे हम एक विवक्षित वर्तमान समयमें आनेवाले कर्म-परमाणुओंकी निपेक-रचना) बनला आये हैं उसी प्रकारकी निपेक-रचना उससे एक समय पूर्व बँधे हुए परमाणुओंकी भी) हुई है, दो समय पूर्व बँधे हुए परमाणुओंकी भी हुई है, तीन समय पूर्व बँधे हुए कर्म-परमा- गुओंकी भी हुई है। इस प्रकार हम पूर्वोक्त काल्पनिक संदृष्टि के अनुसार (४८ समय पूर्व तककी रचनाको सामने रखकर विचार करें तो दिखाई देगा कि. (विवक्षित वर्तमान समयसे ४८ समय पूर्व बँधे हुए समय-प्रबद्ध के अन्तिम निपेकके परमाणु इस समय निर्धाण हो रहे हैं। उसके बाद अर्थात ४० समय पूर्व बंधे हुए समय-प्रबद्ध के उपान्त्य निषेकके १० परमाणु इस समय निर्णि हो रहे हैं। ४६ समय पूर्वके बँधे हुए में-से ११ परमाणु, ४५ समय पूर्व में बंधे हुए में-से १२ परमाणु निर्जीर्ण हो रहे हैं। इस प्रकारसे आगे-आगे बढ़ते जानेपर आप देवगे कि ४८ समयोंके भीतर बँधे हुए कर्म-परमाणुओंके निर्जीर्ण होनेका क्रम इस प्रकार है- (यहाँ ४८ समयका कथन अबाधा-कालकी विवक्षा न करके किया गया है। यहाँ दिशा- बोधके लिए यह संक्षिप्त त्रिकोण-रचनाका संकेत) किया जा रहा है । (पृरी त्रिकोण-रचना परिशिष्ट में देखिए। 2 है ५ १० १० ११ २२ ३० ११ १० .............. ३५ ४० ६ ४८ ६ १३ १४ १५ १६ १५ ११ १० १२ १२ १३ १५. १६ १२ २८ ३२० १२ ११२ ४१६ १४८ ५.१२ ५१२४८० ..../ ७ प्रकृतिसमुत्कीर्तन कर्मणः सामान्यादिभेदप्रभेदान् गाथाद्वयेनाऽऽह:- कम्मत्तणेण इक दव्वं भावो त्ति होइ दुविहं खु । पुग्गलपिंडो दव्वं तस्सत्ती भावकम्मं तु ॥६॥ पूर्वोक्तं कर्म सामान्यकर्मत्वेन एकं भवति । तु पुनः तत् कर्म द्विविधं भवति-द्रव्यकर्म-भावकर्म- भेदात् । तत्र द्रव्यकर्म पुद्गलपिण्डो भवति । तस्य पुद्गलपिण्डस्य या शक्तिः रागद्वेषाद्युत्पादिका रागद्वेष- परिणामो वा भावकर्म भवति ॥६॥ उक्त त्रिकोण-रचनामें स्पष्ट रूपसे दिखाई देगा कि प्रत्येक समयमें) जिस परिमाणमें काल्पनिक रूपसे (६३०० परमाणुका पिण्डजैसे एक समयमें आ रहा है उसी प्रकार विभिन्न समयोंमें बँधे हुए समय-प्रबद्धोंके जो-जो निपेक (प्रतिसमय उदयमें आकर निर्जीर्ण हो रहे हैं उन सबका परिमाण भी एक समय-प्रवद्ध प्रमाण अर्थात् ६३०० ही है ।(यह हुई एक समयमें बँधने और उदयमें आनेवाले द्रव्यके परिमाणकी बात । अब इसी त्रिकोण-रचनामें देखिए कि जहाँ सीधी पंक्ति में प्रतिसमय बँधनेवाले समय-प्रवद्ध की निषेक-रचना दृष्टिगोचर हो रही है, वहाँ ऊपरसे नीचेकी पंक्ति में उदयागत निपेकोंके समय-प्रबद्ध प्रमाण परमाणु भी निर्जीर्ण होते हुए दिखाई दे रहे हैं। अब हम किसी भी विवक्षित समयमें काल्पनिक संदृष्टिके अनुसार ४८ वे समयमें सत्त्वका परिमाण यदि जानता चाहते हैं तो वहाँ उसके नीचेसे खींची गयी पंक्ति नम्बर२ पर दृष्टिपात कीजिए । इसके नीचेका सर्वद्रव्य समुच्चय रूपसे (सदा ही सत्तामें मिलेगा। (इस द्रव्यका प्रमाण कितना) है, इसीका उत्तर गाथाके उत्तरार्धमें दिया गया है कि वह कुछ कम डेढ़ गुणहानि आयामसे गुणित समय-प्रबद्ध प्रमाणो है। जैसा कि हम पहले बतला आये हैं (एक गुणहानिका आयाम = समय) है उसके आधे ४)होते हैं, दोनोंका जोड़ १२) होता है । (उससे समय-प्रबद्ध का प्रमाण जो ६३०० परमाणु है उसमें गुणा कर देनेपर ६३२०४१२=७५६०० प्रमाण संख्या) होती है और उक्त त्रिकोण- रचनामें विविध समय-प्रवद्धोंके जो परमाणु सत्तामें पड़े हुए हैं उनका जोड़ ७१३०४)होता है । (इसलिए सत्ताके द्रव्यको कुछ कम डेढ़ गुणहानि-आयामसे गुणित समय-प्रबद्ध प्रमाण कहा है। (इस प्रकारे उक्त दोनों गाथाओंमें जो यह कहा गया है कि (जीवके प्रतिसमय एक समय-प्रबद्ध बँधता है, एक उदयमें आता है और कुछ कम डेढ़ गुणहानि आयामसे गुणित समयप्रबद्ध-प्रमाण द्रव्य सत्तामें रहता है वह सर्वथा युक्ति-युक्त ही कहा गया है । यहाँ इतनी विशेषता)और समझनी चाहिए कि जब यह संसारी जीव (सम्यग्दर्शनादि विशेप गुणोंको प्राप्त करता है, तब उसके पूर्वोक्त क्रमको उल्लंघन कर गुणश्रेणी रचना आदिके द्वारा सम्यक्त्वोत्पत्ति आदि ग्यारह स्थानोंमें प्रतिसमय असंख्यात गुणश्रेणी रूपसे अनेक समय-प्रबद्धोंकी भी निर्जरा) करता है जिसका निर्देश गाथामें ('पओगदो णेगसमयबद्धं वा इस वाक्यके द्वारा किया गया है। अव दो गाथाओंके द्वारा कर्मके भेद-प्रभेदोका निरूपण करते हैं- अभेद या सामान्यकी अपेक्षा कर्म एक प्रकारका है। भेदकी अपेक्षा द्रव्य और भावके भेदसे दो प्रकारका है। उनमें ज्ञानावरणादि रूप पुद्गलपरमाणुओंके पिण्डको द्रव्यकर्म कहते १. श्रा इक्कं । २. पिण्डगतशक्तिः कार्ये कारणोपचारात्, शक्तिजनिताज्ञानादिर्वा भावकर्म ( गोल क० टी०)। ३. त-कम्मो त्ति । ४. गो० क०६।

कर्मप्रकृति तं पुण अट्ठविहं वा अदालसयं असंखलोगं वा । ताणं पुण वादि त्ति अबादि ति य होति सण्णाओं ॥७॥ पुनः नसामान्यं कम ज्ञानावरणादिभेदन भष्टविधं भवति । वा अथवा तत्कर्म प्रकृतिभेदन अष्ट- चवारिंगछविध ११८ भवति । वा अथवा तत्कर्म असंख्यातलोकप्रमाणं भवति । वा प्राब्दोऽत्र समुच्च- यार्थ: । नेपां चाष्टविधादीनां पृथक-पृथक् बातिरिति अघातिरिति च हे संभवतः ॥७॥ प्रथमोदिष्ट्राष्टविधं कम तदात्ययातिभेदी च गाथाद्वयन सरिराह- णाणम्स दंसणस्य य आवरणं वेयणीय मोहणियं । आउग णामं गोदंतरायमिदि अट्ठ पयडीओ ॥८॥ भानावरणं । दानाचरणं २ वदनीयं ३ मोहनीयं ४ श्रायुः ५ नाम ६ गोत्रं ७ अन्तरायः ८ श्चेति मुमप्रनयोटी ॥४॥ आवरण मोह विग्धं घादी जीवगुणघादणत्तादो । आउग णामं गोदं वेयणियं तह अघादि त्ति ॥९॥ पानायरण : दगंनावरणं २ मोहनीयं ३ अन्तराय ४ श्चेति चत्वारि कर्माणि बालिनामानि स्युः। कुन: ? जीवानां नानादिगुणवानकन्यात । भायुष्यं १ नाम २ गोत्रं ३ वेदनीयं ४ चेति चत्वारि कर्माणि है और उस व्यकर्मरूप पिण्डमें फल देने की जो शक्ति है. उसे भावकर्म कहते हैं। अथवा उस शाक्ति उत्पन्न हुए अज्ञानादि तथा रागादि भावोंको भो भावकर्म कहते हैं ॥६॥ वह कम मूल प्रकृनियोंकी अपेक्षा आठ प्रकारका भी है, अथवा उत्तरप्रकृतियोंकी अपेक्षा एक मां अड़तालीस प्रकारका भी है, अथवा बन्धके कारणभूत कपायाध्यवसाय- न्यानांकी अपेक्षा असंख्यात लोकोंके जिनने प्रदेश होते हैं, उतने भेदरूप भी है। काँके जो आट भेद है, उनमें से चार कमांकी घातिसंज्ञा है और चार कर्माकी अघातिसंज्ञा है ।। श्रय कमौके पाट भेदोका निरूपण करते हैं मानावरणीय, दर्शनावरणीय, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय ये ककि आठ मूलभेद है | विशेषार्थ-आत्माक ज्ञानगुणके आवरण करनेवाले कर्मको ज्ञानावरणीय कहते हैं। दानगुणक आवरण करनेवाले कर्मको दर्शनावरणीय कहते हैं। मुख-दुःखका वेदन कराने- वाले कर्मको चेदनीय कहते हैं। सांसारिक वस्नुमि मोहित करनेवाले कर्मको मोहनीय रहने । नरकादि गनियों में रोककर रखनेवाले कर्मको आयु कहते हैं। नाना प्रकार के गिगादिक निमांग करनेवाले कर्मको नाम कहते हैं। ऊँच और नीच कुलॉमें उत्पन्न करने- वाले करको गोत्र कहते है। तथा इष्ट वन्नुकी प्राप्रिमें विघ्न करनेवाले कर्मको अन्तराय . प्राय उन काम घानि-अधानिका विभाजन करते हैं- सानायय, दानावरणीय, मोदनीय और अन्तराय ये चार घातिया कर्म है क्योंकि जीवनादि गुनका बात करने है । आयु, नाम, गोत्र और वेदनीय, ये चार अघातिया १.न? ! य । २.० २०. गी० १.० ८। भाव मं० १३० १.१.गो० फ०९।

है प्रकृतिसमुत्कीर्तन तथा न नैव, जीवगुणघातकप्रकारेण प्रवृत्तत्वात् अघातिसंज्ञानि भवन्ति श्रीगोम्मटसारे ( ? ) सर्वधाति- देशवातिप्न कृतिसंज्ञा कभ्यते-"केवलणाणावरणं दसणछतं च माहवारसयं । ता सवधाइसण्णा मिच्छत्त- मेयवीसदिसं ॥१॥" केवलज्ञानावरणं १ निद्रा १ निद्रानिद्रा २ प्रचला ३ प्रचलाप्रचला ४ स्त्यानगृद्धिः५ केवल- दर्शनावरणं ६ अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानचतुष्कं मोहद्वादशकं १२ मिश्रसम्यक्त्वं १ मिथ्यात्वं १ एवं २१ प्रकृतयः सर्ववातिसंज्ञाः भवन्ति । देशघातिप्रकृतयः २६ । "णाणावरणचउक्कं दसतिगमंतराइगं पंच । ता हाँति देसघादी सम्म संजलण णोकसाया य ॥२॥' मत्याद्यावरणचतुष्कं ४ चक्षुरादित्रिकं ३ दानादि- पजकं ५ सम्यक्त्वप्रकृतिः १ संज्वलनचतुष्कं ४ नव नोकषाया है एवं २६ देशघातिप्रकृतयः। अन्याः प्रकृतयः १०१ अघातिसंक्षिकाः । सर्वघातयः २१ देशवातयः २६ भवातिप्रकृतयः १०१ एवं सर्वाः १४८ प्रकृतयः ॥६॥ तान् जीवगुणानाह- केवलणाणं दंसणमणतविरियं च खइयसम्मं च । खड्यगुणे मदियादी खओवसमिए य घादी दु॥१०॥ केवलज्ञानं १ केवलदर्शनं २ अनन्तवीर्य ३ क्षायिकसम्यक्त्वं ४ चशब्दात् क्षायिकचारित्रं द्वितीय- चशब्दात् क्षायिकदान-लाभभोगोपभोगाश्च एतान् नव क्षायिकगुणान् ; तु पुनः मतिश्रतावधिमनःपर्ययाख्यान् क्षायोपरामिकाणान् च घ्नन्तीति घातीनि कर्माणि भवन्ति ॥१०॥ आयुःकर्मकार्यमाह- कम्मकयमोहवाडियसंसारम्हि य अणादिजुत्तम्हि । जीवस्स अवट्ठाणं करेदि आऊ हलिव्व णरं ॥१॥ कर्मकृते मोहवर्धिते अनादियुक्त एवम्भूते संसारे चतुर्गतिपु आयुःकर्मोदयः जीवस्यावस्थान स्थिति - 5 कर्म हैं; क्योंकि वे जीवके ज्ञानादि गुणोंके घात करने में असमर्थ हैं ॥९॥ अव अन्धकार धातियाकर्मोंसे घात किये जानेवाले गुणों को बतलाते हैं- केवलज्ञान, केवलदर्शन, अनन्तवीर्य और क्षायिकसम्यक्त्व, तथा 'च' शब्दसे सूचित क्षायिकचारित्र और क्षायिकदानादिरूप क्षायिक गुणोंको; तथा मतिज्ञानादि क्षायोपशमिक गुणोंको भी ये ज्ञानावरणादि कर्म घात करते हैं, इसलिए उन्हें घातिया कर्म कहते हैं ।।१०।। विशेषार्थ क्षायिक भावके नौ भेद हैं- क्षायिकज्ञान, क्षायिक दर्शन, क्षायिक सम्यक्त्व, क्षायिक चारित्र, तथा क्षायिक दान, लाभ, भोग, उपभोग और वोर्य । क्षायोप- शमिक भावोंके अठारह भेद हैं-मति, श्रुत, अवधि मनः पर्यय ये चार ज्ञान; कुमति, कुश्रुत और कुअवधि ये तीन अज्ञान; चक्षु, अचक्षु और अवधि ये तोन दर्शन; दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य; ये पाँच लब्धियाँ झायोपशमिक सम्यक्त्व, चारित्र और संयमासंयम | इन दोनों प्रकारके भावोंको घातने के कारण ज्ञानाचरणादि कमोंको घातिया कहते हैं। अव अघातिया कामे से पहले आयुकर्मका कार्य बतलाते हैं- कर्मोके उदयसे उत्पन्न हुए मोह, अज्ञान, असंयम और मिथ्यात्व भावसे वृद्धिको प्राप्त इस अनादिकालीन संसारमें जो मनुष्यको हलि या खोडेके समान जीवको रोक रखे उसे आयुकर्म कहते हैं ॥११॥ १. गो. क. १०।२. गो० ० ११ २ .

r १० कर्मप्रकृति करोति । कइय? हलिरिव । छिद्वितकाष्टविशेपो हतिः। यथा हडिः नरस्यावस्थितिं करोति, तथा मायुष्कर्म जीवस्य संसार स्थितिकारकं भवतीत्यर्थः ॥११॥ नामकर्मकार्यमाह- गदि आदि जीवमेदं देहादी पोग्गलाण भेयं च । गदि-अंतरपरिणमणं करेदि णामं अणेयविहं ॥१२॥ गन्यायनेकविध नामकम कर्तृभूतं सत्नारकादिजीवपर्यायभेदं श्रीदारिकादिशरीरपुद्गलभेदं गत्यन्तरपरिणमनं च करोति, तेन कारणेन तन्नामकर्म जीव-पुद्गल-क्षेत्रविपाकि भवति । चशब्दाद् मव- विपाकि च भवति । तत्कथमित्याह-ज्ञानावरणपञ्चकं ५ दर्शनावरणनवकं मोहनीयाष्टाविंशतिक २८ अन्तरायपन ५ वेदनीयहयं २ गोत्रदिकं २ प्रशस्ताप्रशस्तविहायोगतिद्वयं २ नरकादिगतिचतुष्कं एकंन्द्रियादिजातिपञ्चकं ५ उच्छ्वासं १ तीर्थकरत्वं स्थावस्त्रसे २ यशोऽयशसी २ बादरसूक्ष्मे २ पर्याप्तापर्यात २ नुस्वरदु.स्वर २ यादेयानादेयं २ सुमगदुर्मगे २ एवमेकीकृताः अष्टसप्ततिः ७८ प्रकतयो जीयविपाकिन्यो भवन्ति । औदारिकादिशरीर ५ बन्धन ५ संघात ५ संस्थान ६ अङ्गोपाङ्ग ३ संहनन ६ रम ५ गन्ध २ वणं ५ स्पर्श ८ मगुरुलघु १ उपघात १ परघात १ आतप १ उद्योत १ निर्माण १ प्रत्येक- माधारण २ रियास्थिर २ शुभाशुभ २ एवं समुच्चयीकृताः द्वापष्टिः प्रकृतयः ६२ पुद्गल विपाकिन्यो भवन्ति । नरकनियमनुष्यदेवगत्यानुपूर्व्यश्चतस्रः ४ क्षेत्रविपाकिन्यो भवन्ति । नरकतिर्यरूमनुष्यदेवा- युकं च ४ मविपाकिन्या भवन्ति ॥१२॥ भावार्थ-जैसे किसी मनुष्य के पाँवको यदि किसी मोटी लकड़ीके छेदमें डालकर उसमें कील ठोक दी जाय, तो वह मनुष्य उस स्थानसे इधर-उधर नहीं जा सकता है, उसी प्रकार आयुकर्म भी इस चतुर्गतिरूप संसार में जीवको रोक रखता है, उसे अपने अभीष्ट स्थानपर नहीं जाने देना। गाथा के पूर्वार्थ द्वारा ग्रन्थकारने यह भाव प्रकट किया है कि यद्यपि संसार- की वृद्धि नो मिथ्यात्व आदिके कारण होती है पर संसार में जीवका अवस्थान आयुकर्मके कारण होता है। अब नामकर्मका कार्य बतलाते हैं- नामकर्म अनेक प्रकारका है । वह गति, जाति आदि जीवोंके भेदोंको, शरीर, अङ्गोपाङ्ग आदि पुद्गलांक भेदोको, नथा जीवके एक गतिसे दूसरी गतिरूप परिणमनको करता है ।।१२।। विशेषार्थनामकर्मकी उत्तर प्रकृतियाँ तिरानवें हैं, उनमें कितनी ही प्रकृतियाँ जीव- विपाकी हैं, कितनी ही पुद्गल विपाकी हैं और कितनी ही क्षेत्रविपाकी हैं, सो इन सवका वर्णन म्ययं ग्रन्धकार आगे करेंगे। यहाँ इतना जान लेना चाहिए कि(जिन गति, जाति आदि प्रवृतियोंका फल जीवमें) होता है, उन्हें जीव विपाकी कहते हैं । (जिनकी फल शरीर, संस्थान आदिक रूपसे पुद्गलमें होता है उन्हें मुद्गल विपाकी) कहते हैं और जिनका फल विग्रहगति- पक्षेत्र विशेपमें ही होता है प्रिमो प्रकृतियोंको क्षेत्रविपाको कहते हैं। जिन प्रकृतियोंका फल नारक आदि भव-विशेपमें ही होता है, उन्हें भवविपाकी) कहते हैं। सो(यथार्थतः आयुकर्मकी चारों प्रकृतियोंको ही भव विपाकी माना है, परन्तु यतः गतिनामा नामकर्म आयुकर्मका अविनाभायी है. अनः अचारसे उसे भी भव विपाकी कहा जा सकता है, ऐसी सूचना गाथा-पटिन चान्दन मिलनी है, ऐसा टीकाकार सूचित करते हैं। १.२ १.। .:. अमनं नन । 3. व एकद्विविन्नु पञ्चेन्द्रियजानिपंचकं ।

- - प्रकृतिसमुत्कीर्तन ११ गोत्रकर्मकार्यमाह- संताणकमेणागयजीवायरणस्स गोदमिदि सण्णा । उच्चं णीचं चरणं उच्चं णीचं हवे गोदं ॥१३॥ सन्तानक्रमेणागतजीवाचरणस्य गोत्रमिति संज्ञा स्यात् । तच्च गोत्रं द्विविधम्-उच्चैनीवमेदात् । तत्रोधाचरणमुच्चैर्गोत्रम् , नीचाचरणं नीचेगोत्रं च भवति ॥१३॥ वेदनीयकर्मकार्यमाह- अक्खाणं अणुभवणं वेयणियं सुहसरुवयं सादं । दुक्खसरूवमसादं तं वेदयदीदि वेयणीयं ॥१४॥ इन्द्रियाणामनुभवनं इन्द्रियविषयसुखानुभूतिः वेदनीयम् । तच्च सुखस्वरूपं सात वेदनीयं भवति । दुःखस्वरूपमसातावेदनीयं भवति । ते द्वे सातासाते वेदनीये वेदयति ज्ञापयतीति वेदनीयम् ॥१४॥ अथ सामान्यतः जीवानां दर्शनादिगुणस्वरूपमाह- अत्थं देक्खिय जाणदि पच्छा सद्दहदि सत्तभंगीहिं । इदिं दंसणं च णाणं सम्मत् हुँति जीवगुणा ॥१५॥ अयं संसारी जीवः अर्थ पदार्थ दृष्ट्वा जानाति, तमेवार्थ पुनः सप्तमङ्गीभिनिश्चित्य पश्चात् श्रदधाति रोचते इत्यनेन प्रकारेण दर्शनं ज्ञानं सम्यक्त्वं च जीवगुणा भवन्ति ॥ १ ॥ (अव गोत्रकर्मका स्वरूप बतलाते हैं- सन्तान-क्रमसे अर्थात कुलकी परम्परासे चले आये आचरणकी गोत्र यह संज्ञा है। उसके दो भेद हैं; उनमें से कुल-परम्परागत उच्च ( उत्तम ) आचरणको उच्चगोत्र कहते हैं और निन्द्य आचरणको नीचगोत्र कहते हैं ।।१३।। ) अव वेदनीय कर्मका स्वरूप बतलाते हैं- (जो कर्म इन्द्रियोंके विषयोंका अनुभवन अर्थात् वेदन करावे, उसे वेदनीय कहते हैं ।) उसके दो भेद हैं, उनमें से जो (सुखरूप इन्द्रिय-विपयाँका अनुभव करावे) उसे सातावेद- नीय कहते हैं और जो (दुःख-स्वरूप इन्द्रिय-विपयोंका अनुभव करावे) उसे (असातावेदनीय) कहते हैं ॥१४॥ अव श्रावरणका क्रम बतलाने के लिए पहले जीवके कुछ प्रधान गुणोंका निर्देश करते हैं- (संसारी जीव पहले पदार्थको देखकर जानता है, पीछे सात भंगवाली नयोंसे निश्चय कर उनका श्रद्धान करता है । इस प्रकार दर्शन, ज्ञान और सम्यक्त्व ये तीन जीवके गुण सिद्ध होते हैं । अर्थात् देखना दर्शनगुण है, जानना ज्ञानगुण है और श्रद्धान करना सम्यक्त्वगुण है ।।१५।। १. गो० क. १३ । २. गो० क० १४ । ३. गो० क० १५ । 1. ब जीवगुणस्वरूपमाह ।

कर्मप्रकृति - सप्तमझानां नामानि दर्शयन्नाह- सिय अस्थि णत्थि उभयं अव्यत्तव्वं पुणो वि तत्तिदयं । दव्यं खु सत्तभंगं आदेसवसेण संभवदि ॥१६॥ न्यु स्कुटं द्रव्यं सप्तमङ्गं सम्भवति । केन ? आदेशवशेन पूर्वसूरिकथनवशेन । ते सप्त भङ्गाः के ? इति चेदुच्यन्ते-'सिय अस्थि' इत्यादि । साच्छन्दः प्रत्येकममिसम्बध्यते- स्यादस्ति १ स्यान्नास्ति २ स्यादस्तिनास्ति ३ स्यादवक्तव्यम् ४ । पुनरपि तृतीयं स्मादस्यवक्तव्यम् ५ स्यान्नास्त्यवक्तव्यम् ६ ग्यादस्मिनामन्यवनव्यम् ७ | तद्यथा- एकस्मिन्नविरोधेन प्रमाणनयवाक्यतः । सदादिकल्पना या च सप्तमङ्गीति सा मता ॥ ३ ॥ स्यादस्लि-स्याकजिन् विवक्षितप्रकारेण स्वव्यादिचतुष्टयापेक्षया दृब्यमस्तीत्यर्थः ।। [ स्थानास्ति-स्याकसिन् विवक्षितप्रकारेण परद्रव्यादिचतुष्टयापक्षया द्रव्यं नास्तीत्यर्थः २ ] स्यादस्ति- नास्ति-स्यान कचिन विवक्षितप्रकारेण क्रमेण स्वपरव्यादिचतुष्टयापेक्षया द्रव्यमस्तिनास्तीत्यर्थः ३ । म्यादयतव्यम्-स्यान कञ्चित् विवक्षितप्रकारेण युगपहनुमशक्य स्वात् 'क्रमप्रवत्तिनी मारती' ति वचनात् युगपन स्वपरल्यादिचतुष्टयापेक्षया दृव्यमवक्तव्यमित्यर्थः ४ । स्मादस्यवक्तव्यम् -स्यात कञ्चित् - अव सात भंग कैसे संभव हैं, इस वातको बतलाते हैं- वस्तु म्यान अम्तिरूप है, स्यात् नास्तिरूप है, स्यात् उभयरूप है और स्यात् अवक्तव्यरूप है । पुनः न्यात अम्ति अवक्तव्यरूप है, स्यात् नास्ति अवक्तव्यरूप है और स्यात् अस्ति-नास्ति अवक्तव्यम्य है । इस प्रकार प्रत्येक द्रव्यके प्रति उपर्युक्त सात भंग आदेश अर्थात् विवक्षाके वास संभव है ।॥१६॥ विशेपार्थ-यात शब्द, कथंचित् विवक्षाविशेपका वाचक है। प्रत्येक पदार्थ अपने न्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है, इसलिए वह स्यात् अम्तिरूप कहा जाता है । किन्तु वही पदार्थ अन्य द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा नहीं पाया जाना है, इसलिए वह स्यात् नास्तिरूप कहलाता है । अर्थात् प्रत्येक पदार्थ द्रव्यकी अपना अस्तिम्प है, और पर्यायकी अपेक्षा नास्तिरूप है। जब पदार्थ के इन अस्ति-नास्ति रूपोंकी कमाः कथन करनेकी विवक्षा होती है तब वह स्यात उभयरूप कहलाता है और जब इन दोनों ही धमकि एक नाथ कथन करनेकी विवक्षा होती है, तब वह स्यात् अवक्तव्यरूप सिद्ध होता है. इसका कारण यह है कि किसी भी वस्तु के परस्पर विरोधी दो धर्माका एक १ पंचाग्नि.१८॥ 1. नानो टीकापाटी भिन्नप्रकारः । नद्यथा-स्यात् कथञ्चित् स्वध्यादिचतुष्टयापेक्षया अयमग्नि ।। म्यान कथाशित परद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया द्रव्यं नास्ति । स्यात् कञ्चित् स्व-परद्रव्यादि- पायास या व्यतिनाति ३ । न्यान कजिन युगपःस्वपरव्यादिचतुष्टयापेक्षया बनुमशक्यत्या. दानवनव्यम् ।। ग्यान कदिन म्बद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया युगपन स्त्रपरद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया च दानमारय याव्यमययमव्यम् । म्यान क्रयन्चित परद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया युगपन स्वपरद्रव्यादि- बनवाया न वनमगरमबाद इयं नास्यवनव्यम् ६ । म्यान कश्चिास्त्रपरद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया माट ट्रयादिश्यापेक्षया च वरनुमगन्यवाद् द्रव्यमस्तिनास्यवक्तव्यम् ७ ।

प्रकृतिसमुत्कोत्तन १३ विवक्षितप्रकारेण स्वद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया युगपत् स्वपरद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया च द्रव्यमस्त्यवक्तव्य- मित्यर्थः ५। स्यानात्यवक्तव्यम्-स्यात् कचित् विवक्षितप्रकारेण परद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया युगपत् स्वपरद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया च द्रव्यं नास्त्यवक्तव्यमित्यर्थः ६ । स्यादस्तिनास्त्यवक्तव्यम् - स्यात् कथञ्चित् विवक्षितप्रकारेण क्रमेण स्वपरद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया युगपत् स्वारद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया च द्रव्यमस्ति- नास्त्यवक्तव्यमित्यर्थः । ४ एकमपि द्रव्यं कथं सप्तमगात्मकं भवतीति प्रश्ने परिहारमाह-यथैकोऽपि देव- दत्तो गौण-मुख्यविवझावशेन बहुप्रकारो भवति । कथमिति चेत् पुत्रापेक्षया पिता भण्यते, सोऽपि स्वकीय- पित्रपेक्षया पुत्रो भण्यते, मातुलापेक्षया भागिनेयो भण्यते, स एव भागिनेयापेक्षया मातुलो भण्यते, मार्या- पेक्षया भर्ता भण्यते, भगिन्यपेक्षया भ्राता भण्यते, विपक्षापेक्षया शर्मण्यते, इष्टापेक्षया मित्रं भण्यते इत्यादि । तथैकमपि द्रव्यं गौणमुखविवक्षावशेन सप्तभङ्गात्मकं भवतीति नास्ति दोष इति1 x ॥१६॥ अथ तदावरणानां पाटक्रमं प्रतीतिपूर्वकमाह- अन्भरिहिदादु पुव्वं णाणं तत्तो दु दंसणं होदि । सम्मत्तमदो विरियं जीवाजीवगदमिदि चरिमे ॥१७॥ अभ्यहि तात् पूज्यात् पूर्व ज्ञानं भणितम् , ''यञ्चाचितं द्वयोः, इति सूत्रसद्भावात् । ततो हि दर्शनं भवति । अतः सम्यक्त्वं भवति । वीर्य तु जीवाजीवेपु प्राप्तमिति हेतोः चरिम अन्ते पठितम् ॥१७॥ - साथ कहना असंभव है । इस प्रकार ये चार भंग सिद्ध हो जाते हैं। पुनः वक्ता जब वस्तुके अस्तिरूपके साथ अवक्तव्यरूप धर्मके कहनेकी विवक्षा करता है, तब स्यात्-अवक्तव्यरूप पाँचवाँ भंग बन जाता है । जब वस्तुके नास्तिरूपके साथ अवक्तव्यरूप धर्मके कहनेकी विवक्षा करता है, तव स्यात् नास्ति-अवक्तव्यरूप छठा भंग बन जाता है और जब अस्ति और नास्तिरूप दोनों धर्मों के क्रमशः कथन करनेके साथ युगपत् कथनकी विवक्षा करता है, तब स्यात् अस्ति-नास्ति-अवक्तव्यरूप सातवाँ भंग बनता है । गाथाकारने प्रारंभके चार भंगोंका स्पष्टरूपसे नाम-निर्देश करके शेष तीन भंगोंके जाननेकी सूचना 'पुणोवि तत्तिदयं' इस पदके द्वारा कर दी है। ये सात भंग जैन दर्शनके मूल या प्राण हैं, इसलिए प्रत्येक पदार्थका स्वरूप-वर्णन इसी सप्त भंगरूप वाणीके द्वारा किया जाता है, यही संकेत ग्रन्थकारने प्रस्तुत गाथाके द्वारा किया है । ग्रन्थकारने 'अत्थं देक्खिय जाणदि' इस गाथामें जिस क्रमसे जीवके गुणोंका निर्देश किया है, तदनुसार पहले दर्शनावरणका और पीछे ज्ञानावरण कर्मका निर्देश करना चाहिए था, परन्तु वैसा न करके पहले ज्ञानावरणकर्मका जो निर्देश आगम-परम्परामें पाया जाता है, सो क्यों ? इस शंकाका समाधान ग्रन्थकार युक्तिपूर्वक करते हैं- (जीवके सर्व गुणों में ज्ञानगुण प्रधान है, इसलिए, उसके आवरण करनेवाले कर्मका सबसे पहले नाम-निर्देश किया गया है। उसके पश्चात् दर्शन और सम्यक्त्वगुगके आवरण करने या घातनेवाले कर्मों का निर्देश किया गया है। वीर्यगुण शक्तिरूप है और यह शक्तिरूप गुण जीव और अजीव दोनों में पाया जाता है, इसलिए उसके घात करनेवाले अन्तराय कर्मका सब कर्मों के अन्तमें निर्देश किया गया है ।।१७।। १. गो० क० १६॥ 1. सन्दर्भोऽयं पञ्चास्तिकायजयसेनीयतात्पर्यवृत्या सह शब्दशः समानः । xव प्रतौ चिहान्तर्गतपाठो नास्ति। 2. व यचावित कर्मप्रकृति । बादीवि अबादि वा णिस्सेसं वादणे असक्कादो। णामनियणिमित्तादो विग्धं पठिदं अधादिचरिमम्हि ॥१८॥ अन्नगयकम बात्यपि अवानिवद ज्ञातव्यम् । कुतः ? निःशेषजीवगुणवातने अशक्यत्वात, नामगीन- बदनानिमितन्याची नामगार वेदनीयान्यव निमित्तं कारणं यस्यान्तरायस्य तत्ततम् । तस्मादधातिनां चन प्रानं पटिन पनि था। श्रायुनामगोत्रसंज्ञाघानिनां प्रान्त कथितम् । अथवा वातिनां चरम पटनम 3011 आवलेण अवविदि भवस्स इदि णाममाउपुव्वं तु । भवमम्मिय णीचुच्चं इदि गोदं णामपुव्यं तु ।।१६।। पुन. आयुर्वलाधानेना िवस्थिति: । कस्य ? नामकर्मकायंगतिलक्षणभवस्य । इति हतोः नामकर्म अ.युःकर्मपूर्वकं भवनि । श्रायु.कर्म पूर्वमन्यति नामकर्मणः । तत्तु पुन: गतिलक्षणभवमाश्रित्य नीचव- मुजन्यं चरिताः गोत्रकम नामकमपूर्वकं कधिनम् । नामकर्म पूर्व यस्य गोत्रस्य तत ॥१९।। बादि व वेयणीयं मोहस्स वलण घाददे जीवं । इदि बादाणं मम मोहम्सादिम्हि परिदं तु ॥२०॥ बदनीयं व मं घानिकर्मबन मोहनीयविशेषरत्यरन्युदयालेनैव जी घातयति, सुखदुःखरूपसाता- माननिमिनेन्द्रियविषयानुभयनन हन्नीनि हेनोः यातिकर्मणां मध्ये मोहनीयस्यादी वेदनीयं परितम् ॥२०॥ हुए कहते हैं- - यहाँपर पुनः शंका उत्पन्न होती है कि अन्तराय तो घातियाकर्म है उसका अघा- निया क्रमांक अन्तमें क्यों नाम-निर्देशो किया गया है ? ग्रन्थकार इसका समाधान करते यद्यपि अन्नगय बानिया कर्म है, तथापि(अघालिया कर्माके समान वह जीवके वीर्थ- गुगको सम्पूर्णरूपये चान करने में समर्थ नहीं; तथा नाम, गोत्र और वेदनीय इन तीन कर्मों के निमिनग्ये हा वह अपना कार्य करता है, इसलिए उसे अघातिया कर्मकि अन्तमें कहा गया है। अाय ग्रन्थकार शेप कौक क्रमकी सार्थकता बतलाते हैं- आयुकमक बळग जीवका विवक्षित भव या चतुर्गतिरूप संसारमें अवस्थान होता है, इसलिए भायुकर्मके निर्देशक पश्चात नामकर्मका निर्देश किया गया है । तथा हारीररूप भवका आयकर ही नीच और ऊँचपनका व्यवहार होता है, इसलिए नामकर्मके पश्चात् गोत्र- कर्मका निर्देग किया गया है ।। यहां पर शंका उत्पन्न होती है कि वंदनीय कर्म तो अघातिया है, फिर उसका पाठ जानिया काक वाचम क्यों किया गया है ? इसका ग्रन्थकार समाधान करते हैं- बानि बदनीयकम अवानिया है, नथापि वह मोहनीयकर्म के बलसे घानिया कमकि समान जीयका पान करना है, इसलिए बानिया कमकि मध्यमें और मोहनीय कर्मके आदि मया नामनिर्दा किया गया है ॥२०॥ B. २०१:.यपदि। ४. गो०१.०१८।५. गो. क.०१२।

? ? प्रकृतिसमुत्कीर्तन १५ णाणस्स दंसणस्स य आवरणं वेयणीय मोहणियं । आउग णामं गोदंतरायमिदि पठिदमिदि सिद्धं ॥२१॥ ज्ञानावरणीयं १ दर्शनावरणीयं २ वेदनीयं ३ मोहनीयं ४ आयुः ५ नाम ६ गोत्रं ७ अन्तरायः ८ इति पूर्वोक्तपाठक्रम एवं सिद्धः । तेषां निरुक्तिः कथ्यते–ज्ञानमावृणोतीति ज्ञानावरणीयम् । तस्य का प्रकृतिः ? ज्ञानप्रच्छादनता । किंवत् ? देवतामुखवस्त्रवत् । दर्शनमावृणोतीति दर्शनावरणीयम् । तस्य का प्रकृति: ? दर्शनप्रच्छादनता। किं वत् ? राजद्वारप्रतिहारवत् । राजद्वारे प्रतिनियुक्तप्रतिहारवत् । वेदयतीति वेदनीयम् । तस्य का प्रकृतिः ? सुखदुःखोत्पादनता । किंवत् ? मधुलिप्तासिधारावत् । मोहयतीति मोह- नीयम् । तस्य का प्रकृतिः ? मोहोत्पादनता। किंवत् ? मद्यधत्तूरमदनकोद्रववत् । भवधारणाय एति गच्छतीत्यायुः । तस्य का प्रकृतिः ? अवधारणता। किंवत् ? शृङ्खलाहडिवत् । नाना मिनोतीति नाम । तस्य का प्रकृति: ? नर-नारकादिनानाविधकरणता । किंवत् ? चित्रकारकवत् । उच्चं नीचं गमयतीति गोत्रम् । तस्य का प्रकृतिः ? उच्चत्वनीचत्वप्रापकता। किंवत् ? कुम्भकारवत् । दातृ-पानयोरन्तरमेतीत्यन्त- रायः । तस्य का प्रकृतिः ? विघ्नकरणता । किंवत् ? भाण्डागारिकवत् ॥२१॥ जीवपएसेक्फेक्के कम्मपएसा हु अंतपरिहीणा । होति घणणिविडभूओ संबंधो होइ णायव्वो ॥२२॥ जीवराशिरनन्तः । प्रत्येकमेकैकस्य जीवस्यासङ्ख्याताः प्रदेशाः । आत्मन एकैकस्मिन् प्रदेशे कर्म- प्रदेशाः हु स्फुटं अन्तपरिहीना इति अनन्ता भवन्ति । एतेषां प्रात्म-कर्मप्रदेशानां सम्यक् वन्धो भवति सम्बन्धः । किलक्षणो ज्ञातव्यः ? घननिबिडभूतः-धनवत् लोहमुद्गरवत् निविडभूतः दृढतर इत्यर्थः॥२२॥ अत्थि अणाईभृओ बधो जीवस्स विविहकम्मेण । तस्सोदएण जायइ भावो पुण राय-दोसमओ ॥२३॥ जीवस्य विविधकर्मणा सह अनादिभूतो बन्धोऽस्ति । तस्य व्यकर्मवन्धस्योदयेन जीवस्य पुनः रागद्वेषमयः भावः परिणामः भावकर्म इति यावत् जायते उत्पद्यते ॥२३॥ - भावार्थ-जब तक जीवके मोहकर्मका सद्भाव रहता है, तब तक ही वेदनीकर्म जीवको सुख-दुःखका अनुभव कराकर उसे अपने ज्ञानादिगुणोंमें उपयुक्त नहीं रहने देता, प्रत्युत पर पदार्थोमें सुख-दुःखकी कल्पना उत्पन्न कर उन्हें सुखी या दुःखी बनाता रहता है इस कारण उसका नाम-निर्देश मोहकर्मके पूर्व घातिया कर्मोके वीचमें किया गया है। इस प्रकारसे कर्मोंका जो पाठक्रम सिद्ध हुआ उसका ग्रन्थकार उपसंहार करते हैं- ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय, इस प्रकारसे आगममें जो कर्मोके पाठका क्रम है वही युक्ति-पूर्वक सिद्ध होता है ।।२१।। अव ग्रन्थकार जीवके प्रदेशोंके साथ कर्मके प्रदेर्शोके सम्बन्ध होने का निरूपण कहते हैं (जीवके एक-एक प्रदेश के ऊपर कर्मोंके अन्न-परिहीन अर्थात् अनन्त प्रदेश अत्यन्त सघन प्रगाढ़ रूपसे अवस्थित होकर सम्बन्धको प्राप्त हो रहे हैं, ऐसा जानना चाहिए । अब ग्रन्थकार(जीव और कर्मके अनादिकालीन सम्बन्धोका निरूपण करते हैं- इस जीवका नाना प्रकार के कर्मों के साथ अनादिकालीन सम्बन्ध है। पुनः उन कोंके उदयसे जीवके राग-द्वेषमय भाव)उत्पन्न होता है ।।३३॥ १. गो० क० २० । २. भावसं० ३२५ । ३. क कम्मेहिं । ४. भावसं० २६ ।

. १६ कर्मप्रकृति भावेण तेण पुणरवि अण्णे बहुपुग्गला हु लग्गति । जह तुप्पियगत्तस्स य णिविडा रेणुन्ध लग्गति ॥२४॥ पुनरपि तेन रागद्वेषमयेन भावेन अन्ये बहवः कर्मपुद्गलाः आत्मनः लगन्ति बन्धं प्राप्नुवन्ति । यथा नविलितगात्रस्य निविडा रंणवो लगन्ति, 1+ तथा रागद्वे पक्रोधादिपरिणामस्निग्धार लितास्मनः निविदकमरजमा लगन्नीत्यर्थः+ ॥२१॥ एकसमएण बद्धं कम्मं जीवेण सत्तभेएहिं । परिणमइ आउकम्मं बंधं भूयाउ [ भुत्ताउ ] सेसेणे ॥२५॥ जीवन एकममयेन बद्धं यत्कर्म तत्कर्म आयुष्कर्म बिना ज्ञानावरण-दर्शनावरण-वेदनीय-मोहनीय-नाम- गोवान्नरायमतभेदः परिणमनि बन्धं प्रामोति । च पुनः यदायुःकर्म तद् भुक्तायुःशेषेण भुक्तायुस्तृतीयभागेन विभागानुक्रमण बन्धं प्राप्नोति ॥२५॥ पुनः उम(गाग-द्वेपमय भावके निमित्तसे बहुतसे अन्य कर्मपुद्गल-परमाणु जीवके साथ मम्बन्धको प्राप्त होते हैं । जैसे कि (घृनसे लिप्त शरीर के साथ धूलिकण अति सघनताके साथ) चिपक जाते है ।।२४|| अब ग्रन्धकार एक समयमें बंधनेवाले कांके विभागका क्रम वतलाते हैं- (जीवके द्वारा एक समयमें बांधा गया कर्म आयुकर्म के विना शेष सात कर्मीके स्वरूपसे परिणमिन होता है । किन्तु जो आयु कर्म है, वह भुज्यमान आयुके (त्रिभागके) शेप-शेप रहने पर बन्धकी प्राप्त होता है ।।२५।। भावार्थ-जीवके राग-द्वेपम्प भावोंका निमित्त पाकर प्रति समय जो अनन्त कर्म- परमाणु आत्माके साथ सम्बन्धको प्राप्त होते हैं, वे प्रति समय ही आयुकर्मके विना शेप सात कर्मक रूपसे परिणत होते रहते हैं। किन्तु आयु कर्मका बन्ध प्रति समय नहीं होता, किन्तु जो आयु कर्म भोगा जा रहा है, उसके दो भाग भोग लिये जानेपर तथा तीसरा भाग शेप रहनेपर नवीन आयुका बन्ध होगा। यदि इस प्रथम विभागके शेप रहनेपर परभव-सम्बन्धी : आयुका बन्ध किसी कारणसे नहीं हो सके, तो शेप जो आयु बची है, उसके भी दो भाग भोग देने और एक भाग शेष रहनेपर नवीन आयुका बन्ध होगा। यही नियम आगे भी जानना चाहिए। जैसे यदि किसी जीवकी आयु'८१ वर्षकी हो, तो उसके(५४ वर्ष व्यतीत होनेपर एक अन्न हत्ती काल नक नवीन आयुके बन्धका अवसर प्राप्त होगा। यदि किसी कारणवश उस ममय आयु-बन्ध न हो, नो शप जो २७ वर्ष बची है, उनमेंसे दो भाग बीतने और एक भागके प रहने पर अर्थान ७२ वर्षकी आयुमं श्रायु-बन्धका अवसर प्राप्त होगा। इसके भी खाली जानेर वर्षमै नीमरी बार नवीन आयुके बन्धका अवसर प्राप्त होगा। इसी प्रकार आगे भी जानना । इस प्रकार भुज्यमान आयुके विभाग शेप रहनेपर आठ अवसर नवीन आयुबंध- क. प्रान होते है । यदि इन सभी विभागों में नवीन आयुका बन्ध न हो सके, तो मरणसे कुछ का पूर्व नियम नवीन आयुका बन्धे हो जायेगा। यहाँ इतना विशप ज्ञातव्य है कि किसी जीयक नवीन आयुका बन्ध एक ही विभागमें होता है, किसीके दो विभागों में होता है, इस प्रया अधिक अधिक आठ बार नक जीव विवक्षित एक ही आयुका बन्ध कर सकता है। - .. प्रकृतिसमुत्कीर्तन सो बंधो चउभेओ णायव्यो होदि सुत्तणि दिडो । पयडि-द्विदि-अणुभाग-पएसबंधो पुरा कहियो ॥२६॥ स पूर्वोक्तकर्मवन्धश्चतु दो ज्ञातव्यो भवति । स कथम्भूतः ? जिनागमे कथितः। ते चत्वारो भेदाः के ? प्रकृतिस्थित्यनुभागप्रदेशाः । बन्धस्य अयं भेदः पुरा पूर्वोक्तगाथासु कथितः । उहि प्रकृतिः परिणामः स्यात् स्थितिः कालावधारणम् । अनुभागो रसो ज्ञेयः प्रदेशः प्रवयात्मकः1 ॥ ४ ॥ पूर्वोक्तज्ञानावरणादिकर्मणां क्रमेण दृष्टान्तमाह- पड-पडिहारसिमजा-हडि-चित्त-कुलाल भंडयारीणं । जह एदेसिं भावा तहविह कम्मा मुणेयव्वा ॥२७॥ देवतामुखवस्त्र १ राजद्वारप्रतिनियुक्तप्रतिहार २ मधुलिप्तासिधारा ३ मद्य ४ हडि- ५ चित्रक ६ कुलाल ७ भाण्डागारिकाणां ८ एतेषां मावा यथा तथैव यथासङ्ख्यं ज्ञानावरणादिकर्माणि ज्ञातव्यानि ॥२७॥ २ अव ग्रन्थकार बन्धके भेदोका निरूपण करते हैं- जीवके एक समयमें जो कर्मवन्ध होता है, वह प्रकृति, स्थिति, अनुभाग और प्रदेश वन्धके रूपसे आगमसूत्र में चार प्रकारका पुरातन आचार्यों-द्वारा निर्देश किया गया है, ऐसा जानना चाहिए ॥२६॥ विशेषार्थ-प्रतिसमय बँधनेवाले कर्म परमाणुओंके भीतर ज्ञान दर्शन आदि आत्म- गुणोंको आवरणादि करनेका जो स्वभाव पड़ता है, उसे प्रकृतिबन्ध कहते हैं । वे बँधे हुए कर्म-परमाणु जितने समय तक आत्माके साथ रहेंगे, उस कालकी मर्यादाको स्थितिवन्ध कहते हैं । उन कर्म-परमाणुओंमें जो सुख-दुःखादिरूप फल देनेकी शक्ति होती है उसे अनुभागबन्ध कहते हैं और आनेवाले कर्म-परमाणुओंका जो पृथक्-पृथक् कर्मों में विभाजन होकर आत्माके साथ सम्बन्ध होता है, उसे प्रदेशबन्ध कहते हैं । अव दृष्टान्तपूर्वक आठों कर्मोंके स्वभावका निरूपण करते हैं- पट (वस्त्र), प्रतीहार ( द्वारपाल ), मधु-लिप्त असि, मद्य ( मदिरा), हलि (पेरको फाँसकर रखनेवाला काठका यन्त्र-खोड़ा), चित्रकार, कुलाल ( कुम्भकार ) और भण्डारीके जैसे अपने-अपने कार्य करनेके भाव होते हैं उसी प्रकार क्रमसे जाठों कर्माके कार्य जानना चाहिए ॥२७॥ विशेषार्थ-ज्ञानके आवरण करनेवाले कर्मको ज्ञानावरण कहते हैं । इसका स्वभाव देव-मूर्त्तिके मुखपर ढके हुए वस्त्र के समान है। जिस प्रकार देवमूर्ति के मुखपर ढका हुआ वस्त्र) देवतासम्बन्धी विशेप ज्ञान नहीं होने देता उसी प्रकार (ज्ञानावरण कर्म ज्ञानको रोकता है, उसे प्रकट नहीं होने देता)आत्माके दर्शनगुणको आवरण करनेवाले कर्मको दर्शनावरण कहते हैं। इसका स्वभाव द्वारपालके समान कहा है। जैसे द्वारपाल आगन्तुक व्यक्तिको राजद्वार- पर ही रोक देता है, भीतर जाकर राजाके दर्शन नहीं करने देता, उसी प्रकार यह कर्म भी १. भावतं० ३२९ । २. गो० क० २१ । 1. सं० पञ्चमं० १, ३६६। व प्रतो नात्ययं श्लोकः । 2. वा हलि । ३ कर्मप्रकृति अथाष्टकर्मणां ज्ञानावरणादीनामुत्तरप्रकृतिसङ्ख्याथं तेपां च स्वभावनिदर्शनार्थं गाथाष्टकमाह-- णाणावरणं कम्मं पंचविहं होइ सुत्तणिदि। जह पडिमावरि खित्तं कप्पडयं छादयं होई ॥२८॥ जानावरणं कम पञ्चविधं सूत्रनिर्दिष्टं जिनागमे कथितं भवति । तत्स्वभावदृष्टान्तमाह-यथा प्रनिमोपरि क्षिप्तं कपटकं छादकं भवति, तथा ज्ञानावरणं कर्म जीवगुणज्ञानाच्छादकं भवति ॥२८॥ दसण-आवरणं पुण जह पडिहारो हु णिवदुवारम्हि । तं णवविहं पउत्तं फुडत्थवाईहि सुत्तम्हि ॥२६॥ पुनः दर्गनावरणं कर्म किं स्वभावम् ? यथा नृपद्वारे प्रतिहारः राजदर्शननिषेधको भवति, तथा कांनावरण कम बन्नुदर्शननिषेधकं भवति । तद्दर्शनावरणं कर्म नवप्रकारं स्फुटार्थवाग्भिर्गणधरदेवादिभिः1 मृो मिदान्त प्रोक्तम् ॥२९॥ आत्माके दर्शनगुणको प्रकट नहीं होने देता। जो सुख-दुःखका वेदन या अनुभव करावे, उसे बदनीय कर्म कहते हैं । इसका स्वभाव शहद लपेटी तलवारकी धारके समान है जिसे चखनेसे पहले कुछ सुख होता है परन्तु पीछे जोभके कट जानेपर अत्यन्त दुःख होता है । इसी प्रकार साता और असाता वेदनीय कर्म जीवको सुख और दुःखका अनुभव कराते हैं । जो जीवको मोहित या अचेत करे उसे मोहनीय कर्म कहते हैं इसका स्वभाव मदिराके समान है । जैसे मदिरा जीवको अचेन कर देती है उसी प्रकार मोहनीय कर्म भी आत्माको मोहित कर देता है उसे अपने स्वरूपका कुछ भी मान नहीं रहता। जो जीवको किसी एक पर्याय-विशेपमें रोक . रग्बना है उसे आयुकर्म कहते हैं। इसका स्वभाव लोहेकी साँकल या काठके खोड़ेके समान है। जिस प्रकार साँकल या काठका खोड़ा मनुष्यको एक ही स्थानपर रोक रखता है, दूसरे स्थान- पर नहीं जाने देना; उसी प्रकार आयुकर्म भी जीबको मनुष्य-पशु आदिकी पर्यायमें रोक रखता है । जो शरीर और उसके अंग-उपांग आदिकी रचना करे उसे नामकर्म कहते हैं। इसका स्वभाव चित्रकार के समान है। जैसे चित्रकार अनेक प्रकारके चित्र बनाता है उसी प्रकार (नामकर्म भी जीवक मनुष्य-पगु आदि अनेक रूपोंका निर्माण करता है।) जो जीवको ऊँच या नौच कुलमें उत्पन्न करे उसे गोत्र कर्म कहते हैं। इसका स्वभाष कुम्भकारके समान है। जैसे कुम्भकार मिट्टीके छोटे-बड़े नाना प्रकार के बरतन बनाता है उसी प्रकार गोत्रकर्म भी जीवको ऊँच या नीच कुलमें उत्पन्न करता है । जो जीवको मनोवांछित वस्तुकी प्राप्ति न होने द, उस अन्तगय कर्म कहते हैं। इसका स्वभाव राजभण्डारीके समान है। जैसे भण्डारी दृमरेको इच्छित द्रव्य प्रान करनेमें विन्न करता है उसी प्रकार अन्तराय कर्म भी जीवको इन्छिन वन्तुकी प्रानि नहीं होने देता। बानावरण कर्म आगममूत्र में पाँच प्रकारका कहा गया है । जिस प्रकार प्रतिमाके ऊपर पड़ा हुआ कपड़ा प्रतिमाका आच्छादक होता है उसी प्रकार यह कर्म आत्माके ज्ञानगुणका आच्छादन करता है | जिम प्रकार गजद्वारपर बैठा हुआ प्रतिहार ( द्वारपाल ) किसीको राजाके दर्शन नहीं करने देना कमी प्रकार दानावरणकर्म आत्माक दर्शन नहीं करने देता। यह कर्म स्पष्टवादी आचाोंने परमागममत्रमें नौ प्रकारका कहा है ॥२०॥ १.१२. व त्यागिदि । ३. नावनं० ३३२ । ! दलितः। 2. व कथिनन् ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन १६ महुलित्तखग्गसरिसं दुविहं पुण होइ वेयणीयं तु । सायासायविभिण्णं सुह-दुक्खं देइ जीवसे ॥३०॥ पुनः वेदनीयं कर्म द्विविधं भवति । कथम्भूतम् ? मधुलिप्तखड्गसदृशम् । तत्सातासातभेदप्राप्त सत् जीवस्य सुख-दुःखं ददाति ॥३०॥ मोहेइ मोहणीयं जह मयिरा अहव कोवा पुरिसं । तं अडवीसविभिण्णं णायचं जिणुवदेसेण ॥३१॥ मोहनीयं कर्म प्रात्मानं मोहयति । यथा पुरुष मदिरा मोहयति । अथवा कोद्वाः पुरुषं मोहयन्ति । तन्मोहनीयं अष्टाविंशति-भेदभिन्नं जिनोपदेशेन ज्ञातव्यम् ॥३१॥ आऊँ चउप्पयारं णारय-तिरिच्छ-मणुय-सुरगइगं । हडिखित्त पुरिससरिसं जीवे भवधारणसमत्थं ॥३२॥ आयुःकर्म चतुःप्रकारम्-नारक-तिर्यङ्-मनुष्य-सुरगतिप्राप्तं सत् । कथम्भूतम् ? हडिक्षितपुरुष- सहशम् । पुनः ? जीवानां भवधारणसमर्थ भवति ॥३२॥ चित्तपडं व विचित्तं णाणाणामे णिवत्तणं णाम। तेयाणवदी गणियं गइ-जाइ-सरीर-आईयं ॥३३॥ नामकर्म गति-जाति-शरीरादिकं बिनवति ५३ रूङख्यागणितं भवति । पुनः तन्नामकर्म किम्भूतम् ? चित्रपटवद् विचित्रं मवति । पुनः किम्भूतम् ? नानाप्रकारनामनिप्पादकं मवति ॥३३॥ गोदं कुलालसरिसं णीचुचकुले सुपायणे दच्छं। घडरंजणाइकरणे कुंभायारो जहा णिउणो ॥३४॥ गोत्रं कर्म कुलालसदृशं नीचोच्चकुलेषु समुत्पादने दक्षं समर्थ भवति । यथा कुम्मकारो 'घटरञ्ज. किं लक्षणम् मधुलिप्त खड्गके सदश वेदनीयकर्म है । वह दो प्रकारका है, जो सातावेदनीयकर्म है वह जीवको सुख देता है और जो असातावेदनीय कर्म है वह जीवको दुःख देता है ॥३०॥ जिस प्रकार मदिरा अथवा मत्तौनिया कोदों पुरुपको मोहित करते हैं उसी प्रकार मोहनीयकर्म जीवको मोहित करता है । जिनेन्द्रदेवके उपदेशसे उसे अट्ठाईस भेदरूप जानना चाहिए ||३१|| नारक, तिर्यच, मनुष्य और देवायुके भेदसे आयुकर्म चार प्रकारका कहा गया है । यह कर्म हडि (खोड़े) में डाले गये पुरुषके सदृश जीवोंको किसी एक भवमें धारण करनेके लिए समर्थ है ॥३२॥ चित्रकार के सदृश नामकर्म जीवके नानाप्रकारके आकारोंका निर्माण करता है। यह गति, जाति, शरीर आदिके भेदसे तेरानवे प्रकारका कहा गया है ।।३।। कुलाल (कुम्भकार ) के सदृश गोत्रकर्म नीच और उचकुलोंमें उत्पादन करने में समर्थ कहा गया है। जिस प्रकार कुम्भकार घट-सिकोरा आदि बनाने में निपुण होता है उसी प्रकार १. भावसं० ३३४ । २. व जिह। ३. भावतं० ३३३ । ४. वा। ५. भावतं० ३३५ । ६. व पडन्ध । ७. भावसं० ३३६ । ८. ज समुपायणे । ९. भावसं० ६३७ । 1. व घटालंजरादिकरणे।

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१ प्रकृतिसमुत्कीर्तन २१ स्पर्शनादीन्द्रियाणां स्थूलविषयेषु ज्ञानजननशक्तित्वात् सूक्ष्मापु परमाणुपु अन्तरितार्थेपु नरकस्वर्गपटला- दिषु दूरार्थेषु मेर्वादिपु ज्ञानजननशक्तिर्न सम्भवतीत्यर्थः । अनेन मतिज्ञानस्वरूपं निवेदितम् । तत्कथम्भूतम् ? अनिन्द्रियेन्द्रियजम्-अनिन्द्रियं मनः, इन्द्रियाणि स्पर्शनादीनि पञ्च । एभ्यो जातं अनिन्द्रियेन्द्रियजम् । अनेन इन्द्रिय-मनसां मतिज्ञानोत्पत्तिकारणत्वं भणितमिति मतिज्ञानं षोढा कथितम् । पुनः प्रत्येकैकस्य मतिज्ञानस्य अवग्रहादयश्चत्वारो भेदा भवन्ति । तद्यथा—मानसोऽत्रग्रहः १ मानसीहा २ मानसोऽवायः ३ मानसी धारणा ४ इति चत्वारः । एवं स्पर्शनेन्द्रियजाः अवग्रहादयश्चत्वारः ४ । रसनजाः अवग्रहा- दयश्चत्वारः ४ । घ्राणजाः अवग्रहादयश्चत्वारः ४ । चाक्षुषाः अवग्रहादयश्चत्वारः ४.। श्रोत्रजाः अवग्रहादय- श्चत्वारः ४ । एवं मतिज्ञानभेदाश्चतुर्विशतिः २४ भवन्ति । बहुः १ अबहुः २ बहुविधः ३ अबहुविधः ४ क्षिप्रः ५ अक्षिप्रः ६ अनिस्सृतः ७ निस्सृतः ८ अनुक्तः ९ उक्तः १० ध्रुवः ११ अध्रुवः १२ एतैर्द्वादशभि- गुणिताश्चतुर्विशतिः २४ मतिज्ञानस्य भेदाः अष्टाशोत्युत्तरद्विशतं २८८ भवन्ति । एते अष्टाशीत्यधिक- द्विशतभेदाः २८८ अर्थस्य स्थिरस्थूलरूपस्य पदार्थस्य भवन्ति । व्यञ्जनस्य अव्यक्तवस्तुनः एकोऽवग्रहो भवति । स तु व्यञ्जनावग्रहः वादिभिर्दादशभिः १२ गुणितः द्वादशनकारो भवति । स तु द्वादशात्मक: चक्षुरनिन्द्रियाभ्यां विना स्पर्शनरसनघ्राणश्रोत्रैश्चतुर्भिः ४ गुणितोऽष्टचत्वारिंशत् ४८ भेदा भवन्ति । एवं एकत्रीकृताः पत्रिंशदधिकत्रिशतभेदाः ३३६ मतिज्ञानस्य भवन्ति । मतिज्ञानमावृणोतीति 1शानियतेऽनेन वेति मतिज्ञानावरणीयम् ॥३७॥ अथ श्रुतज्ञानस्वरूपमाह- अत्थादो अत्यंतरमुवलंभं तं भणंति सुदणाणं । आभिणिवोहियपुव्वं णियमेणिह सद्दजप्पमुहं ॥३८॥ अर्थात् मतिज्ञानेन निश्चितार्थात् अर्थान्तरं तत्सम्बाद अन्यार्थ उपलभ्यमानं ज्ञायमानं श्रुतज्ञाना- विशेषार्थ-स्थूल, वर्तमान योग्य क्षेत्रमें अवस्थित पदार्थको अभिमुख कहते हैं। प्रत्येक इन्द्रियके निश्चित विषयको नियमित कहते हैं। इन दोनों प्रकारके पदार्थोंका मन और इन्द्रियोंकी सहायतासे जो ज्ञान होता है उसे आभिनिबोधिक या मतिज्ञान कहते हैं। इस प्रकार पाँच इन्द्रिय और मनकी अपेक्षा उक्त ज्ञानके छह भेद)होते हैं। इसमें भी प्रत्येकके अवग्रह, ईहा, अवाय और धारणा ये चार-चार भेदोहोते हैं । वस्तुके सामान्य ज्ञानको अवग्रहो कहते हैं,जैसे कि यह मनुष्य है। इससे अधिक विशेष जाननेकी इच्छाको ईहो) कहते हैं जैसे कि यह मनुष्य दाक्षिणी है या उत्तरी। इसीके आकार-प्रकार एवं बोल-चाल आदिके द्वारा निश्चय करनेको अवाय) कहते हैं, जैसे कि उक्त मनुष्य दक्षिणी ही है। और आगे कालान्तरमें इसे नहीं भूलनेको धारणा)कहते हैं। पुनः उनके बहु, बहुविध आदि बारह प्रकारके पदार्थोकी अपेक्षा ( २४४ १२=२८८) दो सौ अठासी भेद हो जाते हैं । (ये सब अर्थावग्रहके भेद हैं । व्यक्त पदार्थके ज्ञानको अर्थावग्रह)कहते हैं । अव्यक्त पदार्थके जाननेको व्यंजनावग्रहो कहते हैं। यह मन और नेत्रइन्द्रियके विना शेप चार इन्द्रियोंसे केवल अवग्रह रूप ही होता है और बहु- आदि बारह पदार्थोंकी अपेक्षा उसके (४४१२=४८) अड़तालीस भेद होते हैं। इन्हें उपर्युक्त दो सौ अठासी भेदोंमें जोड़ देनेपर (२८८+ ४८= ३३६) तीन सौ छत्तील भेद मतिज्ञानके हो जाते हैं। १. श्या 'सत्थज' इति पाठः। २. पञ्चसं० १, १२२ । गो० जी०६१४ । 1. व पाठोऽयं नास्ति ।

कर्मप्रकृति वरणीयान्तराचक्षयोपशमनानं जीवस्य ज्ञानपर्यायं श्रुतज्ञानम् , इति मुनीश्वरा भणन्ति । तत्कथं भवेत् ? आमिनिवाधिकपूर्व नियमन आमिनित्राधिकं मतिज्ञानं पूर्व कारणं यस्य तदाभिनियोधिपूर्व मतिज्ञाना- वरगारममन मनिज्ञान एवं मुत्पद्यते । पश्चात्तद्-गृहीतार्थमवलम्ध्य तबलाघानेनार्थान्तरविषयं श्रुतज्ञान- मुपद्यते । इहास्मिन श्रुतज्ञानप्रकरणे अक्षरानक्षरात्मकयोः शब्दज-लिङ्गजयोः श्रुतज्ञानभदयोर्मध्ये शब्द वर्गपदयायामकगद जनितं ध्रुवजातं1 ज्ञानं प्रमुखं प्रधानं दत्तग्रहणशास्त्राध्ययनादिसकलव्यवहाराणां तन्मूलयात् । अनक्षरात्मकं तु लिङ्गजं ध्रुवज्ञान मेकेन्द्रियादि-पञ्चेन्द्रियपर्यन्तेपु जीवेषु विद्यमानमपि व्यवहारानुपयोगित्वादप्रधानं भवति । श्रूयते श्रोत्रेन्द्रियेण गृह्यते इति श्रुतः शब्दः, तस्मादुत्पन्नमर्थज्ञानमिति घ्युत्पनरक्षरात्मकप्राधान्याश्रयणा प्रधान [ मक्ष रामकं श्रुतज्ञानम् । ] श्रुतज्ञानमावृणोति, "आवियतेऽनेनेति या शुनज्ञानावरणीयम् ॥३८॥ अवधिज्ञानम्वरूपमाह- अवधीयदि त्ति ओही सीमाणापत्ति वणियं समये । भव-गुणपञ्चय विहियं जमोहिणाणेत्ति णं विति ॥३६।। अवधीयते वृध्यक्षेत्रकालमावैः परिमीयते मर्यादीक्रियत इत्यवधिः । मतिश्रुतकंवलबद् च्यादिमिरपरि- मिनविषयवाभावात यननीय मीमाविषयं ज्ञानं समय परमागमे जिनेन कथितं तदिदमवधिज्ञानमित्य- दादयो यन्नि । नन्कनिप्रकारम् ? मव-गुण प्रत्ययविहितम् । भवो नारकादिपर्यायः । गुणः सम्यग्दर्शन- विटा वादिः । भव-गुणी नारकादिपर्यायसम्यग्दर्शनविशुद्याद्या प्रत्ययों कारणे निमित्ती ताभ्यां विहितं उन.मयाणप्रत्ययविहितम् । भवप्रत्ययावेन गुणप्रत्ययस्वेन च अवधिज्ञानं द्विविधं कथितमित्यर्थः। भव- मरयावधिनानं सुराणां नारकाणां चरमभवतीर्थकराणां च सम्भवति । गुणप्रत्ययमवधिज्ञानं पर्याप्तानां नराणां मंजिनेन्द्रियपर्याप्ततिरक्षां च सम्भवति । तदुनं श्रीगोम्मटसार- भवपञ्चयगी सुर-णिरयाणं तिव्ययि सवअंगुत्थी । गुणपश्चयगी गर-तिरियाणं संखादिचिहभवा ॥५॥ ?

प्रकृतिसमुत्कीर्तन ૨૩ ज्ञानं भवति । तिरश्चां पञ्चेन्द्रियसंज्ञिपर्याप्तानां नाभेपरि शङ्ख-पद्म-स्वास्तकादशुभाचह्नमशस्थावधिज्ञानं भवति । अवधिज्ञानमावृणोत्याव्रियतेऽनेनेति वा अवधिज्ञानावरणीयम् ॥३६॥ अथ मनःपयर्ययज्ञानस्वरूपमाह- चिंतियमचिंतियं वा अद्धं चिंतियमणेयभेयगयं । मणपज ति वुच्चइ जं जाणइ तं खु णरलोए' ॥४०॥ चिन्तितं चिन्ताविषयीकृतम् , अचिन्तितं चिन्तयिष्यमाणम् , अर्धचिन्तितं असम्पूर्णचिन्तितं वा इत्यनेकभेदगतमर्थं परमनसि स्थितं यज्ज्ञानं जानाति तत् खु स्फुटं मनःपर्ययज्ञानमित्युच्यते । तस्योत्पत्ति- प्रवृत्ती नरलोके मनुष्यक्षेत्रे एव; न तु तद्वहिः तन्मनःपर्ययज्ञानं द्विविधस्-ऋजुमतिविपुलमतिभेदात । मनःपर्ययज्ञानमावृणोत्याब्रियतेऽनेनेति वा मनःपर्ययज्ञानावरणीयम् ॥४०॥ केवलज्ञानस्वरूपमाह- संपुण्णं तु समग्गं केवलमसवत्त सव्वभावगयं । लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेयव्यं ॥४१॥ जीवद्रव्यस्य शक्तिगतसर्वज्ञानाविभागप्रतिच्छेदानां व्यक्तिगतत्वात्सम्पूर्णम् । मोहनीय-वीर्यान्तराय- निरवशेषक्षयात् अप्रतिहतशक्तियुक्तत्वाञ्च समग्रम् । द्वितीय सहायनिरपेक्षत्वात्केवलम् । घातिचतुष्टय- प्रक्षयादसपत्नम् । क्रमकरणव्यवधानरहितत्वेन सकल पदार्थगतत्वात्सर्वभावगतम् । लोकालोकयोविंगतति- सीमित जाननेकी अपेक्षा परमागममें इसे सीमाज्ञान कहा गया है। जिनेन्द्रदेवने इसके दो भेद कहे हैं । एक भव-प्रत्यय अवधि और दूसरा गुण-प्रत्यय अवधि ॥३६॥) विशेपार्थ-नारक और देवभवकी अपेक्षासे अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होकर जो अवधिज्ञान उत्पन्न होता है उसे भव-प्रत्यय-अवधि) कहते हैं । यह देव, नारकी और तीर्थंकरोंक होता है । (जो अवधिज्ञान सम्यग्दर्शनादि गुणोंको अपेक्षासे अवधिज्ञानावरण कर्मका क्षयोपशम होकर उत्पन्न होता है उसे गुण-प्रत्यय अवधि कहते हैं। यह मनुष्य और तिर्यंचोंके) होता है। मनापर्ययज्ञानका स्वरूप- जो चिन्तित, अचिन्तित अथवा अर्धचिन्तित आदि अनेक भेदरूपसे दूसरेके मनमें स्थित पदार्थको जाने उसे मनःपर्ययज्ञान) कहते हैं । (यह ज्ञान तपस्वी मनुष्यों के मनुष्यलोकमें ही होता वाहर नहीं ॥४॥ केवलज्ञानका स्वरूप- जो ज्ञान सम्पूर्ण, समग्र, केवल ( असहाय ), असपत्न (प्रतिपक्षरहित ), सर्वपदार्थगत और लोंक- अलोकमें अन्धकाररहित होता है उसे केवलज्ञान कहते हैं ।।४।। विशेषार्थ-त्रिलोक और त्रिकालवी समस्त चराचर वस्तुओंके युगपत् जाननेवाले ज्ञानको केवलज्ञान कहते हैं। यह सम्पूर्ण ज्ञानावरण कर्मके क्षयसे उत्पन्न होता है और समस्त पदार्थोंका जाननेवाला है इसलिए यह सम्पूर्ण है । मोहनीय और अन्तराय कनके १. पञ्चसं० १, १२५ । गो० जी० ४३७ । २. पञ्चतं० १, १२६ । गो० जी० ४५९ । 1. व इन्द्रिय । है , कर्मप्रकृति मि प्रकारकमेवर इदं वचलज्ञानं मन्तव्यं ज्ञातव्यम् । कंवलज्ञानमावृणोत्यात्रियतेऽनेनेति वा कंवल- जानावशीयम् ॥21॥ ज्ञानावरगम्य पनपतिनामान्याह- मदि-सुद-ओही-मणपजव-केवलणाण-आवरणमेवं । पंचवियप्पं णाणावरणीयं जाण 'जिणभणियं ॥४२॥ मनिज्ञानावरणं १ ध्रुवज्ञानावरणं २ अवधिज्ञानावरणं ३ मनःपर्ययज्ञानावरणं ४ कंवलज्ञानावरणं ., एयममुना प्रकाज पविकल्प पञ्चप्रकारं ज्ञानावरणीयं जिनमणितं हे शिष्य ! त्वं जानीहि ॥४२॥ अब दानस्वरूपमाह जं सामणं गहणं भावाणं णेव कटुमायारं । अविससिदण अढे दंसणमिदि भण्णए समय ॥४३॥ भावाना पदार्थानां सामान्य विशेषात्मकवाद्य वस्तूनां आकारं भंदग्रहणं अकृत्वा यत्सामान्य- प्रणं स्वपमानाबमामनं तहानमिति परमागर्म मण्यते । वस्तुस्त्ररूपमात्ग्रहणं कथम् ? अर्थान् बाह्य- पदायान प्रविष्य जानिक्रियागुणप्रकार रविकल्प्य स्वरूपसत्तावमासनं " दर्शनमित्यर्थः । दर्शनमावृणो. ग्यानियोऽनननिया दर्शनावरणीयम् ॥४३॥ चक्षुस्याएंगनदगम्वरूपमाह- चायण जं पयासइ दोसई तं चक्खुदंसणं विति । सेमिंदियप्पयासो णायचो सो अचक्नु त्ति ॥४४॥ भगक नाथ उत्पन्न होता है. अतएव अप्रनिहन शक्तियुक्त होने से उसे समग्र)कहते हैं । (इन्द्रिय, मन, प्रकाटा आदि बाहरी पदायोंकी सहायना न रखनेसे इसे केवल या असहाय)कहते हैं। समान पनाकि जानने में उसका कोई बाधक नहीं है अतएव उसे असपन्न या प्रतिपक्षरहित) कहते हैं। कोई भी संच पदार्थ इस जानके विपयसे बाहर नहीं है । उपयुक्त मनि. श्रुत, अवधि, मनापर्यय और केवलज्ञानके आवरण करनेसे ज्ञानावर- जीय कर्म पाँच विकल्परूप जिनभगवान ने कहा है ऐसा हे शिप्य, तृ जान ।।२।। अब अन्धकार दर्शनका स्वरूप कहते हैं- पदाकि आकारम्प-विशेष अंडाका ग्रहण न करके जो केवल सामान्य अंशका निर्वि- कारने प्रहा होता है उसे परमागममें दर्शन कहते हैं ।।१३।। विपार्थ-प्रत्येक पदार्थ में सामान्य और विशपम्प दो धर्म रहते हैं उनमें से केवल सामान्य वर्गकी अपेक्षा जो न्य-पर पदार्थांकी (सनाका प्रतिभास) होता है. उसे दर्शन कहते । टमका विषय बननोंक अगोचर है. इसलिए इसे निर्विकल्प) कहा गया है। परमागममें टन चार भेद कहे गये हैं.-१ चक्षुदर्शन २ अचक्षुदर्शन ३ अवधिदर्शन और ४ केवलदर्शन । जय प्रत्यकार मामशः उनका स्वरूप कहते हुए. पहले चजुदर्शन और अचक्षुदर्शनका न्यन्पनियार करते हैं... - - प्रकृतिसमुत्कीर्तन २५ चक्षुषोः नयनयोः सम्बन्धि यद्पादि वस्तुसामान्यग्रहणं प्रकाशते पश्यति वा तत् नेत्रसम्बन्धिवस्तु श्यते जीवेन अनेनेति कृत्वा चक्षुर्विपयेप्रकाशनमेव तिञ्चक्षुदर्शनमिति जिना युवन्ति कथयन्ति । शेपेन्द्रि- याणां स्पर्शनरसनघ्राणश्रोत्राणां सम्बन्धिवस्तुनो योऽसौ प्रकाशः दर्शनं स ज्ञातव्योऽचक्षुदर्शनमिति । चक्षुर्दर्शनमावृणोत्यात्रियतेऽनेनेति वा चक्षुर्दर्शनावरणीयम् । अचक्षुर्दर्शनमावृणोत्याप्रियतेऽनेनेति वा थचक्षुर्दर्शनावरणीयम् २ ॥४४॥ अथावधिदर्शनस्वरूपमाह- परमाणुआदिआई अंतिमखधं ति मुत्तिदव्याई । तं ओहिदंसणं पुण जं पस्सइ ताई पञ्चक्खं ॥४॥ परमाणोरारभ्य महास्कन्धपर्यन्तं मूर्तिद्रव्याणि, तानि यद्दर्शनं प्रत्यक्षं पश्यनि; तत्पुनः अवधिदर्शनं भवति । अवधिदर्शनमावृणोत्यात्रियतेऽनेनेति वा अवधिदर्शनावरणीयम् ॥४५॥ केवलदर्शनस्वरूपमाह- बहुविह-बहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्मि खेत्तम्मि । लोयालोयवितिमिरो जो केवलदंसणुञ्जोवो ॥४६॥ बहुविधाः तीव्रमन्दमध्यमादिभेदेनानेकविधाः बहुप्रकाराश्चोद्योताः चन्द्रसूर्यरत्नादिभेदेनानेकप्रकारा उद्योताः प्रकाश विशेषाः लोके परिमितक्षेने एव प्रकाशन्ते । यः केवलदर्शनाख्य उद्योतः स लोकालोकयोः सर्वसामान्याकारे वितिमिरः करणक्रमव्यवधानरहितत्वेन सदाऽवमासमानः स केवलदर्शनाख्य उद्योतो भवति । केवलदर्शनमावृणोत्यात्रियतेऽनेनेति वा केवलदर्शनावरणीयम् ॥४६॥ (चक्षुः इन्द्रियके द्वारा जो पदार्थका सामान्य प्रकाश) होता है या वस्तुका सामान्य रूप दिखाई देता है उसे चक्षुदर्शन कहते हैं । चक्षुरिन्द्रियके सिवाय शेष इन्द्रियों और मनके द्वारा होनेवाले अपने-अपने विषयभूत सामान्य प्रकाश या प्रतिभासको अचक्षुदर्शन जानना चाहिए ॥४४॥ अवधिदर्शनका स्वरूप- (अवधिज्ञान होनेके पूर्व उसके विपयभूत परमाणुसे लेकर महास्कन्धपर्यन्त मूर्तद्रव्यको जो सामान्य रूपसे देखता है उसे अवधिदर्शन) कहते हैं । इस अवधिदर्शनके अनन्तर अवधिज्ञान उत्पन्न होता है जो अपने विषयभूत परमाणु आदिको स्पष्ट रूपसे प्रत्यक्ष जानता है ।।४।। केवलदर्शनका स्वरूप- (तीव्र, मन्द, मध्यम आदि अनेक अवस्थाओंकी अपेक्षा तथा चन्द्र-सूर्य आदि पदार्थोकी अपेक्षा अनेक प्रकार के प्रकाश लोकके परिमित क्षेत्र में ही रहते हैं.) किन्तु जो केवल दर्शनरूप उद्योत (प्रकाश) है वह लोक और अलोकको अन्धकाररहित स्पष्ट रूपसे प्रकाशित करता है ॥४६॥ १. य -'दव्वं' इति पाठः । २. पवनं० १.१४० । गो. जो० ४८४ ३. पवन १.१४१ । गो० जी० ४८५ । 1. व यच्चक्षुषा श्यते तशक्षुर्दर्शनम् । ४ २६ कर्मप्रकृति नावरणप्रकृतिनामनवकमाह- चक्खु-अचक्खू-ओही-केवलआलोयणाणमावरणं । 'एत्तो पभणिस्सामो पण णिहा दंसणावरणं ॥४७॥ चक्षुदर्शनावरणं १ अचक्षुर्दर्शनाचरणं २ अवधिदर्शनावरणं ३ केवल दर्शनावरणम् ४ । अत: परं पचप्रकारं निद्रादर्शनावरणं वयं नमिचन्द्राचार्या:1 प्रमणिप्यामः ॥४७॥ पञ्चधा निद्रा का इति चेदाह- अह थीणगिद्धि णिहाणिद्दा य तहेव पयलपयला य । णिद्दा पयला एवं णवमेयं दंसणावरणं ॥४८॥ प्रयन्यनन्तरं स्त्यानगृन्दिः १ निद्रानिद्रा व २ तथैव प्रचलाप्रचला ३ निद्रा ४ प्रचला ५ एवं समुदिनं दर्शनावरणं नवभेदं भवति । स्त्यानगृदयादिनिद्राणां लक्षणमाह--[स्त्याने ] स्वप्ने यया चीर्य- विशेपप्रादुर्भावः सा स्यानगृद्धिः । अथवा स्त्याने स्वप्ने गृदयते दीप्यते यदुदयात् श्रात्तं रौद्रं बहु च कर्मकरणं सा त्यानगृन्दिः । इति स्त्यानगृद्विदर्शनावरणम् १ । यदुदयात् निद्राया उपरि उपरि प्रवृत्ति- सन्निद्रानिद्रादर्शनावरणम् २ । यदुदयात् आत्मा पुनः पुनः प्रवलयति तत्प चलाप्रचला दर्शनावरणम् । गोकश्रममदादि वनवा उपविष्टस्य पुंसः नेत्रगावविक्रियासुचिका [ प्रचला ] सैव पुनः पुनरावर्तमाना प्रचनाप्रचलेग्यर्थः ३ । यदुदयात मददलमविनाशार्थ शयनं तन्निद्रादर्शनावरणम् ४ । यदुदयात् या क्रिया शाामानं प्रचलयति नरप्रचलादर्शनवारण मति: ५ ॥४८॥ पुनः स्यानगृदयादिलक्षणं गाथात्रयणाऽह- थीणुदएणुहविदे सोपदि कम्मं करेदि जंपदि वा । णिदाणिद्दुदएण य ण दिटिमुग्घाडिदु सको ॥४६॥ (स्यानगृद्धिदर्शनावरणोदयेन उत्थापितेऽपि स्वपिति निहायां कर्म करोति जाति च । (निद्रा- निद्रा-[ दर्शना] वरणोदयन बहुधा सावधानीक्रियमाणोऽपि दृष्टिमुदायितुं न शक्नोति २)॥४९॥ उन चक्षु. अचक्षु. अवधि और केवलदर्शनके आवरण करनेवाले कर्मको दर्शनावरण कहते हैं । इस कमके नी भेद हैं जिनमें से चार भेदोका स्वरूप कह दिया। अब पाँच निद्राओं- का स्वरूप आगे कहते है ।।जा दर्शनावरण कर्मके भेद- चक्षुदर्शनावरण आदि चार भेदोंके साथ स्त्यानगृद्धि, निद्रानिद्रा, प्रचलाप्रचला तथा निद्रा और प्रचला इन पाँच निद्राओंके मिला देनेपर दर्शनावरण कर्मके नी भेद हो जाने है ।। त्यानगृद्धि और निद्रानिद्राका स्वरूप- न्यानगृद्धिकर्मक उदयसे जीव छाये जानेपर भी सोता ही रहता है, सोते हुए ही नींद में अनेक कार्य करता है और बोलना भी रहना है पर संज्ञाहीन रहता है । निद्रानिद्रा कर्म, उदय जगाये जाने पर भी आँग्य नहीं उचाइ सकता है 17ll २ १.7 यवनो। .जयजलदि। ६. गो० २.० २१ । १. नाग्या. पर मन्दन: मयामिदि ८ मू० ७ व्याख्यया प्रायः समान: । 3. निदानदयन। च प्रकृतिसमुत्कीर्तन पयलापयलुदएण य वहेदि लाला चलंति अंगाई। णिदुदए गच्छंतो ठाइ पुणो वइसदि पडेदि ॥५०॥ (प्रचलाप्रचलोदयेन मुखात् लाला वहति, अङ्गानि चलन्ति ३)। (निद्रोदयेन गच्छन् तिष्ठति, स्थितः पुनरुपविशति पतति च ४) ५०॥ पयलुदएण य जीवो ईसुस्मीलिय सुवेदि सुत्तो वि । ईसं ईसं जाणदि मुहं मुहं सोवदे मंदं ॥५१॥ (प्रचलोदयेन जीवः ईषदुमल्य स्वपिति, सुप्तोऽपि ईपदीपज्जानाति, मुहुर्मुहुः मन्दं स्वपिति ५)॥ द्विविधं वेदनीयं द्विविधं मोहनीयं चाह-- दुविहं खु वेयणीयं सादमसादं च वेयणीयमिदि । पुण दुवियप्पं मोहं दंसण-चारित्तमोहमिदि ॥५२॥ खु स्फुटं वेदनीयं द्विविधम्-सातवेदनीयं असातवेदनीयं चेति । तत्र यद् रतिमोहनीयोदयवलेन जीवस्य सुखकारणेन्द्रियविषयानुभवनं कारयति तत् सातवेदनीयम् १ । यद् दुःखकारणेन्द्रियविषयानुभवनं कारयति अरतिमोहनीयोदयबलेन तदसातवेदनीयम् २ । पुनः मोहनीयं द्विविकल्पं द्विप्रकारम्-दर्शन- मोहनीयं चारित्रमोहनीयं चेति । तत्र दर्शनमोहनीयं विधा-मिथ्यात्व १ सम्यग्मिथ्यात्व र सम्यक्त्वप्रकृति- ३ भेदात् । चारित्रमोहनीयं पञ्चविंशतिविधम्--कषायनोकषायभेदात् ॥५२॥ प्रचलाप्रचला और निद्राका स्वरूप- प्रचलाप्रचला कर्मके उदयसे मुखसे लार वहती है और अंग-उपांग चलते रहते हैं। निद्राकर्मके उदयसे जीव गमन करता हुआ भी खड़ा हो जाता है, बैठ जाता है, गिर पड़ता है इत्यादि नाना क्रियाएँ करता है ।।५०|| प्रचलाका स्वरूप- उदयसे कुछ-कुछ आँखोंको प्रचला कर्मके यह जीव उघाड़कर सोता है और सोता हुआ भी थोड़ा-थोड़ा जानता है और जागते हुए बार-बार मन्द-मन्द नींद लेता रहता है ।।११।। अव ग्रन्थकार आधी गाथाके द्वारा वेदनीयकर्मके भेदोंका प्रतिपादन करते हैं- वेदनीय कर्मके दो भेद हैं, १-सातावेदनीय २-असातावेदनीय । अव मोहनीय कर्मके भेदोंका निरूपण करते हैं- मोहनीय कर्म दो प्रकारका है १-दर्शन मोहनीय २-चारित्र मोहनीय । जो आत्माके सम्यग्यदर्शन गुणका घात करे उसे दर्शन मोहनीय कहते हैं और सन्या चारित्र गुणका घात करनेवाले कर्मको चारित्र मोहनीय कहते हैं ॥५२॥ १. गो०० २४ । २. गो० ० २५ ।

कर्मप्रकृति .
सत्र निप्रकार दर्शनमोहनीयं दर्शयन्नाह-
बंधादेगं मिच्छं उदयं सत्तं पडुच तिविहं खु ।
दसणमोहं मिच्छं मिस्सं सम्मत्तमिदि जाणे ॥५३।।
बधान बन्धापेक्षया दर्शनमोहनीयं मिध्यावरूपमकं भवति । तदेव दर्शनमोहनीयं उदयं सत्वं
च प्रतीय शाश्रिय त्रिविधं बु स्फुटं भवति-मिथ्यात्वं १ मिश्रं २ सम्यक्त्वं ३ चेति त्रिप्रकारं उदयसवा-
पंक्षया जानीहि । नद्यथा-यस्योदयात्सर्वनप्रणीतमार्गपराङ्मुखो जीवादितत्त्वार्थश्नद्धाननिरुत्सुको हिताहित-
विचाराममा मिथ्याष्टिभवति तन्मिथ्यात्वम् । तदेव मिथ्यात्वं प्रक्षालनविशेपात् क्षीणाक्षीणमदशक्ति-
कोद्रययत नीपत शुद्धरय स्वातियुतं तदुभयं मिश्रं च कथ्यते सम्यग्मिथ्यात्वमिति यावत् । यस्योदया-
दामनार्थ शुद्धमदनकोदबौदनोपयोगापादितमिश्रपरिणामः तदुमयात्मको भवति । तदेव मिथ्यात्वं सम्यक्त्वं
भवनि गदा शुभारिगामनिरुदस्वरम औदासीन्येनावस्थितमात्मनः श्रन्द्वानं न निरुणद्धि, तहृदयमानः सन्
पुरुपः सम्यग्दृष्टिभिधाय1, सा सम्यस्त्वप्रकृतिः ॥५३॥
दर्शनमोहनीय कर्मके भेद-
दर्शनमोहनीय कर्म बन्धकी अपेक्षा एक मिथ्यात्व रूप ही है किन्तु उदय और सत्त्वकी
अपेक्षा तीन प्रकारका जानना चाहिए-१ मिथ्यात्व २ मिश्र (सम्यग्मिथ्यात्व) और
३ सम्यक्रमः
प्रकृति
॥१३॥

- प्रकृतिसमुत्कीर्तन २६ तस्य दर्शनमोहनीयस्य निप्रकारस्य दृष्टान्तमाह जतेण कोद्दवं वा पढमुवसमसम्मभावजतेण । मिच्छादव्वं तु तिधा असंखगुणहीणदव्वकमा ॥५४॥ यन्त्रेण घरट्टेण कोद्रवो दलितो यथा तुप-तन्दुल-कणिकारूपेण विधा भवति, तथा प्रथमोपशम- सम्यक्त्वभावयन्त्रण मिथ्यात्वद्रव्यं दलितं सत् मिथ्यात्व-सम्यग्मिथ्यात्व-सम्यक्त्वप्रकृतिस्वरूपेणासङ्ख्यात- गुणहीनद्रव्यक्रमेण त्रिधा भवति ॥१४॥ पुनः द्विविध-[चारित्र-] मोहनीयस्वरूपं गाथाष्टकेनाऽऽह- दुविहं चरित्तमोहं कसायवेयणीय णोकसायमिदि । पढमं सोलवियप्पं विदियं णवभेयमुदिलु ॥५५॥ चरति चर्यतेऽनेन चरणमात्रं वा चारित्रम् । तच्चारित्रं मोहयति मुह्यतेऽनेनेति वा चारित्रमोहनीयम् । तच्चारित्रमोहनीयं द्विविधम्-कपायवेदनीयं नोकषायवेदनीयं चेति । तत्र प्रथमं कपायवेदनीयं पोडश- प्रकारम् १६ । द्वितीयं नोकषायवेदनीयं नवभेदं नवप्रकारं ९ जिनरुद्दिष्टं कथितम् ॥५५॥ उत्पत्तिके कारणभूत अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण परिणामों के निमित्तसे उस अनादिकालीन मिथ्यात्वके तीन टुकड़े हो जाते हैं। अतः उदय और सत्त्वकी अपेक्षा दर्शन मोहके उक्त तीन भेद जानना चाहिए। किन्तु बन्धकी अपेक्षा वह एक मिथ्यात्वरूपसे ही बँधता है। दर्शनमोहके तीन भेद होनेका दृष्टान्तपूर्वक वर्णन- यन्त्र (जाँता या चक्की ) से दले हुए कोदोंके समान प्रथमोपशम सम्यक्त्व परिणाम- रूप यन्त्रसे मिथ्यात्वरूप कर्म द्रव्य तीन प्रकारका हो जाता है, और वह द्रव्य प्रमाणमें क्रमसे असंख्यात गुणित असंख्यात गुणित हीन होता है ।।५४|| विशेषार्थ-जिस प्रकार कोदोंको चक्कीसे दलनेपर उसके तन्दुल (चावल), कण और भूसी ये तीनरूप हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रथमोपशम सम्यक्त्वरूप परिणामोंके निमित्त- से अनादिकालोन एक मिथ्यात्व कर्मके तीन टुकड़े हो जाते हैं जिनके नाम क्रमशः मिथ्यात्व, सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्प्रकति हैं । इनमें अनादिकालीन मिथ्यात्व द्रव्यके कर्म परमाणु क्रमशः असंख्यातगुणित रूपसे कम-कम होते हैं। इसीलिए पूर्व गाथामें यह कहा गया है कि दर्शनमोहनीय कर्म बन्धकी अपेक्षा एक मिथ्यात्वरूप है और उदय तथा सत्त्वकी अपेक्षा तीन भेद रूप है। चारित्र मोहकर्मके भेद- मोहनीय कर्मका दूसरा भेद जो चारित्र मोहनीय कर्म है वह दो प्रकारका है-कपाय वेदनीय और नोकपाय वेदनीय । उनमें प्रथम कपाय वेदनीय सोलह और द्वितीय नोकपाय वेदनीय नौ प्रकारका कहा गया है ।।५।। १. त मिन्छं दध्वं । २. व तिहा। ३. गो० के० २६ । 1. व स्वरूपमाह । 2. व ईपरकपाया नोकपायाः ।

कर्मप्रकृति अणमप्पचक्खाणं पच्चरखाणं तहेव संजलणं । कोही माणो माया लोहो सोलस कसायेदे ॥५६॥ अनन्तानुवन्धिनः क्रोधमान मायालोमाश्चत्वारः ४ । अथाप्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोभाश्च- स्यार. ४ । प्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोमाश्चत्वारः ४ । तथैव संज्वलनाः क्रोधमानमायालोमाश्चत्वारः ४ । इत्येते एकत्रीकृताः पीडश कपाया भवन्ति ॥५६॥ सिल-पुढविभेद-धूली-जलराइसमाणओ हवे कोहो । णारयतिरियणरामरगईसु उप्पायओ कमसो ॥५७|| गिलाभद-वभिद-धूलिरंखाजलरेखासमानः उत्कृष्टानुत्कृष्टाजघन्यजघन्यशक्तिविशिष्टः क्रोधकपायः । म नारकनियंन रामरगतिषु क्रमशो यथाक्रममुत्पादको भवति जीवस्य । तद्यथा-शिलाभेदसदृशोत्कृष्ट- शामिविशिष्टानन्तानुवन्धिकाधकपायः जीवं नरकगत्यामुत्पादयति १ । पृथ्वीभेदसमानानुत्कृष्टशक्तिकोऽप्रत्या- ध्यानावरणकाधकपायः निर्यगती जीवमुत्पादयति २। धुलिरंखातुल्याजघन्यशक्तियुक्तः प्रत्याख्याना- चरणकोधी जीयं मनुष्प्यगन्यामुत्पादयति ३ । जलरेखासदराजवन्यशक्तियत्संज्वलनक्रोधो जीवं देवगतो नयनि ४ । सत्तच्छनियुनकोधकपाय परिणतजीवस्तद्गायुत्पत्तिकारणतत्तदायुर्गत्यानुपूर्व्यादिप्रकृतीः बना- तात्यर्थः । अन राजिशब्दो खार्थ याची। यथा शिलाभदादीनां चिरतर-चिर-शीघ्र-शीव्रतर कालैविनाऽनु. मन्यानं न बटो, नया उत्कृष्टादिशनियुक्तकोधपरिणतो जीवस्तथाविधकालै विना क्षमालक्षणसन्धान. माग्यो न भवन इन्युपमानापमययोः सादृश्यं सम्भवतीति तात्पर्यार्थः ॥५.७॥ सिल-अहि-कट्ठ-बेत्तं णियभेएणणुहरंतओ माणो। पारयतिरियणरामरगईसु उप्पायओ कमसो ॥५८}} लास्थिकाप्टवेत्रममानस्बोकृष्टादिशक्तिभंदेरनुहरन्। उपमीयमानः मानकपायः क्रमशो नारकतिर्यङ्- : , फपाय वेदनीयके भेद- कपाय वेदनीयक सोलह भेद इस प्रकार हैं-अनन्तानुवन्धी क्रोध मान माया लोभ, अप्रन्यान्यानावरण क्रोध मान माया लोभ, प्रत्याख्यानावरण क्रोध मान माया लोभ और मंध्यलन काध मान माया लोभ ।।५.६|| चारों प्रकारको क्रोधकपायके उपमान और फल-) उनमें से अनन्नानुबन्धी क्रोध पत्थरकी रेखाके समान, अप्रत्याख्यानावरण क्रोध पृथ्यांकी ग्याक समान, प्रत्याग्न्यानावरणक्रोध धूलिकी रेखाके समान और संज्वलन क्रोध जलकी याद ममान परिणामवाला कहा गया है। ये चारों प्रकारके क्रोध क्रमशः नरक, नियंच. मनुष्य और देवनिमें उत्पन्न करनेवाले हैं ।।५.७|| चागं प्रकार की मानपायक उपमान श्रीर फल-) अनन्नानुबन्धी मान पत्थर के समान, अप्रत्याग्न्यानावरण मान हड़ीके समान, प्रत्या- ग्यानावामान काठक नमान और मंचलन मान बनके समान कठोर परिणामवाला कहा गया है। वे चारों प्रकारके मान क्रमदाः नरक, नियंच, मनुष्य और देवगतिमें उत्पन्न करने- वाले है ॥४ प्रकृतिसमुत्कीर्तन ३१ नरामरगतिपु जीवमुत्पादयति । यद्यथा-शिलास्तम्भसमानोत्कृष्टशक्तियुक्तानन्तानुबन्धिमानकपायः जीवं नारकगतावुत्पादयति । अस्थिसमानानुत्कृष्टशक्तियुक्ताप्रत्याख्यानावरणमानकपायो जीवं तिर्यग्गत्यामु. स्पादयति २। काष्ठसमानाजघन्यशक्तिसहितप्रत्याख्यानावरणमानकपायो जीवं मनुप्यगतावुत्पादयति ३ । वेत्रसमानजघन्यशक्तियुक्तसंज्वलनमानकषायो जीवं देवगतावुत्पादयति ४ । यथा चिरतरादिकालैर्विना शैलास्थिकाष्टवेत्राः नामयितुं न शक्यन्ते, तथा उत्कृष्टादिशक्तियुक्तमानपरिणतो जीवोऽपि तयाविधकाविना मानं परिहत्य विनयरूपनमनं कर्तुं न शक्रोतीति सादृश्यसम्भवोऽत्र ज्ञातव्यः । तत्तच्छक्तियुक्तमानकषाय- परिणतो जीवस्तत्तद्गत्युत्पत्तिहेतुतत्तदायुर्गत्यानुपूर्वीनामादिकर्म बनातीति तात्पर्यम् ॥५४॥ वेणुवमूलोरब्भयसिंगे गोमुत्तए य खोरुप्पे । सरिसी माया णारयतिरियणरामरगईसु खिदि जियं ' ||६|| वेणूपमूलोरभ्रकशृङ्गगोमूत्रक्षुरप्रसदृशोत्कृष्टादिशक्तियुक्ता माया वजना यथाक्रमं नारकतिर्यनरामर- गतिषु जीवं निक्षिपति । तद्यथा-वेणूपमूलं वंशमूलग्रन्थिः, तेन समानोत्कृष्टशक्तियुक्तानन्तानुबन्धिमाया- कषायः जीवं नरकगतौ निक्षिपति १ । उरभ्रको मेषः, तच्छृगसदृशानुत्कृष्टशक्तियुक्ताप्रत्याख्यानावरणमाया- कषायः जीवं तिर्यग्गतो प्रक्षिपति २ । गोमूत्रसमानाजघन्यशक्तियुक्तप्रत्याख्यानावरणमायाकपायः आत्मानं मनुप्यगतौ निक्षिपति ३ । क्षुरप्रसमानजघन्यशक्तियुक्तसंज्वलनमायाकषायः जीवं देवगतौ निक्षिपति ४ । यथा वेणूपमूलादयश्चिरतरादिकालं विना स्वस्ववक्रतां परिहृत्य ऋजुत्वं न प्राप्नोति, तथा जीवोऽप्युत्कृष्टा- दिशक्तियुक्तमायाकषायपरिणतस्तथाविधकालैर्विना स्वस्ववक्रतां परिहत्य ऋजुपरिणामो न स्यात् [ इति ] सादृश्यं युक्तम् । तत्तदुत्कृष्टादिशक्तियुक्तमायाकषायपरिणतजीवस्तत्तद्गतिक्षेपकारणं तत्तदायुर्गस्यानुपूर्यादि कर्म वनातीत्यर्थः ॥५९॥ किमिराय-चक-तणुमल-हरिदराएण सरिसओ लोहो । णारयतिरिक्खमाणुसदेवेसुप्पायओ कमसो ॥६०॥ कृमिराम-चक्रमल-तनुमल-हरिद्वारागबन्धसमानोत्कृष्टादिशक्तियुक्तो लोमकपायो विषयाभिलापरूप: क्रमशो यथासङ्ख्यं नारकतिर्यङ्मनुष्यदेवगतिषु जीवमुत्लादयति । तद्यथा-कृमिरागेण कम्बलादिरञ्जनेन समानोत्कृष्टशक्तियुक्तानन्तानुबन्धिलोमकपायो जीवं नारकगतावुत्पादयति । चक्रमलो रथाङ्गमलस्तेन समानानुत्कृष्टशक्तियुक्ताप्रत्याख्यानावरणलोभकषायः जीवं तिर्यग्गत्यामुत्पादयति २ । तनुमल: शरीरमल: -) (चारों प्रकारकी मायाकपायके उपमान और फल- अनन्तानुवन्धी माया बाँसकी जड़के समान, अप्रत्याख्यानावरण माया मेंढ़ेके सीगके समान, प्रत्याख्यानावरण माया गोमूत्रके समान और संज्वलन माया बुरपाके समान कुटिल परिणामवाली कही गयो है । ये चारों प्रकारकी माया क्रमशः जीवको नरक, तिर्यच, मनुष्य और देवगतिमें ले जाती हैं ||५|| (चारों प्रकारकी लोभ कपायके उपमान और फल- अनन्तानुवन्धी लोभ कृमिरागके समान, अप्रत्याख्यानावरण लोभ चक्रमल (ऑगन) के समान, प्रत्याख्यानावरण लोभ शरीरके मलके समान और संचलन लोभ हल्दी रंगके समान सचिक्कण परिणामवाला कहा गया है । ये चारों प्रकारके लोभ क्रमशः नरक, तिथंच. मनुष्य और देवगतिके उत्पादक होते हैं ॥३०॥ १. गो० जी० २८५। २. गो. जी. २८६ ।

कर्मप्रकृति - बहिर्गनी जल्लमलः, तद्वन्धसदृशाजवन्यशक्तिसहितप्रत्याख्यानावरणलोभकपायः जीवं मनुष्यगतावुत्पाद- यनि । हरिद्वारागः अगवनादिरञ्जनद्रव्यरागः, तद्वन्धसदृशजघन्यशक्तियुक्तसंज्वलनलोभकपायः जोवं चगती उत्पादयति ४ । कृमिरागादिसदृशतत्तदुत्कृष्टादिशक्तियुक्तलोभपरिणामेन जीवस्तत्तन्नारकादिमवोत्पत्ति कारणतनदायुगंन्यानुयादिकम बनातीति भावार्थः ॥६०॥ निमनिर्वकं काय यशब्दस्या निरूपयतिः सम्मत्त-देस-सयलचरित्त-जहखादचरणपरिणामे । घादंति वा कसाया चउ-सोल-असंखलोगमिदा ॥६१॥ वा अथवा सम्यक्त्वं तत्वार्थश्रद्धानं देशचारित्रं अणुव्रतं सकल चारित्रं महाव्रतं यथाख्यातचरणं यथाण्यातयारिनं एवंविधात्मविशुद्धिपरिणामान् कपन्ति हिंसन्ति नन्तीति कपायाः इति निर्वचनीयम् । नाथा-अनन्तानुवन्धिकोधमानमायालोमकपायः अात्मनः सम्यक्त्वपरिणामं कपन्ति हिंसन्ति नन्ति; अनन्त संसारकारणत्वात् मिथ्यात्वमनन्तं अनन्तभवसंस्क.रकालं वाऽनुवन्नन्ति सुघटयन्ति इत्यनन्तानु- यन्धिनः इति निरनिसामर्थ्यान् अनन्तानुवन्धिकपायाः । अप्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोमकपायाः जीवस्यागुवनपरिणामं कपन्ति । अप्रत्याख्यानमीपप्रत्याख्यानमणुव्रतमावृण्वन्ति मन्तीति निरुक्तिसिद्धस्वात् प्रग्याम्यानायरणकपायाः । प्रत्याख्यानावरणाः क्रोधमानमायालोमकपाया आत्मनः सकलचारित्रं महाव्रत- परिणामं कपन्ति । प्रन्यायानं सकलसंयमं महाव्रतमावृण्वन्ति मन्तीति निरुक्तिसिद्धत्वात् प्रत्याख्यान- कायाः । संज्वलनाः क्रोधादिकपायाः आत्मनो यथारख्यातचारित्रपरिणामं कपन्ति, सं समीचीनं विशुद्ध मंयम यमाग्यातचारित्रनामधेयं अलन्ति दहन्तीति संज्वलना इति निरुक्तिबलेन । तदुइये सत्यपि मामायिकादिमयमाविरोधः मिन्दः । एवंविधकपायः सामान्येन एकः ५ । विशेषविवक्षायां तु अनन्तानु- वध्यप्रत्याग्यानावरणप्रयाग्यानावरणमंचलनभेदाचवारः ४ । पुनस्ते अनन्तानुबन्ध्यादयश्चत्वारोऽपि प्रय क ोधमानमायालीमा इति पोडश १६ । तद्यथा-अनन्तानुबन्धिक्रोधमानमायालोभाः, अप्रत्या- ग्यानावर गोधमानमायालोमाः, प्रत्याख्यानावरणकोषमानमायालोमाः, संज्वलनक्रोधमानमायालोमा इनि १६ | पुनः सर्वेऽप्युदयस्थानविशेषापेक्षया भयंग्यातलोकप्रमिता भवन्ति । कुतः ? तत्कारणचारित्र- मोहनीयोनरीनरप्रकृति विकरमानामसंख्यातलोकमानत्वात् ॥६१॥ अनन्तानुवन्धी अादि चारों प्रकारकी कपायोंके कार्य- जो सम्यकन्य, देशाचारित्र, सकल चारित्र, और यथान्यात चारित्ररूप परिणामोंको की या बात कर उसे कपाय कहते हैं । इसके अनन्तानुवन्धी अप्रत्याख्यानावरण आदिकी अपेक्षा चार भेद है । इन्हीं चारोंके क्रोध, मान, माया और लोभकी अपेक्षा सोलह भेद हैं और कपालक उदयन्यानोंकी अपेक्षा असंख्यात लोकप्रमाण भेद कहे गये हैं। अनन्तानुवन्धी कपाय मन्यायकी बातक, अप्रत्यान्यानावरण कपाय देदा चारित्र (श्रावकत्रत) की घातक, प्रत्याग्यानावणकपाय मकलचारित्र ( मुनिव्रत ) की यानक और मंचलनकपाय यथाख्यात चाग्निसीवानकह ॥६॥ १.८ ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन ३३ नोकपायवेदनीयनव विधमाह- हस्स रदि अरदि सोयं भयं जुगुंछा य इत्थि-पुंवेयं । संडं वेयं च तहा णव एदे णोकसाया य ॥६२॥ हास्यरत्यरतिशोकमयजुगुप्साश्च स्त्री-पुंवेदी तथा पण्डवेदश्च इत्यते नव नोकपाया भवन्ति । तन्नि- रुतिमाह-ईपत्कपाया नोकपायास्तान् वेदयन्ति वेद्यन्ते एभिरिति नोकपायवेदनीयानि नवधा । यस्यो- दयाद् हास्याविर्भावस्तद्वास्थम् १ । यदुदयाद्देशादिपु औत्सुक्यं सा रतिः २ । तद्विपरीता अरतिः ३ । यद्विपाकात् शोचनं स शोकः ४ । यदुदयादुद्वेगस्तद् भयम् ५। यदुदयादात्मीयदोपस्य संवरणं परदोपस्य धारणं सा जुगुप्सा ६ । यदुदयात् स्त्रैणान् भावान् प्रतिपद्यते स स्त्रं वेदः ७ । यस्योदयात् पौस्नान् भावान् आरकन्दति प्राप्नोति स पुंवेदः ८ । यदुदयान्नपुंसकान् भावान् उपव्रजति गच्छति स नपुंसकवेदः ९ ॥३२॥ श्रथ वेदत्रयं विशेषतः गाथात्रयेणाऽऽह- छादयदि सयं दोसे णयदो' छाददि परं पि दोसेण । छादणसीला जम्हा तम्हा सा वण्णिदा इत्थी ॥६३॥ यस्मात्कारणात् स्वयमात्मानं दोषैः मिथ्यादर्शनाज्ञानासंयमक्रोधमानमायालोभैः छादयति संवृणोति नयतः1 मृदुभाषितस्निग्धविलोकनानुकरवर्तनादि कुशलव्यापारः परमपि अन्यपुरुषमपि स्ववशं कृत्वा दोपेण हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहादिपातकेन छादयति आवृणोति तस्मात्कारणाच्छादनशःला द्रव्य-भावाभ्यां सा अङ्गाना स्त्रीति वर्णिता परमागर्म प्रतिपादिता। स्तृणाति स्वयमन्यं च दोपराच्छादयतीति निरुतेः स्त्री सामान्यतः स्त्रीणां लक्षणमुक्तम् ॥६३॥ पुरुगुणभोगे सेदे करेदि लोयम्हि पुरुगुणं कम्मं । पुरु उत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिदो पुरिसो ॥६४॥ यस्यात् कारणाल्लोके यो जीवः पुरुगुणे सम्यग्दर्शन ज्ञानचारित्राद्यधिकगुणसमूह शेते स्वामित्वेन प्रवर्तते, पुरुभोगे नरेन्द्र-नागेन्द्र-देवेन्द्राद्यधिकभोगसमूहे भोक्तृत्वेन प्रवर्त्तते, पुन्गुणं कर्म धर्मार्थकाममोक्ष. अव नोकपाय वेदनीयके नौ भेदोंका प्रतिपादन करते हैं- हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुंवेद और नपुंसक वेद ये नी नोकपाय । इनका स्वरूप इनके नामोंके अनुसार जानना चाहिए ॥६॥ स्त्रीवेदका स्वरूप- यतः जो मिथ्यादर्शन, अज्ञान, असंयम आदि दोपोंसे अपनेको आच्छादित करती है और मृदु-भापण, तिरछी-चितवन आदि व्यापारोंसे दूसरे पुरुपोंको भी हिंसा, कुशीलादि दोपोंसे आच्छादित करती है, अतः उसे आच्छादन स्वभाव युक्त होनेसे स्त्री कहा गया है ।।३।। पुरुषवेदका स्वरूप- यतः जो उत्कृष्ट गुण अथवा उत्कृष्ट भोगोंका स्वामी है. अथवा जो लोकने उन्कृष्ट गुण- युक्त कर्मको करता है, अथवा जो स्वयं उत्तम है अतः उसे पुरुप कहा गया है ॥३४|| , she' . १. आ ज व णियदो। निजतः इति पाठः । २. पञ्चसं० १, १०५ । गो० ३. पञ्चसं० १,१०६ । गो० जी० २७२ । 1 व न्यायात् नीतः।. व सन्यमानाधिकगुणसमृ है ।

. ... ३४ कर्मप्रकृति लक्षणं पुरपार्थमाधवरूपादिदिध्यानुष्टानं शेते करोति च, पुरुपोत्तम परम पदे सति तिष्ठति पुरुपोत्तमः मन निष्टनीत्यर्थः । तस्मात् कारणान् स द्रव्यभावव सम्पन्नो जीवः पुरुष इति वर्णितः ॥६॥ वित्थी व पुमं णउंसयो उहयलिंगवदिरित्तो । इटावग्गिसमाणयवेयणगरुओ कलुसचित्तो ॥६५॥ यो जीयो नैव पुमान पूर्वानपुख्य लक्षणाभावात् पुरुपो न भवति । नव स्त्रो, उक्तस्त्रीलक्षणाभावात् मी अपि न भवनि, ननः कारणानुभयलिलाव्यतिरिक्षः श्मश्रुमेहनस्तनभागादिपुंसीदव्यलिगारहितः नपुंसकः । यम: स्त्रियमाग्मानं मन्यमान : पुरुपे वेदयनि रन्तुमिच्छति स श्रीवेदः, य के ( ? ) पुमांसमात्मानं" 'नपुंसकवेदः इष्टिकापाकाशिममाननीयकामवेदनागुम्कः कलुपचित्तः सर्वदा तट्टेदनया कलाशितहदयः स जीवो नपुंसकः नपुंसक वेद इति परमागर्म वर्णितः कथितः । श्री-पुरपाभिलापरुपतीवकामवेदनालक्षणभावनपुंसकवेदो. नीत्यर्थः । त्रिवेदानां लक्षणं तथा चीनाम्- श्रोणिमादव-भीमय-मुग्धत्व-कीवता-स्तनाः । मुस्कान समं सप्त निजानि गणसूचने ॥६॥ खरत्य-मेहन-स्तामध्य-शौण्डीय-इमधु-सृष्टता । नोकामन लमं सप्त लिजानि नरवेदने ॥७॥ यानि सी-पुरपलिमानि पूर्वोक्तानि चतुर्दश । मृतानि तानि मिश्राणि पण्टमावनिवेदने ॥८॥ ॥६५॥ अय गाधापूर्वाध आयुशनुष्कं गाधाया उत्तरार्ध प्रारभ्य नामकर्मप्रकृतीचाह- णारयतिरियणरामर आउगमिदि चउविहो हवे आऊ । णामं वादालीसं पिंडापिंडप्पभेएण ॥६६॥ नारकनियंनरामरायुप्यमिनि आयुश्चतुर्विधं भवन । नारकादिभवधारणाय प्रत्यायुः । तत्र नरकादिपु मयसम्बन्धनायुपो व्यपदेनः क्रिया । या नरकपु भयं नारकमायुः १ । नियंग्यांनिगु भयं तैयंग्योनमायुः २ । मनुष्य योनि मयं मानुप्यमायुः ३ । देवेषु मयं देवमायुः ४ इति । नरकेपु तावशीतोष्णादिवेदनेषु दीपंजीयनं नारकायुः । इत्येवं गोपेवपि । पिपटापिण्टप्रभेदेन नामकर्म द्विचत्वारिंशद्विधं ४२ भवति ॥६६॥ नपुंसक बंदका स्वरूप- जो न नीरूप है और न पुरुपाप है एसे दोनों ही लिंगोंसे रहित जीवको नपुंसक कहते हैं । इसकी विषय-सेवनकी लालसा भट्टमें पकनी हुई इंटोंकी अग्निके समान तीन कही गयी है अतएव यह निरन्तर कलुपिन चित्न रहता है ।।६।। अव ग्रन्धकार आधी गाथाके द्वारा श्रायुकर्मका निरूपण करते हैं- नारक, नियंच, मनुष्य और देवाग्रुष्कक भेद आयुकर्म चार प्रकारका होता है, अर्थात् आयुकर्मक चार भेद है-नारकायु, तिर्यगायु, मनुष्यायु और देवायु । अब नामकर्मक भेद-प्रभेदोका वर्णन करते हैं- विष्ट प्रकृति और अपिण्ड प्रकृतियांके भेद नामकम बयालीस प्रकारका है ।।६।। १. पञ्चा० १,१०। नी०जी० २७४ । ! यदुना परमष्टिाद। 2. मं० पजमं० १, १५६.१५८ ।

३५ १ प्रकृतिसमुत्कीर्तन घोरइय-तिरिय-माणुस-देवगइ ति य हवे गई चदुधा । इगि-वि-ति-चउ-पंचक्खा जाई पंचप्पयारे ॥६७॥ नारकतिर्थडमनुष्यदेवगतिरिति गतिश्चनुर्धा चतुःप्रकारा भवेत् । तत्र यदुदयाजीवः भवान्तरं गच्छति सा गतिः। सा चतुर्धा । यन्निमित्तमात्मनो नारकपर्यायस्तन्नारक्रगतिनाम १ । यन्निमित्तमात्मन- स्तिर्यग्भवस्तत्तिर्यग्गतिनाम २ । यन्निमित्तं जीवस्य मनुष्यपर्यायस्तन्मनुष्यगतिनाम ३ । यदुदयानीवस्य देवपर्यायस्त वगतिनाम १: । एक-द्वि-त्रि-चतुः-पञ्चाक्षभेदाजातिः पञ्चप्रकारेति । यदुदयादामा एकन्द्रिय इति शब्दाते तदेकेन्द्रियजातिनाम १ । यस्योदयात् प्राणी द्वीन्द्रिय इत्युच्यते तवीन्द्रियजातिनाम २ । यदुदयाजन्तुस्त्रीन्द्रिय इति भण्यते तत्त्रीन्द्रियजातिनाम ३ । यस्योदयाजीवश्चतुरिन्द्रिय इति वर्ण्यते तच्चतुरि- न्द्रियजातिनाम ४ । यदुंदयादात्मा पञ्चेन्द्रिय इति निगद्यते तत्पञ्चेन्द्रियजातिनाम पा२।९ ॥६॥ ओरालिय-बेगुचिय-आहारय-तेज-झम्मणसरीरं । इदि पंचसरीरा खलु ताण वियप्पं वियाणाहि ॥६॥ औरादिकशरीर १ वैक्रियिकशरीराऽऽ २ हारकशरीर ३ तैजसशरीर ४ कार्मणशरीरभदात् ५ इति शरीराणि पञ्च खलु स्फुटं भवन्ति । तेषां शरीराणां विरल्यान् दशप्रकारान् वक्ष्यमाणगाथायां जानीहि । तद्यथा-यदुदयादात्मनः औदारिकशरीरनिवृत्तिस्तदौदारिकशरीरनाम १ । यदुदयाद् वैक्रियिकशरीरनिष्पत्ति- स्तद्वैक्रियिकशरीरनाम २ । यस्योदयादाहारकशरीरनिवृत्तिस्तदाहारकशरीरनाम ३ । यदुदयात्तैजसशरीर- निर्वृत्तिस्ततैजसशरीरनाम ४ । यदुदयाजीवस्य कार्मणशरीरनिप्पत्तिस्तत्कार्मणशरीरनाम १३११४३ ॥६॥ गति और जाति नामकर्मके भेद- उनमें-से गति नामकर्म चार प्रकारका है-नरकगति, तिर्यग्गति, मनुष्यगति और देवगति । जाति नामकर्म पाँच प्रकारका है—एकेन्द्रियजाति, द्वीन्द्रियजाति, त्रीन्द्रियजाति, चतुरिन्द्रियजाति और पंचेन्द्रियजाति ॥६॥ विशेपार्थ-जिस कर्मके उदयसे यह जीव एक पर्यायसे दूसरी पर्यायको जाता है उसे गति नामकर्म कहते हैं । जिस कर्मके उदयसे जीव एकेन्द्रिय आदि जातियों में उत्पन्न हो उसे जाति नामकर्म कहते हैं। शरीर नामकर्मके भेद- शरीर नामकर्मके पाँच भेद जानना चाहिए-औदारिक शरीर, वैक्रियिक. शरीर, आहारक शरीर, तैजस शरीर और कार्मण शरीर ॥६॥ विशेपार्थ -स्थूल शरीरको औदारिक शरीर कहते हैं, यह गनुप्य और नियंचकि होता है । अणिमा, महिमा आदिकी शत्ति.से युक्त शरीर को बैंक्रियिक झारीर कहते हैं यह देव और नारकियोंके होता है । उत्कृष्ट संयमवाले तपस्वी साधुओंके चित्तमं सूक्ष्म तत्त्वसम्बन्धी सन्देह के उत्पन्न होनेपर और उसके निवासवाले क्षेत्र में केवली-शुनरवलीका अभाव होनेपर सन्देहके निवारणार्थ उनके पादमूल में जाने के लिए जो मरतक से एक हाथका पुतला निकलना है उसे आहारक शरीर कहते हैं। शरीरके भीतर भुक्त अन्नादिके जीर्ण करनेवाले तेजको तेजस शरीर कहते हैं । सर्वकर्माके उत्पन्न करनेवाले एवं उनके आधार मृत शरीरको कामन- शरीर याहते हैं। -- 1. व बहुधा । . व पिण्डयन , व्यनित्वेन । .. मामु १४ वरनामा १० युगाः २४ पतयः ।

कर्मप्रकृति ny १ एप पजशरीराणां भगानाह- तेजाकम्मेहिं तिए तेजाकम्मेण कम्मणा कम्मं । कयसंजोगे चदुचदुचदुदुगएकं च पयडीओ ॥६६॥ तिये इति श्रीदारिकक्रियिकाहारकत्रयेण तेजस-कार्मणाभ्यां संयोग कृन चाम्गप्रशगमः प्रकृतयः । तद्यथा-औदारिकोदारिक १ श्रीदारिकतैजस २ श्रीदारिककामण ३ औदारिकनैजसकामणाः ४ । क्रियिक- वैक्रियिक १ चैकियिकर्तजस २ वक्रियिककामण ३ क्रियिकतजसकामणाः । आहारकाहारक आहारका तेजस २ आहारककामण ३ आहारकतैजसकामणाः ४ । पुनस्तेज कामगन संयोग को मंजसने जम ? तेजसकार्मण २ इनि दे. प्रकृती २ । पुनः कार्मणं कार्मणेन संयोग तदा कामणकामण । इत्येका प्रतिः । एवमेकीकृताः पञ्चदश १५ भवन्ति । एतासु औदारिकीदारिकादयः कामणकामणान्ताः महिनयोगाः पच पुनरुता इति स्यया शेपदशमु विनवत्यां निक्षिप्तामु घ्युत्तरं शतं १०३ नामकत्तिरप्रकृतयां भवन्ति ॥६॥ श्रीरालिय बउब्बिय श्राहारय तेजणामकम्मुद्रा। चड गांकम्मसरीरा कम्मंब य होइ कम्मइयं ॥१॥ पंच य सरीरबंधणणामं ओराल तह य वेउव्वं । आहार तेज कम्मण सरीरबंधण सुणाममिदि ।।७०॥ शरीरबन्धननाम पञ्चप्रकारं भवति । बन्धनशब्दः प्रत्येक सम्बध्यत-औदारिकारीस्बन्धनं नाम १। तथा च चैक्रियिकशरीरबन्धनं नाम २ आहारकशरीरवन्धनं नाम ३ तेजसशरीरबन्धनं नाम ४ कामण- शरीरबन्धनं नाम । किमिदं नाम बन्धनत्वमिति चेदीदारिकाद्विशरीरनामकोदयवशानुपातानामाहार- वर्गणायातपुद्गलस्कन्धानामन्योन्यप्रदेशसंश्लेषणं यतो भवति तद्वन्धननाम ।।१२।२९। ॥७०॥ अव इन पांचों शरीरोंके संयोगसे उत्पन्न होनेवाले भेदोका निरूपण करते हैं- तेजस और कार्मण शरीरके साथ औदारिक, वैक्रियिक और आहारक शरीरका आपस में संयोग करनेपर चार-चार भेद होते हैं, इस प्रकार तीनोंके मिलकर बारह भेद हो जाते हैं। कार्मण शरीरके साथ तेजस शरीरके मिलानेसे दो भेद और कार्मण शरीर के साथ कार्मण शरीरको मिलानेसे एक भेद और होता है, इस प्रकार सब मिलाकर पन्द्रह भेद हो जाते हैं ।।६९|| विशेपार्थ-शरीर नामकर्मके वे पन्द्रह भेद इस प्रकार हैं-१ औदारिक औदारिक, २ औदारिक तैजस ३ औदारिक कार्मण ४ औदारिक तैजस कार्मण ५ वक्रियिक वैक्रियिक ६ वैक्रियिक तेजस ७ वै क्रियिक कार्मण ८ वक्रियिक तैजसकार्मण ६ आहारक आहारक १० आहारक तेजस ११ आहारक कार्मण १२ आहारक तेजस कार्मण १३ तेजस तेजस १४ तैजस कार्मण १५ कार्मण कार्मण वन्धन नामकर्मके भेद- वन्धन नामकर्मके पाँच भेद हैं, १ औदारिक शरीर-वन्धन २ वैक्रियिक शरीर-बन्धन ३ आहारक शरीर-बन्धन ४ तेजस शरीर-बन्धन और ५ कार्मणशरीर-बन्धन ||७|| १. गो० क. २७ । 1. व औदारिकादारिक १ वैक्रियिका क्रियिक २ श्राहारकाहारक ३ तेजसतैजस ४ कार्मणकाण ५ इति सदाहिसंयोगा पञ्च प्रकृतीः परिहृत्य उद्वरितं दशसु त्रिनयन्यां निक्षिप्तासु सतीसु । १. व गाथेयं नास्ति।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन २७ पंच संघादणामं ओरालिय तह य जाण वेउव्वं । आहार तेज कम्मण सरीरसंघादणाममिदि ॥७१॥ शरीरसंघातनाम पञ्चविधम्--औदारिकशरीरसंघातनाम १ तथा वैक्रिविकशरीरसंघातनाम २ श्राहार- शरीरसंघातनाम ३ तैजसशरीरसंघातनाम ४ कार्मणशरीरसंवातनामति ५ जानीहि ।५।२४।३४। किमिदं नाम संघात इति चेत् यदुदयादौदारिकादिशरीराणां विवरविरहितानां परस्परप्रदेशानुप्रवेशेन एकत्यापादनं भवति तत्संघातनाम ॥७१॥ समचउरस णिग्गोहं सादी कुजं च वामणं हुंडं । संठाणं छम्भेयं इदि णिदि जिणागमे जाण ॥७२।। संस्थानं पड्भेदं परमागर्म निदिष्टं जानीहि । समचतुरस्रशरीरसंस्थाननाम : न्यग्रोधपरिमण्डल- संस्थाननाम २ स्वातिसंस्थाननाम ३ कुब्जकसंस्थाननाम ४ वामनसंस्थाननाम ५ हुण्डकसंस्थाननाम ६।३० ४०। किमिदं नाम संस्थानम् ? यदुदयादौदारिकादिशरीराकारो' भवति तत्संस्थानमिति । तिम्रोवधिोमध्ये घु समप्रविभागेन शरीरावयवसन्निवेशव्यवस्थापनं कुशलशिल्पिनिर्वतितसमस्थिति चक्रवदवस्थानकर ] तत्सम- चतुरस्रसंस्थानम् १। यत उपरि विस्तीर्णो अधःपङ्कुचितशरीरा हारो भवति तन्न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थाननाम २। यतोऽधोविस्तीर्ण उपरि संकुचितशरीराकारो भवति तत्त्वातिसंस्थाननाम । स्वातिवाल्मीकं तत्सादृश्यात ३। यतो हस्वसर्वशरीराकारो भवति तत्कुन्जकसंस्थाननाम ४ । यतो दीघहस्तपादा हस्वकबन्धश्चैवं शरीराकारो भवति तद् वामनसंस्थानम् ५। यतः पाषाणैः पूर्णगौणीवद् ग्रन्ध्यादिविषमशरीराकारो भवति, तत् हुण्डक- संस्थाननाम ६ ॥७२॥ . विशेपार्थ-शरीर नामकर्म के उदयसे जीवने जो आहार वर्गणारूप पुद्गलके स्कन्ध ग्रहण किये हैं उनका जिस कर्मके उदयसे आपसमें सम्बन्ध होता है उसे बन्धन नामकर्म कहते हैं। संघात नामकर्मके भेद- संघात नामकर्म पाँच प्रकारका है-१ औदारिक शरीर-संघात २ वैक्रियिक झारीर- संघात ३ आहारक शरीर-संघात ४ तैजस शरीर-संघात और ५ कार्मण शरीर-संघात ||७|| विशेपार्थ-जिस कर्मके उदयसे औदारिक आदि शरीर के परमाणु आपस में मिलकर छिद्ररहित वन्धनको प्राप्त होकर एकरूप हो जाते हैं उसे संघात नामकर्म कहते हैं । संस्थान नामकर्मके भेद- संस्थान नामकर्मके छह भेद जिनागममें कहे गये हैं जो इस प्रकार जानना चाहिए- १ समचतुरस्रसंस्थान २ न्यग्रोधसंस्थान ३ स्वातिसंस्थान ४ कुजक संस्थान ५ वामन- संस्थान और ६ हुण्डकसंस्थान ॥७२॥ विशेपार्थ-जिस कर्मके उदयसे शरीरका आकार उ.पर नीचे तथा बीच समान हो अर्थात् शरीरके अंगोपांगोंकी लम्बाई-चौड़ाई आदि सामुद्रिकवालानुसार यथान्यान दीप-टीय. बने उसे समचतुरन्त्रसंस्थान कहते हैं । जिस कर्मके उदयसे शरीरका आकार न्यग्रोथ ( बट ) वृक्षके समान नाभिके उपर मोटा और नाभिके नीचे पतला हो उसे न्याय परिमण्डल संस्थान कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे शरीरका आकार साँपको बॉमी, नन्दा हार पतला 1. व शरीराकृतिनिप्पत्तिः ।

३८ कर्मप्रकृति ओरालिय वेगुब्धिय आहारय अंगुवंगमिदि भणिदं । अंगोवंगं तिविहं परमागमकुसलसाहहिं ।।७।। औदारिकशरीराशीपालनाम १ चैकियिकशरीरानपानाम २ आहारकशरीरापाज नाम ३ इति शरीराङ्गोपाङ्ग त्रिविधं परमागमकुशलयाधुभिगंणधरदेवमणिनम् 1७।३३।१३। यदुदयात्रापार प्रकटीमति तदाङ्गोपाङ्गनाम । प्रौदारिकशरीरस्य चरणद्वय-बाय-निराम्य पृष्ट-वक्षःसीपभदादागि, अलीकणनासि. काधुपाङ्गानि करोति यत्तदादारिकशरीराजोपालनाग । एवं क्रियिकामारकारीस्योरपि यदीपातकारक तह क्रियिकाहारकशरीराझोपासनामयम् ॥७३॥ अशापामानि दर्शनार्थ गाथामाह- णलया बाह य तहा णियंत्र पुट्टी उरो य सीसी य । अट्ठव दु अंगाई देहे सेसा उवंगाई ॥७॥ नलको पादौ २ तथा बाह हस्ती २ एको नितम्यः । एका पृष्टिः ५ उरांमागः १ शीप यष्टी अगानि, शंपाणि अलीकर्णनासिकादीनि उपागानि देते शरीरं भवन्ति ॥७॥ दुविहं विहायणामं पसत्थ-अपसत्थगमणमिदि णियमा । बजरिसहणारायं वज्जंणाराय णारायं ।।७।। विहायोगतिनाम द्विविधं द्विप्रकारं नियमात निश्चयनः भवति । प्रगम्नविज्ञायांगतिनाम अप्रशस्त- ܢ १ । और नीचे मोटा हो उसे स्वातिसंस्थान कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे शरीर कुबड़ा हो उसे कुजकसंस्थान कहते हैं । जिस कर्मके उदयसे शरीर वीना हो उसे वामनसंस्थान कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे शरीर के अंगोपांग यथायोग्य न होकर हीनाधिक परिमाणको लिये हुए भयानक आकारवाले हों उसे हुण्डकसंस्थान कहते हैं । आंगोपांग नामकर्मके भेद- परमागममें कुशल साधुओंने आंगोपांग नामकर्मक तीन भेद कहे हैं-१ औदारिक शरीर आंगोपांग २ वैक्रियिक शरीर आंगोपांग ३ आहारक झारीर आंगोपांग ||७३|| भावार्थ-आंगोपांग नामकर्मके उदयसे शरीर के अंग और उपांगोंकी रचना होती है । शरीरके आठ अंग- झरीरमें ये आठ अंग होते हैं-दो पैर, दो हाथ, नितम्ब (कमरके पीछेका भाग ), पीठ, हृदय और मस्तक । नाक, कान आदि उपांग कहलाते हैं ॥७४|| अव आधी गाथाके द्वारा ग्रन्थकार विहायोगति नामकर्मके भेद बतलाते हैं- बिहायोगति नामकर्मके नियमसे दो भेद हैं--- १ प्रशस्तविहायोगति २ अप्रशस्त विहायोगति | विशेषार्थ-जिस कर्मके उदयसे जीवकी चाल हाथी, बैल आदिके समान उत्तम हो उसे प्रशस्तविहायोगति नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे जीवकी चाल ऊँट, गधे आदिके समान बुरी हो उसे अप्रशस्तविहायोगति नामकर्म कहते हैं ।) अव संहनन नामकर्मके भेद कहते हैं- अनादि निधन आपमें संहनन नामकर्म छह प्रकारका कहा गया है। १ ववृपभ- १. गो० क० २८ ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन ३९ (राजवृषभ उपभ- विहायोगतिनाम चेति । यत्कर्म विहायसि आकाशे अवकाशस्थाने गमनं करोति सा विहायोगतिः । हंसादिवत् प्रशस्त मनोज्ञं गमनं करोति सा प्रशस्तविहायोगतिनाम १ । खरोष्ट्रमार्जारादिवप्रशस्तममनोनं गमनं करोति साऽप्रशस्तविहायोगतिनाम २:८१४६।) अपरार्धगाथां वक्ष्यमाणगाथाग्रे भणियामः- तह अद्धं णारायं कीलिय संपत्तपुव्य सेवढें । इति संहडणं छविहमणाइणिहणारिसे भणिदं ॥७६॥ पूर्वोक्तगाथापरार्धे वज रिसहेत्यादि 'वज रिसहणारायं बजणारायं पारायं' इति; वज्रपमनाराच- शरीरसंहनननाम १ वज्रनाराचशरीरसंहनननाम २ नाराचशरीरसंहनननाम ३ अर्धनाराचशरीरसंहनननाम ४ कीलितशरीरसंहनननाम ५ असम्प्राप्तासपाटिकाशरीरसंहनननाम ६ इति संहननं पड्विधं अनादि- निधनेन ऋषिणा भणितं श्राद्यन्तरहितेन ऋद्धिप्राप्तेन वृषभदेवेन कथितम् ।६।१२।५२ तेपां पहननानां विचारमाह-यस्योदयादस्थिबन्धनविशेपो भवति तत्संहनननाम । संहननमस्थिसंचयः, ऋषभो वेष्टनम् । वज्रवदभेद्यत्वाद् वज्रऋषभः । वज्रवन्नाराचो वज्रनाराचः । तो हो वज्रनाराचौ अपि यस्मिन् वज्रारीरे संहनने [तद्] वज्रऋषभनाराचशरीरसंहननं नाम १ । एप एव वज्रास्थिवन्धो वज्रऋषमवर्जितः सामान्यवृपभवेष्टितो यस्योदयेन भवति तद् वज्रनाराचारीरसंहनननाम २ । यस्य कर्मण उदयन वज्रपभविशेषणेत रहिता नाराच- कीलिता अस्थिसन्धयो मवन्ति तन्नाराचशरीरसंहनननाम ३ । यस्य कर्मण श्चोदयनास्थिसन्धयो नारावेनाध कीलिता भवन्ति तदर्धनाराचशरीरसंहनननाम ४ । यत्योदयाहज्रास्थीनि कीलितानि भवन्ति तत्कीलित- शरीरसंहनननाम ५। यस्योदयेनान्योन्यासम्प्राप्तानि सरीसृपसंहननवच्छिरावन्दानि अस्थीनि भवन्ति तहसम्प्राप्तामृपाटिकाशरीरसंहनननाम ६ ॥७६॥ प्रत्येकसंहननस्वरूपकथनार्थं गाथाषटकं प्राह- जस्स कम्मस्स उदए वजमयं अट्टि रिसह णारायं । तं संहडणं भणियं बजरिसहणारायणाममिदि ॥७७।। यस्य कर्मण उदये सति वज्रमयं वनवदभेचं अस्थिवृपभनाराचं तसंहननं वज्रवृपमनाराचनामेनि भणितम् ॥७७॥ जस्सुदए वजमयं अट्ठी णारायमेव सामण्णं । रिसहो तस्संहडणं णामेण य वजणारायं ॥७८॥ नाराचसंहनन २ वज्रनाराचसंहनन ३ नाराचसंहनन ४ अर्धनाराचसंहनन ५ कीलकनहनन और असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन ॥७५-७६।। वज्रवृपभनाराच संहननका स्वरूप- जिस कर्मके उदयसे वज्रमय हलो ऋपम (वेष्टन ) और नागच (कील ) हां उसे वज्रवृपभनाराचसंहनन कहते हैं॥७॥ वज्रनाराचसंहननका स्वरूप- जिस कर्मके उदयसे वज्रमय हड़ी और कोलें हों किन्तु वेष्टन मामान्य हो. अर्थात वनमय न हो उसे वज्रनाराचसंहनन कहते हैं ।।७८|| १. त कम्मस्स जस्म । २. त जानेण च वाजरिसणारा । 1. विचिन्त्योऽयमर्थः । . टीकाप्रतिमें नम स्थलपर संहनना कि दिय गय है. इसमीटमें देखिए।

४० । कर्मप्रकृति यस्य कर्मण उदयन बज्रमयं अस्थि नाराचगंय इयं भाति मामान्यपगः । कोश: ? गजवद- तररहितनापमः सामान्य वेष्टनमित्यर्थः । तसंहनन नाम्मा च वज्रनाराचं गणितम् ॥८॥ जस्सुदए वजमया हद्धा वो वजरहिदणारायं । रिसहो तं भणियव्यं णारायसरीरसंहडणं 11७६|| यस्य कर्मण उदयन वनमयानि धनि । वा पादपुरण, उ आई। नाराची यत्रातिः, गुनः गृपम: चारहितः तन्नाराचसंहननं मणितच्यम् ॥ ७॥ चजबिसेसणरहिदा अट्ठीओ अद्धविद्धणारायं । जरसुदए तं भणियं णामेण य अद्वणारायं ।।८०|| यस्य कर्मण उदयन वनविशेषणरहिताः अस्थिमन्धयः नाराचन अधविनाः । कोऽर्थः ? नाराचना कीलिता इत्यर्थः । तन्नाम्ना अर्धनाराचसंहननं भणितम् ॥८०॥ जैस्स कम्मम्स उदए अवजहडाई खीलियाई व । दिढवंधाणि हवंति हु तं कीलियणामसंहडणं ॥८१}} यस्य कर्मण उदयन अवज्रास्थीनि कीलितानीव ठवन्धनानि भवन्ति, हुम्फुट नीलिकानाम संहननं भवति ॥८॥ जस्स कम्मस्स उदए अण्णोणमसंपत्तहदुसंधीओ। परसिर-बंधाणि हवे तं खु असंपत्तसेवट्ट ||२|| यस्य कर्मण उदयन अन्यान्यासम्प्रातास्थिसन्धयः सरीसृपयत नरशिराबन्द्राः गुरफुट नदसम्प्राप्ता- सुपाटिकं भवेत् ॥८२॥ नाराचसंहननका स्वरूप- जिस कर्मके उदयसे हड्डियाँ तो वज्रमय हो किन्तु वेष्टन और कीलें वन्नमय न हों उसे नाराचशरीरसंहनन कहना चाहिए ||७|| अर्धनाराचसंहननका स्वरूप- जिस कर्मके उदयसे हड़ियाँ वज्रविशेपणसे रहित हो और शरीरके अर्धभागमें कीले लगी हों उसे अर्धनाराचसंहनन कहते हैं ।।८०॥ कीलकसंहननका स्वरूप- जिस कर्मके उदयसे हड़ियाँ और कीलें वज्रमय न हों किन्तु हड़ियों में कीलें हद बन्धन- वाली लगी हों उसे कीलकसंहनन कहते हैं ॥१॥ सृपाटिकसंहननका स्वरूप- जिस कर्मके उदयसे हड्डियोंकी सन्धियाँ परस्पर में भिन्न हो और नसोंसे बँधी हुई हों उसे असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन कहते हैं ।।२।। १. आ ओ । २. त कम्मस्म जस्स ।

- प्रकृतिसमुत्कीर्तन ४१ तेपा [ संहननानां ] कार्यमाह- सेवट्टेण य गम्मइ आदीदो चदुसु कप्पजुगलो त्ति । तत्तो दुजुगलजुगले कीलियणारायणद्धोति ॥३॥ सृपाटिकासंहननन सौधर्मयालान्तबद्वयपर्यन्तं चतुर्यु युगलेपु समुत्पद्यते । तत उपरि युग्मदृये क्रमेण कोलिकार्धनाराचसंहननाभ्यामुत्पद्यते । तद्यथा-असंप्राप्तास्पाटिकासंहननेन पष्टेन जीवेन सौधर्म- स्वर्गमारभ्य कापिष्ठस्वर्गपर्यन्तं ८ गम्यते । कीलिकासंहननेन पञ्चमैन जीवेन सहस्रारस्वर्गपर्यन्तं १२ गम्यते । चतुर्थन अर्धनाराचसंहननेन अच्युतस्वर्गपर्यन्तं १६ गम्यते ॥८३॥ गेविजाणुदिसाणुत्तरवासीसु जंति ते णियमा । तिदुगेगे संहडणे णारायणमादिगे कमसो ॥४॥ नाराचादिना संहननेन त्रयेण वज्रनाराचद्वयेन वज्रवृपभनाराचैकन चोपलक्षिताः ते जीवाः क्रमशः अनुक्रमेण नवग्रैवेयक-नवानुदिशपञ्चानुत्तरविमानेपु मोक्षे चोत्पद्यन्ते ॥८॥ सण्णी छस्संहडणो वच्चइ मेघं तदो परं चापि । सेवट्टादीरहिदो पण-पण-चदुरेगसंहडणो ।।८।। संज्ञी जीवः पटसंहननः मेघां व्रजति, तृतीयपृथ्वीपर्यन्तमुत्पद्यत इत्यर्थः । ततः परं चापि सपाटिका- रहितः कीलितान्तः पञ्चसंहननः अरिष्टान्तपञ्चपृथिवीपु उत्पद्यते । अर्धनाराचान्त चतुःपहननः मवव्यन्तपट- पृथ्वीपु समुत्पद्यते । वज्रवृषभनाराचसहननो माघव्यन्तसप्तपृथ्वीपु उत्पद्यते ॥८५॥ अब उक्त संहननवाले जीव स्वर्गमें कहाँतक उत्पन्न हो सकते हैं यह बतलाते हैं- (सपाटिका संहननवाले जीव यदि स्वामें उत्पन्न हों तो आदि स्वर्ग-युगल ( सौधर्म- ऐशान) से लगाकर चौथे कल्पयुगल (लान्तव-कापिष्ठ) तक चार युगलोंमें अर्थात आठवें स्वर्ग- तक उत्पन्न हो सकते हैं । पुनः दो-दो युगलों में कीलक और अर्धनाराच संहननवाले जीव जन्म धोरण करते हैं अर्थात् पाँचवें छठे स्वर्ग युगलमें कोलक) संहननवाले और सातवें तथा आठवें स्वर्गयुगलमें अर्धनाराचंसंहननवाले जन्म ले सकते हैं ॥८६॥ नाराच आदि तीन संहननवाले वज्रनाराच आदि दो संहननवाले तथा वन्न ऋपभ- नाराचसंहनन वाले जीव क्रमशः नौ ग्रैवेयकोंमें नौ अनुदिशोंमें और अनुत्तर विमानवासी देवोंमें उत्पन्न हो सकते हैं, अर्थात् आदिके तीन संहननवाले नौ ग्रैवेयकों तक, आदिके दो संहननवाले नौ अनुदिशों तका और (प्रश्रम संहननवाले जीव पंच अनुत्तर विमानौनक जन्म ले सकते हैं।॥८४॥ अव किस संहननवाले जीव किस नरक तक उत्पन्न हो सकते हैं, यह बतलाते हैं- (छहों संहननवाले)संज्ञी जीव यदि नरकमें जन्म लेवें तो (मेधा नामक तीसरे नरकतक जा सकते हैं । सिपाटिकसिंहनेन-रहित पाँच संहनन वाले अरिष्टा नामक पाँच नरकत उत्पन्न हो सकते हैं । आदिके चार संहननवाले जीव पाँचवें मघवी नामक नरकनके और विनवृपभनाराचसंहननवाले सातवें माधवी नामक नरक तको उत्पन्न हो सकते हैं । -- १. गो० क० २९ । २. त णवगेवेग्जाणुहिमपंचागुत्तरविमाण ते जांनि । ३. में। ३० । ५. गो० क०३१ । ६ ४२ कर्मप्रकृति धम्मा वंसा मेघा अंजण रिहा तहेव अणिवमा । छही मघवी पुढची सत्तमिया माधवी णाम ॥८६॥ वर्मा बंशा मंधा अञ्जना अरिष्टा तथैव अनियोध्या याच्छिकनामान: पी मधी पृथ्वी समिका माधवी नाम, इति सप्त नारकनामानि ॥८६॥ अथ गुणस्थानके संहननं कथयति मिच्छापुव्वदुगादिसु सगचदुपणठाणगेसु णियमेण । पढमादियाइ छत्तिगि 'ओघादेसे विसेसदो णेया ||८७|| मिथ्यादृष्ट्यादिसप्तगुणस्थानेषु पट संहननानि भवन्ति ६ । हि-अपूर्वकरणादिषु चतुपशमकस्थानपुर प्रथमनिकं ३ भवति । पञ्चक्षपकस्थानेषु प्रथमसंहननम् । इति गुणस्थानेषु सामान्य निगलक्षणायन । विशेषतश्च [ आदेशे ] ज्ञेयानि ॥८७॥ वियलचउक्के छ8 पढमं तु असंखआउजीवेसु । चउत्थे पंचम छठे कमसो विय छत्तिगेकसंहडणी ||८|| द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियासंझिजीवेषु पष्टमसंप्राप्तास्पाटिकासंहननं भवति । तु पुनः प्रथमं मंहननं वन. वृपमनाराचं नागेन्द्रपर्वतात् स्वयंप्रभद्वितीयामिधानादर्वाक मानुपोत्तरपर्वताच प्रर्वात असंख्यातीविषु कुभोगभूमि-भोगभूमिमनुष्यतिर्यक्षु वनवृपभनाराचसंहननं प्रथममेव भवति । तथा [अवसर्पिण्या:] कर्मभूमी चतुर्थकाले पञ्चमकाले पटकाले च क्रमेण पट् ६ त्रीणि अन्त्यानि ३ एकं ५ च नृपाटिकापार्ट संहननानि भवन्ति ॥८॥ - अव सातो नरकोंकी पृथिवियों के नाम बतलाते हैं- पहली धर्मा, दूसरी वंशा, तीसरी मेधा, चौथीं अंजना, पाँचवीं अरिष्टा, छही मवी और सातवीं पृथ्वीका नाम माधवी है । ये सभी नाम अनादि-निधन एवं अनवद्य है ।।८६|| अव गुणस्थानों में संहननोंका निरूपण करते हैं- (ओघकी अपेक्षा मिथ्यात्व आदि सात गुणस्थानों में छहों संहननवाले जीव अपूर्व आदि उपशम श्रेणीके चार गुणस्थानोंमें आदिके तीन संहननवाले जीव) और (अपूर्वकरण आदि क्षपक श्रेणीके पाँच गुणस्थानों में प्रथम संहननवाले जीव)पाये जाते हैं। आदेश अर्थात् मार्गणा- स्थानोंमें विशेष रूपसे ( आगमानुसार ) जानना चाहिए ।।८।। जीवसमासोम संहननका निरूपण- विकलचतुष्क अर्थात् द्वीन्द्रियसे लेकर असंज्ञी पंचेन्द्रिय तक चार जातिके जीवों में छठा असम्प्राप्तामृपाटिकासंहनन होता है । (असंख्यात वर्पकी आयुवाले भोगभूमियाँ जीवोंमें पहला वऋषभनाराचसंहनन) होता है। अवसर्पिणीके चौथे कालमें छहों संहननवाले, (पंचमकालमें अन्तिम तीन संहननवाले) और (छठे कालमें अन्तिम एक सृपाटिका संहननवाले) जीव होते हैं। ) १. व ओघेण । २. त णेयो। 1. व अनियोध्या यादृच्छिकनामान श्राचार्याभिप्रायेण नामानः। 2. व अपूर्वकरणानिवृत्तिकरण- सूक्ष्मसाम्परायोपशान्तकपायेपु उपशमश्रेणिसम्बन्धिषु वज्रवृपभादित्रयम्। 3. अपूर्वकरणानिवृत्तिकरण- सूक्ष्मसाम्परायक्षीणकपायसयोगिकंवलिपु प्रथमसंहननम् ।

- प्रकृतिसमुत्कीर्तन ४३ सव्वविदेहेसु तहा विजाहर-मिलिच्छमणुय-तिरिएसे । छस्संहडणा भणिया णगिंदपरदो य तिरिएसु ॥८६॥ भरतैरावतास्थिरकालभावादुक्तम् । सर्वविदेहे पु विद्याधरश्रेणि-म्लेच्छखण्डमनुष्य-तिर्यक्षु मानुपौत्तर- पर्वतवत् स्वयंप्रभद्वीपमध्यं मर्यादीकृत्य नागेन्द्रनामा पर्वतोऽस्ति । तस्मात् नागेन्द्रपर्वतात्परत: स्वयंभू. रमणसमुद्रपर्यन्तं तिर्यक्षु च वज्रपभनाराचाद्यानि सृपाटिकापर्यन्तानि पट संहननानि भवन्ति ॥८९॥ अंतिमतिगसंहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमिमहिलाणं । आदिमतियसंहंडणं णत्थि त्ति जिणेहिं णिद्दिट्ट ॥१०॥ कर्मभूमिदव्यस्त्रीणां अन्तिमत्रिकसंहननानामुदयो भवति । अर्धनाराच ४ कीलिका ५ सृपाटिका ६ संहननत्रिकं कर्मभूमिद्रव्यस्त्रीणां मवतीत्यर्थः । पुनस्तासां श्रादिमत्रिकसंहननादयो नास्तीति जिननिर्दिष्टम् । वज्रवृपमनाराच १ वज्रनाराच २ नाराच ३ संहननत्रिकं कर्मभूद्रव्यस्त्रीणां न भवतीत्यर्थः। तत्राधनाराच- संहननेन तासां पटनरके1 उत्पादः, अच्युतस्वर्गपर्यन्ते च तासामुत्पादो भवति । न तु नवग्रेवेयकादिपु. मोक्षे चोत्पादः । संहननानामधिकारं प्राप्यान्यग्रन्योक्तसंहननादि विशेपमाह- सण्णी छस्संहडणी उववादिगवजिया हु जायंति । उड्ढाधतिरियलोए दव्वादिसु जोगमासेज ॥१०॥ संझिनो जीवा औपपादिकदेवनारकवर्जिताः पटसंहनना भवन्ति–वपमनाराचं १ वज्रनाराचं २ [ नाराचं ३] अर्धनाराचं अर्धमस्थि मित्वा स्थितमर्धनाराचम् ४ कालिकाऽस्थिरहिता मांसमध्ये स्थिता ५ अमृक्- पाटिका अंबिलिका 3 बहिस्त्वगावृतं संहननम् ६ इति पट संहननाः सन्तः द्रव्यादियोगमाश्रित्य अध्यांध. स्तिर्यग्लोकंपूत्पद्यन्ते । लद्वियपजत्ताणं चरिमं सव्वाण होदि हु तसाणं । परिहारसंजमम्मि हु पढमतियं जिणवरुद्दिढें ॥११॥ लब्धिविपयेऽपर्याप्ता येषां पर्याप्तिलब्धिनं भविष्यतीत्यर्थः । तेषां लब्ध्यपर्याप्तानां सर्वत्रसानां च अमृयाटिका- मिधानं चरमसंहननं भवति । परिहारविशुद्धिसंयतेपु प्रथमसंहननत्रिकं ३ जिनोक्तम् । अथ च संहननरहिताः के भवन्तीत्याह- अणाहारऽलेसकम्मे वेउव्याहारऽजोग एयक्व । संघडणाणमभावो आदेसपरूवणे जाण ॥१२॥ अनाहारकेपु संहननानामभावः । के अनाहारका इति चेदाह- विग्गहगइमावण्णा समुग्घया हु केवली अयोगी य । एदे हु अणाहारा सेसा आहारया जीवा ॥१३॥ (अलेश्येषु) (सिद्धेषु) कार्मण-बैकियिकाऽऽहारकशरीरेयु) (प्रयोगि बलिप) टाक्षेप च) संहननाभाय. आदेशतरूपणे गुणावत्यादिविंशतिप्ररूपणायां जानीहि । । -- (सम्पूर्ण विदेह क्षेत्रोंमें तथा विद्याधर म्लेच्छ मनुप्यों में और तियों में छहो मंहननवाले, जीव कहे गये हैं । (नागेन्द्र पर्वतसे परवर्ती तिथंचोंमें भी छहों संहनन कहे गये है ।।८।। कर्मभूमिज स्त्रियोंके संहननका वर्णन- (कर्मभूमिकी महिलाओं के अन्तिम तीन संहननोंका उदय होना है. उनके आदय नीन संहनन नहीं होते ऐसा जिनेन्द्र देवोंने कहा है ॥२०॥ १. त सम्वविदेहे विज्जाहरे मिलिरले व मानतिरिएन। २. न. ३० । 1. व पराभूमी ।'. व मंहननविशेप-. व नीनिंगी। .:. जी. ६६५ । -- ४४ कर्गप्रकृति पंच य वण्णा सेदं पीदं हरिदरुणकिण्णवणमिदि। गंधं दुविहं लोए सुगंध-दुग्गंधमिदि जाणे ||१|| श्वेत-पीत-हरितारुण-कृष्णवर्णा इनि पञ्च वर्णाः भवन्ति, यन्तुको वर्णधिकारन नाम या स्वशरीराणां श्वेतादिवर्णान् यत्करोति तवर्णनाम: । ०१५ .५७ लोकं गन्धनाम हिविधम् --गुगन्धनाम । दुर्गन्धनामति २ जानीहि । यदुदयात्प्रभवो गन्धरतद्गन्धनाम | वा स्वस्मशरीराणां स्वस्यगन्धं करोग यत्तद्गन्धनाम १११४९/२९ ॥११॥ [ तित्तं काय कसायं अंबिल महुरमिदि पंच रमणाम । मउगं ककस गुरु लघु सीदुण्हं णिद्ध रुक्ख मिदि ।।२।। यनिमित्तो रसविकलस्तदसनाम 1 वा स्वशरीराणां स्वस्परसं करोमि यतहमनाम : तपन. विधम्-तिक्तनाम ? कटुकनाम २ कपायनाम ३ आम्लनाम ४ मधुरनाम ५ 1: लवणो नाम रसो लौकिक: पष्टोऽस्ति, स, मधुररसभेद एवेति परमागर्म पृथक नोकः । लवणं बिना हाररसानां स्वादुन्या. भावात् ।। १२१५४१६४ । अस्योदयात्स्पर्शप्रादुर्भावः [ तरस्परांनाम ] 1 या स्यगरीराणां स्व-स्वस्त करोति । तत्स्पर्शनामाष्टविकल्पम् .. मृदुनाम १ ककंशनाम२ लघुनाम ३ गुरुनाम ४ शीननाम ५ उपनाम ६ स्निग्धनाम ७ रूक्षनाम ८ चति स्पर्शनामाष्टविकल्पमिति पदमनगाथास्थम् । १३:२७२॥१२॥ फासं अट्ठवियप्पं चत्तारि आणुपुब्बि अणुकमसो । णिरयाणू तिरियाणू णराणु देवाणुपुब्धि त्ति ||३|| पूर्वशरीराकाराविनाशो यस्योदयाद् भवति तदानुष्यं नाम । चत्वारि आनुपूच्याणि अनुक्रमण नरकगतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम १ तिर्यग्गतिप्रायोग्यानुपूर्यनाम २ मनुष्यगतिप्रायोग्यानुपूज्यनाम ३ देव- गतिप्रायोग्यानुपूर्व्यनाम ४ चेति । ५४।६६१७६ ॥९३i अब नामकर्मके शेप भेदोका प्रतिपादन करते हैं- जिस कर्मके उदयसे शरीर में श्वेत आदि वर्ण उत्पन्न हो, उसे वर्ण नामकर्म कहते हैं। वर्णनांमकर्मके पाँच भेद हैं-श्वेत, पीत, हरित, अरुण (लाल) और कृष्णवर्ण नामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीरमें गन्ध उत्पन्न होती है उसे गन्धनामकर्म कहते हैं। गन्ध नामकर्म लोकमें सुगन्ध और दुर्गन्ध ये दो प्रकारका जानना चाहिए ।।९।। जिस कर्मके उद्ग्रसे शरीर में मधुर आदि रस उत्पन्न होते हैं उसे रसनामकर्म कहते हैं। रसनामकर्म पाँच प्रकारका है-तिक्त (चरपरा), कटु, कपाय (कसैला), आम्ल (खट्टा ) और मधुर ( मीठा) रसनामकर्म । जिस कर्मके उदयसे शरीर में कोमल कठोर आदि स्पर्श उत्पन्न होते हैं, उसे स्पर्श नामकर्म कहते हैं। स्पर्श नामकर्मके आठ भेद हैं-मृदु । कोमल ), कर्कश ( कठोर ), गुरु ( भारी), लघु (हल्का ), शीत (ठण्डा ), उष्ण (गर्म ), स्निग्ध ( चिकना ) और रूक्ष ( रूखा) ||२|| जिस कर्मके उदयसे विग्रहगति में पूर्व शरीरका आकार बना रहता है, उसे आनुपूर्वी नामकर्म कहते हैं। आनुपूर्वी नामकर्मके अनुक्रमसे ये चार भेद जानना चाहिए-नरक- गत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, मनुष्यगत्यानुपूर्वी और देवगत्यानुपूर्वी १६३|| व प्रती चिन्हान्तर्गतपाठो न विद्यते ।

C प्रकृतिसमुत्कीर्तन एदा चउदस पिंडा पेयडीओ वण्णिदा समासेण । एत्तो अपिंडपयडी अडवीसं वण्णइस्सामि ||१४|| एताश्चतुर्दश पिण्डप्राय: १४ समासेन वर्णिताः । अतः परं अपिण्डप्रकृतिरष्टाविंशतिः २८ ताः वयं वर्णयिष्यामः ॥९४॥ अगुरुलहुग उवधादं परघादं च जाण उस्सासं । आदावं उज्जो छप्पयडी अगुरुछक्कमिदि ॥६॥ अगुरुलघुकं १ उपघात: २ परवातः ३ उच्छ्वासः ४ आतपः ५ उद्योतः ६ इति पट प्रकृतयः । एतासां आगमे 'अगुरुपटकसंज्ञा' [इति हे शिष्य त्वं] जानीहि ।२०१७२१८२ । यस्योदयात् अयःपिण्डवत् गुरुत्वात् न च पतति, न चार्कतूलवत् लघुत्वादृय गच्छति तदगुरुलधुनाम १। उपत्य घात इत्युपघातः, आत्मघात इत्यर्थः । यस्योदयादात्मवातावयवा महाङ्ग लम्बस्तन-तुन्दोदरादयो भवन्ति, तदुपयातनाम २१ परंपां घातः परघातः । यदुदयात्तीक्ष्णशृङ्ग-नखविपसर्पदादादयो भवन्ति अवयवास्तत्परघातनाम ३॥ यद्धेतुरुच्छ्वासस्तदुच्छ्वासनाम ४। यदुदयात् निवृत्तमातपनं तदातपनाम :। तदप्यादित्य बिम्बोपन बादर- पर्याप्त पृथ्वीकायिकजीवेप्वेव वर्तते । यस्योदयात् उद्योतनं तदुद्योतनाम । तचन्द्रे खातादिपु च वर्तते ॥६५॥ . इस प्रकार उपर्युक्त चौदह पिण्डप्रकृतियोंका संक्षेपसे वर्णन किया। अब इससे आगे अट्ठाईस अपिण्ड प्रकृतियोंका वर्णन करेंगे ।।४।। अगुरुलघुपटकका स्वरूप- अगुरुलघु, उपघात, परवात. उच्छ्वास, आतप और उद्योत । इन छह प्रकृतियोंको अगुरुपट क जानना.चाहिए ॥९शा विशेपार्थ-जिस कर्मके उदयसे जीवका शरीर लोहेके पिण्डसमान न तो भारी हो जो नीचे गिर जाय और न अर्क-तूल (आकड़ेकी रुई ) के समान इतना हलका हो कि आकाशमें उड़ जाय, ऐसे अगुगलघु अर्थान, गुरुता-लघुनासे रहिन शारीरकी प्रामि जिस कर्मके उदयसे होती है उसे अगुरुलघु नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे अपना ही पान करनेवाले शरीरके अवयव हों, उसे उपघातनामकर्म कहते हैं। जैसे बारह सिंगके सींग होना, पेटकी तोंद निकलना, भारी लम्बे स्तन होना आदि उपघातकर्मके उदयसे ही उत्पन्न होते हैं । जिस कर्मके उदयसे दूसरेके घात करनेवाले अवयव होते हैं. उसे परवातनामकर्म कहते । जैसे शेर-चीते आदिको विकराल दाई होना, पंजेके तीक्ष्य नख होना. लॉपकी दाद और विच्छूको पूँछमें विप होना आदि । जिस कर्मके उदयसे जीव श्वास और उन्ध्यास लेना है. उसे उच्छ्वासनामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे जीवका शरीर स्वयं जगता-प दिन किन्तु प्रभा उष्णता-सहित प्रकाशमान होती है, उसे आतपनामकर्म कहते हैं । इन कर्मका उदय सूर्यमण्डलके पृथ्वीकायिक जीवोंके होता है। जिस कर्म के उदयले स्वयं शानल रहते हुए भी शरीरकी प्रभा भी शीतल एवं प्रकाशमान होती है. वह उद्योतनामकर्म है। उद्यान नामकर्मका उदय चन्द्रबिम्बके पृथ्वीकाचिक जीवोंमें, जुगनुओंमें एवं अन्य भी निचोंमें पाया जाता है। इन छह प्रकृतियोंको आगममें 'अगुरुपटक संज्ञा है. अर्थात् जहाँपर बगु- रुपटकका उल्लेख आवे वहाँपर उपर्युक्त छह प्रकृतिचोंको लेना चाहिए । १. त चौहस । २. पिप्पयडीसी । ३. आ इतो, त एत्तोऽनिरुपयो।

0 ४६ कमप्रकृति - तदातपायात स्थानगाथामाह- मूलण्हपहा अग्गी आदायो होदि उण्हसहियपहा । आइच्चे तेरिच्छे उहणपहा हु उजोबा ॥९६|| मूले उष्णप्रमः अग्निः, उष्णसहितप्रभः आनपः । यचादिग्यविम्योपनियादरपयांसोकायतिरति भवति । उपणरहितप्रमः शीतलप्रम उद्योतः । स चन्द्र खचातादिपु मनि ॥१६॥ तस थावरं च बादर मुहुमं पजत्त तह अपजत्तं । पत्तेयसरीरं पुण साहारणसरीर थिरमथिरं ।।६७॥ मुह असुह सुहग दुव्भग सुस्सर दुस्सर तहेब गायव्वा । आदिजमणादिज जस अजसकित्ति णिमिण तित्थयरं ॥९८|| सप्रकृतिनाम १ स्थावर प्रकृतिताम २ बादरप्रकृतिनाम ३॥ सूक्ष्मप्रकृतिनाम ४ पर्याप्त प्रकृतिनाम ५ तथा अपर्याप्तप्रकृतिनाम ६ प्रत्येकशरीरनाम ७ पुनः साधारणशरीरप्रकृनिनाम ८ स्थिरप्रकृनिनाम अस्थिरप्रकृतिः १० शुमनाम ११ अशुभनाम १२ सुमगनाम १३ दुमंगनाम १४मुम्बरनाम "दुःस्वरनाम १६ तथैव आदेयनाम १७ अनादेयनाम १८ याःकातिनाम १६ अयशकीतिनाम ० निर्माणनाम २१ तीर्थकरनाम २२ इनि ज्ञातव्याः ॥९७-९८॥ तस चादर पजत्तं पत्तेयसरीर थिर मुहं सुभगं । सुस्सर आदिज्ज पुण जसकित्ति निमिण तित्थयरं [तसद्वादसयं] अस १ बादर ३ पर्याप्त ३ प्रत्येकशरीर ४ स्थिर ५ शुभ : सुभग ७ सुस्वर ८ आदेय ९. या १ - अब यग्नि, आतप और उद्योत प्रकृतिमै अन्तर बताते हैं- अग्निकी मूल और प्रभा दोनी उष्ण होते हैं अतः अग्निके उष्ण स्पर्शनामकर्मका उदय जानना चाहिए । किन्तु जिसके आतप नामकर्मका उदय होता है उसका मूल तो शीतल होता है पर प्रभा उष्णतासहित होती है। इस आतपनामकर्मका उदय सूर्यके बिम्बमें उत्पन्न हुए बादरपर्याप्त पृथ्वीकायिक तिर्यच जीवांके होता है । जिसके उद्योतनामकर्मका उदय होता है उसका मूल और प्रभा ये दोनों ही उष्णतारहित अर्थात् शीतल होते हैं । इस नाम- कर्मका उदय चन्द्रबिम्बमें उत्पन्न होनेवाले पृथ्वीकायिक जीवोंमें तथा खद्योत (जुगुन ) आदि विशेष तिर्यंचोंमें होता है ।।९६१) (अपिण्ड प्रकृतियोंका निरूपण- उस-स्थावर, बादर-सूक्ष्म, पर्याप्त-अपर्याप्त, प्रत्येकशरीर-साधारणशरीर, स्थिर-अस्थिर शुभ-अशुभ, सुभग-दुभंग, सुस्वर-दुःस्वर, आदेय-अनादेय, यशकीर्ति-अयशकीति, निर्माण और तीर्थकर ये शेष अपिण्ड प्रकृतियाँ जानना चाहिए ॥९७-६८ (बस द्वादशकका निरूपण- उस, बादर, पर्याप्त, प्रत्येकशरीर, स्थिर, शुभ, सुभग, सुस्वर, आदेय, यशःकीर्ति, निर्माण और तीर्थंकर इन बारह प्रकृतियोंको त्रस-द्वादशक कहते हैं |Ell १. गो० क० ३३ । २. त आदेज्जमणादेज्ज । ३. त सुहगं ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन कीर्ति १० निर्माण ११ तीर्थकरनामेति १२ द्वादशप्रकृतयः सहादशकमिति संज्ञा परमागर्म भण्यते । एतासां द्वादशप्रकृतीनां व्युत्पत्तिपूर्वकनामान्याह-यदुदयाद् हीन्द्रियादियु जन्म तत् बसनाम । यदुदयाद- न्यवाधाकरं शरीरं भवति तद् वादरनाम २। यदुयादाहारादिपर्याप्तिनिवृत्तिस्तत्पर्याप्तिनाम ३। तत् षड्विधम्-आहारशरीरेन्द्रियोच्छ्वासनिःश्वासमाषामनःसम्बन्धेन पोढा भवतीत्यर्थः । तत्र आहारवर्गणा- ऽऽयातपुद्गलस्कन्धानां खलरसभागरूपेण परिणमने आत्मनः शक्तिनिप्पत्तिराहारपर्याप्तिः । खलमागम. स्थ्यादिकठिनावयवरूपेण रसभागं च रसरुधिरादिद्यावयवरूपेण परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिष्पत्ति: शरीरपर्याप्तिः २। स्पर्शनादीन्द्रियाणां योग्यदेशावस्थितस्वस्त्र विषयग्रहणे जीवस्य शक्तिनिप्पत्तिः इन्द्रिय. पर्याप्तिः ३। आहारवर्गणाऽऽयातपुद्गलस्कन्धान उच्छ्वासनिःश्वासरूपेण परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिप्पत्ति- रुच्छ्वासनिःश्वासपर्याप्तिः ४। भाषावर्गणाऽऽयातपुद्गलस्कन्धान् सत्यादिचतुर्विधवारस्वरूपेण परिणमयितुं जीवशक्तिनिप्पत्तिः भाषापर्याप्तिः ५१ दृष्ट-श्रुतानुमितार्थानां गुण-दोपविचारणादिरूपभावमनःपरिणमने मनो. वर्गणाऽऽयातपुद्गलस्कन्धान् द्रव्यमनोरूपपरिणामन परिणमयितुं जीवस्य शक्तिनिप्पत्तिर्मनःपर्याप्तिः ६। पट मिलिता एका पर्याप्तिप्रकृतिः। शरीरनामकर्मोदयानिर्वय॑मानशरीरमकात्मोपभोगकारणं यतो भवति, तत्प्रत्येकशरीरनाम ४। यस्योदयाद् रसादिधातूपधातूनां स्वस्वस्थाने स्थिरमाव निर्वर्तनं भवनि तस्थिरनाम ५। तदुक्तन- रसादक्त ततो मांस मसान्मेदः प्रवर्तते । मेदतोऽस्थि ततो मज्जं मजाच्छुकं ततः प्रजाः ॥१४॥ वातः पित्तं तथा श्लेप्माशिरास्नायुश्च चर्म च । जठराग्निरिति प्राज्ञः प्रोक्ताः सप्तोपधातवः ॥१५॥ धातु प्रमाण ७ फल दिन ३० इच्छा धातु १ लब्ध दिन ४३ । यदुदयाद्रमणीया मस्तकादिप्रशस्ता- • वयवा भवन्ति, तच्छुभनाम ६. यदुदयादन्यप्रीतिप्रभवस्तत्सु मगनाम । यस्मानिमित्ताजोवस्य मनोज्ञस्वर- निर्वर्तन भवति तत्सुस्वरनाम । प्रमोपेतशरीरकारणमादेयनाम ९। पुण्य गुणल्यापनकारण यश.कीर्तिनाम १०॥ यन्निमित्तापरिनिप्पत्तिस्त निर्माणनाम । तद्विविधम्-स्थान निर्माणं प्रमाण निर्माण चेनि । तत्र जानिनामी. दयापेक्षं चक्षुरादीनां स्थान प्रमाणं च निवर्तयति, निर्मीयतेऽननेनि वा निर्माणम् ११। आईन्यकारणं तीर्थकरत्वं नाम १२॥ इति असद्वादशकं भवति । पिण्डप्रकृतयः ३०। शपिण्डाकृतयः ८३॥ ॥६॥ . - विशेपार्थ-जिस कर्मके उदयसे द्वीन्द्रियादि विकलेन्द्रिय या सकलेन्द्रिय जीवोंमें जन्म हो उसे त्रस नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे अन्य जीवोंको आघात करनेवाला शरीर हो, उसे वादर नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे आहार आदि पर्याप्रियांकी पूर्णता हो उसे पर्याप्त नामकर्म कहते है। पर्याप्तियोंके छह भेद हैं-आहारपर्यानि, शरीर- पर्याप्ति, इन्द्रियपर्याप्ति, उच्छ्वासपर्याप्ति, भापपर्याप्ति और मनःपर्याप्ति । आहारवर्गणार. पुद्गलस्कन्धोंका खल और रसरूपसे परिणत होने की शक्ति पाना. आहारपर्याप्ति है । बन्ट भागको हड्डी आदि कठिन अवयवोंके रूपमें और रस भागको रक्त आद्रियेरूपनं परिणमनकी शक्ति पाना शरीरपर्याप्ति है । आहारवर्गणाके पुद्गलस्कन्धोंका इन्द्रियोंके आकार परिणमन करनेकी शक्ति पाना इन्द्रियपर्याप्ति है । आहारवर्गणाके पुद्गलांको श्वान-उच्छ्वान, रूपन परिणमनकी शक्ति पाना श्वासोच्छ्वासपर्याप्ति है। भापावनणार. पुद्गलस्कन्धोंको वचन रूपसे परिणमनको शक्ति पाना भाषापर्याप्ति है। मनोवर्गणापे. पुद्गलम्कन्धोंका विचार करने वाले मनके रूपसे परिणमनकी शक्ति पाना मनःपर्याप्ति है । इनमें से एकेन्द्रिय जीवो..विक- न्द्रियोंके ५, और संज्ञो जीवोंके ६ पर्याप्तियाँ होती हैं। जिन फर्मर उदय एक मानक 1. च सिद्धान्त।". द लोकाः जनाः ।

४८ कर्मप्रकृति थावर सुहुममपञ्जत्तं साहारणसरीरमथिरं च । असुहं दुभग दुस्सर णादिज्ज अजस कित्ति ति ॥१०॥ स्थावर १ सूक्ष्मा २ पर्याप्त ३ साधारणशरीरा ४ स्थिरा , शुम ६ दुभंग ७ दुःस्वरा ८ नादया ५ यशःकीतीति १० स्थावरदशसंशं ज्ञातव्यम् । तन्निमतिमाह-यन्निमित्ताद केन्द्रिय प्रादुर्भावस्थरस्थावर- नाम ।। सूक्ष्मशरीरनिर्वतकं सूक्ष्मनाम २ । पविधपर्याप्त्यभावनुरपर्याप्तनाम ३ । ब्रहनामा'मनामुप- भोगहेतुत्वेन साधारणं भवति शरीरं यतस्तत्साधारणशरीरनाम ४ । तयथा- 1साहारणमाहारो साहारणमाणपाणगहणं च । साहारणजीवाणं साहारणलखणं भणियं ॥१६॥ गृढसिरसंधिपव्वं समभंगमही राहं च विगणयहं । साहारणं शरीरं तबिवरीयं च पत्तेयं ॥१७॥ कंदे मृले छलीपवालसालदल कुसुमफलवाए । समभंग सदि शंता विसमं सदि हाँति पत्तेया ॥१८॥ - स्वामी एक ही जीव हो उसे प्रत्येक शरीर नामकर्म कहते हैं। जिस कर्मके उदयसे शरीरके धातु-उपधातु यथास्थान स्थिर रहे, वह स्थिर नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे शरीरके अवयव सुन्दर हों, वह शुभ नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीव दूसरोंका प्रीतिभाजन हो, वह सुभग नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे स्वर उत्तम हो, वह सुस्वर नामकर्म है । जिस कर्म के उदयसे शरीर में प्रभा-कान्ति हो, वह आदेय नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे यश फैले, वह यशः कोत्ति नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीर के अंग-उपांग यथास्थान और यथाप्रमाण उत्पन्न हों, वह निर्माण नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे जीव त्रिलोकपृजित तीर्थकर पदको पावे, वह तीर्थकर नामकर्म है। आगममें उक्त १२ प्रकृतियोंकी संज्ञा बस- द्वादशक है। स्थावरदशकका वर्णन- स्थावर, सूक्ष्म, अपर्याप्त, साधारण शरीर, अस्थिर, अशुभ, दुर्भग, दुःस्वर, अनादेय और अयश कीर्ति ये दश प्रकृतियाँ स्थावरदशक कहलाती हैं ॥१००|| विशेपार्थ-जिस कर्मके उदयसे एकेन्द्रिय जीवोंमें जन्म हो, वह स्थावर नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे अन्यको बाधा नहीं करनेवाला और वज्रपटलके द्वारा भी नहीं रोके जानेवाला ऐसा सूक्ष्म शरीर उत्पन्न हो, वह सूक्ष्म नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे जीव अपने योग्य पर्याप्तियोंको पूर्ण न कर सके, वह अपर्याप्त नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे अनेक जीवोंके उपभोग योग्य शरीरकी प्राप्ति हो अर्थात् अनन्त जीवे एक शरीरके स्वामी हों वह साधारण शरीर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीर के धातु और उपधातु स्थिर न रह सकें, वह अस्थिर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीरके अवयव सुन्दर न हों, वह अशुभ नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे जीव रूपादि गुणोंसे युक्त होनेपर भी अन्यका प्रीति- पात्र न हो सके, वह दुर्भग नामकर्म है। जिस कर्मके उदयसे गधे, ऊँट, गीदड़ जैसा चुरा स्वर मिले, वह दुःस्वर नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे शरीर प्रभा और कान्तिसे हीन प्राप्त हो, वह अनादेय नामकर्म है । जिस कर्मके उदयसे संसारमें अपयश फैले, वह अयशःकीर्ति नामकर्म है । इन दश प्रकृतियोंकी आगममें स्थावरदशक संज्ञा है। - 1. व इमाः गाथा न सन्ति । 4. गो० जी० १८७ । 2. पञ्चसं. १, ८२ । गो० जी० १९१ । 3. गो० जी० १८६ । - ॥१०॥ - प्रकृतिसमुत्कीर्तन ५६ धातूपधातूनां स्थिरभावेनानिर्वर्तनं यतस्तदस्थिरनाम ५। यदुदयनारमणीयमस्तकाद्यवयवनिबंननं भवति तदशुमनाम ६ । यदुदयाद् रूयादिगुणोपेतोऽप्यनीति विवाति जनः तदुभंगनाम ७ । यनिमित्ता- जीवस्य खरोष्ट्रशृगालादिवदमनोज्ञस्वरनिर्वर्तनं भवति तदुःस्वरनाम ८ 1 निप्प्रमशरीरकारणमनादेयनान ९। पुण्ययशःप्रत्यनीकफलमयशःकीर्तिनाम १० । इति स्थावरदशकं सिद्धान्त भणितम् । (पिण्डप्रकृतिः · ४२ ॥ अपिण्डप्रकृतिः ९३ ।)अथवा १०३ इदि णामप्पयडीओ तेणवदी, उच्चणीचमिदि दुविहं । गोदं कम्मं भणिदं पंचविहं अंतरायं तु ॥१०१।। इति नामकर्मणः पिण्डापिण्डप्रकृतयः ४२ । पृथग्भेदेन प्रकृतिम्चिनवतिः ९३ । औदारिक-तैनसं १ औदारिक कार्मणं २ औदारिक तैजस-कार्मणं ३ वैक्रियिक-तैजसं ४ वैक्रियिक-कार्मणं ५ क्रियिक तैजस- कार्मणं ६ आहारक-तैजसं ७ आहारक-कार्मणं ८ आहारक-तैजस कामणं ९ तेजस-कार्मणं १० इति दश- प्रकृतिमलिताः नामकर्मण उत्तरप्रकृतयः १०३ त्र्यधिकं शतं भवति ) गोत्रकर्म हिविधं भणितम्-उञ्चगोत्रं नीचगोत्रमिति । यस्योदयाल्लोकपूजितेपु कुलेषु जन्म भवति तदुच्चोत्रम् | १ यदुदयेन तहिरीतेषु गहिनेपु कुलेषु जन्म भवति तन्नीचैर्गोत्रम् २१) तु पुनरन्तरायकर्म पञ्चविधं भणितम् ॥१०१॥ तद्गाथामाह- तह दाण लाह भोगुवभोगा विरिय अंतरायमिदि णेयं । इदि सव्वुत्तरपयडी अडदालसयप्पमा होति ॥१०२॥ तथा दान-लाभ-भोगोपभोग-वीर्यान्तरायमिति पञ्चविधं ज्ञेयम् । (यदुदयाहानुकामो:पि न प्रयच्छनि तानान्तरायः १ ) (यदुदयालब्धकामोऽपि न लभते तलाभान्तरायः २ ) यदुट्याद् भानुमिच्छरसपि न न भुक्ने [ तभोगान्तरायः ३ । यदयादुपभोक्तुमभिवान्छन्नपि नोपभुट्क तदुपमोगान्तरायः ४ । (यहूं- दयादुरसहितुकामोऽपि नोत्सहत तेवीर्यान्तरायः ५) अधया (दानस्य विघ्नहेर्दानान्तरायः : लाभम्य रायः २ ) भुक्त्या परिहातव्यो भोगरनस्य विद्महेनु गान्तरायः ३ मुक्या पुनश्च भोकप्य ये उपर्युक्त नामकर्मको सब मिलाकर तेरानवे प्रकृतियाँ जानना चाहिए । गोत्रकर्म दो प्रकारका कहा गया है-उच्चगोत्र और नीचगोत्र । जिस कर्मके उदयसे लोक-पूजित कुलमें जन्म हो, वह उजगोत्र और लोक-निन्द कुलमें जन्म हो. वह नीच गोत्र है। अन्नाय कर्म पाँच प्रकारका है. ( जिनके नाम इस प्रकार हैं- ) ॥१०॥ अन्तराय कर्मके भेद- दानान्तराय, लाभान्तराय, भोगान्तराय. अभोगान्तगाय और वीर्यान्तगाय । पाँच अन्तराय कर्मके भेद जानना चाहिए। जिस कर्मक उदयसे दान देने की इच्छा बनेर भी दे न सके, वह दानान्तराय है । जिस कर्मके उदय होनेपर लाभ न हो सके. यह लामालगाय है। जिस कर्म के उदय होनेपर भोगनेको इन्छा रखने पर भी भोग न सके वह भोगानमाय है । जिसके उदय होनेपर स्त्री आदिक उपभोगोंको न भोग सके वह उपभोगान्नमय है। जिनके उदय होनेपर शरीर में बल-वीर्य प्राप्त न हो सके.. यह वीर्यान्तगाय कम है। इन प्रकार आटों कर्मोकी सभी उत्तर प्रकृतियाँ (५+++++१३+५= 2 :। पर मी अड़तालीस होती हैं ॥१२॥ १. त अमानुत्तरम।

कर्मप्रकृति उपभोगः, तस्य विनतुरुपमोगान्तरायः ४ । चीयं शक्तिः सामथ्र्यम् । रास्य विन्ननुयोगान्तरायः " (इति सर्वेपां कर्मणां उत्तरप्रकृतयः अष्टचत्वारिंशच्छत्तप्रमाः १४८ भवन्ति । उत्तरातरमनिभदा वाग्गोचरा न भवन्ति ॥१०२॥) अथ नामोत्तरप्रकृतिप्वभेदविवक्षायामन्तीयं दर्शयति- देहे अविणाभावी बंधण संघाद इदि अबंधुदया। वण्णचउक्केऽभिण्यो गहिदे चत्तारि बंधुदये ॥१०३।। देहे श्रौदारिकादिपञ्चविधशरीरनामकर्मणि स्व-स्वबन्धनमंघानी अविनाभाविनी, नि कारणात श्रवन्धोदयौ प्रकृती बन्धन-संघाती न भवतः, तत्र व्युत्तरभेदाभिन्ने नाममाण पती बन्धन संबागी पृथक प्रोक्ती इत्यर्थः । वर्णचतुकं वर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शसामान्यचतुके अमिन्ने अभेदविवक्षायां पककस्मिन्नेव गृहीने मत्वादन्यत्र बन्धोदययोश्चतस्र एवं प्रकृतयो भवन्ति । शेषपोडगानां पृथक कान नागीयर्थः ॥१३॥ ताः का इति चेदाह- वष्ण-रस-गंध-फासा चउ चउ इगि सत्त सम्मोमिच्छत्तं । होति अबंधा बंधण पण पण संघाद सम्मत्तं ।।१०४|| एताः अष्टाविंशतिप्रकृतयः अन्धा बन्धरहिता भवन्ति, अतएव बन्धराशी विशल्यधिकशतप्रायो १२० भवन्ति । ताः काः अष्टाविंशतिः २८ । वर्णचतुष्कं ४ [ रसचतुःकम् ४ ] एको गन्धः । स्पसप्तक ७ इति पोडश १६ भवन्ति । मिच्छत्तं इति सम्म इति मालित्वा एका सम्यग्मिध्यान्वप्रकृतिः, मिघ्रप्रकृति- रित्यर्थः ५ । 'बंधण पण' इति, प्रौदारिकवन्धनं १ वैक्रियिकबन्धनं २ श्राहारकयन्धनं ३ तेजसबन्धनं ४ कार्मणबन्धनं ५ इति पञ्च बन्धनानि । 'पण संघाद' इति, औदारिकसंघातः १ चैक्रियिकसंघात : २ आहारक- संघात: ३ तेजससंघातः ४ कार्मणसंघातः ५ इति पद संघाताः । 'सम्मत्तं' इति सम्यवाह निः एवं समुदिताः अष्टाविंशतिप्रकृतयः २८ अबन्धाः बन्धराशो न भवन्तीत्यर्थः ।। १०४॥ .. अव नामकर्मकी उत्तर प्रकृतियोंमें अभेद-विवक्षासे कौन प्रकृति किसमें सम्मिलित हो सकती है यह दिखलाते हैं- शरीर नामकर्मके साथ अपना-अपना बन्धन और अपना-अपना संघात, ये दोनों कर्म अविनाभावी हैं अर्थात् ये दोनों शरीरके बिना नहीं हो सकते । इस कारण पाँच बन्धन और पाँच संघात, ये दश प्रकृतियाँ बन्ध और उदय अवस्थामें अभेद विवक्षासे पृथक् नहीं गिनी जाती, किन्तु उनका शरीरनामकर्ममें ही अन्तर्भाव हो जाता है। तथा सामान्य वर्ण, गन्ध, रस और स्पर्श इन चारमें ही इनके उत्तर वीस भेद सम्मिलित हो जाते हैं अतएव अभेदकी अपेक्षा इनके भी बन्ध और उदय अवस्थामें चार ही भेद गिने जाते हैं॥१०३|| अव ग्रन्थकार अवन्ध प्रकृतियोको अर्थात् जिनका वन्ध नहीं होता, उन प्रकृतियोंको गिनाते हैं- चार वर्ण, चार रस, एक गन्ध, सात स्पर्श, सम्यग्मिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति, पाँच बन्धन और पाँच संघात । ये अट्ठाईस अबन्ध प्रकृतियाँ हैं । अर्थात् इनके अतिरिक्त होप एक सौ बीस प्रकृतियाँ बन्ध-योग्य होती हैं ॥१४॥ १. गो० क० ३४ । २, व मिच्छत्तं ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन ५१ तथा सति बन्धोदयसत्त्वप्रकृतयः कतीति चेचतुर्गाथामिराह- - पंच णव दोणि छब्बीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी। दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ बंधपयडीओ ॥१०॥ ५९।२।२६।४।६७।२।५-१२० .. पञ्ज्ञ ज्ञानावरणानि ५ नव दर्शनावरणानि ९ हे वेदनाये २ पड्विंशतिर्मोहनीयानि २६ । कुनः ? मिश्र-सम्यक्त्वप्रकृत्योदयसत्वयोरेय कथनात् । चत्वार्यायूंपि ४ सप्तपष्टिर्नामानि ६७ । कुतः ? तद्दशबन्धन- संघात-पोडशवर्णादीनामन्तर्भावात् । हे गोत्रे २ । पञ्चान्तरायाः ५। इत्येताः १२० विंशत्युत्तरशतं वन्धयोग्याः प्रकृतयः क्रमेण सर्वणिताः ॥१०५॥ विशेषार्थ - इस गाथामें अट्ठाईस अवन्ध प्रकृतियोंकी संख्या गिना करके अगली १०५वीं गाथामें बन्ध-योग्य १२० प्रकृतियोंको बतलाया गया है। सो यह कथन अभेद विवक्षासे जानना चाहिए; क्योंकि भेदकी विवक्षासे आगे ग्रन्धकार स्वयं ही १०७वीं नाथामें बन्ध-योग्य प्रकृतियों की संख्या १४६ बतला रहे हैं। इसका अभिप्राय यह है कि यतः शरीर नामकर्मके बन्धके साथ ही बन्धन और संघात नामकर्म इन दोनों प्रकृतियोंका बन्ध अविनाभावी है, अर्थात् नियमसे होता है । अतः शरीर नामकर्मका बन्ध कह देनेपर पाँचों बन्धन और पाँचों संघात स्वतः ही गृहीत हो जाते हैं। इस विवक्षासे उन्हें अवन्धप्रकृतियों में गिनाया गया है । ऐसा नहीं समझना चाहिए कि वन्धन और संघात बन्ध-योग्य ही नहीं है । भेद-विवक्षासे उनका बन्ध होता ही है। और प्रतिसमय बँधनेवाले समय प्रवद में से उन्हें प्रदेश-विभाजनके नियमानुसार विभाग मिलता ही है। इसी प्रकार सामान्य वर्णचतुष्कर कहनेपर उनके सभी उत्तर भेद भी स्वतः गृहीत हो जाते हैं। इस गाथा जो यह कहा गया है कि चार वर्ण, चार रस, एक गन्ध और सात स्पर्श ये अबन्धप्रकृतियाँ हैं; उसका भी यह अभिप्राय नहीं समझना कि एक समयमें पाँचों वीमें से किसी एकका ही बन्ध होता है. शेप चारका नहीं, पाँचों रसों में से किसी एक रसका वन्ध होता है, शेष चारका नहीं. दो गन्धोंमें से किसी एकका वन्ध होता है. दूसरोका नहीं, तथा आठों पदामि से किसी एकका वन्ध होता है, शेप सातका नहीं। वस्तुतः वर्णचतुष्ककी सभी उत्तर प्रशानियों का प्रतिनमय बन्ध होता है और साथ ही सभीको प्रदेश-विभाग भी प्राप्त होता है। ग्रन्थकारने एक सामान्य वर्ण. एक सामान्य रस, एक सामान्य गन्ध और एक सामान्य साकी विवाग अर्थात् अभेद-इटिसे इन चारोंको एक-एक मानकर शेष रही संख्याको अबन्धप्रकानियों रूपमें निर्देश कर दिया है और इसलिए अभेद विवक्षासे आगे १७वीं नामाने बन्ध-योग्य प्रकृतियाँ १४६ बताई गयी है । वास्तवमें देखा जाय तो सन्यमिथ्यात्व और मन्वयकति चे दो ही प्रकृतियों ऐसी हैं कि जिनका बन्ध नहीं होता। यही कारण है कि भेद-विवा करने पर भी बन्ध-योग्य प्रकृतियाँ १४६ हो यतलायी गयी हैं. १८ नहीं। जो कान बना गोल प्रकृतियोंके विषय में कही गयी है. वही उदययोग्य प्रकृतियोंके विषय में भी जानना चाहा! अर्थात् अभेद-विवक्षाले १२२ प्रकृतियों उदय योग्य है और भेद-विवान मनः ।। प्रकृतियों उदय-योन्य बतलायी गयी हैं। ६. गो ६.० ६.५।

कर्मप्रकृति उदयप्रकृतीराह-~- पंच णव दोणि अट्ठावीसं चउरो कमेण सत्तट्टी। दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ उदयपयडीओ ॥१६॥ ५॥५॥२॥२८ा।६७/२५=१:२ उदयप्रकृतयो ज्ञानावरण-दर्शनावरण बदनीय मोहनीयायुनाम-गोत्रानगरायाणां प्रमाण पत्र ५ नय । हे २ अष्टाविंशति २८ शतमः ४ सप्तपष्टिः ६, हे २ प ५ मिलिया द्वाविशत्युत्तरमा १२२ उदययोग्य. प्रकृतयो मणिनाः सर्वज्ञः ॥१०६॥ ता एव बन्धादयप्रती: भंदाभेदविक्षया मयाति- भेदे छादालसयं इदरे बंधे हवंति वीससयं । भेदे सव्वे उदये बावीससयं अभेदम्हि ॥१०७॥ भंदवन्ध १४ । अभंदवन्धे १२० । भदोदये १४८ । भदोदय । २२ । बन्धे भेद चित्रक्षायां पट्य चारिशच्छतं1 ५४६ प्रनयो भवन्ति । अभंदविवक्षायां विजयुत्तरशतं १२० प्रकृतयो भवन्ति । उदय भंदविवक्षायां पर्या छटबन्धारिशच्छा ४८ प्रक्रनयो भवन्ति । अभेद- विवक्षायां द्वाविंशत्युत्तरशतं १२२ प्रकृतयां भवति ॥ ...॥ n इस प्रकार बन्ध-योग्य प्रकृतियोंकी संख्याका ग्रन्थकार निरूपण करते हैं- ज्ञानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी नी, वेदनीय की, दो, मोहनीयकी छचीस, आयु. कर्मको चार, नामकर्मकी सड़सठ, गोत्रकर्मकी दो ये सब बन्ध होने योग्य प्रकृतियाँ हैं ॥१०५।। भावार्थ-आठों कर्मांकी बन्ध योग्यं प्रकृतियाँ (५+२+२+२६+४+३+२+ ५=१२० ) एक सौ बीस होती है। अव ग्रन्थकार उदय-योग्य प्रकृतियोंको गिनाते हैं- (ज्ञानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी नी, वेदनीयकी दो, मोहनीयकी अट्ठाईस, आयुकी चार, नामकर्मकी सड़सठ, गोत्रकी दो और अन्तरगयकी पाँच । ये सब उदय-प्रकृतियाँ कही गयी हैं ॥१०६।। भावार्थ-आठों कर्माको उदय-योग्य प्रकृतियाँ (५++२+२+४+६+२+ ५= १२२ ) एक सौ बाईस होती हैं । अव ग्रन्थकार भेद और अभेद विवक्षासे चन्ध और उदयरूप प्रकृतियोंकी संख्या कहते हैं- (भद-विवक्षासे बन्धयोग्य प्रकृतियाँ एक सौ छयालीस) हैं क्योंकि सम्यग्मिथ्यात्व और सम्यक्त्वप्रकृति; इन दो प्रकृतियोंका बन्ध नहीं होता, किन्तु अभद-विवक्षासे एक सी वीस प्रकृतियाँ बन्ध योग्य होती हैं। भद-विवक्षासे उदययोग्य सभी अर्थात् एकसौ अड़तालीस) प्रकृतियाँ किन्तु अभेद-विवक्षासे एकसी बाईस प्रकृतियाँ उदय-योग्य कही गयी है ।।१८७।। / १. गो० क० ३६ । २. गो० क० ३७ । 1. व सम्यग्मिथ्यात्व-सम्यक्त्वप्रकृतिद्वयं विना ।

५३ -- प्रकृतिसमुत्कीर्तन सत्त्वप्रकृतीराह- पंच णव दोणि अट्ठावीसं चउरो कमेण तेणवदी। दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ सत्तपयडीओ ॥१०॥ ५।९।२।२८।४।२३।२।५- १४८ । ज्ञानावरणस्य पञ्च प्रकृतयः ५ दर्शनावरणस्य नव प्रकृतयः ९ वंदनीयस्य हे प्रकृती २ मोहनीयस्य अष्टाविंशतिः प्रकृतयः २८ आयुपश्चतस्रः प्रकृतयः ४ नान्नः विनवतिः प्रकृतयः १३ गोत्रस्य हे. प्रकृती २ अन्तरायस्य पञ्च प्रकृतयः ५ इत्येताः एकनीक़ताः अष्टचत्वारिंशच्छतं १४८ सत्वयोग्य प्रकृतयः क्रमण सर्वज्ञेभणिताः ॥१८॥ घातिकर्माणि [ द्विविधानि-] सवंबातीनि देशवातीनि च । तत्र सर्वघातिप्रकृतीराह- केवलणाणावरणं दसणछकं कसायवारसयं । मिच्छंच सबघादी सम्मामिच्छं अबंधम्हि ॥१०॥ के १ ८६ । क १२ । मि १ । सम्मा० १ एताः २१ सर्वघातयः । कंवलज्ञानावरणं १, कंवलदर्शनावरणं । निद्रा २ निद्रानिद्रा ३ प्रचला ४ प्रचलाप्रचला ५ स्त्यान- गृद्धिः ६ इति दर्शनपट्कं ६, अनन्तानुबन्ध्यप्रन्याख्यानप्रत्याख्यानाधमानमायालोमा इनि कपाय द्वादनक १२ मिथ्यात्वप्रकृतिः १ इति विंशतिः सर्वघातीनि भवन्ति । सम्यग्मिध्यात्वं नु बन्धप्रकृतिनं नवनि । किन्तु तस्य सम्यग्मिथ्यात्वस्य उदय सत्त्वयोरव जात्यन्तरसर्वघातित्वं भवति ॥ १०९॥ देशघातीन्याह- णाणावरणचउकं तिदंसणं सम्मगं च संजलणं । णव णोकसाय विग्वं छब्बीसा देसघादीओ ॥११०॥ ज्ञा ४ । ६३ । स ५ । सं ४ । नो ९ । अं५ । एताः २६ । देशवानिन्यः । मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानावरणानां चतुष्कं ४ चक्षुरचक्षुरयधिदर्शनावरणत्रिकं ३ सम्यक्त्यप्रतिः अव ग्रन्थकार सत्त्वरूप प्रकृतियाँ गिनाते हैं- (जानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी नौ, वेदनीयकी दो, मोहनीयको अढाईस, आयुकम- की चार, नामकर्मकी तेरानवे, गोत्रकर्मकी दो और अन्तरायको पाँच ये नत्व प्रतियो की गयी हैं ॥१०॥ भावार्थ-पाठों कांकी सभी उत्तर प्रगनियाँ सत्त्वयोन्य मानी गयी हैं जिनकी संख्या (५+६+२+२+४-4-६३+२+५= १४८) एक मी अड़तालीम है। पहले जो घातिकर्म बतला आये हैं उनके सर्वघाती और देशवानीकी पन्ना दो भद होते हैं उनमें से सर्वघाती प्रकृतियों को गिनाते हैं- केवलज्ञानावरण, फेवलदर्शनावरण और पाँच निद्रा, इस प्रकार दानाया। प्रकृतियाँ बारह कपाय अर्थात् अनन्तानुवन्धी अप्रत्याख्यानावरण और प्रत्या पानाव बोध मान माया लोभ और मिथ्यात्व मोहनीय ये चील प्रगनियाँ नर्वधान । सन्याय प्रकृति भी वन्धरहित अवस्थामें अर्धान उदय और सत्त्व अवन्या सर्वानी !! १. गो० ०६४ । २. पचन. ४, १८६ गो०.०६९।३.c::::: 1. २ यन्धविवक्षायाम् ।

५४ कर्मप्रकृति १ संज्वलनक्रोधमानमायालोमकपायाणां चतुष्कं ५ हास्य-रस्यरति गोक-मय-गुगुण्यागीयन वेद नपुंसक- वेदा नव नोकपायाः ५ दान-लाम-भोगापभोग-बीर्यान्तरायाः पा , इनि पविशगिः २६ दंशयानानि भवन्ति ॥११॥ घातिनां सर्वघाति देशघातिभंदी प्ररूप्य अघागिनां प्रगम प्रशारदाप्रपांग प्रमाणप्रयागांगा- इयनाऽऽह- सादं तिण्णेवाऊ उच्चं सुर-गरदुगं च पंचिंदी । देहा बंधण संघादंगोवंगाई वणचउ. ।।१११॥ समचउर वारिसह उवघाणगुरुछक सगमणं । तसवारसट्ठसठ्ठी वादालमभेददो सत्था ॥११२।। गाथाद्वयरचना-सा १ । श्रा ३ । उ । म २ । मु २ । पं । दे ५। ५ । मं। अं३ । व ४ । भेद ब २० । स १ । व ५ । अगु ५ । स १ । तस १२ । भंद ६८ । अभेद ४३ । सातावेदनोयं १ तिर्यग्मनुष्यदेवायूंपि त्रीणि ३ । उगा गरगति-नरगन्यानुपये है. २ देवगति. देवगत्यानुपूर्व्यद्विकं २ पञ्चेन्द्रियं १ औदारिक वैक्रियिकाहारक-तैजस-कार्मणानि पज शरीराणि ५. औदारि- कादिपञ्च बन्धनानि ५ औदारिकादिपञ्चसंघातानि ५ श्रीदारिकालोपामचक्रियिकापामारकानापानानि श्रीणि ३ शुभवर्ण-गन्ध-रस-स्पश्चिस्वारः ४ समचतुरससंस्थानं १ बज्रपभनाराचमंहननं १ अगुल्लघु. परघातोच्छ्वासाऽऽतपाद्यौताः ५ प्रशस्त बिहायोगतिः १ अस ५ बादर २ पर्याप्त ३ प्रत्येकारीर ४ स्थिर , शुम ६ सुमग ७ सुस्वरा ८ देय २ यशः कात्ति १० निर्माण ११ तीर्थकराणानि १२ बसद्वादशकं एवं अष्टपष्टिः ६८ प्रकृतयो भदविवक्षया प्रशस्ता भवन्ति । अभेदविवक्षायां हिचस्वारिंगन ४२ प्रकन यो भवन्ति । 'सद्वेद्य शुभायुर्नामगोत्राणि पुण्य'मित्युक्ता एवेत्यर्थः ॥१११-११२॥ भावार्थ-ये सर्वघाती प्रकृतियाँ अपने प्रतिपक्षभूत गुणोंका सम्पूर्ण रूपसे बात करती हैं इसलिए इन्हें सर्वघाती) कहते हैं। अव देशघाती प्रकृतियोंको गिनाते हैं- केवलज्ञानावरणको छोड़कर ज्ञानावरणकर्मकी शेप चार प्रकृतियाँ, पूर्वोक्त ६ भेदोंके सिवाय दर्शनावरणकी शेष तीन प्रकृतियाँ, सम्यक्त्वप्रकृति, संज्वलन क्रोध मान माया लोभ, हास्यादि नौ नोकपाय और अन्तरायकी पाँचों प्रकृतियाँ ये छब्बीस देशघाती)प्रकृतियाँ हैं ॥११०॥ भावार्थ-इन प्रकृतियोंके उदय होनेपर भी जीवका गुण कुछ न कुछ अंशमें प्रकट रहता है इसलिए इन्हें देशघाती कहते हैं । इस प्रकार घातियाकौके भेद कहकर अब अघातिया कर्माके जो प्रशस्त और अप्रशस्त ये दो भेद हैं उनमें से पहले प्रशस्त प्रकृतियोंको बतलाते हैं- सातावेदनीय, तिथंच, मनुष्य और देव ये तीन आयु उच्चगोत्र, मनुष्यगति, मनुष्य- गत्यानुपूर्वी, देवगति, देवगत्यानुपूर्वी, पंचेन्द्रियजाति, पाँच शरीर, पाँच वन्धन, पाँच संघात, तीन अंगोपांग, शुभ वर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श इन चारके वीस भेद, समचतुरस्त्र संस्थान, वज्रऋपभ- नाराचसंहनन, उपघातके विना, अगुरुलघु आदि ६ प्रकृतियाँ तथा प्रशस्तविहायोगति और त्रस आदिक बारह प्रकृतियाँ इस प्रकार अड़सठ प्रकृतियाँ भेद-विवक्षासे प्रशस्त ( पुण्यरूप )) कही हैं। किन्तु अभेद-विवक्षासे वियालीस प्रकृतियाँ ही पुण्यरूप)कही गयीं हैं ।।१११-११२|| २. व अगुरुपटकस्य मध्ये उपघातो निराक्रियते । ३. गो. क० ४१.४२ । 1. तत्त्यार्थ० ८, २५ । १. त -वंगा य।

५५ १ । प्रकृतिसमुत्कीर्तन अप्रशस्तप्रकृतीर्गाथाद्वयेनाऽऽह- घादी णीचमसादं णिरयाऊ णिरिय-तिरियदुग जादी । संठाण-संहदीणं चदु पण पणगं च वण्णचऊ ॥११३॥ उवघादमसग्गमणं थावरदसयं च अप्पसत्था हु । बंधुदयं पडि भेदे अडणवदि सयं दु चदुरसीदिदरे ॥११४॥ गाथाद्वयरचना-घा ४७ । नी १ । अ १ । नि १ । नि २। ति २ । जा ४ । सं ५ । सं५ । व ४ । भेदे २० । उ १ । अस १ । था १० । भेदबन्धे ९८ । अभेदबन्धे ८२ । भेदोदये १०० । अभेदोदये ८४ । घातीनि सर्वाण्यप्रशस्तान्येवेति तानि सप्तचत्वारिंशत् ४७। कानि तानि ? ज्ञानावरण ५ दर्शनावरण २ मोहनीय २८ अन्तराय ५ एवं सप्त चत्वारिंशत् ४७ घातीनि । नीचे गोत्रं १ असातावेदनीयं १ नरका. युप्यं १ नरकगतिनरकगत्यानुपूर्विहिकं २ तिर्यग्गति-तिर्यग्गत्यानुपूर्विद्विकं २ एक-द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियजातयः ४ चतस्रः न्यग्रोधपरिमण्डल १ वाल्मीकसंस्थान २ कुजकसंस्थान ३ वामनसंस्थानानि च ५ इति पञ्च संस्थानानि वज्रनाराच १ नाराच २ अर्धनाराच ३ कीलिका ४ असपाटिका ५ इति पञ्च संहननानि, अशुभवर्ण-गन्ध-रस-स्पर्शाश्चत्वारः ४ उपघातः १ अप्रशस्तविहायोगतिः १ स्थावर १ सूचना २ पर्याप्त ३ साधारणा ४ स्थिरा ५ शुभ ६ दुर्भग ७ दुःस्वरा ८ नादेया ९ यशःकीर्तयः १० इति स्थावरदशकम् १० । इत्येताः अप्रशस्ताः बन्धोदयौ प्रति क्रमेण भेदविवक्षायां अप्टनवति: ६८ शतं १०० च भवन्ति । अभेद- विवक्षायां ह.यशीति ८२ श्चतुरशीति ८४ श्च भवन्ति ॥११३-५१४॥ कपायकार्यमाह- पढमादिया कसाया सम्मत्तं देस-सयलचारिशं । जहखादं धादंति य गुणणामा होति सेसावि ॥११॥ अनन्तानुबन्धिकपायाः सम्यक्त्वं नन्ति, अप्रत्याख्यानकपायाः देशचारित्रं नन्ति, प्रत्याख्यानकपायाः सकलचारित्रं महाव्रतं नन्ति, संज्वलनाः यथाख्यातचारित्रं नन्ति, तेन गुणनामानो भवन्ति । अनन्तसंसार. अव अप्रशस्त (पापरूप) कर्मप्रकृतियोंकी संख्या गिनाते हैं- चारों घातिया कर्मोंकी सैंतालीस प्रकृतियाँ, नीचगोत्र, असातावेदनीय, नरकायु, नरक- गति, नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, एकेन्द्रियादि चार जाति, समचतुरस्र- संस्थान, वज्रऋपभनाराचसंहननके सिवाय शेप पाँच संहनन, अशुभवर्ण, गन्ध, रस, स्पर्श, ये चार मूलभेद अथवा भेद-विवक्षामें बीस भेद, उपघात, अप्रशस्त विहायोगति और स्थावर आदि दश ये सब अप्रशस्त प्रकृतियाँ हैं । ये भेद-विवक्षासे बन्धरूप अट्टानबे हैं और उदय- की अपेक्षा सौ प्रकृतियाँ पापरूपोजानना चाहिए। तथा अभेदविवक्षासे बन्ध-योग्य विधामी) और (उदयरूप चौरासी पाप प्रकृतियाँ जानना चाहिए ।।११३-११४॥ अव अनन्तानुवन्धी आदि चारों कपायोंके कार्य बतलाते हैं- पहली अनन्तानुबन्धी कपाय सम्यक्त्वको, दूसरी अप्रत्याख्यानावरणकपाय देवाचारित्र- को, तीसरी प्रत्याख्यानावरणकपाय सकलचारित्रको और चौथी संचलनकपाय यथाख्यात चारित्र को घातती है । अतएव ये यथार्थ गुणनामवाली हैं अर्थात् जैसे इनके नाम है वैसे ही इनके गुण हैं । इनके अतिरिक्त शेप प्रकृतियाँ भी अपने नामके अनुसार अर्थवाली है ॥१५॥ १. गो० क० ४३.४४ । २. गो० १.० ४५ ।

५६ कर्मप्रकृति कारण वानिमथ्यात्वमनन्तम् , तदनुवचननीयनन्नानुवन्धिनः । प्रत्याग्यान पा संयी देशगमः, नं कपन्तीत्य प्रत्याख्यान कपायाः । प्रत्याख्यानं सकलमयमः, न कपन्नानि प्रयच्यानरूपाया। यम कीया ज्वलन्ति संयमन सहावस्थानात , संयमी वा ज्वलत्यपु सम्वपीति मंचलनाः । एनं पर यथाग्यान कपन्तीति संज्वलनापायाः । एवं शंपनाकपाय नानावरणादीन्यप्यन्यर्थयंत्रानि भवन्ति ॥११॥ संज्वलनादिचतु:कपायाणां वामनाकालमाह- अंतोमुहत्तपक्खं छम्मासं संखऽसंखऽणंतभवं । संजलणमादियाणं वासणकालो दु णिय मेणे ॥११६॥ उदयाभावेऽपि तत्संस्कारकालो वायनाकालः । स च संज्वलनानामन्त मुंह वासनाकालः, प्रन्या- ख्यानावरणानामक: पक्षो वासनाकाल: । अप्रत्याख्यानावरणानां चामनाकाल: पण्मासः । अनन्नानुबन्धिना वासनाकालः संख्यातमवः, असंगमानमयः, अनन्तमयो वा भवति नियमन ॥१६॥ अथ पुद्गल विपाकीन्याह- देहादी फासंता पण्णासा णिमिण तावजुगलं च । थिर-सुह-पत्तेयदुर्ग अगुरुतियं पोग्गलविवाई ॥११७॥ श ५। ६ ५। सं ५ । सं ६ । अं३ । सं६ । व ५। गं२१२५ । ग । नि। या२। स्थि २ । शु २ । १ २ १ अ १ । उ १५.१ । संयुक्ताः ६२ । औदारिकवै क्रियिकाऽऽहारकतैजसकार्मणशरीराणि पत्र ४ औदारिकादिवन्धनपञ्चकं ५ प्रौदारिकादि- -- श्रव कपायोंके वासना ( संस्कार ) का काल बतलाते हैं- संज्वलन आदि चारों कपायोंका वासनाकाल नियमसे क्रमशः अन्तर्मुहर्त एक पक्ष ( पन्द्रह दिन) ६ मास और संख्यात, असंख्यात तथा अनन्तभव है ॥११॥ विशेपार्थ-कपायके उदय नहीं होनेपर भी जितने समयतक उस कपायका संस्कार बना रहता है, उसे वासनाकाल कहते हैं। यहाँ वासनाकालसे अभिप्राय यह है कि किसीके साथ वैर-विरोध हो गया तत्पश्चात् जितने कालतक उसके हृदयमें बदला लेनेका भाव बना रहता है उतने कालको वासनाकाल कहते हैं । जिन साधुओंके संज्वलन कपायका उदय रहता है उनके बदला लेनेका भाव अन्तर्मुहूर्त तक ही रहता है। जिन श्रावकों के प्रत्याख्यानावरण कपायका उदय रहता है उनके बदला लेनेके भाव एक पक्षतक रहते हैं। जिन अविरतसम्य- ग्दष्टि जीवोंके अप्रत्याख्यानावरण कपायका उदय रहता है उनके बदला लेने के भाव ६ मास तक रहते हैं और जिन मिथ्यावष्टि जीवोंके अनन्तानुबन्धी कपायका उदय रेहता है उनके बदला लेनेके भाव ६ माससे लेकर संख्यात, असंख्यात और अनन्तभव तक बने रहते हैं। ऊपर बतलायी गयी कर्मप्रकृतियाँ पुद्गलचिपाकी, क्षेत्रविपाकी, भवविपाकी और जीवविपाकीके भेदसे चार प्रकारकी हैं। उनमें से पहले पुद्गलचिपाकी प्रकृतियों की संख्या वतलाते हैं- शरीर नामकर्मसे लेकर स्पर्श नामकर्म तक पचास प्रकृतियाँ, तथा निर्माण, आतप, उद्योत और स्थिर शुभ, प्रत्येक इन तीनोंका जोड़ा, तथा अगुमलघु आदि तीन ये सब बासठ प्रकृतियाँ पुद्गलविपाकी हैं अर्थात् इनके उदयका फल जीवके पौद्गलिक शरीरमें ही होता है ॥११७॥ १. गो० क०४६। २. गो० ० ४७ ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन संघाताः पज्ञ ५ समचतुरस्त्रादिसंस्थानानि पट् ६ औदारिकवैक्रियिकाऽऽहारकाङ्गोपाङ्गानि ब्रीणि ३ वज्रवृपभ- नाराचादिसंहनननामानि पट् ६ श्वेतादिवर्णाः पञ्च ५. कटु कादिरसाः पञ्च ', सुगन्धं दुर्गन्धो हो २ शीतादि- स्पर्शाष्टकं ८ इति पञ्चाशत् ५० । निर्माणं १ बातपोद्योतो हो २ स्थिरास्थिरहिकं शुभाशुभहिकं २ प्रत्यक- साधारणाहक २ अरुलगवातपरवातत्रिकं ३ इति द्वाप प्टिः ६२ पुद्गलत्रिपाकानि भवन्ति; पुद्गले एवैषां विपाकत्वात् ॥११७॥ भव-क्षेत्र-जीवविपाकीन्याह- आऊणि भवविवाई खेत्तविवाई य आणुपुव्वीओ। अत्तरि अबसेसा जीवविवाई मुणेयब्बा ॥११॥ भववि. आ० ४ । क्षेत्रवि० आनु० ४ । शेषाः जीवविपाकिन्यः ७८ 1. नरकतिर्थमनुष्यदेवायूं पि चत्वारि ४ भवविपाकीनि । नरकतिर्थङ्मनुप्यदेवगत्यानुपाणि चत्वारि ४ क्षेत्रविपाकीनि । अवशिष्टाटसप्ततिः ७८ जीवविपाकोनि । कुनः ? नारकादिजीवपर्याय निवन्ननुवा- जीवविपाकीनि । एवं प्रकृतिकार्यविशेषा ज्ञातव्याः ॥११८॥ तानि कानि जीवविपाकीनीति चेदाह- वेयणीय गोद घादीणेकावणं तु णामपयडीणं । सत्तावीसं चेदे अत्तरि जीवविवाईओ ॥११६।। सानासानवेदनीयद्वयं २ उच्चनीचगोत्रयं २ । घातिज्ञानावरण ५ दर्शनावरण ९ मोहनीय २८ अन्तराय ५ इति धातिसप्तचत्वारिंशत् ४७, वेदनीयगोत्रहवं मिलिना एकपञ्चाशन ५०, नामकर्मणः सप्त- विशति २७ श्रेत्यष्टसप्ततिः ७८ जीवविपाकानि भवन्ति ॥११९॥ नामकर्मणः सप्तविंशतिप्रकृतीराह- तित्थयरं उस्सासं वादर पजत्त सुस्सरादेज्जं । जस-तस-विहाय-सुभगदु चउगइ पण जाइ सगवीसं ॥१२०॥ ति १ । उ । वा २। प २। सु २। आ २। य २ । व २। विरासु २ । ग १ । जो ५। माः २७ । अव भवविपाको, क्षेत्रविपाकी और जीवविपाकी प्रकृतियोंको वतलाते हैं- नारकादिक चार आयु भव विपाकी हैं, क्योंकि नरकादि भव में ही इन प्रकृनियोंका फल प्राप्त होता है । चार आनुपूर्वी प्रकृतियाँ क्षेत्रविपाकी हैं: क्योंकि परलोकको गमन करते जीवके मध्यवर्ती क्षेत्र में ही इनका उदय होना है। शेष अठहत्तर प्रकृतियाँ जीवविपाकी जानना चाहिए क्योंकि इनका फल जीवको ही प्राप्त होता है ।।११।। श्रव इन्हीं अठहत्तर जीवविपाको प्रकृतियोंको गिनाते हैं- वेदनीयकी दो, गोत्रकी दो, धातिया कर्मोकी सैंतालीस, इसप्रकार ६ कोको टकावन प्रकृतियाँ तथा नामकर्मकी सत्ताईस | इसप्रकार सब मिलाकर अव्हनर प्रकृनियों जीय- विपाकी हैं ॥११॥ अब नामकर्मकी उपर्युक्त सत्ताईस प्रकृतियाँ बतलाते हैं- तीर्थंकरप्रकृति. उच्छ्वासप्रकृति, तथा बादर, पर्याप्र. नुवर. आदेय. यानि. १. पच० ४, ४९२ । गो० २०४८ । २.गो.९० ४९ । .मो.०० ...। 1. व पुद्गल विपाकितापहिः भविपावित क्षेत्रभिधायिका पनान्यः महनिया उदरिता: सप्ततिः । हुए + कर्मप्रकृति तीर्थकर १ उच्छ्वास १ बादर ३ सूक्ष्म ४ पर्याप्त ५ अपर्याप्त ६ मुस्बर ७ दुःम्बर ८ श्रादेग अनादेय १० यशाकीतिः ११ अयश-कीर्ति: १२ बम १३ स्थायर १.१ प्रासामनमाधिकायागनि १६ सुभग-दुर्भगहिकं १८ नारकतियंग्मनुष्यदेवगायत्रतत्रः ४, २२; एक-हि-नि-ना: पनियतामयः पन , इति एकत्रिता नामकर्मणः सप्तविंशतिः २७ प्रकृयो भवन्ति ॥ १२० प्रकारान्तरेण ता आह- गदि जादी उस्सासं विहायगदि-तसतियाण जुगलं च । सुभगादी चउजुगलं तित्थयरं चेदि सगवीसं ॥१२१।। ग ४ | जा ५। उ १ । बि २ । त २१ वा २१ प२ । मु२ । सु २ । आ २ । यो । सर्वाः २७। नरकादिचतुर्गतयः ४ एकन्द्रियादिपञ्चजातयः ५ उच्छवामः १ मामलामत विहायोगनियुगलं. २ अस-स्थावरयुग्मं ३ सूक्ष्म-बादरयुगलं २ पर्याप्तापर्याप्तयुग्मं २ मुमग-दुभंगयुगलं २ मुस्बर-दुःस्परयुग्मं २ श्रादेयानादेययुग्मं २ यशोऽयशःकीतियुग्मं २ तीर्थक्षरस्यं , इण्यता मलिनाः नामकर्मणः सप्तविंशनि प्रकृतयो २७ भवन्ति ॥१२॥ इदि पयडिसमुक्कित्तर्ण समत्तं । -- अथ प्रकृतिस्वरूपं व्याख्याय स्थितिबन्धमुपक्रमन्नादी मूलप्रकृतीनामुपस्थितिमाह- तीस कोडाकोडी तिघादि-तदिएसु वीस णामदुगे। सत्तरि मोहे सुद्धं उवही आउस्स तेत्तीस ॥१२२।। ज्ञाना. दर्श० अन्त० वेद. ३० कोडा. साग० । ना. गो० २० को० । मो० ७० को। आयुष्कर्मण ३० सागरस्थितिः । त्रस, विहायोगति और सुभग इनका जोड़ा, नरकादि चार गतियाँ तथा एकेन्द्रियादि पाँच जातियाँ । इस प्रकार नामकर्मकी सत्ताईस प्रकृतियाँ जीवविपाकी जानना चाहिये ।।१२०।। अब दूसरे प्रकारसे इन्हीं सत्ताईस जीवविपाकी प्रकृतियोंको गिनाते हैं- चार गति, पाँच जाति, उच्छवास, विहायोगति; और त्रस, बादर, पर्याप्त इन तीनका जोड़ा तथा सुभग, सुस्वर, आदेय, यश कीर्ति इन चारका जोड़ा और एक तीर्थंकर प्रकृति । इस प्रकार क्रमसे ये सत्ताईस नामकर्मकी प्रकृतियाँ जीवविपाकी हैं ।।१२।। इस प्रकार प्रकृति-समुत्कीर्तन नामक अधिकार समाप्त हुआ। अब स्थितिवन्धको बतलाते हुए, सर्वप्रथम आठो मूल कौको उत्कृष्ट स्थितिको वतलाते हैं- तीन घातिया कर्माकी अर्थात् ज्ञानावरण, दर्शनावरण, अन्तराय कर्मकी तथा तीसरे वेदनीयकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तीसकोडाकोडी सागरप्रमाण है। नाम और गोत्रकर्मको उत्कृष्ट १. गो. क० ५१ । २, गो० क. १२७ । --- स्थितिबन्ध ५६ -- . "तिघादिनदिएसु' इति त्रिवातितृतीयेषु ज्ञानावरण-दर्शनावरणान्तरायघातित्रिके 'तदिए' इनि तृतीयकर्मणि वेदनीयाख्ये च उत्कृष्टस्थितिबन्धस्त्रिंशत् ३० कोटीकोटिसागरोपमाणि भवति । 'नामदुर्ग' नाम- गोत्रयोः द्वयोविंशति २० कोटीकोटिसागरोपमाणि उत्कृष्टस्थितिबन्धो भवति । मोहनीय कर्मणि उत्कृष्टस्थिति- वन्धः सप्ततिः ७० कोटीकोटिसागरोपमाणि भवति । श्रायुःकर्मणि शुद्धानि कोटीकोटिविशेषणरहितानि सागरोपमाण्येव त्रयस्त्रिंशत् ३३ उत्कृष्टस्थितिबन्धो भवति ॥१२२॥ थोत्तरप्रकृतीनां स्थितिबन्धं गाथाषटकेनानाऽऽह- दुक्ख-तिघादीणोघं सादित्थी-मणुदुगे तदद्धं तु । सत्तरि दंसणमोहे चरित्तमोहे य चत्तालं ॥१२३॥ दु १ ज्ञा ५ दं ९ अं ५ सा० ३० को० । इ म ५ को० सा० । मो०७० को० सा० । क. १६ सा० ४० को। 'दुक्ख-तिघादीणेचं' इति असातावेदनीयं १ ज्ञानावरणानां पञ्चकं ५ दर्शनावरणानां नवकं ६ अन्त- रायाणां पञ्चकं ५ एवं विंशतिप्रकृतीनां २० उत्कृष्टस्थितिबन्धः ओघः मूलप्रकृतिवत् त्रिंशत् ३० कोटीकोटि- सागरोपमाणि भवति । सातवेदनीयं १ स्त्रीवेदः १ मनुप्यगति-मनुष्यगन्यानुपूर्विद्वयं २ एतासु चतसृपु उत्कृष्टस्थितिवन्धः तदर्ध पञ्चदशकोटीकोटिसागरोपमाणि भवति । दर्शनमोहे मिथ्यात्वे बन्धे एकविधयान , तत्र दर्शनमोहे उत्कृष्टस्थितिबन्धः सप्ततिः ७० कोटीकोटिसागरोपमाणि भवति । चारित्रमोहनायपोडग- कपायेपु अनन्तानुबन्च्यप्रत्याख्यानप्रत्याख्यानसंज्वलनभेदमिन्नेषु उत्कृष्टस्थितिबन्धश्चत्वारिंशत् ४० कोटीकोटि- सागरोपमाणि भवति ॥२३॥ संठाण-संहदीणं चरिमस्सोघं दुहीणमादि त्ति । अट्ठारस कोडिकोडी वियलाणं सुहुमतिण्हं च ॥१२४॥ हु १ च १ सा० २० को० । बा की १ सा० १८ को । कु १ अ १ सा० १६ को० । साना १ सा०१४ को० । नि० १ व १ सा० १२ को० । स १ व १ सा० १० को। विति ५ च १ सा० १८ को० । सू १ अ १ सा १ सा० १८ को० । स्थिति वोस कोडाकोडी सागरप्रमाण है । मोहनीयकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोडाकोडी सागर प्रमाण है । आयुकर्मकी उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागरप्रमाण है ॥१२२।। विशेपार्थ-एक समयमें बँधनेवाले कर्मोंकी उत्कृष्ट स्थिति गाथामें बतलाये गये काल- प्रमाण है अर्थात् उतने कालतक वह कर्म आत्माके साथ बँधा रहता है और क्रमशः अपना फल देकर झड़ता रहता है। अब काँकी उत्तर प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितिको छ्ह गाधाओले बतलाते हैं- दुःख अर्थात् असातावेदनीय एक, ज्ञानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी नी और अन्न- रायकी पाँच; इन वीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ओघ अर्थात् सामान्य मुलकमांक समान तीस कोडाकोड़ी सागरप्रमाण है । सातावेदनीय, स्त्रीवेद, मनुष्यगति और मनुष्यगन्या. नुपूर्वीः इन चार प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थिनिबन्ध उक्त प्रकृतियोंसे आधा अर्थान् पन्द्रह कोड़ा कोड़ी सागर प्रमाण है । ( मिथ्यात्व दर्शनमोहनीयका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मत्ता कडाकाई सागरप्रमाण है और चारित्र मोहनीयका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध चालीन कोडाकोडी नागर- प्रमाण है ॥१२३॥ छह संस्थान और उह संहननमें से अन्तका हुण्डकसंस्थान और नृपातिक मंहनन इन दोनोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मूलप्रकृतिके समान बील कोडाकोड़ी सागर है । मध्ययन चार १. गो. ०६२८ । २.गो. क.० १६९।

६ ६० कर्मप्रकृति पटसंस्थान पटसंहननानां मध्ये चरमयंग्यानस्य उकस्म । चरगहननम्याग्यम्प्राप्तामृपाटिका. भिधानस्य १ अधः मूलप्रकृतिवन विंशतिः २० कोटीकाटियागरोपमाणि उपस्यियन्धी भवति । 'दुहीणमादित्ति' शेषसंस्थानमंहननानां मगरल मंस्थान-वनयपानारावानापन्न हिनिकोटीकाटि- सागरोपमहीनः शोधः द्विविहीन ओघ इत्यर्थः । बालाबांधा स्पष्टतया उच्या-वामन संस्थान कीलिका- संहननयोः द्वयोः अष्टादशकोटीकोटियागरोपमाणि 14 उमटस्थिनियन्धः । कुन्जकमस्थानाधनारायंहन- नयोः द्वयोः उत्कृष्टस्थितिबन्धः पांडाकोटीकाटिसागरापमाणि १६ भवति। बालमीकसंस्थान-नाराचसंहन- नयोः उत्कृष्टस्थिति बन्धश्चतुदंशकोटोकोटिसागरोपमाणि । मानि । न्यग्रो त्रसंस्थाग-नारायसंहननयों द्वादश कोटीकाटिसागरीपमाणि १२ उत्कृष्टस्थिनियन्धः । समचतुरमा संस्थान यन्त्रपमनारायननयोः दशकोटी. कोटिसागरोपमाणि १० उत्कृष्टस्थितिबन्धः । विकल प्रयाणां हिनिचतुरिन्द्रियाणां मूत्रयाणां मुश्मा. पर्याप्त-साधारणानां च एतासां पण प्रकृतीनां उल्टस्थितिवन्धः अष्टादा 14 कोटीकाटियागगरमाणिमयति । अरदी सोगे संढे तिरिक्ख-भय-णिरय-तेजुरालटुगे । वेगुब्बादावदुगे णीचे तस-वण्ण-अगुरुतिचउकः ॥१२५॥ इगि-पंचिंदिय-थावर-णिमिणासम्गमण अथिरकाणं । वीसं कोडाकोडी सागरणामाणमुबारसं ॥१२६।। असो १ सं ति २ भ २ नि २ ते २ ओव २ मा २ नी नव या पं1 था : नि । श्रस १ अथि ६ साग०२० कोडा० अरती १ शोके १ पण्डवेदे १ तियंग्गति-निर्यग्गयानुष्यंहिक २ मय शुगुमाहिक २ नरकगति- नरकगन्यानुपूव्यंद्विक २ तेजस-कार्मणहि के २ औदारिकोदारिकाजोपाहिक । वैरियिक वैझियिकासापासहिक २ आतपोद्योतद्विक २ नीचैगोत्रे १ असचतुकं इति ब्रस-बादर-पर्याप्त प्रत्येकचनुक ४ वर्णचनुष्क इति वर्ण- गन्ध-रस-स्पर्शचतुष्कं ४ अगुरुचतुफे इति अगुरुलघूपधातपरवातीचच्यासचतुष्कं ४ एकन्द्रिये १ पजेन्द्रियं । स्थावर १ निर्माण ५ अप्रशस्तविहायोगी १ अस्थिरपटक इनि अस्थिराशुभदुभंगदुःस्वरानादेयायशः. कीर्तिपटक ६ एतासु एकचत्वारिंशप्रकृतीपु ४५ प्रत्येकं विंशतिकोटीकोटसागरोपमाणि २० उत्कृष्टस्थिति- बन्धी ज्ञातव्यः ॥१२५-१२६॥ संस्थान और चार संहननोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध दो-दो सागर पहले-पहले तक कम करना चाहिए । अर्थात् वामनसंस्थान और कीलक संहननका अठारह, कुजक संस्थान और अर्ध- नाराच संहननका सोलह, स्वातिसंस्थान और नाराच संहननका चौदह, न्यग्रोध परिमण्डल- संस्थान और वज्रनाराचसंहननका वारह तथा समचतुरस्र संस्थान और वज्रवृपभनाराच संहननका दश कोडाकोड़ी सागरप्रमाण है । विकलेन्द्रिय अर्थात द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय जाति और सूक्ष्मादि तीन; इन छह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अठारह कोड़ाकोड़ी सागर- प्रमाण है ॥१२४|| अरति, शोक, नपुंसकवेद; तिर्यंचगति, भय, नरकगति, तेजस, औदारिक इन पाँचका जोड़ा, वैक्रियिक आतप इन दो का जोड़ा, नीचगोत्र, त्रस, वर्ण, अगुरुलघु इन तीनोंकी चौकड़ी एकेन्द्रिय जाति, पंचेन्द्रिय जाति, स्थावर, निर्माण, असद्गमन (अप्रशस्त विहायोगति ) और अस्थिरादि छह; इन इकतालीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध वीस कोडाकोड़ो सागर- प्रमाण है ।।१२५-२६॥ १. गो. क. १३०-१३१ ।

स्थितिवन्ध ६१ - हस्स रदि उच्च पुरिसे थिरछके सत्थगमणदेवदुगे। तस्सद्धमंतकोडाकोडी आहार-तित्थयरे ॥१२७॥ हा र ११ पु १ धिरादि ६ स दे २ सा० १० कोडा० । श्रा२ति सा० अंतको० । हात्ये १ रतौ १ उच्चैनोंने १ पुंवेदे । स्थिरपटक इति स्थिर १ शुभ २ सुभग ३ सुस्वरा ४ देय ५ यशःकीर्ति ६ पटके प्रशस्तविहायोगतो १ देवगति-देवगत्यानुपूर्वीहिके २ इति त्रयोदशप्रकृतीषु तस्याः विंशतरर्ध दशकोटीकोटिलागरोपभाणि उत्कृष्टस्थितिबन्धो भवति । आहारकद्वये तीर्थकृतश्चोत्कृष्ठस्थितिवन्धः अन्तःकोटीकोटिसागरोपमाणि । कोटीसागरोपमोपरि कोटाकोटिसागरोपममध्चा सा अन्तःकोटीकोटि- संज्ञा ।।१२७॥ सुर-णिरयाऊणोघं णर-तिरियाऊण तिणि पल्लाणि । उक्करसहिदिबंधो सपणीपज्जत्तगे जोगे ॥१२॥ सु १ नि ६ सा० ३३ । न १ ति । ५० ३ । सुर-नारकायुपोरुत्कृष्टस्थितिबन्धः ओघवत् मूलप्रकृतिवत् वयसिंशसागरोपनाणि, तिमनुप्यायुपीः नीणि पल्योपमानि ३ । अयमुत्कृएस्थितिबन्धः संजिपर्याप्तानां जीवानानेव भवति । 'योन्य इत्यनेना संसारकारणत्वादशुभत्वात् शुभाशुभकर्मणां चातुर्गतिकसंक्टिंजीवरेव बध्यत इत्यर्थः ॥१२॥ आधुस्वयवर्जितशुभाशुभप्रकृतीनामुष्टस्थितिकारणं संक्लेश एवेन्याह- सन्यहिदीणमुक्करसओ दु उकस्ससंकिलेसेण । विवरीदेण जहण्णो आउगतिगवजियाणं तु ॥१२६।। तु पुनः तिर्यङ्-मनुप्य-देवायुर्वजितसर्वप्रकृतिस्थितीनां उत्कृष्टस्थिति बन्धनं उत्कृष्टयोदोन भवति । हास्य, रति, उच्चगोत्र, पुरुपवेद, स्थिरादि छह, प्रास्तविहायोगति, देवगति, देव- गत्यानुपूर्वी इन तेरह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध ऊपरकी प्रकृतियोंसे आधा अर्थान् दया कोडाकोड़ो सागरप्रमाण है। आहारकशरीर. आहारक आङ्गोपाङ्ग और तीर्थकर इन नीन- प्रकृतियोंका स्थितिबन्ध अन्तःकोड़ाकोड़ी अर्थात् कोडिसे ऊपर और कोडाकोड़ासे नीचे इतने सागर प्रमाण है ॥१२७॥ देवायु और नरकायु इन दोनोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मूलप्रकृति के सनान तेतील नागर है । मनुष्यायु और तिर्यगायुका उत्कृष्ट स्थिति बन्ध तीन पल्यप्रमाण है । तीन शुभ अायुक सिवाय शेप कोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध संज्ञी, पंचेन्द्रिय, पर्यातक, बोन्य जीयक ही होता है. हरएकके नहीं होता ॥१२॥ अव उत्कृष्ट स्थितिबन्धके कारणभूत परिणामोंका निर्देश करते हैं- तीन आयुकर्म अर्थात् तियंच. मनुष्य और देवाके बिना इंप एकनी सत्ता प्रति- योंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध यथासंभव उत्कृष्ट संबलेश परिणामों होता है और जपन्न मिति. बन्ध विपरीत परिणामोंसे अर्थात् संक्लेशसे उल्टे उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामोल होता है । कर आयुकर्मोका इससे विपरीत अर्थात् उत्कृष्ट विमुद्ध परिणामीले उत्कृष्ट नियतिवन्य होता है उत्कृष्ट संक्लेश परिणामोंसे जवन्य स्थिनियन्ध होता है ॥१२॥ १. गो. पा. १३ः। २. नो००। ६.५.४ ।। 1. व किंचिन्न्यूनकोटीकोटिनागरीपमालि।. वया जाने नि चार बन्धो भवतीत्यर्थः। 1. द कपादन, उल्हासनगरिमानेन ।

- ६२ कर्मप्रकृति तु पुनः तासां तिथंडमनुष्यदेवायुवजितसर्वप्रकृतिस्थितीनां जघन्य स्थितिबन्ध [ विपरीशन ] जघन्य- संकेशेन । अर्थात् ] उस्कृष्ट विशुद्धपरिणामेन भवति । तत्नयरय नियमानुष्यदेवायुष्कत्रयस्य तपस्थिति बन्धनं उत्कृष्टविशुद्धपरिणामन जघन्यस्थितिवन्धनं तद्विपरीतन भवतीत्यर्थः ॥१६॥ उत्कृष्टस्थितिबन्धकमाह- सव्वुक्कस्सहिदीणं मिच्छाइट्ठी दु बंधगो भणिदो । आहारं तित्थयरं देवाउं वा विमोचूणं ॥१३०॥ आहारकशरीराऽऽहारकशरीराङ्गोपाङ्गइयं तीर्थकरत्वं देवायुधेति चत्वारि मुक्त्वा शेप १६ प्रति. सर्वोत्कृष्टस्थितीनां मिथ्याष्टिरेय जीवो बन्धको भणितः । तयाणां साहारकाऽऽहारकामोपासतीशंकरदेवायुषां तु बन्धको सम्यग्दृष्टिरेव जीवां भवति ॥१३०॥ तत्रापि विशेषमाह- देवाउगं पमत्तो आहारयमप्पमत्तविरदो दु । तित्थयरं च मणुस्सो अविरदसम्मो समजेई ॥१३१॥ देवायुः उत्कृष्टस्थितिकं प्रमत्तगुणस्थानवर्तिमुनिरेवाप्रमत्तगुणस्थानाभिमुखो बध्नाति, अप्रमत्ते वायु- [च्छित्तौ अघि तत्र सातिशय तीवविशुद्वित्वेन तदबन्धात् । निरतिशय बोत्कृटासम्भवात् । नु पुनः आहा- रकद्वयं उत्कृष्टस्थितिकं अप्रमत्तः प्रमत्तगुणस्थानामिमुखः संक्लिष्ट एव बनाति, आयुग्मायजितानां उन्कृष्ट- स्थितिरुत्कृष्टसंक्लेशेन इत्युक्तत्वात् । तीर्थकरमुत्कृष्टस्थितिकं नरकगतिगमनाभिमुसमनुप्यासंयतसम्यग्दष्टिरंच जीवो बध्नाति ॥१३१॥ शेषाणां ११६ प्रकृतीनां उत्कृष्टस्थितिबन्धकमिथ्यादृष्टीन् गाथायनाऽऽह- णर-तिरिया सेसाऊ वेगुध्वियछक वियल-सुहुमतियं । सुर-णिरया ओरालिय-तिरियदुगुजोव-संपत्तं ॥१३२॥ - . अव उत्कृष्ट स्थितिवन्धके करनेवाले स्वामियोंका निर्देश करते हैं- आहारकशरीर, आहारकशरीर-आङ्गोपाङ्ग, तीर्थकर और देवायु इन चार प्रकृतियोंको छोड़कर शेप एकसौ सोलह प्रकृतियोंकी उत्कृष्ट स्थितियोंका बन्ध करनेवाला मिथ्यावृष्टि जीव कहा गया है॥१३०॥ अव उक्त चार प्रकृतियोंके बन्ध करनेवाले स्वामियोंका निर्देश करते हैं- देवायुका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध प्रमत्तसंयत करता है। आहारक शरीर और आहारक आंगोपांगका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध अप्रमत्त संयत करता है और तीर्थंकर प्रकृतिका उत्कृष्ट- स्थितिबन्ध अविरतसम्यग्दृष्टि मनुष्य करता है ।।१३१|| अव उक्त चार प्रकृतियों के अतिरिक्त शेष जो एक सौ सोलह प्रकृतियाँ हैं उनके बन्ध करनेवाले मिथ्यादृष्टि जीवोंका विशेषरूपसे निरूपण करते हैं- देवायुसे शेप नरकादि तीन आयु, वैक्रियिकपटक, द्वीन्द्रियादि तीन विकलेन्द्रिय जाति, १. पञ्चसं० ४, ४२६ गो० को० १३५ । २. पञ्चसं० ४, ४२७ गो० क० १३६ । ३. त सेसा।

स्थितिवन्ध ६३ देवा पुण एइंदिय आदावं थावरं च सेसाणं । उक्कस्ससंकिलिट्ठा चद्गदिमा ईसिमज्झिमया ॥१३३॥ नर-तिर्यञ्चः श्या ३ वै ६ वि ३ सू ३ । सुर-नारकाः औ २ ति २ उ १ अ १ । देवाः ए १ था । था । उक्त २८ शेषाः । नरकतिर्यङ्-मनुष्यायूंपि ३ वैक्रियिकपटकमिति चैक्रियिक-चैक्रियिकाङ्गोपाङ्ग-देवगति-देवगत्यानुपूर्वी- नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वीति वैक्रियिकपटकम् ६ विकलत्रयमिति द्वि-त्रि-चतुरिन्द्रियत्रिकं ३ सूक्ष्मन्नयमिति सूक्ष्मसाधारणाऽपर्याप्तत्रयम् ; इत्येतानि उत्कृष्टस्थितिकानि नरास्तिर्यञ्चश्च वनन्ति । श्रौदारिकौदारिकाङ्गी- पाङ्गद्वयं २ तिर्यग्गति-तिर्यग्गत्यानुपूर्व्यद्वयं २ उद्योत: १ असम्प्राप्तसपाटिकसंहननं ५ इत्येतानि उत्कृष्ट- स्थितिकानि सुरनारका एव वनन्ति । एकेन्द्रिया १ तप २ स्थावराणि उत्कृष्टस्थितिकानि पुन: देवा बनन्ति। शेषाणां द्वानवतिप्रकृतीनामुत्कृष्टस्थितिबन्धं उत्कृष्टसंक्लिष्टा मिध्यादृष्टय ईपन्मध्यममंक्लिष्टाश्च1 चानुगतिका जीवा बध्नन्तीत्यर्थः ॥१३२.१३३॥ अथ मूलप्रकृतीनां जवन्य स्थितिवन्धमाह- वारस य वेयणीए णामागोदे य अट्ठ य गुहुत्ता। भिण्णमुहत्तं तु ठिदी जहष्णयं सेसपंचण्हं ॥१३४॥ ज्ञा० द० अन्त० । वे० सु० १२ । मो० आ० अन्त० । ना. गो० मु० ८ । अं० अन्त० । वेदनीये कर्मणि जघन्यस्थितिबन्धो द्वादश मुहूर्ताश्चतुर्विंशतिघटिकाः २४ भवतीत्यर्थः । नाम- गोन्नयोः द्वयोः कर्मणोः जघन्यस्थितिबन्धः अष्टौ मुहर्ताः पोडश घटिका १६ भवति । तु पुनः शेषपज्ञानां ज्ञानावरण-दर्शनावरण-मोहनीयाऽऽयुरन्तरायाणं पञ्चानां कर्मणां एकैकोऽन्तर्मुहत्ता जघन्यस्थितियन्धी भवति ॥१३४॥ सूक्ष्मादि तीन इन पन्द्रह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध मनुष्य और तिर्यंच मिथ्यादृष्टि जीव ही करते हैं । औदारिक शरीर, औदारिक आंगोपांग, तिर्यग्गति, तिर्यग्गत्यानुपूर्वी, उद्योत और स्मृपाटिका संहनन इनका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध देव और नारकी मिथ्यादृष्टि जीव हो करते हैं । एकेन्द्रियजाति, आतप और स्थावर इन तीन प्रकृतियांका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध मिथ्याष्टि देव करते हैं। शेप वानवे प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध उत्कृष्ट संक्लेश परिणामवाले तथा ईपन्मध्यम परिणामवाले चारों गतिके मियादृष्टि जीव करते हैं ।।१३२-१३३।। विशेषार्थ--उत्कृष्ट स्थिति के बन्धयोग्य असंख्यात लोक-प्रमाण संलिष्ट परिणामांके पल्योपमके असंख्यातवें भागप्रमाण खण्ड करनेपर जो अन्तिम खण्ड प्राप्त होता है, उसे उत्कृष्ट संक्लेश परिणाम कहते हैं। प्रथम खण्डका नाम ईपन संक्लेश है। और दोनों मध्यवर्ती परिणामोंकी मध्यम संक्लेश संज्ञा है । अव मूलप्रकृतियोंका जघन्य स्थितिवन्ध बतलाते हैं वेदनीयकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध वारह मृहूर्त है, नाम नथा गोत्रकर्मका आठ मुहर्न है। शेष बचे पाँच कोका जघन्य स्थितिवन्ध अन्तर्मुहर्त्त-प्रमाण है ॥१३॥ १. गो. क० १६९-१३८ । २. पञ्चतं० ४, ४०९ गो० ०१:६। 1. व ईषन्मध्यमपरिणामाः मिथ्यारटयो या। . व एनं जघन्यस्थिनिन् नमनानगरपान याधाति । ३. व इयं स्थितिदशमस्थाने ज्ञातव्या । 1. व ज्ञानावरमानावरताना या जघन्य स्थितिः दशमगुणस्थाने ज्ञातव्या । मोहनीयन्य नदमनगरपाने ।

कर्मप्रकृति अथोत्तरप्रकृतीनां जघन्यस्थितिवन्ध गाथाचतुष्टयंगा- लोहस्स सुहुमसत्तरसाणमोघं दुगेबादलमासं । कोहतिए पुरिसस्स य अ य वासा जहणठिद्री ॥१३॥ लोभस्य सूक्ष्मसाम्परायबन्धसप्तदशानां प्रकृतीनां च जयन्य स्थितिबन्धः यः मूलप्रम नियन भवति । तद्यथा-नवमगुणस्थाने लोभस्य जघन्य स्थिनियन्धानामुंह काली भयनि । गृथ्ममाम्पराय ज्ञानावरणपञ्चकं ५ अन्तरायपञ्चकं ५ चक्षुरचक्षुरधिकंवलदानचतुष्कं ४ एनासां चनुदंगप्रकगीना ४ अन्तर्मुहर्तकालो जघन्य स्थितिवन्धो भवति । तथा सूक्ष्म साम्पराये यशारकी रागात्रस्य च जयन्यस्थिनि. वन्धोऽष्टौ मुहर्ता भवति । सातवेदनीयस्य जघन्य स्थितिबन्धों द्वादश १९ गृहत्ताः । एवं सूक्ष्मसाम्पराये सप्तदशप्रकृतीनां १७ यथासम्भवजघन्यस्थितिबन्धी ज्ञानयः । 'कोहनिए दुर्गपदलमासं' इति प्राधस्य जघन्य स्थितिवन्धो हौ मासी २ । मानस्य जयन्यस्थितिबन्धः एको मास: । मायावा जयस्थितिबन्धाः- र्धमासः । पुवेदस्याटवाणि ८ जघन्यस्थितिबन्धः ।।१३५॥ तित्थाहाराणंतोकोडाकोडी जहण्णठिदिबंधो । खवगे सग-सगबंधच्छेदणकाले हवे णियमा ॥१३६॥ तीर्थकराऽऽहारकद्वययोरन्त:कोटोकोटिसागरोपमाणि । अयं जघन्यस्थितिवन्धः सर्वापि क्षपषु स्व-स्ववन्धव्युच्छित्तिकाले एच. नियमाद्भवति ॥१३६॥ भिण्णमुहुत्तो गर-तिरियाऊणं वासदससहस्साणि । सुर-णिरयआउगाणं जहण्णओ होइ ठिदिबंधो" ॥१३७॥ नर-तिर्यगायुपोः जघन्यस्थितिबन्धोऽन्तर्मुहतो भवति । सुरनारकायुपीः जघन्य स्थितिबन्धी दश. सहस्रवाणि भवति ॥१३७॥ - अब उत्तरप्रकृतियोंका जघन्य स्थितिवन्ध बतलाते हैं- संज्वलन लोभ कपाय और दशवें सूक्ष्मसाम्पराय गुणस्थानमें बँधनेवाली सत्तरह प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबन्ध मूलप्रकृतियों के समान जानना चाहिए । अर्थात् यशःकीर्ति और उच्चगोत्रका आठ-आठ मुहूर्त, सातावेदनीयका बारह मुहूर्त, पाँच ज्ञानावरण, चार दर्शनावरण और पाँच अन्तराय इन चौदहका तथा लोभ प्रकतिका जघन्य स्थितिवन्ध एक- एक अन्तर्मुहूर्त प्रमाण होता है । क्रोधादि तीनका अर्थात् संज्वलन क्रोध, मान और मायाका क्रमसे दो मास, एक मास और पन्द्रह दिन प्रमाण जघन्य स्थितिबन्ध होता है। पुरुपवेदका जघन्य स्थितिवन्ध आठ वर्ष-प्रमाण होता है ॥१३५।। तीर्थंकर और आहारकद्विक इन तीन प्रकृतियोंका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तः कोड़ाकोड़ी सागर-प्रमाण होता है । यह जघन्य स्थितिबन्ध क्षपक श्रेणीवाले जीवोंके अपनी-अपनी बन्ध- व्युच्छित्तिके समयमें ही नियमसे होता हैं ॥१३६।। मनुष्यायु और तिर्यगायुका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त है। देवायु और नरकायुका जघन्य स्थितिबन्ध दश हजार वर्षप्रमाण होता है ।।१३७|| १. त वस्सा । २. गो० क० १४० । ३. गो० क० १४१ । ४. त जहण्णयं । ५. गो० क० १४२ ।

स्थितिबन्ध ६५. सेसाणं पज्जत्तो बादर एइंदिओ विसुद्धो य । वंधदि सबजहण्णं सग-सगउक्कस्सपडिभागे ॥१३८॥ पूर्वगाथोनाभ्य एकोनत्रिंशत्प्रकृतिभ्यः २९ शेपैकनवति ९१ प्रकृतीनां मध्ये वैक्रियिकपटक ६ मिथ्यात्वरहितानां चतुरशीति ८४ प्रकृतीनां जघन्यस्थितिं बादरेकेन्द्रियपर्याप्तो जीवस्तद्योग्य विशुद्ध एवं बध्नाति स्व-स्वोत्कृष्टप्रतिभागेन त्रैराशिकविधानेन इत्यर्थः ॥१३॥ तद्यथा- - एयं पणकदि पण्णं सयं सहस्सं च मिच्छवरबंधो । इगि-विगलाणं बंधो अवरं पल्लासंखूण संखूणं ॥१३६।। ठिदिबंधो समत्तो। एकेन्द्रिया जीवाः मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थिति दर्शनमोहमेकसागरोपमा बन्नन्ति । द्वीन्द्रियजीवाः मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थितिं पञ्चविंशतिसागरोपमाणि २५ बध्नन्ति । त्रीन्द्रियप्राणिनः मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थितिं पञ्चा. शत्सागरोपमाणि ५० बन्नन्ति । चतुरिन्द्रियजीवाः मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थितिं शतसागरोपमाणि १०० वन्ति । असंज्ञिपञ्चेन्द्रियजीवाः सहस्रसागरोपमाणि १००० बन्नन्ति दर्शनमोहोत्कृष्टस्थितिवन्धम् । संजिनः पर्याप्ता जीवा एव मिथ्यात्वोत्कृष्टस्थितिबन्धं सप्तति ७० कोटीकोटिसागरोपमाणि बन्नन्ति । 1 तजयन्यस्तु एकन्द्रिय हीन्द्रियादीनां स्व-स्वोत्कृष्टात् पल्यासंख्येय-पल्यसंख्येयमागोनक्रमो मवति ॥१३९॥ उसका प्रमाण उपर्युक्त उनतीस प्रकृतियोंके सिवाय इक्यानवे प्रकृतियाँ शेप रहती हैं। उनमेसे वैक्रियिकपटक और मिथ्यात्व इन सात प्रकृतियोंके विना शेप चौरासी प्रकृतियोंकी जघन्य स्थितियोंको बादर पर्याप्त यथायोग्य विशुद्ध परिणामोंवाला एकेन्द्रिय जीव ही बाँधता है। गणितके अनुसार त्रैराशिक विधिसे भाग करनेपर अपनी-अपनी स्थिति के प्रतिभागका जो प्रमाण आवे उतना जानना चाहिए ॥१३८|| अव उसी जघन्यस्थितिकी विधि और प्रमाणको दिखलाते हैं- एकेन्द्रिय और विकलचतुष्क अर्थात् द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और असंजी पंचेन्द्रिय ये पाँच प्रकारके जीव क्रमशः मिथ्यात्वकर्मकी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध एक सागर, पञ्चीस सागर, पचास सागर, सौ और एक हजार सागर-प्रमाण करते हैं। एकेन्द्रिय जीव अपनी उत्कृष्ट स्थिति में से पल्यका असंख्यातवाँ भाग कम करनेपर जो प्रमाण बाकी रहता है उतनी जघन्य स्थितिको बाँधते हैं और विकल-चतुष्क जीव अपनी-अपनी उत्कृष्ट स्थितिमें से पल्यके संख्यातवें भाग कम करनेपर जो प्रमाण शेप रहता है, उतनी जघन्य स्थितिको बाँधते हैं ॥१३९।। विशेपार्थ-इस गाथामें एकेन्द्रिय जीवोंसे लेकर असंती पंचेन्द्रिय जीवों तक.के. मिथ्यात्वक उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबन्धका प्रतिपादन किया गया है। जिसका न्बुलासा यह है कि यदि एकेन्द्रिय जीव तीवसे तीन भी संक्लेशसे परिणत होकर मिश्यान्वकर्मका कल करे. नो सागर १. गो. क.० १४३ । २. गो.न. १४४ । 1. व मिथ्या वजघन्य स्थिनियन्धः । 2. एकेन्द्रियाणां दर्शनमोहम्य सोस्पिनिदान पन्धः पल्यांसख्ययभागोनः । हीन्द्रियादिपु वोकृष्टस्धिनि बन्यायल्यानवभागानः । ९ कर्मप्रकृति एकेन्द्रियादोनां दर्शनमोहस्योत्कृष्टस्थितिवन्धं व्याख्याय चारित्रमाहनीय-ज्ञानाचरण-दर्शनावरण- वेदनीयान्तराय-नाम-गोत्राणां उत्कृष्टस्थितिबन्धः कियान् स्यादिग्यासकायां श्रीगोम्मटसारोमगाथामा-- जदि सत्तरिरस पत्तियमंत्तं किं होदि तीलियादीणं । इदि संपाते सेसाणं इगि-विगलंसु उमय दिदी1 ॥१६॥ सप्ततिकोटीकोटिसागरोपमोत्कृष्टस्थितिकमिथ्यात्वस्य धन्धे सति यदि एकेन्द्रियः एकसागरोपममा: दर्शनमोहं वनाति, तदा तीसियादीनां एकेन्द्रि यस्योत्कृष्टस्थितिवन्धः कियान लब्धी भवनीन्याह-वाली. सियानां चारित्रमोहनीयषोडशकपायाणां एकसागरोपमचतुःसप्तमागाः [सा०४] । नीसियानां अमान. वेदनीयकानविंशतिघातिनां १९, एकसागरोपमत्रिसप्तमागाः ॐ [ सा०] । बीसियाना हुण्डासम्प्राप्तास- पाटिकाऽरतिशोकपण्डवेदतिर्यग्गति-तिर्थग्गस्यानुपूर्व्यय-मय द्विक - तजसद्विकोदारिकाद्विकाऽऽनपहिक चित्रि- सचतुष्क-वर्ण चतुष्कागुरुलघूपधातपरघातोच्छ्चासंकेन्द्रियपशेन्द्रियस्थावरनिर्माणासद्गमनास्थिरपटकानां ३.९, एक-सागरोपमद्वि-सप्तमागा [ सा० ३]। पुनः अनेन सम्पानराशिकक्रमेण शेपाणां सागरम जवान १५ कोटीकोटिस्थितिसातवेदनीय स्त्रीवेद मनुष्ययुग्मानां सागराष्टादश 16 कोटीकाटिस्थिति-बामन-कौलित. विकलत्रय-सूक्ष्मन्त्रयाणां सागरपोढश १६ कोटीकाटिस्थिति-कुन्जकार्धनाराचयोः सागरचतुर्दश १४ कोटीकाटि- स्थिति-स्वातिनाराचयोः सागरद्वादश १२ कोटीकोटिस्थितिन्यग्रोध-बज्रनाराचयोः सागरदा १० कोटी कोटि- स्थितिसमचतुरस्र-वज्रवृपभनाराचयोः हास्यरत्युचैत्रि-पुंवेद-स्थिरपटकसद्गमनानां च उत्कृष्टस्थितिबन्ध एकेन्द्रियस्य साधयेत् । एवं पञ्चविंशति २५ पञ्चाशतं ५० शतं १०० सहनं १००० च सागरोपमाणि चतुरः फलराशीन् कृत्वा चालीसियादीनि पृथक-पृथक इच्छाराशीन कृत्वा प्रमाणराशि प्रागनमंव कृत्वा लब्धानि हीन्द्रियादीनां चालीसियादिगतोत्कृष्ट स्थितिबन्धप्रमाणानि भवन्ति । वह एक सागर-प्रमाण स्थितिको बाँधेगा, इससे अधिक नहीं। और वही जीव यदि मन्दसे भी मन्द संक्लेशसे परिणत होकर मिथ्यात्वका बन्ध करे, तो पल्यके असंख्यातवें भागसे कम एक सागर-प्रमाण स्थितिको बाँधेगा, इससे कमकी नहीं। विकल-चतुष्क जीवोंका जो उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बतलाया गया है, उसमेंसे पल्यका संख्यातवाँ भाग कम कर देनेपर जो प्रमाण शेप रहता है, उतनी-उतनी जघन्य स्थितिका वे जीव बन्ध-करते हैं, उससे कमका नहीं। यह तो हुई केवल मिथ्यात्वके उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबन्धकी बात । किन्तु ये ही जीव मिथ्यात्वके सिवाय शेप कर्मोंकी कितनी उत्कृष्ट स्थिति और जघन्य स्थितिका बन्ध करते हैं ? इस प्रश्नके समाधान के लिए टीकाकारने गो० कर्मकाण्डकी 'जदि सत्तरिस्स' इत्यादि एक करण- सूत्र-गाथा लिखकर त्रैराशिक विधिसे शेप कर्मोंकी उत्कृष्ट और जघन्य स्थिति के निकालनेका उपाय बतलाया है, जो कि इस प्रकार जानना चाहिए-यदि कोई एकेन्द्रिय जीव सत्तर कोड़ा. कोड़ीसागरोपम उत्कृष्ट स्थितिवाले मिथ्यात्वकी एक सागर-प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करता है, तो वहीं तीस कोड़ाकोड़ी सागरोपम उत्कृष्ट स्थितिवाले ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय और अन्तराय इन चारों कर्मोकी कितनी उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करेगा ? इस प्रकार त्रैराशिक करनेपर तीन वटे सात सागर अर्थात् एक सागरके समान सात भाग करनेपर उनमेसे तीन भाग-प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध करेगा। इसी प्रकार त्रैराशिक विधिसे निकालनेपर वही जीव चालीस कोड़ाकोड़ी सागर-प्रमाण चारित्र मोहनीयका चार वटे सात सागर-प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिवन्ध करेगा। वही जीव वीस कोडीकोड़ी सागरकी उत्कृष्ट स्थितिवाले नाम और गोत्रका 3 दो वटे सात सागर-प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिका वन्ध करेगा। यह तो हुआ मूलकर्मों के उत्कृष्ट स्थितिवन्धका निरूपण । अब आगे टीकाकारने इसी ऊपरके 1. गो० ऋ० १४५ ।

स्थिति बन्ध चा० मो० द० मि० सा०१ सा० १०० सा० १००० उत्कृष्ट स्थितिबन्धसंदृष्टयथा- ज्ञा०६९अंबे० नानीगो. अं०२० प्र० ३९ पर्याप्तकेन्द्रियस्योत्कृष्टस्थितिबन्धः- सा०४ सा० सा० द्वीन्द्रियस्योत्कृष्टस्थितिबन्धः- सा० २५ सा० १४२ सा० १०५ सा० ४ ब्रीन्द्रियस्योत्कृष्टस्थितिबन्धः सा० ५० सा० २०३ सा० २४ सा० १४ चतुरिन्द्रियस्योत्कृष्टस्थितिबन्धः- सा० ५७१ सा० ४२७ सा० २४ श्रसंज्ञिरञ्जेन्द्रियस्योत्कृष्टस्थितिबन्धः- सा० ५७१ सा० ४२४४ सा० २८५४ एकेन्द्रियवादरपर्याप्तको जीवः दर्शनमोहस्य मिथ्यात्वप्रकृतरुत्कृष्ट स्थितिबन्धं सागरोपममेकं १ वनाति । चारित्रमोहस्य पोडशकषायाणां उत्कृष्टस्थितिवन्धं सागरस्य सप्तभागानां मध्ये चतुभांगान् बध्नाति । ज्ञा० ५ द० ९ अं० ५ असातवे० ५ एवं विंशतिप्रकृतीनामुत्कृष्टस्थितिबन्धं सागरस्य सप्तमागानां मध्ये विभागान् बध्नाति । नामकर्मप्र० हुण्डक १ असम्प्राप्ता० २ अरति ३ ४ शोक ५ नपुं० ६ तियंग्यं ८ भय ९ जुगुप्सा १० तैजस ११ कार्मण १२ औदारिकद्विक १४ अातपोद्योत १६ नीचगोत्र १७ असचतुष्क । अगुरुलघु २२ उप० २३ पर० २४ उच्छ्वास २५ एकं० २६ पंचे० २७ स्या० २८ नि० २९ असद्गमन ३० वर्णचतुष्क ३४ अस्थिरषटकं ४० एकेन्द्रियः पर्याप्तो बनाति । हीन्द्रियपर्याप्तो दर्शनमोहस्य मिध्यात्वोत्कृष्टस्थितिबन्धं सा० २५ चारित्रमोहस्य पोडशपायाणां उ० बं० सा० १४ भा० २ ज्ञा० ५ द० ९ असातवे० ५ अं० ५ एवं विंशतिप्रकृतीनां उत्कृष्टस्थिनियन्धं सा० १० भा० नामप्र० ३१ नीचगोत्रस्य १ उत्कृ० सा० ७ माग बनाति । वीन्द्रियजीवः पयांतो दर्शनमोहत्य मिध्यात्व प्र० उ० सा० ५० कनाति । चारित्रमाहस्य पीडश- कपायाणां उ० सा० २८ भा०। ज्ञा० ५ द० ६ अं. ५ असातवे० ६ एवं २० उ० सा० २५ भा० । नामप्र० ३६ नीच गो० १ एवं ४० प्रकृतीनां स्थिति वं० सा० १४ भा० ३ यनाति । चतुरिन्द्रियः पयांतो दर्शनमो० मिथ्या० उत्कृ० सा० १०० चारित्रमोहस्य १६ प्र. उत्कृष्टस्थितिवन्धं साग० ५.७ भा० साल ५ द० ९ अं० ५ असातवे० ५ एवं विंशतिप्रकृतीनां उ० सा० ४२ भा० नामत्र० ३५ नाचगोल : एतास ४० प्र० उत्कृ० सा० २८ मा० यताति । १ , करणसूत्र-प्रतिपादित नियमके अनुसार उत्तर प्रकृतियोंक भी उत्कृष्ट स्थिनिबन्धको निकाला है, जो इस प्रकार है- एकेन्द्रियजीवके चारित्र मोहनीयकी १६ कपायोंका उत्कृष्ट स्थिनिबन्ध नागर: ज्ञाना- वरणकी ५ दर्शनावरणकी : अन्तरायको ५ और असालावेदनीय इन २० प्रकृनियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध , सागर; हुण्डकसंस्थान, मृपाटिकासंहनन, अरति, शोक, नपुंसकवेद, नियंगनि, तिन्गत्यानुपूर्वी, भय, जुगुप्सा, तैजसशरीर, कार्मणशरीर. औदारिकागा. औदारिक-अंगो पांग, आतप, उद्योत, नीचगोत्र, सचतुष्क, वर्णचतुष्क, अगुगलघु. उपयात. पायात. याम एकेन्द्रियजाति. पंचेन्द्रियजाति, स्थावर, निर्माण, अप्रास्तविहायोगनि. और अधिरपटा इन ३६ प्रकृतियोंका सागर-प्रमाण उत्कृष्ट स्थितिवन्ध होगा। इसी प्रकार पर बतलायी गयी पैराशिकविधिले १५ कोडाकोड़ मागावी यूट स्थितिवाले सातावेदनीय, सीवेद, मनुष्यगति, मनुष्यगत्यानुपूर्वीकाः १८ कोड़ा कोही नगर उत्कुष्ट स्थितिवाले वामन संस्थान, कोलक.संहनन, विकलनिक. मदिर ६ काद सागरकी उत्कृष्ट स्थिति वाले कुजकारीर और अर्ध-नाराच हननकः १४ कोटवाईमा उस्कट स्थिति वाले स्वातिसंस्थान और नाराचसंहननका : कोडार ही नगर ः ६८ कर्मप्रकृति श्रपंक्षिपञ्चेन्द्रियपर्याप्ती दर्शनमोहस्य मिथ्या० उ० साग० १००० चारित्रमा० प्र० सा० ५." मा० ज्ञा० ५६० ६ अं०५ असातवे० ॥ २० 30 सा० ४२८ मा० नाममा ३६ नीचगी। उत्कृ० सा० २८५ भा०४ यन्नाति । एकन्द्रियस्य-दर्शनमोहस्य सागर ? चारित्रमाहस्य मा० द० वे० अं०,, '८ ना. गो० है हीन्द्रियरय-२५ दर्शनमाहस्य उत्कृष्टस्थितिवन्धः या. २. ५७ चारित्रमाहस्य सागरी० १४ श्रा० ज्ञा० द० ० अन्त० उ० सा० १० मा०: नामगोत्रयां० सा० ७ भा० * स्थितिवाले न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान और बननाराचसंहननका; १० कोडाकोड़ी सागरी उत्कृष्ट स्थितिवाले समचतुरस्र संस्थान, वज्रवृपभनाराचसंहनन, हास्य, रनि, उचगोत्र, पुरुषवेद, स्थिरपटक और प्रशस्तविहायोगति इन सभी प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध एकेन्द्रियजीवोंक सिद्धकर लेना चाहिए। यह तो हुआ एकेन्द्रियजीवोंक काँकी उत्तर प्रकृतियोंक उत्कृष्ट स्थितिबन्धका निरूपण । इसी प्रकार २५. सागर की उत्कृष्ट मिथ्यात्व-स्थितिको बाँधनेवालं ह्रीन्द्रियजीवोंक; ५० सागरकी उत्कृष्ट मिथ्यात्व-स्थिति के बाँधनेवाले त्रीन्द्रियजीवोंक; १०० सागरको उत्कृष्ट मिथ्यात्व-स्थिति के बाँधनेवाल चतुरिन्द्रियजीवोंके तथा १०१० सागरकी उत्कृष्ट मिथ्यात्व-स्थिनिक बाँधनेवाले असंज्ञी पंचेन्द्रियजीवोंके भी सभी उत्तर प्रकृतियोंके उत्कृष्ट स्थितिबन्धको भी ऊपर बतलायी गयी त्रैराशिक विधिसे निकाल लेना चाहिए। संस्कृत टीकामें जो अंक-संदृष्टि दी गयी है, उसमें त्रैराशिक करनेसे जो प्रमाण निकलता है। वह दिया गया है। उसका ग्युलासा एके- न्द्रियजीवोंका तो ऊपर कर ही आये हैं। शेपका इस प्रकार जानना चाहिए.-~- द्वीन्द्रिय पर्याप्तक जीव के दर्शनमोहका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध २५ सागर, चारित्रमोहकी सोलह कपायोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध १४ सागर; ज्ञानावरणकी पाँच, दर्शनावरणकी नी, अन्तरायकी पाँच और असानावेदनीय इन बीस प्रकृनियोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध १०४ सागर, नामकर्मकी ३६ प्रकृतियोंका तथा नीचगोत्रका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ७. सागर होता है। *च प्रती इयान पाठोऽधिका- तत्संज्ञी उत्कृप्टेन एकेन्द्रियादीनां उत्कृष्टजघन्यो स्थितिबन्धी श्राह । तदुपरि गोम्मटसारोकगाथामाह- जदि सत्तरिस्त पत्तियमंत्तं किं हादि तीसियादीगं । इदि संपति संसाणं इगिविगले सु उमय टिदी । सप्ततिकोटीकोटिसागरोपमोत्कृष्टस्थितिकदर्शनमाह - मिथ्यात्वस्य यदि एक सागरोपममात्रं एकन्द्रियो जीवो बध्नाति तदा तीसियादीनां ज्ञानावरणादीनां किं भवति लब्धः ? एकन्द्रियः पर्याप्तः दर्शनमाहनीयस्य सागरापमं १ उत्कष्टरिथतिबन्ध बन्नाति । चारित्रमोहनीयस्य सागरापमस्य सप्तभागानां मध्ये चतुरी मागान् बनाति , उत्कृष्टस्थितिम् । ज्ञानावरणदर्शनावरणवंदनीयान्तरायाणां उत्कृष्ट स्थितिबन्धं सागरोपमस्य सप्तमागाः क्रियन्त तन्मध्यं श्रीन मागान बन्नाति । नामगांत्रयाः उत्कृष्ट स्थितिबन्धं सागरोपमस्य सप्त. मागानां मध्ये द्वा भागी वनाति ।

स्थितिबन्ध ६६ श्रीन्द्रियस्य-५० दर्शनमोहस्योत्कृष्टस्थितिबन्धः साग० ५० २०० चारित्रमोहस्य उ० साग० २८ मा०४ ११. ज्ञा० द० वे० अं० सा० २१ भा० 3 १० नामगोत्रयोः सा० १५ भा०३ चतुरिन्द्रियस्य-१०० दर्शनमोहस्य उ० स्थितिव० सा० १०० ४०० चारित्रमोहस्य उ० सा० ५७ भा०७ 300 ज्ञा० द० वे० अं० सा० ४२ भाई २०० नामगोत्रयोः सा० २८ भा० ४ असंजिनः-१००० दर्शनमोहस्य उ० सा० १००० ४००० चारित्रमोहस्य सा० ५७१ मा० 3000 ज्ञा० द. वे० अं० सा० ४२८ भा० ४ २००० नामगोत्रयोः सा० २८५ मा० ४ प्र० ७० फ० १ २० ए० द्वी० त्री० म० ७० फ० २५ प्र० ७० फ० ५.० इ० ४० इ० ४० इ० ४० इ० ४० इ० ४० ..D च० फ० १०० पं० २० प्र० फ० १००० ३० त्रीन्द्रिय पर्याप्तक जीव के दर्शनमोहका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध ५० सागर, चारित्रमोहकी सोलह कपायोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध २८४ सागर, ज्ञानावरणादि तीन घातिया कर्माकी उन्नीस और असातावेदनीय इन बीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध २१ सागर; नामकर्मको ३०. और नीचगोत्रका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध १४ सागर होता है । चतुरिन्द्रिय पर्याप्तक जीवके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध १०० सागरका; चारित्र- मोहकी सोलह प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ५७१ सागरकाः ज्ञानावरणादि तीन घानिया- कर्मोंकी उन्नीस और असातावेदनीय इन बीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध १२सागरका: नामकर्मकी उनतालीस और नीचगोत्र इन चालीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट स्थिनिवन्ध २८ सागरका होता है। असंजी पंचेन्द्रिय पर्याप्तक जीवके मिथ्यात्वका उत्कृष्ट स्थिनियन्ध १०० नागरकाः चारित्रमोहकी सोलह कपायोंका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ५७९६ सागरकाः नानावणादि नान घातिया कर्मीकी उन्नीस और असातावेदनीय इन बीस प्रकृनियोंका उत्कृष्ट विनिवन्ध १८ सागरका; नामकर्मकी उनतालीस और नीच गोत्र इन चालीस प्रकृतियोंका उत्कृष्ट धिनिबन्ध २८५४ सागरका होता है । ऊपर द्वीन्द्रियसे लगाकर असंजी पंचेन्द्रियतकके जीवोंके मानों कोंकी यष्टमितिका निरूपण किया गया है। इनमें से जिस जीवके जिस प्रकृतिका जितना इष्ट मिनिबन्ध होता है, उसमें से पल्यका संख्यालयों भाग कम कर देनेपर वह जीव जन प्रतिक ने जघन्य स्थितिवन्धको करता है।

७० कर्मप्रकृति संक्षिपञ्चेन्द्रियस्यात्कृष्टस्थितिबन्धः दर्शनमोहमियान्यस्य कोडा सा७० नारिटमाहस्य कोला सा० ४० । ज्ञा० द० ० ० कोडा० सा० ३० । नाम-गोत्रयोः कांडा मा.२० । इति स्थितिबन्धप्रकरण समाप्तम श्रथानुभागवन्धस्वरूपं गाथाचतुकणा- सुहपयडीण विसोही तिव्यो असुहाण संकिलेसेण विवरीदेण जहण्णो अणुभागो सयपयडीणं ॥१४०॥ शुभप्रकृतीनां सातादीनां द्वाचस्यारिंशसंग्यांपनानां ४२. विशुद्धपरिणामन विदिगुणेना गटस्य" पुरुषस्य तीवानुभागो भवति । अशुभप्रकृतीनां असातादीनां हया नियंग्यपिताना ८६ मियादृष्ट गुरफटभ्य संक्लेशपरिणामेन च तीवानुमागो भवति । विपरीतन संशपरिणामन प्रशस्त प्रकृतीनां जयन्यानुमागां मयति, विशुद्धपरिणामन अप्रशस्तप्रकृतीनां च जघन्यानुभागी भवति ॥१४॥ अनुभाग इति किम् ? इति प्रश्न तत्स्वरूपं प्रथमतः घातिध्याह- सत्ती य लता-दारू-अट्ठी-सेलोवमा हुघादीणं । दारुअणंतिमभागो त्ति देसघादी तदो सव्वं ॥१४॥ घातिनां ज्ञानावरण-दर्शनावरण-मोहीयान्तरायाणां शक्यः स्पर्धकानि लनादावस्थिर्शलोपनचतुर्वि- - -- संज्ञी पंचेन्द्रिय जीवोंके सभी प्रकृतियोंका उत्कृष्ट और जघन्य स्थितिबन्ध मृलग्रन्थमें गा० १२२ से लगाकर गा० १३८ तक बतलाया ही गया है। आयुकर्मका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध ३३ सागर है जो सर्वार्थसिद्धि या सातवें नरक जानेवाले मनुष्य और तिथंच जीव वर्तमान भवकी आयुके त्रिभागमें वाँधते हैं। आयुकर्मका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तर्मुहूर्त है, यह भी मनुष्य या तिर्यंचके ही होता है। उपर्युक्त सर्व कथनकी अर्थ-बोधक संदृष्टियाँ संस्कृत टीकामें दी हुई हैं, जिन्हें पाठक सुगमतासे समझ सकेंगे। विस्तारके भयसे यहाँ नहीं दी जा रही है। इस प्रकार स्थितिवन्ध नामक द्वितीय प्रकरण समाप्त हुआ। अव अनुभागवन्धका वर्णन करते हैं- सातावेदनीय आदिक शुभ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागवन्ध विशुद्धिसे होता है और असातावेदनीय आदि अशुभ प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनुभागवन्ध संक्लेशसे होता है । उक्त प्रकृतियोंका जघन्य अनुभागवन्ध विपरीत परिणामोंसे होना है अर्थात् शुभ प्रकृतियोंका संक्लेशसे और अशुभ प्रकृतियोंका विशुद्धि से जघन्य अनुभागबन्ध होता है । इस प्रकार सर्व- प्रकृतियों के अनुभागवन्धका नियम जानना चाहिए ॥१४॥ अव धाति और अघाति कर्माकी अनुभागरूप शक्तिका वर्णन करते हैं- घातिया कर्मों के फल देनेकी शक्ति लता ( वेलि) दारु ( काठ ), अस्थि (हड्डी ) और शैल ( पत्थर ) के समान होती है अर्थात् लता आदिकमें जैसे उत्तरोत्तर अधिकाधिक कठोरand १. त संकिलेस्सेप । २. पञ्चसं० ४, ४५१, गो० क. १६३ । ३. गो० क० १८० । 1. अनुभवस्वरूपं-ज्ञानावरणादिकर्मणां यस्तु रसः सोऽनुभवः, अध्ययसानैः परिणाम नित: क्रोधमानमायालोमतीनादिपरिणाममावितः शुभः सुखदः, अशुमः असुखदः, स अनुभागयन्दः । यथा- भजागोमहिप्यादीनां क्षीराणां तीब्रमन्दादिमावेन रसविशेषः, तथा कर्म पुद्गलानां तीवादिमानेन स्वगत. सामध्यविशेषः शुमः अशुमो वा । 2. व नोकटस्य । -nnnn अनुभागवन्ध ७१ भागेन तिष्ठन्ति खलु स्फुटस् ।, तत्र लताभागमादिं कृत्वा दार्वनन्तकमागर्यन्तं देशवानिन्यो भवन्ति । तत उपरिदार्वनन्तबहुभागमादिं कृत्वा अस्थि-शैलभागेषु सर्वत्र सर्ववातिन्यो भवन्ति ॥१४॥ तासां देशघाति-सर्व-घातिनां सर्वासां प्रकृतीनां मध्ये मिथ्यात्वस्य विशेषमाह- देसो त्ति हवे सम्मं तत्तो दारु-अणंतिमे मिस्सं । सेसा अणंतभागा अहि-सिलाफड्ढया मिच्छे' ।।१४२॥ लतामागमादिं कृत्वा दार्वनन्तैकभागपर्यंन्तानि देशवातिस्पर्धाकानि सर्वाणि सम्यक्त्वकृतिर्भवति । शेपदार्वनन्तबहुभागेष्वनन्तखण्डीकृतेप्वेकखण्डं जात्यन्तरसर्वघातिमिश्रप्रकृतिर्भवति । शेपदार्वनन्तबहुमाग- वहुमागाः अस्थिशिलास्पर्धकानि च सर्वघातिमिथ्यात्वप्रकृतिर्भवति ॥१४२॥1 गुडखंडसकरामियसरिसा सत्था हु किंव-कंजीरा । विस-हालाहलसरिसा असत्था हु अघादिपडिभागा ॥१४३।। अणुभागो गदो। अघातिनां द्वाचत्वारिंशत्प्रशस्तप्रकृतीनां ४२ प्रतिमागाः शक्तिविकल्पाः गुड-खण्ड-शर्करामृतसदृशाः खलु [ स्फुटम् ] । अप्रशस्तानां अघातिनां सप्तत्रिंशत्प्रकृतीनां ३७ निम्ब काझीर-विप-हालाहल सदशाः सलु स्फुटम् ।' उदयापेक्षया सर्वप्रकृतयः १२२ । तासु घातिन्यः प्रक तयः ४७ । अघातिन्यः प्रकृतयः ७५ । -- पना है वैसे ही इनके फल देनेकी शक्ति में भी उत्तरोत्तर अधिकाधिक तीव्रता समझना चाहिए. इनमें दारुभागके अनन्तवें भाग तकका शक्तिरूप अंश देशघाती है और दारुके शेप बहुभागसे लेकर शैल भाग तकका शक्तिरूप अंश सर्वघाती है अर्थात् उसके उदय होनेपर आत्माके गुण प्रकट नहीं होते ॥१४॥ अव दर्शनमोहनीयके मिथ्यात्व श्रादि भेदोंमें जो विशेषता है उसे बतलाते हैं- मिथ्यात्व प्रकृतिके लताभागसे लेकर दारुभागके अनन्तवें भागतक देशघाती स्पर्द्धक सम्यक्त्वप्रकृति के हैं। दारुभागके अनन्तवहुभागके अनन्तवभाग प्रमाण भिन्न जानिके सर्व- घातिया स्पर्धक मिश्न प्रकृति अर्थात् सम्यग्मिथ्यात्वके हैं । दाल्के शेप अनन्त बहुभाग नया हड्डी और शैलभागरूप स्पर्धक मिथ्यात्व प्रकृतिके जानना चाहिए ।।१४२।। अव प्रशस्त और अप्रशस्तरूप अघातिया कोंकी शक्तियोंको बतलाते हैं- अघातिया कर्मों में प्रशस्त (पुण्य ) प्रकृतियोंके दशक्ति अंदा गुड़. खाँड, मिनी और अमृत के समान तथा अप्रास्त (पाप ) प्रकृतियोंके शनि अंदा निन्य (नीम ). कांजीर, विप और हालाहलके समान जानना चाहिए ॥१४३।। १. गो० १.० १८१ । २. गो. क. १८४ । 1. शामर-भण्डारस्थप्रती टोकापाठोऽयम्-निध्यात्यप्रकृती दंगघानि-पर्यन्तं प्रधानमन्वय- परिणामन गुणसंझमभागहारेण यंशापेक्षकविधा सत्यल्पमिध्यावनिः देशवानि-जायंटरमधानि. सर्वघातिभेदेन सम्यक्त्व-मित्र-मिथ्यात्वनकातिभेदेन विधा कनास्तीनि लतानागनादि विधा काकादानंतर भागपर्यन्तं देशवातितकानि सर्वाणि सन्यसप्रकृति वेन् । शेप दानन्न दमागरम पकवान कृत्या राजकं सं जायतरसर्वघाति-मिशालानिर्भवति । रोपागा दानंद दाग-दानाः पी. शिलापकानि च सर्वघाति-मिप्यायप्रकृतिभवति । 2. पहों पर जो टीमें हिंदी है, उसै परिक्षित देखिये ।

७२ कर्मप्रकृति पनामु प्रास्ताः ४२ । प्रशस्नाः प्रकृतयः ३३ । प्रशस्तवर्ण चतुष्कामानि गम्मिन् मिलिने ३. अप्रास्ता:1 ॥१४॥ प्रशस्तप्रकृतीना-अमृतसामुन्कृष्टं चतुर्थस्थानं भवति । शकंगमहामनाएं नीयस्थानम् । साहसदृशमजवन्यं द्वितीयस्थानम् । गुडसह जयन्यमकाथानं भवति । अप्रशप्रकृतीनां हालाहलसमानमुत्कृष्टं चतुर्थस्थानम् । विषयमान मनुष्टं तृतीयस्थानम् । कांजीरसमानमजघन्यं द्वितीयस्थानम् । निम्बसमान जयन्यमकस्थानं भवति । इत्यनुभागवन्धः समाप्तः। -- विशेषार्थ-कर्माके फल देनेकी शक्तिको अनुभाग कहते हैं। प्रकृनिबन्धमें कमांक घानी अघाती भेद बतला आयें हैं। उनमें से वातिया कमांक अनुभागकी उपमा लता, दाम, अस्थि और दौलसे दी गयी है। जिस प्रकार इन चारोम उत्तरोत्तर कठोरता अधिक पायी जानी है, उसी प्रकार घातिया कांके लतासमान एकस्थानीय अनुभागसे काप्टसमान द्विस्था- नीय अनुभाग और अधिक तीव होता है। उससे अस्थिसमान त्रिस्थानीय अनुभाग और भी अधिक तीव्र होता है और उससे शैलसमान चतु:स्थानीय अनुभाग और भी अधिक तीत्र होता है । इन चारों जातिके अनुभागोंका बन्ध उत्तरोत्तर संक्लिष्ट, संलिष्टतर और संलिष्टतम परिणामोंसे होता है। बातिया कर्मामें दो भेद हैं-देशघाती और सर्वघाती । देशवाती अनुभाग दाम्जातीय द्विस्थानिक अनुभागके अनन्तवें भाग तक और सर्वघाती अनुभाग उसके आगेसे लेकर शैलके अन्तिम तीव्रतम चतुःस्थानीय अनुभाग तक जानना चाहिए । अघातिया कौके भी दो भेद हैं-५ पुण्यरूप और २ पापम्प । प्रकृतिसमुत्कीर्तनमें पुण्य और पाप प्रकृतियोंको बतला आये हैं । पुण्यप्रकृतियोंका अनुभाग गुड़, खाँड, शकर और अमृत तुल्य उत्तरोत्तर मीठा बतलाया गया है, तथा पापप्रकृतियोंका अनुभाग नीम, काँजीर विप और हालाहलके समान उत्तरोत्तर कडुआ बतलाया गया है। पापप्रकृतियोंके अनुभागका बंन्ध संलोशकी तीव्रतासे और पुण्यप्रकृतियोंके अनुभागका वन्ध संलशको मन्दता या परि- णामोंकी विशुद्धितासे होता है । सामान्यतः सभी मूल कर्मों और उत्तर प्रकृतियोंके अनुभाग- बन्धके विपयमें यही नियम लागू है । यतः घातिया कर्माको पाप प्रकृतियों में ही गिना गया है, अतः उनका अनुभाग उपमाकी दृष्टिसे लता, दारु आदिके समान होते हुए भी फलकी दृष्टिसे नीम, काँजीर आदिके समान उत्तरोत्तर कटुक ही होता है। • जिस जातिके तीव्रतम संक्लेश परिणामोंसे पापप्रकृनियोंके उत्कृष्ट अनुभागका बन्ध होता है, उनसे विपरीत अर्थात् विशुद्ध परिणामोंके द्वारा उन प्रकृतियोंके जघन्य अनुभागका बन्ध होता है । इसी प्रकार जिन विशुद्धतम परिणामोंके द्वारा पुण्य प्रकृतियोंका उत्कृष्ट अनु- भागवन्ध होता है उनसे विपरीत परिणामांके द्वारा अर्थात् संकेश परिणामोंसे उनका जघन्य अनुभागवन्ध होता है। अनुभाग-विषयक अन्य विशेष वर्णन गो० कर्मकाण्डसे जानना चाहिए। इस प्रकार अनुभागवन्धका वर्णन समाप्त हुआ। 1. इस स्थलपर गो० कर्मकाण्डको संस्कृत टीका, जो संदृष्टि दी है, उसे भी परिशिष्टमं देखिये । -- प्रदेशबन्ध ७३ अथ ज्ञानावरणादिकर्मणां कंन प्रकारेण कीगाचरणेन च वन्धी भवतीति गाथापादाकनाऽऽह- पडिणीगमंतराए उवधादे तप्पदोस-णिण्हवणे । आवरणदुर्ग बंधदि भूयो अच्चासणाए वि ॥१४४॥ ज्ञान-दर्शनयोः ज्ञान-दर्शनधरपु अविनयवृत्तिः प्रत्यनीकं प्रतिकूलता इत्यर्थः १ । ज्ञान-दर्शनविच्छेद- करणमन्तरायः २ । मनसा वचनेन वा प्रशस्तज्ञान-दर्शनयोः दूषणं तयोः वाधाकरणं वा उपवातः ३ । तत्प्रदोपः तत्त्वज्ञान-सम्यग्दर्शनयोः तन्दुरेपु हर्पामावः । अथवा तस्य तत्त्वज्ञानस्य मोक्षमाधनस्य कीर्तने कृते कस्यचित्पुंसः स्वयमजल्पतोऽन्तःकरणपैशुन्यं प्रद्वेषः ४ । विद्यमाने ज्ञानादी एतदहं न जानामि, एतन- पुस्तकमस्मत्पाश्च नास्ति, ज्ञानस्य अकथनं निवः । वा अप्रसिदगुरून् अपलप्य प्रसिद्धगुरुकथनं निहवः ५ । कायेन वचनेन ज्ञानस्य अविनयः, गुणकीर्तनादेरकरणं वा आसादनम् ६ । एतेषु पटसु सन्तु जीयो ज्ञानावरण-दर्शनावरणद्वयं भूयः प्रचुरवृत्त्या बनाति, स्थित्यनुमागी बनातीन्यर्थः । ते पटप्रकाराः प्रत्यनी- कादयः तवयस्य ज्ञान-दर्शनावरणस्य युगपद् बन्धकारणानि तु तथा बन्धात् । अथवा विषयभेदादासब- भेदः-ज्ञानविपयत्वेन ज्ञानावरणस्य दर्शनविपयत्वेन दर्शनावरणस्यति ।।१४४॥ - अव प्रदेशबन्धका वर्णन करते हुए पहले ज्ञानावरणीय और दर्शनावरणीय कर्म बन्धक कारणोंका निरूपण करते हैं- प्रत्यनीक, अन्तराय, उपघात, प्रदोप, निद्रव और असातनासे जीव ज्ञानावरण और दर्शनावरण इन दो आवरण कर्मोंको अधिकतासे बाँधता है ।।१४४।। विशेषार्थ-शास्त्रोंमें और शास्त्रोंके जानकार पुरुषों में अविनय रूप प्रतिकूल आचरण करना प्रत्यनीक है। ज्ञान-प्राप्तिमें विघ्न करना, पढ़नेवालोंको नहीं पढ़ने देना, विद्यालय और पाठशाला आदिके संचालनमें बाधाएँ उपस्थित करना, ग्रन्थों के प्रचार और प्रकाशनको नहीं होने देना अन्तराय है । किसीके उत्तम ज्ञानमें दूपण लगाना, ज्ञानके साधन शास्त्र आदिको नष्ट कर देना, विद्यालय आदिको बन्द कर देना उपघात है। पढ़नेवालोंके पठन-पाठनमें छोटी-मोटी विघ्न-बाधाएँ उपस्थित करना भी उपघातके ही अन्तर्गन है। तत्त्वज्ञानके अभ्यासमें हर्षभाव नहीं रखना, अनादर या अरुचि रखना, जानी जनोंको देग्यकर प्रमुदिन न होना, उनको आता देखकर मुख फेर लेना प्रदोप है। किसी विषयके जानते हुए भी दमर- के पूछनेपर 'मैं नहीं जानता' इस प्रकार ज्ञानका अपलाप करना. जानकी माधक पुग्नक आदिके होनेपर भी दूसरेके माँगनेपर कह देना कि मेरे पास नहीं है. निद्रव । अथवा अनेक गुरुजनोंसे पढ़नेपर भी अपनेको अप्रसिद्ध गुरुओंका शिप्य न बतलाकर प्रसिद्ध गुमओ- का शिष्य बतलाना भी निर्वके ही अन्तर्गत है । किसीके प्रांमा-योन्य ज्ञान या उपदेशादिकी प्रशंसा और अनुमोदना नहीं करना, किसी विशिष्ट ज्ञानीको नीच कुलका बला करके उसके. महत्त्वको गिराना असातना है। इन कार्योके करनेसे ज्ञानावरण कर्मका प्रचुर नान बन्ध होता है । इसी प्रकार ज्ञानियोंसे ईप्या और मात्सर्य रखना, निषिद्ध देश और नि पद्धकालमें पढ़ना, गुरुजनोंका अविनय करना, पुस्तकोंसे तकियेका काम लंना. उन्हें परोन हटाना. ग्रन्थोंको भण्डारोंमें सड़ने देना, किन्तु किसोको स्वाध्यायके लिए नहीं देना, न न्ययं नका प्रकाशन करना और न दूसरोंको प्रकाशनार्थ देना. इत्यादि कामि भी हानावरण कर्मका तीव्र बन्ध होता है। ये ऊपर कहे हुए सभी कार्य जब दर्शन गुपके विषय, कि जाते है. १. पप सं०४, २०४ । गो. न.०८००। १० ७४ कर्मप्रकृति भूदाणुकंप-बदजोगजुत्तो' खंतिदाण गुरुभत्तो । बंधदि भूयो सादं विवरीदो बंधदे इदरं ।।१४।। गत्यां गत्यां कर्मविपाकाद् भवन्तीति भूताः प्राणिनः । रोप्यनुकम्पा कारण्यपरिणामः । मानि हिंसाऽनृतस्तेयामह्मचर्यपरिग्रहेभ्यो विरतिः। योगः समाधिः सम्यक प्रणिधानमित्यर्थः। तयुक्तः । क्रोधादिनिवृत्तिलक्षणं क्षान्न्या चतुर्विधदानेन पनगुरुभक्त्या च संपन्नः स जीयः सानं सांवानुमागं भूयो बन्नाति । तद्विपरीतनागसातं बनाति ॥१४॥ दुक्ख-वह-सोग-तावाकंदण परिदेवणं च अप्पठियं ।। अण्णट्ठियमुभयट्ठियमिदि वा बंधो असादस्स ॥१४६।। वेदनापरिणामः दुःखम् १ हननं वधः २ । वस्तुविनाशे भतिगच्यं दीनन्यं शोकः ३ । चित्तस्य खेदः पश्चात्तापः तापः ४ । घुम्बापात हृदयादिकुटनं आमन्दनम् ५ । रोदनं अश्रपात: परिदेवनं च ६ पतारसयं आत्मस्थितं वा अन्य स्थितं चा उमय स्थितं वा मवति, [ तथा ] सति असातस्य दुःग्यस्वरूपस्य कर्मणः बन्धा मवति ॥१४६॥ - तव दर्शनावरण कर्मका तीव्रतासे बन्ध होता है। इसके अतिरिक्त आलसी जीवन बितानेसे, विषयोंमें मग्न रहनेसे, अधिक निद्रा लेनेसे, दूसरेकी इष्टिमें दोप लगानेसे, देखने के साधन उपनेत्र ( चश्मा ) आदिके चुरा लेने या फोड़ देनेसे और जीवधात आदि करनेसे भी दर्शना- वरणीय कर्मका प्रचुर परिमाणमें बन्ध होता है। वस्तुतः आयुकर्मको छोड़कर शंप सात कर्मोंका संसारी जीवोंके निरन्तर वन्ध होता ही रहता है। किन्तु उपर्युक्त कार्योंके करनेसे ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मके तीन अनुभाग और उत्कृष्ट स्थितिका बन्ध होता है। अव वेदनीय कर्मके दोनों भेदोके-बन्ध कारणोंका निर्देश करते हैं- सर्व प्राणियोंपर दया करनेसे, अहिंसादि व्रत और समाधिरूप परिणामांके धारण करनेसे, क्रोधके त्यागरूप क्षमा भावसे, दान देनेसे तथा पंच परमगुरुओंकी भक्ति करनेसे जीव सातावेदनीय कर्मके अनुभागको प्रचुरतासे वाँधता है । उक्त कारणोंसे विपरीत आचरण करनेसे जीव असातावेदनीय कर्मका तीव्र स्थिति और अनुभाग बन्ध करता है। साता- वेदनीयके बन्धमें स्थितिका प्रचुर बन्ध न बतानेका कारण यह है कि स्थितिबन्धकी अधिकता विशुद्ध परिणामोंसे नहीं होती ।।१४५३॥ अव विशेषरूप असातावेदनीय कर्मके-बन्ध कारणोंका निरूपण करते हैं- दुःख, वध, शोक, संताप, आक्रन्दन और परिवेदन स्वयं करनेसे, अन्यको करानेसे तथा स्वयं करने और दूसरेको करानेसे असातावेदनोय कर्मका विपुलतासे बन्ध होता है ॥१४॥ विशेषार्थ-गाथामें जो असातावेदनीयकर्मके बन्ध-कारण बतलाये गये हैं उनके अतिरिक्त जीवोंपर क्रूरतापूर्ण व्यवहार करनेसे, स्वयं धर्म नहीं पालन करके धर्मात्मा जनोंके प्रति अनुचित आचरण करनेसे, मद्य-पान, मांस-भक्षणादिक करनेसे, व्रत, शीत, तपादिके धारकोंकी हँसी उड़ानेसे पशु-पक्षी आदिका वध-बन्धन, छेदन-भेदन और अंग-उपांगादिके १. त -जंजिदो। २. पञ्चसं० ४, २०५। गो० ० ८०१ । 1. व समीचीने सावधानम् । 2, व आत्म-परस्थितम् ।

प्रदेशबन्ध अरहंत-सिद्ध चेदिय-सव-गुरु-सुद-धम्म-संघपडिणीगो । बंधदि दंसणमोहं अणंतसंसारिओ जेण' ॥१४७॥ योऽहं सिद्धचैत्यतपोगुरुश्रुतधर्मसंघानां प्रतिकूलः शत्रुभूतः स प्राणी तदर्शनमोहनीयमिध्यात्वं वनाति येन दर्शनमोहोदयागतेन जीवः अनन्तसंसारी स्यात् ॥४७॥ तिव्वकसाओ बहुमोहपरिणदो रायदोससंतत्तो । बंधदि चरित्तमोहं दुविहं पि चरित्तगुणघादी ॥१४८।। काटनेसे उन्हें बधिया (नपुंसक ) करनेसे जीवोंको नाना प्रकारसे शारीरिक और मानसिक दुःख पहुँचानेसे, तीव्र अशुभ परिणाम रखनेसे, विपय कपाय-बहुल प्रवृत्ति करनेसे, पाँचों पापोंके आचरणसे भी असाता वेदनीय कर्मका विपुल परिमाणमें बन्ध होता है। गाथा में जो सबसे अधिक ध्यान देनेकी बात कही, वह यह है कि ऊपर कहे गये कार्य चाहे मनुष्य स्वयं करे, चाहे, करावे, या करते हुए की अनुमोदना करे, सभी दशाओं में असातावेदनीयकर्म तीव्रतासे बँधेगा। आजकल कितने ही लोग ऐसा समझते हैं कि जो जीव घातक कसाई है उसे ही पाप-बन्ध होगा, माँस-भक्षियोंको नहीं। पर यह विचार एकदम भ्रान्त है । जिस परिमाणमें हिंसक पापी है और उसे प्रचुरतासे पापका बन्ध होता है, उसी परिमाणमें मांस- भोजी भी पापी है और उसके भी उसी विपुलतासे तीन असातावेदनीयका वन्ध होता है । इसके अतिरिक्त अपने आश्रित दासी-दासको, या पशु-पक्षियोंको समयपर आहार आदि नहीं देना, उनकी शक्तिसे अधिक उनसे बलात् कार्य कराना अधिक भार लादना आदि कार्य भी असातावेदनीयके ही बन्धक हैं । अव मोहनीय कर्मके प्रथम भेद दर्शनमोहनीयके वन्ध-कारण कहते हैं- अरहन्त, सिद्ध, चैत्य (प्रतिमा ) तप, श्रुत. ( शास्त्र) गुरु, धर्म, और मुनि, आर्यिका, श्रावक, श्राविकारूप चतुर्विध संघके प्रतिकूल आचरण करनेसे जीव उस दर्शनमोहनीय कर्मका वन्ध करता है, जिससे कि वह अनन्त कालतक संसार में परिभ्रमण करना है ॥१४॥ चिशेपार्थ-जिसमें जो अवगुण नहीं है, उसमें उसके निरूपण करनेको अवर्णवाद कहते हैं। वीतरागी अष्टादश दोपरहित अरहन्तोंके भूख-प्यासकी बाधा बनलाना, गेगादि. की उत्पत्ति कहना, सिद्धोंका पुनरागमन बतलाना, तपस्वियोंमें दृपण लगाना, हिंमा धर्म बतलाना, मद्य-मांस-मधुके. सेवनको निर्दोष कहना. निग्रंन्ध साधुको निर्लन करना. कुमार्गका उपदेश देना, सन्मार्गके प्रतिकूल प्रवृत्ति करना, धर्मात्माओंको दोष लगाना. कर्म-मलीमम संसारियोंको सिद्ध या सिद्ध-समान कहना. सिद्धोंमें असिद्धत्व प्रकट करना. अंदेव या युदयों- को सघा देव यतलाना, देवोंमें अदेवत्व प्रकट करना. असर्वतको नल और महतो असर्वज्ञ कहना, इत्यादि कारणोंसे संसारके बहानेवाले और सम्यक्त्वका घात करनेवाले मिथ्यात्वरूप दर्शन मोहनीय कर्मका तोत्र बन्ध होता है। यह कानी काम प्रधान है. अतः इसे ही कर्म-सम्राट या मोहराज कहते हैं और इनये. नोट बन्धन जीव गमा अनन्त काल तक भटकना पड़ता है। अब मोहनीय कर्मके हितीय भेद चारित्रमोहनीय बन्धकारका निरूप करने हैं- तीन कपायवाला. अत्यधिक मोहयुत परिणामबाला और नाम- मनाय १. पन.१.२०६। गोय.०८०२। इत्यर्थः । ३. पपां. ४, २०७। गोक।

- कर्मप्रकृति यो जीवस्तीचकपायनोकपायोदययुन:1 यामाहपरिणतः राग पसंमतः चारित्रगुणविनाशनमील: स जीवः कपाय-नांकपायभदं हि विधमपि चारित्रमोहनीयं बनानि ॥१४८|| मिच्छो हु महारंभो णिस्सीलो तिब्बलोहसंजुत्तो । णिरयाउगं णिबंधदि पावमई रुद्दपरिणामी ॥१४६।। यः खलु मिथ्यादृष्टिीवः प्रचुरारम्मः संघाकृपिचाणिज्यादिवसाऽरम्मः निःशीरः तीवलीमसंयुक्तः रौद्रपरिणामः पापकारणबुद्धिः स जीवो नारकायुष्कं बध्नाति ॥ १४६॥ कपाय और नोकपाय रूप दोनों प्रकारके चारित्र-मोहकर्मको प्रचुरतासे बाँधता है, जो कि चारित्रगुणका घातक है ।।१४८।। विशेपाथे-पहले चारित्रमोहनीयकर्मके दो भेद बतला आये है कपाय वेदनीय और नोकपायवेदनीय । राग-द्वेपसे संयुक्त तीव्रकपायी जीव कपाय वेदनीयकर्मका और बहुमोहसे परिणत जीव नोकपाय वेदनीय कर्मका बन्ध करता है । इसका खुलासा इस प्रकार है-जीव- क्रोधसे परिणत जीव अनन्तानुबन्धी क्रोधका बन्ध करता है, इसी प्रकार नीत्र मान, माया और लोभवाला जीव अनन्तानुबन्धी मान, माया और लोभ कपायका तात्र बन्ध करता है। तोत्र रागी, अतिमानी, ईर्ष्यालु, मिथ्या-भापी, कुटिलाचरणी और परन्त्री-रन जीव वीवेदका वन्ध करता है। सरल व्यवहार करनेवाला, मन्दकपायी, मृदुस्वभावी ईया-रहित धीर स्वदार-सन्तोषी जीव पुरुपवेदका बन्ध करता है। तीवक्रोधी, चुगलखोर मायावी, पशु- पक्षियोंका वध, बन्धन और अंगच्छेदनादि करनेवाला, स्त्री और पुरुष दोनों के साथ व्यभिचार और अनंग-क्रीड़ा करनेवाला, बत, शील और संयमके धारक साधु और साध्वियोंके साथ मैथुन सेवन करनेवाला, पंचेन्द्रियोंके विपयोंका तीन अभिलापी, जिला-लोलुपी जीव नपुंसक- वेदका बन्ध करता है। स्वयं हँसनेवाला, दूसरोंको हँसानेवाला, मनोरंजनके लिए दूसरोंकी हँसी उड़ानेवाला, विनोदी स्वभावका जीव हास्यकर्मका वन्ध करता है । स्वयं शोक करनेवाला दूसरोंको शोक उत्पन्न करनेवाला, दूसरोंको दुखी देखकर हर्पित होनेवाला जीव झोक कर्मका बन्ध करता है । नाना प्रकारके क्रीड़ा-कुतूहलोंके द्वारा स्वयं रमनेवाला और दूसरोंको रमाने- वाला, दूसरोंको दुःखसे छुड़ानेवाला और सुख पहुँचानेवाला जीव रतिकर्मका बन्ध करता हैं। दूसरोंके आनन्दमें अन्तराय करनेवाला, अरतिभाव पैदा करनेवाला और पापियोंका सम्पर्क रखनेवाला जीव अरतिकर्मका बन्ध करता है। स्वयं भयभीत रहनेवाला, दूसरोंको भय उपजानेवाला जीव भयकर्मका बन्ध करता है। साधुजनोंको देखकर ग्लानि करनेवाला, दूसरोंको ग्लानि उपजानेवाला और दूसरेको निन्दा करनेवाला जीव जुगुप्साकर्म चाँधना है। इस प्रकार चारित्रमोहनीयकर्मकी पृथक्-पृथक् प्रकृतियोंके बन्धके कारणोंका निरूपण किया। अब सामान्यसे चारित्रमोहके बन्ध-कारण बतलाते हैं जो जीव व्रत-शील-सम्पन्न धर्म-गुणा- नुरागी, सर्वजगत्-वत्सल, साधुजनोंको निन्दा-गर्दा करता है, धर्मात्माजनांके धर्म-सेवन में विघ्न करता है, उनमें दोप लगाता है, मद्य-माँस-मधुका सेवन और प्रचार करता है, कपाय और नोकपाय उत्पन्न करता है, वह जीव चारित्र मोहकर्मका तीत्रवन्ध करता है। दूसरोंको अब आयुकर्मके चार भेदोंमें-से पहले नरकायुके वध कारण कहते हैं- मिथ्यादृष्टि, महा आरम्भी, व्रत-शीलसे रहित, तीव्र लोभसे संयुक्त, पापबुद्धि और रौद्रपरिणामी जीव नरकायुको बाँधता है ।।१४।। १. पञ्चसं० ४, २०८ । गो० क०८०४। 1. ज तीव्रकपायोदययुतः। 3. व गुणवत-शिक्षाब तरहितो चा।

प्रदेशवन्ध उम्मग्गदेसगो मग्गणासगो गृढहिययमाइल्लो । सेढसीलो य ससल्लो तिरियाउ बंधदे जीवों ॥१५॥ य उन्मार्गोपदेशकः मिथ्यामार्गापदेशकः सन्मार्गनाशकः सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूपमोक्षमार्ग- नाशकः गूढहृदयः मायावी शठशीलः सशल्यः मायामिथ्यानिदानयुक्तः स जीवस्तिर्यगायुर्वनाति ॥१५०॥ पयडीए तणुकसाओ दाणरदी सील-संयमविहीणो । मज्झिमगुणेहि जुत्तो मणुयाऊ बंधदे जीवों ॥१५॥ यः स्वभावेन मन्दकपायोदयः दानेपु प्रीतः शीलः संयमेन च विहीनः मध्यमगुणयुक्तः स जीवो मानुष्यायुर्वध्नाति ॥१५॥ विशेषार्थ-जो जीव धर्मसे पराङ्मुख है, पापोंका आचरण करता है, महाहिंसाका कारणभूत आरम्भ और परिग्रह रखता है, लेश मात्र भी व्रत-शीलादिका न तो स्वयं पालन करता है और न दूसरोंको करने देता है, करनेवालोंकी हँसी उड़ाना है अभक्ष्य-भोजी, मद्य- पायी, माँससेवी और सर्वभक्षी है, जिसके परिणाम सदा ही चारों प्रकार के आर्त और रौद्रध्यानरूप रहते हैं और जिसका चित्त पत्थरकी रेखाके समान कठोर है ऐसा जीव नरका. युका वन्ध करता है। अब तिर्यगायुके बन्धके कारण बतलाते हैं- जो उन्मार्गका उपदेश देता है, सन्मार्गका नाशक है, गृहृदयी, और महामायाया है. किन्तु मुखसे मीठे बचन बोलता है शठ-स्वभावी और शल्य-युक्त है, ऐसा जीव नियंगायुका वन्ध करता है ।।१५०॥ विशेषार्थ-जो जीव कुमार्गका उपदेश तो देता ही है, साथ ही, सन्मार्गका उन्मूलन भी करता है, सन्मार्गपर चलनेवालोंके छिद्रान्वेपण और असत्य दोपारोपण करता है, माया- मिथ्यात्व, और निदान; इन तीन शल्योंसे युक्त है, जिसके व्रत और झील में अतीचार लगते रहते हैं, पृथिवी-रेखाके सदृश रोपका धारक है, गृढहृदय है. अर्थान इतनी गहन मायाचारी करनेवाला है कि जिसके हृदयकी कोई बात जान ही नहीं सकता; शठशील है. अर्थात मन में मायाचार रखते हुए भी ऊपरसे मीठा बोलनेवाला है और महामायावी है अर्थात करें गुल, सोचे कुछ और बतलाये कुछ ऐसी मायाचारी करनेवाला है; एसा जीव पशु-पक्षियों में उत्पन्न करानेवाले तिर्यगायुकर्मको बाँधता है । अव मनुप्यायु के बन्धके कारण बतलाते हैं- जो स्वभावसे ही मन्दकपायी है. दान देने में नित. शीलमंयमसे बिहीन होकर भी मनुष्योचित मध्यमगुणोंसे युक्त है. ऐसा जीव मनुप्यायुका बन्ध करता है ।।१५।। विशेपार्थ-जिसका स्वभाव जन्मस ही शान्त है. मन्दकपायवाला है, प्रतिभा और विनम्र है. समय-समय पर लोकोपकारक धर्म और देहाय. हिन-कारक कार्यविलिदान देता रहता है. अप्रत्याख्यानावरण कपायके तोत्र उदयसे वन-शीलादिक पालन न का मरने- १. त सदसोलो। २. पह। मो०- ८.५। ३. रिया: ४. परुपतं०४,२१०। गो००८०६। 1. व सायमोक्षमार्गनायरः।

कगप्रकृति अणुवद-महव्वदेहि य बालतवाकामणिराए य । देवाउगं णिबंधड़ सम्माइट्ठी य जो जीवो' ||१५२|| यः सम्यग्दधिः जीयः स कंबलसम्यक्ण्यन साक्षादणुमतः महायतयां वायुयंभाति । यो मिथ्याष्टिः जीवः स उपचाराणुव्रतमहावतः बालतपसा असामनिर्जस्या' च देयायुधमानि ॥५२ पर भी मानवोचित दया, क्षमा आदि गुणोंसे युक्त है बालुकी रेखाक सदा कपायवाला है, न अति संक्लोश परिणामी है । और न अति विशुद्ध परिणामी ही है, किन्तु सरल है, और सरल ही कार्यों को करता है, ऐसा जीव मनुष्यायुका बन्ध करता है। । अब देवायुके बन्धके कारणोंको बतलाते हैं- जो जीव अणुव्रत या महावतसे संयुक्त है, बालनप और अकामनिर्जरा करनेवाला है, वह जीव देवायुका बन्ध करता है। तथा सम्यग्दृष्टि जीव भी देवायुको बाँधता है ।।१२।। विशंपार्थ-जो पाँचों अणुव्रतों और सप्त झीलोंका धारक है, महावतोंको धारणकर पटकायिक जीवोंकी रक्षा करनेवाला है, तप और नियमका पालनेवाला है, प्राचारी है, सरागभावके साथ संयमका पालक है, अथवा बाल तप और अकामनिर्जरा करनेवाला है, ऐसा जीव देवायुका वन्ध करता है। यहाँ बालतपसे अभिप्राय उन मिथ्याष्टि जीवोंक तपसे है, जिन्होंने कि जीव-अजीवतत्व के स्वरूपको ही नहीं समझा है, आपा-परके विवेकसे रहित हैं और अज्ञानपूर्वक अनेक प्रकारके कायक्लेशको सहन करते हैं। बिना इच्छाके पराधीन होकर जो भूख-प्यासको और शीत-उणादिकी बाधा सहन की जाती है, उसे अकाम- निर्जरा कहते हैं । कारागार (जेलखाने ) में परवश होकर पृथ्वीपर सोनेसे, रूखे-सूखे भोजन करनेसे, स्त्रीके अभाव में विवश होकर ब्रह्मचर्य पालनेसे, सदा रोगी रहने के कारण परवश होकर पथ्य-सेवन करने और अपथ्य-सेवन न करनेसे जो कर्मोकी निर्जरा होती है, वह अकामनिर्जरा है । इस अकामनिर्जरा और बालतपके द्वारा भी जीव देवायुका बन्ध करता है। जो सम्यग्दृष्टि जीव चारित्रमोहकर्मके तीन उदयसे लेशमात्र भी संयमको धारण नहीं कर पाते हैं, फिर भी वे सम्यक्त्व के प्रभावसे देवायुका बन्ध करते हैं। तथा जो जीव संक्लेश-रहित हैं, जल-रेखाके समान क्रोधकपायवाले हैं, और उपवासादि करते हैं, वे भी देवायुका वन्ध करते हैं । यहाँ इतना विशेष जानना चाहिए कि सम्यक्त्वी और अणुव्रती या महाव्रती जीव कल्पवासी देवोंकी ही आयुका बन्ध करते हैं। किन्तु अकामनिर्जरा करनेवाले जीव प्रायः भवनवासी, व्यन्तर और ज्योतिपी देवोंकी ही अधिकाँशमें आयु बाँधते हैं । बालतप करनेवाले जीव यथा सम्भव सभी प्रकारके देवोंकी आयुका बन्ध करते हैं किन्तु कल्पवासियोंमें विशिष्ट जातिके जो इन्द्र, सामानिक आदि देव हैं, उनकी आयुका बन्ध नहीं करते । इस प्रकार आयुकर्मके चारों भेदोंके वन्धके कारण बतलाये गये । यहाँ इतना ध्यान रखना चाहिए कि सदा ही आयुकर्मका बन्ध नहीं होता है, अतः त्रिभाग आदि विशिष्ट अवसरोंपर जब आयुवन्धका काल आता है, उस समय उपर्युक्त परिणामोंमें-से जिस जाति के परिणास जीवके होंगे, उसी जातिको नरक, तिथंच आदिकी आयुका बन्ध होगा। । - १. पञ्चसं०४,२११। गो० क० ८०७ । 1. व मिथ्यादृष्टिपरिव्राजकतापसपञ्चाग्निसाधकजनामासाककायक्लेशः बालतपसा। 2. राजभृश्यः कोऽपि पुमान् पृष्टवाहबद्धः गाढबन्धनः सन् पराधीनपराक्रमः क्षुधातृपादिदुःखत्रह्मचर्यकष्टभूमिशयनादिक मलधारणं सहमानः महनेषु इच्छारहितः ईपत्कर्म निर्जस्यति सा अकामनिर्जरा, तया ।

प्रदेशवन्ध ७६ मण-बयण-कायवक्को माइल्लो गारवेहिं पडिबद्धो । असुहं बंधदि णामं तप्पडिवक्खेहिं सुहणामं ॥१५३॥ यो मनोवचनकायैर्वक्र: मायावी रसगारव-ऋद्धिगारव-सातगारवेति गारवत्रयनियन्तः स जीवो नरकगति-तिर्यग्गत्याऽऽद्यशुमं नामकर्म बनाति । यस्तत्प्रतिपक्षपरिणामः मनोवचनकायः सरलः निष्कपटी गारवत्रयरहितः [स] जीवः शुभं नामकर्म मनुष्य-देवगत्यादिकं वनाति ॥१५३॥ अथ तीर्थकरनामकर्मणः कारणपोडशभावनां गाथापञ्चकेनाऽऽह- दसणविसुद्धि विणए संपण्णत्तं च तह य सीलवदे। अणदीचारोऽभिक्खं णाणुवजोगं च संवेगो ॥१५४॥ सत्तीदो चाग-तवा साहुसमाही तहेव णायच्या । 'विजावचं किरिया अरहंताइरियवहुसुदे भत्ती ॥१५॥ पवयण परमा भत्ती आवस्सयकिरियअपरिहाणी य । मंग्गपहावणयं खलु पवयणवच्छल्लमिदि जाणे ॥१५६।। श्रव शुभ और अशुभ नामकर्मके वन्धके कारण बतलाते हैं- जो जीव मन वचन कामसे कुटिल हो, कपट करनेवाला हो, अपनी प्रदांसा चाहनेवाला तथा करनेवाला हो, ऋद्धिगारव आदि तीन प्रकारके गारवसे युक्त हो, वह नरकगनि आदि अशुभ नामकर्मको बाँधता है। और जो इनसे विपरीत स्वभाववाला हो अर्थात सरल स्वभावी हो, निष्कपट हो, अपनी प्रशंसाका इच्छुक न हो और गारव-रहिन हो ऐसा जीव देवगति आदि शुभनामकर्मका बन्ध करता है ॥१५३।। विशेपार्थ-जो मायावी है, जिसके मम-वचन-कायकी प्रवृत्ति कुटिल है, जो रसगारय सातगारव और ऋद्धिगारव इन तीनों प्रकारके गारवों या अहंकारोंका धारक है, नाप-तौल के वाट हीनाधिक वजनके रखता है और हीनाधिक लेता-देता है. अधिक मूल्यकी वस्तुमें कम मूल्यकी वस्तु मिलाकर बेंचता है, रस-धातु आदिका वर्ण-विपर्यास करना है. उन्हें नकली बना करके चता है, दूसरोंको धोका देता है, सोने-चाँदीके आभूपणोंमें ताँया आदि खार मिलाकर और उन्हें असली बताकर व्यापार करता है, व्यवहार में विसंवादनशील एवं झगड़ालू मनो- वृत्तिका धारक है, दूसरोंके अंग-उपांगोंका छेदन-भेदन करनेवाला है. दूसरोंकी नकल करना है, दूसरोंसे ईर्ष्या रखता है; और दूसरोंके शरीरको विकृत बनाता है. ऐसा जीव अगुभ नाम- कर्मका वन्ध करता है । किन्तु जो इन उपर्युक्त कार्योसे विपरीत आचरण करना है. माल. स्वभावी है, कलह और विसंवाद आदिसे दूर रहता है. न्यायपूर्वक व्यापार करना है. और ठीक-ठीक नाप-तौलकर लेता-देता है । वह शुभं नामकर्मका बन्ध करना है । यहाँ शुभ नामकर्मसे अभिप्राय नामकर्मकी पुण्य प्रकृतियोंसे है और अंगुमनामकर्म अभिप्राय नामकर्मकी पापप्रकृतियोंसे है। भव नामफर्मफी प्रतियों में जो सर्वोत्यष्ट है ऐसी तीर्थ फर प्रशातियो कन्धरशाला. को पतलाते हैं- १ दर्शन-विशुद्धि. २ विनय-सम्पलता, ३ निरनिचार जनशीलधारपाना . - १. पच्पन० ४, २१२ । गो ८०८ । २. ८ नोगददेन । ६. न ।

कर्मप्रकृति एदेहिं पसत्थेहिं सोलसमावेहिं केवलीमूले । तित्थयरणामकम्मं बंधदि सो कम्मभूमिजी मणुसो ॥१५७|| दर्शनस्य सग्यवत्वस्य विशुद्विनिमलता पञ्चयिशनिमलराहिल्यम् । तदुतम् - मृढवयं मदाश्चाष्टी तथाऽनायतनानि पट् । अष्टी शहादयश्चेति इग्दीपाः पञ्चविंशति ॥२०॥ सम्यक्त्वस्य निर्मलता इति दर्शनविशुद्धिः प्रथमभावना १ । रचनयमण्डिनमुनी रनवयं च महान् आदरः, विनये परिपूर्णता २ । अहिंसादिवतेषु शीलवतंषु च निष्पापाचरणं शीलयोध्यन तिचारः । निरन्तरं प्रशस्तज्ञानेपु अभ्यासः आमीक्षाज्ञानोपयोगः । संसारदुःपात कातरवं मंगः । आहाराभय- भैपज्यशास्त्राणां विधिपूर्वकं प्रारमशक्त्यनुसारेण पात्रेभ्य:1 दानं शकिन त्यागः ६ । निजशक्त्या जिनोपदिष्ट- कायक्लेशः शक्तितस्तपः ७ । यतिवर्गस्य कुतश्चित वित-समुत्पन्ने सति विनिवारणं समाधिः, साधनां समाधिः साधुसमाधिः ८ । निष्पापविधानेन गुणवतां पुंसां मुनीनां वा दुःखस्फेटनं चयावृत्यकरणम् १ । अर्हतां स्नपन-पूजन-गुणस्तवनादिकं अर्हदक्तिः १० । आचार्याणां सन्मुखगमनं पादपूजनं पिच्छिकमण्दस्वादि. दानं आचार्यमक्तिः ११ । बहुश्रुतेषु मतिः बहुश्रुतमति: १२ । जिनसिन्दान्तं मनःशुद्धया प्रीनिः प्रवचन- भक्तिः १३ । सामायिकं १ चतुर्विशतितीर्थचरस्तवः २ एकतीर्थकरबन्दना ३ प्रतिक्रमणं ४ प्रत्याख्यानं ५ कायोत्सर्गः ६ एवंविधपट अवश्यानि कर्त्तव्यानीति पडावश्यकानि, तपां पडावश्यकानां अपरिहाणिः १४ । ज्ञानेन दानेन पूजया तपोऽनुष्ठानेन वा जिनधर्मप्रकाशनं मागंप्रमावना १५ । सधर्मणि जने स्नेहलत्वं प्रब. चनवात्सल्यं १६ । एतामिः प्रशस्ताभिः पोडशभावनामिः कृत्वा केवलिपादमूले कंवलजानि-सनिधाने श्रुत- केवलिसन्निधाने वा स जगप्रसिद्धः कर्मभूमिजो मनुष्यः भव्यजीवः तीर्थकरनामकर्म बन्नाति १.५४-१५७॥ ज्ञानोपयोगिता, ५ आभीक्ष्ण संवेगता, ६ शक्त्यनुसार त्याग, ७ झक्त्यनुसार तप, ८ साधु- समाधि, ९ वैयावृत्यकरणता, १० अरहंतभक्ति, ११ आचार्यभक्ति, १२ बहुश्रुतभक्ति, १३ परम प्रवचन-भक्ति, १४ आवश्यक-क्रिया अपरिहानि १५ मार्गप्रभावना और १६ प्रवचनवत्सलत्वं इन प्रशस्त सोलह भावनाओंके द्वारा कर्मभूमियाँ मनुष्य केवलीके पादमूलमें तीर्थकर नाम- कर्मको बाँधता है ॥१५४-१५७।। विशेपार्थ--सम्यग्दर्शनका आठ मद, आठ शंकादि दोप, छह अनायतन और तीन मूढ़ता इन पञ्चीस दोपोंसे रहित निर्मल होना दर्शनविशुद्धि है १ । रत्नत्रयधर्ममें और उसके धारकोंमें विनयकी पूर्णता विनयसम्पन्नता है २ । व्रत और शीलको अतीचार-रहित निर्मल पालना निरतिचार व्रत-शील-धारणता है ३ । निरन्तर सम्यग्ज्ञानका अभ्यास करना आभीक्ष्ण ज्ञानोपयोग है ४ । संसार, देह और भोगोंसे उदासीन रहना अभीक्ष्ण संवेगता है ५। अपनी शक्तिके अनुसार पात्रोंको आहार, औपधि, अभय और ज्ञानदान देना शक्तितस्त्याग है ६ । अपनी शक्तिको नहीं छिपा करके यथासम्भव वारह प्रकारके तपोंको धारण करना शक्तित- स्तप है ७ । साधुजनोंके उपसर्ग आदि आनेपर उसे दूर करना साधु-समाधि है ८ । चतुर्विध संघकी भक्ति के साथ वैयावृत्त्य करना वैयावृत्त्यकरणता है ।। अरहन्त देवकी पूजा-भक्ति करना, उनके गुणोंका स्तवन करना अरहन्तभक्ति है १० । आचार्योंके सम्मुख जाना, उनके चरण पूजना, पीछी-कमण्डलु आदि देना आचार्यभक्ति है ११ । द्वादशांगके पाठी और विशिष्ट श्रुतके धारक उपाध्यायोंकी भक्ति करना बहुश्रुतभक्ति है १२ । जैन सिद्धान्त में आन्तरिक शुद्धि के साथ भक्तिभाव रखना परमप्रवचनभक्ति है १३ । सामायिक, चतुर्विंशति तीर्थकर १. त मग्गप्पभावणं । ]. व पात्राय।

प्रदेशबन्ध तित्थयरसत्तकम्मा तदियभवे तब्भवे हु सिझेदि । खाइयसम्मत्तो पुण उक्कस्सेण दु चउत्थभवे ॥१५८|| तीर्थकरसत्त्वकर्मणि सति भव्यजीवः तृतीयभवे सिद्धयति सिद्धिं प्राप्नोति हु स्फुटं । कश्चिन्मनुष्यः तद्भवे तजन्मनि सिद्धयति । पुनः क्षायिकसम्यक्त्ववान जीवः तद्भवे मोक्षं गच्छति, अथवा नृतीयमवे सिन्द-यति सिद्धिं प्राप्नोति । हु उत्कृष्टेन चतुर्थे भवे सिद्धयति, चतुर्थभवं नाकामतीत्यर्थः ॥ ३५८॥ अरहंतादिसु भत्तो सुत्तई पढणमाण गुणपेही । बंधदि उच्चागोदं विवरीओ बंधदे इदरं ॥१५६।। यः अर्हदादिषु भक्तः गणधरायुक्तागमेपु श्रद्धावान् पढनं पठनं माणु इति मानं ज्ञानं गुणः विनयादिः एतेषां प्रेक्षकः दर्शी अध्ययनार्थं विचारविनयादिगुणदीन्यर्थः । स जीवः उर्गोत्रं बनाति । तहियरीन: योऽहंदादिपु भक्तिरहितः, आगमसूत्रस्योपरि अरुचिः, अध्ययनार्थविचारविनयादिगुणविवर्जिनी जीयः इतरत् नीचगोत्रं बध्नाति ॥१५९॥ पर-अप्पाणं जिंदा पसंसणं णीचगोदवंधस्स । सदसदगुणाणमुच्छादणमुभावणमिदि होदि ॥१६०॥ परेषां निन्दा, आत्मनः प्रशंसा, अन्येषां सन्तोऽपि ये ज्ञानादिगुणाः, नेपामाच्छादनम् , स्वस्थानना- नामविद्यमानगुणानां प्रकाशनम् , एतानि चत्वारि नीचगोत्रवन्धस्य कारणानि भवन्ति ॥१६॥ स्तवन, वन्दन, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान और कायोत्सर्ग इन छहों आवश्यकोंका नियमपूर्वक विधिवत् विना किसी नागाके पालन करना आवश्यक क्रिया-अपरिहानि है १४ । नान, दान, पूजा, और तप आदिके अनुष्ठान-द्वारा जिनधर्मका प्रकाश संसार में फैलाना मार्गप्रभावना है १५ । साधर्मी जनों गो-वत्सके समान अकृत्रिम स्नेह रखना प्रवचनवत्सलता है १६। उन. सोलह भावनाओं के द्वारा यह जीव त्रिलोक-पूजित तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध करता है । अब ग्रन्थकार तीर्थकर प्रकृतिकी सत्तावाला तथा क्षायिक सम्यन्द्रष्टि जीव संसारमें अधिकसे-अधिक कितने भव तक रह सकता है इस प्रश्नका उत्तर देते हैं- तीर्थकर प्रकृतिकी सत्तावाला जीव उसी भवमें या तीसरे भव में मिद्धिको माम करना है अर्थात मोक्षको पा लेता है । क्षायिकसन्यग्दृष्टि जीव उत्कृ.प्रतः चौथे भव में मिद्धिको प्रान करता है ॥१५॥ अव दोनों प्रकारके गोत्रकर्मके वन्धके कारण बतलाते हैं- जो जीव अरहंत आदि पंच परमेष्टियोंका भन. हो. जिनेन्द्र-कथिन आगमन्त्रक पठन- पाठनमें प्रीति रखता हो, तत्त्वचिन्तन करनेवाला हो, अपने गुणोंका बढ़ाने वाला हो एमा जीव उन गोत्रका वन्ध करता है और इससे विपरीत चलनेवाला नीचगोत्र कर्मका काय करता है ॥१५॥ अब नीचगोत्र कर्मके बन्धके कारणोंको और भी विपनपस रतलाने- परायी निन्दा करना और अपनी प्रशंसा करना, दुनरंके सद्गुगोंका आमादन पन्ना और अपने भीतर अविधमान भी गुणोंका द्रावन करना। इन करानमः नीचया बन्ध होता है ॥१६॥ १. परगना । पापनमान' ति पाय । २. पद: F. ......! ४. य भावपमदि। 1. पानी।.दप्रानी।

८२ कर्मप्रकृति पाणबधादिसु रदो जिणपूजा-मोक्खमग्गविग्घयरो। अजेड़ अंतरायं ण लहइ जं इच्छियं जेण ।।१६।। इति श्रीनेमिचन्द्रसिंद्धान्तिविरचितकर्मप्रकृतिग्रन्थः समाप्तः । हि-त्रि-चतुरिन्द्रिय-[ पञ्चेन्द्रिय- ] प्राणिवधेषु स्व-परकृतयु प्रोगः, जिनपूजायाः रखत्यप्राप्तेश स्वान्ययोविनकरो यः स जीवस्तदन्तरायकर्म अर्जप्रति यनान्तरायण मंदियन यदीप्सितं ना लमते ॥१६॥ इति सिद्धान्तज्ञानचक्रवत्तिधीनेमिचन्द्रविरचितकर्मग्रकृतिवन्धनामवन्यस्य टीका समाप्ता। - विशेषार्थ--जो सदा ही अरहन्त, सिद्ध, चैत्य, गुरु और प्रवचनकी भक्ति करता है, नित्य सर्वज्ञ-प्रणीत आगम-सूत्रोंका स्वयं अभ्यास करता है और दूसरोंको कराता है. जगतको यथार्थ तत्त्वका उपदेश देता है, आगम-वजित तत्त्वोंका न स्वयं श्रद्धान करता है और न अन्यको भी श्रद्धानके अभिमुख करता है, उत्तम, जाति, कुल, रूप, विद्या आदिसे मण्डित होनेपर भी उनका अहंकार नहीं करता, और न हीन जाति-कुलादिवालोंका तिरस्कार ही करता है, पर- निन्दासे दूर रहता है, भूल करके भी दूसरोंके बुरे कार्योंपर दृष्टि नहीं डालता, किन्तु सदा ही सबके गुणोंको ही देखता है. और गुणीजनोंके साथ अत्यन्त विनम्र व्यवहार करता है, ऐसा जीव उच्चगोत्र कर्मका बन्ध करता है। किन्तु इनसे. विपरीत आचरण करनेवाला जीव नीचगोत्र कर्मका बन्ध करता है । अर्थात् जो सदा अहंकारमें मस्त रहता है, दूसरोंके बुरे कार्योपर ही जिसकी दृष्टि लगी रहती है, दूसरोंका अपमान और तिरस्कार करने में अपना वड़प्पन समझता है, देव, गुरु शास्त्रादिकी भक्ति विनयादि नहीं करता और आगमके अभ्यासको वेकार समझता है । ऐसा जीव नीच योनियों और कुलोंमें उत्पन्न करनेवाले नीचगोत्र कर्मका वन्ध करता है। अव अन्तराय कर्मके वन्ध-कारण बतलाते हैं- जो जीव प्राणियों के घातमें संलग्न हैं, जिनपूजन और मोक्षमार्गमें विघ्न करनेवाला है, वह उस अन्तराय कर्मका उपार्जन करता है कि जिसके कारण वह अभीष्ट वस्तुको नहीं पा सकता।।१६१।। विशेपार्थ-जो जीव पाँचों-पापोंको करते हैं, महा आरम्भी और परिग्रही हैं, तथा जिन-पूजन, रोगी साधु आदिको वैयावृत्त्य, सेवा-उपासनादि मोक्षमार्गके साधन-भूत धार्मिक क्रियाओंमें विघ्न डालते हैं, रत्नत्रयके धारक साधुजनोंको आहारादिके देनेसे रोकते हैं, तथा किसी भी प्रकारके खान-पानका निरोध करते हैं, उन्हें समयपर खाने-पीने और सोने वैठने या विश्राम नहीं करने देते, जो दूसरेके भोगोपभोगके सेवनमें बाधक होते हैं, दूसरेको आर्थिक हानि पहुँचाते है और उत्साह-भंग करते हैं, दान देनेसे रोकते हैं, दूसरोंकी शक्तिका मर्दन करते हैं, उन्हें निराश और निश्चेष्ट बनानेका प्रयत्न करते हैं, अथवा कराते हैं, वे जीव नियमसे अन्तराय कर्मका तीव्र वन्ध करते हैं। इस प्रकारसे वाँधे गये अन्तराय कर्मका जय उदय आता है, तब यह संसारी जीव अपनी इच्छाके अनुकूल न आर्थिक लाभ ही उठा पाता है, न भोग-उपभोग ही भोग सकता है और न इच्छा करते हुए भी किसीको कुछ दान ही दे ३. पञ्चसं०४, २१४ । गो० क० ८१० । 3. ज नेमिचन्द्रविरचित कर्मकाण्डस्य टीका। व टीका महारकश्रीज्ञानभूपणकृता ।

प्रशस्ति ८३ टीकाकारस्य प्रशस्तिः मूलसद्धे महासाधुर्लक्ष्मीचन्द्रो यतीश्वरः । तस्य पट्टे च वीरेन्द्रविबुधो विश्ववन्दितः ॥ १॥ तदन्वये दयाम्भोधिनिभूपो गुणाकरः । टीकां हि कर्मकाण्डस्य चक्रे सुमतिकोत्तियुक् ॥२॥ टीकां गोम्मटसारस्य विलोक्य विहितं ध्रुवम् । पठन्तु सजनाः सर्वे माप्यमंतन महत्परम्1 ॥३॥ प्रमादाद् भ्रमतो वापि यद्यशुद्ध कदाचन । टीकायामन संशोध्यं विबुधै पवर्जितः ॥४॥ इति भट्टारकश्रीज्ञानभूपणनामाङ्किता सृरिश्रीसुमतिकीतिविरचिता कर्मकाण्डस्य ( कर्मप्रकृतेः ) टीका समाप्ता । पाता है । कहनेका सार यह है कि दूसरोंके दान देने में विन्न करनेसे दानान्तराय कर्मका वन्ध होता है, दूसरोंके लाभमें विघ्न करनेसे लाभान्तराय कर्मका बन्ध होता है । अन्न आदि एक बार ही खाने-पीने के काममें आनेवाली वस्तुओंको भोग कहते हैं नी, झाय्या आदि बार- बार भोगी जानेवाली वस्तुओंको उपभोग कहते हैं। जो दूसरोक भोगमें अन्तराय डालना है । वह भोगान्तराय कर्मका बन्ध करता है और जो दूसरोक उपभोग विन डालना है यह उपभोगान्तराय कर्मका बन्ध करता है। जो दूसरोंको निम्त्नाहित करके उनके बल-वीर्यको खण्डित करता है, वह वीर्यान्तराय कर्मका बन्ध करता है। इस प्रकार जो पाँचों प्रकारक अन्तराय फर्मका बन्ध करता है वह अपने लिए मनोनुकूल इष्ट बग्तुकी प्राप्तिले बाँचेन रहता है। इस प्रकार नेमिचन्द्राचार्य विरचित कर्मप्रकृति मन्य समाप्त हुा।

कर्मप्रकृति व प्रति प्रशस्तिः स्वस्ति श्री संवत् १६२७ वर्ष कात्तिकमास कृष्णपक्ष पतम्यां गियी श्रयाः श्रीमधूकर श्री चन्द्रनाथ- चैत्यालये श्रीमूलमंघ सरस्वतीगच्छे बलात्कारगणे श्रीकुन्दन्यान्वये भ. श्रीपानविद वागापभ. श्रीदेवेन्द्रकीर्तिदेवास्तत्पष्टे म० श्रीविद्यानन्दिदेवास्तरपट्टे म० श्री[म.लिभूपणास्तप मा. श्रीलक्ष्मीचन्ता. स्तपट्टे भ० श्रीवारचन्द्रास्तपट्टे म० श्रीज्ञानभूपणास्तरपटं म० श्रीप्रमाचन्द्रोपदेवान बल पारनगम्यातव्यः सिंहापुराज्ञातीयः धर्मकार्यतत्परः श्रे० हांगा मार्या मटक गयाः पुत्री यनिजन महा अने[क] प्रकरणापरा जिनालयाथ दत्तनिजगृहा बाई पूतली नयमां श्रीकमंकापटीका लिगाय म. श्रीप्रमाचन्द्रभ्यां दना। चिरं नन्दतु । हुए। उनके व्यावर-प्रतिकी लेखक-प्रशस्ति स्वस्ति श्री सं० १६२७ वर्पक कार्तिक मास के कृष्णपक्ष की पंचमी तिथिमें आज इस श्रीमधूकपुर में स्थित श्रीचन्द्रनाथ चैत्यालयमें मूलसंघ, सरस्वनीगच्छ, बलात्कारगण वाले श्रीकुन्दकुन्दाचार्यकी परम्परामें भट्टारक श्रीपद्मनन्दिदेव पट्टपर भ० श्रीदेवेन्द्रकीति- देव हुए । उनके पट्टपर भ० श्री विद्यानन्दि देव हुए। उनके पट्टपर भ० श्रीमल्लिभूपण हुए । उनके पट्टपर भ० श्री लक्ष्मीचन्द्र हुए। उनके पट्टपर भ० श्रीवारचन्द्र हुए। उनके पट्टपर भ. श्रीज्ञानभूपण बुए । उनके पट्टपर आसीन भट्टारक श्री प्रभाचन्द्र के उपदेशसे बलसाह नगरक रहनेवाले सिंहपुराजातिके और धर्मकार्यमें तत्पर ऐसे श्रेष्टो हासा हुए। उनकी श्रीका नाम मटकू था । उन दोनोंके पूतलीबाई नामकी पुत्री हुई, जो यतिजनोंकी परम भक्त और व्रत करने में तत्पर थी तथा जिनालयके लिए जिसने अपना घर भी प्रदान कर दिया था, उसने श्रीकर्मकाण्डकी यह टीका लिखाकर भ० श्रीप्रभाचन्द्रको भेंट की। पढ़नेवाले सर्व जन आनन्दको प्राप्त हों।

-- श्री अज्ञाताचार्य-प्रणीता' द्वितीया कर्मप्रकृति-टीका .. गा० १-अहं नेमिचन्द्रकविः प्रकृतिसमुत्कीर्तनं प्रकृतीनां प्रकृतिसमुक्कीतनं प्रकृतीनां ज्ञानावरणादिमूलोत्तरदायुनानां समुत्कीर्तनं कथनं विवरणं वोच्छं वक्ष्ये कथयिष्ये । किं कृत्वा ? लिरसा मस्तकंन नमि नेमिनाथनाकर स्वामिनं पणमिय प्रणम्य नमस्कृत्य । किंभृतं नमिम् ? [गुगरयणविलणं ] गुणाः अहिंसादयः, त एव रत्नानि, तान्येव विभूपणानि याभरणानि यस्य स गुण-[ रखविभूपण-] स्तम् । [ पुनः किंभूनन् ? महावीरं] महांश्चासौ वीरश्च महावीरस्नं महावीरम् । [ पुनः किंभूतम् ? सम्मत्तरयणणिलयं] स्व- स्वरूपलाभः सम्यक्त्वं सप्तप्रकृतिक्षयलक्षणं क्षायिकसम्यक्त्वं या, तदेव रवं तस्य निलयं स्थानं आश्रय. स्तम् । अथवा किं कृत्वा ? महावीरं प्रणम्य, महती विशिष्टा चानी ई लक्ष्मीच तां राति दानाति गृहातोति महावीरस्तम् , प्रगम्य । कोदशं महावीरम् ? [ नेमिम् ] निजोदनपुण्यमाहारन्येन नागेन्द्र नरेन्द्र-देवेन्द्र वन्चं निजपादारविन्द्रद्वन्ह, नमयतीति नेमिः । यदि चा तीर्धक-रध-प्रयत कारस्यालेमिरिच नेमिः, चक्रधरः । एतादृशं महावीरम् । एतानि सर्वाणि विशेषणानि अध्यापि भवन्ति वीरपझे। नामनाम नेमिचन्द्रं कविः प्रणम्य ॥१॥ गा०२-वाक्यम्-स्वभावो हि स्वभाववन्तमपंक्षत नि । कयोः समावः ? जीयकमनीः । तत्र रागादिपरिणमनमात्मनः स्वभावः, रागाद्युत्पादकत्यं नु कर्मणः, तदितरंतराप्रय दोषः । नरंतरायचरि- हारार्थमनयोः सम्बन्धः अनादिः । किंवत् ? कनकोपलवत् अनमोरलियं कथं मिडमिन्युगे आर-बार सिहमिति चेत् ? अहंम्प्रत्ययवेयत्वेनात्मनोऽस्तिम्बम् ; एको दरिद्रः, एरः श्रीमान नि विचिस्माना- स्कर्मणोऽस्तित्वं सिद्धमिति । जीवंगाणं जीव अङ्गयोः । प्रकृतिः स्वभावः । [अणाइसंबंधी ] नादि संबन्धः प्रवर्तते । प्रकृतिः शीलं स्वभावमिति प्रकृतिपर्यायनामानि । स्वभाषस्य वि. लक्षणमिनिट कारणान्तरनिरपेक्षत्वं स्वभावः । या यथा जलस्य निरगमनं स्वभावः, समागमा मारत, पाया [ वायोः ] तिर्यगमन स्वभावः । म च स्वभावः स्वभाववन्नं पंक्षा बाम ग्यभारः : : जीवकर्मणोः । कयोरिव ? कनकोपलवालनिय । यथा बनवपापा ममममन्यः नादिः पतन इतरेतराध्यदोषप्रसङ्गः स्यात् तपरिहारार्थ निवारणाय नया जीवन सामन्य: नाति: ती [ इत्युनम् ] ॥२॥ गा० ३-देहोदाण औदारिक । मिथिय २ ३ जम : नं. , , तस्योदयेन ! जीयः कर्म नोक पुदगल्याणतः (हान) भारदापनि । विहानीपान भरन स्वकीयशरीरं त्याचा नायनारनकरतांधक ना न तु नोककः । समय समय प्रति इति प्रतिवाद साई : स्वस्त धर्म. नोरम भापति । जहारिक विकारारदार ! पिंटऊब जलं ] अपति भवं भावनन् । नया का पहादि ::-:- गृहाति, तशारीरनामोदन महिसोप: रमन सिनnt !! 1. नामोमोज ।।।

- ३ - कर्मप्रकृति गा०४-सिद्धानां अनन्तिममागं ममग यादगणनां यानि, अभध्यमिवेभ्यः अनन्तगुणं समय- प्रवाह बन्नाति । योगवशात मनोवचनकायात विसहर्श वनाति । वर्ग: शक्तिसमूहाऽणारना वर्गणादिता ! वर्गणाना समूहम्तु स्पर्धकः स्पर्धकापहः॥ जीबो योगवशात् मनावचनकाययोगात, समयप्रयई. मगयं समयं प्रविष्यति समाप्रपनः । [ एवंभूतं ] समयप्रबद्धं गृहातीति विज्ञपः। बंधदि बनानि । कोशम् ? सिम्योमन्तिममागं मिन्द्र- राश्यनन्तकमागम् । पुनः कीदृशम् ? अमध्यसिद्धादनमानणं कम नाकम बानि । कोरगं समयप्रयकम् ? विसदृशं नानाप्रकारं अनेकरूपं वा विसदृशं श्रायुवभिनसप्तानां कर्मणां बन्धम् ॥४॥ गा०५-अस्य जीवस्य समय प्रयदः जागाति । [उ. ] पयोगनः ज्ञानोपयोगतः दर्शनोप- योगतः प्रयोगत. ....."अनेकसमयान बन्द, जीणागि ] हानी मयति गधंगुणानिमात्र- समयमबद्धः प्रतिसमयं सत्त्रं भवेत् । एकपल्पस्यासंगया भागाः शियनी, नेपांमध्ये एकाधनागस्य गुण- हानिसंज्ञा शेया (2) ||| गा०६--एकसामान्यापक्षया कमवन एवं कर्म । तु पुनः राकम हिविधम् । पुद्गलानां ज्ञाना. धरणादीनां पिप उसमूह;, ततद्रव्यकम । तच्छतिः रागादिपरिणामः, . भावकम ॥६॥ गा७-तत्कर्म पुनः अष्टविधं वा, अष्टाधारिशच्छ १४० वा, समंगयातलोकमाया। तपा कर्मणां पुनः घाति इति संज्ञा, श्रघाति इति संज्ञा भवति । तत्कम ज्ञानावरणादिभेदेन अष्टविध भवति । वा तस्कर्म प्रकृतिभावभेदेन अष्टचत्वारिशच्छतं भवति । बा सराम अयंग्यानलोकप्रमाणमिति समुच्चयार्थः । तेषां चाष्टविधानां पृथक् पृथक् घातिरिति, अयातिरिति च हे मंझे भवराः ॥७॥ गा०८-ज्ञानावरणीयं दर्शनावरणीयं वंदनीयं मोहनीयं [ आयुष्कं नाम गोत्रं ] अन्तरायः [रति] अष्टौ मूलप्रकृतयः ज्ञातच्याः ॥८॥ गा०९-ज्ञानावरणीयं दर्शनावरणीयं मोहनीयं अन्तराय एतानि चत्वारि घातिकर्माणि ज्ञात- व्यानि । कस्मात् ? जीवगुणयातनात । तथा आयुर्नाम गोत्रं वेदनीयमिति अयातिकर्माणि ज्ञातव्यानि ॥६॥ गा०१०-घाति-धारानात् दूरीकरणात, कंवलज्ञानं केवलदर्शनं अनन्तवार्य क्षायिकसम्यक्त्वं चकारात् क्षायिकचारित्रं क्षायिकदान-लाम-भोगोपभोगाः नव क्षायिकगुणा मयन्ति । मति-ध्रुनायधि-मन:- पर्ययादय एते क्षायोपरामिकगुणाः । [क्षयात. ] नाशनात् वातियातनात [क्षायिकगुणाः भवन्ति ] । सर्व- घातिस्पर्धकानां उदयाभावः क्षयः, तेपो सदवस्था उपशमः, देशवाति स्पर्धकानां उदये सति क्षयोपशमः कथ्यते । [क्षयोपशमन भवाः क्षायोपशमिकाः । मत्यादयः क्षायांपशमिकगुणाः कथ्यन्ते । ] ॥10॥ गा०११---आयुःकर्मादयः कर्मकृते मोहवर्धिते अनादियुक्त एवंभृते संसारे चतुर्गतिपु जीवस्य अवस्थान स्थितिं करोति । किंवत् ? वर-हडिवत् । चथा हलिः छिद्वितकाष्टविशेषः, हलि निगह: नरं पुरुषं श्रवस्थानं करोति; तथा श्रायुःकर्म जीवस्य संसारे स्थितिकारकं भवतीत्यर्थः । छिदवहारविशेषः हलिरित्युच्यते ॥५॥ गा० १२-एतस्य नामकर्मणः विनतिप्रकृतयो भवन्ति । इदं तात्पर्यम्-~-तासु विपयेषु काश्चन प्रकृतयो जीवविपाकिन्यो भवन्ति, काश्चन प्रकृतयः पुद्गलविपाकिन्यः क्षेत्रविपाकिन्यो भवन्ति । चशब्दात् मविपाकिन्यो भवन्ति । याः जीवविपाकिन्यः प्रकृतयः सन्ति, ताः अनेकप्रकारगत्यादिजीयभेदान कुर्वन्ति । [ याः पुद्गल विपाकिन्यः ] प्रकृतयः सन्ति, ता श्रीदारिकादिशरीर-संस्थान-संहननादिकानेक दान् कुर्वन्ति । है 1. समये समये प्रबध्यते इति समयप्रवद्धः । ( गो० क० टो०)। 2. सातिशयक्रियोपेतस्य आत्मनः सम्यक्त्वादिप्रवृत्तिलक्षणप्रयोगेन हेतुना एकादश [ स्थानीय-] निर्जराविवक्षया अनेक समयप्रबद्धो जीर्यते । ( गो० क. टो०) ३. तथा जीवगुण वातकप्रकारेण न इत्यत्रातिसंज्ञानि । ( गो० क० टो०)

प्रकृतिसमुत्कीर्तनम्
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याः क्षेत्रविपाकिन्यस्ताः वर्यानुपूर्वगतः [ चतस्रः श्रानुपूर्व्यः गतेः ] सकाशात अन्यत्र गत्यर्थाः । जीव-
पुद्गल-[भव.] क्षेत्रविपाकिनामिति कथितम् ॥१२॥
गा० १३-सन्तानक्रमेण अनुक्रमेण परम्पराक्रमेण श्रागतजीवस्याचरणं गोत्रमिति सण्णा संज्ञा
स्यात् । यत्र उच्चं चरणं भवेत्, तत्र उच्चं गोत्रम् ; यत्र नीचं च भवति [ तन्नीचगोत्रम् ] ॥१३॥
गा० १४-अक्षाणां इन्द्रियाणां यदनुमवनं 'अनुभूति: तद्दे दनीयम् । यदिन्द्रियाणां सुखस्वरूपं
तत्सातम्, यदुःखस्वरूपं तदसातस् । तत् सुख-दुःखं वेदयतीति वेदनीयम् ।
गा० १५–अयं संसारी जीवः अर्थ पदार्थ पूर्व दृष्ट्वा जानाति, पश्चात, सप्तममामिः याणीमिः
श्रद्दधाति, इत्यनेन प्रकारेण दर्शनं ज्ञानं सम्यक्त्वं च [जीव] गुणाः भवन्ति । चशब्दान वीर्यमपि गृयते ।
स्यादस्ति १ स्यान्नास्ति २ स्यादस्तिनास्ति ३ स्यादवक्तव्यं ४ स्यादस्ति-अवनव्यं ५ स्याहास्ति-अवनव्यं
६ स्यादस्ति-नास्ति-अवक्तव्यं ७ इति सप्तभङ्गी वाणी भगवत: ॥१५॥
गा० १६-खु स्फुटं सप्तमङ्गं द्रव्यं सम्भवति । केन ? आदेशवशेन पूर्वसूरिकथन वशेन । ते सप्तमगाः
के इति चेदुच्यते-स्याच्छब्दः प्रत्येकं अभिसंबध्यते-स्यादस्ति १ स्थानास्ति २ स्यादलिनास्ति ३
स्यादवक्तव्यं ४ स्यादस्ति यवक्तव्यं ५ स्यान्नास्ति-अवक्तव्यं ६ स्यादस्ति-नास्यवनव्यम् ७ एले सप्त
भङ्गाः ज्ञातव्याः । स्यात्कथंचित्प्रकारेण विवक्षितप्रकारेण स्वदच्यादिचतुष्टयापेक्षया द्रव्यमसि ।
स्यान्नास्ति-स्यात्कथंचित्प्रकारेण परद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया नात्यर्थः २ । स्यादस्तिनामिरा-स्याकजिद
विवक्षितप्रकारेण क्रमेण स्वपरद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया द्रव्यमस्तिनास्तीत्यर्थः ३ । स्यादवनच्यम्-स्वाकयजिद
विवक्षितप्रकारेण युगपद् वमशक्यत्वात् 'क्रमप्रवर्तिनी भारती' इति वचनाद् युगपत स्व-परद्रव्यादि.
चतुष्टयापेक्षया द्रव्यमवक्तव्यमित्यर्थः ४ । स्यादस्त्यवनव्यम् -स्या कथचिहियक्षिनप्रकारेण [बदल्यादि.
चतुष्टयापेक्षया ] जीवोऽस्तीति अवतव्यं द्रव्यापेक्षया इति ५ । स्यानास्यवनव्यम् - स्वाकलिहियाशित.
प्रकारेण परदव्यादिचतुष्टयापेक्षया युगपत स्व-परद्रव्यादिचतुष्टयापेक्षया चा ट्रच्यं नारययमच्यम् ६ ।
स्यादस्तिनास्त्यवक्तव्यम्-स्यात्कशिद्विवक्षितप्रकारेण क्रमण स्व परद्रयादिचतुष्टयापेक्षया युगपट्टणमणि
नास्त्यवतव्यमित्यर्थः ७ । ॥१६॥
गा० १७-अभ्यहित्वात् पूज्यत्यात पूर्व जानं भणितम् । ततो दर्शनं भवनि, अतः सम्पपर
भवति । वीर्यन्तु जीवाजीवेषु प्राप्तमिति हेतोः चरम अन्ते पटिनम् ॥ १७॥
गा० १८-[घात्यपि] अन्तरायकर्म [-] पानिवद् ज्ञानप्यम् । कुनः : निरोपजी गया
अशक्यत्वात्, नाम-गोत्र वेदनीय-निमित्तात् नाम-गोत्र वेदनीयान्येव निमिनं कारण यग्य भागमा
तस्मादधातिनां चरमे भन्ते पठितम् ॥१८॥
गा० १६-भवत्य संसाररय आयुःकर्म बलेन स्थितिः भवनि, नागरम भाप मानि । .
कर्मपूर्वस्य नामकर्मणः । तत् पुनः गतिलक्षणभवं शानिय नीरयं उस बगरमनाममा
कथितं नामकर्म पूर्व यस्य गोत्रस्य तन ॥१९॥

२ ३ G . कर्मप्रकृति गा० २३-~-जीवस्य विविधकर्मणा सह अनादिभगः बन्धी रिन । नस्य पकाययष्य [उदयन पुनः राग-द्वेषमयः भावः परिणाम: जायते उत्पात ॥२३॥ गा० २४-पुनरपि तेन राग-देपमयेन मावेन अन्ये वायः कांपुदगर अागनालगन्ति पन्धं प्राप्नुवन्ति । यथा धृतलितगात्रस्य निविडा रेणको लाति', नया रागय का धादिमरिणामनिम्यारमिता. मनः निघट ( निविड) रजवी (रजसः रेणवी वा) लगन्ति इत्यर्थः १९२४॥ गा० २५-'जीवे' इति शेषः । एकसमयेन यकम ग्रन्द्र] नकम आयुकर्म विना शानावरणीय. दर्शनावरणीय वेदनीय-मोहनीय-नाम-गावान्तरायभेदः सप्तप्रकारः परिणमनं करोनि बन्धं प्राप्तानि । पुनः यद् बन्द्रं श्रायुकर्म तद्भुक्तायुःशेपेण भुज्यमानायुभिमाग-निमागानमण [ बन्धं प्राप्नोति । ] ॥२५॥ कर्मभूमितिर्यग्मनुप्यायुर्वन्धविधिः- सुर-णिरया णर-तिरिये छमास सिट्टग] सगाउन्स । गर-तिरिया सब्बाउगतिभागसेसे तु कमास ॥2॥ संसारसभावाणं जीवाणं जीवियाउ वारं । गयदोभाग तिगेकं छप्पणछहइंगि-तिभंगदलं । ॥२॥ इगिवीससर्यसत्तासी सत्तसँयगुंणनीस वसय तेदालं पुण इक्कासी 'कहियं सँगै वीसं गर्व तिण्णिमे गं च ॥३॥ ३ ६५६१०.३%,२१८७३ = ७२६:३%२४३:३%3D८१२ - २७:३% ९:३३:१। अनेनानुक्रमेणायुः कर्म बन्धं याति-- गा० २६--स बन्धः सूने अनादिनिधनद्वादशाङ्गवाण्यां निर्दिष्टः सूत्रनिर्दिष्टः भवनि । स पूर्वानः कर्मवन्धश्चतुर्भदो ज्ञातव्यो भवति । स कथम्भूत: ? जिनागमे कथितः । ते चत्वारो भेदाः के ? प्रकृनि- स्थित्यनुभाग-प्रदेशचन्धाः । अयं भेदः पुरा पूर्वोक्तगाथासु (?) कथितः । प्रकृतिः परिणामः स्यात् स्थितिः कालावधारणं । अनुभागो रसो ज्ञेयः प्रदेशो दलसंचयः ॥२६॥ गा०२७----पटो वस्त्रम् ! प्रतिहारो द्वारपाल: । असिः खड्गम् । मद्यम् [ मदिरा । हडिः ] का. विशेषः निगडः । चित्रम् चित्र वखं वा चित्रकारी पुरुपः कुलाल: कुम्मकारः। भाण्डागारी कोपनियुक्तः पुमान् । यथा एतेषां भावाः, तथाविधानि कर्माणि ज्ञातव्यानि ॥२७॥ गा०२८-ज्ञानावरणं कर्म सूत्रनिर्दिष्टं पञ्चविधं भवति । दृष्टान्तमाह-यथा प्रतिमाया उपरि क्षिप्तं क्षेपितं प्रतिमोपरि क्षिप्तं कर्पटकं वस्त्रं आच्छादकं भवति ॥२८॥ गा० २६-पुनः दर्शनावरणं कर्म किंस्वभावम् ? यथा नृपद्वारे प्रतोहारः राजदर्शननिषेधको भवति, तथा दर्शनावरणकर्म वस्तुदर्शननिषेधको मवति । तद्दर्शनावरणीयं कर्म नवप्रकार स्फुटार्थवादिमिर्गणधरदेवैः सूत्रे सिद्धान्ते प्रोक्तम् ॥२९॥ गा० ३०-पुनः वेदनीयं कर्म द्विविधं भवति । कथम्भूतम् ? मधुलिप्तखड्गसदृशम् । तरसाता- सातभेदप्राप्तं सत् जीवस्य सुख-दुःखं ददाति ॥३०॥ गा० ३१ --मोहनीयकर्म आत्मानं मोहयति, यथा मदिरा पुरुपं मोहयति । [ यथा वा मदन- कोदवा पुरुष मोहयन्ति । ] तन्मोहनीयं कर्म अष्टाविंशतिभेदेन विभिन्नं जिनोपदेशेन ज्ञातव्यम् ॥३१॥ .

प्रकृतिसमुत्कीर्तनम गा० ३२-आयुःकर्म चतुःप्रकारम् । किं लक्षणं आयुःकर्म ? नारकश्च नियंक मनुष्यश्च सुरश्च ये तेषां गतिर्गमनं पर्यायदायकम् । गम्यते यया सा गनिः, तस्याः गम्यं रोचनं (?) नारक-नियंङ् मनुष्य सुरगतिगं प्राप्तम् । कीदृशं आयुः ? हडिक्षिप्तपुरुषसदृशम् । पुनः कीदृशम् ? जीवानां भरधारणे समर्थ भवति ॥३२॥ . , गा० ३३-नामकर्म गति-जाति-शरीरादिकं त्रिनवतिसंग यागणितम् । पुनस्तत् किम्भूनं नाम ? चित्रपटवत् विचित्रं भवति । पुनः किम्भूतं नामकर्म ? नानानामनि- [ वनकं ] उत्पादकं भवनि ॥३३॥ गा० ३४-गोत्रकर्म कुलालसदृशं कुम्मकारतुल्यं वर्तते । कीदृशम् ? नीचोच्चकुलपु उत्पादन वक्ष प्रवीणम् । घटरजना दिकरणे यथा कुम्भकारो निपुणः ॥३४॥ गा०३५-यथा भाण्डागारिकः पुरुषः राजदत्तं धनं निवारयति, तथा अन्तरायपलब्धीनां निवारकं भवति ॥३५॥ गा० ३६- नव द्वौ अष्टविंशतिः चत्वारि कर्माणि अनुक्रमेण विनवतिः त्र्युनरम या द्वे पर उत्तरप्रकृतयो भवन्ति ।।३।। गा०३७-आभिमुख-नियमितबोधनं आमिनिबोधकं भवति [तत] अनिन्द्रियजं इन्द्रियजं बवादि. अवग्रहादिककृतपत्रिंशद्-भेदम् । किंभूतं श्रामिनिबोधकमतिज्ञानम् ? अनिन्द्रिय [ मनोनिप्पनं ] इन्द्रि यजं पञ्चस्पर्शनादिकोत्पन्नम् । श्रवग्रहादिभेदाश्चत्वारः । अवग्रहः वस्तुदर्शनम् । ईहा तहानुज्ञान मिला। अवायः तद्वस्तुनिश्चयः । धारणा तद्वस्तुनः पुनरविस्मरणम् । एते भेदाः बहु १ अबहु २ यहुविध ३ भबहु. विध ४ क्षिप्र ५ अमिन ६ निःसृत ७ अनिःसृत ८ उक्त ९ अनुक्त १० ध्रुव ११ अधव १२ पनैः हादभिः भेदैः गुण्यन्ते, तदा ४८ भंदा भवन्ति । पुनरेते भंदा पञ्चेन्द्रियः मनमा च गुण्यनी, नदा अघांवरहस्य २८८ भेदा भवन्ति । व्यञ्जनावग्रहस्य १८ भवन्ति चक्षुमनाभेदरहितचतुरिन्द्रियगुणिताः १८ भदा भवन्ति । एवं (२८८ + ४८ = ) ३३६ भेदाःमतिज्ञानस्य भवन्ति । मतिज्ञानमावृणोनीनि मनिज्ञानावरणीयम् ।।३।। गा० ३८-अर्थादर्थान्तरं येन उपलभ्यते तदाऽऽचार्याः प्रज्ञानं कथयनिम । कीरनं भुगतानम् ? आभिनियोधकपूर्व श्रुतज्ञानं नियमन शासप्रमुखं प्रधानम् । ध्रुनज्ञानमायूगोनानि शुनज्ञानावरणीयम् ।।३।। गा० ३६-अवधीयते मर्यादीक्रियते इति अवधिः, सीमाज्ञानमिनि वर्णिनं समय मिन्हा। एको भवप्रत्ययोऽवधिः, एकश्च गुणप्रन्ययः, इत्येतदिविधमवधिज्ञानं यदव धिता र मुबमिन इधयति । अवधिज्ञानमावृणोतीति अवधिज्ञानावरणीयम् ॥३९।। गा० ४०-चिन्तितं श्यचिन्तितं या अर्ध चिन्तितं वा घनेक दगा [ परमन मिमि. नाति, तन्मनःपर्यय इति ज्ञानमुच्यते । तरस्फुटं नरलोके मनुप्योंग्रे साधंद्रयही एप [ भवति पर. मिति । मनःपर्यज्ञानमावृणोतीति मनःपर्यययज्ञानावरणीयम् ।।४०॥ गा० ४१-सम्पूर्ण पुनः समारं केवलं अम्मपन्न गरहित समावगनं गोरा निरि प्रकाशकं कंवलजानं मुणेयध्वं ज्ञातव्यम् । केवलसानमावृणीतानि केवल मानायरमीयम् ॥४ गा० ४२-मति-ध्रु तावधि-मनःपर्यय-कंवलजानानि, एतेषां आयरल महिनाम:. ज्ञानावरणीयं २ शवधिज्ञानावरणीयं ३ मनःपर्ययमानावरणीयं जानादानी ५ :नि पञ्चप्रकारं ज्ञानावरणीयं कर्म जिनमणि शिष्य, ग्वं जानीहिः॥४! गा०४३-भावानामाकारं नैव हत्या अर्थान् पदार्शन भविषधि नट समय सिद्धान्त दर्शन मिति भण्यते ॥१३॥ गा०४५-चक्षुपा पल प्रकायने रपयने, नरमान प्रदान करना प्रमशः, स अचक्षुर्शन मिति सातम्यः । चक्षुदर्शनमाहोमादि करना। तीति अनावरणीयम् ॥५॥ . ६२ ९० फर्मप्रकृतिः गा० ४५-परमाण्वादि वृष्यं अनिमस्कन्धं त्रैलोक्यम्कन्ध [ पर्यनि मृसिंद्रयाण, नानि यत्प्रत्यक्षं पश्यति, तदयधिदर्शन मिति । अवधिदगंगमावृणानीति अवधिदानावरणीयम् ॥४५॥ गा०४६–बहुविध-यप्रकाराः उयोनाः चन्द्र मर्याग्निरल प्रमुगाः परिमिग क्षेत्रे याहयाप [ भवन्ति ] यः कंवलदर्शनीयोगः स लोकालोकपिनिमिरः । कंबरदर्शनमाणांनीजि कंवलदारांना. वरणीयम् ॥४६॥ गा०४७-एतेषां चक्षुरचक्षुरवाधिकवलालोकानां यावरणं दनावरणीयं कर्म। एनः पानिद्रा- दर्शनावरणं प्रमणिप्यामः ॥१७॥ गा०४८-अथ सत्यानगृदि: १ निहानिद्रा २ नर्थव प्रचला चला शनिवारी प्रचला ५ च । एवं नवभेदं दर्शनावरणीयम् ॥१८॥ गा०४६-स्त्यानगृहिनिद्रोदन उत्थापिनं सत्यपि स्वपिनि, कर्म करोगि, जहानि च । निद्रानिहो. दयन दृष्टिमुन्दाटयितुं न शक्रोति ॥४॥ गा०५०-प्रचलाप्रचलोदयन [ मुखान ] लाला वहन्ति, शानि चलनि। निद्रादयं सति गच्छन् सन् तिष्ठति । पुनः उपविशति, पतति च ॥५०॥ गा०५१-प्रचलोदयेन च जीवः इंपन्नेत्रे मीलयिस्या ( उन्मील्य ) ग्यपिति, मुप्तः सन ईप- दीपज्जानाति, मुहुर्मुहुः मन्दं मन्दं स्वपिति ॥५१॥ गा० ५२-हिविधं स्फुटं वेदनीयं सातममातं वेदनीयमिति । पुनः द्विविकल्प मोई दर्शनमोहं चारित्रमोहमिति ॥१२॥ गा०५३-बन्धादेकं मिथ्यात्वम् , उदयं सत्ता प्रतीत्य आश्रित्य निविधं स्फुटं दर्शनमोहं मिथ्यात्यं मिश्रं सम्यग्मिथ्यात्वं सम्यक्त्वप्रकृतिः इति त्वं जानीहि ॥५३॥ गा०५४-यन्त्रेण कोदवः विधा भवति प्रथमोपशमसम्यक्त्वभावयन्त्रेण मिथ्यात्वदव्यं विधा भवति । कीदृशं मिथ्यात्वद्रव्यं द्रव्यकर्मणः असंख्यातगुणहीनम् । मिथ्यात्यादसंग्ल्यातगुणहीनं सम्यग्मिथ्या- त्वं भवति, सम्यग्मिथ्यात्वादामुख्यानगुणहीनं सम्यक्त्यप्रकृतिमिध्यात्वं भवति ॥१४॥ गा०५५-द्विविधं चारित्रमोहं कपायवेदनीयं नोकपायवेदनीयं चेति द्विविधम् । प्रथमं पोडश- विकल्पम् , द्वितीयं नवभेदं उद्दिष्टं कथितम् ॥५५॥ गा०५६-अनन्तानुबन्धी अप्रत्याख्यानं प्रत्याख्यानं तथैव संज्वलनं क्रोधः मानः कापट्यं लोमः पोडश कपाया एते ॥५६॥ गा० ५७-शिला-पृथिवीभेद-धूलि-जलराजिरेखासमानः क्रोधः नारकतिर्यट-मनुष्यामरगतिपु क्रमशः क्रमेण उत्पादकः ।।५७॥ गा०५८-शिलाऽस्थि-काष्ठ वेत्ररूपनिजभेदेन अनुहरन् अनुसरन् मानः नारक-तियंङ्-मनुष्य-देव. गतिपु क्रमशः उत्पादकः ॥५८॥ गा० ५६-वेणुमूल-वंशमूल-उरभ्रङ्ग गोमूत्र-क्षुरप्रसदृशी माया नारक-तियंङ-नरामरगतिपु जीवं क्षिपति ॥५९॥ गा०६०-कृमिराग-चक्रमल-तनुमल-हरिद्वारागेन सदृशः लोमः नारक-तियंड-मनुष्य-देवेषु क्रमशः उत्पादकः ॥६॥ गा०६१-सम्यक्त्वं घातयति अनन्तानुवन्धी, अप्रत्याख्यानं देशव्रतं घातयति, प्रत्याख्यानं महाव्रतं घातयति, संज्वलनं यथाख्यातचारित्रं घातयति । कपायाश्चत्वारः पोडश असंख्यात-लोक-परि- माणाः सन्ति ॥६१॥ गा०६२-हास्यं अरतिः शोकः मयं जुगुप्सा घृणां स्त्रीवेदः पुंवेदः तथा पण्ढवेदः एते नव नोकपाया ईपकपायाः ॥६२।।

. प्रकृतिसमुत्कीर्तनम गा०६३-छादयति स्वं आत्मानं दोपः नियनो निश्चयात छादयति परं अन्यं अपि वीषण। छादनशोला यस्मात् , तस्मात् सा वर्णिता कथिता स्त्री। श्रोणिमार्दव-भीरुत्व-मुग्यत्व लीवता-स्तनाः । पुंस्कामेन समं सप्त लिङ्गानि स्त्रीनिवेदने ||१|| गा०६४-पुरुगुण-पुरुभोगान् शेते स्वामित्वन प्रवर्तते, लोके पुनः श्रेष्टः गुणी यस्मिन् , नत् इंद्रनं कर्म करोति, पुरुः उत्तमः, उत्तमे परमेष्टिपदे शेते तिष्टतीति पुरुत्तमः वा पुरुषोत्तमः यस्मात् तम्मानस वर्णितः पुरुषः । खरत्व-मेहन-स्तब्ध-शौण्डीर्य-श्मश्रु-धृष्टताः । स्त्रीकामेन समं सप्त लिङ्गानि नरवेदने ।।६४।। गा० ६५-नैव स्त्री, नैव पुमान् , नपुंसकः, उभयलिङ्गव्यतिरिक्तः रदिनः इष्पानिममानः बदनानुरुः कलुपचित्तः । यानि स्त्री-पुरुषलिङ्गानि पूर्वोक्तानि चतुर्दश । सूक्तानि तानि मिश्राणि पण्ढभावनिवेदने ॥३॥ ॥६५॥ गा० ६६-नारक-तियंट नरामरलक्षणं आयुःकर्म चनुर्विधं भवेत् । नामकर्म द्वाचवारिंगरप्रम पिण्डापिण्डभेदेन ॥६६॥ गा०६७- नारक-तियंड-मनुष्य-देवगति इति गतिनामपिण्डप्रकृनिश्चनुां बनने । एनिद्रर द्वीन्द्रिय-त्रीन्द्रिय-चतुरिन्द्रिय पञ्जेन्द्रियभेदेन जातिनामपिण्डप्रकृतिः पजप्रयारा ॥६॥ गा०६८-औदारिक वैक्रियिकाऽऽहारक तेजम-कामणभेदेन गरीनाम पधिवम् नि नेपा शरीराणां विकल्पान् विजानीहि ॥६॥ गा० ६९---त्रिके औदारिक चैफियिकाऽऽहारके तेज-कामणान्यां मृत योग मनि चायः घामः प्रकृतयो भवन्ति । तैजस-कार्मणेन कृतसंयोगे सनि हे प्रहनी भवनः । काम कामगेन सगी बति एका प्रकृतिभवति । एवं शरीरस्य पञ्चदश भेदा भवन्ति । [जपथा-] ओ ओ औत श्रीने का श्री का का वै otc ntc nic . आ आ सा ote त का काका ९२ कर्मप्रकृतिः गा० ७५-७६~द्विविधं विहायो नाम-प्रशस्तगमनं अगरनगमनमिति नियमानिसयान । वज्रर्पमनाराचमहननं बननाराचसंहननं नाराचमंहननं नया धनागमंहननं कोलकमान असम्प्राप्तास्पाटिकासंहननमिति संहननं पड़िवधं अनादिनिधना भणितम् ॥७५.१६॥ गा० ७७-यस्य कर्मण उदय बनमयं अस्थि अपमं नाराचं नन मंहननं मणितं चमनाराचं नामति ॥७७॥ गा०७८-स्योदय वनमयं अस्थि, नाराचं सामान्यं एब, जयननं नामाबग्रनारावमिनि ॥७॥ गा० ७६-यस्योदय वज्रमयाः हमाः वनरहिनं नाराचं पमश्र तर गाराचशरीरमंहननं भणितव्यम् ॥७२॥ गा०८०-वविशेषणरहितानि अस्थीनि अर्धनारानं च यस्योदय [ मन्ति] मा मणिनं नाना अर्धनारायम् 11८०॥ गा०८१-यस्य कर्मण उदय वज्ररहितहमा कीलिया इय दृढयन्धनाः भवन्धि, स्फुटं नत कोलक- नामसंहननम् ।।८१॥ गा०८२-यस्य कर्मण उदय अन्योन्यासम्प्राप्तहसन्धयः नरशिरायन्द्राः भवन्ति, नत स्फुटं असम्प्राप्तास्पाटिकसंहननं भवेत् ॥४२॥ गा० ८३-~असपाटिकन गम्यतं श्रादित चतु.कल्पयुगलान्तम् । गतः परं हियुगलं हियुगले कोलक- नाराचाधनाराचान्ताः [ गच्छन्ति ] ॥८३।। गा०८४-वेयकानुदिशानुत्तरविमानयामिपु यान्ति ने नियमान विहिककमहननाः नाराचादिकाः क्रमशः ||४|| तेषां स्वर्गादिगमनरचनेयम्--- जी० पु० पु० मी० पु० स्त्री० पु० स्त्री० पु० मी० पु० सी० पु० मी० पु० सी० पु० म्रो० पु० २ 20 ६ ५ ९ नाम कल्पसंख्या संह. अनु० अनुदि० 2zbe गा०८५-संजी पटसंहननयुक्तः ब्रजति गच्छति मेघान्तम् । ततः परं चापि अमृपाटिकारहिताः पञ्च पञ्च-चतुरंकसंहननाः ब्रजन्ति ||८|| गा०८६-धर्मा बंशा मंधा अञ्जना अरिष्टा तथैव ज्ञातव्या पष्ठी मघवी पृथिवी, सप्तमी माघी नाम ॥८६॥ एतासु गमनरचनेयम्- - 2०/ संह. धर्मा अदि० ५ वंशा अंज० मेघा मघ० माघ

प्रकृतिसमुत्कीर्तनम्
गा० ८७-मिथ्यात्वापूर्वहिकादिपु सप्त-चनुः पञ्चस्थानेषु नियमेन प्रथमादिषट्व्यंकगुणस्थानेषु
भोधे । [अयमर्थः- ] मिथ्यात्वादिसप्तगुणस्थानपु षट्संहननयुक्ताः जीवा यान्ति । चनु उपशमणिपु
वज्रर्पमनाराच-वज्रनाराच-नाराचसंहननानि यान्ति । पञ्चक्षपकंपु एको वज्रपंमनाराचसंहनन एवं गच्छति ।
गुणस्थानंपु रचनेयम्-
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आदेशे [ मार्गणास्थानेषु ] विशेषतो ज्ञेयानि ।।८।।
गा०८-विकलचतुकं द्विन्द्रिये त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय अमंज्ञि पवेन्द्रियं च पट संहननं मान ।
असंख्यातायुर्युक्त जीवेपु प्रथमं मंहननं भवनि । [ अयमपिण्याः ] चनुयंकाले पट्माननानि भवन्ति ।
पञ्चमकाले त्रीणि संहननानि भवन्ति । पष्टे काले एकं [मृपाटिकं] संहननं भवनि ॥१८॥
गा०८६-सर्वविदहेषु तथा विद्याधर-ग्लेच्छमनुष्य-तियंभु पट महननानि भणितानि । नागना.
पर्वतात्परतः तिर्यक्षु पट् संहनानि सन्ति ।।६०॥
गा० ६०-अन्तिमत्रिकसंहननाना उदयः पुनः कर्मभूमिमीणाम् । आदिमनिकनाननानि -
स्त्रीणां न सन्तीति जिननिर्दिष्टं कथितम् ॥२०॥
गा०६१-पञ्च च वर्णाः-श्वेनं पातं हरित नं. ष्णं वर्णमिनि । गन्धं दिविध गरे नुगः
दुर्गन्धमिति जानीहि ॥९॥
गा०६२-तिक्त कटुकं कपायमान्लं मधुर मिनि एनानि पर सनामानि । मायोमा.
गरिए लघु-शीतोष्ण-सिग्ध-रक्षाः एतं अौरपाः ।।१२।।
गा०६३–रपर्शः शविकलाः । चारसः आनुपत्यं चनुगमण जानीमा.
गगत्यानुपूर्वी मनुप्यगत्यानुपी देवगत्यानुपूवी चानि ॥३॥
गा०६४-एला चतुर्दा पिण्णमानमः पणिनाः बामिया । 7-::
भष्टाविंशतिं वर्णयिष्यामि कषिप्यामि ।।९।।
गा०६५-अनुरलपुर. उपधान पर पान पुन जानीहि हार :
मगुरुषटकमिति ।।९५॥
६६-लीलामति, ना ग उलमा ! "
रहित उपोतः ॥९॥
T[ ༦-an-'s:འ1:# – འ::ཝ:g :: སt:: : ས “ལས་
रिधरं भरिभरम् ॥९॥

- कर्मप्रनिः गा०६८-शुभनाम अशुभनाम मुभगनाम दुभंगनाम परनाम सपनाम ना जाया: श्रादेयनाम अनादेयनाम यशकीनिनाम अयशारकीतिमाम निमांणनामाकरना ||१६11 गा०६६ जन्म-बादर-पर्याप्त प्रत्येक शरीर-स्थिर-शुम मुगगगुनार-आय-यानिनिमांगावं. करमिति एताः महादशप्रकृतयः ।।५।। गा० १००--स्थावरं, मूक्ष्म, अपर्याप्तं, माधारणगरी, अस्थिरं, ने, दुभंगं मुरबर, अनादरा श्रयास्कीर्तिः इति स्थावरदशकम् ।।१०।। गा० १०१ - इति नामप्रकृतयः विनवतिः । उपना नि विविध गांजाम गिनं कथितम् । पञ्चविध अन्तरायकर्म 11011 गा० १०२-तथा दानं लागः भागः उपभोगः वीर्यम्, ए अन्नाम:मान पाविधं जगन् । इति सर्वोत्तरप्रकृतयः श्रष्टचत्वारिंशदधिकशतप्रमाः भवन्ति ॥१०॥ गा० १०३-देह अधिनामाविन्यः पञ्च बन्धनानि प यानाः इति अनन्यांदयाः । वर्णचनुष्क अभिन्ने भेदरहितं गृहीने सनि चतस्रः प्रकृयो बन्धोदयाः सन्नि । गगन विना न भयनि म अधिनामाची इत्युच्यते । बन्धश्च उदयश्च बन्धादयाँ, न बन्धादया यासां नाः प्रबन्धादगाः । अपविगतः प्रायः बन्धेऽपि न, उदयंऽपि न सन्ति ।।१०३|| गा० १०४-~-वर्ण-रस-गन्ध-स्पाः चन्यारः चन्चारः एकः सप्त सम्यन्मियानं नवनिपनाः श्रबन्धाः बन्धनानि पञ्च पञ्च मंबाताः सम्यकस्वप्रकृनिमियान्यम् ॥१०॥ गा० १०५-~पञ्च नव दें पड्विंशतिः चतमः क्रमेण सप्तपष्टिः हे पाच नगिना मा बन्ध- प्रकृतयः ।।१०५॥ गा० १०६-पञ्च नव द्वे अष्टाविंशतिः चतस्रः क्रमेण सप्तपष्टिः पिच भणिना का उदय- प्रकृतयः ।।१०६॥ गा० १०७-भेदयन्धे पचवारिंशदधिकं शतम् १४६। अभदवन्धे विंशत्यधिक शतम् १२० । भदोदयं सर्वाः १४८ उदयरूपाः प्रकृतयः । द्वाविंशत्यधिक शतं १२२ अभंदादयं ॥१०७।। गा० १०८क्रमण ६२१२८१४४९३।२।५ एताः सत्ताप्रकृतयः मणिताः ॥१०॥ गा० १०९-केवलज्ञानावरणं दर्शनपटकं--पञ्च निद्रा केबलदर्शनं कपायहादशक-अनं० ४ अप्र० ४ प्रत्या० ४---मिथ्यात्वं च सर्वधाति । सम्यग्मिथ्यात्वं अवन्धे [ सबंधाति ] ||१०९।। गा० ११०-ज्ञानावरणचतुष्क-म० श्रु० अ० म०-त्राणि दर्शनानि सम्यक्त्यप्रकृतिः संचलनं ४ नव नोकपायाः अन्तरायाः ५ [एताः ] १६ देशघातिन्यः ।।१०।। गा० १११-११२-साता त्रीण्यायूं पि उच्चगोत्रं मनुप्यगतिः मनुष्यगत्यानुपूर्वी देवगतिः तदानु- पूर्वी पञ्चेन्द्रियत्वं, शरीराणि पञ्च, बन्धनानि पञ्च, संघाताः पञ्च, अङ्गोपाङ्गानि [वीणि] वर्णचतुष्कं, सम- चतुरस्त्र संस्थानं वज्रर्पमनाराचं उपघातानागुरुपटकं प्रशस्त विहायोगनिः बस हादशक (अस-बादर-पाप्त. प्रत्येकशरीर-स्थिर-शुभ-सुभग-सुस्वरादेय-यशःकीतिनिर्माण-तीर्थ कराणि ) [भेदत] अष्टषष्टिः ६८॥ द्वावस्या रिंशत् यमेदतः शस्ताः पुण्यप्रकृतयः ।।१११-११२॥ गा० ११३-११४ यातानि सवाण्यप्रशस्तान्यवेति तानि सप्तवत्वारिंशत् । नोचैगोत्रं असात- वेदनीणं नरकायुष्यं नरकगति-तदानुपूज्य तिर्यग्गति-तदानुपृध्ये एकेन्द्रियादिचतुतियः न्यग्रोधपरिमण्डला. दिपञ्चसंस्थानानि वज्रनाराचादिपंचसंहननानि अशुमवर्णगन्धरसस्पर्शाः उपघातः अप्रशस्तविहायोगतिः स्थावरदशकम् (स्थावर-सूक्ष्मापर्याप्त साधारणास्थिराशुभ-दुभंग-दुःस्वरानादेयायशः कोत्तयः ) इत्येताः अप्रशस्ताः बन्धोदयाँ प्रति क्रमण भंदविवक्षायामष्टनवतिः शतं च मवन्ति । अभेदविवक्षायां दयशीतिश्चतु. रातिश्च भवन्ति । ११३-११४|| - स्थितिवन्धः .. - गा० ११५-अनन्तानुबन्धिनः सम्यक्त्वं घातयन्ति, अप्रत्याख्यानकपायाः देशचारित्रं बानयन्ति, प्रत्याख्यानकपायाः सकलचारित्रं घातयन्ति, संज्वलनकपाया यथाख्यातान्त्रिं घातयन्ति, तेन गुगनामानी भवन्ति. । अनन्तसंसारकारणत्वात् मिथ्यात्वमनन्तं तद् बदन्तीन्यनन्तानुबन्धिन: । अप्रत्याश्यानं पसंचनः. तं कपन्तीति अप्रत्याख्यानपायाः । प्रत्याख्यानं सकलसंयमः, तं कपन्तीनि प्रन्यान्यानक पायाः । सन् एकीभूय ज्वलन्ति संयमेन सहावस्थानात , संयमो वा ज्वलत्येयु सास्वपीति संचलनाः, न एवं यथा- ख्यातं कपन्तीति संज्वलनकपायाः । एवं शेषनोकपायज्ञानावरणादीन्यप्यन्यथं मंज्ञानि नवन्नि! ||3|| गा० ११६–उदयाभावेऽपि तत्संस्कारकालो वासनाकालः । स च संज्वलनानामन्तहनः प्रया. ख्यानावरणानासेकपक्षः, अप्रत्याख्यानावरणानां पण्मासाः, अनन्तानुबन्धिनां संन्यानमयोऽग्यानभवी:- अनन्तभवो वा भवति नियमेन ||११३॥ गा० ११७-देहादि-सशांन्ताः ५० पञ्चशरीर पञ्चयन्धन-पत्नसंघान-पसंस्थान-ज्योपा:- पटसंहनन-पञ्चवर्ण-द्विगन्ध-पञ्चरस-स्पष्टिकमिति पजागत् , निर्माणं आनपाचोती स्थिरास्थिर-शुभाडाम- प्रत्येक साधारणानि अगुरलधूपघातपरघाताश्चेति द्वापष्टिः पुद्गल विपाकानि भवन्तिः पुद्गले. एव पदां विपाकित्वात् ।।११७॥ गा० ११८-चत्वारि शायूंपि भवधिपार्शनि, चतन्त्र : आनुपर्यः क्षेत्राधिपाकिन्यः, अनिता अष्टसप्ततिः जीवविपाकिन्यः; नरकादि जीवपर्याय निवर्तनहेतुत्वात् ॥११८॥ गा० ११६-वेदनीयद्वयं गोत्रयं घाति सप्तचत्वारिंशत् नाममतविनानिमोनि अमनिजांव. विपाकिन्यः प्रकृतयः ॥११९॥ गा० १२०-तीर्थङ्करं उच्छ्वासः चादर-सूक्ष्म-पर्याप्तापर्याव-स्वरतुःस्वादयानाईन मा. यशःकात्ति-वसस्थायर-प्रशरताप्रशस्तविहायोगति-सुभग-दुभंगानुगतयः प3 जावयति मानि नामप्रकृतयः जीवविपाकिन्यः ॥१२०॥ गा० १२१-चतुर्गतयः पजजातयः उच्छ्यासः विहायोगनि-प्रम-बाबरपर्गलयुगमान गुमन सुस्वरादेय-यशःकीर्तियुगलानि तीर्थकरं चेत्यधवानामसप्तविंशतिः ॥१२॥ गा० १२२-उत्कृष्टः स्थितिबन्धः कोटीकोटिनागरोपमाणि जान-मांगा त्रिंशत् । नाम-गोत्रयोः विंशतिः । मोहनीये सप्ततिः । आयुषि गुलानि पोटीमोतिबिना पमाण्येव जयसिंशत् । पाशुद्ध विशेषणं कोटीकोरिव्ययपदार्थम् ॥३६.॥ गा० १२३-उत्प.धस्थितिबन्धः असातवेदनीय-शान नायरामा पत्-त्रिंशत्कोटीकोटिसागरोपमाणि । सातावेदनीय-बीदेव मनुष्यादि केषु नाम्--- पमाणि । दर्शनमोह-मिप्यात्वे बाधे एक विधवान तन मनिवडामा ! पोटशकपाय चत्वारिंदायोटीकोटिनागरीपमाणि ॥२३॥ गा० ५२४-संस्थान-संहनानां परमरधान-पहननन्य मदE. पमाणि। क्षेपसंस्थान-संहननानां समयसमधान-जपनाम विहीन बोधः। विकलापाली समाचार गा० १२५-६२६-भारतमोर-पर-विनिमय बिसाहिकातपरिर-नीगोंग रचाया गुरा -- स्थिरपसानां विवानिको पोटिलागरोपमाणि : २५ गा० १६७-हारकरपुर-हरेद-निमारमा -:--: सागरोनालि। पानी - म + - कर्मप्रकनिः गा० १२८-मुर-गरकायुपीः प्रायः अभिमायागरापमान नियंगमनुष्यायाः प्रीणि पगार- मानि । श्रयमुत्कृष्टस्थितिबन्ध: संत्रिपयांप्तम्यव, भगंजयमानामगा। गागमन अगं गंगार. कारणस्वादशुमत्यात शुभाशुभकर्मणां नानुगंपिकपशिष्टरमा यध्या १२॥ गा० १२६-आयुगाययनिराशुभागमप्रतानां उमरियाग का पंग गोगा:- पुन: तिर्यट-मनुष्य-देवायुर्वजितसबंप्रकृतिस्थिीनां उग स्थिनिया एयरगंग भनि । नन: गामा जघन्यस्थितिबन्ध उस्कृष्टविशुद्धिपरिणामन भनि । तात्रयम्य गु उगाएं उदिाणामन जयायः तद्विपरीतेन भवति ।। १२९।। गा० १३०-आहारकहिकं तीर्थ दवायुओगि वारि गुम्या ११६ प्रतियोगिनां मिया- रष्टिरेव बन्धको मणिनः । ततुणां तु सम्यग्दृष्टिरेव ।।१३। नत्रापि विशेषमा:- गा० १३१-देवायुः उत्कृष्टस्थितिकं प्रमत्त प्रयाप्रमाणमानाभिमुग्गी यागि; अमनं प. व्युच्छित्तावपि तत्र सातिशये शीघविशुद्धण्येन नदयन्धान , निलिमये न गनुमटासम्मयात । पुनः आहारकद्वयं उत्कृष्टस्थितिकं अप्रमत्तः प्रमत्तगुणस्थानामिमुग्यः मंशिष्ट पर पानि, आयुजयनिताना उत्कृष्टस्थितेः उत्कृष्ट संशेन इन्युनत्यान । तीर्थकर उत्कृष्टनियनिक नागनिगमनामिगुगमनुष्यामयग- सम्यग्दृष्टिरेव वनाति ।।१३।। शेपाणां ११६ उत्कृष्टस्थिति यन्धकमिथ्याष्टीनां गाथाहयेना:- गा० १३२-१३३--नरक-निर्या-मनुष्याऍपि क्रियिकपटकं विकन्लायं मूक्ष्मग्रयं गोकृष्ट स्थिति कानि नराः तिर्यञ्चश्व वनन्ति, औदारिकद्वयं नियंग्योद्योनामाप्राप्तामृपाटिक.मननानि सुर-नारका प्रय, एकन्द्रियातपस्थावराणि पुनः देवाः, शेवदानवति उस्कृष्टमंशिष्टा इंपन्मध्यममंसिष्टान बानुगविताः। उक स्सटिदिबंधपाओग्गअसंखेजलोगपरिणामाणं पलि दोवमस्म अमंग्वेजमागमेत्ताणि याणि कादूण राग्य चरम. खंडस्स उकस्ससंकिलेसो णाम, पढमयंडस्म ईपिसंकिले सो णाम, दोण विच्चालयंटाणं महिमामंकिलेसो णामेत्ति उच्चदि ।।१३२.१३३।। गा० १३४-जधन्यस्थिति यन्धो वेदनीये द्वादश मुहर्ताः, नाम-गोत्रपरिष्टो, शेषपानां नु पुनः एकैकोऽन्तर्मुहर्तः ।।१३४॥ गा० १३५-लोमस्य सूक्ष्मसाम्परायवन्धमप्तदशानां च जघन्य स्थितियन्धः मूलप्रकृतिवद् भवति, क्रोधस्य हौ मासौ, मानस्य एकमासः, मायाया अधमासः, पुवेदस्य भष्टवर्षाणि ॥१३॥ गा० १३६-तीर्थकराहारकहिकयोरन्तःकोटीकोटिसागरोपमाणि । अयं जयन्य स्थितियन्म: सर्वोऽपि क्षपकेषु स्व-स्वबन्धव्युच्छित्तिकाले एवं नियमाद् भवति । तद्यथा-पासा तीर्थकराहारकशरीराहारकाहो- पाङ्गानां बन्धविच्छित्तिस्थानं अष्टमगुणस्थानकपष्ठममागः, तत्र जघन्य स्थितिवन्धः। दशमगुणस्थाने लोमस्य जघन्यस्थितिवन्धः अन्तर्मुहर्तकालः । सूक्ष्मसाम्पराये ज्ञानावरणपञ्चकं ५ शन्तरायपनकं ५ चक्षु. रादिदर्शनचतुष्कं ४ एतासां चतुर्दशप्रकृतीनां अन्तर्मुहर्तकाल: जघन्य स्थितिबन्धः । तथा सूक्ष्मसाम्पराये यशस्कीर्तिच्युरुचगोत्रयोरष्टौ मुहर्ता जवन्यस्थितिबन्धः, सातावेदनीयस्य जघन्यस्थितियन्धः द्वादश मुहर्ताः ॥१३॥ गा० १३७--नर-तियंगायुपोजघन्यस्थितियन्धोऽन्तर्मुहत्तों भवति, सुर-नारकायुपोः दशसहस्र- वर्षाणि ॥१३७॥ गा० १३८-उक्ताभ्यः २९ शेपप्रकृतीनां ६१ मध्ये वैफियिकपटक-मिथ्यात्वरहितानां ८४ जघन्यस्थितिं बादरैकेन्द्रियपर्याप्तः तद्योग्यविशुद्ध एव बध्नाति स्व-स्वोत्कृष्टप्रतिभागेन राशिकविधाने - नेत्यर्थः ।।१३८॥ .

अनुभागबन्ध गा० १३२ केन्द्रिया मिध्यात्वोत्कृष्टस्थिति मेकपागरोपमा बन्न नित, द्वीन्द्रियाः पञ्चविंशतिसागरोर पमाणि, नीन्द्रियाः पञ्चाशःसागरोपमाणि, चतुरिन्द्रियाः शतसागरोपमाणि, अज्ञिनः सहस्रसागरोपमाणि, संझिनः पर्याप्ता एव सप्ततिकोटीकोटिसागरोपमाणि । तज्जवन्यस्तु एकेन्द्रिय-डोन्द्रियादीनां स्व-स्वोत्कृष्टात् पल्यासंख्येय-पल्यसंख्येयभागोनक्रमो भवति ॥१३९॥ गा० १४०-शुभप्रकृतीनां सातादीनां प्रशस्तानां विशुद्धि परिणामेन, अपातायत्रशस्तानां संक्लेश- परिणामेन च तीबानुभागबन्धो भवति । विपरीतेन संक्लेशपरिणामेन प्रशस्तानां विशुद्धिपरिणामन च अप्रशस्तानां च जयन्यानुभागबन्धो भवति ॥१४०॥ गा० १४१.-घातिनां ज्ञान-दर्शनावरण-मोहनौयान्तरायाणां शक्करः स्पर्धमानि लतादा स्थिरौली- पमचतुर्विमागेन तिष्ठन्ति खलु स्फुटम् । तत्र लतामागमादिं कृत्वा दार्वनन्तैकभागपर्यन्तं देशवातिन्यो भवन्ति । तत उपरि दार्वनन्तबहुभागमादि कृया अस्थि-शैलमागेषु सर्वत्र सर्ववातिन्यो भवन्ति ॥१४१॥ गा० १४२-लतामागमादिं कृत्वा दार्वनन्तकभागपर्यन्तानि देशवातिस्पर्धकानि सर्वाणि सम्य. क्त्वप्रकृतिर्भवति, शेषदावनन्त बहुभागेपु अनन्तखण्डोकृतेषु एकखण्डं जात्यन्तरसर्ववातिमिश्रप्रकृतिर्भवति । शेषदावनन्तबहुभागभागाः अस्थि-शिलास्पर्धकानि च सर्ववातिमिथ्यात्वप्रकृतिर्मवति ॥१४२॥ गा० १४३-अधातिनां प्रतिभागाः शक्ति विकल्याः प्रशस्तानां गुड-खण्ड-शर्करामृतसदृशाः खलु स्फुटम् । अप्रशस्तानां निम्ब-काझीर-विष-हालाहलसदृशाः खलु स्फुटम् । सर्वप्रायः १२१। तासु घातिन्यः ४७, अबातिन्यः ७५। एतासु प्रशस्ताः ४२, अप्रशस्ताः ३३, अप्रशस्तवर्णचतुष्कमस्तीति तन्मिलिते ३७ भवन्ति ॥१४३॥ गा० १४४-ध्रुत-तद्वरादिपु अविनयवृत्तिः प्रत्यनीकं प्रतिकूलतेत्यर्थः । ज्ञानविच्छेदकरणमन्तरायः। मनसा वाचा वा प्रशस्तज्ञानदूषणमध्येतृपु क्षुद्रबाधाकरणं वा उपघातः । तत्प्रदोपः तत्वज्ञाने हर्षाभावः । तस्य मोक्षसाधनस्य कीर्तने कृते कस्यचिदनभिव्याहरतोऽन्तःपैशुन्यं वा प्रदोपः । तश्चित्कारणात् जाननपि नास्ति, न वेद्मीति व्यपलपनमप्रसिद्धगुरून पलप्य प्रसिद्धगुरुकथनं वा निवः। काय-बाग्भ्यामननुमननं कायेन वाचा वा परप्रकाश्यज्ञानस्य वर्जनं वेत्यासादना। एतेषु षट्सु सत्सु जीवो ज्ञान-दर्शनावरणद्वयं भूयो बध्नाति-प्रचुरवृत्या स्थित्यनुभागौ वनातीत्यर्थः । ते च षडपि तवयस्य युगपद् बन्धकारणानि तु तथा बन्धात् । अथवा विषयभेदादास्रवभेदः-ज्ञानविषयत्वेन ज्ञानावरणस्य, दर्शनविषयत्वेन दर्शनावरण- . स्येति ॥१४४॥ गा० १४५-तो गतौ कोदयवशाद् भवन्तीति भूताः प्रागिनः, तेप्वनुकम्पा । व्रतानि हिंसादि- विरतिः । योगः समाधिः सम्यक् प्रणिधानमित्यर्थः । तैर्मुकः । क्रोधादिनिवृत्तिलक्षणक्षान्त्या चतुर्विध दानेन पञ्चगुरुमवस्या च सम्पन्नः स जीवः सातं तीवानुमागं भूयो बनाति । तहिपरीतस्ताहगलातं बनाति ॥१५॥ गा० १४६-दुःख-वध-शोक-तापाक्रन्दनं परिदेवनं च आत्मनि स्थितं अन्यस्थितं उभयस्धिन मिति वा असाताया बन्धं करोति ॥१६॥ गा० १४७-योऽर्ह सिद्धचैत्य-तपो-गुरु-श्रुत-धर्म-संघप्रतिकूलः स तदर्शनमोहनीयं वनाति, येनो- दयागतेन जीवोऽनन्तसंसारी स्यात् ॥४७॥ गा० १४८-यः तीव्रकपाय-नोकषायोदययुतः बहुमोहररिणतः राग-द्वेषसंसनः चरित्रगुणविनाशन- शोलः स जीवः कषाय-नोकपायभेदं द्विविधमपि चारित्रमोहनीयं वनाति ॥१४८॥ गा० १४९-यो जीवो मिध्यात्वयुक्तः स्फुटं महारम्भः शील.हिनः, नीमलोमसंयुनः रौद्रपरिणामः पापकारणबुद्धिः स नरकायुः निवनाति ॥१४९॥ १३ कर्मप्रकृति गा० १५०-यो जीव उनागदेशकः सन्मार्गनामकः गमादयः मायो काटी गठशाल मागम तिर्यगायुः बामागि ॥१५॥ गा० १५१--यो जीयः प्रकृया स्वभावन जानुपायः गन्धकमायोदयः दानति: दाने : प्रीतियस्य स एवम्भृतः शीलः संयमन च विहीनः मध्यमगुणयुशः म मनुष्यायुधानि ॥ ?':११ गा० १५२-यः सम्यग्दृष्टिजीवः स कयनं सम्ययायन माझादणुपन: मायायुधानि । यो मिध्याटिजीवः स उपचाराणुवत-महानतः बालापमा कामनि जरया प्रदेवायुधानि ॥ गा० १५३---यो जीयो मनोवचनकायवंशः मायाची गारवत्रयप्रमियदः स नरक-नियंगप्याराम नामकर्म वनाति । तत्प्रतिपक्षपरिणामहि शुभं नामक याति ॥ १५ ॥ गा० १५४-१५७ दर्शनविशुद्धिः विनयसम्माता तथा शीलवनीचार: आमीक्षाानोपयोग: संवेगः शक्तिस्त्याग-तपसी साधुसमाधिः तथैव सातव्यः । अयावृत्यं किया शाकिराचागं गतिः गनुवा- भनिः प्रवचने परमा भनित यावश्यकक्रियाऽपरिहाणिश्च मागंप्रमावना प्रवचनवामान्यमित जानी। एताभिः प्रास्तामिः पादशमावनामिः लिमूले समीपे नार्थकरनामस्म कमभूमिगी मनुष्यः वनाति ॥१५४-१५७।। गा० १५८-तीर्थकरसत्कर्मा जीवः तृतीयमय वा तद्भवे एय स्फुटं मिद गनि । क्षायिकमध्ययी उत्कपण चतुर्थमवे सिन्दयति ॥१५८॥ गा० १५९---योऽहंदादिपु मत्तः, सूत्रेषु गणधरायुक्तागर्मपु पठनानुमनन गुन्दशी श्रदाध्ययनाथ. विचारविनयादिगुणदशी स जीव उगात्रं वनाति । तहिपरीलो नाचत्रिं यमाति ॥ १५२॥ गा० १६०---परात्मनोः निन्दाप्रशंसे, अन्य पां विद्यमानगुणानामाच्छादनं स्वस्याविद्यमानगुणानां उद्भासनं प्रकटीकरणं च नीचगोरबन्धस्यास्त्रबहतयः ॥१६॥ गा० १६१-यः वि.नि-चतुरिन्द्रियादिनाणिवधादिषु स्व-परकृतेषु ग्रीनः, जिनपूजाया सनद्रय. प्राप्तेश्च स्वान्ययोविघ्नकरः स जीयस्तदन्तरायकर्म अजयति यनोदयागतेन यदीप्सितं तस लमते ॥१६॥ जीवः पुनः इति श्रीनेमिचन्द्रसिद्धान्तिविरचितकर्मप्रकृतिग्रन्थः समाप्तः ।

पण्डित श्री हेमराज विरचित हिन्दी टीकासहित कर्मप्रकृति पणमिय सिरसा णेमिं गुणरयणविहूसणं महावीरं । सम्मत्तरयणणिलयं पयडिसमुक्त्तिणं वोच्छं ॥१॥ अहं नेमिचन्द्राचार्यः प्रकृतीनां समुत्कीर्तनं वक्ष्ये-मैं जो हूँ नेमिचन्द्र आचार्य सो कर्म- निकी प्रकृति नि वर्णन करूँगा। किं कृत्वा ? क्या करके ? नेमिं प्रणम्य नेमिनाथं तीर्थंकर नमस्कृत्य-नेमिनाथ नामके जो बाईसवें तीर्थंकर हैं, उन्हें प्रणाम करके । कथंभूतं नेमि गुणरत्न- विभूषणं अनन्तज्ञानादिगुणास्तान्येव विभूषणानि यस्य-कैले हैं नेमिनाथ ? अनन्तज्ञानादि जो गुण वे ही हैं आभूषण जिनके ऐसे हैं। पुनः किंभूतम् ? बहुरि कैसे हैं ? महावीरं महा- सुभटम्-महावीर कहिए महासुभट हैं । पुनः किंभूतम् ? बहुरि कैसे हैं ? सम्यक्त्वरत्ननिलयं स्थानम्-सम्यक्त्वरूप रत्नके निलय कहिए स्थान हैं। प्रकृतिशब्देन किमिति प्रश्नः, तत्रोच्यते--प्रकृति कहा कहिए यह आगेकी गाथामें दिखावे हैं-- पयडी सील सहावो जीवंगाणं अणाइसंबंधो। कणयोवले मलं वा ताणत्थित्तं सयं सिद्धं ॥२॥ प्रकृतिः शीलः स्वभाव एते शब्दात्रयं एकार्थवाचकाः सन्ति--प्रकृति शोल अरु स्वभाव ये जो तीनों शब्द हैं सो एक ही अर्थकू कहै हैं । स्वभावो हि स्वभाववन्तं अपेक्षते । स्वभावः प्रकृतिः स्वभाववन्तं जीवं इच्छति--स्वभाव जो है सो स्वभावधानकी अपेक्षा करें है सो प्रकृतिनाम स्वभावको है, वह स्वभाववान् जीवकी अपेक्षा करै है। अत्र कनित्प्रश्नः करोति जोवः शुद्धश्चैतन्यः पुद्गलपिण्डस्तु जडः एतयोयोः पृथक्-पृथक् लक्षणं वर्तते । एतौ द्वौ जीव- पुद्गलौ तस्मिन् कुतः मिलितौ ? यहाँ कोई शिष्य प्रश्न करे कि जीव तो शुद्धचैतन्यरूप है, अरु पुद्गलपिण्ड जड अचेतन है। जब इन दोनोंके लक्षण भिन्न-भिन्न हैं, तब ये दोनों परस्पर कैसे मिले हैं ? तत्र प्रश्नोत्तरमुच्यते-जीवाङ्गयोः सम्बन्धः अनादिः-ऊपर के प्रश्नका उत्तर कहिए है कि जीव और पुद्गलका सम्बन्ध अनादि है। एवं न वाच्यं जीव-पुद्गलौ प्रथमतः भिन्नौ भिन्नौ, पश्चात् मिलितौ। ऐसा नाही कि जीव अरु पुद्गल पहले भिन्न-भिन्न थे, पाठे आपसमें मिले हैं। कस्मिन् कयोरिव ? कनकोपलयोर्मलवत्-यथा एकस्मिन् पापाणे स्वर्णो- पलौ सार्धमेवोत्पद्यते । पुनः सार्धमेव द्वयोर्मध्ये मलस्तिष्ठति । जैसे एक स्वर्णपाषाणमें सोना अन् पापाण दोनों साथ-साथ ही मिलि रहे हैं, ऐसा नाही कि सोना पहले खानिवि था, पाछे आय. कर पापाणरूपमल मिलि गया होय । अत्र कश्चिद् वदति-जीवकर्मगोऽस्तित्वं कथं ज्ञातम् ? तस्योत्तरं दीयते-इहाँ कोई प्रश्न करै है कि जीव अरु कर्मका अस्तित्व कैसे जानिए है. ताका उत्तर कहैं हैं-नयोरस्तित्वं स्वतः सिद्धम् ? केन ? प्रान्तेन-एक दरिद्रः एकः श्रीमान इनि दृश्यते-जीव अरु कर्मका अस्तित्व स्वतः सिद्ध है। किस ट्रान्त करि ? जो कोई एक पुन्प । . १०० कर्मप्रति दरिद्र देखिए है अझ कोई एक श्रीमान देखिप है, ताने जीव अझ फगानीका अग्निन्य सिद्ध होय है । अहमिति प्रतीत्या आत्मनः अस्तित्वं प्रकटोभवनि । यदि आमा पदार्थ एव न भवेग तर्हि अहमिति ज्ञानमेव न स्यान , तस्गादात्मनोऽग्नित्वं विष्टयेव । आ. काि में है इम प्रतीति करि आत्माका अस्तित्व प्रगट सिद्ध होय है। यदि आत्मा नामका माई पदाथ ही न होय तो 'अहं इस प्रकारका ज्ञान ही न होय । नान आत्माका अस्तित्व मिला। देहोदएण सहिओ जीयो आहरदि कम्म-णीकम्मं । पडिसमयं सव्यंगं तत्तायसपिंडओ ब जलं ||३|| देहोदयेन सहितः जोबः, देवाः पञ्च औदारिक वैक्रियिकाहारक जाम-कामणापागुद- येन प्रतिसमयं सर्वाङ्गः कर्म नोकर्म आकर्षति । देह जो शरीरनामा नागकम मा पंच प्रकार है- औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तेजस, अरु कार्मणक, भद करि । मो तिनके अय करि सहित जो यह जीव है सो प्रतिसमय अपने सर्व आत्म-प्रदेशनिकर कर्म अस नाकाको ग्रहण कर है। किंवन् ? तप्तायःपिण्डं जलवन । यथा तमलोहः सर्वाणि जलमाकपनि तथा जीवः देशोदयेन कर्म आकर्षति । जैसे अगनिविर्षे खूब तपाया जो लोहका पिण्ड मो सागकरि जलको ग्वींचे है तैसे ही शरीर नाम कर्मके उदय करि यह जीव सर्व आत्म-प्रदेशनिकारि कर्मको अपने भीतर आकर्पित करें है। समय-समय जीवोऽयं [ कियन्ति ] कर्माण्याकर्पतीनि प्रश्नः, नत्रोच्यते-समय-समय वि यह जीव कितनेक कर्मनित आकर्षित करें इस प्रश्नका उत्तर दीजिए है. सिद्धाणंतिमभागं अभवसिद्धादर्णतगुणमेव । समयपबद्धं बंधदि जोगवसादो दु विसरित्थं ॥४॥ सिद्धानन्तिमभागं सिद्धराशरनन्तिमभाग:-सिद्धजीवनिका जो प्रमाण है, उनके अनन्तवें भागप्रमाण कर्मप्रदेशनिक यह जीव एक समयवि बांध है। पुनः अभव्य सिद्धा. दनन्तगुणमेव-अभव्यराशेरनन्तगुणम् । बहुरि अभव्य जीवनिका जो प्रमाण है, तिननं अनन्तगुणे कर्मप्रदेशनिकू एक समयवि बांधे है। एतासां वर्गणानां समयप्रवद्ध बन्नाति-इतनी प्रमाण वर्गणानिके समुद्रायरूप समयप्रवद्धको बांधे है। पुनः किंभूनं समयप्रबद्धम् ? विसदृशं आयुर्वजितसप्तकर्मजातिवर्गणासंयुक्तं बध्नाति । बहुरि कैसे समयप्रबद्धको बांधे है ? विसदृश भी समयप्रबद्धको बांधे है। जो समय प्रबद्ध बांधे है तिनि विघं आयुकर्म-रहित शेप जो सात कर्म-जातीय जो वर्गणा है तिनिकरि संयुक्त बांधे है । कस्मात ? योगवसात मनवचनकाय- योगात्-कैसे वांधे है ? योग जो मन वचन काय तिसके वशि करि यह जीव कर्मवर्गणानि– बांधे है। भावार्थ-जितनी कछु संसारमें अभध्यराशि है, तिसको जो अनन्तगुणा कीजे, ता सिद्धराशिको अनन्तमा भाग होय । अरु जो सिद्धराशिके अनन्तवें भागको अनन्तमा भाग करिए तो अभव्य राशि होय । तिसते सिद्धराशिके अनन्तवें भाग अझ अभव्यसिद्धते अनन्त- गुणा ए दोऊ गिनती समान है। इस गिनती समान जो वर्गणा मिले तो एक समयप्रबद्ध कहिए। ऐसे समयप्रबद्धको समय-समयवि संसारी जीव निरन्तर बांधे है मन वचन काय इन तीनों योगके उदयतें। इहां कोई प्रश्न करे है के सिद्धराशिके अनन्तमें भाग अरु अभव्यराशिके अनन्तगुणें , प्रकृतिसमुत्कीर्तन १०१ ए दोऊ गिनती समान है, तो दोनों बात गाथामें क्यों न कही ?. ताको समाधान-संसारतें ज्यों-ज्यों जीव मुक्त होंय, त्यों-त्यों सिद्धराशि बढ़ती जाय हैं, त्यों ही सिद्धराशिको अनन्तमा भाग बरे है, तातें सिद्धराशिको अनन्तमां भाग एक अनन्तता करि निश्चित नाही है, उत्कृष्ट होत जात है । अरु यह संसार में जो है अभव्यराशि सो ज्योंकी-त्यों रहै है । जातें इसमें कळू बढ़ती-घटती नाहीं हैं, तातें इसकी अनन्तगुणी अनन्तता निश्चित है, तातें यह ठीकता जाननी । अभव्यराशिको अनन्तगुणें करें तें जो अनन्तता होय, ताही प्रमाण वर्गणाको जघन्य समयप्रबह जानना। या गिनतीका अनन्ततातें समयप्रबद्धकी जघन्यताकी मर्यादा हैं । या जघन्य समयप्रबद्धवर्गणाकी अनन्ततातें आगे भूत भविष्यत् वर्तमानकालकी अपेक्षाकरि सिद्धके अनन्तवें भाग जितने अपने अनन्ते भेद लिये हैं जघन्य उत्कृष्ट मध्यम अनन्तताके भेदकरि तितने ही भेद समयप्रबद्धके अनन्तता करि जानना। तातें अभव्यराशि अनन्त- गुणप्रमाण वर्गणानिको जघन्य समयप्रबद्ध, अरु भविष्यत् कालकी अपेक्षा उत्कृष्ट सिद्ध- राशिके अनन्तिम भागप्रमाण वर्गणानिको उत्कृष्ट समयप्रबद्ध है । मध्यमके अनन्ते भेदकरि मध्यम अनन्त जानना । समयप्रवद्धकी अनन्तताके दिखायवेकू ए दोऊ गिनती गाथामें कही। समये समये कति निर्जरा भवति पुनः कति सत्ता तिष्ठति जीवस्य, तदेवोच्यते गाथया । जीवके प्रतिसमय कितनी निर्जरा होय और कितनी सत्ता रहे यह बात आगेकी गाथामें दिखाइए है- जीरदि समयपबद्धं पओगदो गसमयबद्धं वा । गुणहाणीण दिवढे समयपबद्धं हवे सत्तं ॥१॥ अयं संसारी जीवः एकस्मिन् समये एक समयप्रवद्धं सदा कालं निर्जरयति-यह जो है संसारी जीव सो एक-एक समयविर्षे एक-एक समयप्रबद्ध सदा काल निर्जरै है । प्रयोगतः एकस्मिन् समये अनेकसमयप्रवद्धं निर्जरयति-प्रयोग कहिए मन वचन कायकी चंचलताकी वृद्भिते उदीरणावश एक समयमें अनेक समयप्रबद्धनिकू निर्जर हैं । अग्रेऽर्धगाथायां कथयति- एवं सत्ता कियती तिष्ठति ? आगे आधी गाथामें कहै हैं कि इस प्रकार सत्ता कितनी रहै है ? तत्रोच्यते-द्वयर्धगुणहानिमात्रं समयप्रबद्धं सत्त्वं भवेत्-द्वयर्धगुणहानिमात्रसमवप्रवद्धस्य सत्ता जीवः करोति-यह जीव डेढ़ गुण हानिप्रमाण . समयप्रबद्धनिकी सत्ताकू सदा धारण - . करे है। , औदारिक वैक्रियिक आहारक इनकी नाना गुणहानिको काल अन्तर्नुहूर्त है । तेजस कार्मणको नाना गुणहानिका काल पल्यको असंख्यातमो भाग जानियो । सबकी गुणहानिको काल एक समय है । औदारिक शरीरकी स्थिति तीन पल्य, वैक्रियिककी तेतीस सागर. आहा- रककी अन्तर्मुहूर्त, तैजसकी छयासठ सागर, कार्मणकी उत्कृष्ट स्थिति सामान्यताकरि सत्तर कोड़ाकोड़ी । विशेषकरि ज्ञानावरणादिककी जुड़ी जानिबी। जिस कर्मकी जितनी स्थिति है. तिस माफिक नाना गुणहानि अर्ध अरु गुणहानि हो है । द्वयर्धगुणहानिको अर्थ कहियतु हैं- जो कर्म अनन्तवर्गणाके पुंजकरि समयप्रबद्भप बंध्यो, सो एक नानागुणहानिवि आधो- आधो होय खिरे है । जितनी नाना गुणहानि हैं, ताहीतें इहको नाम द्वयर्धगुणहानि कहिए । द्वि कहिए दोय, तिसको अर्धगुण कहिए आधा सो हानि कहिए ये घाटि होई । जिननी नाना- गुणहानि हैं तिनि विपें खिरे है, यह द्वयर्धगुणहानिको अर्थ है । नाना गुणहानिको अर्थ कहिः - १०२ খানি है-नाना कहिए अनेक प्रकारको गुणानि जा गि, गो नाना गुण मि.दि। गग. हानि कहा कहिए ? जो पहिले-पहिले समयानं अगल-अगले समाधान निर वर्गणा घाटि विर; सो गुणहानि कहिए। एक कम बिनिती अगर पानी नानागानि जाने नानागुणहानिको काल एक समय । अन्नान अन पायो अगंगा भाग असंख्याते समय है नातं असंन्यान। जानी। आग हो अथ अंगमारनामनगानी गरि सिद्धान्तप्रमाण प्रकट लिग्यिा -एक मोहनीयकर्गक वायपर महरि हिमा निसकी भाँति सब ऊपर जानियह। मोहकमकी स्थिति सत्तर मग निमी स्थापना अबाधाकाल छोड़िके अडनालीम १८ मगयो । अमरगानी नानागणनिको मा ६ नानागुणहानि कल्पिा । एक-एक नानागुणानिविणं आठ-आठ गुणाः नि माना की। मोहनीयकर्गकी अनन्तवर्गणाक समयबद्धकी कल्पना टिन ६:०० मा माग स्थापना कीज समझने के बारते । पहिली गुणहानिविणे वनीमग ३००, नगंगा बि । दम- विप्र १६०० तीसरीविप ८०० चीथीविप ४०० पांगवीयि २८ जटीय १.८ ममानि नानागुणहानि प्रति आधा-आधा कम हाय विर है, या गुणानि । यी नाना- गुणहानिविप बत्तीमसै वर्गणा किस भाँनि खिरें, या बात कहा- एक नाना गुणहानिवि आट गुणहानि । निनमें भिन्न-भिन्न किसीमकाय विर हैं, तिन सबको जोड़ अत्तीससे ही हैं। साई कहिए --पहिली गुणनिधि १० पान, बारह खिरें। आगे-आगे गुणहानिवि वलीम अलीम किमी होय बि-१८०११४८1१1 ३८४१३५२५३२०१२८८। पहिली नानागुणहानिवि सम भाँनि । गुणनि-गुणानिधि आठ समयमें खिरे हैं। दूसरी गुणहानिवि १६०० सोहलमै ग्विर । मावि पुनि बाट गुण- हानि है। नहां पुनि भिन्न-भिन्न किमी होय खिर है। पहिली गुणानिधि -विर है। आगे गुणहानिविपं सोलह-सोलह वर्गणा घटावणी ।२४०१२२४२०८1१1१७६११६०।१४। इस भाँतिसो अनुक्रम जानियो। तीसरी नानागुणहानिवि ८०० बिर है। निमकी आठ गुण- हानिवि पहिले १२८ एकसौ आठवीस खिरें । पीठे आठ-आठ घटायने ।१२०।११२११०४।९.६ ८1८०७२। इस भाँति चौथी नानागुणहानिविय ४०० विरें। निनकी आठगुणहानिविय पहिले ६४ चौसट खिरें । पीछे चार-चार घटावने १६०५५६१५.२१८८१४४|४-१३६ पांचवीं नाना- गुणहानिवि २०० खिरौं । तिनको आठ गुणहानिविर्ष पहिले ३२ खिरें। पीछे दाय-दीय पटायने ३०१२८।२६।२४।२२।२०।१८। इस भाँति छठी नानागुणहानिमें सौ १०० खिरे हैं । निसकी आठ गुणहानिवि पहिले सोलह १६ खिरें। आगे एक-एक घटावन १५।१४।१३।१२।१११०३०. इम भाँति सर्वकर्मकी त्रेस ठिसै वर्गणा छह स्थानकवि आठ-आठ अन्तर भेद लिये अड़तालीम समयकी थितिनिवि मोहनीयकर्म अवाधाकाल विना पहिले समयन लेगरि खिरें। इस ही भाँति और कर्मकी भी वर्गणा निर्झर हैं । इस ही भाँति सिद्धान्त विपं कही है जीवक समय- प्रबद्धकी द्वयर्धगुणहानि मात्र सत्ता सदाकाल है। जितनी वर्गणा अनीनकाल पहिली-पहिली नानागुणहानिवि रस लेकरि तिनत आधी-आधी वर्गणा वर्तमानकी नानागुणहानिविप रहे -- १. भापा-वचनिकाकारने पांचवों गाथाका स्पष्टीकरण करते हुए जो तुछ लिखा है, उससे बात होता है कि उन्हें गुणहानि और नानागुणहानिका अर्थ स्पष्ट नहीं हो पाया था। परिणामस्वरूप उन्होंने निपेयको गुणहानि और एक गुणहानिको नानागुणहानि पदका प्रयोग किया है। इसी प्रकार द्वयर्धगुणहानि शब्दक अर्थ करनेमें विपर्यास हुआ है । इसलिए यह पूरा विवेचन विचारणीय हो गया है। इन दोनों गाथाओंका आगमा- नुकूल स्पष्टीकरण पांचवों गाथाके विशेपार्थमें संक्षेपसे कर दिया गया है।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन
इस वास्ते द्वयर्धगुणहानिमात्रसत्ता सदा रहे है। आगे इसको सामान्य न लिखिए है ।
विशेप त्रिकोणयन्त्र है।
२८८ .
१४४
७२
३६
६
३२०
१६०
८०
४०.
१०
३५२
१७६ .
८८
.
२२
१२
३८४
१९२
४८
२४
१२
४१६
२०६
१०४
५२
१३
४४८
२२४
११२
५६
२८
१४
४८०
२४०
१२०
६०
३०
१५
५१२
२५६
१२८
६४
३२
१६
?
ता
सो भाव
सो कर्म के प्रकार है, आगे यह कहे हैं-
कम्मत्तणेण एकं दव्वं भावो त्ति होइ दुविहं खु ।
पुग्गलपिंडो दव्वं तस्सत्ती भावकम्मं तु ॥६॥
तत्कर्म कर्मत्वेन एकम् । कया जात्यपेक्षया। पुनः तदेव कर्म द्रव्य-भावभेदेन द्विविधं
भवेत् । बहुरि सोई कर्म द्रव्य-भाव भेद करि दोइ प्रकार है । द्रव्यकर्म कहा कहिए ? पुद्गल-
पिण्ड ज्ञानावरणादि अष्ट प्रकार कर्मजातिकी वर्गणाओंका पिण्ड सो द्रव्यकर्म कहिए । भावकर्म
कहा कहिए ? तु पुनः तच्छक्तिः भावकर्म। तस्य ज्ञानावरणादिकर्मकी जु है शक्ति सुख-
दुःखादिककी देनवाली सो भावकर्म कहिए । जैसे मिश्री तो द्रव्य है । ता मिश्रीविपें जु है
मिश्नत्व मिष्टशक्ति सो भाव है । अरु जैसे निम्ब द्रव्य है, निम्बविपें जु है
जुह कटुकता
है । तैसे जु है पुद्गलपिण्ड द्रव्यकर्म तिसका जु है शक्ति सुख-दुःखकी उपजावनहारी शक्ति
सो भाव कहिए।
तं पुण अट्टविहं वा अडदालसयं असंखलोगं वा ।
ताणं पुण घादि त्ति य.अघादि ति य होति सण्णाओ॥७॥
पुनः तत्कर्म अष्टविधम् । बहुरि सो कर्म आठ प्रकार है। वा अडदालसयं अष्टचत्वा-
रिंशत् । अथवा सोई कम एक सौ अड़तालीस प्रकार है । अथवा असंख्यात लोकप्रमाण है।
तेपा मध्ये पुनः कानिचित् घातिसंज्ञा, कानिचित् अघातिसंज्ञा भवन्ति । तिन कर्महुके मध्य
केई कर्म घातिया है, केई अघातिया है।
आगे यद्यपि असंख्यातलोकमात्रं कहिए असंख्यातलोकममाण कर्नहु की जाति है,
तथापि अष्ट मूलप्रकृति तावत् कहिए है--
णाणस्स-दसणस्स य आवरणं वेयणीय मोहणीयं ।
आउगं णामं गोदंतरायमिदि अट्ठ पयडीओ ॥८॥

१०१ कर्गप्रकृति नानावरणी १ दर्शनावरणी २ बेदनी ३ मोहनी ४ आगु . नाग ६ गोत्र अनगम अष्ट मूलप्रकृति जानवी। आगे इन मूल प्रकृतिहमके के घानिया के अघानिया ते को- आवरण मोहविग्धं घादी जीवगुणघादत्तादो । आउगं णामं गोदं वेदणीयं तह अघादि ति ।।६।। आवरण-मोह-विनानि घानिकर्माणि भवन्ति । ज्ञानावरण, वागावरण, मागीय, अन्तराय ए चारि कर्म घातिया जानने । काहे न ? जीवगुणवाननन्यान । जाने नारि कर्म जीवके गुणहको घाते हैं, नातं वातिया कहिप है। नया आयुनर्नाम गोयं वेदनीय मानि- कर्माणि भवन्ति । तैसे ही आयु नाम गोत्र वेदनी पचारि प्रकृति अगानिया । इहां कोई वितर्क करें है--जीवगुणहको तो आठों की बात है. इनमें नारिवानियामा भेद क्यों करो हो ? ताकी उत्तर-के जीवके अनन्त हमें चारि गुण प्रधान. अननसान अनन्तदर्शन अनन्त सुख अनन्नवीर्य इन चारि गुगहु को जिसने आदिक वे चारि कर्म आच्छाद हैं, तिसत घातिया कहिए है । प्रधान गुण के घाननन, जान ए नारि गुण आमांक स्वरूपको प्रगट करि दिखाये हैं, नात ए चारि गुण प्रधान है । अन आयु नाम गोत्र वेदनी ए चारि कर्म वैसे प्रधानहूको नहीं आच्छाद है तात अघानिया कहिए, जाग अनयनतुष्टय. विराजमान शुद्ध सर्वज केवलीविप ए चारि कर्म जली जेवगैयन पाए. नाने प्रभान गुणहुको नाही आच्छाद है। अन जो प्रधान गुणहुको आच्छादन होते तो कंवलजानांक अनन्तचतुष्टय गुण प्रगट न होन देते। इस वास्त आयु नाम गोत्र वेदनीय प नारिकम अघातिया कहिए। अथ घानिया कर्महुके अन क्षयोपशमनं जे गुण प्रगट हा है ते कहें है- कंवलणाणं दसणमणंतविरियं च खड़यसम्मं च । खड्यगुणे मदियादी खओवसमिये य घादी दु॥१०॥ केवलज्ञानं केवलदर्शनं अनन्तवीर्य क्षायिकसम्यक्त्वं च एते क्षायिकगुणाः । केवलान केवलदर्शन अनन्तवीर्य क्षायिकसम्यक्त्व च शब्दतें क्षायिकचारित्र दानादि चारि इन [ नी] क्षायिक भावके घात होए घानियाकर्म । इन चारि घातियाकर्मके क्षयनं कवलनान केबल- दर्शन अनन्तवीर्य क्षायिकसम्यक्त्व क्षायिवचारित्र दानादि चारि गुण उपजे हैं। ज्ञाना- वरणकर्मके गयेते अनन्तज्ञान, दर्शनावरणकर्म गये अनन्तदर्शन, अन्तरायके गवने दानादि पंच [ लब्धियां ] मोहनीके गये क्षायिकसम्यक्त्व क्षायिकचारित्र प्रगट हाहि, यह वास्ते ए अनन्तज्ञानादि नव गुण क्षायिक कहे हैं। मत्यादयः क्षायोपशमिकगुणाः । अउर इन पाति- कर्महुके क्षयोपशमतें मति आदिक गुण प्रगट होहि । काहे ते ? घातनत्वात् । जातै सर्वाग ही निराबरण नाहीं, बाते भी हैं, तातें क्षयोपशमगुण कहिए । ज्ञानावरणकर्मक क्षयोपशमते मति। श्रुत, अवधि, मनःपर्यय ए गुण प्रगटै हैं। दर्शनावरण-क्षयोपशमतें चक्षु अचक्षु अवधि- दर्शन हो है। अन्तरायके क्षयोपशमतें किंचित् पंच दानादि हो है । मोहनीयके क्षयोपशमन क्षायिक बिना अष्ट सम्यक्त्व चारित्रादि गुण होहि । एमति आदिक गुण याहीतें क्षयो- पामरूप हैं। - . ।

Phot । प्रकृतिसमुत्कीर्तन १०५ अथ चारि अघातिया कर्महूके मध्य आयुकमंके स्वरूप क्यों कहै हैं- कम्मकयमोहवड्डियसंसारम्हि य अणादि जुत्तम्हि । जीवस्स अवट्ठाणं करेदि आऊ हलिव्य णरं ॥११॥ कर्मकृतमोहवर्धितसंसारे आयुः जीवस्य अवस्थानं करोति । कर्महु करि कय कीयहु जो मोह तिस करि बढ्यो जु संसार तिस विपै जीकी स्थितिको आयुकर्म करै है। कैसा है संसार ? अनादिजुत्तम्हि । अनादिकालथै चल्यौ आयो है। आयुकर्म संसारविषै किस दृष्टान्तकरि स्थिति करै है ? यथा हलिः नरस्य अवस्थानं करोति । जैसे हडिविपै पाँव दिए संते हडि पुरुषको स्थितिको करै है, तैसे ही आयुकर्म स्थिति करै है । भावार्थ-यह जु है अनादि संसार, सो बढ़े तो है मोहादिक कर्महु करि, परन्तु इस को कारण एक आयु ही कर्म जानना । जातें जिस गतिविपै यह जीव जाय है तिस गति विपै जितनी आयुकर्मकी स्थिति है, तितने कालताई सुख-दुखको भोक्ता है। अथ नामकर्मके स्वरूपको कहै हैं- गदिआदिजीवभेदं देहादी पोग्गलाण मेयं च । गदि-अंतरपरिणमणं करेदि णामं अणेयविहं ।।१२।। इदं नामकर्म गत्यादिजीवभेदान् अनेकविधान् करोति । यह जु है नामकर्म सो अनेक प्रकार गति आदि जीवके पर्यायभेद करै है । तु पुनः देहादिपुद्गलभेदान् करोति । बहुरि यह नामकर्म अनेक प्रकार देहादिक जु है पुद्गलके भेद तिनकौं करै है । पुनः गत्यन्तरपरि- णमनम् । बहुरि यह नामकर्म गतितै अउर गतिके परिणमनको करें। तात्पर्य यह-इस नामकर्मकी तिराणवै प्रकृति है, तिनमें केई एक प्रकृति जीव- विपाकी हैं, केई एक पुद्गलविपाकी हैं, केई क्षेत्रविपाकी हैं। जे जीवविपाकी प्रकृति हैं, ते अनेक प्रकार गति आदिक जीवके भेदकौं करै हैं । अरु जे पुद्गलविपाकी है ते औदारिकादि- शरीर संस्थान संहननादिक अनेक प्रकार करै है। अरु जे क्षेत्रविपाको हैं चारि आनुपूर्वी ते गतिके परिणामकौं करै हैं । अथ गोत्रकर्मके स्वरूपकों कहै हैं- संताणकमेणागय जीवायरणस्स गोदमिदि सण्णा । उच्चं णीचं चरणं उच्चं णीचं हवे गोदं ॥१३॥ सन्तानक्रमेणागतजीवाचरणस्य गोत्रं इति संज्ञा। सन्तानक्रमकरिके चली आयी है जीवका आचरण, तिसको गोत्र जैसा नाम कहिए है । यदुच्चं चरणं भवेत् तदुच्चं गोत्रम्, यन्नीचं चरणं तच्च नीचं गोत्रम् । अथ वेदनीयकर्मके स्वरूपकौं कहै हैं- अक्खाणं अणुभवणं वेयणीयं सुहसरूवयं सादं। दुक्खसरूवमसादं तं वेदयदीदि वेयणीयं ॥१४॥ अक्षाणां चद् अनुभवनं तद् वेदनीयम् । समत इन्द्रियहुका जु है प्रत्यक्ष आस्वाद लो वेदनीय कहिए । सो दुविध प्रकार है । यद् इन्द्रियाणां सुखरूपं तत्तानं गुडादिचतुर्भवम् । .

१०६ कामप्रति यत्तु दुःखरूपं तद् असानं निम्बादिवच्चतुर्भदा । मुम्ब-ग्य वेदनानिवदनीगा। जागा- दुःखहु की जुबलि करि शुक्लाव है, मो वेदनीयकग करिए। भावार्थ-यह वेदनीयकर्ग माना अमाना भेद हरिदाय प्रकार गो आरगी विपाक अवस्था विर्षे जीवको इन्द्रियद्वार करि बन बलकार मुग्य-गुणकी को। अथ सामान्यता करि जीवक दर्शनादि गुण को - अत्थं देक्खिय जाणदि पच्छा सदहदि सत्तभंगीहि । इदि दंसणं च गाणं सम्मत् हुँति जीवगुणा ॥१५॥ अयं संमारी जीवः अर्थ हटा जानाति । यह जो नंगारी जीव प्रथम पदार्थको देखे है, पाछे जाणे है कि यह अगुको पदार्थ है, अर उसके गुणकी जान है । पश्चात गम भङ्गीभिः श्रदधाति । पाछे सप्तभंगी वाणी करि उस पदार्थकी श्रद्धा करे । उनि ल्या पानं ज्ञानं सम्यक्त्वं च जीवगुणा भवन्ति । इस करि या जानिए है कि अर्थ का देवनानी दान- गुण करि है, जानना ज्ञानगुणन (ज्ञानगुणकरि ) । इसते पतीनी जीवपदार्थक गुण । अथ सप्तभंगी.वाणीके नाम कह है.- सिय अत्थि पत्थि उभयं अव्यत्तव्यं पुणो वि तत्तिदयं । दव्वं खु सत्तभंगं आदेसबसेण संभव दि ॥१६॥ खु द्रव्यं सप्तभङ्गं सम्भवति स्यु स्फुटम , प्रगट द्रव्य जु है मो मन माम मत भंग प्रकार जा विपैं ऐसा है । काहे करि ? आदशवर्शन आदेश जुद पूर्वानार्यनिका कथन नाक वाकरि जु द्रव्य है सो वचन-विलासकरि मात प्रकार साधिए है । जात मान प्रकार मानने. द्रव्य का यथार्थ ज्ञान होइ है। ते सप्तभंग कौन हैं ? स्यादम्नि नाम्नि उभय अवयं पुनरपि नत्रि- तयम् । स्यात् शब्द सात ही जागै लगाइ लेना । स्यात् अम्ति १ स्यान नाम्नि २ स्यादस्ति- नास्ति ३ स्यादवक्तव्यम् ४ पुनरपि तत्रितयम् । बहुरि तेई पूर्वोक्त नीनी अवनय संयुक्त जानने । स्यादस्ति-अवनव्यं ५ स्यान्नास्ति-अवक्तव्यं ६ स्यादस्ति नास्ति-अवत्तळ्यम जप सप्त भंग जानने । आगे इन सप्त भंगनिकरि द्रव्यका स्वरूप साधिप है-स्यादस्तिस्यात् कहिए कथंचित् प्रकार अपने द्रव्य क्षेत्र काल भावकरि अस्ति द्रव्य है जो वस्तु सो तो द्रव्य कहिए । जो द्रव्य-अवगाहना सो क्षेत्र २ । जो द्रव्य-पर्यायकी कालमर्यादा सो काल । जो व्यका स्वरूप सो भाव ४। जो द्रव्य है सो अपने स्वरूपको इक चतुष्टयकरि धार है, तात स्वचतुष्टयकी अपेक्षा द्रव्यका अस्तित्व कह्या । जैसे स्वचतुष्टयकरि घटका अस्तित्व है १ । स्यात् नास्ति- कथंचित् प्रकार पर-चतुष्टयको अपेक्षा नास्ति द्रव्य नाहीं । जैसे पट-चतुष्टयकरि घट नाहीं। जो पटस्वरूपकरि घट नास्ति घट न होइ, तो घट-पट एक ही वस्तु होइ । सो प्रत्यक्ष प्रमाण यो ती नाहीं। तातें पर-स्वरूपकरि जु द्रव्यविप नास्ति स्वभाव है सो परतें द्रव्यके भिन्न- स्वरूपको साधै है । यातें कथंचित् प्रकार द्रव्य नास्ति कह्या २ । स्यादस्ति-नास्ति-स्यात् का एक प्रकार अपने-परके चतुष्टयकी अपेक्षाकरि 'अस्तिनास्ति' द्रव्य है, नाही, ऐसा कहिए । यद्यपि द्रव्य एक ही काल अस्तिनास्ति है, तथापि जब वचनकरि अस्तिनास्ति ऐसा कहिए. तब कामसों कह्या जाइ है । जातें धचन-उच्चार क्रमतें, एक काल नाहीं । यातें कथंचित् प्रकार द्रव्य अस्ति- नास्ति कडा ३ स्यादवक्तव्यम- स्यात् कथंचित् प्रकार एक ही वार द्रव्य अस्तिनास्ति ऐसा अव- क्तव्यं कह्या जात नाहीं। जब द्रव्यकौं अस्तिनास्ति ऐसा कहिए तब जिस काल अरित कहिए तय नास्ति उच्चार नाहीं । यातें वचन-विलास करि वस्तु-स्वरूप सिद्ध नाही, वस्तु एक ही काल अस्ति- - प्रकृतिसमुत्कीर्तन १०७ नास्ति-स्वरूप है, तातें एक ही बार द्रव्य अस्ति ऐसा अवक्तव्य है ४ । स्यादस्ति अवक्तव्यम्- स्यात् कथंचित् प्रकार अपने चतुष्टयकरि एक ही बार अपने परके चतुष्टयकी अस्तिनास्तिता अस्ति द्रव्य अस्तिवंत है, पर अवक्तव्यं अवक्तव्य है । यद्यपि अपने चतुष्टयकरि द्रव्य अस्ति है, तथापि जब द्रव्य अस्ति ऐसा कहिए. तब 'अस्ति' इस एकान्त वचनकरि 'नास्ति' की अभाव होइ है । द्रव्यका अस्तिनास्तिस्वरूप है, यात द्रव्य अस्ति ऐसा अवक्तव्य है । अरु यद्यपि एक ही काल अपने परके चतुष्टयकी अस्तिनास्तिकरि अस्तिवन्त है, तथापि एक ही बार अस्तिनास्तिकरि अस्तिवन्त है. द्रव्य जैसा अवक्तव्य है, जाते वचन-विलास क्रमवान् है । जु कोई पूछै कि अपनी अस्तिताकरि तो द्रव्य अस्तिवन्त है, परकी नास्तिता करि अस्तिवन्त क्यों संभवै ? -जैसे पटकी नास्तिताकरि घटको अस्तित्व है, जो घट विर्षे पटरूप नाहीं, तो घटका अस्तित्व है। जो पट विपैं घट होइ तो घट-पट एक ही वस्तु होइ ? यात परकी नास्तिताकरि अस्तिवन्त द्रव्य कहा। इस ही तें करि अगलैं व्याख्यानमें भी परचतुष्टयकरि द्रव्य अस्ति जानना। तातै अपने चतुष्टयकरि अपेक्षा एकान्तताकरि अरु एक ही बार अपने परके अस्ति- नास्तित्वकरि द्रव्य अस्ति ऐसा वक्तव्य है, स्यात् नास्ति अवक्तव्यं स्यात् कथंचित् प्रकार परके चतुष्टयकरि अरु एक ही अपने परके चतुष्टयकी अस्तिताकरि नास्ति द्रव्यं-द्रव्य नास्तिवन्त है, पर अवक्तव्यं अवक्तव्य है । यद्यपि परस्वरूपकरि द्रव्य नास्ति है, तथापि जब नास्ति ऐसा कहिए, तव वचन एकान्तता करि अस्तिस्वभावका अभाव हो है। तातें द्रव्य नास्ति ऐसा अवक्तव्य है । अरु यद्यपि एक ही काल अपने परके स्वरूपकी अस्ति-नास्तिताकरि द्रव्य नास्ति- वन्त है, तथापि एक ही बार अस्तिनास्तिता करि नास्ति ऐसा अवक्तव्य है। यहाँ कोई पूछ कि परकी नास्तिताकरि तो नास्ति द्रव्य है, अपने अस्तिताकरि नास्तिवन्त क्यों बने ? जैसे घट अपनी अस्तिताकरि नास्ति है जो घट विपैं अपने स्वरूपका अस्तित्व है तो घटवि- पटका अभाव है । अरु जो घटविर्षे अस्तित्व न होय तो पटस्वरूपकरि घट नास्ति ऐसा न होय । चातें अपनी अस्तिताकरि द्रव्य नास्ति जानना। इस ही नयकरि अगलं व्याख्यानमें भी अपने चतुष्टयकरि द्रव्य नास्ति जानना, तातै परचतुष्टयकी अपेक्षा एकान्तताकरि अरु एक ही बार अपने परके चतुष्टयकी अस्ति-नास्तिताकरि द्रव्य नास्ति ऐसा अवक्तव्य है ६ । स्यात् अस्ति- नास्ति अवक्तव्यं स्यात् कथंचित् प्रकार अपने चतुष्टयकरि अरु पर के चतुष्टयकरि अम् एक ही वार अपने परके चतुष्टयकी अस्ति नास्तिताकरि अस्तिताकरि अस्ति, नास्तिताकरि नास्ति द्रव्य अस्तिनास्तिवन्त है। पर अवक्तव्यं अवक्तव्य है। यद्यपि अपने स्वरूपकरि द्रव्य अस्ति- नास्ति है, तथापि जब अपने स्वरूपकरि अस्तिनास्ति ऐसा कहिए तय एकान्त वचनतें पर स्वरूपकरि अस्तिनास्तिका अभाव है। यातें अपने स्वरूपकरि द्रव्य अस्ति नास्ति अवक्तव्य है। अरु यद्यपि पर स्वरूपकरि द्रव्य अस्ति नास्ति है, तथापि जब पर स्वरूपकरि द्रव्य अस्ति- नास्ति ऐसा कहिए है ते एकान्त वचनतें पर स्वरूपकरि अस्तिनास्तिका अभाव है। यातें पर स्वरूपकरि द्रव्य अस्तिनास्ति ऐसा अवक्तव्य है। अरु यद्यपि एक ही काल अपने परक स्वरूपकी अस्तिनास्तिताकरि द्रव्य अस्तिनास्ति है, तथापि जब अपने परके स्वरूप अस्ति- नास्ति ऐसा कहिए, तब एक ही बार अपने परके स्वरूपकी अस्तिनास्तिता करि व्य अस्ति- नास्ति ऐसा अवक्तव्य है । तातें अपने स्वरूपकी अपेक्षा एकान्तता करि अन पर स्वरूपकी अपेक्षा एकान्तता करि, अरु एक ही बार अपने पर स्वरूपकी अस्तिनास्तिना करिव्य अस्तिनास्ति ऐसा अवक्तव्य है ७। यह सप्तभंगी वाणीका व्याख्यान परडव्यकी अपेक्षा जानना। अरु एई सप्तभंग द्रव्य-पर्यायकी अपेक्षा एक द्रव्यमें साधे हैं-जैसे सुवर्ण अपने पर्यायकी अपेक्षा सप्तभंगरूप है। जो समय नुवर्ण कंकणपर्याय धारी है नव कंका द्रव्य %3D १०८ कामशनि है, यावत प्रमाण कंकण सो क्षेत्र है. कंकणकी जुकाल-मयांदा गोमा जानका स्वरूप सी भाव है। इस कंकणपर्यायकः चतुष्टयकी अपेक्षा गुवर्ण अनि । अझ यही सुवर्ण कुण्डलपर्यायके चतुष्टयकी अपेक्षा नामि। गाही भांति पनि प्रकारको ना सप्तभंग सुवर्णविर्षे अपने पर्यायी अपेक्षा जानना । यो अपने-अपने पर्यायही अपेक्षा सप्तभंगात्मक सय द्रव्य सधैं हैं। जाने द्रव्य उत्पाद व्यय धीय गंयुक, ना गमभंग पर्यायको अपेक्षा है। आगे पई मतभंग संक्षेपना करि काग-2 । नाही नाही ३। है नाही अवतव्य ४ा है करि है, में नाहीं करि पर अयालय है ५ । नाई र नाही. नाही कार नाही, पर अवतव्य ६ । करि नाही कार नाही ना करत नाही, पर अवक्तव्य है ७ । द्रव्य ऐसा जानना । जैसे एक ही पुम्प पिनाकी अपेक्षा पुai पुत्री अपेक्षा पिता है । अरु वही पुन्य मामाकी अपेक्षा भानिजा, भानिजामी अपेक्षा मामा है, वहिनकी अपेक्षा भाई है, स्त्रीको अपेक्षा भत्ता है. इत्यादि अनेर. अपेक्षाकरि वा पुरुप अनेक रूप है, तैसे ही द्रव्य सतभंगात्मक जानना । अथ शिष्य प्रश्न कर है- ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनाय मोनीय आयु नाम गोत्र अन्तराय एसा जु है पिछली गाथामें पाठकम करो नु फाहकों, और ही भांनि सो आगे. पोछे ए कर्म कह होत ताकी गुरु उत्तर करचो आगिली गाथामें- अभरिहिदादु पुव्यं णाणं तत्तो दु दंसणं होदि । सम्मत्तमदा विरियं जीवाजीवगदमिदि चरिमे ॥१७॥ अस्यार्थः-अभ्यहिनान पूर्व ज्ञानं जीवके समस्त गुण में मानगुण बड़ा . पृज्य है, तिसतं पूर्व ही कहा। ततः दर्शनं भवति तिसत उत्तरि दान गुण प्रधान है, तान ज्ञानक पीछे दर्शनगुण कह्या । अतः सम्यक्त्वं तिसत उतरि सम्यक्त्व गुण प्रधान है, निसने दर्शन के आगे सन्यक्त्वगुण कह्या । चरमे जीवाजीवगतं वीर्य पठितम जाने वीर्यगुण जीवमें भी पाइए है अरु अजीवमें भी पाइए, ताते वीर्यगुण सबने अन्तमें कया । जिस भाँनि यह अनन्त चतुष्टयको पाठक्रम कह्या, तिस ही भाँति घाति यहुको पाठक्रम जानना । जाने अनन्त चतुष्टयको ए चारि घातियाकर्म पाते हैं। जैसे प्रधान गुणहुको जो-जो घाति याकर्म घात है तेसा-तैसा प्रधानत्व धादियाकर्महुमें जानना । सबमें ज्ञानगुण प्रधान है किसके आच्छा- दनतं प्रथम ही ज्ञानावरणी कर्म कह्या । तिसने दर्शनावरणी, निसन मोहनीय, तिसत अन्तराय । इन चारि धातियहुको पाठक्रम जानना । अथ शिष्य कहे है कि अन्तरायकर्म आठहु कर्म के वि अघातियहुके अन्तराख्या, सु किस वास्ते ? चाहिए तो वातियहुको अन्त ? ताको उत्तर आचार्य कह हैं- पादिवि अघादि वा णिस्सेसं घादणे असक्कादो। णामतियणिमित्तादो विग्धं पठिदं अघादिचरिमम्हि ॥१८॥ अन्तरायकर्म घात्यपि अघातिवद् ज्ञातव्यम्, अन्तरायकर्म यद्यपि घातिया है, तथापि अघातिया सो है । काहे ने ? निःशेपजीवगुणघातने अशक्यत्वात् । समस्त ही जीवके गुणको घातनेको असमर्थ है । जाते याकी पंचप्रकृति देशघाति है। पुनः नामविकनिमित्ततः बहुरि नाम गोत्र वेदनीय इन तीन्यों कर्महुको निमित्त पायकरि उदय होय है। अतः विघ्नं अघाति- चरमे पठितम इसते अन्तरायकर्म अघातिकर्महुके अन्त पढ़िए है । M प्रकृतिसमुत्कीर्तन १०६ भावार्थ--यह जु है अन्तरायकर्म सो नाम गोत्र वेदनीय इनके अनुसारे वल अरु होनताको धरै है। जैसे कुछ साता-असाताको उदय होय तिस माफिक अन्तरायकर्म अपने चलको करै है। इसतें अन्तरायकर्म हीन है तिसते अन्तरायकर्म नाम गोत्रके अन्त कह्यौ। अथ नामकर्मके पूर्व आयुकर्म कह्यो, अरु गोत्रकमकै पूर्व नामकर्म कह्यो, सु किस वास्ते ? सु इसका समाधान कहे हैं- आउनलेण अवविदि भवस्स इदि णाममाउपुव्वं तु । भवमस्सिय णीचुचं इदि गोदं णामपुव्वं तु ॥१६॥ आयुर्वलेन भवस्य अवस्थितिः नामकर्मके उदयतें उत्पन्न भये जु हैं गति इन्द्रिय शरीरादि पर्याय तिनकी स्थितिको कारण है एक आयुकर्म इति कृत्वा आयु:पूर्वकं नाम इस वास्ते नामकर्मके पूर्व आयुकर्म कह्यौ । जातें नामकर्मकी स्थिति आयुकर्मके बलकरि है । तु पुनः भवमाश्रित्य नीचत्वम् उच्चत्वं गोत्रम् इति हेतोः नामकर्मपूर्वकं गोत्रकर्म भवति । बहुरि नामके उदय उत्पन्न भई जु है गति तिसको आश्रय लेकर नीच-ऊँच गोत्र होय है। जो नोचगति होय तो नीचगोत्र होइ, अरु जो ऊँचगति देवगत्यादिक की होय तो ऊंच ही गोत्र होइहै। इस कारणतें गोत्रकर्मके पूर्व नामकर्म कह्यौ । अथ घातियाकर्महुके मध्य मोहनीयकर्मके ऊपर वेदनीय अवातिया कह्यो, सु किस वास्ते ? इसको समाधान कहै हैं- घादिं व वेयणीयं मोहस्स चलेण घाददे जीवं । इदि घादीणं मज्झे मोहम्सादिम्हि पठिदं तु ॥२०॥ घातिवद्वेदनीयं- घातियासो वेदनीयकर्म है, यद्यपि अघातिया है । काहेत ? मोहस्य वलेन जीवं घातयति-जिसते मोहनीयकर्म के बलकरि जीवको साता-असाताके निमित्त इन्द्रिय-विषयके चलकरि जीवको घात है। इति हेतोः घातिकर्मणां मध्ये मोहस्य आदी पठितम्-इस कारण वेदनीयकर्म घातियाकर्मनिके मध्य मोहनीयकी आदि पढ़िये है। भावार्थ--यह जु बताई इस मोहकर्मको उदय हेतु बताई साता-असातारूप वेदनीय- कर्म बल करै है, जाते रति-अरतिके उदय सुख-दुःख यह जीव मानै है; ताने मोहके अधीन है तिसते घातियासा कहिए है । इस बास्ते घोतियहुके मध्य मोहनीयके पूर्व यो वेदनीय कर्म कहो। - अथ गाथाके ऊपर इन आठ कर्मको पाठक्रम कहैं हैं- णाणस्स देसणस्स य आवरणं वेयणीय मोहणियं । आउग णामं गोदंतरायमिदि पठिदमिदि सिद्धं ॥२१॥ ज्ञानावरण दर्शनावरण वेदनीय मोहनीय आयु नाम गोत्र अन्तराय यह पूर्व ही पक्ष्या था जो पाठक्रम सो पूर्वोक्त प्रकार करि सिद्ध हुआ। अथ बन्धको स्वरूप कहे हैं- जीवपएसेक्केरके कम्मपएसा हु अंतपरिहीणा । होति घणनिविडभूओ संबंधो होइ णायचो ।।२२।।

११० कर्मप्रति एकैकस्मिन् जीयप्रदेश कर्मप्रदेशाः अन्तपरिहाना भवति। - जीवन प्रदेशानिय कर्म के प्रदेश अन्ततं रहित है। भावार्थ-यह संसारविय जीव अनन्त है। एक-एक जीधर अगंगान प्रदेश निन एक-एक प्रदेशविर्षे अनन्त-अनन्त कर्गहुँके प्रदेश जानने । तगां जीवसदनाना बनिविड- भूतः सम्बन्धः ज्ञातव्यः । तिन जीव पुदगलंय प्रदेशात का जाना अयन सवा निविद अनि दृढ़ लोहके मुद्गरसा जु सम्यक प्रकारकरि बन्ध तिमको नामबन्ध मानिना। अथ यहु बन्ध कहान है अम इस बन्धक उदय हान संत कयाहार गोक- अस्थि अणाईभूवो बंधी जीवस्स विविहकम्मेण । तस्सोदएण जायइ भायो पुण राय-दोसमी ॥२३॥ अस्य जीवस्य विविधकर्मणा सह अनादिनः बन्धः अस्ति-इस गंगा जीवके आठ प्रकार कर्महुनें अनादिकालवि उत्पन्न हुआ यह पूर्व ही का जो बन्ध मो यावतकाला। पुनस्तस्योदयेन रागद्वेपमयः भाव उत्पद्यते-बहुरि निस बन्धक उदयकार गगगगय भाव परिणाम उपजे हैं। भावार्थ-यहु इस जीवकै अनादि सन्तानवी आट कमका जो बन्ध में तिसका जब उदय हो है तब यह जीव संसारके समस्त इष्ट अनिष्ट पदार्थको मानना संता राग- द्वेपरूप परिणामको करें है । ऐसे परिणाम भावकर्म कहिए । अथ इनि राग-द्वेप परिणामके होन संते जो हो सो को- भावेण तेण पुणरवि अण्णे बहु पुग्गला हु लग्गति । जह तुप्पियगत्तस्स य णिविडा रेणुव्य लग्गति ॥२४॥ पुनरपि तेन भावेन अन्ये बहवः पुद्गलाः लगन्ति~यहुरि निस गग-पमय परिणाम- करि और बहुत कार्मण वर्गणा लागे हैं जीवको सर्वांग ही। किस दृष्टान्तकरि लागें है ? यथा तुप्पियगात्रस्य निविडा रेणवः लगन्ति । जैसे घृतलेपि गात्रयों निविड नवन धूलि लाग है। भावार्थ-यहु जब यह जीव इष्ट-अनिष्ट संसारीक भावहाविप राग-द्वेपरूप परिणम है तब इस जीवकै सर्वांग प्रदेशहुवि अनेक वर्गणा लाग हैं। जैसे स्निग्ध गात्रको धूलि अति सघन लागै है तैसे राग-द्वेपरूप स्निग्ध परिणामकरि विलिप्त आत्माके अत्यन्त सघन कर्मरूप धूलि लागें है। इहाँ कोई प्रश्न करै है कि जब यह आत्मा राग-द्वेषरूप परिणम है, तब इसके कहाँत कर्म आइ लगैं हैं ? ताको उत्तर-कि इस तीन्यों लोकवि सर्व प्रदेशाविप कार्मणवर्गणा अनन्तानन्त हैं । जिस जागै यह आत्मा जैसे गठास लिए राग-द्वेपरूप परिणमै है ताहीते तिस गठासमाफिक आत्माके कर्मधूलि लागे है । अथ एक समयवि जीवके बन्ध हुआ संता के प्रकार होइ परिणमै है, यह कहै हैं- एकसमएण बद्धं कम्म जीवेण सत्तभेएहिं । परिणमइ आउकम्मं बंधं भूयाउसेसेहिं ॥२५॥ जीवेन एकस्मिन् समये यत् कर्म प्रबद्धं तत्सप्तभेदैः परिणमति--इस जोबने एक समय विज कर्म वाँधा है सो सात प्रकार होय परिणमै है ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन १११ भावार्थ :-यहु जीव जब यह बन्ध करै एक समयविपें तब एक ही समय प्रबद्धका वन्ध करै। परन्तु वही समयप्रबद्ध जीवकै प्रदेशहु सेती बंधा सातकर्मरूप परिणमै है । जाते इस जीवकै संसारविचं समय-समय सातकर्म बन्ध-योग्य परिणाम सदा रहै हैं, तातें सात जातिका बन्ध करै है। जैसे एक अन्न आहाऱ्या संतै रस रुधिर मास चर्वी अस्थि मज्जा शुक्र इन सात धातुरूप होइ परिणमै है। जाते पंचेन्द्रिय औदारिक शरीरमें सात धातु परिणमनकी योग्यता है, तातै परिणमै है । तैसे यह कर्म सात जाति होइ परिणमै है ज्ञाना- वरणी आदि सप्त आयुकर्म बिना। पुनः यत् आयुःकर्म तत् भुक्तायुः शेषेण । बहुरि जो आयुकर्मको बन्ध है सो भुज्यमान जु है आयु तिसके त्रिभागकरिके जानना। भावार्थ :-यह जु जितनी जिस जीवके वर्तमान एक पर्याय मिश्रित आयु है तिस आयुके तीसरे मागविपें आयुबन्ध जानना। अरु जो तीसरे भागवि न होइ तो तीसरेके तीसरे भागमें होइ । अरु जो इहाँ भी न होइ तो इसके तीन भाग करिए। इस ही भाँति नव वार तीन-तीन भाग करि अन्त मरणसमय अवश्य आयुबन्ध होइ । अथ बन्ध के प्रकार है सो कहै हैं- सो बंधो चउमेशो णायव्यो होदि सुत्तणि द्दिवो । पयडि-द्विदि-अणुभाग-पएसबंधो पुरा कहिओ ॥२६॥ चतुर्भेदः बन्धः पुरा कथितः सूत्रनिर्दिष्टः । पूर्व ही जो बन्ध सो चार प्रकार कह्या । कौन-कौन ? प्रकृतिवन्ध, स्थितिवन्ध, अनुभागबन्ध, प्रदेशवन्ध यहु चार प्रकार बन्ध जानना। प्रकृतिः परिणामः स्यात् स्थितिः कालावधारणम् । अनुभागो रसो ज्ञेयः प्रदेशो दलसञ्चयः ।। प्रकृति कहिए स्वभाव परिणाम जिस कर्मका जु स्वभाव सु प्रकृति कहिए । जु ज्ञानका आच्छादनत्व सु ज्ञानावरण कर्मका स्वभाव है। दर्शनका आच्छादन सु दर्शना- वरणका स्वभाव है इस भाँति सब कर्महुका स्वभाव जानना। योगनिकी तीव्रता-मन्दताकरि जु तीव्र-मन्द स्वभाव लिए कर्मका वन्ध सो प्रकृतिबन्ध कहिए । कपायको तीत्र-मन्दताकरि उत्कृष्ट मध्यम जघन्यरूप कालकी मर्यादा लिए बन्ध होइ सु स्थिति कहिए । कपायकी तोत्र-मन्दता अनेक भेद लिए जु अपने रस लिए बन्ध होइ सो अनुभागबन्ध कहिए । योगनिके अनुसारे तीत्र-मन्दता रूप करि तीव्र मन्दरूप होइ आत्माके प्रदेशनिसों एकमेक होइ जु-जु कर्म ही की पुंज बंधे सो प्रदेशबन्ध कहिए । एक-एक बन्धके असंन्याते असंख्याते भेद हैं तीव्र-मन्दताकरि, जातें कपाय योगनिका भी असंख्यात जातिका परिणमन है । अथ इन आठ कर्महुको दृष्टान्त पडपडिहारसिमज्जाहडिचित्तकुलालभंडयारीणं । जह एदेसिं भावा तह विह कम्मा मुणेयवा ॥२७॥ यथा पट-प्रतीहार-असि-मच-हलि-[चित्रक-] कुलाल-भाण्डारिकाणां एतेषां भावाः तथैव कर्माणि ज्ञातव्यानि यथाक्रमम् । जैसे पट वस्त्र. प्रतीहार दरवान, अलि खङ्गा, नव

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११२
कप्रकृति
सुरा, हलि खड़ो, चित्रक चितेग, उल्लाल कुम्हार, भागचागार्ग मंदागन मालों का जमा
परिणमन है तैसा ही अनुराग आठ काका परिणगन जानना ।
भावार्थ :-नानगावृणानीनि ज्ञानावरणीया-मानको जी आला गोशानावरणीय
कर्म कहिए । तिसका स्वभाव ज्ञान-आच्छादनाव है। फिम समानकारि ? जग देवनाक
मुख ऊपरि वन डारन प्रतिमा आच्छादित न मानावगणकाम ज्ञानगुण को जान्दादि ।
दर्शनमावृणोतोनि दर्शनावरणीयम-जो दानगुणको आच्छाद मा दर्शनानाणीयकम करिए।
तिसको प्रकृति दर्शन आच्छादनना। किस दृष्टान्तकरि ? जमा द्वारि बैठा प्रतीहार राजाक
दर्शनको न होन देइ, तैसे दर्शनावरणीयकर्ग दर्शनगुणको प्रगट हान नहीं दः। दयनानि
वेदनीयम-जो सुख-दुःखको जणावं सो वेदनीय कहिए। निमका स्वभाव मुम-ग्य उम्पादक।
कैसे ? जैसे शहद लपेटी खाँ की धार चाटन प्रथम ही मिष्ट अस पार जीभको का,
तैसे वेदनीयकर्म जानना । मोहयतीनि मोहनीयम-जी जीवको गो गो गोहनीय कर्म करिए।
तिसका स्वभाव मोहोत्पादक है। जैसे-गदा-धत्तुर गदनकोदयवा जग मा पोए मने अन
धत्तूरा माचन कोदोंके खाए मंते जीव अत्यन्न विकला. नैसे मोहनीय कर्म का उदय
जानना। भवधारणाय एति गच्छनीत्यायुः पर्याय स्थिनिको जो प्राप्त होमो आयुकर्म
कहिए । तिसका स्वभाव जीव पर्यायको स्थिति कर है। कैसे ? जंगे माफल सापगध पुरुपकी
स्थितिको करै है, तैसे आयुकर्म जानना । नाना मिनोनीति नाम अनेक प्रकार गन्यादि रचनाको
जो करै सो नामकर्म कहिए । तिसका स्वभाव अनेक प्रकार करणय । कैसे ? चित्रकारवन ।
जैसे चितेरा अनेक प्रकार रचना रचे नैसे नामकर्म जानना । उन्नं नीचं गमयतीनि गोत्रम
ऊँचे-नीचे गोत्रवि जो जीवको ले जाई सो गोत्रकर्म कहिए। निसका स्वभाव ऊँच नीच
प्रापकत्व । कैसे ? जैसे कुम्हार घट-हंडादि करण विपं समर्थ तैसे गोत्रकर्म जानना । दातृ-पात्र.
योरन्तरमेतीत्यन्तरायः । दाताके देते संते अरु पात्रके लेते जो विश्न करें जैसे अन्तराय
कर्म जानना।
अथ इन आठ कर्मप्रकृतिहू की जु है. उत्तरप्रकृति तिनकी संख्या की है. अग मूलप्रकृति
हू का स्वभाव-
णाणावरणं कम्मं पंचविहं होइ सुत्तणिहिट्ठ।
जह पडिमोवरि खित्त कप्पडयं छादयं होई ॥२८॥
ज्ञानावरणं कर्म सूत्रनिर्दिष्टं पञ्चविधं भवति-ज्ञानावरणकर्म सूत्रवि कह्या पंच प्रकार
सो किस दृष्टान्तकरि है. ? यथा प्रतिमोपरि क्षिप्तं कर्पटक छादकं भवति । जैसे प्रतिमा ऊपर
डारा हुआ वस्त्र आच्छादक है तैसे ज्ञानावरणीय कर्म जानना।
दसण-आवरणं पुण जह पडिहारो हु णिवदुवारम्मि ।
तं णवविहं पउत्तं फुडत्थवाईहि सुत्तम्मि ॥२६||
यथा नृपद्वारे प्रतीहारः तथा दर्शनावरणीयं कर्म [वस्तुदर्शननिषेधको भवति] जैसे
राजाके द्वारपर वैठा प्रतीहार राजाके दर्शन नाहीं करण देह तैसे दर्शनावरणीयकर्म पदार्थ-
दर्शनका निपेधक जानना। तत् नवविध स्फुटार्थवाग्भिः सूत्रे प्रोक्तम् सोई दर्शनावरणीयकर्म
सिद्धान्त विपें गणधरदेवहूने नव प्रकार कह्या है ।
महुलित्तखग्गसरिसं दुविहं पुण होइ वेयणीयं तु ।
सायासायविभिण्णं सुह दुक्खं देइ जीवस्स ॥३०॥

प्रकृतिसमुत्कीर्तन ११३ पुनः वेदनीयं द्विविधम् बहुरि वेदनीयकम दोय प्रकार है। कैसा है वेदनीयकर्म ? मधुलिप्तखड्गसदृशम् शहद करि लपेटा जैस खड्ग तैसा है। बहुरि कैसा है ? सातासातवि- भिन्नम् साताअसाता ऐसे हैं दो भेद जिसके। तु तद्वेदनीयं कर्म जीवस्य सुख-दुःखं ददाति । बहुरि वह वेदनीयकर्म जीवको सुख-दुःख देइ है । मोहेइ मोहणीयं जह मयिरा अहव कोद्दया पुरिसं । तं अडवीसविभिण्णं गायव्यं जिगुवदेसेण ॥३१॥ यथा मदिरा पुरुपं मोहयति तथा मोहनीयं कर्म पुरुपं मोहयति जैसे मदिरा पुरुषको मोहित करै, तैसे ही मोहनीयकर्म पुरुपको मोहै है। तथा जैसे मदनकोद्रया पुरुपं मोहयन्ति माचन कोदों मूच्छित करै हैं, उसी प्रकार मोहनीयकर्म जीवको मूञ्छित करै है । तत् मोह- नीयं कर्म अष्टाविंशतिभेदभिन्नं जिनोपदेशेन ज्ञातव्यम् वह मोहनीयकर्म जिन भगवान के उप- देशते अट्ठाईस भेद रूप जानना। आऊ चउप्पयारं णारय-तिरिञ्छ-मणुय-सुरगड़गं । हडिखित्त पुरिससरिसं जीवे भवधारणसमत्थं ॥३२॥ नारक-तिर्यङ्-मनुष्य-सुरगतिकं आयुःकर्म चतुःप्रकारम् । नरकगति तिथंचगति मनुष्य- गति देवगति इनको प्राप्तवारो जो है आयुक में जानना। सो आयुकर्म कैसा है ? हलिक्षिप्त- पुरुपसदृशम् जैसे हलि खेड़ा हो पुरुप तैसा है । बहुरि कैसा है ? जीवानां भवधारणे समर्थम जीवहुको पर्याय स्थिति करनेको समथे है । चित्तपडं व विचित्तं णाणाणामे णिवत्तणं णामं । तेयाणवदी गणियं गइ-जाइ-सरीर-आईयं ॥३३॥ गति-जाति-शरीरादिकं त्रिनवतिगणितं नामकर्म विचित्रं भवति । मति जाति झरीरादि प्रकृतिहु करिके तिरानवै प्रकार गिना जु है नामकर्म सो नाना प्रकार जानना । किंवत् ? चित्रपटवत् । जैसे अनेक चित्रकरि मण्डितवस्त्र तैसा है नामकर्म । नाना नामनिवतर्क पूर्ण गोदं कुलालसरिसं णीचुच्चकुलेसुपायणे दच्छं । घडरंजणाइकरणे कुंभायारो जहा णिउणो ॥३४॥ गोत्रं कर्म कुलालसदृशं वर्तते गोत्रकर्म कुम्हारसरीखा है। पुनः कथम्भूतम् ? नीचोन- कुलेषु उत्पादने दक्षम् । नीच ऊँच कुलवि उपजावनेको दक्ष प्रवीण है। घटरखनादिकरणेषु यथा कुम्भकारः घट अरु कूल्हड़ी आदिलेय करिवेवि जैसे कुंभकार निपुण है, तैसे गोत्रकर्म नीचोच्चेपु निपुणः नीच ऊँच कुलवि4 उपजावनेको निपुण है । जह भंडयारि पुरुसो धणं णिवारेइ राइणा दिण्णं । तह अंतरायपणगं णिवारयं होड़ लद्धीणं ॥३॥ यथा भाण्डागारिकः पुरुपः राज्ञा दत्तं धनं निवारयति तथा अन्तरायपद्धकं लब्धीनां निवारकं भवति । जैसे भंडारी पुरुप राजाने दिया जो द्रव्य तिसको नाहीं दे है. तथा नेरे अन्तरायपंचक दानादि पाँच लब्धियोंका निवारण कर है ।

कर्मप्रति ११४ अथ उत्तरप्रकृतिका टोक कोई है- पंच णव दोणि अठ्ठावीसं चउरो कमेण नेणबदी । ते उत्तरं सयं वा दुग पणगं उत्तरा होति ॥३६॥ ज्ञानावरणीयकी ५ दर्शनावरणीयकी वेदनीयकी २ गोहनीयकी २८ बायकी नामकी ६३ वै हैं अरु एकसी तीन १०३ भी जाननी । गोत्रकी २ नारायसी सानी गय नरपनि हैं आठ कर्महुकी। अथ पांच प्रकार ज्ञानावरणीयक कानेके वास्ते प्रथम ही पंग प्रकार मानक म्यम्पको आचार्य कहे हैं। जात पंच प्रकार नानक कहे बिना जानावणीका साप नाही जाना जाय है तान ताहि कहिप है- अहिमुहणियमिययोहणमाभिणियोहियमणिदि-इंदियज । बहुआदि-ओग्गहादिय कयछत्तीसतिसयमयं ॥३७|| अभिमुख नियमितबोधनं आभिनिरोधकं भवनि, जो पदार्थ स्थल । अयमान है, अझ इन्द्रियग्रहणयोग्य प्रदेशविपं प्रवत्त है सो पदार्थ अभिमुग्य काहिए। अझ जो पदार्थ निश्चित है. इस इन्द्रियग्रहणयोग्य यह है इस भांनि ठीक किया है जो पदार्थ निमका नाम नियमित कहिए । इस अभिमुग्य अझ नियमित पदार्थका जाननेवाला निम्ना नाग आभि- नियोधक मतिज्ञान कहिए है । यह मनिज्ञान स्थूल वर्तमान योग्य प्रदेवाविपं स्थित निश्चित पदार्थको जान है जातं यह मतिज्ञान अनिन्दियेन्द्रियजं अनिन्द्रिय कहिए मन भरपंच स्पर्शनादि इन्द्रिय तिनकरि उत्पन्न है पदार्थ स्पर्शनादि इन्द्रिय करि स्कुल पदार्थ जानिए है। परन्तु स्थूल पदार्थ भी तब जानिए है जो वर्तमान होइ है। यो नाही कि भूत भविष्यकालके स्थूलपदार्थ प्रत्यक्ष जानिए है । अरु स्थूल वर्तमान भी पदार्थ नब जानिए है जो इन्द्रियग्रहण योग्य स्थूलविष होहि । यो नाही कि स्थूल वर्तमान मेरु पर्वतादिक दूर निष्टांहे है. यो पदार्थ अरु पटलहुकरि आच्छादित नरक पदाथ ते प्रत्यक्ष जानिए है। अझ स्थूल वनमान इन्द्रिय- ग्रहणयोग्य स्थूलवियें भी तब पदार्थ जानै जाइ है जो पदार्थ निश्चित हो है कि इस इन्द्रिगके हणको योग्य यह अर्थ है । यो नाही कि श्रवण इन्द्रिय ग्रहणयोग्य शब्दको नेत्र इन्द्रिय ग्रह है, अम जिह्वा इन्द्रिय ग्रहणयोग्य रसको श्रवण ग्रह है। जो जिस इन्द्रिय ग्रहणयोग्य पदार्थ होइ तिस ही इन्द्रियकरि अहिए तो स्पर्शनादि इन्द्रियहुकरि पदार्थ जाने जाय है। तात यह सिद्धान्त सिद्ध हुआ के इन्द्रियाधीन मतिज्ञान है । बहुरि मनिज्ञान कैसा है ? बबादि-अवग्रहादिककृत पत्रिंशत्रिशतभेदम् बहुआदिक बारह १२ जु भेद अझ अवग्रहादि चार ४ तिनकरि किए हैं तीन से छत्तीस भेद जिसके। भावार्थ-इस मतिज्ञानके तीन से छत्तीस भेद हैं, ते समस्त प्रगट आगे कहिए है- अवग्रह १ ईहा २ अवाय ३धारणा ४ । अवग्रह कहा कहिए ? पदार्थ अस इन्द्रिय इन दोनोंके संयोग हुए संते पदार्थ-दर्शन हो है। तिसके पीछे जो पदार्थको कछुक ग्रहण तिसको नाम अवग्रह कहिए । जैसे-दूरतें नेत्रकरि अहिएके यह जु कछु पदार्थ देखिए है सो श्वेत है ऐसा जु ग्रहण सो अवग्रह है। ईहा कहा कहिए ? ;जो पदार्थ अवग्रहकरि जान्यो है तिसकी जु विशेष जानिवेकी इच्छा सो ईहा कहिए। जैसे यह श्वेतरूप कहा है ? चकहुकी पंकति है कि धुजा है ऐसा जो ग्रहण सो ईहा । अवाय कहा कहिए ? जो पदार्थको यथावत् स्वरूप विशेपर जानना तिसका नाम अवाय कहिए । के यह वकपंक्ति ही है, पताका नाहीं ।

. प्रकृतिसमुत्कीर्तन ११५ जातें उड़ि ऊंचे जाय है अरु नीचे आवे है, अरु पांख हलावती देखिए है, तातें बकपंक्ति है ऐसा जु है ठीक ग्रहण सो कहिए । धारणा कहा कहिए ? जो पदार्थ यथार्थ ग्रहीन है काला- न्तरवि भी न भूलै तिसका नाम धारणा कहिए । ए चारि अवग्रहादिक भेद जानने । आगे वहु आदिक भेद काहए है-बहु अबहु बहुविध अबहुविध क्षिप्र अक्षित निसृत अनिसृत उक्त अनुक्त ध्रुव अध्रुव । बहु बहुत वस्तुको नाम जानना। अबहु स्तोकका नाम जानना । बहुविध वहुप्रकारकरि जाने । अबहुविध एक प्रकारकरि जाने । क्षिप्र शीघ्र ही जाने । अक्षिप्र विलम्बकरि जाने। निसृत निकसे पुद्गलको जाने। अनिसृत अनिकसे पुद्गलको जाने । उक्त कहनेका नाम जानना। अनुक्त अनुक्त अभिप्राय कहिए । ध्रुव यथार्थ ग्रहणशक्ति । अध्रुव अयथार्थ ग्रहणनाम । इन बारहसों अवग्रहादिकके जो भेद जोडिए तो ४८ भेद होय हैं। बहुत वस्तुको जो किंचित् ज्ञान सो बहु-अवग्रह । बहुतको सन्देहरूप जानना सो बहु-ईहा । बहुतको निश्चित जानना सो बहु-अवाय । जो बहुतको भूले नहीं सो वहु-धारणा। इस ही भांति ए चारों अवग्रहादिक बहु-अवहु आदि भेद १२ सो लगाएतें भेद ४८ जानने । अथ एई अड़तालीस पंच इन्द्रिय छठे मनसों लगावने सो दो सै अठासी २८८ भेद जानने । पूर्व ही कह्या जो अवग्रह तिनके दोय भेद जानने-एक अर्थ-अवग्रह एक व्यंजन-अवग्रह । जो प्रगट अवग्रह होइ के यह कळू वस्तु है सो अर्थ अर्थ-अवग्रह कहिए । अरु जो अप्रगट अवग्रह होय कै यह कळू वस्तु है ऐसा भी ज्ञान न होय सो व्यंजनावग्रह कहिए । जैसे कोरे सरवाके ऊपर दोइ बूंद डारें मालूम नाहीं हो है । अरु सरवा आला नाहीं हो हैं । अरु वही सरवा बारम्बार पानीके सीचिए तो आला हो है, तैसे स्पर्श जिह्वा नासिका कान इन चारयों इन्द्रिय विपें स्पर्श रस गन्ध शब्दरूप परिणमै है तब अर्थ-अवग्रहकरि प्रगट हो है । व्यंजन-अवग्रहके पीछे अर्थावग्रह जानना । व्यंजनावग्रह मन अरु नेत्र विना चार इन्द्रियहुको है । मन अझ नेत्रको अर्थावग्रह है। उन चारों इन्द्रियहुको व्यंजनावग्रह अरु अर्थावग्रह दोऊ है जातें मन अरु नेत्रकरि अर्थ के बिना ही स्पर्शे दूरतें ज्ञात हो है। अरु वे जो हैं चार इन्द्रिय तिनकरि पदार्थ के स्पर्श विना ज्ञान नाहीं हो है, ताते स्पर्शन जिह्वा नासिका कर्णविपें प्रथम ही जब स्पर्श रस गन्ध शब्दरूप पुद्गल स्पर्श है तब दोय तीन समय व्यंजनावग्रह हो है, पीछे बारम्बार स्पर्शते अर्थावग्रह हो है । नेत्र अरु मनकरि पदार्थ के स्पर्श विना जाने ज्ञान है ताते इन दोनों को प्रथम हो अवग्रह है। ताते यह सिद्धान्त सिद्ध हुआ के चार इन्द्रियहुकी अर्थावग्रह है। आगे इन चार इन्द्रियहुके व्यंजनावग्रहसों बहु आदिक १२ भेद लगाइए तो अड़तालीस ४८ भेद हो है । पूर्व ही कहे जे २८८ भेद अरु अड़तालीस व्यंजनावग्रहके ते सय मिलायकरि ३३६ भेद मतिज्ञानके भये । । अथ श्रुतज्ञानको स्वरूप कहै हैं- अत्थादो अत्यंतरमुवलंभं तं भणंति सुदणाणं । आभिणियोहियपुव्वं णियमेणिह सत्थजप्पमुहं ॥३८॥ अर्थात् अर्थान्तरं येन उपलभ्यं तत् आचार्याः श्रुतज्ञानं भणन्ति मतिज्ञानकारि ठीक किया है जो पदार्थ तिसतें और पदार्थ जिस ज्ञानकरि जानिए विशेपरूप तिसका नाम आचार्य सुन कहै हैं । भावार्थ-जिस ज्ञानकरि एक पदार्थके जाने सते अनेक पदार्थ जानिए सो अनजान कहिए । सो श्रुतज्ञान कैसा है ? आभिनियोधिकपूर्वम् । भावार्थ-मतिज्ञान विना अनजान न होय। जो पहिले मतिनानकरि पदार्थ जान्यो होय तो तिसके पीछे भूननानकार विशेष । । ११६ कमप्रति जानिए है। बहुरि कैसा है शुनमान ? नियमेन-शास्त्रजप्रमुग्यम निम्न गरि शान्त्र जनिना श्रुतज्ञान है प्रधान जिसविप । भावार्थ-या श्रुनान दांग प्रकार - एक शव्या, एक लिंगज है। जो शब्दत उत्पन्न है अक्षर स्वर पद वाक्याप मोडमा अनमान कहिए । जो श्रुतज्ञान अनझररूप है, एकेन्द्रिय आदि पंचेन्द्रिय पर्यन्त समम्न जीया विमें प्रय सो लिंगज है । इन दोनोम शब्दज श्रुतमान प्रधान है, जान शास्त्र-पठन-पाठन उपदेशादिक समस्त व्यवहारका यह मूल है । अथ अवधिज्ञान के स्वरूप कहिए- अवधीयदि नि आही सीमाणाणत्ति वणियं समये । भव-गुणपचयविहियं जमोहिणाणत्ति णं बंति ।।३।। अवधीयते इति अवधिः द्रव्य क्षेत्र काल भाव इन चारों करि मर्यादा कगिग जिसकी, सो अवधिज्ञान कहिए । इदं समय सीमानानं वर्णितम यही अवधिनान परमागमवि मर्यादी कहा है । भावार्थ-मति श्रुत केवल ये नीन्यों अमर्यादिक मान जान न वि अपरमान है । मति श्रुतज्ञान परोक्ष समस्त जाने है । कंवलज्ञान सकल प्रत्यक्ष ज्ञान , नान ये नीन्यों अमर्यादिक ज्ञान कहिए। इस अवधिनानका जुई विषय सो मयांदा लिा. नातं अधि. ज्ञान सीमाज्ञान कहो है । यद् भवगुणप्रत्ययविहितं तद अवधिमानं इनि बदन्ति । जो यह ज्ञान भवप्रत्यय अरु गुणप्रत्ययके भेदकरि दोयप्रकार का है। निसहि अवधिज्ञान ऐमो नाम आचार्य कहे हैं। भावार्थ-अवधिज्ञान दाय प्रकार है-भवप्रत्यय अम गुणप्रत्यय । भवप्रत्यय सो कहा कहिए ? जो पर्यायको निमित्त पायकरि उपजे सो भवप्रत्यय कहिए। सो भवप्रत्यय देव- नारकीके अम तीर्थंकरके पर्यायविप अवश्य होय । इहां कोई प्रश्न कर के अवधिज्ञान तो अवधिज्ञानावरणीयकर्मके क्षयोपशमतें उपजे है, तुमने इहां कायों के भवप्रत्यय अवधि पर्यायको निमित्त पाय उपजै है सो यह क्यों संभवे है ? ताको उत्तर-कं जब देव नारक पर्यायकी उत्पत्ति होय है तब ही अवश्यकरि अवधिज्ञानावरणीयकर्मको क्षयोपशम हो है जाते देव- नारकीकी पर्यायविपं वह सबको है तातें भवप्रत्यय अवधिको पर्याय निमित्त कारण कहिए है । जैसे पक्षी पर्याय विपें उड़नेको गुण सबके है, कोई शिक्षा देयकरि उड़ना सिखावता नाही; स्वाभाविक पर्याय अवलंविकरि उड़ना जाने हैं तैसो पर्याय अवलंविकरि भवप्रत्यय अवधि जाननी । जो अवधिज्ञानावरणीयकर्मके क्षयोपशमतें मनुष्य अम. तियंचवि होइ सो गुण- प्रत्यय अवधि कहिए । मनुष्य अरु तिर्यंचवि भी तब होइ जो सैनी पर्यायमें होहि । अझ जो सम्यग्दर्शनादिकको निमित्त होइ । अथ मनःपर्यय ज्ञानको स्वरूप कहिए है- चिंतियमचिंतियं वा अद्धं चिंतियमपणेयभेयगयं । मणपञ्जवं ति चुच्चह जं जाणइ तं खु णरलोए ॥४०॥ चिन्तितं अचिन्तितं वा [ अर्धचिन्तितं ] अनेकभेदगतं परमनसि स्थितं अर्थ यत् जानाति तत् मनःपर्ययज्ञानं उच्यते । चिन्तितं पूर्व ही चिन्तयो होय, अचिन्तितं आगे चिन्त- इगा, अर्ध चिन्तितं वा अथवा आधा चिंतया होय ऐसा जो अनेक प्रकार संयुक्त परमनसि- स्थितं अर्थ पराये मनकेवि तिष्ठै है जु पदार्थ तिसकों जो जाने सो मनःपर्ययज्ञान कहिए। तंत् खलु नरलोके सो मनापर्ययज्ञान मनुष्यलोकयि उपजै है। ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन ११७ भावार्थ-अढाई द्वीपवि सब जीबहुको भूत भविष्यत वर्तमानरूप जु है अनेक प्रकार मनके परिणामनि सूक्ष्म स्थूलरूप सो मनापर्ययज्ञानकरि सब जानिए है । सो मनःपर्ययज्ञान दोय प्रकार है-एक ऋजुमति एक विपुलमति । ऋजुमति मनःपर्ययज्ञान कालाश्रित जघन्यता. करि अपने अरु औरके आगिले पीछिले दोय-तीन पर्याय जाने । अरु उत्कृष्ट योजन : नवके मध्य जीवनिके मनकी बात जाने । विपुलमति मनःपर्ययज्ञान जघन्य कालस्थिति सात-आठ पर्याय जाने। उत्कृष्ट असंख्यात आगिले पीछिलै पर्याय जाने । क्षेत्राश्रित जघन्यताकरि योजन ९ नवके मध्य जीवनिके मनकी बात जाने । उत्कृष्ट मानुपोत्तर पर्वतके भीतर जानें, बाहिर नाहीं । यह ऋजुमति विपुलमतिका भेद जानना। अथ केवलज्ञानको स्वरूप कहिए है- संपुण्णं तु समग्गं केवलमसवत्त सव्वभावगयं । लोयालोयवितिमिरं केवलणाणं मुणेयव्यं ॥४१॥ एतादृशं केवलज्ञानं मन्तव्यम् । कीदृशम् ? सम्पूर्ण अखण्डम् । पुनः किंविशिष्टम् ? समग्रम् । अनन्तज्ञानादिशक्तिकरि समस्त है । पुनः कीदृशम ? सर्वपदार्थ के जाननेते निर्मल है। पुनः किम ? असपत्नम् सर्वघातिया कर्महुके क्षयतें बन्ध-रहित है । पुनः किम् ? सर्वभाव- गतम् समस्त जु है लोकालोकवि पदार्थ तिनिविपैं एक समयमांहि गया है । पुनः किम् ? लोकालोकवितिमिरम् लोकालोकप्रकाशक है ऐसो केवलज्ञान जानना । मदि-सुद-ओही-मणपजव-केवलणाण-आवरणमेवं । पंचवियप्पं णाणावरणीयं जाण जिणभणियं ॥४२॥ मति-श्रुतावधि-मनःपर्यय-केवलज्ञानानां आवरणं एवं पनविकल्पं ज्ञानावरणीयं जानीहि जिनमणितम् । .... .... .... .... .... .... .... .... .... .... अथ दर्शनावरणीयकर्मके स्वरूप कहनेको प्रथम हो दर्शनको स्वरूप कहिए है- जं सामण्णं गहणं भावाणं णेव कटुमायारं । अविसेसिदण अढे दंसणमिदि भण्णए समए ॥४३॥ यद्भावानां सामान्यग्रहणं तत् समये दर्शनं इति भण्यते जो पदार्थको सामान्य ग्रहण सो दर्शन ऐसो उद्वो शास्त्रवि कहिए है। कहा करि ? आकारं नैव कृत्वा भेद नाहीं करिके- यह घट है कै पट है ऐसो भेदके बिना ही करे । अर्थात् अविशेष्य पदार्थनिकी जानि क्रिया गुणकरि विशेषता बिना ही करै । भावार्थ-जो पदार्थको सामान्य वस्तुमात्र आहे. विशेष भेदकरि न रहे सो दर्शन जानना । ज्ञान सर्वांग पदार्थको ग्राहक है। संसारवि जे छद्मस्थ हैं तिनके दान पहिलं है, पाछे ज्ञान है । केवलोके युगपत् एक ही बार होय हैं।

जं ११८ कारामति अथ चतुर्भद दर्शनक कम्यते-- चक्खूण जे पयासह दीसह तं चक्दसणं विति । सेसिंदियप्पयासो णायच्यो सो अचक्षु ति ||४|| चक्षुषा यत्त प्रकाझ्यते दृश्यते तद् आचार्याः चक्षुर्दानं त्रुवन्ति । भावार्थ-आमारे अनन्तगुणमें एक दर्शन गुग हैं. निस दर्शन गुणकरि संगारी जीव चक्षुदर्शनावरणीयामक क्षयोपशमतें नेत्रद्वारकरि मापबन्न पदार्थ दृष्टिगोचर देव, निसका नाम सार्वगन कहिए । वा शेपेन्द्रियप्रकाशः जो पाँच इन्द्रियहुका प्रकाश है. सी अचक्षु इनि सातव्यः । भावार्थ - नेत्र बिना स्पर्शन रसन घाण श्रीत्र मन इन करि संसारी जीव अगदर्शनावरणीयकर्म के भागो. पशमने पदार्थहुको प्रकट कर सामान्य रूप सी अचक्षुदान कहिए । इहां कोई प्रश्न कर है. दर्शन नो वन्नुको नेत्रकारि हो सनात पानादि पंच इन्द्रियहु करि भी कह्यो मु काहने ? नाको उत्तर के जनविपमान सामान्यज्ञानको को है यात इन पंच इन्द्रियहुको सामान्य ज्ञानको दर्शन कहे हैं। अथ अवधिदानके स्वम्पको को है- परमाणुआदिआई अंतिमखंधं ति मुत्तिदव्याई । तं ओहिदंसणं पुण पस्सइ ताई पचक्खं ॥४॥ परमाणु आदि लंकरि अन्तिग म्कन्ध पर्यन्तं अन्नके महाकन्ध रोग आदिक पयन्न यानि मूर्तिद्रव्याणि तानि प्रत्यक्ष पश्यति तद् आचार्याः अवधिवदानं सुन्नि । भावार्थ -- अवधिदर्शनावरणीय कर्मक क्षयोपशमन संसारी जीव अवधिदर्शन हो है, मो परमाणु ने लकरि द्वषणुक व्यणुक चतुरणुक इस भाँ नि महास्कन्ध पर्यन्त लोकके वियं समस्त मृतद्रव्यको प्रत्यक्ष देख है। अथ केबलदर्शनके स्वरूपको कह है- बहुविह-बहुप्पयारा उज्जोवा परिमियम्मि खेत्तम्मि । लोयालोयवितिमिरो जो केवलदंसणुञ्जोयो ॥४६॥ बहुविध-बहुप्रकारा उद्योताः बहुविध तीव्र मन्द आद्यन्त मध्य इत्यादि भेद बहुप्रकार चन्द्रमा सूर्य रत्न अग्नि आदि भेदकरि ऐसे जु है उद्योन इस जगत विय ते परमिते क्षेत्रे सन्ति मर्यादिका भवन्ति । भावार्थ-चन्द्रमा सूर्यादिकको उद्योत प्रमाण लिए है । यः केवलदर्शनो- छोतः स लोकालोकवितिमिरः अरु जो लोकालोकप्रकाशक है स केवलदर्शनोद्योतः सो केवल. दर्शनको उद्योत जानना। भावार्थ केवलदर्शन समस्त लोकालोक प्रकाशक है एक समय- वि एक ही बार। अथ दर्शनावरणीयकर्मको नव प्रकृति कहिए है.- चक्खु-अचक्खू-ओही-केवलआलोयणाणमावरणं । तत्तो पभाणिस्सामो पण णिहा दंसणावरणं ॥४७॥ चक्षुरचक्षुरवधिकेवलालोकानां आवरणं चक्षुदर्शनावरणीय १ अचक्षुदर्शनावरणीय २ अवधिदर्शनावरणीय ३ केवलदर्शनावरणीय ४ पूर्व ही कह्यो जो चार प्रकार दर्शन तिसके प्रकृतिसमुत्कीर्तन ११६ आवरणतें चार प्रकार दर्शनावरणीयकर्म जानना। ततः पञ्च निद्रादर्शनावरणं प्रभणियामः तिसते आगे हम जु हैं नेमिचन्द्राचार्य ते पंचप्रकार दर्शनावरणीयकर्म कहेंगे । भावार्थ-दर्शनावरणीयकर्म नव प्रकार है । तामें चार प्रकार कह्या, पंच प्रकार निद्रा- दर्शनावरणीय अब कहैं हैं। अह थीणगिद्धि णिहाणिद्दा य पयलपयला य । णिद्दा पयला एवं णवमेयं दंसणावरणं ॥४८॥ अथ स्त्यानगृद्धिः निद्रानिद्रा तथैव प्रचलाप्रचला निद्राप्रचला च एवं नवभेदं दर्शना- वरणं ज्ञेयम् । स्त्यानगृद्धि निद्रानिद्रा प्रचलाप्रचला निद्रा अरु प्रचला ये पंच प्रकार निद्रा है । इनहिं मिलाये दर्शनावरणीयकर्म नव प्रकार जानना । स्त्याने स्वप्ने यया वीर्यविशेपप्रादुर्भावः सा स्त्यानगृद्धिः जिसके उदयतें स्वप्नवि विशेष बल प्रगट होय है सो स्त्यानगृद्धि, निद्रा जाननी। यदुदयान्निद्राया उपरि उपरि प्रवृत्तिः सा निद्रानिद्रा, जिसके उदयतें निद्राके ऊपर फेर भी निद्रा आवे सो निद्रानिद्रा कहिए। यदुदयादात्मा पुनः पुनः प्रचलयति सा प्रचला- प्रचला, जिसके उदयतें आत्मा वारंबार चले सो प्रचलाप्रचला जाननी। यदुदयान्मदखेद- लामविनाशार्थ शयनं तन्निद्रा, जिसके उदयतें मद खेद थकान आदिके दूर करनेको सोइए सो निद्रा जाननी। या आत्मानं प्रचलयति सा प्रचला, जिसके उदयतें जीव बेट्या बैठ्या ऊँधै, हालै सो प्रचला जाननी । ऐसे नव प्रकार दर्शनावरणीयकर्म पंच निद्रा मिलि करि भया। अथ त्यानगृद्धि आदिकहु कालविशेपकरि कहै हैं:- थीणुदएणुढविदे सोवदि कम्मं करेदि जंपदि वा । णिहाणिद्दुदएण य ण दिद्विमुग्घाडिहूं सक्को ॥४६॥ स्त्यानगृहयुदयेन उत्थापिते सत्यपि स्वपिति कर्म करोति जल्पति च स्त्यानगृद्धिके उदयतें उठावते संते भी सोवे अरु काम करे अरु बोले । भावार्थ-स्त्यानगृद्धिनिद्राके उदय सोवते संते बहुल बल होय, अरु दारुण कर्म करे १ । निद्रानिद्रोदयेन दृष्टिं उद्भाटयितुं न शक्कोति, निद्रानिद्राकर्मके उदय दृष्टिको उघाडि न सके। भावार्थ-जिस जीवको निद्रानिद्रा कर्मका आवरण है सो भी बहुत प्रकारकरि जगाइए तो भी नेत्रनिको खोलि न सके २ । पयलापयलदएण य वहेदि लाला चलंति अंगाई। णिहुँदए गच्छंतो ठाइ पुणो वइसदि पडेदि ॥५०॥ प्रचलाप्रचलोदयेन लाला वहन्ति, पुनः अङ्गानि चलन्ति प्रचलाप्रचला निद्राके उदयतें मुखतें लाल बहे अरु सोवते अंग हाथ पांव चल्या करे ३ । निद्रोदयेन गच्छन् निष्ठति. स्थिनः उपविशति पतति च, निद्राकर्मके उदय है जो सो जगाइ करि ले चलिए तो भी खड़ा होय रहे, बहुरि बैठे अरु पड़ि जाय है। पयलुदएण य जीवो ईसुम्मीलिय सुवेदि सुत्तो वि । ईसं ईसं जाणदि मुहं मुहं सोवदे मंदं ॥५१॥ प्रचलोदयेन जीवः ईपदुन्मील्य स्वपिति, प्रचलाकर्मके उदयने जीव थोड़ी सी आँखि खोलि सोवै । सुप्तोऽपि ईपदीपज्जानाति सोवते संते भी थोड़ी-थोड़ो जाने. मुहुर्नुह: नन्द स्वपिति वारंवार थोड़ा सोवै । -- ३ १२० কামনি भावार्थ-जिस जीवके प्रचलाको उदय हे मो का आग्नि योन, गा, जो कोई बान कर तिसे हु जाने, अम थोड़ा मोचे वारंवार । इहां कोई पूछे--दर्शनावरणीयकर्म तो मो करायें जो दर्शनको माछा । निद्रामग दर्शनावरणीयमें गिण्या सु किस बारते ? नाको उत्तर के जय पांचोंको उदय नव बानगुण आवरण हो है, तिस वास्ते दानावरणीयमें गिण्या। अथ आधी गाथामें वेदनीयकमको स्वम्प कहे , आधी गाथामें गोहनीयकर्मको स्वरूप कहे हैं- दुविहं खु वेयणीयं सादमसादं च वेयणीयमिदि । पुण दुवियप्पं मोहं दंसण-चारित्तमोहमिदि ।।५।। द्विविधं खलु वेदनीयम दोय प्रकार वेदनीय कर्म जानना । सानं अमानं वेदनीयमिनि सातावेदनीय और असातावेदनीय । पुनः द्विविकल्प मोहनीयमान मोहनीयं चारित्र- मोहनीयमिनि । बहुरि दोय प्रकार मोहनीयकर्म जानना-दानमाहनीय और चारित्रमानीय इस भेदकरि । तिनमें दर्शन मोहनीय नीन प्रकार है अर चारित्रमोहनीय पनीम प्रकार है। अथ त्रिप्रकार दर्शनमोहके स्वरूपको कहें हैं- बंधादेगं मिच्छं उदयं सत्तं पड़ा तिविहं खु । दसणमोहं मिच्छं मिस्सं सम्मत्तमिदि-जाणे ॥५३॥ बन्धादेकं मिथ्यात्यम् बन्धकी अपेक्षात दहा नमोह अकेला मिथ्यात्वन्यप होई । उदय सत्त्वं प्रतीत्य त्रिविधं खु, उदय अरु सत्ताको प्रतीति करि तीन प्रकार है. निश्चय करि । तदर्शन- मोहं मिथ्यात्वं मिश्रं सम्यक्त्वं इति त्रिविध जानीहि । सो दर्शनगोह मिथ्यात्व १ मिश्र सम्यक्त्व ३ इन भेदकरि तीन प्रकार जानहु । भावार्थ-जब दर्शनमोह बंधे, तब एक मिथ्यात्वरूप होय बंधे है। जब उदय हो है तब तीन प्रकार होइ परिणम है । अरु सत्ताकी अपेक्षा तीन प्रकार है। जिस कर्मक उदय वीतराग-प्रणीत मार्ग विमुहे, अम सप्त तत्वको श्रद्धा नहीं करे है, अग हिताहित विचारने को असमर्थ है सो मिथ्यात्व कहिए । अरु जिसके उदय मिथ्यात्व अझ सम्यक्त्वरूप परिणाम समकाल वेदै सो मिश्रमिथ्यात्व कहिए। जिसके उदय वीतराग-प्रणीत तत्वको तो यथावत् श्रद्धा करे, परन्तु कछू भेद राखे के पार्श्वनाथको पूजाते संकट टलें हैं, शान्तिनाथको पूजाते शान्ति हो है; इस जातिका कहुं कहुं भेद राखे तिसका नाम सम्यक्त्वप्रकृतिमिथ्यात्व कहिए है। अथ दृष्टान्त कहिए है- जंतेण कोदवं वा पढमुवसमसम्मभावतेण । मिच्छादव्वं तु तिहा असंखगुणहीणदव्वकमा ॥५४॥ यन्त्रेण कोद्रवं वा जैसे चाकी करि कोदों दल्या संता तीनि प्रकार हो है, तथा प्रथमो. पशमसम्यक्त्वभावयन्त्रेण मिथ्यात्वद्रव्यं त्रिधा भवति तेसे ही प्रथम उपशमसम्यक्त्वरूप जु है भाव सोई भया यंत्र तिसकरि मिथ्यात्वद्रव्य तीन प्रकार है। भावार्थ-जब प्रथम उपशम- सम्यक्त्व हो है तब मिथ्यात्वद्रव्य तीन प्रकाररूप होय परिणमै है-मिथ्यात्व १ मिश्रमिथ्यात्व २ प्रकृतिसमुत्कीर्तन १२१ सम्यक्त्वमिथ्यात्व ३ इन तीन रूप होय परिणमै है । कीदृशं त्रयम् ? असंख्यातगुणहोन- द्रव्यक्रमात् । असंख्यातगुणहीन है द्रव्यकर्म जिनके । भावार्थ-मिथ्यात्व द्रव्यतें असंख्यात: गुणहीन मिश्रमिथ्यात्व है, मिश्रने असंख्यानगुणहीन सम्यक्त्वमिथ्यात्व जानना । इस भाँति इन तीन्यों में परस्पर भेद है। अथ चारित्र मोहनीयको स्वरूप कहै हैं- दुविधं चरित्तमोहं कसायवेयणीय णोकसायमिदि । पढमं सोलवियप्पं विदियं णवभेयमुदि॥५५॥ द्विविधं चारित्रमोहं दोय प्रकार चारित्रमोह जानना । कपायवेदनीयं नोकपायवेद- नीयम् एक कपायवेदनीय अरु दूजा नोकपायवेदनीय । जिस मोहकर्मके उदय सोलह कपाय वेदिए सो कपाय वेदनीय कहिए । अरु जिसके उदय नोकपाय वेदइ सो नोकपायवेदनीय कहिए । प्रथमं पोडशविकल्पम् चारित्रमोहनोय सोलह प्रकार है । द्वितीयं नवभेदमुद्दिष्टम दूसरी जु है नोकपायवेदनीय सो नव प्रकार है । अथ सोलह प्रकार कहिए है- अणमप्पच्चक्खाणं पचक्खाणं तहेव संजलणं । कोहो माणो माया लोहो सोलस कसायेदे ॥५६।। अनन्तानुबन्धी क्रोध अनन्तानुबन्धी मान अनन्तानुबन्धी माया अनन्तानुबन्धी लोभ तथैव अप्रत्याख्यान क्रोधमानमायालोभाश्चत्वारः । तथैव प्रत्याख्यानक्रोधमानमाया- लोभाश्चत्वारः । तथैव संज्वलनचतुष्क जानना । इस ही भांति सोलह प्रकार जानना। आगे चार प्रकार क्रोधके स्वरूपको कहै हैं- सिल-पुढविभेद-धूली-जलराइसमाणओ हवे कोहो । णारयतिरियणरामरगईसु उपायओ कमसो ॥५७॥ शिला-पृथ्वीभेद-धूलि-जलराजिसमानः क्रोधः शिलाभेद भूमिभेद धूलिरेखा जलरेखा समान जु क्रोध सो क्रमशः नारकतिर्यकनरामरगतिषु उत्पादको भवति । भावार्थ-पापाणरेखासमान उत्कृष्टशक्तिसंयुक्त अनन्तानुबन्धी क्रोध जीवको नरक- वि उपजावै है । हलकरि कुवा जु है भूमिभेद तिस समान मध्यम शक्तिसंयुक्त अप्रत्या- ख्यान क्रोध तिर्यंचगतिको उपजावै है। धूलिरेखासमान अजघन्य शक्तिसंयुक्त प्रत्याख्यान क्रोध जीवको मनुष्यगति उपजा है। जलरेखासमान जघन्य शक्तिसंयुक्त संज्वलन क्रोध देवगतिविपें उपजा है। अथ मानके स्वरूपको कहै हैं- सिल-अद्वि-कट्ट-वेत्त णियभेएणणुहरंतओ माणो । णारयतिरियणरामरगईसु उपायओ कससो ॥५८॥ शिलास्थिकाष्ठवेत्रसमानिकभेदैः अनुहरन् मानः पापाणस्तम्भ अस्थिस्तम्भ काप्टस्तम्भ वेत्रस्तम्भ इन समान जु है अपने भेद तिनहु करि उपमीयमान जु है अपने भेद सो जीव नारकतिर्यजनरामरगतिपु उत्पादयनि ।

। १२२ कमप्रकृति भावार्थ-पापाणस्तम्भसमान उत्कृष्ट शक्तिसंयुक्त अनन्नानुबन्धी गान जीवको नरम- गतिविपें उपजा है। अस्थिम्तम्भ समान मध्यमहाशि मयुग, अप्रत्याख्यान मान जीवको तियंचगतिविष उपजावे है । काष्टातम्भसमान अजघन्य शक्तियुग प्रत्याभ्यान मान जीवको मनुष्यगति विपं उपजावे है । वैतसमान जघन्य शहिमयुग मंचलन गान जीवका देवनि- विपे उपजावे है। अथ चार प्रकार मायाके स्वरूपको करे - वेणुवमूलरभयसिंगे गोमत्ता य खोरुप्पे । सरिसी माया णारयतिरियणरामरगईमु खियदि जियं हा वेणूपमूलोरभ्रकशृङ्गगोमूत्रक्षुरप्रसदशी माया बामविडा समान उष्टयक्तिमयुक्त अनन्तानुवन्धीमाया जीवको नरकगनिविपं उपजा है। अजाऐगमगान मध्यमानिमयुग अप्रत्याख्यानमाया जीवको नियंचगतिविपं उपजा है। गोमूत्रसमान अजगन्या नियुक्त प्रत्याख्यानमाया जीवको मनुष्यगतिविप उपजाये है। क्षुरप्रसमान जगन्यशक्तिसंयुक्त संञ्च- लनमाया जीवको देवगतिविपं उपजाये हैं। अथ चार प्रकार लोभक स्वरूपको यह है- किमिराय-चक-तणुमल-हलिदरापण सरिसओ लोहो । णारयतिरिक्खमाणुसदेवेसुप्पायओ कमसो ॥६०॥ कृमिराग-चक्र-तनुमल-हरिद्रारागः सदृशः लोभः कृमिगग किरमजीरंग, चामल गाडीका पइएका मल, ननुमल, दारीरमल, हरिद्रागग हलदरंग इन ममान जु है लोभ सो जीवको चतुर्गत्युत्पादकः क्रमनः । भावार्थ -अनन्तानुबन्धी लोभ किरमजी रंग समान जीवको नरकगनिवि उपजाये है। अप्रत्याख्यान लोभ चक्रके मल समान तियंचगतिविपं उपजाये है। प्रत्यान्यान लोभ शरीरमल समान जीवको मनुष्यगतिविपं उपजाये है। संचलनलोभ हलदरंगसमान जीवको देवगतिवि उपजावे है। अथ निभक्तिपूर्वक कपायको अर्थ कह हैं- सम्मत्त-देस-सयलच रित्त-जहखादचरणपरिणामे । घादंति वा कसाया चउ-सोल-असंखलोगमिदा॥६१।। सम्यक्त्व-देश-सकलचारित्र-यशात्यात चरणपरिणामान् कपन्ति नन्ति वा कपायाः । सम्यक्त्वपरिणाम देशसंयमपरिणाम सकलसंयमपरिणाम यथाख्यानपरिणाम इस चार प्रकार चारित्रपरिणामहुको आच्छादै हैं ताने कपाय कहिए है। सम्यक्त्व के परिणामहुको अनन्तानु- बन्धी आच्छादै, अप्रत्याख्यान अणुवतको आच्छादे, प्रत्याख्यान महावतको आच्छाद, संज्वलन यथाख्यातको आच्छादै । जातें जीवके गुणको विनाओं, तातें ए. कपाय कहिए । एते चतुः-घोडश-असंख्यातलोकमिताः, ए कपाय चार प्रकार है-अनन्तानुवन्धी १ अप्रत्या- ख्यान २ प्रत्याख्यान ३ संज्वलन ४ इन भेद करि । बहुरि सोलह प्रकार है. १६-अनन्तानु- बन्धी आदिसों क्रोध मान माया लोभके लगाएते। बहुरि एई कपाय असंख्यात लोकप्रमाण है-जातें एक-एक कपाय असंख्याते असंख्याते प्रकार है-तोत्र तीव्रतर, मध्यम मध्यमतर, मन्द मन्दतर इत्यादि भेदह करि । अझ जो अनन्त जीवहुकी अपेक्षा देखिए तो अनन्तानन्त प्रकृतिसमुत्कीर्तन १२३ प्रकार है एई कषाय जातें किस ही जीव के परिणाम किस ही जीवको सर्वथा प्रकार नहीं मिले हैं, तातें परिणाम भेदतें कषाय-भेद अनन्तानन्त भए । अथ नव नोकषाय कहे हैं- हस्स रदि अरदि सोयं भयं जुगुच्छा य इत्थि पुंवेयं । संडं वेयं च तहा णव एदे णोकसाया य ॥६२॥ हास्यं रतिः अरतिः शोकं भयं जुगुप्सा स्त्रीवेदं पुंवेदं नपुंसकवेदं च तथा नव एते नोकषाया ज्ञेयाः। भावार्थ -जिसके उदय हास्य प्रगटे सो हास्य कहिए । जाके उदय इष्टवि प्रीति सो रति । जो इष्टवि अप्रीति सो अरति । जिसके उदय उदासीनता सो सोक । अरु जाके उदय अपने दोष आच्छादे पर-डोप प्रगट करे सो जुगुप्सा। जाके उदय स्त्रीके भाव परिणमै सो स्त्रीवेद । जाके उदय पुरुषभाव परिणमै सो पुरुपवेद । जाके उदय नपुंसक भाव परिणमै सो नपुंसकवेद । आगे तीन वेदके लक्षण कहे हैं- छादयदि सयं दोसे णियदो छाददि परं पि दोसेण । छादणसीला जम्हा तम्हा सा वण्णिदा इत्थी ॥६३।। यस्मात् या स्वयं दोपैः आच्छादयति जिस कारणतें जो जीव आपको मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान, असंयम, क्रोध मान माया लोभ इत्यादि सूक्ष्म स्थूल परिणामहु करि आच्छादे स्वयं, बहुरि नियतः परं अपि दोपैः छादयति निश्चयकरि और जीवको भी कोमल स्नेह दृष्टि इत्यादि कुटिल अवस्थाकरि वशि करिके हिंसा असत्य स्तेय कुशील परिग्रहादिक पापहुवि लगायकरि दोपहु करि आवरे, तस्मात् सा छादनशीला स्त्री वर्णिता। तातें सो आच्छादन स्वभाव धारे सो स्त्रीवेद है। भावार्थ-जो आपको दोपनिकरि आच्छादे, अरु और को भी; सो द्रव्यपुरुप वा द्रव्य- नपुंसक वा द्रव्यस्त्री होय । लिंग दोय प्रकार है--एक द्रव्यलिंग, एक भावलिंग। द्रव्यलिंग सो कहावे जिस बाह्य लक्षणकरि पुरुपलिंग-संस्कार नपुंसक मिश्नत्व संस्कार इनि द्रव्यलिंग। भावलिंग जु है परिणामहुकरि जिसके जैसे परिणाम होय, तिसको तैसे वेद कहिए । तिसने जाको आच्छादन स्वभाव होय सो भाव सीवेद कहिए । आगे भावपुरुप कहिए है- पुरुगुणभोगे सेदे करेदि लोयम्हि पुरुगुणं कर्म । पुरु उत्तमो य जम्हा तम्हा सो वण्णिदो पुरिसो ॥६४|| यस्मात् पुरुगुणभोगान् शेते जिसने पुनगुण जु हैं बड़े-बड़े गुण ज्ञान दर्शन चारित्रादि, अरु बड़े ही भोग जिन विपें प्रवते हैं, लोके पुरुगुणं कर्म करोति अझ जिसने लोकविप बई गुण-संयुक्त क्रियाको करे है, पुरु उत्तमः, और निते बड़ा है उत्तम है. तम्मान स पुरुपः वर्णितः, तिसते सो पुरुप कहिए है। भावार्थ-- जो बड़े गुग बड़े भोग-प्रधान नियावि प्रवर्ने नो व्यनिंग होय. यानी वा पुमान् वा नपुंसक होय सो भावपुरुपवेद कहिए। -- . । १२४ कर्मप्रकृति आगे भावनपुंसक कहिए है-- णेवित्थी व पुमं णउंसयो उयलिंगवदिरित्ती । इट्ठायग्गिसमाणयवेयणगरुओ कलुसचिचौ ॥६॥ यः नैव म्री नैव पुमान स नपुंसकः, जो नाही श्री नाही पुरूप मो नपुंसक काहिए। कैसा है नपुंसक ? उभयलिङ्गव्यतिरिक्तः, पूर्व ही कह स्त्री-पुरुपक दाय प्रकार लक्षण निनने रहित है। पुनः कीदृशः ? इष्टकाग्निसमानः पंजाएको आगि समान, सदा उन्यायाधिकारि हृदयमध्य जला कर है। पुनः वेदनागुरुकः, कागकी पीड़ा करि पूर्ण । पुनः किम ? कलुपितचित्तः, कलंकित मन है। भावार्थ-जो इन लक्षण-संयुक्त है सो पुरुष होय, वान्त्री वा संद द्रव्य, नपुंसक- वेदी कहिए। आगे आयुकर्म चार प्रकार है- णारयतिरियणरामर-आउगमिदि चउविही हवे आऊ । णामं वादालीसं पिंडापिंडप्पमेएण ॥६६॥ नारकतिर्यङनर रामरायुष्यमिति चतुर्विधं आयुभवेन , नरक-आयु, गिर्यच-आयु. गनुप्त्य- आयु, देवायु इस प्रकार करि आयुकर्म चार प्रकार है । पिण्डापिण्डप्रभेदेन नामकर्म द्वाचवां- रिझद्विधम , पिण्ड-अपिण्ड प्रकृतिनिके भेदकरि नामकम बयालीन प्रकार है। भावार्थ-नामकर्ममें कई एक पिण्डप्रकृति है, निनक भेदकरि बयालीम प्रकार है । अरु जुदी-जुद्री जो गणिप तो तेगणत्रै होइ । आगे प्रथम ही पिण्डप्रकृति कहिए है- णेरइय-तिरिय-माणुस-देवगइ ति हवे गई चदुधा । इगि-वि-ति-चउ-पंचक्खा जाई पंचप्पयारेदे ॥६७॥ नारक-तिर्यङ्-मनुष्य-देवगतिः इति गतिः चतुर्धा भवेत् , जिस कर्मके उदय चार गतिनिकी प्राप्ति होय सो गतिनामकर्म कहिए। एक-द्वि-त्रि-चतुः-पञ्चाक्षा इति जातिः पन्न. प्रकारा भवेत् । एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय पञ्चेन्द्रिय इस प्रकार करि जातिनाम- कर्म पंच प्रकार है। भावार्थ-जिस कर्मके उदय एकेन्द्रियादि पञ्चेन्द्रिय प्रकार जीव होहि, सो पंच प्रकार जातिनामकर्म कहिए। ओरालिय-वेगुचिय-आहारय-तेज-कम्मण सरीरं । इदि पंच सरीरा खलु ताण वियप्पं वियाणाहि ॥१८॥ औदारिक-बैंक्रियिकाहारक-तैजसकार्मणशरीराणि इति खलु पञ्च शरीराणि भवन्ति । भावार्थ-जिस कर्मके उदय पंच प्रकार शरीर होय सो शरीरनामकर्म कहिए । तेयां विकल्पं जानीहि । तिनि पंच प्रकार शरीरनिके भेद अगली गाथामें जानना । तेजा-कम्मेहि तिए तेजा कम्मेण कम्मणा कम्मं । कयसंजोगे चदुचदु चदुदुग एकं च पयडीओ ।।६।। .

प्रकृतिसमुत्कीर्तन
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तैजस-कार्मणाभ्यां त्रये संयोगे कृते सति चतस्रः चतस्रः प्रकृतयः, औदारिक वैक्रियिक
आहारक इन तीन शरीरवि तैजस-कार्मणकरि संयोग किये संते चार-चार प्रकृति होय हैं।
भावार्थ-औदारिक वैक्रियिक आहारक इन शरीरनिको तैजस-कार्मणसों लगाइए तो
बारह शरीरके भेद होइ हैं-औदारिक-औदारिक १ औदारिक-तैजस २ औदारिक कार्मण ३
औदारिक-तैजस-कार्मण ४ । वैक्रियिक-वै क्रियिक १ । वैक्रियिक तैजस २ । वैक्रियिक-कार्मण ३
वैक्रियिक-तैजस-कामेण ४ । आहारक-आहारक १ । आहारक-तैजस २ । आहारक-कार्मण ३ ।
आहारक-तैजस-कार्मण ४॥
तैजस कार्मणेन संयोगे कृते सति द्वे प्रकृती। तेजस कार्मणके साथ संयोग करनेपर
दोय प्रकृति होय हैं -तैजस-तैजस १ । तैजस-कार्मण २ । कार्मणेन संयोगे कृते सति एका
प्रकृतिः कार्मण-कार्मण १। एवं शरीरस्य पञ्चदश भेदा भवन्ति । इस प्रकार शरीरनिके पंचदश
भेद जानहु । औदारिक-औदारिक, वैक्रियिक-वैक्रियिक, आहारक-आहारक, तैजस-तैजस,
कार्मण-कार्मण इन पंच भेदनिको छांडि दश भेद तिरानवै प्रकृति में मिलाइए तो एक सौ तीन
भेद होय | जातें तिरानवे प्रकृतिमें औदारिकादि पुनरुक्त ते न गिण्या, यातें एक सौ तीन
नामकर्मके भेद जानने ।
भावार्थ-जो चक्रवर्ती भोग-निमित्त और औदारिकशरीरको करै सो औदारिक-
औदारिकशरीर कहिए १। औदारिकशरीर-संयुक्त मुनि जब तैजस पुतला निकासे तहाँ
औदरिक तैजस कहिए २ । जब मरण-समय आत्मप्रदेश निकासे और गति स्पर्शनेको अपने
औदारिकशरीरके ग्रहे संते तब औदारिक-कार्मण कहिए ३ । औदारिक-संयुक्त मुनिके तैजस-
शरीरको निकासनेको अपर शरीर साथ ही कार्मण शरीर जब निकसै, तहाँ औदारिक तैजस-
कार्मण कहिए ४ । देव-नारकीके अपने वैक्रियिकशरीरतें और विकुर्वणा जु करे क्रीड़ानिमित्त,
शत्रुमारण-निमित्त सो वैक्रियिक-वैक्रियिक कहिए ५। देव वा नारकी बहुत क्रोधके वझते
तैजसरूप आत्म-प्रदेशनिको बाहिरै निकासे, तहां वैक्रियिक-तैजस कहिए ६ । देव वा नारकी
मरण-समय और गति स्पर्शनेको आत्म-प्रदेश निकासे अपने वैक्रियिकशरीरको ग्रहे संते, तहां
वैक्रियिक-कार्मण कहिए ७ । देव वा नारको बहुत क्रोध-वशते जब तेजसरूप आत्मप्रदेश
कार्मणरूप आत्म-प्रदेशसंयुक्त निकसै, तहां वैक्रियिक तैजस-कार्मण कहिए ८ । मुनीश्वरको
पदार्थ-सन्देह दूर करण-निमित्त जु आहारक पुतला निकस है सो जहां जाय, तहां जो केवली
न पावे, तब ओही आहारक और आहारकपुतलाको निकासे केवलोके दर्शनको; तहां आहा-
रक-आहारक कहिए ६ । संदेह दूर करण-निमित्त निकस्यो जु आहारक सु नार्गमें उपसर्गवन्त
मुनिको देखिके तिसके सुखीकरण-निमित्त शुभतै नस कर; तहां आहारक-तैजस कहिप १० ।
जहां मुनिके आहारकरूप आत्माके प्रदेश साथि कामणरूप प्रदेशनिकसे, तहाँ आहारक-कार्मण
कहिए ११ । जहां मुनिके शरीरतें निकसो जु आहारक सु किस ही एकको दुखी देखिके.
तिसके सुखीकरण-निमित्त तैजस कर तिस तैजसके साथ ही कार्मणरूप आत्म-प्रदेश निकसे,
तहां आहारकतैजस-कार्मण कहिए १२ । शत्रु मित्र न पाये तब ही नै जस और नै जस कर
तहां तैजस-तैजस कहिए १३ । मुनिशरीरतें निकसे जु कार्मणप्रदेश संयुक्त आहारक नैजन-
शरीरतें आहारकतें और आहारक तैजसतें और तेजस जब करे नहां जन-कार्मण कहिए 21
अरु कार्मण कहिए..... .........."। एवं पंचदस प्रकार शरीरनिके भेद जानने ।
आगे पंचबन्धन कहे हैं-
पंच य सरीर बंधणणामं ओराल तह य वे उच्वं ।
आहार तेज कम्मण सरीरबंधण नुणाममिदि ॥७॥

१२६ कर्मप्रकृति पञ्चैव शारीरबन्धनम बन्धननामकम पंच प्रकार जान । सो कोन कोन ? औदारिक- वैक्रियिकाहारकतैजसकागणबन्धनमिति नामकर्मणः । भावार्थ-जिस नामकर्मय: उदयन पंच प्रकार दागर-योग्य वर्गणा पसर जायमा बन्ध होय सो बन्धन कहिए । सो पंच प्रकार झागग्यन्धन जाना। आगे पंच प्रकार संघाननामकर्ग कहे- पंच संघादणामं ओरालिय नह य जाण उव्यं । आहार तेज कम्मणसरीरसंघादणाममि दि १७१|| पंचप्रकार संघान नामकर्म जानाहि, पंच प्रकार माननागकम जाना । औदारिक तथैव वैक्रियिकं आहारकं तैजस कार्मणं शारीरसंबाननामकर्मेति । औदारिकनबार क्रियि- कसंघात आहार कसंघात नेजममंत्रात कामगसंधान या पंचप्रकार नामक जाना। भावार्थ-जिस नामकर्मक उदयकार पंचमकार दागेर योन्य वर्गणा परपर जीयमों अत्यन्त सचन विवर-रहित एकमेक हाहि चटमो संघात नामकर्म प्रकार करिए। जो कोई पूछ के बंधन-मंबानमें भेद कहा ? नाको उनर के बन्धन गो मा सुश्रीकादि शरीरनि वर्गणाहुको अत्यन्त सघन होय करि बन्ध नाही हाय । अरु अत्यन्त नयन विवर-रहित औदारिकादि वर्गणाहुको जा बन्ध हाहि मो नंबान कहिए। बंधन-संघानमें यह भेद है। आगे पट प्रकार संस्थाननामकर्म ऋदिए है.- समचउरं णिग्गोहं सादी कुजं च वामण हुंडं । संठाण छन्भेयं इदि णिदि जिणागमे जाण ॥७२।। जिनागमे इति निदिष्ट पट्र्भदं संस्थानं जानादि, सिद्धान्तविप यह छा प्रकार संस्थान- नामकर्म दिखाया है। मु कौन-कौन ? समचतुरनं न्यग्रोधं स्यातिकं कुछ वामन हुण्ड. कमिति । समचतुरन्त्रसस्थान न्यग्रोधपरिमण्डलसंस्थान म्बानिकसंस्थान कुजकसंस्थान वामनसंस्थान हुण्डकसंस्थान यह छह प्रकार संस्थानकर्म जानहु। भावार्थ-जिस नामकर्मक उदयकरि औदारिकादिझरीरहुकी आकृति हो। सो पटप्रकार संस्थान कहिए । सर्वांग शुभलक्षणसंयुक्त अर सुन्दर जो होय सो समचतुरन्त्र- संस्थान कहिए १ । जो शरीर ऊपरने विस्तीर्ण होय, नलेन संकुचित होय सो न्यग्रोधपरि- मण्डलसंस्थान कहिए २ । जो शरीर नलेने विस्तीर्ण होय, अन ऊपरत संकुचित होय सो स्वातिक संस्थान कहिए । वामह कैसी आकृति होय सो इस झगीरको नाम वाल्मीकि कहिए । जो शरीर सब जांगत छोटा होय सो वोमन कहिए ?। जिस शारीरमें हाथ पाँच शिर दीर्य होय अम पिण्ड छोटा होय सो कुजकसंस्थान कहिए ५ । जो शरीर सब जांगा गठीला होय पत्थर की भरी गौण कीसी नाई सो हुण्डकसंस्थान कहिए । अथ तीन प्रकार आङ्गोपाङ्ग कह हैं- ओरालिय वेगुब्बिय आहारय अंगुवंगमिदि भणिदं । अंगोवंगं तिविहं परमागमकुसलसाहहिं ।।७३|| 7 १२७ है द्वादशाङ्ग प्रकृत्तिसमुत्कीर्तन परमागम कुशलसाधुभिः आङ्गोपाङ्गं त्रिविधं भणितम् परमागम जु सिद्धान्त तिस वि प्रवीण जें हैं मुनि तिनहुते आङ्गोपाङ्गनामकर्म तीन प्रकार कहो है सो औदारिकवैक्रियिकाहारकाङ्गोपाङ्गमिति । भावार्थ-जिस कर्मके उदय करि दोय चरण दोय हाथ नितम्ब पीठ उर अरु शिर ये- अष्ट अंग होंय, अरु अंगुलि कर्ण नासिका नेत्रादि उपांग होय, सो आंगोपांग नामकर्म कहिए । जातें तीन शरीर में अंग अरु उपांग पाइए । तैजस अरु कार्मण इन दोनोंको अंग अरु उपांग नांहीं, तातें तीन प्रकार होइ । आगे गाथामें आंगोपांग कहे हैं- णलया बाहू य तहा णियंव पुट्ठी उरो य सीसो य । अट्ठव दु अंगाई देहे सेसा उवंगाई ।।७४॥ देहे अष्टौ एच अङ्गानि सन्ति । शरीर में आठ ही अंग होते हैं। ते कवन ? नलकी तथा बाहू नितम्बः पृष्ठः उरः शीर्षः दोनों पांव, दोनों हस्त, नितम्ब, पीठ, छाती, अरु शिर ये आठ अंग जानहु । तु देहे शेषाणि उपाङ्गानि । बहुरि इन अष्टांगनिते जु शेप अवर ते अंगुलि, कर्ण, नासिका नेत्रादि ते उपांग कहिए । आगे दोय प्रकार विहाय नामकर्म कहे हैं- दुविहं विहायणामं पसत्थ अपसत्थगमणमिदि णियमा । वजरिसहणारायं वज्ज णाराय णारायं ।।७।। द्विविधं विहायोगतिनामकर्म । विहायोगतिनामकर्म दोय प्रकार है । ते सु कौन-कौन ? प्रशस्ताप्रशस्तगमनमिति नियमात् । प्रशस्तगमन और अप्रशस्तगमन ये दोय प्रकार निश्चयतें जानहु । भावार्थ-जिस कर्मके उदय जीव विहाय कहिए आकाश तिसवि गमन कर सो विहायोगतिनामकर्म कहिए। जो भली चालि होय सो प्रशस्तगति कहिए | जो बुरी चालि होय सो अप्रशस्तगति कहिए। अथ अर्धगाथामें पट संहनन कथ्यते-वनवृपभनाराच वज्रनाराच नाराच । अगली गाथामें और तीन संहनन कहे हैं- तह अद्धं णारायं कीलिय संपत्तपुव्वसेवढें । इदि संहडणं छव्धिहमणाइणिहणारिसे भणिदं ॥७६।। तथैव अर्धनाराचं कीलकं असम्प्राप्तामृपाटिकासंहननं इति पविध संहननं अनादि- निधना भणितम् । तथा अर्धनाराच, कीलक और असम्प्रामानुपाटिकानंदनन । यह छह प्रकार संहनन अनादि अनन्त जु है द्वादझाङ्ग सिद्धान्त तिसवि कहा है। भावार्थ-जिस कर्मके उदय छह संहनन होय. लो संहनन नानकम कहिए है । आगे इन पटसंहननको स्वरूप छह गाथा कहे हैं- जस्स कम्मस्स उदए वजमयं अहि रिसह पारायं । तं संहडणं भणियं वारिसहणारायणाममिदि ॥७ ये १२८ कर्गप्रकृति यस्य कर्मण उदये वनगयानि अस्थि-ना.पभ-नागनानि भवनि जिम कर्मके उपाय होने संते वज्रमय अतिदुर्भद्य अस्थि कहिए हाड, पापम कहिए वेष्टन, नागन काहिए कीले ए होहिं, तत्संहननं वज्रर्पभनाराचनाम इति भणितम् । सो वर्षभनागर गहनन काहिए। भावार्थ-जिस कर्मके उदय वनमय अस्थि होय, अगदी अस्थिनि ऊपर यसमय वेष्टन होय, अर उन ही हाडनिविपं वनगय कील होय, गो बचपभनागरमंहनन जानना। अथ वचनागचसंहनन कहे है जस्सुदये वजमयं अट्ठी णाराय मेव सामण्णं । रिसहो तसिंहडणं णामेण य वजणारायं ।।७।। यस्योदय वन्नमयं अस्थि, नाराचं सामान्यः वापभः जिस कर्म के अय मंते व समई हाड अरु कील होइ अरु ऋषभ सामान्य होय, यसमई न होय, नन्संहननं नाम्ना बननाग. चम् । वह संहनन वज्रनाराच कहिए । भावार्थ-जिस कर्मके उदय बन्नमई हाड होय, अमहानिविगं वनमई कील है। हाडनिके ऊपर चमई बैठन न होइ सो वनाराच कहिए। आगे नाराचसंहनन कहिए है-- जस्सुदये वजमया हडा वो बजरहिदणारायं । रिसहो तं भणियव्यं णारायसरीरसंड्डणं ।।७६।। यस्योदये वनमया हट्ठाः वनाहिती नाराच-ऋपभी जिस कर्म के उदय व अमई हाड होय, नाराच अम् ऋषभ ये वन्नने रहित होय; तत् नाराचसंहननं भणितव्यम , वह नाराच- संहनन कहना चाहिए। आगे अर्धनाराचसंहनन कहिए हैं- वजविसेसणरहिदा अट्ठीओ अद्धविद्धणारायं । जस्सुदये तं भणियं णामेण य अद्धणारायं ॥२०॥ यस्योदये वनविशेपणरहितानि अर्धनाराचानि अस्थीनि भवन्ति जिस कर्मके उदय वनविशेषणते रहित अरु अर्ध है नाराच कील जिन वि ऐसे हाड होहि तन्नाम्ना अर्धनाराचं भणितम् , उसका नाम अर्धनाराच कहिए है। भावार्थ-जिस कर्मके उदय शरीर वि वज्जते रहित हाड होय, कील भी बनने रहित होय; परन्तु कील-हाड़ की सन्धि विपं आधी वेधी होहिं सो अर्धनाराचसंहनन कहिए । अथ कीलकसंहनन कह हैं- जस्स कम्मरस उदये अवजहड्डाई खीलियाई च । दिवंधाणि हवंति हु तं कीलियणामसंहडणं ||८१॥ यस्य कर्मण उदये दृढवधानि कोलितानि इव अवज्रास्थीनि भवन्ति, जिस कर्मके उदय दृढ़ है वन्ध जिन विर्षे ऐसे कीले सो वज्रते रहित हाह होहि; तत् कीलकनामसंहननम् वह कीलकनाम संहनन कहावे है। - , प्रकृतिसमुत्कीर्तन १२४ भावार्थ-जिस शरीर विपें हाडकी सन्धिहु वि कील तो न हो, परन्तु कोल दईसी होय, अतिहद होय सो कीलकनाम संहनन कहिए है। आगे फाटकसंहनन कहे हैं- जस्स कम्मस्स उदये अण्णोण्णमसंपत्तहड्डसंधीओ। णरसिरबंधाणि हवे तं खु असंपत्तसेवढें ॥२॥ यस्य कर्मण उदये अन्योन्यं असम्प्राप्तहड्डुसन्धयो भवन्ति, जिस कर्म के उदय परस्पर आनि मिली हाडहुकी सन्धि होय नर-शिराबद्धाः नर कहिए नले सिरा कहिए नाडी तिनकरि बंधो होय हाडकी सन्धि तत् खु असम्प्राप्तामृपाटिकम् , सो प्रकट असम्प्राप्तामृपाटिक कहिए। भावार्थ-जिस शरीर विपें हाडहुकी सन्धि ते मिली न होय, सब हाड जुदे जुदे होहि, अरु नले नाडी इनकरि बढ़ बंधे होंय सो फाटकशरीरसंहनन कहिए । आगे इन शरीरहुतें कौन-कौन गति होय सो कहै हैं- सेवट्टेण य गम्मइ आदीदो चदुसु कप्पजुगलो त्ति । तत्तो दुजुगलजुगले कीलियणारायणद्धो ति ॥८३॥ सूपाटि केन आदितः चतुःकल्पयुगलपर्यन्तं गम्यते । फाटकसंहननकरि आदित लेकरि चार स्वर्गहुके युगपर्यन्त जाइए हैं। ततस्तु द्वियुगले कीलकनाराचाभ्याम , तिसतें ऊपर दोय युगल अरु दोय युगलपर्यन्त कीलक अझ अर्धनाराचकरि जाइए यही क्रमकरि । भावार्थ--फाटकसंहननवालो जो बहुत शुभ क्रिया करे तो पहलेतें लेकर आठवें स्वर्गताई जाय । कीलकसंहननवालो पहलेतें बारहवें स्वर्गताई जाय । अरु अर्धनाराचवालो पहलेतें लेकरि सोलहवें स्वर्गताई जाय । गेविजाणुदिसाणुत्तरवासीसु जंति ते णियमा । तिदुगेगे संहडणे णारायणमादिगे कमसो ॥८४॥ नाराचादिकाः त्रिद्विकैकसंहननाः, जो नाराचादिक तीन दोय एक संहनन हैं, ते क्रमनः अवेयकानुदिशानुत्तरवासिषु नियमात् यान्ति, ते अनुक्रमतें नव ग्रंवेयक, नव अनुदिश पंच अनुत्तरविमानहु वि निश्चयकरि जाय हैं । भावार्थ-नाराच, वज्रनाराच अरु वर्षभनाराच इन तीनों संहननवाले जीव शुभ क्रियातें पहले स्वर्ग लेकरि नव वेयक ताई जाय । वननाराच अरु वर्षभनाराच इन दोनों संहननवालो जीव नव अनुदिश विमानताई जाय । वनवृपभनाराचसंहननवाली जीव पंच अनुत्तरविमान अम मोक्षपर्यन्त ताई जाय है । सण्णी छस्संहडणो वच्चइ मेघ तदो परं चावि । सेवट्टादीरहिदो पण-पण-चदुरेगसंहडणो ॥५॥ पटसंहननः संज़ी मेघां व्रजति. छह संदननसंयुक्त जुहै. सैनी जीव लो मेघा है नीमग नरक तहाँ ताई जाय । ततः परं चापि, तिसने आगे मृपाटिकादिरहिनाः पद-पद-पद्न्या- संहननाः स्फाटिकादिसंहननते रहित जु है पंच पंच चार एक मंहननने जमने नमर्ने अगले नरक ताई जाहि । फाटयसंहनन वाले जीव पापनियाने नीमरे नाय. ना जाद , १७ १३० कर्मप्रति बहुरि फाटक विना पाँच संहननवाले जीव पंचमे नरकनाई जादि । 'फाटक-नीलक विना चार संहननवाले जीव छटे नरकताई जाहि । पंचसंहननबिना वनगुगमनागवानी जीव मानव नरकताई जाहि। घम्मा वंसा मेघा अंजण रिटा तहेव अणिवजमा | छट्ठी मघवी पुढवी सत्तमिया माघवी णाम ॥८६॥ धर्मा वंशा मेघा अजना अरिष्टा तथैव अणिवा अनुवन्ध्या गटी मयी पुल्ची सममी माधवी नाम । पहले नरकको नाम घर्मा, दूसरे नरकको नाग वंशा, नीमरे नरकको नाम मेघा, चौथेको नाम अंजना, पंचमी अरिष्टा से ही अनादि काटने लेकर कादि नाम छठी नरकपृथ्वीका नाम मघवी कहिए, सातवीं पृथ्वीको नाग गायी माहिए। भावार्थ-नाम जु है मु दोय प्रकार होय-एक नो नाम मार्थकद, दुमगे गढ़ नाम है । तिसतें इन सातहु नरकको नाम रुढ़ कहे है। जो कोई पृष्ठ के वर्मा नाम पाले नरकका काहेते कहा ? ताको उत्तर-के रूट नाम है इनको अर्थ नरकाको नाही मिलं है । से हो अनादिकालतें रूढ़ि नाम सिद्धान्त विप कहे हैं। मिच्छापुचदुगादिसु सग-चदु-पणठाणगेसु णि यमेण । पढमादियाइ छत्तिगि ओघेण विसेसदो गेया ||८७|| मिथ्यात्वापूर्व द्विकादिपु सप्त-चतुः-पञ्चस्थानेषु मिथ्यात्व आदिक सात गुणस्थानविर्ष अरु अपूर्वकरणकी दोय श्रेणी तिनवि उपामश्रेणीके चार गुणस्थानविष आपकोणी पंच गुणस्थानवि, नियमेन प्रथमादिकाः पदव्येकाः संहननाः भवन्ति, निनाय करि अर, कमने प्रथमादिक संहनन छह तीन एक होहि । आधेन विशेषता शेया, सामान्यताकरि अग विशेषता करि । इस भाँति गुणस्थानवि छहों संहनन जानने । भावार्थ-पहले गुणस्थानतें लेकरि सातवें गुणस्थानताई छहों संहनन पाइए । अपूर्व- करणवि अनिवृत्तिकरण सूक्ष्मसाम्पराय उपशान्तकपाय इन विप वनवृपभनाराच, वन. नाराच, नाराच ये तीन संहनन पाइए। आपकश्रेणीमें पंच गुणस्थान-अपूर्वकरण अनिवृत्ति- करण सूक्ष्मसाम्पराय क्षीणकपाय सयोगिकेवली इनविपं एक वनवृपभनाराच ही संहनन पाइए । इस भांति सामान्यता करि कहे, विशेपकरि जानने । ए छह संहनन कहां कहाँ पाइए यह कह हैं- वियलचउके छ पढमं तु असंखआउजीवेसु । चउत्थे पंचम छ? कमसो विय छत्तिगेकसंहडणी ॥८॥ विकलचतुष्के पष्ठम् , द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय असेनी पंचेन्द्रिय इस विकलचतुष्क- वि स्फाटक संहनन होय । प्रथमं तु असंख्येयायु वितेषु पहलो जु है वनवृपभनाराचसंहनन सो जिन जीवहुको असंख्यात वरसकी आयु है। भावार्थ-भोगभूमियां कुभोगभूमियां मनुष्य-तिर्यंच अरु मानुपोत्तर पर्वततें आगे नागेन्द्रपर्वतपर्यन्त असंख्यातद्वीपनिविर्षे जे तिथंच तिनकी असंख्यात वर्षनिकी आयु है तिसतें इनके वज्रवृपभनाराच प्रथम संहनन होई । चतुर्थ-पञ्चम-पष्ठेषु पट-त्र्येकसंहननानि भवन्ति, चतुर्थकालविपें छहों संहनन होय । पंचमकालवि- अर्धनाराच कीलक स्फाटक ए तीन्यों संहनन होय । छठे कालवि स्फाटिक ही एक संहनन होय। ।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन १३२ सम्वविदेहेसु तहा विजाहर-मिलिच्छ मणुय-तिरिएसु । छस्संहडणा भणिया णगिंदपरदो य तिरिएसु ॥८६॥ सर्व विदेहेषु तथा विद्याधर-म्लेच्छमनुष्य-तिर्यक्षु पटसंहनना भणिताः, समस्त ही विदेहक्षेत्रवि, तैसे ही विद्याधरनिवि, म्लेच्छखंडके मनुष्य-तिर्यंचहु विपें छहों संहनन कहे हैं । नागेन्द्रपर्वतपरतः तिर्यक्षु च, नागेन्द्रपर्वतते परे तिर्यंच निविपें भी छहों संहनन होय । भावार्थ-मानुपोत्तरपर्वततें आगे नागेन्द्रपर्वततें उरें जितने द्वीप समुद्र हैं, तिनविपें तो वज्रवृषभनाराचसंहनन होय । परन्तु नागेन्द्र पर्वततें परें स्वयम्भूरमणसमुद्रपर्यन्त छहों संहनन जानने। अंतिमतिगसंहडणस्सुदओ पुण कम्मभूमिमहिलाणं । आदिमतियसंहडणं णत्थित्ति जिणेहि णिद्दिढ ॥१०॥ कर्मभूमिमहिलानां अन्तिमत्रिक संहननानां उदयोऽस्ति, कर्मभूमिके जु हैं स्त्री तिनके अन्तके तीन संहननको उदय है। भावार्थ-अर्धनाराच कीलक स्फाटिक ए तीन संहनन कर्मभूमिको स्त्रीनिके हो हैं। पुनः तासां आदिमत्रिकसंहननं नास्ति इति जिननिद्दिष्टम् । भावार्थ-कर्मभूमिकी स्त्रीनिके आदिके तीन संहनन न होय, यह वार्ता श्री वृपभनाथने दिखाई है। आगे नामकर्मकी और प्रकृति निको कहे हैं- पंच य वण्णा सेदं पीदं हरिदरुणकिण्णवण्णमिदि । गंधं दुविहं लोए सुगंधदुग्गंधमिदि जाणे ॥११॥ श्वेतं पीतं हरितं अरुणं कृष्णवर्ण इति पञ्च वर्णा भवन्ति । भावार्थ-जिस कर्मके उदय शरीरनिको श्वेतादिक पंच वर्ण होहि, ते पंच वर्ण प्रकृति जाननी । लोके गन्धो द्विविधः सुगन्धः दुर्गन्ध इति जानीहि । भावार्थ-जिस कमके उदय शरीरवि गन्ध हाय सो दोय प्रकार गन्धकर्म कहिए। तित्तं कडुय कसायं अंबिल महुरमिदि पंचरसणामं । मउगं कक्कस गुरुलघु सीदुण्हं णिद्ध रुक्खमिदि ॥१२॥ तिक्तं कटुकं कपायं आम्लं मधुरं इति पञ्चप्रकारं रसनामकर्म भवनि । तिक्त कहिए चिरपड़ा मिरचादि, कटुक निम्बादि, कपाय कसैला आमलादि, आम्ल खट्टा अन मलोनां यह पंच प्रकार रसनामकर्म जानना। भावार्थ-जिस कर्मके उदय पंच प्रकार रस होय सो रसनामक कहिए । मृदु कहां गुरु लघु शीतोष्णं स्निग्ध-रूक्ष मिति स्पर्शनाम अष्टविकल्पं भवति । मृदु कहिए कोमल. करमा कठोर, गुरु भारी, लघु हलका, शीत, उष्ण, स्निग्ध चिकना और रुक्ष रुखा यह आठ प्रकार स्पर्शकर्म जानना । भावार्थ-जिस कर्मके उदय कोमलादिक ए आठ प्रकार तो होहि, सो स्पर्शनाम कहिए। फासं अट्टवियप्पं चत्तारि आणुपुब्बि अणुकमसो। णिरयाणू तिरियाणू णराणु देवाणुपुब्बि ति ॥१३॥ - १३२ कर्मप्रति स्पर्शनाम अष्टविकल्पम पहिली गाथामें कया जुम्पया नी आठ प्रकार। आगे आनुपूर्वी कहिए है-नारकानुपूर्वी नियंचानुपूर्वी नगनुपूर्वी देवानुपूर्वी नि चाननः आनुष्य भवन्ति । भावार्थ-जिस कर्मक उदयन जिस गतिविप जानवाला जीरोग, निगगनधि ले जाहि सो आनुपूर्वी नाम कहिए । एदा चउदस पिंडा पयडीओ वणिदा समासेण । एत्तो अपिंडपयडी अडवीसं वाइम्यामि ||2|| एनाः चतुर्दश पिण्डप्रकृतयः सगासन वणिताः। एनटिक गरि कहीं। अतः अष्टाविंशतिः अपिछडप्रकृतीः वर्णयिष्यामि। भावार्थ- प्रकृति के रहे. अनन्तर अट्ठाईस प्रकार अपिडप्रकृति आगे हम नेमिचन्द्र कांग। अगुरुलहुग उववादं परघादं च जाण उम्सामं । आदावं उज्जो छप्ययडी अगुरुछयामिदि ।।६५|| अगुल्लघुकं उपघात परवानं च उच्छ्वास आनपं योनं पनाः पट प्रकलयः अगुरुपदक इति जानीहि । भावार्थ-जिस कमक उदय लोह के पिंकी ना न ना नले हो मिरे, और अर्कतृलकी नाईं ऊपरको जाय नाहीं सो अगुम्लत्रु नामकर्म कहिए । जिम मगर अब आम- घातको कर ऐसे बड़े सींग, बड़े स्तन, भारी उदर इत्यानि बुग्यदाई अंग हात मा उपचानकम कहिए । जिस कर्मके उदय और जीवको बात कर, से शृंग नाम जाट न्यादि अंग हानि, सो परवात नामकर्म कहिए। जिस कर्मक उदय उच्छ्वास होय, ना उत्राननागार्म करिए। आतप अरु उद्योत इन दोनोंका अर्थ आगिली गाथामें कहंगा। दन सह प्रानिको नाम अगुरुपटक जानना सिद्धान्त विपं । मूलुण्हपहा अग्गी आदावो होदि उण्हसहियपहा । आइच्चे तेरिच्छे. उहणपहा हु उज्जोवो ॥१६॥ मृलोणप्रभः अग्निः, मूल उष्ण होत संते प्रभा उण है जिसकी लो अग्नि कहिए । भावार्थ-मूल जिस विर्ष उष्णता है, अम प्रकाश करे है, सो तो अग्नि कहिए । उग्णसहितप्रभः आतपः भवति, उष्णतासहित है प्रभा जिसकी सो आतप है । भावार्थ-जाको मृल तो उष्ण न होय, पर प्रभा गरम होय सो आतप कहिए। स आदित्यादिपु भवति, सो आतपनामकर्मको उदय सूर्यके विम्बचिप है। भावार्थ-जिस कर्मका उदय मूल [ शीतल ] सो आनपनामकर्म सूर्यके विम्बमें जो एकेन्द्रिय पर्याप्त पृथ्वीकाय तिर्यंच हैं. तिनविर्ष उदयरूप पाइप है । जाते सूर्यविम्ब मूलते उष्ण नहीं, उष्णप्रभासंयुक्त है। इहाँ कोई प्रश्न करे है के आतपनामकर्मके उदयं तो सूर्य विम्बवि कह्यो तुमने, अग्निविपें उगता अरु प्रकाश यह किस कर्मके उदय है ? ताको उत्तर-कै थावरनामकर्म जु है सो पंच प्रकार है पृथ्वोकायादिभेदकारे । तिनमें अग्निकाय नामकर्म है, तिस कर्म के उदयकरि अग्निवि उष्णता अरु प्रकाश है । उष्णरहितप्रभ उद्योतः, उष्णतारहित प्रभा जिसकी सो उद्योत कहिए । भावार्थ-जिसकर्मके उदय गरम- रहित प्रभा होय, सा उद्योतनाम प्रकृति कहिए । सो उद्योत चन्द्रविम्बके पृथ्वीकाय एकेन्द्रिय तिर्यचनिवि पाइए, अरु जुगणूविप पाइए । ] प्रकृतिसमुत्कीर्तन १३३ तस थावरं च बादर सुहुमं पजत्त तह अपजत्तं । पत्त यसरीरं पुण साहारणसरीर थिरमथिरं ॥१७॥ सुह असुह सुहग दुव्भग सुस्सर दुस्सर तहेव णायव्वा । आदिज्जमणादिज्जं जसा अजसकित्ति णिमिण तित्थयरं ॥४८|| त्रसप्रकृति १ थावरप्रकृति २ वादरप्रकृति ३ सूक्ष्म ४ पर्याप्त ५ अपर्याप्त ६ प्रत्येकशरीर प्रकृति ७ साधारणशरीरप्रकृति ८ स्थिर : अस्थिर १० शुभ ११ अशुभ १२ सुभग १३ दुर्भग १४ सुस्वर १५ दुःस्वर १६ आदेय १७ अनादेय १८ यशाकीर्ति १९ अयशीत्ति २० निर्माण २१ तीर्थंकर २२ ए वाईस प्रकृति जानना। आगे इनको अर्थ कहे हैं-जिस कर्मके उदय द्वीन्द्रियादि जातिविपें जन्म होय, सो त्रसनामकर्म कहिए। जिसके उदय एकेन्द्रियजातिवि जन्म होय, सो थावरनामकर्म कहिए । जिस कर्म के उदय और करि घात्या जाय ऐसा थूल शरीर होय सो बादरनामकर्म कहिए । जिस कर्मके उदय और करि घात्या न जाय, सो सूक्ष्म नामकर्म कहिए । जिस कर्मके उदय आहार शरीर इन्द्रिय उच्छ्वास-निःश्वास भापा मन ये छह पर्याप्ति होय सो पर्याप्त नामकर्म कहिए। जिस कर्मके उदय कोई पर्याप्ति पूर्ण न कर पाये, अन्तर्मुहूर्तकाल ताईं रहे पाछे मरे सो अपर्याप्तनामकर्म कहिए । इहाँ कोई पूछे है कै अपर्याप्त अपर्याप्त अलब्धि पर्याप्त इनके भेदकरि जीव तीन प्रकार है । अपर्याप्तनामकर्मके उदय 'अलब्धपर्याप्त कहिए । अपर्याप्त जोव कौन कर्मके उदय कहावे है ? यहु कहो । ताको उत्तर- कै पर्याप्तजीव भी पर्याप्त नामकर्म के उदयतें कहा। कोई जीव पर्याप्त होना है जब नाई उस जीवकी सब पर्याप्ति पूरी नहीं हो है तब ताई वह जोव अपर्याप्त कहिए है। जब सब पर्याप्ति पूरी करे तब वही जीव पर्याप्त कहिए । तिसतें अपर्याप्त जीव पर्याप्त नामकर्मके उदयनं कहिए । अपर्याप्तनामकर्मके उदयतें अलब्धपर्याप्त होय है। जिसकर्मके उदयनं एक जीव भोगको कारण एक शरीर होय सो प्रत्येक शरीरनामकर्म कहिए। जिसकमके उदयन अनेक जीवहुके भोगको कारण एक शरीर होय सो साधारणनामकर्म कहिए। जिसकर्मके उदय सात धातु उपधातु अपने-अपने स्थानके विपें स्थिरताको करें सो स्थिरनामकर्म कहिए । जिसके उदय धातु-उपधातु स्थिरताको न करें सो अस्थिर नामकर्म कहिए । जाके उदय सुन्दर मनोज्ञ मस्तकादि भले अंग होय सो शुभनामकर्म कहिए । जाके उदय बुरे अंग हाय सो अशुभ नामकर्म कहिए । जाके उदय सबको प्रीति उपजे, सुखवंत होय सो सुभगनामकर्म कहिए । जाके उदय सबको बुरा लागै, दुखी-दरिद्री होय सो दुर्भगनामकर्म कहिः । जा कर्मके उदय भला स्वर होय सो सुस्वरनामकर्म कहिए । जाके उदय बुरा स्वर होय सो दुःस्वर- नामकर्म कहिए । जाके उदय प्रभासंयुक्त शरीर होय सो आदेयनामकनं कहिए । जाये उदय प्रभारहित शरीर होय, सो अनादेयकर्म कहिए । जाके उदय यश होय लो बहानामयम काहिए जाके उदय अपकीर्ति होय सो अयशनामकर्म कहिए । जा कर्म के उदय जागेको जागे प्रमाण लिए इन्द्रियादिकहुकी सिद्धि होय सो निर्माणनामकर्म कहिए । नो निर्माणनामकर्म दाय प्रकार होय-एक स्थाननिर्माण एक प्रमाणनिर्माण । जो चक्षुरादिक इन्द्रिय के स्थान निर्माच नो स्थाननिर्माण कहिए । जो इन्द्रियहुके प्रमाण करे सो प्रमाणनिर्माग काहिए । जा कम दर तीर्थकरपदकी विभूति होय सो तीर्थकरनामप्रकृति कहिए । आगे त्रसद्वादशक कहे हैं- तस वादर पज्जत्तं पत्त यसरीर धिर सुहं सुभगं । सुस्सर आदिज्जं पुण जसकित्ति निमिण तिथवरं ।

१३४ कर्मप्रकृति त्रस बादर पर्याप्त प्रत्येकदागर स्थिर शुभ मुभग मुस्वर आदेश गशःकानि निर्माण तीर्थकर इन बारह प्रकृतिको नाम त्रसद्वाददाक सिद्धान्त विपं का है। जहाँ कही 'म बारस' ऐसा कहें, तहाँ ए बारहु प्रकृति जाननी। आगे स्थावरदशक कहे हैं- थावर सुहुममपजत्तं साहारणसरीरमथिरं च । असुहं दुभग दुस्सर णादिज्ज अजसकित्ति ति ॥१००] स्थावर सूक्ष्म अपर्याप्त साधारण अस्थिर अशुभ दुर्भग दुःम्बर अनादेय अयशःकात्ति सिद्धान्त विपें इतनी प्रकृतिको नाम 'स्थावरददाक' कहिए है। इदि णामप्पयडीओ तेणवदी उच्चणीचमिदि दुविहं । गोदं कम्मं भणिदं पंचविहं अंतरायं तु ॥१०॥ इति नामप्रकृतयः विनवतिरक्ताः । पिण्डक भेदकरिए नामप्रकृति तेगण कही। गोत्रकर्म द्विविधं भणितम्-उजगोत्रं नोचगोत्रमिनि, एक ऊँच गोत्र एक नीच गोत्र इस भाँति दोय प्रकार गोत्रकर्म कयो। जिस कर्मके उदय लोकपूज्य ऊँच कुलवि जन्म होय सो ऊँच- गोत्र कहिए। जा कर्मके उदय लोक-निन्दनीक कुल विपं जन्म होय सो नीच गोत्र कहिए। यह दोय प्रकार गोत्रकर्म कह्यो । अन्तरायकर्म पंचप्रकार है ताहि कहिए.- तह दाण लाभ भोगुवभोगा वीरिय अंतरायमिदि णेयं । इदि सव्युत्तरपयडी अडदालसयप्पमा होति ॥१०२॥ तथा दान-लाभ-भोगोपभोग-वीर्यान्तरायं इति नेयम , यह पंच प्रकार अन्तरायकर्म जानहु । भावार्थ-जिस कर्मके उदय दीया चाहे अरु देय न सके सो दानान्तराय कहिए । जा कर्मके उदय लीया चाहै, पर लाभ न होय सो लाभान्तराय कहिए। जा कर्मके उदय भोग चाहे पर भोगको पावे नाहीं, सो भोगान्तराय कहिए । जा कर्मके उदय उपभोगको चाहे, पर उपभोग होय नाहीं सो उपभोगान्तराय कहिए। जा कर्मके उदय शक्तिको चाहै अरु बल न होय सो वीर्यान्तराय कहिए। इस प्रकार सर्व उत्तर प्रकृति एकसौ अड़तालीस है । सवको वर्णन कह्या। आगै नामकर्महुकी प्रकृति निको अन्तर्भाव दिखाये हैं- देहे अविणाभावी बंधण संघाद इदि अबंधुदया । वण्णचउकेभिण्णे गहिदे चत्तारि गंधुदया ।।१०३।। देहे अविनाभाविनौ बन्धन-संघातौ इति अवन्धोदयौ । देह जु है पंच प्रकार नामकर्म ताके वि बन्धन पंच प्रकार संघात पंच प्रकार अविनाभावी है, इस वास्ते इन्हें अबन्धोदय प्रकृति कहिए । भावार्थ-देह नामकर्म पंच प्रकार है, वन्धन संघात ए भी पंच प्रकार है। तिसतें जहाँ जिस देहका वन्ध उदय है तहाँ तिस देह सम्बन्धी बन्धन-संघातको बंध उदय होय है। जाते देह बन्ध उदय विना इनको बन्ध उदय न पाइए। तातें बन्धन संघातकी दश प्रकृति अबन्धोदय कहिए। इस वास्ते पंच शरीरवि ए दश प्रकृति गर्भित भई। वर्ण- चतुष्के अभिन्ने गृहीते चतस्रः बन्धोदयाः, वर्णचतुष्क जु है बीस प्रकृति ते अभेदविवक्षाकरि ग्रहे संते चार वन्धोदय प्रकृति कहिए।

प्रकृतिसमुत्कीर्तन १३५ भावार्थ-वर्णचतुष्ककी बीस प्रकृतिनिको बंध अरु उदय विपें जो भेद न करिए तो चार प्रकृति ग्रहणी, तातें सोलह प्रकृति अबन्धोदय कहिए । चार प्रकृति वन्धोदय कहिए । जातें इन चार ही प्रकृति निवि सोलह प्रकृति गर्भित भई, तातें बन्ध-उदयवि जुद्री न गिनिए, चार ही लीजे। आगै आगली गाथामें अबन्धोदय प्रकृति कितनी, ऐसा ठीक कहै हैं- वण्ण-रस-गंध-फासा चउ चउ इगि सत्त सम्ममिच्छन्नं । होति अवंधा बंधण पण पण संघाद सम्मत्तं ॥१०४॥ एताः अबन्धप्रकृतयः भवन्ति, ए अट्ठावीस प्रकृति अवन्ध हैं। कौन कौन ? वर्णाश्च- त्वारः, रसाश्चत्वारः, गन्ध एकः, स्पर्शाः सप्त, सम्यग्मिथ्यात्वं, बन्धनानि पञ्च, संघाताः पञ्च, सम्यक्त्वमि । वर्ण ४ रस ४ गन्ध १ स्पर्श ७ मिश्रमिथ्यात्व १ बन्धन ५ संघान ५ सम्य- क्त्वप्रकृति १ ए अट्ठावीस प्रकृति जाननी । भावार्थ-ए अट्ठावीस प्रकृति वन्धयोग्य प्रकृति नि विपें नाहीं गिनी हैं तात अबन्ध- प्रकृति कहिए। बन्धयोग्य प्रकृति कितनी, यह कहै हैं- पंच णव दोण्णि छब्बीसमवि य चउरो कमेण सत्तट्ठी । दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ वधपयडीओ ॥१०॥ एताः बन्धप्रकृतयः भणिताः। ये वन्धप्रकृतियाँ कही हैं। ते कौन कौन ? पन नव द्वे पड्विंशतिः चतस्रः क्रमेण सप्तपष्टिः । पञ्च । ज्ञानावरणीयकी ५ दर्शनावरणीयकी । वेद- नीयकी २ मोहनीयकी २६ नामकी ६७ गोत्रकी २ अन्तरायकी ५ ए सर्व एकसी वीस यन्ध- योग्य कहिए। भावार्थ-सर्व प्रकृति एक सौ अड़तालीस हैं, तिनमें बन्धप्रकृनि एक सौ बीस १२० जाननी। जातें मिथ्यात्व वि मिश्रमिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृतिमिथ्यात्व ये दोनों गर्मिन हैं 'बन्धादेगं मिच्छं' इस गाथामें पूर्व ही कहेके न्यायकरि । तात दोय प्रकृति न गिनी मोहकर्ममें वन्ध प्रकृति निविपें। और अभेदविवक्षाकरि पंच बन्धन, पंच संघात ये दनों प्रकृति भी वन्धप्रकृतिनिवि नहीं गिनी । जातें पंच शारीरके बन्ध-उदय साथ ही इन दनांका बन्ध-उदय है, तातें नामकर्ममें पंच शरीर ही विपें ये दसों प्रकृति गर्भित कही। और अभेद विवक्षाकरि वर्ण गन्ध रस स्पर्श इन चार प्रकृतिविपें वर्ण ४ रस ४ गन्ध : सर्गए मोला प्रकृति गर्भित भई, तातें ए सोलंहु प्रकृति बन्धप्रकृति विपं नाहीं गिनी। नामकर्ममें बन्धन संघातकी १० प्रकृति, वर्ण चतुष्ककी सोलह प्रकृति इन २६ प्रकृति विना नामकर्मकी नहमति ६७ प्रकृति जाननी । तातें मिनमिथ्यात्व, सन्यक्त्वप्रकृतिनिध्यात्व, बन्धन ५ मंबान ५ वर्णचतुष्ककी १६ इन अट्ठावीस प्रकृति विना १९० प्रकृति बन्ध-योन्य जाननी । आगे उदयप्रकृति फितनी यह कहे हैं- पंच णव दोणि अट्ठावीसं चउरो कमेण सत्तट्टी। दोणि य पंच य भणिया एदाओ उदयपयडीओ ॥१०६|| ।

१३६ कर्गप्रकृति एता उदयप्रकृतयः भणिनाः, जननी या निमितान्न विष का कौन-कौन ? ज्ञानावरणीयकी ५ दर्शनावरणीयकी । वेदनीयको २ गोहनीयकी २८ आयुकी ४ नामकी ६० गोत्रकी २ अन्तरायकी '५ ये एक मी वात्रीम उदयपानि जाननी । भावार्थ-जितनी बन्धप्रकृति नही पूर्व गाथा, निननी ही आगप्रति जाननी । पर विशेप इतनी-वहाँ २६ प्रकृति गोहकी ग्रही, वहाँ अट्टाईम । जात पानगाहको प्रकृति उदयकालवि जुदी-जुदी उदय होय है । निसनं उदयप्रति १२२ जाननी । आगे भेद-अभेद विवक्षाकरि बन्धनानि उन्यप्रानि किननी है, यह मां-- भेदे छादालसयं इदरे बन्धे हवंति वीसमयं । भेदे सव्ये उदये बावीस सयं अभेदम्हि ।।१०७|| भेदे बन्धे पट्चत्वारिंशाच्छनं प्रकृतयः भवन्ति, मंद बनविण ११६ प्रनि होय है। भेदे उदये सर्वाः, भेद-उदयविप १४८ प्रकृति होय है। अभेदोदय द्वाविशन्युनरातम , अभदो- दयविप १२२ प्रकृति होय है। [ अभेदे बन्धे विडत्युत्तरदानं प्रकृतयः भवन्नि ] अभेदयन्ध में एक सौ बीस प्रकृति होय हैं। भावार्थ-बन्धन ५ संघात ५ वर्णचतुष्ककी १६ इन नंयुक्त १४६ वन्धप्रकृनि जाननी । भेदविवक्षाकरि मिश्रमिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृति मिथ्यात्व इन धिना । इहां कोई प्रश्न कर है के भेदविवक्षाकरि १४६ बन्धप्रकृति कही, १४- किस वाम्ते न कही ? मिश्रमिथ्यात्व, सन्य. क्त्वप्रकृतिमिथ्यात्व इन संयुक्त ? ताको उत्तर के दशं नमोहके बन्ध होते अकेला मिथ्यात्व ही बंधे हैं। 'जतेण कोदवं वा इस गाथाके न्यायकरि । उदयकालविर्ष नोन प्रकार होय है तातें भेदकरि १४६ बन्धप्रकृति कहीं। बन्धन ५ संवात ५ वर्ण चतुरुकी ५६ इनको बन्ध भी होय है, उदय भी होय है, बन्धन-संघात बन्ध उदय शरीरनामकर्मके साथि हो है। सस रस गन्ध वर्ण इन चारके गहेते वे सोलह आवे हैं, तातें अभेदबन्धमें १२० कही, भेदयन्धमें १४६ कही। मिश्रमिथ्यात्व, सम्यक्त्वप्रकृतिमिथ्यात्व ए जु दोनों बन्धमें नाहीं, तात इन विप भेद-अभेदविवक्षा नाहीं । बन्धन-संघात १० वर्णचतुष्ककी १६ इनमें भेदविवक्षा जाननी । आगें आगिली गाथामें सत्ताप्रकृति कितनी यह कह हैं- पंच णव दोण्णि अट्ठावीसं चउरो कमेण तेणवदी। दोण्णि य पंच य भणिया एदाओ सत्तपयडीओ ॥१०॥ क्रमेण एताः सत्त्वप्रकृतयः भणिताः, यथाक्रम ए सत्ताप्रकृति सर्वज्ञदेवने कही हैं। ते कौन कौन ? ज्ञानावरणीयको ५ दर्शनावरणीयकी ९ वेदनीयकी २ मोहनीयकी २८ आयुकी ४ नामकी ९३ गोत्रकी २ अन्तरायकी ५ ये एक सी अडतालीस सत्ताप्रकृति जाननी। जो कर्मको अस्तित्व सो सत्ता जाननी । अस्तित्व सब ही प्रकृति निको है तातें १४- सत्ता प्रकृति कहीं। आगें वातिया कमेनिवि देशघातियाकी कितनी प्रकृति सर्वघातिया कितनी प्रकृति , - यह कहे हैं- केवलणाणावरणं दंसणछक्क कसायवारसयं । मिच्छं च सव्यघादी सम्मामिच्छं अबंधम्मि ॥१०६।। एताः प्रकृतयः सर्वघातिन्यः, इतनी प्रकृति सर्वघातिया कहिए । से कौन-कौन ? केवलज्ञानावरण १ एक, केवलदर्शनावरण १ निद्रादि पंच ५, बहुरि अनन्तानुबन्धी चतुष्क ४, १ प्रकृतिसमुत्कीर्तन १३७ अप्रत्याख्यानचतुष्क ४ प्रत्याख्यानचतुष्क ४ ये कपायद्वादशक, बहुरि एक मिथ्यात्व । अबन्ध सम्यग्मिथ्यात्व और उदय-सत्तावि सम्यग्मिथ्यात्व सर्वघाती है । जातें दर्शनमोहके बन्ध- वि मिथ्यात्व ही बंधे है, तातें उदय-सत्तावि सर्वघाती है। इस प्रकार २१ प्रकृति सर्व घातिया कहीं। आगे छठवीस प्रकृति देशघातिया कहै हैं- णाणावरणचउक्क तिर्दसणं सम्मगं च संजलणं । णव णोकसाय विग्धं छब्बीसा देसघादीओ ॥११॥ ज्ञानावरणचतुष्कं मतिश्रुतावधिमनःपर्ययज्ञानावरणानि यह ज्ञानावरणचतुष्क जानना। त्रिदर्शनं चक्षुरचक्षुरवधिदर्शनानि यह तीन प्रकार दर्शनावरण । सम्यक्त्वं च, बहुरि सम्यक्त्वप्रकृतिमिथ्यात्व, संज्वलनं संज्वलन क्रोध मान माया लोभ यह संज्वलनचतुष्क, नव नोकपाय हास्य रति अरति शोकादि ए नव नोकपाय, विघ्नानि पञ्च दानान्तराय लाभा- न्तराय भोगान्तराय उपभोगान्तराय वीर्यान्तराय यह पाँच प्रकार अन्तरायकर्म जानना । एताः पड्विंशतिः प्रकृतयः देशघातिन्यः, ए छब्बीस प्रकृति देशघातिया जानना । भावार्थ -जो प्रकृति आत्माके सर्व गुणको घाते ते सर्वघातिया कहिए । जे प्रकृति गुणके एक देशको घातें ते देशघातिया होय । आगे विशेषकरि कहै हैं-सर्व केवलज्ञानगुणके आच्छादनेंतें केवलज्ञानावरणीय सर्वघाती है। सर्व केवलदर्शनगुणके आवरणते फेवल- दर्शनावरण अरु पंच निद्रा ए सर्वघातिया हैं। यहां जो कोई प्रश्न करे-के पंच प्रकार निद्राकर्म तुमने सर्वघाती कहे सो इन पंच प्रकारमें किन ही एक निद्राको उत्कृष्ट विपाक है कै नाही ? एकको जघन्य विपाक है, इनमें बहुत भेद है। ए सर्वे सर्वघातिया कही सु किस कारणते ? जिनके जघन्य विपाक हैं ते देशघातियामें कही होती ? ताको उत्तर-जिसकाल निद्राकम उत्कृष्ट वा जघन्य उदय है, ता काल आत्माके सर्व दर्शनको आच्छादे है । प्रचला. निद्रा सवतें जघन्य है, जब इसका भी उदय है, तब आत्माके दर्शनगुण प्रगट नाही पाइए है । ताते पंच हु निद्रा सर्वघातियाकर्म कही। सकलचारित्रगुणके आच्छादन अन- न्तानुबन्धोचतुष्क अप्रत्याख्यानचतुष्क प्रत्याख्यानचतुष्क ए चारह प्रकृति सर्वघाती है । जाने अनन्तानुबन्धीचतुष्कके उदय सकलचारित्र नाहीं है, अप्रत्याख्यानके उदय होते सरलचारित्र नाहीं । अरु प्रत्याख्यानके भी उदय होते सकलचारित्र नाहीं तातें सकलचारित्रगुणको आपछादे है सो सर्वघाती कहिए । संज्वलनचतुष्क नव नोकपाय ए चारित्रके एकदेशको आच्छाद हैं. जाने इन तेरह प्रकृति के उदय होते सकल चारित्र पाइए है, तातें ए तेरह प्रकृति देशघातो आगिली गाथामें कहिजो। इहाँ कोई प्रश्न करे के तुम पूर्व ही यो कही है जो सर्वगुणको आहाद सो सर्वघाती है, जो गुणके एक देशको आच्छादै सो देशघाती है। ददाँ आरमारे, यथाख्यातचारित्र गुण ही सर्व है, इसको संचलनचतुष्क अरु नव नोकपाय ए आन्छाद है. ताते ए तेरह प्रकृति सर्वधातिया कहो, और अनन्तानुबन्धी आदि वार, प्रकृति देवापानी कहो ? ताको समाधान-के आत्मामें चारित्रनाम गुण है. निस चारित्रकी नानिको अनन्तानुवन्धी आदि बारह कपाय आच्छादै है, ताहीकी देशमणिको मंचनन अर नोकपार आच्छाद है, तातें चारह कपायके गये सकल चारित्र होय है। चयाख्यानमाभित्रको यह जानना-जैसा शुद्धात्मावि चारित्रगुण कहा है तैसा हो होना नायो नाम यथान्यात कहिए। बारह प्रकृतिके गये सकरचारित्र कहिए है. यथाव्यानरूप नाही. जाते देशानि आच्छादित है। जब तेरह वे भी जाय हैं तब वहीं सपालचारित्र पपायावरच १८ १३८ कर्मप्रकृति तातें आत्मावि चारित्रगुण जानना। यथान्यात चारित्र मा जो कहिप है मो सकल- चारित्रकी अपेक्षाकरि; जाने सकल प्रधानगुण आच्छादनान मियान्य गर्व वानी जानी, जाते याके उदय आत्माका यथार्थ श्रद्धानम्प सम्यग्दर्शनगुण प्रगट नाही हाय है। मिश्र- मिथ्यात्व भी सर्वघाती है, जान मिश्रमिथ्यात्वक उदय असत्य पदार्थ विप समान श्रद्धान है, तातें मिश्रमिथ्यात्व जात्यन्तर सर्वघाती कहिए। एकवीस प्रति हम भाँनि सर्ववानी जाननी। आगे देशघातीनिकी विशेषता को है-गनिशान शुनसान अवधिमान मनापर्यय- ज्ञान ये ज्ञानके अंश हैं, तातें इनको जे प्रकृति आच्छाद ते दायानी कहिए। चक्षुदर्शन अचक्षुदर्शन अवधिदर्शन ये दर्शन गुणके अंश है, इनके आच्छादनेन चक्षदर्शनावरणीय अचक्षुदर्शनावरणीय अवधिदर्शनावरणीय देशवानिया कहिए । जाने सम्यक्त्वप्रति मिथ्या- त्वका चतुर्थगुणस्थानतें सप्तमगुणस्थान नाई उदय है, सम्यक्त्वको मलिन कर, नाश नाही कर है, तानं सम्यक्त्वगुणके देश आच्छादन सम्यक्त्यप्रकृनिमियान्य देशवानी जानना । जाने चारित्रके देशको आच्छादै है, ताने संज्वलनचतुष्क देशवानी कहिए | जाने अन्तराय कर्म जीवके वीयगुणके देश ही को आच्छाद है, सर्व वीर्यगुण वान वेको असमर्थ है, नान अन्तरायकर्मको पंच प्रकृति देशवातिया काहिए। इस भाँति वाम प्रकृति देशवानी कही। आगे एकसी अड़तालीस प्रकृति निमें कितनी प्रशाम्न हैं. कितनी अप्रशम्न है. यह भेद कहनेको प्रथम ही अप्रशस्त प्रकृति कहे हैं-प्रशस्त नाम भली प्रकृतिका है, अप्रझम्न बुरी प्रकृतिका नाम है। सादं तिण्णेवाऊ उच्चं सुर-णर दुगं च पंचिंदी । देहा बधण संघादंगोवंगाई वण्णचऊ ॥१११।। समचउर बजरिसहं उवघाण गुरुङक सग्गमणं । तसवारसट्ठसठ्ठी वादालमभेददो सत्था ॥११२॥ सातं सातावेदनीय, त्रीणि आयूंपि देवायु मनुष्यायु तियंचायु ये तीन आयुकर्म, उचं ऊंचगोत्र, नर-सुरद्विकं मनुष्यगति मनुष्यगत्यानुपूर्वी देवगति देवगत्यानुपूर्वी, पन्नेन्द्रियं पञ्चेन्द्रियजाति, देहाः पञ्च औदारिकारीर वैक्रि यिकारोर आहारकारीर तेजसझरीर कार्मण- झरीर यह पंच प्रकार शरीर, बन्धनानि पञ्च औदारिकवन्धन बैंक्रियिकवन्धन आहारकवन्धन तैजसवन्धन कार्मणवन्धन यह पंच बन्धन, संघातानि पञ्च औदारिकसंघात बैंक्रियिक- संघात आहारकसंघात तैजससंघात कार्मणसंघात यह पंचसंघात, आंगोपांगानि त्रीणि औदारिकांगोपांग बैंक्रियिकांगोपांग आहारकांगोपांग यह तीन प्रकार आंगोपांग, वर्णचतुष्क शुभवर्ण शुभरस शुभगंध, शुभस्पर्श यह वर्णचतुष्क, समचतुरस्रं समचतुरस्र संस्थान, वन्न. वृपभं वज्रवृपभाराचसंहनन, उपघातोनागुरुपटकं उपघात-प्रकृतिविना अगुरुपटककी पंच प्रकृति, अगुरुलघु १ परवात २ उच्छ्वास ३ आतप ४ उद्योत ५ एवं पंच प्रकृति, सद्वादशक त्रस १ बादर २ पर्याप्त ३ प्रत्येक ४ स्थिर ५. शुभ ६ सुभग ७ सुस्वर ८ आदेय : यशःकीर्ति १० निर्माण ११ तीर्थकर १२ ये उस बारह; एताः अष्टपष्टिः प्रकृतयः शस्ताः भवन्ति ये अड़सठ प्रकृति प्रशस्त है, इनको नाम पुण्य प्रकृति कहिए। द्विचत्वारिंशत् प्रकृतयः अभेदविवक्षायां शम्ताः ये बयालीस प्रकृति प्रशस्त जाननी। जातं वर्णचतुष्ककी वीस प्रकृति अभेदविवक्षामें चार गिने हैं। अझ वन्धन-संघातकी दश प्रकृति पंच देह वि गर्भित हैं, तातें इन छब्बीस प्रकृतिविना अभेदविवक्षातें बयालीस जाननी ।

. प्रकृतिसमुत्कीर्तन १३९ आगे अप्रशस्त प्रकृति कहैं हैं- घादी णीचमसादं णिरयाऊ णिरय-तिरिय दुग जादी । संठाण-संहदीणं चटु पण पणगं च वण्णचऊ ॥११३॥ उवधादमसग्गमणं थावरदसयं च अप्पसत्था हु । वंधुदयं पडि भेदे अडणवदि सयं दु चदुरसीदिदरे ॥११४॥ घातीनि चत्वारि चार घातियाकर्म अप्रशस्त हैं, ज्ञानावरणकी ५ दर्शनावरणकी ९ मोहनीयकी २८ अन्तरायकी ५ ये घातियानिकी ४७ प्रकृति, नीचं नीचगोत्र, असातं असाता- वेदनीय, नरकायुः नारक-आयु, नरकद्विकं नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी, तिर्थन्द्विकं तियचगति तिर्यंचगत्यानुपूर्वी, जातयश्चतस्रः एकेन्द्रिय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय यह चार प्रकार जाति, संस्थानानि पञ्च-न्यग्रोधपरिमंडल स्वाति कुजक वामन हुंडक ये पंच संस्थान, संह- ननानि पञ्च-वज्रनाराच नाराच अर्धनाराच कीलक सुपाटिक ये पंच संहनन, वर्णचतुष्क अशुभवर्ण ५ अशुभगन्ध १ अशुभरस ५ अशुभस्पर्श ८ यह वर्ण चतुष्क, उपघातं उपघात, असद्गमनं अप्रशस्तगति, स्थावरदशकं स्थावर १ सूक्ष्म २ अपर्याप्त ३ साधारण ४ अस्थिर ५ अशुभ ६ दुर्भग ७ दुःस्वर ८ अनादेय ६ अयशःकीत्ति १० ये स्थावर दशक, एताः अप्रशस्नाः ये १०० प्रकृति अप्रशस्त जाननी, । एताः वन्धोदयौ प्रति भेदेन अष्टनवतिः शतं च भवन्ति ये ही अप्रशस्तप्रकृति बन्ध अरु उदयप्रति भेदविवक्षाकरि अट्ठानचे अम सी होय है । भावार्थ- भेद बन्धवि ६८ भेदोदय विपं १०० अप्रशस्त प्रकृति हैं, जातें बन्धकालवि दर्शनमोह मिथ्यात्वरूप ही बन्ध है तातें मिश्रमिथ्यात्व सम्यक्त्वप्रकृति मिथ्यात्व इन दोय विना अट्टान प्रकृति भेदबन्धवि कहीं, जातें उदयकालविपं दर्शनमोह त्रिधारूप उदय है तात भेदोदयविप एकसौ १०० प्रकृति कहीं। इतरे द्वयशीतिः चतुरशीतिश्च भवन्ति, अरु एई प्रकृति इतर अभेद- विवक्षावि बयासी अरु चौरासी हैं। भावार्थ-अभवन्धवि ८२ अभेदोदयविप ८ एई अप्रशस्त प्रकृति होय हैं, जाते अभेदविव झामें वर्ण चतुककी २० प्रकृनिविप लांजे, अर बन्धकालवि दर्शनमोहमें मिथ्यात्व हो है तातें २ प्रकृति विना अभेद बन्धविप ८२ कहा। अरु अभेदोदयवि जातें दर्शनमोहकी ३ उदय हैं, तातें वर्णचतुष्कको १६ विना ८४ कहा। आगे कपायका कार्य कहे हैं- पढमादिया कसाया सम्मत्त देस-सयलचारित्त । जहखादं घादंति य गुणणामा होति सेसा वि ॥११५।। यतः प्रथमादिकपायाः जातें प्रथमको आदि लेकरि कपाय सम्यक्त्यं देवा-मकलकारि यथाख्यातं घ्नन्ति, सम्यक्त्व देशचारित्र सकलचारित्र चधाग्यान इनहिं हन है. मन गुण. नामानः भवन्ति, ताते ये कपाय गुणनाम हैं यधागुण नया नाम हैं। भावार्थ-अनन्त मिथ्यात्वं अनुवनन्तीत्यनन्तानुवन्धिनः जाने मन्यान्यनुनको पान अनन्त मिथ्यात्वको बन्ध है तातें अनन्तानु बन्धो कहिए । अईपन नंगमं करतीन्याया- नकपायाः जातें देशसंयमको हिंसहि हैं तातें अप्रत्याख्यानकपाय यहिए। प्रतापान कार न्तीति प्रत्याख्यानकपायाः जातें सफल चमको हिने हैनाने प्रत्यायानपान करान समं एकीभूत्या बलन्नि संध्यलनाः, जाने यमाग्न्यातनंयमको दिन .. मरम्बार होय करि दैदीप्यमान हैं तातें संचलनकपाय काहिए। इस प्रकार धागुन नमा कर्मप्रकृति १४० शेपाः अपि गुणनामानः भवन्ति, शेप जो है. हास्यादि नव नोकगाय सो भी गुणनाम है जाने जो हास्यको प्रगट करे, सो हास्य वेदनीय है, इसी भाँति अन्य भी जाना इस प्रकार एफसी अड़तालीस प्रकृति समस्त ही यथागुण तथा नाम जाननी । आगे संज्वलन आदिक चार कपायको वासनाकाल कहिए- अंतोमुहुत्त पक्खं छम्मासं संखऽसंखऽणंतभवं । संजलणमादियाणं वासणकालो दु णियमेण ॥११६|| संज्वलनादिकानां वासनाकालः संचलनादि लेकरि जी है कपाय निनका वामनाकाल अन्तर्मुहून पक्ष पण्मासं संस्थातासंख्यातानन्तभवान्तं नियमेन, अन्नमुहर्न, एकपल, छामास संख्यात असंख्यात अतन्त भव निश्चयकरि यथाक्रम जानना । भावार्थ:-कर्मोदय के अभाव होते संते जो कर्म-संस्कार गई है. नाको नाम वासनाकाल कहिए । जैसे काहू वस्तु ऊपर पुष्प राखि जो उठाय लोजे, वहाँ वासना कछुकाल नाई गई है, तैसे कपायकर्मके उदय होय गये भी केतक कालनाई संस्कार र सो वासना कहिए है । संज्वलनका वासनाकाल अन्तर्मुहर्त जानना। प्रत्याख्यानका बासनाकाल एक पक्ष है। अप्रत्याख्यानका वासना काल पद मास है । अनन्तानुबन्धीका बासनाकाल मंग्यातभव वा असंख्यातभव वा अनन्तभव ताई जानना। आगें पुद्गलविपाकी प्रकृति कहे हैं- देहादी फासंता पण्णासा णिमिण ताव जुगलं च । थिर-सुह-पत्तेयदुर्ग अगुरुतियं पोग्गलविवाई ॥११७|| देहादि-स्पर्शान्ताः पञ्चाशत् प्रकृतयः, देहनामकर्मको आदि लेकरि स्पर्शनामकर्मताई पचास प्रकृति । ते कौन हैं ? देह ५ बन्धन ५ संघात ५ संहनन ६ संस्थान ६ आंगोपांग ३ वर्ण ५ रस ५ गन्ध २ स्पर्श ८ एवं ५० । निर्माणं निर्माणप्रकृति, आतपयुगलं च आतप १ उद्योत २ । स्थिर-शुभ-प्रत्येकद्विकं स्थिर १ अस्थिर २, शुभ १ अशुभ २, प्रत्येक साधारणद्विक २, अगुन- त्रिक अगुरुलघु १ उपघात २ परघात ३ यह अगुरुत्रिक; एताः पुद्गल विपाकिन्यः ये बासठ प्रकृति पुद्गलविपाकी जाननी। पुद्गलके विपें विपाक रस है जिनका ते पुद्गलविपाकी प्रकृति कहिए। देहनामकर्मके उदयतें देह होय है, सो देह पुद्गलमयी है, ताने देहनामकर्म पुद्गल विपाकी है । या भाँति इन बासठ प्रकृतिनिका विपाक पुद्गल विप जानना । आगे भवविपाकी क्षेत्रविपाकी जीवविपाकी कर्म कहे हैं- आऊणि भवविवाई खेतविवाई य आणुपुव्वीओ। अत्तरि अवसेसा जीवविवाई मुणेयवा ॥११८|| आयूंपि भवविपाकोनि, नरकायु तिथंचायु मनुष्यायु देवायु वे चार भवविपाकी कहिए हैं, जातें इनका भव कहिए पर्याय सोई विपाक है आयुके उदय पर्याय भोगिए हैं, ताते आयु- कम भवविपाको कहिए । क्षेत्रविपाकीनि आनुपूर्याणि, नरकानुपूर्वी तिर्यगानुपूर्वी मनुष्यानु- पूर्वी देवानुपूर्वी ये चार आनुपूर्वी क्षेत्रविपाकी हैं, जातें इनका विपाक क्षेत्र है तातें क्षेत्र- विपाकी हैं । अवशिष्टानि अष्टसप्ततिः जीवविपाकीनि, पुद्गलविपाकी भवविपाकी क्षेत्रविपाकी पूर्व कहे जे कर्म एक सौ अड़तालीस प्रकृतिमध्य तिनतें बाकी रहे जे अठहत्तरि कर्म ते जीव- विपाकी कहिए। १ स्थितिबन्ध १४१ आगे ते जीव विपाकी कर्म आगिली गाथामें नाम लेकर कहै हैं- वेयणिय गोद घादीणेकावणं तु णामपयडीणं । सत्तावीसं चेदे अत्तरि जीवविवाईओ ॥११।। वेदनीय-गोत्र-घातीनि एकपञ्चाशत् , सातावेदनीय असातावेदनीय २ उच्चगोत्र नीचगोत्र २ घाति याकर्म ज्ञानावरण ५ दर्शनावरण : मोहनीय २८ अन्तराय ५ ये इक्यावन ५१ । नामप्रकृतीनां सप्तविंशतिश्च नामकर्मकी प्रकृति निवि सत्ताईस प्रकृति २७ इति अष्टसप्ततिः जीव विपाकिन्यः भवन्ति ये अठहत्तरि प्रकृति जीवविपाकी होहिं, जातें इनके उदय दुःख-सुख, ऊँच-नीच, ज्ञानावरणादि नारकादि पर्यायरूप जीवके ही परिणाम होहिं तातें जीव विपाकी ए प्रकृति कहिए। आगें नामकर्मकी सत्ताईस प्रकृति जीवविपाकी कौन-कौन, यह नाहीं जानिए है, इनके जानवेको गाथा कहिए है- तित्थयरं उस्सासं बादर पजत्त सुस्सरादेज्ज । जस-तस-विहाय-सुभगदु चउ गइ पणजाइ सगवीसं ।।१२०॥ तीर्थकर उच्छ्वासं बादर-पर्याप्त-सुस्वराऽऽदेय-यशस्त्रस-विहायः सुभगद्विकम् , तीर्थकर १ उच्छ्वास २ बादर ३ सूक्ष्म ४ पर्याप्ति ५ अपर्याप्ति ६ सुस्वर ७ दुःस्वर ८ आदेय : अनादेय १० यश-कीर्ति ११ अयशःकीर्ति १२ त्रस १३ स्थावर १४ प्रशस्तगति १५ अप्रास्तगति १६ सुभग १७ दुर्भग १८ चतस्रः गतिः चार गतियाँ, पञ्च जातयः पाँच जातियाँ इति सप्तविंशतिः ए सत्ताईस प्रकृति नामकर्मकी जीवविपाकी जाननी । आगे ए सत्ताईस प्रकृति और क्रमकरि गाथामें कह हैं- गदि जादी उस्सासं विहायगदि तसतियाण जुगलं च । सुभगादी चउजुगलं तित्थयरं चेदि सगवीसं ॥१२१॥ गतयश्चतस्रः गति चार, जातयः पञ्न जातियाँ पाँच, उच्छ वामं उन्हवास एक.. बिहा- योगति-सत्रयाणां युगलं च प्रशस्त अप्रशस्त विहायोगति २. स-स्थावर २. सूक्ष्म-यावर २, पर्याप्त-अपर्याप्त २ यह सत्रिकका युगल, सुभगादिचतुर्णा युगलं सुभग-दुर्भग २ मुम्बर दुःस्वर २, आदेय-अनादेय २, यश कीर्ति-अयशःकोत्ति २ यह सुभगादि-चतुष्कका युगल. तीर्थकरं तीर्थंकरप्रकृति इति सप्तविंशतिः ए सत्ताईस प्रकृति नामकर्मको जाननी दर्ग गाथाके क्रमकरि। ये समस्त प्रकृतिबन्ध समान भया। आगे स्थितिबन्ध कहें हैं । प्रथम ही मूलप्रकृतिनिकी स्थिनि कहिमा है - तीसं कोडाकोडी तिघादि-तिदयेसु वीस णाम-दुगे। सत्तरि मोहे सुद्धं उवही आउस्स तेत्तीसं ॥१२२॥ त्रिघातित्रितयेषु निंदान् कोटाकोटो अधयः तीन पानी ज्ञानावर वनावर राय अरु तीसरा कर्म कहिए वेदनीय इन चार कर्म विधिनि नाम मात्रामा नामद्विके विंशतिः नाम-गोत्रकर्मविप वीस कोडामाड़ो मागरम पिक है। मन:

, १४२ कर्गप्रकृति मोहनीयकर्म विपं सत्तर कोडाकोडी सागर उत्कृष्ट स्थिति है । आयुपि गुदा त्रग्निशन । आयु- कर्मकी उत्कृष्ट स्थिति शुद्ध तेतीस सागर जाननी । आगे उत्तरप्रकृति निको स्थिनिबन्ध कहे हैं- दुक्ख-तिघादीणोघं सादित्थी-मणुदुगे तदद्धं तु । सत्तरि दंसणमोहे चरित्तमोहे य चत्तालं ॥१२३।। दुःख-त्रिघातिनामोधवत् , दुःख कहिए असानावेदनीय और नाग घानिया ज्ञानावरण ५ दर्शनावरण ६ अन्तराय ५ इन वास उत्तरप्रऋतिनिको स्थितिबन्ध उगट ओवचन कहिण मूलप्रकृतिकी नाई तीस कोडाकोडी जानना । तु साना-न्त्री गगुप्यद्रिकेषु नदम मानावेदनीय १ स्त्रीवेद २ मनुष्यगति ३ मनुष्यगत्यानुपूर्वी ४ इन चार प्रनिनिवि नदर्धम करिए पहिली प्रकृतिनिकी स्थितिते आधी जाननी अर्थात् १५. कोडाको सागर उत्कृष्ट स्थिनिवन्ध है। सप्ततिर्दर्शनमोहे, दर्शनमोह विप सत्तर कोडाकोडीको स्थिति है। चारित्र मोहे. चत्वारिंशत , चारित्रमोह विपें चालीस कोडाकोडी उत्कृष्ट स्थितिबन्ध है । संठाण-संहदीणं चरिमस्सोघं दुहीणमादि ति । अट्ठरस कोडकोडी वियलाणं मुहुमतिण्हं च ॥१२४|| संस्थान-संहननानां चरमस्य ओघवत , संस्थान-सहननके मध्य जो अन्नको हुंडक- संस्थान अरु फाटकसंहनन ताकी उत्कृष्ट स्थिति मूल नामकर्म प्रकृनियन बीस कोडाकोडी सागरकी जाननी । द्विहीनं आदिपर्यन्तम , बहुरि आदिके संहनन-संस्थाननाई दोय कोडाकोडी हीन बाकी संस्थान-संहननकी स्थिति जाननी । भावार्थ-वामनसंस्थान कीलकमंहनन इनकी स्थिति अठारह कोडाकोडीसागर, कुजकसंस्थान अर्धनागसंहनन इनकी स्थिति सोलह कोडाकोडी सागर, स्वातिकसंस्थान नाराचसंहननकी स्थिति चौदह कोडाकोडी. सागर, न्यग्रोधपरिमंडलसंस्थान बज्रनाराचसंहनन इनकी स्थिति बारह कोड़ाकोडी सागर, समचतु- रस्त्रसंस्थान वनवृपभनाराचसंहनन इनकी स्थिति दश कोडाकोडी सागर जाननी । विकलत्र- याणां सूक्ष्मत्रिकाणां च अष्टादश कोटीकोट्यः, विकलत्रिक द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रियजाति, सूक्ष्मत्रिक सूक्ष्म १ पर्याप्त २ साधारण ३ इन छहों प्रकृति निकी उत्कृष्ट स्थिनि अठारह कोडा- कोडी सागरकी जाननी। अरदी सोगे संढे तिरिक्ख-भय-णिरय-तेजुरालदुगे। वेगुवादावदुगे णीचे तस-वण्ण-अगुरु-तिचउक्के ॥१२५॥ इगि-पंचिंदिय-थावर-णिमिणासग्गमण-अथिरछकाणं । वीसं कोडाकोडी सागरणामाणमुक्कस्सं ॥१२६॥ अरतौ शोके पण्डे अरतिकर्मवि १ झोकवि २ नपुंसकवेदवि ३ तिर्यग्भय-नारक- तैजसौदारिकद्विके तिर्यग्गति तिर्यग्गत्यानुपूर्वी नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी, भय-जुगुप्सा, तैजस-कार्मण, औदारिकशरीर औदारिकांगोपांग, इन पंच द्विकवि, वैक्रियिकाऽऽनपद्विके वैक्रियिकशरीर वैक्रियिकांगोपांग, आतप-उद्योत इन दोय द्विकवि नीचे नीचगोत्रवि त्रस- वर्णागुरुत्रिकचतुष्के त्रस बादर पर्याप्त प्रत्येक यह सचतुष्क, वर्ण गन्ध रस स्पर्श यह वर्ण चतुष्क, अगुरुलघु उपयात परधात उच्छवास यह अगुरुलघु चतुष्क, इन तीन चतुल्कवि, एकेन्द्रिय-पञ्चेन्द्रिय-स्थावर निर्माणासद्गमनास्थिर पटकानां एकेन्द्रियजाति पंचेन्द्रियजाति स्थितिबन्ध १४३ स्थावर निर्माण असद्गमन अस्थिर पटक अस्थिर अशुभ दुर्भग दुःस्वर अनादेय अयशःीति यह अस्थिरपटक सागरनाम्नां विंशति कोटीकोन्यः उत्कृष्टा स्थितिः इन इकतालीस प्रकृति विपें वीस कोडाकोडी सागरकी स्थिति जाननी । हस्स रदि उच्च पुरिसे थिरछक्के सत्थगमण देवदुगे। तस्सद्धमंतकोडाकोडी आहार-तित्थयरे ॥१२७॥ हास्य रत्युच्चपुरुपेषु हास्य रति उच्चगोत्र और पुरुषवेदमें, स्थिरपट केषु स्थिर शुभ सुभगे सुस्वर आदेय यशःकीर्ति यह स्थिरपट क, प्रशस्तगमने प्रास्तविहायोगति, देवद्वि के देवगतिदेवगत्यानुपूर्वी इन तेरह प्रकृतिनिवि तदर्धम् पूर्वकी कहो जु स्थिति वीस कोडाकोडी ताकी आधी दशकोडाकोडी स्थिति जाननी । आहारकद्विकतीर्थकरयोः अन्तःकोटाकोटी आहारकशरीर-आहारकांगोपांग और तीर्थंकरप्रकृति इन विपें उत्कृष्टस्थिति अन्तःकोडाकोडी सागरोपम जाननी । अन्तः कोडाकोडी सागरोपम महा कहिए ? कोटिसागर ऊपर कोडाकोडी सागर मध्य याको नाम अन्तःकोडाकोडी सागरोपम कहिए । सुर-णिरयाऊणोघं णिर-तिरियाऊण तिणि पल्लाणि । उकस्सडिदिव धो सण्णी पञ्जत्तगे जोगे ॥१२॥ सुर-नरकायुपोः ओघवत् उत्कृष्टस्थितिवन्धः, देवायु मरकायुकी उत्कृष्ट स्थिति मूल- प्रकृतिकी नाई तेतीस सागर जानना । नर-तिर्यगायुषोः त्रीणि पल्यानि, मनुप्यायु-नियंचायु इनकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य जानना। यह उत्कृष्ट स्थितिबन्ध कौन जीवहुकी योग्यताविप है ? संज्ञिपर्याप्तकानां योग्ये, सेनी पर्याप्रक जीवहुकी योग्यताके विपें है । आगे शुभाशुभ प्रकृतिनिको उत्कृष्ट स्थिति-कारण कहे हैं- सव्वाहिदीणमुक्कस्सओ दु उकस्ससंकिलेसेण । विवरीदेण जहण्णो आउगतिगवज्जियाणं तु ॥१२६॥ आयुस्त्रयवर्जितानां सर्वस्थितीनामुकृष्टः स्थितिबन्धः देवायु मनुष्यायु नियंचागुन तीन आयुपों करि वर्जित समस्त ही जु है प्रकृति तिनका उत्कृष्टबन्ध सो उत्कृापनहोशेन उत्प संलश परिणाम करि हो । भावार्थ-मनुष्यायु तिर्यगायु देवायु इनि नीयको उन्र धिनि- बन्ध उत्कृष्ट विशुद्ध परिणाम हि करि होय । अन्य समस्त ही प्रतिनिको उन्कट स्थिनियन्ध उत्कृष्ट संकेश परिणाम नि करि होय है । विपरीतेन जयन्यः. पूर्वोत. अर्धकी विपरीतना कारि जघन्य स्थितिबन्ध होय है । भावार्थ-तीन आयुजित सर्व प्रकृतिनिको उत्कृष्ट धिनिबन्ध उत्कृष्ट संकोश परिणामकरि जानना। अरु जघन्य स्थितिबन्ध जघन्य नंदा परिणाम अमीन उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामकरि जानना। आगे उत्कृष्ट यन्धके कारणवाले जीव कौन-कौन है यह कदै है- सव्वुकस्सट्टिदीणं मिच्छाइट्ठी दुधगो भणिदो। आहारं तित्थयरं देवाउं वा विमोत्तणं ।।१३०॥ सर्वोत्कृष्ट स्थितीनां मिथ्यावृतिः बन्धकः मणिनः. समल ही है. इष्टमिनि निन मिथ्याष्टि जीव गाँधनेवाला कहा है। कहा करि : आहा नकर देवार मुन्या. आहारकारीर ? आहारकांगोपांग र नीयकर ३ देवायु " दन पार पनि निः इति । जाते इन चारहुका पन्धया सन्मादृष्टि जीव है ।

. -- - - कर्मप्रकृति आगे ए चार प्रकृति सम्यग्दष्टि जीव किस किस स्थानक बाँध यह कार है- देवाउगं पमत्तो आहारयमप्पमत्तविरदो दु । तित्थयरं च मणुस्सो अविरदसम्मो समज्नेह ॥१३॥ प्रमत्तः देवायुवनाति, प्रमत्त जो है. पष्टम गुणस्थानव मुनि सो उत्कृष्ट देवायुका बन्ध विशुद्धपरिणामनिकरि बाँधे है । अप्रमत्तविरतम्तु आहरकठिकम , अप्रमत मप्रमगुणस्थानवी मुनि जब छठे गुणस्थानके सन्मुख होय है, नव संसिष्ट है, ता समय आहारकार-आहार- कांगोपांग इनका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध बाँध, जान तीन आयुविना और प्रकृनिनिका उत्कृष्ट बन्ध उत्कृष्टसंलश परिणामनि ही करि है। अविरतसम्यग्दा टिमनुष्यः नीर्थकर मगर्जयति, अविरतसम्यग्दृष्टि जु है मनुष्य सो उत्कृष्ट नीथकरका बन्ध उस्कृष्ट महोश परिणामकरि बाँधे है। यद्यपि तीर्थकर प्रकृतिका वन्ध अविरतगुणस्थानने लेकरि सप्तमगुणस्थानपर्यन्न बाँधे है, तथापि अविरत गुणस्थानवी मनुष्य नरक-सन्मुख जब होय, नव उत्कृष्ट स्थिनिक याँ थे है । और गुणस्थाननिमें तीर्थकर प्रकृतिका उत्कृष्टस्थितिवन्ध नाहीं। आगे समस्त ही प्रकृतिनिका मिथ्याटि बन्धक है, यह कई हैं-- पर-तिरिया सेसाऊ वेगुब्बियछक वियल-मुहमतियं । सुर-णिरया ओरालिय-तिरियदुगुजोवसंपत्तं ॥१३२॥ देवा पुण एइंदिय आदावं थावरं च सेसाणं । उक्कस्ससंकिलिट्ठा चदुगदिआ ईसिमझिमया ॥१३३।। उत्कृष्टसंक्तिष्टाः नर-तिर्यच एतानि बन्धन्ति उत्कृष्ट संकोश संयुक्त है जो मनुष्य वा तियंच ते इतने कर्मनिका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध करे हैं । ते कौन-कौन ? शेपायूंपि वैक्रियिकपटकं विकलत्रयं सूक्ष्मत्रिकम् , देवायुविना और तीन आयुष नरकायु तिर्यगायु मनुष्यायु । जाते देवायुका उत्कृष्ट वन्ध पष्ठम गुणस्थानवर्ती मुनि ही करे है, तातें देवायु विना शेष तीन आयु । अरु वैक्रियिकपटक देवगति-देवगत्यानुपूर्वी नरकगति-नरकगत्यानुपूर्वी वैनियिकशरीर-वैक्रियिकांगोपांग ६, अरु विकलत्रय द्वीन्द्रिय त्रीन्द्रिय चतुरिन्द्रिय ३, अरु सूक्ष्मत्रिक सूक्ष्म साधारण अपर्याप्त ३, इनका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध कर हैं। सुर-नारकाः औदारिक तिर्यग्द्विकोद्योतासम्प्राप्तानि, उत्कृष्ट संकोशयुक्त जे देव अरु नारकी ते औदारिक. शरीर-औदारिकांगोपांग, तिर्यग्गति-तिर्यगत्यानुपूर्वी उद्योत स्फाटकसंहनन इन छह प्रकृति निका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध करे हैं । देवाः पुनः एकेन्द्रियातपस्थावराणि उत्कृष्टसंकोश संयुक्त जो हैं देव ते एकेन्द्रिय आतप स्थावर इन तीन कर्मनिका उत्कृष्ट स्थितिवन्ध करे हैं। शेषाणां उत्कृष्टसंक्लिष्टाः ईपन्मध्यमिकाश्च चातुर्गतिकाः, पूर्व ही कहे जे कर्म तिन विना और कर्म रहे, तिनका उत्कृष्ट स्थितिबन्ध लश-संयुक्त जु हैं ते जीव, अथवा थोरे मध्य संलिष्ट जु हैं ऐसे चारों गतियोंके जीव ते उत्कृष्टस्थितिवन्ध करे हैं । आगे आठ कर्मनिका जघन्य स्थितिबन्ध कहे हैं- वारस य वेयणीए णामागोदे य अट्ट य मुहुत्ता । भिण्णमुहुनं तु ठिदी जहण्णयं सेसपंचण्हं ॥१३४॥ वेदनीये द्वादश मुहूर्ताः, वेदनीय कर्मवि बारह मुहूर्त जघन्य स्थितिबन्ध है । नाम- गोत्रयोः अष्टौ मुहूर्ताः, नाम अरु गोत्रकर्मविपें आठ मुहर्त जघन्य स्थितिवन्ध है। शेषपश्चाना स्थितिवन्ध १४५ तु जघन्यस्थितिः भिन्नमुहूर्ता, बाकी जु हैं पंच कम ज्ञानावरण १ दर्शनावरण २ मोहनीय ३ आयु ४ अन्तराय ५ इनकी जघन्य स्थिति अन्तर्मुहर्त्त जाननी । अन्तर्मुहर्त कहा कहिए ? एक आवली एक समय यह जघन्य अन्तर्मुहूर्त है । दोय घड़ी एक समय घाटि उत्कृष्ट अन्तर्मुहूर्त कहिए । एक समय एकावलीके ऊपर दोय घड़ो एक समय घाटिके तलें जितने असंख्याते समय भए तितनी जाति मध्यम अन्तर्मुहर्त्तके भेद जानने । ए तीन प्रकार अन्तर्मुहूर्त हैं। आगे उत्तर प्रकृतिनिका जघन्य स्थितिबन्ध कहै हैं- लोहस्स सुहुमसत्तरसाणमोघं दुगेकदलमासं । कोहतिए पुरिसस्स य अट्ट य वासा जहण्णठिदी ॥१३॥ लोभस्य सूक्ष्मसप्तदशकानां ओघवत् , नवम गुणस्थानविप लोभकी जघन्य स्थिनि अम सूक्ष्मसाम्परायगुणस्थानविर्षे सत्तरह प्रकृति निकी जघन्य स्थिति मूलप्रकृतिवन जाननी । लोभकी जघन्यस्थिति अन्तर्मुहूर्तकी, ज्ञानावरण ५. अन्तराय ५ दर्शनावरण ४ इनकी भी जघन्यस्थिति अन्तर्मुहूर्तकी, यशःकीर्ति उचगोत्र इनकी जघन्यस्थिति आठ मुहूर्न, साना- वेदनीयकी जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त । इन स तरह प्रकृतिनिका जघन्य स्थिनिबन्ध दाम गुणस्थानविपें जानना । क्रोध त्रिके द्विकैकदल मासाः क्रोध मान माया इस त्रिकविप यथाक्रम दोय मास, एक मास, अर्ध मास जघन्य स्थिति जाननी । क्रोधकी २ माम स्थिति, मानकी एक मास स्थिति, मायाकी अर्धमास स्थिति जाननो । पुरुपस्य जयन्यस्थिनिः अन वर्षाणि पुरुपवेदकी जघन्य स्थिति अष्ट वर्प जाननी । तित्थाहाराणतोकोडाकोडी जहण्णविदिवन्धो । खवगे सग-सगवन्धच्छेदणकाले हवे णियमा ।।१३६।। तीर्थकराऽऽडारकद्विकयोः जघन्यस्थितिबन्धः अन्तःकोटाकोटि-मागरोपमाणि नीर्थ- कर, आहारकद्विक इनका जघन्य स्थितिबन्ध अन्तः कोडाकोडी सागरोपम जानना । सपए स्व-स्वबन्धव्युच्छित्तिकाले नियमाद् भवेत् , यह जु है जघन्य स्थिनिबन्ध नी नपकगुणन्धा- ननिवि स्वकीय बन्धव्युच्छित्तिकालवि निश्चयकरि होय है । भिण्णमुहुत्तो णर-तिरियाऊणं वासदससहस्साणि । सुर-णिरयाउगाणं जहण्णओ होइ ठिदिवंधो ॥१३७॥ नर-तिर्यगायुपोः अन्तमुहर्त्तः, मनुष्यायु निर्यगायु इनकी जघन्य धिनि अन्नान है। सुर-नरकायुपोः वर्पदशसहस्राणि, देवायु अरु नरकायु इनकी जयन्य धिनि वामान वर्प जाननी। सेसाणं पजत्तो वादर एइंदियो विसुद्धो य । वंधदि सव्वजहण्णं सग-सग-उकास्म पडिभागे ॥१३८।। शेषाणां पर्यापः बादर एकेन्द्रियः विशुद्धश्च. पूर्व ही कही जो २० प्रति लिन काय रही जो ६१ प्रकृति तिन्हें पर्याप्त बादर अर परिणाम कति विशद करा जो कन्दिर रही सवजघन्यां पनाति, सर्वते जघन्य जो है स्थिति निन कांदे हैं। :- प्रकृतिका जघन्य स्थितिबन्ध बांधिवेको पूर्वोन एदेन्द्रिीय मान्य है ! ६६

কনসঙ্গনি
स्व-स्वोत्कृष्ट प्रतिभागेन आपना-आपना जु है. उत्कृष्टवन्ध नाक प्रतिभाग करि । मायाथ-
उस एकेन्द्रियजीवक जिस-जिस प्रकृतिका जमा-जमा उत्कृष्ट बन्ध है. निम-निय प्रकृतिका
तैसा-तैसा राशिक विधानकरि जघन्य स्थिनिबन्ध जानना । गशिकविधान गणित विशेष
है सो सिद्धान्तनं जानना । गोम्मटसारविप सो विम्वन कथन।
आगे एकेन्द्रियादि जीवनिक उत्कृष्ट स्थिनिबन्ध मोदनीयकगका काई -
एयं पणकदि पणं सयं सहम्मं च मिच्छवर-बंधी ।
इगि-विगलाणं बंधी अवरं पल्लासंग्ण संग्वणं ॥१३६।।
एकेन्द्रिय-विकलानां मिथ्यात्ववरवन्धः एकन्द्रिय अरु विकट-मनुष्क हीन्द्रिय त्रीन्द्रिय
चतुरिन्द्रिय असैनीपंचेन्द्रिय यह विकल-चतुष्क इन जीवनिक मिश्यायको कृष्ट बन्ध अनु-
क्रमतें एक पञ्चविंशतिः पश्चादान शतं सहनं सागरोपमाणि, एक मागर १, पगाम मागर २५,
पचास सागर ५०, सौ सागर १००, हजार सागर १०००, जानना । अमंगी पंचेन्द्रिय १०००
सागर | संज्ञी पर्याप्त जीव सत्तरकोड़ाकोड़ी सागर उत्कृष्ट बन्ध करे। पुनः एतेषां अवग्बन्धः
बहुरि इन एकेन्द्रिय विकल-चतुष्कको जघन्य बन्ध पल्यासंग्य योनः पल्यनन्ययानः, अपने-
अपने उत्कृष्ट बन्धन पल्यके असंन्यानवे भाग घाटि, पल्य के संग्यान भाग चाटि उपन्य
बन्ध जानना।
भावार्थ-एकेन्द्रिय जीवके दर्शनमोहको उत्कृष्ट बन्ध एक मागर, निममें पन्यको
असंख्यातवां भाग जो घाटि करिए तो जघन्य बन्ध होय । विकलगनुष्कर जो उनष्ट बन्ध
है, तिसमें पल्यको संख्यानवां भाग घाटि जघन्य स्थितिवन्ध जानना ।
यह स्थितियन्ध पूर्ण भया।
आगे अनुभागवन्धको स्वरूप कह है-
सुहपयडीण विसोही तिब्बो अमुहाण संकिलेसेण ।
विवरीदेण जहण्णो अणुभागो सव्वपयडीणं ॥१४०॥
शुभप्रकृतीनां तीवोऽनुभागः विशुद्धया भवति, शुभ प्रकृनिनिको नीत्र जो है उत्कृष्ट
अनुभाग सो उत्कृष्ट विशुद्ध परिणामकरि हो है। अशुभाना संकोदशन, अशुभप्रकृनि निको
उत्कृष्ट अनुभाग उत्कृष्ट संसोझपरिणामकरि हो है। पुनः सर्वप्रकृतीनां जघन्योऽनुभागः
विपरीतेन, बहुरि सर्वप्रकृतिनिका जघन्य अनुभाग पूर्वोक्त कथनने विपरीतनाकरि जानना ।
भावार्थ-कर्महुका जो विपाक रसको नाम अनुभाग है। सो अनुभाग दोय प्रकार
है-उत्कृष्ट जघन्यके भेदकरि । शुभ प्रकृतिनिको उत्कृष्ट अनुभाग शुभ परिणामनिकरि,
शुभप्रकृति निको जघन्य अनुभाग संकोश परिणामनिकरि हो है । अशुभ प्रकृति निको उत्कृष्ट
अनुभाग संक्लशपरिणामनिकरि, तथा जघन्य अनुभाग विशुद्धपरिणामनिकरि हो है।
शुभाशुभ परिणामनिकी योग्यताकरि उत्कृष्ट जघन्य अनुभाग मध्य अनुभागविपं अनेक
भेद जानने।
आगे घातियाकर्मके अनुभागको स्वरूप कहे है.--
सत्ती य लता-दारू-अट्ठी-सेलोवमा हु घादीणं ।
दारू-अणंतिमभागो त्ति देसघादी तदो सव्वं ॥१४१॥

। . अनुभागवन्ध १४७ घातिनां शक्तयः लता-दार्वस्थि-शिलोपमाः खु भवन्ति, वातिया कर्मनिकी शक्ति लता- वेलि, दारु काठ, अस्थि हाड, शिला पापाण इन चार कीसी है उपमा जिनकी ऐसी है । भावार्थ- -एक घातियाकर्म निकी शक्ति लतावत् है, एकनिकी काप्टवन् , एकनिकी हाडवत् है, एकनिकी शिलावत् है। ऐसी चार शक्तिमें अनन्ते-अनन्ते भेद हैं। जैसे वेलि काठ हाड पापाणवि एक-एकमें अनेक भेद हैं कोमल-कठिनादि भेदकरि । अरु जैसे अतिकोमल जघन्यताके भेदतें लेकरि अति कठोर उत्कृष्ट पापाणके भेद पर्यन्त क्रमवृद्धिसों भेद-वृद्धिसंयुक्त है, तैसे ही लतावत् जघन्य शक्ति ते लेकरि उत्कृष्ट पापाणवत् शक्तिपर्यन्त क्रमलों शक्तिनिव अनुभाग-वृद्धि जाननी । आगे आधी गाथामें देशघाती कौन शक्ति है, इस विपें यह कह है- दार्वनन्तभागपर्यन्तं देशघातिन्यः, ततः सर्वघातिन्यः, दारूके अनन्तवें भाग-पर्यन्त देवा- घातिया जाननी, तिसतें आगे सर्वघातिया है- भावार्थ :-लतावत् शक्तिके अनन्त भागनितें लेकरि दाम्के केते एक उत्कृष्ट भाग विना अनन्त भागपर्यन्त देशघातिया कर्महुकी शक्ति है। बाकी दाम्के अनन्त भागनिते लेकरि अस्थिके अनन्त भाग, शिलाके अनन्त भागपर्यन्त सर्वघातिया शक्ति है । आगे दर्शनमोहकी प्रकृतिनिविपें देशघातित्व सर्वघातित्व कहे हैं- देसो त्ति हवे सम्म तत्तो दारु-अणंतिमे मिस्सं । सेसा अणंत भागा अहिसिलाफड्ढया मिच्छे ।।१४२।। देशपर्यन्तं सम्यक्त्वं भवेत् , लताके भागते लेकरि दाम्के अनन्त भागपर्यन्त जे देशघाति स्पर्धक हैं, ते सम्यक्त्वमिथ्यात्वके हैं। भावार्थ-सम्यक्त्वप्रकृति मिथ्यात्य सम्यग्दर्शन गुणके देशको घाते है, जाते सम्यक्त्वप्रकृति मिथ्यात्वके उदयतें चल मलिन अगाढ दोप सम्यक्त्वमें होय हैं, तातें सम्क्त्वप्रकृति मिथ्यात्व देशघाती जानना । देशघाती स्पर्धक दारुके अनन्तिम भागपर्यन्त हैं, तातें सम्यक्त्वप्रकृतिमिथ्यात्व द्वारके अनन्त भागपर्यन्त कहा। जितने लताके अनन्ते भाग हैं, अरु दारके अनन्तवें भागपर्यन्त जितने अनन्ते भाग हैं तितनो जातिको सम्यक्त्वप्रकृति मिथ्यात्वको अनुभाग जानना मन्दनीय मध्यमके भेदकरि । ततः दानन्तिमः मिश्रम् , तिन देशघाती स्पर्धकनिकी मादाने आगे दारुको अनन्तवां भाग सो मिश्रमिथ्यात्व है। भावार्थ-दार शक्तिके अनन्ते भाग तिन विपें कितने एक बहुत भाग विना अनन्ते भाग देशघातिमें हैं, निन दायानि पकनिन आगे जो हैं, वे बहुत भाग, तिनके अनन्त खंड करिए तिनमें एक खंड मिभनिध्यात्य है । सो मिश्रमिथ्यात्व जात्यन्तर सर्वघाती है, जाते मिश्रमिथ्यात्व के उदयने मम्मरल मियान्य दोनों मिले परिणाम होय हैं। सर्वथा सम्यक्त्वगुगको नाही आन्दादे हैं, होनहानि-नयुक्त जघन्य सर्वघाती हैं, जातें आचार्यहने मिश्रमिथ्यात्वको नाम जात्यन्तर सर्व धानी कहा। सो मिश्रमिथ्यात्व दारुके अनन्त भागके एक खंड विपें अपने अनुभागके अनन्न मंद लिये है। शेफाः अनन्तभागाः अस्धिशिलास्पर्धकाः मिथ्यात्वम् , मिमिथ्यात्य र आने १४८ - कामप्रति आगे अघानिकर्मनिका अनुभाग को - गुडखंड सधारामियसरिसा सन्था हु णिच-कंजीग । विस-हालाहलसरिसा असत्था हु अधादिपडिभागा ।।१।१३।। प्रझम्ताः अबातिप्रतिभागाः गुड-ग्यान-दशर्कगमनसदृशाः, शुभ अवानिया कनिक जु हैं अनुभागके भेद, ते गुड, खाँड, हाका अगृत इन नारका बगवर ।। भावार्थ- अघातिया कर्म दोय प्रकार -एक शुभ अनातिया है, एक अशुभ अभानिया । जिनमें शुभ अघातिया कर्म के अनुभागकी शक्ति चार प्रकार -गुटयन ? ग्यांच्या मिश्रावत अमृतवन ४ इन एक-एक अनुभागदनिवि अनन्त भेद है। जैसे एक गुटविणे अनेक भेद जघन्य उत्कृष्ट मध्यग मिष्टन्य के भेदने । गुड्यन हानिक जगन्य अनुभागने कार उत्कृष्ट अमृत भेदपर्यन्त क्रमवृद्धिसे बढ़ते अनुभाग अनन्न भेद है। यह चार प्रकार शुभ अघातियनिके . अनुभाग जानना। अप्रझम्नाः निम्ब-कावीर विप-हालाहन्टमदासाः. अशुभ अघातियनिके अनुभागकी शक्ति निम्ब १ कांजीर इन्द्रायनका फल २ विष हालाहल गहा- कालकूट विप ४ इन चारके बराबर है। भावार्थ-इन चार दानिक विगं भी एक क्रमवृद्धिता लिये अनन्ते अनुभागके भेद है। जैसे एक निम्बाविप कटुकवाकी नीयता- मन्दताकरि अनेक भेद है। यह चार प्रकार अशुभ-अघानियनिका अनुभाग जानना । यह अनुभागबन्ध पूर्ण भया। आगे किस-किस क्रिया करि शुभ-अशुभ कर्मका बन्ध होय यह कद हैं- पडिणीगमंतराए उवधादे तप्पदोस-णिण्हवणे । आवरणदुर्ग बंधदि भूयो अच्चासणाए वि ॥१४४|| प्रत्यनीक-ज्ञानविपं दर्शनवि अरु ज्ञान-दर्शनके धारकनिवि अविनय करिए, सो प्रत्यनीकता कहिए । अन्तरायः-ज्ञान-दानविपं व्यवधान देय वा बाधा करे सो अन्न- राय कहिए । उपघातः -किसीके उत्तम ज्ञान-दर्शनमें दृपण देव सो उपधान कहिए । वा पड़नेवालनिके क्षुद्र उत्पातादि करे सो उपघात कहिए। तत्प्रदीपः-निन नान-दर्शन अरु तिनके धारकनिवि जो आनन्दका अभाव सो प्रद्वेप कहिए। अथवा इन विपं अन्तःकरणमें पिशुनता राव सो भी प्रद्वेप कहिए । निह्नवः-ज्ञानके होते संत कहे के मैं नहीं जानना । अरु कहे के मेरे पास यह पुस्तक नाहीं, इस भाँति मुकरि करि ज्ञान लोपे सो निदव कहिए । अथवा.अप्रसिद्ध गुम्को छिपाय प्रसिद्ध गुरुका अपनेको शिप्य कहना । आसादना-ज्ञाना- दिक गुणकी कथनी न करना.। अथवा अविनय करना . यह आसांदना है । एतेषु पटसु सत्सु भूयः आवरणद्विकं वन्नानि, इन छहः प्रकारनिके होते संते. स्थिति-अनुभागकी विशेषता करि ज्ञानावरण दर्शनावरण कर्म बंधे। : • आगे वेदनीयके बन्धके कारण कहे हैं- भूदाणुकंप-बदजोगजुत्तो खंति-दाण गुरुभत्तो । वनदि भूयो सादं विवरीदो. बधदे इदरं ॥१४॥ द; भूतार्थानुकम्पा-व्रतयोगयुक्तः-जो जीव भूत जु है प्राणी तिनिवि दयासंयुक्त होय, दया सत्य अचीर्य ब्रह्मचर्य निःपरिग्रह इत्यादि व्रतसंयुक्त अरु योग जु है समाधि तिस संयुक्त . :

.. प्रदेशवन्ध १४२ होय । क्षान्ति-दान-गुरुभक्तः क्षान्ति जु है क्रोधादिनिवृत्ति, चार प्रकार दान, अन् गुरुसेवा इन विपें रत होय, सो जीव भूयः सातं बध्नाति-स्थिति अनुभागकी विशेषनाकरि साता- वेदनीयको बाँधे । विपरीतः इतरं बध्नानि-अन् इस पूर्वोक्त जीवने विपरीत निर्दयादि परिणामसंयुक्त सो असातावेदनीय वाँधे । आगे और भी असातावेदनीयके बन्धके कारण कहे हैं। दुक्ख-बह-सोग-तावाकंदण-परिदेवणं च अप्पठियं । अण्णट्ठियमुभयट्ठियमिदि वा बंधो असादस्स ॥१४६।। दुःख-वध-शोक-तापाक्रन्दन-परिदेवनं आत्मस्थितं भवति-पीडारूप जु परिणाम सो दुःख कहिए । जो आत्मघात परघात सो वन्ध कहिए । इष्ट वस्तु विनसे संते जो अति विक- लता सो शोक कहिए। ये दुःखादि आपवि हाच तो असातस्य बन्धो भवनि-असाताबेद- नीयका बन्ध होय । अन्य स्थितं वा-और जीवके विपें होय तो भी असाताका बन्ध होय । उभयस्थितं इति वा-अरु जो ये दुःखादि आपवि अरु परवि होय तो भी अलानावेदनीय कर्मका बन्ध होय है। आगे दर्शनमोहके बन्ध-कारण कहिए है-- अरहंत-सिद्ध-चेदिय-तव गुरु-सुद-धम्म-संघपडिणीगो । बंधदि दंसणमोहं अणंतसंसारिओ जेण ॥१४७|| यः अर्हत्सिद्धचैत्यतपोगुरुश्रुतधर्मसंघप्रत्यनीकः स दर्शनमोहं बनानि-जी जीव अरहन्त सिद्ध चैत्यालय तप गुरु सिद्धान्त धर्म चतुर्विध संघ इनका प्रत्यनीय मात्र नो जीय दर्शनमोहकर्मको बांधे है । येन अनन्तसंसारी भवति-जिस दानमोहकरि यह जीव अनन संसारी होय है। आगे चारित्रमोहके बन्ध-कारण कहिए है- तिब्वकसाओ बहुमोहपरिणदो राय-दोससंतत्तो । बंधदि चरित्तमोहं दुविहं पि चरित्तगुणघादी ॥१४॥ यः तीत्रकपायः बहुमोहपरिणतः रागद्वेपसंतप्तः चारित्रगुणवानी-जो जीय नाकापाय- परिणत है, अरु बहुत मोह-संयुक्त है, अन राग-द्वेपकरि सन्तान है. अम. चारित्रापानक स द्विविधमपि चारित्रमोहं वनानि-वह कपाय-नोकपायके भेदकारि दोन प्रकार के चारित्रमोह तिसहि बांधे है। आगे नरकायुके बन्ध-कारण कह हैं- मिच्छो हु महारंभो णिस्सीलो तिव्वलोभमंजुत्तो । गिरयाउगं णिबंधदि पावमई रुद्दपरिणामो ॥१४६।। यः खलु मिथ्याष्टिः महारम्भः निःशील-नीत्रलोभनंबुनः पतिः वरि जीव निश्चयफरि मिथ्यात्वी है. अरु महा आरभी है. अरनिंध बनाव. ना. अरु पापबुद्धि है. अरु महान्द्रपरिणामी है. स जीवः नरकायुयनानि-नार चन्ध करै है। - ...

. १५० कर्मप्रति आगे नियंचायुके बन्ध-कारण कहिए- उम्मग्गदेसगो मन्गणासगो गृढहिययमादल्ली । सहसीलो य ससललो निरिया बंधदे जीवो ॥१५॥ यः उत्मार्गदेशकः--जो गिश्यामार्गका उपदेशक, गार्गनासकः-अम सम्पक मार्गका नाशक है, गृढहृदयः-अरु जिसके मनकी कड़ पाई जानि नाही, मागायो, कटियालय, सढशीलः-अरु मूर्खम्वभाव लिए है, मझाल्यः-अम माया मिथ्या निदान नि नीन मन्यकारि संयुक्त है, स जीवः निर्यगायुवनानि-सी जीव नियंच-आयुका वन्म करे। आगे मनुष्यायुके बन्ध-कारण कहिए- पयडीए तणुकसाओ दाणादी सील-संयमविहीणों। मझिमगुणेहि जुत्तो मणुयाऊ बंधदे जीवा ||१५१|| यः प्रकृत्या तनुकपायः-जो जीव स्वभाव होकरि मन्द कापाई, दानरतः-दानविय रन है, शील-संयमविहीनः--शील अरु नयमन रहित है. मध्यमगुणयुनः म जीयः मनुष्यायु- बध्नाति-मध्यमगुणोंकरि संयुक्त है, वह जीव गनुप्यायुका बन्ध को है। आगे देवायुके बन्ध-कारण कहिए है- अणुवद-महब्बदेहि य वालतवाकामणिज्जराए य । देवाउगं णिबंधड़ सम्माइट्टी य जो जीयो ॥१५२|| जीव अणुवन-महावनैः देवायुर्वधनानि-सम्यग्दष्टि जीव अणुवन अम महावनकरि देवायुको बांध है; बालतपसा अकामनिर्जरया च-जो मिथ्याष्ट्रिजीव है लो अशान नपारि अथवा अकामनिर्जराकरि देवायुको बांध हैं। यः सम्यग्दतिः सोऽपि-जो केवल सम्गदृष्टि है सो भी देवायुका बन्ध कर है । आगे नामकर्मके बन्ध-कारण कह हैं- मन-वयण-कायवको माइल्लो गारवेहि पडिरहो। असुहं गंधदि णामं तप्पडिवक्सहिं मुहणामं ॥१५३|| यः मन-वचन-कायवक्र:-जो जीव मनवचनकायकरि वक हैं, मायावी-कुटिल मायाचारी है, गारवैः प्रतिवद्धः-रस ऋद्धि साता इन तीन गारवकरि संयुक्त है, स अशुभं नामकर्म वध्नाति-सो जीव अशुभनामकर्म बांधे है । तत्प्रनिपक्ष: शुभनाम बध्नाति-तिसतें जो प्रतिपक्षी जीव कहिए मन वचन कायाकरि सरल निष्कपट कुटिलता-रहित, गारव-रहित सो शुभनामकर्म बांधे है। आगे तीर्थंकर प्रकृति नामकर्मके बंधक सोलह कारण कहिए है- दंसणविसुद्धि विणए संपण्णनं च तह य सीलवदे। अणदीचारोऽभिक्खं णाणुवजोगं च संवेगो ॥१५४|| सत्तीदो चाग-तवा साहुसमाही तहेव णायव्या । विज्जावचं किरिया अरहताहरियवहुसुदे भत्ती ॥१५॥ -

प्रदेशवन्ध
पवयण परमा भत्ती आवस्सयकिरिय अपरिहाणी य ।
मग्गपहावणयं खलु पवयणवच्छल्लमिदि जाणे ॥१५६।।
एदेहिं पसत्थेहिं सोलसमावेहिं केवलीमूले |
तित्थयरणामकम्मं बंधदि सो कम्मभूमिजो मणुसो ॥१५७॥
चतुः कलम् )
दर्शनविशुद्धिः-जो पञ्चीस मल-रहित सम्यग्दर्शनकी निर्मलता सो दर्शनविशुद्धि प्रथम-
भावना १ । विनये सम्पन्नता-रत्नत्रयधारक मुनि अरु रत्नत्रयगुण, इनकी विनय विपं प्रवी-
णता २ । शीलवतेपु अनतीचारः-सामायिकादि शील अरु अहिंसादि व्रत इन वि अतीचार-
रहितत्व ३। आभीक्ष्णं ज्ञानोपयोगः-निरन्तर सम्यग्ज्ञानका अभ्यास ४ । संवेगः-धर्म अफ
धर्मफलवि प्रीति, संसारदुःखतें उद्वेगता ५। शक्तितस्त्यागः-यथाशक्ति विधिपूर्वक पात्र-
दान सो शक्तितस्त्याग कहिए ६। शक्तितस्तपः-यथाशक्ति कायक्लेश करिए सो शान्तिन्तप
कहिए ७ । तथैव साधुसमाधिः--साधु कहिए भली राग-द्वेप-रहित झान्नभावपरिणनि लो
साधुसमाधि कहिए। किस ही एक कारणते यतिवर्गको उपसर्ग आए संते विघ्नका जो
निवारण सो भी साधुसमाधि कहिए ८ । वैयावृत्त्यक्रिया-मुनियोग्य क्रियाकरि मुनिके
रोगादिक दूर करना ९ । अहँदाचार्यबहुश्रुतेपु भक्तिः-अरहन्त १ आचार्य २ बहुश्रुत कहिए
उपाध्याय ३ इन विपें भक्ति अरहन्तभक्ति १० । आचार्यभक्तिः ११ । बहुश्रुनभक्ति ।
प्रवचने परमा भक्तिः-प्रवचन जो परमागम ताको परम भक्ति करना १३ । आवश्यक
क्रियाऽपरिहानिः-सामायिक १ प्रतिक्रमण २ स्तवन ३ वन्दना ४ प्रत्याख्यान ५ कायोत्सर्ग ६
ये छह आवश्यक इनकी जो क्रिया तिसकी हानि न करे १४ । मार्गप्रभावना ग्यलु-निश्रय-
करि भगवन्त के मार्गका ज्ञान दान पूजा तप आदिक क्रियाकरि उद्योन करना १५ । प्रवचन-
वात्सल्यमिति जानीहि-प्रवचन जो है साधर्मी तासों स्नेह १६। ये सोलह कारणभावना
जाननी । एतैः प्रशस्तैः पोडशभावैः ये जो हैं उत्तम सोलह कारण भाव निनकारि फेयन्ति मृले.--
केवलज्ञानी अरु श्रुतकेवली इनके समीप, यः कर्मभूमिजो मनुष्यः-जो कर्मभूमिविर उपच्या
होय मनुष्य, स तीर्थकरनामकर्म वनाति-सो तीर्थकरनामकर्म बांधे ।
तित्थयरसत्तकम्मा तदियभवे तब्भवे हु सिज्मोदि ।
खाइयसम्मत्तो पुण उकास्सेण चउत्थभवे ॥१५॥

१५२ - कगप्रकृति विनयादि झगका देखनेवाला हो, ग अंग बन्नागि---गी जीन नगी का। विपरीतः इनरं बन्नानि इसने जो विपीन अहलाको भनिन, आर्मागवन. पटन. निमित्त विनयादिगुण-रहिन, मी जीव नीनगोत्रक बांधे।। पर अप्पाणं गिंदा पसंसणं णीचगोद धम्म । सदसदगुणाणमुच्छादणमुठभासणमिदि होदि ॥१६॥ परात्मनोः निन्दा-प्रशंसने-परंपा निन्दा, आगनः प्रगंगा और जीनिती निन्दा करना, अपनी प्रशंसा करना, मद सद्गुणाना आच्छादनाहावने आया गदगुणानां माना. दनं आत्मनः असद्गुणानां अद्भावनं-औक वर्गमान गुणनिका आधादन, म अपने विण गुण नाहीं, बढ़ाई निमित्त मुटे अपने गुणमा प्रकाशन, पनानि आप नीनगीवाग कार- णानि भवन्ति-यं भी नीचगात्रवन्धक कारण जानने । आगे अन्तरायकर्मक बन्धकारण को है- पाणवधादिमु रदो जिणपूजामक्खि मागविग्ययगे । अज्जेइ अंतरायं ण लहइ जं इच्छियं जेण ॥१६॥ यः प्राणवधादिपु रतः--जो जीव हिंसा अमन्य चोरी गैथुन परिग्रह इत्यादि अधर्म- विप रत हैं, जिनपूजामोक्षमार्गविन्नकर:-जिनेवरकी पृजा अम. सम्यन्दनमान चारित्रा- भक मोक्षमार्ग इनका विन्न करणवाला, स अन्तरायं अर्जयनि-मो जीव अन्नगमकर्म उपार्जन करे है, येन स यदिच्छितं लाभं न लभते-जिस अन्नगायकरि वा जीव वांछित वस्तुको न पाये ऐसा अन्तरायकर्म बाँधे है । इहाँ जो कोई प्रश्न करे कि सिद्धान्त विप संसारी जीवके निरन्तर समय-समयवि आयुकर्मके विना सातकर्मका बन्ध कया है, इहाँ प्रत्यनीक आदिक किंयाकरि जुदा जुदा काया है; एक-एक कर्मका वन्ध एक क्रिया जो खरे थोड़ा काल विप होय, तो भी असंख्यात समय ताई होय, तो एक समय सातकर्मका बन्ध क्यों संभव ? ताको उत्तर-इस अनादि-अनन्न संसारबि जीव अनादिसों सन्तानवशतें राग-द्वेपादि परिणाम करे है, निस राग-पादि परिणामके वझतें समय-समय सातकर्मका बन्ध स्थिति-अनुभागी जगन्यता करि करें है। अरु जिस काल यह जीव पूर्वोक्त प्रत्यनीकादिक क्रियाविपं प्रवर्त, तब जैसी कट उत्कृष्ट मध्यम जघन्य शुभाशुभ क्रिया होय, तिस माफिक कर्म का बन्ध करे स्थिति-अनुबन्धकी विशेपताकरि । तिसतें समय-समयवि बन्ध जो करे सो तो स्थिति-अनुभागकी हीनताकरि । अरु जो प्रत्यनीक आदिक पूर्वोक्त क्रिया करि कर सो स्थिति-अनुभागको विशेषता करि कर, यह सिद्धान्त जानना। इयं मापा-टीका कर्मकाण्ठस्य पण्डित हेमराजेन कृता स्ययुद्धगनुसारेण । इति कर्मप्रकृतिविधान समाप्तम् ।

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नर्गनि मा० ११ indi गा० 'द 2 १५४ न गगणा में गंगगमगरण गन गंगा पाणमारियो पुणभोग गई मनी १४६ ૨ १३ दुविहं मु फागं अग मami मान मनियम यहवियामाग बंधावंग मिल बारमय वेषणी १४२ ११७ १३ ? ३ भायण गणार भिषणमा पर निग्गिा १७ भदाणगंगा जोग भेदे छादालना ८ १०७ २७ दंगणआवरणं पुण दंगणाविगविणए दुसतिघातीणो दुराम-वह गोग-ताया गणीयं दुयिहं नारित्तमोह दुविहं विहायणामं देवागं पमत्ता देवा पुण एइंदिय देसी ति हवे सम्म देहादो फागंता देहे अविणाभावी देशोदाण महिओ प पडाडिहारसिममा पडिणीगमंतराए पढमादिया कसाया पणमिय सिरसा मि पयडीए तणुकमाओ पयडी सील सहावो पयलापयलुदएण य पयलुदएण य जीवो पर अप्पाणं जिंदा परमाणुआदियाई पवयणपरमा भत्ती पंच णव दोषिण अट्टा- पंच णव दोण्णि अट्टा पंच णव दोणि अट्टा पंच णव दोणि रब्बी- १४४ ११५ ४२ १ मणवयणायकको मदिमुद प्रोही माय महचित्तहणमागि मिच्छ.पुटबदुगादिगु मिच्छो हु महारंभो मानमा HTTE संगम मासिक मिसानीमा मियम मिल-निया निमयभगालो गुनियामान गुः अनु गुटगा गुरपणी निमोती नबोण ग गम्मद मेमा जगतो ग. रजनी मो गोपउभेओ ह हम्म रवि अगदिमाग हम्म रदि उच्च परिसे १.८ २ १४९. ५० मूलुहपहा अग्गो ३१ १६० १५६ मोहेइ मोहणीयं ल लोहस्स मुहुम सत्तरसा व वजजविसेसणरहिदा वष्णरसगंधफागा वियलच उपर छट्ट ८० ६२ १०४ १२७ १०८ ८८ १०५ ९० टीकोद्धृत-पद्यानुक्रमणी जदि सत्तरिस्म एत्तिय १३९ दोकां गोम्मटसारस्य प्रशस्ति णाणावरणच उपकं ९ तदन्वये दयाम्भोधिः परमाणूहि अणंतहि प्रकृतिः परिणामः स्यात् २६ प्रमादाद भ्रमनो वापि प्रशस्ति अणहारलेमकम्मे एकस्मिन्नवरोधेन ओरालिय वैरब्विय केवलणाणावरणं कंदे मूले छल्लो खरत्व मैहनस्ताव्य गूढसिरसंधिपवं भवानगो मुर- मूढायं मदाश्याष्टो मूलमंधे महामाधुः प्रवास्ति यानि स्योपुरुष लिङ्गानि रसाद् रक्तं ततो मांग लदियाज्जत्ताणं वर्गः शक्तिसमूहो १ १०० गाथानुक्रमणी गा. मा० ६५ वात: पित्तं तथा श्लेष्मा विगहग इमावण्णा साहारणमाहातो घोणिमादेवभीनत्व सगणो छस्संडणी २५ इगिवीस सय सत्तासो खरत्वमेहनस्तब्ध प्रकृतिः परिणाम: स्यात द्वितीयटीकागत-पद्यानुक्रमणी यानि स्त्रीपुरुपलि नानि ६५ वर्ग. शक्तिसम्हो श्रोणिमार्दव भीरुत्व- सुरणिरया नरनिरिव संसारसभावानं ६४ पारिभापिक शब्दकोष गा० ? गा० अवाग जो १०० नाम रामनाम समानाननीय अगिरनाम १०० और सोरिका ४४ .८८ आगावित जागर पनाम मानाम . 14 अगुरुलघुनाम अङ्गोपाल नाम अचक्षुदर्शन अचक्षुदर्शनावरण अनन्तानुबन्धित पाय अनन्तानुवन्धिक्रोध अनन्तानुवन्धिमान अनन्तानुबन्धिमाया अनन्तानुबन्धिलोग अनादेयनाम अनुमानबन्ध अन्तराय १८८ अन्तरायकर्म अपर्याप्तनाम १०० अप्रत्याख्यानावरण कपाय क्रोध ६० आगपनाम बादशनाम आनापानापित आनुवर्तीनाम आगादन आहारशरीरनाम आहारराप्ति आहारकबन्धन आहारयागंघात काममा पुका द्रनाम १०० १८ १२ केवलन वलसांना फ्रोम इ इन्द्रियपर्याप्ति " ५८ मान ३७ ईहा মনিনা " ईहावरण मतिज्ञान गन्धनाम " गुरुनाम गोकर्म १३ च ९६ १०० माया लोभ अप्रशस्त बिहायोगतिनाम ७५ अभीक्ष्णज्ञानोपयोग १५४ अम्लनाम अयशःकोत्तिनाम अरतिमोहनीय अर्थावग्रह अर्धनाराचसंहनन ७६,८० अर्हद्भक्ति १५५ अवग्रह अवधिज्ञान अवधिज्ञानावरण अवविदर्शन ४५ अवधिदर्शनावरण उच्चगोग उच्छ्वासनाम उद्योत उद्योतनाम उपघातनाम उपभोगान्तराय བཤུ༣ii चक्षुदर्शनावरण चरिन्द्रिय जाति चारियमोहनीयकर्म ९२ उप्णनाम ३ ४० ६२ म ऋजुमतिमनःपर्ययज्ञान ए एकेन्द्रियजातिनाम जातिनाम जुगुप्सानोषापाय ज्ञानावरणकम ४२ ६७

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गार्गप्रति १.7. श . गम्गा प्रतिमा गामिनाम दानितनरत्याग १० सदान प ९२ गचलनमा - ९२ गंजालनमान १०० मागितासाप शरीरनाम गरीरमर्यानि शीतस्पर्ग गोलन नेवनतीचार गुभनाम शोकमोहनीय शुनज्ञान নানামুঙ্গা श्वेतवर्णनाम निनाम १२ म गंम्यागनाम मंहनननाम གiatiཧjit माधारणगरीरनाम पान मासान १००

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Karmaprakriti

Author
Acharya Nemichandra
Title
Karmaprakriti
File name
Karmaprakriti
Text
OCR done
Citation
1964
Published
2010/08
Publisher
Bharatiya Jnanpitha Kashi
Language
Sanskrit
Pages
196
Library
Digamber Jain Atishay Kshetra, Jain Vidhya Sansthan Library, Shri Mahaveer Ji, (karauli )
Classification
Devotional
DLI number
539630
Barcode
99999990070380.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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